सामाजिकता
उस्ताद हुसैन अंसारीयान (दामत बरकातुहु)
अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क
बिस्मिल्लाह हिर्रहमा निर्रहीम
किताब: सामाजिकता
लेखन: उस्ताद हुसैन अंसारीयान (दामत बरकातुहु)
अनुवादन: सैयद एजाज़ हुसैन मूसवी
संशोधन: सैयद क़मर ग़ाज़ी ज़ैदी
सैयद ताजदार हुसैन ज़ैदी
विषयसूची
सामाजिकता 1
विषयसूची 3
प्रस्तावना (लेखक) 13
प्रस्तावना (अनुवादक) 17
इस्लाम सम्पूर्ण और अविनाशी विधान 19
ईश्वर को केवल इस्लाम धर्म स्वीकार्य है 23
इस्लाम सारे संसार का धर्म है 24
सामाजिकता इस्लाम की दृष्टि में 25
सामाजिकता का महत्व 26
सामाजिकता सृष्टि के नियम के अनुरूप है 26
सृष्टि का मेलजोल एवं मैत्री 28
पक्षियों के पंख और मनुष्य का जीवन 29
पानी और ताप 30
वायु और वर्षा 31
कुकुरमुत्ता और जलबक 33
घास और जानवर 34
इंसानी शरीर 38
सामाजिकता की आवश्यकता 38
इस्लाम में सामाजिकता 40
सामाजिकता के दो पहलू 41
प्रभावित होना और प्रभावित करना 45
सही प्रभाव स्वीकार करने का उदाहरण 49
मार्गदर्शन के लिये साथ रहना 53
नैशापूर में लेखक के साथ घटने वाली आश्चर्य जनक घटना 56
प्रेमी पर प्रेम पात्र का प्रभाव 64
पैग़म्बरे इस्लाम (स) और उनके अहलेबैत (अ) से प्रभावित होना 67
वफ़ादार दोस्त 70
इमामे सादिक़ (अ) का पड़ोसी 73
सच्ची दोस्ती का महत्व 75
अच्छाई को पहचानने की कसौटी 76
रोग निवारण नुस्ख़ा 78
दोस्ती के कारण 79
दोस्ती में पहचान प्रतिभा की आवश्यकता 83
सामाजिकता और महाप्रलय 85
सामाजिक वास्तविकता से कटने का परिणाम 87
पवित्र एवं अपवित्र साथी 89
महान दायित्व 89
दोस्त रूपी दुश्मन की निशानियां 93
उक़बा बिन अबी मुईत की खेदजनक कथा 95
ग़लत संगत आत्मा के लिये दर्दनाक सज़ा 99
दिल व दिमाग़ पर होने वाले अत्याचार की दुहाई 101
आयतों व हदीसों की चेतावनी 104
भटके हुए लोगों से सामाजिकता का मना होना 111
नादान लोगों की संगत व दोस्ती से बचना 114
ग़लत लोगों की संगत 116
अच्छा और पवित्र साथी 118
सबसे बड़ी नेकी 120
अच्छे लोगों के साथ दोस्ती का महत्व 120
अच्छा साथी , माहिर बाग़बान 124
सही दोस्ती के साथ दुनिया और आख़ेरत का सौभाग्य 127
हज़रत अली (अ) की दृष्टि में पवित्र मित्र 129
नबियों का साथ 130
अध्यात्म की बुनियाद पर चयन 130
फ़िरऔन की पत्नी आसिया 133
हबीबे नज्जार (बढ़ई) 137
अमीरुल मोमिनीन (अ) की नबियों के साथ सामाजिकता 138
इमाम हुसैन (अ) नबियों की सिफ़तों का आईना 141
पवित्र क़ुरआन का साथ 144
दुनिया और आख़ेरत की भलाई से लाभ उठाना 145
वास्तविक सभ्यता और झूठी संस्कृति 153
आज की सभ्यता 155
इंसान अल्लाह के संदेश (वही) का भूखा 163
पवित्र क़ुरआन का मार्ग दर्शन 164
सोच विचार पर उभारना 167
पवित्र क़ुरआन का इतिहास लेखन 168
पवित्र क़ुरआन में अच्छे लोग 170
ज़ालिमों को सज़ा और नेकों को पुन्य 173
पवित्र क़ुरआन में महाप्रलय 175
पवित्र क़ुरआन के पाले हुए 178
अहले बैत अलैहिमुस सलाम के साथ सामाजिकता 182
बेहतरीन दोस्त 182
अहले बैत अलैहिमुस सलाम के साथ दोस्ती व सामाजिकता के लक्षण 187
अंधकारमय मौत से निजात 187
कश्ति ए निजात के ज़रिये निजात 189
इंसानियत के कमाल तक पहुचना 192
दो सच्चे व वास्तविक मित्र 197
हज़रत इमाम अली अलैहिस सलाम और निर्धन व्यक्ति 202
हज़रत इमाम अली रज़ा अलैहिस सलाम की कृपा 204
ज़ुहैर बिन क़ैन बजली 206
बहादुरी की मेराज 208
इंसानी और ईश्वरीय मित्र की बुलंदी 211
इश्क़ की राह में पाकदामनी 212
अच्छाईयों से इश्क़ की महानता 215
ज़ालिमों को मुंहतोड़ जवाब 220
जन्नती आचरण और जन्नती घराना 225
पैग़म्बरे अकरम (स) उवैसे क़रनी का अध्यात्मिक जुड़ाव 229
तैमूर लंग का नसीहत लेना 232
अमीर अब्दुल्लाह ख़लजिस्तानी 233
पवित्र जीवन का परिलेख 235
सच्चे दोस्त के बारे में सुन्दर मिसाल 239
पहाड़ की बुलंदी पर झरना 244
बुद्धिमान लुक़मान और अदुभुत सामाजिक 249
मुक़द्दसे अरदबेली से अध्यात्मिक जुड़ाव 251
वहीदे बहबहानी से अध्यात्मिक जुड़ाव 253
दोस्ती और सामजिकता के अधिकार 255
सामाजिकता पर इमाम सादिक़ अलैहिस सलाम का दृष्टिकोण 258
सामाजिकता (मुआशेरत) ख़राब होने का कारण 265
धोखा व फ़रेब 265
चुग़लखोरी 266
ग़ीबत 268
आरोप और इल्ज़ाम लगाना 270
मुनाफ़ेक़त 271
बदला और इन्तेक़ाम 272
उलझना और झगड़ना 274
दर्दों की दवा 275
बुतून (पेट) का हराम से ख़ाली होना 275
खाने में भूख और संतुलन का ध्यान रखना 281
आधी रात को तहज्जुद और इबादत 283
सभ्य और योग्य लोगों के साथ उठना बैठना। 290
जुदाई तौबा के स्वीकार होने का कारण 294
सामाजिकता के बेहतरीन नमूने 299
ख़ुदा के लिये सब्र करना 299
इंसानीयत की मेराज 300
प्रगति और कमाल तक पहुचने के लिये इल्म हासिल करना 304
मिरज़ा जवाद मलेकी एक संपूर्ण अंतरयामी और भक्ती में लीन विद्धान 308
इरफ़ान व अध्यात्म की बुलंदियों को तय करने वाले आयतुल्लाह काज़ी 311
आत्मा की महानता व स्वतंत्रता 315
बेमिसाल ज़ोहद व तक़वा 320
मुल्ला अब्बास के पत्रों से तर्बरुक हासिल करना 324
अच्छाईयों और नेकियों का आगमन 326
नूर का जलवा 327
बेदीनी के तूफ़ान में धर्म की रक्षा 330
बेहतरीन शिक्षक और माँ 336
शिक्षक का महान दायित्व 338
दोस्ती की ज़रुरत 338
बेहतरीन शिक्षक इंसानी जीवन के बेहतरीन बाग़बान 340
पौधे और बीज के गुणों की पूर्ण जानकारी होना। 340
उन्नति व प्रगति के लिये रास्ते को समतल बनाना। 341
उन्नति व प्रगति के लिये ज़रुरी मदद 341
बढ़ते पौधों की लगातार देखभाल 342
शिक्षक और इंसानी जीवन की पाँच श्रेणियां 347
शिक्षक और इंसानी जीवन की पाँच श्रेणियां 349
पहला पड़ाव (खेलकूद) 352
बचपन के खेल 352
बच्चों को स्वतंत्र छोड़ देना 354
सीख लेने योग्य घटना 355
दूसरा पड़ाव , मनोरंजन 357
फ़ुर्सत के समय 358
बुद्धि , बुरे स्वभाव की संरक्षक 359
विचारों की गुमराही 361
झिंझोड़ देने वाली कथा 364
तीसरा भाग: ज़ीनत (सजना संवरना) 365
जवानों की शिक्षा व प्रशिक्षण 366
अदृश्य ख़तरा 368
शिष्टाचार सिखाना 369
कलयुग में प्रशिक्षण 370
प्रशिक्षण का दौर 371
औलाद का अधिकार 372
मां बाप की लापरवाही पर बच्चों की ज़िम्मेदारी 373
वैभव (सजना संवरना) जैसी बीमारी का इलाज 374
चौथा पड़ाव , घमंड व बड़ाई 375
शक्ति एवं प्रभाव बढ़ाने की बीमारी का इलाज 375
उचित अभिमान व सत्कार 377
पाचवां पड़ाव माल की अधिकता 378
आर्कषित होना और आकर्षित करना , प्रभावित होना और प्रभावित करना ऐसी वास्तविकता है जो इस संसार के लगभग सभी प्राणी वर्ग में पाई जाती है।
अगर ऐसा नही होता तो दुनिया में हर चीज़ जोड़ा नही होती और इसके कारण संसार में जो बेहतरीन प्रभाव पाये जाते हैं या जितनी बड़ी और जिस पैमाने पर प्रगतियां हो रही है संभवत वह न होतीं।
सूरज अपनी ताक़त के ज़रिये ज़मीन पर प्रभाव डालता है। ज़मीन सूरज की किरनों के प्रभाव से गर्मी प्राप्त करके और दूसरी अन्य चीज़ों की सहायता से विभिन्न प्रकार पेड़ , पौधे , अनाज , घास , फूल , खनिज और क़ीमती पदार्थ पैदा करती है।
अगर मिट्टी के कणों में प्रभावित करने की शक्ती न होती तो बहुत सी चीज़ों का कोई प्रभाव नही होता। जैसे खान पान आहार , दवायें , विभिन्न प्रकार के कपड़े , पानी , हवा , सर्दी और गर्मी में भिन्न भिन्न प्रकार के प्रभाव पाये जाते हैं जिन्हे ज़िन्दा जीव स्वीकार करते हैं और उन प्रभाव को अपने वुजूद से जोड़ा बनाते हैं और इसी तरह से प्रगति व उन्नती करके अपना जीवन व्यतीत करते रहते हैं।
संसार के समस्त प्राणियों में मनुष्य के अंदर सबसे ज़्यादा प्रभावित होने और प्रभावित करने की क्षमता पाई जाती है। यहां तक कि इंसान अपने इस जीवन के बाद की दुनिया की सफ़लता व असफ़लता भी इसी चीज़ के ज़रिये से अर्जित करता है।
यह इंसान जिस में पाये जाने वाले सकारात्मक प्रभाव , प्रशिक्षण , मार्गदर्शन और ज्ञान की वास्तविकताएं , जो वह अपने प्रभाव से दूसरों तक पहुचाता है और उन्हे प्रभावित करता है। निसंदेह वह इस महान समाज सेवा के माध्यम से अपनी दुनिया व परलोक में मिलने वाले पुरस्कार को सुरक्षित कर लेता है और जो इंसान भी ऐसे स्रोत से मिलने वाले प्रभाव को स्वीकार करता है और ऐसे प्रशिक्षण , मार्गदर्शन और ज्ञान की वास्तविकताओं से ख़ुद का संवारता है तो बेशक वह अपनी दुनिया व परलोक की ख़ुश क़िस्मती को प्राप्त कर लेता है।
सामाजिकता , मित्रता , दोस्ती व संगत एक ऐसी हक़ीक़त है जो प्रभाव डालने और प्रभाव स्वीकार करने के मामले में बहुत महत्वपूर्ण और शक्तीशाली है , इतनी ज़्यादा कि इंसान के जीवन में शायद ही कोई दूसरी चीज़ इतना ज़्यादा आकर्षण रखती होगी।
सामाजिकता व संगत का मामला अगर सही और सकारात्मक तरीक़े से सारी शर्तों और क़ानून की रिआयत के साथ अंजाम दिया जाये तो बेशक वह दुनिया व परलोक की सच्ची और हमेशा की ख़ुश क़िस्मती का कारण बन सकता है और इसी तरह से अगर इसे ग़लत और नकारात्मक तरीक़े और क़ानून और नियमों की अनदेखी करते हुए अंजाम दिया जाये तो वह इंसान की हमेशा की परेशानी का सबब हो सकता है।
इंसान जो अपने तमाम वुजूद के साथ दूसरों से मुहब्बत व हम नशीनी व दोस्ती का लुत्फ़ उठाता है , अगर वह अच्छे और सकारात्मक , योग्य , नेक , ख़ूबियों वाले , इज़्ज़तदार , समझदार , अच्छी सोच , सूझबूझ वाले और जानकार लोगों के साथ इन विशेषताओं की बुनियाद पर दोस्ती व सामाजिकता के बंधन में बंधेगा और उनके सकारात्मक प्रभाव को स्वीकार करेगा तो वह भी उनकी तरह या संभवत उन से भी बेहतर हो सकता है। ठीक इसी तरह से कि अगर वह नकारात्मक छवि वाले , बुरे , ख़राब , बुरी आदत के मालिक , असभ्य , जाहिल और अनपढ़ लोगों के साथ मित्रता व संगत को अपनायेगा और उसके नकारात्मक प्रभाव को स्वीकार करेगा तो उन ही के जैसा या संभवत उनसे भी बुरा व पस्त हो सकता है।
इस्लाम धर्म ने दोस्ती व हम नशीनी , संगत व सामाजिकता के इंसान की ज़िन्दगी में शदीद प्रभाव डालने व प्रभाव स्वीकार करने को ध्यान में रखते हुए , इस के लिये पवित्र क़ुरआन और हदीसों में एक अलग विशेष अध्याय का गठन किया है और उस में इस के सकारात्मक व नकारात्मक प्रभावों की तरफ़ इशारा किया है और समाज और मुआशरे को सकारात्मक व अच्छी सामाजिकता की तरफ़ मार्गदर्शन किया है और बुरी और नकारात्मक सामाजिकता से मना किया है। सही सामाजिकता व पवित्र लोगों की संगत व दोस्ती को दुनिया व आख़िरत की अच्छाई का सबब बयान किया है और ग़लत सामाजिकता व ग़लत संगत , अपवित्र , असभ्य , हैवान सिफ़त मित्रों की मित्रता व सामाजिकता को दुनिया व आख़ेरत की ख़राबी का कारण बताया है।
यह किताब जो आपके सामने है , इसमें मैंने अल्लाह की मदद और उसकी तौफ़ीक़ से सामाजिकता व सामाजिक व्यवहार के बारे में बहसों और बातों पर इस्लाम धर्म के दृष्टिकोण को पवित्र क़ुरआन और हदीस के अनुसार लिखा है , जहां तक संभव हुआ मैंने इस मौज़ू के तमाम पहलुओं व वास्तविकताओं पर ध्यान देने की कोशिश की है और मौज़ू और शीर्षक को देखते हुए इसकी ज़रुरत , आवश्यकता , महत्व व सकारात्मक प्रभाव के अनुसार अथवा बहस की समानता व मुनासिबत से और बहुत सी दूसरी बातों की शामिल किया गया है।
फ़क़ीर हुसैन अंसारीयान
15.04.1383 (हिजरी शम्सी)
इस वक़्त क़ौम और ख़ास तौर पर जवानों की जो हालत है वह किसी साहिबे नज़र से पोशीदा नही है। इस ज़वाल और पिछड़ेपन के असबाब बहुत से हैं जहां एक तरफ़ तालीमो तरबीयत की तरफ़ ग़फ़लत और कमी इस का एक सबब है वहीं क़ौम ख़ास कर जवानों की मज़हबी व दीनी , ज़ेहनी व फिक्री नश व नुमा के लिये हमारे पास अच्छे लिटरेचर का न होना है।
अरबी , फ़ारसी और उर्दू में किसी हद तक इस कमी का इतना एहसास नही होता मगर इस वक़्त जवानों की उर्दू ज़बान व अदब से दूरी ने अहले नज़र हज़रात के लिये ज़ियादा मुश्किलें पैदा कर दी हैं। लिहाज़ा ज़रुरत इस बात की है कि इस कमी को महसूस करते हुए हम सब मिल कर क़दम बढ़ाये। कहीं ऐसा न हो कि हमारी यह ग़फ़लत हमारे जवानों और नस्लों को मज़हबी अफ़कार से दूरी का सबब फ़राहम कर दे।
इस बात के पेशे नज़र ज़रुरत है इस बात कि ज़ियादा से ज़ियादा किताबों का अरबी व फ़ारसी व उर्दू से हिन्दी में तर्जुमा करके हिन्दी के ज़ख़ीरे को बढ़ाया जाये , ता कि हमारे हिन्दी पढ़ने वाले क़ारी पीछे न रह जायें।
ज़ेरे नज़र किताब उसी सिलसिले की एक कड़ी है जिस में सादे व आसान व आम फ़हम ज़बान में मतलब को अदा करने की कोशिश की गई है।
मौज़ू के ऐतेबार से यह किताब हिन्दी के इस्लामी ज़ख़ीरे में यक़ीनन इज़ाफ़ा है।
उम्मीद है क़ारेईन इससे कमा हक़्क़हू फ़ायदा उठायेगें और समाज की एक फ़र्द की हैसियत से एक अच्छे समाज की बुनियाद रखने की राह में अपनी कोशिश से दरेग़ नही करेगें।
और आख़िर में गुज़ारिश है कि क़ारेईने केराम इस किताब की कमियों और ग़लतियों की तरफ़ रहनुमाई करेगें ता कि आईन्दा उनका इज़ाला किया जा सके।
ख़ुदावंदे आलम हमारी इस नाचीज़ सी ख़िदमत को क़बूल फ़रमाएं और हम सबको दीनी ख़िदमात की तौफ़ीक़ अता फ़रमाएं।
वस सलाम
सैयद एजाज़ हुसैन मूसवी
(हौज़ ए इल्मिय ए क़ुम)
इस्लाम , स्वस्थ विश्वासों , सही आचरण , अच्छे चरित्र , स्थिर अहकाम और आदेशों एवं निषेधों का संग्रह है। यह सृष्टि की उत्पत्ती से ही ईश्वर का धर्म था और इस के अंत तक ईश्वर का धर्म रहेगा।
इस धर्म के नियम और सिद्धांत प्रत्येक काल में मनुश्य की आवश्यकता के अनुसार वही (ख़ुदा का आदेश जो फ़रिश्ते के ज़रिये नबी तक पहुचता है) के माध्यम से रसूले अकरम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) के पाक ह्रदय पर उतारे गये हैं और आप (स) लोगों के अनुदेश के लिए इन सिद्धांतों का वर्णन किया करते थे।
पैग़म्बरे अकरम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) की रिसालत के मध्य में जब आपने ग़दीरे ख़ुम में अमीरुल मोमिनीन अली (अलैहिस सलाम) को मोमिनीन का संरक्षक , लोगों की स्वामी , शासक और मार्ग दर्शक बनाया गया तो यह इस्लाम धर्म के सिद्धातों के पेश करने , हलाल एवं हराम का वर्णन करने और वास्तविक्ता को प्रमाणित करने लिहाज़ से सम्पूर्ण हुआ और लोगों को महाप्रलय तक आप (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) के अतिरिक्त किसी और को पैग़म्बर , क़ुरआन के अतिरिक्त दूसरी किताब और इस्लाम के अतिरिक्त किसी दूसरे धर्म से नि:स्पृह (बे नियाज़) कर दिया गया और उनको ऐसी वास्तविक्ता के पास ला दिया गया जिसके माध्यम से वह महाप्रलय तक अपने माद्दी और मानवी सिद्धांतो की आवश्यकता को पूरा कर सकें।
الْيَوْمَ أَكْمَلْتُ لَكُمْ دِينَكُمْ وَأَتْمَمْتُ عَلَيْكُمْ نِعْمَتِي وَرَضِيتُ لَكُمُ الإِسْلاَمَ دِينًا
आज मैने तुम्हारे लिये धर्म को सम्पूर्ण कर दिया है और अपनी अनुकम्पा को सम्पूर्ण कर दिया है और तुम्हारे लिये इस्लाम धर्म को मनोनीत कर दिया है।
इमाम मुहम्मद बाक़िर (अलैहिस सलाम) फ़रमाते है:
وکانت الفریض ۃ تنزل بعد الفریض ۃ الاخری و کانت الولای ۃ آخر الفراءض فانزل الل ہ عزول(الْيَوْمَ أَكْمَلْتُ لَكُمْ دِينَكُمْ وَأَتْمَمْتُ عَلَيْكُمْ نِعْمَتِي وَرَضِيتُ لَكُمُ الإِسْلاَمَ دِينًا )
पैग़म्बरे अकरम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) के अवतरण काल में निरंतर विभिन्न प्रकार के अहकाम अवरोहित होते थे , मुसलमानो की विलायत और मार्ग दर्शता अन्तिम आवश्यक काम था (जिसको अवरोहित करने के बाद) ईश्वर ने यह आयत अवरोहित की (आज मैने तुम्हारे लियह धर्म को सम्पूर्ण कर दिया है और अपनी अनुकम्पा को सम्पूर्ण कर दिया है और तुम्हारे लिये इस्लाम धर्म को मनोनीत बना दिया है।)
एक कथन में इमाम जाफ़र सादिक़ (अलैहिस सलाम) फ़रमाते हैं:
पैग़म्बरे अकरम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) की सेवा में जिबरईल उपस्थित हुए और कहा ऐ मुहम्मद , ईश्वर आप पर सलाम भेजता है और आपसे कहता है अपनी उम्मत (मुसलमानों) से कहो कि आज तुम्हारे धर्म को अबी तालिब के बेटे अली (अलैहिस सलाम) के मार्ग दर्शन और विलायत के माध्यम से पूर्ण कर दिया और अपनी अनुकम्पा को तुम पर सम्पूर्ण कर दिया और तुम्हारे लिये इस्लाम धर्म को स्वीकार कर लिया। और इसके बाद अब कोई आदेश अवरोहित नही करूंगा। इससे पहले नमाज़ , ज़कात , रोज़ा , और हज को आदेश बना कर उतार चुका हूँ और विलायत एवं उत्तराधिकारी का ऐलान पाँचवा और अन्तिम आदेश है , और इन चारों आदेशों को भी अबी तालिब के बेटे अली (अलैहिस सलाम) की विलायत एवं नबी का उत्तराधिकारी मानने के बिना स्वीकार नही करूंगा।
इस वास्तविकता का वर्णन कर देना आवश्यक है कि पैग़म्बरे अकरम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) और अइम्मा मासूमीन (अलैहिमुस सलाम) के तमाम कथन , ईश्वरीय आदेशों और क़ुरआनी आयतों की व्याख्या हैं , जो कि विश्वस्त किताबों से विश्वासपात्र रावी (किसी बात को बयान करने वाला) से ली गयी हैं , यह सारे कथन समय के अनुसार और लोगों की आवश्यकता के अनुरूप शिक्षा एवं ज्ञान के स्रोत और अलौकिक परिवार से निकले है।
इस्लाम , स्वस्थ विश्वासों , सही आचरण , अच्छे चरित्र का नाम है और इंसानों को ईश्वर के आदेशों को बिना किसी तर्क के स्वीकार कर लेना चाहिये , जिस समय इस्लाम इंसानों की माद्दी और मानवी (लौकिकि एवं अलौकिक) जीवन के सम्पूर्ण व्यवहारिक एवं सदाचारिक पक्षो में विश्वास के साथ विराजमान हो जाता है तो वह इंसान को मुसलमान की परिधि से निकाल कर उस के वास्तविक आशय में प्रविष्ट कर देता है परिणाम स्वरूप इंसान को परलोक एवं संसार दोनो का सौभाग्य प्राप्त हो जाता है।
ईश्वर के सारे आदेशों को स्वीकार कर लेने का मूल्य इतना अधिक है कि तमाम अम्बिया और औलिया ने विनती एवं विलाप के साथ इसकी इच्छा की है।
हज़रत इब्राहीम और इस्माईल (अलैहिमुस सलाम) ने काबे का निर्माण करने के बाद दुआ के लिये हाथ उठाया और ईश्वर से कहाः
رَبَّنَا وَاجْعَلْنَا مُسْلِمَيْنِ لَكَ وَمِن ذُرِّيَّتِنَا أُمَّةً مُّسْلِمَةً لَّكَ
हे ईश्वर! हम दोनो को अपना मुसलमान और आज्ञाकारी बना दे और हमारी संतान में भी एक आज्ञाकारी उम्मत पैदा कर।
हज़रत याक़ूब (अलैहिस सलाम) ने अपने बेटों को वसीयत (मरते समय कहना कि मेरे पश्चात ऐसा ऐसा किया जाये) करते समय कहा और इस बात की इब्राहीम (अ) और याक़ूब (अ) ने अपनी संतान को वसीयत की और कहाः
وَوَصَّى بِهَا إِبْرَاهِيمُ بَنِيهِ وَيَعْقُوبُ يَا بَنِيَّ إِنَّ اللّهَ اصْطَفَى لَكُمُ الدِّينَ فَلاَ تَمُوتُنَّ إَلاَّ وَأَنتُم مُّسْلِمُونَ
और इसी बात की इब्राहीम (अ) और याक़ूब (अ) ने अपनी औलाद को वसीयत की कि ऐ मेरे बेटों , ईश्वर ने तुम्हारे लिये धर्म को निर्वाचित कर दिया है अब उस समय तक संसार से ना जाना जब तक वास्तविक मुसलमान न हो जाओ।
हज़रत यूसुफ़ (अलैहिस सलाम) ने ईश्वर के दरबार में इस प्रकार से प्रार्थना कीः
تَوَفَّنِي مُسْلِمًا وَأَلْحِقْنِي بِالصَّالِحِينَ
मुझे संसार से आज्ञाकारी उठाना और सदाचारियों की पंक्ति मे रखना।
इंसान की पूरे माद्दी और मानवी जीवन काल मे न्यायिक स्तर पर अनुदेश और उसकी इन्सानियत के आधार को दृढ़ करते हुऐ उसको गुणों एवं विभूति का स्रोत बना देना , इस्लाम के अतिरिक्त कोई और धर्म नही कर सकता है।
इस्लाम ईश्वर के समक्ष सर झुकाता है और उसके आदेशों का संचालन करते हुऐ इंसान के जीवन को संसार मे पवित्र जीवन और परलोक मे अशीयतुर राज़िया बना देता है और चूंकि कोई भी अध्यापक या संस्कृति एवं सभ्यता , इस्लाम की तरह सम्पूर्ण और शक्तिमान नही है इसलिए ईश्वर ने इसको इंसानों के लिये धर्म विधान बनाया है और इस्लाम के अतिरिक्त किसी दूसरे धर्म को स्वीकार नही किया है।
ईश्वर ने जिस प्रकार से संसार मे इस्लाम को इंसान के लिये मनोनीत धर्म जाना है उसी प्रकार महाप्रलय मे भी वह अपने भक्तों से केवल इसी धर्म को मांगेगा।
ईश्वर संसार में अपने मनोनीत धर्म के बारे मे कहता हैः
رَضِيتُ لَكُمُ الإِسْلاَمَ دِينًا ।
तुम्हारे लिये इस्लाम धर्म को मनोनीत बना दिया है।
और महाप्रलय मे इस्लाम के लिये कहता हैः
وَمَن يَبْتَغِ غَيْرَ الإِسْلاَمِ دِينًا فَلَن يُقْبَلَ مِنْهُ وَهُوَ فِي الآخِرَةِ مِنَ الْخَاسِرِينَ
और जो इस्लाम के अतिरिक्त कोई भी धर्म मानेगा तो वह धर्म उससे स्वीकार नही किया जाएगा और वह महाप्रलय के दिन घाटे उठाने वालों मे होगा।
यह पवित्र धर्म आत्मा के अनुसार ईश्वर के सामने सिर झुकाने और उसके आदेशों का पालन करना है इसलिए यह धर्म केवल इन्सानो के लिए नही है बल्कि यह अपनी उत्पत्ति के पड़ाव मे इस संसार की सारी चीज़ों को सम्मिलित है।
क़ुरआने मजीद इस बारे में फ़रमाता हैः
وَلِلّهِ يَسْجُدُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الأَرْضِ مِن دَآبَّةٍ وَالْمَلآئِكَةُ وَهُمْ لاَ يَسْتَكْبِرُونَ
और अल्लाह ही के लिए आसमान की सारी चीज़ें और ज़मीन के सारे चलने वाले और फ़रिश्ते सजदा करते हैं और कोई अभिमान एवं घमंड करने वाला नही है
दूसरी आयत में फ़रमाता हैः
وَالنَّجْمُ وَالشَّجَرُ يَسْجُدَانِ
और बेल बूटियां और वृक्ष सब उसी को सजदा कर रहे हैं।
बहरहाल अपनी उत्पत्ति के पड़ाव में इस्लाम सारी सृष्टि का धर्म है लेकिन तशरीअ (आदेश के पड़ाव) में मनुष्य के लिए ईश्वर का मनोनीत धर्म है।
सारी सृष्टि के ऊपर जो दृण और मज़बूत व्यवस्था शासन कर रही है वह तकवीनी इस्लाम है। (उत्पन्न इस्लाम)
इंसान अगर सारी सृष्टि और दृण एवं मज़बूत व्यवस्था से लाभ उठाना चाहता है तो उसको इस्लामी आदेशों (तशरीई इस्लाम) को मानना पड़ेगा और वह अपने जीवन की सारी लौकिक एवं अलौकिक (माद्दी एवं मानवी) आवश्यकताओं को इस्लाम पर आस्था रखने और उसके आदेशों का पालन करने के माध्यम से पूरा कर सकता है और इस संसार एवं परलोक का सौभाग्य प्राप्त कर सकता है।
इस्लाम धर्म में ईश्वर की अराधना (इबादत) , एकाकी , समाजी , अर्थव्यवस्था , सियासत , ब्रह्माज्ञान , बुद्धि और ज्ञान जैसी सारी चीज़े पाई जाती हैं , इसीलिए क़ुरआने करीम ने इसको संपूर्ण धर्म जाना है और इसी संपूर्णता की वजह से सामाजिकता की तरफ़ ध्यान दिलाया है जो मनुष्य के लिए अति आवश्यक है और सही सामजिकता की वयाख्या करने के लिए मार्ग दर्शन है चाहे वह अम्बिया , अइम्मा और ईश्वरीय दूतों के साथ आत्मा का संबन्ध हो या उनके समक्ष हो , और चाहे उनकी अनुपस्तिथि में , इसी प्रकार सामाजिकता चाहे पत्नी , बेटे , माँ , बाप और संबंधियों के साथ हो या दूसरे व्यक्तियों के साथ , इस्लाम ने ऐसे नियम बना दिये हैं कि अगर कोई सामाजिकता की सारी समस्याओं में इन आदेशों का पालन करे तो कल्याण एवं सौभाग्य उसके क़दम चूमेंगें और सामाजिकता से माध्यम से एक दूसरे के दोस्त हो जाऐगें और इस प्रकार से अपनी कुछ लौकिक एवं अलौकिक (माद्दी एवं मानवी) समस्याओं या दूसरे की समस्याओं का हल निकाल सकेगें।
बहरहाल इस सारी सृष्टि पर एक नियम शासन कर रहा है इस प्रकार से कि आत्मज्ञानी इसको एक मानते हैं , जैसे कि सारे संसार सारी उत्पत्ति इंसान को निमंत्रण दे रही है किः
सारे इंसान अपने जीवन को दोस्ती और मुहब्बत से जरिये और सब मिल जुल कर माद्दी मानवी (लौकिक एवं अलौकिक) सदाचार इंसानी आचरण में एक दूसरे की सहायता करें और एक दूसरे की ख़ुशी और ग़म में सम्मिलित हों और एक दूसरे के जीवन के रिक्त स्थान को अच्छे व्यवहार से भरें , और ईश्वर एवं परलोक पर आस्था और इस्लाम के जीवनदायी नियमों का ज्ञान रखते हुए सामजिकता एवं दोस्ती के साथ जीवन यापन करें , ताकि सबकी दुनिया एवं परलोक सौभाग्यमय हो जाए और कल्याण एवं सौभाग्य सदा उन के संग रहे और इस प्रकार की सामजिकता और दोस्ती की छाया में सुख शांति , प्यार मुहब्बत , और श्रेष्ठता और बड़ाई से जीवन यापन करें।
यह दोस्ती और मिलाप चीज़ों के बीच विशेषकर मनुष्य के लिए महान प्रतिफल को जन्म देती है। ऐ काश कि इंसान भी एक दूसरे के लिए मैत्री , दोस्ती एवं पार्श्व वर्ती के साथ एक दूसरे के जीवन में अच्छे विचार व्यक्त करते ताकि जीवन का वातावरण स्वर्ग जैसा हो जाता और सदैव एक दूसरे से इंसानी एवं सद्व्यवहारिक लाभ उठाते। नि:सन्देह इस प्रकार की दोस्ती और पार्षदता केवल ईश्वर , महाप्रलय , इस्लाम धर्म के नियमों का पालन करने , अम्बिया , क़ुरआन और मासूमीन (ईश्वरीय दूत) पर आस्था रखने से ही मिल सकती है।
अब्र व बाद व मह व ख़ुर्शीद व फ़लक दर कारन्द
ता तू नानी बे कफ़ आरी व बे ग़फ़्लत नख़ुरी
बे हमे अज़ बहरे तू सर गश्ते व फ़रमान बरदार
शर्ते इंसाफ़ नबाशद के तू फ़रमान नबरी
अनुवादः बादल , हवा , चाँद , सूरज और आसमान सब तुम्हारे लिये काम में लगे हैं ताकि तुम हाथ में आई हुई रोटी को बेख़बरी में न खाओ , सब तुम्हारे के लियह आदेश का पालन करने में लगे हैं लिहाज़ा , यह न्याय नही है कि तुम (अल्लाह के) आदेश का पालन न करो।
इस वास्तविक्ता की व्याख्या कि सारी सृष्टि एक दूसरे से मिली हुई है करने के लिए एक बहुत बड़ी पुस्तक लिखने की आवश्यकता है , इसलिए हम यहां पर इससे संबंधित कुछ आवश्यक पहलुओं पर प्रकाश डाल रहे हैं।
अगर सृष्टि के बीच बुद्धिमान और शक्तिमान पैदा करने वाला , कृपालु और बुद्धिमान उत्पत्ति कर्ता इस प्रकार की दोस्ती मिलाप उत्पन्न न करता तो नि:सन्देह जीवन इस प्रकार न होता और सृष्टि का क्रम इतना सुंदर और व्यवस्थित एवं संगठित आकृति में प्रकट न होता।
सारी सृष्टि एक दूसरे मे समाहित है , यानी एक का जीवन दूसरे के जीवन पर निर्भर है , दूसरे शब्दों में यह कहा जाए कि हर एक का अस्तित्व दूसरे के अस्तित्व को पूर्ण करता है।
मानो इस संसार की सारी सृष्टि के सारे अंश और सेल्स एक शरीर से बने हैं , और उनके बीच जीवन का एक संबंध स्थापित है , इस प्रकार से कि अगर इस संसार में कोई छोटा सा दोष भी प्रकट हो जाए और एक प्राणि वर्ग भी समाप्त हो जाए तो दूसरे प्राणियों के जीवन के लिए भी संकट उत्पन्न हो जाएगा।
अब हम यहां पर प्राणि वर्ग के बीच छोटा सा नमूना पेश करते हैं।
अगर पक्षियों के पंख न होते तो इंसान व जानवर जीवित न रहते , अगर विश्वास नही होता तो इस पर ध्यान दें।
पंख , पक्षियों के शरीर को सर्दी एवं गर्मी से बचाने के लिए उन का वस्त्र हैं , और उड़ने में बहुत सहायता करते हैं , अगर पक्षियों के पंख न होते तो सर्दी एवं गर्मी मे वह जीवित नही रह सकते और शीघ्र ही सब समाप्त हो जाऐंगे फिर क्या होगा ?
कीड़े मकोड़े (जो कि अधिक्तर पक्षियों का खाना हैं) अधिक हो जाऐगें और जब यह अधिक हो जाऐंगे तो वह सदैव बढ़ते ही रहेगें और फैलते रहेगें , खेती को खा जाऐंगे , शस्यस्थल और गोचर समाप्त हो जाऐंगे , हरियाली और वृक्ष समाप्त हो जाऐंगे , चरने और घास खाने वाले जानवर खाना न होने के कारण मर जाऐगें , और फिर शाकाहारों के बाद मांसाहारो का नंबर आएगा वह भी मर जाऐंगे और धरती ख़ाली हो जाएगी और कोई भी चलने फिरने वाला प्राणी दिखाई नही देगा , इसी प्रकार कीड़ों की अधिकता से कीटाणु अधिक हो जाऐंगे और जब कीटाणु अधिक होगें तो मनुष्य , जानवर , घास फूंस सब समाप्त हो जाऐंगे।
धरती का पानी सूरज की ऊषमा से भाप बनता है , भाप ऊपर ठंडे स्थल में जाकर बादल बनता है , बादल वर्षा बनते हैं और सभी जानते हैं कि अगर धरती पर वर्षा न हो तो क्या होगा!
क्या आप यह भी जानते हैं कि अगर सूरज की ऊषमा ठीक मात्रा मे धरती के पानी तक न पहुंचे तो वर्षा नही होगी ? अगर पानी को भाप बनने के लिए बहुत अधिक मात्रा मे ताप की आवश्यकता होती तो कभी वर्षा न होती , जो भाप ऊपर जाती है वह अगर ठंडे स्थल में न पहुंचे तो भी वर्षा नही हो सकती , जो भाप ठंडे स्थल में पहुंती है अगर उसमें एक स्थान पर एकत्र होने की योग्यता न होती तो न ही बादल बनते और न वर्षा होती , अगर बादलो में दोष रह जाता तो वर्षा न होती अगर धरती का आक्रषण वर्षा की बूंदों को अपनी ओर न खींचता तो वर्षा न होती और वर्षा में सहायक अनगिनत कारण न होते तो वर्षा न होती।
क्या आप जानते हैं कि जीवित वस्तु और घास के जीवन में वायु कितनी प्रभावी है ? क्या आप जानते हैं कि संसार में हवा चलने में क्या प्रबंध और व्यवस्था छुपी हुई है ?
वायु वर्षा बनाती है , अगर हवा न हो तो वर्षा नही हो सकती , प्रकृति के जानकार कहते हैं कि बादल एक बिजली (विधुत) की तरह है अगर एक प्रकार की हो तो एक दूसरे को दूर करती है और अगर दो तरह की हो तो एक दूसरे को खीचती है।
वायु की विशेषता यह है कि वह दो प्रकार की विधुत को एकत्र करती है परिणाम स्वरूप एक विधुत दूसरी को आकर्शित करती है और विधुत का मिलाप होता है और वर्षा इसी मिलाप का परिणाम होती है , इसलिए इन दो विधुतों के मिलाप एवं मैत्री से जो प्रभावी कार्यकर्ता उत्पन्न होता है और उसको वर्षा का नाम दिया जाता है वह हवा है।
मौसमी हवायें जो महासागरों की तरफ़ से आती हैं और गर्म क्षेत्रों में चलती हैं अगर यह हवायें न चलें तो वहा पर गर्मी की अधिकता से जीवन व्यतीत करना कष्टकारी हो जाता , वायु गर्मी की अधिकता को कम करती है और इन क्षेत्रों को मनुष्य के जीवन अनुसार बनाती है , इन्ही क्षेत्रों में से एक हिन्दुस्तान है जो बहुत गर्म प्रदेश है लेकिन हवा ने इस भूखंड को जीवन के अनुसार बना दिया है।
दरियाई और ज़मीनी हवायें जो रात दिन गर्म क्षेत्रों में चलती रहती हैं इन हवाओं ने समुद्र तट पर रहने वालों के जीवन को आसान बना दिया है।
गर्म क्षेत्रों से गर्म वायु ठंडे इलाक़ो की तरफ़ जाती है और वहां की सर्दी को कम करती है , जैसे इंग्लैड के लिए गल्फ़ इस्ट्रेम और जापान के लिए गल्फ़ वल्ड ( gulf world)
भूमध्य रेखा से नीचे की गर्मी को विद्धान लोग जानते हैं और वह जानते है कि इसकी गर्मी प्रकृति के अनुसार बढ़ती रहती है , उत्तरीय और दक्षिणीय ध्रुव के मुक़ाबले में भूमध्य रेखा के क्षेत्रों में वहां बहुत ही तेज़ होती है जिसके कारण वहां के लोग बहुत आसानी से जीवन बसर करते हैं।
क्षेत्रों की बारिश के हालात को वायु बदल देती है , इन्डोनेशिया जैसे देशों में वर्षा ऋतु को गर्मी की ऋतु कहा जाता है , लेबनान में बारिश सर्दियों में होती है।
कुछ क्षेत्रों में शायद हिन्दुस्तान का एक शहर भी इसी में से है , जहां पूरे साल वर्षा होती है , हिन्दुस्तान के इस क्षेत्र में एक साल में ग्यारह मीटर तक बारिश हो जाती है पृथ्वी पर वर्षा ऋतु की भिन्नता कारण बनती है कि मनुश्य हर तरह की वनस्पति से लाभ उठा सकता है।
ज़्यादातर वनस्पतियों में नर और मादा दोनो पहलू पाए जाते हैं जैसे मनुष्य मे दोनो पाए जाते हैं , अकसर वनस्पतियों में क़लम लगा दी जाए तो वह बहुत ज़्यादा फल देते हैं और अगर यह न किया जाए तो अच्छे फल नही देते हैं।
कुछ वृक्षों की क़लम इंसान लगाता है जैसे खजूर की नेकिल कुछ दूसरे वृक्षो की क़लम नर और मादा के माध्यम से हुवा करती है , इससे पता चलता है कि अगर हवा यह काम न करे तो पूरी दुनिया में अच्छे फल न पायें।
खजूर के वृक्ष के क़लम मे भी हवा का प्रभाव होता है , हवा के माध्यम से क़लम का अर्थ यह है कि वायु नर वृक्ष के कणों को लेकर मादा वृक्ष तक पहुंचा देती है , इस के अलावा कीड़ों के माध्यम से भी यह काम होता है।
अब तक जो बयान किया वह वायु की सेवा से संबंधित था अगरचे हवा की सेवायें इससे बहुत अधिक हैं।
कुकुरमुत्ता अपने अंदर हरे रंग का मूल द्रव्य (क्लोरोफ़िल) न होने के कारण (जो कि अकसर वनस्पतियों में कार्बन लेने के लिए होता है और यह शकर और चर्बी आदि बनाने के काम आता है) सदैव प्रयत्न करता है कि क्लोरोफ़िल वाली घास से दोस्ती करे और इस प्रकार अपने जीवन के लिए उचित आहार प्राप्त करे। इसलिए यह “जलबक से दोस्ती करता है (जो ख़ुद भी एक दूसरे दर्द से ग्रस्त है यानी उसमें पृथ्वी की शक्ति और खनिज पदार्थ को अपने अंदर प्राप्त करके की योग्यता नही होती है लेकिन इसके बदले उसमे क्लोरोफ़िल बहुत अधिक होता है) दोनो तरफ़ से इस दोस्ती और उपनिवेश के प्रस्ताव के माध्यम से कुकुरमुत्ता जलबक से क्लोलोफ़िल प्राप्त करता है और जलबक कुकुरमुत्ते से शक्ति लेता है।
क्या कुकुरमुत्ता और जलबक एक साथ मिलकर अपने इस बुद्धिमता पूर्ण सहयोग के माध्यम से एक सचेत , बसीर , और हकीम (बुद्धिमान) मबदा (पैदा करने वाला) की तरफ़ अनुदेश कर सकता है ?
हर वनस्पति अपने समान वनस्पति उत्पन्न करती है और यह ख़ुद एक आश्चर्य जनक और जटिल वनस्पतियों को उत्पन्न करती है जो कि ईश्वरेच्छा और विस्तिरित प्रोग्राम के अधीन अंजाम पाता है , आपने उनकी परिचित एवं प्रचलित आकृतियों को बहुत बार देखा होगा , अधिक जानकारी के लिए हम दूसरे उदारहण पेश करते हैं:
फूल और वनस्पतियों के विभिन्न समूह अपने कारख़ानों और निजी ग्रंथियों के कारण विभिन्न फूलों के शीरे को बनाते हैं और चुने हुए कीड़ों को अपने इर्द गिर्द इकट्ठा करते हैं ताकि यो कीड़े , क़लम लगाने का काम करें , जिस के फल स्वरूप अगले साल और अगली नस्ल के फूलों और पौधों को तैयार करने के लिए आवश्यक बीज तैयार हो सकें।
यही वह स्थान है जहां वनस्पतियां अपने जमा किये हुए विभिन्न शीरों के माध्यम से कीड़ों को अपने साथ दोस्ती पर बाध्य करते हैं या दूसरे शब्दों मे यह कहा जाए कि ईश्वरीय व्यवस्था ने जानवरों को वनस्पति की उत्पत्ति की सेवा के लिए बनाया है।
इस जटिल प्रक्रिया और राज़ को इस विद्या के जानकार डाक्टर जान विलियम क्लातेस की दृष्टि से अध्ययन करें जो कि जीव विज्ञान के गुरू या फ़िज़ियोलाजी , प्रकृति और फ़लसफ़े के डाक्टर और विभिन्न प्रकार के कीड़ों की विरासत मे माहिर हैं , वह कहते हैः
विश्व के जटिल विषयों में से एक विषय एक तरह का इजबारी संबंध और समागम है जो कुछ उत्पत्तियों के बीच जैसे एक चुने हुए फूल और एक ख़ास जानवर के बीच देखने को मिलता है। इस गहरे संबंध के एक चरितार्थ यूका फूल और यूका मक्खी के अंदर पाया जाता है। यूका फूल के सर नीचे की तरफ़ होता है और इस फूल के मादा के भाग नर फूल से नीचे की तरफ़ होता है , फूल की मादा का भाग जहां बीज को जाना चाहिए , इस प्रकार से है कि उसमे अपने आप बीज प्रवेश नही कर सकता , यूका का बीज मादा यूका मक्खी सूर्यास्त के थोड़ी ही देर बाद उठा कर ले जाती है और फिर यूका मक्खी इस बीज का एक भाग को मुंह मे दबाती है और मादा फूल की ओर उड़ती है , फूल के बीज को उस पर छिड़कती है और अपने बीज के कुछ दाने उस पर रखती है , फिर इस के ऊपरी भाग को इस बीज से छिपा देती है जिस को वह लेकर आई है।
फूल बहुत अधिक दाने देता है जिस मे से कुछ को मक्खी के नवजात कीड़े खा लेते हैं और उसमें से कुछ दाने नये फूल बनाते है , यूका फूल की नस्ल के बाक़ी रहने का राज़ इसकी उत्तपत्ति से लेकर आज तक केवल इसी मक्खी के माध्यम से होता है।
इंजीर और उसके अंदर छोटे छोटे मच्छरों के बीच भी इसी प्रकार का संबंध पाया जाता है।
इंजीर के वृक्ष के गुच्छे दो प्रकार के होते हैं , इनमे से कुछ मे नर फूल भी होते हैं और मादा फूल भी होते है और कुछ मे केवल मादा फूल होते हैं , लेकिन यह सब फूल मादा मक्खियों के माध्यम से क़लम कारी करते हैं , इस प्रकार कि इन फूलों के ऊपर विभिन्न पत्ते होने के कारण उनके प्रवेश को पार करना बहुत कठिन होता है इसलिए बेचारे कीड़े बहुत ही परिश्रम के साथ उसके अंदर जा पाते हैं और उसके अंदर जाते समय उन के पर उखड़ जाते हैं लेकिन ईश्वरेच्छा उनको इस कठिन कार्य पर मजबूर करती है जिस के कारण वह उसके अंदर दाख़िल हो जाते हैं।
अगर फूल उस प्रकार के हैं जिसमें नर और मादा दोनों पाये जाते हैं तो उस में मादा मक्खी अंडे देती है और ख़ुद मर जाती है , बाद में वह अंडे मक्खी बन जाते हैं , नर मक्खियां मर जाती हैं और मादा मक्खियां फूल से बाहर आ कर दूसरे फूलो की तरफ़ उड़ान भरती हैं , लेकिन यह मक्खियां फूलों के अंदर से बाहर आने से पहले फूल के अंदर मौजूद बीज मे लिपट जाती हैं ताकि उस बीज को दूसरे फूलों तक पहुंचा सकें।
अगर दूसरे फूल जिन के ऊपर यह मक्खियां बैठती हैं , उस प्रकार की हैं जिसमें नर और मादा दोनो पाये जाते हैं तो यह गत कार्य दोबारा होता है और अगर नया फूल केवल नर हो तो उस फूल की गहराई अधिक होने के कारण यह मक्खियां उस फूल पर अंडे दिये बिना उस पर बैठने के बाद वहां से उड़ जाती हैं लेकिन उन के इस थोड़ी देर बैठने के कारण उसमें जो बीज लिपटा होता है उसके माध्यम वह उसमें क़लम लगा देती है जिस के परिणाम स्वरूप यह फूल बड़ा होने के बाद इंजीर में बदल जाता है।
जब अमरीका में इंजीर का पहला वृक्ष लाया गया तो उस पर फूल नही आए , काफ़ी समय बाद उन लोगों ने ध्यान दिया कि इस वृक्षों को लाते समय इन के साथ जो मक्खियां होती हैं वह उन को नही लाए थे , इसलिए जब उन ख़ास मक्खियों को लाया गया तो उन वृक्षो पर फल आने लगे और इंजीर अमरीकी व्यवसाय का प्रमुख अंग बन गयी।
इंसान को शरीर के ऐतेबार से एक पूरे शहर से तुलना की जा सकती है , जिसमें जीवन की आवश्यकता के सारी चीज़े पाई जाती हैं जैसे मकान , रास्ते , बहुत शक्तिशाली दूर संचार (फोन , टेलीग्राफ़ , इन्टरनेट आदि) गोदाम , रसोई घर , जीविका बांटने के केन्द्र (कोटे) इसी प्रकार विधुत , पानी की पाइप लाइन , रहने के लिए बहुत अधिक मकान आदि।
हाँ , इस बात पर अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि एक शरीर बनावट किसी शहर की बनावट से बहुत अधिक जटिल है क्योकि शरीर बहुत पलते लाखों सेल्स से बना है जिन में आपस में एक सहमती और एकता पाई जाती है और अपनी इसी अद्रितीय सहमती से एक दूसरे को बनाया है , दूसरे शब्दों मे यह कहा जाय कि इन सेल्स ने आश्चर्य जनक नक़्शे के माध्यम से एक दूसरे को बनाया है जो रत्ती भर भी उस सीमा का उल्लंघन नही करता है।
सामाजिकता मनुष्य के जीवन का अभिन्य अंग है , और यह जीवन के लिए बहुत आवश्यक है , यहां तक कि अच्छी सामाजिकता दुनिया एवं परलोक में सौभाग्य और बुरी सामाजिकता दुनिया एवं परलोक के दुर्भाग्य का कारण बन जाता है।
दोस्ती और दोस्त की तलाश एक ऐसी वास्तविकता है जिस की तरफ़ सारे इंसानो की प्रकृति और नेचर खिंचा चला जाता है और इंसान के अंदर इस का अस्तित्व इतना अधिक पाया जाता है कि कुछ विद्धानों ने इस को इंसान की स्वाभाविक प्रवृति और अभिलाषा का अंग जाना है।
यह स्वाभाविक प्रवृति और स्वभाविक खिचाव इस कारण से है कि ईश्वर ने मनुष्य को समूह का अंग और सामाजवादी पैदा किया है और उसकी माद्दी और मानवी आवश्यकताओं को पूरा करना दूसरों की कर्तव्य बनाया है।
इंसान की पैदाइश का राज़ इस प्रकार से है कि वह दूसरों के बिना अकेला जीवन नही गुज़ार सकता और समाज से दूर रहते हुए एक कोने में बैठ कर दूसरों के बिना अपने जीवन को संम्पूर्ण नही कर सकता है।
प्रत्यक्ष तौर पर इंसान एकांत चाहता है लेकिन फिर भी जीवन चलाने के लिए वह दूसरो के परिश्रम और कोशिश का मोहताज रहता है और अंत में वह एकांत में भी समाजिक जीवन व्यतीत करता है।
दूसरों के साथ जीवन जीने की इच्छा और दोस्त बनाने की ख़्वाहिश को हज़रत आदम (अलैहिस सलाम) से लेकर इस्लाम के अवतरण तक , इस्लाम (क्योंकि ईश्वर की परम्परा इंसान की उत्पत्ति से लेकर महाप्रलय तक है) ने सदैव इस का ध्यान रखा है और इस के संबंधित बुहत से परिणाम देने वाले विधान और नियम बता कर इंसान को अनुदेश का रास्ता दिखाया है।
प्रत्येक काल में क़ुरआने मजीद की आयात और रिवायात (रसूल (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) या मासूम इमाम (अलैहमुस सलाम) से ली जाने वाली बातें) में सामाजिकता की तरफ़ ध्यान दिलाया गया है और इस से संबंधित मनुष्य की बहुत आधिक रहनुमाई की गई है।
इस्लाम ने दुःस्वभावी और बदचलनों एवं दुष्कृत लोगों के साथ रहने और ज़िन्दगी बसर करने को (क्योंकि उसके साथ दोस्ती और संपर्क , पथभ्रष्टता , बर्बादी , इंसानियत की बर्बादी का कारण है) को शैतान जाना है। पूरे इतिहास ऐसे इंसान को ईश्वर के रास्ते से भटके और संसार एवं परलोक में सौभाग्य और ख़ुश क़िस्मती का दुश्मन माना गया है और उसको गुनाह एवं पाप का कारण मानते हुए अपने दोस्त के लिए बुरा जाना है , और इस तरह की सामाजिकता और मेल मिलाप का नतीजा लज्जा और पछतावा मात्र है।
وَإِنَّهُمْ لَيَصُدُّونَهُمْ عَنِ السَّبِيلِ وَيَحْسَبُونَ أَنَّهُم مُّهْتَدُونَ حَتَّى إِذَا جَاءنَا قَالَ يَا لَيْتَ بَيْنِي وَبَيْنَكَ بُعْدَ الْمَشْرِقَيْنِ فَبِئْسَ الْقَرِينُ
और यह शैतान ऐसे लोगों को रास्ते से रोकते हैं और यह यही ख़्याल करते हैं कि यह हिदायत प्राप्त कर चुके हैं , यहां तक कि जब हमारे पास आऐंगे तो कहेंगे कि काश हमारे और उनके बीच पूरब और पश्चिम जितनी दूरी होती यह तो बड़ा बुरा साथी निकला।
सामाजिकता , मेल मिलाप और दोस्ती इस्लाम की दृष्टि में अपने सारे अर्थों के साथ इंसान के कल्याण और अच्छाई के लिए रास्ता समतल करती है , या अपने सारे अर्थों के साथ इंसान के लिए बुराई के लिए रास्ता तैयार करती है।
अच्छे मेल मिलाप और दोस्ती का नतीजा सौभाग्य एवं कल्याण होता है और बुरे मेल मिलाप और दोस्ती का नतीजा पछतावा और दुर्भाग्य होता है।
कुछ चीज़ों की अच्छाई आंशिक होती है और उसकी तरफ़ रुचि भी कम होती है , कुछ कामों की बुराई कम होती है , लेकिन कुछ वास्तविक्ताओं की अच्छाई बहुत अधिक और कुछ चीज़ों की बुराई बहुत अधिक होती है जिससे इंसान बर्बाद हो जाता है।
दूसरों के साथ दोस्ती , मेल मिलाप और सामाजिकता उन विषयों में से है कि अगर यह सही हों और उनका सही चुनाव किया जाए तो यह इंसान के लिए दुनिया एवं परलोक मे सौभाग्य का कारण बनती हैं और अगर ग़लत हों और उनका सही चुनाव न किया जाए तो उनकी बुराई दुनिया एवं परलोक मे सदैव मनुष्य के साथ रहती है।
कभी कभी इंसान आत्मा की बुराई , बुरे आचरण और शैतानी चरित्र के कारण नर्क में चला जाता है लेकिन सही और अच्छी दोस्ती , भलाई चाहने वाले और शुभ चिंतक मोमिन के कारण उसका रास्ता बदल जाता है और वह दोस्त से अच्छा स्वभाव , अदब , सभ्यता और तमीज़ हासिल करने के कारण स्वर्ग और सीधे रास्ते पर चल पड़ता है।
कभी इंसान आत्मा की सुन्दरता और अच्छाई , अच्छे आचरण , और ईश्वरीय चरित्र के कारण स्वर्गीय हो जाता है और अपनी दुनिया एव परलोक के सौभाग्य को प्राप्त कर लेता है लेकिन कभी कभी अच्छे ज़ाहिर और बे अदब एवं बे दीन आत्मा के कारण अपने रास्ते को बदल देता है और बुराई का प्रभाव होने के कारण नर्क और बुराई की तरफ़ क़दम बढ़ा देता है।
इतिहास मे दोनो प्रकार के लोग बहुत पाए जाते हैं और क़ुरआन करीम ने बहुत सी आयात में इन दोनों समूह की तरफ़ इशारा किया है और दोनो को अच्छी सामाजिकता के लिए शिक्षा एवं नसीहत बनाया है।
हज़रत नूह (अलैहिस सलाम) के बेटे ने अपने बाप से अलग होने के बाद हक़ और वास्तविक्ता का इन्कार करने वालों , वासना में लिप्त , पथभ्रष्ट और भटकाने वाले बे अदबों की दोस्ती और मेल मिलाप का चुनाव किया और उनके आचरण और चाल ढाल को इस प्रकार स्वीकार कर लिया कि उसके अंदर से ईश्वरीय और इंसानी व्यक्तित्व समाप्त हो गया और पानी की लहरों और मौजों के बीच डूब जाने बाले आज़ाब (गुनाह का फल) का शिकार हो गया और ईश्वर के दरबार मे बेटे की मुक्ति के लिए हज़रत नूह (अ) की दुआ स्वीकार नही हुई!!
وَنَادَى نُوحٌ ابْنَهُ وَكَانَ فِي مَعْزِلٍ يَا بُنَيَّ ارْكَب مَّعَنَا وَلاَ تَكُن مَّعَ الْكَافِرِينَ قَالَ سَآوِي إِلَى جَبَلٍ يَعْصِمُنِي مِنَ الْمَاء قَالَ لاَ عَاصِمَ الْيَوْمَ مِنْ أَمْرِ اللّهِ إِلاَّ مَن رَّحِمَ وَحَالَ بَيْنَهُمَا الْمَوْجُ فَكَانَ مِنَ الْمُغْرَقِينَ وَقِيلَ يَا أَرْضُ ابْلَعِي مَاءكِ وَيَا سَمَاء أَقْلِعِي وَغِيضَ الْمَاء وَقُضِيَ الأَمْرُ وَاسْتَوَتْ عَلَى الْجُودِيِّ وَقِيلَ بُعْداً لِّلْقَوْمِ الظَّالِمِينَ وَنَادَى نُوحٌ رَّبَّهُ فَقَالَ رَبِّ إِنَّ ابُنِي مِنْ أَهْلِي وَإِنَّ وَعْدَكَ الْحَقُّ وَأَنتَ أَحْكَمُ الْحَاكِمِينَ قَالَ يَا نُوحُ إِنَّهُ لَيْسَ مِنْ أَهْلِكَ إِنَّهُ عَمَلٌ غَيْرُ صَالِحٍ فَلاَ تَسْأَلْنِ مَا لَيْسَ لَكَ بِهِ عِلْمٌ إِنِّي أَعِظُكَ أَن تَكُونَ مِنَ الْجَاهِلِينَ
नूह ने अपने बेटे को आवाज़ दी जो अलग जगह पर था कि बेटे हमारे साथ कश्ती (नाव) में सवार हो जाओ और काफ़िरों में न हो जाना , उसने कहा मै अनक़रीब (जल्द ही) पहाड़ पर पनाह (शरण) ले लूंगा वह मुझे पानी से बचा लेगा। नूह ने कहा आज ईश्वर के आदेश से कोई बचाने वाला नही है सिवाए उसके जिस पर ख़ुद ईश्वर कृपा करे और फिर दोनो के बीच मौज आ गई और वह डूब गया , और क़ुदरत (ईश्वर) का आदेश हुआ कि ऐ पृथ्वी अपने पानी को निगल ले और ऐ आसमान अपने पानी को रोक ले। और फिर पानी घट गया और काम तमाम कर दिया गया और कश्ती जूदी नामक पहाड़ पर ठहर गई और आवाज़ आई मौत अत्याचार एवं अन्याय करने वालें के लिए है , और नूह ने अपने ईश्वर को पुकारा हे ईश्वर , मेरा बेटा मेरे अहल मे से है और तेरा वादा (अहल के बचाने का) सच्चा है और तू बेहतरीन न्याय करने वाला है , इरशाद हुआ कि नूह यह तुम्हारे अहल मे से नही है उसका अमल सही नही है इसलिए मुझसे उस चीज़ के बारे में प्रश्न न करो जिसका तुम्हें ज्ञान नही है। मै तुम्हें नसीहत करता हूँ ताकि तुम्हारा शुमार जाहिलों में से न हो जाए।
पिसरे नूह बा बदान बेनशिस्त
ख़ानदाने नबूवतश गुम शुद
सगे असहाबे कहफ़ रोज़ी चंद
पै नेकान गिरफ़्त व आदम शुद
अनुवादः नूह (अ) का बेटा बुरी संगत में रहा तो नबूवत उसके ख़ानदान से चली गई , असहाबे कहफ़ का कुत्ता कुछ दिन अच्छों के साथ रहा तो इंसान हो गया।
दोस्ती एवं सामाजिकता का आश्चर्य जनक प्रभाव वह चाहे अच्छा हो या बुरा इससे कभी भी इंकार नही किया जा सकता।
जिस समय इंसान विशेषकर जवानी के दिनों में जब उसकी भावना , चेतना और ख़्वाहिशात बुलंदी पर होते हैं , किसी अच्छे इंसान से टकरा जाए और उसकी अच्छे चरित्र और आदत से लाभ उठाते हुए उसका दोस्त और साथी बन जाए , उसके साथ उठे बैठे तो निःसंदेह ही उसका अच्छा और पवित्र होना इस इंसान में असर करेगा , और जिस समय इंसान पथभ्रष्ट , बुरे चरित्र और बे अदब इंसान के पास बैठेगा और वह बोलने की योग्यता भी नही रखता होगा तो उसकी बुरी राह और ग़लत अंदाज़ और आदत उस पर प्रभाव डालेगी और वह उसको दुर्भाग्य और योग्यताओं को सामने आने से रोक दोगी।
जब इंसान किसी साथी से दिल लगाये और दोनो एक दूसरे से प्यार करने लगें तो दोस्ती के प्रभाव का विषय एक ऐसी वास्तविक्ता है कि अगर इस्लाम इसकी व्याख्या न करता तो इसकी वास्तविक्ता कभी किसी पर प्रकट न होती और चूंकि इस्लाम ने इस वास्तविक्ता के तमाम पहलुओं पर प्रकाश डाला है और उसकी व्याख्या की है और इससे संबंधित किसी भी पहलू को बिना व्याख्या के नही छोड़ा है , जो इंसान के जीवन में इस विषय की श्रेष्ठता और महत्व का सबूत है।
इंसान सामाजिकता के माध्यम से (चाहे उसकी मर्ज़ी हो या न हो) प्रभावित होता है और उसमें कभी भी यह शक्ति नही होती है कि वह प्रभावित होने और साथी के प्रभावित करने को समाप्त कर सके और अगर ऐसा न होता तो इंसान के जीवन मे यह सब अच्छे और बुरे लक्षण और चिन्ह पैदा न होते।
और चूंकि इंसानी प्रवृति (जैसा कि हमने कहा) बहुत तेज़ी से इस प्रभाव को स्वीकार करती है , क़ुरआने करीम ने अत्याचारियों और उन लोगों से जो ईश्वरीय आदेशों को नही मानते हैं , उनके साथ उठने-बैठने से मना किया है और फ़रमाया हैः जब वास्तविक्ताओं का ज्ञान और ईश्वरीय निशानियों की जानकारी हो जाए और हिदायते हक़ (ईश्वरी की तरफ़ राहनुमाई) का सूरज तुम्हारी आत्मा के क्षितिज से उदय कर जाए और तुम्हें सीधे रास्ते की राहनुमाई कर दे तो हुक़ूक़ की हदों से तजावुज़ करने वालों (सही रास्ते से हट जाने वालो) के साथ सामजिकता न करना और याद आने के बाद फिर ज़ालेमीन (अत्याचारियों) के साथ न बैठना।
चरित्र का प्रभाव स्वीकार करना इतना अधिक तेज़ और ज़्यादा है कि क़ुरआने करीम इस संबंध मे फ़रमाता हैः
और उसने किताब (क़ुरआन) में यह बात नाज़िल (अवरोहित) कर दी है कि जब आयाते इलाही (ईश्वरीय निशानियां) के बारे में यह सुनो कि उनका इंकार और इस्तेहज़ा (मज़ाक उड़ाना) किया जा रहा है तो ख़बरदार उनके साथ हरगिज़ न बैठना जब तक वह दूसरी बातों में मसरूफ़ न हो जाएं वरना तुम उनही के मिस्ल (तरह) हो जाओगें ख़ुदा कुफ़्फ़ार और मुनाफ़ेक़ीन सबको जहन्नम (नर्क) में एक साथ इकट्ठा करने वाला है।
जिन तत्वों से हमारा शरीर बना है वह इसी संसार के तत्व है , स्वतंत्र तत्व , प्रभावित करने वाले और प्रभावित होने वाले हैं और हम भी इन्ही तत्वों से बने हैं इसलिए हम में भी प्रभावित करने और प्रभावित होने वाले तत्व पाये जाते हैं और इसीलिए यह नियम सदैव हम पर लागू होगा।
हम जिन विषयों से भी संबंध रखते हैं उनसे प्रभावित होते हैं और बहुत सी चीज़ों पर अपना प्रभाव छोड़ते हैं।
जब हम शरीर के किसी भाग में प्रभाव डालते हैं या प्रभावित होते हैं तो निःसंदेह आत्मा , रूह और जान में भी प्रभाव छोड़ते और प्रभावित होते होंगे क्योकि इनमें निर्मलता और स्वच्छता पाई जाती है।
आप किसी एक व्यक्ति की विभिन्न प्रकार की निगाहों को अपनी तरफ़ ग़ौर से देख़े तो हर प्रकार की निगाह जान और आत्मा पर एक अलग प्रकार का प्रभाव छोड़ती है।
क्रोधित और ग़ुस्से से भरी हुई दृष्टि एक प्रभाव और साधारण दृष्टि एक अलग प्रभाव छोड़ती है , मुहब्बत भरी निगाह वैभव शाली का प्रभाव और आश्चर्य एवं प्रश्न वाली निगाह एक अलग प्रभाव छोड़ती है।
विभिन्न प्रकार की आवाज़ें (ध्वनियां) विभिन्न प्रकार का रहन सहन भी इंसान पर विभिन्न प्रकार का प्रभाव छोड़ते हैं।
सामजिकता की कहानी दो दिलों की एक दूसरे से मुलाक़ात की कहानी की तरह है और दो आत्माओं का मुहब्बत भरे रिश्ते के माध्यम से मिलना और प्रभावित करने के ऐतेबार से दोनो की दृष्टि बहुत तेज़ है।
जब कोई किसी से दोस्ती करता है और उसकी दोस्ती एवं साथ को पसंन्द करता है चाहे सामने वाला अच्छा हो या बुरा , वह चाहता है कि रह प्रकार से स्वंय को उसके जैसा बनाए और सजाए रखे ताकी अपनी दोस्ती को दृढ़ और मज़बूत करने के लिए उसको प्रसन्न कर सके।
दूसरे शब्दों में यह कहा जाए कि जब कोई व्यक्ति किसी के साथ दिली और दोस्ती का रिश्ता बनाता है और सामने वाले के आकर्षण और सुन्दरता के कारण वह उसके अधिकार में चला जाता है तो कुछ दिनो के बाद सामने वाले का अस्तित्व उसके बराबर हो जाता है , यहां तक कि उसके रहन सहन और चाल चलन को देखने वाले (चाहे वह शारीरिक हो या सदाचारिक एवं व्यवहारिक) उसके दोस्त को याद करने लगते हैं और कहते हैः मानो यह वही है!
इस मिलाप और चेहरे मोहरे में आवश्यक नही है कि इंसान का महबूब शारीरिक तौर से उपस्थित हो बल्कि कभी कभी कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के गुणों और पवित्र रहन सहन को दूसरो से सुनकर या अध्ययन करने से अवगत हो जाता है और उसके दिल में उसकी मुहब्बत घर कर लेती है और इस मुहब्बत के प्रभाव में वह अपने महबूब के हुलिये और रहन सहन को अपना लेता है और वह इस सीमा तक पहुंच जाता है कि अपने आप को अपने महबूब का अस्तित्व बना देता है।
विशिष्ट किताबों में रिवायत बयान की गई है कि जब हज़रत अली अकबर (अलैहिस सलाम) ख़ुदा की राह में जिहाद और इस्लाम की रक्षा के लिए मैदाने करबला की तरफ़ चले तो इमाम हुसैन (अलैहिस सलाम) ने ख़ुदा की बारगाह में कहाः
اللَّهُمَ اشْهَدْ فَقَدْ بَرَزَ إِلَيْهِمْ غُلَامٌ أَشْبَهُ النَّاسِ خَلْقاً وَ خُلُقاً وَ مَنْطِقاً بِرَسُولِك
हे ख़ुदा! इस क़ौम पर साक्षी रहना निःसंदेह जंग के मैदान में इनकी तरफ़ ऐसा व्यक्ति गया है जो , व्यवहार , आचरण और चाल चलन में तेरे पैग़म्बर (स) से बहुत अधिक समानता रखता है।
हज़रत अली अकबर (अ) ने पैग़म्बरे अकरम (स) के स्वभाव को अपने चचा हज़रत इमाम हसन (अ) और अपने पिता हज़रत इमाम हुसैन (अ) से सुना था और आपके (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) तौर तरीक़े एवं चाल चलन को क़ुरआन में देखा था इसलिए इन सब चीज़ों के देखते हुए आप पैग़म्बरे इस्लाम (स) से बहुत अधिक मोहब्बत करने लगे थे और इसी मोहब्बत और आपसे प्रभावित होने के कारण आप पैग़म्बरे इस्लाम (स) के समान हो गए थे , जैसा एक मासूम इमाम , हज़रत इमाम हुसैन (अ) ने इस वास्तविक्ता की तरफ़ इशारा किया है।
पैग़म्बरे इस्लाम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) ख़ुदा की सही पहचान और ख़ुदा से मोहब्बत करने के कारण दयालू परवरदिगार की सिफ़तों के वाहक बन गए थे , यहां तक कि क़ुरआने मजीद ने पैग़म्बरे अकरम (स) के अनुसरण और उनकी बैअत को ख़ुदा की बैअत माना है जैसा कि इर्शाद होता हैः
... مَّنْ يُطِعِ الرَّسُولَ فَقَدْ أَطَاعَ اللّهَ
जिसने पैग़म्बरे अकरम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) का अनुसरण किया उसने वास्तव में ख़ुदा का अनुसरण किया है।
إِنَّ الَّذِينَ يُبَايِعُونَكَ إِنَّمَا يُبَايِعُونَ اللَّهَ يَدُ اللَّهِ فَوْقَ أَيْدِيهِمْ فَمَن نَّكَثَ فَإِنَّمَا يَنكُثُ عَلَى نَفْسِهِ وَمَنْ أَوْفَى بِمَا عَاهَدَ عَلَيْهُ اللَّهَ فَسَيُؤْتِيهِ أَجْرًا عَظِيمًا
निःसंदेह जो लोग आपकी बैअत करते हैं वह लोग वास्तव में ख़ुदा की बैअत करते हैं और उनके हाथों के ऊपर अल्लाह का हाथ है अब इसके बाद जो बैअत तोड़ देता है वह अपने ही विरुद्ध कार्य करता है और जो ख़ुदा से किए गए वादे को पूरा करता है ख़ुदा बहुत जल्द उसको बहुत बड़ा इन्आम देगा।
दुआ ए जोशन कबीर के पैतालीसवें बंद में ख़ुदावंदे आलम को हबीब के नाम से याद किया गया है और चौहत्तरवें बंद में रफ़ीक़ (दोस्त) के नाम से याद किया गया है
पैग़म्बरे इस्लाम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) ने ख़ुदा को अपना हबीब और दोस्त बनाया और अपने महबूब एवं दोस्त और अत्यधिक मोहब्बत और इश्क़ के कारण उसकी सिफ़तों और अस्मा (नामों) को अपने अंदर समा लिया जिसका असर यह हुअ कि उनका अनुसरण ख़ुदा का अनुसरण और उनकी बैअत ख़ुदा की बैअत हो गई।
मीसमे तम्मार , रशीद बजरी , उमर बिन होमोक़े ख़ज़ाई और मालिके अश्तर आदि ने अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अलैहिस सलाम) को अपनी दोस्ती मोहब्बत और साथी के तौर पर चुना , यहां तक कि इन लोगों ने काफ़ी हद तक अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ) की सिफ़तों को अपने अंदर समो लिया था और व्यवहार एवं चाल चलन में अपके जैसे हो गए थे।
अगर सामाजिकता और दोस्ती को सही सिद्धांत पर स्वीकार किया जाता तो निःसंदेह लोगों का जीवन शांति अमन और भरोसे वाली हो जाती
अगर लोग ग़लत काम करने वालों से दूर हो जाते , उसके साथ रहन सहन और दोस्ती ना करते , उनके ख़ुश होकर ना मिलते और उनके साथ समाजिकता के लिए यह शर्त रखते कि वह अपना व्यवहार और चाल चलन बदलें तो चरित्रहीनों और बुरा काम करने वालों की संख्या बहुत कम हो जाती और शायद समाज से उनका अस्तित्व ही समाप्त हो जाता।
अफ़सोस कि चरित्रहीनों , बुरे काम करने वालों और फ़ासिक़ों के लिए जीवन की सारी राहें खुली हुई हैं और बहुत से लोग उनको अपनाने के लिए तैयार रहते हैं और इस प्रकार उनके लिए प्रभाव छोड़ने का रास्ता तैयार करते हैं , इंसान और इन्सानियत से ख़यानत करने का रास्ता बनाते हैं और जहां तक इन लोगों में शक्ति होती है बहुत जल्द लोगों को अपने जैसी सोच रखने वाला बना देते हैं और उनके अपने रंग में रंग लेते हैं।
चरित्रहीनों और बुरे काम करने वालों के मार्ग दर्शन के लिए उनके बीच बैठना आवश्यक है लेकिन यह मेल मिलाप और बैठना उस समय सही है जब मार्ग दर्शन करने वाले में इतनी रूहानी शक्ति हो कि वह लोग उस पर अपना प्रभाव ना छोड़ सकें और उसको यह लोग उसके अपने अंधकारमयी जीवन का अंग ना बना सकें।
अगर ख़ुदावंदे आलम हज़रत मूसा (अलैहिस सलाम) और हज़रत हारून (अलैहिस सलाम) को आदेश देता है कि फ़िरऔन के मार्ग दर्शन और उसकी हिदायत के लिए उसके पास जाएं तो यह इसलिए था कि पता था कि हज़रत मूसा (अलैहिस सलाम) और हज़रत हारून (अलैहिस सलाम) फ़िरऔन के चरित्र और उसकी बातों से प्रभावित नही होंगे।
कुछ रिवायतों के अनुसार हज़रत मूसा (अ) और हज़रत हारून (अ) ने पच्चीस साल तक रात दिन फ़िरऔन औऱ फ़िरऔनियों को ख़ुदा की तरफ़ बुलाया और उनके साथ उठे बैठे , लेकिन फ़िरऔन और उसके अनुयायियों की हवा हवस और उनके ग़रुर एवं घमंड के कारण इन लोगों ने इन दोनों नबियों के निमंत्रण को स्वीकार नही किया , और इन दोनों नबियों ने फ़िरऔन और उसके साथियों के साथ उठने बैठने और समाजिकता बनाने के बावुजूद उनके तौर तरीक़ों और चाल चलन को स्वीकार नही किया।
فَقُولَا لَهُ قَوْلًا لَّيِّنًا لَّعَلَّهُ يَتَذَكَّرُ أَوْ يَخْشَى , اذْهَبَا إِلَى فِرْعَوْنَ إِنَّهُ طَغَى
तुम दोनों फ़िरऔन की तरफ़ जाओं क्योंकि वह (ख़ुदा के सामने) सरकश हो गया है , उससे नर्मी से बात करना कि शायद वह नसीहत मान ले (और वास्तविक दीन को स्वीकार कर ले) या डर जाए।
तेहरान में जहां मैं रहता हूँ वहा एक जवान रहता है तो शराब , जुआ , जैसी बुराईयों , नाजाएज़ संबंधों और लोगों के हक़ को बरबाद करने में किसी प्रकार की कोताही नही करता था , और उससे जानने वालों में कोई भी ऐसा नही था जो उसको इन बुराईयों से रोकता।
एक दिन मैं अपने एक मोमिन दोस्त से मिलने के लिए उसके पास गया , वह एक ऐसा मोमिन था जिसमें बहुत से नेक गुण पाए जाते थे और वह लोगों की समस्याओं को हल किया करता था , मेरे मोमिन दोस्त ने उस जवान का मार्ग दर्शन किया उस इस प्रकार उसने बहुत से नेक गुण और इंसानी सिफ़तें और व्यवहार सीख लिए थे , जब मैं उसके पास पहुँचा तो वह जवान उसी के पास बैठा हुआ था , उसकी बातों से लग रहा था कि उसने अपनी आदतें बदल दी हैं और शैतान के रास्ते से रहमान के रास्ते पर आ गया है , उसके इस बदलाओ को देख कर मैं समझ गया कि उसके अंदर कोई ऐसा गुण पैदा हो गया है जिसने उसके ख़ुदा का रास्ता दिखा दिया है और उसको हलाकत एवं बर्बादी से बचा लिया है।
मैंने उससे पूछा कि तुम्हारे साथ ऐसी कौन सी अच्छी घटना घटी है जिसके कारण तुमने शैतान का रास्ता छोड़कर हक़ और हक़ वालों की पैरवी और उनका रास्त अपना लिया है ?
