तारीख़े इस्लाम
भाग 1
नबीयों के हालात
लेखकः अल्लामा फ़रोग़ काज़मी
नोटः ये किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क के ज़रीऐ अपने पाठको के लिऐ टाइप कराई गई है और इस किताब मे टाइप वग़ैरा की ग़लतीयो को सही किया गया है।
Alhassanain.org/hindi
हिन्दुस्तानी मुस्लिम ब्रादरी और ख़ुसूसी तौर पर शिया मुस्लिम समाज में तारीख़े इस्लाम पर मबनी कोई ऐसी जामेय और मुफ़स्सिल किताब मेरी नज़रों से नहीं गुज़री थी कि जिसकी सिर्फ़ एक ही जिल्द में किसी मुसन्निफ़ या मोअल्लिफ़ ने इब्तेदाये आफरीनिश से खि़लख़ते आदम (अ.स.) तक और खि़लख़त हज़रत आदम (अ.स.) से ख़ातेमुल अम्बिया तक तमाम अम्बिया व मुरसलीन (अ.स.) नीज़ हज़रत अली (अ.स.) इब्ने अबु तालिब (अ.स.) से इमामुल अस्र वल ज़मां अजल्लाह फ़रजह तक तमाम आइम्मा ए मासूमीन (अ.स.) के तारीख़ी व तफ़सीली और मुस्तनद व मोतबर हालात मुजतमा किये हों। लेहाज़ा मेरी दिली ख़्वाहिश व कोशिश यह थी कि उर्दू ज़बान में कोई ऐसी किताब मंज़रे आम पर लायी जाये जिसकी एक ही जिल्द मौजूदा इस्लामी तक़ाज़ों और वक़्त की इस अहम ज़रूरत को पूरा कर सके।
ख़ुदा का शुक्र है कि मोहक़िक़ बसीर जनबा फ़रोग़ काज़मी ने मेरे इस कर्ब को महसूस किया और इन्तेहाई मेहनत , लगन , तहक़ीक़ व जुस्तजू के बाद तफ़सीरे इस्लाम के उनवान से यह किताब मुकम्मल कर के मेरे ख़्वाब को ताबीर से हमकिनार कर दिया।
तक़रीबन नौ सौ सफ़हात पर मुश्तमिल यह ज़ख़ीम किताब यक़ीनन जनाब फ़रोग़ काज़मी का इन्फ़ेरादी कारनामा है जिसके दामन में इस्लामी तारीख़ से मुतअल्लिक़ सब कुछ है।
मुझे मसर्रत है कि मैं इस गिरां क़द्र किताब की अशाअत का शरफ़ हासिल कर रहा हूं और इसके साथ ही दुआगो हूं कि परवरदिगारे आलम इसकी मक़बूलियत व कामयाबी को दोश बदोश मोहतरम फ़रोग़ काज़मी की तौफ़िक़ात में भी इज़ाफ़ा फ़रमाये।
वाज़ेह हो कि हमने हिन्दीदां तबक़े के लिये इसको तीन भागों में विभाजित कर दिया है। पहला भाग नबियों के हालात पर आधारित है , दूसरे भाग में हज़रते मोहम्मदे मुस्तफ़ा (स.अ.व.व.) के हालात और तीसरे भाग में खि़लाफ़त और इमामत की तफ़सीलात और ज़हूरे इमाम तक की तफ़सीलात हैं। हमें उम्मीद है कि हिन्दीदां हज़रात हमारी कोशिश को सराहेंगे।
वस्सलाम
सै 0 अली अब्बास तबातबाई
इब्तेदाईया
अज़
हुज्जतुल इस्लाम वल मुसलेमीन मौलाना सैय्यद ज़ाहिद अहमद साहब क़िब्ला रिज़वी अलनजफ़ी।
सुल्तान बहादुर रोड , काज़मैन लखनऊ
इस्लाम वह इलाही अक़ीदा है जिसके लिये खुदा ने चाहा कि यह मेरे रसूल (स.अ.व.व.) और इताअत गुज़ारों का दीन हो। यह इन्सानी हुकू़क़ का वह कामिल मजमूआ है जिसकी वही खुदा ने अपने नबी पर की और नबी ने उसको अपनी उम्मत तक पहुँचाया। जिन लोगों ने नबीऐ मुरसल (स.अ.व.व.) की दावत पर लब्बैक कही और जिन्होंने इस दीन की पैरवी की वह हज़रात दीन के पैरू हैं खुद दीन नहीं है।
इस्लाम अज़ली भी है और अबदी भी। यह दीन हज़रत आदम (अ.स.) के दौर में भी था और क़यामत तक बाक़ी रहेगा। यह और बात है कि हज़रत आदम (अ.स.) के ज़माने में इस्लाम के मौजूदा ख़दो खाल नहीं थे। उसूल व ज़वाबित मोअय्यन नहीं थे और न कोई बाक़ायदा निज़ामे हयात था। इस लिये क़ुरआने मजीद ने इस्लाम का तज़किरा सबसे पहले हज़रत नूह (अ.स.) की ज़बान से किया। चुनान्चे इरशाद हुआ :- फ़ा इन तवल्लैतुम फ़मा साअलतोकुम मिन अजरे इन अजरी इल्ला अल्लाहो व ओमिरतो अन अकूना मिनल मुस्लेमीन (यूनुस आयात 72) ‘‘ तुम ने (मेरी नसीहत से) मुंह मोड़ लिया हालांकि मैने तुम से कोई उजरत नहीं मांगी थी , मेरी उजरत तो अल्लाह पर है और मुझे हुक्म है कि मैं उसके फ़रमाबरदारों में शामिल हों जाऊं। ’’
आयाए मज़कूरा में लफ़्ज़े मिनल मुस्लेमीना से साफ़ तौर पर ज़ाहिर है कि इस्लाम का सिलसिला हज़रत नूह (अ.स.) से पहले भी था और वह ख़ुद इस सिलसिले की एक कड़ी थे।
इसके बाद हर दौर हर ज़माने में इस्लाम का ज़िक्र ‘‘ तकरार ’’ के साथ होता रहा ताकि यह अम्र भी वाज़ेह हो जाए कि शरिअतों के बदल जाने से शरिअत की ‘‘ रूह ’’ की रूह पर कोई असर नहीं पड़ता। नीज़ यह भी आशकार हो जाए कि इस्लाम दर हक़ीक़त वही दीने इलाही है जो इन्सानी ज़िन्दगी के लिये ज़ाबते के तौर पर वज़ा हुआ था और जिसकी हमागीर तालीमात में इन्सान की फ़लाह व निजात के इसरार व रमूज़ पोशीदा हैं।
जब हज़रत इब्राहीम (अ.स.) ख़लील उल्लाह का दौर आया तो उन्होंने भी अपनी शरीयत को इस्लाम से ताबीर किया। जैसा कि क़ुरआने मजीद का बयान है :- व वसी बेहा इब्राहीमो बैनही व याक़ूब या बुनैय्या इन्नल लहा इस्तफ़ालकुमुद्दीना फला तमूतुन्ना इल्ला व अनतुम मुस्लेमून (बक़रा आयत 132)
‘‘ इब्राहीम (अ.स.) व याक़ूब (अ.स.) ने अपने फ़र्ज़न्दों को वसीयत की कि अल्लाह ने तुम्हारे लिये इस्लाम को पसन्द किया है लेहाज़ा जब दुनिया से तुम उठना तो मुस्लमान उठना। ’’
हज़रत इब्राहीम (अ.स.) और हज़रत याक़ूब (अ.स.) की यही वसीयत जब जनाबे यूसुफ़ (अ.स.) की तरफ़ मुन्तक़िल हुई तो उन्होंने फ़रमाया :- रब्बे क़द आतैनी मिनल मुल्के व अल्लम तनी मिन तावीलिल अहदीस फातेरस समावाते वल अर्ज़े अन्ता वलीये फिद दुनिया वल आख़ेरत तवफ़्फ़नी मुस्लेमन व अलहक़्क़ेनीबिल सालेहीन (यूसुफ़ आयत 101)
‘‘ परवर दिगार ! तूने मुझे मुल्क दिया है और हदीसों की तावील का इल्म भी अता किया है , तू ही ज़मीन व आसमान का ख़ालिक और दुनिया व आख़ेरत में मेरा वली व सरपरस्त है। मेरे मालिक ! मुझे इस दुनिया से मुसलमान उठाना और सालेहीन से मुलहक़ कर देना। ’’
इस आया ए करीमा में हज़रत यूसुफ़ (अ.स.) की तरफ़ से अपने पदरे बुज़ुर्गवार की वसीयत के मुतालिक़ जादये इस्लाम पर गामज़न रहने दुनिया से मुस्लमान उठने और ‘‘ सालेहीन ’’ से इल्हाक़ की ख़्वाहिश का इज़हार है और इसके साथ ही यह भी बताया गया है कि सिर्फ़ इस्लाम ही वह मज़हब है जो दुनिया व आख़ेरत दोनों जगह इन्सान के काम आता है।
मालूम हुआ कि हज़रत नूह (अ.स.) की तरह हज़रत यूसुफ़ (अ.स.) की नज़रों में भी अल्लाह के कुछ मख़्सूस और सालेह बन्दे ऐसे थे जिनकी ज़वाते मुक़द्देसा ग़ायबाना तमस्सुक ज़रूरी था। वह ‘‘ सालेहीन ’’ कौन थे ? यह वह बन्दे थे जिनके बारे में क़ुरआन का इरशाद है :-
यह वह ‘‘ सालेहीन ’’ हैं कि जिनके बारे में रसूल (स.अ.व.व.) ने फ़रमाया :- ‘‘ मेरे अहले बैत की मिसाल किश्ती ए नूह (अ.स.) की सी है। जो इस पर सवार हुआ वह निजात पा गया और जो इससे किनारा कश रहा वह ग़र्क़ हो गया। ’’
एक और मौक़े पर फ़रमाया :- ‘‘ मैं तुम्हारे दरमियान दो गरांक़द्र चीज़ें छोड़े जा रहा हूँ एक क़ुरआन है और दूसरे मेरे अहले बैत हैं। यह दोनों अज़मत में मसावी हैं और एक दूसरे से उस वक़्त तक जुदा न होंगे जब तक (क़यामत के दिन) हौज़े कौसर पर मेरे पास वारिद न हों। अगर तुम उनसे तमस्सुक रखोगे और उनका दामन थामे रहोगे तो मेरे बाद कभी गुमराह न होगे। ’’
कुरआने मजीद ने जहां जहां पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) का ज़िक्र किया है वहां वहां ‘‘इस्लाम ’’ का तज़किरा भी इस अन्दाज़ में किया है कि गोया ‘‘ दीने इस्लाम ’’ सिर्फ़ आप ही का दीन है और अल्लाह की तरफ़ से पहले पहल आप ही को अता हुआ है।
हक़ीकत भी यही है क्यों कि अम्बियाये साबेक़ीन में से हर नबी ने अपने इस्लाम से पहले किसी ‘‘ साहबे इस्लाम ’’ के ‘‘ इस्लाम ’’ का एतराफ़ किया है लेहाज़ा यह देखना चाहिये कि वह साहबे इस्लाम कौन है ?
क़ुरआन मजीद जवाब देगा :- ‘‘ क़ुल इन्ना सलाती व नासोकी व मोहयाया व ममाती लिल्लाहे रब्बिल आलामीना ला शरीका लहू व बेज़ालेका ओमिरतो व अना अव्वुलल मुस्लेमीन (इन्आम आयत 163 व 164) ’’
‘‘ ऐ रसूल (स.अ.व.व.) ! कह दो कि मेरी नमाज़ , इबादत़ ज़िन्दगी और मौत सब उस अल्लाह के लिये है जो आलेमीन का रब और लाशरीक है और मैं पहला मुसलमान हूँ। ’’
क़ुरआने करीम ने यह वाज़ेह कर दिया कि अल्लाह का आखि़री रसूल मुहम्मद (स.अ.व.व.) पहला मुसलमान और ‘‘ साहबे इस्लाम ’’ है और रसूले अकरम (स.अ.व.व.) ने भी अपनी बेअसत के बाद मुसलसल तेईस साल तक उम्मत को इस्लाम ही की तालीम दी मगर रसूल (स.अ.व.व.) के इस्लाम और उम्मत के इस्लाम में एक नुमाया फ़र्क़ यह है कि रसूल (स.अ.व.व.) का इस्लाम अज़ली है और उम्मत का इस्लाम उसके वजूद में आने के बाद शुरू हुआ है। रसूल (स.अ.व.व.) के इस्लाम के मुताअल्लिक़ अव्वलो मन असलमा और अव्वलुल मुसलेमीना की लफ़ज़े इस्तेमाल हुई हैं। इन लफ़्ज़ों का मतलब ही यह है कि जब से इस्लाम का सिलसिला शुरू हुआ है पैग़म्बर (स.अ.व.व.) का इस्लाम तमाम अम्बिया ए कराम व अहले इस्लाम के इस्लाम पर मुक़द्दम रहा है। दूसरा वाज़ेह फ़र्क़ यह है कि उम्मत का इस्लाम पैग़म्बर (स.अ.व.व.) के दस्ते मुबारक पर कलमे का मरहूने मिन्नत है जब कि ख़ुद पैग़म्बरे (स.अ.व.व.) ने किसी से इस्लाम का दर्स नहीं लिया।
इसमें कोई शक नहीं कि क़ुरआन मजीद ने साहेबाने इस्लाम की फेहरिस्त में नूह (अ.स.) , इब्राहीम (अ.स.) , जु़र्रिय्यते इब्राहीम (अ.स.) , याक़ूब (अ.स.) यूसुफ़ (अ.स.) यहां तक कि कायनात अरज़ो समा को भी शामिल किया है लेकिन इसके साथ साथ यह भी ऐलान कर दिया है कि सरकारे ख़़तमी मरतबत अव्वल मुस्लेमीन हैं। आप उस वक़्त भी साहबे इस्लाम थे जब इस कायनात का वजूद भी न था।
लेकिन इन तमाम बातों के बवजूद इस्लाम और इस्लामी तारीख़ का सबसे बड़ा अलमिया यह है कि दुनिया परस्तां ने मुरसले आज़म (स.अ.व.व.) की वफ़ात के बाद अपने मुफ़ाद की ख़ातिर इस्लाम को तहस नहस करने और शरियते मुहम्मदी को तबाह व बरबाद करने में कोई दक़ीक़ा उठा नहीं रखा। यहां तक कि इस्लामी तारीख़े नवीसी के फ़न पर भी बड़ी बड़ी ज़ालिब व जाबिर हुकूमतों की मोहरें लगी हुई हैं और उसकी नशो नुमां दौलत व इक़्तेदार के साये में हुई है। इस्लाम की तारीख़े मुखालेफ़ीन व मुनाफे़क़ीन के घरों में पली है और उन्हीं की आग़ोश मुनाफ़ेक़त में परवान चढ़ी हैं। इन अलल व असबाब के बावजूद अगर इस्लामी तारीख़ के दामन में हमारे मतलब की कोई बात मिल जाती है तो यह इस अमर की दलील है कि वह हक़ीक़त इतनी वाज़ेह और रौशन थी कि मोअर्रिख़ीन के बिके हुए क़लम भी इसकी परदा पोशी न कर सके और न ह ीवह हक़ीक़त तौज़िह व तावील की नज़र हो सकी।
इस्लाम की इब्तेदाई दौर में अहादीस , रवायात या वाक़ियात के बयान करने का जो तरीक़ा राएज था वह ज़बानी था। तसनीफ़ व तालीफ़ का सिलसिला अहदे माविया में शुरू हुआ जब उसने अबीद बिन शरिया को (जो ज़बानी हदीसो का रावी था) सनआ से बुला कर किताबों और मोअर्रिखों के ज़रिये उसकी बयान की हुई हदीसों को क़लम बन्द कराया जिसके नतीजे में मुत्ताइद किताबें आलमे वजूद में आयीं। उनमें से एक किताब का नाम ‘‘ किताबुल मुलूक व इख़बारूल मज़ाईन ’’ है।
किताबों में ग़ालेबन यह पहली किताब है जो मुआविया के हुक्म से लिखी गई। इसके बाद ‘‘ अवाना बिनुल हकीम ’’ का नाम क़ाबिले ज़िक्र है जो एख़बार व अन्साब का माहिर था और जिसने आम किताबों के अलावा ख़ास बनी उमय्या और मुआविया के हालात पर एक किताब लिखी जो पहलवी ज़बान में थी। उसका तर्जुमा अरबी ज़बान में हिश्शाम बिन अब्दुल मलिक के हुक्म से सन् 117 में और फ़ारसी ज़बान में 1260 में ईरान से हुआ।
143 हिजरी में जब तफ़सीर व फ़िक़ा और हदीसों की तदवीन का बाज़ाबता काम शुरू हुआ तो दीगर उलूम की किताबों के साथ तारीख़ व रिजाल में भी किताबे लिखी गईं। चुनान्चे मोहम्मद बिन इस्हाक़ (अल मतूनी 151 हिजरी) ने सीरते नबवी पर एक किताब मन्सूर अब्बासी की तहरीक पर लिखी जो मेरे ख़्याल से फ़ने तारीख़ की पहली किताब है।
इसके बाद तारीख़ बतदरीज तरक़्क़ी की मंज़िलें तय करती रही और बड़े बड़े नामवर मुवर्रिख़ पैदा होते रहे। इन मोअर्रेख़ीन में नज़र बिन मुज़ाहम कूफ़ी , सैफ़ बिन अमरूल असदी , मोअम्मिर बिन राशिद कूफ़ी , अब्दुल्लाह बिन साअद ज़हरी , अबुल हसन अली बिन मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह मदायनी , अहमद बिन हारिस ख़ज़ार (मदायनी का शार्गिद) , अब्दुल रहमान बिन अबीदा और उमर बिन अलशबा वग़ैरा ख़ास तौर पर क़ाबिले ज़िक्र हैं।
अगर चे मुसन्नेफ़ीन की किताबें अब ना पैद हो चुकी हैं लेकिन दीगर किताबें जो इससे क़रीब तर ज़माने में लिखी गईं है उनमें बहुत कुछ सरमाया उन मुसन्नेफ़ीन की किताबों का मौजूद व महफ़ूज़ हैं। मसलन अब्दुल मलिक बिन हिशाम (अल मतूनी 213 हिजरी) की किताब सीरते इब्ने हश्शाम , मुहम्मद बिन सईद बसरी (अल मतूफ़ी 230 हिजरी) की किताब तबक़ात , अब्दुल्लाह बिन मुस्लिम बिन क़तीबा (अल मतूफ़ी 270 हिजरी) की किताब अल इमामत व अल सियासत , अहमद बिन दाऊद (अल मतूफ़ी 282 हिजरी) की किताब एख़बारूल तवाल , मुहम्मद बिन जरीर तबरी (अल मतूफ़ी 300 हिजरी) की किताब तारीख़े तबरी , मरूजुज़ ज़हब और किताबुल अशराफ़ुल तबनिया वग़ैरा। यह तसानीफ़ जिस दौर की हैं वह मुतक़देमीन का दौर कहलाता है।
पांचवी सदी हिजरी के आग़ाज़ से मुतवस्तीन का दौर शुरू है। इस दौर में इब्ने असीर , समआनी , ज़हबी , अबुल फ़िदा , नवेरी और सियुती वग़ैरा ने नाम पैदा किया लेकिन उन लोगों में ख़ास कमी यह थी कि तारीख़ में इज़ाफ़ा के बजाय उन्होंने जो तरीक़ इख़्तेयार किया वह यह था कि मुतक़देमीन में से किसी की तसनीफ़ सामने रख ली और उसमें तग़य्युरात पैदा करके उसकी हैयत बदल दी लेकिन इसके बावजूद उन किताबों को अवामी हलके में ख़ातिर ख़्वाह मक़बूलियत हासिल हुई। तारीख़ इब्ने असीर और तारीख़े तबरी ने तो यह शोहरत और मक़बूलियत हासिल की कि अकसर कुदमा की किताबें नापैद हो गईं। इब्ने असीर और तबरी के बाद जो मोअर्रेख़ीन पैदा हुए उन्होंने भी अपनी किताबों का माखि़ज़ इब्ने असीर और तबरी की किताबों को क़रार दिया। इस फ़ेहरिस्त में इब्ने ख़ल्दून का नाम शामिल नहीं किया जा सकता इस लिये कि इसका अन्दाज़े तहरीर सबसे अलग है।
मुख़्तसर यह कि उमवी और अब्बासी दौर में तसनीफ़ात व तालीफ़ात का काम बकसरत हुआ और झूठी अहादीस , मोहमल रिवायत और ग़लत वाक़ियात की बुनियाद पर ख़ूब किताबे लिखी गईं और चूंकि उमवी और अब्बासी हुक्मरानों ने दौलत और ताक़त का इस्तेमाल कर के ख़ुसूसी तवज्जो और दिल चस्पी के साथ किताबें लिखवाईं लेहाज़ा ज़ाहिर है कि तारीख़ का तदवीनी मरहला उन्हीं की निगरानी में तय हुआ और उन्हीं की मरज़ी के मुताबिक़ तारीख़ी वाक़ियात किताबों में मरक़ूम किये गए। इस काम में मुलूकियत , इमारत , डिक्टेटर शिप , शाही और शहनशाही के साथ उसके नाजायज़ टुकड़ों पर पलने वाले ख़ुशामदी , दरबारी , जागीरदार , ओहदेदार , क़ाज़ी , मुल्ला , मुफ़ती , रावी , ज़मीर फ़रोश ओलमा और इमान फ़रोश मोअर्रेख़ीन सभी शामिल थे। जिन्होंने मिल कर इस्लामी तारीख़ को मसख़ करने में अपनी साज़िशी कोशिशे सरफ़ रक दीं जिसका नतीजा यह हुआ कि हज़ारों की तादाद में जाली हदीसे , फ़र्ज़ी रवायतें और ग़लत व मोहमल वाक़ियात क़लम के ज़रिये इस्तेहकाम पा गये।
यह भी एक तारीख़ी हक़ीक़त है कि मुआविया और उसके बाद के इस्तेबदादी दौर में यह ना मुम्किन था कि कोई शख़्स ज़बानी या तरीरी तौर पर आले मोहम्मद (स.अ.व.व.) के फ़ज़ाएल व मुनाक़िब बयान करता। अगर वह ऐसा करने की सई करता भी तो उसकी ज़बान गुद्दी से ख़ींच ली जाती उसके हाथ पाओं काट दिये जाते और उसकी आंखों में लोहे की गर्म सलाख़ें चला दी जाती। यही सबब है कि इस दौर में सच्चाई ख़ामोश रही और तारीख़ का दामन झूटी हदीसों , जाली रवायतों और ग़लत वाक़ियात से छलक पड़ा। चुनान्चे शेख़ मुफ़ीद अलह रहमा ने जब अपनी किताब इरशाद के लिये क़लम उठाया तो वाक़ेयाते करबला को दर्ज करते हुए इब्तेदा ही में उन्होंने यह वज़ाहत कर दी कि इन बयानात का तअल्लुक़ तमाम तर अरबाबे तारीख़ व सियर से है , मैंने सिर्फ़ इस मुक़ाम पर नक़ल कर दिया है। इसका मतलब यह हुआ कि शेख़ मुफ़ीद अलैह रहमा ने तारीख़ की तहक़ीक़ व सेहत का काम अपने बाद के मोहक़्क़ेक़ीन व मोअर्रेख़ीन पर छोड़ दिया।
तारीख़ का एक इम्तेयाज़ यह भी है कि शरियत के अलूम व फ़ुनून का ताल्लुक़ फ़ने तारीख़ से नहीं बल्कि एक मक़सूस व महदूद दुनिया से है और इससे इन्सान के अक़ाएदी जज़बात वाबस्ता होते हैं और ताअस्सुब व तंग नज़री के इमकानात भी पाये जाते हैं। तारीख़ के मसाएल इससे बिल्कुल मुख़्तलिफ़ हैं। इससे अमूमन जज़बात व एहसासात का राबता नहीं होता और यह कहने की गुजांइश बाक़ी रहती है कि मोअर्रिक़ ने दयानत दारी व ग़ैर जानिबदारी से काम लिया है। चुनान्चे यही वह रास्ता है जिस पर मोहक़िक़ बसीर जनाबे फ़रोग़ काज़मी मौजूदा दौर में गामज़न हैं और तहक़ीक़ व हक़ाएक़ की रौशनी में दीनी खि़दमात अन्जाम दे रहे हैं।
मौसूफ़ का हक़ आशना व हक़ीक़त निगार क़लम इस्लामी दुनिया में मोहताजे तारूफ़ नहीं है। उनकी किताबों में अल ख़ोलफ़ा , तफ़सीरे करबला , हज़रत आयशा की तारीखी़ हैसियत , जदीद शरीयत और सैय्यदा सकीना (अ.स.) वग़ैरा वह माया नाज़ किताबें हैं जो मक़बूलियत के दर्जे पर फ़ायज़ हो कर अवाम से खि़राजे तहसीन हासिल कर चुकि हैं यहां तक कि बाज़ किताबों का तर्जुमा भी दूसरी ज़बानों में हो रहा है जो इन्शाअल्लाह जल्दी ही मंज़रे आम पर आजायेगा।
ज़ेरे नज़र किताब तफ़सीरे इस्लाम ख़ुसूसी इम्तेयाज़ात निगारिश की िंबना पर ब्रादरम फ़रोग़ काज़मी की क़लमी काविशों का वह तारीख़ी सहीफ़ा है जिसके दामन में इस्लाम व तौहीद और इब्तेदाये आफ़रेनश की झलकियों के साथ साथ आदम (अ.स.) शीश (अ.स.) इदरीस (अ.स.) नूह (अ.स.) हूद (अ.स.) सालेह (अ.स.) इब्राहीम (अ.स.) इस्माईल (अ.स.) इस्हाक़ (अ.स.) लूत (अ.स.) ज़ुलक़रनैन (अ.स.) याक़ूब (अ.स.) यूसुफ़ (अ.स.) अय्यूब (अ.स.) शुऐब (अ.स.) मूसा (अ.स.) हिज़खि़़ल (अ.स.) यूशा बिन नून (अ.स.) इलयास (अ.स.) लुक़मान (अ.स.) दाऊद (अ.स.) सुलेमान (अ.स.) शेया (अ.स.) हैक़ूक़ (अ.स.) ज़करिया (अ.स.) यहीया (अ.स.) अरनिया (अ.स.) दानियाल (अ.स.) अज़ीर (अ.स.) ईसा (अ.स.) और खि़ज़र (अ.स.) वग़ैरा के मोतबर व मुस्तिनिद हालात और उनके दौर के वाक़ियात पूरी तफ़सील के साथ जलवा गर हैं। ख़ास बात यह है कि तारीख़ की दीगर किताबों की तरह जनाबे फ़रोग़ काज़मी की यह किताब सिर्फ़ पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) के हालात व वाक़ियात तक ही महदूद नहीं है बल्कि यह तमाम आइम्मा ए अतहार (अ.स.) के हालात से गुज़र कर हज़रत वलीउल अस्र अज्जलल्लाह फ़राजा के वाक़ियात पर तमाम हुई है। इस तरह कारेईने कराम को एक ही किताब में आदम (अ.स.) से इमामे अस्र (अ.स.) तक तमाम हालात मिल जायेंगे।
दर हक़ीक़त मोहक़िक़े बसीर जनाब फ़रोग़ काज़मी का यह वह कलमी कारनामा है जो मिल्लते इस्लामिया के लिये बहुत ज़रूरी था। तफ़सीरे इस्लाम के उन्वान से यह किताब यक़ीनन क़ौम के अहम तक़ाज़ों को किसी हद तक पूरा कर सकेगी और मोअल्लिफ़ की तरफ़ से आलमे इस्लाम ख़ुसूसन मिल्लते जाफ़रिया के लिये एक गिरां क़द्र तोहफ़ा साबित होगी। मेरी दुआ है कि परवरदिगारे आलम मौलूफ़ मौसूफ़ की इस मेहनत को क़ुबूल फ़रमाये और उन्हें अजरे अज़ीम अता करे। मेरी नज़र में जनाबे फ़रोग़ काज़मी मुबारकबाद के साथ मुकम्मल तौर पर हौसला अफ़ज़यी के भी मुस्तहक़ हैं। अल्लाह करे ज़़ोरे क़लम और ज़्यादा। फ़क़ीर दरे आले मोहम्मद (अ.स.) (सैय्यद ज़ाहेद अहमद रिज़वी)
बिस्मिल्लाहिर्रहमार्निरहीम
अल्हम्दो लिल्लाहे रब्बिल आलमीन वस सलातो वस्सलामो अला सय्यदिल अम्बिया ए वल मुरसलीन मोहम्मदिंव व आलहित तय्येबीनत ताहेरीन
अमीरूल मोमेनीन हज़रत अली इब्ने अबी तालिब (अ.स.) ने फ़रमाया तमाम हम्द उस ख़ुदा के लिये है जिसकी मदह तक बोलने वालों की रसाई नहीं जिसकी नियामतों को गिनने वाले गिन नहीं सकते न कोशिश करने वाले उस का हक़ अदा कर सकते है न बलन्द परवाज़ उसे पा सकते हैं न अक़लो फ़हम की गहराईयां उस की तह तक पहुँच सकती है उसके कमालो ज़ात की कोई हद मुअय्यन नहीं न उसके लिये तौसीफ़ी अल्फ़ाज़ है न उसकी इब्तेदा के लिये कोई वक्त है जिसे शुमार में लाया जा सके न उसकी कोई मुद्दत है जो कहीं पर ख़त्म हो सके।
‘‘ दीन की इब्तेदा उसकी मारेफ़त है कमाले मारेफ़त उसकी तस्दीक़ है कमाले तस्दीक़ तौहीद है कमाले तौहीद तनज़ियाओ एख़लास है और कमाले तनज़ियाओ एख़लास यह है कि उस से सिफ़तों की नफ़ी की जाए क्यों कि हर सिफ़त शाहिद है कि वह अपने मौसूफ़ की ग़ैर है और हर मौसूफ़ शाहिद है कि वह सिफ़त के अलावा कोई चीज़ है लिहाज़ा जिसने ज़ाते इलाही के अलावा सिफ़ात माने उसने ज़ात का एक दूसरा साथी मान लिया और जिसने ज़ात का दूसरा साथी माना उसने दुई पैदा की , जिसने दुई पैदा की उसने जुज बना डाला और जो उसके लिये अजज़ा का क़ायल हुआ वह उससे बे ख़बर रहा। ’’
इस्लाम क्या है ?
‘‘ इस्लाम एक ऐसा दीन है जिसकी असासा ओ बुनियाद हक़ व सदाक़त पर क़ायम है यह उलूम और मारेफ़त का एक ऐसा चश्मा है जो अक़्लों दानिश के दरियाओं को ज़ौलानियां अता करता है ऐसा चिराग़ जिससे मोताद्दिद चिराग़ रौशन होते हैं एक ऐसा मनारा ए नूर है जो अल्लाह की राह को रौशन व मुनव्वर करता है। यह उसूलों और अक़ाएद का ऐसा मजमूआ है जो हक़ व सदाक़त के हर मुतलाशी को सुकून और इतमिनान बख़्शता है अल्लाह ने इस्लाम को ही अपनी ख़ुश्नूदी का ज़रिया और एताअत व इबादत का बलन्द तरीन मेयार क़रार दिया है। इस्लाम ने तमाम मुसलमानों को बिला तफ़रीक़ आला एहकाम , बलन्द उसूलों मोहकम दलायल और नाक़ाबिल और नाक़ाबिले तरदीद तफव्वुक़ से नवाज़ा है। अब मुसलमानों का फ़र्ज़ है कि शानो अज़मत को क़ायम रखे उस पर पुरख़ुलूस दिल से अमल करें उसके मोतक़ेदात से इन्साफ़ करें इसके अहकाम की सही तौर पर तामील करें और अपनी ज़िन्दगियों में इसे मुनासिब मुक़ाम दे। ’’
इस्लाम इन्सान को एताअत एबादत और ख़ुदा शिनासी की दावत देता है अगर ज़हने इन्सान किसी माबूद के तसव्वुर से ख़ाली हो तो न एताअत का सवाल होता है न एबादत ओ रेयाज़त का और न किसी आईन (शरिअत) की पाबन्दी का क्यों कि जब कोई मंज़िल ही सामने न होगी तो मन्ज़िल की तरफ़ बढ़ने के क्या माअनी ? और जब कोई मक़सद ही पेशे नज़र न होगा तो उसके लिये दग व दौ करने का क्या मतलब ? अल बत्ता जब इन्सान की अक़्ल व फ़ितरत उसका रिश्ता किसी माफ़ौक़ुल फ़ितरत ताक़त से जोड़ देती है और उसके ज़ौके परसतारी व जज़्बाए उबूदियत उसको किसी माबूद की तरफ़ झुका देता है तो वह मनमानी करने के बजाए अपनी ज़िन्दगी को मुख़्तलिफ़ क़िस्मों की पाबन्दियों की ज़न्जीरों में जकड़ा हुआ महसूस करने लगता है। इन्ही पाबन्दियों का नाम दीन है जिसका आग़ाज़ ख़ुदा की मारेफ़त और उसका एतराफ़ है और इसके भी मुख़्तलिफ़ मदारिज हैं।
यह है कि फ़ितरत के विजदानी एहसास और ज़मीर की रहनुमाइ से या एहले मज़हब और उलेमा की ज़बान से सुनकर इस अन देखी हस्ती का तसव्वुर ज़हन में पैदा हो जाए जो ख़ुदा कही जाती है। यह तसव्वुर दर हक़ीक़त फिकरो नज़र की ज़िम्मेदारी और तहसीली मारेफ़त का हुक्म आयद होने का अक़लन पेश ख़ेमा है लेकिन तसाहुल पसन्द और माहौल के दबाव में असीर हसतियां इस तसव्वुर के पैदा होने के बावजूद तलब की ज़हमत गवारा नहीं करती इस लिये वह तसव्वुर तस्दीक़ की शक्ल एख़्तेयार नहीं करता और वह मारेफ़त से महरूम हो जाती है और इस महरूमी पर वह मवाख़ज़ा की मुस्तेहक़ हो जाती है लेकिन जो शख़्स इस तसव्वुर की तहरीक से मुतास्सिर हो कर क़दम आगे बढ़ाता है और उस पर ग़ौरो फ़िक्र ज़रूरी समझता है इस लिये दूसरी मंज़िल फ़हमो इदराक की होती है।
इदराक और फ़हम का यह है कि मख़लूक़ात मसनूआत और कायनात की नैरंगियों से खल्लाक़े आलम का पता लगाया जाय क्यों कि हर नक्श नक्काश के वजूद पर और हर असर मोअस्सिर की कारफ़रमाइ पर एक ठोस और बेलचक दलील है चुनान्चे इन्सान जब अपने गिर्दों पेश का जायज़ा लेता है तो उसे कोई ऐसी चीज़ दिखाई नहीं देती जो किसी साने की कारफ़रमाइ के बग़ैर आलामे वजूद में आ गई हो यहां तक कि कोई नक़्शे क़दम बग़ैर राहरू के और कोई इमारत बग़ैर मेमार के ख़ड़ी होते नहीं देखता तो वह क्यों कर यह बावर कर सकता है कि यह नीलगूं आसमान और इसकी पहनाइयों में आफ़ताब व महताब की तजल्लियां और यह ज़मीन और उसकी वसअतों में सबज़ा व गुल की रानाईयां बग़ैर किसी साने की सनअत तराज़ी के मौजूद हो गई होगी लेहाज़ा मौजूदाते आलम और नज़मो कायनात के देखने के बाद कोई इन्सान इस नतीजे तक पहुँचने से अपने दिल और दिमाग़ को नहीं रोक सकता कि इस जहाने रंग और बूका कोई बनाने और सवारने वाला है।
यह कि इस माबूद का इक़रार वहदत के एतराफ़ के साथ हो बग़ैर इसके ख़ुदा की तस्दीक़ मुकम्मल नहीं हो सकती क्यों कि जिस ख़ुदा के साथ और भी ख़ुदा माने जायेंगे वह एक नहीं होगा और ख़ुदा के लिये एक होना ज़रूरी है क्यों कि एक से ज़्यादा होने पर यह सवाल पैदा होगा कि इस कायनात को एक ने ख़ल्क़ किया है या कई ख़ुदाओं ने मिलकर पैदा किया है और अगर एक ही ने ख़ल्क़ किया है तो उसमें कोई ख़ुसूसियत होना चाहिये वरना इस एक को बवजह तरजी होगी जो अक़्लन बातिल है और अगर मुख़्तलिफ़ ख़ुदाओं ने मिल कर बनाया है तो दो हाल से ख़ाली नहीं या तो वह दूसरों की मदद के बग़ैर अपने उमूर की अन्जाम देही न कर सकता होगा या उसकी शिरकत व तावुन से बेनियाज़ होगा पहली सूरत में उसका मोहताज व दस्त नगर होना और दूसरी सूरत में एक फेल के लिये कई मुस्तक़िल फ़ाएलों का कारफ़रमा होना लाज़िम आयगा और यह दोनों सूरतें अपने मुक़ाम पर बातिल की जा चुकी हैं और अगर यह फ़रज़ किया जाए कि सारे ख़ुदाओं ने तमाम मौजूदात को आपस में बांट कर बक़दरे हिस्सा व बक़दरे जुस्सा ईजाद किया है तो इस सूरत में तमाम मम्लूकात के हर वाजिबुल वजूद से यक्सा निस्बत न रहेंगी बल्कि अपने सिर्फ़ बनाने वाले से ही निस्बत होगी हालांकि हर वाजिब को हर मुम्किन से और हर मुम्किन को हर वाजिब से यकसां निस्बत होना चाहिये क्यों कि तमाम मुम्किनात असरपज़ीरी में और तमाम वाजिबुल वजूद असर अन्दाज़ी में एक से माने गये हैं तो अब उसे एक माने बग़ैर कोई चारा नहीं है क्यों कि मुताअदिद ख़ालिक़ों के मानने की सूरत में किसी चीज़ के मौजूद होने की गुंजाइश ही बाक़ी नहीं रहती और ज़मीन और आसमान नीज़ कायनात की हर शै की तबाही बरबादी ज़रूरी क़रार पाती है। ख़ुदा वन्दे आलम ने इस दलील को क़ुरआने मजीद में इन लफ़्ज़ों में पेश किया है :- ‘‘ लव काना फी हेमा इलाहातो इल्लाहे ले फ़सादता ’’ अगर ज़मीनों आसमान में अल्लाह के अलावा और भी ख़ुदा होते तो यह ज़मीनों आसमान दानों तबाह और बरबाद हो जाते।
यह है कि ख़ुदा को हर नुक्साओ ऐब से पाक समझा जाए और जिस्मो जिस्मानियात , शक्ल व सूरत तमसीलो तशबीह मकान व ज़मान हरकत व सुकून और इज्ज़ व जेहेल से मुनज़्ज़ा माना जाए क्यों कि इस बाकमाल व बे ऐब ज़ात में न किसी नुक़्स का गुज़र हो सकता है न उसके दामन पर किसी ऐब का धब्बा उभर सकता है और उसको न किसी के मिस्ल व मानिन्द ठहराया जा सकता है क्यों कि यह तमाम चीज़े वुजूब की बलन्दियों से उतार कर मकान की पस्तियां में आने वाले हैं चुनान्चे क़ुदरत ने तौहीद के पहलू ब पहलू अपनी तनज़ीह ओ तकदीस को जगह दी है।
1. क़़ुल होवल्लाहो अहद अल्ला हुस्समद लम यलिद वल यूलद वलम या कुल्लहू कोफ़ोवन आहद।
कह दो अल्लाह यगाना है , उसकी ज़ात बे नियाज़ है , न उसकी कोई औलाद है न वह किसी की औलाद है , और न उसका कोई हम पल्ला है।
2. उसको निगाहें देख नहीं सकती अलबत्ता वह निगाहों को देख रहा है और वह हर शै से आगाह और बा ख़बर है।
3. अल्लाह के लिये मिसाले न गढ़ो बे शक अस्ल हक़ीक़त को अल्लाह जानता है।
4. लैसा कमिस्लेही व हुआ समीउल बसीर।
कोई चीज़ उसके मानिन्द नहीं है वह सुनता भी है और देखता भी है।
वह है जिससे मारेफ़त मुकम्मिल होती है कि उसकी ज़ात में सिफ़ात को अलग से न सिमोया जाए कि ज़ाते अहदियत में दोइ की झलक पैदा हो जाए और तौहीद अपने सही मफ़हूम को खो कर एक तीन और तीन एक के चक्कर में पड़ जाए क्यों कि उसकी ज़ात जौहर ओ अर्ज़ का मजमुआ नहीं कि उसमें सनअतें इस तरह क़ायम हो जिस तरह फूल में ख़ुश्बू और सितारों में चमक बल्कि उसकी ज़ात ख़ुद तमाम सिफ़तों का सर चश्मा है और वह अपने कमालो ज़ात के इज़हार के लिये किसी तवस्सुत की मोहताज नहीं अगर उसे आलिम कहा जाता है तो इस बिना पर कि उसके इल्म के आसार नुमाया हैं और अगर उसे क़ादिर कहा जाता है तो इस लिये कि कायनात का हर ज़र्रा उसकी क़ुदरत व कारफ़रमाई का पता दे रहा है और समी व बसीर कहा जाता है तो इस वजह से कि कायनात की शिराज़ा बन्दी और मख़लूक़ात की चारासाज़ी देखे और सुने बग़ैर नहीं हो सकती मगर उन सिफ़तो की नमूद उसकी ज़ात में इस तरह नहीं ठहराई जा सकती जिस तरह मुम्किनात में है कि उसमें इल्म आए तो आलिम हो हाथ पैरों में तवानाई आए तो वह क़ादिर व तवाना हो क्यों कि सिफ़त को ज़ात से अलग मानने का लाज़मी नतीजा दुइ है और जहां दुई का तसव्वुर हुआ तो तौहीद का अक़ीदा रूख़्सत हुआ।
इस लिये अमीरूल मोमेनीन (अ.स.) ने ज़ाएद बरज़ात सिफ़ात की नफ़ी फ़रमा कर तौहीद के ख़द व खाल से आशना फ़रमाया है और दामने वहदत को कसरत के धब्बों से बदनुमा नहीं होने दिया इससे यह मुराद नहीं कि उसके लिये कोई सिफ़त तजवीज़ ही नहीं की जा सकती कि उन लोगों की मसलक की ताइद हो जो सुलबी तसवुरात तसवीरात के भयानक अंधेरो में ठोकर खा रहे हैं हालांकि कायनात का गोशा गोशा उसकी सिफ़तों के आसार से छलक रहा है और मख़्लूक़ात का ज़र्रा ज़र्रा गवाही दे रहा है कि वह जानने वाला है क़ुदरत वाला है सुनने और देखने वाला है और अपने दामने रूबूवियत में पालने वाला और साया ए रहमत में परवान चढ़ाने वाला है मक़सद यह है कि उसकी ज़ात में अलग से कोई चीज़ तजवीज़ नहीं की जा सकती कि उसे सिफ़त से ताबीर करना सही हो क्यों कि जो ज़ात है वही सिफ़ात है और जो सिफ़ात है वहीं ज़ात है इसी मतलब को इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की ज़बान फ़ैज़ तरजुमान से सुनिये और फिर मज़ाहिबे आलम के अक़ीदा ए तौहीद को इसकी रौशनी में देखिये और परखिये कि तौहीद के सही मफ़हूम से रूशिनास करने वाली शख़्सियत कौन थे ? आप फ़रमाते हैं :-
हमारा ख़ुदा ए बुज़ुर्ग हमेशा से इल्म आलिम रहा हालांकि मालूम अभी अदम के परदे में था और ऐन समी व बसीर रहा लाहांकि किसी आवाज़ की गूंज बलन्द थी न कोई दिखाई देने वाली चीज़ थी और ऐन क़ादिर रहा हालांकि क़ुदरत के असरात को क़ुबूल करने वाली कोई शै न थी फिर जब उसने उन चिज़ों को पैदा किया और मालूम का वजूद हुआ तो उसका इलम मालूमात पर पूरी तरह मुनतबिक़ हुआ और मक़दूर के ताआलुक से उसकी क़ुदरत नुमायां हुई।
यह वह अक़ीदा है जिस पर आईमा ए अहलेबैत का इजमा है मगर सवादे आज़म ने इसके खि़लाफ़ दूसरा रास्ता इख़्तेयार किया है और ज़ात व सिफ़ात में आलहेदगी का तसव्वुर पैदा कर दिया है चुनान्चे शहरिस्तानी तहरीर फ़रमाते हैं :- अबूल हसन अश्तरी कहते हैं कि अल्लाह क़ुदरत , हयात , इरादा , कलाम और समाओ बसर के ज़रिये आलिम , क़ादिर , ज़िन्दा मुरीद , मुताकल्लिम और समी व बसीर है।
अगर सिफ़तों को इस तरह ज़ाएद बरज़ात माना जाएगा तो दो उमूर से ख़ाली नहीं या तो यह सिफ़तें हमेशा से उसमें होगी या बाद में तारी हुई होगी। पहली सूरत में जितनी इसकी सिफ़तें मानी जायेंगी उतने ही क़दीम और मानना पड़ेंगें जो क़दामत में उसी के शरीक होगी और दूसरी सूरत में उसकी ज़ात को महले हवादिस क़रार देने के अलावा यह लाज़िम आएगा कि वह इन सिफ़तों के पैदा होने से पहले न आलिम हो न क़ादिर हो न समी हो और न बसीर। यह अक़ीदा बुनियादी तौर पर इस्लाम के खि़लाफ़ है।
अमीरूल मोमेनीन (अ.स.) ने एक दूसरे ख़ुत्बे में मिल्लतें मुसलेमा को नसीहत करते हुए इस्लाम और तौहीद के बारे में इरशाद फ़रमाया :-
मैं तुम्हें उस अल्लाह से डरने की नसीहत करता हूं कि जिसने तुम्हें पैदा किया और जिसकी तरफ़ तुम्हें पलटना है वही तुम्हारा कामरानियों का ज़रिया और तुम्हारी आरज़ुओं की आख़री मंज़िल है तुम्हारी राहे हक़ उसी से वाबस्ता है और वही ख़ौफ़ व हिरास के लिये तुम्हारे लिये पनाहगाह है।
दिल में अल्लाह को ख़ौफ़ रखो क्यां कि यह तुम्हारे दिलों के रोग का चारा फ़िक्र व शऊर की तारीकियों के लिये उजाला है जिसमों की बिमारी के लिये शिफ़ा सीनों की तबाहकारियों के लिये इस्लाह नफ़्स की कसाफ़तों के लिये पाकीज़गी आंखों की तीरगी के लिये नूर दहशत के लिये ढारस और जिहालत के अंधेरों के लिये रोशनी है। सिर्फ़ ज़ाहिरी तौर पर अल्लाह की इताअत का जामा न ओढ़ो बल्कि उसे अपना अन्दरूनी पहनावा बनाओ न सिर्फ़ अन्दूरूनी पहनावा बल्कि ऐसा करो कि वह तुम्हारे बातिन में उतर जाए और दिल में रच बस जाए और उसे अपने मामलात पर हुक्मरान हश्र पर वारिद होने के बाद मन्ज़िले मक़सूद तक पहुँचने का वसीला , ख़ौफ़ के दिन के लिये सिपर , क़ब्र के लिये चिराग़ , तनहाई की तवील वहशत के लिये हमनवा व दमसाज़ और मंज़िल की अन्दोहनाकियों से रिहाई का ज़रिया क़रार दो क्यों कि ख़ुदा की इताअत , मसाअबो आलाम , ख़ौफ़ो दहशत और भड़कती हुई आग के शोलों से बचाती है। जो तक़वा को मज़बूती से पकड़ लेता है तो मुसीबतें उसके क़रीब होते हुए भी दूर हो जाती हैं। तमाम उमूर तल्ख़ी व बदमज़गी के बावजूद शीरी हो जाते हैं। तबाही व हलाकत की मौजें हुजूम करने के बाद छट जाती हैं और दुश्वारियां सख़तियों में मुबतेला करने के बाद आसान हो जाती हैं। क़हत और नायाबी के बाद लुत्फ़ व करम की झड़ी लग जाती है , रहमत बरगशता होने के बाद फिर झुक पड़ती है।
‘‘ उस ख़ुदा से डरो , कि जिसने पन्दोमोआज़ेमत से तुम्हें फ़ाएदा पहुँचाया , अपने पैग़ाम के ज़रियें वाज़ो नसीहत की , अपनी नेअमतों से तुम पर लुत्फ़ व एहसान किया उसकी बन्दगी और नियाज़मन्दी के लिये अपने नफ़्सो को पाक करो , उसकी फ़रमाबरदारी का पूरा पूरा हक़ अदा करो। ’’
‘‘ इस्लाम ही वह दीन है जिसे अल्लाह ने अपने पहचनवाने के लिये पसन्द किया , अपनी नज़रों के सामने उसकी देख भाल की , उसकी तबलीग़ के वास्ते बेहतरीन ख़लाएक को अन्जाम फ़रमाया , अपनी मोहब्बत पर उसके सुतून खड़े किये , उसकी बरतरी की वजह से तमाम दीनों को सरनिगू किया और उसकी बलन्दी के सामने सब मिल्लतों को पस्त किया। उसकी इज़्ज़त , अज़मत और बुज़ुर्गी के ज़रिये दुश्मनों को ज़लील और उसकी नुसरत और ताईद से मुखालेफ़ीन को रूसवा किया , उसके सुतून से गुमराही के खम्बों के गिरा दिया। प्यासों को उसी के दरियाओं से सेराब किया और पानी उलचने वालों के ज़रिये हौज़ों को भर दिया फिर उसे इस तरह मज़बूत किया कि इसके बन्धनों से शिकस्तो रेख़्त नहीं न उसके हुक़ूक़ की कड़ियां एक दूसरे से अलग हो सकती हैं न उसके क़वानीन महो हो सकते हैं , न उसके सफ़ेद दामन पर स्याही का धब्बा उभर सकता है , न उसकी इस्तेक़ामत में पेंचोख़म पैदा हो सकते हैं न उसकी कुशादा राहों में कोई दुश्वारियां हैं , न उसके चिराग़ गुल हो सकते हैं , न उसकी ख़ुशगवारियों में तल्खि़ का गुज़र होता है इस्लाम ऐसे सुतूनों पर हावी है जिसके पाए अल्लाह ने हक़ की सरज़मीन पर क़ायम किये हैं और उनकी असासा व बुनियाद को इस्तेहक़म बख़्श है। अल्लाह ने इस्लाम में अपनी इन्तेहाइ रज़ामन्दी , बलन्दतरीन अरकान अपनी एताअत की ऊंची सतह को क़रार दिया है चुनान्चे अल्लाह के नज़दीक इसके सुतून मुस्तहकम , उसकी इमारत सरबलन्द , उसकी दलील रौशन , उसकी ज़ियाए नूरपाश और उसकी सलतनत ग़ालिब है जिसकी बीख़कनी दुश्वार है , उसकी इज़्ज़त व विक़ार को बाक़ी रखो , उसके एहकाम की पैरवी करो , उसके हुक़ूक़ अदा करो और उसके हर हुक्म को उसकी जगह पर क़ायम करो। ’’ (माख़ुज़ अज़ नहजुल बलाग़ा)
अमीरूल मोमेनीन हज़रत अली इब्ने अबी तालिब (अ.स.) के अक़वाल व नसायह की रौशनी में तौहीद का जो हक़ीक़ी तसव्वुर निगाहे इन्सानी में उभरता है वह यह कि ख़ुदा क़दीम है यानि हमेशा से है और हमेशा रहेगा। ख़ुदा क़ादिर है यानि हर चीज़ पर क़ुदरत रखता है। ख़ुदा आलिम है यानि हर चीज़ का जानने वाला है। ख़ुदा बसीर है यानि कोई ज़ाहिर व बातिन उससे मख़फ़ी नहीं है हालांकि वह आंख व कान वग़ैरा नहीं रखता , ख़ुदा मुताकल्लिम है यानि जिस चीज़ में चाहे क़ुव्वते गोयाई पैदा कर दे जैसे कि उसने दरख़्त मकें आवाज़ पैदा कर दी जो मूसा (अ.स.) से बातें करता था या पत्थर के संग रेज़ों से तकल्लुम पैदा कर दिया जो रसूल (स.अ.व.व.) की रिसालत की गवाही देने लगे। ख़ुदा सादिक़ है यानि उसका कलाम सच्चा और दुरूस्त है। ख़ुदा लाशरीक है वह अपनी ज़ात में किसी को शरीक नहीं करता। ख़ुदा मुरक्क़़ब नहीं यानि वह जिस्म व अरज़ और जौहर से नहीं बना। ख़ुदा ला मकान है यानि वह कोई मकान व मुक़ाम नहीं रखता बल्कि अपनी क़ुदरते कामिला से हर जगह और हर शै में मौजूद है ख़ुदा की ज़ात में हुलूल नहीं ख़ुदा हर ऐब से बरी और पाक व साफ़ है ख़ुदा को कोई देख नहीं सकता न दुनियां में और न उक़बा में। ख़़ुदा बड़ा आदिल और इंसाफ़ करने वाला है और वह किसी उमूर में किसी का मोहताज नहीं है। ख़ुदा ज़ालिम व जाबिर नहीं है यानि वह अपने बन्दों पर ज़ुल्म व जब्र नहीं करता और ख़ुदा जिस्मो जिस्मानियत से मुबर्रा है।
क़ुरआन भी कहता है कि ख़ुदा शक्ल व सूरत , जिन्स व जिस्म और तशबीह व हदबन्दी के तसव्वुर से पाक है आखें उसे देख नहीं सकतीं 1 चुनान्चे मूसा (अ.स.) ने जब दीदार की ख़्वाहिश ज़ाहिर की तो इरशाद हुआ कि तुम मुझे देख नहीं सकते।
अफ़सोस है कि अमवी दौर के इक़तेदार परस्त उलेमा के एक मख़सूस गिरोह ने अली (अ.स.) की दुश्मनी और अदावत में वहदानियत के इस हक़ीक़ी तसव्वुर को यह कर पामाल कर दिया कि ख़ुदावन्दे आलम अपनी मख़लूक के सामने जलवा अफ़रोज़ होगा और लोग उसे चौदहवी के चांद की तरह देखेंगे 3। ख़ुदा हर शबे जुमा आसमान से ज़मीन पर उतरता है और दुनियां की सैर करता है 4। ख़ुदा (हश्र के दिन) जहन्नुम में अपना पैर डाल देगा और वह भर जाएगा 5। वह अपनी पिन्डली खोल कर देखेगा ताकि मोमेनीन इसे पहचान लें। वह हंसता है तो ख़ुद हैरत में पड़ जाता है। ख़ुदा के दो हाथ दो पैर और पांच उंगलियां हैं पहली उंगली आसमानों पर , दूसरी ज़मीनों पर , तीसरी दरख़्तों पर चौथी पानी पर , और पांचवी तमाम मख़्लूक़ात पर रखी हुई है। ख़ुदा अर्श पर बैठा हुआ है और उसका जिस्म चार चार उंगल अर्श से बाहर निकला हुआ है और वह इस क़दर भारी व भरकम है कि उसके बोझ से अर्श चुर चुर करता है। हज़रत अबू बक्र बिन कहाफ़ा का क़ौल है कि ख़ुदा के ही हुक्म से इंसान ज़िना का मुरतकिब होता है। मौलवी शिब्ली नौमानी ने भी अपनी किताब इल्मे अहकाम में तहरीर फ़रमाया है कि इंसान को अपने अफ़आल पर क़ुदरत नहीं है ख़ुदा ही इंसान से नेकी भी कराता है और बदी की तरगीब भी देता है।
यही वह इक़वाल व हदीसें हैं जिन से बिरादराने अहले सुन्नत ख़ुदा की रोयेत पर इस्तेदलाल करते हैं और उन अक़वाल व हदीसों की हक़ीक़त यह है कि उन्हें सहाबा के दौर में गढ़ा गया है। काबुल एहबार जो यहूदी था और उमर बिने खत्ताब के अहद में मुसलमान हुआ उसने यहूदी मोतेकादात को बाज़ मफ़कूदुल अक़्ल रवायतों मसलन अबू हुरैरा और वहब बिने मबता के ज़रिये से इस्लाम में दाखि़ल कर दिया।
बुख़ारी व मुस्लिम में ज़्यादातर रवायतें अबू हुरैरा से मरवी हैं जो हदीसे नबवी और काबुल अहबार की हदीसों में तमीज़ नहीं रख पाते थे चुनान्चे उन्हें एक मरतबा उमर बिने ख़त्ताब ने महज़ इसी बात पर मारा कि वह यह हदीस बयान किया करते थे कि ज़मीन और आसमान को अल्लाह ने सात रोज़ में ख़ल्क किया है।
यक़ीनन वहदहू ला शरीक से मुताअल्लिक़ यह मज़हक़ खे़ज़ तसव्वुर ख़ुदा की वहदानियत अज़मत व जलालत का मज़ाक उड़ाने के मुत रादिफ़ है। इस ग़लत और बातिल अक़ीदे से मुसलमानों को गुरेज़ करना चाहिये ताकि आख़ेरत में शरमिन्दगी और निदामत का सामना न हो और उस ख़ुदा पर ईमान रखना चाहिये जो मख़लूक़ात की मुशाबेहत से बालातर , तौसीफ़ करने वालों के तौसीफ़ी कलेमात से बलन्दतर , अपने अजीब नजमो नस्क की बदौलत देखने वालों के लिये सामने आशकारा और अपने जलालो अज़मत की वजह से वहमो गुमान और फ़िक्रो आहाम की नज़रो से पोशीदा है। जो आलिम है बग़ैर उसके कि किसी से कुछ मालूम करे जो हर चीज़ जानने वाला है बग़ैर उसके किसी से कुछ पूछे न उसपे रात की तारीकियां मुहीत होती है और न वह दिन की रौशनी से क़स्बे ज़िया करता है।
न ज़मीन का ख़ाकी फ़र्श था न आसमान का नीलगू शामियाना न आफ़ताब की ज़िया बारियां थी न माहो अन्जुम की नूर पाशिया न फ़िज़ाओं की सर गोशियां थीं न हवाओं की सर मस्तियां न पहाड़ों की सर बलन्दियां थीं न सर सब्ज़ाओं शादाब घाटियां न ठहरे हुए समन्दर थे न बहते हुए दरिया न तायरों की ख़ुशनवाइयां थीं न दरिन्दों की बज़्म आराइयां , न दिन का उजाला था न रात का अन्धेरा गर्ज़ के कुछ न था फ़क़त एक ख़ुदा की ज़ात थी जो बेनियाज़ी के आलम में अपने अनवारे समदिया से अपने कमाल और जमाल का मुशाहेदा कर रही थी।
फिरएएरादए क़ुदरत से एक जौहरे नूर पैदा हुआ जिसके हिसार मे अनवार के तेरह मुरक्क़े और चमक रहे थे। इन्हीं अनवारे ताहिरा की बदौलत आदम की हमागीर ज़ुलमते वुजूद की सलाहियतो से जगमगा उठी।
अल्लमाए कुस्तेलानी का कहना है कि जब परवरदिगारे मखलूक़ात की ईजाद का इरादा किया तो नूरे मौहोम्मदी को अपने अनवारे समदियां से खल्क़ फरमाया ऐ जाबिर इब्ने अन्सारी से रिवायत है कि मैने हज़रत रसुलल्लाह से पूछा कि या रसुल्लाह सबसे पहले खुदा ने किस चीज़ को ख़ल्क़ फरमाया। हज़रत ने जवाब दिया कि सबसे पहले ख़ुदा ने तेरे नबी के नूर को अपने नूर से ख़ल्क़ फ़रमाया। अल्लामा मसूदी ने मुरव्वजुज़ जंहब मे हज़रत अली ;अण्सद्ध से रिवायत की हैं कि जब अल्लाह ने तक़दीरे मख़्लूक़ात और आफ़रीनश की खि़लक़त का इरादा किया तो आसमान और ज़मीन की पैदाइश से क़ब्ल अपने नूर से एक शोलाए नूर को पैदा किया जो हमारे रसूल हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.व.व.) की शक्ल में पैदा हुआ।
यनाबेउल मोअद्दत और कोकबदुर्री वग़ैरा में हज़रत रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व.) से मरवी है कि मेरा और अली का नूर एक था जो खिलक़ते आदम (अ.स.) से चौदह हज़ार साल क़ब्ल ख़ुदा की बारगाह में ताअत व तक़दीस करता था यहां तक कि आदम की खि़लक़त हुई और ख़ल्लाके कायनात ने इस नूर को उनके सुल्ब में रखा फिर वही नूर एक नबी के सुल्ब से दूसरे नबी के सुल्ब में मुन्तक़िल होता हुआ अब्दुल मुत्तलिब के सुल्ब में आया उसके बाद ख़ुदा ने इस नूर को दो हिस्सों में तक़सीम कर दिया , इस तरह कि मेरा हिस्सा अब्दुल्लाह के सुल्ब में और अली का हिस्सा अबू तालिब के सुल्ब में ठहरा पस अली मुझसे और मैं अली से हूँ। हज़रत अली (अ.स.) से भी यही रिवायत है कि ख़ुदा ने हम अहलेबैत के नूर को हज़रत आदम से चौदह हज़ार साल क़ब्ल ख़ल्क़ फ़रमाया।
बहरहाल यह ख़ल्लाक़े कायनात की पहली तखलीक़ थी कि उसने अपने नूर से अपने हबीब (स.अ.) और उसके वसी के नूर को ख़ल्क़ फ़रमाया। उसूले काफ़ी में है कि ख़ुदा ने अपने नूर से मोहम्मद (स.अ.व.व.) अली (अ.स.) और फ़ातिमा (स.अ.) के नूर को पैदा किया फिर यह लोग हज़ारों किरन ठहरे रहे , उसके बाद अल्लाह ने दुनियां की तमाम चीज़ों को ख़ल्क किया , फिर इन मख़्लूक़ात की तखलीक पर अम्बिया को शाहिद बनाया और एताअत और फ़रमाबरदारी इन (अम्बिया) पर फ़र्ज़ की।
हज़रत उस्मान बिने अफ़ान ने हज़रत उमर बिने ख़त्ताब से रिवायत की है कि अल्लाह तआला ने अपने फ़रिश्तो को हज़रत अली इब्ने अबि तालिब (अ.स.) के नूरे दहन से पैदा किया है। क़ुरआन मजीद का इरशाद है कि यह मशियते खुदा है इनका कोई क़ौल या अमल ख़ुदा के हुक्म के बग़ैर नहीं होता यह वही करते हैं जो खु़दा चाहता है।
इसके बाद मशियते परवरदिगार ने क़यामत तक पैदा होने वाली मख़लूक़ की रूहों को ख़ल्क फ़रमाया और इन रूहों में से जुमला अम्बिया व मुरसलीन की अरवाहे मुक़द्देसा को एक मरकज़ पर जमा कर के उनसे अपनी रूबूबियत और पैग़म्बरे आख़ेरूज़्ज़मा की नबूवत पर इमान का अहद लिया। क़ुरआन में यह वाक़िया यूं मज़कूर है :-
तरजुमा :- ख़ुदा ने पैग़म्बरों से इक़रार लिया कि मैं तुम्हें जो किताब और हिक्मत दूं उस पर अमल करना और अगर (तुम्हारी ज़िन्दगी में) तुम्हारे पास हमारा रसूल (मोहम्मद (स.अ.व.व.)) आए और वह तुम्हारी किताबों (और नबूवत) की तसदीक़ करे तो तुम उस पर ईमान ले आना और उसकी मदद करना। फिर दरयाफ़्त किया कि क्या तुम ने इक़रार कर लिया और मेरे अहद का बोझ उठा लिया ? सब ने कहा हां ! हमने इक़रार कर लिया , तो इरशाद हुआ कि अब तुम इस क़ौलो क़रार पर एक दूसरे के गवाह हो जाओ और देखो मैं भी तुम्हारे साथ गवाह हुआ जाता हूँ।
मुफ़स्सेरीन ने क़ुरआन की आयत के बारे में अलग अलग तफ़्सीरें की हैं जिनका खुलासा यह है कि जन्नत से निकलने के 300 बरस बाद जब हज़रत आदम की तौबा क़ुबूल हुई तो उनकी पुश्त से तमाम रूहें निकाली गईं और उन से तीन तरह का वादा लिया गया। पहला यह कि तमाम इंसानों से कहा गया कि क्या मैं तुम्हारा रब नहीं हूँ ? सब ने जवाब दिया , बेशक तू हमारा रब है। दूसरा वादा आलिमों से लिया गया कि तुम अल्लाह के हुक्म की तबलीग़ करना और तीसरा वादा नबियों से लिया गया जिसका बयान ऊपर लिखी क़ुरआन की आयत में है। इस वादे और इक़रार की तफ़्सीर में ंहैं कि ख़ुदा ने अम्बिया से फ़रमाया कि अगर मैं तुम्हें किताब दे कर नबूवत का ताज तुम्हारे सर पर रख दूं और मेरे बन्दे तुम्हारे उम्मती बन जायें और तुम्हारी नबूवत का आफ़ताब पूरी तरह चमक रहा हो और उस वक़्त मेरा हबीब तुम्हारे बीच में जलवा अफ़रोज़ हो तो तुम्हारा फ़र्ज़ होगा कि तुम उस पर इमान ले जाओ क्यों कि उसके आते ही तुम्हारे दीन और किताबें मन्सूख़ हो जायेंगी। बोलो क्या तुम्हें मन्ज़ूर है ? जब तमाम नबियों ने इक़रार कर लिया तो हुक्म हुआ कि अब तुम इस पर एक दूसरे के गवाह बन जाओ और देखो मैं भी तुम्हारे साथ गवाह बन जाता हूँ।
यह बात ग़ौर करने की है कि ख़ुदा ने अपनी रूबूबियत और नबी की नुबूवत पर इमान का वादा लेते वक़्त , पैग़म्बरों के अलावा किसी को एक दूसरे का गवाह नहीं बनाया और न वह ख़ुद किसी की गवाही में शामिल हुआ , आखि़र इसकी वजह क्या थी ? इसे बस खुदा ही जाने , लेकिन यह कहना ग़लत न होगा कि परवरदिगारे आलम मुतलक़ है और उसके इल्म में यह बात थी कि आं हज़रत का ज़माना कोई नबी न पाऐगा उसके बावजूद इक़रार लिया जाना इस बात की दलील है कि यह वादा अम्बिया के गिरोह के लिये नबियों के गिरोह के लिये आखि़री पैग़म्बर पर इमान की अलामत बन जाए। चुनान्चे हर नबी अपने इस अहद पर क़ायम रहा और शबे मेराज बैतुल मुक़द्दस में रसूल अल्लाह के पीछे नमाज़ पढ़ कर इस वायदे को पूरा और सच कर दिखाया। जैसा कि अबू हुरैरा से रिवायत है कि रसूलल्लाह ने फ़रमाया कि मेराज की शब हज़रत मूसा (अ.स.) , इब्राहीम (अ.स.) , ईसा (अ.स.) के साथ तमाम अम्बिया बैतुल मुक़द्दस में जमा हो गए यहां तक कि नमाज़ का वक़्त आया और मैं उनका इमाम हुआ।
पैग़म्बर ने फ़रमाया कि अल्लाह ने मुझसे कहा कि एै मोहम्मद मैनें तमाम नबियों से अपनी रुबूबियत तेरी नबूवत और अली कि विलायत का इक़रार लिया है। इमाम बाकिर (अ.स) ने फरमाया कि परवरदीगार ने हमारे शियों से अपनी रुबूबियत , रसूले खुदा की रिसालत और हमारी विलायत का इकरार लिया है। हज़रत अली का इरशाद कि खुदा ने कलमए कुन से एक नूर पैदा किया और उस नूर से मेरे भाई मोहम्मद को और मुझे , और मेरी जुर्रियत को खल्क़ फरमाया बस हमी नुरुल्लाह है. हमी रुहुल्लाह हैं और हम ही कलमतुल्लाह है। खुदा को मखलूक़ देख नही सकती मगर हमारी वजह से उसकी ज़ात व सिफात को समझ सकती है. फिर खुदा ने सारी अहद मेरे अहद मेरे भाई रसूले खुदा के साथ इस तरह लिया है कि हम एक दुसरे की मदद और नुसरत करते रहें , इसलिए मेनें आपकी मदद और नुसरत मे कोताही नही की , कदम कदम पर आप के साथ रहा आप के दुश्मनों से जिहाद किया और उन्को क़त्ल किया। उस्मान बिन अफ़ान हज़रत उमर इब्नें ख़त्ताब से रवायत करते है कि अल्लाह ने अपने मलाएका और फरिशतों को अली इब्ने अबितालिब के नूर से ख़ल्क़ फरमाया है।
ऐसी सूरत में यह कहना ग़लत नही होगा की जिस वक्त अम्बिया और मूरसलीन से अहद लिया जा रहा था उस वक्त उन के साथ उन के अहलेबैत भी हिजाब व अनवार के परदों मे थें। और जिस वक्त आदम आबों-गिल के दरमियांन थें उस वक्त भी ये पाक हस्तियाँ इल्में लदुन्नी की मालिक थी और शायद यही वजह थी कि हज़रत अली ने दावा किया कि अगर मेरे लिए मसनदें कज़ा बिछ़ा दी जाये और मैं उस पर बैठ जाऊँ तो तौरेत वालों के लिए तौरेत से , इन्जील वालो के लिए इन्जील से , ज़बूर वालो के लिए ज़बूर से और कुरान वालो के लिए कुरान से फैसला करुगा-। और शायद इसीलिए आप ने मिम्बर से एलान किया ऐ लोगों , जो पुंछना चाहो पुछ़ लो इससे पहले कि मै तुम्हारे बीच से उठ जाऊँ , खुदा की कसम मै जमीन के रास्तों से ज्यादा आसमान के रास्तों को जानता हूँ , मेरे अन्दर तमाम इल्म बहरे ज़ख्खार की तरह मौज़े मार रहें है मैं इस्रारे नबूवत का खजाना हूँ मै ग़ूज़रे हुए लोगों के हालात जानता हूँ , और उन बातों को भी जानता हुँ , जो आइन्दा पेश आने वाली हैं , मुझसे किलाबे खुदा के बारे में सवाल करो खुदा की कसम कोई आयत ऐसी नही जिसके बारे मे मुझे इल्म न हो कि दिन के उजाले मे नाज़िल हुई या राल के अन्धेरे में पहाड़ पर नाज़िल हुई या मैदान मैं।
इन अक़वाल रवायात और आयात से ज़ाहिर होता है कि रोज़े अजल परवरदिगार ने अम्बिया से अपनी वहदानियत , ऩबी-ए-मुरसल की नबूवत और अली कि विलायत का इक़रार लिया और जब वह इस इक़रार की मन्ज़िल से ग़ुज़र चुके तो उनके लिए मन्सबे नबूवत का इन्तेखाब हूआ , इस से ज़ाहिर है कि अम्बिया के ईमान की अलामत की बूनियाद , अल्लाह की रुबूबियत , नबी की नबूवत , और अली की वलायत का इक़रार है , इसमें कमी की कोई गुंजाईश नही है। अब मुस्लमानो को ये समझ लेना चाहिए कि इन तीनों चीज़ो मे से किसी एक में भी कमी आ गयी तो ईमान नही रह सकता , और मुसलमान , मुसलमान नही रह सकता।
