इमाम अली के मकतूबात (पत्र)

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लेखक: सैय्यद रज़ी र.ह
इमाम अली(अ)

इमाम अली के मकतूबात (पत्र)

(नहजुल बलाग़ा से)

अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क


मुक़द्देमा

बिस्मिल्लाहिर रहमानिर्रहीम

नहजुल बलाग़ा अमीरूल मोमेनीन अली इब्ने अबी तालिब अ.स. के कलाम का वह मशहूर तरीन संयोजन है जिसे सैयद रजी ने चौथी शताब्दी के अंत में संकलित किया तथा इस किताब को तीन हिस्सो मे तक़सीम किया गया है :

1. खुतबाते इमाम अली (उपदेश)

2. इमाम अली के मकतूब (पत्र)

3. इमाम अली के अक़वाल (कथन)

किताब के बड़ी होने के कारण हम यहा सिर्फ इमाम अली के मकतूब (पत्र) जमा कर रहे है।


इमाम अली के मकतूब (पत्र )

इसमें मौलाए कायनात अमीरूल मोमेनीन (अ 0) के वह ख़ुतूत और तहरीरें दर्ज हैं जो आपने अपने मुख़ालेफ़ीन और अपने क़लमर्द के मुख़्तलिफ़ शहरों के हाकमो के नाम भेजी हैं और इसमें कारिन्दों के ना जो हुकूमत के परवाने और अपने साहेबज़ादों और साथियों के नाम जो वसीयत नामे लिखे हैं या हिदायतें की हैं , उनका इन्तेख़ाब भी दर्ज है। अगरचे हज़रत का तमाम का तमाम कलाम इन्तेख़ाब में आने के लायक़ है।


1- आपका मकतूबे गिरामी (जो मदीने से बसरे की जानिब रवाना होते हुए अहले कूफ़ा के नाम तहरीर किया )

ख़ुदा के बन्दे अली अमीरूल मोमेनीन (अ 0) की तरफ़ से अहले कूफ़ा के नाम जो मददगारों में सरबरावरदा , और क़ौमे अरब में बलन्द नाम हैं , मैं उस्मान के मामले से तुम्हें इस तरह आगाह किये देता हूँ के सुनने और देखने में कोई फ़र्क़ न रहे। लोगों ने उन पर एतराज़ात किये तो मुहाजेरीन में से एक मैं ऐसा था जो ज़्यादा से ज़्यादा कोशिश करता था के इनकी मर्ज़ी के खि़लाफ़ कोई बात न हो और शिकवा-शिकायत बहुत कम करता था। अलबत्ता उनके बारे में तल्हा व ज़ुबैर की हल्की से हल्की रफ़्तार भी तुन्द व तेज़ थी और नर्म से नर्म आवाज़ भी सख़्ती व दरश्ती लिये हुए थी , और उन पर आइशा को भी बेतहाशा ग़ुस्सा था चुनांचे एक गिरोह आमादा हो गया और उसने उन्हें क़त्ल कर दिया और लोगों ने मेरी बैयत कर ली इस तरह के न उन पर कोई ज़बरदस्ती थी और न उन्हें मजबूर किया गया था बल्कि उन्होंने रग़बत व इख़्तेयार से ऐसा किया। और तुम्हें मालूम होना चाहिये के दारूल बहत (मदीना) अपने रहने वालों से ख़ाली हो गया है और इसके बाशिन्दों के क़दम वहां से उखड़ चुके हैं और वह देग की तरह उबल रहा है और फ़ित्ने की चक्की चलने लगी है लेहाज़ा अपने अमीर की तरफ़ तेज़ी से बढ़ो और अपने दुश्मनों से जेहाद करने के लिये जल्दी से निकल खड़े हो।

2- आपका मकतूबे गिरामी (जिसे अहले कूफ़ा के नाम बसरा की फ़तेह के बाद लिखा गया)

शहरे कूफ़ा वालों! ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे पैग़म्बर (स 0) के अहलेबैत (अ 0) की तरफ़ से जज़ाए ख़ैर दे , ऐसी बेहतरीन जज़ा जो उसकी इताअत पर अमल करने वालों और उसकी नेमतों का शुक्रिया अदा करने वालों को दी जाती है , के तुमने मेरी बात सुनी और इताअत की , तुम्हें पुकारा गया तो तुमने मेरी आवाज़ पर लब्बैक कही।

3-आपका मकतूबे गिरामी (अपने क़ाज़ी शरीह के नाम)

कहा जाता है के अमीरूलमोमेनीन (अ 0) के एक क़ाज़ी शरीह बिन अलहारिस ने आपके दौर में अस्सी दीनार का एक मकान ख़रीद लिया तो हज़रत ने ख़बर पाते ही उसे तलब कर लिया और फ़रमाया के मैंने सुना है तुमने अस्सी दीनार का मकान ख़रीद लिया है और उसके लिये सयामा (दस्तावेज़) भी लिखा है और इस पर गवाही भी ले ली है ? शरीह ने कहा के ऐसा तो हुआ है। आपको ग़ुस्सा आ गया और फ़रमाया

