आदाबे ज़िन्दगी
हज़रत अमीरुल मोमनीन (अ.) की नज़र में
लेखकः सैय्यद मौहम्मद मूसावी नजफी
रुपान्तरणकर्ताः हैदर महदी
नोटः ये किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क के ज़रीऐ अपने पाठको के लिऐ टाइप कराई गई है और इस किताब मे टाइप वग़ैरा की ग़लतीयो को सही किया गया है।
Alhassanain.org/hindi
नाम किताब- आदाबे ज़िन्दगी
हज़रत अमीरुल मोमनीन (अ.) की नज़र में
रुपान्तरणकर्ता- हैदर महदी- बी. काम , एम.ए.
प्रकाशन तिथि- जनवरी 1995
मुद्रक- ए. बी. सी. आफ्सेट प्रेस , दिल्ली
टाईप सेटिंग- फ़ाइव स्टार पब्लिकेशन्स , लखनऊ
प्रकाशक- अब्बास बुक एजेन्सी
बिस्मिल्ला हिर्रहमानिर्रहीम
अस्सलामों अ-लल महदी अज्जलल्लाहो
हज़रत रसुले खुदा (स.अ) की वफ़ात के बाद मुस्लमान दो अहम हिस्सों मे तक़सीम हो गये
1. अहलेबैत (अ) के पेरौकार- यानी अली इब्ने अबी तालिब (अ) के शिया- ये लोग इसी नाम से रसुले खुदा के ज़माने मे मोजूद थे और उन्ही लोगों की मदह व सनाह में क़ुराने करीम की आयतें नाज़िल हुई – जैसे यह आयत दुनिया मे सबसे बेहतर वह लोग है जो ईमान लाये और जिन्होने नेक आमाल अन्जाम दिये।
तमाम मुआफ़िक़ व मुखालिफ़ इसके मोअतरिफ़ है कि जब यह आयत नाज़िल हुई तो रसुले ख़ुदा ने इरशाद फ़रमायाः
अली अ. के शिया ही कामयाब हैं।
इसी तरह और भी रसुले खुदा की हदीसे शियों के मदह मे वारिद हुई है.- यही वो लोग है जिन्होने सक़लैन यानि ख़ुदा की किताब और अहलेबैत नबी )अ ( से तमस्सुक किया है- यही वो अफराद है जिन्होने अपना दीन ऐसे रास्तों से हासिल किया है जो उनके नज़दीक बल्कि तमाम ओकला के नज़दीक बहुत ज्यादा मोतबर है- और ये अहले बैते नुबुव्वत है- घर की बातें घर वाले ज्यादा जानते है.।
2- ख़ोलफ़ा के पैरोकार जो हाकिमाने वक़्त और अवाम पर मुसल्ल्त थे उन लोगों को बाद में मआविया ने अहले सुन्नत वल-जमाअत का नाम दे दिया , और वह उस वक़्त जब इसने इमाम हसन (अ) से ख़िलाफ़त ग़ज़्ब कर ली।
उस साल का नाम इसने “ आमुल जमाअत ” जमाअत का साल रखा ये लोग अ-ददी अकसरियत के पीछ़े चलते थे।
रसूले ख़ुदा की हदीस है
नबी (अ) के बाद उम्मत ने जब भी इख्तेलाफ़ किया तो बातिल हक़ पर ग़ालिब आया। “ ये लोग अपना दीन खोलफ़ा से हासिल करते है। ”
और उन सहाबा व ग़ैर सहाबा से हासिल करते हैं जो ख़ोलफ़ा के रास्ते पर चलें चाहे वे मुत्तक़ी व परहेज़गार और मोरिदे एअतेमाद हों या ना हों-
दोनों गिरोह इस बात पर मुत्तफ़िक़ हैं के क़ुरान और सुन्नत शरीअत के दो अहम नतीजे हैं लेकिन दोनों में बुनियादी इख्तेलाफ़ इस सवाल की बिना पर है कि “ सही और मोतबर सुन्नत कहाँ हैं- ?”
अहलेबैत (अ) के पैरोकार अहलेबैत (अ) से सुन्नत अख्ज़ करते हैं क्योकि ये हज़रात सुन्नत को सबसे ज्यादा जानने वाले है।इस उम्मत के सरदार और सबसे ज्यादा सिक़ा है , वह कोई हदीस उस वक़्त तक नही लेते जब तक उसके रावी की सदाक़त और वसाक़त को ख़ुब परख न लेते हों।-
जबकि ख़ोलफ़ा के पैरोकार अहलेबैत (अ) के अलावा दुसरों से हदीस अख्ज़ करते हैं जैसे अबु- हुरैरा- समरा बिन जुन्दब और मोग़ीरा बिन शेअबा वग़ैरा।
इन दो गरोहों के दरमियान यह पहला बुनियादी और अहम इख्तेलाफ़ है। इस दुरी और वाज़ेह इख्तेलाफ़ का सरचश्मा यह है के कौन ज्यादा मोतबर और सिक़ा है अहैलेबैत (अ) या उन के अलावा दुसरे लोग जो ग़लतियाँ करते हैं इन दोनों में कितना ज़्यादा वाज़ेह फ़र्क़ है।
दुसरा फ़र्क़ इन अहादीस की तादाद में है जो अहलेबैत (अ) के पैरोकारों को अहलेबैत (अ) से मिली हैं और वह हदीसे जो ख़ोलफ़ा के पैरोकारों के पास है- ख़ोलफ़ा के पैरोकारों ने अपने को साफ़ व शफ़्फ़ाफ़ और शीरीं चश्मे से महरुम कर लिया। जिसको खुदा वन्दे आलम ने तमाम मुस्लमानों के लिए करार दिया था। और वह चश्मा अहलेबैत (अ) हैं इन लोगों ने अहलेबैत (अ) को छोड़ दिया – और उनसे हदीसे नक़ल नही की इसका नतीजा यह हुआ कि जो हदीसे ख़ोलफ़ा और सहाबा वग़ैरा से नक़ल की गई हैं वह बहुत कम है और फ़िक़ा के अबवाब के लिए ना काफ़ी है। लिहाज़ा ये लोग मसाएल के हल के लिए क़यास के पनाह मे गये यह जानते हुए की यह दीन मे बीदअत है दीन मे क़यास करना बिल्कुल सही नही है। और जैसा कि इमाम जाफरे सादिक़ (अ) से मनक़ूल है कि सबसे पहले जिसने कयास किया वह इब्लीस था इसीलिए हम देखते हैं कि ख़ोलफ़ा के पैरोकार के नज़रियात क़यास की बिना पर शरीअत से कोसों दुर हैं। क्योकि ये इंसान के हाथों के दुरुस्त करदा हैं। जबकि शरीअ़त अल्लाह ने नाज़िल की हैं- अगर ये लोग रसुल ख़ुदा (स.अ) की उन अहादीस को अख्ज़ करते जो अहलेबैत (अ) से मनक़ुल हैं तो कभी क़यास की ज़रुरत पेश न आती और न दुसरी गुमराहियों तक नौबत पहुँचती।
दीने इस्लाम का यह एक मौजज़ा है कि इसके अहकाम इतने वसीय हैं के ज़िन्दगी के हर छोटे बड़े और बारीक नीज़ अहम मसाएल को अपने दामन मे लिए हुए हैं। यह बात किसी और दीन मे नही पायी जाती कोई इन्सान इतनी बारीक बीनी से इन तफ़सीलात के साथ मसाएल बयान नहीं कर सकता यह सब अल्लाह का हुक्म हैं।
यह मोजज़ा उस वक़्त और ज़्यादा वाज़ेह व – रोशन हो जाता है जब हम अहलेबैत की रवायात का मुतालेआ़ करते है। जो हज़ारो की तादाद मे हैं। इन्सान के ज़ेहन मे जितने भी मसाएल और मुश्किलात आ सकती हैं। ये हदीसें उन सबको अपने दामन मे लिए हुए हैं- यह बात ख़ोलफ़ा के पैरोंकारो को नसीब नही हैं। और वह इसलिए के इन लोगो ने अपने आप को रसुले ख़ुदा के उल्लुम से महरुम रखा जिनकों अहलेबैत (अ.) से नक़्ल किया था।
हज़रत इमामे जाफ़रे सादिक़ (अ.)ने फरमाया:- “ मेरी हदीस मेरे वालिद की हदीस है उन्होने अपने जद से और उन्होने रसुले ख़ुदा से ”
ख़ोलफ़ा के पैरोकारों के पास अहादीस की जो किताबें हैं उनमें अहादीस की तादाद बहुत कम हैं जब हम इन किताबों को अहलेबैत (अ.) के पैरोकारों की अहादीस से मुकाबला करतें हैं।
“ मोहम्मद बिन याक़ूब क़ुलैनी ” की किताब “ काफ़ी ” मे तमाम सहाय- सित्ता से ज्यादा हदीसे हैं जबकि “ क़ाफ़ी ” शियों के नज़दीक हदीस की चार मशहुर किताबों (कुतुबे अरबा) मे से एक है।
जबकि शियों के पास हदीस की ऐसी किताबें भी हैं जो “ काफ़ी ” से कहीं ज्यादा वसीय हैं। जैसे अल्लामा मजलिसी की “ बेहारुल अनवार ” हुर्रे आमली की “ वसाएलुश शिया ” अब्दुल्लाह बहरानी की “ अलअवालिम वग़ैरा उलूम की वह मेक़दार जो शियों ने अहलेबैत (अ.) से हासिल की हैं। उसका तक़ाबुल उन उलूम से किया जा सकता जो मुख़ालेफिन ने दुसरे मज़ाहिब व मकातिब से अख़्ज़ किये हैं। इसके अलावा शियों के नज़दीक हदीस की सेहत व सदाक़त ये अहलेबैत (अ.) की मुतलक़ सदाक़त की बिना पर हैं जिनको अल्लाह ताला ने हर तरह के रिज्स व बुरायों से पाक व पाकीज़ा क़रार दिया है.।
मुझे याद है जिस वक़्त “ वसाएलुश शिया ” क़ाहेरा में तबअ हुई तो जाम- ए- अज़हर के बाज़ उलमा ने उसका मुतालेआ किया और एक अज़ीम आलिम ने कहाः इस किताब के जुज़वी मुताले के बाद मुझे इस बात का यक़ीन हो गया कि वे हदीस जो अहले सुन्नत नक़्ल करते हैं। वह बिल मानी नक़्ल करते हैं। और वे हदीसें जो शिया नक़्ल करते हैं। वह ऐन इबारत नक़्ल करते हैं। हम सहाय सित्ता और दुसरी अहम किताबों को देखतें हैं। कि एक हदीस मुख़्तलीफ़ अन्दाज़ व अल्फ़ाज़ से नक़ल की गई है। जबकि शियों के यहाँ देखते हैं कि एक हदीस मुताद्दिद और मुख्तलिफ़ रावियों से नक़्ल की गयी है। लेकिन सबकी इबारत एक है और यह इस बात की दलील है कि शियों ने रसुले ख़ुदा की ऐन इबारत को नक़्ल किया हैं। जबकि हमारे यहां यह सुरत नही हैं। लिहाज़ा शियों की हदीस हमारी अहादीस की ब-निस्बत ज़्यादा सही ज़्यादा मोरिदे एअ़तेमाद हैं। ”
दुनिया अहलेबैत (अ.) की अहादीस से वाक़िफ़ नही है। मगर बहुत ही मुख्तसर सी वाक़्फियत और यह इस बिना पर कि मुस्लमान दुसरों से मुनसलिक रहे और अहलेबैत से दुर होते चले जायें अगर लोग अहलेबैत की अहादीस से खुब वाक़िफ हो जाते तो उनके पैरोकार बन जातें।
लिहाज़ा अहलेबैत (अ.) के मुख्लिस पैरोकारों के लिये ज़रुरी है कि वह लोगों को अहलेबैत (अ.) की अहादीसों से रु- शेनास करायें और अक़्ल व फ़िक्र के उन गरा – बहा – खज़ानों और जवाहरात से लोंगों को वाक़िफ़ करायें इन्सानियत की तारीख़ मे इस तरह के ख़ज़ाने और जवाहरात नही मिलते –
अहलेबैत (अ.) की हदीसे ही इस बात के लिये काफी हैं। के यहीं लोग साहेबाने हक़ हैं इनके अलावा कहीं और हक़ नहीं हैं-
अहादीस अपनी कसरत के बावजुद जिनका अहाता और शुमार आसान नहीं हैं। एक दसरे से मबूर्त हैं। जबकि बाज़ हदीसे सदरे इस्लाम मे हज़रत अली (अ.) से वारिद हुई हैं। और बाज़ हदीसें बारहवें इमाम हज़रत वली-ए-अस्र अज्जल्लाहों फ़रजहु से वारिद हुई हैं। दोनों के दरमियान दो सौ ( 200) साल से ज्यादा अस्रे – का फासला हैं। मगर सबके नुक़ूश व ख़ुतूत एक ही हैं ऐसा मालुम होता है के सारी हदीसे एक ही शख्स से वारिद हुई हैं , और एक ही वक़्त मे नक़्ल हूई हैं। इसके अलावा सारी हदीसे आयाते क़ुरानी से मबुर्त व मुनसलिक हैं। तलाश करने वालों को कुरान की 6666 आयतों और अहादीस में ज़रा भी इख्तेलाफ़ नज़र नहीं आयेगा।
