मुझे रास्ता मिल गया
समूहन विभिन्न
लेखक डाॅ. तेजानी समावी
पुस्तक की भाषा هندی
मुद्रण वर्ष 1404

मुझे रास्ता मिल गया

लेखक – मुहम्मद तीजानी समावी ट्यूनीशया

उर्दू तरजुमा – अल्लामा सैय्यद ज़ीशान हैदर जव्वादी

नोटः ये किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क के ज़रीऐ अपने पाठको के लिऐ टाइप कराई गई है और इस किताब मे टाइप वग़ैरा की ग़लतीयो को सुधार दिया गया है।

Alhassanain. org/hindi


मेरी हयात के मुख़तसर इशारे

मुझे आज तक याद है के बचपन मे मेरे वालिदे मोहतरम मुझे किस तरह इलाक़े की मस्जिद की तरफ़ ले गऐ थे जहॉ माहे रमज़ान मे नमाज़े तरावीह पढ़ाई जाती थी जबकि मेरी उम्र सिर्फ दस साल थी और मुझे नमाज़ियो पर मुक़द्दम कर दिया गया था।

जिस अम्र पर मैं अपने ताअज्जुब को पोशीदा ना रख सका। मैं ये जानता था के मेरे मुअल्लिमे क़ुरआन ने तमाम उमूर को मुरत्तब कर लिया था कि मैं जमाअत के साथ दो या तीन राते नमाज़े तरावीह पढाऊं वरना मैं आदतन इलाक़े के बच्चों के साथ जमाअत के पीछे पढ़ा करता था और इस बात का इंतेज़ार करता था कि इमाम क़ुरआने करीम के निस्फ सानी यानी सूर-ऐ-मरियम तक पहुंच जाऐं और चूंकि मेरे वालिद को ये शौक़ था कि मुझे दीनी मदरसे में क़ुरआन की तालीम दिलवाऐं और खुद मेरे घर मे रात के बाज़ हिस्सों में वो इमामे मस्जिद जो मेरे अक़रुबा मे थे और नाबीना थे हिफ़ज़े क़ुरआन का काम अंजाम दिया करते थे और मैं इस मुख़तसर उम्र में निस्फ़ क़ुरआन हिफ़ज़ कर चुका था।

मेरे मुअल्लिम ने चाहा कि मेरे ज़रिये अपने फ़ज़लो इजतेहाद का इज़हार करे तो तिलावत के दौरान रुकु के मवाक़े की भी तालीम दी और बार-बार उसकी तकरार की ताकि मेरी समझ का यक़ीन हासिल हो जाऐ और जब मैं इम्तेहान में कामयाब हो गया और तवक़क़ो के मुताबिक जमाअत के साथ नमाज़ और तिलावत तमाम कर चुका तो मजमा दस्त-बोसी के लिऐ मुझ पर टूट पड़ा।

सब मेरे हाफ़िज़े से ख़ुश और मेरे मुअल्लिम के शुक्र गुज़ार थे। लोग मेरे वालिद को मुबारकबाद दे रहे थे और सब के सब अल्लाह की हम्दो सना में मसरूफ़ थे कि उसने नेमते इस्लाम के साथ शैख़ की बरकात से भी सरफ़राज़ फ़रमाया है।

मैंने उस दौर मे ऐसेन अय्याम भी गुज़ारे हैं जो मरे हाफ़िज़ से महो नहीं हो सकते इस लिऐ कि मैं मुसलसल देख रहा था के लौग मेरे क़द्रदां हैं और मेरी शोहरत सारे शहर तक फ़ैल चुकी है। माहे रमज़ान की उन रातों ने मेरी ज़िन्दगी पर ऐसी छाप लगा दी के उसके आसार आज कत बाक़ी हैं। इस तरह के मेरे लिऐ जब भी मसाएल मुशतबा हो जाते हैं मैं एक ग़ैबी कूवत का एहसास करता हूँ जो मुझे सही राह की तरफ़ ले जाती है मैं जब भी शख़्सियत के जोफ़ और ज़िन्दगी की बेवक़अती का एहसास करता हूँ तो वो यादें मुझे रुहानियत के आला दरजात की तरफ़ ले जाती हैं और मेरे ज़मीर में वो ईमान का शोला भड़का देती हैं जो हर ज़िम्मेदारी संभालने के क़ाबिल बना सके।

कमसिनी में इमामते जमाअत की ज़िम्मेदारी जो मेरे वालिद और उस्ताद ने मेरे हवाले की थी उसने मुझे ये शऊरे मुस्तक़िल दिया की मैं उस सतह पर पहुँचने से क़ासिर हूँ जिसे मैं निगाहों में रखे हूँ या जिसका लोग मुझ से मुतालेबा कर रहे हैं इस लिऐ मैंने अपने बचपने और शबाब का ज़माना निस्बतन इस्तेकामत से ग़ुज़ारा है। जहां अकसर औक़ात बराअत , हस्बे इत्तेला और तक़लीद का दौरे दौरा था इनायते इलाहिया ने मुझे इस क़ाबिल बना दिया था कि अपने तमाम भाईयौं में सकून और संजीदगी के ऐतेबार से मुमताज़ हो जाऊ और मेरे क़दम मआसी और मोहलक़ात में फ़सलने ना पाऐं। मैं इस बात को नहीं भूल सकता मेरी ज़िनदगी में मेरी वालेदा का भी बहुत असर हैं। मेने जब आँख खोली तो उन्होने मूझे कूरआने करीम की तालीम दी। नमाज़ो तहारत सिखाई और मेरी तरबियत पर खुसूसी तवज्जोह दी क्यूंकि मैं उनका पहला फरज़न्द था और वो ये देख रही थी के उनके पहलू मे इसी घर में उनकी सौत भी थी जो उनसे बरसों पहले से थी और उसकी औलाद लगभग उनके हमसिन थी तो मेरी मां को मेरी तालीमों तरबियत से सुकून मिलता था और वो गोया इस तरह अपनी सौत और अपने शौहर की दूसरी औलाद के मुक़ाबले मे मसरूफ रहती थी मेरे नाम मे ये तीजानी जो मेरी वालिदा ने क़रार दिया है ये समावी ख़ानदान में ख़ास अहमियत रखता है जिसने तरीक़-ऐ-तीजानी को इस वक़्त गले से लगाकर रखा है जब शैख़ अहमद तीजानी की औलाद में से किसी ने जज़ाएर की वापसी में शहरे-क़फ़सा में क़याम किया था और समावी घराने को अपनी मंज़िल बनाया था उस ज़माने मे बहुत से अहले शहर खुसूसन इल्मी और मालदार इस सूफ़ी तरीक़े को अपना लिया था और इस कि तरवीज मे मसरूफ थे और चूंकि मेरा नाम तीजानी था लिहाज़ा मैं समावी घराने में बहुत मक़बूल हो गया। जहां बीस से ज़्यादा घराने आबाद थे और इस से बाहर भी तीजानी तरीक़े ताअल्लुक रखने वालो में मेरी महबूबियत बढ़ती गयी और इसी लिये अकसर बुज़ुर्ग नमाज़ी जो माहे रमज़ान की रातों में हाज़िर होते थे मेरे सर और हाथ के बोसे लेते थे और मेरे वालिद को ये कह कर मुबारकबाद पेश करते थे कि ये सब शैख़ अहमद तीजानी के बरकात का फ़ैज़ है।

क़ाबिले ज़िक्र बात ये है के तरीक़ा-ए-तीजानीया मग़रिब , जज़ाएर , तयूनस , लीबिया , सूडान और मिस्र में बाकसरत मुंतशिर हुआ और इसको गले लगाने वाले किसी ना किसी मिक़दार मुतास्सीब भी होते हैं और इसी लिऐ मकामाते औलिया की ज़ियारत नहीं करते हैं और उनका ऐतेक़ाद ये है के तमाम औलिया ने तसलसुल के साथ एक दूसरे से इल्म लिया है लेकिन शैख़ अहमद तीजानी ने बराहे रास्त अपना इल्म रसूललाह (स) से हांलांकि वो ज़माना-ऐ-रिसालत से तेरह सदी पीछे थे और उन लोगो की रवायत ये है के शैख़ अहमद तीजानी ने खुद बयान किया है के रसूललाह (स) उनके पास हालाते बेदारी मे तशरीफ़ लाते थे ना कि ख़ाब में जिस तरह ये लोग कहते है कि उनके शैख़ की मुरत्त्ब की हुई नमाज़ चालीस दिन के खत्मे क़ुरआन से बेहतर है। हम इख्तेसार का लिहाज़ रखते हुऐ तीजानियत के इस मिक़दार मे तआरुफ़ पर इकतेफ़ा करते है और इंशाअल्लाह आईनदा किसी दूसरे मक़ाम पर कदरे तफ़सील के साथ पेश करेगें।

मैं शहर के दूसरे नौजवानों की तरफ़ इसी ऐतेक़ाद पर पला बढ़ा कि हम सब के सब बेहम्देलिल्लाह मुसलमान और अहले सुन्नत-वल-जमाअत हैं। हम सब का मसलक इमामे मदीना मालिक इब्ने अनस का मज़हब है ये और बात के हम सूफ़ी तरीक़ो में मुखतलिफ़ हिस्सों में बटे हुऐ है। जैसा के ख़ुद शहरे क़फसा में भी इतने शोबे पाऐ जाते है। तीजानीया , क़ादिरया , रहमानिया , सलामिया , ईसाविया और इनमें से हर तरीक़े के अंसारो इत्तेबा हैं जो इन के क़सायदो अज़कारो औराद को हिफ़ज़ करते हैं जिनको मुख्तालिफ़ इजतेमाआत और शब्बे दारियों में अक़दे ज़वाज , खतना या कामयाबी या नज़्र की मुनासिबत से पेश हैं। ये सही है के इसके बाज़ नुक़सानात भी हैं लेकिन इसके बावजूद इन तरीक़ो ने शआऐरे दीन और ऐहतरामे औलिओ सालेहीन के तहफ़फ़ुज़ में बड़ा कारे नुमायां अंजाम दिया है।

हज-जे-बैतुल्लाहिल-हराम

मेरी उम्र अठठारह बरस की थी जब तयूनस की क़ौमी जमहूरिया ने इस बात पर इत्तेफाक़ किया के मुझे मक्का-ऐ-मुकर्रिमा में मुनअक़िद होने वाले इसलामी और अरबी इजतेमा में शिरक़त की दावत दी जाऐ जिस में पूरे तयूनस से सिरफ़ छह अफ़राद का इंतेख़ाब किया गया था और मैं सब में सिनो साल के ऐतेबार से छोटा और इल्मो सक़ाफ़त के ऐतेबार से कमतर था इसलिये के उनमे दो मदरसों के मुदिर थे तीसरा दारुल-हुकूमत मे उसताद था चौथा रिशता-ऐ-सहाफ़त से वाबसता था और पाँचवे के ओहदे से मैं वाक़िफ़ नही था लेकिन ये मालूम था कि उस ज़माने में खुद वज़ीर-तरबियत के क़राबतदारों में शुमार होता था हमारा ये सफ़र बराहे रासत नही था बलकि पहले हम योनान के दारुल-हुकूमकत ऐथेनज़ मे वारिद हुऐ। वहां तीन दिन ग़ुज़रने के बाद अरदन के दारुल-हुकूमकत अमान मे वारिद हुऐ वहां चार दिन ग़ुज़ारने के बाद सऊदिया पहुँचे जहाँ कानफ़्रेन्स मे शिरकत की और हज-जो-उमरा के मनासिक अदा किऐ। पहले पहले हुदूदे बैतुल्लाह में दाखिल होते हुऐ जो मेरे एहसासात थे उसका तसव्वुर नही हो सकता ऐसा मालूम होता था के मेरा दिल धड़कनों के सबब पसलियों को तोड़ कर बाहर निकलना चाहता है ताकि बराहे रास्त उस घर का मुशाहिदा कर सके जिसके खवाब देखते रहता था। ऑसुओं का एक सैलाब जारी हो गया जो बज़ाहर थकने वाला नही था और ऐसा मालूम होता था कि मुझे मलाएका तमाम हाजियों के सरों से बालातर उठाकर सतहे काबा तक ले जाना चाहते हैं जहाँ मैं तलबिया पढूगा----- लब्बेका अल्लाहुम्मा लब्बेक।

हज्जाजे किराम की तलबिया की आवाज़ें सुनकर मैने ये नतीजा अख्ज़ किया की इन्होंनें इस सफ़र की तैयारी , सामान की फ़राहमी और अमवाल की जमाआवरी में मुददतें गुज़ारी है लेकिन मेरी आमद अचानक बग़ैर किसी तैयारी के थी और मुझे याद है के मेरे वालिद ने जब हवाई जहाज़ के टिकट देखे और उन्हें मेरे सफ़र का यक़ीन हो गया तो अचानक रो पड़े और कमाले मोहब्बत से मुझे बोसे देकर इस तरह रुख्सत किया “बेटा मुबारक हो अल्लाह ने ये तय कर दिया था कि तुम इस कमसिनी में मुझ से पहले हज करो और क्यू ना होता तुम मेरे सरकार अहमद तीजानी की औलाद हो। बैतुल्लाह मे पहुँच कर मेरे हक़ में दुआ करना कि वो मेरे

गुनाहों को मुआफ़ कर दे और हज-जे-बैतुल्लाह की तोफ़ीक़ करामत फ़रमाऐ। इन हालात की बिना पर मेरा ख़याल था कि अल्लाह ने मुझे पुकारा है और अपनी इनायत को मेरे शामिले हाल कर दिया है और मुझे उस मंजिल तक पहुँचा दिया है जहाँ पहुँचने से पहले बेशुमार अफ़राद उममीदो हसरत लिये दुनिया से ग़ुज़र जाते हैं। अब मुझ से ज़्यादा तिलविये की ज़िम्मेदारी किस पर है इसलिए मै नमज़ो तवाफ़ों सई मे बहुत ज़्यादा दिलचस्पी लेता था यहाँ तक के ज़म ज़म का पानी पीने और पहाड़ो पर चढ़ने मे भी सब से आगे निकालना चाहता था ताकि ज़ब्ले नूर की बलन्दी पर पहुँच कर गारे हीरा की ज़ियारत करूँ और येही वजह थी के ऐक सूडानी जवान के अलावा जिसका मै ‘सानी-असनीन था कोई मुझसे आगे ना जा सका मै वहाँ जाकर रेत पर लोटने लगा गोया मुझे सरकारे दो आलम की आग़ोश मरहमत मिल गई है और मै उनकी ख़ुशबू महसूस कर रहा हूँ कितने हसीन थे वो मनाज़िर वो यादें जो मेरे दिल मे गहरा असर छोड़ गई जो कभी महो होने वाला नहीं है दूसरी इनायते परवरदिगार जिसने तमाम वुफूद के दरमियान मुझे महबूब बना दिया था और हर शख्स मेरा पता मांगने लगा था और खुद मेरे साथियों ने भी मुझसे इजहारे मोहब्बत करना शुरू कर दिया था। जबकि पहली मुलाक़ात मे हम लोग तयूनस के दारुल- हुकूमत मे जमा हिए थे तो सबने मुझे हिकारत की नज़र से देखा था और मैंने इस को महसूस भी कर लिया था लेकिन ये समझ कर सब्र कर लिया था के अहले शुमाल अहले जुनूब को हक़ीर और पस-मंदा ही शुमार करते हैं लेकिन बहुत जल्द सफ़रों मोतमर के दोरान उनकी निगाह बदल गई और तमाम वुफूद के दरमियान वो सुर्खरू हो गये कि मैं मुताअद्दीद अशआरो कसाएद का हाफिज़ था और इसी बिना पर मेने मुख्तलिफ़ मुकाबलों मे इनामात भी हासिल किए थे के मुल्क कि वापसी तक मेरे पास मुख्तलिफ़ मुल्कों के बीस अफराद के पते मोजूद थे सउदिया मे हमारा क़याम बीस दिन रहा जहां हमने उल्मा से मुलाक़ात की उनके बयानात में शिरकत की थी और मै ज़ाती तौर पर वहाबियों के बाज़ अकाएद से मुतास्सिर हुआ और मेरी ये आरज़ू हो गई के काश सारे मुसलमान इसी रास्ते पर चलें और मेरा ये ख़्याल था कि अल्लाह ही ने इन लोगो को अपने घर की हिफाज़त के-लिए मुन्तख़ब किया है लिहाज़ा ये रूऐ ज़मीन की तमाम मख्लूक़ात से ज़्यादा साहिबे इल्म और ज़्यादा पाकीज़ा नफ़्स हैं इन्हें अल्लाह ने पेट्रोल की दौलत इसी लिए दी है ताकि ये अल्लाह के मेहमानों की ख़िदमत करें और उनकी सलामती का इंतेज़ाम करें चुनांचे मैं अपने वतन वापस आया तो सऊदिया का मख़सूस लिबास पहन कर आया और उस इस्तेक़्बाल को देख कर हैरतज़दा हो गया जिसका ऐहतेमाम मेरे वालिद ने किया था के मुख्तलिफ़ जमाअतें स्टेशन पर हाजिर थीं और उनके आगे-आगे सूफी मसलक इसाविया , तीजानीया , क़ादिरया के शेयूख़ भी मौजूद थे जिनके साथ तबल और दफ़ भी बजाऐ जा रहे थे लोगो ने शहर की मुख्तलिफ़ सड़कों पर तकबीरों तहलील के साथ मुझे गश्त कराया और हम जब किसी मस्जिद के क़रीब से गुज़रते थे तो उसके आस्ताने पर थोड़ी देर के लिए रोके जाते थे और लोग हमारी दस्त-बोसी के लिए टूट पड़ते थे। ख़ुसूसन जो मुझे बोसा भी देते थे और ज़ियारते बेतुल्लाह ज़ियारते क़ब्रे रसूल के शोक़ में गिराया भी रहे थे और उन्होने मुझसे पहले इस उम्र के आदमी को हज करते ना देखा था। मैंने उस वक़्त अपनी ज़िन्दगी के हसीन तरीन लम्हात गुज़ारे हमारे घर में सलाम करने और मुबारकबाद देने के लिए कबारो अशराफ़ हाज़िर हुए और अक्सर मुझसे ये मुतालीबा किया जाने लगा के मैं अपने वालिद की मौजूदगी में फ़ातेहा और दुआ पढ़ूँ जिससे में कभी शर्मिंदा होता था कभी मेरे होसले बढ़ जाते थे मेरे वालिदा ने ज़ायरीन के हर गिरोह के निकाल जाने के बाद मेरे पास आकर ख़ुशबू सुलगाती थीं और तावीज़ का ऐहतेमाम करती थीं ताकि मैं हासीदों के शर और शयातीन के मक्र से महफूज़ रहूँ।

मेरे वालिद ने तीजानी बारगाह में तीन रात मुसलसल इस शान से हाज़िरी दी कि रोज़ाना वलीमे के लिए एक दुन्बा ज़िबहा होता था और लोग मुझसे हर छोटी बड़ी बात के बारे में सवाल करते थे मेरे जवाब ज़्यादातर सउदियों कि मदहों सना और नशरे इस्लाम और नुसरते मुसलेमीन के बारे में उनकी ख़िदमात पर मुश्तमिल होते थे। शहर वालों ने मुझे हाजी का लक़ब दे दिया था और इस लफ़्ज़ से मेरे अलावा किसी और का तसव्वुर नहीं पैदा होता था। इसके बाद मेरी शोहरत और बढ़ गई और ख़ुसूसन जमाअते अख्वाने मुस्लेमीन जैसे दीनी हल्क़ों में मैं मस्जिदों का दोरा करके लोगों को जरिहों का बोसा देने और लड़कियों के मस करने को मना करता था और तमाम तर कोशिश यही थी कि मै इन्हे समझा सकूँ कि ये सब शिर्क है। मेरे निशाते अमल में और वुसअत पैदा हुई तो मैं मस्जिदों में जुमे के खुतबे से पहले दीनी दरस देने लगा और मस्जिदे अबू-याक़ूब से मस्जिदे-कबीर तक हर जगह हाज़िर होने लगा। इसलिऐ के जुमे कि नमाज़ दोनों मक़ामात पर मुख्तलिफ़ औक़ात में होती थी इसके अलावा इतवार के दिन मेरे हलक़ा-दरस में हर कालेज के तुल्लाब भी हाज़िर होते थे। जहां मैं टेक्नोंलाजी और तिब्बीयात के दरस देता था। लोग मेरे एक़दामात से ख़ुश होते थे और उन के मुहब्बतों ऐहतेराम में बराबर इज़ाफ़ा हों रहा था कि मैंने उन्हें अपने वक़्त का एक बड़ा हिस्सा दिया था कि मैं उनके अफ़्कार से उन बदलियों को छांट दूँ जो फ़लसफ़े के मुल्हिद , माददी और कम्युनिस्ट उस्तादों ने पैदा करदी थी। लोग बड़ी बेचैनी से इन इजतेमाआत का इंतेज़ार किया करते थे और बाज़ तो मेरे घर भी आया करते थे। मैंने इस काम के लिए बहुत सी दीनी किताबें भी ख़रीदी और इस के मुतालेऐ पर भी ज़ोर दिया ताकि मैं उस सतह तक पहुंच जाऊ जहां मुखतलिफ़ सवालात के जवाबात दिऐ जा सकते हों। उसी साल जिस साल मैंने हज-जे-बैतुल्लाह किया मैं अपने निस्फ़्दीन का भी मालिक हो गया यानी मेरी वालिदा की ये ख़्वाहिश सामने आई कि अपने मरने से पहले मेरा अक़्द कर दें क्योंकि उन्होने ही मेरे वालिद की दूसरी तमाम औलादों की तरबीयत की थी और उनकी शादियाँ की थीं तो अब उनकी तमन्ना थी की मुझे नोशा की शक्ल में देखें। अल्लाह ने उनकी तमन्ना को पूरा कर दिया और मैंने उनके हुक्म की इताअत में एक ऐसी लड़की से अक़्द कर लिया जिसे मैंने देखा भी नहीं था। वो मेरे पहले दो बच्चों की विलादत तक ज़िंदा रही और उसके बाद दारे दुनिया से रुख्सत हो गई। इस आलम में कि वो मुझसे खुश थी और उनसे दो साल पहले मेरे वालिद का इंतेक़ाल हुआ जबकि वो हज्जे-बैतुल्लाह भी कर चुके थे और वफ़ात से पहले तौबा-ऐ-खालिस भी कर चुके थे।

एक ऐसे दौर में जब इसराईल के मुक़ाबले मे शिकस्त खाने के बाद अरब और मुसलमान इंतेहाई ज़िल्लत-आमेज़ ज़िंदगी गुज़ार रहे थे अचानक लीबिया का इंकेलाब हुआ और काएदे इंकेलाब की शक्ल मे एक ऐसा जवान सामने आया जो इस्लाम का नाम लेता था , लोगो के सामने मस्जिद मे नमाज़ पढ़ता था और उस की आज़ादी का नारा लगता था। इन नारों की बिना पर मैं भी उस जवान का गिरवीदा हो गया। जिस तरह अरबी और इस्लामी मुल्कों मे आम नोजवानों का हाल होता है और हमने मज़ीद मालूमात हासिल करने के लिए लीबिया का एक सकाफती सफर मुरत्तब किया जिसमे शोब-ऐ-तालीम के चालीस अफराद साथ थे। हमने उस इलाक़े का दोरा इंकेलाब के इब्तेदाई दौर में किया और निहायत दर्जा-ऐ- खुशहाल वापस आऐ तो हमने देखा की हालात एक ऐसे मुस्तकबिल की ख़बर दे रहे है जो अरबी और इस्लामी कोम के लिए दर्जा सालह और खुशगवार होगा।

इन चंद बरसों के दौरान बाज़ दोस्तों से मुरासेलत का सिलसिला जारी रहा और मेरे शोंक मे इज़ाफा होता रहा मेरे ताल्लुक़ात का मरकज़ वो चंद अफराद थे जिन्होने मुलाक़ात पर ज़्यादा ज़ोर दिया था। चुनांचे मेने ये निज़ाम मुरत्तब किया कि गर्मियों में तीन महीनों कि छुट्टियों में एक तवील सफ़र करूँ जिसका प्रोग्राम ये बना कि ख़ुश्की के रास्ते सफ़र लीबिया से शुरू किया जाऐ उसके बाद मिस्र उसके बाद लुबनान उसके बाद शाम , अरदन और आखिर में सउदिया जहां मनासिके उमरा अदा करना थे और उन वहाबियों से तजदीदे अहद करना था जिनके अक़ाएद की नौजवानों के हल्कों में और अख़वाने मुस्लेमीन की मस्जिदों में बकसरत तबलीग़ की थी और उस दौर में मेरी शोहरत मुख्तलिफ़ अतवारों जवनिब में पहुँच चुकी थी और अक्सर सामेईन जुमा पढ़ने के लिए और उन बयानत में शिरकत करने के लिए आ जाया करते थे और फिर अपने इलाक़े में इसका चर्चा किया करते थे यहाँ तक कि ये ख़बर सूफियों के बुज़र्ग शैख इस्माईल बावफ़ी तक पहुंची जिनके पैरो और मुरीद तयूनस और उसके बाहर फ्रांस और जर्मनी में बकसरत पाऐ जाते हैं और उन्होंने अपने वुक़्ला के ज़रिये मुझे अपनी ज़ियारत कि दावत दे दी। उनके वुक़्ला ने मुझे एक मुफ़स्सल ख़त लिखा जिस में इस्लाम और मुस्लेमीन के बारे में मेरी ख़िदमात की क़द्रदानी करते हुऐ ये दावा किया के ये सारे आमाल ज़र्रा बराबर भी ख़ुदा से क़रीब नहीं कर सकते जब तक किसी शैखे आरिफ़ के वसीले से ना हों और अपने हलक़े की मशहूर हदीस का हवाला देते हुऐ कि “जिस के पास कोई शैख नहीं होता उसका शैतान होता है ’’ या ये कि “हर शख़्स के लिए एक शैख़ का होना ज़रूरी है वरना आधा इल्म नाक़िस रह जाऐगा ’’ ये कह कर इस बात की बशारत दी के साहिबुज़्ज्मान यानी शैख इस्माईल ने मुझे ख्वास में शामिल करने का फैसला कर लिया है। ये ख़बर सुनकर मेरे होशो हवास उड़ गऐ और मै इनायते इलाहिया पर बेइख्तियार रो पड़ा कि जिसकी बिना पर मैं मुसलसल बलन्दियों की मंज़िलें तय कर रहा था। इसलिऐ कि मैं इससे पहले माज़ी में सैय्यद हादी हफ़ियान का पैरो रह चुका हूँ जिनके मुख्तलिफ़ करामातों मोजिज़ात नक़्ल किऐ जा चुके हैं और उसके बाद सैय्यद सालेह और सैय्यद जीलानी की सोहबत का शर्फ़ भी हासिल कर चुका हूँ और अब शैख़ इस्माईल कि बारगाह में तलब किया गया हूँ। मैं बेचैनी से उन से मुलाक़ात का इंतेज़ार करता रहा। यहाँ तक की जब शैख़ के घर में दाख़िल हुआ तो एक-एक चेहरे को हैरतो हसरत से देखता रहा कि मजलिस में मुरीदों और मशाएख़ का मजमा था और सब इंतेहाई सफ़ेद लिबास पहने हुए थे। मरासीमे हाज़री की अंजाम देही के बाद शैख़ इस्माईल हुजरे से बाहर तशरीफ लाये और सारे मजमे ने ऐहतेराम से उनके हाथ चूमे और एक नुमाइंदे ने इशारा किया कि शैख़ ये ही है लेकिन मैने किसी जज़्बे का इज़हार नहीं किया इस लिए कि मैं इन हालात के अलावा किसी और बात का मुंतज़िर था और मेरे ज़ेहन में शैख़ के वक़ील और मुरीदों ने करामतों मोजिज़ात की जो ख्याली तस्वीर बनाई वो कुछ और ही थी। मुझे शैख़ एक मामूली आदमी नजर आऐ जिनके चेहरे पर ना कोई विकार था ना कोई हैबत , थोड़ी देर के बाद वकील ने मुझे उनके सामने पेश किया उन्होने “ मरहबा ” कहते हुऐ दाहिनी तरफ बैठाया और खाना पेश किया। खाने पीने के बाद फिर महफिल जम गई और मुझे वकील ने दोबारा शैख़ के सामने पेश किया ताकि मैं उनसे अहद और विरद हासिल कर सकूँ। मजमे में मुझे मुबारकबाद दी और मुझसे गले मिले और मुझे ये अंदाज़ा हुआ कि उन्होने मेरे बारे मे बहुत कुछ सुन रखा है और इसी कदरदानी ने मुझे इस बात पर आमादा किया कि मैं शैख़ के बाज़ जवाबात पर जो सवाल करने वालों को दिये गऐ थे एतेराज़ करूँ और अपनी बात पर क़ुरानों सुन्नत से दलील दूँ।

ज़ाहिर है ये जुरअत बाज़ हाज़ेरीन को नागवार गुज़री और उन्होने इसे शैख़ की बारगाह में सूऐ – अदब क़रार दिया कि वो तो इस बात के आदी थे कि शैख़ के सामने बिला इजाज़त ज़बान न खोले। शैख़ ने महसूस कर लिया के हाज़ेरीन को मेरी बात नागवार गुज़री है इसलिऐ निहायत ही होशियारी से सूरते हाल का इज़ाला करते हुऐ ऐलान किया कि जिसकी इब्तेदा दिलसोज़ होती है उसकी इंतेहा ताबनाक होती है।

हाज़ेरीन ने ये खयाल किया कि ये सरकार की तरफ़ से एक सनद है और अन्क़रीब मेरा अंजाम ताबनाक होने वाला है इसलिऐ मुझे सबने इस बात की भी मुबारकबाद दी। लेकिन शैख़ इन्तेहाई होशियार और तरबियत याफ़ता थे उन्होने मेरी इस गुस्ताख़ी का रास्ता रोकने के लिए फ़िल्फ़ौर एक आरिफ़ का क़िस्सा ब्यान किया कि उनके हलक़े में एक आलिम आ गऐ तो उन्होने उनसे कहा कि जाओ गुस्ल करो ” वो गुस्ल करके वापस आऐ तो दोबारा फिर यही हुक्म दिया वो इस मर्तबा पहले से बेहतर अंदाज़ मे ग़ुस्ल करके आऐ और बैठना चाहा था कि शैखे आरिफ़ ने डांट दिया और कहा जाओ फिर ग़ुस्ल करो और आलिम ने रोते हुऐ अर्ज़ की कि मैं अपने इल्म के मुताबिक़ बेहतरीन गुस्ल कर चुका हूँ। अब अल्लाह आपके तुफ़ैल से कुछ और इन्केशाफ़ कर दे तो दूसरी बात है तो आरिफ़ ने फरमाया अच्छा अब बैठ जाओ। मै फ़ौरन समझ गया कि इस क़िस्से का मक़सूद मै ही हूँ और हाज़ेरीन ने भी महसूस कर लिया और शैख़ के जाने के बाद मेरी मलामत भी की और मुझे शैख़ की बारगाह में खामोशी का हुक्म देते हुऐ इस आयाते क़ुरआन से इस्तेदलाल किया कि “ईमान वालों , खबरदार! अपनी आवाज़ों को पैगम्बर की आवाज़ों पर बुलंद न करना और उनसे बुलंद लहजे में बात भी न करना। जैसे आपस में बातें करते हो कहीं ऐसा न हो की तुम्हारे आमाल बर्बाद हो जाऐ और तुममे शऊर भी न पैदा हो ” मैंने अपनी औक़ात पहचान ली और नसीहतों का इम्तेसाल किया जिसके बाद शैख़ की बारगाह में कुछ ज़्यादा ही मुक़र्रब हो गया और तीन दिन के क़याम के दौरान इम्तेहान के लिए मुख्तलिफ़ सवालात करता रहा और शैख़ को भी इस बात का अन्दाज़ा होता रहा और वो यही कहते रहे कि क़ुरआन के लिए ज़ाहिर भी है और बातिन भी है और सात सात बातिन हैं जिसके बाद उन्होने अपने ख़ज़ाने को खोलकर एक ख़ास कागज़ दिया जिसमें सालेहीन और आरेफ़ीन का सिलसिलाऐ सनद अबुल हसन शाज़री तक पहुंचता था और उनके बाद मुख्तालिफ़ औलिया से गुज़रता हुआ हज़रत अली इब्ने अबीतालिब करमुल्लाहो वजहू तक पहुँचता था।

ये बात नागुफ़्ता न रह जाऐ के ये हलक़ात तमामतर रूहानी होते थे और इनका इफ़्तेताह शैख़ क़ुरआने करीम की तिलावत से करते थे जिसके बाद क़सीदे का मतला पढ़ा जाता था और तमाम मुरीद उसे दोहराते थे इसलिऐ के सबको ये क़साएदों अजकार हिफ़्ज़ होते थे और उनका बीशतर हिस्सा दुनिया की मज़म्मत और आखिरत की तरगीब पर मुश्तमिल होता था। शैख़ की तिलावत के बाद उनकी दाहिनीं तरफ़ बैठने वाला उसका इआदा करता था उसके बाद शैख़ नऐ क़सीदे का मतला पढ़ते थे और सब उसको दोहराते थे यूं ही हर शख़्स एक-एक आयत की तिलावत करता था और फ़िर क़सीदे पर सबको इजतेमाई तौर पर हाल आने लगता था जहां क़सीदे की धुन पर सब दाएं बाएं झूमने लगते थे और जब शैख़ खड़े हो जाते थे तो सारे मुरीद उनके साथ खड़े हो जाते और वो घूम घूम कर एक-एक मुरीद को देखते थे और हर तरफ़ से आह आह की आवाज़े आती थीं ऐसा मालूम होता था के तबल बजाया जा रहा है और बाज़ अफराद की हरकतें जुनूनी अंदाज़ की होती थीं और ये सारी आवाज़ें एक मुनज्जम नगमे की शक्ल में बुलंद होने के काफी देर के बाद थम जाती थीं और शैख़ आख़िरी क़सीदा पढ़ते थे जिस के बाद लोग उनके सर और शाने का बोसा देने के बाद बैठ जाते थे मैंने भी उन लोगों के साथ बाज़ हरकतों में हिस्सा लिया लेकिन मैं फितरतन मुतमईन नहीं था बल्कि मैं इन बातों को उस अकीदे के बिल्कुल मुताज़ात पता था जो मैंने साऊदिया से हासिल किया था के गैरे खुदा से तवस्सुल नहीं हो सकता।

मैं गोया ख़ाक पर गिर पड़ा और मेरे आँसू जारी हो गऐ और मैं हैरतज़दा दो तूफ़ानों के बीच खड़ा था। एक तरफ सूफियत का माहोल जहां ऐसी रूहानियत जो इंसान के दिल मैं खोफ़े खुदा , ज़ोहद और औलिया-ए-सालेहीन के ज़रिऐ तकर्रुब का जज़्बा पैदा कराऐ और दूसरी तरफ वहाबियत का तूफान जिसने ये तालीम दी है के ये सब शिर्क है और शिर्क को खुदा माआफ नहीं कर सकता और जब पैग़ंबर रसूल अलल्हा होने के बाद काम नहीं आ सकते और उनसे तवस्सुल नहीं हो सकता तो इन ओलिया- ऐ-सलेहीन की क्या हक़ीक़त है। अगरचे शैख़ ने मुझे एक मनसब भी इनायत कर दिया था कि मुझे कफसा मे अपना वकील बना दिया था लेकिन मैं अंदर से मुतमइन नहीं था अगरचे कभी-कभी सूफियत की तरफ माइल हो जाता था लेकिन हमेशा सोचता रहता था के मैं इस तरीक़े का अहतेराम तो कर रहा हूँ लेकिन खुदा के इस हुक्म की मुखालफत कर रहा हूँ के “अल्लाह के साथ किसी और खुदा को ना पुकारो ” इस के अलावा कोई और खुदा नहीं है और जब ये शख्स कहता था के परवरदिगर का इरशाद है के “ईमान वालों अल्लाह से डरो और वसीला तलाश करो ” तो फ़ोरन साऊदी ओलेमा का सिखाया हुआ जवाब दोहरा देता था वसीला अमले सलाहे है।

बहरहाल मैंने वो वक़्फ़ा इज़्तेराब के आलम में गुज़ारा जबकि मेरे पास बहुत से मुरीद हाज़िरी दिया करते थे। हम रात भर हाल क़ाल की महफ़िलें जमाया करते थे। हमारे हमसाऐ के लोग हमारी इस आह आह से आजिज़ थे लेकिन खुलकर इसका इज़हार नहीं कर सकते थे उन्होने अपनी औरतों के ज़रिये मेरी अहलिया से शिकायत की और जब मुझे मालूम हुआ तो मैंने अपने मुरीदों से कहा कि वो इन हल्क़ात को अपने घरों में ले जाएं और ये कह कर हाज़िरी से माज़ेरत कर ली कि मियां तीन महीने के लिए मुल्क से बाहर जा रहा हूँ और मैं अपने अहलो अयाल और अक़रुबा को रुख्सत करके खानाऐ ख़ुदा के इरादे से निकल पड़ा उसी पर मेरा ऐतेमाद था और इसके अलावा मेरा कोई दूसरा ख़ुदा नहीं था।

तौफ़ीक़ आमेज़ सफ़र

मिस्र-लीबिया के दारुल-हुकूमत तराबलस में मेरा उतना ही क़याम रहा कि मैं मिस्री सिफ़ारत खाने से मिस्र का वीज़ा हासिल कर लूँ। चुनांचे इसके दौरान बाज़ दोस्तो से मुलाकात भी हुई और उन्होने इस राह में मेरी मदद भी की।

क़ाहिरा का रास्ता तक़रीबन तीन शबो रोज़ में तय होता है मैंने टैक्सी से तय किया जिसमें चार मिस्री और थे जो लीबिया में काम करते थे और अपने वतन वापस जा रहे थे। दौराने सफ़र मै उनसे बात करता रहा और उन्हे क़ुरआन सुनाता रहा जिसकी बिना पर उन्होने मुझसे इजहारे मुहब्बत किया और हर शख़्स ने अपने घर क़याम की दावत दी। मैंने उनके दरमियान से एक शख़्स का इन्तेखाब किया जिसका नाम अहमद था और मेरा नफ़्स उसके ज़ोहदो तक़वा से मुतमइन था। उसने भी बक़ाएदा मेज़बानी के फराएज़ अंजाम दिऐ। क़ाहिरा में मैंने बीस दिन गुज़ारे जिसमें मशहूर मौसीक़ीकार अतरश से उनके घर पर मुलाक़ात की इसलिऐ के मैंने अखबारात रसाएल में उनके जिस एखलाक़ो तवाज़ो का तज़किरा पढ़ा था उससे मैं मुतास्सिर था लेकिन मेरी मुलाकात सिर्फ बीस मिनट जारी रह सकी क्योंकि वो लेबनान जाने के लिए एअर-पोर्ट जा रहे थे।

क़ाहिरा ही में मैंने मशहूर क़ारी जिन से मैं बे-हद मुतास्सिर था शैख़ अब्दुल बासित मुहम्मद अब्दुल समद से मुलाकात की तीन दिन उनके साथ क़याम रहा और मुख्तलिफ़ मौज़ूआत पर उनके अकरुबा-ओ-दौस्तों से तबादला-ऐ-खयालात करता रहा और वो लोग जुरअत , सराहत और मालूमात की कसरत से बेहद मुतास्सिर हुए , वो लोग जब फन के बारे मे बहस करते थे तो मैं इसके कमाल का इज़हार करता था और जब ज़ोहदो तसव्वुफ़ की बाते करते थे तो मैं तीजनिया और मदीना तरीकों से अपने ताअल्लुक का इज़हार करता था और जब मग़रिब की गुफ़्तगू करते थे पेरिस , लन्दन , हालेंड , इटली , स्पेन , के किस्से बयान करता था जिनहे गर्मियों की छुट्टी के दौरान देखा था और जब हज की गुफ़्फ़्तगु छेडी तो मेने ये खबर भी सुनाई के मैं एक बार हज कर चुका हूँ और अब उमरे के लिए जा रहा हूँ और मेने उन मकामात का तज़किरा किया जिनसे साथ-साथ हज करने वाले भी वाकिफ नहीं थे जेसे गारे हिरा , गारे सूर और कुर्बानगाहे इस्माईल अलैहिस सलाम और जब वो लोग उलूम और इख्तेराआत की बात करते थे मैं उसके आदादो मुस्तेलाहात का हवाला देकर उनकी इल्मी तशनगी को दूर करता था और जब सियासत का ज़िक्र छेड़ते थे तो मैं अपनी ज़ाती राय से ये कह कर उन्हे खामोश कर देता था के ख़ुदा सलाहुद्दीन अय्युबी पर रहमत नजील करे के उसने हँसना तो दरकिनार अपने लिए मुस्कुराहट को भी हराम करार दे दिया था और जब मुकर्रेबीन ने ये कह कर मलामत की के सरकारे दो आलम हमेशा मुसकुराते नज़र आते थे तो जवाब दिया के मैं कैसे मुस्कुरा सकता हूँ जब के मस्जिदे अकसा पर दुशमनाने ख़ुदा का क़ब्ज़ा है और ख़ुदा की क़सम मैं उस वक़्त तक ना मुस्कुराउगा जब तक उसे आज़ाद ना करा लूं या मर ना जाऊँ।

इन इजतेमाआत में जामिया-ऐ-अज़हर के शयूख भी हाज़िर होते थे और मेरे ज़ब्ते-अहादीसो आयतों दलाएले मुहकम से मुतस्सिर भी होते थे और ये पूछा करते थे के मै किस जामए से फ़ारिग-उल-तहसील हूँ तो मैं निहायत फख्र से जवाब देता था के मै जामिअ-ऐ-ज़ैतून का तालिबे इल्म हूँ जों अज़हर से पहले क़ायम हुआ था और फातमीईन जामआ-ऐ-अज़हर की तासीस के लिए तयूनूस ही से गए थे। मैंने जामआ-ऐ-अज़हर के बहुत से उलमा से मुलाक़ात की जिन्होने मुझे किताबें भी दीं और एक दीं जब मै अज़हर के एक ज़िम्मेदार के दफ़्तर में बैठा हुआ था। मिस्र मजलिसे इंकेलाब के एक रुकन और उन्होने उस मसउल को मिस्र की एक कंपनी की तरफ़ से मुनाक़िद होने वाले इस्लामी इजतेमा में शिरकत की दावत दी और उन्होने इस बात पर इसरार कि मैं उनके साथ जाऊँ। चुनांचे मैंने उस जलसे में शिरकत की और अजहरी आलिम और फ़ादर शनुदा के दरमियान बिठाया गया लोगो मे मुझसे तक़रीर का भी मुतालेबा किया और मैंने निहायत आसानी से काम अंजाम दिया। इसलिऐ के मैं मजलिस और सक़ाफती इजतेमाआत में तक़रीरों का आदी हो चुका था।

इन तमाम बयानात का नतीजा ये है के मेरा शऊर बराबर तरक़्क़ी कर रहा था और मुझमें ये गुरूर भी पैदा हो चला था कि अब मै भी आलिम हो गया हूँ और ऐसा क्यों न होता जब के उल्मा-ऐ-अज़हर ने मेरे इल्म की शहादत दी थी और मुझसे कहा था के आप जैसे हज़रात को यहाँ अज़हर में होना चाहिऐ था और इस से ज़्यादा क़ाबिले फ़ख्र ऐजाज़ ये है के रसूले अकरम ने मुझे अपने आसार की ज़ियारत का शरफ़ इनायत फ़रमाया जब क़ाहिरा में मस्जिदे रासुल-हुसैन(अ।स) के मसउल ने मुझसे ब्यान किया और मुझे एक ऐसे हुजरे में ले जाने के बाद दरवाजा बंद कर के वो खज़ाना खोला जिसमें रसूल अल्लाह की क़मीज़ और दूसरे आसार निकाल कर मुझे ज़ियारत कराई और मै इंतेहाई मुतास्सिर और अश्कबार वापस आया।

जबकि इस मसउल ने मुझ से किसी रक़म का भी मुतालेबा नहीं किया बल्कि इन्कार कर दिया मेरे इसरार पर सिर्फ़ एक मामूली रक़म लेकर मुझे इस बात की बशारत और मुबारकबाद दी के मै रसूले अकरम की बारगाह का एक मक़बूल इंसान हूँ इस वाक़िऐ ने मेरे दिल पर बेहद असर किया और मै मुतआदिद रातों में वहाबियों के इस बयान पर गौर करता रहा के “रसूल मर गऐ और उनका क़िस्सा तमाम हो गया ” मुझे ये बात बिल्कुल पसंद नहीं थी बल्कि मुझे इस अक़ीदे के मोहमल होने का यक़ीन पैदा हो गया था के अगर राहे ख़ुदा में क़त्ल होने वाला शहीद मुर्दा नहीं होता बल्कि ज़िंदा रहता है और अपने परवर्दिगार से रिज़्क़ हासिल करता है तो वो क्योंकर मुर्दा हो सकता है जो सैयद-उल-आलेमीनो वल आखिरीन है और ये शऊर कुवतो वज़ाहत के ऐतेबार से और भी तरक़्क़ी करता रहा। उन तालीमात की बुनियाद पर जो सूफीयों से हासिल हुई थी जहाँ औलिया ओ शयूख़ में ये सलाहियत पाई जाती थी की निज़ामे क़ायनात पर असर अंदाज़ हो सकें के ये सलाहियत उन्हे परवर्दिगार ने आता की है के उन्होने उसकी इताअत की है और उसने हदीसे क़ुदसी में वादा किया है के “मेरे बंदे मेरी इताअत कर तू मेरा नमूना बन जाएगा और जिस चीज़ के बारे में कह देगा वो हो जाऐगी ” मेरे दाख़िल में अक़ाऐद में जंग जारी रही और मैंने मुख्तलिफ़ मस्जिद की ज़ियारत करने उन में नमाज़ अदा करने के बाद मिस्र में क़याम का सिलसला तमाम कर दिया। हर मसलक की मस्जिद में नमाज़ अदा की और सैयदा ज़ैनब(अ।स) और सैयय्देना हुसैन की ज़ियारत की और तीजानी ज़ाविये की भी ज़ियारत की जिसकी दास्तान बेहद तावील है।

बहरी जहाज़ की एक मुलाक़ात

बहरी जहाज़ से रिज़र्वेशन के मुताबिक़ मैं स्कंदरिया पहुंचा और वहाँ से मिस्री जहाज़ से बैरूत का सफर इख्तियार किया। मैं अपने आप को निहायत इज़तेराब के आलम में जिस्मानी और फ़िक्री ऐतेबार से ख़स्ता हाल प रहा था और अपनी बर्थ पर लेटे हुए फ़िक्र में डूबा हुआ था और जहाज़ दो तीन घंटों से रवां दवां था। थोड़ी देर आराम करने के बाद अचानक उठ गया। जब मेरे बराबर वाले की आवाज़ कानों में आई “मालूम होता है बहुत थक गऐ हैं ” मैंने कहा हाँ मैं स्कंदरिया तक जहाज़ में सवर होने के लिए आ गया और रात को बहुत कम सो सका मैंने उनके लहजे से अंदाज़ा लगा लिया के वो मिस्री नहीं हैं और मेरे दख्ल दर माक़ूलात की आदत ने मुझे आमादा किया के उन का ताअरुफ़ हासिल करूँ तों मैंने अपना ताअरुफ़ कराते हुऐ उनका ताअरुफ़ हासिल किया तों मालूम हुआ के वो ईराक़ी हैं और उनका नाम मनअम है। बग़दाद यूनिवर्सिटी के उस्ताद है और अज़हर में डॉक्टरेट की थीसेस जमा करने के लिऐ क़ाहिरा आऐ थे। हमारी गुफ़्तगू का आग़ाज़ मिस्र आलमे अरबो इस्लाम , अरबों की शिकस्त और यहूदियों की फ़तेह से हुआ। ये गुफ़्तगू इन्तेहाई दर्दनाक थी मैंने दौराने कलाम ये कहा कि शिकस्त का असल सबब अरब और मुसलमानों का मुख्तालिफ़ हुकूमतों , मुख्तालिफ़ गिरोहों और मुख्तालिफ़ मज़ाहिब मे तक़सीम हो जाना है कि इतनी कसरते अदद के बावजूद दुशमनों की निगाह में कोई वज़न और ऐतबार नहीं रखते है। हमने मिस्र और मिश्रेयों के बारे में बहुत सी बातें कीं और दोनों हज़ीमत के असबाब पर मुत्तफ़िक़ थे और मैंने ये इज़ाफ़ा किया के मैं इन तकसीमात का सख़्त मुखालिफ हूँ। ये इस्तेमार ने हमारे दरमियान पैदा कराई है ताकि हम पर क़ब्ज़ा करना और हमें ज़लील करना आसान हो जाऐ लेकिन हम आज भी मालिकी और हनफ़ी के झगड़े में पड़े है और मैंने एक दर्दनाक क़िस्सा सुनाया जो मेरे साथ उस वक़्त पेश जब मैं क़हिरा की मस्जिद अबु हनीफ़ा में दाख़िल हुआ और हाज़ेरीन के साथ बा-जमाअत नमाज़े अस्र अदा की तो नमाज़ के बाद जो शख़्स पहलू में खड़ा हुआ था उसने इंतेहाई गुस्से से कहा के तुमने हाथ क्यों नहीं बांधे ? मैंने अदब और ऐहतेराम से जवाब दिया के मैं मालिकी हूँ और मालिकी हाथ खोल कर नमाज़ पढ़ते है। तो उसने कहा के अगर ऐसा है तो मालिक की मस्जिद में जाकर नमाज़ पढ़ो! मैं वहाँ से इस सूरते हाल से बेज़ार होकर बाहर निकल आया और मेरी हैरतों में इज़ाफ़ा हो गया। मेरी इन बातों पर ईराक़ी उस्ताद ने मुस्कुरा कर कहा और मई तो शिया हूँ। मैं इस ख़बर से चोंक गया और मैंने निहायत बे ऐतेनाई से कहा के अगर मालूम होता के तुम शिया हो तो मई तुमसे बात भी न करता उसने कहा “क्यों ” ?

मैंने कहा इसलिए के तुम लोग मुसलमान नहीं हो। तुम लोग अली इब्ने अबी तालिब की इबादत करते हो और तुम में जो मोतदिल है वो अल्लाह की इबादत करते हैं लेकिन रिसालते पैगंबर पर ईमान नहीं रखते हैं और जिब्राईल को गलियाँ देते हैं के उन्होने खयानत से काम लिया है और रिसालत को अली के बजाए मुहम्मद के हवाले कर दिया है। मैंने इस तरह अपने बयानात को जारी रक्खा और मेरा साथी कभी मुस्कुराता और कभी लाहौल पढ़ता था और जब मेरी गुफ़्तगू तमाम हुई तो अज़ सारे नौ ये सवाल किया की आप उस्ताद हैं और तुल्लाब को दरस देते हैं ? मैंने कहा हाँ! उसने कहा जब असातेज़ा की फिक्र का ये आलम है तो अवाम से क्या कहा जाए। जिनके पास कोई सक़ाफ़त नहीं होती है। इसका मक़सद क्या है ? उसने कहा मुआफ़ फरमाएगा। ये गलत इल्ज़ामात आपको कहाँ से मालूम हुऐ ? मैंने कहा तारीख़ की किताबों और लोगो के दरमियान शोहरत से!उसने कहा लोगो की शोहरत छोड़िये। आपने तारीख़ की कौन सी किताब पढ़ी है ? मैंने किताबें शुमार करना शुरू की। अहमद अमीन की फज़रुल-इसलाम , जुहा-उल-इसलाम , जुहरुल-इसलाम वगैरा।

अहमद अमीन शियों के लिए किस तरह सनद हो गए। अदलो इंसाफ का तक़ाज़ा तो ये था के उनके नज़रयात उन्हीं के मसादिर से दरयाफ़्त किए जाते।

मैंने कहा के मुझे क्या ज़रूरत है के मै ऐसी बात के बारे में तहक़ीक़ करूँ जो ख्वाया सो अवाम के दरमियान मशहूर हों। उन्होने कहा के अहमद अमीन ने ख़ुद ईराक़ का दौरा किया है और मै उन असातेज़ा में से था जिन से उन्होने नजफ़ में मुलाक़ात की है जब हम लोगो ने उनकी तहरीरों पर शियों के बारे में ऐतेराज़ किया तो उन्होने ये कह कर माज़ेरत की के मै आप लोगों के बारे में कुछ नहीं जानता और आज पहले पहल शियों से मुलाक़ात कर रहा हूँ तो हम लोगों ने कहा उज़रे गुनाह बदतर अज़ गुनाह। जब आप हमारे बारे में कुछ नहीं जानते हैं तो आपको ऐसी बदतरीन बातों के लिखने का क्या हक़ है ? इसके बाद उसने इस बात का इज़ाफ़ा के अगरचे कुरआन हमारे लिऐ सनद है लेकिन हम यहूदों नसारा के अकाएद की गलती पर कुरआन से इस्तेदलाल केरें तो क्या फायदा होगा जब के वो लोग कुरआन को नहीं मानते हैं। हमारी दलील उसी वक़्त क़वी और मोहकम होगी जब हम उन के ऐतेकाद को उन्ही की किताबों से नक़ल केरें ‘अज़ बाबे श्हद शाहिद मिन अहलोहा ’

हमारे साथी के इस बयान ने हमारे दिल पर वही असर किया जैसे किसी प्यासे को आबे सर्दो शीरी मिल जाऐ और मैंने अपने दाखिल में एक इंकेलाब महसूस किया। दुश्मनी से तनकीद की तरफ , इस लिए के मैं एक सही मनतिक और मुस्तहक दलील के सामने खड़ा था।

मैंने कोई झिझक महसूस नही की और कहा के इसका मतलब तो ये है के आप लोग हमारे पैगंबर की रिसालत का अक़ीदा रखते हैं! उसने कहा के तमाम शियों का यही अक़ीदा है और आप के लिऐ क्या ज़हमत है अगर आप बराहे रास्त तहक़ीक़ कर लें और अपने भाइयों के बारे मे बद गुमानी छोड़ दें के बाज़ गुमान गुनाह होते हैं और अगर आप हकाएक की मरेफ़त चाहते हैं और अपनी आंखो से देख कर यकीन पैदा करना चाहते हैं तो मैं आप को इराक़ के दोरे की दावत देता हूँ ताकि आप उलमाए शिया से मुलाक़ात करें और आप को दुश्मन के किज़्बो इफतिरा का सही अंदाज़ा हो जाऐगा।

मैंने कहा के ये तो मेरी आरज़ू हे के मैं कभी इराक़ की ज़ियारत करूँ और उसके इस्लामी आसार को देखूँ जो अब्बासी खुल्फ़ा बिल खुसूस उसके सर बाहर हारून रशीद ने छोड़े हैं लेकिन अव्वलन तो मेरे इमकानात महदूद हैं और मे उमरे के लिए जा राहा हूँ और दूसरी बात ये हे के मेरे पासपोर्ट में इराक़ मे दाखिल होने की इजाज़त भी नहीं है। उसने कहा जब मेने आप को दावत दी हे तो इसका मतलब ही ये है के मैं बेरूत से बगदाद तक आमदो रफ्त और इराक़ में कायम के जुमला इखराजात का जिम्मेदार हूँ और आप मेरे घर मे मेरे महमान होंगे और जहां तक इराक मे दाखले की इजाज़त का सवाल है तो इस काम को अल्लाह के हवाले कर दे अगर ये बात मुकद्दर मे है तो ये काम होकर रहेगा और हम खुद बेरूत पहुचने के बाद कोशिश करेगे के इजाज़त हासिल कर लें।

मैं उसकी इन बातों से बे हद खुश हुआ और मेने ये वादा कर लिया के मैं इनशाअल्लाह कल जवाब दूंगा।

जहाज़ मे कैबिन से निकाल कर हवाखोरी के लिए मैं छत पर गया तो मेरे जेहन मे एक नई फिक्र थी और मेरी अक़ल उस समंदर मे गुम हो गई थी। जिसने आफाक को पुर कर दिया था और मैं उस खुदा की तसबी कर रहा जिसने कायनात को पैदा किया और मुझे इस मंज़िल तक पहुंचाया मैं ये दुआ कर रहा था शर और अहले शर से महफूज रखे और हर खताओ लग़ज़िश से बचाए रहे। मेरे ज़हन मे सारा सिलसिला-ऐ-हालात गर्दिश कर रहा था वो सआदतें जो बचपन से आज तक देखी थी और जिनसे बेहतरीन मुस्तक़्बिल की आरज़ू रखता था और ये एहसास पैदा करता था के इनायते ईलाही मेरा ऐहाता किऐ हुऐ है।

मैं एक मर्तबा मिस्र की तरफ मुतावज्जह हुआ जिसके बाज़ साहिल अभी भी नज़र आरहे थे मैंने उस सर ज़मीन को अलविदा कहा जहां कमीज़े पैगंबर को बोसा दिया था जो मेरी ज़िंदगी की अज़ीज़ तरीन यादगार है। इसके बाद मै उस शिया की बातों पर गौर करने लगा जिसने मेरे उस ख़्वाब को शर्मिंदा-ऐ-ताबीर बनाने का इरादा ज़ाहिर करके मुझे बेहद खुश कर दिया था के मै इराक़ की ज़ियारत करूंगा जिसका नक्शा मेरे ज़हन में हारून और मामून के क़सरे-शाही ने बनाया है जिसने उस दारुल हकूमत की तासीर की थी जहां हर दौर मैं मगरिब के तुललबे उलूम तहसीले इल्म के लिए जया करते थे। इसके अलावा इराक़ कूतुबे रब्बानी शैख़ समादानी अब्दुल कादिर जीलानी का मुल्क है जिनकी शोहरत सारी काएनात में है जिनकी तरीक़त का चर्चा हर बस्ती और इलाक़े में है। मेरे इस ख़्वाब की ताबीर परवरदिगार की जदीद तरीन मेहरबानीए है अब मै उम्मीदों समंदर तैर रहा था यहाँ तक के जहाज़ वालों की तरफ से ऐलान हुआ के मुसाफिरीने मोहतरम शब के खाने के लिए तशरीफ ले आऐ। मैं डाइनिंग हाल की तरफ चला तो यहाँ लोग हसबे आदत एक दूसरे को ढकेल कर आगे बढ़ने की फिक्र में थे और एक शोरे हँगामा बरपा था आचनक मेरे शिया साथी ने मेरा दमन पकड़ कर खींचा और कहा के अपने को ज़हमत में ना डालिऐ हम थोड़ी देर के बाद बगैर किसी ज़हमत के खा लेंगे और मैं तो आप को तलाश ही कर रहा था उस के बाद उसने पूछा आप ने नमाज़ पढ़ ली है। मैंने कहा नहीं तो उस ने कहा आइऐ पहले नमाज़ पढ़ें उस के बाद खाने के लिए जाऐगें जब तक जगह खाली हो जाऐगी। मैंने इस राय को पसंद किया और एक खाली जगह पर जाकर वुज़ू किया और अपने साथी को इमाम बनाकर आगे बढ़ा दिया के देखूँ ये किस तरह नमाज़ पढ़ता है उस के बाद मैं अपनी नमाज़ का ऐआदा कर लूँगा।

उसने मग़रिब की नमाज़ शुरू की और जब क़िराअतो दुआ को तमाम किया तो मेरी राय बदल गई और ऐसा महसूस हुआ जैसे मैं सहाबा-ऐ-किराम में किसी के पीछे पढ़ रहा हूँ जिन के वुरु-ओ-तक़द्दूस के बारे में बहुत कुछ पढ़ता रहा हूँ।

नमाज़ के बाद उसने दुआ को तूल दिया और ऐसी दुआएं पढ़ी जिनको मैंने इससे पहले अपने मुल्क में या किसी दूसरे मुल्क में नहीं सुना था।

मेरा दिल उस वक़्त बहुत खुश होता था जब वो मुहम्मदो आले मुहम्मद पर सलवात पढ़ता था और उनकी साना-ओ-सिफ़त करता था मैंने नमाज़ के बाद देखा के उसकी आँखों में आंसुओं के आसार हैं और ये सुना के वो मेरी बसीरत और हिदायत के लिए अल्लाह से दुआ कर रहा है।

हम लोग डाइनिंग हाल में उस वक़्त दाखिल हुऐ जब मजमा जा चुका था उसने पहले मुझे बिठाया उसके बाद खुद बैठा। हमारे लिए खाने की दो पलेटें लायी गई उसने पलेटों को तब्दील कर दिया इसलिऐ के हमारी पलेट में गोष्ट कम था और इस तरह इसरार करना शुरू किया जैसे मैं उसी का मेहमान हूँ। उसने आदाबे अकुल्लो शरब के बारे में ऐसी रवायतें बयान कीं जो मैंने कभी नहीं सुनी थी मुझको उसका ऐख्लाक़ बेहद अच्छा लगा। हमने उसके साथ इशा की नमाज़ पढ़ी उसने दुआ को इतना तूल दिया के मुझपर गिरया तारी हो गया और मैंने अल्लाह से दुआ की के उसके बारे में मेरे ख्यालात को बादल दे इसलिऐ के बाज़ ख्यालात गुनाह बन जाते हैं। लेकिन कौन जनता था। रात को मै सोया तो ख़्वाब में इराक़ की रातें देख रहा था और उस वक़्त बेदार हुआ जब उसने नमाज़े फज्र के लिऐ बेदार किया हमने नमाज़ पढ़ी फिर बैठकर अल्लाह की नेमतों का तज़किरा शुरू कर दिया हम दोबारा आकर सो गऐ जब उठे तो देखा वो अपनी सीट पर तसबीह लेकर ज़िक्रे खुदा कर रहा है। बेहद खुशी महसूस हुई और मेरा दिल मुतमइन हो गया और मैंने परवरदिगार से इस्तग्फ़ार किया। हम खाना खा रहे थे जब ऐलान हुआ के जहाज़ साहिल से क़रीबतर हो रहा है और अन्क़रीब दो घंटे बाद हम बेरूत के पोर्ट पर पहुँच जाएंगें।

उसने मुझसे पूछा क्या आप गोर कर चुके और आपने क्या फेसला लिया ? मेने कहा अगर परवरदिगार ने वीज़े की सहूलत दिलवा दी तो बजाहिर कोई मानेअत नहीं है और मेने उसकी दावत का शुक्रिया अदा किया।

हम बेरूत मे वारिद हुए और रात वहाँ गुज़ारी फिर दमिश्क का सफर किया और वहाँ पाहुचते ही इराक के सिफ़रत खाने गऐ और नाकाबिले तसव्वुर हद तक उजलत के साथ वीज़ा हासिल कर लिया और इस आलम मे निकले के वो मुझे मुबारकबाद दे रहा था और मैं अल्लाह की मदद पर शुक्रिया अदा कर रहा था।


इराक़ का पहला सफ़र

हमने नजफ़ की एक आलमी सर्विस बस मे दमिश्क से बग़दाद तक का सफ़र किया जिस वक़्त हवा का दर्जा-ऐ-हरारत चालीस डिग्री था। बग़दाद पाहुचने के फ़ोरन बाद हमने अपने मेज़बान के घर का रूख किया। उनके एयर कंडिशन मे पहुँचने के बाद राहत मिली और उन्होने एक इराक़ी ‘दिशदशा ’ लाकर दिया। कुछ मेवे और खाने का सामान लाकर रखा और घर के लोग अदबो ऐहतेराम से सलाम करने केलिए आने लगे। उनके वालिद ने इस तरह मुआनिका किया जेसे मुझे पहले से पहचानते हों और उनकी वालिदा स्याह अबा ओढ़े हुऐ दरवाजे के पास आकर खड़ी हो गाई और वहीं से सलाम किया और खुशआमदीद कहा और मेरे दोस्त ने उनकी तरफ से ये माज़ेरत की के हमारे यहाँ अजनबी इंसान से मुसाफेहा हराम है। मुझे बेहद ताआज्जुब हुआ और मेने दिल ही दिल मे कहा जिनको हम दीन से खारिज समझते हैं वो हमसे ज़्यादा दीन के पाबंद हैं और इसके अलावा हमने सफर के दोरान जो दिन उन्के साथ गुज़ारे उनमे बुलंद इखलाक , इज्जते नफस और करामतों शहादत का मुकम्मल मुशाहेदा किया। ऐसी तवाज़ो और ऐसी वरअ जो इससे पहले कभी नहीं देखी थी और अब महसूस होता था के मैं मुसाफिर नह हूँ बल्कि अपने घर में हूँ। रात को हम लोग सोने के लिए पुशते बाम पर आ गाऐ और आखरी शब तक यही सोचता रहा के मैं ख़ाब देख रहा हूँ या बेदार हूँ। क्या मैं वाक़ेअन बग़दाद मे हज़रत अब्दुल करीम जीलानी के हम साये मे कायाम पज़ीर हूँ ? मेरे दोस्त ने ये महसूस कर कर मुस्कुरा कर पूछा के अब्दुल कादिर जीलानी के बारे मे तयूनस वालों का अक़ीदा क्या है ? और मेने उनके करामातों मकामात का तज़किरा शुरू कर दिया जो यहाँ बराबर बयान होते रहते थे के वो दाएर-ऐ-करामात के कुतुब हैं जिस तरह पैग़ंबर सय्यदुल-अंबिया हैं वो सय्यदुल-औलिया हैं और उनका ये कहना हक़ बा जानिब है के तमाम लोग काबे का तवाफ करते हैं और काबा मेरे ख़ैमे का तवाफ करता है।

मैं मुसलसल अपने दोस्त को समझाना चाहता था के शैख़ अब्दुल कादिर जीलानी अपने मुरीदों के पास आकर उनके अमराज़ का इलाज करते हैं और उनकी परेशानियों को दूर करते हैं। मैं कसदन या बेखयाली मे उन वहाबी अकाएद को बिलकुल भूल चुका था जिसमे ये जिसमे ये तमाम बातें शिर्क बिललाह थी मैंने जब ये महसूस किया के मेरे दोस्त पर कोई असर नहीं हो रहा है शायद मेरा बयान ही सही नहीं हैं और मैंने उनसे उनकी राय के बारे मे पूछा रात को सोयऐ थकाने सफर है आराम कीजये कल इनशा अल्लाह हम लोग शैख़ की ज़ियारत करेगे मैं इस बात पर बहुत खुश हुआ और मेरे दिल की आरज़ू थी के सुबहा अभी तलेअ हो जाऐ लेकिन थकने सफर ने इतना असर किया के तुलूअ आफ़ताब तक सोता रहा और मेरी नमाज़ भी क़ज़ा हो गई और मेरे दोस्त ने बताया की मीने बरहा जगाने की कोशिश की लेकिन जब कोई फाएद नहीं हुआ तो मुझे मेरे हाल पर छोड़ दिया।

अब्दुल क़ादिर जीलानी और इमाम मूसा काज़िम अ। स।

सुबह के नाश्ते के बाद हम बाबुल- शैख़ तक गऐ और उस जगह को देखा जिसकी ज़्यारत का बरसो से इश्तियाक था और फिर बेतबना मेरे कदम बढ़ने लगे और मैं इस शान से दाखिल हुआ जेसे मैं आगोशे मरहमत मे पनाह ले रहा हूँ मेरे दोस्त मुसलसल मेरे साथ रहे और मैं उन ज़ाएरीन मे शामिल हो गया जो उस मक़ाम की तरफ उसी तरह बढ़ रहे थे जैसे हज-जे-बैतुल्लाह का हुजूम होता है बाज़ लोग मिठाईया लूटा रहे थे और लोग उनको उठाने के लिए मुक़ाबला कर रहे थे मैंने भी दो मिठाइयाँ हासिल कर ली। एक को फ़ोरन बरकत के लिऐ खा लिया और एक को यादगार के तौर पर जेब मे रख लिया। वहीं नमाज़ अदा की बकाद्रे इमकान दुआ की और पानी पिया गोया ज़ाम-ज़ाम का पानी पी रहा हूँ और चाहता था के मेरे दोस्त इतनी देर इंतज़ार करें के मैं तयूनस के अपने बाज़ दोस्तों को ख़त लिख दूँ जिस पर शैख़ अब्दुल क़ादिर के रौजे की तस्वीर बनी थी और जिसे मैंने वहीं से खरीदा था के अपने दोस्तों और अकरुबा पर ये साबित कर सकूँ के मेरी बुलंद हिम्मती ने मुझे वहाँ तक पहुंचा दिया है जहां उनमे से कोई नहीं पहुंचा है। इसके बाद हमने एक शहर के शेबी होटल मे दोपहर का खाना खाया और दोस्त मुझे टेकसी से काजमेंन की तरफ ले गया। ये लफ्ज मुझे उस गुफ्तगू से मालूम हुआ जो मेरे दोस्त ने टेकसी ड्राईवर से की थी और जैसे ही हम गाड़ी से उतर कर चले हमे एक बहुत बड़ा मजमा दिखाई दिया जिस मै सबके सब मर्दो ज़न अतफ़ालो बुजुर्ग एक ही रुख पर जा रहे थे मुझे रस्मे हज की याद आ गाई लेकिन मुझे नहीं मालूम था के मेरी मंज़िल क्या है यहाँ तक के मुझे सुनहरा गुंबद और सुनहर मीनार दिखाई दिया जिस से आँखें चाका-चोंध रह गई थीं मैं समझ गया के ये शियों की कोई मस्जिद है इस लिए के मुझे मालूम था के ये लोग अपनी मस्जिद को सोने और चाँदी से मुज़इयन करते हैं जो की इस्लाम मे हराम है।

मैं वहाँ दाखिल नहीं होना चाहता था लेकिन अपने दोस्त के जज़्बात का खयाल रखते हुए बेइख्तियार दाखिल हो गया। हम पहले दरवाजे से दाखिल हुए तो देखा के बड़े बुजुर्ग लोग दरवाज़े का बोसा ले रहे हैं मैंने अपने नफस को उस तख्ती को पढ़कर तसल्ली दी जिस पर लिखा हुआ था के बे-पर्दा औरतों का दाखिला मना है और हज़रत अली ने फ़रमाया है के एक ज़माना आऐगा जब औरतें इस शान से निकलेंगी के लिबास पहने होगी और बरहना होंगी हम उस मक़ाम पर पहुंचे जहां हमारा दोस्त इजने दखूल पढ़ रहा थाऔर हम दरवाज़े को देख रहे थे और उस सोने चाँदी को देख रहे थे जिसने उसके सफ़हात को पुर कर दिया था और हर तरफ़ आयाते क़ुरआनी के नक़ूश थे मैं अपने दौस्त के साथ चलता रहा और मुसलसल उन बयानात की बिना पर चौकन्ना रहा जो मैंने बाज़ किताबों में पढे थे और जिन में शियों को काफ़िर साबित किया गया था। मैंने रौज़े के अंदर ऐसे नक़्श देखे जिंका तसव्वुर भी नहीं किया गया था और दहशत ज़दा रह गया गोया किसी गैर मानूस और गैर मारूफ़ आलम में पहुंचगाया हूँ। मई बार-बार बददिली से उन लोगों को देख रहा था जो ज़रीह के गिर्द तवाफ़ कर रहे थे और उसके अरकान को बोसा दे रहे थे जाबके दूसरे लोग नमाज़ भी पढ़ रहे थे।

मुझे फ़ौरन पैगंबरे इस्लाम की वो हदीस याद आ गई के “ ख़ुदा यहूदा नसारा का बुरा करे के उन्होने अपने औलिया की क़ब्रोंको मस्जिद बना लिया है ” ।

मई अपने दोस्त से दूर हो गया जब देखा के उसने दाखिल होते ही गिरया करना शुरू कर दिया है फिर उसको नमाज़ के लिए मैंने आज़ाद कर दिया और मैं उस ज़ियारत की तख़्ती के क़रीब खड़ा हो गया जो जरीह पर मुअल्लक़ थी मैंने उसको पढ़ा तो उसमें अजनबी नाम थे जिनको मै न समझ सका आखिर मै एक गोशे में में खड़े होकर साहिबे क़ब्र के लिए फतेहा पढ़ा के खुदया अगर ये मययत मुसलमान हो तो इस पर रहमत नाज़िल फरमा के तू इसके हालत को मुझसे बेहतर जानता है।

मेरा दोस्त मेरे क़रीब आया और आहिस्ता से कान में कहा के अगर तुम्हारे पास कोई हजता है तो इस मक़ाम पर अल्लाह से तलब करो के हम लोग इनको बाबुल हवाएज कहते हैं।

मैंने उसके क़ौल को कोई अहमियत नहीं दी बल्कि उन बूढ़े-बूढ़े लोगों को देखता रहा जिनके सरों पर स्याह और सफ़ेद अमामे थे और जिनकी पेशानियों पर आसारे सजदा थे और उनकी हैबत को उनकी दाढ़ियों ने और बढ़ा रखा था जिनको उन्होने छोर रखा था और उनसे ख़ुशबू निकल रही थी आलम ये था के जब भी कोई शख़्स दाख़िल होता था तो बेसाख्ता रोने लगता था तो मैंने अपने अंदर ये सवाल उठाया के क्या ये सारे आँसू झूठे हैं और क्या ये हो सकता है के सारे बूढ़े बुज़ुर्ग ख़ताकार हों ? मै इसी हैरत और दहशत के आलम में बाहर निकल आया जाबके मेरा दोस्त उल्टे पांव चल रहा था के क़ब्र की तरफ़ पुश्त ना होने पाऐ।

मैंने उस से पूछा के ये साहिबे क़ब्र कौन हैं ? उसने कहा ये इमाम मूसा काज़िम (अ।स)! मैंने पूछा ये इमाम मूसा काज़िम (अ।स) कौन हैं ?

उसने कहा सुभानअल्लाह!आप अहले सुन्नत ने मगज़ को सीहहोर दिया है और छिलकों को पकड़ लिया। मैंने गुस्से में आकर कहा के इस लफ़्ज़ का मतलब क्या है ? तो उसने मुझे समझाते हुऐ कहा के भाई आप जबसे इराक़ में दाख़िल हुऐ हैं बराबर अब्दुल क़ादिर जीलानी का ज़िक्र कर रहे हैं। ये अब्दुल क़ादिर कौन हैं ? जिनको आपने इस क़दर अहमियत दे रखी है। मैंने पूरे फ़ख्र के साथ जवाब दिया के ये ज़ुर्रियते पैगंबर में हैं और अगर पैगंबर के बाद कोई नबी होता तो अब्दुल क़ादिर जीलानी होते।

उसने कहा के बरदार समावी। क्या आप तारीखे इस्लाम से वाक़िफ़ हैं ? मैंने बिला तरद्दुद जवाब दिया जी हाँ। हालांकि हक़ीक़तन मैं तारीखे इस्लाम के बारे में कुछ नहीं जानता था। इसलिऐ के हमारे असातेज़ा मुअल्लेमीन हमको इस काम से इसलिऐ रोकते थे के ये तारीख़ स्याह और तारीक है और इसके पढ़ने से कोई फ़ायेदा नहीं है। इसकी एक मिसाल ये है के मेरे एक उस्ताद जो बलाग़त का दरस देते थे एक दिन नहजुल-बलागाका खुत्बा-ऐ-शक़शक़या पढ़ा रहे थे और मैं अपने दूसरे साथियों की तरह इसके मज़ामीन से हैरत ज़दा हुआ जा रहा था मैंने हिम्मत करके ये ये सवाल किया के क्या ये वाक़ई इमाम अली ‘अलै। ’ का कलाम है ? तो उन्होने कहा यक़ीनन!और उनके अलावा ऐसी बलाग़त किस से मुमकिन है और अगर ये उनका कलाम तो मुहम्मद अब्दहू जैसे उल्मा-ऐ-इसकी शरह क्यों करते ? तो मैंने कहा के इमाम आली अलै।तो अबूबकरो को इल्ज़ाम देते हैं के उन्होने उनके हकके खिलाफ़त को ग़स्ब कर लिया है ? तो उस्ताद को जलाल आज्ञा और उन्होने शिद्दत से दांते हुऐ आईन्दा ऐसे सवालत पर कॉलेज से निकाल देने की धम्की दी और फ़रमाया कि हम बलाग़त के मुदर्रिस हैं तारीख़ के मुदर्रिस नहीं। मेरी नज़र में इस तारीख़ की कोई अहमियत नहीं है जिसके सफ़हात फ़ितनों और मुसलमानों के दरमियान खूंरेज़ जंगों से स्याह हैं और जब अल्लाह ने हमारी तलवारों को उनके ख़ून से पाक रखा है तो हम अपनी जबानों को भी उनकी बुराइयों से पाक रखेंगे। मैं इस तौज़ीह से मुतमइन नहीं हुआ और मेरा गुस्सा उस उस्ताद पर बरकरार रहा जो बेमानी बलाग़त का दरस दे रहा था और मैंने कई मर्तबा तरीखे इस्लामी पढ़ने का इरादा किया लेकिन मेरे पास मसादिर और इमकानात की कमी थी और मैंने किसी आलिम को तारीख़ को अहमियत देते न देखा था बल्कि सबने गौया इस बात का इत्तेफ़ाक़ कर लिया था के इसे लपेट कर रख दिया जाऐ। इसलिऐ किसी के पास मुकम्मल तारीख़ की कोई एक किताब न थी और इसीलिऐ जब मेरे दोस्त ने तारीख़ के बारे में सवाल किया तो मैंने हटधरमी के तौर पर और मेरी ज़बाने हाल ये कह रही थी के तारीख़ एक स्याहो तारीक तारीख़ है जिसका कोई फ़ाऐदा फितना-ओ-फ़साद और इख्तेलाफ़ातों और तनाक़ेज़ात के अलावा नहीं है।

मेरे दोस्त ने पूछा के क्या आपको मालूम है के अब्दुल क़ादिर जीलानी कब पैदा हुऐ थे किस दौर के आदमी के आदमी हैं ?