रुहों की ख़िलकत और अहद व पैमान के बाद माअद्दों की सूरतगरी हुई और इसके साथ ही खुदा वनदेआलम ने अपने इरादा-ए-क़ुदरत से कुशादा फैजाओं ख़लाई वसअतों की ख़ल्क़ फरमाया और उन्हे हवा और पानी से भर दिया नीचें पानी की तुफानी लहरें थी और ऊपर हवा के तेज़ व तुन्द झोकें , फिर यही हवा पानी के अन्दर चली और उसके सख्त थपेड़ो ने पानी को इल तरह मंथ दिया कि जौसे दही मथा जाता है इससे झाग और बुखारात पैदा हुए फिर यही झाग और बुखारात हवा के दोश पर वलन्द होकर फज़ाओं में मुहीत व मुन्जमिद हो गये जिन से सात आसमानों की तख़लीक हुई। परवरदिगार ने आसमान के नीचले तबक़े को इस अन्दाज़ से ठहराया कि न सुतूनों की ज़रुरत पड़ी और न बन्धों की। फिर चाँद ,सूरज , और सितारो की चमक दमक से उसे अरासता किया और सातों आसमानो के दरमियांन ख़ला पैदा करके उन्हे मलायक के वजूद से भर दिया।
यह मलायक तमाम माद्दी कसाफतो से पाक और आलाइशों से बरी है। उन का काम सिर्फ अल्लाह की इबादत व इताअत हैं चुनानचें उनमें जो मलाएक सर ब सजूद वह सजदे से सर नही उठाते , जो रुकू में है वह सीधे खड़े नही होते और जो क़याम में है वह अपनी जगह नही छ़ोड़ते। न उन पर नींद तारी होती है न सुस्ती व काहिली का ग़लबा होता है. न उनमें भूल- चूक पैदा होती है और न यह सहो व निसयात का शिकार होते हैं उनमें कुछ वही-ए-इलाही के अमीन है जो अल्लाह का पैग़ाम ले कर रसूल की तरफ आते जाते है कुछ़ बन्देगाने खूदा के निगेहबान और जन्नत के पासबान हैं और कुछ वह हैं जिनके क़दम मज़बूती से ज़मीन की तहों में जमें हुए हैं और उनकी निगाहें जलाले किबरियाई के सामने झुकी हुई है।
इन उमूर से फ़राग़त के बाद , इरादाए क़ुदरत से मौजें मारते हुए पानी की सतह पर उसी के झाग से बालाई की तरह एक मोटी सी तह जमना शुरु हुई जिसने ज़मीन की शक्ल इख्तेयार की और जहां से यह तह जमना शुरु हुई उसका नाम मक्का है मगर चुँकि ज़मीन के नीचे पानी ही पानी था जो थपेड़ो पर थपेड़े मार रहा था इसी लिए वह मताहरिंक थी उसे रोकने और मुनजमिद करने के लिए ख़ुदा ने पहाड़ो को पैदा किया जिन की मेख़े ज़मीन के सीनों में पैवस्त हो गयीं ताकि वह अपनी जगह से वह जुम्बिश न कर सकें। इन पहाड़ो से फिर पानी के चश्में फूटें जिन्हो ने आईन्दा खूश्क ज़मीनों की सेराबी का इन्तेज़ाम किया और जहां चश्मों का पानी नही पहुँच सकता था वहा के लिए बादल पैदा हुए जो पानी के ज़खीरे अपने साथ लेकर सफर करते हैं और ख़ुश्क मक़ामात को सेराब करते है।
चश्मो की आबयारी और बादलों की आबबारी से ज़मीन में नमूं की कूव्वत पैदा हूई और फर्शे गेती पर सब्ज़ा लहलहाने लगा , सरसब्ज़ व शादाब दरख्त झुमने लगें अब आलम में रंग बू की कमी न थी मगर दरियाओं की रवानी , समन्दरों का शोर और बादलों की गरज के अलावा इस दुनिया में कोई आवाज़ न थी। इस भयानक सन्नाटे को चहल पहल में बदलनें के लिए कुदरत ने हैवानात को ख़ल्क़ किया , यहां तक की चरीन्दों ,परिन्दो ,और दरिन्दों का जमघटा लग गया , लेकिन इस मख़लूक में नज्म व ज़ब्त का कोई शऊर न था और पुरी कारगाह डहकते शोलों और गरजते हुए दरिन्दो ,और ख़ौफ नाक भेड़ियों व अजदहों से महशरिस्तान बनी हुई थी। ख़ुदा वन्दे आलम ने इसकी तन्जीमकारी के लिए आग से बनी हुई मखलूक़ जिनों को खल्क़ फरमाया लेकिन इस मख़लूक ने नज़्मों ज़ब्त क़ायम करने के बजाए अपनी शोला मिजाज़ी की बदौलत रुए ज़मीन पर ग़ैज़ो ग़ज़ब की आग भड़का दी और ख़ुद ही बाहेमी ख़ूरेंज़ी और जंग और जिदल में मस्रुफ़ हो गये और परवरदिगार की इताअत से मुहँ मोड़ कर उसके एहकामात की खिलाफ़वर्जी पर उतर आए। आखिर कार यह पूरी कौम क़हरे इलाही का शिकार होकर फेना के घाट उतर गयी , बस वही रह गये जो अल्लाह की नज़र में रहमो करम के मुस्तहक़ थे , उनमें से एक जो इन्तेहाई इबादत ग़ूज़ार था अपनी इबादत और रियाज़त के नतीजे में इस तरह बचा कि उसे मलाएका की सफ़ों में जगह दे दी गयी उसका नाम इज़राइल था। जो बाद मे इबलीस और शैतान के नाम से मशहूर हुआ।
बनी जान (कौमें जिन) की तबाही और बरबादी के बाद , एक रवायत और कौलें मुरसल के मुताबिक़ इस दुनिया की सरज़मीन 4000 साल तक सुन्सान , वीरान और गैर आबाद पड़ी रही। फिर मशियत की तरफ से मलाएका की सफों मे यह एलान हुआ कि मैं ज़मीन पर अपना एक खलिफ़ा (नायब) मुक़र्रर करने वाला हूँ। फरिशतें , जो जिन्नात का बाहमी कुशतों ख़ुन व इवरतनाक अन्जाम देख चुके थे , कहने लगे , माबूद क्या तू ऐसे को अपना खलीफा मुकर्रर करेगा जो ज़मान पर ख़ुरेंज़ी और फसाद बरपा करें हांलाकि हम तेरी तसबीह और तक़दीस करते हैं। जवाब मिला कि मेरी सारी हिक्कमते राज़ में है और जो कुछ़ मैं जानता हुँ वह तुम नही जानते। फ़रिश्ते ख़ामोश हो गये।
दुबारा फिर एलान हुआ कि मैं मिट्टी से एक मक़सुस मख़लूक़ (इन्सान) को पैदा करने वाला हूँ ,और देखों जब में इसका पुतला तैयार कर के इसमें रुह दाखिल करु तो तुम उसके सामने अपनी अपनी पेशानियां सजदें में रख देना। इस ऐलान को भी तमाम मलाएका ने सुना और किसी ने इन्कार नहीं किया।
अब ख़ालिक़ ने अपनी क़ुदरते खास के इन्तेज़ाम से नरम और सख्त शिरीं और शोराज़ार , हमवार व नाहमवार ज़मीन से मिट्टी जमा की और उसे पानी में इतना भिगोया कि वह साफ हो कर ऩिथर गयी , और तरी से इतना गूँधा की उसमें लस पैदा हो गया , और उससे एक ऐसा पैकर बनाया जिसमें जोड़ है , मोड़ है , आज़ा है , और मुख्तलिफ हिस्से हैं , फिर उसे यहां तक सुखाया कि थम सकें और उसे यहा तक सुखाया कि वह ख़न्ख़नाने लगें। फिर एक वक्तें मुअय्यन और मुददतें मुकर्ररा तक उसे युहीं रहनें दिया , फिर उसमे रुह फूंकी तो वह ऐसे इन्सान की सूरत में उठ खड़ा हो गया जो कवाए ज़ेहनी तो हरकत देने वाला , फिकरी जौलानियों को बरुए कार लानें वाला , आज़ा व जवारे से खिदमत लेने वाला , हाथो और पैरों को चलाने वाला , और एसी शिलाख्त का मालिक है जिसके ज़रियें वह हक़ व बातिल में तमीज़ कर सकें.।
मुल्ला बाकिर मजलिसी अलैहिर्रहमा ने सै 0 इब्ने ताऊस और उन्होने मुसफे इदरीस के हवाले से तहरीर फरमाया है कि यक शम्बें की सुबह को अल्लाह ताआला कि वह तीनतें आदम के अजज़ा को बाहम मख़लूत करके ख़मीर करे , चुनांचें इस फरिश्ते नें 40 साल तक उस मिट्टी को गुँधा , फिर 40 साल में वह लसदार हुई , उसके बाद 40 साल ही हज़रत आदम का पुतला तैयार हुआ।
मज़कूरा रवायत से पता चलता है कि इन्सान के पैकरे ख़ाक़ी मुद्दते तख़लीक़ 120 बरस है। अब इस सजदे की मन्ज़िल मलाएका के सामने थी। जिसके लिए हज़रत आदम की खिलकत से कल्ब परवरदिगारे आलम की तरफ से ऐलान हो चुका था। चुनांचे बरोज़े जुमा ख़ल्लाके आलम ने हज़रत आदम के पैकरे ख़ाकी में अपनी पसन्दीदा रुह उन्हें एक जीते जागते और ब शऊर इन्सान की शक्ल में फरिश्तों के सामने पैश कर दिया। हुक्में खालिक़ के मुताबिक़ मलायका ने अपनी पेशानियाँ सजदें में रख दी लेकिन इबलिस नें यह कह कर इन्कार कर दिया कि मैं इस मख़लूक़ को सजदा नहीं करुंगा , इस लिए की इसकी ख़िलक़त मिट्टी से हुई है और मेरी ख़िलक़त आग से , जो मिट्टी से बहरहाल अफ़ज़ल है , इबलिस का यह इस्तेकबार ,यह ग़ुरूर और यह इन्कार ग़ज़बे इलाही का सबब बना और परवरदिगार ने उसे अपनी जवारे रहमत से और मलाएका की सफों से निकाल कर मरदूदें बारगाह करार दे दिया , जिसका नतीजा यह हुआ कि उसकी 4000 साल की इबादत व रियाज़त खाक़ में मिल गयी। इब्लिस मलाएका की सफ़ो से बाहर तो हो गया लेकिन उसने हिम्मत नही हारी , बल्कि परवरदिगार से उसने इन्सान की अज़मत और बरतरी को शिकस्त देने के लिए कयामत तक की ज़िन्दगी और मोहलत लेली और कहा कि मैं तेरी इस मखलूक़ और उसकी नसलों को गूमराह करके यह साबित कर दूगा कि यह अज़मत और बलन्दी का मुस्तहक नही है जो तेरी तरफ़ से उसे अता की गयी है। परवरदिगार ने भी उसे यह कह कर उसे ज़िन्दगी और मोहलत दे दी कि उस मख़लूक़ की नस्ल में मेरे कुछ़ ऐसे भी होंगे जो नेकी और बशरीयत की उस मन्ज़िले कमाल पर फ़ायज़ होंगे जहाँ तक तेरी रसाई ग़ैर मुम्किन है।
हज़रत आदम को आदम इसलिए कहा जाता हैं कि वह अदीमुल अर्ज़ यानी ज़मीन की मिटटी से ख़ल्क़ हुए चुँकि उनकी खिलक़त में नर्म और सख्त , शीरी व शोर , हमवार व नाहमवार ज़मीन की मिटटी इस्तेमाल हुई है इसलिए इन्सानों मे मुखतलिफ़ रंग और मुख़तलिफ मिजाज़ के इन्सान पाए जाते है। सिनफे निसवां की पहली फर्द , हवा की खिलकत उस मिटटी से हुई जो हज़रत के पहलू और पसलियां बनाने से बच गयी थी। हज़रत हव्वा को हज़रत आदम अ 0 का शरीके जिन्दगी क़रार दिया और अर्श पर दोनो का निकाह हुआ।
परवरदिगार ने इन दोनों को सुकूनत का हक़ दिया और तमाम अनवाओ अक़साम के फल और मेवे जात खाने की इजाज़त दी , लेकिन एक मखसूस दरख्त के बारे में मना कर दिया कि इस के नज़दीक न जाना।
इबलीस चूँकी हज़रत आदम अ 0 ही की बदौलत मरदूदे बारगाहे इलाही क़रार पाया था इसलिए वह इनका दुश्मन था और उससे हर वक्त यह फिक्र दामनगीर रहती थी कि उन्हे किस तरह जन्नत से निकलवाया जाए। आख़िर कार हव्वा के ज़रिये वह हज़रत आदम को समझाने में कामयाब हो गया कि ममनुआ दरख्त के नज़दीक गये बग़ैर वह अगर उसका फल खाए तो कोई मुज़ाएका नही है , चुनांचें आदम बीवी के कहने पर अमल कर बैठें और इबलिस अपने मक़सद में कामयाब हो गया।
इस ममनुआ दरख्त का चखना था कि जन्नत के लिबास आदम व हव्वा के जिस्मों से उतर गये और वह आसमान की बलन्दी से बेदख़ली के बाद ज़मीन की पसती में फेक दिये गये।
आदम व हव्वा ने जन्नत से निकल कर दुनिया के जिस मुकाम पर पहले पहल अपने कदमों को रखा वह सरज़मीनें हिन्द की वादी सरानदीप है , यहां से दोनों ने मक्के की तरफ हिजरत की। आदम कोहे सफा पर पहुँचे और हव्वा कोहे मरवा पर पहुँची। यहाँ पहुच कर आदम और हव्वा ने अपने उस फेल पर जो शैतान के कहने से जन्नत में सरज़द हुआ था , तौबा व अस्तग़फार और गिरीयाज़ारी शुरु की , जिसे ख़ुदा ने 300 बरस के बाद पंजतन अ 0 के नामों की बरकत से कुबूल फरमाया और जिबराईल को हुक्म दिया की वह एक ख़ैमा जन्नत से ले जाएं और उसे ज़मीन पर नसब कर दें जो खानाए काबा के लिए मखसुस की गयी है। जिबराईल आये उन्होने ख़ैमा नसब किया और उसके हाथ ही उन्होने हुदुदे काबा के चारों कोनों पर पत्थर नसब कर के हद बन्दी कर दी। हुक्में इलाही के मुताबिक़ जिबराईल ने उन पत्थरों में से एक कोहे मरवा , एक कोहे सफा एक कोहे तूर और एक को , जबलूस सलाम (नजफ़े अशरफ़) से लिया। फिर उन्होने हजरे असवद को नसब किया जो जन्नत से आया था और कोहअहुक़बीस पर बतौरे अमानत रखा हुआ था। इस पत्थर के बारे में बाज़ मोअर्रेखीन का बयान है कि यह एक फ़रिश्ता था जो अहदे मीसाक़ का अमीन था , चुनाँचें ख़ुदा ने चाहा की यह अहद ज़मीन पर जारी हो लिहीज़ा उसने फरिश्ते को हजरे असवद की शक्ल में तबदील कर दिया और खाना-ए-काबा के लिए मख़सूस कर दिया कि लोग अपनें अहद व पैमान को इसके ज़रिये याद करते रहें।
हज़रत आदम ने जिबराईल के साथ हुदूदें हरम का तवाफ़ किया और बाद में चारों कोनों पर नस्ब करदीं। पत्थरों की बुनियाद पर काबा की दीवारों को बलन्द किया। अल्लाह ने अपने इस पहले नब को जरुरियाते ज़िन्दगी की हर शै के इल्म से आरासता करके दुनिया में भाजा था लिहाज़ा वह मुतमईन थे। लेकिन सबसे बड़ा मसला उनके सामने अफ़जा़इशे नस्ल का था। क्योकिं नवये बशर में सगे बहन और भाई के दरमियान सुन्नते तजवीज़ का जारी होना दुरूस्त न था , इस मुशकिल को खुदा ने हुरों के ज़रिये आसान कर दिया जैसा कि तारीख़ बताती है कि हज़रत आदम के फ़रज़न्द हज़रत शीस का नीकाह नज़ला नामी एक हूर से हूआ था और दुसरे बेटें आसिफ़ का निकाह मन्ज़ला से हूआ था और वह भी हूर थी। इस तरह हज़रत आदम की नस्ल आगें बढ़ी और फली फूली।
हज़रत आदम अ 0 के यूं तो बहुत से बेटे थे मगर हज़रत शीस अपने बाप के कमालात के हामिल थे लिहाज़ा वही उनके वसी और जानशीन क़रार पाए. उनके अलावा दुसरे बेटों में दो भाई हाबील व क़ाबील थे जो सिफ़ात और किरदार में एक दुसरे के मुखालिफ थे यानि हाबील इन्तेहाई नेक ख़सलत थे और क़ाबील इन्तेहाई बद तीनत। नेकियों की बिना पर बाप की चश्मे इल्तेफ़ात हाबील पर ज़्यादा रहती थी इस लिए क़ाबील उनके लिए अपने दिल में बुग़ज़ो हसद रखता था।
एक रवायत में यह है कि हज़रत आदम ने हाबील को अपना वसी बनाने का इरादा ज़ाहिर किया था , इस पर क़ाबील बेहद नाराज़ हुआ और उसने ये ख्वाहीश ज़ाहिर की कि मुझे वसी बनाया जाए। इस पर हज़रत आदम ने फैसला किया कि तुम दोनों भाई ख़ुदा की राह में अपनी अपनी क़ुबानियां पेश करो , जिस की क़ुरबानी क़ुबूल हो जाएगी वही मेरा वसी होगा।
इस वक्त शरफे क़ुबूलियत का मेयार यह था कि आसमान से एक आग का शोला उतरा था और वह क़ुरबानी को जलाकर खाक़ कर देता था। चुनांचे दोनो भाईयों ने अपनी अपनी क़ुरबानियों को बारगाहे इलाही में पेश की। ख़ुदा ने हाबील की क़ुरबानी क़ुबूल कर ली और क़ाबील की कफे अफसोस मल कर रह गया। उसी वक्त से क़ाबील हाबील का जानी दुश्मन बन गया। एक दिन जब हाबील जंगल में अपनी बकरीयां चरा रहे था तो क़ाबील ने मौक़ा पाकर क़तल कर दिया। यह पहला इन्सानी ख़ुन था जो ज़मीन पर बहाया गया।
इस इरतेकाबे क़त्ल के बाद क़ाबील को यह फिक्र दामनगीर हो गयी की अब लाश को क्या किया जाए। इतने में दो कव्वे लड़ते हुए ज़मीन पर गिरे और उनमें एक ने दुसरे को हलाक़ कर दिया। फिर उसने अपनी चोँच और पंजों से ज़मीन में एक गडठा खोदा और मरे हुए कव्वे को उसी में रख कर दफ़न कर दिया। क़ाबील यह माजरा देख रहा था चुनांचे उसने भी यही तरीक़ा अपनाया और एक गडठा खोद कर हाबील की मय्यत को उसमें दफ़न कर दिया।
जब हज़रत आदम को यह पता चला कि क़ाबील ने हाबील को क़त्ल कर दिया तो वह इस क़दर रोए कि ज़मीन आसुओं से तर हो गयी। तबरी व क़ामिल वग़ैरह में है कि इस सानिहे ग़म पर आदम ने गिरया भी किया और चन्द अशआर नज़म करके नौहा भी पढ़ा।
तारीख़ की किताबों मे ये भी मिलता है कि आग ने जब क़ाबील की क़ुरबानी को ठुकरा दिया और हाबील क़त्ल हो गये तो क़ाबील ने एक आतिश कदे की दाग़ बेल रखी और वहीं से आतिश परसती का आग़ाज़ हूआ जो आज भी जारी है।
हज़रत आदम की उम्र जब 230 बरस की हुई तो हज़रत शीस पैदा हुए और जब 636 बरस की उम्र मे दुनिया से रेहलत हुई तो उस वक़्त आप की ओंलादों में(पोते , परपोते) की तादाद 40000 तक पहुँच गई थी मगर आप ने उन लोंगो को बग़ैर अपने ख़लीफा के नही छ़ोड़ा और न उनको मौक़ा दिया कि वह अपना सरदार ख़ुद मुक़र्रर करें चुनांचे अपनी वफात से क़ब्ल उन्होने अपने फरज़्नद शीस को बूला कर तहरीरी तौर पर अपना वली-ए-अहद मुकर्रर कर दिया। और उन्होने यह वसीयत कर दी कि क़ाबील और उनकी अवलादों से पोशीदा रखें।
जिस तरह खुदा ने आदम की ख़िलकत के मामले में खलीफ़ा मुनतखब करने का एख़तेयार फरिश्तों को नही दिया उसी तरह खिलाफ़त के बारे में हज़रत आदम ने किसी इन्तेखाब का इख्तेयार अपनी अवलादों को नही दिया और तहरीर लिख कर यह सराहत फ़रमादी कि हर नबी ज़बानी या तहरीरी तौर पर अपना ख़लीफा व जानाशीन मुक़र्रर कर सकता है। अब इसके बाद कोई जमाअत अपने इन्तेखाब , शुरा या इस्तेख़लाफ़ की बुनयाद पर किसी को ख़लीफ़ा बनाती है या किसी नबी को तहरीरी वसीअत में माआने होती है तो उसका यह फेल क़तई तौर पर सीरते आदम के ख़िलाफ़ है।
मोअर्रिख अबुलफ़ेदा का कहना है कि हज़रत आदम 6216 बरस क़बल हिजरत नबवी दुनिया में वारिद हुए थे और 636 बरस की उम्र में आप का इन्तेक़ाल हुआ। दीगर किताबों में है कि हज़रत ने 630 बरस की उम्र में जुमें के दिन इस दुनिया से रेहलत की। जिबराईल और उनके साथ कुछ़ मलाएका ने उन्हें ग़ुस्ल व कफ़न दिया , हज़रत शीस ने नमाज़े जनाज़ा पढ़ाई और उनके जसदे ख़ाकी को एक ताबुत में रखकर मक्का की सरज़मीन पर दफन कर दिया। हज़रत आदम के एक बरस के बाद हज़रत हव्वा का इन्तेका़ल हुआ। और वह भी अपने शौहर के पहलू में दफन हुई। जब तुफाने नुह आया तो हज़रत आदम के ताबूत को निकाल कर नूह अ 0 ने अपनी कश्ती मे रख लिया था। तुफान ख़त्म हुआ तो वह ताबूत नजफ में अमीरुल मोमनीन हज़रत अली अ 0 के मजारे मोक़ददस के क़रीब दफ़न किया गया। कहा जाता है कि हज़रत आदम का क़द पैंतीस 35 गज सत्तर हाथ था। नव्यैते सजदा।
मलायका ने हज़रत आदम अ 0 को जो सजदा किया उसके बारे में उल्माए फ़रीक़ैन का इत्तेफाक़ है कि वह सजदा ताज़ीमी था। बैज़ावी रक़म तराज़ है कि परवरदिगार ने इसलिए फरिश्तो को आदम के सजदे का हुक्म दिया कि वह फज़िलते आदम के अमलन मुतारिफ हो जाए और उन्हें इस बात का यक़ीन हो जाए कि हम ने आदम के बारे मे जो कहा था वह दुरुस्त न था। शरई नुक्ते नज़र से सजदा दर अस्ल ख़ुदा के लिए था और आदम की हैसियत उस वक्त क़िबले जैसी थी , यानि आदम को सजदा ताज़ीमी था कि यूसुफ़ के भाईयो ने यूसुफ़ को सजदा मिस्र में किया।
तफ़सीरे साफ़ी मे है कि चूंकि हज़रत आदम अ 0 के सुल्ब मे मोहम्मद व आले मोहम्मद का नूर था जो तमाम मखलूक़ात से यक़ीनन अफज़ल है लिहाज़ा खुदा ने मलायका को सजदे का हुक्म दे कर उनकी अज़मत को ज़ाहिर किया , यानि जो सजदा किया गया वह इस नूर के लिए ताज़ीमन इकरामन ख़ुदा के लिए अबुदियतत और आदम के लिए एताअतन था। तबरी में है कि आदम के लिए फरिश्तों का सजदा ताज़ीमी था क्योकि सजदा अल्लाह के सिवा और किसी को नही किया जो सकता और उस वक़्त आदम को उसी तरह क़िबले की हैसियत हासिल थी जिस तरह हमारे लिए खानें काबा है , काबे का शरफ़ ज़ाहिर करने के लिए हमारी पेशानियां काबे की तरफ झुकाई जाती है। आदम का शरफ़ ज़ाहिर करने के लिए मलाएका की पेशानियां उनकी तरफ झुकाई गयी। शेख अलहिन्द मौलाना मोहम्मद हसन देव बन्दी लिखते है कि जब हज़रत आदम का खलीफा होना मुसल्लम हो चुका तो फरिश्तों को और उनके साथ जिन्नातों को हुक्म हुआ कि हज़रत आदम की तरफ सजदा करें और उन को सजदए माबूद का क़िबला बनाए जैसा कि सलातीन अव्वलन अपना वली अहेद मुक़र्रर करते है फिर रियाया को नज़रें पेश करने का हुक्म देते है ताकि किसी को सरताबी की गुन्जाइश न रहें।
अजाएबुल क़सम मे है कि फरिश्तो ने हुक्में सजदा की मोकम्मल तामील की और सौ साल बरायतें पाँच सौ साल सजदे में पड़े रहे जब सजदे से सर उठाया तो देखा कि इबलीस सामने खड़ा है और उसकी शक्ल व सूरत बदल गयी है , यानि वह मलक के बजाए देव की सूरत में कर दिया गया है यह देख कर मलाएका कमाले इताअते बारी और शुक्रे ख़ुदा वन्दी में फिर चले गये , मलाएका के इन्ही दोनों सजदों की वजह से नमाज़ की हर रकत में दो सजदे क़रार दिये गये है।
हज़रत शीस की विलादत का वाक़िया तारीखों मे यूं मिलता है कि एक दिन हज़रत आदम और हव्वा एक पाकीजा मकाम पर बैठे हुए महवे गुफ़तगू थे। कि जन्नत से एक जू-ए-आब जारी होकर दोनो के करीब पहुचां और इसी के साथ साथ जिबराईले अमी भी कुछ फरिश्तो को लिए हुए वारिद हुए , उन्होने आकर हज़रत आदम को सलाम किया , आदम ने जवाबे सलाम दिया उसके बाद जिबरईल ने आदम के सामने जन्नती मेवों का एक तबक पेश किया और कहा कि इसे नोश कीजिये और आप आबे बेहिशत से गुल्ल करके हव्वा के पास जाइये क्योकि आज नूरे मोहम्मदी तुम्हारे सुल्ब से रहमे हव्वा मे मुन्तिकि़ल किया जाएगा और तुम्हरी वही की बुन्याद पड़ेगी।
हज़रत आदम ने इस हुक्मे इलाही की तामील की और हज़रत हव्वा इसी शब हामेला हुई। मोद्दते हमल गुजरने के बाद एक फरजन्द की विलादत हुई जिसका नाम शीस रखा गया।
तारीखे़ ख़मीस मे है कि चूंकि नूरे मोहम्मदी को हज़रत आदम के सुल्ब से मुन्तकि़ल होकर हज़रत शीस के सुल्ब मे आना था इसीलिए उनकी विलादत मे खास एहतेमाम किया गया।
अजाएबुल क़सस और हयातुल कु़लूब मे है कि जब हज़रत शीस सिने बुलूग़ पर पहुचें तो जिबराईल नाज़िल हुए है और आदम से कहा कि ए आदम तुम फलां मकाम पर कल शीस को लेकर पहुँच जाओ और मै भी फरिश्तों को लेकर वहाँ आ जाऊगा। आदम ने इस इजतेमा का सब्ब दरयाफ्त किया तो जिबराईल ने कहा कि शीस से नूरे मोहम्मदी के मोताल्लिक़ एहदो मीसाक लेना है। दूसरे दिन हजरत आदम मकामे मोइयना पर पहुँच गये , हजरत जिबरईल भी हजारो फरिशतो को लेकर वहां आ गये , और हजरत शीस से अहदे मीसाक़ लिया गया और उन्हे कुछ हिदायें
जिस वक्त हज़रत शीस मोतावल्लिद हुए उस वक्त हज़रत आदम की उम्र 230 बरस की थी। आप की नस्ल हज़रत शीस से ही चली। और हज़रत शीस के अहद मे अवलादे आदम दो गिरोह मे तक़सीम हुई एक क़ाबील की पैरव , जो आतश परस्त हुई दूसरी हज़रत शीस की पैरव जो खुदा परस्त रही।
हज़रत शीस अवलादे आदम मे इन्तेहाइ मोहतरम बुजुर्ग अपने वालिद से मुशाबेह और खू़बसूरत थे। इन पर 50 सहीफे नाजिल हुए। और जब इनकी उम्र 612 बरस की हुई तो इन्तेक़ाल हुआ। इन्तेक़ाल से क़ब्ल इन्होने अपना वसी अनूश को मोकर्रर किया और अनूश ने क़ीनान को क़ीनान ने महलाईल को और महलाईल ने यारो को यारो ने अख़नूख़ को अपना वसी और जानाशीन मोक़र्रर किया जो हजरत इदरीस कहलाए।
आप को इदरीस इसलिए कहा जाता है कि आप अपनी क़ौम के लोंगों को , अल्लाह की रुबूबियत , मआरेफत , इबादत , इताअत और इन्सानी ज़ाबताए हयात का दरस दिया करते थे। आप हज़रत आदम की सातवीं पुश्त में मोतावल्लिद हुए , अंग्रेज़ मोहक़्कि ने आप और हज़रत आदम का दरमियानी वक़्फ़ा 622 बरस बताया है।
आप लहीम शहीम , फरबे और वलन्द क़ामत थे , नर्म आवाज़ से आहिस्ता आरिस्ता बाते करते थे। अल्लामा अब्दुल वाहिद हनफी देवबन्दी का कहना कि ख़ुदा ने आप को दस चीज़ो से मुम्ताज़ और मुन्फरिद किया था
आप नबीये मुरसल थे
आप पर 30 सहीफे नाज़िल हुए
इल्में नुजूम जानते थे
क़ल्म से लिखने की इबतेदा की
कपड़ा इजाद किया
जंगी अस्लहे इजाद किया
जेहाद क़ायम किया
काफ़िरों और उनकी गिरफ्तारी का तरिक़ा इजाद किया
लोगों को लिबास पहन्ना बताया
ख़ुदा ने आपको ज़िन्दा आसमान पर उठाया
कुछ़ मोअर्रिख़ों का कहना है आपने तक़रीबन 100 शहर आबाद किये। अल्लामा मजलिसी अलैहिर्रहमा का बयान है कि आप मस्जिदे सहला मे दर्स देने के अलावा ख़याती का काम भी करते थे और वहीं रहते भी थे कशफुल ग़म्मा में है। आप को 72 ज़बानों पर क़ुदरत हासिल थी और आप हर ज़बान मे तबलीग़ का काम अन्जाम देते थे। रौज़ा तुल सफा में है कि आप ही ने बुर्जो में आफताब की मुन्तक़ाली से लोगों को आगाह किया और रुय ते हिलाल के बारे में बताया बुर्जो के नाम तजवीज़ किये नुजूम कि इसतेलाहें का़यम की और अपने इल्म से अम्बिया की तादाद बताई।
दुनिया मे आप ने 365 साल तक कारे तबलीग़ अन्जाम दिया इसके बाद अल्लाह ने आप को जिन्दा आसमान पर उठा लिया। आसमान पर उठाये जाने से पहले आप ने उमुरे दीनी अपने साहबज़ादे मुतवशलख़ को अपना जानशीन बनाया। मुतवशलख़ ने वक्ते आखिर अपने फ़रज़न्द लमकया लामख़ को जानशीन मोकर्रर किया। और उनसे वह वसीयते की जो आप के बुज़ूर्गों ने आप से की थी। लमकया लामिख की उम्र 800 बरस की हूई और उनकी वफात तुफाने नूह से 620 साल पहले बताई जाती है। उन्ही लमक के साहबज़ादे हज़रत नूह थे।
आप को नूह इस लिए कहा जाता है कि आप ने अपनी गुमराह क़ौम की सरकशी , और अज़ीयत रसानी पर 650 बरस तक नौहा. किया। मुखतलीफ हदीसों और रवायतों मे आप का नाम अब्दुल आला , अब्दुल मलक , अब्दुल शकूर , अब्दुल ग़फ़्फ़ार और सकन बताया गया है। आप गुदाज़ जिस्म बलन्द व बाला क़द के इन्सान थे. चेहरा पतला कदरे लम्बा , आँखें बड़ी और दाढ़ी घनी थी। खुदा ने आप को 2500 साल की ज़िन्दगी अता की लेकिन इस उम्र में मोअर्रेखीन के दरमियान इखतेलाफ है कि कब आप मनसबे नबूअत पर फायज़ हुए , किसी रवायत में 850 बरस , किसी रवायत में 840 बरस , किसी में 860 बरस , किसी में 400 बरस , किसी में 250 बरस तहरीर किया है तबरी मे सिर्फ 50 साल तहरीर है जो मेरे ख़याल मे किताबत की ग़लती का शाखसाना है।
मोअर्रेखीन इस बात पर मोत्ताफिक है कि आप ने 650 साल तक तबलीग़ी ख़िदमत अन्ज़ाम दी लेकिन चूंकि आप क़ाबील की अवलादों पर मबउस हुए थे जो इब्तेदा ही से गुमराह , सरकश , आतिश परस्त , ज़िनाकार , जराएम पेशा और नाफरमान थी इसलिए आप की तबलीग़ी कोशिशों का कोई खास नतीजा बरामद न हुआ और आप के मोतक़दीन की तादाद 80 से ज़्यादा न हो सकी।
आप पर कोई सहीफ़ा नाज़िल नही हुआ। क़बले नुबूवत भी आप अपने बाप दादा के मज़हब पर थे और इन्तेहाई इबादत ग़ुज़ार , मुत्तकी , परहेज़गार , मोवारिद और खुदा परस्त थे। अपनी क़ौम की इज़ा रसानियों से परेशान होकर आप ने उनसे अलाहेदजी इखतेयार करली थी और कुफ़े के क़रीब सिम्त फ़ुरात के किनारे एक ग़ैर आबाद मुकाम पर रहते थे और वहीं हमा वक्त खुदा की इबादत में मस्रुफ रहते थे।
अल्लामा मजलिसी इब्ने ताउस के हवाले से रक़म तराज़ हैं कि जब आप की उम्र का एक तवील हिस्सा गुज़र गया तो आप की ख़िदमत में जिबरईल आयें और उन्होने कहा कि ऐ नूह तुम ग़ोशो नशीन क्यो हो तुम बाहर निकलो और भटकी हुई क़ौम को राहे रास्त पर लाने की कोशिश करो , आप ने फरमाया , यह क़ौम बड़ी बेकार है , न मेरी सुनती है न मेरी तरफ रुख करती है और न मुझे पहचानती है। जिबरईल ने फरमाया अगर ये लोग नरमी से राहे रास्त पर आने को तैयार नही है तो उनसे जिहाद करों। आप ने फरमाया , मैं उनके मुक़ाबले मे जिहाद की ताक़त व तवानाई नही रखता। जिबरईल ने कहा अगर खुदा ताक़त व तवनाई अता कर दे तो।
जिहाद करोगे। आप ने फरमाया यक़ीनन मे जिहाद करुगाँ। इस पर जिबरईल ने कहा ऐ नूह मैं खुदा की तरफ से भेजा गया फरिश्ता हुँ , इस वक्त अल्लाह ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है बाद सलाम के कहा है कि मैने तुम्हे ताक़त व तवनाई दे कर नबूवत के मन्सब पर फायज़ कर दिया है अब तुम तबलीग़ के लिए गोशा छ़ोड़ कर मैदान में निकलों और फरीज़ाए नबूवत अदा करो , खुदा तुम्हारे साथ है वह तुम्हारी मदद करेगा। यह सुनना था कि नूह अ 0 अज्म व हिम्मत के साथ एक सफेद असा लेकर उठ खड़े हुए और खुदाई ताक़तों को समेट कर तबलीग़ की ग़रज़ से एक ऐसी बस्ती में दाखिल हुए जहाँ लोग ईद की खुशियाँ मना रहे थे , अतिश परस्ति में मशग़ूल थे और आग भड़क रही थी , नाराए तौहीद बलन्द किया और फरमाया। ऐ ग़ुमराह क़ौम के लोगों आगाह हो जाओ कि तुमनें शैतानी जामा पहन रखा है , हक़ीकी खुदा से मुन्हरिफ होकर , आग और बुतों की परसति कर रहे हो जो तुम्हे जहन्नुम की तरफ ले जाने वाली हैं अगर तुम्हे जहन्नुम की आग से बचना है तो ख़ुदाए वहदहू लाशरीक की इताअत करो , मैं तुम्से यही एक़रार लेने आया हुँ क्योकि अल्लाह ने मुझे तुम पर नबी मोक़र्रर किया हैं। मगर बदबख़तो ने एक न सुनी , हालांकि उन पर हैबत तारी हुई और उनका आतिश कदा गुल हो गया।
आतिश कदा के गूल होने और हज़रत नूह की इस दिलेराना गुफ़तग़ु से एक तरफ तो आतिश परसतों पर खौफ व हिरास और सरासीमगी के आसार तारी थे और दुसरी तरफ अमुरा बिन्ते हमरान नामी एक हसीन व जमील दोशीज़ा पर उन कलमात का यह असर हुआ की वह उसी वक्त ईमान ले आयी , उसका ईमान लाना था कि पुरी कौम , पुरी बस्ती ,बल्कि गिरदो नवाह मे एक तहेलका मच गया। अमुरा का ख़ौफ ज़दा बाप , उस पर इस कदर बेरहम हुआ की उसने बेटी को कैद कर के एक कमरे में बन्द कर दिया कि जब तक वह अपने इस फैल पर तौबा नही करेगी उस का खाना पानी बन्द रहेगा। वह ज़िन्दा रहे ख्वाह मर जाए , रफता रफता अमुरा का एक साल का अर्सा ग़ुज़र गया। और जब दरवाज़ा खोल कर देखा गया तो वह पहले से बहतर हालात में थी , और उसकी पेशानी मे एक नूर चमक रहा था। लोगो ने इस्तेजाबाना लहज़े में उससे पुछा कि वे साल भर तक बग़ैर खाने और पानी के क्यों कर जिन्दा रही , उसने कहा कि जब भुख और प्यास से मेरी जान लबों पर आ गयी तो जिन्दगी की कोई उम्मीद बाक़ी न रही तो मैने नूह के परवरदिगार से दुआ की और मुझे बेहतर से बेहतर खाना व पानी मिलने लगा। बा एजाज़ हज़रत नूह अ 0 मेरे कमरे में आते थे और मुझे सेरो सेराब करके चले जाते थे , इसलिए मै तनोमन्द और तन्दुरुसत हूँ , यही अमुरा बाद में हज़रत नूह की ज़ोजियत मे दाखिल हुई और उनके बत्न से साम की विलादत अमल में आयी।
बहर हाल अमूरा बिन्ते हमरान के यह मोजिज़ा नुमा वाक़ियात भी क़ाबील की अवलादों पर असर अन्दाज़ न हुए क्योकि यह पूरी क़ौम इब्तेदा ही से आतिश परस्त व बुत परस्त थी , मुस्तजाद यह कि उनसे हज़रत शीस की क़ौम के लोगों ने भी इख्तेलाफ़ कर लिया था और उनके साथ भी इन्सानियत सोज़ हरकतों और बुराईयों की तरफ़ मायल हो गये थे , आतिश परस्ती , बुत परस्ती , ज़िनाकारी , आबरु रेज़ी , शराब खोरी और बद अमली उनका मोकद्दर बन चुकी थी , फिर शैतान भी उनकी बद कारियों में उनका मोईन व मददगार था , इसलिए उस वक्त का पूरा इन्सानी मोअशरा बुराईयों और बद आमालियों के समन्दर में ग़रक़ हो चुका था।
हज़रत नूह 650 साल तक इस क़ौम की इस्लाह के लिए सरगरदां व परेशान रहे और जब ज़मीन पर उस क़ौम के गुनाहों और मासियत का बोझ ज़रुरत से ज़्यादा बढ़ गया और कोई ख़ातिर खवाह नतीजा बर आमद न हो सका तो आप ने ख़ुदा की बारगाह में बद्दुआ के लिए हाथ बलन्द किये और फरयाद की कि परवरदिगार इस क़ौम पर अपना अज़ाब नाज़िल फरमा और उन्हे नेस्त व नाबूद कर दे।
अल्लाह ने नूह अ 0 की यह फरयाद सुन ली , लेकिन उसके साथ ही जिबरईल के ज़रिये यह पैग़ाम भी दिया कि ऐ नूह अ 0 तुम अपनी क़ौम को मेरे अज़ाब की ख़बर भी देते रहो और उन्हे राहे रास्त पर आने का मौक़ा भी फ़राहम करते रहों। इस पर नूह अ 0 ने यह ख्वाहिश ज़ाहिर कि की फ़िलहाल औरतों को अक़ीमा कर दिया जाय ताकि ताकि वक्ते अज़ाब बच्चे महफ़ूज़ रह सके। खुदा ने नूह अ 0 की यह ख्वाहिश पूरी की , औरतों को अक़ीमा कर दिया और उनका बच्चा जनना बन्द हो गया। इसके बाद हुक्में इलाही के मोताबिक़ हज़रत नूह अ 0 अपनी क़ौम को अजाबे इलाही के बारे मे मुत्तला करते रहे यहां तक कि एक ज़माना ग़ुज़र गया और ख़ुदा ने उन्हे कश्ती की तैयारी का हु्क्म दिया।
रवायतों में है कि जिबरईल आसमान से कुछ़ दरख्तों के पौधे लेकर आये थे जिन्हे हज़रत नूह ने लगाया , उनकी देख भाल और आबयारी की और जब 40 साल में दरख्त तैयार हुए तो उन्हें काट कर यकजा किया गया और एक सौ बीस बरस में यह अमल तीन बार दोहराया गया कि हज़रत नूह अ 0 इन दरख्तों के बीज बोते रहे और तैयारी पर चालीस साल के बाद उन्हें काटते रहे। आखिर कार खुदा का हुक्म हुआ कि ऐ नूह अ 0 इन दरख्तों से एक लाख चौबीस हज़ार तख्तें तैयार कराओ।इस हुक्में रब्बानी पर नूह अमल पैरा हुए और तक़रीबन निस्फ सदी की मेहनत और जाफिशानी के बाद जब तखतों की तादाद मोकम्मल हो गयी तो फिर हुक्म हुआ कि इन तख़तों पर तमाम अम्बियाओं के नाम लिख दिये जाए। यह काम जिबरईल की मदद से शुरु हुआ और अम्बियाओं के इस्मा ग्रामी लिखे जाने लगें , लेकिन दुसरे दिन हज़रत नूह अ 0 ने देखा कि पहले दिन जो नाम तख्तों पर लिखे जा चुके थें वह महो हो चुके है वह हैरान और परेशान हुए और दुबारा उन नामों को फिर लिखा। तीसरे दीन फिर मिट गये , यह माजरा देख कर हज़रत नूह अ 0 सख्त फिक्रमन्द थे। वही आयी ऐ नूह , तुम अम्बियाओं के नामों को लिखने का आग़ाज़ मेरे नाम से करो और मेरे हबीब (मोहम्मद) के नाम पर खत्म करों। चुनांचें इस ग़ैबी तालीम की रौशनी में जनाबें नूह अ 0 ने इबतेदा की और जब तमाम अम्बिया के अस्मा तख्तों पर लिख चुके तो आसमान से एक निदा आयी की अब कश्ती का आग़ाज़ करो। कश्ती के तमाम तख्ते जोड़ दिये गये लेकिन आखिर मे चार तख्तों की जगह फिर रह गयी। फिर जनाबे नूह अ 0 ने जिबरईल से पुछ़ा की इन चार तख्तों पर क्यो लिखा जाए जिबरईल ने फरमाया कि अम्बिया के इन तमाम अस्मा के साथ साथ जब तक अली अ 0, फातिमा अ 0, हसन अ 0, हुसैन अ 0 का अस्माए मुबारक शामिल न होगा , उस वक़्त तक कश्ती की तकमील नामुम्किन है. क्योकि तमाम अस्माए मुबारक में खुदा और उसके हबीब के नामों के अलावा यही नाम ऐसे है जो उस कश्ती को जुमला आफ़ते अर्ज़ी व समावी से महफ़ुज़ रख सकते है और उन्ही नामों की बरकत से पैग़म्बरों को अज़मत बख्शी गयी है। जनाबे नूह अ 0 ने बराए एहतराम तख्तों पर उन नामों को भी लिखा और जब चारों तख्ते कश्ती में लग गये तो परवरदिगार ने फरमाया कि ऐ नूह अ 0 अब कश्ती मुक़म्मल हो गयी।
अल्लामा मजलिसी का बयान है कि तख्तों की तराशकारी और कश्ती की तैयारी में काफी आदमीयों की ज़रुरत थी ,चुनांचे इसके लिए हज़रत नूह अ 0 ने खुदा की बारगाह में दुआ की ऐ पालने वाले मुझे कुछ़ मददगार मोहय्या कर , हुक्म हुआ कि ऐ नूह अ 0 यह ऐलान करदे की जो शख्स मेरे काम मे मदद करेगा उसके लिए मेरा परवरदिगार , लकड़ी का बूरादा सोने चाँदी में तबदील कर देगा। इस एलान के बाद लालच मे कुछ़ लोग आने लगें और कश्ती खुदा की निगरानी में जिबरईल की हिदायत के मुताबिक तैय्यार होना शुरु हो गयी।
अल्लामा जज़ाएरी बहवलए किताबुल खेराज में तहरीर फरमाते है कि रसूलल्लाह ने फरमायाः
जब हज़रत नूह अ 0 कश्ती की तैय्यारी मे मसरुफ हुए तो जिबरईल ने उन्हे कीले मोहय्या की जिनकी तादात एक लाख उनतीस हज़ार थी। हज़रत नूह अ 0 जिबरईल की हिदायत के मोताबिक उन कीलों को कश्ती के तख्तों मे पेवस्त करते रहे यहाँ तक की जब आखरी पाँच कीले रह गयी और नूह अ 0 ने उनकी तरफ हाथ बढ़ाना चाहा तो वह नूरानी हो गयी और उनसें शुआएं फूटने लगी। यह माजरा देख कर हज़रत नूह अ 0 हैरान हुए तो जिबरईल ने फरमाया कि इन कीलों से पंजतन का नाम वाबस्ता है यानी यह कीलें मोहम्मद स 0, अली अ 0, फातेमा स 0,हसन अ 0, हुसैन अ 0, के नामों से मन्सूब है लिहाज़ा ऐ नूह अ 0 पहली कील को कश्ती की दाहिनी तरफ , दुसरी को बाई तरफ , तसरी को दरमियान में , चौथी को बाई तरफ वाली कील के नीचे और पाँचवी को दाहिनी तरफ वाली कील के नीचे ठोंक दो नूह अ 0 ने ऐसा ही किया लेकिन जब आखरी कील लगाने लगें तो उनहे इस तख्ते पर खुन की तरी नज़र आई , उन्होने घबरा कर जिबरईल से पुछा कि क्या माजरा हैं जिबरईल ने वाक्या बताया जिस पर वह बहुत रोए और का़तिलाने हुसैन पर लानत की।
मोअर्ररेखीन का बयान है कि इस कश्ती की तैय्यारी मे 250 साल लगे। इस कश्ती की लम्बाई , चौड़ाई , और ऊचाँई में मोहक़्क़ेक़ीन के दरमियान इख्तेलाफ़ है। य़ाक़ूब ने तीन सौ हाथ लम्बाई और पचास हाथ चौड़ाई तहरीर की है , अल्लामा मजलिसी का कहना है कि लम्बाई तीन सौ हाथ , चौड़ाई 250 हाथ और ऊचांई 33 हाथ थी। तबरी ने 1200 गज लम्बाई और 40 गज चौड़ाई बतायी गयी है। लेकिन ये दुरुस्त इसलिए नही है कि इमाम जाफ़रे सादिक़ अ 0 का कौल है कि 1200 एक हज़ार दो सौ हाथ , चौड़ाई 800 आठ सौ हाथ और ऊचांई 80 अस्सी हाथ थी।
हज़रत ईसा अ 0 के अहद में उनके हुाएरीन ने यह ख्वाहिश ज़ाहिर की कि जो तुफाने नूह का हाल बयान कर सके। जनाबे ईसा ने ज़मीन से एक मुट्ठी ख़ाक उठाई और क़ाब बिन साम बिन नूह की रुह को उसमें समों कर उससे तूफ़ाने नूह का वाक़या दरयाफत किया , हज़रत ईसा ने कशती की लम्बाई पुछ़ी तो उसने बताया कि 1200 हाथ लम्बी थी और उस पर सर पोश भी था ताकि उसमें सवार होने वाला बारिश से महफ़ूज़ रह सकें।
(अजाएबुल क़सस)
उलेमा और मोअर्रेखीन ने तूफ़ान के जो वाक़यात बयान किये हैं उनका खुलासा यह है कि हज़रत नूह अ 0 की बीवि कूफें में अहानी तन्दूर में रोटियां तैयार कर रही थी जो हज़रत आदम अ 0 की बीवी हव्वा की मिलकीयत में था। चंद औरतें भी यहाँ मौजुद थी जो कश्ती और तूफ़ान का तज़किरा कर के हज़रत नूह अ 0 का मज़ाक़ उड़ा रही थीं कि अचानक तन्दूर के अन्दर एत ज़ोरदार धमाका हुआ और ज़़मीन के सीने से पानी का धारा उबल पड़ा। जो औरतें मज़ाक़ उड़ा रही थी वह यह कहती हुई भागीं की हमें जिस अज़ाब की ख़बर थी वह नाज़िल हो गया। नूह की बीवी रोटियां छ़ोड़ कर नूह की तरफ भागी और उनसे सारा वाक्या दरयाफ्त किया , वह भी दौड़ते हुए तन्दूर के पास आये और इस ख्याल से की अपने एहलो अयाल को महफ़ूज़ करले , उन्होने तन्दूर का दहाना एक बड़े पत्थर से ढ़क दिया और हुक्में इलाही का इन्तेज़ार करनें लगें। फ़ौरन हुक्म हुआ कि जिस क़दर हो सके अपने एहलो अयाल और बाईमानको लोंगों को लेकर कश्ती में सवार हो जाओ और अपने हमराह जुमला मख़लूकात का एक एक जोड़ा भी लेलो। नूह ने कहा पालने वाले इस उजलत में दुनिया भर के जानवरों और परिन्दों को कैसे जमा करु , इरशाद हुआ कि वह मेरे हुक्म से खुद तुम्हारे पास पहुचं रहे है। चुनांचे दुनिया भर के मख़लूक़ एक हवा के झोकें से हज़रत नूह अ 0 तक पहुंच गये। उन्होने सब को इस तरह सवार किया कश्ती के नीचले हिस्से में दरिन्दों को , परिन्दों को और दीगर चौपायों को रखा। दरमियानी हिस्से मे खुर्रद्दनी आशया और दीगर ज़रुरयात का सामान रखा और बालायी हिस्सें में अपने अहलो अयाल और दीगर बाईमान लोगों की एक मुखतसर सी जमाअत को ठहराया। जानवरों मे चीटी , चुंकि सबसे छोटी और उसके पायमाल हो जाने का अन्देशा था , इसलिए उसको बलायी हिस्से में रखा। एक रवायत में है कि कश्ती में जब सब जानवरों और परिन्दों को सवार किया जाने लगा तो तीतर सबसे पहले सवार हुआ। अल्लामा इसमाईल सब ज़ावारी का कहना है कि चुंकि तीतर मोहिब्बें एहलेबैत होता है। इस लिए हज़रत नूह अ 0 ने उसे सबसे पहले सवार किया।
क़ुरानी सराहत के साथ जुमला मोअर्रेख़ीन और मोहद्दसीन का बयान है कि जब तन्दूर से पानी उबलना शुरु हुआ तो हजरत नूह ने अपनी ज़ुर्रियत से फ़रमाया कि वक्त बहुत कम है लिहाज़ा तमाम लोग बउजलत कश्ती मे सवार हो जाएं इस हुक्म की तमील नूह के बेटों साम , हाम और याफिस ,नीज़ , बीवी उमूरा के साथ दीगर ने भी की जो बाईमान और मोमिन थे , लेकिन उनका एक बेटा केनान , जो नाफ़रमान और सरकश था और एक बीवी जिसका नाम दामेला था , इस हुक्म से बरी उज़जिम्मा रहे , उन्होने नाफ़रमानी सरताबी की और कहा कि यह कश्ती आप ही को मुबारक हो , हमारे लिए बुलन्द और बाला पहाड़ो की चोटियां काफी है। शायद यही केनानी सीरत थी जिस पर अमल करते हुए हजरत उमर ने रसूलल्लाह से फरमाया था कि हमारे लिए कुर्आन काफी है।
इमाम जाफ़रे सादिक़ अ 0 फ़रमाते है कि नूह के बेटे किनान ने जिस पहाड़ पर भरोसा किया था वह कोहे नजफ था जिसकी चोटियां बड़ी सर बलन्द थीं केनान का भरम खाक मे मिलाने के लिए खुदा वन्दे आलम ने इस पहाड़ को ज़र्रो मे तबदील करके हवा मे उड़ा दिया और इसकी जगह एक दरिया बहने लगा जिसका नाम “ नै ” हुआ फिर वह दरिया खुश्क हो गया , और किसी शय के खुश्क होजाने को अरबी जबान मे “ जफ़ ” कहते है इसीलिए इस मकाम को “ जफ़ ” कहा जाने लगा। फिर कसरते इस्तेमाल की बिना पर “ नैजफ़ ” रफता रफता नजफ हो गया और यह वही जगह है जहां हज़रत आदम हज़रत अली- ए- मुर्तुज़ा और नूह अ 0 की क़ब्रें हैं।
हजरत आदम के बारे मे तारीखें यह बताती है कि वह मक्के में दफन हुए थे , लेकिन तूफान के मौके पर हज़रत नूह ने उनके ताबूत को अपनी कशती मे रख लिया था , और एक रवायत मे यह है कि आप का ताबूत लहद से बुलन्द होकर पानी की सतह पर आ गया था जिसे नूह अ 0 ने अपनी कशती मे ले लिया था और तूफान खत्म होने के बाद उन्हे ऩजफ मे दफन कर दिया।
अमीरुल मोमेनीन हज़रत अली अ 0 की क़ब्र के बारे मे यह रवायत है कि इसे हज़रत नूह ने बादस्तेखुद तय्यार की थी और सियानी ज़बान मे एक तख्ती लिख कर इसमें रख दी थी कि इस क़ब्र को नूह पैग़म्बर ने आखि़रुज़ जमा के वसी हज़रत अली अ 0 के लिए तैयार किया है। चुनाचें हस्नैन अ 0 ने अमीरुल मोमेनीन को दफ़न किया।
मुख्तार यह है कि जब सब लोग कश्ती मे इत्मेनान से सवार हो गये तो हज़रत नूह अ 0 ने तन्दूर का दहाना खोल दिया और खुद भी दौड़ कर कश्ती में सवार हो गये। तन्दूर के मुंह का खुलना था कि ज़मीन का पानी आसमान से बाते करने लगा और आसमान का पानी जमीन के ग़रक़ाब करने लगा। देखते ही देखते कायनात ठाटें मारते हुए समन्दरो की आमाज गाह नज़र आने लगी। फिर आफताब को गहन लगा और दुनिया की रौशनी पर एक भयानक अन्धेरा मोहित हो गया। हज़रत नूह अ 0 इस अन्धेरे को देख कर फिक्रमन्द और परेशान हुए चुनांचे खुदा ने जिबराईल के ज़रिये अपने नबी की खिदमत मे दो मोती भेजे। उनमे एक दिन मे अपनी चमक से कश्ती मे उजाला करता था और दुसरा दिन में , जिससे दिन और रात का फर्क मालूम होता था और नमाज़ का वक्त पता चलता था।
तूफान का आगाज होते ही जनाबे नूह अ 0 ने कश्ती के बादबान खोल दिये थे और वह पानी की सतह के साथ साथ ज़मीन छोड़ कर आसमेन की तरफ बुलन्द हो गयी थी कि तुन्दो तेज हवाओ के झोकों ने उसे कुव्वते रफ्तार अता की और वह एक सिम्त चल पड़ी। उसने पहले दो दुनिया का एक चक्कर लगाया फिर पानी से खेलती हुई खानोए काबा के क़रीब आयी और सात मरतबा इसका तवाफ करके जिधर हवा का रुख था उधर रवाना हुई।
रवायतों से ये साबित होता है कि ख़ानए काबा तूफानें नूह में ग़रके आब नही हुआ बल्कि पानी की सतह के साथ साथ वह भी आसमान की तरफ बुलन्द होता रहा , इसलिए इसे बैतुलअतीक़ कहा जाता है।
कश्ती पूरी कूव्वत के साथ रवां दवां थी मौजों के थपड़े बुलन्द होकर गुनाहों की दुनिया और इस आसी मख़लुक की ग़रक़ आबी का तमाशा देख रहे थे कि एक मुक़ाम पर कोई इनसानी सर पानी से उभरा और दर्द नाक चीख के साथ आवाज़ आई कि अब्बा जान मुझे बचा लीजिए , शफक़ते पिदारी ग़ालिब आइ नूह ने बेटे का बाज़ु पकड़े के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि हुक्में इलाही ने वही रोक दिया। नूह अ 0 ने फरमाया कि परवरदिगार , तेरा वादा है कि तु मेरे एहल को बचाएगा , हुक्म हुआ की ये तेरे अहल से नही है तेरे अहल से वही है जो इबादत और इताअत ग़ुज़ार है और तेरे साथ कश्ती में है। मालुम हुआ कि ग़ैर सालेह अमाल की बिना पर अवलाद , अहल से खारिज हो जाती है। चुनांचे नूह अ 0 का बेटा ड़ुब गया और नूह अ 0 हुक्में इलाही के सामने कुछ़ न कर सकें। अलबत्ता मशीअत ने नूह अ 0 और उनके बेटे के दरमियान एक मौज हायल कर दी थी ताकि हज़रत नूह अ 0 अपने बेटे को डूबते हुए न देख सके।
मोअर्ररेख़ीन का कहना है कि हज़रत नूह की कश्ती करबला की सरज़मीन पर पहूंची तो गिरबाद (भंवर) में फंस गयी और ज़रे ओ ज़बर होने लगी , अन्देशा था की कही ग़रक़ न हो जाए यह कैफियत देख कर हज़रत नूह अ 0 घबरा गये और उन्होने खुदा की बारगाह में अर्ज़ किया कि परवरदिगार यह क्या माजरा है. क्या हम सब ग़रक़ हो जाएगें , निदा आयी आले मोहम्मद को अपनी नियात का ज़रिया क़रार दो और उनके वसीले से दुआ मांगो , नूह ने दुआ मागीं और कश्ती पर जब कुछ ठहराव के आसार मुरत्तब हुए तो फरमाया मेरे माबूद ये कौन सी जगह है जहाँ मेरी कश्ती भी हिचकोले खा रही है और मेरा दिल भी ड़ुब रहा है। इरशाद हुआ की ऐ नूह अ 0 ये करबला है जहां आले मोहम्मद की कश्ती खुन में ग़रक़ होगी और एक दुसरी रवायत में है जब नूह अ 0 की कश्ती क़ैद खानाए शाम के सर के ऊपर से ग़ूजरी तो उस वक्त भी वह मुतज़लज़िल व मुतलातिम हुई और नूह अ 0 ने इस मक़ाम के बारे में भी परवरदिगार से पुछा तो उन्हे जवाब मिला कि ये क़ैद खानएं शाम है। जहां ज़ुर्रियते रसूल मोक़य्यद की जाएगी।
अल्लामा मजलिसी अलैहिर रहमा का बयान है कि चलते चलते जनाबे नूह अ 0 की कश्ती का सीना जब कोहे जूदी से टकराया तो एक हैबतनाक आवाज़ बलन्द हुई और ये उस वक्त ख़त्म हुई जब जनाबे नूह अ 0 ने आले मोहम्मद को सुकून व क़रार का वसीला बनाया।
इन तमाम वाक़्यात का तसल्सुल यह बताता है कि ज़ाते इलाही के अलावा हज़रत नूह अ 0 की कश्ती के हक़ीक़ी पासबान व निगेहबान मोहम्मद अ 0 अली अ 0, फातमा स 0, हसन अ 0, हुसैन अ 0 थे। किसी की मजाल नही कि नुकूसे क़ुदसिया ख़मसा के रौशन चिराग़ो को बुझा सके।
हज़रत नूह अ 0 की कश्ती 10 रजबूल मोरज्जब को कूफ़े से रवाना हुई छः माह ज़ेरे आसमान सफर करने के बाद कोहे जूदी पर ठहरी। अहलैबेत की कश्ती भी छः माह ज़मीन पर चलती रही। नूह की कश्ती कूफे से चल कर करबला पर गिरदाब पर मुबतिला हुई और कश्तीये अहलैबेत मदीने से चलकर करबला मे नज़रे तुफाने सितम हुई , शायद इसलिए रसूल ने फरमाया हो कि मेरे अहलैबेत की मिसाल कश्तिये नूह के मानिनद है जो इसमे सवार हुआ वह निजात पा गया , और जिस ने इसे छोड़ दिया वह ग़रक हो गया।
चालीस शबाना रोज़ पानी बरसता रहा और ज़मीन से पानी उबलता रहा। जब कौमे नूह ग़रकाब होकर अपना वजूद खो बैठी तो परवरदिगार ने अजाब का सिलसिला खत्म करके तूफान के इख्तेताम का फैसला किया चुनांचे फिर ज़मीन को हुक्म हुआ कि पानी पीजा , आसमान को फरमान जारी हुआ की वह बारिश रोक दे , बस इस हुक्म के बाद ही पानी घटना शुरु हो गया कश्ती अहिस्ता अहिस्ता आसमान की बुलन्दी से नीचे उतरने लगी। क़ौस व क़जह ने ज़ाहिर होकर जब अम्न का पैग़ाम दिया तो हज़रत नूह अ 0 ने सजदाए शुक्र मे अपनी पेशानी रख दी। इस तूफान में ख़ुदा की मखलूकात मे से वही बचे जो कश्ती में सवार थे बाकी सब कुछ खत्म हो गया।
बेशतर मोअर्रेख़ीन का ख्याल है कि कोहे जूदी मूसल मे वाक़ा है लेकिन जदीद माहैरीन आसारे क़दीमा और मोहक़्क़ेक़ीन ने दलीलों की रोशनी मे यह वाज़े किया है कि मशहूर तसव्वुराती परसतान वाला कोहकाफ जो रुस में वाके है उसी का एक बुलन्द तरीन हिस्सा कोहे जूदी कहलाता है और उसकी तफसील मोतादिद कुतुबे तारीख मे भी मज़कूर है।
हज़रत नूह अ 0 तक़रीबन दो माह कोहे जूदी पर क़याम फ़रमा रहे और जब ज़मीन का पानी कद्रे ख़ुश्क हुआ तो वह कश्ती से उतरे और उन्हे भी उतारा जो उनके साथ इस कश्ती में सवार हुए थे।
मोअर्रेख़ीन की एक जमाअत का कहना है कि चरिन्द , परिन्दों के अलावा इस कश्ती मे इन्सानों की तादाद 80 थी जो औरतों और द कुलव मर्दों पर मुशतमिल थी लेकिन मेरा तहक़ीक़ी नज़रिया है कि यह तादाद कूल 72 नुफूस पर मुशतमिल थी जिसकी मुनासेबत करबला के उन शहीदों से है जो अपनी मिसाल आप थे मेरे इस नज़रिये को अल्लामा जलालुद्दीन सिवती के इस कौल से भरपूर तक़वियत हासिल होती है जिसमें मौसूफ़ ने इशारा किया है कि कश्तीये नूह अ 0 में बेहतरीन मोमिन सवार थे।
मोतबर रवायत मे है कि नूह अ 0 जब कश्ती से उतरे और उन्होने इतमेनान की सांस ली तो उन्हें इब्लीस उनकी ख़िदमत में हाज़िर हुआ और उसने कहा ऐ नूह अ 0 आप का मुझ पर बहुत बड़ा एहसान है। नूह अ 0 ने फरमाया , आखिर मेरा वह कौन सा अमल है जो तेरे नज़दीक एहसान का सबब बना. इबलिस ने जवाब दिया कि अल्लाह के नबी आप ने खुदा से अपनी क़ौम के लिए बद-दुआ करके तमाम काफिरों को एक साथ अज़ाब की आग में झोंक दिया और वह इस आग में फना होकर सीधे जहन्नुम की आग में चले गये और दर हक़ीक़त मेरा यही दिली मक़सद था। अगर ऐसा न होता तो मुझे ख़ौफ़ लाहक़ रहता कि आप की तबलीग़ कहीं इन पर असर अन्दाज़ न हो जाए और वह कहीं इमान न क़बूल कर लें। ऐ नूह अ 0 आप का यह एहसान मुझ पर कम नही है कि आप ने मुझे उऩके बहकाने से निजात दे दी। चुनांचे इस एहसान के बदले में मैं आप को यह बताना चाहता हूँ की वह मवाके कौन कौन से है कि जिन मौक़ो पर मैं इन्सान पर क़ाबू हासिल करके उसे ज़ेर करता हूँ। हज़रत नूह अ 0 ने फ़रमाया कि जल्द बता कि तेरी क़ुरबत से मुझे छुटकारा मिलें। इबलिस ने संजीदगी से बताना शुरु किया कि पहला मौक़ा तो वह है कि जब इन्सान गुस्से की हालत में होता हैं , दुसरा मौक़ा तो वह है कि जब दो अजनबी मर्द और औरत तन्हाई मे होते हैं और तीसरा मौक़ा वह है कि जब कोई शख्स दो आदमियों के दरमियान फैसला करता तो में फैसला करने वाले शख्स से इनतेहाई क़रीब होता हूँ। फिर इबलिस ने कहा कि ऐ नूह मेरी दो बातें और सुन लिजिए अव्वल यह कि हसद और ग़ुरुर से हर आदमी को बचना चाहिए क्योंकि इसी हसद और गुरुर की वजह से में मलउन और मतऊन क़रार दिया गया , दूसरे यह कि इन्सान को हिर्स और तमा से दूर रहना चाहियें क्योंकि हिर्स और तमा ही की बदौलत हज़रत आदम जन्नत से निकाले गये। यह कह कर इबलीस हज़रत नूह अ 0 की निगाहों से ओझल हो गया।
मुअर्रेख़ीन का कहना है कि जब हज़रत नूह अ 0 की रेहलत का वक्त आया , उस आप धूप मे बैठें थे कि मलाकुल मौत का वरुद हुआ आप ने ख़न्दापेशानी से उनका इस्तेक़बाल करते हुए फ़रमाया कि क्या इतनी इजाज़त है कि मै धूप से उठ कर साए मे आये और बैठ जाऊँ. कहा , हा इजाज़त है , चुनांचे जब हज़रत नूह अ 0 साए में आये मलकुल मौत ने अपना काम शुरु किया तो आप से पुछा कि ऐ अल्लाह के नबी आप ने बड़ी तवील उम्र गुज़ारी है , अब यह बताइये कि आप की नज़र मे मुद्दते हयात क्या मायने रखती है. फ़रमाया , बस इतनी की धूप से उठ कर साए मे आ गया हूँ। इसके बाद मलकुल मौत ने रुह क़ब्ज़ की और अल्लाह का यह नबी हमेशा के लिए दुनिया से रुखसत हो गया।
अबू मोअन्निफ लूत बिन यहया खज़ाई अपनी तहक़ीकी किताब कंजूल निसाब में हज़रत नूह आ 0 की रेहलत के बारे में लिखते है कि हज़रत नूह अ 0 कही जा रहे थे कि रास्ते में उन्होने देखा कि चार आदमी एक कब्र की तैयारी में मसरुफ़ है , नूह ने उन्से पुछा कि यह क़ब्र किसकी है. जवाब मिला की एक बन्दाए ख़ुदा की है , फरमाया मेरी कोई ख़िदमत दरकार है. कहा कि आप इस क़ब्र मे लेट जाए तो हम इस बन्दाए ख़ुदा के तुलो अर्ज़ का अन्दाज़ा कर ले। हज़रत नूह अ 0 इस कब्र में लेट गये और वहीं उन्की रुह क़ब्ज़ कर ली गयी। अबू मोअन्निफ़ कहते है कि वह चारों अशखास , जिबराईल अलैहिस्सलाम है मिकाईल अ 0 इसराफ़ील अ 0 और इज़राईल अ 0 थे।
रवायतो में यह भी है कि हज़रत नूह अ 0 को उस मुकाम पर दफ़न किया गया जहाँ उन्होने तूफान के बाद हज़रत आदम के ताबूत को दफ़न किया था। या जहाँ बाद में अमीरुल मोमनीन हज़रत अली अ 0 दफ़न हुए।
अल्लामा मजलिसी अलैहिर्रहमा मोतबर रवायतो के हवाले से रक़म तराज़ है कि हज़रत अली अ 0 ने वक़्ते शहादत अपने फ़रज़न्दों इमामे हसन अ 0 और इमामें हुसैन अ 0 से यह फरमाया था कि मेरे जनाज़े के अगली सिम्त तुम लोग हाथ न लगाना जिस तरफ भी वह जाए उसे जाने देना और जहां ठहर जाए वहां रखकर ज़मीन से मिट्टी हटाना एक क़ब्र बरामद होगी उसमें मेरे जनाज़े को दफ़न कर देना। चुनांचे अमीरुल मोमनीन का जनाज़ा चलते चलते एक मुकाम पर रुक गया और वहा की मिट्टी हटायी गयी तो एक क़ब्र बरामद हुई जिसके अन्दर एक क़तबा भी रखा हुआ था और उसमें सरबानी ज़बान में तेहरीर था कि इस कब्र को हज़रत नूह अ 0 ने वसी ए मुस्तेफा हज़रत अली अ 0 इब्ने अबुतालिब के लिए तूफाने नूह अ 0 से सात सौ साल पहले तैयार किया है। मुस्तानद रवायतों से यह साबित है कि हज़रत अली अ 0 नज़्फ़े अशरफ में दफ़न है और आप के सरे मुबारक से मुलहक़ हज़रत नूह अ 0 और हज़रत आदम अ 0 की क़ब्रे हैं.