शरीह! अनक़रीब तेरे पास वह शख़्स आने वाला है जो न इस तहरीर को देखेगा और न तुझ से गवाहों के बारे में सवाल करेगा बल्कि तुझे उस घर से निकाल कर तनो तन्हा क़ब्र के हवाले कर देगा। अगर तुमने यह मकान दूसरे के माल से ख़रीदा है और ग़ैर हलाल से क़ीमत अदा की है तो तुम्हें दुनिया और आखि़रत दोनों में ख़सारा होगा। (((-साहब आग़ानी ने इस वाक़ेए को नक़्ल किया है के अमीरूल मोमेनीन (अ 0) का इख़्तेलाफ़ एक यहूदी से हो गया जिसके पास आपकी ज़िरह थी , उसने क़ाज़ी से फै़सला कराने पर इसरार किया , आप यहूदी के साथ शरीह के पास आए , उसने आपसे गवाह तलब किये , आपने क़म्बर और इमाम हुसैन (अ 0) को पेश किया , शरीह ने क़म्बर की गवाही क़ुबूल कर ली और इमाम हसन (अ 0) की गवाही फ़रज़न्द होने की बिना पर रद कर दी , आपने फ़रमाया के रसूले अकरम (स 0) ने उन्हें सरदारे जवानाने जन्नत क़रार दिया है और तुम उनकी गवाही को रद कर रहे हो ? लेकिन इसके बावजूद आपने फ़ैसले का ख़याल करते हुए ज़िरह यहूदी को दे दी। उसने वाक़ेए को निहायत दरजए हैरत की निगाह से देखा और फिर कलमए शहादतैन पढ़ कर मुसलमान हो गया। आपने ज़िरह के साथ उसे घोड़ा भी दे दिया और 900दिरहम वज़ीफ़ा मुक़र्रर कर दिया। वह मुस्तक़िल आपकी खि़दमत में हाज़िर रहा यहां तक के सिफ़्फ़ीन में दरजए शहादत पर फ़ाएज़ हो गया। इस वाक़ेए से अन्दाज़ा होता है के इमाम अलैहिस्सलाम का किरदार क्या था और शरीह की बदनफ़्सी का क्या आलम था और यहूदी के ज़र्फ़ में किस क़द्र सलाहियत पाई जाती थी।)))

याद रखो अगर तुम इस मकान को ख़रीदते वक़्त मेरे पास आते तो मुझसे दस्तावेज़ लिखवाते तो एक दिरहम में भी खरीदने के लिये तैयार न होते , अस्सी दिरहम तो बहुत बड़ी बात है। मैं उसकी दस्तवेज़ इस तरह लिखता-

यह वह मकान है जिससे एक बन्दाए ज़लील ने उस मरने वाले से ख़रीदा है जिसे कूच के लिये आमादा कर दिया गया है। यह मकान दुनियाए पुरफ़रेब में वाक़ेअ है जहाँ फ़ना होने वालों की बस्ती है और हलाक होने वालों का इलाक़ा है , इस मकान के हुदूद राबइया हैं।

एक हद असबाबे आफ़ात की तरफ़ है और दूसरी असबाबे मसाएब से मिलती है , तीसरी हद हलाक कर देने वाली ख़्वाहिशात की तरफ़ है और चौथी गुमराह करने वाले शैतान की तरफ़ और इसी तरफ़ इस घर का दरवाज़ा खुलता है। इस मकान को उम्मीदों के फ़रेब ख़ोरदा ने अजल के राहगीर से ख़रीदा है जिसके ज़रिये क़नाअत की इज़्ज़त से निकल कर तलब व ख़्वाहिश की ज़िल्लत में दाखि़ल हो गया है। अब अगर इस ख़रीदार को इस सौदे में कोई ख़सारा हो तो यह उस ज़ात की ज़िम्मेदारी है जो बादशाहों के जिस्मों का तहो बाला करने वाला , जाबिरों की जान निकाल लेने वाला , फ़िरऔनों की सलतनत को तबाह कर देने वाला , कसरा व क़ैसर तबअ व हमीर और ज़्यादा से ज़्यादा माल जमा करने वालों , मुस्तहकम इमारतें बना कर उन्हें सजाने वालों , उनमें बेहतरीन फ़र्श बिछाने वालों और औलाद के ख़याल से ज़ख़ीरा करने वालों और जागीरें बनाने वालों को फ़ना के घाट उतार देने वाला है के इन सबको क़यामत के मौक़फ़ हिसाब और मन्ज़िले सवाब व अज़ाब में हाज़िर कर दे जब हक़ व बातिल का हतमी फ़ैसला होगा और अहले बातिल यक़ीनन ख़सारे में होंगे। इस सौदे पर इस अक़्ल ने गवाही दी है जो ख़्वाहिशात की क़ैद से आज़ाद और दुनिया की वाबस्तगीयों से महफ़ूज़ है ’ (((- जब असहाबे जमल बसरा में वारिद हुए तो वहाँ के गवर्नर उस्मान बिन हनीफ़ ने आपके नाम एक ख़त लिखा जिसमें बसरा की सूरते हाल का ज़िक्र किया गया था। आपने इसके जवाब में तहरीर फ़रमाया के जंग में पहल करना हमारा काम नहीं है लेहाज़ा तुम्हारा पहला काम यह है के उन पर एतमामे हुज्जत करो फिर अगर इताअते इमाम (अ 0) पर आमादा हो जाएं तो बेहतरीन बात है वरना तुम्हारे पास फ़रमाबरदार क़िस्म के अफ़राद मौजूद हैं , उन्हें साथ लेकर ज़ालिमों का मुक़ाबला करना और ख़बरदार जंग के मामले में किसी पर किसी क़िस्म का जब्र न करना के जंग का मैदान क़ुरबानी का मैदान है और इसमें वही अफ़राद साबित क़दम रह सकते हैं जो जान व दिल से क़ुरबानी के लिये तैयार हों वरना अगर बादल न ख़्वास्ता फ़ौज इकट्ठा भी कर ली गई तो यह ख़तरा बहरहाल रहेगा के यह ऐन वक़्त पर छोडड़ कर फ़रार कर सकते हैं जिसका तजुर्बा तारीख़़े इस्लाम में बारहा हो चुका है और जिसका सबूत ख़ुद क़ुराने हकीम में मौजूद है।-)))

4- आपका मकतूबे गिरामी (लशकर के कुछ सरदारो के नाम )