मैंने कहा तक़रीबन छठवीं या सातवीं सदी के।

उसने कहा के इनके और रसूल अल्लाह के दरमियान कितना फ़ासला है ? तो मैंने कहा छह सदी का!

उसने कहा अगर एक सदी में कम से कम दो नस्लें गुज़रती हैं तो उनके और रसूल के दरमियान बारह नस्लों का फ़ासला होगा ?

मैंने कहा “बेशक ”

उसने कहा लेकिन हज़रत मूसा इब्ने जाफ़र इब्ने अली इब्ने हुसैन इब्ने फ़ातेमा ज़हरा ‘स।अ। ’ का नसब उनके जद रसूल अल्लाह तक पहुंचता जाता है या यूं कहिये के वो दूसरी सदी में पैदा होने वाले शख़्स हैं तो इस तरह रसूल से क़रीबतर कौन होगा ?

मैंने बेसाख्ता जवाब दिया के यकीनन ये क़रीबतर होंगे लेकिन हम इनके बारे में कुछ नहीं जानते।

उसने कहा असल हासिले गज़ल यही है और इसी लिऐ मैंने कहा था के आप लोगों ने मगज़ को छोड़ दिया है और छिलकों को ले लिया है तो आप बुरा न मानें मैं आपसे मुआफ़ी चाहता हूँ। हम बातें करते हुऐ जा रहे थे के एक इल्मी मजलिस तक पहुंचे। जहां तुल्बा-ओ-असातेज़ा आपस में तबादेला-ऐ-ख़्यालात कर रहे थे हम वहाँ बैठ गऐ और हमारा दोस्त जैसे किसी को तलाश करने लगा इतने में एक शख़्स ने आकर हमें सलाम किया और हम समझ गए के इसका जामिआ का दोस्त है उसने किसी शख़्स के बारे में सवाल किया और हमने जवाबत से अंदाज़ा किया के वो डॉक्टर है जो अन्क़रीब आने वाला था। इतने में मेरे दोस्त ने कहा के मै आपको यहाँ इसलिऐ लाया हूँ के मै आपकी मुलाक़ात एक ऐसे डॉक्टर से कराउंगा जो तारीख़ का माहिर है और बग़दाद यूनिवर्सिटी में तारीख़ का प्रोफेसर है। उसने अब्दुल क़ादिर जीलानी के बारे में थीसेस लिख कर डाक्टरेट की डिग्री ली है और उसकी मुलाक़ात आपके हक़ में मुफीद हो सकती है मै तारीख़ का माहिर नहीं हूँ।

हमने थोड़ा बहुत कोल्ड ड्रिंक पिया था के वो प्रोफेसर साहब आ गऐ हमारे दोस्त ने उठकर सलाम किया और मुझको उनके सामने पेश करके ये तक़ाज़ा किया के वो मुझे अब्दुल क़ादिर जीलानी की ज़िंदगी के बारे में कुछ बताएं। डॉक्टर ने हमारे लिए ठंडा शर्बत मंगवाया और हमसे हमारा नाम , शहर और पेशे के बारे में पूछा और ये सवाल किया के तयुनसमें अब्दुल क़ादिर जीलानी की शोहरत कैसी है ?

मैंने उनसे बहुत सी बातें बताईं और ये भी कहा के हमारे यहाँ के लोग ये अक़ीदा रखते हैं के शबे मेराज जिबरील जब एक मुकाम पर जाकर ठहर गऐ तो हुज़ूर को अब्दुल क़ादिर जीलानी अपने कांधों पर ले गऐ और हुज़ूर ने ये सनद दी के मेरे क़दम तुम्हारी गर्दन पर हैं और तुम्हारे क़दम क़यामत तक तमाम औलिया की गर्दनों पर रहेंगे।

डॉक्टर साहब मेरी ये बात सुनकर बहुत हँसे और मै न समझ सका के ये हंसी इन रवायात पर है के किस बात पर है। थोड़े से मुबाहसे के बाद उन्होने कहा के मैंने रिसर्च के दौरान सात साल में लाहौर , टर्की , मिस्र , बरतानिया और उन तमाम मक़ामात का सफर किया है जहां अब्दुल अकादिर जीलानी की तरफ मनसूब मख़तूतात थे और उन सब की तस्वीरें भी हासिल की है लेकिन इस बात का कोई सुबूत ना मिल सका के वो रसूल अल्लाह की औलाद से थे। सिर्फ उनकी औलाद में से किसी एक शख़्स का एक शेर है जिसमें रसूल अल्लाह को जद कहा गया है और बाज़ उल्मा ने इसकी तफ़सीर भी पैगंबर की इस हदीस से की है के “मै हर परहेज़गार का जद हूँ ” और फिर ये बताया के सही तारीख़ की बिना पर अब्दुल क़ादिर की असल ईरानी है और वो असलन अरबी नहीं हैं वो ईरान के एक शहर जीलान में पैदा हुऐ और उसी की तरफ़ मनसूब हैं वहाँ से बग़दाद आऐऔर वहीं इल्म हासिल किया और फिर वहीं दरस देने लगे जिस वक़्त के वहाँ के इख़लाक़ी हालात बेहद खराब थे उन्होने जोहड़ का रास्ता इख्तियार किया तो लोगों ने उनसे मुहब्बत करना शुरू कर दी और मरने के बाद उनके नाम पर एक तरीका-ऐ-क़ादिरया ईजाद कर दिया जिस तरह के आम तौर पर सोफियों के मुरीद किया करते हैं और इस ऐतेबार से अरब की हालत इन्तेहाई अफ़सोसनाक है।

अचानक मेरे ज़हन में वहाबियत की गैरत भड़क उठी और मैंने डॉक्टर साहब से कहा आप वहाबी ख़याल मालूम होते हो और उनही की तरह औलिया-ऐ-ख़ुदा का इंकार करते हैं मैं हरगिज़ वहाबी ख़याल नहीं हूँ और मुसलमानों की अफसोसनाक बात ये है के इफ़रातो तफ़रीत की मंज़िल में रहते हैं या तमाम ऐसे खुराफात पर यकीन लाएँगे जिनकी कोई अक़्ली या शरअइ दलील न हो या तमाम अश्या का इंकार करगें। यहाँ तक के पैग़म्बर के मौजीज़ात और अहादीस का भी इंकार करेंगे अगर उनके ख्वाहिशात और अक़ाएद से हम आहन्ग न हो। इसी बोदुल-मशरक़ैन का नतीजा ये है के सूफ़ी इस इमकान के क़ायल हो गऐ के अब्दुल क़ादिर जीलानी बयक वक़्त बग़दाद और तयूनस मैं रह सकते हैं के तयुनस के मरीज़ को शिफ़ा दे दें और बग़दाद में दजला में डूबने वालों को बचा लें जो इफ़रात की मंज़िल है और वहाबियों ने इसके रद-दे-अमल में हर शै केए इंकार करके पैग़म्बर से तवस्सुल को भी शिर्क करार दे दिया जो तफ़रीत की मंज़िल है जाबके हम वही चाहते हैं जो परवर्दीगार ने कहा है के तुमको उम्म्ते वसत बनया गया है ताकि लोगों के गवाह बनो। मुझे डॉक्टर का क़लाम बहुत पसंद आया और मैंने बुनयादी तौर पर उनका शुक्रिया अदा करते हुऐ उनकी बातों से इत्मीनान का इज़हार कार दिया तो उन्होने अब्दुल क़ादिर जीलानी पर अपनी किताब निकाल कर मुझे बतौर तोहफा दी और मुझे अपने यहाँ मेहमान बनने की दावत दी जिससे मैंने माज़ेरत कर ली और हम तयूनस और शुमाली अफ्रीका के बारे मे मुखतलिफ़ बातें करते रहे यहाँ तक के हमारा दोस्त कांसे वापस आ गया और हम रात पे वक़्त घर वापस आऐ जबके हमने सारा दिन मुलाक़ात और मुबाहेसात मे गुज़ारा औए बेहद थकान के एहसास की बिना पर अपने को नींद के हवाले कार दिया। सुबह सवैरे उठ कार मैंने नमाज़ पढ़ी और उस किताब के मुतालेऐ मे मसरूफ़ हो गया मेरा दोस्त उस वक़्त उठा जिस वक़्त मैं आधी किताब पढ़ चुका। वो बार-बार मुझे नाश्ते की दावत दे रहा था लेकिन मैं इंकार कार रहा था यहाँ तक के मैंने मुतालेएआ मुकम्मल कर लिया और किताब ने मेरे अंदर ऐसा शक पैदा कार दिया जो बहुत देर काफी नहीं रहा और इराक़ छोड़ने से पहले ज़ाएल हो गया।

शक और सवाल

मैं अपने दोस्त के घर तीन दिन मुकीम रहा जिसमे आराम भी किया और मुसलसल उन बयानात पर गोर भी करता रहा जो इन लोगो से सुने थे जिंका ताज़ा इंकेशफ़ हुआ था और गोया के ये लोगे सतहे कमर पर आबाद थे तो क्यों ऐसा हुआ के हर शख्स इन के बारे में वही तज़किरा करता था जो एबदारों तोहिनआमेज़ हों और क्यों मैं खुद मैं इनसे बेज़ार और मुतान्फिर हूँ जब के मैं इन्हे पहचानता भी नहीं शायद ये उन प्रोपैगंडो का नतीजा है जो इनके बारें में बारहा सुना है के ये लोगे हज़रत आली अलै। की इबादत करते हैं और अपने इमामों को खुदा की जगह पर रखते है और हुलूल के क़ायल हैं या खुदा को छोड़े कर पत्थरों को सजदा करते हैं या जैसा के मेरे बाप ने हज की वापसी पर बयान किया था के ये लोगे क़ब्रे-पैगंबर के पास वहाँ नजासते डालने के लिऐ आते हैं और इनको सऊदीयों ने रंगे हाथों गिरफ्तार करके फाँसी भी दी है वगैरा-वगैरा। भला कैसे मुमकिन है के मुसलमान एसी बातें सुने और शियों से बेज़ार और मुतन्नफिर ना हों या उनसे जिहाद ना करें लेकिन मेरी मुश्किल ये है के मैं उन खबरों की कैसे तसदीक़ कर दूँ जबके मैंने अपनी आँखों से बहुत कुछ देखा है और अपने कानों से बोहुत कुछ सुना है और तो उनके दरमियान रहते हुए एक हफ्ते से ज़्यादा गुज़र गया है जबके मैंने इनसे सिवाऐ मनतक़ी कलेमात के और कोई बात नही सुनी है वो कलेमात जो अक़्ल में बिन किसी इजाज़त के दाखिल हो जाते हैं बल्कि मुझे अपनी इबादत नमाज़। दुआ , इख्लाक़ और ऐहतेरामे उलमा ने इस कदर मुतास्सिर किया है के मई उन्हीं के जैसा बनना चाहता हूँ। अब मैं दिल ही दिल में ये सवाल करने लगा हूँ के क्या वाक़यन ये लोग रसूल अल्लाह से नफ़रत करते हैं जबके मैंने बारहां इनके सामने हुज़ूर का तज़किरा कियाऔर हर मर्तबा इन लोगों ने बा आवाज़े बुलंद सलवात पढ़ी के मुझे ये ख़्याल हो गया के ये सब मुनाफ़िक़ हैं लेकिन ये ख़्याल उस वक़्त ख़त्म होगया जब मैंने इनकी किताबों की औराक़ गरदानी की और पैग़म्बर के बारे में बेहद ऐहतेराम और तक़दीस के कलेमात देखे जो अपनी किताबों में भी नहीं देखे थे। ये लोग क़ब्ले बेसअत और बादे बेसअत पैग़म्बर की इस्मत के क़ायल हैं जाबके अहले-सुन्नत सिर्फ तबलीगे क़ुरआन में मासूम मानते हैं बाक़ी मक़ामात पर एक ख़ताकार बशर क़रार देते हैं और अक्सर अवक़ात उनकी ख़ता और सहाबा की सही राय की मिसालें भी देते हैं जबकि शिया इस बात को शिद्दत से ठुकरा देते हैं के रसूल अल्लाह गलती करें और कोई दूसरा शख़्स सही कहे तो इन हालात में किस तरह मैं इस बात की तसदीक़ कर सकता हूँ के ये लोग रसूल अल्लाह को नापसंद करते हैं चुनांचे एक दिन मैंने अपने दोस्त से इस मौज़ू पर गुफ़्तुगू की और उससे इलतेमास की बल्कि क़सम दिलाई की जवाब साफ ओ सरीह हो जिसके नतीजे में ये गुफ़्तुगू सामने आई।

-आप लोग हज़रत अली करमल्लाहो वजहू को बमनज़िला अन्बिया समझते हैं और जब उनका ज़िक्र आता है तो अलैहिस्सलाम कहते हैं।

-यकीनना हम अमीरुल- मोमेनीन और आईम्मा के ज़िक्र पर उन्हे अलैहिस्सलाम कहते हैं लेकिन इसका ये मतलब हरगिज़ नहीं के ये हज़रात अन्बिया हैं। ये रसूल की ज़ुरियत और उनकी वो इतरत हैं जिन पर सलवात भेजने का हुक्म दिया गया है और इसी बिना पर उन पर अलैहिस्सलातो-वससलाम कहना दुरुस्त है।

-बरादर , हम सिवाए रसूल अल्लाह और अन्बिया-ओ-साबेक़ीन के किसी के लिए सलवातो सलाम के काएल नहीं है और उसमे अली या औलादे अली का कोई दखल नहीं है।

--मेरी ख़ाहिश और मेरा तक़ाज़ा ये है के आप कुछ ज़्यादा पढ़ें ताकि हक़ीक़त से बाखबर हो जाऐ।

-बरदार मैं कौन सी किताबें पढ़ूँ क्या आप ने ये नहीं कहा था के अहमद अमीन की किताबें भी हमारे लिए सनद और क़ाबीले ऐतेमाद नहीं है। क्या आप ये नहीं देखते के ईसाइयों की किताबों में ईसा के इब्नुल्लाह होने का ज़िक्र मौजूद है जबकि क़ुरआने हकीम में जो असदकुल-आलेमीन है खुद ईसा इब्ने मरियम की ज़बान से ये नकल करता है के मैंने सिर्फ ये कहा है केयल्लाह की इबादत करो जो मेरा भी परवर्दिगार है और तुम्हारा भी।

-आपने बिलकुल सही कहा। मैं आपसे कह भी चुका हूँ और फिर ये चाहता हूँ के अक़्लो मनतिक़ इस्तेमाल करें और क़ुरआने करीम सुन्न्ते-सहीआ से इस्तेदलाल करें इसलिए के हम सब मुसलमान हैं। हाँ गुफ़्तुगू अगर किसी यहूदी या ईसाई से होती तो तरज़े इस्तेदलाल कुछ और होता।

-मैं किस किताब में हक़ीक़त तलाश करूँ जबके हर मुअल्लिफ़ , हर फ़िरका और हर मज़हब अपने बर हक़ होने का दावेदार है।

-मैं अन्करीब बहूर्त वाज़ेह दलील पेश करूंगा जिसमें मुसलमानों के फिरकों में कोई इख्तेलाफ़ ना होगा। ये और बात है के आप हमें जानते हैं अल्लाह से दुआ कीजिऐ के वो इल्म में इज़ाफा करे क्या आपने ये आयते करीमा “इन्नल्लाहा-व-मलाऐकतहु यसल्लूना अलननबी या आइयोहल-लज़ीना-आमेनो सल्लू अलैहे-वसल्लेमू तसलीमा ” की तफ़सीर पढ़ी है। इसके बारे में तमाम शिया और सुन्नी मुफ़स्सेरीन के जिन असहाब को मुखातब बनाया गया है वो रसूल अल्लाह की ख़िदमत में आऐ और कहा के हम आप पर सलाम का तरीक़ा जानते हैं पर सलावात का तरीक़ा नहीं जानते हैं तो आपने फरमाया के कहो “अल्लाहुम्मा सल्ले आला मुहम्मद वा आले मुहम्मद कमा सल्लेता अला इब्राहिमा वा आले इब्राहिमा फ़िल आलेमीन इन्नका हामिदुम मजीद ” और ख़बरदार मुझ पर नाकिस सलावात ना पढ़ना।

पूछा गया “या रसूल अल्लाह नाक़िस सवाल क्या है ” ? तो फरमाया के “अल्लाह-हुम्मा सल्ले अला मुहम्मद ” कह कर खामोश हो जाना और याद रखो के अल्लाह कामिल है तो किसी नाक़िस को कबूल नहीं करता और इसी लिए उनके बाद सहाबा और उनके बाद ताबेईन कामिल सलावात पढ़ा करते थे यहाँ तक के इमाम शाफ़ई ने उनके बारे में फरमा दिया है के “ऐ अहलेबैते रसूल आपकी की मुहब्बत वो फरिजा-ऐ-इलाही है जिसको कूरआन में नाज़िल किया गया है आपकी अज़मतो शान के लिए यही काफ़ी है के जो आप पर सलावात न पढ़े उनकी नमाज़ नमाज़ नहीं ” ।

मेरे दोस्त का बयान मेरे कानों से टकराता जा रहा था और मेरे दिल में उतरता जा रहा था बल्कि उसका मुसबत रद्दे अमल भी हो रहा था और इस वक़्त जब मैंने ये बातें बाज़ किताबों में पढ़ ली हैं तो इस बाती का ऐतेराफ़ कर लिया है के हम रसूल पर सलावात भेजते डबल्यूक्यूटी उनके आलो आशाब पर भी सलावात भेजेंगे लेकिन अली अलै।स को अलग से अलैहिस्सलाम नहीं कहेंगे। मेरे दोस्त ने कहा आपकी बुखारी के बारे में क्या राय है। क्या वो शिया था ? मैंने कहा वो अहले सुन्नत के जलीलुल क़द्र इमाम थे और उन की किताब अल्लाह की किताब के बाद सही तरीन किताब है। तो ये सुन कर वो उठे और अपने क़ुतुब खाने से सही बुखारी निकाल कर किसी ख़ास सफहे को तलाश करने लगे और मुझे पढ़ने को दिया के फुला ने फुला हज़रत अली से रवायत की है। मैं रवायत देख कर भी तसदीक़ ना कर सका और फरते हैरत से ये शक करने लगा के ये सही बुखारी है भी के नहीं ? मैंने बेचैन होकर बार बार सफह और जिल्द को देखा और जब मेरे दोस्त ने किताब के बारे मे मेरे शक का एहसास किया तो दूसरा सफहा खोल दिया जहा ये था के हज़रत अली इबनूल हुसैन अलैहुमुस्सलाम ने बयान किया है तो मेरा जावा इस के सिवा कुछ ना था के सुभहानअल्लाह और वो इस जवाब से मुतमइन हो कर बाहर निकाल गऐ और मैं सोचता रहा और बार-बार वरक़ गर्दानी करता रहा और किताब की तबाअत के बारे में जुस्तुजू करता रहा तो मैंने देखा ये किताब मिस्र में शिरकते हलबी से तबअ और नशर हुई है ! खुदया अब मैं क्यों इनाद और हठधर्मी से काम लूँ जब की मेरे सामने सही तरीन किताब की मज़बूत दलील मौजूद है और बुखारी बहरहाल शिया नहीं थे बल्कि अहले सुन्नत के इमामों और मुहद्दीसों में से थे तो क्या मैं इस हदीस को तस्लीम कर लूँ के हज़रत अली “अलैहिस्सलाम ” हैं ? लेकिन खतरा ये है के इस हक़ीक़त के पीछे बहुत से औरे हक़ाएक़ आ जाएँगें जिन का मैं ऐतेराफ़ नहीं करना चाहता मैं अपने दोस्त के सामने दो मर्तबा शिकस्त खुरदा हुआ उस के नतीजे में अब्दुल क़ादिर जीलानी के तक़्द्दुस दस्त बरदार हो कर ये तस्लीम किया के इमाम मूसा काज़िम अलै। उससे बेहतर हैं और फिर ये क़ुबूल किया के हज़रत अली इस बात के अहल हैं के उन्हें अलैहिस्सलम कहा जाऐ लेकिन अब मज़ीद कोई शिकस्त नहीं खाना चाहता। मैं ही वो हूँ जो कुछ दिन क़ब्ल मिस्र में आलिम की हैसियत में था। जहाँ उल्मा-ऐ-अज़हर मेरा ऐहतेराम करते थे और आज अपने नफ़्स को शिकस्त खुर्दा और मग़लूब देख रहा हूँ और वो भी उन लोगों के मुक़ाबले जिनके बारे में ऐतेक़ाद यही है के वो गलती पर हैं इसलिए के मेरी आदत हो गई है के मैं लफ्ज़े शिया को गाली समझूँ।

ये अजीब ग़ुरूर और हुब्बे ज़ात का जज़्बा है।ये अकीकी अनानीयत , फ़साद औए तअस्सुब है। खुदाया। मुझे अक़ल अता फारमा और हक़ीक़त को तल्खी के बावजूद कबूल करने की तौफ़ीक़ अता फारमा। मेरी बसर और बसीरत को रोशन कर दे। मुझे सिराते मुस्तक़ीम की हिदायत फ़रमा और जो बातों को सुन कर बेहतरीन बातों का इत्तेबा करते हैं। परवरदिगार। मुझको हक़ दिखला दे और उसकी इत्तेबा की तौफ़ीक़ अता फ़रमा और बतिल को बातिल की शक्ल में दिखला दे और इससे इजतेनाब की तौफ़ीक़ अता फ़रमा।मेरा दोस्त मुझे घर पर ले कर आया और मैं रास्तेभर इन दुआओं को दोहराता रहा यहाँ तक के उसने मुस्कुरा कर कहा खुदा हमे और आपको और सारे मुसलमानों को हिदायत दे के उसने अपनी किताबे मोहकम मै फरमाया हे के “जिन लोगों ने हमारी रह मे जिहाद किया हम उन्हे अपने रास्तों की हिदायत करेंगे और अल्लाह नेक किरदार वालों के साथ है ” और जिहाद उस आयत मे इल्मी बहस के मानी है जो इंसान को हक़ीक़त तक पहुंचा दे और अल्लाह हर तालिबे हक़ को हक़ की हिदायत करने वाला है।

सफ़रे नजफ़

एक रात मेरे दोस्त ने मुझको खबर दी के मैं कल इनशाअल्लाह नजफ़ का इरादा रखता हूँ। मैंने कहा ये नजफ़ क्या है ? ये एक इल्मी शहर है जहां इमाम अली इब्ने अबीतालिब अलै। की क़ब्र है। मैं हैरत में पड़ गया के इसे क्योंकर मालूम हो जब के हमारे शयूख बताते हैं के उनकी कोई मशहूर क़ब्र नहीं है फिर भी हम उनके साथ उमूमी गाड़ी मे सवार हो कर पहले कुफा पहुंचे के मस्जिड़े कूफा की ज़ियारत करें जो इस्लाम के क़दीम तरीन आसार मे से एक है वहाँ मेरे साथी ने क़दीम तरीन मकामात दिखलाऐ और मुस्लिम इब्ने अकील अले॰ , हानी इब्ने उरवा का मज़ार दिखाया और मुख़तसर लफ्जों मे उनकी शहादत की कैफ़ियत बयान की।

इसके बाद मुझे उस मेहराब में ले गए जहां हज़रत अली अलै।की शहादत हुई थी , इसके बाद हमने उन के उस घर की ज़ियारत की जिसमें वो अपने दोनों फ़रज़न्दों सैय्यदना हसन और सैय्यदना हुसैन अलै। के साथ रहते थे। उस घर मे एक वो कुआं भी है जिससे वो हज़रात पानी पीते थे और वुज़ू करते थे। मैंने उस घर में चंद ऐसे रूहानी लम्हात गुज़ारे के दुनिया और माफ़ीहा से गाफिल हो गया और सिर्फ़ इमाम के ज़ोहद और उनकी सादी ज़िंदगी पर गोर करता रहा जब वो अमीरुल-मोमेनीन और चौथे खलीफा-ऐ-राशीद भी थे। मैं अहले कूफ़ा की तवाज़ों और शराफ़त को न नज़र अन्दाज़ नहीं कर सकता कि मै जिस गिरोह के पास से गुज़रा उसने उठ कर हमें सलाम किया और हमारा साथी उनमें से बहुत से अफ़राद से वकिफ़ भी था। एक शख़्स जो वहाँ का मुदीर था उसने हमे घर बुलाया वहाँ हमने उसके बच्चों से मुलाक़ात की और निहायत ही खुशगवार रात गुज़ारी जैसे हम अपने घर और खानदान वालों के दरमियान हों। ये लोग जब भी अहले सुन्नत का तज़किरा करते थे तो बरादराने अलहे-सुन्नत कहते थे जिससे मैं बहुत मानूस हुआ और मैंने इस लफ्ज की सिदाक़त मालूम करने के लिऐ बहुत से इम्तेहानी सवाल किऐ। कूफ़े से हम लोग नजफ़ गऐ जो वहाँ से तक़रीबन दस किलोमीटर के फासले पर है वहाँ पहुचते ही काज़मैन की याद आ गई कि दूर से रोज़े के मीनार नज़र आऐ जो सुनहरे गुंबद का अहाता किए हुए थे। शिया ज़ाएरीन के तरीक़े के मुताबिक हम इज़्ने दखूल पढ़ कर इमाम के हराम मे दाखिल हुए और वहाँ हमने काज़मैन से ज़्यादा अजीब तर मंज़र देखा। मैंने आदतन फ़ातेहा पढ़ा जबके मुझे इस बात में शक था कि इस क़ब्र में इमाम अली अलै। का जसद अतहर है बलके इस घर की सादगी को देख कर जिसमें आप कूफ़ा में रहा करते थे ये इतमीनान हो गया कि हज़रत अली इस सुनहेरी और रुपहली आराईश से हरगिज़ राज़ी नहीं हो सकते जबके दुनिया के मुखतलिफ़ हिस्सों में मुसलमान भूक से मर रहे हैं और खुसुसियत के साथ खुद वहाँ भी मैंने ऐसे फुक़रा देखे जो खैरात मांगने के लिए हर राहगीर के आगे हाथ फैला देते थे।

मेरी ज़बाने हाल ये कह रह रही थी शियों! तुम गलती पर हो कम अज़ कम अपनी गलती का इक़रार कर लो के जिस अली को रसूल अल्लाह ने कबरों को बराबर कर देने के लिए भेजा था उसकी कबर पर सोने चाँदी की कारिगिरी अगर शिर्क नहीं है तो कम से कम ऐसी अज़ीम गलती ज़रूर है जिसको इस्लाम माफ नहीं कर सकता।

मेरे साथी ने मिट्टी का एक टुकड़ा बढ़ाते हुए सवाल किया के आप नमाज़ पढेगें ? मैंने सख्ती से जवाब दिया के हम क़ब्रों के पास नमाज़ नहीं पढ़ते हैं।

उसने कहा कि अच्छा इतनी मोहलत दीजिये के मै दो रकअत नमाज़ पढ़ लूँ , मैं उसके इंतज़ार में ज़रीह पर मुअल्लक़ तख्ती को पढ़ने लगा और जालियों के दरमियान से इसके अंदर देखा तो उसमें दिरहम-ओ-दिनार और रियाल वगेरा के नोट भरे हुए थे इसको ज़ाएरीन वहाँ के तमीरी प्रोग्राम में हिस्सा लेने के लिए बरकत के तोर पर दाल देते थे मेरा ख़्याल ये था के इतनी बड़ी मिक़दार कई महीनों में जमा होती होगी। लेकिन मेरे साथी ने बताया के यहाँ के मुतावल्लीन हर रात नमाज़े ईशा के बाद इस ज़खीरे को साफ कर दिया करते हैं। मैं वहाँ से निहायत ही हैरत ओ दहशत के आलम में निकला और गौया मेरी आरज़ू थी के काश इसमें से कुछ मुझे मिल जाता या कम से कम इन फ़ुकारा ओ मसाकीन ही पर तक़सीम हो जाता जो वहाँ बाकसरत पाए जाते थे मैं चार दीवारी के हर गोशे में देख रहा था के लोगों की जमाआतें कहीं महू-ए-नमाज़ हैं और कहीं खुताबा के बयानात सुन रही हैं और बाज़ अतराफ़ से रोने की आवाज़ें भी बुलंद हैं।फिर मैंने कुछ गिरोह को देखा जो गिरये के साथ सीना ज़नी भी कर रहे थे और मैंने चाहा के अपने साथी से दरयाफ्त करूँ के इन्हें क्या हो गया है जो गिरया-ओ-सीना ज़नी कर रहे हैं के हमारे करीब से एक जनाज़ा भी गुज़रा जिसके बारे में ये देखा के सहन का एक पत्थर उठा कर सर्दाब में उतार दिया गया तो मैं समझा शायद ये रोना इसी मय्य्त के लिए था जो इन लोगों की निगाह में अज़ीज़ ओ महबूब रही होगी।

मुलाक़ाते उल्मा

मेरा साथी मुझे हराम के गोशे की एक मस्जिद में ले गया।जहां मुकम्मल तौर पर क़ालीन बिछा हुआ था और महराब में निहायत ही खूबसूरत तरीके से आयाते क़ुरआनी नक़्श थीं। मेरी तवज्जह बच्चों की इस जमाअत की तरफ हो गई जो अमामे बांधे हुए मेहराब के क़रीब मुबाहेसा कर रहे थे और हर एक के हाथ में एक किताब थी।मुझे ये मंज़र इन्तेहाई हसीन दिखाई दिया।और मैंने कभी ऐसे अहले इल्म नहीं देखे थेजो तेहरा और सोलह की दरमियानी उम्र में उल्मा की शक्ल में हों और उनका लिबास ऐसा हो जो उन्हें आसमान का चाँद बनादे।

मेरे साथी ने इन लोगों से सय्यद के बारे में सवाल किया तो उन्होने बताया के वो नमाज़े जमाअत पढ़ाएंगे मैंने समझा के ये सय्यद कोई बुज़ुर्ग हैं लेकिन इतना ज़रूर अन्दाज़ा हो गया के वो उल्मा में कोई बुज़ुर्ग हैं। ये बाद में मालूम हुआ के वो क़ौमे शिया के अज़ीम तरीन रहनुमा होज़-ऐ इलमिया के ज़ईम ओ ज़िम्मेदार सय्यद अल-खुई हैं जबके मुझे ये मालूम था के शियों में सय्यद हर उस शख़्स को कहा जाता है जो नस्ले पैग़म्बर से हो और सय्यद आलिम हो या तालिबे इल्म स्याह अमामा बांधता है जाबके दूसरे उल्मा सफ़ेद अमामा बांधते है और उन्हे शैख़ कहा जाता है उसके अलावा बाक़ी अशराफ़ जो उल्मा नहीं हैं सब्ज़ अमामा बांधते हैं। मेरे साथी ने इन लोगों से कहा के हम थोड़ी देर उनके साथ बैठे और उसके बाद सय्यद की मुलाक़ात के लिए जाएंगें।उन लोगों ने खुश आमदीद कहा और निस्फ़ दाएरा बना कर बैठ गए। मई एक एक न्छेहरे को बगौर देख रहा था और उनकी पाकीज़गीए नफ़्स और परहेजगारी का एहसास कर रहा था। मेरे ज़हन में पैग़म्बर की हदीस गर्दिश कर रही थी के इंसान फ़ितरते इस्लाम पर पैदा होता है इसके बाद उसके माँ बाप यहूदी नसरानी या मजूसी बना देते हैं और मैं अपने दिल में कह रहा था के या शिया बना देते हैं। इन बच्चों ने मेरे वतन के बारे में सवाल किया तो मैंने बताया के तयूनस। उन्होने पुछा के क्या वहाँ भी होज़ात इलमिया पाए जाते हैं ? मैंने कहा हमारे यहाँ स्कूल और कॉलेज हैं। इसके बाद चारों तरफ से सवालात की बौछार हो गयी जो निहायत ही गहरे और परेशान कुन थे मैं इन बच्चों से क्या कहूँ जिन सादा लोगों को ये ख़्याल है के सारा आलमे इस्लाम होज़ा-ए-इलमिया है फ़िक़ऐ उसूले दीन और शरीयत ओ तफ़सीर की तालीम दी जाती है और उन्हे ये खबर नहीं है के आलमे इस्लामी और हमारे मुमालिक इस दौर से आगे बढ़ गए हैं के हमने क़ुरआनी मकातीब को इब्तेदाई स्कूल में तब्दील कर दिया है जिस की निगरानी ईसाई राहबात के हाथों में है तो क्या मैं उनसे कह दूँ के ये लोग हमारी निस्बत से अभी पिछड़े हुए हैं।

एक बच्चे ने मुझसे सवाल किया के तयुनस का अमूमी मज़हब क्या है ? तो मैंने कहा के माल्की और ये देखा के उनमें से बाज़ बच्चे हंस रहे हैं लेकिन मैंने उसकी कोई परवाह नहीं की। उसने कहा के क्या आप लोग मज़हबे जाफरी से बाख़बर नहीं हैं ? तो मैंने कहा नहीं। ये नया नाम क्या है हम तो सिवाए चार मज़ाहेब के कुछ नहीं जानते हैं और इसके अलावा जो कुछ है वो इस्लाम नहीं है।

बच्चे ने मुस्कुरा कर कहा माफ कीजिएगा मज़हबे जाफरी खालिस इस्लाम है ।क्या आप को नहीं मालूम के इमाम अबू हनीफ़ा इमाम जाफ़र सादिक़ अलै।के शागिर्द और अबू हनीफ़ा ने उन्हीं के बारे में ये कहा के अगर दो साल शागिर्दी के ना होते तो मैं हलाक हो जाता। मई खामोश हो गया और मैंने कोई जवाब नहीं दिया। इसलिए के उसने एक ऐसा नाम ले लिया जिसको मैंने आज से पहले कभी नहीं सुना था। लेकिन शुकरे ख़ुदा किया के उनके इमाम जाफर सादिक़ अलै।इमाम मालिक के उस्ताद नहीं थे और हम तो माल्की हैं हनफ़ी नहीं हैं। उसने कहा मज़ाहेबे अरबा में सब ने एक दूसरे से इल्म लिया है। अहमद इब्ने हम्बल ने शाफ़ई से , शाफ़ई ने मालिक से , मालिक ने अबु हनीफ़ा से और हज़रत अबु हनीफ़ा ने इमाम जफर सादिक़ अलै। से लिहाजा ये सब जाफर इब्ने मुहम्मद के शागिर्द हैं। उन्होने सबसे पहले मस्जिद में इस्लामी दर्सगाह क़ाएम की थी। जहां चार हज़ार से ज़्यादा मुहद्दिस और फ़क़ीह उनकी शागिर्दी करते थे। मैं उस बच्चे की जहानत को देख कर हैरत में ज़दा गया। जो तारीख़ी वाक़ेआत को इस रवानी से बयान कर रहा था जैसे हम लोग क़ुरआन के सूरह हिफ़्ज़ करते हैं और उस वक़्त मेरी मदहोशी में और इज़ाफा हो गया। जब उसने बाज़ तारीख़ी मसादिर जिल्द और बाब के हवाले के साथ बयान किऐ और सिलसिलाए बयान को यूं जारी रखा जैसे कोई उस्ताद अपने शागिर्द को तालीम दे रहा हो। मुझे उसके सामने अपनी कम्ज़ोरी का एहसास पैदा हुआ तो मैंने आरज़ू की के काश मैं अपने साथी के साथ निकल गया होता और इन बच्चों के दरमियान ना बैठा होता। अब तो इन के तारीख वफ़्क़े के हर सवाल के जवाब से मैं आजिज़ था यहाँ तक के एक बच्चे ने पूछ लिया के मैं ख़ुद किस इमाम का मुक़ल्लिद हूँ तो मैंने कहा इमाम मालिक का।उसने कहा के आप उस मुर्दा इमाम की किस तरह तक़लीद करते हैं जिसके और आपके दरमियान चौदह सदियों का फ़ासला है अगर आज आप कोई नया मसला दरयाफ्त करना चाहें तो वो आप किस तरह बताएँगे ? मैंने थोड़ी देर गोर किया और कहा के आपके जाफ़र भी मर चुके हैं तो किस की तक़लीद करते हैं उसने अपने साथियों के साथ यक ज़बान होकर फिल-फॉर जवाब दिया के हम सैय्यद अल खुई के मुक़ल्लिद और वही हमारे इमामे फ़कीह हैं। मैं न समझ सका इनकी नज़र में खुई आलम हैं या जाफ़र सादिक़। तो मैंने चाहा के मौज़ू तब्दील कर दूँ इसलिए मैंने दूसरे सवाल शुरू कर दिए। नजफ़ की आबादी कितनी है। नजफ़ और बग़दाद का फासला कितना है क्या तुम इराक़ के अलावा और मुल्क भी जानते हो और जब वो कोई जवाब देते थे तो मैं एक नया सवाल पेश कर देता था ताकि वो मुझसे सवाल करने से गाफ़िल हो जाएँ इसलिए के मेरे पास कोई जवाब नहीं रह गया था लेकिन मई इस कमजोरी का एहसास भी नहीं कर सकता था। अगर्चे मैं अंदर से मोतार्रिफ़ था के जो इल्म , बुज़ुर्गी और शराफ़त मैंने मिस्र में देखी थी वो सब यहाँ भाप बन कर उड़ गई है। खसूसियत के साथ इन बच्चों से मिलने के बाद मुझे इस शेर के मआनी मालूम हुए “जो शख्स इल्म में फ़लसफे का मुद्दई है उससे कह दो के तुम ने एक शै का तहफ़्फुज़ किया है और तुम्हारे हाथ से बहुत सी अशिया निकल गई है ” ।

मेरा तसव्वुर ये था के इन बच्चों की अक़लें उन मशाएख़ की अक़्लों से बड़ी हैं जिनको मैंने अज़हर में देखा था और इन उल्मा की अक़्लों से अज़ीम तर हैं जिन को मैं तयूनस में जानता हूँ। इतने में सय्यद अलखूई बावक़ार उल्मा की एक जमाअत के साथ मस्जिद में दाख़िल हुए और उन बच्चों के साथ मैं भी खड़ा हो गया। बच्चों ने बढ़ कर उनके हाथ को बोसा दिया और मई अपनी जगह खड़ा रहा। उनके बैठते ही सारा मजमा बैठ गया और उनहोंने मस्साकूमल्लाह बिल्खैर कहना शुरू किया और सबने वैसे ही जवाब दिया। यहाँ तक के मेरा नंबर आया तो मैंने भी वैसे ही जवाब दिया फिर मेरे साथी ने उनसे सरगोशी करते हुए मेरी तरफ इशारा किया के करीब आएँ और मुझे उनके पहलू में बैठा दिया और कहा के आप सय्यद से बयान करें के आपने तयूनस में शियों के बारे में क्या सुना है ? तो मैंने कहा के मुझे उन हकायात की ज़रूरत नहीं है जो यहाँ वहाँ से सुन्नी हैं।

अब तो मैं बराहे रास्त शियों के अक़ाएद जानना चाहता हूँ और मेरे पास कुछ सवालात हैं जिनके वाज़ेह जवाबात जानना चाहता हूँ मेरे साथी ने इसरार किया के उन ऐतेक़ाद कस तज़किरा करूँ तो मैंने कहा के हमारे नज़दीक शिया इस्लाम के हक़ में यहूदों नसारा से बदतर हैं। इसलिए के वो लोग अल्लाह की इबादत करते हैं और मूसा की नबूवत पर ईमान रखते हैं लेकिन शियों के बारे में सुना जाता है के वो अली की इबादत करते हैं और बाज़ ख़ुदा की इबादत भी करते हैं तो अली को नबी की मंज़िल पर क़रार देते हैं फिर मैंने जिबरील वाला किस्सा सुनाया के उन्होंने ख़यानत करके रिसालत को अली के बजाए मुहम्मद के हवाले कर दिया सय्यद कुछ देर सर झुकाए सुनते रहे इसके बाद नज़र उठा कर फरमाया के हम इस बात की शहादत देते हैं के अल्लाह के अलावा कोई ख़ुदा नहीं है। मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं अली अल्लाह के बंदों में से एक बंदा हैं इसके बाद हाज़रीन की तरफ रुख़ करके फ़रमाया देखो इन सादा लोगों को ग़लत प्रोपेगेंडा ने किस कदर गलत फ़हमियों में मुब्तला कर दिया है और ये कोई अजीब बात नहीं है मैंने इससे भी कुछ ज़्यादा ही सुना है। वलाहोल वला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहिल अलीउलअज़ीम।

इसके बाद मेरी तरफ मुतवज्जह होकर फ़रमाया के क्या आपने क़ुरआन पढ़ा है ? मैंने कहा के मैं दस साल की उम्र में निस्फ़ क़ुरआन का हाफ़िज़ हो चुका था। उन्होंने फरमाया तो क्या आप जानते हैं के इस्लाम के तमाम फ़िरक़े क़ुरआन करीम पर मुत्तफ़िक़ हैं और जो क़ुरआन हमारे पास है वही क़ुरआन आप हज़रात के पास है ? मैंने कहा हाँ ये मुझे मालूम है तो उन्होंने कहा क्या आपने ये आयात नहीं पढ़ी “मुहम्मद सिर्फ अल्लाह के रसूल हैं उनसे पहले बहुत से रसूल गुज़र चुके हैं। या “मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं और उनके साथी कुफ़्फ़ार के लिए शदीद तरीन हैं ” । या ये के “मुहम्मद तुम्हारे मर्दों में से किसी के बाप नहीं हैं लेकिन अल्लाह के रसूल और खातेमुन नबीईन हैं।

मैंने कहा के मैं इन आयात से बाख़बर हूँ तो फरमाया के इन आयात में अली की रिसालत का ज़िक्र कहाँ हैऔर जब हमारा क़ुरआन मुहम्मद को रसूल कहता है तो ये इफ़्तेरा कहाँ से आया ? मैं ये सुनकर खामोश हो गया तो मज़ीद अल-अयाज़ों बिल्लाह जिबरील की ख़यानत की दास्तान तो इससे बदतर है इस लिए के जिबरील जब मुहम्मद के पास भेजे गए थे तो हज़रत की उम्र चालीस साल की थी और अली उस वक़्त कमसिन बच्चे थे तो ये कैसे मुमकिन है के जिबरील इतनी बड़ी ग़लती करें के उन्हें जवान मुहम्मद और कमसिन अली का फ़र्क़ भी मालूम न हो सके।

वो खामोश हो गए और मैं उनके अक़वाल के बारे में फ़िक्र करता रहा और उनकी गुफ़्तुगू का तज्ज़िया करके उससे लज़्ज़त हासिल करता रहा जो गुफ़्तुगू मेरे दिल की गहराइयों में उतर गई थी और उसने मेरी निगाहों से पर्दे उठा दिये थे और मैं अपने नफ़्स से पूछ रहा था के मैंने ख़ुद ऐसी मंतिक़ी तहलील क्यों नहीं की।

उसके बाद सैयदुल-खुई ने मज़ीद फ़रमाया के मैं मज़ीद ये कहना चाहता हूँ के इस्लाम के तमाम फ़िरकों में शिया ही एक ऐसा फ़िरक़ा है जो अंबिया और अईम्मा की इस्मत का क़ायल है तो जब हमारे इमाम जो हमारी ही तरह के इंसान थे वो तमाम खताओं से महफ़ूज और मासूम हैं तो जिबरील कैसे गलती करेंगे जो मलके-मुक़र्रब भी हैं और खुदा ने उनको रुहुल-अमीन भी करार दिया है मैंने पूछा के फिर इफ़्तेरात कहाँ से आए हैं तो उन्होने बताया के उन दुश्मनाने इस्लाम की तरफ से जो मुसलमानों में तफ़रेका पैदा करके उन्हें टुकड़े-टुकड़े कर देना चाहते थे और उन्हें आपस में टकरा देना चाहते थे वरना मुसलमान शिया हो या सुन्नी सब आपस में भाई-भाई हैं सब खुदाऐ वहदहु लाशरीक की इबादत करते हैं , सब का क़ुरआन एक , नबी एक और क़िबला एक है। इख्तलाफ़ात फ़िक्ही मसाएल में हैं जिस तरह के खुद सुन्नी मज़ाहिब के दरमियान इख्तलाफ़ पाया जाता है के मालिक को अबु-हनीफ़ा से इख्तेलाफ़ है और अबु-हनीफ़ा को शाफ़ई से मैंने कहा तो ये तमाम बातें इफ़्तेरा हैं ? उन्होने कहा के आप बेहम्देलिल्लाह साहिबे अक्लो फहम हैं आपने शियों के इलाक़े देखे हैं उनके दरमियान गर्दिश की है तो क्या कहीं इन इल्ज़ामात का कोई असर देखा या सुना है।

मैंने कहा के मैंने तो सिर्फ़ ख़ैर ही ख़ैर देखा है और मैं शुक्रे ख़ुदा करता हूँ के मेरी मुलाक़ात बाहरी जहाज़ में उस्ताद मुनीम से हो गयी और मैं उनकी वजह से इराक़ आ गया और यहाँ बहुत सी बातों से बाख़बर हो गया। मेरी ये गुफ़्तुगु सुन कर उस्ताद मुनीम ने मुस्कुरा कर कहा के और ये भी मालूम हो गया के हज़रत अली अलै।की कोई क़ब्र भी है।

मैंने उन्हें रोका और ये कहना शुरू किया के मैंने तो बहुत सी नयी बातें उन बच्चों से भी सीखी है और मेरे दिल मैं ये आरज़ू पैदा हो गयी के काश मुझे मोक़ा होता तो मैं उन्हीं की तरह हौज़ा-ऐ-इस्लामिया में तालीम हासिल करता , सय्यद ने फरमाया आह्लन व साहलन अगर आप तलबे-इल्म के ख्वाहिशमंद हैं तो हौज़ा आपका ज़िम्मेदार है और हम आपके ख़िदमतगुज़ार। हाज़ेरीन ने इस तजवीज़ का इस्तेक़्बाल किया खुसूसन मेरे साथी मुनीम का चेहरा खुशी से दमकने लगा , मैंने कहा के मैं शादी शुदा हूँ और मेरे दो बच्चे हैं।

सय्यद ने फरमाया के मैं ग़िज़ा , लिबास , मकान और तमाम ज़रूरियात का ज़िम्मेदार हूँ मक़सद तलबे-इल्म है मैंने थोड़ी देर ग़ौर किया और दिल ही दिल में कहने लगा के ये बात कोई माकूल नहीं है के पाँच साल कोलेगे में उस्ताद रहने के बाद मैं यकबारगी शागिर्द बन जाऊँ ऐसा फैसला इतनी आसानी से नहीं किया जा सकता। मैंने सैयदुल-खुई की इस पेशकश का शुक्रिया अदा किया और ये कहा के मैं उमरे से वापसी पर वतन पाहुच कर ग़ौर करूंगा लकिन मुझे चाँद किताबों ज़रूरत है।

सैयद ने किताबों के हुक्म दे दिया तो उल्म की एक जमाआत खड़ी हो गई और मुख्तलिफ़ स्टाक खुल गऐ , चन्द लम्हे गुज़रे थे के मेरे सामने सत्तर से ज़्यादा किताबें रक्खी हुई थी और हर शख़्स एक दौरा-ऐ-किताब दे कर कहते के ये मेरी तरफ से हदिया है।

मैंने देखा के इन सब किताबों का ले जाना मुमकिन नहीं है ख़ुसुसन जब के मैं साउदिया जा रहा हूँ जहां पर किताब का दाख़िला इसलिऐ मम्नूअ: है के मुल्क में अपने मज़हब के खिलाफ़ दूसरे अक़ाएद ना फैल जाएँ लेकिन मैं उन किताबों के बारे में कोई कोताही भी नहीं कर सकता जैसी किताबें मैंने ज़िंदगी में कभी नहीं देखी , तो मैंने अपने साथी और दीगर हाज़ेरीन से ये कहा के मेरा सफर बहुत तावील है , दमिश्क़ , अरदन , सउदिया और वापसी में तावील हो जाएगा के मिस्र और लीबिया होते हुऐ तयूनस वापस जाना है और गरा बारी के अलावा बहुत सी हुकूमतों में किताबों का दाख़िला मम्नूअ: भी है तो सैयद ने फरमाया के आप अपना पता दे दें तो हम इन किताबों को भिजवा देंगे मैंने इस नज़रिये को पसंद किया और अपना कार्ड जिस पर तयूनस का पता लिखा हुआ था उनके हवाले कर दिया और उनके अहसानात का शुक्रिया भी अदा किया फिर जब मैं रुखसत होकर उठने लगा तो वो मेरे साथ उठे मुझे सलामती की दुआ और कहा जब मेरे जड़ रसूले अक्रम की क़ब्र के करीब जाएगा तो मेरा सलाम कह दीजिएगा , इस फ़िक़रे से हाज़ेरीन और मैं बेहद मुतास्सिर हुआ और मैंने देखा के उनकी आँखों में आँसू जारी हैं मैंने दिल में कहाँ के माज़अल्लाह क्या ये भी ग़लतकार हो सकते हैं क्या ऐसे लोग भी झूठे हो सकते हैं , इनकी हैबतों अजमत और खाकसारी आवाज़ दे रही है के ये शराफ़त के खानदान से हैं तो मैं बेसाख्ता उनके हाथों को बोसा देने लगा जबके वो मुझसे मुसलसल इंकार करते रहे मेरे साथ सारा मजमा उठा सबने मुझे सलाम किया और बाज़ बच्चे जो मुझसे बहस कर रहे थे और मेरे साथ चले और मुझसे ख़तोकिताबत के लिए उनवान तलब किया जो मैंने उन्हें दे दिया।

अब हम दोबारा कूफ़ा आए एक ऐसे शख़्स की दावत पर जो सैयद खुई की बज़्म में मौजूद थे और हमारे साथी मुनीम के दोस्त थे जिनका नाम अबू शब्बर था हम उन्नके घर में वारिद हुऐ और दानिश्वर नौजवानों की एक जमाअत के साथ तमाम रात महुवे गुफ़्तुगू रहे उन्हीं के दरमियान बाज़ नौजवान सैयद मुहम्मद बाक़र सदर के शागिर्द थे और उन्होंने उनसे मुलाक़ात का मशविरा दिया और और इस बात की ज़िम्मेदारी ली के दूसरे दिन उनसे मुलाक़ात का वक़्त ले लेंगे मेरे साथी मुनीम ने इस पेशकश को पसंद किया लेकिन इस बात पर इज़हारे अफसूस किया के वो खुद न अ रह सकेंगे इसलिए के उन्हें बगदाद में एक काम है जिस में हाज़री ज़रूरी है , हमने इस बात पर इत्तेफ़ाक़ कर लिया के मुनीम की वापसी तक तीन चार दिन अबू शब्बर के मकान में रहेंगे।

नमाज़े सुबह के बाद मुनीम बगदाद के लिए रवाना हो गए और हम सोने के कमरे में चले गए इस रात को हमने इन दानिश्वरों से बहुत कुछ सीखा और हैरत अंगेज़ बात ये है के उन्होंने हौज़ा-ऐ-इलमिया से मुखतलिफ़ उलूम हासिल किए हैं। फ़िक़ा ओ शरीयत उन्हें इक़्तेसाद , इज्तेमाअ: , सियासत , तारीख , लुगत और फ़लकियात वगैरा भी तालीम दी गई है।

मुलाक़ाते सैय्यद मुहम्मद बाक़िरुल-सदर

सैयद अबुशब्बर की रिफ़ाक़त मुझे सैयद मुहम्मद बाक़िरूल-सदर के घर की तरफ़ ले चली , रास्ते में उन्होंने मशहूर उलमा और तक़लीद वगैरा के बारे में बहुत सी मालूमात फरहम किए और जब हम सैयद बाक़िरुल-सदर के मकान में दाखिल हुऐ तो देखा के मकान तुललबे उलमा से भरा हुआ है और उनमें अकसरियत नौजवान मुमतमीन की है।

सैयद ने उठ कर हमें सलाम किया और ख़ुशआमदीद कहते हुए अपने पहलू में बिठा लिया और फिर टयूनस और जज़ाएर और वहाँ के मशहूर उलमा खिज़्र हुसैन और ताहिर बिन आशुर वगैरा के बारे में सवाल करना शुरू कर दिया , मैं उनकी गुफ़ुतूगू से बेहद मानूस हुआ और उनहके चेहरे की जलालत और हमनशीनों के दरमियान उनके ऐहतेराम के बावजूद मैंने कोई अजनबीयत नहीं महसूस जैसे मैं उन्हें पहले से पहचानता था और मैंने उस जलसे से बहुत कुछ फायदा उठाया इस लिए के मैं तुलबा के सवालात भी सुन रहा था और उनके जवाबात भी और उस वक़्त मुझे अंदाज़ा हुआ की ज़िंदा उल्मा की तक़लीद की कदरों क़ीमत क्या है जो तमाम मुश्किलात का बराहे रास्त और वाज़ेह जवाब फराहम करते हैं और मुझे यक़ीन हो गया के शिया मुसलमान अल्लाह के इबादत गुज़ार और रिसालते पैग़म्बर पर ईमान रखने वाले हैं अगरचे मेरे दिल में शैतान ये वसवसा पैदा कर रहा था के मैं जो कुछ देखता रहा हूँ वो सब ड्रामा मालूम होता है और शायद के तक़ैय्या और इज़हारे खिलाफ़े वाक़ेआ का नतीजा हो लेकिन बहुत जल्द ये शक़ ज़ाएल हो गया और ये वसवसे फना हो गऐ इसलिए के ये नामुमकिन है के वो सैकड़ों अफराद जिनको मैंने देखा या सुना है सब इसी ड्रामे के अज्ज़ा हो फिर इस तमसील की ज़रूरत भी क्या है ? मैं कौन हूँ और इनकी निगाह में मेरी अहमियत क्या के मेरे वास्ते तक़ैय्या इस्तेमाल करें फिर ये इनकी सैकड़ों बरस पुरानी किताबें और जदीद तरीन किताबें सब अपने मुक़दमे में वहदानियते खुदा और सनाए रसूल का तज़किरा करती हैं और इस वक़्त जबके मैं ईराक़ और खारिजे ईराक़ के मशहूर मरजा-ऐ तक़लीद सैयद मुहम्मद बाक़िरूल सदर के घर में हूँ तो देख रहा हूँ के जब भी पैग़म्बर का नाम आता है तो सारा मजमा यक आवाज़ हो कर कहता है “ अल्ला हुम्मा सल्ले अला मुहम्मद व आले मुहम्मद ” ।

थोड़ी देर के बाद नमाज़ का वक़्त आ गया और हम उनके साथ हमसाऐ की एक मस्जिद में गऐ और वहाँ उन्होने नमाज़े ज़ोहरो अस्र पढ़ाई और मैंने महसूस किया कि जैसे मैं सहाबा-ऐ-किराम के दरमियान खड़ा हूँ इसलिए कि दोनों नमाज़ों के बीच एक नमाज़ी ने एसी दर्दनाक आवाज़ से ये दुआ पढ़ी जैसे जादू कर दिया हो , ये दुआ सरापा तम्जीद थी दुआ के खातमे पर मजमे से आवाज़ बुलंद हुई “अल्ला हुम्मा सल्ले अला मुहम्मद वा आले मुहम्मद ” नमाज़ के बाद सैयद मेहराब में बैठ गऐ और बाज़ लोगों ने सलाम करके खुफिया और ऐलानिया सवालात करना शुरू कर दिऐ सैयद बाज़ सवालात के जवाबात आहिस्ता देते थे जिससेड़ ये अंदाज़ा होता था कि ये निजी क़िस्म के मसाएल हैं और सवाल करने वाला जवाब लेकर हाथों को बोसा देकर चला जाता था।

मैंने दिल में कहा कि खुशक़िस्मत हैं ये लोग जिनको एस आलिमे जलील मिल जाऐ जो इनकी मुश्किलात को हल कर दे और इनके मसाएल के दरमियान ज़िंदगी गुज़ार दे।

सैयद की महफिल जिस में मैंने इनायतों ऐहतेमाम और हूसने ज़ियाफ़त का इस क़दर मुशाहिदा किया की गोया अपने घर वालों को भूल गया और ये महसूस किया की मैं अगर एक महीना इनके साथ रह जाऊँ तो यक़ीनन इनके हुस्ने इख्लाक़ और तवाज़ो और करम की बिना पर शिया हो जाऊंगा , मैं जब उनकी तरफ निगाह करता था तो मुस्कुरा कर गुफ़्तुगू करते थे और बराबर ज़रूरियात के बारे में सवाल करते रहते थे मैं चार दिन क़याम के दौरान सिवाऐ सोने के अवक़ात के किसी मौक़े पर उनसे जुदा न होता था हालांकि उनके पास ज़ाऐरीन और मुखतलिफ़ उलमा का हुजूम रहता था , मैंने वहाँ सउदी अफ़राद को भी देखा जबके मेरा तसव्वुर भी न था कि हिजाज़ में भी शिया हैं , इसी तरह बहरैन , क़तर , लेबनान , शाम , ईरान , अफ़ग़ानिस्तान , टर्की और अफ्रीक़ा के उल्मा भी देखे , उनके साथ सैयद गुफ़्तुगू भी किया करते थे और उनकी ज़रूरियात भी पूरी करते थे कि बाहर निकलने वाला मसरूरो दिलशाद निकलता था ये बात बिला बयान न रह जाए की मैंने वहाँ एक अजीबो ग़रीब वाक़ेआ देखा है जिसको तारीख़ में महफूज़ कर देना चाहता हूँ ताकि मुसलमानों को ये अंदाज़ा हो जाए कि हुकमे ख़ुदा को नज़रअंदाज़ करके किस ख़सारे का सामना किया है।

सैयद मुहम्मद बाक़िरुल सदर के पास चार अफराद आऐ जिनके लहजे से मालूम होता था के वो ईराक़ी है उनमें से एक शख़्स को चन्द साल पहले अपने दादा से एक मकान मीरास में मिला था और उस मकान को दूसरे शख़्स के हाथ बेच डाला जो खुद भी वहाँ मौजूद था , तारीखे मुआमेलत के एक साल बाद दो भाई आऐ जिन्होंने ये साबित कर दिया के वो मरने वाले के शरई वारिस हैं चारों सैयद के सामने बैठे हुए थे और हर एक अपने औराकों असनाद दिखला रहा था सैयद ने औराक़ को देखने के बाद और चन्द लम्हे गुफ़्तुगू एक आदिलाना फैसला कर दिया कि खरीदार को मकान में तसर्रुफ़ का हक़ है और बेचने वाले को चाहिए कि दोनों भहियों को उनका हिस्सा दे दे।

ये फैसला सुनकर सबने खड़े होकर उनके हाथों का बोसा दिया और आपस में मुआनिक़ा करने लगे , मैं ये देख कर दहशत ज़दा रह गया और मैंने अबू शब्बर से पूछा के क्या किस्सा तमाम हो गया ? उन्होंने कहा हाँ! हर एक को उसका हक़ मिल गया , मैंने सुब्हान अल्लाह कहा इस आसानी के साथ और इतने मुख़तसर वक़्त में चन्द लम्हों में इतने बड़े झगड़े का फैसला ? ऐसे मामलात तो हमारे मुल्कों में दस साल में तय होते हैं जब बाज़ साहेबाने मामला मर जाते हैं और उनकी औलाद उनकी जगह पर आ जाती है उसके बाद अदालत और वकीलों को इतनी फ़ीस देनी पड़ती है जो बाज़ अवक़ात ख़ुद मकान की कीमत से भी ज़्यादा होती है , इब्तेड़ाई अदालत से अपील तक और अपील से तजदीदे नज़र तक और आखिर में सब राज़ी भी नहीं होते हैं , जबके ज़हमत , मसारिफ़ , रिश्वत और बुग्ज़ो व अदावत सब बर्दाश्त कर चुके होते हैं।

अबू शब्बर ने जवाब दिया यही हाल हमारे मुल्कों में भी होता है बल्कि बदतर है , मैंने कहा ये कैसे ? उन्होंने कहा अगर लोग अपने मुकदमे को सरकारी अदालत में ले जाना चाहते हैं तो यही हाल होता है जो आपने बयान किया है लेकिन जब मरजऐ-दीन की तक़लीद करते हैं और इस्लामी अहकाम की पाबन्दी करते हैं तो अपने मुकद्देमात को उसी के पास ले जाते हैं और वो चन्द लम्हों में फैसला कर देता है “ और साहेबाने अक़्ल के लिए अल्लाह से बेहतर किसका हुक्म हो सकता है ” ।सैयदुल सदर ने उनसे एक पैसा भी नहीं लिया जबकि सरकारी अदालत में जाइऐ तो सर भी मूँड लिया जाता है , मैं इस ताबीर पर खुश हुआ की हमारे यहाँ भी यही ताबीर राएज है और मैंने कहा सुभानअल्लाह! मैं अभी तक अपने मुशाहिदात को झुठलाता रहा हूँ और अगर ये मन्ज़र अपनी आँखों से न देख लेता तो तस्दीक़ न करता।

अबू शब्बर ने कहा के बरादर , ये तो बहुत सादा सा मसअला था यहाँ ऐसे पेचीदा मसाएल भी आते हैं जिनमें दरमियान में खूंरेज़ी का मामला भी होता है , मरआजे चन्द घंटों में उसका फैसला कर देते हैं तो मैंने हैरत से कहा के क्या ईराक़ में दो हुकूमतें हैं , सरकारी हुकूमत और रजाले दीन की हुकूमत ? तो उन्होंने कहा के नहीं हुकूमत तो सिर्फ़ सरकारी है लेकिन शिया लोग अपने मरजऐ-दीन की तक़लीद करते हैं जिसका हुकूमत से कोई ताअल्लुक़ नहीं है इसलिए की हुकूमत बासी है इस्लामी नहीं है वो इसके अहकाम पर सिर्फ़ वतनी मुआमेलात , टैक्स , शहरी हुकूक़ और शख़्सी अहवाल पर अमल करते हैं अगर किसी मुतदैयन मुसलमान का झगड़ा किसी बेदीन मुसलमान से हो जाऐ तो उसे मजबूरन सरकारी अदालत ही में जाना पड़ता है इसलिए के बेदीन मुसलमान रिजाले दीन के फैसले को क़ुबूल नहीं करेगा लेकिन अगर फ़रीकैन पाबंदे शरीयत हैं तो कोई मसअला नहीं पैदा होता है और मरजा-ऐ-दीन का फैसला फ़रीकैन के लिए हरफ़े आख़िर होता है और उसी की बुनियाद पर मरजे मुक़दमात उसी दिन तय हो जाते हैं जबकि अदालतों के मुक़दमात महीनों और बरसों में तय होते हैं।

इस हादसे ने मेरे दिल में अहकामाते इलाहिया की अहमियत का शऊर पैदा कर दिया और मैं क़ुरआने मजीद के इस इरशाद के माने भी समझ गया “ जो खुदाई क़ानून के खिलाफ़ फैसला करे वो काफिर हैं , फ़ासिक़ हैं ” जिस तरह के मेरे नफस में उन मुद्दईयों के खिलाफ नफ़रतों अदावत का शऊर भी बेदार हुआ जो अल्लाह के आदिलाना अहकाम को इंसान के बनाए जालिमाना अहकाम से बादल देते हैं और इस पर इक्तेफ़ा नहीं करते बल्कि पूरी बेहयाई के साथ अहकामे इलाहिया का मज़ाक़ भी उड़ाते हैं और उन्हें वहशियत और बरबरियत का नाम देते हैं के इनमें चोर के हाथ काटे जाते हैं , ज़िनाकार को संगसार किया जाता है और क़ातिल को क़तल कर दिया जाता है , ख़ुदा जाने ये हम अरी मज़हबी विरासत से बेगाना नज़रियात कहाँ से हमारी सफों में आ गए ? बेशक ये मग़रिब और दुश्मनाने इस्लाम की देन है जिन्हें मालूम है के अहकामे इलाहिया का निफाज उनके खात्मे का ऐलान है , इसलिए की वो सब चोर , खाएन , ज़िनाकार मुजरिम और क़ातिल हैं अगर उन पर अहकामे इलाहिया मुन्तबक़ कर दिये जाए तो आज सब को उन से राहत मिल चुकी होती।

हमारे और सैयद मुहम्मद बाक़िरुल सदर के दरमियान उन दिनों मुख्तालिफ़ बातें होती रही जहां मैं हर छोटी बड़ी बात के बारे में सवाल करता था और दीगर रुफ़्क़ा से सहाबा और आइम्मा-ऐ-असना अशर के बारे में हासिल होने वाली मालूमात की तहक़ीक़ करता था।

मैंने सैयदुस-सदर से पूछा के अज़ान में अलीयन-वली-उल्लाह की शहदत क्यों दी जाती है ? उन्होंने फ़रमाया के अमीरुल-मोमिनीन हज़रत अली अलैहिस्सलाम अल्लाह के उन मुन्तख़ब बंदों में थे जिन्हें ख़ुदा ने अंबिया के बाद पैगामे इलाहि का बोझ उठाने के लिए मुन्तख़ब किया था और ये सब अंबिया के वसी थे , हर नबी का एक वसी होता है और हज़रत अली इब्ने अबितालिब हज़रत मुहम्मद स।अ।व।व।के वसी थे , हम उन्हें अल्लाहो रसूल की दी हुई फ़ज़ीलत की बिना पर तमाम सहाबा पर फ़ज़ीलत देते हैं और उसके बाद हमारे पास क़ुरआनो सुन्नत के बयानात के अलावा अक़्ली दलाएल भी मौजूद हैं जिनमें किसी तरह के शक-ओ-शुबहे की गुंजाईश नहीं है , रवाएतें मुतावातिर हैं और शिया और सुन्नी दोनों रस्तों से सही हैं , हमारे उल्मा ने इस सिलसिले में बहुत सी किताबें भी लिखी हैं लेकिन जब उमवी हुकूमत ने ये चाहा के इस हक़ीक़त को महू कर दें और हज़रत अली अलै। और औलड़े अली अलै। का खात्मा कर दें और नतीजा इस मंज़िल तक पहुंचा की उन हें मिंबरों से बुरा कहा जाने लगा और लोगों को जबरन इस ज़ुल्म पर आमादा किया जाने लगा तो शियों और पैरवाने अली अलै। ने उनकी विलायत की शहादत देना शुरू कर दी ताकि ये वाज़ेह हो जाए कि किसी मुसलमान को किसी वली-ऐ-ख़ुदा को बुरा भला कहने का हक़ नहीं है ये दर हकीवकात ज़ालिम हुकूमत के खिलाफ़ एक चैलेंज था ताकि इज्ज़त अल्लाहो रसूल और साहेबाने ईमान के लिए रहे और आने वली नस्लों के लिए एक तारीख़ी सुबूत बन जाऐ जिससे आली कि हककनीयत और दुश्मनों के बातिल होने का इल्म होता रहे , हमारे फ़ुक़हा का तरीक़ा-ऐ-कार रहा है कि अज़ानों अक़ामत में बतौरे इस्तेहबाब इस शहादत का ऐलान करते रहें हैं न इसलिऐ कि ये अज़ानों अक़ामत का जुज़ हैं इसलिऐ कि जूजियत कि नियत से तो अज़ान और अक़ामत दोनों बातिल हो जाती हैं और मुस्तेहिबात , इबादात और मुआमेलात में बेशुमार हैं जिनके फ़ेल पर मुसलमान को सवाब मिलता है और तरक पर इताब नहीं होता है मिसाल के तौर पर शहादतो वहदानियतों रिसालत के बाद मुस्तहब है के मुसलमान ये भी कहें “ अशहदोअन्न्ल-जन्नतुल हक़ वन्नार हक़ वइन्नल्लाहा बइयसा मन फिल क़ुबूर ” लेकिन ये जुज़वे अज़ान नहीं है , मैंने कहा कि हमारे उल्मा कि तालीम है बर बिनाए तहक़ीक़ अफ़ज़लुल खुलफ़ा अबूबक़्र सिद्दीक़ हैं उसके बाद उम्र फ़रूख हैं उसके बाद उस्मान और उसके बाद सैय्यदेना हज़रत अली अलै। तो सैयद ने कदरे खामोशी के बाद फ़रमाया कि वो जो चाहें कह सकते हैं लेकिन शरई दलाएल से साबित नहीं कर सकते हैं ये क़ौल उन सरीह बयानात का मुखालिफ़ है जो ख़ुद उनकी सही और मोतबर किताबों में पाए जाते हैं कि अफ़ज़लुलनास अबूबक़्र हैं उनके बाद उस्मान हैं और अली का कोई ज़िक्र नहीं है बल्कि उन्हें आम मामूली इन्सानों में क़रार दिया गया है ये तो बाद के उल्मा थे जिन्होंने खुलफ़ा-ऐ-राशिदीन के ज़िक्र की बुनियाद पर उन्हें भी शामिल कर लिया है।

इसके बाद मैंने उस सजदागाह के बारे में सवाल किया जिसको तुरबते हुसैनी कहा जाता है तो उन्होने फ़रमाया कि सबसे पहले ये मालूम करना ज़रूरी है के हम ख़ाक पर सजदा करते हैं ख़ाक को सजदा नहीं करते हैं जैसा कि बाज़ प्रोपैगेंडा करने वालों का ख़्याल है , सजदा फ़क़त अल्लाह के लिए होता है और ये बात हमारे और अहले-सुन्नत के दरमियान इत्तेफ़ाक़ी है कि सजड़े के लिए बेहतरीन शै ज़मीन या ज़मीन से उगने वाली चीज़ है जो खाई न जाती हो उसके अलावा कोई शै क़ाबिले सजदा नहीं है , ख़ुद पैगंबर भी ख़ाक और खजूर के तुकरे को सजदगाह बना कर उस पर सजदा करते थे और असहाब को भी यही तालीम दी थी चुनांचे वो भी ख़ाक और रेत पर सजदा करते थे और कपड़े पर सजदा करने को मना फ़रमाते था ये हमारे यहाँ बिलकुल वजेहाट में है इसके बाद इमाम ज़ैनुलआबिदीन ने अपने पिदरे बुज़ुर्गवार इमाम हुसैन अलै। कि ख़ाके क़ब्र से सजदागाह बनाई कि ये ख़ाक तययबो ताहिर थी और इस ज़मीन पर सैयदुश शुहदा का ख़ून बहा था और ये रस्म शियों में आज तक रह गई हम इस बात के काएल नहीं हैं के सजदा सिर्फ़ ख़ाके कर्बला पर होगा बल्कि हमारा मसलक ये है कि हर पाक मिट्टी या पत्थर पर सजदा हो सकता है जिस तरह कि खजूर वगैरा कि चटाई पर भी हो सकता है।

इमाम हुसैन का ज़िक्र आ गया तो मैंने कहा कि शिया रोते क्यों हैं ? सीनाज़नी क्यों करते हैं ? और अपने को इतना क्यों मारते हैं के ख़ून जारी हो जाए जबकि इस्लाम में ये अमल हराम है और रसूल अक्रम ने फ़रमाया है के वो हममें से नहीं है जो मुँह पर तमाँचे मारे , गरेबान चाक करे और जाहिलयत कि दावत दे।

सैयद ने फ़रमाया कि बेशक ये हदीस सही है लेकिन ये मातमे हुसैन पर मन्तबक़ नहीं होती है , जो शख़्स इंतेकामे ख़ूने हुसैन का नारा लगाता है वो हुसैन अलै। के रास्ते पर चलता है इसकी दावत जाहिलयत कि दावत नहीं है फिर शिया भी इंसान हैं उनमें जाहिल भी हैं और आलिम भी हैं और सबके पास जज़बात हैं और फिर जब ये जज़बात इमाम हुसैन अलै। और उनके घर पर वारिद होने वाले मसाएब क़त्ल , बेहुरमती और असीरी कि याद में भड़क जाते हैं तो उनका इज़हार इन तरीकों से किया जाता है लिहाज़ा वो अजरो सवाब के मुस्तहक़ हैं कि उनकी नियत फी सबिलिल्लाह है और अल्लाह हर अमल पर बाऐतेबारे नियत सवाब देता है अभी मैंने चन्द दिनों पहले जमालुद-दीन नासिर कि मौत पर मिस्री हुकूमत कि रिपोर्ट पढ़ी थी जिसमे ये दर्ज था कि इस खबर को सुनकर लोगों ने आठ तरीक़ों से खुदकशी कर ली किसी ने अपने को छत से गिरा दिया और किसी ने अपने को रेल के नीचे डाल दिया। मजरूहीन और ज़ख़्मियों कि तादाद तो बहुत ज़्यादा है इन मिसालों का मक़सद उन जज़बात को बयान करना है जो बाज़ अवक़ात भड़क जाया करते हैं तो अगर कुछ मुसलमान जमालुद-दीन नासिर कि मौत पर जो बिलकुल तबअई ऐतेबार से वाक़ेअ हुई थी अपने को क़त्ल कर दें तो हम ये नहीं कह सकते के मज़हबे अहले-सुन्नत गलत हैं और न बरादराने अहले-सुन्नत को ये हक़ है के अपने बरादराने शिया को ग़लतकार करार दें सिर्फ़ इस बात पर के उन्होंने मसाएबे इमाम हुसैन का एहसास किया है और बराबर कर रहे हैं और उन पर इसलिए आँसू बहा रहे हैं के ख़ुद रसूले अकरम ने अपने अपने इस फ़रज़न्द पर गिरया किया है और उनके साथ जिबरील भी शरीके गिरया रहे हैं , मैंने कहा के शिया अपने औलिया की क़ब्रों को सोने चाँदी से मुरस्सा करते हैं जबकि ये अमल इस्लाम में हराम है ?