उसने जवाब दियाः जुमेरात की रात को मैं मस्त होकर शराब को अड्डे से बाहर आया और बहुत अधिक शाराब पीने का कारण मैं सड़क के किनारे गिर गय , जब मुझे होश आया तो मैंने देखा कि मेरा सर एक आलिमे दीन के ज़ानू पर है और वह मेरे सर पर अपना हाथ फेर रहे हैं , उन्होंने मुझ से कहा कि मेरे साथ उस मस्जिद में चलो जहां मैं रोज़ नमाज़ पढ़ाता हूँ और जुमे की सुबह को दुआ ए नुदबा पढ़ता हूँ।
मैंने शरमाते हुए उनसे कहा कि इस हालत में मस्जिद में जाना ठीक नही है!
उन्होंने कहा कि नही बल्कि मस्जिद जाने के लिए तुम्हारी यही हालत सबसे अधिक अच्छी है! बहतु कहने और इसरार करने के बाद अंत में उन्होंने मुझे साथ जाने के लिए तैयार कर लिया और मेरे हाथ में हाथ डाल कर वह मुझे मस्जिद ले गए , बहुत ही मोहब्बत के साथ उन्होंने मुझे वज़ू करने और नमाज़ पढ़ने के लिए कहा , नमाज़ के बाद मुझे मस्जिद के आफ़िस में ले गए और अपने हाथों से उन्होंने मेरे लिए नाश्ता बनाया और मुझसे कहा कि इमाम ज़माना (अलैहिस सलाम) के दस्तरख़ान पर खाना खाओ , और शायद मस्जिद के इसी खाने , वहां नमाज़ पढ़ने और वहां के खाने ने मेरा इलाज कर दिया और मैं सही रास्ते पर आ गया।
يَا أَيُّهَا النَّاسُ قَدْ جَاءتْكُم مَّوْعِظَةٌ مِّن رَّبِّكُمْ وَشِفَاء لِّمَا فِي الصُّدُورِ وَهُدًى وَرَحْمَةٌ لِّلْمُؤْمِنِينَ
हे लोगों! निःसंदेह तुम्हारे पास परवरदिगार की तरफ़ से नसीहत और दिलों की एतेक़ादी (आस्था वाली) और व्यवहारिक बीमारियों के लिए शिफ़ा का सामान मार्ग दर्शन और ईमान लाने वालों के लिए रहमत और मार्ग दर्शन का सामान क़ुरआन आ चुका है।
इस आलिमें दीन के मार्ग दर्शन और मुहब्बत के कारण मैने गुमराही से बच गया और मैंने ख़ुदा के रास्ते को चुन लिया और एक दीनदार एवं मोमिन लड़की से मेरी शादी हो गई और अब मैं ख़ुदा की कृपा से अपनी हिदायत पा चुकी ज़िन्दगी और इस आलिमे दीन की मुहब्बत और दोस्ती और बैठक से पूर्ण रूप से प्रसन्न हूँ।
नैशापूर में एक व्यक्ति है जिसकी इमाम ज़माना (अलैहिस सलाम) से मुहब्बत हर इंसान की ज़बान पर आम है और वह व्यक्ति जब नबियों और इमामों की यादगार यानी इमाम ज़माना (अ) का नाम सुनता है तो उसकी आँखों से आँसू जारी हो जाते हैं , उसने ज़िल हिज्जा महीने के दूसरे हफ़्ते में ईदे विलायत के अवसर पर तबलीग़ करने के लिए मुझे वहा बुलाया।
वहां पर तब्लीग़ करते हुए मुझे अभी कुछ ही दिन बीते थे कि मेरे एक दोस्त जो कि आलिमे दीन थे और मशहद में रहते थे मुझसे मिलने के लिए नैशापूर आए , मैंने उनसे बहुत कहा कि वह मेरी मजलिस के समाप्त होने तक नैशापूर में मेरे पास रहें।
मैं उस ज़माने में इमामे सज्जाद (अलैहिस सलाम) कु दुआओं की किताब सहीफ़ ए सज्जादिया की व्याख्या (तफ़्सीर) करने में लगा हुआ था , एक दिन मेरे उस आलिमे दीन दोस्त ने शहर के पास बाईपास रोड पर चहल क़दमी करने की इच्छा प्रकट की , मैने उनकी बात स्वीकार कर ली और क़लम छोड़कर उनके साथ सड़क पर टहलने के लिए निकल गया।
अभी हम पैदल चल ही रहे थे कि एक जवान ने हमारे पास पहुँच कर अपनी गाड़ी के ब्रेक लगाए और उसने बहुत ही मोहब्बत के साथ हमसे कहा कि आप लोग जहां तक जाना चाहते हैं मैं आप लोगों को पहुँचा दूँगा , मेरे दोस्त ने हाथ और आँखों के इशारे से कहा कि इसको अपने साप से हटा दो और इसकी गाड़ी में सवार ना होना इसलिए कि पता नही यह गाड़ी किसकी है और यह किस मक़सद से यहां आया है।
मैंने उस जवान के हुलिये को ग़ौर से देखा , उसके जिस्म पर छोटी आस्तीन वाली एक शर्ट थी जिससे पता चलता था कि निःसंदेह यह जवान एक अपरिचित संस्क्रति में खोया हुआ है और यह एक ऐसा बीमार है जिसको एक मेहरबान डॉक्टर , साथ रहने वाले , चाहने वाले दोस्त और एक शुभ चिंतक मित्र की आवश्यकता है , मैं उसकी गाड़ी में सवार हो गया और अपने आलिमे दीन दोस्त से भी गाड़ी में सवार होने के लिए कहा।
मेरा आलिमे दीन दोस्त ना चाहते हुए भी डरते हुए मेरे साथ गाड़ी में सवार हो गया , यह उस समय की बात है जब ईरान के उत्तर और पश्चिम में काफ़िर सद्दाम के हामियों के साथ जंग हो रही थी और अंधे मुनाफ़िक़ प्रतिदिन शरह किसी ना किसी कोने में बे गुनाह लोगों की जान ले रहे थे और ख़ानदानों को दाग़दार कर रहे थे।
उस नौजवान ड्राइवर ने मुझ से पूछाः कहां जाएंगे ? मैंने कहाः जहां तुम्हारा दिल चाहे , वह मेरे जवाब से प्रसन्न हो गया और कहने लगा कि कहां के रहने वाले हो ? मैंने कहाः तेहरान , फिर उसने पूछा इस शहर में क्या कर रहे हो ? मैंने कहा तुमसे मुलाक़ात के लिए आया हूँ , वह इस प्रकार की मुलाक़ात से और वह भी एक आलिमे दीन से जिसकी उसे आशा भी नही थी बहुत ख़ुश हो गया।
मुझसे कहने लगाः मैं आर्थिक रूप से बहुत मज़बूत हूँ , और मेरे पास दो मंज़िला मकान है जिसमें अकेला रहता हूँ , मेरी इच्छा है कि आप कुछ देर के लिए इस घर में मेरे मेहमान बनें।
मैंने उसके घर जाना स्वीकार कर लिया , मेरे आलिमे दीन दोस्त नें देश की ख़राब हालात के कारण हाथ के इशारे से मुझसे कहा कि इसके घर ना जाओ , लेकिन मैंने ख़ुदी की कृपा और उसकी मेहरबानी एवं अम्र बिल मारूफ़ एवं नही अनिल मुनकर (अच्छाई का हुक्म देना और बुराई से रोकना) के वाजिब होने की वजह से उसके घर जाने का पक्का इरादा कर लिया।
घर पहुँचने के बाद उसने हमें अपने घर के अतिथि कक्ष में बिठाया उस अतिथि कक्ष की चारों दीवारों पर अलग अलग प्रकार की गंदी , उत्तेजक और पश्चिमी फ़िल्मी दुनिया की औरतों की अर्द्ध नग्न तस्वीरे लगी हुई थीं , मेरे आलिमे दीन दोस्त जो कि मुत्तक़ी और मुक़द्दस व्यक्ति थे ने मुझसे कहाः यह कैसा नर्क है जिसमें हम आ गए हैं ? इस कमरे में ज़मीन देखने या आँखें बंद रखने के अतिरिक्त और कोई चारा नही है ?!
मैंने उनसे कहा हिम्मत से काम लो , धैर्य रखे शायत इस शहर में हमारे सफ़र का मक़सद यह था कि हम इस जवान से परिचित हों और कुछ देर उसके साथ बैठें ताकि यह इस बुराई से नजात प्राप्त कर सके , क्योंकि ख़ुदावंदे आलम अपने सारे बंदों पर मेहरबान एवं कृपालू है और उसने हर गुनाह करने वाले के लिए तौबा का द्वार खोल रखा है जैसा कि दुआ में भी आया हैः
انت الذی فتحت لعبادک بابا الی عفوک سمیتہ التوبۃ فقلت توبو الی اللہ توبۃ نصوحا فما عذر من اغفل دخول الباب بعد فتحہ
हे ख़ुदा! तू ही है जिसने अपने बंदों के लिए माफ़ी के द्वार खोल रखे हैं और उसका नाम तौबा रखा है , इसलिए तूने फ़रमायाः सब ख़दावंदे आलम की तरफ़ ख़ालिस तौबा के साथ वापस आ जाओ , इसलिए जो व्यक्ति इन द्वारों के खुलने के बाद में दाख़िल ना हो उसके लिए क्या बहाना हो सकता है ?
कुछ देर के बाद वह जवान कमरे में आया और हमें स्वागत कहने के बाद हमारे लिबास जो कि पैग़म्बरे इस्लाम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) का लिबास है और हमारी तरफ़ कोई ध्यान दिये बिना बेशर्मी से कहने लगाः मेरे घर की फ्रिज में बेहतरीन शराब और अफ़्ग़ानिस्तान की बेहतरीन अफ़ीम और गांजा मौजूद है , चाय और फल खाने के बाद आप जो भी कहें आपके सामनें पेश कर देता हूँ!!
वह अपनी इस पेशकश के साथ सोच रहा था कि अपने दो नए मेहमानों की (अरगचे दोनों आलिमे दीन हैं) इस प्रकार अच्छी मेज़बानी करे।
मग़रिब की नमाज़ में अभी एक घंटा बाक़ी था , मैंने उससे कहा कि आज रात मेरी अपने एक मेहमान दोस्त से मुलाक़ात है और वह दोस्त भी ऐसा है जो कि बहुत प्यारा , चाहने वाला , सहायता करने वाला और मेहरबान है और वह शराब और नशे वाली चीज़ों से बहुत नफ़रत करता है , इसलिए अगर उसने शराब और नशे वाली चीज़ों की ज़रा सी बू भी सूँघ ली तो मुझे डर है कि वह मुझसे दूर हो जाएगा , और उसको छोड़ने की मुझमें हिम्मत नही है और यह एक ऐसी हानि होगी जिसकी जिसकी मैं कभी भी भरपाई ना कर सकूँगा।
तुम मुझे मेरे उस दोस्त और माशूक़ की वजह से इन जीज़ों से दूर ही रखो , उसने भी बहुत ख़ुशी से मेरी बात मान ली और केवल चाए और फल ही हमारे सामने पेश किए
मेरे आलिमे दीन दोस्त ने हाथों और आँखों के इशारे से मुझसे कहा कि इन चीज़ों को खाने से बचूँ , मैंने धीरे से उनसे कहाः हम यहां पर जितना भी खाएंगे उसका ख़ुम्स दे देंगे ताकि किसी प्रकार का कोई संदेह ना रह जाए।
मग़रिब के समय उस जवान ने मुझसे कहाः शहर के किस स्थान पर तुम अपने दोस्त से मिलने के लिए जाओगे ? मैंने कहाः नैशापूर की जामा मस्जिद के पास , उसने कहा कि मैं वहां आप लोगों को पहुँचा दूँगा।
मस्जिद के पास गाड़ी रोक कर वह हमारे साथ नीचे उतरा और पूछाः तुम्हारा दोस्त अभी नही आया ? मैंने कहाः मेरा दोस्त यहां पर है। उसने कहा मुझे भी अपने दोस्त को दिखाओ , मैंने कहा मेरा महबूब और दोस्त ख़ुदा है जिसके साथ अज़ान के समय नमाज़ के माध्यम से मुलाक़ात है और यह मुलाक़ात का समय है जिसके लिए मैं आया हूँ।
वह जवान भौचक्का और आश्चर्य चकित रह गया और उसने अपना सर गरेबान में छिपाने का प्रयत्न करने लगा और लज्जित हो गया , मैंने उससे कहाः जी हां , वह मेरा महबूब है जो शराब , नशे वाली चीज़ों , जुआ , नाजाएज़ संबंधो और हराम माल से नफ़रत करता है , और मैं नही चाहता कि इन चीज़ों में लिप्त होने के कारण वह मुझ से दूर हो जाए और हमारे संबंध समाप्त हो जाएं।
जवान ने कहाः मैंने उस घर में कोई ऐसी रात नही गुज़ारी जब मैंने नशे वाली चीज़ों और शराब ना पी हो , भिन्न प्रकार की कैसेटें और अर्द्ध नग्न फ़िल्में ना देखी हों , लेकिन आज रात की इस मुलाक़ात से मैंने पक्का इरादा कर लिया है कि इन सारी चीज़ों को छोड़ दूँगा , लेकिन मैं तुमसे चाहता हूँ कि कल तुम मेरे पास अवश्य आना , मैंने उसकी बात स्वीकार कर ली , और अगले दिन दस बजे जामा मस्जिद के पास उससे मिलने का वादा कर लिया।
दस बजे वह आया , मुझे और मेरे दोस्त को शहर की कुछ ज़ियारत गाहों (धार्मिक स्थलों) जिनमें से क़दमगाह भी थी ले गया , और हमसे कहा कि रात को हम उसी के पास रहें , और संयोग से वह रात भी शबे जुमा (गुरुवार की रात) थी , दूसरी तरफ़ लोग दुआ ए कुमैल के लिए मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे क्योंकि मुझे वहां पर तक़रीर (भाषण) भी करनी थी , और उस जवान को नही मालूम था कि मैं इस शहर की मस्जिद में तक़रीर कर रहा हूँ।
मैंने मजलिस का पता उसको दिया , दुआ ए कुमैल आरम्भ होने से पहले ही वह वहां पहुँच गया , बहुत अधिक भीड़ होने के कारण मजलिस में दाख़िल होने का रास्त नही था , मैंने इशारे से उससे कहा कि मेरे पास आ जाओ , उसको क़िबले की तरफ़ अपने पास बिठाया , सारी लाइटों को बंद कर दिया गया , पूर्ण अंधेरे में दुआ ए कुमैल पढ़ी गई।
दुआ ए कुमैल के बाद मैंने देखा कि उस जवान की दोनों आँखें बहुत अधिक रोने और बहुत अधिक आँसू बहाने के कारण लाल ख़ून हो रही थीं , मैंने उससे कहाः ख़ुदावंदे आलम ने तुम्हारे सारे गुनाह माफ़ कर दिए , पाक और पवित्र जीवन आरम्भ करो , उसके बाद मैंने उससे विदा ले ली और ख़ुदा हाफ़िज़ कर लिया , और उसी रात नैशापूर से तेहरान वासप आ गया।
तीन साल तक मुझे उसके बारे में कुछ पता ना चल सका , मैं मशहद की एक यात्रा के दौरान अपने उसी आलिमे दीन दोस्त से मिलने के लिए गया , उसने कहाः मैंने एक दिन इमाम रज़ा (अलैहिस सलाम) के रौज़े में उस जवान को देखा , उसने आप के बारे में पूछा , मैंने कहाः तेहरान ही में हैं , फिर उसने उसी यात्रा के बारे में बात शुरू की और कहाः मैंने सच्ची तौबा कर ली है और नैशापूर से मशहद आ गया हूँ , और यहां पर इमाम रज़ा (अलैहिस सलाम) की कृपा से एक नेक और दीनदार बीवी मिल गई है जिसने मेरे मार्ग दर्शन और परिवर्तन में बहुत अधिक साथ दिया है।
जी हाः एक घंटे के सही और स्वच्छ साथ और सही दोस्ती के माध्यम से अगरचे कम ही मात्रा में इस्लामी शिक्षा का प्रसार किया जाए तब भी राह से भटके हुए लोगों का मार्ग दर्शन हो सकता है।
इसीलिए अगर बुरे और फ़ासिक़ लोगों के दोस्ती करने और उनके साथ रहन सहन करने में इंसान पर बुरा प्रभाव पड़े और इंसान के व्यवहार और आदतें प्रभावित हों तो इस्लाम की निगाह में इस प्रकार की दोस्ती और रहन सहन हराम है , और अगर इंसान का ईमान सुरक्षित रहे तो उनके मार्ग दर्शन और सही रास्ता दिखाने के लिए दोस्ती करना आवश्यक है , बल्कि अम्र बिल मारूफ़ और नही अनिल मुनकर के आधार पर वाजिब है।
इंसान दोस्ती समाजिकता रहन सहन और बैठक के सिलसिले में जिस समय महबूब की मुहब्बत की सीमा में क़दम रखता है तो यह वह नही है जो बहुत आसानी के साथ महबूब के प्रभाव को स्वीकार कर लेता है बल्कि यह महबूब है जो मुहब्बत के माध्यम से अच्छे प्रभाव , रूहानी महत्व और आत्मिक सुन्दरता को आशिक़ के अंदर डाल देता है और धीरे धीरे मुहब्बत करने वाले को आपने दूसरे अस्तित्व में बदल देता है।
इश्क़ अज़ माशूक़ अव्वल सर ज़नद
ता बे आशिक़ जलवए दीगर कुनद
आशेक़ी रा क़ाबेलीयत लाज़िम अस्त
तालिबे हक़ रा हक़ीक़त लाज़िम अस्त
अनुवाद ,
इश्क़ पहले माशूक़ के दिल में पैदा होता है , उसके बाद आशिक़ के दिल में उसका जलवा ज़ाहिर होता है।
आशिक़ी के लिये इश्क़ की योग्यता आवश्यक है , सत्य व हक़ की चाहत रखने वाले के लिये वास्तविकता आवश्यक है।
इंसान जिस समय इल्म और जानकारी के साथ मेहरबान ख़ुदा को अपने अपने महबूब के तौर पर चुनता है और दिल को उसके इश्क़ में गिरवी रख देता है तो अल्लाह ताला की तरफ़ से कमालात और रुहानी बुलंदियां उसके ज़रफ़ के एतेबार से धीरे धीरे उसके अंदर प्रकट होने लगते हैं।
उस बरकत और रहमत के मरहले में स्वर्ग से निकाला गया आदम चमकते हुए सूरज की तरह शब्दों के क्षितिज से निकलता है और तौबा के महान पड़ाव से होता हुआ ख़ुदा तक पहुँच जाता है।
इस प्रकाशमयी पड़ाव पर पहुँचने के बाद अय्यूब (अलैहिस सलाम) मुसीबतों और कठिनाईयों की तीव्र मौजों के सामने सब्र करते हैं और अपने ख़ुदा की निगाह में एक नेक और अच्छे बंदे होने का ओहदा प्राप्त कर लेते हैं और सदैव के लिए सब्र और पाएदारी का नमूना बन जाते हैं।
इस बुलंद स्थान पर हज़रत इब्राहीम और हज़रत इस्माईल (अलैहिस सलाम) तस्लीम और सुपुर्दगी के क्षितिज से प्रकट होते हैं और बाप बहुत ही शौक़ और ज़ौक़ के साथ अपने महबूब की आज्ञा का पालन करने के लिए हज़रत इस्माईल (अलैहिस सलाम) को क़ुरबान करने के लिए तौयार हो जाता है , और जब उनको इसी महबूब के कारण मिनजिनीक़ में रख कर भड़कती हुई आग में फेंका जाता है तो उनको उसका कोई डर नही होता है।
इसी पड़ाव पर पहुँच कर हज़रत यूसुफ़ (अलैहिस सलाम) कनआन के गहरे कुएं में अपने दोस्त का करम और उसकी मेहरबानियां पाते हैं और कुएं के अंधेरे में अपनी आत्मा और दिल को रौशन रखने के लिए अपने महबूब के प्रकाश से नूर प्राप्त करते हैं , और अपने परवरदिगार के करम की आशा में अपने आप सुकून और इत्मीनान को सुरक्षित रखते हैं , और अंत में अज़ीज़े मिस्र के सिंहासन से प्रकट होते हैं।
इस आत्मिक द्रण्टि के आधार पर फ़िरऔन के डर से पूर्ण रूप से रूपोश हो जाते हैं और दस साल तक जंगल में हज़रत शुऐब (अलैहिस सलाम) की भेड़ों को चराते हैं और फिर मिस्र वापस जाते समय सीना की घाटी में क़दम रखते हैं , वहां पर अपने महबूब के नूर को पवित्र घाटी में प्रकट होते हुए देखते हैं और माशूक़ की आवाज़ को सुनते हैं और उससे बात करने का सौभाग्य प्राप्त करते हैं और अंत में कलीमुल्लाह की पदवी प्राप्त करते हैं।
पैग़म्बरे इस्लाम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) अपनी मारेफ़त पर भरोसा करते हुए आरम्भ से ही अपने महबूब ख़ुदा का चुनाव करते हैं और अपने जीवन की अंतिम सांस तक अपने दोस्त के साये और उसकी दोस्ती एवं मोहब्बत में अपना जीवन व्यतीत कर देते हैं , और फिर आपका वुजूद गुणें से इस प्रकार परिपूर्ण हो जाता है कि आप फ़रमाते हैः
من رانی فقد رای الحق
जिसने मुझे देखा उसने बेशक हक़ को देखा है।
आपने (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) इस आत्मिक संबंध और रूहानी दोस्ती और मिलाप के माध्यम से ऐसा रुतबा प्राप्त कर लिया कि ख़ुदावंदे आलम ने आपके नाम को तशह्हुद में अपने नाम के साथ वाजिब कर दिया और काफ़िरों एवं मुशरिकों के ईमान लाने के लिए अपनी तौहीद के इक़रार के साथ साथ आपके इक़रार को भी वाजिब किया है।
अगर इंसान मारेफ़त के साथ पैग़म्बरे इस्लाम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) के साथ समाजिकता और दोस्ती का वातावरण बना ले , और इल्म एवं समझ के साथ उनका चाहने वाला और हो जाए तो आप (स) का पवित्र वुजूद अपने गुणों से इंसान को इस प्रकार भर देगा कि इंसान अपने पहले वुजूद या साइक्लोजिस्टों के अनुसार अपनी फ़ितरी अना अर्थात मैं से दूर हो जाएगा और अपने अस्तित्व की सीमा अनुसार पैग़म्बरे इस्लाम (स) का दूसरा वुजूद बन जाएगा , यानी ऐसा वुजूद जो हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अलैहिस सलाम) पूर्ण रूप से साकार हो गया था , इसी कारण पैग़म्बरे अकरम (स) ने आप के बारे में फ़रमायाः
لحمک لحمی، دمک دمی، و سلمک سلمی و حربک حربی
तुम्हारा गोश्त मेरा गोश्त , तुम्हारा ख़ून मेरा ख़ून , तुम से संधि मुझसे संधि और तुमसे जंग मुझसे जंग है।
ऊँटों को चराने वाला ओवैस जब तक रूहानी दुनिया में पैग़म्बरे अकरम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) का दोस्त नही बना था और उनको नही पहचानता था तब तक वह ऊँटों को चराने वाला ओवैस था , लेकिन जब मारेफ़त का वादी में पैग़म्बरे इस्लाम (स) को पहचान गया और रूहानी दुनिया में आप (स) की दोस्ती और साथ की तरफ़ आ गया और अपने महबूब के क़रीब आ गया तो ओवैस के वुजूद में पैग़म्बरे इस्लाम (स) के प्रभाव ने ओवैस को इस मंज़िल पर पहुँचा दिया कि वह तौहीद के बाग़ का ख़ुश्बूदार फूल बन गया और पैग़म्बरे अकरम (स) मदीने में रहते हुए यमन की तरफ़ से ओवैस में से ख़ुदा की ख़ुश्बू को सूँघ रहे थे।।
गुफ़्त अहमद ज़े यमन बूई ख़ुदा मी शनवम
अनुवाद
पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने कहा कि यमन से मुझे ख़ुदा (के सच्चे भक्त) की ख़ुशबू आ रही है।
सलमान इस दोस्ती , सामाजिकता , इश्क़ और मोहब्बत से इस मंज़िल पर पहुँच गए थे कि पैग़म्बरे अकरम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) ने उनके वुजूद के महत्व के सलमान के जीवन के क्षितिज से प्रकट किया और सलमान “अस्सलमानो मिन्ना अहलुल बैत ” की मंज़िल पर पहुँच गए।
इंसान जब अहले बैत और मासूम इमामों (अ) की मोहब्बत को अपने अंदर समो लेता है तो उन सम्मानित हस्तियों के गुण इंसान के जीवन में प्रकट होने लगते हैं , और वह उनका दूसरा वुजूद बन जाता है।
बहरहाल यह महबूब जो मज़बूत संबंध के माध्यम से मोहब्बत करने वाले के ज़ाहेरी वुजूद और फ़ितरी अनानिय को समाप्त कर देता है और उसको माशूक़ का दूसरा वुजूद बना देता है।
वास्तव में वास्तविक मोहब्बत करने वाला वही महबूब है लेकिन दूसरे वुजूद में और वास्तविक आशिक़ वही माशूक़ है लेकिन दूसरे रूप में।
अच्छे महबूब ना केवल दुनिया में अच्छे प्रभावों और कमाल को इंसान में डालते हैं और इंसान में आश्चर्य जनक प्रभाव छोड़ते हैं बल्कि आख़ेरत में भी अपने महबूबों के साथ होने वाली तीव्र मोहब्बत के कारण उनको क़यामत भयानक और डरावने माहौल से बचाते हैं और अपने साथ जन्नत ले जाते हैं जहां पर दोस्ती , रहन सहन और मोहब्बत के साथ एक दूसरे के पास सदैव रहेंगे।
" و حسن اولئک رفیقا "
और यह नेक दोस्त हैं।
आशिक़ में सही माशूक़ का जलवा , आशिक़ की आत्मा को माशूक़ की आत्मा के साथ एक कर देता है और उसकी आत्मा एवं दिल को माशूक़ की आत्मा और दिल से मिला देता है , यहां तक कि भी घटना और मुसीबतों के तूफ़ान में भी अपने माशूक़ से जुदा नही होता है।
अबू अमामा बाहुली जो कि अमीरुल मोमिनीन (अलैहिस सलाम) के चाहने वाले थे , एक बार मोआविया के पास गए वह मोआविया जो कि हक़ और इमाम अली (अ) का बहुत बड़ा दुश्मन था और जिसके पास बहुत अधिक माल और दौलत और देश का ख़ज़ाना था।
मोआविया ने उनको अपने पास बुलाकर अपने पास बिठाया और आदेश दिया कि इनके लिए खाना लाया जाए , उसके बाद अपने हाथ से उसने उनके सर और दाढ़ी के बालों पर इत्र लगाया और आदेश दिया कि सोने के सिक्कों से भरी हुई थैली लाई जाए , उसके बाद अबू की तरफ़ देखा और कहाः तुम्हें ख़ुदा की क़सम है यह बताओ कि मैं अच्छा हूँ या अमीरुल मोमिनीन (अ) ?
अबू अमामा ने कहाः मैं कभी भी ख़ुदा और उसके बंदों से झूठ नही बोलता , तुमने ऐसी बात पूछी है तो सच सच कहता हूँ ख़ुदा की क़सम! अमीरुल मोमिनीन (अ) तुझ से बहुत अच्छे और करीम हैं , और इस्लाम में सबसे आगे हैं और पैग़म्बरे अकरम (स) से सबसे अधिक क़रीब हैं और इस्लाम में उन्होंने सबसे अधिक कठिनाइयां बर्दाश्त कीं।
रसूले ख़ुदा (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) के चचा ज़ाद भाई , हज़रत ज़हरा (सलामुल्ला अलैहा) को पति , जन्नत को जवानों के दोनों सरदार के बाप , हज़रत हमज़ा के भतीजे और हज़रत जाफ़र के भाई हैं , तू कहां और वह कहां , तू यह सोचता है कि मझे कुछ पैसे दे कर ख़रीद लेगा , और मैं तुझे उनसे अच्छा कह दूँगा ? तू समझता है कि मैं तेरे पास मोमिन आया हूँ और काफ़िर हो कर वापस जाऊँगा! तूने अपने आप को धोखा दिया है।
उसके बाद वह मोआविया के पास से उठे और क्रोध की हालत में उसके दरबार से बाहर निकल गए , मोआविया ने सोने के सिक्कों से भरी हुई थैली उनके पास भेजी लेकिन अबू अमामा ने उसको स्वीकार नही किया , जबकि अबू अमामा को पैसे की बहुत आधिक आवश्यकता थी!!
एई बे बहिश्ते ख़ाके कूयत
चश्मे हमे आरेफ़ान बे सूयत
गीती हमे पर ज़े शूरे इश्क़त
आलम हमे मस्त अज़ सूयत
दर दहर नयाफ़तम निगारी
बाशद सनमा बे ख़लक़ व ख़ूयत
गश्तम ज़े क़ुयूद आलम आज़ाद
ता गश्त दिलम असीर मूयत
इश्क़े रुख़े तू बे बरद अज़ दिल
हर आरज़ूई जुज़ आरज़ूयत
जान मी दहमत बे मुज़देगानी
गर आवुरदम नसीम , हूयत
नासेह ना कुनद मलामते मा
गर बेनिगरद आन रुख़ ना कूयत
बर बसते लबान ख़ूयश लामे
अज़ हर चे ग़ैर ग़ुफ़्तुगूयत
अनुवाद
ऐ वह कि जिसके गली की ख़ाक स्वर्ग है , जिसकी ओर समस्त आध्यात्मिकों की दृष्टि लगी रहती है।
सारा संसार तेरे इश्क़ के जोश से भरा हुआ है , सारा संसार तेरे (इश्क़) के जाम से मस्त है।
संसार में कोई ऐसा सनम नही मिला जिससे तेरा चेहरा और आदतें मिलती हों।
दुनिया की क़ैद से स्वतंत्र हो कर धूमा तब जाकर मेरा दिल तेरी ज़ुल्फ़ों असीर हो सका है।
तेरे हसीन रूप के इश्क़ ने दिल से सबकी आरज़ू निकाल दी है अब केवल तेरी आरज़ू है।
जान ख़ुशख़बरी के बदले में दे दूंगा अगर सुबह की हवा तेरी महक को मेरे पास लाई।
उपदेश देने वाले मेरी आलोचना नही करें , अगर वह तेरे हसीन चेहरे को देख लें।
अपने होटों को तेरी बातों के अलावा सब बातों के लिये सी लिया है।
एक आदमी इमामे सादिक़ (अलैहिस सलाम) का पड़ोसी था और आप से दिल की गहराइयों से मुहब्बत करता था।
एक दिन इमामे सादिक़ (अ) ने सुना कि उनका पड़ोसी अपने घर को एक लाख दिरहम में बेच कर जा रहा है जबकि उसके घर की क़ीमत चालीस हज़ार दिरहम से अधिक नही है।
इमाम (अ) ने उसको बुलाकर पूछा तुम अपना घर क्यों बेच रहे हो ? उसने जवाब दियाः मैं आर्धिक रूप में कमज़ोर हो गया हूँ और घर को बेचने के अतिरिक्त मेरे पास और कोई चारा नही है।
आप ने फ़रमायाः लोग कहते हैं कि तुम्हारे घर की क़ीमत चालीस हज़ार दिरहम के बराबर है , फिर उसको तुम एक लाख दिरहम में क्यों बेच रहे हो ? उसने रोते हुए कहाः हे रसूल अल्लाह (स) के बेटे मैं आपका शिया और आपका आशिक़ हूँ , और आपके पास से एक क्षण के लिए भी अलग नही होना चाहता , आर्थिक संकट के कारण घर को बेचने और आपसे दूर जाने पर विवश हूँ , मेरे घर की क़ीमत चालीस हज़ार दिरहम है और साठ हज़ार दिरहम आपका पड़ोसे होने के कारण हैं जो मैं ले रहा हूँ।
इमाम सादिक़ (अ) ने जिनका अख़लाक़ ख़ुदा और रसूल का अख़लाक़ था। ख़ुद के लिए ज़रूरी समझा कि मुहब्बत का जवाब मुहब्बत से दिया जाए और सामने वाले की मुहब्बत का सम्मान किया जाए और
هَلْ جَزَاء الْإِحْسَانِ إِلَّا الْإِحْسَانُ
(क्या नेकी का जवाब नेकी के सिवा कुछ और है ?) का क़ानून उसके लिए भी रखा जाए , इसलिए इमाम (अ) ने उससे फ़रमायाः अपने घर को मेरे हाथों बेच दो , उसने कहाः मैं अपने दिल की गहराईयों से इस घर को आपके हवाले करता हूँ और आपको भेट करता हूँ , लेकिन आपने उसे बेचने पर बहुत ज़ोर दिया।
मालिक ने कहाः जब आप बेचने पर इतना ज़ोर दे रहे हैं तो मैं आपको उसी मामूली क़ीमत यानी चालीस हज़ार दिरहम में बेच दूँगा , इमाम (अ) ने फ़रमायाः तुमने जो क़ीमत दूसरों को बताई है मैं उसी एक लाख़ दिरहम में इसको ख़रीदूँगा , उसके बाद आपने अपने सेवक से फ़रमायाः एक लाख दिरहम घर के मालिक को दे दो , सेवक ने एक लाख दिरहम उसको दे दिये , जब वह इमाम के पास से जाने के लिए उठा तो इमाम (अ) ने उससे फ़रमायाः इस एक लाख दिरहम के अतिरिक्त जो कि घर की क़ीमत है , घर भी मैंने तुमको वापस कर दिया।
जी हां , इंसान अच्छे लोगों के साथ समाजिकता कर के दुनिया में भी रूहानी और दुनियावी लाभ प्राप्त करता है और आख़ेरत में भी उनके मक़ाम और रुतबे के साथ साथ अल्लाह ताला के विशेष करम को भी प्राप्त करता है और बुरे एवं ग़लत लोगों की संगत में रहकर अपने जीवन को तबाह और बरबाद कर देता है और अपने महत्व को समाप्त कर देता है और अपने आप को दुनिया के अपमान और आख़ेरत के अज़ाब से दो चार करता है।
सही दोस्ती और मेल मिलाप से संबंधित पैग़म्बरे इस्लाम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) से रिवायत करते हैं कि आपने (स) अपने सहाबियों से फ़रमायाः
ای عری الایمان اوثق؟ فقالوا : اللہ و رسولہ اعلم و قال بعضھم : الصلاۃ و قال بعضھم : الزکاۃ، و قال بعضھم : الصیام، و قال بعضھم الحج و العمرۃ، و قال بعضھم الجھاد، فقال رسول اللہ صلی اللہ علیہ و آلہ و سلم لکل ما قلتم فضل و لیس بہ و لکن اوثق عری الایمان الحب فی اللہ و البغض فی اللہ و نوالی اولیاء اللہ و التبری من اعداء اللہ
ईमान का सबसे मज़बूत स्तंभ क्या है ? उन्होंने कहाः ख़ुदा और उसका रसूल बेहतर जानते हैं , कुछ दूसरों ने कहाः नमाज़ , कुछ ने कहाः ज़कात , और कुछ ने कहाः रोज़ा , हज , उमरा जिहाद आदि , उसके बाद पैग़म्बरे अकरम (स) ने कहाः तुम लोगों ने जो यह सब बताया इस सबका अपना एक स्थान और सम्मान है , लेकिन ईमान का सबसे मज़बूत स्तंभ यह है कि मोहब्बत हो तो ख़ुदा के लिए और नफ़रत और दुश्मनी हो तो ख़ुदा के लिए और ख़ुदा के दोस्तों से दोस्ती और उसके दुश्मनों से बेज़ारी और संबंध तोड़ लेना चाहिए
निःसंदेह नेक इंसान वह है दो ख़ुदाई कामों को पसंद करता हो और बुरे एवं शैतानी कामों से नफ़रत करता हो इसलिए अगर किसी में इस प्रकार की सिफ़तें पाई जाती हों तो नेक नेक लोगों के गुण उसने अंदर जमा हो जाते हैं और बुरे लोगों की बुराई उससे दूर हो जाती हैं।
इमाम बाक़िर (अलैहिस सलाम) ने नेकी को अपनाने और बुराई से नफ़रत करने को अच्छाई की कसौटी बताया हैः
اذا اردت ان تعلم ان فیک خیراً فانظر الی قلبک فان کان یحب اھل طاعۃ اللہ و یبغض اھل معصیتہ ففیک خیر وللہ یحبک و ان کان یبغض اھل طاعۃ اللہ و یحب اھل معصیتہ فلیس فیک خیر و اللہ یبغضک والمرء مع من احب
जब तुम यह देखना चाहों कि तुम्हारे अंदर भलाई पाई जाती है तो अपने दिल की तरफ़ देखो , अगर तुम ख़ुदा के आदेशों का पालन करने वालों को पसंद करते हो और उसकी अवहेलना करने वालों से नफ़रत करते हो तो तुम्हारे अंदर भलाई पाई जाती है , और ख़ुदा भी तुमको दोस्त रखता है , और अगर ख़ुदा के आदेशों का पालन करने वालों के साथ दुश्मनी और उसकी अवहेलना करने वालों को दोस्त रखते हो तो तुम्हारे अंदर भलाई नही पाई जाती और ख़ुदा तुम्हारा दुश्मन है और इंसान वही व्यक्ति है जो ख़ुदा को दोस्त रखता है।
जो लोग ख़ुदा के लिए और ख़ुदा की राह में एक दूसरे से मोहब्बत और दोस्ती रखते हैं , क़यामत के दिन वह लोग , ख़ुदावंदे आलम के विशेष कमर को पाएंगे।
अब्दुल्ला बिन मसूद ने पैग़म्बरे अकरम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) से रिवायत की है कि आपने फ़रमायाः
المتحابون فی اللہ عزوجل علی اعمدۃ من یاقوت احمر فی الجنۃ یشرفون علی اھل الجنۃ فاذا اطلع احدھم ملا حسنہ بیوت اھل الجنۃ : اخرجوا ننظر المتحابین فی اللہ عزوجل قال : فیخرجون و ینظرون الیھم احدھم وجھہ مثل القمر فی لیلۃ البدر، علی جباھھم : ھولاء المتحابون فی اللہ عزوجل
जो लोग ख़ुदा की राह मे दोस्ती करते हैं वह जन्नत में लाल याक़ूत स्तंभो पर क़ाएम होंगे , जन्नत के लोगों से आगे (अधिक सम्मान वाले) होगें , उनमें से जब भी कोई सामने आएगा तो उसका सौन्दर्य जन्नत में रहने वालों के घरों को प्रकाशमयी कर देगा , जन्नत वाले कहेंगेः अपने घरों से बाहर आओ ताकि ख़ुदा की राह में दोस्ती करने वालों को हम भी देख लें , वह बाहर निकलेंगे वह जन्नत वाले उन लोगों को देखेंगे उनमें से हर एक का चेहरा चौदहवीं के चाँद की तरह चमक रहा होगा , उनकी पेशानी (माथे) पर लिखा होगाः यह लोग ख़ुदा के लिए और ख़ुदा की राह में दोस्ती करते थे।
हमारे मासूम इमामों (अलैहिमुस सलाम) ने नेक अच्छे लोगों के साथ रहन सहन , उनके साथ सामाजिकता और दोस्ती को दिल के लिए शिफ़ा देने वाली दवा बताया हैः
دواء القلوب و جلاوؤھا فی خمسۃ اشیاء : قرآءۃ القرآن المجید باتدبیر، وخلاء البطن، و قیام اللیل، و التضرع فی السحر و مجالسۃ الصالحین
दिल की दवा और उसकी चमक के लिए पाँच चीज़ें हैः ग़ौर और फ़िक्र के साथ क़ुरआन पढ़ना , अधिक खाने और हराम से पेट को ख़ाली रखना , आधी रात को नमाज़े शब के लिए जागना , सुबह के समय रोना और नेक लोगों के साथ रहन सहन और समाजिकता।
अगर लोगों के बीच दोस्ती के कारण रूहानी चीज़ें हो जाएं तो यह दोस्ती सदैव बनी रहेगी , बल्कि उसकी व्रद्धि और कमाल का भी कारण बनेगी , और अगर इसके उलट दोस्ती का कारण माल और दौलत और पद आदि हों तो इस प्रकार की दोस्ती सदैब बाक़ी नही रहेगी , बल्कि यह पस्ती , परेशानी , जंग ना अमनी और एकता के समाप्त होने का कारण बनेगी।
अगर दोस्ती के कारण ज़ाहेरी कारणों में से कोई हो तो उसके समाप्त होती ही दोस्ती भी समाप्त हो जाएगी , क्योंकि , मीठी चीज़ मक्खियों की अपनी तरफ़ खींचती है , और इंसान के जीवन में यह ज़ाहेरी चीज़ें भी दोस्ती को मक्खियों की तरह ख़ींचती हैं , जैसा कि एक शायर ने कहा हैः
ईन दग़ले दोस्तान के मी बीनी
मगसाननद गिर्दे शीरीनी
अनुवाद ,
धोखेबाज़ और मक्कार दोस्त उन मक्खियों की तरह हैं जो मिठाई के इर्द गिर्द चक्कर लगाती है।
लोगों विशेषकर जवानों से यह प्रश्न है कि मक्खियों जैसे दोस्ती का इंसान के जीवन में गंदगी फैलाने और बरबाद करने के अतिरिक्त और क्या रोल हो सकता है ?
जो दोस्ती ज़ाहेरी और दुनियावी कारणों से होती है उस दोस्ती का नतीजा ग़म और परेशानी , उम्र और समय का बरबाद होना , और इंसानी इज़्ज़त की बरबादी होना है।
इस प्रकार की दोस्ती में रूह और दिलों के संबंध दिन ब दिन कमजोर होते जाते हैं , मुहब्बत की लौ बुझ जाती है और मुहब्बत की गर्मी समाप्त होने लगती है।
इस प्रकार की दोस्ती की समाप्ती पर इंसान ग़फ़लत की नींद से इस प्रकार के उठता है जिस प्रकार से सोया हुआ इंसान अचानक जागता है , और ग़म एवं हसरत के साथ हाथ मलता है , शर्मिंदगी के कारण अपने होंटों को चबाता है , और अपने उन दोस्तों पर लानत करता है जिन्होंने धोखा धड़ी , माल और दौलत , पद और सम्पत्ती को प्राप्त करने के लिए उसे धोखा दिया , और अपना पेट भरा है और अपनी इच्छाओं को जानवरों की तरह पूरा किया है , उस समय यह अपनी उम्र के बरबाद होने पर आँसू बहाता है , उस समय अपने दोस्तों से धोखा खाने के बाद दूसरों से भी नफ़रत करने पर मजबूर हो जाता है और जिस प्रकार भेड़ बकरियां भेड़िये को देख कर भाग जाती हैं , उसी तरह यह इंसानों से भागने लगता है , और इंसानों को देख कर उसको डर लगने लगता है और वह सोचता है कि सब उसको दोखा देने के लिए उसके पास आ रहे हैं!।
रूहानी दोस्ती में कि जिसका आधार ईमान , मोहब्बत और दोस्ती है , इस प्रकार की दोस्ती कभी भी जुदाई , नफ़रत और दुश्मनी में नही बदलती है
बिलाल पैग़म्बरे इस्लाम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) से जुदा नही हुए चाहे उनके शरीर को ज़ख़्मों से छलनी ही क्यों ना कर दिया गया , अबूज़र हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अलैहिस सलाम) से अलग नही हुए , चाहे उनको तपते हुए रेगिस्तान रबज़ा में तड़ीपार ही क्यों ना कर दिया गया , अब्बास बिन शबीब शाकेरी ने हज़रत इमाम हुसैन (अलैहिस सलाम) को अकेला नही छोड़ा , चाहे आशूर के दिन जंग के मैदान में पत्थर , लकड़ी और तीर एवं तलवार से उनके बदन को टुकड़े टुकड़ें ही क्यों ना कर दिया गया , और कुमैत बिन ज़ैदे असदी ने अहले बैत (अ) की मोहब्बत को दिल से ना निकाला चाहे चालीस साल तक सूली पर चढ़े रहे!
इस प्रकार की दोस्ती में इलाही इश्क़ , मोहब्बत जान निछावर कर देना और एक रूहानी लगाव है।
इंसान इस इश्क़ के कारण हैवानी संबंधों और माद्दियात की ज़ंजीरों से उसी प्रकार स्वतंत्र हो जाता है जिस प्रकार एक परिंदा , पिंजरे से आज़ाद होता है , दुनियावी चीज़ों से निकल कर इलाही और आसमानी चीज़ों में प्रवेश कर जाता है , दिल दिमाग़ और अक़्ल इलाही दोस्ती के कारण काम करने लगते हैं और दिल , रूहानी जीवन से जीवित हो उठता है , इंसान की इन्सानियत जाग उठती है और आदमियत का वृक्ष फल देने लगता है।
जो व्यक्ति अपनी तरक़्क़ी और कमाल , अदब और तरबियत और दुनिया एवं आख़ेरत से मोहब्बत करता है , और अपने जीवन में हानि और नुक़सान और फ़ितना एवं फ़साद नही चाहता है उसके लिए आवश्यक है कि वह अपने वास्तविक दोस्तों और दोस्तों के भेस में रहने वाले दुश्मनों की पहचान करे।
इस पहचान और मारेफ़त को प्राप्त करने के लिए क़ुरआने करीम के अतिरिक्त और कोई दूसरा रास्ता नही है , क़ुरआने करीम और उसकी आयातों को पहचानने के दो रास्ते हैः एक यह कि ज्ञानियों और उलेमा की शागिर्दी अख़्तियार करके इस्लामी शिक्षा को ग्रहण करें और दूसरे किसी ऐसी मजलिस में समिलित हों जिनमें ख़ुदा का ज्ञान रखने वाले उलेमा और ज्ञानि लोगं इस्लामी शिक्षा को लोगों के सामने बयान करते हैं और अहले बैत (अलैहिमुस सलाम) के मकतब का प्रचार करते हैं।
इंसान जब क़ुरआन और रिवायतों को समझने लगता है तो क़ुरआने मजीद के माध्यम से अपने सच्चे दोस्त को पहचान लेता है जो ख़ुदा , नबी और इमाम (अ) हैं , और इस वास्तविक्ता को जान लेता है कि इनके अतिरिक्त सभी दोस्त के भेस में छिपे हुए दुश्मन हैं।
निःसंदेह पहचान एवं मारेफ़त मोहब्बत का कारण होती है क्योंकि इंसान जब अच्छाईयों को पहचान लेता है तो उसी पहचान के अंदर से इश्क़ और मोहब्बत की आग , की लपटें तेज़ हो जाती हैं तो यही मोहब्बत करने वाले के अस्तित्व में महबूब के नेक गुणों को भर देती है।
आशिक़ इस बात को जानता है कि माशूक़ अपने आशिक़ से उसी समय राज़ी औऱ प्रसन्न होता है जब वह अपने गुणों को आशिक़ के अंदर देख ले , क्योंकि ख़ुदावंदे आलम क़ुरआने करीम में फ़रमाता हैः
إِنَّ اللّهَ يُحِبُّ الْمُحْسِنِينَ
निःसंदेह ख़ुदावंदे आलम एहसान करने वालों को दोस्त रखता है।
क्योंकि ख़ुदावंदे आलम सारी सृष्टि को विशेषकर इंसान के साथ एहसान और नेकी करता है , और जब किसी व्यक्ति में इस चीज़ को देखता है कि वह दूसरों के साथ अच्चे आचरण और एहसान के साथ पेश आ रहा है तो वह उससे इश्क़ करने लगता है , इस कारण से ख़ुदावंदे आलम क़ुरआने मजीद में फ़रमाता हैः
إِنَّ اللّهَ يُحِبُّ الْمُقْسِطِينَ
निःसंदेह ख़ुदावंदे आलम इन्साफ़ करने वालों को दोस्त रखता है।
क्योंकि ख़ुदावंदे आलम स्वंय सारी सृष्टि के साथ इन्साफ़ करता है और जब वह देखता है उसका कोई बंदा किसी के साथ अच्छा व्यवहार कर रहा है औऱ नेकी से पेश आ रहा है और दोस्तों के साथ आदालत से पेश आ रहा है तो वह उससे मोहब्बत करने लगता है। क़ुरआने करीम में फ़रमाता हैः
إِنَّ اللّهَ يُحِبُّ الْمُتَّقِينَ
निःसंदेह ख़ुदावंदे आलम मुत्तक़ियों को दोस्त रखता है।
बहर हाल इंसान मारेफ़त औऱ पहचान के बाद ख़ुदावंदे आलम , नबियों , इमामों और ख़ुदा के वलियों से मोहब्बत करने लगता है और उनसे इश्क़ के माध्यम से उनके व्यवहार और गुणों को अपना लेता है और उनसे जुड़ने के बाद उनका महबूब बन जाता है।
बिलकुल उसी प्रकार जब कोई व्यक्ति , वास्तविक और नेक बंदों को पहचान लेता है तो उनके अंदर पाए जाने वाले नेक गुणों को देखते हुए उनसे मोहब्बत और दोस्ती करने लगता है औऱ उनके साथ दोस्ती और समाजिकता से उनके सारे गुणों को स्वीकार कर लेता है और दुनिया एवं आख़ेरत का स्वभाग्य प्राप्त कर लेता है।
कुछ उलमा का मानना है कि इंसान शब्द उन्स से लिया गया है और उन्स एक ऐसी वास्तविक्ता है जो इंसान की आत्मा से संबंधित है , इसी कारण इंसान तन्हाई और अकेले पन से घबराता है और दोस्तों के साथ उठने बैठने और समाजिकता के पसंद करता है।
सामाजिकता अपना ने वाले रूही लगाव के कारण एक दूसरे पर आत्मिक , विचारिक , रूहानी और बातेनी औऱ व्यव्हारिक प्रभाव डालते हैं , अगर यह सामाजिकता और रहन सहन ख़ुदाई और इंसानी संविधानों पर आधारित हो तो इंसान अपने साथी के अक़ीदों कार्यों और व्यवहार से प्राप्त किए हुए प्रभावों के अनुसार कार्य करता है , जिसकी मिसाल उस दाने की तरह जो जीवन की खेती में बोया जाए और आख़ेरत में ख़ुदा की मर्ज़ी और जन्नत के रूप में काटा जाए , और यह वही वास्तविक्ता है जिसकी तरफ़ पैग़म्बरे इस्लाम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) ने इशारा किया है
الدنیا مزرعۃ الآخرۃ
दुनिया आख़ेरत की खेती है।
जी हां जैसा कि प्रसिद्ध हैः
المجالسۃ موثرۃ
सामाजिकता और दोस्ती अपना प्रभाव छोड़ती है।
यह प्रभाव इतना महत्व पूर्ण है कि इसका नतीजा जन्नत और सदैव का स्वभाग्य होता है या नर्क और सदैव का दुर्भाग्य होता है।
क्या इस दुनिया में कोई ऐसी मिसाल पाई जाती है कि किसी ने गेहूँ बोए हों और जौ काटी हो , मसूर बोई हो और चने काटे हों ? जो व्यक्ति ग़लत संगत और बुरे दोस्तों से दोस्ती करता है उसको इस बात का इन्तेज़ार नही करना चाहिए कि उसके बुरे दोस्त जो प्रभाव पड़ेंगे , वह दुनिया और आख़ेरत में उसे फ़ाएदा पहुँचा सकेंगे।
पैग़म्बरे इस्लाम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) ने फ़रमायाः
وَ مَنْ يُطِعِ الشَّيْطَانَ يَعْصِ اللَّهَ وَ مَنْ يَعْصِ اللَّهَ يُعَذِّبْهُ اللَّه
जो शैतान का अनुसरण करता है वह ख़ुदा की नाफ़रमानी करता है और जो ख़ुदा की नाफ़रमानी करे ख़ुदा उसको अज़ाब में गिरफ़्तार कर देता है।
इंसान की आत्मा अस्तित्व और माहियत के एतेबार से ऐसी होती है जो ज़ाहेरी और बातेनी हिसों से बहुत अधिक प्रभावित होती हा , जिस चीज़ को भी कान सुनता है , आँख देखती है , और खाल स्पर्श करती है , उसको इंसान की आत्मा तुरन्त स्वीकार कर लेती है और इंसान उन्हीं प्रभावों के अनुसार कार्य करता है जो उसकी आत्मा में समा गए हैं।
आँख जब किसी सुन्दर दर्शय को देखती है तो इंसान की आत्मा अपने आप को उस आकृति तक पहुँचाना चाहती है और अपने इस लक्ष्य के प्राप्त करने के लिए विचलित हो जाती है।
दीन , दीनदारी , अच्छे व्यवहार और मुहब्बत के आधार पर दोस्ती और सामाजिकता , वास्तव में इंसान के अस्तित्व के साथ मेल , ख़ुदा की मुहब्बत में डूब जाने और नबियों एव वलियों के दिलों में स्थान पाने का कारण है और क़यामत के दिन शिफ़ाअत करने वालों की शिफ़ाअत का स्थान है।
अगर जीवन इस प्रकार ना होता तो फिर कहना चाहिए कि यह जीवन नर्क वालों के जीवन का एक नमूना है , क़यामत के दिन नर्क वाले , ख़ुदा के करम और उसकी रहमत से दूर होंगे और उनको शिफ़ाअत करने वालों की शिफ़ाअत नसीब ना होगी।
क़ुरआने करीम ने इस संबंध में फ़रमाया हैः
إِنَّ الَّذِينَ يَشْتَرُونَ بِعَهْدِ اللّهِ وَأَيْمَانِهِمْ ثَمَنًا قَلِيلاً أُوْلَئِكَ لاَ خَلاَقَ لَهُمْ فِي الآخِرَةِ وَلاَ يُكَلِّمُهُمُ اللّهُ وَلاَ يَنظُرُ إِلَيْهِمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ وَلاَ يُزَكِّيهِمْ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ
जो लोग ख़ुदा से किए गए वादे और क़सम को (दुनियावी मक़सद को प्राप्त करने के लिए) थोड़ी क़ीमत पर बेच डालते हैं उनके लिए आख़ेरत में कोई हिस्सा नही है और ना ख़ुदा उनसे बात करेगा और ना क़यामत के दिन उनकी तरफ (करम और रहमत वाली) निगाह करेगा और ना उन्हें गुनाहों की गंदगी से पाक बनाएगा और उनके लिए भयानक अज़ाब है।
كُلُّ نَفْسٍ بِمَا كَسَبَتْ رَهِينَةٌ، إِلَّا أَصْحَابَ الْيَمِينِ، فِي جَنَّاتٍ يَتَسَاءلُونَ، عَنِ الْمُجْرِمِينَ، مَا سَلَكَكُمْ فِي سَقَرَ، قَالُوا لَمْ نَكُ مِنَ الْمُصَلِّينَ، وَلَمْ نَكُ نُطْعِمُ الْمِسْكِينَ، وَكُنَّا نَخُوضُ مَعَ الْخَائِضِينَ، وَكُنَّا نُكَذِّبُ بِيَوْمِ الدِّينِ، حَتَّى أَتَانَا الْيَقِينُ، فَمَا تَنفَعُهُمْ شَفَاعَةُ الشَّافِعِينَ
हर नफ़्स अपने आमाल में गिरफ़्तार है , अलावा असहाबे यमीन के , वह जन्नतों में रह कर आपस में सवाल कर रहे होंगे मुजरिमों के बारे में (उनकी तरफ़ देखकर कहेंगे) आख़िर तुम्हें किस चीज़ ने नर्क में पहुँचा दिया ? वह कहेंगे हम नमाज़ नही पढ़ते थे , और मिसकीनों को खाना नही खिलाते थे , लोगों के कामों में समिलित हो जाया करते थे , और क़यामत के दिन को झुठलाया करते थे , यहां तक कि हमें मौत आ गई , तो उन्हें सिफ़ारिश करने वालों की सिफ़ारिश भी कोई लाभ ना पहुँचाएगी।
बेशक जब उनका व्यवहार थोड़ा सा भी ख़ुदावंदे आलम , नबियों और सालेहीन के अख़्लाक़ से मेल नही खाता तो फिर उनकों ख़ुदा की रहमत और शिफ़ाअत करने वालों की शिफ़ाअत कैसे प्राप्त हो सकती है ? किस प्रकार यह लोग मुहब्बत करने वालों की मुहब्बत से लाभ उठाएंगे ? किस प्रकार ख़ुदावंदे आलम क़यामत के दिन इन पर करम भरी निगाह डालेगा और किस प्रकार शिफ़ाअत करने वाले उनको नर्क के अज़ाब से बचाएंगे ?
क़ुरआने करीम की आयतें , इस्लामी रिवायतें और इस्लामी शिक्षा इस बात की तरफ़ इशारा करती हैं कि जीवन में दोस्ती और साथ और समाजिकता एक बड़ा वाजिब और महान दायित्व है।
इंसान अगर ऐसे व्यक्ति को दोस्त के तौर पर चुने जिसका दिमाग़ गंदा और हलका हो और वह पेट और शहवत के अतिरिक्त किसी दूसरी चीज़ के बारे में ना सोचता हो। ख़ुदा , क़यामत , दीन , दीनदारी , अख़्लाक़ और नेक अमल से ग़ाफ़िल हो और किसी इंसान से दोस्ती और समाजिकता में दुनियावी मज़े और टाइम पास करने के अतिरिक्त उसका कोई दूसरा लक्ष्य ना हो तो निःसंदेह इस प्रकार के दोस्त का चुनाव करके उसने ख़ुद अपने आपको बरबाद और अपनी दुनिया एवं आख़ेरत दोनो को ख़राब कर लिया है , ख़ुदावंदे आमल को अपने से नाराज़ किया , अपने सौभाग्य से लापरवाही की है और ख़ुदावंदे आलम के महान वाजिब को नज़र अंदाज़ किया है , संक्षिप्त रूप से यह कह दिया जाए कि उसने क़यामक के लिए बहुत ही बुरे सामाने सफ़र का चुनाव किया है।
ख़ुदावंदे आलम , सारे नबियों , मासूमीन और ख़ुदा के वलियों की सब से महत्व पूर्ण नसीहत यह है कि “ ख़राब और बुरे साथ से बचो। ”
ग़लत इंसान से दोस्ती ज़हर से भी अधिक जानलेवा , हर ख़तरे से अधिक ख़तरनाक , और हर बुरे काम से अधिक बुरा है , क्योंकि ग़लत साथी , इंसान के दीन , ईमान , एतेबार और इज़्ज़त को बरबाद कर देता है और इंसान को ख़ुदा की रहमत और बरकत से महरूम एवं दूर कर देता है।
ता तवानी मी गुज़र अज़ यारे बद
यार बद बदतर बुवद अज़ मारे बद
मारे दब तनहा तू रा बर जान ज़नद
यारे बद बर जान व बर ईमान ज़नद
अनुवाद
निःसंदेह ऐसे दोस्त से अधिक ख़तरनाक और क्या चीज़ हो सकती है जो इंसान के जीवन में आने के बाद उसको मेहरबान ख़ुदा से जुदा कर देता है , आदमी के जीवन को गंदा कर देता है और इन्सानियत की जड़ों को सुखाकर एक नाज़ुक फूल को कांटे में बदल देता है और इंसान के आबाद व्यक्तित्व को बुरे अख़्लाक़ के वीराने में बदल देता है और इंसान को ख़ुदा से दूर और उसके ख़ानदान के सामने अपमानित कर देता है!!
यह नापाक चेहरे , बुरी सिफ़तें , भूतों की तरह फ़साद फैलाने वाले लोग अपनी बातों , लेखों और आदतों एवं तौर तरीक़ों के माध्यम से इंसान को नर्क की आग और सदैव बाक़ी रहने वाले अज़ाब की तरफ़ बुलाते हैं और यह कहना भी सही है कि उन लोगों पर अफसोस! जो पागलों , कम अक़्लों और इंसान की सूरत में रहने वाले जानवरों के निमंत्रण को स्वीकार करें और उनकी ग़ुलामी का दाग़ अपने माथे पर लगाएं।
أُولئِكَ يَدْعُونَ إِلَى النَّار
यह मुशरिक लोग (ना केवल लोगों को बल्कि अपनी औलाद तक को) नर्क की तरफ़ बुलाते हैं
बुरा साथी
बुरा साथी जिसको क़ुरआने करीम ने ख़तरनाक शैतान और हानि पहुँचाने वाला लुटेरा कहा है , वह इंसान के सम्मान को बरबाद करने के बाद उसको बंद आँखों के साथ हलाकत और मौत की वादी में ढकेल देता है। अमीरुल मोमिनीन अली इब्ने अबी तालिब (अलैहिस सलाम) के कथन अनुसार यह इंसान के रूप में देव है जिसका चेहरा इंसान का है और दिल जानवर का है। अगर बुरा साथी दोस्ती और समाजिकता के माध्यम से इंसान की जीवन में प्रवेश कर जाए और उसका पूरा कंट्रोल अपने हाथ में ले ले तो उसकी दुनिया और आख़ेरत दोनों को बरबाद कर देता है और इस बात का कारण बन जाता है कि इंसान के लिए रहमत के सारे दरवाज़े बंद हो जाएं और अज़ाब एवं क्रोध के दहाने उसकी तरफ़ खुल जाएं।
इस बात को नही भूलना चाहिए कि इंसान के जीवन में बुरा दोस्त स्वंय उसकी मर्ज़ी से आता है और इस बारे में इंसान बरी नही कर सकता और यह नही कह सकता कि इसपर उसका कोई कंट्रोल नही है और सारी बुराईयों एवं ग़लत कामों को बुरे दोस्त के माथे नही मढ़ सकता है। बुरे दोस्त का सबसे बुरा रोल यह है कि वह बुराई , गुनाह और ग़लत काम का निमंत्रण देता है , इसलिए इंसान को अपने इरादे और इख़्तियार से काम लेते हुए ख़ुदावंदे आलम के बताए हुए हिदायत के रास्तों पर चलते हुए इस क़ातिल और ख़तरनाक व्यक्ति को अपने आप से दूर करना चाहिए , और उसका निमंत्रण स्वीकार करने से इन्कार कर देना चाहिए , क्योंकि दुनिया और आख़ेरत की भलाई , भविष्य सौभाग्य ख़ुदावंदे आलम के आदेशों का पालन करने और उसके दुश्मनों विशेषकर बुरे दोस्तों से दूरी करने के बाद ही प्राप्त हो सकता है।
बुरा दोस्त एक ऐसा वुजूद है जिसके ऊपर अक़्ल के स्थान पर जहल , दिल के स्थान पर शहवत (इच्छाएं) और हक़ के स्थान पर शारीरिक इच्छाओं का कंट्रोल है , और उसका लक्ष्य इंसान को वास्तविक्ताओं से ख़ाली करने के साथ साथ उसकी दुनिया और आख़ेरत को बर्बाद करना है।
हर ज़माने में शैतानी गुणों वाले इंसान बहुत ख़तरनाक होते हैं जो विशेषकर जवानों को अपनी तरफ़ खींचते हैं और उसके सामने दोस्ती और साथ की पेशकश करने के बाद उसने माल और सम्पत्ति से ग़लत फ़ाएदा उठाते हैं , औऱ उनके इंसानी गुणों को बर्बाद कर देते हैं।
यह लोग अपने ख़ूबसूरत चेहरे , सुन्दर मुसकान , मीठी मीठी बातों और धोखे से अपने आपको इंसानों जैसा प्रकट करते हैं और इस जाल से इंसान की तरफ़ दोस्ती का हाथ बढ़ाते हैं और जब इंसान को अपनी मक्कारी भरी मोहब्बत के जाल में फसा लेते हैं तो वह अपने वसवसों को आरम्भ करते हैं और धीरे धीरे एक लंबी अवधि के बाद इंसान को ख़ुदा , हक़ और हक़ीक़ , इबादत , आत्मा की पवित्रता और अच्छी बैठकों से दूर कर देते हैं और इसी प्रकार इंसान को शहवत और शारीरिक इच्छाओं की तरफ़ भेज देते हैं , फिर इंसान को अपने हाथों की कटपुतली और अपनी बुराईयों एवं गुनाहों का ग़ुलाम बना लेते हैं , इसके बाद इंसान की नेकियों और अच्छाइयों की बसी बसाई दुनिया में आग लगा देते हैं और ऐसा काम करते हैं जिससे शर्मिंदगी के दिन वापस लौटने का मौक़ा हाथ नही आता और नजात एवं बचने के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं।
इस प्रकार के ख़तरनाक और दोस्त के रूप में दुश्मन को इन निशानियों के माध्यम से पहचानना को कठिन काम नही है ।
जब आप देखें कि कोई आपके कान में हक़ से दूर होने की सरगोशी कर रहा है और और आप यह बात समझ जाएं कि वह तुमको अपनी आरज़ुओं का ज़रिया बनाने की कोशिश कर रहा है और तुम्हे अच्छाइयों और नेकियों से नाता तोड़ने का आदेश दे रहा है , समाज के अच्छे लोगों को तुम्हारी निगाह में ज़लील और बुरे लोगों को तुम्हारे सामने अच्छा बताने की कोशिश कर रहा है तो समझ लो कि वह ख़तरनाक ज़ालिम , शैतानी गुणों वाला इंसान अपनी मक्कारियों से अपने आपको तुम्हारा दोस्त प्रकट करना चाहता है , उस समय तुम्हारा काम यह है कि उसकी तरफ़ दोस्ती का हाथ ना बढ़ाओ , उसके साथ समाजिकता ना बनाओ , उसके संबंध में अक़बा बिन अबी मोईत की सीख भरी कहानी (जिसकी तरफ़ सूरा फ़ुरक़ान की 29वीं आयत में इशारा हुआ है) से लाभ लेते हुए अपने आपको उस ज़ालिम के चंगुल से निजात दिलाओ।
उक़बा की गिनती मक्के के बुत परस्तों और मुशरिकों में होती थी , और उसके अपने ख़ानदान के साथ बहुत अच्छे संबंध थे।
उसका एक दोस्त था जिसका नाम अबी बिन ख़लफ़ था वह हर समय , चाहे वह यात्रा में हो या वतन में , आने जाने में , गली कूचो में सदैव उसके साथ रहता था वह एक ऐसा दोस्त था जो शैतान का अनुयायी और देव के गुणों वाला होने में कोई उसका मुक़ाबला नही कर सकता था।!
एक बार उक़बा एक व्यापारिक यात्रा से वापस आया तो उसने मक्के के बड़े लोगों और पैग़म्बरे इस्लाम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) को अपने घर दावत पर बुलाया , उस दावत में किन्ही कारणवश अबी बिन ख़लफ़ उपस्तिथ नही था।
जब सब मेहमान आ गए और दस्तरख़ान बिछ गया तो सबने खाना खाना शुरू कर दिया , उक़बा ने देखा कि पैग़म्बरे अकरम (स) खाना नही खा रहे हैं , तो उक़बा ने आपसे खाना ना खाने का कारण पूछा , तो आपने (स) फ़रमायाः मैं तुम्हारा खाना उस समय तक नही खाऊँगा जब तक तुम ख़ुदा के एक होने और मेरे रसूल होने की गवाही नही दोगे , इस्लाम और मुसलमानों के दाएरे में नही आओगे अगर तुम यह काम करोगे तो तुम्हारे ऊपर रहमत और जन्नत के द्वार खुल जाएंगे।
उक़बा ने फौरन कलमा पढ़ लिया और पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने भी खाना खाना शुरू कर दिया।
दावत के बाद जब उक़बा अपने शैतान के अनुयायी और बुत परस्त दोस्त के पास गया तो उसने उसके (उक़बा को) बहुत डांटा फट्कारा औऱ उससे कहा कि तुम कैसे अपने दीन को छोड़कर मुहम्मद (स) के दीन में दाख़िल हो गए ?!
उक़बा ने इस्लाम लाने का वाक़ेआ उसके सामने बयान किया , अबी बिन ख़लफ़ ने बहुत ही कठोर लहजे में उससे कहाः मैं तुम्हे उस समय तक राज़ी नही होंगा जब तक तुम मुहम्मद (स) को झुठलाओगे नही!!
भाग्य के मारे उक़बा ने अपने दोस्त दिखने वाले ग़द्दार दुश्मन को अपने से दूर करने की कोशिश नही की और पास आई भलाई एवं प्राप्त हुए सौभाग्य को बचाने के बजाए नर्क के रास्ते पर चल पड़ा , उक़बा उस गंदे दोस्त को प्रसन्न करने के लिए पैग़म्बरे अकरम (स) के पास गया और बहुत ही बेशर्मी के साथ पैग़म्बरे इस्लाम (स) के ऊपर थूक दिया।
आपने (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) उसके लिए भविष्य वाणी की कि वह हिजरत से पहले तक जीवित रहेगा और जब मक्के से बाहर आएगा तो हक़ की तलवार से उसको इन्तेक़ाम लेते हुए क़त्ल किया जाएगा। आपकी यह भविष्य वाणी बद्र की जंग में सच्ची साबित हुए , उक़बा बद्र की जंग में नर्क पहुँचा और उसका बुरा दोस्त अबी बिन ख़लफ़ ओहद की जंग में क़त्ल हुआ।
सूर ए फ़ुरक़ान की सत्ताईसवीं और अठ्ठाईसवीं आयत पैग़म्बरे इस्लाम (स) को सांत्वना देने और इस गंदे इंसान के मनहूस अंजाम को बयान करने के लिए नाज़िल हुईं जो स्वंय गुमराह और दूसरों को गुमराह करने वाले शैतानी दोस्त के चक्कर में पड़ गया था।
وَيَوْمَ يَعَضُّ الظَّالِمُ عَلَى يَدَيْهِ يَقُولُ يَا لَيْتَنِي اتَّخَذْتُ مَعَ الرَّسُولِ سَبِيلًا، يَا وَيْلَتَى لَيْتَنِي لَمْ أَتَّخِذْ فُلَانًا خَلِيلًا، لَقَدْ أَضَلَّنِي عَنِ الذِّكْرِ بَعْدَ إِذْ جَاءنِي وَكَانَ الشَّيْطَانُ لِلْإِنسَانِ خَذُولًا
उस दिन ज़ालिम अपने हाथों को (हसरत और नाउम्मीदी से) दांतों से काटेगा और कहेगा कि काश मैंने रसूल के साथ ही रास्ता चुना होता , हाए अफ़सोस काश मैंने फ़लां व्यक्ति को (जो मेरे दुर्भाग्य का कारण बना) अपना दोस्त ना बनाया होता , उसने तो ज़िक्र (क़ुरआने करीम) के आने के बाद मुझे गुमराह कर दिया और शैतान तो हमेशा इंसान को (भटकाने करने के बाद हलाकत की वादी में) ज़लील करने वाला है।
जी हां! ख़ुदावंदे आलम के कहे अनुसार बुरा साथी शैतान है और निःसंदेह शैतान इंसान का दुश्मन है , वह इंसान को घाटे और हानि में डालने के बाद उसको भटकाने और हैरत और दुनिया के तूफ़ानों और मुसीबतों में डालकर हमेशा के लिए चला जाता है।
وَكَانَ الشَّيْطَانُ لِلْإِنسَانِ خَذُولًا
और शैतान तो हमेशा इंसान को (भटकाने करने के बाद हलाकत की वादी में) ज़लील करने वाला है।
दोस्त और साथी वह नही है जो इंसान की बुराईयों एवं ऐबों और रूहानी कमियों को बढ़ाए और इंसान की शराफ़त और सम्मान में भयानक आग लगा दे बल्कि वास्तविक सच्चा दोस्त वह है जो इंसान की बुराईयों और उसके ऐबों को कम करते हुए उसकी कमियों को दूर करे और अपने दोस्त की रूही और आत्मिक ख़ामियों को दूर करे।
इमाम सादिक़ (अलैहिस सलाम) ने अच्छे साथी के बारे में फ़रमायाः
أَحَبُ إِخْوَانِي إِلَيَ مَنْ أَهْدَى إِلَيَّ عُيُوبِي
मेरा सबसे प्यारा भाई वह है जो मुझे मेरी बुराईयों को पहचनवाए।
इन्साफ़ को चाहने वाला और सौभाग्य प्राप्त करने वाला इंसान जब अपने दोस्त के माध्यम से अपनी बुराईयों को जानकारी प्राप्त करता है तो वह अपनी बुराईयों को दूर करने की कोशिश करता है और अपने शरीफ़ दोस्त और साथी के कारण इंसानी गुणों की बुलंदी और सम्मान की चोटी पर पहुँच जाता है।
अइ ग़ज़ाली गुरेज़म अज़ यारी
कि अगर बद कुनम , नको गोयद
मुख़्लिसे आन शवम कि ऐबम रा
हम चू आइने रू बरू गोयद
ना कि चूल शाने बा हज़ार ज़बान
पुश्ते सर रफ़ते मू बे मू गोयद।
अनुवाद
ऐ ग़ज़ाली ऐसे दोस्तों से भागता हूं जो मेरी बुराई की प्रशंसा करता है।
मैं ऐसे मित्रों को इच्छुक हूं जो मेरी कमियों को मुझे आईने की तरह दिखाये।
ऐसे दोस्तों को पसंद नही करता जो कंधे की तरह , हज़ार ज़बान से मेरे पीठ पीछे सबसे मेरी बुराई करें।
जो दोस्त और साथी , ईमान , अख़लाक़ और नेक अमल से ख़ाली हो और इसी कारण नेक गुणों करामत आदि से भी ख़ाली हो वह ऐसी आग है जो वृक्ष को उसकी डालों और पत्तियों के साथ जला देती है और अंत में इंसान को इस दुनिया में लज्जित और अपमानित कर देता है , उसकी दोस्ती और साथ कारण बनता है कि वह आख़ेरत में भी सख़्त अज़ाम में गिरफ़्तार हो जाए और नर्क में जो उनके सदैव रहने का स्थान है बुरे , नालाएक़ दोस्तो को देखने के कारण उसकी आत्मा अज़ाब में पड़ जाए।
किताबों में सीख देने वाली कहानियों के अंतर्गत बयान किया गया है कि एक बाद बादशाह अनूशीरवान ने आदेश दिया कि उसके सबसे बड़े वज़ीर बूज़र जमहर को क़ैदख़ाने में डाल दिया जाए , उसका यह वज़ीर बहुत अक़्लमंद और ज्ञानी था वह “कलीला और दिमना ” पुस्तक को हिन्दुस्तान से ईरान ले गया था।
एक दिन बादशान ने जेल के दरबान से कहाः बूज़र जमहर से भेंट करों और अपने तौर पर उसका हाल चाल पता करो।
जेल के दरबान ने बूज़र जमहर का हाल चाल पूछा तो बूज़र जमहर ने कहाः मेरे पास एक दवा है जिसको मैं अपने आप को ख़ुश और प्रसन्न रखने के लिए प्रयोग करता हूँ और वह दवा है ख़ुदा पर भरोसा रखना , इसके अतिरिक्त अपनी हालत पर प्रसन्न हूँ और ख़ुश हूँ कि अगर इसके अतिरिक्त किसी और हालत में होता तो और कठिनाईयों एवं समस्याओं में घिरा होता।
इससे पता चलता है कि क़ैदख़ाने ने बूज़र जमहर के व्यक्तित्व पर प्रतिकूल प्रभाव नही डाला था और उसने अपने बीवी बच्चों और लोगों से दूर रहने को ख़ुदावंदे आलम पर भरोसा करने और अपनी हालत पर राज़ी रहने से पूरा कर लिया।
अनूशीरवान चाहता था कि जेल उसके लिए अज़ाब बन जाए , लेकिन जब उसने देखा कि वह वहां पर भी ख़ुश है तो बहुत क्रोधित हुआ , उसने अपने साथियों से मशविरा किया कि बूज़र जमहर को कैसे परेशान किया जाए , उनमें से एक ने कहाः अगर तुम यह चाहते हो कि क़ैदख़ाना उसके लिए अज़ाब बन जाए तो किसी पागल और कम अक़्ल इंसान को उसके पास क़ैदख़ाने में छोड़ दो , क्योंकि अक़्लमंद इंसान की आत्मा पागल औऱ कम अक़्ल के पास रहने से पीड़ित हो जाती है। तब एक पागल को तलाश करके बूज़र जमहर के पास क़ैदख़ाने में छोड़ दिया गया , कुछ ही समय बीता था कि उस कम अक़्ल ने रोना शुरू कर दिया , बूज़र जमहर ने उससे कहाः रो क्यों रहे हो ? क़ैदख़ाने की कठिनाईयां और बीवी बच्चों की दूरियां शीघ्र ही समाप्त हो जाएगी और अंत में तुम आज़ाद हो जाओगे , उस पागल ने कहाः मैं इस कारण से नही रो रहा हूँ , बल्कि मैं अपने बकरे के कारण रो रहा हूँ जिससे मैं बहुत मोहब्बत करता हूँ और तुम जब भी बात करते हो या खाना खाते हो और तुम्हारी दाढ़ी हिलती है तो मुझे अपने बकरे की याद आ जाती है!!