इमामे जाफ़रे सादिक़ अ 0 फ़रमाते है कि हज़रत नूह आ 0 850 बरस की उम्र में मबऊस हुए , 650 साल उन्होने कारे तबलीग़ अन्जाम दिया , 200 बरस कश्ती तैयार की और तूफान के बाद 500 बक़िया हयात रहे। इस तरह हज़रत नूह अ 0 की उम्र 2500 बरस की हुई है।
हज़रत जाफ़रे सादिक़ अ 0 से यह रवायत भी है कि खुदा ने हज़रत नूह अ 0 को बज़रियाए वही इस अम्र से मुत्तला फरमां दिया था कि आप के बाद ज़ालिम व जाबिर सलातीन बर सरे इक़्तेदार आएगें और जब्र व तशद्दुद और ज़ुल्म व जौर का ग़लबा होगा लिहाज़ा आप अपने फ़रज़न्द साम को जब अपना वसी मुक़र्रर करें तो यह ताकीद भी फरमा दें कि जब तक तुम में हूद नामी एक शक्स ज़ाहिर न हो सबरो जब्त के साथ ज़िन्दगी बसर करना चुनांचे हज़रत नूह अ 0 ने उस अमरे इलाही से अपने बेटे साम को मुत्तला किया और साम ने अपनी क़ौम को बाख़बर किया।
पाकिस्तानी मोहक्किफ हकीम सैय्यद महमूद गिलानी अपने तहक़ीक़ी मक़ाले में तहरीर फरमाते है कि 1651 ईसवी की जुलाई में रुसी महरीन आसार क़दीमा की एक टोली बादी ए क़ाफ़ में देखभाल कर रही थीं और ग़ालेबन किसी नई कान की तलाश में मसरुफ़ थी। कि एक मुक़ाम पर उसे लकड़ी के कुछ बोसिदा टुकड़े नज़र आये ग्रुप आफिसर ने उस जगह को कुरेदना शुरु किया तो मालूम हुआ कि बहुत सी लकड़ीया संगलाख ज़मीन में दबी हुई हैं। माहरीन ने चन्द सतही अलामत से अन्दाजडा कि यह लकड़ीया कोई ग़ैर मामूली और पोशीदा राज़ अपनें अन्दर रखती है। उन्होने उस मक़ाम की खुदाई निहायत तवज्जो से कराई , बहुत सी लकड़ीया और दीगर अशिया बरामद हुई , लकड़ी की एक मुस्तातील तावीज़ नुमा तख्ती भी बोसीदगी और कुहन्गी इख्तेयार कर चुकी है लेकिन चौदाह इन्च तूल और दस इन्च अर्ज़ रखनें वाली यह तख़्ती इक़तादी तग़ैसात से महफ़ुज़ है। 1652 ईसवी के आख़िर मे माहेरीन ने अपनी तहक़ीकात को लिबासे तकमील पहनाकर यह इन्केशाफ़ किया कि मज़कुरा लकड़ी हज़रत नूह अ 0 की उस मारुफ़ कश्ती से ताल्लुक़ रखती है। जो कोह क़ाफ़ की एक चोटी (जूदी) पर आकर ठहरी थी जिस पर किसी कदीम ज़बान मे चन्द हुरुफ कन्दा है उसी में लगी थी।
जब यह तहक़ीक हो चुकी की काफ़ से बरामद होने वाली लकड़ीयां वाक़ई कश्तीए नूह अ 0 की है तो अब यह अम्र तशना रह गया कि पुरअस्रार चूबी तख्ती और उसपर लिखे हुए हुरुफ की हक़ीक़त क्या है।
रुस की सोतियत हुकूमत के ज़ेरे एहतेमाम इसके रिसंर्चिग डिपार्टमेन्ट नें मज़कूरा कशती की तहकीक के लिये माहेरीने आसारे क़दीमा का एक बोर्ड क़ायम किया , जिसने 27 फरवरी 1653 से अपना काम शुरु कर दिया इस बोर्ड के अराकीन मुन्दरजाज़ील थें।
1 सौले नौफ प्रोफेसर शोबाए लिसानियात मासको युनिवर्सिटी ( 2) ईफहाने खीनू , माहिरे सनेसे सने क़दीमा , लूलूहान कालेज चाइना ( 3) मीशाइन , लव फ़ाजिग आफीसर आला आसारे क़दीमा , (4) तानमोल गौरफ , उसतादे लिसानियात कैफरद कालेज ( 5) डीराकीन , माहिर आसारे क़दीमा लाएनन इन्सिटयूट ( 6) एम एहमद कोलार्ड , नाज़िम जिटकोमन रिसर्च एसोसिएशन ( 7) मेजर कोलोफ , निगरा दफतर तहक़ीक़ात मोताल्लिका एसटालिन कालेज।
इन , सातों माहेरीन ने अपनी तहक़ीक़ात पर पूरे आठ महीने सर्फ करनें के बाद पुरइसरार तख्ती से मोताल्लिक यह इनकेशाफ किया कि जिस लकड़ी सें नूह अ 0 की कश्ती तैयार हुई थी , उस लकड़ी से यह तख्ती भी बनाई गई है और नूह अ 0 ने इसको अपनी कश्ती मे तबर्रुक और तक़द्दुस के तौर पर हुसूले अम्नो आफियत और अज़दियाद बरकत व रहमत के लिए लगाया था।
इस तख्ती पर कन्दा हूरुफ़ को रुसी माहेरीन ने आठ माह की मग़जमारी और दिमागी काविशो से बमुशकिल तमाम पढ़ा और रुसी ज़बान में इसका तर्जुमा किया। फिर मिस्टर एन एफ माकिस माहिरे अलसने क़दीमा बरतानिया (मानचिस्टर इंग्लैड़) ने इस रुसी ज़बान के तर्जुमे को अंग्रेज़ी ज़बान में मुन्तकिल किया और उसका उर्दू तर्जुमा यूं है कि (ऐ मेरे खुदा , मेरे मददगार अपने मक़द्दस नुफूस के तुफैल में अपने रहमो करम से मेरा हाथ पकड़ , मोहम्मद अ 0 अली अ 0, फातेमा अ 0 हसन अ 0 हुसैन अ 0 अज़ीम तरीन और वाजिबुल एहतेराम है तमाम दुनिया इन्ही के लिए क़ायम की गयी है इन नामों की बदौलत मेरी मदद कर तू सिराते मुस्तक़ीम की तरफ रहबरी करनें वाला है।)
गैलानी मौसूफ़ लिखते है कि जिस वक़्त यह इबारत मन्ज़रे आम पर आयी तो मोलाहदा ज़नादेका और कुफ्फारों मुन्केरीन की आँखें खुल गयी और उन्हे शदीद हैरत मे मुब्तेला इस बात ने किया कि कश्ती की तमाम लकड़िया तो खुर्दा और बोसीदा हालत में बरामद हुई मगर नुफ़ूसे खमसा के अस्माए गिरामी वाली यह तख्ती हज़ारहा साल गुज़रने पर भी मुकम्मिल महफ़ूज़ रही और तग़य्यूरात उसको कोई गज़न्द न पहुंचा सके। यह तख्ती (आज भी) रुस के मरकज़े आसारो तहक़ीकात (मासको) में हिफ़ाज़त से रखी हुई है।
हज़रत हूद अ 0 हज़रत नूह अ 0 की सातवीं पुश्त में मुतावल्लिद हुए। इनका शजराए नसब हूद बिने रियाह बिने जादब बिने आद बिने साम बिनें नूह अ 0 पर तमाम होता है। तबरी ने वालिद का नाम शालिख़ बताया है , मुम्किन है कि अब्दुल्लाह का दुसरा नाम शालिख़ रहा हो।
जनाबे हूद अ 0 खसलत और आदत और शक्ल और सूरत मे अपने जद हज़रत आदम से बहुत मुशाबेह थे। यह नूरानी चेहरा , खूबसूरत ख़दोखाल सिड़ौल जिस्म और बलन्द और बाला क़दोक़ामत के मलिक थे , दाढ़ी घनी और दराज़ थी।
ख़ुदा ने उन्हे क़ौमे आद (जो मुल्के यमन और किजडरे मौत में इलाक़ाए एहकडाफ की तरफ बकसरत आबाद थी) की हिदा.त के लिए बी की हैसियत से दुनिया में भेजा।
इस क़ौम के लोग इन्तेहाई तनों मन्द जसीम , ताकतवर , सरकश मग़रुर बदतीनत , बदकिरदार और माफरमान थे। बुत परस्ती और बातिल परस्ती उनका बुनियादी अक़ीदा था और उसी को वह दीन , ईमान और मज़हब समझते थे। उनके क़द चालीस चालीस पचास पचास गज़ के होते थे और उनके सीने दस दस गज चौड़े होते ते यह ज़मीन पर ख़ड़े होकर ऊंचे ऊंचे पहाड़ो की बड़ी बड़ी चट्टानों को अपनी जगह से खिसका देते थे। यह लोग बड़ी बड़ी ज़मीनो के मालिक थे। इनका पेशा ज़िराअत और बाग़बानी था। इनके बाग़ात इन्तेहाई खुबसूरत और सरसब्ज़ और शादाब होते थे और उसमे खजूर व दीगर मेवें जात की पैदावार बकसरत होती थी। उनका रहन सहन शाहाना था। उनके मकान पत्थरों के बने हुए सेह मन्ज़िला और चहार मन्ज़िला होते थे।
हज़रत हूद अ 0 ने जब अपनी उम्र की चालीसवीं मन्ज़िल में क़दम रखा तो खुदा ने उनहे , इसी गुमराह व बरगशता क़ौम पर मबूस किया और उसके साथ ही हज़रत हूद अ 0 ने अपनी मन्सबी ज़िम्मेदारीयों के तहत कारे तबलीग़ की इब्तेदा की , उन्होने कौमे आद के लोगो को समझाया कि तुम लोग उस खुदा की इबादत करो जिसने तुम्हें पैदा किया है और जिसकी तरफ तुम्हें पलट के जाना है। उस खुदा की इताअत करो जो तुमहारी कामरानियों को ज़रिया और आरजुओं की मन्ज़िल है , उस खुदा के सामनें सरे जियाज़ खम करो जो तुम्हारे मालो दौलत मे इजाफा करने वाला है। ऐसे खुदाओं की परस्तिश से क्या फ़ायदा , जो न तुम्हें कुछ दे सकते है और न तुम्हारे किसी काम आ सकते है।
यह पहला मौक़ा था कि अपने ख़ुदाओं के बारे मे हज़रत हुद की ज़बान से खिलाफे उम्मीद इस किस्म के कलमात सुन कर बुत परस्तों के बातिल अक़ीदो पर एक कारी ज़र्ब लगी जिससे ख़िजिल होकर उन लोगों ने जनाबे हूद अ 0 का मज़ाक उड़ाया और उन्हे बुरा भला कहा।
इसके बाद एक दूसरे मौक़े पर जब कौमे आद के बहुत से सरदार एक जगह इकठ्ठा थे तो हज़रत हूद आ 0 भी वहां जा पहुंचे और उन्हें दावते हक़ दी सरदारों ने कहा ऐ हूद अ 0 पहले तुम अच्छे भले थे अब तुम्हे यह क्या हो गया है , जनाबे हूद अ 0 ने फ़रमाया अल्लाह ने मुझें मन्सबे नबूवत पर फायज़ करके तुम्हारी इस्लाह के लिए मुक़र्रर किया है। बस यह सुन्ना था कि वह लोग उन पर झपट पडे उन्हे जदो कोब किया और इस बेदर्दी से गला घोटा कि जनाबे हूद अ 0 बेहोश हो गये। एक दिन एक रात की मुसल्सल बेहोशी के बाद जब उन्हे होश आया तो उन्होने खुदा की बारगाह में फरयाद की और कहा। पालने वाले तूने देखा कि इन बदबख्तों ने मेरे साथ क्या ज़ुल्म किया है। हुक्म हुआ कि ऐ हूद अ 0 तुम मलूल और रंजीदा न हो और मोहकम इरादों के साथ इसी तरह कारे तबलीग़ जारी रखो आज से मैने तुम्हें वह रोब , वह दबदबा ,वह क़ुव्वत और वह हैबत अता करदी है कि आइन्दा यह लोग तुम्हारी तरफ आँख उठाकर देखने की हिम्मत भी नही कर सकतें। हज़रत हूद अ 0 को अपने खुदा की इन बातों पर पुरा पुरा एतमाद और भरोसा था इसलिए वह फिर बेखौफ़ व ख़तर उन काफ़िरों के दरमियान गये और उन्हों राहे हक़ की दावत दी। लोगों ने कहा , ऐ हूद अ 0 पहली मार में तुम बच गये लेकिन इस बार तु्म्हे ख़त्म करके ही दम लेगें , वरना अपनी इस तबलीग़ से बाज़ आ जाओं। हूद अ 0 ने फरमाया कि यह तुम्हारे हक़ में बेहत्तर होगा कि तुम अपने साब़िक़ा गुनाहों की तौबा कर लो और सीधे रास्ते पर आ जाओ वरना मेरा खुदा जहां रहीम व करीम है वहां क़हार व जब्बार भी है। हज़रत हूद अ 0 की इस गुफ़त्गू में वह एतमिनान व दबदबा था कि मुलहदीन के दिलों में वह खोफ पैदा उआ कि वह वहां से भाग खड़े हुए और अपनी क़ौम के सरदारों से मारा माजरा बयान किया , चुनांचे एक दिन पूरी क़ौम एक मरकज पर जमा हुई और यह तय पाया कि सब लोग एक साथ मिल कर हूद अ 0 को क़त्ल करदें चुनांचे इस इरादे से वह लोग हूद अ 0 के पास पहुंचे और चाहा कि हमला करके उन्हे क़त्ल कर दें , हज़रत हूद अ 0 ने हालात की नज़ाकत को महसूस किया और एक ऐसा नारा बलन्द किया कि सब के सब दहशत ज़दा होकर मुंह के बल ज़मीन पर गिर पड़े।
इन वाक़ियात को मोतबर रावियों के ज़रिये बहुत से उलेमा और मोअर्रेखीन ने लिखा है। बहरहाल हज़रत हूद अ 0 की तबलीग़ इधर जारी रही और उधर उसके रददे अम्ल में क़ौमे आद के लोगों की सरकशी और नाफ़रमानी बढ़ती गयी चंन्द अफराद के अलावा किसी ने इमान कु़बूल नही किया हांलांकि जनाबे हूद अ 0 इस कौम को हर मन्जिल में मोहकम दलीलों के ज़रिए इस कौम के लोगों को बराबर शिकस्त देते रहें और शिकस्त के नतीजे में यह लोग हज़रत हूद अ 0 को साहिर जादुगर और न जाने क्या क्या कहते रहें।
जह हज़रत हूद अ 0 ने 760 साल तक तवील तबलीग़ी कोशिशों के ज़रिये हुज्जत तमाम कर ली और पानी सर से ऊंचा हो गया तो आपने परवरदीगार से इनपर अज़ाब नाज़िल करने की इस्तेदुआ की।
चुनांचे सबसे पहले ख़ुदा ने इस कौम के लोगों पर चीटियों तो मुसल्लत किया जो इनकी नाक व कान के ज़रिये हलक़ के अन्दर उतर जाती थी और काट काट कर इनहें मौत के हमकिनार कर देती थीं। आखिर कार तंग आ कर इन लोगों ने शहरों की सुकूनत तर्क कर दी और अपनी जान बचाने की गरज़ से माल व पता छोड़ कर दुसरे इलाकों में चले गयें। इस आफत नागहानी के बाद भी जब लोगों की आँखे न खुल सकीं और वह वदस्तूर अपने मसलक पर अड़े रहे तो खुदा ने इन्हें कहत मे मुबतेला किया क्योंकि इनकी ज़िन्दगीयों और ऐश , कोशिशयों का सारा दामोदार ज़राअत पर था। कहत ने जब इन्हे फाका कशी के दहाने पर ला कर खड़ा कर दिया और वह भुखों मरने लगे तो क़ौम के सरदारों ने एक वफ़द मर्सद बिन साद बिन अफीर की क़यादत में हज़रत हूर के पास रवाना किया कि वह इनसे मिलकर बारिश के लिए दुआ का तालिब हों चुनांचे वफ़द हज़रत हूर की खिदमत में हाज़िर हुआ और इन्की गुफ्तगू से मुतास्सिर हो कर पहले अल्लाह की वहदानियत और हूद की नबूवत पर ईमान लाया फिर उसने कहा कि ऐ अल्लाह के नबी आप ख़़ुदा से दुआ कीजिए कि वह हमें इस क़हत से निजात से निजात दे।
हज़रते हूद ने बारिश के लिए दुआ की , और फरंमाया कि परवरदिगार इस गुमराह कौम को एक मौक़ा और दे जवाब मिला कि एै हूद इनसे कह दो कि बस यह आख़री मौक़ा और हैं। ग़रज़ यह कि हज़रत हूद ने इनको हुकमें इलाही से आगाह किया और यह मुजदा सुनाया कि जाओ तुम्हारे शहरों में बारिश होगी। चुनांचे जब वफ़द वापस गया तो उनके शहरों में ऐसी बारिश हुई कि ख़ुश्क ज़मीनें सेराब हो गयीं और सुखी हुई खेती फिर लहलहाने लगी। बाग़ात सरसब्ज़ो शादाब हो गये। लेकिन इस एहसान फरामोश क़ौम के दिल में न हज़रते हूद के लिए कोई जज़बा पैदा हुआ और न उनके तरज़े अमल में कोई तबदीली वाके हुई। बल्कि खुदाए वहदहू लाशरीक के मुक़बिलमें उसकी नाफरमानियां जुरअतें जसारतें और हिम्मतें कुछ और बढ़ गयी लेकिन परवरदिगार इन्हे मोहलत देता रहा और जब यह क़ौम किसी सूरत से राहे रास्त पर न आयी तो मशीयते इलाही को जलाल आ गया और हज़रते हूद को यह हुक्म हुआ कि इन्हें मुकम्मल आज़ाब की खबर दे दो।
इस आख़री अज़ाब की इब्तेदा यूं हुई कि ख़ुदा वन्दे आलम ने इस क़ौम के चारो तरफ रेत व बालू के बुलंद व बाला दीवारें खड़ी करके इसके अंदर इनहें महसुर कर दिया ताकि कोई शख्स राहे फरार इकतेयार न कर सके। अल्लामा मजलिसी अर 0 तहरीर फरमाते हैं कि इस क़ौम के अफराद रेत व बालू के टीलों को हटाते थे मगर वह फिर इनके गिर्द और ऊंचे हो जाते थे और इन टीलों से यह आवाज़े आती थीं ऐ हूद तुम फिक्र न करो यह टीले इनके लिए अज़ाब बन जायेंगे। फिर खुदा ने हवाओ को हुक्म दिया कि वह इस कौम का काम तमाम कर दें। चुनांचे ऐसी तेज़ व तुन्द हवायें चलीं कि जिसने दरख्तों को जड़ो से उखाड़ फेका , पहाड़ो से बड़े बड़े पत्थर आसमान की तरफ बलन्द होते और ज़मीन के सीनों में धंस जाते थें। लेकिन चुंकि हवा इन्तेहाई तेज़ी व शिद्दत के साथ ज़मीन के अन्दर से निकल रही थी। लिहाज़ा वह इन पत्थरों को गेंद की तरह फिर आसमान की तरफ उछाल देती थी। मोअर्रेखीन का बयान है कि यह हवा जो अज़ाब की शक़्ल में क़ौमे आद पर मुसल्लत हुई थी एक हफता रात व दिन चलती रही। यहां तक की पुरी क़ौम नेस्तोनाबुद हो गयी। इनके बाग़ात व मकानात सब खा़क में मिल गये। और पत्थरों के बड़े बड़े किले रेत की शक्ल में तब्दील हो गये बाज़ रवायतों में है कि यह हवा क़ौमें आद के लोगों को ज़मीन व आसमान के बीच बुलन्द करती थी और ऊपर से इस तरह पटकती थी कि इनके जिस्मों की हड्डियां रेज़ा रेज़ा हो जाती थी।
अल्लामा मजलिसी का कहना है कि ज़मीन अहक़ाफ में अब भी क़ौमे आद के मकानात और इनकी हड्डियों के ढांचे रेज़ो की शक्ल में मौजूद हैं। इस हवा का नाम बादे अक़ीम है जो इन्तेहाई तेज़ व तुन्द होती है और जब यह चलती है तो तमाम नबातात को जला कर खाक कर देती है। क़ौमे आद को जडातुल आमाद भी कहा जोता है। क्योंकि इन्होंने पहाड़ो से बड़े बड़े सुतून तराश कर अपने बुलंद मकानों में लगाये थे। इस क़ौम की आबादी वाले इलाकों को एहकाफ़ इसलिए कहा जाता है कि यह ख़ित्ता रेगिस्तानी था और अहक़ाफ के माने रेत हैं और यह अज़ाब क़ौमे आद पर चुंकि चहार शम्बा को नाज़िल हुआ था। इसलिए ख़ुदा ने इसको रोज़े नहस मुसतमिर किया है। जब मोतसिम का दौर आया तो उसने इस एलाक़े के एक मक़ाम बर्तानिया में एक कुंआ खुदवाया मगर 300 गज़ खुदवाई के बावजुद इसमें पानी न निकला आखिर तंग आकर इसने खुदाई बन्द कर दी। और अपना इरादा तर्क कर दिया फिर जब मुतावक्किल का ज़माना आया तो इसने इस कुऐं की अस्सरे नौ ख़ुदाई शुरु करायी।
चुनांचे ख़ुदाई करते करते एक पत्थर की चट्टान नज़र आयी और जब इसको तोड़ा गया तो इसके अंदर से हवाएं सर्द का झोंका बाहर आया जिसने तमाम लोगों को हलाक कर दिया और जितने भी इस कुऐं के आस पास थे सब के सब मौत के घाट उतर गये। जब यह ख़बर मुतवक्किल को मालूम हुई तो वह सख्त हैरान हुआ और उसने तमाम उलमा को जमा करके उइनसे इसके बारे में दरियाफत किया लेकिन कोई कुछ न बता सका। आखिर कार इमामे अली नक़ी को सारे हालात से आगाह किया तो आपने तहरीर फरमाया कि यह जगह कौमे आद के शहरों की है। जो हवाएं तुन्द से हलाक हो गये इसलिए कि जब खुदा ने हज़रत हूद अ 0 को उनकी तरफ भेजा तो उन्होने तकज़ीब की और ख़ुदा की नाफरमानी करते रहे तो खुदा ने उन पर हवा का अज़ाब मुसल्लत किया जिसने उनकी पूरी क़ौम को हलाक कर दिया। हज़रते हूद अ 0 के साथ वही लोग इस अजाब से महफूज़ रहे जो ईमान कुबूल कर चुके थे।
रवायतो से यह पता भी चलता है कि वक्ते अज़ाब हज़रते हूद ने परवरदिगार के हु्क्म से एक बहूत बड़ा हेसार खैंचा था और जो लोग अल्लाह की वहदानियत पर ईमान ला चुके थे इन्हे लेकर वह इसी हिसार में दाखिल हो गये थे। हज़रते इमामे अली अ 0 का कौल है कि हवा की पाँच किस्में है जिनमें से एक का नाम बादे अक़ीम और मे इस की शर से ख़ुदा की पनाह तलब करता हुँ तारीखों की किताबों से यह पता तो चलता है कि हज़रते हूद अ 0 ने 760 सालों तक कारे तब्लीग़ अन्जाम दिया लेकिन यह पता नही चलता कि आपकी वफात के वक्त आप की मजमुई उम्र क्या थी और मुफस्सेरिन व मोअर्रेखीन के दरमियान इस अम्र मे इखतेलाफ है कि आप कहा दफन हुए बाज़ का बयान है कि हज़रे मौत के किसी ग़ार में है। बाज़ का कहना है कि मक्के में हजरे इसमाइल के आस पास मदफुन है।
हज़रत इमामे हसन अ 0 का क़ौल है कि मेरे वालिद हज़रत अली अ 0 ने बादे अज्ज़रबत मुझसे फरमाया था कि मुझको नजफ में मेरे भाईयों हूद और सालेह के दरमियान दफन करना।
शेख तुसी और इब्ने बाबुबिया का बयान है कि एक शख्स अब्दुल्ला बिन कलाबा का उँट खो गया था। वह इस अदन के सहराओं और बयाबानो मे तलाश करता फिर रहा था कि अचानक उसकी नज़र एक शहर पर पड़ी जो खुबसुरती में अपनी मिसाल आप था। इस शहर के चारो तरफ एक फसील थी जो बेश कीमत जवाहेरात से मुज़ैयन थी। इस फसील के अन्दर बहुत से कस्र बने थे और उन कस्रो पर उंचे उंच परचम लहरा रहे थे।
अब्दुल्ला बिन क़लाबा शहर के क़रीब आया और फ़सील के साये में मुक़ीम हो गया। वह तीन रोज़ तक वहां क़याम पज़ीर रहा लेकिन उसने न तो किसी को शहर के अन्दर जाते देखा और न शहर के बाहर आते देखा। चुनांचे उसको यह जुस्तु जु हुई कि आखिर यह माजरा क्या है और इस शहर की खामोशी का राज़ क्या है। इसने शहर मे दाखिल होने का इरादा किया और तलवार नियाम से बाहर निकालकर फ़सील के किनारे किनारे एक तरफ चल पड़ा। थोड़ी दुर चलने के बाद इसे दो बुलन्द क़ामत दरवाज़े नज़र आये जो इन्तेहायी खुश्बुदार लकड़ी से बने थे। और इन्हे ज़र्द और सुर्ख रंग के याकूत से मुरस्सकिया गया था। अब्दुल्ला यह हाल देखकर हैरत व इस्तेजाब के आलम में कुछ देर चुप चाप खड़ा रहा। फिर एक दरवाज़ा खोलकर अन्दर दाखिल हो गया था। यह देख कर सख्त तअज्जुब में मुब्तेला हुआ वहां जितनी भी इमारतें है सब की सब याकूत के सुतूनों पर क़ायम है और हर इमारत पर एक बाला खाना है। जो तेला व नुक़रा मखारीद याकूत व ज़मर्रुद से बनाया गया है और इमारतका फर्श मुश्कओ अम्बर से बना है लेकिन किसी मतानफ़िस का दूर दूर तक पता नहीं है। वह यह वीरानी देख कर कुछ खौफ़ ज़दा हुआ फिर इसने इन इमारतों के अतराफ में नज़र डाली बहुत से चमन व खुबसुरत बाग़ात दिखायी दिये। जो फूलों और फलों से लदे हुए थे और जां बजां दूध की तरह साफ व शफ्फाफ नहरे जारी थी। ग़र्ज़ कि मोतियों और ज़ाफरान व मुशको अम्बर से अपना दामन भरा और खामोशी से बाहर आ गया। दुसरे रोज़ वह अपने नाक़े पर सवार हुआ और जिधर से आया था। उधर रवाना हो गया।
जब अब्दुल्ला अपने घर पर पहुंचा तो उसने सारा माजरा लोगों से बयान किया जिसे सुनकर लोग हैरत ज़दा हो गयें। रफता रफता यह ख़बर माविया तक पहुंची। तो इसने हाकिमे सनआ के पास अपना एक क़ासिद रवाना किया और अब्दुल्ला बिन क़लाबा को तलब किया जब वह आया तो माविया ने ख़लवत में इससे सारा हाल मालूम किया अब्दुल्ला ने जो कुछ अपनी आंखो से देखा था बयान कर दिया। फिर माविया ने क़ाबुल अहवार नामी एक शख्स को तलब किया जो साबेका बातों का इल्म रखता था। जब का़ब आया तो माविया ने इससे पूछा कि क्या तुमने ऐसे किसी शहर का हाल किसी से सुना या किताबों में पढ़ा है जो सोने और चाँदी और जवाहरात से बना हो और इसकी इमारतें याकूत व ज़र्मरुद के सुतूनों पर क़ायम हो और इसके अन्दर दूध की तरह साफ व शफ़फ़ाफ नहरे जारी हों। काब नें कहा हां इस शहर को शद्दाद पिसरे आद ने बनाया था और इरमें ज़ातुल माद यही है जिसका तज़केरा ख़ुदा ने कुराने मजीद में किया है और इसके वस्फ़ में कहा है कि लम युख़लोको मिसलोहा फिल बेलाद यानी इस शहर का मिस्ल और कोई शहर नही है। माविया ने कहा कि इसका मुफस्सल हाल बयान करो। इसने कहा कि आद क़ौमे हूद से था। इसके दो बेटे थे। एक का नाम शदीद था और दुसरे का नाम शद्दाद था जब आद ने रेहलत की तो शद्दाद बादशाह हुआ और ख़ुदा ने सल्तनते अज़ीम इसको अता की।
शद्दाद को किताबों के मुतालेआ का बेहद शौक था चुनानंचे जब इसने बहिश्त का ज़िक्र पढ़ा और इसकी इमारतों के कसरों के हालात से आगाह हुआ तो इसने हुक्म दिया कि खुदा की बेहिश्त के मुका़बले में वैसी ही बेहिश्त मेरे लिये दुनिया में तैयार की जाये। सौ आदमी इसके बनाने पर मामूर हुए और हर आदमी को उसके हज़ार मद्दगार मोहय्या किये गये। लोगों ने कहा कि इतना सोना चांदी और जवाहेरात कहां से मोहय्या होगा। शद्दाद ने कहा कि क्या तुम नहीं जाते कि सारी दुनिया मेरे कब्ज़े में है। कहा जानते हैं। शद्दाद ने कहा कि सोने चांदी और जवाहेरात कि कानों में अपने आदमी मुक़र्रर करो जो इन आशिया की फ़राहमी करें। इसने इन तमाम सलातीने ममलेकत के नाम फरमान जारी किये दस बरस में सोना , चांदी और जवाहेरात जमा किये गये। और तीन सौ बरस में जन्नते शद्दाद बन कर तैयार हुयी।
जब शद्दाद को यह इत्तेला दी गयी कि तेरे हुक्म के मुताबिक़ बेहिश्ते अर्ज़ी बनकर तैयार हो चुका है। तो शद्दाद अपने लशकर और अहले ममलेकत के हमराह इसका मोआयना करने की गरज़ से रवाना हुआ और जब वह बेहिश्त के क़रीब पहुंचा तो हक्क़े तआला ने इस पर और इसके तमाम हमराहियों पर एक ऐसी सदा आसमान से नाज़िल की कि वह सब के सब हलाक हो गये। न शद्दाद खुद इस बेहिश्त में दाखिल हो सका न ही उसके साथियों को इसमें दाखिला होना नसीब हुआ। जिसका नाम इरमें जातुल आमाद है। अल्लामा मजलिसी का बयान है कि इस वक्त शद्दाद की उम्र नौ सौ साल की थी।
हज़रते सालेह बिन अबीद बिन आसिफ बिन रासिख़ बिन अबीद बिन आमिर बिन समूद निन इरम बिन साम बिन नूह अ 0 हज़रते नूह की दसवीं पुश्त में मुतवल्लिद हुए। जब तक आप हयात रहे अपने लिए कोई घर नहीं बनवाया। आप का हुलिया मुख़तलिफ़ किताबों में अलग-अलग अन्दाज़ में मोअर्रेख़ीन ने तहरीर किया है। जिसकी मजमुयी सूरत यह है कि आप का क़द लम्बा चेहरा बेज़ावी पेशानी कुशादा आंखें बड़ी जिस्म फ़रबे और रंग गोरा था। और आप हमेशां बरहेना पैर रहते थे।
आप बचपन ही से बड़े ज़ाहिद व मुत्तकी व परहेज़गार और इबादत गुज़ार थे परवरदिगार ने सोलह बरस की उम्र में सन्सबे नबूवत पर फाएज़ कर दिया और उसी वक्त से आप कारे तबलीग़ की अन्जाम देही में मसरुफ़ हो गये। जिसका सिलसिला 120 साल तक जारी रहा। खुदा ने आपको क़ौमें समूद पर मबऊस फरमाया था। जो वादियेक़रा से तेरह किलो मीटर की दूरी पर हजर नामी एक मक़ाम पर आबाद थीं और इसका हल्क़ए मस्कन न सिर्फ हजर बल्कि दूर दराज़ तक फैला हुआ था।
यह क़ौम बुत परस्त थी और 70 बुतों को अपना ख़ुदा तस्लीम करती थी। जब सालेह इस क़ौम को मुद्दतों बुतपरस्ती से मना करते रहे और समझाते रहे कि तुम लोग उस खुदा की इबादत करो जो याफ्ता व लाशरीक है। और जिसके सिवा कोई माबूद नहीं है। लेकिन जब यह लोग न मानें और हज़रते सालेह इनके जाहिलाना अफ़आल से आजिज़ आ गये तो उन्होंने पूरी क़ौम के सरदारों को जमा किया और फरमाया कि मैं तुम लोगों जिहालत से तंग आ चुका हूं। अब सिर्फ यह सूरत रह गयी है कि हमारे तुम्हारे दरमियान अमली मुनाज़ेरा हो। यानी तुम लोग हमसे सवाल करो और इस सवाल को हम अपने ख़ुदा से पूरा करा दें तो तुम लोग ईमान ले आओ या फिर हमें इजाज़त दो कि हम तुम्हारे ख़ुदाओं से सवाल करें और वह उसे पूरा कर दें। तो हम अपने चंद साथियों के साथ तुम लोगों से किनारा कश हों जायें। और किसी दूसरी जगह चले जायेंगे। लोगों ने कहा कि तुम्हारी यह बात दुरूस्त है। मुनासिब होगा कि ईद के मौक़े पर यह मारका आराई हो जाये।
चुनांचे जब ईद का मौक़ा आया तो क़ौमे समूद की सरबरआवुरदा अफ़राद अपने बुतों को नहला धुला कर एक जंगल में ले गये। और इनके साथ ही वह लोग खाने पीने का सामन भी ले गये। और जब ईद की खुशियां मना चुके तो हज़रते सालेह को बुलवाया और उनसे कहा कि वह उनके ख़ुदाओं से सवाल करें इन्हें पूरा यक़ीन था कि सालेह का हर सवाल पूरा होगा। क्योंकि इनके ख़ुदाओं में अकसर शैतान हुलूल कर जाता था। जो इन बुत परस्तों को गुमराही के रास्ते पर कायम रखने के लिए इनसे बातें किया करता था। और इन्हें तरह तरह की झूठी तसल्ली दिया करता था। मगर अल्लाह के नबी के सामने शैतान की क्या मजाल थी कि वह उन बुतों में हुलूल करता। या इनकी ज़बान में बातें करता।
ग़र्ज़ कि हज़रते सालेह इन बुत परस्तों के बड़े बुत के पास गये और इसके नाम से इसे आवाज़ दी। लेकिन कोई जवाब न मिला फिर लोगों ने कहा कि दूसरे बुत को पुकारों आपने इसे भी आवाज़ दी वह भी खामोश रहा यहां तक कि जनाबे सालेह ने उन्होने एक एक कर के देकर बुतों को मुख़ातिब करना चाहा मगर कोई न बोला तब आपने फरमाया कि तुम्हारे यह खुदा गूंगे हैं , बहरे हैं , बेजान हैं और मजबूर हैं। जब यह मेरी आवाज़ पर बोल नहीं सकते हैं तो यह मेरा सवाल कैसे पूरा कर सकते हैं। फिर आपने फरमाया कि अब तुम सब लोग मुझसे मिल कर अपनी ख्वाहिशों को ज़ाहिर करो मैं इन्शाअल्लाह अपने खुदा से ज़रूर पूरी करा दूंगा। इस पर लोगों ने कहा कि ऐ सालेह इस वक्त हमारे खुदाओं को न जाने क्या हो गया जो ख़ामोश हैं तुम हमें एक मौक़ा और दो ताकि हम इन्हें राज़ी कर लें। चुनान्चे हज़रते सालेह ने इन्हें मोहलत दी और वापस चले आये। चन्द दिनों के बाद फिर पूरी कौम इकट्ठा हुई बुतों के सामने फर्श बिछाया गया और सब के सब इस पर लोटने लगे। जब लोटते लोटते थक कर बेहाल हो गये तो उन लोगों ने फरियाद ओ ज़ारी शुरू की और कहा कि ए हमारे ख़ुदाओं हमें ज़लील और रूसवा न करो। सालेह को जवाब दो वरना हम मुंह दिखाने के क़ाबिल न रहेंगे। इतने में किसी बुत के अन्दर छिपे हुए शैतान ने ज़ोरदार क़हक़हा बुलन्द किया जिसका मतलब लोग यह समझे कि इनके खुदाओँ ने अपनी रज़ा मन्दी ज़ाहिर की है। उन्होंने फौरन हज़रते सालेह को बुलवाया और कहा कि हमारे खुदा हमसे राज़ी हो गये हैं। अब आप इनके सामने अपनी ख़वाहिश बयान करें। हज़रते सालेह ने साबेक़ा अन्दाज़ से फिर बुतों को मुख़ातिब करना शुरू किया। मगर नतीजा कुछ न निकला और सिवाये खामोशी के कोई जवाब न मिला। तो हज़रते सालेह ने फलमाया की मेरी हुज्जत तमाम हो चुकी है। अब तुम लोगों को चाहिए कि तुम अपनी ख्वाहिश बयान करो और मैं अपने खुदा से पूरी करा दूं मगर शर्त यह कि अगर तुम्हारी ख्वाहिश पूरी हो जाये तो तुम्हें मेरे खुदा पर ईमान लाना होगा।
चुनान्चें अरबाबे समूद ने अपनी क़ौम के बुजुर्ग व मोअतबर 70 आदमी इस बात के लिए मुन्तखब किए कि वह हज़रते सालेह से सावाल करें और अगर वह पूरा हो जाये तो पूरी क़ौम इनका मसलक कुबूल कर ले। ग़्रज कि वह 70 अफराद हज़रते सालेह को एक पहाड़ की तरफ ले गये और वहां उनसे कहा कि अपने खुदा से कहो कि इस पहाड़ी से एक सुर्ख़ रंग की उटनी पैदा करे। जो दस माह की हामला हो। और जिसकी लम्बाई एक मील की हो।
हज़रते सालेह ने फरमाया कि यह काम मेरे लिए मुश्किल और दुशवार हो सकता है लेकिन मेरे परवरदिगार के लिए बहुत आसान है फिर आपने दुआ के लिए हाथ बलन्द किये और पहाड़ की तरफ इशारा किया अभी दुआ तमाम न हुई थी कि पहाड़ पर एक ज़लज़ला तारी हुआ और के मुहीब आवाज़ के साथ उसमें शिगाफ पैदा हुआ जिससे ऊटनी का सर बाहर निकला देखते ही देखते एक चीख के साथ वह बाहर आ गयी।क़ुतरत का यह करिशमा देखकर सब लोग हैरान रह गये और हज़रत सालेह से कहने लगे कि तुम्हारे परदिगार ने बेशक हमारी बात मान ली। और महारी ख्वाहिश पूरी हुई। अब इससे कहो कि वह हमें इस ऊटनी के शिकम से बच्चा पैदा कर के भी दिखाये। हज़रते सालेह ने फिर दुआ कि और उसी वक्त इसके शिकम से बच्चा पैदा हुआ।
इसके बाद जनाबे सालेह ने क़ौम समूद के लोगों से फरमाया कि अगर और कोई ख्वाहिश है तो उसे भी बयान करो उन्होंने कहा कि नहीं हम मुतमइन हो गये। बेशक तुम्हारा खुदा सच्चा और इबादत व इताअत का मुसतहक़ है अब तुम इस ऊटनी को लेकर हमारी क़ौम के पास चलो ताकि जो कुछ हमने देखा है वह और लोगों से बयान करें और इन्हें तरग़ीब दें कि वह लोग भी ईमान ले आयें हज़रते सालेह अपने नाक़े के हमराह इनके साथ चल पड़े लेकिन रास्ते ही में 70 आदमियों के दरमियान इख़तेलाफ पैदा हुआ और 64 अफराद फिर मुतद हो गये और इस करिश्मये कुदरत को हज़रत सालेह के सेहरओ जादू से ताबीर करने लगे सिर्फ 6 आदमी बाक़ी रहे लेकिन बाद में इनमें से भी एक शख्स शक व शुब्हे में मुब्तेला होकर इमान से फिर गया।
इस बाहमी इखतेलाफ का नतीजा यह हुआ कि क़ौमे समूद में से चंद लोग ईमान लाये बाक़ी लोगों ने यह कह दिया कि यह सब जादू है। हम अपने खुदाओं को नही छ़ोड़ सकते हैं।
हज़रते सालेह ने हुक्मे इलाही के मुताबिक़ अहले समूद के दरमियान यह एलान कर दिया था कि तुम्हारी वादी का पानी एक रोज़ मेरा नाक़ा पियेगा और दूसरे दिन तुम्हारे जानवर सेराब हुआ करेंगे। मोअर्ख़ीन का बयान है कि नाक़ा अपनी बारी पर सारी वादी का पानी पी जाता था और इस क़द्र दुध देता था कि पूरी क़ौम इससे सेराब होती थी। फिर कुछ सरकशों ने बाहम यह मशवेरा किया कि इस ऊंटनी को ख़त्म कर देना चाहिए। क्योंकि इसकी वजह से हमारे जानवरों को दीसरे दिन पानी मिल पाता है और जब तक यह ज़िन्दा रहेगी उस वक्त तक यही होता रहेगा। बाज़ मोअर्रेख़ीन का कहना है कि इस काम के लिए क़ौमे समूद के सरदारों ने कुछ इनाम भी मुकर्रर किया।
चुनांचे क़ेताम नामी एक औरत के एक आशिक़ क़ेदार जो वलदुज़्ज़ेना था अपने साथियों की मद्द से ऊटनी को उस वक्त पै कर दिया जब वह वादी से पानी पी कर वापस आ रही थी वह पहलू के भल ज़मीन पर गिरी और ख़ून में लोटने लगी फिर उस ज़ालिम नें उसे ख़त्म करके इसका गोश्त क़ौम के लोगों में तक़सीम कर दिया। ऊंटनी के बच्चे ने जब अपनी मां का यह हाल देखा तो वह भाग कर पहाड़ पर चढ़ गया। और आसमान की तरफ मुंह उठाकर खुदा से फरियादो ज़ारी करने लगा। जिसके नतीजे में ग़ैज़ै इलाही जुम्बिश में आया।
बजरिया वही हज़रते सालेह को हुकम हुआ कि ऐ सालेह इन ज़ालिमों को अज़ाब की ख़बर दे दो। और इनसे कह दो कि मेरी तरफ से इन्हें तौवा के ले तीन दिन का मौक़ा दिया जाता है वरना यह लोग अज़ाब में मुब्तेला होंगे। जिसकी अलामत यह होगी कि कल सुबह तक इनके चेहरे ज़र्द हो जायें फिर दूसरे दिन सुर्ख और दीसरे दिन सियाह हो जायेंगे। अगर इस पर भी इन लोगों ने तौबा न की तो यह पूरी क़ौम के घाट उतर जायेगा।
चुनान्चे इस खुदाई फैसले से हज़रते सालेह ने अहले समूद हो आगाह किया लेकिन वह लोग अपनी सरक़शी पर अड़े और सालेह की बातों पर कोई तवज्जहू न दी बल्कि इनका मज़ाक उड़ाया। ग़रज़ कि रात गुज़रने के बाद जब दूसरे दिन सुबह हुई तो अहले समूद के चेहरे ज़र्द थे। कुछ ने कहा कि सालेह की बतायी हुई पहली अलामत ज़ाहिर हो चुकी है। अब हमें क्या करना चाहिए। कुछ ने काह कि यह भी सालेह का एक जादू है जिसके जरिये वह चाहते हैं कि हम उनका कहना मान लें और अपने ख़ुदाओं को छोड़ दें लिहाज़ा इस पर हमें ध्यान नहीं देना चाहिए।
दूसरे दिन सुबह के वक्त इनके चेहरे सुर्ख हुए। तो कुछ लोग तशवीश में मुबतेला हुए। और कुछ ने कहा कि हम इस फरेब में मुब्तेला होने नहीं। दीसरे दिन इनसे चेहरे सियाह हो गये मगर इस सरकश क़ौम ने की परवाह न की और कहा कि ख़्वाह हमारी जानें चली जायें लेकिन न हम तौबा करेंगे और न ही हम सालेह की बात पर तवज्जो देंगे।
और हुज्जत तमाम हो चुकी थी। इसलिए कुदा की तरफ से अज़ाव में कोई ताख़ीर भी न थी। चुनान्चे तीसरा दिन गुज़कर कर जपब रात आयी और लोग अपने अपने घरों में सो गये तो निस्फ़ शब को एक आवाज़ गूंजी ऐसी भयानक आवाज़ कि जिससे कानों के प्रर्दे फट गये। दिल टुकड़े- 2 और जिस्म पारा पारा हो गये और जब सुबह हुई सतो वह तमाम अहले समूद जो ना फ़रमान और सरकश ते अपने अपने घरों में मुर्दा पड़े थे। फिर आसमान से एक शोला उतरा जिसने इनकी लाशों को राक के ढेर में तब्दील कर दिया सिर्फ वही लोग बचे जो सालेह और उनके कुदा पर ईमान ला चुके ते। तबली का कहना है कि यह क़ौम शाम और यमन के दरमियानी हिस्सा यानी होजाज़ और हरमैन में आबाद थी। और ख़ुदा ने इसपर बिजली और ज़ल्ज़ले का अज़ाब नाजिल किया।
अल्लामा मजलिसी हयातुल कुलूब में काबुल अहबार से रवायत करते हैं कि जब क़ौमे समूद ने यह तय किया कि नाक़े को पै कर दिया जाना चाहिए। तो कोई शख्स हमें ऐसा हिम्मत और दिलेर नहीं मिलता था जो इस काम के अन्जाम दे सके। क़दार को क़ेताम नामी एक औरत ने इस काम पर तैयार किया जो इसकी मासूक़ा थी और अपने वक्त की हसीन व जमील औरतों में इसका सुमार होता था।
यानी मोअर्रेख़ीन का खयाल है कि (रस) वह कुआं है जो मक्के के रास्ते में वाक़े है। इस कुऐं से कुछ फासले पर एक दरिया था और इस दिरिया के किनारे वह अस्हाबे रस की बस्ती कहलाती थी। यह लोग इन्तेहाई खुन्ख़्वार सरकश और जाहिल थै। हज़रते सालेह अनपी तब्लीग़ के इब्तेदाई दौर में लोगों की हिदायत के ले अपने नुमाइन्दे भी भेजा करते थे। चुनान्चे भेजा जिसे इन लोगों ने कत्ल कर दिया फिल दूसरा भेजा वह भी कत्ल कर दिया गया। यहां तक कि तीन नुमाइन्दे यके-बा-दीगरे क़त्ल कर दिये गये तो आपने चौथा नुमाइन्दा भेजा और इसके साथ अपना एक वली भी बेजा चुनान्चे एत दूसरे की मदद से यह लोग महफूज़ रहें और कारे हिदायत अन्जाम देते रहे मगर असहाबे रस की खूंखार सरिश्त पर इनकी हिदायत का को ई असर न हुआ उन्होने ख़ुदा की इताअत कुबूल करने से इनकार किया और कहा कि हमारा खुदा दरिया में रहता हैरजिसे हम सजदा करते हैं और वह साल में ईद के मौके पर ज़ाहिर होता है।
हज़रते सालेह के वली ने कहा कि मैं अपने ख़ुदा का एक हक़ीर बन्दा हूं लेकिन अगर तुम्हारा कुदा मेरी इताअतरफरमाबरदारी करने लगे तो क्या तुम लोग मेरे ख़दा की इताअत कुबूल कर लोगें असहाबे रस ने का कि अगर ऐसा हुआ तो हम तुम्हारे ख़ुदा पर ईमान ले आयेंगे। इस परवलीये सालेह ने कहा कि अच्छा तो ईद के दिन फिर आऊंगा। ईद का मौक़ा आया तो दोनों नुमाइंदै वहामं पहुंचे असहाबे रस दरिया के किनारे जमा ते। यह लोग भी वहां बैठ गये.और असहाबे रस के ख़ुदा का इन्तेज़ार करने लगे।
थोड़ी देर में एक देव पैकर मछली नमूदार हुई जो चार मछलियों पर सवार ती असहाबे रस इसे देखते की सजदे में गिर पड़े और अपनी अपनी मुरादें मांगने लगे हज़रते सालेह के वली ने इस मछली से कहा कि ऐ मछली बहुकमे ख़ुदा तू मेरे पास चली आ वह अपनी सवारी के साथ मेरे पास आ वह चारों मछलियों से साथ इनके पास आ गयी। फिल कहा कि वापस जा और दरिया में ग़र्क हो जा। वह वापस हुई और तरिटया की तह में ग़्रर्क हो गयी लेकिन असहाबे रस यह सब कुछ अपनी आंखों से देखने के बावजूद ईमान नहीं लाये बल्कि इन लोगों ने हज़रते सालेह के वली की तकज़ीब की और इन्हें जादूगर ठहराया जिसके नतीजे में वह अज़ाबे इलीहरी का शिकार हुए एक तेज़ और तुन्त हवा का तूफान आया जिससे असहाबे रस को मैं इनके मवेशियों समैत तरिया में ग़र्क़ कर दिया। और इनके वजूदसे दामने गेती को पाक कर दिया इसके बाद हज़रत सालेह के दोनों नुमाइन्दे इस कुएं के पास पहुंचे जिसका नाम रस था। और इसके अन्दर असहाबे रस का सोने और चांदी का खज़ाना था जिसे इन लोगों ने निकाला और जो लोग ईमान लाने की वजह से तूफ़ान की ज़द से बच गये ते इनके दरमियान तक़सीम कर दिया और हज़रते सालेह की खिदमत में वापिस आ गये।
तबरी का कहना है कि इन दोनों अज़ाबों के बाद हज़रते सालेह वह मकान छोड़ कर पिलस्तीन की तरफ़ उन लोगों के साथ हिजरत कर जो ईमान ला चुके थे।
आम मोअररेखीन का खयाल है कि आप का इन्तेक़ाल मक्का – ए- मोअज़्ज़मा में हुआ और वहीं आप दफ़न भी हुए। लेकिन अइम्मए अहलेबैत की मोअतबर रवायात से यह वाज़ेह होता है कि आप नजफ़े अशरफ (इराक़) में मदफून हुए और आप की क़ब्र वहीं है। जैसा कि इमामे हसन अ 0 से ज़रबत लगने के बाद अमीरल मोमेनीन हज़रते अली 0 ने फरमांया था कि मुझे नजफ में हज़रते हूद और हज़रते सालेह के दरमियान उस क़ब्र मे दफन करना जो हज़रते नूह की बनायी हुई है। इस तरंह आप की उम्र के बारे में भी इख़तेलाफ है। किसी ने 58 साल और किसी ने 85 साल किसी ने 180 साल किसी ने 200 साल और किसी ने 250 साल बतायी है। मेरे नज़दीक आखरी क़ौल तहक़ीक शुदा और दुरुस्त है।
नाक़ेय सालेह और हज़रत अली 0 के वाक़ेयात में मुताबेक़त
नाक़ेय सालेह को जब हम वाक़ेयाते अलवी के आइने में देखते है तो दोनों में हैरत अंगेज़ मुताबेक़त नजर आती है।
1. नाक़ेह सालेह अगर अल्लाह की निशानी था तो अमीरल मोमेनीन भी आयतुल्लाह थे।
2. नाक़ेह सालेह अगर पहाड़ के पत्थरो के पहाड़ से नमूदार हुआ तो हज़रत अली भी पत्थरो से बनी इस अज़ीम इमारत मे पैदा हुए जिसका नाम काबा है।
3. नाक़ेह सालेह के दूध से अगर लोग सेराब होते थे तो हजऱत अली के चश्मए इल्म भी लोगो को सेराब करता था।
4. नाक़ेह सालेह को अगऱ पै किया गया तो हज़रत अली अ 0 को भी शहीद किया गया।
5. नाक़ेह सालेह को पै करने वाला क़ेदार अगर वलदुज़्ज़ेना था तो हज़रत अली अ 0 का क़ातिल इब्ने मुल्जिम भी ज़ेनाज़ादा था।
6. अगर क़ेदार पस्ता क़द और करंजा था तो इब्ने मुल्जिम भी पस्ता क़द और करंजा था।
7. नाक़ेह सालेह को अगर क़ित्ताम नामी औरत के इश्क में पै किया तो हज़रत अली को क़ित्ताम नामी औरत के आशिक़ ने कत्ल किया।
8. नाक़ेह सालेह के पै होने पर अगर खुदा की तरफ से अज़ाब नाज़िल हुआ तो वारिसे अली का ज़हूर भी दुश्मनाने आले मोहम्मद के लिए अज़ाब होगा।
9. अगर हज़रते सालेह की क़ब्र नजफ में है तो हज़रत अली अ 0 का मज़ारे अक़दस नजफ में है।
10. अगर हज़रते सालेह बरोज़े हश्र अपने नाक़े पर सवारर होंगे तो हजरत अलीअ 0 भी नाक़ए जन्नत पर सवार होकर बरामद होंगे।
11. रसूलअल्लाह स 0 ने हज़रत अली से पूछा कि ऐ अली क्या तुम जानते हो कि पहले के लोगो मे बदबख़्तरीन इन्सान कौन था। हज़रत अली ने फरमाया कि ऊटनी की कोचें काटने वाला। फिर आप ने दरियाफ़त किया कि आखिरी लोगों में बदबख़त तरीन लोग कौन है ?फिर अर्ज़ किया कि यह खुदा और उसका रसूल बेहतर जानता है। रसूल अल्लाह ने फ़रमाया कि यह वह शख्स़ होगा जो तुम्हारे सर पर ज़रबत लगायेगा और तुम्हारी दाढ़ी को तुम्हारे खून से ख़ेज़ाब करेगा।
एक सवाल के जवाब में हज़रत इमामे हसन अ 0 ने फ़रमाया कि अल्लाह की मखलूक़ मे सात चीज़े ऐसी हैं जो बत्ने मादर से नहीं पैदा हुई-
1. आदम़
2. हव्वुआ
3. नाक़ए सालेह
4. गोस्फंदे इब्राहीम
5. मारे बेहिश्त
6. शैतान
7. किलाग़ हाबील और क़ाबील यानी कौआ।
नसब- हज़रत इब्राहीम बिन नाहूर बिन सारूग़ बिन अरग़वा बिन फ़ालिग़ बिन आबिर बिन शलिख़ बिन क़िनान बिन अरफशद बिन साम बिन नूह अ 0
विलादत – हज़रते नूह से 2040 साल बादनमरूद बिन क़ेनआन के दौरे हुकूमत में आप कूफ़े (इराक) के नवाह में कोसारिया नामी गांव के एक ग़ार में मुतावल्लद हुए। आपकी जाए विलादत के बारे में बाज़ मोअर्रेख़ीन ने बाबुल और बाज़ ने एहवाज़ भी तहरीर किया है। लेकिन मेरी तहक़ीक़ के मुताबिक़ कूफ़ा ज्यादा दुरूस्त है। ग़ार में प की विलादत का वाक़ेया यूं बयान किया जाता है कि आपव का बुत साज़यो बुत परस्त चचा जिसका नाम (आज़र) था। नमरूद के दरबार में साही ज्योतिषि के मंसूब पर फाएज़ था और मुस्तक़बिल में आने वाले हालात के बारे में पेशिनगोइयां किया करता था। एक दिन उसने अपने इल्मे नजूम के ज़रिये नमरूद को यह ख़बर दी कि तेरी हुकूमत में ऐसा बच्चा पैदा होने वाला है जो तेरी बिसात उलट कर तेरी तबाही और हलाकत का सबब बनेगा।
नमरूद चूंकि आज़र की बात पर यक़ीन व भरोसा करता था इसलिए इसने अपनी हुकूमत में हर तरफ मनादी करा दी कि आज की तारीख से कोई मर्द अपनी रत के साथ मुक़ारेबत नहीं करेगा। जो औरत हामिला हो उसका हमल फौरी तौर पर गिरा दिया जाये। और जो बच्चा पैदा हो उसी क़त्ल कर दिया जाये। इस नमरूदी फरमान पर सख़्ती से अमल हुआ और हज़ारो मर्द व रतों को मुक़ारेबत के जुर्म में कैद कर लिया और हर नवज़इदा मासूम बच्चा मौत के घाट उतार दिया गया।
इसी ज़माने में मादरे इब्राहीम बी हामेला थीं मगर खुदा की कुदरत से इनका हमल ज़ाहिर न हुआ। यहां तक कि जब हज़रते इब्राहीम अ 0 की विलादत का वक्त करीब आया आप पर वज़ये हमल के आसार मुरत्तब हुए और दर्दे जेह में मुब्तेला हुईं। तो आप ने घर से बाहर निकल कर पहाड़ के एक ग़ार में पनाह ली और वहीं हज़रते इब्राहीम अ 0 पैदा हुए। विलादत के बात इस ख़ौफ से कि बच्चा कहीं क़त्ल न कर दिया जाये। दूसरे दिन हज़रत इब्राहिम अ 0 की वालिदा ने इन्हें खुदा के हवाले किया और ग़ार का दहाना एक पत्थर से बन्द करके पने घर वापस आ गयी।
हज़रते इब्राहीम अ 0 के सामने यह पहली इम्तेहानी मंज़िल थी जब आप ग़ार की तन्हायी में अपनी मां की आग़ोशे तरवियत और दूध से महरूम हो गये। लेकिन चूंकि नबूवत का ताज प के सर पर रखा जाने वाला था। इसलिए कुदरत ने अपने इन्तेज़ामें कास से आपके दाहिने हाथ के अंगूठे से एक दूध का चश्मा जारी किया जिससे आप सिकम सेर होने लगे। इस दूध में कूवते नमूं इस क़द्र ज़्यादा थी कि बच्चा एक माह में जितना बढ़ता है. हज़रते इब्राहीम एक दिन में इतना ही बढ़ते थे। ममता से मजबूर होकर कभी- 2 आप की वालेदा भी लोगोंम की नज़रें बचा कर ग़ार में तशरीफ ले जातीं और अपने बच्चे को दूध पिला कर नीज़ प्यार वग़ैरा कर के वापस चली आती थीं। सवा साल के अरसे में ही हज़रते इब्राहीम इस क़ाबिल हो गये थे कि वह अच्छी तरंह गुफतगू करने लगे थे।
एक दिन हज़रते इब्राहीम अ 0 ने अपनी वाल्दा से फरमाया कि ऐ मादरे गिरामी आप मुधे यहां से गर ले चलिए ताकि देखूं कि इस दुनिया के हालात क्या हैं। आप की वालेदा ने कहा ऐ बेटा अभी इसका मौक़ा नहीं हा अगर ऩमरूद को ख़बर हो गयी तो वह तुम्हें क़त्ल करवा देगा। रफता रफता ग़ार में रहते रहते हज़रते इब्राहीम को 13 साल की मुद्दत गुज़र गयी। एक दिन फिल आप ने पलमाया कि ऐ मादरे गिरामी आप मुधे गर ले चलिये। आपने फरमाया कि ऐबेटा अच्छा मैं तेरे चचा आजटर के खयालात मालूल कर लूं और इससे इजाज़त ले लूं तो तुझे ले चलूं। चूंकि वह नमरूद का ख़ास आदमी है।
कहीं तेरे बारे में कुछ कह न दे यह कह कर वाल्दए इब्राहीम रुख़सत हो गयीं और जब वह थोड़ी दूर निकल गयीं तो हज़रते इब्राहीम भी इनके पीछे पीछे चल पड़े और अपने घर गये। जब आज़र की नज़र हज़रते इब्राहीम पर पड़ी तो हैरत अंगेज़ हुआ और उसने मादरे इब्राहीम से पूछा कि यह कौन है फरमाया कि यह मेरा बेटा है जो तेरह साल क़ब्ल नमरूद के ख़ौफ से फलां ग़ार में पैदा हुआ था। और मैंने आज तक इसे लोगों की नज़रों से पोशीदा रखां। इस पर आज़र सख़त बरहम हुआ और कहा कि अगर नमरूद को इसकी ख़बर हो गयी तो वह इसे ज़िन्दा नहीं छोड़ेगा। फिलहाल तुम यह वादा करो कि अपनी ज़बान बन्द रखोगे।
रवायतों से पता चलता है कि आज़र ने जनाबे इब्राहीम की वालदा से अपवी ज़बान बन्द रखने का वादा तो कर लिया लेकिन अक्सर उसके दिल में यह खयाल पैदा होता कि वह नमरूद को उसकी ख़बल दे दे। लेकिन जब हज़रते इब्राहीम का चेहरा इसकी नज़रों के सामने आता तो इसके दिल में आप की तरफ से मोहब्बत जोस मारती और वह अपना ख़याल तर्क कर देता था। अल्लामा मजलिसी अलैहिर्रहमा अपवी किताब हयातुल कूलूब में तहरीर फ़रमाते हैं कि हज़रत इमामे हसन अ 0 का यह क़ौल नक्ल किया है कि हज़रते इब्राहीम इन्तेहायी ख़ूबसूरत और हसीन और जमील थे। ख़ूबसूरती का यह आलम ता जिसकी नज़र आप पर पड़ती थी उसके दिल में आप की मोहब्बत पैदा हो जाती थी।
हज़रत रसूल ख़ुदा स 0 अ 0 का क़ौल है कि हज़रते इब्राहींम शक्ल व सूरत में मुझसे बहुत मुशाबेह ते। रवायतों से यह भी पता चलता है कि हज़रते इब्राहीम ख़ूबसूरती में हजरते यूसुफ़ के हुस्न के बराबर थे।
बाज़ मोअर्रेख़नी यह न समझ सकेकि आज़र दरअस्ल इब्राहीम का बाप था या चाचा। चुनांचे इस ज़ैल में उलमाए तफ़ासीर और सियर तारीख़ ने बड़ी-बड़ी बहसें की हैं और आख़िर कार यह नतीजा बरामद किया है कि आज़र दर हक़ीक़त इब्राहीम का चचा ही था। जैसा कि अल्लमा अब्दुल अली ने शरए मुस्लिम में तहरीर फरमाया है कि आज़र के बारे में सही क़ौल यह है कि वह हज़रते इब्राहीम का चचा था। आप के वालिद तारीख़ थे। क्योंकि अरब का दस्तूर था कि जो चचा अपने भतीजे की परवरिश करता था वह उसका बाप कहलाता था।
इसी उसूल के तहत खुदा ने भी कुरआने मजीद में फरमाया है कि इज़ क़ाला इब्राहीमा लेअबी (जब जनाबे इब्राहीम ने अपने अब से कहा) यहां तहक़ीक़ के खिलाफ अगर कोई यह बात कहता है कि कि खुदा ने इब्राहिम के बाप को बुत परस्त कहा है तो हमारा जबाव यह है कि बाप का लफज़ चचा के लिए भी इस्तेमाल होता है। जैसे कि हज़रते याकूब के फरज़न्दो ने इब्राहीम , हज़रते इस्माइल , हज़रते याकूब़ के माबूद की इबादत करते हैं। इसमें हज़रते याकूब़ के फरज़न्दो ने हज़रते इस्माई को खभी हज़रते याकूब का बाप कहा है। हालांकि यह मालूम है कि हज़रते इस्माइल आप के बाप न थे बल्कि आप के चचा थे। यह भी एहतेमाल है कि हज़रते इब्राहीम के बुतपरस्त बुजुर्ग का तज़केरा है इससे मुराद आप का नाना हो। क्यूंकि अरबी ज़बान में नाना को भी बाप कहते हैं। नमरुद के दरबार से वाबस्ता होने के बावजूद आज़र अपने पेशे के लिहाज़ से सनमसाज़ व बुततराश था। चुनान्चे वह बुत बनाया करता था। और अपने बेटोंको दिया करता था कि वह इन्हें बाज़ार में ले जाकर फ़रोख़त करें। एक दिन हज़रते इब्राहीम को भी कुछ बुत दिये और इनसे भी कहा कि इन्हें ले जाओ और बाज़ार में फरोख़त करो। हज़रते इब्राहीम ने इन बुतों की की गर्दनों में रस्सी बांधी और इन्हें घसीटते हुए बाज़ार में ले गये और वहां पुकार पुकार कर कहने लगे कि ऐ भाइयों मैं ऐसी चीज़ बेचने लाया हूं जो किसी को भी फायदा नहीं पहुंचा सकती। और न ही इससे किसी को कोई नुक़सान का अन्देशा है। फिर आप इन बुतों को पानी के क़रीब ले जाते थे और इनसे कहते थे कि तुम्हें प्यास लगी होगी लो पानी पी लो कभी कहते कि ऐ बुतों कुछ बातें करो बुतों के साथ हज़रते इब्राहीम का यह बरताव देख कर तमाम बाज़ारी लोग शशदर रह गये। जब आज़र को इस तौहीन का हाल मालूम हुआ तो वह भी आपे से बाहर हो गया और इसने हज़रते इब्राहीम को घर में क़ैद करके इन पर घर से निकलने पर पाबन्दी आयद कर दी।
इस्लाम जो अल्लाह का पसन्दीदा दीन और कुरआनी आयात का मजमुआ है हमेशां से था और हमेशा रहेगा। तमाम अम्बियाए मुरसलीन की तब्लीग़ी कोशिशें सिर्फ और सिर्फ इस्लाम के लिए थीं। चुनान्चे जो हज़रते आदम पैग़ाम लाये वह भी इस्लाम था। और जो शीस इद्रीस और नूह जिस अम्र की तब्लीग की वह भी इस्लाम था।
इसी तरंह जितने अम्बियाए मुरसलीन मबऊस हे वह सब इसनलाम ही के मुबल्लिग़ थे। इस लेगाज़ से आदम नूह और तमाम अम्बिया के सरगुज़ार हयात सब इस्लाम की तारीख़ का जुज़ है। मगर हज़रते इब्राहीम से पहले इस्लाम इस्लाही तौर पर इस्लाम के नाम से मौसूम न था। कुरआने मजीद से पता चलता है कि लफज़े इस्लाम का आग़ाज हज़रते इब्राहीम के वक्त से हुआ। आप ही ने इस दीने इलाही के पौरों का नाम सबसे पहले मुस्लिम रखा। जैसा कि इरशाद हुआ है (इवीसवाकुम उसमुस्लेमीनी मिनक़ब्ले) और सबसे पहले इस लक़ब से मौसूम होने लावे हज़ते इब्राहीम और इनके फ़रज़ंद इस्मीइल ते जिन्होंने अपनी नश्ल में इनके बाक़ी रहने की दुआ भी की। जैसा कि कुरआने मजीद का बयान है कि (परवरदिगार) हमें आपनी बारगाह में मुस्लिम कराह दे और हमारी नस्ल में भी एक उम्मत क़रार दे जो तेरी बारगाह में मुस्लिम हो। इससे काफ ज़ाहिर है कि औलादे इब्राहीम जो लोग नस्ले इस्माइल से हैं वह इस्लाम ही के पैरो समझे जायेंगे।
चूंकि इनके बुजुर्गो का दीन यही था। जिसकी बक़ा के लिए इन्होंने बक़ा के लिए उन्होंने दुआ फरमायी। मेरे नज़दीक नस्ले इस्हाक़ का सिलसिला बी ख्वाह वह ईसाई पर मबनी हो या मूसा पर उसूली तौर पर इस्लाम ही से मुन्सलिक है। यह और बात है कि इनकी शरियतें मखसूस थी जिनकी वजब से इनके पैरो बाद में यहूदी और नस्रानी के नाम से मैसूम हुए। मगर यह शरीयते बनी इस्राइल से मुख़तस थीं औलादे इब्राहीम व इस्माइल के क़तई नहीं थीं। औलादे इस्माइल के लिए सिर्फ दीने इब्राहीम था जो क़ानून और शरीअत के एतेबार से इस्लाम कहलाता था और ब नस्से कुरआन यहूदियत और नसरानियत के मुक़ाबले में था जैसा कि कुरआनि से वाज़ेह है कि इब्राहीम न यहूदी ते न ईसाई बल्कि वह दीने इलाही के पैरो और मुसलमान थे। वह मुशरिकों में से नहीं थे।
हज़रते इब्राहीम ही वह पहले शख़्स हैं जिन्होंने अपने अमल के ज़रिये मेहमान नवाज़ी का दर्स दिया ख़तने का हुकम जारी किया। मूछों और नाखूनों को तरशवाया मिसव़ाक की , बालों को कंघी से संवारा , पानी से नाक और मुंह साफ करना बताया , नवाज़ पढ़ने का कग्म दिया और इसका तरीक़ा बताया। सजदे मुअय्यन किये और पानी से इस्तिनजे का तरीक़ा राएज किया। कुछ मोअर्रेख़ीन ने लिखा है कि आप ने तीशे से अपना ख़तना खुद किया। इस रवायत से मुझै इत्तेफ़ाक नहीं है क्यूंकि इमाम और पैगम्बर ख़तना शुदा नाफ बुरीदा पैदा होता है। हज़रते इब्राहीम को खुदा ने पहले नबी फिर रसूल बनाया इसेक बाद इमामत के मन्सब पर फाएज़ किया।
जिससे यह मालूम होता है कि खुदा की नज़र में इमामत का मन्सब तमाम मनासिब से लन्द है। और शायद यही वजब थी कि जनाबे इब्राहीम ने अपनी नस्ल में इमामत की दुआ भी की थी।
हज़रते इब्राहीम अ 0 के दोर मेंम मुशरेकीन के दरमियान तीन तरहं के शिर्क राएज थे।
1. चांद , सितारों और सूरज की परस्तिश
2. इसनाम परस्ती
3. इन्सान परस्ती
आप ने इन तीनों बातें के खिलाफ खुल कर एहतेजाज किया और बड़े ही हकीमाना अंदाज़ में इन्हें तस्लीम करने से इन्कार किया। चुनान्चे जब रात की तारीकी छायी और सितारा नज़र आया तो प ने फरमाया कि यहब मेरा परवरदिगार है और जब वह ग़ुरूब हो गया तो कहा मैं कुरूब हो जाने वाली चीज़ को पसन्द नहीं करता। फिर चांद को चमकते हुए देखा तो फरमैया कि क्या यह मेरा ख़ुदा है ? जब वह भी कुरुब हो गया तो बोले कि आगर मेरा हक़ीक़ी ख़ुदा मेरी हिदायत न करता तो मैं बी गुमराहों की तरंह होता और जब सूरज निकला तो फरमाया कि यह तो सबसे बड़ा है क्या यह मेरा ख़दा हो सकता है। जब वह भी गुरुब हो गया तो कहा कि ऐ मेरी क़ौम वालों जिन जिन चीज़ों का तुम खुदा समझते हो में इन सब चीजों से बेज़ार हूं यह हरगिज़ ख़ुदा नहीं हो सकते। मेरा खुदा तो बस वही है जो ज़मीनो आसमान का पैदा करने वाला है और मैं मुशरेकीन में से नहीं हूं।
हज़रते इब्राहीम का इन चीजों का खुदा कहना बतौर इस्तेक़हाम और इनकारी के था और क्यूंकि मुशरेकीन में इस वक्त लोग चांद , सूरत और सितारों की खुदायी के कांयल थे और आप काहिन को माकूल करना और दलील के जरिये खुदाये यकता की ख़ुदाई साबित करना मन्जूर था इसलिए यह तक़रीर फरमाई रर यह समझा दिया कि इन चीज़ों में हुदूस व इमकान की अलामत पायी जाती है। क्यूंकि तगय्यूर व हरकत सिर्फ मुमकिन के लिये है लिहाज़ा इनके लिए एक ऐसे ख़ालिक़ की जरूरत है जिसमें किसी क़िस्म का तगय्यूर न पाया जाता हो। और वह न किसी तरंह मजबूर हो जैसे चांद तारे वगैरह और न ही इसकी हुकूमत महदूद हो जैसे नमरूद वग़ैरह। यह खयाल न करना चाहिए कि माज़अल्लाह हज़रते इब्राहीम पहले मुशरिक थे लबकि आपने मुशरेकीन को अक़वाल और नज़रियात को महज़ फ़र्ज करके फिर इसे ग़लत साबित किया।
दूसरी तरंह का शिर्क इस्लाम परस्ती की शक्ल में राएज था। यानी बुतों की परस्तिश और इबादत की जाती थी। यह वह वाज़ेह शिर्क है जिसके मुर्तकिब गिरोह का इस्तेलाही नाम मुशरेकीन हुआ। और यह शिर्क लोगों के दरमियान आज भी कायम है। और इसके खिलाफ जनाबे इब्राहीम ने अपने ही घर से जेहाद शुरु किया।
क्यूंकि आप का चचा (जिसे आप खुद भी बाप कहते थे) और कुरआने मजीद बी बाप ही के लफज़ से याद करता है। बुतपरस्ती का बहुत बड़ा अलमबरदार था। हज़रते इब्राहीम ने आज़र को पहले नर्म लहजे में समझाया कि आप ऐसी चीजों की इबादत क्यों करते हैं। जो न सुन सकती हैं न देखती हैं और न आपको कोई फायदा पहुंचा सकती हैं। यह सिलसिला काफी दिनों तक जारी रहा। और जब आज़र पर इब्राहीम के समझानवे बुझाने का कोई असर न हुआ तो आपका लहजा बदला। और अंदाज़े गुफतुगू में तलखी पैदा हुई।
चुनान्चे आपने फरमाया तुम कुछ बुतों को अपना खुदा बनाये हुए हो। मैं तुम्हें और तुम्हारी क़ौम को खुली हुई गुमराही में देखता हूं जब इस गुफतुगू का भी आज़र पर कोई असर न हुआ तो आपने पूरी क़ौम के दिल में अमली चोट लगाने का एक मन्सूबा जेहन में मुरत्तब किया और इस की तकमील के लिए वह मौक़ा निकाला जब तमाम मुशरेकीन अपनी ईदगाह में कोई मुशरेकाना रस्म अदा करने जा रहे थे। आज़र ने इब्राहीम को भी ले जाना चाहा। मगर आप ने अपनी अलालत का उज्र कर के जाने से इन्कार कर दिया। (इसी का नाम तक़य्या है) और जब सब लोग चले गये तो आपने खाना और थोड़ा खाना और तीशा अपने साथ लेकर मरकज़ी बुत खाने में दाखिल हुए। जहां कसीर तादाद में बुत रके हुए थे।
चुनान्चे आप एक-एक बुत के सामने जाते और इससे कहते कि खाना खाओं और मुझसे बाते करो। जब वह कोई जवाब न देता तो उसका सर और पांव तीशे से काट देते थे। रफता रफता आप ने तमाम बुतों का यही हाल कर दिया और जो सबप से बड़ा बुत था उसेक गले में तीशा लटका कर अपने घर वापस चले आये। जब ईदगाह से रस्म की अदायगीके बाद लोग अपने अपने घर लौटो और बुतों की शिकस्ता हालत देखी तो पूरी क़ौम में कोहराम बरपा हो गया। कुछ लोगों ने कहा कि यह इब्राहीम नाम का एक नौजवान रहता है जो हमारे बुतों को बुरा भला कहता है। यह हरकत इसी की हो सकती है।
ग़र्ज कि कुछ लोगो ने हज़रते इब्राहीम को पकड़ लिया और नमरुद के पास ले गये इससे सा माजरा बयान किया। और कहा कि यह आज़र का भतीजा है इसी ने हमारे बुतों को तोड़ा है। नमरुद ने आज़र को तलब किया और कहा कि तुमनें हमें धोखा दिया जो इसको हमसे पोशीदा रखा कि अब यह जवान हो गया है। आज़र ने कहा कि यह काम दरअस्ल इसकी मां का है जो यह कहती थी कि मैं नमरुद को जवाब दे लूंगी। नमरुद मे जनाबे इब्राहीम की मां को बुलवाया और उनसे पूछा कि तुमने हमसे इस बच्चे को क्यो छुपाया। जबकि बच्चा पैदा होने पर मेरा हुक्म इसकी गर्दनज़दनी का था।
मादरे इब्राहीम ने फरमाया कि ऐ नमरुद मैंने इस बच्चे को इसलिए छुपाया कि लोगों के मासूम बच्चे कत्ल होने से बच जायें जैसा कि तुझे बताया गया है कि तेरी हुकूमत में एक ऐसा बच्चा पैदा होगा जो तेरी तबाही और बरबादी का बाएस होगा। अगर यही वह बच्चा है तो हलाक कर दिया जायेगा। और बाक़ी बच्चे बच जायेंगे। और अगर वह यह नहीं है तो मेरा बच्चा बच जायेगा। यह दलील नमरुद पर कारगर हुई और मादरे इब्राहीम से मज़ीद बाज़ पुरसी के बजाये वह फिर जनाबे इब्राहीम से मुखातिब हुआ और इनसे दरियाफत किया कि क्या तूने हमारे ख़ुदाओं के साथ यह सुलूक किया है कि वब पारा-पारा हो गये। जनाबे इब्राहीम ने फरमाया कि मैं ऐसा क्यों करने लगा। मेरा खयाल है कि यह काम इस बड़े बुत का है जिसकी गर्दन में तीशा लटका हुआ पाया गया है। अगर वह बोलता हो तो खुद पूछ लो। नमरुद इस जवाब पर महबूत रह गया क्योकि यह लतीफ पैराया मैं इसके खुदाओं की आजज़ी और बेबसी की इज़हार था। जो जनाबे इब्राहीम ने कहा इन्सान परस्ती के ज़ैल में नमरुद अपने को खुदा कहलवाता था।
चुनान्चे हज़रते इब्राहीम ने इसके इस गुरुर को भी तोड़ा जब इसने आपसे सवाल किया कि तुम अपना परवरदिगार किसे समझते हो। जवाब दिया कि मेरा परवरदिगार वह है जो जिलाता भी है और मारता भी है। नमरुद ने कहा मैं भी मारता और जिलाता हूं इस तरंह कि किसी बेगुनाह की जान ले ली और एक ऐसे शख़्स की जान बख़्श दी जिसके लिए मौत की सज़ा का हुक्म हो चुका था। हज़रते इब्राहीम ने कहा कि मेरा परवरदिगार सूरज को मशरिक़ से निकालता है। तुम अगर खुदाई का दावा करते हो तो मग़रिब से निकाल दो। वह काफ़िर इब्राहीम की यह बात सुनकर दंग रह गया और खामोशी के अलावा इससे कोई जवाब न बन पड़ा मगर इसके नतीजे में उसका ग़ैज़ और ग़ज़ब जनाबे इब्राहीम के खिलाफ़ बहुत बढ़ गया और उसने लोगों के मशविरे के बाद यह तय किया कि जनाबे इब्राहीम को जिन्दा आग में जला दिया जाये।
हज़रते इब्राहीम क़ैद कर लिये गये और उन्हें आग में जलाने का इन्तेज़ाम किया जाने लगा। पूरी क़ौम ने मिलकर एक माह तक लकड़ियां जमा कीं और फिर उसमें आग देकर मुशतइल किया गया यहां तक कि शोले बलंद होकर आसमान से बातें करने लगे। रवायतों में आग की कैफियत यह बतायी गयी थी कि उसके एतेराफ में तीन मील तक के परिंदे परवाज़ नही कर सकते थे। नमरुद ने अपने लिए एक बहुत ही ऊंचा मुक़ाम तामीर करवाया था ताकि वह वहां से बैठकर हज़रते इब्राहीम का तमाशा देख सके।
अब मसला हज़रते इब्राहीम को भड़कती हुई आग में डालने का था। लिहाजा उसके लिए मिनजनीक़ तैयार किया गया और जनाबे इब्राहीम को ज़ंजीरों में जकड़ कर इस मिनजनीक में बैठाया गया फिर आग में फेंक दिया गया। लिखा है कि जिस वक़्त हज़रते इब्राहीम आग की तरफ चले तो आसमान करवटें लेने लगा और ज़मीन के सीने से एक आवाज़ बलंद हुई कि ऐ परवरदिगार तेरी इस दुनिया में हज़रते इब्राहीम के अलावा तेरी इबादत करने वाला फिलहाल दूसरा कोई नहीं है। क्या तू राजी है कि इन्हें आग में जला दिया जाये। लेकिन हिकमते इलाही ख़ामोश रही और अब तक इसकी कुदरते कामला किसी भी मंज़िल में कुदरते इलाही मज़ाहिम हो जाती तो ज़ालिमों के जुल्म की आख़िरी हद सामने न आती और न ही साबिर के सब्र का पता चलता। फिर ज़ालिमो को यह कहने का मौक़ा फराहम हो जाता कि हज़रते इब्राहीम को जलाने का मक़सूद ही न था हम तो फक़त धमका रहे थे।
लेकिन हज़रते इब्राहीम जब मिनजनीक़ से जुदा हो गये तो इनका इखतेयार की मंज़िल ख़त्म हो गयी। अब अगर ज़ालिम खुद बी चाहता कि हज़रते इब्राहीम आग से बच जायें तो यह खुद भी उसके बस की बात थी। यानि जूल्म की हद तमाम हो चुकी थी। मलाएका ने जब हज़रते इब्राहीम को हवा के दोश पर आग की तरफ बढ़ते हुएअ देखा तो वह भी बेचैन हो गये। और बारगाहे इलाही में यह अर्ज़ करने कि ए परवरदिगार तेरा ख़लील आग में जलाया जा रहा है। तू खामोश क्यों है जवाब मिला कि अगर वह मुझसे मद्द् तलब करेगा तो मैं ज़रुर करूंगा। जिबरईल से सब् न हुआ और कहा कि ऐ परवरदिगार अगर तेरी इजाज़त हो तो मैं तेरे ख़लील की मद्द करने के लिए जाऊं। हुक्म हुआ कि अगरप मेरा ख़लील तुम्हारी मद्द क़ुबूल करे तो ज़रूर जाओ। हज़रते इब्राहीम भड़कती हुई आग से मुत्तसिल होने ही वाले थे कि जिबरईल हाज़िर हुए। उन्होंने कहा या ख़लील अल्लाह क्या आप को मुझसे कोई हाजत तो है मगर तुमसे नहीं और जिससे हाजत है उससे कुछ कहने की जरूरत नहीं आयी और आग को हुक्म हुआ “ यानारोकूनी बरदंव व सलमान अला इब्राहीम ö ऐ आग इब्राहीम के लिए सलामती के साथ बुरूदत अख़तियार कर इस हुक्म के साथ ही आग की फितरत बदली और वह सर्द होना शुरू हुई और इस हद तक सर्द हुई कि हज़रते इब्राहीम के दांत बजनवे लगे फिर वह एतेदाल पर आयी तो वह भड़कते हुए शोले गुलज़ार बने और दहकते हुए अंगारे लाला बन गये।