तो सैयदुस-सदर ने फ़रमाया के ये बात न शियों में मुन्हसिर है न इस्लाम में हराम है , बरादराने अहले-सुन्नत में ईराक़ , मिस्र , टर्की वगैरा में कितनी मस्जिदें जो सोने चांदी से मुज़य्यन हैं , ख़ुद मदीना-ए-मुनव्वरा में मस्जिड़े रसूल में सोने का काम है और मक्का-ए-मुकर्रेमा में खाना-ऐ-काबा को हर साल सोने के काम का गिलाफ़ पहनाया जाता है जिस पर लाखों रियाल ख़र्च होते हैं लिहाज़ा ये बात सिर्फ़ शियों से मुताल्लिक़ नहीं है।

मैंने कहा के उल्मा-ऐ-सऊदिया का कहना है के मिम्बरों को बोसा देना और अल्लाह के नेक बन्दों को पुकारना शिर्क है तो आपकी क्या राय है ? सैयद मुहम्मद बाक़िरुल-सदर ने फ़रमाया कि अगर कब्रों को मास करना और औलिया-अल्लाह को पुकारना इस नियत से है कि वो मुस्तकिल तौर पर नफ़ऐ और नुक़सान के मालिक हैं तो ये यकीनन शिर्क है लेकिन मुसलमान मुवहिद होता है और व्क़ो जानता है के नफ़ऐ और नुक़सान का मुकम्मल इख्तियार सिर्फ़ परवरदिगार के हाथों में है वो औलिया और अलैहुमुस्सलाम को अल्लाह कि बारगाह में वसीला बनाना चाहता है और ये शिर्क नहीं है जिस पर शिया और सुन्नी दोनों रसूले अकरम के ज़माने से आज तक मुत्ताफ़िक़ हैं सिवाऐ सऊदिया के वहाबी उल्मा के जिंका आपने तज़किरा किया है कि ये अपने ताज़ा तरीन मज़हब कि बिना पर इजमा-ऐ-मुस्लेमीन के मुखालिफ़ हैं और इन्होंने इस अक़ीदे की बिना पर मुसलमानों में एक फ़ितना बरपा कर रखा है , उन्हें काफिर क़रार दे रहे हैं और उनके ख़ून को मुबाह बनाऐ हुऐ हैं बूढ़े-बूढ़े हुज्जाजे बैतुल्लाह को सिर्फ़ इसलिए सज़ा देते हैं कि उन्होंने “अस्सलामों अलैका या रसूल अल्लाह ” कह दिया है , किसी आदमी को ज़रीहे अक़दस मस करने कि इजाज़त नहीं देते , हमारे उल्मा के उनसे मुतआदिद मनाज़िरे हो चुके हैं लेकिन वो लोग अपने ऐतेक़ाद और इस्तेकबार पर अड़े हुऐ हैं।

हमारे शिया आलिम सैयद शरफुद्दीन ने जब अब्दुल अज़ीज़ आले सऊद के जमाने में हज-जे-बैतुल्लाह किया और उन्हें दीगर उल्मा के साथ ईदुज़्ज़ुहा की मुबारकबाद देने के लिए क़सरे शाही में मदूव किया गया तो जब मुबारकबाद में उनकी बारी आई तो उन्होंने बादशाह से मुसाफ़ेहा किया और उसे एक हाड़ीय गिलाफ में लिपटा हुआ क़ुरआने मजीद पेश किया , आईबीने सऊद ने उसे लेकर सर पर रखा और ऐहतेरामन बोसे दिऐ , सैयद शरफुद्दीन ने फरमाया के आप उस जिल्द को क्यों बोसा दे रहे हैं और उसकी क्यों ताज़ीम कर रहे हैं , ये तो एक बकरी की खाल है ? तो बादशाह ने जवाब दिया कि मेरा मक़सद जिल्द कि ताज़ीम नहीं है इस क़ुरआने करीम की ताज़ीम है जो इसके अंदर है , तो सैयद शरफुद्दीन ने फ़रमाया की अहसन्त , हम जब हुजरा-ऐ-पैग़म्बर की जालियों और दरवाज़ों को बोसा देते हैं तो हम भी जानते हैं कि ये लोहा है जिसका कोई नफ़आ और नुक़सान नहीं है लेकिन हमारा मकसूद , मावराए हदीद होता है और हम उससे पैग़म्बर की ताज़ीम करना चाहते हैं जिस तरह आपने जानवर की खाल का बोसा लेकर क़ुरआने मजीद की ताज़ीम का इज़हार किया है , ये सुनकर हाज़ेरीन ने नारा-ऐ-तकबीर बलन्द किया और कहा की आपने सच फ़रमाया है उस वक़्त बादशाह ने मजबूरन हुज्जाज को आसारे पैग़म्बर से बरकत हासिल करने की इजाज़त दे दी लेकिन उसके बाद आने वाले बादशाह ने फिर पुराना क़ानून नाफ़िज़ कर दिया जिसका मतलब ये है की मसअला लोगों के मुशरिक हो जाने का नहीं है मसअला सियासी है जिसकी बुनियाद मुसलमानों की मुखालिफ़ और मुल्को सल्तनत के इस्तहकाम के लिए उनके बाज़ पहलू मुसबत है और बाज़ मनफ़ी।

मुसबत पहलू , नफ़्स की तरबियत और उसका सादा ज़िन्दगी और लज़्ज़ते दुनिया के मुक़ाबले में ज़ोहद से आशना करना है ताकि वो आलमे अरवाह की तरफ परवाज़ कर सके और मनफ़ी पहलू गोशा नशीनीं और मैदाने ज़िन्दगी से फरार है और जीकरे खुदा का लफ़ज़ी आदाद में महदूद कर देना है और इस्लाम मुसबत पहलूओं को यकसर रद करता है और हमे ये कहने का हक़ है की इस्लाम के उसूल और तालीमात मुसबत हैं लिहाज़ा वो ऐसे आमाल को बरदाश नहीं कर सकता जिनमें मनफ़ी पहलू भी पाऐ जाते हैं।

शक और हैरत

सैयद मुहम्मद बाक़िरुल-सदर के जवाबात वाज़ेह और मुतमइन करने वाले थे लेकिन ऐसे जवाबात उस शख़्स के दिल की गहराइयों में कैसे उतर सकते हैं जिसने अपनी उम्र के पच्चीस साल तक़दीसो ऐहतेरामे सहाबा बिलखुसूस खुलफ़ा-ऐ-राशदीन के माहौल में गुज़ारे हों जिनके सरबराह अबूबक़्र सिद्दीक़ और उमर हों और उसने ईराक़ में वारिद होने के बाद से उनका नाम भी न सुना हो बल्कि ऐसे अजीबो ग़रीब नाम सुने हों जो कभी न सुने थे और बारह इमामों का ज़िक्र सुना हो जिनके बारे में ये दावा किया जाता हो कि पैग़म्बर ने अपनी वफ़ात से पहले ही हज़रत अली खिलाफ़त पर नस कर दी थी भला मैं किस तरह इस बात कि तसदीक़ कर सकता था कि तमाम मुसलमान और सहाबा-ऐ-किराम जो रसूल अकरम के बाद खैरुलबशर थे हज़रत अली के खिलाफ़ मुत्ताहिद हो जाएँ जबकि हमको बचपन से ये सिखाया गया है कि सहाबा-ऐ-किराम हज़रत आली का ऐहतेराम करते थे और उनके हक़ का ऐतेराफ़ करते थे कि वो हज़रत फ़ातेमा ज़हरा स।अ। के शौहर थे और हज़रते हसन-ओ-हुसैन अलैहुमुस्सलाम के पिदरे बुज़ुर्गवार और बाबे मदीना-ऐ-इल्म थे।

जिस तरह के सैयदेना अली अलै।हज़रत अबूबक़्र के हक़ से वाक़िफ़ थे के वो सबसे पहले इस्लाम लाए और ग़ार में रसूले अकरम के साथ रहे जिसका ज़िक्र क़ुरआने मजीद ने किया है और रसूले अकरम ने मरजुल मौत में उन्हें इमामे जमाअत बनाया और ये फरमाया के अगर मैं किसी को अपना खलील बनाता तो वो अबूबक़्र ही होते और इसी बुनियाद पर मुसलमानों ने उन्हें खलीफ़ा बनाया था जिस तरह हज़रत अली अलैहिस्सलाम उमर के हक़ से भी बाखबर थे जिनके ज़रिये अल्लाह ने इस्लाम को इज़्ज़त दी और जिनहे रसूल ने फ़ारुक़ का लक़ब दिया और वो हज़रत उस्मान के हक़ से भी बाखबर थे जिनसे मलाएका शर्माते थे और जिन्होंने तंगदस्ती के आलम में लश्कर मुरत्तब किया था और जिनको रसूल ने ज़ुलनूरेन का लक़ब दिया था तो ये कैसे मुमकिन है के हमारे बरादराने शिया इन हकाएक से बेखबर हों और उन शख़्सियतों को ऐसे मामूली अफराद बना दें जिनको हवा-ओ-हवस और तमऐ दूनया इत्तेबाऐ हक़ से रोक दें और वो वफ़ात के बाद ही रसूले अकरम के अहकाम की मुखालिफ़त पर आमादा हो जाएं जबकि उनकी ज़िन्दगी में उनके अहकाम की इताअत के लिए एक दूसरे पर सबक़त ले जाने की फिक्र में रहते थे और इज्जते इस्लाम के लिए अपने घर को क़ुर्बान `करने के लिए आमादा थे बल्कि अपने क़रीबी क़राबतदारों को क़त्ल कर दिया करते थे , ये नामुमकिन है की यकबारगी तमअ दुनिया उन्हें गुमराह कर दे और वो मसनडे खिलाफ़त पर आने के लिए रसूले अकरम के अहकाम को पसे पुश्त डाल दें , बेशक मैं इन ख़्यालात की बिना पर शियों की तमाम बातों की तसदीक़ नहीं कर सकता था अगरचे बहुत सी बातों से मुतमइन भी हो चुका था , नतीजा ये हुआ कि मैं शक और हैरत कि दरमियानी कैफ़ियत का शिकार हो गया , शक वो जिसे उल्मा-ऐ-शिया ने मेरे दिमाग़ में पैदा कर दिया था इसलिऐ के उनका क़लाम माकूल और मन्तिक़ी था और हैरत इस बात पर कि मैं इस अम्र कि तसदीक़ नहीं कर सकता था कि सहाबा-ऐ-किराम इख्लाक़ कि इस मंज़िल तक गिर जाएंगें कि हम जैसे आम इंसान बन जाएँ , न उनमें अनवारे रीसलत कि चमक रह जाऐ और न उन्हें हिदायते मुहम्मदी मुहज़्ज़ब बना सके।

ख़ुदाया!ये क्यों कर हो सकता है ? क्या ये मुमकिन है कि सहाबा उस मंज़िल पर हों जो शिया कहते हैं ? मैं ये तो फैसला न कर सका लेकिन इस शको हैरत ने मेरे ज़ेहन में ये ऐतेराफ़ पैदा कर दिया के कुछ बातें पसे-पर्दा हैं जिंका दरयाफ़्त करना हक़ीक़त तक पहुँचने के लिए ज़रूरी है।

मैं अपने साथी मनअम कि वापसी पर करबला चला गया `और वहाँ इमाम हुसैन अ।स। के उन मसाएब को महसूस किया जिंका एहसास शियों में दौरे क़दीम से पाया जा रहा है , वहाँ पहुँच कर मुझे अन्दाज़ा हुआ के शहिदे करबला इमाम हुसैन अभी ज़िन्दा हैं और लोग परवानावार उनकी ज़रीह के गिर्द चक्कर लगा रहे हैं और इस सोज़िशे क़ल्ब और फ़रियादो फुगाँ के साथ गिरया कर रहे हैं कि इसका नमूना मैंने कहीं नहीं देखा था गौया इमाम हुसैन अभी शहीद हुऐ हैं।

मैंने खुत्बा को भी देखा के वो वाक़ेयाते करबला को बयान करके सामेईन के शऊर को गर्मा रहे हैं और शोरे गिरया और शेवन बुलन्द है और कोई शख़्स अपने नफ़्स पर क़ाबू नहीं रखता है ये हालात देख कर मैंने भी बेहद गिरया किया और अनाने नफ़्स मेरे हाथ से छुट गई और इस गिरये के बाद मैंने एक नफ़सानी सुकून का एहसास किया जो इससे `पहले कभी महसूस नहीं किया था और गोया कि मैं दुश्मनने हुसैन कि साफों में था और आज अत्तेबा-ओ-असहाबे हुसैन कि साफों में आ गया हूँ जो उन पर जान कुर्बान करने के लिए तैयार थे उस वक़्त ख़तीब हूर बिन यज़ीदे रियाही कि डसस्तान बयान कर रहा था जो लशकरे यज़ीद कि तरफ से इमाम हुसैन के क़त्ल पर मामूर था लेकिन सामने आकर रुक गया और मारके में लरज़ने लगा और जब किसी ने पूछा कि क्या आप मौत से दर रहे हैं तो उन्होंने कहा के लावल्लाह , मैं अपने नफ़्स को जन्नत और जहन्नम के दरमियान पा रहा हूँ , और उसके बाद घोड़े को ऐड़ लगा कर लशकरे इमाम हुसैन कि तरफ़ ये कह कर चला कि “ फरज़न्दे रसूल क्या मेरी तौबा क़ुबूल हो सकती है ? ये सुनकर मैं अपने जज़्बात पर क़ाबू न पा सका और शिद्दते गिरया से ज़मीन पर गिर पड़ा और गोया कि मैं हुर कि मंज़िल में था और इमाम हुसैन को आवाज़ दे रहा था कि फरज़न्दे क्या मेरी तौबा क़ुबूल हो सकती है ? फरज़न्दे रसूल मेरी ख़ता को मुआफ़ कर दे , खातीब कि आवाज़ बहुत मुअस्सिर थी और लोगों के नाला-ओ-शेवन कि आवाज़ बहुत बुलन्द थी , मेरे दोस्त ने मेरे गिरये कि आवाज़ सुनी और मुझे गले से ` लगा लिया और हालते गिरया में मुझे सीने से लगा कर इस तरह इजहारे मुहब्बत शुरू कर दिया जिस तरह एक मादरे मेहरबान अपने बच्चे पर मेहरबानी करती है , उसकी ज़बान पर मुसलसल या हुसैन-या हुसैन कि आवाज़ थी यही वो चंद लम्हे थे जिनमें मैंने हक़ीक़ी गिरया और वाक़ई शेवन का एहसास किया था और ऐसा मालूम होता था कि ये मेरे आंसू मेरे क़ल्ब और मेरे जिस्म को अन्दर से धो रहे हैं और मैं रसूले अकरम के इस मानी को महसूस कर रहा था “ अगर तुम्हें उन बातों का ग़म होता जिनका मुझे है तो तुम्हारी हंसी कम और गिरया ज़्यादा होता ” ।

मैं तमाम दिन इन्तेहाइ दिलतंग रहा मेरे दोस्त ने मुसलसल तसल्ली दी और मेरे वास्ते ठंडे शर्बत वगैरा का इंतेजाम किया लेकिन मेरी इश्तेहा बिलकुल ख़त्म हो चुकी थी और मैं बराबर ये तक़ाज़ा कर रहा था के मेरे सामने मक़तले हुसैन का तज़किरा करे इस लिए के मैं इस वाक़्ये से मुकम्मल तौर पर बेख़बर था और मेरे शयूख़ इस वाक़्ये का तज़किरा इस अन्दाज़ से किया करते थे के जिन दुश्मनाने इस्लाम और मुनाफ़िक़ीन ने सैयदना उमर , सैयदना उस्मान और हज़रत आली अ।स। को क़त्ल किया था उन्होंए ही सैयदना हुसैन को भी क़त्ल किया है और मुझे इसके अलावा कुछ नहीं मालूम था बल्कि हम रौजे आशूर जश्न मनाया करते थे कि ये इस्लामी ईद है जिसमें माल कि ज़कात निकाली जाती है , उम्दा खाने पकाए जाते हैं और बच्चे बुज़ुर्गों कि ख़िदमत में हाज़री देते हैं ताकि उनसे ईदी लेकर मिठाइयाँ और खिलौने ख़रीद सकें।

बेशक बाज़ देहातों में ये रवाज था के लोग इस दिन आग रोशन करते थे और कोई काम नहीं करते थे , कोई खुशी या शादी की तक़रीब नहीं करते थे लेकिन हम इसे सिर्फ आबाई तक़लीद समझते थे और हमारे लिए इसकी कोई दूसरी तफ़सीर नहीं थी हमारे उल्मा फ़ज़ाएले आशुर की रवायत बयान करते थे और इसकी बरकतों और रहमतों का हैरतअंगेज़ अन्दाज़ तक तज़किरा किया करते थे।

हमने इसके बाद सैयदेनल-हुसैन अलैहिस्सलाम के भाई सैयदेनल-अब्बास अलैहिस्सलाम की ज़्यारत की , हमे मालूम भी न था के ये कौन हैं लेकिन हमारे साथी ने इनकी जुरअत और शुजाअत की दास्तान बयान की। इसके बाद हमने मुतअदिद उल्मा-ऐ-किराम से मुलाक़ात की जिनके नाम तफ़सीलन याद नहीं सिर्फ़ चंद अलकाब याद हैं बहरुल-उलूम , सैयद हकीम , काशीफूल-गिता , आले यासीन , तबातबई , फिरोज़ाबादी , असद हैदर वग़ैरा और हक़ीक़त ये है कि ये वो बुज़ुर्ग उल्मा थे जिनके चेहरों से हैबतो विकार के आसार नुमायान थे और शिया इंका शिद्दत से ऐहतेराम करते थे और इन्हें अपने अंवाले खुम्स लाकर देते थे और उसके ज़रिये हौज़ाहाऐ-इल्मिया मदरिसे दीन का इआदा करते थे और मुख्तलिफ़ मुमालिक से आऐ हुऐ तुल्लाबे उलूम की किफ़ालत करते थे ये हाजरात अपने मक़ाम पर बिलकुल मुस्तक़िल थे और इंका हुक्काम का किसी तरफ़ से कोई ताअल्लुक़ नहीं था , बर खिलाफ़ हमारे उल्मा के कि वो हुक्काम कि इजाज़त उनके टकरुर और माजूली के साहिबे इख्तियार थे।

गोया ये एक नयी दुनिया थी जिसका मैंने इन्केशाफ़ किया था औरखुदा ने मेरे मुतान्नफ़ीर था और अपने को बिलकुल हम आहंग कर दिया था , इस नयी दुनिया ने मेरे अफ़कार में इंकेलाब पैदा कर दिया था और मुझमें बहस और तमहीस और फ़िक्रो नजरों तहक़ीक़ का जज़्बा पैदा हो गया ताकि मैं वाक़ई हक़ीक़त को दरयाफ्त कर सकूँ , ये जज़्बात मेरे ज़ेहन में उस वक़्त से गर्दिश कर रहे थे जब से मैंने सरकारे दो आलम की हदीस पढ़ी थी “ अन्क़रीब सब मेरी उम्मत तिहत्तर फिरकों में तक़सीम हो जाऐगी और एक के अलावा सब जहन्नमी होंगे ” ।

मेरी गुफ़्तुगू उन अदयान के बारे में नहीं है जिनमें हर एक अपनी हक़्क़ानियत और दूसरे के बातिल होने का दावेदार हैं , मैं तो इस हदीस को पढ़ कर हैरतों इस्तेजाब में पद जाता था न ख़ुद हदीस के बारे में बल्कि उन मुसलमानों के बारे में जो इस हदीस को पढ़ते हैं , खुत्बों में दोहराते हैं और इसके क़रीब से निहायत आराम से गुज़र जाते हैं और न कोई तहलील करते हैं और न इसके मज़मून का तजज़िया करते हैं कि इस तरह फ़िरक़ा-ऐ-नजिया का पता लगाएं और राहे हक़ को दरयाफ़्त कर लें।

इस से ज़्यादा हैरत अंगेज़ ये है कि हर फ़िरक़ा इस बात पर मुतमइन है कि वही नाजी है और हदीस के ज़ैल में ये भी नक़्ल किया जाता है कि रसूले अकरम से दरयाफ़्त किया गया कि वो फ़िरक़ा कौन है ? तो आपने फरमाया कि जिस रास्ते पर मैं और मेरे असहाब हैं , तो क्या कोई फ़िरक़ा ऐसा है जो किताबो सुन्नत से तमस्सुक का मुद्दई न हो और इस सिफ़त का दावा न करता हो ये अगर इमाम मालिक , अबु-हनीफ़ा , शाफई , या अहमद बिन हंबल से दरयाफ्त किया जाए तो उनमें से कोण किताबो सुन्नत के अलावा किसी और शै से मुतमस्सिक है इसके बाद शियों के फिरकों से दरयाफ़त किया जाए जिनके फ़सादे मज़हब का अक़ीदा हमारे दरमियान राएज है तो क्या वो इसके सिवा कोई और जवाब देंगे कि हमारा तमस्सुक किताबे इलाही और सुन्नते सहिआ से है जिसके रावी अहलेबैते रसूल हैं घर वाले घर के हालात से बेहतर वाक़िफ़ होते हैं , तो क्या इसका मतलब है कि सभी अपने दावे के मुताबिक़ बरहक़ हैं ? हरगिज़ नहीं , हदीसे शरीफ तो इसके बिलकुल बरअक्स हे मगर ये के इसे वज़अई और जाली क़रार दे दिया जाए लेकिन इसका भी इमकान नहीं हे के हदीस दोनों फिरकों के दरमियान मुत्तफ़िक अलैह और मुतावातिर हे तो क्या इसके मफ़हूम को बे मआनी क़रार दे दिया जाए ? लेकिन ये भी मुमकिन नहीं है कि रसूल अल्लाह कि शान में बे मआनी कलाम करने कि जसारत कि जाए जाबके वो अपनी ख़ाहिश से कलाम भी नहीं करते हैं और वही कहते हैं जो वहिऐ इलाही होती है और उन तमाम कलमात हिकमतो इबरत हैं , तो अब हमारे सामने एक ही बात रह गई कि हम इस अम्र क इक़रार कर लें कि ईन में एक फ़िरक़ा हक़ है और बाक़ी सब बातिल __गोया हदीस हैरतों इस्तेजाब के साथ बहसो तमहीस की दावत भी देती है कि मुद्दई-ऐ-निजात अपने रास्ते के बारे में तहक़ीक़ करे और इसके बाद इस पर बाक़ी रहने का फैसला करे।

इस बुनियाद पर मेरे दिल में शियों से मुलाक़ात करने कि बात एक शक और तहैयुर पैदा हो गया कि शायद यही हक़ कहते हों और इनहि क बयान हसीले सदाक़त हो तो फिर मैं क्यों न मैं तहक़ीक़ो तफतीश करूँ जबकि कुराने मजीद ने मुसलसल बहसो तमहीस की दावात दी है और ये वादा किया है कि “ जो लोग हमारी राह में जिहाद करेंगे हम इन्हें अपने रास्तो कि हिदायत देंगे ” या “ जो लोग बातें सुनकर बेहतरीन बात का इत्तेबा करते हैं उन्हीं को ख़ुदा ने हिदायत दी है और वही साहिबाने अक़्ल हैं ” और रसूले अकरम ने भी फ़रमाया है कि “ तुम अपने दीन के बारे में इस क़दर तहक़ीक़ करो कि लोग तुमको दीवाना कहने लगें ” लिहाज़ा बहसो तहक़ीक़ एक वाजिबे शरई है जिसकी ज़िम्मेदारी हर मुकल्लफ़ पर है।

इस फैसले और इस अज़्मे सादिक़ का वादा मैंने अपने नफ़्स और इराक़ में अपने शिया रुफ्का से उस वक़्त कर लिया जब मैं उनसे रुख़सत हो रहा था और उनकी जुदाई से शिद्दत से मुतास्सिर था कि उन्होंने मुझसे मुहब्बत की थी और मैंने उनसे मुहब्बत की थी और उनको मुख्लिस , अज़ीज़ और दोस्त की शक्ल में ख़ुदा हाफिज़ कहा था उन्होंने मेरी ख़ातिर बड़ा वक़्त कुर्बान किया था जबकि मुझसे न खोफ़ था न तमआ , ये सारा काम फ़क़त मरज़ी-ऐ-परवर्दिगार के लिए हो रहा था की हदीस शरीफ में ये फ़िक़रा वारिद हुआ है कि “ अगर अल्लाह तुम्हारी वजह से एक शख़्स को भी हिदायत दे दे तो तुम्हारे हक़ में इस पूरी दुनिया से बेहतर है जिस पर आफ़ताब कि रौशनी पड़ती है ” ।

मैंने बीस दिन ईराक़ में शियों के जवार में गुज़ारने के बाद इस ईलाक़े को खैरबाद कहा और ऐसा मालूम होता था कि जैसे मैंने कोई हसीन और लज़ीज़ ख़्वाब देखा था। मैं कोताही-ऐ-मुद्दत के सदमे के साथ उस इलाक़े से रुख़सत हुआ कि मुझसे वो दिल जुदा हो गऐ जिसमें मेरी मुहब्बत थी और वो क़ुलुब जुदा हो गऐ जो मुहब्बते अहलेबैत के जज़्बे साथ धड़कते थे , अब मैं बैतुल्लाह और क़ब्रे सरकारे दो आलम के इरादे से हिजाज़ की तरफ़ सफ़र कर रहा था

सफ़रे-हिजाज़

मैं जददा वारिद हुआ तो मैंने अपने एक दोस्त बशीर से मुलाक़ात की जो मेरी आमद से बेहद खुश हुऐ और उन्होंने मुझे अपने घर मेहमान किया और मेरा बेहद ऐहतेराम किया। वो अपने खाली अवक़ात में मेरे साथ तफरीह और और मज़ारात की ज़ियारात में गुज़ारा करते थे हम उन्हीं के साथ उमरे के लिए गऐ और वहाँ के चन्द रोज़ तक़वा और इबादते इलाही में गुज़ारे मैंने उनसे अपनी ताखीर की माज़ेरत करते हुए सफरे ईराक़ का तज़किरा किया और वहाँ से हासिल होने वाली जदीद तरीन इन्केशाफ़ात का तज़किरा किया ,तो अगरचे वो रोशन फिक्र और बाख़बर आदमी थे लेकिन उन्होंने बरजस्ता कहा के शियों के यहाँ बाज़ उल्मा बुज़ुर्ग हैं जिनका मसलक यही है लेकिन उनमें से बाज़ फ़िरक़े बिलकुल मुनहरिफ़ और काफ़िर हैं जो हमारे लिए मुसलसल मुश्किलात ईजाद करते रहते हैं।

मैंने उन मुश्किलात के बारे में सवाल किया तो उन्होंने बताया के ये लोग क़ब्रों के गिर्द नमाज़ अदा करते हैं ,जन्नतुल - बक़ी में गिरोह दर गिरोह दाख़िल होते हैं और वहाँ गिरया ओ बुका और नोहा ओ ज़ारी करते हैं ,अपने पास पत्थर के टुकड़े रखते हैं और उन्हीं पर सजदा करते हैं और जब ओहद में हज़रते हमज़ा की क़ब्र पर जाते हैं तो वहाँ गिरया ओ बुका और सीनाज़नी करते हैं जैसे मालूम होता है कि हज़रते हमज़ा आज ही शहीद हुए हैं इसी लिए हूकूमते सऊदिया ने मज़ारात में इनका दाखिला बंद कर दिया है।

मैं ये सुनकर मुस्कुरा दिया और मैंने कहा की क्या इन्हीं असबाब की बिना पर ये लोग दीन से मुनहरिफ़ हो गऐ हैं ? उन्होंने कहा की नहीं और भी बहुत से असबाब हैं ,मसलन ये लोग ज़ियारते क़ब्रे पैग़ंबर के लिए आते हैं तो हज़रत अबूबकर ओ उमर की क़ब्र के पास खड़े होकर उन पर लानत भेजते हैं और बाज़ उन क़ब्रों पर ग़लाज़त डाला देते हैं।

हमें अपने इस दोस्त के बयान ने अपने वालिदे मोहतरम के उस बयान को याद दिला दिया जो उन्होंने हज से वापसी पर इरशाद फ़रमाया था लेकिन उनकाबयान ये था कि ग़लाज़त क़ब्रे पैग़म्बर पर डाल देते हैं ज़ाहिर है ये मन्ज़र उन्होंने खुद नहीं देखा था लेकिन उनका इरशाद था कि हमने सऊदी पुलिस को बाज़ हुज्जाज को डन्डों से मारते देखा और जब इस अमल पर इज़हारे नफ़रत किया तो पुलिस वालो ने बताया कि ये मुसलमान नहीं हैं ये शिया हैं और क़ब्रे रसूल पर डालने के लिए ग़लाज़ते अपने साथ ले आते हैं उनका फ़रमाना था कि हमने भी ये सुनकर शियों पर लानत की और मुँह पर थूक दिया।

आज मैं दौबरा ये शिकायत अपने सऊदी दोस्त से सुन रहा था जिसकी विलादत मदीना-ऐ-मुनव्वरा मे हुई थे और उसका बयान ये था कि ग़लाज़त क़ब्रे अबूबकर ओ उम्र पर डाली जाती है तो मुझे दोनों रवायतों कि सेहत के बारे में शुबहा पैदा हो गया लेकिन मैंने ख़ुद भी हज किया है और अपनी आंखो से देखा है जिस हुजरे में रसूले अकरम स।अ। और अबूबक्र ओ उमर कि क़ब्र हैं उसका दरवाज़ा मुकफ्फ़ल है और कोई शख्स उस दरवाज़े या जाली के क़रीब भी नहीं जा सकता है चे जाऐके उसमें किसी शै के डालने का इमकान पैदा हो जाऐ।

अव्वलन तो इसलिऐ के उसमें कोई सुराख़ या रास्ता नहीं है और सानियन इसलिये के सऊदी सिपाहियों का पेहरा इतना सख़्त है कि वो क़रीब जाने वालों कि कोड़ों से मरम्मत करते हैं और हुजरे के अन्दर देखने कि भी इजाज़त नहीं देते हैं तो उसमें किसी शै के डालने का क्या सवाल पैदा होता है।

गालेबन असल राज़ ये है कि बाज़ शियों को काफिर कहने वाले सिपाहियों ने जब ये देखा कि इस तोहमत का कोई जवाज़ नहीं है तो इस तरह का अफ़साना तैयार कर लिया की मुसलमानों को इनसे नफ़रत करने के लिए आमादा किया जाए या कम से कम वो इनकी अहानत पर खामोश रहें और अपने वतन जाकर ये क़िस्से बयान करें की शिया क़ब्रे पैग़म्बर पर गलाज़त फेंकते हैं और इस तरह से एक तीर से दो शिकार हो जाएँ।

ये बिलकुल वैसा ही अफ़साना है जैसा के बाज़ मोतबर अफ़राद ने मुझसे बयान किया के हम लोग खानऐ काबा का तवाफ़ कर रहे थे कि एक नौजवान को अजदहाम कि कसरत कि बिना पर उबकाई आई और उसने क़ै करदी तो सऊदी पुलिस ने उसको मारना शुरू कर दिया कि ये नजासत लेकर आया था और लोगों ने भी इसकी गवाही दे दी नतीजे में उसे उसी दिन क़त्ल कर दिया गया।

मेरे ज़ेहन में ये अफ़साने गर्दिश कर रहे थे और मई सऊदी दोस्त के बारे में ग़ौर कर रहा था के आख़िर शियों के काफ़िर होने क्या वजह है ? सिर्फ़ यही बात कि ये गिरया ओ ज़ारी करते हैं या पत्थर पर सजदा करते हैं या क़ब्रों के पास नमाज़ पढ़ते हैं ,तो इन उमूर में लाइलाहा - इल्लल्लाह ,मुहम्मदन रसूल अल्लाह कहने वाले के काफ़िर होने का क्या जवाज़ है ,हज - जे - बैतुल्लाह भी करते हैं और अम्र - बिल - मरूफ़ और नहीं - अनल - मौनकर का फर्ज़ भी अन्जाम देते हैं।

मैं अपने दोस्त से कोई झगड़ा या बहस नहीं करना चाहता था इसलिए कि इसका कोई फ़ाएदा नहीं था लिहाज़ा मैंने सिर्फ़ इतना कहने पर इक्तेफ़ा की कि अल्लाह हमे और उन्हें दोनों को सेड्ढे रास्ते की हिदायत दे और उन दुश्मनाने ख़ुदा पर लानत करे जो इस्लाम और मुसलमानों के बारे में तरह तरह की साज़िशे करते रहते हैं।

मेरा ये दस्तूर था की मैं उमरा या ज़ियारात के दौरान जब भी ख़ानऐ काबा का तवाफ़ करता था तो नमाज़ पढ़ कर अपने पूरे वजूद के साथ ये दुआ करता था कि रब्बे करीम मेरी बसीरत को कुशादा कर दे और मुझे हक़ीक़त तक पहुँचने की हिदायत फरमा दे।

मैंने मक़ामे इब्रहीम के पास खड़े हो कर इस आयऐ करीमा को अपने ज़ेहन में गर्दिश दी कि “अल्लाह के बारे में इस तरह जिहाद करो जो जिहाद करने का हक़ है कि उसने तुम्हें मुन्तख़ब बनाया है और दीन में किसी तरह कि ज़हमत नहीं रखी है ,ये तुम्हारे बाप इब्राहीम का रास्ता है उसी ने तुम्हारा नाम मुसलमान रखा है पहले भी और इस क़ुरआन में भी ताकि रसूल तुम्हारे आमाल का गवाह रहे और तुम तमाम लोगों के गवाह रहो ,लिहाजा नमाज़ कायम करो ज़कात अदा करो और अल्लाह से वाबसता रहो के वही तुम्हारा मौला है और वही बेहतरीन मौला है ” । ‘सूरऐ हज आयत ७८ ’ ।

मैं इस वक़्त अपने सरकार बल्कि बा - नेस - क़ुरआन पिदरे बुज़ुर्गवार हज़रत इब्राहीम से मुनाजात कर रहा था कि “ मेरे पिदरे बुज़ुर्गवार जिसने हमारा नाम मुसलमान रखा है ,आज आपकी औलाद मुख्तलिफ़ फ़िरकों और गिरोह में तक़सीम हो गई है कोई यहूदी है तो कोई ईसाई और कोई मुसलमान फिर भी क़ौमे यहूद भी आपस में इक्हत्तर फ़िरकों में बंट गए और मुसलमान भी तिहत्तर फ़िरकों में हो गऐ हैं

जिन में से एक के अलावा सब जहननामी हैं जैसा कि आपके फ़रज़न्द हज़रत मुहम्मद स।अ। ने ख़बर दी है कि आपके अहद पर सिर्फ़ एक फ़िरक़ा बाक़ी रहने वाला है तो क्या ये तय कर दिया है के इन्सान यहूदी ,ईसाई ,मुसलमान बन जाएँ या म्ल्हिद और बेदीन या मुशरीक हो जाएँ या ये हुब्बे दुनिया का असर है कि लोग तालीमते इलाहिया से दूर हो गए हैं और लोगों ने ख़ुदा को भुला दिया है तो उसने भी उन्हें नज़र अन्दाज़ कर दिया है। मेरी अक़्ल इस क़ज़ा ओ क़द्र कि ताईद तो नहीं कर सकती है कि उसने गुमराही को मुक़द्दसर कर लिया दिया है बल्कि मेरा मैलान और यक़ीन तो ये है कि उसने पैदा करके नेकों बद की हिदायत कर दी और रसूलों को भेज कर मुश्किल मसाएल को वाज़ेह कर दिया है और हक़्क़ो बातिल में इम्तियाज़ क़ायम कर दिया है ,अब ये इन्सान है जिसे ज़िन्दागानिऐ दुनिया और ज़ीनते दुनिया ने गुमराह कर दिया है और वो अपनी अनानियत ,जिहालत ,गुरूरों नख़वत ,इनदों बग़ावत या ज़ुल्मो शक़ावत की बुनियाद पर हक़ से किनाराकशहो गया है और उसने शैतान का इत्तेबा करके रहमान से दूरी इख्तियार कर ली है ,इसकी मन्ज़िल दूसरी मन्ज़िल हो गई है और इसकी गिज़ा दूसरी गिज़ा ,क़ुरआने हकीम ने इस सूरते हाल की बेहतरीन ताबीर इस तरह की है “ अल्लाह किसी पर ज़र्रा बराबर ज़ुल्म नहीं करता है ये इन्सान ही है जो अपने नुफ़ूस पर ज़ुल्म करते हैं ” । ‘सूरऐ यूनुस आयत 44 ’ ।

पिदरे बुज़ुर्गवार।।।।।।।।।।।मैं यहूदियों और इसाइयों को क्या कहूँ जिन्हें उनके इनाद ने मुन्हरिफ़ कर दिया है और वो दलाएल के बावजूद बहक गए हैं मेरी फरयाद तो इस उममते मूसलीमा के बारे जिसे ख़ुदा ने आपके फ़रज़न्द हज़रत मुहम्मद स।अ। के ज़रिये ज़ुलमटोन से निकाल कर नूर तक पहुंचा दिया था और उसे बेहतरीन उम्मत क़रार देकर लोगों की रहनुमाई का फ़रमान सुपुर्द कर दिया था आज वो कुछ ज़्यादा ही नजरे इख्तिलाफ़ हो गई है और इसमें कुछ ज़्यादा ही तफ़रीको तक़सीम हो गई है और सब एक दूसरे को काफ़िर क़रार दे रहे हैं जबकि नबीए करीम ने इस ख़तरे से आगाह कर दिया था और उन्हें होशियार कर दिया था के “किसी मुसलमान को ये हक़ नहीं की अपने भाई से तीन दिन से ज़्यादा किनाराकश रहे ” तो फिर इस उम्मत को क्या हो गया है जो तफ़रीक़ो तक़सीम का शिकार होकर मुख्तलिफ़ हुकूमतों में बंट गई है और हर एक दूसरे का दुश्मन और दूसरे से बरसरे पैकार रहता है बल्कि दूसरे को काफ़िर बनाने के लिए तैयार है यहाँ तक की एक दूसरे को पहचानता भी नहीं है और सारी ज़िन्दगी के लिए उससे किनाराकश रहता है आख़िर इस उम्मत को क्या हो गया है के खैरुल उमम होंने के बदतरीन उम्मत हो गई है और शर्क ओ ग़र्ब पर हुकूमत करने के बाद और लोगों को हिदायते उलूमो फुनून और तहज़ीब ओ तमद्दुन से आशना बनाने के बाद क़लील तरीन और जलील तरीन उम्मत हो गई है इसकी ज़मीनें ग़स्ब हो चुकी हैं इसके क़बाएल आवारावतन हो चुके हैं ,इसकी मस्जिदें अक़्सा पर यहूदियों का कब्ज़ा हो चुका है और वो इसकी आज़ादी पर कादिर नहीं है और इसके मुमालिक की सैर करें तो आपको तबाह कुन इफलास ,भूख ,बंजर ज़मीनों और मूज़ी अमराज़ और बदअख्लाक़ी के अलावा कुछ न नज़र आऐगा फ़िक्री ऐतेबार से पसमान्दगी ,ज़ुल्मो इसटेबड़ाड़ ,गंदगी और हशरातुल अर्ज़ इसकी सर ज़मीन के इम्तियाज़ात हैं हद ये है की यूरोप के बैतुलख़ला में भी मुक़ाबला किया जाए तो अन्दाज़ा होगा की यूरोप के बैतुलख़ला में दाखिल होने वाला सफाई और बिल्लौर जैसी चमक का मुशाहिदा करता है और हमारे मुल्कों में मुसाफिर बैतुलख़ला में दाख़िल होने की हिम्मत भी नहीं करता जबकि इस्लाम ने हमे ये तालीम दी थी की “सफाई ईमान का एक हिस्सा है और कसाफ़त शैतनत की पैदावार है ” तो क्या ये ईमान हमारे यहाँ से मुंतकिल होकर यूरोप चला गया है और यहाँ सिर्फ़ शैतान का कब्ज़ा रह गया है।

आख़िर मुसलमानों ने अपने मुल्कों में इजहारे अक़ीदा की आज़ादी क्यों नहीं है ? और मुसलमान के चेहरे पर इस्लाम की हुकूमत क्यों नहीं हैं और इनकी दाढ़ी क्यों नज़र नहीं आती है ,इंका लिबास इस्लामी क्यों नहीं है ,जबकि दूसरी क़ौमें अलल ऐलान शराब पी रहाई है और ज़िना कर रही ,बेहुरमती आम है और मुसलमान इन्हें रोक भी नहीं सकता बल्कि अम्र - बिल - मारूफ़ और नही - अनल - मुनकर भी नहीं कर सकता है मुझे तो यहाँ इततेला मिली है के मिस्र को फ़क़्रो फ़ाक़ा और इफलास की बुनियाद पर ज़िनाकारी के लिए भेजते हैं ताकि उनके ज़रिये चन्द पैसे हासिल कर सकें। ‘ वलाहोल बिला क़ूव्वता इल्ला बिललाह ’ खुदाया _____ तू क्यों इस उम्मत से इस क़दर दूर हो गया है और तूने तारीकियों में ठोकरें खाने के लिए छोर दिया है ____ अस्तग़फ़िरुल्लाह ____ये मेरा खाम ख़्याल है जिसके लिए मैं तौबा करता हूँ हकीकते अम्र ये है की ये उम्मत यूझसे दूर हो गई है और इसने शैतान के रास्ते को इख्तियार कर लिया है ____ तेरी हिकमत अज़ीम और तेरी क़ुदरत बलन्द तरीन है तूने पहले ही कह दिया था “जो शख़्स यदे खुदा से गाफ़िल होगा हम उसे शैतान के हवाले कर देंगे और वही इसका हमदमो हमनशीं होगा ” -----‘ज़ख़रफ़ ’ -३६ --- “मुहम्मद स।अ। सिर्फ अल्लाह के रसूल हैं जिनसे पहले बहुत से रसूल गुज़र चुके हैं क्या वो मर जाएँ या क़त्ल हो जाएँ तो तुम उल्टे पाँव पीछे की तरफ पलट जाओगे ? तो याद रखो जो पलट जाएगा वो खुदा को कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकता है और अल्लाह अन्क़रीब शुक्र गुज़ार बंदों को जज़ा अता करेगा ” सूरए आले इमरान १४४।

बेशक उम्मते इस्लामिया का ये इन्हेतात और उसकी ज़िल्लतो गुरबत और पसमानदगी दलील है के वो सिराते मुस्तक़ीम से दूर हो गई और ज़ाहिर है के एक अक़लियत या एक फ़िरक़े का राहे रास्त पर होना उम्मत की राहे अमल पर असर अंदाज़ नहीं हो सकता है ,ख़ुद रसूले अकरम ने इरशाद फ़रमाया है “तुम लोग अम्र - बिल - मारूफ़ और नही - अनल - मुनकर करते रहो वरना ख़ुदा अशरार को तुम पर मुसल्लत कर देगा जिसके बाद नेक बंदे दुआ भी करेंगे तो क़ुबूल नहीं होगी ” ।

परवरदिगार हम तेरे अहकाम पर ईमान लाए हैं और तेरे रसूल का इत्तेबा किया है लिहाजा हमे गवाहों में दर्ज कर ले---परवरदिगार! हिदायत के बाद हमारे दिलों को सिराते मुस्तक़ीम से मुन्हरिफ़ न होने देना और हमे अपनी तरफ़ से रहमते ख़ास आता फरमाना की तू बेहतरीन आता करने वाला है। परवरदिगार!हमने अपने नफ़्स पर ज़ुल्म किया है अगर तूने मुआफ़ न कर दिया और रहम न किया तो हमारा शुमार खिसारा वालों में हो जाएगा।

इसके बाद मैंने मदीना - ए - मुनव्वराका सफर किया और अपने हमराह अपने दोस्त का एक खत उसके एक रिश्तेदार के नाम ले आया ताकि उसके यहाँ मेरा कायम रहे और उसने टेलीफ़ोन से भी इस अम्र की इत्तेला दे दी थी चुनांचे उसके अज़ीज़ ने मेरा इस्तेक़बाल किया और ख़ुशआमदीद कहा और मैं वहाँ पहुँचने के फ़ौरन बाद ज़ियारते क़ब्रे पैग़म्बर के ,लिए रवाना हो गया ,गुस्ले ज़ियारत करने ख़ुशबू लगाने और बेहतरीन और पाकीज़ा लिबास पहनने के बाद मैंने रौज़ऐ अक़दसका रुख किया इस वक़्त मौसमे हज की निस्बत से ज़ाएरीन का मजमा कम था लिहाजा मैं क़ब्रे रसूल और क़ब्रे अबूबक्रो उमर के सामने सुकून से खड़ा हो सका जो काम अय्यामे हज में मुमकिन ना था मैंने चाहा के तबररुक के तौर पर किसी एक दरवाज़े को हाथ लगाऊँ कि पहरेदार ने मुझे झिड़क दिया और वो दरवाज़े पर क़ब्ज़ा जमाए हुऐ था इसके बाद जब मैंने दुआ में तूलदिया और ये चाहा कि अपने अहबाब की अमानत सलाम साहिबे क़ब्र तक पहुंचा दूँ तो पहरेदार ने मुझे वहाँ से दूर हो जाने का हुक्म दिया उयर मैंने चाहा के इस मोज़ू पर गुफ़्तुगु करूँ लेकिन बे फ़ायेदा समझ कर खामोश हो गया।

फ़िर मैं रौज़ऐ मुतहर कि तरफ वापस आया और वहाँ बैठ कर बक़दरे इमकान तिलावते क़ुरआन में मसरूफ़ हो गया बाक़ाएदो क़ानूनके मुताबिक़ तिलावते क़ुरआन शुरू की और बार बार कलेमात की तकरार करता रहा इस एहसास की बुनियाद पर की गौया मुरसले आज़म मेरी तिलावत को सुन रहे हैं और मेरा दिल ये पूछ रहा था कि क्या वाक़ेअन रसूले अकरम दूसरे इन्सानों कि तरह मुर्दा हो चुके हैं और अगर एस है तो हम अपनी नमाजों में बतौरे खिताब “अससलामो अलैका अय्योहल नबी व रहमुतुललाहे व बरकातहु ” क्यों कहते हैं ? और अगर मुसलमानों का ये अक़ीदा है के जनबे खिज़्र जिन्दा हैं और हर सलाम करने वाले के सलाम का जवाब भी देते हैं बल्कि हमारे सूफी माशेईख का तो ये ईमान है कि उनके शैख़ हज़रत अहमद तीजानी या अब्दुल क़ादिर जिलानी जीते जागते उनके पास तशरीफ़ लाते हैं और ये कोई ख़्वाब नहीं होता है तो हम सारा बुख्ल रसूले अकरम ही कि करामात के बारे में क्यों करते हैं जबकि वो तमाम काएनात और मख़लूक़ात से बहरहाल अफज़ल हैं लेकिन फ़िर मेरे नफ़्स को ये समझ कर तस्कीन हो रही थी कि तमाम मुसलमान रसूले अकरम के करामात में बुख्ल से काम नहीं लेते हैं बल्कि सिर्फ वहाबी फ़िरक़े के लोग हैं जिनसे अब धीरे धीरे मेरे दिल में नफ़रत पैदा होना शुरू हो गई जिसके मुख्तलिफ़ असबाब थे और जिनमें से एक सबब अखलाक़ी और तुन्द खुई थी जिसका मुशाहिदा मैंने ख़ुदा किया और जिसका निशाना वो साहिबाने ईमान थे जो वहाबियों से अक़ाएद में इख्तेलाफ़ रखते थे।

मैंने बक़ी की ज़ियारत की और क़ुबूरे अहलेबैत के करीब खड़े होकर उनके अरवाहे तय्यबा के लिए फ़ातेहा पढ़ा था और मेरे पास एक बहुत ही बूढ़ा इंसान खड़ा हुआ रो रहा था जिसके गिरये से मैंने ये अंदाज़ा किया कि ये शिया है और थोड़ी देर के बाद उसने रुबा क़िबला होकर नमाज़ शुरू कर दी के अचानक एक सिपाही दौर कर आया और गौया कि वो इस मोमिन की हरकत की मुसलसल निगरानी कर रहा था उसने एक लात मारी जबकि वो ग़रीब हालते सजदा में था और इसी हालत में उलट गया और चन्द मिनट तक बेहोश पड़ा रहा लेकिन सिपाही की मार पीट और गालम गलोच का सिलसिला जारी रहा मुझे इस बूढ़े पर बेहद रहम आया और मेरा ख़्याल था कि वो मर चुका है

और मेरी ग़ैरत ने मुझे ललकारा और मैंने मुदाखिलत करते हुए उस सिपाही से कहा के हालते नमाज़ में किसी नमाज़ी को मारना हराम है तो उसने मुझे ये कह कर डांट दिया के खामोश रहो और इन मुआमेलात में दख्ल मत दो वरना तुम्हारे साथ भी ऐसा ही बर्ताव किया जाएगा और जब मैंने उसकी आँख से शरारत के शोले भड़कते हुए देखे तो खामोश हो गया और अपने नफ़्स की मलामत करने लगा की मैं एक मज़लूम की मदद भी नहीं कर सकता और सउदियों के खिलाफ़ दिल ही दिल में इज़हारे गैज़ो गज़ब करने लगा जो लोगों के साथ आज़ादाना तौर पर ऐसा बरताव करते हैं और उन्हें कोई टोकने वाला भी नहीं है।

इस मक़ाम पर जो जाएरीन मौजूद थे उनमें से बाज़ ने इस वाक़्ये पर लाहौल पढ़ी और बाज़ ने कहा कि ये इसी बरताव का हकदार था इसलिए कि ये क़ब्रों के पास नमाज़ पढ़ रहा था जबकि ये अमल हराम है।

मैं इस बात को बर्दाश्त न कर सका और मैंने टोक कर उस शख़्स से कहा कि ये बात किसने कही है कि क़ब्रों के पास नमाज़ हराम है ?

उसने कहा के रसूले अकरम ने मुमानिअत फरमाई है।

मैंने बेख़्याली मैं ये कह तो दिया कि ये रसूल अल्लाह पर इल्ज़ाम है लेकिन फिर ख़्याल पैदा हुआ कि कहीं हाज़ेरीन मुझ पर न टूट पड़ें या उस सिपाही को न बुलवा लाएँ जो मेरे साथ भी एस ही बरताव करे जो उस मोमिन के साथ कर चुका है इसलिए मैंने निहायत नरमी से कहा कि अगर रसूले करम ने इस बात से माना फ़रमाया है तो लाखों हुज्जाज और जाएरीन आपके हुक्म कि मुखालेफ़त क्यों करते हैं और फिर ख़ुद आपकी क़ब्रे मुबारक़ या हज़रत अबूबक्रो उमर की क़ब्र के पास मस्जिदे नबवी में नमाज़ क्यों पढ़ते हैं या दुनिया की और दूसरी मस्जिदों में एस क्यों होता है और अगर ये तय हो जाए की क़ब्रों के गिर्द नमाज़ पढ़ना हराम है तो क्या इसका इलाज इससी शिद्दत से होना चाहिए।

आप मुझे इजाज़त दें तो मैं आपको उस आराबी का क़िस्सा बयान करूँ जिसने हुज़ूरे अकरम और आसहाब की मौजूदगी में बिला किसी शर्मो हया के मस्जिदे पैग़म्बर में पेशाब कर दिया था और जब असहाब तलवार खींच कर उसे क़त्ल करने के लिए बढ़े तो आपने ये कह कर रोक दिया की ऐसा इक़दाम ना करो बल्कि इस पेशाब पर एक डोल पानी दाल दो , तुम आसानियान पैदा करने के लिए भेजे गए हो दुश्वारियों के लिए नहीं ,तुम्हारा काम नेकियों की बशारत देना है नफ़रते पैदा करना नहीं है और तमाम आसहाब ने इस हुक्म की तामील की और अपने आराबी को बुलाकर अपने पास बिठाया और निहायत ही लुत्फ़ो मुहब्बत के साथ फ़रमाया कि ये जगह खानाए ख़ुदा है और इसका नजिस करना जाएज़ नहीं है जिस हूसने अमल को देख कर वो मुसलमान हो गया और हमेशा मस्जिद में बहतरीन और पाकीज़ा तरीन लिबास के साथ हाज़री देने लगा और क्यों ना होता परवरदिगार ने सच कहा था के “ पैग़म्बर अगर तुम बद इख्लाक़ और तुन्द खू होते तो ये सब तुम्हारे पास से टूट टूट कर चले जाते ” ‘आले इमरान ’ ,आयत 159 ’ ।

मेरे इस बयान से बाज़ हाज़ेरीन बेहद मुतास्सिर हुए और एक शख़्स ने अलग ले जाकर मुझसे पूछा के आप कहाँ के रहने वाले हैं ? मैंने बताया के तयूनस का उसने मुझे सलाम किया और कहा के भाई लिल्लाह अपने नफ़्स कि हिफ़ाज़त कीजिए और यहाँ इस क़िस्म कि बातें न कीजिए मैं आपको बराए ख़ुदा नसीहत करता हूँ जिसके बाद मेरे बुग़ज़ो अदावत में इजाफ़ा हो गया के ये लोग जो अपने को हरमैन का मुहाफ़िज़ कहते हैं वो अल्लाह के मेहमानों से ऐसी सख्ती का बरताव करते हैं और कोई शख़्स न इज़हारे ख़्याल कर सकता है और न उसके खयालातों ऐतेक़ादात के खिलाफ़ कोई वाक़ेया बयान कर सकता है मैं अपने नऐ दोस्त के घर वापस आ गया जिसके नाम से भी वाकिफ़ नहीं था ,उसने शाम का खाना लाकर सामने रखा और क़ब्ल इसके की मैं खाना शुरू करूँ उसने सवाल कर लिया के आप कहाँ चले गए थे ? मैंने उससे पूरा वाक़िया तफसील के साथ बयान कर दिया और दरमियान में ये भी कह दिया के भाई साफ बात ये है के अब मुझे वहाबियों से सख्त नफरत होने लगी है और मेरा रुजहान शियों की तरफ हो रहा है। ये सुनकर उसके चेहरे का रंग बादल गया और उसने कहा के आइन्दा कोई ऐसी बात न कीजिएगा।

ये कह कर वो चला गया और मेरे साथ खाना भी नहीं खाया मैं ता देर इंतेज़ार करता रहा यहाँ तक कि सो गया ,सुबह को अलस्सबा मस्जिदे पैगंबर की आजान सुनकर उठा तो देखा के खाना उसी तरह रखा हुआ है और साहिबे खाना वापस नहीं आया है मुझे ये शुबहा पैदा हुआ कि कहीं ये शख़्स जासूस तो नहीं है इसलिए मैं फ़ोरन उठा और फ़िर उसका घर छोर कर बाहर निकल गया।

मैंने तमाम दिन हरमे पैग़म्बर में ज़्यारत और नमाज़ में गुज़रा सिर्फ़ ज़रूरियात और वुज़ू के लिए निकलता था और फ़िर आकार मसरूफ़े इबादत हो जाता था।

नमाज़े असर के बाद मैंने ख़तीब को देखा जो नमाज़ियों कि एक जमाअत को दरस दे रहा था मैं उधर मुतवज्जह हो गया और आसार से ये अंदाज़ा किया के ये मदीना का क़ाज़ी है।

वो क़ुरआने मजीद की बाज़ आयतों की तफ़सीर बयान कर रहा था और जब दरस तमाम करके निकलने लगा तो मैंने उसे रोक कर सवाल किया की हुज़ूर क्या आप बता सकते हैं कि इस आयात का मफ़हूम क्या है : “इननमा युरीदुल्लाहो ले युज़हिबा अन्कुमुर रिज्सा अहल्लबैत व युताहरेकुम ततहीरा ” ‘सुरऐ अहज़ाब आयत 32।

ये अहलेबैत कौन हज़रात हैं उसने फ़ौरन जवाब दिया के अज़वाजे पैग़म्बर और फ़िर इब्तेदाऐ आयत का हवाला दिया “या निसाउन नबी।

मैंने कहा उल्माऐ शिया का कहना है के ये आयत अली ,फ़ातेमा ,और हसनो हुसैन के साथ मख़सूस है और जब मैंने उन पर ये ऐतेराज़ किया के आयत कि इब्तेदा निसा से हुई है तो उन्होंने जवाब दिया के जब तक अज़्वाज मुखातब थी सीगे सब मुअन्नस के थे “लेतुन्ना ,अन अतक़इतुन्ना ,फलातख्जुउन्ना वक़ुलना वक़रना फी बयूतोकुन्ना ,वलातबरज़ना ,व अक़मनस्सलातवआतीन ,वअतअन ” और जब आयत का ये टुकड़ा आया जो अहलेबैत के साथ मख्सूस है तो सीगा बदल गया और मुज़क्कर के अलफाज इस्तेमाल होने लगे “लेयुज़हिबा अंकुम ,युताहेराकुम ” ।

उसने ऐ मर्तबा चश्मा उठा कर मेरी तरफ़ देखा और कहा के ऐसे ज़हरीले अफ़कार से होशियार रहना ,शिया हमेशा अपने ख़्वाहिशात के मुताबिक कलामे इलाही कि तावील कर लेते हैं उनके पास अली और औलादे अली के बारे में ईईसी आते हैं जिनको हम जानते भी नहीं है और उनके पास एक ख़ास क़ुरआन है जिसको मुसहफ़े फ़ातेमा कहते हैं लिहाज़ा ख़बरदार उनके धोके में न आ जाना।

मैंने कहा हुज़ूर बिलकुल मुतमइन रहें मैं उनकी बहुत सी बातों को जानता हूँ और पूरे तौर पर होशियार हूँ लेकिन मैं कुछ तहक़ीक़ करना चाहता था उन्होने पूछा के आप कहाँ के रहने वाले हैं ? मैंने कहा “तयूनस ”

फरमाया आपका नाम क्या है ?

मैंने कहा “तीजानी ”

उन्होंने फाटेहाना अंदाज़ से मुस्कुरा कर फरमाया के आप जानते हैं ये अहमद तीजानी कौन हैं ?

मैंने कहा कि तरीक़त के शैख़ हैं। उन्होंने फरमाया कि जी नहीं वो फ़्रांसीसी इस्तेमार का एक एजेंट है जिसे जज़ाएर और तयूनस के लिए मुअइन किया गया है और अगर आप पेरिस जाए तो वहाँ कि नेशनल लाइब्रेरी में ख़ुद जाकर फ़्रांसीसी क़ामूस में बाबे अलिफ का मुतालेआ कर लें आप देखेंगे के फ्रांस ने अहमद तीजानी को क्या मर्तबा दिया है और उन्होंने फ़्रांसीसी हुकूमत की किस क़दर बेपनाह ख़िदमत अंजाम दी है।

मैं ये सुनकर हैरत ज़दा रह गया और उनका शुक्रिया अदा करके वापस आ गया।

मदीने में मेरा कयाम मुकम्मल एक हफ़्ता रहा जिसमें चालीस नमाज़े पूरी कीं और मज़ारत की ज़ियारत की। दौराने क़याम तमाम हालात को बड़ी गहरी नज़र से देखता रहा और वहाबीयत से मेरी नफरत में मुसलसल इज़ाफ़ा होता रहा।

मदीनऐ मुनव्वरा से मैं अरदन आया जहां बाज़ उन दोस्तों से मुलाक़ात की जिंका हज कान्फ्रेंस के दौरान तारूफ़ हासिल हुआ था ,उनके पास तीन दिन क़याम पज़ीर रहा और मैंने देखा कि उनके पास तयूनस वालों से कुछ ज़्यादा ही शियों से नफ़रत पाई जाती है।

वही रवायात ,वही अफ़साने और वही प्रोपैगन्डे

मैंने जिस से भी दलील के बारे में पूछा हर एक का यही जवाब था की हम बराबर सुनते चले आ रहे हैं किसी ने न किसी शिया को देखा था शियों की कोई किताब पढ़ी थी और न पूरी ज़िन्दगी में किसी शिया से मुलाक़ात की थी।

मैं अरदन से शाम आया और यहाँ दमिश्क़ में मस्जिदे उमवी की ज़ियारत की जिसके पहलू में मरक़दे रसिल हुसैन अलै।है और वहीं सलाहुद्दीन अय्युबी और सैयदा ज़ैनब स।अ। की भी ज़ियारत की और बैरूत से बराहे रास्त तराबलस आ गया।

ये सफर चार दिन समन्दर में रहा जहां मुझे जिस्मानी और फ़िक्री ऐतेबार से कदरे आराम मिला और मैं अपने ज़ेहन में इस सफर की पूरी फिल्म को दोहरा रहा था जो खात्मे के करीब पहुँच चुकी थी , मेरे दिल में शियों का ऐतहराम ,और उनकी तरफ रुजहान और उसके मुक़ाबले में वहाबियों से बेजारी और नफरत का जज़्बा पैदा हो चुका था कि मैं उनकी मक्कारियों जाल साजियों का मुशाहिदा कर चुका था ,मैंने ख़ुदा कि बे पनाह नेमतों और इनायतों पर उसका शुक्रिया अदा किया और इस बात की दुआ की कि वो मुझे राहे हक़ की हिदायत दे दे। मैं अपने वतन की सरज़मीन पर इस आलम में वापस आया कि अपने अहले खाना ,अहले खानदान और अहबाब और दोस्तों के लिए सरापा शोक बना हुआ था अल्हम्दुलिल्लाह सबको बखैरीयत पाया।

मेरी हैरत कि इन्तेहां न रही जब मैंने घर में दाख़िल होते ही किताबों का अंबार देखा जो मुझसे पहले पहुँच चुकी थी और जब मैंने किताबों को खोला तो मेरे दिल में उन हज़रात की मुहब्बत और उनके लिए जज़बए ऐहतेराम में इजाफ़ा हो गया जिन्होंने अपने वादे की मुखालिफ़त नहीं की और उससे कहीं ज़्यादा किताबें इरसाल कर दीं जो वहाँ मुझे बतौर तोहफ़ा दी गई थी।

आग़ाज़े तहक़ीक़

मैं किताबों को देख कर बहुत खुश हुआ और मैंने उन्हें एक कमरे में लाइब्रेरी की शक्ल में मुरत्तब कर दिया।

चंद रोज़ आराम करने के बाद मुझे कॉलेज की तरफ़ से मुझे नए साल का टाइम टेबिल मिला जिसमें हर हफ्ते तीन दीन तदरीस के थे और चार दिन बराबर आराम के।

मैंने मौक़े को ग़नीमत जाना और मौजुदा क़ुतुब का मुतआलेआ शुरू कर दिया। मैंने “अक़ाएदुल इमामिया ” और “असले शिया वल उसूलेहा ” जैसी किताबें पढ़ी तो मेरा ज़मीर शियों के अफ़कार और आक़ाएद की तरफ़ से बिलकुल मुतमइन हो गया और उसके बाद मैंने सैयद शरफुद्दीन मुसवी की किताब “अलमराजेआत ” पढ़ी तो चन्द ही सफहों के बाद किताब से एस इश्क़ हो गया के सिवाए मजबूरी के उसे छोड़ने का दिल नहीं चाहता था बल्कि बाज़ अवक़ात तो अपने साथ कॉलेज तक लेकर चला जाता था इस किताब ने मुझे बिलकुल मबहूत बना दिया था के शिया आलिम में किस सराहत के साथ बात काही है और उन मसाएल को कितनी आसानी से हल किया है जो एक सुन्नी आलिम और शेख अज़हार के लिए भी इन्तेहाई मुश्किल और दुश्वार गुज़ार थे।

मैंने इस किताब में अपना मुद्दुया हासिल कर लिया इसलिए की ये उन किताबों की मानिंद नहीं थी जिनमें मुअल्लिफ़ जो चाहता है लिखता रहता आई और कोई रोकने टोकने वाला नहीं है। ये किताब मुख्तालिफ़ बड़े उल्मा की बहस है जिसमें हर एक दूसरे की छोटी बड़ी बात का मुहासेबा और मुआखेज़ा करता है ताकि क़ुरआन सुन्नत से सही तौर पर इस्तेफ़ादा किया जा सके।

दर हक़ीक़त इस किताब में वही काम किया है जो मैं कर रहा था ,किताब एक जोयाए हक़ का काम कर रही थी जो हक़ीक़त को तलाश कर रहा हो और जहां मिल जाए कुबूल करने को तैयार हो।

किताब मेरे हक़ में बेहद मुफीद थी और इसका मेरे ऊपर अहसान अज़ीम है। मैं उस वक़्त और हैरत ज़दा रह गया जब मैंने ये किताब में ये बहस देखी के सहाबा - ए - किराम रसूले अकरम की इताअत नहीं करते थे और इसके मुताबिक रिसालों के हवाले देखे जिनमें एक “रोज़े पन्जशंबा ” का हादेसा भी था। मैं तो ये तसव्वुर भी नहीं कर सकता था के हज़रत उमर बिन खत्ताब जैसा आदमी भी रसूले अकरम के अहकाम में मुदाखिलत करके उन पर हिजयान का इल्ज़ाम का लगायेगा ,चंचे मैंने इबटेड़ा में यही ख़याल किया कि रवाएत शियों कि किताब में होगी लेकिन उस वक़्त मेरी वहशत में और इजाफ़ा होगया जब मैंने देखा के आलिमे शिया ने इस रिवायत को सही बुखारी और सही मुस्लिम से नक़ल किया है और मैंने तें कर लिया कि अगर ये रिवायत सही बुखारी से निकल आई तो मैं भी अपने बारे में कोई फैसला कर लूँगा।

मैंने दारुल हकूमत का सफर किया और वहाँ जाकर सही बुखारी सही मुस्लिम ,मुसन अहमद दे ,सही तिरमिज़ी ,मोता इमाम मालिक और दूसरी बहुत सी किताबें खरीद ली और घर वापस आने का इंजार भी नहीं किया रसस्ते ही से मुतआलेआ शुरू कर दिया ,मैं बस में बैठा किताब कि वर्क़ गरदानी कर रहा था और रोज़े पन्जशंबा के हादसे को तलाश कर रहा था और मेरा दिल ये छह रहा था कि ये रिवायत किताब में न मिले लेकिन इसके बार खिलाफ रिवायत मिल गई और मैंने उसे बार बार पढ़ा और वैसा ही पाया जैसा कि सैयद शरफुद्दीन ने नक़ल किया था ,चुनांचे मेरा दिल चाहा के मैं पूरे वाक़ेऐ का सिरे से इंकार कर दूँ इसलिए कि मेरे लिए ये मानना बहुत मुश्किल था के हज़रत उमर ऐसा इक़दाम कर सकते हैं लेकिन मैं उन हकाएक कि क्योंकर तकजीब कर सकता था जो हमारे सहा में मौजूद थे और जिनकी सेहत पर हम तमाम अहले - सुन्नत वल जमाअत का ईमान था और उन पर शक करना या उनकी तकजीब करने का मक़सद ये था कि हम अपने तमाम ऐटेक़ादात को ठुकरा दें यर बात अगर शिया आलिम ने अपनी किताबों से नक़ल कि होती तो मई हरगिज़ तसदीक़ न करता लेकिन अब जबकि इन सहा से नक़ल की है जिनके इन्कार की गुंजाईश नहीं है और जिन्हें हम किताबे खुदा के बाद असहुल कुतुब मान चुके हैं तो अब ये बात हमारे लिए लाज़िम हो गई है वरना ये किताब मशकूक करार पा जाएगी और हमारे पास अहकामे इस्लामी का कोई क़ाबिले ऐतेमाद ज़रिया न रह जाएगा।

कितबे खुदा के सारे अहकाम मुजमल हैं जिनकी तफ़सीलत का ज़िक्र नहीं किया गया है। ये ज़माना ज़मानए रसूल से सदियो बाद का है और अहकामे दीन सब इन्हीं सहा के जरिये बतौर विरासत हम तक पहुंचे हैं लिहाज़ा इनके नज़र अंदाज़ करने का कोई इमकान नहीं।

मैंने इस तुलानी और दुश्वार गुज़ार वादिए बहस में कदम रखते हुए ये अहद कर लिया कि मैं सिर्फ़ उन्हीं अहादीसों पर ऐतेमाद करूंगा जिन पर अहले सुन्नत और शिया दोनों का इत्तेफ़ाक हो और उन अहादीस को नज़र अन्दाज़ कर दूंगा जिसको किसी एक फ़रीक ने बयान किया होगा इस मोतादिल दरमियानी अन्दाज़े बहस से मैं तमाम जज़्बाती मोहर्रेकात , मज़हबी तास्सूबात और क़ौमी या वतनी रूजहानात और मीलानात से दूर रह सकूँगा। और शक कि राहों को तें करके यकीन कि बुलंदियों तक पहुँच सकूँगा जो हक़ीक़तन तारीक़े हक़ और सिराते मुस्तक़ीम है।।

अमीक़ तहक़ीक़ का आगाज़

सहाबा -----अहलेसुन्नत और शियों की नज़र में

मंज़िले हक़ीक़त तक ले जाने वाली बहसो में सबसे अहम बहस जो इस तामीर में संगे बुनियाद की हैसियत रखती है सहाबा की ज़िंदगी ,उनके हालात ,उनके आमाल और उनके अक़ाएद का मसअला है इस लिए कि वही हर मामले में सतून की हैसियत रखते है और उन्हीं से हमने अपने दीन लिया है और अहकामे ख़ुदा की मारेफ़त की रोशनी ली है।

उल्माऐ इस्लाम ने साबिक़ में भी इस मसअले की अहमियत का अंदाज़ा करते हुए उन की सीरत और उनके किरदार के बारे में बहस की है और मुख्तालिफ़ किताबें तलीफ की है मसअलन “उसुदुलगाबा फ़ी तमीज़े सहाबा ” -“अलअसाबा फ़ी मारिफ़ते सहाबा ” और “मीज़ाने ऐतेदाल ” वग़ैरा जिन किताबों ने इन की हयात का तजज़िया किया है और इनके बारे में बहस की है लेकीन या तमाम बहसें सिर्फ़ अहले सुन्नत वल जमाअत के नुकतऐ निगाह से हैं।

इस मक़ाम पर सबसे बड़ी दुश्वारी ये है कि साबिक़ उल्मा आम तौर से तारीख ओ तहरीर में वो अंदाज़ इख्तियार करते थे जो उमवी और अब्बासी हुक्काम कि ख़्यालात के मुताबिक हों जिनकी दुश्मनीऐ अहलेबैत शोहरा आफ़ाक़ हैसियत रखती है इस बिना पर ये इन्तेहाई नाइन्साफ़ी है कि उनके बयानात पर ऐटतेमाद कर लिया जाऐ और दूसरे उल्माऐ इस्लाम के बयानात को यकसर नज़र अन्दाज़ कर दिया जाए जिन्हें इन हुकूमतों ने पामाल किया है ,आवारा वतन बनाया है या मौत के घाट उतार दिया है सिर्फ़ इस लिए कि ये हाजरात अहलेबैत के पैरो थे और इन्होंने उन ज़ालिमों और बेरह - रव हुकूमतों के खिलाफ़ सदाऐ इन्क़ेलाब बुलन्द की थी।

इन तमाम मसाएल में बुनियादी ज़िम्मेदारी सहाबा की है कि यही वो लोग हैं जिन्होंने इस बात में झगड़ा डाल दिया कि रसूल अल्लाह वो तारीख़ी नविशता लिख दें जो उन्हें क़यामत तक गुमराही से बचाए रहे और उनके इसी झगड़े ने उम्म्ते इसलामिया को इस फ़ज़िलत से महरूम कर दिया और गुमराही के उस गढ़े में ढकेल दिया जिसके नतीजे में तक़सीम ,तकसीम ,तफ़रीका ,जंग ओ जिदाल ,कमज़ोरी और आखिर में तबाही और बरबादी मन्ज़रे आम पर आ गई है।

इन्हीं सहाबा ने खिलाफ़त में झगड़ा डाला और फिर हज़्बे हाकिम और हज़्बे इख्तिलाफ़ में तक़सीम हो गए और इसके नतीजे में उम्मत पसमानदा होकर शियाऐ अली अलैहिस्सलाम और शियाऐ माविया दो गिरोह में तक़सीम हो गई।

इन्ही सहाबा - ऐ - किराम ने किताब ओ सुन्नत की तफ़सीर में इख्तिलाफ़ पैदा किया जिसके बाद मज़ाहिब ,फ़िरके ,मिल्लतें और गिरोह वोजूद में आऐ और इस के ज़ेरे असर इल्मे कमाल के मदरसे ,अफकार के झगड़े और तरह तरह के फलसफे मांजरे आम पर आऐ जिनहे सियासी मुहरेकात ने इक़तेदात पर कब्ज़ा करने के लिए ख़ूब सहारा दिया।

हक़ीक़ते अम्र ये हे के अगर सहाबा न होते तो मुसलमानों में न कोई इख्तेलाफ़ होता न कोई तफ़रिका और जो कुछ भी तफ़रिका पैदा हुआ हे या पैदा होगा सबका ताअल्लुक इन्हीं सहाबा के बसरे में खिलाफत से है वरना सबका खुदा एक ,असूल एक ,क़िबला एक और क़ुरआन एक ही है सब इस बात पर मुत्तफ़िक़ है के इख्तेलाफ़ का सिलसिला रोज़े अव्वल वफ़ाते पैग़म्बर के बाद सकीफ़ा बनी साएदा में सहाबा के इख्तेलाफ़ से शुरू हुआ है और आज तक जारी है और न जाने कब तक जारी रहेगा।

मैंने उल्माऐ शिया से गुफ़्तुगू के दौरान ये नतीजा निकाला है के इनकी नज़र में असहाब की तीन किस्में हैं।

पहली क़िस्म उन असहाब की है जो नेक किरदार ,ख़ुदा और रसूल के मुकम्मल तौर पर पहचानने वाले और रसूल के हाथों पर मर मिटने के लिए बैयत करने वाले ,अक़वाल में उनके साथी और आमाल में उनके मुख़लिस थे ,उनमे किसी तरह का इख्तेलाफ़ नहीं पैदा हुआ और हुज़ूर के बाद भी अपने अहद पर क़ायम रहे ,इन्हीं असहाब की क़ुरआने मजीद मुख्तलिफ़ मक़ामात पर मदह की गयी है और उन्हीं की सना ओ सिफ़त का ऐलान मुख्तलिफ़ अवक़ात में पैग़म्बरे इस्लाम ने किया है।

शिया इन असहाब का निहायत ही एहतेराम और तक़दीस के साथ तज़किरा करते हैं और इनके हक़ में दुआए मग्फ़िरत करते हैं जिस तरह कि अहले सुन्नत इनके ऐजाज़ और एहतेराम के क़ायल हैं। दूसरी क़िस्म उन असहाब की है जिन्होंने इस्लाम को गले लगाया खौफ़ या रग़बत से रसूले अकरम का इत्तेबा किया और बराबर आप पर अपने इस्लाम का अहसान जताते रहे ,बल्कि बाज़ अवक़ात तो आपको अज़ीयत भी देते रहे आपके अवामिरो नवाही का इत्तेबा करने के बजाए नुसुसे सरीह के मुक़ाबले में अपने इजतेहाद का रास्ता खोलते रहे यहाँ तक के क़ुरआन ने कभी इनकी सरज़निश की और कभी इन्हें अज़ाबे इलाही से डराया बल्कि मुख्तलिफ़ आयात में नसीहत का ऐलान किया और रसूले अकरम ने भी मुख्तलिफ़ अहादीस में इनसे होशियार रहने की तलक़ीन फ़रमाई। शिया हज़रात इन असहाब का उनके आमाल ओ अफ़आल का तज़किरा करते हैं और अलग से किसी तक़दीस और ऐहतेराम के क़ायल नहीं है।

तीसरी क़िस्म उन मुनाफ़िक़ असहाब की है जो मक्कारियों की बिना पर रसूले अकरम के साथ रहे ,इस्लाम का इज़हार किया और बातिन में फ़र्क़ छुपाये रहे रसूले अकरम से नज़दीक सिर्फ़ इस्लाम और मुसलमानों को तबाह करने के लिए आए और उनके बारे में ख़ुदा ने एक मुकम्मल सूरा नाज़िल फरमा दिया और मुख्तलिफ़ मक़ामात पर उनकी मज़म्मत की और जहन्नम के आख़री तबक़े की तंबीह की ,रसूले अकरम ने भी उनका तज़किरा करते हुए उनसे होशियार रहने की तलक़ीन की और बाज़ असहाब ने उनके नाम और उनकी अलामतों से भी बाख़बर कर दिया और यही वो अफ़राद हैं जिन पर शिया और सुन्नी लानत करते हैं और उनसे दोनों ही बेज़ार हैं।

इन तीनों क़िस्म के अलावा सहाबा की एक और क़िस्म भी है जिन्हें क़राबत और जिस्मानी और रूहानी फ़ज़ीलत का इम्तियाज़ भी हासिल है इन्हें ख़ुदा और रसूल ने उन खुसुसियात से नवाज़ा है जहां तक कोई दूसरा पहुँच नहीं सकता ,इन्हीं को अहलेबैत कहा जाता है जिनसे ख़ुदा ने हर रिज्स को दूर रखा है और जिन्हें मुकम्मल तरीक़े से पाक और पाकीज़ा बना दिया है ‘सूरऐ अहज़ाब ’ ‘आयत-33।

इन्हीं पर रसूल की तरफ सलवात को वाजिब क़रार दिया हैं और इन्हीं के लिए खुम्स में एक हिस्सा क़रार दिया है --- ‘सूरऐ इन्फ़ाल 41

इन्हीं की मुहब्बत को रिसालत का अज्र क़रार देकर तमाम मुसलमानों पर फर्ज़ किया है –-सूरऐ शूरा - 23

और यही वो उलिल-अम्र हैं जिनकी इताअत का हुक्म दिया गया है-निसा ५६।

और यही रासेखूना फ़िल इल्म है जो तावीले क़ुरआन से बाख़बर और मोहकम और मुताशाबा के जानने-सूरऐ आले इमरान-7

और यही वो अहले ज़िक्र है जिन्हें रसूले अकरम ने हदीसे सक़लैन में क़ुरआन का साथी बना कर दोनों से तमस्सुक करने को वाजिब क़रार दिया है -- कन्ज़ुलआमाल , जिल्द अव्वल , पेज न। 44 - मुसनदे अहमद ,जिल्द ५ ,सफ़हा 182।

यही वो अफराद हैं जिनहे कशतिए नूह की मिसाल बनाया गया है जो इस सफ़ीने पर सवार हो गया निजात पा गया जो अलग हुआ वो डूब गया। : मुस्तदरके हाकिम जिल्द 3 , पेज न। 151 , :सवाएक़े मुहरिक़ा सफ़हा १८२ व 234 : ’’

सहाबाऐ किराम खुद भी अहलेबैत की क़द्रो मंज़िलत से वाकिफ थे और उनकी ताज़ीम ओ तकरीम किया करते थे , शिया इन अहलेबैत को तमाम सहाबा पर फ़ौक़ियत देते हैं और इनके बारे में उनके पास नुसूसे सरीहा के मुख्तलिफ़ दलाएल भी मौजूद हैं।

अहले सुन्नत वल जमाअत अगरचे अहलेबैत के ऐहतेरामो ताज़ीम और तफ़ज़ील के क़ायल हैं लेकिन सहाबा की इस तक़सीम क़ायल नहीं हैं और न असहाब में मुनाफ़िक़ीन का शुमार करते हैं बल्कि सहाबा उनकी नज़र में सब की सब रसूले अकरम के बाद तमाम मखलूक़ात से बालातर हैं और अगर कोई तक़सीम हैं तो सिर्फ इस्लाम में सबक़त और राहे ख़ुदा में मुजाहेदात के ऐतेबार से है इसी लिऐ पहली मंज़िल में खुल्फ़ाऐ राशदीन को फ़ज़ीलत दी जाती है।

इसके बाद अशराए मुबश्शेरा के बाक़ी छह अफराद को रखा गया है जिनको उनके ख़्याल में जन्नत की बशारत दी गई है और इसी लिए आप देखते हैं की जब रसूल और आल पर सलवात भेजते है तो बिला इस्तेसना तमाम असहाब को भी शामिल कर लेते हैं।

यही वो हक़ाएक़ हैं जिनको मैंने तक़सीमे सहाबा के बारे में उलमाऐ शिया से हासिल किया है और इसी बात ने मुझे मजबूर किया है कि मैं अपनी बहस का आगाज़ सहाबा के बारे में अमीक़ तरीन गुफ़्तुगू से करूँ और मैंने परवरदिगार से अहद किया है कि अगर उसकी तौफ़ीक़ शामिले हाल रहे तो तमाम जज़्बात से अलग होकर ग़ैर जानिबदार अंदाज़ से बहस करूंगा इस तरह कि दोनों फ़िरक़ों कि बात सुनूंगा और जो बेहतर होगा उसकी इत्तेबा करूंगा।

इस सिलसिले में मेरी दो बुनियादें हैं ,१मन्तिक़े सलीम का क़ानून और इसका मतलब ये है के मैं किताबे ख़ुदा और सुन्नते पैग़म्बर की तफ़सीर में सिर्फ़ इन बातों पर ऐतेबार करूंगा जो फ़रीक़ैन के दरमियान मुत्तफ़िक़ अलैह होगी।

२ – अक़्ल जो इंसान के लिए अल्लाह की सबसे बड़ी नेमत है और उसके ज़रिए अल्लाह ने उसे तमाम मख्लूक़ात से अफ़जल ओ बेहतर क़रार दिया है की जब भी किसी बात पर ऐहतेजाज करना होता है तो इसी का हवाला देकर फरमाता है कि क्या उनके पास अक़्ल नहीं है ? क्या ये फ़हम नहीं रखते हैं ? क्या ये तदबीर से काम नहीं लेते हैं ? और क्या इन्हें कुछ दिखाई नहीं देता है।

बहस से पहले मेरे इस्लाम कि बुनियाद ये है कि मैं अल्लाह ,मलाएका ,साहिफ़ो और रसूलों पर ईमान रखता हूँ ,हज़रत मुहम्मद स।अ। को उसका बंदा और रसूल समझता हूँ और इस्लाम को उसका पसन्दीदा क़रार देता हूँ।

इस सिलसिले में मेरा ऐतेमाद किसी सहाबी पर नहीं है चाहे वो कैसी ही क़राबत या मन्ज़िलत का मालिक क्यों न हो ,मैं न उमवी हूँ न अब्बासी ,न फ़ातिमी ,मेरा मसलक न सुन्नी है और न शिया ,मैं न अबूबकर ,उमर ओ उस्मान से अदावत रखता हूँ और न अली अ।स। से , हद ये है के हज़रत हमज़ा के क़ातिल वहशी से भी नहीं कि वो मुसलमान हो गया था और इस्लाम पुराने मामेलात ख़त्म कर देता है और रसूले अकरम ने भी उसे माफ़ कर दिया है ?

