हेमफरे के ऐतेराफात

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फेहरिस्त

पेश लफ्ज़ 3

हुकूमते बरतानिया की फ़िक्रमन्दी 3

लंदन 25

बसरा 35

लंदन से ख़त 59

मेरी इराक़ की रिपोर्ट 72

इस्लाम की नाबूदी का मंसूबा 111


पेश लफ्ज़

यह किताब एक बर्तानवी जासूस मिस्टर हमफ़रे की याद दाश्तों का मजमूआ है। यह याद्दाश्त जब दूसरी आलमगीर जंग के दौरान जर्मनों के हाथों लगीं तो उन्हें ऐ जर्मन रिसाले स्पीगल में इसकी क़िस्तवार शाया करके बर्तानवी इस्तेअमार को ख़ूब ख़ूब रुस्वा किया। स्पीगल के बाद जब एक फ्रांसीसी रिसाले ने इन याद्दाश्तों को शाया किया और एक लेबनानी दानिश्वर ने इनका मुतालिआ किया तो उन्होंने उनको अवाम के फ़ायदे के लिये अरबी में छापा दिया और अब हम इन्हुों याद्दाश्तों का उर्दू से हिन्दी तर्जुमा आप तक पहुंचा रहे हैं ताकि आप बर्तानवी सामराज की तरफ़ से इस्लाम और मुसलमानों के ख़िलाफ होने वाली दो सौ साला पूरानी साज़िश से बाख़बर हो सकें।

यह वही बर्तानवी सामराज है , जिसने अपनी इस्लाम दुश्मनी की तस्कीन के लिये मशरिक़े वुस्ता में इस्राईल को वुजूद दिया। जिस तरह रुसी सामराज ने ख़लील में बहाई मस्लक की बुनियाद डाली थी , उसी तरह इस सामराज ने भी बर्रेसग़ीर में क़ादयानी मज़हब की बुनियाद रखी और सूडान में महदियत का फ़ितना खड़ा किया।

मुद्दतों हुकूमते बरतानिया अपनी अज़ीम और मुस्तहकम नौ आबादी के बारे में फ़िकमन्दी और उसकी सल्तनत के हुदूद ने इतनी वुसअ़त इख़्तियार की कि अब वहाँ सूरज भी गुरुब नहीं होता था लेकिन हिन्दुस्तान चीन और मशि्रक़ी वुस्ता के मुमालिक और दीगर बेशुमार नौ आबादियों के होते हुए भी ज़ज़ीरए बरतानिया बहुत छोटा दिखायी देता था। हुकूमते बरतानिया की सामराजी पालिसी भी हर मुल्क में यकसाँ नौइयत की नहीं है। बाज़ मुमालिक में अनाने हुकूमत ज़ाहिरन वहाँ के लोगों के हाथ में है लेकिन दरपरदा पूरा सामराजी निज़ाम कार फ़रमा है और अब इसमें कोई क़सर बाक़ी नहीं है कि वह मुमलिक अपनी ज़ाहिरी आज़ादी खोकर बरतानिया की गोद में चले आयें। अब हम पर लाज़िम है कि हम अपने नौ आबादयाती निज़ाम पर नज़रे सानी करें और ख़ास तौर से दो बातों पर लाज़िमी तवज्जोह दें

1. ऐसी तदाबीर इख़्तियार करें जो सल्तनते इंग्लिस्तान की नौ आबादियों में उसके अमल और कब्जे को मुस्तहाम करें।

2. ऐसे प्रोग्राम मुरत्तब करें जिनसे उन इलाकों पर हमारा असर रुसूख़ कायम हो जो अभी हमारे नौ आबादयाती निज़ाम का शिकार नहीं हुए हैं।

इंग्लिस्तान की नौ आबादियती इलाकों की विज़ारत ने मज़कूरा प्रोग्रामों को रव्वये अमल लाने के लिये इस बात की ज़रुरत महसूस की कि वह नौ आबादियाती या नीम आबादियाती इलाक़ों की विज़ारत में मुलाज़िमात के शुरु ही से हुस्ने कारकर्दगी का मुज़ाहिरा किया। ख़ास तौर पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अहद की जांच पड़ताल के सिलसिले में अच्छी कारकर्दगी ने मुझे विज़ारते ख़ज़ाना में एक अच्छे ओहदे पर फ़ाएज़ किया। यह कम्पनी बज़ाहिर तिजारती नौइयत की थी मगर दरहक़ीक़त जासूसी का अड्डा था और उसके क़याम का मक़सद हिन्दुस्तान में उन सूरतों या उन रास्तों की तलाश थी जिनके ज़रीए इस सरज़मीन पर मुकम्मल तौर पर मरतानिया का असरो नुफूज़ क़ायम हो सके और मशरिक़े वुस्ता पर उसकी गिरफ़्त मज़बूत हकी जा सके।

इन दिनों इंगिस्तान की हुकुमत हिन्दुस्तान से बड़ी मुतमइन और बेफ़िक्र थी क्योंकि क़ौमी , क़बाएली़ , मज़हबी ओर सक़ाफ़ती इख़्तिलाफ़ात मशरिक़े वुस्ता के रहने वालों को इस बात की फुरसत ही कहाँ देते थे कि वह इंग्लिस्तान के जाएजे असर व रुसूख़ के ख़िलाफ कोई शूरिश बरपा कर सकें। यही हाल चीन की सरज़मीन का भी था। बुध और कनफ़्यूशस जैसे मुर्दा मज़ाहिब के पैरोकारों की तरफ से भी अंग्रेंजी को कोई ख़तरा लाहक नहीं था और हिन्दु चीन में कसरत से बाहमी बुनयादी इख्तिलाफ़ात के पेशे नज़र यह बात बईद अज़ क़यास थी कि वहाँ के रहने वालों को अपनी आज़ादी और इस्तिक़लाल की फ़िक्र हो। यही वह एक मौजू था जो कभी उनके लिये काबिले तवज्जोह नहीं रहा। ताहम यह सोचना भी गैर दानिशमन्दी है कि आईन्दा के पेशे नज़र इन्किलाबात भी उन कौमों को अपनी तरफ़ मुतवज्जेह नहीं करेंगे। पस यह बात सामने आयी कि ऐसी तदाबीर इख़्तियार की जायें जिनसे उन क़ौमों में बेदारी की सलाहियत ही मफ़कूद हो जाये। यह तदाबीर तवीलुल मीआद प्रोग्रामों की सूरत में उन सरज़मीनों पर जारी हुऐ तो तमाम इफ़्तिराक़ , जिहालत , बीमारी और गुरबत की बुनियाद पर इस्तेवार थे। हमने उन इलाकों के लोगों पर उन मुसीबतों और बदबख़्तियों को वारिद करते हुए बुध तक की इस ज़र्बुल मसल को अपनाया जिसमें कहा गया हैः

“ बीमार को उसको अपने हाल पर छोड़ दो और सब्र का दामन हाथ से न जाने दो बिल आख़िर वह दावा को पूरी कड़वाहट के बावजूद पसन्द करने लगेगा।

हमने बावजूद उसके कि अपने दूसरे बीमार यानी सल्तनते उस्मानी से कई क़रारदादों पर अपने फ़ायदे में दस्तख़त करवा लिये थे ता हम नौ आबादियातदी इलाक़ों की विज़ारत के माहिरीन का कहना था कि एक सदी के अन्दर ही इस सल्तनत का पल्ला बैठ सकता है। हमने इसी तरह ईरान में उस्मानियों और उसी तरह ईरानियों के ज़ेरे असर सरगर्म अमल रहे और बावजूद उसके कि उन्होंने अंग्रेज़ी हुकूमत के मक़ासिद में नुमायाँ कामयाबियाँ हासिल की और दफ्तरों के निज़ाम को बिगाड़ कर रिश्वत सतानी आम कर दी , बादशाहों के लिये ऐशो इशरत के सामान फ़राहम किये और इस तरह उन हुकूमतों की बुनियादों को किसी हद तक पहले से ज़्यादा मुतज़लज़ल किया तो हम उस्मानी और ईरानी सल्तनतों की कमज़ोरी को सामने रखते हुए भी ज़ैल में बयान किये जाने वाले बाज़ वुजूहात की बिना पर हम अपने हक़ में कुछ ज्यादा मुतमइन नहीं थे और वह अहम तरीन वुजुहात यह थेः

1- लोगों में इस्लाम की हक़ीकी रुह का असरो नुफ़ूज़ जिसने उन्हें बहादुर , बेबाक और पुरअज़्म बना दिया था और यह कहना बेजा न होगा कि एक आम मुसलमान , मज़हबी बुनियादों पर एक पादरी का हम पल्ला था। यह लोग किसी सूरत भी अपने मज़हब से दस्तबदार नहीं होते थे। मुसलमानों मे शिया मज़हब के पैरोकार जिनका तअल्लुक ईरान की सरज़मीन से है , अक़ीदे और ईमान के एतेबार से ज्यादा मुहकम और ज़्यादा ख़तरनाक वाके़अ हुए हैं।

शिया हज़रात ईसाईयों को नाजिस और काफ़िर मुतलक समझते हैं। (यह इल्ज़ाम सरासर बेबुनियाद है और बेएतबार इस्लाम तमाम अहले किताब साहिबान हैः) उनके नज़दीक एक ईसाई ऐसी मुतअफ़्फन ग़िलाज़त है की हैसियत रखता है जिसे अपने दरमियान से हटाना हर मुसलमान के लिये ज़रुरी है। एक दफा मैंने एक मुसलमान शिया से पूछाः-

“ तुम लोग नसारा को हिक़ारत की निगाह से क्यों देखते हो हालांकि वह लोग खुदा , रसूल और रोज़े क़यामत पर ईमान रख़ते हैं। ?”

उसने जवाब दियाः

हज़रत मौहम्मद स 0अ 0 साहिब इल्म और साहिबे हिकमत पैग़म्बर थे और वह चाहते थे कि इस अन्दाज़ से काफ़िरों पर दबाव डालें कि वह दीने इस्लाम कुबूल करने पर मजबूर हो जायें। “ सियासी मैदान में भी जब कभी हुकुमतों को किसी फ़र्द या गिरोह से खटका होता है तो वह अपने हरीफ़ पर सख्तियाँ करती हैं और उसे रास्ते से हटने पर मजबूर करती हैं ताकि बिल आख़िर वह अपनी मुख़ालिफ़तों से बाज़ आ जाये और अपना सरे तस्लीम ख़म कर दे। ईसाईयों के नजिस और नापाक होने से मुराद उनकी ज़ाहिरी नापाकी नहीं बल्कि बातिनी नापाकी है और यह बात सिर्फ़ ईसाईयों तक महदूद नहीं है बल्कि इस में ज़र्द तशती भी शामिल हैं जो क़ौमी एतेबार से ईरानी है , इस्लाम उन्हें भी “ नापाक ” समझता है।

मैंने कहा।

अच्छा मगर ईसाई तो ख़ुदा , रसूल और आखि़रत पर ईमान रखते हैं।

उसने जवाब दियाः

हमारे पास उन्हें काफ़िर और नाजिस गरदान्ने के लिये दो दलीले हैं। पहली दलील तो यह है कि रसूले अकरम स 0अ 0 को नहीं मानते और कहते हैं मोहम्मद स 0अ 0 (नअूज़ोबिल्लाह) झूठे हैं। हम भी उनके जवाब में कहते हैं कि तुम लोग नापाक और नाजिस हो और यह तअल्लुक़ अक़्ल की बुनियाद पर हैं क्योंकि जो तुम्हें दुख पहुँचाये तुम भी उसे तकलीफ दो।

दूसरे यह कि ईसाई अम्बिया-ए-मुरसलीन अ 0स 0 पर झूठी तोहमतें बांधते हैं जो खुद एक ब़डा गुनाह और उनकी बे-हुरमती है , मसलन कहते हैं

हज़रते ईसा अ 0स 0 (नअूज़ो बिल्लाह) शराब पीते थे , इसलिए लानते इलाही में गिरफ़्तार हुए और उन्हें सूली दी गयी।

मुझे इस बात पर ब़डा ताव आया और मैंने कहाः

“ ईसाई हरगिज़ यह नहीं कहते। “

“ तुम नहीं जानते ” किताबे मुक़द्दस में यह तमाम तोहमतें वारिद हैं।

उसके बाद उसने कुछ नहीं कहा और मुझे यक़ीन था कि वह झूठ बोल रहा है। अगरचे मैंने सुना था कि बाज़ अफ़राद ने पैगम्बरे इस्लाम स 0अ 0 पर झूठ की निसबत दी है लेकिन मैं उससे ज़्यादा बहस नहीं करना चाहता था। मुझे खौफ़ था कि कहीं मेरा भांडा न फूट जाये और लोग मेरी असलियत से वाकिफ़ न हो जायें।

2. मज़हबे इस्लाम तारीखी पसे मन्ज़रों की बुनियाद पर एक हुर्रियत पसन्द मज़हब है और इस्लाम के सच्चे पैरोकार आसानी के साथ गुलामी कुबूल नहीं करते। उनके पूरे वजूद में गुज़श्ता अज़मतों का गुरुर समाया हुआ है यहाँ तक कि अपने इस नातवानी और पुरफुतूर दौर में भी वह उससे दस्तबरदार होने पर तैयार नहीं है। हम इस लात पर क़ादिर नहीं है कि तारीख़े इस्लाम की मन मानी तफ़सीरे पेश करके उन्हें यह बतायें कि तुम्हारी गुज़श्ता अज़मतों की कामयाबी इन हालात पर मुनहसिर थी जो इस ज़माने के तक़ाज़ा था मगर अब ज़माना बदल चुका है और नये तक़ाज़ों ने उनकी जगह ले ली है और अब गुज़श्ता दौर में वापसी ना मुमकिन है।

3. हम ईरानी और उस्मानी हुकूमतों की दूर अन्देशों , होशियारियों और कार्यवाहियों से महफूज़ नहीं थे और हर आन यह ख़टका था कि कहीं वह हमारी सामराजी पालिसियों से बाख़बर होकर हमारे किये धरे पर पानी न फेर दें। यह दोनों हुकूमतों जैसा कि पहले बयान हो चुका है बहुत कमज़ोर हो चुकी थीं और उनका असर व रुसूख़ सिर्फ़ अपनी सरज़मीन की हद तक महदूद था। वह सिर्फ़ अपने ही इलाकें में हमारे ख़िलाफ असलाह और पैसा जमा कर सकते थे ता हम उनकी बदगुमानी हमारी आईन्दा कामयाबियों के लिये अदमे इत्मिनान का सबब थी।

4. मुसलमान ओलमा भी हमारी तशवीश की बाएस थे। जामेअ़हुल अज़हर के मुफ़्ती और ईरान व ईराक़ के शिया मरोज़अ़ हमारे सामराजी मक़ासिद की राह में एक अज़ीम रुकावट थे। यह ओलामा जदीद इल्म व तमद्दुन और नये हालात से यकसर बे ख़बर थे और उनकी तनहा तवज्जोह उस जन्नत के लिये थी जिसका वादा कुरआन ने उन्हें दे रखा था। यह लोग इस कद्र मुतअस्सिब थे के अपने मौक़िफ़ से एक इंच पीछे हटने को तैयार नहीं थे। बादशाह और ओमारा समेत तमाम अफ़राद उनके आगे छोटे थे। अहले सुन्नत हज़रात शियों की निस्बत अपने ओलामा से इस क़दर खौफ़ज़दा नहीं थे और हम देखते हैं कि उस्मानी सल्तनत में बादशाह और शेखुल इस्लाम के दरमियान हमेशा खुशगवार तअल्लुक़ात बरक़रार रहे थे और ओलामा का ज़ोर सियासी हुक्काम के ज़ोर के हम पल्ला था लेकिन शीअी मुमालिक में लोग बादशहों से ज्यादा ओलामा का एहतराम करते थे। मज़हबी ओलामा से उनका लगाव एक हक़ीकी लगाव था लेकिन हुक्काम या सलातीन को वह कुछ ज़्यादा अहमियत नहीं देते थे। बहरहाल सलातीन और ओलामा की क़द्रदानी से मुतअल्लिक़ शिया और सुन्नी नज़रयात का यह फर्क नौ आलदियाती इलाकों की विज़ारत और अंग्रेजी हुकुमत की शोरिश में कमी का बाएस नहीं थी।

हमने कई बार उन मुमालिक के साथ आपस की पेचीदा दुश्वारियों को दूर करने के सिलसिले में गुफ़्तगु की लेकिन हमेशा हमारी ग़ुफ्तगु ने बदगुमानी की सूरत कारकनों की दरख्वास्तें भी साबिका मुज़ाकरात की तरह नाकाम रहीं लेकिन फिर हम ना उम्मीद नहीं हुए क्योंकि हम एक मज़बूत और पुरशकीबा क़ल्ब के मालिक हैं।

मुझे याद है कि एक दफ़ा नौ आबादियाती इलाकों के वज़ीर ने लंदन के एक मशहूर पादरी और 25 दीगर मज़हबी सरबराहों के साथ एक इजलास मुनक़्किद किया जो पूरे तीन घंटे तक जारी रहा और जब यहाँ भी कोई ख़ातिर ख़्वाह नतीजा बरामद न हो सका तो पादरी ने हाज़रीन से मुख़ातिब होकर कहाः

“ आप लोग अपनी हिम्मते पस्त न करें , सब्र और हौसले से काम लें , ईसाईयत तीन सौ साल की ज़हमतों और दरबदरी के साथ हज़रते ईसा अ 0स 0 और उनके पारवकारों की शहादत के बाद आलमगीर हुई। मुमकीन है आईन्दा हज़रत ईसा अ 0स 0 की नज़रे इनायत हम पर हो और हम तीन सौ साल बाद काफ़िरों को निकालने में कामयाब हों। पस हम पर लाज़िम है कि हम अपने आपको मोहकम ईमान और पायदार सब्र से मुज़य्यन करें और उन तमाम वसाएल को बरोए कार लायें जो मुसलमान ख़ित्तों में ईसाइयत की तरवीज का सबब हों। अगर उसमें हमें सदियों का अरसा भी गुज़़र जाये तो घबराने की कोई बात नहीं , आबाओ अजदाद अपनी औलाद के लिये बीज बोते हैं। “

एक दफ़ा फिर नौ आबादयाती इलाकों की विज़ारत में रुस फ्रांस और बरतानिया के आला रुत्बा नुमाईन्दों पर मबनी कान्फ्रेन्स का इनइक़ाद हुआ। कान्फ्रेंस के शुराका में सियासी वुफूद , मज़हबी शख़्सियतें और दीगर मशहूर हस्तियाँ शामिल थीं। हु्स्ने इत्तेफाक़ से मैं भी वज़ीर से क़रीबी तअल्लुक़ात की बिना पर इस कान्फ्रेन्स में शरीक था। मौजूए गुफ़्तगू इस्लामी मुमालिक में सामराजी निज़ाम की तरवीज और उसमें पेश आने वाली दुश्वारियाँ थी।

शोरका का ग़ौरो फ़िक्र इस बात में था कि हम किस तरह मुस्लिम ताक़तों को दरहम बरहम कर सकते हैं और उनके दरमियान निफ़ाक़ का बीज बो सकते हैं। गुफ़्तगू उनके ईमान के तज़लजुल के सिलसिले में थी। बाज़ लोगों का ख़्याल था कि मुसलमानों के इसी तरह राहे रास्ते पर लाया जा सकता है जिस तरह स्पेन कई सदियों के बाद ईसाईयों की आगोश में चला आया था। क्या यह वही मुल्क नहीं था जिसे वहशी मुसलमानों ने फ़तह किया था ? कान्फ्रेंस के नताएज ज़्यादा वाज़ेह नहीं थे। मैंने उस कान्फ्रेंस में पेश आने वाले तमाम वाकिआत को अपनी किताब “ अज़ीम मसीह की सिम्त एक परवाज़ ” में ब्यान कर दिया है।

हकीक़तन मशरिक़ से मग़रिब तक फैलाव रखने वाले अज़ीम और तनावुर दरख़्त की जडों को काटना इतना आसान काम नहीं। फिर भी हमें हर क़ीमत पर उन दुश्वारियों का मुक़ाबला करना हैं क्योंकि ईसाई मज़हब उसी वक़्त कामयाब हो सकता है जब सारी दुनिया उसके कब्जे में आ जाये। हज़रते ईसा अ 0स 0 ने अपने सच्चे पैरवकारों को इस जहाँगीरी की बशारत दी है। हज़रत मोहम्मद स 0अ 0 की कामयाबी उन इजतिमाअ़ी और तारीख़ी हालात से वाबस्ता थी जो उस दौर का तक़ाज़ा था। ईरान व रोम से वाबस्ता मशरिकों मगरिब की सल्तनतों का इन्हितात इस्ल बहुत कम अरसे में हज़रत मोहम्मद स 0अ 0 की कामयाबी का सबब बना। मुसलमानों ने उन अज़ीम सल्तनतों को ज़ेर किया मगर अब हालात बिल्कुल मुख़तलिफ़ हो चुके हैं और इस्लामी मुमालिक बड़ी तेज़ी से रुबा ज़वाल है और उसके मुकाबले में ईसाई रोज़ बरोज़ तरक़्की की राह पर गामज़न हैं। अब वह वक़्त आ गया है कि ईसाई मुसलमानों से अपना बदला चुकायें और अपनी खोयी हुई अज़मत दोबारा हासिल करें। इस वक़्त सबसे ब़ड़ी ईसाई हुकूमत अज़ीम बरतानिया के हाथ में है जो दुनिया के तूलो अर्ज़ में अपना सिक्का जमाये हुए है और अब चाहता है कि इस्लामी मुमलिकतों से नबरुद आज़मायी का परचम भी उसी के हाथ में हो।
सन् 1710 0 में इंग्लिस्तान की नौ आबदियाती इलाकों की विज़ारत ने मुझे मिस्र , ईरान , हिजाज़ , और उस्मानी ख़िलाफत के मरकज़ इस्तम्बूल (आज का इस्तम्बूल उस वक़्त का कुस्तुनतुनिया था) की जासूसी पर मामूर किया। मुझे उन इलाकों में वह राहें तलाश करनी थीं जिनसे मुसलमानों को दरहम बरहम करके मुस्लिम मुमालिक में सामराजी निज़ाम राएज किया जा सके। मेरे साथ नौ आबदियाती इलाकों की विज़ारत के नौ और बेहतरीन तजुर्बेकार जासूस इस्लामी मुमालिक में इस काम पर मामूर थे और बड़ी तुन्दही से अंग्रेज़ी साम्राजी निज़ाम के तसल्लुत और नौ आबादियाती इलाकों में अपने असर व नुफूज़ के इस्तिहकाम के लिये सरगर्म अमल थे। उन वुफूद को वाफ़र मिक़दार में सरमाया फ़राहम किया गया था। यह लोग बड़े मुरत्तब शुदा नक्श़े और बिल्कुल नई और ताज़ा इत्तेलाआत से बहरामंद थे। उनको उमरा , वुज़रा , हुकूमत के आला ओहदेदारों और ओलामा व रोअसा के नामों की मुकम्मल फ़हरिस्त दी गयी थी। नौ आबदियाती इलाकों के मुआवन वज़ीर ने हमें रवाना करते हुए ख़ुदा हाफिज़ी के वक़्त जो बात कही , वह आज भी मुझे अच्छी तरह याद है। उसने कहा थाः

“ तुम्हारी कामयाबी हमारे मुल्क के मुस्तक़बिल की आईनादार होगी लिहाज़ा अपनी तमाम कुव्वतों को बरुए कार लाओ ताकि कामयाबी तुम्हारे क़दम चूमे। ”

मैं खुशी खुशी बहरी जहाज़ के ज़रीए इस्तम्बूल के लिए रवाना हुआ। मेरे जिम्मे अब दो अहम काम थे। पहले तुर्की ज़बान पर उबूर हासिल करना जो उन दिनों वहाँ की क़ौमी ज़बान थी मैने लन्दन में तुर्की ज़बान के चन्द अल्फाज़ सीख लिये थे। उसके बाद मुझे अरबी ज़बान , कुरआन , उसकी तफ़सीर औऱ फिर फ़ारसी सीखना थी। यहाँ पर यह बात भी क़ाबिले ज़िक्र है कि किसी ज़बान का सीखना और अदबी क़वाएद , फ़साहत और महारत के एतेबार से इस पर पूरी दस्तर्स रखना दो मुख़तलिफ़ चीज़ें हैं। मुझे यह ज़िम्मेदारी सौंपी गयी थी कि मैं उन ज़बानों में ऐसी महारत हासिल करुँ कि मुझमें और वहाँ के लोगों में ज़बान के एतेबार से कोई फर्क़ महसूस न हो। किसी ज़बान को एक दो साल में सिखाया जा सकता है लेकिन उस पर उबूर हासिल करने के लिये बरसों का वक़्त दरकरार होता है मैं इस बात पर मजबूर था कि उन ग़ैर मुल्की ज़बानों को इस तरह सीख़ूँ कि उसके क़वाएद व रुमूज़ का कोई नुकतए फ़र्द गुज़ाश्त न हो और कोई मेरे तुर्क ईरानी या अरब होने पर शक न करे।

उन तमाम मुशकिलात के बावजूद मैं अपनी कामयाबी के सिलसिले में हरासाँ नहीं था क्योंकि मैं मुसलमानों की तबीयत से वाकिफ़ था और जानता था कि उनकी कुशादा क़लबी , हुस्ने ज़न और मेहमान नवाज़ तबीयत जो उन्हें कुरआन व सुन्नत से विरसे में मिली थी उन्हें ईसाईयों की तरह बदगुमानी और बदबीनी पर महमूल नहीं करगी और फिर दूसरी तरफ से अस्मानी हुकूमत ग़ैर मुल्की जासूसों की कार्रवाईयों मालूम करने को कोई ज़रीआ नहीं था और ऐसा कोई इदारा मौजूद नहीं था जो हुकूमत को उन ना मतलूब अनासिर से बा ख़बर कर सके। फ़रमान रवा और उसके मुसाहिबीन पूरे तौर पर कमज़ोर हो चुके थे।

कई महीने के थका देने वाले सफ़र के बाद आख़िरकार हम उस्मानी दारुल ख़िलाफा पहुँचे। जहाज़ से उतरने से क़ब्ल मैने अपने लिये “ मोहम्मद ” का नाम तजवीज़ किया और जब मैं शहर की जामे मस्जिद में दाख़िल हुआ तो वहाँ लोगों के इजतिमाआ़त नज़्मों ज़ब्त और सफ़ाई सुथरायी देखकर महजूज़ हुआ और दिल ही दिल में कहाः आख़िर क्यों हम उन पाक दिल अफ़राद के आज़ार के दरपे हैं ? और क्यों उनसे उनकी आसाईश छीनने पर तुले हुए हैं ? क्या हज़रते ईसा अ 0स 0 ने उस किस्म के नाशाइस्ता उमूर की तजवीज़ दी है ? लेकिन फौरऩ लेकिन फ़ौरन ही मैंने उन शैतानी वसवसों और बातिल ख़यालात को ज़हन से झटक कर इस्तिग़फार किया और मुझे ख़याल आया कि मैं तो बरतानिया उज़मा की नौ आबादियती विज़ारत का मुलाजिम हूँ और मुझे अपने फ़राएज़ दियानतदारी से अंजाम देने चाहिये और मुँह से लगाये हुए सागर को आख़िरी घूंट तक पी जाती है।

शहर में दाख़िला के फ़ौरन बाद ही मेरी मुलाक़ात अहले तसन्नुन के एक बूढे पेशवा से हुई। उसका नाम अहमद आफ़िन्दी थी। वह एक बरजस्ता , साहिबे फ़ज़्ल और नेक तीनत आलिम था। मैंने अपने पादरियों में ऐसी बुजुर्गवार हस्ती नहीं देखी थी । वह दिन रात इबादत में मशगूल रहता था और बुजुर्गों और बरतरी में हज़रत मोहम्मद स 0अ 0 की मानिन्द था। वह रसूले खुदा स 0अ 0 को इन्सानियत को मज़हरे कामिल समझता था और आप स 0अ 0 की सुन्नत को अपनी ज़िन्दगी का मुतमह नज़र बनाये हुए था। हज़रत मोहम्मद स 0अ 0 का नाम आते ही उसकी आँखों से आँसुओं की झड़ी लग जाती थी। शेख़ के साथ मुलाक़ात में मेरी एक खुश नसीबी यह भी थी कि उसने मुझसे एक दफ़ा ही हस्बो नस्ब और ख़ानदान के बारे में सवाल नहीं किया ओर हमेशा मुझे मोहम्मद आफ़िन्दी के नाम से पुकारता था। जो कुछ मैं उससे पूछता था बड़े विकार और शराफत से जवाब देता था ओर मुझे बहुत चाहता था। खास तौर से जब उसे मालूम हुआ कि मैं ग़रीबुल वतन हूँ और उस अस्मानी सल्तनत के लिये काम कर रहा हूँ जो पैग़म्बर स 0अ 0 की जानशीन है तो मुझ पर और भी मेहरबान हो गया (यह वह झूठ था जो मैंने इस्तम्बूल में अपने क़याम की तौज़ह ब्यान करते हुए शेख़ के सामने बोला था)।

उसके अलावा मैंने शेख़ से यह भी कहा था कि मैं बिना माँ बाप का एक नौजवान हूँ। मेरे कोई बहन भाई नहीं है। मैं बिल्कुल अकेला हूँ लेकिन मेरे वालिदेन ने विरसे में मेरे लिये बहुत कुछ छोड़ा है। मैने इरादा किया है कि कुरआन और तुरकी और अरबी ज़बान सीखने के लिये इस्लाम के मरकज़ यानी इस्तम्बूल का सफ़र इख़्तियार करुँ और फिर दीनी और मअ़नवी सरमाया के हुसूल के बाद माद्दी कारोबार में पैसा लगाऊँ। शेख़ अहमद ने मुझे मुबारकबाद दी और चंद बातें कहीं जिन्हें मैं अपनी नोट बुक से यहाँ नक़्ल कर रहा हूँः-