यहां तक कि इस करिशमें कुदरत को देखकर नमरूद भी बेअख़तियार होकर चीख उठा कि खुदा हो तो ऐसा जैसा कि इब्राहीम का खुदा है। होना तो यह चाहिए था कि रइस मुशाहिदये कुद 0रत के बाद पूरी क़ौम ईमान ले आती। मगर इन बदबखतों के कुर्फ्रो एनाद में कोई कमी नहीं आयी बस मुख़तसर से लोगों ने नमरूद से छिपकर (तक़य्या करके) ईमान कुबूल किया। नमरूद अपनी इस शिकस्त परल मुंह दिखऱाने के क़ाबिल नहीं रह गया था। इसलिये उसने हज़रते इब्राहीम के मामलात में कुछ दिनों तक खामोशी इखतेयार की। जिसके नतीजे में हज़रते इब्राहीम एलानिया तौर पर तबलीग़ के मैदान पर उतर आये ताकि इस क़ौम पर ख़ुदा की तरफ से कोई अज़ाब नाज़िल होने से पहले वह हुज्जत तमाम कर लें। इस वक्त हज़रते इब्राहीम की उम्र 16 साल की थी (तबरी)।
नमरूद अपनी शिकस्त व नीकामी पर एक साल तक खामोश रहा मगर जब उसने देखा कि हज़रते इब्राहीम अपने मौक़िफ पर अड़े हुए हैं और कारे तबलीग़ तेज़ी से जारी है तब वह बदबख़त जुनून में गिरफतार होकर हज़रते इब्राहीम के खुदा से जंग पर आमादा हो गया। उसने आप को पिर तलब किया और कहा (कुरआने मजीद पारा 17 आयत 5) ऐ इब्राहीम मैं तुम्हारे खुदा से जंग करना चाहता हूं क्या वह मुझसे मुक़ाबले के लिये तैयार है।
हज़रते इब्राहीम ने फरमाया कि क्या तू मेरे कुदा से अपनी शिकस्त का इंतेक़ाम लेना चाहता है। पिर हज़रते इब्राहीम ने बारगाहे इलाही में अर्ज की ऐ खुदा नमरूद तुझसे जंग का ख़वाहिशमंद है। इसे क्या जवाब दूं हुक्म हा कि कहा दो नमरूद अपना लशकर जमा करे। नमरूद ने छः माह में लशकर इकट्ठा किया और जब तमाम तैयारियां मुकम्मल हो गयीं तो वह तीरो कमानों नैज़ों और तलवारों से लैस लशकर लेकर एक मैदान मैं डट गया और हज़रते इब्राहीम को बुलवा कर कहा कि अपने खुदा से कहो कि अपना लशकर लेकर आये।
इज़रते इब्राहीम ने कहा घबराता क्यों है हलाकत के ले मेरा परवरदिगार का लशकर जरूर आयेगा। नागहा मग़रिब की सिम्त से एक घटा उठी जो तेज़ी से नमरूद के लशकर पर मुहीत हुई। लोगों ने देखा तो पता चला कि एक काली घटा सियाह रंग के मच्छरों की एक अजीम फोज है जो अज़ाब की शक्ल में नाज़िल हुई है। नमरूद के सिपाही घबराहट और बौखलाहट में इधर उधर भागने लगे। मगर उन्हें मफ़र कहा एक – एक सिपाही से लाखों की तादाद में मच्छर लिपट गये और उनका खून चुस – चूस कर सब को कैफरे किरदार तक पहंचा दिया। एक मच्छर बाद में आया था इसे खुदा ने नमरूद पर मुसल्लत किया था। जो उसकी नाक के रास्ते से दिमाग में घुस गया चुनान्चे जब वह काटता था तो नमरूद चीख़ने लगता था। और उसे एसी सख़्त अज़ीयत होती थी कि जब तक इसके सर पर जूताकारी नहीं होती थी उसको चैन नहीं आता था। यह सिलसिला 40 साल तक जारी रहा। और रोज़आना जूते खाते खाते अखिरकार वह उसी अजाब में मर गया।
हज़रते इब्राहीम कै मुक़बले में नमरूद की यह दूसरी शिकस्त थी जिस पर बराफरोख़ता होकर उसने आपको अपने मुल्क से जिलावतन कर दिया फरमान जिलावतनी के बाद जदनाबे इब्राहीम ने हिजरत का फैसला किया। और अपनी बीवी सारा जो (बक़ौले तबरी) आपके चचा हारान बाज़ मोअर्रेखीन के मुताबिक़ अपकी खाला की साहबजटादी थीं के लिए एक संदूक बनवाया ताकि वह इसमें बैठकर सफर कर सकें फिर आपने अपना सरमाया (पूंजी) और तमाम माल व असबाब (जिसमें ऊंटों , भेड़ों और बकरियों का ग़ल्ला भी शामिल था) लिया और अपने भतीजे हज़रते लूत के साथ ईराक से शाम की तरफ रवाना हो गये। यह तीनों अफराद इस्लाम के पहले मुहाजिर हैं। यह क़ाफ़िया ईरान में कुछ रोज़ मुक़ीम रहा। वहां रोज़ाना शब को ज़लज़ला आता था। जब पहली रात जनाबे इब्राहीम ने इस मक़ाम पर क़याम किया तो यह मुक़ाम ज़लज़ले से महफूज़ रहा। वहां के लोगों ने कहा कि क्या सबब है कि जो आज रात खहर में ज़लज़ला नहीं आया। ज़रूर कोई बुजुर्ग शख़्स हमारे शहर में आया है। दूसरी रात फिर खैरियत से गुजरी। अब लोग आप की तलाश में निकले और जब मुलाक़ात हुई तो लोगों ने कहा कि आप अब इसी शहर में बूद व बाश इख़तेयार करें हम आप की खिदमत करेंगे क्योंकि आपही के क़दमों की बरकत से हमें जलज़ालें से निजात मिली है। आप ने फरमाया कि तुम्हारे इलाके में फिलहाल ठहरने का की इरादा नहीं है। मगर खुदा से यह दुआ करूंगा कि वह आइंदा भी तुम्हारे शहर को जलज़लो से महफूज़ रखे। फिर आप ने वहां दो चार दिन कयाम किया फिर आप मिस्र के ले रवाना हो गये। उस वक़्त मिस्र पर तूलीसनामी फिरऔन की हूकूमत थी। और वह इन्तेहायी नफसपरस्त और इन्तेहायी बदकार था।
जब इसे हज़रते इब्राहीम के आने की ख़बर मालूम हुई और उसके हाशिये बरादरों ने यहं भी बताया कि उनके साथ एक इन्तेहायी हसीन व जमील औरत भी है तो उसने दोनों को अपन दरबार में तलब किया और जनाबे सारा की तरफ इशारा करके हज़रत इब्राहीम से पूछा कि यह ख़ातून तुम्हारी कौन हैं आप ने फरमाया कि यह मेरी बहन हैं। यह एक हक़ीक़तआमेज़ तकंय्या था जिस पर आप ने अमल किया और आप का जवाब इसलिए दुरूस्त था कि जनाबे सारा आप की बीवी होने के अलावा आप की चचाज़ाद बहन भी थीं। तूलीश ने जब जनाबे सारा के हुस्नो जमाल को देखा तो इस पर शैतानी नफ़स का ग़लबा हुआ। चुनान्चे इसने बेइखतेयार होकर अपना हाथ आप की तरफ बढ़ाने का इरादा किया ही था कि कुदरते इलाही ने उसे मफ़लूज (लुंजा) कर दिया।
यह करिशमा देखकर तूलीश का सारा भूत चश्मेज़दन में उतर गया। और वह अपनी इस बेहूदा हरकत पर नादिम हुआ आख़िरकार उसने तौबा की और जनाबे इब्राहीम ने दुआ फरमायी तो उसका हाथ ठीक हो गया। इस वाक्ये के बाद उसको जनाबे सारा की अज़मत का एहसास हुआ। और उसने आप की बड़ी क़द्र और बहन का मरतबा दिया इसके साथ ही ख़िदमत के लिए एक कनीज़ बतौर तोहफ़ा पेश की जिसका नाम हाजरा था। नीज़ काफी नज़राना वग़ैरह देकर इन्हें अपने यहां से रुख़सत किया। यह लोग वहां से शाम की तरफ रवाना हुए और चंद मुक़ामात की रद्दोबदल के बाद हज़रते इब्राहीम जनाबे सारा के साथ फिलिस्तीन में मुक़ीम हुए और हज़रते लूत को उरदुन के नवाही इलाकों में बग़रज़े तबलीग़ भेज दिया यह है इस्लाम के वह इब्तेदायी नुकूश जो मसाएब व आलाम गुरबत और जिला वतनी को अपना सरमायए इफतेखार बनाये हुए थे। इसलिए तो पैग़म्बरे इस्लाम ने फरमाया कि इस्लाम का आग़ाज़ ही गुरबत और जिलावतनी से है।
जनाबे हाजरा के लिए परवरदिगार ने यह शरफ मख़सूस कर दिया था कि हज़रते इस्माइल की विलादत उनके बत्न से हो। इसलिए जनाबे इब्राहीम को शाम में रहते हुए एक अरसा गुज़र गया। मगर आप का दामन आरजुए औलाद से अब तक खाली था उम्र ज्यादा हो जाने की वजह से जनाबे सारा भी औलाद की तरफ से मायूस हो चुकीं थीं। चुनान्चे हज़रते सारा ने हज़रते इब्राहीम से कहा कि आप मेरी कनीज़ हाजरा से जो अभी जवान हैं अक़दकर लें शायद इन्हीं के बत्न से खुदा आपको कोई औलाद अता करदे। जो आप की जानाशीन हो।
हज़रते इब्राहीम ने जनाबे सारा की तजवीज़ पर अमल करते हुए जनाबे हाजरा से अक़द फरमाया और इज़जवादी ताअल्लुक़ात क़ायम किये। जिसके नतीजे में हज़रते इस्माइल मुताविल्लद हुए इस वक्त हज़रते इब्राहीम की उम्र 86 साल की हो चुकी थी। हज़रते इस्माइल की विलादत के बाद अद्ल के दायरे में रह कर हज़रते इब्राहीम की मज़ीद और ख़ुसूसी तवज्जे का हज़रत हाजरा की तरफ मबजूल हो जाना और हज़रते हाजरा की तरफ से जनाबे सारा के दिल में रश्क़ व हसद का पैदा हो जाना एक फितरती अमल था जिसका इज़हार इस शक्ल में हुआ कि जनाबे सारा मुसतकिल मख़जून व मग़मूम रहने लगीं और इन्हें यह एहसास परेशान करने लगा कि ख़ुदा ने हाजरा के बदन से इब्राहीम को बेटा अता किया और मेरी गोद खाली रखा।
एक दिन हज़रते इब्राहीम ने जनाबे सारा से हुज़न व मलामत का सबब दरियाफ़त किया तो आपने फरमाया कि कुछ नहीं। बस मैं यह चहाती हूं कि आप हज़रते हाजरा और हज़रते इस्माईल को मुझसे अलाहदा कर दें और कहीं दूर ले जाकर इनके क़याम का इंतेज़ाम करदें। हजरते इब्रहीम जनाबे सारा की मोहब्बत इताअत फरमा बरदियों और कुरबानियों की वजह से इन्हें बहुत चाहते थे क्योंकि वह एक बेहद इताअत गुज़ार और फरमा बरदार बीवी थीं इसके अलावा आप के सर पर इनके एहसानात भी बहुत ज़्यादा थे। शादी के बाद इन्होने अपनी तमाम दौलत और ज़ायदाद हज़रते इब्राहीम को हिबा कर दी थी। मगर इन तमाम बातों के बावजुद मिजाज़े इब्राहीम को मुक्कदस परेशानी पर मागवारी की शिकन उभर आयी और चेहरे पर कबीदा खातिरी के आसार मुरत्तब हो गए। मगर मशीयते इलाही से इस परदे में अज़ीम उम्मत के लिये एक अज़ीम मरकज़ की तशकील व तामील का मुरक्क़ा देख रही थी।
इसीलिए परवदिगार का हुक्म हुआ कि ऐ इब्राहीम सारा की जो ख़्वाहिश है उस पर अमल करो इस हुक्में इलाही के सामने हज़रते इब्रहिम के लिए इसके अलावा कोई चारएकार न था कि वह इसकी तामील फौरी तौरफ् करें चुनान्चे उन्होंने शीरख़्वार इस्माइल को गोद में उठाया और जनाबे सारा को साथ लिया और अपने माबूद पर भरोसा करके घर से निकल खड़े हुए। कहां अर्जे फिलस्तीन कहां सरज़मीने मक्का मगर जिस रहनुमाए मुतलक़ ने जनाबे सारा की ख़्वाहिश पर अमल करने का हुक्म दिया था। उसी की रहनुमाई में आप ने अपना सफर तमाम करके एक ऐसे बेआबोगेयाह मैदान को मंज़िल क़रार दिया जहां न कोई दरख़त था न कोई चश्मा ता न कोई सबज़ा न ग़िजा की फराहमी का की ज़रिया था न वहां पानी की सबील की कोई सूरत।
मुख़तसर यह कि जहां कुछ न था वहां आप ने खुदा की ज़ात पर भरोसा रखने वाली अपनी पाक बाज बीवी और मासूम फरज़ंद इस्माइल को छोड़ा। एक मशक पानी और कुछ खाने का सामान दिया और आसमान की तरफ हाथ बुलंद करके यह दुआ फरमायी कि पालने वाले तेरा खलील अपनी जुर्रियत को तेरे घर के ज़ेरे साया छोड़ कर जा रहा है। लोगों के दिलों को इनकी तरफ मोड़ दे और इनकी हिफाजत फरमा। इसके बाद आप शाम की तरफ वापस पलट गये और कभी इनकी खबर गीरी के लिए आते जाते रहे। इमामे जाफ़रे सादिक़ अ 0 का इरशाद है कि जब आप फिलस्तीन से मक्कए मोअज़्जा का इरादा करते थे तो खुदा वंदे आलम के हुक्म से ज़मीन सिमट जाती थी और आप आनेवाहिद में मककए मोअज़्ज़मा पहुंच जाते थे। दुसरे या तीसरे दिन हज़रते इब्राहीम का दिया हुआ एक मश्क़ पानी जनाबे हाजरा के पास ख़त्म हो गया और हज़रते इस्मिल पर प्यास का ग़लबा हुआ तो आप पानी की तलाश में निकलीं और सफा व मरवा के दरमियान सात चक्कर लगाये जिसकी यादगार मनासिब हज में हमेशां के लिए क़ायम है।
सातवें चक्कर के बाद जनाबे हाजरा थक गयीं और पानी न मिला तो मायूस होकर अपने फरजंद इस्माइल के पास वापस आयीं और कुदरते इलाही का यह हैरत अंगेज़ करिशमा देख कि बच्चे के पैरों तले साफ और शफ़फ़ाफ़ व शीरीं पानी का एक चश्मा उबल रहा है। यही वह चश्मा है जो बाद में आबे ज़मज़म कहलाया। ख़ुश्क ज़मीन से पानी का बरामद होना था कि चारों तरफ से तायरों का झुरमुट अपनी अपनी प्यास बुझाने के लिए वहां जमा हो गया और इन्हीं तायरों की रइनुमाई से इन्सानों का गुज़र भी वहां हुआ और रफता रफता सर जमीने मक्का आबाद होने लगी। दर हक़ीक़त यही दुनिया - ए - इस्लाम के मरकज़े अक़ीदत का संगे लस संगे बुनियाद था जिसकी तारीख़ में भूख प्यास , बेसरो सामानी , संगे बूनियाद था। जिसकी तारीख़ मे भूख प्यास , बेसरो सामानी ,संगे बुनियाद था। जिसकी तारीख में भूख प्यास गूरबत सब ही चीजें नुमाया तौर पर नज़र आती हैं।
जनाबे सारा की उम्र 60 साल की हुई तो जिबरईल ने उन्हें यह खुशखबरी सुनाई कि खुदावन्दे आलम आप को एक फरज़न्द अता करने वाला है यह सुनकर जनाबे सारा को सख़्त हैरत हुई और आपने जिबरईल से फरमाया कि अब मैं बूढ़ी हो चुकी हूं और औलाद पैदा करने की तमाम सलाहियतें दम तोड़ चुकी हैं। किसी फरज़ंद का अब क्या सवाल है। जिबरील ने कहा यह कादिरे मुतलक़ का हुक्म और अम्रे इलाही है इसीलिए यक़ीनन ऐसा ही होगा। जिब्रईल की इस यक़ीन दहानी के चन्द दिनों के बाद मसलहते एज़दी ने करवट ली और जनाबे साराह को हैज़ जारी हुआम मुद्दत खत्म हुई तो आप हामला हुई और जनाबे इस्हाक़ 10 माह 3 दिन शिकमे मादर में रहकर दुनिया में तशरीफ़ लाये। इमामे जाफरे सादिक़ अ 0 ने फरमाया है कि सारा से पहले दुखतराने अम्बिया हैज़ से मुस्तसना थीं। क्योंकि हैज़ उकूबत में दाखिल है हज़रते इस्हाक़ अपने वालिद हज़रते इब्राहीम से इस क़द्र मुशाबेह थे कि बाप और बेटे के दरमियान इम्तेयाज़ मुश्किल था। इसलिए खुदा ने हज़रते इब्राहीम के दाढ़ी के बालों को सफेद कर दिया ताकि दोनों में फर्क़ पैदा हो जाये।
हज़रते इब्राहीम की तरफ से खुदा की बारगाह में पेश की जाने वाली तमाम कुरबानियों में हज़रते इसमाइल की कुरबानी वह अहम व अज़ीम कुरबानी है जिसका ज़िक्र खुसूसियत के साथ क़ुरआने मजीद में मौजूद है। और जिसका इजमाल यह है कि हज़रते इब्राहीम ने ख़्वाब में देखा कि वह अपने बेटे को ज़िबह कर रहे हैं। यह हुक्मे इलाही क्योंकि ख़्वाब की हालत में मौसम हुआ था। और इसकी सूरते वही इल्हाम या ग़बी आवाज़ की न ती। इसलिए जनाबें इब्राहीम ने उस दिन कोई क़दम नहीं उठाया।दूसरी रात फिर यही ख़वाब देखा और वह दिन भी तरद्दुद और कश्माकश मैं गुज़र गया। तीसरी रात को बैनहू फिर वही ख्वाब देखा तो आपने महसूस किया कि हुक्म की तामील ज़रूरी है। आपने अपने बेटे इस्माइल से फरमाया ऐ बेटा मैं बराबर यह ख़्वाब देख रहा हूं कि मैं अपने हाथों से तुम्हें ज़िब्ह कर रहा हूं। तो बेटे ने भी फरमाया कि बाबाजान जो आपको हुक्म हो रहा है उस पर आप अमल कीजिये इन्शाअल्लाह आप मुझे साबेरीन में पायेंगे।
जब जनाबे इब्रहीम ने अपने फरजोद का यह अज़्म और इरादा देखा तो बीबी हाजरा के पास आये और उनसे फ़रमाया कि मुझे एक छुरी और रस्सी देदो। बीबी हाजरा ने मतलूबा चीजें फराहम कर दीं। और यह दोनों बाप बेटे घर से निकल खड़े हो गये। एक मख़सूस मक़ाम पर पहुंच कर हज़रते इब्राहीम ने अपनी क़बा ज़मीन पर बिछाई और जनाबे इस्माईल को उनकी ख़्वाहिश के मुताबिक़ हाथ पैर बांध कर पेशानी के बल पर लिटा दिया। इसके बाद आपने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली ताकि बेटे के ज़िबह होने और तड़पने का मंज़र न देख सकें पिर आपने इस्माइल की पुश्ते गर्दन पर छुरी रखकर उसे पूरी कूपत से चलाना ही चाहा था कि हुक्में इलाही सो जिबरईन ने छुरी पलट दी दूसरी बार फिर यही हुआ क्योंकि निगाहे कुदरत जनाबे इस्माइल की नस्ल में एक बड़ी कुरबनी का मुरक़क़ा देख रही थी और इब्राहीम के ख़्वाब की ताबीर इसी कुरबानी अज़ीम में मस्तूर थी। इसलिए हूक्म की तामील के साथ – साथ हज़रते इस्माइल को बचाना भी मक़सूद था। चुनान्चे तीसरी मरतबा हज़रते इब्राहीम ने जब छुरी फेरी तो हज़रते इस्माइल बचाने गये और इनकी जगह दुमबा जबह हो गया।
हज़रते इब्राहीम ने आंखों से पट्टी हटायी तो यह देखकर हैरान हो गये कि हज़रते इस्माइल सजदए शुक्र में और इनकी जगह मजबूह दुम्बा पड़ा हुआ है। आपदम ब खुद खड़े थे कि निदा आयी ऐ इब्राहीम तुमने अपना ख्वाब सच कर दिखाया। हम नेकी करने वालों को जज़ाए ख़ैर देते हैं (कुरआने मजीद सूरए सफ़ात आयत 108) और हमने इस कुरबानी का फिदया ज़बहे अज़ीम यानी एक बड़ी कुरबनी को क़रार दिया जो इस्माइल की नस्ल में मुज़मर है और ऐ इब्राहीम हमने तुम्हारे दरजात बुलन्द करके तुम्हें इमाम बना दिया। इब्राहीम ने अर्ज की परवरदिगार क्या यह मंसब मेरी लाद को बी अता होगा इरशाद हुआ कि हां मगर जो ज़ालिम होंगे वह इस मंसब से महरुम रहेंगे।
जब जनाबे हाजरा को अपने बेटे की कुरबानी का हाल मालूम हुआ और उन्होंने इस्माइल की गर्दन पर छुरी का निशान देखा तो वह बेहद ग़मग़ीन हुई और इनके दिल में यह ख़्याल पैदा हा कि अगर दुम्बा न आता तो मेरा बच्चा इस्माइल ज़बहा हो जाता चुनान्चे वह इस ग़म में बीमार हुई और फिर इस दुनिया से रेहलत कर गयीं।
अहले किताब यहूदी व नसारा इस म्र के दावेदार हैं कि हज़रते इब्राहीम ने अपने ख़्वाब की बिना पर जो कुरबानी अल्लाह की बारगाह में पेश की वह हज़रते इस्माइल की न थी बल्कि हज़रते इस्हाक़ की थी। मगर कुरआन और बाईबिल के सायाक़ओ सबाक़ से इस बात की वज़ाहत होती है कि वह हज़रते इस्माइल ही थे। दराएत भी इसकी ताइद में है इसले कि अगर यह वाक़ेया जनाबे इस्हाक़ से मुताल्लिक़ होता तो उसकी यादगार बनी इस्राइल में नज़र आती। क्योंकि हज़रते इस्हाक़ बनी इस्रइल के मूरिसे आला थे। मगर इनकी मज़हबी रवायात में किसी क़िस्म की कोई यादगार इस वाक़ये से मुताल्लिक नहीं मिलती। बरख़िलाफ इसके कि औलादे इस्माइल में इस वाक़ये अज़ीम की यादगार क़ायम है जो आज तक ईदुलअज़हा और मनासिके हज के मौक़े पर कुरबानी की शक्ल में मनायी जाती है।
उमर इब्ने अब्दुल अज़ीज ने अपने दौर में यहूदी आलिम से यह दरियाफ़त किया कि हरज़ते इब्राहीम ने हज़रते इस्माइल की क़ुरबानी पेश की यी हज़रते इस्हाक की उसने कहा कि अहले किताब (यहूदो व नसास) के उलमा क इस बात का यकीन है कि ज़बहीउल्लाह हज़रते इस्माइल हैं मगर रश्क व हसद की बिना पर वह लोग यह चाहते थे कि यह फ़ज़ीलत इनके जद के लिये साबित न हो और तुम्हारे जद के लिये साबित न हो (हयातुल कुलूब जिल्द 1 सफा 280)
खानए काबा की तामीर
जब हज़रते इस्माइल ने सिने बुलूग़ की मन्जिलों में क़दम रखा को परवदिगार ने हज़रते इब्राहीम को हुक्म दिया कि तुम और इस्माइल मिल कर ख़ानए काबा की तामीर करो।
ख़ानाए काबा की तामीर दरहक़ीक़त मुसलमानों और दीने इस्लाम के एक मुक़द्दर मरकज़ की तामीर थी जो तमाम आलमीन के लिए सरमायए निजात नीज़ बनस्से कुरआन अल्लाह का घर है। ग़र्ज़ दोनों बाप बेटे इस तामीर में मसरुफ हुए। हज़रते इब्राहीम मेमारी कर रहे थे और हज़रते तामी में मसरुफ हुए। हज़रते इस्माइल मज़दूर का काम अंजाम दे रहे थे। हालांकि क़बीलए जुरहम के लोग मक्के में कसरत से आबाद हो चुके थे और मज़दूरों की कमी न थी मगर शायद खालिक़ को यही मन्जूर था कि उसका घर हज़रते इब्राहीम और हज़रते इस्माइल के मुताबिक हाथों से बने यही वह मौक़ा था कि जब हज़रते इब्राहीम इस्माइल की मदद से ख़ानए काबा की दीवारें ऊंची करते जाते थे और अपने ज़ुर्रियत के लिए इस्माइलपर बरक़रार रहने की दुआ करते जाते थे जिसका ज़िक्र इब्तेदा में हो चुका है।जब खानए काबा की तामीर मुकम्मल हो गयी तो जनाबे इब्राहीम को हुक्म हुआ कि अब तुम हज का ऐलान करदो चुनान्चे आपने ऐलान फ़रमाया और लोगों को हज्जे बैतुल्लाह की दावत दी। इस दावत मे कुछ ऐसी तासीर थी कि तमाम अरब में ख़वाह वह मोमिन हों या काफ़िर ससे मुताअस्सिर हुए बग़ैर न रह सका यहां तक कि जब हुजूरे खत्मी मरतबत स 0 मबऊस ब रेसालत हुए तो उसी वक़्त अरब का मआशेरा नमाज़ रोज़ा , ज़कात ,और दीगर दीनी फराएजी की अदायगी से बेगाना था। मगर हज की रस्म उस वक्त बी कायम थी।
हज़रते इब्राहीम उलुलअज़म पैग़म्बर थे और आप का लक़ब ख़लीलुल्लाह था और खुदा की बाहगाह में आप का यह मरतबा था कि हज़रत रसूलउल्लाह स 0 को आप की शरीयत को कायम रखने का हुक्म हुआ। 175 साल की उम्र में जब आपने इस दुनिया से रेहलत की और कुदसे जलील में दफन किये गये।
हज़रते इस्माइल हज़रते इब्राहीम की दुआ से मुतावल्लिद हुए आप अपने वालिदे बुजुर्गवाल की शरीयत पर गामज़न थे और इसी की तब्लीग़ करते ते आप का तब्लीग़ी दायरए कार तमाम हेजाज़ यमन और बैरूत तक फेला हुआ था आपनै अपनी शादी क़बीलए जुरहम में रमला नामी एक दोशीज़ा से की थी जिसके बत्न से ख़ुदा ने आप को बारह बेटे अता किये जो सब के सब सरदारी के ओहदे पर फाएज़ थे। इन औलादों की औलादों इस कसरत से हुई कि ज़मीने मक्का सुकूनत के मामले में इनके लिए तंग हो गयी और बहालते मजबूरी इन्हें दूसरे शहरों में आबाद होना पड़ा। अरब की तारीख़ , अरबों को तीन हिस्सों में तक़सीम करती है। पहला हिस्सा जो यमन की नस्ल योरा बिन कहतान से था अरबे आलेबा कहलाया इसमें क़बाएले आद व समूद तसम व जदलीस और जुरहुम ऊला थे। इनका कुफ्र व ऐलान जब हद से ज़्यादा बढ़ गया तो यह अज़ाबै इलाही का शिकार हुए। इसलिए इनको क़बाएले वाएदा (नेस्त व नाबूद शुदा क़बीला) कहा जाता है कि दूसरा हिस्सा अरबे मुताअर्रबा कहलाया यह वह थे जो अरबे आरेबा से अज़दवाजी रिशतों कै साथ मुन्सलिक हुए इऔर फिर इनि औलादों में अरबी ज़बान में नशोनुमां पायी चाहे ज़मज़म के नमूदार होने पर क़बीलए जुरहम जो सरज़मीने मक्का पर कर आबाद हुआ इन्हीं क़बाएल में था और इन्हें जुरहमें सानीया कहा जाता है।
जनाबे इस्माईल ने इसी क़बीले में नशोनुमा पायी। इसीलिए इब्तेदा ही से प की ज़बान अरबी थी। फिर आप ने इसी क़बीले में शादी भी की इसलिए आपनकी औलादों की भी मादरी ज़बान अरबी हुई। यह क़ौम तीसरें हिस्से पर मुश्तमिल थीं जो अरबे मुस्तअर्रबा कहलाया अपब का मुस्तक़बिल प वेक़ार दुनिया में क़यामत तक के लिए इसी अपने मुस्तहर्रबा से वाबस्ता हुआ। अरबे आरेबा पहले ही फ़ना हो चुके थे।
अरबे मुस्तहर्रबहा की नस्लें मुम्किन हों कि सहरायी क़बाएल में हों। मगर तारीख़ मेंम उनका कोई नामों निशान नहीं मिलता। अलबत्ता तमाम आलम में जो अरब के इज़्ज़त व इफतेख़ार के अलम बरदार हैं वह आले इस्माइल ही हैं। जो दुनिया भर में फैले हुए हैं। यह ख़ुदा का वह लवादा है जो उसने इब्राहीम् से नस्ले इस्माइल के बारे में किया था कि मैं उनकी नस्ल में बरकत दूंगा और इनमें बारह सरदार क़रार दूंगा इस वायदे का ज़िक्र तौरैत में सफरे तकरीन बाब 17 में भी है हज़रते इस्माइल के बोटों मैं कीदार की नस्ल बहुत फली पूली और हिजाज़ में आबाद हुई यही पैग़म्बर इस्लाम के मूरिसे आला हैं। जनाबे इस्माइल का आबाद होना ख़ानए काबा ज़मज़म का बरामद होना मक्कए मोअज्ज़मा का आबाद होना ख़ानए काबा की तामीर होना मनासीके हज का जारी होना 10 ज़िल्हिज्जा को तमाम दुनिया के मुसलमानों मैं रस्में कुरबानी का क़ायम होना वग़ैरह शामिल है आप ने अपने वालिदे बुजुर्गवार की मौजूदगी में 133 साल की उम्र में इन्तेक़ाल फरमाया।
हज़रते इस्हाक़ हज़रते ब्राहीम की पहली बीबी जनाबे सारा से स वक्त पैदा हे जब उनकी उम्र 70 साल की हो चुकी थी। क़ुरआने मजीद में आप से मुताअल्लिक़ की सा वाक़या नहीं मिलता जिसे तारीख़े इस्लाम का जुज़ क़रार दिया जाये। अलबत्ता तौरैत में कुछ वाक़ेयात मज़कूर हैं जो हर ऐतेबार से नाक़बिले कुबूल हैं। आपके वालिद हज़रते इब्राहीम ने शाम में आपके अपना जानशीन मुक़र्रर किया था तबरी का कहना है कि जब हज़रते इस्माइल की रेहलत का ज़माना क़रीब आया तो उन्होंने भी आप ही को अपना जानशीन क़रार दिया और अपनी बेटी की शादी आप के बेटे ऐस से की इससै वाज़ेह होता है कि इस्माल और इस्हाक़ के दरमियान ताअल्लुक़ात नेहायत खुशगवार थे और दोनों भाई सुकूनत की बिना पर बहुत दूर होने के बावजूद एक दूसरे के दिल के बहुत क़रीब थे।
हज़रते इस्हाक़ की शादी जनाबे इब्राबीम के चचा आज़र की पोती रफक़ा बिनते नाहेरा से ही जिनके बत्न से दो लड़के याकूब , इस्रिल और ऐस पैदा हुए याकूब की औलादें बनी इस्रिल कहलायीं। ऐस सुर्ख रंग के थे इनका एक बेटा रोम नामी पैदा हुआ जिसका रंग ज़र्द था इस वजह से औलाते रोम बनी असग़र कहलायीं चुनांचे जितने रोमी हैं वह सी रोम और इसके भाइयों की औलादें हैं। इस्हाक़ ने बरस की उम्र में रेहलत की और अपने वालिद हज़रते इब्राहीम की कब्र के पास दफ़न किए गए।
हज़रते लूत , हज़रते इब्राहीम के हक़ीक़ी भतीजे और उन पैग़म्बरों में ते जो ख़नता शुदा पैदा हुए। इराक़ से हिजरत और फिलिस्तीन में क़याम के बाद हज़रते इब्राहीम ने आपको रदुन के नबाही इलाकों में तब्लीग़ पर मामूल किया था। जहां उन्हें एक एसी बदआमाल और सरकश क़ौम से सावेक़ा पड़ा जो नफ़सानी ख़्वाहिशात की तनमील। (लवायता) यानी इग़लामबाज़ी के ज़रिये किया करती थी। मर्दों के अलावा इस क़ौम की औरतें बी अपने नफस की तस्कीन के लिये बाहम चिपटी लड़ाया करती थीं। जिन शहरों में यह क़ौम आबाद ती वह सदूम और सैदूम लुदना और उमरिया के नाम् से मशहुर थे। जनाबे लूद ने उनकी इस्लाह और हिदायत में कोई दक़ीक़ा उठा नहीं रखा। मगर उनकी तालीमात और हिदायात का इस क़ौम की तरफ से जवाब यह मिला कि उन्होंने आपस में यह तय किया कि लूत को संग सार कर दिया जाये। या पिर इन्हें शहर से बाहर निकाल दिया जाये क्योंकि यह पारसायी का दर्स देते हैं और बदफेलियों में हमारे साथ शिरकत नहीं करते।
इस ज़ैल में अल्लामा मजलिसी र 0अ 0 ने अपनी किताब हयातुल क़ुलूब जिल्द अव्वल में इमामे बाक़िर अ 0 का एक क़ौल नक़्ल किया है। जिसका खुला 4सा यह है कि इसं शर्मनाक फेल के इरतेकाब से पहले यह क़ौम शराफ़त और नेकियों की तरफ माएल थी और इनकी तमाम खूबियों में एक खूबी यह भी थी कि जब यह किसी काम से कहीं जाते थे तो सारे मर्द एक साथ मिल कर जाते थे। और अपने घरों में अपनी औरतों को तनहा छोड़ जाते थे।शैतान इन्हें गुमराह करने में रात दिन फिक्र में लगा रहता था और नई – नई तरकीबें सोचा करता था। चुनान्चे एक मौक़े पर औरतों की तनहायी से उसने फायदा उठाया और एक खूबसूरत औरत का भेस बदल कर इसने कुछ मस्तूरात को चिपटी के ज़रिये लुत्फ अन्दोज़ होने की तालीम दी। फिर वह उनकी ज़राअतों की तरफ मुतावज्जे हुआ और इन्हें नुक़सान पहुंचाने की ग़रज़ से उसने हरे भरे खेतों और बागों को तहस नहस करना शुरू किया। जब कभी उस क़ौम के अफराद शहर के बाहर जाते तो वह उनकी इमलाक को तबह व बरबाद करता।
यहां तक कि लोग आजिज़ व परेशान हो गये तो उन्होने आपस में यह मशविरा किया कि जो शख़्स हमारे बाग़ों व खेतों को नुक़सान पहुंचाता है उसकी ताक में रहना चाहिए। चुनान्चे वह लोग ताक में लग गये आख़िरकार एक दिन एक इन्तेहायी हसीन न जमील और ख़ुबसूरत लड़के को गिरफ़्तार किया और उससे पूछा कि क्या तू वही है जो हमारे खेतों और बाग़ों को तबाह करता है। उसने इक़रार किया तो सबों की राय इस अम्र पर मुत्तफ़िक़ हुई कि इसे क़त्ल कर दिया जाये। चूंकि शाम ढल चुकी थी और रात अपनी जवानी की तरफ बढ़ रही थी। लिहाज़ा क़त्ल का मामला दूसरे दिन पर रखा गया और उस लड़के को एक शख़्स की निगरानी और सुपुदर्गी में रात भर के लिए दे दिया गया।
वह शख़्स उसको अपने घर ले आया और जिस कमरे में खुद सोता था और उसी में लड़के का इऩ्तेजाम भी कर दिया ताकि वह नजरों से ओझल न होने पाये। जब रात काफी गुज़र चुकी थी और तमाम घर के लोग सो गये तो लड़के ने फ़रियाद शुरु की और कहा कि मेरा बाप हर शब मुझकों अपने पेट पर सुलाता था इसलिए मुझे नींद नहीं आ रही है। उस शख़्स ने कहा यह बात है तो मेरे पेट पर सो जा लड़का उसके पेट लेट गया और रफता रफता इसने कुछ ऐसी हरकतें कीं कि उसने इस शख़्स को अपने साथ बदफेली पर आमादा कर किया और पूरी रात दोनों लवाएता से लुत्फ़अन्दोज़ होते रहे। यह लड़का दरहक़ीक़त शैतान था जो सुबह होने से पहले ही गायब हो गया। सुबह हुई तो वह शख़्स अपनी क़ौम के लोगो से मिला और उसने रात का माजरा और लवाता की लज्जत और कैफ़ियत से इन्हें आगाह किया जिसे उन्होंने बेहद पसन्द किया और इसी दिन से यह फेले क़बीहा इनके शरस्त में दाख़िल हो गया। अल्लामा मजलिसी की इस रवायत से यह बात वाज़ेह भी होती है कि इन्सान पर जब गुमराही और नफ़सानी ख़्वाहिशात का भूत सवार होता है तो वह शैतान को भी नही छोड़ता। बहर हाल रफता रफ़ता नौबत यहां तक आगयी जो मुसाफ़िर इनके शहर की तरफ़ से गुज़र जाता था तो उसे यह ज़ेर कर देते थे और वह अपनी बचाने में कामयाब न होता था।
लवाता के अलावा इस क़ौम के लोगों में जो आदतें नुमायां थी वह यह थी कि ( 1) यह लोग जरुरत स ज्यादा मन्हूस और बख़ली थे। ( 2) गुरूर की बिना पर इस कद्र लम्बा लिबास पहनते थे कि वह चलते वक़्त ज़मीन पर ख़त खैंचता था। ( 3) अज़राहे तकब्बुर अपने पैरहन और क़बा के बटन खुले रखते थे।( 4) महफ़िलों में एक दूसरे के मुंह पर रियाह सादिर करते थे। ( 5) लोगों के सामने एलानिया एग़लामबाज़ी करते थे। ( 6) ग़ुस्ले जनाबत नही करते थे। ( 7) पैशाब करके पानी नही लेते थे। ( 8) पैखाने के बाद आबदसत नही लेते थे। वग़ैरह जनाबे लूत ने मुसलसल तीस बरस तक इस क़ौम को राहे रास्त पर लाने की अनथक कोशिशें की लेकिन आप की तब्लीग़ी कोशिशों का कोई असर न हुआ।
बिलाआखिर मायुस होकर आपने बहालते मजबूरी इस क़ौम पर अज़ाब की ख़ुदा से इल्तेजा की। परवरदिगार ने चार फरिश्तो को अज़ाब के लिए मामुर किया। जिसके सरबराह हज़रते जिबरईल थे। यह चारो फरिश्ते खूबसूरत लड़को की शक्ल मे हज़रते लूत के पास इस वक्त पहुंचे जब वह शहर से बाहर अपने खेतों और बाग़ों की आब पाशी कर रहे थे और शाम हो चुकी थी। जनाबे लूत ने इन्हे हैरत से देखा और पुछा की आप लोग कौन हो और किस मक़सद से यहां आये है। उन्होने कहा कि मुसाफिर है चुंकि शाम हो चुकी है इसलिए आज की रात हम लोग आप के यहां क़याम करना चाहते हैं और आप के मेहमान होना चाहते हैं। जनाबे लूत ने फरमाया की तुम्हारी मेहमानी मुझे मन्ज़ूर है लेकिन इस बात से भी तुम्हें आगाह कर देना चाहता हुँ कि इस शहर के लोग इन्तेहायी सरकश और बद किरदार हैं मेहमान को मायुब समझते हैं और उन्हे लूट लेते हैं और लड़कों और मर्दो से बदफेली किये बग़ैर उन्हे नही छोड़ते मेरी समझ मे नही आता कि किस तरह तुम लोगों को अपना मेहमान बनाऊँ। फरिश्तो ने कहा रात ज्यादा हो गयी है आज तो हम आप ही के मेहमान होंगे।
ग़र्ज़ की जनाबे लूत इन लोगों को अपने घर लें आये और जब घर के अन्दर सब लोग दाखिल हो गये तो जनाबे लूत ने अपनी ज़ोजा को (जो उसी क़ौम की थी) और जिसकी ज़ात से जनाबे लूत को यह खतरा था कि कंही वह इन मेहमानों के आने की ख़बर अपनी क़ौम वालों को न दे दे। अपनी ज़ौजा को अलग बुलाया और उससे कहा कि इन मेहमानों को आने की ख़बर किसी को न होने पाये अगर तूने मेरा कहा माना तो मै तेरी गुज़शिता नाफ़रमानियों को माफ कर दुंगा। उसने कहा बेहतर है। ऐसा ही होगा लेकिन जब हज़रते लूत मुतमईन हो कर मेहमान की मेहमान नवाज़ी की तरफ मुताव्वजे हो गये तो उनकी ज़ौजा ने मेहमानों की आमद की खबर अपनी क़ौम वालों को कर दी। नतीजा यह हुआ की जनाबे लूत का घर चारो तरफ से घेर लिया गया। मुहासेरीन का मुतालेबा था कि मेहमानों को हमारे हवाले कर दिया जाये ताकि हम अपना शौक़ पुरा करें।
जनाबे लूत ने फरमाया कि हमारी पाको पाकीज़ा लड़कियां तुम्हारे लिए काफ़ी है। खुदा के कहर से डरो और मुझे ज़लील (हमारी लड़कियों से मुराद क़ौम की लड़किया हैं क्योकि हर पैग़म्बर अपनी उम्मत के लिए बाप के मसावी होता है।) व रुस्वा न करो लेकिन वह लोग न मानें और जनाबे लूत की कोई बात सुननें के बजाय शिद्दत पर उत्तर आये तो आपने बेबसी के आलम में खुदा की बारगाह में फरियाद की और कहा कि पालने वाले तू देख रहा है कि मेरी क़ौम मेरे उपर कहां तक मुझ पर जुल्म कर रही है। काश मुझे भी कूवत हासिल होती तो मैं भी इन ज़ालिमो को जवाब देता। यह सुन कर जिबरईल ने कहा कि ऐ लूत आपको मालूम होना चाहिए कि आप के साथ खुदा की बहुत बड़ी ताक़त है। फरमाया वह क्यो कर जिबरईल ने कहा मै जिबरईल हुँ और मेरे साथ तीनो लड़के भी जो इस वक्त आप के मेहमान हैं फरिश्ते हैं हम लोग इस कौम पर अज़ाब के लिए आये हैं लूत ने फरमाया कि फिर देर किस बात की है।
जिबरईल ने कहा कि नुज़ूले अज़ाब के लिए सुबह का वक्त मुअय्यन है। उस वक्त का इन्तेज़ार कीजिये। अभी यह बात हो ही रही थी कि यह लोग लूत के घर का दरवाज़ा तोड़ कर घर के अंदर दाखिल हो गये। बस इनका दाखिल होना था कि जिबरईल ने अपने परों को जुम्बिश दी जिसकी हवा से सबके सब अन्धे हो गये। जैसा कि कुरआन ने कहा कि हमने उन्हे अन्धा कर दिया क्यूकिं इन लोगों ने नाजायज़ फेल की ख्वाहिश की थी। बीनायी जाने के बाद वह एक दुसरे पर गिरते पड़ते भागने लगे और तमाम शहर में यह खबर फैल गयी कि लूत ने जिस आज़ाब की खबर दी थी खुदा की तरफ से इसकी इब्तेदा हो चुकी है।
अल्लामा मजलिसी हयातुल कुलूब में रक़म तराजड हैं कि क़ौमे लूत मे एक शख्स काहिन व आलिम भी था जब उसे सारा हाल मालूम हुआ तो उसने कहा कि बेशक यह वही अज़ाब है इससे बचने की सूरत सिर्फ यही है कि तुम लोग हजडरते लूत के घर का मुहासेरा कर लो। ताकि वह यहां से निकल कर जाने न पायें इस लिए कि जब तक वह तुम्हारे तहमियान रहेंगे। खुदा की तरफ से अज़ाब का नुजूल नही होगा। गर्ज़ कि पूरी क़ौम यकजा हुई और सभी ने मिलकर दुबारा हज़रते लूत का घर घेर लिया जब निस्फ शब गुज़री तो जनाबे लूत से जिबरईल ने कहा कि आप अपने घर वालों को यहां से लेकर निकल जाइये। तो हज़रते लूत ने फरमाया मैं किस तरह जाऊं चारों तरफ तो मुहासेरा है।
फिर जिबरईल ने मुहासेरीन और जनाबे लूत के दरमियान नूर का सुतून क़ायम किया और फरमाया कि इसी सुतूने नूर के सहारे आप निकल जाइये। आपको कोई न देख सकेगा। मगर शर्त यह है कि आप मे कोई शख्स पीछे मुड़ कर न देखे। मुखतसर यह कि जनाबे लूत अपने घर वालों के साथ निकले और जिबरईल के बताने के मुताबिक़ एक तरफ रवाना हो गये। अभी थोड़ी ही दूर गये होंगे कि लूत कि बीवी ने जो उनके हमराह थी पीछे मुड़ कर देखा उसका मक़सद दरअसल यह था कि अपनी क़ौम वालों को हज़रते लूत के जाने की इत्तेला कर दें। नागहा उस पर आसमान से एक पत्थर गिरा और वह वहीं ढेर हो गयी।
इसके बाद जब खुदावंदी अज़ाब का मुअय्यन वक्त क़रीब आया तो हज़रते जिबरईल ने अपने साथी फरिश्तों कीमद्द से अपना काम इस तरह शुरु किया कि क़ौमे लूत की आबादी वालें चारों शहरों को ज़मीन की तह से उठा कर इस कद्र बलंद किया कि अहले आसमान को अरबाबे लवायता और उनके जानवरों की आवाज़े सुनाई देने लगीं जो चीख व चिल्ला रहे थे।
फिर जिबरईल ने इन शहरों को इस तरह पलटा दिया कि पूरी क़ौम धरती में समा गयी और आबादी का वुजूद सफए हस्ती से मिट गया जो लोग इस शहरों से बाहर थे उन पर आसमान से पत्थरों की बारिश हुई जिससे वह लोग भी हलाक हो गये। इन वाक़ेयात का ज़िक्र करते करते हुए परवरदिगार ने क़ुरआने मजीद में इरशाद फरमाया है कि हमने क़ौमे लूत की बस्ती के ऊपरी हिस्से को ज़मीन के नीचे का हिस्सा कर दिया। और आसमान से पत्थरों की बारिश की। ( 1) क़ुरानें मजीद बारहवां पारा आयत न 0 7 (2) तारीखें तबरी जिल्द पहली सफह 187 यह वाक्या हज़रते आदम अ 0 के 3422 साल के बाद बयान किया जाता है।
तारीख़ी और पुरानी सराहतों से यह पता चलता है कि रूम के शहंशाह अयास या अब्दुल्ला बिन ज़हाक़ बिन माद का लक़ब जुलक़रनैन और सिकंदर था इस अम्र में उलमा के दरमियान इख़तेलाफ हे कि आप पैग़म्बर थे या नहीं बेशतर का यह कहना है कि आप पैग़म्बर नहीं थे। मगर आप के खुदा परस्त और मुक़र्रेबए बारगाह होने से इन्कार नहीं किया जा सकता।
इसमें शक नहीं कि आप क नेक तीनत नेक ख़सलत और पाकबाज़ इन्सान थे आप का दिल बचपन ही से नूरे इमान से रौशन व मुनव्वर था शायद यही वजह थी कि इबतदा में आपने तबलीग़ का रास्ता अपनाया और अपनी कौम के लोगों को नेकियों और ख़दापरस्ती की तालीम देने लगे चुनान्चे एक दिन कारे हिदयत की अन्जाम देही के दौरान कुछ शरपसन्दों ने आप के दाहिनी तरफ एक ऐसी ज़रब लगायी कि आप जांबहक हो गये और सौ साल एक दूसरी रिवायत के मुताबिक पाँच सौ साल तक मौत की नींद सोया किये इसके बाद मशीयते खुद ने फिर आप के सर पर बाएँ तरफ ज़र्ब लगायी और आप सौ साल तक फिर मिर्दा पड़े रहे यहाँ तक कि खुदा ने आप को फिर जिन्दा किया और सर के ज़ख्म खुर्दा दोनों हिस्सों में सीगों की जड़ की तरह उबार पैदा करके तमाम दुनिया की बादशाही अता कर दी मुवरेख़ीन का कहना है कि चूंकि मौत के बाद प को परवरदिगार ने दोबारा जिन्दा किया इसलिए आप को जुलकरनैन कहा जाता है कुरान-ए-मजीद से इस बात की सराहत भी होती है कि खुदा ने सलतीन की सफ़ में सिर्फ चार अशख़ास को तमाम दुनिया की जमीन पर हुकूमत का हक़ दिया जिनमें नमरूद और बख़्तेनसर दोनों काफ़िर थे और दो मोमिन थे जो हज़रते सुलेमान और सिकन्दर जुलक़रनैन के नामों से मशहूर हुए।
जब ख़ुदा ने सिकन्दर जुलक़रनैन को शिकोह दबदबा और एक़तेदार का मालिक बना दिया और इज़्ज़त , कूवत , हैबत व हुकूमत आता कर दी तो उन्होंने दुनिया का सफर करके अपनी सलतनत की वसअतों का जाय़जा लेने का इरादा किया चुनान्चे वह रुप से निकले और चलते आफताब के गुरुब होने की जगह पर पहुंचे वहां उन्होने देखा कि कायनात को रोशनी देने वाला और नूर बरसाने वाला सूरज सियाह रंग की कीचड़ के एक चश्में मे डूब रहा है। और इस चश्मे के करीब एक क़ौम भी आबाद है अभी यह करिश्मा देख ही रहे थे कि परवरदिगार का इरशाद हुआ ऐ जुलक़रनैन तुम इस क़ौम को सजा दोगे या इनके साथ हुस्ने सुलूक करोगे।
जुलक़रनैन ने कहा पालने वाले हम सरकशों , मुशरिकों और ज़ालिमों को सज़ा देंगे क्योंकि वह तेरी तरफ से भी बरोज़े क़यामत अज़ाब सुलूक करेंगे। चूंकि वह क़यामत में जज़ाते ख़ैर का मुसतहक़ होगा। इस क़ौम के लोगों के बारे में मुवर्रेख़ीन और मुफ़स्सेरीन का कहना है कि यह नास्तिक काफ़िर , क़दावर , सुर्ख़बालों , करंजी आंखो वाले थे। इनका लिबास हैवानों की खाल और ग़िज़ा जानवरो का गोशत था।
इस अजीबो ग़रीब मुक़ाम का मुशाहेदा करने के बाद जुलक़रनैन ने एक दूसरे सिम्त का रुख़ किया और चलते-चलते उस मुक़ाम पर पहुंचे जिस जगह से आफ़ताब निकलता है वहां भी इन्होने एक ऐसी आबादी देखी कि जिनके सरों पर आफ़ताब तुलू हो रहा था और सर छुपाने के लिओ कोई साया नहीं है। इस क़ौम के बारे में मुफ़स्सेरीन व मुअर्रेख़ीन का कहना है कि यह लोग वहशी थे इन्हें घर बनाने का सलीका नहीं था। ना धूप से बचने का कोई ज़रिया था। अलबत्ता जब तेज़ बारिश होती थी तो यह पहाड़ के ग़ारो में पनाह ले लेते थे। औरर घास-फूस इनकी ग़िज़ा थी और यह लोग जानवरो की तरह ज़िन्दगी बसर करते थे। ज़ुलक़रनैन ने यहां से एक तीसरा रास्ता इख़्तेयार किया और चलते-चलते जब एक पहाड़ के दो किनारों के दरमियान से गुज़रे तो वहां देखा कि वहां भई एक क़ौम आबाद है। जिसकी ज़बान अजीबो ग़रीब है। मगर चूंकि इन्हें खुदा ने मुख़तलिफ ज़बानों पर भी क़ुदरत अता की थी। इसलिए उन्होंने इस क़ौम के लोगों से बाचतीच भी की और इनका हाल भी पूछा इन लोगों ने इस बात की शिकायत की कि इस घाटी के पार याजूज-माजूज की क़ौम आबाद है। जो फ़साद बरपा करती है और जब वह हम लोगों पर खुरूज करते हैं तो हमारी ज़राअतों और बाग़ों को तबाह और बरबाद और हमारे सैकड़ों आदमियों को खा जाते है। अगर आप कहें तो हम लोग आप के पास इस ग़र्ज से चन्दा जमा करेंकि आप हमारे और उस क़ौम के दरमियान कोई मुसतहकम दीवार तामीरकर दें। ताकि बवक़्ते खुरूज वह हमारी तरफ न आ सकें।
ज़ुलक़रनैन ने कहा मेरे परवरदिगार ने मुझे खर्च की जो कुदरत दी है वह तुम्हारे चन्दे से कहीं बेहतर है। मुझे तुम्हारा माल नहीं चाहिए। शर्त यह है कि अगर तुम लोग मेरी मदद व मेरी हितायत पर अमल करो तो मैं तुम्हारे और इस क़ौम के दरमियान एक आहनी दीवार (लोहे की) तामीर करके इनकी तबाहकारियों से हमेशा के लिए तुम्हें महफूज़ कर दूं। ग़र्ज़ कि सब लोग जुलक़रनैन की हिदायतों पर अमल करने के लिए तैयार और कमरब़स्ता हो गये।
यह एक बहुत बड़ी क़ौम है जो जानिबे शिमाल ज़मीन के आख़िरी हिस्से पर पहाड़ों के दरमियान आबाद हैं। याजूज और माजूज इस क़ौम के यूरिसे आला थे। बाज़ रवायतों से पता चलता है कि याजूज और माजूज हज़रते याफ़िस बिन नूह की औलाद से दो गिरोह हैं और इनके जिस्मानी साख़्त की किस्में हैं।
पहली यह कि इनमें कुछ ऐसे लम्बे तडंगे हैं तो इनका क़द ताड़ के दरख़त के बराबर है। दूसरी क़िस्म के लोगो की लम्बायी और चौड़ाई दोनो बराबर है।और तीसरे क़िस्म के लोग जिनके कान बहुत ही बड़े है चुनान्चे वह अपने एक कान से बिछौने और दूसरे कान से ओढ़ने का काम लेते हैं। इनकी तादाद अहद ज़ुलकरनैन में चार लाख थी। याजूज और माजूज की क़ौम में औरतें भी है और मर्द भी इनमें से कोई मर्द इस वक्त तक नही मरता जब तक कि वह एक हज़ार औलादें न करे। यह बरहैना रहते हैं। चलते फिरते जानवरों की तरह जुफती खाते है। और हैवानों की सतह पर ज़िन्दगी बसर करते है। इन्के जिसमों पर रिछ की तरह बाल होते है। जिनसे ऐसी बदबू निकलती है जिसे कोई बर्दाशत नही कर सकता। इनकी आवाज़े इतनी क़रखत और बलन्द हैं कि मीलों के फासले से सुनी जा सकती है। असल ग़िज़ा इनकी मछली है।
चुनांचे जब इनके इलाकों में बारिश होती है तो पानी के साथ साथ मछलियां भी आसमान से बरसती है। और वही इनकी ग़िज़ा बनती है। लेकिन जब बारिश नही होती और इन पर भुख का ग़लबा होता है तो यह निकल पड़ते है और घास , दरखतों की पत्तियां , आदमी , जानवर , हराम हलाल जो इन्हे मिलता हैं सब खा जाते है। जिधर यह हमला करते है उस जगह को तहस नहस और तबाह व बरबाद कर देते है।
ज़ुलक़रनैन ने पहाड़ी क़ौम के लोगों से कहा कि मैं तुम्हें लोहे और ताम्बे के कानों का पता बताता हूं तुम लोग सबसे पहला काम यह करो कि वहां जाओं और लोहा और ताम्बा इकरट्ठा करो। पूरी क़ौम लोहा और ताबा लाने में लग गयी। इधर ज़ुलक़रनैन ने अपनी हिक्मते अमली से दातों को पिघलाने वाला एक सुफूफ तैयार किया था।जिसकी ख़ासियत यह थी कि जब वह लोहे या तांम्बे पर डाला जाता था तो वह पानी की तरंह पिघल जाता था। मुख़तसर यह कि पहाड़ी क़ौम लोहा और ताम्बा लाती गयी और इस सफुफ की मद्द से बड़ी बड़ी सिलें तैयार होती रहीं।
एक नामालूम मुद्दत में जब यह तमाम तैयारियां मुकम्मल हुई और दीवार की तामीर का काम शुरू हुआ इस करंह की लोहे की तैयार शुदा सिलें तरतीब के साथ एक दूसरे पर जमायी जाने लगीं यह तक कि तीन मील लम्बी एक दीवार बुलन्द हुई फिर ज़लक़रनैन ने इन्हें हुक्म दिया कि अब तुम लोग इस दीवार के चारों तरफ लकड़िया कजमा करो। पूरी क़ौम लकड़िया जमा करने में मसरूफ हुई। और बड़े बड़े तनों और दरख़तों को काट काट कर दीवार के चारों तरफ ढेर कर दिये गये। जब लकड़ियों का अम्बार लग गया तो जुलक़रनैन ने कहा कि इसमें आग लगा दो और दूर से इसे धौकते रहो। धौकते धौकते जब वह दीवार सुर्ख़ अंगारा बन गयी तो ज़ुलक़रनैम ने धातु पिघलाने वाले सफ़ूफ़ की मद्द से तांबा पिघला पिघला कर इस दीवार में डाल दिया। यहां तक कि दीवार इस करंह मजबूत और मुसतहकम हो गयी कि न तो याजूज और माजूज की क़ौम उस पर चढ़ सकती थी और न ही इसमें नक़ब के ज़रिये कोई रास्ता बना सकती थी।
दीवार की तकमील पर ज़ुलक़रनैम नै सजदए शुक्मर अदा किया और कहा कि ये मेरे परवरदिगार की नीशानी और मेहरबानी है। क़ुरबे क़यामत जब हुज्जतुल्लाह का जहूर होगा तो खुदा वन्दे आलम इस दीवार को मुनहदिम कर देगा। इसका वायदा सच्चा और अटल है।
अल्लामा मजलिसी अ 0 र 0 का कहना है ज़ुलक़रनैन के साथ दीवार बनाने में खुदा ने एक परिशता मुक़र्रर किया था जिसका नाम रक़ाईल था।
हयातुल क़ुलूब क़ससे जुलक़रनैन में इमामे जाफरे सादिक़ अ 0स 0 से मरवी है कि जब दुनिया के गोशे पर ज़ुलक़रनैन की हुकूमत मुसल्लम और मुस्तहकम हो गयी तो उनके दिल में समुन्दर की सैर और उसके गहराइयों का हाल मालूम करने का इश्तेयाक़ पैदा हुआ। चुनान्चे उन्होंने शीशे का एक बड़ा तवील व अरीज़ सन्दूक़ बनवाया कताकि इसके अन्दर बैठ कर बाहरी चीजों का मुशाहेदा किया जा सके। जब इस संदूक के अन्दर हवा पानी और खाने वगैरा का सारा इन्तिज़ाम कर लिया गया तो वह इसे अपने कुछ हमराहियों को साथ लेकर समुंदर के किनारे पहुंचे और एक जहाज़ नुमा कशती पर सवार एक तरफ चल पड़े। जब इनकी कशमी समुन्दर के दरमीयान में पहंची तो उन्होंने सन्दूक़ में एक रस्सी बांधी और अपने साथियों से कहा कि मुझे सन्दूक़ में बन्द कर के समुंदर में डाल दो। और मुझे तह की तरफ जाने दो। लेकिन इस बात का ख़याल रहे कि जब मैं पानी के अन्दर से रस्सी को हरकत दूं तो मुझे ऊपर खैंच लेना। गर्ज कि ज़ुलक़रनैन समुंदर गहराइयों में उतरते गये। और समन्दरी अजायबात और इसके मख़्लूक़ात को देखते गये यहां तक कि एक शख़्स ने सन्दूक़ पर हाथ मारा और इसे अपनी तरफ मुतावज्जे करना चाहा और पूछा कि ऐ ज़ुलक़रनैन कहां का इरादा है कहा चाहता हूं कि समन्दर की तह तक पहुंच जाऊं और वहां देखूं कि क्या है। इस शख़्स ने जवाब दिया कि इस वक्त प इस जगह हैं जहां से तूफ़ान के जमाने में हज़रते नूह गुज़रे थे और इनका तीशा कशती से गिर गया था और आज तक इसकी गहरइयों में उतरता चला जा रहा है। और अभी तक तह तक नहीं पहुंचा। लिहाज़ा मेरी बात मानिये तो इस जगह से वापस चले जायें। और अपने को मज़ीद ख़तरे में न डालें। ज़ुलक़रनैन ने इस शख़्स के कहने पर अमल किया और रस्सी को हरकत देकर वापस पलटे और उस मुक़ाम पर आपने एक हद क़ायम कर दी जो सिद्दे सिकन्दरी कहलायी। आज वह जगह बाक़ी है।
ज़ुलकरनैन समुंदर की सैर से लुत्फ अन्दोज़ होने के बाद वापस पलट रहे ते कि रास्तें में इन्होंने देखा कि एक शख़्स नमाज़ में मसरूफ है और उसने इन्हें देख कर भी कोई तवज्जो न की तो वह ठहर गये। और जब वह शख़्स नमाज़ से फारिग हो चुका तो वह उनके क़रीब गये और कहा कि तुमने मुझे देखकर बी मेरी तरफ तवज्जे नहीं की जानते हो मैं कौन हूं इसने कहा जानता हूं लेकिन मैं इस वक़्त उसकी मुनाजात में मसरूफ था। जिसकी बादशाही तेरी बादशाही पर ग़ालिब , जिसकी हुकूमत तेरी हुकूमत से बाला। मुझे ख़ौफ था कि मैं अगर तेरी तरफ मुतावज्जे हुआ तो वह कहीं नाराज न हो जाये। ज़ुलक़रनैन ने महसूस किया कि यह कोई ख़ुदा परस्त शख़्स है। लिहाज़ा उन्होने कहा कि क्या तुम इस बात पर राज़ी हो कि मेरे साथ चलो ताकि मैं तुम्हें हुकूमत शरीक करूं और उमूरे ममलेकत में तुम्से मद्द हासिल करूँ।
इस शख्स ने जवाब दिया कि मैं चार शर्तों पर तुम्हारे साथ चलने को तैयार हूं। अव्वल यह कि तुम मुझे ऐसी नेअमत अता करो जो कबी जवाल पज़ीर न हो , दूसरे यहकि मुजे ऐसी सेहत दो जिसमें बीमारी का ख़तरा न हो , तीसरे यह कि मुझे ऐसी जवानी बख़शों जिसमें बुढ़ापा न हो और चोथी श्रत यह है कि मुझे ऐसी ज़ीन्दगी देने का वादा करो जिसमें मौत न हो। ज़ुलक़रनैन हैरत ज़दा रह गये और उसने जवाब में कहा कि मख़लूक़ात में कौन ऐसा है जो इन चीजों पर क़ादिर है। इस शख़्स ने कहा तो पिर मुझे उसी के साथ रहने दो जो इन तमाम चीजों पर कुदरत रखता है।र ऐ ज़ुलक़रनैन तुम बी इसके क़बज़ए कुदरत में हो। ज़ुलक़रनैन ने इस खुदा परस्त की गुफतुगू से इबरत हासिल की और आगे बढ़ गये।
अल्लामा मजलिसी अपनी किताब हयातुल कुलूब में लिखते हैं कि जुलक़रनैन का गुज़र एक ऐसे शख़्स के पास से हुआ जो आलिम था। उसने आपसे चन्द सवालात किया। उसने कहा ऐ जुलक़रनैन आप मुझे इस बात से आगाह फरमाइये कि वह दो चीज़ें कौन सी हैं जो अपनी किलक़त के बात से अब तक उसी हालत पर काय़म हैं। वह दो चीज़े कौन सी हैं जो बाते अज़तक़लीक़ अब तक रवां दवां हैं। वह दो चीज़ें से भी मुझे मुत्तेला फ़रमाइये जो एक दूसरे पर बराबर आती रहती हैं। और उन दो चीजों से बी आगाह कीजिए जो एक दूसरे की दुश्मन हैं। जुलक़रनैन ने कहा वह दो चीज़ें जो किलक़त के बाद से अपनी हालत में बरक़रार हैं वह ज़मीन व आसमान हैं। वह दो चीज़ें जो अब तक रवां दवां हैं वह आफ़ताब और महताब हैं। इसी तरंह वह दो चीज़ें जो एक दूसरे के बाद जुहूर होती हैं वह दिन और रात हैं। वह दो चीज़ें जो एक दूसरे की दुश्मन हैं इन्सानकी जिंन्दगी और मौत है। यह जवाबात सुनकर उस आलिम ने कहा बेसक तुम इस क़ाबिल हो कि खुदा तुम पर अपनी नेअमतों और नवाज़िशों को जारी रखे।
अल्लामा मजलिसी रक़मतराज़हैं कि इसी सफर के दौरान जुलक़रनैन का गुज़र एक ऐसे शख्स के पास से बी हुआ जो मुर्दों की खौपड़ियां जमा किये हुए उन्हें उलट पुलट कर देख रहा है। जुलक़रनैन ने उससे दरियाफ़त किया कि तुम इन खोपड़ियोंम में क्या देख रहे हो उसने जवाब दिया कि मैं जानना चाहता हूं कि इनमें कौन अमीरथा और कौन ग़रीब। मगर मुझे कुछ पता नहीं चलता। ज़ुलक़रनैन समझ गये कि यह शख़्स मुझे इबरत का दर्स दे रहा है और इसका मतलब सिर्फ मेरी तन्बीह है। चुनान्चे वह आगे बड़ गये।
क़ौमे याजूज और माजूज की रोक के लिये आहिनी दीवार की तामीर के मौक़े पर रक़ाएल नामी जिस फरिशते को खुदा ने मासूर किया था ज़ुलक़रनैन की उससे दोस्ती हो गयी थी। चुनान्चे वह फरिशता कभी कभी अपने परवरदिगार से इजाज़त लेकर जुलक़रनैन के पास आया करता था और मुख़लिफ़ मौजूआत पर दोनों में गुफतुगू हुआ करती थी। एक दिन ज़ुलक़रनैन ने उससे कहा ऐ रक़ाएल काश मैं इतने दिनों तक ज़िन्दा रहता कि मैं अपने परवरदिगार की इबादत का हक़ अदा कर सकता। क्या इसकी कोई सूरत मुम्किन है। रक़ाएल ने जवाब दिया कि हां। परवरदिगार ने ज़मीन से एक चश्मा पैदा किया है जिसका नाम आबे हयात है। उसके पानी में यह तासीर है कि जो शख़्स उसे पी लेता है उसे मौत नहीं आती।जब तक अपनी मौत के लिए खुदा से इस्तेदुआ न करे।जुलक़रनैन ने पूछा कि क्या तुम बता सकते हो कि वह चश्मा कहा है। रक़ाएल ने कहा कि बस मै इतना जानता हूं कि इसी ज़मीन के किसी मुक़ाम पर बहरे जुल्मात है और वह चश्मा इसी में है। मगर वहां तक पहुंचना नामुम्किन अम्र है। रक़ाएल की ज़बानी यह ख़बर सुनकर ज़ुलक़रनैन को फ़िक्र लाहक़ हुई कि किस तरंह बहरे जुल्मात का पता लगाया जाए और किस तरंह इस चश्मे तक पहुंचा जाये। चुनान्चे उन्होंने तमाम दुनिया के उलेमा व फ़ोक़हा और औसिया और औलिया को जमा किया जो आसमानी किताबों के माहिर और आसारे पैग़म्बरी को देखे हुए थे। उनसे दरियाफ़त किया सभीं ने अपनी लाइल्मी का इज़हार किया। इस बज़्म में जनाबे ख़िज़ भी तशरीफ फ़रमा थे उन्होने बताया कि वह जुल्मात और वह चश्मा मशरिक़ में है। मैने इसका हाल हज़रते आदम के सहीफे मे पढ़ा है। जनाबे ख़िज की इस निशानदेही से ज़ुलकरनैन के हौसलों पर जवानी आ गयी।
चुनान्चे उन्होंने तमाम उलमा व फोक़हा , होकमा को अपने हमराह लिया और काफ़ी साज़ो सामा नीज़ लशकर के साथ जनाबे खिज़ की रहनुमायी में आबे हयात की तलाश मे निकल खड़े हुए।और बारह साल तक मुसलसल सफर की सउबतें बरदाश्त करने के बाद बिला आख़िर उस बहरे जुल्मा तक पहुंच गये जिसका जिक्र रक़ाइल ने किया था। जुलक़रनैन ने अपने लशकर को जुल्मात के किनारे ठहराया और उसमें से छह हज़ार अहले दानिश व अहले कमाल को मुनतख़ब करके उनसे फ़रमाया कि मै इस ज़ोलमात में दाख़िल होकर इसे तय करना चहाता हूं तुम्हारी क्या राय है। अकसरीयत ने मुखालेफत की और कहा कि यह इरादा तर्क कर दीजिए। ज़ुलकरैन ने कहा मै जो इरादा कर चुका हूँ वह अपनी जगह अटल है ख्वाह कि मै ज़िन्दा रहू या हलाक़ हो जाउं। उलमा व होकमा ने भी समझाया मगर जब ज़ुलकरनैन किसी की बात मानने पर तैयार न हुए तो लौगो ने कहा कि आप को इख्तेयार है मगर इस सफर में हम आप से माफी के ख्वास्तगार हैं।
इसके बाद जुलक़रनैन ने ख़िज्र से पुछा कि क्या जोलमात के सफर में आप मेरी रहबरी फरमायेगें। जनाबे खिज्र ने जब अपनी रज़ा मंदी का इज़हार फरमाय़ा तो जुलकरनैन ने इन्हे दो हज़ार का एक दस्ता फ़राहम किया और इस पर इन्हे सरदार मुकर्रर कर के और खुद भी चार हज़ार जांबाज़ों का दस्ता अपने साथ भी लिया। बाक़ी लशकर को यह हुक्म दिया कि वह इसी मक़ाम पर रहे और मेरी वापसी का इन्तज़ार करे। अगर बारह साल की मुद्दत ग़ुज़र जाने पर में वापस पलट कर न आउं तो तमाम लशकरियों को यह इखतेयार होगा कि जहां चाहे चलें जायें। गर्ज़ कि बाकरा घोडियों पर सवार छः हज़ार का यह अज़ीम क़ाफेला जोलमाल में अपनी मंज़िल की तरफ रवाना हुआ। सबसे पहले हज़रते खिज्र दाखिल हुए उनके पीछें ज़ुलकरनैन और उनका लशकर। सफर का तरीक़ा यह था कि जनाबे खिज्र रवाना होते थे ज़ुलक़रनैन उसी मंजिल पर क़याम करते जाते थे।
अल्लामा मजलिसी का कहना है कि जुलकरनैन को यह भी पता बताया गया था कि यहां आबे हयात का चश्मा वाक़ये है वहा मिनजुमला उनके 356 चश्में और भी है जो आबे हयात की तासीर नही रखते इसलिए वह अपने साथ नमक आलूदा खुश्क मछलियां भी लाये थे। और उन्होने ज़ोलमात में दाखिल होने से पहले 360 मछलियां जनाबे खिज्र अ 0 को दी थी। ताकि ऐसा हंगाम आये तो वह 356 आदमियों में एक एक मछली तक़सीम करें और एक एक आदमी को एक एक चश्में पर इस हिदायत के साथ मुकर्रर कर दें कि अगर वह अपनी मछली को इस चश्में में जिस पर वह मुक़र्रर थें गोता दे। अगर वह मछली ज़िन्दा होकर चलनें लगे तो वह समझ लेंगे कि आबे हयात का चश्मा यही हैं। फिर इसकी ख़बर मुझे भी कर दीजिये। चुनांचे जनाबे खिज्र जब इस मुकाम पर पहुचें जहां 360 चश्में थे। तो उन्होने जुलक़रनैन की हिदायत के मुताबिक अपने असहाब में से एक एक मछली 356 आदमियों में तक़सीम कर के एक मछली अपनें पास रख ली। फिर आपने इन आदमियों को अलग अलग चश्मों पर भेजा और एक चश्में पर खुद भी गये इत्तेफाक़ से जिस चश्में की जानिब जनाबे खिज्र गये वही चश्मा आबे हयात का था।
जैसे ही आपने उस नमक आलूदा मुर्दा मछली को पानी में डाला वह जिन्दा हो गयी और पानी पर चलनें लगी. फिर आपने उसी पानी से गुस्ल किया और कपड़े धोये और उसे जी भर कर पिया। इसके बाद आप अपने असहाब के साथ ज़ुलकरनैन के पास आये और इनसे सारा माजरा बयान किया और खडुशकडबरी दी। लेकिन जब ज़ुलकरनैन को साथ लेकर चश्में के मुक़ाम पर फिर वापस आये तो लाख इस चश्में को तलाश करने की कोशिश की गयी लेकिन वह न मिल सका। यहां तक कि यह लोग इस मक़ाम से आगे बढ़ गये और बहरे जुलमात से आगे बढ़ कर रोशनी के समन्दर में पहुच गये। यह आफताब या महताब की रोशनी न थी। बल्कि उसे अनवारे इलाही की तजल्ली से ताबीर किया जाये तो ज्यादा मुनासिब होगा। इस जगह की ज़मीन सुर्ख थी और इसके संगरेज़े मरवारीद के थे। इस मक़ाम पर ज़ुलकरनैन ने एक आलीशान महल को देखा जो चमक दमक के साथ अपनी खामोशी को दास्तान दोहरा रहा था।
जुलकरनैन ने जनाबे खिज्र की निगरानी में अपने लशकर को महल के बाहर ठहराया और खुद तनो तनहा उसमें दाखिल हो गये। जंहा सिर्फ वीरानी नज़र आयी फिर उन्होने देखा कि एक तरफ बालायी हिस्से पर जानें के लिए एक ज़ीना था आप बेधड़क इस ज़ीने से उपर पहुंचे तो वहां इन्हें एक इन्तेहायी खूबसूरत शख्स नज़र आया जिसकी शक्ल व सूरत इंसान की शक्ल व सूरत सें मुशाबेह थी। वह शख्स सफेद लिबास में महफुस अपने मुहं पर हाथ रखे आसमान की तरफ कुछ देख रहा था। ज़ुलकरनैन की आहट पर वह चौंका और उनसे पुछा कि तुम कौन हो कहा मैं ज़ुलक़रनैन क्या इनती अज़ीम और कुशादा दुनिया जिसे छोड़ कर तुम यहां आये हो काफी न थी। फिर इसनें एक पत्थर का टुकड़ा उठा कर ज़ुलकरनैन की तरफ फेंका और कहा कि इसे ले जाओ और इसको और पत्थरों के साथ वजन करो तुम्हें इससे अजीबो ग़रीब सबक मिलेगा।
ज़ुलकरनैन ने वह पतथर का टुकडा उठा लिया और वापस पलटे। फिर आपने अपने असहाब से सारा वाक्या बयान किया और पत्थर दिखाया और हुक्म दिया कि इस पत्थर के वजन की हकीकत से आगाह किया जाये। इस पत्थर का वजन किया गया जिस चीज़ से भी वह तोला जाता था वजन में ज़्यादा ठहरता था। यहां तक कि एक हज़ार पत्थर इसके बराबर तराज़ू में ऱखें गये फिर भी वह वजन में ज्यादा ही रहा। जनाबे खिज्र भी यह करिश्मा देख रहे थे। उनसे ज़ुलकरनैन ने कहा कि क्यों इस पत्थर का वजन ज्यादा ठहरता है। हज़रते खिज्र ने जवाब दिया कि यह मामला अभी हल हो जाता है। इस पत्थर को एक बार फिर वजन किया जाये। चुनांचे जैसे ही वह पत्थर तराजू के एक पल्ले मे रखा गया जनाबे खिज्र ने इस पर एक मुठ्ठी खाक़ डाल दी और कहा कि अब इसको वजन किया जाये। ग़र्ज़ कि इस पत्थर के मुक़ाबले में जब एक पत्थर रख कर तराजू उठायी गयी तो उसका वजन कम ठहरा।
हांलाकि खाक़ डालने से उसे बढ़ जाना चाहिए था। फिर वह पत्थर हर शय के मुक़ाबले में कम ही ठहरता चला गया। तो ज़ुलकरनैन ने पुछा ऐ खिज़्र आखिर इसमें राज़ क्या है तो जनाबे खिज़्र ने फरमाया ऐ ज़ुलकरनैन जिसने आपको यह पत्थर दिया है वह फरिश्ता था और इसने इस पत्थर के इस मामुली टुकड़ों को आप की मिसाल क़रार दिया है कि ख़ुदा ने तमाम दुनिया की बदशाही आप को अता कर दी है फिर भी आप की हिरस व हवस में इज़ाफा होता जा रहा है। एक दिन आपकी यह हिरसों हवस खुद बखुद खत्म हो जाएगी। यह सुनकर ज़ुलकरनैन पर रिक़्कत तारी हो गयी उन्होने कहा की ऐ ख़िज्र तुम सच कहते हो यह पत्थर मेरे लिए दरसे इबरत है। अब मैं अपनी ज़िन्दगी सिर्फ इबादते खुदा में गुज़ारुगां। इसके बाद ज़ुलकरनैन और उनके लशकरी बहरे जुलमात मे दाखिल होकर वापस पलटे और जब वापसी पर भी आबे हयात का चश्मा जुलक़रनैन को न मिला तो इस पर उन्होनें खिज़्र से कहा कि यह मेरी क़िस्मत है कि खुदा ने मुझको इससे महरुम रखा।
अल्लामा मजलिसी तहरीर फरमाते है कि आबे हयात की जुस्तजू के बाद वापसी पर ज़ुलक़रनैन ने दुमतहुल जिनदल के एक मक़ाम पर सुकूनत इखतेयार कर ली। और 500 बरस की उम्र में वहीं इन्तेक़ाल फरमाया।
हज़रते इसहाक़ बिन इब्राहीम के दो बेटे जनाबे याक़ूब और ऐस जुडवां पैदा हुए उनकी विलादत के सौ साल बाद तक हज़रते इसहाक़ हयात रहे और जब वफ़ात का ज़माना क़रीब आया तो उन्होंने हज़रते याक़ूब को अपना खलीफ़ा और जानशीन मुकर्रर किया।
हज़रते याक़ूब की विलादत हज़रते ईसा से 1837 साल कब्ल हुई। जवान हुए तो आपने पहली शादी लेया बिनते लेयान बिनते शोराइल से की। उनके बत्न से छह बेटे यहूदा रूएल शमउन लावी ज़बालून और यशजर पैदा हुए दूसरा अकद आप ने अपने मामू लोबान बिन नाबिर बिन आज़र की बेटी रायल से फरमाया जिनके बत्न से एक लड़की वीना और दो लड़के यूसुफ और बनयामीन मुतावल्लिद हुए। चूंकि यूसुफ़ की वाल्दा रायील उनकी कमसिनी ही में इन्तेक़ाल कर गयीं थीं। इसलिये वह अपनी ख़ाला राहील की गोद में पले और बढ़े। नीज़ उन्हीं को अपनी मां कहते थे। हज़रते याकूब ने तीसरा अक़द राहील की एक कनीज़ से किया। उनके बत्न से भी दो बेटे दान और तफ़तानी हुए। चौथा अक़्द आपने अपनी पहली बीवी लेया की कनीज़ से किया। इसके बत्न से भी दो बेटे हाद और अशर पैदा हुए। इस तरंह हज़रते याकूब एक बेटी और मजमुई तौर पर बारह बेटों के बाप थे। लेकिन इन तमाम बेटों में हज़रते यूसुफ़ का हुस्न व जमाल इस क़दर शोहरए आफ़ाक़ था कि। जो शख़्स उन्हैं एक मरतबा देख लेता था तो उनकी आंखों में उसकी तस्वीर उतर जाती थी।