और जबकि मैंने हक़ीक़त को तलाश करने में अपने नफ़्स को इस मुहलके में डाल दिया है और पूरे इख़लास के साथ तमाम साबिक़ अफ़कार से आज़ादी हासिल कर ली है तो रहमते ख़ुदा के सहारे मेरी बहस का आग़ाज़ सहाबा के मोक़फ़ और उनके आमाल ओ अफ़आल से होगा।

सहाबा सुल्हे हुदैबिया में

इस क़िस्से का इजमाल ये है की ६हिजरी में रसूले अकरम अपने चौदह सौ अफ़राद के साथ उमरे के इरादे से मदीने से निकले और सबको हुक्म दिया कि तलवारों को न्याम में रखें ज़िल-हलीफ़ा में सबने अहराम बाँधा और तक़लीद के साथ क़ुरबानी को साथ ले कर चले ताकि कुरैश को मालूम हो जाऐ कि ज़ियारत और उमरे कि नीयत से आ रहे हैं और जंग का कोई इरादा नहीं है लेकिन कुरैश को अपने ग़ुरूर और नख़वत की बिना पर ये खौफ़ पैदा हो गया कि कहीं अरब को ये एहसास न पैदा हो जाऐ के मुहम्मद ने ताकत के ज़ोर से मक्के में कुरैश की शानो शौकत को तोड़ दिया है ,इसलिए सुहैल बिन उमरू बिन अब्दवद उलआमली की सरकर्दिगी में एक वफ़द भेजा और ये मुतालेबा किया कि पैग़म्बरे इस्लाम इस साल वापस चले जाएं और अगले साल उनके वास्ते तीन दिन के लिए मक्का ख़ाली कर दिया जाऐगा वो इत्मीनान से उमरा कर लेंगे।

इस सिलसिले में कुछ संगीन शर्तें भी रखी लेकिन हुज़ूरे अकरम ने मसलेहते इस्लाम के लिए सब कुछ क़ुबूल कर लिया लेकिन बाज़ अफ़राद को आपके तसर्रुफ़ात अच्छे नहीं मालूम हुऐ और उन्होंने इन इक़दामात का शिददत से मुक़ाबला किया ,यहा तक के उमर इब्ने ख़तताब ने आकर कहा क्या आप वाक़ेयन नबी हैं ? आपने फ़रमाया बेशक! क्या हम हक़ पर और हमारे दुश्मन बातिल पर नहीं हैं ? आपने फरमाया बेशक ऐसा ही है।

उन्होंने कहा तो फिर हम ज़िल्लत क्यों बर्दाश्त कर रहे हैं ?

आपने फ़रमाया मैं अल्लाह का रसूल हूँ और उसके हुक्म की खिलाफ़वर्ज़ी नहीं कर सकता जबकि वो मेरा सरपरस्त भी है और मददगार भी!

उन्होंने कहा क्या आपने हमसे नहीं कहा था कि हम ख़ानऐ ख़ुदा का तवाफ़ करेंगे ?

आपने फरमाया बेशक कहा था लेकिन क्या ये भी कहा था के इसी साल ? —तो उमर ने कहा नहीं!

फ़रमाया तो फिर तुम ख़ानऐ ख़ुदा तक जाओगे भी और तवाफ़ भी करोगे।

इसके बाद उमर इब्ने खत्ताब अबूबकर के पास आऐ और कहा क्या ये वाक़ेयान नबीऐ बर हक़ नहीं हैं ? उन्होंने कहा-हैं! तो उमर ने वो सारे सवालात उनसे भी किए जो रसूल अल्लाह से कर चुके थे और उन्होंने भी तक़रीबन वैसे ही जवाबात दिये और कहा कि ऐ शख्स वो अल्लाह के रसूल हैं और उसकी मुखालिफ़त नहीं कर सकते लिहाज़ा उनके अहकाम की इताअत करो।

इसके बाद जब सुलहनामा मुकम्मल हो गया तो आपने असहाब को हुक्म दिया के उठो और क़ुरबानी दो और सर के बाल काट दो लेकिन कोई एक शख्स भी नहीं उठा यहाँ तक कि आपने तीन मरतबा इस हुक्म कि तकरार की और जब कोई तामील करने वाला पैदा नहीं हुआ तो ख़ैमे के अंदर तशरीफ ले आऐ और जब बाहर आऐ तो किसी से बात भी नहीं कि और ख़ुद अपने दस्ते मुबारक से नहर कर दिया और बाल काटने वाले को बुलाकर सर के बाल कटवा दिये , इसके बाद जब असहाब ने ये मन्ज़र देखा तो बादिले नाखास्ता उठे जानवर ज़िबह किया और इसी तरह एक दूसरे के बाल काटने लगे जैसे गला ही काट देंगे। “सही बुखारी किताबे मशरूत-बाबे शुरूत फ़ी जिहाद ,जिल्द २ स।१२२ ” “सही मुस्लिम बाबे सुल्हे हुदैबिया ”

ये सुल्हे हुदैबिया का इजमाली क़िस्सा जिस पर तमाम शिया और सुन्नी उलेमा मुत्तफ़िक़ हैं और जिस का तज़किरा तबरी ,इब्ने असीर और इब्ने साद जैसे तमाम असहाबे तारीख़ और सैर ने किया हैं।

मैं इस मक़ाम पर ठहरना चाहता हूँ कि मेरे लिए ये मुम्किन नहीं है के मैं ऐसे वाक़ेयात को पढ़ूँ और मुतास्सिर न हूँ या मुझे नबीये अकरम के सामने असहाब की जसारत पर तआज्जुब न हो ,क्या कोई अक़्लमन्द इस बात को क़ुबूल कर सकता है की सहाबा तमाम अहकामे रसूल की तामिल ओ तन्फ़ीज़ किया करते थे जबकि ये वाक़ेया इस बात की तक्ज़ीब और ऐसी बातों की तरदीद के लिए मौजूद है और क्या कोई साहिबे अक़्ल ये तसव्वुर कर सकता है की नबी के सामने ऐसे तसर्रुफ़ात मामूली हैं या इन तसर्रुफ़ात में आदमी को मजूर क़रार दिया जा सकता है जबकि क़ुरआने मजीद का खुला हुआ ऐलान है की “पैग़म्बर आपके परवरदिगार की क़सम ये लोग साहिबे ईमान नहीं बन सकते हैं जब तक कि अपने तमाम इख्तेलाफ़ात में आपसे फ़ैसला न कराएं और जब आप फ़ैसला कर दें तो अपने नफ़्स में तंगी महसूस न करें , और सरापा तस्लीम न बन जाएँ ” “सूरऐ निसा आ।६५ ”

क्या उमर इब्ने ख़त्ताब ने इस मक़ाम पर अपने नफ़्स को रसूल अल्लाह के हवाले कर दिया था और क्या किसी तरह कि तंगी का अहसास नहीं किया था ? क्या उन्हें हुब्बे पैग़म्बर में तरद्दुद नहीं था और क्या वो रसूले अकरम के जवाबात से मुतमइन हो गए थे ? और उन्होंने दोबारा अबूबकर से ये सवालात नहीं किए थे ? और क्या वो अबूबकर के जवाब और उनकी नसीहत से मुतमइन हो गऐ थे ?

मुझे तो यक़ीन नहीं है वरना वो ये क्यों कहते कि मैंने इस गुस्ताखी के लिए बहुत से आमाल अंजाम दिऐ उन आमाल को

तो अल्लाह और रसूल ही बेहतर जानते हैं मैं तो ये भी नहीं जानता हूँ के बाक़ी असहाब ने भी तीन दफ़ा तकरार के बावजूद हुज़ूर के अहकाम कि इताअत क्यों नहीं की।

सुबहान अल्लाह मैं तो इन बातों की तसदीक़ की हिम्मत भी नहीं कर सकता था कि सहाबा रसूले अकरम के हुक्म को नज़र अंदाज़ करने में इस मंज़िल तक पहुँच जाएंगे और अगर ये क़िस्सा शियों ने नक़ल किया होता तो मैं इसे भी सहाबाऐ किराम के खिलाफ़ उनके इल्ज़ामात का हिस्सा क़रार दे देता लेकिन मुश्किल ये है कि ये क़िस्सा अपनी सेहत और शोहरत के ऐतेबार से उस मंज़िल पर है कि अहले सुन्नत के तमाम मोहद्देसीन और मोअररेखीन ने नक़ल किया है और मैंने चूंकि ये तय कर लिया है कि मुत्ताफ़िका अलैह मसाएल को तस्लीम कर लूँगा इस लिए मेरे पास तस्लीम और तहय्युर के कोई चाराऐ कार नहीं है।

मेरी समझ में नहीं आता कि मैं क्या कहूँ और उन सहाबा के बारे में क्या उज़्र तलाश करूँ जिन्होंने बेसत से अब तक तक़रीबन बीस साल रसूले अकरम के साथ गुज़ारे हैं ,उनके मौजीजात और नाबूवत के अनवार का मुशाहेदा किया है ,क़ुरआने मजीद उन्हें दिन रात रसूले अकरम की बारगाह के आदाब सिखाता रहा है और यहाँ तक तंबीह कर दी है कि अगर रसूल कि आवाज़ पर आवाज़ भी बुलन्द हो गयी तो सारे आमाल बर्बाद कर दिए जाएंगे लेकिन इसके बावजूद ये सूरते हाल सामने है।

मुझे तो ये ख़्याल भी पैदा हो रहा है कि उमर इब्ने खत्ताब ही ने दूसरे हाज़ेरीन को मुखालिफ़त पर आमादा किया था जैसा के ख़ुद उनका इक़रार है के इस सिलसिले में बहुत से आमाल अंजाम दिए हैं और दूसरे मक़ामत पर ये वज़ाहत भी की है कि मैं तमाम ज़िन्दगी रोज़े रखता रहा ,सदका देता रहा ,नमाज़े पढ़ता रहा और गुलाम आज़ाद करता रहा उन बातों कि मकाफ़ात में जो मेरी ज़बान से निकल गई थी। “ सीरते हलबिया बाबे सुल्हे हुदैबिया जिल्द २ ,सफ़हा ७०६ “।

इन बातों से साफ़ अंदाज़ा होता है कि उमर को ख़ुद भी अपने मौक़िफ़ कि संगीनी का अहसास था और उन्होंने क़सदन ये रास्ता इख्तियार किया था ,ज़ाहिर है कि ये वाक़ेयात इंतेहाई अजीबो ग़रीब और हैरतअंगेज़ हैं मगर क्या किया जाऐ कि ये एक हक़ीक़त है जिसे नज़रअन्दाज़ भी नहीं किया जा सकता है।

सहाबा और हादसे-ऐ-रोज़े पंचशन्बा

इस वाक़ये का इजमाल ये है कि पैगम्बर की वफ़ात से तीन दिन पहले असहाब आपके घर में जमा थे तो आपने उन्हें हुक्म दिया कि क़लमो दावात ले आएं ताकि उनके वास्ते एक ऐसा नविश्ता लिख दें जो उन्हें गुमराही से महफ़ूज़ रखे लेकिन सहाबा ने इख्तिलाफ़ किया और बाज़ ने तो सिर्फ नाफरमानी ही कि और बाज़ ने आप के हुक्म को हिज़यान क़रार दे दिया।

इस वाक़ये की मुख़तसर तफसील इब्ने अब्बास के अल्फ़ाज़ में ये है कि “पंचशंबे का दिन था और क्या क़यामत था पंचशंबा का दिन जब पैग़म्बर के मर्ज़ में शिद्दत पैदा हुई और आपने असहाब से फ़रमाया आओ तुम्हारे लिए एक ऐसा नविश्ता लिख दूँ जिसके बाद कभी गुमराह न हो तो उमर ने कहा कि पैग़म्बर का दर्द पर ग़ल्बा है और तुम्हारे पास क़ुरआन मौजूद ही है जो हमारे लिए काफ़ी है जिस पर घर वालों में इख्तिलाफ़ पैदा हो गया बाज़ का कहना था कि क़लम ओ डावात ले आओ ताकि पैगम्बर एक नविशता लिख दें जिसके बाद कभी गुमराह न हो बाज़ ने वही कहा जो उमर ने कहा था और जब लड़ाई झगड़े में शिद्दत पैदा हो गई तो रसूले अकरम ने फ़रमाया कि मेरे पास से निकल जाओ ” जिसके बाद इब्ने अब्बास बराबर कहते रहे कि सबसे बड़ी मुसीबत ये थी कि लोग पैगम्बर इस्लाम और उस नविशते के दरमियान हायल हो गऐ जो इख्तिलाफ़ और गुमराही से बचाने वाला था। “ सही बुखारी जिल्द २ बाब क़ौल्लु मरीज़ क़ौमू आइन्नी ”

ये वाक़ेया अपने मक़ाम पर बिलकुल सही है और इसमें किसी शक कि कोई गुंजाइश नहीं है इस लिए कि इसे उल्माओ मुहद्दीसीनों मुअर्र्खीने अहले सुन्नत ने अपनी किताबों में।

और मुझे तो बहरहाल वाक़ेये कि सेहत को तस्लीम करना है इसलिए कि मेरी बहस का बिनियादी उसूल ये है कि मुत्ताफ़िक़ा अलैह हक़ाएक़ को तस्लीम किया जाएगा जिसके बाद मेरी हैरत कि कोई इन्तेहा नहीं रह जाती है कि मैं हुकमे रसूल के मुक़ाबले में उमर बिने ख़त्ताब के मौक़िफ़ कि क्या तफ़सीर करूँ जबकि ये हुक्म भी ऐसा था जो उम्मत को गुमराही से बचाने वाला था और ये यकीनन एक ऐसा नविश्ता होता जो मुसलमानों के लिए तमाम तमाम शुकूक और शुबहात का खात्मा कर देता छोड़िए शियों के इस इददुआ को कि पैग़म्बर अली को खिलाफत के लिए नाम्ज़द करना चाहते थे और उमर ने इस नुक़्ते को बांप लिया और इसी लिए मना कर दिया इसलिए कि शिया इस दावे से मुझे मुतमइन न कर सकेंगे लेकिन क्या इस दर्दनाक हादसे की कोई और भी माकूल तफ़सील हो सकती है जिसने रसूले अकरम को इतना ग़ज़बनाक कर दिया की आपने सबको बाहर निकाल दिया और इब्ने अब्बास ज़िन्दगी भर इस तरह रोते रहे की ज़मीन तर हो जाती थी और इस वाक़ेये को अज़ीम तरीन मुसीबत से ताबीर करते रहे अहले सुन्नत का कहना है के हज़रत उमर ने मर्ज़ कि शिद्दत का अहसास करके आपको आराम देना चाहता था लेकिन इस तौज़ीह को सादा लोह आवाम भी नहीं क़ुबूल नहीं कर सकते चे ज़ाएके उल्मा और दानिश्वर हज़रात मैंने बारहा चाहा के हज़रत उमर के लिए कोई उज़्र तलाश करूँ लेकिन हादसे कि नौवियत आड़े आ गई यहाँ तक के अगर मैं लफ़्ज़े हिज़यान का ‘ग़ल्बाऐ मर्ज़ ’ से भी तब्दील कर दूँ तो भी इस लफ़्ज़ का कोई जवाज़ नहीं मिलता कि तुम्हारे पास क़ुरआन मौजूद है और हमारे लिए वो काफ़ी है क्या हज़रत उमर रसूले अकरम से ज़्यादा आरीफ़े क़ुरआन थे या रसूल अल्लाह माज़अल्लाह ख़ुद अपने अलफ़ाज़ के मानी भी नहीं समझ पा रहे थे या उन्होंने ख़ुद भी उम्मत में कोई इख्तिलाफ़ और तफ़रिक़ा पैदा करना चाहा था ,’अस्तग्फ़िरुल्लाह।

फ़िर अगर अहले सुन्नत की ये तौज़ीह सही भी होती तो ख़ुद रसूले अकरम को इस हूसने बीयत का अंदाज़ा करना चाहिए था और उमर का शुक्रगुज़ार होना चाहिऐ था और उन्होंने लिखने की ज़हमत से बचा लिया न ये के इजहारे गैज ओ ग़ज़ब करे और सबको निकाल बाहर करे दें।

मुझे ये तो ये भी पूछने को जी चाहता है कि रसूले अकरम के इस हुक्म के बाद लोग क्यों हुजरेऐ शरीफ़ से बाहर निकल गए इस हुक्म को क्यों हिज़यान क़रार नहीं दिया क्या इसका सबब इसके अलावा कुछ और है कि लोग रसूले अकरम को नविश्ता लिखने से रोकने के प्रोग्राम में कामयाब हो गऐ और उसके बाद वहाँ रहने की कोई ज़रूरत नहीं रह गई थी।

इसके बाद ये मसअला इतना सादा भी नहीं था की सिर्फ़ उमर की ज़ात से मुतल्लिक़ होता वरना आप उन्हें समझा कर खामोश कर देते की नबी अपनी ख़ाहिश से कलाम नहीं करता है और हिदायते उम्मत के बारे में उस पर किसी मर्ज़ का ग़लबा नही होता है बल्कि मसअला हमागीर था और उमर को इतनी आसानी से हम आवाज़ अफ़राद मिल गऐ थे जैसे पहले से इस बात पर इत्तिफ़ाक़ रहा हू और इसी लिए हर तरफ़ से शोर और हंगामा बरपा हो गया और किसी को ये क़ौले ख़ुदा याद माँ आया कि “ ईमान वालों ख़बरदार अपनी आवाज़ को नबी की आवाज़ पर बुलंद न करना और उनके सामने इस तरह बुलंद आवाज़ से बात न कर न जिस तरह आपस में बातें करते हो कि तुम्हारे आमाल बर्बाद हो जाएँ और तुम्हें शऊर भी न पैदा हो- “सूरऐ हुजरात आयत 2 ” ।

इस हादसे में सहाबा अदब और तहज़ीब के तमाम हुदूद से आगे बढ़ गए औए हुज़ूर को हिज़यान गो तक कह दिया और उनकी मौजूदगी में एक लफ़्ज़ी मारका खड़ा हो गया।

मेरा ख़्याल ये है कि उस वक़्त की बड़ी अकसरियत हज़रत उमर की हमख़्याल थी और इसी लिऐ रसूले अकरम ने देखा कि अब लिखने का कोई फ़ायेदा नहीं है इसलिए कि जब ये लोग आवाज़ बुलन्द न करने के ख़ुदाई हुक्म का एहतेराम नहीं करते हैं और उसकी मुखालिफत कर रहे हैं तो रसूल के हुक्म कि क्या इताअत करेंगे फ़िर तक़ाज़ऐ हिकमत भी यही था कि अब कुछ न लिखें इसलिए कि जब उनके सामने ख़ुद उन पर इल्ज़ाम लगाया जा रहा है तो उनके बाद उनकी तहरीर की क्या हैसियत होगी उस वक़्त तो कह दिया जाएगा कि ये तहरीर भी हिज़यान कि एक क़िस्म है और इस तरह मरज़ुल मौत के तमाम अहकाम में तशकीक कि जाएगी कि हिज़यान का ऐतेक़ाद साबित हो चुका है मैं तो परवरदिगार से अस्तग़फार करता हूँ कि रसूले अक्रम कि बारगाह में ये लफ़्ज़ किस तरह इस्तेमाल किया जा सकता है और मैं किस तरह अपने नफ़्स और ज़मीर को ये कह कर मुतमईन कर सकता हूँ कि उमर ने बेख़्याली में ये बात कह दी होगी जाबके बाज़ असहाब और हाज़रीन इस हादसे पर इस क़दर रोऐ कि ज़मीन तर हो गई और इसे आलमे इस्लाम का सबसे बड़ा सानेहा क़रार दे दिया मैं तो इस नतीजे तक पहुंचा हूँ कि वाक़्ये कि तमाम तौज़िहात और तावीलात मुहमल हैं और सिर्फ़ यही हो सकता है कि असल हादसे का इन्कार कर दिया जाऐ ताकि इसकी कर्बनाकी से राहत हासिल कि जा सके लेकिन मुश्किल ये है के तमाम कुतूबे सहीहा ने इसे नक़्ल किया है और सही भी क़रार दिया है।

मैं तक़रीबन शियों कि राय से इत्तेफाक़ करना चाहता हूँ वो एक मनतिक़ी तौज़ीह है और इसके बाद क़राएन भी हैं ,और मुझे अभी तक सैयद मुहम्मद बाक़िरुल सदर का ये जवाब याद है कि जब मैंने उनसे पूछा कि तमाम सहाबा के दरमियान हज़रतउमर ही कैसे समझ गए कि रसूले अक्रम अली कि खिलाफ़त का नाविश्ता लिखना चाहते हैं क्या ये उनकी गैरमामूली ज़िहनत का सबूत नहीं है तो उन्होंने फ़रमाया कि तन्हा उमर ही ने इस मक़सद का इदराक नहीं किया था बल्कि अक्सर हाज़रीन यही समझते थे इसलिए कि रसूले अकरम इस क़िस्म के अल्फ़ाज़ पहले भी इस्तेमाल कर चुके थे जब आपने फ़रमाया था कि मैं तुम्हारे दरमियान दो गरांक़द्र चीज़े “किताबल्ला और अपने इतरतो अहलेबैत ” को छोड़े जा रहा हूँ जब तक इन दोनों से मुतामस्सिक रहोगे हरगिज़ गुमराह न होगे और आज ये फार्मा रहे थे ‘लाओ एक तहरीर लिख दूँ कि जिसके बाद कभी गुमराह न होगे तो हाज़ेरीन ने मय उमर के महसूस कर लिया कि पैग़म्बर उसी बात की तहरीरी ताक़ीद करना चाहते हैं जो ग़दीरे ख़ुम में किताब ओ अहलेबैत के बारे में फ़रमा चुके हैं और इतरत की सबसे नुमायाँ फ़र्द अली हैं यानी पैग़म्बर ये कहना चाहते हैं कि तुम सबको क़ुरआन और अली से तमस्सुक करना है जैसा कि मुहद्देसीन कि बयान के मुताबिक़ मुख्तलिफ़ मक़ामात पर इशारा भी कर चुके थे और दूसरी तरफ कुरैश कि अकसरियत अली से ख़ुश नहीं थी इसलिए कि वो उम्र के ऐतेबार से कमसिन भी थे और उन्होंने मुख्तालिफ़ मैदानों में उनके बहादुरों को क़त्ल करके उनकी नाक रगड़ दी थी और उनके गुरुर और नख्वत को चूर चूर कर दिया था लेकिन वो इस हद तक जसारत करने को तैयार नहीं थे जैसा कि सुलहे हुदैबिया में या अब्दुल्लाह इब्ने अबी मुनाफ़िक़ की नमाज़े जनाज़ा में या इस मौक़े पर देखने में आया और आपको मालूम है के मरज़ुल मौत के मौक़े पर किताबत की राह में रुकावट डालने से दूसरे अफ़राद के हौसले भी बुलन्द हो गए और उन्होंने भी जसारत में हिस्सा लेना शुरू कर दिया यहाँ तक कि एक हँगामा बरपा हो गया।

हज़रत उमर का ये क़ौल दर हक़ीक़त मक़सदे हदीस की मुकम्मल तरदीद है इसलिए के इरशादे सरकारे दो आलम था की उम्मत को क़ुरआन और इतरत दोनों से तमस्सुक करना है और बिने खत्ताब ने कहा के क़ुरआन हमारे पास ,मौजूद है और वही हमारे लिए काफ़ी है हमें इतरत की कोई ज़रूरत नहीं है अब इस हादसे की इसके अलावा और क्या तफ़सीर हो सकती है कि सहाबा का मक़सद रसूले अकरम की मुखालिफ़त करना था और बस हां सिर्फ़ ये तावील की जा सकती है कि हसबुना किताबल्लाह का मक़सद ये था कि ख़ुदा काफ़ी है और रसूल की कोई ज़रूरत नहीं है लेकिन ये बात भी खिलाफ़े इस्लाम और गैरे माकूल है।

इसलिए मैंने अंधे तास्सुब और बेजा जज़बातियत के रास्ते को छोड़ने के बाद अक़्ले सलीम और फ़िक्रे आज़ाद के फैसले की बिना पर ये तय कर लिया के शियों का तजज़िया बिलकुल सही है और अगर मेरा ये ख़्याल ग़लत भी है तो ये गलती उस फ़ेल से कांतरार है के हसबुना किताबल्लाह कह कर सीरते पैग़म्बर को ठुकरा दिया जाऐ और अगर बाज़ मुसलमान हुक्काम ने सीरते पैगम्बर को ये कह कर ठुकरा दिया कि इसमें तनाकुज़ पाया जाता है तो इसमें भी इस्लामी तारीख़ के इसी साबिक़े का इत्तेबा किया गया है और मैं तो इस ग़लती कि ज़िम्मेदारी तन्हा हज़रत उमर पर नहीं डालता बल्कि इन्साफ़ के रास्ते पर चलते हुऐ उन तमाम सहाबा को जिम्मेदार क़रार देता हूँ जिन्होंने उमर जैसी बात कही और रसूल अल्लाह के मुक़ाबिले में उनके मौक़िफ़ की ताईद कर दी।

मुझे तो उन लोगों पर ताअज्जुब होता है जों इस वाक़ेये को पढ़ कर यूं गुज़र जाते हैं जैसे कोई वाक़ेया हुआ ही न हो जबकि बक़ौले इब्ने अब्बास ये तारेख का सबसे बड़ा हादसा है और सबसे ज़्यादा ताअज्जुब उन लोगों के हाल पर होता है जों एक सहाबी की इज़्ज़त बचाने और उसकी गलती की तौज़ीह करने में सारा ज़ोर सर्फ़ कर देते हैं चाहे इस राह में रसूल अल्लाह की इज़्ज़त और इस्लाम के क़वानीन ही को क्यों न कुर्बान करना पड़े।

अज़ीज़ाने गिरामी! आख़िर हम हक़ीक़त से क्यों भागना चाहते हैं ? और उन मामलात को क्यों दबाना चाहते हैं जों हमारी ख्वाहिशात के मुताबिक़ नहीं है ? हम ये ऐतेराफ़ क्यों नहीं करते कि सहाबी हम जैसे इन्सान हैं ? उनके पास भी ख्वाहिशात ,मुफ़ादात और मैलानात सब कुछ हैं ,वो सही काम भी करते हैं और उनसे ग़लतियाँ भी होती हैं।

हाँ! मेरा ताअज्जुब उस वक़्त खत्म हो जाता है जब मैं किताबे ख़ुदा का मुतालेआ करता हूँ और वो अँबियाऐ किराम के वाक़ेयात और मोजिज़ात देखने के बाद भी क़ौमों की तरफ़ से उनके हक़ में शदीद क़िस्म की मुखालिफ़त का ज़िक्र करता है-ख़ुदाया! हिदायत के बाद हमारे दिलों में कजी न पैदा होने देना और हमें अपने खज़ानए ख़ास से रहमत अता फ़रमा कि तू बेहतरीन अता करने वाला है।

अब मुझे ये अंदाज़ा होने लगा है कि शिया हज़रात जों मुसलमानों की ज़िंदगी के बेशतर मसाएब की ज़िम्मेदारी ख़लीफ़ऐ दोम पर डालते हैं के उन्होंने उम्मत को उस नविशतऐ हिदायत से महरूम कर दिया है जो रसूले अकरम इसके वास्ते लिखना चाहते थे ,उनके इस मौक़िफ़ का पस मंजर क्या है और मैं इस ऐतेराफ़ पर मजबूर हूँ कि जिस शख़्स ने भी शख़्सियतों से बालातर होकर हक़ का इरफान हासिल किया है वो उनके मौक़िफ़ कि ताईद करेगा और जिसने हक़ को शख़्सियतों ही से पहचाना है उससे बात करने का कोई फायदा नहीं।

सहाबा लशकरे उसामा में

इस वाक़ेये का ख़ुलासा ये है कि रसूले अकरम ने अपनी वफ़ात से दो दिन पहले रोम से मुक़ाबिला करने के लिए एक लश्कर तैयार किया और उसका सरदार उसामा इब्ने ज़ैद इब्ने हारिसा को क़रार दिया जिनकी उम्र सिर्फ़ अठ्ठारह साल थी और उस लश्कर में अबूबकर ,उमर और अबूउबैदा जैसे मशाहीर असहाब और महाजिरीन ओ अन्सार के नुमायाँ अफ़राद को भी शामिल कर दिया ,जिस पर एक जमाअत ने उसामा कि सरदारी पर ऐतेराज़ किया और कहा कि हम पर ऐसे जवान को क्यों सरदार बनाया गया है जिसका सब्ज़ा अभी आगाज़ नहीं हुआ है और यही बात इससे पहले उनके बाप कि सरदारी के मौक़े पर काही जा चुकी थी।

चुनांचे सहाबा के इस तन्ज़ ओ तनक़ी को सुनकर सरकार को बेहद गुस्सा आया और आप बुखार के आलम में सर पर पट्टी बांधे दो अफ़राद पर तकिया किए हुऐ यूं बैतुश्शरफ़ से बरामद हुऐ के आप के पाँव ज़मीन पर ख़त देते जाते थे और फ़िर मिंबर पर जाकर हम्दो सनाऐ इलाही के बाद फ़रमायाकि “अय्योहन्नास ये उसामा कि सरदारी के बारे में क्या बातें सुन अरहा हूँ और आज ये कोई ऐतेराज़ नहीं है तुम इन से पहले इनके बाप कि सरदारी पर भी ऐतेराज़ कर चुके हो ,ख़ुदा कि क़सम ज़ैद सरदारी के हक़दार थे और उनके बाद उनका बेटा इस मन्सब का अहल है ” -तबक़ात इब्ने साद ,जिल्द-२ सफ़हा १९० ,तारीखे इब्ने असीर ,जिल्द-२सफ़हा ३१७ ,अस्सीरते हलबिया ,जिल्द-३ ,सफ़हा २०७ ,तारीखे तबरी ,जिल्द-३ ,सफ़हा २२६।

इसके बाद आपने क़ौम को उजलत पर आमादा करना शुरू कर दिया और फ़रमाया कि लशकरे उसामा को तैयार करो ,लशकरे उसामा को रवाना करो ,लशकरे उसामा को आगे बढ़ाओ और इसी बात कि मुसलसल तकरार करते रहे लेकिन लोगों कि सुसूति में कोई फ़र्क़ नहीं आया तो अब मेरे जेहन में ये सवाल पैदा होता है कि आख़िर ख़ुदा और रसूल के मुक़ाबले में ये जुरअत कैसी है और पैग़म्बरे अकरम के हक़ में ये नाफ़रमानी क्या मानी रखती है जबकि वो मोमीनीन के फ़ायदे के लिए बेचैन और उनके हाल पर मेहरबान रहते हैं।

मैं तो ऐसी मुख़ालिफ़त और ऐसी जुरअत की कोई माकूल तफ़सीर नहीं सोच सकता हूँ और मेरी तरह कोई दूसरा इन्सान भी नहीं सोच सकता है।

मेरा दिल चाहता था कि मैं दीगर वाक़ेयात की तरह इस वाक़ेये से भी आँख बंद करके गुज़र जाऊँ या इसकी तकज़ीब कर दूँ कि इस से क़रीब या दूर से सहाबा की अज़मत को ठेस लग गई है लेकिन मैं इस हक़ीक़त से कैसे इन्कार कर सकता हूँ जिसे शिया और सुन्नी दोनों तरह के मुअर्रेखीन और मुहद्देसीन ने बिल-इत्तेफाक़ नक़्ल किया है।

मैं अपने ख़ुदा से अहद कर चुका हूँ कि इन्साफ करूंगा और किसी मज़हबी तास्सुब से काम नहीं लूँगा और हक़ के अलावा किसी चीज़ को कोई अहमियत नहीं दूंगा अगरचे हक़ इस मक़ाम पर इंटेहाई तल्ख़ है और सरकारे दो आलम ने फ़रमाया है के “हक़ कहो चाहे अपने ही खिलाफ़ क्यों न हो और हक़ कहो चाहे तल्ख़ ही क्यों न हो।

और हक़ इस वाक़ेये में यही है कि जिन सहाबा ने उसामा की सरदारी पर ऐतेराज़ किया उन्होंने हुकमे इलाही की मुखालिफ़त की और उन सरीही नुसूस की मुखालिफ़त की जिनमें किसी शक और तावील की गुंजाइश नहीं है और इस सिलसिले में उनके पास कोई माकूल उज़्र भी नहीं है।

अलावा उन बेजान माजरतों कि जिन्हें बाज़ लोगों ने सहाबा और सल्फ़े सालह कि इज़्ज़त के तहफ़्फ़ुज़ के लिए तलाश किया है जाबके आज़ाद फ़िक्र और साहिबे अक़्ल ऐसी बातों को किसी क़ीमत पर क़ुबूल नहीं कर सकता है मगर ये की उन लोगों में शामिल हो जाऐ तो बक़ौले क़ुरआन कोई बात ही नहीं समझते हैं या बेअक़्ल हैं या तास्सुब ने उन्हें इतना अन्धा बना दिया है कि वाजिब ओ हराम में कोई इम्तियाज़ क़ायम नहीं कर पाते हैं।

मैंने बहुत ग़ौर किया कि इन सहाबा के लिए कोई उज्र तलाश करूँ लेकिन मेरी फ़िक्र में कोई फायदा नहीं पहुंचाया।

फिर मैंने अहले सुन्नत की ये माज़िरते पढ़ी कि ये सब कुरैश के शयूख़ और बुज़ुर्ग थे इन्हें इस्लाम में सब्क़त हासिल थी और उसामा बिलकुल नौजवान थे उन्होंने बद्र ओ ओहद ओ हुनैन जैसे इज़्ज़ते इस्लाम के लिए फ़ैसला कुन मारकों में शिरकत भी नहीं की उनका इस्लाम में कोई साबिक़ा भी नहीं था बल्कि वो बिलकुल एक कमसिन नौजवान थे जिसे फ़ितरी तौर पर बुज़ुर्ग और बूढ़े बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं और तबई तौर पर उनके अहकाम की इताअत पर तैयार नहीं होते हैं और इसी लिए उन लोगों ने उसामा की सरदारी पर ऐतेराज़ किया था और ये चाहा था कि हुज़ूर उनकी जगह पर किसी बुज़ुर्ग और नुमायाँ सहाबी को सरदार बना दें --- लेकिन मुझे इन माज़िरतो कि कोई अक़्ली और शरई दलील नहीं मिल सकी और किसी क़ुरआन पढ़ने वाले और उनके अहकाम जानने वाले मुसलमान के लिए इसके अलावा कोई रास्ता नहीं है कि इन माज़िरतों को रद् कर दे इसलिऐ कि परवरदिगार ने फ़रमाया है कि “जो तुम्हें रसूल दे दें ले लो और जिस चीज़ को रोक दें रुक जाओ ” “ख़ुदा ओ रसूल अगर किसी अम्र का फैसला कर दें तो किसी मोमिन मर्द या औरत को कोई इख्तियार नहीं रह जाता है और जो ख़ुदा और रसूल की मुखालिफ़त करेगा वो खुली हुई गुमराही में मुब्तिला होगा ” सूरेए अहज़ाब -३६।

इन सरीही नुसूस के बाद वो कौन सा उज़्र बाक़ी रह जाता है जिसे साहिबाने अक़्ल क़ुबूल कर लें और मैं उस क़ौम के बारे में कह सकता हूँ जिसने ये जानते हुए रसूले अकरम को ग़ज़बनाक किया कि इनका ग़ज़ब अल्लाह का ग़ज़ब है और उन्हें हिज़यान गो क़रार दिया और मरज़ुल मौत के आलम में उनके सामने इतना हुल्लड़ और हंगामा किया कि सब को हुजरे से बाहर निकाल देना पड़ा क्या ये हादेसा इस अम्र के लिए काफ़ी नहीं था कि लोग राहे रास्त पर आ जाएँ और अल्लाह की बारगाह में तौबा करें और रसूल से भी अपने हक़ में अस्तग़फ़ारका मुतालिबा करें जैसा कि क़ुरआन ने इशारा दिया है चे जाएके इसके बाद बक़ौल अरब “मिट्टी को और गीला बना दें ” और रहीम ओ करीम पैगंबर के मुक़ाबले में ऐसी जसारते करें कि उनके हक़ की रियाअत रह जाऐ और न उनका ऐहतेराम की हाइसियात रह जाऐ और उसामा की सरदारी पर उस वक़्त तअनो तंज़ करे जबकि अभी हिज़्यान का ज़ख्म मुन्दमिल नहीं हो पाया था और बक़ौल मुअर्रेखीन रसूले अकरम को इन शिद्दते मर्ज़ के आलम में बाहर निकलने पर मजबूर कर दें जबकि आप दो आदमियों पर तकिया किए हुए थे और आपके पाँव ज़मीन पर ख़त देते जा रहे थे फिर आपको इस बात की क़सम भी खाना पड़े कि उसामा सरदारी के हक़दार हैं और ये ऐलान भी करना पड़े कि ये लोग इससे पहले ज़ैद बिन हारिसा की सरदारी पर भी ऐतेराज़ कर चुके हैं जिससे ये साफ ज़ाहिर होता है कि इन लोगों कि इससे पहले भी बहुत सी मवाफ़िक़ और साबिक़े हैं जो इस बात कि गवाही देते हैं कि ये लोग हरगिज़ उन लोगों में नहीं थे जो रसूल के फ़ैसले के बाद दिल में किसी तरह कि तंगी महसूस न करें और उनके सामने सरापा तस्लीम बन जाएँ बल्कि उनका शुमार उन मुआन्दीन और मुखालेफ़ीन में था जिन्होंने अपने वास्ते हक़्क़े तनक़ीद ओ ऐतेराज़ महफूज़ कर लिया था चाहे इस राह में ख़ुदा और रसूल के अहकाम कि मुखालिफ़त ही क्यों न करना पड़े।

इस सरीही मुखालिफ़त का एक सबूत ये भी है कि इन अफराद ने ये देखने के बाद भी के पैग़म्बरे इस्लाम गैज़ के आलम में हैं और आप ने ख़ुद अपने हाथों से अलमे लश्कर तैयार किया है और लोगों को जल्दी करने का हुक्म दिया है ,सुस्ती और काहिली से काम लिया है और लशकरे उसामा के साथ न गऐ यहाँ तक कि हुज़ूर का इन्तेक़ाल हो गया “हमारे माँ बाप क़ुरबान उस क़ल्बे नाज़नीन पर जो अपने साथ उम्मत का ये दर्द लेकर चला गया कि ये अन्क़रीब उल्टे पाँव पलट जाने वाली है और इस का अंजाम आतिशे जहन्न्म होगा अलावा उस मुख़तसर अक़लियत के जिस को ख़ुद हुज़ूर ने हिदायत याफ़्ता क़रार दिया है।

हम अगर इस वाक़ये में मज़ीद ग़ौर करना चाहें तो देखेंगे कि इसके सबसे ज़्यादा नुमायाँ उन्सुर और इस सियासी पेचो ख़म के सबसे बड़े क़ुतुब खलीफ़ए दोम थे जिन्होंने वफ़ाते पैग़म्बर के बाद भी अबूबकर से ये मुतालिबा किया था कि उसामा को माज़ूल करके किसी दूसरे को सरदारे लश्कर बना दें जिस पर अबूबकर ने बिगड़ कर जवाब दिया था कि “इब्ने खत्ताब! तेरी माँ तेरे ग़म में बैठे मुझे उस शख़्सको माजूल करने का मशवेरा दे रहा है जिसे रसूल अल्लाह ने हाकिम बनाया है ” -तबक़ाते इब्ने साद ,जिल्द २ ,सफ़हा१९० ,तारीखे तबरी ,जिल्द ,३ सफ़हा२२६।

आख़िर उमर को इस हक़ीक़त का इदराक क्यों नहीं हुआ जिसे अबूबकर ने समझ लिया था या फिर इस मसअले में कोई दूसरा ही राज़ था जो मूअररेखीन पर वाज़ेह नहीं हो सका या उन्होंने इस राज़ को उमर की अज़मत के तहफ़्फ़ुज के लिए छुपा दिया जैसे कि उनकी एक आम आदत है और इसी के तहत लफ़्ज़े हिज़्यान ग़ल्बऐ मर्ज़ से तब्दील कर दिया है।

मुझे बाहरहाल उन असहाब के नाम पर ताअज्जुब होता है जिन्होंने पंचशन्बे के दिन रसूले अकरम को गज़बनाक किया ,और उन्हें हिज़्यान गो करार दिया और फ़िर हसबुना किताबुल्लाह का ऐलान कर दिया जबकि ख़ुद किताबे ख़ुदा का ऐलान था कि “पैग़म्बर कह दीजिए कि अगर तुम अल्लाह के चाहने वाले हो तो मेरा इत्तेबा करो ताकि अल्लाह तुमसे मुहब्बत करे ”— सुरऐ आले इमरान आयत।३१।

तो क्या ये सहाबा किताबे ख़ुदा और उसके अहकाम से उस पैग़म्बर से भी ज़्यादा बाख़बर थे जिस पर ये किताब नाज़िल हुई थी और आज इस हादसे के दो दिन बाद और पैगम्बर कि बारगाह इलाही में हाज़री से दो दिन पहले आपको कुछ ज़्यादा ही गज़बनाक कर रहे हैं और आपके हुक्म कि नाफ़रमानी करते हुऐ उसामा कि सरदारी पर ऐतेराज़ कर रहे हैं।

हादसा इतना संगीन है कि पैगम्बर घर से बाहर जाने पर मजबूर हो गए हैं और मिम्बर पर आ जाने के बाद अपने पहले मुकम्मल खुत्बे के अंदाज़ से हम्दो सनाऐ इलाही की ताकि क़ौम को अंदाज़ा हो जाऐ कि मेरे कलाम में किसी तरह का हिज़्यान नहीं है इसके बाद उनके ऐतेराज़ को बयान किया और चार साल पहले वारिद होने वाले ऐसे ही एक ऐतेराज़ को याद दिलाया ,इसके बाद भी सहाबा का ख़्याल था कि पैग़म्बर हिज़्यान गो हैं या उन पर मर्ज़ का ग़ल्बा हो गया है और उन्हें ख़ुद शऊर नहीं है कि क्या कर रहे हैं।

मेरे ख़ुदाऐ पाक ओ बेनियाज़!इन लोगों ने तेरे रसूल की शान में किस तरह की जसारत की और किस तरह के अहकाम की शिद्दत से मुखालिफ़त की है उसने तीन मर्तबा हुदैबिया में क़ुरबानी का हुक्म दिया तो किसी क़ुबूल न किया और अब्दुल इब्ने अबी के जनाज़े की नमाज़ के लिए खड़ा हुआ तो ये कह कर दामन खींच लिया कि मुनाफ़िक़ कि नमाज़े जनाज़ा ममनुअ है गोया ये लोग ख़ुद पैग़म्बर को अहकामे इलाही सिखा रहे थे जबकि तूने क़ुरआन में ये ऐलान कर दिया था कि ‘ पैग़म्बर हमने आपकी तरफ़ ज़िक्र को इसलिऐ नाज़िल किया है कि आप लोगों से इसके अहकाम बयान करें ’ सुरऐ नहेल। “ पैगंबर हमने आपकी तरफ़ इस किताब को हक़ के साथ नाज़िल किया है कि आप ख़ुदा के बताए हुए क़ानून के मुताबिक़ लोगों के दरमियान फैसला करें ” सूरऐ निसा-आयत १०५। “ जिस तरह हमने तुम्हारी तरफ़ तुम्ही में से एक रसूल भेजा जो तुम्हारे सामने हमारी आयात की तिलावत करता है तुम्हें पाकीज़ा नफ़्स बनाता है और किताबों हिकमत की तालीम देता है और उन तमाम बातों की तालीम देता है जिन्हें तुम नहीं जानते थे ” सूरऐ बक़र-आयत-१५१।

यक़ीनन हैरत अंगेज़ है उस क़ौम का हाल जो अपने को रसूले अकरम से बालातर समझती है कि कभी उनके अहकाम को ठुकरा दिया कभी उन्हें हिज़यान गो क़रार दे दिया और कभी उनके सामने अदबो ऐहतेराम का लिहाज किऐ बग़ैर हंगामा शुरू कर दिया कभी ज़ैद बिन हारिसा की सरदारी पर ऐतेराज़ किया और कभी उनके बेटे उसामा की सरदारी को क़ाबिले तनक़ीद बना दिया।

क्या इसके बाद भी अहले तहक़ीक़ की नज़र में इस अम्र में कोई शक रह जाता है के शिया इस बात में क़तअन हक़ बा जानिब है के वो सहाबा के आमाल के सामने सवालिया निशान खड़ा करते हैं और उनके ऐहतेराम को साहिबे रिसालत और अहलेबैत की मुहब्बत ओ मुवद्दत का नतीजा क़रार देते हैं।

मैंन मुखालिफ़तों की चार पाँच मिसालें बनज़रे इख्तिसार बयान कर दी हैं ताकि उन्हें नमूना क़रार दिया जाऐ वरना उल्माऐ शिया ने ऐसे सैकड़ो मवारिद की निशानदही की है जहाँ सहाबा ने सरीही नुसूस की खुली मुखालिफ़त की है और इस दावे पर उन्हीं बयानात से इस्तेदलाल किया है जिन्हें उल्माऐ अहले सुन्नत ने अपने सहा और मसानिद में नक़्ल किया है।

मैं जिस वक़्त इन मवाफ़िक़ पर नज़र करता हूँ तो हैरत ज़दा और मदहोश होकर रह जाता हूँ न सिर्फ़ इस लिए कि सहाबा के तसर्रुफ़ात क्या थे बल्कि इसलिए भी इन उल्माऐ अहले सुन्नत को हो क्या गया है जो हमारे सामने सहाबा की ये तस्वीर पेश करते हैं कि वो हमेशा हक़-वा-जानिब थे और उन पर किसी तरह की तन्क़ीद नहीं हो सकती है और इस तरह एक जोयाऐ हक़ीक़त को मंज़िल तक पहूँचाने से रोक देते हैं और वो फ़िक्री तनाक़ेज़ात के दरमियान ठोकरे खाता रहता है।

गुज़िशता बयानात के अलावा मैं कुछ मिसालें और नक़्ल करना चाहता हूँ जिनसे सहाबा के किरदार की सही तस्वीर कशी हो सकती है और शियों का मक़िफ़ और भी बाख़ूबी समझा जा सकता है।

बुख़ारी ने अपनी सही की जिल्द चार सफ़्हा ४७ ,बाबुसब्र अलल अज़ा में और आयऐ करीमा “इन्नमा युफिस्साबेरुना अज़्रहुम ” के ज़ैल में आमश का ये बयान नक़्ल किया है कि मैंने शक़ीक़ को ये कहते हुए सुना है के अब्दुल्ला का बयान है रसूल अल्लाह ने एक दिन कुछ माल तक़सीम किया तो अन्सार में से एक शख़्स ने कहा ‘वल्लाह इस तक़सीम की बुनियाद ज़ाते ख़ुदा नहीं है तो मैंने ये कहा कि मैं ये बात पैग़म्बर से बयान करूंगा और मैंने आकर असहाब के सामने उसे बयान भी कर दिया तो पैग़म्बर के चेहरे का रंग बदल गया और ऐसे ग़ज़ब के आसार नमूदार हुए कि मैंने सोचा के काश मैंने ये खबर न दी होती तो आपने फ़रमाया कि मूसा को इससे ज़्यादा तकलीफ़ दी गयी है लेकिन उन्होंने भी सब्र से काम लिया है।

जिस तरह बुख़ारी ने भी इसी किताबुल अदब के बाबे अलतबस्सुम वल ज़हक में अनस बिन मालिक का ये क़ौल नक़्ल किया है कि मैं रसूल अकरम के साथ जा रहा था और आप एक नजरानी रिदा ओढ़े हुऐ थे कि एक अराबी ने आकर पूरी शिद्दत से रिदा को खींचा कि आपका शाना खुल गया और जिस्म पर रिदा के हाशिये के निशान पड़ गए और ये कहा कि मुहम्मद स।अ। जो माले ख़ुदा रखे हुऐ हैं उसमें से मुझे भी दो तो आपने उसकी तरफ़ मुड़ कर देखा और अतिया का हुक्म दे दिया।

जिस तरह ख़ुद बुख़ारी ही ने हज़रत आईशा का ये क़ौल भी नक़्ल किया है कि पैग़म्बर ने एक अमल अंजाम देकर उसकी इजाज़त दी तो लोगों ने उससे परहेज़ करना शुरू कर दिया और आपको इस बात की ख़बर मिली तो ख़ुत्बा इरशाद फ़रमाया और हम्दे इलाही के बाद फ़रमाया कि इन क़ौमों को क्या हो गया है जो उस बातों से परहेज़ करती है जिन्हें मैं अंजाम देता हूँ ,ख़ुदा कि क़सम मैं इन सबसे ज़्यादा मारिफ़ते ख़ुदा भी रखता हूँ और खौफ़े ख़ुदा भी इन रिवायत में जो भी वक़्ते नज़र से काम लेगा वो ये देखेगा के सहाबा अपने को पैग़म्बर से भी बालातर समझते थे और उनका ये ऐतेक़ाद था कि पैग़म्बर ग़लती करता है और वो इसलाह करते हैं फ़िर उसके बाद मुअररेखीन का सिलसिला शुरू होता है जिन्होंने सहाबा के हर अमल की तसहीह और तायीद की चाहे वो अमल पैग़म्बर के खिलाफ़ ही क्यों न हो बल्कि बाज़ सहाबा को तो इल्मो तक़वा में पैग़म्बर से भी बालातर बना कर पेश कर दिया जैसे कि जंगे-बद्र में असीरों के बारे में हुआ कि पैग़म्बर के फैसले को ग़लत क़रार दिया और उमर इब्ने ख़त्ताब के फैसले को सही और पैग़म्बर की तरफ़ जाली रिवायत भी मनसूब कर दी कि अगर हम किसी मुसीबत में मुब्तिला हो जाएँ तो सिवाए इब्ने ख़त्ताब के कोई निजात नहीं दिला सकता गोया उनके ख़्याल में पैग़म्बर ये कह रहे थे कि “लौला उमर लहलका नबी ” माज़अल्लाह।भला इस फ़ासिद अक़ीदे का भी कोई ठिकाना है जिससे बदतर कोई अक़ीदा नहीं और मैं तो अपनी जान की क़सम खा कर कहता हूँ कि जो भी ये अक़ीदा रखता है वो इस्लाम से बौदुल मशरक़ैन और उसे चाहिए कि अपनी अक़ल का इलाज कराए या शैताने रजीम को अपने दिल से निकाल कर बाहर करे।

इर्शादे इलाही है “क्या आपने उसे देखा है जिसने अपनी ख़ाहिश को ख़ुदा बना लिया है और उसे इल्म के बावजूद ख़ुदा ने गुमराही में छोड़ दिया है ,उसके दिल और कान पर मुहर लग गई है और उसकी आँख पर पर्दे पड़ गऐ हैं अल्लाह के बाद उसे कौन हिदायत दे सकता है तो तुम क्यों नसीहत हासिल नहीं करते हो। ‘ जासित आयत २३ ’ ।

मेरी जान कि क़सम जो लोग यर ऐतेक़ाद रखते हैं कि रसूले अकरम ख़्वाहिशात की तरफ़ झुक जाते हैं और राहे हक़ से मुन्हरिफ़ होकर मरज़िये ख़ुदा के खिलाफ़ ख़्वाहिशात के इत्तेबा में अमवाल तक़सीम कर देते हैं या जो लोग उन चीजों से परहेज़ करते हैं जिन्हें रसूले अकरम ने अन्जाम दिया है इस ऐतेक़ाद की बिना पर कि ये रसूलल्लाह से भी ज़्यादा साहिबे इल्मो तक़वा है ये लोग किसी ऐहतेराम के हक़दार नहीं हैं चेजाएके इन्हें मलायका कि मंज़िल में रख दिया जाए और रसूले अकरम के बाद अफ़्ज़ले खलाएक़ क़रार देकर मुसलमानों को इनके इत्तेबा ,इक़्तेदा और पैरवी की दावत दी जाए सिर्फ इसलिए कि ये रसूल अल्लाह के असहाब थे जबकि ये बात ख़ुद अहले सुन्नत के तर्ज़े अमल से भी तज़ाद रखती है जो मुहम्मद ओ आले मुहम्मद पर सलवात पढ़ते वक़्त सहाबा का भी इज़ाफ़ा कर देता है जबकि ख़ुदा को इनकी क़द्रो मंज़िलत मालूम है और उसने इन्हें रसूल ओ आले रसूल पर सलावात पढ़ने का हुक्म दिया है ताकि ये उनकी मंज़िलत से बाख़बर रहें तो हमें क्या हक़ है कि हम उन्हें ऊंचा करके उनके बराबर कर दें जिन्हें ख़ुद ख़ुदा ने आलेमीन से अफ़जल क़रार दिया है।

आप मुझे ये नतीजा निकाल दें कि उमवी और अब्बासी हुक्काम ने अहलेबैत से दुश्मनी करके ,उन्हें वतन से निकाल कर ,मुसीबतों में डाल कर और उनका और उनके चाहने वालों का क़त्ले आम करके जब देखा के अहलेबैत के फज़ाएल और कमालात इम्तियाज़ी हैसियत रखते हैं और अल्लाह उन पर सलवात पढे बग़ैर किसी मुसलमान की नमाज़ भी क़ुबूल नहीं करता है तो ये सोचा कि अपनी अदावत और अपने इन्हिराफ़ का क्या जवाज़ पेश करें और इसके नतीजे में असहाब को अहलेबैत से मुल्हक़ कर दिया ताकि लोगों को ये धोका दे सकें के अहलेबैत और असहाब दोनों एक ही जैसे हैं ,ख़ुसूसन जब हमें ये मालूम है कि उनके बाद बुज़ुर्ग वो बाज़ असहाब हैं जिन्होंने असहाब और ताबेईन के कमज़ोर रावियों को किराये पर ले लिया ताकि तमाम सहाबा और बिल ख़ुसूस मसनदे खिलाफ़त तक आने वाले असहाब की शान में ये रवाएतें बयान करे और सही चीज़ उनके मांसबे हुकूमत तक आने का सबब बनेगी तारीख़ इस बात की बेहतरीन गवाह है कि उमर इब्ने खत्ताब जैसा आदमी जो अपने वालियों से सख़्त मुहासेबा करता था और उन्हें अदना शुबहे पर माज़ूल कर देता था ,वो भी माविया के साथ नर्मी कर बर्ताव करता है और कोई मुहासेबा नहीं करता है।

चुनांचे वो अबूबकरो उमर कि पूरी ज़िन्दगी मन्सबे खिलाफ़त पर फाएज़ रहा और कोई ऐतेराज़ करने वाला पैदा नहीं हुआ ,जबकि शिकायत करने वालो का एक ताँता जो उमर से कहते थे कि माविया सोना और रेशम पहनता है जिसे रसूल अल्लाह ने मर्दों के लिए हराम क़रार दिया है और उमर ये जवाब देता था कि उसे उसके हाल पर छोड़ दो वो अरबो में कसरा की मिसाल है।

माविया इसी तरह पर बीस साल से ज़्यादा हुकूमत पर क़ाबिज़ रहा और किसी ने न कोई तन्क़ीद की और न उसे माज़ूल किया बल्कि जब उस्मान के हाथ में हुकूमत आई तो उन्होंने कुछ और इलाक़े भी शामिल कर दिये जिस की बुनियाद पर माविया इस्लामी सरमाये पर क़ाबिज़ हो गया और उसे मौक़ा मिल गया कि अरब के अवबाशों का लश्कर तैयार करके इमामे उम्मत के खिलाफ़ इन्क़ेलाब बरपा करदे और ताक़त के ज़ोर पर हुकूमत पर कब्ज़ा करके मुसलमानों की गरदनों पर हुकूमत करने लगे और उन्हें अपने जबरो क़हर की बुनियाद पर अपने शराब ख़्वार बेटे यज़ीद की बैअत पर आमादा करे।

ये मसाएब की दूसरी दास्तान है जिसकी तफ़सील का यहाँ मौक़ा नहीं है ,मक़सद सिर्फ ये है कि उन सहाबा की नफ़्सियात का अन्दाज़ा हो जाऐ जिन्होंने तख़्ते खिलाफ़त पर कब्ज़ा करके बराहे रास्त बनी उमय्या की हुकूमत की राह हमवार कर दी उन क़ुरैश की मर्ज़ी के मुताबिक़ जो नाबूवत और खिलाफ़त को बनी हाशिम में नहीं नहीं देख सकते थे। ‘ खिलाफ़त ओ मुलूकियत-मौदूदी ’ यौमुल इस्लाम-अहमद अमीन ’ ।

उमवी हुकूमत को ये हक़ हासिल था बल्कि उसका फ़र्ज़ था कि उन लोगों का शुक्रिया अदा करे जिन्होंने उनकी हुकूमत की राह हमवार की और उनका कम अज़ कम शुक्रिया ये था के ऐसे ज़मीर फ़रोश रावी पैदा करे जो उनके बुज़ुर्गों कि शान में ऐसी रवाएतें तैयार करें जिन्हें क़ाफ़िले अपने मुखतलिफ़ इलाकों में अपने साथ ले जाएँ और उनके मरतबे को जाली फ़ज़ाएल और इम्तियाज़ात की बुनियाद पर अहलेबैत अ।स। से बालातर बनाए जबकि खुदा शाहिद है शरई ,अक़्ली और मन्तिक़ी दलाएल की रोशनी में देखा जाए तो उन फ़ज़ाएल की कोई हैसियत नहीं रह जाऐगी मगर ये कि इन्सान की अक़्ल माउफ रह जाऐ और वो तनाकिज़ात पर ईमान लाने लगे।

ये जाली रिवायतों का ही असर था कि स्सरे इलाक़े में उमर की अदालत शोहरा हो गाय और काफिले वाले कहने लगे कि वो इन्साफ़ कर के सो गऐ ,और बाज़ लोगों ने यहाँ तक कि मशहूर कर दिया कि उमर को क़ब्र में खड़ा दफन किया है ताकि अदलो इन्साफ़ मरने न पाऐ।

ज़ाहिर है जिसका जो जी चाहे इस राह में बयान करे कोई किसी का रोकने वाला नहीं है लेकिन सही तारीख़ का बयान यही है २० हिजरी में जब उमर ने अताया मुअय्य्न किऐ थे तो उन सीरते पैग़म्बर को दरयाफ़्त किया और न उसकी पाबंदी की ,रसूले अकरम ने तमाम मुसलमानों को बिला इम्तियाज़ बराबर के अतिये दिये थे और यही काम अपने दौरे खिलाफ़त में अबूबकर ने भी किया था लेकिन उमर ने तक़सीम का एक नया तरीक़ा ईजाद कर दिया और साबेक़ीन को गैरे साबेक़ीन पर क़ुरैश के महाजिरीन को गैरे क़ुरैश के महाजिरीन पर और आम मुहाजिरीन को तमाम अन्सार पर और तमाम अरब को तमाम अज़म पर और सरीह को मवाली पर मिज़्र को रबीया पर फ़ज़िलत दी और मिज़्र को तीन सौ और रबीया के लिऐ दो सौ और मुअय्य्न किए और फ़िर औस को खसरज पर फ़ाज़िलत दे दी। ‘ तारीख़े याक़ूबी-जिल्द-२ ,स।१०६ ,फ़तहुल बलदान ,सफ़्हा-४३७ ’ ।

अहले अक़्ल इन्साफ़ करें कि क्या इसी तफ़ावत का नाम अदलो इन्साफ़ है फ़िर इसके बाद इन्हीं रावियों से उमर इब्ने खत्ताब के भी इल्म की भी बेशुमार दासताने सुनी जाती हैं यहाँ तक की कि इन्हें आलमे असहाब भी क़रार दे दिया गया है और ये रिवायत भी तैयार की गई है कि उनके परवरदिगार ने अक्सर मक़मात पर उनके और पैग़म्बर के दरमियान इख्तिलाफ़े राय की शक्ल में उनकी ताईद में आयतें नाज़िल की हैं हालांकि सही तारीख यही है कि उन्होंने नुज़ूले क़ुरआन के बाद भी उसका इत्तेबा नहीं किया है और जब अय्यामे खिलाफ़त में सवाल किया कि अगर हालते जनबत में पानी न मिले तो क्या किया जाऐ तो आपने कहा नमाज़ छोड़ दो और अम्मार इब्ने यासिर मजबूर हुऐ कि तयम्मुम का क़ानून याद दिलाएँ लेकिन उमर मुतमइन न हुऐ और कहा कि हम उतना ही बोझ डालते हैं जितना कि आदमी उठा सके (सही बुख़ारी जिल्द-1, पेज न। 52)

सवाल ये पैदा होता है कि तयम्मुम के बारे में हज़रत उमर का इल्म कहाँ चला गया था जबकि इसका हुक्म क़ुरआन मजीद में मौजूद है और पैग़म्बर ने वुज़ू की तरह इसकी भी तालीम दी है और ख़ुद उमर ने भी मुखतलिफ़ मक़ामात पर अपने जाहिल होने का ऐतेराफ़ किया है बल्कि यहाँ तक कह दिया हैं की घर में बैठने वाली औरतें भी उमर से ज़्यादा दीन से बाख़बर हैं और इस जुमले की तकरार की है कि “अगर अली अ।स न होते तो मैं हलाक हो जाता ” ,उन्हें मरते मरते कलाला का हुक्म न मालूम हो सका जिसके बारे में तारीख़ शवाहिद है के मुताबिक़ मुख्तालिफ़ फैसले किए हैं तो आखरी उन मवाक़े पर उनका इल्म कहाँ चला गया था।

इसके बाद उमर कि शुरूआत और बहदुरी कि दासताने भी सुनी जाती हैं यहाँ तक कह दिया गया कि उमर के इस्लाम के बाद क़ुरैश खौफ़ज़दा हो गए और मुसलमानों कि ताक़त में इज़ाफ़ा हो गया बल्कि उमर इब्ने ख़त्ताब से इस्लाम को इज्ज़त मिल गई और और रसूले अकरम को ऐलानिया दावते इस्लाम की उस वक़्त तक हिम्मत नहीं हुई जब तक उमर मुसलमान नहीं हो गऐ लेकिन वाक़ई तारीख़ इनमें से किसी बात का पता नहीं देती है और न तारीख़ में मशहूर या किसी ग़ैर मशहूर ऐसे इंसान का नाम मिलता है जिसे उमर इब्ने खत्ताब ने मुक़ाबले में या बदरो ओहदो ख़न्दक़ जैसे मारको में क़त्ल किया हो ,बल्कि इसके बरअक्स तारीख़ ये ज़रूर बयान करती है कि उन्होंने मारकऐ ओहद में और उसके बाद मारकऐ हुनैन में फ़रार इख्तियार किया है और रसूले अकरम ने खैबर को फतह करने के लिऐ भेजा तो शिकस्त खा कर वापस चले आए हद ये है कि किसी सरये में शरीक भी हुऐ तो ताबे की हैसियत से शरीक हुऐ सरदार की हैसियत से नहीं और आख़री सरये में तो उन्हें उसामा इब्ने ज़ैद जैसे नौजवान का महकूम बना दिया गया तो इसके बाद इन दास्तानों की क्या क़ीमत रह जाती है।

जुरअत और शुजाअत ही की तरह उमर के तक़वा ,खौफ़े ख़ुदा और खशय्य्ते इलाही में गिरये की दस्तानें भी सुनी जाती हैं यहाँ तक की इन्हें इस बात का खौफ़ था की ईराक़ में किसी खच्चर का पाँव फ़िसल गया तो उन्हें रोज़े महशर हिसाब देना पड़ेगा के उन्होंने रास्ता हमवार क्यों न किया।

लेकिन सही तारीख़ का बयान ये है कि वो इन्तेहाई तुन्दखू और सख़्त मिजाज़ के आदमी थे और उन्हें किसी बात का खौफ़ नहीं था यहाँ तक कि अगर कोई आयते क़ुरआन के बारे में भी पुछ लेता था तो उसे इतना मारते थे कि लहूलुहान होजाता था बल्कि उनकी हैबत और तुशर्रुई को देख औरतों के हम्ल साक़ित हो जाते थे।

सवाल ये है कि उनमें खौफ़े ख़ुदा उस वक़्त क्यों न पैदा हुआ जब तलवार लिए हर उस आदमी को धम्की दे रहे थे जो पैग़म्बर के इन्तेक़ाल का क़ायल हो और क़सम खाकर बयान कर रहे थे कि उनका इन्तेक़ाल नहीं हुआ है बल्कि वो हज़रते मूसा की तरह परवरदिगार से मुनाजात करने गऐ हैं और अगर कोई उनकी मौत का नाम भी लेगा तो उसका गला काट दिया जाएगा। ‘ तारीख़े तबरी ,तारीख़े इब्ने असीर ’ ।

ये खौफ़े ख़ुदा उस वक़्त क्यों न पैदा हुआ जब बीनते रसूल के दरवाज़े पर ये ऐलान कर रहे थे कि अगर लोग बैयत के लिए बाहर न आए तो घर में आग लगा दी जाऐगी ‘अल-इमामत-वास-सियासत ’ और जब ये कहा गया कि इस घर में दुख़्तरे पैग़म्बर भी है तो साफ़ कह दिया कि कोई भी हो।

और इसके बाद किताबे ख़ुदा और सुन्नते रसूल के खिलाफ़ जुरअत का मुज़ाहिरा करते हुऐ ज़मानऐ खिलाफ़त में बेशुमार ऐसे फ़ैसले कर दिए जो कुरान और सुन्नत के खिलाफ़ थे। ‘अलनस – वल-इज्तेहाद ’ ।

तो इन मक़ामत पर वो तक़वा और खौफ़े ख़ुदा कहाँ चला गया था और मैंने इस एक मशहूर सहाबी को बतौर मिसाल पेश किया ताकि बयान में तूल न होने पाऐ वरना अगर तमाम सहाबा के किरदार कि तफसील पेश कि जाए तो मुतादिद किताबें तैयार हो सकती हैं लेकिन मैंने पहले ही कहा था कि ये सारे तज़किरे बतौरे मिसाल हैं और बतौरे हस्र नहीं है और मेरे इस मुख़तसर बयान से सहाबा के नफ़्सियात और उल्माऐ अहले सुन्नत मुताज़ाद मौक़िफ़ कि मुकम्मल वज़ाहत हो सकती है कि वो एक तरफ तो लोगों को तशकीक और तन्क़ीद से रोकते हैं और दूसरी तरफ़ ख़ुद ही ऐसे वाक़ेयात बयान करते है जिनसे तन्क़ीद और ऐतेराज़ का मौक़ा मिलता है।

काश उल्माऐ अहले सुन्नत ने इन वाक़यात का तज़किरा न किया होता जिनसे सहाबा की अजमत मजरूह होती है और उनकी अदालत मख्दूश होतो है तो भी इस परेशानी से खुद-ब-खुद निजात मिल जाती है।

मुझे याद आता है के जब मैंने नजफ़े अशरफ़ में वहाँ के एक आलिम और किताब “अल-इमाम सादिक़ वल-मज़ाहिबुल-अरबा ” के मुअल्लिफ़ जनाब असद हैदर से मुलाक़ात की और तश्य्यो और तसन्नुन के मौज़ू पर गुफ़्तुगू की तो उन्होंने अपने वालिद का ये क़िस्सा बयान किया कि पचास साल पहले उनकी मुलाक़ात हज के दौरान तयूनस के आलिम से हुई थी और अमीरुल मोमीनीन हज़रत अली अलैहिस्सलाम की इमामत पर गुफ़्तुगू हो रही थी तो तयूनस के आलिम बग़ौर मेरे वालिद के बयान किऐ हुऐ दलाएले इमामत ओ खिलाफ़त को सुन रहे थे और जब वो चार पाँच दलाएल बयान कर चुके तो तयूनसी आलिम ने कहा के अब तसबीह निकाल कर शुमार करो हज़रत अली की इमामत पर वो सौ दलीलें बयान की जो मेरे वालिद को भी नहीं मालूम थी और ये वाक़ेया सुन कर फरमाया के अगर अहले सुन्नत ख़ुद अपनी किताबों का मुतालेआ करते तो वो भी वही कहते जो हम कह रहे हैं और अब तक सारे इख्तिलाफ़ खत्म हो चुके होते। और मेरी जान की क़सम ये वो सच्ची बात है जिससे कोई फ़रार नहीं कर सकता अगर इन्सान अन्धे तास्सुब और ग़ुरूर से आज़ाद हो जाऐ और वाज़ेह दलाएल का इत्तेबा करने लगे।

सहाबा के बारे में क़ुरआनी फ़ैसला

आगाज़े बहस से पहले ये तज़किरा करना ज़रूरी है कि परवरदिगारे आलम ने अपनी किताबे अज़ीज़ के मुखतलिफ़ मक़ामत पर उन आसहाबे रसूल की तारीफ़ की है जिन्होंने आपसे मुहब्बत की है ,आपका इत्तेबा किया है और बगैर किसी तमऐ दुनिया के आपकी इताअत की है ,उनके पास न कोई ग़ुरूर था न मुक़ाबिला और इस्तकबार ,बल्कि सारे काम मरज़िऐ ख़ुदा और रसूल के लिऐ अंजाम दे रहे थे ख़ुदा उनसे खुश था औ र वो ख़ुदा से खुश थे इसलिए की उनके दिल में खौफ़े ख़ुदा था और यही सहाबा की वो क़िस्म है जिनकी क़द्रो मंज़िलत को उनके मवाक़िफ़ और आमाल से पहचाना गया है ,मुसलमानों ने उनसे मुहब्बत की है ,इनका ऐहतेराम किया है उनकी ताज़ीम की है और हमेशा इनका ज़िक्र से रिज़ाए इलाही के साथ किया है।

ज़ाहिर है की मेरी बहस का ताअल्लुक़ इन सहाबाऐ किराम से नहीं है ,ये शिया और सुन्नी दोनों फ़िरक़ों में क़ाबिले इज्ज़त ओ ऐहतेराम हैं।

जिस तरह के मेरी बहस का मौज़ू वो मुनाफ़िक़ीन भी नहीं है जिन पर फ़रीक़ैन लानत करने को जाएज़ समझते हैं।

मेरी बहस का ताअल्लुक़ उस क़िस्म से है जिसके बारे में मुसलमानों में इख्तिलाफ़ है और जिसकी सरज़निश के लिऐ क़ुरआन की आयतें नाज़िल हुई हैं और जिसको रसूले अकरम ने मुखतलिफ़ मौक़ों पर तंबीह की है या उनसे मोहतात रहने का इशारा दिया है और हक़ीक़तन शिया और सुन्नी का इख्तिलाफ़ इसी क़िस्म के बारे में है कि शिया उनके आमाल और अक़्वाल पर तन्क़ीद करते हैं और इनकी अदालत में शक करते हैं और अहले सुन्नत इनकी तमाम ग़लतियों के साबित हो जाने के बावजूद उन्हें क़ाबिले ऐहतेराम समझते हैं।

मेरी बहस का ताअल्लुक़ सहाबा की इसी क़िस्म से है जिसके बारे में बहस के ज़रिये से तमाम या बाज़ हाक़ाएक़ को मालूम करना चाहता हूँ और ये बात इसलिए कह रहा हूँ कि किसी को ये ख़्याल न पैदा हो कि मैंने मदहे सहाबा की तमाम आयात को नज़र अंदाज़ कर दिया है और क़दहे सहाबा की तमाम आयात को नुमायाँ करना चाहता है।

हक़ीक़ते अम्र ये है कि जिन बाज़ आयात में बज़ाहिर मदह की गई है हक़ीक़तन उनमें क़दह और मज़म्मत का पहलू भी पाया जाता है और बाज़ इसके बिलकुल बर-अक्स है।

इस वक़्त मैं अपने नफ़्स को ज़्यादा ज़हमत में नहीं डालूँगा जिस तरह से मैंने गुज़िशता तीन बरसों में तहक़ीक़ के दौरान ज़हमत की है बल्कि सिर्फ़ चन्द आयात को मिसालन ज़िक्र करके अपने मुद्दुआ की वज़ाहत करूंगा इसके बाद जो लोग तफ़सिलात के ख़्वाहिश मन्द होंगे उनका फर्ज़ है के ख़ुद ज़हमत करें और तहक़ीक़ और तफ़तीश का काम अंजाम दें ताकि हिदायत अपनी पेशानी के पसीने और अपनी फ़िक्र निचोड़ का नतीजा हो और ख़ुदाई फर्ज़ भी अदा हो जाऐ और वजदान का तकाज़ा भी पूरा हो जाऐ कि वो एसी क़नाअत का तलबगार होता है जिसे शुबहात कि तेज़ ओ तुन्द आंधियाँ मुताजल्ज़िल न कर सकें और खुली हुई बात है कि ज़ाती इत्मीनान खारजी असरात से हासिल होने वाले इत्मीनान से कहीं ज़्यादा मुफीद है और कार आमद होता है। ख़ुद रब्बुलआलेमीन ने भी अपने रसूल की मदह इस तरह की है “हमने आपको गुमगशता पाकर हिदायत दी है ”— और दूसरे मक़ाम पर इरशाद फ़रमाता है कि “जिन लोगों ने हमारे बारे में जिहाद किया है हम उन्हें अपने रास्तो की हिदायत करेंगे ” ।

आयते इन्क़ेलाब: इर्शादे रब्बुल आलेमीन है “मुहम्मद सिर्फ़ अल्लाह के रसूल हैं ,उनसे पहले बहुत से रसूल गुज़र चुके हैं क्या वो मर जाएँ या क़त्ल कर दिएँ जाएँ तो तुम सब अपने पुराने दीन की तरफ पलट जाओगे ,तो जो भी ऐसा करेगा वो खुदा को कोई नुकसान नहीं पहुँचा सकता और अल्लाह अन्क़रीब शुक्र गुज़ार बंदों को जज़ा अता करेगा। सूरऐ आले इमरान-आयत-१४४।

इस आयते करीम में सराहत और वज़ाहत के साथ ऐलान किया गया है के बाज़ सहाबा अन्क़रीब पुरानेडीन की तरफ पलट जाएंगे और सिर्फ़ चन्द अफ़राद राहे हक़ पर साबित क़दम रहेंगे जिनको शाकिरीन के लफ्ज़ से ताबीर किया गया है और शाकिरीन का गिरोह क़ुरआन से बहरहाल अक़लियत में है ” सूरऐ सबा ,आयत-१३।

अहादीसे पैग़म्बर में भी इस इन्क़ेलाब का इशारा दिया गया है ये और बात है कि आयते करीमा में पलट जाने वालों के अज़ाब का ज़िक्र नहीं किया गया है और सिर्फ़ शुक्रगुज़ारों के सवाब और उनकी जज़ा पर इक्तेफ़ा की गई हैएकिन इतना तो बहरहाल वाज़ेह है कि पलट जाने वाले किसी सवाब के हक़दार नहीं है। जैसा कि रसूले अकरम ने भी मुख़्तलिफ़ अहादीस में इरशाद फ़रमाया है और बयाने रावयात के दौरान उनकी वज़ाहत भी की जाऐगी।