ऐ नौजवान मुझ पर तुम्हारी पिज़ीराई और एहतेराम कई वुजूहात की बिना पर लाज़िम है और वह वुजूहात यह हैः

1- तुम एक मुसलमान हो और मुसलमान आपस में भाई भाई हैं। (हदीस)

2- तुम हमारे शहर में मेहमान हो और पैग़म्बरे इस्लाम स 0अ 0 का इरशाद हैः मेहमान को मोहतरम जानो। (हदीस)

3- तुम तालिबे इल्म हो और इस्लाम ने तालिबे इल्म के एहतेराम का हुक्म दिया है। तुम हलाल रोज़ी कमाना चाहते हो और उस पर “ कारोबार करने वाला अल्लाह का दोस्त है ” की हदीस सादिक आती है। (हदीस)

इस पहली मुलाक़ात ही में शेख ने अपने आला ख़साएल की बुनियाद पर मुझे अपना गिरवीदा बना लिया था। मैंने अपने दिल में कहाः काश ईसाइयत भी उन आशकार हकीक़तों से आशना होती लेकिन दूसरी तरफ में यह देख रहा था कि इस्लामी शरीअ़त इतनी बलन्द निगाही और बलन्द मक़ामी के बावजूद रूबा ज़वाल हो रही थी और इस्लामी हुक्मरानों की नालायकी , जूल्म ओ सितम , बद अतवारी और फिर ओलामाए दीन का तअस्सुब और दुनिया के हालात से उनकी बेख़बरी उन्हें यह दिन दिखा रही थी। मैंने शेख से कहाः

“ अगर आप की इजाज़त हो तो मैं आपसे अरबी ज़बान और कुरआन मजीद सीखने का ख़्वाहिशमंद हों। ”

शेख़ ने मेरी हिम्मत अफ़ज़ाई की और मेरी ख़्वाहिश का इस्तिक़बाल कि और सूरए हम्द को मेरे लसिये पहला सबक़ कत़रार दिया और बड़ी गरमजोशी के साथ आयतों की तफ़सीरों तावील पेश की। मेरे लिये बहुत से अरबी अल्फाज़ के तलफ्फ़ुज़ दुश्वार थे और कभी यह दुश्वारी बहुत बढ़ जाती थी। वह बार बार मुझसे कहता था कि मैं अरबी इबारत इस तरह तुम्हें नहीं सिखाऊँगा तुम्हें हर मुश्किल लफ़्ज़ को दस मर्तबा तकरार करना होगा ताकि अल्फ़ाज़ तुम्हारे ज़हन नशीन हो जायें

शेख़ ने मुझे हुरुफ़ को एक दूसरे से मिलाने के तरीके सिखाये। मुझे कुरआन की तजवीद ओ तफ़सीर सीखने में दो साल का अरसा लगा। दर्श शुरु करने से पहले वह खुद भी वुजू करता था और मुझे भी वुज़ू करने का हुक्म देता था। फिर हम क़िब्ला रुख़ बैठ जाते थे और दर्स का आगाज़ होता था। यह बात भी क़ाबिले ज़िक्र है कि इस्लाम में आज़ा को एक ख़ास तरतीब से धोने का नाम वुज़ू है। इब्तिदा में मुंह धोया जाता है। फिर पहले सीधे हाथ को उंगलियों और बाद में उल्टे हाथ से कुहनी तक धोया जाता है। उसके बाद सर , गर्दन और कानों के पिछले हिस्से का मसह किया जाता है और आख़िर में पैर धोये जाते हैं।

वुजू करते वक़्त कुल्ली करना और नाक में पाना चढ़ाना मुस्तहिब है। आदाबे वुजू से पहले एक खुश्क लकडी से दांतों का मिसवाक जो वहाँ की रस्म थी मेरे लिये बहुत नागवार थी और मैं समझता था कि यह खुश्क लकड़ी दांतों और मसूढ़ों के लिये इन्तिहाई नुक़सान देह है। कबी कभी मेरे मसूढ़ों से खून भी जारी हो जाता था मगर मैं ऐसा करने पर मजबूर था क्योंकि वुजू से पहले मिसवाक़ करना सुन्नते मुवक्किदा है और उसके लिये बहुत सवाब और फज़ीलत बयान की गयी है।

मैं इस्तमबूल में क़याम के दैरान रातों को एक मस्जिद में सो रहा था और उसके इवज़ वहाँ ख़ादिम को जिस का नाम मरवान आफिन्दी था कुछ रक़म दे देता था। वह एक बद इख़्लाक , गुस्सेवर शख्स था और अपने आपको पैग़म्बरे इस्लाम स 0अ 0 के एक सहाबी का हमनाम समझता था और उस नाम पर बड़ा मुफ़तख़र था। एक बार उसने मुझसे कहाः

“ अगर कभी ख़ुदा ने तुम्हें साहिबे औलाद किया तो ”

तुम अपने बेटे का नाम मरवान रखना क्योंकि इसका शुमार इस्लाम के अज़ीम मुजाहिदों में होता है।

रात का खाना मैं खादिम के साथ खाता था और जुमे का तमाम दिन जो मुसलमानों की ईद और छुट्टी का दिन था ख़ादिम के साथ गुज़ारता था। हफ़्ते के बाक़ी दिन एक बढ़ई की शागिर्द में काम करता था और वहाँ से मुझे एक हक़ीर सी रक़म मिल जाया करती थी। आधा दिन काम करता था क्योंकि शाम को मुझे शेख़ दर्स लेना होता था इसलिए मेरी दिहाड़ी भी आधी होती थी उस पर बढ़ई का नाम ख़ालिद था। दोपहर को खाने के वक़्त वह हमेशा फ़ातिहे इस्लाम “ ख़ालिद बिन वलीद ” का तज़कीरा करता था और उसके फ़ज़ाएल व मनाक़िब बयान करता था और उसे उन असहाबे पैग़म्बर स 0अ 0 में गरदान्ता था जिनके हाथों मुख़ालिफ़ीने इस्लाम ने हज़ीमत उठायी। हर चंद हज़रते उमर से उसके तअल्लुक़ात कुछ ज़्यादा इस्तिवार न थे और उसे यह खटका था कि अगर ख़िलाफत उन्हें मिली तो वह उसे मअ़जूल कर देंगे और ऐसा ही हुआ।

लेकिन ख़ालिद बढ़ई अच्छे किरदार का हामिल न था ता हम अपने दीगर शागिर्दों से कुछ ज़्यादा ही मुझ पर मेहरबान था जिसका सबब मुझे अब तक मालूम न हो सका। शायद इसलिए कि बग़ैर लैतो लअ़ल के उसके हर काम को बजा लाता था और उससे मज़हबी उमूर या अपने काम के बारे में किसी किस्स का कोई बहस व मुबाहिसा नहीं करता था। कई बार दुकान ख़ाली होने पर मैंने महसूस किया कि वह मुझे अच्छी नज़रों से नहीं देख रहा है। शेख अहमद ने मुझसे कहा था कि इक़लाम (बद फेअ़ली) इस्लाम में बहुत बड़ा गुनाह है लेकिन फिर भी ख़ालिद मुझसे इस फेल के इरतिकाब पर मुसिर था।

वह दीन ओर दिनयात का ज़्यादा पाबन्द नहीं था और दरहक़ीकत सही अक़ीदे और सही ईमान का आदमी नहीं था। वह सिर्फ़ जुमे के जुमा नमाज़ पढ़ने मस्जिद में जाया करता था और बाक़ी दिनों में उसका नमाज़ पढ़ना मुझ पर साबित नहीं था बहरहाल मैंने उसकी इस बेशर्माना तरग़ीब को रद किया लेकिन कुछ दिनों बाद उसने यह फेल शफ़ीअ़ अपनी दुकान के एक और ख़बरु कारीगर के साथ अंजाम दिया जो अभी नौ मुस्लिम था और यहूदियत से इस्लाम में वारिद हुआ था।

मैं रोज़ाना बढ़ई की दुकान में दोपहर का खाना खाकर ज़ोहर की नमाज़ के लिये मस्जिद में चला जाया करता था और वहाँ नमाज़े अस्र तक रहता था। अस्र की नमाज़ से फ़ारिग़ होकर शेख़ अहमद के घर जाया करता था और वह दो घंटे कुरआन ख़्वानी में सर्फ़ करता था। कुरआन के अलावा अरबी और तुरकी ज़बान भी सीखता था और हर जुमे को हफ़्ते भर की दिहाड़ी ज़कात के उनवान से शेख़ अहमद के हवाले करता था और यह ज़कात दर हक़ीक़त शेख़ से मेरी इदारत और लगाव का एक नज़राना और शेख़ के दर्स कुरआन का एक हक़ीर सा हक़्कुल ज़हमा था। कुरआन की तालीम में शेख़ ता तर्ज़ दर्स बे नज़ीर नौइयत का था। उसके अलावा वह मुझे इस्लामी एहकाम का मुबादियात अरबी और तुर्की ज़बान में सिखाता था।

जब शेख को मालूम हुआ कि मैं ग़ैर शादी शुदा हूँ तो उसने मुझे शादी का मशवरा दिया और अपनी बेटी मेरे लिये मुन्तख़ब की लेकिन मैंने बड़े मोअद्दिबाना से माज़िरत चाही और अपने आप को शादी के नाकाबिल ज़ाहिर किया। मैं यह मौक़िफ़ इख़्तियार करने पर मजबूर था क्योंकि शेख़ अहमद अपनी बात पर मुसिर था और हमारे तअल्लुक़ात बिगडने में कोई कसर बाक़ी नहीं रह गयी थी। शेख़ अहमद शादी को पैग़म्बरे इस्लाम स 0अ 0 की सुन्नत समझता था और इस हदीस का हवाला देता थाः

“ जो कोई मेरी सुन्नत सें एतेराज़ करे वह मुझसे नहीं है। ” (हदीस)

लेहाज़ा इस बहाने के अलावा मेरे पास और कोई चारा नहीं था। मेरे इस मसलिहत आमेज़ झूठ ने शेख़ को मुतमइन कर दिया और फिर उसने शादी से मुतअल्लिक़ कोई गुफ्तुगू नहीं की और हमारी दोस्ती फिर पहली मनज़िल पर आ गयी।

दो साल इंसतबूल में रहने ओर कुरआन समैत अरबी और तुरकी ज़बानों को सीखने के बाद मैंने शेख से वापस वतन जाने की इजाज़त चाही लेकिन शेख़ मुझे इजाज़त नहीं देता था और कहता था तुम इतनी जल्दी क्यों वापस जाना चाहते हो ? यह एक बड़ा शहर है। यहाँ तुम्हारी ज़रुरत की हर चीज़ मौजूद है। हरबनाये मशयीयते इलाही इस्तम्बूल में दीन और दुनिया दोनों दस्तयाब हैं। शेख़ ने अपनी गुफ्तुगू के दौरान कहाः

“ अब जबकि तुम अकेले हो और तुम्हारे माँ बाप ओर बहन भाई कोई नहीं तो फिर तुम इस्तम्बूल के अपना मसकन क्यों नहीं बनाते ?”

बहरहाल शेख़ को मेरे वहाँ रहने पर बड़ा इस्रार था। उसे मुझसे उनुस हो गया था। मुझे भी इससे बहुत दिलचस्पी थी मगर अपने वतन इंग्लिस्तान के बारे में मुझ पर जो जि़म्मेदारियाँ आएद थीं वह मेरे लिये सबसे ज़्यादा अहम थीं और मुझे लंदन जाने पर मजबूर कर रही थी। मेरे लिये ज़रुरी था कि मैं लंदन जाकर नौ आबादियाती इलाकों की विज़ारत को अपनी दो साला का गुज़ारी की मुकम्मल रिपोर्ट करुँ और वहाँ से नये एहकामात हासिल करुँ।

इस्तम्बूल में दो साल की रिहाइश के दौरान मुझे उस्मानी हुकूमत के हालात पर हर माह एक रिपोर्ट लंदन भेजनी पड़ती थी। मैं ने अपनी एक रिपोर्ट में बदकिरदार बढ़ई के उस वाक़िए को भी लिखा था जो मेरे साथ पेश आया था। नौ आबादियों इलाक़ों की विज़ारत ने जवाब में मुझे यह हुक्म दिया अगर तुम्हारे साथ बढ़ई का यह फेल हमारे लिये मनज़िले मक़सूद तक पहुंचने की राह को आसान बनाता है तो इस काम में कोई मज़ाइका नहीं। जब मैंने यह इबारत पढ़ी तो मेरा सर चकराने लगा और मैंने सोचा हमारे अफ़्सरान को शर्म नहीं आती कि वह हुकूमत की मसलिहतों की ख़ातिर मुझे इस बेशर्मी की तरग़ीब देते हैं। बहरहाल मेरे पास कोई चारए कार नहीं था और होठों से लगाये हुए उस कड़वे जाम को आख़िरी घूंट तक पी जाता था हम मैंने इस हुक्म का कोई नोटिस नहीं लिया और लंदन के आला ओहदेदारों की इस बेमहरी की किसी से शिकायत की। मुझे अलविदाअ कहते हुए शेख़ की आँखों में आँसू भर आये और उसने मुझे इल अल्फा़ज़ के साथ रुख़्सत किया।

“” ख़ुदा हाफ़िज़ बेटे मुझे मालूम है कि अब जब तुम लौट कर आओगे तो मुझे इस दुनिया मैं नहीं पाओगे। मुझे न भुलाना। इन्शाअल्लाह रोज़े महशर पैग़म्बरे इस्लाम स 0अ 0 के हजूर हम ऐ दूसरे से मिलेंगे। ”

दर हक़ीकत शेख़ अहमद की जुदाई से मैं एक अर्से तक आजुर्दा ख़ातिर रहा और उसके ग़म में मेरी आँखें आँसू बहाती रहीं लेकिन क्या किया जा सकता था ? फ़राएज़ की अंजाम जाते एहसासात से मावरा है।

मेरे नौ दीगर साथियों को भी लंदन वापस बुलाया गया था मगर बद क़िस्मती से उनमें से सिर्फ पांच वापस लौटे थे। बाक़ी मांदा चार अफ़राद में से एक मुसलमान हो चुका था और वहीं मिस्र मे रिहाइश पिज़ीर था। इस वाकिए को नौ आबादियाती इलाकों की विज़ारत के सेकेट्री ने मुझे बताया लेकिन वह इस बात से खुश था कि मज़कूरा शख़्स ने उनके किसी राज़ को अफ़शा नहीं किया था। दूसरा जासूस रुसी निज़ाद था और रुस पहुँचकर उसने वहीं बूदो बाश इख्तियार कर ली थी। सेकेट्री उसके बारे में बड़ा फिक्रमंद था। उसे खटका था कि कहीं यह रुसी निज़ाद जासूस जो अब अपनी सरज़मीन में पहुँच चुका है हमारे राज़ फाश न कर दे। तीसरा शख़्स बग़दाद के क़रीब वाकिअ़ “ अम्मारा ” में हैज़े से हलाक हो गया था और चौथे के बारे में कोई इत्तेला मौसूलस न हो सकी थी। नौ आबादियाती इलाकों की विज़ारत को उसके बारे में उस वक़्त तक इत्तेला रही जब तक वह यमन के पायए तख़्त “ सनआ ” में रहते हुए सलसल एक साल तक अपनी रिपोटें मज़कूरा विज़ारत को भेजता रहा लेकिन उसके बाद जब कोई इत्तेला मौसूल न हुई तो हर चंद कोशिश के बावजूद नौ आबदयिती इलाक़ों की विज़ारत को उसका कोई निशान न मिल सका। हुकूमत एक ज़बरदस्त जासूसों की गुमशुदगी के नताएज से अच्छी तरह बाख़बर थी यह हर मुलाज़िम के काम की अहमियत को बड़़ी बीरकी के साथ जांचती थी और दर हक़ीकत इस तरह के मुलाज़िम में किसी मिलाज़िम की गुमशुदगी इस सामराजी हुकूमत के लिये तशवीशनाक थी जो इस्लामी मुमालिक में उज़्र मचाने ज़ेर करने की इस्कीमों की तैयारी में मसरुफ हो।

हमारा तअ़ल्लुक़ एक ऐसी क़ौम से है जो आबादी के एतेबार से कम होने के साथ बड़ी अहम जि़म्मेदारियों का बोझ सहार रही हैं और तज्रुबेकार अफ़राद की कमी यक़ीनन हमारे लिये शदीद नुक़्सान का बाअिस थी।

सिक्रेट्री ने मेरी आख़िरी रिपोर्ट के अहम हिस्सों के मुतलिए के बाद मुझे इस कान्फ्रेंस में शिरकत की हिदायत की जिसमें लंदन बुलाये गये पांच जासूसों की रिपोर्ट सुनी जाने वाली थीं। इस कान्फ्रेंस में जो वज़ीर ख़ारजा की सदारत में हो रही थी नौ आबादियाती विज़ारत के आला ओहदेदार शिरकत कर रहे थे। मेरे तमाम साथियों ने अपने रिपोर्ट के अहम हिस्सों को पढ़कर सुनाया। वज़ीरे ख़ारज़ा , नौआबादियाती इलाकों की विज़ारत के सिकेट्री और बाज़ हाज़िरीन ने मेरी रिपोर्ट को बड़ा सराहा। ताहाम मैं इस मुहासिबे में तीसरे नम्बर पर था। दो और जासूसों ने मुझसे बेहतर कारकर्दगी का मुज़ाहिरा किया था जिनमें पहला नम्बर जी बिलको़ड G BELCOUD और दूसरा हेनरी फैन्स HENRY FANSE का था।

यह बात काबिले ज़िक्र है कि मैंने तुर्की अरबी तजवीदे कुरआन और इस्लामी शरीअ़त में सबसे ज़्यादा दस्तर्स हासिल की थी लेकिन उस्मानी हुकूमत के ज़वाल के सिलसिले में मेरी रिपोर्ट ज़्यादा कामयाब नहीं थी। जब सेकेट्री ने कान्फ्रेन्स के इख़्तिताम पर मेरी इस कमज़ोरी का ज़िक्र किया तो मैं ने कहाः

इन दो सालों में मेरे लिये दो ज़बानो का सीखना , तफ़सीरे कुरआन और इस्लामी शरीअ़त से आशनाई ज़्यादा अहमियत की हामिल थी और दूसरे उमूर पर तवज्जोह देने के लिये मेरे पास ज़्यादा वक़्त नहीं था। अगर आप भरोसा करें तो में यह कसर आईन्दा सफ़र में पूरी कर दूंगा।

सिकेट्री ने कहाः इसमें कोई शक नहीं कि तुम अपने काम में कामयाब रहो हो लेकिन हम चाहते हैं कि तुम इस राह में दूसरों से बाज़ी ले जाओ।

उसने यह भी कहाः आईन्दा के लिये तुम्हें दो अहम बातों का ख़्याल रखना हैः

1. मुसलमानों की उन कमज़ोरियों की निशानदेही करो जो हमें उन तक पहुंचने और उनके मुख़तलिफ गिरोहों के दरमियान फूट डालने में कामयाबी फ़राहम करे क्योंकि दुश्मन पर हमारी कामयाबी का राज़ उन मसाएल की शिनाख़्त पर मुनहसिर है।

2. उनकी कमज़ोरियाँ जान लेने के बाद तुम्हारा दूसरा काम उनमें फूट डालना है। इस काम में पूरी कुव्वत सर्फ़ करने के बाद तुम्हें यह इल्मियान हो जाना चाहिये कि तुम्हारा शुमार सर्फ़ अव्वल के अंग्रेज़ जासूसों में होने लगा है और तुम एज़ाज़ी निशान के हक़दार हो गये हो। छः माह लन्दन में क़याम के बाद मैने अपने चाचा की लड़की “ मेरी शिवी ” से शादी कर ली जो मुझसे एक साल बड़ी थी। उस वक़्त मैं 22 और वह 23 साल की थी। “ मेरी ” एक दरमियाना दर्जे की ज़हीन लड़की थी लेकिन बड़े दिलकश ख़दो ख़ाल की मालिक थी। मेरी बीवी का मुझसे मुतावाज़िन सुलूक था और मैने अपने ज़िन्दगी के बेहतरीन दिन उसके साथ गुज़ारे। शादी के पहले साल ही मेरी बीवी उम्मीद से थी और मैं नये मेहमान का बेचैनी से मुनतज़िर था लेकिन ऐसे मौक़े पर मुझ़े विज़ारत ख़ाने से यह हतमी हुक्म मौसूल हुआ कि मैं वक़्त ज़ाया किये बग़ैर फ़ौरन ईराक़ पहुँचूँ जो बरसहा बरस से उस्मानी ख़िलाफ़त के इस्तेहसाल था।

हम मियाँ बीवी जो अपने पहले बच्चे के इन्तिज़ार में थे इस हुक्मनामे से बहुत आजुरदा हुए लेकिन मुल्क व मिल्लत से मोहब्बत एहसास जाह तलबी और अपने साथियों से रक़ाबत , तमाम घरेलू आसाएशात ज़ज्बात और बच्चे की मोहब्बत पर छा गयी और मैंने बग़ैर तरद्दुद के इस नई मामूरियत के कुबूल कर लिया हालांकि मेरी बीवी बार बार यह ज़ोर देती रही कि मैं अपनी रवानगी को बच्चे की पैदाइश तक मुलतवी रखूँ। जब मैं उससे रुख़सत हो रहा था तो वह और मैं बोतहाशा से रहे थे। उस पर मुझ से ज़्यादा रिक्क़त तारी थी और वह कह रही थी मुझे भूल न जाना , ख़त ज़रुर लिखते रहना , मैं भी अपने बच्चे के सुनहरे मुस्तकबिल के बारे में तुम्हें लिखती रहूँगी। उसकी बातों ने मेरा दिल पसीज दिया और मुझ उस मंज़िल तक पहुँचाया कि मैं अपने सफ़र को कुछ अरसे तक मुलतवी कर दूँ लेकिन फिर मैंने अपने आप पर काबू पाया और उससे रुख़सत होकर नये एहकामात हासिल करने के लिये विज़ारत ख़ाना रवाना हो गया। समन्दरों में छह माह के तवील सफ़र के बाद आख़िरकार मैं बसरा पहुँचा। इस शहर में रहने वाले ज़्यादा तर वहीं अतराफ़ के क़बाएल थे जिनमें ईरानी और अरब अक़वाम के दो अहम बाजू शिया और सुन्नी एक साथ ज़िन्दगी बसर करते थे। बसरे में ईसाईयों की तादाद बहुत कम थी। अपनी ज़िन्दगी में यह पहला मौक़ा था। कि मैं अहले तशय्योअ़ और ईरानियों से मिल रहा था। यहाँ यह बात ना मुनासिब नहीं होगी अगर मैं अहले तशीअ़ और अहले तसन्नुन के अक़ाएद के बारे में मुख़्तसर कुछ कहता चलूँ। शिया हज़रात , हज़रत मोहम्मद मुस्तफा स 0अ 0 के दामाद और चचाज़ाद भाई अली बिन तालिब (अ 0स 0) के मुहिब हैं और उनको हज़रते मोहम्मद स 0अ 0 का बरहक़ जानशीन समझते हैं। उनका ईमान है कि हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा स 0अ 0 ने नस्से सरीह के जरीए हज़रत अली अ 0स 0 को अपना जानशीन मुन्तख़ब फ़रमाया था और आपके ग्यारह फरज़न्द यके बाद दीगरे इमाम और रसूल खुदा स 0अ 0 के बरहक जानशीन हैं।

मेरी सोज के मुताबिक हज़रत अली अ 0स 0 और आपके दो फ़रजन्द इमामे हसन अ 0स 0 और इमाम हुसैन अ 0स 0 की ख़िलाफ़त के बारे में शिया हज़रात मुकम्मल तौर पर हक़ बजानिब हैं क्योंकि अपने मुआमलात की बुनियाद पर बाज़ शवाहिद व असनाद मेरे इस दावे पर दलालत करते हैं। इसमें कोई शक नहीं कि हज़रते अली अ 0स 0 ही वह हस्ती थे जो मुमताज़ सिफ़ात के हामिल थे और सही तौर पर फ़ौज और इस्लामी हुकूमत की सरबराही के अहले थे। इमाम हसन अ 0स 0 और इमाम हुसैन अ 0स 0 की इमामत के बारे में हज़रत मोहम्मद स 0अ 0 की बहुत सी हदीसें दस्तायाब हैं और अहले सुन्नत को भी उनसे इन्कार नहीं हैं और दोनों फ़रीक़ उस पर मुत्तहिद हैं (हज़रत अलीअ 0स 0 जनाबे हुसैनअ 0 और दीगर अइम्माअ 0 की इमामत के बारे में कसरत से अहादीस लक़ल हुई है। मुलाहिज़ा फ़राइयेः किताबे तौहीद अज़ शेख़ सुदूक) , अलबत्ता मुझे बाक़ी नौ अफ़राद की जानशीनी तरद्दुद है जो हुसैन अ 0स 0 बिन अली अ 0स 0 की औलाद हैं और शिया हज़रात उन्हें इमामे बरहक़ मानते हैं (इस अंग्रेंज़ जासूस का शुबह बेबुनियाद है इस कि औलादे इमाम हुसैनअ 0 की इमारत और हज़रतअ 0 की ग़ैबत के बारे में बहुत सी अहादीस मौजूद हैं। मुलाहिज़ा फ़रमाइयेः किताबे तौहीद अज़ शेख़ सुदूक़। मुन्तहीयुल आमाल अज शेख़ अब्बास कुम्मी वग़ैरा)

यह कैसे मुमकिन है कि पैग़म्बर स 0अ 0 उन अफ़राद की इमामत के ख़बर दें जो अभी पैदा ही न हुए हों ? अगर मोहम्मद स 0अ 0 अल्लाह के बरहक पैग़म्बर हों तो ग़ैब की ख़बर दे सकते हैं जैसा कि हज़रते ईसा अ 0स 0 ने आईन्दा की ख़बरें दी हैं लिकिन हज़रत मोहम्मद स 0अ 0 की नबूव्वत ईसाईयों के नज़दीक मुसल्लम नहीं है। (एक अंग्रेज़ जासूस से इस तरह के नज़रियात ख़िलाफ़ तवक़्के नहीं हैं ख़ास तौर पर जब उसे मुसलमानों की सरकूबी के लिये भेजा गया हो)

मुसलमानों का कहना है कि कुरआन पैग़म्बर स 0अ 0 की नबूव्वत पर भरपूर दलील है लेकिन मैने जितना भी कुरआन पढ़ा मुझे ऐसी कोई दलील नहीं मिली। (यह क्योंकर हो सकता है कि एक क़ारी कुरान की नज़र इस आयत पर न गयी हो जिसमें हज़रत ईसाअ 0 की रिसालत पर सरीहन चार आयतें मौजूद हैं। सूरा आले इमरान आयत 144, सूरा अहजाब आयत 40, सूर मोहम्मद आयत 3, सूरा फ़तह आयत 29)

इसमें कोई शक नहीं कि कुरआन एक बलन्द पाया किताब है और इस उसका मक़ाम तोरतै और इंजील से बढकर है। क़दीम दास्तानें , इस्लामी अहकाम व आदाब , तालीमात और दीगर बातों ने इस किताब को ज़्यादा मुमताज बना दिया है लेकिन क्या सिर्फ़ यह खुसूसी फ़ौकियत मोहम्मद स 0अ 0 की सच्चाई पर दलील बन सकती है ? मैं हैरान हूँ कि एक सेहरा नशीन जिसे लिखना और पढना भी न आता हो किस तरह एक ऐसी अरफअ़ व आला किताबे इन्सानियत के हवाले कर सकता है। यह काम तो कोई पढ़ा लिखा और साहिबे इस्तिअ़दाद आदमी भा अपनी पूरी होशमन्दी के बावजूद अंजाम नहीं दे सकता। फिर किस तरह एक सहराई अरब बगैर तालीम के ऐसी किताब लिख सकता है ? और जैसा कि मैं पहले भी अर्ज़ कर चुका हूँः “ क्या यह किताब की नबूवत पर दलील हो सकती है ?”