अगर दुश्मन इताअत के ज़ेरे साया आ जाएं तो यही हमारा मुद्दआ है और अगर मुआमलात इफ़तेराक़ और नाफ़रमानी की मन्ज़िल ही की तरफ़ बढ़े तो तुम अपने इताअत गुज़ारों को लेकर नाफ़रमानों के मुक़ाबले में उठ खड़े हो और अपने फ़रमाबरदारों के वसीले से इन्हेराफ़ करने वालों से बेनियाज़ हो जाओ के बादल नाख़्वास्ता हाज़िरी देने वालों की हाज़िरी से ग़ैबत बेहतर है (जो बददिली से साथ हो उसका न होना होने से बेहतर है) और उनका बैठ जाना ही उठ जाने से ज़्यादा मुफ़ीद है।

5- आपका मकतूबे गिरामी (आज़रबाईजान के गवर्नर अशअस बिन क़ैस के नाम )

यह तुम्हारा मन्सब कोई लुक़्मए तर नहीं है बल्कि तुम्हारी गर्दन पर अमानते इलाही है और तुम एक बलन्द हस्ती के ज़ेरे निगरानी हिफ़ाज़त पर मामूर हो , तुम्हें रिआया के मामले में इस तरह के एक़दाम का हक़ नहीं है और ख़बरदार किसी मुस्तहकम दलील के बग़ैर किसी बड़े काम में हाथ मत डालना , तुम्हारे हाथों में जो माल है यह भी परवरदिगार के असवाल का एक हिस्सा है और तुम इसके ज़िम्मेदार हो जब तक मेरे हवाले न कर दो , बहरहाल शायद इस नसीहत की बिना पर मैं तुम्हारा बुरा वाली न हूंगा , वस्स्सलाम।

6-आपका मकतूब े गिरामी

देख मेरी बैअत उसी क़ौम ने की है जिसने अबूबकर व उमर व उस्मान की बैअत की थी और उसी तरह की है जिस तरह उनकी बैअत की थी , के न किसी हाज़िर को नज़रेसानी का हक़ था और न किसी ग़ायब को रद कर देने का इख़्तेयार था। शूरा का इख़्तेयार भी सिर्फ महाजेरीन व अन्सार को होता है लेहाज़ा वह किसी शख़्स पर इत्तेफ़ाक़ कर लें और उसे इमाम नामज़द कर दे तो गोया के इसी में रिज़ाए इलाही है और अगर कोई शख़्स तन्क़ीद करके या बिदअत की बुनियाद पर इस अम्र से बाहर निकल जाए तो लोगों का फ़र्ज़ है के इसे वापस दे दें और अगर इन्कार कर दे तो उससे जंग करें के इसने मोमेनीन के रास्ते से हट कर राह निकाली है और अल्लाह भी उसे उधर ही फेर देगा जिधर वह फिर गया है।

माविया! मेरी जान की क़सम , अगर तू ख़्वाहिशात को छोड़कर अक़्ल की निगाहों में देखोगा तो मुझे सबसे ज़्यादा ख़ूने उस्मान से में इस सिलसिले मसले से पाक दामन (बरी) पाएगा और तुझे मालूम हो जाएगा के मैं इस मसले से बिल्कुल अलग थलग था। मगर यह के तू हक़ाएक़ की परदा पोशी करके इल्ज़ाम ही लगाना चाहे तो तुझे मुकम्मल इख़्तेयार है , ( यह गुजिश्ता बैअतों की सूरते हाल की तरफ़ इशारा है वरना इस्लाम में खि़लाफ़त शूरा से तै नहीं होती है-- जवादी)

7-आपका मकतूबे गिरामी

अम्माबाद! मेरे पास तेरी बेजोड़ नसीहतों का मजमुआ और तेरा ख़ूबसूरत सजाया बनाया हुआ ख़त वारिद हुआ है जिसे तेरे गुमराही के क़लम ने लिखा है और इस पर तेरी बेअक़्ली ने इमज़ा किया है , यह एक ऐसे शख़्स का ख़त है जिसके पास न हिदायत देने वाली बसीरत है और न रास्ता बताने वाली क़यादत , उसे ख़्वाहिशात ने पुकारा तो उसने लब्बैक कह दी और गुमराही ने खींचा तो उसके पीछे चल पड़ा और इसके नतीजे में औल-फ़ौल बकने लगा और रास्ता भूलकर गुमराह हो गया। देख यह बैअत एक मरतबा होती है जिसके बाद न किसी को नज़रे सानी का हक़ होता है और न दोबारा इख़्तेयार करने का। इससे बाहर निकल जाने वाला इस्लामी निज़ाम पर मोतरज़ शुमार किया जाता है और इसमें सोच विचार करने वाला मुनाफ़िक़ कहा जाता है। (((-अब्बास महमूद एक़ाद ने अबक़रीतुल इमाम (अ 0) में इस हक़ीक़त का एलान किया है के ख़ूने उस्मान की तमामतर ज़िम्मेदारी ख़ुद माविया पर है के वह उनका तहफ़्फ़ुज़ करना चाहता तो उसके पास तमामतर इमकानात मौजूद थे , वह शाम का हाकिम था और उसके पास एक अज़ीमतरीन फ़ौज मौजूद थी जिससे किसी तरह का काम लिया जा सकता था। इमाम अली (अ 0) की यह हैसियत नहीं थी - आप पर दोनों तरफ़ से दबाव पड़ रहा था , इन्क़ेलाबियों का ख़याल था के अगर आप बैअत क़ुबूल कर लें तो उस्मान को ब-आसानी माज़ूल किया जा सकता है और उस्मान का ख़याल था के आप चाहें तो इन्क़ेलाबियों को हटाकर मेरे मन्सब का तहफ़्फ़ुज़ कर सकते हैं और मेरी जान बचा सकते हैं। ऐसे हालात में हज़रत ने जिस ईमानी फ़रासत और इरफ़ानी हिकमत का मुज़ाहिरा किया है उससे ज़्यादा किसी फ़र्दे बशर के इमकान में नहीं था।-)))

8-आपका मकतूबे गिरामी (जरीर बिन अब्दुल्लाह बजली के नाम जब उन्हें माविया की फ़हमाइश के लिये रवाना फ़रमाया )