इन आयाते करीमा की तफ़सीर मुसीलमाए क़ज़्ज़ाब ,सज्जाह और तलीहा जैसे लोगों के हालत से भी नहीं की जा सकती है इस लिए कि ये लोग हयाते पैग़म्बर ही में मुरतद हो गऐ थे और इन्होंने नबूवत का दावा भी कर दिया था और इनसे रसूल अल्लाह ने जिहाद करके इन पर फ़तेह भी हासिल कर ली थी जिस तरह कि इसकी तफ़सीर मानिऐन ज़कात के किरदार से भी नहीं हो सकती जिन्हें अबूबकर ने ज़कात न देने की बिना पर मुरतद क़रार दे दिया था अगरचे उनके ज़कात न देने के असबाब में ये अम्र भी शामिल था कि उन्होंने तहक़ीक़ात की ख़ातिर ज़कात रोक ली थी कि अबूबकर वाक़ई ख़लीफ़तुल मुस्लेमीन हैं कि नहीं ? इसलिए की वो लोग हुज्जतुल विदा में शरीक थे जहां रसूले अकरम ने ग़दीरे ख़ुम में हज़रत अली अ।स। की मौलाइयत का ऐलान किया था और इन लोगों ने बैयत भी की थी बल्कि खुद अबूबक्र ने भी बैयत की थी तो अब उन्हें हैरत थी कि अचानक अबूबक्र खलीफ़ा क्यों हो गऐ ? और उन्होंने ज़कात का मुतालिबा क्यों किया है ? जिस मसअले में मुअर्रेखीन गौर ओ खौज़ नहीं करना चाहते हैं कि इस तरह से अज़मते सहाबा के मजरूह होने का अनदेशहा है।

फ़िर मालिक इब्ने नवीरा और उनके साथी मुसलमान थे जिनकी गवाही खुद अबूबकर और उनके असहाब ने दी थी जिन्होंने ख़ालिद के इस क़त्ल पर ऐतेराज़ किया था और अबूबकर ने ख़ालिद के भाई को बैतुल माल से देत भी अदा की थी और माज़िरत भी तलब की थी जबकि वाक़ई मुरतद का क़त्ल वाजिब है और उसकी देत का कोई सवाल नहीं पैदा होता है और न उसकी माज़िरत की जाती है।

हक़ीक़त ये है कि आयते इन्क़ेलाब से मुराद वो सहाबा हैं जिन्होंने रसूले अक्रम की ज़िन्दगी में उनके साथ मदीने में ज़िंदगी गुज़ारी है और उनकी वफ़ात के बाद बिल फ़ासला मुन्हरिफ़ हो गए हैं जिनकी वज़ाहत अहादीसे पैग़म्बर में मुकम्मल तरीक़े से पाई जाती है जिनमें शक और शुबहे की गुंजाइश नहीं है और तारीख़ इसकी बेहतरीन गवाह है और सहाबा की सफ़ों में पेश आने वाले वाक़ेयात का मुतालिआ करने वाला बखूबी जानता है कि इस इन्हेराफ़ से अक़लियत के अलावा कोई महफ़ूज़ नहीं रह सकता।

२:आयते जिहाद:इर्शादे हज़रत अहदियत है “ ईमान वालों तुम्हें क्या हो गया है कि जब राहे ख़ुदा में जिहाद के लिए निकालने को कहा जाता है तो ज़मीन से चिपक जाते हो ,क्या तुम आख़ेरत के बजाए ज़िन्दगानिए दुनिया से खुश हो गए तो याद रखो कि आख़ेरत में मताऐ दुनिया बहुत कम है अगर तुम घर से निकलोगे तो अल्लाह तुम पर दर्दनाक अज़ाब करेगा और तुम्हारे बदले दूसरी क़ौम को ले आएगा और तुम उसे कुछ नुकसान नहीं पहुंचा सकते हो कि अल्लाह हर शै पर क़ादिर है। सूरऐ तौबा-३८-३९।

आयते करीमा इस मतलब में सरीह है कि सहाबा ने जिहादे राहे ख़ुदा में सुस्ती से काम लिया है और ज़िन्दगानिए दुनिया की तरफ़ मैलान का इज़हार किया है जबकि उन्हें मालूम था कि सरमायऐ दुनिया बहुत क़लील यहाँ तक कि रब्बुलआलेमीन ने उनकी तंबीह की है और उन्हें दर्दनाक अज़ाब से डराया और ये बताया कि वो उनके बदले सच्चे मोमिनीन ले आने पर भी क़ादिर है और इस अम्र की मुख्तलिफ़ मक़ामत पर तकरार भी की कि “अगर उन्होंने रुगरदानी की तो ख़ुदा उनके बदले दूसरी क़ौम को ले आऐगा जो उनके जैसी नहीं होगी ” सूरऐ मुहम्मद , आयत-३८।

दूसरे मक़ाम पर इरशाद हुआ कि “ईमान वालों जो तुम में से मूरतद हो जाएँ उसे मालूम हो जाना चाहिए कि अन्क़रीब खुदा एक ऐसी क़ौम को ले आऐगा जिन्हें वो दोस्त रखेगा और वो ख़ुदा की चाहने वाली होगी ये लोग कुफ़्फ़ार के मुकाबिले में सख्त और मोमिनीन के मुक़ाबले में नर्म होंगे राहे खुदा में जिहाद करेंगे और किसी मलामत करने वाले की परवाह न करेंगे वो फ़ज़ले ख़ुदा है जिसे वो जिसको चाहता है अता कर देता है और वो बड़ी वुसअत वाला और साहिबे इल्म है ” सूरऐ माएदा आयत-५४।

अगर हम चाहें कि उन तमाम आयात का ज़िक्र करें जिनमें इस अम्र की ताक़ीद पाई जाती है और जो वज़ाहत के साथ इस तक़सीमे सहाबा की ताईद करती है जिसके शिया हज़रात क़ायल है तो एक मुकम्मल किताब तैयार हो सकती है और क़ुरआने मजीद ने मुख़तसर अलफ़ाज़ में इस हक़ीक़त की यूं निशान दही कर दी है कि “तुम में से एक क़ौम को होना चाहिए जो खैर की दावत दे ,नेकियों का अम्र करे और बुराइयों से नही करे और यही लोग कामयाब होंगे और ख़बरदार उन अफराद जैसा न हो जाना जिन्होंने तफ़रीक़ा पैदा किया और वाज़ेह निशानियों के आ जाने के बाद भी इख्तिलाफ़ किया कि उनके लिए एक अज़ाबे अज़ीम है और जिस दिन कुछ चेहरे रोशन होंगे और कुछ स्याहफ़ाम ,जो चेहरे स्याह होंगे वो उनसे कहा जाऐगा कि तुमने ईमान के बाद कुफ़्र इख्तियार किया है लिहाजा अपने कुफ़्र का अज़ाब बर्दाश्त करो और जिनके चेहरे सफ़ेद और रोशन होंगे वो अल्लाह कि रहमत में रहेंगे और हमेशा-हमेशा रहेंगे ” सूरऐ आले इमरान ,आयत-१० ,१०५ ,१०६।

इन आयात के बारे में हर साइबे नज़र जानता है कि इंका मुखातब सहाबा हैं और उन्हीं को तहदीद की गई है और तफ़रिक़ा और इख्तिलाफ़ से अलग रहने की ताक़ीद की गई है और अज़ाबे अज़ीम की ख़बर सुनाई गई है और फ़िर उन्हें दो हिस्सों में तक़सीम कर दिया गया है एक हिस्सा वो जिसके चेहरे रौशन होंगे और एक वो हिस्सा जिसके चेहरे स्याह होंगे ,पहली क़िस्म के लोग वो शुक्रगुज़ार बन्दे है जो रहमते इलाही के हकदार हैं और दूसरी क़िस्म में वो अफ़राद हैं जिन्होंने ईमान के बाद कुफ़्र इख्तियार किया है और उन्हें अज़ाबे अजीब की ख़बर सुनाई गई है।

वाज़ेह सी बात है कि सहाबाऐ किराम ने रसूल अकरम तफ़रिक़ा अन्दाज़ीकि आपस में इख्तिलाफ़ किया ,फ़ितने कि आग भड़काई यहाँ तक के नौबत जंगों जिदाल और ख़ूनी मारकों तक पहुँच गई जिसके नतीजे नें मुसलमान पसमान्दा हो गऐ और दुश्मनों ने उनके हालत देख कर तमा पैदा की और उन्हें अपने मक़ासिद का आला-ऐ-कार बना लिया --- और इस मसअले में किसी तरह की तावील और तौज़ीह की गुंजाईश नहीं है और इसके वाज़ेह मफ़हूम से अलग भी नहीं किया जा सकता है।

३:आयते ख़ुशूव:इर्शादे इलाही होता है “क्या साहिबाने इस्लाम के लिए इस अम्र का वक़्त नहीं आया है के उनके दिल यादे ख़ुदा और नाज़िल होने वाले हक़ के सामने झुक जाएँ और उन लोगों जैसे न हो जाएँ जिन्हें इससे पहले किताब दी गई तो उनके दिल सख़्त हो गऐ और उनमें से बहुत से फ़ासिक़ भी हैं सूरऐ हदीद आयत १९।

जलालुद्दीन सेवती दुरे मन्सूर में लिखते हैं के असहाबे रसूल मदीने आऐ और मक्के की ज़हमतों के बाद उन्हें मदीने की राहत नसीब हुई तो बहुत से मुआमलात पर सुस्ती बरतना शुरू कर दी जिस पर ये आयत नाज़िल हुई। और दूसरी रिवायत में है कि नुज़ूले क़ुरआन के बाद सतरह बरस के बाद भी रसूले अकरम ने मुहाजिरीन के दिलों में कमज़ोरी महसूस की तो आयत नाज़िल हुई “अलअम यानल-लज़ीना आमेनू! ”।

ज़ाहिर है कि जब उस सहाबाऐ किराम जो अहले सुन्नत के नज़दीक कायनात में सबसे बेहतर है उनके दिल १७ साल तक अहकामे ईलाही के सामने न झुक सके और इन्हें इताब और तहदीद करना पड़ी कि इनके दिल सख़्त हो गऐ हैं और फ़िस्क़ में मुब्तिला हो गए हैं तो उनसे बाद में आने वालों को क्या कहा जाऐगा जो फ़तेह मक्का के बाद मुसलमान हुऐ हैं।

इन मिसालों से साफ वाज़ेह हो जाता है कि अहले सुन्नत का ये मसलक बिलकुल बेबुनियाद है कि सहाबा सब के सब आदिल थे और उनमें किसी तरह का कोई इन्हेराफ़ नहीं था बल्कि अगर रिववायत का मुतालेआ किया जाए तो इससे कई गुना ज़्यादा मिसालें मिल सकती हैं जिन्हें इख्तिसार के लिहाज़ से तर्क कर दिया गया है और तहक़ीक़ करने वालों कि ज़िम्मेदारी है कि उन्हें तलाश करें और उनकी रौशनी में फ़ैसला करें।

सहाबा के बारे में रसूले अकरम का नज़रिया

हदीसे हौज़:रसूले अकरम का इरशादे गिरामी है कि “मैं मैदाने महशर में एक गिरोह को देखूँगा जिन्हें पहचान लूँगा तो एक शख़्स दरमियान से उठ कर मुझे बुलाऐगा और फ़िर उन्हें जहन्नुम की तरफ़ ले जाऐगा तो मैं पूछूंगा कि आखिर इन्हें क्या हो गया है ? तो जवाब मिलेगा कि ये आपके बाद उल्टे पाँव पलट गए थे और फ़िर चन्द एक अलावा किसी को निजात न मिलेगी ” -सही बुख़ारी जिल्द ४ ,सफ़्हा ९४-९९ ,१५६।जिल्द ३ ,सफ़्हा३२ ,सही मुस्लिम ७ ,सफ़्हा ६६ ,हदीसे हौज़।

दूसरे मक़ाम पर इरशाद होता है कि हौज़े कौसर पर तुमसे पहले पहुचूँगा मेरे पास हाज़िर होगा सेराब होगा और जो सेराब होगा वो प्यासा न होगा लेकिन मेरे पास कुछ क़ौमे वारिद होंगी जिनको मैं पहचानता हूँगा और वो मुझको पहचानते होंगे फ़िर दोनों के दरमियान हिजाब हायल कर दिया जाऐगा तो मैं आवाज़ दूँगा ये मेरे असहाब हैं तो जवाब मिलेगा आपको क्या मालूम कि इन्होंने आपके बाद क्या कारनामे अंजाम दिए हैं तो मैं कहूँगा ख़ुदा बुरा करे उन लोगों का जिन्होंने मेरे बाद दीन को बदल डाला है।

उल्माऐ अहले सुन्नत की सहा और मसानिद में नक़्ल होने वाली इन अहादीस में नज़र करने वाले इस अम्र का यकीन किऐ बगैर नहीं रह सकता के सहाबा ने दीन में तबदीली पैदा की है बल्कि मुरतद भी हो गऐ हैं उन अफ़राद के अलावा जिन्हें “हुमुल-नअम ” से ताबीर किया है और इन रवायत को मुनाफ़िक़ीन पर महमूल नहीं किया जा सकता है इसलिए की रसूले अकरम ने असहाब कह कर याद किया है और महशर में मुनाफ़िक़ीन के बारे में इस ताबीर का कोई इमकान नहीं है।

ये रिवायत एक ऐतेबार से साबिक़ आयात के मज़ामीन की तफ़सील और तशरीह है ,जिनमें सहाबा के इन्क़ेलाब ,इरतेदाद और अज़ाबे अलीम के बारे में ख़बर दी गई है।

हदीसे तनाफ़ुस-अल्द-दुनिया: रसूले अकरम का इरशादे गिरामी है कि “ मैं तुम से साबिक़ हूँ और तुम पर गवाह हूँ यक़ीनन मैं हौज़े कौसर की तरफ़ देख रहा हूँ और मुझे ज़मीन के सारे ख़ज़ानों की चाबियाँ दे दी गई हैं और ख़ुदा की क़सम मुझे तुम्हारे मुशरिक हो जाने का ख़तरा नहीं है लेकिन हुसूले दुनिया के बारे में हिरस ओ हवस का ख़तरा है ” सही बुख़ारी जिल्द ४ ,सफ़्हा१०० ,१०१।

हुज़ूर ने बिलकुल सच फ़रमाया था कि सहाबा ने हिरसे दुनिया पैदा की इस राह में इस क़दर इख्तिलाफ़ किया कि तलवारे निकल आई जंग क़ायम हो गई और एक ने दूसरे को काफ़िर बनाना शुरू कर दिया और बाज़ असहाब तो बाक़ाएदा सोने चांदी के ख़ज़ाने रखते थे जैसे कि मसऊदी ने मुरव्वज-उज़-ज़हब में और तबरी वग़ैरा ने अपनी किताबों में नक़्ल किया है कि सिर्फ़ एक ज़ुबैर जिसकी दौलत का सरमाया पचास हज़ार दीनार नक़्द ,हज़ार घोड़े ,हज़ार गुलाम और बसरा ओ कूफ़ा में बेपनाह जाएदाद और मिस्र वग़ैरा में बेहिसाब इमलाक पर मुश्तमिल था।

तलहा का ग़ल्ला ईराक़ में यौमिया हज़ार दीनार के बराबर था या उससे भी कुछ ज़्यादा ,अब्दुर्रहमान बिन औफ़ के पास सौ घोड़े ,हज़ार ऊँट और दस हज़ार बकरियाँ थी और तरके का १/८ जो अजवाज़ पर तक़सीम हुआ उसकी मिक़दार ८४ हज़ार दीनार थी।

उसमान बिन उफ़्फ़ान ने वक़्ते मर्ग जानवर और ज़मीन ओ जाएदाद के अलावा १-१/२ लाख दीनार भी छोड़े थे।

ज़ैद बिन साबित ने सोने चाँदी के इतने ज़ख़ीरे छोड़े थे कि जिन्हें कुल्हाड़ी से काटा जाता था और दीगर इमलाक के अलावा एक लाख दीनार नक़्द भी छोड़े थे। ‘ मुरव्वज-उज-ज़हब ,मसऊदी जिल्द २ ,सफ़्हा ३४१।

ये सिर्फ़ चन्द मिसालें हैं वरना तारीख़ में ये दास्तान बहुत तवील है जिसमें दाख़िल होने का इरादा नहीं है और सिर्फ़ इस मिक़दार पर इक्तेफ़ा करना काफ़ी है जिससे अपनी बात कि सिदाक़त वाजिब हो जाती है और ये मालूम हो जाता है दुनिया उनकी निगाह में आरस्ता हो गई थी और वो इस ज़ीनत ओ ज़ेबाइश पर मर मिटने को तैयार थे।

सहाबा के बारे में सहाबा का फ़ैसला

१: ख़ुद अपने बारे में तब्दीलये सुन्नत का ऐतेराफ़:अबू सईदे ख़दरी का बयान है कि रसूले अकरम ईदुल-फ़ितर या ईदुल-ज़ुहा कि नमाज़ के लिए तशरीफ ले जाते थे पहले नमाज़ अदा करते थे और फिर उसके बाद मजमे की तरफ़ रुख़ करके मोऐज़ा और नसीहत फ़रमाते थे और लोग सफ़ बस्ता बैठे रहते थे और ये सिलसिला यूँ ही बरक़रार रहा यहाँ तक कि मैं अमीरे मदीना मरवान के साथ नमाज़ के लिए निकला तो उसने महल्ले नमाज़ पर पहुँच कर कसीर बिन सलत के बनाए हुऐ मिम्बर पर नमाज़ से पहले जाने का इरादा किया तो मैंने ने उसे खींच लिया लेकिन वो दामन छुड़ाकर मिम्बर पर चढ़ गया और उसने नमाज़ से पहले ख़ुत्बा दिया तो मैंने कहा कि तुम लोगों ने सुन्नत को बादल दिया है तो उसने कहा क अबू सईद! तुम्हारे मुआमेलात का दौर गुज़र चुका है! मैंने कहा मेरे मुआमेलात इस जदीद बिदअत से बेहतर है ,उसने कहा कि लोग नमाज़ के बाद नहीं टहरते थे लिहाज़ा मैंने ख़ुत्बे को मुक़द्दम कर दिया है। “ सही बुख़ारी-१ सफ़हा १२२ किताबुल ईदैन ”

मैंने इस रवायत को देखने के बाद बहुत तलाश किया कि आख़िर इस तब्दील्ये सुन्नत का मुहरीक क्या था तो अंदाज़ा हुआ कि बनी उमैय्या जिनकी एक बड़ी तादाद सहाबा की थी और जिनका रास ओ रईस बख़्याले मुस्लिमीन कातिबे वही माविया था।ये लोग मुसलमानों को हज़रत अली अलैहिस्सलाम पर लानत करने और उन्हें बुरा भला कहने पर मजबूर करते थे जैसा कि सही मुस्लिम ने बाबे फज़ाएले अली में नक़्ल किया है और माविया ने तमाम अम्माल को इस लानत को सुन्नत बनाने का हुक्म दे दिया था और जिन सहाबा ने ऐतेराज़ किया या इस हुक्म कि मुखालिफ़त की उन्हें क़त्ल कर दिया जैसा की हुज्र बिन अदी के बारे में हुआ या ज़िन्दा ही दफ़्न कर दिया जैसा की बाज़ दीगर अफ़राद के बारे में हुआ जिसका इक़रार मौलाना अबुल-अला मौदूदी ने ‘खिलाफत ओ मुलूकियत ” में अबुल हसन बसरी के बयान के हावाले से इस तरह किया है कि माविया में चार बातें एसी पाई जाती थी जिनमें से एक भी इन्सान की हलाकत के लिऐ काफ़ी थी।

१-सहाबाऐ किराम के होते हुऐ बग़ैर किसी के मशवरे के हुकूमत पर कब्ज़ा कर लेना।

२- अपने बाद अपने शराबी और रेशम पहनने वाले ,गाने बजाने वाले फ़रज़न्द को जानशीन बना देना।

३- ज़्याद को अपने नसब में शामिल कर लेना जबकि रसूले अकरम का इरशाद था कि “बच्चा साहिबे फ़राश का होता है और ज़ानी का हिस्सा सिर्फ़ पत्थर होता है ” ।

४- हुज्र बिन अदी और उनके असहाब का क़त्ल करा देना।

ऐसे हालात में अक्सर मोमिनीन नमाज़ के फ़ौरन बाद मस्जिद से बाहर निकाल जाते थे और ख़ुत्बे में शिरकत नहीं करते थे जिसका इख़्तेताम सब्बे अली और लानत पर होता था इस लिऐ बनी उमैय्या ने सुन्नते रसूल को तब्दील कर दिया और ख़ुत्बे को नमाज़ पर मुक़द्दम कर दिया ताकि तमाम अफ़राद शरीक हों गोया उनकी नाक रगड़ दी जाऐ।

ख़ुदा उन सहाबा को ग़ारत करे जिन्होंने सुन्नते रसूल में तबदीली से भी गुरेज़ नहीं किया और अपने पस्त मक़ासिद को हासिल करने के लिए अहकामे इलाही को भी बादल डाला और उस शख़्स को मुरीदे लानत क़रार दे दिया जिस से ख़ुदा ने हर रिज्स को दूर रखा है और उसे मुकम्मल तौर पर पाको पाकीज़ा बनाया है उस पर सलवात को ज़रूरी करार दिया है और उसकी मुहब्बत ओ मुवद्दत को अजरे रिसालत बना दिया है यहाँ तक के रसूले अकरम ने ख़ुद फ़रमाया था कि अली की मुहब्बत ईमान है और उनका बुग़्ज़ निफ़ाक़ है। ‘सही मुस्लिम ’ सफ़्हा-६१।

लेकिन इन सहाबा ने सब कुछ बदल डाला और सलवात ओ मुवद्दत की बजाए सब्बो शितम और लान ओ तान को जायज़ बना लिया और इस सिलसिले को बक़ौले मुअर्रेखीन साठ साल तक जारी रखा।

अगर कल असहाबे मूसा ने हारून के खिलाफ़ साज़िश की थी और उन्हें क़त्ल करने का मन्सूबा बना लिया था तो आज असहाबे मुहम्मद ने भी उनके हारून को क़त्ल करा दिया और उनकी औलाद और उनके पैरवों को हर गोशे में तलाश करके उन्हें तबाह ओ बरबाद कर दिया और उनका नाम दीवान से महो कर दिया और इस अम्र पर पाबंदी आयद के कोई उनके नाम पर नाम न रखे और ख़ुद लानत करने के साथ दूसरे सहाबाऐ मुख्लेसीन को भी मजबूर किया कि वो हज़रत अली अलैहिस्सलाम पर लानत करें।

मैं जिस वक़्त अपनी सहाह और मसानीद में हज़रत अली से मुहब्बत और उन्हें तमाम सहाबा पर मुक़द्दम करने कि रविश देखता हूँ और इस इरशादे गिरामी को देखता हूँ कि आपने फ़रमाया है कि “या अली तुम्हारी मंज़िलत मेरे लिऐ वही है जो मूसा के लिए हारून की थी फ़क़त ये कि मेरे बाद कोई नबी न होगा ”—“ तुम मुझसे हो और मैं तुम से हूँ ”—“ अली कि मुहब्बत ईमान है और इनकी अदावत निफ़ाक़ है ”—“ मैं शहरे इल्म हूँ और अली उसका दरवाज़ा है ”—“ अली मेरे बाद हर मोमिन के वली हैं ”—“ जिसका मैं मौला हूँ उसके ये अली मौला हैं ”—“ ख़ुदाया उसको दोस्त रखना जो अली को दोस्त रखे और उससे दुश्मनी रखना जो अली से दुश्मनी रखे ” ।

तो मेरी हैरत की कोई इन्तेहा नहीं रह जाती है कि इस तरहा के बेशुमार फ़ज़ाएल हमारे असहाबे सहाह ने नक़्ल किऐ हैं जिन्हें जमा किया जाऐ तो एक मुकम्मल किताब तैयार हो सकती है और फ़िर सहाबा ने सब को नज़र अंदाज़ कर के अली से दुश्मनी शुरू कर दी उन पर मिम्बरों से लानत की और उनसे जंगो जिदाल बल्कि उनके क़त्ल के लिऐ भी तैयार हो गऐ।

मैं फ़िर भी चाहता हूँ कि उनके लिए कोई जवाज़ तलाश करूँ लेकिन हुब्बे दुनिया ,निफ़ाक़ ,इरतिदाद और इन्क़ेलाब के अलावा कोई तौज़ीह नज़र नहीं आती फ़िर मैंने चाहा कि इन तमाम इक़्दामात को सहाबा कि तीसरी क़िस्म और मुनाफ़िक़ीनके हिसाब में लिख दूँ लेकिन अफ़सोस ऐसे आमाल अंजाम देने वाले बुज़ुर्गतरीन और मशहूरतरीन असहाब थे।

खानऐ अली अ।स। के घर में आग लगाने वाले उमर इब्ने ख़त्ताब थे ,उनसे जंग करने वाले तल्हा ,ज़ुबैर ,और उम्मुल्मोमिनीन आयशा ,माविया इब्ने अबूसुफ़ियान और उमरु बिन आस जैसे अफ़राद थे।

मेरी ये हैरत ख़त्म होने वाली नहीं है और मेरी तरह हर आज़ाद फ़िक्र और मुन्सिफ़ मिजाज़ इन्सान ग़रके हैरत रहेगा के उल्माऐअहले सुन्नत ने अदालते सहाबा और उनके रज़ीअल्लाह अन्हू होने को किस तरह इन इक़दामत से हम आहन्ग बनाया है जबकि उनके क़ानूने अदालते सहाबा में कोई इस्तेसना नहीं है और बाज़ अफ़राद ने यहाँ तक कह दिया कि “यज़ीद पर लानत करो लेकिन उससे आगे न बढ़ो ” जबकि यज़ीद के मज़ालिम कि क्या हैसियत है उन मजालिम के मुक़ाबिले में जिन्हें न दीन तस्लीम करता है न अक़्ल।

मैं तो सोच भी नहीं पाता हूँ कि अगर वाक़ेयन अहले सुन्नत रसूल कि पैरवी करने वाले है तो उन अफ़राद को कैसे आदिल क़रार देते हैं जिनके फ़िस्क़ और इरतेदाद का क़ुरआन ओ सुन्नत ने एलान किया है और जिनके बारे में रसूले अकरम का इरशादे गिरामी है “जिसने अली को बुरा कहा उसने मुझे बुरा कहा उसे खुदा मुंह के बल जहन्नम में डाल देगा ” । ‘मुस्तदरके हाकिम-३सफ़्हा१२१ ,ख़सायसे निसाई सफ़्हा २४ ,मुसनदे अहमद -९ ,सफ़्हा३३ ,मनाक़िबे ख़्वारज़मी-सफ़्हा ८१ ,इयजुल नुजरा-२ सफ़्हा २१९ ,तारीखे सेयूती सफ़्हा ७३। ’

ये तो अली को बुरा कहने कि सज़ा है फिर उसका अंजाम क्या होगा जो लानत करे या उनसे जंग करे या उनको क़त्ल करा दे।आखिर हमारे उल्माऐ किराम इन हक़ाएक़ से कितनी दूर चले गऐ हैं या उनके दिलों पर कुफ़्ल पद गऐ हैं — परवरदिगार!मैं शैतान के वसवसों और उनके तसल्लु के मुक़ाबिले में तेरी पनाह चाहता हूँ।

२-सहाबा ने नमाज़ तक बदल डाली:अनस बिने मालिक का बयान है कि “ज़मानऐ पैग़म्बर कि तमाम बातों में सबसे पहले हमें नमाज़ का इल्म हुआ और तुम लोगों ने उसे भी ज़ाया कर दिया है ” ज़ुहरी का बयान है कि मैं अनस बिन मालिक के पास दमिश्क़ में हाज़िर हुआ तो देखा के वो रो रहें है तो मैंने पूछा कि आप क्यों रो रहे हैं ? तो उन्होंने कहा कि मैं तमाम चीजों में से इसी नमाज़ को पहचानता हूँ और इसे भी ज़ाया कर दिया गया है। ‘ बुख़ारी-१-७४ ’ ।

किसी शख़्स को ये ख़्याल पैदा न हो कि ये काम फ़ितनों और जंगों के बाद ताबेईन ने किया है लिहाजा इस अम्र की याददहानी ज़रूरी है की सब से पहले नमाज़ में तबदीली का काम ख़लीफ़तुल-मुस्लिमीन उसमान ने अंजाम दिया है और उसके बाद ये काम उम्मुलमोमिनीन आयशा ने किया है।

चुनाँचे बुख़ारी और मुस्लिम की रवायत है की रसूले अकरम ने मिना में नमाज़ कस्र पढ़ी है और यही कम अबूबकर ओ उमर ने भी उसमान ने भी खिलाफ़त के एक दौरे में अंजाम दिया है उसके बाद इसे चार रकअत बना दिया है। ‘ बुख़ारी-२सफ़्हा-१५४ ,मुस्लिम-१सफ़्हा२६० ’

मुस्लिम ही ने अपनी सही में ज़ुहरी का ये क़ौल नक़्ल किया है कि “ मैंने उरवा से पूछा के आयशा पूरी नमाज़ क्यों नहीं पध्त्यि है तो उन्होंने कहा कि उन्होंने उसमान ही कि तरह तावील कर ली है ”— मुस्लिम -२-सफ़्हा१४३ किताब सलातुल मुसाफ़िरीन।

ख़ुद उमर इब्ने खत्ताब भी अक्सर नुसूसे सरीहा के मुक़ाबले में इजतेहाद और तावील से काम लिया करते थे और अपनी राय से फ़तवे दिया करते थे चुनांचे उनका ऐलान था के “दो मुतआ रसूले अकरम के ज़माने में राएज थे और मैं दोनों को हराम क़रार देता हूँ और उनके अंजाम देने वालों को सज़ा भी दूंगा ” और उन्होंने हालते जनाबत में पानी न पाने वाले को नमाज़ तर्क कर देने का हुक्म दे दिया था जबकि क़ुरआने मजीद में तयम्मुम का सरीह हुक्म मौजूद है और बुख़ारी ने इस वाक़्ये को बाबे “इज़ा खाफ़ल जुनुब अला नफ़्सहू में नक़्ल किया है कि मैंने शक़ीक़ बिन सलमान को ये कहते सुना है के मैं अब्दुल्लाह और अबूमूसा के पास था तो अबूमूसा ने कहा कि अबू अब्दुर्रहमान तुम्हारा क्या ख़्याल है कि अगर किसी मुजनिब को पानी न मिले तो वो क्या करेगा तो अब्दुल्लाह ने कहा कि जब तक पानी न मिले नमाज़ नहीं पढ़ेगा तो अबू मूसा ने कहा के फिर रसूले अकरम के इस इरशाद का क्या करेंगे जो आपने अम्मार से फ़रमाया था ? तो उन्होंने कहा कि मगर उमर उससे मुतमइन नहीं थे ? तो अबूमूसा ने कहा कि अम्मार की बात को छोड़ो आते तयम्मुम का क्या करोगे ? जिस पर अब्दुल्लाह खामोश हो गए और कोई जवाब न बन पड़ा सिर्फ ये कहने पर इक्तेफ़ा कि के अगर ऐसी इजाज़त दे दी गई तो जिसको पानी ठंडा मालूम होगा वो भी ग़ुस्ल छोडकर तयम्मुम कर लेगा तो मैंने शक़ीक़ से कहा कि क्या अब्दुल्लाह ने इसीलिऐ मकरूह क़रार दिया है तो उन्होंने कहा बेशक। ‘ बुख़ारी-१-सफ़्हा-५४ ’ ।

३-सहाबा की गवाही ख़ुद अपने खिलाफ़:- अनस बिन मालिक रावी हैं कि हज़ूरे ने अन्सार से फरमाया कि मेरे बाद शदीद तरीन हालात का मुक़ाबला करना होगा लिहाज़ा सब्र करना यहाँ तक कि ख़ुदा की बारगाह में पहुँच जाओ और रसूल से हौज़े कौसर पर मुलाक़ात करो ---लेकिन अनस का कहना है कि हम लोग सब्र न कर सके। ‘ बुख़ारी-२-सफ़्हा-१३५ ’ ।

अला बिन मुसय्यब ने अपने बाप का ये क़ौल नक़्ल किया है कि मैंने बरा इब्ने आज़िब से मुलाक़ात करके ये कहा कि आप खुश्क़िस्मत हैं कि आप को सरकार की सोहबत का शर्फ़ हासिल हुआ और आपने बैयते शजरा में शिरकत की है ,तो उन्होंने फ़रमाया भाई!तुम्हें नहीं मालूम हमने उसके बाद क्या किया है ’ बुख़ारी-३-सफ़्हा-३२ बाब गज़वऐ हुदैबिया ’

ज़ाहिर है कि जब साबिक़ीने अव्वलीन के इस सहाबी ने नबी की बैयत करने के बाद और रिज़ाऐ इलाही कि सनद हासिल कर लेने के बाद अपने खिलाफ़ ये गवाही दी है कि हम लोगों ने रसूले अकरम के बाद बिदअते ईजाद की हैं तो दोसरों का क्या ज़िक्र है जबकि ये गवाही उस ख़बरे गैब की मिसड़ाक है कि जिसमें हुज़ूर ने अपने बाद बिदअतों के ईजाद होने कि ख़बर दी थी और लोगों के मुरतद हो जाने के बारे में बयान किया था तो क्या ये मुमकिन है कि इन हालात के बाद भी कोई अक़्लमंद सबके आदिल होने कि तसदीक़ कर दे जैसा कि हज़रते अहले सुन्नत का ख़्याल है।

मेरे ख़्याल में तो ऐसा शख़्स अक़्ल और नक़्ल दोनों के मुखालिफ़ होगा और ऐसे नज़रियात के बाद हक़ीक़त तक पहुँचने का कोई इमकान नहीं रह जाऐगा।

४:हज़रते शेखैन की शहादत ख़ुद अपने खिलाफ़:-बुख़ारी ने अपनी सही में मनाक़िबे उमर इब्ने खत्ताब के बाब में नक़्ल किया है कि जब उन्होंने ज़ख्मी होने के बाद अपने दर्द ओ आलम का इज़हार किया तो इब्ने अब्बास ने तस्कीन देते हुऐ कहा कि “अगर आपको ये तक्लीफ़ है तो आपने सोहबते रसूल का शरफ़ हासिल किया और इस आलम में उनसे जुदा हुऐ कि वो आपसे राज़ी थे फिर अबूबकर की बाक़ाऐदा सोहबत इख्तियार की है और वो भी आप से राज़ी थे ” तो उन्होंने फ़रमाया जहाँ तक रसूले अकरम की सोहबत और रज़ामंदी का ताल्लुक़ है तो ये अल्लाह का एहसान था और अबूबकर की सोहबत और उनकी रज़ामंदी का है लेकिन इस वक़्त मेरा इज़्तेराब तुम्हारे असहाब के बारे में है कि अगर रुऐ ज़मीन के बराबर सोना भी सदक़ा देकर अज़ाबे इलाही से निजात हासिल कर सकता तो मैं दे देता। ‘ बुख़ारी-२-सफ़्हा-२०१ ’ ।

तारीख ने इनका ये बयान भी नक़्ल किया है कि उन्होंने फ़रमाया कि काश मैं एक दुंबा होता जिसे घर वाले खिला पीला कर तंदरुस्त बनाते और जब कोई मेहमान आ जाता तो ज़िबहा करके उन्हें खिला देते और खाने के बाद फुज़ला बन कर निकल जाता---और इन्सान न होता। ‘मिन्हाजुस-सुन्नत इब्ने तीमिया-३ ,सफ़्हा-५२ ’ ।

तारीख़ ने ऐसा ही एक बयान अबू बकर की तरफ़ मनसूब किया है कि उन्होंने दरख़्त पर एक परिंदे को देख कर फ़रमाया कि तू खुश क़िस्मत है ,दरख़्त पर बैठा है ,खजूर खाता है और तेरे ज़िम्मे न कोई हिसाब है न अज़ाब ,काश मैं भी सारे राह कोई दरख़्त होता और राहगीरों का ऊँट मुझे खा कर मेंगनी बना देता और मैं इन्सान न होता। तबरी-सफ़्हा-२१ ,रियाज़ुल नुजरा-१ ,सफ़्हा-१३४ ,कन्ज़ुल आमाल-सफ़्हा-३६१ ,मिन्हाजुल-सुन्नत-३ ,सफ़्हा-१२० ’ ।

दूसरे मुक़ाम पर फ़रमाया कि “काश मेरी माँ ने मुझे जन्म न दिया होता और मैं कोई कूड़ा कर्कट होता ” तबरी-४१ ,रियाज़ुल नुजरा-१-१३४ , कन्ज़ुल आमाल-३६ ,मिन्हाजुल-सुन्नत-३-१२० ’ ।

इन बयानात के मुक़ाबिले में क़ुरआने मजीद का वो बयान जो साहिबाने ईमान को बशारत देता है कि “औलियाऐ ख़ुदा के लिऐ न कोई खौफ़ है न कोई हुज़्न साहिबाने ईमान और मुत्तक़ी अफ़राद थे इनके लिऐ ज़िन्दगानिऐ दुनिया और आखिरत दोनों मक़ाम पर बशारत है ,कलामाते ख़ुदा में तब्दीली का कोई इमकान नहीं है और यही अज़ीम कामयाबी है ” सूरऐ युनूस-६२-६३-६४।

“ जिन लोगों ने ये कहा कि ख़ुदा हमारा रब है और उसी पर क़ायम रहे उन पर मलाएका का नुज़ूल होता है कि ख़बरदार खौफ़ और हुज़्न न करो और उस सुन्नत की बशारत हासिल करो जिसका तुम से वादा किया गया है ,हम ज़िन्दगानिऐ दुनिया और आखिरत दोनों में तुम्हारे साथी हैं और तुम्हारे लिऐ जन्नत में जो कुछ चाहो हाज़िर है ये परवरदिगार कि तरफ़ से तुम्हारी ज़ियाफ़त का सामान है ” सूरऐ फ़ुस्लत-30।31।32

अब नाज़रीने किराम का क्या ख़्याल है कि क़ुरआने मजीद के इन बायनात के बाद भी शेखैन की ये आरज़ू है कि काश वो इन्सान न होते जिसे रब्बे करीम ने तमाम मख्लूक़ात से अफ़जल बनाया है और अगर आम मोमिनीन पर इस्तेक़ामत के बाद मलाएका नाज़िल होते हैं और उसे मक़ामाते जन्नत कि बशारत देते हैं और वो अजाबे इलाही की तरफ़ से मुतमइन हो जाएँ और उसे दुनिया के हाल पर हुज़्न नहीं होता है और आखिरत से पहले दुनिया ही में बशारत मिल जाती है तो इस बुजुर्ग सहाबा को क्या हो गया जो तमाम मख्लूक़ात अफ़्ज़ल ओ बालातर होने के बाद फुज़ला ,मेंगनी ,या बाल और कूड़ा कर्कट होने की आरज़ू करते हैं।

ज़ाहिर है कि अगर मलाएका ने उन्हें भी बशारत दे दी होती तो सारी दुनिया के बराबर सोना सदक़ा देकर अज़ाबे ईलाही से बचने कि आरज़ू न करते जबकि क़ुरआने मजीद ने साफ़ कह दिया है के “अगर ज़ुल्म करने वाले इन्सान के पास सारी दुनिया भी होती तो वो उसे फ़िदाए में दे देता और अज़ाब देखने के बाद निदामत का एहसास करता और इंसाफ के साथ फ़ैसला कर दिया जाता और किसी पर ज़ुल्म न किया जाता ” ।सूरऐ युनूस-५४।

“ अगर ज़ालिमीन के पास कुल रुऐ ज़मीन का सरमाया होता और उतना ही मिल जाता तो भी कयामत के अज़ाब के मुक़ाबिले में क़ुर्बान कर देते और ख़ुदा की तरफ़ से इस अम्र का इज़हार होता जिसका उन्हें गुमान भी नहीं था और उनकी बदआमालियों का इज़हार भी हो जाता और उनका इस्तेहज़ा खुद उन्हीं को घेर लेता ” ।सूरऐ ज़मर-४७-४८।

मेरी तमाम तर आरज़ू है कि काश ये आयते हज़रते अबुबकर ओ उमर जैसे बुज़ुर्गों पर मुन्तबिक़ न होती — लेकिन मुझे इन आयात को देखने के बाद एक लम्हे के लिऐ ठहरना पड़ता है कि मैं ये देखूँ कि इन लोगों ने रसूले अक्रम के साथ क्या बर्ताव किया है और किस तरह आखिरे वक़्त में उनके अहकाम के निफ़ाज़ की मुखालिफ़त की है और इस तरह अज़ीयत दी है के वो घर से निकाल देने पर मजबूर हो गऐ थे जिस तरह कि मेरे सामने इन हवादिस की दास्तान भी है जो सरकारे दो आलम के बाद पेश आऐ हैं और जिसमें आपकी दुख्तरे नेक अख़्तर हजरते फ़ातेमा स।अ। ज़हरा स।अ। को अज़ीयत दी गई है और उनका हक़ ग़स्ब किया है जबकि आपने वाज़ेह तौर पर फ़रमा दिया था कि “फ़ातेमा स।अ। मेरा एक जुज़ है जिसने उसे गज़बनाक किया उसने मुझे गज़बनाक किया ” बुख़ारी — २-२०६ ,बाबे मनाक़िबे क़राबते रसूल अल्लाह।

और ख़ुद जनाबे फ़ातेमा स।अ। ने अबूबकर ओ उमर से कहा था कि “मैं ख़ुदा को गवाह बनाकर पूछती हूँ कि क्या तुम दोनों ने मेरे बाबा का ये इरशाद नहीं सुना है के फ़ातेमा स।अ। कि रिज़ा मेरी रिज़ा है और फ़ातेमा स।अ। का गज़ब मेरा गज़ब है जिसने फ़ातेमा स।अ। से मुहब्बत कि उसने मुझसे मुहब्बत की और जिसने फ़ातेमा स।अ। को राज़ी किया उसने मुझे राज़ी किया और जिसने उन्हें नाराज़ किया उसने मुझे नाराज़ किया ” तो दोनों ने तसदीक़ की कि हमने ये बयान सुने हैं जिस पर आपने फ़रमाया कि मैं ख़ुदा को गवाह करके कहती हूँ के तुम दोनों ने मुझे नाराज़ किया है और राज़ी नहीं किया है और मैं पैग़म्बरे इस्लाम से मुलाक़ात करूँगी तो तुम दोनों की शिकायत करूँगी ” अल-इमामत वास-सियासत इब्ने क़तीबा-१-२० ,फ़िदक फ़ी तारीख़-९२।

छोड़िये इस रिवायत को जो दिल को ख़ून कर देती है के शायद इब्ने क़तीबा भी शिया हो गया हो ,अगरचे उसका शुमार जलिलूल-क़द्र उल्माऐ अहले सुन्नत में होता है और वो तफ़सीर ,हदीस ,लुग़त और तारीख़ में मुखतलिफ़ किताबों का मुसन्निफ़ भी है — जैसा कि तारीखुल-खुलफ़ा से इस्तेनाद के मौक़े पर मुतास्सिब आलिमे अहले सुन्नत ने मुझसे कहा था कि इब्ने क़तीबा शिया था और यही बात हर गैर मुतास्सिब सुन्नी आलिम के बारे में कही जाती है चुनांचे निसाई ने ख़सायसे अमीरुल-मोमिनीन की तालिफ़ की तो वो शिया हो गया ,तबरी ने चन्द फ़ज़ाएल नक़्ल कर दिये तो वो शिया हो गया ,इब्ने क़तीबा ने तारीख़ लिख दी तो वो शिया हो गया और हद ये है कि डोरे हाज़िर के मशहूर मुसन्निफ़ ताहा हुसैन ने अल-फ़ितनातुल-कुबरा लिख दी तो वो भी शिया हो गऐ के उन्होंने हदीसे ग़दीर नक़्ल कर दी है और बहुत से हक़ाएक़ का ऐतेराफ़ कर लिया है हालांकि हक़ीक़त ये है कि इनमें से कोई शिया नहीं था और सबने शियों का तज़किरा इन्तेहाई बदतरीन अंदाज़ में किया है और सहाबा की अदालत से दिफ़ाअ किया है बात सिर्फ़ ये है कि जिसने भी फ़ज़ाएले अहलेबैत का तज़किरा कर दिया है और सहाबा की ग़लतियों का इक़रार कर लिया है उस पर तशय्यो की तोहमत लगा दी गई है ताकि उसका बयान बे-क़ीमत और जानिबदार हो जाऐ हद ये है कि अगर किसी ने सलावात में आल का ज़िक्र कर दिया है या अली को अलैहिस्सलाम कह दिया है तो वो भी शियों में शुमार कर लिया गया है ,इसी लिऐ मैंने एक दिन अपने आलिमे अहले-सुन्नत से बहस करते हुऐ पूछा कि आपका बुख़ारी के बारे में क्या ख़्याल है तो उन्होंने कहा कि वो आईम्मऐ हदीस में है और उनकी किताब तमाम किताबों में बलातर है तो मैंने कहा कि वो तो शिया थे तो उन्होंने तन्ज़िया मुस्कुराहट के साथ फ़रमाया के माज़अल्लाह वो किस तरह शिया हो सकते हैं ? मैंने कहा कि आपका क़ानून है कि जो अली को अलैहिस्सलाम कह देता है उसे शिया बना देते है और ये चन्द मक़ामात हैं जहाँ बुख़ारी ने अली को अलैहिस्सलाम ,फ़ातेमा स।अ। को अलैहिस्सलाम और हुसैन इब्ने अली को अलैहिस्सलाम लिखा है तो क्या वो शिया नहीं हैं ? तो वो सकते में आगऐ और कोई जवाब न दे सके। ‘ बुख़ारी-जिल्द-१ ,सफ़्हा १२७ ,१३० ,जिल्द-२ सफ़्हा-१२६ ,२०५ ’ ।

मुश्किल ये है कि मैं इब्ने क़तीबा की रिवायत को तर्क कर दूँ कि जिसने ये तज़किरा किया है कि हज़रते फ़ातिमा स।अ।ज़हरा अबूबकर ओ उमर पर गज़बनाक हो गई और उनसे कलाम नहीं किया तो बुख़ारी के बारे में किस तरह शक करूँगा कि जिसकी किताब असहुल-कुतुब है और हम लोगों ने उसे सही तसलीम कर लिया है और शियों को हमारे मुक़ाबिले में इस किताब से इस्तेदलाल करने का हक़ है और उसने बाबे मनाक़िबे क़राबतुर-रसूले में ये रिवायत दर्ज की है के रसूले अक्रम ने फ़रमाया है कि “फ़ातेमा स।अ। मेरा युकरा है और जिसने उसे गज़बनाक किया है उसने मुझे गज़बनाक किया ” और फ़िर बाबे गज़वऐ खैबर में आयशा से नक़्ल किया है कि “फ़ातेमा बिन्ते रसूल ने अबूबकर के पास अपनी मीरास का तक़ाज़ा भेजा तो उसने फ़ातेमा स।अ।को कुछ भी देने से इन्कार कर दिया जिस पर वो नाराज़ हो गई और उन्होंने क़तऐ रवाबित कर लिऐ और ताहयात उनसे बात नहीं की ” बुख़ारी जिल्द-३-सफ़्हा-१३९।

और इन दोनों बयानात का नतीजा एक है फ़र्क़ सिर्फ़ ये कि बुख़ारी ने इख्तेसार के साथ ज़िक्र किया इब्ने क़तीबा तफ़सील बयान कर दिया है और जब बुख़ारी इस अम्र का इक़रार कर लें कि फ़ातेमा स।अ।गज़बनाक हो गई और जीते जी अबूबकर से बात नहीं की---और इस अम्र का ऐलान कर दे के “फ़ातेमा स।अ। सैय्यदतुल निसाइल आलेमीन हैं ” जैसा की किताबुल इस्तिज़ान में ज़िक्र किया गया है और फ़ातेमा स।अ।ही वो तन्हा खातून है जिन्हें आयते ततहीर का मरकज़ बना कर तमाम बुराईयों से दूर रखा गया है

तो इसका खुला हुआ मतलब है कि फ़ातेमा स।अ।का ग़ज़ब हक़ के अलावा किसी शै के लिऐ नहीं हो सकता और उनका ग़ज़ब यक़ीनन ख़ुदा और रसूल का बाइस होगा और इसी लिऐ ख़ुद अबुबक्र ने कहा के मैं रसूले अकरम और फ़ातेमा स।अ।के ग़ज़ब से पनाह माँगता हूँ और फ़ातेमा स।अ।की नाराज़गी पर वो इस तरह रोऐ कि क़रीब था कि इन्तेक़ाल कर जाएँ और वो बराबर फ़रमाती रहीं कि मैं तुम्हारे खिलाफ़ हर नमाज़ में बददुआ करूँगी जिसके बाद मुझे ऐसी बैअत की कोई ज़रूरत नहीं है और मुझे खिलाफ़त से मुआफ़ कर दिया जाऐ। अल-इमामत-वल-रियासत ,जिल्द-१ ,सफ़्हा-२०।

ये और बात है के हमारे अक्सर उल्मा इस क़रार के बाद कि फ़ातेमा स।अ।ने अबूबक्र से मीरास और अतिया के बारे में इख्तिलाफ़ किया है और जब उनका दावा रद कर दिया गया तो नाराज़ हो गई और ता हयात नाराज़ रही ,इन वाक़ेयात से इस तरह से गुज़र जाते हैं जैसे के कोई वाक़ेया ही न हुआ।सिर्फ़ इसलिऐ के अबूबक्र के आबरू का तहफ़्फ़ुज़ करे और उनके किरदार पर कोई आँच न आने पाऐ।

इस सिलसिले में सबसे हैरतअंगेज़ ये सूरतेहाल है कि बाज़ उल्मा ने तमाम वाक़ेयात को तफ़सील के साथ नक़्ल करने के बाद ये फ़ैसला दिया है कि “फ़ातेमा स।अ। के लिऐ नामुम्किन हैं कि वो गैरे हक़ का मुतालिबा करें और अबूबक्र के लिऐ भी ये नामुम्किन है के वो हक़ का इन्कार कर दें ” गोया उनकी नज़र में इस फ़रेबकारी और रियाकारी मसअला हल हो गया और तहक़ीक़ करने वाले मुतमइन हो गऐ ,इस बयान का तो वाज़ेह सा मतलब ये है कि क़ुरआने मजीद के लिऐ ये नामुमकिन है के वो ग़लत बयानी से काम लें और बनी इसराईल के लिऐ ये नामुम्किन है कि वो गोसाला परस्ती शुरू कर दें ” ख़ुदा जानता है कि हम ऐसे उल्मा के हाथों में मुब्तिला हो गऐ जो ये भी नहीं जानते कि हम क्या कह रहे हैं और बयक वक़्त दो मुताज़ाद और मुतनाक़िज़ उमूर का अक़ीदा रखते हैं जबकि वाज़ेह सी बात ये है कि फ़ातेमा स।अ। ने एक दावा किया था और अबूबक्र ने उसे रद कर दिया था गोया फ़ातेमा स।अ।(माज़अल्लाह)ग़लत बयानी से काम ले रही थी या अबूबक्र ने उनके ऊपर ज़ुल्म किया है ,इसके अलावा मसअले की कोई तीसरी शिक़ नहीं है जिसकी पनाह ली जा सके और अगर अक़्ली और नक़्ली दलाएल से ये नामुमकिन है कि फ़ातेमा स।अ। ग़लत बयानी से काम ले सकें कि उन्हें रसूले अकरम ने अपना जुज़ क़रार दिया है और उनकी अज़ीयत को अपनी अज़ीयत क़रार दिया है तो इसका वाज़ेह सा नतीजा ये है कि इस अम्र का इक़रार कर लिया जाए कि उन पर ज़ुल्म किया गया है और उनके दावे को रद कर देना कोई मामूली हादेसा नहीं है ,जबकि हदीसे ‘बिज़अतो मिन्नी ’ उनकी इस्मत कि दलील है और आयते ततहीर उनकी पाकीज़गी का ऐलान कर रही है ये और बात है कि घर में आग लगाने वालों के लिऐ तकज़ीब और इन्कारे हक़ की कोई हैसियत नहीं है। तारीखुल-खुल्फ़ा दीनवरी ,जिल्द-१ ,सफ़्हा।२०।

इसी लिऐ आप देखते हैं कि फ़ातिमा ज़हरा स।अ। ने घर में दाख़िल होने की भी इजाज़त नहीं दी और जब वो लोग घर में दाख़िल हो गऐ तो अबूबक्र ओ उमर कि तरफ़ से मुँह फ़ेर लिया और उन्हें देखना भी पसन्द नहीं फ़रमाया। अल-इमामत वस-सियासत ,जिल्द-१ ,सफ़्हा-२०।

फिर इन्तेक़ाल के बाद के लिऐ वसीयत कर दी कि जनाज़े को रात कि तारीकी में दफ़्न कर दिया जाऐ ताकि ज़ालिम जनाज़े में शरीक न हो सकें। बुख़ारी जिल्द-३ ,सफ़्हा-३९।

इन्हीं मसायब का नतीजा था कि बिन्ते रसूल कि क़ब्र आज तक मालूम न हो सकी और मेरा सवाल उल्माऐ किराम से बाक़ी है कि इन हक़ाएक़ के बारे क्यों साकित हैं और इन मसाएल पर क्यों बहस नहीं करते हैं और इन्हें महल्ले बहस में क्यों नहीं लाते हैं और सहाबा को मलायका की शक्ल में हमारे सामने क्यों पेश करते हैं उनकी ग़लती और ख़ता का इक़रार क्यों नहीं करते हैं और जब उनसे पूछा जाता है ख़लीफ़तुल-मुस्लिमीन उसमान का क़त्ल क्यों वाक़े हो गया था तो दो लफ़्ज़ों में सारे वाक़ेयात का खुलासा क्यों बता देते हैं कि मिस्र के कुफ़्फ़ार की एक जमाअत ने आकार उन्हें क़त्ल कर दिया ,ये तो मुझे बहसो तहक़ीक़ कि फुर्सत मिली तो मैंने देखा कि उसमान के क़ातिल असल में सहाबाऐ किराम हैं जिनमें सारे-फ़ेहरिस्त हज़रते आयशा हैं जो उनके क़त्ल के नारे लगाती थी और उन्हें नासल कह कर उनके क़त्ल पर लोगों आमादा कर रही थी।तबरी-जिल्द-४ ,सफ़्हा-४०७ ,इब्ने असीर जिल्द-२ सफ़्हा-२०६ ,लिसानुल अरब जिल्द-१४ सफ़्हा-१३९ ,ताजुल उरूस जिल्द-८ सफ़्हा-१४१ ,अकदुल फरीद जिल्द ४ ,सफ़्हा-२९०।

इसके बाद तल्हा ,ज़ुबैर और मुहम्मद बिन अबिबक्र जैसे मशाहीर सहाबा हैं जिन्होंने महासिरे के दौरान पानी बन्द करके इस्तीफ़ा देने पर मजबूर करना चाहा था बक़ौल मुअर्रेखीन इन्हीं सहाबा ने उन्हें मुसलमानों के क़ब्रिस्तान में दफ़्न नहीं होने दिया और बिल आख़िर यहूदियों के क़ब्रिस्तान “हिशे-कौकब ” में दफ़्न हो गऐ।

ऐसे हालात में कैसे कहा जा सकता है कि वो मजबूर मारे गऐ और उन्हें कुफ़्फ़ार की एक जमाअत ने क़त्ल कर दिया है।

दर हक़ीक़त ये वाक़ेआ भी हज़रते फ़ातेमा ज़हरा स।अ।और आबु बक्र जैसा एक वाक़ेया है या तो उसमान मज़लूम है और जिन सहाबा ने उन्हें क़त्ल किया है या क़त्ल में शिरकत की है वो क़ातिल और मुजरिम थे कि उन्होंने ख़लीफ़तुल मुस्लिमीन के क़त्ल को मुबाह क़रार दिया और फिर जनाज़े पर खिश्तबारी की और इस क़द्र तोहीन की कि मुसलमानों के क़ब्रिस्तान में दफ़्न भी नहीं होने दिया या ये कि सहाबा उसमान को आमाल और अफ़आल पर जाएज़ुल क़त्ल समझते थे और उनके आमाल क़ाबिले क़त्ल थे ,इसके बाद तीसरा कोई ऐहतेमाल नहीं है जब तक हम तारीख़ के तमाम हक़ाएक़ का इन्कार करके फ़रेब कारी का कारोबार न शुरू कर दें और मिस्र के काफ़िरों को क़ातिल न क़रार दे दें — लेकिन बहरहाल दोनों सूरतों में अदालते सहाबा का नज़रिया ज़रूर मजरूह हो जाता है कि कज़िए के फ़रीक़ैन सहाबा थे और इख्तिलाफ़ क़त्ल की हदों तक पहुँचा हुआ था जिसके बाद शियों का ये ख़्याल सही हो जाता है कि बाज़ सहाबा आदिल थे और बाज़ फ़ासिक़ ओ ज़ालिम फिर उसके बाद जंगे जमल के बारे में सवाल पैदा होता है जिसकी आतिशे जंग को उम्मुल मोमिनीन आयशा ने भड़काया था और ख़ुद उन्होंने ही इस जंग कि कयादत की थी उम्मुल मोमिनीन उस घर से इस तरह बाहर निकली जिसमें ठहरे रहने का हुक्म क़ुरआन ने दिया था “व क़रना फ़ि — जाहिलयतल ऊला ” सूरऐ अहज़ाब आयत ३३।और किस तरह ख़लिफ़तुल मुस्लिमीन से जंग को जाएज़ क़रार दे दिया जबकि वो तमाम मोमिनीन और मोमिनात के वली थे।

हमारे उल्माऐ किराम इन सवालात के जवाबात निहायत आसानी के साथ ये देते हैं हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने क़िस्सए उफ़क में रसूले अकरम को तलाक़ देने का मशविरा दिया था और ये बात उम्मुल मोमिनीन को नापसन्द थी लिहाज़ा वो हज़रत अली अलैह।स।को पसन्द न करती थीं गोया कि तलाक़ का मशविरा इस अम्र का जवाज़ था कि हुकमे ख़ुदा की खिलाफ़त की जाऐ ,घर से बाहर मैदान में जंग की जाऐ ,ऊंट पर बैठ कर हवाब के मक़ाम तक सफ़र किया जाऐ जिससे रसूले अकरम ने मना भी किया था और इस ख़तरे से आगाह भी किया था। “ अल इमामत वस-सियासत ” फिर मदीने से मक्का और मक्का से बसरा की तावील मुसाफ़त तय करके बे गुनाह अफ़राद के ख़ून को मुबाह बना लिया जाऐ और अमीरुल मोमिनीन से जंग कि जाऐ और इसके नतीजे में हज़ारों अफ़राद को तहे तेग़ कर दिया जाऐ। ‘ तबरी ,इब्ने असीर और मदायनी वग़ैरा-हवादिस-३६ हिजरी ’ ।

और ये सब सिर्फ़ इसलिए हो कि इमाम अली अ।स।ने तलाक़ का मशविरा दे दिया और ये उन्हें पसन्द नहीं था अगरचे रसूले अकरम ने तलाक़ भी नहीं दी थी।

इसके अलावा मुफ़स्सरीन ने इनके और बहुत से मुआन्दाना हरकात का ज़िक्र किया है जिनकी कोई तावील मुमकिन नहीं है मिसाल के तौर पर जब आप मक्के से वापस आ रही थी तो लोगों ने ख़बर दी कि उसमान को क़त्ल कर दिया गया है तो आपने इन्तेहाई मुसर्रत का इज़हार किया लेकिन जैसे ही मालूम हुआ कि लोगों ने अली अ।स। को खलीफ़ा तस्लीम कर लिया है तो आपने बरजस्ता ऐलान किया कि काश आसमान ज़मीन पर गिर पड़ता और अली अ।स। अमीरुल मोमिनीन ना बन पाते ,मुझे वापस ले चलो और उसके बाद शोलऐ जंग भड़काने की तैयारी करने लगी और अली अ।स। से इस क़दर इख्तिलाफ़ किया कि उनका नाम लेना भी पसन्द नहीं करती थी।

क्या उन्होंने रसूले अकरम का ये इरशाद नहीं सुना था कि “अली की मुहब्बत ईमान है और अली की अदावत निफ़ाक़ है ” सही मुस्लिम ,जिल्द-१ सफ़्हा-४८। यहाँ तक कि बाज़ सहाबा का बयान है कि हम मुनाफ़िक़ीन को अली की अदावत ही के ज़रिये पहचानते हैं।

और क्या उन्होंने रसूले अकरम का ये ऐलान नहीं सुना था “जिसका मैं मौला हूँ उसका ये अली भी मौला है ” यक़ीनन उन्होंने सुना था और वो ये सब जानते थे लेकिन उनके बावजूद अली को पसन्द नहीं करते थे और जब उनकी शहादत की ख़बर सुनी तो फ़ौरन सजदे में गिर पड़े। ‘ तबरी ,इब्ने असीर ,मदाएन वग़ैरा हवादिस-३६ हिजरी।

छोड़िये इन मामलात को मेरा मक़सद उम्मुल्मोमिनीन की तारीखे हयात नक़्ल करना नहीं हा मेरा मक़सद तो सिर्फ़ ये बयान करना था कि अक्सर सहाबा इस्लामी क़वानीन कि खिलाफ़ वर्ज़ी किया करते थे और रसूले अकरम के अहकाम की परवाह नहीं करते थे जिस मक़सद के लिऐ उम्मुल मोमिनीन का ये फ़ितना ही काफ़ी है कि जिस पर तमाम मुअर्रेखीन का इत्तेफ़ाक़ है और सबने इस हक़ीक़त को नक़्ल किया है कि जब उनका काफ़िला मक़ामे हौवअब पर पहुँचा और वहाँ के कुत्तों ने भौंकना शुरू कर दिया तो रसूले अकरम कि तन्बीह याद आई कि ख़बरदार तुम में से कोई मक़ामे हौवअब तक न जाने पाऐजहां कुत्ते भौंकेंगे और जब उन्होंने वापसी का इरादा किया तो तल्हा और ज़ुबैर ने रकम देकर पचास आदमियों को जमा किया और उन्होंने क़सम खाकर गवाही दी कि ये मक़ाम हौवअब नहीं है और वो बसरे तक अपने सफ़र को जारी रखेरहें जो बक़ौल मुअर्रेखीन इस्लाम में पहली झूठी गवाही थी। ‘ तबरी ,इब्ने असीर ,मदाईनी वग़ैरा ,हवादिस-३६ हिजरी।

अब मैं रोशन फ़िक्र अफ़राद से सवाल करता हूँ कि इस इशकाल का कोई हल बताएं और ये समझाएँ कि क्या इन्हीं सहाबाऐ किराम की अदालत का ढिंडोरा पीटा जाता है ,एयूआर क्या इन्हीं को रसूले अकरम के बाद अफ़्ज़लुल बशार क़रार दिया जाता है जो झूठी गवाही से भी दरेग़ नहीं करते जिसे रसूले अकरम ने गुनाहे कबीरा क़रार दिया है।फ़िर दोबारा ये सवाल पैदा होता है कि इनमें कौन हक़ पर था और कौन बातिल पर ? इसलिऐ कि या तो अली अलैहिस्सलाम और उनके साथी माज़अल्लाह ज़ालिम और बातिल पर हों या आयशा और उनके साथी तल्हा और ज़ुबैर ज़ालिम और बातिल पर होंगे और दोनों सूरतों में सहाबा का किरदार वाज़ेह हो जाऐगा और किसी तीसरी क़िस्म का कोई इमकान भी नहीं है मेरे ख़्याल में तो हर इन्सान पसन्द का रुजहान अली की तरफ़ होगा जो हक़ के साथ हैं और हक़ उनके साथ है बल्कि उन्हीं के साथ गर्दिश करता है और उम्मुल मोमिनीन के फ़ितने में बेज़ार होगा जिसकी आग हर ख़ुश्क ओ तर को खा गई और उसके आसार आज तक बाक़ी हैं। बुख़ारी ने अपनी सही में “किताबुल-फ़ित्न ” में ये रवायत नक़्ल की है कि जब तलहा ,ज़ुबैर और आयशा ने बसरे का रुख इख्तियार किया तो अल अलैहिस्सलाम ने अम्मारे यासिर और हज़रत हसन बिन अली अ।स। को भेजा और ये हज़रात कूफ़ा आऐ ,मजमा जमा किया उर मिम्बर पर गए इमाम हसन बालाई ज़ीने पर थे और अममरे यासिर उसके बाद वाले ज़ीने पर--- अम्मार ने बाआवाज़े बुलन्द ऐलान किया कि आयशा ने बसरे का रुख़ कर लिया है और वो तुम्हारे रसूल कि ज़ोजा हैं अब परवरदिगार तुम्हारा इम्तेहान ले रहा है कि तुम रसूल की इताअत करते हो कि आयशा की। ‘बुख़ारी जिल्द-४ सफ़्ह-१६१ ’ ।

इसके अलावा बुख़ारी ने रसूले अकरम के साथ उनके सूऐ-ऐख़्लाक़ और बदतमीज़ी के भी बहुत से अजीब ओ ग़रीब मनाज़िर नक़्ल किऐ हैं और यहाँ तक बयान किया है कि उनकी इन्हीं हरकात पर अबूबक्र ने उन्हें इतना मारा कि ख़ून जारी हो गया फ़िर उन्होंने रसूले अकरम के खिलाफ़ ऐसी साज़िश की कि आपको तलाक़ की राय देना पड़ी और रब्बुलआलिमीन ने दूसरी ज़ौजा बदलने का इशारा दे दिया जिसकी दास्तान बेहद तवील है।

मेरा तो सवाल ये है कि क्या इन हरकातो इक़दामात के बाद भी आयशा उन ऐहतेरामात की मुस्तहक़ है जिसके बरादराने अहले सुन्नत क़ायल हैं सिर्फ़ इसलिऐ कि वो ज़ौजाऐ पैग़म्बर थीं जबकि पैग़म्बर की बहुत सी अज़वाज हैं और बाज़ अज़वाजे पैग़म्बर उनसे अफ़्ज़ल हैं –‘तिरमिज़ी ,इस्तेयाबे हालाते सफ़िया ,असाबा ’— या इसलिए कि वो बिन्ते अबूबक्र थीं — या इसलिऐ कि उन्होंने वसीयते पैग़म्बर को ठुकराने पर पूरा ज़ोर सर्फ़ कर दिया था और जब उनके सामने ज़िक्र आया कि पैग़म्बर ने अली के बारे में वसीयत की है तो फ़रमाया कि रसूले अकरम मेरे सीने पर तकिया किऐ हुऐ थे और इसी आलम में उनका इन्तेक़ाल हुआ है तो मेरी समझ में नहीं आता कि उन्होंने किस तरह वसीयत कर दी है या इसलिऐ कि उन्होंए एक बेपनाह जंग की क़यादत की है और इमामे हसन अ।स। के जनाज़े के दफ़्न होने में रुकावट डाली है और उन्हें ये कह कर नाना के पहलू में दफ़्न न होने दिया कि मेरे दिल में इसे दाख़िल न करो जिसे मैं पसन्द नहीं करती हूँ और ये भूल गई कि रसूले अकरम ने फ़रमाया था कि “हसन ओ हुसैन जवानाने जन्नत के सरदार हैं ” “ख़ुदा उसे दोस्त रखे जो उन्हें दोस्त रखे और उससे नफ़रत करे जो इनसे अदावत रखे ” “मेरी उससे जंग है जो इनसे जंग करे और उनसे सुल्ह है जो इनसे सुल्ह करे ” और फ़िर हसन ओ हुसैन अ।स। को उम्मत में रेहाने रसूल क़रार दिया।

और ये कोई अजीब बात नहीं है कि उन्होंने पैग़म्बर से अली के बारे में इससे कहीं ज़्यादा सुना है लेकिन उसके बावजूद अली अलैह।स। से जंग की और लोगों को उनके खिलाफ़ वरग़ला कर मैदान में ले आई उनके फ़ज़ाएल ओ मनाक़िब का इन्कार कर दिया और इसी बुनियाद पर बनी उमैय्या ने उन्हें पसन्द किया और उन्हें तमाम उम्मत से बालातर मंज़िल पर रख दिया और उनकी शान में वो रिवायतें तैयार की हैं जिनसे किताबों को भर दिया और दायर ब दायर उनका प्रोपैगन्डा किया यहाँ तक की उन्हें उम्मते इसलामिया के लिऐ मरजऐ अकबर क़रार दे दिया गया है और उनके बयानात को निस्फ़ दीन का माखज़ बना दिया गया है।

और शायद दीन का “निस्फ़े आख़िर ” अबूहुरैरा के हिस्से में आ गया था जिसने उनकी शान में रिवायाते वज़अ: की और उन्होंने उसके सिले में उसे वालीये मदीना बना दिया और उसके लिऐ क़सरे अतीक़ तैयार कर दिया जबकि वो एक फ़क़ीरे महज़ आदमी था और उसे “रावीयतुल-इस्लाम ” का लक़ब दे दिया और इस तरह उसने बनी उमैय्या के लिऐ एक जदीद और मुकम्मल दीन फ़राहम कर दिया जिसमें किताब ओ सुन्नत के वही अहकाम नज़र आऐ जो उनकी ख़ाहिश के मुताबिक़ और उनकी सल्तनत और इस्तेहकाम का जरिया थे ज़ाहिर है कि ऐसे दीन को तमाशों का मजमुआ और मुतनाकेज़ात का मुरक्कब मजमुआ होना ही चाहिए था।

नतीजा ये हुआ की हक़ाएक़ मस्ख़ हो गऐ और उनकी जगह ज़ुल्मात ने ले ली ,लोगों को इन्हीं ख़ुराफ़ात पर आमादा किया गया और उनके दरमियान इन्हीं ख़ुराफ़ात की तरवीज की गई और इस तरह दीने इलाही एक मज़हका बन कर रह गया ,जिसका कोई मेयार न हो और जिसमें माविया का खौफ़ ,खौफ़े ख़ुदा से ज़्यादा हो।

लेकिन जब हम अपने उल्माऐ किराम से इस अम्र के बारे में पूछते है तो कि मुहाजिरीन और अन्सार के बैयते अली कर लेने के बाद माविया के पास उनसे जंग करने का जवाज़ क्या था ? और जिस जंग में मुसलमानों को शिया सुन्नी दो गिरोह में तक़सीम कर दिया और हजारों मुसलमानों का ख़ून बहाया उसके भड़काने की हैसियत क्या है ? तो वो हस्बे आदत निहायत आसानी के साथ ये जवाब दे देते हैं कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम और माविया दोनों सहाबी थे और दोनों ने इज्तेहाद से काम लिया है अली का इज्तेहाद सही था इसलिए उनके लिए दो अज्र है ,और इन बुज़ुर्गों के बारे में कोई फ़ैसला करने का हक़ नहीं है जैसा कि परवरदिगर आलम का इरशाद है कि “ये उम्मत गुज़र चुकी है वो अपने आमाल कि ज़िम्मेदार है

और तुम अपने आमाल के जिम्मेदार हो ,तुमसे उनके आमाल के बारे में कोई सवाल नहीं किया जाऐगा ” ।

अफ़सोस सद अफ़सोस कि हमारे उल्माऐ किराम का अंदाज़े जवाब जो एक वाज़ेह सफ़सुता और फ़रेबे अक़्ल है जिसे न कोई दी क़ुबूल कर सकता है और न कोई क़ानून — ख़ुदाया!मैं तुझसे अफ़कार की लग़ज़िश और ख्वाहिशात की कजरवी से पनाह माँगता हूँ ,तू हमे शैतानी वसवसों औए शयातीन के ग़लबे से निजात अता फ़रमाना ” भला अक़्ले सलीम उस माविया को मुजतहिद बना कर एक अज्र किस तरह दिलवा सकती है जिसने इमामुल-मुस्लिमीन से जंग की है ,बेगुनाह मुसलमानों का कत्ले आम किया है और इतने जराइम अंजाम दिऐ हैं जिनका शुमार ख़ुदा के अलावा कोई नहीं कर सकता है यहाँ तक कि अहले तारीख़ के दरमियान मशहूर हो गया है कि “अपने हरीफ़ों को क़त्ल करना है तो उन्हें जहर आलूद शहद खिला दो और फिर ये कह दो कि ख़ुदा के पास शहद के भी लश्कर हैं ” ।

आख़िर ये लोग माविया को मुजतहीद क़रार देकर किस तरह एक अज्र का हक़दार बनाते हैं जबकि वो बाग़ी गिरोह का सरगनाह था और तमाम मुहद्दीसीन ने सरकारे दो आलम कि ये हदीस नक़्ल की है कि “अम्मार का क़ातिल एक बाग़ी गिरोह होगा ” और उन्हें माविया और उनके साथियों ही ने क़त्ल किया है इसके अलावा हुज्र बिन अदी और उनके असहाब को इन्तेहाई बेदर्दी से उसने क़त्ल किया है और उन्हें शाम के एक बियाबान सहरा में दफ़्न करा दिया है सिर्फ़ इसलिऐ कि उन्होंने हज़रत अली अलैहिस्सलाम को गालियां देने से इन्कार कर दिया था।

भला माविया को किस मुँह से सहाबिऐ आदिल कहा जाता है जबकि उसने इमाम हसन अलैहिस्सलाम को ज़हर दिया है जिनको रसूले अकरम ने जवानाने जन्नत का सरदार क़रार दिया था।

उसे किस तरह पाक दामन क़रार दिया जा सकता है जबकि उसने जब्र ओ इस्तेब्दाद के ज़रिये अपने लिऐ और अपने फ़ासिक़ ओ फाजिर ,शराबी बेटे के लिऐ बेयत ली है और उम्मत के निजामे शुरा को क़ैसरियत ओ शहन्शाहियत में तब्दील कर दिया है। ‘खिलाफ़त ओ मुलुकियात-मौदूदी ,यौमुल-इस्लाम अहमद अमीन ’ ।

उसे किस तरह मुज्तहिद बनाकर एक अज्र का हक़दार क़रार दिया जा रहा है जबकि उसने लोगों को अली अ।स। पर माज़अल्लाह लानत करने के लिऐ आमादा किया है और आले रसूल को बुरा भला कहा है जिन असहाब ने इस हुक्म से इन्कार किया है उन्हें भी क़त्ल कर दिया है और सब्बे अली को एक सुन्नते जारिया क़रार दिया है जिस पर बच्चे जवान हो जाएँ और जवान बूढ़े हो जाएँ। फ़लाहुला-विला कुव्वता इल्ला बिल्लाहिल-अलिउल अज़ीम ’ ।

हमारा ये सवाल फ़िर पलट कर आता है कि दोनों गिरोह में कौनसा गिरोह हक़ पर था और कौन सा बातिल पर ?