मैनें इस बारे में हक़ीक़त से आगाही के लिये बहुत मुतालिआ़ क्या है। लंदन में जब मैंने एक पादरी के सामने इस मौजू को पेश किया तो वह भी कोई क़ाबिले इत्मिनान जवाब न दे सका। तुर्की में भी मैंने शेख़ अहमद से कई दफ़ा इस मौजू पर बातचीत की मगर वहाँ भी मुझे इत्मिनान नहीं हुआ। यह बात क़ाबिले ज़िक्र है कि मैं लन्दन के पादरी के मुक़ाबिल , शेख़ अहमद से इतनी गुफ़्तगू नहीं कर सकता था इसलिए कि मुझे ख़तरा था कि कहीमं मेरा पोल न खुल जाये या फिर कम अज़ कम पैग़म्बरे इस्लाम स 0अ 0 के बारे में इसे मेरी नियत पर शक न हो जाये। बहरहाल मैं हज़रते मोहम्मद स 0अ 0 की क़द्रो मनज़िलत की अज़मत और बुजुर्गी का क़ाएल हूँ। बेशक आपका शुमार उन बा फ़ज़ीलत अफ़राद में होता है जिनकी कोशिशें तरबियते बशर के लिये नाक़ाबिले इन्कार हैं और तारीख़ इस बात पर शाहिद है लेकिन फिर भी मुझे उनकी रिसालत में शक है। ता हम अगर उन्हें पैग़म्बरे तसलीम न भी किया जाये तो भी उनकी बुजुर्गी उन अफ़राद से बढ़कर है जिन्हें हम नवाबिग़ समझते हैं। मोहम्मद स 0अ 0 तारीख़ के होशमन्द तरीन अफ़राद से ज़्यादा होशमन्द थे।

अहले सुन्नत कहते हैः हज़रत अबू बकर , उमर और उस्मान सलीम आरा की बुनियाद पर हज़रत अली अ 0स 0 से ज़्यादा अम्रे ख़िलाफत के हक़दार थे। इस तरह उन्होंने खुलाफ़ा इक़दाम किया। इस तरह के इख़्तिलाफ़ात अक्सर अदयान बिलखुसूस ईसाईयत में पाये जाते हैं लेकिन शिया सुन्नी इख्लितलाफ़ का नाक़ाबिले फ़हम पहलू उसका इस्तिक़रार या मुसलसल जारी रहना है जो हज़रत अली अ 0स 0 और हज़रत उमर के गुज़रने के सदियों बाद भी अब तक , इसी ज़ोर ओ शोर से बाक़ी है। अगर मुसलमान हक़ीक़तन अक़्ल से काम लेते तो ग़ुज़ारी तारीख़ और भूले ज़माने के बजाये आज के बारे में सोचते। एक दफ़ा मैंने शिया सुन्नी इख्तिलाफ़ात के मौजू को अपनी नौ आबादियाती इलाकों की विज़ारत के सामने पेश किया और उनसे कहाः

“ मुसलमान अगर ज़िन्दगी के सही मफ़हूम को समझते हैं तो उन इख़्तिलाफ़ात को छोड़ बैठते और वहदत् व इत्तेहाद की बात करते। ”

अचानक सदरे जलसा ने मेरी बात काटते हुए कहाः

“ तुम्हारा काम मुसलमानों के दरमियान इख़्तिलाफ़ की आग भड़काना है न यह कि तुम उन्हें इत्तेहाद और यक जहती की दावत दो। ”

ईराक़ जाने स पहले सिक्रेट्री ने अपनी एक नशिस्त में मुझ से कहाः

हमफ़रे। तुम जानते हो कि जंग और झगड़े इन्सान के लिये एक फ़ितरी अम्र हैं और जब से ख़ुदा ने आदम अ 0स 0 को ख़ल्क़ किया और उसके सुल्ब से हाबील और क़ाबील पैदा हुए इख़्तिलाफ़ ने सर उठाया और अब उसको हज़रते ईसा अ 0स 0 की बाज़गश्त तक उसी तरह जारी रहना है। हम इन्सान इख़्तिलाफ़ात को पांच बातों पर तक़सीम कर सकते हैंः

1- नस्ली इख़्तिलाफ़ात

2- क़बाएली इख़्तिलाफ़ात

3- अरज़ी इख़्तिलाफ़ात

4- क़ौमी इख़्तिलाफ़ात

5- मज़हबी इख़्तिलाफ़ात

इस सफ़र में तुम्हारा अहम तरीन फ़रीज़ा मुसलमानों के दरमियान इख़्तिलाफ़ात के मुख़तलिफ़ पहलुवों को समझना और उन्हें हवा देने के तरीक़ों को सीखना है। इस सिलसिले में जितनी भी मालूमात मुहय्या हो सके तुम्हें इसकी इत्तेला लन्दन के हुक्काम तक पहुंचाना है। अगर तुम इस्लामी मुमालिक के बाज़ हिस्सों में सुन्नी शिया फ़साद बरपा करो तो गोया तुमने हुक़ूमत बरतानिया की अज़ीम ख़िदमत की है।

जब तक हम अपने नौ आबादियती इलाकों में निफ़ाक , तफ़रिका , शोरिश और इख़्तिलाफ़ात की आग को हवा नहीं देंगे पुरसुकून और मुरफ़्फ़हुल हाल नहीं हो सकते। हम उस वक़्त उस्मानी सल्तनत को शिकस्त नहीं दे सकते जब तक उसके क़लमरु में शहर शहर , गली गली फ़ितना व फ़साद बरपा न कर दें। इतने बड़े इलाक़े पर अंग्रेजों की मुख़्तसर सी क़ौम सिवाये इस हथकन्डे के और किस तरह छा सकती है।

पस ऐ हमफ़रे तुम्हें चाहिये कि तुम पहले अपनी पूरी कुव्वत सर्फ़ करके हंगामे , शोर शराबे , फूट और इख़्तिलाफात की कोई राह निकालों और फिर वहाँ से अपने काम का आगाज़ करो। तुम्हें मालूम होना चाहिये कि इस वक़्त उस्मानी और ईरानी हुकूमतें कमज़ोर हो चुकी हैं। तुम्हारा फर्ज़ है कि तुम लोगों के उनके हुक्मरानों के ख़िलाफ़ भड़काव। तारीख़ी हक़ाएक़ की बुनियाद पर हमेशा इन्कि़लाबात , हुक्मरानों के ख़लिफ़ अवाम की शोरिश से वुजूद में आये हैं। जब कभी किसी इलाक़े के अवाम में फूट और इन्तिशार पड़ जाये तो इस्तिअ़मार की रहा बड़ी आसानी से हमवार हो सकती है।

बसरा पहुँच कर मैं एक मस्जिद में दाखिल हुआ। मस्जिद के पेश इमाम अहले सुन्नत के मशहूर आलिम शेख़ उम्र ताई थे। मैंने उन्हें देखकर बड़े अदब से सलाम किया लेकिन शेख़ इब्तिदाई लमहे से ही मुझ पर मज़नून हुआ और मेरे हस्ब नस्ब और ग़ुजश्ता जिन्दगी के बारे में मुझसे सवालात करने लगा। मेरा ख़याल है कि मेरे चेहरे और लहजे ने उसे शक में डाल दिया था लेकिन मैं ने बड़ी तरकीब से अपने आप को उसकी गिरफ़्त से बचा लिया और शेख़ के जवाब में कहाः

मैं तुर्की में वाकिअ़ “ आग़दीर ” का रहने वाला हूँ और मुझे कुसतुनतुनिया के शेख़ अहमद की शागिर्दी का शरफ़ हासिल है मैं ने वहाँ ख़ालिद बढ़ई के पास भी काम किया है।

मुख़्तसर यह कि तुर्की में जो कुछ मैंने सीखा था वह सब उससे बयाह किया। मैंने देखा कि शेख़ हाज़िरी में से किसी को आँख के ज़रीए इशारा कर रहा है। मालूम होता था कि वह जानना चाहता है कि मुझे तुर्की आती भी नहीं। उस शख़्स ने आँखों से हामी भरी। मैं दिल में बहुत खुश हुआ कि मैंने किसी हद तक शेख़ की दिल जीत लिया है लेकिन कुछ ही देर बाद मुझे अपनी ग़लत फहमी का एहसास हुआ और मैंने महसूस किया शेख़ का शुबहा अभी अपनी जगह बाक़ी है और वह मुझे उस्मानियों का जासूस समझता है। मशहूर था कि शेख़ , बसरा के गवर्नर का सख़्त मुख़ालिफ़ था जिसे उस्मानियों ने मोअय्यन किया था।

बहरहाल मेरे पास उसके सिवा कोई चारए कार नहीं था कि मैं शेख़ उमर की मस्जिद से इलाक़े के एक ग़रीब नवाज़ मुसाफिर ख़ाने में मुनतक़िल हो जाऊँ। मैंने वहाँ एक कमरा किराया पर लिया। मुसाफ़िरख़ाने का मालिक एक अहमक़ आदमी था जो हर सुबह सवेरे मुसाफ़िरों को परेशान किया करता था। अज़ान के बाद अंधेरे मुँह मेरा दरवाज़ा ज़ोर ज़ोर से पीटता था और मुझे नमाज़ के लिये जगाता था

और फिर सूरज निकलने तक कुरआन पढ़ने पर मजबूर करता था। जब मैं उससे कहता कि कुरआन पढ़ना वाजिब नहीं है फिर क्यों तुम्हें इस अम्र में इतना इसरार है ? तो वह कहता कि तुलूए आफ़ताब से क़ब्ल की नींद फुक्र और बदबख़्ती लाती है और इस तरह उस मुसाफिर ख़ाने के तमाम मुसाफ़िर बदबख़्ती का शिकार हो जायेंगे। मुझे इसकी बात माननी पड़ी क्योंकि वह मुझे वहाँ से निलक जाने की धमकी देता था। हर रोज़ सुबह मैं नमाज़ के लिये जाने की धमकी देता था। हर रोज़ सुबह मैं नामाज़ के लिये उठता था और फिर एक घंटा या उससे भी ज़्यादा वक़्त तक कुरआन की तिलावत करता था।

मेरी मुश्किल यही ख़्तम नहीं हुई। एक दिन मुसाफ़िर ख़ाने के मालिक मुरशद आफ़िन्दी ने आकर कहाः जब से तुमने इस मुसाफ़िर खाने में रिहाइश इख़्तियार की है मुसीबतों ने मेरा घर देख लिया है और उसकी वजह तुम और तुम्हारी लायी हुई नहूसत है इसलिए कि तुमने अभी तक शदी नहीं की है और किसी को अपना शरीके हयात नहीं बनाया है। तुम्हें या शादी करनी होगी या फिर यहाँ से जाना होगा।

मैंने कहाः आफ़िन्दी। मैं शादी के लिये सरमाया कहाँ से लाऊँ ? इस दफ़ा मैंने अपने आपको शादी के नाक़ाबिल जा़हिर करने से एहतेराज़ किया क्योंकि मैं जानता था कि मुरशद आफ़िन्दी टोह लगाये बग़ैर मेरी बात पर यकीन करने वाला आदमी नहीं था।

मुरशद आफ़िन्दी ने जवाब दियाः ओ नाम के ज़ईफुल एतेक़ाद मुसलमान। क्या तुमने कुरआन का मुतालेआ़ नहीं किया जहाँ वह फ़रमाता हैः

“ वह लोग जो फ़ुक्र में मुब्तिला हैं खुदावन्दे आलम उनहें अपनी बुजूर्गी से मालामाल कर देगा ”

मैं हैरान था कि इस नासमझ इन्सान से किसी तरह पीछा छुड़ाऊँ। आख़िरकार मैंने उसेसे कहाः आप का इरशाद बजा है रक़म के बग़ैर कैसे शादी कर सकता हूँ ? क्या आप ज़रूरी अख़राजात के लिये मुझे कुछ रक़म कर्ज़ दे सकते हैं। इस्लाम में महर अदा किया बगैर कोई औरत किसी के अक़्द में नहीं आ सकती।

आफ़िन्दी कुछ देर सोज में पड़ गया और फिर कर्ज़े हसना की बात करने के बजाये अचानक उसने सुर बुलन्द किया और ऊँची आवाज़ में चीख़ीः मुझे कुछ नहीं मालूम या तुम्हे शादी करनी होगी या फिर रजब की पहली तारीख़ तक कमरा छो़ड़़ना होगा।

इस दिन जमादिउस्सानी की पांचवीं तारीख़ थी और सिर्फ़ 25 दिन मेरे पास थे।

इस्लामी महीनों के नामों के बारे में भी यहाँ कुछ तज़किरा न मुनासिब न होगाः

1- मोहर्रम 2- सफर

3- रबीउल अव्वल 4- रबीउस्सानी

5- जमादिउल अव्वल 6- जमादिउस्सानी

7- रजब 8- शाबान

9- रमज़ान 10- शव्वाल

11- ज़ीक़ाद 12- ज़िलहिज्जा

हर महीने चांद के आगाज़ से शुरु होता है और 30 दिन से ऊपर नहीं जाता लेकिन कभी कभी चांद 29 दिन का भी होता है।

मुख़्तसर यह कि मुसाफ़िर ख़ाना के मालिक की सख्तगीरी के सबब मुझे वह जगह छोड़ना पड़ी। मैंने यहाँ भी एक तरखान की दुकान पर इस शर्त के साथ नौकरी कर ली वह मुझे रहने और खाने की सहूलत फ़राहम करेगा और उसके इवज़ मज़दूरी कम देगा। मैं रजब से पहले ही नई जगह मुनतक़िल हो गया और तरखान की दुकान पर पहुँचा। तरखान अब्दुररज़ि निहायत शरीफ़ और मोहतरम शख़्स था और मुझसे अपने बेटों जैसा सुलूक करता था।

अब्दुररिज़ा ईरानी अल अस्ल शिया था और खुरासान का रहने वाला था मैंने मौक़े से फ़ायदा उठाते हुए उससे फ़ारसी सीखना शुरु की। दोपहर के वक़्त उसके पास बसरे में मुक़ीम ईरानी जमा होते थे जो सब के सब शिया थे। वहाँ बैठकर इधर उधर की गुफ़्तगू होती थी। कभी सियासत और मअ़ीशत उनवान कलाम होता और कभी उस्मानी हुकूमत को बुरा भला कहा जाता। ख़ास तौर पर सल्तनते वक़्त और इस्तम्बूल में मुकर्रर होने वाला ख़लीफ़ए मुसलिमीन उनकी तनक़ीद का नीशाना होता लेकिन जूँ ही कोई अजनबी ग्राहक दुकान में आता वह सब के सब ख़ामोश हो जाते और ज़ाती दिलचस्पी के मुतअल्लिक़ ग़ैर अहम बातें हो लगती।

मुझे मालूम नहीं मैं क्योंकर उनके लिये क़ाबिले एतेमाद था और वह मेरे सामने हर क़िस्म की गुफ़्तगू को जाएज़ समझते थे। यह बात मुझे बाद में मालूम हुई कि उन्होंने मुझे आज़र बाईजान का रहने वाला ख़्याल किया था क्योंकि मैं तुरकी में बातचीत करता था और आज़र बाईजानियों की तरह मेरा चेहरा सुर्ख़ व सफेद था।

इन दिनों जब मैं तुरखान का काम करता था मेरी मुलाकात एक ऐसे शख़्स से हुई जो वहाँ आता जाता रहता था और तुर्की , फ़ारसी और अरबी ज़बानों में गुफ़्तुगू करता था। वह दीनी तालिबे इल्मों का लिबास पहनता था। उसका नाम मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब था। वह एक ऊँचा उड़ने वाला , एक जाह तलाब और निहायत गुस्सीला इन्सान था। उसे उस्मानी हुकूमत से सख़्त नफ़रत थी और वह हमेशा उसकी बुराई करता था लेकिन हुकूमते ईरान से उसको कोई सरोकार नहीं था। तुरखान अब्दुल रिज़ा से उसकी दोस्ती वजह मुशतरिक यह थी वह दोनों ही उस्मानीं ख़लीफ़ा को अपना सख़्त तरीन दुश्मन समझते थे लेकिन मेरे इल्म में यह बात न आ सकी कि उसने अब्दुर रिज़ा तुरखान से किस तरह दोस्ती बढ़ाई थी जबकि यह सुन्नी और वह शिया था। मुझे यह भी नहीं मालूम हो सका उसने कि उसने फ़ारसी कहाँ से सीखी थी ? अलबत्ता बसरे में शिया सुन्नी मुसलमान एक साथ ज़िन्दगी बसर करते थे और एक दूसरे के साथ उनके रवाबित भी दोस्ताना थे और वहाँ औ़ फ़ारसी और अरबी दोनों ज़बानों बोली जाती थीं ताहम तुरकी समझने वालों की तादाद भी वहाँ कुछ कम न थी।

मोहम्मद अब्दुल वहाब एक आज़ाद आदमी था। उसका ज़हन शिया सुन्नी तासियात से बिल्कुल पाक था हालांकि वहाँ के बेशतर सुन्नी हज़रत शियों के ख़िलाफ़ थे और बाज़ सुन्नी मुफ़्ती शियों की तकफ़ीर भी करते थे। शेख़ मोहम्मद के नज़दीक हनफ़ी , शाफ़िअी , हम्बली और मालिकी मकातीब फ़िक्र में से किसी मकतबे फ़िक्री की कोई ख़ास अहमियत नहीं थी। वह कहता था कि खुदा ने जो कुछ कुरआन में कह दिया है बस वही हमारे लिये काफी है।

इन चार मकातीब फ़िक्र की दास्तान भी कुछ यूँ है कि हज़रते पैग़म्बरे स 0अ 0 की वफ़ात से सौ साल बाद आलमे इस्लाम में बलन्द पाए ओलामा का जूहूर अमल में आया जिनमे चार अफ़राद अबू हनीफ़ अहमद बिन हम्बल , मालिक बिन अनस और मोहम्मद बिन इदरीस शाफ़ई अहले सुन्नत की पेशवाई के मक़ाम तक पहुँचे। अब्बासी ख़ोलफ़ा का ज़माना था और इन अब्बासी ख़ोलफ़ा ने मुसलमानों पर दबाव डाल रखा था कि वह मज़कूरा चार अफ़राद के अलावा किसी की तक़लीद न करें अगरचे कोई कुरआन व सुन्नत में उनसे बढकर दस्तरिस क्यों न रखता हो। अब्बासी ख़ोलफ़ा ने उनके अलावा किसी मुतज्जिर और आला पाया आलिम को उनके मुक़ाबिल में उभरने नहीं दिया और इस तरह दरहक़ीक़त उन्होंने इल्म के दरवाज़े को बन्द कर दिया और यह बात अहले सुन्नत वल जमाअत के फ़िक्री जमूद का बाइस बनी। इसके बरअक्स शिया हज़रात ने अहले सुन्नत की इस पाबन्दी और जमूदी कैफ़ियत से फ़ायदा उठाते हुए अपने अक़ायद व नज़रियात को वसीअ पैमाने पर मुन्तशिर करना शुरु किया और दूसरी सदी हिजरी के मुक़ाबिल में दस फ़ीसद थी उनकी तादाद में मुसलसल इज़ाफा होने लगा और वह अहले सुन्नत के हम पाया हो गये और यह एक फ़ितरी अम्र था क्योंकि शिया हज़रात के पास इज्तेहाद का दरवाज़ा खुला हुआ था और यह बात मुसलमानों की ताज़गीये फ़िक्र , इस्लामी फ़िक़हा की पेशरफ़्त और नई रौशनी में कुरआन व सुन्नत के फ़हम का बाइस बनी और उसने इस्लाम को नये ज़मानो के तक़ाज़ों से हमआहंग किया। इज्तेहाद ही वह बड़ा वसीला था जो फ़िक्री जमूद से नबर्दआज़मा रहा और उसके ज़रिये इस्लाम ने जिला पाई और फि़क्रों में इंक़ेलाब रुनुमा हुआ। इस्लाम को चार मकातीबे फ़िक्र में मुक़य्यिद करना , मुसलमानों के लिये जुस्तजू और तलाश के रास्तों को बंद करना और नई बात से उनकी समाअत को रोकना और वक़्त के तकाज़ों से उन्हें बेतवज्जो रखना दरअसल वह पोशीदा असलाह था जिसने मुसलमानो की पोशरफ़्त रोक दी। ज़ाहिर है कि जब दुश्मन के हाथ में नया असलाह हो और आप अपने पुराने जंगजदा असलेह से इसका मुक़ाबिला करेंगे तो यक़ीनन जल्द या बा देर आपको हज़ीमत उठाना प़ड़ेगी मैं पेशीनगोई से काम लेते हुए यह कहूँगा कि अहले सुन्नत के साहिबाने अक़्ल अफ़राद बहुत जल्द ही मुसलमानों पर इज्तेहाद का दरवाज़ा खोल देंगे और यह काम मेरे अंदाज़े के मुताबिक अकली सदी तक रुबा अमल आयेगी और सो साल बाद मुसलमानों में इज्तेहाद के हामी शियों की अक्सरियत होगी और अहले तसन्नुन अक़लियत में रह जायेंगे।

अब मैं शेख मोहम्मद अब्दुल वहाब के बारे में अर्ज़ करुँ कि यह शख़्स कुरआन व हदीस का अच्छा मुतालिआ रखता था और अपने उफ़कार की हिमायत में बुजुर्गाने इस्लाम के अक़वाल व आरा को बतौर सनद पेश करता था , लेकिन कभी कभी इसकी फ़िक्र मशाहिरे ओलमा के ख़िलाफ़ होती थी। वह बात पर कहताः

पैग़म्बरे ख़ुदा (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेहि वसल्लम) ने सिर्फ़ किताब व सुन्नत को नाक़ाबिले तग़य्युर उसूल बना कर हमारे लिये पेश किया और कभी यह नहीं कहा कि सहाब-ए-कराम और अइम्मा-ए-दीन के फ़रमूदात अटल और वहीये मुन्ज़िल हैं। पस हम पर वाजिब है कि हम सिर्फ़ किताब व सुन्नत की पैरवी करें। ओलामा , अइम्मा अरबा हत्ता कि सहाबा की राय ख़्वाह कुछ भी क्यों न हो , हमें उनके इत्तिफ़ाक़ व इख्तिलाफ़ पर अपने दीन को उस्तवार नहीं करना चाहिये।

एक दिन उसकी ईरान से आने वाले एक आलिम से खाने के दस्तरख़्वान पर झड़प हो गयी। उस आलिम का नाम शेख़ जवाद कुम्मी था और उसे अब्दुल रिज़ा तर खाने ने अपने पास मेहमान बुलाया था। शेख़ जवाद कुम्मी के मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब से उसूली इख़्तिलाफ़ात थे और उनकी गुफ़्तगू ने जल्द ही तलख़ी और तरशीर का रंग इख़्तियार कर लिया।

मुझे उनके दरमियान होने वाली तमाम गुफ़्तगू तो याद नहीं अलबत्ता जो जो हिस्से मुझे याद हैं , मैं उनको यहाँ पेश करना चाहता हूँ।

शेख़ कुम्मी ने इन जुमलों से अपने गुफ़्तगु का आगाज़ किया और मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब से कहाः

“ अगर तुम एक आज़ाद ख़्याल इंसान हो और अपने दावे के मुताब़क़ इस्लाम का काफ़ी मुतालिआ कर चुके हो तो फिर क्या वजह है कि तुम हज़रत अलीअ 0स 0 को वह फ़ज़ीलत नहीं देते जो शिया देते हैं ?”

मोहम्मद ने जवाब दिया इस लिये कि हज़रत उमर और दीगर अफ़राद की तरह उनकी बातें भी मेरे लिये हुज्जत नहीं है। सिर्फ़ किताब व सुन्नत को मानता हूँ।

कुम्मीः अच्छा अगर तुम सुन्नत के आमिल हो तो क्या पैग़म्बरे अकरमस 0 ने यह नहीं कहा थाः “ मैं शहरे इल्म हूँ और अली उसका दरवाज़ा है ” (अना मदीनतुल इल्म व अलीयुन बाबोहा) और क्या यह कह कर पैग़म्बरस 0 ने अलीअ 0 और सहाबा दरमियान फ़र्क़ क़ायम नहीं किया ?

मोहम्मदः अगर ऐसा ही है तो फिर पैग़म्बरस 0 को यह कहना चाहिये था किः “ मैं तुम्हारे दरमियान दो चीज़ें छोड़े जाता हूँ एक किताब और एक अलीअ 0 बिन अबीतालिबअ 0” ।

कुम्मीः बेशक यह बात भी पैग़म्बरस 0 ने अपने मक़ाम पर कही है किः मैंने तुम्हारे दरमियान किताब और अहलेबैतअ 0 को छो़ड़ा है। ” (इन्नी तारेकुम फ़ीकोमुस सक़लैन केताबल्लाहे व इतरती व अहलाबैती) बेशक अलीअ 0 अहलेबैतअ 0 के सरबआवरदा अफ़राद में से है।

मोहम्मद ने इस हदीस को झुठलाया लेकिन शेख़ कुम्मी ने उसूले काफ़ी के असनाद की बुनियाद पर पैग़म्बरस 0 से इस हदीस को साबित किया और मोहम्मद को ख़ामोश होना पड़ा। अब उसके पास कोई जवाब नहीं था। अचानक उसने शेख़ पर एतराज ठोंकाः पैग़म्बरस 0 ने हमारे लिये सिर्फ़ किताब और अपने अहलेबैतअ 0 को बाक़ी रखा है तो फिर सुन्नत कहां गयी ?

कुम्मी ने जवाब दियाः सुन्नत उसी किताब की तफ़सीर व तशरीह का नाम है , और इसके अलावा कुछ भी नहीं। पैग़म्बरे ख़ुदा (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेहि वसल्लम) ने फ़रमाया अल्लाह की किताब और मेरे अहलेबैतअ 0 यानि किताबे खुदा इस तशरीह व तफ़सीर के साथ जो सुन्नत कहलाती है और उसके बाद सुन्नत की तकरार की ज़रुरत बाक़ी नहीं रहती।

मोहम्मद ने कहाः अगर आप के दावे के मुताबिक़ इतरत या अहलेबैतअ 0 ही कलामे इलाही की तफ़सीर हैं तो फिर क्यों मतने हदीस में इसका इज़ाफ़ा हुआ है ?

कुम्मी ने जवाब दियाः “ जनाबे रिसालतमाब (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेहि वसल्लम) ” ने अपनी ग़ैबी इल्म की बुनियाद पर किताबे इलाही को अस्ले साबित और इतरत मुफ़स्सिर व शारेअ किताब बना कर उम्मत के हवाले किया।

हैरानी के साथ साथ मुझे उनकी गुफ़्तगु से बड़ा मज़ा रहा था। मैंने देखा कि मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब उस ज़ईफुल उम्र शेख़ जवाद कुम्मी कि आगे एक ऐसी चिड़िया की मानिन्द फड़फड़ा रहा था जैसे क़फ़स में बन्द कर दिया गया हो और उसके परवाज़ की राह मसदूद हो गयी हो।

मोहम्मद अब्दुल वहाब से मेल जोल और मुलाकातों के एक सिलसिले के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि बर्तानवी हुकूमत के मक़ासिद को अमली जामा पहनाने के लिये यह शख़्स बहुत मुनासिब दिखाई देता है। इसकी ऊँचा उड़ने की ख़ुवाहिश , जाह तलबी , गुरुर , ओलमा व मशाएख़े इस्लाम से उसकी दुश्मनी , इस हद तक खुदसरी कि ख़ोलफ़ा-ए-राशेदीन भी इसकी तंक़ीद का निशाना बनें और हक़ीक़त के सरासर ख़िलाफ़ कुरआन व हदीस से इस्तेफ़ादा उसकी कमज़ोरियाँ थीं जिससे बड़ी आसानी से फ़ायदा उठाया जा सकता था।

मैंने सोचा कहां यह मग़रुर नौजवान और कहां इस्तनबोल का वह तुर्क बूढ़ा आदमी (अहमद आफ़न्दी) जिसके उफ़कार व किरदार गोया हज़ार साल पहले के अफ़राद की तस्वीरकशी करते थे। उसने अपने अन्दर ज़रा भी तब्दीली पैदा नहीं की थीं हनफ़ी मज़हब से तअल्लुक़ रखने लाला वह बूढ़ा शख़्स अबूहनीफ़ा का नाम ज़बान पर लाने से पहले उठ कर वज़ू करता था या मसलन सहीह बुख़ारी बिल्कुल बचर और बेहूदा है।

बहर सूरत मैंने मोहम्मद से बहुत गहरे मरासिम क़ायम कर लिये और हमारी दोस्ती में नाक़ाबिले इस्तेहकाम पैदा हो गाय। मैं बार बार उसके कानों में यह रस घोलता था कि ख़ुदा तुम्हें हज़रतअ 0 और हज़रत उमर से कहीं ज़्यादा साहिबे इस्तेदाद बनाया है और तुम्हें बड़ी फ़ज़ीलत और बुजूर्गी बख़्शी है। अगर तुम जनाबे रिसालतमाबस 0 के ज़माने में होते तो यक़ीनन उनकी जानशीन का शरफ़ तुम्हें मिलता। मैं हमेशा पुरउम्मीद लहजे में उससे कहताः

“ मैं चाहता हूँ कि इस्लाम में जिस इन्क़ेलाब को रुनुमा होना है तुम्हारे ही मुबारक हाथों से अंजाम पज़ीर हो इसलिये कि सिर्फ़ तुम ही वह शख़्सियत हो जो इस्लाम को ज़वाल से बचा सकते हो और इस सिलसिले में रुब की उम्मीदें तुम से वाबस्ता हैं। ”

मैने मोहम्मद के साथ तय किया कि हम दोनों बैठ कर ओलमा , मुफ़स्सेरीन , पेशवायाने दीन व मज़हब और सहाब-ए-कराम से हट कर नये उफ़कार की बुनियाद पर कुरआन मजीद पर गुफ़्तगू करें। हम कुरआन पढ़ते और आयत के बारे में इज़हारे ख़्याल करते। मेरा लाएहा अमल यह था कि मैं किसी तरह उसे अंग्रेज़ नौआबादियती इलाकों की वज़रात के दाम में फंसा दूं।

मैंने आहिस्ता आहिस्ता इस ऊँची उड़ान वाले ख़ुदपरस्त इंसान को अपनी गुफ़्तगू की लपेट में लेना शुरु किया यहां तक कि उसने हक़ीक़त से कुछ ज़्यादा ही आज़ाद ख्याल बनने की कोशिश की।

एक दिन मैंने उससे पूछाः “ क्या जेहाद वाजिब है ?” उसने कहाः क्यों नहीं। खुदा वन्दे आलम फ़रमाता है “ काफ़िरों से जंग करो। ”

मैंने कहाः खुदा वन्दे आलम फ़रमाता हैः काफ़िरो और मुनाफ़िकों दोनों से जंग करो और अगर काफ़िरों और मुनाफ़िक़ों से जंग वाजिब है तो फिर पैगम्बर (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेहि वसल्लम) ने मुनाफ़िकों से क्यों जंग नहीं की ?”

मोहम्मद ने जवाब दियाः “ जेहाद सिर्फ़ मैदाने जंग ही में नहीं होता। पैग़म्बर ख़ुदास 0 ने अपनी रफ्तार व गुफ़्तार ज़रिये मुनाफि़कों से जंग की है। ”

मैनें कहाः “ फिर इस सूरत में कुफ़्फार के साथ जंग भी रफ़्तार व गुफ़्तार के साथ वाजिब है। ”

उसने जवाब दियाः नहीं , इसलिये कि पैग़म्बरस 0 ने जंग के मैदान में उनके साथ जेहाद किया है। ”

मैंने कहाः “ कुफ़्फार के साथ रसूले ख़ुदा (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेहि वसल्लम) की जंग अपने दिफ़ाअ के लिये थी क्योंकि वह उनकी जान के दुश्मन थे। ”

मोहम्मद ने इस्बात में अपना सर हिलाया और मैंने महसूस किया कि मैं अपने काम में कामयाब हो गया हूँ।

एक और दिन मैंने उससे कहाः “ क्या औरतों के साथ मुतअ जाएज़ है ?”