ये हदीसे उलूम व मआ़रिफ़ और अजीब व ग़रीब हक़ायक़ पर मुश्तमिल हैं इन्सान इल्म के किसी भी दर्जे पर फ़ायज़ हो जाये मगर इस तरह की हदीसें बयान नहीं कर सकता – यह इस बात की वाज़ह दलील हैं कि अहलेबैत (अ.) का इल्म खुदावन्दे आलम का अता करदा है और इन्ही के बारे में खुदा ने अपनी किताब “ कुरान ” मे इरशाद फ़रमाया है कि
“ व मन इन – दहु इल्मुल-किताब ”
“ और जिस के पास किताब का मुकम्मल इल्म हैं ”
अहलेबैत (अ.)ने अहादीस के बारे मे खास एहतेमाम किया है और शियों को अहादीस सीखने का हुक्म दिया हैं। हदीस का इल्म हासिल करना सबसे अफ़ज़ल इबादत है। हज़रत इमामे मोहम्मदे बाक़िर (अ.) ने जनाबे जाबिर से फरमाया “ ऐ जाबिर ख़ुदा की क़सम हलाल व हराम के बारे मे जो सादिक़ से पहुँची है वह तुम्हारे लिए उन चीज़ों से बेहतर हैं जिस पर सुरज तुलूअ और ग़ुरुब होता हैं ”
( अलमोहसिन)
इमाम (अ) ने यह भी इरशाद फ़रमायाः-
“ अगर शिया जवानों मे कोई जवान मुझे ऐसा नज़र आये जो दीनी मालूमात न रखता हो तो मैं उसको सज़ा दूँगा। (अलमोहसिन)
इल्म और अहादीस हासिल करने के सिलसिले में बेशुमार हदीसें हैं। बाज़ किताबें तो ख़ास इसी मौज़ू के लिये तालीफ़ की गई हैं।
शिया उलूम ने अहादीस की ऐसी अहम किताबें तालीफ़ की हैं। जिसमें अहलेबैत (अ.) से मनक़ूल रवायतों को दर्ज किया हैं। बाज़ मशहूर किताबें इस तरह हैः-
1- अल- काफ़ी तालीफ़ (संकलित) अल- कुलैनी मुता- वफ्फ़ा हिजरी 329
2- मन- ला यहजुरोहुल फ़कीह तालीफ़ शेख़ सुदूक़ मुता- वफ़्फ़ा 381 हिजरी
3- तहज़ीबुल अहकाम तालीफ़ शेख़ तुसी मुत- वफ़्फ़ा 460 हिजरी
4- अल- इस्तिबसार तालीफ़ शेख़ तुसी मुता- वफ़्फ़ा 460 हिजरी
5- जाम- ए- उल- अखबार फ़ी ईज़ाहूल-इस्तिबसार
तालीफ़ अब्दुल लतीफ़ अल हायरी अल हमदानी शार्गिदे शेख़ बहाई मुता – वफ़्फ़ा 1050 हिजरी
6- अल- वाफ़ी तालीफ़ फ़ैज़ काशानी मुता- वफ़्फ़ा 1091, हिजरी
7- वसाएलुश – शिया तालीफ़ हुर्रुल- आमली मुता- वफ़्फ़ा 1101, हिजरी
8- बेहारुल अनवार तालिफ़ अल्लामा मजलिसी मुता- वफ़्फ़ा 1110 हिजरी
9- अल – अवालिम ( 100 ज़िल्दें) तालिफ़ शेख़ अब्दुल्लाह अल बहरानी मुआसिर अल्लामा मजलिसी और उनके शार्गिदें रशीद
10- अश – शिफ़ा फ़ी हदीसे आले मुस्तफ़ा तालीफ़ शेख़ मो. रज़ा- तबरेज़ी मुता- वफ़्फ़ा 1158 हिजरी
11- जाम- ए- उल- अहकाम तालीफ़ सैय्यद अब्दुल्लाह शब्बर मुता-वफ़्फ़ा 1246 हिजरी
12- मुस्तदरेकुल वसाएल तालीफ़ मिर्ज़ा हुसैन अन – नूरी अत – तबरिसी मुता-वफ़्फ़ा 1320 हिजरी
हदीसे अल अरबाओ मेत ( चार सौ हदीसें )
ये वह हदीसें हैं जो अमीरुल मोमनीन हज़रत अली (अ.) से मनक़ूल हैं। जिसको आलिमें जलील जनाब “ इब्ने शेअ- बतुल- हुर्रानी ” ने अपनी किताब मे नक़्ल किया हैं। ये हदीसें दुनिया व आखेरत मे नफ़ा – बख्श चार सौ अबवाब पर मुश्तमिल है। ग़ौर करने वाला अगर इन अहादीस की गहराई और गीराई पर ग़ौर – व – ख़ौज़ करे तो वाज़ह हो जायेगा कि इन अहादीस के बयान करने वाले का इल्म , इन्सानी इल्म नही हैं। वह ऐसा इल्म है जो दुनिया व आख़ेरत की ज़िन्दगी के तमाम पहलुओं को अपने दामन मे लिए हुए है। यह वुसअ़त सिर्फ़ उसी को हासिल हो सकती है जिसका इल्म , इल्मे – इलाही का आइनादार हो
इन्साफ पसन्द के लिए यही एक हदीस काफी है कि हज़रत अली (अ.) बर – हक़ हुज्जते ख़ुदा है , बाबे मदीनतुल इल्म हैं तारीख़े बशरीयत मे जितनी किताबें , खुत्बात , रसायल व मक़ालात हैं. उनकी तमामतर कसरत व वुसअ़त के बावजुद उनमे कोई किताब , ख़ुत्बा और मक़ाला ऐसा नहीं जिसका इस एक हदीस की वुसअतों और बारिक़यों से तक़ाबुल किया जा सके – पैग़ामे रिसालत की सदाक़त पर यह एक बेहतरीन दलील हैं। कि इस्लाम ख़ुदा का दीन हैं। और अहलेबैत (अ.) ही साहेबाने हक़ और हक़ीक़त हैं। इनके अलावा कोई और नही हैं। हम तमाम अद्याने मज़ाहिब , तमाम मकातिबे नज़र और तमाम साहेबाने अक़्ल व इन्साफ़ को दावत देते है कि निहायत ग़ौर – व – फ़िक्र से इस हदीस का मुतालेआ करें ताकि वे इस नूर हक़ीक़त से वाक़िफ़ हो सकें जिसको जेहल व तअस्सुबात ने छ़ुपा रखा हैं।
हम तमाम लोगों से बस यह इस्तेदुआ करते हैं कि वह अहलेबैत के अक़वाल को पढ़े , ग़ौर करें और समझें और तमाम मौरुसी इलाक़ाई तअस्सुबात से आज़ाद होकर अक़्ल व इन्साफ़ की हुर्रियत की रोशनी में फ़ैसला करें- हक़ के मुतालाशी अफ़राद के लिये यही इल्मी रास्ता है-
जहाँ तक अहलेबातिल का मसला हैं। तो वह अपनी आँख़ , कान , दिल सब हक़ से फेरे हुए हैं और हक़ को न सुनना चाहते हैं। और न समझना अपने पैरोकारों को भी इसी बात का हुक्म देते हैं – वह इस बिना पर कि वे हक़ से ड़रते हैं। और हक़ की दलीलों का सामना करने की उनमें ताब व तवानाई नही हैं।
क़ुल हातु बुर्हानकुम इन कुन्तुम सादेक़ीन ,
ऐ रसूल कह दीजिए ले आओ तुम लोग अपनी दलीलो को अगर तुम सच्चे हो-
सदा – क़ल्लाहुल अलियुल अज़ीम
बेशक ख़ुदा – ए – बुज़ुर्ग़ व बर्तर ने सच फ़रमाया हैं –
सै. मो. मूसवी नजफ़ी
बिस्मिल्लाह हिर्रहमा निर्रहीम
अमीरुल मोमेनीन अली इब्ने अबी तालिब (अ) ने इरशाद फ़रमायाः
1- हज़ामत बदन को सालिम और अक़्ल को पुख्ता करती है।
2- मुँछ़ का दुरुस्त करना पाक़िज़गी और सुन्नत है।
3- इसमें ख़ुश्बू लगाना कातेबीन की करामत और सुन्नत हैं।
4- तेल ज़िल्द को मुलायम और दिमाग़ व अक़्ल में इज़ाफ़ा करता हैं। और वुज़ु व ग़ुस्ल की जगहों को हमवार , ख़ुश्क़ी को दुर और रंग को साफ करता हैं।
5- मिसवाक ख़ुदा की ख़ुशनुदी और मुँह की पाक़ीज़गी का सबब और सुन्नत हैं।
6- ख़त्मी से सर धोना कसाफ़त व गन्दगी को दुर करता है।
7- वुज़ु और ग़ुस्ल के वक़्त नाक मे पानी ड़ालने और कूल्ली करने से मुँह और नाक साफ़ रहते हैं।
8- छींक सर के लिए मुफ़ीद है बदन और सर के जुम्ला अमराज के लिये शिफ़ा है-
9- नूरे से बदन मुस्तहकम और जिस्म पाक रहता है।
10- नाख़ून काटने से बड़ी बीमारियाँ दूर रहती हैं और रिज़्क में वुसअत होती है।
11- बग़ल के बाल साफ करने से इन्सान बदबू से महफ़ूज़ रहता है और यह सुन्नत भी है।
12- खाने से पहले और बाद दोनों हाथ धोने से रिज़्क में इज़ाफ़ा होता है —
13- जो शख़्स ख़ुदा से मुरादें चाहता है और सुन्नत पर अमल करना चाहता है वह ईद के दिनों ग़ुस्ल करे।
14- रात की इबादत से जिस्म सेहत मन्द रहता है ख़ुदा राज़ी-होता है , रहमतें नाज़िल होती हैं और अम्बिया के अख़लाक़ से तमस्सुक होता है।
15- सेब खाने से मेदा सही रहता है।
16- कुन्दर चबाने से जबड़े मज़बूत होते हैं और बलग़म दूर होता है ओर मुँह की बदबू ख़त्म होती है —
17- जमीन में गर्दिश करने की ब-निस्बत तुलू- ए- फज़्र से तुलू- ए- आफ़ताब तक मस्जिद में बैठने से रिज़्क जल्दी हासिल होता है-।
18- सफ़र- जल खाने से कमज़ोर दिल क़वी होता है , मेदा दुरूस्त होता है , दिल साफ़ होता है , बुज़दिल , बहादुर बनता है और फर्ज़न्द बेहतर होता है।
19- रोज़ाना नाश्ते में 21 अदद सुर्ख़ किशमिश खाने से मौत के अलावा सारे अमराज़ दूर हो जाते हैं।
20- मुसलमान के लिए मुस्तहब है के माहे मुबारक की पहली शब अपनी ज़ौजा से हमबिस्तरी करे क्योंकि ख़ुदा का इरशाद है कि माहे मुबारक की रातों में अपनी औरतों से नजदीकी तुम्हारे लिए हलाल कर दी गई है।
21- चाँदी के अलावा कोई और अँगूठी मत पहनना रसूले ख़ुदा का इरशाद है कि “ जिस हाथ में लोहे की अँगूठी होगी ख़ुदा उस हाथ को कभी पाक नहीं करेगा ” जिसकी अँगूठी पर असमा-ए-इलाही नक्श हों जरूरी है के इस्तिन्जा के वक्त उसको उतार ले।
22- जब आइना देखो तो कहो , हम्द उस ख़ुदा की जिसने मुझे पैदा किया , और बेहतरीन हालत व बेहतरीन शक्ल व सूरत में पैदा किया। मुझे वे चीज़े दीं जिनसे दूसरों को महरूम रखा और मुझें इस्लाम से इज़्ज़त अता की।
23- जब अपने बरादरे मोमिन से मिलने जाओ तो अच्छे हालत में जाओ , जिस तरह एक अजनबी से अच्छी हालत में मिलते हो।
24- हर महीने के तीन दिन के रोज़े और माहे शाबान के रोज़े दिल के वुसवास और क़ल्ब की परेशानियों को दूर करते हैं।
25- ठण्डे पानी से इस्तिन्जा करने से बवासीर नहीं होती।
26- कपड़ा धोने से हम व ग़म दूर होता है और नमाज़ के लिए तहारत होती है।
27- सफेद बालों को निकालों नहीं क्योंकि यह नूर है जिसके बाल ख़िदमते इस्लाम में सफ़ेद हुए हों क़यामत में उसे एक नूर दिया जायेगा।