अम्माबाद- जब तुम्हें यह मेरा ख़त मिल जाए तो माविया से हतमी फ़ैसले का मुतालेबा कर देना (उसे दो टूक फ़ैसले पर आमादा करो , और उसे किसी आखि़री और क़तई राय का पाबन्द बनाओ और दो बातों में से किसी एक के इख़्तेयार करने पर मजबूर करो) , के घर से बेघर कर देने वाली जंग या रूसवा करने वाली सुलह , अगर वह जंग को इख़्तेयार करे तो तमाम ताल्लुक़ात और गफ़्त व शनीद ख़तम कर दो और अगर सुलह चाहे तो उससे बैअत ले लो।

9-आपका मकतूबे गिरामी (माविया के नाम )

हमारी क़ौम (क़ुरैश) का इरादा था के हमारे पैग़म्बर (स 0) को क़त्ल कर दे और हमें जड़ से उखाड़ कर फेंक दे , उन्होंने हमारे बारे में रंजो ग़म के असबाब फ़राहम किये और हमसे तरह-तरह के बरताव किये , हमें राहत व आराम से रोक दिया और हमारे लिये मुख़्तलिफ़ क़िस्म के हौफ़ का इन्तेज़ाम किया। कभी हमें नाहमवार पहाड़ों में पनाह लेने पर मजबूर किया और कभी हमारे लिये जंग की आग भड़का दी , लेकिन परवरदिगार ने हमें ताक़त दी के हम उनके दीन की हिफ़ाज़त करें और उनकी हुरमत से हर तरह से दिफ़ाअ करें। हममें साहेबे ईमान अज्रे आखि़रत के तलबगार थे और कुफ़्फ़ार अपनी अस्ल की हिमायत कर रहे थे। क़ुरैश में जो लोग मुसलमान हो गए थे वह इन मुश्किलात से आज़ाद थे या इसलिये के उन्होंने कोई हिफ़ाज़ती मुआहेदा कर लिया था या उनके पास क़बीला था जो उनके सामने खड़ा हो जाता था और वह क़त्ल से महफ़ूज़ रहते थे और रसूले अकरम (स 0) का यह आलम था के जब जंग के शोले भड़क उठते थे और लोग पीछे हटने लगते थे तो आप अपने अहलेबैत (अ 0) को आगे बढ़ा देते थे और वह अपने को सिपर बनाकर असहाब को तलवार और नैज़ों की गरमी से महफ़ूज़ रखते थे। चुनांचे बद्र के दिन जनाबे उबैदा बिन अलहारिस मार दिये गए , ओहद के दिन हमज़ा शहीद हुए और मौतह में जाफ़र काम आ गए। एक शख़्स ने जिसका नाम मैं बता सकता हूँ उन्हीं लोगों जैसी शहादत का क़स्द किया था लेकिन उन सब की मौत जल्दी आ गई और उसकी मौत पीछे टाल दी गई।

किस क़द्र ताज्जुबख़ेज़ है जमाने का यह हाल के मेरा मुक़ाबला ऐसे अफराद से होता है जो कभी मेरे साथ क़दम मिलाकर नहीं चले और न इस दीन में उनका कोई कारनामा है जो मुझसे मवाज़ना किया जा सके मगर यह के कोई मुद्दई किसी ऐसे शरफ़ का दावा करे जिसको न मैं जानता हूँ या “ शायद ” ख़ुदा ही जानता है (यानी कुछ हो तो वह जाने) मगर हर हाल में ख़ुदा का शुक्र है। रह गया तुम्हारा यह मुतालेबा के मैं क़ातिलाने उस्मान को तुम्हारे हवाले कर दूं तो मैंने इस मसले में काफ़ी ग़ौर किया है। मेरे इमकान में उन्हें तुम्हारे हवाले करना है और न किसी और के , मेरी जान की क़सम अगर तुम अपनी गुमराही और अदावत से बाज़ न आए तो अनक़रीब उन्हें देखोगे के वह ख़ुद तुम्हें ढूंढ लेंगे और इस बात की ज़हमत न देंगे के तुम उन्हें ख़ुश्की या तरी , पहाड़ या सहरा में तलाश करो , अलबत्ता यह तलब होगी के जिसका हुसूल तुम्हारे लिये बाइसे मसर्रत न होगा (नागवारी का बाएस होगा) और वह मुलाक़ात होगी जिससे किसी तरह की ख़ुशी न होगी और सलाम उसके अहल पर। (((-क़ुरैश की ज़िन्दगी का सारा इन्तेज़ाम क़बाइली बुनियादों पर चल रहा था और हर क़बीले को कोई न कोई हैसियत हासिल थी लेकिन इस्लाम के आने के बाद इन तमाम हैसियतों का ख़ातेमा हो गया और इसके नतीजे में सबने इस्लाम के खि़लाफ़ इत्तेहाद कर लिया और मुख़्तलिफ़ मारके भी सामने आ गए लेकिन परवरदिगारे आलम ने रसूले अकरम (स 0) के घराने के ज़रिये अपने दीन को बचा लिया और इसमें कोई क़बीला भी इनका शरीक नहीं है और न किसी को यह शरफ़ हासिल है , न किसी क़बीले में कोई अबूतालिब जैसा मुहाफ़िज़ पैदा हुआ है और न उबैदा जैसा मुजाहिद , न किसी क़बीले ने हमज़ा जैसा सय्यदुश शोहदा पैदा किया है और न जाफ़र जैसा तय्यार यह सिर्फ़ बनी हाशिम का शरफ़ है और इस्लाम की गरदन पर उनके अलावा किसी का कोई एहसान नहीं है।-)))

10-आपका मकतूबे गिरामी (माविया ही के नाम )