उसने कहाः “ हरगिज़ नहीं। ”

मैने कहाः “ फिर क्यों कुरआन ने इसे जाएज़ क़रार देते हुए कहा हैः और जब तुम उनसे मुतअ करो तो उनका मेहर अदा करो। ” (सूर-ए-निसा आयत 24)

उस ने कहाः हाँ , आयत तो अपनी जगह ठीक है मगर हज़रत उमर ने इसे यह कहकर हराम क़रार दिया किः मुतअ पैग़म्बरस 0 के ज़माने में हलाल था , मैं इसे हराम क़रार देता हूँ और अब जो इसका मुरतकिब होगा मैं उसे सज़ा दूँगा।

मैंने कहाः बड़ी अजीब बात है। तुम तो हज़रत उमर की पैरवी करते हो और फिर आपको उससे ज़्यादा साहिबे अक़्ल भी कहते हो। हज़रत उमर को क्या हक़ पहुँचता है कि वह हलाले मोहम्मदस 0 को हराम करे। तुमने कुरान को भुला कर हज़रत उमर की राय को तस्लीम कर लिया ?

मोहम्मद ने चुप साध ली और ख़ामोशी उसकी रिज़ामन्दी की दलील थी। इस मौज़ू पर उसके ख्यालात दुरुस्त करके मैंने उसके जिन्सी ग़रीज़ा को उभारना शुरु किया। वह एक ग़ैर मुताहिल शख़्स था। मैंने उससे पूछाः “ क्या तुम मुताअ के ज़रिये अपनी ज़िन्दग़ी को पुरमसर्रत बनाना चाहते हो ?”

मोहम्मद ने रिज़ा व रग़बत की अलामात से अपना सर झुका लिया।

मैं अपने फ़राएज़ के इन्तेहाई अहम मोड़ पर पहुँच चुका था। मैंने उससे वादा किया कि मैं बहरहाल तुम्हारे लिये इसका इन्तेज़ाम करुँगा। मुझे सिर्फ इस बात का ख़दशा था कि कहीं मोहम्मद बसरा के उन सुन्नियों से खौफ़ज़दा न हो जाये जो इस बात के मुख़ालिफ़ थे। मैंने उसे इत्मिनान दिलाया कि हमारा प्रोग्राम बिल्कुल मख़फ़ी रहेगा यहां तक की औरत को भी तुम्हारा नाम नहीं बताया जायेगा। इस गुफ़्तगू के फ़ौरन बाद मैं इस बदक़िमाश नसरानी औरत के पास गया जो इंग्लिस्तान के नो आबादयाती इलाक़ों की वज़ारत की तरफ़ से बसरे मैं इस्मत फ़रोशी पर मामूर थी और मुसलिम नौजवानों को बेराहेरवी पर उभारती थी। मैंने उससे तमाम वाकिआत ब्यान किये। जब राज़ी हो गया तो मैंने उसका आरज़ी नाम “ सफ़िया ” रखा और कहा कि मैं शेख़ को ले कर उसके पास आऊँगा।

मुक़र्ररा दिन में शेख़ मोहम्मद को ले कर सफ़िया के घर पहुँचा। हम दोनों के सिवा वहाँ और कोई नहीं था। मोहम्मद ने एक अशर्फ़ी मेहर पर एक हफ़्ते के लिये सीग़े से अक़्द किया। मुख़्तसर यह कि मैं बाहर और सफ़िया अन्दर से मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब को अपने आईन्दा के प्रोग्रामों के लिये तैयार कर रहे थे। सफ़िया ने अहकामे दीन की पामाली और आज़ादिये राय का पुरकैफ़ मज़ा मोहम्मद को चखा दिया था।

मैं इस तक़रीब के तीसरे दिन फिर मोहम्मद से मिला और हमने एक बार फिर अपनी गुफ़्तगू शराब की हुरमत के मुतअल्लिक थी। मेरी कोशिश थी कि मैं इन आयात के रद् करुं जो मोहम्मद के नज़दीक हुरमते शराब पर दलील थी। मैंने उससे कहाः “ अगर माविया , यज़ीद , ख़ोलफ़ा-ए-बनु उमय्या और बनी अब्बास की शराब नोशी हमारे नज़दीक मुसल्लम हो तो क्योंकर हो सकता है कि यह तमाम पेशवायाने दीन व मज़हब गुमराही की ज़िन्दगी बसर करते हों और तन्हा तुम सच्चे रास्ते पर हो ? बेशक वह लोग किताबे इलाही और सुन्नते रसूलस 0अ 0 को हम से ज़्यादा बेहतर जानते थे। पस यह बात सामने आती है कि इरशादाते ख़ुदा और (रसूल सल्लल्लाहो अलैहे व आलेहि वसल्लम) से उन बुजूर्गों ने जो इस्तेनाबात किया था वह शराब की हुरमत नहीं बल्कि उसकी कराहत थी। इसके अलावा यहूद व नुसारा की मुकद्दस किताबों में सराहत से शराब पीने की इजाज़त है हालांकि यह भी इलाही अदयान हैं और इस्लाम उन अदयान के पैग़म्बरों को मोअतक़िद है। यह कैसे मुम्किन है कि शराब अल्लाह के भेजे हुए एक दीन में हलाल और दूसरे में हराम हो ? क्या यह सब अदयान बरहक या ख़ुदाये यकता के भेजे हुए नहीं है ? हमारे पास तो यह भी रिवायत है कि हज़रत उमर उस वक़्त तक शराब पीते रहे जब तक यह आयत नाज़िल नहीं हुईः “ क्या तुम शराब और जूए से दस्तबरदार नहीं हो गये। ” (सूर-ए-मायदा आयत 91) अगर शराब हराम होती तो रसूल ख़ुदारस 0 हज़रत उमर की शराब नोशी पर हद जारी फ़रमाते मगर आप का उन पर हद जारी न करना इत बात की दलील है कि शराब हराम नहीं है।

मोहम्मद जो बड़े ग़ौर से मेरी गुफ़्तुगू सुन रहा था अचानक संभला और कहाः “ रिवायत में है कि हज़रत उमर शराब में पानी मिला कर पीते थे ताकि उसकी वलह कैफ़ियत दूस हो जाये जो नशा पैदा करती है। वह कहते थे शराब की मस्ती हराम है न कि खुद शराब। वह शराब जिससे नशा तारी न हो हराम नहीं है। ”

मोहम्मद , हज़रत उमर के इस नजरिये को इस आयत की रोशनी में दुरुस्त जानता था , जिसमें इरशाद होता है।

“ शैतान चाहता है कि तुम्हारे दरमियान शराब और जुए के जरिये अदावत और दुश्मनी पैदा करे और तुम्हे यादे खुदा और नमाज़ से बाज़ रखे। ” (सूर-ए-मायदा आयत 91)

आगर शराब में मस्ती और नशा न हो तो पीने वाले पर इसके असरात मुरतब नहीं होंगे और इसी लिये वह शराब जिसमें मस्ती नहीं हराम नहीं है।

मैंने मोहम्मद के साथ शराब से मुतअल्लिक़ गुफ़्तुगू को सफ़िया के गोशगुज़ार किया और उसे ताकीद की कि मौक़ा मिलते ही मोहम्मद को नशो में चूर कर दिया और जितना हो सके शराब पिलाओ।

दूसरे दिन सफ़िया ने मुझे इत्तिला दि कि उसने शेख़ के साथ जी खोल कर शराब नोशी की यहां तक कि वह आपे से बाहर हो गया ओर चीख़ने चिल्लाने लगे। रात की आख़री घड़ी में कई मर्तबा मैंने उससे मुक़ारिबत की और अब उस पर नक़ाहत का आलम तारी है और चेहरे की आब व ताब ख़त्म हो चुकी है। ख़ुलासा कलाम यह कि मैं और सफ़िया पूरी तरह मोहम्मद पर छा चुके थे। इस मंज़िल पर मुझे नो आबादयाती इलाक़ों के वज़ीर की दो सुनहरी बात याद आई जो उसने मुझे अलविदा कहते वक़्त कही थी। उसने कहा थाः

“ हमने स्पेन को कु़फ़्फार (मुराद अहले इस्लाम हैं) से शराब और जुए के ज़रिये दोबारा हासिल किया। अब उन्हें दो ताक़तचों के ज़रिये दूसरे इलाक़ों को भी पामर्दी के साथ वापस लेना है। ”

मोहम्मद के साथ मज़हबी ग़ुफ़्तगू के दौरान एक दिन मैंने रोज़े के मसअले को हवा दी और कहाः “ कुरआन कहता हैः “ रोज़ा तुम्हारे लिये बेहतर है। ” (सूर-ए-अलबक़रा आयत 184) उसने यह नहीं कहा कि तुम पर वाजिब है। ” लेहाज़ा इस्लाम में रोज़ा वाजिब नहीं मुस्तहब है। ”

इस मौके पर मोहम्मद को गुस्सा आया और उसने कहाः “ तुम मुझे दीन से ख़ारिज करना चाहते हो ”

मैंने कहाः “ ऐ मोहम्मद दीन क़ल्ब की पाक़ी , जान की सलामती और एतदाल का नाम है। यह कैफ़ियत इन्सान को दूसरों पर जुल्म व ज़ियादती से रोकती है। क्या हज़रत ईसाअ 0 ने यह नहीं कहा कि मज़हब इश्क़ व वारफ़तगी का नाम है। ” क्या कुरआन यह नहीं कहताः “ यक़ीन हासिल करने तक अल्लाह की इबातदत करो ” (सूर-ए-हजर आयत 99) अब अगर इंसान यक़ीने कामिल की मंज़िल पर पहुंच जाये , खुदा और रोज़े क़यामत उसके दिल में रासिख़ हो जायें , ईमान से उसका दिल लबरेज़ हो जाये और वह अच्छे सुलूक का हामिल हो तो फिर रोज़े की क्या ज़रुरत बाक़ी रह जाती है ? इस मंज़िल में वह आला तरीन इंसानी मरातिब से वाबस्ता हो जाता है। ”

मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब ने इस मर्तबा मेरी शदीद मुख़ालिफत की और अपनी नाराज़गी का इज़हार किया। फिर एक दफ़ा मैंने उससे कहाः नमाज़ वाजिब नहीं। ”

उसने पूछाः “ क्यों ?

मैंने कहाः इस लिये कि ख़ुदा वन्दे आलम ने कुरआन में कहा है कि “ मुझे याद करने के लिये नमाज़ क़ायम करो। ” सूर-ए-ताहा आयत 14) पस नमाज़ का मक़सद ज़क्रे इलाही और तुम्हें चाहिये कि तुम उसका नाम अपनी ज़बान पर जारी रखो। ”

मोहम्मद ने कहाः “ हाँ मैंने सुना है कि बाज़ औलमा-ए-दीन नमाज़ के वक़्त अल्लाह के नाम की तकरार शुरु करते हैं और नमाज़ अदा नहीं करते। ”

मैं मोहम्मद के इस एतराफ़ से बहुत ज़्यादा खुश हुआ पर एहतियातन कछ देर मैंने उसे नमाज़ पढ़ने की तलक़ीन भी की जिसका नतीजा यह निकला कि उससे नमाज़ की पाबन्दी छूट गयी। अब वह कभी नमा़ज़ पढ़ता और कभी न पढ़ता। ख़ास तौर से सुबह की नमाज़ ग़ालबन उसने तर्क ही कर दी थी। हम लोग रात को देर तक जिसकी वजह से सुबह उठने और वज़ू करने की उसमें हिम्मत बाक़ी न रहती थी।

क़िस्सा मुख़्तसर , आहिस्ता मैं मोहम्मद के बदन से ईमान का लबादा उतारने में कामयाब हो गया। मैंने हर रोज़ उससे अपनी मीठी गु़फ़्तगू का सिलसिला जारी रखता। अंजामकार एक दनी मैंने गुफ़्तगू की हदूद को जनाबे रसूल ख़ुदा (सल्लल्लाहू अलैहे व आलेहि वसल्लम) की जात (अक़दस) तक आगे बढ़ाया। अचानक उसके चेहरे पर तब्दीली आयी और वह इस मौज़ू पर गुफ़्तगू के लिये तैयार नहीं हुआ। उसने मुझसे कहाः “ अगर तुमने रसूले खुदा (सल्लल्लाहू अलैहे व आलेहि वसल्लम) की शान में गुस्ताख़ी की तो हमारी तुम्हारी दोस्ती के दरवाज़े यहीं से हमेशा के लिये बन्द हो जायेंगे। ” मैंने अपनी मेहनतों पर पानी फिरते देखा तो फ़ौरन् अपना मौज़ू-ए-गुफ़्तगु बदल लिया और फिर इस मौज़ू पर गुफ़्तगू नहीं की।

उस दिन के बाद से मेरा मक़सद मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब को रहबरी और पेशवाई की फ़िक्र देना हो गया। मुझे उसके क़ल्ब व रुप में उतर शिया सुन्नी फ़िरक़ों के अलावा इस्लाम में एक तीसरे फ़िर्के की सरबराही की पेशकश को उसके लिये क़िबिले अमल बनाना था। इस मक़सद के हुसूल के लिये ज़रुरी था कि पहले मैं उसके ज़ेहन को बेज़ा मजनून और अन्धे तअसुबात से पाक कर दूँ इस उन्वान से इसकी आज़ाद ख़्याली और बुलन्द परवाज़ी को तक़वियत पहुँचाऊँ। इस काम मैं सफिया भी मेरी मददगार थी क्योंकि मोहम्मद उसे दीवानों की तरह चाहता था और हर हफ़्ते मुतअ की मुद्दत को बढ़ाता जाता था। मुख़्तसर यह कि सफ़िया ने मोहम्मद से सब्र व क़रार और उसके तमाम इख्तियार छीन लिये थे।

मैंने अपनी एक मुलाक़ात में मोहम्मद से कहाः “ क्या यह दुरुस्त है कि जनाबे रसूले खुदा (सल्लल्लाहू अलैहे व आलेहि वसल्लम) की तमाम असहाब से दोस्ती थी ?”

उसने जवाब दियाः “ हाँ ”

मैंने पूछाः “ इस्लाम के क़वानीन दायमी हैं या वक्ती ?”

उसने कहाः “ बेशक दायमी हैं ” इसलिये कि रसूले खुदास 0 फ़रमाते है किः “ हलाले मोहम्मदस 0” क़यामत तक हलाल और हलाले मोहम्मदस 0 क़यामत तक हराम है। ”

मैंने बिला ताख़ीर कहाः “ पस हमें भी उनकी सुन्नत पर अमल करते हुए एक दूसरे का दोस्त और भाई बनना चाहिये। ”

उसने मेरी पेशकश को कुबूल किया और उस दिन के बाद से तमाम सफ़र व हज़र में हम एक दूसरे के साथ रहने लगे।

मैं इस कोशिश में था कि जिस पौदे को सींचने में मैंने अपनी जवानी के दिन सर्फ़ किये हैं अब जितनी जल्द हो सके उसके फलों से इस्तेफ़ादा करूं।

हिस्बे मामूल मैं अपने हर महीने की रिपोर्ट इंग्लिस्ताम में मो आबादयाती इलाक़ों की वज़ारत को भेजता रहा। रिपोर्ट लिखना अब मेरी आदत में शामिल हो गया था जिसमें कभी मैं कोताही नहीं करता था। वहां से जवाबात लिखे जाते थे वह तमाम के तमाम बड़े हौसला औफ़ज़ा और पुरउम्मीद हुआ करते थे और मोहम्मद ने जिस रास्ते का तअय्युन किया था हम उसे बड़ी तेज़ी से तय कर रहे थे। मैं सफ़र और हज़र में कभी उसको तन्हा नहीं छोड़ता था। मेरी कोशिश यही थी कि मैं आज़ाद ख़्याली और मज़हबी अक़एद में जिद्दत पसन्दी की रुह को उसके वजूद में इस्तेहकाम बख़शो में हमेशा उसेको यह साथ दिलाता रहता था , कि एक ताबनाक मुस्क़बिल तुम्हारे इन्तेज़ार में है।

एक दिन मैंने उससे अपना एक झूठा ख़्वाब बयान किया और कहाः रात मैंने जनाबे ख़त्मी मरतबतस 0 को बिल्कुल उसी सरापा के साथ कुर्सी पर बैठे देखा जैसे ज़ाकेरीन और वाएज़ीन मिम्बरों पर बयान करते रहते हैं। बड़े बड़े ओलमा और बुजुर्गाने दीन ने जिनसे मेरी कोई वाक़फ़ियत नहीं थी चारों तरफ़ से उनको घेरे रखा था। ऐसे में , मैंने देखा कि अचानक तुम उस मजमे में दाख़िल हो गये। तुम्हारे चेहरे ते नूर की शुआयें फू़ट रही थी जब तुम रिसालतमाब (सल्लल्लाहू अलैहे व आलेहि वसल्लम) के सामने पहुँचे तो उन्होंने खड़े होकर तुम्हारी ताज़ीम की और माथा घूमा और कहाः “ ऐ मेरे हमनाम मोहम्मद तुम मेरे इल्म के वारिस और मुसलमानों के दीनी और दुनियावी उमूर को संवारने में मेरे जानशीन हो ”

यह सुन कर तुमने कहाः “ या रसूल अल्लाह। (सल्लल्लाहू अलैहे व आलेहि वसल्लम) ” लोगों पर अपने इल्म को ज़ाहिर करते हुए मुझे ख़ौफ़ महसूस होता है। ”

जनाबे रिसालतमाबस 0 ने फ़रमायाः ख़ौफ़ को अपने दिल में जगह न दो क्योंकि जो कुछ तुम अपने बारे में सोचते हो , उससे कहीं ज़्यादा साहिबे मर्तबा हो।

मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब ने मेरे इस मनगढंत ख़्वाब को सुना तो खुशी से फूला नहीं समाया। वह बार-बार मुझसे पूछता था क्या तुम्हारे ख़्वाब सच्चे होते हैं ? और मैं उसे मुसलसल इत्मिनान दिलाता रहा। मैंने महसूस किया कि ख़्वाब के तज़किरे के साथ ही उसने अपने दिल में नये मज़हब के एलान का मुसम्मम इरादा कर लिया है।


इसी दौरान लंदन से मुझे ख़त पहुँचा कि मैं फौरन करबला और नजफ़ के उन मुक़द्दस शहरों की तरफ़ रवाना हो जाऊँ जो शियों के लिये क़िबल-ए-आरज़ू और इल्म व रुहानियत के मराकज़ हैं। अब सबसे पहले मैं मुक़द्दमे के तौर पर उन दोनों मुक़द्दस शहरों का एक निहायत मुख़्तसर तारीख़ी पसमंज़र पेश करना चाहता हूँ।

अहले तशीअ के पहले इमाम और आम्मतुल मुस्लेमीन के चौथे ख़लीफ़ा हज़रत अलीअ 0 की तदफ़ीन शहरे नजफ़ की अहमियत का सरनौहा-ए-आगाज़ है और यहीं से इस बस्ती की वुजूद अमल में आता है और यह रोज़ बरोज़ फैलती चली जाती है और यह सिलसिला आज तक जारी है। हज़रत अलीअ 0 की शहादत के वक़्त मरक़ज़े ख़िलाफ़त यानि कूफे से नज़फ़ का फ़सिला छः किलो मीटर था़ , जिसे पैदल एक घण्टे में तय किया जा सकता था। आप की शहादत के बाद जनाबे हसनैनअ 0 आप के ज़नाजे को पोशीदा तौर पर उस दूर उफ़तादा इलाक़े में लाये जिसे आज नज़फ़ कहा जाता है और रात की तारीकी में आप को दफ़्न कर दिया। अब यह शहर बैनुल नहरैन का सबसे बड़ा इलाक़ा कहलाता है और उसकी आबादी कूफ़ा से कहीं ज़्यादा है। इस जगही अहले तशीअ का हौज़ा-ए-इल्मिया क़ायम है और दुनिया भर के ओलमा ने इस शहर में इख़्तियार किया है। हर साल इसके बाज़ारों , मदरसों और घरों में इज़ाफ़ा होता चला जा रहा है। शिया ओलमा खुसूसी एहतेराम के हामिल हैं। इस्तनबोल में मुक़ीम उस्मानी ख़लीफ़ा मुन्दर्जा ज़ैल वुजूहात की बिना पर उनका बड़ा एहतेराम करता था।

1. एहतेराम ईरान और तुर्की के दोस्ताना रवाबित में इस्तेहकाम का बाइस था और इस तरह दोनों मुमालिक में जंग का ख़टका ख़त्म हो जाता था।

2. नजफ़ के ईतराफ़ व अकनाफ़ में बहुत से क़बाएल आबाद थे जो सबके सब मुसल्लह और सख़्ती से शिया मराजे के पैरुकार थे। उनके पास फौ़ज़ी असलहा और फ़ौजी तरबियत नहीं थी। यह लोग क़बाएली ज़िन्दगी के आदी थे , लेकिन ओलमा की तौहीन बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। लेहाज़ा अगर उस्मानियों की तरफ़ से ओलमा की बेएहतेरामी अमल में आती तो वह सब के सब उस्मानियों के ख़िलाफ़ मुत्तहिद हो जाते और यह कोई अक़लमन्दी की बात न थी कि इस्तनबोल की ख़िलाफ़त ऐसा ख़तरा अपने लिये मोल लेती।

3. सारी दुनिया-ए-तशय्यो में शिया ओलमा की मरजइयत क़ायम थी लेहाज़ा अगर उस्मानियों की तरफ़ से ज़र्रा बराबर भी उनकी एहानत होती तो ईरान , हिन्दुस्तान , अफ्रीका और दुनिया के तमाम मुमालिक के शिया बरफ़रोख़्ता होता और यह बात तुर्क हुकूमत के हक़ मे न थी।

अहले तशय्यों का दूसरा मुक़द्दस शहर कर्बला ए मोअल्ला है। यह शहर भी हज़रत अलीअ 0 और हज़रत फ़ातेमास 0 मोअल्ला है। यह शहर भी हज़रत अलीअ 0 और हज़रत फ़ातेमास 0 के फ़रज़न्द हज़रत इमाम हुसैनअ 0 की शहादतद के बाद आज तक मुसलसल फैल रहा है। इराक़ के लोगों ने इमाम हुसैनअ 0 की शहादत के बाद आज तक मुसलसल फैल रहा है। इराक़ के लोगों ने इमाम हुसैनअ 0 के दात दी कि आप मुसलमानों के अम्रे ख़िलाफ़त को संभालने के लिये हिजाज़ से कूफ़ा तशरीफ़ लायें , लेकिन ज्योंहि आपअ 0 अपने ख़ानदान के साथ कर्बला पहुंचे जो कूफ़े से तक़रीबन 72 किलो मीटर के फ़ासले पर है। इराक़ के लोगों का मिज़ाज बदल गया और वह यज़ीद के हुक्म पर इमामअ 0 के ख़िलाफ़ लड़ने पर आमादा हा गये।

यज़ीद बिन माविया अमवी ख़लीफ़ा था , जिसकी शाम पर हुकूमत थी। अमवी लश्कर , हुसैनअ 0 और उनके घराने से बरसरे पैकार हुआ और आख़िरकार उन सब को क़त्ल कर दिया। इराक़ियों की वह बुज़दिली और वज़ीदी लश्कर की पलीदी और संगादिली इस्लामी तारीख़ की सबसे ज़्यादा शर्मनाक दास्तान है। इस वाक़िये के बाद से आज तक दुनिया के तमाम शिया कर्बला को ज़ियारत इबादत रुहानी लगाओ और तवज्जो का मरकज़ बनाये हुए हैं और हर तरफ़ से जोक़ दर जोक़ वहाँ पहुँचते हैं। कभी तो इतना मजमा होता है कि तारीख़ मसीहियत में कभी ऐसा इज्तेआम देखने में नहीं आया। कर्बला के शहर में भी शिया ओलमा और मराजे दीने इस्लाम की तालीम व तरवीज़ में हमेशा मसरुफ़ नज़र आते हैं यहां के दीनी मदरसे तालिब इल्मों से भरे रहते हैं। कर्बला और नजफ़ बिल्कुल एक दूसरे के मुमासिल हैं। दजल व फुरात इराक़ के दो बड़े दरिया हैं जिनका तरचश्मा तुर्की का एक कोहिस्तानी इलाक़ा है। बैनुल नहरैन की खेतियां इसी के दम से आबाद हैं और यहां के लोगों की खुशहाली इन्हीं दरियाओं की मरहूने मिन्नत हैं।

जब मैं लंदन वापस गया तो मैंने नो आबादयाती इलाक़ों की वज़ारत को यह पेशकश की कि वह हुकूमते इराक़ को अपना फ़रमांबरदार बनाने के लिये दजला व फुरात के संगम को कन्ट्रोल करे और शोरिश और बग़ावत के मौक़ों पर उसके रास्ते को तब्दील करे ताकि वहां के लोग अंग्रेज़ों के इस्तेमारी मक़ासिद को मानने पर मजबूर हो जायें।

मैं एक बरबरी सौदागर के भेंस में नजफ़ पहुँचा और वहाँ के शिया ओलमा से रस्म व राह बढ़ाने के लिये उनकी दर्सी मजलिसों और मुबाहिसे की महफिलों में शिरकत करने लगा। महफ़िलें बेशतर औक़ात मुझे अपने अन्दर जज़्ब कर लेती थइं क्योंकि उनमें क़ल्ब व ज़मीर की पाकी हुक्म फ़रमा थ। मैंने शिया ओलमा को इन्तेहाई पाक दामन और परहेज़गार पाया लेकिन अफ़सोस कि उनमें ज़माने की तब्दीली के असरात का फ़ुकदान था और दुनिया के इन्क़ेलाबात ने उनकी फ़िक्र में कोई तब्दीली पैदा नहीं की थी।

1. नजफ़ के ओलमा मराज़े उस्मानी हुक्काम के शदीद मुख़ालिफ़ थे। इस लिये नहीं कि वह सुन्नु थे बल्कि इस लिये कि वह ज़ालिम थे और अवाम उनसे नाख़ुश थे और अपनी निजात के लिये उनके पास कोई रास्ता नहीं था।

2. वह लोग अपना तमाम वक़्त दर्स व तदरीस और दीनी उलूम व मुबाहिस पर सर्फ़ करते और कुरुने वुस्ता के पादरियों की तरह उन्हें ज़दीद उलूम से दिलचस्पी नहीं थी और अगर कुछ जानते भी थे तो वह उनके लिये न जानने के बराबर था।

3. उन्हें दुनिया के सियासी वाक़िआत का क़तअन इल्म न था और इस क़िस्म के मसाएल पर सोचना उनके नज़दीक बिल्कुल आबस और बेहूदा था। उन्हें देख कर मैं आप ही आप कहता थाः वाक़ई यह लोग कितने बदबख़्त हैं। दुनिया जाग चुकी हैं मगर यह अभी ख़्वाबे ख़रगोश ही में पड़े हैं। शायद कोई तबाहकुन मौज ही उनको इस ख़्वाबे गरां से बेदार करे। मैंने बाज़ ओलमा से ख़िलाफते उस्मानिया के ख़िलाफ तहरीक चलाने पर गुफ़्तगू की , लेकिन उन्होंने अपनी तरफ़ से कोई रद्दे अमल ज़ाहिर नहीं किया और ऐसा मालूम होता था कि वह लोग इस क़िस्म के मसाएल से दिलचस्पी नहीं रखते। बाज़ लोग मेरा मज़ाक उड़ाते थे , और मेरी बात का यह मफ़हूम निकालते थे कि मैं दुनिया के हालात को दिगरगों और नज़मे आलम को बरहम करना चाहता हूँ। इन ओलमा की नज़र में ख़िलाफ़त मक़दूर व महतूम थी। उनका अक़ीदा था कि उन्हें ज़हूरे महदी मोऊदअ 0 (अज्जल्लाहा फ़राजा) से पहले आले उस्मान के ख़िलाफ कोई इक़दाम नहीं करना चाहिये। महदी मोऊदअ 0 शियों के बारहवें इमामअ 0 हैं जो बचपन ही से पर्दा-ए-ग़ैब में चले गये हैं और अबी तक ज़िन्दा हैं। आख़री ज़माने में उनका ज़हूर होगं और वह उस वक़्त दुनिया को अद्ल व इंसाफ़ से भर देंगे जब वह मुकम्मल तौर पर ज़ुल्म व ज़ियादती से भर चुकी होगी।

मैं इसी तरह का अक़ीदा रखने वाले इस्लामी दानिशमन्द के बारे में सख़्त हैरान था। उनका अक़ीदा बईयेना क़शरी ईसाईयों का अक़ीदा था जो क़यामे अद्ल के लिये हज़रत ईसाअ 0 की बाज़गश्त के क़ाएल थे। मैंने एक आलिम से पूछाः क्या आप का यह अक़ीदा नहीं है कि अभी से ज़ुल्म व जि़यादती के ख़िलाफ़ रिज़्म आरा हो कर दुनिया में इस्लाम का बोल बाला किया जाये ? बिल्कुल उसी तरह जैसे पैग़म्बरे इस्लाम (सल्लल्लाहू अलैहे व आलेहि वसल्लम) ने ज़ालिमों के ख़िलाफ़ जेहाद किया था ?