उस दिन से बूज़र जमहर को रूह के अज़ाब औऱ उसकी सज़ा का अनुभव हुआ , क्योंकि यह स्वभाविक है कि नापाक़ और बुरे का साथ रुह के लिए एक सज़ा है।
इटली के एक सत्ता धारी के मरने के बाद उसके व्यक्तिगत संदूक़ से एक ख़त मिला जिसमें लिखा थाः मेरे मरने के बाद इटली के लोगों से मेरी तरफ़ से क्षमा मांगना और कहना कि वह मेरे लिए दुआ करें क्योंकि मैंने देश और देश की जनता के साथ ग़द्दारी की है।
उसके बाद उसने अपनी ग़द्दारी को इस प्रकार बयान कियाः मैं एक गांव का रहने वाला था , जो देश की राजधानी से बहुत दूर था , मैं एक समान्य सा आदमी था और एक बहुत ही ग़रीब ख़ानदान का था , और व्यवहार के एतेबार से बहुत ही आज़ाद जीवन व्यतीत करता था , एक दिन मेरी वासना भरी निगाहें पड़ोसी की बहुत ही सुन्दर लड़की पर पड़ीं , मैं रिश्ता लेकर उसके घर गया तो उसके माँ बाप ने रिश्ता स्वीकार करने से इन्कार कर दिया।
मैं उस लड़की को बहुत चाहता था और उस तक पहुँचने का पक्का इरादा कर चुका था , मैंने सोंच लिया के जैसे भी हो मैं उसको पाकर रहूँगा।
एक दिन मैंने सुना कि एक सोना बेचने वाल राजाधानी से हमारे गांव आया और बहुत अधिक पैसा देकर उस लड़की को ख़रीद कर राजधानी ले गया।
अब मेरा उस गांव में रहना कठिन हो गया था और मैं भी बहुत ही कठिनाईयों और मुसूबतों के साथ राजधानी चला गया , उस लड़की को बहुत तलाश किया लेकिन उसका कुछ पता ना चला।
कुछ समय के बाद देश में ग़ुलामों की आज़ादी के लिए एक पार्टी बनाई गई , मैंने भी उस पार्टी में अपना नाम लिखवा दिया और उसका मिम्बर बन गया , इस पार्टी ने बहुत बड़े पैमाने पर राजधानी में अपनी गतिविधियां आरम्भ कर दीं और एक लंबे समय के बाद मेरे शुमार इस पार्टी के बड़े लोगों में होने लगा
कुछ ही समय के बाद इस पार्टी का सत्ता पर अधिकार हो गया और मैं भी इस पार्टी का एक मिम्बर होने के नाते हुकूमत करने वालों में शामिल हो गया!
कुछ समय के बाद मैंने अपने एक विश्वासपात्र से कहाः जो सोना चाँदी बेचने वाले लोग लड़कियों का कारोबार करते हं उनको शाम के खाने पर बुलाया जा , लगभग चालीस लोगों को जिनके पास बहुत अधिक माल और दौलत थी खाने पर बुलाया गया , रात को एकांत में उन सबको क़त्ल करने का आदेश दिया और क़त्ल के बाद सबको एक स्थान पर दफ़न करवा दिया ताकि किसी को पता ना चल सके , मैं एक आदमी को क़त्ल करना चाहता था और वह एक जौहरी था जो मेरी माशूक़ा को उनके घर वालों से ख़रीद कर राजधानी ले आया था , लेकिन चूँकि मैं उसको पहचानता नही था इसलिए मैंने सोचा कि सब को समाप्त कर दूँ ताकि उनके घरों में उसको तलाश किया जा सके , चलीस घरों से शिकायतें आईँ कि उनके मर्द ग़ाएब हो गए हैं , मैंने आदेश दिया कि सबको उनके दास और दासियों के साथ बुलाया जाए ताकि मैं उनको तसल्ली दे सकूँ , सब आए लेकिन उनमें वह लड़की ना थी।
काफ़ी समय के बाद मुझे पता चला कि इटली की सुन्दर लड़कियों को पड़ोसी देश को बहुत अधिक क़ीमत पर बेचा जा रहा है , मैंने एक ऐसा काम किया जिसके कारण इटली और पड़ोसी देश में जंग छिड़ गई , बहुत घमासान जंग हुई , जंग के दिनों में एक रात जब जंग कुछ हलकी थी , मैं आराम कर रहा था , फ़ौज के एक अड्डे से बहुत अधिक शोर उठा जिससे मैं जाग गया , मैंने आदेश दिया कि पता किया जाए कि यह कैसा शोर है मुझे ख़बर दी गई कि दो तीन सिपाही एक वेश्या के चक्कर में लड़ रहे हैं , मैंने कहाः उस औरत और सिपाहियों को मेरे पास लेकर आओ , उस औरत और सिपाहियों को मेरे पास लाया गया जब मैंने ग़ौर से उस औरत को देखा , तो यह वही लड़की थी जिसको मैं वासना भरी निगाहों से देखा करता था और उसका आशिक़ हो गया था!!
एक वेश्या के चक्कर में मैंने लड़कियों को ख़रीदने और बेचने वाले चालीस सोनारों को बेगुनाह क़त्ल कर दिया , देश के ख़ज़ाने और लोगों को बिना किसी कारण जंग की आग में जला दिया , इसलिए लोगों से माफ़ी मांगना और उनसे क्षमा चाहना।
नफ़्स की यह हालत है कि वह अपनी आँखों से ग़लत देखता है और कानों से ग़लत सुनता है , उसके बाद वह नफ़्से अम्मारा (बुराई की तरफ़ ले जाने वाला) में बदल जाता है , या दूसरे शब्दों में यूँ कह दिया जाए कि एक ख़तरनाक अज़दहे का रूप धर लेता है जो हर पल दीन , ईमान , और इंसानी गुणों को निलगता रहता है और पचाता रहता है।
इस संबंध में ख़तरे इतने अधिक हैं कि परवरदिगारे आलम जो इंसान को सौभाग्य और तरक़्क़ी और आगे बढ़ते हुए देखना चाहता है , क़ुरआने मजीद में साफ़ शब्दों के साथ इंसान को सावधान कर रहा है कि बुरे साथियों से बचो , उनके साथ दोस्ती ना करो और किसी भी प्रकार से उनकी विलायत और सरपरस्ती को स्वीकार ना करो , ख़ुदावंदे आलम इस सिलसिले में मोमिनों के दामन को उनसे पाक जानता है और उसने बुरे साथियों से उनके संबंधों को तोड़ दिया है , चाहे वह रिश्ते के एतेबार से कितने ही क़रीबी क्यों ना हो।
لَا تَجِدُ قَوْمًا يُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ يُوَادُّونَ مَنْ حَادَّ اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَلَوْ كَانُوا آبَاءهُمْ أَوْ أَبْنَاءهُمْ أَوْ إِخْوَانَهُمْ أَوْ عَشِيرَتَهُمْ
आप कभी ना देखेंगे कि जो क़ौम अल्लाह और क़यामत के दिन पर ईमान रखने वाली है वह उन लोगों से दोस्ती कर रही है जो अल्लाह और उसके रसूल से दुश्मनी करने वाले हैं चाहे वह उनके बाप , दादा , या औलाद या भाई या ख़ानदान और क़बीले वाले ही क्यों ना हों।
जी हां अगर बाप , दादा या औलाद या भाई या ख़ानदान और क़बीले वालों का चेहरा शैतानी हो और इंसान विश्वास कर ले कि वह उसको ख़ुदा से दूर करना चाहते हैं और इंसानी इज़्ज़त को बरबाद करते हुए उसकी दुनिया और आख़ेरत को समाप्त कर देना चाहते हैं तो ख़ुदा की मर्ज़ी के अनुसार उनकी दोस्ती से बचना चाहिए , और अपने माँ बाप से केवल सम्मान और उनके एहतेराम को बनाए रखने के लिए संबंध रखना चाहिए।
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَتَّخِذُوا عَدُوِّي وَعَدُوَّكُمْ أَوْلِيَاء تُلْقُونَ إِلَيْهِم بِالْمَوَدَّةِ وَقَدْ كَفَرُوا بِمَا جَاءكُم مِّنَ الْحَقِّ
हे ईमान वालों ख़बरदार मेरे और अपने दुश्मन को दोस्त मत बनाना कि तुम उसकी तरफ़ दोस्ती की पेशकश करो जब्कि उन्होंने हक़ का इन्कार कर दिया है जो तुम्हारे पास आ चुका है और वह रसूल को और तुमको केवल इस बात पर निकाल रहे हैं कि तुम अपने परवरदिगार (अल्लाह) पर ईमान रखते हो।
रसूले ख़ुदा (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) ने फ़सादियों और बुरे लोगों से दूर रहने औऱ उनकी तरफ़ ध्यान ने देने को आवश्यक बताया है और जो लोग इंसान की दुनिया और उसकी आख़ेरत को हानि पहुँचाते हैं विशेषकर जो लोग दीन और दीनदारी के लिए ख़तरनाक हैं उनसे दूर रहने को कहा है आप (स) फ़रमाते हैः
إِذَا رَأَيْتُمْ أَهْلَ الرَّيْبِ وَ الْبِدَعِ مِنْ بَعْدِي فَأَظْهِرُوا الْبَرَاءَةَ مِنْهُمْ وَ أَكْثِرُوا مِنْ سَبِّهِمْ وَ الْقَوْلَ فِيهِمْ وَ الْوَقِيعَةَ وَ بَاهِتُوهُمْ كَيْلَا يَطْمَعُوا فِي الْفَسَادِ فِي الْإِسْلَامِ وَ يَحْذَرَهُمُ النَّاسُ وَ لَا يَتَعَلَّمُوا مِنْ بِدَعِهِمْ يَكْتُبِ اللَّهُ لَكُمْ بِذَلِكَ الْحَسَنَاتِ وَ يَرْفَعْ لَكُمْ بِهِ الدَّرَجَاتِ فِي الْآخِرَةِ
जब मेरे बाद बिदअत करने वालों को देखो जो कि दीन के विरुद्ध काम कर रहे हैं और इस्लाम के विश्वव्यापी और पूर्ण क़ानून में कमी या ज़्यादती कर रहे हैं , अक़ीदों और अहकाम में शक और संदेह कर रहे हैं , तो उनसे खुली हुई बेज़ारी अख़्तियार करो और सदैव उनको बुरा भला कहते रहो , उनको अपनी बातों और कामों से विद्रोही और ग़ैर मोतबर बताओ , उनके साथ इल्मी बहसें करो ताकि वह चकरा जाएं , ताकि वह बातिल और ग़लत बातें ना कर सकें , इस्लाम में फ़साद और बुराई फ़ैलाने की आशा समाप्त हो जाए , लोगों को उनसे दूर करो , उनकी बिदअतों को ना सिखाओ , अगर तुम इस प्रकार का अक़लमंदी वाला रवय्या अपनाओंगे तो ख़ुदा तुम्हारे अमाल नामे में नेकियां लिखेगा और इस प्रकार तुम्हारी आख़ेरत के मरतबे बुलंद हो जाएंगे।
रसूले अकरम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) ने फ़रमायाः
الْمَرْءُ عَلَى دِينِ خَلِيلِهِ، فَلْيَنْظُرْ أَحَدُكُمْ مَنْ يُخَالِل
इंसान अपने दोस्त के दीन और धर्म के अनुसार कार्य करता है , इसलिए तुम में से हर एक को अक़्ल से सोचना चाहिए कि किसके साथ दोस्ती करो।
दूसरे स्थान पर रसूले अकरम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) ने फ़रमायाः
مَنْ كَانَ يُؤْمِنُ بِاللَّهِ وَ الْيَوْمِ الْآخِرِ فَلَا يُوَاخِيَنَّ كَافِراً وَ لَا يُخَالِطَنَّ فَاجِراً وَ مَنْ آخَى كَافِراً أَوْ خَالَطَ فَاجِراً كَانَ كَافِراً فَاجِراً
जो भी ख़ुदा और क़यामत के दिन पर ईमान रखता है वह काफ़िर के साथ बहुत क़रीबी दोस्ती और संबंध नही बनाएगा और बुरे इंसान के साथ मेल जोल ना रखे जो भी काफ़िर के साथ बहुत अधिक दोस्ती बनाएगा या बुरे इंसान के साथ समाजिकता करेगा वह काफ़िर और बुरा हो जाएगा।
और रसूले अकरम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) ने फ़रमायाः
الْوَحْدَةُ خَيْرٌ مِنْ قَرِينِ السَّوْء
अकेले जीवन व्यतीत करना बुरे साथी के साथ ज़िन्दगी बसर करने से अच्छा है।
हज़रत अमीरुल मोमिनीन अली (अलैहिस सलाम) से रिवायत हुई है कि आप से एक शाम के रहने वाले बूढ़े व्यक्ति से सवाल कियाः
बदी और बुराई में लिप्त साथी कौन है ? आपने फ़रमायाः
الْمُزَيِّنُ لَكَ مَعْصِيَةَ اللَّه
जो ख़ुदा की अवहेलना को तुम्हारे लिए सजाने बनाने का प्रयत्न करे (और उनको तुम्हारी निगाह में सजाए ताकि तुम्हारे लि उसको करना आसान हो जाए)
इसी प्रकार रसूले इस्लाम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) ने फ़रमायाः
ثَلَاثٌ مَنْ حَفِظَهُنَ كَانَ مَعْصُوماً مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيمِ وَ مِنْ كُلِّ بَلِيَّةٍ مَنْ لَمْ يَخْلُ بِامْرَأَةٍ لَيْسَ يَمْلِكُ مِنْهَا شَيْئاً وَ لَمْ يَدْخُلْ عَلَى سُلْطَانٍ وَ لَمْ يُعِنْ صَاحِبَ بِدْعَةٍ بِبِدَعِه
जो व्यक्ति तीन चीज़ों की पाबंदी करेगा वह ख़ुदा की बारगाह से निकाले गए शैतान से अमान में रहेगा और हर बला से बचा रहेगा , एक नामहरम (अजनबी) औरत से साथ एकेले में ना रहे , दूसरे बादशाह के पास ना जाए , तीसरे बिदअत करने वाले की बिदअत में सहायता ना करे।
इमाम मूसा बिन जाफ़र (अलैहिस सलाम) ने हज़रत ईसा (अलैहिस सलाम) से रिवायत की है कि आपने फ़रमायाः
يَا عَمَّارُ إِنْ كُنْتَ تُحِبُ أَنْ تَسْتَتِبَّ لَكَ النِّعْمَةُ وَ تَكْمُلَ لَكَ الْمُرُوءَةُ وَ تَصْلُحَ لَكَ الْمَعِيشَةُ فَلَا تُشَارِكِ الْعَبِيدَ وَ السَّفِلَةَ فِي أَمْرِكَ - فَإِنَّكَ إِنِ ائْتَمَنْتَهُمْ خَانُوكَ وَ إِنْ حَدَّثُوكَ كَذَبُوكَ وَ إِنْ نُكِبْتَ خَذَلُوكَ وَ إِنْ وَعَدُوكَ أَخْلَفُوك إِنَ صَاحِبَ الشَّرِّ يُعْدِي وَ قَرِينَ السَّوْءِ يُرْدِي فَانْظُرْ مَنْ تُقَارِن
बेशक ख़ता करना वाले और गुनाह करने वाले लोग , दुश्मनी करते हैं और इंसान के हक़ को बरबाद करते हैं , ग़लत और बुरा दोस्त , इंसान को बरबाद कर देता है और उसकी इज़्ज़त एवं सम्मान को ख़ाक में मिला देता है , इसलिए दोस्त और साथी बनाने में ग़ौर एवं फ़िक्र से काम लो।
इमाम सादिक़ (अलैहिस सलाम) ने अम्मार बिन मूसा से फ़रमायाः
يَا عَمَّارُ إِنْ كُنْتَ تُحِبُ أَنْ تَسْتَتِبَّ لَكَ النِّعْمَةُ وَ تَكْمُلَ لَكَ الْمُرُوءَةُ وَ تَصْلُحَ لَكَ الْمَعِيشَةُ فَلَا تُشَارِكِ الْعَبِيدَ وَ السَّفِلَةَ فِي أَمْرِكَ - فَإِنَّكَ إِنِ ائْتَمَنْتَهُمْ خَانُوكَ وَ إِنْ حَدَّثُوكَ كَذَبُوكَ وَ إِنْ نُكِبْتَ خَذَلُوكَ وَ إِنْ وَعَدُوكَ أَخْلَفُوك
हे अम्मार अगर तुम चाहते हो कि तुम्हारे लिए नेमतें सदैव तैयार और बाक़ी रहें , तुम्हारी मर्दानगी और मुरुव्वत पूर्ण हो जाए और की अर्थ व्यवस्था पटरी पर आ जाए तो दासों और नीच लोगों को अपने जीवन में शरीक मत करो , क्योंकि अगर तुम उनको अमीन बनाओगे तो वह ख़यानत करेंगे , अगर वह तुमसे बात करेंगे तो झूठ बोलेंगे , अगर तुम मुसीबतों एवं मुश्किलों में घिर जाओगे तो वह तुमको छोड़ देंगे , अगर तुमसे कोई वादा करेंगे तो अपने वादे से मुकर जाएंगे।
इमामे सादिक़ (अलैहिस सलाम) ने दाऊदे रक़्क़ी से फ़रमायाः
انْظُرْ إِلَى كُلِ مَنْ لَا يُفِيدُكَ مَنْفَعَةً فِي دِينِكَ فَلَا تَعْتَدَّنَّ بِهِ وَ لَا تَرْغَبَنَّ فِي صُحْبَتِهِ فَإِنَّ كُلَّ مَا سِوَى اللَّهِ تَبَارَكَ وَ تَعَالَى مُضْمَحِلٌّ وَخِيمٌ عَاقِبَتُه
जो लोग तुम्हारे दीन में तुम्हारी सहायता ना करें , उनसे दोस्ती ना करो , उस पर भरोसा ना करो और उसकी दोस्ती की तरफ़ ना जाओ क्योंकि ख़ुदावंदे आलम के अतिरिक्त हर जीज़ समाप्त हो जाने वाली है।
इमाम जवाद (अलैहिस सलाम) ने फ़रमायाः
إِيَّاكَ وَ مُصَاحَبَةَ الشَّرِيرِ، فَإِنَّهُ كَالسَّيْفِ الْمَسْلُولِ، يَحْسُنُ مَنْظَرُهُ وَ يَقْبُحُ أَثَر
बुरे काम करने वाले और लोगों को परेशान करने वाले लोगों से दूर रहो क्योंकि वह मियान से निकली हुई तलवार की भाति है जिसका दर्शन अच्छा और उसका नतीजा बहुत बुरा है।
इस बारे में क़ुरआन मजीद की आयतें हमारा मार्ग दर्शन करती हैं , अगर हम इस मार्ग दर्शन के अनुसार कार्य करें तो दुनिया और आख़ेरत दोनों का सौभाग्य प्राप्त कर सकते हैं।
وَإِذَآ أَنْعَمْنَا عَلَى الإِنسَانِ أَعْرَضَ وَنَأَى بِجَانِبِهِ
और जब हम इंसान पर कोई नेमत नाज़िल करते हैं तो वह पहलू बचा कर किनारे हो जाता है।
दुनिया में ऐसे लोग पाए जाते हैं जिनको माल और दौलत और ऐश एवं आराम ख़ुदा की याद और उसके क़ानून से ग़ाफ़िल कर देते हैं , और वह समझने लगते हैं कि हर चीज़ पर जीत और हर समस्या का समाधान माल और दौलत है। वह अपनी दौलत को हर चीज़ का आधार समझ लेते हैं और सोचते हैं कि वह हर चीज़ और हर व्यक्ति पर अधिकार रखते हैं , इसलिए अब उन सबको उसकी मर्ज़ी के अनुसार काम करना चाहिए और हर स्थान पर उनका सम्मान किया जाना चाहिए। घमंड के कारण अकड़ने लगते हैं और घमंडियों की नर्क वाली अवस्था उनके अंदर भड़कने लगती है और वह ऐसे कार्यों , व्यवहार और अख़्लाक़ में पड़ जाते हैं कि ख़ुदावंदे आलम से दूरी और उसके आदेशों की अवहेलना करने लगते हैं।
उलमा से दूरे बनाए रखते हैं , मस्जिद , मेहराब और नसीहत एवं वअज़ से दूर रहते हैं , दीन और दीनदारों के लिए उनके पास कोई जगह नही होती है , ख़ुदा और उसके क़ानून कि विरुद्ध रास्ता चुनते हैं , ऐसी ख़ुशियां मनाते हैं जिन ख़ुशियों का कोई आधार नही है , और जावनरों वाली नज़्ज़तों में पड़े रहते हैं , ख़ुदाई वास्तविक्ताओं को सुनने के लिए तैयार नही होते हैं , जो भी उनके पास आता है उसको अपनी ही तरह बाग़ी और विरोधी बना देते हैं।
यह लोग हर शहर और हर समाज में पहचाने जा चुके हैं , क़ुरआन करीम ने इनसे दूर रहने का आदेश दिया है और उनसे दोस्ती एवं सामाजिकता बनाने से मना किया है।
وَإِذَا رَأَيْتَ الَّذِينَ يَخُوضُونَ فِي آيَاتِنَا فَأَعْرِضْ عَنْهُمْ
और जब तुम यह देखो कि लोग हमारी निशानियों के बारे में बेकार की बहसें कर रहे हैं तो उनसे दूर हो जाओ।
وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّن ذُكِّرَ بِآيَاتِ رَبِّهِ ثُمَّ أَعْرَضَ عَنْهَا إِنَّا مِنَ الْمُجْرِمِينَ مُنتَقِمُونَ
औऱ उससे बड़ा ज़ालिम कौन है जिसे ख़ुदा की निशानियों की याद दिलाई जाती है और फिर उससे मुँह मोड़े तो हम निःसंदेह मुजरिमों से इन्तेक़ाम लेने वाले हैं।
ऐसे लोग भी पाए जाते हैं जिनको क़ुरआन करीम की आयतों के माध्यम से ध्यान दिलाया जाना आवश्यक है , उनको अम्र बिल मारूफ़ और नही अनिल मुनकर की आवश्यकता है , उन पर हुज्जत तमाम होनी चाहिए ताकि उनके लिए सौभाग्य के द्वार खुल जाएं , लेकिन उनके साथ जितनी मोहब्बत और मेहरबानी बरती जाती है वह उतना ही बिगड़ते हैं और ख़ुदा की आयतों से मुँह मोड़ लेते हैं , बद बख़्ती और दुर्भाग्य से हमराही हो जाते हैं , यह लोग ख़ुद से पाक अख़्लाक़ और नेक अक़ीदों को अपनाना नही चाहते हैं।
इनकी हालतों को देखकर बेहतर यही है कि इनसे दूरी इख़्तियार की जाए , इनकी दोस्ती और सामाजिकता से बचा जाए , कहीं ऐसा ना हो कि उनकी शैतानी आदतें और गुण दूसरों को गुमराही के कुँए में धकेल दें , और रहमत के द्वार उन पर बंद हो जाएं और दुनिया एवं आख़ेरत दोनों के सैभाग्य से महरूम हो जाएं।
فَأَعْرِضْ عَن مَّن تَوَلَّى عَن ذِكْرِنَا وَلَمْ يُرِدْ إِلَّا الْحَيَاةَ الدُّنْيَا ،ذَلِكَ مَبْلَغُهُم مِّنَ الْعِلْمِ
इसलिए जो व्यक्ति भी हमारे ज़िक्र से मुँह फेरे और दुनिया की ज़िन्दगी के अतिरिक्त कुछ ना चाहे आप भी उससे मुँह फिरा लें , यही उनके इल्म की हद है।
दुनिया में इस प्रकार के लोग पाए जाते हैं जो जानते बूझते ख़ुदा की याद , क़ुरआन की आयतों हालाल और हराम और वास्तविक्ताओं सो मुँह मोड़ते हैं , वासना , दौलत , सत्ता और हुकूमत और शारीरिक इच्छाओं के अतिरिक्त किसी और चीज़ के बारे में नही सोचते हैं।
यह लोग जीवन के हर काम में यहां तक कि इंसानों की कोशिश को भी वासना और दौलत की राह में प्रयोग करना चाहते हैं और जो भी उनके रास्ते में आता है उसको अपने से दूर कर देते हैं , उसके साथ दुश्मनी , हसद और कीने से काम लेते हैं।
यह लोग ख़ुदा की तरफ़ मार्ग दर्शन नही चाहते , आख़ेरत से इनको कोई लगाव नही है , यह नबियों के द्वारा उठाई गई कठिनाईयों का सम्मान नही करते , इसी कारण मेहरबान ख़ुदा इंसानों के महत्व को सुरक्षित रखने के लिए आदेश देता है कि इस प्रकार के लोगों से दूर रहो , उनके साथ दोस्ती और सामाजिकता से बचो।
रिवायतों में भी इनसे दूर रहने के लिए ज़रूरी अहकाम बयान हुए हैं , इस सिलसिले में नीचे दी जा रही रिवायतें बेहतरीन मार्ग दर्शक हैः
रसूले ख़ुदा (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) से रिवायत हुई हैः
أَحْكَمُ النَّاسِ مَنْ فَرَّ مِنْ جُهَّالِ النَّاس
बुद्धिमान इंसान वह है जो नादानों से दूर रहे।
इमाम सादिक़ (अलैहिस सलाम) से रिवायत हुई हैः
لَا يَنْبَغِي لِلْمُسْلِمِ أَنْ يُوَاخِيَ الْفَاجِرَ وَ لَا الْأَحْمَقَ وَ لَا الْكَذَّاب
मुसलमान के लिए मुनासिब नही है कि वह बुरा काम करने वाले , मुर्ख और झूठे इंसान के साथ सामाजिकता और दोस्ती करे।
इमाम सादिक़ (अलैहिस सलाम) ने फ़रमायाः जब अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ) मिम्बर पर जाते थे तो कहते थेः मुसलमानों के लिए मुनासिब यह है कि वह तीन (प्रकार के) लोगों से दूर रहेः माजिन , अहमक़ (मुर्ख) , और झूठा।
माजिनः वह व्यक्ति है जो अपने कार्यों को तुम्हारे लिए सजाता और सवांरता है कि तुम भी उसी के जैसे हो जाओ , वह कभी भी तुम्हारे दीन और तुम्हारी आख़ेरत पर तुम्हारी सहायता नही करता , उसके साथ दोस्ती और सामाजिकता करना ज़ुल्म और संगदिली का कारण है , उसके साथ उठना बैठना तुम्हारे लिए अपमान है।
अहमक़ः वह व्यक्ति है जो नेकी और भलाई की तरफ़ तुम्हारा मार्ग दर्शन नही करता , तुम उससे मुसीबत , समस्याओं और बुराई के अतिरिक्त किसी और चीज़ की आशा ना रखो , अगरचे वह अपने पूरे वुजूद के साथ कोशिश करता है और तुमको लाभ पहुँचाना चाहता है लेकिन हानि ही पहुँचाता है , उसकी मौत उसके जीवन से बेहतर है , उसका चुप रहना बोलने से बेहतर है , उसका दूर रहना पास रहने से बेहतर है।
झूठाः वह व्यक्ति है जिसके साथ रहने से तुम्हारा जीवन अच्छा नही होगा , तुम्हारी ज़िन्दगी की बातों को दूसरों से बताएगा और दूसरों की बातें तुमसे बताएगा , जब भी कोई चीज़ कहेगा तो मुँह बंद करेगा और बात को काट देगा और दूसरी बात आरम्भ कर देगा और अगर सच बात कहेगा तो चूँकि उसका कोई ऐतेबार नही है इसलिए उसकी बात का भरोसा नही हो सकता , लोगों के बीच दुश्मनी पैदा करता है , सीनों में कीने और दुश्मनी को उभारता है , ख़ुदावंदे आलम की तरफ़ देखो और अपने वुजूद की तरफ़ ग़ौर और फ़िक्र करो।
पैग़म्बरे इस्लाम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) ने फ़रमायाः
मुर्दो के साथ सामाजिकता (दोस्ती करने) से दिल बुरा हो जाता है , कहा गयाः हे अल्लाह के रसूलः मुर्दों के साथ सामाजिकता का क्या अर्थ है ?
आपने फ़रमायाः जो भी ईमान के रास्ते से भटका हुआ है और ख़ुदा के अहकाम से दूर हो गया है और उनका पालन करने से इन्कार करता है उनसे सामाजिकता और दोस्ती ना करना।
हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अलैहिस सलाम) ने फ़रमायाः
قَطِيعَةُ الْجَاهِلِ تَعْدِلُ صِلَةَ الْعَاقِل
जाहिल से संबंध तोड़ना आलिम से संबंध बढ़ाने के बराबर है।
इमाम बाक़िर (अलैहिस सलाम) ने रसूल इस्लाम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) से रिवायत की है कि आपने (स) ने फ़रमायाः
إِنَ أَسْرَعَ الْخَيْرِ ثَوَاباً الْبِرُّ، وَ أَسْرَعَ الشَّرِّ عِقَاباً الْبَغْيُ، وَ كَفَى بِالْمَرْءِ عَيْباً أَنْ يُبْصِرَ مِنَ النَّاسِ مَا يَعْمَى عَنْهُ مِنْ نَفْسِهِ، وَ أَنْ يُعَيِّرَ النَّاسَ بِمَا لَا يَسْتَطِيعُ تَرْكَهُ، وَ أَنْ يُؤْذِيَ جَلِيسَهُ بِمَا لَا يَعْنِيه
सवाब के ऐतेबार से जल्दी मिलने वाली अच्छाई , लोगों के साथ नेकी करना है और अज़ाब के लिहाज़ से जल्दी मिलने वाली बुराई , लोगों के साथ बुरा बर्ताव करना है , और ऐब के ऐतेबार से इंसान के लिए यही काफ़ी है कि वह लोगों में वह चीज़ देखे (उस बुराई की तलाश में रहे) जो (स्वंय) उसके वुजूद में उससे छिपी हुई है और लोगों की उस चीज़ से निंदा करे जिसको ख़ुद छोड़ने की शक्ति ना रखता हो , और अपने साथी को ऐसे कार्यों के कारण परेशान करे जिनका कोई महत्व नही है।
इमाम सादिक़ (अलैहिस सलाम) ने अपने पिता से उन्होंने रसूले ख़ुदा (स) से रिवायत की है कि आपने (स) फ़रमायाः
أَلَا أُنَبِّئُكُمْ بِشَرِّ النَّاسِ؟ قَالُوا بَلَى يَا رَسُولَ اللَّهِ قَالَ : مَنْ أَبْغَضَ النَّاسَ وَ أَبْغَضَهُ النَّاسُ ثُمَّ قَالَ : أَ لَا أُنَبِّئُكُمْ بِشَرٍّ مِنْ هَذَا؟ قَالُوا بَلَى يَا رَسُولَ اللَّهِ قَالَ : الَّذِي لَا يُقِيلُ عَثْرَةً وَ لَا يَقْبَلُ مَعْذِرَةً وَ لَا يَغْفِرُ ذَنْباً ثُمَّ قَالَ : أَ لَا أُنَبِّئُكُمْ بِشَرٍّ مِنْ هَذَا؟ قَالُوا بَلَى يَا رَسُولَ اللَّهِ قَالَ مَنْ لَا يُؤْمَنُ شَرُّهُ وَ لَا يُرْجَى خَيْرُه
क्या मैं तुमको सबसे बुरे लोगों के बारे में ना बताऊँ ? सबने कहाः हे अल्लाह के रसूल! बताइये फ़रमायाः सबसे बुरा इंसान वह है जो लोगों से दुश्मनी और हसद (जलन) करता हो और लोग भी उसके अत्याचारों और बुराई के कराण उसके दुश्मन हों , उसके बाद फ़रमायाः क्या मैं तुम्हें इससे भी अधिक बुरे इंसान के बारे में ना बताऊँ ? सबने कहाः हे अल्लाह के रसूल! बताइये आपने फ़रमायाः जो लोगों की ग़ल्ती और ख़ता को माफ़ ना करे और क्षमा मांगने वाले की क्षमा को स्वीकार ना करे और अपने सामने वाले की ग़ल्तियों और गुनाहों को माफ़ ना करे
उसके बाद फ़रमायाः क्या मैं तुम्हे इससे भी बुरे इंसान की ख़बर ना दूँ ? सबने कहाः जी हां हे अल्लाह के रसूल! आपने फ़रमायाः जिसके अत्याचारों से कोई बचा ना हो और किसी को उससे भलाई की आशा ना हो।
इमाम सादिक़ (अलैहिस सलाम) ने फ़रमायाः
مَنْ خَافَ النَّاسُ لِسَانَهُ فَهُوَ فِي النَّار
जिसकी ज़बान से लोग डरते हों वह निःसंदेह नर्क में जाएगा।
रसूले ख़ुदा (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) ने फ़रमायाः
شَرُّ النَّاسِ يَوْمَ الْقِيَامَةِ الَّذِينَ يُكْرَمُونَ اتِّقَاءَ شَرِّهِم
क़यामत के दिन सबसे बुरा इंसान वह है जिसकी बुराई से बचने के लिए उसका सम्मान किया जाए।
दोस्त चाहना और दोस्ती एवं सामाजिकता एक ऐसी वास्तविक्ता है जिसको ख़ुदावंदे आलम ने इंसान की फ़ितरत में रखा है , और इस चाहत का फल मसलेहत और हिकमत के आधार पर हर ज़माने में बनाया है और वह ऐसे सम्मानित और उच्च श्रेणी के इंसान है जिनमें ख़ुदाई गुण और इंसानी सिफ़तें पाई जाती है।
वह निशानियां , पहचान और सिफ़तें क़ुरआन मजीद की आयतों , रिवायतों और इस्लामी शिक्षा में बयान हुई हैं और उनका आवश्यक और पूर्ण नुस्ख़ा सबके सामने है।
सच्चे दोस्तो और वास्तविक साथियों को पहचानने के यह आधार हैः
ख़ुदा और क़यामत पर विश्वास , नेक अमल , दीन की जानकारी और उसकी मारेफ़त , ख़ुलूस और इख़्लास , मेहरबानी , वक़ार (क़द्र और सम्मान) ईसार (ख़ुद को दूसरों पर निछावर कर देना) शुभ चिंतक होना , अदब और संजीदगी , साफ़ दिल और चाहने वाला , सच्चाई , अमानत , क्षमा करना आदि।
इन सब चीज़ों के जोड़ को अहले बैत की ज़बान में नेक अख़्लाक़ कहा जाता है , ख़ुदावंदे आलम ने पैग़म्बरे इस्लाम (स) को क़ुरआने में इसी सिफ़त से याद किया हैः
وَإِنَّكَ لَعَلى خُلُقٍ عَظِيمٍ
नेक अख़्लाक़ (ख़ुदाई गुणों और इंसानी सिफ़तों का मजमूआ है) जिसमें भी पाया जाता हो बेहतर यह है कि लोग उससे दोस्ती और समाजिकता बनाएं , कम से कम रोज़ एक घंटा उसके पास बैठें और उसकी ख़ुदाई सांसों की बरकत और इंसानी गुणों से लाभ प्राप्त करें।
इस प्रकार का इंसान अगर किसी व्यक्ति के इन्सानियत के क्षितिज से प्रकट हो और सूर्य की तरह उसके वुजूद की ज़मीन पर अपनी किरनें बिखेर कर उसके जीवन में प्रवेश कर जाए तो यह समझ लेना चाहिए कि ख़ुदावंदे आलम की तरफ़ से उसको सबसे बड़ी नेकी मिल गई है।
पैग़म्बरे इस्लाम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) ने फ़रमायाः
من اراد اللہ بہ خیرا رزقہ خلیلا صالحا ان نسی ذکرہ و ان ذکر اعانہ
अगर ख़ुदा किसी के साथ नेकी करना चाहता है तो उसको बेहतरीन और नेक दोस्त अता करता है , अगर वह ख़ुदाई वास्तविक्ता , हलाल और हराम और ख़ुदा के आदेशों को भूल जाता है तो वह दोस्त उसको याद दिलाता है और अगर वह उसका ध्यान रखता है तो उनके अनुसार कार्य करने में वह दोस्त उसकी सहायता करता है।
पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने क़ौम को ऐसे प्रतिष्ठित इंसानों जिनको ख़ुदा की तरफ़ से बड़ी नेकी प्राप्त हुई है के साथ दोस्ती करने का शौक़ दिलाया है और एक रिवायत में ऐसी दोस्ती के महत्व के बारे में इरशाद फ़रमाया हैः
من آخی اخا فی اللہ رفع اللہ لہ درجۃ فی الجنۃ لا ینالھا بشءی من عملہ
जो भी दोस्त को ख़ुदा के लिए चुने और ख़ुदा की ख़ुशी प्राप्त करने के लिए अपने मोमिन भाई से दोस्ती के लिए तैयार हो तो ख़ुदावंदे आलम जन्नत में उसको इतना ऊँचा स्थान देगा कि जो उसके किसी भी कार्य से प्राप्त ना हो सकेगा।
पैग़म्बरे अकरम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) ख़ुदा की राह में और ख़ुदा की ख़ुशी प्राप्त करने के लिए ऐसे लोगों से दोस्ती और सामाजिकता के बारे में जिनके अंदर दोस्ती की सारी शर्तें पाई जाती है फ़रमाते हैः
ینصب لطاءفہ من الناس کراسی حول العرش یوم القیامۃ، وجوھھم کالقمر لیلۃ البدر یفزع الناس ولا یفزعون و یخاف الناس و لا یخافون، ھم اولیاء اللہ لا خوف علیھم ولا ھم یحزنون، فقیل منھم یا رسول اللہ؟ قال : ھم المحتابون فی اللہ
क़यामत के दिन एक गुट के लिए आसमान के इर्द गिर्द बहुत से तख़्त बिछा दिए जाएंगे (वह उनपर बैठेंगे) उनके चेहरे चौदहवीं रात के चाँद की भाति चमकते होंगे , लोग डर रहे होंगे लेकिन उनको कोई डर और ख़ौफ़ ना होगा , यह ख़ुदा के दोस्त हैं जिनको कोई ग़म और ख़ौफ़ नही है , लोगों ने कहाः हे अल्लाह के रसूल! यह कौन लोग हैं ? आपने फ़रमायाः यह वह लोग हैं जो ख़ुदा के लिए , ख़ुदा की राह में एक दूसरे से दोस्ती करते हैं।
इस सिलसिले में एक बहुत ही महत्व पूर्ण हदीस में रसूले इस्लाम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) ने फ़रमायाः
ان اللہ تعالی یقولّ حقت محبتی للذین یتزاورون من اجلی، و حقت محبتی للذین یتناصرون من اجلی، و حقت محبتی للذین یتحابون من اجلی، و حقت محبتی للذین یتبادلون من اجلی
ख़ुदावंदे आलम फ़रमाता हैः मेरी मोहब्बत केवल उन लोगों के लिए है जो मेरे कारण एक दूरसे से मुलाक़ात करते हैं , और मेरी मोहब्बत उन लोगों का अधिकार है जो मेरे कारण एक दूसरे की सहायता करते हैं , और मेरी मोहब्बत के केवल वह हक़दार हैं जो मेरे कारण एक दूसरे से दोस्ती करते हैं , और मेरी मोहब्बत उन लोगों के लिए है जो मेरे कारण एक दूसरे पर ख़र्च करते हैं।
इस प्रकार की दोस्ती और साथ का इतना अधिक महत्व है कि फ़रिश्ते भी ख़ुदावंदे आलम से बंदों के बीच इस प्रकार की मोहब्बत पैदा होनी की दरख़ास्त करते हैं।
रसूले ख़ुदा (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) ने फ़रमायाः
ان اللہ ملکا نصفہ من النار و نصفہ من الثلج یقول : اللھم کما الفت بین الثلج و النار الف بین عبادک الصالحین
ख़ुदावंदे आलम का एक फ़रिश्ता है जिसका आधा शरीर आग का है और आधा बर्फ़ का , वह हमेशा कहता हैः जिस प्रकार तूने आग और बर्फ़ के बीच मोहब्बत पैदा कर दी उसी प्रकार अपने नेक बंदों के बीच भी मोहब्बत और दोस्ती पैदा करे दे।
अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अलैहिस सलाम) ने इस प्रकार के दोस्तो (जो इंसान के लिए दुनिया और आख़ेरत की नेकी का कारण बनते हैं) का चुनाव करने के संबंध में फ़रमाया हैः
علیکم بالاخوان فانھم فی الدنیا و الآخرۃ الا تسمع الی قول اھل النار فَمَا لَنَا مِن شَافِعِينَ، وَلَا صَدِيقٍ حَمِيمٍ
अच्छे दोस्तों और मोमिन भाईयों के चुनाव के लिए खड़े हो जाओ क्योंकि इस प्रकार के दोस्त दुनिया और आख़ेरत के लिए बेहतरीन तोशा ए सफ़र हैं , क्या तुम ने नर्क वालों की बातों को नही सुनाः जो कहेंगे कि अब हमारे लिख कोई शिफ़ाअत (सिफ़ारिश) करने वाला भी नही है और ना ही कोई दिल को अच्छा लगने वाला दोस्त।
अच्छे दोस्त और नेक साथी को चुनने का महत्व इतना अधिक है कि शादी से संबंधित रिवायत में बयान हुआ है कि जो भी अच्छी औरत और नेक जीवन संगिनी से शादी करे , उसका शुमान उन लोगों में होता है जिन्होंने ख़ुदा की राह में और ख़ुदा के लिए मोहब्बत और इश्क़ किया है , जैसा कि एक रिवायत में बयान हुआ हैः
من نکح امراۃ صالحۃ لیتحصن بھا عن وسواس الشیطان و یصون بھا دینہ او لیولد لہ ولد صالح یدعو لہ و احب زوجتہ لانھا آلتہ فی ھذہ المقاصد الدینیۃ فھو محب فی اللہ تعالی
जो भी नेक औरत से इसलिए शादी करे ताकि उसके माध्यम से अपने दामन की पवित्रता को शैतानी बहकावो से सुरक्षित करे , और अपने दीन को सुरक्षित करे , या उसके लिए नेक औलाद पैदा करे जो उसके लिए दुआ करे और अपने जीवन साथी से इसलिए मोहब्बत करे कि उसने इन सारे कामों में उसकी सहायता की है तो निःसंदेह उसका शुमार उन लोगों में होगा जिन्होंने ख़ुदा की राह में और ख़ुदा के लिए दोस्ती की है।
सही और अच्छा दोस्त और साथी हो हक़ की राह में क़दम उठाता है और नेक अमल और अच्छे व्यवहार से परिपूर्ण होता है वह कभी भी इंसान की आदतों और उसके तरीक़ों से लापरवाह नही हो सकता , वह ईमान , क़यामत और अपने दोस्ती की मोहब्बत को ध्यान में रखते हुए अपना दायित्व समझता है कि उसको ख़तरों , फ़ितनों , बुराईयों और सामाजिक तूफ़ानों सो सुरक्षित रखे और एक फौलादी ठाल की तरह उसकी हिफ़ाज़त करे और उसको ، وَتَوَاصَوْا بِالصَّبْرِ وَتَوَاصَوْا بِالْمَرْحَمَةِ وَتَوَاصَوْا بِالْحَقِّ وَتَوَاصَوْا بِالصَّبْرِ के वातावरण में रखे और एक माहिर बाग़बान की भाति नेकियों की ज़मीन में उसको बढ़ाए और तरक़्क़ी दे और उसको इंसानी बुलंदी तक पहुँचाए।
सच्चा और मेहरबान दोस्त , इंसान को ख़ुदा की तरफ़ बुलाता है और उसकी दुनिया और आख़ेरत की भलाई के लिए काम करता है , क्योंकि नेक दोस्त इंसान को ख़ुदा की अमानत के तौर पर देखता है और इसी कारण बहुत अच्छी अमानतदारी करता है।
बेहतर है कि इस वास्तविक्ता को ध्यान में रखा जाए कि हम इंसानों के पास ख़ुदा , नबी , इमाम और वास्तविक मोमिनों के अतिरिक्त कोई और सच्चा दोस्त नही है।
وَحَسُنَ أُولَئِكَ رَفِيقًا
और यही बेहतरीन दोस्त हैं।
यह लोग इंसान की भलाई , दुनिया और आख़ेरत के सौभाग्य , कमाल और तरबियत के अतिरिक्त कुछ नही चाहते हैं।
ख़ुदा की वही के यह प्रशिक्षित है जिनका स्रोत मेहरबान ख़ुदा का पवित्र वुजूद है , यह पैग़म्बरे अकरम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) से प्रशिक्षण पाए हुए हैं जो सारी सृष्टि के लिए रहमत है और अहले बैत (अ) ने इन को प्रशिक्षण दिया है जो नजात की कश्ति , ज्ञान का स्रोत और रहमत की कान हैं।
यह इंसान के वुजूद की मिट्टी को अपने वुजूद की मिट्टी से प्रशिक्षित करते हैं और रूहानी इत्र से ख़ुदबूदार करते हैं और इंसान के जीवन को ऐसे बाग़ में बदल देते हैं जिसमें अच्छा व्यवहार , नेक अमल और सही अक़ीदे मौजूद है।
मलिकुल शोअरा बहार ने सअदी की चार प्रसिद्ध बैतों पर अपनी तज़मीन में इस नुक्ते को इस प्रकार बयान किया हैः
शबी दर महफ़िली बा आह व सूज़ी
शनीदस्तम कि मर्द पारेह दूज़ी
चुनीन मी गुफ़्त बा पीर अजूज़ी
गुली ख़ूश्बूई दर हम्माम रूज़ी
रसीद अज़ दस्ते महबूबू बे दस्तम
गिरफ़्तम आन गुल व करदम ख़मीरी
ख़मीरी नर्म व ताज़े चुन हरीरी
मोअत्तर बूद व ख़ूब दिल पज़ीरी
बे ऊ गुफ़्तम कि मुशकी या अबीरी
कि अज़ बूई दिल आवेज़े तू मस्तम
हमे गुलहाई आलम आज़मूदम
ना दीदम चुन तू व इबरत नमूदम
चू गुल बेशनवद इन गुफ़्त व शनूदम
बे गुफ़्ता मन गुली नाचीज़ बूदम
व लेकिन मुद्दती बा गुल नशिस्तम
गुल अनदर्ज़ रीज़ गुसतरदे पर गर्द
मरा बा हमनशीनी मुफ़्तख़िर करद
चू उमरम मुद्दती बा गुल ग़ुज़र करद
कमाले हमनशीनी दर मन असर करद
व गरने मन हमान ख़ाकम कि हस्तम
मेहरबान दोस्त और सच्चा साथी दुनिया और आख़ेरत की भलाई का कारण होता है इस सिलसिले में अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अलैहिस सलाम) की एक महत्व पूर्ण रिवायत बयान हुई हैः
جُمِعَ خَيْرُ الدُّنْيَا وَ الْآخِرَةِ فِي كِتْمَانِ السِّرِّ وَ مُصَادَقَةِ الْأَخْيَارِ وَ جُمِعَ الشَّرُّ فِي الْإِذَاعَةِ وَ مُؤَاخَاةِ الْأَشْرَار
दुनिया और आख़ेरत की भलाई , राज़ों के छिपाने और नेक लोगों के साथ दोस्ती और समाजिकता में जमा हो गई है , और सारी बुराई राज़ों को खोलने और बुरे लोगों के साथ दोस्ती और समाजिकता करने में जमा हो गई हैं
इस बात को जो बार बार कहा जाता है कि अपनी आत्मा के अंदर नबियों और इमाम (अ) की दोस्ती पैदा करो और आत्मा को उनका दोस्त बनाओ और अपनी रोज़ाना के जीवन में नेक लोगों से दोस्ती करो इसका कारण यह है कि सारे गुण और नेकिया इन हस्तियों में जमा हो गई हैं , इनके साथ (ज़ाहिरी या बातिनी) समाजिकता से इनके गुण इंसान की क्षमता के अनुरूप उसके अंदर आ जाती है और उनका वुजूद इंसान के ज़ाहिर और बातिन पर प्रभाव डालता है।
महान फ़क़ीह , तफ़्सीर करने वाले और ज्ञानी शेख़ तूसी ने इमाम सादिक़ (अलैहिस सलाम) से रिवायत की है कि आपने फ़रमायाः
نَحْنُ أَصْلُ كُلِ خَيْرٍ وَ مِنْ فُرُوعِنَا كُلُّ بِرٍّ وَ مِنَ الْبِرِّ التَّوْحِيدُ وَ الصَّلَاةُ وَ الصِّيَامُ وَ كَظْمُ الْغَيْظِ وَ الْعَفْوُ عَنِ الْمُسِيءِ وَ رَحْمَةُ الْفَقِيرِ وَ تَعَاهُدُ الْجَارِ وَ الْإِقْرَارُ بِالْفَضْلِ لِأَهْلِهِ وَ عَدُوُّنَا أَصْلُ كُلِّ شَرٍّ وَ مِنْ فُرُوعِهِمْ كُلُّ قَبِيحٍ وَ فَاحِشَةٍ فَمِنْهُمُ الْكَذِبُ وَ النَّمِيمَةُ وَ الْبُخْلُ وَ الْقَطِيعَةُ وَ أَكْلُ الرِّبَا وَ أَكْلُ مَالِ الْيَتِيمِ بِغَيْرِ حَقِّهِ وَ تَعَدِّي الْحُدُودِ الَّتِي أَمَرَ اللَّهُ عَزَّ وَ جَلَّ وَ رُكُوبُ الْفَوَاحِشِ ما ظَهَرَ مِنْها وَ ما بَطَنَ مِنَ الزِّنَاءِ وَ السَّرِقَةِ وَ كُلُّ مَا وَافَقَ ذَلِكَ مِنَ الْقَبِيحِ وَ كَذَبَ مَنْ قَالَ إِنَّهُ مَعَنَا وَ هُوَ مُتَعَلِّقٌ بِفَرْعِ غَيْرِنَا
हर नेकी जड़ और आधार हम हैं हमारी शाख़ों और पत्तों से हर प्रकार की नेकी निकलती है औऱ नेकी से तौहीद , नमाज़ , रोज़ा , क्रोध की पी जाना , सताने वालों को क्षमा करना , फ़क़ीरों पर एहसान , पड़ोंसियों का ख़्याल और फ़ज़ीलत वालों की फ़ज़ीलत का इक़रार पैदा होता है , हर बुराई की जड़ और आधार हमारे दुश्मन हैं उनकी शाख़ों और पत्तों से हर प्रकार की बुराई निकलती है , इस बुराई से झूठ , कंजूसी , लगाई बुझाई करना , संबंधो का तोड़ना , सूद खाना , यतीम के माल को नाहक़ खाना , ख़ुदा की हदों से आगे बढ़ना , ज़ाहिरी और बातिनी गुनाहों में पड़ना , ज़िना , चोरी और हर प्रकार की दूसरी बुराईयां निकलती हैं , जो यह दावा करे कि वह हमारे साथ है लेकिन हमारे दुश्मनों की शाख़ और पत्तों में लिपटा हो वह झूठा है।
अमीनुल मोमिनी हज़रत अली (अलैहिस सलाम) सच्चे दोस्त के बारे में फ़रमाते हैः
لَا يَكُونُ الصَّدِيقُ صَدِيقاً حَتَّى يَحْفَظَ أَخَاهُ فِي ثَلَاثٍ فِي نَكْبَتِهِ وَ غَيْبَتِهِ وَ وَفَاتِه
दोस्त उस समय तक दोस्त नही है जब तक अपने दीनी भाई और दोस्ती की तीन चीज़ों में ख़याल ना रखेः मुसीबत और परेशानी में उसका साथ दे , उसके पीछे लोगों के बीच उसके हितों की रक्षा करे और उसके मरने के बाद उसके कामो का दायित्व संभाले।
परेशानी और मुसीबत में माल , मान सम्मान और ज़बान से उसकी सहायता करने में जल्दी करे ताकि उसकी परेशानी दूर हो जाए , उसके ना होने की अवस्था में लोगों से उसके हितों की रक्षा करे और उसके विरुद्ध अपनी ज़बान को बंद रखे। उसके मरने के बाद उसके कामों की ज़िम्मेदारी संभाले और उसके बीवी बच्चों की सहायता करे।
अगर दोस्ती और समाजिकता अमीरुल मोमिनीन के कथन अनुसार हो जाए तो क़यामत के दिन सभी लोगों की ज़िन्दगी जन्नत वालों के लिए नमूना बन जाए।
संभव है कि कोई यह करे कि इस प्रकार की दोस्ती होना बहुत कठिन है बल्कि संभव ही नही है , उसके जवाब में कहना चाहिएः क़ुरआन और अहले बैत (अलैहिमुस सलाम) के घर से प्रशिक्षण पाए हुए दूसरों के साथ दोस्ती और समाजिकता में इसी प्रकार का कार्य किया करते थे , जिस प्रकार अमीरुल मोमिनीन (अ) ने फ़रमाया है और अपने कांधों पर किसी प्रकार का बोझ नही समझते थे , उन्होंने अपने व्यवहार से सिद्ध कर दिया कि मारेफ़त और दीन के बारे में किसी भी प्रकार का काम करना बहुत आसान और संभव है। आगे आने वाले भागों में उन लोगों के जीवन की तरफ़ इशारा किया जाएगा जिनका पूरा जीवन प्रकाश था और उन्होंने नबियों , इमामो और नेक बंदों को अपनी दोस्ती और साथ के लिए चुना।
निःसंदेह अगर कोई इंसान अपने लिए दोस्त और साथी को तलाश करने और दोस्ती को आगे बढ़ाने में जानकारी और अक़्ल से काम ले तो बेहतरीन लक्ष्य प्राप्त करेगा।
यह जानकारी और ज्ञान केवल , अच्छे पढ़ाई , सही सोच , ज्ञानियों से विचार विमर्श और ख़ुदाई आदेशों का पालन करने से प्राप्त होती है।
जानकारी और इल्म इतना महत्व पूर्ण है कि ख़ुदावंदे आलम ने अपने पैग़म्बर से फ़रमायाः अपना रास्ता , रसम व रिवाज , धर्म और क़ानून और रास्ते को लोगों के सामने बयान करो और उनसे कहो कि हम और हमारा अनुसरण करने वाले बसीरत और जानकारी के आधार पर इंसानों को ख़ुदा की तरफ़ बुलाते हैं जैसा कि इस आयत में बयान हुआ हैः
قُلْ هَذِهِ سَبِيلِي أَدْعُو إِلَى اللّهِ عَلَى بَصِيرَةٍ أَنَاْ وَمَنِ اتَّبَعَنِي
आप कह दीजिए कि यही मेरा रास्ता है कि मैं ज्ञान और जानकारी के साथ ख़ुदा की तरफ़ बुलाता हूँ और मेरे साथ मेरा अनुसरण करने वाला भी है।
जो लोग अक़्लमंदी , सोच , जानकारी और ज्ञान के आधार पर दोस्त का चुनाव करते हैं , विशेषकर रूहानी ऐतेबार से नबियों और मासूमीन (अ) की तरफ़ दोस्ती का हाथ बढ़ाते हैं , उनके वुजूद से उनके अंदर रूहानी और आत्मिक संबंध बन जाता है जिसके माध्यम से उनके जीवन का पेड़ फलों से भरा हुआ , महत्व पूर्ण और लाभदायक हो जाता है , दूसरे शब्दों में यह कहा जाए कि इस प्रकार यह संबंध दोस्त के वुजूद में बदल जाता है ,
मन कीम लैली व लैली कीस्त मन
हर दो यिक रूहीम अंदर दो बदन
अनुवाद
मैं कौन हूं लैला और लैला कौन है मैं
हम दोनों एक ही रुह हैं दो बदन में
क़ुरआन करीन ऐसे व्यक्तियों को पहचनवाता है जिनके वुजूद में नबियों से मिलने से पहले अक़्ल और सही सोच के एतेबार से केवल एक कमज़ोर सी लौ टिमटिमा रही थी और इसी कमज़ोर सी लौ ने उनके वुजूद को बुराईयों और बरबादी से हमेशा के लिए उनको बचाया।
यह लोग जब सोच विचार और थोड़े से नूर के साथ नबियों के हमराज़ हो गए और उनकी शैली और ख़ुदाई धर्म को अपना लिया तो वह ऐसे बुलंद मरतबों पर पहुँच गए जो इंसान को आश्चर्य में डाल देते हैं।
इन्ही में से एक मोमिने आले फ़िरऔन , फ़िरऔन का चचाज़ाद भाई , या ख़ालाज़ाद भाई था जिसको क़ुरआन ने इन शब्दों में याद किया हैः
وَقَالَ رَجُلٌ مُّؤْمِنٌ مِّنْ آلِ فِرْعَوْنَ يَكْتُمُ إِيمَانَهُ
और फ़िरऔन वालों में से एक मोमिन मर्द ने जो अपने ईमान को छिपाए हुए था।
फ़िरऔन के ख़ानदान के मोमिन ने हज़रत मूसा (अलैहिस सलाम) के व्यवहार और आचरण को देखने के बाद उनके आचरण और ईमान को अपना लिया और रूहानी तौर पर हज़रत मूसा के साथ गए , उन्होंने अपने दिल और आत्मा को हज़रत मूसा (अ) से जोड़ दिया , रूहानी कमाल और तरक़्क़ी के रास्ते पर चल पड़े , लेकिन अपने अंदर के ईमान को फ़िरऔन और उसके दरबारियों से छिपाए रखा ताकि हज़रत मूसा (अ) के मूरीद और सहायकों के तौर पर ना पहचाने जाएं , और इस प्रकार (तक़य्ये के माध्याम से) हज़रत मूसा (अ) की सहायता करते रहें हज़रत मूसा (अ) और आपके भाई हज़रत हारून (अ) की जान को फ़िरऔनियों के ख़तरे से बचाते रहे।
आप बहुत होशियार , स्थिति को भांपने वाले , और , बहुत तेज़ दिमाग़ वाले एवं शक्तिशाली थे , बहुत ही नाज़ुक मौक़े पर आपने हज़रत मूसा (अ) की सहायता की और जैसा कि सूरा मोमिन की आयतों में बयान हुआ है आपको फ़िरऔनियों के ख़तरनाक जाल से बचाया है
उन्होंने अपनी रूह में केवल हज़रत मूसा (अ) और हज़रत हारून (अ) को दोस्त के तौर पर चुना , और मूसा (अ) और बनी इस्राईल के इतिहास में एक बेहतरीन रोल अदा किया।
उन्होंने ने अक़्ल और सोच , बसीरत और जानकारी के साथ हज़रत मूसा (अलैहिस सलाम) के सच्चे होने को पहचाना और दिल एवं जान से हज़रत मूसा (अ) पर ईमान लाईं और अपने जीवन में आपको मेहरबान मार्ग दर्शक के तौर पर चुना और हक़ के रास्ते में धैर्य और दृण्ता और ज़ालिमों के हाथों विभिन्न प्रकार की सज़ाओं को बर्दाश्त करते हुए जन्नत को सिधार गईं
आपने कुफ़्र और शिर्क , ज़ुल्म और अत्याचार के दरबार में सही अक़ीदे पर विश्वास , नेक कार्यों के करने और अच्छे आचरण को अपना कर इन्सानियत के इतिहास में औरतों के चेहरे को सदैव के लिए प्रकाशमयी कर दिया और दूसरी औरतों को भी इज़्ज़त और सम्मान दे दिया और क़यामत तक के लिए अपने आपको उन औरतों के लिए ख़ुदा की हुज्जत और सीधे रास्ते के तौर पर पहचनवाया , और बुरे एवं फ़ासिक़ों के लिए किसी भी प्रकार के बहाने के रास्ते को बंद कर दिया।
फ़िरऔन को जब यह पता चला कि वह हज़रत मूसा (अ) पर ईमान ले आईं हैं , तो पहले आपको बहुत अधिक माल और दौलत देने और पूरी साज एवं सज्जा के साथ एक क़ीमती घर देने का लालच दिया ताकि वह इस प्रकार हक़ के रास्ते से हट जाएं और मूसा (अ) का इन्कार करें ताकि मूसा (अ) पर ईमान लाने में दूसरे लोग भी इनको (फ़िरऔन की बीवी को) नमूना ना बनाएं।
आसिया ने फ़िरऔन के जवाब में कहाः मुझे तेरे माल और दौलत एवं घर की आवश्यकता नही है जो कुछ मेरे ख़ुदा और मेरे महबूब ने मुझसे वादे किए हैं और मुझे उनके वादों पर विश्वास है (मूसा और तौरैत जो स्वंय सच्चे हैं और सच्चे कहे गए हैं ने जन्नत का वादा किया है) वह सब उससे अच्छे हैं जो तू मुझे देना चाहता है।
इसके बाद फ़िरऔन ने उनको भयानक सज़ाएं देनी आरम्भ कर दीं और उनसे सारे पद छीन लिए , आपने फ़िरऔन के जवाब में कहाः मुझे इन चीज़ों से कोई डर नही है और मैं अपने धर्म की सुरक्षा के लिए इन सारी सज़ाओं और अत्याचारों को बर्दाश्त करूँगी और अपने ख़ुदा के दीन को नही छोड़ूँगी और कभी भी मूसा का इन्कार नही करूँगी , क्योंकि मूसा (अ) दुनिया और आख़ेरत में निजात दिलाने वाले और ख़ुदा के बेहतरीन बंदे हैं।
(घमंडी और अहंकार में चूर) फ़िरऔन ने आदेश दियाः इस ईश्वरीय नारी के हाथ और पैरों को ज़मीन पर कीलों से गाड़ दिया जाए भूख और प्यास के साथ इनको बहुत भयानक सज़ाएं दी जाएं और इनके ऊपर बहुत भारी पत्थर रख दिया जाए जिससे इनकी सारी हड्डिया टूट जाएं।
आसिया ने इन सारे अत्याचारों को बर्दाश्त करते हुए मूसा (अ) से कहाः हे ख़ुदा से बात करने वाले! अपने ईमानी दोस्त को इन मुसीबतों में देख रहे हो ? मूसा (अ) ने कहा आसमान के फ़रिश्ते तुम्हें देखने के लिए आए हैं इस समय तुम अपने परवरदिगार की बारगाह में दुआ करो।
आसिया ने हज़रत मूसा के आदेश पर ख़ुदा से दुआ की और कुछ ही क्षणों के बाद उनकी पवित्र आत्मा जन्नत की तरफ़ चली गई।
इस नारी (जिसने दुश्मनों को अपने जीवन से दूर किया और अपनी अक़्ल का प्रयोग करते हुए मूसा को अपना वली , मुनि , और सच्चे दोस्त के तौर पर चुना) के कार्यों के महत्व को जानने के लिए निम्न लिखित आयत के महत्व पूर्ण नुक्तों की तरफ़ ध्यान से देखते हैं
وَضَرَبَ اللَّهُ مَثَلًا لِّلَّذِينَ آمَنُوا اِمْرَأَةَ فِرْعَوْنَ إِذْ قَالَتْ رَبِّ ابْنِ لِي عِندَكَ بَيْتًا فِي الْجَنَّةِ وَنَجِّنِي مِن فِرْعَوْنَ وَعَمَلِهِ وَنَجِّنِي مِنَ الْقَوْمِ الظَّالِمِينَ
और ख़ुदा ने ईमान वालों के लिए फ़िरऔन की पत्नी की मिसाल बयान की है कि उसने दुआ कि के परवरदिगार मेरे लिए जन्नत में एक घर बना दे और मुझे फ़िरऔन और उसके कुकर्मों से बचा ले , और इस पूरी अत्याचारी क़ौम से बचा ले।
शबे क़द्र में जिसमें इबादत और पूरी रात जगने का महत्व हज़ार महीनो से अधिक है , लाखों लोग रोते एवं गिड़गिड़ाते हुए और तौबा करने की अवस्था में क़ुरआन करीम को सर पर रखकर ख़ुदा को क़सम देते हैः
اللَّهُمَ بِحَقِ هَذَا الْقُرْآنِ وَ بِحَقِّ مَنْ أَرْسَلْتَهُ بِهِ وَ بِحَقِّ كُلِّ مُؤْمِنٍ مَدَحْتَهُ فِيه
हे अल्लाह! इस क़ुरआन शरीफ़ का वास्ता , उसका वास्ता जिसके साथ तूने इसको भेजा और हर मोमिन का वास्ता जिसकी तूने क़ुरआने करीम में प्रशंसा की है।
क़ुरआन शरीफ़ में जिन लोगों की प्रशंसा की गई है उनमें से एक फ़िरऔन की पत्नी आसिया हैं।
निःसंदेह इस नारी का मक़ाम और मरतबा इतना ऊँचा और पद इतना महान है कि लाखों लोग , ख़ुदावंदे आलम को इसके हक़ का वास्ता देते हैं कि वह शबे क़द्र में अपने करम और मेहरबानी के दरबार में उनको स्वीकार कर ले।
आप बहुत महान और सम्मानिय व्यक्ति थे , आपने तीन नबियों को अपने दोस्त और मार्ग दर्शक के तौर पर स्वीकार किया जिसके कारण आप तरक़्क़ी और सम्मान के इस मरतबे पर पहुँचे कि क़ुरआन शरीफ़ ने आपकी प्रशंसा की है।
अंताकिया क्षेत्र में जब ख़ुदा के भेजे हुए तीन नबियों को लोगों ने परेशान किया और उनके साथ दुश्मनी और शत्रुता से काम लेते हुए उनके निमंत्रण को स्वीकार करने से इन्कार कर दिया तो बहुत दूर से नबियों की सहायता करने के लिए आप वहां आए और बहुत ही मेहरबानी के साथ लोगों से कहाः
“ और शहर के एक कोने से एक व्यक्ति दौड़ता हुआ आया और उसने कहा कि मेरी क़ौम वालो! नबियों का अनुसरण करो , उनका पालन करो कि जो तुमसे किसी प्रकार का श्रमिक नही माँगते हैं और प्रशिक्षित (हिदायत याफ़्ता) हैं , और मुझे क्या हो गया है कि मैं उसकी इबादत ना करूँ जिसने मुझे पैदा किया है और तुम सब उसी की बारगाह में पलटाए जाओगे ,? क्या मैं उसके अतिरिक्त किसी दूसरे ख़ुदा को मान लूँ जब्कि वह मुझे हानि पहुँचाना चाहे तो किसी की सिफ़ारिश काम आने वाली नही है और ना ही कोई बचा सकता है , मैं तो उस समय खुली हुई गुमराही में हो जाऊँगा मैं तुम्हारे परवरदिगार पर ईमान लाया हूँ इसलिए तुम मेरी बात सुनो ”
अंताकिया के जाहिल और नफ़रत रखने वाले लोगों ने हबीब नज्जार की बातों का कोई भी प्रभाव नही लिए बल्कि उनसे हसद और शत्रुता करते हुए मोमिन होने और नबियों की सहायता करने के जुर्म में हमला किया और आपको इतना मारा कि आपकी शहादत हो गई।
जब इस दुनिया से बरज़ख़ की दुनिया में प्रवेश किया तो इस बंदे से कहा गया कि जन्नत में प्रवेश कर जाओ , जिस समय ख़ुदा की विशेष रहमत के दस्तरख़ान और विशेष नेमतें प्राप्त हुईं तो मेहरबानी भला चाहते हुए कहाः
काश मेरी क़ौम को भी पता होता कि मेरे ख़ुदा ने मुझे किस प्रकार क्षमा कर दिया है और मुझे सम्मानित लोगों में रखा है।
अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अलैहिस सलाम) जो सबसे अधिक अक़्ल वाले बेमिसाल मारेफ़त और सबसे अधिक दुद्धिमान थे , आपने अपने जीवन के आरम्भ से ही रसूले इस्लाम (स) को ज़ाहिर में और दूसरे सारे नबियों को अपनी आत्मा में अपना हमराज़ , साथी , दोस्त बल्कि जान से भी अधिक प्यारे भाई के तौर पर चुना और इनके सारे गुणों को अपने पवित्र वुजूद में समाने के बाद सारे नबियों से महान और पैग़म्बरे अकरम (स) के बाद क़रार पाए।
सारे नबियों से बड़ा और पैग़म्बरे अकरम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) के बाद आपका मरतबा एक ऐसी वास्तविक्ता है जिसको बहुत ही आसानी के साथ क़ुरआन शरीफ़ की आयतों विशेषकर आयते मुबाहेला और उन रिवायतों से जिनको शिया और सुन्नी ने लिखा है , सिद्ध किया जा सकता है , प्रसिद्ध हदीस है कि आपने फ़रमायाः
کنت مع الانبیاء سرا و مع محمد جھرا
मैं रूहानी दुनिया में सारे नबियों (स) का हमराज़ और साथी था और ज़ाहिर में हज़रत मोहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) का हमराज़ , दोस्त और साथी हूँ।
आपने अपने बेटे हज़रत इमाम हसन (अलैहिस सलाम) को मोहब्बत से भरा हुआ और नसीहत से परिपूर्ण वसीयत नामा लिखा है (हर बाप पर ज़रूरी है कि वह इस पत्र की अपनी औलाद को शिक्षा दे और इस ख़त के आधार पर उसकी पालें) इसमें इस वास्तविक्ता को उजागर किया है कि आपने रुहानी तरीक़े और अक़्ली यात्रा के माध्यम से पूर्वजों से ऐसा संबंध बनाया था जैसे उन सबका एक ही वुजूद हो आप लिखते हैः
أَيْ بُنَيَ إِنِّي وَ إِنْ لَمْ أَكُنْ عُمِّرْتُ عُمُرَ مَنْ كَانَ قَبْلِي فَقَدْ نَظَرْتُ فِي أَعْمَالِهِمْ وَ فَكَّرْتُ فِي أَخْبَارِهِمْ وَ سِرْتُ فِي آثَارِهِمْ حَتَّى عُدْتُ كَأَحَدِهِمْ بَلْ كَأَنِّي بِمَا انْتَهَى إِلَيَّ مِنْ أُمُورِهِمْ قَدْ عُمِّرْتُ مَعَ أَوَّلِهِمْ إِلَى آخِرِهِم
मेरे बेटे! अगरचे मेरी आयू मुझसे पहले जीने वालों के बराबर नही हुई लेकिन मैंने उनके आचरण और उनके हाल और सूचनाओं के बारे में ग़ौर एवं चितंन किया और उनके शिल्प को देखा ताकि मैं भी उनके जैसा हो जाऊँ , बल्कि उनके संबंध में जो कुछ भी मुझे पता चल सका मैंने अपना जीवन उनके उसी आचरण के अनुरूप जिया है।
जी हां! आपने रूहानी दुनिया में अक़्ल और दिल के रास्ते से क़ुरआन शरीफ़ की आयतों , और पैग़म्बरे इस्लाम (ससल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) के मार्ग दर्शन के माध्यम से नबियों से ऐसा आत्मिक संबंध बनाया कि ख़ुद आपके कथन अनुसार उनके साथ एक हो गए थे।
इस बारे में पैग़म्बरे अकरम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) के ख़ुदाई और रूहानी कथन को हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अ) के संबंध मे ध्यान पूर्वक पढ़ें कि वह इंसान के साथ साथी की रूहानियत को किस प्रकार बयान करते हैं और इंसान को बुलंदी के किस स्थान तक पहुँचाते हैं।
पैग़म्बरे अकरम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) अपने सहाबियों के बीच बैठे हुए थे कि अचानक अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अलैहिस सलाम) आपके (स) तरफ़ आते हुए दिखाई दिये पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने फ़रमायाः
مَنْ أَرَادَ أَنْ يَنْظُرَ إِلَى آدَمَ فِي خُلُقِهِ وَ إِلَى نُوحٍ فِي حِكْمَتِهِ وَ إِلَى إِبْرَاهِيمَ فِي حِلْمِهِ فَلْيَنْظُرْ إِلَى عَلِيِّ بْنِ أَبِي طَالِب
जो भी आदम को उनके व्यवहार में , नूह को उनकी हिकमत में , और इब्राहीम को उनके हिलम में देखना चाहता है वह अली इब्ने अबी तालिब (अ) की तरफ़ देखे। और आपने फ़रमायाः
مَنْ أَرَادَ أَنْ يَنْظُرَ إِلَى آدَمَ فِي عِلْمِهِ وَ إِلَى نُوحٍ فِي فَهْمِهِ، وَ إِلَى يَحْيَى بْنِ زَكَرِيَّا فِي زُهْدِهِ، وَ إِلَى مُوسَى بْنِ عِمْرَانَ فِي بَطْشِهِ، فَلْيَنْظُرْ إِلَى عَلِيِّ بْنِ أَبِي طَالِبٍ عَلَيْهِ السَّلَام
जो भी आदम को उनके इल्म में , नूह को उनके चिंतन में यहया बिन ज़करिया को उनके ज़ोहद (दुनिया को त्याग देना) में , और मूसा बिन इमरान को उनके काम की तेज़ी और सख़्ती में देखना चाहे वह अली इब्ने तालिब (अ) को देखे।
ज़े राहे निस्बत बर रूह बा रूह
दरी अज़ आशनामी हस्त मफ़तूह
मियान आन दो दिल क इन दर बूद बाज़
दर आवुरदन तवान अला दर दिल
हज़रत इमाम हुसैन (अलैहिस सलाम) अपने पवित्र वुजूद को क़ुरआन शरीफ़ , पैग़म्बरे अकरम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) के आइने में देख रहे थे और अपनी फ़िक्र और मारेफ़त को नबियों (अ) के वुजूद में देख रहे थे इसलिए आप पूरे अस्तित्व से उनके आशिक़ हो गए और अपनी रूह की दुनिया में उनसे साथी और हमराज़ बन गए।
और उनके वुजूद के सारे गुणों को अपने अंदर बसा लिया जिसके कारण आप उनके वारिस और अत्तराधिकारी हो गए।
जब हम यह कहते हैं कि इमाम हुसैन (अलैहिस सलाम) नबियों का वारिस हैं , उसका अर्थ यह नही है कि आपने उनसे दुनियावी सम्पत्ति में मीरास प्राप्त की है बल्कि इसका अर्थ यह है कि इस पवित्र वुजूद ने उनके ख़ुदाई और रुहानी सारे गुणों और किरदारों को मीरास में प्राप्त किया है।
ख़ुदा के नबी (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) अगरचे हर नबी अपने जीवन यापन और जिन्दगी के ख़र्च के लिए दुनिया के कार्यों में से किसी एक कार्य में लगा हुआ था लेकिन उन्होंने अपने दुनियावी जीवन में खाने , पीने और गुज़र बसर करने में बहुत ही मामूली चीज़ों पर जीवित रहे , उन्होंने ज़ोहद और तक़वा से काम लिया है और उनके ख़र्च से जो कुछ बचता था उसको वह ख़ुदा की राह में ख़र्च कर दिया करते थे , उनके मरने के बाद दुनियावी सम्पत्ति में से बहुत ही कम माल बचता था।
नबियों (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) के बाद उनकी सबसे बड़ी मीरास जो बचती थी वह उनके ख़ुदाई और इंसानी गुण होते थे , कि जिनका वारिस हर वह इंसान बन सकता है जो रूहानी हसब नसब में उनकी मीरास पाने की योग्यता रखता है , इमाम हुसैन (अ) अपने रूहानी संबंधों के कारण उनके गुणों को सबसे अधिक हक़दार और वासिर एवं उत्तराधिकारी हुए।
इमाम हुसैन (अलैहिस सलाम) ने हज़रत आदम (अलैहिस सलाम) से ख़िलाफ़त , सारे नामों का ज्ञान , मार्ग दर्शन और करामत का पद मीरास में प्राप्त किया था और हज़रत नूह (अलैहिस सलाम) से धर्म प्रचार , धैर्य , दृण्ता और ख़ुदा के बंदो से मोहब्बत का मक़ाम प्राप्त किया था , इसी प्रकार हज़रत इब्राहीम (अलैहिस सलाम) से दोस्ती , दुआ , स्वीकृति और इमामत का मरतबा प्राप्त किया और हज़रत मूसा (अलैहिस सलाम) से सब्र , दृण्ता , अत्याचारियों के विरुद्ध जंग और हज़रत ईसा (अ) से रूहानी और आत्मिक पद औऱ पैग़म्बरे अकरम (स) से सारे ख़ुदाई गुण और अमीरुल मोमिनीन (अ) से सारी वास्तविक्ताओं को मीरास में प्राप्त किया था और इसी मीरस और रुहानी साथ के कारण आप ऐसे बुलंद स्थान पर पहुँच गए कि ज़ियारते वारिसा में आपसे कहा जाता हैः
اشھد انک الامام البر التقی الرضی الزکی الھادی المھدی
ख़ुदावंदे आलम का पवित्र वुजूद आपनी सारी मेहरबानियों और रहमत के साथ जो सारी सृष्टि विशेषकर इंसान से जो इश्क़ और मोहब्बत करता है , इस बात का तक़ाज़ा करता है कि वह इंसान के शरीर के खाने के प्रबंध करने के अतिरिक्त उसकी रूह और आत्मा के खाने का भी प्रबंध करे , दूसरे शब्दों में यूँ कहा जाए कि दुनिया और आख़ेरत को आबाद करने के लिए उसकी सारी रूहानी आवश्यकताओं को पूरा करे , ख़ुदावंदे आलम ने इस सिलसिले में इंसान की दुनिया और उसकी आख़ेरत को सवांरने के स्रोत क़ुरआने मजीद को नाज़िल करके अपने इश्क़ और मोहब्बत को इज़हार किया है।
अमीरुल मोमिनीन (अलैहिस सलाम) के कथन अनुसार क़ुरआन शरीफ़ दो लक्ष्यों को बयान करता हैः
एक हर प्रकार की नेकी और भलाई को बयान करता है और दूसरे हर प्रकार की बुराई और बदी को बयान करता है और उससे संबंधित किसी चीज़ को उसकी हालत पर नही छोड़ा है।
दोस्ती और समाजिकता इंसान के जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव डालती है चाहे वह सही और सही तरीक़े से हो या बुरी और बुरे तरीक़े से हो , इसी कारण क़ुरआन शरीफ़ के मार्द दर्शन के कुछ भागों ने इस महत्व पूर्ण मसअले की तरफ़ बहुत आधिक ध्यान दिया है।
अगर इंसान , ख़ुदा कि किताब को इलाज करने वाले नुस्ख़े के तौर पर देखे और उसे अपने जीवन के हर भाग में प्रयोग करे तो निःसंदेह उसका पूरा जीवन नेकियों और गुणों से भर जाएगा और वह हर प्रकार की बुराई और आफ़तों से सुरक्षित हो जाएगा।
हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अलैहिस सलाम) फ़रमाते हैः
أَنَ اللَّهَ تَعَالَى أَنْزَلَ كِتَاباً هَادِياً بَيَّنَ فِيهِ الْخَيْرَ وَ الشَّرَّ فَخُذُوا نَهْجَ الْخَيْرِ تَهْتَدُوا وَ اصْدِفُوا عَنْ سَمْتِ الشَّرِّ تَقْصِدُوا
निःसंदेह अल्लाह ने ऐसी महान और मार्ग दर्शन करने वाली किताब नाज़िल की है जिससमे अच्छाईयों और बुराईयों को (खोल कर) बयान किया है , तो तुम भलाई के रास्ते को शरीर और दिल की ताक़त से स्वीकार करो ताकि हिदायत पा सको और बुराई की तरफ़ से मुँह मोड़ लो ताकि सीधे रास्ते पर चल सको।
अगर इंसान क़ुरआन शरीफ़ से सही संबंध स्थापित कर ले तो वह इंसान के जीवन के हर पड़ाव पर उसको तरक़्क़ी और बुलंदी पर पहुँचा देता है और उसको दुनिया एवं आख़ेरत की भलाई दे देता है , उसकी दुनिया और आख़ेरत की सलामत को पूरा करता है , ख़ुदा की मर्ज़ी और जन्नत एवं रिज़वान तक पहुँचा देता है।
पवित्र क़ुरआन पढ़ने वालों के तीन समूह
इमाम बाक़िर (अलैहिस सलाम) ने क़ुरआन पढ़ने वालों को तीन गुटों में बांटा है जिनमें से दो गुटों को नाकाम जाना है और एक गुट को क़ुरान वाले गुट के तौर पर पहचनवाया है। आप फ़रमाते हैः
قُرَّاءُ الْقُرْآنِ ثَلَاثَةٌ رَجُلٌ قَرَأَ الْقُرْآنَ فَاتَّخَذَهُ بِضَاعَةً وَ اسْتَدَرَّ بِهِ الْمُلُوكَ وَ اسْتَطَالَ بِهِ عَلَى النَّاسِ وَ رَجُلٌ قَرَأَ الْقُرْآنَ فَحَفِظَ حُرُوفَهُ وَ ضَيَّعَ حُدُودَهُ وَ أَقَامَهُ إِقَامَةَ الْقِدْحِ - فَلَا كَثَّرَ اللَّهُ هَؤُلَاءِ مِنْ حَمَلَةِ الْقُرْآنِ وَ رَجُلٌ قَرَأَ الْقُرْآنَ فَوَضَعَ دَوَاءَ الْقُرْآنِ عَلَى دَاءِ قَلْبِهِ فَأَسْهَرَ بِهِ لَيْلَهُ وَ أَظْمَأَ بِهِ نَهَارَهُ وَ قَامَ بِهِ فِي مَسَاجِدِهِ وَ تَجَافَى بِهِ عَنْ فِرَاشِهِ فَبِأُولَئِكَ يَدْفَعُ اللَّهُ الْعَزِيزُ الْجَبَّارُ الْبَلَاءَ وَ بِأُولَئِكَ يُدِيلُ اللَّهُ عَزَّ وَ جَلَّ مِنَ الْأَعْدَاءِ وَ بِأُولَئِكَ يُنَزِّلُ اللَّهُ عَزَّ وَ جَلَّ الْغَيْثَ مِنَ السَّمَاءِ فَوَ اللَّهِ لَهَؤُلَاءِ فِي قُرَّاءِ الْقُرْآنِ أَعَزُّ مِنَ الْكِبْرِيتِ الْأَحْمَر
क़ुरआने करीम के पढ़ने वाले तीन प्रकार के लोग हैः एक वह व्यक्ति है जो क़ुरआन को पढ़ता है लेकिन क़ुरआन करीम को एक सामान समझते हुए अपनी जेब को भरने के लिए चुनता है और क़ुरआने के माध्यम से दौलतमंद लोगों से जो चाहता है लूट लेता है और ख़ुदा की वजह से दूसरों पर फ़ख़्र करता है।
दूसरा वह व्यक्ति है जो क़ुरआन शरीफ़ को पढ़ता है , उसके शब्दों को याद करता है और उसकी हदो को तोड़ देता है , वह उसको बिना कमान की तीर की तरह उठाता है (उसके हलाल और हराम और वाजिब चीज़ं का पालन नही करता है) ख़ुदावंद क़ुरआन को उठाने करने वालों में इन जैसै लोगों का इज़ाफ़ा ना करे।
तीसरा वह व्यक्ति है जो क़ुरआन को पढ़ता है और अपने दिल एवं आत्मा की बीमारियों का इलाज़ के लिए क़ुरआन शरीफ़ के फ़ैसलों का पालन करता है , क़ुरआने करीम के माध्यम से इबादत के लिए रातों को जागता रहता है , दिन में रोज़े रखता है और क़ुरआन शरीफ़ के साये में मस्जिदों और ईबादत में लगा रहता है , आराम और चैन के बिस्तर से दूर रहता है , इन्ही के कारण ख़ुदावंदे आलम लोगों से बलाओं को दूर करता है औऱ इन्हीं की बरकतों से ख़ुदा दुश्मनों से इन्तेक़ाम लेता है और इन्ही के कारण ख़ुदा आसमान से बारिश बरसाता है , ख़ुदा की क़सम यह लोग क़ुरआन करीम को पढ़ने में किबरीते अहमर (लाल माचिस) से भी अधिक कामियाब हैं।
जी हां , क़ुरआन शरीफ़ के वास्तविक पढ़ने वाले अपने दिल को ख़ुदा की किताब की आयतों पर रखते हैं , क्योंकि आयातों के ज्ञान से अपने दिल की बीमारियों जैसै हसद (जलन) कीना , कंजूसी , लालच और दिखावा आदि को पहचानते हैं , क़ुराआन करीम की आयते , ख़ुदा की याद , क़यामत और इमाम बाक़िर (अलैहिस सलाम) के कथन अनुसार अपने दिल पर क़ुरआन के फ़ैसलों की मोहर लगाकर अपने दिल की बीमारियों का इलाज करते हैं और इसको तौहीद एवं आख़ेरत के निकलने का क्षितिज बनाते हैं और बुराईयों दूर करके अच्छाईयों को अपनाते हैं , जिस समय इंसान के दिल का इस प्रकार इलाज हो जाता है तो इंसान की रातें , ख़ुदाई लोगों की रातें हो जाती हैं।
शबे मर्दाने ख़ुदा रोज़े जहान अफ़रोज़ अस्त
रोशिनान रा बे हक़ीक़त शबे ज़ुलमानी नीस्त
अनुवाद
ख़ुदाई लोगों की रातें , दुनिया को प्रकाशमयी कर देने वाले दिन की तरह प्रकाशमयी होती है , नूरानी लोगों की रात भी वास्तव में अंधेरे वाली नही होती।
ख़ुदाई लोगों की रातें , इबादत , दुआ , इस्तिग़फ़ार , ख़ुदा की सृष्टि में चिंतन , क़ुरआन शरीफ़ को पढ़ने में बीतती है यह लोग अपने को पहचनवाए बिना मोहताजों , मजबूरों और ज़रूरतमंदों की सहायता करते हैं , दिल का इलाज होने के बाद इंसान के दिन हलाल रोज़ी कमाने , लोगों की समस्याओं का समाधान करने और ख़ुदा के वलियों से मुलाक़ात में बीतते हैं।
क़ुरआने करीम से प्रभावित होने की बरकर में दिल नूरानी हो जाते हैं , उसके बाद मस्जिदें इंसानों से आबाद हो जाती हैं और शिक्षा एवं धर्म प्रचार और हक़ की तालीम की क्लासों में बदल जाती है।
जब क़ुरआन से इंसान का दिल , ख़ुदा का हरम हो जाता है तो इंसान का आरामदायक बिस्तर ख़ाली हो जाता है , और इंसान , इबादत के रास्ते और लोगों की सहायता के लिए हर समय तैयार रहता है , अपनी उम्र के हर क्षण को ख़ुदा की मर्ज़ी प्राप्त करने के लिए प्रयोग करता है और नेकी एवं भलाई की चोटी पर पहुँच जाता है जिसके माध्यम से ख़ुदावंदे आसम दुश्मनों की साज़िशों एवं मंसूबों को मुसलमान क़ौम से दूर करता है और उसकी के कारण बलाओं को समाज से दूर करता है और लोगों की दुनिया को आबाद करने के लिए आसमान से बारिश बरसाता है।
इंसान , क़ुरआन शरीफ़ की आयतों , उसकी सच्चाई , इशारे और किनायों को देखते हुए अक़्ल , जान , रूह , आत्मा की शक्ति , रुहानी जीवन की सुरक्षा और संभावित ख़तरों को दूर करने के कारण नबियों और इमामों (अलैहिमुस सलाम) की तरफ़ जाता है और दुनिया में ख़ुदा के वलियों के दामन को पकड़कर उनकी दोस्ती और साथ के लिए तैयार हो जाता है और इस सिलसिले में अपने सारे वुजूद को उन ख़ुदाई चेहरों के रूहानी चश्में से सेराब करता है और धीरे धीरे ख़ुदा पर ईमान , क़यामत पर विश्वास , क़ुरआन शरीफ़ में बयान किए गए वजिबात का पालन करते हुए इस्लाम , ईमान , इबादत और ख़िदमत की राह में मज़बूत पहाड़ की तरह खड़ा हो जाता है। फ़ितनों के हमले और शैतानों की संस्कृति के आक्रमण के ख़तरों को कारण अमन और अमान के साये में में चला जाता है जैसा कि हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अ) की शान में बयान हुआ हैः
كُنْتَ كَالْجَبَلِ لَا تُحَرِّكُک الْعَوَاصِف
पवित्र क़ुरआन का इंसानसाज़ मंसूबा
क़ुरआन शरीफ़ , इंसान को सीधे रास्ते की तरफ़ मार्ग दर्शन करने के लिए नाज़िल हुआ है और उसमें वह सारे क़ानून और अहकाम पाए जाते हैं जो इंसान की फ़ितरत और उसकी प्रकृति से मेल खाते हैं , इस क़ानून का पालन करने से दुनिया और आख़ेरत का सौभाग्य प्राप्त होता है।
क़ुरआन करीम ने निम्म लिखित तीन प्रस्तावनाओं का ख़याल रखते हुए इंसान के जीवन के लक्ष्यों को इस प्रकार पेश किया हैः
1) हर इंसान के अपने जीवन में कुछ लक्ष्य होते हैं (अच्छा जीवन) जिन को प्राप्त करने के लिए वह प्रयत्न करता है।
2) यह प्रयत्न प्रोग्राम और मंसूबों के बिना लाभदायक नही हो सकता।
3) इस मंसूबे को सृष्टि और प्रकृति कि पुस्तकों में अध्ययन करना चाहिए , दूसरे शब्दों में यूँ कहा जाए कि ख़ुदाई संबंधों के माध्यम से प्राप्त करे , इंसान के जीवन के मंसूबों को इस प्रकार क्रमांतित करना चाहिएः
अपने मंसूबे का आधार , ख़ुदा की मारेफ़त और उसकी शिनाख़्त को बनाए , एकेश्वरवाद पर विश्वास को धर्म को पहचानने की पहली सीढ़ी बनाए और ख़ुदा को पहचानने के बाद क़यामत की पहचान क़यामत पर विश्वास (कि जिसमें इंसान को उसके अच्छे और बुरे कार्यों का फल मिलेगा) को दूसरा ज़ीना बनाए , उसके बाद पैग़म्बर की पहचान को क़यामत की जानकारी से प्राप्त करे क्योंकि अच्छे और बुरे कार्यों का अच्छा या बुरा फल बिना बताए (जो कि आकाशवाणी और नबूवत के माध्यम से होता है) नही दिया जा सकता और उसको भी एक ज़ीना बनाए। इस आधार पर ख़ुदा के अकेले होने , नबूवत और क़यामत पर विश्वास को इस्लाम धर्म के सिद्धांत बनाए।
उसके बाद अच्छे व्यवहार और नेक गुणों के तीनों मुनासिब सिद्धांतों को जो कि एक वास्तविक्ता को तलाश करने वाले और इमानदार व्यक्ति में होना चाहिएं , बयान करे।
उसके बाद जीवन के लिए वह क़ानून बनाए जो वास्तव में वास्तविक सौभाग्य की सुरक्षा करने वाले , अच्छे व्यवहार को बढ़ावा देने वाले , सही अक़ीदों और सही उसूलों को तरक़्क़ी और बढ़ावा देने वाले हैं।
जो व्यक्ति वासना एवं शारीरिक इच्छाओं , चोरी , धोख़ा धड़ी , माल में मिलावट और लोगों को धोख़ा देने में लगा रहता हो और इसमें किसी क़ानून का ख़याल ना करता हो उसमें आत्मा की पवित्रता की तिफ़त पाई जाए यह संभव नही है या जो व्यक्ति माल जमा करने के चक्कर में पड़ा रहता हो , लोगों की ज़िम्मेदारियों और वाजिब हक़ को पूरा ना करता हो उसमें सख़ावत की सिफ़त पैदा हो जाए संभव नही है या जो व्यक्ति ख़ुदा की आराधना ना करता हो और हफ़्तों या महीनों ख़ुदा को याद ना करता हो वह ख़ुदा और क़यामत के विश्वास और बंदगी के मरतबे पर पहुँच जाए संभव नही है।
सारांश यह है कि क़ुरआन मजीद इस्लाम के वास्तविक आधार (जो कि तीन हिस्सों से बनती है) निम्न लिखित क्रम अनुसार हैः
1. इस्लामी अक़ीदों के उसूल कि जिसके एक भाग में धर्म के तीनों उसूल पाए जाते हैं यानी तौहीद (एकेश्वरवाद) नबूवत , और क़यामत और दूसरे भाग में इनसे संबंधित अक़ीदे जैसे लौह , क़लम , क़ज़ा एवं क़द्र , फ़रिश्ते , अर्श और कुर्सी , ज़मीन और आसमान का अस्तित्व में आना आदि।
2. अच्छा अख़्लाक़।
3. धार्मिक अहकाम और व्यवहारिक कानून जिनके कुल्लियात को क़ुरआन करीम ने बयान किया है और उसको विवरण एवं विस्तार से पैग़म्बरे इस्लाम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) ने बयान किया है और पैग़म्बरे अकरम (स) ने भी (हदीसे सक़लैन के अनुसार जिसको इस्लाम की सभी सम्प्रदायों ने तवातुर के साथ लिखा है) अले बैत (अलैहिमुस सलाम) के कथन को अपने कथन का स्थान दिया है।
क़ुरआन के रास्ते को जो कि फ़ितरत और प्रक़ति का रास्ता है , अपनाने से इंसान का सौभाग्य सुरक्षित जो जाता है और क़ुरआन शरीफ़ से मुँह मोड़ लेने से या दूसरे शब्दों में यह कहा जाए कि सीधे रास्ते से हट जाने से ना केवल सभ्यता एवं संस्क्रति को उसके वास्तविक अर्थ में प्राप्त नही किया जा सकता बल्कि ऐसा वातावारण बनाया जा सकता है जिसमें गुंडागर्दी , ज़ुल्म एवं अत्याचार , इंसानों के अधिकारों को बरबाद किया जाता है और जिसमें पीड़ितों की फ़रयाद कोई नही सुन पाता।
किसी भी सभ्यता और संस्कृति में दो पहलू पाए जाते हैः एक दुनियावी पहलू , और दूसरा रूहानी पहलू।
दुनियावी पहलू शरीर की शक्ति और वह सारी चीज़ें हैं जो हिस का अनुसरण या उसकी सहायता करती हैं , जैसे भाप , और बिजली की शक्ति से प्राप्त होने वाले अविश्कार और बनाई जाने वाली चीज़ें जैसे , एटम , गाड़ियां , हवाई जहाज़ , रॉकिट , पानी के जहाज़ , और पन डुब्बी आदि , बिलकुल सामने की बात है कि यह सारी शक्तिया दुनियावी है , और इसी प्रकार वह सारी चीज़ें जो इंसान के रोज़ाना के जीवन में आराश और ऐश के लिए प्रयोग की जाती है , जैसे पेन आदि , यहां तक कि वह सारी चीज़ें जिनको इस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए प्रयोग करते हैं जैसे गणित , और दूसरे इल्म , यह सारे के सारे दुनियावी हैं , क्योंकि इंसान के जीवन के लिए इनका नतीजा केवल यही अविश्कार और बनाई जाने वाली चीज़ें हैं जिनसे इंसान को दुनिया में आराम और सुकून प्राप्त होता है , बल्कि हर स्कूल और यूनिवरसिटी जो इन चीज़ों का ज्ञान देती है उन सबका शुमार दुनियावी और माद्दी शक्तियों में होता है।
लेकिन रूहानी पहलू या किसी सभ्यता की रूहानी शक्ति यह है कि इंसानी आचरण और नेक व्यवहार को अंजाम दिया जाए और उन तक पहुँचने का प्रयत्न किया जाए।
इंसानों के संबंधों को सही करने का प्रयत्न , समाजी सोच को तरक़्क़ी देने की कोशिश , राजनीतिक पहलू पर लोगों की जानकारी और इल्म बढ़ाने का प्रयत्न को रूहानी शक्ति कहते हैं , इसी प्रकार इंसानों में यह आदत डाली जाए कि वह सदैव इंसानों की भलाई के लिए काम करें , सदैव नेकी और अच्छाई के बारे में सोचें , लोगों की कामियाबी की दुआ करें और उनका दिल अपने भाईयों की मोहब्बत में धड़कता रहे , इसी प्रकार लोगों की सही शिक्षा और प्रशिक्षण के लिए सही क़ानून बनाएं , इंसानों की रूह के आहार के लिए बेहतरीन केन्द्र बनाना और इंसानों के साथ नेकी करने में रूहानी सभ्यता और संस्क्रति के पहलू पाए जाते हैं यही रूहानी सभ्यता की जान हैं।
किसी भी संस्क्रति या सभ्यता को उस समय तक वास्तविक सभ्यता या संस्क्रति नही कहते जब तक उसमें यह दोनों पहलू ना पाए जाएं और उसमें यह दोनों पहलू बराबर और समान रूप से ना पाए जाएं।
यहां पर इस ज़माने की सभ्यता (जो कि अपनी सारी विशेषताओं में हक़ और सही रास्ते से दूर है) पर एक संक्षिप्त निगाह डालते हैं ता कि मालूम हो जाए कि जिसको आज कहा जाता है कि हम सभ्यता और संस्क्रति वाले हैं क्या वह सही सभ्यता है या ख़राब , तरक़्क़ी करने वाला है या अपने स्थान पर ठहरा हुआ है , इंसानों के लिए आशा कि किरण है या निराशा लाने वाला ?