तुम उस वक़्त क्या करोगे जब दुनिया के यह लिबास जिनमें लिपटे हुए हो तुमसे उतर जाएंगे , यह दुनिया जो अपनी सज-धज की झलक दिखाती और अपने हज़ व कैफ़ से वरग़लाती है जिसने तुम्हें पुकारा तो तुमने लब्बैक कही , उसने तुम्हें खींचा तो तुम उसके पीछे हो लिये और उसने तुम्हें हुक्म दिया तो तुमने उसकी पैरवी की , वह वक़्त दूर नही के बताने वाला तुम्हें उन चीज़ों से आगाह करे के जिनसे कोई सिपर तुम्हें बचा न सकेगी , लेहाज़ा मुनासिब है के इस दावे से बाज़ आ जाओ और हिसाब व किताब का सामान तैयार कर लो , आने वाली मुसीबतों के लिये आरास्ता (तैयार) हो जाओ और गुमराहों को अपनी समाअत पर हावी न बनाओ वरना ऐसा न किया तो मैं तुम्हें इन तमाम चीज़ों से बाख़बर कर दूंगा जिनसे तुम ग़ाफ़िल हो , तुम ऐश व इशरत के दिलदादह हो शैतान ने तुम्हें अपनी गिरफ़्त में ले लिया है और अपनी उम्मीदों को हासिल कर लिया है और तुम्हारे रग व पै में रूह और ख़ून की तरह सरायत कर गया है।

माविया! आखि़र तुम लोग कब रिआया की निगरानी के क़ाबिल और उम्मत के मसाएल के वाली थे जबके तुम्हारे पास न कोई साबेक़ा शरफ़ था और न कोई बलन्द व बाला इज़्ज़त हम अल्लाह से तमाम दीरीना बदबख़्तीयों से पनाह मांगते हैं और तुम्हें बाख़बर करते हैं के ख़बरदार उम्मीदों के धोखे में और ज़ाहिर व बातिन के इख़्तेलाफ़ में मुब्तिला होकर गुमराही में दूर तक मत चले जाओ। तुमने मुझे जंग की दावत दी है तो बेहतर यह है के लोगों को अलग कर दो और बज़ाते ख़ुद मैदान में आ जाओ , फ़रीक़ैन को जंग से माफ़ कर दो और हम तुम बराहे रास्त मुक़ाबला कर लें ताके तुम्हें मालूम हो जाए के किस के दिल पर रंग लग गया है और किस की आंखों पर परदे पड़े हुए हैं। मैं वही अबुलहसन हूँ जिसने रोज़्रे बद्र तुम्हारे नाना (उतबा) मामू (वलीद बिन उतबा) और भाई हन्ज़ला का सर तोड़कर ख़ात्मा कर दिया है। (((-इस मुक़ाम पर सियासत से मुराद सियासते आदिला और आयते कामेला है के इस काम का अन्जाम देना हर कस व नाकस के बस का नहीं है वरना सियासत से मक्कारी , दग़ाबाज़ी और ग़द्दारी मुराद ली जाए तो बनी उमय्या हमेशा से सियासत के मुराद थे और अबू सुफ़यान ने हर महाज़ पर इस्लाम के खि़लाफ़ लशकरकशी की है और इस राह में किसी भी मौक़े को नज़र अन्दाज़ नहीं किया है। कभी मैदानों में मुक़ाबला किया है और कभी बैअत करके इस्लाम का सफ़ाया किया है। हज़रत का यह वह मुतालेबा था जिसकी अम्र व आस ने भी ताईद कर दी थी लेकिन माविया फ़ौरन ताड़ गया और उसने कहा के तू खि़लाफ़त का उम्मीदवार दिखाई दे रहा है और फिर मैदान का रूख़ करने का इरादा भी नहीं किया के अली की तलवार से बच कर निकल जाना मुहालात में से है।-)))

अभी वह तलवार मेरे पास है और मैं उसी हिम्म्मते क़ल्ब के साथ दुश्मन का मुक़ाबला करूंगा , मैंने न दीन तब्दील किया है और न नया नबी खड़ा किया है और मैं बिला शुबह उसी शाहेराह पर हूँ जिसे तुमने अपने इख़्तेयार से छोड़ रखा था और फिर ब-मजबूरी इसमें दाखि़ल हुए और तुम ऐसा ज़ाहिर करते हो के तुम ख़ूने उस्मान का बदला लेने को उठे हो हालांके तुम्हें अच्छी तरह मालूम है के उनका ख़ून किसके सर है , अगर वाक़ई बदला ही लेना मन्ज़ूर है तो उन्हीं से लो। मुझे तो यह मन्ज़र नज़र आ रहा है के जंग तुम्हें दांतों से काट रही है और तुम इस तरह फ़रयाद कर रहे हो जिस तरह ऊंट भारी बोझ से बिलबिलाने लगते हैं और तुम्हारी जमाअत मुसलसल तलवार की ज़र्ब और मौत की गर्म बाज़ारी और क़ज़ा और कश्तों के पुश्ते लग जाने की बिना पर मुझे किताबे ख़ुदा की तरफ़ दावत दे रही होगी , हालांके वह ऐसे लोग हैं जो काफ़िर और हक़ के मुनकिर हैं या बैअत के बाद उसे तोड़ देने वाले हैं।

11-आपका मकतूबे गिरामी (दुश्मन की तरफ़ भेजे हुए एक लशकर को यह हिदायतें फ़रमाईं )

जब तुम दुश्मन की तरफ़ बढ़ो या दुश्मन तुम्हारी तरफ़ बढ़े तो तुम्हारा पड़ाव टीलों के आगे या पहाड़ के दामन में या नहरों के मोड़ में होना चाहिये ताके यह चीज़ तुम्हारे लिये पुश्त पनाही और रोक का काम दे और जंग बस एक तरफ़ या (ज़ाएद से ज़ाएद दो तरफ़ से हो) और पहाड़ों की चोटियों और टीलों की बलन्द सतहों पर दीदबानों को बिठा दो ताके दुश्मन किसी खटके की जगह से या इत्मीनान वाली जगह से (अचानक) न आ पड़े और उसको जाने रहो के फ़ौज का हर अव्वल दस्ता फ़ौज का ख़बर रसाँ होता है और हर अव्वल दस्ते को इत्तेलाआत उन मुख़बिरों से हासिल होती है (लोग आगे बढ़ कर सुराग़ लगाते हैं) देखो तितर-बितर होने से बचे रहो , उतरो तो एक साथ उतरो , और कूच करो तो एक साथ करो और जब रात तुम पर छा जाए तो नैज़ों को (अपने गिर्द) गाड़कर एक दाएरा सा बना लो और सिर्फ़ ऊंघ लेने और एक-आध झपकी ले लेने के सिवा नीन्द का मज़ा न चखो।