28- मुसलमान जनाबत की हालत में नहीं सोता वह तो बा-तहारत सोता है जिसको पानी मैयस्सर न हो वह तैयम्मुम कर ले क्योंकि मोमिन की रूह बारगाहे इलाही में जाती है। वह उसे कुबूल करता है और मुबारकबाद देता है। अगर उसका वक्त पूरा हो चुका होता है। तो उसको अच्छ़ी सुरत मे रख दिया जाता है। और अगर उम्र बाक़ी होती है तो उसको अमानतदार फ़रिश्ते के साथ जिस्म में वापिस कर दिया जाता है।
29- मुसलमान क़िब्ले की तरफ़ नहीं थूकता , अगर भूल से थूक दिया तो फौरन अस्तग़फ़ार करता है।
30- रास्ते में पाखाना नहीं करना चाहिए और जिस वक्त हवा चल रही हो उस वक्त कोठे पर पेशाब नहीं करना चाहिए और न जारी पानी में अगर किसी ने ऐसा किया तो वह एक ऐसी चीज़ में गिरफ्तार हो जायेगा के जिसके लिये बस अपने नफ़्स की मलामत करे क्योंकि हवा और पानी में कुछ ज़िन्दा चीज़े हैं हवा के रूख़ पर पेशाब न करों।
31- चित मत लेटो।
32- बे- दिली से और जमाही लेते हुए नम़ाज न पढ़ो।
33- जब बारगाहे इलाही में हाजिर हो अफ़कार को कम करो , क्योंकि जिधर दिल होगा वैसी ही नमाज़ होगी।
34- किसी भी जगह और किसी भी वक्त ज़िक़्रे ख़ुदा से ग़ाफ़िल न हो।
35- नमाज़ में इधर उधर मुल्तफ़ित न हो क्योंकि जब बन्दा दूसरी तरफ़ मुल्तफित होता है ख़ुदा उससे कहता है मेरे बन्दे मेरी तरफ़ मुतावज्जेह हो क्योंकि यह दूसरी चीज़ो से बेहतर है।
36- ( दस्तरख़ान) पर जो गिरा है उसको खाओ क्योंकि इज़्ने ख़ुदा से उसमें शिफ़ा है अमराज़ से , उसके लिये जो शिफा चाहे।
37- सूती कपड़े पहना करो , क्योंकि यही रसूले ख़ुदा का लिबास है आप बग़ैर ज़रूरत के ऊनी और बाल वाले कपड़े नहीं पहनते थे।
38- जब खाना खाओ तो वह उँगली चाट लो जिससे खाया है , अल्लाह ताला फ़रमाता है खुदा तुम्हे बरकत दें।
39- ख़ुदा जमाल को दोस्त रखता है औऱ नेमत के आसार अपने बन्दे पर देखना चाहता है।
40- अपने रिश्तेदारों के साथ कम से कम सलाम के ज़रिये सिले रहम करो क्योंकि ख़ुदा का इरशाद है कि उस ख़ुदा से डरो जो तुमसे रिश्तेदारों के बारे में सवाल करेगा।
41- अपना दिन इधर उधर की बातों में ज़ाया न करो , क्योंकि तुम्हारे साथ ऐसे अफ़राद हैं जो तुम्हारी हर चीज़ को लिख रहे हैं।
42- हर जगह अल्लाह को याद करो।
43- पैग़म्बरे इस्लाम पर सलवात भेजा करो , ख़ुदा पैगम्बर के एहतेराम में तुम्हारी दुआ कुबूल करेगा।
44- खाना ठण्डा करके खाया करो- जब रसूले ख़ुदा के सामने गर्म खाना लाया गया उस वक़्त हज़रत ने इरशाद फ़रमाया , ठहरो ताकि ठण्डा हो जाये ख़ुदा हमें गर्म नहीं खिलाना चाहता – बरकत तो ठण्डे में है गर्म में कोई बरकत नहीं।
45- अपने बच्चों को ऐसी चीज़ें तालिम दों जिन्हें अल्लाह ने उनके लिए मुफ़ीद क़रार दिया है ताकि उनपर ला – मज़हबियत ग़ालिब न हो।
46- ऐ लोगों ! अपनी ज़बान को रोको और अच्छ़े अन्दाज़ में सलाम करो।
47- अमानते अदा करो चाहे क़त्ल अम्बिया के बारे में हों।
48- जिस वक़्त बाज़ार में दाख़िल हो , और लोगों से तिजारती गुफ़्तगु करो उस वक़्त ख़ुदा को बहुत ज़्यादा याद करो क्य़ोकि गुनाहों का कफ़्फारा है और नेकियों में इज़ाफ़े का सबब है देख़ों ग़ाफ़िलों में शामिल न हों।
49- माहे मुबारके रमज़ान मे सफ़र करना मुनासिब नहीं है। क्योकि अल्लाह का इरशाद है कि “ जब माहे मुबारके रमज़ान आ जाये तो रोज़ा रखो ”
50- शराब पीने और मोज़े पर मसा करने में कोई तक़इया नहीं हैं।
51- देखो हमारे हक़ में हरगिज़ गुलू न करना बल्कि कहो के हम अल्लाह के पर्वर्दाबन्दे हैं। फिर हमारे बारे में जो चाहो कहो।
52- जो हमसे मोहब्बत करता हैं उसे हमारे जैसा अमल करना चाहिये और परहेज़ग़ारी से हमारी मदद करनी चाहिये। यही बेहतरीन चीज़ हैं जिससे दुनिया व आख़ेरत में मदद ली जा सकती है।
53- जहाँ हमारी बुराई की जा रही हो वहाँ न बैठो।
54- हमारे एलानिया दुश्मन के सामने हमारी तारीफ़ न करो। हमारी दोस्ती ज़ाहिर करके ज़ालिम बादशाह के सामने ख़ुद को ज़लील न करो।
55- सच्चाई के पाबंद रहो उसी में निजात है।
56- जो अल्लाह के पास है उसे तलब करो , उसकी ख़ुशनूदी और उसकी इताअत के मुतालाशी रहो और उस पर साबित क़दम रहो।
57- कितनी बुरी बात है कि मोमिन बे-आबरू होकर जन्नत में जाये।
58- अपने किरदार के ज़रिये क़यामत के दिन हमारी शफ़ाअत से दूर न हो।
59- क़यामत के दिन अपने दुश्मन के सामने ज़लील न हो।
60- ख़ुदा के नजदीक तुम्हारी जो मंज़िलत है उसे ह़कीर दुनिया की मोहब्बत में हाथ से न जाने दो।
61- जिस चीज का ख़ुदा ने हुक्म दिया है उस पर अमल करो।
62- इससे बढ़कर कोई आरज़ू नहीं के इन्सान एहतेज़ार के वक़्त रसूले ख़ुदा की ज़ियारत का शरफ़ हासिल कर ले।
63- जो कुछ अल्लाह के पास है वह बाक़ी रहने वाला है , शहादत दी जाये जो आखँ की ठण्डक और रहमते इलाही से मुलाक़ात का सबब होगी।
64- अपने कमज़ोर भाइयों को गिरी निगाह से न देखो जो किसी को गिरी निगाह से देखेगा कयामत के दिन ख़ुदा उसे हक़ारत से देखेगा और दोनों को एक जगह जमा नहीं करेगा मगर यह के वह तौबा कर लें।
65- जब अपने भाई की ज़रूरत से आगाह हो तो उसे सवाल की ज़हमत न दो।
66- एक दूसरे से मुलाकात करो , आपस में मेहरबान रहो और एक दूसरे को तोहफ़े दो।
67- मुनाफ़िक़ की तरह न हो जो बातें तो करता है मगर अमल नहीं करता।
68- शादी करो , रसूले ख़ुदा ने इरशाद फ़रमाया “ जो मेरी सुन्नत पर अमल करना चाहता है उसे शादी करना चाहिये। शादी करना मेरी सुन्नत है। ”
69- औलाद तलब करो मैं क़यामत के दिन दूसरी उम्मतों पर तुम्हारी कसरत की बिना पर मुबाहात करूँगा।
70- अपनी औलाद को कुंद ज़ेहन और बदकिरदार औरत का दूध न पिलाओ क्योंकि दूध से आदत फैलती है।
71- ऐसे परिन्दें न खाओ जिसके पोटा और संगदाना न हो।
72- उन परिन्दों का गोश्त न खाओ जिनके नाख़ून तेज़ होते हैं और उन परिन्दों का भी गोश्त न खाओ जिनके पंजे शिकारी होते हैं।
73- तिल्ली न खाओ क्योंकि उससे फ़ासिद खून बनता है।
74- सियाह लिबास न पहनो क्योंकि यह फ़िरऔन का लिबास है।
75- गोश्त के ग़ुदूद न खाओ उससे जुज़ाम का ख़तरा है।
76- दीन में क़यास आराइयाँ न करो , ऐसा गरोह आयेगा जो क़यास करेगा और वही दीन का दुश्मन होगा सबसे पहले जिसने क़यास किया वह इब्लीस था।
77- नोंकदार जूते न पहना करो इस तरह के जूते फ़िरऔन पहना करता था।
78- शराब ख़ोरों से दूर रहो।
79- खजूर खाया करो इसमें अमराज से शिफ़ा है।
80- रसूले ख़ुदा के अक़वाल की पैरवी करो हज़रत ने इरशाद फ़रमाया के जो शख़्स अपने लिये दूसरे के सामने सवालात के दरवाज़े खोल लेता है ख़ुदा उसके लिये फ़क़्र का दरवाज़ा खोल देता है।
81- बहुत ज़्यादा अस्तग़फ़ार किया करो इससे रिज़्क़ हासिल होता है।
82- जितना हो सके अमले ख़ैर करो , कल तुम्हें यही मिलेगा।
83- बहस व मुबाहिसा न किया करो इससे शक में मुबतला हो जाओगे।
84- जो अल्लाह से कुछ मुरादें चाहता है वह जुमे के दिन तीन वक्त दुआ करे।
1- ज़वाल के वक़्त जब हवा चलती है , आसमान के दरवाज़े खुल जाते हैं औऱ रहमत नाज़िल होती है , परिन्दे आवाज़ देते हैं।
2- रात के आखिरी हिस्से में तुलू- ए- फ़ज्र के नज़दीक उस वक़्त दो फरिश्ते यह निदा देते हैं के है कोई तौबा करने वाला जिसकी तौबा क़ुबूल की जाये , है कोई माँगने वाला जिसे दिया जाये , है कोई मुरादें माँगने वाला के मुरादे पूरी की जायें , पस अल्लाह की आवाज़ पर लब्बैक कहो।
तुलू- ए- फ़ज्र और तुलू- ए- आफ़ताब के दरमियान रिज़्क़ तलब करो , ज़मीन में गर्दिश करने की ब-निस्बत उस वक़्त रिज़्क़ बहुत जल्दी मिलता है। यही वह वक़्त है जब अल्लाह अपने बन्दों के दरमियान रिज़्क़ तक़सीम करता है। इमाम के जुहूर का इन्तेज़ार करो और अल्लाह की रहमत से मायूस न हो जुहूर का इन्तेज़ार अल्लाह के नज़दीक बहुत ज़्यादा पसंदीदा है। और वह चीज़ बहुत ज़्यादा पसंदीदा है जिस पर मोमिन मुस्तक़िल कारबंद रहे।
85- नमाज़े सुबह के बाद अल्लाह पर तवक्कुल करो उस वक़्त मुरादें मिलती हैं।
86- तलवार लेकर हरम न जाओ।
87- तलवार के सामने नमाज़ न पढ़ो क्योंकि क़िब्ला अम्न व अमान की जगह है।
88- जब हज करो तो रसूले ख़ुदा की ज़ियारत ज़रूर करो इसी का तो हुक्म दिया गया है। ज़ियारत न करना हज़रत पर जफ़ा करना है।
89- जिनके हुक़ूक़ तुम पर हैं उनकी क़ब्रों की ज़ियारत करो और वहाँ रिज़्क़ तलब करो वे तुम्हारी ज़ियारत से ख़ुश होते हैं। वालदेन की क़ब्रों के पास उनके लिये दुआ करने के बाद अपने हक़ में दुआ क़ुबूल होती है।
90- गुनाहे कबीरा की ताक़त न रखने की बिना पर गुनाहे सग़ीरा को कम न समझो , क्योंकि सग़ीरा जमा होकर गुनाहे कबीरा हो जाते हैं।
91- सजदों को तूल दो जो सजदे को तूल देगा वह इताअत गुज़ार और निजात चाहता होगा।
92- मौत को अक्सर याद किया करो और उस दिन को भी याद रखो जिस दिन क़ब्र से निकाले जाओगे और जिस दिन अपने ऐब के सामने पेश किये जाओगे ताकि तमाम मुसीबतें तुम्हारे लिये दूर हो जायें।