माज़अल्लाह अली और उनके शिया ज़ालिम ओ बातिल हैं या माविया और उसके पैरोकार — और दोनों सूरतों में अदलते सहाबा का क़ानून तो बहरहाल बातिल हो जाता है और अदालते सहाबा का अक़ीदा एक तनाक़ुज़ और तज़ाद ही का शिकार हो जाता है जो अक़्ले सलीम और मन्तिक़े सही से हम आहन्ग नहीं हो सकता।

इन तमाम मौज़ूआत की इतनी मिसालें हैं जिन्हें ख़ुदा के अलावा कोई शुमार नहीं कर सकता है तो मैं तो तफ़सीलात में जाना चाहता हूँ और तमाम मौज़ूआत को शर्तो बसत के साथ बयान करूँ तो बड़ी बड़ी जिल्दे तैयार हो सकती हैं लेकिन मेरा मक़सद तो इख्तेसार के साथ चन्द मिसालों का बयान कर देना था जो अल्हम्दुलिल्लाह मेरे मक़सद की वज़ाहत और उसके सबूत के लिऐ काफ़ी है जिनसे उन लोगों के ख्यालात की तरदीद हो जाती है जिन्होंने मेरी फ़िक्र को एक मुद्दत तक ज़ामिद बनाए रखा और मेरे ऊपर तमाम नए आफ़ाक़ के रास्ते बन्द कर दिए कि मैं तारीख़ी वाक़ेयात का तज्ज़िया कर सकें और उन्हें शरई और अक़्ली मेयारों पर परख कर उनके बारे में फ़ैसला कर सकूँ ।जिन मवाज़ैन और मक़ाईस का इशारा क़ुरआने मजीद और सुन्नते शरीफ़ ने दिया है।

अब मैं अपने नफ़्स से बग़ावत करूंगा और तास्सुब के गुबार को झाड़कर ,तमाम क़ैद ओ बन्द से आज़ाद होकर मसाएल पर ग़ौर करूंगा — वो क़ैद ओ बन्द जिसमें मुझे बीस साल से ज़्यादा जकड़ कर रखा गया था और अब मेरी ज़बाने हाल आवाज़ दे रही है —

“ काश मेरी क़ौम इस अम्र से बाख़बर होती कि मेरे रब ने मुझे बख़्श दिया है और मुझे बुज़ुर्ग और मोहतरम अफ़राद में क़रार दे दिया है ,काश मेरी क़ौम को मालूम होता कि मैंने उस दुनिया का इन्केशाफ़ कर लिया है जिससे ये सब बेख़बर हैं और ये बिला मारेफ़त इससे इनाद ओ इख्तिलाफ़ से काम ले रहें हैं।

इन्क़ेलाब की इब्तेदा

मैं तीन महीने तक इन्तेहाई हैरत और कश्मकश के आलम में ज़िन्दगी गुज़ारता रहा ,जहां नींद में भी मुख्तालिफ़ ख़यालात और अवहाम मेरा दामने नज़र खींचते रहे और मुझे उन सहाबा से शिद्दत से खौफ़ था जिनके हालात के बारे में तहक़ीक़ कर रहा था जिनकी ज़िन्दगी में हैरत अंगेज़ क़िस्म की कजरवी का मुशाहेदा कर रहा था लेकिन मेरी सारी ज़िन्दगी ककई तरबियत मुझे औलियाऐ ख़ुदा और बन्दगाने सालेहीन की तक़दीस और ऐहतेराम की दावत दे रही थी जो अपने हक़ में बेअदबी करने वालों को मरने के बाद भी सख्त सज़ा दे सकते हैं।

खुसूसियत के साथ मैं किताब हयातुल हैवान दमेरी में ये वाक़्या पढ़ चुका था के क़ाफ़ले में एक शख़्स उम्र बिन ख्त्ताब को बुरा भला कह रहा था और लोग उसे मना कर रहे थे लेकिन वो बाज़ नहीं आता था नतीजा ये निकला के वो पेशाब करने गया तो एक साँप ने उसे डंस लिया और उसके बाद जब उसका इंटेकाल हुआ तो जहां जहां क़ब्र खोदी गई साँप निकल आया यहाँ तक के बाज़ उरफ़ा ने कहा के तुम सारी ज़मीन भी खोद डालोगे तो ऐसे साँप निकलते रहेंगे कि ख़ुदा उमर की शान में गुस्ताख़ी करने वाले को आखेरत से पहले दुनिया में ही सज़ा देना चाहता है।

इन हालात में ऐसी खतरनाक बहस में दाखिल होते हुऐ मैं लरज़ रहा था और फिर अपने मदरसे में ये सबक़ भी पढ़ चुका था कि तमाम खुलफ़ा में सबसे अफ़जल हाज़रा अबूबक्र सिद्दीक़ी हैं और उनके बाद उम्र फ़ारूख़ हैं जिनके जरिये ख़ुदा हक़ ओ बातिल में तफ़रिक़ा पैदा करता है और उनके बाद हज़रत जुलनूरैनउसमान हैं जिनसे मलाएक-ऐ-आसमान भी शर्माते हैं और उनके बाद हज़रत अली अ।स। हैं।

फिर इन सबके बाद हज़रत अशराऐ-मुबश्शिरा के बाक़ी छह अफ़राद हैं और उनके बाद बाक़ी सब सहाबाऐ किराम हैं लेकिन उनमें से किसी की शान में गुस्ताख़ी करना जायज़ नहीं है इसलिऐ की क़ुरआनी इरशाद है कि “रसूलों के दरमियान तफ़रीक़ नहीं हो सकती है ” और सबको एक नज़र से देखना चाहिऐ।

इस बुनियाद पर मैं मुसलसल खौफ़ज़दा होता रहा और बार बार अस्तग़फ़ार करके अपने इरादए बहस को तर्क करने के बारे में सोजता रहा जिस सहाबा के बारे में यानि अपने दिन के बारे में मशकूक हो जाने का ख़तरा था लेकिन इस मुद्दत में बाज़ उल्मा से गुफ़्तुगू करने के दौरान ऐसी मुतानाक़िज़ बातें सुनता रहा जिन्हें अक़्ल किसी क़ीमत पर क़ुबूल करने को तैयार नहीं थी और वो मुसलसल इस अम्र से डराते रहे कि अगर सहाबा के हालात में बहस ओ तहक़ीक़ का सिलसिला जारी रहा तो ख़ुदा नेमत को सल्ब कर सकता है और हलाक भी कर सकता है जिसकी बिना पर मेरी इल्मी फ़ुज़ूलियत ने मुझे मजबूर कर दिया कि मैं मंज़िले हक़ीक़त तक पहुँचने के लिए अपना तहक़ीक़ी सफ़र जारी रखूँ और इस ख़तरनाक वादी की सैर करता रखूँ इसलिए कि मैं अपने अंदर इन सबके खिलाफ़ एक कूवत पा रहा था जो मुझे मुसलसल हिम्मत दिला रही थी और जिसकी वजह से मैं अपनी बहस को जारी रखे हुआ था।

एक साहिबे इल्म से गुफ़्तुगू

मैंने अपने एक आलिम से कहा कि माविया ने इतने बेगुनाहों का क़त्ल किया और इतनी औरतों की बेहुरमाती की और आप हज़रत कहते हैं कि ये उसकी ख़ताए इज्तेहादी है और वो एक अज्र का मुस्तहक़ है — फ़िर यज़ीद ने फ़रज़न्दे रसूल को क़त्ल किया और मदीने की हुरमत को अपने लश्कर के लिऐ मुबाह क़रार दिया और आप लोगो कहते हैं कि ये उनकी ख़ताए इज्तेहादी है और वो एक अज्र का हक़दार है। यहाँ तक के बाज़ अफ़राद ने हज़रत हुसैन अलैहिस्सलाम को अपने नाना की तलवार का मक़तूल क़रार दिया है क़वानीने इस्लाम के ऐन मुताबिक़ था — तो फ़िर मैं क्यों न इज्तेहाद करूँ ? चाहे उसके नतीजे में सहाबा की अज़मत में शुबहात पैदा हो जाएँ और उनका इक़रार ख़त्म हो जाए — इसलिए कि मेरा जुर्म माविया के असहाबे रसूल और यज़ीदके फ़रज़न्दाने रसूल के क़त्ल से बहरहाल हल्का रहेगा ,तो मैं भी अगर सही रास्ते पर आगया तो दोहरे अज्र का मुस्तहक़ हूंगा वर्ण एक अज्र तो बहरहाल मिलेगा जबकि मैं सहाबा-ऐ-किराम को गालियाँ भी नहीं देता और उन्हें बुरा भला भी नहीं कहता हूँ सिर्फ़ उनकी कमज़ोरियों को वाज़ेह करके इस हक़ीक़त तक पहुँचना चाहता हूँ के तमाम फ़िरकों में निजात पाने वाला फ़िरक़ा कौन सा है और ये मेरा एक फर्ज़ है जो तमाम मुसलमानों पर आयद होता है के हक़ को तहक़ीक़ के साथ तशख़ीस दें — और ख़ुदा मेरे वतन और मेरे ज़मीर के हालात से बेहतर तौर पर बाख़बर है।

उस आलिम ने जवाब दिया के फ़रज़न्द!बाबे इज्तेहाद एक ज़माना हुआ बन्द हो चुका है ।

मैंने पूछा ये किसने बन्द कर दिया है ?

उसने कहा आइम्माऐ अरबा ने!

मैंने निहायत आसानी से कहा कि ख़ुदा का शुक्र है कि उसने या उसके रसूल ने या खुलफ़ाए राशिदीन ने नहीं बन्द किया है तो इस तरह आइम्माऐ अरबा ने इत्तेहाद किया है हमें भी इत्तेहाद करने का हक़ है उन्होंने कहा कि इज्तेहाद के लिऐ १७ उलूम में महारत दरकार है जिसमें इल्मे तफ़सीर ,लुगत ,नहू ,सर्फ़ ,बलाग़त ,हदीस और तारीख़ जैसे उलूम शामिल हैं।

मैंने कहा कि मुझे लोगों का अहकामे ख़ुदा और रसूल बताने और किसी मज़हब का इमाम बनने के लिऐ इज्तेहाद नहीं करना है मैं तो सिर्फ़ हक़ ओ बातिल का इम्तियाज़ करना चाहता हूँ और इसके लिऐ १७ उलूम की महारत की कोई ज़रूरत नहीं है इसके लिऐ तो सिर्फ़ हज़रत अली अलैहिस्सलाम और माविया की ज़िन्दगी का मुतालिआ काफ़ी है जिसे ये मालूम हो जाऐगा कि कौन हक़ पर था ? और कौन बातिल पर ?

उन्होंने फ़रमाया कि “ये मालूम करने की ज़रूरत ही क्या है ,एक क़ौम है जो गुज़र चुकी है वो अपने आमाल की ख़ुद ज़िम्मेदार है और तुम से उनके आमाल के बारे में सवाल नहीं किया जाऐगा ” ।

मैंने पूछा कि आयात में आप “तसअलून ” की ‘ते ’ को ज़बर के साथ पढ़ते हैं कि पेश के साथ ?

फ़रमाया पेश के साथ।

मियाने अर्ज़ की अलहम्दुलिल्लाह---अगर ये लफ्ज़ ज़बर के साथ होता तो मैं अपनी बहस को खत्म कर देता लेकिन जब पेश के साथ तो इस का मतलब ये हे कि ख़ुदा हमसे उनके आमाल का मुहासिबा नहीं करेगा और “हर शख़्स अपने आमाल का ज़िम्मेदार है ”—“ हर इंसान का उतना ही हिस्सा है जितनी उसकी अपनी सई और कोशिश है ” लेकिन क़ुरआन मजीद में हमे गुज़िशता उम्मतों के बारे में मालूमात हासिल कने और उनके वाक़ेयात से इबरत हासिल करने का हुक्म दिया है और ख़ुद फ़िरओन ,हामान ,नमरूद और क़ारून जैसे अफ़राद और अंबियाऐ साबेक़ीन और उनकी उम्मतों के वाक़ेयात का तज़किरा किया है न इसलिए कि उससे तस्कीन हासिल की जाए बल्कि इसलिऐ कि हक़ और बातिल में इम्तियाज़ पैदा हो जाऐ और आपका ये कहना के हमारे लिऐ इस तहक़ीक़ की कोई अहमियत नहीं है तो आपके लिऐ न होगी लेकिन मेरे लिऐ है।

सानियन — इसलिए कि मैं चाहता हूँ कि परवरदिगार की इबादत के तरीक़े दरयाफ़्त करूँ और उन फ़राएज़ पर अमल करूँ जो उसने हमारे ज़िम्मे आयद किऐ हैं न इस तरह जिस तरह मालिक या अबूहनीफ़ा या दूसरे हज़रात चाहते हैं इसलिए मैं देख रहा हूँ कि मालिक ने नमाज़ में बिस्मिल्लाह को मकरूह क़रार दिया है और अबू हनीफ़ा ने वाजिब , और दूसरे हज़रात इसके बग़ैर नमाज़ को बातिल क़रार देते हैं जबकि नमाज़ सतूने दीन है अगर वो क़ुबूल हो जाएँ तो सारे आमाल क़ुबूल हैं वरना सारे आमाल रद कर दिए जाने के क़ाबिल हैं।

ऐसी हालत में मैं नहीं चाहता कि मेरी नमाज़ बातिल हो जाऐ जिस तरह के शिया वुज़ू में पैर के मसअ: के क़ायल हैं और अहले सुन्नत धोने के क़ायल हैं — और क़ुरआने मजीद का हुक्म है कि “अपने सरों और पैरों का मसअ: करो ” और ये मसअ: के बारे में सरीही हुक्म है तो एक मुसलमान के लिऐ ये किस तरह मुम्किन है कि एक शख़्स का क़ौल क़ुबूल कर लें और दूसरे के कलाम को रद्द कर दें और इस सिलसिले में कोई तहक़ीक़ और तमहीस भी ना करें।

उन्होंने फ़रमाया कि तुम्हारे लिऐ ये मुम्किन है कि जो पसन्द आऐ उसे इख्तियार कर लो कि ये सब ही इस्लामी मज़ाहिब हैं और सबने रसूले अकरम से अपना मज़हब हासिल किया है।

मैंने अर्ज़ की कि मुझे खौफ़ है कि मैं आयते करीमा का मिस्दाक़ न बन जाऊँ “क्या तुमने उसे देखा है जिसने अपनी ख़ाहिश को ख़ुदा बना लिया है और ख़ुदा ने उसे इल्म के बावजूद गुमराही में छोड़ दिया है और उसके कान और दिल पर मुहर लगादी है और उसकी आँखों पर परदे पड़े हुए हैं और ख़ुदा के बाद कौन हिदायत दे सकता है ,क्या तुम नसीहत नहीं हासिल करते हो! ”सूरऐ जासिया-२३।

मैं ये अक़ीदा नहीं पैदा कर सकता कि तमाम मज़ाहिब हक़ पर हैं जबकि एक मज़हब एक शै को हलाल क़रार देता है और दूसरा हराम और वक़्ते वाहिद में एक ही चीज़ हराम और हलाल नहीं हो सकती है और न ख़ुदा और न रसूल के अहकाम में तज़ाद पैदा हो सकता है ,रसूल का कलाम वहिऐ इलाही का नतीजा है और वही की अलामत ही ये है कि उसमें इख्तिलाफ़ नहीं हो सकता —“ अगर क़ुरआन ग़ैर ख़ुदा की तरफ़ से होता तो इसमें बकसरत इख्तिलफ़ात पाऐ जाते ” सूरऐ निसा ८२।

मज़ाहिबे अरबा का इख्तिलाफ़ ख़ुद इस बात की दलील है कि ये ख़ुदा की तरफ़ से नहीं है और न मेरा ताअल्लुक़ रसूले अकरम से है कि रसूले अकरम क़ुरआन के खिलाफ़ कोई हुक्म नहीं दे सकते हैं।

आलिमे दीन ने मेरे कलाम की माक़ूलियत और इसके मन्तिक़ी अंदाज़ को देख कर फ़रमाया कि मैं तुम्हें बराए ख़ुदा ये नसीहत करता हूँ कि जिस चीज़ में चाहो शक करो — ख़बरदार खुलफ़ाए राशिदीन के बारे में शक न करना कि ये सब इस्लाम के सतून है अगर सतून ही मुन्हदिम हो गया तो सारी इमारत मुन्हदिम हो जाऐगी।

मैंने अर्ज़ की हुज़ूर अगर येही सब दीन के सतून हैं तो रसूले अकरम की जगह कहाँ है ? और उनका इसलाम से क्या ताअल्लुक़ है ?

फ़रमाया वो बुनियादे दीन हैं और अस्ल में उन्हीं का नाम इस्लाम है।

मैंने ये सुनकर मुस्कुराया और मैंने अस्तग़फ़ार करते हुए कहा कि आपका मक़सद ये है कि रसूले अकरम भी इन्हीं चारों हज़रात के बग़ैर क़ायम नहीं रह सकते हैं जबकि रबबूल आलेमीन का इरशाद है “उस ख़ुदा ने अपने रसूल को दीने हक़ के साथ भेजा है ताकि इस दीन को तमाम अदयान पर ग़ालिब बनाऐ और ख़ुदा गवाही के लिऐ काफ़ी है ” सूरऐ फ़तह-२८।

ख़ुदा ने अपने पैग़म्बर को को रिसालत के साथ भेजा और चार में से किसी को शरीके रिसालत नहीं बनाया बल्कि साफ़ साफ़ ऐलान कर दिया कि “जिस तरह हमने तुम्हारे दरमियान एक रसूल भेजा जो तुम्हारे सामने हमारी आयात की तिलावत करता है तुम्हारे नुफ़ूस को पाकीज़ा बनाता है तुम्हें किताबो हिकमत की तालीम देता है और वो सब कुछ बताता है जो तुम नहीं जानते थे ” सूरऐ बक़रा आयत १५१।

उन्होंने फ़रमाया कि ये बाते हमने अपने बुज़ुर्गों से सीखा है और हमारे दौर में बुज़ुर्गों से बहस करने का रिवाज नहीं था कि जिस तरह के तुम लोग इस दौर में बहसो मुबाहेसा करते हो और हर चीज़ में शक ओ शुबह पैदा करते हो जो दर हक़ीक़त क़ुरबे क़यामत के अलामात हैं जैसा कि रसूले अकरम ने फ़रमाया है कि “क़यामत बदतरीन अफ़राद के दौर में क़ायम होगी ” ।

मैंने अर्ज़ की हुज़ूर इस क़दर दमकी न दें ,मैं न दीन में ख़ुद शक करता हूँ न शक पैदा करता हूँ मेरा ईमान ख़ुदाऐ वहदहू लाशरीक ,उसके मलाऐका और उसकी कुतुब और रसूल सब पर है मैं सरकारे दो आलम हज़रते मुहम्मदे मुस्तफ़ा स।अ।व।व। को ख़ुदा का बन्दा और उसका रसूल ,अफ़्ज़ले अंम्बिया ओ मुरसेलीन और खातिमुल नबीईन मानता हूँ ,मैं एक मुसलमान इंसान हूँ आप मुझे तशकीक का इल्ज़ाम न दें! उन्होंने कहा कि मैं इससे बड़ा इल्ज़ाम देता हूँ कि तुमने हज़रत अबूबकर और हज़रत उमर के बारे में शुबहात पैदा किये हैं जबकि रसूले अकरम ने फ़रमाया है कि “अगर सारी उम्मत का ईमान अबूबक्र के ईमान के साथ तोला जाऐ तो अबूबकर का पल्ला भारी होगा ” और हज़रत उम्र के बारे में फ़रमाया है कि “मेरी उम्मत को मेरे सामने पेश किया गया तो उसका पैरहन सीने तक भी नहीं पहुँचा था और उमर को पेश किया गया तो उनका पैरहन ज़मीन पर ख़त देता जा रहा था ” “और जब लोगों ने इस कलाम की तावील दरयाफ़्त की तो फ़रमाया कि ये दीन की ताबीर है ” और जब तुम चौदवी सदी हिजरी में अदालते सहाबा में शक करते हो और हज़रते अबूबक्र ओ उमर की अज़मत में शुबहा करते हो क्या तुम्हें नहीं मालूम के अहले ईराक़ अहले शक़्क़ाक़ और अहले कुफ्र ओ निफ़ाक़ है।

अज़ीज़ाने मोहतर्म मैं ऐसा मुद्दई-ऐ-इल्म के बारे में मैं क्या कहूँ जो गुनाहों की इस क़दर जुरअत करता हो और जीदाले आहसन के बजाए इस तरह कि इफ़्तेरा परदाज़ी से काम लेता हो और लोगों के सामने इस तरह के प्रोपैगंडे करता हो जिससे उनकी आँखें सुर्ख़ हो जाएँ ,गले की रगें फूल जाएँ और चेहरे से शर के आसार नुमाया हो जाएँ मेरे पास इसके अलावा और कोई चारऐ कार नहीं था के मैं फ़ौरन वापस घर आगया और मैंने इमाम मलिक की मौता और बुख़ारी की सही उठाई और ले जाकर उन बुज़ुर्ग के पास पहुँच गया और मैंने अर्ज़ की कि मुझे इस शक पर ख़ुद पैग़म्बरे इस्लाम ने आमादा किया और ये कह कर मैंने मौता खोली और उसमें से मालिक की ये रिवायत निकाली कि रसूले अकरम ने शोहदाऐ ओहद की तरफ मुँह करके फ़रमाया कि ये वो अफ़राद है जिनके बारे में मैं गवाही दे रहा हूँ – तो अबूबक्र ने कहा कि या रसूल अल्लाह क्या हम इनके भाई नहीं हैं ? कि जिस तरह ये ईमान लाए हैं उसी तरह हम भी ईमान लाए हैं और जिस तरह इन्होंने जिहाद किया है हमने भी जिहाद किया है आपने फ़रमाया कि ये सही है लेकिन ये क्या मालूम कि तुम मेरे बाद क्या करने वाले हो ” ये सुनकर अबूबकर रोऐ और बहुत रोऐ और कहा “हम आपके बाद रहने वाले हैं ” मौता जिल्द १ सफ़हा ३०७ , मगाज़ी वाक़िदी सफ़हा -३१०।

इसके बाद मैंने सही बुख़ारी खोली और ये रिवायत निकली हज़रत उमर हफ़्सा के पास आऐ जब इनके पास असमा बिन्ते उमैस भी थी और उनको देख पूछा कि ये कौन हैं ? हफ़्सा ने कहा असमा बिन्ते उमैस हैं! तो उमर ने कहा यही हबशिया है और येही बहरिया है!जिस पर असमा ने कहा कि जी हाँ मैं हूँ!उमर ने कहा कि हमने तुमसे पहले हिजरत कि है लिहाजा रसूल के बारे में हमारा हक़ ज़्यादा है!

असमा को ये सुनकर गुस्सा आगया और उन्होंने कहा कि हरगिज़ नहीं तुम रसूल अल्लाह के साथ थे तो वो तुम्हारे भूकों को खाना खिलाते थे और तुम्हारे जाहिलों को मोयेज़ा फ़रमाते थे और हम एक दूर दराज़ ज़मीन पर थे लेकिन ख़ुदा और रसूल के हक़ में थे जब भी खाना खाते थे या पानी पीते थे तो पहले ख़ुदा के रसूल को याद करते थे — मैं अन्क़रीब तुम्हारी इस बात को हुज़ूर से नक़्ल करूंगी और ख़ुदा की क़सम किसी तरह के झूठ या ग़लत बयानी से काम नहीं लूँगी।

इसके बाद जब रसूले अकरम तशरीफ़ लाए तो असमा ने कहा कि उमर ने इस तरह की बातें की हैं।

आपने फ़रमाया तुमने क्या जवाब दिया है।

असमा ने अपना जावाब बयान किया ,आपने फरमाया कि उमर का तुम लोगों से ज़्यादा हक़ नहीं है उन्होंने एक हिजरत की है और तुम अहले सफ़ीना ने दो हिजरते की हैं।

असमा का बयान है कि इसके अबूमूसा और असहाबे सफ़ीना मेरे पास नुमाइन्दे भेजते रहे कि मुझसे इस हदीस की तफसील दरयाफ्त क्रेन किओ उनके हक़ में हुज़ूर की इस सनद से बड़ी और अज़ीम कोई शै मुसर्रत के लिऐ नहीं थी।

हमारे आलिमे दीन और हाज़िरीन ने इस रिवायत को पढ़ा तो एक दूसरे के मुँह को देखें लगे और सब इस बात के मुन्तज़िर थे के हमारे शेख़ साहब कोई जावाब देंगे लेकिन उन्होंने सिर्फ़ एक निगाहे हैरत उठाई और फ़रमाया कि “रब्बे ज़िदनी इलमन ” मैंने अर्ज़ की के अबूबक्र के बारे में रसूल अल्लाह को शक था और उन्होंने उनके ईमान की गवाही नहीं दी है कि ख़ुदा जाने उनके बाद क्या करने वाले हैं।

---और अगर रसूले अकरम ने उमर इब्ने खत्ताब को असमा बिन्ते उमैस से अफ़्ज़ल नहीं करार दिया है बल्कि उनकी फ़ज़िलत का ऐलान फ़रमाया है तो मुझे भी हक़ है कि मैं शक करूँ और किसी को उस वक़्त तक अफ़्ज़ल न क़रार दूँ जब तक कि मुकम्मल तहक़ीक़ न हो जाऐ---और मुझे मालूम है कि ये दोनों हदीसे उन तमाम हड़ीसोन से टकरा रही हैं जिनमें अबूबक्र ओ उमर के फ़ज़ाएल का ऐलान किया गया है और उन सब रिवायतों को बातिल क़रार दे रही है इसलिऐ कि ये डोननोन हदीसें हक़ीक़त से ज़्यादा करीब तर और अहादीसे फ़ज़ाएल ओ मनाक़िब से अक़्ल ओ मन्तिक़ से करीब हैं मेरी इस बात पर तमाम हाज़िरीन बोल उठे कि ये आपने किस तरह कह दिया है ? मैंने कहा कि रसूले अकरम ने अबूबक्र के बारे में कोई गवाही नहीं दी है और ये फ़रमाया है कि ख़ुदा जाने ये मेरे बाद क्या बिदअतें ईजाद करने वाले हैं----तो ये एक इन्तेहाई माकूल जिसकी क़ुरआने करीम और तारीख ने भी ताईद की है और जिसकी बिना पर वो रो भी रहे थे और उन्होंने दीन में तब्दीली भी की है और जनबे ज़हरा स।अ। को ग़ज़बनाक भी किया है और अपनी तब्दीलियों पर इस क़दर शरमिन्दा भी थे कि उनकी आरज़ू थी कि ऐ काश मैं भी इंसान के बजाऐ चिड़िया होता।

रह गई रसूल अकरम की तरफ़ मनसूब ये रिवायत कि “अबुब्क्र का ईमान सारी उम्मत के ईमान से ज़्यादा वज़नी है ” तो ये इन्तेहाई मुहमल और ग़ैरे माकूल बात है और ये ना मुमकिन बात है की जिस शख़्स ने चालीस साल बुतपरस्ती में गुज़ारे हों उसका ईमान सारी उम्मत के ईमान से ज़्यादा वज़नी हो जाऐ जबकि उम्मत में औलियाऐ सालेहीन और शुहड़ा ओ सिद्दीक़ीन भी हैं और आइम्माऐ ताहिरीन भी हैं जिन्होंने तमाम ज़िन्दगी जिहाद और राहे ख़ुदा में गुज़ारी है---फ़िर अगर ये रिवायते ईमान सही थी तो ख़ुद अबूबक्र ने इसे क्यों नज़र अंदाज़ कर दिया जबकि वो ये आरज़ू कर रहे थे कि ऐ काश में इन्सान न होता---और अगर उनका ईमान सारी उम्मत से बालातर था जनाबे फ़ातेमा स।अ। उनसे किस तरह नाराज़ हुई कि हर नमाज़ में उनके लीऐ मुस्तक़िल बददुआ करती रहीं।

हमारे आलिमे दीन ने इस बात का कोई जवाब नहीं दिया लेकिन बाज़ हाज़िरीन ने ये ज़रूर कहा कि इस हदीस ने तो हमारे दिलों में शक पैदा कर दिया है जिसे सुनकर आलिमे दीन ने मुझसे फ़रमाया कि तुम यही चाहते थे और बिलआख़िरइनके दिलों में शक पैदा कर ही दिया जिस पर एक शख़्स बोल पड़ा कि ये बिलकुल सही कहते हैं और हमारी बदक़िसमती है कि हमने आज तक कोई मुकम्मल किताब नहीं पढ़ी है और हमेशा आप हज़रत अन्धी तक़लीद में पड़े रहे हैं आज ये मालूम हुआ कि इस हाजी ने बिलकुल सही बात कही है------लिहाज़ा हमारा फर्ज़ है के हम ख़ुद पढ़े और तहक़ीक़ करें जिस पर बाज़ हाज़िरीन ने इत्तेफ़ाक़े राय का इज़हार किया और हक़ और हक़ीक़त की पहली फ़तह का ऐलान हो गया---ये फ़तह किसी क़हर ओ ग़ल्बा का नतीजा नहीं था बल्कि अक़्ल ओ मन्तिक़ और हुज्जत ओ बुरहान का नतीजा थी और इसीलिए क़ुरआन मजीद ने बार बार कहा है कि अगर तुम सच्चे हो तो दलील और बुरहान ले आओ और इसी बात ने मुझे बहस ओ तामहीस पर आमादा किया था और उसके दरवाज़े को पाटो पाट खोल दिया था मैंने नामे ख़ुदा ले कर इस मैदान में क़दम रखा और मिल्लते रसूल का इत्तेबा किया और ख़ुदाए पाक से तौफ़ीक़ ओ हिदायत का उम्मीदवार रहा कि उसने हर तहक़ीक़ करने वाले से हिदायत का वादा किया है और वो अपने वादे के खिलाफ़ नहीं करता है।

मेरी तलाश दिक़्क़ते नज़र के साथ तीन साल तक जारी रहे और मैंने हर मुतालिए को बार बार दोहराता रहा और एक एक किताब को मुकर्रर अव्वल से आख़िर तक पढ़ता रहा।

मैंने इमाम शर्फ़ुद्दीन मूसवी की किताब “अल मराजिआत ” पढ़ी और बार बार उसका मुतालिआ किया जिसने मेरे सामने नए नए दरवाज़े खोल दिए और यही बात मेरी हिदायत ओ शरहे सदर का सबब बनी कि मेरा दिल मुहब्बते अहलेबैते अतहार के लिए कुशादा हो गया।

मैंने शैख़ अमीनी की किताब “अल-ग़दीर का मुतालिआ किया और तीन मर्तबा मुतालिआ किया कि इस किताब में वाज़ेह और पुरमग़ज़ हक़ाएक़ पाऐ जाते हैं फ़िर मैंने सैयद मुहम्मद बाक़िरुल सदर की किताब “फ़िदक ” और शैख़ मुहमंद रज़ा मुज़फ़्फ़र की किताब “अस-सकीफ़ा ” का मुतालिआ किया जिसने बहुत से पुर असरार मामलात को वाज़ेह किया--- फ़िर मैंने किताब “अल-नस-वल-इज्तेहाद ” का मुतालिआ किया जिसने मेरे यकीन में और इज़ाफ़ा कर दिया।

फ़िर सैयद शर्फ़ुद्दीन की किताब “अबूहुरैरा ” और शैख़ मुहम्मद अबूरिया मिस्री की किताब “शैख़ुल मुज़ीरा ” पढ़ी जिससे ये वाज़ेह हो गया कि रसूले अकरम के बाद दीन बदलने वाले सहाबा की दो किस्में थी ,बाज़ ने क़हर ओ ग़ल्बा और हुकूमत के ज़ोर पर तबदीली पैदा की थी और बाज़ ने झूठी हदीसों को वज़्ह करके ये कारोबार अंजाम दिया था।

इसके बाद मैंने जनाब असद हैदर की किताब ‘अल इमाम सादिक़ वल मज़ाहिबे अरबा ” का मुतालिआ किया और मुझे इस अम्र का अंदाज़ा हुआ कि वहबी इल्म में और दुनिया के इक्तेसाबी इल्म में क्या फ़र्क़ होता है और वो हिकमते इलाही क्या होती है जो ख़ुदा अपने मख़सूस बंदों को इनायत करता है और वो इल्म ओ इज्तेहाद बिल बराए किया होता है जो उम्मत को रूहे इस्लाम से क़रीबतर बना देता है।

इसके बाद मैंने सैयद जाफ़र मुरतज़ा आमिली और सैयद मुरतज़ा असकरी ,सैयद ख़ुई ,सैयद तबातबई ,शैख़ मुहम्मद अमीन ज़ैनुद्दीन ,फ़िरोज़ाबादी ,इब्ने अबील हदीद और ताहा हुसैन की फ़ितनतुल कुबरा वग़ैरा जैसी किताबों का मुतालिआ किया और कुतुबे तवारीख़ में तारीखे तबरी ,तारीखे इब्ने असीर ,तारीखे मसऊदी ,तारीखे याक़ूबी वग़ैरा किताबों का मुतालिआ किया और इस क़दर मुतालिआ किया कि मुझे यक़ीन हो गया कि शिया मज़हब बिलकुल बरहक़ है और मैंने इस मज़हब को इख्तियार कर लिया और ख़ुदाऐ करीम के फज़ल से सफ़ीनऐ निजात आले मुहम्मद पर सवार हो ज्ञ अब मेरा तमस्सुक ईमान हिदायते इलाही और मुवद्दते आले मुहम्मद से है और मैंने ये तय कर लिया है की अहलेबैत उन असहाब से यक़ीनन अफ़जल हैं जिनमें से बाज़ उल्टे पाँव पुराने मज़हब की तरफ़पलट गऐ थे और चन्द एक के अलावा निजात पाने वाला नहीं है हमारे लिऐ वसीलऐ निजात सिर्फ़ आइम्माऐ अहलेबैत हैं जिनसे ख़ुदा ने ने हर रिज्स को दूर रखा है और उन्हें कमाले तहारत के दरजे पर फ़ायज़ किया है उनकी मुहब्बत को सारे इन्सानों पर वाजिब किया है और उसी को अज्रे रिसालत क़रार दिया है।

अब शिया हमारी निगाह में वो नहीं हैं जो हमारे बुज़ुर्गों ने बताऐ थे की ये चन्द ईरानी मजूसी थे जिनकी शान ओ शौकत को जंगे क़ादिसया में हज़रत उमर ने ख़त्म कर दिया था इसलिए ये लोग हज़रत उमर से नफ़रत करते हैं अब तश्य्यो इरानियों का हिस्सा है न इराक़ियों का , शिया ईरान , इराक़ , हिजाज , सऊदिया , लेबनान , शाम जैसे तमाम अरब मुल्कों में भी पाऐ जाते हैं और पाकिस्तान , हिंदुस्तान , अफ्रीका , अमरीका जैसे दूसरे मुमालिक में भी , ये न अरब से ताल्लुक रखते हैं न अजम से।

अगर शिया सिर्फ़ ईरान ही में होते तो उनकी दलील और मुस्तहकम होती की ये लोग आइम्माऐ असना अशर की इमामत के क़ायल हैं और वो सब के सब क़ुरैश ,बनी हाशिम ,और ज़ुरियते रसूले अरबी से थे — तो अगर बात तास्सुब की होती और अजम अरब को बर्दाश्त न करते तो ये लोग बारह इमाम के भी क़ायल न होते जैसा कि बाज़ लोगों का ख़्याल था और सलमाने फ़ारसी को अपना इमाम बना लेते इसलिए के वो जलीलुल क़द्र सहाबी थे और अजम भी थे लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ---बल्कि इसके बरअक्स अहलेसुन्नतों ने भी अजमों को अपना इमाम क़रार दिया है और इसके बेशतर इमाम अजम हैं। इमाम अबूहनीफ़ा , इमाम निसाई , तिरमिज़ी , बुख़ारी , मुस्लिम , इब्ने माजा , राज़ी , ग़ज़ाली , इब्ने सीना , फ़राबी जैसे आइम्माऐ फ़न सब अजम हैं और अरब उन्हें अपना इमाम तस्लीम करते हैं और अगर ईरानियों की नफ़रत हज़रत उमर से उनके अरब होने और अजम की शान ओ शौकत पामाल कर देने की बिना पर होती तो शियों में ग़ैरे अजम और अरबों में कोई न होता हालांकि ऐसा कुछ नहीं है और शिया हर क़ौम में पाऐ जाते हैं और उन लोगों ने उमर इब्ने खत्ताब को उनके अफ़आल औरे किरदार की बिना पर मुस्तरद किया है कि उन्होंने अमीरुल मौमिनीन सैय्यदुल वसीईन हज़रत अली अ।स। को खिलाफ़त से महरूम किया है और इसके नतीजे में बेशुमार फ़ितने और मसाएब पैदा कर दिए हैं जिसे उम्मते इस्लामिया पारा पारा हो गई है और यही वो हक़ाएक़ जिसका इन्क़ेशाफ़ हो जाना ही अदावत और नफ़रत के लिऐ काफ़ी है पहले से किसी अदावत और नफ़रत की कोई ज़रूरत नहीं है। और हक़ीक़ते अम्र ये है कि शिया अरब हों या अजम--उनका ईमान नुसूसे क़ुरआनिया और इरशादाते नबविया पर है और उन्होंने इमामूल हुदा और उनकी औलादे ताहिरीन का इत्तेबा किया है उनके अलावा किसी को पसन्द नहीं किया है और बनी उमैय्या की तरगीब और तरबियत की सियासत से बालातर होकर हक़ाएक़ का फ़ैसला किया है जबकि बनी उमैय्या और बनी अब्बास ने सात सदियों तक उन्हें तलाश करके उनका इस्तीसाल किया है और उन्हें क़त्ल ओ ख़ून ,आवारा वतनी और महरूमी जैसी हर मुसीबत से दोचार किया है और उनके अताया पर पाबन्दी आयद की है और उनके आसार को महो कर दिया है और उनके खिलाफ़ ज़बरदस्त प्रोपैगन्डा किया है जिससे उमूमी नफ़रत पैदा हो जाऐ और इसका सिलसिला नस्लों में बाक़ी रहे और शिया इन तमाम मसाएब के मुक़ाबले में साबित क़दम रहे ,उन्होंने सब्र ओ इस्तेक़ामत से काम लिया है और हक़ से वाबस्ता रहे ,न किसी ने मलामत करने वाले की मलामत का ख़्याल किया और न किसी तरगीब ओ तरहीब के दबाव में आए और इसी सब्र ओ इस्तेक़ामत और सबात क़दम की क़ीमत आज तक अदा कर रहे हैं और मैं अपने तमाम उल्मा को चैलेंज करता हूँ की उनके किसी आलिम के साथ बैठ जाएँ और थोड़ी देर गुफ़्तुगु कर लें उसके बाद इन्शाअल्लाह हिदायत लेकर ही उठेंगे और उनके तुफ़ैल में राहे हक़ पर आ जाएँगे।

अल्हम्दोलिल्लाह की मैंने अपने मज़हब और अपने सहाबा का बदल पा लिया है ये ख़ुदा का करम है की उसने हिदायत दे दी वरना उसकी हिदायत शामिले हाल न होती तो मैं राहे हक़ पर नहीं आ सकता था।

उसका लाख लाख शुक्र है की उसने फ़िरक़ऐ नाजिया का पता चला दिया है जिसे मैं बड़े शौक़ से तल्श कर रहा था और अब मेरे दिल में कोई शक ओ शुबहा नहीं है की जिसने अली और उनके अहलेबैत से तमस्सुक इख्तियार किया वो ईउमान और हिदायते इलाही से मुतामस्सिक हो गया और उस पर बेशुमार नुसूसे नबविया दलालत करती है जिन पर उल्माऐ इस्लाम का इज्मा है — और अक़्ल खुद भी बेहतरीन दलील और रहनुमा है हर शख़्स के लिऐ जो बग़ौर हरफ़े हक़ सुने और हाज़िर दिमाग़ रहे।

मेरी नज़र में हज़रत अली अ।स। ब-इज्माऐ उम्मत तमाम सहाबा से ज़्यादा इल्म ओ फज़ल और शुजा ओ बहादुर थे और ये बात भी उनकी अहक़ियत खिलाफ़त के लिऐ काफ़ी है दूसरे दलाएल की ज़रूरत ही नहीं है इरशादे रब्बुल इज़्ज़त है “उनके नबी ने कहा कि ख़ुदा ने तालूट को तुम्हारा बादशाह बना कर भेजा है तो उन लोगों ने कहा कि वो किस तरह सरदार और बादशाह बनेंगे उनके पास तो माले दुनिया नहीं है तो नबी ने जवाब दिया कि उन्हें अल्लाह ने चुना है और इल्म ओ जिस्म की वुसअत अता की है और वो अपना मुल्क जिसको चाहता है अता करता है कि वो साहिबे वुसअत भी है और आलिम ओ दाना भी है। सूरऐ बक़रा-२४७।

रसूले अकरम का इरशाद है “अली मुझसे है और मैं अली से हूँ वो मेरे बाद तमाम साहिबाने ईमान का वली और हाकिम है ” ।सही तिरमिज़ी जिल्द-५ सफ़्हा २९६ ,खसाएसे निसाई सफ़हा-८७ ,मुस्तदरके हाकिम जिल्द-३ ,सफ़हा-११०।

इमामे ज़म्ख़शरी ने अपने अशआर में इसी हक़ीक़त का ऐलान किया है:-

इख्तिलाफ़ और शक भी है बेहद----और फ़िर सबकी राह है सीधी

मैं तो तौहीद से हूँ वाबस्ता--- --- ---मेरे महबूब हैं नबी ओ अली

सगे असहाबे कहफ़ था फ़ाएज़---अब है फ़ाएज़ मुहिब्बे आले नबी

बेशक मैंने पुराने रहनुमाओं का बदल पा लिया है और अब मैं बेहम्देलिल्लाह रसूले अकरम के बाद अमीरुल मोमिनीन ,सैय्यदुल वसीईन ,क़ायदुल गुररिल महजिलीन ,असादुल्लाहिल ग़ालिब अल-इमाम अली इब्ने अबी तालिब और सैय्यदी शबाबे अहलेजिन्ना ,रेहाने मुस्तफ़ा इमाम अबु मुहम्मद उल हसन उज़्ज़की और इमाम अबू अब्दुल्लाहिल हुसैन और बिज़अतुर-रसूल ,ख़ुलासाऐ नबूवत ,उम्मुल आइम्मा ,सैय्यदतुल-निसा हजरते फ़ातिमा ज़हरा अलैहुमुस्सलाम की इक़्तेदा करता हूँ जिनके ग़ज़ब से ख़ुदा भी ग़ज़बनाक होता है।

मैंने इमाम मालिक के बदले उस्तादुल-आइम्मा और मुअल्लिमुल-उम्मता हज़रते जाफ़र अलैहिस्सलाम को पा लिया है और मेरा तमस्सुक ज़ुर्रियते इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के नौ आइम्मा से है जो मुसलमानों के इमाम और ख़ुदा के वली हैं।

मैंने माविया ,उमरुआस ,मुगीरा बिन शेबा ,अबूहुरैरा ,अकरमा ,काअबुल-अहबार ,जैसे दीने जाहिलयत की तर्फ पलट जाने वाले असहाब के मुक़ाबले में उन असहाब को पा लिया है जिन्होंने अहदे रिसालत से वफ़ा की है और हर हाल में शुक्रे ख़ुदा अदा किया है जैसे अम्मार बिन यासिर ,सलमाने फ़ारसी ,अबूज़रे ग़फ़ारी ,मिक़दाद बिन आस्वाद ,खज़ीमा बिन साबित ,ज़ुल शहादतैन अबी इब्ने काअब वग़ैरा और इस नेक हिदायत पर ख़ुदा का लाख लाख शुक्र है।

मैंने अपने उल्माऐ किराम जिन्होंने हमारी अक़्लों को जामिद बना दिया था और जिनमें की अकसरियत सलातीने वक़्त की ताबे और हुक्काम जौर की ग़ुलाम थी और उनके बदले उन उल्माऐ शिया को पा लिया है जिन्होंने इज्तेहाद के दरवाज़े को बन्द नहीं किया और हुक्काम ओ सलातीन की चौखट पर जुब्बा साई नहीं की है।

बेशक मैंने मुतास्सिब और तनाक़िज़ात से भरे हुऐ महदूद अफ़कार की जगह उन अफ़कार को इख्तियार किया है जो रौशन और आज़ाद और दलील ओ हुज्जत ओ बुरहान के ताबे हैं---और दौरे हाज़िर की इस्तेलाह ,मैंने अपने ज़ेहन को तीस साल के उमवी क़िस्म के कसीफ़ ख़्यालात से अक़ीदऐ तहारते मासूमीन के ज़रिये धो डाला है ताकि आईन्दा ज़िन्दगी तहारते फ़िक्र ओ पाकीज़ा ख़्यालात के साथ गुज़ार सकूँ।

ख़ुदाया!हमे अहलेबैत के रास्ते पर ज़िन्दा रखना और उन्हीं के तरीक़े पर मौत देना ,मैदाने महशर में हमारा हशर उन्हीं के साथ हो कि तेरे रसूल ने ऐलान किया है कि इंसान का हशर उसके महबूब के साथ होता है।

इस इन्क़ेलाबे अक़ीदे के ज़रिये मैं अपनी नस्ल की तरफ़ वापस आ गया कि मेरे बुज़ुर्गाने ख़ानदान का बयान है कि हम लोग शजरे के ऐतेबार से सादात हैं जो बनी अब्बास के मज़ालिम की बिना पर इराक़ से भाग कर शुमाली अफ़्रीका आ गए थे और फ़िर तयूनस में क़याम किया था जिसके आसार आज तक पाऐ जाते हैं इसके अलावा शुमाली अफ़्रीका में एक बड़ी आबाड़ी है जिसको अशराफ़ से ताबीर किया जाता है और ये सब नसले रसूले अकरम से है लेकिन बनी उमैय्या और बनी अब्बास के मज़ालिम की वजह से हक़ीक़त से दूर निकल गए हैं और इनके पास अवामी ऐजाज़ ओ ऐहतेराम के अलावा सियादत ओ शराफ़त का मज़हर नहीं रह गया है।

ख़ुदा का लाख लाख शुक्र है कि उसने मुझे हिदायत दे दी है और मेरी आँखों को खोल कर रख दिया है हक़ीक़त मुझ पर वाज़ेह हो गई है और राहे हक़ मेरे लिए मुकम्मल तौर पर रौशन और ताब नाक हो गई है।

मेरे तशय्यो के असबाब

जिन मुखतलिफ़ असबाब ने मुझे मज़हबे शिया इख्तियार करने की दावत दी और मुझे इस मंज़िले हक़ीक़त तक पहुंचाया उनकी दास्तान बहुत तवील है और उनका एहसा इस मुख़तसर वक़्त में मुमकिन नहीं है सिर्फ़ चन्द बुनियादी असबाब की तरफ़ इशारा कर देना काफ़ी है।

१:-नस्से खिलाफ़त:-मैंने इस बहस के आगाज़ ही में ये तय कर लिया था कि मैं उन्हीं बयानत पर ऐतेबार करूंगा जो फ़रीक़ैन के दरमियान मुत्तफ़िक़ अलैह और क़ाबिले ऐतेमाद होंगे और किसी एक फ़िरक़े के मुन्फ़रिद बयान को हरगिज़ क़ाबिले ऐतेनाअ नहीं क़रार दूंगा---और इसी बुनियाद पर मैंने अबू बक्र और हज़रत अली इब्ने अबी तालिब के फ़ज़ाएल पर ग़ौर करना शुरू किया और ये तय करना शुरू किया कि खिलाफ़त के बारे में हज़रत अली अ।स। पर कोई नस थी या ये काम इन्तेख़ाब और शूरा के ज़रिये अन्जाम पाना चाहिए था ?

मेरे ख़्याल में इन्सान जुमला अवारिज़ और तअस्सुबात से अलग होकर सिर्फ़ हक़ीक़त पर निगाह रखे तो देखा कि हज़रत अली इब्ने अबी तालिब के बारे में वाज़ेह तौर पर नस मौजूद है जैसे हुज़ूरे अकरम का ये इरशाद है कि “मन कुन्तो मौलाहो फ़ ‘ हाज़ा अलीउन मौलाह ” जैसे हज जतुल विदा से वापसी के मौक़े पर इरशाद फ़रमाया था और जिसकी मुबारकबाद तामम सहाबा ने पेश की थी जिनमें अबूबक्र ओ उमर भी शामिल थे और उन्होंने कहा था कि “अबूतालिब के फ़रज़न्द मुबारक हो आज से आप तमाम मोमिनीन और मोमिनात के वली हो गऐ ” ।(मुसनदे अहमद जिल्द ४ सफ़हा-२८१ ,सिररुल आलिमीन गिज़ाली सफ़हा-१२ ,तज़किर-ऐ-ख़वासुल उम्मत सफ़हा-२८ ,अल-रियाज़ुल नुज़रा जि:-२ स:-१६९ ,कन्ज़ुल आमाल जिल्द ७६ स:-३९७ ,अल-बदाया वल-निहाया जि ;-५ स:-२१२ ,तारीखे इब्ने असाकर जि:-२ स:-५० ,तफ़सीरे राज़ी जि:-३ स:-६३ ,अल-हादिउल फ़तावा सेयूती जि:-१ स:-११२)।

इस नस पर अहले सुन्नत और शिया दोनों का इत्तेफ़ाक़ है ये और बात है के मैंने सिर्फ़ अहले सुन्नत के मसादिर का ज़िक्र किया है बाक़ी मसादिर का ज़िक्र नहीं किया है जो मज़कूरा माख़ज़ और मसादिर से कहीं ज़्यादा है और जिनकी तफ़सीलात के लिऐ अल्लामा अमीनी की किताब ‘अल-ग़दीर ’ का मुतालिआ करना होगा जिसकी तेहरा जिल्दें छप चुकी हैं और जिसमें मुसन्निफ़ ने अहले सुन्नत वल जमाअत के तरीक़ से रिवायत के तमाम रावियों का तज़किरा किया है।

रह गया वो इजमा जिसका इददुआ अबूबक्र की खिलाफ़त के बारे में किया गया है और जिसकी बुनियाद पर मस्जिदे रसूल में उनसे बैयत की गई थी तो वो एक दावऐ बिला दलील है जिकि कोई बुनियाद नहीं और उसका सबसे सुबूत ये है की हज़रत अली ,इब्ने अब्बास ,और तमाम बनी हाशिम के अलग रहने के बावजूद इजमा का इददेआ किस तरह किया जा सकता है ? फ़िर आम असहाब में सी भी बिन ज़ैद ,ज़ुबैर ,फ़ारसी ,अबूज़रे ग़फ़ारी ,मिक़दाद बिन असवद ,अममर बिन यासिर ,हुज़ैफा बिन यमान ,खज़ीमा बिन साबित ,अबूबुरैरदा असल्मा ,बरा: इब्ने आज़िब ,उबी बिन काअब ,सुहैल बिन हनीफ़ ,साद बिन उबाड़ा ,क़ैस बिन साद ,अबू अय्यूब अन्सारी ,जाबिर इब्ने अब्दुल्लाह ,ख़ालिद बिन सईद वग़ैरा ने भी शिरकत नहीं की और इन शिरकत न करने वालों की तादाद बहुत बड़ी है।(तबरी ,इब्ने असीर ,तारीख़ुल खुल्फ़ा ,तारीखे ख़मीस ,इस्तियाब वग़ैरा)

बन्द्गाने ख़ुदा!आप बताएँ इस इजमा की क्या हकीक अत है जिसमें इस क़दर जलीलुल क़द्र असहाब शरीक न हों चेजाऐके अगर तन्हा अली इब्ने अबीतालिब शरीक न होते तो भी इजमा बेक़ीमत था की वो तन्हा खिलाफ़त के उम्मीदवार थे और अगर उनके बारे में नस्से रसूल न होती तो उनका ज़िक्र बहरहाल आना चाहिए था।

हक़ीक़त ये है की अबूबक्र की बैयत बग़ैर किसी मशविरे के बल्कि मुसलमानों की ग़फ़लत के आलम में हो गई जबकि अरबाबे हल्लो अक़्द रसूले अकरम की तजहीज़ ओ तदफ़ीन में मशगूल थे और मदीने को अचानक वफ़ाते रसूल के हादसे से दो चार होना पड़ा था और फिर क़हर ओ जब्र के साथ उनके सर पर ये बैयत मुसल्लत कर दी गई थी।(तारीख़ुल खुल्फ़ा इब्ने क़तीबा जी:-१ स:-१८)

जिसका अंदाज़ा बैते फ़ातिमा में आग लगा देने की धमकी से होता है की अगर उस घर में रहने वाले बैयते अबूबक्र के लिए घर से बाहर न आऐ तो घर में आग लगा दी जाऐगी।

एसी हालत में ये क्योंकर कहा जा सकता है किअबूबक्र की बैयत किसी राय या मशविरे या इजमा का नतीजा थी जबकि ख़ुद उमर इब्ने ख़त्ताब का भी बयान है कि अबूबक्र की बैयत एक नागहानी हादेसा थी जिसके शर से ख़ुदा ने मुसलमानों को बचा लिया और अब अगर कोई ऐसा इक़दाम करेगा तो उसे क़त्ल कर दिया जाएगा या दूसरे अल्फ़ाज़ में कोई ऐसी बैयत की दावत देगा तो उसकी बैयत का कोई ऐतेबार न होगा।(बुख़ारी जी:-४ स:-१२७)।

इमाम अली अ।स। ने इस बैयत के बारे में इस तरह इरशाद फ़रमाया था कि “ख़ुदा की क़सम आईबीने आबी क़हाफ़ा ने क़मीज़े खिलाफ़त को खींच तानकर पहन लिया जबकि उसे मालूम था कि मेरी जगह इस खिलाफ़त में वो मरकज़ी जगह है जो चक्की में दरमियानी कील की जगह होती है कि इल्म का सैलाब मेरी ज़ात से जारी होता है और फ़िक्र का तायर मेरी बलन्दियों तक परवाज़ नहीं कर सकता है।

और साद बिन उबादा का बयान था कि जिन्होंने अबूबक्र और उमर से सकीफ़ा में शादीद इख्तिलाफ़ किया था और पूरी इम्कानी कोशिश की कि खिलाफ़त उन लोगों के हिस्से में न जाने पाऐ लेकिन मरज़ की बुनियाद पर बाक़ाऐदा तौर पर मुक़ाबिला न कर सके और जब अन्सार ने अबूबक्र की बैयत कर ली तो फरमाया कि ख़ुदा की क़सम मैं तुम्हारी बैयत नहीं करूंगा जब तक मेरे तरकश के तमाम तीर ख़त्म न हो जाएँ और मेरा नैज़ा ख़ून से रंगीन न हो जाऐ और मेरी तलवार तुम्हारे मुक़ाबिले में न उठ जाए मैं अपने अशीरे और क़बीले के सहारे तुमसे जंग करूंगा और ख़ुदा की क़सम तुम्हारे साथ अगर इन्सान और जिन्नात सब मिल जाएँ तो भी मैं बैयत नहीं करूंगा यहाँ तक के मैं अपने रब की बारगाह में पहुँच जाऊँ।

और इसी नज़रिये की बिना पर साद उनके नमाज़ और दीगर इजतेमाआत में शरीक नहीं होते थे और अगर उन्हें आवानो अन्सार मिल जाते तो यक़ीनन मुक़ाबिला करते और अगर एक शख़्स भी उनके हाथ पर जंग के लिऐ बेयत कर लेता तो जिहाद करते लेकिन मजबूरन ख़ुद बेयत से अलग हो गऐ और शाम में उमर के दौरे खिलाफ़त में इन्तेक़ाल किया।(तारीख़ुल ख़ुल्फ़ा जी:-१ स:-७)

अब जबकि ये बैयत एक नगहानी हादेसा थी और ख़ुदा ने मुसलमानों को उसके शर से बचा लिया जैसा की ख़ुद हज़रते उमर ने कहा था जिन्होंने बैयत के अरकान को मजबूत बनाया था और ख़ुद आप हज़रात ने भी उसके अंजाम को देख लिया है।

और हज़रत अली के अलफ़ाज़ में ये क़मीज़ की खींचा तानी थी।और साद बिन उबादा की ज़बान में ये एक सरीही ज़ुल्म था ।

और अकाबिरे सहाबा के इन्कार और अलाहिदगी की बिना पर क़तअन ग़ैरे शरई थी।

तो अबू बक्रकी खिलाफ़त की क्या शर्त रह जाती है और किस तरह तस्लीम किया जा सकता है----हक़ीक़ते अम्र ये है कि इस खिलाफ़त की कोई शरई दलील नहीं है और ये सिर्फ़ एक हटधर्मी है और कुछ नहीं----और इस बुनियाद पर शियों का ये अक़ीदा बिल्कुल सही है कि खलीफ़ऐ बिला फ़स्ल हरत अली अ।स। है जिनकी खिलाफ़त पर नस्से रसूल मौजूद है और इसे तमाम उल्माऐ अहले सुन्नत ने नक़्ल किया है और इसकी तावील सिर्फ़ आजमाते सहाबा के तहफ़्फ़ुज़ की बिना पर की गई है। वरना इन्साफ़ पसंद इंसान जानता है कि नुसूस के ठुकराने का कोई जवाज़ नहीं और तमाम ख़ुसूसियात को निगाह में रखते हुए इसके न मानने का कोई जवाज़ नहीं है (अस-सक़ीफ़ा वल-खिलाफ़ा अब्दुल फ़त्ताह अब्दुल मक़सूद ,आस-सक़ीफ़ा-मुहम्मद रज़ा मुज़फ़्फ़र)

२:-अबूबक्र के साथ हज़रते फ़ातिमा स।अ। का इख्तिलाफ़

इस मौज़ू की सेहत पर भी फ़रीक़ैन के उल्मा का इत्तिफ़ाक़ है और इसे देखने के बाद कोई इन्साफ़ पसन्द अबूबक्र को ज़ालिम और गासिब न भी करार दे तो उन्हें ख़ताकार माने बग़ैर नहीं रह सकता है इसलिए कि इस हादेसा की तमाम ख़ुसूसियात पर नज़र करने वाला इस अम्र को बख़ूबी जान लेता है कि अबूबक्र ने क़स्दन जनबे फ़ातिमा स।अ। को अज़ीयत दी है और उनकी तकज़ीब की है ताकि वो नुसूसे ग़दीर वग़ैरा से अपने शौहर की खिलाफ़त पर इस्तेद्लाल न कर सकें जिसके बेशुमार क़राएन मौजूद हैं।

जिसमें से एक करीना मुअर्रेखीन का ये बयान है कि जनाबे फ़ातिमा स।अ। रातों को अन्सार के दरवाज़ों पर जाकर अपने इब्ने अम के वास्ते बैयत और नुसरत का तक़ाज़ा करती थी तो अहले मदीना का जवाब सिर्फ़ ये था कि बिन्ते रसूले-अहम अबूबक्र की बैयत कर चुके हैं वरना आपके इब्ने अम अबूबक्र से पहले आ गए होते हम उनकी बैयत कर लेते----जिस पर आपने फ़रमाया के अबुल हसन ने जो कुछ किया है उन्हें वही करना चाहिए था और तुमने जो कुछ किया उसका हिसाब अल्लाह की बारगाह में देना होगा ।(तारीख़ुल ख़ुल्फ़ा ,इब्ने क़ातिबा जी:- 1 स:-१९ ,शराहे नहजुल बलागाह बैयते अबी बक्र)

बेशक अबूबक्र ने हुस्ने नियत या इश्तबाह की बिना पर ग़लती की होती तो जनबे फ़ातिमा स।अ। उन्हें मुतमइन करने की कोशिश करती लेकिन आपने गैज़ ओ ग़ज़ब का इज़हार करते हुए इन से कलाम करने को तर्क कर दिया और ज़िन्दगी भर बात नहीं की के उन्होने आप के दावे को रद्द कर दिया है और आपकी गवाही को क़ुबूल नहीं किया है और इस बुनियाद पर आपका ग़ज़ब इतना शदीद हो गया के अपने जनाज़े में भी शिरकत की इजाज़त नहीं दी — और अपने शौहर को वसीयत करदी के मेरे जनाज़े को रात की तारीकी में ख़ामोशी से दफ़्न कर दिया जाऐ। बुख़ारी -जि:-३ स:-३६ ,मुस्लिम-जि:-२ स:-७२ बाब ला नूरिसा मा तरकनाहो सदक़ताहू)

जनाबे फ़ातिमा ज़हरा स।अ। के रात की तारीकी में दफ़्न होने की बात आ गयी है तो ये वज़ाहत भी ज़रूरी है कि मैंने अपनी तहक़ीक़ के दौरान ख़ुद मदीनऐ मुनव्वरा का सफ़र किया है ताकि बाज़ हक़ाएक़ का अंदाज़ा कर सकूँ तो मुझ पर हसबे ज़ैल उमूर का इन्केशाफ़ हुआ है:-

१:-जनाबे फ़ातिमा ज़हरा स।अ। की क़ब्र आज तक नामालूम है कि बाज़ हज़रत का कहना है कि हुजरऐ पैग़म्बर में है और बाज़ कहते हैं हुजरे के सामने अपने घर में है और बाज़ का बयान है कि बाक़ी में अहलेबैत की क़ब्रों के दरमियान है लेकिन उसकी कोई जगह मुअईन नहीं है।

इस पहली हक़ीक़त से मुझे ये अंदाज़ा हो गया कि फ़ातिमा स।अ। ने अपनी वसीयत के ज़रिये हर नस्ल को दावते फ़िक्र दी है कि लोग उन असबाब का पता लगाएँ जिनकी बिना पर उन्होंने अपने शौहर को वसीयत की थी कि उन्हें रातो रात दफ़्न कर दिया जाऐ और कोई शख़्स उनके जनाज़े में शरीक न हो---कि इस तरह सही-उल-फ़िक्र मुसलमान हक़ीक़त का पता लगा सकता है और उस पर बहुत से राज़ मुन्कशिफ़ हो सकते हैं।

२:-मुझे ये भी अंदाज़ा हुआ कि उस्मान बिन अफ़ान की क़ब्र की ज़ियारत करने वाले को काफ़ी दूर चलना पड़ता है जहाँ उनकी क़ब्र बक़ी के आख़िर में दीवार के क़रीब है जबकि तमाम सहाबा इब्तेदाऐ बक़ी के दरवाज़े के क़रीब दफ़्न किऐ गऐ हैं यहाँ तक कि हज़रत मालिक जो ताबेईन के भी ताबेए थे उनकी क़ब्र आज़वाजे पैग़म्बर के क़रीब है जिससे मुअर्रेखीन का ये बयान साबित हो जाता है कि उनकी क़ब्र यहूदियों के क़ब्रिस्तान हिश्शे कौकब में है कि मुसलमानों ने उन्हें अपने क़ब्रिस्तान में दफ़्न होने से रोक दिया था और जब हुकूमत माविया के हाथ आई तो उसने यहूदियों से ये ज़मीन ख़रीद कर बक़ी में शामिल कर दी ताकि अपने खानदान के सरबराह कोई क़ब्र मुसलमानों के क़ब्रिस्तान में दाख़िल हो जाऐ---जननतुल बक़ी की ज़ियारत करने वाला आज भी इस मंज़र को अपनी आँखों से देख सकता है।

मुझे इस अम्र पर इन्तेहाई ताज्जुब होता है जनाबे फ़ातिमा का इन्तेक़ाल रसूले अकरम के बाद सबसे पहले होता है और दोनों के दरमियान बहुत से बहुत छ: महीने का फ़ासला है तो उनकी क़ब्र बाप के पहलू में क्यों नहीं है ? और अगर ये इस बुनियाद पर है कि उन्होंने वसीयत कर दी थी के मेरे जनाज़े को ख़ामोशी के साथ दफ़्न कर दिया जाऐ तो उनके फ़रज़न्द इमामे हसन अलैहिस्सलाम को क्यों नहीं दफ़्न किया गया---कि जब इमाम हुसैन दफ़्न करने के लिए लाऐ तो उम्मुल मोमिनीन आयशा ख़च्चर पर सवार होकर आ गई और नारा लगाना शुरू कर दिया कि मेरे घर में उसे हरगिज़ दफ़्न न करो जिसे मैं पसंद नहीं करती हूँ और बनी हाशिम और बनी उमैय्या के दरमियान जंग ओ जिदाल की नोबत आ गई इमामे हुसैन ने फ़रमाया के मैं जानजे को तवाफ़े क़ब्रे रसूल के लिऐ लाया हूँ--- और यर कह कर बक़ी में ले जाकर दफ़्न कर दिया कि इमामे हसन ने वसीयत फ़रमाई थी कि मेरे जनाज़े पर खूंरेज़ी न होने पाऐ और इब्ने अब्बास ने इस मौक़े पर आयशा को ख़िताब करके फ़रमाया था कि “आप ऊँट पर सवार हो चुकीं ,ख़च्चर पर सवार हो चुकीं ,और अगर कुछ और दिन ज़िन्दा रह गई तो हाथी पर भी सवार होंगी ,आपका हिस्सा मीरासे रसूल में १/८ का नवां हिस्सा था लेकिन आपने सारे माल पर क़ब्ज़ा कर लिया।

ये एक दूसरी खौफ़नाक हक़ीक़त है जिसका इन्केशाफ़ इब्ने अब्बास ने किया है कि आपका हिस्सा आठवा हिस्से का नवां हिस्सा था और आपने कुल पर क़ब्ज़ा कर लिया था और अगर आपके बाप की रिवायत तस्लीम कर लिया जाऐ तो नबी के यहाँ मीरास ही नहीं होती तो आपका कोई हिस्सा नहीं था कुल और जुज़ का क्या सवाल पैदा होता है---तो क्या कोई ऐसी आयात भी है जिसमें ज़ौजा का हिस्सा है और बेटी का हिस्सा नहीं है — या ये सिर्फ़ सियासत है जिसने तमाम इक़दार को बदल कर रख दिया है और बेटी को तमाम अमवाल से महरूम बनाने के बाद ज़ौजा को सारे अमवाल का मालिक और वारिस बना दिया है।

३:-अली ही इत्तेबा के अहल हैं:

जिन असबाब ने मुझे आबाओ अजदाद के तरीक़े को छोड़कर तश्य्यो की दावत दी है इनमें से एक सबब हज़रत अली और अबूबक्र के दरमियान अक़्ली और नक़्ली मुवाज़िना भी है मैंने इस सिलस्सीले में भी इसी तरीक़े को इख्तियार किया मुत्तफ़िक़ा अलैह हक़ाएक पर ऐतेमाद किया जाऐ और इन्फ़िरादी बयानत को नज़र अंदाज़ कर दिया जाऐ।

चुनांचे मैंने फ़रीक़ैन की किताबों का मुतालिआ किया और सिवाऐ अली इब्ने अबीतालिब के किसी ज़ात पर कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं पाया उन्हीं की इमामत पर फ़रीक़ैन ने इत्तेफ़ाक़ किया है।जबकि अबूबक्र की खिलाफ़त के क़ायल सिर्फ़ बाज़ मुसलिमीन हैं और ख़ुद उमर ने इस खिलाफ़त को नागहानी हादेसा क़रार दिया है।

जिस तरह के अली इब्ने अबीतालिब के अक्सर फ़ज़ाएल ओ मनाक़िब जिंका शिया हज़रात तज़किरा करते हैं ,अहले सुन्नत हज़रात की किताबों में मौजूद है और ऐसे तरीक़े के साअथ हैं जिंका इन्कार मुमकिन नहीं है कि उनके रावी सहाबाऐ किराम है और इस कसरत के साथ हैं कि इमाम अहमद बिन हन्बल ने फ़रमाया है कि “असहाबे रसूल में से किसी के लिए इतने फ़ज़ाएल अली इब्ने अबीतालिब के नक़्ल किऐ गए हैं ” (मुस्तदरके हाकिम ,जि:-३ स:-१०७ ,मनाक़िबे ख़्वारज़मी जि:-३ स:-१९ ,तारीख़ुल ख़ुल्फ़ा सेयूती स:-१६७ ,सवाऐक़े मुहरिक़ा स:-७२)।

और क़ाज़ी इस्माईल ,निसाई और अबू अली नीशापुरी का बयान है कि “हुस्ने असनाद के साथ जिस क़दर रिवायत अली इब्ने अबीतालिब के लिऐ बयान हुई है किसी दूसरे के बारे में नक़्ल नहीं हुई है ” (रियाज़ुल नुज़रा तबरी जि:-२ स:-२८२ , सवाऐक़े मुहरिक़ा स:-११८ ,७२७)।

इसके बाद इस नुक्ते को निगाह में रकहा जाता है कि बनी उमैय्या ने शरक़ ओ ग़रबे आलम को मजबूर किया था कि माज़अल्लाह हज़रत अली अलैहिस्सलाम पर लानत की जाऐ और उन्हें बुरा भला कहा जाऐ ,उनके फ़ज़ाएल नक़्ल न किऐ जाएँ ,कोई शख़्स उनके नाम पर नाम भी न रखे और उसके बाद उनके फ़ज़ाएल इस क़दर हैं इमाम शाफ़ई का इरशाद है कि “मुझे उस एसएचकेएचएस के बारे में इन्तेहाई ताज्जुब है कि जिसके फ़ज़ाएल को उसके दुश्मनों ने दुश्मनी की बिना पर और दोस्तों ने तक़य्ये की बिना पर छुपाया लेकिन इसके बावजूद इस क़दर हैं कि शरक़ ओ ग़रबे आलम को पुर कर दिया है ” ।

और उसके मुक़ाबिले में अबूबक्र के फ़ज़ाएल के रिवायात ख़ुद अहले सुन्नत की किताबों में इस मिक़दार में यक़ीनन नहीं हैं और जो रिवायात भी हैं वो या तो उनकी साहबज़ादी आयशा से मन्क़ूल हैं जिंका मौक़िफ़ बिल्कुल वाज़ेह है कि वो हज़रत अली की अदावत में अपने बाप की हर तरह से ताईद करना चाहती थीं चाहे इस काम के लिऐ रिवायत क्यों न वज़्ह करना पड़ें---या अब्दुल्लाह इब्ने उमर से मनसूब हैं जो इमाम अली अ।स। से बिल्कुल बेज़ार थे और तमाम उम्मत के बैयत कर लेने के बाद भी उनहोनने इमाम अली अ।स। की बैयत नहीं की थी और ये ऐलान करते रहे कि “अफ़्ज़लुलनास बादल नबी अबूबक्र हैं फ़िर उमर फ़िर उस्मान और इसके बाद कोई अफ़्ज़लियत नहीं है और तमाम लोग बराबर कि हैसियत रखते हैं ” । (बुख़ारी जि:२ स:-२०२)।

यानि इस बयान ने हज़रत अली अ।स। को माज़अल्लाह अवाम के बराबर बना दिया और उनकी हैसियत एक मामूली इन्सान से ज़्यादा कुछ नहीं रह गई ज़ाहिर है अब्दुल्लाह इब्ने उमर के इस बयान की क्या हैसियत है उल्माऐ उम्मत उन बयानात के मुक़ाबिले में जिनमें ये वाज़ेह किया गया है कि हज़रत अली अ।स। के बराबर किसी सहाबी के फ़ज़ाएल नक़्ल नहीं किऐ गऐ हैं---तो क्या अब्दुल्लाह इब्ने उमर ने इन अहादीस में से कोई हदीस नहीं सुनी थी ? और उन्हें किसी बात की इत्तेला नहीं हुई थी ,यक़ीनन हुई थी लेकिन ख़ुदा बुरा करे सियासते दुनिया का कि ये हक़ाएक़ को बदल देती है और अजूबऐ रोज़गार आमाल अंजाम दिया करती है।

इसके अलावा अबूबक्र के फ़ज़ाएल उमरु बिन आस ,अबूहुरैरा ,अकरमा ने बयान किऐ हैं जो सबके सब हज़रत अली के दुश्मन और उनसे मुक़ाबिला करने वाले थे चाहे वो अस्लहा लेकर मैदान में आ जाएँ या दुश्मनों के हक़ में रिवायत तैयार कर दें और इमाम अहमद बिन हन्बल ने कहा था “हज़रत अली के दुश्मन बेपनाह थे और सबने मिल कर चाहा कि उनके किरदार में ऐब तलाश करें लेकिन जब न पैदा कर सके तो उनके हरीफ़ों के लिऐ फ़ज़ाएल ओ मनाक़िब तैयार करने लगे और उसका एक अन्बार लगा दिया ” (फ़तहुल बारी फ़ी शरहे सही बुख़ारी जि :-७ स:-८३ ,तारीख़ुल ख़ुल्फ़ा सेयूती स:-१९९ , सवाऐक़े मुहरिक़ा स:-१२५)।

लेकिन रब्बुल आलिमीन का वाज़ेह एलान है की “ये लोग अपनी मक्कारी कर रहे हैं और हम पनि तदबीर कर रहे हैं ,अब काफ़िरीन को थोड़ी देर के लिऐ छोड़ दो और उन्हें मोहलत दे दो ” । (तारिक:-आयत:-१५ ,१६ ,१७)।

हकीकते अम्र ये है की ये रब्बुल इज़्ज़त का मोजिज़ा है की छह सौ बरस के मुसलसल उमवी और अब्बासी मज़ालिम के बावजूद इमाम आली अ।स। के फजाएल महफ़ूज रह गऐ और किताबों में उनके आसार आज भी बाक़ी हैं।

अबू फ़ारस हमदानी के मुताबिक़ बनी उमैय्यासे किसी तरह कम नहीं थे और उन्होंने उनके क़त्ले आम और ज़ुल्मो सितम में कोई दक़ीक़ा उठा नहीं रखा है।

“ बनी उमैय्या ने अज़ीम तरीन जराएम के बावजूद उन हुदूद को नहीं पाया जहाँ बनी अब्बास के मज़ालिम थे।बनी अब्बास!तुमने दीन में किस ग़ददारी से काम लिया है और रसूले अकरम का कितना ख़ून बहाया है तुम अपने को उनका पैरो कहते हो और तुम्हारे चन्गुल उनकी पाकीज़ा औलाद के ख़ून से तर हैं ” ।

इन तमाम तारीकियों के बावजूद इन पंजो से फ़ज़ाएल बचकर निकल जाएँ तो इसे ख़ुदा की हुज्जते बालीग़ा के अलावा क्या कहा जा सकता है और ख़ुदा खुद भी नहीं चाहता कि उस पर किसी की हुज्जत तमाम हो सके।

दूसरी तरफ़ अबूबक्र थे जो ख़लीफ़ए-अव्वल और उनके क़ौम में असरात थे उमवी हुकूमतों ने उनके हक़ में रिवायतें गढ़ने वालों के लिऐ इनामात मुक़र्रर किऐ थे उनके जाली फ़ज़ाएल से किताबों के सफ़हात स्याह किए गऐ थे लेकिन इसके बावजूद उनके कुल फ़ज़ाएल इमाम अली के फ़ज़ाएल ओ मनाक़िब के अशरे अशीर भी नहीं थे।

और जो फ़ज़ाएल भी हैं अगर उनका तजज़िया किया जाऐ और तारीख़ के हक़ाएक़ की कसोटी पर परखा जाऐ तो उनमें ऐसे उमूर का तज़किरा पाया जाता है जो अक़्ल और शरह किसी ऐतेबार से क़ाबिले क़ुबूल नहीं हैं मिसाल के तौर पर ये रिवायत की “अगर अबूबक्र के ईमान को सारी उम्मत के ईमान से टोला जाऐ तो अबूबक्र का पल्ला भारी रहेगा ” क़तअन ना क़ाबिले ऐतेबार है इसलिए कि अगर रसूले अकरम को ऐसे अज़ीम ईमान का इल्म होता तो हरगिज़ उसामा को उनका सरदार न बनाते ,और उनके बारे में शहादत देने से गुरेज़ न फ़रमाते कि ख़ुदा जाने तुम लोग मेरे बाद क्या करने वाले हो यहाँ तक कि अबूबक्र ज़ार ओ क़तार रोने लगे और हुज़ूर ने तसल्ली भी न दी।(मौता इमाम मालिक जि:-१ स:-३०७ ,मग़ाज़ी वाक़्दी स:-३१०)।

और फिर सूरऐ बराअत को देने के बाद हज़रत अली को भेज कर उनसे वापस न लेते थे और उन्हें तबलीगे बराअत से माना फ़रमाते थे।(तरमिज़ी जि:-४ स:-३३९ ,मुस्नदे अहमद बिन हन्बल जि:-२ स _३१९ ,मुस्तदरके हाकिम जि:-३ स:-५१)।

और रोज़े खैबर ये ऐलान करने के बाद कि “कल उसे आलम दूंगा जो मर्दे मैदान ,ख़ुदा ओ रसूल का मुहिब ओ महबूब और कर्रार गैरे फ़र्रार होगा और ख़ुदा ने उसके दिल का इम्तेहान ले लिया होगा ” अलमे लश्कर हज़रत अली अलैहिस्सलाम के हवाले न कर देते अबूबक्र को ही देते।(सही मुस्लिम बाबे फ़ज़ाएले अली इब्ने अबी तालिब अ।स।)।

और अगर आपको इस वसीय ओ अज़ीम ईमान का इल्म होता तो हरगिज़ इस बात की टाइड न फ़रमाते कि अगर तुमने रसूल की आवाज़ पर आवाज़ को बुलन्द कर दिया तो तुम्हारे सारे आमाल बर्बाद कर दिऐ जाएँगे।(बुख़ारी जि:-४ स:१८४)।

और अगर हज़रत अली या दीगर असहाब को इस बलन्द तरीन ईमान की ख़बर होती तो हरगिज़ उनकी बैयत से इन्कार न करते--- ?