उन्होनें फ़रमायाः पैग़म्बरे अकरम (सल्लल्लाहू अलैहे व आलेहि वसल्लम) ने इसी काम के लिये मामूर किया था और इसी लिये उनमें इस काम को अंजाम देने की तवनाई थी।

मैंने कहाः क्या कुरआन यह नहीं कहताः “ अगर तुम अल्लाह की मदद करोगे तो अल्लाह भी तुम्हारा मददगार होगा। ” (सूर-ए-मोहम्मदस 0 आयत 7) लेहाज़ा तुम भी अल्लाह की तरफ़ से ज़ालिमों के ख़िलाफ़ तलवार उठाने पर मामूर हो।

आख़िरक़ार जच होकर उसने कहाः “ तुम एक तिजारत पेशा आदमी हो और उन मौज़ूआत पर गुफ़्तगू के लिये एक सिलसिलए इल्म की ज़रुरत है जिसके लिये तुम मुनासिब नहीं हो। ”

अब ज़रा नजफ़ की तरफ़ जायें और हज़रत अलीअ 0स 0 के रोज़े के बारे में गुफ़्तगु करें। बड़ी पुरशिकोह और बाअज़मत आरामगाह है। पूरी इमारत सनाई , नक़्काशी , आईनाकारी और मुख़्तलिफ सजावटों का बेमिसाल शाहकार है। इतराफ़े मज़ार बड़े बड़े पुरशिकोह कमरे , तिलाई नाप का अज़ीम गुम्बद ओर सोने के दो मीनारे एक अजीब मंज़र पेश करती हैं। शिया हज़रात हर रोज गिरोह दर गिरोह रोज़े की ज़ियारत के लिये हाज़िर होते हैं और वहां की नमाज़े जमाअत में शिरकत करते हैं। वह लोग बड़े वलिहाना अन्दाज़ में इख़लास व इरादत का मुजस्सिमा बन कर ज़रीह को बोसा देते हैं दाख़िले से पहले आशिक़ाने इमाम दरवाज़े की चौखट पर अपने आप को गिरा देते हैं और बड़े एहतेराम से बाहरगाह की ज़मीन को चूमते हैं। फिर इमाम अलीअ 0 पर दुरुद भेजते हैं और इज़्ने दख़ूल पढ़ कर हरम में दाख़िल होते हैं। हरम के चारों तरफ़ एक अज़ीमुश्शान सहन है जिसमें बहुत से कमरे बने हुए हैं जो ओलमा-ए-दीन और ज़ायरीने हरम की इक़ामतगाह है।

करबला-ए-मोअल्ला में दो मशहूर आरामगाहें हैं जो थोड़े से इख़्तिलाफ़ के साथ नजफ़ में वाक़े हज़रत अलीअ 0 की आरामगाह के तर्ज़ पर बनाई गयी है। पहली आरामगाह इमाम हुसैनअ 0 की और दूसरी हज़रतअ 0 की है। कर्बला के ज़ायरीन भी नजफ़ की तरह रोज़ाना हरम में हाज़री देते हैं और इमामअ 0 की ज़ियारत करते हैं। कर्बला मजमूई तौर पर नजफ़ से ज़्यादा दरमियान दरिया के बहते पानी ने उसकी खूबसूरती में चार चाँद लगा दिये हैं।

इन शहरों की वीरानी और आशफ़ताहाली ने हमारी कामयाबी के मवाक़े फ़राहम कर रखे थे। लोगों की हालतेज़ार को देख कर यह अन्दाज़ा लगाया जा सकता था कि उस्मानी हुक्काम ने इन शहरों के रहने वालों के साथ किन-किन जराएम का इस्तेकाब किया और कैसी कैसी ज़ियादतियाँ कीं। यह लोग बड़े नादान , लालची और खुदसर थे और जो चाहते थे कर गुज़रते थे। ऐसा मालूम होता था कि इराक़ के लोग उनके ज़र ख़रीद गुलाम हैं पूरी क़ौम हुकूमत से नालां थी और जैसा कि मैं पहले कह चुका हूँ शिया हज़रत अपनी आज़ादी के छिन जाने के बावजूद हुक्काम के जुल्म व सितम को सब्र व सुकून से सह रहे थे और कोई रद्दे अमल ज़ाहिर नहीं कर रहे थे। अहले सुन्नत हज़रात का भी यही हाल था। वह लोग अपनी सरज़मीन पर तुर्क गवर्नर के तसल्लुत से बहुत नाखुश थे। ख़ास तौर पर जब्कि उनकी रगों में अरब अशराफ़ियत का ख़ून दौड़ रहा था। उधर ख़ानदाने रिसालतस 0 से वाबस्तगी रखने वाले अफ़राद हुकूमती इन्तेज़ामात में अपने आप को उस्मानी गवर्नर से ज़्यादा हक़दार समझते थे।

तमाम बस्तियाँ वीरान थीं। गर्दों गुबार बस्ती वालों का मुक़द्दर बन चुका था। हर तरफ़ बदनज़मी का दूर दौरा था। रास्तों पर लुटेरे काबिज़ थे और इस ताक में बैठे रहते थे कि हुकूमत की सरपरस्ती से आज़ाद कोई क़ाफ़िला वहां से गुज़रे और वह उन्हें लूटना शुरु कर दें लेहाज़ा बड़े बड़े क़ाफ़िले सिर्फ़ उसी वक़्त मंजिले मक़सूद तक पहुंच सकते थे जब उन्हें मुसल्लेह आदमियों के ज़रिये हुकूमत की हिमायत हासिल हो।

दूसरी तरफ़ क़बाएली झड़पों में भी इज़ाफ़ा हो गया था। कोई दिन ऐसा न ता जिसमें एक क़बीला दूसरे क़बीले पर हमला आवर न हो और क़त्ल व ग़ारतगरी का बाज़ार गर्म न होता हो। रोज़ाना कई अफ़राद मौत के घाट उतर जाते थे। नादानी और बेइल्मी ने पूरे इराक़ को अजीब तरह अपनी लपेट में ले रखा था। यह वाक़िआत कुरुने वुस्ता में पादरियों के दौर की याद ताज़ा कर रहे थे। सिर्फ़ नजफ़ और कर्बला के ओलमा इससे मुस्तसना थे या फिर किसी क़दर तालिबे इल्म या वह लोग जिनका उन ओलमा से मेल जोल था वगर न सबके सब जाहिल थे। मुल्की इक़्तेसाद का पहिया जाम हो गया था और बीमारी , बेरोज़गारी , ज़ेहालत और बदबख़्तियों ने शिद्दत से मुतवस्सित लोगों का घर देख लिया था। ममतलिकात का शीराज़ा बिख़र चुका था। हर तरफ एक हंगामा बपा था। हुकूमत और अवाम के दरमियान मुफ़ाहिमत की कमी थी और वह एक दूसरे को अपना दुश्मन समझते थे। उनका एक दूसरे के साथ तआवुन नहीं था। ओलमा-ए-दीन , इलाही मसाएल में इस तरह ग़र्क़ थे कि दुनिया की ज़िन्दगी की नज़रों से ओझल हो गयी थी।

ज़मीन ख़ुश्क और खेतियाँ उजाड़ थीं। दजला व फुरात के दोनों दरिया खेतों को सेराब करने के बजाये एक आशाफ़ता सर मेहमान की तरह प्यासी ज़मीन के बीच से बसरअत गुज़र रहे थे। मुल्क की यह आशफ़ता हाली यक़ीनन एक इन्क़ेलाब का पेश ख़ेमा थी।ॉ

मुख़्तसर यह कि मैंने कर्बला और नजफ़ में चार महीने गुज़ारे। नजफ़ में , मैं ऐसी बीमारी में मुब्तिला हुआ कि जीने की औस टूट गयी। तीन हफ़्ते तक मेरी बुरी हालत थी। आख़िरकार मुझे शहर के एक डाक्टर से रुजू करना पड़ा। उसने मेरे लिये कुछ दवायें तजवीज़ की जिनके इस्तेमाल से मैं बतदरीज , बेहतर होता चला गया। उस साल गर्मी भी बड़ी शदीद और नाक़बिले बर्दाश्त थी और मैंने अपनी बीमारी का तमाम वक़्त एक तहख़ाने में गुज़ारा जो किसी क़दर पुरसुकून और ठण्डा था। मेरा मालिके मकान मेरे दिये हुए मुख़्तसर पैसे से मेरे लिये दवा दारु और खाने पीने की इन्तेज़ाम करता था। वह हज़रत अलीअ 0 के ज़व्वारों की ख़िदमत को तक़रुबे इलाही का ज़रिया समझता था। बीमारी के इब्तिदाई दोनों में मेरी ग़िज़ा मुर्ग़ का सूप था लेकिन बाद में डाक्टर की इजाज़त से मैंने गोश्त और चावल भी इस्तेमाल करना शुरु किया।

बीमारी से किसी कद्र इफ़ाक़े के बाद मैं बग़दाद रवाना हुआ और वहां जा कर मैंने कर्बला , नजफ , हिल्ला और बग़दाद से मुतअल्लिक अपने मुशाहिदात के तक़रीबन सो सफ़हात पर मुश्तमिल एक रिपोर्ट में नो आबादयाती इलाकों की विज़ारत के लिये रक़म किया और लंदन भेजने के लिये उसे बग़दाद में मज़कूरा विज़ारत के नुमाइन्दा के सुपुर्द किया और अपने रुकने या लंदन वापस जाने से मुअल्लिक़ नये एहकामात के इन्तेज़ार में बै़ठा रहा।

यहां यह बीत भी बताता चलूं कि मैं वापसी के लिये बहुत बेक़रार था , क्योंकि अपने देश , ख़ानदान और अज़ीज व अक़ारिब से छूटे मुझे एक अरसा हो चुका था। ख़ास तौर पर रह रह कर रास्पोटीन का ख्याल आ रहा था जो मेरी इराक़ रवानगी के कुछ अर्से बाद ही इस दुनिया में वारिद होआ था। इस नो मौलूद की याद मुझे बहुत बेचैन कर रही थी। इसी बाएस मैंने दरख़्वास्त में एक मुख़्तसर अर्से के लिये वापस लंदन आने के लिये इजाज़त चाही थी। मुझे इराक़ में तीन साल का अर्सा हो चुका था। बग़दाद में नो आबादयाती इलाकों की विज़रात के नुमाइन्दे का इसरार था कि मैं बार बार उसके पास न जाऊँ क्योंकि इस तरह मुम्किन है लोग मुझे शक की निगाह से देखने लगे और इसी बात को मद्दे नज़र रखते हुए मैंने दजला के करीब एक मुसाफ़िर ख़ाने को अपना ठिकाना बनाया। लो आबादयाती इलाक़े के नुमाइन्दा ने कहा था कि लंदन से जवाब आते ही मुझे बाख़बर कर दिया जायेगा।

बग़दाद में अक़ामत के दौरान मैंने उसे शहर का आम हालतों में उस्मानी हुकूमत के पाया-ए-तख़्त “ कुस्तुनतुनिया ” से मवाज़ना किया तो मुझे उन दिनों में नुमायां फ़र्क़ महसूस हुआ जो अरबों की निस्बत उस्मानियों की दुश्मनी और बदनियती का ग़म्माज़ था। उन्होंने इराक़ी शहरों और इराक़ी आबादियों को हिफ़ाज़ाने सेहत के तमाम उसूलों के बरख़िलाफ़ ग़िलाज़त और गन्दगी का मिस्किन बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।

बसरा से कर्बला और नजफ़ पहुँचने के चन्द माह बाद मुझ मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब का ख्याल आया। मैं उसकी तरफ़ से बड़ा फ़क्रमन्द था। मैंने उस पर बड़ी मेहनत की थी , लेकिन मुझे उस पर भरोसा नहीं था , क्योंकि वह मतलूने मिज़ाज वाक़ै हुआ था। इसके अलावा वह गुस्से का भी बड़ा तेज़ था और ज़रा ज़रा सी बात पर आपे से बाहर हो जाया करता था। इन ख़ुसुसियात के पेशे नज़र मुझे धड़का था कि कहीं मेरी मेहनत अकारत न जाये और जिस ख़्वाहिश को मैं एक अर्से से अपने सीने में लिये फिर रहा था उस पर पानी न फिर जाये।

जिस दिन में बसरा कि सिम्त रवाना हो रहा था वह तुर्की जाने पर बज़िद था कि वहां जाकर उस शहर के बारे में मालूमात हासिल कर। मैंने ब़ड़ी सख़्ती से उसे उस सफ़र से बाज़ रखा और कहा मुझे डर है कि तुम वहाँ जा कर कोई ऐसी उलटी सीधी बात न कर बैठो जिससे तुम पर कुफ्र व इलहाम का इलज़ाम आयद हो और तुम्हार ख़ून रायगां जाये लेकिन सच्ची बात यह थी कि मैं नहीं चाहता था कि वहां जा कर वह बाज़ ओलमा-ए-अहले सुन्नत से कोई राब्ता क़ायम करे क्योंकि इसमें इस बात का ख़तरा था कि कहीं वह लोग अपनी मोहकम दलीलों के ज़रिये दोबारा उसे अपने जाल में न फांस लें और मेरे तमाम मन्सूबे धरे के धरे रह जायें।

जब मैंने देखा कि मोहम्मद बसरा से जाने पर मुसिर है तो मजबूरन मैंने उसे ईरान जने पर उभारा कि वहां जा कर वह शीराज़ और इस्फ़ेहान की सैर करे।

यहाँ इस बात की वज़हात भी ज़रुरी है कि उन दिनों शहरों के रहने वाले शिया मज़हब के पैरुकार हैं और यह बात बईद अज़ क़यास थी कि शेख़ उनके अक़ाएद से मुतस्सिर हो। मुझे इस बारे में पूरा इत्मिनान था , क्योंकि मैं शेख़ को अच्छी तरह जानता था।

रुख़सत होते हुऐ मैंने उससे पूछाः “ तक़य्या के बारे में तुम्हारा क्या ख़्याल है ” ?

उसने कहाः “ दुरुस्त हैं क्योंकि पैग़म्बरे अकरमस 0 के एक सहाबी अम्माररजि 0 उन मुशरेकीन के डर से जिन्होंने उनके माँ बाप को क़त्ल कर दिया था अपने आपको मुशरिक ज़ाहिर करते रहे और ख़त्म मरतबतस 0 ने जनाबे अम्मार यासिररजि 0 की इस रविश की तरफ़ इशारा भी किया है। ”

मैंने उससे कहाः “ पस तुम पर भी वाजिब है कि ईरान जा कर तक़य्ये को न भूलो और अपने आपको ख़ालिस शिया ज़ाहिर करो ताकि एतराज़ात से बचे रहो और ओलमा की सोहबत भी तुम्हें हासिल रहे और साथ ही साथ ईरानियों के आदाब व रुसूम भी तुम पर खुल जायें क्योंकि आईन्दा चल कर यह मालूमात तुम्हारे बहुत काम आयेगी और तु्म्हें अपने मक़़ासिद में ब़ड़ी कामयाबी अता करेगी ” ।

इस गुफ्त़गू के बाद मैंने उसे कुछ रक़म “ ज़कात ” के उन्वान से दी। ज़कात एक तरह का इस्लामी टैक्स है जिसे सरमायादारों से वसूल किया जाता है ताकि उस आमदनी को उम्मत के फ़लाह व बहबूद पर ख़र्च किया जाये। जाते हुए मैंने रास्ते ही में उसे एक घोड़ा ख़रीद कर दिया क्योंकि उसे उसकी सख़्त ज़रुरत थी और फिर मैं उससे अलग हो गया और उस दिन से अब तक उसकी कोई ख़बर नहीं है और नहीं मालूम उस पर क्या बीती होगी। मुझे ज़्यादा तशवीश इस लिये भी थी कि हमने बसरे से निकलते वक़्त यह तय किया था कि हमें वापस असरा ही पहुंचना है और अगर हममें से कोई वहां न पहुँच सके तो अपनी कैफ़ियत “ अब्दुर रज़ा तुरखान ” को लिख भेजे ताकि दूसरा उससे बाख़बर हो मगर अब तक उसकी तरफ़ से कोई इत्तिला नहीं मिली थी।

कुछ अर्से इन्तेज़ार के बाद बिलआख़िर नोआबादयाती इलाकों की विज़ारत से ज़रुरी ऐहकामात बग़दाद पहुंचे और मेरी हुकूमत ने मुझे फ़ौरी तौर पर तलब किया। लंदन पहुंचते ही नौआबादयाती इलाक़ों की विज़ारत के सेक्रेट्री और आला ओहदादारों के साथ हमने एक कमीशन तशकील दिया। मैंने इस जलसे में अपने फराएज़ , इक़दामात और मुतालिआत पर मब्नी रिपोर्ट को लंदन हुक्काम के सामने पेश किया और उन्हें बैनुल नहरैन की कैफ़ियत से भी आगाह किया।

इराक़ से मुतअल्लिक़ मेरी फ़राहमकर्दा मालूमात और मेरी कारगुज़ारियों ने सबके दिल जीत लिये थे। पहले भी इराक़ से मैंने कई रिपोर्ट उनके लिये रवाना की थी और उन सबसे वह मुतईन थे। उधर सफ़िया ने भी एक रिपोर्ट भेजी थी जो पूरी तरह मेरी रिपोर्ट की ताईद करती थी। इसके अलावा मुझे यह बात भी मालूम हुई कि विज़ारतख़ाना ने मेरी निगरानी के लिये कुछ मख़सूस अफ़राद को मेरे पीछे लगा रखा था जो सफ़र व हज़र में मुझ पर निगाह रखते थे। उन अफ़राद ने भी अपनी रिपोर्टों में मेरे तर्ज़ अमल और दिलचस्पी से रिज़ाइयत की इज़हार किया था और उन रिपोर्टों की तस्दीक व ताईद की थी जिन्हें मैंने लंदन मालूम हुई कि विज़ारतख़ाना ने मेरी निगरानी के लिये कुछ मख़सूस अफ़राद को मेरे पीछे लगा रखा था जो सफ़र व हज़र में मुझ पर निगाह रखते थे। उन अफ़राद ने भी अपनी रिपोर्टों में मेरे तर्ज़ अमल और दिलचस्पी से रिज़ाइयत की इज़हार किया था और उन रिपोर्टों की तस्दीक व ताईद की थी जिन्हें मैंने लंदन भेजा था। इस मर्तबा कुल्ली तौर पर मैदान मेरे हाथ और सब मुझशे खुश थी यहाँ तक कि उस दौर के सेक्रेट्री ने वज़ीर से मेरी मुलाक़ात के लिये वक़्त लिया और मैं उसके साथ वज़ीर से मिलने गया। मुझे देखते ही वज़ीर के चेहरे पर एक गोना शगुफ़्तगी आ गयी और ब़ड़े पुरतपाक अन्दाज़ में खुश आमदीद कहते हुए उसने मुझसे हाथ मिलाया। यह मुलाक़ात गुज़िश्ता की बेजान और मुख़्तसर करती थी कि मैंने उसके दिल में अपने लिये जगह पैदा कर ली है।

वज़ीर ख़ास तौर से मेरी महारत का मोअतरिफ़ था जिसकी बुनियाद पर मैंने शेख़ मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब को अपने कब्ज़े मे कर लिया था। मुझे याद है कि उसने अपनी गुफ़्तगू के दौरान मुझसे कहा थाः “ मोहम्मद पर तसल्लुत नोआबादयाती विज़ारत का सबसे अहम मसअला था ” उसने बड़ी शिद्दत से यह ताकीद की थी कि मैं मोहम्मद को एक मुनज़्जम मनसूबे के तहत उन उमूर से आगाह करुं जिन्हें आईन्दा चल कर उसे हमारे लिये , अंजाम देना है। वह बार-बार इस बात का एतराफ़ कर रहा था कि अज़ीम बर्तानिया के लिये मेरी तमाम ख़िदमात शे़ मोहम्मद जैसे शख़्स की जुस्तजू और उस पर अपना असर व नुफूज़ करने के मुक़ाबिले में पासिंग भी नहीँ। नोआबादयाती इलाक़ों के वज़ीर को जब इस बात का इल्म हुआ कि मैं शेख़ की गुमशुदकी के बारे में बहुत परेशाह हूँ तो उसने निहायत इत्मिना से जवाब दियाः “ परेशान होने की ज़रुरत नहीं। तुमने जो कुछ शेख को पढाया था वह अभी तक उसे याद है और हमारे आदमी इस्फ़ेहान में उससे राब्ता क़ायम रखे हुए हैं। उनकी रिपोर्टों से मालूम होता है कि शेख़ अभी तक अपनी डगर पर क़ायम है। मैंने आप ही आप कहा शेख़ ने अपने इस गुरुर व नख़ूत के साथ अंग्रेज़ जासूस को क्योंकर इजाज़त दी होगी कि वह उसके बारे में मालूमात फ़राहम कर सके। इस मौजू़ पर वज़ीर से बात चीत करते हुए मुझे ख़ौफ़ महसूस हुआ कि कहीं वह बुरा न मान जाये। बाद में शेख़ से दोबारा मुलाक़ात पर मुझे सब कुछ इल्म हो गया और उसने तमाम माजरा कह सुनाया। उसने बताया कि इस्फ़ेहान में उसकी दोस्ती अब्दुल करीम नामी एक शख्स से हुई जो अपने आपको अहले क़लम ज़ाहिर करता था और उसी ने शेख़ पर अपना सिक्का बिठा कर उसके तमाम राज़ मालूम किये थे। इसके साथ ही सफ़िया भी कुछ अर्से बाद इस्फ़ेहान आई और उसने मज़ीद दो महीने के लिये थी बल्कि अब्दुल करीम ने उसे अपने साथ रखा हुआ था। शीराज़ में अब्दुल करीम ने शेख़ के लिये सफ़िया से भी ज़्यादा ख़ूबसूरत लड़की का इन्तेजाम किया था और वह शीराज़ के एक यहूदी ख़ानदान की हसीन व जमील लड़की थी जिसका नाम आसिया था। अब्दुल करीम इस्फ़ेहान के एक मादर पिदर आज़ाद ईसाई का फ़र्ज़ी नाम था और वह भा आसिया का तरह ईरान में बर्तानिया के नौआबादयाती इलाक़ों की विज़ारत का एक क़दीम मुलाजि़म था।

मुख़्तसर यह कि अब्दुल करीम , सफ़िया , आसिया और राक़िमुल हुरुफ़ ने मिल कर अपनी रात दिन की कोशिशों से शेख़ मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब को नौआबादयाती इलाकों की विज़ारत की ख़्वाहिशात के ऐन मुताबिक़ ढाला और आईऩ्दा की प्लानिंग को रु बा अमल लाने की ज़िम्मेदारी उठाने पर आमादा किया। यहां यह नुकता भी काबिले ज़िक्र है कि वज़ीर से मुलाक़ात के मौक़े पर सेक्रेट्री के अलावा विज़ारत के दो और आला ओहदादार भी वहां मौजूद थे जिन्हें उस वक़्त तक मैं नहीं जानता था। वज़ीर ने इजलास के इख्तिताम पर मुझसे कहाः “ अब तुम इंग्लिस्तान की नोआबादयाती विज़ारत के दो और आला ओहदादार भी वहां मौजूद थे जिन्हें उस वक़्त तक मैं नहीं जानता था। वज़ीर ने इजलास के इख़्तिमाम पर मुझसे कहाः “ अब तुम इंग्लिस्तान की नोआबादयाती विज़ारत के सबसे बड़े इफ्तिख़ारी निशान के हक़दार हो और यह वह एजाज़ा है जिसे हमारी हुकूमत सफ़े अव्वल के जासूस को दिया करती है। ” ख़ुदा हाफ़ज़ी के मौक़े पर उसने क़तई अन्दाज़ में कहा ” : मैंने सेक्रेट्री से कह दिया है कि वह तुम्हें हुकूमत के बाज़ “ पोशीदा ” और “ राज़दराना ” मसाएल आगाह करे ताकि तुम अपनी जिम्मेदारियों को ज़्यादा बेहतर तरीक़े से अंजाम दे सको। ”

वज़ीरे की खुशनूदी के सबब मेरी दस दिन की छुट्टी मंजूर हुई और मुझे अपनी बीवी और एक अदद बच्चे से मिलने का मौक़ा हाथ आया। मेरा लड़का जो अब तीन साल का हो चुका था , बिल्कुल मेरा हसमशकल था और बाज़ अल्फ़ाज़ बड़े मीठे अंदाज़ में बोलने लगा था। उसने चलना भी सीख लिया था। मैं हक़ीक़तन अपने दिल के टुकड़े को ज़मीन पर चलता फिरता महसूस कर रहा था। अफसोस कि खुश के यह लम्हात बड़ी तेज़ी से गुज़र रहे थे। बीवी और बच्चे के साथ गुजरने वाले यह पुरमुसर्रत लम्हात वाक़ई नाक़ाबिले बयान हैं और ज़िन्दगी की तमाम लज्ज़तें उसे आगे हैज हैं मेरी एक उम्र रसीदा चची थी जिसकी मुझ पर बचपन ही से नवाज़िशात और मेहरबानियां रही हैं। मैं उससे मिल कर किस क़द्र खुश हुआ , इसका अंदाज़ा किसी को नहीं हो सकता। मेरी उससे यह आख़री मुलाकात थी इस लिये कि दस दिन की छुट्टियों के बाद जब मैं तीसरी मर्तबा अपने सफ़र पर रवाना हुआ तो निहायत अफ़सोस के साथ मुझे उसकी मौत की इत्तिला मिली।

मेरी दस दिन की यह छुट्टियाँ पलक झपकते गुज़र गयीं। यह एक तल्ख़ हक़ीक़त है कि ज़िन्दगी के पुरमर्सत लम्हात हमेशा बड़े तेज़ी से गुज़रते हैं और मुसीबत की घड़ियाँ अपने दामन में सालों का फ़ासिला रखती हैं। लंदन के पुरमसर्रत लम्हात में मैंने अपनी नजफ़ की बीमारी को याद किया जिसका हर लम्हा मेरे लिये एक सदी बन गया था। मैं किसी तरह भी मुसीबत के उन अय्याम को भुला नहीं सकता। खुशी के लम्हात को इतना दवाम नहीं कि वह मुीबतों के दिनों की कोफ़्त को यादों के दरीचों में न आने दें।

दस दिनों की छुट्टियां मनाने के बाद आइन्दा के लाएहा अमल से बाख़र होने के लिये मैं बादिले ना ख़्वास्ता वज़ारत ख़ज़ाना गया। सेक्रेट्री से मुलाक़ात के मौक़े पर मैंने उसे हमेशा की तरह खुश व ख़ुर्रम पाया। उसने मुझसे बड़ी गर्मजोशी के साथ हाश मिलाया और दोस्ताना लहजे में कहाः

नोआबादयाती उमूर के ख़ुसूसी कमीशन की मर्ज़ी के मुताबिक़ वज़ीर ने ख़ुद मुझे यह हुक्म दिया है कि मैं तुम्हें दो अहम रुमूज़ से आशना करुं। इन रुमूज़ से वाक़फ़ियत आईन्दा के प्रोग्रामों में तुम्हारे लिये बहुत मुफ़ीद साबित होगी और इन दो बातों से नोआबादयाती इलाक़ों की विज़ारत के सिर्फ़ चन्द एक मिम्बरान ही बाख़बर हैं। यह कहकर उसने मेरा हाथ थामा और अपने साथ विज़ारतख़ाने के एक कमरे में ले गाय जहाँ कुछ लोग एक गोल मेज़ इतराफ़ बैठे हुए थे। उन्हें देख कर तअज्जुब से मेरी चीख़ निकलते रह गयी क्योंकि उस इजलास के आदमियों की कैफ़ियत कुछ यूँ थी।

1. हू बहू सल्तनते उस्मानी का जलालत अफ़रोज़ पैकर जो तुर्की और अंग्रेज़ी ज़बानों पर पड़ी महारत से मुसल्लत था।

2. कुस्तुनतुनिया के शेख़ुल इस्लाम की दूसरी हक़ीक़त से क़रीब तस्वीर।

3. शहंशाहे ईरान के शिया आलिम की मुकम्मल शबीह।

4. नजफ़ में शियों के मराजे तक़लीद का बेमिस्ल सरापा

यह आख़री तीन अफ़राद फ़ारसी और अंग्रेज़ी ज़बानों में गुफ़्तगू कर रहे थे। सबके नज़दीक उनके प्राईवेट सेक्रेट्री बिराजमान थे जो उनकी बातों का नोट बना कर हाज़ेरीन के लिये उसका तर्जुमा पेश कर रहे थे। ज़ाहिर है कि इन तमाम प्राईवेट सेक्रेट्रियों का किसी ज़माने में मज़कूरा पाच शख़्सियतों से बहुत क़रीब का राब्ता कर चुका था और उनकी मुकम्मल रिपोर्ट के तहत उन पांच हमशबीह अफ़राद कतो बईनहे तमाम आदत व ख़साएल के साथ ज़ाहिरी और बातिनी एतबार से असली अफ़राद की मुकम्मल तस्वीर बनाया गया था। यह पाँचों सवांगी अपने फ़राएज़ और मक़ाम व मंसब से बख़ूबी आशना थे। सेक्रेट्री ने आग़ाज़े सुख़न करते हुए कहाः उन पाच अफ़राद ने असली शख़्सियतो का बहरुप भर रखा है और यह बताना चाहते हैं कि वह किसी तरह की सोच रखते हैं और आईन्दा के बारे में उनका क्या ख़्याल है। हमने इस्तनबोल , तेहरान और नजफ़ की मुकम्मल इत्तिलाआत उन्हें फ़राहम कर दी है। अब वह अपनी हैइयत कज़ाई को हक़ीक़त पर महमूल किये बैठे हैं और इसी अहसास के साथ अपनी हासिलकर्दा मालूमात से हमारे सवालों का जवाब फ़राहम करते हैं। हमारी जांच पड़ताल के मुताबिक उनके सत्तर फ़ीसद जवाबात हक़ीक़त के ऐन मुताबिक या यूँ कहिये कि असली शख़्सियतों के उफ़कार से हम आहंग होते हैं। सेक्रेट्री में अपनी गुफ़्तुगू के दौरान मुझे मुख़ातिब ले सकते हो। मिसाल के तौर पर नजफ़ के शिया मरजा तक़लीद से जो चाहो पूछ सकते हो। ” मैंने कहाः “ बहुत अच्छा ” और फ़ौरन ही कुछ सवालात पूछ डाले।

मेरा पहला सवाल थाः “ किब्ला व काबा। ” क्या आप अपने मुक़ल्लेदीन को इस बात की इजाज़त देते हैं कि वह सुन्नी और मुतअस्सुब उस्मानी हुकूमत की मुख़ालिफ़त पर कमरबस्ता हों और उनके खिलाफ एलाने जंग करें ?”