93- जब आँख में कोई तकलीफ़ हो तो “ आयतल कुर्सी ” पढ़ो और यह एतेक़ाद रखो के इससे शिफ़ा हो सकती है तो इन्शाल्लाह शिफ़ा होगी।
94- गुनाहो से परहेज़ करों , क्योकि मुसिबत और रिज़्क़ मे तंगी सब गुनाहो की बिना पर है यहाँ तक कि ख़राश भी गुनाह का नतीजा है। ख़ुदावन्दे आलम का इरशाद है कि “ तुम्हें जो मुसीबतें पहुँचती हैं वे तुम्हारे आमाल की बिना पर है ख़ुदा तो बहुत सी चीज़ो को दरगुज़र करता है ” ।
95 ख़ाने पर अल्लाह को बार बार याद करो , खाने को फ़ेको नहीं अल्लाह की हर नेमत और रिज़्क पर उसकी हम्द “ और शुक्र ज़रुरी हैं ”
96- हर नेमत से अच्छा बर्ताव करो , क़ब्ल इसके के वह छ़िन जाये- नेमत तो ज़ायल हो जायेगी लेकिन तुम्हारा बर्ताव तुम्हारे ऊपर गवाह रहेगा।
97- जो अल्लाह से मुख़्तसर से रिज़्क पर राज़ी होगा अल्लाह उससे मुख़्तसर से अमल से ख़ुश्नुद होगा।
98- तफ़रीत से बचों , क्योकि उस दिन शर्मिन्दा होना पड़ेगा जिस दिन शर्मिन्दगी फ़ायदामन्द न होगी।
99- मैदाने जंग मे जब दुश्मन के रु-ब-रु हो तो बाते कम करों , अल्लाह बुज़ुर्ग व बर्तर को ज़्यादा याद करो मैदान से मुँह न मोड़ो , वरना अल्लाह के ग़ज़ब के मुसतहक हो जाओगे । जंग मे जब अपने भाई को ज़ख्मी या दुश्मनों में गिरफ्तार देखो तो उसको तक़वियत पहुँचाओ इमकान भर अच्छा बर्ताव करो इस तरह बुरी मौत से महफ़ुज़ रहोगे ।
100. बेहतरीन जख़ीरा बकरी है जिसके घर मे एक बकरी हो हर रोज़ एक मरतबा फ़रिश्ते उसकी ताज़ीम करते हैं। और जिसके पास दो बकरियाँ हो फ़रिश्ते दो बार उसकी ताज़ीम करते हैं। और इसी तरह अगर तीन बकरीयाँ हो तो तीन मर्तबा ताज़ीम करते हैं। और ख़ुदा कहता है के तुझे बरकत दी गई हैं।
101- जब मुस्लिम कमज़ोर हो जाये तो उसे गोश्त और दही खाना चाहिये अल्लाह ने इन दोनो के क़ुव्वत क़रार दी हैं ।
102- जब हज करने जाओ तो अपनी ज़रुरयात की बाज़ चीज़े पहले ख़रीद लो क्योकि ख़ुदावन्दे आलम का इरशाद है कि जब सफ़र का इरादा करो तो सामान पहले मोहय्या करो।
103- अगर धुप में बैठना जाहते हो तो सुरज की तरफ पुश्त करके बैठों इससे अनदुरुनी बामारी दुर होती हैं।
104- जब हज करने जाओ तो ख़ान- ए- काबा को बार- बार देखो , ख़ुदा वन्दे आलम ने अपने घर के ईर्द गिर्द 120 रहमते रखी हैं । 60 तवाफ़ करने वालो के लिए , 40 नमाज़ पढ़ने वालो के लिए और 20 ख़ान- ए- ख़ुदा को देखने वालों के लियें।
105- जितने गुनाह याद हों ख़ान- ए- ख़ुदा के सामने सबका इक़रार कर लो और जो न याद हो तो यह कहो के ऐ ख़ुदा जो चीज़े तेरे यहाँ महफ़ुज़ हैं और हम भूल गये हैं सब को माफ़ कर दें। क्योकि जो शख्स उस जगह अपने गुनाहो का इक़रार करेगा और उन्हे शुमार करेगा , तो खुदावन्दे आलम के लिए सज़ावार है कि उस शख्स को बख़्श दे।
106- बला नाज़िल होने से पहले दुआ करों क्योकि छ़: मौकों पर आसमान के दरवाज़े खुलते हैं।
I- बारिश के वक़्त
II- जंग के वक़्त
III- अज़ान के वक़्त
IV- तिलावते कुरान के वक़्त
V- ज़वाल के वक़्त
VI- तुलू- ए- फ़ज्र के वक़्त
107. जो मय्यित को सर्द होने के बाद छ़ुए उस पर ग़ुस्ल वाजिब है जो मय्यित को ग़ुस्ल व कफ़न दें उसे बाद में खुद नहाना चाहिये।
108- कफ़न को धुनी न दो , काफ़ुर के अलावा मुर्दो को कोई और ख़ुश्बू न दो , क्योकि मय्यित उस शख्स की तरह है जो अहराम की हालत में हो।
109- अपने खानदान वालों को बताओं कि मय्यित के पास अच्छ़ी बात करें। जब रसूले ख़ुदा का इन्तेक़ाल हुआ उस वक़्त बनी हाशिम की लड़कियों ने जब फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैयहा के पास आकर कुछ़ अशार पढ़े। उस वक़्त आपने फ़रमाया के “ रस्म को तर्क करो और दुआएं करो ” ।
110- मुसलमान मुसलमान का आईना है , जब अपने भाई कि लग़्ज़िश देख़ो तो सब उस पर बार न कर दो उसको समझाओ , नसीहत करों और नर्मी से पेश आओ।
111- देखो इख़्तेलाफ न करो , वरना दीन से ख़ारिज हो जाओगे हमेशा राहे एअ़तेदाल इख़्तेयार करो आपस में मेल व मोहब्बत से रहो , सवारी के ज़रिये सफ़र शुरु करने ने से पहले अपने जानवर को आब- व- दाना दो देखो जानवरों के मुँह पर मत मारो , क्योकि ये अपने परवरदिगार की तसबीह करतें हैं।
112- सफ़र मे रास्ता भुल जाओ या किसी से ड़र हो तो यह कहो “ या सालेहो अग़िस्नी ” ( ऐ सालेह मेरी इमदाद कीजिये) क्योकि जिनों मे कुछ़ ऐसे है जो आवाज़ सुनते हैं , जवाब देते हैं और गुमशुदा को तलाश कर देते हैं।
113- जिसे बिच्छ़ू का ख़ौफ़ हो वह इस आयत की तिलावत करे “ सलामुन अला नुहिन फ़िल आलेमीन अना तज- ज़ेयुल मोहसेनीन इन्नहू मिन एबादेनल मोमेनीन ” ।
114- पैदाइश के सातवें दिन अपनी औलाद का अक़ीक़ा करो और बाल के हम वज़न चाँदी सदक़ा दो क्योकि यह हर मुसलमान पर वाजिब है और रसूले ख़ुदा ने हसन (अ.) और हुसैन (अ.) के सिलसिले मे यही किया था।
115- जह साएल को कुछ़ दो तो उससे कहो कि तुम्हारे हक़ मे दुआ करें उसकी दुआ तुम्हारे हक़ मे क़बूल होगी। और ख़ुद उसके हक़ मे क़बूल न होगी क्योकि यह अक्सर ग़लत बयानी करते हैं। जो चीज़ देने के लिए अपने हाथ मे लिये हो उसको चुम लो क्योकि साएल के क़ुबूल करने से पहले ख़ुदा क़ुबूल करता है। खुद ख़ुदा ने फ़रमाया है कि अल्लाह सदक़े को क़ुबूल कर लेता हैं.।
116- रात में सदक़ा दिया करो , रात का सदक़ा ग़ज़बे ख़ुदा को कम करता हैं।
117- बातों का आमाल से मवाज़ना न करो बातें कम करो मगर नेकी की बात।
118- जो रोज़ी अल्लाह ने तुम्हे दी है उसमे से राहे ख़ुदा मे ख़़र्च करो- राहे ख़ुदा मे इनक़ाफ़ करने वाला राहे ख़ुदा मे जिहाद करने वाले की तरह हैं। जिसे मुआवज़े का यक़ीन होता है वह राहे ख़ुदा मे ख़र्च करता है और इसी तरह अपने दिल को सख़ावत का ख़ुगर बनाता है।
119- अगर यक़ीन के बाद शक हो तो यक़ीन पर एतेमाद करो क्योकि शक न य़कीन को दुर करता है। और न कम कर सकता है।
120- बातिल गवाही न दो।
121- ऐसे दस्तरख़ान पर मत बैठो जहाँ शराब पी जा रही हो क्योकि किसी को इस बात का इल्म नही हैं। कि कब उस को मौत आ जायेगी।
122- जब ख़ाने के लिए बैठो तो गुलामो की तरह बैठो ज़मीन पर खाओ एक पैर दुसरे पैर पर मत रख़ो और उकड़ू न बैठो क्योकि अल्लाह इस तरह बैठने को पसंद नही करता और ऐसे शख्स को अल्लाह दोस्त नही रखता अम्बिया (अ) रात का खाना नमाज़े इशा के बाद तनाव्वुल फ़रमाते थे। रात का खाना तर्क न करो क्योंकि इससे बदन कमज़ोर होता है।
123- बुख़ार मौत का क़ासिद है और ज़मीन पर ख़ुदा का क़ैद खाना जिसे चाहता है उसमें क़ैद कर देता है। और यह गुनाहों को इस तहर गिराता है जैसे ऊँट के कोहान से रोयें गिर जाते हैं।
124- हर दर्द बदन के अन्दर से उठता है सिवाय बुख़ार और ज़ख़्म के ये जिस्म के ऊपर असर अन्दाज़ होते हैं बुख़ार की गर्मी गुल- ब- नफ़शा और ठण्डे पानी से कम करो बुख़ार की गर्मी जहन्नम की गर्मी से है।
125- मुसलमान इलाज उस वक़्त करता है जब मर्ज़ सेहत पर ग़ालिब आ जाता है।
126- दुआ हतमी क़ज़ा को बदल देती है उसको मोहय्या करो और उसको इस्तेमाल करो।
127- तहारत के बाद वुज़ू दस नेकियाँ रखता है।
128- सुस्ती से दूर रहो , जो सुस्ती करेगा वह ख़ुदा के हुकूक़ अदा न कर सकेगे।
129- बदबू का इलाज पानी से करो , अपने को साफ़ सुथरा रखो , ख़ुदा गन्दे लोगों को पसंद नहीं करता , ऐसे लोग के जहाँ बैठें दूसरों को तकलीफ हो।
130- नमाज़ में दाढ़ी से न खेलों और ऐसा कोई काम न करो जो नमाज़ से ग़ाफ़िल कर दे।
131- क़ब्ल इसके के दूसरे काम में मशगूल हो नेक काम में जल्दी करो।
132- मोमिन ख़ुद तकलीफ़ और सख़्ती में रहता है मगर दूसरों को उससे आराम मिलता है।
133- तुम्हारी अक्सर बातें ज़िक्रे ख़ुदा होनी चाहिए।
134- गुनाहों से बचो क्योंकि जब बन्दा गुनाह करता है उस का रिज़्क़ कैद हो जाता है।
135- अपनी बीमारियों का इलाज सद्के से करो।
136- ज़कात अदा करके अपने अमवाल की हिफ़ाज़त करो।
137- परहेज़गारों के तक़र्रूब का ज़रिया नमाज़ है।
138- हज हर कमज़ोर का जिहाद है।
139- बेहतरीन शौहरदारी औरत का जिहाद है।
140- तंगदस्ती मर्गे अज़ीम है।
141- अयाल की क़िल्लत एक तरह की तवांगरी है।
142- एअतेदाल निस्फ़ मआश है।
143- जिसने एअ़तेदाल से काम लिया वह कभी फ़क़ीर नहीं हुआ।
144- जिसने मशविरे से काम लिया वह हलाक नहीं हुआ।
145- शरीफ़ और दीनदार इन्सानों के साथ ही नेकी अच्छी लगती है।
146- हर चीज़ का एक फल है। नेकी का फल जल्दी चिराग़ रोशन करता है।
147- जिसे सवाब का यक़ीन होता है वह राहे ख़ुदा में ख़र्च करने से दरेग़ नहीं करता।
148- जो मुसीबत के वक़्त अपने ज़ानू पर हाथ मारे उसका सवाब ख़त्म हो ज़ाता है।
149- मोमिन का बेहतरीन अमल जुहूर का इन्तेज़ार करना है।