12-आपकी नसीहत (जो माक़ल बिन क़ैस रियाही को उस वक़्त फ़रमाई है जब उन्हें तीन हज़ार का लशकर देकर शाम की तरफ़ रवाना फ़रमाया है)

उस अल्लाह से डरते रहना जिसकी बारगाह में बहरहाल हाज़िर होना है और जिसके अलावा कोई आखि़री मन्ज़िल नहीं है , जंग उसी से करना जो तुमसे जंग करे , ठण्डे औक़ात में सुबह व शाम सफ़र करना और गरमी के वक़्त में क़ाफ़िले को रोक कर लोगों को आराम करने देना। (((-यह वह हिदायात हैं जो हर दौर में काम आने वाली हैं और क़ाएदे इस्लाम का फ़र्ज़ है के जिस दौर में जिस तरह का मैदान और जिस तरह के असलहे हों उन सब की तन्ज़ीम इन्हीं उसूलों की बुनियाद पर करे जिनकी तरफ़ अमीरूल मोमेनीन (अ 0) ने दौरे नैज़ा व शमशीर में इशारा फ़रमाया है। हालात और असलहों के बदल जाने से उसूले हर्ब व ज़र्ब और क़वानीने जेहाद व क़ेताल में फ़र्क़ नहीं हो सकता है-)))

आहिस्ता सफ़र करना और अव्वले शब में सफ़र मत करना के परवरदिगार ने रात को सुकून के लिये बनाया है और उसे क़याम के लिये क़रार दिया है , सफ़र के लिये नहीं , लेहाज़ा रात में अपने बदन को आराम देना और अपनी सवारी के लिये सूकून फ़राहम करना , उसके बाद जब देख लेना के सहर तुलूअ हो रही है और सुबह रौशन हो रही है तो बरकते ख़ुदा के सहारे उठ खड़े होना और जब दुश्मन का सामना हो जाए तो अपने असहाब के दरम्यान ठहरना और न दुश्मन से इस क़दर क़रीब हो जाना के जैसे जंग छेड़ना चाहते हो और न इस क़द्र दूर हो जाना के जैसे जंग से ख़ौफ़ज़दा हो , यहां तक के मेरा हुक्म आ जाए और देखो ख़बरदार दुश्मन की दुश्मनी तुम्हें इस बात पर आमादा न कर दे के उसे हक़ की दावत देने और हुज्जत तमाम करने से पहले जंग का आग़ाज़ कर दो।

13-आपकी नसीहत

मैंने तुम पर और तुम्हारे मातहत लशकर पर मालिक बिन अलहारिस अल अशतर को सरदार क़रार दे दिया है लेहाज़ा उनकी बातों पर तवज्जोह देना और उनकी इताअत करना और उन्हीं को अपनी ज़िरह और सिपर क़रार देना के मालिक उन लोगों में हैं जिनकी कमज़ोरी और लग़्ज़िश का कोई ख़तरा नहीं है और न वह इस मौक़े पर सुस्ती कर सकते हैं जहां तेज़ी ज़्यादा मुनासिब हो , और न वहां तेज़ी कर सकते हैं जहां सुस्स्ती उमदा क़रीने अक़्ल हो। (((-यह सारी हिदायात माक़ल बिन क़ैस के बारे में हैं जिन्हें आपने तीन हज़ार अफ़राद का सरदारे लशकर बनाकर भेजा था और ऐसे हिदायात से मसलेह फ़रमा दिया था जो सुबहे क़यामत तक काम आने वाली हों और हर दौर का इन्सान उनसे इस्तेफ़ाज़ा कर सके। मालिके अश्तर उन लोगों में हैं जिन्होंने अबूज़र के ग़ुस्ल व कफ़न का इन्तेज़ाम किया था जिनके बारे में रसूले अकरम (स 0) ने फ़रमाया था के मेरा एक सहाबी आलमे ग़ुरबत में इन्तेक़ाल करेगा और साहेबाने ईमान की एक जमाअत इसकी तजहीज़ व तकफ़ीन का इन्तेज़ाम करेगी।-)))

14-हिदायत (अपने लशकर के नाम सिफ़्फ़ीन की जंग के आग़ाज़ से पहले)

ख़बरदार! उस वक़्त तक जंग शुरू न करना जब तक वह लोग पहल न कर दें के तुम बेहम्दे अल्लाह अपनी दलील रखते हो और उन्हें उस वक़्त तक का मौक़ा देना जब तक पहल न कर दें , एक दूसरी हुज्जत हो जाए , इसके बाद जब हुक्मे ख़ुदा से दुश्मन को शिकस्त हो जाए तो किसी भागने वाले को क़त्ल न करना और किसी आजिज़ को हलाक न करना और किसी ज़ख़्मी पर क़ातिलाना हमला न करना और औरतों को अज़ीयत मत देना चाहे वह तुम्हें गालियां ही क्यों न दें और तुम्हारे हुकाम को बुरा भला ही क्यों न कहें के यह क़ूवते नफ़्स और अक़्ल के एतबार से कमज़ोर हैं और हम पैग़म्बर (स 0) के ज़माने में भी उनके बारे में हाथ रोक लेने पर मामूर थे। जबके वह मुशरिक थीं और उस वक़्त भी अगर कोई शख़्स औरतों से पत्थर या लकड़ी के ज़रिये तारज़ करता था तो उसे और उसकी नस्लों को मतऊन किया जाता था। (((-यह दलील सूरए हिजरात की आयत नम्बर 9है जिसमें बाग़ी से क़ेताल का हुक्म दिया गया है और इसमें कोई शक नहीं है के माविया और उसकी जमाअत बाग़ी थी जिसकी तसदीक़ जनाबे अम्मारे यासिर की शहादत से हो गई , जिनके क़ातिल को सरकारे दो आलम (स 0) ने बाग़ी क़रार दिया था-)))