और अगर हज़रते फ़ातिमा ज़हरा स।अ। को इस ईमान का इल्म होता तो उनसे नाराज़ न होतीं और उनसे ता-हयात तरके कलाम का अहद न कर लेती और उनके सलाम का जवाब दे देतीं और हर नमाज़ के बाद उनके हक़ में बददुआ न करतीं(अल-इमामत वस-सियासत जि:- 3 स:-१२५)और उन्हें अपने जनाज़े में शिरकत से मना न करतीं ।

और अगर ख़ुद अबूबक्र को भी इस ईमान क इल्म होता तो इस अम्र पर अफ़सोस न करते कि काश मैंने ख़ानऐ ज़हरा स।अ। पर हमला न किया होता---और काश मैंने फ़जातुल-सल्मा को जला न दिया---और काश मैंने खिलाफ़त को उमर या अबूउबबैदा के हवाले कर दिया होता।(तबरी जि:-४ स:-५२ ,अल इमामत वल सियासत जि:-१ स:-१८ ,तारीखे मसऊदी जी:-१ स:-४१४)।

इसलिए कि जिसके पास ऐसा अज़ीम ईमान होता है वो ज़िन्दगी के आख़री लम्हात में इस तरह की निदामत या शर्मिन्दगी या परेशानी का इज़हार नहीं करता है और न ये आरज़ू करता है कि काश मैं इंसान न होता जानवर का बाल या ऊँट की मेंगनी हो जाता ,क्या ऐसे इंसान का ईमान भी सारी उम्मत के ईमान के बराबर या उससे अफ़जल हो सकता है।

उसके बाद दूसरी हदीस “अगर मैं किसी को दोस्त बनाता तो अबूबक्र को बनाता ” का तजज़िया करते हैं तो उसका भी यही हाल नज़र आता है अगर ये वाक़ेया सही है तो अबूबक्र मुवाख़ाते सुग़रा के दिन कहाँ थे और मुवाख़ाते कुबरा के मौक़े पर मदीने में कहाँ चले गए थे की रसूले अकरम ने उन्हीं को अपना भाई न क़रार दिया और हज़रत अली अ।स। को दुनिया ओ आखेरत के लिए अपना भाई क़रार दे दिया मैं इस मौज़ू को तूल नहीं देना चाहता हूँ की मेरे लिए यही दो मसअले काफ़ी है वरना शियों के पास तो कोई रिवायत भी क़ाबिले ऐतेबार नहीं है और उनके पास बेशुमार दलाएल हैं की फ़ज़ाएले अबूबक्र की तमाम रिवायतें ख़ुद अबूबक्र के दौर के बाद तैयार की गई हैं और उनकी ज़िन्दगी में इन फ़ज़ाएल का दूर तक पता नहीं था।

फ़ज़ाएल के बाद अगर नक़ाएस और मुआएब का मुआज़िना किया जाऐ तो वहाँ भी फ़रीक़ैन की तमाम किताबों में मिलाकर भी हज़रत अली की एक बुराई नज़र ना आऐगी जबकि इसके बरखिलाफ़ सहाह और तारीख़ें सैर में अबूबक्र की मुतआदिद बुराइयों कमज़ोरियों का तज़किरा मौजूद है जिसका मतलब ये है कि फ़रीक़ैन इजमा हज़रत अली अ।स। की फ़ाज़िलत और इमामत है अबूबक्र की फ़ाज़िलत और खिलाफ़त पर नहीं। फ़िर हज़रत अली के अलावा किसी को बाक़ाएदा बैयत भी नहीं हुई है वो हज़रत अली ही थे जो मुसलसल इन्कार कर रहे थे और मुहाजिरीन और अन्सारबैयत एक नागहानी हादेसा थी जिसके शर से बक़ौले उमर ख़ुदा ने उम्मते इसलामिया को बचा लिया था और ख़ुद उमर की खिलाफ़त भी अबूबक्र की नामज़दगी पर तय हुई थी ,उस्मान की खिलाफ़त तो एक तारीख़ी मज़ाक है जिसमें उमर ने छह आदमियों को नामज़द किया था और फ़िर ये तरतीब क़रार दि थी कि अगर चार मुत्तफ़िक़ हो जाएँ तो और दो इख्तिलाफ़ करने वालों को क़त्ल कर दिया जाऐ और अगर अगर तीन तीन के गिरोह बन जाएँ तो उसको खलीफ़ा बनाया जाऐ जिसके साथ अब्दुर्रहमान इब्ने औफ़ हो और अगर वक़्ते मुक़र्रिरा के नादार फ़ैसला न हो तो सबको क़त्ल कर दिया जाए---

ये दास्तान इन्तेहाई दिलचस्प और अजीब ओ ग़रीब है लेकिन इसका ख़ुलासा ये है कि इताबे ख़ुदा और सुन्नते रसूल के साथ सीरते शैखैन पर अमल करें और आपने इन्कार कार्ड इया तो उस्मान ने क़ुबूल कर लिया और उस्मान को ख़लीफ़ा बना दिया गया और हज़रत अली अ।स।उस मजमे से बाहर निकल गऐ कि आपको इस तरतीब का अंजाम मालूम था जिसका तज़किरा आपने अपने ख़ुत्बाऐ शकशकिया में वाज़ेह अंदाज़ से किया है।

हज़रत अली अ।स। के बाद इस खिलाफ़त पर माविया ने क़ब्ज़ा कर लिया और उसने खिलाफ़ते क़ैसरीयत में तब्दील कर दिया जहां बनी उमैय्या और बनी अब्बास नस्लन बादे नस्ल हुकूमत करते रहे और हर खालीफ़ा अपने पेशरव की नस ,तलवार और अस्लहा के ज़ोर पर खिलाफ़त हासिल करता रहा न बैयत की कोई क़ीमत रह गई न राय की----जिसका वाज़ेह सा मतलब ये है कि पूरी तारीख़े इस्लाम में ख़ुल्फ़ा के अहद से कमाल अतारतिक के दौर तक किसी एक ख़लीफ़ा की सही तौर पर बैयत नहीं हुई है---ये इम्तियाज़ अगर हासिल हुआ है तो सिर्फ़ इमाम अली अलैहिस्सलाम को जिन्होंने तमाम फ़रीकों की तरफ़ से इख्तियारी बैयत हासिल की है और कसी पर कसी तरह का जब्र नहीं किया है।

४:-हज़रत अली के बारे में अहादीस-:

जिन रिवायत ओ अहादीस ने मुझे इस बात पर मजबूर किया है

कि मैं इमाम अली अ।स। की इक़्तेदा करूँ और जिन्हें असहाबे सहाह और मसानिदे अहले सुन्नत ने भी नक़्ल किया है वो हस्बे ज़ैल अहादीस है---उल्माऐ शिया के यहाँ तो ये ज़खीरा बहुत अज़ीम है लेकिन मैंने शुरू से ये तय कर लिया है कि सिर्फ़ मुत्तफ़िक़ अलैह मवाद पर इत्तिफ़ाक़ करूंगा और मुन्फ़रिदात को नज़र अंदाज़ कर दूँगा।

१:-हदीस “आना मदीनतुल इल्म व अलीउन बाबोहा ” ---(मुस्तदरके हाकिम :-३-१२७ ,तारीख़े इब्ने कसीर:-३५७ ,मनाक़िबे अहमद बिन हन्बल)ये हदीस ताने-तन्हा इस हक़ीक़त को साबित करने के लिए काफ़ी है कि उम्मते इस्लामिया में इत्तेबा के क़ाबिल इमाम अली इब्ने अबीतालिब अ।स। की ज़ाते गिरामी है इसलिए कि इस्लाम में आलिम ही क़ाबिले इत्तेबा होता है और जाहिल क़ाबिले इत्तेबा नहीं होता है चुनांचे इरशादे जनाबे अहदियत है “क्या जाहिल और आलिम बराबर हो सकते हैं ” (ज़मर-९)---- “क्या वो शख़्स जो हिदायत करता है वो ज़्यादा हक़दारे इत्तेबा है या जो ख़ुद भी हिदायत का मोहताज है ,तुम्हें क्या हो गया है और तुम लोग किस तरह के फ़ैसले करते हो ” युनुस ३५। और वाज़ेह सी बात है हिदायत करने वाला आलिम होता है और हिदायत का मोहताज जाहिल होता है।

ख़ुद तारीख़े इस्लाम ने भी सरीह लफ़्ज़ों में इक़रार किया है अली इब्ने अबीतालिब अ।स। तमाम सहाबा में सबसे ज़्यादा साहिबे इल्म थे और तमाम सहाबा अहमतरीन मसाएल में उनकी तरफ़ रुजू किया करते थे जबकि उन्होंने कभी किसी मसअले में किसी एक शख़्स की तरफ़ भी रुजू नहीं किया।

इमाम अली अ।स। के बारे में ख़ुद अबू बकर का ये ऐतेराफ़ था कि ‘ख़ुदा उस मुश्किल के लिऐ बाक़ी न रखे जिसके हल के लिऐ अबुल हसन न हों ” और उमर का मशहूर मक़ूला था “अगर अली न होते तो उमर हलाक जाता ” । (इस्तियाब :-३-३९ ,मनाक़िबे ख़्वारज़मी-४८ ,अल-रियाज़ुल नुज़रा ;-२-१९४)।

इब्ने अब्बास का खुला हुआ ऐलान था कि “मेरा और तमाम असहाबे मुहम्मद का इल्म अली के इल्म के मुक़ाबिले में ऐसा ही है जैसे समन्दर के मुक़ाबिले में क़तरा ” (रियाज़ुल नुज़रा-२-१९४)।

ख़ुद इमामा अली ने भी अपने ख़ुत्बे में इरशाद फ़रमाया है कि “जो चाहो दरयाफ़्त कर लो कि मैं क़यामत तक के तमाम वाक़ेयात से बाख़बर कर सकता हूँ ,मुझसे किताब अल्लाह के बारे में दरयाफ़्त करो मैं हर आयत के बारे में जानता हूँ कि रात में नाज़िल हुई या दिन में। सहरा में नाज़िल हुई है कि पहाड़ पर ” (रियाज़ुल नुज़रा-२-१८९ ,तारीख़ुल ख़ुल्फ़ा सेयूती-१२४ ,इत्तिक़ान-२-३१९ ,फ़तहुलबारी-८-४८५ ,तहज़ीब अलतहज़ीब-७-३३८)।

जबकि अबूबकर से “अब्बा ” के मानी पुछे गई तो उन्होंने कहा कि मुझ पर कौन सा आसमान साया करेगा और कौन सी ज़मीन मेरा बोझ उठाऐगी अगर मैं किताबे ख़ुदा के बारे में कोई ऐसी बात कहूँ जिसका मुझे इल्म नहीं है ” और उमर ने वाज़ेह लफ़्ज़ों में ऐलान कर दिया था कि “तमाम लोग उमर से ज़्यादा दीनियात से बाख़बर हैं यहाँ तक कि घरों में रहने वाली औरतें ” ।

और उनसे किताबुल्लाह के बारे में कोई सवाल किया जाता था अव्वलन झिड़क देते थे और उसके बाद सायल की इस तरह मरम्मत करते थे कि लहूलुहान हो जाता था और फरमाते थे कि ऐसी बातों के बारे में मत पूछो जो तुम्हें मालूम हो जाएँ तो बुरी मालूम हों ” (सुन्ने दारमी-१-५४ ,तफ़सीरे इब्ने कसीर-४-२३२ ,दुरे मन्सूर-६-१११)।

और बक़ौले तफ़्सीरे तबरी उनसे “कलाला ” के मानी पुछे गऐ तो कहा कि अगर मुझे इसके मनी मालूम हो जाएँ तो मेरे शाम के महलत से ज़्यादा अज़ीज़ होंगे---और इब्ने माजा ने इनका ये क़ौल भी नक़्ल किया है कि “तीन बातें रसूले अकरम ने बयान कर दी होतीं तो मेरी निगाह में दुनिया और माफ़िहा से बेहतर होतीं — कलाला ,रबा ,खिलाफ़। ”

अस्तग्फ़िरुल्लाह मैं तो ये सोच भी नहीं सकता हूँ के रसूले अकरम ने अपने अहम मसाएल को बयान नहीं किया।और इसी तरह दुनिया से चले गए।

२:-हदीस:- “या अली बे मंज़िलतल हारून मीन मूसा इल्ला इन्हू ला नबी बादी ” ।

इस हदीस का अंदाज़ ही वाज़ेह कर रहा है के अमीरूल्मोमीनीन को पैग़म्बरे इस्लाम से वो खसूसियत और इरतेबात हासिल है जो किसी को हासिल नहीं है और आप उसी तरह हज़रत के वसी ,वज़ीर और खलीफ़ा हैं जिस तरह हारून हज़रत मूसा के वसी वज़ीर और खलीफ़ा थे जब वो कोहे टूर पर मुनाजात के लिऐ तशरीफ़ ले गए थे--और हज़रत अली अ।स। को वही मंज़िलत हासिल है जो हज़रत हारून को हासिल थी सिर्फ आपके लिऐ नबूवत नहीं है कि नाबूवत रसूले अकरम पर तमाम हो गई है--- और आप तमाम सहाबा से अफ़जल ओ बरतर हैं कि आपसे बालातर साहिबे रिसालत के अलावा कोई नहीं है।

३:-हदीस:-मन कुन्तो मौलाहो फ़हाज़ा अलीउन मौला ”

ये हदीस तन्हा भी इन तमाम खयालात की तरदीद के लिऐ काफ़ी है जिनमें अबूबक्र ओ उमर ओ उस्मान को हज़रत अली पर मुक़द्दम किया गया है और आपकी विलायत का ऐहतेराम नहीं किया गया है ,मौला की तफ़सीर में मुहिब और नासिर के माने पैदा करना उस मफ़हूम से इन्हेराफ़ है जिसके लिऐ रसूले अकरम ने ये एलान फरमाया था — और इसका मंशा इज्ज़ते असहाब के तहफ़्फ़ुज़ के अलावा कुछ नहीं है वरना हर शख़्स जानता है कि रसूले अकरम ने ग़दीर के मैदान में शदीद तरीन गर्मी क्के माहौल में ख़ुत्बा इरशाद फ़रमाया था तो क़ौम से ये सवाल किया था कि तुम लोग इस बात पर गवाह नहीं हो कि मैं तमाम मोमिनीन से उनके नुफ़ूस के मुक़ाबिले में ज़्यादा ऊला हूँ और जब सबने इक़रार कर लिया तो फ़रमाया “जिसका मैं मौला हूँ उसका ये अली भी मौला है ” जो खिलाफ़त के बारे में एक नस्से सरीह है और जिसका इन्कार किसी साहिबे अक़्ल और इन्साफ़ पसन्द के लिऐ मुमकिन नहीं है इसलिए कि इस मौलाइयत और हाकिमयत के इन्कार में रसूले अकरम का इस्तेख्फ़ाफ़ और उनकी हिकमत का इस्तेहज़ा है कि उन्होंने इस नाक़ाबिले बर्दाश्त गर्मी में सारे असहाब के मजमे को रोक कर ऐसा ऐलान किया जिसे हर इन्सान जनता था कि अली अ।स। साहिबाने ईमान के दोस्त और मददगार हैं।

दर हक़ीक़त ये तावील सहाबा के तहफ़्फ़ुज़ के लिऐ की गई है जबकि इज़्ज़ते रसूल का तहफ़्फ़ुज़ इज्जते सहाबा के तहफ़्फ़ुज़ से ज़्यादा अहमियत रखता है।

फिर अगर मसअला मुहब्बत और नुसरत का है तो इस इजमा की क्या तावील की जाऐ जिसमें सरकारे दो आलम ने हज़रत अली अ।स। की बैयत का ऐहतेराम किया था और सबसे पहले उम्माहतुल मोमिनीन ने बैयत की थी उसके बाद अबूबक्र ओ उमर ने कहा था कि “अबूतालिब के फ़रज़न्द मुबारक हो आप तमाम मोमिनीन ओ मोमिनात के मौला हो गई हक़ीक़त ये है के तावील करने वाले ग़लत बयानी से काम ले रहे हैं और अपने ज़ाती बयानात को ख़ुदा और रसूल स।अ।व।व। की तरफ़ मनसूब कर रहे हैं जबकि क़ुरआन मजीद ने साफ़ कह दिया है कि “एक फ़रीक़ हक़ को छुपा रहा है जबकि वो हक़ की हक़्क़ानियत से ख़ूब बाख़बर है ” (सूरऐ बक़रा-१४६)।

४:-हदीस:- “अलायो मिन्नी व अना मीन अली वला यूदी अन्नी इल्ला अना ओ अली ” । सुन्नने इब्ने माजा-१-२४ ,ख़साएसे निसाई-२० ,तिरमिज़ी-५-३००)।ये हदीसे शरीफ़ भी वाज़ेह ऐलान है कि अली इब्ने अबीतालिब ही वो तन्हा शख़्स हैं जिन्हें साहिबे रिसालत ने अपना पैग़ाम पहुँचाने के लिऐ मुन्तख़ब किया था और ये बात उस वक़्त फ़रमाई थी जब सूरऐ बराअत की तबलीग़ के लिऐ हज़रत अली को भेजा और अबूबक्र को माज़ूल कर दिया और उन्होंने वापस आकर कि क्या मेरे बारे में कोई चीज़ नाज़िल हुई है है तो आपने फ़रमाया मेरे परवरदिगार ने हुक्म दिया है कि “इस अम्र की तबलीग़ या मैं करूंगा या अली अलैहिस्सलाम ” ।

और ये इरशाद बिलकुल उसी इरशाद पे हमपल्ला है जो आपने दूसरे मक़ाम पर अली की फ़ज़ीलत बयान करते हुऐ फरमाया था कि “या अली तुम मेरी उम्मत में तमाम इख्तिलाफ़ात के बयान करने वाले हो ” (तारीखे दमिश्क़ इब्ने असाकर-२-४७७ ,कनुज़ुल हक़ाएक़ मुनादी-२०३ ,कन्ज़ुल आमाल-५-३३)।

और जब रसूले अकरम के पैग़ाम की तबलीग़ करने वाला अली के अलावा कोई नहीं और वही हर इख्तिलाफ़ की हक़ीक़त बयान करने वाले हैं तो उन पर ऐसे अफ़राद को मुक़द्दम कर दिया जाऐगा जो अब्बा और कलाला के मानी से भी बेख़बर हो।

ये तो वो मुसीबत है जिसमें सारी उम्मत को मुब्तिला कर दिया गया है और इसके नतीजे में उम्मत उस फरीज़े को अदा न कर सकी जिसे ख़ुदा ने उसके हवाले किया था ,बेशक ख़ुदा की हुज्जत उन लोगों पर तमाम है जिन्होंने हक़ाएक़ को मस्ख़ किया है और वाक़्यात को बदल डाला है---इरशादे जनाबे अहदियत है “जब उनसे कहा जाता है कि हुकमे ख़ुदा ओ रसूल की तरफ़ आओ तो कहते हैं हमारे वही काफ़ी हैं जिस पर हमने अपने बाप दादा को पाया है चाहे उनके बाप दादा बिल्कुल जाहिल रहे हों और बिल्कुल हिदायत याफ़्ता न हों ” (मायदा:-१०४)।

५:-हदीस:- “अददार यौमुल अन्ज़ार ”

दावते रोज़े ज़ुल अशीरा में रसूले अकरम ने हज़रत अली की तरफ़ इशारा करके फ़रमाया था कि “ये मेरा भाई ,मेरा वसी और मेरे बाद मेरा खलीफ़ा है लिहाजा इसकी बात सुनो और इसके अम्र की इताअत करो ” (तबरी-२-३१९ ,इब्ने असीर-३-६२ ,अस-सीरतुल हलबिया-१-३११ ,शवाहिदुल तन्ज़ील हिस्कानी-१-२७१ ,कन्ज़ुल आमाल-१-१५ ,तारीखे इब्ने असाकर-१-७५ ,तफ़्सीरे ख़ाज़िन अलाउद्दीन शाफ़ई-३-३७९)।

ये हदीस शरीफ़ उन सही अहादीस में से है जिसे इब्तेदाऐ बेसत के हालात में तमाम मुअ र्रेखीन ने नक़्ल किया है और इसे पैग़म्बर के मौजीजात में शुमार किया है लेकिन अफसोस क सियासते दुनिया ने हक़ाऐक़ को तब्दील कर दिया और वाक़ेयात को मस्ख़ करके रख दिया है और ये कोई हैरतअंगेज़ नहीं है बलकि आज रौशनी के दौर में भी ये कारोबार बराबर हो रहा है जो कल जिहालत और तारीकी के दौर में हो रहा था---ये हज़रत मुहम्मद हुसैन हैकल हैं------जिन्होंने हयाते मुहम्मद के पहले ऐडीशन में १३५४ हिजरी में सफ़्हा १०४ पर इस हदीस को मुकम्मल अंदाज़ में नक़्ल किया था और फ़िर दूसरे ऐडीशन में “वसी व ख़लीफ़ती मीन बादी ” के लफ़्ज़ को हज़्फ़ कर दिया — जिस तरह कि तफ़्सीरे तबरी जिल्द१९ पर “वसी व ख़लीफ़ती ” के लफ़्ज़ को अखी व कज़ा कज़ा कर दिया गया और ये भुला दिया गया कि तबरी की तारीख़ की जिल्द २ सफ़्हा-३१९ पर मुकम्मल हदीस मौजूद है और तफ़्सीर में तहरीफ़ करने से कोई फ़ायदा नहीं है।

अफ़सोस कि ये उल्माऐ इस्लाम किस तरह कलेमात को उनकी जगह से तहरीफ़ कर रहे हैं और हक़ाएक़ को मुन्क़लिब कर रहे हैं और उनका मन्शा ये है कि किसी तरह नूरे ख़ुदा को अपनी फूँकों से बुझा दें जबकि उन्हें ये मालूम है कि ख़ुदा अपने नूर को बहरहाल मुकम्मल करने वाला है।

मैंने अपनी तहक़ीक़ के दौरान ये चाहा कि मुझे हयाते मुहम्मद का पहला ऐडीशन मिल जाऐ और मैं हक़ीक़ते हाल पर मुत्तेला हो जाऊँ और इसके लिऐ मुझे बहुत ज़हमत करना पड़ी और काफ़ी रक़म ख़र्च करना पड़ी लेकिन ख़ुदा का शुक्र है कि मुझे किताब मिल गई और मैं अहले सू की कोशिशों से बाख़बर हो गया जो हक़ाएक़ को मस्ख़ करने के लिऐ सर्फ़ कर रहे हैं।

बेशक कोई भी साहिबे अक़्ल ओ इन्साफ़ आईएनएस शरारतों से बाख़बर होगा तो ऐसे अहले इल्म से दूर हो जाऐगा और उसे अंदाज़ा हो जाऐगा कि उनके पास तहरीफ़ और तरमीम के अलावा कोई दलील नहीं है और हुक्कामे वक़्त ऐसे अफ़राद को किराऐ पर लेने के लिऐ बेतहाशा पैसा भी ख़र्च किया है और बड़े बड़े अल्क़ाब ओ खिताबत से नवाज़ा है ताकि ये लोग शियों के खिलाफ़ मकाले लिखें ,उन्हें काफ़िर क़रार दें और हर बातिल तरीक़े से उन सहाबा की अज़मत का तहफ़्फुज़ करें जो उल्टे पाँव पुराने मज़हब की तरफ़ पलट गए थे और जिन्होंने रसूले अकरम के हक़ को बातिल में तब्दील कर दिया था ऐसा ही कारोबार इनके पहले वाले भी कर चुके हैं “इन सब के दिल एक जैसे हैं और हमने अपनी आयात को वाज़ेह तौर पर बयान कर दिया है(बक़र-११८)।

अहादीसे सहीहा-जो इत्तेबाऐअहलेबैत को लाज़िम क़रार देती है

१:-हदीसे सक़लैन:- “अय्योहल नास मैं तुम्हारे दरमियान दो चीज़ें छोड़े जा रहा हूँ जिन्हें ले लोगे तो कभी गुमराह न होगे ,वो किताबे ख़ुदा और मेरी इतरत जो अहलेबैत हैं ” दूसरे अल्फ़ाज़ में “क़रीब है कि नुमाइन्दऐ परवरदिगार मुझे तलब करने के लिऐ आ जाऐ और मैं उसकी आवाज़ पर लब्बैक कह दूँ लिहाज़ा में तुम्हारे दरमियान दो गराँक़द्र चीज़ें छोड़े जा रहा हूँ ,एक किताबे ख़ुदा है जिसमें हिदायत और नूर है और एक मेरे अहलेबैत हैं।तुम्हें ख़ुदा को याद दिला रहा हूँ अपने अहलेबैत के बारे में ,मैं तुम्हें ख़ुदा को याद दिला रहा हूँ अपने अहलेबैत के बारे में ” । (सही मुस्लिम बाबे फ़ज़ाएले अली अ।स। -५-२२ ,सही तिरमिज़ी-५-३२८ ,मुस्तदरके हाकिम-३-१५८ ,मुसन्दे अहमद-३-१७)।

अगर हम हदीस के मज़मून पर ग़ौर करें जिसे अहले सुन्नत के सहाह ने नक़्ल किया है तो अंदाज़ा होगा कि उम्मते इस्लामिया में सक़लैन यानी किताब ओ इतरत का इत्तेबा करने वाला शियों के अलावा कोई नहीं है ,अहले सुन्नत ने तो उमर के क़ौल “हसबुना किताबुल्लाह ” का इत्तेबा कर लिया है और काश इसका इत्तेबा बग़ैर किसी ख़्वाहिशाती ताबीर और तफ़सीर के कर लिया होता ,लेकिन जब ख़ुद उमर को कलाला के मानी नहीं मालूम थे और वो हुकमे तयम्मुम से नाआशना थे और बहुत से दूसरे अहकाम से बेख़बर थे तो उनके बाद आने वाले और बिला तहक़ीक़ उनकी तक़लीद करने वालों या नुसूसे सरीहा के मुक़ाबले में इज्तेहाद करने वालों का क्या हल होगा---- ?

बज़ाहिर मेरे इन सवालात के मुक़ाबिले में एक ही बात कही जाऐगी कि रसूले अकरम का इरशाद है कि “मैं किताब और अपनी सुन्नत को छोड़े जा रहा हूँ ” ।

लेकिन याद रहे हदीसे सही भी हों तो अपने मफ़्हूम ही में सही होगी और दोनों रिवायतों का खुलासा ये होगा कि तुम लोग मेरे अहलेबैत की तरफ रुजू करना कि वही मेरी सुन्नत के बताने वाले होंगे और वही सही अहादीसे के नक़्ल करने वाले होंगे कि उनका दामन हर किज़्ब और ग़लतबयानी से पाक है और रब्बुल आलिमीन ने आयते ततहीर के ज़रिये उनकी इस्मत और तहारत का ऐलान किया है।

इसके बाद वही सुन्नत का मफ़्हूम समझाने वाले और उसकी हक़ीक़त के वाज़ेह करने वाले भी होंगे कि तन्हा किताबे ख़ुदा हिदायत के लिऐ काफ़ी नहीं है वरना हर गुमराह फ़िरक़ा किताबे ख़ुदा से इस्तेद्लाल न करता और बहुत से क़ारियाने क़ुरआन पर क़ुरआन ख़ुद लानत न करता किताबुल्लाह एक ख़ामोश सहीफ़ा है जिसमें मुताद्दिदमानी का ऐहतेमाल पाया जाता है और इसमें मुहकमात के साथ मुतशाबिहात भी हैं और इसको समझने के लिऐ ऐसे रासिख़ूना फ़िल इल्म की ज़रूरत है जो रसूले अकरम की लफ्जों में अहलेबैते अतहार हों और क़ुरआने हकीम के वाक़ई मफ़ाहीम से आशना बना सके।

हज़राते शिया इन्हीं आइम्माऐ मासूमीन और अहलेबैत की तरफ़ रुजू करते हैं और इज्तेहाद से वहाँ काम लेते हैं जहाँ उनकी कोई नस मौजूद न हो और हम अहले सुन्नत सबसे पहले सहाबा की तरफ़ रुजू करते हैं और उन्हीं से तफ़्सीरे क़ुरआन ताबीरे सुन्नत का सबक़ लेते हैं जबकि सहाबा के हालात उनके इज्तेहाद बिल राय और इज्तेहाद दर मुक़ाबिले नस के वाक़ियात तश्त अज़ बाम हैं और उनकी तादाद सैकड़ों से तजावुज़ कर चुकी है।

हम अगर अपने उल्मा से सवाल करें कि आप किस सुन्नत का इत्तेबा करते हैं ? तो हर एक का जवाब होगा सुन्नते रसूल---हालांकि हक़ीक़त इसके बिल्कुल बरखिलाफ़ है उन्होंने ख़ुद ही ये रिवायत भी नक़्ल की है कि सरकार ने फ़रमाया है कि “मेरी और ख़ुल्फ़ाऐ राशिदीन की सुन्नत का इत्तेबा करते है और कभी सुन्नते रसूल से असनाद करते हैं तो वही ख़ुल्फ़ाऐ राशिदीन ही के तरीक़ से-।

जबकि हमने अपनी किताबत में से मना फ़रमाया है ताकि किताब ओ सुन्नत मखलूट न होने पाएँ और अबूबक्र ओ उमर ने इसी रिवायात की रौशनी में अपने अय्यामे खिलाफ़त में मुकम्मल पाबन्दी आयद कर दी थी ‘ये सुन्नती लफ़्ज़ के छोड़ने का कोई मफ़्हूम नहीं है-! वाज़ेह रहे कि ये “सुन्नती ” का लफ़्ज़ सहाहे सत्ता में किसी किताब में वारिद नहीं हुआ है और इस लफ़्ज़ के साथ रिवायत सिर्फ़ मालिक ने मौता में मुरसल तौर पर नक़्ल किया है और इसके बाद उनसे तबरी ,इब्ने हशशाम वग़ैरा ने अख़्ज़ करके मुरसल ही नक़्ल कर दिया और उसकी सनद नहीं दर्ज की है।

फ़िर जिन वाक़ेयातकी तरफ़ मैंने इशारा किया है और जिन बेशुमार वाक़ेयात का ज़िक्र मैंने नहीं किया है सब इस हदीस के बातिल होने पर दलालत करते हैं कि सुन्नते राशिदीन और सुन्नते रसूल का जमा करना ही मुमकिन नहीं है और इस रिवायत में दोनों से तमस्सुक करने का हुक्म दिया गया है मिसाल के तौर पर रसूल की वफ़ात के बाद पेश आने वाले वाक़ेयात में सबसे पहले पेश आने वाला वाक़ेया जनाबे फ़ातिमा ज़हरा स।अ। और अबूबक्र के इख्तेलाफ़ का है जहाँ अबूबक्र ने हदीस ‘नहनो माशरल अन्बिया लानूरसा मातरकना सद्दक़ता ” से इस्तेद्लाल किया था और जनाबे फ़ातिमा स।अ। ने आयाते क़ुरआनी के हवाले से इस रिवायत की तकजीब की थी और अबूबक्र से साफ़ कह दिया था कि मेरा बाप अहकामे `क़ुरआनी की मुख़ालिफ़त नहीं कर सकता है और जब क़ुरआन ने तमाम औलाद की विरासत का तज़किरा किया है (सूरऐ निसा-११)

और जनाबे सुलेमान के वारिस वारिद होने की तसरीह की है (सूरऐ नहल-१६)और जनाबे ज़करिया की इस दुआ का तज़किरा किया है कि “खुदा मुझे एक वारिस आता फ़रमा जो मेरा और आले याक़ूब का वारिस बने और उसे पसन्दीदा क़रार दे दे ” (सूरऐ मरियम-५-६)तो उमूमी और ख़ुसूसी दोनों क़िस्म के तज़किरों के बाद इस हदीस की क्या क़ीमत रह जाती है।

फ़िर इसके बाद दूसरा हादेसा जो अबूबक्र के दौरे खिलाफ़त में पेश आया और जिसे अहले सुन्नत के तमाम मुअररेखीन ने नक़्ल किया है---जहाँ अबूब्क्र का इख्तिलाफ़ उसके क़रीब तरीन शख़्स उमर इब्ने ख़त्ताब से हुआ जिसका ताल्लुक़ मानयैने ज़कात से जंग करने से था कि उमर इस जंग से क़तई मुख़ालिफ़ थे और उसका कहना था कि रसूले अकरम ने फ़रमाया है कि “उस वक़्त तक जिहाद करो जब तक कि लोग ला इलाहा इल्लल्लाह और मुहम्मदन रसूल अल्लाह न कह दें ” और ये लोग तो मुस्तक़िल कलमा पढ़ रहे हैं तो इनके जान ओ माल को किस तरह हलाल कर लिया जाऐगा।

और इस रिवायत को सही मुस्लिम में जंगे खैबर के ज़ैल में नक़्ल किया गया है कि हुज़ूरे अकरम ने रोज़े खैबर हज़रत अली को आलम देकर रवाना किया तो उन्होंने पूछा कि ‘या रसूल अल्लाह कब तक जिहाद करूँ ” ? ---फ़रमाया “जब तक ये लोग तौहीद ओ रिसालत की गवाही न दे दें ” ---कि इसके बाद अगर गवाही देने लगे तो इनका ख़ून और माल महफ़ूज होगा और इनका हिसाब ख़ुदा के ज़िम्मे होगा ” ---लेकिन अबूबक्र इस रिवायत से मुतमइन न हुऐ और उन्होंने साफ़ साफ़ कह दिया कि हम इन लोगों से बाहर हाल जंग करेंगे जिन्होंने नमाज़ और ज़कात में फ़र्क़ किया है और नमाज़ अदा करने के बावजूद ज़कात नहीं अदा की है बल्कि अगर मुख़्तसर माल भी रसूले अकरम को दिया करते थे और मुझे न दिया तो मैंने इनसे जिहाद करूँगा।

जिसके आड़ उमर भी उनके बयान से मुतमइन हो गऐ और उन्होंने कहा कि अबूबक्र अपने मौक़िफ़ में इस तरह अड़े रहे कि ख़ुदा ने मेरे सीने को कुशादा कर दिया और मैंने उसकी बात को तस्लीम कर लिया।

ये मसअला बहरहाल क़ाबिले ग़ौर है कि ख़ुदा सुन्नत ओ सीरते रसूल की मुख़ालिफ़त करने वालों का सीना किस तरह कुशादा कर सकता है--- ?

हक़ीक़तन ये तमाम ताविलेन मुसलमान से जिहाद करने को जायज़ करने की तदबीरें थीं वरना क़ुरआन करीम ने साफ़ लफ़्ज़ों में कह दिया था कि “ईमान वालों जब ज़मीन का रास्ता तय करो तो पहले तहक़ीक़ कर लो और ख़बरदार किसी सलामती की पेशकश करने वाले को गैरे मोमिन न बना देना कि तुम माले दुनिया चाहते हो और ख़ुदा के पास मुनाफ़े बहुत हैं तुम ख़ुद भी पहले उन्हीं के जैसे थे ये तो ख़ुदा का ऐहसान था कि उसने तुमको हिदायत दे दी तो अब बिला तहक़ीक़ कोई क़दम न उठाना कि ख़ुदा तुम्हारे आमाल से ख़ूब बाख़बर है ” (निसा-९४)।

अलावा इसके कि इन हज़रात ने अबूबक्र को ज़कात देने से इन्कार किया था असल वजूबे ज़कात के बक़ौल शिया उनके लिऐ अबूबक्र की खिलाफ़त की खबर एक हादिसऐ नागहानी थी वो हुज्जतुल विदा कि मौक़े पर रसूले अकरम को इमाम अली अलैहिस्सलाम की विलायत का एलान करते देख चुके थे तो उन्होंने चाहा की नई सूरते हाल का जायज़ा लें की ये इन्क़ेलाब किस तरह आ गया है----लेकिन अबूबकर ने उन्हें मुहलत न दी और उनके ऊपर हमला कर दिया।

मैं अपनी क़रारदाद के मुताबिक़ किसी एक फ़रीक़ के बयानात से इस्तेद्लाल नहीं करता हूँ लिहाजा इस तावील को शियों ही के हवाले कर देता हूँ और वही अपने बयान के ज़िम्मेदार हैं ,दूसरे हज़रात की ज़िम्मेदारी ये है की इस बयान की सिदाक़त के बारे में तहक़ीक़ करें शायद हक़ीक़ते हाल वाज़ेह हो जाऐ।

लेकिन मैं इस क़िस्से को नज़र अंदाज़ नहीं कर सकता जो ख़ुद रसूले अकरम की हयात में पेश आया है ,जब सालिबा ने आप से ख़्वाहिश की कि दौलत के लिए दुआ फ़रमादें फ़िर बेहद इसरार किया जिसके बाद आपने दुआ कर दी और ख़ुदा ने इस क़दर दौलत दे दी कि भेड़ ,बकरी और ऊँटों की मदीने में जगह न रह गई और वो बाहर चला गया जिसके बाद नमाज़ों में हाज़िरी कम हो गई और जब आपने नमाज़े जुमा में नहीं देखा तो तो आपने आमिल को भेजा के नमाज़ में नहीं आ सकते हो तो न आओ जानवरों की ज़कात दे दो तो उसने ये कह कर इन्कार कर दिया कि ये तो एक तरह का जज़िया है जो कुफ़्फ़ार के बजाए मुसलमानों से लिया जा रहा है---लेकिन इसके बावजूद न आपने उसे क़त्ल किया न उससे जंग का ऐलान फ़रमाया यहाँ तक कि परवरदिगार आलम ने इस वाक़ेये को इस अंदाज़ से बयान किया है कि बाज़ लोग ऐसे हैं जो ख़ुदा से इस अम्र का अहद करते हैं कि अगर उसने अपने फ़ज़ल ओ करम से कुछ अता कर दिया तो उसकी राह में सदक़ा देंगे और नेक किरदार हो जाएँगे---लेकिन जब ख़ुदा ने अपने फ़ज़ल से दे दिया तो बुख्ल करने लगे और मुँह फेर कर किनाराकश हो गए(तौबा-७५ ,७६)।

सालिबा इस आयत को सुनकर रोता हुआ हुज़ूरे अकरम की ख़िदमत में आया और उसने ज़कात देने का वादा किया लेकिन आपने हस्बे रिवायत ज़कात लेने से इन्कार फ़रमा दिया।

तो अगर अबूबक्र ओ उमर सीरते रसूल की पैरवी कर रहे थे तो उन्होंने इस सीरत की मुखालिफ़त क्यों की और मुसलमानों के ख़ून को क्यों मुबाह कर दिया जबकि अबूबक्र की तरफ़ से ये उज़्र पेश करने वाले कि ज़कात हक़ माल है और हक़ माल में कोई रियायत नहीं कि जा सकती---सालिबा की रिवायत के बाद कोई उज़्र नहीं पेश कर सकते कि वो भी माल ही का मसअला था और उसने ज़कात ही को जज़िया जैसा क़रार देने की जसारत की थी।

मेरा ख़्याल है कि अबूबक्र तक़रीर के बाद उमर का मुतमइन हो जाने का राज़ भी यही था कि उन्होंने देखा कि ये लोग मैदाने ग़दीर में मौजूद थे और ये जिंदा रह गऐ और इनका इन्कार मशहूर हो गया तो रिवायाते ग़दीर ख़ुद बख़ुद मशहूर हो जाऐगी और उनकी खिलाफ़त ख़तरे में पद जाऐगी इसी लिऐ ख़ुदा ने फ़िलफ़ौर उनके सीने को कुशादा कर दिया और वो जिहाद के लिऐ तैयार हो गऐ जिस तरह की ख़ानऐ फ़ातिमा स।अ। में रह कर बैयत न करने वालों पर घर जलाने के लिऐ तैयार हो गऐ थे।

तीसरा हादेसा अबूबक्र की खिलाफ़त के इब्तेदाई दौर में पेश आया था और उसमें भी उमर ने उनसे इख्तिलाफ़ किया था और आयाते क़ुरआनी और इरशादाते नबवी की हस्बे ख़्वाहिश तावील कर ली थी ये ख़ालिद बिन वलीद का क़िस्सा है जिसने मालिक बिन नवीरा को बेदर्दी के साथ क़त्ल कर दिया और उसी रात उसकी बीवी के साथ हमबिस्तरी की जिस पर उमर ने ख़ालिद से कहा कि ऐ दुशमने ख़ुदा एक मुसलमान को क़त्ल कर दिया है और उसकी ज़ोजा के साथ बदकारी की है ,ख़ुदा की क़सम मैं तुझे संगसार करूँगा ” (तबरी-३-२८० ,तारीखे अबुल फ़िदा-१-१५८ ,तारीखे याक़ूबी-२-११० ,अलअसाबा-३-३३६)।

लेकिन अबूबक्र ने ख़ालिद की तरफ़ से दिफ़ा किया और कहा “उमर!ख़ालिद को मुआफ़ उन्होंने तावील में ग़लती की है लेकिन अपने ज़बान को रोके रहो ” ।

ये एक तारीख़ी वाक़ेया है जिसमें एक सहाबी के किरदार की तस्वीर कशी की गई है और फ़िर हम से मुतालिबा ये है कि इस सहाबी का ज़िक्र पूरे एहतेराम से करें और उसे सैफुल्लाह के लक़ब से याद करें।

मैं नहीं समझ सकता कि मुझे ऐसे सहाबी के बारे में क्या कहना चाहिए जो मालिक बिन नवीरा जैसे जलीलुल क़दर सहाबी ,सरदारे बनी तमीम ओ बनी यरबूअ को क़त्ल करके जिनकी मर्दानगी और करम ओ शुजाअत शोहरा आफ़ाक़ थी और मुअररेखीन ने वज़ाहत के साथ नक़्ल किया है कि ख़ालिद ने मालिक को धोका दिया है और जब इन लोगों ने अस्लहा रख दिया और नामज़े जमाअत में शरीक हो गए तो उन्हें रस्सियों से बांध दिया और उन्हीं असीरों के दरमियान लैला बिनते मिन्हाल ज़ौजाऐ मालिक को देखा जो अपने हुस्ने जमाल में शोहरा आफ़ाक़ थी और बाज़ बयानात के मुताबिक़ अरब में उससे ज़्यादा खूबसूरत कोई औरत न थी---तो उसके हुस्न पर फ़रफ़्ता और मालिक ने साफ़ कह दिया कि हमें अबूबक्र के पास भेज दो वही हमारे बारे में फ़ैसला करेंगे और अब्दुल्लाह इब्ने उमर अबूकतादा अन्सारी ने भी इस तजवीज़ की ताईद की इन्हें अबूबक्र के पास भेज दिया जाऐ और वो फ़ैसला करें लेकिन ख़ालिद ने तमाम मुतालिबात को ठुकरा दिया और कहा कि “ख़ुदा मुझे मुआफ़ न करे अगर मैं इसे क़त्ल न कर दूँ ” ये सुनकर मालिक ने अपनी ज़ौजा की तरफ़ देखा कि “ख़ालिद अस्ल में मेरे क़त्ल की बुनियाद ये औरत है ” जिस पर ख़ालिद ने उनकी गर्दन उड़ा दी और लैला को गिरफ़्तार करके उसी रात उससे हमबिस्तरी की-(अबुल फ़िदा-१-१५८ ,याक़ूबी-२-११०-तारीखे इब्ने शख़्ना बार हाशिया कामिल-११-११४ ,दफ़ियातुल अयान-६-१४)।

आख़िर में उन सहाबा के बारे में क्या कहूँ जो हरामे ख़ुदा को हलाल कर लेते हैं और नुफ़ूसे मोहतरम का क़त्ल कर देते हैं सिर्फ़ अपनी ख़्वाहिशे न नफ़्स की बिना पर अस्मतों को मुबाह बना लेते हैं जबकि इस्लाम में शौहर के मरने के बाद इद्दत गुज़रने से पहले किसी क़ीमत पर अक़्द जायज़ नहीं है अफ़सोस के ख़ालिद ने ख़्वाहिश को अपना ख़ुदा बना लिया और अपने को हलाकत में डाल दिया---और ज़ाहिर है जो मुसलमान को बेदर्दी और गद्दारी से कत्ल कर सकता है उसकी निगाह में इददऐ वफ़ात की क्या क़ीमत है यही वजह है की अबूकतादा वापस चले आऐ और उन्होंने क़सम खाई की जिस लश्कर का सरदार ख़ालिद होगा उसमें हरगिज़ शिरकत नहीं करेंगे(तबरी-३-२८० ,याक़ूबी-२-११० ,अबुल फ़िदा असाबा-३-३३६)।

इस सिलसिले में उस्ताज़ हैकल का वो ऐतेराफ़ नक़्ल कर देना भी काफ़ी होगा की जो उन्होंने अपनी किताब “अबूबकर सिद्दीक़ ” राय उमरो हुज्जत फ़िल अम्र के ज़ैल में दर्ज फ़रमाया है की हज़रत उम्र क़तई अदालत का नमूना थे और उनका ख़्याल था कि ख़ालिद ने एक मुसलमान पर ज़्यादती की है और उसकी ज़ौजा से बदकारी की है लिहाजा उसका लश्कर में रहना किसी क़ीमत पर मुनासिब नहीं है ताकि ऐसे जराएम की तकरार न होने पाऐ और उमूरुल मुस्लेमीन में फ़साद न पैदा हो---और उसे बग़ैर सज़ा के छोड़ा जाऐ कि उसने लैला के साथ बदकारी का इरतेकाब किया है।

और अगर ये मान भी लिया जाऐ कि ख़ालिद ने तावील में ग़लती की है तो ये मालिक के मामले में होगा अगरचे उम्र को ये भी तस्लीम नहीं है लेकिन उनकी ज़ौजा के साथ बदकारी तो बहरहाल हद की मूजिब है और उसका ये उज़्र हरगिज़ नहीं हो सकता कि वो सैफुल्लाह हा या वो एक सरदार है जिसकी रकाब में फ़तह ओ ओ ज़फ़र साथ चला करती थी---इस लिए कि ऐसे उज़्र क़ाबिले क़ुबूल हो गए तो इसका मतलब ये है कि ख़ालिद जैसे अफ़राद के लिए तमाम हराम हलाल हो जाएँ और ये बात ऐहतेरामें किताबुल्लाह की बदतरीन मिसाल होगी----और यही वजह है कि उमर बराबर अबूबक्र से सज़ा के बारे में इसरार करते रहें यहाँ तक कि उन्होंने उसे बुलाकर डांट दिया(अल सिद्दीक़ अबूबक्र-१५१)।

इस मक़ाम पर क्या मैं उस्ताज़ हैकल और अपने तमाम उल्माऐ किराम से तक़दीसे सहाबा के लिए हर ना जायज़ काम करने को तैयार हूँ---ये सवाल कर सकता हूँ की अबूबक्र ने ख़ालिद पर हद क्यों नहीं जारी की---- ? और अगर उमर क़तई और हत्मी अदालत ओ इन्साफ़ के नमूने थे तो उन्होंने सिर्फ़ माज़ूली पर क्यों इक्तेफ़ा कर ली और हद का तक़ाज़ा क्यों नहीं किया ताकि ये मुसलमानों में ऐहतेरामें किताबुल्लाह की बाद तरीन मिसाल न बनने पाऐ जैसा कि उन्होंने अपने ऐहतिजाज में कहा था और क्या उन लोगों ने किताबुल्लाह का ऐहतेराम कर लिया और हुदूदे इलाही को क़ायम कर दिया----हरगिज़ नहीं---ये सिर्फ़ एक सियासी चाल थी जिसे हर शख़्स नहीं समझ सकता कि सियासत अजाएबे रोज़गार जनम दिया करती है और हक़ाएक़ को मुन्क़लिब कर दिया करती है ,सियासत नुसूसे क़ुरआनी को दीवार पर मार दिया करती है।

क्या मैं अपने उल्माऐ किराम से जिन्होंने अपनी किताबों में ये रिवायत दर्ज की है कि “जब उसामा ने एक चोर के बारे में रसूले अकरम से सिफ़ारिश की तो आप बेहद ग़ज़बनाक हुऐ और आपने फ़रमाया कि तुम हुदूदे इलाहाई के बारे में सिफ़ारिश कर रहे हो---याद रखो अगर इसकीजगाह मेरी बेटी फ़ातिमा ने ये अमल किया होता तो मैं उसके भी हाथ क़त्आ कर देता-तुम से पहले वाले इसी बात पर हलाक हुऐ हैं कि जब किसी शरीफ़ ने चोरी की तो उसे छोड़ दिया और जब किसी मामूली आदमी ने यही अमल अंजाम दिया तो उसके हाथ काट दिये-----ये हज़रात उन बेगुनाह अफ़राद के क़त्ल के मसअलेमें क्यों खामोश हैं और इस बदकारी पर क्यों ऐहतेजाज नहीं करते जहां उन औरतों पर ज़ुल्म किया गया जो अपने शौहरों के क़त्ल में ग़मज़दा बैठी थीं---और काश ये हज़रात खामोश ही रह जाते — लेकिन ये तो ख़ालिद के आमाल को जायज़ क़रार देना चाहते हैं और उसके लिए तरह तरह की रिवायत वज़ा कर रहे हैं और सैफुल्लाह जैसे मनाक़िब की तख़लीक़ कर रहे हैं।

मुझे मेरे एक दोस्त ने उस वक़्त हैरत में डाल दियाजब मैं उसकी “मिज़ाह पसन्द तबीयत को देखा कर ख़ालिद की खुसूसियात बयान कर रहा था और सैफुल्लाह के लक़ब से याद कर रहा था तो उसने कहा की वो “सैफुल शैतान वल मशलूल ” था और मुझे ये बात इन्तेहाई नागवार और अजीब मालूम हुई लेकी जब मैंने ख़ुद तहक़ीक़ की तो अल्लाह ने मेरी बसीरत के दरवाज़े खोलकर मुझे उन लोगों के हालात से बाख़बर बना दिया जिन्होंने खिलाफ़त पर क़ब्ज़ा करके अहकामे ख़ुदा को तब्दील और हुदूदे ख़ुदा को मुअत्तल कर दिया था।

ख़ालिद बिन वलीद का एक वाक़ेया खुदा हयाते पैग़म्बर में भी पेश आया जब आपने उसे बनी जज़ीमा की तरफ़ दावते इस्लाम के लिए भेजा और जंग का कोई हुक्म नहीं दिया था लेकिन जब वो सही लहजे इस्लाम का एलान नहीं कर सके तो ख़ालिद ने उन्हें क़त्ल करना और गिरफ़्तार करना शुरू कर दिया और अपने असहाब को हुक्म दिया के सारे असीरों को क़त्ल कर दें सिर्फ़ बाज़ ने उनके इस्लाम को देख कर क़त्ल से इन्कार कर दिया और वापस आकर रसूले अकरम से शिकायत की तो आपने फ़रमाया कि “ख़ुदाया मैं ख़ालिद के अमल से बेज़ार हूँ ” और यही फ़िक़रा दो मरतबा दुहराया(बुख़ारी-४-१७१-बाबे इज़ा अक़्ज़ल-हाकिम बेजौर) और इसके बाद हज़रत अली अलैहिस्सलाम को भेज कर मक़तूलीन की दैत अदा कराई और उनकी तमाम अंवाल का मुवाऐज़ा अदा कराया---और हज़रत ने रुबाक़िबला खड़े होकर दोनों हाथों को आसमान की तरफ़ बुल्न्द करके फ़रियाद की “ख़ुदाया!मैं ख़ालिद के अमल से बेज़ार हूँ और इस फ़िक़रे को तीन मर्तबा दुहराया।(सीरते आईबीने हश्शम-४-५३ ,तबक़ाते इब्ने साद ,असदुलग़ाबा-३-१०२)।

क्या मैं इन हज़रात से सवाल कर सकता हूँ कि सहाबाऐ किराम की मफ़रूज़ा अदालत कहाँ चली गई----और अगर ख़ालिद इस सुलूक के बाद भी सैफुल्लाह है तो क्या ख़ुदा की तलवार बेगुनाह मुसलमान पर ही उठती है ? और क्या इसका मक़सद बन्द्गाने ख़ुदा की हतके हुरमत और आबूरूरेज़ी ही है ये तो अजब मुताज़ाद मनतिक़ है कि एक तरफ ख़ुदा कत्ले नफ़्से मोहतरम से मना करता है ,फ़ुहशा और मुन्कर से रोकता है और दूसरी तरफ़ उसकी तलवार (सैफुल्लाह)मुसलमानों की गरदनों पर चली रही है और उनका ख़ूने नाहक बहा रही है ,उनके अमवाल ग़स्ब हो रहे हैं ,उनके बच्चे यतीम और उनकी औरतें क़ैदी बनाई जा रही है।

“ ख़ुदाया!तू पाक ओ बेनियाज़ है और इन ख़ुराफ़ात से कहीं ज़्यादा बलन्द है तूने ज़मीन ओ आसमान के दरमियान की मख़लूक़ात को बातिल नहीं पैदा किया है ये तो काफ़िरों का ख़्याल है ,और काफ़िरों के लिऐ जहन्नम का अज़ाब है ” ।

भला अबूबक्र जैसे ख़लीफ़तुल मुस्लेमीन के लिऐ ये अम्र कैसे जायज़ हो गया कि इन मुहलिक जराएम के ब्बारे में साकित और ख़ामोश रह जाएँ और उमर इब्ने ख़त्ताब को ज़बान बन्द करने का हुक्म दें। और अबूकतादा पर इसलिए नाराज़ हो जाएँ कि उन्होंने ख़ालिद के आमाल पर एतेराज़ किया था--- क्या वाक़ियन उनका ये ख़्याल था कि ख़ालिद ने तावील में ग़लती की है तो फिर इस वाक़ेये के बाद किसी भी मुजरिम को सज़ा देने का क्या जवाज़ रह जाता है और हर एक की तावील को क्यों न क़ुबूल किया जाऐगा--- ?

मैं तो ऐतेक़ाद नहीं रखता हूँ कि अबूबक्र ने ख़ालिद के मामले में तावील से काम लिया हो जबकि उमर ने ख़ालिद को अदुअल्लाह कह कर खिताब किया था और उनकी राय थी के ख़ालिद को क़त्ल कर दिया जाऐ कि वो नफ़्से मुस्लिम का क़ातिल भी है और उसकी ज़ौजा का ज़ानी भी है ,उसे बहरहाल संगसार होना चाहिऐ-----हरगिज़ नहीं ,ख़ालिद महफ़िले खिलाफ़त से फ़ातिहाना शान से बरामद हुआ कि अबूबक्र ने उसकी हिमायत कर दी हालांकि वो उसके हाल से ज़्यादा बाख़बर थे जैसा कि मुअर्रिखीन ने नक़्ल किया है कि उन्होंने इस वाक़ेये के बाद ख़ालिद को यमामा की तरफ़ भेजा गया जहां उसने मारके को सर कर लिया उसके बाद लैला ही की तरह एक दूसरी लड़की से अक़्द कर लिया जबकि न अभी मुसलमानों का ख़ून ख़ुश्क हुआ और न मुसैलिमा के पैरोकारों का लहू ,ये ज़रूर है कि अबूबक्र ने इस फ़ेल पर पहले से कुछ ज़्यादा सरज़निश की थी(अलनसिद्दीक़ अबूबक्र-१५१)।

जबकि ये लड़की लैला ही कि तरह शौहरदार भी थी वरना अबूबक्र तन्बीह भी न करते और इस पर इस क़दर ज़ोर भी न देते जैसा कि मुअर्रेखीन ने नक़्ल किया है कि अबूबक्र ने ख़ालिद की तरफ़ ये पैग़ाम भेजा कि “फ़र्ज़न्दे उम्मे ख़ालिद तुझे औरतों के साथ हमबिस्तरी करने की बड़ी फ़ुर्सत है जबकि तेरे सामने बारह सौ मुसलमानों के लाशे पड़े हुए हैं और उनके ख़ून ख़ुश्क नहीं हुए हैं-(तबरी-३-२५४ ,तारीखे ख़मीस-३२४३)।और जब ख़ालिद ने इस ख़त को पढ़ा तो बरजस्ता ज़बान से निकला कि ये सब उमर इब्ने ख़त्ताब की हरकत है।

यही वो कवि असबाब हैं जिन्होंने मुझे इन असहाब से मुतानफ़्फ़िर बन दिया और इनके पैरोकारों से बेज़ार कर दिया जो ऐसे लोगों के लिऐ रज़ीअल्लाहो ताला अन्हू कहते हैं और पूरी ताक़त से उनकी तरफ़ से दिफ़ाअ करते हैं ,उनके मुक़ाबिले में नुसूसे इलाहिया की तावील करते हैं और उनकी शान में अजीबोब ग़रीब वाक़ेयात और रिवायात वज़अ करते हैं ताकि उनके जरिये अबूबक्र ,उमर ,उस्मान ,ख़ालिद ,माविया और उमरे आस वग़ैरा के आमाल की तौज़ीह कर सकें और उन्हें एक बजानिब क़रार दे सकें।

ख़ुदाया! मैं तुझसे अस्तग़फार और तेरी बारगाह में तौबा करता हूँ मैं इन अफ़राद के इन अफ़आल से बेज़ार हूँ जिनमे तेरे अहकाम कि मुख़ालिफ़त हुई है और तेरे हराम को हलाल बना दिया गया है और तेरे हुदूद को मुअत्तल किया गया है तेरी बारगाह में उन तमाम अफ़राद और उनके इत्तेबा और अन्सार से इज़हारे बराअत करता हूँ जिन्होंने ये सब जानते हुऐ भी उनसे इज़हारे ख़ुलूस ओ मुहब्बत नहीं किया है परवरदिगार मेरे माज़ी के इन्हेराफ़ को मुआफ़ कर देना कि मैं जाहिल था और तेरे रसूल ने फरमाया है “कि जाहिल जहालत से माज़ूर होता है ”

ख़ुदाया! मेरे बुज़ुर्गों और सरदारों ने मुझे रास्ते से बहकाया है और हक़ीक़त पर परदा दाल दिया है हमारे सामने मुन्हरिफ़ सहाबा को रसूले अकरम के बाद अफ़्ज़लुल-ख़ल्क़ बनाकर पेश किया है और यकीनन हमारे आबाओ अजदाद भी इस जालसाज़ी और फ़रेबकारी का शिकार हुए हैं जिसका जाल बनी उमैय्या और उसके बाद बनी अब्बास ने बिछाया था।

ख़ुदाया!मुझे और इन दोनों को मुआफ़ करदे कि तू दिलों के राजों का जाने वाला है असरारे मख़फ़िया से बाख़बर है हमारी मुहब्बत और ऐहतेराम सिर्फ़ हुस्ने नियत की बिना पर था ये सब रसूले अकरम के अन्सार ओ आवान और असहाब ओ अजनाब थे तुझे बख़ूबी मालूम है कि हम सब तेरे रसूल की इतरत के चाहने वाले हैं और उन आइम्माऐ अहलेबैत से मुहब्बत करने वाले हैं जिनसे तूने हर रिज्स को दूर रखा हैं और मुकम्मल तौर पर पाक ओ पाकीज़ा रखा है और जिनके रास ओ रईस हज़रते सैय्यदुल-मुरस्लीन , अमीरुल-मोमिनीन , क़ायदुल-गुर्रिल मुहजिबीन , इमम्मुल मुत्तक़ीन अली इब्ने अबीतालिब अलैहिस्सलाम हैं।

ख़ुदाया!मुझे उनके शियों में उनकी मुहब्बत से तमस्सुक करने वाले और उनकी राह पर चले वालों में क़रार दे ,हम उनके सफ़ीनऐ-निजात पर सवार रहें और उनकी मज़बूत रस्सी को थामे रहें इन्हीं के आमाल ओ अक़वाल का इत्तेबा करें और इन्हीं के फ़ज़ल ओ एहसान के गुन गाते रहें।

ख़ुदाया!हमें इन्हीं के ज़ुमरे में महशूर करना कि तेरे नबीऐ करीम ने वादा किया हैकि “हर इन्सान अपने महबूब के साथ महशूर जाऐगा ” ।

२:-हदीसे सफ़ीना:-रसूले अकरम का इरशाद है कि “मेरे अहलेबैत की मिसाल सफ़ीनऐ नूह की मिसाल है कि जो इस पर सवार हो गया निजात पा गयाऔर जो इससे अलग रह गया ग़र्क़ हो गया ” (मुस्तदरके हाकिम-३-१५१ ,तल्खीसे ज़हबी यनाबीहुल मुवद्दत-३० ,३७० ,सवाइक़े मुहरिक़ा-१८४ ,२३४ ,तारीखुल ख़ुल्फ़ा सेयूती ,और जामऐ सगीर ,असआफ़उल रागिबीन)।

तुम्हारे दरमियान मेरे अहलेबैत की मिसाल बाबे हितता की सी है जो इसमें दाख़िल हो गया उसे बख़्श दिया गया ” (मजमऐ-ज़वाईद-९-१६८)।

इब्ने हजर ने सवाएक़े मुहरिका में इस रिवायत को नक़्ल करने के बाद फ़रमाया है कि अहलेबैत को सफ़ीनऐ नूह से तशबीह देने का मक़सद ये है कि जिसने इनसे मुहब्बत की और इनकी अज़मत का ऐतेराफ़ किया उनके उल्मा की हिदायत की राह पर चलता रहा वो मुख़ालिफ़तों की तारीकियों से निजात पा गया और इनसे मुन्हरिफ़ हो गया वो कुफ़राने नेमत के समंदर में ग़र्क़ हो गया और सरकशी के तूफ़ानों में गुम हो गया---और बाबे हितता से तशबीह देने का मतलब ये है कि जिस तरह से ख़ुदा ने बाबे इरीहा या बाबे बेतुलमुक़द्दस को बनी इस्राइल के लिऐ सबबे मग़फ़िरत क़रार दे दिया था और अगर वो तवाज़ों और अस्तग़फ़ार के साथ दाख़िल हो जाते इसी तरह इस उम्मत के लिऐ अहलेबैत की मुहब्बत को वसीलऐ मग़फ़िरत क़रार दिया है।

काश में इब्ने हजर से पूछ सकता कि क्या जनाब इस सफ़ीनऐ निजात पर सवार हो गऐ हैं ? और क्या इस्लाम में इसी दरवाज़े से दाखिल हुए हैं और क्या इन्हीं के उल्मा से हिदायत हासिल की है ? ---या आप का शुमार उन लोगों में होता है जो कहते कुछ और हैं करते कुछ और हैं और अक़ीदे के खिलाफ़ अमल करते हैं और इन तारीकियों में ठोकरें खाने वालों से सवाल किया जाऐ तो जवाब यही देते हैं कि हम अहलेबैत का ऐहतेराम करते हैं उनकी अजमत के क़ायल हैं और कोई ऐसा नहीं है जो उनके फ़ज़ल और फ़ज़ाएल का मुनकिर हो।

बेशक ये लोग अपनी ज़बान से वो सब कुछ कहते हैं जो इनके दिलों में नहीं है या ऐहतेराम औए ऐजाज़ का करते हैं और इत्तेबा उनके दुश्मनों ,क़ातिलों और मुख़ालीफ़ों का करते हैं---या ये जानते ही नहीं कि अहलेबैत कौन हज़रात हैं ? और जब पूछा जाता है तो फ़ौरन कह देते हैं अहलेबैत से मुराद अज़वाजे पैग़म्बर हैं जिनसे ख़ुदा ने हर रिज्स को दूर रखा है और उन्हें तय्यब ओ ताहिर क़रार दिया है।

ये राज़ तो मुझ पर उस वक़्त खुला जब मैंने अपने एक आलिम से पूछा कि अहलेबैत से आपका राबता क्या है ? तो फ़रमाया कि हम सब अहलेबैत की इक़्तेदा करते हैं और जब मैंने हैरत से पूछा कि ये किस तरह--- ? ---तो फ़रमाया कि रसूले अकरम ने ख़ुद फ़रमाया कि “अपना निस्फ़ दीन हुमैरा(आयशा) से ले लेना और हमने निस्फ़दीन इन्हीं अहलेबैत से लिया है।

उस वक़्त मुझे अंदाज़ा हुआ कि अहलेबैत के ऐजाज़ ओ ऐहतेराम का मफ़हूम क्या है ,और जब आइम्माऐ असना अशर के बारे में पूछा गया तो फ़रमाया इमाम अली ,इमाम हसन और इमाम हुसैन के सिवा किसी को नहीं जानते और फिर उनकी भी इमामत के क़ायल नहीं हैं ,बल्कि उस माविया का ऐहतेराम करते हैं जिसने हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम को ज़हर दिया और उसे क़ातिबे वही के लफ़्ज़ से सरफ़राज़ करते हैं और उमरे आस का उसी तरह ऐहतेराम करते हैं जिस तरह अहजरत अली अलैहिस्सलाम का ऐहतेराम करते हैं।

ये दर हक़ीक़त एक तनाक़िज़ और हक़ीक़त की परदापोशी और हक़ ओ बातिल का इम्तियाज़ है जिसका मतलब नूर पर ज़ुल्मत का गिलाफ़ चढ़ा देना है और रौशनी को पोशीदा कर देना है और बस वरना क़ल्बे मोमिन में हुब्बे ख़ुदा और शैतान का जमा होना नामुमकिन है ,रब्बे करीम ने ख़ुद इरशाद फ़रमाया है:-

“ तुम किसी ऐसी क़ौम को जो ख़ुदा और रोज़े आखिरत पर ईमान रखती हो ऐसा न पाओगे कि वो ख़ुदा और रसूल के दुश्मनों से मुहब्बत करे चाहे वो उनके आबाओ अजदाद और बरादर ओ अशीरा ही क्यों न हों ,अल्लाह वालों के दिल मे ईमान लिख दिया है और ख़ुदा ने अपनी रूह से उनकी ताईद कर दी है और वो हमेशा उन्हें उन जन्नतों में दाख़िल करेगा जिनके नीचे नहरे जारी होंगी वो हमेशा वहीं रहेंगे ,ख़ुदा उनसे राज़ी है और वो ख़ुदा से राज़ी हैं यही दर हक़ीक़त ख़ुदा के गिरोह वाले हैं और ख़ुदा का गिरोह ही कामयाब होने वाला है ” (मुजादिला:-२२)।

“ ईमान वालों ख़बरदार हमारे और अपने दुश्मन को दोस्त न बनाना कि उन्हें मुहब्बत का पैग़ाम दे दो जबकि ये लोग इस हक़ के मुनकिर हैं जो तुम्हारी तरफ़ आ चुका है ” (मुम्तहिना:-१)।

३:-हदीसे “मन सिर-रहू अन यहिया हयाती ” :-रसूले अकरम का इरशाद है कि “जो शख़्स ये चाहता है कि मेरी तरह ज़िन्दगी के साथ जिऐ और उसे मेरी तरह की मौत नसीब हो और उसी जन्नते अदन में रहे जिसे रब्बे करीम ने मुहय्या किया है तो वो मेरे बाद अली अ।स। और उनके दोस्तों से मुहब्बत करे ,मेरे अहलेबैत की इक़्तेदा करे कि यही इतरत हैं जिन्हें मेरी टीनत से ख़ल्क़ किया गया है और इन्हें मेरा इल्म और फ़हम आता किया गया है ,मेरी उम्मत में इनके फ़ज़ल का इन्कार करने वालों और उनसे क़तऐ ताल्लुक़ करने वालों के लिऐ जहन्नम है और हरगिज़ शिफ़ाअत न करूंगा ” । (मुस्तदरके-३-१२८ ,जामऐ कबीर तबरानी ,असाबा इब्ने हजरे असक़लानी ,कन्ज़ुल आमाल-३१५५ ,मनाक़िबे ख़्वारज़मी-३३४ ,यनाबीउल मुवद्दत-१४९ ,हुलयतुल औलिया ,तारीखे इब्ने असाकर-२-९५)।

ये हदीस अपने मफ़हूम में मुकम्मल तौर पर सराहत और वज़ाहत रखती है जिसमें किसी तरह की तावील ओ तशकीक की गुंजाइश नहीं है और इसका वाज़ेह तरीन मफ़हूम ये है कि अगर कोई शख़्स अली से मुहब्बत और अहलेबैत की पैरवी नहीं करता है तो वो रोज़े क़यामत सरकारे दो आलम की शिफ़ाअत से महरूम रहेगा।

इस मक़ाम पर इस नुक़्ते की तरफ़ इशारा कर देना ज़रूरी है कि मैंने अपनी तहक़ीक़ात के दौरान न इब्तेदामें इस हदीस की सेहत में शक किया था और इतनी अज़ीम तहदीद को नाक़ाबिले तसव्वुर क़रार दिया था कि हज़रत अली अ।स। और अहलेबैत से इख्तिलाफ़ करने वाला शिफ़ाअते पैग़म्बर से महरूम रह जाऐ जबकि इस हदीस में तहवील की भी गुंजाइश नहीं है लेकिन मेरे ज़हन का बोझ क़दरे हल्का हो गया जब मैंने इब्ने हजरे असक़लानी का बयान पढ़ा कि उन्होंने इस हदीस को नक़्ल करने के बाद ये नोट लगाया इसकी सनद में यहिया इब्ने लैला है जो ज़ईफ़ और वाहियात आदमी है ,और मैंने समझ लिया कि ये शख़्स जालसाज़ था और उसकी बात का कोई ऐतेबार नहीं है लेकिन इसकी असल हक़ीक़त का अंदाज़ा उस वक़्त हुआ जब मैंने मनाफ़िशाते अक़ाऐदिया फ़ी मक़ालाते इब्राहिमुल जबहान नामी किताब पढ़ी और उसमें देखा कि मुसन्निफ़ ने इस तहक़ीक़ का ऐलान किया है कि यहिया बिन लैला मुहारिबी आदमी है और उस पर बुख़ारी और मुस्लिम जैसे मुहद्देसीन ने ऐतेबार किया है और मैंने ख़ुद बराहे रास्त इन हाक़ाएक़ का मुतालिआ किया और ये देखा कि बुख़ारी ने बाबे गज़वऐ हुदैबिया में अपनी सही की जिल्द-३-३१ पर इसकी रिवायत को नक़्ल किया है और मुस्लिम में बाबुल हुदूद-५-११९ ,पर उसकी रिवायत दर्ज की है और ज़हबी ने इन्तेहाई तशद्दुद और तास्सुब के बावजूद उसकी विसाक़त को बतौर मुस्लिमात दर्ज किया है और आइम्माऐ रिज़ाल ने इसे मोतबर रावियों की फहरिस्त में जगह दी है।

मेरी समझ में नहीं आता कि आख़िर इस जालसाज़ी और इन्कारे हक़ाएक़ की वजह क्या है और इब्ने हजर को इस क़िस्म की ग़लत बयानी की क्या ज़रूरत पेश आई है ? क्या सिर्फ़ इस जुर्म में कि उसने इत्तेबाऐ अहलेबैत की रिवायत को नक़्ल कर दिया है उसकी सज़ा ये क़रार पाई कि इब्ने हजर उसे ज़ईफ और वाहियात क़रार दे दे और ये भी भूल जाए की इसके पीछे भी उल्मा ओ मुहक़िक़ीन का एक गिरोह है जो हर छोटी बड़ी ख़यानत का मुहासिबा करने वाला है और तास्सुब और जिहालत के परदे उठा कर हक़ाएक़ को बेनक़ाब करने वाला है की उसे नबूवत की नूरानियत और हिदायते अहलेबैत अलैह।की रोशनी का सहारा हासिल है।

मुझे अब अंदाज़ा हो गया है की हमारे बाज़ उल्मा की तमाम तर कोशिश यही है की हक़ाएक़ की परदापोशी करें और उन्हें अवाम पर वाज़ेह न होने दें और इस राह में कभी वो अहादीसे सहीहा की तावील करते हैं और उसे अजीब ओ ग़रीब मानी पर महमूल करते हाइनौर कभी मोतबर अहदीस का इन्कार ही कर देते हैं चाहे उनका इन्दराज सराह और मसानीद ही में क्यों न हो----और कभी रावियों को ज़ईफ़ क़रार देकर उनकी बात को बेवज़न बनाना चाहते हैं और कभी हदीस का १/२ या १/३ हिस्सा हज़्फ़ कर देते हैं ताकि वो उनकी ख़्वाहिशात के मुताबिक रहे।और कभी एक एडीशन में दर्ज करने के बाद दूसरे एडीशन से निकाल देते हैं और इस हज़्फ़ ओ तरमीम की वजह भी बयान नहीं करते हैं----अगरचे उन्हें मालूम है कि साहिबाने नज़र इन तमाम हरकाट ओ आमाल के हक़ीक़ी असबाब ओ मुहर्रीकात से बाख़बर हैं जिस तरह मुझ पर ये तमाम हक़ाएक़ वाज़ेह हो चुके हैं और मैं अपने मुददुआ पर क़तई दलाएल का एक ज़ख़ीरा रखता हूँ।

काश ये उल्माऐ किराम आजमाते सहाबा के तहफ़्फ़ुज़ की ख़ातिर इस क़दर जालसाज़ी और ग़लत बयानी करने के बजाए और मुतानाक़िज़ अक़वाल नक़्ल करने या तारीख़ी हक़ाएक़ से वाज़ेह तौर पर टकराने के बजाए हक़ का ऐतेराफ़ ही कर लेते तो इन्हें भी सुकून हासिल हो जाता और लोग भी इनके शर से महफ़ूज हो जाते और इस उन्हें उम्मत के इफ़्तिराक़ को मिटाने और उसमें इज्तेहाद और इत्तिफ़ाक़ पैदा करने का अज्र भी मिल जाता।

और जब देख रहे हैं की बाज़ सहाबऐ अव्वलीन नक़्ले

रिवायत में इस क़दर गैरे मोतबर है की अपनी ख़्वाहिश के मुताबिक़ न होने वाले उमूर को नज़रअन्दाज़ कर देते हैं और ख़ुद रौले अकरम की वसीयत को भी फ़रामोश कर देते हैं कि बक़ौल बुख़ारी ओ मुस्लिम रसूले अकरम ने वक़्ते वफ़ात तीन बातों कि वसीयत फ़रमाई थी।

1:-मुशरिकीन को जज़ीरऐ अरब से निकाल दिया जाऐ।

2:-हर वफ़्द के साथ वैसा ही बर्ताव किया जाए जैसा कि मैं किया करता था।

३:-रावी का बयान है कि मैं तीसरी वसीयत को भूल गया।(बुख़ारी-१-१२१:-बाबे हवाएजुल वफ़्द मीन किताबुल जिहाद ,सही मुस्लिम किताबे वसीयत)।

और सहाबाए किराम तीन वसीयतों को भी महफ़ूज न रख सके जबकि इन हज़रात का हाफ़िज़ा इस क़दर क़वी था कि एक बार क़सीदा सुनने के बाद पूरे क़सीदे को महफ़ूज कर लिया करते थे----तो क्या ये न कहा जाए कि ये सब सियासत की बाज़ीगिरी है जिसने इन्हें निसयान और अदमे ज़िक्र पर मजबूर कर दिया है।

हक़ाएक़े इस्लाम के साथ ये सहाबाऐ किराम का दूसरा मज़ाक़ है जहां रसूले अकरम की वसीयत का ताल्लुक़ हज़रत आली की खिलाफ़त से था और इसी लिऐ सहाबी का हाफ़िज़ा ख़ता कर गया और इस वसीयत को याद न रख सका जबकि इस मसअले में तहक़ीक़ करने वाला साफ महसूस कर लेता है कि रिवायत से वसीयत ओ वसायते अली की ख़ुशबू आ रही है अगरचे इसके छुपाने पर पूरा ज़ोर सर्फ़ कर दिया गया जैसे कि बुख़ारी ही में किताबुल वसाया में और मुस्लिम में किताबुल वसीयत में नक़्ल किया है कि हज़रत आयशा के इस अम्र का तज़किरा किया गया था कि रसूले अकरम ने हज़रत अली के बारे में वसियत की थी---(बुख़ारी-३-६८ ,बाबे मरज़े नबी व वफ़ात ,मुस्लिम-२-१४ किताबुल वसीयत)।

देखा आपने अल्लाह अपने नूर को किस तरह ज़ाहिर करता है चाहे ज़ुल्मते किस क़दर परदापोशी क्यों न करना चाहें।

अब मुझे दोबारा कहना पड़ेगा कि जब नक़्ले वसीयते पैग़म्बरे इस्लाम में सहाबाऐ किराम इस क़दर गैरे मोतबर हैं तो उनके ताबेईन और तबऐ ताबेईन के बारे में क्या कहा जा सकता है और जब हज़रत आयशा “उम्मुल मोमिनीन ” हज़रत अली अलैहिस्सलाम के नाम को बर्दाश्त न कर सकी और उनका जीकरे खैर न पसन्द कर सकीं जैसा कि इब्ने साद ने तबक़ाते क़िस्मे दोम जिल्द ,सफ़्हा-२९ और बुख़ारी ने बाबे मरज़ुल नबी में नक़्ल किया है और हज़रत अली की ख़बरे शहादत पर सजदऐ शुक्र करें तो उनसे क्या तवक़्क़ो राखी जाऐ कि वो हज़रत के बारे में वसीयत का ज़िक्र करेंगी जबकि उनकी अली और औलादे अली से अदावत शोहरा आफ़ाक़ है और हर ख़ास ओ आम को मालों है।

-फ़लाहौला वला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहिल-अलीउल अज़ीम-

हमारी सबसे बड़ी मुसीबत:

“ इज्तेहादे दर मुक़ाबिलऐ नस ” है।

मैंने अपनी तहक़ीक़ के दौरान ये नतीजा अख़्ज़ किया है कि उम्मते इस्लामिया की सबसे बड़ी मुसीबत नुसूसे सरिहा के मुक़ाबिले में इज्तेहाद है जिसने हुदूदे इलाहिया को मुअत्तल और सुन्नते नबविया को बर्बाद कर दिया है ,सहाबा के बाद यही कारोबार उल्मा ने किया है और उन्होंने भी अपने अफ़कार की बुनियाद सहाबा के इज्तेहाद पर राखी है और इस तरह कभी सहाबा के अमल से टकराव की सूरत में नस्से नबवी को नज़रअंदाज़ कर दिया है और कभी नस्से क़ुरआनी को-और मैं इस बयान पर क़तई मुबालिगे से काम नहीं ले रहा हूँ बल्कि मैंने इसकी मिसालें भी नक़्ल कर दी हैं जिसकी वाज़ेह तरीन मिसाल आयते तयम्मुम और सुन्नते रसूल के मुक़ाबिले में सहाबा का इज्तेहाद और उनका तरके नमाज़ का हुक्म है जिसकी तौज़ीह अब्दुल्लाह इब्ने उमर ने इज्तेहाद ही की रौशनी में की है।

इस राह में सबसे पहले जिस सहाबी ने इस दरवाज़े को पाटो पात खोला है----वो ख़लीफ़ऐ दोम हज़रत उमर हैं जिन्होंने वफ़ातेरसूल के बाद नस्से क़ुरआणि के मुक़ाबिले इज्तेहाद करके मवुल्लेफ़तुलूक़ुलूब के हिस्से को ज़कात से साकित कर दिया और फ़रमा दिया कि हमें तुम लोगों की ज़रूरत नहीं है नुसूसे नबविया मुक़ाबिले में आपके इज्तेहादात की मिक़दार बेहद बेहिसाब है यहाँ तक कि मुतादिद बार तो हुज़ूर की ज़िन्दगी में भी उनके अहकाम के मुक़ाबिले में अपने ज़ाती इज्तेहाद से काम लिया है जिसकी मिसाल सुल्हे हुदैबिया के मौक़े पर — और आख़िरी वक़्त में “हसबुना किताबुल्लाह ” का ऐलान करते वक़्त सामने आई और सबसे वाज़ेह तरीन मिसाल जिसने उनके नफ़्सियात को तश्त अज़ बाम कर दिया यही बाशरत का किस्सा है जिसमें हुजूरे रसूले अकरम ने अबूहुरैरा को ये ऐलान करने के लिऐ भेजा कि “जो शख़्स कल्मऐ लाइलाहा इल्लल्लाह ज़बान पर जारी करे और उसके दिल में तौहीद का यक़ीन हो उसे जन्नत की बशारत दे दो ” ।