150- जिसने अपने वालदैन को नाराज़ किया वह आक़ हुआ।
151- सद्क़ा देकर रिज़्क हासिल करो।
152- दुआओं के ज़रिये बलाओं को दूर करो बला नाज़िल होने से पहले दुआएं करो क़सम है उस ज़ात की जिसने दाने को शिगाफ़्ता किया और जानदारों को पैदा किया बलाएं मोमिन पर इतनी तेज़ रफ़्तारी से नाज़िल होती है के पानी भी इतनी तेज़ी से ऊपर से नीचे नहीं आता बल्कि घोड़ा भी इतनी तेज़ नहीं दौड़ता।
153- बलाओं के हुजूम में आफ़ियत तलब करो , क्योंकि बलाओं का हुजूम दीन को अपने साथ ले जाता है।
154- सईद तो वह है जो बग़ैर मौएज़ा के सुधर जाये।
155- अपने नफ़्स को अच्छे अख़लाक़ से आरास्ता करो , क्योंकि बन्द- ए- मोमिन अपने हुस्ने अख़लाक़ से आबिदे शब जिन्दादार और रोज़ेदार का दर्जा हासिल करता है।
156- जो शराब को शराब जानकर पिये ख़ुदा उसे क़यामत के दिन गन्दगियों से सेराब करेगा , चाहे वह बख़्श ही क्यों न दिया गया हो।
157- गुनाहों के लिये कोई नज़्र नहीं और क़त- ए- रहम के लिये कोई क़सम नहीं।
158- बग़ैर अमल के दुआ करना जैसे बग़ैर चिल्ले के तीर चलाना।
159- औरत को चाहिये कि अपने शौहर के लिये खुशबू लगाए।
160- जो अपने माल की हिफ़ाज़त में कत्ल किया जाये वह शहीद है।
161- जिसको धोखा दिया गया हो वह न क़ाबिले तारीफ़ है न क़ाबिले अज्र (सवाब)।
162- बाप बेटे और शौहर व ज़ौजा के दरमियान कोई क़सम नहीं।
163- रात तक ख़ामोश रहना अच्छा नहीं मगर ज़िक्रे ख़ुदा में।
164- हिजरत के बाद बू तर्ज़े मुआशेरत का कोई सवाल नहीं और फत़्हे मक्का के बाद कोई हिजरत नहीं।
165- जो अल्लाह के पास है उसको तलब करो इस तरह उन चीज़ो से मुस्तग़्नी हो जाओगें जो दूसरो के पास है।
166- ख़ुदा वन्दे आलम अमानतदार कारीगर को दोस्त रखता है।
167- नमाज़ से बढ़ कर कोई चीज़ ख़ुदा के नज़दीक महबुब नहीं। दुनियावीं मशाग़ील तुम्हें नमाज़ से बाज़ न रखें ख़ुदा वन्दे आलम ने ऐसी कौम की मज़म्मत की है। जिन्होने औकाते नमाज़ की परवाह नहीं की है ।
168- यह जान लो की तुम्हारे नेकुकार दुश्मन अपने आमाल को एक दुसरे को दिखाते हैं वह इसलिये के अल्लाह ने उनसे तौफ़ीक सल्ब कर ली हैं। ख़ुदा तो बस उन्ही आमाल को क़बूल करता है जो सिर्फ और सिर्फ अल्लाह के लिये अन्जाम दिये जाते हैं।
169- नेकी कभी पुरानी नहीं होती और गुनाह कभी भुलाया नहीं जाता।
170- ख़ुदा उन लोगो के साथ है जौ परहेज़गार हैं जो आपस में एक दुसरे से अच्छा बर्ताव करते हैं।
171- मोमिन अपने भाई को ऐब नहीं लगाता उसके साथ ख़यानत नहीं करता , उस पर तोहमत नहीं लगाता उसे ज़लील नहीं करता , उससे दुरी इख्तेयार नहीं करता , अपने भाई के उज्र को क़बूल कर लो अगर (उज्र) न हो तब भी उसके लिये उज्र तलाश करो।
172- पहाड़ को हटा देना आसान है मगर वक़्ती बादशाह की तमन्ना का दिल सें निकलना बहुत मुश्किल हैं ।
173- अल्लाह से मदद चाहो और सब्र से काम लो , ख़ुदा अपने बन्दों मे जिसको चाहेगा ज़मीन का वारिस बनायेगा , और अन्जामकार परहेज़गारों के लिये हैं।
174- काम का वक़्त आने से पहले जल्दबाज़ी से काम न लो वरना शर्मिन्दा होंगे।
175- लम्बी लम्बी आरज़ुएं न करो वरना संगदिल हो जाओगे – अपने ज़ईफ़ों पर रहम करो उनके लिये ख़ुदा से रहमत तलब करो-
176- देख़ो ग़ीबत न करो , कोई मुस्लमान अपने भाई कि ग़ीबत नही करता क्योकि ख़ुदा बन्दे आलम ने इससे मना किया है। ख़ुदा का इरशाद है कि क्या तुम अपने मुर्दा भाई का गोश्त खाना पसन्द करते हो – हर्गिज़ नही।
177- मोमिनो को हाथ बाँधकर नमाज़ नहीं पढ़ना चाहिये वरना वह काफ़िरों का हमरंग हो जायेगा।
178- ख़ड़े हो कर पानी न पियो वरना ऐसा मर्ज़ लाहक़ होगा जिसका कोई इलाज नहीं मगर यह कि ख़ुदा शिफ़ा दे – अगर नमाज़ में कोई कीड़ा पकड़ लो तो या उसको दफ़्न कर दो , या फ़ूंक दो या फिर कपड़े में लपेट लो – यहाँ तक कि नमाज़ तमाम कर लो।
179- क़िब्ले से ज़्यादा रु – गर्दानी नमाज़ को बातिल कर देती है और जिसने ऐसा किया उसे चाहिये कि फिर से अज़ान , अक़ामत और तकबीर कहे।
180- जो तुलू-ए-आफ़ताब से पहले दस मर्तबा “ क़ुल-हो-वल्लाहो अहद ” दस मर्तबा “ इन्ना अन्ज़ल्ना ’’ और दस मर्तबा “ आयतल कुर्सी ” पढ़े उसका साल ख़तरात से महफ़ूज़ रहेगा –
181- जो तुलू-ए-आफ़ताब से पहले दस मर्तबा क़ुल- हो- वल्लाहो अहद और दस मर्तबा इन्ना अन्ज़ल्ना की तिलावत करे वह दिन भर गुनाहो से महफ़ूज़ रहेगा चाहे शैतान कितनी ही कोशिश करे।
182- ख़ुदा से पनाह माँगो कि कर्ज़ ज़्यादा न होने पाये।
183- अहलेबैत (अ.) की मिसाल कश्तिये नूह (अ.) की है जिसने मुख़ाल्फ़त की वह हलाक हुआ।
184- कपड़े को समेटना नमाज़ के लिये तहारत है- ख़ुदावन्दे- आलम का इरशाद है- कि लिबास क़ो पाक करो “ यानि दामन को समेटो ” ।
185- शहद इस्तेमाल करने में शिफ़ा है- “ ख़ुदावन्दे आलम का इरशाद है कि ” और उसके शिकम से ऐसी पीने की चीज़ निकलती है “ जिसका रंग मुख़्तलिफ़ है और उसमें लोगो के लिये शिफ़ा है ” ।
186- खाने से पहले और खाने के बाद नमक खाया करो अगर लोगों को यह मालूम हो जाये कि नमक में क्या तासीर है। तो नमक को तिर्याक पर तरजीह दें – जो अपना खाना नमक से शुरू करें ख़ुदा उससे सत्तर अमराज़ दूर करेगा , जिन अमराज़ का इल्म सिर्फ ख़ुदा को है।
187- हर महीने में तीन दिन रोज़ा रखो , यह जिन्दगी भर के रोज़ो के बराबर होगा- यह रोज़े हम इस तरह रखते हैं दो जुमेरात और उसके दरमियान एक बुध- खुदा वन्दे आलम ने जहन्नम बुध के दिन पैदा किया है लिहाज़ा उस दिन ख़ुदा से पनाह माँगो।
188- अगर तुम्हारी कोई हाजत हो तो जुमेरात की सुबह से तलब करो- रसूलल्लाह ने ख़ुदावन्दे आलम से दुआ फ़रमाई है कि “ ऐ ख़ुदाया जुमेरात की सुबह मेरी उम्मत के लिये बा-बरकत क़रार दे ” ।
189- जब घर से निकलो तो यह आयत पढ़ो इन्ना फ़ी खल्क़िस समावाते वल अरज़े वख़तिलाफ़िल लैले वन नहार- इन ऩका ला तुख़लेफ़ुल मी- आद और आयतल कुर्सी , इन्ना अन्ज़ल्ना , सूर-ए-हम्द (आले इमरान आयत 192) क्योंकि इसमें दुनिया व आख़ेरत की हाजतें पोशीदा हैं।
190- मोटे कपड़े पहना करो जिसका कपड़ा बारीक उसका दीन भी उसी तरह बारीक होगा- देखो ऐसा कपड़ा पहन कर ख़ुदा की बारगाह में आओ जिसमें तुम्हारा बदन नज़र न आये।
191- बारगाहे इलाही में तौबा करो ओर उसकी मोहब्बत में दाखिल हो जाओ , क्योंकि ख़ुदावन्दे आलम तौबा करने वालों को दोस्त दोस्त रखता है। और तहारत करने वालों को दोस्त रखता है। मोमिन बारगाहे ख़ुदा में बार बार हाज़िर होता है और कसरत से तौबा करता है।
192- जब मोमिन एक दूसरे मोमिन से “ उफ़ ” कहे उनके दरमियान जुदाई हो जाती है और अगर यह कह दे कि “ तुम काफ़िर हो गये ” तो उनमें से एक काफ़िर है- मोमिन के लिये नामुनासिब है कि वह किसी को तोहमत लगाये क्योंकि इत्तेहाम लगाने से ईमान इस तरह पिघल जाता है जिस तरह पानी में नमक।
193- जो तौबा करना चाहे उसके लिये तौबा का दरवाज़ा खुला हुआ है। बारगाहे ख़ुदा में सिद्क़ दिल से तौबा करो ताकि ख़ुदा तुम्हारे गुनाह बख़्श दे।
194- अहद् व पैमान को पूरा करो किसी क़ौम से कोई नेमत और आसाइश नहीं सल्ब की गई मगर उनके गुनाहों की बदौलत।
195- ख़ुदा अपने बन्दों पर ज़र्रा बराबर ज़ुल्म नहीं करता अगर दुआओं से इसतक़बाल किया जाये तो नेमत ज़ाएल नहीं होगी।
196- जब कोई मुसीबत नाज़िल हो या कोई नेमत सल्ब हो जाये उस वक्त बारगाहे इलाही में सिद्क नियत से गिड़गिड़ाये , सुस्ती न करे और असराफ़ न करे तो ख़ुदा तमाम ख़ूबियों की इस्लाह कर देगा और गुम शुदा मिल जायेगा।
197- जब मुसलमान तंगदस्ती का शिकार हो तो दूसरों से नहीं कहना चाहिए बल्कि ख़ुद बारगाहे इलाही में शिकायत करना चाहिये क्योंकि उमूर की कुंजियाँ उसी के दस्ते क़ुदरत में है , वही उन तमाम चीज़ो को चलाता है जो आसमानों , ज़मीनों ओर उनके दरमियान हैं वही अर्शे अज़ीम का परवरदिगार हैं।
198- जब नींद से उठो तो खड़े होने से पहले कहो के हस- बेयर- रब्बो मिनल – एबादे हसबी होवा हसबी व नेअमल वकील और जब रात को उठो तो आसमान की तरफ देखकर यह आयत पढ़ो –
“ इन्ना फ़ी ख़लकिस़ समावाते वल अरज़े वरव़- तेलाफ़िल लैले वन नहार- ला तुख़ लेफ़ुल मीआद ” ( आले इमरान-आयत 192) दुनिया में चार नहरें जन्नत की हैं
1- फ़ुरात
2- नील
3- सीहून
4- जीहून
ज़मज़म के पानी से सर धोने से मर्ज दूर होता है और हजरे असवद् के सामने इसका पानी पियो।
199- मोमिन किसी ऐसे सरदार के साथ जिहाद नहीं करता जो अहकामे इलाही पर ईमान न रखता हो और लोगों में अहकामे ख़ुदा नाफ़िज न करता हो और अगर वह ऐसे जिहाद में क़त्ल हो जाये तो उसने हमारे दुश्मन का साथ दिया जो हमारा हक़ ग़ज़्ब करना चाहता है और हमारा ख़ून बहाना चाहता है ऐसे शख़्स की मौत जाहेलियत की मौत होगी।