हज़रते यूसुफ़ जब बारह बरस के हुए तो उन्होंने यह ख्वाब देखा कि आसमानों के दर खुल गये हैं। और एक ऐसा नूर ज़ाहिर है कि जिसकी तजल्ली सै तमाम कायनात रौशन और मुनव्वर है। और मैं ख़ुद एक अज़ीम पहाड़ की बलन्दी पर खड़ा हूं। मेरे गिर्द व पेश हरे-भरे दरख़तों की क़तारें हैं और नहरे जारी हैं जिसकी मछलियां तस्बीहे इलाही में मशग़ूल हैं। फिर मुझे एक नूरानी पोशाक पहनायी गयी जिसके पहनते ही आलम के तमाम रमूज़ व असरार मुझ पर रोशन हो गये। फिर जमीन के ख़ज़ानों की कुंजियां मेरे सुपुर्द की गयी। और सूरज और चाँद और ग्यारह सितारों ने मुझे सजदा किया। मुफ्सेरीन का कहना है सूरज से मुराद हज़रते याक़ूब अ 0 और चांद से मुराद जनाबे यूसुफ़ की मां राहील और ग्यारह सितारों से मुराद उनके ग्यारह भाई।
हज़रते याक़ूब की आंख कुली तो रात ही में अपना ख़्वाब अपने वालिद याक़ूब से बयान किया। उन्होने फरमाया बेटा इस ख्वाब को अपने भाइयों से न बयान करना वरना वह तुम्हारे ख़िलाफ मक्कारी और अय्यारी की तदबीरें इख़तेयार करेंगे। और इस अम्र में शक नहीं कि शैतान इन्सान का खुला हुआ दुश्मन है। तुमनें जो ख़्वाब देखा है उसकी ताबीर यह है कि परवरदिगारे आलम तुम्हें मनसबे जलीला पर फ़ाएज़ करेगा। बरगुज़ीदा करेगा और ख़्वाबों की ताबीरों का इल्म देगा। जिस तरह उसने तुम्हारे दादा व पर दादा इस्हाक़ व इब्राहीम पर अपनी नेअमतें तमाम की हैं। उसी तरह तुम पर भी अपनी नेअमतें तमाम करेगा। यक़ीनन तुम्हारा परवरदिगार बड़ा अलीम और हकीम है।
जिस वक़्त दोनों बाप बेटों (याक़ूब और यूसुफ़) के दरमियान यह गुफ़तुगू हो रही थी। उस वक़्त यूसुफ़ के किसी भाई की बीवी जाग रही थी। चुनान्ते सुबह होते ही उसने सारा हाल अपने शौहर से बयान किया और उसके ज़रिये तमाम भाइयों में इस वाक़ये की ख़बर मशहूर हो गयी।
हज़रते याकूब यूसुफ़ को इस क़द्र चाहते थे कि उन्हे एक पल भी आंखों के सामने से ओझल होना गवारा न था। और यही वह वालहाना मोहब्बत थी जो बरादराने यूसुफ़के लिए रस्क ओ हसद का सबब बनी। चुनान्चे याकूब की दीगर औलादों ने अकसरों बेशतर उनसे इस बात की शिकायत भी की कि आप का तरज़े अमल यूसुफ के साथ कुछ और है और हमारे कुछ और है। यह सरासर आप की नाइंसाफी है कि सारी मोहब्बतें व शफ़क़ते सिर्फ यूसुफ से लिए हैं। और हम लोग इससे महरूम है। मगर चूंकि याकूब के दिल में यूसुफ़ की तरफ़ से मोहब्बत का समन्दर ठाठें मार रहा था। इसलिए उन्होंने बेटों की इस शिकायत पर कोई तवज्जों नहीं दी। आख़िरकार इसका नतीजा यह हुआ कि वह यूसुफ की दुश्मनी पर उतर आये। और आपस में मशविरा कर के यह फ़ैसला किया कि इनका क़िस्सा ही तमाम कर दिया जाये। ताकि बाप की सारी मोहब्बतें और हमदर्दियां जो यूसुफ़ से वाबस्ता हैं वह हमारी तरफ मबज़ूल हो सकें।
जनाबे यूसुफ़ के सब बाई एक दिन अपने बाप याक़ूब की खिदमत में हाजिर हुए और उनसे कहने लगे कि आप यूसुफ को इतना चाहते हैं कि हर वक़्त इनको घर की चहार दीवारी में क़ैद रखते हैं। हमारी भी ख़वाहिश है कि हम लोगों के साथ वह खेलनें-कूदनें में कभी कभी हिस्सा लिया करें। लिहाज़ा आज हमारे साथ इसे भेजिये। वह हम लोगों के साथ जंगल में भेड़े भी चरायेगा और खेले-कूद भी लेगा। हम कोई ग़ैर नहीं है। हमारा भी यूसुफ पर हक़ है। आप हम पर भरोसा कीजिए हम इनकी पूरी तरंह देख – भाल रखेंगे। याक़ूब ने फ़रमाया कि अगर तुम इसे अपने साथ ले जाओगे तो यक़ीनन मुझे सदमा होगा। इसके अलीवा मैं इस बात से बी डरता हूं कि ऐसा न हो तुम लोग खेल कूद में लग जाओ और यूसुफ की तरफ से हरगिज़ गाफिल न होंगे। अगर खुदा न ख़ास्ता ऐसा हो गया तो यक़ीनन हमारा शुमार निकम्मों में होगा। ग़र्ज कि जनाबे यूसूफ पसे पेश करते रहे और बरादराने यूसुफ़ इस्रार। यहां तक कि वह लोग अपनी फरेबकारियों में कामयाब हो गए। और हज़रते याक़ूब की कर्बनाक ख़ामोशी को इजाज़त ,खामोशी को इजाज़त समझकर उन लोगों ने यूसुफ का हाथ पकड़ा और इन्हें लेकर तेज़ी से जंगल की तरफ रवाना हुए। जब यह लोग जंगल में दाखिल हुए और एक ऐसे मक़ाम पर पहुंचे जहां यूसुफ़ की फरियाद सनने वाला कोई न था। तो इन लोगों ने चाहा कि इन्हे क़त्ल कर दें। मगर बड़े भाई ने मुख़लेफत की और कहा कि इनके ख़ुन में हाथ रंगने से क्या फायदा। ज़्यादा मुनासिब यह है कि इसको किसी कुएं में डाल दो यह खुद ही मर जायेगा। या फिर कोई राहगीर इधर से गुज़रा तो वह इसे निकाल कर अपने साथ ले जायेगा। इस तरंह हम क़त्ल के गुनाह से भी बच जायेंगे और हमारा मकसद भी पूरा हो जायेगा।
यह तजवीज़ सभी को पसन्द आयी चुनान्चे इन लोगों ने जनाबे यूसुफ को पहले मारा-पीटा फिर उनका पैरहन उतारा और इन्तेहायी बेदर्दी और बेरहमी से उनको एक कुएं में फेंक दिया। और ख़ुद कुछ फासले पर उनकी बर्बादी का तमाशा देखने के लिए बैठ गये। मगर क़ुदरते इलाही को यूसुफ की ज़िन्दगी मक़सूद थी। इसलिए पहला मोजिज़ा यह हुआ कि उनके गिरते ही इस कुएं का सारा पानी ज़मीन पी गयी और इसके सोते खुश्क हो गये मगर ज़ाहीर है कि ज़ीन्दगी और मौत की इस कश-मकश के दौराना जनाबे यूसुफ की क्या कैफ़ियत रही होगी। इस यासो बीम के आलम में बस फ़क़त एक ख़ुदा की ज़ात थी जो इनकी निगेहबानी और पासबानी कर रही थी। चुनान्चे जब यूसुफ़ ने फ़रयाद की कि पालने वाले तू देख रहा है कि मेरे भाई मुझ पर क्या-क्या ज़ुल्म कर रहें हैं तो जवाब मिला कि अन्क़रीब़ हम तुम्हें बुलन्द मन्सब पर फाएज़ करेंगे। तब तुम इस फेले बद से इन्हें मुतानब्बेह करोगे। (क़रआने मजीद सुरए यूसुफ आयत 15)
अपने ख़ालिक़ से यूसुफ की फ़रयाद अभी नातमाम थी कि दूसरा मोजिज़ा यह हुआ कि हुक्मे इलाही से एक मिस्री क़ाफिला आकर उस कुएं के पास ठहरा। और उनमें से एक शख़्स ने पानी के लिये कुएं में डोल डाला फिर क्या था। जनाबे यूसुफ़ ने इस डोल की रस्सी को मज़बूती से पकड़ा और डोल पर चढ़ कर बैठे गये। जब उस शख़्स ने डोल को पूरी ताक़त से उपर खैंचा तो यह देख कर हैरान रह गया कि उस पर एक इन्तेहायी हसीन व जमील व ख़ुबसूरत लड़का बैठा हुआ है। उसने इन्हें बाहर निकाला और अपने क़ाफिले वाले के पास ले आया।
बरादराने यूसुफ जो उनकी तबाही और बरबादी का तमाशा देखने के लिये कुछ फ़ासले पर मौजूद थे यह देखकर कि यूसुफ़ कुएं के बाहर निकल आये हैं। क़ाफिले वालों की तरफ दौड़ पड़े और उनसे कहा कि यह हमारा गुलाम है जो ला पता हो गया था। अगर तुम लोग चाहो तो हमसे इसे ख़रीद लो वरना हमारे हवाले कर दो। जनाबे यूसुफ ने भी मसहलते ईज़्दी की बिना पर अपनी ज़बान इस मौक़े पर बन्द रखी। यहां तक कि उनके भाइयों से एक शख़्स मालिक बिन ज़अर ने बीस दिरहम में उन्हें ख़रीद लिया और क़ाफ़िला आगे बढ़ गया। अब हज़रते यूसुफ के भाइयों को यह फ़िक्र लाहक हुई कि हज़रते याकूब को क्या जवाब दिया जाए।
चुनान्चे बाहम मशविरा करके उन लोगों ने एक भेड़ का बच्चा ज़बह किया और यूसुफ का पैरहन जो इन लोगों ने इन्हें कुएं में डालने से पहले उतार लिया था। भेड़ के खून में तर करके जब रात-रात की तारीकी मोहीत होने लगी तो घर की तरफ़ रवाना हुए। करीब पहुंच कर उन लोगों ने बड़ी सफाकी के साथ रोना पीटना शुरू किया और पछड़े खाते हुए घर में दाख़िल हुए। जनाबे याक़ूब ने रोने का सबब पूछा तो वह कहने लगे कि जिस अम्र का आपने अंदेशा ज़ाहिर किया था वही हुआ। हम लोग यूसुफ को सामान के साथ छोड़ कर खेलने में मसरूफ़ हो गये और भेड़िया उन्हे खा गया। यह उनका ख़ून आलूदा पैरहन है।
हालांकि हमें मालूम है कि अगर हम लोग अपनी बात में सच्चे भी हों तब भी आपको यक़ीन नही आयेगा। हज़रते याकूब ने जब हज़रते यूसुफ़ का पैराहन देखा तो कहा कि तुम लोगों ने महज़ अपने बचाव के लिये यह कहानी मुरत्तब की है। अगर भेड़िया खाता तो यह पैरहन फटा ज़रुर होता। ख़ैर जो तुम लोग कह रहे हो उसका फैसला खुदा ही करेगा। मेरे लिये तो सब्रो शुक्र के अलावा अब और कोई दूसरा रास्ता नहीं है। क्योकि यूसुफ़ से तुम लोगों ने मुझे महरुम कर दिया है। यह कह कर आप ज़ारो क़तार रोने लगे। मोअर्रेख़ीन का कहना है कि आपने 21 साल तक फ़िराक़े यूसुफ़ में शबो रोज़ इस तरह गिरिया किया कि आंखों की बीनायी रुख़सत हो गयी थी। क़ुरआने मजीद में है कि आप की आंखें सफ़ेद हो गयी थी।
जिस क़ाफिले ने हज़रते यूसुफ़ को उनके भाईयों से ख़रीदा था। उसने अपनी तिजारती सामान में खूब मुनाफ़ा कमाया और क़ाफिले वाले जब लोट कर अपने वतन (मिस्र) आये तो लोगों ने यूसुफ़ के हुसन व जमाल का मुशाहेदा किया। और यह ख़बर आम होते होते अज़ीज़े मिस्र के कानों तक पहुंची। चुनान्चे उसने मालिनक बिन ज़अर को बुलाया और उनसे हज़रत यूसुफ़ को उनके बराबर दिरहम कि एवज़ ख़रीद लिया ख़रीदारी के बाद जब हज़रते यूसुफ़ उनके सामने पेश किये गये तो उसने इन्हें बग़ौर देखा और उनकी पेशानी में अनवारे पैग़म्बरी को महसूस किया तो उसने पूछा तुम्हारा नसब क्या है। फ़रमाया मैं याक़ूब का बेटा इस्हाक़ का पोता और हज़रते इब्राहीम का पर पोता हूं।
यह सुनकर उसने अपनी बीवी जुलैख़ा को फ़ौरन तलब किया और जनाबे यूसुफ को उनके हवाले करके यह ताकीद कर दी कि तुम उनकी ख़िदमत करो और इनके आराम व आसाइज का पूरी तरंह ख़याल रखों। खुदा इनके सबब से हमें मज़ीद बरकतें अता करेगा। फिर मुम्किन हुआ तो हम उनको अपनी औलाद बना लेंगे। क्योंकि हमारा घर औलाद की नेअमत से ख़ाली है। मुख़तसर यह कि अज़ीज़े मिस्र के घर में जनाबे यूसुफ़ ऐशो आराम से रहने लगे और उनकी देख भाल तरबियत और मोहब्बतें और शफ़क़क़तों में आला मेयारी सतह पर होने लगीं यहां तक कि आप जवान हुए। चढ़ती हुई जवानी की मलाहत ने आपके हुसन व जमाल में चार चांद लगा दिये। चुनान्चे भरपूर शबाब हुस्नों जमाल चौदवीं रात को चांद की तरंह दमकता हुआ चेहरा। हसनी नुकूश ख़बसूरत व दिलकश खंदो ख़ाल देखकर अज़ीज़े मिस्र की बीवी जुलैख़ा यूसुफ पर दीलों जान से फ़रेफ्ता हो गई। और उसके अन्दर नफ़सानी ख़्वाहिशात का ज्वालामुखी भड़कने लगा। और वह रात दिन इस फिक्र में रहने लगीं कि किस तरंह यूसुफ को अपनी तरफ मुतावज्जे कर के इनसे तसकीने नफस का सामान फराहम किया जाये।
आख़िरकर एक दिन मौक़ा पाकर उसने जनाबे यूसुफ को अपने कमरे में बन्द कर लिय और खुद बरहैना होकर कहने लगी आओ यह मंज़र देखकर यूसुफ़ के होश उड़ गये। उन्होंने फ़रमाया कि तुझे शर्म नहीं आती कि तू मुझसे फेले बद की तालिब है। जबकि तेरा शौहर मौजूद है। मेरा मालिक व मोहसिन है। भला यह क्योंकर मुमकिन है कि मैं उसकी ज़ौजा के साथ ज़िना करूं। जो खुदा की नज़र में गुनाहे अज़ीम है। मगर जुलैख़ा पर चूंकि नफस का भुत बुरी तरंह सवार हो चुका था इसलिए वह यूसुफ़ की कोइ भी बात सुनने को तैयार न हुई। और उसने इनका हाथ पकड़ कर अपनी तरफ खैचा और उनके ऊपर गिर जाये। हज़रते यूसुफ़ ने उस हाथ को झटका दिया और छुड़ाकर दरवाज़े की तरफ भागे। उसने झपट कर उनके कुर्ते का दामन पकड़ कर फिर अपनी तरफ़ खैंचा। इसी अफ़रा तफ़री में हज़रते यूसुफ़ का दामन फट गया। और वह दरवाज़ा खोलकर हापतें कांपते बाहर निकले। तो अज़ीज़े मिस्र को दरवाज़े पर ख़ड़ा पाया। शायद पहले से ही कुछ सुन गुन पा चुका था। और इसी टोह में आया था कि यह दोनों क्या करते हैं।
यूसुफ़ के पीचे बरहैना हालत में जुलैख़ा बी निकली। चुनान्चे अज़ीज़े मिस्र को देखा तो झट अपने शौहर से कहने लगी कि यह तुम्हारी बीवी के साथ बदकारी का इरादा करे इसकी सज़ा इसके सिवा और कुछ नहीं है कि इसे कैद कर दिया जाये। या दर्दनाक अज़ाब में मुब्तेला करदिया जाए। आप देख रहे हैं कि यूसुफ़ ने मेरी वह हालत बना दी कि मैं बरहैना आप के सामने खड़ी हूं अज़ीज़े मिस्र ने हज़रते यूसुफ़ की तरफ खूंख़वार और सवालियत नज़रो से उसकी तरफ देखा। आप ने फरमाया कि इसने ख़ुद मुझसे फैले बद की ख्वाहिश की थी। मेरा कुसूर हरगिज़र नहीं है। मेरे परवरदिगार ने मुझे बहुत बचाया। अगर आप को यक़ीन न हो तो सारी हक़ीक़त इस शीरख़वार बच्चे से पूछ लें जो आप के क़रीब इस ग़हवारे में पड़ा है।
जुलेख़ा के ख़ालाजाद या मामूज़ाद बाई का ख़लीका नामी बच्चा जिसकी उम्र सिर्फ चार माह की थी झूले में पड़ा था। अज़ीज़े मिस्र ने कहा कि यह बच्चा जो बोल नहीं सकता तुम्हारी वह गवाबी क्या देगा। अज़ीज़े मिस्र का यह कहना था कि वह बच्चा बहुक्में खुदा गोया हुआ और उसने कहा ऐ अज़ीज़े मिस्र तुम यूसुफ का कुर्ता देखों कि आगे से फटा है या पीछे से। अगर यूसुफ के कुर्ते का दामन आगे से फटा हो तो यूसुफ़ ख़तावार हैं और गर पीछे से फटा है तो जुलैख़ा खतावार है। अज़ीज़े मिस्र ने चार माह के बच्चे के मुंह से यह आवाज़ सुनी तो हैरतज़दा रह गया। और उसके दिल में ख़ौफ पैदा हुआ।
चुनान्चे उसने यूसुफ के कुर्ते का दामन देखा जिसका दामन पीछे से फटा था। तो अज़ीज़े मिस्र जुलैख़ा पर बरस पड़ा और कहने लगा कि यह सब तेरा मक्र व फंरेब है। जबकि वह बेख़ता हैं तुझे चाहिये कि इनसे माफी मांग और खुदा से अपने फेले बद पर तौबा और अस्तख़फ़ार कर फिर उसने यूसुफ से कहा आप इस मामले को पोशीदा रखें क्योंकि यह मेरी इज्जतों आबरु का मसला है और इसकी तशहीर में मेरी सख़्त बदनामी और रूसवायी है। मगर न जाने वे किस तरह इसकी ख़बर सारे शहर में फैल गयी और औरतों के दरमियान घर घर मे यह चर्चे होने लगे कि अज़ीज़े मिस्र की बीवी जुलैख़ा ने अपने परवर्दा नौजवान से फेले बद की कोशिश की और वह उस पर बुरी तरंह आशिक़ व फ़रेफ़्ता है।
जब जुलैख़ा को यह खबर मालूम हुई कि शहर की औरतों और मर्दो में इसके इस फेले बद में हिक़ारत आमेज़ तज़किरे हो रहे हैं। और ज़रूरत से ज्यादा उसकी रूसवायी और बदनामी हो रही है। उसने शहर के मौहज्जब तरीन घरानों से चालीस ऐसी हसीन व ख़ुबसूरत औरतों को मुन्तख़ब करके अपने यहां दावत पर बुलाया जो हुस्नों जमाल में अपनी मिसाल आप थीं जब सब औरतें जमा हो गयी तो जुलैख़ा ने एक एक नेबू और एक – एक छुरी दे दी और कहा कि मैं यूसुफ को बुलाती हूं जब वह तुम्हारे दरमियान से गुज़रने लगें तो तुम लोग अपना अपना नेबू काट लेना। फिल जुलैख़ा ने यूसुफ को बुलाया और कहा कि तुम इनके दरमियान से गुज़र जाओ।
चुनान्चे जब युसुफ़ इनके दरमियान से गुज़रने लगे तो सब औरतों ने उनके हुस्नो जमाल को देख कर इतनी बेखुद और मदहोश हो गयीं कि सभी ने नीबू के बदले अपने हाथों को काट लिया और कहने लगीं कि एक फरिशता है। रवायतो से पता चलता है कि उनमें से नौ औरतें बेहोश हो गयीं। इसके बाद ज़ुलैख़ा ने इन औरतों को मुख़ातिब किया और कहा कि यह वही शख़्स है जिसके बारे में तुम मुझ पर लानत और मलामत करती थीं। बेशक मैंने इससे फेले बद की ख्वाहिश की थी अगर यह मेरी बात पर अमल नहीं करेगा तो यक़ीनन क़ैद भी होगा और जलील भो होगा। जुलैख़ा की यह बातें सुनकर यूसुफ ने अपने परवरदिगार से दुआ की और कहा - कि पालने वाले जिस बात के लिये यह औरतें मुझसे ख़्वाहिशमंद हैं उसकी बनिस्बत क़ैदख़ाना मुझे ज्यादा पसन्द है। सूरए यूसुफ़ आयात 33
ख़ुदा की बारगाह में यूसुफ़ की दुआ मुस्तेजाब हो गयी। इस तरंह कि अज़ीज़े मिस्र ने सोंचा कि इस बदनामी के दाग़ को धुलवाने के लिये मसलहतन कुछ अरसे तक क़ैदख़ाने में रखा जाये ताकि जुलैख़ा और दीगर औरतों से वह मह़फूज रह सकें। चुनान्चे हज़रते यूसुफ को उसने क़ैदख़ाने में क़ैद करके उस जगहं रखा जहां दो क़ैदी और थे उनमें एक बादशाह का साक़ी यूनान और दूसरा शाही बवर्ची मजीला था। और यह दोनों बादशाह को ज़हर देने के इल्जाम में क़ैद किये गये थे।
एक दिन इन दोनों ने हज़रते यूसुफ़ से पूछा कि आप क्या सिफ़त और कमाल रखते हैं फरमाया में ख़्वाबों की ताबीरें जानता हूं यह सुनकर इनमें से एक ने कहा कि मैंने यह ख़्वाब देखा है कि अंगूरों की शराब बना रहा हूं आप ने फ़रमाया कि इसकी ताबीर यह है कि तुम बहुत जल्द इस क़ैद ख़ाने से रिहा होगे। और बादशाह के साक़ी बनोगे। दूसरे ने कहा कि मेरा ख़्वाब यह है कि मैं रोटियों का एक गट्ठर उठाये हुए हूं और चीलें कौए इस पर मंडला रहे हैं आप ने फ़रमाया कि तुम क़त्ल किये जाओगे। और तुम्हारे सर का भेजा चील कौऐ खायेंगे।
चुनान्चे पहला शख़्स रिहा होकर बादशाह का साक़ी बना और दूसरी शख़्स को क़त्ल करके ऐसी जगह डाल दिया गया जहां उसके सर का भेजा चील कौऐ खा गये। जब पहले शख़्स की रिहायी का परवाना आया था। इस वक़्त जनाबे यूसुफ़ ने उससे कहा था कि जब तुम बादशाह के साक़ी बन जाना तो मेरा भी तज़केरा उससे करना वह मेरे बारे में भी कुछ ख़याल करे। मगर वह भूल गया। यहां तक कि क़ैदख़ाने में यूसुफ़ को सात साल गुज़र गये। बादशाह ने एक दिन ख़्वाब में देखा कि सात मोटी ताज़ी गायें सात दुबली पतली गायों को खा रही हैं। और गंदुम की सात हरी भरी बालियों से सात सूखी हुई बालियां लिपटी हुई है। बेदार हुआ तो उसे ताबीर मालूम करने की फ़िक्र लाहक़ हूई।
चुनान्चे उसने हुकूमत के तमाम वज़ीरों और दानिसवरों को जमा करके उनसे ख़्बाव बयान किया। और ताबीर चाही मगर सब के सब ताबीर बताने से क़ासिर रहे। और बाज़ों ने यह कह कर टाल दिया कि यह एक ख़्वाबे परेशां है इसकी कोई ताबीर नहीं है। इस मौक़े पर साक़ी भी मौजूद था। अचानक उसे अपना क़ैदख़ाने वाला ख़्वाब याद आया। उसने कहा अगर हुज़ूर मुझे क़ैदख़ाने तक जाने की इजाज़त दें तो मैं इस ख़्वाब की ताबीर ला सकता हूं। चूंकि वहां ऐसा बरगुज़ीदा शख़ क़ैद है। जो ख़्वाबों की ताबीरों का मुकम्मल इल्म रखता है। बादशाह की इजाज़त से उस क़ैदख़ाने में गया पहले तो उसने जनाबे यूसुफ़ स अपनी भूल की माज़रेत की फिर बादशाह का ख़्वाब बयान किया।
आपने परमाया कि इसकी ताबीर यह है कि इस साल मुल्क मे सात साल तक गल्ला ख़ुब पैदा होगा। इस पैदावार के दरमियान बादशाह को चाहिए कि ज़रुरत के मुताबिक ही बालियों से गल्ला निकालने का हुक्म सादिर करे। बाक़ी को युंही महफुज़ कर लिया जाए ताकि ग़ल्ले में कीडे वगैरह न लगे। क्योकि इसके बाद सात साल तक मुल्क सख्त व शदीद कहत मे मुब्तेला होगा। और यही महफ़ुज़ कि हुई बालियों की ग़ल्ला लोगों की जान बचायेगा। और सात साल की क़हत के बाद फिर खुशहाली का दौर आयेगा। तो ज़रात और बाग़ात पर फिर हरियाली छा जाएगी। ख्वाब की ताबीर लेकर वह बादशाह के पास आया और सारा वाकया बयान किया जिसे सुनकर हैरत ज़दा हो गया और बेहद मुताअस्सिर हुआ यहां तक कि उसने हुक्म दिया कि तुम फिर क़ैदखाने में जाओ और उन्हे मेरे पास लेकर आओ। वह शख्स फिर गया और उसने जनाबे यूसुफ़ को बादशाह का पैग़ाम सुनाया आप ने फ़रमाया कि मैं बादशाह की खिदमत में ज़रुर चलूंगा।
मगर मेरी एक शर्त है कि वह पहले ज़ुलैखा और उन औरतों को जिन्होने अपने हाथ काट लिए थे तलब करे। और उनसे पुछें कि मेरे बारे में अब इन्का क्या ख्याल है। वह अपनी ग़लतियां तस्लीम करने को तैयार है या नही। हज़रते यूसुफ़ के कहने पर बादशाह ने अज़ीज़े मिस्र के ज़रिये उन तमाम औरतों को बुलवाया और जब वह आ गयी तो उनसे पुछा कि तुम लोग मुझे सच सच बताओ कि तुम्हारे मामले में युसुफ कि खता थी। कि तुम लोगों ने उनके मामले में मक्कारी व फरेब से काम लिया था। सब औरते खामोश रही मगर ज़ुलैखा ने बैखोफ हो कर एतेराफ किया कि ग़लती हमारी थी। और हमने यूसुफ के साथ बद कारी का इरादा किया था। वरना हक़ीक़त ये है कि वह बेखता और पाक दामन है। इस सच्चायी के ज़ाहिर हो जाने के बाद बदशाह ने यूसुफ के फ़ौरी तोर पर रिहायी का परवाना जारी किया। और कहा कि इन्हें कैद से इज्ज़तो एहतेराम के साथ निकाल कर बाहर लाया जाये। ग़र्ज़ जब यूसुफ बादशाह के सामने लाये गये तो उसने उनको बग़ौर देखा और बड़ी देर तक कुछ सोचता रहा। फिर उसने आपकी अक़लमन्दी और दानिशमन्दी का अन्दाज़ा किया और कहा कि मैं आज से अपना मुकर्रब और अपना अमीन बनाता हूं और इस बात का वायदा करता हूँ कि आप जो हुक्म देंगे उसकी तामील की जायेगी। क्या आपको यह पेशकश मंज़ूर है।
हज़रते यूसुफ ने फरमाया कि अगर आप मुझ पर इस दरजे मेहरबान ही हैं और मेरी ख़िदमत की आप को ज़रुरत है तो इस मुल्क का शोब ए मालियात महारे हवाले कर दिजिए. क्योकि मैं मुल्की खज़ानो की इस्लाही उमूर और हिसाबो किताब को बड़ी खुश उसलूबी और खूबसूरती से अन्जाम दे सकता हूँ। बादशाह ने यूसुफ की बात फौरन मान ली और मुल्की खज़ाने और उसकी जुम्ला इखतेयारात यूसुफ को सौंप दिये इस तरह आप मिस्र की हुकुमत मे सबसे पहले ख़ज़ानों के अफ़सरे आला पर फायज़ हुए। और ओहदा सम्भालते हुए ही अपने कामों की अन्जाम देही में मस्रुफ हो गये। चुनान्चे सबसे पहले आप ने हूकुमत की आमदनी और खर्च पर तवज्जो फरमायी और एक ऐसा ज़ाबेता मुअय्यन किया जिस्से फ़ालतु अख़राजात का बोझ अज़ानो पर न पड़े। फिर आप ने टैक्सों और ज़जीयों को उसूली का एक कारगार निज़ाम और मन्सूबा मुरत्तब किया। जिसका नतीजा यह हुआ कि बहुत ही कम वक्फे मे तमाम ख़जाने दीरहम और दीनार से छलकने लगे। ख़ज़ानों की हालत जब इत्मीनान बख्श हो गयी तो आपने ज़ेराअत का शोबा भी अपने हाथ मे ले लिया और माशीयात की तरफ मुतावज्जे हुए। आपकी कोशिशों और तदबीरों से जब पैदावार में नुमाया इज़ाफा होने लगा तो अनाज का ज़खीरा करने के लिए बड़ी बड़ी इमारते तामीर हुई। और वसीय और अरीज़ गोदाम बनाये गये। जब यह सारा इन्तिज़ाम हो गया तो आप ने इस शर्त के साथ आम ख़रीदारी का ऐलान किया कि जो शख्स भी अपना फालतू ग़ल्ला फ़रोख्त करना चाहे वह ख़ोशों (बालियों) से दाना जुदा किये बग़ैर बाज़ारी भाव पर हूकुमत के हाथ फरोख्त कर सकता है।
इस तरह आप ने मुसलसल सात साल तक ग़ल्ला इस्टाक किया। यहां तक की इतना ज़खीरा हो गया कि दस बरस तक मुल्क भर के लिए काफी हो सके। इसके चबाद जब क़हत साली के दौर का आग़ाज़ हुआ और बहरानी कैफियत पैदा हुई तो आपने जमा शुदा ग़ल्ला बग़ैर मुनाफे के आवामं मे फरोख्त करना शूरु किया।
लेकिन किसी भी शख्स को उसकी ज़रुरत से ज्यादा ग़ल्ला नही दिया जाता था। महज़ इस गरज़ से कि कहीं मौका परस्त लोग उसकी तिजारत न करने लगे। चुनान्चे दूर दूर से लोग आते थे और मुखतलिफ आशिया के एवज़ ग़ल्ला ले जाते थे। तारीखे बताती है. कि आप (यूसुफ) ने पहले साल दिरहम और दीनार के एवज़ लोगो को ग़ल्ला फराहम किया। दुसरे साल ज़ेवरात वग़ैरह तीसरे साल जानवरों और चौपाओं , चौथे साल गुलाम और कनीज़ो , पाँचवे साल घरों और असासुलबैत , छटे साल बाग़ो ज़मीनों और नहरों वगैरह के एवज़ ग़ल्ला दिया , सातवे साल जब लोगों के पास कुछ न रह गया तो उनकी जानों का मोल कर के गल्ला दिया गया।
ग़र्ज़ कि पूरे मुल्क में कोई शख्स भी ऐसा नही रह गया जो किसी न किसी ज़ाविये से आप का गुलाम न हो। इस तरह परवरदिगारे आलम ने आपके दामन से गुलामी का धब्बा मिटा कर पूरे मुल्क को आपका गुलाम बना दिया।
हज़रते यूसुफ के आबायी वतन पर भी क़हत का ज़बरदस्त असर पड़ा। वहां के लोग भी बुरी तरह मुताअस्सिर हुए। चुनांचे जब नौबत फ़ाके की आ गयी तो मजबूर हो कर याकूब ने भी जो यूसुफ़ के ग़म मे रोते रोते नाबीना , कमजोर और जईफ हो गये थे अपने फरज़न्दो को ग़ल्ले की खरीदारी के लिए मिस्र रवाना किया। जब वह लोग वहां पहोंचे तो यूसुफ ने उन्हे पहचान लिया। मगर वह लोग उन्हें पहचानने से क़ासिर रहे। जनाबे यूसुफ़ ने अपने भाईयों से पूछा कि तुम लोग कौन हो और कहां से आये हो उन लोगों ने जवाब दिया कि हम लोग याकूब के फरज़न्द और वह इसहाक के बेटे और हज़रते इब्राहीम ख़हीउल्लाह के पोते हैं। पूछा तुम्हारे वालिदे बुज़र्गवार क्यों नहीं आये हैं। कहा वह इन्तेहायी ज़ईफ़ और कमज़ोर हैं। इसके अलावा आखों की बीनायी से भी महरूम हैं। फिर आप ने दरियाफ़ किया कि तुम्हारा कोई भाई और भी है। कहां हां , एक सौतेला भाई और भी है। यह सुनकर आप नै फ़रमाया कि आइंदा जब तुम लोग आना तो अपने साथ उसको लेकर आना। वरना यह समझ लेना कि तुन्हारे लिए मेरे पास कुछ न होगा।
इसके बाद आपने भाईयों को इनकी ज़रूरत के मुताबिक़ ग़ल्ला दिया और उसकी जो क़ीमत उनसे उसूल हुई थी उसे भी नज़रें बचाकर इन्हीं के बोरों में रख दिया और इज़्ज़त के साथ इन्हें रूख़स्त किया। जब वह लोग अपने घर पहुंचे और बोरियों को खोला गया तो ग़ल्ले के साथ उन्हें उनकी अदा कर्दा कीमत वापस मिल गयी। ज़ाहिर है कि इस हुस्ने सुलूक पर इनकी ख़शियों का क्या आलम रहा होगा। इन्होंने अपने वालिद जनाबे याक़ूब से सारा वाक़ेया बयान किया और इनके साथ ही अज़ीज़े मिस्र (यूसुफ़) के एख़लाख़ व एहसान और हुस्ने सूलूक का तज़केरा भी किया और यह भी कहा कि आइंदा अगर आप हमें ग़ल्ले के लिए फिर भेजिये तो हमारे साथ बनयामीन को ज़रूर रवाना करें।
वरना यह समझ लें कि वहां मायूसी के अलावा कुछ न मिलेगा। क्योंकि अज़ीज़े मिस्र का कहना है कि अगर तुम उस भाई को लेकर न आये तो तुम्हारे लिए हमारे पास कुछ भी न होगा। हज़रते याक़ूब ने फ़रमाया कि मैं तुम लोगों के साथ बनयामीन को उस वक़्त तक नहीं भेजूंगा जब तक तुम लोग खुदा को हाज़िरो नाज़िर जानकर यह हलफ न उठाओगे कि इनको अपने साथ हर हालत में वापस भी लाओगे।
चूंकि एक बार यूसुफ़ के मामले में तुम्हारी तरफ से धोखा हो चुका है। तमाम भाईयों ने इस बात का अहद लिया और क़स्में खायीं कि ख़्वाह हमारी जानें ही क्यों न चली जायें लेकिन बनयामीन इन्शाअल्लाह हर हाल में वापस आयेंगी। ग़र्ज़ कि जब आया हुआ ग़ल्ला ख़त्म हुआ तो बहालते मजबूरी हज़रते याकूब ने अपने तमाम फ़रज़न्दों से एहदे पैमाना लेकर बनयामीन को उनके साथ मिस्र रवाना कर दिया और यह ताकीद फरमा दी कि सब भाई एक ही दरवाजे से उस शहर में दाख़िल न होना वरना नज़र लगने का अन्देशा है।
जब फ़रज़न्दाने याकूब बुनयामीन को साथ लेकर मिस्र पहुंचे और अलग अलग दरवाज़े से शहर में दाख़िल होकर हज़रते यूसुफ की ख़िदमत में हाज़ीर हुए तो बनयामीन को देखकर आपकी खुशियों का ठिकाना न रहा फिर आपने बनयामीन के इस तर्जे अमल पर भी ग़ौर किया कि वह अपने भाईयों से अलग थलग हैं। और एक जगह ख़ामोशी से बैठे हुए हैं। तो आपने उन्हें अपने पास बुलाया और पूछा कि क्या यह लोग तुम्हारे भाई नहीं हैं जिनके साथ तुम यहां तक आये हो। जवाब दिया कि यह हमारे भाई जरूर है मगर मैं खुद ही इन लोगों से अलहदा रहता हूं।
इसका यह सबब है कि मेरा हक़ीक़ी भाई था जिसका नाम यूसुफ था। बचपन में उसे यह लोग एक दिन अपने साथ जंगल में ले गये फिर वह वहां से नहीं आया। इन लोगों का कहना था कि उन्हें भेड़ियों ने खा लिया था। इन लोगों की इस बात पर मेरे बाप को आज तक यक़ीन नहीं है। हालांकि वह इस ग़म में रोते रोते अन्धे हो चुके हैं। जबसे इनके साथ मैं किसी अम्र में शरीक नहीं होता। वालिद के हुक्म से मजबूर होकर फ़लिस्तीन से यहां तक आया हूं। मगर खुदा गवाह है कि इस सफर में इनसे बुल्कुल अलग थलग रहा। यहां तक कि जहां यह लोग क़याम करते थे वहां से कुछ दूर हट कर क़याम करता था। और इस वक्त भी लग हूं जैसा कि आप देख रहे हैं। बनियामीन की यह अलम अंगेज़ गुफ़तुगू सुनकर यूसुफ़ का दिल रंजों ग़म की गहराइयों में डूबने लगा। और आंखों से आंसू टपकने के लिए बेक़रार होने लगे।
मगर आप ने सब्रो ज़प्त से काम लिया और आप ने मज़ीद गुफ़तुगू के लिए अपने भाईयों से फ़रमाया कि तुम लोग थीड़ी देर के लिए बाहर चले जाओ और अपने इस भाई को मेले पास छोड़ दो। में तन्हायी में इससे कुछ बातें करना चाहता हूं। ग़र्ज वह लोग जब बाहर चले गये तो हज़रते यूसुफ बनयामीन को एक अलहदा कमरे में आये और उनसे लिपट कर बहुत रोये जब दिल कुछ काबू में आया तो आप ने फरमाया कि मैं ही तुम्हारा गुमशुदा भाई हूं। अब तुम्हे ख़ुश होना चाहिए और ख़ुदा का शुक्र अदा करना चाहिए कि उसने हमें एक दूसरे से मिला दिया है। लेकिन इस राज़ को अभी तुम किसी पर ज़ाहिर न करना और मेरा इरादा यह है कि तुम्हे अपने पास ही रोक लूं फिर वालिद को भी बुलवा लूंगा।
लिहाजा तुम्हें रोकने के लिये मैं जो क़दम उठाऊं उससे तुम परेशान न होना। क्योंकि यहां के क़ानून के मुताबिक़ कोई किसी को बग़ैर माकूल वजब के बग़ैर किसी जुर्म के रोक नहीं सकता। इस बात चीत के बाद हज़रते यूसुफ़ बनयामीन से रूख़सत हो गये और वह अपने भाईयों के पास फिर वापस आ गया। हज़रते यूसुफ ने इन्हें रोकने की यह तदबीर इख़तेयार की कि जब वह अपने सब भाईयों को ग़ल्ला देने लगे तो बनयामीन के ग़ल्ले वाली बोरी में बादशाह का एक तेलायी प्याला चुपके से रख दिया औह जब सब लोग यूसुफ से रुखसत हो कर और ग़ल्ले ले कर शहर से बाहर निकले तो इन्हें फिर वापस बुलवायां और एक-एक तलाशी करने के बाद वह प्याला बिनयामीन के बोरे से बरामद करके इन्हे रोग लिया।
हालांकि दीगर भाईयों ने सख़्त एहतेजाज भी किया कि बनयामीन का रोकना उसूली हैसियत से ग़लत होगा। क्योंकि हम लोग चोर नहीं हैं इन्हें आप छोड़ दीजिये। चुंकि हमारे वालिद इन्तेहायी ज़ईफ़ और कमज़ोर और नाबीना है। अपने एक बेटे के ग़म में रोते रोते उनकी आंखें सफ़ेद हो चुकी है। इसके बाद से ही वह बनयामीन को बहुत ज्यादा चाहते हैं। इसी लिए वह इनकी जुदाई का सदमा बर्दाश्त नहीं कर सकेंगे।
इसके अलावा हमारा इनसे वायदा भी है कि हम बनयामीन को हर कीमत पर अपने हमराह वापस लायेंगे। लिहाज़ा आप चाहें तो हममें से किसी को रोक लें और इन्हें जाने दें। भला यह क्यो कर हो सकता है कि जिसके पास से माल बरामद हुआ है और उसके एवज़ में किसी दूसरे को रोक लूं। ग़र्ज कि यूसुफ़ बुनयामीन को उनके हवाले करने पर किसी कीमत पर राज़ी न हुए तो बड़े भाई यहूदा ने अपने भाईयों से कहा कि मैं बग़ैर बनयामीन को अपने साथ लिये हरग़िज वापिस नहीं जाऊंगा। तुम लोग जाऔ और जाकर वालिद को इस सूरते हाल से आगाह करो। इसके बाद जैसा उनका हुक्म होगा उसी पर अमल करूंगा।
चुनान्चे वह लोग अपने वतन वापस आ गये। हज़रते याकूब से सारा वाक़ेया बयान किया। बलाआख़िर जनाबें याक़ूब ने अज़ीज़े मिस्र के नाम एक ख़त लिखा जिसका मजमून यह ता कि ऐ अज़ीज़ इस अम्र में कोई शक नहीं कि हम खानवादये नबूवत के अफराद हमेशां रंजोआलाम में मुब्तेला रहते हैं। क्योंकि परवरदिगारे आलम हमारा इम्तेहान लिया करता है। इधर बीस बरस से ज़्यादा मुसीबतों का सामना है। पहली अज़ीम मुसीबत यह थी कि मेरे लख़ते जिगर यूसुफ को इनके भाई सुबह के वक़्त सैर व तफ़रीह के बहाने से जंगल की तरफ ले गये थे और शाम को रोते पीटते इनका ख़ून आलूदा कुर्ता वापस लाये और मुझसे बयान किया कि एक भेड़िये ने इनको फाड़ खाया है।
यह सुनकर दुनिया मेरी नज़रों में सियाह हो गयी और मैं इसके फ़िराक़ में इस क़द्र रोया कि बीनायी जाती रही। इसके बाद इनके छोटे भाई बिन यामीन से मेरा दिल बहलता था कि मिस्र से वापस आकर लड़कों ने बयान किया है कि इसने चोरी की है और अज़ीज़ ने उसे गिरफ़तार कर लिया है। हालांकि हम अहलेबैते बबूवत चोरी नहीं करते। ग़र्ज तुमने इसे क़ैद कर लिया है। जिसके सबब मेरी मुसीबतों में और भी इज़ाफा हो गया हैं। मुझ पर रहम करो और इसे छोड़ दो। यह ख़त लेकर याकूब के बेटे फिर मिस्र की तरफ रवाना हुए और वहां पहुंचकर मकतूब यूसुफ़ के हवाले किया जिसे पढ़कर इन्हें ताबे ज़्बत न रही तन्हायी में जाकर खूब रोये और तीन मरतबा ऐसे ही किया जब किसी सूरत से ज़ब्त न हो सका तो आख़िरकार इन्होंने अपने भाईयों पर सारी हक़ीक़त वाज़ेह कर दी। और कहा कि बनयामीन मेरा हक़ीक़ी भाई है। बेशख खुदा ने मुझ पर फज़लो करम किया है और वह नेकियां करने वालों का अज्र बरबाद नहीं करता। अब आज की तारीख़ से तुम लोगों पर कोई इल्ज़ाम नहीं है खुदा तुम्हारे गुनाहों को माफ करे। और वही सबसे ज़्यादा रहीम है।
इसके बाद हज़रते यूसुफ़ ने अपना एक कुर्ता अपने भाई को दिया और कहा कि इसको ले जाओ। और बाप की आंखों से मस करो। इन्शाअल्लाह उनकी बीनायी वापस आ जायेगी। फिर तुम लोग उन्हे और अपने अहलो अयाल को लेकर अपने पास आ जाना। कहा जाता है कि यह वही कुर्ता था जो नमरूद की आग तक सफर के दौरान हज़रते इब्राहीम के जिस्म पर था। और यूसुफ को रूख़सत करते वक्त हज़रते याकूब ने इस कुर्ते को उनके बाजू पर बांधा था। इसकी ख़सूसियत यह थी कि जब वह किसी बीमार के जिस्म से मस किया जाता तो उसका सारा मर्ज जाएल हो जाता था। बहर हाल ब्रादराने यूसुफ़ ने जब वह कुर्ता जनाबे याक़ूब की आंखों से मस किया तो उनकी आंखें रोशन और मुनव्वर हो गयीं। तो इन लोगों ने सारा मिस्र का हाल याकूब से बयान किया। और यूसुफ के मिलने की ख़ुशखबरी के साथ-साथ अपने साबेक़ाना फेल का एतेराफ़ भी किया फिर चन्द दिनों के बाद यह ख़ानवादा फिलिस्तीन से हिजरत कर के मिस्र की तरफ रवाना हुआ। और जब यह सब लोग मिस्र के क़रीब पहुंचे तो हज़रते यूसुफ़ ने शहर से बाहर निकलकर अपने वालदैन का इस्तेक़बाल किया। इज़्जत व एहतेराम के साथ इन्हें महल में लाये और वालदैन को अपने तख्त पर बिठाया।
हज़रते यूसुफ मिस्र की हुकूमत मे जिस वक़्त ख़ज़ानो के सरबराह मुकर्रर हुए थे इस वक़त आप की उम्र 33 साल की थी। जब आप 40 साल के हुए तो बादशाह ने आप के हुस्नें ततबीर और फहमो फरासत को देखते हुए अपना ताज उतार कर आप के सर पर रख दिया। और सलतनत के जुम्ला उमूर को आपके सुपूर्द करके ख़ुद दस्त बरदार हो गया। चुनांचे इस ज़मानए क़हत में आप की हैसियत एक ताज़दार की थी इसी साल ज़ुलैखा के शौहर ततफीर का इन्तेकाल हो गया। और उसके इन्तेक़ाल के बाद ज़मानए क़हत में ज़ुलैखा भी एक एक दाने को मोहताज हो गयी। यहा तक कि वह भीख मांगने लगी। उसका यह हाल देखकर लोगों ने उससे कहा कि यूसुफ के पास क्यों नही जाती। उसने कहा हयामाने है। इसलिए हिम्मत नहीं पड़ती।
मगर जब लोगों का इसरार ज़्यादा हुआ तो एक दिन वह सरे राह खड़ी हो गयी। और जब उधर से हज़रते यूसुफ की सवारी ग़ुज़रने लगी तो इसकी ज़बान से बेसाखता यह अलफाज़ निकले कि “ पाको पाकिज़ा है वह खुदा कि जिसने बादशाहों को नाफरमानी की वजह से गुलाम बना दिया और गुलामों को फरमाबरदारी की वजह से बादशाहत अता कर दी। ” ज़ुलैखा की ये आवाज़ यूसुफ के कानों से टकरायी तो उन्होने सवारी रोक दी। उन्होने उसे पास बूला कर पूछा कि क्या तुम ज़ुलैखा हो उसने कहा कि हां। पूछा कोई हाजत उसने कहा हां ऐ युसुफ जब मै बुढियां हो चुकी हूँ तो तुम्हे मेरी हाजत का ख्याल आया काश जवानी मैं तुम्हारे दिल मे मेरी तरफ से कोई ख्याल पैदा होता यह सुनकर हज़रते यूसुफ जुलैखा को अपने हमराह क़सरे शाही मे लाये और वहां उससे पूछा कि क्या तुमने मेरे साथ नारवा सुलूक नही किये ? और क्या मुझे गुनाहों की तरफ माएल करने की कोशिश नही की ?
जुलैखा ने कहां हां- यकीनन तुम्हारी बातें हक़ीक़त पर मब्नी है। मगर इसकी वजह और मजबूरी भी थी।
यूसुफ़ ने फरमाया – वजह और मजबूरी क्या थी ?
ज़ुलैखा ने कहां – अव्वल यह कि परवरदिगार ने तुम को ऐसा हसीन पैदा किया और न मिस्र मे मेरी तरह खुबसूरत औरत पैदा होती। दुसरा कि मेरा शौहर नामर्द था। तीसरे यह कि मुझे आपसे फितरी तौर पर इश्क़ था।
यूसुफ ने फरमाया-अगर तू पैग़म्बरे आखरुज़्ज़मा के ज़माने में पैदा होती और उनका हुस्नों जमाल देखती तो खुदा जाने तेरी क्या हालत होती। खैर अब तेरा इरादा क्या है।
ज़ुलैखा ने कहा- तुम बेशक बरगुज़ीदा और पाक हो। ख़ुदा से दुआ करो कि वह मेरी जवानी वापस कर दे। इसलिए कि मै अब भी तुमसे निकाह की ख़वाहीश मंद हुं।
चुनांचे हज़रते यूसुफ ने दुआ फरमायी और खुदा वन्दे आलम ने जुलैखा की जवानी पलटा दी और इसके साथ ही उसके हुस्न मे मज़ीद इज़ाफा भी कर दिया। और जब हज़रते यूसुफ ने उससे अक़द किया तो वह बाकरा थी। जुलैखा के बदन से हज़रते यूसुफ के दो बेटे मुंशा और अफराहम मुतावल्लिद हुए। अफराहम हज़रते मूसा के वसी यूशा के दादा थे। और एक बेटी रहीमा पैदा हुई। जो हज़रते अय्युब की ज़ौजा थी।
हज़रते यूसुफ की मज़मुयी उम्र 110 साल की हुई। आप 18 साल तक क़ैद मे रहे। और 80 साल तक हुकूमत की। जबकि हज़रते याकूब की मजमुई उम्र 147 साल की हुई और इन्तेक़ाल के बाद वह अपने दादा हज़रते इब्राहीम के पास दफन हुए। जनाबे यूसुफ अपने वालिद के इन्तेकाल के बाद 23 साल तक ज़िन्दा रहे। इसके बाद जब आप का इन्तेक़ाल हुआ तो आप मिस्र में दफन हुए।
खुदा के मखसूस बन्दो की हालत भी अजीबो ग़रीब होती है। कभी इनका इम्तेहान राहत व खुशहाली और ऐश व आराम में मुब्तेला करके इनकी आज़माइश की जाती है। हज़रते अय्यूब बिन मूस बिन ऐस बिन इस्हाक बिन इब्राहीम अ 0 का शूमार भी उन खास बन्दो में होता है। जिन्हें खुदा ने इम्तेहान की खातिर ऐशओं आराम के बाद मसाएब व अलाम की सखतियों से हम किनार किया।
आप की वालिदा हज़रते लूत की साहबज़ादी थी जिनके साये शफक़्क़त से आप बचपन में ही महरुम हो गये थे। आप की ज़ौजा का नाम रहीमा था। जो जुलैखा के बदन से हज़रते यूसुफ़ की बेटी थी। बाज़ मोअर्रेखीन ने आप की ज़ौजा का नाम ज़ेबा बिन्ते याकूब तहरीर किया है। और बाज़ में रहीमा को इब्राहीम बिन यूसुफ़ को दुख़तर क़रार दिया है। जो मेरे नज़दीक ग़लत है।
हज़रते अय्यूब ऐसे शुक्र गुज़ार बन्दे थे कि ख़ल्लाके आलम में इनके दामाने तशक्कुर को मुख़तलिफ़ क़िस्मों की नेअमतों मालो मता और दौलत सरवत नीज़ कसरते औलाद से भर दिया था। चुनान्चे मोअर्रख़ीन ने आप के बेटों की तादाद 25 बतायी है। मेहमान नवाज़ी तुर्रेइम्तियाज़ और इबादत और इताअत आपका शेआर थी। नीज़ इबादत और रियाज़त के लिए आप हमेशां ऐसा रास्ता इख़तेयार करते थे जिसमें मेहनत और मशक़्क़त ज्यादा हो। आप के 80 बरस इन्तेहायी कुनून और इतमिनान और असूदा हाली में गुज़रे इसके बादज जो इन्तेहान का सिलसिला शुरू हुआ तो , तमाम औलादें मर गयीं , दोलत तबाह हो गयी , जानवर हलाक हो गये , खेतियां बरबाद हो गयी , फाक़ों पर फाक़े होने लगे और ख़ुद तरंह – 2 की बीमारियों के शिकार हो गये। फिर वह मंज़िल भी आयी कि तमाम लोगों ने हज़रते अय्यूब को उनकी बीमारी की बिना पर छोड़ दिया। कोई न था जो उनका साथ देता उन मुसीबतों आलाम यास और नामुरादजी के आलम में ख़ुदा की ज़ात के अलावा बस एक ज़ात आप की बीबी रहीमा की थी जो शबो रोज़ आप की देखभाल और आपकी तीमारदारी के फराएज़ अन्जाम देही में हमानत मसरूफ़ रहती थीं।
वह आप की ख़िदमत भी करती थीं और मज़दूरी करके हज़रते अय्यूब के खाने पीने का समान भी फराहम करती थीं। जब सात साल यूं ही गुज़र गये तो एक दिन शैतान ने रहीमा से कहा कि तुम एक आला ख़ानदान की औरत होकर इतनी मेहनत और मशक़्क़त करती हो। आख़िरकार इसका सिला क्या है जबकि अय्यूब खुद सख़्त तरीन बलाओं और शदीद तरीन मूज़ी मर्ज का शिकार हैं। आप ने जवाब दिया कि यह सब कुछ अल्लाह की तरफ़ से हैं।
उसी ने हमें नेअमतें अता की इज़्ज़त बख़्शी माल व मता और कसरते औलाद से सरफराज़ किया और अब वही हमारा इम्तेहान ले रहा है। और हम बहर हाल उसका शुक्र करते हैं। शैतान ने कहा यह तुम्हारी ग़लत फहमी है। इसकी कोई वजह और भी हो सकती है। यह कह कर शैतान ने ज़ौजए अय्यूब के दिल में एक वस्वसा पैदा कर दिया। और शक़ूक व शुबाहात के दरवाज़ों को खोल दिया। रहीमा जब अपने शौहर के पास आयीं तो सारा वाक़ेया बयान किया। हज़रते अय्यूब ने फरमाया कि वह शैतान है जो तुम्हें खुदा की राह से बरगशता करना चाहता है। और हमें इम्तेहान में नाकाम करने की कोशिश कर रहा है। आश़िरकार तुमने उसकी बातों पर तवज्जों ही क्यों की। याद रखो कि अगर मैं ठीक हो गया तो इस जुर्म की पादाश में तुम्हें सौ क़मजियां मारूंगा कि तुमने ऐसे मलउन शख़्स से मेरे इस इम्तेहान के बारे में गुफतुगू क्यों की जो खुदा की तरफ से हमें बरगशता करना चाहता हैं।
आख़िर कार शैतान के वरग़लाने और बहकाने से जब लोगों ने जनाबे अय्यूब को ताना देना शुरू किया और यह कहने लगे कि तुमने कोई पोशीदा गुनाह ज़रूर किया है। जिसकी सज़ा ख़ुदा तुम्हें दे रहा है। और शैतान ने कहा कि तुम्हारा मर्ज़ इतना तुलानी हो गया है। मगर तुम्हारा ख़ुदा तुम पर कोई रहम नहीं करता। तो आप का पैमानए सब्र छलक उठा। जब़्तो तहम्मुल की ताब न रही चुनान्चे आपने बारगाहे इलाही में दुआ की और फरमाया पालने वाले तू देख रहा कि मेरे उम्मती मुझे ताने दे रहे हैं और मुझ पर गुनाहों की तोहमत आयद कर रहे हैं। इसके अलावा शैतान भी तरह तरह की अज़ीयते पहुंचा रहा है। तू बड़ा रहीम और करीम है। अब मुझे मसायबो आलाम से निजात दे।
चुनान्चे हुकम हुआ कि ऐ अय्यूब ज़मीन पर एक ठोकर मारो। ग़र्ज़ ठोकर का मारना था कि ज़मीन का सीना शक़ हुआ और उससे आबे शीरीं व सर्द का एक चश्मा बरामद हुआ। जिससे आपने गुस्ल किया और पानी को पिया जिससे आप की तमाम तकलीफे दूर हो गयीं और परवरदिगार की रहमत ने आपको एक सेहतमंद इन्सान बना दिया। और इसके बाद ख़ुदा ने पहले आपको जितनी नेअमत , दौलत और औलादें अता की थीं उससे ज़्यादा दोबारा अता कर दीं। फिर खुदा ने बीबी रहीमा के मामले में अय्यूब को अपनी क़सम पूरी करने का तरीक़ा यह बताया कि इन्हें सौ क़चियां मारने के बजाये सौ क़मचियों का एक मुट्ठा बनाकर सिर्फ एक बार मार दो। मोअर्रेख़ीन ने हज़रते अय्यूब के वाक़ेयात में इनके जिस्म में कीड़ों का पड़ना भी तहरीर किया है। जिसे मेरा ज़हन कुबूल नही करता। क्योंकि पैग़म्बरों में ऐसी कोई बीमारी नहीं होती जो लोगों के लिए सबबे कराहत बने।
मोअर्रेख़ीन ने हज़रते अय्यूब की उम्र 63 साल की बतायी है। इन्तेक़ाल से क़ब्ल 62 साल में आप ने अपने वसी व जानशीन मोहल को मुकर्रर फरमाया।
आप हज़रते अय्यूब के साहब ज़ादे थे आपका नाम बशर और लक़ब जुलकफ़ल था। आप अपने वालिद अय्यूब के बाद मन्सबे पैग़म्बरी पर फायज हुए बहैसियते नबी लोगों को दीने हक़ और तौहीद का दर्स देते रहें आप चूंकि अज़इब्तेदा ता इन्तेहा शाम में ही सुकूनत पज़ीर रहे। इसलिए 75 साल की उम्र में वही आप का इन्तेक़ाल भी हुआ। आपने अपना वसी अपेन फरज़ंद अब्दान को बनाया था।
आप हज़रते इब्राहीम के फरज़ंद मदीन के बेटे मिनकाएल के साहबज़ादे थे। इस तरंह हज़रते इब्राहीम आपके पर दादा हुए। लेकिन बाज़ मोअर्रेख़ीन का ख़याल है कि आप हज़रते इब्राहीम की औलाद में नहीं थे। बल्कि उन लोगों में से किसी शख्स की औलाद में से थे कि जो आप पर ईमान लाने के बाद उनके साथ हिजरत करके आए थे शाम में सुकूनित पज़ीर हो गए थे।
मदीना एक बस्ती का नाम भी था जो परज़न्दे इब्राहीम (मदीना) के नाम से मौसूफ थी। इस बस्ती मैं 40 घर थे। इन लोगों की हिदायत भी आप ही से मुताल्लिक़ थी। मदीन के लोगों में मिनजुम्ला और बुरी आदतों के दो तीन बातें बहुत ही ख़राब थी। जिनमें हर शख़्स मुब्तेला था। अव्वल यह लोग रहज़नी और चोरी के खूगर थे। और जो मुसाफ़िर इनकी बस्तदी से गुज़रता था उसे लूट लेते थे। दूसरे नाप तौल में ज़्यादा लेना और कम देना इनकी सरिशत में दाख़िल था। तीसरी यहलोग मुखरिक थे।
चुनान्चे आपने नाप तौल के लिए पैमाना ईजाद किया और वज़न मुक़र्रर किये। लोगों का शिर्क से रोकते रहे। और चोरी और रहज़नी की मुख़लेफ़त में आवाज़ बुलन्द करते रहे। नीज़ उन्हें नमाज़ की तरगीब देते रहे। मगर इन पर कोई असर न हुआ। वह कहते कि तुम्हारी नमाज़ हमारे बाप दादा के खुदाओं की परशतिश से हमें रोकती है। नाप तौल के बारे में उनका कहना था कि आप हमें रोकने वाले कौन होते हैं। हमारा माल हम जिस तरंह चाहें ख़रीदें और फरोख़त करें। अगर हमारे ज़्यादा दख़लन्दाजी करोगे तो हम तुम्हें संगसार कर देंगे।
ग़र्ज कि जब अहले मदीन अपनी हद से गुज़र गये और जनाब शुऐब की तमाम तर इस्ली कोशिशें नाकाम हो गयीं तो खुदा ने उन पर अजाब नाज़िल करने का फैसला किया और इन्हे इस क़द्र शदीद गर्मी में मुब्तेला किया कि सरदाबों में भी उन्हें चैन मयस्सर न आ सका। इसके बाद एक खुश्क और सर्द अब्र का टुकड़ा नमूदार हुआ जिसके नीचे राहत की तलवाश में तमाम लोग जमा हो गये। तो एक सदा बुलन्द हुई जिससे ज़मीन लरज़ने लगी और उस अब्र के टुकड़े से ऐसी आग बरसी कि सब के सब हलाक हो गये।
हज़रते शुऐब का दिल मोहब्बते इलाही से इस क़द्र मामूर था कि आप अपने परवरदिगार के लिए शबो रोज़ गिरया किया करते थे। यहां तक कि आप की मुसलसल गिरये की वजह से तीन दफा आप की बीनामी चली गयी। और तीनों बार खुदा वन्देआलम ने उन्हें नूर बख्शा। आपके मोजिज़ात में से यह भी था कि आप जब किसी पहाड़ पर चढ़ने का कस्द करते थे तो इस पहाड़ की चोटी सर निगूं होकर ज़मीन से लग जाती थी। और आप आसानी से इस पर चढ़ जाते थे। बाज़ रवायतों से पता चलता है कि हज़रते मूसा का असा भी आप ही का अतिया था। और हज़रते मूसा के क़ब्ल आपके पास इससे मोजिज़ात ज़ाहिर हुआ करते थे। तारीखों से यह इन्केशफ़ भी होता है कि आपने अपनी बेटी सफूरा का निकाह हज़रते मूसा से किया था। आपकी विलादत और वफ़ात के बारे में तारीख़ें ख़ामोश नज़र आती है।
हज़रते मूसा बिन इमरान बिन लावी बिन याकूब अ 0। हज़रते ईसा अ 0 से पन्द्रह सौ 75 बरस क़ब्ल और हज़रते यूसुफ से 400 बरस बाद मिस्र की सरज़मीन पर मुतावल्लद हुए। आप का क़द लम्बा आंखें नीली दाढ़ी घनी और दराज़ जिस्म पर बाल ज्यादा और रंग गंदुमी था। आप का नाम क़बती जुबान में मूं और सी से मुरक्कब है। मूं को पानी और सी का इस्तेमाल दरख़त के मानी में होता है। वजहे तसमिया यह बयान की जाती है कि वह सन्दूक जिसमें बन्द करके मूसा दरियाये नील मैं डाले गये थे बहते बहते क़स्रे फिरऔन के किनारे एक दरख़त के नीचे आकर ठहरा था। इसलिए पानी और दरख़त की निस्बत से आप का नाम मूसा हुआ।
आप की वालेदा के नाम में इख़तेलाफ है। मोहक़्क़ेक़ीन व उलमा फाहिया नजीबा अबाहेसा एयारख़ा , बुज़ाइद और ख़ाएस वग़ैरह तहरीर किया है। मगर इस नतीजे तक नहीं पहुंचे कि हक़ीक़तन आप का अस्ल नाम क्या था। मगर इस अम्र में इख़्तेलाफ नही है कि आप एक पाक बाज़ और इबादत गुज़ार इस्राइली ख़ातून थीं। बनी इस्राइल को हज़रते यूसुफ़ ने मिस्र में आबाद किया था। और यही क़ौम यूसुफ़ के बाद इख़तेदार की मालिक बनी। मगर अपने ग़लत तौरो तरीकों की वजह से बहुत जल्द अपना वेक़ार खो बैठी। और हुकूमत पर क़बतियों का क़ब्ज़ा हो गया। जिसका आख़री ताजदार वलीद बिन मसअद था। जो फ़िरऔन के नाम से मशहूर हुआ।
यह बनी इस्राइल के हक़ में बड़ा ज़ालिम व जाबिर बादशाह था। जब किसी इस्राइली को सज़ा देता तो इस को जंमीन पर चितलेटा कर उसके हाथों और पैरों में लोहे की मेंख़ें ठुकवा देता था। जिसकी ताब न लाकर वह हलाक हो जाता था। हज़रते मूसा अपने घर में सबसे छोटे थे। आपके हक़ीक़ी भाई हारून आप से तीन साल बड़े थे। और उनसे बड़ी एक बहन थी जिसका नाम मरियम था। वह ख़ानवाद – ए - याक़ूब का कालिब बिन यूक़ना को ब्याही थीं। और ज़्यादातर अपने वालदैन के घर में रहीं थीं। फ़िरऔन ने एक शब ख़्वाब में देखा कि बैतुल मुक़द्दस की तरफ से एक आतिशी शोला उठा जिसने मिस्र के तमाम क़िबतियों के घरों को जला कर राख कर दिया। मगर बनी इस्राइल को कोई नुक़सान नहीं पहुंचाया। इस ख़्वाब की ताबीर मालूम की गयी तो नुजूमियों और काहिनों ने बताया कि बनी इस्राइल में एक बच्चा पैदा होने वाला है जो बड़ा होकर फिरऔनियत का तख़ता पलट देगा और पूरी सलतनत को तबाह और बरबाद कर देगा। उसी वक़त से फिरऔन के मज़ालिम बनी इस्राइल पर और ज़यादा बढ गये। और वह उन्हें अपना हरीफ़ समझने लगा। उसने फरमान जारी किया और दाइयां मुक़र्रर की कि बनी इस्राइल की कोई औरत अगर हामेला हो तो उसको हमल जांया कर दिया जाये। और जल्लादों को इस अम्र पर मामूर किया कि अगर किसी के घर में कोई बच्चा पैदा हो तो वह उसे क़त्ल कर दें।
चुनान्चे हज़ारों औरतों के हमल गिरा दिये गये। और लातादाद मासूम बच्चे माओं की गोदों में ज़बह कर दिये गये। इस शोरिश के ज़माने में मूसा पैदा हुए। और खुदा की शान की वह फिरऔन की ही गोद में पले बढ़े और जवान हुए। वाक़ये का इजमाल यह है कि जनाबे मुसा की विलादत के बाद मादरे मूसा को यह फिक्र दामनगीर हुई कि कहीं उनका बच्चा क़त्ल न कर दिया जाये। तो वह बेहद परेशान और मुज़तरिब हुईं। यहां तक कि खुदा वंदेआलम ने बज़रियए वही उन्हें मुत्तला किया कि तुम कोई ख़ोफ़ न करो और इस बच्चे को सन्दूक में बन्द कर के दरिया में डाल दो। हम इसके मुहाफ़िज़ हैं। और इसे फिर तुम्हारे पास पहुंचा देंगे। और इसे अपना रसूल बनायेंगे। (कुरआने मजीद सू 0 अलक़सस आयत 7) इस हुक्में इलाही के बाद मादरे मूसा को तरद्दुद पैदा हुआ कि सन्दूक कहां से महैया किया जाये।
चुनान्चे वह हिज़क़ील बिन सबूर के पास गयीं जो फिरऔन का चचा ज़ाद भाई था और नज्जारी का काम करता था। उससे आपने पांच बालिशका एक लकड़ी का संदूक बनवाया मगर उसके इसरार पर आपने अपनी ग़रज़ भी बयान कर दी। लिहाज़ा हिज़क़ील इस इरादे से फिरऔन के दरबार में गये कि वह उससे यह वाक़या बयान कर दें। मगर खुदा ने उन्हें गोयायी से महरूम कर दिया। और वह इशारों के जरियें फ़िरऔन को अपनी बात समझा नहीं सके। और जब वह वहां से वापस अपनी दुकान पर आये तो उनकी ज़बान फिर बहुक्में खुदा खुल गयी। फिर उन्होंने चाहा कि इस राज़ को तशत अज़बाम कर दें। तो ज़बान फिर बन्द हो गयी। इस बार इनकी आंखों से बीनायी भी रूखस्त हो गयी तो वह बहुत घबराये और खुदा की बारगाह में तौबा की तो उन्हें गोयायी और बीनायी फिर वापस मिली।
इसके बाद आप मूसा पर ईमान ले आये। और मोमिने आले फिरऔन कहलाये। जिसका ज़िक्र कुरआन में मौजूद है। इस सिलसिले में एक रवायत यह भी है कि वह सनदूक़ जिबरइले अमींन मादरे मूसा की ख़िदमत में लेकर हाज़िर हुए थे। बहरहाल जब रात हुई और तमाम शहर पर तारीकी मोहित हो गयी तो मादरे मूसा ने अपने दिल पर पत्थर रख कर मूसा को सन्दूक में बन्द किया और सब्रो सूकुन की छाओं में दरिया के हवाले कर के तड़पती ममता के साथ घर वापस आ गयी। सूबह के वक्त आसिया ज़ने फिरऔन अपने कुछ कनीज़ों के साथ जब दरियाये नील के कनारे सैर के लिये निकली तो उसने देखा कि एक सन्दूक पानी की सतह पर तैर रहा है। जिसे हवा के नर्म व लतीफ झोंके आहिस्ता - 2 उसकी तरफ बढ़ रहे है वह खड़ी हुई इसके कनारे पर बैचैनी से इन्तिज़ार करने लगी। रफता रफता करके सन्दूक एक दरख़त के निचे ठहरा जहां पानी बहुत ही कम था।
आसिया ने अपनी कनीजों को हुक्म दिया कि इसे बाहर निकालो चुनान्चे जब वह संदूक बाहर निकाल कर खोला गया उसने देखा कि सन्दूक के अन्दर एक इन्तेहायी हसीन व जमील व खूबसूरत बच्चा आराम से लेटा हुआ है। अपने दाहिने हाथ का अंगूठा चूस रहा है। खुदा की कुदरत की बच्चे को देखते ही इसके दिल में मोहब्बत का एक तुफान करवटें लेने लगा। चूंकि इसका दामन मुराद नेअमते औलाद से खाली था। इसलिए बेइख़तेयार होकर उसने मूसा को गोद में उठा लिया और प्यार करने लगी। फिर वह उन्हें अपने सीने से लगाये हुए अपने महल में आई और फिरऔन से सारा वाक़ेया बयान किया और कहा कि अगर आप इजाज़त दें तो हम इसे पाल ले और अपनी औलाद बना लें। क्योंकि ख़ुदा ने हमें तमाम नेअमतें दी हैं मगर हम औलाद की नेअमत से महरूम हैं। फिरऔन बच्चे को क़त्ल करना चाहता था। और आसिया की बातों से मुत्तफ़िक़ न था मगर मशीयते ऐज़दी मूसा की आड़ में उसकी तबाही और बरबादी का तमाशा देखना चाहती थी। इसलिए आसिया ने ख़ुशामद दरामद करके आख़िरकार उसे रज़ामंद कर लिया।
फिरऔन का राज़ी होना था कि यह खबर दूर-दूर तक फैल गयी कि आसिया को दरियाये नील से एक खूबसूरत बच्चा मिला है जिसे फ़िरऔन ने अपनी फरज़ंदी में ले लिया है। और अब इसे दूध पिलाने वाली एक दाया की तलाश है। यह ख़बर सुनकर बहुत सी औरतें आयीं और लायीं गयीं। मगर जनाबे मूसा ने किसी की तरफ रुख़ भी न किया। यह बात जब मादरे मूसा को मालूम हुई तो उन्होंने समझ लिया कि उनका बच्चा फिरऔन के महल में पहुंच गया है।
लिहाज़ा मामता से मजबूर होकर अपनी बेटी का इस काम पर मामूर किया कि वह महल में जाकर वाक़ेया का पता लगाये और सही सूरते हाल से इन्हें मुत्तेला करे। मां के इस हुक्म पर वह क़सरे फ़िरऔन की तरफ रवाना हुई। और जब महल के कऱीब पहुंची तो उन्होंने देखा कि दूध पिलाने वाली कूछ पेशावर किबती औरतें ले जायी जा रही हैं।
चुनान्चे वह भी इन्हीं औरतों में दाख़िल होकर अन्दर दाखिल हो गयीं। इस वक़्त मूसा आसिया की गोद में थे। पास ही फ़िरऔन भी ख़ड़ा था। और औरतें बारी बारी बच्चे को दूध पिलाने की कोशिश में दिलों जान से मसरूफ़ थीं। मगर मूसा किसी की तरफ रूख नहीं कर रहे थे। थोड़ी देर में फिरऔन जब वहां से हट गया तो ख़्वाहरे मूसा ने आसिया से कहा कि तूझे मैं भी एक ख़ातून का पता बताऊं जिसका हसब व नसब व ख़ानदान बहूत ही अच्छा है। हो सकता है कि यह बच्चा इन्हीं की तरफ रूजू हो जाये। आसिया ने पूछा वह औरत किस क़बीले से ताअल्लूक़ रखती है। कहा बनी इस्राईल से।
आसिया ने कहा कि हमें किसी भी इस्राइली औरत की ज़रुरत नही है। क्योकि फिरऔन इस बात को कभी पसन्द नही करेगा। कि बनी इस्राइल की औरत इस बच्चे को अपना दूध पिलाये या इसकी परवरिश करे। कनीज़ों ने कहा कि जब बच्चा किसी का दूध नहीं पी रहा और इसकी जिन्दगी का सवाल है तो आप फ़िरऔन पर दबाव डालें और इससे कहे शायद यह बच्चा उसी का दूध पी ले। ग़र्ज कि जब कनीज़ों का इसरार हद से ज़्यादा बढ़ा तो आसिया फ़िरऔन के पास गयी और मादरे मूसा के बारे मुख़तसर नसली तअर्ररूफ़ के बाद उन्हें बुलाने की इजाज़त चाही। फ़िरऔन ने कहा अगर यह बच्चा भी बनी इस्राईल से हुआ तो हमारी तबाही और बरबादी का ज़िम्मेदार कौन होगा। लिहाज़ा क़िबती औरत तलाश करो। ताकि उसका दूध इस बच्चे खून में शामिल होकर इसकी इस्राइलियत और हमारी ख़्वाब की ताबीर को बदल दे। आसिया ने कहा जब इसकी नशोनुमां परवरिश और तरबियत हमारी निगरानी में आप के ज़ेरे साया होगी। तो यह ख़ुदबख़ुद क़बती हो जायेगा। हमें डर व ख़ौफ़ किस बात का।
मुख़तसर यह कि थोड़ी सी बहसो मुबाहेसे के बाद आसिया ने बिल आख़िर फिरऔन को राज़ी कर लिया और मादरे मूसा तलब फ़रमायी गयीं। वह आयीं और जैसे ही अपना दूध मूसा की तरफ बढ़ाया तो उन्होने हुमक कर अपने दहन में ले लिया। और पीने लगे फिरऔन के महल में खुशी की एक लहर दौड़ गयी। और आसियाओ फिरऔन का दामन मसर्रत तहनियतओ मुबारकबाद के फूलों से भर गया। इसके बाद फ़रऔन ने मादरे मूसा को दूध पिलाने के ले मुलाज़िम रख लिया। और उनकी तनख़्वाह मुक़र्रर कर दी। इस तरंह ख़ुदा ने वादे के मुताबिक़ उसका बच्चा उसको वापस कर दिया। और बाज़ाब्ता जनाबे मूसा की परवरिश होने लगीं।
जनाबे मूसा अभी डेढ़ बरस के थे कि एक दिन फ़िरऔन ने इन्हें गोद में उठा कर चाहा कि प्यार करें। अचानक आपने उसकी दाढ़ी पकड़ कर और ज़ोरदार झटका दिया कि मुट्ठी भर बाल जड़ से उख़ड़ कर आप के हाथ में रह गये। और वह बदबख़त तक़रीबन अपनी चौथाई दाढ़ी से महरूम हो गया।
बेशक फ़िरऔन के ख़िलाफ़ जनाबे मूसा का यह पहला ताज़ीरी कारनामा था। जिसने उसकी फ़िरऔनियत को चक्कर में डाल दिया। और वह बड़ी संजीदगी से यह सोचने पर मजबूर हो गया कि कहीं यह बच्चा वहीं तो नहीं जिसके बारे में नजूमियों ने पेशिंगोइयां की है। यह ख़याल पैदा होते ही इसके ग़ैज़ो ग़ज़ब की कोई इन्तेहा न रही। और उसने इरादा किया कि मूसा को फ़ौरी तौर पर क़त्ल कर दें। मगर आसिया फिर आड़े आयीं उन्होंने कहा यह नासमझ और नादान बच्चों की फितरत हुआ करती है। कि जिस चिज़ पर फौरन हाथ डाल देते हैं। और एक आप हैं कि अपनी मुटठी भर दाढ़ी के लिये मेरे बच्चे की जान लेना चाहते हैं यह कैसा इन्साफ है। फिरऔन ने कहा कि अगर तेरी नज़र में इसका यह फेल तिफलाना है तो मैं इसकी आज़माइश करूंगा। ताकि हक़ीक़त वाज़ेह हो जाये। फिर इसके हुक्म के मुताबिक़ दो तबक़ इस नोअय्यत के तैयार किये गये। कि एक में दहकते हुए अंगारे थे और दूसरे में लालो जवाहीर।
इसके बाद यह दोनों तबक़ मूसा के सामने रख दिये गये और इन्हें आज़माइश के लिए छोड़ दिया गया। जनाबे मूसा के लिए यह एक बड़ा सख़्त और इम्तेहानी मसला था कि एक तबक़ में आप की ज़ीन्दगी थी और दूसरे में आप की मौत और इन दोनों के दरमियान फ़िरऔन तलवार लिये जल्लाद की तरंह खड़ा था। अगर मूसा तिफलाना समझ को बरू ऐ कार ला कर लालो जवाहिर से भरे तबक़ की तरफ़ हाथ बढ़ा देते तो यक़नन क़त्ल कर दिये जाते लिहाज़ा उन्होंने इस अक़्ले सलील की बिना पर मिनजानिबिल्लाह रसूलों और पैगम्बरों को अता होती है। लालो जौहर की चमक दमक छोड़ कर अन्गारों का इन्तेख़ाब किया। आहिस्ता आहिस्ता आगे बढ़े और एक दहेक्ता हुआ अंगारा उठाया और मुंह में रख लिया फिर एक बार चीख़ मार कर रो भी दिए। ज़ाहिर है आप का मुंह भी जला होगा और हाथ भी। लेकिन इसका नतीजा यह हुआ कि आप क़त्ल से बच गये। और फ़िरऔन का क़तिलाना इरादा हवा में उड़ गया।
तारीख़ों की छानबीन से यह बात वाज़ेह हो जाती है। कि हज़रते मूसा ने अपनी तब्लीग़ का आग़ाज़ अपने ही घर से शुरू किया। चुनान्चे जब सोलह बरस के हुए और आप ने अपने वालदैन के घर आने जाने में फिरऔन की तरफ से उन पर की पाबन्दी न रही तो उन्होंने सबसे पहले अपने ही खान्दान के अफराद को तौहीद का दर्स देना शुरू किया। रफ़ता रफ़ता यह सिलसिला और आगे बढ़ा और यहां तक पहंचा कि बनी इस्राईल की दीगर मुक़तदिर हसतियां भी आपके दर से मुसतफीज़ होने लगीं। फ़िरऔन चूंकि अपनी ख़ुदायी का दावेदार था। इसलिए इब्तेदा से ही आप उसके मुख़लिफ थे और इस मुख़ालेफत में दरेपरदा आसिया ज़ने फ़िरऔन , हिज़क़ील और हारून भी आपेक हमख़याल और सहीम व शरीफ़ थे। जो फिरऔन के ख़ौफ़ की वजह से हालते तक़य्या में अपनी जिन्दगियां गुज़ार रहे थे। मूसा के इन ख़यालात से फ़िरऔन भी बेखबर था। मगर जबयह ख़बरें आम हुईं और कुछ ख़ुशआमदी लोगों ने उससे कहा कि जिसे आपने पाला है और वली अहद बनाया है वहीं आप का मुख़ालिफ़ है।
आप की खुदायी की नफ़ी करता और आप के ख़िलाफ लोगों को हमवार करता है। तो एक दिन फ़िरऔन ने मूसा को तलब किया और उनसे कहा कि मैं तुम्हारे मुताल्लिक़ वह बातें लोगों की ज़बान से सुन रहा हूं जिन पर मुझे यक़ीन नहीं आता। यह बताओं कि क्या तुम मेरी ख़ुदायी पर ईमान नहीं रखते।
मूसा ने जवाब दिया आप ख़ुद ग़ौर फरमायें कि जब आप आम इन्सानों की तरंह मजबूर व बेबस पैदा हुए है दूसरों के मरहूने मिन्नत आपकी यह ज़िन्दगी है तो फिर आप ख़ुदायी का दावा किस बुनियाद पर करते हैं। दरहक़ीक़त खुदा तो वह है जिसने न सिर्फ आपको बल्कि तमाम आलमीन को ख़ल्क़ किया जो हर जगह मौजूद है। मगर दिखायी नहीं देता जो ना बेबस है न मजबूर न वह किसी पर जुल्म करता है न किसी जालिम को पसन्द करता है।