और अबूहुरैरा ये बशारत ले कर चले तो रास्ते में उमर से मुलाक़ात हो गई और उन्होंने ये ऐलान करने से मना कर दिया और इतना मारा कि अबूहुरैरा ज़मीन पर गिर पड़े और रोते पीटते रसूले अकरम की ख़िदमत में हाज़िर हुऐ और उमर के सुलूक की शिकायत की तो आपने उमर से जवाब तलब किया कि तुमने ऐसा क्यों किया ? —उन्होंने कहा कि क्या आपने इस ऐलान के लिऐ हुक्म दिया था ? ---आपने फ़रमाया बेशक---उन्होंने कहा कि ऐसा मत कीजिऐ वरना लोग ला इलाहा इल्लल्लाह पर भरोसा कर बैठ जाएँगे----जिस तरह उनके फ़रज़न्द को ये ख़तरा था कि लोग तयम्मुम पर भरोसा कर लेंगे और इसी तरह नमाज़ पढ़ने लगेंगे लिहाज़ा नमाज़ का तरक करना ज़्यादा बेहतर है। काश इन हज़रात ने नुसूस को अपने हाल पर रहने दिया होता और अपने बेबुनियाद इज्तेहादात से शरीयत को बर्बाद करके और मुहरमात को मुबाह करके उम्मत में इफ़तिराक़ पैदा करने का अमल न किया होता तो तो आज मुख़तलिफ़ मज़ाहिब ओ आरा उर मुतादिद फ़िरक़ो के दरमियान उम्मते इस्लामिया की तक़सीम न होती और बाहमी इख्तिलाफ़ और खूंरेज़ी का सिलसिला न होता।

हज़रत उमर के इन तमाम मवाक़िफ़ और इक़दामात से ये बात खुल कर सामने आ जाती है कि आपका ऐतेक़ाद इस्मते रसूल पर हरगिज़ नहीं था और आप उन्हें एक आम इन्सान जैसा समझते थे ,जो सही भी का सकता है और ग़लती भी कर सकता है और इसी लिऐ उल्माऐ इस्लाम में ये नज़रिया पैदा हो गया कि रसूले अकरम सिर्फ़ तबलीगे क़ुरआन में मासूम थे और बाक़ी मुआमेलात में उनके यहाँ दूसरे अफराद की तरह माज़अल्लाह ग़लती के इमकानात पाऐ जाते थे और इसी लिऐ हज़रत उमर ने मुखतलिफ़ मुक़ामात पर आपकी ग़लतियों की इसलाह भी की है:-

और ज़ाहिर है कि अगर रसूले अकरम की यही हैसियत है जो बाज़ जाहिलों ने बयान की है कि आप घर में आराम फ़रमा रहे थे और औरतें दफ़ बजा रही थीं और शैतान लहोलाब में मसरूफ़ था और अचानक हज़रत उमर आगाए और उनको देख कर शैतान फ़रार हो गया और औरतों ने सारे दफ़ छुपा दिए। और आपने फ़रमाया कि “उमर! शैतान तुम्हें किसी भी रास्ते पर जाता देखता है तो रास्ता बदल लेता है और उधर आने की हिम्मत नहीं करता है ” तो कोई बईद नहीं है कि मज़हब के मामले में उमर की एक राय हो जो रसूले अकरम की राय से मुताआरिज़ हो और रियासत की तरह से दीन में भी उनकी राय को रसूले अकरम के फ़रमान पर मुक़द्दम कर दिया जाऐ जैसे कि उन्होंने बशारते जन्नत के मुआमले में इज़हार फ़रमाया है।

इस इज्तेहाद दर मुक़ाबिलऐ नस के नज़रिये बहुत से सहाबा की अज़मत और इन्फ़िरादियत को जन्म दिया है जिनके सारे फ़हरिस्त उमर इब्ने ख़त्ताब का नाम है और सबने मिलकर पंचशनबे के दिन नस्से सरीह की मुखालिफ़त की थी और क़लम ओ दवात देने से मना कर दिया था और यहीं से ये भी अंदाज़ा हो जाता है कि इन साहबाने नस्से ग़दीर को एक दिन के लिऐ क़ुबूल नहीं किया था और उसके वाज़ेह इन्कार का मौक़ा वफ़ाते पैग़म्बर के बाद मिला जिसमें सक़िफ़ा में इजतेमा करके अबूबक्र का इन्तेख़ाब कर लिया और इससे भी एक इज्तेहाद क़रार दे दिया जिसके नतीजे में खिलाफ़त का दरवाज़ा खुल गया और किताबे ख़ुदा के मुक़ाबिले में जसारत के हुदूद को मोत्तल अहकाम को तब्दील कर दिया गया और वो क़यामत ख़ेज़ सानेहा पेश आया जिसे हज़रत फ़ातिमा स।अ। ने अपने शौहर के खिलाफ़त से महरूमी के बाद बर्दाश्त किया और फिर मानऐन ज़कात का क़त्ले आम हुआ और ये सब “इज्तेहाद दर मुक़ाबिले नस ” के नतीजे के तौर पर हुआ।

और उसके बाद उमर बिन ख़त्ताब की खिलाफ़त इसी इज्तेहाद के नतीजे में सामने आई और अबूबक्र ने इस शूरा को नज़रअंदाज़ कर दिया जिससे अपनी खिलाफ़त की सेहत पर इस्तेदलाल किया करते थे और उमर ने मिट्टी को और गीला कर दिया कि उमूरे मुस्लेमीन पर क़ब्ज़ा करके हलाले ख़ुदा को हराम और हरामे ख़ुदा को हलाल बना दिया।(सन्नने अबूदाउद- 1-344)।

उसके बाद उस्मान का दौर तो वो सौ क़दम और आगे गए और उन्होंने अपने साबेक़ीन को भी पीछे छोड़ दिया और सियासत और मज़हब के मैदान में इज्तेहाद का बाज़ार गर्म कर दिया यहाँ तक कि इन्क़ेलाब बरपा हो गया और उन्हें अपने इज्तेहाद की मुकम्मल क़ीमत अदा करनी पड़ी।

इन हालात के बाद इमाम अली अ।स। के हाथ में ज़माने हुकूमत आई तो आपके सामने सबसे बड़ा मसअला क़ौम को सुन्नते नबवी और कानूने इलाही कि तरफ़ वापस लाने का था जिसके लिए आपने पूरी पूरी कोशिश की कि बिदअतों को ज़ाऐल किया जाऐ और सुन्नत को क़ायम किया जाऐ लेकिन क़ौम ने “वा सुन्नता उमरा ” का नारा बुलन्द कर दिया और बुरे अक़ीदे की बिना पर जिन लोगों ने हज़रत अली से इख्तिलाफ़ किया था या उनसे जंग की थी सब इस हादसे के मारे हुए थे कि आप क़ौम को सही रास्ते पर लाना चाहते थे और बिदअतों को फ़ना करके नुसूसे सरीहा ज़िन्दा करना चाहते थे जहां चौदहवी सदी के इज्तिहाद का ख़ात्मा करना था और अवाम को उस तरीक़ऐ कार से अलग करना था जहाँ हवाओ हवस और बन्देगाने हिरस ओ तमअ ने ख़ुदा माले को ज़ाती जाऐदात और बन्देगाने खुदा को अपना ख़ादिम और गुलाम बना लिया था घरों में सोने चाँदी के ढेर लगे हुए थे और खुद कमज़ोर अफ़राद मामूली से मामूली हक़ से महरूम हो गऐ थे।

और हमने तो हर दौर के मुताकब्बेरीन को ऐसा ही देखा है कि उन्हें इज्तेहाद से बेहद दिलचस्पी रही है जो उन्हें उनके ख्वाहिशात तक पहुँचाने का रास्ता हमवार कर दे जबकि नुसूसे सरीहा का मंशा ये रहा है कि इस रास्ते को रोक दिया जाऐ और उनके मक़ासिद कि राह में दीवार खड़ी कर दी जाए।

फिर इस इज्तेहाद को हर दौर में अनसार और आवान भी मिल गऐ और खुद मुस्तज़इफ़ीन ने भी सहूलत के पेशे नज़र इस रास्ते को अपना लिया और हर तरह की पाबंदी से निजात हासिल कर ली।

नस का रास्ता इल्तेज़ाम और हुर्रियते ख़्वाहिशात का रास्ता था जिसे रिजाले सियासत की इस्तेलाह में ख़ुदाई का रास्ता कहा जाता है जबकि इज्तेहाद का रासता अवामी रास्ता था और खुली हुई बात ये है कि जिन लोगों ने वफ़ाते पैग़म्बर के बाद सकीफ़ा में इजतेमा किया था उन्होंने ख़ुदाई हुक्म को नज़र अंदाज़ करके डेमोक्रेसी का रास्ता इख्तियार किया था जहाँ क़ौम अपने नेक ओ बद का फ़ैसला करती है और ख़ुदा को भी इख्तियार नहीं दिया जाता है---हालांकि ये खुली हुई बात है कि सहाबा को डेमोक्रेसी के लफ़्ज़ का इल्म नहीं था और वो सिर्फ निज़ामे शूरा से बाख़बर थे जिसका इतलाक़ अबूबकर के इन्तेख़ाब पर भी नहीं हो सका इसलिए कि सकीफ़ा में जमा होने वाले अफराद के पास उम्मत की नुमाइन्दगी की कोई सनद नहीं थी

आज ये नस्से खिलाफ़त के मुनकिर इस बात पर नाज़ करते हैं कि दूनया में डेमोक्रेसी कि इब्तेदा इस्लाम से हुई और इसका पहला तजुरबा साक़ीफ़ा बनी साऐदा में हुआ हे। और ये वही इज्तेहाद है जो नस के मुक़ाबले में लाया गया था और इसके ज़रिये इस्लाम को मग़रिबी अफकार से क़रीब तर कर दिय था जिसके नतीजे में आज तक मग़रिबी मुमालिक उन्हें तरक़्क़ी पसंद क़रार देते हैं और उनके इस्लाम को सहूलत और आसानी का इस्लाम क़रार देते हैं और नुसूसे इलाहिया पर अमल करने वालों को मुताशदिद और बुनियाद परस्त जैसे अलक़ाब से नवाज़ा जाता है और शियों का ताअल्लुक इसी दूसरी क़िस्म से क़रार दिया जाता है जो हुकमे इलाही और शूरा का फ़र्क़ जानते हैं और शूरा का महल वहाँ क़रार देते हैं जहाँ कोई नस मौजूद न हो---वरना नस के होते हुए भी किसी शूरा की गुंजाइश नहीं है।

क्या आप नहीं देखते हैं कि रब्बे करीम ने ख़ुद रसूले अकरम का इन्तिख़ाब करने केडबल्यू बाद उनसे फ़रमाया था कि “अपने मुआमिलात में उनसे मशविरा किया करो ” (आले इमरान-159)। और क़ाऐदीने बशरियत के इन्तेख़ाब के बारे में फ़रमाया था कि “तुम्हारा परवरदिगार जो चाहता है पैदा करता है और जिसको चाहता है इख्तियार करता है तुम्हें इन्तेख़ाब करने का कोई हक़ नहीं है।(क़सस-67)।

और इसी बिना पर शिया हज़रातहज़रत अली अ।स। की खिलाफ़त और इमामत के क़ायल हैं और दूसरे सहाबा पर तनक़ीद करते हैं और वो भी उन्हीं सहाबा पर तनक़ीद करते हैं जिन्होंने नस को इज्तेहाद से बदल दिया है और हुक्मे ख़ुदा और रसूल को ज़ाया कर दिया है और इस्लाम में ऐसे रख़ना पैदा कर दिये हैं जो पूरे होने वाले नहीं हैं।

और हम देखते हैं कि मग़रिबी हुकूमतों और उनके मुफ़क्करीन शियों को नज़र अंदाज़ करते हैं और तास्सुब का इल्ज़ाम देकर रज़अत पसन्द क़रार दे देते हैं कि वो क़ुरआने मजीद की तरफ़ रुजू करके चोर के हाथ काटने के क़ायल हैं और ज़िनाकार को संगसार कर देनी के क़ायल हैं फिर राहे ख़ुदा में जिहाद को ज़रूरी समझते हैं जो इन लोगों की निगाह में वहशत और बरबरियत के सिवा कुछ नहीं है।

मुझे इस तहक़ीक़ के दौरान ये भी मालूम हुआ कि अहले सुन्नत ने दूसरी सदी हिजरी से इज्तेहाद का दरवाज़ा क्यों बन्द कर दिया था और शियों ने यहाँ ये दरवाज़ा आज तक क्यों खोला हुआ है ,बात सिर्फ़ ये हैं कि अहले सुन्नत ने नस के मुक़ाबिले में इज्तेहाद का दरवाज़ा खोल कर उन मसाएब और उन खूंरेज़ जंगों का सामना किया है जहाँ खैरे उम्मत बाहम दस्त ओ गरिबाँ रहने वाली उम्मत में तब्दील हो गई और साम्राज्य दौरे दौरा हो गया ,क़बाइली निज़ाम राएज हो गया और इसलाम जाहिलियत में तब्दील हो गया जिसके बाद इस सिलसिले का रोकना ज़रूरी हो गया लेकिन शियों के यहाँ ये दरवाज़ा उस वक़्त तक खुला रहेगा जब तक नुसूस बाक़ी हैं और आयात ओ अहादीस का वुजूद क़ायम है इसलिए कि उनके यहाँ इज्तेहाद इन नुसूस के मफ़हूम के इदराक का नाम है उनसे मुक़ाबिला करने का नाम नहीं है।

इस बहस से ये अंदाज़ा हो गया कि अहले सुन्नत ने सुन्नते नबवी केलिखने से रोकने की बिना पर अपने को अक्सर मामलात में बेसहारा पाया और नतीजे में कयास ,राय ,इस्तेहसान और सददेबाब ज़राऐ वग़ैरा का सहारा लेना पड़ा लेकिन शियों को इस लावारिस का सामना नहीं करना पड़ा है और उन्होंने हज़रत अली अलैहिस्सलाम की शख़्सियत को अपना मरकज़े शरीयत क़रार दे दिया जो बाबे मदीनतुल इल्मे पैग़म्बर थे और उनका मुसलसल ऐलान था कि जो चाहो दरयाफ़्त कर लो कि मुझे रसूले अकरम ने इल्म के हज़ार बाब तालीम किऐ हैं और मैंने हर बाब से हज़ार बाब खोले हैं(तारीख़े दमिश्क़ इब्नेअसाकर-२-४८४ ,मक़तलुल हुसैन ख़्वारज़मी-१-३८ ,अलग़दीर-३-१२०)।

गैरे शिया अफ़राद ने माविया के गिर्द हल्का बाँधा था जिसके पास सुन्नते रसूल का इल्म न होने के बराबर था और वो अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली अ।स। के बाद बाग़ियों का इमाम होने के लिऐ अमीरुल मोमिनीन भी बन गया और उसने अपने पेश-रू अफ़रादसे ज़्यादा नुसूस के मुक़ाबिले में इज्तेहाद किया था और अहले सुन्नत उसे कातिबे वही और आलिमे मुज्तहिद का दर्जा ही देते रहे ,हालांकि मेरी समझ में नहीं आता कि वो शख़्स किस तरह मुज्तहिद क़रार दिया जा सकता है जिसने फ़रज़न्दे रसूल सरदारे जवानाने जन्नत इमाम हसन अलैहिस्सलाम को ज़हर दिया हो और उनकी ज़िन्दगी का ख़ात्मा कर दिया हो---मगर ये कि उसे भी मुज्तहिदक़रार दिया जाऐ और ख़ताऐ इज्तेहाद का दर्जा दे दिया जाऐ।

भला माविया कैसा मुज्तहिद है कि उसने क़हर ओ जब्र के साथ अपने और फिर अपने बेटे यज़ीद के लिऐ बैयत हासिल की और निज़ामे शूरा को कैसरियत में तब्दील कर दिया और हज़रत अली अलैहिस्सलाम और अहलेबैते किराम पर मिम्बरों से साठ साल तक लानत कराई मगर ये कि इसे भी इज्तेहाद क़रार दे दिया जाऐ।

आख़िर माविया को कतिबे वही किस ऐतेबार से क़रार दिया जाता है जबकि वही का सिलसिला-२३ साल तक जारी रहा और माविया इसमें से इक्कीस साल मुशरिक रहा और फ़िर फ़तहे मक्का के बाद मुसलमान हुआ और किसी रिवायत में न माविया के मदीने में रहने का ज़िक्र है और न रसूले अकरम के फ़तहे मक्का के बाद मक्का में क़याम करने का तज़किरा है तो क्या कातिबे वही ऐसा ही इन्सान होता है ? फ़लाहौला वला कुव्वता इल्ला बिल्लाहिल अलीउल अज़ीम।

मेरा सवाल अपने मक़ाम पर क़ायम है की इन दोनों फ़रीक़ों में कौन हक़ पर है ? और कौन बातिल पर ? माज़अल्लाह हज़रत अली अलैहिस्सलाम और उनके साथी ज़ालिम और बातिल पर हैं या माविया और उसके पैरोकार ज़ालिम और बातिल पर हैं ?

हक़ीक़ते अम्र ये है की रसूले अकरम ने हर मसअले को वाज़ेह कर दिया था लेकिन अहले सुन्नत की इत्तेबा का दावा करने के बावजूद इन्हिराफ़ से काम लेते हैं और मुझ पर बहसो तहक़ीक़ से बात वाज़ेह हो चुकी है कि माविया का दिफ़ाअ करने वाले बनी उमैय्या और उनके पैरोकार हैं जिंका सुन्नते रसूल से कोई ताल्लुक़ नहीं है ख़ुसूसन अगर उनके मवाक़िफ़ और हरकात का जाएज़ा लिया जाऐ तो अंदाज़ा होगा कि इन अफ़राद को शियायाने अली अलैहिस्सलाम से नफ़रत है और ये आशूरे को ईद का दर्जा देकर उन सहाबा से दिफ़ाअ करते हैं जिन्होंने रसूले अकरम को ज़िन्दगी में और मरने के बाद हर हाल में अज़ीयत दी थी और उनकी ग़लतियों को सही क़रार देकर उनके आमाल की तौज़ीह ओ तावील करना चाहते हैं। मैं अपने बरादराने अहले सुन्नत से पूछना चाहता हूँ कि आख़िर आप किस तरह क़ातिलों को भी रज़ीअल्लाह अन्हू ए लफ़्ज़ से याद करते हैं आप किस तरह अल्लाह और रसूल से मुहब्बत करते हैं जबकि ऐसेलोगों से दिफ़ाअ करते हैं जिन्होंने अहकामे ख़ुदा ओ रसूल को बदल दिया और अहकामे इलाही के मामले में अपनी राय से इज्तेहाद किया।

आप उन लोगों का किस तरह ऐहतेराम करते हैं जिन्होंने रसूले अकरम का ऐहतेराम नहीं किया और उन्हें हिज़यानगो क़रार दिया और उनके फ़ैसलों को ठुकरा दिया।

आप उन आइम्मा की किस तरह तक़लीद करते हैं जिन्हें उमवी और अब्बासी हुक्मरानों ने सियासी इग़राज़ के तहत इमाम मुक़र्रर किया था और उनकी तादाद की वज़ाहत रसूले अकरम ने फ़रमाई थी।(सही बुख़ारी-4-164) ,सही मुस्लिम119 बाबुन्नास तबअ क़ुरैश ,यनाबिउल-मवद्दत क़न्दोज़ी हन्फ़ी)।

आप उन आइम्मा की तक़लीद करते हैं जिन्हें रसूले अकरम का मुकम्मल इरफ़ान हासिल नहीं था और बाबे मदीनए इल्म को तरक कर देते हैं जो उनके(रसूल)लिए वैसा ही था जैसे जनाबे मूसा के लिए हारून!

फिर आखिर ये अहले सुन्नत वल जमाअत की इस्तेलाह का मुजिद कौन था ? मैंने तारीख़ में बहुत जुस्तजू की है तो इस क़दर मिला कि जिस साल माविया ने हुकूमत पर क़ब्ज़ा किया है उसे “आमुल-जमाअत ” कहा जाता है और वो इस तरह की उस्मान के बाद उम्मत दो हिस्सों में तक़सीम हो गई थी ,शियायाने अली अलैहिस्सलाम और अत्तबाऐ माविया---और फिर इमाम अली की श्षदत के बाद माविया ने इमाम हसन अलैहिस्सलाम से सुल्ह करके इक़्तिदार पर क़ब्ज़ा कर लिया और उस साल का नाम ‘आमुल-जमाअत ’ रख दिया जिसका मतलब ये है कि अहले सुन्नत का मफ़हूम माविया की सुन्नत के मानने वाले और उसकी हुकूमत पर इज्तिमा करने वाले है इसका सुन्नते रसूल से कोई ताल्लुक़ नहीं है वरना सुन्नते रसूल को उनकी और ज़ुरियत से बेहतर कौन समझ सकता है ? कि “घर की बात घर वाले ही बेहतर समझते हैं और अहले मक्का अपने घाइयों से बेहतर वाक़िफ़ हैं ” ।

लेकिन अफ़सूस हमने आइम्माऐ असना अशर की मुख़ालिफ़त की जिनके बारे में रसूले अकरम ने नस फ़रमाई थी और उनके दुश्मनों का इत्तेबा कर लिया जबकि हम उन रिवायात का भी इक़रार करते हैं जिनमें रसूले अकरम ने साफ़ साफ़ ऐलान कर फ़रमाया है कि मेरे बाद बारह ख़ुल्फ़ा होंगे और सबके सब क़ुरैश से होंगे लेकिन हमारे बरादराने अहले सुन्नत चार ही पर रुक जाते हैं।

शायद माविया ही ने हमें अहले सुन्नत वल जमाअत का नाम दिया था तो इसका मक़सद सबबे-अली अलैहिस्सलाम थी की जिसका सिलसिला साठ बरस तक जारी रहा और जिसे उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ के अलावा कोई न रोक सका उसने भी रोक दिया ओ बाज़ मुअरिखीन के बयान के मुताबिक़ बनी उमैय्या ही ने उसके क़त्ल की साज़िश की थी सिर्फ़ इसलिए की उसने सुन्नत यानि हज़रत अली अलैहिस्सलाम पर लानत को बन्द कर दिया।

बरादराने अहले सुन्नत आईऐ ख़ुदा की हिदायत का सहारा लेकर , हक़ीक़त को तलाश करें हमे सब बनी उमैय्या और बनी अब्बास के मारे हुऐ हैं और एक तारीक तारीख़ के सहिद हैं हमें उस जुमूदे फ़िक़्री ने तबाह कर दिया है जिसे हमारे बुज़ुर्गों ने हामरे सारों पर मुसल्लत कर दिया है हमें उस मकरो फ़रेब के शहीद हैं जिसका सिलसिला माविया ,उमरे आस ,मुगीर बिन शेबा वग़ैरा ने जारी किया था।

आईऐ!इस्लामी तारीख़ का वाक़ई मुतालिआ करें और हक़ाएक़ पता लगाएँ ताकि दुहरे अज्र के हक़दार बने ,शायद ख़ुदा ह ,माँरे ज़रिये इस यतीम और तिहत्तर फ़िरक़ों में बटी उम्मत पर रहम कर दे और हम इसे तौहीद और रिसालत और इत्तेबाऐ अहलेबैत के परचम तले जमा कर सकें जिनके बारे में हुज़ूरे अकरम का इरशाद है कि “उनसे आगे न बढ़ो कि हलाक हो जाओगे और उनसे अलग भी न रह जाओ कि तबाह हो जाओगे ,उन्हें तालीम देने की कोशिश न करो कि ये तुमसे बेहतर जानने वाले हैं।

(दुरे मन्सूर- 2-60,असदुलग़ाबा- 3-137,सवाएके मुहरिका- 148,यनाबीउल मवद्दत- 41,335,कन्ज़ुल आमाल- 1-168,मजमऐ ज़वाईद- 9- 163)।

अगर हमने ये काम अंजाम दे लिया तो ख़ुदा अपने ग़ज़ब को बरतरफ़ कर देगा और हमारे खौफ़ को अमन में तब्दील कर देगा हमें ज़मीन में इक़्तेदार इनायत करेगा अपनी खिलाफ़त से नवाज़ेगा और अपने वलिए ख़ास इमाम मेहदी अ।ज। को ज़ाहिर कर देगा जिसके बारे में रसूले अकरम का वादा है कि वो ज़ुल्म ओ जोर का ख़ात्मा करके अदल ओ इन्साफ़ की हुकूमत क़ायम कर देगा।

अहबाब के लिऐ दावते फ़िक्रो नज़र

दर हक़ीक़त अक़ीदे की तब्दीली से मेरी रूहानी सआदत का आग़ाज़ हो गया था और ,मैं अपने ज़मीर को मुतमइन और दिल को मज़हबे हक़ या हक़ीक़ी इस्लाम के लिए कुशादा पाने लगा था ,मेरे दिल में फ़रहत ओ मुसर्रत और इफ़्तिख़ार ओ इन्बिसात का दौरे दौरा था कि परवरदिगार ने मुझे हिदायत ओ रुषाद की नेमत से सरफ़राज़ फ़रमाया है और अब मेरे लिए ये मुमकिन न था के मैं अपने दिल में करवटें लेने वाले जज़बात को पोशीदा रख सकूँ और हक़ीक़त के इदराक खामोश रह जाऊँ चुनांचे मेरे दिल ने आवाज़ दी कि हक़ीक़त का इज़हार ज़रूरी है और “नेमते ख़ुदा का बयान इंसानियत की ज़िम्मेदारी है ” और यही दुनिया ओ आख़ेरत की सबसे बड़ी सआदत है और नेक बख़्ती है वरना “हक़ के मामले में ख़ामोश रह जाने वाले गूँगा शैतान कहा जाता है ” और हक़ के बाद गुमराही के अलावा कुछ नहीं है और जिस चीज़ ने मेरे इस शऊर मज़ीद यक़ीन अता किया वो रसूले अकरम और अहलेबैते ताहिरीन से मुहब्बत रखने वालों से अहले सुन्नत की बराअत और बेज़ारी का सुलूक था चुनांचे मैंने चाहा कि तारीख़ के ताने बाने बिखेर दिए जाएँ और हक़ीक़त के चेहरे को बेनक़ाब कर दिया जाऐ ताकि लोग हक़ का इत्तेबा कर सकें और ऊँ पर नेमते ख़ुदा की तकमील हो जाऐ जिस तरह कि ख़ुद मैं भी उन्हीं हालात से गुज़रा हूँ “पहले तुम भी इसी तरह थे वो तो तुम पर अहसान कर दिया है ” (निसा ;-९४)।

चुनांचे मैंने अपने साथ काम करने वाले चार उस्तादों इस अम्र की तरफ़ दावत दी जिनमें से दो तरबियते दीनी के उस्ताद थे और एक अरबी अदब का उस्ताद था और एक इस्लामी फ़ल्सफ़े का उनमें से कोई एक भी क़फ़्सा का रहने वाला नहीं था बल्कि तयूनस ,जम्माल और सूसा वग़ैरा के रहने वाले थे मैंने उनसे ये मुतालिबा किया कि मेरे साथ इस अहम और ख़तरनाक बहस में हिस्सा लें और मैंने इस तरह इज़हार किया कि मैं बाज़ मफ़ाहीम के इदराक से क़ासिर हौं और बाज़ मसाएल में तशकीक का शिकार हूँ लिहाज़ा ये हज़रात मेरे इस शक का इलाज करें--चुनांचे सब ने काम तमाम करने के बाद मेरे घर आने का वादा कर लिया और मैंने मुतालिए के लिए “अल-मराजेआत ” उनके हवाले कर दी इस इज़हार के साथ की इसके मुसन्निफ़ ने अजीब ओ ग़रीब क़िस्म के दावे किए हैं चुनांचे तीन अफ़राद ने इस किताब को बेहद पसंद किया और चौथे ने चार पाँच नशिस्तों के बाद हमसे क़तऐ ताल्लुक़ कर लिया और ये कहा की “अरब चाँद पर कमन्द डालने की फ़िक्र में है और तुम इस्लामी खिलाफ़त के बारे में बहस कर रहे हो ” ।

एक महीने तक इस किताब पर बहस का सिलसिला जारी रहा यहाँ तक की उनमें से तीन राहे हक़ पर आ गऐ और मैंने मन्ज़िले हक़ीक़त तक पहुँचने में उनकी हर इमकानी मदद भी की कि ये काम मेरे लिए आसान हो चुका था और मैं वुसअते मुतालिआ की बिना पर क़रीब तरीन रास्ते से हक़ तक पहुँचने का काम अंजाम दे सकता था ,मैंने हिदायत की शीरीनी को महसूस कर लिया था और मैं मुस्तक़बिल के बारे में कुछ खुशबीन भी था चुनांचे मैं बराबर क़फ़्सा के अफ़राद को मदू करता रहा और जिन जिन हज़रात से सूफ़ी हलक़ात या मज़हबी जलसात में राबता था सब को इस मसअले पर ग़ौर करने की दावत देता रहा मैंने अपने बाज़ शागिर्दों को भी दावते फ़िक्र दी और खुदा का शुक्र कि साल तमाम न होने पाया था की हमारी एक बड़ी जमाअत तैयार हो गई ,जो अहलेबैते रसूल से मुहब्बत करने वाली और उनके दुश्मनों से नफ़रत करने वाली थी , हम उनकी खुशी में खुशी मनाने लगे और अय्यामे आशूरा में मजालिसे अज़ा क़ायम करने लगे।

मैंने अपने हिदायत याफ़्ता होने की ख़बर सबसे पहले अल-सय्यद खुई और सय्यद मो॰ बाक़िरुल सदर को दी जब मैंने ईदे ग़दीर की मुनासिबत से कफ़्सा में पहली मर्तबा जश्न का इनऐक़ाद किया और हर ख़ासो आम में इस अमर की शोहरत हो गई कि मैंने मज़हबे शिया इख्तियार कर लिया है और आले रसूल की पैरवी की दावत दे रहा हूँ जिसके बाद इल्ज़ामात और तोहमतों का सिलसिला शुरू हो गया और मुझे इसराईल का जासूस क़रार दिया जाने लगा कि मैं लोगों के दीन में तशक़ीक करता हूँ और सहाबाऐ किराम को गालियाँ देता हूँ और क़ौम में फ़ितना ओ फ़साद पैदा कर रहा हूँ।

मैंने तयूनस में अपने दोस्त राशिदुल ग़नूश और अब्दुल फ़त्ताह मुरीद से मुलाक़ात की जिनसे मेरा झगड़ा शहीद हो चुका था और एक दिन जब मैंने अब्दुल फ़त्ताह के घर में बहस के दौरान ये कह दिया कि एक मुसलमान की हैसियत से हमें अपनी तारीख़ और अपनी किताबों पर नज़रे सानी करना चाहिए और उनके मुन्दरजात पर ग़ौर करना चाहिए मिसाल के तौर पर बुख़ारी में बहुत सी ऐसी बातें हैं जिन्हें न अक़्ल क़बूल करती है और न दीन — तो दोनों को बहुत गुस्सा आया और उन्होंने कहा कि आपकी हक़ीक़त क्या है और आप बुख़ारी पर तनक़ीद करेंगे मैंने बहुत चाहा कि वो मेरी हक़ीक़त में शरीक हो जाएँ लेकिन उन्होंने ये कह कर नज़र अंदाज़ कर दिया कि अगर आप शिया हो गए तो हम आपके साथ नहीं हैं और हमारे पास इससे ज़्यादा अहम मसअला ये है कि हम ऐसी हुकूमत का मुक़ाबिला करे जो इस्लाम पर अमल नहीं करती है---मैंने कहा कि इसका फ़ायदा क्या है ? अगर हुकूमत आपके हाथ में आ गयी तो आप इससे बदतर इक़दामात करेंगे और आपको खुद भी हकीकते इसलाम का इल्म नहीं है और न तहक़ीक़ करना चाहते हैं जिस पर वो हज़रात बेज़ार होकर चले गए। उसके बाद हमारे खिलाफ़ प्रोपैगन्डे शदीद तर हो गए और अख़्वाने मुस्लिमीन ने ये कहना शुरू कर दिया कि मैं हुकूमत का ऐजेन्ट हूँ और मुसलमानों को शक में मुब्तिला करके इस तहरीक से अलग करना चाहता हूँ। जो हुकूमत के लिए चलाई जा रही है और इस तरह मैं उन नौजवानों से बिलकुल अलग हो गया जो अख़्वाने मुस्लिमीन की तहरीक के साथ काम कर रहे थे और उन शयूख़ से भी कट कर रह गया जो सूफ़ी तरीक़ों को अपनाऐ हुऐ थे और मेरी ज़िन्दगी इन्तेहाई सख़्त हो गई कि हम अपने दयार में भी ग़रीबुल वतन हो गए और अपने अशीरे और और क़बीले में अजनबी मालूम होने लगे।

ये तो खुदा का फ़ज़्ल ओ करम था कि उसने दूसरे रूफ़्क़ा ओ अहबाब दे दिऐ और हमारे पास दूसरे शहरों से नौजवान आने लगे और हक़ाएक़ का इल्म हासिल करने लगे और उसके नतीजे में राहे हक़ पर आने लगे कि मैंने उनको मुतमइन करने में अपना सारा ज़ोर सर्फ़ कर दिया और इस तरह दारुल-हुकूमत और किररान , सोसा , सैय्यदी बूज़ीद वग़ैरा में मोमिनीन की एक जमाअत तैयार हो गई फिर मैंने गर्मी की छुट्टी में ईराक़ के सफ़र के दौरान यूरोप में फ्रांस वग़ैरा में अपने बाज़ अहबाब से मुलाक़ात की और उन्हें सूरते हाल से आगाह किया तो बहम्देलिल्लाह वो भी राहे रास्त पर आ गऐ।

मैं अपनी फ़रहत ओ मुसर्रत का अंदाज़ा नहीं कर सकता था जब मैंने नज्फ़े अशरफ़ में अल-सैय्यद मुहम्मद बाक़िरुल सदर से मुलाक़ात की और उन्होंने अपने पास बैठे हुऐ उल्मा ओ अफ़ाज़िल की जमाअत से मेरा ताअररुफ़ इस तरह कराया कि “कि ये शख़्स तयूनस में मज़हबे आले मुहम्मद स।अ। और तशय्यो का पहला बीज और संगे बुनियाद है ” और इसके बाद इस अमर का इज़हार फ़रमाया कि जब मैंने उन्हें पहली मर्तबा मुनअक़िद होने वाले जश्ने ग़दीर और अपने तश्य्यो के साथ अपने ऊपर होने वाले हमलों और आयद किए जाने वाले इल्ज़ामात से बाख़बर किया था तो उन्होंने काफ़ी गिरया फ़रमाया था---और फिर हमसे मुखातिब होकर ये फ़रमाया “मशक़्क़तों का बर्दाश्त करना ज़रूरी है कि अहलेबैत का रास्ता इन्तेहाई और दुश्वार मुश्किल है ,एक शख़्स सरकारे दो आलम की खिदमत में हाजिर हुआ और उसने कहा कि मैं आपसे मुहब्बत करता हूँ तो आपने फ़रमाया कि इम्तेहानात की कसरत के लिए आमादा हो जाओ---!उसने कहा कि मैं आपके इब्ने अम हज़रत अली इब्ने अबीतालिब अ।स। को भी दोस्त रखता हूँ फरमाया कि कसरते आदा के लिए भी आमादा हो जाओ--!उसने कहा कि मैं आपके फ़रज़न्द हसन और हुसैन अ।स। को भी दोस्त रखता हूँ---फ़रमाया फ़क्र ओ बला के लिए भी तैयार हो जाओ! और हमने कहा और हक़ीक़त से दिफ़ा करने के लिए क्या दिया ? —जिस तरह कि इमाम हुसैन अ।स। ने इसकी कीमत अपने ख़ून से अदा की है और अपने असहाब और अक्रबा की क़ुरबानी दी है और उनके शिया तारीख के हर दौर में और आज भी अपनी मुहब्बत की क़ीमत अदा कर रहे हैं लिहाज़ा अजीज़े मन! राहे ख़ुदा में क़ुरबानी और मसाएब का बर्दाश्त करना ज़रूरी है कि अगर ख़ुदा ने तुम्हारे ज़रिये एक शख़्स को भी हिदायत दे दी तो दुनिया और माफ़िहा की तमाम नेमतों से बेहतर है।

जनाबे सैय्यदुल असद ने मुझे ये भी नसीहत की कि ख़बरदार गौशा नशीन होकर न बैठ जाना और अपने अहबाब से ताल्लुक़ात को बाहर हाल बरक़रार रखना अगरचे वो तुमसे दूर रहना चाहेंगे लेकिन नमाज़ उन्हीं के साथ पढ़ना ताकि क़तऐ ताल्लुक न होने पाए और अवामुन्नास को बेक़सूर समझना कि ये सब प्रोपैगन्डे और तहरीफ़ शुदा तारीख़ के मारे हुऐ हैं “और ये इंसान की फ़ितरत है कि जिस चीज़ को नहीं जानता हैं उसका दुश्मन हो जाता है ”

इसी तरह सैय्यद खुई ने भी मुझे नसीहत फ़रमाई और सैय्यद मुहम्मद अली तबातबई अलहकीम भी बराबर अपने ख़ुतूत में एसी ही नसीहतों से सरफ़राज़ फरमाते रहे जिससे मेरे हम मसलक़ अफराद ने काफ़ी फ़ायदा उठाया।

मैंने नज्फ़े-अशरफ़ और उल्माऐ नज्फ़े-अशरफ़ की मुख़तलिफ़ मुनासिबात में बारहा ज़ियारत की है और मैं ये तय कर लिया था की हर साल गर्मियों की छुट्टियों का ज़माना इमाम अली अ।स। की बारगाह में गुज़ारुंगा ,और सैय्यद मुहम्मद बाक़िरूल सदर के दर्स में हाज़िर होता रहूँगा क्योंकि मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा है और उनकी सोहबत ने मुझे बहुत कुछ फ़ायदा पहुंचाया था जिस तरह कि मैंने भी ये तय कर लिया था कि बारह इमामों की ज़ियारत का शरफ़ हासिल करूंगा चुनांचे खुदा का शुक्र है मेरी ये भी आरज़ू पूरी हो गई और मैंने इमामे रिज़ा अ।स। की ज़ियारत भी कर ली जिनका मज़ारे मुक़द्दस रूस की सरहद के करीब मशहद (ईरान) में है और वहाँ भी मैंने बहुत से उल्मा से मुलाक़ात की है और उनसे इल्मी इस्तेफ़ादा किया।

जिस तरह के मेरे मुक़ल्लिद सैय्यद खुई ने मुझे खुम्सो ज़कात के अमवाल में तसररूफ़ करने की वकालत भी दे दी है जिसके नतीजे में मैंने अपने बरादरान की काफी खिदमत की और उसके वास्ते बराबर किताबें वग़ैरा फ़राहम करता रहा हूँ और एक अज़ीम मकतब भी क़ायम किया है जिसमें फ़रीक़ैन की तमाम किताबें और तहक़ीक़ का सारा मवाद मौजूद है इस मकतब का नाम मकताबे अहलेबैत है और इसने काफ़ी अफ़राद को रास्ता दिखला दिया है।

रब्बे करीम ने मेरी फरहत ओ मुसर्रत ओ सआदत को उस वक़्त और दोबराबर कर दिया। जब तक़रीबन 15 साल क़ब्ल कफ़्सा के बल्दिए के कातिबे आम को ये तौफ़ीक़ हासिल हुई कि उसने मेरी ख़्वाहिश पर मेरे मकान के रास्ते का नाम “शारहे-अल इमाम-अली इब्ने अबीतालिब अ।स। ” रख दिया। अब मेरा फर्ज़ है कि मैं उसकी इस इनायत का शुक्र अदा करूँ कि वो बा अमल मुसलमानों में है और उससे इमाम अली अ।स। से काफ़ी मुहब्बत है और उनकी तरफ काफ़ी रुझान रखता है। मैंने उसे भी किताब अल-मुराजिआत दी है और वो मेरे साथियों के साथ काफ़ी मुहब्बत ओ ऐहतेराम का बर्ताव करता है। खुदा उसे जज़ाऐ खैर दे और उसकी मुरादों को पूरा करे अगरचे बाज़ हासीदों और नुमाइंदों ने चाहा था कि इस तख़्ती को हटा दिया जाए लेकिन उनकी तदबीरे कारगर न हुई और बहम्देलिल्लाह वो तख़्ती बाक़ी है और अब सारी दुनिया से आने वाले ख़ुतूत पर “शारहे-अल इमाम-अली ” लिखा होता है और मेरा शहर इस मुबारक नाम की बरकत से मुतबर्रिक और मुनव्वर हो गया है।

अब मैं आइम्माऐ ताहिरीन और उल्माऐ नज्फ़े अशरफ़ की नसीहत के मुताबिक़ अपने बरादराने इस्लाम से क़रीबी ताल्लुक़ात रखता हूँ और उनकी जमाअत में बराबर हाज़िरी देता हूँ जिसकी बिना पर तास्सुब कदरे कम हो गया है और बहुत से नौजवान मेरी तरफ़ से मुतमइन हो गए हैं कि उन्होंने मेरी वुज़ू ,मेरी नमाज़ ओ मेरे अक़ाएद के बारे में बार बार सवालात किए हैं और मेंने सबको काफ़ी और शाफ़ी जवाबात दिये हैं।

हिदायते हक़

एक रोज़ का वाक़ेया है कि तयूनस के जुनूब में एक देहात में एक महफ़िले अक़्द के दौरान चन्द औरतें किसी शख़्स की औरत के बारे में गुफ़्तुगू कर रही थीं और दरमियान में बैठी एक ज़ईफ़ औरत अपने इस्तेजाब का इज़हार कर रही थी कि फ़लाँ औरत ने फ़लाँ मर्द से किस तरह अक़्द कर लिया और वो उसकी ज़ौजा किस तरह हो गई है जबकि दोनों को मैंने ही दूध पिलाया है और दोनों रिज़ाई ऐतेबार से भाई बहन हैं।

उन औरतों ने इस ख़बर को अपने मर्दों से नक़्ल कर दिया और उन लोगों ने तहक़ीक़ की तो लड़की के बाप ने भी तसदीक़ कर दी और दोनों क़बीलों में एक कयामत बरपा हो गई और एक जंगे अज़ीम शुरू हो गई। हर एक दूसरे क़बीले पर इल्ज़ाम लगता था कि उसको धोका दिया है और इस अज़ाबे अज़ीम में मुब्तिला किया है। इत्तिफ़ाक़े अम्र कि इस रिश्ते को दस साल गुज़र चुके थे और तीन बच्चे भी पैदा हो चुके थे। नतीजा ये हुआ कि औरत अपने बाप के घर चली गई और उसने खाना पीना तर्क करके ख़ुदकुशी का प्रोग्राम बना लिया कि उसने अपने भाई से अक़्द किया है और उससे बच्चे भी पैदा किये हैं और उधर बच्चे भी लावारिस हो गऐ थे और ये जंग बाज़ शयूख़ की मुदाखिलत पर रुक गई थी लेकिन इस्तेफ़ताआत का सिलसिला शुरू हो गया था और इलाक़े के मुखतलिफ़ उल्मा से मसअला दरयाफ़्त किया गया था और सबने हुरमत का फ़तवा दे दिया था और अपने अपने ऐतेबार से कफ़्फ़ारा भी मुअइयन कर दिया था कि इत्तिफ़ाक़न वो लोग कफ़्सा आऐ और यहाँ के उल्मा से भी दरयाफ़्त किया उन्होंने भी वही जवाब दिया क्योंकि सब इमाम मालिक के मुक़ल्लिद थे और वो एक क़तरा दूध पिलाने से भी हुरमत के क़ायल हैं और उनकी निगाह में दूध का हुक्म शराब जैसा है कि उसका क़लील ओ कसीर सब हराम है।

हुस्ने इत्तेफ़ाक़ ऐसा हुआ कि एक शख़्स ने साहिबे मामला को तनहाई में ले जाकर कहा कि यहाँ एक शख़्स और भी है आप उससे दरयाफ़्त करें कि वो तमाम मज़ाहिब से बाख़बर हैं और मैंने उसे तमाम उल्मा से बहस करते और शिकस्त देते हुए देखा है।

ये बात मुझसे उस औरत के शोहर ने मुलाक़ात के दौरान हर्फ़ ब हर्फ़ नक़्ल की और आख़िर में कहा कि हुज़ूर मेरी औरत ख़ुदकशी करना चाहती है और मेरी औलाद बिल्कुल लावारिस हो गई हमारे पास मसअले का कोई हल नहीं है और लोगों ने हमें आपका पता बताया है ,हमें उम्मीदे क़वी है कि यहाँ कोई भला हो जाएगा इसलिऐ कि हमने पूरी ज़िन्दगी में ऐसा कुतुबख़ाना नहीं देखा जैसा आपके पास है।

मैंने क़हवा पेश किया और थोड़ी देर ग़ौर करने उससे पूछा कि तुमने कितनी बार इस औरत का दूध पिया है ? उसने कहा मुझे इसका इल्म नहीं है अलबत्ता मेरी ज़ौजा ने दो या तीन मर्तबा दूध पिया है जिसकी गवाही उसके बाप ने दी है कि वो दो या तीन मर्तबा उस औरत के घर ले गया था मैंने कहा अगर ये बात सही है तो तुम्हारे ऊपर कोई ज़िम्मेदारी नहीं है और अक़्द जायज़ और सही है ,ये सुन्ना था कि वो मिसकीन मेरे क़दमों पर गिर पड़ा और हाथ और पैर के बोसे देने लगा उसने कहा कि ख़ुदा आपको जज़ाए खैर दे आपने मेरी ज़िन्दगी में सुकून के दरवाज़े खोल दिऐ हैं और फौरन उठकर चला गया ,चाय भी तमाम नहीं की और कोई सवाल भी नहीं किया सिर्फ़ बाहर जाने की इजाज़त ली और रवाना हो गया ताकि अपनी ज़ौजा और अपनी औलाद को ये खुशखबरी सुनाऐ।

लेकिन दूसरे दिन वापस आया तो उसके हमराह सात अफ़राद थे और सबका ताररूफ़ उसने इस अंदाज़ से कराया कि ये मेरी ज़ौजा के वालिद हैं और ये मेरे वालिद हैं ये गाँव के रईस हैं और ये इमामे जुमा ओ जमाअत हैं ये दीनी रहनुमा हैं और ये क़बीले के शयूख़ हैं और ये साथ में दीनी मदरसे के मुदीर हैं ये आपसे मसअले के बारे में दरयाफ़्त करने आऐ हैं।

मैंने सबको कुतुबख़ाने में बैठाया , चाय पेश की और ख़ुशआमदीद कहा उन लोगों ने कहा हम आपके फ़तवे के बारे में बहस करना चाहते हैं कि आपने उस अमल को किस तरह हलाल कर दिया जिसे क़ुरआने करीम , रसूले अकरम और इमाम मालिक सबने हराम क़रार दिया है।

मैंने अर्ज़ की कि आप लोग आठ आदमी हैं। मैं तन्हा हूँ अगर मैं तमाम आदमियों से बात करूंगा तो मैं हरगिज़ मुतमइन न कर सकूँगा और बहस ज़ाया हो जाऐगी लिहाजा किसी एक आदमी का इन्तेखाब करें जिससे गुफ्तगू की जाऐ और आप हाज़रात दरमियान में हकम और सालिस का फर्ज़ अंजाम दें--! उन लोगो ने इस तजवीज़ को पसंद किया और मसअले को दीनी मुरशद के हवाले कर दिया की ये सब से ज़्यादा आलिम और माहिर हैं। उन्होंने मुझसे सवाल को दोहराया कि आपने , ख़ुदा रसूल, इमाम के हराम को हलाल किस तरह कर दिया है ?

मैंने अर्ज़ की माज़अल्लाह मेरी क्या मजाल कि मैं हराम को हलाल कर सकूँ मेरा दावा तो ये है कि ख़ुदा ने हुरमते रिज़ाअ का ऐलान इजमाली तौर पर किया है और उसकी तफसील को रसूले अकरम के हवाले कर दिया है कि वो कम्मियत और कैफ़ियत का ऐलान करें!

उन्होंने फ़रमाया---तो इमाम मालिक ने एक क़तरा रिज़ाअत को भी मुजीबे हुरमत क़रार दिया।

मैंने अर्ज़ की मुझे मालूम है लेकिन इमाम मालिक तमाम मुसलमानों के लिए हुज्जत नहीं है वरना दूसरे आइम्मा का हशर क्या होगा-- ?

उन्होंने फ़रमाया वो सब ख़ुदा से राज़ी थे और ख़ुदा उनसे राज़ी था कि सबने अपना मज़हब रसूले करम से ही लिया है।

मैंने अर्ज़ की जब सबका मज़हब रसूले अकरम से ही माख़ूज़ है तो आपके इमाम मालिक को इख्तियार करने का जवाज़ क्या है जिसका फ़ेल रसूले अकरम के खिलाफ़ है। उन्होंने हैरत से फ़रमाया कि ये आपने क्या फ़रमाया। हमारे इमामे मदीना हज़रत मालिक रसूल अकरम के खिलाफ़ थे ? हाज़ीरीन ने भी इस बात का इज़हार किया और सब मेरी इस जसारत पर वहशत ज़दा रह गए इसलिए कि उन्होंने किसी और से इस तरह की जसारत का मुशाहेदा नहीं किया था।

मैंने बात काटते हुए कहा कि इमाम मालिक सहाबा में से थे ? उन्होंने फ़रमाया नहीं! मैंने अर्ज़ की ताबेईन में से थे ? फ़रमाया नहीं! बल्कि वो तबऐ ताबेईन में से थे!

मैंने अर्ज़ की तो हज़रत अली इब्ने अबी तालिब अलैहिस्सलाम रसूले अकरम से क़रीबतर हैं या इमाम मालिक ?

उन्होंने फ़रमाया इमाम अली — इसलिए कि वो ख़ुल्फ़ाऐ राशीदीन में से हैं और एक शख़्स ने मज़ीद ये इज़ाफ़ा किया कि वो बाबे मदीनऐ इल्मे रसूल हैं तो मैंने सवाल किया कि फिर आप हज़रात ने बाबे मदीनए इल्म को छोड़कर एक ऐसे शख़्स को क्यों इख्तियार कर लिया है जो न असहाब में से हैं न ताबेईन मे से — वो मुसलमानों पर अज़ीम फ़ित्ने और मदीने के लशकरे यजीद पर तीन दिन तक मुबाह रहने और उनकी बेशुमार बदकारियों के बाद पैदा हुऐ है , जबकि बेशुमार बेहतरीन असहाब का क़त्ले आम हो चुका था और कितनी हुरमतें ज़ाया हो चुकी थी , कितनी सुन्नते रसूल बिदअत में तब्दील की जा चुकी थी और कितना मदीने का माहौल बदल चुका था ऐसे हालात में इन्सान किसी ऐसे इमाम से किस तरह मुतमईन हो सकता है जिनसे हुकूमते वक़्त सिर्फ़ इस बिना पर राज़ी हो कि वो उसकी ख्वाहिशात के मुताबिक़ फ़तवा दे सकता है ?

इस मौके पर एक शख़्स ने मुदाखिलत करते हुऐ कहा कि हमने सुना है कि आप शिया हैं और हज़रत अली अलैहिस्सलाम की इबादत करते हैं ? लेकिन दूसरे शख़्स ने उसे ज़ोर से ठोकर मारकर कहा कि ख़ामोश रहो तुम इस क़िस्म की बातें एक ऐसे पढ़े लिखे शख़्स के बारे में कह रहे हो जबकि मैंने तमाम उल्मा को देखा है और किसी के घर में इतना बड़ा कुतबख़ाना नहीं देखा है जैसा यहाँ है , ये शख़्स पूरे इल्मो ऐतेमाद के साथ बोलता है और इसके हक़ में इस तरह की जसारत मुमकिन नहीं है।

मैंने कहा कि ये बात तो सही है कि मैं शिया हूँ लेकिन ये गलत है कि शिया हजरत अली अ।स। की इबादत करते हैं , हाँ वो इमाम मालिक के बजाऐ इमाम अली अ।स। के अहकाम पर अमल करते हैं और उनको आप ही की शहादत के मुताबिक़ बाब मदीना-ऐ-इल्म तस्लीम करते हैं मुरशीदे दीन ने कहा कि क्या इमाम अली ने दो दूध पीने वालों के अक़्द को जायज़ क़रार दिया है ? मैंने कहा कि नहीं — लेकिन उन्होंने उस वक़्त हराम क़रार दिया है जब दूध पीने की मिक़दार 15 मर्तबा मुसलसल या इस क़दर हो कि गोश्त और पोस्त बन जाऐ।

ये सुन्ना था कि ज़ौजा के वालिद का चेहरा खुशी से दमकने लगा और उसने कहा कि अलहम्दोलिल्लाह मेरी बच्ची ने दो या तीन मर्तबा दूध पिया है और इमाम अली अ।स। का ये इरशाद इस मुसीबत से निकल आने के लिए काफ़ी है ये दर हक़ीक़त आलमे यास ओ हिरमान में एक ख़ुदाई रहमत ओ बशारत है मुर्शद ने कहा कि हमें इस क़ौल की दलील चाहिए ताकि हम मुतमइन हो सकें मैं अल-सय्यद खुई कि किताब “मिन्हाजुल-सालेहीन ” दे दी , उन्होंने बाबे रिज़ाअत का मुतालिआ किया और पढ़ कर सब को सुनाया जिस पर तमाम लोग बेहद खुश हुए ख़ुसूसन वो शौहर जो इस बात से खौफ़ ज़दा था कि अगर मैं उन्हें मुतमईन न कर सका तो उसका क्या होगा ? इसके बाद उन लोगों ने उस किताब को कुछ दिन के लिऐ ले लिया ताकि अहले क़रया (गाँव) को दिखा सकें और माज़ेरत करते हुए दुआएँ देते हुऐ तशरीफ़ ले गऐ। उनके घर से बाहर निकलते ही एक दुश्मन साथ लग गया और उन्हें उल्माऐ सू मे से एक आलिम के पास ले गाया जिसने उन्हें बताया कि में इसराईल का ऐजेंट हूँ और किताब “मिन्हाजुल-सालेहीन ” अज़ अव्वल ता आख़िर सिर्फ गुमराही है और अहले ईराक़ अहले कुफ़्र ओ निफ़ाक़ हैं---और शिया अस्ल में मजूसी हैं जो बहनों से निकाह को जायज़ जानते है और इसी लिए उस शख़्स ने भाई और बहन के अक़्द को जायज़ कर दिया है और इस तरह की धमकियाँ इस क़दर शदीद कर दी कि वो लोग इतमिनान के बाद फ़िर मशकूक हो गऐ और हिदायत के बाद फ़िर मुन्हरिफ़ हो गऐ और शौहर को इस अम्र पर मजबूर किया कि वो अदालत में तलाक़ का मुक़दमा पेश करे , क़फ़सा की इब्तेदाई अदालत ने मसअले को दारुल हुकूमल की बड़ी अदालत की तरफ मोड़ दिया ताकि मुल्क के मुफ़तिऐ आज़म की तरफ़ रुजू किया जा सके और वो इस मसअले को हल करे शौहर ने दारुलहुकूमत का सफ़र करके एक महीने वहाँ क़याम किया ताकि मुफ़्तीऐ आजाम की खिदमत में बारयाब हो सके और अपना क़िस्सा बयान कर सके चुनांचे उसने अव्वल ता आख़िर पूरा क़िस्सा बयान किया और मुफ़्तीऐ आज़म ने उन तमाम उल्मा के बारे में दरयाफ़्त किया जिन्होंने इस अक़्द को जायज़ क़रार दिया है शौहर ने जवाब दिया कि तीजानी समावी के अलावा कोई आलिम ऐसा नहीं है जिसने इस अक़्द को जायज़ क़रार दिया हो मुफ़्तीए मुमलिकत ने मेरा नाम नोट कर लिया और शोहर से कहा कि वापस जाऐ मैं क़फ़्सा की अदालत में क़ाज़ी को ख़त लिख रहा हूँ---जिसके बाद उनका ख़त वासिल हुआ और शौहर के वकील ने उसे इत्तेला दी कि मुफ़्तीऐ जम्हूरिया ने इस अक़्द को हराम क़रार दिया है।

ये वो क़िस्सा है जिसे मुझसे ख़ुद शोहर ने बयान किया जिसके चेहरे से ज़ोफ़ के आसार नमूदार थे और वो शिद्दते थकान से बेदम हो रहा था उसने मुझसे मुसलसल माज़िरत की कि उसकी वजह से मैंने बहुत ज़हमत बरदाश्त की और मेरा काफ़ी वक़्त ज़ाया हुआ लेकिन मैंने उसके जज़्बात का शुक्रिया अदा किया और इस बात पर इज़हारे हैरत करता रहा कि मुफ़्तीए जम्हूरिया ने किन बुनियादों पर इस अक़्द को बातिल क़रार दे दिया है और उससे मुतालिबा किया के मुझे वो ख़त दिखला दे जो मुफ़्तीए आज़म ने अदालते क़फ़्सा के नाम भेजा है ताकि मैं तयूनस के अख़बारात में शाया कर सकूँ और मुसलमानों को इस हक़ीक़त से बाख़बर कर सकूँ कि मुफ़्तीए जम्हूरियत किस क़दर जाहिल है और वो मसअलऐ रिज़ाअत में इस्लामी फ़िक़ से किस क़दर नावाक़िफ़ हैं।

लेकिन शौहर ने माज़िरत की कि मैं उस फ़ाइल को नहीं देख सकता हूँ तो ख़त कहाँ से हासिल कर सकता हूँ और ये कह कर चला गया चन्द दिनों बाद मुझे रइसेमुहकमा की तरफ़ से मदू किया गया कि मैं अपनी किताब और इस अक़्द के बातिल न होने पर अपने दलाएल पेश करूँ मैं बहुत से मसादिर लेकर अदालत में हाज़िर हो गया मैंने इस मौज़ू पर मुकम्मल तैयारी कर रखी थी और तमाम किताबों में बाबे रिज़ाअत पर निशानी रख दी थी ताकि बा आसानी तलाश किया जा सके।

मैं वक़्ते मुक़र्रिरा पर अदालत में हाज़िर हुआ तो जज साहब के कलर्क ने मेरा इस्तेक़बाल किया और मुझे जज साहिब के चेम्बर में हाज़िर कर दिया। वहाँ मैंने देखा कि इब्तेदाई अदालत के मजिस्ट्रेट और वकीले जम्हूरिया तीन मेम्बरान समेत हाज़िर हैं और सब ख़ास अदालती लिबास पहने हुऐ हैं जिससे मुझे अंदाज़ा हुआ कि मैं किसी कानूनी जलसे में तलब किया गया हूँ और मैंने ये भी देखा कि उस औरत का शौहर एक कोने में बैठा हुआ है।

मैंने तमाम हाज़िरीन को सलाम किया और सबने एक निगाहे तहक़ीर ओ ज़िल्लत के मेरी तरफ़ देखा और जैसे ही मैंने बैठने का इरादा किया रईसे महकमा ने निहायत तुन्द लहजे में सवाल किया — आप ही तीजानी समावी हैं ? मैंने अर्ज़ किया बेशक!

फ़रमाया आप ही ने इस मसअले में अक़्द के सही होने का फ़तवा दिया है ? मैंने कहा मैं मुफ़्ती नहीं हूँ बल्कि आइम्मा और उल्माऐ इस्लाम ने इस अक़्द के जवाज़ का फ़तवा दिया है।

फ़रमाया कि मैंने इसी लिए आपको तलब किया है और इस वक़्त आप मुल्ज़िम के कटहरे में हैं अगर आप अपने दावे को साबित न कर सके तो अन्क़रीब जेल के हवाले कर दिया जाऐगा और फिर उससे बाहर आना नसीब न होगा।

उस वक़्त मुझे अंदाज़ा हुआ कि मैं मुल्ज़िमों के कटहरे में हूँ न इसलिए कि मैंने कोई फ़तवा दिया है बल्कि उल्माऐ सू ने हुक्काम को ख़बर दी है कि मैं मुल्क के अंदर कोई फ़ितना हूँ और मैं सहाबा को गालियाँ देता हूँ और इत्तेबाए अहलेबैत की दावत देता हूँ और रईसे महकमा ने ये कह दिया था कि अगर दो गवाह भी मिल गए तो मैं इस शख़्स को जेल में डाल दूँगा।

इधर जमाअते अख़्वाने मुस्लिमीन ने मौक़े को ग़नीमत समझा और तमाम ख़ास ओ आम में ये ख़बर मशहूर कर दी कि मैं भाई बहन के अक़्द को जायज़ जानता हूँ और ये शियों का ख़ास मसलक है।

ये सब बातें मुझे पहले ही मालूम हो चुकी थीं और उस वक़्त यकीन भी हो गया जब रईसे महकमा ने जेल की धमकी दी और मेरे पास कोई चारा-ऐ-कार न रह गया सिवाए इसके कि मैं बाक़ाऐदा मुक़ाबिला करूँ और खुला चैलेंज करके पूरी हिम्मत के साथ अपनी तरफ़ से दिफ़ाअ करूँ ,चुनांचे मैंने कहा कि क्या मुझे सराहत के साथ बिला खौफ़ बोलने की इजाज़त है ?

मजिस्ट्रेट ने कहा बोलिऐ यहाँ आपका कोई वकील नहीं है ।

सबसे पहली बात ये है कि मैंने कभी मुफ़्ती होने का दावा नहीं किया है ये उस औरत का शौहर मौजूद है इससे पूरी बात मालूम कर लीजिऐ कि यही मेरे दरवाज़े पर मसअला पूछने के लिऐ आया था और उसने मुझसे सवाल किया था तो मेरा फ़र्ज़ था कि मैं अपने इल्म के मुताबिक़ बयान कर दूँ चुनांचे मैंने रिज़ाअत की मिक़दार के बारे में सवाल किया और जब इसने बताया कि इसकी ज़ौजा ने दो या तीन मर्तबा दूध पिया है तो मैंने इस्लाम का हुक्म बयान कर दिया-वरना न मैं मुजतहिद हूँ और न साहिबे शरीयत।

रईसे महकमा ने बिगड़ कर कहा — यानी आपका ख़्याल है कि आप इस्लाम जानते हैं और हम जाहिल हैं ?

मैंने कहा अस्तग्फ़िरुल्लाह मेरा ये मक़सद हरगिज़ नहीं है लेकिन यहाँ तमाम लोग सिर्फ़ इमाम मालिक का मज़हब जानते हैं और वहीं रुक जाते हैं और मैं तमाम इस्लामी मज़ाहिब से बाख़बर हूँ और मैंने उन्हीं मज़ाहिब ही में से इस मसअले का हल तलाश किया है।

रईस ने कहा ये हल कहा मिला है ,मैंने अर्ज़ की कि क्या मैं कोई सवाल कर सकता हूँ ? रईस ने कहा कीजिऐ!आपका ख़्याल दूसरे इस्लामी मज़ाहिब के बारे में क्या है ? उन्होंने फ़रमाया सब सही हैं और सब रसूले अकरम से माख़ूज़ हैं और उनका इख्तिलाफ़ ख़ुद एक रहमत है।

मैंने अर्ज़ की फ़िर आप इस ग़रीब शौहर के हाल पर रहम करें जो दो महीने से अपनी ज़ौजा और अपनी औलाद से अलग है जबकि इस्लामी मज़ाहिब में इस मसअले का हल मौजूद है।

क़ाज़ी ने ग़ुस्से में आकर कहा ज़रा अपनी दलील तो बयान कीजिए ,मैंने आपको दिफ़ाअ का इख्तियार दिया है तो आप दूसरे के वकील बन गए हैं।

मैंने अपने बैग से “अल-सैय्यद खुई ” की किताब “मिन्हाजुल-सालेहीन ” निकाली और उसे पेश करते हुऐ कहा कि ये मज़हबे अहलेबैत है और इसमें दलील मौजूद है ,रईस ने बात काटते हुऐ कहा कि मज़हबे अहलेबैत की बात मत करो हम उसे नहीं पहचानते और न उस पर हमारा ईमान है।

मुझे इस जवाब का इन्तेज़ार पहले से था इसलिए मैं अपने साथ अहले सुन्नत जमाअत के मसादिर भी तलाश करके ले गया था और तरतीब में सबसे ऊपर सही बुख़ारी रखी और उसके बाद सही मुसलिम फिर किताब फ़तावा महमूद शलतूत ,किताब बदायतुल-मुज्तहिद व निहायतुल-मुक़्तसद आईबीने रशद ,किताब ज़ादुल मुसीर फ़ी इल्मे तफ़सीर आईबीने ज़ौजी और दूसरे मसादिर रख कर ले गया था ,चुनांचे जैसे ही रईस महकमा ने अल-सैय्यद खुई की किताब मिन्हाजुल-सालेहीन ” देखने से इन्कार किया मैंने सवाल किया कि आपका ऐतेबार किन किताबों पर है ? उन्होंने फ़रमाया कि बुख़ारी और मुस्लिम----!मैंने सही बुख़ारी निकाल कर उसका सफ़हा खोल कर रख दिया कि इसे मुलाहिज़ा फ़रमाइऐ!

रईस ने कहा कि आप ही पढ़िये मैंने पढ़ना शुरू किया कि फ़ुलाँ ने फ़ुलाँ के वास्ते हज़रत आयशा से रवायत नक़्ल की है कि रसूले अकरम ने अपनी हयात में पाँच या उससे ज़्यादा ही पर हुरमत का हुक्म दिया था इससे कम पर नहीं।

रईस ने किताब लेकर ख़ुद पढ़ी और उसके बाद वकीले सरकार को दे दिया उसने दूसरे को दिया और मैंने इस दरमियान सही मुस्लिम को खोल लिया और बेऐनेही वही हदीस निकाल कर दिखा दी फिर शैख़ुल-अज़हर महमूद शलतूत की किताब “अल-फ़तावा ” निकाली जिसमें आइम्मा के इख्तिलाफ़ात का ज़िक्र था कि बाज़ हज़रात 15 मर्तबा दूध पिलाने के क़ायल हैं और बाज़ सात मर्तबा में और बाज़ पाँच या उससे ज़्यादा को मूजिबे हुरमत क़रार देते हैं सिर्फ़ इमाम मालिकने नस की मुख़ालिफ़त करते हुऐ एक क़तरे पर भी हुरमत का हुक्म दे दिया है उसके बाद शैख़ शलतूत का फ़ैसला है कि मैं दरमियानी क़ौल का क़ायल हूँ कि सात मर्तबा या उससे ज़्यादा ही मूजिबे हुरमत होता है।

रईसे मुहकमा ने इन तहरीरों को देखने के बाद कहा कि बस यही मिक़दार काफ़ी है और उस औरत के शौहर की तरफ़ रुख करके कहा कि जाओ अपनी ज़ौजा के वालिद को ले आओ कि वो आकर गवाही दे कि तुम्हारी ज़ौजा ने सिर्फ़ दो या तीन मरतबा दूध पिया है ताकि तुम्हारी ज़ौजा को आज ही तुम्हारे हवाले कर दूँ।

वो मिसकीन खुशी के मारे दौड़ पड़ा और वकीले सरकार ने तमाम हाज़िरीन से माज़िरत करते हुऐ सबको रुख़्सत कर दिया ,मैदान खाली हो गया तो रईसे महकमा ने माज़िरत करते हुऐ मुझसे कहा कि उस्ताद! आप मुझे मुआफ़ कर दीजेगा लोगों ने मुझे बहुत धोका दिया है और आपके बारे में तरह तरह की बातें बयान की है लेकिन मुझ पर वाज़ेह हो गया कि सब हासिद और बेईमान हैं जो आपको नुक़सान पहुँचाना चाहते थे।

मेरे होश ओ हवास उड़ गए कि इतनी जल्दी इतना बड़ा इन्क़ेलाब किस तरह आ गया और समीमे क़ल्ब से आवाज़ दी कि ख़ुदा का शुक्र है कि हुज़ूर के हाथों मुझे फ़तह नसीब हुई है।

रईस ने कहा सुना है कि आपके पास बहुत बड़ा कुतुबख़ाना है क्या उसमें दमीरी की किताब “हयातुल-हैवान ” भी है ?

मैंने कहा कि बेशक! उन्होंने कहा कि आप मुझे आरियतन दे सकते हैं ? मैंने कहा जिस वक़्त चाहें हाज़िर कर दूँ!

उन्होंने कहा कि आपके पास कोई ऐसा वक़्त है कि मेरे पास मक़तब में तशरीफ़ ले आएँ और मैं आपसे इस्तेफ़ादा करूँ ?

मैंने कहा आप बुज़ुर्ग हैं इस्तेफ़ादा मैं करूँगा और मेरे पास हफ़्ते में चार दिन खाली हैं जिस दिन फ़रमाएँ मैं हाज़िर हो सकता हूँ , चुनांचे हम लोगों ने रोज़े शन्बा पर इत्तिफ़ाक़ किया उस दिन सरकारी इजलास नहीं होता था और मैंने रईस के मुतालिबे पर बुख़ारी , मुस्लिम और फ़तावा शलतूत को वहीं छोड़ दिया ताकि वो उसकी इबारतों को नक़्ल करके लोगों को दिखला सकें।

मैंने इन्तेहाई खुशी के आलम में शुक्रे परवरदिगार अदा किया और अदालत से बाहर निकल आया जब मैं आया था तो क़ैद की धमकी दी गई थी और जब बाहर जा रहा हूँ तो रईसे महकमा मेरा दोस्त बन चुका है और वो मुझसे इस्तेफ़ादा करना चाहता है और ये सब इसी तरीक़ऐ अहलेबैत का सदक़ा है जिससे तमस्सुक करने वाला मायूस नहीं होता है और जिसकी पनाह में आने वाला हमेशा मुतमइन और मामून रहता है।

इस वाक़्ये को उस औरत के शौहर ने अपने क़रिये में बयान किया और फिर सारे इलाक़े में ये ख़बर फ़ैल गई और औरत अपने शौहर के घर वापस चली गई और लोगों ने ये कहना शुरू कर दिया कि तीजानी तमाम लोगों से ज़्यादा आलिम हैं और हद ये है कि ख़ुद मुफ़्तीऐ जम्हूरिया भी इसके आगे कोई हैसियत नहीं रखता है।

उसके बाद एक दिन इस औरत का शौहर एक बड़ी गाड़ी लेकर मेरे घर आया और उसने सारे घर को मदू किया कि मेरे घर वाले आप लोगों की आमद का इन्तेज़ार कर रहे हैं और वो लोग इस मुसररत के मौक़े पर तीन जानवर ज़िबह करेंगे लेकिन मैंने अपनी मसरूफ़ियात की बिना पर माज़िरत कर ली कि फिर किसी वक़्त हाज़िर हूँगा।

और रईसे महकमा ने भी इस वाक़्ये को अपने अहबाब से बयान किया और क़िस्सा सारे इलाक़े में मशहूर हो गया और रब्बे करीम ने ज़ालिमों के मक्र को रफ़ए कर दिया और बाज़ ने मुझसे माज़िरत की और बाज़ की बसीरत कुशादा हो गई और वो राहे हक़ पर आगे और उनका शुमार मुख़्लेसीन आले मुहम्मद स।अ। में हो गया।

और दर हक़ीक़त ये ख़ुदा का फ़ज़लों करम है वो जिसे चाहता है अता कर देता है कि वो साहिबे फ़ज़ले अज़ीम है और हमारा आख़िरी कल्मा ये है कि सारी हम्द ख़ुदाऐ रबबूल आलेमीन के लिऐ है और सलवात ओ सलाम हज़रते मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल ’ लाहो व आलेही वसल्लम और उनकी आले ताहिरीन अलैहुमुस्सलाम के लिऐ है।

मसादिर

वो किताबे जिनसे इस किताब में मदद ली गई

कुतुबे-तफ़्सीर:-

1-----क़ुरआने करीम

2-----तफ़सीरे तबरी

3-----दुरे-मन्सूरे सेयूती

4-----अल-मीज़ान तबातबाई

5-----तफ़्सीरे कबीर फ़ख्र राज़ी

6-----तफ़्सीरे इब्ने कसीर

7-----ज़ादुल-मुसीर इब्ने जौज़ी

8-----तफ़्सीरे क़रतबी

9-----अल-हावा-अल-फ़तावा-अल-सेयूती

10----शवाहिदुल-तन्ज़ील हिस्कानी

11---इतक़ान फ़ी उलूमिल क़ुरआन

कुतुबे अहादीस:-

1----सही बुख़ारी

2----सही मुस्लिम

3----सही तिरमिज़ी

4----सही इब्ने माजा

5----मुस्तदकिल-हाकिम

6----मूसनाद-अल-इमाम अहमद बिन हन्बल

7----सुन्नन इब्ने दाऊद

8----कन्ज़ुल आमाल

9----मौता इमाम मालिक

10----जामेउल-उसूल इब्ने कसीर

11----अल-जामेउल-सगीर वल-कबीर अल-सेयूती

12----मिन्हाजुल-सुन्नत इब्ने तीमिया

13----मजमउल-ज़वाईद हसीमी

14----कनूज़ुल हक़ाएक़ मुनादी

15----फ़तहुल बारी फ़ी शरहे बुख़ारी

कुतुब तारीख़:-

1----तारीख़ उल उमम वल मुलूकुल तबरी

2----तारीखे-ख़ुल्फ़ा सेयूती

3----तारीख़ुल कामिल इब्ने असीर

4----तारीखे दमिश्क़ इब्ने असाकर

5----तारीखे मसऊदी(मुरवजुल ज़हब)

6----तारीखे याक़ूबी

7----तारीख़ुल ख़ुल्फ़ा इब्ने क़तीबा(अल इमामत वल सियासत)

8----तारीखे अबुल फ़िदा

9----तारीखे इब्ने शहना

10----तारीखे बग़दाद

11----अल अक़्दुल फ़रीद

12----अल-तब्क़ातुल कुबरा इब्ने साद

13----मग़ाज़ी वाक़िदी

14----शरहे नहजुल बलाग़ा

कुतुबे सीरत:-

1----सीरते इब्ने हश्शाम

2----सीरतुल हलबिया

3----अल-इस्तियाब

4----अल असाबा फ़ी तमीज़े सहाबा

5----असदुल ग़ाबा फ़ी मारिफ़ते सहाबा

6----हुलयतुल औलिया अबू नईम

7----अल-ग़दीर शेख़ अमीनी

8----अल तराएफ़ इब्ने ताऊस

9----अल-फ़ितनातुल कुबरा ताहा हुसैन

10----हयाते-मुहम्मद मुहम्मद हुसैन हैकल

11----रियाज़ुल नुज़रा अल-तबरी

12----अल-खिलाफ़त वल मुल्क मौदूदी

[[अलहम्दो लिल्लाह किताब (मुझे रास्ता मिल गया) पूरी टाईप हो गई खुदा वंदे आलम से दुआगौ हुं कि हमारे इस अमल को कुबुल फरमाऐ और इमाम हुसैन (अ.) फाउनडेशन को तरक्की इनायत फरमाए कि जिन्होने इस किताब को अपनी साइट (अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क) के लिऐ टाइप कराया। 15.6.2017

फेहरिस्त

मेरी हयात के मुख़तसर इशारे 2

हज-जे-बैतुल्लाहिल-हराम 6

तौफ़ीक़ आमेज़ सफ़र 19

बहरी जहाज़ की एक मुलाक़ात 24

इराक़ का पहला सफ़र 33

शक और सवाल 44

सफ़रे नजफ़ 51

मुलाक़ाते उल्मा 55

मुलाक़ाते सैय्यद मुहम्मद बाक़िरुल-सदर 66

शक और हैरत 80

सफ़रे-हिजाज़ 89

आग़ाज़े तहक़ीक़ 108

अमीक़ तहक़ीक़ का आगाज़ 112

सहाबा -----अहलेसुन्नत और शियों की नज़र में 112

सहाबा सुल्हे हुदैबिया में 119

सहाबा और हादसे-ऐ-रोज़े पंचशन्बा 124

सहाबा लशकरे उसामा में 133

सहाबा के बारे में क़ुरआनी फ़ैसला 153

सहाबा के बारे में रसूले अकरम का नज़रिया 162

सहाबा के बारे में सहाबा का फ़ैसला 165

इन्क़ेलाब की इब्तेदा 195

एक साहिबे इल्म से गुफ़्तुगू 197

मेरे तशय्यो के असबाब 217

अहादीसे सहीहा-जो इत्तेबाऐअहलेबैत को लाज़िम क़रार देती है 244

हमारी सबसे बड़ी मुसीबत: 270

अहबाब के लिऐ दावते फ़िक्रो नज़र 285

हिदायते हक़ 293