200- हम अहलेबैत का तज़किरा शिफ़ा है ख़यानत से अमराज़ से और गुनाहों के वुस्वुसों से हमारी मोहब्बत अल्लाह की ख़ुश्नूदी है। जो हमारे रास्ते को इख़तेयार करेगा हमारी बातों पर अमल करेगा वह कल जन्नत में हमारे साथ होगा और जो हमारे ज़ुहूर का इन्तेज़ार करेगा वह तो उस श्ख़्स की मानिन्द है जो ख़ुदा की राह में ख़ून में डूबा हुआ हो।
201- जो शख़्स मैदाने जंग में हो , हमारी आवाज़ सुने और हमारी मदद न करे ख़ुदा उसे मुँह के बल जहन्नम में डाल देगा।
202- जिस वक्त लोग कयामत में उठाये जायेंगे और तमाम रास्ते तंग हो जायेंगे तो उस वक़्त हम हैं जन्नत का दरवाज़ा और हम ही हैं तौबा का दरवाज़ा और हम ही वही “ बाबुस्सलाम ” हैं जो इसमें दाख़िल होगा उसने निजात पायी और जो दूर रहा हलाक हुआ।
203- हम ही से ख़ुदा ने शुरूआत की है और हम ही पर इख़्तेताम होगा। ख़ुदा चाहता है हमारे ज़रिये महों कर देता है ज़माने की सख़्तियाँ ख़ुदा हमारे ज़रिये दूर करता है और हमारी बिना पर बारिश होती है देखो कोई तुम्हे धोखा न देने पाये।
204- जिस वक़्त हमारे “ कायम ” का जुहूर होगा उस वक़्त आसमान से बरकतें नाज़िल होगी ज़मीन अपनी शादाबियों को ज़ाहिर कर देगी। लोगों के दिल बुग्ज़ व कीना से पाक साफ़ हो जायेंगे। शेर और बकरी एक साथ रहेंगे इराक़ और शाम के दरमियान अगर औरत सफ़र करेगी उसका हर कद़म हरियाली पर पड़ेगा कहीं ज़मीन ख़ाली नज़र न आयेगी और उसके सर पर उसकी ज़म्बील होगी न उस पर कोई दरिन्दा हमलावर होगा और न उसको किसी तरह का ख़ौफ़ होगा।
205- अगर तुम्हें इसका इल्म हो जाये के दुश्मनों के दरमियान रहने और उनकी बातें सुन सुनकर सब्र करने से तुम्हें क्या दर्जात मिलेंगे तो तुम्हारी आँखे रौशन हो जायेंगी।
206- मेरे बाद तुम ऐसी चीज़े देखोगे कि हर एक को मौत की तमन्ना होगी तुम देखोगे कि जुल्म व जौर हर तरफ़ फैल गया है। हुक़ूक़े इलाही की तौहीन की जा रही है हर एक को अपनी जान का ख़ौफ़ है और जब ऐसी सूरत आजाये तो सब मिलकर अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से पकड़ लो और इख़्तेलाफ़ न करो। सब्र , नमाज़ और तक़य्या का दामन हाथों से न छूटने पाये और यह भी जान लो के ख़ुदा उन लोगों को पसन्द नहीं करता जो रंग बदलते रहते हैं। हक़ और अहलेहक़ से कभी दूर न होना और जिसने हमारे अलावा किसी और से तमस्सुक किया वह हलाक हुआ। दुनिया भी गई और दुनिया से गुनाहगार जायेगा।
207- जब घर में दाख़िल हो तो अहले ख़ाना पर सलाम करो और अगर घर में कोई न हो तब इस तरह कहो अस्सलामो अलैना मिर-रब्बैना।
जब घर में दाख़िल हो तो उस वक़्त “ क़ुलहो वल्लाहो अहद ” पढ़ो इस तरह से तंगदस्ती दूर होती है।
208- अपने बच्चों को नमाज़ की तालीम दो और जब आठ बरस के हो जायें तो उन पर सख़्ती करो।
209- कुत्तों से दूर रहो , अगर सूखे कुत्ते से मस हो जाओ तो अपने कपड़े पर पानी छिड़क लो अगर वह गीला है तो अपना कपड़ा धोलो।
210- अगर हमारी कोई हदीस सुनो और उसको न समझ पाओ तो हमारी तरफ़ वापिस कर दो , उसके बारे में ख़ामोश रहो और जब हक़ वाज़ह हो जाये तो सामने तसलीम हो जायें। देखो राज के फ़ाश करने वाले और जल्द बाज़ न बनो।
211- जो हमारे हक़ में ग़ुलू करेगा उसकी बाज़गश्त हमारी ही तरफ़ होगी और जो हमारे हक़ में कोताही करेगा वह आख़िर कार हमारे ही पास आयेगा।
212- जिसने हमसे तमस्सुक किया उसने मुरादें पायीं और जो हमसे दूर हुआ वह बर्बाद हुआ जिसने हमारी पैरवी की वह कामयाब हुआ , और जिसने हमारे अलावा दूसरा रास्ता इख़्येतार किया पामाल हुआ।
213- हमारे दोस्तों के लिये अल्लाह की रहमत की फ़ौज है और हमारे दुश्मनों के लिये अज़ाबे इलाही के सिपाही हमारा रास्ता एअ़तेदाल और हमारी बातें हिदायत।
214- पाँच चीज़ों में सहो और निस्यान का कोई गुज़र नहीं
1- नमाज़े वित्र (नमाज़े शब की आखिरी एक रकअत)
2- हर वाजिब नमाज़ की पहली दो रकअतें (जिसने हम्द और सूरे की तिलावत करना चाहिये)
3- नमाज़े सुबह
4- नमाज़े मगरिब
5- हर दो रकअती वाजिब नमाज़े ख़ाह वे सफ़र की बिना पर दो रकअती हो गई हों।
215- हर अक्लमन्द बा- तहारत क़ुर्आन की तिलावत करता है।
216- अगर नमाज़ में सूरा पढ़ रहे हो तो सूरे के बाद ख़ूब अच्छी तरह रूकूअ़ और सुजुद बजा लाओ।
217- ऐसे कपड़े में नमाज़ नहीं पढ़ना चाहिये जिसमें एक शाना ढका हो और एक खुला क्योंकि यह क़ौमे लूत का तरीक़ा है।
218- मर्द एक कपड़े में भी नमाज़ पढ़ सकता है , के उसके दोनों सिरे गर्दन में इस तरह बाँधे के बदन छुप जाये या ऐसा मोटा कपड़ा जिसमें बदन दिखाई न दे।
219- तसवीर पर सजदा नहीं करना चाहिये और न किसी ऐसी चीज़ पर जिसपर तसवीर बनी हो। हाँ उसके क़दमों के नीचे तसवीरे हो सकती हैं या तसवीर को किसी चीज़ से छुपा दे।
220- ऐसे दरहम को लिबास में गिरह लगाकर नमाज़ न पढ़े जिसमें तसवीर बनी हो हाँ अगर दरहम हमयान (बेल्ट) या कपड़े में है मगर ज़ाहिर नहीं है तो कोई हर्ज नहीं।
221- गेहूँ के ख़िरमन , जौ के ख़िरमन पर सजदा न करे और न उन चीजों पर सजदा करे जो खाई जाती हैं रूई पर भी सजदा न करे।
222- जब बैयतुल- ख़ला जाओ तो यह पढ़ो “ बिस्मिल्लाहे अल्लाह- हुम्मा अम्ते अनिल अज़ा व इज़नी मिनश- शैतानिर रजीम ” ( उस ख़ुदा के नाम से जिसने मेरी तकलीफ़ दूर की औऱ मुझे शैतान से पनाह दी)
और जब बैठो तो यह दुआ पढ़ो
“ अल्लाह हुम्मा कमा अतअ़मतनीह तय्येबन वसा वग़्ग़ता- नीहे फ़क्फ़नेहि ” ( खुदाया जिस तरह तूने पाकीज़ा ग़िज़ा खिलाई तू री केफायत फरमा)
और जब फराग़त के बाद मदफ़ूअ पर नज़र पड़े तो यह कहे
“ अल्लाह हुम्मर ज़ुक़निल हलाला व जुम्बिल हराम ”
ख़ुदाया तूने हलाल रोज़ी अता की और हराम से महफ़ूज़ (रखा) रसूले ख़ुदा (अ.) न इरशाद फ़रमाया है के इन्सान के लिये ख़ुदावन्दे आलम ने एक मुल्क को मोअय्यन किया है कि जब बन्दा फ़राग़त हासिल करता है तो वह उसकी मदफ़ूअ की तरफ मोड़ देता है ऐसे मौक़े पर इन्सान के लिये सज़ावार है
कि वह अल्लाह से हलाल रोज़ी तलब करे क्योंकि वह मलक उससे कहता है कि वह अल्लाह से हलाल रोज़ी तलब करे क्योंकि वह मलक उससे कहता है कि ऐ इब्ने आदम यही वह चीज़ है जिसके लिये तुम हरीस थे देखो इसके लिये कितने जतन किये और उसका अन्जाम क्या है।
223- वुज़ू करते वक़्त पानी इस्तेमाल करने से पहले यह दुआ पढ़ना चाहिये।
“ बिस्मिल्लाहे अल्लाह हुम्मज अल्नी मिनल तव्वाबीन वज- अल्नी मिनल मुतह- हरीन ” और जब वुज़ू कर चुके तो यह दुआ पढ़े।
“ अश्हदो अल- ला- इलाहा इल्लल्लाहो वहदहु ला शरीक लहु व अन्ना मोहम्मदन अब्दोहु व रसूलोहु पस उस वक़्त बख़्शिश का मुसतहक़ होता है ” ।
224- जो नमाज़ सही मानों में अदा करेगा ख़ुदा उसके गुनाह बख़्श देगा।
225- फ़रीज़ा के वक़्त नाफेला अदा न करो पहले फ़रीज़ा अदा कर लो फिर जो दिल चाहे पढ़ो।
226- बग़ैर उज़्र के नाफ़िला तर्क न करो अगर उसकी क़ज़ा अदा हो सकती है तो ज़रूर अदा करो क्योंकि ख़ुदा वन्दे आलम का इरशाद है। वे लोग जो नमाज़ के पाबंद हैं यही वे लोग हैं जो रात में क़ज़ा शुदा नमाज़ को दिन में अदा करते हैं और दिन में क़ज़ा शुदा नमाज़ को रात में अदा करते हैं।
227- ख़ान- ए- काबा और मस्जिदे नबवी में एक रकअत नमाज़ हज़ार रकअत के बराबर है। हज में एक दिरहम सद्क़ा देना हज़ार दिरहम के बराबर है।
228- नमाज़ में ख़ुदा से डरना चाहिये जो नमाज़ में ख़ुदा से डरेगा वह नमाज़ के दौरान किसी चीज से खेलेगा नहीं।
229- हर दो रकअती नमाज़ में दूसरी रकअत में रूकूअ से पहले क़ुनूत पढ़ना चाहिये सिवाय नमाज़ जुमअ के क्योंकि इसमें दोनों रकअत में क़ुनूत है।
पहली में रूकूअ से पहले और दूसरी रकअत में रूकूअ से बाद नमाज़े जुमअ की पहली रक्अत में हम्द के बाद सूर- ए- मुनाफ़ेक़ून पढ़ना चाहिये।
230- दोनों सजदों के बाद इतनी देर बैठो के तुम्हारे आज़ा साकिन हो जायें फिर खड़े हो क्योंकि यही हमारा तरीक़ा है।
231- जब नमाज़ शुरू करो तो दोनों हाथ सीने के बराबर लाओ और जब नमाज़ के लिये खड़े हो तो बिल्कुल सीधे खड़े हो और जब नमाज़ पढ़ चुको तो दुआ के लिये आसमान की तरफ़ हाथों को बलन्द करो और हाथों को सीधा रखो उस वक़्त "इब्ने" सबा ने कहा क्या ख़ुदा हर जगह नहीं है ? आपने फ़रमाया , क्यों नहीं ? तो फिर हम आसमान की तरफ़ हाथ बलन्द क्यों करें ? आपने (अ.) फ़रमाया वाय हो तुम मगर तुमने क़ुर्आन में नहीं पढ़ा कि आसमान में तुम्हारा रिज़्क है। और वे चीज़े हैं जिनका तुमसे वायदा किया गया है रिज़्क तो उसकी जगह से ही तलब करेंगे और उसका वायदा अल्लाह ने आसमान में किया है।
232- किसी मोमिन की नमाज़ क़ुबूल नहीं होती जब तक वह जन्नत की दुआ न करे और जहन्नम से पनाह न माँगे।
233- ख़ुदा से दुआ करो कि तुम्हें हूरऐन अता करे।