आज की दुनिया ने दुनियावी शक्ति के एतेबार से बहुत अधिक तरक़्क़ी कर ली है लेकिन रूहानी शक्ति के एतेबार से बहुत बड़ी हार हुई है और उस गर्त की तरफ़ चली गई है जिसके बारे में ना कोई आशा थी और ना ही अनुमान।
जो लोग दुनियावी चका चौंध , चेहरों के श्रंगार , दुनियावी ऐश और शारीरिक आराम को पसंद करते हैं उन्होंने दुनियावी सभ्यता के लिए बहुत तालिया बजाई हैं और इतने अधिक नारे लगाए हैं कि उनकी आवाज़ें बैठ गई और उनके हाथों ने काम करना छोड़ दिया। लेकिन जो लोग इंसानों में उनकी रूह की बुलंदी को चाहते हैं और चेहरे के सौन्दर्य को चरित्र के सौन्दर्य के बिना स्वीकार नही करतें और सदैव इंसान की कामयाबी को चाहने वाले हैं , वह आज की सभ्यता पर आँसू बहाते हैं , और एक गुट तो बिलकुल इस सभ्यता से दूर हो कर अपने सपनों की दुनिया में उड़ रहा है , उसने अपने सपनों में एक अलग शहर बना लिया है वह ख़ाब और सपनों के अतिरिक्त कुछ भी नही जानता।
हवाई जहाज़ों ने सम्पूर्ण आसमान को अपने सामने छुका दिया , रॉकिटों ने इंसान को चाँद पर पहुँचा दिया और दूसरे ग्रहों पर पहुँचने के लिए तैयार हैं , पन डुब्बियां समन्दर की तहों में जाती हैं , बिजली है एटम की शक्ति ने इस सपने की वास्तविक्ता में बदल दिया। प्रकाश , गर्मी , सर्दी , आहार और वस्त्र , पानी , हवा और दुनियावी जीवन के लिए जो चाहों एक बटन दबाकर प्राप्त कर लो , आश्चर्य जनक उपकरणों के माध्यम से दुनिया के इस कोने से उस कोने तक आडियों और वीडियों संबंध बना सकते हो।
आज की सभ्यता के अविश्कारों को गिनना संभव नही है , मानो दुनिया ने अपने अस्तित्व के दिन से ही सारे राज़ अपने सीने में छिपा रखे थे ताकि आज के अविश्कारियों के माध्यम से इन सारे राज़ों को बयान करे और यह कहे कि आज के ज़माने में शक्ति और प्रकृति अपने सारे राज़ का हिसाब देने के लिए तैयार हो गई है।
लेकिन इन ज़ाहिरी बातों से धोखा नही खाना चाहिए , एक तुर्की मुहावरे में कहा गया है “घर और उसकी सुन्दरता तुमको धोखा ना दे जिसने भी उसमें जीवन व्यतीत किया उसको चैन और सुकून नही मिला है ” घरों और उनमें रहने वालों की तरफ़ देखो ताकि पता चल जाए कि बेकार लोगों की समस्याएं , जवानों की परेशानी , पागल ख़ानों में रहने वालों की संख्या में बढ़ोतरी , निराश और बेघर लोग , दुनिया के कोने कोने में विशेषकर एशिया , अफ़्रीक़ा , अमरीका में ख़ूनी जंगें , गुडांगर्दी , तनाव , अत्याचार , हुकूमतों का विभिन्न प्रकार के हथियारों से लैस होना , लोगों को क़त्ल करना , धोखा देना , चोरी , ज़मीनी , दरियाई , और हवाई डकैतियां , व्यवहारिक बुराईयां , सेक्स एस्केन्डलस , और इसी प्रकार की दूसरी बुराईया और तबाहियां इन सुन्दर महलों और आज की सभ्यता में हो रही हैं।
इस सजे हुए महलों में अच्छी क़िस्मत वाले लोग कहां हैं ?! यह यात्रा के साधनों से लदी और सामान से भरी हुई सुन्दर कश्ति अमन और अमान के किस किनारे पर रुकेगी ?
बर्टोल ब्रच “Bertolt Brecht” ने अपनी पुस्तक में लिखा हैः जिस समाज में पैसे की सत्ता हो और पैसा प्राप्त करने के लिए बुराई के अतिरिक्त कोई दूसरा रास्ता ना हो तो ऐसे समाज में नेकियां भी झूठी हो जाती है!!
थामस मान “Thomas Mann” अपनी पुस्तक “शहीदों के अंतिम पत्र ” की प्रस्तावना में लिखा हैः
जिस दुनिया में उलटे पांव लौटने का ख़तरनाक रिवाज हो , जिसमें हसद और जलन की ख़ुराफ़ान और सार्वजनिक डर और ख़ौफ़ एक साथ जमा हो गए हों जिस दुनिया की अपूर्ण संस्क्रति और आचरण ने आदमी के जीवन की क़ीमत को ख़तरनाक हधियार के हवाले कर दिया हो जिसमें हथियार के गोदाम कि जिसे केवल बरबादी के लिए एकत्र किया जाए कि अगर आवश्यकता पड़े तो दुनिया को एक वीराने में बदल दे (कितनी बेवक़ूफ़ी भरी धमकी है!) जिस दुनिया के ऊपर ज़हरीले बादल छाए हुए हों , सभ्यता और संस्क्रति का गर्त में चले जाना हो , नाक कान कटी शिक्षा हो , बेहयाई और बेग़ैरती , राजनीतिक अदालत में पूर्ण धोखाधड़ी के कार्य स्वीकार्य हों , लाभ के चक्कर में लगे रहना , ईमान और वफ़ादारी का नाम ना हो जो दुनिया दो विश्व युद्धों के नतीजों या कम से कम इन दो जंगों से प्रभावित होने से अप्रत्याशित हालतों की तरफ़ चली गई हो , वह इंसान और उसके जीवन को तीसरे विश्व युद्ध की बरबादी से बचाने के लिए क्या सुरक्षा दे सकती है ?!
“ होमान लूमर ” ने अपनी पुस्तक “रास्ते और भविश्य की बेनवाई ” (राहहा व आयनदए बे नवाई) में कहा हैः
मशीनें और उपकरण जितना अधिक अपने आप कार्य करने लगेंगे और जितना भी ज्ञान और टेक्निक का रास्ता खुला होगा उतना ही फ़क़ीरों की संख्या में बढ़ोतरी होगी।
“ रूमी फ़्लासिफ़र सिनका ” कहता हैः फ़क़ीर वह नही है जिसके पास माल और दौलत कम है बल्कि फ़क़ीर वह है जो आधिक चाहता है।
इन सारे बद नसीबिंयों का राज़ यह है कि सभ्यता का दुनियावी पहलू , रूहानी पहलू से अधिक शक्तिशाली हो गया है , इसी कारण आज की सभ्यता इंसान को विश्वास की निगाह से नही देख सका अगरचे सभ्यता ने दूरियां कम कर दीं , फ़ासलों को मिटा दिया , इस विशाल दुनिया को वास्तव में छोटा कर दिया , मानों दुनिया के सारे लोगों को एक घर में बिठा दिया है लेकिन लोगों के बीच से रूहानी दूरियां और आत्मा के फ़ासलों और दिलों की जुदाईयों को नही मिटा सका , मकानों को एक दूसरे से क़रीब कर दिया लेकिन उनके रहने वालों को एक दूसरे से दूर कर दिया , भौगोलिक शिक्षा में तरक़्क़ी प्राप्त कर लिया , समाजिक , इंसानों को पहचानने और अच्छे इंसानों को पैदा करने की शिक्षा में किसी भी स्थान तक नही पहुँच सका।
आज की सभ्यता ने पहाड़ों , जंगलों , ज़मीन की गहराईयों , अंतरिक्ष और समन्दरों को खंगाल डाला यहां तक कि एक कण के अंदर भी रास्ता बना लिया , लेकिन इंसान के दिल को अपने बस में नही कर सका वह इंसानों के दिलों में रास्ता नही बना सका , भौगोलिक आधार पर इंसानों की एकता में सहायता करता रहा लेकिन समाजिक स्तर पर आदमियों के बीच विरोध एवं इख़्तिलाफ़ डालने का प्रयत्न कर रहा है , आज की सभ्यता बहुत ही आश्चर्य जनक और शक्तिशाली है लेकिन बहुत आधिक अज्ञानी , अंधा और धैर्य ना रखने वाला है।
आज की सभ्यता ने यह तो पता लगा लिया है कि किस प्रकार जीवन व्यतीत करें ? और किस प्रकार जीवन को अच्छा बनाएं , लेकिन यह पता नही लगा सका कि किस लिए जियें , किस लिए जीवन जीना चाहिए , और जीवन का लक्ष्य क्या है ?
आज की सभ्यता इस प्रश्न का उत्तर नही दे पा रही है , हां साइंस जीवन के तरीक़े और सलीक़े को अच्छा बना सकती है लेकिन जीवन के लक्ष्य को निर्धारित नही कर सकती , साइंस जीवन की मात्रा में तो सहायता कर सकती है लेकिन जीवन की कैफ़ियत को निर्धारित नही कर सकती।
नई सभ्यता ने नेशनलिज़्म को शक्ति दी लेकिन यही सोच जब अपनी हदों से आगे बढ़ी तो लोगों की जान के लिए वबाल बन गया , और इसके कारण दुर्भाग्य आ गया है , भूत में ख़ानदान एक ही था लेकिन फिर सब क़बीलों में बट गए , उसके बाद शहरों के आधार पर बटे , उसके बाद एक धर्म और दीन के नाम पर बटे , नई सभ्यता में सम्पत्ति की सोच बनी लेकिन इन सारी राहों और शैलियों में रोज़ीं का मुँह नही देखा , इस अवस्था के बावुजूद दुनिया को इन मुसीबतों और समस्याओं से छुटकारा नही मिलेगा मगर यह कि ऐसी सभ्यता आ जाए जो इन्सानियत ही को अपना लक्ष्य , वास्तविक आधार और अंतिम लक्ष्य बनाए।
आज की सभ्यता वाले आचरण को भी दुनियावी दृष्टि से देखते हैं , शिक्षा और प्रशिक्षण के मंसूबों को वतन परस्ती की सोच और ऐसे कार्यों के आधार पर तैयार करते हैं जिसमें अधिक पैसा कमाया जा सके।
पूरी दुनिया की हुकूमतों की अधिकतर सम्पत्ति शारीरिक इच्छाओं या ग़र्ज़ों में ख़र्च होता है , बड़े कारख़ाने और बड़ी बड़ी मशीने कारण बनीं कि इनके मालिक इंसानों को भी मशीनों के कल पुर्ज़ों की भाति अपनी सम्पत्ति समझें। इस प्रकार माद्दा और माद्दा परस्ती ने आज की सभ्यता बनाने वाले लोगों के दिमाग़ों पर अधिकार कर लिया है , जिस दुनिया के सारे राजनितिज्ञय , ज्ञानी और आर्थशास्त्री इस दुनिया परस्ती में पड़े हैं।
इस समस्याओं में अगर कोई रूही सुधार या व्यवहारिक सुधार के बारे में बात करता है तो मानों उसने बेसुरा गाना आरम्भ कर दिया है या उसने बेकार की बात कह दी और बहुत ही पुरानी सोंच को प्रकट कर दिया है , जीवन खीर इतनी टेढ़ी हो गई कि इस सभ्यता के लीडर यानी यूएनओ के सदर को मध्य पूर्व के अकाल के ज़माने में यू एन ओ में कहना पड़ाः
“ इंसानी इतिहास में राजनीतिक और इंसानी आचरण इतना कभी नही गिरा था। “
यह कहने के बाद खेदपूर्ण गर्त को रोकने के लिए उन्होंने क्या किया है ? क्या कारवाईयां की हैं ? इतने बड़े विश्वव्यापी संस्था के प्रमुख की यह बात क्या आज की सभ्यता की रूहानी हार का ऐलान नही है ?।
आज की सभ्यता अक़्ल की तारीफ़ और उसकी बुलंदी के आधार में बहुत आगे बढ़कर देखा है , इस सभ्यता के संस्थापकों ने अपनी बदहवासी के कारण केवन अक़्ल को अच्छे जीवन का आधार माना है , अक़्ल की तारीफ़ का नतीजा , साइंस की तरक़्क़ी और आश्चर्य जनक हथियारों और उपकरणों की पैदाइश है जिसने इंसान को आसमानों की ऊँचाई पर तो पहुँचा दिया लेकिन अफ़सोस की इस अजीब यात्रा के बाद उसको अब वास्तविक्ता का अंदाज़ा हुआ कि केवल अक़्ल और साइंस सौभाग्य और कामियाबी का रास्ता नही हैं , अगर इसे ऐब कहना सही हो तो इस ऐब एवं बुराई को अरसतू और उसकी शिक्षा ने जनम दिया है जिसने अक़्ल को हाकिम और इन्साफ़ करने वाला बना दिया
उन्नीसवीं शताब्दी ने महान आर्थिक बदलाव और बीसवी शताब्दी ने महान समाजिक बदलावों के माध्यम से इंसान को समझाया कि इस सभ्यता में किसी चीज़ की कमी है और यह कमी , बग़ावत का कारण बनती है और इसी कमी ही ने आज की पीढ़ी को वुजूद और अदम का मुनकिर बना दिया है इस सभ्यता की कमी क्या है ? वही रुही पहलू जिसकी तरफ़ इस बहस के आरम्भ में इशारा किया था , इस बात का ध्यान रहे कि इल्म की बड़ाई और उसके सम्मान से इनकार नही किया जा सकता लेकिन अकेला ज्ञान औऱ इल्म काफ़ी नही है।
सही और स्वस्थ जीवन व्यतीत करने और सब के अधिकारों का ध्यान रखने वाला वातावरण बनाने के लिए और पर प्रकार की इच्छाओं , और चाहतों को बराबर पलड़ें में लाने के लिए इंसान को बहुत अधिक आकाशवाणी की आवश्यकता होती है आकाशवाणी , अक़्ल और इल्म एवं ज्ञान से बड़ी शक्ती और ताक़त का नाम है और केवल आकाशवाणी ही वह वास्तविक्ता है जो इंसान को उसकी फ़ितरत और प्रवर्ति के आधार पर अक़ीदती , व्यवहारिक और शौक्षिक पहलू की तरफ़ मार्ग दर्शन कर सकती है ऊपर बताए गए यह तीनों चीज़ें ही दुनिया और आख़ेरत में इंसान के सौभाग्य की गारन्टी हैं।
क़ुरआन शरीफ़ , ख़ुदावंदे आलम की तरफ़ से पैग़म्बरे अकरम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) पर आकाशवाणी , मार्ग दर्शान की सम्पूर्ण पुस्तक , सदैव बाक़ी रहने वाला स्रोत , दुनिया और आख़ेरत के सौभाग्य का रास्ता दिखाने वाला , जीवन का मूल दिद्धांत , इंसान का सच्चा प्रशिक्षण करने वाला और पूर्ण वास्तविक्ताओं को बयान करने वाला है , क़ुरआन शरीफ़ इंसान को अपने अंदर झांकने का निमंत्रण देता है और उसको अपनी रूह के सामने फैसला करने वाला बनाता है ताकि वह अपनी फ़ितरत को समझ सके और उसकी अंदरूनी समझ उसको नींद से जगा सके।
अंदरूनी हिस बहुत कम ग़ल्ती करती है और अंतरआत्मा का फ़ैसला शत प्रतिशत सही होता है , जिस इंसान पर किसी की फ़ितरत हुकूमत करती है वह गुमराही से बहुत दूर रहता है और कामियाबी उसकी प्रतीक्षा करती है।
इंसान के जीवन में फ़ितरत की हुकूमत , अक़्ल की हुकूमत से आगे है , पागल और छोटे बच्चे का भी फ़ितरत मार्ग दर्शन करती है और यह दोनों ज़ुल्म एवं अत्याचार को बुरा समझते हैं , झूठ को पसंद नही करते हैं , सत्य , इन्साफ़ और एहसान को अच्छा समझते हैं , बुराईयों की बुराई और नेकियों की अच्छाई का फ़ैसला फ़ितरत करती है क्योंकि पागलों और बच्चों में अक़्ल नही होती है।
अगर फ़ितरत के मार्ग दर्शन से रोकने वाले हालात का माहौल (जो कि वासना में लिप्त रहने और जानदार एवं ग़ैर जानदार बुतों की पूजा का नतीजा है) ना होता तो सारे इंसान नेक होते और बरबादी एवं अत्याचार का दूर दूर तक निशान ना होता और यह दुनिया अद्ल औऱ इन्साफ़ से भर जाती।
क़ुरआन शरीफ़ अपने मार्ग दर्शन में ऐसा काम करता है कि इंसान होश में आ जाता है और अपने आप से पूछता है कि यह काम जो कर रहे हो सही है या ग़लत ? यह विचार जो व्यक्ति कर रहे हो यह जिस चीज़ से यह निश्कर्ष निकाल रहे हो यह सही है या ग़लत ?
कौन है जो यह प्रश्न करता है ? और किससे पूछता है ? जब्कि प्रश्न करने वाल और उत्तर देने वाला एक ही हैं दो नही हैं , क़ुरआन शरीफ़ इंसान की फ़ितरत को शिर्क से दूरी और ख़ुदा के एक और अकेले होने का निमंत्रण देता है।
ज़रा यह तो बताओ कि विभिन्न प्रकार के ख़ुदा बेहतर होते हैं या एक और क़ह्हार ख़ुदा
ख़ुदावंदे आलम की शक्ति को प्रदर्शित करने के लिए इस प्रकार प्रश्न होता हैः
(क्या वह शरीक बेहतर हैं जिनको तुमने चुना है) या वह परेशान हाल की फ़रयाद और पुकार को सुनता है जब वह उसको आवाज़ देता है और उसकी परेशानी को दूर कर देता है और तुम लोगों को ज़मीन का वारिस बनाता है क्या ख़ुदा के साथ कोई और ख़ुदा है (जो उसकी क़ुदरत और रब होने में उसका साथी हो ?) नहीं , बल्कि यह लोग बहुत कम सीख लेते हैं।
(क्या वह शरीक बेहतर हैं जिनको तुमने चुना है) या वह जो सूखे (ख़ुश्की) और पानी (तरी) के अंधेरों में (सितारों और दूसरी चीज़ों के माध्यम से) तुम्हारा मार्ग दर्शन करता है ? और वह कौन है जो बारिश से पहले बशारत (शुभ समाचार) के तौर पर हवाएं चलाता है ? क्या अल्लाह के साथ कोई और ख़ुदा है(जो उसकी क़ुदरत और रब होने में उसका साथी हो ?) निःसंदेह वह ख़ुदा सारी सृष्टि से कही अधिक महान और बड़ा है जिन्हे यह लोग उसका साथी मान रहे हैं।
(क्या वह शरीक बेहतर हैं जिनको तुमने चुना है) या वह जो हर चीज़ को पैदा करता है और फिर (मरने के बाद) दोबारा भी वही पैदा करेगा ?! और कौन है जो आसमान और ज़मीन से तुमको रोज़ी देता है ?
क़ुरआन शरीफ़ ने बुतों की शक्तिहीनता और हक़ की शक्ति को इस प्रकार बयान किया हैः
क्या ऐसा पैदा करने वाला उनके जैसा हो सकता है जो कुछ नही पैदा कर सकते
“إِنَّ الَّذِينَ تَدْعُونَ مِن دُونِ اللَّهِ لَن يَخْلُقُوا ذُبَابًا ”
यह जिनको तुम ख़ुदा को छोड़कर आवाज़ देते हो यह सब मिल भी जाएं तो एक मक्खी नही पैदा कर सकते हैं।
क़ुरआन करीम इनके मार्द दर्शन के लिए एक दूसरा क़दम उठाता है और इंसान को उसकी अक़्ल की तरफ़ पलटने का निमंत्रण देता है।
क़ुरआन मजीद अक़लमंदों के साथ बात करता है और उनसे कहता है कि अपनी अक़्लों से काम लेकर सौभाग्य और कामियाबी को पाप्त कर लो , क़ुरआन शरीफ़ सूरा आले इमरान में इस प्रकार फ़रमाता हैः
निःसंदेह ज़मीन और आसमान का पैदा होना और रात एवं दिन का आना और जाना अक़्लमंदों के लिए क़ुदरत (ख़ुदा) की निशानियां है
सूरा बक़रा में इस प्रकार फ़रमाता हैः
अपने लिए यात्रा का सामान तैयार करो कि बेहतरीन और सबसे अच्छा यात्रा का सामान तक़वा है और हे अक़्ल वालों! हमसे डरो।
सूरा यूसुफ़ में इस प्रकार फ़रमाता हैः
निःसंदेह उनकी कहानियों में अक़्लमंदों के लिए सीख (इबरत) का सामान है।
दुनिया की रचना , इंसान औऱ ज़मीन एवं आसमान का पैदा होने के बारे में चिंतन पर उभारना , क़ुरआन मजीद के मार्द दर्शन का एक नमूना है।
क़ुरआन शरीफ़ सूरा ग़ाशिया में फ़रमाता हैः
क्या यह लोग ऊँट की तरफ़ नही देखते हैं कि उसके किस प्रकार पैदा किया गया है ? और आसमान को किस प्रकार ऊँचा किया गया है ? और पहाड़ को किस प्रकार बिठाया गया है ? और ज़मीन को किस प्रकार बिछाया गया है ?
क़ुरआन करीम इंसान को अध्ययन और तलाश का निमंत्रण देता है ताकि वह दुनिया और उसकी रचना के राज़ों में चितंन करे और सृष्टि की वास्तविक्ताओं को जानकारी पैदा करे।
ग़लत धर्म अपने अनुयायियों को बहस और चितंन से मना करते हैं लेकिन क़ुरआन शरीफ़ अपने मानने वालों को बहस और तलाश का निमंत्रण देता है
ईसाई धर्म आज अक़्ल से काम नही लेता और इंसानों को सही सोच एवं चितंन से दूर करता है।
अगर एक ईसाई से कहोः तीन किस प्रकार एक हो सकते हैं ? (उनका मानना है कि ईश्वर तीन हैं लेकिन एक है) तो वह कहता है कि यह अक़्ल की पहुँच से ऊँची बात है , बाप , बेटा और रूहुल क़ुद्स अगरचे यह तीन हैं लेकिन वास्तव में एक हैं , और इस प्रकार अक़्ल और गणित के मूल भूत क़ानून को तोड़ देते हैं।
क़ुरआन शरीफ़ इतिहासिक पुस्तक नही है लेकिन नबियों और नेक लोगों के इतिहास को बयान करता है , इसी प्रकार बुरे अत्याचारियों और ज़ामिलों की कहानियों को भी अपने दामन से जगह देता है।
कहानिया सुनने और पढ़ने वाले को ग़फ़लत की नींद से जगाती है , मस्त लोगों को होशियार करती है।
क़ुरआन शरीफ़ वास्तविक इतिहास और सच्ची कहानियों को बयान करता है ताकि पढ़ने वाला उसको समझकर सीख पाप्त कर सके और सही काम करके ग़ल्ती और बुराईयों से दूर रहे।
क़ुरआन मदीज हज़रत मूसा (अलैहिस सलाम) और फ़िरऔन के इतिहास को बयान करता है , हज़रत इब्राहीम (अलैहिस सलाम) और नमरूद के कहानी को बयान करता है , हज़रत यूसुफ़ (अलैहिस सलाम) के तक़वे और ज़ुलैख़ा के इश्क़ की दास्तान को बयान करता है , मिस्र के बादशाह की सच्चाई की तलाश को बयान करता है और नबियों के साथ अरब क़ौमों की जंगों को बयान करता है।
क़ुरआनी कहानिया ख़ुदा की महान लिपियों में शुमार होते हैं जिनकी मिसाल दुनिया की किसी भाषा में आज कर दिखाई नही देती और अगर ऐसा होता तो वह दिखाई देतीं।
क़ुरआन का लक्ष्य कहानियों को बयान करना नही है बल्कि यह इंसानों के मार्ग दर्शन का साधन हैं , इंसान फ़ितरत के अनुसार कहानियों और क़िस्सों को पसंद करता है और चाहता है कि ग़ुज़रे हुए लोगों को इतिहास को जाने , क़ुरआन शरीफ़ ने इंसान की इसी चाहत को इंसान के लाभ में प्रयोग किया है और इसको मार्ग दर्शन का माध्यम बनाया है और यह काम क़ुरआन शरीफ़ इंसान की गहरी परख की सूचना देता है।
इंसान अपने मिज़ाज के अनुसार नेकी को पसंद करता है औऱ चाहता है कि अच्छे काम करे , लोग उसको नेकी से याद करें , इस चाहत की जड़ इंसान की फ़ितरत और उसकी पृक्रति में है , इंसान अच्छाईयों को पसंद करता है और बुराईयों से दूर रहता है औऱ चूँकि स्वंय दोस्ती भी प्रकृतिक है इसलिए अगर यह दोनों एक साथ मिलकर काम करें तो उसका नतीजा यह होगा कि हर इंसान अच्छाई और नेकी से पहचाना जाएगा , क़ुरआन मजीद नेक काम करने वालों को पहचनवाता हैः
नेकी यह नही है कि अपना चेहरा पूरब और पश्चिम की तरफ़ कर लो बल्कि नेकी (वास्विक और पूर्ण नेकी जो तुम्हारे सारे कामों में मापदंड बने वह उन लोगों का आचरण एवं व्यवहार है) उस व्यक्ति का हिस्सा जो अल्लाह , क़यामत , फ़रिश्तों , किताब (क़ुरआन) और नबियों पर ईमान ले आए और ख़ुदा की मोहब्बत में रिश्तेदारों , यतीमों , फ़क़ीरों , ग़रीबों , यात्रियों , सवाल करने वालों और ग़ुलामों की आज़ादी के लिए माल दे और नमाज़ क़ाएम करे और ज़कात अदा करे और जो भी वादा करे उसे पूरा करे और ग़रीबी एवं फ़ाक़े में और परेशानियों एवं बीमारियों में और जंग के मैदान में धैर्य रखने वाले हो तो यही लोग अपने ईमान और एहसान के दावे में सच्चे हैं और यही तक़वा वाले और परहेज़गार हैं।
इस आयत के दो भाग हैः रोकना और मना करना , कहना और इस्बात करना , रोकने के भाग में ख़याली नेकी को बातिल बताया है और इस्बात के भाग में नेकी की प्रशंसा की है।
आरम्भ में इस प्रकार कहा हैः यह ना समझो कि पूरब और पश्चिम की तरफ़ चेहरा करके खड़े होना नेक काम है और स्वंय को इससे प्रसन्न कर लो और अपने आपको नेक काम करने वाला समझ बैठो।
ईसाई , चर्च में जाकर पश्चिम की तरफ़ चेहरा करके खड़े होकर विर्द और ज़िक्र पढ़ने को नेक काम समझते हैं , उनके यहा दीन के सारे कार्य केवल यही हैं।
यहूदी अपने अराधना स्थलों पर जा कर पश्चिम की तरफ़ चेहरा करके अराधना करने को नेक काम समझते हैं और धार्मिक दायित्वों को पूरा करने में केवन यही करते हैं , क़ुरआन शरीफ़ ने दोनों गुटों का ध्यान इस बात की तरफ़ दिलाया है और उनकी ग़ल्ती को बयान किया है।
मुसलमानों में भी यही रस्म और रिवाज पाए जाते हैं।
कुछ लोग धार्मिक वाजिबात को पूरा करने से रोकते हैं और कहते हैः दिल को पवित्र होना चाहिए , हमारा दिल पवित्र है और धर्म का स्थान दिल है।
कुछ लोग धार्मिक कार्यों को करने से भागते हैं और यह लोग पहले गुट का साथ देते हैं , यह लोग एक घंटा बैठकर सौ बार ज़िक्र पढ़ने को नेक काम कहते हैं!
यह चारो गुट ग़लत सोच के चलते अपनी इच्छाओं का पालन करते हैं और जो कुछ उनका दिल कहता है उसकी को करते हैं और अपने आप को अच्छा और नेक इंसान समझते हैं , यह लोग अपने आपको धोखा दे रहे हैं और इसके माध्यम से तक़वा और परहेज़गारी को स्वीकार नही करते हैं और दुनिया में ज़ुल्म एवं अत्याचार पैदा करते हैं।
क़ुरआन शरीफ़ इस सोच को समाप्त कर देता है , इस तरीक़े को नेक काम नही समझता , इंसान की ग़ल्ती को सामने ला कर उसका मार्ग दर्शन करता है।
फिर इस्बात के भाग में नेक कामों को गिनता है क्योंकि बुरे काम करना क़ुरआन मजीद का तरीक़ा नही है , क़ुरआन शरीफ़ बहुत बड़े राज़ रे पर्दा उठाता है , ऐसा राज़ जो सबके लिए छिपा हुआ है और वह राज़ यह हैः नेक काम , दिल और शरीर के अंगों से मिला हुआ है और जो भी इन दोनों को मानता है वह नेक काम करेगा।
केवल दिल से अच्छे काम नही किए जाते , ज़बानी ज़िक्र से कोई नेक नही होता , कुछ देर पूरब या पश्चिम की तरफ़ चेहरा करके खड़े होने से कोई सौभाग्य प्राप्त नही करता और समाजिक इन्साफ़ नही पैदा होता।
नेक काम दो चीज़ों से बनते हैः एक दिल और अंदर से और दूसरे शरीर एवं बाहर से
ख़ुदा , क़यामत , फ़रिश्ते , नबियों और आसमानी किताबों पर ईमान रखना दिल का दायित्व है , जिसका दिल ईमान से भरा होगा उसकी बोलचाल ईमानी और नूरानी होगी।
क़यामत और महाप्रलय का वुजूद अत्याचारियों और पापियों की इच्छा के अनुसार नही है। उन लोगों को यह अच्छा लगता है कि उन्हे किसी तरह की सज़ा न मिले , यह लोग प्रयत्न करते हैं कि अपने आपको और दूसरे को यक़ीन दिलायें कि आख़िरत का कोई अस्तित्व नही है।
जो कुछ है बस सही दुनिया है अगर पुन्य व दंड है तो वह इसी दुनिया में है और चूंकि इस दुनिया में उन्हे कोई दंड नही मिला लिहाज़ा यह सज़ा व दंड के पात्र नही है न ही ज़ालिम व पापी है।
निसंदेह यह दुनिया के बड़े ज़ालिमों को सज़ा देने की शक्ति नही रखते , जिन्होने लोगों के सरों से ऊंचे मीनार बनाये हों , उनको इस संसार में किस तरह से सज़ा दी जा सकती है ?
कल्पना करें कि अगर ज़ुल्म के कारण सज़ा में उनको मार दिया तो यह सज़ा तो बस एक क़त्ल की हुई बाक़ी क़त्लों का क्या होगा ?
इसके अलावा दंड और सज़ा देने वाले के पास ज़ालिम से अधिक शक्ति और ताक़त होनी चाहिये ताकि वह उनको सज़ा दे सके और ऐसी शक्ति इस संसार में किसी के पास नही पाई जाती।
क्या चंगेज़ , तैमूर , बटलर , नरोन , यज़ीद और हुज्जाज जैसे अत्याचारियों को इस संसार में सज़ा मिली है ? क्या जिन लोगों ने आम नागरिकों के क़त्ल का ऐलान किया था उनको सज़ा मिली है ?
यह बात उन लोगों के लिये भी है जिन्होने बड़े महान नेक काम अंजाम दिये हैं , जिस नेक इंसान ने हज़ारों परेशान लोगों की परेशानियों को दूर किया हो और उनको कमाल तक पहुचाया हो , किस तरह यह दुनिया उसको इन कामों का बदला दे सकती है ?
जिस पवित्र हस्ती ने इंसानों की भलाई और प्रगति के लिये अपनी जान को फ़िदा कर दिया है , यह दुनिया उसको क्या ईनाम दे सकती है ?
यह संसार अव्यवस्थित अथवा जंगलियों का संसार नही है बल्कि यह इंसानों का संसार है।
इंसान , ज़ुल्म व अत्याचार करने वाले को दंड का पात्र समझते हैं और नेक काम करने वालों को पुन्य का पात्र समझते हैं और लोग ऐसे ही संसार की कामना करते हैं। अत: संसार ऐसा ही होना चाहिये क्यों कि इंसान की प्राकृतिक और बुद्धिपूर्वक इच्छाएं ग़लत नही है। यही कारण हैं कि एक ऐसा संसार होना चाहिये जहां दंड और पुन्य दिया जा सके।
इस संसार पर एक समझदार और शक्तिशाली हस्ती शासन और राज करती हैं जो पापियों के पापों और नेक लोगों की नेकियों को देख रही हैं और निसंदेह वह उन्हे दंड और पुन्य भी देगी।
क़ुरआने करीम ने महाप्रलय को साबित और इंसान का क़यामत को ओर मार्गदर्शन करने के लिये बडे महान क़दम उठायें हैं , क्योंकि क़ुरआने करीम इंसानों की भलाई के लिये उनके पास भेजा गया है और लोगों का दूसरी दुनिया (क़यामत) पर श्रद्धा रखने में फ़ायदा है और इसी में इंसान और समाज का भी फ़ायदा है , क़ुरआने करीम का अस्तित्व आख़िरत के वुजूद के साथ जुड़ा हुआ है।
क़ुरआने करीम मार्गदर्शन और हिदायत की किताब है जो इस संसार में न्याय व इंसाफ़ की स्थापना के लिये ईश्वर की ओर से भेजी गई है। न्याय की स्थापना के लिये एक ज़िम्मेदार इंसान का होना आवश्यक है। जो इस किताब के क़ानून को लागू कर सके वरना इस किताब के मार्गदर्शन को कोई लाभ नही पहुचेगा और क़यामत व महाप्रलय पर दृढ़ श्रद्धा का होना ही इसकी ज़मानत का सूचक है।
जो अत्याचारी , पवित्र क़ुरआन की चेतावनी से डरते हैं वह ज़ुल्म व अन्याय करने से दूर रहते हैं। ऐसे पापी भी पाप से दूर रहने का प्रयत्न करते हैं। पवित्र क़ुरआन उम्मीद देने वाली किताब है , ज़ुल्म व अत्याचार के शिकार लोगों के लिये और इसी तरह नेकी करने और पवित्र लोगों के लिये आशा की किरण है।
महाप्रलत पर श्रद्धा की बुनियाद ईश्वर पर आस्था है , पवित्र क़ुरआन में क़यामत का वर्णन ईश्वर के मानने वालो से किया गया है। ईश्वर न्याय प्रिय , शक्तिशाली , आध्यात्मी और बुद्धिमान है और उसने इंसान को बेकार जन्म नही दिया है , उसने इंसान को इस संसार का शासक बनाया है , उसको सत्य व वास्तविकता को ओर बुलाया है , अपनी तरफ़ से उसके मार्ग दर्शन के लिये नबियों को भेजा और इस पवित्र किताब को अपना संदेश बना कर भेजा है।
एक व्यक्ति ने एक मरे हुए इंसान की गल चुकी हड्डी को हाथ में उठाया और उसको इस तरह से दबाया कि वह राख बन गई उसके बाद उसने उस राख को हवा में उड़ा दिया फिर उसके बाद पूछा: कौन है जो इस राख बन कर हवा में उड़ चुकी इस हड्डी को दोबारा जीवित करे ताकि उसे उसके पापों की सज़ा दे सके ? पवित्र क़ुरआन ने उसका जवाब इस तरह से दिया है:
उसका ज़िन्दा करने वाला वही ईश्वर है जिसने उसे सबसे पहली बार अस्तित्व दिया था जबकि उस समय वह कुछ भी नही है , पहली बार ज़िन्दा करना ज़्यादा मुश्किल है या दोबारा जिन्दा करना ? कहां कुछ न होने को अस्तित्व देना और कहां मार कर दोबारा ज़िन्दा करना , ज़ाहिर है और सब इस बात को जानते हैं कि इंसान नही था फिर ईश्वर ने उसे पैदा किया है। पवित्र क़ुरआन ने इस बात को साबित करने के लिये जो दलील दी है उसकी बुनियाद जग ज़ाहिर है कि इंसान को कुछ न होने के बाद अस्तित्व देने वाला ईश्वर है।
इंसान के जीवन की समस्त निजी , घरेलू और समाजी परेशानियां उसके आध्यात्म की बीमारियों के कारण होती है जिनमें से कुछ यह हैं: घमंड , लालसा , कंजूसी , हसद व जलन , घृणा , नेफ़ाक़ , ख़ुदग़र्ज़ी , ख़ुद परस्ती और वास्तविकता से लापरवाही। इंसान को आध्यात्म की इन सारी बीमारियों से जो उसकी परेशानियों का कारण बनती है , केवल पवित्र क़ुरआन ही निजात दिला सकता है।
इस बुनियाद पर समस्त संसार , विशेष कर मुसलमान अगर चाहते हैं कि इस बुरी हालत से निजात पायें तो पवित्र क़ुरआन और उसकी आयतों को समझ कर पढ़े और उस पर सोच विचार करें।
क़ुरआन पढ़ने से अपने आध्यात्म के दर्द का इलाज करें , बिना समझे और बिना अमल के पढ़ने का कोई लाभ नही है और इस तरह किसी बीमार का इलाज संभव नही है।
आवश्यक है कि इस भाग में उन लोगों के जीवन के कुछ उदाहरण का वर्णन किया जाये जिन्होने पवित्र क़ुरआन के अख़लाक़ी , ऐतेक़ादी और अमली मंसूबे की सहायता से ख़ुद को संवारा और क़ुरआन के प्रशिक्षण से प्रगति करके सही , सदाचारिक , नेक आचरण , परहेज़गार , सच्चे , शरीफ़ , चमत्कारिक व दाता बन गये। ऐसे लोगों का उल्लेख , शायद अध्धयन करने वालों के लिये मार्गदर्शन और कमाल तक पहुचने का अमली उदाहरण और दुनिया व आख़िरत की सफ़लता का कारण हो और उन महान इंसानों की जीवनियों के पढ़ने से यह बात स्पष्ट हो जायेगी कि पवित्र क़ुरआन एक ऐसी रचनात्मक किताब है जो इस संसार को उन सारी समस्याओं से निजात दिला सकती है।
ईश्वर के लिये , ईश्वर के कारण और केवल ईश्वर की राह में क़दम उठाना , एक ऐसी वास्तविकता है जिसे अगर इंसान अपने अंदर पैदा कर ले तो निसंदेह वह अपनी श्रेष्ठता , नूरानीयत और कोमलता के अलावा अपने जीवन के समस्त कार्यों में जैसे आमाल , आचरण और सदाचार में नबियों , इमामों और ईश्वर के विशेष वलियों में से हो जायेगा।
वह अपने अंदर ऐसी हालत पैदा कर ले कि ईश्वर के अलावा किसी चीज़ को न देखे , ईश्वर के अलावा किसी वस्तु की इच्छा न करे और ईश्वर के अलावा किसी के लिये कोई क़दम न उठाये। उसके विचार , उसका दुख , क्रोध केवल जनता को लाभ पहुचाने के लिये हो और वह ईश्वर के सामने अपनी शान व शौकत को न देखे। ख़ुलासा यह है कि अपने इख़लास व शुद्धता को ईश्वर की उपासना से दूर गुमराही और आश्चर्य के दलदल में पड़े लोगों के लिये मार्गदर्शन और ख़ैर व भलाई का कारण बना दे।
ऐसा इंसान अपने ख़ुलूस व शुद्धता की रौशनी में सिर्फ़ और सिर्फ़ ऐसा वास्तविकता के बारे में सोचता है कि मेरा इंसानी और ईश्वरीय दायित्व अपने और दूसरों के साथ क्या है ? और जिस समय उसकी ज़िम्मेदारी और उसका दायित्व सामने आता है तो वह बहुत ही शौक़ और दिलचस्बी के साथ उसको अंजाम देता है और इस सिलसिले में किसी बुराई करने वाले की परवाह नही करता बल्कि अपनी ज़िम्मेदारी को निभाता है।
इस सिलसिले में उस्ताद शहीद मुतहहरी लिखते हैं:
मुझ़े स्वर्गीय आयतुल्लाहिल उज़मा बुरुजर्दी रहमतुल्लाह अलैह का वाक़ेया याद है:
आरम्भ में जब आप बुरुजर्द से तेहरान और तेहरान से क़ुम आये और हौज़ ए इल्मिय ए क़ुम (पवित्र शहर क़ुम स्थित शीया जगत का सबसे बड़ा व महत्वपूर्ण धार्मिक शिक्षा केन्द्र) के निवेदन पर क़ुम में रहने की प्रार्थना को स्वीकार कर लिया। अगरचे आप तेहरान एक बीमारी के इलाज के कारणवश आये थे , जहां आपका आपरेशन होना था।
क़ुम में कई महीने तक रहने के बाद जब गर्मियों में शिक्षा केन्द्र में छुट्टी हो गई तो आपने आठवे इमाम हज़रत अली रज़ा अलैहिस सलाम की ज़ियारत के लिये इस्लामी गणतंत्र ईरान के दूसरे पवित्र शहर मशहद जाने का संकल्प किया क्यों कि आपने बीमारी के ज़माने में मन्नत मानी थी कि अगर अल्लाह तआला ने मुझे स्वास्थ प्रदान किया तो मैं इमाम अली रज़ा अलैहिस सलाम की ज़ियारत के लिये जाऊंगा।
मुझसे एक मरज ए तक़लीद ने बयान किया कि आयतुल्लाह बुरुजर्दी ने एक विशेष बैठक में मुझसे मशहद जाने के बारे में अपना इरादा व्यक्त किया और उस बैठक में मौजूद अपने दोस्तों से फ़रमाया: आप लोगों में से कौन मेरे साथ इस सफ़र पर आना चाहेगा ? सबने कहा कि हम विचार करने के बाद आपको उत्तर देंगे। बाद में हम सबने आपस में राय मशवरा किया और यह तय हुआ कि इस समय उन्हे क़ुम से मशहद नही जाना चाहिये। इस लिये कि हमारा यह मानना था कि चूंकि आप नये नये क़ुम आये हैं और ईरान के लोग विशेष कर तेहरान और मशहद के लोग आपको अच्छी तरह से नही पहचानते है और आप को जो प्रतिष्ठा व सम्मान व सत्कार मिलना चाहिये वह नही मिल सकेगा इस लिये हम सबने यह चाहा कि आपको इस सफ़र पर जाने से रोकें , जबकि हम यह भी जानते थे कि यह बात हम उनसे कह नही पायेंगे इसलिये हमें कोई ऐसी बहाना बनाना पड़ेगा जिससे वह ख़ुद ही अपने इस मंसूबे को स्थागित कर दें जैसे यह कि हम उनसे कहें कि आप बीमार हैं , अभी आपका आपरेशन हुआ है मुम्किन है कि इस लंबे सफ़र में (चूंकि उस समय मशहद के लिये हवाई जहाज़ और रेलगाड़ी आदि नही थे) आपको कोई नुक़सान पहुच जाये।
दूसरी बैठक में जब आप यह बात फिर से रखी तो हम सबने प्रयत्न किया कि आपको इस सफ़र से रोक सकें मगर हम में से एक ने हमारे दिल की बात बयान कर दी और आप समझ गये कि इस बात का अस्ली कारण क्या है और अचानक आपका लहजा बदल गया , आपने बहुत ही गंभीरता पूर्वक कहा कि अल्लाह तआला ने मुझे सत्तर वर्ष की आयु प्रदान की है , इस अरसे में उसने मुझे बहुत सी नेमतों से नवाज़ा है जिन में से एक भी मेरी तदबीर की वजह से नही मिली , मैंने हमेशा कोशिश की कि मैं अपनी ज़िम्मेदारी पर अमल करूं , अब सत्तर साल की उम्र साल के बाद उचित नही है कि मैं अपने बारे मे सोचूं , अपने जीवन के कार्यों में सोच विचार करूं , मुझ से यह सब नही हो सकता लिहाज़ा मैं जाऊंगा।
जी हां , एक इंसान अगर अपनी अमली ज़िन्दगी में कोशिश और इख़लास से काम ले तो ख़ुदावंदे आलम उसकी ऐसे रास्तों से उसी मदद करता है जिसकी उसको ख़ुद भी ख़बर नही होती।
अगर फ़र्ज़ करें कि इंसान इस संसार में अध्यात्म रखने वाले , ईश्वर की राह में क़दम बढ़ाने वाले , और सम्मान व सत्कार रखने वाले दोस्त व साथी का साथ न पा सके जिनके ज़रिये वह प्रगति व अध्यात्म , पवित्र कार्यों के तौर तरीक़े और इंसानी सम्मान से पूर्ण आदतें व तरीक़े न सीख सके और ख़ुद को इंसानियत के उच्च सत्कार और कमाल तक पहुच सके तब भी अध्यात्मिक दुनिया और परलोक के दरवाज़े उस के लिये बंद नही हुए हैं। यह ऐसा संसार है जिस में पवित्र क़ुरआन की आयतें और हदीसों के ज़रिये से इस में प्रवेश किया जा सकता है। अंबिया , सिद्दीक़ीन , शोहदा और सालेहीन के मार्ग से मित्रता के ज़रिये आत्मा व दिल से संबंध स्थापित किया जा सकता है। उनके अध्यात्मिक मार्गदर्शन और भलाई व जनहित वाले सिद्धातों से फ़ायदा उठाया जा सकता है।
यह लोग (जैसा कि पवित्र क़ुरआन की आयतें और मासूमान अलैहिमुस सलाम की हदीसें बयान करती हैं) क़यामत तक के लिये तमाम कार्यों में इंसान के लिये आईडियल हैं।
यही वह लोग हैं जिनके ज़रिये इंसान को (आयतों , हदीसों या हमदर्द व जानकार शिक्षकों की सहायता) अपने अस्तित्व में उनके नेक कामों , अक़ीदों और सदाचार से मारेफ़त हासिल करना चाहिये और आहिस्ता आहिस्ता उनकी राह व मार्ग से फ़ायदा उठाना चाहिये ताकि अपने अंदर मौजूद योग्यता के ऐतेबार से उनके जैसे हो जायें और इंसान में अध्यात्मिक स्थान और ईश्वरीय सत्कार का इज़ाफ़ हो जाये और आख़िर में नतीजे के तौर पर जिस प्रकार से संसार में मारेफ़त , दिल से ईमान और आत्मिक संबंध के ज़रिये उनके साथ विचार आधारित मित्रता बनाई है , परलोक में भी स्वर्ग में उनके साथ हो , इस लिये यह लोग इंसान के लिये बेहतरीन और नेक दोस्त व साथी हैं जैसा कि पवित्र क़ुरआन में आया है कि
وَ مَنْ یُطِعِ اللَّہَ وَ الرَّسُولَ فَاٴُولئِکَ مَعَ الَّذینَ اٴَنْعَمَ اللَّہُ عَلَیْہِمْ مِنَ النَّبِیِّینَ وَ الصِّدِّیقینَ وَ الشُّہَداء ِ وَ الصَّالِحینَ وَ حَسُنَ اٴُولئِکَ رَفیقاً ۔
और जो भी अल्लाह और रसूल की इताअत और पैरवी करेगा वह उन लोगों अंबिया , सिद्दक़ीन , शोहदा और सालेहीन के साथ रहेगा जिन पर अल्लाह ने ईमान , अख़लाक़ और अमले सालेह की नेमतें नाज़िल की हैं और यही बेहतरीन साथी और दोस्त हैं।
एक हदीस में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे वा आलिहि वसल्लम फ़रमाते हैं:
अंबिया से मैं , सिद्दीक़ीन से अली बिन अबी तालिब , शोहदा से हसन व हुसैन और सालेहीन से मुराद हमज़ा और इमाम हुसैन अलैहिस सलाम के वंश से आने वाले इमाम हैं।
और चूंकि पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम और अइम्मा अलैहिमुस सलाम , पवित्र क़ुरआन और हदीसों के माध्यम से इंसानी समाज के मार्गदर्शन के लिये सदैव मौजूद हैं और इंसान उन के साथ हमराज़ हो सकता है अत: यह कहना चाहिये कि यह हज़रात बेहतरीन दोस्त , बेहतरीन सामाजिक और हमदर्द साथी हैं जिनके अस्तित्व और मार्गदर्शन से इंसान ईश्वरीय आदाब से ख़ुद को बना संवार सकता है।
यह बेहतरीन दोस्त मज़बूत अक़ीदे , नेक आमाल , अच्छे सदाचार , न्याय व इंसाफ़ , सच्चाई व ईमानदारी , वफ़ा , पवित्रता , पाकदामनी , इजतेहाद , शराफ़त , विद्धत्ता , प्यार और भलाई के पात्र हैं और अगर इंसान अध्यात्म की दुनिया पवित्र क़ुरआन और हदीसों के मार्गदर्शन के ज़रिये उनके साथ हो जाये और उनके चमत्कारों की ओर ध्यान लगाये तो उनका प्रभाव स्वीकार करने के कारण उनके जैसा हो जाये और क़यामत में उनकी संगत का पात्र हो जायेगा। जैसा कि पवित्र क़ुरआन ने फ़रमाया है:
وَ حَسُنَ اٴُولئِکَ رَفیقاً “ और यह लोग बेहतरीन दोस्त है।
मैं ख़ुद अल्लाह का इच्छुक एक धर्म गुरु हूं और अब इस समय जब कि मैं इस किताब को लिख रहा हूं लगभग पैंतीस वर्षों से ईरान और दूसरे युरोपीय व अरबी देशों में ईश्वर के धर्म के प्रचार की तौफ़ीक़ हासिल कर चुका हूं , मैंने अब तक बहुत से पथभ्रष्ट लोगों को पवित्र क़ुरआन की आयतों अथवा हदीसों के ज़रिये ख़ुदा वंदे आलम , अंबिया और अइम्म ए मासूमीन अलैहिमुस सलाम से अवगत कराया है और उनके जीवन की डोर को अल्लाह , अंबिया और अइम्मा अलैहिमुस सलाम से मिला दिया है और उसके ज़रिये से मैंने लोगों के अख़लाक़ व आमाल में बहुत ज़्यादा बदलाव होते हुए देखा है। दूसरे शब्दों में यह कहा जाये कि मैं ख़ुद इस बात का अनुभव किया है कि बहुत से ऐसे लोग जो धर्म को छोड़ चुके थे वह अल्लाह , अंबिया और अइम्म ए मासूमीन अलैहिमुस सलाम से अवगत व परिचित होने के बाद हिदायत पा गये हैं।
इस सिलसिले में अब तक कई हज़ार पत्र लोगों ने मुझे लिखे हैं उन में से बहुत से लोग यहूदी व ईसाई व नास्तिक हैं जो धार्मिक वास्तविकता , ईश्वरीय शिक्षा को सुनने के बाद ग़लत रास्ते को छोड़ कर वापस धर्म की तरफ़ आ गये है और ख़ुदा वंदे आलम की कृपा व रहमत के पात्र बन चुके हैं। इसी तरह से उन्होने नबी ए इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम और अइम्म ए मासूमीन अलैहिमुस सलाम से मदद मांग कर उनको अपने जीवन का आईडियल बना लिया है और उनकी पवित्र संस्कृति से प्रगति व कमाल तक पहुच गये हैं और दुनिया व आख़िरत में सम्मान व सत्कार हासिल कर लिया है।
पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम के पाक व पाकीज़ा अहले बैत अलैहिमुस सलाम ऐसे मार्गदर्शक हैं कि उनका इल्मी व आध्यात्मिक व्यय बहुत ज़्यादा है। वह ऐसे दरिया हैं जो अपने ज्ञान और आध्यात्म के मुंगे व मोतियों से इच्छुक लोगों को बेनियाज़ कर सकते हैं और उनके ख़ज़ाने में कोई कमी नही आयेगी।
ख़ुदा वंदे आलम ने आध्यात्मिक व्यय के फ़ायदे को इंसान के बस में इस लिये दिया है कि वह इस ईश्वरीय ख़ज़ाने से अपनी आध्यात्मिक व आत्मिक विचार के ख़ालीपन को पूर्ण कर सकें और अंधकार पूर्वक मौत से जो कि बुद्धि व आत्मा व दिल की मौत है , सुरक्षित रहें और हलाक कर देने वाले तूफ़ानों से अपने अस्तित्व की नाव को सही सलामत निजात के साहिल पर ले जाये और यही दुनिया व आख़िरत के सम्मान और ईश्वर की प्रसन्नता का कारण है। जी हां इसी वजह से ख़ुदा वंदे करीम ने सूर ए इब्राहीम की पहली आयत में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम के धरती पर भेजने के फ़लसफ़े को पवित्र क़ुरआन हाथ में ले कर इंसानों को अंधेरों से निजात दिलाना बयान किया है:
کِتابٌ اٴَنْزَلْناہُ إِلَیْکَ لِتُخْرِجَ النَّاسَ مِنَ الظُّلُماتِ إِلَی النُّورِ بِإِذْنِ رَبِّہِمْ إِلی صِراطِ الْعَزیزِ الْحَمید “( ۱ ) ۔
यह किताब है जिसे हमने आप के ऊपर नाज़िल किया है ता कि आप लोगों को ख़ुदा के आदेश से अंधेरों , जिहालत , गुमराही और सरकशी से निकाल कर , नूर , मारेफ़त , न्याय व ईमान की तरफ़ ले आयें और अज़ीज़ व हमीद ईश्वर के रास्ते पर लगा दें।
इस संसार में आध्यात्म के मैदान में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम से अच्छा मित्र और साथी कौन हो सकता है ? ऐसी दोस्ती जो इच्छा व लालच और इश्क़ व मुहब्बत के साथ इंसान को अंदरुनी ग़रीबी से निजात दिलाती है औप आपकी ख़्वाहिश ही इंसान को दुनिया व आख़िरत के ख़ैर और कमाल तक पहुचाना है।
لَقَدْ جاء َکُمْ رَسُولٌ مِنْ اٴَنْفُسِکُمْ عَزیزٌ عَلَیْہِ ما عَنِتُّمْ حَریصٌ عَلَیْکُمْ بِالْمُؤْمِنینَ رَؤُفٌ رَحیمٌ “( ۱ ) ۔
सूर ए तौबा , सूरह संख़्या 9 , आयत 128
निसंदेह तुम्हारे पास वह नबी (दूत) आया है जो तुम ही में से है और उस पर तुम्हारी मुसीबत सख़्त होती है वह तुम्हारी हिदायत के बारे में आरज़ू रखता है और मोमिनीन के हाल पर दयालु व मेहरबान है।
पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम तुम्हारी गुमराही से हिदायत और निजात के लिये बहुत ज़्यादा शौक़ व उम्मीद रखते हैं।
पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम के बाद आपके अहलेबैत अलैहुमुस सलाम मअनवी सरमाये के महान स्रोत है। यह भी पैग़म्बरे इस्लाम (स) की तरह लोगों को वास्तविकता की तरफ़ हिदायत करते हैं और उनको ख़तरों और बुराईयों से निजता दिलाते हैं।
जो लोग अपने अस्तित्व और अपनी दुनिया व आख़िरत की इस्लाह के लिये उन हज़रात की दरबार में भीख मांगते हैं और अपनी ज़िन्दगी के तमाम कामों में उनकी पैरवी और उनकी अनुसरण करते हैं। यक़ीनन वह हलाक कर देने वाली चीज़ों से निजात हासिल कर लेते हैं और अपनी दुनिया व आख़िरत के ख़ैर व भले को सुरक्षित कर लेते हैं। क्यों कि यह ईश्वर के सच्चे भक्त इस भौतिक संसार में उस ईश्वर की ओर से निजात की कश्ती के तौर पर मौजूद हैं लिहाज़ा जो भी उन्हे याद करता है यह उसको निजात दिलाते हैं और जो भी उनको छोड़ देता है वह विभिन्न प्रकार के ख़तरों में घिर जाता है और उसकी दुनिया व आख़िरत ख़राब हो जाती है।
हज़रत अबूज़रे ग़फ़्फ़ारी इस्लामी दुनिया की एक प्रसिद्ध हस्ती हैं जिनके बारे में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम ने फ़रमाया है कि अबूज़र सच्चाई के कमाल पर पहुचे हुए हैं लिहाज़ा अबूज़र कहते हैं कि मैंने ख़ुद पैग़म्बरे इस्लाम (स) को फ़रमाते हुए सुना है , आपने फ़रमाया:
انما مثل اھل بیتی فیکم کمثل سفینة نوح من رکبھا نجا و من تخلف عنھا غرق “ ( ۱ ) ۔
बेशक तुम्हारे दरमियान मेरे अहले बैत अलैहुमुस सलाम की मिसाल , नूह की कश्ती की तरह है कि जो भी इस आध्यात्मिक नाव में सवार हो गया वह निजात पा गया और जो भी इस में सवार नही हुआ वह डूब गया।
(अलअमाली , शेख़ तूसी , पेज 60 , मजलिस 2 हदीस 88 , बेहारुल अनवार जिल्द 33 पेज 105 अध्याय 7 हदीस 3)
अहले सुन्नत के बुज़ुर्ग उलामा ने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलिहि वसल्लम से हदीस नक़्ल की है कि आपने फ़रमाया:
فاطمة بھجة قلبی و ابناھا ثمرة فوادی و بعلھا نور بصری والائمة من ولدھا امناء ربی و حبل ممدود بینہ و بین خلقہ من اعتصم بھم نجا ومن تخلف عنھم ھوی “( ۲ ) ۔
फ़ातेमा मेरे दिल का सुकून है , उसके दोनो बेटे हसन व हुसैन मेरे दिल का चैन हैं , उसका शौहर मेरी आंखों की रौशनी है , और उसकी नस्ल से आने वाले इमाम , अल्लाह के अमीन हैं। वह अल्लाह और लोगों के दरमियान एक रस्सी की तरह हैं। जो भी उनकी पनाह में आ जायेगा वह निजात हासिल कर लेगा और जो उन से दूर होगा वह गुमराह हो जायेगा।
फ़रायइदुस समतैन जिल्द 2 पेज 66 , इसी तरह शिया स्रोत में भी बयान हुआ है जैसे अत तरीफ़ जिल्द 1 पेज 117 , हदीस 180 , बेहारुल अनवार जिल्द 33 पेज 110 अध्याय 7 हदीस 16।
हज़रत इमाम अली रज़ा अलैहिस सलाम ने अपने आबा व अजदाद से , उन्होने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम से नक़्ल किया है कि आपने फ़रमाया:
مثل اھل بتی فیکم، مثل سفینةنوح من رکبھا نجی و من تخلف عنھا زخ فی النار “ ( ۱ ) ۔
तुम्हारे दरमियान मेरे अहले बैत की मिसाल , कश्ती ए नूह की तरह है जो भी इस में सवार हुआ वह निजात पा गया और जो भी उससे दूर हुआ वह नर्क की आग में चला गया।
(सहीफ़तुल इमामिर रिज़ा पेज 57 हदीस 76 , बेहारुल अनवार जिल्द 33 पेज 122 अध्याय 7 हदीस 45)
यक़ीनन अहलेबैत अलैहुमुस सलाम के साथ दोस्ती और उनके साथ मअनवी सामजिकता के लक्षण इतने ज़्यादा हैं कि लिखने वाला क़लम और बेहतरीन वक्ता भी उसका अंदाज़ा नही लगा सकता।
वास्तविकता का ज्ञान और जानकारी हासिल करना , दिल व विचार में तौहीद (एक ईश्वर) के जलवों को प्रकट होना , धर्म के सीधे रास्ते पर खड़े रहना , इंसान के अस्तित्व से अच्छे सदाचार का बाहर आना , इंसान के शरीर के अंगों से अच्छे कामों का ज़ाहिर होना आदि यह सब उस बरकत वाली दोस्ती और आध्यात्मिक सामजिकता के लक्षण हैं। इस सिलसिले में अगर बहुत ही महत्वपूर्ण हदीस की तरफ़ तवज्जो की जाये जिसे शेख़ तबरसी ने अपनी प्रसिद्ध किताब अल ऐहतेजाज में नक़्ल किया है तो यह वास्तविकता स्पष्ट हो जायेगी कि अहले बैत अलैहुमुस सलाम की दोस्ती व सामजिकता इंसान को सम्मान व प्रतिष्ठा के आसमान पर पहुचा देती है।
इब्ने कव्वा ने हज़रत अमीरुल मोमिनीन अली अलैहिस सलाम से रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम के सहाबियों के बारे में पूछा तो आपने फ़रमाया कि तुम मुझ से पैग़म्बरे इस्लाम (स) के कौन से सहाबी के बारे में पूछना चाहते हो ? उन्होने कहा मुझे अबूज़र के बारे में बताएं , आपने फ़रमाया: मैंने पैग़म्बरे अकरम (स) को फ़रमाते हुए सुना है:
مااظلت الخضراء و لا اقلت الغبراء ذالھجة اصدق من ابی ذر “ ۔
आसमान ने किसी ऐसे इंसान पर साया नही किया और ज़मीन ने किसी ऐसे शख़्स के वुजूद को बर्दाश्त नही किया जो अबूज़र से ज़्यादा सच्चा हो।
उन्होने कहा: या अमीरल मोमिनीन , मुझे सलमान के बारे में बताइये। आपने फ़रमाया: ख़ुशा बहाल सलमान , सलमान हम में से हैं और तुम्हारे लिये हकीम लुक़मान की तरह हैं , सलमान इब्तिदा व इंतेहा का इल्म रखते थे।
उन्होने कहा , मुझे हुज़ैफ़ ए यमान के बारे में बताइये , आपने फ़रमाया: हुज़ैफ़ा वह हैं जो मुनाफ़ेक़ीन के नामों को जानते हैं और अगर उनसे हुदूदे इलाही के बारे में पूछते तो उनको हुदूदे इलाही का आलिम व आरिफ़ पाते।
उन्होने कहा: मुझे अम्मारे यासिर के बारे में बताइये , आपने फ़रमाया:
अम्मार वह हैं जिसके गोश्त व ख़ून पर आग हराम है और नर्क की आग अम्मार के गोश्त व ख़ून तक नही पहुच सकती।
उन्होने कहा , या अमीरल मोमिनीन , मुझे अपने बारे में बताइये , आपने फ़रमाया:
जब भी तुम मेरे बारे में तमाम हक़ीक़त के मुतअल्लिक़ सवाल करोगे तो मैं तुम्हे जवाब दूंगा और अगर ख़ामोश हो जाओगे तो मैं ख़ुद बयान करूंगा।
۱۔ ” عن الاصبغ بن نباتہ قال : خطبنا امیر المومنین ( علیہ السلام ) علی منبر الکوفة فحمداللہ و اثنی علیہ ثم قال : ” ایھا الناس سلونی قبل ان تفقدونی، فان بین جوانحی علما جما، فقام الیہ ابن الکواء فقال یا امیرالمومنین اخبرنی عن اصحاب رسول اللہ ( صلی الله علیه و آله وسلم ) (
हज़रत इमाम हसन असकरी अलैहिस सलाम फ़रमाते हैं कि एक गिरोह हज़रत इमाम अली रज़ा अलैहिस सलाम के पास आया और आपसे कहा: हम अली अलैहिस सलाम के शिया हैं। इमाम रज़ा अलैहिस सलाम ने एक मुद्दत तक तो उन्हे अपनी ज़ियारत नही कराई फिर जब मिलने और मुलाक़ात करने की इजाज़त दी तो फ़रमाया:
वाय हो तुम पर , अमीरुल मोमिनीन अलैहिस सलाम के शिया हसन , हुसैन , सलमान , अबूज़र , मिक़दाद , अम्मार और मुहम्मद बिन अबी बक्र थे जो किसी भी तरह से आपके हुक्म और क़वानीन की मुख़ालेफ़त नही करते थे।
पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम ने अमीरुल मोमिनीन अली अलैहिस सलाम से फ़रमाया:
ان الجنة تشتاق الیک والی عمار وسلمان و ابی ذر والمقداد “ ( ۲ )
) قال عن ای اصحاب رسول اللہ؟ تسالنی ، قال : یا امیر المومنین اخبرنی عن ابی ذر الغفاری ، قال ( علیہ السلام ): سمعت رسول اللہ ( صلی اللہ علیہ و آلہ وسلم ) یقول : ما اظلت الخضراء و لا اقلت الغبراء ذا لھجة اصدق من ابی ذر، قال : یا امیر المومنین اخبرنی عن سلمان الفارسی قال : بخ بخ سلمان منا اھل البیت و من لکم بمثل لقمان الحکیم علم علم الاول وعلم الآخر، قال : یا امیر المومنین فاخبرنی عن حذیفة بن الیمان، قال : ذلک امروا علم اسماء المنافقین ان تسالوہ عن حدود اللہ تجدوہ بھا عارفا عالما،قال : یا امیرالمومنین اخبرنی عمار بن یاسر، قال : ذاک امرو حرم اللہ لحمہ و دمہ علی النار و ان تمس شیئا منھما قال یا امیر المومنین فاخبرنی عن نفسک، قال : کنت اذا سالت اعطیت و اذا سکت ابتدیت “ ۔ الاحتجاج، ج ۱، ص ۲۶۰۔بحار الانوار، ج ۱۰، ص ۱۲۳، باب ۸، حدیث ۲۔
۱۔ ” ابی محمد العسکری ( علیہ السلام ) قال : قدم جماعة فاستاذنوا علی الرضا ( علیہ السلام ) وقالوا : نحن من شیعة علی فمنھم ایاما ثم لما دخلوا قال لھم : ویحکم انما شیعة امیرالمومنین الحسن والحسین و سلمان وابوذروالمقداد و عمار و محمد بن ابی بکر الذین لم یخالفوا شیئا من اوامرہ “ ۔ الاحتجاج ، ج ۲، ص ۴۴۰۔ بحارالانوار، ج۲۲، ص ۳۳۰، باب ۱۰، حدیث ۳۹۔
2. रौज़तुल वायेज़ीन जिल्द 2 पेज 280 , अल ख़ेसाल जिल्द 1 पेज 303 हदीस 80 , बेहारुल अनवार जिल्द 22 पेज 341 अध्याय 10 हदीस 52
यक़ीनन जन्नत तुम्हारी , अम्मार , सलमान , अबूज़र और मिक़दाद की मुश्ताक़ और मुन्तज़िर है।
हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस सलाम ने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम से नक़्ल किया है कि आपने फ़रमाया:
ख़ुदावंदे आलम ने मुझे चार लोगों से मुहब्बत का हुक्म दिया है , सबने कहा , ऐ अल्लाह के रसूल वह कौन लोग हैं ? आपने फ़रमाया: अली बिन अबी तालिब , उसके बाद ख़ामोश हो गये , फिर फ़रमाया: बेशक ख़ुदावंदे आलम ने मुझे चार लोगों से मुहब्बत का हुक्म दिया है , सबने कहा वह कौन लोग हैं ? फ़रमाया अली बिन अबी तालिब। उसके बाद ख़ामोश हो गये , फिर फ़रमाया: बेशक ख़ुदावंदे आलम ने मुझे चार लोगों से मुहब्बत का हुक्म दिया है , सबने कहा वह कौन लोग हैं ? फ़रमाया अली बिन अबी तालिब , मिक़दाद बिन असवद , अबूज़रे ग़फ़्फ़ारी , सलमाने फ़ारेसी।
ज़ोरारा बिन अअयन , जो कि इल्म व अख़लाक़ में प्रसिद्ध हैं , ने हज़रत इमाम मुहम्मह बाक़िर अलैहिस सलाम से हदीस नक़्ल की है कि उन्होने अपने वालिदे माजिद से उन्होने अपने वालिदे मोहतरम से और उन्होने हज़रत अमीरुल मोमिनीन अलैहिस सलाम से रिवायत नक़्ल की है कि आपने फ़रमाया:
ضاقت الارض بسبعة بھم یرزقون و بھم ینصرون و بھم یمطرون منھم سلمان الفارسی، والمقداد، و ابوذر و عمار و حذیفہ رحمة اللہ علیہم و کان علی ( ع ) یقول : و انا امامھم وھم الذین صلوا علی فاطمة ( علیہ السلام )( ۲ ) ۔