आपका यह जाहो हशम यह एख़तेदार यह इज्ज़त यह हुकूमत और यह महल और यह दौलतो सरवत सब उसी ख़ुदा की बख़सी हुई दौलत है तो फिर यह सरकशी , यह तकब्बुर और यह गुरूर क्यों। मैं आपको उसी खुदाए बरहक़ का वास्ता देता हूं कि अपने गुनाहों की तौबा कीजिये और अपने को ख़ुदा कहलवाना छोड़ दीजिये। मूसा की यह गुफ़तुगू सुनकर फिरऔन दम बखुरदा रह गया। उसके होश हवास जाते रहे। और वह कुछ देर ख़ामोश रहा फिर बोला अगर तुम्हारी जगह और कोई मुझसे यह कलाम करता तो मैं इस वक़्त इसकी गर्दन उड़ा देता। क्योंकि मैंने तुम्हें औलाद की तरंह पाला है लिहाज़ा इतनी मोहलत देता हूं और अपनी ज़बान बन्द रखों और इस्लाह कर लो। वरना तुम्हें इसी जगंह क़त्ल कर डालूंगा। जहां तुम्हारी फरियाद का सुनने वाला कोई न होगा। इसके बाद मूसा के पास ख़ामोशी के अलावा कोई चाराए कार न था।
लिहाज़ा आप चुप हो गये। क्योंकि अभी आप फिरऔन की हुकूमत और ताक़त से टकराने के क़ाबिल न थे। इसके अलावा आपने यह फैसला भी कर लिया कि अपने दीन व ईमान की सलामती के लिए फिलहाल इस शहर को छोड़ ही देना ज़्यादा मुनासिब होगा। चुनान्चे आप मौक़े की तलाश में रहने लगे और जब मौक़ा हाथ आया तो एक दिन खच्चर पर सवार होकर निकल पड़े।
शहर से बाहर निकल कर जनाबे मूसा ने कुछ फासला तय किया था कि इत्तेफाक़न रास्ता भूल गये और चलते चलते रात की तारीकी में एक ऐसी जगंह पहुंचे जहां दो आदमी अपने अपने ख़ुदाओं के बारे में झग़ड़ा कर रहे थे। इनमें एक इस्राईली था इसका कहना था कि खुदा वह है जो तमाम कायनात का ख़ालिक है। दूसरा शख़्स क़िब्ती था जो इस बात पर बाज़िद था कि फ़िरऔन ख़ुदा है। मूसा भी ठहर कर यह तमाशा देखने लगे। यहां तक कि दोनों के दरमियान मार पीट शुरू हो गयी। क़िब्ती अपने इस्राइली हरीफ पर भारी पड़ रहा था। चुनान्चे इस पर ग़लबा हासिल करने के लिए इस्राईली शख़्स ने मूसा से मद्द मांगी आपने उसकी हिमायत में क़िब्ती के सीने पर एक घूंसा जड़ दिया जिसकी ताब न लाक वह चक्कर खाकर गिरा और मर गया।
दूसरे दिन आपने देखा कि वही इस्राईली एक दूसरे क़िब्ती से झगड़ा कर रहा और आप से फिर इमदाद का तालिब है आप ने दोनों को छुड़ाने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि क़िब्ती कहने लगा कि “ ऐ मूसा जिस तरंह तुमनें एक आदमी को मार डाला है उसी तरंह आज मुझे भी मार डालना चाहते हो। क्या तुम्हारा नज़रिया है कि दुनिया में मुसलेह बन कर रहने के बजाये सरकश बन कर रहो। अभी यह गुफगुतू हो ही रही ती कि मूसा ने देखा कि एक तरफ से हिज़क़ील भागते हुए चले आ रहे हैं। और जब वह करीब पहुंचे तो उन्होनें मूसा से कहा कि क़िब्ती की मौत की ख़बर फिरऔन को हो गयी है। और उसने शहर के तमाम बड़े आदमियों से मशविरे के बाद तुम्हें क़त्ल कर देने का फैसला कर लिया है। नीज़ उसके गुमाशते तुम्हारी तलाश में सरगर्म अमल हो चुके हैं। लिहाज़ा जिस कद्र जल्द हो सके तुम यहां से निकल भागों।
हिज़कील के ज़रिये यह इत्तेला फराहम होते ही हज़रते मूसा अ 0 मद्दीन की तरफ तेज़ी से रवाना हो गये। क्योकि यह शहर फिरऔन की हुकूमत से बाहर था। दौराने सफर दीगर सउबतों के अलावा आपने आठ दिन तक मुसलसल फांक़े किये और दरख़तों के पत्तों को अपनी जिन्दगी का वसीला क़रार दिया। किताबों मे मरकूम हैं कि फाकों से आप की यह हालत हो गयी थी की बदन का सारा गोश्त घुल कर खत्म हो गया था। सिर्फ हड्डिया रह गयी थी। और खाल इस क़दर पतली हो गयी थी कि ऊपर से पत्तियों की सब्ज़ी ज़ाहिर होती थी। ग़र्ज़ कि आठवें दिन आप मद्दीन के एक कुएं पर पहुचे जो शहर से बाहर था।
वहां एक दरखत के नीचे लेट गये और कुछ देर आराम के बाद उठे तो आपने देखा कि कुएं के गिर्द एक भीड़ जमा है यह भीड चरवाहों की थी जो अपने अपने जानवरों को पानी पिला रहे थे। मगर इन्के पीछे दो लड़कियां भी खड़ी थी जिनके चेहरों से आशकार था कि वह किसी शरीफ और मोहज़्ज़ब घराने से तअल्लुक़ रखती है। जनाबे मुसा हमर्ददी के ख्याल से इन लड़कियों के पास गये और पुछा कि तुम क्यों खड़ी हो। उन्होने जवाब दिया कि जब सब चरवाहे अपने जानवरों को पानी पिला लेंगे तो हम भी अपनी बकरीयों को पिलायेंगे। इस भीड़ में हमारे लिये यह काम मुश्किल है।
चुनांचे जनाबे मूसा ने कुंए से पानी निकाला और उनकी बकरियों को सेराब कर के अपनी जगह पर आ कर बैठ गये। इस वक़्त आप पर भूख का सख्त तरीन ग़ल्बा था इसलिए आपने जानिबे आसमान देखा और फरमाया परवरदिगार तू मेरे लिये इस वक्त जिस नेअमत को मुनासिब समझ भेज दे। मैं इसका सख्त हाजत मंद हुँ। अभी आप की दुआ न तमात थी। कि इन लड़कियों में से एक लडकी पलट कर आप के पास वापस आयी और कहा कि मेरे साथ चलिए। आप को मेरे वालिद ने तलब किया है। ताकि वह बकरियों को पानी पिलाने की उजरत आपको अदा करे।मूसा ने पुछा कि उनका नाम व नसब क्या है। उस लडकी ने कहा शुएब नाम है और हज़रते इब्राहीम की नस्ल से ताअल्लूक रखते हैं। यह सुन कर हज़रते मूसा उनके पास तशरीफ लाये और फिर ग़ुफ्तगू के दौरान अपना सारा हाल बयान फरमाया। शुएब ने फरमाया कि अब तुम कुछ अन्देशा न करो ज़ालिमों से तुम्हे नजात मिल चुकी है। फिर आपने इन बकरियों को पानी पिलाने के एवज़ मे कुछ देना चाहा मगर मूसा ने यह कह कर इनकार कर दिया कि मैं दुनिया के एवज़ में अपनी आखेरत नही बेचता जनाबे मूसा की यह दयानत दारी देखकर हज़रते शुएब की साहबज़ादी बोली बाबा जान आप इन्हे अपने यहां मुलाज़िम क्यों नही रख लेते। क्योकि सबसे बेहतर वह है कि जो अपने इरादों का पुख्ता और ईमानदार हो और इनमें यह दोनों बाते मौजूद है।
अपनी बेटी की इस तजवीज़ पर जनाबे शुएब ख़ामोश हुए और बड़ी देर कुछ सोंचते रहे और जब वह चली गयी तो आपने मूसा को मुखातिब कर के फरमाया मेरे ख्याल में मुलाज़ेमत तुम्हारे शयाने शान नहीं है। मैं यह चाहता हुं कि पनी एक लडकी का निकाह तुम्हारे साथ इस मेहर के एवज़ मे कर दुं। कि तुम आठ साल तक मेरे घर में रहों और मेरी बकरियों की देखभाल करों और अगर इस मुद्दत से ज्यादा यानी दस साल तक तुम्ने अपना काम अन्जाम दिया तो यह तुम्हारा मजीद एहसान होगा। वरना तुम्हे एखतियार होगा और इन्शाअल्लाह तुम मुझे नेकोकारों में पाओगे। मूसा ने कहा मुझे आपका हुक्म मन्ज़ुर है। मगर इसकी नोअय्यत सिर्फ मेरे और आपके माबैन सिर्फ मुआहेदे की होगी। और इसके बाद किसी जब्र या ज्यादती का हक़ आपको नही होगा। ग़र्ज़ कि इस मोआहदे की बुनियाद पर आपका निकाह जनाबे शुएब की छोटी बेटी सफूरा से हो गया। और वहीं रहने सहने भी लगे।
कहा जाता है कि यह वह असा था कि जिसे हज़रते आदम अपने साथ जन्नत से लाये थे। और हज़रते इब्राहीम के बाद सिलसिला दर सिलसिला यह हज़रते शुएब तक पहुंचा था। इसकी खुसूसियत यह थी कि इसके एक तरफ़ दो शाखा था। जो हमेशा सर सब्जो शादाब रहता था। और अंधेरे में रोशनी का काम देता था। यह असा जब दुश्मन पर हमलाआवर होता था तो एक मुहीब और ख़ौफ़नाक अजदहा बन जाता था। इसकी ज़र्ब से पहाड़ टुकड़े -टुकड़े हो जाता था और दरियाओँ का पानी ख़ुश्क हो जाता था। यह नाक़ा बनकर सवारी के काम भी आता था। और जिस जगह गाड़ दिया जाता था हरे भरे मेवेदार दरख़त की शक्ल इख़तेयार कर लेता था। एक दिन हज़रते मूसा ने जनाबे शुएब से कहा कि जब आपने बकरियां चराने का काम मेरे सुपुर्द किया है तो कोई लाठी भी दीजिए जो दरिन्दों जंगली जानवरों को दफा करने के काम में आये।
जनाबे शुएब ने अपनी बेटी से फरमाया फुंला असा उठा लाओ। और वह गयीं और एक असा लेकर वापस आयीं आपने फरमाया यह नहीं दूसरा असा लाओ वह बोली कि मैं क्या करूं बाबजान मैं जब दूसरा असा उठाने का क़स्द करती हूं तो यह असा ख़ुद ब ख़ुद उठ कर मेरे हाथ में आ जाता है। तो आपने फरमाया कि तो फिर इसी को दे दो। मालूम होता है कि मरज़िये इलाही यही है। और मूसा ही इस असा के मुसतहक़ है।
हज़रते मूसा को मद्दीन मे रहते जब दस साल गुज़र गये और मुहेदा की मद्दत भी तमाम हो गयी तो एक दिन आपने जनाबे शुएब से अपनी वापसी की ख़्वाहिस ज़ाहिर की उन्होंने पूछा कि क्या सफ़ूरा को भी अपने साथ ले जाना चहते हो। आपने कहा हां इसके बाद जनाबे शुएब ने इन्तिज़ाम किया और मुख़तलिफ़ साज़ों सामान के अलावा एक कनीज़ एक गुलाम कुछ बकरियां और कुछ ज़र नक़द देकर आपको रूख़सत किया। मूसा मद्दीन से बैतुल मुक़द्दस की तरफ़ रवाना हुए और जब काफी सफर तय हो गया तो रास्ते में अचानक सफ़ूरा के पेट में दर्द पैदा हुआ क्योंकि वह हामेला थीं। रात अंधेरी थी कुछ नज़र भी नहीं आता था। इसलिए मूसा थोड़ी दूर चलकर एक मक़ाम पर ठहर गये ज़रा देर के बाद आपने देखा कि एक तरफ कुछ फ़ासले पर आग रौशन है और शोले भड़क रहे हैं। ख़याल पैदा हुआ कि शायद यहां कोई आबादी है।
लिहाज़ा आपने सफ़ूरा से कहा कि मैं चाहता हूं कि तुम्हारे लिए थोड़ी सी आग ले आऊं और लोगों से रास्ता भी मालूम कर लूं। फिर आपने कनीज़ को सफूरा के बारे में चन्द ताकीदें की और उस रूख़ पर रवाना हो गये जिधर आग जल रही थी। काफी राह पैमाई व जद्दो जेहद के बाद जब आप करीब पहंचे तो एक सरसब्ज़ो शदाब दरख़त है जो चारों तरफ से आग से घिरा हुआ है मगर भड़कते हुए शोलों का इस पर कोई असर नहीं है। चुनान्चे जब आप इस दरख़त की तरफ आगे बढे तो वह पीछे खिसकने लगा यह करिशमा देखकर आप जब ख़ौफ से पीछे हटे तो वह आपकी तरफ आगे बढ़ने लगा। यहां तक कि आपके दिल में एक मुकम्मल दहशत पैदा हो गयी। और आप वहां से भागने लगे तो इसी दरख़त से आवाज़ आयी कि ऐ मूसा भागों नहीं तुम्हारा खुदा तुमसे कलाम करना चाहता है।
यह सुनकर मूसा ने अपने दिल को क़वी किया और ठहर कर फ़रमाया इसकी क्या दलील है कि यह आवाज़ मेरे खुदा ही की है। जवाब मिला कि अगर दलील चाहते हो तो तुम्हारे हाथ में जो असा है उसे ज़मीन पर डाल दो। तो आपने असा ज़मीन पर डाल दिया जो देखते ही देखते एक होलनाक अजदहा बन गया। उसकी लम्बाई दरख़ते खुरमै के बराबर थी और इसके मुंह से शोले निकलने लगे यह हाल देखर मूसा इस क़द्र ख़ौफ़ जदा हो गए कि थरथराने लगे। फिर आवाज़ आयी कि ऐ मूसा डरो नहीं अब इस असे को उठा लो मूसा की हिम्मत जवाब दे चुकी थी। मगर अपना दिल मज़बूत करके उन्होंने अजदहे की दुम पर पांव रखा और इसे उठाना चाहा तो फिर वह असा बन गया। मूसा अभी आलमे हैरत में थे कि फिर आवाज़ आयी के ऐ मूसा तुम इस वक़्त वादिये मुक़द्दस में हो जिसका नाम तूर है। लिहाज़ा इसके तक़द्दुस का एहतेराम करो और अपनी नालैने उतार कर अपना दाहिना हाथ अपने गरेबान में डालो आपने गरेबान में डाला और जब बाहर निकाला तो वह इस क़द्र मुनव्वर था कि इसी शुआएं दूर दूर तक फैल गयीं। फिर थोड़ी देर बाद वह शुआएं तो ख़त्म हो गयी मगर मूसा की हतेली में सफेदी का वह निशान रह गया जिससे रोसनी निकल रही थी।
यही निशान यदे बैज़ा कहलाया। दरख़त से फिर आवाज़ आयी कि ऐ मूसा हमने तुम्हें पैग़म्बरी के साथ फिलहाल असा और यदे बैज़ा के मोजिज़ै दिये हैं। जो तुम्हारे लिए काफी है। अब तुम बेख़ौफ व ख़तर फ़िरऔन के दरबार में जाओ और कारे तबलीग़ अन्जाम दो इस पर मूसा ने कहा कि पालने वाले मेरे भाई हारून की ज़बान फसीतर है। लिहाज़ा तू इन्हे मेरा वज़ीर और मद्दगार बना दे ताकि वह कारे तबलीग़ में मेरा हाथ बटाऐ और मेरी नबूवत की तसदीक़ भी करें। हुक्म हुआ कि तुम फ़िक्र न करो हम तुम्हारे भाई को वज़ीर भी बनायेंगे और तुम्हें सलतनत व हुकूमत भी अता करेगे। हज़रते मूसा आग लेने गये थे और पैग़म्बरी लेकर अपनी बीवी सफूरा के पास वापस आये। सफूरा के पास आये तो उन्होंने देखा कि वह एक खूबसूरत नवाज़ाएदा बच्चा गोद में लिये बैठी हैं।
फिर जनाबे मूसा ने सफूरा से सारा वाक़या बयान किया। इन्हें तसल्ली दी और कहा कि मेरे लिये ख़ुदा का हुक्म है कि मैं फिरऔन के दरबार में तब्लीग़ की ग़रज़ से जाऊं लिहाज़ा ऐसी सूरत में मुनासिब होगा कि तुम यहीं से अपने बाप के घर वापस चली जाओ ताकि वहां सुकून और आलाम से रह सको मैं तुम्हारी ख़बर गीरी के लिए आता रहूंगा। और जब हालात साजगार हो जायेंगे तो मैं कुद तुम्हें अपने पास बुला लूंगा।
सफूंरा ने आपकी इस बात से इत्तेफ़ाक किया चुनान्चे आपने इसी मक़ाम से इन्हें गुलाम व कनीज़ के हमराह में जुमला साज़ो सामान के मद्दीन की तरफ रवाना किया. और खुद मिस्र के लिए रवाना हो गये। और फिर सफूरा उस वक्त तक अपने बाप के पास मद्दीन में रहीं जब तक कि फिरऔन दरियाएं नील में ग़्रक न हो गया।
हज़रते मूसा से चूंकि ख़ुदा ने कलाम किया था। इसलिए आपका लक़ब कलीमउल्लाह हुआ। यहुदियों और क़ब्तियों का शुमार आप ही की उम्मत में होता है। आप पर तौरेत नाज़ील हुई थी। (जिसका ज़िक्र आगे होगा) जो यहूदियों की मज़हबी किताब है। और आज तक वह लोग इसी को खुदा की किताब समझते हैं और हज़रते मूसा ही को अपना पैग़म्बर मानते हैं। नीज़ हज़रते ईसा और हज़रते रसूले खूदा स 0 व 0 नबूवत के मुन्किर हैं।
यह फ़िरऔन का मोतमिद वज़ीर था औ इसकी ख़ुदायी पर ईमान रखता था। मूसा से इसका अदावत व दुश्मनी शोहरए आफाक़ है। फिरऔन के हुक्म से एक पहाड़ पर इसने एक बुलन्द व बाला महल तैयार किया था। जिसकी ऊंचाई आसमान से बातें करती थी। कहा जाता है कि इस महल की तामीर में मजदूरों के अलावा 50 हज़ार मेअमारों ने हिस्सा लिया और कई साल में जब वह बन कर तैयार हुआ तो फ़िरऔन इसकी छत पर गया ताकि वह मूसा के खुदा को देख सके इसका ख़याल था कि आसमान इसकी छतसे बहुत नज़दीक होगा। मगर जब वह हवां पहंचा तो इसे आसमान वहां से इतना ही दूर मालूम हाआ कि जितना कि ज़मीन से था। वह बहुत नादिम हुआ और शर्म सारी व ग़ैज़ की हालत में उसने मूसा के ख़ुदा को पुकारना और ललकारना शुरू किया। जब जवाब न मिला तो इसने एक तीर आसमान की तरफ फेंका।
ख़दा की क़ुदरत की वह जब तीर वापस होकर गिरा तो वह खून आलूदा था। जिसे देखकर वह ख़ुशी से उछलने कुदने लगा और कहने लगा कि मैंने मूसा के ख़ुदा को हलाक कर दिया। इस वाक़ये के दूसरे ही दिन ज़लज़ले के एक झटके ने इस महल को मिसमार कर दिया। और इसके गिरनै से हज़ारों लोग मर गये।
यह हज़रते मूसा का चचाज़ाद या ख़ालाज़ाद भाई था। इल्में कीमिया से वाक़िफ़ था इसलिए इसने इतनी दौलत जमा कर ली थी कि उसके खज़ानों की कुंजियां घोड़ों और खच्चरों पर बार की जाती थीं। यह हीरे जवाहेरात से मुरस्सा सुर्ख और सौख़ रंग के लिबास पहनता था। सफैंद घोड़े पर सवारी करता था। और जब अपने क़स्र से निकलता था तो चार हज़ार सवार इसके अक़ब में तीन सौ गुलाम इसके दाहीनी तरफ ज़ेवरात व पुरतकल्लुफ लिबास से आरास्ता तीन सौ ख़ूबसूरत कनीज़ें बायीं तरफ चलती थीं। यह इन्तेहाई मग़रूर व बख़ील था इसकी तबाही और बरबादी की वजह यह बयान की जाती है कि क़िब्तियों की तबाही के बाद जब जनाबे मूसा ने हुकूमत जनाबे हारून के सिपुर्द कर दी और जब कोई कुरबानी करता तो इसका जानवर भी हारून के हाथ ज़ीबह होता था। जिसे ग़ैबी आग आकर उठा ले जाती थी।
इस पर क़ारून को हसद पैदा हुआ। और गुस्ताख़ाना मूसा से कहने का हुक्म ता वैसा ही मैंने किया उस वक्त से वह मूसा का सख़्त दुश्मन हो गया। पने इसससे तौबा करने को कहा तो इसने आपका मज़ाक उड़ाया। जब ज़कात का हुक्म हुआ तो इसने कहा कि मैं नहीं दूंगा। हत्ता कि एक दीनार देने पर बी राज़ी न हुआ। और कहा कि मूसा हमें फक़ीर बनान चाहता है। एक दिन एक बदकार औरत को अशरफ़ियां देकर इसने इससे कहा कि मजमए आम में मूसा पर तोहमत लगाये चुनान्चे दुसरे दिन जब वाज़ में हज़रते मूसा ज़िना की मज़म्मत कर रहे ते तो उसने कहा कि आप को बी लोग ऐसा ही जानते हैं। पिर इस औरत को उसने गवाहा में पेश करना चाहा। मगर ख़ुदा की सान की इसको ख़ौफ़ पैदा हुआ और इसने सच्चा वाकेया बयान कर दिया। और क़ारून की सरबेमोहर वह दोनों थैलियां दिखायीं। आख़िरकार वह मजमए आम में ज़लील हुआ। इसकी इस हरकत पर जनाबे मूसा को जलाल आया चुनान्चै आपने बद्दुआ की ख़ुदा का हुक्म हुआ कि ऐ मूसा मैं ज़मीन को तुम्हारे इख़्तेयार में देता हूं। क़ारून के ले जो मनासिब समझो वह करो।
आपने फरमाया ऐ जंमीन इसे निगल जा क़ारूम मैं घरोबार और ख़जानों के घुटनों तक ज़मीन में धंस गया। तो उसने मान चाही तो आपने ज़मीन को पिर निगलने का हुक्म दिया तो वह कमप तक धंस गया। तीसरी बार जब हुक्म दिया तो वह अपनी दौलत समेत ज़मीन के अन्दर धंस गया कि सफ-ए-हस्ती से उसका नाम व निशान मिट गया।
दस साल क़बल हज़रते मूसा अपने वतन व घर से ख़ाली हाथ निसले थे। मगर जब वापस आये तो पैग़म्बरी की एक अज़ीम दौलत आके साथ थी। घर में दाख़िल होते ही आपनै अपने वालदैन को अपने तमाम हालात और वाक़ेयात से आगाह किया और मद्दीन में हज़रते शुएब से मुलाक़ात और नीज़ अपनी शादी के बारे में बी तफसील से बताया। इसके बाद आपने दो दिन आराम किया और तीसरे दिन अपने भाई हारून को साथ लेकर फ़िरऔन व हामान की हिदायत को रवाना हुए।
दूसरी तरफ़ फ़िरऔन को हज़रते मूसा की तरफ़ लाहक़ था। इसलिए उसने दस बरस के वक़्फ़े में अपनी हिफ़ाज़त के खुसूसी इन्तज़ामात किये थे। और अपने पुराने महल को सात हिस्सों में तक़सीम करके हर हिस्से को एक हनी क़िला बना दिया था। इब्तेदायी और बैरूनी दोनों हिस्सों के दिरमियान जो आमदो रफ़त का रास्ता था। इब्तेदायी और बैरूनी दोनों हिस्सों के दरमियान जो आमदो पफ़त का रास्ता था। इसे दोनों तरफ़ दहकते हे शेरों और गुर्राते हुए खूंख्वार भेडियों के एक तूलानी आमाजगाह ती। जिसे चारों तरफ से लोहों के मज़बूत कटहरो से घेर दिया गया था। ताकि हंगामी हालात में इन दरिंदों से काम लिया जा सके।
वसती हिस्से में दरबार था जिसके दरमियान में फ़िरऔन और इसके वज़रा व मुहाफ़िज़ों के इल अस्सी हाथ ऊंची एक नशिस्तगाह बनायी गयी थी फिरऔन को अपने मुख़बिरों के ज़िरिये जब यह मालूम हुआ कि मूसा अपने बी हारून के हमराह इसके महल की तरफ रवाना हो चुके हैं। तो इसने महल का सद्र दरवाज़ा बन्द करवा दिया और शेरों और भेड़यों को आज़ाद करा दिया ताकि वह लोग जैसे ही महल में दाख़िल हो यह दरिदे इनका काम तमाम कर दें।
ग़र्ज कि जनाबे मूसा और हारून जैसे ही बैरूनी गेट पर पहुंचे तो इसे बन्द पाया और कहने के बावजूद जब फ़िरऔन के सिपाहिय़ों ने इसे खोलने से इन्कार कर दिया तो आपने इस पर अपना असा मारा। असा का पड़ना था कि दोनों पर खुल गयटे और आप बैख़ौफ़ो ख़तर इसके अन्दर दाख़िल हो गये। जब दरिंदों ने आपको देखा तो हमलाआवर होने के बजाये उन्होंने आप के कदमों में अपना सर झुका दिया और वह भी पके पीछे-पीछे दुम हिलाते हुए फ़िरऔन की तरफ चल पड़े आपने दूसरे दरवाज़े को भी असे की मद्द से खोला।
यहां तक कि आप ने सातवां दरवाज़ा खोला तो फ़िरऔन हमान और अपने दीगर साथियों के साथ आपके सामने खड़ा था। इसने जह यह हाल देखा कि मेरे दरिंदों ही मूसा के साथ हैं और वह ही मेरी तरफ खूंखार नज़रों से गूर रहे हैं तो वह डर के मारे भागने लगा। जनाबे मीसा ने फ़रमाया कि ब 6गता क्यों है मेरी मरज़ी के बग़ैर तेरे यह दरिंदे तुझसे कोई ताअरूर्ज़ नहीं करेंगे। फ़िरऔन ने कहा मैं जीते जी अपनै पोस्टमार्टम नहीं कराना चाहता लिहाज़ा तुम पहले इन दरिन्दों को यहां से दफ़ा करो फिर मेरे क़रीब आओ। मीसा नै अपने से से इन्हें इशारा किया और वह दरिंदे जब चले गये तो फ़िरऔन ने पूछा ऐ मैका अब तुम यहां क्यों आये हो और तुम्हारा मक़सद क्या है। आपने फरमाया खुदा ने मुझे नबूवत पर फाएज़ करके तुम लोगों की हिदायत पर मामूर किया है।
फिरऔन ने कहा तुम्हारे ख़ुदा को तुम्हारे सिवा और की न मिला था। मूसा ने कहा अगर वह मेरे सिवाए किसी और को नबी बनाता तो तेरी तबाही और बरबादी का सबब कौन बनता। यह सुनकर फिरऔन को नुजूमियों की पेशिंगोई याद आ गयी और वह बदहवस हो गया। इसके आड़े तिरछे लहजे में नरमी पैदा हुई। इसने कहा-ऐ मूसा , तुम्हें पाला है तुम्हारी तरबियत की है क्या इसका सिला यही है कि तुम कुफ़राने नेअमत करो।
मूसा ने कहा मेरे कुदा का हुक्म है कि मैं तुम्हारे सर से फिरऔनियत के बूत को रफा करूं और तुम्हे राहे रास्त पर लाऊं। फिरऔन ने कहा अगर मेरे सिवा कोई दूसरा खुदा है तो इसकी निशावियां हमें बताओ और सुबूत दो। मूसा ने अपना असा ज़मीन पर डाल दिया जब यह एक हैबतनाक अजदहा बन गया। उसके मुंमह से झाग और शोले निकलने लगे। यह करिशमा देखकर फिरऔन का दम खुश्क हो गया। और वह इस क़द्र खौफ़ज़दा हुआ और कहने लगा कि ऐ मूसा तुम्हें इस दूध का वास्ता जो तुमने मेरे गर में पिया है इसको हटाओ। वरना मुझे निगल जायेगा। आपने असा उठा लिया और पिर अपने गरेबान में हाथ डाल कर बाहर निकाला यो यदैबैज़ा की तजल्ली से इसकी आंखें चकाचौंध हो गयीं। और इस क़द्र मरऊब हुआ कि ईमान लाने के बारे में बड़ी संजीदगी से ग़ौर करने लगा। और कुझ जब ना था कि वह ईमान ले आता। मगर पास ही हामान खड़ा था इसने कहा कि यह सब जादू है और तू इतना बड़ा नादान है कि अपनी ख़ुदाई छोड़ कर एक बन्दे पर ईमान लाने को सोंच रहा है।
फिरऔन ने कहा कि अगर तेरे नज़दीक यह जादू है तो अपने जादूगरों के ज़रिये से मूसा सै मुक़ाबला कर। चुनान्चे हामान के सरबराही में मशहीर व मुमताज़ जादूगरों की एक जमाअत का इन्तेख़ाल अमल में आया। और मुकाबले की तारीख़ मुक़र्र करके सारे शहर में इसका एलान कर दिया गया। मोअय्यन तारीख़ जब आयी तो सारा शहर उमंढ़ पड़ा और फिरऔन का दरबरा तमाशाईयों से खचा खच भर गया। करतब दिकाने से पहले जादूगरों ने फ़िरऔन से कहा कि अगर हम मूसा ग़ालिब आ गये तो हमें क्या इनाम मिलेगा।
फिरऔन ने कहा कि मैं हूकूमत में शरीक कर लूंगा। पर याद रखो कि अगर तुम हारे और मूसा तुम पर ग़ालिब आये तो मैं ईमान कुबुल कर लूंगा और मेरे साथ तुम लोगों को बी ईमान लाना होगा। उन लोगों ने यह शर्त मान ली और फ़िरऔन की तरफ से हामान ने इन्हें मुक़ाबले की हरी झंड़ी दे दी। जादूगरों ने मूसा से पूछा कि इब्तेदा हम करेंगे या तुम करोगें। मूसी ने कहा कि मुझे जादू नहीं आता लिहाज़ा इब्तेदा तुम करो। में सिर्फ दफ़ा करूंगा। ग़र्ज़ कि इब्तेदा यूं हुई कि जादूगरें ने कुछ रस्सियां और कुछ लाठियां मूसा की तरफ फ़ेकी जो सांप बनकर इनकी तरफ बढ़ने लगीं। मूसा को खयाल पैदा हुआ कि अगर मैं अपना असा छोड़ता हूं ते लोग मुझे बी इनकी तरंह जादूगर न समझ बैठें और मेरी तरफ से गुमराह और बदज़न न हो जायें। कि इतने में वही आयी कि ऐ मूसा घबराओ नहीं अपना असा ज़मीन पर डालो मैं तुम्हें इन पर ग़ालिब करूंगा।
चुनान्चे मूसा ने अपना असा ज़मीन पर डाला जिसने अजदहे की शक्ल इख़तेयार करके जादूगरों की रस्सिया और लाठियों को निगल लिया। फिर क्या था जादूगरों में भगदड़ मच गयी और उसके साथ तमाशायी भी भागे नतीजा यह हुआ कि कितने लोग कुचल कर मर गयेछ। कितने लोगों ने खड़े खडे पेशब कर दिया और कितनों के पाखान निकल गया। जिसकी वजह से उनके लिबास नजिस हो गये। तारीख़ बताती है कि इस मोजिज़नुमी और मारकाआराई के बाद तक़रीबन 60 हज़ार अफ़राद मूसा पर ईमान लाये। एगर फ़िरऔन अपने क़ौल से मुकर गया। और जो लोग ईमान ला चुके थे। उनकी गिरफतारियां उसने शुरू कर दीं। उन्हें सख्त से सख़्त सज़ायें देने लगा। यहां तक कि जब नका जीना दूभर हो गया तो उन लोगों ने फ़िरयाद व ज़ारी की और मूसा से इम्दाद के तालिब हुए मूसा का परवरदिगार फिरऔन के मज़ालिम से बेख़बर नहीं था। लिहाज़ा इसकी तरफ से अज़ाब की इब्तेदा हुई। कि अचानक एक ऐसा सैलाब आया कि जिस की तुग़यानी ने पूरे शहर को अपने लपेट में ले लिया।
फिरऔनियों (किबतियों) के मकानात ढेर हो गये। हज़ारों जाने चली गयीं। और जो लोग बाक़ी बचे वह शहर छोड़कर जंगलों और मैदानों की तरफ भाग खड़े हुए। मगर यह क़ुदरते इलाही थी कि बनी इस्राइल के घरों में पानी का एक क़तरा भी दाख़िल न हुआ। मुख़तसर यह कि चालीस दिन तक सैलान का पानी फिरऔन की फिऱऔनियत को रिहा किया और न ही इनके जुल्म व तशद्दुद में की कमी वाक़े हुई। तो ख़ुदा ने इनकी क़ौम पर टिड्डियों को मुसल्लत किया जिसकगा नतीजा यह हुआ कि इनके तमाम ज़रातें तबाह हो गयीं।
दरख़्तों और बागों का सफ़ाया हो गया। और जब कुछ न बचा तो टिड्डियों ने इसके मकानों के दरवाजों और खिडकियों पर धावा बोला। और इनकी लकड़ियों को खाना शुरू किया। जब इनका भी ख़ात्मा हो गया तो खुदा की इस अजीब व ग़री ब मख़लूक़ ने किबतियों के कपड़ों और लिबासों का सफाया किया। यहां तक कि पूरी कौम को बरहेना कर दिया। फिर उनके जिस्मों से लिपट गयीं और उन्हें सर वग़ैरह के बालों से बी महरूम कर दिया। य़ह हाल देखकर फ़िरऔन ने मूसा से मन्नत और समाजित की और उसने कहा कि – ऐ मूसा तू अपने खुदा से कहकर इस बला से हमें निजात दिलादो तो हम तुम्हारी क़ौम (बनी इस्राइल) के तीस हज़ाल क़दियों को रिहा कर देंगे। और खुद भी तकुम परईमान लायेंगे। मूसा ने रहम ख़ाकर दूआ की और खुदा की कुदरते कामेला नै टिड्डिययों का अज़ाब फ़िरऔनियों के सर से टाल दिया। लेकिन मतलबप निकल जाने के बाद। फ़िरऔन अपने दावे से फिर से मुकर गया। तीसरी मरतबा ख़ुदा ने मूसा से फ़रमाया कि दवम अपना सा ज़मीन पर मारो असा का मारना था कि ज़मीन एक जगह से शक हुई और इसके अंदर से जुओं का एक समुंदर उमंड पड़ा जो निहायत सुरअत व तेजी के बजाये हवा में उड़ती थीं। और जिस क़िबती पर हमलाआवर होती थीं उसका खून चूस लेती थीं जिस्म पर बड़े- 2 आवले पड़ जाते थे। इसका सर गंजा हो जाता था। और भवें व पलकें साफ हो जाती थीं। इनकी कसरत का यह हाल था कि अगर वह की चीज़ खाने के कस्द करते तो इसमें भी बेशुमार जुऐ चलती फिरती नज़र आती और पानी पीते तो उनका प्याला जूओं से भर जाता था। इस अनोखे अज़ाब से तंग आकर पूरी क़ौम मौत के दहाने पर पहुंच गयी। तो पिरऔन ने फिर जनाबे मूसा का सहारा लिया और उन्हें यक़ीन दियाला कि इस मरतबा हम लोग जरूर ईमान लायेंगे औरत कैदियों को भी आज़ाद कर देगे।
मगर शर्त यह है कि हमें इस अज़ाब से छुटकारा दे दो। चुनान्चे मूसा ने पिर दुआ फरमायी और जैसे ही फिरऔन को इस अज़ाब से छुटकारा मिला वह पिर अपने वायते से मुकर गया। बहर हाल फिरऔन की कुदाई का इक़रार करने वाली यह बदनसीब क़ौम तरंह तरंह के अज़ाब का शिकार होती रही। यहां तक कि उनकी खेतियां बरबाद हो गयीं , बाग़ात तबाह हो गयी। उनकी दौलत संगरेज़ों में तब्दील हो गयी। इनकी औरतें और औलादैं ताऊन वगैरा में मुब्तेला होकर मर गयीं। और वह राहे रास्त पर न आयीं। बहुत कम लोग से थे जो फिरऔन से मुनहरिफ होकर मूसा के हमनवां बन सके।
यही वह ज़माना था कि जनाबे हिज़क़ील मोमिने आले फिरऔन तक़य्ये को खैरबाद कहा और खुल कर जनाबे मूसा पर अपने ईमान का एलान किया जिसके नतीजे में फिरऔन ने उन्हें व उनके अहलो अयाल करो एक तन्दूर के अन्दर ज़िन्दा जलवा दिया। यही वह ज़माना था कि इसने अपनी ज़ौजा आसिया बिन्ते मज़हिमा को मूसा पर ईमान लानै के जुर्म में जलती ही ज़मीन पर बरहैना लिटा कर उनके हाथों और पैरों में लोहे की मेख़ें ठुकवा दीं। जिसकी वजह से वह मोमिना दुनिया से चल बसी। यही वह ज़माना था जब बहुक्में खुदा बनी इस्राइल मिस्र
छोड़कर हज़रते मूसा की क़यादत में शाम की तरफ रवाना हुए।
बाज़ रवायतों से मालूम होता है कि मुसलसल अज़ाब की वजह से फ़िरऔन जब बहुत ज्यादा तंग व परोशान हा तो उसने बनीइस्राइल को कैंद से रिहा कर दिया था। इसके बाद ख़ुदा की तरफ़ से मूसा को यह हुक्म हा कि तुम रातों रात बनी इस्राइल को लेकर शाम की तरफ रवाना हो जाओं। चुनान्चे आप रवाना हे और सवेरा होते होते दिरयाये नील के किनारे पहुंचे।
दुसरी तरफ जब फ़िरऔन को यह ख़बर मालूम ही कि मूसा बनी इस्राइल को लेकर मिस्र से कहीं और जा रहे हैं तो इसने दस लाख और एक रवायत के मुताबिक़ एक लाख साठ हज़ार का लखकर लेकर उनका पीछा किया ताकि रास्ते ही में वह तमाम लोगों को मौत के घाट उतार दे। गर्ज़ कि जब फ़िरौन और उसका लशकर क़रीब पहुंचा और बनी इस्राइल ने देखा तो वह बहुत ज़्यादा ख़ौफ़ज़दा और परेशान हे। चुंकि उनके सामने मौजें मारता हुआ वसी दरिया था जिसमें डूब जाने का ख़तरा था। पुश्त पर फ़िरऔन का लशकर जिससै क़त्ल हो जाने का अंदेशा था। यानि इनके आगे भी मौत थी और पीछे बी इस हालत में बहुत से लोग मूसा से बदज़न हुए और कहने लगे ऐ मूसा आज तुम्हारी वजह से हम लोग मारे गये। मूसा ने फरमाया कि घबराओ नहीं हमारा ख़ुदा हमारी मदद जरूर करेगा। इतने में वही हुई कि ऐ मूसा तुम अपना असा दरिया पर मारो तो तुम्हारे वास्ते रास्ते खुल जायेंगे।
चुनान्चे असा के मारते ही दरियाये नील के बारह रास्ते इस तरंह पैदा हुए कि इन रास्तों के दोनों तरफ पानी बुलंद होकर दीवार की तरंह ठहर गया। और जनाबे मूसा की क़यादत में बनीइस्राइल तेज़ी से इस पार से उस पार पहुंच गये। इतने में फिरऔन बी मय लशकर के वहां पहुंच गया। और उसने दरिया में खड़ा होकर अपने लशकरियों को आवाज़ देने लगा खुदा का करिशमा देखिये कि जब बनी इस्राइल का आख़िरी शख़्स दरिया के उस पार गया और फिरऔन की फ़ौज का आख़िरी शख़्स दरिया में दाखिल हो चुका तो पानी की सतह तेज़ी से बराबर और हमवार हो गयी। और फ़िरऔन मय लशकर के ग़र्क़ हो गया।
कुरआन कहता है कि फ़िरऔन जब बने लगा तो उसने कहा कि जिस ख़ुदा पर बनी इस्राइल ईमान लाये हैं उस पर मैं भी ईमान लाता हूं बेशक उसके सिवा की माजूद नहीं हैं। और मैं (भी) उसके फरमा बरदार बन्दों में से (कुरआने मजीद सुरए यूनुस आयात 60-62)।
फिरऔन इससे क़ब्ल भी हज़रते मूसा से मान लाने के बारे में मुताअद्दि बार वादा ख़िलाफी कर चुका था और चूंकि वह तमाम उमर् नाफरमानियां और सरकशी करता रहा। इसलिए उसे आखिरी अज़ाब के मौक़े पर ख़ुदा की तरफ़ से कोई छूट नहीं मिली और डूबते वक़्त जब वह आख़िरी हिचकियां लेने लगा तो इरशादे बारी हुआ-
हम आज तेरी रुह के साथ कोई रियायत नहीं करेंगे। अलबत्ता तेरे जिस्म को दरिया में तह नशीन होने से बचायेंगें ताकि तू अपने बाद आने वालों के ले इबरत का नमूना बन सके।
मज़कूरा आयतों से यह भी वाज़ेह होता है कि अगर की शख़्स तमाम उम्र खुदा और सके नबी की नाफ़रमानियों और ईज़ा रसानियों का मुरतकिब होता रहे। और फिर वह वक़्ते आख़िर तौबा करे या मजबूरन अपने ईमान का मुज़ाहेरा करके फ़रमाबरदार बन्दों की फेहरिस्त में शमिल होना से क़ब्ल या उसके बाद बहालते मजबूरी या बरबिनाये मसलहत मुसलमान हुए और रसूले अकरम स 0 अ 0 पर ईमान लाये। मगर आले रसूल के साथ हमेशां दुश्मनी से पेश आये।
बहरहाल तारीख़ से पता चलता है कि फ़िरऔन का लशकर दरिया में इस तरंह डूबा कि उनकी लाशें भी न उभर सकीं। मगर फ़िरऔन की लाख दरिया के मग़रिबी किनारे पर जिसे जबले फ़िरऔन कहा जाता है। तैरती हुई बरामद की गयी। इस मक़ाम पर गर्म पानी का एक चस्मा भी है। जिसे वहां के मक़ामी लोग हम्मामे फ़िरऔन के नाम से जानते हैं। 1907 में माहेरीने आसारे क़दीमा को फिरऔन की मम्मी दस्तेयाब हुई थी। जो आज भी काहेरा के अजाएब ख़ाने में रखी हुई है। कुरआन की हक़ानियत का एलान कर रही है।
दरियाये नीलं को उबूर करने के बाद बनीइस्राइल (जिनकी तादाद 6 हज़ार थी) हज़रते मूसा के साथ एक बे आब व गेयाह मैदान में जब केयाम पज़ीर हुए तो ख़ालिके कायनात ने इनके ले एक अब्र का टुकड़ा भेजा जो दिन की धूप में इन पर साया करता था और रात में इससे तुरन्जबीन बरसती थी। और जिसे दिन में यह लोग खाते थे फिर शाम के वक़्त बइजाज़े इलाही भुने हुए तीतर और बटेरा हवा के ज़रिये आ जाते ते। जो रात के वक़्त ग़िज़ा का काम देते ते इसी को क़ुरआने मजीद में मन्नो व सलवा कहा गया है। पानी के लिये हज़रते मूसा ने एक पत्थर पर अपना असा मारा था जिससे आबे शीरी के बारह चश्में जारी हुए इसी को यह लोग पीते थे। जब कुछ अरसा गुज़र गया तो एक दिन इस्राइलियों ने मूसा से कहा कि एक तरंह की ग़िज़ा खाते खाते हमारा दिल भर गया है।
लिहाज़ा तुम अपने खुदा से कहो कि वह हमारे लिये कुछ साग व सब्ज़ी ,सब्ज़ी ,सब्ज़ी ,सब्जी लहसुन प्याज़ करेले कक़ड़ी दाल रोटी का इन्तेजाम भी करे। मूसा ने फ़रमाया कि अगर तुम लोग कुदा की नेअमतों को ठुकरा कर अदना चीज़ों के ख़्वाहिश मंद हो तो हमारे साथ फिलिश्तीन चल कर क़ौमे अमालेक़ा से ल़डो जिसके ले परवरदिगार ने हुक्म दिया है कि वहां तुम्हारी मतलूबा चीजें तुम्हें मिल जायेंगी। यह सुन कर इन लोगों ने कहा कि क़ौमें अमालेक़ा बड़ी जंगजूं ,जंगजूं खूंखार ज़ालिम व जाबिर क़ौम है। इससे लड़ने के लिए हमारे पास हिम्मत व ताक़त नहीं है।
जनाबे मूसा ने इन्हें समझाया बुझाया और हमवार करने की बड़ी कोशिश कीं मगर इन्होंने कहा कि तुम ख़ुद लड़ो हम यहीं रहेंगे और जब तुम इस क़ौम पर फतह और क़ाबू हासिल कर लोगे तो हम भी आ जायेंगे। यूशा बिन नून और कालिब बिन यूहेन्ना भी जनाबे मूसा के हम राह थे। इन लोगों ने बहुत कुछ समझाया और हर तरहं की तसल्लियां दीं मगर इन नमक हराम क़ौम ने यह कहकर साफ इन्कार कर दिया कि हम हरगिज़ हरगिज़ इस शहर में दाख़िल नहीं होगे जब तक बनी अमालेक़ा के अफ़राद वहां मौजूद हैं। आख़िरकार इनकी सरकशी और हट धरमी से तंग कर जनाबे मूसा ने खूदा की बारगाह में यह दुआ की कि परवरदिगार हमें इन सरकशों से अलहदा कर दे।
इसके बाद हज़रत , मूसा ने अपने भाई हारून यूश बिन नून कालिब बिन युहेन्ना और कुछ उन इस्राइलियोंम को जो आपके हमनवां थे साथ लिया। और फ़िलिस्तीन की तरफ जाने का इरादा कर लिया। इस्राइलियों ने जब यह देखा तो आपस में यह कहने लगे कि अगर मूसा हमारे दरमियान से चले तो हम पर ख़ुदा का अज़ाब नाज़ल हो जायेगा। चुनान्चे सब एस जगह इकट्ठा हुए और हज़रते मूसा के पास आये इन्होंने तौबा की और अपनी सरकशी की माफी मांगी मगर फिर भी इनके साथ जाने पर रज़ामंद न हे तो परवरदिगार ने जनाबे मूसा से फ़रमाया ऐ मूसा इन्हें इनके हाल पर छोड़ दो।
यह चालीस साल तक इसी बियाबान में सरगर्दा रहेंगे और किसी शहर में दाखिल न हो सकेंगे। ग़र्ज़ कि जनाबे मूसा ने वहां से जाने के बाद यह लोग रोज़आना शब को पना सामान बांधकर रवाना होते और सारी राद राह पैमायी के बाद सुबह के वक्त इसी मक़ाम पर फिर आ जाते जहां से चले थे। इसी तरंह चालीस बरस गुज़र गये। इनमें जो बच्चे ते वह जवान हो गये जो जवान थे वह बूढ़े हो गये जो बूढ़े थे वह मह गये।
चालीस साल बाद हुक्में इलाही की बिना पर हज़रते मूसा ने अपने भाई और यूसा बिन नून को इन्हीं जंगल से शहर में लाने के लिए रवाना किया चूंकि जंगल में रहते रहते यह लोग बहुत ज़्यादा परेशान हो चुके थे। इसले फ़ौरन तैयार हो गये। और हारून व यूशा के हमराह शहर की तरफ चल पड़े रास्ते में इन्हें आरीहा नामी एक फ़सील बन्द आबादी से गुजरना था जिसकी मग़रिबी दरवाज़ा बाबे हत्ता यानी बख़शिश का दरवाज़ा कहलाता है।
इसके बारे में जनाबे हारून ने बनी इस्राईल हो यह हिदायत कर दी थी कि जब वह वहां पहुंचे तो वह अदब वह एहतेराम से इस दरवाज़े को बोसा दें। इसके बाद अपनी ज़बान से हत्ता हत्ता कहते हे क़दम आगे बढ़ायें। इस अमल से परवरदिगार इनके गुनाहों को बख़श देगा। मगर यह लोग जब वहां पहुंचे तो उनका मज़ाख़ उडाया और हत्ता हत्ता कहने के बजायटे तमसख़ुराना मजाक में हन्ता हन्ता यानी गन्दूम गन्दुम की सदायें बल्न्द करने लगे। मक़सद यह ता कि हम मन्नो व सलवा खाते खाते तंग आ चुके हैं लिहाज़ा अब हमें गेहूं की रोटियां चाहिए। इस इसतेहज़ा की सज़ा इन्हें यह मिली कि कुदा ने इनकी पूरी क़ौम पर ताउन को मुसल्लत कर दिया जिसने चौबीस हजार इस्राइलियों को मौत के घाट उतार दिया। हज़रते
अमीरूल मोमेनीन अली इब्ने अबी तालीब अ 0 का क़ौल है कि उम्मते मुसलमा में मेरी मिसाल सफीनए नूह बाबे हित्ता की सी है। यानी जिस तरंह बाबे हत्ता बनी इस्राइल के गुनाहों की बखशिश का दरवाज़ा था। उसी तरंह मेरे अहलेबैत मुसलमानों के लिए बख़शिश और निजात का ज़रिया हैं।
औज बिन औक़ को दुनिया का पहला अजूबा कहा जाये तो ग़लत न होगा। इस जीबुल खिलकत इन्सान का क़द तीन हज़ारह तीन सौ ती स गज़ था और एक रवायत के मुताबिक़ तीन लाख तीन हज़ाह सौ गज़ लम्बा था। इनके हाथ की उन्गलियां तीस-तीस गज़ की थीं। यह समन्दर की तह से मछलियांम पकड़ता था। बरसात के दिनों में बादलों से पानी चूस कर पीता था। कहा जाता है कि तूफाने नूह। का पानी जो पहाड़ों की बलंदियों से भी चार सौ गज़ उंचा था। सिर्फ इसकी पिंडली तक पानी पहंचा था।
क़ौमे अमालेक़ा से जंग के दौरान हज़रते मूसा ने बनी इस्राइल के बारह क़बीलों में से हर क़बीले के एक शख़्स को उसका सरदार मुकरई करके यह ताकीद की थी कि हर क़बीला अपने सरदार के साध क़ौमे अमालेक़ा की तलाश में मुशतलिफ सिमतों की तरफ रवाना हो। और जहां इनसे मुठभेड़ हो जंग कर लें।
चुनांनचे इसी तलाश व तजस्सुस के दरमियान एक क़बीले से औज बिन औक़ का सामना हो गया इसने तमाम क़बीले के लोगों को अपने दामन में रखकर कमर से बांध लिया और अपनी मां (औक़) के पास लाकर डाल दिया और कहने लगा कि यह हमसे जंग करने आये थे। इनकी मां ने कहा कि इन्हें छोड़ दो ताकि यह लोग अबने शहर मैं जाकर हमारा हाल बयान करें। और यह सुनकर दूसरे लोग ख़ौफ़ खायें। और जब यह लोग पलट कर हज़रते मूसा के पास आये तो उन्होंने सारा माजरा बयान किया जनाबे मूसा ने उन्हें जंग की तरग़ीब दी और ख़ुद भी एक लखकर लेकर औज की तलाश में रवाना हुए।
औज ने जनाबे मूसा और उनके लशकर को दोखा तो पहाड़ का एक बहुत बड़ा तोदा था तो वह अपने सर पर उठा लिया ताकि वह एक साथ पूरे लशकर को तबाह करदें।मनगर कुदा की कुदरते कामेलला ने इस तोदा के दरमियानी हिस्से में एक छेद कर दिया जिसकी वजह से वह ज की गर्दन का तौक़ बन गया। और लाख कोशिश के बावजूद उसकी गर्दन से निकल न सका। यह कैफ़ियत देखकर जनाबे मूसा आगे बढ़े और तेजी से उछल कर इसके टखने पर एक ऐसा असा मारा कि वह गिर पड़ा इसका गिरना था कि बनी इस्राइल इस पर टूट पड़े और अपनी तलवारों से इसके टुकड़े कर दिये एक रवायत में है कि तीन हज़ार साल तक इसके पांव की हड्डी दरियाये नील पर पूल का काम देती रही (वअल्लाहो आलम)।
जब हज़रते मूसा की उम्र 80 साल की हुई तो परवरदिगार का हुक्म हुआ कि ऐ मूसा तुम अपनी क़ौम् से अलग होकर एक माह के लै कोहे तूर पर ख़लवत इख़तेयार करो तो हम तुम्हें ऐसी किताब देंगे जो तुम्हारे बाद बी तुम्हारी क़ौम की हिदायत करती रहे। चुनान्चे आपने अपने भाई हारून को अपना नायब बनाकर तूर पर तशरीफ ले गये।
मरज़िये इलाही से मोईना मुद्दत कुछ बढ़ गयी और एक माह के बजाये चालीस दिन हो गये तो वह बनी इस्राइल यह समझे कि मूसा हमें छोड़ कर कहीं भाग गये हैं। उन्होंने हारून की इताअत छोड़ दी और सामरी के बहकाने से एक बछड़े का मुजस्सेमा बनाकर उसकी परस्तिश करने लगे जनाबे हारून ने इन्हें लाथ समझाया और मना किया मगर इन लोगों ने एक न मानी जब हज़रते मूसा पलट कर आये तो अपनी क़ौम की यह हालत देखकर बेहद रंजीदा मलूल और नाराज़ हुए। बिल आखिर खुदा के हुक्म से आपने यह सज़ा तजवीज़ फरमायी कि वह सब मिलकर बाहम एक दूसरे को क़त्ल कर दें।
ग़र्ज़ बनी इस्राइल मजबूर हुए इन्होंनै गुस्ल किये कफन पहने सहरा में गये और वहां दो जानू बैठकर अपनी ख़म कर दीं। बारह हज़ार आदमी जो साबित क़दम थे वह बरहैना तलवारें लिए इनके सरोकं पर आ धमके इसके बाद एक सियाह घटा छा गयी ताकि तारीकी की वजह से अपनों और बेगानों का पता न चल सके। और रहम न आये गर्ज़ दोपहर से शाम तक क़त्लेआम होता रहा। और हज़ार इस्राइली मौत के मुंह में चले गये। तब बाक़ी लोगों की ख़ता माफ हुई इसके बाद जनाबे मूसा ने इनसे तौरैत पर अमल पैरा होने को कहा तो वह किताब की ज़ख़ामत को देखकर घबराये और कहनै लगे कि हमसे इसका बोज तो उठ नहीं सकता है इतने अहकाम की तामील क्योंकर मुमकिन है। खुदा ने इनकी 45 तम्बी के ले कोहेतूर का निस्फ़ हिस्सा इनके सरों पर मोअल्लक़ कर दिया कि मानते हो तो मानो वरना कुचल दिये जाओगे। तब जबरन व क़हरन उन्होंने तौरैत को तस्लीम किया और इस पर अमल का वादा किया।
हज़रते मूसा के ज़माने में एक औरत बहुत ही खूबसूरत और हसीन थी इसके पास आफ़ील नामी एक शख़्स ने जो बड़ा नेक व मालदार था। शादी का पैग़ाम भेदा आफ़ील के चचाज़ाद भाई ने बी पैग़माम दिया। इस औरत ने आफ़ील के पैग़ाम को मन्जूर कर लिया और शादी हो गयी।रश्द व हसद में फ़ील के भाई नै एक शब को सको कत्ल कर ला और इसकी लाश दूसरे मोहल्लै मैं एक मस्जिद के दरवाज़े पर डाल दी और फिर खुद भी सुबह इसके क़ेसास का दावेदार हुआ। बनी इस्राइल में इस वाक़ये को लेकर सख़्त हंगामा बरपा हो गया। और हर क़बीला दूसरे क़बीले को क़त्ल का ज़िम्मेदार और मुजरिम क़रार देने लगा।
खुदा का हुक्म है कि तुम एक गाये ज़बहा करके इसके गोस्त का टुकड़ा इसकी लाश पर मारो। मक़तूल खुद ही ज़िन्दा होकर अपने क़ातिल का पता बतायेगा। पहले तो बनी इस्राइल ने गाये ही के बारे में कट हुज्जितिया कीं इसके बाद ख़रीदारी के मामले में भी अपनी हेमाक़तो और शरारतों से बाज़ न आये आख़िरकार एक मरदे मोमिन को जो आले मौहम्मद पर दुरुद भेजता रहता था और अपने वालदैन का फरमा बरदार था। खुदा ने इन अहमकों के हाथ से एक गाये की क़ीमत दिलवायी कि शहर भर के बनी इस्राइल मुफ़लिस व मोहताज हो गये इन्हें इतना सोना देना पड़ा कि जितना की इस गाये कि खाल में समा सका। ग़र्ज कि वह गाय ज़बहा की गयी और इसके गोस्त का एक टुकड़ा मक़तूल की लाश पर मारा गया। गोश का मारना था कि वह मय्यत उठ बैठी और उसने अपने चचाज़ाद भाई को अपना क़ातिल बता दिया। और पिर इसको परवरदिगार की तरफ़ से काफी तूलै उम्र अता हुई। इस वक़्त से तमामि दुनिया में गाय का ज़बीहा राएज हुआ।
जनाबे मूसा फूतुहात की मंजिलों से गुज़र कर जब अरज़े मुकद्दस पर वारिद हुए तो वहां उन्होंने चहार दीवारी बुलन्द करके एक मस्जिद की बुनियाद डाली जो बैतुल मुकद्दस के नाम से मशहूर है। इसमें नमाज़े जमात होती थी। तौरैतद रखी जाती थी। और ताबूतै सकीना व दीगर तबरर्रुकात भी इस मस्जिद में रहते थे।हज़रते मूसा ने सका इन्तेज़ाम अपने भाई के जिम्मे किया था। जो इनके बाद इनके दो बेटों शब्बर और शब्बीर के हवाले रहा। फिर इनकी औलादें इनकी मुतावल्ली हुईं। हज़रते हारुन अपनी आख़री सांस तक जनाबे मूसा के बेहतरीन नाएब व जानशीन रहे। चुनान्चे इसी बिना पर पैग़म्बरे इस्लाम ने फ़रमाया है कि ऐ अली तुम्हें मेरी तरफ़ से वही मंज़ीलत हासिल है जो हारुन को मूसा की तरफ़ से हासिल थी। बस फर्ख़ सिर्फ़ इतना है कि मेरे बाद कोई पैग़म्बर न होगा।
यहूद के माने हरकत देने के हैं और चूंकि यहूद तौरैत पढ़ने वक़्त हिला करते थे। इस वजह से यहूदी कहलाये। दूसरा सबब यह भी होता है कि यहूद बिन याकूब की औलाद होकने की बजह से यहूदी कहे जाते थे। कुरआनी सराहतों से यह अमर् आशकर है कि बनी इस्रीइल (यहूदियों) पर मिसलसल इनायतें होती रहीं। इनकी रहबरी और रहनुमायी के लिऐ पैग़म्बरों का सिलसिला जारी रहा।
ख़ुदा ने इन्हें अपनी नेअमतों से ख़ूब ख़ूब नवाजा बड़ी बड़ी हुकूमतें भी अता कीं। मगर यह बदबख़त क़ौम न कभी मुत्तहिद रही और न इसने दिल से खुदाए वहदहु लाशरीक की वहदानियत का इक़रार किया कभी इसे क़ारून ने गुमराह किया सामरी ने और कभी शैतान ने बहकाया।
इस क़ौम पर ख़ुदा के एहसानात और इन एहसानात के बदले में इनका मुखरेकाना और जाहेलाना रवैया इस वक़्त वाज़ेह हो सकेगा जब हम इनके वाक़ेयात का मुताला करें जिससे कि कुरआने मजीद का बहुत बड़ा हिस्साभरा पड़ा है। यह एक हक़ीक़त है कि यह क़ौम अपनी मुशरेकाना सरगरमियों और बदआमालियों की वजह से बार बार ख़ुदा के एतापब व अजड़ाब का सबब बनती रहीं। मगर इनकी सरिश्त में कोई तब्दीली वाक़े न हुई। जिसका अन्जाम यह हुआ कि परवरदिगार ने इन्हें क़यामत तक के लिये ज़िल्लत और रूसवायी से हम किनार कर दिया। जैसा कि कुरआन में है कि –
हम क़यामत तक तुम पर ऐसे हाकिमों को मुक़र्रर करते रहेंगे जो तुम्हें बड़ी बड़ी तकलीफें और जलील व रुसवा करेंगे। (कुरए एराफ़ आयात)। खुदा की तरफ से यह एलान किसी फ़रदे वाहिद के लिए नहीं बल्कि पूरी क़ौम यहूद के ले है। और तारीख़ भी गवाह कि कभी इन्हें बख़ते नस ने तबह व बरबाद मुल्क बदर किया कबी ईसाईयों ने ताराज यह क़ौम ज़लील व सुसवा होती रहेगी। मौजूदा सदी में भी यह क़ौम जर्मनी के नाज़ियों के क़हर व ग़ज़ब का शिकार हो चुकी है। जिन्होंने इनके क़त्लेआम के बाद इन्हें मुल्क बदर कर दिया था और यह अपनी जान बचाने की ग़रज़ सके दूसरे मुमालिक में मुन्तशिर हो गयी थी। मगर बरतानिया और अमरीका ने इनकी एक अलग रियासत बनाकर इस नाक़िस क़ौम को फिर मुसलमानों पर मुसल्लत कर दिया। और यह क़ौम फिर एक बार ख़ुदायी क़हरो ग़ज़ब का निशाना बनने के लिऐ मुसलमानों के ख़िलाफ़ फ़ितना परदाजियों और महाज़आराईयों के साथ शैतानियत के रास्तों पर गामज़न है।
इस क़ौम पर ख़ुदा के एहसानात और इन एहसानात के बदल में इनका मुशरेकाना और जाहेलाना रवैया इस वक़्त वाज़ेह हो सकेगा जब हम इनके वाक़येता का मुतालेआ करें जिससे किकुरआने मजीद का बहुत बड़ा हिस्सा भरा पड़ा है। यह एक हक़ीक़त है कि यह क़ौम अपनी मुशरेकाना सरगरमियों और बदआमालियों की वजह से बार बार ख़ुदा के एताब व अज़ाब का सबब बनतीरहीं। मगर इनकी सरिश्त में कोई तब्दीली वाक़े न हुई। जिसका अन्जाम यह हुआ कि परवरदिगार ने इन्हें क़यामत तक के लिये जिल्लत और रूसवायी से हम किनार कर दिया। जैसा कि कुरआन मैं है कि-
हम क़यामत तक तुम पर ऐसे हाकिमों को मुक़र्रर करते रहेंगे जो तुम्हें बड़ी बड़ी तकलीफें देंगे और ज़लील व रुसवा करेंगे। (कूरए एराफ़ आयात)। खुदा की तरफ से यह एलान किसी फ़रते वाहिद के लिऐ नहीं बल्कि पूरी क़ौम यहूद के लिऐ है। और तारीख़ भी गवाह है कि कभी इन्हें बख़ते नस्र ने तबह व बरबाद , मुल्क बदर किया कभी ईसाईयों ने ताराज किया और कभी मुसलमानों ने ज़लील व रुसवा किया और क़यामत तक यह क़ौम ज़लील व रुसवा होती रहेगी।
मौजूदा सदी में भीयह क़ौम जर्मनी के नाज़ियों के क़हर व ग़ज़ब का शिकार हो चुकी है। जिन्होंने इनके क़त्तलेआम के बाद इन्हें मुल्क बदर कर दिया था और यह अपनी जान बचाने की ग़रज़ सेदूसरे मुमालिक में मुन्तशिर हो गयी थी। मगर बरतानिया और अमरीका ने इनकी एक अलग रियासत बनाकर इस नाक़िस कौम को पिर मुसलमानों पर मुसल्लत कर दिया। और यह क़ौम फिर एक बार ख़दायी क़हरो ग़ज़ब का निशाना बनने के लिए मुसलमानों के ख़िलाफ़ फ़तना परदाज़ियों और महाज़ आराईयों के साथ शैतानियत के रास्तों पर गामज़न है।
अल्लामा मजलिसी तहरीर फ़रमाते है कि जब जनाबे हारून की रेहलत का ज़माना क़रीब आया तो हज़रते मूसा एक दिन इन्हैं कोहेतूर की तरफ लेकर रवाना हुए। रास्ते में इन्हें आलीशान क़सर् मिला जिसकै दरवाज़ें घर एक खुशमुमां दरख़त था और इसमें एक पोशाक टंगी हुई थी जनाबे हारून से हज़रते मूसा ने फ़रमाया इसे पहन लीजिए।
चुनान्चे उन्होंने पहन लिया इसके बाद मूसा इन्हें लेकर इस क़स्र में दाख़िल हे तो देखा कि वहां एक तख़्त है जिस पर बेशक़ीमत मसनद पड़ी हुई और पूरा मकान मुशको अम्बर की खूशबू से मोअत्तर है। आपने हारून से फरमाया कि इस तख़त पर लेट जाइये। वह लेट गये और मलकुल मौत ने इनकी रूह क़ब्ज़ कर ली। और इसके बाद न वह दरख़त रहा न क़स्र रहा , न तख़्त रहा और न जनाबे हारुन रहे। ख़ुदा वन्दे आलम ने सबको आसमान पर उठा लिया।
अल्लामा मजलिसी फ़रमाते हैं कि मलकुल मौत जब मूसा के पास इनकी रुह क़ब्ज करने आये तो आपने इनसे पूछा ऐ मलकुल मौत क्यों आये हो कहा रुह क़ब्ज करने की ग़रज़ से हाज़िर हुआ हूं। फरमाया की किस जगह से रुह क़बज़ करोगे। कहा मुहं की तरफ से। आपने फरमाया कि इस मूंह से तो मैं आपने खुदा के साथ सलाम करता हूं। फरमाया पैरों से चलकर खुदासे बातें करने के लिए जाता हूं। कहा कानों से। फरमाया कि कानों से खुदा की आवाज सुनता हूं। कहा अच्छा तो फिर आंखों से रुह क़ब्ज़ कर लूं। फरमाया मैं आंखों से खुदा की रहमतों का नज़ारा करता रहता हूं। इसके बाद मलकुल मौत को खुदा का हुक्म हा कि वापस आ जाओ। और फरमाया कि मूसा जब अपनी मौत की ख्वाहिस करें तो इनके पास जाना।
चुनान्चे मलकुल मौत वापस गये और हज़रते मूसा ज़िन्दा रहे। यहां तक कि आपने जनाबे हारून के बाद जनाबे यूशा बिन नून को अपना जानसीन मुक़र्रर किया। फिर कुछ अरसे बाद एक दिन अपनी क़ौम से छिप कर एकऐसे मक़ाम पर गये जहां एक शख्स क़ब्र खोद रहा था। आपने भी कब्र की तैयारी में उनकी मद्द की और जब क़ब्र तैयार हो गयी तो इसमें लेट गये। आपका क़ब्र में लेटने था कि खुदावन्दे आलम नें आपनी नज़रों के सामने से तमाम हिजाबाद हटा दिये और इन तरजात को ज़ाहिर कर दिया जो इनके लिऐ उसने बेहिश्त में मुक़र्रर फ़रमाये थे। मूसा ने फरमाया परवरदिगार मुझे अपने पास बुलाले।
चुनान्चे मलकुल मौत को हुक्म हुआ फिर आप की रूह क़ब्ज़ कर ली गयी। इस शख़्स ने क़ब्र बन्द करदी और मूसा इसी क़ब्र में दपन हो गये। वह शख़्स दरहक़ीक़त एक फ़रिशता था। जो खुदा की तरफ से इस काम पर मामूर हुआ था। यही वजह है कि अहले किताब को मूसा की क़ब्र का निशान तक नहीं मालूम। वक़्ते वफ़ात आपकी उम्र 130 साल की थीं।
आप हज़रते मूसा के भांजे थे नीज़ आपका नसबी सिलसिला हज़रतै यूसूफ बिन याकूब अ 0 पर तमाम होता है। जनाबे हारून की वफ़ात के बाद आप हज़रते मूसाकगे वसी और जानशीनी मुक़र्रर हुए और खुदा की तरफ से मुक़ामे अरीह में मन्सबे नबूवत पर फ़ाएज़ किये गये।
दौराने तब्लीग़ आपने अपने अहद में मुशरेकीन व मुनाफ़ेक़ीन से कई लड़ाईया लड़ी मगर तमाम लड़ाईयों में सबसे अहम लड़ाई हज़रते मूसा की बीबी सफ़रा से हुई जिससे तरफैन के 70 हज़ार अफ़राद मारे गये। इस जंग की तफसीलऔर एललो असबाब लके बारे में तारीख़ी किताबें ख़ामोश नज़र आती हैं। मगर इस अम्र की निशानदेही ज़रूर होती है कि सफूरा और यूशा बिन नून के माबैन यह जंग जंगे जमल से बड़ी हद तक ममासेलत रखती है।
जिस तरंह हज़रत रसूले खुदा स 0अ 0 ने अपने को जिस तरह हज़रते मूसा से तशबीह दी इसी तरंह हज़रत मूसा की ज़ौजा सफूरा और ज़ौजे रसूल हज़रते आयशा में भी पूरी मुशाबेहत ज़ाहिर हुई। यूशा से जंग की और हज़रते आयशा ने रसूल खुदा के वसी और जानशीन हज़रत अली इब्ने अबी तालिब अ 0 से लड़ाई की सफूरा भी ऊंट पर बैठ कर लड़ने आयी थी और आयशा भी ऊंट पर सवार होकर जमल में तशरीफ़ लिऐ गयीं थीं। सफूरा के मुक़ाबले में यूशा बिन नून कामयाब हुए और आयशा के मुक़ाबले में अमीरलमोमेनीन को फ़तह हासिल हुई। बांझ थीं और सफूरा के यहां हज़रते मूसा की एक औलाद हो चुकी थी। इससे यह बाद भी वाज़ेह हो जाती है कि बाज़्म्बियाए मुरसलीन की बीवियं सिराते मुस्तक़ीम से खुद बी भटक गयीं और उन्होंने दूसरों को गूमराह किया।
हज़रते यूशा नै जनाबे मूसा के साल बद और हज़रते ईसा से सालक़ब्ल बरस की उम्र में इन्तेक़ाल फ़रमाया। अपनी वफ़ात से कुछ पहले आपने वह तमाम तबररूकात और ताबूते सकीना जो आपको हज़रते मूसा से मिले थे हज़रते हारुन के साहबज़ादों के हवाले कर दिया था (तबरी जिल्द पहला सफा 227)।
हज़रते यूशा बिना नून के बाद बनी इस्राइल के सरदार व पेशवा जनाबे तालिब बिन यूफना हे इनके बाद हज़रते हिज़क़ीलव का दौर आया। आप के वालिद हज़रते मूसा के दीन की तब्लीग़ किया करते थे। एक मरतबा इनकी क़ौम ने काफ़िरों और मुशरिकों से लड़ने के लिए इनके हुकम पर सरकशी इख़तेयार की तो खुदा ने बसूरते अज़ाब इन पर ताउव्वन की बीमारी को मुसल्लत किया। जो मुसलसल व बार बार साल ब साल आ , रही। जिसके नतीजे में लोग शहर छोड़ कर भाग जाया करते। एक मरतबा इस बीमारी ने वह शिद्दत इख़तेयार की कि तमाम शहर के लोग एक जंगल की तरफ निकल गये औन इन्हें यह गुमान पैदा हो गया कि अब हम यक़ीनन मौत से बच जायेंगे. तो खुदा ने इन पर कबारगी मौत को तारी कर दिया। और 70 हज़ार फ़राद फ़ना के गाट उतर गये। इनकी लाशें यूं हीं पड़ी रहीं यहां तर गोश्त पोस्त सब घुल कर ख़त्म हो गया। और सिर्फ हड्डियों के ढ़ाचे रह गये। जो एक अर्से तक इसी मक़ाम पर पड़े रहे। एक मुद्दत के बाद जनाबे हिज़क़ील का गुज़र इस मक़ाम से हुआ तो कसीर तादाद में इन्सानी ढ़ांचों को देखकर आपने मामले की नवैयत मालूम की। लोगों ने बताय कि यह ज़ाबे इलाही का शिकार हे हैं। चुनान्चे आपने बारगाहे एज़दी में इनकी ज़ीन्दगियों की दुआ फरमायी हुक्म हा कि ऐ हिज़क़ील बक़दरे ज़रूरत पानी लेकर असमाये पन्जेतन को इस पर दम करो। और पिर इस पानी को चुल्लूमें लेकर इनके ढ़ाचों पर छिड़क दो तो हम इन्हें दुबारा ज़िन्दा कर दें। ग़्रर्ज़ आप पानी छिड़कते जाते ते और लोग ज़िन्दा होते जाते थे। यहां तक सब के सब ख़ाक झाड़ते हे उछ खड़े हुए।
यह वाक़या नौरोज़ के दिन का है। इसी वक्त से ख़ुदा ने इस दिन एक का दूसरे पर पानी या गुलाब छिड़कना सुन्नत क़रार दिया। मगर अफ़सोस के हमारे भाईयों ने सुन्नत को होली में तब्दील कर दिया।
नौरोज़ उस दिन को कहते हैं जिस दिन आफ़ताब बुर्ज हमल में दाख़िल हुआ। इस दिन से ज़माने क़दीम से इस दिन को ख़ास फ़ज़ीलत हासिल है। जनाबे नूह की कशती इसी दिन कोहे जूदी पर ठहरी हज़रते इब्रहीम ने इसी दिन बुतों को तोड़ा। पैग़म्बरे इस्लाम ने इसी दिन अपने आख़री हज से वापसी पर ग़दीर में हज़रते अली की वेलायत का एलान किया और इन्हें अपना खलीफ़ा और जानशीन बनाया। अल्लामा मजलिसी अ 0र 0 ने मोअल्ला बिन ख़नीस की ज़बानी रवायत नक़ल की है कि नौरोज़ के दिन के लिऐ हड़रते इमामे जाफ़रे सादिक़ अ 0 का इरशाद है कि नौरोज़ के दिन पाको साफ़ लिबास पहन्ना खुशबू लगाना , आपस में एक दूसरे को मुबारकबाद देना और दुरूद पढ़ते हुए एक दूसरे पर गुलाब या पानी छिड़कना सुन्नत हबै। इसीले कि इस दिन हज़रते रसूले खुदा ने भी ईद और ख़ुशी मनायी थी।
ग़र्ज़ कि हिज़क़ील अपनी नाफरमान क़ौम को बराबर हिदायत करते रहे मगर इन पर आपकी बातों का की असर न हुआ। मगर इनकी रेशादवानियां जब लनाक़बिले बर्दाश्त हो गयीं तो प परेशान होकर बाबुल की तरफ जले गये और वहीं इन्तेक़ाल फ़रमाया।
हज़रते हिज़कील के बाद उनके साहबज़ादे हज़रते इस्माइल उनके वसी और जानशीन मुक़र्रर हुए और उन्होंने भी कारे तब्लीग़ न्जाम दिया लेकिन तारीखों में इनका कोई क़ाबिले ज़िक्र कारनामा नहीं मिलता है।
इस्माइल के बाद ख़ुदा ने हज़रते इल्यास बिन यासी न बिन मीशा बिन फख़ाख़ बिन अज़ा बिन हारून को पैग़म्बरी अता की प इलाक़ए बालाबक के इस्रिलियों पर मबऊस हुए। जिनकी शरारतों और बदआमालियां हद्दे कमाल से तजवुज़ कर चुकीं थीं।
इस वक़्त का बादशाह अजीना नामि का एक शख़्स था जो अपनी साबेक़ा ज़िन्दगी में मोमिन और बाइमान था। मगर शादी के बादग अपनी बीवी असबील के कहने सुनने और बहकाने से काफिर हो गया था। आपने उसकी हर चन्द फ़हमाइश की मगर की असर न हुआ।
एक दिन अज़बील की नज़र एक आबिदों ज़ाहिद की हरे भरे सब्ज़ो शादाब बाग़ पर पड़ी। जिससे वह अपनी गुज़र बसर करता था। इसे देखकर अज़बील की नियत ख़राब हुई। चुनान्चे इस बाग़ के मीलिक को क़त्ल करा दिया और खुद इस परक़ाबिज़ व मुतासर्रिफ़ हो गया। इसकी इस नारवा हरकत पर परवरदागर को जलाल या और इरशाद हा कि मैं इस खूनवे नाहक़ का बदला ज़रूर लूंगा। मगर अजीना और अज़बील इसी बाग़ में इस तरंह मारे जायेंगे कि इनकी लाशों को दफ़न करने वाला कोई न होगा।
एहतेजाजन हज़रते इल्यास ने भी इन्हे समझाना चाहा और मगर अजीना अपनी बीवी के कहने पर इल्यास ही के लिऐ दरपैआज़ार हो गया। और इसने आपनी गिरफ़तारी का परवाना जारी कर दिया। मगर ख़ुदा की शान यह कि इसका बेटा कुछ ऐसा बीमार हुआ कि वह उसकी बीमारी की तरफ़ मुतावज्जे हो गया और हज़रते इल्यास मौक़ा पासर वहां से निकल गये।
और एक पहाड़ पर जाकर खुदा की इबादत में मशगूल हो गये। बादशाह ने जब कुछ लोगों को साम के बुतों के पास अपने बेटे की दुआऐ सेहत के लिए रवाना किया तो उन लोगों ने इन लोगों से आप की मुलाक़ात हुई।
आपने फ़रमाया कि अगर तुम्हारा बादशाह बुतों की परशतिश से दस्तबरदार होकर ख़ुदा पर ईमान ले आये तो उसका बेटा अच्छा हो जायेगा। इस बदबख़्त को अपने आदमियोंसे आप का ठिकाना मालूम हुआ। तो कई बार उसने अपनी फ़ौज के सिपाहियों को आपकी गिरफ़तारी के लिए भेजा। मगर वह सब के सब पनी बद्दुआ से हलाक हो गये।
आख़िर में उसने अपने वज़ीर को जो ईमानदार था रवाना किया। तो वह हज़रते इल्यास ही के पास रह गया और पलट कर न आया। इधर इसका बेटा भी मर गया इसके बाद वहां के लोग कहत काशिकार हुए।
जब एक मुद्दत गुज़र गयी और बारिश न ही तो हज़रते इल्यास फ़िर पलट कर आये और उन्हें समझाया बुझाया कि तुम लोग अपने बुतों के सामने दुआ कर अगर बारिश हो जाये तो बुत परस्ती पर क़ायम रहना। इसका बरअक्स अगर मेरी दा से बारिश हो तो मेरे ख़ुदा की इतात क़ुबूल कर लेना। सब राज़ी हो गये।
मगर इन्हें अपने बुतों से पानी का एक क़तरा न मिला। आख़िरकार आपने दुआ फ़रमायी तो खूब बारिश ही। मगर वह अपने इक़रार से फिर गये। आख़िरकार आपने हज़रते लयसी को अपना नायब मुक़र्रर किया और खुद लोगों की नज़रों से ग़ायब हो गये और कहा जाता है कि ख़ुदा ने आपको ज़िन्दा आसमान पर उठा लिया।
एक मुसतनद रवायत मिलती है कि आप जनाबे ख़िज्र की तरंह इसी दुनिया में हैं मगर लोगों की नज़रों से पोशीदा हैं। और जो अहकामें इलाही इनके सिपुर्द होते हैं इसे अन्जाम देते हैं। हज़रते ख़िज्र दरियाओँ और समुंदरों पर मुक़र्रर हैं। और हज़रते इल्यास सहराओं और पहाड़ों पर मुतीईन हैं। इन दोनों की मुलाक़ात भी हज के मौक़े पर खानए काबा में होती है। ग़र्ज़ कि खुदा ने आप की गैबत के बाद वहां के लोगों पर एक दूसरे बादशाह को मुसल्लत कर दिया जिसने अज़बील और दबील को क़त्ल करे उसी बाग़ में डलवा दिया और दरिंदे इन दोनों को खा गये।
हज़रते मूसा के बाद एक अरसे तक बनी इस्राइल जंग व जदल फतोहात की तरफ माएल रहे और जब केनान और उसके जैली इलाकों पर इन्हें इकतेदार हासिल हो गया तो चन्द रोज़ चैन से रहे। मगर जब उनके शर पसन्द मिजाज़ ने उन्हें फिर शरारतों पर मजबूर कर दिया और यह लोग फिर अपनी साबेका हालत पर पहुंच गये तो परवर दिगार ने इन पर एक इन्तेहायी ज़ालिम व जाबिर बादशाह को मुसल्लत किया जिसका नाम जालूत था। इसने इस्राइलियों पर वह जा़लिमाना व जाबिराना अक़दाम किये कि इनका जीना दूभर हो गया और इनकी हालतें ख़राब हो गयीं।
आखिरकार जालूत के जब्रो इस्तेबदाद से परेशान होकर इन्होंने हज़रते शामूल की तरफ रुजू किया। जो हज़रते मूसा की शरीयत पर नबी थे और ग़ज़्जा और असक़लान के इलाकों पर मबउस थे।
बनी इस्राइल ने हज़रते शमूवील से जालूत के मजा़लिम की शिकायतें कीं और कहा कि आप खुदा से दुआ करें कि वह हमें इसके जुल्म से निजात दे। इसके अलावा अगर आप मुनासिब समझें तो हम पर कोई ऐसा हाकिम मुक़र्रर फरमायें जिसकी मातेहती में हम लोग जालूत से जंग करें। हज़रते शमूवील ने बारंगाहे ऐजंदी में इनका मुद्दआ बयान किया परवरदिगार ने रौग़ने ज़ैतून से भरा हुआ एक ज़र्फ का असा जिब्रअील के ज़रिये जनाबे शमूवील की खि़दमत में इरसाल फ़रमाया और यह हुक्म दिया कि जिस शख़्स के सामने यह रौग़न जोश खाने लगे यह असा इसके क़द के बराबर हो जाये उसी शख़्स को बादशाह बना दो।