234- जब नमाज़ पढ़ो तो इस तरह पढ़ो के यह गोया तुम्हारी आख़िरी नमाज़ है।
235- मुस्कुराहट नमाज़ को नहीं तोड़ती , हाँ क़हक़हा से नमाज़ टूट जाती है।
236- जब नींद दिल पर ग़ालिब आ जाये तो वुज़ू करो , और अगर आँखों में नींद भरी है तो सो जाओ क्योकि इस सूरत में तुम्हें इसका ख़याल नहीं के तुम अपने हक़ में दुआ कर रहे हो या बद- दुआ।
237- जो हमे दिल से दोस्त रख़े , ज़बान से हमारी हिमायत करे और हमारे साथ जिहाद करे वह जन्नत में हमारे दर्जे में होगा।
238- जो दिल से हमें दोस्त रखें मगर ज़बान से हमारी मदद न करें और न जिहाद मे शरीक हो वह उससे कमतर दर्जे में होगा।
239- जो हमें दुश्मन रखे , हमारे ख़िलाफ़ ज़बान चलाये और हमें नुकसान पहुँचाये वह जहन्नम के आख़िरी हिस्से में होगा।
240- जो दिल से हमें दुश्मन रखें , ज़बान से ईज़ा दे मगर नुक़सान न पहुँचाये वह जहन्नम के ऊपरी हिस्से मे होगा।
241- जो हमें दिल से दुश्मन रखें मगर ज़बान और हाथ से हमें ईज़ा न पहुँचाये वह जहन्नम में होगा।
242- जन्नत वाले हमारे शिया के दर्जात इस तरह देखेंगे , जिस तरह से लोग आसमान पर तारे देखतें हैं।
243- जब तुम ऐसे सुरे की तलावत करो जिसकी इब्तदा सब्बह या यो- सब्बेहो से होती हो उस वक़्त “ सुब्हाना रब्बे यल- आला ” हो और जब यह आयत पढ़ो “ इन्नल्लाह व मलाएकतोहु यो सल्लुना अलन नबी , पैग़म्बरे अकरम पर ज़्यादा से ज़्यादा सलवात भेजो।
244- बदन में सबसे न शुक्री आँख है देखो इसके मुतालेबात पुरे न करो वरना यह तुम्हें ख़ुदा की याद से ग़ाफ़िल कर देगी।
245- जब सुर- ए- “ वत्तीन ” की तिलावत करो तो आख़िर में कहो “ व- नहनों अला ज़ालेका मिनश- शाहेदीन ” ।
246- जब यह आयत पढ़ो “ क़ूलू आमन्ना बिल्लाहे उस वक़्त आमन्ना बिल्लाहे से व- नहनों लहु मुसलेमून ” तक पढ़ो।
247- जब बन्दा नमाज़े वाजिब के आख़िरी तश्हुद मे यह कहता है अश्हदो अल- ला इलाहा इल्लल्लाहो वहदहु ला शरीकलहु व अन्ना मोहम्मदन अब्दोहु व रसुलोहु व अन्नस सा- अता- तय्यतहु ला रैबा फ़ीहा व अन्नल्लाहा यब- असो- मनफ़िल कुबूर इसके बाद कोई हादिसा हो जाये तो नमाज़ मुकम्मल होगी।
248- अल्लाह की इबादत में सबसे दुशवार मंज़िल नमाज़ के लिये जाना हैं।
249- ऊँट की गर्दन और पाँव में ख़ैर तलाश करो जाते वक़्त और आते वक़्त।
250- जब कोई बरहना होता हैं तो शैतान उसे तमअ़ की निगाह से देखता है अपने बदन को उसयाँ न करो।
251- मर्द के लिए यह बात मुनासिब नही है के लोगों के दरमियान बैठे और रान खुली हो।
252- बदबूदार चीज़ खाकर मस्जिद न जाया करो।
253- सजदे मे अपने पिछ़ले हिस्से को ज़्यादा उठाया करो।
254- ग़ुस्ल करने से पहले अपने दोनों हाथ कोहनियों तक धो लो।
255- जब अकले नमाज़ पढ़ रहे हो तो इस तरह पढ़ो के कि़र्अत और तकबीर व तसबीह की आवाज़ ख़ुद सुन सको।
256- जब नमाज़ से उठो तो दाहिनि तरफ़ चलो।
257- दुनिया से परहेज़गारी ज़ख़ीरा करो , क्योकि आख़ेरत के लिये बेहतरीन जख़ीरा तक़वा है।
258- जो अपना दर्द तीन दिन तक दुसरो से पोशिदा रखे और सिर्फ़ अल्लाह से दुआ करे तो ख़ुदा के लिेये सज़ावार है कि वह उसको शिफा दे।
259- जिस वक़्त बन्दा अपने पेट और शर्मगाह की फ़िक्र करता है उस वक़्त वह ख़ुदा से बहुत ज़्यादा दुर हो जाता है।
260- ऐसा सफ़र न करो जिससे दीन को ख़तरा हो।
261- दुआ मे अपने कान को चार चीज़ो से आशना रखो
1- पैग़म्बरे इस्लाम पर दुरुद व सलाम
2- जन्नत की तलब
3- आतिशे जहन्नम से दुरी
4- हुरऐन की तमन्ना
262- नमाज़ तमाम करने के बाद पैग़म्बरे अकरम पर सलवात भेजो और जन्नत की दुआ करो। आतिशे जहन्नम से पनाह मांग़ो और हुरेऐन का मुतालबा करो।
263- जो पैग़म्बरे अकरम पर सलवात नही भेजता उसकी दुआ रद कर दी जाती है।
264- जब कोई ख़ुदा से जन्नत चाहता है तो जन्नत तक उसकी आवाज़ पहुँच जाती है। तो जन्नत से आवाज़ आती है ख़ुदाया तेरा बन्दा जो चाह रहा है वह उस को अता कर दे।
265- जो जहन्नम से पनाह माँगता है तो जहन्नम से आवाज़ आती है। ख़ुदाया अपने बन्दे को नारे दोज़ख़ से आज़ाद कर दे।
266- जब हुरेऐन की तमन्ना करता है तो हुरेऐन की आवाज़ आती है ख़ुदाया अपने बन्दे का मुतालबा पुरा कर दे।
267- ग़िना (मुसिक़ी) जन्नत से निकाले जाने पर शैतान का गिरया है।
268- जब सोने का इरादा करो तो अपना दाहिना हाथ रुख्सार के नीचे रखलो और कहो।
“ बिस्समिल्लाहे व जअतो हस्बी लिल्लाहे अला मिल्लते इब्राहीमा व दीने मोहम्मदिन व वला- यतेहि मनिफ- तरज़ल्लाहो ता- अतहु- माशा- अल्लाहो काना वमा लम यशाओ लम यकुन ”
269- जो सोते वक़्त “ सुर- ए- कुल हो वल्लाहो अहद ” तिलावत करे ख़ुदा वन्दे आलम उसकी हिफ़ाज़त के लिए 50 हज़ार फ़रिश्ते मोअ़य्यन करता है।
270- जब सोने लगो तो करवट लेने से पहले यह दुआ पढ़ोः-
ओ- ईज़ो नफ़सी व अहली व दीनी व माली व वलदी व ख़वातीमे अमली वमा ख़व्वलनी रब्बी वर ज़ुक़नी बे इज़्ज़तिल्लाहे व अज़मतिल्लाहे व जबा- रुतिल्लाहे व सुल्तानिल्लाहे व रहमतिल्लाहे व रा- फ़तिल्लाहे व गुफ़्रानिल्लाहे व क़ुव्वतिल्लाहे व क़ुदरतिल्लाहे वला इलाहा इल्लाहो वरकानिल्लाहे व मुन इल्लाहे व जुम- इल्लाहे व बे क़ुदर्तेही अला मा- यशाओ मिन शर्रिस- सामते व मिन शर्रिल जिन्ने वल इनसे व मिन शर्रे- मा ज़रा फ़िल अर्ज़े वमा युख़रोजो मिन्हा व मिन शर्रे मा यो नज़्ज़लो मिनस समाये वमा यअ़रोजो फीहा व मिन शर्रे कुल्ले दाब्बतिन अन्ता आख़ेजुन वे- नासीतेहा इन्ना रब्बी अला सिरातिम मुस्तिम मुस्तक़ीम व होवा अला कुल्ले शैयईन क़दीर बला हौला वला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहे रसुले ख़ुदा ने इसी तरह हसन और हुसैन (अ) को तावीज़ दिया था और रसूले ख़दा ने हमें भी इसका हुक्म दिया है।
271- हम हैं दीने ख़ुदा के ख़ज़ानादार।
272- हम हैं इल्म के चिराग।
273- जब रहबरी हमसे ग़ुज़री तब दुसरों की रहबरी ज़ाहिर हुई।
274- जिसने हमारी पैरवी की वह कभी गुमराह न हुआ।
275- जिसने हमारा इन्कार किया वह हिदायत याफ़्ता न हुआ।
276- जिसने हमारे दुश्मन की मदद की वह निजात याफ़्ता न हुआ।
277- जिसने हमें छ़ोड़ दिया उसकी मदद न की गई।
278- देखो दुनिया की लालच में हमसें दुरी इख्तेयार न करो।
279- जिसने दुनिया को हम पर तरजीह दी उसे क़यामत में हसरतें मिलेंगी। ख़ुदा का इरशाद है कि क़यामत के दिन कुछ लोग यह कहेंगें "हाय अफ़सोस ख़ुदा की राह में क्या-क्या कोताहियाँ हुई और मैं तो हँसी उड़ाने वालों में था"।
280- अपने बच्चों को गन्दगी से पाक साफ़ रखो , क्योंकि शैतान को गन्दगी पसन्द है। जब बच्चा सो जाता है उस वक़्त शैतान उसे सूँघता है जिससे बच्चा डर जाता है। औऱ गन्दगी से उन फ़रिश्तों को भी अज़ियत होती है जो इसके लिये मोअ़य्यन किये गये हैं।
281- औरत पर एक निगाह के बाद दूसरी निगाह न करना वरना फ़ित्ने में मुबतला हो जाओगे।
282- जो शख़्स मुस्तक़िल शराब पीता है वह ख़ुदा से बुतो के पुजारी की तरह मुलाक़ात करेगा उस वक़्त हुज़ूर बिन अदी ने दरियाफ़्त किया के ऐ अमीरूल मोमेनीन (अ.) मुस्तक़िल शराब पीने वाला कौन है हज़रत ने फ़रमाया के हर वह शख़्स जिसे जब शराब मिले पी ले।
283- जिसने शराब पी चालीस दिन तक उसकी नमाज़ क़ुबूल नहीं होगी।
284- जो किसी बन्द- ए- मोमिन से ऐसी बात कहे जिससे उसकी आबरूरेज़ी हो जाये ख़ुदा ऐसे शख़्स को क़यामत के दिन कीचड़ में डाल देगा। यहाँ तक कि वह उसके लिये कोई माकूल वजह पेश कर सके।
285- एक चादर में दो मर्दों को नहीं सोना चाहिये।
286- एक चादर में दो औरतों को नहीं सोना चाहिये जो ऐसा करें उसे मुतानब्बह करना चाहिये।
287- कद्दू खाओ इससे दिमाग़ तेज़ होता है। औऱ रसूले ख़ुदा इसे पसन्द करते हैं।
288- खाने से पहले और खाने के बाद तरंज खाओ आले मोहम्मद इसी तरह तनाव्वुल करते हैं।
289- अमरूद खाने से दिल को जिला होती है औऱ दर्द दूर होता है।
290- जब बन्दा नमाज़ के लिये खड़ा होता है उस वक़्त शैतान उसे हसद की निगाह से देखता है। वह यह देख रहा है कि किस तरह अल्लाह की रहमतें उसके शामिले हाल हो रही है।
291- बदतरीन उमूर वह जदीद उमूर हैं कुर्आन व हदीस में जिनका तज़किरा नहीं है। बेहतरीन काम वह है जिसमें ख़ुदा की मर्ज़ी हो।
292- जिसने दुनिया की इताअत की औऱ उसको आख़ेरत पर तरजीह दी उसने अपनी आख़ेरत बर्बाद की।
293- अगर नमाज़ गुज़ार को यह मालूम हो जाये के ख़ुदा की क्या-क्या रहमतें उसके शमिले हाल हों रही हैं तो वह कभी सजदे से सर न उठाये।
294- नेक अमल की अन्जाम देही में ताख़ीर न करो जेसे मौक़ा मिले फ़ौरन बजा लाओ।
295- अपने इम्कान भर कोशिश करो , जो मुक़द्दर में है वह तुम्हारी कमजो़री के बाबजूद मिलेगा। औऱ जो मुसीबत आने वाली है उसे हीला व बहाना से दूर नहीं कर सकते।