۱۔ جعفر بن الحسین المومن، عن ابن الولید ، عن الصفار، عن ابن عیسی عن ابن ابی نجران، عن صفوان الجمال، عن ابی عبداللہ ( علیہ السلام ) قال : قال رسو ل اللہ ( صلی اللہ علیہ و آلہ وسلم ): ان اللہ امرنی بحب اربعة، قالوا : ومن ھم یا رسول اللہ ( صلی اللہ علیہ و آلہ وسلم ) ؟ قال : علی بن ابی طالب، ثم سکت، قال : ان اللہ امرنی بحب اربعة، قالوا : ومن ھم یارسول اللہ؟ قال : علی بن ابی طالب،ثم ثکت، ثم قال : ان اللہ تعالی ا مرنی بحب اربعة ، قالوا : ومن ھم یا رسول اللہ؟ قال : علی بن ابی طالب والمقداد بن الاسود، وابوذر الغفاری و سلمان الفارسی “ ۔الاختصاص، ص ۹۔ روضة الواعظین، ج۲، ص ۲۸۳۔ بحارالانوار، ج۲۲ص ۳۴۵، باب ۱۰، حدیث ۵۸۔
۲۔ رجال الکشی، ص ۶۔ بحارالانوار، ج ۲۲، ص ۳۵۱، باب ۱۰، حدیث۷۷۔
सात लोगों की अज़मत और महानता के मुक़ाबले में ज़मीन तंग है , लोगों को उनके ज़रिये से रोज़ी मिलती है , उन ही के वसीले से अल्लाह की मदद और बारिशें बरसती हैं। वह सात लोग सलमाने फ़ारेसी , मिक़दाद , अबूज़रे ग़फ़्फ़ारी , अम्मार व हुज़ैफ़ा हैं , उन पर अल्लाह की रहमत हो और हज़रत अली अलैहिस सलाम हमेशा फ़रमाते थे कि मैं उन सब का इमाम हूं और यह वह लोग हैं जिन्होने फ़ातेमा सलामुल्लाहे अलेहा के जनाज़े पर नमाज़ पढ़ी है।
इंसान से ख़ुदा का इश्क़ , धार्मिक आध्यात्म , हिदायत व मार्ग दर्शन की पैरवी व अनुसरण आदि ऐसे लक्षण हैं जो अहलेबैत अलैहिमुस सलाम के साथ दिली संबंध , उनके साथ मुहब्बत और आध्यात्मिक सामजिकता व समाजी व्यवहार से वुजूद में आते हैं।
सईद बिन मुसय्यब में ईश्वर भक्ति , ज़ोहद व तक़वा और फ़िक़ह व हदीस जैसे तमाम कमालात जमा हो गये हैं।
हज़रत इमाम अली रज़ा अलैहिस सलाम ने उनके वास्तविक शिया होने की गवाही दी है और हज़रत इमाम सज्जाद अलैहिस सलाम उनके बारे में फ़रमाते हैं:
सईद बिन मुसय्यब अपने ज़माने में धर्मशास्त्र के सबसे बड़े विद्धान थे।
हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस सलाम उनके सिलसिले में फ़रमाते हैं: आप इमाम अली बिन हुसैन अलैहिस सलाम के भरोसेमंद थे।
सईद की एक बेटी बहुत ही सुन्दर अध्यात्म और आकर्षक व्यक्तित्व की मालिक थी। अब्दुल मलिक बिन मरवान ने अपने बेटे हुशाम के लिये उसका रिश्ता मांगा तो उन्होने मदीने के गवर्नर , जिसके ज़रिये से यह रिश्ता आया था , उसे जवाब दिया कि मैं कभी भी यह रिश्ता स्वीकार नही कर सकता , मैं अपनी बेटी की शादी बादशाह के बेटे से हरगिज़ नही करूंगा।
एक दिन उन्होने अपने एक शिष्य से जिसको आप धर्म शास्त्र पढ़ाते थे , कहा: कई दिन से तुम क्लास में क्यों नही आ रहे हो ? उसने कहा: उस्ताद मेरी जवान बीवी का स्वर्गवास हो गया है उसी सिलसिले में मैं कई दिन से दुनिया के कामों में फंसा हुआ हूं जिसके कारण क्लास में नही आ पा रहा हूं। आपने उससे कहा: बिना बीवी के ज़िन्दगी न गुज़ारो और शादी करने में जल्दी करो। उसने कहा: उस्ताद मेरे पास माले दुनिया में से सिर्फ़ दो दिरहम है और शादी के लिये पैसों की आवश्यकता पड़ती है। उस्ताद ने कहा: दुनिया और पैसे की परवाह मत करो। उसके बाद अपनी बेटी की शादी उससे कर दी और उसको तंहाई की परेशानी से निजात दिला कर उसकी ज़िन्दगी को अच्छा बना दिया।
वह शागिर्द कहता है कि चालीस साल से उस्ताद किसी के घर नही गये थे , लेकिन जिस दिन उन्होने अपने बेटी की निकाह मुझसे पढ़ा , मग़रिब के समय दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ आई , मैंने दरवाज़ा खोला तो देखा कि उस्ताद खड़े हैं , अपनी बेटी का हाथ मेरे हाथ में दिया और चले गये।
मैंने उनकी बेटी से पूछा: तुम्हारे पास ज़ेवर व माल वग़ैरह में से क्या है ? उसने कहा: पूरे क़ुरआन की हाफ़िज़ हूं। मैंने पूछा: तुम्हारा मेहर क्या है ? उसने कहा: मुझे हदीस याद कराओ। मैंने कहा:
جھاد المراة حسن التبعل “ ۔ ।
औरत का जिहाद , शौहर के साथ अच्छा सुलूक करना है।
सईद बिन मुसय्यब जिन्होने अहलेबैत अलैहिमुस सलाम की पाठशाला में प्रशिक्षण प्राप्त किया था और इमाम सज्जाद अलैहिस सलाम के आशिक़ थे , कहते हैं कि एक बार मदीने में सूखा पड़ गया और बहुत दिन तक बारिश नही हुई , सारे लोग नमाज़े इसतिसक़ा और दुआ के लिये सहरा में गये। मैं भी उनके साथ नमाज़ और दुआ की जगह पर गया लेकिन मैंने उस भीड़ की दुआ को स्वीकार्य योग्य और बारिश होने के लायक़ नही पाया।
इसी दौरान एक काले ग़ुलाम को देखा जो एक टीले के पास ज़मीन पर सर को रख कर ख़ुज़ू व खुशू और पाक नीयत के साथ बारिश होने की दुआ कर रहा था , उसकी दुआ स्वीकार हो गई , पूरे इलाक़े में बादल छा गये और आसमान से मूसलाधार बारिश होने लगी।
दुआ के बाद वह शहर की ओर जाने लगा मैं उसके पीछे चल दिया ता कि उसके घर को देखूं और उसका शुक्रिया अदा करूं , वह पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम के घर के पास इमाम सज्जाद अलैहिस सलाम के घर में दाख़िल हो गया।
मैं इमाम सेवा में गया और मैंने उनसे प्रार्थना की कि वह उस ग़ुलाम को मुझे दे दें ताकि मैं उसे अपने घर ले जा कर उसकी सेवा करूं। आपने आदेश दिया कि तमाम ग़ुलामों को हाज़िर किया जाये लेकिन वह उन ग़ुलामों के दरमियान नही था , मैंने कहा मुझे इन में से किसी की आवश्यकता नही है क्यों कि जिस की तलाश है वह इन में नही है। आपसे कहा गया केवल एक ग़ुलाम बाक़ी रह गया है जो इस्तबल में काम करता है। फ़रमाया: उसको भी बुलाओं। मैंने इमाम अलैहिस सलाम से कहा: मुझे उस ग़ुलाम की ज़रुरत है आपने ग़ुलाम से फ़रमाया: मैंने तुम्हे सईद को बख़्श दिया है वह ग़ुलाम रोते हुए कहना लगा , सईद मुझे इमाम से जुदा न करो , मैं एक मिनट भी अपने इमाम से दूर होने की ताक़त नही रखता।
मैंने उसको छोड़ दिया और चला गया , मेरे जाने के बाद उसने अपना भेद खुल जाने की वजह से ख़ुदा की बारगाह में दुआ की कि उसको अपने पास बुला ले। इस बात की अभी कुछ ही देर गुज़री थी कि इमाम सज्जाद अलैहिस सलाम ने मुझे उस ग़ुलाम के जनाज़े में शिरकत करने के लिये बुलवाया।
अहले बैत अलैहिमुस सलाम के चाहने और मानने वाले इंसानो की हिदायत के लिये अल्लाह की तरफ़ से नियुक्त हुए हैं। उनका अस्तित्व नूरी और मलकूती है और उनका वुजूद और उनका अमल चूंकि हक़ के दायरे में होता है लिहाज़ा वह इस संसार की आंतरिक अर्थव्यवस्था से संतुलित रहता है और यह संतुलन उनकी प्रसिद्धी का कारण बनता है और इसी वजह से यह आसमान और ज़मीन वालों में पसंद किये जाते हैं।
ज़ियारते अमीनुल्लाह में बयान हुआ है:
محبة لصفوة اولیائک محبوبة فی ارضک و سمائک مشتاقة الی فرحة لقائک “ ۔
ऐ ईश्वर , मुझे अपने औलिया का आशिक़ और चाहने वाला बना दे और ज़मीन व आसमान वालों के दरमियान महबूब व पसंदीदा बना दे........ अपनी ज़ियारत की ख़ुशहाली का मुश्ताक़ क़रार दे।
ابواب الاجابة لھم مفتحة “ ۔
दुआ के स्वीकार होने के दरवाज़े को उनके लिये खोल दे।
यह आध्यात्मिक व ज़ाहिरी संबंध उनकी प्रगति , धर्म में दृढ़ता और कमाल तक पहुचने और दुनिया व आख़िरत में उन की दुआ के क़बूल होने का सबब है।
जो इंसान ख़ुदा से दूर अंबिया और अइम्मा अलैहिमुस सलाम की जानकारी न होने की वजह से गुमराही की वादी में क़दम रखता है। उसका अंदरुन विभिन्न प्रकार की बुराईयों से भर जाता है और उसका ज़ाहिर विभिन्न प्रकार के पापों में डूब जाता है और इस संसार की अर्थव्यवस्था से उसकी संबंध ख़त्म हो जाता है।
वह नीचे की ओर गिरने लगता है और अगर फिर भी न जागे और तौबा न करे तो उनको कुछ भी नसीब नही होगा।
वह पाक व पवित्र दिलों को महबूब नही हो सकता। मुश्किलों में उसकी कोई सहायक नही है और उसकी दुआ स्वीकार नही होगी।
चौहदवीं का चांद किसी के लिये दो टुकड़े हो जाता है , सूख़ा कूंवा किसी के पवित्र मुंह से निकलने वाले से थूक से पानी से भर जाता है , किसी के सूखे पेड़ से टेक लगाने से वह हरा भरा हो जाता है , क्यों कि उनका वुजूद सदाचार व आचरण , ज़ाहिर व बातिन , ईमान व नेक अख़लाक़ और नेक कामों की वजह से इस संसार की आंतरिक अर्थव्यवस्था से संतुलित है।
एक दिन एक निर्धन व्यक्ति अमीरुल मोमिनीन अलैहिस सलाम के दरवाज़े पर आया , आपने अपने बेटे इमाम हसन अलैहिस सलाम से कहा कि बेटा हसन अपनी अम्मी से कुछ पैसे लाकर इस ग़रीब को दे दो। इमाम हसन अलैहिस सलाम ने कहा: बाबा जान हमारे पास कुछ छ: दिरहम हैं जिससे हमें आटा ख़रीदना है , किस तरह से हम इस पैसे को उस ग़रीब आदमी को दे दें ? अमीरुल मोमिनीन अलैहिस सलाम ने फ़रमाया: मेरे बेटे यह जान लो कि सच्चा मोमिन वह है जो अपने पास मौजूद हर चीज़ से ज़्यादा उस पर ईमान रखता हो जो ख़ुदा के पास है , उसके बाद फ़रमाया: यह सारे दिरहम उस ग़रीब को दे दे।
इमाम अली अलैहिस सलाम अभी कुछ ही दूर गये थे कि आपकी मुलाक़ात एक आदमी से हुई जो अपने ऊंट को बेचना चाहता था , आपने ऊंट के मालिक से फ़रमाया: तुम्हारे ऊंट की क़ीमत कितनी है ? उसने कहा एक सौ चालीस दिरहम , आपने फ़रमाया: मैं इस ऊंट को ख़रीदना चाहता हूं लेकिन इसकी क़ीमत आठ दिन में अदा करूंगा , ऊंट के मालिक ने स्वीकार कर लिया और मामला तय हो गया।
अभी कुछ ही देर गुज़री थी कि एक राहगीर ने ऊंट को बंधे हुए देखा तो उसको ख़रीदने का दिल चाहने लगा। उसने आपसे कहा: इस ऊंट की कितनी क़ीमत है। आपने फ़रमाया: दो सौ दिरहम , उस राहगीर ने उस ऊंट को ख़रीद लिया और क़ीमत आपके हवाले कर दी , आपने एक सौ चालीस दिरहम ऊंट के पहले मालिक को दिये और साठ दिरहम घर ले कर आ गये। हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्ला अलैहा ने पूछा यह पैसे कहां से आये ? आपने फ़रमाया: यह ख़ुदा के कलाम पर गवाह है जो आपके वालिद पर नाज़िल हुआ है।
من جاء بالحسنة فلہ عشر امثالھا ۔ ।
जो भी नेक काम करेगा उसको दस बराबर जज़ा मिलेगी।
एक बार मैं एक ऐसे आबिद व ज़ाहिर इंसान से मिला जो अपनी बूढ़ी मां की सेवा करते थे , कभी कभी मैं इस आध्यात्मिक फ़ायदे के लिये उनके पास जाता था और उनके आध्यात्मिक कमाल से फ़ायदा उठाने के अलावा उनके ज्ञान और इल्म से भी लाभ उठाता था। एक दिन जब वह अपने अध्यात्म की बुलंदी और प्रकाशमय इरफ़ान में झूम रहे थे तो उन्होने मुझ से एक वाक़ेया नक़्ल किया और कहा:
एक आरिफ़ , बसीर , मुत्तक़ी व परहेज़गार विद्धान से मेरी जान पहचान हुई और मुझे उनके पास जाने की तौफ़ीक़ नसीब हुई। वह विद्धान , गर्मियों के दिनों में हज़रत इमाम अली रज़ा अलैहि सलाम की ज़ियारत के लिये पवित्र शहर मशहद गये। वहा से वापसी पर मैं उनसे मिलने के लिये गया ता कि वह ज़ियारत के अध्यात्मिक फ़ायदों की मुझ से चर्चा करें।
उन्होने सफ़र का वर्णन इस तरह से शुरु किया कि कई साल से मैं हज़रत इमाम अली रज़ा अलैहिस सलाम की ज़ियारत के लिये नही जा सका था और मेरा दिल बहुत परेशान था। मेरे घर वाले भी पवित्र शहर मशहद की ज़ियारत के लिये बहुत ज़्यादा ज़ोर देने लगे थे और चूंकि मैं फलों में आड़ू को ज़्यादा पसंद करता था और मशहद के फलों में आड़ू बहुत ज़्यादा मशहूर हैं लिहाज़ा मैंने अपने घरवालों से वादा किया कि जब आड़ू की फ़स्ल आयेगी तो तुम सबको मशहद ले कर जाऊंगा।
फिर जब आड़ू की फ़स्ल आई तो मैं सबको लेकर मशहद गया और एक घर में ठहर गया , ज़ियारत पर जाने से पहले आराम करने के लिये बिस्तर पर लेट गया ताकि कुछ देर आराम करके ज़ियारत के लिये जाऊं।
जब मुझे नींद आ गई तो मैंने ख़्वाब में देखा कि मस्जिदे गौहर शाद के सहन में दाख़िल हुआ और ज़ियारत के इरादे से उस तरफ़ बढ़ा जहां अंदर जाने से पहले जूते जमा किये जाते हैं। मैं उधर गया और अपने जूते रखवा कर रौज़े में अंदर दाख़िल होने के लिये आगे बढ़ा तो मुझे एक बड़ा सा दरवाज़ा नज़र आया जिसके पास एक नूरानी चेहरे वाले बुज़ुर्ग बहुत ही सभ्य अंदाज़ में ख़ड़े हुए थे। मैंने उनसे कहा: यह दरवाज़ा कहां पर खुलता है ? उन्होने कहा कि यह उस हाल में खुलता है जहा अध्यात्मिक मजलिस हो रही है और इंसान के बातिन , आत्मा और नफ़्स के बारे में तक़रीरें हो रही हैं और इस समय जो मजलिस हो रही है उसमें हज़रत इमाम अली रज़ा अलैहिस सलाम भी मौजूद हैं। मैंने उस सुरक्षा कर्मी से कहा कि मैं भी इस ज्ञान को प्राप्त करना चाहता हूं लिहाज़ा मेरे लिये अंदर जाने की आज्ञा ले आओ , वह सुरक्षाकर्मी बड़े ही अदब के साथ अंदर गया और कुछ देर बाद वापस आकर कहने लगा कि इमाम अली रज़ा ने फ़रमाया है कि पहले अपने पेट को आड़ू से सेर कर लो , उसके बाद हमारी ज़ियारत के लिये आओ।
जी , हां , मेरी ज़ियारत का इरादा आड़ू खाने से मिल गया था और मेरे मौला ने मेरी हिदायत फ़रमाई कि आज के बाद ज़ियारत की नीयत हवा व हवस से पाक होना चाहिये।
ज़ुहैर बिन क़ैन बजली , अरब जगत के एक बहुत बहादुर और प्रसिद्ध इंसान और अपने क़बीले के सरदार थे। वह अक़ीदे व अमल के ऐतेबार से उस्मान बिन अफ़्फ़ान के अनुयाई थे और उसी वातावरण में जीवन यापन कर रहे थे।
वह हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस सलाम को नही पहचानते थे और आपके वुजूद की मारेफ़त नही रखते थे। इसी वजह से उन्होने उस्मानी समुदाय को अपना रखा था। मक्के से कूफ़े के रास्ते में वह इमाम हुसैन अलैहिस सलाम के सामने नही आना चाह रहे थे इसी लिये जब इमाम हुसैन अलैहिस सलाम का क़ाफ़िला आराम करने के लिये रुकता था तो वह नही रुकते थे और जब इमाम अलैहिस सलाम का क़ाफ़िला चलने के लिये तैयार होता तो वह अपना क़ाफ़िलो रोक लेते। एक बार इत्तेफ़ाक़ से दोनो क़ाफ़िले एक साथ एक ही जगह पर ठहर गये। ज़ोहर के समय ज़ुहैर खाना खाने के लिये दस्तर ख़्वान पर बैठे तो इमाम हुसैन अलैहिस सलाम का दूत ख़ैमे में दाख़िल हुआ और कहा: हुसैन की दावत को स्वीकार कर लो। ज़ुहैर ने कहा: मुझे हुसैन से कोई काम नही है। उनकी बीवी ने पर्द के पीछे से आवाज़ दी तुम्हे शर्म नही आती कि हुसैन की दावत को क़बूल नही कर रहे हो ?
नेक और सालेह बीवी के कहने पर ज़ुहैर इमाम हुसैन अलैहिस सलाम के ख़ैमे में गये , कुछ देर तक इमाम की नूरानी महफ़िल में बैठे और उन्ही चंद लम्हों में इमाम हुसैन अलैहिस सलाम की मारेफ़त की तौफ़ीक़ नसीब हो गई और उन्होने इमाम हुसैन अलैहिस सलाम के वास्तविक वुजूद को पहचान लिया और आपके आशिक़ हो गये और जब उन्होने इमाम हुसैन अलैहिस सलाम के मअनवी और इलाही सुन्दरता को देखा तो फिर एक लम्हे के लिये भी आपसे अलग नही हुए। यहां तक कि आशूर के दिन जब इमाम अलैहिस सलाम ज़ोहर की नमाज़ के लिये खड़े हुए तो वह आपके सामने ढाल की तरह खड़े हो गये और इमाम अलैहिस सलाम को दुश्मनों के तीरों से बचाये रखा लेकिन ख़ुद जामे शहादत नोश कर लिया और हक़ व हक़ीक़त के आशिक़ों के दरमियान अपना नाम हमेशा के लिये इतिहास के पन्नों में लिखवा लिया।
آن دل کہ ز عشق چو غنچہ شکفت ہر نکتہ کہ گفت ز حسن تو گفت
بیدار غمت از صبح ازل تا شام ابد ، یک لحظہ نخفت
گوش دل ہر ہشیار دلی ہر نغمہ شنفت ہم از توشنفت
مژگان من دل رفتہ ز دست جز خاک رہ کوی تو نرفت
از اشک و سر شک روان دلم پیداست حقیقت راز نھفت
آن دل کہ نگشتہ ز طاقت طاق حاشا کہ بود با عشق تو جفت
این غم کہ نصیب مفتقر است ہرگز ندھد از دست بہ مفت ( ۱ ) ।
वह दिल जो इश्क़ में कलियों की तरह खिल जाता है ,
और जो ज़िक्र भी होता है तेरे हुस्न का होता है।
तेरे ग़म का मारा यह दिल सुबहे अज़ल से शामे अबद तक
जाग रहा है और एक लम्हे को भी नही सोता।
इंसान , औलिया ए इलाही की संगत में रह कर इंसानी हालात की पस्ती से निकल कर भक्ति व बंदगी के कमाल पर पहुच जाता है। सिफ़ाते नासूतिया से निकल कर सिफ़ाते लाहूतिया से आरास्ता हो जाता है। यही बात दुआ की वास्तविकता में छुपी हुई बयान हुई है:
” وفقنا اللہ و ایاکم للترقی من حضیض البشریة الی ذروة العبودیة،و رزقنا اللہ و ایاکم للتخلی عن صفات الناسوتیة والتجلی بالصفات اللاھوتیة “ ۔ ।
मुहम्मद बिन अबी उमैर का शुमार हज़रत इमाम मूसा बिन जाफ़र अलैहिमस सलाम के सहाबियों में होता है। बनी अब्बास के शासक ने आपका सारा माल सिर्फ़ इस लिये छीन लिया कि आप सारे शियों के नाम जानते थे और आपने वह नाम उसको नही बताये थे और सिर्फ़ इसी जुर्म में चार साल तक आपको जेल में डाले रखा।
जब आपकी क़ैद का समय पूरा हो गया तो आपको बुलाया गया और दोबारा से सारे शियों के नाम और पते पूछे गये मगर आपने फिर भी उन्हे नही बताया।
बनी अब्बास के शासक के आदेश पर आपको इतने कोड़े मारे गये कि आपके बदन से ख़ून बहने लगा और आप बेहोश हो कर ज़मीन पर गिर पड़े और उसके बाद एक ज़माने तक आपका जिस्म ज़ख़्मी रहा। उसके अलावा आपके पास एक भी पैसा बाक़ी नही रहा जिससे रोज़ी का कोई ज़रिया बनता और आप अपने घर वालों के लिये जीवन यापन के लिये कुछ उपाय करते।
एक दिन किसी ने आपके घर का दरवाज़ा खटखटाया जब आपने दरवाज़ा खोला तो एक आदमी दस हज़ार दिरहम का एक थैला लिये खड़ा था , उसने मुहम्मद बिन उमैर से कहा कि इस पैसे को मुझ से स्वीकार करो। पैसा लेकर आने वाला एक व्यापारी था जिसका दिवालिया निकल चुका था वह व्यापारी मुहम्मद बिन उमैर के साथ व्यापार में साझी था और उस पर मुहम्मद बिन उमैर के दस हज़ार दिरहम बाक़ी थे। आपने उससे कहा कि तुम्हे तो व्यापार में नुक़सान हो गया था। यह पैसा कहां से आया क्या तुम्हे कोई मीरास मिली है ? उसने कहा , नही। मुहम्मद ने कहा तो क्या तुम्हे यह पैसा किसी ने तोहफ़े में दिया है ? उसने कहा , नही। मुहम्मद ने कहा तो क्या तुम्हारे पास कोई बाग़ या ज़मीन थी जिसको बेच कर तुमने यह पैसा हासिल किया है ? उसने कहा , नही। तो आपने पूछा फिर यह पैसा कहां ले लाये हो ? उसने कहा कि अगरचे मुझे व्यापार में घाटा हुआ और मैं दिवालिया हो गया लेकिन मैंने सोचा कि तुम कई साल तक जेल में रहे हो और तुम्हारा सारा पैसा हुकूमत ने ले लिया है और अब जब तुम आज़ाद हुए हो तो तुम्हारे पास न कोई माल है न ताक़त कि अपने बच्चों के लिये रोज़ी का कोई बंदोबस्त कर सको। इसी वजह से मुझे तुम्हारे हाल पर रहम आया लिहाज़ा जिस घर में मैं और मेरे बच्चे रहते थे मैंने उसको बेच कर तुम्हारा उधार चुकाने का हौसला किया है और यह पैसा लाया हूं।
मुहम्मद बिन उमैर ने कहा: मेरा हालत यही है जो तुमने बयान की है और इस समय भी मुझे पैसों की आवश्यकता है लेकिन ईश्वर की सौगंध मैं तुम्हारा यह एक दिरहम भी स्वीकार नही कर सकता क्यों कि इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस सलाम से रिवायत है कि आपने फ़रमाया: क़र्ज़ की वजह से इंसान को अपने घर और पैदा होने की जगह को नही बेचना चाहिये लिहाज़ा अब तुम वापस जाओ और इस पैसे को वापस करके अपने घर को वापस ले लो।
इमाम मूसा बिन जाफ़र , इमाम अली बिन मूसा और इमाम मुहम्मद तक़ी अलैहिमुस सलाम के एक सहाबी थे जिनका नाम सफ़वान बिन यहया था। इमाम अली रज़ा के नज़दीक उनका मरतबा बहुत बुलंद था। दीन व दुनिया के उमूर में वह इमाम अली रज़ा अलैहिस सलाम और इमाम मुहम्मद तक़ी अलैहिस सलाम के वकील थे।
वह अपनी ज़िन्दगी के तमाम मराहिल में मुतमईन थे। लोगों के दरमियान सबसे ज़्यादा इबादत करने वाले इंसान थे वह रोज़ाना एक सौ पचास रकअत नमाज़ पढ़ करते थे। इबादत और ज़ोहत में उनका मरतबा बहुत बुलंद था। धर्म में दृढ़ता और सब्र में अपनी मिसाल आप थे। वाक़ेफ़ीया सम्प्रदाय ने आपको बहुत सारा माल देने का प्रयत्न किया ता कि वह अपना फ़िरक़ा छोड़ कर उनके सम्प्रदाय को स्वीकार कर लें। लेकिन उन्होने क़बूल नही किया और अपने धर्म पर बाक़ी रहे।
आप व्यापार और कारोबार में अब्दुल्लाब बिन जुन्दब व अली बिन नोमान के साझी थे। किताबों में बयान हुआ है कि तीनों दोस्तों ने ख़ान ए काबा के पास वादा किया था कि हम में से किसी एक के स्वर्गवास के बाद ज़िन्दा रहने वाला दोस्त , मरने वाले तरफ़ से उसकी सारी नमाज़ें पढ़ेगा , उसके क़ज़ा रोज़े रखेगा और उसके माल की ज़कात देगा। उन दोनो दोस्तों का देहांत हो गया और सफ़वान दिन व रात में एक सौ पचास रकअत नमाज़ अपने लिये और तीन सौ रकअत नमाज़ अपने दोनो दोस्तों के लिये पढ़ते थे और तीन महीने रोज़े रखते थे , माहे मुबारक रमज़ान में अपने लिये और दूसरे दो माह में अपने दोनो दोस्तों के लिये और अपने पास से उनकी तरफ़ से ज़कात देते और जो भी अल्लाह की राह में ख़र्च करते उसमें से एक हिस्सा अपनी तरफ़ से और दो हिस्से अपने दोस्तों की तरफ़ से ख़र्च करते।
एक जवान जो इश्क़ की आग में जल रहा था लेकिन अपने आचरण और पाकदामनी को सुरक्षित रखने के कारणवश बहुत परेशान था। इस परेशानी से छुटकारा पाने के लिये हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस सलाम की ख़िदमत में आया , वह युवक अपने पड़ोसी की सुन्दर दासी पर मोहित हो गया था। उसके प्यार की कहानी यह है कि वह पहली नज़र में उसका दीवाना हो गया था , उसकी आंखों से नींद उड़ चुकी थी। उसने इमाम अलैहिस सलाम से अनुरोध किया कि उसको इस सख़्त मुश्किल से निजात दिलायें और कोई रास्ता इसे हल करने के लिये बतायें। आपने फ़रमाया: अब जब भी तुम्हारी नज़र उस दासी पर पड़े तो यह वाक्य कहना:
جملہ ” اسئل اللہ من فضلہ
ऐ अल्लाह मैं तेरा फ़ज़्ल चाहता हूं।
और हमेशा इसे दोहराते रहो और ईश्वर से इसके हल होने की प्रार्थना करते रहो।
उस जवान ने आपके आदेश पर अमल किया , अभी कुछ ही दिन हुए थे उस दासी का मालिक उस जवान से मिलने आया और कहा कि मुझे एक बहुत ही आवश्यक काम के लिये सफ़र पर जाना है मगर मैं इस दासी के कारण उस सफ़र को लेकर परेशान हूं। मैं उसे अपने साथ भी नही ले जा सकता हूं न ही उसे यहां अकेला छोड़ सकता हूं। अगर तुम उसे अपने घर में रख लो तो शान्ती से उस सफ़र पर जा सकता हूं क्यों कि मुझे तुम्हारे अलावा किसी दूसरे पर भरोसा नही है।
उस पाकदामन और नेक जवान की इच्छा भी यही थी कि वह उस दासी के मिलन तक पहुच जाये इसलिये उसे फ़ौरन पूरे मन व मर्ज़ी के साथ स्वीकार कर लेना चाहिये था मगर उसने इस बात को स्वीकार करने से इंकार कर दिया और कहा कि मेरे घर में कोई नही है जो तुम्हारी दासी की रक्षा कर सके और यह भी उचित नही है कि वह और मैं एक घर में अकेले रहें क्यों कि संभव है कि मेरे मन में पाप आ जाये और मैं ख़ुद पर क़ाबू न रख सकूं लिहाज़ा मैं तुमसे क्षमा चाहता हूं।
उस दासी के मालिक ने कहा: मैं उसे उचित क़ीमत पर तुम्हारे हाथ बेच देता हूं ता कि तुम हर तरह से उसके मालिक हो जाओ , इस शर्त के साथ कि तुम इस पैसे को अपने ऊपर ज़मानत के तौर पर रखो और जब मैं वापस आऊंगा तो दासी को इस पैसे के बदले मुझे वापस कर दोगे।
जवान ने इस सुझाव को स्वीकार कर लिया और वह उस दासी का साथ पा कर प्रसन्न जीवन व्यतीत करने लगा।
दासी के मालिक के वापस आने से कुछ दिन पहले उस काल के शासक को उस सुन्दर दासी के बारे में मालूम हो गया और उसने कहा कि जैसे भी जितने भी पैसे में संभव हो उसे ख़रीद लो। उन्होने कई गुना पैसे उस जवान को दे कर उसे ख़रीद लिया और अपने साथ ले गये।
जब मालिक वापस आया तो उसने पूरी कहानी उसे सुना दी और सारा पैसा उसके सामने रख दिया। उसने कहा: अब जबकि ऐसा वाक़ेया पेश आया है तो मैं सिर्फ़ उतना ही पैसा लूंगा जिसकी तुम ने ज़मानत ली थी और सारा पैसा उसको वापस कर दिया।
इस कथा में दीनदारी , पवित्रता और संयम की रक्षा के कारण , वह जवान ईश्वर की कृपा का पात्र बना और न सिर्फ़ यह कि वह उस दासी को जिससे वह प्रेम करता था , प्राप्त करने में सफ़ल रहा बल्कि बहुत सारा पैसा भी उसके हाथ लगा। जिससे उसका भविष्य अच्छा हो गया।
दारमिया एक बुद्धिमान , अध्यात्म व इस्लाम का ज्ञान रखने वाली नारी थी और अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली अलैहिस सलाम पर बहुत ज़्यादा ईमान रखती थी।
आपका घर जहून नामक जगह पर था , आप बहुत ज़्यादा दिलेर और निडर औरत थीं। अली अलैहिस सलाम की मुहब्बत आपके दिल में भरी हुई थी। वह हमेशा अली अलैहिस सलाम के न्याय और अल्लाह के रसूल के वास्तविक उत्तराधिकारी होने की बातें किया करती थीं। सिफ़्फ़ीन की जंग में अली अलैहिस सलाम के सिपाहियों को मुआविया , जो कि हक़ व सत्य का दुश्मन था , के ख़िलाफ़ बढ़काती थीं और जंग के लिये जोश दिलाने वाला भाषण दिया करती थीं।
मुआविया सिंहासन की गद्दी पर बैठने के बाद एक बार मक्का आया हुआ था। उसने दारमिया के बारे में पूछा कि वह ज़िन्दा है या मर गई। किसी ने कहा: ज़िन्दा है और सही व सालिम है। मुआविया ने कहा: दारमिया को हाज़िर किया जाये। दारमिया आयीं जैसे ही मुआविया की नज़र उन पर पड़ी कहने कहा: ऐ हाम की बेटी , (हाम हबशियों का पूर्वज है) तुम यहां किस लिये आई हो ?
दारमिया: तू मेरी बे इज़्ज़ती करना चाहता है। मैं बनी कनाना के क़बीले की हूं , हाम की औलाद नही। और मेरा नाम दारमिय ए जहूनिया है।
मुआविया: सच कहती हो , क्या तुम जानती हो कि मैंने तुम्हे क्यों बुलाया है ?
दारमिया: सुबहान अल्लाह मैं ग़ैब का ज्ञान नही रखती।
मुआविया: मैंने तूझे इस लिये बुलाया है ता कि तुझ से सवाल करूं कि तू अली को क्यों दोस्त रखती है और मुझ से दुश्मनी क्यों रखती है ? वह क्यों तुम्हे पसंद हैं और मैं क्यों नापसंद ? दारमिया ने कहा: मुझ से यह सवाल न करो।
मुआविया: यह संभव नही है तुम्हे इस का उत्तर देना ही पड़ेगा।
दारमिया: अब जबकि मैं मजबूर हूं तो इसकी वजब बयान करती हूं:
मैं अली अलैहिस सलाम को इस लिये दोस्त रखती हूं कि उन्होने जनता में न्याय व इंसाफ़ की बुनियाद डाली।
मैं अली अलैहिस सलाम को इस लिये दोस्त रखती हूं कि वह जनता को उसका हक़ देते थे और जनता का हक़ बाटने में न्याय और बराबरी से काम लेते थे।
लेकिन तुझसे इस लिये नफ़रत करती हूं कि तूने ऐसे इंसान से जंग की जो तुझ से बहुत ज़्यादा बुलंद और बेहतर था। वह ख़िलाफ़त व शासन के लिये तुझ से ज़्यादा बेहतर और लायक़ था। तूने उससे ना हक़ जंग की , तूने उनकी मुख़ालेफ़त की और उनके हक़ पर क़ब्ज़ा जमा लिया।
अली अलैहिस सलाम को इस लिये दोस्त रखती हूं कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम ने उनको विलायत व ख़िलाफ़त के लिये चुना था और सब उनको पसंद करते थे और समस्त मुसलमान उनका आदर करते थे।
तुझसे इस लिये घृणा करती हूं कि तूने ना हक़ लोगों का ख़ून बहाया और तूने ज़ुल्म व अत्याचार से फ़ैसला किया , अक़्ल से फ़ैसला नही किया , तूने अल्लाह के रसूल (स) के तरीक़े से न्याय नही किया बल्कि अपने हवा व हवस से फ़ैसले किये।
मैं अली अलैहिस सलाम को दोस्त रखती हूं और मरते दम तक उनके साथ हूं लेकिन तुझसे और तेरे कामों से बेज़ार हूं और जब तक ज़िन्दा हूं , तुझसे नफ़रत करती रहूंगी।
मुआविया: इसी वजह से तेरा पेट और छातियां मोटी हो गई है और कूल्हे फैल गये हैं ?
दारमिया: तूने जो सिफ़ते बयान की हैं वह सब तेरी मां में पाई जाती थीं क्यों कि मैंने ख़ुद सुना है कि तेरी मां हिन्द इन्ही सिफ़तों से अजनबी लोगों को लुभाती थी।
मुआविया ने जब यह देखा कि यह औरत वास्तविकता को बयान करने से नही डरती तो उनके साथ राजनितिक तरीक़े से पेश आने लगा और उनसे माफ़ी मागते हुए कहना लगा: मैं इन जुमलों से तुम्हारी बे इज़्ज़ती नही नही करना चाह रहा था बल्कि मैं तुम्हारी तारीफ़ कर रहा था। तारीफ़ करने के बाद सवाल किया कि क्या तूने ख़ुद अली को देखा है ?
दारमिया: हां ख़ुदा की क़सम मैंने उनको अपनी आंखों से देखा है।
मुआविया: तो उनको तूने कैसा पाया ?
दारमिया: मैंने उनको इस हालत में देखा है कि न तो शासन ने उनको धोखा दिया था और न ही उन नेमतों ने उनको ख़ुदा से ग़ाफ़िल किया था जिन पर तू तकिया किये हुए है।
मुआविया ने इशारा किया कि बस इतना काफ़ी है।
वह डर गया कि अगर इस शेर दिल ख़ातून से अली अलैहिस सलाम की अच्छाईयों और बड़ाईयों के बारे में कुछ देर तक और बयान किया तो जो कुछ सम्मान बचा है वह भी ख़त्म हो जायेगा और वह सबकी नज़रों में गिर जायेगा। इसी वजह से उनको ख़ामोश होने को कहा।
जब मुआविया ने उनको ख़ामोश होने का आदेश दिया तो दारमिया ने कहा:
ख़ुदा की सौगंध यह वह बातें हैं जो मेरे मरे हुए दिल को ज़िन्दा कर देती हैं और उनके ख़िलाफ़ होने वाले झूठे प्रचार को भंग कर देती हैं। यह बातें दिलों को इस तरह से रौशन और साफ़ कर देती हैं जैसे ज़ैतून का तेल बरतनो के ज़न्ग को साफ़ कर देता है।
मुआविया: तुम सच कहती हो और मैं तुम्हारी बातों को प्रमाणित करता हूं। अब यह बताओ कि क्या तुम्हे किसी चीज़ की आवश्यकता है ?
दारमिया: अगर मैं तुझ से कोई चीज़ मांगूं तो क्या तू मुझेगा अता करेगा ?
मुआविया: हां ,
दारमिया: मुझे लाल बालों वाले सौ ऊंट सारबान के साथ चाहिये।
मुआविया: सौ ऊंट का क्या करोगी ?
मैं चाहती हूं कि उनके दूध से छोटे बच्चों का पालन पोषण करूं और ख़ुद उनके ज़रिये बूढ़े और कमज़ोर लोगों की देख भाल कर सकूं।
मुआविया: अगर यह सब मैं तुम्हे दे दूं तो फिर अली बिन अबी तालिब की तरह मुझे दोस्त रखोगी ?
दारमिया ने कहा: नहीं , ख़ुदा की सौगंध , बल्कि उनसे कम भी नही तुम्हे दोस्त नही रख सकती।
मुआविया ने एक शेर पढ़ा और कहा कि देख यह मेरी बड़ाई है कि मैं तेरे गुनाहों को नज़र अंदाज़ करता हूं और तूझे बख़्शता हूं। अगर अली बिन अबी तालिब होते तो तुझे एक खोटा सिक्का भी न देते।
दारमिया ने कहा: बेशक अली अलैहिस सलाम यह काम न करते , यहां तक कि उन ऊटों को एक बाल भी न देते क्यों कि वह जनता के ख़ज़ाने को तेरी तरह से बर्बाद नही करते थे।
इस ख़ातून के इश्क़ को जो ऐसे बुलंद मरतबा इंसान से इश्क़ करती है जिस में तमाम कमालात व फ़ज़ाइल जमा हो गये हैं। पश्चिमी नारियों के इश्क़ से , जो बेहद ख़राब व घटिया रासस्ता चलते लोगों से इश्क़ करती हैं , तुलना करें ताकि आपको मालूम हो सके कि धर्म पालन और क़ुरआन के साथ संबंध और अधर्मी व हवा व हवस के संबंध रखने में कितना ज़्यादा अंतर पाया जाता है।
अरवा बिन्ते अब्दुल मुत्तलिब बहुत बूढ़ी हो गई थीं इतनी कि कमर ख़म हो चुकी थी और लाठी के बिना आपके लिये संभव नही था। एक दिन मुआविया के दरबार में दाख़िल हुई और जैसे ही मुआविया ने आपको देखा कहा: स्वागत है आपका ऐ ख़ाला जान। कैसी हैं आप ?
अरवा ने कहा: अल्हम्दुलिल्लाह , मैं अच्छी हूं। लेकिन चूंकि तूने मेरे चचाज़ाद भाईयों को विरोध किया है और उनके हक़ को छीन लिया है और नाहक़ ख़ुद को मुसलमानों का ख़लीफ़ा कहता है इस बात का मुझे बहुत ग़ुस्सा है।
पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम के स्वर्गवास के पश्चात क़बील ए बनी तैम , अदी और बनी उमय्या ने हमारे हक़ को हमसे छीन लिया है और हमें हमारे हक़ से वंचित कर दिया है। जबसे तुम शासन की गद्दी पर बैठे हो , हम जिसके ज़्यादा पात्र थे। हमें अलग थलक कर दिया है , मुझे इन सब का बहुत दुख है।
हमारी और तुम्हारी मिसाल क़िबतीयों और फ़िरऔन के मानने वालों की तरह है और अली बिन अबी तालिब अलैहिस सलाम की मिसाल हज़रत मूसा के बाद हारून की तरह है।
इस बीच अम्र बिन आस , जो अपने ज़माने का प्रसिद्ध धुर्त व्यक्ति था , ने अरवा पर ऐतेराज़ किया और कहा: ऐ बूढ़ी औरत , चुप हो जा। मंद बुद्धि , भोली और वेवक़ूफ़ जैसे शब्दों का प्रयोग किया जो सब के सब उसके अत्यधिक क्रोध और अरवा की बुराई के सूचक थे।
लेकिन अरवा न सिर्फ़ यह कि चुप नही हुई और डरी नहीं बल्कि पहले से ज़्यादा दृढ़ता और निडरता के साथ बोलते हुए उस धुर्त का जवाब इस तरह से दिया:
ऐ हराम की औलाद , तू क्या कहता है ? इन बातों का तुझ से क्या संबंध है ? तेरी मां मक्के की नाज़ायज़ संबंध रखने वाली औरतों में से थी , सबसे इश्क़ और मुहब्बत के पैंग लड़ाती थीं और बहुत ही कम पैसे में उनके साथ शारीरिक संबंध बनाती थी और उन्हे ख़ुश करती थी। तू उसकी औलाद हो कर मुझ पर आपत्ति जता रहा है ?
तू वह है कि जब पैदा हुआ तो छ: लोग तेरा बाप होने के दावेदार थे और जब तेरी मां से पूछा गया तो उसने कहा कि इन सब ने मेरे साथ शारीरिक संबंध बनाये हैं लिहाज़ा यह जिस से सबसे ज़्यादा मिलता हो उसी का होगा। तेरी मां को मैने ख़ुद देखा है कि मेना के मैदान में उपस्तिथी के दिनों में हर घृणित और बुरे जवान के साथ मिलती थी और चूंकि तू आस बिन वायल से सबसे ज़्यादा मिलता था इस लिये तू उसकी औलाद हो गया और तूझे अम्र बिन आस कहा जाने लगा।
अभी अरवा अम्र बिन आस की असलियत बता ही रही थीं कि इतने में मरवान उनकी बात काट कर बीच में बोल पड़ा:
ऐ बुढ़िया , बेकार की बातें न कर , चुप हो जा। मंद बुद्धि , कैसी बातें कर रही है , अपने काम की बात कर। अरवा या बेहतर तरह से कहा जाये कि क़ुरआन की पाठशाला की शिष्य और इस्लाम के तालीमात की रौशनी में परवरिश पाने वाली , इस स्वतंत्र नारी , इस्लाम की गर्वता का प्रतीक , शक्तिशाली व पाक दामन औरत ने अपनी तलवार से ज़्यादा काटदार ज़बान का रुख उसकी तरफ़ मोड़ा और कहा: तू भी आस के इस बेटे की तरह बातें कर रह हैं , ऐ नीली आंखों वाले , ऐ लाल बालों वाले , ऐ नाटे क़द वाले बद शक्ल इंसान , ऐ बेढंगा शरीर और अनुचित अंगों वाले , तू हर लिहाज़ से हारिस बिन कंदा के ग़ुलाम ज़्यादा मिलता है न कि अपने बाप हकम से। इसलिये कि उसकी भी आंखें नीली थी , बाल लाल थे , क़द नाटा और शक्ल बुरी थी , तुझ से क्या मतलब है तू दूसरों के काम दख़ालत करता है और बेकार के काम करता है ?
मैंने तूझे पहचानती हूं तू अपने बाप से बिल्कुल भी नही मिलता जबकि तेरा बाप दावा करता है कि तू उसी की औलाद है , मैं तेरे बाप को भी पहचानती हूं जिसमें जिस जिस तरह की बातें पाई जाती थी वह तुझ में नही पाई जाती हैं या यह कि जो सिफ़ते उस में पाई जाती थी तुझ में नही पाई जाती हैं। लिहाज़ा मुझ पर ऐतेराज़ करने से पहले अपनी मां के पास जा और उससे जा कर पूछ के तेरा बाप कौन है ? तुझे मुझ से क्या मतलब है ?
फिर मुआविया की तरफ़ रुख़ किया और कहा: ऐ मुआविया , ईश्वर की सौगंध , तू कारण बना कि यह सब जनता के कामों के ठेकेदार बन जायें और इन में यह जुरअत पैदा हो गई है , तू और सिर्फ़ है जिसने इन के हाथ में बागडोर दी है जिससे इन में इतना साहस पैदा हो गया है कि यह मुझ से इस तरह से बातें कर रहे हैं।
मुआविया ने आदर पूर्वक उन्हे दिलासा दिया और कहा: ख़ुदा ने पहले के कामों को माफ़ कर दिया है अब अगर आपको किसी चीज़ की आवश्यकता है तो कहिये।
अरवा ने कहा: मुझे तेरी किसी चीज़ की आवश्यकता नही है। उसके बाद वहां से उठीं और दरबार से बाहर निकल गयीं।
मुआविया ने अम्र बिन आस और मरवान बिन हकम को संबोधित करते हुए कहा कि लानत हो तुम पर , तुम्हारी वजह से आज मुझे यह सारी बातें सुननी पड़ी। फिर उसने किसी को उनके पीछे भेजा ता कि उन्हे बुला कर लाये , उनके आने के बाद मुआविया ने कहा: अपनी आवश्यकता को मुझ से बयान करिये मैं उसे पूरा करना चाहता हूं।
अरवा ने कहा: मुझे छ: हज़ार दीनार की ज़रुरत है। मुआविया ने कहा: उन पैसों का क्या करना चाहती हो ?
अरवा ने कहा: दो हज़ार दीनार से एक नाला बनवाऊंगी जिससे क़बील ए बनी हारिस के ग़रीबों के लिये रोज़ी का ज़रीया पैदा हो सके। दो हज़ार दीनार से बनी हारिस के ग़रीब जवानों की शादियां करूंगी और बाक़ी दो हज़ार से दूसरे आवश्यक कार्यों को पूरा करूंगी।
मुआविया ने कहा: इन्हे छ: हज़ार दीनार दे दिया जाये। जिस समय अरवा दरबार से बाहर निकलना चाहती थीं , मुआविया ने कहा:
यह मैं था जिसने आपको छ: हज़ार दीनार देने का आदेश दे दिया। अगर मेरी जगह अली बिन अबी तालिब होते तो इसके बावुजूद कि वह आपके चचा के बेटे थे , आपको कुछ नही देते।
यह बात सुनते ही उनका चेहरा ग़ुस्से से लाल हो और रंग उड़ गया। बेहद ग़ुस्से की हालत में आपको रोना आ गया फिर मुआविया से कहा:
अली की बात करके तुमने अली की याद ताज़ा कर दी। तुमने मुझे अली उनके न्याय , उनकी बहादुरी..... की याद दिला दी।
उसके बाद अली अलैहिस सलाम की शान में एक तफ़्सीली क़सीदा पढ़ा , उन्हे सब पर फ़ज़ीलत दी और मुआविया को और ज़्यादा ज़लील व रुसवा करके वापस हो गयीं।
नसीबा बिन्ते कअब उर्फ़ उम्मे अमारा ने अपने शौहर और अपने दो बच्चों के साथ जंगे ओहद में शिरकत की थी और उन्होंने खुद भी तलवार उठा कर पैगम्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम की राह में जेहाद किया था। कुरआने करीम , इस्लाम और मुसलमानों से दिफ़ा करती थी और कभी कभी तीर कमान उठा कर दुश्मन का मुकाबला करती थी और उनको पीछे हटने पर मजबूर करती थीं , इसी महान जँग में आप के कंधों और बदन पर बारह ज़ख्म लगे थे।
जवान लड़कियां और औरतें जब आपके बदन और सीने पर ज़ख्म देखती थीं तो मालूम करती थीं कि यह ज़ख्म कैसे लगे। उन्हीं में से एक ख़ातून उम्मे सअद बिन्ते सअद बिन रबीअ थी जो कहती हैः जंगे ओहद का अपना वाक़ेया मुझे सुनाओ:
उम्मे अमाराः उस दिन ज़ोहर के नज़दीक पानी की एक मश्क और ज़ख्मों पर बाँधने वाली पटटी उठा कर मैं मैदाने जँग में गई ता की ज़ख़्मियों को पानी पिलाऊँ और उनके ज़ख्मों पर पटटी बांधूँ , मुझे इस बात का ख्याल भी नहीं था की मैं अपने शौहर और अपने दो बेटों के साथ कंधे से कंधा मिला कर दुश्मन से जँग करूँगी , जैसे ही मैदान में दाख़िल हुई तो देखा की घमासान की जँग हो रही है और मुसलमान शिकस्त खा रहे हैं हर आदमी भाग रहा है , मैं तलवार चलाती हुई पैगम्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम के नज़दीक पहुँच गई। उस दिन मैं तलवार भी चला रही थी और तीर कमान से तीर अंदाज़ी भी कर रही थी , और मैं ने इस क़दर जँग की कि मेरे कांधों पर यह ज़ख्म लगे हैं।
उम्मे सअदः मैंने खुद उन ज़ख्मों को देखा है जिन पर वरम मौजूद था , मैंने उनसे पूछा यह ज़ख्म किसने लगाये हैं तो उन्होंने कहाः जिस समय लोग पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम को छोड़ कर भाग गये तो इब्ने कमीया चिल्ला रहा थाः
मुहम्मद कहाँ हैं ? मुहम्मद कहाँ हैं ? वाय हो मुझ पर अगर मैं उनको कत्ल न करूँ।
मुसअब बिन उमैर और दूसरा गिरोह जिसके दरमियान मैं भी मौजूद थी। उसके सामने खडे हो गए और पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम का देफा करने लगे , इसी हमले में यह ज़ख्म मेरे बदन पर लगे हैं , मैंने भी उस पर कई वार किये लेकिन चूंकी वह खुदा का दुश्मन दो ज़िरह पहने हुऐ था मेरी तलवार का वार उस पर कोई असर नहीं करता था।
मैंने उससे पूछा तुम्हारे इस हाथ पर क्या हुआ है। उन्होंने कहाः जिस दिन यमामा में मुसलमानों ने काफ़िर अरबों से शिकस्त खाई , अंसार ने मुसलमानों से मदद माँगी , उनकी मदद के लिए जो अफ़राद गये उनमें से एक मैं भी थी , हज़ीकतुल मौत नामी जगह पर जँग हो रही थी और लगभग एक घन्टे तक जँग जारी रही। यहाँ तक की अबू दुजाना की वहीं पर शहादत हो गई और आख़िर कार मुसलमान कामयाब हो गये। इसी जगह जब मैं खुदा के दुश्मन मुसैयलमा का पीछा कर रही थी तो एक शख्स ने अचानक मुझ पर वार किया और मेरा हाथ कट गया।
उम्मे अमारा के बेटे अब्दुल्लाह बिन ज़ैद बिन आसीम ने बयान किया हैः मैं जंगे ओहद में जँग कर रहा था। जिस वक्त लोग पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम के पास से फ़रार कर रहे थे। मैं खुद आपके पास पहुँचा , मेरी वालेदा भी पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम की तरफ़ से जँग कर रही थीं। जैसे ही पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम की नज़र मुझ पर पड़ी फरमायाः उम्मे अमारा के बेटे हो। मैंने कहा जी हाँ या रसूलल्लाह , आँ हज़रत ने कहाः फिर जँग क्यों नहीं करते। तीर अन्दाज़ी करो। मैंने एक तीर उठाया और पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम के सामने एक मुशरिक को मारा जो उसके घोड़े की आख में लगा जिससे उसका घोड़ा बिदक गया और उसके साथ ज़मीन पर गिर गया। मैं फिर से उस पर हमला कर रहा था यहाँ तक की मैं ने पैगम्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम की तरफ़ देखा तो देखा कि आप मुस्कुरा रहे थे , जिससे ज़ाहिर था कि आप मेरी हिम्मत बढ़ा रहे थे , उसी वक्त दुश्मन के एक सिपाही ने मेरी मां के कंधों पर एक ज़र्ब लगाई जिससे वह ज़ख्मी हो गईं , पैगम्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम ने फरमायाः
तुम्हारी मां , तुम्हारी मां , उन्हे बचाओ , उनके ज़ख्म को बाँधो , तुम उस बा बरकत ख़ानदान के अफ़राद हो , तुम्हारी माँ का मरतबा फलाँ फलाँ से ज़्यादा है और तुम्हारे बाप का रुतबा फलाँ फलाँ के मक़ाम से ज़्यादा है खुदा वन्दे आलम तुम्हारे खानदान पर रहमत नाज़िल करे।
मेरी माँ ने कहाः या रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम , खुदा से दुआ करें कि वह हमें स्वर्ग में आपके साथ जगह इनायत करे। पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम ने उसी वक्त दुआ की और कहाः
अल्लाहुम्म अजअल हुम रफकाई फिल जन्नः
اللھم اجعلھم رفقائی فی الجنة “ ۔
जैसे ही मेरी माँ ने पैगम्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम की यह दुआ सुनी तो इस क़दर खुशहाल हुई जिसका अंदाज़ा नहीं किया जा सकता और कहाः
मुझ पर जो रन्जो मुसीबत नाज़िल हुई है अब मुझे उसकी कोई फिक्र और ग़म नहीं है।
ओवैस क़रनी ने पैगम्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम को नहीं देखा था लेकिन आपकी विशेषताएं और आपकी दावत को सुन कर फ़िदा हो गए थे और हिदायत को क़बूल करके जामे ईमान , कामिल इबादत और आरेफ़ाना अध्यात्म से जुड़ गये थे।
पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम ने उनके लिए जन्नत की गवाही दी और अपने असहाब से फरमायाः
तुम्हें अपनी उम्मत के ओवैस नामी शख़्स की बशारत देता हू यकीनन वह क़यामत में क़बील ए रबीया और मुज़िर के बराबर अफ़राद की शिफ़ाअत करेंगे:
पैगम्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम ने फरमायाः
” تفوح روائح الجنة من قبل القرون و اشوقاہ الیک یا اویس القرن “ ۔
तफुहो रवाऐहुल जन्नह मिन कब्लील करून व अशोकाहो इलैक या ओवैसे करन
यमन की तरफ़ से जन्नत की हवा चल रही है। ऐ ओवैस करनी मैं तुम्हारी ज़्यारत का कितना मुश्ताक हूं। पैगम्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम ने उनको नफ़सुर्रहमान और ख़ैरुत्ता बैईन के नाम से याद किया और कभी कभी यमन की तरफ़ उनकी खुशबू को सुँघते थे और फरमाते थेः
” انی لاشم روح الرحمن من طرف الیمن “ ۔
इन्नी ला अशुम्म रुहुर्रहमान मिन तरफल यमन.
मैं यमन की तरफ़ से नसीमे रहमानी सुँघ रहा हूँ।
ओवैसे क़रनी पैगम्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम की ज़्यारत के शौक़ में परेशान थे। अपनी मां से मदीने जाकर पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम की ज़्यारत की आज्ञा मांगी , उन्होने कहाः इस शर्त पर इजाज़त देती हूँ की आधे दिन से ज़्यादा मदीने में न रुकना , औवेस अपनी वालेदा की इजाज़त से मदीने आ गये। जब आँ हज़रत सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम के घर पहुँचे तो आप घर पर तशरीफ नहीं रखते थे। आधे दिन वहाँ रुकने के बाद अपने महबूब की ज़्यारत किए बगैर यमन वापस आ गए। जिस वक़्त पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम घर तशरीफ लाऐ तो फ़रमायाः ये किस का नूर है जिसको मैं यहाँ देख रहा हूँ। सब ने कहाः एक ऊँट चराने वाला , जिसका नाम ओवैस था , यहाँ आया था और वापस चला गया , आपने फरमायाः वह इस नूर को हमारे घर में बतौरे हदिया छोड़ कर चले गये हैं।
ये क़िस्सा मशहूर है की जब जँगे ओहद में पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम की पेशानी ज़ख्मी हुई और दाँत शहीद हुए तो ओवैस क़रनी सहरा में ऊँटों को चरा रहे थे। वह भी पेशानी और दाँत के दर्द से आहो ज़ारी कर रहे थे।
जी हाँ मानवी मुआशेरत करने वालों और नूरानी चेहरे वालों की ज़िन्दगी में ज़ाहिरी तौर पर मौजूद होना ज़रुरी नहीं है। इंसान कोशिश और मुस्बत कार कर्दगी के ज़रीये औलिया ए हक़ की मानवी ख़िदमत में पहुँच सकता है और जब औवैसे क़रनी ने आं हज़रत सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्ल्म से अपना अध्यात्मिक संबंध बना लिया तो आपके वुजुद में बहुत ज़्यादा फ़ुयुज़ व बरकात जमा हो गये , कहा गया हैः
من جَدَّ وَجَدَ “ ۔
मन जद्दा वजद।
जो भी जिस चीज़ के लिए कोशिश करता है उसको हासिल कर लेता है।
पाठकों , ख़ुसूसन जवानों को जिनकी दुनिया भावनाओं और जज़्बात की दुनिया है। इस वाक्य की हक़ीक़त से आगाह करने के लिए तारीख़ में कोशिश करने वालों के कुछ वाक़ेयात की तरफ इशारा करेंगे।
एशिया में तैमूर बादशाह की कुदरत , बहादुरी और हुकूमत प्रसिद्ध थी। जब उससे किसी ने पुछा की तुम किस तरह इस हुकूमत और कुदरत पर पहुँचे तो उसने कहाः एक जंग में मुझे बहुत बड़ी हार हुई मैंने जंग में दुश्मन के खेलाफ़ बहुत ज़्यादा कोशिश की थी। लश्कर का शिराज़ा बिखरने के बाद , चूंकि मैं मशहूर था इसलिए मैंने बंदी बनाये जाने के डर से फ़रार का रास्ता इख्तेयार किया , जंगल में फ़रार करते हुए एक बुढ़ी औरत के ख़ैमे में पहुँचा जो सूत काता करती थी। मैंने एक रात वहाँ रहने की इजाज़त मांगी , उस बुढ़िया ने कबूल कर लिया। कुछ देर के बाद दुश्मन के सिपाही भी फ़रार करने वालों को तलाश करते हुए वहाँ पहुँच गये। मैं रुई के नीचे छिप गया ताकी दुश्मन मुझे न देख सकें , दुश्मन ने सब जगह तलाश किया और रुई में भी मारा जो मेरे पैर में लग गया लेकिन मैंने हिम्मत से काम लिया और खामोशी से बैठा रहा , दुश्मन के जाने के बाद मैं भी बुढ़ी औरत को खुदा हाफ़िज़ कह कर लँगड़ाता हुआ अपने मक़सद की तरफ रवाना हो गया।
एक वीराने में पहुँचा , आराम करने और दुश्मन की नज़रों से ओझल होने के उद्देश्य से वहाँ छुप गया , हर तरफ सन्नाटा था , मैं सोच रहा था की आख़िर अब क्या होगा कि अचानक मेरी नज़र एक चूँटी पर पडी जो गेहूँ का दाना अपने (बिल) घर में ले जा रही थी , मैंने देखा कि वह इस तरफ़ से दीवार के उस तरफ़ जाना चाहती है और गेहूँ के दाने को भी अपने घर में ले जाना चाहती है।
कमज़ोर चूँटी जो अपने वज़्न से ज़्यादा वज़्न को उठाए हुए थी। जब दिवार पर पहुँची और चाहती थी कि दीवार पर बैठे तो गेहूँ का दाना उसके मुँह से छूट कर ज़मीन पर गिर गया। वह दोबारा फिर उसी रास्ते से वापस आई और गेहूँ का दाना उठा कर दोबारा दीवार पर चढ़ने लगी लेकिन दीवार पर चढ़ते वक्त दोबारा गेहूँ का दाना ज़मीन पर गिर गया सड़सठ (67) मर्तबा उसने या सख्त काम अन्जाम दिया , लेकिन वह चूँटी आख़िरकार गेहूँ के उस दाने को दीवार पर लेकर चली गई और फिर दीवार से अपने घर में प्रवेश कर गई।
चूँटी का प्रयत्न और जिद्दो जेहद को देख कर मैंने उससे सबक हासिल किया और अपने आप से कहाः तू उस चूँटी से कम नहीं है , कोशिश कर ता की बुलन्द ओहदे व मुक़ाम हासिल कर सके। मैं ने कोशिश की और एक सिपाही से अमीरी और सल्तनत तक पहुँच गया और आगे अगर खुदा वन्दे आलम ने मौका दिया तो पूरी दुनिया पर हुकूमत करुँगा।
वह खुरासान (ईरान का एक राज्य) में नाल बन्दी का काम करता था लेकिन अपने प्रयत्न और जिद्दो जहद के ज़रीए खुरासान का शासक बन गया।
एक दिन उसका दोस्त उससे मुलाकात करने के लिए गया और उससे पुछाः तुम किस तरह नाल बन्दी से ख़ुरासान की हुकूमत तक पहुँचे।
उसने कहाः एक दिन मैं आराम करने के लिए अपने घर गया , घर में मेरी नज़र हन्ज़ला बाद गैसी नामक ईरानी कवी की पुस्तक पर पड़ी , मैं ने अध्धयन के लिए उसको खोला तो एक रोबाई पर मेरी नज़र पडी।
मेहतरी गर्बे कामे शीर दर अस्त
रो खतर कुन ज़ेकामे शिर बेजुई
या बुज़ुर्गी व इज़्ज़ो नेमतो जाह
या चु मर्दानत मर्ग रो या रुई.
अगर किसी महत्वपूर्ण चीज़ को शेर के मुँह में देखो तो उसके मुँह से निकालने की कोशिश करो या तो उस काम में सफ़लता के नतीजे में तुम्हें मुक़ाम व मन्सब और नेमत मिलेगी या जवान मर्दों की मौत नसीब होगी , जो खुद एक अज़मत है।
इस रोबाई ने मेरे दिल व दिमाग़ में एक गति उत्पन्न कर दी और उसको हासिल करने के लिए मैं मन्सब व मुकाम की कोशिश में लग गया और आख़िरकार नाल बन्दी के काम से ख़ुरासान की हुकूमत तक पहुँच गया।
सातवें इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम इंसान की उम्र को इलाही और मलकूती सरमाया शुमार करते हैं और आप चाहते थे कि तमाम लोग अपनी उम्र को ऐसी तिजारत में बसर करें जिसके ज़रीये वह दुनिया व आख़ेरत में फायदा उठायें। इसी वजह से लोगों को चार हक़ीक़तों की तरफ हिदायत फरमाते हैं
اجتھدوا فی ان یکون زمانکم اربع ساعات : ساعة لمناجاة اللہ، و ساعة لامر المعاش، و ساعة لمعاشرة الاخوان والثقات الذین یعرفونکم عیوبکم و یخلصون لکم فی الباطن، و ساعة تخلون فیھا للذاتکم فی غیر محرم و بھذہ الساعة تقدرون علی الثلاث ساعات “ ( ۱ ) ۔
अपने आयु को चार भागों में बाटने की कोशिश करो , एक हिस्सा आराधना व इबादत और खुदा से मुनाजात के लिए , एक हिस्सा कारोबार और ज़िन्दगी का ख़र्च हासिल करने के लिए , एक हिस्सा दीनी भाईयों से सामाजिक व्यवहार और नशिस्तो बर्खास्त के लिए , ताकी वह तुम्हारी बुराइयों को वह तुम्हें बताऐं और बातिन में वह तुम से ख़ुलूस से पेश आयें और यह हिस्सा जायज़ खुशियों और लज़्ज़तों के लिए मख़्सूस करो और ये आख़िरी हिस्सा थकन और सुस्ती को दूर करता है इसके ज़रीये पहले तीन भागों की रक्षा करो।
इस हदीस का ध्यानपूर्वक अध्धयन करो और उस पर विचार करो कि सही सामाजिक व्यवहार कितना महत्व रखता है। हज़रत इमाम मूसा बिन जाफ़र अलैहिस्सलाम ने हुक्म दिया कि अपनी उम्र का एक हिस्सा ऐसे दोस्तों की सोहबत व संगत में गुज़ारो जो तुम्हारी प्रगति व तरक़्क़ी और तुम्हे तुम्हारी बुराइयों को पाक करने में असरदायक साबित होँ।
इमाम अलैहिस्सलाम फरमाते हैः
दो चीज़ों के बारे में अपने नफ्स से बहस व गुफ्तग़ू न करो। ग़रीब व तँग दस्ती और लंबी आयु के लिए , इस लिये कि जो भी अपनी सोच को उन दोनो बातों के लिए मख्सूस कर देता है वह ग़रीबी और तँगहाली से दो चार हो जाता है और कंजूसी करना शुरु कर देता है और जो भी लंबी आयु के बारे में सोचने लगता है वह लालच का शिकार हो जाता है। दुनिया से अपने फायदों को हलाल और ऐसे कामों में क़रार दो जिससे मुरव्वत बाक़ी रहे और फ़ुज़ूलख़र्ची न हो , इस प्रकार जीवन यापन करना पाको पाकीज़ा ज़िन्दगी बसर करना है , दीनी कामों के लिए खुदा से मदद तलब करो , क्यों की इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम से हदीस नक़्ल हुई है कि
” لیس منا من ترک دنیاہ لدینہ او ترک دینہ لدنیاہ “ ( ۱ ) ۔
लईसा मिन्ना मन तर्का द्दुनिया लेदीनेही अव तरक दीनोहु लेदुनियाहु.