नक़ली या सवांगी मराजा तक़लीद ने कुछ देर सोचा और कहा। “ मैं मुतलिक़ जंग की इजाज़त नहीं देता क्योंकि वह सुन्नी मुसलमान हैं ओर कुरआन की आयत कहती है कि “ तमाम मुसलमान आपस में भाई-भाई हैं। ” सिर्फ़ उस सूरत में जंग जाएज़ है जब उस्मानी हुक्मरान जुल्म व सितम पर उतर आयें। ऐसी हालत में अम्र बिल मारुफ़ और नेहि अनिल मुन्कर के तहत उनसे जंग लड़ी जा सकती है। वह भी उस वक़्त तक जब आसारे ज़ुल्म ज़ाएल न हो जायें और ज़ालिम जुल्म से बाज़ न आ जाये। ”

मैंने फिर दूसरा सवाल पूछाः “ हुज़ूरे वाला। ” यहूदियों और ईसाईयों की निजासत के बारे में आप का क्या ख़़्याल है क्या यह लोग वाक़ई नापाक है ?”

उसने कहाः “ हाँ यह दोनों फ़िर्क़े मसलन नाजिस हैं और मुसलमानों को उनसे दूर रहना चाहिये। ”

मैंने पूछाः “ इसकी वजह क्या है ” ?

उसने जवाब दियाः “ यह दरअसल मसावियाना सुलूक का मसअला है कि क्योंकि वह लोग भी हमें काफ़िर गर्दान्ते हैं और हमारे पैग़म्बरअ 0 की तकज़ीब करते हैं। ”

उसके बाद मैंने पूछाः “ पैग़म्बरे अकरम (सल्ललल्लाहो अलैहे व आलेहि वसल्लम) की सफ़ाई से मुतअल्लिक़ इतनी ताकीदात के बाद कि सफाई ईमान की अलामत है , फिर क्यों हज़रत अलीअ 0 के सहने मुतहर और तमाम बाज़ारों में इस कद्र गन्दग़ी फैली रहती है ?”

मरज-ए-तक़लीद ने जवाब दियाः “ बेशक इस्लाम ने सफाई और सुथराई को ईमान की दलील जाना है मगर उसको क्या किया जाये कि उस्मानी हुकूमत के आमाल की बेतवज्जेही और पानी की किल्लत ने यह सूरत पैदा की है। “

दिलचस्प बात यह थी कि इस बनावटी मरजा तक़लीद की आमादगी और हाज़िर जवाबी नजफ़ के हक़ीक़ी मरजा तक़लीद के ऐन मुताबिक़ थी। फ़क़त उस्मानी हुकूमत के आमाल की बेतवज्जेही की बात उसने अपनी तरफ से उसमें मिलाई थी क्योंकि नजफ़ के आलिम की ज़बान से यह जुमला नहीं सुनाया गया था। बहरहाल मैं इस हमआहंगी और मुशाबिहत पर सख़्त मुतहय्यर था , क्योंकि तमाम जवाबात बईयेहनही अस्ल मरजा तक़लीद के बयानात थे जिसे उसने फ़ारसी में पेश किया था और अक़ली मरजा भी फ़ारसी ही में गुफ़्तगू कर रहा था।

सेक्रेट्री ने मुझसे कहाः “ दीगर चार अफ़राद से भी चाहो तो सवाल कर सकते हो। यह चारों अफ़राद भी तुम्हें असली शख़्सियतों की तरह जवाब देंगे। ”

मैंने कहा कि मैं इस्तनबोल के शेखुल इस्लाम अहमद आफ़न्दी के उफ़कार और बयानात से बख़ूबी वाक़िफ हों और उसकी बातें मेरे हाफिज़े में महफूज़ हैं। आपकी इजाज़त से मैं उसके हमशक्ल से गुफ्तगू करुंगा। उसके बाद मैंने पूछा “ आफ़न्दी साहब। ” क्या उस्मानी ख़लीफ़ा की इताअत वाजिब है ?”

उसने कहाः “ हाँ मेरे बेटे। उसकी इजाज़त खुदा , और उसके रसूलअ 0 की इताअत की तरह वाजिब है। “

मैंने पूछाः “ किस दलील की बुनियाद पर ?”

उसने जवाब दियाः “ क्या तुमने यह आयते करीमा नहीं सुनी है किः ख़ुदा , उसके रसूल (सल्ललल्लाहो अलैहे व आलेहि वसल्लम) और उलुल उम्र की इताअत करो। ” (सूर-ए-निसा आयत 59)

मैंने कहाः “ अगर हर ख़लीफ़ा उलुल अम्र है तो गोया ख़ुदा ने हमें यज़ीद की इताअत की भु हुक्म दिया है क्योंकि वह उस वक़्त का ख़लीफ़ा था दरआंहालिया कि उसने मदीने की ताराजी का हुक्म दिया था और सिब्ते रसूलअ 0 हज़रत इमाम हुसैनअ 0 को क़त्ल किया था। ख़ुदा वन्दे अलीम किस तरह वलीद की इताअत का हुक्म देगा जबकि वह शराबख़ोर था। ”

नक़ली शेखुल इस्लाम ने जवाब दियाः “ मेरे बच्चे। ” यज़ीद अल्लाह की तरफ़ से मोमिनों का अमीर था , लेकिन क़त्ले हुसैनअ 0 में उससे ख़ता हो गयी थी जिसके लिये बाद में उसने तौबा कर ली थी। मदीने में क़त्ल व ग़ारतगरी का सबब वहां के लोगों की सरकशी और यज़ीद की इताअत से इन्हेराफ़ था जिसमें यज़ीद का कोई कसूर नहीं था। अब रह गया वलीद तो इसमें शक नहीं कि शराब पीता था , लेकिन शराब में पानी मिला कर पीता था ताकि उसकी मस्ती ख़त्म हो जाये और यह इस्लाम में जाएज़ है। ” (शराबखो़री इस्लाम में मुतलक़म हराम है और यह हुरमत किसी शर्त से नहीं टूटती)

मैंने कुछ अर्से क़ब्ल इस्तनबोल में हुरमते शराब से मुतअल्लिक मसअले को वहां के शेखुल इस्लाम शेख़ अहमद से दरियाफ़्त कर लिया था। इसका जवाब थोड़े से इख़्तिलाफ़ के साथ लंदन के उस नक़ली शेखुल इस्लाम के जवाब से मिलता जुलता था। मैंने अस्ल से नक़्ल की ऐसी शबाहत तैयार करने की कोशिशों को सराहते हुए सेक्रेट्री से पूछाः “ आख़िर इस काम से क्या फ़ायदा हो सकता है ?”

उसने जवाब दियाः “ इस तरह हम बादशहों और सुन्नी ओलमा के उफ़कार और उनके मीलाने तबअ से आशनाई हासिल करते हैं। फिर इन मकालमात को परखा जाता है और उनसे नताएज अख़ज़ किये जाते हैं और फिर हम इलाके के दीनी और सियासी मसाएल में दख़ल अन्दाज़ी करते हैं मसलन अगर हमें यह मालूम हो जाये कि फलां आलिम या फ़लां बादशाह इलाक़े की मशरक़ी सरहदों में हमसे मुख़ासिमत पर उतर आया है तो हम उसके अमल को नाकारा बनाने के लिये हर तरफ़ से अपनी तवानाईयों को उस सिमत में मरकूज़ कर देते हैं , लेकिन अगर हमें न मालूम हो कि हमारा हक़ीक़ी दुश्मन किस मक़ाम पर सरगरमे अमल है तो फिर हमें अपनी तवानाईयों को इलाक़े के चप्पे चप्पे में फैलाना पड़ता है। मज़कूरा अमल हमें इस बात में भी मदद देता है कि हम इस्लाम के अहकाम व फ़रामीन से एक फ़र्द मदद देता है कि हम इस्लाम के अहकाम व फ़रामीन से एक फ़र्द मुस्लिम के तर्ज़ इस्तेनबात को समझें और उसके ज़ेहन में शक और तज़बज़ुब पैदा करने के लिये ज़्यादा वाजेह और ज़्यादा मिन्तक़ी मतालिब फ़राहम करें और उसके अक़ाएद को बातिल क़रार दें। इख़्तिलाफ़ात , तफ़रिके , गड़बड़ और मुसलमानों के अक़ाएद में तज़लजुल पैदा करने के लिये इस तरह के इक़दामात बेइन्तेहा मोसिर पाये जाते हैं। इसके बाद सेक्रेट्री ने मुझे एक हज़ार सफ़हों पर मुश्तमिल एक ज़ख़ीम किताब मुतलिये के लिये दी। उस किताब में असली और नक़ली अफ़राद की गुफ़्तगू और मुनाक़िशात के तजज़िये और मुक़ाबिलों के नताएज से मुतअल्लिक़ आदाद व शुमार दर्ज थे और मुझे हासिल शुदा नताएज की बुनियाद पर इस्लामी दुनिया में फौजी , माली , तालीमी और मज़हबी मसाएल से मुतअल्लिक़ हुकूमते बरतानिया के मुरत्तब शुदा प्रोग्रामों से वाक़फ़ियत हासिल करना थी। बहरहाल मैं किताब घर ले गया और तीन हफ़्ते के अर्से में बड़ी तवज्जो के साथ शुरु से आख़िर तक उसका मुतालिआ किया और मुक़रर्रा मुद्दत में नोआबदयाती इलाक़ों की विज़रात को वापस दे आया। किताब वाक़ई बड़ी मेहनत से तैयार की गयी थी। उसमें साहिबाने इल्म , साहिबाने सियासत और इस्लाम की दीनी शख़्यितों के अक़ाएद व नज़रियात के बारे में इस ख़ूबी से बहस की गयी थी और नतीजा अख़ज़ किया गया था , कि पढ़ने वाला दंग रह जाता था। सत्तर फ़ीसद मुबाहिसे हक़ीक़त पर मिन्तकी थे जबकि 30 फ़ीसद में इख़्तिलाफ़ था। किताब के मुतालिये के बाद मुझे इत्मिनान हो गया कि मेरी हुकूमत यक़ीनन् अपने अमल में कामयाब होगी और मज़कूरा किताब की पेशगोई के मुताबिक़ सल्तनते उस्मानी एक सदी से कम अर्से में बहरहाल ख़त्म हो जायेगी।

सेक्रेट्री से मिलने के बाद मुझे यह बात मालूम हो गयी कि नोआबादयती इलाक़ों की विज़ारत में दुनिया के तमाम मुमालिक के लिये ख्वाह वह इस्तेमारी हों या नीम इस्तेमारी इस तरह की शबीहसाज़ी या नक़ली रुप का अमल बरुयेकार लाया गया है और इन तमाम मुमालिक को पूरी तरह इस्तेमार के शिकंजे में जकड़ने के इन्तेज़ाम मुकम्मल किये गये हैं।

सेक्रेट्री ने अपनी गुफ़्तगू के दौरान मुझसे कहा था कि यह वह पहला राज़ है जिसे उसने वज़ीर के हुक्म के मुताबक मुझे बताया है मगर दूसरे राज़ को वह मज़कूरा किताब कू दूसरी जिल्द के मुतालिये पर एक माह बाद मुझे बतायेगा।

मैंने दूसरी किताब लेकर उसका मतालिआ शुरु किया।

मैंने दूसरी किताब लेकर उसका मुतालिआ शुरु किया। यह किताब पहली किताब को मुकम्मल करती थी। इसमें इस्लामी मुमालिक से मतअल्लिक़ नई इत्तिलाआत ज़िन्दगी के मुख़्तलिफ़ मसाएल में शिया सुन्नी अक़ाएद व उफ़कार जो हुकूमत की मसाएल में शिया सुन्नी अकाएद व उफ़कार जो हुकूमत की कमज़ोरी या तवानाई को ज़ाहिर करते थे और मुसलमानों की पसमान्दगी के असबाब व अलल वग़ैरा पर गुफ़्तगू थी। इस किताब में उन मौज़ूआत पर बड़ी सेर हासिले बहत की गयी थी और मुसलमानों के कमज़ोर पहलुओं या ताक़त के ज़राए को नुमायां किया गया था और उनसे अपने हक़ में फ़ायदा उठाने की तदाबीर समझाई गय थी। इस किताब में मुसलमानों की जिन कमज़ोरियों की तरफ इशारा किया गया था वह यह थी।

1. (अ) शिया सुन्नी इख़्तिलाफ़

(ब) हुक्मरानों के साथ कौमों के इख़्तिलाफ़ात।

(स) ईरानी और उस्मानी हुकूमतों के इख़्तिलाफ़ात।

(द) क़बाएली इख़्तिलाफ़ात।

(ज) ओलमा और हुकूमत के ओहदादारों के दरमियान ग़लत फ़हमियां।

2. तक़रीबन तमाम मुसलमान मुल्कों में जेहालत और नादानी की फ़रावनी।

3. फ़िक्री जमूद और तअस्सुब , रोज़ाना के हालात से बेख़बरी , काम और मेहनत की कमी।

4. माद्दी ज़िन्दगी से बेतवज्जेही , जन्नत की उम्मीद में हद से ज़्यादा इबादत जो इस दुनिया में बेहतर जि़्नदगी के रास्तों को बन्द कर देती थी।

5. खुदसर फ़रमांरवाओं के जुल्म व इस्तेबदाद।

6. अम्न व अमान का फुक़दान , शहरों के दरमियान सड़कों और रास्तों का फ़ुक़दान , इलाज मुआलिजे की सहूलतों और हि़फ़ाज़ाने सेहत के उसूलों का फ़ुक़दान जिसकी बिना पर ताऊन या इस जैसी मुतअद्दी बीमारियों से हर साल आबादी का एक हिस्सा मौत की नज़र हो जाता।

7. शहरों की वीरानी , आबपशी के निज़ाम का फ़ुक़दान , ज़राअत और खेती बाड़ी की कमी।

8. हुकमती दफ़्तरों में बदइन्तेज़ामी और क़ायदे क़वानीन का फुक़दान , कुरआन और अहकामे शरीअत के एहतेराम के बावजूद अमली तौर पर उससे बेतवज्जेही।

9. पसमान्दा और ग़ैर सेहतमन्दाना इक़्तिसाद। पूरे इलाक़े में आम गुरबत और बीमारी का दूर दौरा।

10. सही तरबियत याफ़्ता फ़ौजों का फुक़दान , असलहा और दिफ़ाई साज़ो सामान की कमी और मौजूदा असलहों की फ़रसूदगी।

11. औरतों की तहक़ीर और उनके हकूक़ की पामली।

12. शहरों और देहातों की गन्दगी , हर तरफ़ कूड़े करकट के अम्बार , सड़कों , शाहेराहों और बाज़ारों में अशियाए फ़रोख़्त के बेहंगम ढेर वगैरा।

मुसलमानों के इन कमज़ोर पहलुओं को गिनवाने के बाद किताब ने इस हक़ीक़त की तरफ़ भी इशारा किया था कि शरीयते इस्लाम का क़ानून मुसलमानों की इस तर्ज़ ज़िन्दगी से रत्ती बराबर मेल नहीं खाता , लेकिन यह बात ज़रुरी है कि मुसलमानों को इस्लाम की हक़ीकी रुह से बेख़बर रखा जाये और हक़ाएक़़े दीन तक न पहुँचने दिया जाये। इस के बाद किताब ने बसूरते फ़ेहरिस्त उन अवामिर व अहकामात की तरफ़ भी इशारा किया था जो दीने इस्लाम के उसूल व मबानी को ज़ाहिर करते थे और उनकी सूरत यह थी।

1. वहदत , दोस्ती और भाई चारा की ताकीद और तफ़रिक़े से दूरी। (सूर-ए-आले इमरान आयत 103)

2. तालीम व तरबियत की ताकीद। (हदीस)

3. जुसत्जू और इब्तेकारी की ताकीद (सूर-ए-आल इमरान आयत 201)

4. माद्दी ज़िन्दगी को बेहतर बनाने की ताकीद (सूर-ए-बक़रा आयत 201)

5. ज़िन्दगी के मसाएल में लोग से राय मशविरे की ताकीद। (सूर-ए-शूरा आयत 38)

6. शाहेराहें बनाने की ताकीद (सूर-ए-मुल्क आयत 15)

7. हदीसे नबवीस 0 की बुनियाद पर तन्दरुस्ती मुआलिजे की ताकीद।

(अ) इल्मे फ़िक़ह , दीन की हिफ़ाज़त के लिये।

(ब) इल्मे तिब , बदन की हिफ़ाज़त के लिये।

(स) इल्मे नहो , ज़बान की हिफ़ाज़त के लिये

(द) इल्मे नुजूम , ज़माने की पहचान के लिये (हदीस)

8. आबादकारी की ताकीद । (सर-ए-बक़रा आयत 29)

9. अपने कामों में नज़म व तरबियत। (हदीस)

10. मुआशी इस्तेहकाम की ताकीद। (हदीस)

11. जदीद तरीन असलहा और जंगी साज़ो सामान से लैस फौज़ी तंज़ीम की ताकीद। (सूर-ए- इन्फ़ाल आयत 60)

12- जदीद तरीन असलहा और जंगी साज़ों सामान से लैस फ़ौजी तंज़ीम की ताकीद। (सूर-ए-इन्फ़ाल आयत 60)

12. औरतों के हुकूक़ की हिफ़ाज़त और उसके एहतेराम की ताकीद (सूर-ए-बक़रा आयत 228)

इन अवामिर के तज़किरे के बाद किताब अपने दूसरे बाब में इस्लाम के ताक़त व कुव्वत के सरजश्मों और मुसलमानों की पेशरफ्त के असबाब पर रौशनी डालती है और उन्हें तबाही से दो चार करने के लिये तरक़्क़ी व तकामुल की राहों के ख़िलाफ़ इक़दामात को नोआबादयाती इलाक़ों की विज़रात का नुक़्ता आग़ाज़ की क़रार देती है और वह तरक़्की व तकामुल की राहें यह थीः

1. रंग व नस्ल , ज़बान , तहज़ीब व तमद्दुन और क़ौमी तअस्सुबात को ख़ातिर में न लाना।

2. सूद , ज़ख़ीरा अन्दोज़ी , अदअमली , शराब और सूअर के गोश्त वग़ैरा की मुमानिअत।

3. ईमान व अक़ीदा की बुनियाद पर ओलमा-ए-दीन से शदीद मोहब्बत और वाबस्तगी।

4. मौजूदा ख़लीफा की निस्बते आम्मतुल मुस्लेमीन का एहतेराम मोहब्बत और यह अक़ीदा कि वह पैग़म्बरस 0 का जानशीन और उलुल अम्र है जिसकी बिना पर उसके अहकामात की बजाआवरी ख़ुदा और रसूल (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेहि वसल्लम) के अहकामात की बजाआवरी है।

5. क़ुफ़्फार के ख़िलाफ वजूबे जेहाद।

6. गै़र मुस्लिमों की नापाकी पर मब्नी अहले तशय्यो का अक़ीदा।

7. तमाम अदयान और मज़ाहिब पर इस्लाम की बालादस्ती का एतक़ाद (हदीस)

8. इस्लामी सरज़मीन पर यहूदी और नसरानी इबादताहों की तामीर के बारे में शिया हज़रात की मुमानिअत।

9. जज़ीरतुल अरब से तमाम यहूदियों और नसरानियों के इनख़ेला पर अकसर मुसलमानों का इत्तिफाक़।

10. इश्तियाक़ के साथ नमाज़ , रोज़ा और हज के फ़राएज़ की अंजामदेही मदावमत।

11. ख़ुम्स की अदायगी के बारे में अहले तशय्यो का अक़ीदा और ओलमा की तरफ़ से मुस्तहक़ीन को उस रक़्म की तक़सीम।

12. ईमान व इख़लास के साथ इस्लाम के दीनी अक़ाएद से दिलचस्पी।

13. घरेलू इस्तेहकाम के बुनियादी मक़सद के साथा बच्चों और नौजवानों की रवायती तालीम व तरबियत और बच्चों के साथ वालदैन के दायमी इरतेबात की ज़रुरत व अहमियत का रुजहान।

14. औरतों को परदा की ताकीद जो उन्हें ग़ैर शरई रवाबित और बदअमलियों से रोकती है।

15. नमाज़े जमाअत का इस्तेहबाब और हर जगह के लोगों का दिन में कई मर्तबा एक मस्जिद में इकट्ठा होना।

16. पैग़म्बरे अकरमस 0, अहलेबैतअ 0 और सुलहा की ज़ियारतगाहों की ताज़मी और उन मक़ामात को मुलाक़ात और इज्तेमाअ के मराकज़ क़रार देना।

17. सादात का एहतेराम और रसूले अकरमस 0 का इस तरह तज़किरा करना गोया वह अभी ज़िन्दा हैं और दुरुद व सलाम के मुस्तहक हैं।

18. शियों की तरफ़ से अज़ादारी का इंऐक़ाद ख़ास तौर पर मोहर्रम और सफ़र को अज़ीम इज्तेमाआत और उनमें ओलमा व ज़ाकेरीन कु मुन्तज़िम तक़रीरें जो यक़ीनन मुसलमानों के ईमानी इस्तेहकाम में एक नाक़बिले इन्कार असर छोड़ जाती है और उन्हें नेक चाल चलन पर उभीरती है।

19. इस्लाम अहम उसूलों को उन्वान से अम्र बिलमारुफ़ और नेही अनिल मुन्कर का वुजूब।

20. शादी ब्याह , कसरते औलाद और ताअद्दे अज़वाजव का मुस्तहब होना।

21. काफ़िरों की हिदायत पर इतना ज़ोर कि अगर कोई किसी काफ़िर को मुसलमान करे तो यह काम उसके लिये तमाम दुनिया की दौलत से मुफ़ीद होगा।

22. नेक अमल अंजाम देने की अहमियतः “ जो कोई किसी नेक अमल की पैरवी करेगी उसके लिये दो जज़ायें मख़सूस हैं। एक ख़ुद उस नेक अमल की अपनी जज़ा और दूसरे नेक अमल को अंजाम देने की जज़ा। ” (हदीस)

23. कुरआन व हदीस का बेइन्तहा पास व एहतेराम और सवाबे आख़रत के लिये उन पर अमल पैरा होने की शदीद ज़रुरत।

इस्लाम के उन सरचश्मे हाये कुव्वत के तज़किरे के बाद किताब के अगबे अबवाव में दियानत के उन मोहकम सुतूनों को कमज़ोर बनाने के अमली रास्तों पर मोहकम दलीलों के साथ ग़ुफ़्तगू की गयी थी। उसके बाद बसूरते फ़ेहरिस्त इन इक़दामात की ताक़ीद थी जिनके ज़रिये इस्लामी दुनिया को कमज़ोर बनाया जा सकता था और वह यह थीः

1. बदगुमानी और सूए तफ़ाहुम के ज़रिये शिया और सुन्नी मुसलमानों मे मज़हबी इख़्तिलाफ़ात पैदा करना और दोनों गिरोहों की तरफ़ से एक दूसरे के ख़िलाफ़ एहानत आमेज़ और तोहमत अंगेज़ बातें लिखना और निफ़ाक़ व तफ़रिक़े के इस सूदमन्द प्रोग्राम को रु बा अमल लाने के लिये भारी अख़राजात की हरगिज़ परवा न करना।

2. मुसलमानों को जेहालत और लाइल्मी के आलम में रखना। किसी तालीमी मरकज़ के क़याम की कोशिश को कमयाब न होने देना। तबाअत और नश्र व अशाअत पर पाबन्दी आयद करना और ज़रूरत पड़े तो अवामी किताब ख़ानों को नज़रे आतिश करना। बच्चों को दीनी मदारिस में जाने से रोकने के लिये ओलमा और मराजे दीनी पर तोहमतें लगाना।

3. काहिली फैलाने और ज़िन्दगी की जुस्तजू से मुसलमानों को महरुम करने के लिये मौत के बात की दुनिया में रंग आमेज़ी और जन्नत की ऐसी तौसीफ़ बयान करना कि वह मुजस्सम बन कर लोगों के ज़ेहन पर क़ल्ब पर छा जाये और वह उसको हासिल करने के लिये अपनी मआशी तग व दो से दस्तबरदार हो जायें और मलकुल मौत के इन्तेज़ार में बैठे रहें।

4. हर तरफ़ दरवेशों की ख़ांक़ाहों का फैलाओ और ऐसी कितबों और रिसालों की तबाअत जो लोगों को दुनिया व माफ़िहा से बरगशता करके उन्हें मरदुम बेज़ारी और गोशा नशीनी की तरफ़ माएल करें जैसे ग़ज़ाली की अहयाउल उलूम , मौलाना रोम की तसनवी और महियुद्दीन अरबी की किताबें वग़ैरा

5. मुस्तबिद और ख़ुदख़्वाह हुक्मरानों की हक़्क़ानियत के सुबूत में मुख़्तलिफ़ अहादीस की अशाअत मसलनः “ बादशाह ज़मीन पर अल्लाह का साया है। ” या फिर यह दावा कि हज़रत अबूबकर , उमर , उस्मान और अलीअ 0, बनी उमय्या और बनी अब्बास सब के सब बिलजहर तलवार के ज़ोर से हुकूमत के मनसब पर फ़ाएज़ हुए और बज़ोरे शमशीर हुक्मरानी या सक़ीफ़ा की कार्रवाई को एक तमाशे की सूरत में पेश करना दलाएल क़ायम करना जैसे हज़रत अली (अलैहिस्सलाम) के तरफ़दारों ख़ास तौर पर आप की ज़ौजा हज़रत फ़ातेमा ज़हरा (अलैहिमुस्सलाम) का घर जलाना नेज़ यह साबित करना किः

(1) हज़रत उमर कि ख़िलाफ़त , ज़ाहेरन हज़रत अबूबकर की वसीयत और बातेनन मुख़ालेफ़ीन को डरा धमका कर अमल में आई।

(2) हज़रत अली (अलैहिस्सलाम) की मुख़ालिफ़त की बुनियाद पर हज़रत उस्मान के इन्तेख़ाब में एक ड्रामाई शुरा की तश्कील , जो बिलआख़िर मुख़ालिफत , शोरिश , ख़लीफ़ा सोम के क़त्ल और हज़रत अलीअ 0 की ख़िलाफ़त पर मुन्तिही हुई।

(3) मक्रों हीला और शमशीर के ज़रिये माविया का बरसरे इक़्तिदार आना और इसी सूरत में उसके जानशीनों का इस्तेक़रार।

(4) अबू मुस्लिम की क़यादत में सफ़्फ़ाह की मुसल्लह शोरिश और बज़ोरे शमशीर ख़िलाफ़ते बनी अब्बास का क़याम।

(5) हज़रत अबूबकर से लेकर उस्मानियों की हुक्मरानी के इस दौर तक तमाम खोलफ़ाए इस्लाम आमिर थे और यह कि

(6) निज़ामे इस्लाम में हमेशा आमरियत का दौर दौरा रहा है।

6. रास्तों में अदअम्नी के असबाब फ़राहम में फ़ितना व फ़साद बरपा करना और गुण्डों फ़सादियों और ड़ाकूओं की पुश्तपनाही करना और उनहें असलहा और रक़म फ़राहम करके उनकी तशवीक़ करना।

7. हिफ़ज़ाने सेहत की कोशिशों के आड़े आना और जबरी और कुदरती उफ़कार को तरजीह देना और यह बताना कि हर चीज़ अल्लाह की तरफ़ से है। बीमारी भी अल्लाह की देन है और इसका इलाज बेसूद है। इस सिलसिले में यह आयत पेश करनाः "वही है जो मुझे खाना देता है और प्यास की हालत में सेराब करता है और जब मैं बीमार होता हूँ तो मुझे तन्दुरुस्ती अता करता है ” (सूर-ए-शोअरा आयत 81) शिफ़ा अल्लाह के हाथ में है। मौत और हयात भी उसके क़बज़-ए-कुदरत में है। बीमारी से शिफ़ायाबी और मौत से रेहाई उसकी मशीयत और उसके इरादे के बग़ैर क़तई नामुम्किन है और यह तमाम रुनुमा होने वाले वाक़िआत क़ज़ाए इलाही है।

8. इस्लामी मुमालिक को फ़क़रो फ़लाकत में बाक़ी रखना और उनमें से किसी क़िस्म का तग़य्युर व तबद्दुल या इस्लाह अमल को जारी न होने देना।

9. फ़ितना व फ़साद और हंगामा आराईयों को हवा देना और इस अक़ीदा को लोगों में राख़िस कना कि इस्लाम महज़ इबादत और परहेज़गारी का नाम है और दुनिया और उसके उमूर से उसको कोई वास्ता नहीं। हज़रत ख़तमी मरतब (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेहि वसल्लम) और उनके जानशीनों ने कभी इन मसाएल में पड़ने की कोशिश नहीं की और सियासी और इक़्तिसादी तंज़ीम से कोई सरोकार नहीं रखा।

10. ऊपर दिये हुए उमूर पर तवज्जो इक़्तसादी बदहाली और ग़ुरबत व बेकारी में इज़ाफ़ा का बाइस होग मगर इसके साथ साथ पासमान्दगी में इज़ाफ़ा करने के लिये ज़रुरी है कि किसानों के ग़ल्ले के ढ़ेरों को नज़रे आतिश किया जाये , तिजारती कश्तियां डिबो दी जायें. तिजारती ज़हाज़ और सनअती मराक़ज में बड़े पैमाने पर आग भड़काई जाये। दरियाओं के बन्द तो़ड़ कर बस्तियां वीरान की जायें और पीने के पानी को ज़हर आलूद बनाया जाये ताकि इस लिहाज़ से इलाक़े वालों की पसमान्दगी और फ़क्र व फ़लाकत का सामान फ़राहम किया जा सके।

11. इस्लामी हुक्मरानों के मिज़ाज को बदला जाये और उनमें शराब नोशी , जूए बाज़ी और दीगर अख़लाक़ी बुराईयाँ पैदा की जायें। क़ौमी ख़ज़ाने में ख़ुर्द बुर्द और लूट घसोट की ऐसी सूरत पैदा की जाये कि उनके पास अपने दिफ़ा , मुलकी मईशत और तरक़्कि़याती उमूर के लिये कोई रक़म बाक़ी न रहे।