15-आपकी दुआ (जिसे दुश्मन के मुक़ाबले के वक़्त दोहराया करते थे )

ख़ुदाया तेरी ही तरफ़ दिल खिंच रहे हैं और गर्दनें उठी हुई हैं और आंखें लगी हुई हैं और क़दम आगे बढ़ रहे हैं और बदन लाग़र हो चुके हैं।

ख़ुदाया छिपे हुए कीने सामने आ गए हैं और अदावतों की देगें जोश खाने लगी हैं। ख़ुदाया हम तेरी बारगाह में अपने रसूल की ग़ैबत और दुश्मनों की कसरत की और ख़्वाहिशात के तफ़रिक़े की फ़रयाद कर रहे हैं। ख़ुदाया हमारे और दुश्मनों के दरम्यान हक़ के साथ फ़ैसला कर दे के तू बेहतरीन फ़ैसला करने वाला है।

16-आपका मकतूब गिरामी (जो जंग के वक़्त अपने असहाब से फ़रमाया करते थे)

ख़बरदार तुम पर वह फ़रार गराँ न गुज़रे जिसके बाद हमला करने का इमकान हो और वह पसपाई परेशान कुन न हो जिसके बाद दोबारा वापसी का इमकान हो , तलवारों को उनका हक़ दे दो और पहलू के भल गिरने वाले दुश्मनों के लिये मक़तल तैयार रखो , अपने नफ़्स को शदीद नैज़ाबाज़ी और सख़्त तरीन शमशीरज़नी के लिये आमादा रखो और आवाज़ों को मुर्दा बना दो के इससे कमज़ोरी दूर हो जाती है , क़सम है उस ज़ात की जिसने दाने को शिगाफ़ता किया है और जानदार चीज़ों को पैदा किया है के यह लोग इस्लाम नहीं लाए हैं बल्कि हालात के सामने सिपर अन्दाख़्ता हो गए हैं और अपने कुफ्ऱ को छिपाए हुए हैं और जैसे ही मददगार मिल गए वैसे ही इज़हार कर दिया। (((-इसमें कोई शक नहीं के मैदाने जंग में ऐसे हालात आ जाते हैं जब सिपाही को अपनी जगह छोड़ना पड़ती है और एक तरह से फ़रार का रास्ता इख़्तेयार करना पड़ता है , लेकिन इसमें कोई इश्काल नहीं है बशर्ते के हौसलाए जेहाद बरक़रार रहे और जज़्बाए क़ुरबानी में फ़र्क़ न आए। मैदाने ओहद का सबसे बड़ा ऐब यही था के “ सहाबाए कराम ” जज़्बाए क़ुरबानी से आरी हो गए थे और रसूले अकरम (स 0) के पुकारने के बावजूद पलट कर आने के लिये तैयार न थे ऐसी सूरते हाल यक़ीनन इस क़ाबिल है के उसकी मज़म्मत की जाए और यह नंग व आर नस्लों में बाक़ी रह जाए वरना फ़रार के बाद हमला या पस्पाई के बाद वापसी कोई ऐसी बात नहीं है जिस पर मज़म्मत या मलामत की जाए।-)))

17-आपका मकतूबे गिरामी (माविया के नाम उसके एक ख़त के जवाब में)

तुम्हारा यह मुतालबा के मैं शाम का इलाक़ा तुम्हारे हवाले कर दूँ , तो जिस चीज़ से कल इनकार कर चुका हूँ वह आज अता नहीं कर सकता हूं और तुम्हारा यह कहना के जंग ने अरब का ख़ातेमा कर दिया है और चन्द एक अफ़राद के अलावा कुछ नहीं बाक़ी रह गया है तो याद रखो के जिसका ख़ात्मा हक़ पर हुआ है उसका अन्जाम जन्नत है और जिसे बातिल खा गया है उसका अन्जाम जहन्नम है। रह गया हम दोनों का जंग और शख़्सियात के बारे में बराबर होना , तो तुम शक में इस तरह तेज़ रफ़्तारी से काम नहीं कर सकते हो जितना मैं यक़ीन में कर सकता हूँ और अहले शाम दुनिया के बारे में इतने हरीस नहीं हैं जिस क़द्र अहले इराक़ आखि़रत के बारे में फ़िक्रमन्द हैं। और तुम्हारा यह कहना के हम सब अब्दे मुनाफ़ की औलाद हैं तो यह बात सही है लेकिन न उमय्या हाशिम जैसा हो सकता है और न हर्ब अब्दुलमुत्तलिब जैसा , न अबू सुफ़ियान अबूतालिब का हमसर हो सकता है और न राहे ख़ुदा में हिजरत करने वाला आज़ाद कर्दा अफ़राद जैसा। न वाज़ेह नसब वाले का क़यास शजरे से चिपकाए जाने वाले पर हो सकता है और न हक़दार को बातिल नवाज़ जैसा क़रार दिया जा सकता है। मोमिन कभी मुनाफ़िक़ के बराबर नहीं रखा जा सकता है , बदतरीन औलाद तो वह है जो इस सल्फ़ के नक़्शे क़दम पर चले जो जहन्नम में गिर चुका है। इसके बाद हमारे हाथों में नबूवत का शरफ़ है जिसके ज़रिये हमने बातिल के इज़्ज़तदारों को ज़लील बनाया है और हक़ के कमज़ोरों को ऊपर उठाया है और जब परवरदिगार ने अरब को अपने दीन में फ़ौज दर फ़ौज दाखि़ल किया है और यह क़ौम बख़ुशी या ब-कराहत (नाख़ुशी से) मुसलमान हुई है तो तुम उन्हें दीन के दायरे में दाखि़ल होने वालों में थे या ब-रग़बत (लालच से) या ब-ख़ौफ़ जबके सबक़त हासिल करने वाले सबक़त हासिल कर चुके थे और मुहाजेरीन अव्वलीन अपनी फ़ज़ीलत पा चुके थे , देखो ख़बरदार शैतान को अपनी ज़िन्दगी का हिस्सेदार मत बनाओ और उसे अपने नफ़्स पर राह मत दो , वस्सलाम। (((-माविया ने अपने ख़त में चार नुक्ते उठाए थे और हज़रत ने सबके अलग-अलग जवाबात दिये हैं और हक़ व बातिल का अबदी फ़ैसला कर दिया है और आखि़र में यह भी वाज़ेह कर दिया है के तमाम मुआमलात में मसावात फ़र्ज़ कर लेने के बाद भी शरफ़े नबूवत का कोई मुक़ाबला नहीं हो सकता है जो परवरदिगार ने बनी हाशिम को अता किया है है और इसका बनी उमय्या से कोई ताल्लुक़ नहीं है। और ज़ाती किरदार के एतबार से भी बनी हाशिम इस्लाम की मन्ज़िल पर फ़ाएज़ थे और बनी उमय्या ने फतहे मक्का के मौक़े पर मजबूरन कलमा पढ़ लिया था और ज़ाहिर है के अस्तसलाम इस्लाम के मानिन्द नहीं हो सकता है-)))