जो अपनी दुनिया और कारोबार के लिए दीन को छोड़ दे , या अपने दीन की वजह से दुनिया को छोड़ दे , वह हम में से नहीं है।
नेक बंदों के साथ सामाजिकता
सम्पूर्ण भलाई एवं सम्पूर्ण बुराई
इस्लाम भी ऐसा धर्म है जो सम्पूर्ण सभ्यता व सक़ाफ़त और सौभाग्य व सआदत प्रदान करता है , इस्लाम , सही सामाजिक व्यवहार , वास्तविक मित्रता और ज़िन्दा दिल लोगों के साथ रहने में भलाई समझता है। इसी तरह पवित्र आत्माओं , ईमान वालों और ऐसे लोगों के साथ सोहबत व संगत को , जो मसीहाई का दम रखते हैं और इंसान की इस्लाह , अदब , तरबीयत , रुश्द और करामत के अलावा कुछ और नहीं चाहते , को मुकम्मल सआदत जानता है।
इस्लाम , ग़लत सामाजिकता , बेकार दोस्त और मुर्दा दिल वालों के साथ रहने को मुकम्मल शर से ताबीर करता है। इसी तरह बुरी आत्मा वाले , बुरे , कमीने और बेदीन लोगों के साथ सामाजिक व्यवहार करने को मुआशरे व समाज की बुराई मानता है।
पवित्र व भले लोगों के साथ सामाजिक व्यवहार करना , मोमिन और फरीश्तों जैसे नेक लोगों के साथ उठना बैठना , वफ़ादार या ज़िन्दा ज़मीर दोस्तों के साथ दोस्ती करना ऐसे शरबत की तरह है जो इंसान की विचारधारा और आत्मिक बीमारीयों का ऐलाज करता है और इंसान को एक अच्छा और बेहतरीन ज़िन्दगी गुज़ारने की दावत देता है।
नापाक और बीमार दिल लोगो के साथ सामाजिक व्यवहार बनाना , बेईमान और शैतान नुमा लोगों की संगत में रहना , मुनाफ़िक़ लोगों के साथ दोस्ती व सामजिकता इख़्तेयार करना , ऐसे खतरनाक ज़हर की तरह हे जो इंसान की ज़िन्दगी में दाख़िल होकर उस के तमाम कामों और पहलुओं में ज़हर धोल देता है और इंसानों को हलाकत , ज़लालत , बदहाली , परेशानी और मुसीबतों में गिरफ्तार कर देता है।
बुरे और कमीने लोगों की संगत और सोहबत से जो ज़िल्लत व रुस्वाई इंसान को नसीब होती है उसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती , बल्की ज़िन्दगी की लज़्ज़त और मिठास ख़त्म हो जाती है।
अमीरुल मोमनीन अली अलैहिस्सलाम फरमाते हैः
عار الفضیحة یکدر حلاوة اللذة “ ( ۱ )
आरुल फज़ीहत यकदिरो हलावतुल लज़्ज़त.
बुरे साथी व दोस्त और ग़लत तौर तरीक़े से जो रुस्वाई मिलती है वह ज़िन्दगी की लिज़्ज़तों को खत्म कर देती है।
لا یقوم حلاوة اللذة بمرارة الآفات “ ( ۲ ) ۔
ला यपुमो हलावतुल लिज़्ज़त बेमरारतुल आफात.
उन लज़्ज़तों की कोई महत्व नहीं है जो आफ़तों की तल्ख़ियों के लाथ हों।
निसंदेह जो भी बुरे और अपवित्र दोस्त की संगत में एक मुद्दत तक ज़िन्दगी बसर करता है वह ग़लत सामजिकता के कारण ज्ञान , अध्यात्म , आराधना व इबादत , ख़िदमत और करामत , से वंचित हो जाता है। वह अपनी क़ीमती उम्र को शैतानी रास्ते में बर्बाद कर देता है और जब आँखें खोलता है तो जवानी की उमंगें , इच्छा शक्ति और इंसानी करामत खत्म हो चुकी होती है , इसके मुर्दा वुजूद से ख़ानदान और दूसरे लोगों को पीड़ा के अलावा कुछ नहीं मिलता , जल्दी गुज़र जाने वाली लज़्ज़तों की मिठास के मुकाबले में आज गले पड़ने वाले नुक़सान और आफतें घाटे का सौदा मालूम होने लगते हैं।
इस्लामी गणतंत्र ईरान के प्रसिद्ध कवी जलालुद्दीन रुमी ने अपनी प्रसिद्ध किताब (मसनवी) में पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम की एक हदीस को बयान किया है और ख़ास अंदाज़ और हुनर के साथ उसे नज़्म किया है जिसको यहाँ पर नक़्ल करना फायेदे से ख़ाली नहीं है।
बहार की हवा को ग़नीमत समझो क्यों कि वह तुम्हारे बदन में उसी तरह असर करती है जिस तरह पेड़ों पर असर करती है और पतझड़ की हवा से दूरी इख्तेयार करो क्यों कि वह तुम्हारे बदन पर उसी तरह असर करती है जिस तरह पेड़ों पर असर करती है।
जलालुद्दीन रुमी कहते हैः पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम सबसे फ़सीह इंसान हैं और उनका कथन तमाम इंसानों के कलाम से बुलन्द व बाला है और खुदा के कलाम से कम है , बेशक इस हदीस से बुलन्द हकीक़त और बहुत अहम कलाम मुराद है।
शायद पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम की नज़र में सुबह की ठंडी और ख़ुशगवार हवा और बादे सबा से मुराद अहले दिल और अवलिया ए इलाही का दम भरने वालों के मोजिज़ नुमा और मलकूती कलाम हैं क्यों कि जिस तरह बहारी हवा दरख्तों को ज़िन्दा करती है। उसी तरह ये भी मरे हुऐ दिलों को हयात अता करते हैं। पजमुर्दा जानों को हरकत देते हैं और पजमुर्दा नुफ़ूस को अख़लाक़ी और ईरफ़ानी हालात की बुनियाद पर ज़िन्दा करते हैं।
आ हज़रत पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम की नज़र में बादे खेज़ाँ से मुराद अहले बातिल और शैतान सिफ़त लोगों का मुर्दा कलाम है कि जिस तरह तूफ़ाने खेज़ाँ दरख्तों के पत्तों को पीला करके ज़मीन पर गिरा देता है उसी तरह यह भी नीम जाँ दिलों को मार देते हैं और कम ताकत जानों को क़त्ल कर देते हैं और मुर्दा दिलों को तहरीक करके अजगर की तरह बे महार शहवत की तरफ़ ले जाते हैं।
आ हज़रत पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम के कलाम की मुराद यह है कि अगर इंसान इलाही मुआशेरत मलकूती रफ़ीक़ और अर्श नशीं दोस्त जिस की ज़बान ईमान में ग़र्क़ उसके हालात हक़ायक़ से नज़दीक और उसका अख़लाक बाग़े करामत का फल है , के साथ दोस्ती और हम नशीनी करो तो इंसानी इस्तेदाद और उसके मानवी हालात ईसवी फूँक से ज़िन्दा हो जाऐंगे और उसके वुजूद का पौधा शजरे तय्यबा जिसकी जड़ें ज़मीन में साबित हैं और उसकी शाखें आसमान में और उसका फल हमेशा बाक़ी रहने वाला है , में तब्दिल हो जायेगा।
अगर शरीर मुआशिर , शैतान सिफ़त साथी और माद्दी व बेदीन दोस्त जिसकी ज़बान कुफ्रो शिर्क में ग़र्क हो और उसके हालात बुतपरस्ती के सक़ाफ़त और उसका अख्लाक़ अबू जहल के तरबूज़ की तरह से हो। (जिसके बारे में कहा जाता है कि तल्ख़ और कड़वा होता है) रेफाक़त और हम नशीनी इख्तेयार करेगा तो उसकी इंसानी इस्तेदाद और बातिनी हालात बादे खेज़ाँ की तरह उसकी गर्म साँसों से नाबूद हो जाऐंगे और उसके वुजूद को पौधा शजरे ख़बीसा जिसकी ज़मीन में कोई जड़ नहीं है , में तब्दील हो जाऐगी।
इंसान को हकीकी दोस्त और पाको पाकीज़ा रफीक़ का फायेदा उसी तरह होता है जिस तरह फूल पौधों और दरख्तों को नसीमे बहारी से होता है और इंसानों को बुरे दोस्त से उसी तरह नुक्सान होता है जिस तरह आग घास फूंस में पड़ने के बाद उसको स्याह राख में तब्दील कर देती है और हवा उसके हर ज़र्रे को अपने साथ ले जाती है।
गुफ़्त पैग़म्बर ज़ सर्मा ए बहार
तन म पुशानीद यारान ज़ीनहार
ज़ान के बा जाने शुमा आन मी कुनद
कान बहारन बा दरख्तान मी कुनद
लैक बीग्रीज़न्द अज़ सर्दे खज़ान
कॉन कुन्द कु कर्द बा बागो वज़ान
रावीयान इनरा बे ज़ाहीर बुर्दे अन्द
हम बर आन सुरत कनाअत करदे अन्द
बी ख़बर बुदन्द अज़ जाई आन गिरोह
कुह रा दिदे न दिदे कान बे कूह
अन खज़ान नज़्दे खुदा नफ्सो हवास्त
अक्लो जान बहारस्तो बकास्त
मर तु रा अक्लीस्त जुज़्वऐ दर नेहान
कामीलुल अक्ली बेजो अन्दर जहान
जुज़्वे तु अज़्कुल्ले तु कुल्ली शवद
अक्ले कुल बर नफ्से चुन गुल्ली शवद
पस बे ताविल इन बुवद कॉन फा सेपाक
चुन बहारस्तो हयाते बर्गो ताक
गुफ्तहाऐ अवलिया नर्मो दुरुश्त
तन म पुशान ज़ान की दिनत रास्त पुश्त
गर म गोयद सर्द गोयद खुश बेगीर
ज़ानज़े गर्मो सर्द बेज्ही वस्सईद
गर्मो सर्देशनौ बहारे ज़िन्दगीस्त
माऐ सिदको यकीनो बन्दगीस्त
ज़ान के ज़ु बिस्ताने जान्हा ज़िन्दे अस्त
ज़िन ज्वाहीर बहरे दिल आतन्दे अस्त
बर दिले आकील हज़ारान गम बुवद
गर ज़बाग दिल खेलाली कम बुद
परवीन ऐतेसामी ने अपने क़सीदे में ना मुनासीब साथी के आख़िर में उस पानी की ज़ुबानी बयान किया है जो देग़ में हम नशीनी के असर में आग में जल कर बुखार में तब्दील हो जाता है और उसकी अस्लीयत ख़त्म हो जाती है और वह इंसान को फायदा नहीं पहँचा पाता , कहता हैः
मन के बूदम पिज़िश्के बीमारान
आख़िर कार खुद शुदम बीमार
मन के बर
तुतीयान रा चे कार बा मुर्दार.
अनुवाद
ग़लत मुआशिर और बद सीरत दोस्त इंसानियत के शजरे तय्यबा की जड़ को खुश्क कर देता है और दरख्ते फितरत की शाख़ और पत्तों को गिरा देता है और सआदत के तमाम रास्ते इंसान पर बन्द कर देता है। मोतहर्रीक अमल और पाक फिक्र को बे हरकत और मोतवक्किफ़ कर देता है ज़मीर की फरियाद को ख़ामोश और उसकी रुही ताकत को ख़त्म कर देता है और इंसानों को खुश्क काँटों में तब्दील कर देता है।
नेक मित्र , वफ़ादार दोस्त और शाइस् रफीक वजूदे इंसान की सरज़मीन के लिए बुलन्द पहाड़ पर एक चश्मे की तरह है जो पहाज़ के अतराफ की सर्ज़मीन पर मुसल्लत है और खुश्गवार पानी को तमाम जगहों पर पहुँचाता है और मौसमे बहार में उस ज़मीन से सब्ज़ घास खुश रँग फुल खुश्बुदार घास और पत्तों से भरे हुए दरख्त उगते हैं जो हर देखने वाले को तअज्जुब में डाल देते हैं.
इंसान जब पाको पाकीज़ा सही दिल सोज़ और आगाह दोस्त के पास बैठता है और उससे अच्छी कद्रों को लेने के लिए अपनी लियाक़त व सलाहियत को ज़ाहिर करता है और अपने इरादे से उन अक़दार को इन्तेखाब कर लेता है तो वह तमाम अक़दार इस तरह से इंसान के पास आ जाती हैं जिस तरह बादल ज़मीन पर अपने पुरे वुजूद के साथ बरसते हैं और इनसानों के वुजूद के दरख्त को इस सही सामाजिक की बरकत से माला माल कर देता है।
अपने आप को सालेह और नेक दोस्त से महरुम रखने का मानवी नुक़सान ऐसा है जैसे इंसान अपने आप के तरो ताज़ा हवा सुरज के नूर और सही गज़ा से महरुम कर ले।
शहरे मक्का में अबू लहब लगभग पचास साल तक पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम का हम अस्र रहा लेकिन एक लम्हे के लिए भी वह अपने मानवी कमालात से फायदा उठाने और आपके साथ रेफाक़त व मुआशेरत करने के लिए तैयार नहीं हुआ बल्की उसने अपनी आख़िरी साँसों तक अपने आपको पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम की मुआशेरत से महरुम रखा और अपनी पेशानी पर हमेशा का दाग़ और हमेशा की ज़िल्लत लेकर इस दुनिया से चल बसा , कुरआने करीम ने उसको एक क़ाबिले नफ़रत शख्स के उन्वान से ब्यान किया हैः तब्बत यदा अबी लहब।
अबू लहब की ताकत व कुदरत खत्म हो जाऐ और वह नाबूद हो जाए।
जी हाँ कामयाब दोस्त और लायक़ साथी से महरुम होना। इंसान के वुजूद से इन्सानियत के लिबास को उतारना और हैवानीयत के लेबास को अपने बातिन पर पहना है और वह इंसान को (कलअनाम) (कमस लुल कल्ब). और (कमसलुल हिमार) का मिस्दाक बना देता है।
इंसान को अपने से ज़्यादा इल्मो दानिश मारेफ़त और अखलाक़ व तरबीयत वाले इंसान से ग़फ़लत नहीं बरतनी चाहिए। ऐसी शख्सीयत से जुडने में हरगिज़ कंजूसी और ग़फ़लत से काम नहीं लेना चाहिए।
कंजूसी और गफलत करना दुनिया व आखेरत के खराब होने का सबब है।
आज भी पाको पाकीज़ा लोगों की दावत की सदा कानों में आती है और क्यामत तक ये आवाज़ आती रहेगी कि ऐ इंसानों आओ और अपने वुजूद के पौधे को दिलो जान से हमारे साथ मुत्तसील कर दो तुम भी उस कामिल रिज़्क और मानवी रोज़ी से फायदा उठाओ। जिसको हमारे परवरदिगार ने हमें अता किया है , ताकी तुम्हारी अक्ल कामिल हो जाए और तुम्हारी अक्ल गुले बहार की तरह शगुफ्ता हो जाऐ , तुम्हारे वुजूद पर मानवीयत का नूर चमकने लगे और तुम्हारे वुजूद के उफक़ से मलकूती समरात ज़ाहिर होने लगें और इस नेज़ामे हस्ती की ज़मीन पर शजरे तइयबा की तरह जिसकी तरफ कुरआने करीम ने इशारा किया है। रुश्द करने लगो और तुम्हारी जड़ें साबित हो जायें और तुम्हारी अक्लो ख़ेरद और जान व रुह की शाखें और पत्ते उस मलकूती फिज़ा में पहुँच जाऐं जिसका फल हमेशा जारी व सारी रहता है और तुम खुद और दूसरे लोग उस हमेशा बाक़ी रहने वाले फल से हमेशा फाऐदा उठाते रहो।
वह लोग और उनके तरबीयत याफ्ता अफ़राद तुम्हें दावत देते हैं की आओ , हमारी मस्जिद की फूँक के ज़रीऐ गुनाहों से पाक हो जाओ , फिक्री और रुही बिमारियों से शिफा हासिल करो , हमारी हकीमाना हिक्मत से तुम्हारे मानवी व बातिनी दर्दों का ऐलाज हो जाऐ और हर तरह से सलामत व आफीयत के ज़ेवर से आरास्ता हो जाओ ताकी रहमते हक़ , इनायते परवरदिगार और अवलिया ए खुदा की विलायत में क़रार पाओ। क्योंकि उन हकायक़ तक पहुँचने के लिए पाको पाकीज़ा और नेक अफ़राद से दोस्ती और सामाजिकता के अलावा कोई रास्ता नहीं है। इसलिए की उनकी इताअत दर हकीक़त खुदा की इताअत है।
इस सिलसिले में इमाम जाफ़रे सादिक अलैहिस्सलाम से बहुत ही अहम रिवायत इस मज़मून के साथ नक्ल हुई है कि आपने फ़रमायाः
मैं अपने वालिद इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम के साथ रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम की क़ब्र और मिम्बर तक गया। अचानक मेरे वालिद अपने अस्हाब के एक गिरोह के पास पहुँचे उनके नज़्दीत खड़े होकर उनको सलाम किया और फरमायाः
खुदा की क़सम मैं तुम्हारा आशिक़ , तुम्हारी खुश्बू और तुम्हारी रुह हूँ , तुम मुझे उस इश्को मुहब्बत को महफूज़ रखने के लिए परहेज़गारी , हर गुनाह से दूर रहने , राहे खुदा में सई व कोशिश और मुस्बत काम अन्जाम देने के ज़रीये मदद करो , क्यों कि तुम पाक दामनी , अपने आप को गुनाहों से महफूज़ रखने और मुस्बत सई व कोशिश के बगैर हमारी वेलायत तक नहीं पहुँच सकते हो।
आदाबुन नफ्स के महान लेखक कहते हैः
बेहतरीन दोस्त , मेहरबान साथी और कामयाब मददगार की चार सिफतें हैं।
इफ्फ़ते नफ्स , तक़वा , दुनिया के साज़ो सामान में ज़ोहद , वरअ और पाक दामनी और ये चार चीज़ें ऐसे हकायक़ हैं। जो पाको पाकीज़ा इंसानों के साथ सामाजिकता में इंसानों को हासिल होते हैं।
हम्नशीने तु अज़ तु बेह बायद.
ता तू रा अक्लो दिन बेयफ्ज़ायद.
ज़रुरी है कि ऐसे अफ़राद के साथ दोस्ती और हम नशीनी करें। ताकी क्यामत के दिन उनके साये में परवरदेगारे आलम का लुत्फो करम हमारे शामिले हाल हो सकें और उनकी शिफाअत के ज़रीये बहिश्त और रिज़वाने इलाही में दाख़िल हो सकें। ऐसे दोस्तों के हाथ में अपना हाथ न दें जिनके लिए क्यामत के रोज़ ज़िल्लत हो। व अम्ताज़ुल यौम अइयोहल मुजरेमून. आवाज़ आयेगी ऐ मुजरिमों आज तुम ज़रा उन नेक अफ़राद की सफ़ से अलग तो हो जाओ।
और आख़िर हम भी उनके साथ उठने बैठने और उनकी आदात इख्तेयार करने की वजह से उनके साथ हो जायें और पाको पाकीज़ा लोगों और सालेहीन की सफ़ से जुदा हो जायें।
लुक़मान हकीम सुडान के रहने वाले स्याह फाम थे और बहुत सालों तक ग़ुलाम के तौर पर अमीर लोगों की ख़िदमत करते थे और उनके लिए ज़हमत व मशक्क़त वाले काम अंजाम देते थे। लेकिन ऐसे हालात में भी वह इलाही तालीमात और हकीमों की हिक्मत से ग़ाफिल नहीं थे।
क़ैदो बन्द की ज़िन्दगी से आज़ाद होने के बाद उलमा , उक़ला और पाको पाकीज़ा अफ़राद के साथ नशिस्त व बरख़ास्त की , यहाँ तक की उस मलकूती और मोवद्दब शख़्सियत ने अपने बेटे से फरमायाः
मैंने जिन पाको पाकीज़ा और बुलन्द मरतबा इंसानों के साथ मुआशेरत और हम नशीनी की है उनकी तादाद तक़रीबन चार हज़ार है।
उन मुआशेरत करने वालों के पाक नफ़्स उन नेक सीरत दोस्तों के इंसानी तौर तरीक़े और उन मलकूती आदात हम नशीनों की आदत व इतवार ने उनके दिल में ऐसा असर किया कि उन्होंने अपने पाको पाकीज़ा दिल के ज़रीए हिक्मते इलाही को ख़ुदा वन्दे आलम से हासिल किया।
” ولقد آتینا لقمان الحکمة “
(वलकद आतैना लुक़मान अल हिक्मत) यकीनन हम ने लुक़मान को हिक्मत अता की।
हकीम लुक़मान की हिक्मत के उसूल कुरआने करीम ने नक्ल किए हैं , उसी तरह अहले बैत अलैहिमुस्सलाम ने भी आपकी हिक्मत के बेहतरीन उसूलों को बयान किया है जैसेः
मेरे बेटेः दुनिया से वअज़ो नसीहत हासिल करो ता की लोगों के टुकड़ों के मुहताज न रहो , और दुनिया में इस क़द्र दाख़िल हो कि तुम्हारी आख़ेरत को कोई नुक़सान न पहुँचे।
मेरे बेटेः दुनिया एक अमीक़ समन्दर है बहुत से उलमा उसमें गर्क़ हो गए। इस समन्दर में तुम्हारी कश्ती तक़वा और परहेज़गारी होना चाहिए और उस कश्ती में जो तेजारत का माल रखो वह ईमान हो और उसका बादबान तवक्कुल , नाखुदा अक़्ल , कुतुब नुमा , इल्म व बसीरत और इतमीनान व तसकीन का सरमाया सब्र होना चाहिए।
मेरे बेटेः शबो रोज़ में से दस घन्टे अपने लिए मख्सूस करो ताकी उन दस घन्टों में इल्मो दानिश हासिल कर सको।
मेरे बेटे ज़ालिम व सितमगर के साथ सफ़र न करो , उसके साथ दोस्ती और मुआशेरत न करो , फासिक़ और बदकार के साथ भी दोस्ती बरक़रार न करो।
मेरे बेटेः दिन एक दरख़्त की तरह है ईमान उसका पानी है जो उसको उगाता है , नमाज़ उसकी जड़ है , ज़कात उसकी तना है खुदा के लिए दोस्ती , उसकी शाखें हैं , नेक अखलाक़ उसके पत्ते हैं , हराम से दूरी उसका फल है , जिस तरह दरख्त अच्छे फलों से कामिल होता है उसी तरह दीन भी हराम कामों से दूरी करने से कामिल होता है।
इमाम जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम ने उनके मोतअल्लिक़ फ़रमायाः
लुक़मान ऐसी शख़्सियत थी जो खुदा के लिए फ़ेअल व अमल में ताकत , हक के रास्ते में परहेज़गार ख़ामोशी में ग़र्क़ , वक़ार से आरास्ता , दक़ीक़ , तेज़बीन , नसीहत क़बूल करने वाले थे , आपको ग़ुस्सा नहीं आता था और किसी से मज़ाक भी नहीं करते थे , लोगों के इख्तेलाफ़ को दूर करते थे।
इंसान , तक़वा व इबादत , ख़िदमत और क़वी ईमान के ज़रीए ऐसे मुक़ाम पर पहुँच सकता है कि अपने आपको अवलिया ए इलाही के मअनवी हुज़ूर में हाज़िर कर सके और उनके क़ुदसिया अन्फ़ास से फायदा उठा सके।
इंसान की ज़िन्दगी में उन मलकूती चेहरों का अपने वुजूद के साथ हाज़िर होना ज़रुरी नहीं है बल्की अपने दिल में उन बुज़ुर्गों और नूरानी चेहरों की शिनाख़्त और मारेफ़त काफी है और इंसान के रुश्दो तकामुल में उनके तौर तरीक़े और तहज़ीब व सक़ाफ़त को अपना लेना ही काफी है।
मुकद्दसे अर्दबेली बहुत ही मशहूर और मारुफ़ शख़्सियत हैं। आपने पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम और अइम्मा अलैहिमुस्सलाम की मारेफ़त का रास्ता तय किया और उनके नूर की हकीक़त को अपने पाक क़ल्ब में जलवा गर किया और उनके अख़्लाक़ को हासिल करके बहुत बुलन्द दर्जे पर फायज़ हुए।
आपका एक मुत्तक़ी शागिर्द बयान करता हैः मैंने आधी रात को देखा की उस्ताद ने अपने सर पर अबा डाली और मौला ए मोवहहेदीन अमीरुल मोमिनीन अली बिन अबी तालिब अलैहिस्सलाम के रौज़े की तरफ़ रवाना हुए।
रौज़े के तमाम दरवाज़े रात को बंद होते थे लेहाज़ा मुझे तअज्जुब हुआ कि उस्ताद रात को रौज़े की तरफ़ क्यों जा रहे हैं लेहाज़ा मैं भी उस्ताद के पीछे चल दिया ताकी ये देख सकूँ कि उस्ताद किस तरह रात को रौज़े जाते हैं।
उस्ताद रौज़े के सहन के बंद दरवाज़े की तरफ़ बढ़े तो दरवाज़ा खुल गया। उसके बाद रौज़े के दरवाज़े की तरफ़ बढ़े तो वह भी खुल गया और आप रौजे में दाख़िल हो गये। उन्होंने अपने मौला से मुख़ातब होकर कहाः फलाँ फिक्ही मसले में इस तरह की मुश्केलात पाई जाती है , ऐ हल्लाले मुश्किलात मेरी मुश्किल को हल किजिए।
ज़रीह से बहुत ही मुहब्बत आमेज़ आवाज़ आईः मस्जिदे कूफा जाओ और वहाँ मेरे बेटे मेहदी (अ) से मुलाक़ात करो और अपनी फिक्ही मुश्किल को उनसे बयान करो , वह तुम्हारे लिए उसको आसान कर देंगे।
वहीद बहबहानी शियों के बहुत ही मशहूर व मारुफ़ आलीमे दीन हैं। जिन्होंने अख़बारी मकतब फैल जाने के बाद शियों की मज़बूत फ़िक़्ह की फ़रियाद सुनी और उसको उस मकतब के तूफ़ानों से नेजात दिलाई।
आप फतेह अली शाह क़ाचार की बादशाहत के ज़माने में ज़िन्दगी बसर करते थे और बादशाह आपका बहुत ज़्यादा ऐहतेराम करता था।
ईरान का बादशाह हर चीज़ और हर दस्तावेज़ से अपनी ताईद के लिए फ़ायदा उठाता था लिहाज़ा तीन बार उसने आपको ख़त लिखा की आप इराक़ से ईरान मुन्तक़िल हो जायें और हर मरतबा वहीद बहबहानी ने इंकार कर दिया।
जब बादशाह का इसरार ज़्यादा बढ़ा तो आपने अपने शागिर्दों के ज़ेरे दस्त शागिर्दों जिनमें से एक साहेबे कश्फ व करामत अल्लामा बहरुल उलूम सय्यद मेहदी तबातबाई थे , का इन्तेख़ाब किया और उनको गवाह के तौर पर अपने साथ अमीरुल मोमिनीन अलैहिस्सलाम के रौज़े की तरफ़ ले गए और उन सबके सामने हज़रत अमीरुल मोमिनीन अलैहिस्सलाम से अर्ज़ कियाः शाहे ईरान ने इसरार के साथ दरख़्वास्त की है कि मैं हौज़े को छोड़ कर ईरान चला जाऊं और वहां पर दर्सो तदरीस में मशग़ूल हो जाऊं। मैं उसके इसरार की वजह से परेशान हूँ और इंतेख़ाब नहीं कर पा रहा हूँ कि क्या करुँ , मैं आपसे दरख़्वास्त करता हूँ कि इस मसले में मेरी रहनुमाई किजीये।
उन शागिर्दों ने अपने कानों से सुना कि ज़रीहे मोतह्हर से आवाज़ आईः ला तखरुज मिन बलादेना ,
वहीद हमारे शहर से बाहर न जाओ और यहीं पर हमारे पास रहो।
इंसान जब किसी नेक दोस्त से दोस्ती या सामाजिक व्यवहार करता है तो इस्लाम के अनुसार उन दोनो पर एक दूसरे के लिये कुछ हुक़ूक बन जाते हैं। कभी उन हुकूक का अदा करना वाजिब होता है तो कभी मुस्तहब होता है , मगर यह कि उन दोस्तों में से कोई एक दोस्त अपने इख़्तेयार से दूसरे को हुक़ूक़ अदा करने से आज़ाद कर दे।
इस्लाम ने दोस्ती और सामाजिक व्यवहार के हुक़ूक़ के सिलसिले में ऐसी वास्तविकता को पेश किया है कि इंसान इस धर्म के फैले हुए क़ानूनों विशेष कर सामजिकता के अधिकार को देख कर हैरत में पड़ जाता है।
निसंदेह समस्त अधिकारों की व्याख्या और तफसील बयान करने की इस मुख्तसर किताब में गुँजाईश नहीं है , अत: मजबूरन हम उन हुक़ूक़ के कुछ भागों की तरफ इशारा करेंगें।
सामाजिकता अमीरुल मोमिनीन अली अलैहिससलाम की दृष्टि में
अमीरुल मोमनीन अली अलैहिस सलाम ने पैग़म्बरे अकरम सल्लल लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम से रिवायत की है की आपने फरमायाः
मुसलमान के ऊपर अपने दीनी भाई के तीस हक़ हैं , जिनसे वह उस वक़्त तक आज़ाद नहीं हो सकता जब तक उनको अदा न करे या वह उसे उसके अदा करने या न करने में स्वतंत्र न कर दे।
उसकी भूल और ग़ल्तियों को क्षमा कर दे , उसके रोने गिड़गिड़ाने पर उस पर दया करे , उसकी बुराईयों को छुपाये , उसके बहाने और क्षमायाचिका को स्वीकार करे , उसकी ग़ीबत (बुराई) न करे और न ही उसकी ग़ीबत (बुराई) सुने , उसकी भलाई चाहता रहे , उसकी दोस्ती की रक्षा करे , उससे किये गये वादों को पूरा करे , बीमारी में उसे देखने जाये , उसके मरने पर उसके ज़नाज़े में शिरकत करे , उसकी दअवत को स्वीकार करे , उसके तोहफ़े को स्वीकार करे , उसकी नेकियों का अच्छा बदला दे , उसकी नेअमतों का शुक्रिया अदा करे , अच्छे तरीके से उसकी मदद करे , इफ़्फ़त और पाकदामनी का ख़्याल करते हुऐ उसकी बीवी की रक्षा करे , उसकी आवश्यकताओं और ज़रुरतों को पुरा करे , उसकी इच्छा और ख़्वाहीशात को पूरा करने में उसकी मदद करे , छिँकते वक्त उसके लिये दुआ करे , उसकी खोई हुई चीज़ को तलाश करे , उसके सलाम का जवाब दे , उसकी बात को गौर से सुने , उसके दिये हुए को कबूल करे , उसकी क़स्मों की पुष्टि करे , उसके दोस्तों से दोस्ती और उसके दुश्मनों से दुश्मनी करे , चाहे वह ज़ालीम हों या मज़लूम उनकी सहायता करे।
ज़ालिम की इस तरह मदद करे कि उसको किसी पर ज़ुल्म न करने दे , और मज़लूमियत में इस तरह मदद करे कि उसका हक़ वापस मिल जाये , उसको बला व मुसीबत में गिरफ्तार न करे , जिस अच्छाई को अपने लिये पसन्द करता हो उसके लिये भी उसी अच्छाई को पसन्द करो , और जिस बुरी चीज़ को खुद पसन्द नही करता , उसके लिये भी पसन्द न करे।
उसके बाद फरमाते हैः
मैंने रसूले ख़ुदा सल्लल लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम से सुना है कि तुम में से जो कोई भी अपने दीनी भाई के हुक़ूक़ को छोड़ देगा क़यामत में उससे उसका मुतालेबा किया जायेगा और उस बुनियाद पर साहिबे हक़ के फायदे में हुक़्म दिया जायेगा और हक़ छोड़ने वाले के ख़िलाफ फैसला होगा।
इमाम सादिक़ अलैहिस सलाम फरमाते हैः
” المسلم اخو المسلم، ھو عینہ و مرآتہ، و دلیلہ، لا یخونہ و لا یخدعہ و لا یظلمہ و لا یکذبہ و لا یغتابہ “ ( ۲ ) ۔
अल्मुस्लिमो अखुल मुस्लिम होव अई नहू व मिर्आतोहू व दलीलहू लायखूनहू वलायख्दअहु वला यज्लोमोहू वला यक्ज़ेबोहू वला यक्ताबोहू।
मुसलमान , मुसलमान का भाई है वह अपने मुसलमान भाई के लिये आँख , आईना और मार्ग दर्शक है , वह उससे विश्वास घात नही करता , उसके साथ धोखा व फरेब नही करता , झूठ नहीं बोलता और उसकी ग़ीबत (बुराई) नहीं करता।
मुअल्ला बिन ख़ुनैस कहते हैः मैंने इमाम जाफरे सादिक़ अलैहिस्सलाम से पूछा: एक मुसलमान का दूसरे मुसलमान पर क्या हक़ है ?
आपने फ़रमायाः एक मुसलमान पर दूसरे मुसलमान के ज़िम्मे सात अधिकार अनिवार्य व आवश्यक हैं और अगर वह उनमें से किसी एक हक़ को भी अदा नही करेगा तो ख़ुदा की विलायत (सर परस्ती) और उसकी ईताअत (पैरवी) से बाहर हो जाऐगा और उसकी बंदगी व भक्ती का कोई फायदा नहीं होगा।
मैंने इमाम अलैहिस सलाम से पूछा वह हुक़ूक़ क्या हैं ?
आपने फ़रमायाः ऐ मुअल्ला , निसंदेह मैं तुम्हारे साथ मेहरबान हूँ और डरता हूँ की तुम उसको बर्बाद न कर दो और उसकी हिफाज़त व रक्षा न करो और ख़बर होने के बावुजूद उस पर अमल न करो।
मैंने इमाम से कहाः
لاحول ولا قوة الا باللہ “
(ला हौला वलाक़ुव्वता इल्ला बिल्लाह)
आपने फरमायाः इनमें सबसे आसान हक़ यह हैः
जो अपने लिये पसन्द करते हो वही उसके लिये भी पसन्द करो , और जो अपने लिये भी पसन्द नही करते हो वह उसके लिये भी पसन्द न करो।
उसके क्रोध और ग़ुस्से से दूर रहो और उसकी खुशी हासिल करने की कोशिश करो और उसके क़ौल की पैरवी करो।
उसकी अपने माल , ज़बान हाथ और पैर से मदद करो।
उसकी आँख , आईना और मार्ग दर्शक बन जाओ।
ऐसा न हो कि वह भूखा हो और तुम पेट भर कर खाना खा लो , वह प्यासा हो और तुम सैराब हो जाओ , और वह नंगा हो और तुम कपड़े पहन लो।
अगर तुम्हारे पास कोई सेवक है और उसके पास नहीं है तो अपने सेवक को उसके पास भेजो ता की वह उसके कपड़े धोये , खाना बनाये और उसके लिये बिस्तर बिछाये।
ख़ुदा की क़सम उससे वफादारी करो , उसकी दअवत को क़बूल करो , बीमारी में उसकी देखभाल करो , उसके जनाज़े में शिरकत करो , और अगर मालूम हो जाये की उसको किसी चीज़ की ज़रुरत है तो उसको देने में जल्दी करो , ऐसा न हो कि उसे तुम्हारे आगे हाथ फैलाना पड़ जाये , उसकी ज़रुत को पुरा करने में जल्दी करो अगर ऐसा करोगे तो उसकी दोस्ती को अपनी दोस्ती से जुड़ा हुआ पाओगे।
इमाम जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम ने एक मुफ़स्सल रेवायत में दो मुसलमानों के एक दूसरे पर हुक़ूक़ को बयान किया है , आप फरमाते है कि एक मुसलमान का दूसरे मुसलमान पर बहुत बड़ा हक़ है।
फिर फ़रमायाः
जो चीज़ अपने लिये पसन्द करते हो वही अपने मुसलमान भाई के लिये भी पसन्द करो , और अगर कभी किसी चीज़ की ज़रुरत पड़े तो उससे तलब करो और अगर वह तुमसे माँगे तो उसको अता करो , उसके किसी भी अच्छे काम से घबराओ मत हो , उसकी हिफाज़त करो ताकि वह तुम्हारी हिफाज़त करे , जब वह कहीं चला जाये तो उसके पीछे उसकी इज़्ज़त व आबरू की हिफ़ाज़त करो , और जब वह सामने मौजूद हो तो उसकी जियारत करो , उसका ऐहतेराम करो , क्योंकि वह तुमसे है और तुम उससे हो , अगर वह तुमसे गिला करे तो उससे जुदा न हो , ताकि उसको दरगुज़र कर सको , अगर उसको कोई चीज़ पहुँचे तो खुदा का शुक्र करो , अगर किसी मुश्किल में गिरफ्तार हो जाये तो उसका हाथ पकड़ो , अगर कोई उसके लिये जाल बिछाये और उसकी चुग़ल ख़ोरी करे तो उसकी मदद करो , और अगर कोई इंसान अपने दीनी भाई से कहे तुम पर वाय (लानत) हो तो उसकी मअनवी (बातिनी) दोस्ती खत्म हो जाती है।
आबान बिन तग़लिब कहते हैः इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम के साथ काबे का तवाफ कर रहा था मेरा एक दोस्त मेरी तरफ आया , उसने मुझसे आवेदन किया था कि मुझे एक चीज़ की ज़रुरत है वहाँ पर मेरे साथ चलो , उसने मुझे ईशारा किया , इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम ने उसको देखा तो फरमायाः आबान वह शख्स तुम्हें बुला रहा है , मैंने कहाः जी हाँ , फरमायाः वह तुम्हारा हम अकीदा है , मैंने कहाः जी हाँ , आपने फरमायाः उसके साथ जाओ और अपने तवाफ को तोड़ दो , मैंने कहाः अगर तवाफ वाजिब हो तब भी मैं तवाफ को छोड़ दूँ , इमाम ने फरमायाः जी हाँ।
मैं उसके साथ चला गया उसके बाद इमाम की सेवा में पहुँचा और कहाः मोमिन का मोमिन पर क्या हक़ है ? आपने फरमायाः उसको छोड़ दो , मैंने कहाः मैं आप पर फिदा हो जाऊँ , मुझे ज़रुर बताइये मैंने ज़िद की तो आपने फरमायाः आबान उसका हक़ इतना है कि अपने माल का आधा हिस्सा उसे दे दो , उसके बाद उन्होंने मेरी तरफ नज़र की और देखा की मेरा क्या हाल है , फरमायाः ऐ आबान क्या तुम नहीं जानते कि ख़ुदा ने उनको याद करते हुए कहा है कि उनको अपने ऊपर मुकद्दम रखो , मैंने कहाः जी हाँ मैं आप पर कुर्बान हो जाऊँ- आपने फरमायाः अगर तुम अपना आधा माल उसको दे दोगे तो वह तुम्हारे ऊपर मुकद्दम नहीं होगा , बल्कि तुम्हारे बराबर होगा , वह उस वक्त तुम पर मुकद्दम होगा जब तुम अपने हिस्से से भी कुछ और उसको दोगे।
इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम फरमातेः हैं कि इमाम बाक़िर अलैहिस्सलाम हमेशा फरमाते थेः
” عظموا اصحابکم و وقروھم ولا یتجھم بعضکم بعضا و لا تضاروا ولا تحاسدوا و ایاکم والبخل، کونوا عباداللہ المخلصین “( ۲ ) ۔
अज़्ज़मू अस्हाबेकुम वक्क़रुहुम वला यतहज्जमू बॉज़ोकुम बॉज़ा वला तज़ार्रु वला तोहासेदू व ईयाकुम वल कंजूसी कुनू ईबादल्लाहील मुख्लेसीन।
अपने दोस्तों का आदर करो , एक दूसरे से बहस न करो , एक दूसरे को नुक़सान न पहुचाओ , एक दूसरे से हसद न करो , कंजूसी व कन्जूसी से परहेज़ करो , और ख़ुदा के मुख़्लिस बन्दे हो जाओ।
इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम अपने असहाब से फरमाते हैः
”اتقوا اللہ و کونوا اخوة بررة متحابین فی اللہ، متواصلین، متراحمین، تزاوروا و تلاقوا و تذاکروا امرنا و احیوہ “ ( ۱ ) ۔
ईत्तकुल्लाह व कुनू ईख्वत बर्रत मोतहाब्बीन फिल्लाहे मोत वासेलीन मोतरा हेमीन तज़ावरु वतलाकू वतज़ा करु अमरना वअह यूहो।
ख़ुदा से डरो और नेक़ सुलूक करने वालों के दोस्त हो जाओ , एक दूसरे से मुहब्बत करो , एक दूसरे की ज़ियारत करो , एक दूसरे के यहाँ मुलाक़ात के लिये जाओ , अपनी मजालीस व महाफिल में हमारे क़वानीन को बयान करो और उनको क़ायम करो।
इमाम बाक़िर अलैहिस्सलाम ने पैगम्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम से रिवायत की है कि आपने फरमायाः
जिब्रईल ने मुझसे बयान किया हैः
ख़ुदावन्दे आलम ने एक फ़रिश्ते को ज़मीन पर भेजा वह ज़मीन पर आने के बाद चलने लगा उसका गुज़र एक ऐसे घर से हुआ जिसके दरवाज़े पर एक आदमी खड़ा हुआ था और वह उस घर के मालिक से अन्दर आने की इजाज़त मांग रहा था , फरिश्ते ने उससे कहाः तुम्हें इस मालिक की क्या ज़रुरत है , उसने कहाः यह मेरा दीनी भाई है , मैं ख़ुदा के लिये उसको देखने आया हूँ , फरिश्ते ने कहाः केवल इसी लिये आये हो , उसने कहाः सिर्फ इसी लिये यहाँ आया हूं , उसने कहाः मैं ख़ुदा का भेजा हुआ हूं और ख़ुदा ने तुम्हें सलाम कहा है और फरमाया हैः तुम पर जन्नत वाजिब है , उस फरिश्ते ने कहाः ख़ुदा वन्दे आलम फरमाता हैः
जो मुसलमान भी अपने किसी मुसलमान भाई की ज़ियारत करे उसने उसकी ज़ियारत नहीं की है बल्कि मेरी ज़ियारत की है और उसका सवाब मेरे ज़िम्मे स्वर्ग है।
” تبسم الرجل فی وجہ اخیہ حسنة و صرف القذی عنہ حسنة و ما عبد اللہ بشیء احب الی اللہ من ادخال السرور علی المومن “( ۱ ) ۔
तबस्सो मुर्रजुले फिवज्हे अखीहे हसनतुँ व सर्फुल कज़ा अन्हो हसनतुँ वमा इन दल्लाहे बे शैईन अहब्बो इलल्लाह मिन इदखा लीस्सोरुर अलल मोमिन।
अपने दीनी भाई की तरफ मुसकुराहट के साथ देखना नेकी है , और उसके पास से काँटें और मिट्टी वगैरह भी दूर करना नेकी है , और ख़ुदा वन्दे आलम के नज़दीक किसी मोमिन के दिल को खुश करने से ज़्यादा कोई और बंदगी नहीं है।
इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम फरमाते हैं कि
” لقضاء حاجة امری ء من احب الی اللہ من عشرین حجة کل حجة ینفق فیھا صاحبھا ماة الف “ ( ۱ ) ۔
लेकज़ाऐ हाजते इम्रे ईम मन अहब्ब इलल्लाहे मिन ईशरीन हज्ज तीन कुल्लो हज्ज तीन यन्फेको फिहा साहेबोहा मेअत अल्फीन।
किसी मोमिन शख्स की ज़रुरत को पूरा करना ख़ुदा की बारगाह में ऐसे बीस हज से ज़्यादा पसंदीदा है जिसमें हाजी एक लाख दिरहम अल्लाह की राह में ख़र्च करे।
” ما قضی مسلم لمسلم حاجة الا ناداہ اللہ تبارک و تعالی : علی ثوابک ولا ارضی لک بدون الجنة “ ( ۲ ) ۔
मा कज़ा मुस्लि मुन लेमुस्ले मिन हाजतन इल्ला नादा हुल्लाहो तबारक व तआलाः अला स्वा बेक वला अर्ज़ी लक बेदूनील जन्नते।
कोई मुसलमान किसी मुसलमान की ज़रुरत पूरी नहीं करता मगर ख़ुदावन्दे आलम उसको आवाज़ देता है कि तुम्हारी जज़ा (पुन्य) मेरे ज़िम्मे है और मैं तुम्हारे लिये बहिश्त (स्वर्ग) से कम किसी चीज़ को पसन्द नहीं करता।
दो मुसलमान और दो इंसान जब एक दूसरे से दोस्ती का संबंध बनाते हैं तो उनके लिये आवश्यक है कि एक दूसरे के लिये धोखा , फ़रेब , चुगलखोरी , ग़ीबत , इल्ज़ाम , सुऐज़न , मुनाफ़ेक़त , बदला व इन्तेकाम , ग़लत संगत , और दुश्मनी व नफ़रत जैसे कामों से परहेज़ करें।
रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम ने फरमायाः
” من غش مسلما فی شراء او بیع فلیس منا و یحشر یوم القیامة مع الیھود لانھم اغش الخلق للمسلمین “( ۱ ) ۔
मन ग़श्शा मुसलेमन फी शराइन अव बैईं फ़लैस मिन्ना वयह शोरोहुम योमिल क़्यामते मअल यहूदे ले अन्नहुम अगश्शल खल्क लिल मुस्लेमिन।
जो भी किसी मुसलमान से ख़रीदने बेचने में धोखा व फ़रेब से काम ले , वह हम में से नहीं है और रोज़े क़यामत यहूदियों के साथ शुमार होगा क्योंकि यहूदी मुसलमानों के साथ धोखा व फरेब से काम लेते हैं।
फिर फरमायाः
” من بات و فی قلبہ غش لاخیہ المسلم بات فی سخط اللہ و اصبح کذلک حتی یتوب “ ( ۲ ) ۔
मन बात व फी कल्बेही ला अखीहे अलमुस्लिम बात फि सख्तल्लाहे व अस्बह कज़ा लेक हत्ता ,यतूबो।
जो भी इस हालत में रात गुज़ारे कि उसके दिल में अपने मुसलमान भाई से कोई धोखा व फ़रेब हो तो उसने ख़ुदा के नाराज़गी में रात बसर की और ऐसा ही है अगर वह ऐसी हालत में सुबह करे और तौबा करने की तौफीक़ न हो।
इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम ने मंसूरे दवानिक़ी से फ़रमायाः
” لاتقبل فی ذی رحمک و اھل الرعایة من اھل بیتک قول من حرم اللہ علیہ الجنة و جعل ماواہ النار، فان النمام شاھد زور و شریک ابلیس فی الاغراء بین الناس “( ۱ ) ۔
ला तक्बल फी ज़ी रहेमेक व अहलीर रेआयते मिन अहले बैतेके मिन हर्रमल्लाहो अलैहील जन्नते व जअल मावा हुन्नार फइन्न नम्माम शाहेदन जोर व शरीको इब्लीसीन फिल इगराऐ बे इनन्नासे।
अपने रिश्तेदार और उन लोगों के मुतअल्लिक जो तुम्हारी सरपरस्ती में हैं , ऐसे लोगों की बातों को क़बूल न करो , जिन पर ख़ुदा ने जन्नत को हराम कर दिया है , और उनका ठेकाना जहन्नम है , क्योंकि चुग़लख़ोर लोगों के दरमियान इख़्तेलाफ़ डालने में झूठा गवाह है और शैतान का शरीक है।
एक हदीस में रसुले ख़ुदा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम ने फरमायाः
” ان شر الناس یوم القیامة المثلث قیل وما المثلث یا رسول اللہ؟ قال : الرجل یسعی باخیہ امامہ فیقلتہ فیھلک نفسہ و اخاہ و امامہ “( ۲ ) ۔
इन्न शर्रन्नासे यौमल क़्यामते अल्मो सल्लसो किल वमा मोसल्लसे या रसूलल्लाहे , कालः रजलो यसआ बेअखीहे इमामहू फयहलको नफ्सहू वअखाहो व इमामहू।
बेशक़ क़यामत के रोज़ बदतरीन लोग तीन हैं , सबने पूछा या रसूल्ल्लाह वह तीन कौन लोग हैं ? फ़रमायाः वह लोग जो अपने दीनी भाई की बादशाह के सामने चुग़लख़ोरी और जासूसी करें , और बादशाह उसको कत्ल कर दे , उसने तीन आदमियों को कत्ल किया है , अपने आप को अपने दीनी भाई को और बादशाह को।
रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम फरमाते हेः
” واللہ الذی لا الہ الا ھو ما اعطی مومن قط خیر الدنیا والآخرة الا بحسن ظنہ باللہ عز وجل والکف عن اغتیاب المومنین ، واللہ الذی لا الہ الا ھو لا یعذب اللہ عز وجل مومنا بعذاب بعد التوبة والاستغفار لہ الا بسوء ظنہ باللہ عز وجل و اغتیابہ للمومن “( ۱ ) ۔
वल्लाहे अल्लज़ी लाइलाह ईल्ला होव मा आता मोमेनुन कत्तो खैरद्दुनिया वल आखेरते इल्ला बेहुस्ने जन्नेही बिल्लाहे अज़्ज़वजल वअल्कफ्फ अन इग्तेयाबे अल मोमेनीन , वल्लाहील लज़ी ला इलाह इलल्लाह इल्ला होव सा योअज़्ज़े बुल्लाहो अज्ज़वजल मोमेनन बेअज़ाबे बॉद अल्तौबते वला इस्तगफारे लहू इल्ला बेसुऐ ज़न्नेही बिल्लाहे अज़्ज़वजल व इग्तेयाबेही लिल मोमिन।
उस ख़ुदा की कसम जिसके अलावा कोई माबूद नहीं है यकिनन किसी मोमिन को दुनिया व आखेरत की ख़ैर अता नहीं की गई मगर ख़ुदा वन्दे आलम के मुतअल्लिक अच्छा गुमान करने और मोमनीन की ग़ीबत न करने की वजह से , उस ख़ुदा की कसम जिसके अलावा कोई माबूद नहीं है , ख़ुदा वन्दे आलम किसी मोमिन को तौबा और इस्तिग़फ़ार करने के बाद अज़ाब से दोचार नहीं करता मगर ख़ुदावन्दे आलम के मोतअल्लिक बदगुमानी और मोमनीन की ग़ीबत करने की वजह से उस पर अज़ाब करता है।
फिर आँ हज़रत सल्ललाहो अलैहे व आलेही वसल्लम ने अपने इस जुमले में इरशाद फरमायाः
” ایاکم والظن فان الظن اکذب الکذب و کونوا اخوانا فی اللہ کما امرکم اللہ ولا تتنافروا و لا تجسسوا ولا تتفاحشوا ولا یغتب بعضکم بعضا و لا تتباغوا ولا تتباغضوا ولا تتدابروا ولا تتحاسدوا فان الحسد یاکل الایمان کما تاکل النار الحطب الیابس “( ۲ ) ۔
ईया कुम वल ज़न्न फइन्न जन्नह अक्ज़बुल किज़्ब वकूनू इखवानन फिल्लाहे कमा अम्र कुमुल्लाहो वला त्तना फेरु वला तज्जेसू वला त्तफाहेशू वला यग्तेबो बॉजोकुम बॉज़न वला त्तबाऊ वला त्ताबाऐज़ू वला त्तदाबेरू वला त्तहासेदू फइन्नल हसद या कुल्लुल ईमान कमा ताकुलो अन्नारो अल्हत्ब अल्याबेस।
एक दूसरे के हक़ में बुरे गुमान से परहेज़ करो क्योंकि झूठ बोलने में सबसे बड़ा झूठ बदगुमानी है , जैसा कि हुक्म दिया गया है की ख़ुदा की राह में एक दूसरे के भाई रहो , एक दूसरे से नफरत न करो , एक दूसरे के छुपे हुए राज़ को तलाश न करो , एक दूसरे के साथ बदज़बानी न करो , एक दूसरे की ग़ीबत न करो , एक दूसरे पर ज़ुल्म न करो , एक दूसरे के साथ दुश्मनी न करो , एक दूसरे से जुदा न हो , एक दूसरे से हसद न करो , क्योंकि हसद ईमान को इस तरह खा जाता है जिस तरह आग सुखी लकड़ी को जला देती है।
आरोप लगाने का शुमार बहुत बड़े गुनाहों में होता है , जिसका इंसान मुरतकिब होता है , इंसान किसी पाक दामन और शरीफ़ पर नापाकी और बुराई का इल्ज़ाम लगाता है , यह किस क़दर संगीन , कितना ग़लत और शैतानी अमल है , इस सिलसिले में क़ुरआने करीम और रिवायात ने बहुत से मतालिब पेश किये गये हैं , उन पर यक़ीन करने वाले बहुत ज़्यादा खौफ ज़दा होते है।
रसुले ख़ुदा सल्ललाहो अलैहे व आलेही वसल्लम से रिवायत हुई है:
” من بھت مومنا او مومنة اوقال فیہ ما لیس فیہ اقامہ اللہ تعالی یوم القیامة علی تل من نار حتی یخرج مما قالہ فیہ “( ۱ ) ۔
मन बहत मोमेन्न अव मोमेनतन अव काल फिहे मा लैस फिहे अकाम हुल्लाहो तआला यौम अल्क़यामते अला तल्ले मिन्नारीन हत्ता यखरोजो मिम्मा कालहू फिहे।
जो भी किसी मोमिन या मोमिना पर इल्ज़ाम या आरोप लगाता है , या उसके सिलसिले में कोई ऐसी बात कहे जो उसमें न पाई जाती हो तो ख़ुदावन्दे आलम क़यामत के दिन उसको आग के एक टीले पर रोकेगा ताकि उसने जो चीज़ दूसरे के मुतअल्लिक कही है उससे आज़ाद हो जाऐ।
इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम फरमाते हैः
” من باھت مومنا او مومنة بما لیس فیھما حبسہ اللہ عزوجل یوم القیامة فی طینة خبال حتی یخرج مما قال، قلت : وما طینة خبال ؟ قال : صدید یخرج من فروج المومسات یعنی الزوانی “( ۲ ) ۔
मन बाहत मोमेनन अव मोमेनतन बेमा लइस फिहेमा हब्सहु अल्लाहो अज़्ज़वजल यौम अल्क्यामते फि तईनतीन खेबालीन हत्ता यखरोजो मिम्मा काल , कुल्तोः वमा तईनतो खेबालीन , कालः ज़दीदीन यख्तजो मिन फरोजे अल्मोमेसात यअनी अज़्ज़वानी।
जो भी किसी मोमिन या मोमिना पर उस चीज़ का आरोप लगाये जो उसमे नहीं है , तो ख़ुदा वन्दे आलम क़यामत के दिन उसको खबाल के कीचड़ में कैद करेगा ताकि जो कुछ उसने कहा है उसको साबित करे , रावी कहता हैः मैंने आपसे पूछाः खोबाल का कीचड़ क्या है ? आपने फरमायाः ऐसा खून और गन्दगी है जो ज़ेनाकार औरतों की शर्मगाह से बाहर आता है।
इमाम बाक़िर अलैहिस्सलाम मुनाफ़ेक़त के सिलसिले में फरमाते हैः
” بئس العبد عبد یکون ذا وجھین و ذا لسانین یطری اخاہ شاھدا و یاکلہ غائبا ان اعطی حسدہ و ان ابتلی خذلہ “( ۱ ) ۔
बेऐस अलअब्द अब्द यकून ज़ा वजहईन वज़ा लेसानीन यतरी अखाहो शाहेदा व या कोलोहू गाऐबा अन आता हसदहू व अन अब्तेला खज़्लहू।
कितना बुरा इंसान वह है जो दो तरह की बातें (मुनाफ़ेक़त) करे , अपने दीनी भाई की उसके सामने बहुत ज़्यादा तारीफ करे और उस में मुबालेग़ा (बढ़ा चढ़ा कर बयान करना) करे और उसके पीछे उसकी ग़ीबत करने में अपने मुर्दा भाई का गोश्त खाता है , अगर उसके भाई को कुछ अता हो तो उससे हसद करता है और अगर वह किसी मुसीबत में फँस जाता है तो उसकी मदद करने से भागता है।
फिर इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम से रिवायत हुई है।
” من لقی المسلمین بوجھین و لسانین جاء یوم القیامة و لہ لسانان من نار “( ۲ ) ۔
मन लका अलमुस्लेमीन बेवजहिने व लेसानीने जॉअ योमल कियामते वलहु लेसानाने मिन नॉरीन।
जो भी मुसलमान के साथ दो ज़बानों और जो चेहरों से मुलाकात करे , क़यामत के रोज़ वह ऐसी हालत में आयेगा कि उसकी आग की दो ज़बानें होंगीं।
इस्लाम लोगों को दावत देता है कि अगर तुम्हारे किसी रिश्तेदार या अज़ीज़ या दोस्त ने तुम पर कोई ज़ुल्म किया है और तुम उससे बदला लेना चाहो तो जितना उसने तुम पर ज़ुल्म किया है उतना ही उससे चाहो और बेहतर तो यह है कि बदला लेने के बजाय उसे क्षमा कर दो।
” وَ جَزاء ُ سَیِّئَةٍ سَیِّئَةٌ مِثْلُہا فَمَنْ عَفا وَ اٴَصْلَحَ فَاٴَجْرُہُ عَلَی اللَّہِ إِنَّہُ لا یُحِبُّ الظَّالِمینَ “( ۱ ) ۔
व जज़ाअ सैय्ये अतीन सैय्यअतुन मिस्लोहा फमन गफा व अस्लह फअजरोहू अल्ल लाहे इन्नहू ला योहिब्बुज़्ज़ीलेमीन।
और हर बुराई (जैसे कत्ल , ज़ख़्म लगाने और माल बर्बाद करने) का बदला उसके जैसा होता है फिर जो मुआफ कर दे और (और आपस में) समझौता कर ले , उसका सवाब अल्लाह के ज़िम्मे है वह निसंदेह ज़ालिमों को दोस्त नहीं रखता है।
अमीरुल मोमेनीन अली अलैहिस्सलाम फरमाते है:
” ثلاثة لا ینتصفون من ثلاثة : شریف من وضیع و حلیم من سفیہ و مومن من فاجر “( ۲ ) ۔
सलासतो ला यन्तसेफून मिन सलासतीनः शरीफुन मिन वज़ीईन व हलीमुन मिन सफीहीन व मोमेनुन मिन फाजेरीन।
तीन लोगों को तीन लोगों से बदला नहीं लेना चाहिये: शरीफ़ व बुज़ुर्ग इंसान को पस्त व ज़लील इंसानों से , समझदार को बद अक्ल से , और मोमिन को बदकार से।
रसूले ख़ुदा सल्ललाहो अलैहे व आलेही वसल्लम फरमाते हैं:
” من کثر ھمہ سقم بدنہ ومن ساء خلقہ عذب نفسہ ومن لاحی الرجال سقطت مروتہ و ذھبت کرامتہ، ثم قال رسول اللہ : لم یزل جبرئیل ینھانی عن ملاحاة الرجال کما ینھانی عن شرب الخمر وعبادة الاوثان “( ۲ ) ۔
मन कसर हम्महू सकम बदनहू व मन साअ खुल्कहू अज़ब नफसहू व मन लाहिऐ अर्रेजाल सकतत मुरव्वतो व ज़हबत केरामतोहू , सुम्म काल रसूलल्लाहोः लम यज़ल जिब्रईलो यन्हानी अन मलाहाते अर्रेजालो कमा यन्हानी अन शोर्बे अल्खमरे व ईबादतो अलअवसाने।
जिसके विचार ग़ुस्सा और ग़म वाले कामों में ज़्यादा लगे रहते हैं उसका जिस्म बीमारी से ग्रस्त हो जाता है और जिसका स्वभाव बुरा हो वह खुद को दुख , रंज , परेशानी और कष्ट में डालता है और जो लोगों के साथ दुश्मनी की वजह से उलझता और झगडता है , उसकी मुरव्वत , करामत , और ऐहतेराम खत्म हो जाता है।
उसके बाद फरमायाः जिबरईल मुझे हमेशा दुश्मनों के साथ उलझने और झगडने से इस तरह मना करते थे जिस तरह शराब ख़्वारी और बुत परस्ती से मना करते थे।
ऐसी हकीकत जो अध्यात्म की बीमारियों की दवा और उसकी ऑब व तॉब और रौनक़ का कारण है जिससे दिन की सच्ची पैरवी करने वालों , हकायक़ व फज़ायल के आशिकों और इल्म व अमल व बसीरत से आरास्ता अफ़राद नें बताया है और तमाम दोस्तों पर लाज़िम है कि वह एक दूसरे को उसकी ताकीद करें।
हराम ऐसा माल है जो ज़ुल्मों सितम , ज़्यादती , नाजायज़ कारोबार , जैसे सूद , कम तौलना , चोरी , क़ब्ज़ा , रिश्वत , और धोखा व छल फ़रेब से हासिल होता है , बेशक हराम खानों से परहेज़ करना , इंसान के बातिन का इलाज है और वह आदमी के दिल को मुनव्वर कर देता है।
कुरआने करीम की आयात और रिवायात इंसान को हराम माल के नज़दीक होने से शदीद तौर पर मना करती है और हराम माल खाना , बातिन (अध्यात्म) की खराबी , हृदय के काले हो जाने और क़ब्र में अंधेरे का सबब बनता है।
पैग़म्बरे अकरम सल्ललाहो अलैहे व आलेही वसल्लम ने फरमायाः
” رب اشعث اغبر مشرد فی الاسفار مطعمہ حرام و ملبسہ حرام و غذی بالحرام یرفع یدیہ فیقول : یا رب یا رب فانی یستجاب لذلک “( ۱ ) ۔
रब्बो अशअत अगबरो मुशर्रेदो फिल अस्फारे मत्अमहू हरामुन व मिल्बेसहू हरामुन व गोज़ी बिल्हरामे यर्फओ यदैहे फयकूलः या रब्बे यारब्बे फअन्नी यस्तजाबो लेज़ालेक।
बहुत बार देखने में आता है कि हराम चीज़ें खाने और पीने वाला मुसाफिर अगर जेहालत में परेशानी के साथ अपने दोनों हाथों को ख़ुदा की बारगाह में बुलन्द करता है और या रब्बे या रब कहता है , तो भी उसकी दुआ क़बूल नहीं होती आख़िरकार उस हराम से कहाँ और किस तरह उसकी दुआ स्वीकार होगी।
फिर आँ हज़रत ने फरमायाः
” من اشتری ثوبا بعشرة دراھم و فی ثمنہ درھم حرام لم یقبل اللہ تعالی صلاتہ مادام علیہ منہ شیء “( ۲ ) ۔
मन इशतेरा सौबन बेअशरते दराहिम व फि समनेही दिर्हमुन हरामुन लम युक्बलो अल्लाहो तआला सलातहू मादाम अलैहे मिन्हो शैईन।
अगर कोई दस दिरहम का एक कपड़ा ख़रीदे और उसके दिरहमों में एक दिरहम हराम हो तो जब तक वह हराम चीज़ उसके लेबास में रहेगी ख़ुदा उसकी नमाज़ को क़बूल नहीं करेगा।
दूसरी जगह फरमाते हैः
” کل لحم نبت من حرام فالنار اولی بہ “( ۳ ) ۔
कुल्लो लहमीन नब्त मिन हरामीन फन्नार अवला बेह।
जो गोश्त हराम से परवान चढ़ा है उसके लिये जहन्नम की आग ज़्यादा बेहतर है।
आपसे एक रेवायत नक्ल हुई है:
من لم یبال من این اکتسب المال لم یبال اللہ من این ادخلہ النار ( ۴ )
मन लम योबालो मिन अईन इक्तसब अल्माल लम योबा लुल्लाहो मिन अईन अद खलो हुन्नार।
जो इंसान किसी भी रास्ते से माल कमाने में लापरवाही करता हो , ख़ुदावन्दे आलम भी उसको किसी भी जगह से नर्क में दाखिल करने की परवाह नहीं करेगा।
पैग़म्बरे अकरम सल्ललाहो अलैहे व आलेही वसल्लम फरमाते हैः
” درھم من ربا اشد من ثلاثین زنیة فی الاسلام “( ۵ ) ۔
दिर्हमो मिन रेबा अशद्दो मिन सलासीन ज़िनतीन फिल इस्लाम।
सूद का एक दिरहम , इस्लाम में तीस ज़ेना से बदतर है।
फिर आप फरमाते हैं:
” من اصاب مالا من ماثم فوصل بہ رحما او تصدق بہ او انفقہ فی سبیل اللہ جمع اللہ لہ ذلک جمیعا ثم قذفہ فی النار “( ۶ ) ۔
मन असाब मालन मिन मासमीन फौसल बेही रहमन अव तसद्दकबेही अव अन्फकोहू फि सबी लिल्लाहे जम अल्लाहो लहू ज़ेलेक जमिअन सुम्म कज़फहू फिन्नार।
जो भी हराम और गुनाह व पाप के रास्ते से कोई माल जमा करे , फिर उससे सिल ए रहम करे , या सदका दे , या ख़ुदा की राह में इन्फ़ाक़ करे तो ख़ुदावन्दे आलम उस सब को एक जगह जमा करता है फिर जहन्नम में डाल देता है।
इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम ने पैग़म्बरे अकरम सल्ललाहो अलैहे व आलेही वसल्लम से रेवायत की है कि आपने फरमायाः
” ان اخوف ما اخاف علی امتی من بعدی ، ھذہ المکاسب الحرام والشھوة الخفیة والربا “( ۷ ) ۔
इन्न अखूफ़ मा अखाफ अला उम्मती मिन बअदी , हाज़ेही अल्मकासीबो अलहरामो वश्शहवतो अल खफीअतो वर्रेबा।
अपने बाद अपनी उम्मत पर सबसे खतरनाक जिस चीज़ से ड़रता हूँ वह हराम की कमाई , छुपी हुई शहवत और सूद है।
इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम से रेवायत हैः
” اذا اکتسب الرجل مالا من غیر حلہ ثم حج فلبی نودی لا لبیک و لا سعدیک “( ۱ ) ۔
इज़ा अक्तसब अर्रीजल मालन मिन गैर हिल्लेही सुम्म हज्ज फलब्बा नोदीय ला लब्बैक वला सअदैक।
जिस समय इंसान किसी माल को ग़ैर हलाल रास्ते से कमाता है , उसके बाद उससे हज के लिये जाता है और तलबीह (लब्बैक अल्लाहुम्मा लब्बैक) कहता है तो जवाब आता हैः तुम्हारी लब्बैक क़ुबूल नहीं होगी और तुम खुशबख़्त भी नहीं होगे।
फिर फरमाते हैः
” کسب الحرام یبین فی الذریة “( ۲ ) ۔
कस्बुल हराम योबईन फि अल ज़ुर्रीयते।
हराम रोज़ी के लक्षण इंसान की नस्ल में ज़ाहिर होते हैं।
इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम से नक्ल हुआ हैः
” ان الحرام لا ینمی و ان نمی لا یبارک لہ فیہ، و ما انفقہ لم یوجر علیہ و ما خلفہ کان زادہ الی النار “( ۳ ) ۔
इन्नल हराम ला यनमी व इन्न नमी ला योबारेको लहू फिहे , नमा अन्फकहू लम योजीर अलैहे वमा खल्फहू कान ज़ादहू अलन नार।
हराम ज़्यादा नहीं होता अगर हो जाये तो उसमें बरकत नहीं होगी और हराम को अल्लाह की राह में ख़र्च करने का कोई स्वाब नहीं है और हराम कमाने वाला अपने बाद जो चीज़ छोड़ता है वह जहन्नम की आग के लिये ईंधन होता है।
हलाल के सिलसिले में बुद्धिजीवियों और ब्रहमाज्ञानियों से रिवायत नक़्ल हुई हैः
बंदा ईमान की वास्तविकता को नहीं पहचान सकता मगर यह कि उसमें चार बातें पाई जाती हों:
वाजेबात को पैगम्बरे अकरम सल्ललाहो अलैहे व आलेही वसल्लम और अहले बैत अलैहिमुस्सलाम की सुन्नत की तरह अन्जाम देता हो।
तक़वा और पाकदामनी के साथ हलाल खाना खाता करता हो।
ज़ाहिर और बातिन में जिस चीज़ से नही हुई है उससे परहेज़ करता हो।
मरते वक्त उन चीज़ों पर बाकी रहता हो।
जो भी चाहता है कि सिद्दिक़ीन (अल्लाह के सच्चे बंदों) की अलामतें उसमें पाई जायें तो वह सिर्फ हलाल चीज़ें खाये और दीन के अलावा किसी चीज़ पर अमल न करे।
जो भी चालीस दिन तक ऐसा खाना खाये जिसमें हराम का शुब्हा पाया जाता हो उसका दिल तारीक हो जाता है।
मेरे नज़दीक ऐसे एक दिरहम को छोड़ देना जिसमें हराम का शुब्हा पाया जाता हो एक लाख दिरहम सदक़ा देने से बेहतर है।
इमाम सादिक अलैहिस्सलाम कई दिन तक बनी अब्बास के हाकिम की क़ैद में रहे , एक नेक और शरीफ़ औरत ने जेलर के ज़रीये एक रोटी आपके लिये भेजी , जेलर ने उस रोटी को एक सीनी में रखा और आपके सामने पेश किया , इमाम ने उस रोटी को खाने से इंकार कर दिया और फरमायाः इस रोटी को न खाने का कारण यह था कि वह रोटी एक ज़ालिम के ज़रिये आई थी।
पैग़म्बरे अकरम सल्ललाहो अलैहे व आलेही वसल्लम से पेट के खाली रहने और भूख के संदर्भ में बहुत सी महत्वपूर्ण हदीसें नक़्ल हुई हैं।
” جاھدوا انفسکم بالجوع والعطش فان الاجر فی ذلک کاجر المجاھد فی سبیل اللہ و انہ لیس من عمل احب الی اللہ تعالی من الجوع والعطش “( ۱ ) ۔
जाहदु अन्फोसकुम बिलजुऐ वलअतश फइन्न अल अज्रे फि ज़ालेक कअज्रे अलमुजाहिदे फि सबीलिल्लाहे वइन्नहू लईस मिन अमलीन अहब्बो अलल्लाहे तआला मिनल जुऐ वल अतश।
भूख और प्यास के ज़रीये अपने नफ़्सों से जेहाद करो , क्योंकि उसका स्वाब ख़ुदा की राह में जेहाद करने का स्वाब है और ख़ुदा के नज़दीक भूख और प्यास सबसे पसंदीदा अमल है।
” لایدخل ملکوت السماوات والارض قلب من ملا بطنہ “( ۲ ) ۔
ला यदखोलो मलकूतुस्समावाते वल अर्ज़ कल्ब मिन मलअन बतनेही।
जिसका पेट खाने से भरा हुआ है उसका दिल आसमान की बुलंदियों में दाख़िल नहीं होगा।
” وقیل یا رسول اللہ ای الناس افضل؟ قال : من طعمہ و ضحکہ و رضی بما یستر بہ عورتہ “( ۳ ) ۔
वक़ील यारसूलल्लाहे अइयह अन्नासे अफ़ज़लो , कालः मन तअमोहू व ज़ेहकोहू वरज़ा बेमा यस्तरो बेही औरतोहू।
रसूले ख़ुदा सल्ललाहो अलैहे व आलेही वसल्लम से पूछा गयाः सबसे अच्छे लोग कौन हैँ ? आपने फ़रमाया: जिसकी खुराक और हँसना कम हो और बुराईयों को छिपाने वाली चीज़ें पसन्द करता हो।
” ان اللہ یباھی الملائکة بمن قل طعمہ فی الدنیا یقول : انظروا الی عبدی ابتلیتہ بالطعام والشراب فی الدنیا فترکھما لاجلی اشھدوا یا ملائکتی ما من اکلة ترکھا لاجلی الا ابدلتہ بھا درجات فی الجنة “( ۴ ) ۔
इन्नल्लाह योबाही अल्मलाइकतो बेमन कल तअमोहू फिद्दुनिया यकूलोः अन्ज़ोरु ईला अब्दी इब्तलैतहू बित्तआमे वश्शराबे फिद्दुनिया फतरकोहोमा लेअजली अशहदो वा या मलाईकती मा मिन अक्लतीन तर्कहा लेअजली इल्ला अब्दलतहू बेहा दर्जातुन फिल जन्नत।
यक़ीनन ख़ुदा वन्दे आलम फ़रिश्तों से उस शख्स पर फख़्र व मुबाहात करता है जो दुनिया में कम खाता है। और फरमाता हैः मेरे बन्दे को देखो मैंने उसको दुनिया में खाने और पीने में आज़माया , लेकिन उसने मेरी वजह से दोनों को छोड़ दिया , गवाह रहना की वह मेरी वजह से एक वक्त का खाना नही छोड़ता मगर यह कि मैं उसको स्वर्ग की श्रेणियों से बदला देता हूँ।
” لا تمیتوا القلوب بکثرة الطعام والشراب فان القلب یموت کالزرع اذا کثر علیہ الماء “( ۱ ) ۔
ला तमीतु अल्कोलूब बेकसरते अत्तआमे वश्शराबे फइन्न कल्ब यमूतो कज़्ज़रऐ ईज़ा कसोर अलैहे अल्माओ।
दिलों को ज़्यादा खाने और पीने से मुर्दा न करो , क्योंकि दिल खेती की तरह हैं जब उनमें हद से ज़्यादा पानी दिया जाता है तो वह बर्बाद हो जाती हैं।
الفکر نصف العبادة ، و قلة الطعام ھی العبادة “ ( ۲ )
अलफिक्रो निस्फुल ईबादतो , व किल्लतो अत्तआमे हिय अल ईबादतो।
विचार करना आधी आराधना है और कम खाना खुद इबादत है।
नमाज़े शब ग्यारह रकअत है और उसके पढ़ने का वक्त आधी रात से अज़ाने सुबह तक है , और यह ख़ुदावन्दे आलम की तरफ से इंसान पर वाजिब नहीं हुई है , लेकिन अगर इंसान अपने इरादे व इख्तेयार और इच्छा व रुचि से अन्जाम दे तो वह बहुत सी ऐसी फज़ीलतों को हासिल कर लेगा , जिसको ख़ुदा के अलावा कोई नहीं जानता , इस सिलसिले में कुरआने करीम फरमाता हैः
تَتَجافی جُنُوبُہُمْ عَنِ الْمَضاجِعِ یَدْعُونَ رَبَّہُمْ خَوْفاً وَ طَمَعاً وَ مِمَّا رَزَقْناہُمْ یُنْفِقُونَ ،فَلا تَعْلَمُ نَفْسٌ ما اٴُخْفِیَ لَہُمْ مِنْ قُرَّةِ اٴَعْیُنٍ جَزاء ً بِما کانُوا یَعْمَلُون ( ۳ ) ۔
ततजाफी जोनूबहुम अन मज़ाजेअ यदऔन रब्बहुम खौफन व तमअन व मिम्मा रज़क्नाहुम युन्फेकून , फला तअलम नफ्सुन मा अखफी लहुम मिन कुर्रते अयोने जज़ाऊँ बेमा कानू याअमलून।
उनके पहलू बिस्तर से अलग रहते हैं और वह अपने परवरदेगार को डर और लोभ की बुनियाद पर पुकारते रहते हैं और हमारे दिऐ हुए रिज़्क से हमारी राह में ख़र्च करते रहते हैं , अत: किसी नफ़्स को नहीं मालूम है की उसकी आंखों की ठंडक के लिये क्या क्या सामान छुपाकर रखा गया है जो उनके नेक कर्मों का पुन्य है।
” وَ الَّذینَ یَبیتُونَ لِرَبِّہِمْ سُجَّداً وَ قِیاماً “( ۱ ) ۔
वल्लज़ीना यबीतूना लेरब्बेहीम सुज्जदव व क्यामा।
यह लोग रातों को इस तरह गुज़ारते हैं कि अपने रब की बारगाह में सर बसुजूद रहते हैं और कभी हालते क़याम में रहते हैं।
पैग़म्बरे अकरम सल्ललाहो अलैहे व आलेही वसल्लम रात में ख़ुदा के लिये इबादत और तहज्जुद (नमाज़े शब) के बारे में एक रिवायत में फरमाते हैः
” رکعتان یرکعھما العبد فی جوف اللیل خیر لہ من الدنیا و ما فیھا و لولا ان اشق علی امتی لفرضتھما علیھم “( ۲ ) ۔
रकअतान बर्कअहुमाअलअब्दो फी जौफे अल्लैले खेरुन लहू मिनद्दुनिया वमा फिहा वलौला अन अशक्क अला उम्मती लफरज़तोहोमा अलैहिम।
मेरा बंदा रात के अंधेरे में जो दो रकअत नमाज़ पढ़ता है उसके लिये वह तमाम चीज़ों से बेहतर है जो दुनिया में मौजूद है , अगर मेरी उम्मत के लिये सख़्त न होता तो मैं इस नमाज़ को अनिवार्य क़रार देता।
” علیکم بقیام اللیل فانہ داب الصالحین قبلکم و ان قیام اللیل قربة الی اللہ تعالی و تکفیر للذنوب و مطردةللداء عن الجسد و منھاة عن الاثم “ ( ۳ ) ۔
अलैकुम बेक्यामे अल्लैले फइन्नहू दाबो अस्सालेहीन कब्लकुम व इन्न क्याम अल्लैले कुर्तन इलल्लाहे तआला व तकफीरुँ लिज़्ज़ोनूबे व मित्रदतुन अनिल जसदे व मिन्हातुन अनिल इस्मे।
मैं तुम सबको रात में आराधना और तहज्जुद (नमाजे शब) की सिफ़ारिश करता हूँ क्योंकि रात में इबादत करना तुमसे पहले गंभीर लोगों का तरीक़ा था , और रात में इबादत करना ख़ुदा के नज़दीक होने , गुनाहों के मुआफ होने , बदन से बीमारियों के दूर होने और गुनाहों से बचने का सबब होता है।
एक रिवायत में है कि पैग़म्बरे अकरम सल्ललाहो अलैहे व आलेही वसल्लम के ज़माने में एक शख्स रात के वक्त जब सब सो जाते थे तो वह ख़ुदा की इबादत के लिये उठता था , नमाज़ पढ़ता था और तिलावत करता था , और कहता था परवर्देगारा , मुझे नर्क की आग ने नेजात दे , उसके इस काम की पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम को खबर दी गई , आपने फरमायाः जब वह नमाज़े तहज्जुद के लिये खड़ा हो तो मुझे ख़बर करना , उसकी नमाज़ के वक्त आपको खबर दी गई तो आप उसके घर की दीवार के पिछे खड़े हुऐ और उसकी आह व फरियाद को सुना , जब सुबह हुई तो उससे फरमायाः तुमने ख़ुदावन्दे आलम से स्वर्ग की प्राथना क्यों नहीं की , अभी कुछ ही देर हुई थी कि जिबरईल नाज़िल हुए और पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम से कहाः फलाँ शख़्स को ख़बर दीजिये कि ख़ुदा वन्दे आलम ने उसको नर्क की आद से नेजात दी और उसको स्वर्ग में दाखिल कर दिया।