296- जब रकाब में कदम रखो उस वक़्त कहो सुब्हानल्लाहिल लज़ी स़ख़्ख़रना-लना हाज़ा वमा कुन्नालहु मुकर्रेनीना व अना इला रब्बनल-मुनक़लेबन।
297- जब रक़ाब मे क़दम रखो उस वक़्त कहो “ सुब्हानल्लाहिल लज़ी सख़्ख़रना- लना हाज़ा वमा कुन्नालहु मुक़र्रेनीना व अना इला रब्बनल- मुनक़लेबून ”
298- जब सफ़र के लिए निकलो तो यह कहो “ अल्लाह हुम्मा अन्तस साहेबो फ़िस- सफ़रे वल हामिले अलज़- ज़हरे वल ख़लीफ़तो फ़िल अहले वल माले ” जहाँ सफ़र ख़त्म हो तो यह कहो केः- अल्लाहुम्मा अन्ज़िल्ना मुन्ज़ेलन मुबारेकन व अन्ता खैरुल-मुन्ज़ेलीन
299- जब बाज़ार जाओ तो यह कहो-
“ अश- हदोअन ला- इलाहा इल्लल्लाहो वहदहु ला- शरीका लहु व अन्ना मोहम्मद अब्दोहु व रसूलोहु अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ोबेका मिन सफ़ा- क़तिन खासे- रतिन व यमीनिन फजरतिन व अऊज़ोबेका मिन बवा इल इसम। ”
300- अस्र के बाद वक़्ते नमाज़ का इन्तेज़ार करने वाला ख़ुदा का ज़ायर है और ख़ुदा के लिये सज़ावार है कि वह अपने ज़ायर का अहतेराम करते हुए उसकी मुरादें पूरी कर दे।
301- हज करने वाला और उमराह करने वाला ख़ुदा का मेहमान है और अल्लाह के लिये सज़ावार है कि वह अपने मेहमान का इकराम करे और उसके गुनाहों को माफ़ कर दे।
302- जो किसी बच्चे को शराब पिलाये क़यामत के दिन ख़ुदा उसे गन्दगियों मे मुबतला कर देगा , यहाँ तक कि वह माकुल उज़्र पेश करे।
303- सदक़ा मुस्तहक़म सिपर है। मोमिन और आतिशे जहन्नम के दरमियान हिजाब है काफ़िर के माल का मुहाफ़िज है उसका एवज़ जल्द दिया जायेगा- बदन से अमराज दुर करता है। लेकिन आख़ेरत में काफ़िर को कुछ़ नही मिलेगा।
304- ज़बान की ही बदौलत अहले जहन्नम , जहन्नम में जोयेंगे।
305- ज़बान की ही बदौलत अहले क़ुबूर नूर में रहेगें।
306- अपने ज़बान की हिफाज़त करो , ज़िक्रे ख़ुदा के अलावा किसी और चीज़ में उसे मशग़ुल न करो।
307- जो कोई तस्वीर बनायेगा क़यामत में उससे उसके बारे में सवाल किया जायेगा।
308- जब किसी की आँख में कुछ पड़ जाये तो उससे कहो ख़ुदा तुमसे हर बला (मुसीबत) को दूर कर दे।
309- जब कोई हमाम से नहाकर निकले तो उससे कहो तुम्हें नहाना गवारा हो और उसे जवाब में कहना चाहिये के ख़ुदा तुम्हें आफ़ियत अता करे।
310- जब कोई यह कहे कि ख़ुदा तुम्हे सलामती अता करे तो तुम जवाब में कहो कि ख़ुदा तुम्हें भी सलामती अता करे और जन्नत में तुम्हारी जगह क़रार दे।
311- पहले ख़ुदा की हम्द करो फिर दुआएं माँगो।
312- पहले उसकी सना करो फिर हाजत बयान करो।
313- ऐसी दुआएं न माँगो जो मोहाल हों या हलाल न हों।
314- जब किसी के फ़रज़न्द की पैदाइश पर मुबारकबाद देना चाहो तो यह कहो यह फरज़न्द तुम्हें मुबारक हो , ख़ुदा इसे जवानियाँ अता करे और तुम्हारा फ़रमा-बरदार क़रार दे।
315- जब कोई मक्के से आये तो उसके आँख और मुँह को चूम लो क्योंकि उसने हजरे असवद का बोसा लिया है जिसका रसूले ख़ुदा ने बोसा लिया था , और उसकी पेशानी का भी बोसा लो।
316- जब उसे मुबारकबाद देना हो तो यह कहो कि ख़ुदा तुम्हारे आमाल क़ुबूल फरमाये , तुम्हारी सइ (कोशिश) मोरिदे शुक्रिया हो , तुम्हारी रोज़ी में इजाफा हो औऱ यह सफ़र आखिरी सफ़रे मक्का न हो।
317- ऊबाशों औॅर पस्त लोगों से दूर रहो क्योंकि उन्हें ख़ुदा का कोई ख़ौफ़ नहीं होता।
318- ख़ुदा ने तलाश के बाद हमें इख़्तेयार किया और हमारे लिये शियों को मुनतख़ब किया जो हमारी नुसरत करते हैं। और हमारी ख़ुशी में ख़ुश होते हैं। और हमारे ग़म में ग़मगीन और हमारी राह में जान व माल की परवाह नहीं करते हैं। वह हमसे हैं और हमारी तरफ उनकी बाज़- गश्त होगी।
319- वह हमारा शिया नहीं है जो ऐसे आमाल अन्जाम दे जिससे हमने रोका हो , वह मौत से पहले ऐसी बला में मुबतला होगा जिससे उसके गुनाह माफ़ हो जायेंगे। ये माल व औलाद , जान हर तरह की रो सकती है। यहाँ तक कि वह ख़ुदा से इस हालत में मुलाक़ात करे कि हमारा दोस्त है। और उस पर कोई गुनाह नहीं है।
320- अगर गुनाह बाक़ी रह गये हैं तो मौत की सख़्ती से गुनाह माफ़ हो जायेंगे।
321- हमारे शियों की मौत शहीद की मौत होती है। जिसने हमारे अहकाम की तसदीक़ की , जिसने ख़ुदा के लिये ख़ुदा और रसूल (स.) पर ईमान रखते हुए हमारी ख़ातिर दोस्ती की औऱ हमारी खातिर दुश्मनी की।
322- जो हमारा राज़ फ़ाश करेगा ख़ुदा दहकते हुए लोहे से उसको मज़ा चखायेगा।
323- सातवें दिन अपनी औलाद का ख़त्ना करो और इसके लिये सर्दी गर्मी को बहाना क़रार न दो , क्योंकि इससे बदन की तहारत होती है। ज़मीन उस शख़्स की शिकायत करती है जिसका ख़त्ना न हुआ हो।
324- नशे की चार किस्में हैं ।
1- जवानी का नशा।
2- दौलत का नशा।
3- नींद का नशा।
4- इत्तेदार का नशा।
325- मुझे यह बात पसन्द है कि मोमिन हर पन्द्रहवें दिन नूरा लगाये।
326- मछली कम खाओ क्योंकि इससे बदन में पानी हो जाता है औऱ बलग़म में इज़ाफ़ा होता है , साँस भारी हो जाती है।
327- आहिस्ता-आहिस्ता दूध पीने से अमरारज़ दूर हो जाते हैं , सिवाय मरज़ुल-मौत के।
328- अनार उसके अन्दर की चर्बी के साथ खाओ , इससे मेदा पुख़्ता होता है। और दिल ज़िन्दा होता है , शैतानी वुसवास दूर होता है।
329- कास्नी खाओ क्योंकि हर सुबह जन्नत का एक क़तरा उस पर गिरता है।
330- बारिश का पानी पियो इससे बदन पाकीज़ा होता है , अमराज दूर होते हैं क्योंकि ख़ुदा वन्दे आलम का इरशाद है कि ख़ुदा आसमान से पानी नाज़िल करता है ताकि उससे तुम्हें पाक करे और तुमसे शैतानी वुसवास दूर करे।
331- काले दाने में मौत के अलावा हर मर्ज़ की दवा है।
332- गाये का गोश्त मोजिबे दर्द है लेकिन उसके दूध में शिफ़ा है इसी तरह उसकी चर्बी।
333- ज़ने हामिला के लिये बेहतरीन ग़िज़ा ताज़ा खजूरें हैं ख़ुदा वन्दे आलम ने जनाबे मरियम से कहा था। खजूर की शाखें हिलाओ उससे ताज़ा खजूरें गिरेंगी।
334- अपनी औलाद को ताज़ा खजूरें चबाकर खिलाओ रसूले ख़ुदा ने इमाम हसन और इमाम हुसैन को इसी तरह खिलाई थी।
335- जब अपनी ज़ौजा से हम- बिस्तर होना चाहो तो जल्दी न करो , सब्र करो ताकि वह भी तुम्हारी तरह आमादा हो जाये।
336- अगर किसी अजनबी औरत पर निगाह पड़ने से जज़बात उभरें भी तो अपनी जौजा से हम- बिस्तर हो क्योंकि उसंमें भी वे तमाम चीज़े हैं जो उस अजनबी औरत में हैं।
337- देखो कभी शैतान को रास्ता न दो और उसकी बातों में न आओ।
338- ना- महरम औरतों से दूर रहो।
339- अगर शादी नहीं हुई है तो दो रक़अ़त नमाज़ पढ़ो और ज्यादा से ज़्यादा खुदा की हम्द करो।
340- जिस वक़्त अपनी ज़ौजा से नज़दीक हो तो बातें कम करो वरना फर्ज़न्द गूँगा होगा।
341- उस वक्त शर्मगाह के अन्दर न देखो वरना औलाद बर्स का शिकार होगी।
342- हाँ नज़दीकी के वक्त ये दुआ पढ़ो "अल्लाहुम्मा इन्नी इसतह ल लतो फ़रजहा बे अम्रेका व क़बे लतका बे अमानेका फ इन क़जैता मिन्हा वलदन फज अल हो ज़करन सवय्यन वला तज अलो लिश शैताने फ़ीहे शेरकन वला नसीबन"।
343- अनीमा के बारे मे रसुले ख़ुदा ने फरमाया के अनीमा से पेट बड़ा होता है। अन्दुरुनी ख़राबियाँ दूर होती हैं। जिस्म ताकतवर होता है।
344- बा नफ़्शा के ज़रिये छ़ीको रसुल्लाह ने इसके बारे मे फ़रमाया के अगर लोगों को ये मालूम हो जाये के ब नफ़्सा में क्या क्या फ़ायदा है तो उसको घूँट घूँट पी जाते।
345- हर क़मरी महीनो की इब्तेदाई और वुस्ती रातों में हम बिस्तरी करने से परहेज़ करो क्योकि इन दोनो मवाक़ों (अवसर का बहु) पर शैतान फ़र्ज़न्द की तलाश में रहता है।
346- हर चार शम्बा (बुध) और जुमेअ़ को हजामत (बदन से फासिद ख़ुन निकलवाना) न कराओ क्योकि बुध मनहुस दीन है। और इसी दिन जहन्नम पैदा किया गया है। और जुमेअ़ के दिन एक ऐसा वक़्त है कि जो हजामत करायेगा वह मर जायेगा।
( तोहफुल- उकूल)
अल्लाहुम्मा अज्जिल फ़ी फ़रजे
वली- ये- कल हुज्जतिब निल हसने
सलावातेका अलैहे वज अलना
मिन आवानेही व अनसारेही व ख़ुददामेही।
अल-हम्दो लिल्लाहे अव्वलन व आख़ेरन
[[अलहम्दो लिल्लाह किताब (आदाबे ज़िन्दगी हज़रत अमीरुल मोमनीन (अ.) की नज़र में) पूरी टाईप हो गई खुदा वंदे आलम से दुआगौ हुं कि हमारे इस अमल को कुबुल फरमाऐ और इमाम हुसैन (अ.) फाउनडेशन को तरक्की इनायत फरमाए कि जिन्होने इस किताब को अपनी साइट (अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क) के लिऐ टाइप कराया। 17.8 .2017
फेहरीस्त
पेश लफ़्ज़ 3
हदीस न. 1 से 20 13
हदीस न. 21 से 40 15
हदीस न. 41 से 6019
हदीस न. 61 से 80 21
हदीस न. 81 से 100 23
हदीस न. 101 से 120 26
हदीस न. 121 से 140 31
हदीस न. 141 से 160 33
हदीस न. 161 से 180 35
हदीस न. 181 से 200 37
हदीस न. 201 से 220 42
हदीस न. 221 से 240 46
हदीस न. 241 से 260 50
हदीस न. 261 से 280 52
हदीस न. 281 से 300 55
हदीस न. 300 से 320 59
हदीस न. 321 से 246 61