एक फ़रमान रवा के इन्तेख़ाब का यह अजीबो ग़रीब मेयार था। जिसमें मसलेहते इलाही कार फ़रमा थी। बहरहाल यह सुनकर बड़े बड़े लोग इस रौगन और असे के सामने हुक्मरानी की तमन्नाओं के साथ आये। मगर इस रौग़न में न कुछ जोश पैदा हुआ और न असे में कोई हरकत हुई।
चुनान्चे जब बन इस्राइल में हज़ारो लोग इसमें से गुज़र गये तो आखि़र में सक्कायी का पेशा करने वाला एक शख्स आया जिसका नाम तालूत था। इसके आते ही रौगन भी जोश खाने लगा और असा भी उसके कद के बराबर हो गया। यह देख कर हजरते शमूवील ने हुक्में इलाही के मुताबिक इसी को बादशाह बना दिया। लेकिन बनी इस्राइल अपनी साबेका आदतो फितरत की बिना पर इस इन्तेखाब से मितमइन न हो सके। वह ऐतराज़ात और अंगुश्त नुमाईयां करने लगे , उनका नजरिया यह था कि जिनके पास माल व दौलत खजाना और तुजको एहतेशाम हो उसी को बादशाह होना चाहिए।
इन एतेरेजाल के ज़ैल में हजरते शमूवील का जवाब तमद्दुन के कायदे पर मबनी था कि सल्तनत का काम जाहिरी तुजक्को एहतेशाम से नही चल सकता। इसके लिए इल्म व हिकमत , फहम व फरासत के खजानो की जरुरत है। और इसी बात का लेहाज खुदा वन्दे आलम ने हर नबी व खलीफा की तकरसरी में रखा है। बैयत ग़ल्बा और उम्मत का इज्मा और भेड़िया धसान कोई चीज नही है।
गर्ज कि बड़ी मुश्किलो और कट हुज्जतियो के बाद इन लोगो ने तालूत को अपना बादशाह तसलीम किया और इनकी मा तहती में जालूत से जंग करने के लिए निकले। इस वक्त इनकी तादाद 70 हजार थी। गर्मी का मौसम था धूप की शिद्दत में इन पर प्यास का ग़ल्बा हुआ तो तालूत से कहने लगे कि पानी की किल्लत और प्यास हमें मारे डालती है। ऐसी सूरत में हम कैसे जिन्दा रहेगे और क्यो कर सफर करेगे। तालूत ने फरमाया कि घबराओ नही कुछ दूर चल कर एक नहर मिलेगी। वह तुम्हारी प्यास बुझा देगी।
मगर शर्त यह है कि इस नहर से सिर्फ एक चुल्लू पानी पीना वरना मैं किसी का जिम्मेदार न होऊगा। मगर यह लोग जब नहर पर पहुंचे तो तीन सौ तेरह आदमियों के सिवा मुंह के भल उस पर दुरे और खूब जी भर कर पानी पिया और नतीजा यह हुआ कि इनके पेट फूल गये , होंठ सियाह हो गये और यह लोग चलने फिरने को मजबूर हो गये। यह पानी पीते जाते थे मगर इनकी प्यास नही बुझती थी। मगर जिन लोगों ने तालूत के कहने के मुताबिक अमल किया था यानी सिर्फ एक चुल्लू पानी पिया था इन्हे सुकून भी मिला थकन भी दूर हुई और प्यास भी बुझ गयी।
हजरते शमूवील भी तालूत के हमराह थे इन पर खुदा के वही नाजिल हुई कि जो लोग पानी के बीमार है। उन्हे इसी मुकाम पर छोड़ दो और जो तीन सौ तेरह तन्दुरुस्त हैं इन्हे लेकर आगे बढ़ो। चुनान्चे वह आगे बढ़े और बाकी सफर तय करके महाज़ पर पहुंच गये। जब जालूत को यह खबर मिली तो वह भी एक लाख का लशकर लेकर आ धमका।
माराकाए कारजार गर्ब होने से पहले हज़रते शमूवील ने तालूत से कहा कि जालूत को वही शख्स कत्ल करेगा जो आले याकूब में होगा। और जिस के बाप का नाम ईशा होगा। चुनान्चे लोगो की निगाहे हजरते दाउद पर ठहरी जो तीन सौ तेरह आदमियो में शामिल थे। जिस्मानी एतेबार से खान पान होने के बावजूद सेफात व कमालात में हजरते शमूवील के मेयार पर पूरे उतर रहे थे।
लड़ाई छिड़ने से पहले तालूत ने यह भी ऐलान कर दिया कि जो शख्स जालूत को कत्ल करगा में उसे निस्फ सल्तनत दे दुंगा। इसके साथ ही में अपनी बेटी भी इसे ब्याह दुंगा.।
ग़र्ज़ की जंग शुरु हुई और जालूत ने अपना मददे मुक़ाबिल तलब किया किसी कि हिम्मत नही हुई तो हज़रते दाउद मुक़ाबले के लिए चले उन्होने न तलवार ली न नैज़ा बल्कि तीन पत्थर रास्ते से उठा लिये और इनमें से एक पत्थर गोफन (मिनजनीक़) में रखा जालूत की तरफ फेंका जो उसकी पेशानी पर लगा और कासए सर को तोड़ता हुआ पुश्ते गर्दन से बाहर निकल गया। बस यही एक वार काफी था। जालूत इसी जगह ढेर हो गया। इसका मरना था कि फौज के कदम उखड़ गये और तालूत को नुमायां फतेह हासिल हुई।
इसके बाद उन्होने अपने एलान के मताबिक जनाबे दाउद अ 0 को अपनी बेटी ब्याह दी और अपने बाद के लिए उन्हे अपना वारिस व जानशीन मुक़र्रर कर दिया। इस तरह जनाबे दाउद अ 0 हज़रते तालूत अ 0 के बाद हाकिम क़रार पाये। आपकी सलतनत का जिक्र जाबजां क़ुरआन में मौजूद है।
हज़रते दाउद अ 0 हज़रते याकूब की नस्ल से थे। सिलसिलए नसब दाउद बिन ईशा बिन ओबेद बिन बाकिर बिन सल्मुन बिन बख़शुन बिन अमीनादिब बिन राम बिन हसनरुन बिन फारिज़ बिन याक़ूब बिन इस्हाक बिन इब्राहिम पर तमाम होता हे।
आप हज़रते ईसा से 1085 साल पहले पैदा हुए आप पैग़म्बर भी थे और बादशाह भी थे। इस तरह खुदा ने आपको दीनो दुनिया दोनों की सरदारी से सरफराज़ किया था। जैसा कि कुरआने मजीद में इरशाद हुआ – यक़ीनन हमनें दाउद को अपनी बारगाह से बुजूर्गी अता की और पहाड़ों को हुक्म दिया की वह तसबीह में इनका साथ दें नीज़ परिंदों को हमनें इनका ताबेह बनाया। (सुरए सबा आयत 10)
आप पर जो अल्लाह की तरफ से आसमानी किताबे नाज़िल हुई उसका नाम ज़बूर है। नबूवत और इल्मो हिक्मत के साथ साथ खुदा ने आपको खुशइलहानी से भी नवाज़ा था। जिसकी कैफियत यह थी कि जब आप सोज़ व गुदाज़ के साथ मसरुफे मुनाजात होते तो तमाम चरिन्द परिन्द आपके गिर्द जमा हो जाते और दरखतो और पहाड़ो से सदाये बलन्द होने लगती और जिस वक्त आप जुबूर की तिलावत फरमाते तो उलमाए यहूद शजर व हजर कोह व सहरा ,जिन्न व इन्स सब के सब बेखुदी में झुमने लगते थे और अकसर जानदारों पर बेहोशी का आलम तारी हो जाता। बरोज़े क़यामत यही एजाज़ व कशिश अमीरलमोमेनीन हज़रेत अली अ 0 की आवाज़ में होगी। जैसा कि रसुले खुदा स 0 अ 0 का इरशाद है कि खुदा वन्दे आलम क़यामत के दिन अली को जिबरईल की कूवत आदम का नूर यूसुफ का जमाल , और दाउद की आवाज़ अता करेगा और अहले बेहिश्त का ख़तीब बनायेगा। और जब वह कलाम करेंगे तो बहूत से लोग उनकी आवाज़ सुनकर बेहोश हो जायेंगे। एक बादशाह और ताज़दार की हेसियत से हज़रते दाउद का तरीक़ए कार यह था कि जब वह अकसर रातों में भेष बदलकर रियाया का हाल मालूम करने निकलते थे तो लोगों से अपने बारे में भी दरियाफत करते थे। कि तुम्हारे बादशाह का तौर व तरीका कैसा है। एक शब एक फरिश्ते ने इन्सानी सूरत में आपसे मुलाकात की तो आपने उससे भी हस्बेदस्तूर अपने बारे में पूछा तो उसने बताया कि बादशाह का रवैया और बरताव रियाया के साथ बहुत ही अच्छा है। मगर एक ऐब यह है कि वह खुद अपना और अपने अहलोअयाल के एख़राजात का बोझ बैतुलमाल पर डालते है जो गैरे मुनासिब है। क्योकि वह एक बादशाह होने के साथ साथ एक नबी भी है।
इस गुफ्तगू के बाद हज़रते दाउद ने यह तय कर लिया कि वह आइंदा अपना व अपने अहलो अयाल का बोझ बैतुलमाल पर नहीं डालेंगे। इस फैसले के बाद खुदा वन्दे आलम ने जिब्रइल के ज़रिये इन्हे ज़िरासाज़ी की तालीम दी और यह एज़ाज़ बखशा कि लोहा इनके हाथ में आने के बाद मोम की तरह नर्म होने लगा। गर्ज़ कि आपने ज़िरासाजी का काम शुरु किया और ऐसी ज़िरा बनाने लगे कि उस दौर में वह चार हज़ार दिरहम में फ़रोखत होने लगी और इसी से आप के जुमला एखराजात पूरे होने लगे। मौर्अरेखीन व मुस्सेरीन का कहना है कि ज़िरा आप ही की ईजाद है। पूरा मुल्के शाम और जज़ीरए आरमीना के तमाम इलाके आप की हुकूमत में शामिल थे। जो आप की ज़ाती फ़तुहात का नतीजा थे। इनका सबब यह था कि एक काफिर और ज़ालिम व जाबिर बादशाह सेआपकी जंग हुई और वह मार गया। इसलिए उसकी हुकूमत पर भी आपका कब्ज़ा हो गया वरना कोई तारीख यह नही वताती कि आपने जबरन लोगों को खुदा परस्ती इख़तेयार करने या एहकामें इलाही का पाबन्द बनाने के लिए जेहाद के नाम पर या मुल्क गीरी के लिए तलवार के ज़ोर से कोई इलाका फ़तेह किया हो जैसा कि पैग़म्बर आखरुज़्ज़मा की वफात के बाद हज़रत उमर के दौर में हुआ।
आपने 40 साल तक बादशाहत और पैग़म्बरी और 70 साल की उम्र मे इन्तेकाल फरमाया। रेहलत के वक्त आपने अपने छोटे साहबज़ादे जनाबे सुलेमान को अपना खलीफा मुक़र्रर किया और कुरआनी सराहतों के मुताबिक वही आपके ममलेकत इल्म और नबूवत के वारिस क़रार पाए।
कुरआने मजीद ने इस विरासत के ज़ैल में हज़रत रसूले खुदा स 0 अ 0 की उस दरमियान चौदह सौ बरस से निज़ा का सबब है। शियों का कहना है कि रसूले खुदा की मीरास भी उसी तरह जारी होना चाहिए जिस तरह और लोगो की होती है.। हज़रते अहले सुन्नत यह कहते है कि आन हज़रते का कोई वारिस नही हो सकता और इसकी दलील बह यह पेश करते है कि रसूले खुदा स 0 अ 0 ने खुद फरमाया है कि हम गिरोहे अम्बिया न किसी के वारिस होते है और न किसी को अपना वारिस बनाते है बल्कि जो कुछ छोड़ जाते हैं वह सदका होता है। लेकिन कुरआने मजीद साफ साफ बता रहा है कि जनाबे दाउद ने अपने फरज़न्द को अपना वारिस छोड़ा और हज़रते सुलेमान हज़रते दाउद के वारिस हुए। मुमकिन है कि पैग़म्बरे इसलाम स 0 अ 0 ने इस तरह फरमाया हो कि हम गिरोहे अम्बिया में वारिस होते भी है और वारिस छोड़ते भी है और हज़रते अबू बक़र उलटी बात समझे हों। हालाकि हुजूरे अकरम वारिस ने छोड़ते के बारे में अगर कुछ फरमाते तो सबसे पहले इसका ज़िक्र जनाबे फात्मा ज़हरा स 0 अ 0 से करते कि बेटी तुम याद रखना कि अम्बिया का कोई वारिस नही होता। इसके बाद हज़रते आयशा से फरमाते या किसी और बीवी से बयान करते। क्योकि आन हज़रत की मीरास का दावायही लोग कर सकतीं थी। लेकिन सरकारे दोआलम की ज़बान से यह बात न जनाबे सैयदा ने सुनी और न किसी ने इसकी तस्दीक की। सिर्फ अबू बक़र इसके मुददई और रावी है जो किसी पहलू से दुरूसत नहीं मालूम होती है।
हज़रते ईसा से 1033 साल क़ब्ल हज़रते सुलेमान पैदा हुए। हज़रते दाउद के 19 बेटे थे और उनमें से एक अपने बाप की विरासत व हुकूमत का दावेदार था। जब हज़रते दाउद की रेहलत का वक़्त क़रीब आया और हुकूमत के लिए आपके बेटों में निज़ाई सूरत पैदा हुई तो आपको जिब्रइल के ज़रिेए एक मोहरबंद आसमानी मकतूब उसूल हुआ। जिसमें चंद सवालात थे। और इनके साथ यह सराहत भी थी कि तुम्हारे बेटों में जो इन सवालात का जवाब देगा वही तुम्हारा वारिस व जानशीन होगा। चुनान्चे आपने तमाम अराकीने हुकूमत और अमायदीने शहर को जमा किया और सब बेटों के सामनें बारी-बारी वह सवालात पेश किये मगर जनाबे सुलेमान के अलावा किसी ने कोई जवाब न दिया आखि़रकार आप ही अपने वालिद दाउद के वारिस व जानशील क़रार पाये। आपको अपने बाप से जो हुकूमत विरासत में मिली थी इस पर क़ाबिज़ व मुतासर्रिफ़ होने के बाद आपने इसकी वुसअत के लिए खुदा की बारगाह में यह दुआ की कि पालने वाले मुझे बख़श दे और मुझे वह हुकूमत अता कर कि मेरे बाद यह शरफ फिर किसी को न निले। बेशक तू बड़ा अता करने वाला है (कुरआने मजीद सूरए साद आयत 35)।
इस दुआ की बुनियाद पर खुदा वन्दे आलम ने तमाम जिन्नो इन्स , जमादात व नबातात व हैवानात पर वह इख़्तेयार दे दिया कि जिसकी मिसाल सलतीने दुनिया की तारीख़ में नहीं मिलती।
इन्सानों के अलावा आप का लशकर जिन्नातों , देवज़ादो , दरिंदों परुदों , चरिंदों , पर भी मुश्तमिल थी। और दो सौ मुरब्बामील के तवील व अरीज़ रक़बे में फैला रहता था। जिसकी तरतीह इस तरंह होती थी कि पचास मुरब्बे मील में इन्सानों की फ़ौज रहती थी। पचास मुरब्बा मील में जिन्नातों और देवज़ादों का लशकर रहता था। रचास मुरब्बे में दरिन्दों का मस्कन था। और पचास मुरब्बे मील के रक़बे मील के रक़बे में चरीनादों और परीन्दों का जगघटा लगा रहता था।
आपने तीन मील लम्बी डेढ़ मील चौड़ी एक अजीमुश्शान बिसात बनायी थी। जिसमें लकड़ियों पर शीशों के बने हुए एक हज़ार महल थे। सोने , चांदी , हीरे और जवारेरात से मरस्सा एक वसी और अरीज़ तख़्त था। जिसके दरमिय़ा में एक याकूत का मिम्बर था। और उसके चारों तरफ सोने व चांदी की तीन हज़ार कुर्सियाँ थीं। जिन पर आपके वुज़रा , मख़सूसीन और मुसाहेबीन जलवा अफ़रोज होते थे। इनके गिर्द जिन्नतों और देवज़ादो की क़तारें होतीं थीं। और पूरी बिसात पर परिंदे अपने परों का साया किये रहते थे। और हवा इस बिसात को आपकी ख़्वाहिश के मुताबिक़ एक मकाम से दूसरे मक़ाम तक अपने दोश पर उठा कर ले जाती थी। इसी बिसात को बिसाते सुलेमानी कहा जाता है।
आपकी बीवियों का तादात 300 बतायी जाती है। और कहा जाता है कि उनते लिए भी आपने 72 मुरब्बा मील के रक़बे में एक आलीशान महल ताम़ीर कराया था। जिसकी ईंटे सोंने और चांदी की थीं। फर्श याकूत और जमर्रुरद का था।
कुरआने मजीद से पता चलता है कि तख़्ते सुलेमानी की आराइश और ज़ेबाइश के लिए जिन्नात तरह तरह के मूरतें बनाते थे। तफसीर से यह भी वाज़ेह है कि वह नबियों और फरिशतों और मस्जिदों के मुरक्के बनाते थे। ताकि इन्हें देखकर लोग इबादत की तरफ़ रूजू हों। यह अम्र काबिले तवज्जो है कि हज़रते सुलेमान के दौर में इनके हुक्म से फरिश्तों और नबियों की तस्वीर इसलिए बनायी जाती थीं कि उस ज़माने के लोग इन्हें देखकर इबादत की तरफ रूजू हों। तो मौजूदा जमाने में हज़रते इमामे हुसैन अ 0 के रौज़ए अक़दस की तस़्वीर ताजिये पर ऐतेराज़ और बिदअत के फ़तवे एक बेजां और मोहमल बात है.। क्योंकि तस्वीर ताजिये की ग़र्ज भी यही होती है कि इसको देखकर लोग मज़लूमे करबला हज़रत इमाम हुसैन अ 0 की शहादत को याद करें। और तज़केरा और ग़िरया करें। चुंकि पैगम्बर इस्लाम भी इमामे हुसैन अ 0 की शहादत की ख़बर क़ब्ल अज़ वक्त सुनकर बार बार रोये थे। और वाक़ये शहादत के बाद भी हज़रत उम्मे इब्ने अब्बास वगैरह ने ख़्वाब में आन हज़रत को रोते हुए देखा था। तो इस वजह से रसूले अकरम स 0 अ 0 की ताअस्सी की ताअस्सी में हज़रते इमाम हुसैन अ 0 पर रोना भी इबादत है।
जनाबे सुलेमान को जब मग़रिब से मशरिक़ तक तसल्लुत हासिल हो गया और हर शय इनके ज़ेरे इकतेदार आ गई तो इनके दिल में यह ख़्याल पैदा हुआ कि खुदा ने मुझे इतनी बड़ी हुकूमत अता की है क्यों न एक दिन सारी मख़लूकात की दावत की जाये। इस पर वही नाज़िल हुई कि ऐ सुलेमान ये तुम्हारे बस कि बात नही यह मेरा ही काम है कि तमाम मख़लूक़ात तक रिज़क़ पहुचाता हूँ। जनाबे सुलेमान ने अर्ज़ कि की पालने वालेतूने मुधे बहुत कुछ दिया है और मुझे उम्मीद है कि मैं तेरी मख़लूक़ात को शिकम सेर कर सकूंगा। लिहाज़ा तेरी बारगाह में ग़ुज़ारिश है कि तू इस अम्र की मुझे इजाज़त मरहमत फरमादे। चुनान्चे आपको इजाज़त मिली और आपने समुंदर के किनारे एक वसी और अरीज़ मैदान में दावत का एहतेमाम किया। लाखों इन्सानो और जिन्नातों ने मिनकर खाना जमा किया और जब आपको इत्मेनान हो गया कि ज़रुरत से ज़्यादा खुरदनी अशिया जमा हो गयी है तो आपने एक वक़्त मुक़र्रर करके हवा के ज़रिये तमाम मखलूक़ात के कानों तक अपनी तरफ़ से दाबत की आबाज़ पहुंचाई। अछभी एक मरकज़ पर मख़लूक़ात के जमा होने का इन्तेज़ार हो रहा था। कि समुंद्र से एक मछली ने सर निकाला और उसनें जनाबे सुलेमान से कहा कि सुना है आपने तमाम मख़लूक़ात की दावत कि है। लिहाज़ा मैं भी आयी हुँ मुझे सेर कीजिये। जनाबे सुलेमान ने फरमाया अभी कुछ देर इन्तिज़ार कर जब सब जमा हो जायेगें तो खाना खिलाया जायेगा। उसने कहां मैं तो बहुत भूखी हूँ मज़ीद इन्तेज़ार मेरी कूवते बरदाश्त से बाहर है। यह सुनकर जनाबे सुलेमान ने फरमाया जो मौजूद है उसमें से खा ले। कहा जाता है कि जो खाना तमाम मख़लूक़ात के लिए उस जगह जमा किया था मछली तन्हा उसे खा गई और मज़दी खाने की तालिब हुई यह देखकर जनाबे सुनेमान सजदए ख़ालिक़ में गिर पड़े और रो- रो कर कहने लगे कि ऐ पालन वाले रिज़क़ पहुंचाना बेशक तेरा की काम है। मुझसे ग़लती हुई तू मुझे माफ कर दे। यह भी कहा जाता है कि उस दिन तमाम मख़लूक़ात जिन्हें जनाबे सुलेमान ने मदू किया था सब भूखीं रह गयी।
हज़रते सुलेमान एक मरतबा अपने लशकर के साथ हवा के दोश पर परवाज़ कर रहे थे कि अचानक आपने एक वादी में उतरने का क़स्द किया जो चीटियों की अमाजगाह थी। हवा ने आहिस्ता आहिस्ता आपको इस बादी पर उतारने का क़स्द किया। तो एक चीटी ने (जो तमाम चीटियों की मलका थी) कहा की ऐ चीटीयों तुम अपने अपने ठिकानों पर चली जाओ इसलिए कि हज़रते सुलेमान का लशकर हमारी ज़मीन पर उतर रहा है। ऐसा न हो की तुम रौंदी जाओ। जनाबे सुलेमान को इसकी खबर भी न हो यह आवाज़ जनाबे सुलेमान के कानों तक पहुचाई। आपाने चीटियों कि उस मलका को तलब किया और अपनी हथेली पर उठाया और फरमाया कि क्या तेरे नज़दीक सुलेमान ज़ालिम है उसने कहा कि मैं आपको ज़ालिम नही समझती। मुझे अपनी रियाया की हिफाज़त करना फ़र्ज़ है मैने इस फर्ज़ के तहत इन्हे आगाह किया था ताकि वह जानी नुकसान से महफुज़ रहे। जनाबे सुलेमान ने फरमाया कि क्या तुम अपनी रियाया पर इस शफक्कत को रवा रखती हो। मलका ने कहा क्योकि खुदा ने मुझे इनकी सरदारी अता की है। इसलिए इन पर शफ़क्कत भी मेरे लिए वाजिब है। फिर जनाबे सुलेमान ने फरमाया कि क्या तुम्हारी हूकुमत बेहतर है या मेरी।उसने कहा इस वक्त तो मेरा मरतबा आपसे बलन्द है क्यों की मै आपके हाथ में हुँ। आप के अज़ीम बादशाह होने के साथ साथ अल्लाह के नबी भी है। यह सुनकर जनाबे सुलेमान के आँखो मै आ गये आपने सर झुका लिया और खामोश हो गए।
हज़रते सुलेमान एक दिन आपने दरबार में तशरीफ़ फ़रमा थे और परिन्दे हस्बे दस्तूर आप पर साया किये थे। एक ख़ला से धूप की किरने आपके चहरे पर पड़ी नज़र उठा करे जायज़ा लिया तो देखा कि हूदहूद की जगह खाली है। आपने फरमाया की हूदहूद कहां है पता लगाओं मै उसको सख्त सज़ा दुँगा। अभी थोड़ी ही देर ग़ज़री थी की हुदहूद होंपता कांपता खिदमत मै हज़िर हुआ। आप ने फरमाया कि तु कहा था उसने कहां की हुज़ूर एक ऐसी ख़बर लाया हूँ कि ग़ालेबन आप को भी नही है फरमाया बयान कर उसने कहा मुल्के यमन मै दो पहाड़ियों के दरमियान सबा नामी एक शहर है , जो वहां की हसीन तरीन मलका बिल्कीस बिन्ते शराजील इब्ने मालिक का दारुस्सलतनल है। इस मलका की अपनी बादशाहत है और शाही का तमाम साज़ो समान इसके पास मुहैया था। सोने , चाँदी ,हीरे ,जवाहेरात से बना हुआ उसका तख्त तीस ग़ज लम्बा , तीस गज़ चौड़ा , तीस ग़ज ऊँचा है। इनमें सात खाने है और हर खाने में बड़े बड़े कीमती मोती और आवेज़ा है। इसके चारों पाये याकुतो ज़मर्रुदो पुखराजो मोती के है और वह इस तरह आरास्ता और पैरास्ता है. कि देखने वालो की निगाह नही ठहरती। मगर सबसे बड़ा ऐब यह है कि वह मलका और उसकी रियाया आपताब को सज़दा करती है और शैतान ने उसे बहका रखा है.।
हज़रते सुलेमान चुंकि अल्लाह के नबी थे। बनी नोए इन्सान की हिदायत पर मअमुर थे। इसलिए हुद हुद की ज़बान में ग़ैरउल्लाह की परशतिश का हाल सुनकर आपकी पेशानी पर नागवारी की शिकने नमुदार हुई। चुनान्चे आपने बिल्कीस के नाम एक खत लिखा और हुद हुद से कहां कि यह खत ले जा और इसे मलका तक युँ पहूचा दे कि उसे यह न मालूम हो की किस तरह आया है। हुदहुद यह खत ले कर रवाना हुआ और जब वह वहां पर पहुचा तो उस वक्त बिल्किस अपने मखसुस कमरे में महवें इस्तेराहत थी। यह रौशन दान से कमरे में दाखिल हुआ और मलका के सीने पर खत रख कर चला आया और जब वह सो कर उठी तो उसने अपने सीने पर सुलेमान का खत देख कर सख्त मुताअज्जि और हैरान व परेशान हुई। पहरे दारों से पुछा तो सभी ने लाइल्मी ज़ाहिर की। ग़र्ज कि उसने खत खोला और पढ़ा तो होश उड़ गये। इसमें लिखा था कि हमें मालुम हे कि तुम लोग खुदा की इबादत करने के बजाए ग़ैरुल्लाह की परशतिश में मसरुफ हो। और आपताब को सजदा करते हो। मैं एक नबी की हैसियत से तुम लोगो को दीने हक इख़तेयार करने की दावत देता हूँ और हिदायत देता हुँ की अगर तुम लोग न माने और कुर्फ़ो ज़लालत पर कायम रहे तो याद रखो कि में तुम पर हमला करके तुम्हारी सारी सलतनत को नेस्तोनाबूद कर दुँगा। खत पढ़ने के बाद बिलकिस पर लज़्जा तारी हो गया। वह इस क़द्र तशवीश व तरद्दुद में मुब्तेला हुई कि उसने फौरी तोर पर तमाम वज़ीराने ममलेकत अराकीने हुकूमत अपने तमाम फौज़ के सरदारो को तलब किया और पूरे वाक़्ये कि तफसील बयान कर हज़रते सुलेमान का वह मकतुब रखा और उन लोगों से पुछा कि इस बारे में तुम्हारी क्या राय है.। उन्होने कहां की हम लोगों के पास ताक़त व शुजाअत दोनों चीज़े है आइन्दा आप को इख्तेयार है। अन्जाम को सामने रखते हुए जो हुक्म सादिर फरमायें हम उसके लिए हर वक्त तैयार हैं..।
बिलकिस ने कहा की यह दुनिया का उसूल है कि जब कोई बादशाह किसी हुकूमत पर हमला करता है तो वह उसे तबाह व बरबाद करने व बाइज़्ज़त लोगों को ज़लीलो रुसवा करने की कोशिश करता है। लिहाज़ा इस टकराव से बचना चाहिए। मेरा यह ख्याल है कि मै पहले सुलेमान के पास इम्तेहान्न कुछ कीमती तोहफा भेजू अगर वह वाक़्यी पैग़म्बर है तो वापस कर देंगे वरना क़बूल कर लेगें। चुनान्चे तोहफे में उसने ज़नाना लिबास में मलबूस 500 ग़ुलाम और मर्दाना लिबास में मलबूस 500 कनीज़े उनके साथ जडाऊ जीन से आरास्ता 1000 अरबी घोड़े 1000 सोने चाँदी की ईटे और एक जड़ाउ ताज , कुछ मुश्को अम्बर नासिफ और नासुफता मोतियो का एक डिब्बा अपने वज़ीर मुन्ज़र बिन अमरो के हाथ रवाना किया मुन्ज़र ने यह हिदायत कर दी थी कि अगर सुलेमान यह शिनाख्त कर ले की गुलामों और कनीज़ो में कौन ग़ुलाम और कौन कनीज़ है। तो समझ लेना की वह कोई ग़ैर मामुली इन्सान है.। फिर उसने कहा कि वह इन मोतियों में किसी ऐसी मख्लुक़ से सुराख करा ले जो जिन्ना हो न इन्सान , अगर वह इस अम्र को पाए तकमील तक पहुंचा दे तो यकीन कर लेना की वह पैग़म्बर है। हज़रते सुलेमान ने खबर गीरी के लिए हुद हुद को मामुर कर रखा था। चुनान्चे जब उसने इस तमाम बातो की इत्तेला आपको दी तो आपने भी अपने दरबार को आरास्ता करने का हुक्म दिया सात मील तक सोने और चाँदी की ईंटे बीझा कर उन पर याकूत का जड़ाऊ फर्श बनाया गया। दरमियान में शाही तख्त रखा गया उसके गिर्द चार हज़ार तिला व नुकरा की कुर्सिया बिछायी गयी। इन पर वज़रा व अमरा बिठाये गये। इसके बाद इन्सानो जिन्नातो और दरिंदो का लश्कर सफबस्ता खड़ा हुआ। फिर परिन्दो नें अपने परों का साया किया किया। ग़र्ज़ इस शान से मन्ज़र इस्तेक़बाल किया गया कि वह अपने तहाएफ़ को हक़ीर ख्याल करके खुद ही नादिम हो गया। इसके बाद जनाबे सुलेमान ने मुन्ज़र से गुफ्तगु की उसे खुदा की इबादत की तरग़ीब दी। गुलामों कनीज़ो को पहचाना और एक कीड़े को हुक्म दिया की वह बिलकीस के इरसाल कर्दा नासोफता मोतियों मे सुराख कर दे। जब यह तमाम मराहिल तय हो गये तो आप ने मन्ज़र से फरमाया कि मुझे तुम्हारे तोहफे की हाजत नही है इन्हे वापस ले जाऔ और मेरे खुदा ने मुझे बहूत अता किया है। और तुम्हारे माल से बेहतर है।
बिलकीस काफिर सतादा मन्जर जब अपने वतन वापस गया हो वहां उसने हज़रते सुलेमान का जाहो हशम आपकी खुदाई ताक़त , अज़मतों जलालत का सारा हाल बयान किया। जिसे सुन कर मलका बेहद मुताअस्सिर हुई और उसने तय किया कि सुलेमान की इताअत क़ुबूल करने ही में आफियत है। चुनान्चे उसने दुबारा फिर अपना क़ासिद रवाना किया और उसके पीछे खुद भी बारह हज़ार अमीरों और लश्करीयों के हमराह रवाना हुई। क़ासिद चुंकि पहले ही पहूंच गया था और उसने हज़रते सुलेमान को बिलकीस की आमद व इरादे मुत्तेला कर दिया था।
लिहाज़ा आपने भी मलका की शायाने शान इस्तेकबाल की तैयारीयां कर ली थी। लेकिन आपकी ख्वाहिश यह थी की बिलकीस जब हमारे महल में दाखिल हो तो वह अपने ही तख्त पर फरोकश हो। चुनान्चे आपने दरबारियों से फरमाया कि तुम्में से कौन ऐसा है जो मलिकाए सबा के यहां पहुचने से पहले उस शाही तख्त को ले आये। क़ौमे जिन्न में से एक ने कहा कि मै दरबार बर्खास्त होने से पहले इस काम को अन्जाम दे सकता हूँ। इस पर आसिफ बिन बरकिया जो आपका वज़ीर था। जिसे खुदा ने कुरआन का इल्म दे रखा था। एक रवायत के मुताबिक़ वह इसमे आज़म ज़रिये मंगवा सकता हूँ इसके बाद उसने कुछ पढ़ कर इसारा किया औप वह तख्त हज़रते सुलेमान के क़दमों मैं आ गया। आप ने फरमाया कि तख्त में कुछ तबदीली पैदा कर दो।
मै यह देखना चाहता हूँ कि मलिकए सबा अपनी मिलकियत को पहचानती है कि नही। ग़र्ज की बिलकिस जब हज़रते सुलेमान के महल में दाखिल हुई तो वहां अपना तख्त देख कर हैदरत ज़दा रह गयी। हज़रते सुलेमान ने फरमाया कि क्या तुम्हारा तख्त ऐसा ही है उसने जवाब दिया की मै अब आपकी इताअत कुबूल कर चुकी हूँ। खुदा की मारेफत का नूर हासिल कर चुंकि हूँ। लिहाजा कोई चीज मेरी नज़रो से पोशिदा नही रह सकती इसके जवाब पर हज़रते सुलेमान मुस्कुरा दिये। इसके बाद आपने हुक्में इलाही के मुताबिक बिलकीस से अक़द फरमाया। उसे खुसुसी शरफ़ व मन्ज़ेलत से सरफ़राज़ किया।
कुरआन मजीद के पारा 23 सूरए साद की आयात 31-34 में यह वाक़या मज़कूर है। जिसकी तफसीर में मौलाना फरमान अली साहब किब्ला रक़म तराज़ हैं कि हज़रते सुलेमान एक अज़ीमुश्शान बादशाह थे मगर फिर भी नबी थे दमिश्क व नसाबीन के कुफ़फ़ार पर चढ़ाई और जेहाद का इरादा था। जिसकी तैयारी में उन्होने उम्दा किस्म के घोड़े अपने सामने तलब किये जो किसी ने तोहफतन भेजे थे। आप इनको देखने में ऐसे मुनहमिक हुए कि आखिर वक्त जो दुआए या वज़ाएफ़ पढ़ा करते थे वह तर्क हो गया। और आफताब ग़ुरुब हो गये। इसका आप को ऐसा सदमा हुआ कि इस मुस्तहबी वजाएफ के कफ्फारे में अपने खुदा की राह में इन्ही घोड़ो की कुरबानी कर दी और इनका गोश्त फ़ोकरा व मसाकीन में तकसीम कर दिया। इस किस्से के मुत्तालिक मुफस्सरीन केऔर अक़वाले लग़ो और बातिल है। यह एक पैग़म्बर पर खां मखां का इलज़ाम है.। जिसे किसी तरह अक़ले सलीम क़ुबूल नही करती।
बैतुलमुक़द्स की इब्तेदा सबसे पहले हज़रते सुलेमान मे की इसके बाद हज़रते दाउद ने इसका कुछ हिस्सा तामीर किया। फिर हज़रते सुलेमान को इसकी तामीर का हुक्म हुआ तो आपने इसमें क़ीमती पत्थरों को तरशवा कर सरेनवं इसकी तामीर करवाई। याकूत व ज़मुर्ररुत और सोने और चांदी की तखतियों से दीवारे बनीं.। ज़बर जद के सूतून बनाये गये। फीरोज़े से मेहराबो दर बने और इसमें कीमती मोती आवेज़ा किये गये जवाहेरात की जडाउ छत बनी। जिसमें इस कद्र चमक थी की रात में रौशनी की ज़रुरत न थी। याक़ूत व ज़मर्ररुत फ़ीरोज़ा फर्श में इस्तेमाल किया गया। इसमें शक नही कि यह मस्जिदे सुलेमानी सहकारथी। जिसे 454 के बाद बाबुल के बादशाह बख्ते नस्र ने तबाह व बर्बाद कर दिया और सारा साज़ो समान लूट कर अपने साथ ले गया। यह इमारत जो बाक़ी है बहूत बाद की बनाई हुई है।
हज़रते सुलेमान जब 16 साल के थे तब हज़रते दाउद के वारिस व जानशीन हुए। 40 साल आपने हुकूमत की इस तरह वक्ते वफात आप की उम्र 56 साल की करार पाई। लेकिन इस मुद्दत के बारे में मुहक्केकीन के दरमियान इख्तेलाफ है। यहं तक एक रवायत में है कि आप की उम्र 712 साल की मज़कूर है। लेकिन हालात और वाकेयात के पेशनज़र यह मुद्दत करीन क़यान हरगिस नही है। आपके इन्तेक़ाल की हिकायतें भी मुख्तलीफ है। मगर मेरे नज़दीक दुरुस्त यह है कि आपने समुंद्र के साहिल पर एक शीशे का कुब्बा बनवाया था। जो इस कद्र बूलन्द था कि इस पर खड़े हो कर अकसरों बेंशकर आप अपनी अफवाज़ का मुआयना किया करते थे।
चुनान्चे एक दिन आप असा के सहारे खड़े होकर फरमा रहे थे। कि एक खुबसूरत नौजवान इस क़ूब्बे में दाखिल हुआ इसे देख कर आपने पुछा तु कौन है और किसकी इजाज़त से यहा आया है। उसने कहा कि मैं मलकूल मौत हुं और में खुदा की इजाज़त से आया हुँ आप ने फरमाया कि क्या इतनी मोहल्त है कि बैठ जाउं। इसने कहा कि अम्रे इलाही यही कि मै इसी हालत में आपकी रुह क़ब्ज़ कर लूं। चुनान्चे रुह क़ब्ज़ कर ली गयी.। आप खड़े के खड़े रह गये। एक साल ग़ुज़रने के बाद फौज म बेचेनी हुई तो खुदा ने दीमक को हुक्म दिया और उसने आप के खा लिया और जब असा टुटा तो नबी ज़मीन पर गिरे तो लोगो को मालूम हुआ की नबी हमारे दरमियान से ग़ुज़र गये।
हज़रते सुलेमान की वफात के बाद तमाम दरिन्दे चरिन्दे परिन्दे देवज़ादे और जिन्नात वगैरा सब के सब आज़ाद हो गये थे। और सुलेमानी हुकूमत का दायरा इखतेयार सिमट कर सिर्फ इन्सानों पर हुक्म रानी तक महदुद रह गया था। ना वह दबदबए इख्तेदार था और न वह जाहो हशम। बहरहाल जो कुछ भी था उसके वारिस जनाबे सुलेमान के साहब ज़ादे जनाबे रहीम क़रार पाये और उऩ्होने 17 साल तक मस्नदे एख्तेदार पर रहकर कारे तब्लीग़ अन्जाम दिया। उनके बाद इनके साहब ज़ादे आफिया बिन रहीम बरसरे इक़तेदार आये और उन्होऩे 63 साल तक हुकूमत की इसके बाद इनके फ़रज़न्द असा बिन आफिया तख्ते हुकूमत पर मुतामुक्किन हुए उन्होने भी एक अरसए दराज़ तक तब्लीग़ी उमुर अन्जाम दिये।
इसी तरह बिला तरतीब यके बाद दीगरे सैकड़ो बरस तक हज़रते सुलेमान की नस्ल में हुकूमत चलती रही। फिर एक दो दौर ऐसे भी आये आबाओं अज़दाद के पुराने मसलक की तरफ पलटने लगे। तो इनके रोक थाम के लिए खुदा ने दो पैग़म्बरो को बयक वक्त उन्की हिदायत के लिए मअमूर किया। जिन्हे तारिख हज़रते हीकूक़ और हज़रते शैया के नाम से जानती है।
मगर इनके हालात वाक्यात से बे बहरा है। हज़रते शेबा के बाद खुदा ने बनी इस्राइल पर ह़ज़रते अरमिया को मामूर फरमाया जिन्का सिलसिलए नसब हज़रते हारुन बिन इमरान पर तमाम होता है। जनाबे आरमिया की इसलाही कोशिशों और तब्लीग़ी उमूर मे जैसे जैसे शिद्दत पैदा होती गयी वैसे वैसे उन्की क़ौम की सरकशी और जिद में इज़ाफा होता गया। यहां तक कि यह लोग एलानिया तौर पर बुत परस्ती पर आमादा हो गये। और किसी सुरत से राहे रास्त पर आने को तैयार न हुए तो परवरदिगार ने हज़रते आरमिया के ज़रिये इन्हे सख्त वारनिंग दी और फरमाया कि अगर तुम लोग राहे रास्त पर न आओगे तो हम ऐसे ज़ालिम व जाबिर को तुम पर मुसल्लत कर देंगे जो ज़नाज़ादा होगा। जिसकी परवरिश ग़लीज़ और बदतरीन ग़िज़ा की मरहुने मिन्नत होगी। और जो तुम्हारे मर्दों को क़त्ल तुम्हारी औरतों को असीर करेगा।
इसके बाद ख़ल्लाक़े आलम ने हज़रते अरमिया की ख़्वाहिश पर उन्हे उस बादशाह की ख़ुसुसी अलामतें और निशानियां बता दी.। नीज़ यह भी ज़ाहिर कर दिया था कि इसका नाम बखते नस्र होगा। वह तुम्हारे ही ज़माने में तुम्हारी ही क़ौम (बनी इस्राईल) पर खुरुज करेगा।
मुताज़क्केरा बाला ख़बर के बाद हज़रते आरमिया को यह फिक्र लाहक़ हुई कि खुदा की बतायी हुई आलामतों और निशानियों की रोशनी में बख़ते नस्र को तलाश करना चाहिए। चुनान्चे आप उसकी जुस्तजु में निकल खड़े हुए और मुख़तलिफ मुक़ामात का सफर तय करते हुए बाबुल पहुंचे। वहां एक गाँव से गुज़र रहे थे तो आपने देखा कि चार पांच बरस का एक बच्चा मुख्तलिफ बीमारियों में मुब्तेला है इन्तेहाई हक़ीर हालत से एक मज़बिले (घूरे) पर पड़ा है और उसके ही क़रीब एक औरत बैठी हुई है जो कुत्तिया का दुध निकाल रही है। यह मन्ज़र देख कर आप ठहर गये। जब वह कुत्तिया का दुध निकाल चुकी तो इस औरत ने इस दुध में रोटीयों के चन्द टुकड़े भिगोये और उस लड़के को खिलाकर वहां से चली गयी। जब वह तन्हा रह गया तो हज़रते आरमिया उसके क़रिब गये ताकि उसका कुछ हाल मालूम करें चुनान्चे सबसे पहले आपने उसका नाम पुछा इसने कहां मेरा नाम बखते नस्र है लेकिन बद बख्ती का शिकार हुँ आप ने फरमाया इस हाल में क्यों पड़ा है। उसने कहा ज़िना ज़ादा हुँ लिहाज़ा इस जुर्म की सज़ा में यहा के लोगों ने मुधे इस मज़बले पर ड़ाल रखा है। सिर्फ कुत्तिया का दुध मेरी परवरिश का ज़रिया है.।
इतना सुन लेने के बाद जनाबे अरमिया को मज़ीद कुछ पुछने की हाजत न रह गयी। आप समझ गये कि यह वही लड़का है जिसकी अलामतें व निशानियां खुदा ने ज़ाहिर की थी। यह एक दिन बनी इस्राईल पर ग़लबा हासिल करेगा। इन पर अज़ाब बनकर मुसल्लत होगा। चुनान्चे उसकी तरफ से आपने आपनी पुरी तवज्जो मबजूल कर दी। उसी गांव में आप ठहर गये उसका इलाज कराया और उसकी खुर्दोनोश पर ध्यान दिया। यहां तक वह अच्छा भला न्दुरुस्थ हो गया। आप पांच बरस तक वहां मुक़ीम रहे और उसकी तालीम व तरबियत पर तवज्जो देते रहे।
जब वह तकरीबन ग्यारह बारह साल का हो गया तो आपने उससे अपना तअर्रुफ कराया और कहा मैं बनी इस्राईल का पैग़म्बर अरमिया हूँ। खुदा ने तुम्हारे मुताअल्लिक़ ख़बर दी है कि वह अन्क़रीब तुम्हे मिरी क़ौम पर मुसल्लत करे और तुम बादशाह होगे। मगर जब तुम्हें ग़लबा हासिल हो जाये तो मुझे भूल न जाना। इसने कहा कि भला यह क्यों कर मुमकिन है कि मैं अपने मोहसिन को भुल जाऊँ। आपने फ़रमाया कि अब मैं अपने वतन जाना चाहता हुँ। लिहाज़ा मेरी ख्वाहिश है कि तुम मुझे एक अमान नामा लिख दो ताकि वक़्त पर काम आये। ग़र्ज़ कि इसने एक आमान नामा लिख दिया जिसे लेकर आप वहां से वापस चले गये।
बख्ते नस्र जब जवान हुआ और उसने बनी इस्राईल के मज़ालिम की दास्ताने सुनी तो इसकी की तरफ से इसके दिल में नफ़रतैं पैदा हो गयी इसने इनके खिलाफ लोगों को उभारना शुरु किया। मशीयते इलाही भी यही थी। लिहाज़ा लोगों ने उसका साथ दिया यहां तक कि एक कसीर जमीयत इसके साथ हो गयी। जिसे मुनज़्ज़ करके उसने पहले अपने ही शहर बाबुल पर चढाई कर दी। और जब बाबिल पर मुक्कमल तसल्लुत हासिल हो गया और उसकी बादशाहत मुस्तहकम हो गयी तो उसने अपनी कूवत व ताक़त में खातिरे ख्वाह इज़ाफा करके बनी इस्राइल के दारुस सलतनत बेतुल मुक़द्दस पर हमला कर दिया। हज़रते अरमिया अ 0 भी उस वक़्त मौजूद थे जब आप को बकते नस्र के हमले का हाल मालूम हुआ तो उसके तहरीरकर्दा आमान नामा को लेकर उसके पास गये आपको देखते ही उसने फौरन पहचान लिया और बड़ी तकरीमों ताज़ीम के साथ पेश आया। इसने आपके तहफ़फुज़ का माकूल इन्तेज़ाम किया।
बनी इस्राइल ने पहले ही रेले मे सिपर ड़ाल दी थी। इसलिए बखते नस्र ने इन पर क़ाबू पाते ही उनके क़त्ले आप का हुक्म दे दिया। जिसके नतीजे में बैतुल मुक़द्दस की सर ज़मीन इन्सानों के खून से सुर्ख हो गयी। अल्लामा मजलिसी अ 0 र 0 ने साआलबी के हवाले से तहरीर फ़रमाया है कि बेशुमार क़त्लेआम के बाद जब लोग गिरफ़तार हुए तो उनमें से बच्चों की तादाद 70 हज़ार थी। तबरी का कहना है कि कैदियों में हज़रते अज़ीज़ और हज़रते दानियाल भी शामिल थे जो उस वक़्त बैतुल मुक़द्दस में तबलीग़ी उमुर अंजाम दे रहे थे , दीगर तारीखी शबाहिद से पता चलता है कि दो तिहाई आबादी शहर की ख़त्म हो चुकी थी और बैतुल मुक़द्दस का सारा क़ीमती असास लूट कर उसे बिल्कुल तबाह और बरबाद कर दिया गया था.। हज़रते अरमिया अर्ज़े मुक़द्स की तबाही और बरबादी को देखकर और दिल ही दिल मे सोचा करते थे कि शायद अब यह सरज़मीन पहले की तरह आबाद न हो सके।
आपकी इस कैफियत को देक कर परवरदिगार आलम ने फरमाया कि ऐ अरमिया तुम रन्जीदा और मलूल न हो हम इस शहर को उसी तरह दुबारा फिर आबाद करेंगे। और तुम देखोगे कि तुम्हारे खुदा ने अपना वादा किस तरह पूरा किया।
हज़रते अरमिया अ 0 एक रात जब सोये तो परवरदिगारे आलम ने इन पर सौ बरस की नींद तारी कर के इन्हें जिब्रील के ज़रिये दुनिया की निगाहों से पोशीदा कर दिया। और शाह फ़ारस को इस अम्र पर मामूर कर दिया कि वह अस्सरे नौ बैतुल मुक़द्दस की ज़मीन को आबाद करे। ग़र्ज़ कि उसने अपनी तमाम कोशिशें सर्फ करके 72 साल में अर्ज़े मुक़द्दस को पहले की तरह फिर आबाद कर दिया। और नजब सौ बरस का वक्फा रूरा हो गया तो मशीयते ख़ुदी वन्दी ने हजडरते अरमाया को फिर बेदार किया आपने शछहर को जब उसी तरह आबाद व बा रौनक़ देखा तो बेहद ख़ुश हुए और सजदए शुक्र किया इसके बाद हज़रते अरमिया अ 0 काफी अरसे तक हयात रहे। बाज़ मुफस्सेरीन ने इस वाक़ये को हज़रते अज़ीज़ अ 0 की तरफ मन्सूब किया है। जो मेरी तहक़ीक़ के लिहाज़ से ग़लत है।
हज़रते दानियाल हज़रते याकूब अ 0 की नस्ल से हज़रते अरमिया के हमअस्र थे। इमामे जाफ़रे सादिक़ अ 0 का क़ौल हे कि बचपने में ही आप के वालदैन का साया सर से उठ गया था। आप यतीम हो गये थे। बनी इस्राइल की एक बूढ़ी औरत ने आपकी परवरिश की थी। हज़रते मूसा अ 0 की शरीयत पर अमल पैरा थे और बनी इस्राइल को खुदा परस्ती का दर्स दिया करते थे। खुदा ने आपको अक़लो खेरद फहमो इदराक के साथ पैगम्बरी से सरफराज़ किया था। बख्ते नस्र बादशाह आपको बैतुल मुकददस में कैद करके अपने वतन (बाबूल) ले गया और उसने आपको वहां ऐसे अन्धे कुएं में डाल दिया था जो पहले से ही उसकी पली हुई एक खुंखार शेरनी का मसकन था। यह मसलहते इलाही थी कि शेरनी ने आप को कोई गज़न्द नही पहुचाया बल्कि खिलाफे फितरत उसने आपको दूध पिला पिला कर इस वक्त तक आपको ज़िन्दा रखा जब तक की खुदा ने आप को निकालने का कोई सबील पैदा न की। हज़रते दानियाल को इस कुंए से निजात क्योकर मिली। इस ज़िम्न में कहा जाता है कि बख्ते नस्र ने एक दिन ख्वाब में देखा कि आसमान से फरिश्तों की जमाअत इस कुएं पर आती है। वहां नमाज़ पढती है और फिर वापस चली जाती है। ख्वाब से जब ये बेज़ार हुए तो उसके दिल में हज़रते दानियाल का हाल मालूम करने कि जूसत जू पैदा हुई चुनान्चे रात ग़ूज़री और जब सुबह को उसे यह मालूम हुआ कि आप ज़िन्दा है। शेरनी ने आप को कोई ज़र नही पहुचाया तो उसके दिल में आपकी तरफ से हैबत पैदा हो गई और उसने इज़्ज़त व एहतेराम के साथ उस कुएं से निकलवाया लेकिन फिर भी उन्हे आज़ाद नही किया बल्कि अपने खुसुसी हिरासत में रखा ताकि आवाम से हज़रते दानियाल का कोई राब्ता क़ायम न हो सके।
कुएं के बाद जो आपको कैदखाना मिला था। एक कुशादा मकान की शक्ल में था। इसके चारो तरफ फौज का पहरा रहता था। ताकि वहां पर किसी शख्स का ग़ूज़र न हो। ग़र्ज़ कि आप सात बरस तक इसी कैद खाने में मसरुफे इबादत रहे।
एक दिन बख्ते नस्र ने फिर ऐसा ही ख्वाब देखा जिससे वह परेशान व खौफज़दा हुआ। लेकिन जब सुबह हुई तो वह उस ख्वाब को भूल गया और इन्तेहाई ग़ौरव ख़ौज करने पर भी याद न आया तो उसने तमाम मुनज्जिमों और काहीनों को जमा किया और उनसे कहा कि मैंने बहूत ही ख़ौफनाक ख्वाब देखा है मगर भूल गया हूं। तुम लोग अपने इल्म के ज़रिये बताओ कि मैंने क्या देखा। ख्वाब की ताबीर क्या है। उन लोगो ने कहा ख्वाब पता हो तो हम लोग ताबीर बता सकते है.। लेकिन ख्वाब का बताना हमारे लिए मुमकिन नहीं है। बखते नस्र ने कहा कि मैं तीन दिन का मौका तुम लोगो को देता हूं इस दरमियान तुम खूब ग़ौर कर लो और न बता पाये तो सोच लो मैं तुंम लोगो को क़त्ल कर दुंगा। ग़र्ज़ जब यह खबर मशहूर हुई जहां हज़रते दानियाल कैद थे वहां के किसी पहरे दार ने यह वाकया आपको सूनाया तो आपने फरमाया कि तू बादशाह से जा कर यह कह दे कि यह खवाब बता देना काहिनो और नज़ूमियो के बस में नही है। अलबत्ता वह मुझसे रुजू करें तो मैं इसका ख्वाब और इसकी ताबीर दोनों बता सकता हूँ।
बखते नस्र को जब यह मालूम हूआ तो उसने फौरन हज़रते दानियाल को क़ैद खाने से तलब किया और उनसे कहा बताइये कि मैने ख्वाब में क्या देखा है और इसकी ताबीर क्या है। आपने फरमाया कि तुने ख्वाब में यह देखा है कि तुने ख्वाब में एक ऐसे बूत को देखा है जिसका पैर ज़मीन पर है और सर आसमान पर है। इसका सर सोने का है दरमियानी हिस्सा चांदी का है। ज़ानू ताबें के हैं. पिंडलिया लोहे की है और क़दम मिट्टी के हैं जब तू इसे ग़ौर से देख रहा था तो नागहा आसमान से किसी ने उसके सर पर एक पत्थर मारा जिससे उसका कद इतना छोटा हो गया कि उसके सारे अज़ाए जिसमानी एक दुसर में पैवस्त हो गये। फिर तुने यह देखा कि जो पत्थर उसके सर पर मारा गया था वह बड़ा होने लगा और रफता रफ़ता तमाम कायनात पर मुहीत हो गया।
बखते नस्र ने कहा बेशक मैने यही ख्वाब देखा था। अब आप यह बताइये कि इसकी ताबीर क्या है ? आपने फरमाया कि ऐ बादशाह उस बूत से मुराद उम्मते है जो तेरे बाद दरमियान व आखिर में होंगी तलायी हिस्सा जिस्म से मुराद मौजूदा उम्मत और , तेरी बादशाही का ज़माना है नुक़रयी हिस्सा जिस्म से मूराद तेरे बेटे की हुकूमत का ज़माना होगा ताम्बे से मुराद अहले रुम है। लोहे से मुराद फारस और अज़म के लोग है। जिस पत्थर ने इस बुत के क़द को छोटा किया था उससे मुराद वह दीन है जो आखिरी दौरे पैग़म्बरी में उस वक्त की उम्मत पर नाज़िल होगा और दुसरे दीनों को खत्म कर देगा। अरब की सरज़मीन पर खुदा उस पैग़म्बर को मबउस करेगा। जो तमाम नबियों में आखरी नबी होगा। जिसका दीन तमाम दुनिया मं फैलेगा। जिस तरह वह पत्थर पूरी कायनात पर मुहित हो गया। उसी तरह आखरी नबी का दीन भी पुरी कायनात पर छा जाऐगा। बखते नस्र यह सुनकर बहूत मुताअस्सिर हुआ और कहने लगा कि ऐ दानियाल मैं आपसे बहुत शर्मिन्दा हूँ मैंने आप पर जुल्म के सिलसिले को रवा रखा। आज से आप आज़ाद है जहां चाहें जा सकते है। आपने फरमाया तुनें मैरा वतन उजाड़ दिया है। अब कहां जाउ यही रहना चाहता हूँ। जैसे भी तुम रखो। बिला आखिर बखते नस्र ने आपको अपना मुशीर खास मुकर्रर किया और तमाम अराकीने हुकूमत को यह हिदायत जारी कर दी कि वह हज़रते दानियाल से मशवेरा किए बगैर कोई काम न करें।
हज़रते दानियाल इस मन्सबे शाही पर तीस साल तक फ़ायज़ रहे। यहां तक कि बखते नस्र को उसीके एक गुलाम ने क़त्ल कर दिया। उसके बाद बख्ते नस्र का बेटा महरुया या फलशताश तख्त नशीं हुआ। उसने सत्तरह साल बीस दिन तक हुकूमत की। उसी ज़माने में हज़रते दानियाल ने बाबूल के एक मकाम सुस में इन्तेकाल फ़रमाया और वहीं दफन हुए। इमामे सालवी का कहना है कि हज़रते उमर के दौर में जब सुस फतेह हुआ और अबू मुसा अशरी वहां के हाकिम हुए तो दारुल अमारा के एक मुक़फ्फल कमरे में इन्हे तवीलुल क़ामत एक मय्यत रखी हुई मिली जिसका मुंह खुला था और लाश ख़राब होने से महफूज़ थी। उसने मय्यत का हाल मालूम करने में बहुत कोशिश की मगर जब कुछ पता न चला तो उसने इस वकये की तफसील से हज़रते उमर को आगाह किया और दरियाफत किया कि इस मय्यत के मताअल्लिक हम क्या करें। जब दरबारे खिलाफत में भी यह मसला हल न हुआ तो अमीरल मोअमेनीन हज़रते अली इब्ने अबूतालिब अ 0 की तरफ रुजु किया गाया। आपने फ़रमाया कि वह लाश हज़रते हज़रते दानियाल की है जो बख़ते नस्र के ज़माने में थे। फिर आपने ह़ज़रते दानियाल की है जो बखते नस्र के ज़माने में थे। फिर आपने हज़रते दानियाल के हालात बयान किये और उमर को यह मशविरा दिया कि अबू मुसा को लिख दिया जाये कि वह इस मय्यत पर नमाज़ पढ कर ऐसी जगह दफन कर दे जहाँ अहले सूस की रसाई न हो। चुनान्चे अबू मूसा अशरी ने नहर के पानी को रोक कर उसके दरमियानी हिस्से में मय्यत को दफन करके नहर का पानी फिर बदस्तूर जारी कर दिया। इसी वजह से बाज़ मोहर्रेखीन ने लिखा है कि हज़रते दानियाल नहरे सूस में दफन है।
हज़रते अज़ीज़ अ 0 जनाबे हारुन की नस्ल से थे और अपने भाई उरज़ा के साथ जुड़वां पैदा हुए थे। आपके वालिद का नाम शरहिया था साहेबे रोज़तुस्तुस्सफा का कहना है कि आप अपने बचपन से जवानी के ज़माने तक बखते नस्र की कैद में रहे और जब रिहाई मिली तो अपने वतन तशरीफ ले गये।
कैद से छुटने के बाद आप दीन की तब्लीग़ में मसरुफ रहे। यहां तक की जब आपकी उम्र 50 बरस की हुई तो आपको एक सफर में जाने का इत्तेफाक हुआ। चुनान्चे आप गदहे पर सवार होकर रवाना हुए। रास्ते में एक ऐसी उजड़ी हुई बस्ती मिली जिसकी पुरी आबादी ताउन की बीमारी मे मुब्तेला होकर ख़त्म हो चुकी थी और लातादाद इन्सानी ढ़ाचे जां बजां बिखरे हुए पड़े थे। नीज़ इस सानेहे को इतनी मुद्दत गुज़र चुकी थी की उनके मकानों की छत और दीवारें मुनहदिम होकर खन्डरात में तबदील हो गयी। एक अरसए तवील गुज़र जाने के बाद यह देखकर आप पर हैरत व इत्तेजाब का एक आलम तारी हुआ और दिल पर एक ऐसा सदमा ग़ुज़रा कि आपके जिस्म से रुह परवाज़ कर गयी।
सौ बरस तक आप वहां मुर्दा पड़े रहे। आखिरकार मशीयते एज़दी ने आपको फिर ज़िन्दा किया और आपके साथ वह तमाम लोग भी ज़िन्दा हो गये। जो आपसे क़ब्ल मर चुके थे। अल्लामा मजलिसी का कहना है कि उनकी तादाद एक लाख थी। इस वाक्ये के बाद आप मजीद पचास साल तक ज़िन्दा रहे। आपका तज़केरा कुरआने मजीद में मौजूद है। यहूदी आपको ख़ुदा का बेटा कहते है।
आप हज़रते मूसा की शरीयत के पाबन्द थे और बनी इस्राइल पर तबलीग़ के लिए मअमूर हुए थे यह वाकया बहुत मशहूर है कि आप एक मरतबा कशती पर सवार दरियाये दज़ला में महवे सफर थे कि अचानक वह कशती उलट गयी और दरिया में गिर गये गिरते ही आपको एक बहूत बड़ी मछली ने निगल लिया। तीन या सात रात या चालीस रोज़ तक आप उस मछली के पेट में मसरुफे इबादत रहे। यहां तक कि खुदा के हुक्म से उस मछली न आपको फिर उगल कर अपने शिकम से बाहर निकाला। इसी वजह से आपको जुननून और साहेबे हौत भी कहा जाता है। आपने 147 साल की उम्र में वफात पायी।
आप हज़रते सुलेमान की नस्ल में युहन्नाबिन ऊन के बेटे थे। आप की तारीखे विलादत के बारे में किलाबे खामोश है।
आप की ज़ौजा इमरान बिन मतान की बेटी और मरयम मादरे ईसा की हकीकी बड़ी बहन थी। लेकिन इनके नाम में इखतेलाफ है। बाज़ मोअर्रेखीन ने इसाअ बाज़ ने हनाना और बाज़ ने उम्मे कुल्सुम तहरीर किया है लेकिन मेरे नज़दीक आखिउज़जिक्र ज्यादा मुस्तनद है।
आप चुंकि हज़रते सुलेमान की नस्ल से थे इसलिए बैतुल मुकददस के मुन्तज़िम व मुतावल्ली भी थे। जब आपकी उम्र 98 साल की हो गयी और आप नेअमते औलाद से महरुम रहे। तो आपको यह तशवीश पैदा हुई कि मेरे बाद मेरा वारिस और खुदा के घर का मुतवल्ली कौन होगा। चुनान्चे आपने बारगाहे इलाही में दुआ की जो कुबूल हुई और खुदा वन्दे आलम ने आपको यहिया जैसा बेटा अता किया जिसका तज़केरा क़ुरआने मजीद में इन अलफ़ाज़ के साथ मौजूद है।
जब जनाबे ज़करिया ने अपने परवरदिगार को धीमी आवाज़ से पुकारा और अर्ज़ कि ऐ मेरे पालने वाले में तेरी बारगाह में दुआ करके आज तक महरुम नही रहा हुं बुढापे की वजह से मेरी हडडियां कमज़ोर हो चुकी है. और सर के बाल सफेद हो चुके है। अपने मरने के बाद मैं अपने वारिसों की तरफ से फिक्रमंद हुँ वह दीन को बरबाद न कर दे। मेरी बीवी बांझ है। बस तू अपनी कुदरते कामेला से एक ऐसा फइज़ब्त अता फरमा जो मेरी और याक़ूब की मीरास का वारिस हो।
खुदा ने फरमाया हम तुमको एक फरज़न्द की वेलदत की खुशखबरी देते है। इनको एक नेक और सालेह बेटा अता फरमाया जिसका नाम यहिया होगा। और हमनें इससे पहले किसी को सका हमनाम नही पैदा किया ज़करिया ने कहा परवरदिगार लड़का क्योकर होगा मेरी बीवी बांझ है और मै हद से ज़्यादा बूढ़ा हुँ। इरशाद हुआ ऐसा ही होगा यह बात मेरे लिए बहुत आसान है। हज़रते यहिया की विलादत से क़ब्ल आपने हज़रते मरयम मादरे ईसा को भी अपनी औलाद की तरहं पाला था। चुनान्चे जब वह सिने बुलूग़ तक पहूचीं तो मसलहते इलाही ने उनके बदन मे बगैर किसी मर्द का साया पड़े हज़रते ईसा का हमल कर दिया। जब वह वाज़ह हुआ तो जाहिलों ने आप (ज़करिया) पर मरयम से नाजायज़ तअल्लुकात का इल्ज़ाम आयद किया और आपको घेरकर आपको क़त्ल करना चाहा।
चुनान्चे आप इस खौफ से भागे इसी असना में एक दरखत बहुकमे खुदा दरमियान से शिगाफता हुआ और आप इसी मे दाखिल हुए तो वह फिर अपनी असली हालत में आ गया। क़ज़ाये कार कि आपके दामन का एक कोना बाहर ही निकला रह गया। जिसकी वजह से मुखालेफीन समझ गये कि आप इसी दरखत में पौशीदा है। ग़र्ज़ कि उन लोगो ने दरखत को मय आपके आरे से चीर दिया जिसके नतीजे मे आप शहीद हो गये। इस वक्त आपकी उम्र सौ साल की थी और हज़रते ईसा पैदा हो चुके थे।
हज़रते यहिया अ 0 हज़रते ईसा इब्ने मरियम से छह माह कल्ब पैदा हुए चार साल की उम्र मे आपने तौरेत हिफ़ज़ की , दस साल की उम्र में तमाम अहकाम से वाक़िफ होकर मन्सबे नबूवत पर फ़ाएज़ हुए। और बनी इस्राइल के दरमियान बाक़ायदा तबलीग़ की तरफ मुतावज्जा हो गये।
ज़ोहद तक़वा और परहेज़गारी आपका तुर्ररए इमतेयाज़ था लेकिन इसके साथ खौफे खुदा भी आपके दिल मे इस क़द्र था कि तमाम उम्र आपको किसी ने हंसते नही देखा ख़ुश्क रोटी खाते टाट के कपड़े पहनते और तौरेत में जब आज़ाबे इलाही का तज़केरा पढते या अपने बाप ज़करिया की ज़बानी सुनते तो इस क़द्र रोते थे कि आपके रुखसारों का गोश्त गल गया था। और दांत नुमाया हो गये थे। हज़रते ज़करिया ने एक बार अपने वाज़ में जहन्नुम का तज़केरा किया तो रोते पीटते आप सहरा की तरफ निकल गये।
आपके वालदेन जब तलास में निकले तो तीन दिन के बाद सजदे की हालत में आपको बेहोश पाया आपने इस क़द्र गिरया किया कि उस जगह की मिट्टी आंसुओ से तर होकर कीचड़ हो गयी थी। चुनान्चे आपकी वालिदा ने जब आपके गर्द आलूदा चेहरे को साफ करना चाहा तो आपने यह समझा कि इज़राइल है। फरमाया कि बस इतना ठहर जा कि मैं अपने वालदैन से एक बार मिल लूँ मां ने कहा बेटा मैं तेरी मां हूँ। यह यह सुनकर आप ने आँखे खोली और सहरा की तरफ फिर भागने का क़स्द किया। मगर उन्की मां ने उन्हे मजबूर करके उनहे अपने घर ले आयी। इस वाक्ये से आपकी खुदा परस्ती रहम दिली पाकीज़गी और परहेज़गारी नुमाया है. जैसा कि परवरदिगारे आलम कूरआने मजीद में इरशाद फरमाता है। कि-
हमने इन्हे बचपने ही मे अपनी बारगाह से नबूअत , रहमदिली पाकीज़गी अता फरमायी और वह ख़ुद भी परहेज़गार और अपने वालदैन के हक़ में सआदत मंद थे। हमारी तरफ से इल पर बराबर सलाम है।
आपकी शहादत का वाकेया यह बयान किया जाता है कि आपके दौर मे हरदुस नामी एक इस्राइली बादशाह था।
जिसने अपने भाई क़ैसुस की खुबसुरत हसीन व जमील बेवा हैरदोआबा से अक़द कर लिया था। क़ैसुस से एक लड़की भी थी जो हरदुस की सगी भतीजी थी। चुनान्चे जब वह लड़की जवान हुई तो हरदूस ने उनकी मां की मरज़ी से इसे अपने तसर्रुफ में लेना चाहा तो लोगों ने कहा कि शरीयत के लिहाज़ से यह तुझ पर हराम है। इससे अक़द जायज़ नही है। मगर चुंकि इसकी तबीयत अपनी भतीजी की तरफ रुजू हो चुकी थी नीज़ इसकी मां ने भी कहा कि यह लड़की आपके नुत्फे से होती तो हराम करार पाती। लेकिन जब आपके नुत्फे से नही हैं तो फिर क्योकर हो सकती है। बेहतर यह है कि आप इस मसले को यहिया से मालूम करे। चुनान्चे उसने हज़रते यहिया को तलब किया और उससे दरियाफत किया कि मैं इस लड़की से शादी कर सकता हूँ या नहीं। आपने फरमाया कि शरीयत के तहत यह आप कर क़तई जायज़ नही है।
उस लडकी की मां ने भी अपने शौहर की इस शैतानी ख्वाहिश की हिमायत में हज़रते यहिया से भी खुब तकरार की यह लडकी जब बादशाह के नुत्फें से नही है तो फिर किस तरह इनके लिए हराम हो सकती है। हज़रते यहिया ने फरमाया कि हुक्मे खुदा यही है जो मै बयान कर रहा हूँ और इस अम्र मे मुदाखेलत का हक़ किसी को नही है।
हज़रते यहिया तो यह कह कर चले गये मगर बादशाह और उसकी बीवी को यह फैसला इन्तेहाई शाक़ गुज़रा। उसकी बीवी ने कहा कि जब भाई की बीवी के साथ अकद हो सकता है तो भाई की लडकी क्यो कर हराम हो सकती है।यह तो यहिया की सरासर ज़्यादती मालूम होती है। अगर यहिया की तरफ से आपको कुछ अन्देशा है तो उन्हे क़त्ल कराके अक़द कर सकते है।
बादशाह पर नफ़सानी ख्वाहिश की तकमील के लिए इस लड़की की तरफ से इश्क का भूत बूरी तरह सवार था। लिहाज़ा वह अपनी बीवी के इस जाहिलाना मशविरे पर तैयार हो गया और उसने यहिया के क़त्ल का फरमान जारी कर दिया और आखिरकार वह इबादत की हालत मे क़त्ल कर दिये गये। और इनका सर काट कर एक तश्त में रखकर बादशाह के सामने दरबार में पैश कर दिया गया। तारिखी शवाहिद से पता चलता है कि जिस वक्त हज़रते यहिया का सर उसके सामने रखा गया वह शराब पी रहा था और नशे की हालत मे था चुनान्चे उसने आपके सर के साथ जब तौहीन आमेज़ गैर शाइस्ता रवैया इख्तेयार किया तो सर से आवाज़ आयी कि ऐ बादशाह मेरे क़त्ल के बाद भी वह लड़की तुझ पर जायज़ नही हो सकती मगर उस बदबख्त पर इस आवाज़ का कोई असर न हुआ और वह दुसरे ही दिन अपनी सगी भतीजी पर मुतासर्रिफ हो गया।
हज़रते यहिया अ 0 के खूने नाहक का असर यह हुआ कि पत्थरों से खून जारी हुआ और चालीस दिन तक आफताब को गहन लगा रहा नीज़ परवरदिगार ने इस खून का बदला इस तरह लिया कि शाहे रुम तैतुस के ज़रिये हरदुस और इस कौम के 70 आदमियों को क़त्ल करा दिया।
इमामे हाकिम वग़ैरा ने इब्ने अब्बास से रवायत की है कि खुदा ने हज़रते रसूले खुदा से वही के ज़रिये फरमाया है कि मैनें यहिया बिन ज़करिया के खून के एवज़ 70 हज़ार आदमियो को क़त्ल कराया है और तुम्हारे फ़रज़न्द हुसैन के खून के एवज़ एक लाख चालीस हज़ार आदमियों को क़त्ल कराउँगा। तबरी का कहना है कि हज़रते यहिया के खून का क़ेसास परवरदिगार ने यूं लिया कि तैतुस क़ैसरे रुम ने मुल्क शाम पर चढायी की और बैतुलमुक़ददस को तबाह व बरबाद कर दिया। क़त्लेआम के नतीजे में बैशुमार लोग मारे गये।
हज़रते यहिया अ 0 और हज़रते इमामे हुसैन अ 0 के हालात और वाकेयात में मुन्दरजा जैल हमआंहगी और यकसानियत पायी जाती है।
1. हज़रते यहिया अ 0 और हज़रते इमाम हुसैन आ 0 दोनों ही छह माह की मुददत हमल मे मुतावल्लिद हुए।
2. हज़रते यहिया जिस तरह से दींन और शरीयत के मामले में क़त्ल किये गये उसी तरह हज़रते इमाम हुसैन अ 0 भी दीन व शरीयत के लिये शहीद हुए।
3. हज़रते यहिया अ 0 का सर जिस तरह तन से जुदा होने के बाद तश्त मे हरदूस के सामने पेश किया गया उसी तरह हज़रते इमामे हुसैन अ 0 का सर भी तन से जुदा करके तश्त मे यज़ीद मलउन के सामने दरबार में पैश किया गया।
4. हज़रते यहिया अ 0 का क़ातिल हरदूस शराबी और बदकार था उसी तरह यज़ीद भी शराबी और बदकार था।
5. हज़रते यहिया अ 0 के सर से जिस तरह हरदूस ने बेअदबी और गुस्ताखी की उसी तरह यज़ीद भी हज़रते इमाम हुसैन अ 0 के सरे अक़दस से बेअदबी और गुस्ताखी का मुरतकिब हुआ।
6. हज़रते यहिया अ 0 के सर ने जिस तरह तन से जुदा होने के बाद भी कलाम किया इसी तरह हज़रते इमाम हुसेन अ 0 के सरे अक़दस ने कलामें पाक की तलावत की।
7. हज़रते यहिया अ 0 की शहादत के बाद जिस तरह पत्थरों से खुन जारी हुआ इसी तरह मज़लूमें करबता की शहादत के बाद पत्थरों से खुन जारी हुआ और आसमान व ज़मीन ने गिरया किया।
8. हज़रते यहिया अ 0 की शहादत के बाद जिस तरह गहन आपताब को लगा उसी तरह हज़रते इमामें हुसैन अ 0 की शहादत के बाद आफताब व महताब को गहन लगा और सारी दुनिया अंधेरे में डूब गयी।
ग़ालेबन यही वजह थी कि हज़रते इमामें हुसैंन अ 0 अपने सफर करबला के दौरान हज़रते यहिया को बार बार याद करते थे।
हज़रते मरियम खुदा की कुदरते कामेला से शौहर के बगैर जिस वक्त हामेला हुई इस बक्त आप की उम्र 11या 13 या 15 और 20 साल की बतायी जाती हैं.। इस तरह हमल की मुददत में भी इख्तेलाफ है। मोहक़्क़ेक़ीन व मुफ़स्सेरीन में से किसी ने 6 माह किसी ने 8 माह और किसी ने 9 माह और किसी ने सिर्फ 9 घण्टेँ तहरीर किये है।
बत्ने मरियम में स तकरारे हमल और विलादते ईसा के बारे में खुदा की तरफ से जो रुदाद कुरआने मजीद में मज़कूर हुई है उसका खुलासा यह है कि हज़रते मरियम एक दिन अपने हुजरे ए इबादत से निकल कर मकान के मशरिकी हिस्से मे तशरीफ ले गयी और वहां उन्होने खलवत इख्तेयार की तो परवरदिगार ने जिबरईल को इन्सानी शक्ल में उनके पास भेजा जब वह वारिद हुए जनाबे मरियम उन्हे देखकर घबरायीं और कहने लगीं कि अगर तू परवरदिगार है तो मैं तुझसे ख़ुदा की पनाह मांगती हुँ। जिबरईल ने कहा घबराओ नहीं में तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से भेजा हुआ एक फरिशता हुँ और तुम्हारे बत्न से एक पाको पाकीज़ा लड़के की विलादत की बशारत देने आया हूँ। यह सुनकर जनाबे मरियम ने फरमाया न मै बदकार हूं और न ही किसी मर्द का साया मुझ पर पड़ा है तो मेरे बत्न से लड़का पैदा होने का क्या सवाल है। जिबरईल ने कहा तुम ठीक कहती हो लेकिन तुम्हारा परवरदिगार कहता है कि बिन बाप के लड़का पैदा करना मेरे लिए बहूत आसान है। मै चाहता हूँ कि इसे अपने कूदरत की निशानी करार दूं और अपनी रहमते खास का ज़रिया बनाऊं और यह अम्र यक़ीनी और तय शुदा है।
इसके बाद हज़रते मरियम मशीयत के इशारे से खुद ब खुद हामेला हो गयीं मगर हमल उस वक्त जाहिर न हुआ जब तक कि हज़रते ईसा की विलायत का वक्त बिलकुल क़रीब नही आया।
चुनान्चे जब आपको तकलीफ महसुंस हुई और दर्दे ज़ेह मे मुबतेला हुई तो घर से निकल कर बैतुलमुकददस में तशरीफ लायीं। मगर वहां एक गैबी आवाज़ ने आपको मुतानब्बे किया कि ऐ मरियम यह विलादत की जगह नही है। बल्कि इबादत का मुक़ाम है लिहाज़ा आप फौरन इसके हुदूस से निकल जाइये। यह बात सुनकर आप पर खौफ़ तारी हुआ और मायूसी की हालत में आप वहां से निकलकर उलटे पाँव वापस आयीं। इसके बाद दर्द की शिद्त ने आप को दुसरा ठिकाना ढूंढने पर मजबूर किया। तो आप किसी महफूज़ जगह की तलाश में एक ना माकूल मुक़ाम की तरफ रवाना हुई रास्ते में कुछ लोगों से मुलाक़ात हुई जो क़ौम के जुलाहे थे। उन लोगों ने आपका मज़ाक उड़ाया आपने उन्हें बद्दुआ दी और आगे बढी तो फिर कुछ ताजिरों से मुलाक़ात हुई तो उन्होंने एक खजूर के दरख्त का पत्ता बताया आप इन्हें दुआऐं देती हुई जब इस दरख़त के क़रीब पहुंची तो वह बिलकुल खुश्क था। जैसे ही आप इसकी जड़ से लग कर बैठी वह हरा भरा हो गया। इसकी शाखें फ़ूटी और आप को चारों तरफ से घेर कर परदें में ले लिया फिर ख़ोशे निकले और फल तैयार हुए। जो आपकी ग़िज़ा क़रार पायी। खुदा ने आबे शीरीं का एक चश्मा जारी कर दिया जो पिने के काम आया ग़र्ज़ कि हूरों की मदद से हज़रते ईसा इसी मुक़ाम पर पैदा हुए। बाज़ मुफ़स्सेरीन ने तहरीर किया है कि इस मुक़ाम का नाम नासेरा था। इसी वजह से वहां के लोगों ने खुद को अन्सार उल्लाह कहा जो बाद में नसारा हुआ।
विलादत के बाद हज़रते मरियम की नज़र जब अपने फ़रज़न्द पर पड़ी तो उनके दिल में यह ख़याल पैदा हुआ कि ख़ुदा ने इस बच्चे को बग़ैर बाप के पैद तो कर दिया है मगर जब मेरी क़ौम इसे देखेगी तो मेरे बारे में क्या सोंचेगी। काश मैं पहले ही मर गयी होती यह दिन देखना मुझे नसीब न होता। नागहा एक आवाज़ आयी ऐ मरियम तुम फ़िक्र मंद क्यों हो खुदा तुम्हारी इज़्ज़तो अज़मत का निगेहबान व मुहाफिज़ है। तुम इस नेअमत के एवज़ तशक्कुर का रोज़ा रखो। और अगर तुमसे कोई कुछ पुछे तो क़तई जवाब न दो।
तीसरे दिन मरियम अपने फ़रज़न्द ईस को गले से लगाये हुए जब अपने घर में दाखिल हुए तो बनी इस्राईल के मर्दो और औरतों ने इन्हे चारो तरफ से घेर लिया लानतो मलामत करने लगे और कहने लगे कि ऐ मरियम तूने बहूत ही बुरा का किया है। ऐ हारुन की बहन न तो तेरी मां बदकार थी न तेरा बाप ही बुरा आदमी था। मगर तुने बनी इस्राइल की नाक कटवा दी। आखिर तुने यह क्या किया।
चुंकि उस वक़्त आप रोज़े की हालत में थी इसलिए कोई जवाब देने के बजाये आपने बच्चे की तरफ इशारा किया जिसका मक़सद यह था कि जो तुम्हें पूछना है इस बच्चे से पूछ लो। इस पर लोगों ने कहा कि यह नौज़ाएदा और शीर ख्वार बच्चा क्योंकर बात कर सकता है। मालूम नही मरियम को क्या हो गया है।