इमामे सादिक़ अलैहिस सलाम से रात की इबादत के बारे में रिवायत हुई है:
” ان من روح اللہ عزوجل ثلاثة : التھجد باللیل، وافطار الصائم ، ولقاء الاخوان “( ۲ ) ۔
इन्न मिन रुहल्लाहे अज़्ज वजल सला सतुनः अतोहज्जोदो बिल्लईले , व इफ़तारो अस्साऐमे , व लेक़ाओ अल इख़्वान।
ख़ुदा की रहमतों में से तीन चीज़ें हैः रात की इबादत , रोज़ेदार को इफ़्तार कराना और अपने दीनी भाई से मुलाकात करना।
एक शख़्स इमाम सादिक अलैहिस सलाम के पास आया और एक आवश्यकता के सिलसिले में आपसे शिकायत की और अपनी शिकायत पर ज़िद करने लगा , यहाँ तक कि वह अपनी भूख के बारे में भी शिकायत करने वाला था , इमामे सादिक अलैहिस सलाम ने उससे फरमायाः नमाज़े शब पढ़ते हो , उसने कहाः जी हाँ , आपने अपने अस्हाब की तरफ़ रुख किया और फरमायाः झूठ कहता है , जो भी गुमान करे कि वह नमाज़े शब पढ़ता है और दिन में भूखा रहता है , ख़ुदा वन्दे आलम रात की नमाज़ की वजह से उसकी दीन की रोज़ी का ज़ामिन होता है।
5. सहर के समय अल्लाह के दरबार में रोना व गिड़गिड़ाना।
जो चीज़ ख़ुदा को सबसे ज्यादा महबूब है वह सहर के वक़्त रोना गिड़गिड़ाना है , यहाँ तक कि ख़ुदा वन्दे आलम ने आदेश दिया है।
” ادْعُوا رَبَّکُمْ تَضَرُّعاً وَ خُفْیَةً إِنَّہُ لا یُحِبُّ الْمُعْتَدین “( ۲ ) ۔
उदऊ रब्बोकुम तज़र्रोअँ व खुफयतन इन्नहू ला योहिब्बुल मोअतदीन।
तुम अपने रब को गिड़गिड़ा कर और ख़ामोशी के साथ पुकारो कि वह ज़्यादती करने वालों को दोस्त नहीं रखता है।
पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम फरमाते हैः
” اذا احب اللہ تعالی عبدا ابتلاہ حتی یسمع تضرعہ “( ۳ ) ۔
ईज़ा अहब्बल्लाहो तआला अब्दन ईब्तेलाहो हत्ता यसमओ तज़र्रोओहू।
जब भी ख़ुदा वन्दे आलम अपने किसी बंदे को दोस्त रखता है तो उसको ऐसी चीज़ में मुब्तला करता है कि उसके रोने और गिड़गिड़ाने की आवाज़ को सुन सके।
सहीफऐ सज्जादिया की अड़तालिसवीं दुआ में बयान हुआ हैः
” ولا ینجینی منک الا التضرع الیک “ ۔
वला यनजैनी मिन्क इल्ला अल तज़र्रओ इलैक।
तेरे दरबार में रोना व गिड़गिड़ाना मुझे अज़ाब और इन्तेकाम से नेजात देता है।
हज़रत मूसा अलैहिस सलाम पर वही (अल्लाह का संदेश) हुईः
” یا موسی کن اذا دعوتنی خائفا مشفقا وجلا عفر وجھک لی فی التراب واسجد لی بمکارم بدنک و اقنت بین یدی فی القیام و ناجنی حین تناجینی بخشیة من قلب وجل “( ۱ ) ۔
या मूसा कुन ईज़ा दअवतनी खाऐफ़न मुशफेक़न वजलन अफर वजहक ली फत्तोराबे वअस्जुद ली बेमुकारेमे बदनेक वअक्नुत बैन यदयुँ फि अल्क़्यामे व नाजनी हईन तना जिनी बेखशयतीन मिन कल्बीन वजलीन।
ऐ मूसा , जब भी मुझको पुकारो तो दर्द से डरते हुए पुकारो , अपने चेहरे को ख़ाक में मलो और अपने बेहतरीन अअज़ा से सजदा करो , मेरी बारगाह में उपासना व आराधना के लिये खड़े हो और विनय और डर का साथ मुझ से मुनाजात करो।
हज़रत ईसा अलैहिस सलाम पर वही (अल्लाह का संदेश) हुईः
یا عیسی ادعنی دعاء الغریق الحزین الذی لیس لہ مغیث یا عیسی اطب لی قلبک و اکثر ذکری فی الخلوات واعلم ان سروری ان تبصبص الی وکن فی ذلک حیا ولا تکن میتا واسمعنی منک صوتا حزینا ( ۲ ) ۔
या ईसा अदइनी दुआअल गरीक अलहज़ीने अल्लज़ी लईस लहू मोगीसो या ईसा अतीब ली कल्बक व अक्सीर ज़िक्री फि खल्वाते वआलम इन्न सरुरी इन तबस्बसो इला वकनी फी ज़ालेक हइयन वला तकुन मइतन वअसमअनी मिन्क सौतन हज़ीनन।
ऐ ईसा , मुझे इस तरह पुकारो जिस तरह दरिया में ग़र्क होने वाला पुकारता है और उसकी कोई फ़रियाद नहीं सुनता , ऐ ईसा अपने दिल को मेरे लिये ज़लील व रुसवा करो , और तन्हाई में मुझे बहुत ज़्यादा याद करो , और जान लो कि मेरी खुशी इसमें है कि भक्त की सूरत में मेरे पास आओ और उन कामों में हर्ष और आनंद के साथ करो , मुर्दा और बे ध्यानी से नहीं , मेरी बारगाह में अपने रोने व गिड़गिड़ाने की आवाज़ के साथ आओ।
इमाम सादिक़ अलैहिस सलाम से रिवायत हुई है किः
”ان اللہ عزوجل کرہ الحاح الناس بعضھم علی بعض فی المسالة و احب ذلک لنفسہ ان اللہ عزوجل یحب ان یسال و یطلب ما عندہ “( ۱ ) ۔
इन्नल्लाह अज़्ज़वजल करह इल्हाहो अल्नासे बॉज़ो हुम अला बॉज़ीन फि मसअलतीन व अहब्बो ज़ालेक लेनफ्सेही इन्नल्लाह अज़्ज़वजल योहिब्बो अन योसाल व युत्लबो मा इन्दहू।
ख़ुदावन्दे आलम लोगों के एक दूसरे से मांगने और अनुरोध करने को पसंद नही करता , लेकिन अपनी बारगाह में ज़िद करने को पसंद करता है , निसंदहे ख़ुदावन्दे आलम चाहता है कि उसके बंदे उससे अपनी मांगों को तलब करें और जो उसके पास है उसको तलब करें।
दवा ए दर्द मा रा यार दानद
बली अहवाले दिल दिलदार दानद
ज़े चशमेश पुर्स अहवाले दिल आरी
ग़मे बीमार रा बीमार दानद
व गर अज़ चशमे ऊ ख्वाबी ज़े दिल पुर्स
कि हाले मस्त रा बिस्यार दानद
दवा ए दर्द आशीक दर्द बाशद
कि मर्दे इश्क दरमाने आर दानद
तबीबे आशेकान हम ईश्क बाशद
के रन्जे ख़स्तगान ग़म ख़्वार दानद
नवाए राज़ मा बुलबुल शेनासद
के हाले ज़ार रा हम , ज़ार दानद
न हर दिल ईश्क रा दर ख़ुर्द बाशद
न हर कस शीव ए इन कार दानद
ज़े खुद बेगुज़शतेई चून फैज़ बायद
के जुज़ जाबाज़ी इन्जा आर दानद।
दिल के बीमारों के लिये बेहतरीन दवा , सभ्य और लायक़ इंसानों की संगत में बैठना है , यह लोग अपनी उन्नती व प्रगति के लिये कुरआने करीम की तिलावत से इश्क़ व मोहब्बत रखते हैं , यह हर हराम से परहेज़ करते हैं , पेट भर कर खाना न खाना इनका आदत है , यह लोग अपनी रातें , इबादत , उपासना , तहज्जुद (नमाज़े शब) और इताअत में बसर करते हैं , और सहर के वक्त रोने व गिड़गिड़ाने से लज़्ज़त उठाते हैं।
जी हाँ यह क़ल्ब के लिये कीमिया हैं और बीमार दिलों के लिये दवा और इलाज हैं।
यह वह लोग हैं जिनके साथ दोस्ती और मुआशेरत करने से बरकतें , नेमतें , हेदायत और करामत हासिल होती है।
आपने इस संसार में इस बात की ओर ध्यान दिया होगा कि ख़ुदावन्दे आलम ने इंसान के बदन और दुनिया की तमाम नेमतों में एक समानता और संतुलन पैदा किया है , जिस वक्त नेमतें बदन में जाती हैं और बदन के साथ फ़िट होती हैं तो वह इंसान के बदन की सलामती , स्वास्थ और फ़ायदे का सबब बनती हैं , और अगर जंगल का सख़्त काँटा , या ज़हर आलूद घास , ज़हीरीला खान वगैरह इंसान के बदन से संतुलित होती है तो वह बीमार हो जाता है , उसकी सलामती खतरे में पड़ जाती है , उसके बदन की व्यवस्था में मुश्किल पैदा हो जाती है , बदन का खून संक्रमित हो जाता है , और हज़ारों दर्द व मुसीबतें शुरु हो जाती हैं।
लायक़ संगी भी मॉद्दी नेमतों की तरह बदन से संतुलन रखता है , जब वह इंसान के बदन के नज़दीक होता है तो उसकी बुद्धि और विचार प्रगति करते है , इंसान की मानवियत (अध्यात्म) कमाल की तरफ बढ़ती है , इंसान का ईमान दृढ़ होता है , उसका अख़लाक व व्यवहार शालीन हो जाता है , आखिरकार इंसान अच्छे लोगों की संगत की ख़ूबी और बरकत से नेक और सालेह हो जाता है , और ऐसे बंदे में बदल जाता जाता है जिससे ख़ुदा खुश और राज़ी होता है।
ईरान की इस्लामी क्रातिं की सफ़लता से पहले (1356-1357 , हिजरी शम्सी) जिस समय गली कूचों में जनता तानाशाह के विरुद्ध प्रदर्शन कर रही थी , हमारे मुहल्ले का एक चौकीदार , लोगों से नाराज़ होता था और उसके पास जो भी हथियार होता था वह उससे क्रांति कारियों पर हमला करता था , इस्लामी क्रांति के शीर्ष और वरिष्ठ नेता और उन के साथियों को बुरा भला कहता था।
इस्लामी क्रांति की सफ़लता के बाद उसको भी गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया , एक मुद्दत तक जेल में रहने के बाद उसको इस्लामी कानून के तहत क्षमा कर दिया फिर उसको उसके पुराने काम पर वापस लगा दिया गया।
इस्लामी क्रांति की सफ़लता के बाद उसने अच्छे और लायक़ जवानों की संगर इख़्तेयार की जिसके नतीजे में उनकी संगत प्रभावित साबित हुई , उसने अपने गुज़श्ता गुनाहों से तौबा की और इस्लाम से नज़दीक हो गया , जब ईरान और ईराक की जंग शुरु हुई तो वह सबसे पहले जंग पर गया और ख़ुदा की राह में जंग करता हुआ शहीद हो गया।
योग्य और लायक़ दोस्त , सिर्फ दुनिया ही में बरकत और रहमत का सबब नहीं बनते बल्कि आख़ेरत में भी इंसान को स्वर्ग की तरफ ले जाते हैं।
इब्ने अब्बास जो कि कुरआने करीम की तफ़सीर (व्याख्या) में अमीरुल मोमिनीन अली अलैहिस सलाम के बेहतरीन छात्र हैं।
یوم ندعوا کل اناس بامامھم “ ( ۱ )
यौम नदअऊ कुल्लो अनासीन बे इमामेहिम।
(उस दिन को याद करो) जब हम हर गिरोह को उसके इमाम और मार्गदर्शक के साथ बुलायेंगे।
की तफ़सीर में फरमाते हैः जब क़यामत आयेगी तो ख़ुदावन्दे आलम हिदायत के इमाम और तक़वा व परहेज़गारी की अलामत अमीरुल मोमनीन , इमाम हसन और इमाम हुसैन अलैहिमुस्सलाम को बुलायेगा , फिर उनसे कहेगाः आप लोग ख़ुद और आपकी बातों का अनुसरण करने वाले सेरात से गुज़र जायें और बिना हिसाब किताब के स्वर्ग में प्रवेश कर जायें , उसके बाद फ़िस्क़ व फुजूर व बुराईयों के मार्गदर्शकों (ख़ुदा की कसम इन्हीं में से एक यज़ीद है) को बुलायेगा और कहेगाः अपनी पैरवी करने वालों का हाथ पकड़ो और बग़ैर हिसाब को नर्क की आग की ओर में चले जाओ।
इस्लाम के फ़ायदेमंद क़ानूनों में से एक कानून ख़ुदा के दुश्मनों के साथ जेहाद करना है जो धर्म की रक्षा , देश और देश वासियों की सुरक्षा और बच्चों , औरतों , और मर्दों की हिफाज़त के लिये वाजिब (अनिवार्य) होता है।
ख़ुदा वन्दे आलम ने दुश्मनों के साथ जेहाद करने वालों को , जेहाद में सुस्ती करने वालों के मुकाबले में बहुत ज़्यादा पुन्य देने के साथ उन पर प्रधानता प्रदान की है।
فضل اللہ المجاھدین علی القاعدین اجرا عظیما “( ۱ ) ۔
फज़लुल्लाहो अल मुजाहेदीन अला अलकाऐदीन अजरन अज़ीमा।
और मुजाहेदीन को (बिना किसी कारण के जंग पर न जाने वाले लोग) बैठे रहने वालों के मुकाबले में अज्रे अज़ीम (महान पुन्य) अता किया है।
अमीरुल मोमिनीन अली अलैहिस सलाम ने अपनी उम्र के आखिरी लम्हों में जेहाद के महत्व और दुनिया व आखेरत में जेहाद के फ़ायदों को बयान करते हुऐ अपनी औलाद और तमाम मोमिनीन को क्यामत तक के लिये वसीयत फरमाईः
” اللہ اللہ فی الجھاد باموالکم و انفسکم و السنتکم “( ۲ ) ۔
अल्लाह अल्लाह फिलजेहादे बेअमवालेकुम व अन्फोसेकुम व अलसेनतेकुम।
अपने माल , जान और ज़बानों के जेहाद में सिर्फ ख़ुदा को मद्दे नज़र रखो।
इस वाजिब हुक्म और इस्लाम के इस महान क़ानून को नज़र में रखते हुऐ मोमिनीन , पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम के मार्ग दर्शन में दुश्मन से जंग करने के लिये तबूक की तरफ़ रवाना हुए , लेकिन मुनाफ़ेक़ीन का एक गिरोह और तीन मोमिन कअब बिन मालिक , मरारत बिन रबीअ और बेलाल बिन उमइया ने पैगम्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम के साथ दुश्मन से जंग करने से इंकार किया।
उन तीनों मोमीनों की ख़िलाफ वर्ज़ी कअब बिन मालिक की ज़बान से बयान करते हैः
कअब बिन मालिक कहता है किः जिस समय पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम तबूक की तरफ़ रवाना हुए , मुझ में जेहाद करने की सारी शर्तें पाई जाती थीं। घर और जंग का सारा ख़र्च मेरे पास मौजूद था , मैंने सोचा कि तबूक जाने के लिये परसों को रवाना हो जाऊँगा और लश्करे इस्लाम से मिल जाऊँगा लेकिन मैंने सुस्ती से काम लिया और मदीने में रह गया और ख़ुद को जेहाद के अज़ीम लाभ से वंचित कर लिया।
इन्हीं दिनों में बेलाल बिन उमइया और मरारत बिन रबीअ जिन्होंने मेरी तरह पैगम्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम के साथ जंग में न जाने की ख़िलाफ वर्ज़ी की थी , से मुलाकात की , हम तीनों रोज़ाना सुबह को बाज़ार जाते थे और ख़रीदने बेचने का कोई मुआमला भी अन्जाम नहीं देते थे , और एक दूसरे से जंग पर जाने का वादा करते थे , लेकिन वादा वफा नहीं करते थे।
रोज़ाना इसी तरह वक्त गुज़रता रहा , यहाँ तक कि पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम के मदीने वापस आने की खुशख़बरी सुनी हम अपने काम से लज्जित थे।
रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम के स्वागत के लिये गये और आपको सही व सालिम वापस आने की मुबारकबाद दी और आप को सलाम किया , पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम ने हमारे सलाम का जवाब नहीं दिया और हमारी तरफ़ से रुख मोड़ लिया , हमने इस्लाम के मुजाहेदीन को सलाम किया , उन्होंने ने भी पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम की पैरवी करते हुऐ हमारे सलाम का जवाब नहीं दिया।
यह ख़बर हमारे घर में हमारी बीवियों को भी मालूम हो गई , उन्होंने भी हमसे संबंध तोड़ लिया और हमसे बात नहीं की।
मस्जिद गये तो किसी ने हमसे सलाम कलाम नहीं किया , हमारी बीवियों पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम के पास गईं और कहाः हमने सुना है कि आप हमारे शौहरों से नाराज़ हैं , क्या हम उनसे जुदा हो जायें , आपने फरमायाः जुदा न हों लेकिन उनको अपने पास न आने दो।
जब हमने इतनी बड़ी घटना अपनी ज़िन्दगी में देखी और अपने लिये अपमान की भावना देखी तो अपने आपसे कहाः मदीना हमारे रहने की जगह नहीं है , पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम , मोमिनीन और हमारे घर वाले हमसे बात नहीं करते और हमसे संबंध तोड़ लिया है , लिहाज़ा हम मदीने के नज़दीक उस पहाड़ पर चले जाते हैं और वहीं ज़िन्दगी बसर करते हैं या तो पैगम्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम हमारी ग़लती को क्षमा कर देंगे या हम वहीं पर मर जायेगे।
तीनों उस पहाड़ पर चले गये और रोज़ा रखते थे उनके घर वाले उनके लिये खाना लाते और उनके सामने रख देते लेकिन उनसे कोई कलाम न करते , इसी तरह बहुत समय गुज़र गया , वह दिन रात रोते थे और ख़ुदा से क्षमा की दुआ करते थे , लेकिन उनकी तौबा स्वीकार होने की कोई ख़बर नहीं आती थी।
कअब ने अपने उन दोनों दोस्तों से जिन्होंने उसको जंग पर जाने से मना किया था , कहाः ख़ुदा , पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम , मोमिनीन और हमारे घर वाले हमसे नाराज़ हैं और हमसे बात नहीं करते और हमारी तौबा भी कबूल नहीं होती इसकी वजह यह है कि हम एक दूसरे से इस तरह नाराज़ नहीं हुए हैं जिस तरह ख़ुदा , पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम और मोमिनीन हमसे नाराज़ हैं।
इस बुनियाद पर आधी रात को एक दूसरे से जुदा हो गये और कसम खाई कि एक दूसरे से उस वक्त तक बात नहीं करेंगे जब तक हमारी तौबा कबूल नहीं हो जाती या हमें मौत नहीं आ जाती , तीन रात दिन इसी तरह गुज़र गये , तीसरी रात जिस वक़्त पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम उम्मे सलमा के घर तशरीफ फऱमा थे , यह आयत नाज़िल हुई।
وَ عَلَی الثَّلاثَةِ الَّذینَ خُلِّفُوا حَتَّی إِذا ضاقَتْ عَلَیْہِمُ الْاٴَرْضُ بِما رَحُبَتْ وَ ضاقَتْ عَلَیْہِمْ اٴَنْفُسُہُمْ وَ ظَنُّوا اٴَنْ لا مَلْجَاٴَ مِنَ اللَّہِ إِلاَّ إِلَیْہِ ثُمَّ تابَ عَلَیْہِمْ لِیَتُوبُوا إِنَّ اللَّہَ ہُوَ التَّوَّابُ الرَّحیمُ “( ۲ ) ۔
व अला अस्सलासते अल्लज़ीन खुल्लेफू हत्ता ईज़ा ज़ाकत अलैहिम अलअर्ज़ो बेमा रहोबत व ज़ाकत अलैहिम अन्फोसहुम व ज़न्नू अन ला मल्जँ मिनल्लाहे इल्ला इलैह सुम्म तॉब अलैहिम लेयतूबू इन्न लिल्लाहे होव अत्तव्वाबुर्रहिम।
और अल्लाह ने उन तीनों पर भी रहम किया जो जेहाद से पीछे रह गये यहाँ तक कि जब ज़मीन अपने फैलाव समेत उन पर तंग हो गई और उनकी जान पर बन गई और उन्होंने यह समझ लिया कि अब अल्लाह के अलावा कोई पनाहगाह नहीं है तो अल्लाह ने उनकी तरफ तवज्जोह फरमाई कि वह तौबा कर लें इस लिये कि वह बड़ा तौबा कबूल करने वाला और मेहरबान (दयालु) है।
अबू तलहा , रसूले ख़ुदा सल्ललाहो अलैहे व आलेही वसल्लम के सहाबी हैं , उनकी एक बीवी थीं जिनका नाम उम्मे सलीम था , उन दोनों मियाँ बीवी का एक बेटा था जिसको वह दोनों बहुत चाहते थे , विशेष तौर पर अबू तलहा अपने बेटे से बहुत ज़्यादा मुहब्बत करते थे , बेटा बीमार हो गया और उसकी बीमारी इतनी ज़्यादा हो गई कि उम्मे सलीम समझ गईं कि अब उनका बेटा ज़िन्दा नहीं बचेगा।
उम्मे सलीम ने यह सोचते हुए की उनका शौहर , बेटे के मरने की वजह से बेताब न हो , उसको बहाने से पैगम्बरे अकरम सल्ललाहो अलैहे व आलेही वसल्लम के पास भेज दिया , कुछ देर के बाद उस बच्चे का इन्तेकाल हो गया।
उम्मे सलीम ने बच्चे के जनाज़े को एक कपड़े में लपेट कर एक कमरे में छुपा दिया , और सारे घर वालों से कहा कि किसी को हक नहीं है कि वह अबू तलहा को बेटे की मौत से बाख़बर करे , उसके बाद उसने खाना तैयार किया और खुद भी साफ सुथरी होकर खुशबू लगा कर तैयार हो गई , कुछ घन्टों के बाद अबू तलहा आये तो घर की हालत को बदला हुआ पाया और पूछा की बच्चा कहाँ है ?
उम्मे सलीम ने कहाः बच्चे को आराम मिल गया है , अबू तलहा को भूख लगी हुई थी उसने खाना मांगा , उम्मे सलीम ने खाना लगाया , दोनों ने खाना खाया और हम बिस्तर हुए , अबू तलहा को सुकून मिला तो उम्मे सलीम ने कहाः मैं तुमसे एक बात पूछना चाहती हूँ , उन्होंने कहाः सवाल करो , अगर मैं तुम्हें यह खबर दूँ कि हमारे पास एक अमानत थी और हमने उस अमानत को उसके मालिक के हवाले कर दिया तो तुम नाराज़ होगे , अबू तलहा ने कहाः नहीं मैं हरगिज़ नाराज़ नहीं हूँगा , लोगों की अमानत को वापस करना चाहिये , उम्मे सलीम ने कहाः सुब्हानल्लाह , ख़ुदा वन्दे आलम ने हमारे बेटे को हमें अमानत दिया था और अब उसने वह अमानत हमसे वापस ले ली है।
अबू तलहा को अपनी बीवी के इस बयान पर बहुत तअज्जुब हुआ और कहाः ख़ुदा की क़सम मुझे तुमसे ज़्यादा अपने बेटे के ग़म में साबिर होना चाहिये , वह अपनी जगह से उठे , गुस्ल किया और दो रकअत नमाज़ पढ़ी , फिर रसूले ख़ुदा सल्ललाहो अलैहे व आलेही वसल्लम की ख़िदमत में जाकर पूरा वाक़या शुरू से सुनाया , रसूले ख़ुदा सल्ललाहो अलैहे व आलेही वसल्लम ने फ़रमायाः ख़ुदावन्दे आलम आज तुम्हे बरकतों से नज़दीक करे और तुम्हे पाक व पाकीज़ा नस्ल अता करे , मैं खुदा का शुक्र अदा करता हूँ कि उसने मेरी उम्मत में भी बनी इसराईल की साबेरा की तरह किसी को क़रार दिया है।
अमीरुल मोमिनीन अली अलैहिस्सलाम एक ऐसे महान व्यक्तित्व के मालिक हैं जिनमें समस्त इंसानी विशेषताएं इकठ्ठा हो गई हैं , आप का कुतर्क , रंग भूमि पर आधारित है और जैसे आपने उसमें अपना सारा जीवन गुज़ारा है , आप की आत्मा ऐसी है जो जंग के समस्त दावों के भलि भाति जानती है , दूसरे दृष्टिकोण से भी हज़रत अली अलैहिस सलाम की ज़िन्दगी को देखते हैं तो आपको एक ऐसा आरिफ़ (अंतरयामी) पाते हैं कि मानो आप ख़ुदा से राज़ो नियाज़ के अलावा किसी और चीज़ के आशिक नही हैं।
नमूने के तौर पर नहजुल बलागा की दो पंक्तियों की तरफ़ ईशारा करेंगें ताकि इस्लाम की मन्तिक (कुतर्क) से ज़्यादा पहचान हो सके।
सिफ़्फ़ीन में हज़रत अमीरुल मोमिनीन अली अलैहिस्सलाम का मुआविया से पहला मुक़ाबिला इस तरह होता है कि मोआविया का लश्कर एक तरफ़ से आता है और हज़रत अली अलैहिस्सलाम का लश्कर दूसरी तरफ से वारिद होता है दोनों लश्कर फ़ुरात के किनारे एक दूसरे से नज़दीक होते हैं , मुआविया हुक्म देता है कि उसके लश्कर वाले आगे बढ़े और हज़रत अली अलैहिस्सलाम और आपके फ़ौजियों वहां के पहुँचने से पहले फ़ुरात पर कब्ज़ा कर लें और उन पर पानी के बंद कर दें , मुआविया की फ़ौज के सिपाही बहुत खुश होते हैं और कहते हैः हमने बेहतरीन दावे से फ़ायदा उठाया है , क्योंकि हज़रत अली अलैहिस्सलाम के लश्कर को पानी नहीं मिलेगा तो मजबूर होकर फ़रार करेंगे।
अमीरुल मोमनीन अली अलैहिस्सलाम ने फरमायाः पहले एक उनसे बात करो और बातचीत के ज़रिये इस मुश्किल को हल करो , जो गिरह हाथों से खुल सकती हो उसे दांतों से क्यों खोलते हो , जहाँ तक संभव हो ऐसा काम न करो कि मुसलमानों के दो गिरोहों में जंग और ख़ून बहे।
मुआविया को पैग़ाम दिया कि अभी हम उस जगह तक नहीं पहुँचे और तूने पानी बंद कर दिया , मुआविया ने एक सभा बुलाई और यह मसअला उनके सामने रखा और कहा कि तुम्हारा क्या मशवरा है , उनके लिये पानी को बंद रखें या आज़ाद कर दें , कुछ ने कहाः पानी को आज़ाद कर दिया जाये और कुछ ने कहा नहीं।
अमरे आस ने कहाः पानी को आज़ाद छोड़ दें क्योंकि अगर आज़ाद नहीं छोड़ेंगे तो वह ज़बरदस्ती हमसे छीन लेंगें और हमारी इज़्ज़त मिट्टी में मिल जायेगी , दूसरों ने कहाः नहीं हम पानी पर अपना कब्ज़ा रखेंगे और वह हमसे पानी नहीं छीन सकते , आख़िरकार उन्होंने घाट से अपना कब्ज़ा नहीं हटाया , और अमीरुल मोमिनीन अली अलैहिस्सलाम को जंग करने पर मजबूर कर दिया , उसके बाद आपने अपने लश्कर के सामने जंग से पहले देने वाला एक खुत्बा इरशाद फ़रमायाः जो हज़ारों तबल , हज़ारों फौजी हरबों से ज़्यादा प्रभाव डालने वाला था आपने बुलन्द आवाज़ में फरमायाः
ऐ लोगों , यह लोग आये हैं और मुआविया ने अपने गिर्द गुमराह लोगों का एक गिरोह जमा किया है , उन्होंने तुम पर पानी बंद कर दिया है , जानते हो उन्होंने क्या किया , तुम्हारे ऊपर पानी बंद कर दिया है , ऐ लोगों , तुम्हें मालूम है कि तुम्हें क्या करना है , दो रास्तों में से एक रास्ते का चुनाव करो , मेरे साथी मेरे पास आये कि प्यासे हैं और पानी नहीं है , हमें सैराब होने के लिये पानी चाहिये , तुम पहले अपनी तलवारों को उन ज़ालिमों के खून से सैराब करो तभी तुम सैराब हो सकते हो।
इमाम अलैहिस्सलाम ने मौत और ज़िन्दगी की व्याख्या में जंग के मौक़े वाला ख़ुतबा इरशाद फरमाया किः जिसने दिलों में उथल पुथल मचा दी और वह जुमला यह हैः ऐ लोगों , हयात का क्या मतलब , ज़िन्दगी का क्या मतलब , और मरने का क्या मतलब है , ज़िन्दगी यानी ज़मीन पर रास्ता चलना और खाना पीना , मौत यानी मिट्टी के नीचे दफ़्न हो जाना , नहीं , न यह ज़िन्दगी है और न वह मौत है।
” فالموت فی حیاتکم مقھورین والحیاة فی موتکم قاھرین “( ۱ ) ۔
फल्मौत फि हयातेकुम मक्हूरीन वलहयातो फि मौतेकुम काहेरीन।
ज़िन्दगी यह है कि मर जाओ और सफ़ल रहो , मौत यह है कि ज़िन्दा रहो और असफ़ल रहो।
हज़रत अली अलैहिस्सलाम की फ़ौज आपके इस खुतबे से ऐसी प्रभावित हुई कि सबने दुश्मन पर हमला किया और उसको फुरात से कई किलो मीटर पीछे ढकेल दिया , दरिया का घाट उससे छीन लिया और दरिया के तमाम घाटों को बंद कर दिया , मुआविया और उसके लश्कर के पास पानी नहीं रहा , उसने अनुरोध के साथ एक खत लिखा , हज़रत अली अलैहिस्सलाम के असहाब ने कहाः असंभव है कि हम उन पर पानी को आज़ाद करें , हमने यह काम नहीं किया है बल्कि हमने यह काम तुमसे सीखा है , लेकिन हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने अपने असहाब से फ़रमायाः हम कभी भी ऐसा काम नहीं करेंगे , यह बहुत ग़लत काम है , मैदाने जंग में दुश्मन से जंग ज़रुर करेंगे लेकिन हरगिज़ इस तरह की कामयाबी हासिल नहीं करेंगे , इस तरह की पाबंदियों से सफ़ल होना मेरी और एक बाईज़्ज़त मुसलमान की शान नहीं है।
स्वर्गिय आयतुल्लाह नजफी कौचानी ने अपनी किताब (सियाहते शर्क़ (पूर्वी दुनिया की सैर) में लिखा है किः
समस्त धार्मिक छात्रों को पहले अपने अध्यात्म की पवित्रता के लिये प्रयत्न करना चाहिये और अगर कोई अभी बचपन की उम्र है और उसका बातिन अपवित्र और मैला नहीं हुआ है तो उसको इस बात का ख़्याल रखना चाहिये कि उसका बातिन (अध्यात्म) नजिस न हो , अत: पहले मरहले में इल्म व अमल और अख़्लाक से आरास्ता होना चाहिये उसके बाद गंभीरता से इल्म की वास्तविकता को हासिल करने का प्रयत्न करना चाहिये।
मुल्ला सदरा ने इल्म को माल व मुक़ाम के लिये हासिल नहीं किया उनका मानना था कि धार्मिक छात्रों को माल व अवसर की फ़िक्र नहीं करनी चाहिये , सिर्फ इस इतना माल हासिल करे जिसकी उसको ज़रुरत है , सदरुल मोतअल्लेहीन कहते थेः जो भी इल्म को माल व मुक़ाम के लिये हासिल करे वह बहुत खतरनाक इंसान है उससे दूरी इख़्तेयार करनी चाहिये , वह अपनी कक्षा में (फ़ारसी के प्रसिद्ध कवी मोलवी) के इन शेरों को पढ़ा करते थे।
बद गोहर रा इल्मो फ़न आमूख्तन
दादने तीग़ अस्त दस्ते राहे ज़न
तीग़ दादन दर कफे ज़न्गी मस्त
बेह के आयद इल्मे नाक़िस रा बेदस्त
इल्मो मालो मन्सबो जाहो कुरआन
फितना आरद दर कफे बद गोहरान
चून क़लम दर दस्त ग़द्दारी फोताद
ला जरम मन्सूर बर्दारी फोताद।
मुल्ला सदरा ने जब मीर दामाद के पहले दर्स में शिरकत की तो दर्स खत्म होने के बाद मीर दामाद उनको अपने साथ एक जगह ले गये और कहाः ऐ मोहम्मद , मैंने आज कहा है कि जो भी हिक्मत हासिल करना चाहता है उसको पहले अमली हिकमत को तलाश करना चाहिये और अब तुमसे कहता हूँ कि पहले मरहले में हिकमते अमली दो चीज़ें हैं:
एक यह कि दीने इस्लाम के तमाम वाजेबात को अंजाम दो , और दूसरे यह कि हर उस चीज़ से बचो जिसको नफ़्स अपनी खुशी के लिये चुनता है।
बोध (हिकमत) हासिल करने वाले के लिये दूसरा तरीक़ा यह है कि वह अपने नफ़्स को इच्छाओं की पूर्ती से बचाये , जो भी नफ़्से अम्मारा (बुरी इच्छाओ) का आज्ञाकारी होकर हिकमत (बोध) हासिल करे , वह एक दिन बे घर्म हो जाऐगा और सेराते मुस्तकीम (सीधे रास्ते) से उसका ईमान मुन्हरिफ़ (भ्रष्ट) हो जायेगा।
मोहम्मद ज़करीया ए राज़ी (प्रसिद्ध मुसलमान हकीम) इस्लामी चिकित्सा शास्त्र के छात्रों की विशेषता का उल्लेख करते हुए कहते हैः
अनिवार्य (वाजिब) है की चिकित्सा शास्त्र का छात्र इस शास्त्र को माल जमा करने के लिये हासिल न करे बल्कि उसको ध्यान रखना चाहिये कि ख़ुदा के नज़दीक सबसे करीबी बन्दे वही हैं जो विद्धान और न्याय प्रिय होने के साथ लोगों पर बहुत ज़्यादा मेहरबान (दयालु) हैं।
मुल्ला सदरा की कक्षा में शिरकत करने के लिये ईरान के तमाम शहरों से छात्र शीराज़ शहर जाते थे , मुल्ला सदरा अपने शागिर्दों को चार शर्तों पर अमल करने की प्रतिज्ञा के साथ स्वीकार करते थे जिनका वर्णन नीचे किया जा रहा हैं:
1- पैसा कमाने के लिये इस शास्त्र को हासिल न करें , केवल उतना माल हासिल करें जितने की उसको ज़रुरत हो।
2- पद और अवसर हासिल करने के लिये इस शास्त्र को हासिल न करें।
3- पाप और गुनाह न करें।
4- तक़लीद न करे (यानी बिना विचार किये आँख बंद करके हर एक की बेजा बात न मानें)।
अगर शागिर्द इन चार शर्तों को तसलीम करके उन पर अमल करता था तो मुल्ला सदरा उसको कबूल करते थे कि वह उनके मदरसे में इल्म हासिल करे और शागिर्दों के पास बैठे वर्ना उससे कहते थे कि इस मदरसे से चला जाये और किसी दूसरी जगह इल्म हासिल करे।
मुल्ला सदरा कहते थेः असंभव है कि कोई माल की तलाश में हो और इल्म हासिल करले क्यों कि माल हासिल करना और ज्ञान हासिल करना दो विभिन्न और विपरित चीज़ें हैं जो एक दूसरे के नज़दीक नहीं हो सकतीं।
जो भी तूल (लम्बाई) में बढ़ेगा उसकी चौड़ाई और मोटाई कम हो जायेगी इसी अनुमान की बुनियाद पर जो भी माल को हासिल करना चाहेगा अगरचे वह दौलतमंद हो सकता है लेकिन यक़ीनी तौर पर इल्म हासिल नहीं कर सकता और जो मालदार अपने को ज्ञानी ज़ाहिर करता हैं वह दिखावे और बनावट से काम लेता हैं।
बा अमल विद्धान , संपूर्ण अध्यात्मिक , आबिद व ज़ाहिद , क़ुरआने करीम की आयात से हक़ीक़ी तरबीयत पाने वाले मिर्ज़ा जवाद आक़ा मलेकी का शुमार जमालुस सालेकीन , कत्बुल आरेफ़ीन और साहिबे नफ़्से क़ुदसिया आखुन्द मुल्ला हुसैन क़ुली हम्दानी के शागिर्दों में होता है।
आपने बहुत सालों तक आले मोहम्मद (अलैहिमुस सलाम) के शीयों के गढ़ क़ुम शहर में , अहले बैत अलैहिमुस्सलाम के शागिर्दों को पढ़ाते और प्रशिक्षण देते रहे , रजब , शाबान और रमज़ान के मुबारत महीनों हमेशा रोज़े रखते थे , रातों में तहज्जुद (नमाज़े शब) इबादत और अल्लाह के दरबार में रोया गिड़गिड़ाया करते थे , मदरस ए फ़ैज़ीया में धर्म शास्त्र के छात्रों को पाठ पढ़ाया करते थे , मदरस ए फैज़ीया के रुहानी और मलकूती केन्द्र के दरो दीवार को वह दुखद आवाज़ , आंसू भरी आँखें और रोने व गिड़गिड़ाने की आवाज़ अभी तक याद है जो अपने तमाम वुजूद से बेनज़ीर इख़्लास के साथ कहते थे:
” اللھم ارزقنی التجافی عن دار الغرور والانابة الی دار الخلود والاستعداد للموت قبل حلول الفوت “( ۱ ) ۔
अल्ला हुम्म अर्ज़ुकनी अल्त जाफी अन दारील गुरुरे वअल इनाबते इला दारील खूलूदे वल इस्ते अदादे लिल मौते कबोल होलील फौते।
आप के फजायल व करामतें बहुत ज़्यादा हैं उन सबको इस किताब में बयान करने की गुंजाईश नहीं है , आप के अख़्लाक़ , ज़ोहद , तक़वा , ईश्क और इरफ़ान के बारे में आपके शागिर्दों ने बहुत से वाक़ेयात बयान किये हैं और उनको ख़ुदा की बारगाह में गिरया व ज़ारी करने वालों की सफे अव्वल में शुमार किया है।
किताब गंजीन ए दानिशंदान के लेखक कहते हैः आयतुल्लाह हाज सय्यद जअफर शाहरुदी जो कि इन स्वर्गीय के खास शागिर्द थे , ने मेरे सामने उनका एक वाक़ेया नक्ल किया कि मैंने शाहरूद में ख्वाब में देखा कि इमामे ज़माना (अज्जलल्लाहो तआला फरजहूश शरीफ) एक जमाअत के साथ सहरा में तशरीफ़ फरमा हैं , जैसे कि नमाज़े जमाअत को लिये खड़े हैं नज़दीक गया ताकि उनके बेमिसाल चेहरे की ज़्यारत करूँ , और आपके हाथ को चूम सकूं , मैंने देखा की उनके बराबर में एक शैख खड़े हुए हैं जिनके चेहरे से जमाल और बुज़ुर्गवारी ज़ाहिर हो रही है , जब मैं बेदार हुआ तो उन शैख के बारे में सोचने लगा कि वह कौन थे जो हमारे इमामे ज़माना से इस कदर नज़दीक थे , उनको तलाश करने के लिये मशहद गया लेकिन उनको तलाश न कर सका , तेहरान आया लेकिन वह वहाँ भी नहीं मिले , फिर मैं क़ुम आया और उनको मदरस ए फैज़ीया के एक हुजरे में पढ़ाते हुए देखा , मैंने पूछा यह कौन हैं , कहाः हाज मिर्ज़ा जवाद आका ए मलेकी तबरेज़ी हैं।
मैं उनकी सेवा में गया , उन्होंने बहुत ज़्यादा मेहरबानी से फ़रमायाः कब आये हो , जैसे वह मुझे पहले से जानते और पहचानते हैं और मेरे ख़्वाब के वाकये को जानते हैं , लिहाज़ा मैंने उनकी हमराही और शागिर्दी इख़्तेयार कर ली और उनको ऐसा ही पाया जैसा ख्वाब में देखा था।
ग्यारहवीं ज़िल हिज्जा 1342 हिजरी क़मरी की रात को सहर के समय ख़्वाबो बेदारी के आलम में देखा की आसमान के दरीचे मेरे लिये खुल गये है और तमाम पर्दे ऊठा लिये गये हैं यहाँ तक की मैं आलमे मलकूत की गहराईयों को देख कर रहा हूँ , मैंने देखा की हाज मिर्ज़ा जवाद आक़ा खड़े हुए हैं और कुनूत के लिये हाथ बुलन्द करके मुनाजात और गिरया व ज़ारी में मशगूल हैं , मैंने ख़ुदा वन्दे आलम की बारगाह में उनके मुक़ाम को देखकर तअज्जुब किया , अचानक घर के दरवाज़े पर खटखटाने की आवाज़ सुनी , मैं तेज़ी से ऊठा और दरवाज़े को खोला , मैंने देखा की मेरे एक दोस्त हैं , उन्होंने कहाः आक़ा के घर चलो , मैंने कहा ख़ैर तो है , उसने कहा मैं आपको ताज़ीयत पेश करता हूँ , आक़ा का इन्तेक़ाल हो गया है।
इस भाग में ऐसे नूरानी चेहरे का ज़िक्र करेंगे जो अपने ज़माने में बहुत ही अद्धितीय व्यक्तित्व के मालिक थे और क्या बेहतर होगा कि आपके गुणों और विशेषताओं को आपके प्रशिक्षित शागिर्द यानी महान भाष्यकार , अद्धितीय अध्यात्मिक , अल्लामा तबातबाई (आलल्लाहो मुक़ामहू) की ज़बान से बयान करें , उस मलकूती और इलाही शख्स ने फरमायाः
इस सिलसिले में जो भी हमारे पास है वह स्वर्गीय काज़ी का दिया हुआ है , जो कुछ हमने उनकी ज़िन्दगी में उनसे हासिल किया , और जो तरीका हमने अपनाया है वह भी स्वर्गीय काज़ी से लिया है।
अज़ रहगुज़र खाक़ सरे कुए शुमा बूद
बर नाफ़े की दर दस्ते नसीम सहर उफ़ताद।
स्वर्गीय काज़ी अपने शागिर्दों को शरई मेअयारों के अनुसार बातनी (अध्यात्मिक) आमाल के आदाब की रिआयत , नमाज़ों में हुज़ूरे कल्ब और अफ़आल में इख़्लास की दावत देते थे और उनको गैबी देव वाणी स्वीकार करने के लिये तैयार करते थे।
मस्जिदे कूफा और मस्जिदे सहला में उनका एक कमरा था जिसमें रात का एक भाग अकेले में गुज़ारा करते थे , और अपने शागिर्दों को भी नसीहत करते थे कि रात को मस्जिदे कूफा और मस्जिदे सहला में इबादत में बसर करें।
आपने हुक्म दिया था कि अगर नमाज़ के दरमियान या कुरआने करीम की तिलावत करते वक्त या ज़िक्रो फिक्र के दौरान कोई हालत पेश आये या कोई जमाल नज़र आये या आलमे ग़ैब के कुछ दृश्य दिखाई देने लगें तो उसकी तरफ़ तवज्जो न करो और अपने अमल में मशग़ूल रहो।
अल्लामा तबातबाई फरमाते हैं कि एक रोज़ मैं मस्जिदे कूफा में बैठा हुआ ज़िक्र में मशगूल था , उस समय जन्नत की एक हूर मेरी दाहिनी तरफ़ से , हाथ में जन्नत की शराब का एक जाम लिये हुए मेरी तरफ आई और खुद को मेरे सामने पेश किया , जैसे ही मैंने उसकी तरफ़ तवज्जो करनी चाही , फौरन मुझे उस्ताद की बात याद आ गई , लिहाज़ा मैंने आँखें बंद कर लीं और कोई तवज्जो नहीं की , वह हूर खड़ी हुई और मेरे बायें तरफ़ से आई और उस जाम को मेरे सामने पेश किया , मैंनं फिर कोई तवज्जो नहीं की और अपना रुख मोड़ लिया , वह दुखी हुई और चली गई , मैं जब भी उस मंज़र को याद करता हूँ तो उस हूर के नाराज़ होने से प्रभावित होता हूँ।
स्वर्गीय काज़ी का शुमार बुज़ुर्ग मुजतहेदीन में होता था , वह फिक़ह की किताबें भी पढ़ाया करते थे।
रमज़ान के मुबारक महीने की बीस तारीख तक रात में तालीम और उन्स व मोहब्बत के जलसे रखते थे , रात के चार घन्टे गुज़रने के बाद शागिर्द आपकी सेवा में जाते थे और दो घन्टे तक मजलिस चलती रहती थी लेकिन बीस तारीख के बाद मजलिस की छुट्टी हो जाती थी और स्वर्गीय काज़ी रमज़ान के आखिर तक गायब रहते थे , उनके शागिर्द जहाँ भी आपको तलाश करते। नजफे अशरफ़ , मस्जिदे कूफा , मस्जिदे सहला या करबला में , कहीं भी आप का कोई असर नहीं मिलता , स्वर्गीय काज़ी का यह तरीक़ा आपकी रेहलत तक बाकी रहा।
आम तौर से दस या बीस दिन तक अपने घर तशरीफ़ फरमा होते और आपके दोस्त व अहबाब आपके पास आते , मुज़ाकेरात और दर्सो बहस में शामिल होते लेकिन एक दम से कुछ दिनों के लिये ग़ायब हो जाते और उनके घर वालों को भी खबर न होती।
एक रिवायत में है कि इमामे ज़माना (अज्ज लल्लाहो तआला फरजहुश शरीफ) का ज़हूर होगा तो आप अपनी दावत का आगाज़ मक्का से करेंगे , इस तरह कि रुक्न व मक़ाम के दरमियान काबे की तरफ़ पीठ करके ऐलान करेंगे और आपके तीन सौ तेरह ख़ास असहाब आपके पास जमाँ होंगे।
हमारे उस्ताद स्वर्गीय काज़ी फरमाते हैः ऐसी हालत में इमाम अलैहिस्सलाम उनसे एक बात कहेंगे जिससे तमाम असहाब पूरी दुनिया में फैल जायेंगे , क्योंकि उन सबको तईयुल अर्ज़ की करामत हासिल है , समस्त संसार में तलाश व जुस्तजू करेंगे और समझ जायेंगे कि पूरी दुनिया में आपके अलावा किसी को वेलायते मुतलका हासिल नहीं है और आपके अलावा कोई भी इसरारे इलाही , क्याम , और ज़हूर , के लिये नहीं भेजा गया है , उसके बाद सब मक्का वापस आजाऐंगे और अपने आपको इमाम के सामने पेश करेंगे और आप की बैअत करेंगे।
स्वर्गीय काज़ी फरमाते हैः मैं जानता हूँ कि इमाम उन सबसे क्या कहेंगे और वह सब अलग अलग होकर फैल हो जायेंगे।
अल्लामा तबातबाई फरमाते हैः मैं और मेरी बीवी , स्वर्गीय हाज मिर्ज़ा अली आक़ा ए काज़ी के नज़दीकी रिश्तेदार थे , नजफ़े अशरफ़ में सिलए रहम (रिश्तोंदारों के यहां जाना) के लिये वह हमारे घर तशरीफ लाते थे।
हमें ख़ुदावन्दे आलम ने कई मरतबा औलाद अता की लेकिन वह बचपने ही में इन्तेकाल कर जाते थे , एक रोज़ स्वर्गीय काज़ी हमारे घर तशरीफ लाये , उस समय मेरी बीवी गर्भ से थीं और मुझे इसका इल्म नहीं था , ख़ुदा हाफ़िज़ी के समय उन्होंने मेरी बीवी से कहाः मेरे चचा की बेटी इस बार ख़ुदा वन्दे आलम जो तुम्हें बेटा अता करेगा वह जीवित रहेगा , उसका नाम अब्दुल बाकी है , मैं स्वर्गीय काज़ी की बात सुन कर खुश हो गया , ख़ुदावन्दे आलम ने हमें बेटा अता किया और पहले बच्चों के विपरित वह ज़िन्दा रहा और उसको कोइ मुशकिल पेश नहीं आई हमने उसका नाम अब्दुल बाकी रखा।
मिर्ज़ा शिराज़ी ने तम्बाकू के हराम होने का फ़तवा देकर ईरान में ईंग्लैण्ड की ताकत को खत्म कर दिया था , शियों के दरमियान मर्जईयत का महत्व व अज़मत , फ़तवे की ताक़त और मर्जईयत पर लोगों के ईमान को पश्चिमी दुनिया के सामने पेश किया , जब मिर्ज़ा शिराज़ी का इन्तेकाल हुआ तो शियों की मर्जईयत और सर परस्ती को स्वीकार करने के लिये आयतुल्लाह सय्यद मोहम्मद फेशारकी की तरफ़ आये , मिर्ज़ा ए शिराज़ी के बाद मोहम्मद फेशारकी का शुमार बड़े ज्ञानियों में होता था , लेकिन उन्होंने अपने पास आने वालों से फरमायाः
मैं शियों की मर्जईयत , प्रभुत्व और दीनी हुकूमत के लायक़ नहीं हूँ , क्योंकि दीनी हुकूमत , मर्जईयत और प्रभुत्व के लिये इल्मे फिक़ह के अलावा दूसरी चीज़ों की भी ज़रुरत है जैसे राजनिती की समस्या की जानकारी और समस्त कार्यों में अधिक विचार से काम लेना वगैरह , मैं शक व शंका से ग्रस्त हूँ , अगर मैं दीनी मर्जईयत और प्रभुत्व को स्वीकार कर लूं तो दीनी कार्यों और शिईयत की व्यवस्था तबाह व बर्बाद हो जाऐगी , मेरे लिये पढ़ाने के अलावा कोई और काम जायज़ नहीं है।
इस तरह हवा व हवस से आज़ाद यह शख्स लोगों को मिर्ज़ा मोहम्मद तकी शिराज़ी की तरफ मोराजेआ करने की दावत देता है।
हौज़ ए इल्मिया क़ुम के संस्थापक आयतुल्लाहिल उज़मा अब्दुल करीम हायरी फरमाते हैं कि मैंने अपने उस्ताद आयतुल्लाह फेशारकी से सुना है कि आपने फरमायाः जब मिर्ज़ा ए शिराज़ी का स्वर्गवास हुआ तो मैं घर गया और जैसे अपने दिल में खुशी का एहसास किया , बहुत सोचने और विचार करने के बाद भी इस खुशी का कारण समझ में नही आया , मिर्ज़ा ए शिराज़ी का इन्तेक़ाल हो गया और वह मेरे उस्ताद और प्रशिक्षक थे , स्वर्गीय मिर्ज़ा इल्म व तक़वा और ज़कावत के लेहाज़ से अदुभुत व्यक्तित्व के मालिक थे।
मैं बहुत देर तक सोचता रहा कि खराबी कहाँ है , यह खुशी किस चीज़ की वजह से है , आख़िरकार इस नतीजे पर पहुँचा कि शायद यह खुशी इस वजह से है कि अब मैं मरजए तक़लीद हो जाऊँगा और शियों की सर परस्ती मेरे कन्धों पर आजायेगी , मैं अपनी जगह से उठा और अमीरुल मोमेनिन अलैहिस्सलाम के रौज़े में गया और आपसे प्रार्थना की कि इस ख़तरे को मुझसे दूर करें , गोया मैं ऐहसास करता हूँ कि मुझे मरजईयत की तमन्ना है।
आयतुल्लाह फेशारकी सुबह तक हरम में रहे और सुबह के वक्त जब जनाज़े में शामिल होने के लिये आये तो उनकी आँखों से मालूम हो रहा था कि वह सुबह तक गिर्या व ज़ारी में मशग़ूल रहे है , बहरहाल उन्होंने रुहानी कोशिश की ताकि मरजईयत और प्रभुत्व उनके घर से किसी दूसरी जगह मुन्तक़िल हो जाये।
जी हाँ ख़ुदा के बन्दे और कुरआन के तरबीयत शुदा इस तरह अपनी रक्षा करते हैं कि मरजईयत और प्रभुत्व तक पहुँच जाते हैं लेकिन फिर भी उसको स्वीकार नहीं करते।
ऐ काश ऐसा संभव होता कि ख़ुदा के शुद्धहृदय बन्दों की आज़ादी और कुरआनी प्रशिक्षण के सूचक इन वास्तविकताओं को दुनिया के पक्षपात का दम भरने वाले नेताओं विशेषकर पश्चिमी नेताओं व राजनितिज्ञयों तक पहुँचाते ताकि वह यह जान लेते कि सही तरबीयत कुरआने करीम के अलावा कहीं और मुम्किन नहीं हैं , और उस पर अमल करते।
अद्ल व इंसाफ के बिना वास्तविक जीवन से आनन्दित होना संभव नही है , जानवरों वाला सदव्यवहार और निरंतर अत्याचार , क़ुरआनी शिक्षा व तालीमात पर अमल किये बग़ैर हमारी ज़िन्दगी की फ़ज़ा से नहीं निकल सकते।
आज ईक्किसवीं शताब्दी इंसान (पूर्बी या पश्चिमी) ने इस आयत।
آیت ” وما اوتیتم من العلم الا قلیلا “( ۱
वमा उवतितुम मिनल इल्म इल्ला क़लीला।
का संबोध्य होने के बावुजूद भी इल्म व फ़न के ज़रीये से एक हद तक तो अपने तालीम याफ़ता होने की मुश्किल को तो हल कर लिया है लेकिन (इंसान होने) के बारे में वह अभी तक दलदल में फँसा हुआ है , लिहाज़ा आज की टेकनॉलोजी और संस्कृति व सभ्यता ने तालीम याफ़ता होने की मुश्किल को तो हल कर लिया है लेकिन आदमी होने के असंभवता को अभी तक हल नहीं कर पाई है।
इंसान समस्त गुणों का संकलन है
कुरआने मजीद के सच्चे प्रशिक्षित , अदुभुत और महान इंसानों में से एक आख़ून्द मुल्ला अब्बास तुरबती हैं।
विद्धवान शोधकर्ता स्वर्गीय राशिद जो आपके पुत्र हैं अपने पिता के बारे में इस तरह लिखते हैं:
आपने दुनिया को छोड़ दिया था और हमेशा ख़ुदा की याद में रहते थे , हर काम ख़ुदा के लिये अंजाम देते थे , ख़ुदा व रसूल और क़यामत पर दृढ़ ईमान रखते थे , यही कारण था कि दिन रात धार्मिक अहकाम की पाबन्दी और अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभाने में कभी भी ग़फलत नहीं बरतते थे , वह अपनी उम्र का एक लम्हा भी बेकरा नहीं होने देते थे।
आपने अपनी उम्र में वाजिब (अनिवार्य) और मुस्तहब (सुन्नत) तमाम इबादतों को अंजाम दिया और कभी भी किसी बड़े और छोटे गुनाह को अंजाम नहीं दिया , यहाँ तक कि गुनाह करने का विचार भी कभी मन में नही आया।
साल के अधिकतर दिनों में रोज़ा रखते थे और संभवत केवल एक वक्त खाना खाते थे और बग़ैर सहरी के रोज़ा रखते थे।
वाजिब नमाज़ों को उनके तमाम आदाब और शरायत के साथ अंजाम देने के अलावा मुस्तहब नमाज़ें पढ़ने का जब भी वक्त मिल जाता था , चाहे वह मजलिस में मिम्बर पर जाने से पहले हो या दस्तर ख़्वान लगने से पहले , उसी वक्त पढ़ते थे , इन तमाम नमाज़ों को रोज़ाना की पांच समय की नमाज़ ज़ोहर , अस्र , मग़रिब , ईशाँ , और सुबह की तरह पढ़ते थे।
अपने स्वर्गीय माँ बाप , भाई बहन , चचा फुफी और दूसरे रिश्तेदारों के लिये भी नमाज़ें पढ़ते थे , किसी के साथ बात नहीं करते थे , यहाँ तक कि रास्ता चलते हुए भी नमाज़ पढ़ते थे , और सजदा करने के बजाय सजदगाह को पेशानी पर रखते थे , इसी वजह से हर वक्त पाक व पवित्र रहते थे।
साल के दिनों में जितने भी मुस्तहब आमाल और दुआयें वर्णित हुई हैं उन सबको अंजाम देते थे , अपने बालिग होने से मरते दम तक रात को सहर के वक्त तक जागते रहते थे और नमाज़े शब को उसके तमाम आदाब और शरायत के साथ पढ़ते थे , अपने मरने से दो या तीन दिन पहले तक एक रात भी नमाज़े शब को नहीं छोड़ा।
वह ख़ुदा के खौफ से बहुत ज़्यादा रोया करते थे , और ख़ानदाने रिसालत से बहुत ज़्यादा मुहब्बत करते थे , जब भी पैगम्बरे अकरम सल्ललाहो अलैहे व आलेही वसल्लम या किसी इमाम अलैहिस्सलाम का नाम उनकी ज़बान पर जारी होता था , तो आपकी आँखों से अश्क जारी हो जाते थे , मिम्बर पर धर्मोंपदेश देते हुए और नसीहत करते हुए या इमामों के सलायब बयान करते हुऐ सुनने वालों से पहले खुद रोया करते थे।
चूँकि आप बहुत ज़्यादा सतर्कता बरतते थे इसलिये अकसर व अधिकतर धर्मोंपदेश व नसीहत या दीनी मसायल या अहलेबैत (अलैहिमुस्सलाम) के मसायब का ज़िक्र करते वक्त सबको प्रमाणित किताबों से ही पढ़ते थे।
आबिदों और ज़ाहिदों की जीवनियों में आपकी रुचि बहुत ज़्यादा थी यहाँ तक कि अकसर आप कहते थेः कुछ लोग ऐसे थे जो गर्मियों में पानी को धूप में रखते थे ताकि गर्म हो जाये और फिर उस पानी को पीते थे ताकि वह लज़्ज़ते दुनिया से ठण्डे पानी की बहुत कम मिक़दार का भी प्रयोग न कर सकें।
स्वर्गीय राशिद लिखते हैं कि मैं हुसैन अली राशिद कि जिसने इन वाक़ेयात को लिखा है , और मेरा एक भाई दोनों धार्मिक शास्त्र के छात्र थे , हमारे पिता आख़ून्द मुल्ला अब्बास ने अपनी उम्र में एक वक्त भी हमें अपने पास आने वाले धार्मिक पैसों , जैसे सहमे इमाम , ख़ुम्स , रद्दे मज़ालिम और कफ्फारात में से कुछ नहीं दिया , यही नहीं बल्कि उन्होंने हमें इस तरह डराया और तरबीयत की थी कि हम समझते थे कि अगर हमने इन पैसों को हाथ लगाया तो गोया यह हमें साँप या बिच्छू की तरह काट लेंगे।
मैं जवान था और मशहद में इल्म हासिल कर रहा था , गर्मियों की छुट्टियों में अपने देहात (तुर्बत) गया , मग़रिब का वक़्त नज़दीक था और मेरी माँ को खुले हुऐ पैसों की ज़रुरत थी , उस ज़माने में जो पैसा चलता था उसके खुले पैसे लेना चाहती थीं , उन्होंने मेरे पिता से कहाः इन पाँच रियाल को (सहमे इमाम और खुम्स के) पैसों में से चेंज कर दें , मेरे पिता ने कहाः मैं इन पैसों में से नहीं दे सकता , बच्चे को दुकान पर भेज दो और वहाँ से फुटकर करा लो फिर मैंने दूकान पर ले जाकर उनको चेंज किया।
स्वर्गीय आख़ून्द मुल्ला अब्बास धार्मिक पैसें का अपने लिये उपयोग नहीं करते थे बल्कि अपने माल से भी ख़ुम्स व ज़कात अदा करते थे।
उनके पास एक खेती की ज़मीन थी जो उनको मीरास में मिली थी , वह गेहूँ की ज़कात को उसी वक्त बालियों से जुदा करने के बाद अदा कर देते थे और बाकी को घर ले आते थे और जिस वक्त वह खेती की ज़कात अदा करते थे वह रजब का महीना था या जिस साल के शुरु में ज़मीन की पैदावार उनको मिलती थी वह रजब का महीना था लिहाज़ा उन्होंने माहे रजब को अपना ख़ुम्स का साल करार दिया था जबकि ख़ुम्स का साल विशेष कर खेती के कामों में शम्सी (ईरानी कैलेंडर अनुसार) साल होना चाहिये , क़मरी नहीं , बहरहाल पूरे साल में रजब के शुरु में जो कुछ हमारे घर में होता था उसका पाँचवाँ हिस्सा अलग करते थे , आटे और गेहूँ से लेकर पकी हुई रोटी तक , मिर्चें , घी , चीनी , हल्दी वगैरह सब चीज़ों का ख़ुम्स निकालते थे और उसके हक़दार तक पहुँचाते थे।
जिस वक़्त उनके वालिद का स्वगर्वास हुआ तो उनके वारिस सिर्फ वह थे और एक उनकी बहन जो हमारी फूफी थीं , उन्होंने हमारी फूफी से कहाः जो कुछ तुम्हें चाहिये उसको अपने हिस्से के तौर पर ले लो और उन्होंने भी अपनी मर्ज़ी से अपना हिस्सा ले लिया।
उसके बाद जो भी मेरे पिता के हिस्से में बाकी बचा , पैसा , गाय , भेड़ और गेहूँ आदि सबको रद्दे मज़ालिम , खुम्स और ज़कात के हिसाब से अपने पिता की तरफ़ से बांट दिया , क्योंकि वह कहते थे कि मालूम नहीं है कि मेरे पिता धार्मिक अनिवार्य माल को पूरी तरह से अदा करते थे या नहीं , और सिर्फ़ खेती की ज़मीन को बाकी रखा जिसमें से आधा हमारी मां के मेहर का हिस्सा था , और उस ज़मीन से हमें इतना ही गेंहू मिलता था जिससे हमारा साल भर का खर्च पूरा हो जाता था।
दूसरा काम जो अंजाम दिया वह यह है कि उन्होंने एक बार सोचा कि उनके ख़ुम्स का साल रजब के महीने में होता है जबकि खेती का साल शम्सी (ईरानी साल) होता है , और कभी कभी रजब के शुरु में ख़रीफ़ की फस्ल होती थी जिसमें गेहूँ की घास हरी होती थी लेकिन अभी तक गेहूँ हमारे हाथों में नहीं आते थे और खुद उस हरी घास की क़ीमत होती थी , और उसका फायदा होता था , उन्होंने सोचा कि इसका ख़ुम्स देना चाहिये और उन्होंने नहीं दिया है लिहाज़ा इसी वजह से उस ज़माने (1345 हिजरी क़मरी) में तीन सौ तूमान ऐहतेयातन ख़ुम्स के उनवान से दे दिये जिसकी वजह से हमें ज़िन्दगी गुज़ारने में बहुत मुश्किल हुई और उस पैसे को अदा करने के बाद एक मुद्दत तक हम सख़्तियों की ज़िन्दगी गुज़ारते रहे।
वह जब भी किसी शख़्सियत को ख़त लिखते थे तो वह उनके ख़तों पर अमल करते थे। अपने नाम से पहले (अलअहक़र (नाचीज़)) जैसे अल्फ़ाज़ नहीं लिखते थे , वह कागज़ के तमाम सफ़हे को पूरा लिखते थे जबकि वह विज़ीटिन्ग कार्ड के बराबर होता था , वह उसके किसी भी हिस्से को सफेद नहीं छोड़ते थे , क्योंकि उसको इसराफ़ (फ़ुज़ुलख़र्ची) समझते थे , वह उस कागज़ को बगैर लिफ़ाफ़े के देते थे , अगर किसी को पुलिस वाले या बादशाह के आदमी रोक लेते थे तो उनके ख़त के ज़रीये उसको छोड़ देते थे और अगर किसी से जुर्माना माँगते थे तो उनके खत की वजह से उसको मुआफ कर देते थे और अगर वह क़र्ज़दार होता था तो उनके खत की वजह से क़र्ज अदा करने का वक्त बढ़ा देते थे।
मुझे याद है कि एक रोज़ एक ख़ातून ने शिकायत की कि उसके शौहर को मुहल्ले के रईस ने किसी वजह से रोक लिया है , मेरे वालिद ने एक ख़त जैसा कि ज़िक्र हुआ है , नवाब के नाम लिखा , उस वक्त ज़ोहर का वक्त था वह ख़ातून खत लेकर गई और कुछ देर के बाद वापस आईं और कहा , मैंने आपका ख़त लेजा कर दे दिया , वह खाना खाने के बाद आराम करना चाहता था कि उसके नौकर ने आपका खत उसको दिया उसने ख़त पढ़ कर फाड़ दिया , मेरे वालिद यह बात सुन कर बहुत नाराज़ हुए , उसकी ख़बर नवाब को पहुँची , लिहाज़ा एक दिन वह मेरे वालिद के पास आया और उसी ख़त को अपने पास से निकाला और चूमा और आख़ून्द को दिखा कर कहाः मैंने आपके तमाम ख़तों को हिफाज़त से रख रखा है और मैंने वसीयत कर रखी है कि जब मेरा इन्तेकाल हो तो इन ख़ुतूत को मेरे कफ़न में रख देना , ताकि मेरी नेजात का सबब बन जाऐं , मैंने उस ख़ातून से कहा थाः मैं अब सोना चाहता हूँ और फलाँ शख्स यहाँ नहीं है जो मैं उससे तुम्हारे शौहर को आज़ाद करने के लिये कहूँ , लेकिन उस ख़ातून ने आपसे आकर यह बात झूठ कही है , अफसोस कि ज़रुरत मन्द इस तरह से झूठ बोलते रहते हैं।
इस तरह स्वर्गीय हाज आख़ून्द इबादात के अलावा लोगों की ख़िदमत के लिये हर ज़माने में चाहे वह गर्मियों का ज़माना हो या सर्दियों का रात हो या दिन , हमेशा तैयार रहते थे और उन ख़िदमतों और ज़िम्मेदारियों को अन्जाम देने में अपने अलावा सबकी तरफ़ नज़र करते थे।
मैंने अपनी उम्र के लगभग चालीस साल स्वर्गीय हाज आख़ून्द के ज़माने में गुज़ारे हैं , लेहाज़ा मैं बहुत ही इतमीनान के साथ कह सकता हूँ कि उन्होंने अपने नफ़्स को क़ाबू में कर रखा था , मिसाल के तौर पर कभी ऐसा होता था की आधी रात को हमारे घर के दरवाज़े पर कोई दस्तक देता था और हम डर कर नींद से जाग जाते थे और देखते थे कि आने वाला कह रहा है कि फलाँ शख्स हालते ऐहतेज़ार में है , हाज आख़ून्द उनके सिरहाने चलें , फौरन बग़ैर किसी तअम्मुल और परेशानी के एक परिन्दे की तरह उठते थे , वुज़ू करते थे और चले जाते थे।
स्वर्गीय राशिद लिखते हैं कि मेरा (हुसैन अली राशिद) जन्म 1284 हिजरी शम्सी में हुआ और मेरे पिता का 1251 हिजरी शम्सी में हुआ है इस बेना पर मेरे जन्म के समय उनकी आयु 34 साल थी जब मैं तीन साल का हुआ तो मेरे वालिद अपने देहात (कारीज़क) (जब तक हम इसी देहात में रहते थे और शहरे तुरबत में नहीं आये थे) से एक काफ़िले के साथ पैदल करबला गये , यह उस साल की बात है जब संसद भव पर तोप से हमला हुआ था और उस यात्रा से आप सात महीने के बाद वापस आये।
जिस दिन मेरे पिता वापस आये उस दिन सारे मर्द और औरतें जमा हो गये थे और हमारे घर में बैठने की जगह नहीं थी , पानी में शकर डाल कर सबको शरबत पिला रहे थे , और लोगों ने मेरे पिता के चारो ओर घेरा बना रखा था , उस देहात की औरतें सबके साथ पैर मिला कर कभी अपने एक पैर को ज़मीन से उठाती थीं और कभी ज़मीन पर रखती थीं और कहती थीः
धर्म आ गया , ईमान आ गया , नूर आ गया , रहमत , ख़ैर , बरकत , मेहराब , मिन्बर , नमाज़ , मस्जिद , किताब और कुरआन आ गया वह इसी तरह के जुमले कहती जाती थीं , उस वक्त का मन्ज़र और आवाज़ें मेरी नज़र में इस तरह हैं कि जिस तरह यह वाक़ेया अभी कल ही हुआ था।
स्वर्गीय राशिद लिखते हैं कि हमने अपने पिता से जो चीज़ें देखी हैं और वह हमारे लिये अस्पष्ट रह गई हैं , उनमें से एक बात यह है कि मेरे पिता का रविवार के रोज़ 17 शव्वाल 1362 हिजरी क़मरी को सूरज निकलने के दो घन्टे बाद इन्तेकाल हुआ , सुबह की नमाज़ उन्होंने लेटे हुऐ पढ़ी , उनके ऊपर ऐहतेज़ार की हालत तारी हुई , उनके पैरों को क़िबले की तरफ़ किया और अपनी उम्र के आखिरी लम्हे तक वह होशियार थे और आहिस्ता आहिस्ता वह कुछ पढ़ रहे थे जिस तरह वह अपनी मौत से बाख़बर थे और आखिरी लम्हे में कलेम ए ला इलाहा इल्लललाह कह रहे थे।
वह अपने स्वर्गवास से एक सप्ताह पहले रविवार के दिन नमाज़े सुबह के बाद क़िबले की ओर लेटे और अपनी अबा को अपने चेहरे पर ड़ाला , अचानक सूरज की तरह जैसे किसी सूराख़ से रौशनी निकल रही हो , आपका पूरा जिस्म रौशन हो गया और उनका चेहरा जो बिमारी की वजह से पीला हो गया था , साफ़ नूरानी हो गया , बल्कि अबा के नीचे से आपका चेहरा नज़र आ रहा था , वह एक दम से हिले और कहाः सलामो अलैकुम या रसूलल्लाह , आप मुझ हक़ीर को देखने के लिये आये हैं , उसके बाद इस तरह जैसे कोई उनको एक के बाद एक देखने आ रहा हो , हज़रत अमीरुल मोमनीन अलैहिस्सलाम को सलाम किया , और एक एक इमाम को बारहवें इमाम तक सलाम किया और उनके आने का शुक्रिया अदा किया , फिर हज़रते ज़हरा अलैहस सलाम को सलाम किया और उसके बाद हज़रते ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा को सलाम किया , और उस वक्त बहुत रोये और कहाः बीबी मैं तुम्हारे लिये बहुत रोया हूँ , उसके बाद अपनी माता को सलाम किया और कहाः अम्मा मैं तुम्हारा शुक्रिया अदा करता हूँ कि तुमने मुझे पाक व पाकीज़ा दूध पिलाया और उनकी यह हालत दो घन्टे तक ऐसी ही रही , फिर वह रौशनी जो उनके ऊपर पड़ रही थी खत्म हो गई और उनका चेहरा फिर दोबारा पीला हो गया और ठीक अगले इतवार को उसी वक्त दो घन्टे तक ऐहतेज़ार की हालत में रहै और फिर उनका स्वर्गवास हो गया।
इन दोनों इतवार के बीच एक दिन मैंने उनसे पूछा कि हमने अम्बिया और अइम्मा अलैहिमुस्सलाम के आने की रिवायत सुनी है और आरज़ू करते हैं कि काश हम ख़ुद होते और इस मन्ज़र को देखते , अब इस वक्त कि आप मुझसे ज़यादा नज़दीक हैं , ऐसी हालत देखी गई है मेरा दिल चाहता है कि मैं समझ जाऊँ कि यह क्या हालत थी , वह खामोश रहे और कुछ नहीं कहा , दूसरी मरतबा तीसरी मरतबा अलग अलग तरह से उनसे सवाल किया , लेकिन वह खामोश रहे , जब मैं ने चौथी और पाँचवीं बार दोहराया तो कहाः हुसैन अली मुझे परेशान न करो , मैंने कहाः मेरा इरादा यह था कि मैं कुछ समझ जाऊँ , कहाः मैं तुम्हें नहीं समझा सकता , तुम खुद समझो।
यह थी एक शुद्धहिदय अल्लाह के बंदे के ईमान , अख़्लाक़ , सदाचार और अमल की दुनिया , यह थी एक क़ुरआनी इंसान की मौत , क्या आज की ख़ुदा व क़यामत पर ईमान से बे परवाह और क़ुरआन की शिक्षा से मीलों दूर सभ्यता और संस्कृति में ऐसे क़ुरआन के प्रशिक्षित लोगों की जीवनी की पवित्रता कहीं और देखने में आ सकती है।
क्या समस्त पूरब व पश्चिम में वास्तविकता और अध्यात्म से दूर रहने वाले किली स्कूल , कालेज , यूनिवर्सीटी मे दम है जो ऐसे बा अज़मत , ज़ाहिद , आबिद , मोमिन , ख़िदमत गुज़ार , दिलसोज़ और मेहरबान चेहरों की प्रशिक्षण दे सकें।
देशों और जनता की ग़फलत , हैरत , असुरक्षा , रोष , पाप , अत्याचार से मुक्ति केवल कुरआने करीम की शिनाख़्त और और उसकी तालिमात पर अमल करने से प्राप्त हो सकती है।
जी हाँ अगर दुनिया के लोग कुरआने करीम के साथ दोस्ती करें , और केवल कुरआने करीम के साथ जीवन व्यतीत करें , अल्लाह के नेक और मोमिन बंदों के हाथों में हाथ दें और उनके साथ दोस्ती और मित्रता का रास्ता अपनायें तो निसंदेह दुनिया व आख़ेरतत की ख़ुशबख़्ती और सौभाग्य हासिल कर लेंगे।
वस्तुवाद , अचेतना और फ़साद के दलदल में फँसे हुई सभ्यता ने पूरे संसार को असुरक्षा , खौफ़ व डर और अविश्वास के घेरे में डाल दिया है जिसको केवल कुरआन और उसके बाअज़मत व्याखकों यानी अहलेबैत के सहारे ही से मुक्ति मिल सकती है।
दुनिया वाले अगर कुरआने करीम की तरफ तवज्जो करें और अपनी ज़िन्दगी के तमाम उमूर में क़ुरआने करीम के अहकाम पर अमल करें तो ज़मीन व आसमान से ख़ुदालन्दे आलम की बरकतें उनको नसीब होंगी और हर नेक काम के बदले में दस गुना खैर उनको नसीब होगा।
उम्मे कुलसूम बिन्ते उकबा बिन अबी मोईत ऐसे वंश में पैदा हुईं जो इस्लाम के इतिहास में बहुत ही ज़लील व पस्त व नीच था।
इसी ख़ानदान के तीन लोगों को बारे में तीन आयतें नाज़िल हुई , एक उनके पिता उक़बा के लिये , दूसरी भाई वलीद के लिये और तीसरी ख़ुद के लिये।
ध्यानपूर्वक बात यह है कि इस महान नारी ने दुनिया की चमक धमक और अधर्म के तूफ़ान में अपने गन्दी फितरत और पस्त तबीयत बाप और भाई के मुकाबले में अपने दृढ़ ईमान और क़ुरआन और वही प्रशिक्षित होने को प्रमाणित किया और रेसालत और वही की पाठशाला से पाठ लिया।
बेहतर है कि इस ख़ानदान के बारे में कुछ बयान किया जाये ताकि इस महान नारी की इंसानी और ईमानी महानता और व्यक्तित्व स्पष्ट हो जाये।
उनके पिता का शुमार उन लोगों में होता है जिन्होंने मक्के में पैग़म्बरे अकरम सल्ललाहो अलैहे व आलेही वसल्लम को दुख देने और नुक़सान पहुँचाने में कोई कमी नहीं रखी , यही नहीं बल्कि उसने पैगम्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम की शान में यह गुस्ताख़ी की कि अपना लोआबे दहेन पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम के ऊपर डाला।
” وَ یَوْمَ یَعَضُّ الظَّالِمُ عَلی یَدَیْہِ یَقُولُ یا لَیْتَنِی اتَّخَذْتُ مَعَ الرَّسُولِ سَبیلا “ ( ۱ ) ۔
व यौम यअज़्ज़ो ज़ालेमुन अला यदैहे यकूलो या लेतनी इत्तखज़तो मअ अर्रसूले सबीला।
उस दिन ज़ालिम अपने हाथों को (ग़म व हसरत के कारण) काटेगा और कहेगा कि ऐ काश मैंने रसूल का रास्ता अपनाया होता।
वलीद इसी उक़बा का बेटा और उस्मान का माँ जाया भाई है , जिस समय पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम के चचा हज़रत हमज़ा की शहादत हुई तो उसने और अम्र बिन आस ने शराब पी और ख़ुशी मनाई। अगरचे वह बाद में मुसलमान हो गया , लेकिन उसके अख़्लाक़ और आचरण में किसी तरह का कोई फर्क़ नहीं पड़ा। उस्मान की ख़िलाफ़त के ज़माने में वह कूफे का गवर्नर बनाया गया और शराब की मस्ती की हालत में सुबह की नमाज़ दो की जगह चार रेकअत पढ़ा बैठा। और जब यह ख़बर मदीने पहुँची तो उस्मान ने उसको तलब तो किया मगर हद जारी न कर सका और उस्मान के क़रीबी होने के बावुजूद हज़रत अमीरुल मोमिनीन अलैहिस्सलाम ने उस पर शराब पीने की हद जारी की।