12. “ मर्द औरतों पर हाकिम हैं। ” (सूर-ए-निसा आयत 34) की आयत या “ औरतें बदी का पुतला हैं। ” की हदीस के सहारे औरतों की तौहीन व तहक़ीर और कनीज़ी का प्रचार किया जाये।

13. इसमें कोई शक नहीं कि मुसलमानों की शहरी और गन्दगी का सबसे बड़ा सबब उन इलाकों में पानी की कमी है और हमें चाहिये कि हम हर मुम्किन तरीक़े से गंजान आबाद इलाकों में पानी की फ़रावानी रोक दें ताकि उन इलाकों में ज़्यादा कसरत से गन्दगी में इजाफा हो।

किताब के एक और बाब में मुसलमानों की कुव्वत व ताक़त को तोड़ने और उन्हे कमज़ोर बनाने के दीगर उसूलों पर भी गुफ़्तगू की गई थी जो दिलचस्पी से ख़ाली नहींः

1. ऐसे उफ़कार की तरवीज जो क़ौमी , क़बाएली और नसली असबियतों को हवा दें और लोगों को गुज़िश्ता क़ौमों की तारीख़ ज़बान और सक़ाफ़ात की तरफ़ शिद्दत से माएल करें और वह मा क़ब्ल इस्लाम की तारख़ी शख़्सियतों पर फ़रीफ़ता हो जायें और उनका एहतराम करें। मिस्र में फ़िरऔनियत का अहिया , ईरान में दीन ज़रोतश्त और बैनुल नहरैन में बाबुल की बुत परस्ती इन ही की मिसालें हैं। किताब के इस हिस्से में एक बड़े नक़शे का भी इज़ाफ़ा किया गया था जिसमें उन मराकज़ की निशानदेही की गयी थी जिनमें साबिकुज़ ज़िक्र ख़ुतूत पर अमल दरामद हो रहा था।

2. शराब ख़ोरी , जुए बाजी , बदफ़ेली और शहवतरानी की तरवीज , सूअर के गोश्त के इस्तेमाल की तरग़ीब , इन कारगुज़ारियों में यहूदी , नसरानी , ज़रोतश्ती और साबई अक़्लियतों को एक दूसरे के साथ हाथ बटाना चाहिये और इन बुराईयों को मुसल्लम मुआशिरे में ज़्यादा से ज़्यादा फ़रोग़ देना चाहिये जिनके एवज़ नोआबादयाती इलाक़ों की विज़ारत उन्हें इनाम व इकराम ने नवाज़ेगी। इस काम के लिये मुतअद्दिद अफ़राद की ज़रुरत है जो किसी भी मौक़े को हाथ से न जाने दें और शराब , जुआ , फ़ोहश और सूअर के गोश्त को जहाँ तक हो सके लोगों में मक़बूल बनायें। इस्लामी दुनिया में अंग्रेज़ी हुकूमत के कारिन्दों का यह फ़रीज़ा था कि वह माल व दौलत , इनाम व इकराम और हर मुनासिब तरीके से इन बुराईयों की पुश्तपनाही करें और इन पर आमिल अफ़राद को किसी तरह का गुज़िन्द न पहुँचने दें और मुसलमानों को इस्लामी अहकामात और उसके अवामिर व नवाही से रुगरदानी की तरग़ीब दें क्योंकि अहकामे शरअ से बेतवज्जेही मुआशिरे में बदनज़मी और अफ़रा तफ़री का सबब होती है। मिसाल के तौर पर कुरआन मजीद में सूद की शिद्दत से मज़म्मत की गयी है कि और उसका शुमार गुनाहाने कबीरा में होता है। पर लाज़िम है कि हर हाल में सूद और हराम सौदे बाज़ी को आम करने की कोशिश की जाये और इक़्तिसादी बदहाली को मुकम्मल तौर पर मुज़महिल बनाया जाये। इस काम के लिये ज़रुरी है कि सूद की तहरीम से मुतअल्लिक आयात की ग़लत तफ़सीर की जाये और इस उसूल को पेशेनज़र रखा जाये कि कुरआन के एक हुक्म से सरताबी इस्लाम के तमाम अहकाम से रुगर्दानी की जरुअत का आईनादार होती है। मुसलमानों को यह समझाने की ज़रुरत है कि कुरआन ने जिस सूद को मना किया है वह सूद मरकब (या सूद दर सूद) है वगर न आम सूद में कोई क़बाहत नहीं है। कुरआन कहता है “ अपने माल को कई गुना करने की ख़ातिर सूद न खाओ। ” (सूर-ए-आले इमरान आयत 130) इस बिना पर आम हालत में सूद हराम नहीं है।

3. 4. ओलमा-ए-दीन और अवाम के दरमियान दोस्ती और एहतेराम की फ़िज़ा हर मुलाज़िम को याद रखना चाहिये। इस काम के लिये दो बातों पर इल्ज़ाम तराशी करना।

अ. ओलमा व मराजे पर इल्ज़ाम तराशी करना।

ब. नोआबादयाती इलाकों की विज़ारत से मुन्सलिक बाज़ अफ़राद को ओलमा-ए-दीन की सूरत में देना और उन्हें अल अज़हर यूनिवर्सिटी , नजफ़ , कर्बला और इस्तनबोल के इल्मी और दीनी मराकज़ में उतारना , ओलमा-ए-दीन से लोगों का रिश्ता तोड़ने के लिये एक रास्ता यह भी है कि बच्चों को नोआबादयती इलाक़ों की विज़ारत के प्रोग्रामों के मुमताबिक़ तरबियत दी जाये। इस काम के लिये ऐसे असातज़ा की ज़रुरत है जो हमारे तंख़्वाहदार हों ताकि वह जदीद उलूम की तदरीस के ज़िम्न में नौजवानों को ओलमा-ए-दीन और उस्मानी ख़लीफ़ा से मुतनफ़र करें और उनकी अख़लाक़ी बुराईयों और जुल्म व ज़ियातियों को बड़ी आब व ताब के साथ बयान करें और यह बतायें कि वह किस तरह क़ौमी सरमाये को अपनी अय्याशियों की नज़र करते हैं और उनमें से किसी पहलू से इस्लामी झलक नहीं पाई जाती।

5. वुजूबे जेहाद के अक़ीदे में तज़लजुल पैदा करना और यह साबित करना कि जेहाद सिर्फ़ सदरे इस्लाम के लिये था ताकि मुख़ालेफ़ीन की सरकूबी की जाये मगर आज इसकी क़तअन ज़रुरत नहीं है।

6. काफ़िरों की पलीदी और निजासत से मुमतअल्लिक़ मौज़ूअ जो ख़ास तौर पर शिया हज़रात का अक़ीदा है , इन मसाएल में से है जिसे मुसलमानों के ज़ेहन से ख़ारिज होना चाहिये और उसके लिये कुरआन और हदीस से मदद लेने की ज़रुरत है। मिसाल के तौर पर यह आयत जिसमें कहा गया है कि “ अहले किताब जो खाना खाते हैं वह तुम पर हलाल है और जो तुम खाते हौ वह उन पर हलाल है और पाक़ दामन मोमिन औरतें और पाकदामन अहले किताब (यहूद व नसारा) औरतें तुम पर हलाल हैं। ” (सूर-ए-मायदा आयत 5) क्या रसूले खुदा (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेहि वसल्लम) ने सफिया और मारिया नामी यहूदी और मसीही औरतों से शादी नहीं की थी ? और क्या यह कहा जा सकता है कि (नऊज़ोबिल्लाह) रसूल (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेहि वसल्लम) की बीवियाँ नाजिस थी ?

7. मुसलमानों कोयह बात समझनी चाहिये कि दीन से हज़रत ख़त्मी मरतबत (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेहि वसल्लम) की मुराद सिर्फ़ इस्लाम नहीं बल्कि जैसा कि कुराने हकीम से भी साबित है दीन में अहले किताब यानि यहूद व नसारा भी शामिल है. और तमाम अदयान के पैरोकार को मुसलमान कहा जायेगा। कुरआन मजीद में हज़रत युसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ख़ुदा से दुआ करते हैं कि इस दुनिया से मुसलमान जायें। (सूर-ए-युसुफ आयत 12) हज़रत इब्राहीम व इस्माईल (अलैहिमुस्सलाम) की भी यही तमन्ना है कि “ परवर दिगार हम दोनों को मुसलमानों के ज़मरे में और हमारे ख़ानदान को उम्मते मुस्लिमा क़रार दे। ” (सूर-ए-अलबक़रा आयत 128) हज़रत याकूब (अलैहिस्सलाम) अपने फ़रज़न्दों से कहते हैं “ न मरना मगर हालते इस्लाम मैं। ” (सैर-ए-आले इमरान आयत 102)

8. दूसरा अहम मौज़ू कलिसाओं और कनीसाओं की तामीरात के असबाब से मुतअल्लिक़ है। कुरआन , हदीस और तारीख़े इस्लाम की रोशनी में लोगों को यह बावर कराया जाये कि अहले किताब की इबादतगाहें मोहतरम हैं। कुरआन का इरशाद हैः “ अगर ख़ुदा वन्दे आलम लोगों को मना न फ़रमाता तो लोग नसारा के कलियाओं , यहूदियों के कनीसाओं और ज़दतशियों के आतिशकदों को तबाह व बर्बाद कर देते हैं। (सूर-ए-हज आयत 40) इस आयत से यह हक़ीक़त सामने आती है कि इस्लाम में इबादतगाहें मोहतरम हैं और इन्हें हरगिज़ नुक़सान नहीं पहुँचाया जा सकता।

9. दीने यहूद से इन्कार पर मब्नी चन्द हदीसें जनाबे रिसालतमाब (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेहि वसल्लम) से नक़्ल की गयी हैं मसलन यहूदियों को ज़जीरतुल अरब से बाहर निकाल दो या जज़ीरतुल अरब में दो मुतफ़ादत अदयान की गुंजाइश नहीं। “ हमें हर हाल में इन अहादीस की तरदीद करनी चाहिये और यह बताना चाहिये कि अगर यह अहादिस सही होती तो हज़रत ख़तमी मरतबतस 0 कभी यहूदी औरत से शादी न करते। ”

10. लाज़िम है कि मुसलमानों को इबादत से रोका जाये और इसके वजूब के बारे में इनके दिलों में शुकूक पैदा किये जाये , ख़ास तौर से इस नुके पर जोर दिया जाये कि ख़ुदा वन्दे आलम बन्दों की इबादत से बेनियाज़ है। हज को एक बेहूदा अमल क़रार दिया जाये और मुसलमानों को शिद्दत के साथ मक्के जाने से रोका जाये। इस तरह मजालिस और इस सिलसिले के तमाम इज्तेमाआत पर पाबन्दी लगाई जाये। यह इज्तेमाआत हमारे लिये ख़तरे की घण्टी हैं और इन्हें शिद्दत के साथ रोकना ज़रुरी है। मसाजिद , आइम्म-ए-दीन (अलैहिमुस्सलाम) के मज़ारात , इमाम बारगाहों और मदरसों की तामीरात पर भी बन्दिश आयद की जाये।

11. खुम्स और ग़नाएम जंगी की तक़सीम भी इस्लाम की तक़वियत का एक सबब है। ख़ुमस का तअल्लुक लेन देन , तिजारती और कारोबारी मुनाफे से नहीं है। मुसलमानों को इस बात से आगाह करने की ज़रुरत है कि इस मद में रक़म की अदायगी पैग़म्बर अकरम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेहि वसल्लम) और इमामों (अलैहिस्सलाम) के ज़माने में वाजिब थी , लेकिन अब ओलमा-ए-दीन को इसका इख़्तियार नहीं है कि वह लोगों से इस रकम को हासिल करे , ख़ास तौर पर जब कि यह लोग इस रक़म से ज़ाती फ़ायदे हासिल करते हैं और अपने लिये भेड़ , बकरियाँ , गाये , घोड़े , बाग़ात और महलात ख़रीदते हैं। इस एतबार से शरअन ख़ुम्स की रक़म उनके लिये जाएज़ नहीं है।

12. लोगों को बरगश्ता करने के लिये यह ज़ाहिर करने की ज़रुरत है कि इस्लाम फ़ितना व फ़साद और अबतरी और इख़्तिलाफ़ात का दैन है और उसके सुबूत में इस्लामी मुमालिक में रुनुमा होने वाले वाक़िआत को पेश करना चाहिये।

13. अपने आपको तमाम घरानों में पहुँचा कर बाप , बेटों के तअल्लुक़ात इस हद तक बिगाड़ा जाये कि बुजुर्गों की नसीहत बेअसर हो जाये और लोग आमरियत की तहज़ीब व तमाद्दुन का शिकार हो जायें। इस सूरत में हम नौजवानों को उनके दीनी अक़ाएद से मुन्हरिफ़ करके उन्हें ओलमा से दूर रख सकते हैं।

14. औरतों की बेपरदगी के बारे में हमें सअ़ी बलीग़ की ज़रुरत है ताकि मुसलमान औरतें ख़ुद पर्दा छो़ड़ने की आरज़ू करने लगें। इस सिलसिले में हमें तारीख़ी दलाएल व शवाहिद का सहारा लेकर यह साबित करना होगा कि पर्दा का रिवाज बनी अब्बास के दौर से हुआ और यह हरगिज़ इस्लाम की सुन्नत नहीं है। लोग रसूले अकरमस 0 की बीवियों को बग़ैर पर्दा देखते रहे हैं। सदरे इस्लाम की औरतें ज़िन्दगी के तमाम शोअबों में मर्दों के शाना बशाना रही हैं। इन कोशिशों के बारआवर होने के बाद हमारे साथियों का यह फर्ज़ है कि वह नौजवान नस्ल को मशरु रवाबित और अय्याशियों की तरग़ीब दें और इस तरह बुराईयों को इस्लामी मुआशिरे में रिवाज दें। ज़रुरी है कि ग़ैर मुस्लिम मुआशिरे में पेश करें ताकि मुसलमान औरतें उन्हें देख कर उनकी तक़लीद करें।

15. जमाअत का नमाज़ से लोगों को रोकने के लिये ज़रुरी है कि अइम्मा व जमाअत पर इल्ज़ाम तराशियां की जायें और उनके फ़सक़ फ़जूर पर मब्नी दलाएल पेश किये जायें ताकि लोग मुतनफ़र होकर उनसे अपना राब्ता तोड़ लें।

16. हमारी दुश्वारियों में से एक बड़ी दुश्वारी बुज़ुर्गाने दीन के मज़ारों पर मुसलमानों की हाज़री है। ज़रुरी है कि मुख़्तलिफ़ दलाएल से यह साबित किया जाये कि क़ब्रों को अहमियत देना और उनकी अराइशात पर तवज्जो देना बिदअत और ख़िलाफ़े शरअ है और ख़तमी मरतबत (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेहि वसल्लम) के ज़माने में मुर्दा परस्ती और इस क़िस्म की बातें राएज नहीं थी। आहिस्ता आहिस्ता उन क़ब्रों को मिस्मार करके लोगों उनकी ज़ियारत से रोका जाये। इस सिलसिले में एक मुफ़ीद प्रोग्राम यह भी है कि उन मराकज़ की असलियत के बारे में लोगों को मुश्तबा किया जाये। मसलन यह कहा जाये कि हज़रत ख़तमी मरतब (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेहि वसल्लम) मस्जिदे नबवी में मदफून नहीं है बल्कि अपनी वालिदा गिरामी की क़ब्र में सो रहे हैं और इसी तरह तमाम बुजूगाने दीन के बारे में कहा जाये कि वह उन मक़ामात पर नहीं है जिन मक़ामात को उनसे मंसूब किया गया है। हज़रत अबूबकर व उमर दोनों जन्नतुल बक़ी में मदफू़न हैं। हजरत उस्मान की क़ब्र का कहीं पता नहीं है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम की आरामगाह बसरा में है और वह क़ब्र जो नजफ़े अशरफ़ में मुसलमानों की ज़ियारतगाह हैं। दरअसल उसमें मग़ीरा बिन शोअबा दफ़्न हैं। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का सरे अक़दस मस्जिदे “ हन्नाना ” में दफ़्न है और आप के जिस्मे अक़दस की तदफीन के बारे में सही इत्तिला नहीं है। काज़मैन की मशहूर ज़ियारतगाह में इमाम मूसा काज़िम (अलैहिस्सलाम) और इमाम मोहम्मद तक़ी (अलैहिस्सलाम) के बजाये दो अब्बासी ख़लीफ़ा दफ़्न हैं। मशहद में इमाम रिज़ा (अलैहिस्सलाम) नहीं बल्कि हारुन रशीद दफ़्न हैं। सामरा में भी इमाम अली नक़ी (अलैहिस्सलाम) और इमाम हसन असकरी (अलैहिस्सलाम) के बजाये अब्बासी ख़ोलफ़ा दफ़्न हैं। हमें बक़ी के क़ब्रिस्तान के सिलसिले में कोशिश करनी चाहिये कि वह ख़ाक के यकसां हो जाये और तमाम इस्लामी मुमालिक की ज़ियारतगाहें वीरानियों में बदल दी जायें।

17. खा़नदाने रिसालत से अहले तशय्यों की अक़ीदत व एहतेराम ख़त्म करने के लिये झूठे और बनावटी सादात पैदा किये जायें और इस काम के लिये हमें चन्द तंख़्वाहदार अफ़राद की ज़रुरत है जो स्याह और सब्ज़ अमारियों के साथ लोगों में ज़ाहिर हों और अपने आप को औलादे रसूल से निस्बत दें। इस तरह वह लोग जो उनकी हक़ीक़त से वाक़िफ़ हैं आहिस्ता आहिस्ता हक़ीक़ी सादात से बरगश्ता हो जायेंगे और औलादे रसूल पर शक करने लगेंगे। दूसरा काम हमें यह करना होगा कि हम हक़ीक़ी सादात और ओलमा-ए-दीन के सरों से उनके आमामे उतरवायें ताकि पैग़म्बरे खुदा (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेहि वसल्लम) से वाबस्तगी का सिलसिला ख़त्म हो और लोग ओलमा का एहतेराम छोड दें।

18. इमाम हुसैन (अलैहिस्साल) की आज़ादरी के मराकज़ की गुमराही की राह रोकने और दीन को बदबख़्ती और नाबूदी से बचाने के उन्वान से होना चाहिये। अपनी तमाम कोशिशों को बरुएकार लाकर लोगों को मजालिसे अज़ा में जाने से रोकने की कोशिश की जाये और अज़ादारी को बतदरीज ख़त्म किया जाये। इस काम के लिये इमाम बारगाहों की तामीर और ओलमा व ज़ाकेरीन के इन्तेख़ाब की शराएत को सख़्त बनाया जाये।

19. आज़ाद ख़्याली और चून व चरा वाली कैफ़ियत को मुसलमानों के इज़हान में रासिख़ करना चाहिये ताकि हर आदमी आज़ादाना तौर पर सोचने के क़ाबिल हो औऱ हर काम अपनी मर्ज़ी से अंजाम दे। अम्र बिल मारुफ़ और नेहि अनिल मुन्कर वाजिब नहीं। अहकामे शरीयत की तरवीज का अमल मतरुक होना चाहिये। अगर अम्र बिल मारुफ़ और नेहि अनिल मुन्कर को वाजिब समझा जाये तो यह काम बादशाहों का है। अवामुन्नास को इसमें कोई दख़ल नहीं।

20. नस्ल को कन्ट्रोल किया जाये और मर्दों को एक से ज़्यादा बीवी इख्तियार करने की इज़ाज़त न दी जाये। नये क़वानीन वज़अ करके शदी के मसअले को दुश्वार बनाये जाये मसलन किसी अरब मर्द को ईरानी औरत और ईरानी मर्द को अरब औरत से शादी की इज़ाज़त न दी जाये। इस तरह तुर्क , ईरानियों से शादी नहीं कर सकेंगे।

21. इस्लामी तालीम की आफ़क़ियत के मसअले को मोहकम दलाएल से रद किया जाये और यह बताया जाये कि इस्लाम उसूलन दीन हिदायत नहीं है बल्कि उसका तअल्लुक़ सिर्फ़ एक क़बीले और एक क़ौम से है जैसा कि कुरान ने इक़रार किया हैः “ यह दीन तुम्हारी और तुम्हारे क़बीले की हिदायत के लिये है। ” (सूर-ए-जख़रिफ़ आयत 44)

22. मसाजिद , मदारिस , तरबियती मराकज़ और अच्छी बुनियादों पर क़ायम होने वाली तामीरात से मुतअल्लिक़ इस्लाम की तमाम सुन्नतों को कालइद्म या कम अज़ कम महदूद कर दिया जाये। इस क़िस्म के उमूर का तअल्लुक़ ओलमा से नहीं बल्कि सरबराहाने ममलिकत से है और जब हुकूमतें इस क़िस्म का काम अंजाम देंगी तो अज़ खुद उनकी दीनी क़द्रों क़ीमत जाती रहेगी।

23. ज़रुरी है कि मुसलमानों के हाथों में मौजूद कुरआन में कमी बेशी करके लोगों को शक मे मुब्तिला किया जाये। ख़ास तौर पर कुफ़्फार और यहूद व नसारा के बारे में तौहीन आमेज़ आयात नेज़ अम्र बिल मारुफ़ और जेहाद से मुतअल्लिक़ आयतों को कुरआन से हज़फ़ किया जाये और उन कुरानों को तुर्की और फ़ारसी ज़बानों में तर्जुमा करके बाज़ारों में लाया जाये। ग़ैर अरब मुस्लिम हुकूमतों को तरग़ीब दी जाये कि वह अपने अपने इलाकों में कुरान , अज़ान और नमाज़ को अरबी ज़बान में पढ़ने से परहेज़ करें। दूसरा मसअला अहादीस व रिवायत में तशकीक पैदा करना है और कुरान की तरह इसमें भी तहरीफ़ व तर्जुमे से काम लेना है।

मुख़्तसर यह कि इसदूसरी किताब में भी मुझे बड़ी कारआमद चीज़ें दिखाई दी। इस किताब का नाम “ इस्लाम को क्योंकर सफ़हे हस्ती से मिटा जाये ” रखा गया था। इस में वह बेहतरीन अमली प्रोग्राम मुरत्तब थे जिन पर मुझे और मेर दीगर साथियों को काम करना था। इस किताब ने मुझ पर बड़ा असर क़ायम किया था। किताब के मुतलिये के बाद मैं इसे वापस करने नोआबादयाती इलाक़ों की विज़ारत पहुँचा जहाँ दूसरी मर्तबा सेक्रेट्री से मेरी मुलाक़ात हुई। उसने मुझे मुख़ातिब करके कहाः

“ जिन उमूर को तुम्हें अंजाम देना है इसमें तुम अकेले नहीं हो बल्कि तक़रीबन पांच हज़ार सच्चे और खरे अफ़राद मुख़्तलिफ़ गिरोहों की सूरत में तमाम इस्लामी मुमालिक में तुम्हारी मदद के लिये आमदा है। नोआबदयाती इलाक़ों की विज़ारत का ख़्याल है कि वह काम की पेशरफ़्त के साथ साथ उन अफ़राद की तादाद में इज़ाफ़ा करके उन्हें एक लाख तक पहुंचा दे। जब भी हमें उस अज़ीम गिरोह की तशकील में कामयाबी हुई यक़ीनन हम तमाम आलमे इस्लाम पर छा जायेंगे और इस्लामी आसार को मुकम्मल तौर पर मिटा देंगे। ”

इसके बाद सेक्रेट्री ने अपनी गुफ़्तगू जारी रखते हुए कहाः

“ मैं तुम्हे यह ख़ुशख़बरी देता हूँ कि हम आईन्दा एक सदी में अपनी मुराद को पहुंच जायेंगे और अगर आज हमारी नस्ल इस कामयाबी को न देख सके तो हमारी औलादें ज़रुर यह अच्छे दिन देखेंगी और यह ईरानी ज़रबुल मिस्ल कितनी मानी खेज़ है जिसमें कहा गया हैः “ कल दूसरो ने बोया हमने खाया। आज हम बो रहे है कल दूसरे खायेंगे। ” जिस दिन भी अज़ीम बर्तानिया या (समन्दरों की मलका) को इस्लामी मुमालिक पर फ़तहमन्दी नसीब हुई दुनियाए मसीहत उन तमाम तकालीफ़ से निजात पा जायेगी जिसे वह बारह सदियों से बर्दाश्त कर रही है। मुसलमानों ने इस अर्से में हम पर बड़ी जंगें मुसल्लत की जिनमें सलीबी जंगें बतौरे मिसाल है। यह जंगे बिल्कुल मुग़लों की यलगार की तरह बेमकसद थी कि जहाँ सिवाये क़त्ल व ग़ारतगरी , वीरानी व तबाही और लूट मार के कोई मक़स नहीं था लेकिन इस्लाम के ख़िलाफ हमारी जंग मुग़लों की तरह फ़ौज़ी कार्रवाईयों ओर क़त्ल व ग़ारतगरी पर मुन्हसिर नहीं है। हमें इस काम में जल्दी भी नहीं है। अज़ीम बर्तानिया की हुकूमत इस्लाम को मिटाने के लिये पूरे मुतालिये के साथ आगे बढ़ेगी और बड़े सब्र व तहम्मुल के साथ अपने अज़ीम कामों को बरुएकार लायेगी और अपने मक़सद में कामयाब होगी अलबत्ता हम ज़रुरी मवाक़े पर फ़ौजी कार्रवाईयों से भी दरेग़ नहीं करेंगे मगर यह इस सूरत में होगा जब हम इस्लाम हुकूमतों पर पूरी तरह छा जायेंगे और कुछ अनासिर हमारी मुख़ालिफ़त पर कमरबस्ता होकर मैदान में उतर आयेंगे। इस में कोई शक नहीं कि इस्तन्बोल के हुक्मरान बड़ी होशमन्दी और फ़तानत के मालिक हैं और इतनी जल्द हमें अपने प्रोग्रामों में कामयाब नहीं होने देंगे लेकिन हमें अभी से मुतवस्सित तबक़े के बच्चों को उन स्कूलों में तरबियत देना है , जो हमने उनके लिये क़ायम किये हैं। हमें उन इलाक़ों में मुतअद्दिद चर्च भी बनाने हैं , शराब , जुआ और शहवतरानी को इस तरह फैलाना है कि नौजवान नस्ल दीन व मज़हब को भूल जायें। हमें इस्लामी मुमालिक के हुक्मरानों के दरमियान इख़्तिलाफ़ात की आग भी हवा देना है। हर तरफ़ हरज मरज और फ़ितना व फ़साद का बाज़ार गर्म करना है। अरकाने हुकूमत और साहिबाने ईसाई औरतों के दाम में फंसाना है औऱ उनकी महफ़िलों को उन परीवशों से रौनक़ बख़्शना है ताकि वह आहिस्ता आहिस्ता अपने दीनी और सियासी इक़्तिदार से हाथ धो बैंठे। लोग उनसे बदज़न हो जायें और इस्लाम के बारे में उनका ईमान कमज़ोर हो जाये जिसके नतीजे में ओलमा , हुकूमत और अवाम का इत्तिहाद टूट जाये और ऐसे हालात में जंग की आग भड़का कर हम उन मुमालिक में इस्लाम की जड़ बुनियाद उखाड़ फेंकेंगे। ”


आख़िरकार नोआबादयाती इलाक़ों की विज़ारत के सेक्रेट्री ने इस दूसरे राज़ से भी पर्दा उठाया जिसका उसने मुझे वादा किया था और मैं शिद्दत से जिसके इन्तेज़ार में था और यह वह क़रारदाद थी जो हुकूमते बर्तानिया के आला ओहदेदारों ने मंजूर की थी। पचास सफ़हात पर मुश्तमिल यह क़रारदाद नोआबादयाती इलाक़ों की विज़ारत की इस सियासत की आईनादार थी। जिसके ज़रिये इस्लाम और अहले इस्लाम को एक सदी के अन्दर अन्दर नाबूद करना था। इस रिसले की पेशीनगोई के मुताबिक़ इस अर्से के बाद इस्लाम सारी दुनिया से रुख़सत हो जायेगी और सिर्फ़ तारीख़ में इसका नाम बाक़ी रह जायेगी। इस बात की सख़्ती से ताकीद की गयी थी कि 14 नुकाती क़रारदाद के मज़मून को सीग़-ए-राज़ में रखा जाये और यह किसी उन्वान से ज़ाहिर न होने पाये क्योंकि इस बात का ख़तरा था मुसलमानों को उसकी ख़बर हो जाये और वह इस की चाराजोई में उठ ख़ड़े हों। ताहम मुख़्तसर तौर पर इसका मवाद कुछ यूँ था।

1. तजाकिस्तान , बुख़ारा , इरमिन्सतान , शुमाली खुरासान और मादरा अलनहर और रुस के जुनूब में वाक़ै मुस्लिम आबादियों पर इख़्तियार हासिल करने के लिये सल्तनत रुस से वसीअ पैमाने पर इश्तेराके अमल , इसके अलावा ईरान के सरहदी शहरों तुर्कीस्तान और आज़र बायजान पर तसल्लुत हिसाल करने के लिये रुस के साथ इश्तेराके अमल।

2. इस्लामी हुकूमतों को अन्दरुनी और बैरुनी एकबार से पूरी तरह तबाह करने के लिये एक मुनज़्ज़म प्रोग्राम की तश्कील मेरुस और फ्रांस के सलातीन के साथ इश्तेराके अमल।

3. उस्मानी और ईरानी हुकूमतों के दरीना तनाज़ेआत को हवा देना और उनके दरमियान क़ौमी और नस्ली इख़्तिलाफ़ात की आग भड़काना इराक़ और ईरान के इतराफ़ में आबाद क़बीलों में क़बाएली जंगें और शोरिशें पैदा करना। माक़ब्ल इस्लाम मज़ाहिब की तब्लीग़ हत्ता कि ईरान , मिस्र और बैनुल नहरैन के मतरुक और मुर्दा अयान का अहया और उनके पैरूकार को इस्लाम से फिराना।