बस यह वह मौक़ा था कि जब हुक्में इलाही से हज़रते ईसा अ 0 ने ज़बान खोली और बोल उठे ऐ बनी इस्राइल के सरकश लोग होश में आओं मैं ख़ुदा का बन्दा हुँ उसने मुझे बा बरकत क़रार दिया है। नबी बनाया है और किताब अता की है। उसने मुझे हुक्म दिया है कि मैं ता ज़िन्दगी नमाज़ व ज़िक़ात अदा करुँ और अपनी मां के साथ नेकियों का बरताव करुँ। मुझे मेरे खुदा ने बद बख्त ज़ालिम और जाबिर नही बनाया है। मुझ पर सलामती है कि जब मै पैदा हुआ जिस दिन मरुंगा और जिस दिन फिर ज़िन्दा किया जाऊंगा। लोगों ने जब ईसा अ 0 की गुफ्तगू सुनी तो कहने लगे कि मरियम बेगुनाह है। और यह सब खुदा का मौजज़ा है।
बतने मरयम में हज़रते ईसा अ 0 का हमल बरोज़े चुमा मुस्तक़िर हुआ और पच्चीस ज़ीक़ाद बरोज़े मंगल आप की विलादत अमल में आयी। आप बनी इस्राइल के आख़री उलुल अज़म पैग़म्बर थे। आपके और हज़रत मूसा अ 0 के दरमियान खुदा की तरफ से छह सौ पैग़म्बर और भी तशरीफ लाये जिन्की तादाद का तज़केरा तो मिलता है लेकिन चन्द के आलावा बाक़ी पैग़म्बरों के नाम और हालात की सराहत किताबों में नही है।
हज़रते ईसा की विलादत और उनके ज़ैल में रुनुमा होने बले वाकेयात की खबरें जब वहा के बादशाह बहरुस की कानों तक पहुंची तो उसने इरादा किया कि इन्हे क़त्ल कर दे। खुदा ने बीबी मरियम को हुक्म दिया कि वह ईसा अ 0 को लेकर शाम से मिस्र की तरफ हिज़रत कर जायें चुनान्चे वह अपने रिश्ते के एक भाई यूसुफ निजार के महराह मिस्र की तरफ चली गयी। और वहां बारह साल तक रही। यहां तक की जब बहरुस मर गया तो अपने वतन वापस आयीं एक शरीफ इन्सान ने अपने मकान में आपको ठहरने की जगह दे दी थी। क़सबे माश के लिए आपने सम्भल की फराहमी और कपड़े की बिनाई का काम शुरु कर दिया था। जिससे गुज़र बसर होती थी।
हज़रते ईसा और इब्तेदाई तालीम
मिस्र में आपने क़याम के दौरान बीबी मरियम ने हुसूले तालीम के लिए हज़रते ईसा को एक बाईमाल मोअल्लिम के सिपुर्द कर दिया था। चुनान्चे पहले दिन जब उस मोअल्लिम ने हज़रते ईसा को पढ़ाना शुरू किया तो उसने कहा कि कहो बिस्मिल्ला हिर रहमानिर रहीम आपने कहा बिस्मिल्ला हिर रहमानिर रहीम फिर उसने कहा कहो अब जद आपने फ़रमाया अब जद और इसके साथ ही यह सवाल कर बैठे कि अब जद में जो अलाहदा अलाहदा हुरूफ है इनके माइने क्या है। यह सुनकर मोअल्लिम ने कहा मैं जो पढ़ा रहा हुँ वो पढ़ो। बिला वजह कठ हुज्जती मत करो। आप ने फरमाया अच्छा तो फिर यह बताइये कि बिस्मिल्लाह हिर रहमानिर रहीम में ब सीन और मीम के क्या मानी है। आप की यह बातें सुनकर मोअल्लिम को सख्त गुस्सा आया उसने कहा तुम पढ़ने आये हो या मेरा इम्तेहान लेने। आपने फरमाया कि अगर आप को नहीं पता तो मैं बताऊँ। वह और बरहम हुआ और हज़रते ईसा को लेये हुए बीबी मरियम के पास आया और कहने लगा तुम्हारा फ़रज़न्द वह जानता है जो तुम्हें नहीं मालूम लेहाज़ा मैं इसे नही पढ़ा सकता
हज़रते ईसा को जो मोअज़िजे खुदा की तरफ से अता हुए थे। इनमें से मुर्दो को ज़िन्दा करना और बीमारों को शिफा देना और पत्थरों को जवाहेरात में तबदील करना , पानी पर चलना , ग़ैब का हाल बताना , मिट्टी के परिन्दे बना कर इन्में जान पैदा करना वग़ैरह शामिल है इन मोअजिज़ात के अलावा भी हस्बे ज़रुरत मामूली मामूली आपके मोअजिज़े आप की ज़ात से ज़हुर पज़ीर हुआ करते थे। मसलन यह वाक़या बहूत मशहूर है कि जब आप कमसिन थे उस वक़त आप की मादरे गिरामी ने आपको कपड़ा रंगने वाले एक शख्स के यहा मज़दूरी पर रख दिया था। एक दिन इस रंग रैज़ ने आपको कुछ कपड़े दिये और कहा कि हर कपड़े के साथ एक रंगीन धागा बन्धा हुआ है। इसी धागे के मुताबीक़ इन कपड़ो पर रंग चढ़ाओ। यह कह कर वह कहीं चला गया आपने सारे कपड़े उठाये और एक ही रंग के मठके में इन्हे ड़ाल दिया और जब वह वापस आया तो उसने पुछा कि क्या कपडे रंग गये तो आपने फरमाया कि हां रंग गये। उसने पुछा कि कहा हैं आपने मठके कि तरफ इशारा कर के बताया कि उस मठके में पड़े है। यह सुनकर उसने मुंह पीट लिया और कहने लगा तुम्ने तो सब चौपट कर दिया। मैने अलग अलग रंगो मैं रंगने को कहा था और तुम्ने एक ही रंग के मटके में झोक दिया अब में ग्राहकों को क्या जवाब दुंगा आप ने मुस्कुराते हुए फरमाया कि ए भाई इस कद्र ख़फ़ा क्यो होते हो इन्हे मटके से बाहर निकाल कर तो देखो ग़र्ज़ कि जब उसने यह कपड़े मटके से निकाले तो हैरत अंगैज़ माजरे को देख कर शशदर रह गया। सब का रंग अलग अलग और इनमें बन्धे धागों के मुताबिक थे। चुनान्चे वे उसी वक़्त हज़रते ईसा पर ईमान ले आया।
एक शादी के मौक़े पर हज़रते ईसा ने फरमाया कि ये दुल्हा कल मर जाएगा। आप की इस बात से तमाम अफराद के दरमियान रंज व ग़म की एक लहर दौड़ गयी। दुसरे दिन जब वे ज़िन्दा सलामत व बखैरियत रहा तो लोगों ने आप को बुरा भला कहना शुरू किया यह सुनकर आप ने इस तकज़ीब करने वालो को अपने हमराह लिया और इस दुल्हे के घर तशरीफ ले गये। दुल्हन को बुलाया और उससे फरमाया कि रात में जो कुछ तुमने कारे खैर अंजाम दिया हो उसे बयान करो। उसने कहा कि मैनें खुदा के नाम पर एक फक़ीर को खाना खिलाया था। इसके अलावा कुछ नही हुआ। फिर आपने बढ़कर उस दूल्हा का बिस्तर हटाया तो लोगो ने देखा कि उसके पास एक खतरनाक किस्म का साँप मौजूद है। आप ने फरमाय कि इसी साँप के ज़रियें दुल्हा की मौत थी मगर इसकी बीबी के सदक़े में इसकी जान बच गयी। चुँकि खिदा की राह में दिया हुआ सदक़ा तमाम बलाओं को दुर करता है।
हज़रते ईसा की दुआओं के बदौलत उसकी उम्मत पर नुज़ूले माएदा का ज़िक्र कुरआने मज़ीद में इजमालन मौजुद है। जिसकी तफ़सील में मुफ़स्सेरीन का कहना है कि एक दिन हज़रते ईसा ने अपने कुछ हवारीन की ख्वाहिश पर खुदा की बारगाह में नुजूले माएदा की इसते दुआ की चुनान्चे एक ख्वान आसमान से उतरा जिसमें एक भुनी हुई मछली , कुछ मुख्तलीफ किस्म की सब्ज़िया , पांच अदद रौंगनी रोटियां , नमक ,लहसुन और सिरका रखा हुआ था। चुनान्चे जब खाने का वक्त आया तो आपके हवारीन ने कहा कि ऐ खुदा के रसूल हमारी ख्वाहिश है कि हम इस ख्वान की मछली को ज़िन्दा देखे। यह सुनकर आपने बिस्मिल्लाह कह कर इस पर अपना हाथ फैरा और बा हूक्में खुदा का वह ख्वान पर चलने फिरने लगी। दुबारा फिर अपने हाथ फेरा तो वह जैसी थी वह वसी ही हो गयी। आपके इस मोजिज़े को देख कर सब के सब हैरत ज़दा रह गये।
इसके बाद जिसने यह खाना खाया फ़ायदे में रहा इसमें अगर कोई बीमार था तो इसे शिफा मिल गयी परेशान हाल था तो ख़ुश हाल हो गया , नादार थआ तो मालदार हो गया। और बावजूद कि कसीर तादाद ने इस खाने को खाया और शिकम सेर हुए। मगर इसमें कोई कमीं वाके न हुई .। रवायतों से पता चलता है कि इस मायदे का नुज़ूल बराबर 40 दिन तक होता रहा। और तमाम शहर के लोग इससे शिकम सेर हुए। मुस्तफीज़ होने वालों में चुंकी दौलत मंद तब्का भी शामिल होने लगा इस लिए ईसा ने खुदा की हूकमत से इसे सिर्फ ग़ुरबा व मसाकिन के लिए मखसूस कर दिया जिसका नतीजा यह हुआ कि लोग नारारज़ हो कर दीन से फिर गये और बग़ावत कर आमादा हो कर हज़रते ईसा की तकज़ीब करने लगे। और यहूदियों की तरह साहिर व जादूगर कहने लगे। नीज़ इस ख्वाने नेअमत का मज़ाक उड़ाने लगे। इस्राइलियों की यह बात खुदा वन्दे आलम को इस कद्र नाग़वार ग़ुज़री की उसने यह सिलसिला बन्द कर दिया और बग़ावत और सरकशीरी करने वालों को इस अज़ाब में मुब्तेला कर दिया कि वह रात में अच्छें भले इन्सान की तरह सोये लेकिन जब सुबह उठे तो लोग बन्दर ,सुअर ,रीछ और ना जाने क्या क्या बन चुके थे.।
तफसीर हज़रते इमामे अस्करी अ 0 हज़रते रसूले खुदा ने मन्कूल है कि नुजूले माएदा की नाकदरी और हज़रते ईसा को बूरा भला कहने की वज़ह से खुदा ने इन्हे चार सौ किस्म के हैवानों की सुरत में मस्ख कर दिया था। और वह लोग तीन दिन तक इसी हालात में रहने के बाद हलाक़ हो गये।
हज़रते ईसा यूं तो बचपन चही चसे कारे तब्लाग़ की अन्जाम दे ही में मसरुफ रहे लेकिन जब आप की उम्र तीस साल की हुई तो आपने एतेराफ और जवानिब में अपने नायेबीन भेजने शुरू किये और ब हुक्में खुदा इन्हे अपने मोअज़िज़ात के इस्तेअमाल की इजाज़त भी दे दी ताकि तब्लीगी उमूर में इन्हें कोई दुशवारी न हो।
आपने दीगर शहरों के साथ शहरे अन्ताकिया में भी सादिक और सिददीक़ नामी अपने दो नाएबीन भेजे जहां का फरमान रवां ख़ुदा भी बुत परस्त था और अपनी रियाया को भी बुतपरस्ती के लिए मजबूर करता था। जब यह दोनें अन्ताकिया शहर के नज़दीक पहुंचे तो उनकी मुलाकात सबसे पहले एक बूढ़े शख्त से हुई जो अपनी बकरियां चरा रहा था। इन लोगों ने इसे सलाम किया इसने जवाबे समाल दिया। और पुछा कि तुम कौन हो और कहां से आ रहे हो। इन लोगों ने कहा कि हम हज़रते ईसा के नायब हैं और तब्लग़ी की ग़रज़ से यहां आये है। इसने कहा कि तुम्हारे पास क्या इसका क्या सबूत है.। तो उन्होने कहा कि इब्ने मरियम ने हमें मोअज़िज़े देकर भेजा है। हम बीमारों को शिफा और अंधो को आंखे दे सकते है। बूढ़े शख्स ने कहां कि मेरा बेटा मुददत से बीमार है। क्या तुम लोग इसे शिफा दे सकते हो ? इन लोगों ने कहा हमें अपने घर ले चलो।
चुन्नाचे वह इन्हे अपने घर ले आया सादिक और सिददीक़ ने खुदा की बारगाह में दुआ कि और लडके के सर पर हाथ फेरा कूदरते इलाही से उसी वक्त अच्छा भला हो गया और उसकी सारी बीमारी दूर हो गयी। यह देख कर पूरे घर ने इस दिन से मसीही दिन इख्तेयार कर लिया। इस बूढ़े शख्स का नाम हबीब निज़ार था.। जिन्हे मोमिने आले यासीन के नाम से दुनिया याद करती है। लड़के का शिफा याब होना था कि उसकी शोहरत तमाम शहर में हुई लोग सादिक़ और सिददीकी के गिर्दे जमा होने लगे और बीमारों को शिफा और अन्धों को आँखे मिलने लगी। यहां तक की हज़ारों लोगों ने हज़रते ईसा का दीन इख्तेयार कर लिया और बुत परस्ती से मुन्हरिफ हो गये। रफ्ता रफ्ता यह खबर वहा के बादशाह जिसका नाम शलाखिन था को मालूम हुई तो इन दोनो मुबल्लेग़ीन को गिरफ्तार करा करा कर शाही बुत खाने में क़ैद कर दिया। हज़रते ईसा को जब यह इत्तेला फ़राहम हूई कि सादिक़ और सिददकी को अन्ताकिया के बादशाह ने क़ैद कर लिया है तो आपने सुलूम नामी एक तीसरे शख्स को अपना नायब बना कर वहां रवाना किया। और यह हिदायत कर दी कि वह अपना दीन न ज़ाहिर करे बल्कि तक़य्ये की हालत में रह कर ख़ुफिया तौर पर कारे तब्लीग़ अन्जाम दे और उन दोनों नायबीन को बादशाह की क़ैद से छुड़ाने की कोशिश भी करे।
सलूम जब अन्ताकिया पहुंचे तो उन्होने भी मरीज़ो को शिफ़ा देने और अंधों को अच्छा करने का काम शुरू कर दिया। जिन्की वजह से इन्की बहूत जल्द शौहरत हो गयी मगर उन्हे अपने मसीही मस्लक़ का इज़हार नही किया बल्कि ज़ाहिर यही किया कि हमारा मज़हब वही है। जो यहां के बादशाह का।
जब बादशाह से लोगो ने बताया कि एक नया शख्स शहर में दाखिल हुआ है। और वह भी मरिज़ो को शिफ़ा और अंधों को आँखे देता है। लेकिन वह ईसाई नही है। बल्कि उसका भी मज़हब वही है। जो हमारा है। तो वह बहुत खुश हुआ। और सलूम को अपने पास तलब कर के उसने बचशम खुद बीमारो को अच्छा करते हुए देखा तो अपना मुकरिबे खास बना लिया।
सुलूम ने वहां रहकर जब खुफिया तरीके से पता लगाया कि सादिक व सिद्दीक शाही बुतखाने में कैद हैं तो एक दिन उन्होने बादशाह से कहा कि मैं शाही बूतखाने में इबादत करना चाहता हूँ। बादशाह की तरफ से इजाज़त मिल गयी। इसलिए वह वहां आने जाने लगे। चुनान्चे मौका पाकर उन्होनें इन दोनों मुबल्लेगीन से गुफतुगू की इनके हालात मालूम किये और उनके साथ ही यह ताकीद भी कर दी कि कभी यह ज़ाहिर न होने पाये कि हम एक दूसरे को जानते हैं। या एक ही मज़हब से हमारा तअल्लुक है।
मुख़तसर यह कि सुलूम ने वहां रहकर बादशाह पर जब अपना काफी असर जमा लिया तो मौका महल देखकर एक दिन उसने उससे दरियाफ़त किया कि वह दो आदमी कौन है ज़ो बुतखाने में कैद हैं। बादशाह ने कहा कि वह लोग भी आपकी तरह मरीजों और अंधो को अच्छा करते हैं। लेकिन वह हमारे खुदाओं को बुरा भला कहते हैं। और अपने खुदा की परस्तिश कराना चाहते हैं। यहां के लोगों ने उनकी करामात देख देख कर हमारे खुदाओं को छोड़ कर उनका मज़हब कुबूल करना शुरू कर दिया। तो हमने इन्हें कैद कर लिया ताकि यहां के आवाम से इनका कोई राबेता न रह जाये। यह सुनकर सुलूब ने कहा अगर आप मुनासिब समझें तो इन्हें किसी दिन अपने दरबार में बुलायें और हम मुबाहेसा करें ताकि हक़ और बातिल का पता चले। नीज़ उनकी अच्छाईयों और बुराईयों के बारे में कोई नज़रिया कायम हो सके।
बादशाह ने सुलूक की तजवीज़ मान ली और दूसरे ही दिन सादिक और सिद्दीक दरबार में तलब किये गये। बादशाह और दरबारियों की मौजूदगी में सुलूम ने इनसे पूछा कि तुम लोग कौन हो और यहां तुम्हारे आने का मकसद़ क्या हैं। उन्होनें कहा कि हम लोग खुदा के रसूल हज़रते ईसा अ 0 के फ़रिस्तादा हैं और यहां तब्लीग की रहे हो। उहोंने कहा कि हम लोग बुतपरस्तों को ख़ुदा परस्ती की दावत देते हैं। और इसकी दलील में मोजिजे़ से काम लेते हैं।
सुलूम ने कहा कि तुम लोग किस किस्म के मोज़िज़े ज़ाहिर करते हो। उन्होने कहा हम बीमारो को अच्छा करते हैं और अंधों को आंखें देते हैं और अपाहिजों और कोढ़ियों को शिफा अता करते हैं सुलूम ने कहा यह सब कुछ तो हमें भी आता है कोई नई बात बताओ जो इन्सान से मुमकिन न हो। उन लोगों ने कहा हमारे बादशाह का एक बेटा मर चुका है। और वह फुलां मुकाम पर दफन है अगर तुम उसे जिन्दा कर दो तो हम वादा करते हैं कि हम लोग भी तुम्हारा दीन क़ुबूल कर लेंगे वरना तुम्हारी गर्दनें उड़ा दी जायेंगी।
ग़र्ज़ कि बहामी मुहायदा और कौलो इक़रार के बाद सादिक़ और सिद्दीक़ ने दो रकत नामज अदा की और सजदे में बादशाह के उस लड़के के ज़िन्दा किये जाने की दूआ की जिसे मरे हुऐ काफी अरसा हो चुका था.। इसके बाद उन्होने कहा कि बादशाह का लड़का ज़िन्दा होकर कब्र से बाहर आ चुका है। कुछ लोगों को वहां भेजिये कि वह उसे यहां ले आयें। सुनकर बादशाह ख़ुद अपने लड़के कि कब्र की तरफ भागा उसके पीछे और लोग दौड़े वहां पहुंच कर उन लोगो ने देखा कि वह लड़का अपनी कब्र के पास खड़ा हुआ अपने चेहरे और सर से गर्दों गुबार झाड़ रहा है। बादशाह ने दौड़ कर इसे गले से लगा लिया और पूछा कि बेटा तुम क्योंकर ज़िन्दा हुए उसने कहा कि मैंने मुर्दा हालत में यह देखा कि दो आदमी सजदे में मेरे ज़िन्दा किये जाने की दुआ मांग रहे है।
बस उनकी दुआ कुबूल हुई और हमें ज़िन्दा कर दिया गया। फिर दो आदमियों ने हमारी कब्र खोद कर हमें बाहर निकाल कर खड़ा कर दिया। और ग़ायब हो गये। यह वाक़या सुनकर बादशाह के रोंगटे खड़े हो गये। उसने पूछा कि क्या तुम उनहे पहचानते हो। लडके ने कहा हां यक़ीनन मैं उन्हे पहचान लूंगा। दुसरे दिन बादशाह ने दोनो मुबल्लेग़ीन क़ैदियों सादिक़ और सिददक़ के हमराह अपने रियाया को भी एक बड़े मैदान में जमा किया और अपने लड़के को ले कर एक मक़ाम पर खड़ा हो गया। एक शख्स जब उस लड़के के सामने से गुज़रता रहा। वह कहता रहा कि यह नही है और जब वह दोनों कैदी सादिक़ और सिददीक़ इसके सामने से गुज़रने लगे तो उसने कहा कि यह यही है।
बादशाह ने उनके साथ जो नारवा सुलूक किये थे उन पर वह नादिम हुआ और उसी वक्त उस ने मसीही दीन इख्तेयार करने का एलान कर दिया। इसके साथ उसकी रियाया में भी हज़ारो लोग ईमान ले आये। लेकिन यहूदियों ने ईसा की तक़जीब की जिस पर हबीबे नज्जार बिगड़ गये और उन्होने कहा कि ऐ यहूदियों इन पैग़म्बरो का इत्तेबा करो। क्योकि यह हिदायत याफ़ता है और तुमसे कोई अज्र नही मांगते। यह सुनकर एक यहूदी आगे बढ़ा और इसने हबीब को वहीं क़त्ल कर दिया। इस ख़ुन के बदले में खुदा ने इन पर अज़ाब नाज़िल किया और वह सब के सब हलाक हो गये। इसके बाद तीनो मुबल्लेग़ीन सुलूम , सादिक़ और सिददीक़ अन्ताकिया से वापस आये और हज़रते ईसा से सारे वाक़ेयात बयान किये।
इस अम्र मे कोई इख्तेलाफ नही है कि आपके खुसूसी हवारीन की तादाद बारह ती अलबत्ता इनके नामों में मोअर्रेखीन ने इख्तेलाफ किया है बहर हाल जिन नामों पर मोअर्रेखीन की अकसरियत मुत्तफिक़ है वह दर्ज ज़ैल है।
1 याकूब ज़बदी
2 शमउन क़ेनाली
3 अनोराउस
4 शमुन बिन हमून
5 याक़ूब बिन हलफी
6 पुलूस
7 हरतोलूमाउस
8 युहन्ना
9 यहूदा
10 मता
11 मारकूस
12 लुक़ा
सालबी का कहना है कि यह ऐसे असहाब थे जिन पर हज़रते ईसा को बड़ा ऐतमादो भरोसा था। और यहीं बारह आदमी आप पर सबसे पहले ईमान लाये। मौलाना फरमान अली साहब कुरआने मजीद में सुरह आले इमरान के हाशिये पर एक जगह रक़म तराज़ है कि वह बारह आदमी जो सबसे पहले आप पर ईमान लाये हवारी कहलायेय़। इब्रानी ज़बान में हूर के माने खालिस सफेदी के है। पस इन्हे हवारी इन्हे इस वजह से कहते है कि पहले यह लोग धोबी का पेशा करते थे। औप कपड़ो को निखार कर सफ़ेद करने की वजह से यह नाम हुआ हो।
इस वजह से कि हज़रते ईसा ने इऩ्हे ग़ुस्ले इस्तेबाग़ दिया था। जो अब तक नस्रानियों में जारी है। यह इस वजह से कि हज़रते मरियम ने हज़रते ईसा को काम सिखाने की ग़रज़ से एक रंग रेज़ के पास रख दिया था। या फिर इस लिए कि वह नुफूस को गुनाहों की आमोजिश से पाक व साफ रखते थे और दुसरों को भी पाक करते रहते थे। इस वजह से इन्हे हवारी कहते है। यह लोग ज़बर्दस्त वायज़ थे खुसुसन लूका। जिनकी तरफ इन्जील का एक हिस्सा मन्सुब है। यह भी याद रखने की बात है। कि जिस तरह बनी इस्राइल के बारह नक़ीब थे। हज़रते ईस के बारह हवारी थे। इसी तरह उम्मते मुस्लेमा के भी बारह आईम्मा है। मौलाना ने हवारीन के बारे में जों मुख्तलिफ बयानात बयान फरमाये है। इससे पता चलता है कि मुअर्रेखीन इस अम्र में सही नतीजा नही अक़ज़ कर सके है कि हवारीन कहलाने का असल सबब क्या है। और शायद यह वजह है कि गलत फहमी के बिना पर हज़रते ईसा के हवारीन को किसी ने धोबी और किसी ने अंग्रेज़ तसव्वर किया है। मेरी तहक़ीक के मुताबिक़ हवारीन के लुग़वी मानी मददगार के है।
लिहाज़ा ज्यादा करीने क़यास बात यही है कि हज़रते ईसा के जो सच्चे मोईन व मदद गार थे वही हवारीन कहलाये। जैसा कि इमामे रज़ा अ 0 के इस क़ौल से साबित है कि हज़रते ईसा को अस्हाबे खास को हवारीन इस लिए कहा जाता है। कि वह मवाएज़ और नसीहतों के ज़रीये गुनाहो से दुर रखते और हज़रते ईसा के मोईन व मदद गार थे। हवारीन के माने चुँकि साफ करने वाले के भी है। इसलिए लोगों ने धोखा खाया। इसलिए किसी ने धोबी किसी ने रंगरेज़ लिख दिया।
हज़रते ईसा अ 0 का आसमान पर उठाया जाना
हज़रते ईसा जब शामून बिन हामुन को अपना खलीफा और जानशीन मुकर्रर कर चुके तो आप ने हवारीन को हुक्म दिया कि तुम लोग अतराफे आलम में तब्लीग़ व हिदायत के लिए फैल जाओ चुनान्चे जब वह लोग ग़ैर मुल्को में चले गये तो आपको तनहा देखकर इस्राइली यहूदी ने जिनकी फ़ितरत और सरिश्त में शरारत और शैतनत भरी हुई थी। एक मन्सूबा तैयार किया कि किसी तरह क़त्ल कर दिया जाये। चुनान्चे मुखतलिफ़ हीलों बहानों से एक शब इन लोगों ने आपकों गिरफ्तार करके एक घर में मुकय्यद कर दिया। खुदा का करिश्मा देखिये कि जिब्रील आये और एक रौशन दान से निकल कर आपको आसमान पर ले गये।
जब सुबह तड़के यहूदी हज़रते ईसा को फांसी देने के इरादे से वहां पहुंचे तो उनका एक सरदार जिसका नाम यहूदा था आपको बाहर लाने के लिए घर के अन्दर दाखिल हुआ। खुदा ने अपनी कुदरत से यहूदा को हज़रते ईसा की शक्ल में तब्दील कर दिया। हज़रते ईसा को न पाकर जब वह अपने साथियों से माजरा बयान करने बाहर निकला तो इसे देखते ही ईसा समझ कर इसके उपर टूट पड़े दबोच लिया और वह लाख चीख़ता चिल्लाता रहा कि मैं ईसा नहीं हुं बल्कि तुम्हारा साथी यहूदा हूँ।
आखिर इसे सुली पर चढ़ा ही दिया जब उसका काम तमाम हो गया तो इऩ बदबख़तों ने इसकी लाश पर तबर भी बरसाये। जब यह सब कुछ हो चुका तो खुदा ने फिर यहूदा को उसकी अपनी असली शक्लों सूरत में कर दिया। यह देख कर उन लोगों ने अपना मुंह पीट लिया और हाथ मल कर रह गये। यह वाक्या 21 रमज़ानुल मुबारक का बताया जाता है।
हज़रते ईसा के बारे में यहूद नसरा दोनों ही शुबहे में पड़े हुए थे। यहूदी आपके बारे में बेहूदा ख्यालात रखते थे जबकि नसारा आपको खुदा का बेटा कहते थे। परवर दिगार ने ह़रते आदम की मिसाल देकर दोनों की तशफफी कर दी यहूदियों को यह करहर मुतमइन कर दिया कि जब आदम की खिलकत मिट्टी से हो सकती हो तो ईसा का ब़गैर बाप के पैदा होना तअज्जुब खेज़ क्यों। और नसारा को यह कह कर समझा दिया कि ईसा का बग़ैर बाप का पैदा होना खुदा या खुदा का बेटा होने की दलील हो तो हज़रते आदम के मां और बाप दोनों ही नही थे। लिहाज़ा सबसे पहले इन्हे खुदा या ख़ुदा का बेटा होना चाहिए था।
हज़रते ईसा के आसमान पर उठा लिये जाने क् बाद शमून अपनी पूरी ज़िम्मेदारीयों के साथ बहैसियते वसी अपने फ़राज़ और तब्लीग़ उमूर अन्जाम देते रहे। और उनकी वसीयत के सिलसिलें इनके बाद भी हज़रते सरकारे कायनात रसूले खुदा स 0 अ 0 की बेसत तक बराबर जारी व सारी रहा। और शमून इब्ने हमून के बाद यहिया बिन ज़करिया मंज़र बिन शमउन सलेमा बिन मन्ज़र बरज़ा बिन सलमा , अबी बिन बरज़ा , दुस बिन अबी , असीद बिन दोस , होफ बिन असीद यहिया बिन होफ। बजीरा राहिब और बाज़ रवायात की बिना पर जनाबे सलमान फ़ारसी बित्तरतीब एके बा दीगरे एक दुसरे के वसी मक़र्रर होते रहे। और यह तमाम हज़रात तालीमातो शरीयत ईसा की तब्लीग़ के सिलसिले के साथ पैग़म्बरे आख़्रुज़मा की बशरत भी किया करते थे। जनाबे सलमाने फ़ारसी वही बुज़ुर्ग हैं जो बाद में मुशर्रफ ब इस्लाम हुए और ईमान के दस दरजे पर फ़ायज़ थे। और इऩ्ही के बारे में हज़रते रसूले ख़ुदा स 0 अ 0 ने फरमाया था कि सलमान मेरे अहलेबैत में से है।
यह बात भी तय शुदा है कि क़रीब क़यामत जब आख़री इमाम हज़रते मेंहदी आखिरउज़्ज़मा जूहुर फरमायेगें तो हज़रते ईसा भी आसमानें चहारूम से ज़मीन पर तशरीफ लायेंगे। उनकी इमामत की तस्दीक़ करेंगे और उन्ही की इमामत में नमाज़ पढ़ेगे।
इमामे फ़ख़रुद्दीन राज़ी अपनी तफसील में लिखते हैं कि जिस वक्त इमामें मेंहदी का जुहूर होगा हज़रते ईसा अर्शे चहररुम से ज़मीन पर तशरीफ लायेगें। तो उस वक्त उनकी हैसियत एक उम्मती से ज़्यादा न होगी।
मौलाना फरमान अली साहब कुरआने मजीद में सुरह आले इमरान के हाशिये पर एक जगह रक़म तराज़ है कि वह बारह आदमी जो सबसे पहले आप पर ईमान लाये हवारी कहलायेय़। इब्रानी ज़बान में हूर के माने खालिस सफेदी के है। पस इन्हे हवारी इन्हे इस वजह से कहते है कि पहले यह लोग धोबी का पेशा करते थे। औप कपड़ो को निखार कर सफ़ेद करने की वजह से यह नाम हुआ हो।
इस वजह से कि हज़रते ईसा ने इऩ्हे ग़ुस्ले इस्तेबाग़ दिया था। जो अब तक नस्रानियों में जारी है। यह इस वजह से कि हज़रते मरियम ने हज़रते ईसा को काम सिखाने की ग़रज़ से एक रंग रेज़ के पास रख दिया था। या फिर इस लिए कि वह नुफूस को गुनाहों की आमोजिश से पाक व साफ रखते थे और दुसरों को भी पाक करते रहते थे। इस वजह से इन्हे हवारी कहते है। यह लोग ज़बर्दस्त वायज़ थे खुसुसन लूका। जिनकी तरफ इन्जील का एक हिस्सा मन्सुब है। यह भी याद रखने की बात है। कि जिस तरह बनी इस्राइल के बारह नक़ीब थे। हज़रते ईस के बारह हवारी थे। इसी तरह उम्मते मुस्लेमा के भी बारह आईम्मा है। मौलाना ने हवारीन के बारे में जों मुख्तलिफ बयानात बयान फरमाये है। इससे पता चलता है कि मुअर्रेखीन इस अम्र में सही नतीजा नही अक़ज़ कर सके है कि हवारीन कहलाने का असल सबब क्या है। और शायद यह वजह है कि गलत फहमी के बिना पर हज़रते ईसा के हवारीन को किसी ने धोबी और किसी ने अंग्रेज़ तसव्वर किया है। मेरी तहक़ीक के मुताबिक़ हवारीन के लुग़वी मानी मददगार के है।
लिहाज़ा ज्यादा करीने क़यास बात यही है कि हज़रते ईसा के जो सच्चे मोईन व मदद गार थे वही हवारीन कहलाये। जैसा कि इमामे रज़ा अ 0 के इस क़ौल से साबित है कि हज़रते ईसा को अस्हाबे खास को हवारीन इस लिए कहा जाता है। कि वह मवाएज़ और नसीहतों के ज़रीये गुनाहो से दुर रखते और हज़रते ईसा के मोईन व मदद गार थे। हवारीन के माने चुँकि साफ करने वाले के भी है। इसलिए लोगों ने धोखा खाया। इसलिए किसी ने धोबी किसी ने रंगरेज़ लिख दिया।
हज़रते ईसा जब शामून बिन हामुन को अपना खलीफा और जानशीन मुकर्रर कर चुके तो आप ने हवारीन को हुक्म दिया कि तुम लोग अतराफे आलम में तब्लीग़ व हिदायत के लिए फैल जाओ चुनान्चे जब वह लोग ग़ैर मुल्को में चले गये तो आपको तनहा देखकर इस्राइली यहूदी ने जिनकी फ़ितरत और सरिश्त में शरारत और शैतनत भरी हुई थी। एक मन्सूबा तैयार किया कि किसी तरह क़त्ल कर दिया जाये। चुनान्चे मुखतलिफ़ हीलों बहानों से एक शब इन लोगों ने आपकों गिरफ्तार करके एक घर में मुकय्यद कर दिया। खुदा का करिश्मा देखिये कि जिब्रील आये और एक रौशन दान से निकल कर आपको आसमान पर ले गये।
जब सुबह तड़के यहूदी हज़रते ईसा को फांसी देने के इरादे से वहां पहुंचे तो उनका एक सरदार जिसका नाम यहूदा था आपको बाहर लाने के लिए घर के अन्दर दाखिल हुआ। खुदा ने अपनी कुदरत से यहूदा को हज़रते ईसा की शक्ल में तब्दील कर दिया। हज़रते ईसा को न पाकर जब वह अपने साथियों से माजरा बयान करने बाहर निकला तो इसे देखते ही ईसा समझ कर इसके उपर टूट पड़े दबोच लिया और वह लाख चीख़ता चिल्लाता रहा कि मैं ईसा नहीं हुं बल्कि तुम्हारा साथी यहूदा हूँ।
आखिर इसे सुली पर चढ़ा ही दिया जब उसका काम तमाम हो गया तो इऩ बदबख़तों ने इसकी लाश पर तबर भी बरसाये। जब यह सब कुछ हो चुका तो खुदा ने फिर यहूदा को उसकी अपनी असली शक्लों सूरत में कर दिया। यह देख कर उन लोगों ने अपना मुंह पीट लिया और हाथ मल कर रह गये। यह वाक्या 21 रमज़ानुल मुबारक का बताया जाता है।
हज़रते ईसा के बारे में यहूद नसरा दोनों ही शुबहे में पड़े हुए थे। यहूदी आपके बारे में बेहूदा ख्यालात रखते थे जबकि नसारा आपको खुदा का बेटा कहते थे। परवर दिगार ने ह़रते आदम की मिसाल देकर दोनों की तशफफी कर दी यहूदियों को यह करहर मुतमइन कर दिया कि जब आदम की खिलकत मिट्टी से हो सकती हो तो ईसा का ब़गैर बाप के पैदा होना तअज्जुब खेज़ क्यों। और नसारा को यह कह कर समझा दिया कि ईसा का बग़ैर बाप का पैदा होना खुदा या खुदा का बेटा होने की दलील हो तो हज़रते आदम के मां और बाप दोनों ही नही थे। लिहाज़ा सबसे पहले इन्हे खुदा या ख़ुदा का बेटा होना चाहिए था।
हज़रते ईसा के आसमान पर उठा लिये जाने क् बाद शमून अपनी पूरी ज़िम्मेदारीयों के साथ बहैसियते वसी अपने फ़राज़ और तब्लीग़ उमूर अन्जाम देते रहे। और उनकी वसीयत के सिलसिलें इनके बाद भी हज़रते सरकारे कायनात रसूले खुदा स 0 अ 0 की बेसत तक बराबर जारी व सारी रहा। और शमून इब्ने हमून के बाद यहिया बिन ज़करिया मंज़र बिन शमउन सलेमा बिन मन्ज़र बरज़ा बिन सलमा , अबी बिन बरज़ा , दुस बिन अबी , असीद बिन दोस , होफ बिन असीद यहिया बिन होफ। बजीरा राहिब और बाज़ रवायात की बिना पर जनाबे सलमान फ़ारसी बित्तरतीब एके बा दीगरे एक दुसरे के वसी मक़र्रर होते रहे। और यह तमाम हज़रात तालीमातो शरीयत ईसा की तब्लीग़ के सिलसिले के साथ पैग़म्बरे आख़्रुज़मा की बशरत भी किया करते थे। जनाबे सलमाने फ़ारसी वही बुज़ुर्ग हैं जो बाद में मुशर्रफ ब इस्लाम हुए और ईमान के दस दरजे पर फ़ायज़ थे। और इऩ्ही के बारे में हज़रते रसूले ख़ुदा स 0 अ 0 ने फरमाया था कि सलमान मेरे अहलेबैत में से है।
यह बात भी तय शुदा है कि क़रीब क़यामत जब आख़री इमाम हज़रते मेंहदी आखिरउज़्ज़मा जूहुर फरमायेगें तो हज़रते ईसा भी आसमानें चहारूम से ज़मीन पर तशरीफ लायेंगे। उनकी इमामत की तस्दीक़ करेंगे और उन्ही की इमामत में नमाज़ पढ़ेगे।
इमामे फ़ख़रुद्दीन राज़ी अपनी तफसील में लिखते हैं कि जिस वक्त इमामें मेंहदी का जुहूर होगा हज़रते ईसा अर्शे चहररुम से ज़मीन पर तशरीफ लायेगें। तो उस वक्त उनकी हैसियत एक उम्मती से ज़्यादा न होगी।
रिश्ते आज़ल से क़ायम है यह सिर्फ जिस्मानी नही है। बल्कि रुहानी भी होते है। इनका ज़हूर चाहे जब बई हो यह उसूल सिर्फ इन्फेरादी रिश्तों का नही बल्कि क़ौम और गिरोहों का भी है। सिर्फ इन्सानी रिश्तों के लिए नहीं बल्कि हैवानी , नबाताती और जमादाती रिश्तें काभई यही उसूल है कि वह भी अज़ली है। यह एक अलग तफ़सीली मौजू है जिसके साइंटिफिक सबूत हैं हमें फिलहाल यह देखना है कि ज़मानए क़दीम में रसूले अकरम स 0 अ 0 की जाए विलादत अरब और हिन्तुस्तान के दरमियान के दरमियान क्या रिश्ते थे।
1000 क़ब्ल मसीह यमन की एक क़ौम सब ने हिन्दुस्तान से तिजारती तअल्लुक़ात इस्तेवार किये। बम्बई के क़रीब सुपारा नामी एक गांव से अहदे सुलेमानी में (जिनका ज़माना 650 क़ाफ़ 0 मीम है) फिलिस्तीन से तिजारत शुरू हुई। इसी तरह हिन्दुस्तानी मलमल छींट और रुमाल वग़ैरह अरब में मक़बूल थे.। जिनका ज़िक्र अरबी अशार में मिलता है। खानदाने मोरिया के आन्ध्रा प्रदेश में तमाम क़ुतुबाते आरामी अरबी तर्ज़ में लिखे हुए मिले है। और अशोक के क़ुतुबात भी फराहम हुए हैं।
आब सबल यह पैदा होता है कि आज से पांच हज़ार साल क़ब्ल हिन्दुस्तान में अरबी ज़बान युधिश्टिर के दरबार में क्यों कर राएज हुई। इसका जवाब यह हो सकता है कि आज से पांच हज़ार साल पेशतर इस मुल्क में दीने इस्लाम का दौर दोरा था.।
हिन्तोस्तान की एक और जमाअत भी क़दीम ज़माने से अरब में पायी जाती थी। इसको अरबी बाशिन्दे मेद कहते थे। इसतखरी ने लिखा है कि हुदूदे सिन्ध के तमाम शहरों में कुफ़्फ़ार का मज़हब बौद्ध था। और इनके साथ ही एक क़ौम है जिसे मेद कहा जाता है। जाठ और मेद के बाद हिन्दुस्तान की एक और क़ौम अरब में पायी जाती है वह सबाबजामासबाबचा है। बलाज़री ने फ़ुतुहुल बलादान में और इब्ने ख़ुलदून ने अपनी तारीख़ में बार बार सबाबचा का ज़िक्र किया है। अरब में हिन्दुस्तान की एक और जमाअत ज़मानए कदीम से आबाद थी. जिसे अरब हुमरा , हमर , अहमिर और अहामेरा के लक़ब से याद करते थे। इसी तरह मज़हबी रवाबित और ख़ुसुसन अम्बिया अ 0 की आमद या बेअसत के सिलसिले में हमें मुताअदिद रवायत मिलती है।
अहदे हाज़िर के मुसलमानों में एक आम तसव्वुर यह भी है कि जिन अम्बिया का ज़िक्र कुरआन में है उनका ताल्लुक़ सिर्फ जज़ीरा नुमाए अरब से था। यह दावा करने वाले यह नहीं बताते कि हज़रते आदम हज़रते नूह , अरब , मिस्र , ईराक , शाम के किन हिस्सों में दावत के लिए मबउस हुए थे। इस सिलसिले में मोहक़्क़ीन हज़रात को जो कुछ मिला है हम मुख़तसर पेश कर रहे है।
यह एक दिलचस्प बात है कि श्रीलंका में कोहेसरान दीप पर एक बड़े पांव का निशान मोजूद है। जिसे बहूत से मज़ाहिब के पैरों मुक़दस मानते है। मुसलमान और ईसाइ इसे हज़रते आदम के पांव का निशान मानते है। बौद्ध मज़हब के पैरब गौतम बुध के पांव का निशान कहते है। और हिन्दू इसे शिव जी के पैर का निशान मानते है। यह अजीबो ग़रीब रवायत बिल्कुल बेबुनियाद भी नही है। इसकी क़ड़ीयां हमें अरबों की तारीख़ में मिलती है।
अहले अरब का यह दावा है कि हिन्दुस्तान से इसका तअल्लुक सिर्फ चन्द हज़ार बरसों का नही है। बल्कि अज़ली तौर पर यह मुल्क इनका पिदरी वतन है। हदीसों और तफ़सीरों मं जहाँ हज़रते आदम के वाक़ेयात है। मुताअदिद रवायतों से भी ज़ाहिर होता है कि हज़रते आदम जब आसमान की जन्नत से निकाले गये तो हिन्दुस्तान की आरज़ी जन्नत पर उतारे गये। श्रीलंका में उन्होने पहला क़दम रखा जिसका निशान इसके एक पहाड़ पर मौजूद है। इब्ने जज़ीर इब्ने अबी हातम ने लिखा है कि हिन्दुस्तान की सरज़मीन का नाम जिसमें आदम उतरे वजना है। क्या यह कहा जा सकता है कि यह वजना दखिना या दखिना या दकखिन है जो जुनूबी हिन्दुस्तान के हिस्से का मशहूर नाम है।
अब एक सबूत तफ़सीर की किताबों से मुलाहेज़ा फ़रमायें। इब्ने अब्बास ने फ़रमाया है कि आदम का तनूर हिन्द में था। यह वाज़ेह रहे कि कुरआन , इंजील और तौरेत से मुफ़स्सेरीन को यह रौशनी अभी तक नही मिल सकी कि आदम दुनिया के किस खित्ते में उतारे गये।
मुन्दरजा बाला रवायात से श्रीलंका में पांव के निशान से यह इशारात मिले है कि हज़रते आदम अ 0 की बेअसत इस सरज़मीन में हो सकती है. हालांकि यह रवायत ज़ईफ़ क़रार दी जाती है। लेकिन यह बात ज़रुर क़बिले गौर है कि दुनिया के किसी और खित्ते के बारे में ऐसा दावा होने की रवायत भी हमें नही मिलती।
कुरआन से यह हमें मालूम होता है कि तूफाने नूह अ 0 के बाद हज़रते नू की कश्ती कोहे जूदी पर ठहरी जो ईराक़ के इलाके करदिस्तान में है। और बाइबिल से पता चलता है कि कोहे अरारत पर इनकी कश्ती रुकी थी जूदी कोहे अरारात की एक चोटी है। लेकिन आज तक मोफ़स्सेरीन ने यह नही बताया कि कश्ती के रुकने के बाद हज़रते नूह के तब्लीग़ी मराकिज़ दुनिया के कौन कौन से इलाके रहे और यह भी नही पता चल सका कि तूफाने नूह से पहले हज़रते नूह छः सौ साल तक कहां रहें। तौरेत से तो सिर्फ तना मालूम होता है कि हज़रते नूह और उनके साथी बाबुल में इकट्ठा हुए और वहां से पूरी दुनियां में फैले।
इसलिए इसका नाम बाबुल है क्योकि खुदा वन्दे आलम ने वहां पर तमाम अहले ज़मी की ज़बानों को ग़लत खिल्त मिल्त कर दिया था। और वहां से इन (हज़रते नूह और इनके साथियों) के ख़ुदा ने तमाम रुए ज़मीन पर फैलाया तौरेत किताबे पैदाइश 11,9।
क़ुरआन यह कहता है कि तनूर से पानी उबलना शुरू हुआ था और यहां से तूफान की इब्तेदा हुई थी। (तरज़ूमा)
यहां तक कि जब हमारा हुक्म आ पहुंचा और तन्दुर से पानी उबलना शुरू हुआ तो हमने कहा कि इस (कश्ती) में हर किस्म के जोड़ो में से दो दो को चढा तो (सुरए हूद 40)। लफज़े तन्दूर अरबी ज़बान का लफज़ नही है। फ़ारसी में इसका माना रोटी पकायी जाने बाले तनूर के है। बैश्तर मुफ़स्सेरीन ने इस लफ़्ज़ को इन्ही मानों मे इस्तेमाल किया है। और कुछने तनूर से मूराद सतह ज़मीन भी लिया है। यानी ज़मीन की सतह से पानी उबलना शुरू हुआ लफ़ज़े तनूर से पहले कुआन में अलिफ और लाभ इस्तेमाल हुआ है। जिसका मतलब है कि कोई मखसुस तनूर इस सिलसिले में उलमाए कराम की तशरीह लिखी देखी और अगर यह कहा जाये कि अलिफ और लाम तन्दूर में हैं तो इसका जवाब यह है कि यह बइद नहीं कि नूह को वह तन्दुर मालूम हो। हसन बसरी का यह बयान है कि वह तन्दूर पत्थर का था। हज़रते हव्वा इस पर रोंटिया पकाती थी। फिर वह हज़रते नूह के पास आ गया था। और उऩसे कह दिया गया था कि देखो तन्दूर से जब पानी उबल रहा हो तो अपने साथियों को लेकर कश्ती पर सवार हो जाना। लफ़्जें तन्दूर पर बहूत से अक़वाल इकठ्ठा करते हुए अल्लामा शोक़कानी ने लिखा है कि आठवां कौल हो कि वह एक मुक़ाम है। जो हिन्द में है (तफसीरे फतहुल ग़दीर जिल्द 2 सफ़ा 474)। यह बात दिल चस्पी से खाली नही कि रेलवे टाईम टेबल में तनूर नाम का एक मक़ाम केरेला में है और नक़्शे में केरला के मुल्लापुरम ज़िले में समुन्दर के साहिल पर तनूर नाम का एक मकाम वाक़ये है। यह हिन्दुस्तान के मग़रीबी साहिल पर है। जो बहराए अरब के ज़रिए अरब से जुदा होता है। रवायत की रोशनी में क्या यह क्यास किया जा सकता है कि यह वही मक़ाम है जहां से सैलाब नूह के शुरू होने का ज़िक्र कुरआन ने किया है. इससे दुसरे तमाम अक़वाल की ततबीक़ भी हो जाती है। यानी साहिले समन्दर पर तनूर नामी जो मक़ाम है वहां सतहे ज़मीन से पानी उबलना शूरू हुआ था। और यहीं मक़ाम हज़रते आदम का तनूर कहलाया। इससे यह साबित होता है कि हज़रते नूह तूफान से क़ल्ब हिन्दुस्तान में थे। बरसों की तहक़ीक के बाद गुजरात के एक माहिर क़ानूनदा एम ज़मा खोखरा ने यह इनकेशाफ किया है कि आदमे सानी खाके मुजरात में महवे इस्तेराहत हैं। इनके दावे की बुनियाद 240 फिट लम्बा एक मजार है जो गुजरात के इस तारीख़ी शहर से 25 मील दूर मौज़ा बड़ीला शरीफ के नवाह में सदियों से मरजए ख़लाएक़ है। गांव से तक़रीबन एक फरलांग जुनूब में घनी झाड़ियों और छायादार तरख्तों से घिरी स कब्र के बारे में आम तासीर यह है कि हज़रते नूह के बेटे या पोते कबीत का मदफन है। लेकिन एम ज़मा खोखरे ने इल्में कश फुल कुबूर के उलमा की रवायतों से यह साबित किया है कि यह क़बीत नही बल्कि खुद हज़रते नूह हैं। बहुत से उलमाए कश फुल कुबूर और बुजुर्गान के हवाले ताइद में बयान करने के बाद लिखते हैं।
बड़ीला शरीफ एक सरहदी गांव है और गुज़रात से पांच मील दूर जानिबे शिमाल और मशरिक़ क़स्बए टाएंड़ा के नज़दीक वाक़े है। यहां से झम्ब का इलाका शुरू हो जाता है और दरियाए चुनाब व तबई इसके क़रीब ही बहते है। तक़सीम से क़ल्ब हिन्दू , इस मज़ार को मनो मेहरिस्त के नाम से पुकारते थे , मनुमेह रिस्त संस्कृत का लफ़्ज़ है जिसके माना कश्ती वाला है। इबरानी लफ्ज़े नूह से भी यह माना अख़ज़ किया जाते है। संस्क़त की क़दीम किताबो में दर्ज है। कि आदम का एक बेटा पंख पखेरु मे समेट कर एक कश्ती में बुलाता है। तूफाने नूह का ज़िक्र आर्याओं की मज़हबी किलाबों में भी आया है और इस हवाले से यह भी साबित होता है कि अवाएल ही में नूह की औलाद बरसगीर हिन्द तक फैली हुई थी। आइनए गुजरात मे दर्ज है गुजरात के बाशिन्दे हज़रते नूह के बेटे हाम की औलाद हैं और हामियों ने कश्मीर के नवाह में बड़ी बड़ी इमारतें तामीर करायी। इमतेदादे ज़माने से हाम की कब्र के आसार मिट चुके है। लेकिन शहरो और मज़रात की सूरत में इनकी आमद के निशानात यहां के वसीव अरीज़ इलाको में फैले हुए है। बढ़ेला शरीफ के नवाह में मिट्टी के बड़े बड़े तौंदे और टीले इस अम्र के गवाह हैं कि कभी यहां औलादे आदम की आलीशान बस्तियां होंगी।
याक़ूते हमूवी ने लिखा है कि बुकीर बिन यखतिन बिन हाम बिन नूह की औलाद में हिन्द और सिंध नामी दो भाई थे जिनके नाम से यह दोनो मुल्क मशहूर है। इन तूफाने नूह से क़ल्ब और बाद में भी हज़रते नूह का तअल्लुक़ हिन्दुस्तान से था।
ऐ ऐन किगहम की आसारे क़दीमा रिपोर्ट के ज़ैल में यह पता चलता है कि अयोध्या में दो पर्वतों के दरमियान मुसलमानों का क मज़हबी मकाम है जो मशरिक़ से मग़रिब तक चौसठ फिट है और इसकी चौड़ाई 47 फिट है इनमें दै मज़ार हैं जिन्हे हज़रते शीश और हज़रते अय्यूब से मनसूब किया जाता है।
एम 0 ज़मा खोखरा जिनका ज़िक्र हम क़ौमी जंग रामपुर के हवाले से करर चुके है के बारे में अखबार मज़ीद लिखता है कि (मुस्लिम इंण्डिया ऊर्दु अप्रैल सन 1988 सफा 15)एम 0 ज़मा खोखरा ने मज़ारे नूह या फ़रज़न्दे नूह के मरक़द के अलावा वसी अरीज़ कबीरों की निशानदेही की है इनके बक़ौल मोज़ा चौगानी मे तानूग़ किनआनी थे। और वह हज़रते युसुफ के बेटे थे आइनये गुजरात में दर्ज है कि क़ाज़ी सुल्तान महमूद ने इल्मे कशफुल कुबूर के ज़रिये गुजरात के आस पास मुताअदिद मज़ारात की निशानदेही की है इनका दावा है कि यह तमाम क़बरे इन तमाम अम्बियाए बनी इस्राइल की है जो औलादे मूसा व इमरान में से थे। क़दीम तारीख़ी हवालों से यह अन्दाज़ा होता है कि गुजरात इल्म व फ़ज़्ल के एतेबार से ख़ित्तए यूनान ही नही बल्कि रुहानियत की निस्बत से पैग़म्बरों का मदफ़न भी है। रवाल शरीफ के मक़ाम पर एक मज़ार है जिसकी लम्बाई आम क़ब्रो से कई फिट ज्यादा है।
इसके बारे में यह कहा जाता है कि यहां आदम के बेटे शीश की औलाद में से एक बुजुर्ग दफन है. पसीर नगर में हमसेयालान की एक तुरबत है. बखते नस्र के हमले के दौरान अपने बेटे समेत क़ैद हुए थे। और बाबूल में असीरी के सत्रह बरस गुज़रने के बाद हिन्दुस्तान चले आये थे। इनके जददे अमजद हज़रते हारुन हैं। क़स्बा टाण्ड़ा में एक इस्राइली सरदार नक़ीब खुशी की क़ब्र है। दिरियाये तवई के किनारे सुल्तान क़ैनूस और फ़नानूस की क़ब्रें है।
यह दोनो हज़रते इब्राहीम के बेटे अफ़रासीम की औलादों में बयान किए जाते है। सुल्तान शनयाउस के बारे में यह मसहूर है कि वह हज़रते दाउद के फ़रज़न्द है। एक नौ गज़ी कब्र मौज़ए रंगड़ा में भी है इन सदियों और क़रनो में क़बरों ने गर अपने तक़ददुस व एहतेराम को बरक़रार रखा है तो सके बारे में यब कहा जा सकता है कि यह पैग़म्बरों के मोअजेज़ात हैं (रोज़ नामा क़ौमी जंग रामपुर 13 मार्च 1988) हज़रते मूसा के बारे में हिन्दुस्तान की जैन क़ौम के रवायात में यह मिलता है कि वह हिन्दुस्तान आये थे। (वव्वाबो आवमो बिस्सवाब)
हज़रते ईसा के हिन्दुस्तान की आमद के बारे में कश्मीर और लद्दाख में बहूत सी रवायतें मशहूर है। रुसी और अंग्रेज़ी मोहक़्क़ेकीन ने भी इसका ज़िक्र किया है। फिलहाल हम हिन्दी ज़बान के मशहूर रिसाले कादिम्बनी मार्च 1976 में छपे आचार्य रजनीश के एक मौजू ईसा की नामालूम जिन्दगी से कुछ एखतेबासात नक़ल कर रहे है जो हिन्दी के बजाये मेरी अपनी ज़बान में है। हिन्दुस्तान में यह यक़ीन करने के कई सुबूत है। कि हज़रते ईसा कश्मीर मे एक बुद्ध मठ में ठहरे रहे। कश्मीर में कहानियां मशहूर है कि ईसा वहां थे। मुराक़ेबे में ग़र्क थे। फिर वह यरुशलम में ज़ाहिर हुए। इस वक्त वह 30 साल के थे।
एक फ्रांसीसी मुसन्निफ अपनी किताब जन्नत का सांप में कहता है कि कोई जानता कि तीस साल में उन्होने क्या किया और कहां कहां रहे। एक रवायत के मुताबिक़ वह काएशर में रहे। रुसी सैयाह नकोलस , फीरोविच जो 1888 के आस पास हिन्दुस्तान आया था लद्दाख गया वहां वह बिमार पड़ गया और मशहूर हन्मेस गुफ़ा में रहा अपने गुफ़ा मे क़याम के दौरान इसने मुताअदिद बुद्ध ग्रथों को पढ़ा।
इसने ग्रंथो मे ईसा उनकी तालीमात और उनके लद्दाख के सफर वग़ैरह के बारे में काफी बयान पाया बाद में उसने एक किताब शायां की उसमें उसनें ईसा के लद्दाख और मशरिक़ के दुसरे मुमालिक के सफर से मुताअल्लिक़ बयानों का ज़िक्र किया है। इनमें बयान यब किया कगया है कि लद्दाख में हज़रते ईसा ऊँचे पहाड़ों के दरों से बर्फीले रास्तों को पार करते हुए पहले गाम कश्मीर पहुंचे वह वहां काफी अरसे तक अपनी भेड़ बकरियों की देखभाल करते रहे।
इसी हिन्दी रिसाले कादमब्नी के सतम्बर 1978 के शुमार में शान्ति कुंज हरिद्धार का एक मज़मून तिब्बती लामा की कुबत में ईसा के उनवान से छापा है। इसके एक़तेबासात भी मुलाहेज़ा फरमाये।
यह तीस साल हज़रते ईसा ने कहां और किस तरह गुज़ारे। यह जानने के लिए आलिमों ने काफी रिसर्च की है। रिसर्च स्कालरों में सबसे आगे रुसी आलिम नूर विच है जिन्होने मुसलसल चालीस साल तक सफर करके रिसर्च की और अपने नताएज 1898 में ईसा की नामालूम ज़िन्दगी नामी किताब की शक्ल में शायां कराया नकोलिस नुरविच अपनी तहक़ीकाती सफर के दौरान तिब्बत भी गये और उन्होने तिब्बत के हमूस बौद्ध विहार में ताड़ के पत्तों पर लिखा हुआ एक क़दीमी ग्रंथ देखा नूरविच ने इस बौद्ध विहार में गुज़ारे अरसे का बयान इस तरह लिखा है कि मै जब एक गुफ़ा मे गया तो वहां के लामा ने एक ऐसे पैग़म्बर के बारे में बताया जिसे वह बुद्ध का ही एक रुप मानता था।
लामा ने उस पैग़म्बर का नाम ईसा बताया है। और कहा हम लोग इस नाम को बड़ी इज़्ज़त के साथ ज़बान पर लाते है। इनके बारे में हमें ज़्यादा मालूम नही लेकिन बडे लामा के पास एक क़दीमी ग्रंथ बहूत कुछ लिखा है। किसी तरह नूरविच ने वह क़दीमी ग्रंथ देखने और उसकी तस्वीर उतारने में कामयाबी हासिल कर ली। इस ग्रंथ मे चौदह बाब है और दो सौ चवालिस श्लोक है।
इसमें ईसा के बारे में यह है कि ह़ज़रते ईसा ज्ञान हासिल करने की ग़र्ज़ के हिन्दुस्तान आये। इन दिनों यरुशलम के क़ाफिले तिजारत के लिए यहां आया करते थे। चुनान्चे वह भी एक क़ाफिले के साथ सिन्ध होते हुए हिन्तुस्तान मे वारिद हुए। ईसा सभी इन्सानो से मोहब्बत किया करते थे और उन्हे भी वैश्य और शूद्र सभी प्यार करते थे। उन दिनों वह जंगनाथपुरी में ठहरे हुए थे।
वहां से पुजारियों को जब पता चला कि ईसा शूद्रों से भी मिलते है तो वह उनसे नाराज़ रहने लग। ईस को पुजारियों की नाराज़गी का पता चला तो वह राज गृह चले गये। छह साल वहां रहे और इसके बाद नेपाल होते हुए तिब्बत पहुंचे। और सोलह साल तक इसी तरह सफर करते हुए ईरान के रास्ते से अपने वतन लौट गये।
भविष्य पर उन्क प्रसंग 3 अध्याय 22 के 21 ता 23 श्लोक तक हिमालय पर ईसा से शकादीश की मुलाक़ात का बयान इस तरह मिलता है कि एक बार शिकादीश हिमालय से आगे होन्टर गये। वहां उन्होने एक सफेद पोश गोरे रंग के सन्त को पहाड़ो पर घुमते देखा। शिकादीश ने इनसे तअर्रुफ चाहा तो सुन्नत ने कहा कि ईसा मेरा नाम है। मैंने कुआरी मां के पेट से जन्म लिया है और मैं गैरे मुल्क़ से आया हुँ। मुझे मसीह कहा जाता है।
मज़कूरा तमाम वाक़ेयात रवायतों के एतेबार से ज़ईफ़ से ज़ईफ हो या कुछ हों मगर इनसे यह बात पाये सबूत को पहुंचती है कि हिन्दुस्तान से पैग़म्बरों का गहरा और मुसलसल तअल्लुक रहा है।
हज़रते आदम से ईसा तक मशहूरों मारुफ अम्बियाए किराम के जो ज़रुरी हालात मैने तहरीर किये है। उनके बारे में यह विज़ाहत कर देना चाहता हुँ कि वह ज़्यादा तर तारीख अबुलफिदा , हयातुल कुलूब , तारीखे तिबरी और तारीखे कामि वग़ैरा मे माखुज़ है।
ज़ाहिर है कि उन अम्बिया के दौर की इत्मिनान बख्श तहक़ीक़ इस दौर के किसी महिक्कि के लिए एक बड़ा ही दुश्वार ग़ुज़ार मरहला है क्योकि उनके दौर की लिखी हुई कोई तारीख कहीं मौजूद नहीं अलबत्ता हिन्दूओं की क़दीम तरीन किताबों मे वेदों के श्लोकों के बारे में भी कुछ रौशनी मिलती है मगर वह ऐसी नहीं है कि उसकी बुनियाद पर हालात ओ वाकिआत की कोई इमारत खड़ी हो सके।
तारीख के तदवीनी सिलसिले के अव्वलीन दौर में मुहक़्कीन ओ मुवर्रखीन ने मुखतलीफ ज़राए ओ क़राएन से अम्बिया के दौर की तजदीद में अपनी कोशिशें सर्फ की लेकिन उनमें उनहें कहां तक कामयाबी मिली है। अल्लाह बहतर जानता है।
अम्बियाए किराम से मुताअल्लिक़ जो हदीसें या रिवायतें पैगम्बरे इस्लाम या आइम्मा अतहार की ज़बानी मज़कूर हुई है कि उनमें उलमा मुहक्केक़ीन और मुफस्सेरीन के माबैन एकतेलाफ नज़र आता है , उनके रावियों पर भी एतबार व एतमाद नही किया जा सकता है। इसलिए जो हालात व वाकेयात मैने कलम बद किये हैं उनमें अगर किसी जगह कोई शुबहा , एतराज़ या तनाकुस हो तो नज़र अंदाज़ करना चाहिए क्योकि जब कुद रसूले अकरम स 0 की विलादत की तारीख़ आज तक मुसलमानों के दरमियान तय नही हो सकी तो हज़रते आदम अ 0 हज़रत इब्राहीम , हज़रते नूह , हज़रते मूसा अ 0 या हज़रते ईसा अ 0 की सही तारीखों का तअय्युन क्योकर हो सकता है।
कुरान मजीद में उन अम्बियाए किराम के इजमाली तज़किरे मौजूद है मगर उनकी विलादत वफात मदफन या उनके ज़माने के बारे में किसी किस्म का कोई ताअय्युन नही किया गया चुनान्चे जिस अन्दाज़ से इस आसमानी किताब में उनके मकारिम इख्लाक़ सिफाते हसना हयाते ज़किया खिदमाते जलीला और इग़राज़े ख़िलकत ओ बेसत के हालात ओ वाकिआत मज़कूर है उसी तरह मैने भी उनका लिहाज़ रखा और उसी उसूल के तहत उनके हालात ओ वाकिआत ज़ेरे कलम आये है।
यह बात क़ाबिले तवज्जो है कि अम्बियाए किराम के हालत ओ वाकिआत बई उन्ही रावियो और मुवर्रिख़ों के ज़रिए हम तक पहुंचे हैं जो ज़माने के मुतअल्लिक भी अजीब ओ गरीब और मज़हका खेज़ ऐसी रिवायतें बयान करते रहे है। जिनकी वजह से इस्लाम का विकार गैर मुस्लिमों के हाथों पहले भी मज़रुह हुआ है और अब भी हो रहा है। मसलन तिबरी की यह रिवायत है किः-
बाज़ लोगों का कहना है कि दुनिया कुल सात हज़ार बरस की है और इब्ने अब्बास से मरवी है कि दुनिया , आकिरत के हफ़तो में से एक हफ्ता है जिसकी मेयाद सिर्फ सात हजार बरस की है नीज़ इस मेयाद में छः हज़ार कुछ सौ बरस गुज़र चुके हैं और कई सौ बरस ग़ुज़र चुके हैं और कई सौ बरस बाक़ी है। और बाज़ लोगों ने कहा है कि ज़माने का मजमूआ सिर्फ छः हज़ार बरस पर मुशतमिल है इसमें छः हज़ार कई सौ बरस गुज़र चुके है।
इसके बाद अल्लामा तिबरी अपनी तहक़ीक़ लिकते है किः- इन दोनों में सही क़ौल अज़रुए हदीस ए पैग़म्बर ,इब्ने अब्बास का है जो उन्होने कहा कि दुनिया ओ आखिरत के हफ्तों मे से एक हफ्ता है जिसकी मीआद सात बरस की है। बस मालूम हुआ कि नबी के इस इसशाद के वक़त तक छः हज़ार की है। बस मालूम हुआ कि नबी के इस इरशाद के वक्त तक छः हज़ार पाँच सौ बरस गुज़र चुके है और तकरीबन पाँच सौ बरस ग़ुज़र चुके है औ तक़रीबन पाँच सौ बरस बाक़ी हैं। (तिबरी जिल्द अव्वल सफा 5 ता 6)
इन दोनों रिवायतों और तिबरी की तहक़ीक़ का ग़लत होना आफताब की तरह रौशन ओ मुनव्वर है इस वक़्त दुनिया के फ़ना होने की मुददत सिर्फ पाँच सौ बरस मान ली गयी और मुस्लमानों ने उसे तसलीम भी कर लिया क्योकि इन रिवायतों के रावी अकाबिरीन सहाबा थे। ज़ाहिर है कि इस वाकिए को चौदह सौ बरस गुज़र चुके है। मगर दुनिया फ़ना नही हुई बल्कि अपनी जगह बरक़रार है।
इन्ही रावियों ने रसूल उल्लाह स 0 अ 0 से खुदा के रहने की जगह भी तज़वीज़ करा दी। चुनान्चे यह तिबरी फरमाते है कि एक शख्स ने यह सवाल किया आंहज़रत से कि या रसूल उल्लाह स 0 अ 0 यह तो बताईये कि दुनिया को ख़ल्क़ करने से पहले खुदा कंहा रहता था। फरमाया एक सियाह अब्र में जिस के नीचे भी हवा थी और ऊपर भी हवा थी फिर खुदा ने अर्श पानी पर पैदा किया (तिबरी जिल्द सफा 16)
यही तिबरी रक़मतराज़ है कि आसमान , ज़मीन और तमाम दरिया एक हैकल में है , हैकल कुर्सी में है। और खुदा के दोनों पांव उस कुर्सी पर है। और वह कुर्सी को उठाये हुए है। जिसकी वजह से कुर्सी कि हालत ऐसी हो गयी है कि वह खुदा के पांव में फटी हुई जूती की तरह मालूम होती है। (तिबरी जिल्द 1 सफा 16)
इसी तरह बहुत से मोअर्रेखीन व मोहक़्क़ीन ने अपनी अपनी किताबों में बेसरों पैर की अजीब अजीब मज़हका खेज़ हदीसें और रिवायतें बयान की है। जिनमें बुखारी सरे फेहरिस्त है। इन मज़मूम रिवायतों और हदीसों से यक़ीऩन इस्लाम क पाको पाकीज़ा तसव्वर पर ग़ैर मुस्लिमों की तरफ से तहक़ीरों इस्तेहाज़ा की ज़रबें पड़ती हैं और मुस्लिम मुआशेरा उसे ख़ामोशी से बर्दाश्त भी करता है।
मौजूदा तरक़्क़ी पजीर दौर में तक़रीबन हर तालीम याफता इन्सान के नज़रियात साइंस की जदीद तहक़ीक़ से वाबस्ता और हम आहंग है। इसलिए वह इन खुराफाती रिवायतों पर यकीन और भरोसा नही करता क्योकि तहक़ीकात ओ इन्केशापात से इस किस्म की रिवायते बिल्कुल ग़लत और मोहमल साबित होती है। मस्लन तिबरी ने अपनी तारीख मं दुनियां की मुददत सिर्फ सात हज़ार साल बतायी है जबकि इल्मेतब्कातुल अर्ज़ के माहेरीन की तहक़ीकात से पता चलता है कि 20 करोड़ साल पहले भी दुनिया थी और ज़मीन के तमाम खुश्की वाले हिस्से एक दुसरे से पैवस्त और जुड़े हुए थे। जिन्के चारो तरफ समुन्द्र था। चुनान्चे एक मशरूरो मुमताज़ सांइस दां रोनाल्ड़ शेलर अपने एक तहक़ीक़ी मक़ाले (ब उनवान ज़मीन के बर्रे आज़म बह रहे है।) में लिखता है कि दुनियां की चार अरब साठ करोड़ साला दुनिया की तारीख़ में समुन्द्र एक रिकार्ड बाज़े कि तरह फैलते और सिकुड़ते रहे है। और बर्रे आज़म तूफानी समन्दर में एक पुराने जहाज़ की तरह मुताहर्रिक रहे है।
यक़ीनन इस मोअम्मे के कुछ हिस्से अभी ग़ायब है। और तमाम तफसीलात पर सांइसदां अभी मुत्तफिक़ नही हो पाये लेकिन एक उमुमी ख़ाके पर सांइस दोनो की अकसरियत इस हैसियत से इत्तेफाक़ कर चुकी है कि अब सिर्फ एक नज़रिया नही रहा। बल्कि उसे सांइटिफिक सच्चाई तस्लीम कर लिया गया है। (मज़मुआ रीडर्स ड़ाइजेस्ट शुमार माह जुलाई सन 1971 ई 0)
उसके बाद रोनाल्ड शेलर फिर लिखता है।
यह तमाम बर्रे आज़म एक ज़बर्रदस्त ताक़त के ज़रिये जिसका मर्कज़ नामालूम है। मुखतलिफ सिम्तो में बह रहे है और उन्की रफतार एक सेमी 0 से 15 सेमी 0 सलाना है। जो कि इल्में तबक़ातुल अर्ज़ की रु से एक ज़बरदस्त रफतार है।
मसलन साईंस दानों को यह मालूम हुआ कि बहरे उकयानूस की चौड़ाई बढ़ रही है। योरप और शिमाली अमरीका एक दूसरे से ढाई सेमी 0 के हिसाब से साल ब साल दूर होते जा रहे है। समुन्दर के फ़र्श की हरकत का हिसाब लगाने के बाद सांईस दां यह मालूम कर सके हैं कि ख़ुश्की के तमाम बर्रेआज़म पहले किसी शक्ल में एक दूसरे से जुडे थे। सबसे पहले एक ज़बर्दस्त मशरिक़ो मग़रिब , दरार पैदा हुई जिसकी वजह से अफ्रीका और जुनूबी अमरीका जुदा हुए , अंटार्टिका और आस्ट्रेलिया अलाहिदा हुए और हिन्दुस्तान ढाई सेमी 0 सलाना के हिसाब से खिसकना शुरू हुआ। और बीस करोड़ साल से ज़मीन ने मौजूदा शक्ल इख़तेयार कर ली।
तिबरी के रावियों ने खुदा के बारे में जो जिस्मानी तसव्वुर पेश किया है या दुनिया के बारे में जो मुददत मुअय्यन की है इन दोनों को रोनाल्ड शेलर की सांइसी तहक़ीक़ ग़लत क़रार देती है।
खुदा के लिए उस अज़ीम सांईसदानों का कहना है कि वह एक ज़बर्दस्त ताक़त है जिसका मर्कज़ नामालूम है और दुनिया के बारे में उनका ख़याल है कि बीस करोड़ साल से इसी तरहं क़ायम है। और इसके साथ ही अमीरल मोअमेनीन हज़रत अली अ 0 के इस क़ौल की भी सिदाक़त समझ में आ जाती है कि खुदा ने मेरे भाई मुहम्मद के नूर को क लाख चौबीस हज़ार साल क़ल्ब अपने नूर से ख़ल्क़ किया।
एक तहक़ीक़ी ज़ेहन रखने वाला इन्सान इस ग़ौरो फिक्र के बाद यह नतीजा अख़ज़ करने पर मज़बूर है कि अव्वलीन दौर के मोअर्रेखीन के यहां भी बहुत सी ऐसी रिवायत पायी जाती हैं जिनकी सिरे से कोई हक़ीक़त नही है।
तारीख और ज़मानें के अलावा जो हालात और वाक़ियात मैंने इस किताब के गुज़िशता सफहात मं मरकूम किये है वह तक़रीबन सही है। क्योंकि उनका ज़िक्र कुरआने मजीद में मौजूद है। और मोअतबर रिवायात से भी उनकी तहक़ीक़ हर ज़ाविये से हो चुकी है। मसलन हज़रते आदम के दो फ़रज़न्दों में से एक का दुसरे को क़त्ल कर देना , हज़रते नूह के ज़माने में तुफान का आना , हज़रते इब्राहिम का आग में ड़ाला जाना , खुदा की राह में हज़रते इस्माइल का ज़बह होने पर आमादा होना और हज़रते यूसुफ़ का किस्सा वग़ैरह।
इन तमाम अम्बिया व मुरसलीन के हालात से यह भी वाज़ेह है कि हर नबी ने अपने बाद के लिये अपना खलीफा और जानशीन अपनी ज़िन्दगी में खुद मुक़र्रर किया है। इस मसले को उम्मत पर नहीं छोडा। फिर भला हज़रते रसूले खुदा स 0 अ 0 अपने बाद इस अहम मसले को उम्मत के रहमो करम पर क्यों कर छोड़ते।
यह भी वाज़ेह है कि तमाम अम्बियाये कराम इस दुनिया में सिर्फ बनी नौ इन्सान की हिदायत के लिए आये थे , मुल्क गीरी , बादशाहत , लश्कर कशी , खुंरेज़ी , तलवार , के ज़ोर पर अपना कलमा पढ़वाने या ज़बर्दस्ती लोगों को अपने दींन का पाबन्द बनाने के लिए नही आये थे। वह खुदा के इताअत गुज़ार बंदे थे।
अहले आलम को अमनो आश्ती का पैग़ाम देना , तमददुनों मोआशेरत का दर्स देना और लोगों को आखेरत का तलबगार बनाना उनका काम था और उनके खोलफा और औसिया भी उन्ही की पैरवी करते रहे। इसी तरह पैग़म्बरे इस्लाम के बाद जो लोग उनके किरदार व सीरत का मुकम्मल नमूना बने वही सच्चे जानशीन और ख़लीफा हैं न कि वह हज़रात जो ज़बर्दस्ती मस्नदे खिलाफत पर क़ाबिज़ हुए।
14.12.2017
फेहरिस्त
अर्ज़े नाशिर 2
इस्लाम और तौहीद 17
इस्लाम 19
पहला दरजा 19
दूसरा दरजा 20
तीसरा दरजा 21
चौथा दरजा 22
पांचवा दरजा 23
इब्तेदाए आफ़रीनश और अहदे मिसाक़ 32
अबुल बशर हज़रत आदम अ 0 43
हज़रत शीश अ 0 54
हज़रत इदरीस अ 0 56
हज़रत नूह अ 0 58
कश्ती की तैयारी 62
तूफ़ान 66
हज़रत नूह अ 0 से शैतान की गुफ्तगू 74
हज़रत नूह अ 0 की रहलत 75
तहक़ीकात व इन्कशाफ़ात 78
हज़रत हूद अ 0 81
इरमें ज़ातुल - एमाद की हक़ीक़त 89
हालाते हज़रते सालेह अ 0 93
नाकेय सालेह का अन्जाम और अज़ाब 98
असहाबे रस का वाक़ेया 101
हज़रते सालेह का मदफ़न 103
सात चीज़ें 105
हालाते हज़रते इब्राहीम अ 0 107
आज़र की हक़ीक़त 110
तारीख़े इस्लाम का आग़ाज़ 112
हज़रते इब्राहीम के तबलीग़ी कारनामे 115
नमरूद का इबरत नाक अंजाम 122
जिलावतनी और हिजरत 124
हज़रते इस्माईल कि विलादत और हिजरत 126
हज़रते इसहाक़ की विलादत 130
हज़रते इस्माईल की कुरबानी 131
हज़रते इब्राहीम की रेहलत 135
हज़रते इस्माइल और इस्हाक़ का मुख़तसर तअर्रुफ 136
हज़रते इस्माइल 136
हज़रते इस्हाक़ 138
हज़रते लूत अ 0 140
क़ौमे लूत में लवाता (एग़लाम) की इब्तेदा कब और कैसे हुई 140
जुलक़रनैन का वाक़ेया 147
याजूज और माजूज 151
दीवार की तामीर 152
समन्दर की सैर 154
नमाज़ी से मुलाक़ात 155
ज़ुलक़रनैन से चन्द सवालात 156
मुर्दों की खोपड़ियां 157
आबे हयात की तलाश 158
हज़रते याक़ूब व यूसूफ़ अ 0 165
हज़रते यूसुफ़ का ख़्वाब 166
बरादराने यूसुफ़ के रश्क और हसद का सबब 167
फ़रेब कारियां 168
हज़रते यूसुफ़ का कुएं से बाहर निकलना और फ़रोख़त होना 170
हज़रते यूसुफ़ अज़ीज़े मिस्र और जुलैख़ा 172
नीबू और छुरी 176
हज़रते यूसुफ़ और क़ैदख़ाना 177
हुकुमते मिस्र में हज़रते यूसुफ का मन्सब 181
भाईयों से मुलाक़ात 183
बीनायी की वापसी और हिजरत 190
ज़ुलैखा से हज़रते यूसुफ का निक़ाह 191
वफात और मदफन 193
हज़रते अय्यूब अ 0 195
हज़रते जुलकफल अ 0 199
हज़रते शुऐब अ 0 199
हज़रते मूसा बिन इमरान अ 0 201
दाईयों की तलाश 206
फिरऔन की दाढ़ी 209
तब्लीग़ की इब्तेदा 211
क़िब्ती की मौत 213
मूसा का मद्दीन में दाख़िला और शादी 215
असाऐ मूसा 217
हज़रते मूसा की मराजेअत 218
कलीमउल्लाह 222
हामान और क़ारून 223
क़ारून 224
दरबारी मारके आराई 225
फिरऔन की ग़रक़ाबी 233
बनी इस्राइल और मन्नो व सलवा 236
बाबे हत्ता की हक़ीक़त 239
औज बिन औक़ 240
तौरेत का नुजूल 242
गाये का क़िस्सा 243
बैतुलमुक़द्दस की बुनियाद 245
यहूदियों की मुशरेकाना व जाहिलाना सरिश्त 245
जनाबे हारून की रेहलत 248
वफ़ाते मूसा अ 0 249
हज़रते यूश बिन नून अ 0 252
हज़रते हिज़क़ील बिन बोरी अ 0 253
हज़रते इल्यास अ 0 255
तालूत व जालूत 258
हज़रते दाउद अ 0 263
हज़रते सुलेमान अ 0 268
आराइश और जेहबाइश 270
मखलूक़ात की दावत 271
चींटी से मुलाकात 272
मलक़ए बिलक़ीस बिन्ते शराजील का वाक़ेया 273
कस्रे सुलेमान मे बिलकीस का वरुद 277
घोड़ो की क़ुरबानियां 278
बैतुलमुक़द्दस की तामीर 279
हज़रते सुलेमान की वफात 280
मुख्तलिफ अम्बिया व औसिया 281
बखते नस्र के वाक़ेयात 283
हज़रते दानियाल अ 0 287
हज़रते अज़ीज़ अ 0 292
हज़रते यूसुफ बिन मता अ 0 293
हज़रते ज़करिया अ 0 294
हज़रते यहिया बिन ज़करिया अ 0 296
वाकेयात में हमआंहगी और यकसानियत 300
हज़रते ईसा इब्ने मरियम 301
हज़रते मरियम की हिजरत 306
हज़रते ईसा के मोअज़िज़े 307
सदक़े की अहमियत 308
नुज़ूले माएदा 309
तब्लीग़ी सरगरमियां 311
हज़रते ईसा के हव्वारीन 317
हज़रते ईसा अ 0 का आसमान पर उठाया जाना 323
हिन्दुस्तान से पैग़म्बरों का ताअलुक़ 326
हज़रते आदम अ 0 और हिन्दुस्तान 328
हज़रते नूह अ 0 और हिन्दुस्तान 329
हज़रते मूसा और दीगर अम्बिया 333
हज़रते ईसा और हिन्दुस्तान 335