एक बार पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम ने उसको आदेश दिया कि क़बील ए बनी मुस्तलक़ के पास जाये और उनसे ज़कात जमा करके लाये , चूँकि उसके कब़ीले और क़बील ए बनी मुस्तलक़ में पहले दुश्मनी थी इसलिये जब क़बील ए बनी मुस्तलक़ वाले जोश व उत्साह के साथ उसके स्वागत के लिये आये तो उसने सोचा कि यह लोग उसको क़त्ल करने के लिये आ रहे हैं , लिहाज़ा वह भाग कर मदीने आ गया और पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम से कहा कि उन्होंने ज़कात देने से इंकार कर दिया है।
पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम नाराज़ हुए और आपने उनसे जंग करने का इरादा किया लेकिन ख़ुदावन्दे आलम ने यह आयत नाज़िल फ़रमाईः
یا اٴَیُّہَا الَّذینَ آمَنُوا إِنْ جاء َکُمْ فاسِقٌ بِنَبَإٍ فَتَبَیَّنُوا اٴَنْ تُصیبُوا قَوْماً بِجَہالَةٍ فَتُصْبِحُوا عَلی ما فَعَلْتُمْ نادِمینَ “ ( ۱ ) ۔
या अइयोहल लज़ीन आमनू इन जाअकुम फासेकुन यनबईन फतबईयनू अन तोसीबी कौमन बेजेहालतीन फतोसीहू अला मा फअल्तुम नादेमीन।
ऐ ईमान वालो अगर कोई फासिक़ कोई खबर लेकर आये तो उस ख़बर की जांच पड़ताल करो कहीं ऐसा न हो कि ना वाक़ेफ़ीयत की बुनियाद पर किसी क़ौम को कोई नुक़सान पहुँचा दो और उसके बाद तुम्हे अपने किये पर शर्मिन्दा होना पड़े।
इसी घटना के कारण पवित्र क़ुरआन ने वलीद के लिये फ़ासिक जैसी बुरी उपाधि हमेशा याद रहने के लिये रख दी है।
वह हज़रत अमीरुल मोम्नीन अली अलैहिस्सलाम का सख़्त दुश्मन था।
लेकिन उम्मे कुलसूम का शुमार उन औरतों में होता है जो पैगम्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम की बअसत के शुरु में मुसलमान हो गई थीं , इन्होंने बैतुल मुक़द्दस और काबा दोनों किबलों की तरफ नमाज़ पढ़ी है , पैगम्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम की बैअत की और मक्के से पैदल मदीने की तरफ़ हिजरत की।
इनके दोनो भाई वलीद और अम्मारा ने अपने दिलों को इस्लाम के नूर से मुनव्वर नहीं किया था बल्कि इस्लाम और मुसलमानों से शदीद जंग के लिये खड़े रहे , यह किसी भी तरह का ग़लत काम करने से परहेज़ नहीं करते थे , इन्होंने अपनी बहन को भी हिजरत करने से रोकना चाहा था।
उम्मे कुलसूम ने होदैबिया की सुलह के बाद हिजरत की थी , प्रतिज्ञा पत्र के अनुसार मुसलमानों का फर्ज़ था कि वह मक्का से मदीना जाने वालों को उसके क़बीले के हवाले कर दें , इस अहद (प्रतिज्ञा पत्र) नामे की बुनियाद पर जो मुसलमान मक्के से फ़रार करके मदीने आ जाते थे , पैगम्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम उनको वापस मक्का भेज देते थे और यह पैगम्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम का एक महान कारनामा था , जिसने इस्लाम की प्रगति में बहुत से रौशन परिणाम पेश किये , लेकिन यह प्रतिज्ञा पत्र औरतों को शामिल नहीं होता था , क्योंकि सुलह नामे में पहले से स्पष्ट लिखा गया था कि जो मर्द मक्के से मदीने जायेगा उसको वापस किया जायेगा , इस बेना पर हिजरत करने वाली औरतों को वापस करना ज़रुरी नहीं था , उम्मे कुलसूम ने इस मौके से फायदा उठाया और मदीने में बाकी रह गईं , उम्मे कुलसूम और उनके जैसी औरतों के बारे में पवित्र क़ुरआन ने फरमायाः
یا اٴَیُّہَا الَّذینَ آمَنُوا إِذا جاء َکُمُ الْمُؤْمِناتُ مُہاجِراتٍ فَامْتَحِنُوہُنَّ اللَّہُ اٴَعْلَمُ بِإیمانِہِنَّ فَإِنْ عَلِمْتُمُوہُنَّ مُؤْمِنات فلا ترجعوھن الی الکفار
لا ہُنَّ حِلٌّ لَہُمْ وَ لا ہُمْ یَحِلُّونَ لَہُنَّ “ ( ۱ ) ۔
या अइयोहल लज़ीन आमनू इज़ जाअकुम अल मोमेनातो मोहाजेरातीन फअम्तेनबुन्न इलल्लाहो आलमो बे ईमानेहिन्न फिइन्न अलिम्तोमू बुन्न मोमेनाते फला तर्जेऊ हुन्न इला अल्कुफ्फारे वा बुन्न हिल्लुन लहुम वला हुम यहिल्लुन लहुन्न।
ऐ ईमान वालों जब तुम्हारे पास हिजरत करने वाली औरतें (अपने शौहरों को छोड़ कर) आयें तो पहले उनका (मोमिन होने के ऐतेबार से) इम्तेहान लो अगरचे अल्लाह उनके ईमान को खूब जानता है फिर अगर तुम भी देखो कि यह मोमेना हैं तो ख़बरदार उन्हें कुफ्फार (उनके शौहरों) की तरफ़ वापस न करना , न वह उनके लिये हलाल हैं और न यह उनके लिये हलाल हैं।
उम्मे कुलसूम जिन्होंने सिर्फ हक़ को स्वीकार करने के लिये हिजरत की थी , हक़ के आदेश से मदीने में रह गईं और उसी वजह से उनके भाई मक्के वापस चले गये।
उम्मे कुलसूम ने मदीने में ज़ैद बिन हारेसा से शादी की , लेकिन उनकी शादी ज़्यादा दिन तक बाकी न रही और जंगे मोता में ज़ैद की शहादत से ख़त्म हो गई।
उम्मे कुलसूम ने अपने शौहर की शहादत के बाद कई लोगों से शादी की लेकिन उनमें से कोई एक भी ईमान , जेहाद और बलिदान के लेहाज़ से ज़ैद के जैसा न था।
इस बात को नज़र अंदाज़ करते हुए कि इस महान नारी ने इस्लाम और पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम की इताअत में अपने वतन , ख़ानदान और नज़दीकी रिश्तेदार जैसे भाई आदि को छोड़ा और अपने भाईयों की वापस ले जाने की लाख कोशिशों के बावुजूद मक्के से मदीने तक का फ़ासला पैदल तय किया और किसी रुकावट से नही डरीं। आप वह ख़ातून हैं जिन्होंने पैगम्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम से एक हदीस भी नक़्ल की है और वह हदीस यह हैः
سمعت النبی ( صلی الله علیه و آله وسلم ) یقول : لیس بالکاذب من اصلح بین الناس فقال خیرا ( ۱ ) ۔
समअतुन्नबी (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम) यकूलः लईस बिल काज़िब मन अस्लह बैनन्नास फकाल खइरा।
जो भी लोगों के दरमियान सुलह कराने की गरज़ से किसी अच्छी बात को झूठ में कहे वह झूठा नहीं है।
औफ़ बिन मोहल्लम शैबानी की एक लड़की थी जिसका नाम अयास था , यह लड़की अपने माँ बाप के घर में उनकी तरबीयत में परवान चढ़ी।
उमर बिन हुजर अलकंदी नाम के एक शख़्स ने उस लड़की के लिये रिश्ता भेजा , जब रिश्ते और शादी की तमाम रस्में पुरी हो गई और दुल्हन अपने शौहर के घर जाने के लिये तैयार हो गई , जिस रात दुल्हन को शौहर के घर ले जाना चाहते थे , दुल्हन की माँ अपनी बेटी के पास आई और उसको नसीहत करते हुए कहती हैः
मेरी बेटी , तुमने अब तक अपने माँ बाप के घर में ज़िन्दगी बसर की है , और अब तुम्हें अपने शौहर का घर आबाद करना है लेहाज़ा अपने घर की ज़िन्दगी को नज़र अंदाज़ कर दो क्योंकि तुम ऐसे आदमी के घर जा रही हो जिसको अच्छी तरह से नहीं पहचानती हो , न उसके अख़्लाक़ को जानती हो , तुम अपनों से दूर जा रही हो। अब तुम्हे उसके साथ रहना है जिससे तुम से मानूस नहीं हो , लेहाज़ा तुम उसके सामने विनम्र हो जाओ ताकि वह तुम्हारे साथ नर्मी से पेश आये , मैं तुम्हें कुछ नसीहतें करना चाहती हूँ अगर तुम उन पर अमल करोगी तो यह तुम्हारे काम आयेंगी , मेरी नसीहतें यह हैं:
1- क़नाअत (निस्पृहता) पर राज़ी रहो।
2- अच्छी तरह से अपने शौहर के बात को सुनो और उसको अंजाम दो।
3- उसके सामने बन संवर कर आओ ताकि वह तुम्हें देख कर नाराज़ न हो।
4- अपने आपको इत्र और ख़ुशबू से महकाओ ताकि वह तुममें से अच्छी खुशबू सूँघे।
5- खाना खाते समय उसकी ख़ूब ख़ातिर करो इसलिये कि भूख में इंसान को ग़ुस्सा आता है।
6- आराम के समय उसकी मदद करो। संभव है कि न सोने की वजह से वह परेशान हो।
7- उसकी ग़ैर मौजूदगी में उसके माल की रक्षा करो।
8- उसके सेवकों और साथियों का ख़्याल रखो।
9- उसके कामों की अवज्ञा न करो।
10- उसके राज़ों को फाश न करो , अगर उसके राज़ को फ़ाश किया और उसकी अवज्ञा की तो मुतमईन रहो कि उसके फ़रेब और धोखे से सुरक्षित नहीं रहोगी।
11- जान लो और अच्छी तरह से याद कर लो कि जिस समय वह परेशान हो तुम खुश न होना और जिस समय वह खुशहाल हो तुम दुखी न रहना।
12- अगर इन नसीहतों को गिरह में बाँध कर अपनी ज़िन्दगी में उन पर अमल करोगी तो निसंदेह तुम दोनों की ज़िन्दगी स्वर्ग की ज़िन्दगी हो जायेगी।
सामजिकता और दोस्ती इंसान के जीवन के अति महत्वपूर्ण मसलों में से है , यहाँ तक कि उसके सही और वास्तविक लक्षण इंसान को दुनिया व आख़ेरत में सच्ची ख़ुशी प्रदान कर सकते हैं , और उसके ग़लत असरात इंसान की दुनिया और आख़ेरत को ख़राब कर सकते हैं।
दोस्ती करना और दोस्त बनाना एक ऐसी हकीकत है कि तमाम इंसानों की फ़ितरत उसकी तरफ मायल है और इंसान के अन्दर उसकी कशिश इस क़दर दृढ़ है कि कुछ लोग उसको इंसान के नेचर का हिस्सा करार देते हैं।
यह फितरी आकर्षण और कशीश इस वजह से है कि ख़ुदा ए मेहरबान ने इंसानों को समाज और मुआशरे में रहने वाला बनाया है और उसकी माद्दी और मअनवी ज़िन्दगी की बाज़ ज़रुरतों को दूसरों के सुपुर्द किया है।
इंसान की पैदाइश ही इस तरह की है कि वह दूसरों से हट कर ज़िन्दगी बसर नहीं कर सकता वह समाज और मुआशरे से दूर रह कर तन्हाई की ज़िन्दगी नहीं गुज़ार सकता।
इंसान अगरचे ज़ाहिरी तौर पर अकेलेपन को पसंद करता है लेकिन फिर भी अपनी ज़िन्दगी को बाक़ी रखने में दूसरों की कोशिशों का मोहताज है और आख़िरकार तन्हाई में भी वह इसी समाज और मुआशरे में ज़िन्दगी बसर करता है।
दूसरों के साथ ज़िन्दगी बसर करने की ख़्वाहिश और दोस्त बनाने का आकर्षण पहले नबी से लेकर इस्लाम के ज़हूर तक एक बुनियादी मसअला रहा है और इस्लाम ने उसकी तरफ खास तवज्जो दी है और इस सिलसिले में बहुत फ़ायदेंमंद क़ानून और मसायल को बना कर इस गरीज़े और इंसानी रग़बत और चाहत की तकमील की है और दुनिया व आख़ेरत में दोस्ती और मुआशेरत की तरफ इंसानों को हिदायत की है।
इस भाग में शिक्षकों व प्रशिक्षकों के बारे में कुछ धार्मिक क़ानून व अहकाम को बयान किया जायेगा ताकि वह अच्छी तरह से अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा कर सकें।
कुरआने करीम और रिवायात ने इंसानों को पौधे से संज्ञा दी है और यह संज्ञा शिक्षकों विशेष कर माता पिता की महान ज़िम्मेदारियों की तरफ इशारा करती है कि यह लोग इंसान की ज़िन्दगी के तमाम भागों में उसे अच्छी प्रशिक्षण दे सकें।
बाग़बान (माली) के रोज़ाना के कामों से बाख़बर होने के बाद , जो वह रोज़ाना सुबह व शाम पौधों और पेड़ों के साथ अंजाम देता है , हम प्रशिक्षण और तरबीयत की हक़ीक़त को पूर्ण रुप से जान सकते हैं।
एक बाग़बान (माली) का काम क्या है , वह कभी भी पौधों और पेड़ों में किसी चीज़ की योग्यता और क़ाबिलयत को पैदा नहीं करता और जिस पौधे में सूखने के बाद उन्नती की योग्यता ख़त्म हो जाती है वह उसके बस से बाहर का काम है , बल्कि यह कहना बेहतर होगा कि बाग़बान पौधों और पेड़ों के उन्नती व प्रगति के लिये विभिन्न कार्य अंजाम देता है उसके अलावा कोई और काम नही करता। अत: बाग़बान के कामों को निम्नलिखित संक्षंप में इस प्रकार बयान किया जा सकता हैः
उन्नती व प्रगति की मौजूदा हालत की विशेषता से सही जानकारी के बग़ैर बाग़बान (माली) के तमाम प्रयत्न बेकार हो सकते हैं क्योंकि हर पेड़ और हर पौधे में उन्नती व प्रगति के विशेष हालात पाये जाते हैं , कभी कभी कुछ हालात बाज़ पौधों और बीजों के लिये फ़ायदेमंद होते हैं और तो कुछ पौधों और पेड़ों के लिये नुक़सान देह होते हैं।
उन्नती व प्रगति का रास्ता इस लिये समतल व हमवार किया जाता है कि बीज और पौधा अपनी योग्यता , लियाक़त और क़ाबिलयत को ज़ाहिर कर सके और अकसर रूकावटों को दूर करने से ऐसा हो जाता है।
लिहाज़ा बाग़बान ख़ुदाई के ज़रीये पौधों के जड़ों की जगह को नर्म करता है , पत्थर और दूसरी सख़्त चीज़ों को उसके पास से हटाता है , बाग़ व बाग़ीचे को बीज की उन्नती व प्रगति के लिये तैयार करता है और कभी कभी अपने इस लक्ष्य तक पहुँचने के लिये टेढ़ी शाखों को काट देता है ताकि पेड़ अच्छी तरह से उन्नती व प्रगति कर सके।
एक पौधे की परवरिश के लिये अंदरूनी क़ुदरत व ताकत के अलावा बाहरी सहायता की भी ज़रुरत होती है ताकि पौधा सूरज की किरणों से ज़मीन की मिठास और मीठे पानी के ज़रीये अपनी ज़रूरी योग्यता से फायदा उठा सके और अपनी उन्नती के कमाल तक पहुँच सके और अपनी योग्यता को पत्तों , फूल और फलों के ज़रीये ज़ाहिर कर सके इस सिलसिले में कभी कभी बाग़बान (माली) मजबूर हो जाता है कि कुछ परिवर्तन व बदलाव अन्जाम दे और उनके किनारों को किसी चीज़ के मुनासिब पैवन्द से तब्दील करे।
कोई भी पौधा हो या घास (जिसकी उन्नती व प्रगति के लिये एक विशेष तरीक़ा अपनाया जाता है) उसके लिये भी इन शर्तों के अनुसार कार्य होना आवश्यक है , कभी कभी की ग़फलत की वजह से ऐसा होता है कि पौधा अपने रास्ते और विशेष आकार से दूसरी तरफ़ निकल जाता है और अपनी उन्नती के कमाल तक नहीं पहुँच पाता।
यह पौधे की परवरिश के बारे में एक सीधे सादे बाग़बान या माली की कार्यशैली को बयान करने के लिये एक छोटा सा ख़ाका था , जो मुदुलता (नज़ाकत) , विनोद (ज़राफ़त) और तरबीयत के विभिन्न तौर तरीक़ों की पाबन्दी के ऐतेबार से इंसान की तरबीयत के हज़ारवें हिस्सों को भी बयान नहीं कर पाता।
जब एक पौधे की परवरिश के लिये इस क़दर मंसूबा बंदी की जाती है और उसको अहमियत दी जाती है तो इंसानों को प्रशिक्षकों विशेष तौर पर मां बाप को अपनी ज़िम्मेदारियों की जानकारी होनी चाहिये और इस संक्षिप्त हदीस को तफ़सील से पढ़ना चाहिये।
बिल्कुल उसी खाक़े की तरह जो एक पौधे की परवरिश के सिलसिले में बयान हुआ है , हमें उसे बहुत ही बड़े पैमाने पर इस शीर्षक के साथ कि इस इंसान को एक महान समाज में क़दम रखना है , उसके अनुसार इस पर कार्य और उसके नियमों का पालन करना चाहिये।
परवरिश का पहला क़दम बच्चों की रुही , जिस्मी ख़ुसूसियात से आगाही और उनके लिये फ़ायदेमंद और नुक्सानदेह बातों की जानकारी हासिल करना है , लेकिन अफ़सोस कि मां बाप में बच्चों के लिये यह बुनियादी शर्त नहीं पाई जाती और वह बच्चे को किसी भी तरह से नहीं पहचानते लेकिन फिर भी उनसे बहुत ज़्यादा उम्मीद रखते हैं।
आश्चर्य की बात है कि आज के ज़माने में इंसानी इंजीनियरिंग को मशीनी इंजीनियरिंग से कम अहमियत दी जाती है , यानी इंसान से ज़्यादा खुद उसकी बनाई हुई चीज़ों पर ज़्यादा ध्यान दिया जाता है इंसान पर नहीं।
एक सादी गाड़ी के कार्यों या ड्राईवरी को सीखने के लिए कई महीने तक फ़िक्री और अमली क्लासों में समय दिया जाता है लेकिन जिस समय इंसान मां बाप होने के नाते अपने बच्चे की परवरिश करना चाहता हैं तो वह किसी तरह की तालीम हासिल नहीं करना चाहता और अकसर वालेदैन बच्चे को क़ुसूरवार ठहराते हैं और अपने आपसे नहीं मालूम करते कि शायद असली क़ुसूरवार हम खुद हैं , शायद हमने ही सही तरबीयत नहीं की है।
इंसानों में भी फ़ेअल (कर्म) और इंफ़ेआल (पश्चाताप) के मैकानिकी क़ानून पाये जाते हैं , अगर हम उनके साथ काम करना चाहते हैं तो हमें उनके मैकानिकी कायदे और क़ानून को पहचानना पड़ेगा।
इंसान भी एक नम्बरों वाले ताले की तीजोरी की तरह है , जिसको खोलने के लिये एक नंबर का इल्म होना ज़रुरी है ताकत का नहीं , रुह व दिल की किताब को खोलने के लिये भी हर चीज़ से ज़्यादा जानकारी और ज़राफ़त की ज़रुरत है , ज़ोर व जबरदस्ती की ज़रुरत नहीं है।
इंसान के सदाचार उसके आचरण की शिक्षा का क़ानून भी फिज़िक्स कैमिस्टिरी और फिज़ियोलांजी के क़ानून की तरह है उसे उसके अंदर से तलाश करने की आवश्यकता है , बनाने की नही।
इंसानी रहबरी के कुछ क़ायदे व क़ानून अगर अस्ल फितरत और ख़िलक़त को तकाज़ों के अनुसार न हों तो वह मक़बूल नहीं होंगे और किसी भी कुदरत और ताकत के ज़रीये फ़ितरी सुन्नत के ख़िलाफ क़वानीन को इंसानों पर थोपा नहीं जा सकता।
इंसान की परवरिश के सिलसिले में जब पहले अमल को अंजाम दिया जाये यानी प्रशिक्षक बच्चे की विशेषता और उसकी पैदाइश के सिस्टम को समझ ले और यह कि बच्चे की फरदी विशेषताएं जैसे जिस्म की उन्नती व प्रगति , दिमाग़ की परवरिश और ऐतेमाद बे नफ्स को किन चीज़ों की ज़रुरत है और उसके समाजी पहलुओं की परवरिश के लिये क्या करना चाहिऐ ताकि वह समाज व मुआशरे के लिये प्रभावपूर्ण और फ़ायदेमंद इंसान बन सके , तो उस समय इन तीन कामों की ज़रुरत है जिसको हमने एक पौधे की परवरिश के सिलसिले में बयान किया था।
सही प्रगति यह है कि जिसकी तरबीयत कर रहे हैं उसको तमाम पहलुओं में परवान चढ़ायें क्योंकि एक विभाग में प्रगति और दूसरे में अप्रगति बर्बादी का कारण बन सकती है जैसे जब भी किसी बच्चे के जिस्म में केवल दिल बढ़ता रहे लेकिन उसके दूसरे आज़ा न बढ़ें या पूरा जिस्म , दिल की तरह उन्नति न करे तो यह एक तरफ़ा प्रगति , मौत का सबब है , यही बात इंसान के दूसरे कामों में भी जारी है।
जब भी किसी इंसान के माद्दी पहलु और आध्यात्मिक पहलु की उन्नती व प्रगति ज़्यादा हो , और उसकी ज़िन्दगी के दूसरे पहलू ग़फलत का शिकार हों तो इस प्रगति को एक तरफ़ा उन्नती व प्रगति कहेंगे।
सही और बक़ा का ज़ामिन वही उन्नती व प्रगति है जिसके तमाम पहलुओं में एक साथ ऐसा हो और तमाम विभाग एक खास व्यवस्था के साथ आगे की तरफ कदम बढायें।
पश्चिमी दुनिया के सदाचार विधारम संस्कार का कमज़ोर पहलु यह है कि वह इंसान की रुह के एक मूल पर तकिया करते हैं और इंसान की रुह के दूसरे मूलों को नज़र अन्दाज़ कर देते हैं , नफ़्सियाती शिक्षाओं की बुनियाद पर क़ायम होने वाली कोई भी प्रशिक्षक पाठशाला जैसे (फ़रायड) की जो जिन्सियात के अलावा इंसान के तमाम पहलुओं से अंजान था , इंसान की शख़्सीयत को शहवत और अनुभव की निगाह से देखता है और बाकी तमाम शहवतों के दरमीयान शहवत और जिन्सी तवज्जो पर तकिया करता है जिसके नतीजे में इंसान की वाक़ई शख्सियत , शहवत और जिन्सी उमूर में खुलासा हो जाती है और इंसान की रुह के उन दूसरे मूल की जानिब से ग़फलत हो जाती है कि जिन को इल्मे नफ्सियात से कश्फ किया है।
नफ़सियात और तरबीयती उमूर के माहिर लोगों का यह समूह इंसान को शहवत की नज़र और जिन्सी तमायुलात की निगाह से देखता है और बहस व गुफ्तगू के तरीक़े कार के महदूद होने की वजह से उसके दूसरे मूल से ग़ाफिल और बेखबर रहता है , तरबीयती उमूर के माहिर लोगों के इस गिरोह का नुक़सान बहुत ज़्यादा भयानक है।
तरबीयती उमूर के बाज़ दूसरे माहिर लोग जो मैटरियालिस्ट और माद्दियत के क़ायल हैं और जिनके विचार की बुनियाद माद्दा है वह अपनी बहस व गुफ्तुगू में रुह की परवरिश को अहमियत देने की जगह अकसर जिस्म की परवरिश को अहमियत देते हैं , वह ग़रायज़ को कन्ट्रोल और उसकी सही रहबरी करने के बजाय उनको खुली छूट के साथ सेर करने की हिदायत देते हैं उनके इस तरह के ग़लत और अस्वस्थ दृष्टिकोण की बुनियाद पर ऐसे बुद्धिजीवी पैदा होते हैं जो ज़मीन व आसमान और समन्दर की तहों को रौंद कर संसार में एक ही चिँगारी से आग लगा देते हैं।
इंसानी विशेषताओं से पूर्ण इंसानीयत के हमदर्द और सूझ बूझ रखने वाले सम्पूर्ण इंसान उनके इस दृष्टिकोण की बुनियाद पर हरगिज़ पैदा नहीं हो सकते।
इस्लाम ने न केवल दोस्त तलाश करने के लिये मोहक विचार और नियम पेश किये हैं बल्कि तमाम इंसानी ग़रायज़ , आरज़ूओं और अंदरूनी कोशिशों के लिये , यहाँ तक कि ज़िन्दगी के सारे विभागों के लिये दृढ़ और फायदे मंद मार्गदर्शन प्रस्तुत किया हैं।
सुर ए हदीद की इस आयत को ध्यान पूर्वक पढ़ें , इस आयत में इंसान के जीवन को पाँच विभन्न भागों में बांटा गया में हैः
” اعْلَمُوا اٴَنَّمَا الْحَیاةُ الدُّنْیا لَعِبٌ وَ لَہْوٌ وَ زینَةٌ وَ تَفاخُرٌ بَیْنَکُمْ وَ تَکاثُرٌ فِی الْاٴَمْوالِ وَ الْاٴَوْلادِ کَمَثَلِ غَیْثٍ اٴَعْجَبَ الْکُفَّارَ نَباتُہُ ثُمَّ یَہیجُ فَتَراہُ مُصْفَرًّا ثُمَّ یَکُونُ حُطاماً وَ فِی الْآخِرَةِ عَذابٌ شَدیدٌ وَ مَغْفِرَةٌ مِنَ اللَّہِ وَ رِضْوانٌ وَ مَا الْحَیاةُ الدُّنْیا إِلاَّ مَتاعُ الْغُرُور “( ۱ ) ۔
ऐलमू अन्नमल हयातो अद्दुनिया लऐबुन व लहलवुन व ज़िनतुन व तफाखुर बैनकुम व तकीसोरुन फि अलअम्वाले व अल औलादे कमसले गैसीन अअजब नबातोहू सुम्म यहेजो फतराहो मुसफर्रन सुम्म यकूनो होतामन व फिल आखेरते अज़ाबुन शदीदुन व मगफेरतुन मिन अलील्लाहे व रज़्वानुन वमा अल हयातुद्दुनिया इल्ला मताऊँ अलगोरुर।
याद रखो कि इस संसार का यह जीवन (वह रखने वाला जो ईमान और नेक कर्म से दूर हो।) सिर्फ़ एक खेल , तमाशा , आपस में एक दूसरे पर गर्व करना और माल और औलाद के ज़्यादा होने का मुक़ाबला करने का नाम है और (ऐसी दुनिया) बस उस बारिश की तरह है जिससे (दृष्य सुन्दर हो जाये) और किसान आश्चर्य चकित रह जाये और उसके बाद वह खेती मुरझा जाये फिर तुम उसे पीला देखो और अंत में वह रेज़ा रेज़ा होकर बिखर जाये (निसंदेग दुनिया को पूजने वाले बे ईमान लोगों के लिये आख़ेरत में बड़ी बुरी सज़ा है (और ऐसे मोमिनों के लिये जिन्होने अपनी दुनिया को हक़ की पैरवी और जनता की सेवा में व्यस्त किया) उनके लिये ईश्वर की ओर से गुनाहों की बख़्शिश और अल्लाह की प्रसन्नता है और इस संसार का यह जीवन तो बस एक धोखे के सिवा कुछ भी नहीं है।
निसंदेह अगर जानकार और हमदर्द शिक्षक विशेष कर माता पिता इन पाँचों श्रेणियों को कुरआने करीम , ईश्वरीय तालीमात और इस्लामी रिवायात और हदीसों से सहमत कर लें और उन समस्त कार्यों को इंसान की प्रगति और तरबीयत के लिये इस्तेमाल करें तो आख़ेरत में उसका नतीजा यह होगा कि ख़ुदावन्दे आलम इंसान से खुश हो जायेगा और उसको मुआफ़ कर देगा और अगर इन पाँचों भागों को सही और इस्लामी रंग न दिया जाये तो ताज़े और हरे भरे होने के बाद भी इंसानियत के यह पौधे सूख जाऐंगे और इंसान एक बे प्रशिक्षण , बुराई फैलाने , दूसरों से जलने , लालची और दूसरों का हक़ मारने वाला प्राणी बन जायेगा और वह अपनी इच्छाओं और बेजा ख़्वाहिशों के पूरा करने के लिये हर तरह की बुराइयों और पापों को अंजाम देगा और वह उस नर्क में , जिसे ख़ुद उसने अपने हाथों से बनाया है , जलेगा।
इंसान को इस संसार की माद्दी चीज़ों और अल्लाह की नेमतों से फ़ायदा उठाने का हक़ प्राप्त है , परन्तु यह हक़ ख़ुदा व रसूल सल्लललाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम और अइम्म ए अहले बैत अलैहिमुस सलाम के मार्गदर्शन के ज़रिये से प्राप्त होना चाहिये और उस हक़ को क़नाअत जैसी ख़ूबी के साथ संतुलित होना चाहिये।
खाना , पीना , घर बनाना , और सवारी का साधन रखना इंसान की मूल आवश्यकता है और इन समस्त चीज़ों को जायज़ व्यापार और शरई तरीक़ों से प्राप्त करना चाहिये और हर इंसान को (जैसा कि ईश्वरीय तालीमात में बयान हुआ है) जीवन व्यतीत करने के लिये अपने और अपने घर वालों के आराम और सहूलत के लिये जहां तक संभव हो , प्रयत्न करना चाहिये और उन कार्यों को करने में पीछे नही हटना चाहिये।
जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये प्रयत्न करना , ज़रुरत अनुसार अल्लाह की नेमतों से फ़ायदा उठाना और अपने ख़र्च से बचे हुए माल से दूसरों की सहायता करना , नबियों , अइम्मा और अल्लाह के नेक बंदों का स्वभाव रहा है।
निसंदेह इस प्रकार का जीवन व्यतीत करना , हर तरह से पाक व पाकीज़ा रहने और ऐश व आराम के जीवन के साथ साथ क़यामत के दिन अल्लाह की बख़्शिश और ख़ुशी का कारण भी बनता है। हक़ के मार्ग से दूरी और इस्लामी संस्कृति से अलग ज़िन्दगी बसर करना दुनिया में भंयकर अंधकार और क़यामत में कठोर सज़ा का कारण बनता है।
शिक्षक व प्रशिणक विशेष कर माता पिता इस बात पर ध्यान दें कि उनकी औलाद , इंसानियत की पवित्र ज़मीन के पौधे हैं। उनको उन पौधों के बारे में सम्पूर्ण जानकारी होनी चाहिये। इसी तरह से उनकी उन्नती व प्रगति के संबंध में सम्पूर्ण क़ानून की जानकारी होनी चाहिये ताकि वह उनकी रौशनी में इस संसारिक जीवन की पांचों श्रेणियों की सही निगरानी और देखभाल कर सकें और हर भाग में प्रयत्न करें कि इन पौधों के ख़ास ताज़गी और पुर सुकून माहौल में ईश्वरीय और इंसानी क़ानून के साथ , बुद्धिमता आधार प्रगतिशील मंसूबों के साये परवान चढ़ाये ताकि इंसानियत की ज़मीन के यह नाज़ुक पौधे सही रास्ते की ओर क़दम आगे बढ़ा सकें।
क़ुरआने मजीद ने जीवन के पहले क़दम को लहव लअब (खेल कूद) से नामांकित किया है।
इस भाग में बच्चा खेल के साथ खेलने वाले से बेहद मुहब्बत करता है। वह खेल कूद के समस्त सामान और खिलौनों से मुहब्बत की भावना व्यक्त करता है और अपने हम उम्र बच्चों से पहली ही मुलाक़ात में अपने साथ खेलने के लिये इस प्यार से उसे अपनी ओर आकर्षित करता है जैसे दोनो एक मां बाप से पैदा हुए हों और अगर कोई उसको खेलने से मना करता है तो उसके दिल में उसकी तरफ़ से नफ़रत और घृणा उत्पन्न हो जाती है और इस तरह वह अपने नाज़ुक और छोटे से ज़ेहन पर बोझ महसूस करता है।
शिक्षक विशेषकर मां बाप के लिये आवश्यक है कि वह अपने बच्चों को खेल कूद में स्वतंत्र छोड़ दें , क्यों कि खेल की ओर उसका आकर्षण फ़ितरी है , खेल एक ऐसी वास्तविकता है जिसे ईश्वर ने उसके नेचर में रखा है।
एक हदीस में हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस सलाम से नक़्ल हुआ है:
” الغلام یلعب سبع سنین “ ( ۱ ) ۔
अल ग़ुलामों यलअबो सबआ सिनीन।
लड़का सात वर्ष तक खेलता है।
खेल का मसअला फ़ितरी है परन्तु उसकी अवस्था और मात्रा का ख़्याल रखना चाहिये। बच्चे का खेल , उसके साथ खेलने वाला और खिलौनों के सामान की क़िस्मों की ओर ध्यान देना आवश्यक है ताकि यह भाग बहुत ही सावधानी , स्वस्थ और सलामती के साथ गुज़र जाये और उसको इस प्रकार से व्यवस्थित करना चाहिये कि बच्चे का व्यक्तित्व में उन्नती व प्रगति हो।
बच्चे को अगर खेल , खेल के साथी और खेल के सामान के साथ स्वतंत्र छोड़ दिया जायेगा तो चूंकि उसका अस्तित्व ज़िद की तरफ़ ज़्यादा मायल होता है लिहाज़ा उस में शरारत पैदा हो जायेगी और फिर वह आहिस्ता आहिस्ता ज़िद करने लग जायेगा। मां बाप और अभिभावकों की बात सुनने से इंकार करने लग जायेगा।
बच्चे के खेल के वातावरण को सही व सालिम रखा जाये और ऐसे बच्चों के पास आने जाने से दूर रखा जाये जो बहुत ही बे परवा और बे प्रशिक्षण है ता कि इस तरह बच्चे की छवि ख़राब न हो।
हज़रत अमीरुल मोमिनीन अली अलैहिस सलाम , इंसान के नफ़्स और उसकी फ़ितरत के आज़ादी की तरफ़ मायल होने के बारे में फ़रमाते हैं:
النفس مجبولة علی سوء الادب والعبد مامور بملازمة حسن الادب والنفس تجری بطبعھا فی میدان المخالفة والعبد یجھد بردھا عن سوء المطالبة فمتی اطلق عنانھا فھو شریک فی فسادھا و من اعان نفسہ فی ھوی نفسہ فقد اشرک نفسہ فی قتل نفسہ “ ( ۱ ) ۔
अन नफ़्सो मजबूलतुन अला सूइल अदब , वल अबदो मामूरुन बे मुलाज़ेमते हुसनिल अदब , वन नफ़्सो तजरी बे तबएहा फ़ी मैदानिल मुख़ालफ़ते , वल अब्दो यजहदो बे रद्देहा अन सुइल मुतालेबते , फ़ मता अतलक़ा अनानुहा फ़हुवा शरीकुन फ़ी फ़सादेहा व मन अआना नफ़सहु फ़ी हवा नफ़सिहि फ़क़द अशरका फ़ी क़तले नफ़सिहि।
इंसान का अस्तित्व फ़ितरी तौर पर स्वतंत्रता और बुरे स्वभाव की ओर आकर्षित होता है जबकि इंसान की दायित्व है कि वह अपने आपको अच्छे सदचार और सही प्रशिक्षण व संस्कार से सजाये संवारे। इंसान का वुजूद फ़ितरी तौर पर जीवन की मसलहतों और अच्छे आचरण से जंग के लिये तैयार रहता है और जानकार और ख़बर रखने वाला इंसान अपनी नाजायज़ तमन्नाओं के रास्ते को अपने ऊपर बंद कर लेता है , जो भी अपने बिगड़े हुए नफ़्स की लगाम को छोड़ और अपनी बेजा ख़्वाहिशों और इच्छाओं को स्वतंत्र छोड़ दे उसने अपने वुजूद को बर्बाद और तबाह होने में मदद की है। जो भी अपने ज़ालिम नफ़्स की अपनी नाजायज़ इच्छाओं और ख़्वाहिशों के पूरा करने में उसकी मदद करे , उसने इंसानीयत को क़त्ल करने में मदद की है।
बच्चे में इतनी शक्ती नही है कि वह अपनी लगाम के आज़ाद होने और अपनी अंदरूनी इच्छाओं को पूरा करने में अपने बिगड़े हुए नफ़्स से जंग करे और ख़ुद को अच्छे आचरण से सजाये संवारे और अपने अस्तित्व का क़ातिल न बने , इस बेना पर बच्चे के खेल , खेल के साथी , खेल का सामान , उन सब की देखभाल और निगरानी करने और उसको अच्छे इंसानी हालात से सजाना संवारना मां बाप का महान दायित्व है। मां बाप को उन्नती व प्रगति के क़ानून की जानकारी होनी चाहिये और बच्चे के अस्तित्व के समस्त पहलुओं पर नज़र रखते हुए उस से बुद्धिमता पूर्वक और समझदारी वाला सुलूक करना चाहिये।
जी हां , लहव लअब (खेलकूद) के ज़माने में खेल कूद , समाज और खेल के साथियों के चुनाव में अपने बच्चों की सहायता करना मां बाप की ज़िम्मेदारी और ईश्वरीय दायित्व है और इस सिलसिले में कमी करना बच्चे के भविष्य को ख़तरे में डालना है।
प्रसिद्ध हैं कि एक युवक को जुर्म , क़त्ल और चोरी के कारण जज ने फांसी की सज़ा सुनाई।
जज ने आदेश देते समय उससे पूछा कि अगर तुम्हारी कोई आख़िरी इच्छा हो तो बता दो या लिखवा दो। उसने कहा कि मेरी केवल एक ख़्वाहिश है और वह यह है कि फांसी की मौक़े पर मेरी मां को हाज़िर किया जाये ताकि मैं अपने जीवन के अंतिम पल में उसको देख सकूं।
उसकी मां को फांसी की जगह पर लाया गया ताकि वह अपने बेटे को देख सके। उसने अपनी मां से कहा कि मैं अपने जीवन के आख़िरी पल में चाहता हूं कि तुम अपनी ज़बान मेरे मुंह में दे दो और मुझ पर यह आख़िरी अहसान करो। जब उसकी मां ने अपनी ज़बान उसके मुंह में दे दी तो उस युवक ने अपनी पूरी शक्ति से उसकी ज़बान को इस तरह से काटा कि उसकी ज़बान से ख़ून निकलने लगा। जब उस जवान से इस ग़लत कार्य के बारे में पूछा गया तो उसने बताया कि मुझे यह फांसी इस मां की शाबाशी देते रहने की कारण हो रही है जिसने मुझे बचपन में मुर्ग़ी के अंडे चुराने का हौसला दिलाया और फिर उसके बाद मैंने पीछे मुड़ कर नही देखा बात ऊंट की चोरी और क़त्ल तक पहुच गई।
हज़रत अमीरुल मोमिनीन अली अलैहिस सलाम ने (अपने एक बुद्धिमतापूर्ण वाक्य में इंसान को संबोधित करते हुए) फ़रमाया:
” فکرک یھدیک الی الرشاد “ ( ۱ ) ۔
फिकरोका यहदीका एलर रशाद।
तुम्हारे बुद्धिमतापूर्ण विचार और मूल चिंतन तुम्हे वास्तविक मसलहत और मार्गदर्शन के रास्ते की ओर ले जाते हैं। इस दुनिया में एक मां बाप के लिये अपनी औलाद से ज़्यादा बहुमुल्य चीज़ क्या हो सकती है ?
क्या मां बाप का दायित्व नही है कि वह अपने बच्चों की प्रशिक्षण , उन्नति और उसकी सही प्रगति के लिये विचार करें और इस सिलसिले में हकीमाना मंसूबे और दृढ़ नियमों का चुनाव करें ?
जब सही विचार और मूल चिंतन मां बाप के प्रशिक्षण के तौर तरीक़ों में अमली लिहाज़ से ज़ाहिर हो जाये तो उसकी परिणाम बच्चों में हस्तांरित हो जाता है। फिर बच्चे भलाई , सभ्यता और प्रशिक्षण के ख़ज़ाने बन जाते हैं। ऐसे बच्चे भविष्य में समाज के लिये बहुत लाभदायक साबित होते हैं।
क़ुरआने करीम के अनुसार जीवन का दूसरा अध्याय मनोरंजन है।
निसंदेह मनोरंजन और ऐसे कामों का करना जो इंसान के व्यक्तित्व की उन्नती व प्रगति में सहायक होते हो और उसे सही विचारधारा की ओर ले जाने पर मजबूर करते हों। इस्लाम धर्म की दृष्टि में न केवल यह कि मना नही हैं बल्कि पसंदीदा और स्वीकार्य हैं।
जो बच्चा खेल कूद के माध्यम से मनोरंजन के मैदान में दाख़िल होता है। मार्कर , स्केच , बेलेड , कैंची , रंग और पेटिंग आदि के सामान के साथ ख़ुद को मशग़ूल करता है और ख़ुद से या दूसरों की मदद से पेटिंग , नक़्शे और डिज़ाइन बनाता है और फिर बेलेड और कैंची आदि से उसको काट कर अलग अलग करता है और उसको दूसरे पेज पर विशेष तरकीब से लगाता है। यहां तक कि वह आहिस्ता आहिस्ता बाग़ व बाग़ीचा , हरे भरे दृष्य , घर व भवन , दूसरे आवश्यक सामाम , विभिन्न प्रकार की गाड़ियों की पेटिंग और स्केच बनाता है या विभिन्न रंगों के कपड़ों को एक दूसरे के साथ सी कर उनसे गुड़ियों के कपड़े बनाता है और मां बाप भी इस तरह के कार्यों में उसका हौसला बढ़ाते हैं , उसे शौक़ दिलाते हैं और उसकी सलाहियतों को परवान चढ़ाते हैं। निसंदेह ऐसे बच्चे भविष्य में बेहतरीन अविष्कारक , मेकेनिक , इंजीनीयर और डाक्टर बनते हैं और जनता को अपनी सलाहियतों से भरपूर लाभ पहुचाते हैं।
शिक्षकों विशेष कर मां बाप के लिये आवश्यक है कि वह अपने बच्चों को इस सिलसिले में जानकारी रखते हुए उन्हे शौक़ दिलायें , उनका हौसला बढ़ाये उन्हे आवश्यक सामान ख़रीद कर दें ताकि वह फ़ालतु समय में उसमें ख़ुद को मशग़ूल करें , घर को उनके ख़ूबसूरत कार्यों के लिये तैयार करें ताकि वह अपने अंदर छुपे हुनर को निखार सकें।
निसंदेह फ़ुर्सत के समय ताश , शतरंज , जुवा आदि खेलना , संगीत , अनुचित सी डी , फ़िल्में , धारावाहिक आदि देखना , बिगड़े हुए बच्चों के साथ समय बिताना , ख़राब कहानियों की किताबें , ग़लत और नामुनासिब अफ़साने और आम फ़ोटो और कैसेटों आदि में लगने से बच्चों की छवि पर बुरा और नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और उनके अंदर की सलाहियतों को प्रभावित करता है। इसके अलावा इस बात का भी डर होता है कि वह पापी , गुनाहगार , फ़ासिक़ व फ़ाजिर , ज़ालिम व बेईमान न बन जायें।
नफ़्सीयात के विशेषज्ञों का मानना है कि अव्यस्क व मार धाड़ वाली फ़िल्में , बुराइयों और जुर्म व अपराध की संख्या बढ़ाने में असरदायक हैं और बहुत से मुजरिम , जज के सामने खुल कर इस बात को स्वीकार करते हैं कि उन्होने यह बुरे और घृणित काम फ़ला फ़िल्म या धारावाहिक से सीखे हैं जिन में यह सब दिखाये गये हैं।
इस वास्तविकता में कोई शंका नही है कि समस्त कामशक्ति व इंसानी इच्छाओं में कोई न कोई लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
अगर इंसान में यह इच्छायें न होतीं तो उसके लिये जीवन व्यतीत करना संभव नही हो पाता क्यों कि अगर इंसान में ग़ुस्सा , वासना , माल , पद और औलाद की इच्छा व आरज़ू ख़त्म हो जाये तो ज़िन्दगी उसकी नज़र में ख़त्म हो जायेगी और वह इस जीवन को आगे बढ़ाने के प्रयत्न नही करेगा।
इस में भी कोई शंका नही है कि बुद्धि और विचार की शक्ति इन इच्छाओं में संतुलन पैदा करती है और इन अंदरूनी शक्तियों से फ़ायदा उठाना एक सीमा तक इंसान के लिये आवश्यक व फ़ितरी है।
इंसान की इच्छाएं , गाड़ी के इंजन की तरह उसको आगे बढ़ने की शक्ति प्रदान करती हैं जबकि इंसान की बुद्धि और विचार की शक्ति गाड़ी के ब्रेक की तरह उसको ग़लत रास्ते पर जाने से रोकती है। इस तरह वह उस की जान की रक्षा करती है और उसके जीवन को सुरक्षा प्रदान करती है।
बुद्धि व समझदारी गाड़ी की लाइटों की तरह इंसान को रास्ते बताने का काम करती है और उसके लिये रास्ते और गढ्ढे को स्पष्ट करके दिखाती है।
अध्यात्म की व्यवस्था में बुद्धि का स्थान बहुत महान है। इसी लिये ऐसी चीज़ों से बचना चाहिये जो दिमाग़ी व्यवस्था में ख़लल , विचारों की व्यवस्था में बुराई , देखने और सुनने की शक्ति में कमज़ोरी पैदा करें क्यों कि अक़्ल के सही मार्गदर्शन के बिना माद्दी व अध्यात्मिक जीवन संभव नही है।
इस्लाम धर्म ने बुद्धि के स्थान को सुरक्षित रखने के लिये उन चीज़ों से मना किया है जो उसे ख़राब और इंसान के मार्गदर्शन की व्यवस्था को गुमराह करतें हैं। जैसे विभिन्न प्रकार के नशे , शराब , बुराई में संलिप्त करने वाले काम , उन्नती व प्रगति से रोकने वाले कार्य , जुवा , नुक़सानहेद संगत और क्षतिग्रस्त रात भर जागने को मना और हराम क़रार दिया है और उसके विपरित बुद्धि के प्रशिक्षण व परवरिश के लिये प्रयत्न करने का आदेश दिया है ताकि इंसान अपनी बुद्धि के ज़रिये फ़ितरी व अमली अक़्ल को प्राप्त कर सके और अपने अनुभव , इबरत और नसीहतों से , अक़्ल की पाठशाला का साथ दे सके।
ज्ञान और बुद्धिजीवियों के लेखन का अध्ययन और सृष्टि की व्यवस्था पर शोध , बुद्धि की प्रगति का कारण बनता है। इसके विपरित पाप का दोहराना , बुरे लोगों की संगत में रहना , गुनाह दृश्य देखना , अक़्ल की कमज़ोरी का कारण बनते बनतें हैं और ऐसा होने से बहुत सी चीज़ों में पाई जाने वाली बुराई इंसान को दिखाई देना बंद हो जाती है।
सबसे बड़ा भटकाव , विचारों की गुमराही है। यह ऐसी गुमराही है जिसके कारण इंसान अच्छे बुरे की समझ खो देता है बल्कि इससे भी बढ़ कर वह हक़ को बातिल और बातिल को हक़ समझने लगता है।
निम्नलिखित हदीस विचारों की गुमराही और वास्तविकताओं को ग़लत समझने के सिलसिले में बयान हुई है।
पैग़म्बरे इस्लाम सल्लललाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम ने एक दिन अपने सहाबियों से फ़रमाया:
کیف بک اذا فسدت نساوْکم ، و فسق شبابکم و لم تامروا بالمعروف و لم تنھوا عن المنکر؟ فقیل لہ : و یکون ذلک یارسول اللہ ؟ فقال : نعم و شر من ذلک، کیف بکم اذاامرتم بالمنکر و نھیتم عن المعروف؟ فقیل لہ : یا رسول اللہ و یکون ذلک؟ قال : نعم و شر من ذلک، کیف بکم اذا رایتم المعروف منکرا والمنکر معروفا “ ؟ ! ( ۱ ) ۔ ।
एक दिन वह आयेगा कि जब तुम्हारी औरतें और जवान फ़ासिक़ व फ़ाजिर हो जायेगें और अम्र बिल मारूफ़ व नही अनिल मुन्कर को छोड़ दिया जायेगा।
सहाबियों ने बहुत ही आश्चर्य से पूछा: क्या ऐसा संभव है ? आपने फ़रमाया: इससे भी ज़्यादा बुरे काम किये जायेगें , एक ज़माना वह आयेगा कि जब तुम्हे बुरे काम करने का आदेश दिया जायेगा और अच्छे कामों से मना किया जायेगा।
सहाबियों ने कहा: क्या वाक़ई ऐसा होगा ? आपने फ़रमाया: इससे भी ज़्यादा बुरा होगा और वह यह कि लोगों की नज़रों में अच्छाइयां बुरी और बुराईयां अच्छी नज़र आयेगीं।
पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम का आख़िरी जुमला इस वास्तविकता को बयान कर रहा है कि लोगों के दृष्टिकोण बदल जायेगें। लोग गुनाहों और बुराईयों के ज़्यादा होने , बुरे कामों में फंसे होने के कारणवश अच्छाइयों और बुराईयों में भिन्नता नही कर पायेगें बल्कि अख़लाक़ी बुराईयां , अख़लाक़ी अच्छाईयों की जगह ले लेगीं।
अफ़सोस है कि बहुत से घरों का वातावरण बिगाड़ने वाले कार्यों के लिये बहुत ही स्वतंत्र , भयावह और ख़तरनाक है।
जो चीज़ें बच्चे विशेषकर नौजवान देख कर और सुन कर सीख रहै हैं वह बहुत ही गुमराह करने वाली हैं। फ़िल्में , वीडियों , सी डी और सबसे बढ़ कर डिश , यह चीज़ें जिस चीज़ को सबसे ज़्यादा ज़ाहिर करती हैं वह है इश्क़ व हवस व वासना और माफ़ियाई गैंगिस्टर है। वह लड़के और लड़कियों को उनके अस्तित्व को ख़राब और बुद्धि व समझ और होश व हवास से दूर करके गुमराही की ओर ले जाते हैं।
इंसान के विचार और उसके काम , इन तमाम तंत्रों और मनोरंजक तत्वों के प्रभाव को देखने और समझने के लिये काफ़ी है कि इंसान बच्चों के नफ़्सियात का अध्ययन करे , जिन्होने कई बार मार धाड़ और जुर्मी दुनिया पर आधारित फ़िल्में देखी है।
अकसर यह बच्चे फ़ालतू समय में उन फ़िल्मों के हीरों की नक़्ल करते हैं , गली सड़क , घर और स्कूलों में एक दूसरे पर हमला करते हैं , हाथ पैर से एक दूसरे क सर और चेहरे पर मारते हैं और मार धाड़ करते समय फ़िल्म के हीरों के नाम को अपनी ज़बान पर लाते है और कभी कभी उससे भी ज़्यादा हो जाता है।
अख़बार में छपा कि कुछ बच्चे अपने घरों से भाग कर देश के उत्तरी भाग में पाये जाने वाले जंगलों में चले गये ताकि अपने ज़माने के टार्ज़न बन जायें। एक स्कूल के अध्यापक ने बताया कि उनके स्कूल के एक विधार्थी ने एक फ़िल्म देखी , उसने उस फ़िल्म की नक़्ल करते हुए अपनी क्लास के कुछ साथियों को बताया और स्कूल में चोरों का एक गिरोह बना लिया। जो अपने मंसूबे के अनुसार विधार्थियों के सामान चोरी करते थे।
इस्लामी देश ईरान के अख़बार कैहान के 732 वें अंक में यह ख़बर छपी कि फ्रांस में एक चौदह वर्ष के लड़के एक बच्चे को अग़वा करके उसका क़त्ल कर दिया। बाद में पकड़े जाने पर उसने यह स्वीकार किया कि मैंने यह काम एक फ़िल्म देखने के बाद किया है। उसने पुलिस को बताया कि मैंने क़त्ल से कई दिन पहले पेरिस की टीवी पर एक फ़िल्म देखी। इस फ़िल्म में क़ातिल एक इक्कीस वर्ष का लड़का था जो सज़ा के लिये उन्हे क़त्ल कर देता था , मैंने भी सोचा कि देखूं फांसी का मज़ा कैसा होता है। इसी वजह से मैं उस बच्चे के पास गया जिसका नाम अमानोएल था और उसको अपने साथ खेलने के बहाने शहर स बाहर ले गया। वह बहुत प्रसन्न हो रहा था और मैं उसकी इस प्रसन्नता के कारणवश क्रोधित हो रहा था वह अंतिम क्षणों तक यही सोच कर ख़ुश होता रहा कि मैं उसे खेलाने के लिये लाया हूं और उसके साथ खेल रहा हूं।
यह बुरे काम , बुरी व्यवस्तता के कारण पेश आते हैं जिनकी क्षति की पूर्ती करना बाद में संभव नही होता है।
दूसरे दौर में जो कि खेल कूद और मनोरंजन का ज़माना है। इन वास्तविकताओं को मद्देनज़र रखते हुए मां बाप की महान दायित्व स्पष्ट हो जाता है और अगर इस दौर से लापरवाही की गई तो अचानक हमारे सामने कोई बहुत भयानक घटना आ सकती है। जिससे उठने वाला धुवां सबसे पहले मां बाप की आख़ों को रुलायेगा उसके बाद हमारे समाज और देश को रुलायने का कारण बनेगा।
यह भाग उम्र का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसमें जवानी , सुन्दर और आकर्षक चेहरे के साथ आती है और इंसान का अस्तित्व मस्ती और जोश से भरा होता है। आशाएं और इच्छाएं अपने कमाल को पहुचने लगती हैं। सजने संवरने , सुन्दर और आकर्षक दिखने की चाहत और सुन्दरता से इश्क़ बढ़ने लगता है। फिर जवान लड़का हो या लड़की अच्छे जूते , कपड़े , गाड़ी , घर और घर के अच्छे सामान के बारे में सोचने लगता है। हर दिन , हर समय यही प्रयत्न करता है कि अपने चेहरे , बालों और शरीर को दूसरों को दिखाये और हर दिन चाहता है कि पहले से ज़्यादा आकर्षक दिखाई दे।
इस भाग में मां बाप , प्रशिक्षक , शिक्षक , और उन सभी लोगों का दायित्व पहले से ज़्यादा बढ़ जाता है जो किसी नौजवान के साथ किसी भी प्रकार से संबंध रखते हैं। इस मरहले में अगर प्रशिक्षक विशेष कर मां बाप लापरवाही से काम लेंगें तो उस जवान की मूल इंसानियत , इस समाज और इच्छा के कारणवश बर्बाद हो सकती है।
इस भाग में शिक्षकों के लिये बेहतरीन उदाहरण और आईडियल हज़रत अमीरुल मोमिनीन अली अलैहिस सलाम का पवित्र और मुबारक अस्तित्व है। आपने एक सविस्तार पत्र में अपने बुद्धिमतापूर्ण तौर तरीक़े को हज़रत इमाम हसन अलैहिस सलाम के प्रशिक्षण के सिलसिले में बयान किया है। उसमें आपने जवानों में धार्मिक भावनाओं को जगाने के लिये अपने महान दृष्टिकोण को पेश किया है:
” وان ابتدئک بتعلیم کتاب اللہ عزوجل و تاویلہ و شرائع الاسلام و احکامہ وحلالہ و حرامہ “( ۱ ) ۔
।
मैंने तुम्हारे प्रशिक्षण को क़ुरआने मजीद की शिक्षा और उसकी आयतों के अर्थ को साफ़ बयान करने से आरम्भ किया और इस्लाम के क़ानून और नियम और उसके नूरानी अहकाम , हराम और हलाल को तुम्हे सिखाया।
जी हां , प्रशिक्षकों और मां बाप का दायित्व है कि वह जीवन व्यतीत करने के तौर तरीक़ों को क़ुरआने मजीद से लें और बेहतरीन क़ानून औक उसूल को इस्लाम से हासिल करें और फ़ायदेमंद अहकाम जो कि ईश्वरीय अहकाम हैं और बेहतरीन ज्ञान जो कि ईश्वर के हलाल और हराम की पहचान है , अपने बच्चों और जवानों को सिखायें।
परन्तु यह शिक्षा ज़बरदस्ती , ग़लत तरीक़े और लंबी क्लासों के ज़रिये से नही होनी चाहिये। क्योंकि अगर इस तरह से किया जायेगा तो जवानों की भावना और जज़्बात को ठेस पहुचेगी और उसकी पवित्र आत्मा को ज़ख़्म पहुच सकता है और ख़ुदा न करे वह धर्म और धार्मिक गतिविधियों से दूर हो सकता है और वह उनके चंगुल में फंस सकता है जो ज़ाहिरी तौर पर मुहब्बत और दोस्ती करते हैं और फिर उसका परिणाम यह होता है कि उन भेड़ियों के ज़रिये इंसानियत और आदमियत की ज़िन्दगी बर्बाद हो जाती है और कभी कभी वह ख़ुद भी दूसरों का जीवन बर्बाद करने के लिये एक भेड़िया इंसान बन जाता है।
यह शिक्षा और तालीम अगर अच्छे स्वभाव , अच्छे व्यवहार और नर्मी के साथ हो तो जवानों के गोश्त व ख़ून रच बस सकती है और उससे एक शिष्ट स्वभाव , सही प्रशिक्षण और अच्छे आचरण के व्यक्तित्व वाला इंसान वुजूद में आता है।
हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस सलाम इस सिलसिले में फ़रमाते हैं:
” من قراء القرآن و ھو شاب مومن اختلط القرآن بلحمہ و دمہ “ ( ۱ ) ۔
जो क़ुरआन पढ़े और वह बा ईमान जवान हो तो क़ुरआने मजीद उसके गोश्त और ख़ून में रच बस जाता है और उसके पूरे अस्तित्व में अच्छा प्रभाव छोड़ता है।
हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस सलाम एक दूसरी हदीस में इस तरह फ़रमाते हैं:
و یتعلم الکتاب سبع سنین و یتعلم الحلال والحرام سبع سنین “ ( ۱ ) ۔ ।
बच्चे को सात वर्ष में आहिस्ता आहिस्ता क़ुरआने करीम पढ़ना चाहिये और दूसरे सात वर्ष में हलाल व हराम सीखना चाहिये।
हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस सलाम का दृष्टिकोण यह है कि क़ुरआने करीम और हलाल व हराम की शिक्षा , नौजवान पर दबाव डाल कर न दिलवाएं और क़ुरआने मजीद और हराम व हलाल की तालीम कम समय में संभव नही है।
इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस सलाम , पथभ्रष्ट लोगों और बुरी सभ्यताओं के भयानक ख़तरों से , जो कि संभव है कि जवानों और नौजवानों को भावना और जोश , जज़्बात के कारण प्रभावित कर दें , को इस प्रकार होशियार रहने की सीख देते हैं:
” بادروا اولادکم بالحدیث قبل ان یسبقکم الیھم المرجئة “ ( ۱ ) ۔ ।
अपने जवानों को अहले बैत अलैहिमुस सलाम की शिक्षा और तालीम देने में जल्दी करो और इस महत्वपूर्ण दायित्व को अंजाम देने में जल्दी करो। इससे पहले कि पथभ्रष्ट मुनाफ़ेक़ीन और संस्कृति वाले लोग अपनी असत्य व बातिल बातों से उनकी बुद्धि और विचार को ख़राब कर दें और उनको पथभ्रष्टता और गुमराही की ओर ढकेल दें और उनकी दुनिया व आख़िरत को तबाह व बर्बाद कर दें।
हज़रत अमीरुल मोमिनीन अली अलैहिस सलाम ने एक हदीस में सही प्रशिक्षण की ओर इशारा करते हुए इस तरह फ़रमाते हैं:
” من کلف بالادب قلت مساویہ “ ( ۱ ) ۔ ।
जो भी सही प्रशिक्षण और शिष्टाचार प्राप्त करने को तैयार हो और अच्छी तरह से उसे स्वीकार करे तो निसंदेह उसमें बुराई बहुत कम हो जायेगी।
किसी जवान का प्रशिक्षण अगर उसके मां बाप और हमदर्द प्रशिक्षक के ज़रिये सही तौर पर अंजाम पाये तो वह मां बाप के शांति व सुरक्षा का स्रोत और दूसरों को बेहतरीन फ़ायदा देने वाला साबित होगा।
और अगर मां बाप अपने जवानों के सही प्रशिक्षण से ग़ाफ़िल और लापरवाह होंगे और केवल उन के कपड़े , पहनावे और खाने पीने को काफ़ी समझेंगे तो निसंदेह वह भविष्य में अशिष्ट , अप्रशिक्षित और बदमाशी व बुराई के कारण अपने जीवन को ग़म व दुख में व्यतीत करेंगें।
हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस सलाम एक हदीस में इस तरह से फ़रमाते हैं:
” ان خیر ما ورث الآباء لابنائھم الادب لا المال “ ( ۲ ) ۔ ।
निसंदेह मां बाप अपने बच्चों के लिये जो बेहतरीन मीरास छोड़ते हैं वह उन का सही प्रशिक्षण और शिष्टाचार है पैसा और माल नही।
पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम ने अपनी जिन हदीसों में उम्मत के भविष्य की ख़बर दी है उनमें औलाद के प्रशिक्षण से लापरवाही की शिकायत की है। आपने कुछ बच्चों को देखने के बाद फ़रमाया:
ویل لاولاد آخر الزمان من ابائھم، فقیل : یا رسول اللہ من آبائھم المشرکین؟ فقال : لا من آبائھم المومنین، لا یعلمونھم شیئا من الفرائض و اذا تعلموا اولادھم و رضوا عنھم بعرض یسیر من الدنیا فانا منھم بری و ھم منی برآء “ ( ۲ ) ۔ ।
आख़िरी ज़माने के बच्चों पर उनके मां बाप की लापरवाही के कारण वाय हो। सबने कहा: या रसूलल्लाह , उन के मुशरिक मां बाप पर वाय हो। आपने फ़रमाया: नही , उनके मुसलमान मां बाप पर , ऐसे मां बाप पर जिन्होने धार्मिक और ईश्वरीय आवश्यक व अनिवार्य बातों में उन्हे कुछ भी नही सिखाया और अगर बच्चे ख़ुद से कोई चीज़ सीखना भी चाहते थे तो वह उनको मना करते थे। वह अपने बच्चों के सिलसिले में उस चीज़ पर क़नाअत करते थे कि यह बच्चे अपने इस जीवन में इस दुनिया से कुछ सामान और चीज़ें जमा कर लें। मैं ऐसे मां बाप से बेज़ार हूं और वह मुझ से जुदा और बेज़ार हैं।
हज़रत अमीरुल मोमिनीन अली अलैहिस सलाम ने औलाद के प्रशिक्षण के दायित्व के सिलसिले में इमाम हसन अलैहिस सलाम को लिखा:
فبادرتک بالادب قبل ان یقسو قلبک و یشتغل لبک “ ۔ ।
मेरे बेटे मैंने तुम्हारे सही प्रशिक्षण और तुम्हे शिष्टाचार सिखाने में तमाम मौक़ों से फ़ायदा उठाया और इस सिलसिले में पूर्ण रूप से अपने दायित्व का निर्वाह किया। इससे पहले कि तुम्हारा दिल इस नौजवानी में ख़तरों के हमलों से कठोर हो जाये और तुम्हारी बुद्धि सभ्यता व संस्कृति के हमलों में फंस जाये।
इमाम अलैहिस सलाम ने मां बाप और प्रशिक्षकों को इस सिलसिले में होशियार किया है कि अगर अपनी औलाद के सही प्रशिक्षण में लापरवाही से काम लिया और उन की बुद्धि और विचारों की आवश्यकता को क़ुरआने करीम और ईश्वरीय अहकाम और अहलेबैत अलैहिमुस सलाम की शिक्षा से सैराब नही करोगे तो वह कठोरता , संगदिली और शैतानी कामों का शिकार हो जायेंगे।
इमाम सज्जाद अलैहिस सलाम अपने अधिकारों के बारे में अपने लेखन (रिसाल ए हुक़ूक़) में फ़रमाते हैं:
و اما حق ولدک فان تعلم انہ منک و مضاف الیک فی عاجل الدنیا بخیرہ و شرہ ، وانک مسئول عما ولیتہ من حسن الادب والدلالة علی ربہ عزوجل والمعونة لہ علی طاعتہ فاعمل فی امرہ عمل من یعلم انہ مثاب علی الاحسان الیہ معاقب علی الاسائة الیہ “ ۔ ।
तुम्हारी औलाद का तुम पर यह अधिकार है कि तुम उसे अपने टुकड़ा समझों , इस दुनिया में उसके अच्छे बुरे काम को श्रेय तुम्हे दिया जायेगा। तुम्हे मालूम होना चाहिये कि उसको बेहतरीन शिष्टाचार सिखाने का दायित्व तुम पर है। उसका उसके ईश्वर की ओर मार्गदर्शन करो और ईश्वर के अहकाम की पैरवी करने में उसकी सहायता करो , आवश्यक है कि अपनी औलाद के प्रशिक्षण के सिलसिले में अपने दायित्व का एहसास करो। जो कोई अपनी औलाद को अच्छा प्रशिक्षण देगा उसको उसका अच्छा बदला मिलेगा और जो अपनी औलाद का प्रशिक्षण सही तरीक़े से नही करेगा उसको उसकी सज़ा और दंड मिलेगा।
हज़रत अमीरुल मोमिमीन अली अलैहिस सलाम ने उन जवानों को बहुत महत्वपूर्ण नसीहत की है जिन के मां बाप और प्रशिक्षक अपने जवानों के सही प्रशिक्षण में लापरवाही से काम लेते हैं। सारे मां बाप और प्रशिक्षकों को जवानों पर ध्यान देना चाहिये और जवान अपने मां बाप की लापरवाही के कारण ख़ुद को असमर्थ न समझें और यह न कहें कि चूंकि उन्होने हमें अच्छा प्रशिक्षण नही दिया। इस लिये अब हमारी कोई ज़िम्मेदारी नही बनती है और इस सिलसिले में हम पर कोई दायित्व नही है और हमारी गर्दन पर कोई पाप नही होगा।
इमाम अली अलैहिस सलाम फ़रमाते हैं:
یا معاشر الفتیان حصنوا اعراضکم بالادب و دینکم بالعلم “ ۔ ।
ऐ जवानों , शिष्टाचार और सही प्रशिक्षण के ज़रिये अपनी अख़लाक़ी मूल्यों और इंसानी प्रतिष्ठा की रक्षा करो और अपने धर्म को ज्ञान व आध्यात्म से संवार कर उसकी रक्षा करो।
मां बाप को अपनी औलाद के सजने संवरने और ख़ूबसूरत दिखने की चाहत पर सीधा हमला नही करना चाहिये बल्कि उन्हे प्यार व नर्मी से अच्छे अख़लाक़ और बुद्धिमता पूर्वक बातों से समझाना चाहिये कि कहीं ऐसा न हो कि उनका ज़ाहिरी हुस्न व जमाल और सजना संवरना उनको आध्यात्म और पढ़ाई लिखाई से दूर करके बेकार और फ़ुज़ूल कामों में व्यस्त करके पाप और शहवत के रास्ते पर डाल दे।
मां बाप के लिये अनिवार्य है कि वह जवानों को उम्र के इस दौर में जिस में भावना , जज़्बात , कशिश और विपरित लिंग की ओर आकर्षण जोश मारने लगता है। उनको अंदरुनी हुस्न और दिल की सुन्दरता का शौक़ दिलायें और उनको धर्म की ओर जाने , धार्मिक बातों को सीखने , ज्ञान व आध्यात्म और दूसरे अच्छे कामों की तरफ़ भेजना चाहिये जैसे खेती , कारीगरी , व्यापार और दूसरे कला और फ़न के लिये उनको तैयार करना चाहिये और उम्र के इस हिस्से में जब जवान अपने हम उम्र साथियों का दिलदादा होता है और न चाहते हुए भी अपने वंश या स्कूल में अपनी उम्र के साथियों को अपना दोस्त बनाना चाहता है तो उनको फ़ायदेमंद सामजिकता और सही दोस्त चुनने की ओर मार्गदर्शित करें और समझायें कि उनके हम उम्र दोस्तों के बीच ऐसे लोग भी हैं जो उनकी भलाई और ख़ुशी नही चाहते हैं और उन्ही में से बहुत से ऐसे भी है जो उनका बुरा चाहते हैं। इस सिलसिले में बहुत ज़्यादा ध्यान देने की आवश्यकता है। अगर वह ऐसे दोस्तों से मिलें जो सही और सीधा रास्ता न दिखायें तो वह उनको ख़ुद से दूर करें और ऐसे बुरे लोगों से अपने संबंध तोड़ लें।
इस पड़ाव को क़ुरआने मजीद ने नाज़ करना , गर्व व बड़ाई और दूसरों के सामने अपने सत्कार को बयान करना , ज़िक्र किया है। इंसान को इस बात पर ध्यान देना चाहिये कि यह मिट जाने वाले काम जिन पर वह गर्व कर रहा है , इस की कोई बुनियाद नही है और किसी ऐसी चीज़ पर गर्व करना जो इंसान को दुनिया के ज़रा से माल तक पहुचा देता है। एक नापसंद काम है और यह इंसानी सदाचार से दूर है। इसके ज़रिये दूसरों का दुख पहुचता है और उसमें एक तरह का घमंड और स्वाभिमान पाया जाता है।
इमाम अमीरुल मोमिनीन अली अलैहिस सलाम ने मालिके अशतर को एक प्रतिज्ञा पत्र में संबोधित करते हुए शक्ति व प्रभाव को लोगों की सेवा करने का कारण , जनता की सहायता करने का मंत्र और उनकी समस्याओं को हल करने कूंजी बयान किया है।
शक्ति व प्रभाव अगर घमंड और स्वाभिमान का कारण बन जाएं तो इंसान फ़िरऔनी सदाचार से दोचार हो जाता है और अपने साथियों को भी इसी सदाचार में फंसा लेता है और परिणाम पूर्वक अत्याचार और ज़ुल्म व अन्याय से भरपूर शासन की नीव रखता है।
इमाम अमीरुल मोमिनीन अली अलैहिस सलाम ने अपने एक पत्र में अशअस बिन क़ैस को शासन , जो ख़ुदा की ओर से इंसान के हाथ में एक धरोहर है और उसको ईश्वर के बंदों की सेवा में लगाना चाहिये , के बारे में लिखते हैं:
و ان عملک لیس لک بطعمة و لکنہ فی عنقک امانة “ ۔ ।
शासन व हुकूमत और शक्ति व प्रभाव हमारे लिये ऐसा निवाला नही है कि जिस को तुम अपने और अपने वंश और दोस्तों के लिये निगल लो बल्कि तुम्हारी गर्दन पर यह ख़ुदा की अमानत है जिस को सेवा और समस्याओं के हल करने के ज़रिये उसके मालिक तक वापस पलटा दो।
अत: शासन का सिंहासन व माल व दौलत , जो कि मिट जाने वाली चीज़ है और प्रमाण पत्र , जो इल्म व ज्ञान को सूचक है , के कारण घमंड व स्वाभिमान नही होना चाहिये बल्कि यह सब काम का एक बेहतरीन मौक़ा है जिसे इंसान ईश्वर के बंदों और देश की सेवा करने में प्रयोग कर सकता है।
इंसान अगर अभिमान व सत्कार करना चाहता है तो उसे तक़वा व परहेज़गारी और ईश्वर की शुद्ध आराधना पर ऐसा करना चाहिये। जो ईश्वर ने उसे प्रदान किया है।
इमाम अमीरुल मोमिनीन अली अलैहिस सलाम अपने बुद्धिमता पूर्ण कलाम में फ़रमाते हैं:
इस संसार में ख़ूबी और अच्छाई यह नही है कि माल व औलाद में बढ़ोतरी हो बल्कि ख़ूबी और अच्छाई यह है कि तुम्हारा आध्यात्म और ज्ञान ज़्यादा हो , तुम्हारी गंभीरता व शालीनता में इज़ाफ़ा हो जाये। और जब नेकी , भक्ति और जनसेवा में सफ़ल हो जाओ तो ईश्वर के शुक्र के लिये तैयार हो जाओ।
و ان تباھی الناس بعبادة ربک “ ۔ ।
ईश्वर के दरबार में भक्ति और उसकी उपासना व आज्ञा पालन के कारण लोगों पर अभिमान व सत्कार करो। निसंदेह इंसान की प्रतिष्ठा व सम्मान से परे है कि वह इस दुनिया की माद्दी व ज़ाहिरी चीज़ों के कारण दूसरों पर गर्व व सत्कार करे। विशेष कर उन लोगों पर जो इन चीज़ों से वंचित हों।
क़ुरआने करीम ने इस पड़ाव को माल व दौलत और औलाद की अधिकता का वर्णन किया है।
निसंदेह अगर यह संबंध और प्यार , ईमान और तक़वा के ज़रिये संतुलित न हो तो इंसान क़ारून की तरह घमंड में चूर , लालच और कंजूसी का ऐसा केन्द्र बन जायेगा जिससे उसकी दुनिया व आख़ेरत ख़राब हो जायेगी।
इंसान को माल और औलाद के ज़रिये ईश्वर की सहायता से अपने कमाल के रास्ते की रक्षा करनी चाहिये और अल्लाह के अहकाम की बुनियाद पर माल व दौलत की उसकी राह में ख़र्च करना चाहिये। और नस्ल के प्रशिक्षण के लिये ईश्वर से मार्गदर्शन हासिल करना चाहिये और नेक , प्रतिष्ठित और सम्मानित औलाद समाज के हवाले करनी चाहिये।
बहरहाल अगर यह पाँचों पड़ाव ईश्वर पर भरोसा करते हुए और हमदर्द प्रशिक्षकों के मार्गदर्शक से , तय कर ले तो आख़िरत में तौबा और अल्लाह की ख़ुशी का सबब क़रार पायेगा लेकिन अगर अहंकारी और घमंडी हो जाये तो आरम्भ में हरे भरे जंगल की तरह है जो इंसान में शुरु में अच्छा लगता है परन्तु अंत में पीली और सुखी हुई घास के सिवा कुछ नही होता। जिसको जलाने के अलावा की और चारा नही है। जैसा कि ख़ुदा वंदे आलम ने इस आय ए करीमा के आख़िर में इस हक़ीक़त की तरफ़ इशारा करते हुए फ़रमाया है:
اعلموا انما الحیاة الدنیا لعب و لھو و زینة و تفاخر بینکم و تکاثر فی الاموال والاولاد کمثل غیث اعجب الکفار نباتہ ثم یھیج فتراہ مصفرا ثم یکون حطاما و فی الآخرة عذاب شدید و مغفرة من اللہ و رضوان و ما الحیاة الدینا الا متاع الغرور “ ۔ ।
याद रखो कि दुनिया का यह जीवन केवल एक खेल , तमाशा , सजना संवरना , गर्व व अभिमान और माल व दौलत की अधिकता का मुक़ाबला है और बस , जैसे कोई बारिश हो जिसमें पैदावार को ज़्यादा होना किसान को प्रसन्न कर दे और उसके बाद वह खेती सूख जाये और फिर तुम उसे पीला देखो और आख़िर में वह रेज़ा रेज़ा हो कर बिखर जाये और आख़िरत में कठोर सज़ा भी है और ईश्वर को ओर से क्षमा और ख़ुशी भी है।
लेखन
उस्ताद हुसैन अंसारीयान
स्रोत सूची
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