4. इस्लामी मुमालिक के शहरों और देहातों के बाज़ हिस्सों को ग़ैर मुस्लिम अक़वाम के हवाले करना मसलन मदीना यहूदियों को़ , इस्कन्दरिया ईसाईयों को , बुज़्द पारसियों को अमारा साबेईयों को , करमान शपाह अली अल्लाहियों को , मूसल यज़ीदियों को और बोशहर समेत ख़लीज फ़ारस के कुर्ब व जवार के इलाक़े हिन्दुओं को सौंपने। इन दो आख़ेरुज़ इलाक़ों में पहले अहले हिन्द को बसाना ज़रुरी है। इसी तरह लेबनान में वाक़े तराबिलिस द्रोज़ियों , के क़ारिज़ उलूवियों के और मुस्तक़ित ख़्वरिज के हवाले करना। यही नहीं बल्कि माद्दी इमदाद , जंगी साज़ व समान और फौजी और सियासी माहेरनीन के ज़रिये उन्हें मज़बूत बनाना भी ज़रुरी है ताकि कुछ अर्से बाद यह अक़लीयते अहले इस्लाम की आंखों में खटकने लगीं और इस्लाम का पैकर आजुरदा हो जाये और इलाके में बदतरीज इनका असर व नुफूज़ मुस्लिम हुकूमतों की तबाही का सबब बन जाये और इस्लाम की तरक़्क़ी पज़ीर में रख़ना पड़ जाये।

5. हिन्दुस्तान की तरह ईरानी और उस्मानी हुकूमतों में भी छोटी छोटी रियासतों का क़याम अमल में आये और फिर फूट डालो और हुकूमत करो या बेहतर अल्फ़ाज़ में “ फूट डालो और मिटा दो ” के कानून पर अमल करते हुए उन्हें एक दूसरे से भिड़ा दिया जाये। इस सूरत में एक तरफ़ वह आपस में दस्त व गिरेबां होंगे और दूसरी तरफ़ मरकज़ी हुकूमत से भी उनके तनाज़ेआ का सामान फ़राहम रहेगा।

6. एक सोचे समझे मुनज़्ज़म मंसूबे के तहत इस्लामी दुनिया में लोगों के उफ़कार से हम आहंगी रखने वाले मनघड़त अक़ाएद व मज़ाहिब तब्लीग़ मसलन अम्मा अहलेबैत (अलैहिस्सलाम) से बेइन्तहा अक़ीदत व एहतेराम रखने वाले शियों के लिये हुसैन इलाही मज़हब इमाम जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम की ज़ात से मुतअल्लिक़ शख़्सियत परस्ती , इमाम अली रिज़ा (अलैहिस्सलाम) और इमाम ग़ाएब (हज़रत महदी मऊद अज्जल्लाह तआला फ़रजहुल शरीफ़) के बारे में मुबालिग़ आराई और हश्त इमामी फ़रिक़ा की तरवीज। हर हर मज़हब के लिये उसके मुनासिब तरीन मक़ाम की यह सूरत होगीः हुसैनअ 0 अल्लाह फ़िरका (कर्बला) इमाम जाफ़रे सादिक़अ 0 की परस्तिश (इस्फ़ेहान) इमाम मेहदी (अलैहिस्सलाम) की परस्तिश (सामरा) और हश्त इमामी मज़हब (मशहद)। इन जाली मज़ाहिब की तब्लीग़ व तरवीज का दायरा सिर्फ़ शिया मज़हब की तक महदूद नहीं होना चाहिये बल्कि अहले तसन्नुन के तमाम फ़िरक़ों में भी इस क़िस्म के मज़ाहिब को तरवीज दिया जाना चाहिये और फिर उनमें इख़्तिलाफ़ात को हवा देकर नफ़रत का वह बीज बोना चाहिये कि उनमें का हर फ़िरक़ा अपने आपको सच्चा मुसलमान और दूसरे को काफ़िर , मुरत्तिद और वाजिबुल क़त्ल समझे।

7. ज़िना , लवाता , शराब नोशी और जुआ वह अहम उमूर हैं जिन्हें मुसलमानों के दरमियान राएज करने की ज़रुरत है। इन बुरी आदतों को मुसलमानों में फैलाने के लिये इलाक़े के उन लोगों से ज़्यादा मदद लेनी चाहिये जो माक़ब्ल इस्लाम मज़ाहिब से वाबस्ता हैं और खुश किस्मती से उनकी तादाद कुछ कम नहीं है।

8. अहम और हस्सास ओहदों पर ग़लतकार और नापाक अफ़राद का तक़रुर और उस बात पर तवज्जो कि रियासतों की सरबराही नोआबादयाती इलाक़ों की विज़ारत से वाबस्ता रहनी चाहिये ताकि वह इंग्लिस्तान की हुकूमत के लिये काम करें और उनसे अहकामात वुसूल करें। फिर इन बाअसर अफ़राद के ज़रिये हमारे मक़ासिद पोशिदा तौर पर कुव्वत के सहारे रुबअमल आयें अलबत्ता उनके चुनाओं में मुस्लिम बादशाहों का हाथ होगा।

9. ग़ैर अरब मुस्लिम मुमालिक में अरबी सक़ाफ़त और ज़बान के फैलाओ की राह रोकना और उसके बजाये संस्कृत , फ़ारसी , कुर्दी , पुश्तो , उर्दू और क़ौमी ज़बानों को उन सरज़मीनों पर राएज करना ताकि इलाक़ाई ज़बानें , रिवाज पाकर अरबी ज़बान बोलने वाले क़बाएल मे उतर आयें और फ़सीह अरबी ज़बान की जगह इख्तियार करें। इस तरह अहले अरब का कुरआन और सुन्नत की ज़बान से रिश्ता टूट जायेगा।

10. हुकूमती दफ़ातिर में मुशीरों और माहिरों की हैसियत से बर्तानवी अमाल और जासूसों की तैनाती में इज़ाफ़ा , इस तरह इस्लामी मुमालिक के वोज़रा और उमरा के फ़ैसलों में हमारा बेहतर रास्ता यह होगा कि पहले ज़हीन और मोअतमिद गुलामों और क़नीज़ों को तालीम व तरबियत दें और फिर उन्हें हुक्मरानों , शाहज़ादों , वज़ारों , अमीरों और अहम दरबारी औहदों पर फाएज़ बाअसर अफ़राद के हाथों बेच दें। यह गुलाम अपनी सलाहियतों और फ़हम व फ़रास्त की बुनियाद पर उनके नज़दीक अपना मक़ाम पैदा करेंगे और आहिस्ता आहिस्ता उन्हें मुशाविर का मक़ाम हासिल हो जायेगा। इस तरह मुस्लिम रिवाज में उनका एक उमनट नक़्श क़ायम हो जायेगा।

11. मुसलमानों के मुख़्तलिफ़ तबकों ख़ास तौर पर डाक्टरों , इंजीनियरों , हुकूमत के माली उमूर से वाबस्ता ओहदेदारों और उन जैसे दीगर रौशन फ़िक्र अफ़राद में मसीहियत की तब्लीग़ व तरवीज , कलिसाओं , खुसूसी स्कूलों और कलिसा से वाबस्ता शिफ़ाख़ानों की तादाद में इज़ाफ़ा , तब्लीग़ाती कुतुब व रसाएल की नश्रो इशाअत और मुतवस्सित तबक़े के लोगों में उनकी मुफ़्त तक़सीम , तारीख़े इस्लाम के मुक़ाबिले पर तारीख़े मसीहियत की निगारिश का एहतेमाम , मुसलमानों के उम्माल और जसूसों का तक़रुर्र अलबत्ता उनका दायरा अमले इस्लामी मुमालिक में वाक़े दैर व कलीसा ही होंगे। इन आलिमनुमा ईसाईयों में बाज़ का कास यह होगा कि वह मुश्तशरिक़ और इस्लाम शिनास बन कर तारीख़ी हक़ाएक़ में तहरीफ़ करें और उन्हें बरअक्स दिखाने की कोशिश करें और फिर दलाएल की फऱ़राहमी और इस्लामी मुमालिक से ज़रुरी इत्तिलाआत हासिल करने के बाद ऐसे मक़ाले तैयार करें जो इस्लाम में नुक़सान और ईसाईयत के फ़ायदे में हों।

12. मुसलमान लड़कों और लड़कियों में ख़ुदसरी और मज़हबे बेज़ारी की तरवजी और उन्हें इस्लाम के उसूल काम मिशनरी स्कूलों , मुख़र्रिबे अख़लाक़ और इस्लाम दुश्मनी पर मब्नी किताबों , ऐश व नोश और ख़ुशबाशी का सामान फ़रहाम करने वाले कल्बों और ग़लत बुनियादों पर उस्तवार मुस्लिम और ग़ैर मुस्लिम नौजवानों की दोस्ती के ज़रिये अंजाम पा सकता है। मुस्लि नौजवानों को फांसने के लिये यहूदी और मसीही नौजवानों की शराकत से खुफ़िया अंजुमनों की तासीस।

13. इस्लाम को कमज़ोर करने , मुसलमानों के इत्तिहाद को तोड़ने और उन्हें ज़िन्दगी के मसाएल के बारे में सोचने और तरक़्की की राह में आगे बढ़ने से रोकने के लिये इस्लामी मुमालिक में अन्दरुनी और बैरुनी तौर पर शोशिरें पैदा करना और मुसलमानों को एक दूसरे या फिर दीगर अदयान के पैरुकारों से भि़डाये रखना। क़ौमी दौलत , माली ज़खाएर और फ़िक्रो फ़हम की कुव्वतों को तबाही से दो चार करना , मुसलमानों में रुहें अमल और वलवला अंग्रेज़ी को ख़त्म करना और उनमें इन्तेशार पैदा करना।

14. इस्लामी मुमालिक के इक़्तिसादी निज़ाम को दरहम बरहम करना जिसमें ज़राअत और आमदनी के तमाम ज़राए शामिल हैं। इस मक़सद को पूरान करने के लिये बन्दों में शिगाफ़ पैदा करना , दरियायों में रेत की सतह ऊँची करना , लोगों में सुस्ती , सहल अंगारी और तने आसानी को फ़रोग़ देना , पैदावर और तौलादी उमूर की तरफ़ से लोगों की बेतवज्जेही को तक़वियत देना और अवाम को मंशियत का आदी बनाना ज़रुरी है।

इस बारे में यह वज़हात ज़रुरी है कि मज़कूरा 14 नुकात इन्तेहाई शरह बेअसत के साथ ज़ब्त तहरीर में लाये गये थे और उनके साथ नक़शे , अलामतें और तस्वीरें भी थी। मैंने यहां इशारतन उनकी निशानदेही की है।

मुख़्तसर यह कि नोआबादयाती इलाक़ों की विज़ारत के सेक्रेट्री से उस भरोसे की बुनियाद पर जो उसने मेरी ज़ात से वाबस्ता कर रखी थी और जिसके ज़ेरे असर उसने मुझे इतनी अहम औऱ ख़ुफ़िया किताब पढ़ने को दी थी। मैंने दूसरी बार बसद अहम और ख़ुफ़िया किताब पढ़ने को दी थी। मैंने दूसरी बार बसद एहतेराम इज़हारे तशक्कुर किया और मजीद एक महीने लंदन में रहा। उसके बाद वज़ीर की तरफ़ से मुझे इराक़ जाने का हुक्म मिला। मेरा यह सफ़र सिर्फ़ इस मक़सद के लिये था , कि मैं मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब को नये दीन के इज़हार की दावत पर आमादा करुँ। सेक्रेट्री ने बार बार मुझे यह ताकीद की , कि मैं उसके साथ बड़ी दरायत और होशियारी से पेश आऊँ और मुक़द्दमाते उमूर की आमादगी में हरगिज़ हद्दे एतदाल से आगे बुनियाद पर सेक्रेट्री को इस बात की यक़ीन हो चुका था कि मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब क़ाबिले भरोसा और नोआबादयाती इलाक़ों की विज़ारत के प्रोग्रामों को रद्दे अमल लाने के लिये मुनासिब तरीन आदमी है।

इसके बाद सेक्रेट्री ने अपनी ग़ुफ़्तगू जारी रखते हुए कहाः

“ तुम्हें मोहम्मद के साथ बिल्कुल वाज़ेह और दो टूक अल्फ़ाज़ में गुफ़्तगू करनी है , क्योंकि हमारे उम्माले इस्फ़ेहान में इससे बड़ी सराहत के साथ पहले ही गुफ़्तगु कर चुके हैं और वह उनकी बातों को मान चुका है मगर इस शर्त के साथ कि उसे उस्मानी हुकूमत के मक़ामी आमाल , ओलमा और मुतअसिब लोगों के हाथों आने वाले ख़तरात से बचा लिया जाये और उसकी हिमायत और तहफ़्फुज़ का भरपूर इन्तेज़ाम किया जाये क्योंकि उसकी दावत के ज़ाहिर होते ही हर तरफ़ से उसे ख़त्म करने की कोशिश की जायेगी और ख़तरनाक सूरतों में उस पर हमले किये जायेंगे। ”

हुकूमते बर्तानिया ने शेख़ मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब को असलेह से अच्छी तरह लैस करने के बाद ज़रुरत के मौक़े पर उसकी मदद की ताईद की थी और शेख़ ही की मर्ज़ी के मुताबिक़ ज़जीरतुल अरब में वाक़े नजद के क़रीब इलाक़े को उसकी हाक्मियत का पहला मक़ाम क़रार दिया था।

बहरहाल शेख़ की मवाफ़िक़त की ख़बर सुन कर मेरी ख़ुशी की कोई इन्तेहा न रही और मैंने सेक्रेट्री से सिर्फ़ यह सवाल किया कि मेरी आईन्दा की ज़िम्मेदारियाँ क्या होगी ? मुझे इसके बाद क्या करना होगा और शेख़ से किस क़िस्म का काम लेना होगा। नीज़ यह कि मैं अपने फ़राएज़ का कहां से आगाज़ करुँ ?

सेक्रेट्री ने जवाब दियाः नोआबादयाती इलाक़ों की विज़ारत ने तुम्हारे वज़ाएफ़ को बड़ी वज़ाहात से मुतअय्यन किया है और वह उन उमूर का अलक़ा है जिसे शेख़ को तद़रीजन अंजाम देना है और वह यह है।

1. उसके मज़हब में शमूलियत इख्तियार न करने वाले मुसलमानों की तक़फ़ीर और उनके माल , इज़्ज़त और आबरू की बर्बादी को रवा समझना , इस ज़िम्न में गिरफ़्तार किये जाने वाले मुख़ालेफीन को बरदा फ़रोशी की मार्केट में कनीजी व गुलाम की हैसियत से बेचना।

2. बुत परस्ती के बहाने बसूरत इम्कान ख़ाना-ए-काबा का इन्हेदाम और मुसलमानों को फ़रीज़-ए-हज से रोकना और हाजियों के जान व माल की ग़ारतगरी पर क़बाएले अरब को उकसाना।

3. अरब क़बाएल को उस्मानी ख़लीफ़ा के एहकामात से सरताबी की तरग़ीब देना और नाख़ुश लोगों को उनके ख़िलाफ़ जंग पर आमादा करना। इस काम के लिये एक हथियार बन्द फौज़ की तश्कील। इशराफे हिजाज़ के एहतेराम और असर व नुफूज़ को तोड़ने के लिये उन्हें हर मुम्किन तरीक़े से परेशानियों में मुब्तिला करना।

4. पैग़म्बरे इस्लाम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेहि वसल्लम) उनके जानशीनों और कुल्ली तौर पर इस्लाम की बरगुज़ीदा शख़्सियतों की एहानत का सहारा लेकर और इसी तरह शिर्क व मुत परस्ती के आदाल व रुसूम को मिटाने के बहाने मक्का , मदीना और दीगर शहरों में जहां तक हो सके मुसलमानों की ज़ियारतगाहों और मक़बरों की ताराजी।

5. जहां तक मुम्किन हो सके इस्लामी मुमालिक में फ़ितना व फ़साद , शोरिश और बदअनी का फैलाव।

6. कुरान में कमी बेशी पर शाहिद अहादिस व रिवायत की रो से एक जदीद कुरआन की नश्रो आशाअत।

सेक्रेट्री ने अपने इस छः नुकाती प्रोग्राम की तशरीह के बाद जिसे शेख़ मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब को अंजाम देना था अपनी गुफ़्तगू जारी रखते हुए कहाः

“ कहीं इस प्रोग्राम की दुश्वारियां तुम्हें घबराहट में मुब्तिला न कर दें। हम सब का यह फर्ज़ है कि इस्लाम की तबाही का बीज इस सरज़मीन में बिखेर दें ताकि हमारी आईन्दा आने वाली नस्ल हमारी इस राह पर आगे पढ़े और किसी फ़ैसलाकुन नतीजे पर पहुँच सके। बर्तानिया की हुकूमत हमारी इस सब्र आज़मा दराज़ मुद्दत कोशिशों से वाकिफ़ है। क्या मोहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेहि वसल्लम) ने यको तन्हा अपने इस तबाहकुन इंक़ेलाब को बरपा नहीं किया। मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब भी (नऊज़ोबिल्लाह) की तरह हमारे पेशे नज़र इंक़ेलाब को शोलावर कर सकेगा। ”

इस मुलाक़ात के कुछ दिन बाद मैं वज़ीर और सेक्रेट्री से सफ़र की इजाज़त मांगी और फिर घर वालों और दोस्तों को विदाअ किया। घर से बाहर निकलते हुए मेरे छोटे लड़के ने मुल्तिसमाना लहजे में कहाः “ बाबा जल्दी घऱ आईयेगा। ” उसके इस जुमले ने मेरी आंखे छलका दीं और मैं उन अश्कों को अपनी बीवी से न छिपा सका। रुख़सत के आख़री मरासिम तय करके मैं आमदा-ए-सफ़र हुआ।

हमारा जहाज़ बसरा की सिम्त रवना हुआ। बड़े दुश्वार और सख़्त सफ़र के बाद रात के वक़्त मैं बसरा पहुँचा और सीधा अब्दुल रज़ा तुरखान के घर पहुँचा। वह बेचारा सो रहा था। मुझे देखते ही बहुत खुश हुआ और बड़ी गर्मजोशी से मेरा इस्तक़बाल किया। मैंने रात वहां काटी। दूसरे दिन सुबह मुझे अब्दुल रज़ा से मालूम हुआ कि शेख़ मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब कुछ अर्से पहले ईरान से बसरा पहुंचा और अभी चन्द दिन पहले किसी नामालूम मक़ाम की तरफ़ खुदा हाफ़ज़ कह कर गया है। अब्दुल रज़ा ने यह भी बताया कि शेख़ मेरे नाम उसे एक ख़त भी दे गया है। उस खत में उसने अपना पता नजद लिखा था।

दूसरे दिन मैं अकेला आज़िमे नजद हुआ और बड़ी ज़हमतों के बाद मंज़िले मक़सूद पर पहुँचा और शेख़ से उसके घर पर मिला। उसके चेहरे पर उससे गुफ़्तगू मुनासिब नहीं समझी लेकिन जल्द ही मुझे पता चल गया कि उसने दूसरी शादी रचा ली है और जिन्सी रवाबित में अफ़रात से काम ले कर अपनी ताक़त खो बैठा है। मैंने इस बारे में उसे नसीहतें कीं और बताया कि अभी हम दोनों को मिल कर बहुत से उमूर अंजाम देने हैं। इस मंज़िल पर हमने यह तय किया कि मैंने अपने आपको इस मंज़िल पर हमने यह तय किया कि मैंने अपने आपको “ अब्दुल्लाह ” के फर्ज़ी नाम से बतौर गुलाम पेश करुंगा और बताऊँगा कि शेख़ ने मुझे बरदा फ़रोशों के गिरोहों से ख़रीदा है चुनाचे शेख़ ने लोगों से मेरा इसी उन्वान से तआरुफ़ कराया और बताया कि मैं बसरा में उसके काम से ठहरा हुआ था और अब यहां जद्दे पहुँचा हूँ।

नजद के रहने वाले मुझे शेख़ मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब का गुलाम समझते थे। यहां यह भी बताना जरुरी होगा इस मक़ाम पर शेख़ की दावत का सामान फ़राहम करने में हमें दो साल का अरसा लगा। 1143 हिजरी के अवासित में मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब ने जज़ीरतुल अरब में अपने नये दीन के एलान का हतीमी इरादा किया और अपने दोस्तों को इकट्ठा किया जो उसके हमख़्याल थे और उसका साथ देने का वादा कर चुके थे। इब्तिदा में सिर्फ़ अपने ख़ास असहाब और मुरीदों के दायरे में चन्द मुबहम और ग़ैर वाज़ेह अल्फाज़ में बड़े इख़्तियार के साथ उस दावत का आगाज़ हुआ लेकिन कुछ अर्से बाद नजद के हर तबक़-ए-ख़्याल के अफ़राद को बड़े पैमाने पर दावतनामे भेजे गये। आहिस्ता आहिस्ता हमने पैसे के ज़ोर पर शेख़ के इतराफ़ उसके उफ़कार की हिमायत में एक बड़ा मजमा इकट्ठा किया और उन्हें दुश्मनों से नबरिद आज़मा होने की तलक़ीन की। यह बात भी क़ाबिले ज़क्र है कि जज़ीरतुल अरब में शेख़ की दावत के फ़ैलने के साथ साथ उसके दुश्मनों और मुख़ालिफ़ों की तादाद भी बढ़ने लगी।

जल्द ही रुकावटों और दुश्मनियों का सिलसिला इस मंज़िल तक पहुँचा के पांव उखड़ने लगे। ख़ास तौर पर नजद में इसके ख़िलाफ़ बड़ी ख़तरनाक बातें फैली हुई थीं। मैंने बड़ी क़ातेईयत के साथ उसे जमे रहने की तरग़ीब दी और उसके इरादे को सुस्त नहीं होने दिया। मैं हमेशा उससे कहता थाः “ बेअसत के इब्तिदाई दिनों में अल्लाह के रसूल हज़रत मोहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेहि वसल्लम) के दुश्मन तुम्हारे दुश्मनों से बदरजहा ज़्यादा ताक़तवर थे मगर आप उनकी पैदाकर्दा दुश्वारियों और मुसीबतों को बड़े तहम्मुल के साथ झेलते रहे। इन अज़ीयतों , तोहमतों और दुश्नाम तराज़ियों को सहे बगै़र किसी बड़ी राह पर गामज़न होना और बुलन्दियों को छूना नामुम्किन है। कोई पेशवा और कोई रहबर इन दुश्वारियों से दामन छुड़ा न सका।

इस तरह हमने अपनी जिद्दो जेहद का आगाज़ किया और ख़तरनाक दुश्मनों के मुक़ाबिल आये। जंगो गुरेज़ इस मबारज़ा में हमारी हिक्मते अमली थी। हमारे कामयाब प्रोग्रामों में से एक प्रोग्राम शेख़ दुश्मनों को पैसे के ज़रिये तोड़ना था। हमारे यह तंख़्वाहदार मुख़ालेफ़ीन की सफ़ में रह कर हमारे लिये जासूसी करते थे और उनके इरादों से हमें आगाह रखते थे। हम अपने इन बज़ाहि दुश्मन साथियों की इत्तेलाआत के ज़रिये मुख़ालिफ़ों की तमाम स्कीमों को नक़्श बर आब किया करते थे। मसलन एक बार मैंने सुना कि चन्द आदमियों के एक गिरोह ने शेख़ को क़त्ल करने का इरादा किया है। मैंने फ़ौरी अक़दामात के ज़रिये इस कत्ल की साज़िश को नाकाम बना दिया और उस गिरोह को इतना रुस्वा किया कि बात शेख़ के हक़ में तमाम हुई और लोगों ने दहशतगर्द का साथ छोड़ दिया।

आख़िरकार शेख़ मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब ने मुझे यह इत्मिनान दिलाया कि वह नोआबादयाती इलाक़ों की विज़ारत के छः नुकाती प्रोग्राम को रु बा अमल लाने में अपनी पूरी कोशिश करेगा। ताहम उसने दो नुकात के बारे में ख़ातिर ख़्वाह जवाब नहीं दिया। इनमें से एक मक्के पर तसर्रुफ़ हासिल करने के बाद ख़ाना-ए-काबा का इन्हेदाम था। शेख़ के नज़दीक यह एक बेहूदा और ख़तरनाक काम था , क्योंकि अहले इस्लाम इतनी जल्दी इसके दावे को तस्लीम करने वाले नहीं थे और यही सूरत हज को बुतपरस्ती क़रार देने की थी और दूसरा अम्र जो उसके बस से बाहर था वह एक जदीद कुरआन की निगारिश थी। वह कुरआन के मुक़ाबिल नहीं आना चाहता था। इसके साथ साथ वह मक्के और इस्तन्बोल के हुक्काम से बहुत ख़ाएफ़ था और कहता था अगर मैंने काबा को बढ़ा दिया और नये कुरआन की निगारिश की तो इस बात का ख़तरा है कि उस्मानी हुकूमत एक बड़ी फौज मेरी सरकूबी के लिये अरबिस्तान भेजे और हम इस पर पूरे न उतर सकें। मैंने इसके उज्र को मअकूल समझा और अन्दाज़ा लगाया कि इस दौर की सियासी और मज़हबी फ़िज़ा इस बात की मुत्तक़ाज़ी नहीं है।

मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब की दावत के बरसों बाद जब छः नुकाती प्रोग्राम कामयाबी पूरी मंज़िलें यह कर चुका तो नोआबादयाती इलाको़ की विज़ारत ने इरादा किया अब सियासी एतबार से भी जज़ीरतुल अरब में कोई काम होना चाहिये। यही वजह थी कि उसने अपने उम्माल में से मोहम्मद बिन सऊद (सऊदी ख़ानदान का मोरिसे आला जिसने 1147 हिजरी में वहाबी मज़हब इख़्तियार किया और हुकूमते बर्तानिया की तरफ़ से नजद का हुक्मरान बना और 1179 हिजरी में मौत से हमकिनार हुआ।) को मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब के साथ इश्तेराके अमल पर मामूर किया और इस काम के लिये मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब के पास खुफ़िया तौर पर एक नुमाइन्दा भी भेजा ताकि वह इसके सामने हुकूमत बर्तानिया के मक़ासिद की तौज़ीह करे और “ मोहम्मद ” (यानि मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब और मोहम्मद बिन सऊद) के इश्तेराके अमल की ज़रुरत पर जोर दे और ताक़ीद करे कि दीनी उमूर के फ़ैसले कुल्ली तौर पर मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब के हाथ में होंगे और सियासी उमूर की निगरानी मोहम्मद बिन सऊद की जिम्मेदारी होगी। नोआबादयाती इलाक़ों की विज़ारत का हदफ़ मुसलमानों के जिस्म व जान दोनों पर अपना असर क़ायम करना था और तारीख़ इस बात की गवाह है कि सियासी हुकूमतों से दीनी हुकूमतें ज़्यादा देरपा ताक़तवर रही हैं।

इस तरह दीनी और सियासी शख़्सियतों के इत्तिहाद व अमल के नतीजे में अंग्रेज़ों का भला हो रहा था और हर आने वाला दिन इस भलाई में इज़ाफ़ा कर रहा था। इन दोनों रहबरों ने नजद के क़रीब “ दरईना शहर ” को अपना पायाए तख़्त बनाया। नोआबादयाती इलाक़ों की विज़ारत ख़ुफिया तौर पर जी खोलकर उनकी माली एआनत कर रही थी। मज़कूरा विज़ारत की प्लानिंग के तहत हुकूमत को बज़ाहिर कुछ गुलाम ख़रीदने थे जो दरअस्ल नोआबादयाती इलाक़ों की विज़ारत ही के कुछ आदमी थे जिन्हें अरबी ज़बान पर उबूर हासिल था और जो सहराई जंगों के फुनून से भी वाक़िफ़ थे। इन तमाम बातों का इन्तेज़ाम भी हमारी हुकूमत ने किया था। मैंने इन अफ़राद के इश्तेराके अमल से जो में ग्यारह थे इस इस्लामी हुकूमत की दीनी और सियासी राहें मोअय्यन की। दोनों “ मोहम्मद ” अपने फ़राएज़ से बख़ूबी वाकिफ़ थे और उन मोअय्यन की जाने वाली राहों पर नपे तुले क़दमों से आगे बढ़ रहे थे। यहां यह बात भी क़ाबिले ज़िक्र है कि कभी कभार उन दोनों के दरमियान जुज़वी तौर पर कशमकश हो जाया करती थी और वहीं उसी वक़्त फ़ैसला भी हो जाया करता था और नोआबदयाती इलाक़ों की विज़ारत को इसमें दख़ालत की ज़रुरत पेश नहीं आती थी।

हमने नजद के इतराफ़ की लड़कियों से शादियां की। हमें इस बात का एतराफ है कि मुसलमान औरतों में मोहब्बत , खुलूस और शौहरदारी की सिफ़त वाक़ई हैरतअंगेज़ और क़ाबिले तारीफ़ है। हम इन रिश्तों के ज़रिये अहले नजद के साथ दोस्ती , हम दिली और ताल्लुक़ात को और ज़्यादा मज़बूत बना सके।

इस वक़्त हम उनके साथ अपनी दोस्ती की मेराज पर हैं। मरकज़ी हुकूमत तमाम जज़ीरतुल अरब में अपना असर व नुफूज़ क़ायम करने में कामयाब हो चुकी है। अगर कोई नागवार हादसा रुनुमा न हुआ तो बहुत जल्द इस्लामी सरज़मीनों पर बिखरे हुए यह बीज तनावरदा दरख्तों में तब्दील हो जायेंगे और हमें उनसे अपने मतलूबा फल हासिल होंगे।

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[[अलहम्दो लिल्लाह किताब (हेमफरे के ऐतेराफात) पूरी टाईप हो गई खुदा वंदे आलम से दुआगौ हुं कि हमारे इस अमल को कुबुल फरमाऐ और इमाम हुसैन (अ.स.) फाउनडेशन को तरक्की इनायत फरमाए कि जिन्होने इस किताब को अपनी साइट (अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क) के लिऐ टाइप कराया। 17.4 .2018