18-हज़रत का मकतूबे गिरामी (बसरा के गवर्नर अब्दुल्लाह बिन अब्बास के नाम)

याद रखो के यह बसरा इबलीस के उतरने और फ़ितनों के उभरने की जगह का नाम है लेहाज़ा यहाँ के लोगों के साथ अच्छा बरताव करना और उनके दिलों से ख़ौफ़ की गिरह खोल देना। मुझे यह ख़बर मिली है के तुम बनी तमीम के साथ सख़्ती से पेश आते हो और उनसे सख़्त क़िस्म का बरताव करते हो तो याद रखो के बनी तमीम वह लोग हैं के जब उनका कोई सितारा डूबता है तो दूसरा उभर आता है , यह जंग के मामले में जाहेलीयत या इस्लाम कभी किसी से पीछे नहीं रहे हैं और फिर हमारा उनसे रिश्तेदारी और क़राबतदारी का ताल्लुक़ भी है के अगर हम इसका ख़याल रखेंगे तो अज्र पाएंगे अैर क़तअ ताल्लुक़ करेंगे तो गुनहगार होंगे , लेहाज़ा इब्ने अब्बास ख़ुदा तुम पर रहमत नाज़िल करे , उनके साथ अपनी ज़बान या हाथ पर जारी होने वाली अच्छाई या बुराई में सोच-समझ कर क़दम उठाना के हम दोनों इन ज़िम्मेदारियों में शरीक हैं , और देखो तुम्हारे बारे में हमारा हुस्ने ज़न बरक़रार रहे और मेरी राय ग़लत न साबित होने पाए।

19-आपका मकतूबे गिरामी (अपने बाज़ गवर्नरो के नाम)

अम्माबाद! तुम्हारे शहर के ज़मीनदारों ने तुम्हारे बारे में सख़्ती , संगदिली , तहक़ीर व तज़लील और तशद्दुद की शिकायत की है और मैंने उनके बारे में ग़ौर कर लिया है , वह अपने शिर्क की बिना पर क़रीब करने के क़ाबिल तो नहीं हैं लेकिन अहद व पैमान की बिना पर उन्हें दूर भी नहीं किया जा सकता है और उन पर ज़्यादती भी नहीं की जा सकती है लेहाज़ा तुम नके बारे में ऐसी नरमी का शोआर इख़्तेयार करो जिसमें क़द्र से (कहीं-कहीं) सख़्ती भी शामिल हो और उनके साथ सख़्ती और नर्मी के दरम्यान का बरताव करो के कभी क़रीब कर लो , कभी दूर कर दो , कभी नज़दीक बुला लो और कभी अलग रखो , इन्शाअल्लाह।

20-आपका मकतूबे गिरामी (ज़ियाद बिन अबिया के नाम)

जो बसरा के गवर्नर अब्दुल्लाह बिन अब्बास का नायब हो गया था और इब्ने अब्बास बसरा और अहवाज़ के तमाम एतराफ़ के गवर्नर थे)

मैं अल्लाह की सच्ची क़सम खाकर कहता हूँ के अगर मुझे ख़बर मिल गई के तुमने मुसलमानों के माले ग़नीमत में छोटी या बड़ी क़िस्म की ख़यानत की है तो मैं तुम पर ऐसी सख़्ती करूंगा के तुम नादार , बोझिल पीठ वाले और बेनंग व नाम (बेआबरू) होकर रह जाओगे। वस्सलाम। (((-वाज़ेह रहे के किसी का क़रीब कर लेना और है और उसके साथ आदिलाना और मुनसिफ़ाना बरताव करना और है , इस्लाम आदिलाना बरताव का हुक्म हर एक के बारे में देता है लेकिन क़ुरबत का जवाज़ सिर्फ़ साहिबाने ईमान व किरदार के लिये है) कुफ़्फ़ार व मुशरेकीन को तो उसने हरमे ख़ुदा से भी दूर कर दिया है और उनका दाखि़ला हुदूदे हरम में बन्द कर दिया है , यह और बात है के आज आलमे इस्लाम में कुफ़्फ़ार व मुशरेकीन ही क़रीब बनाए जाने के क़ाबिल हैं और कलमागो मुसलमान इस लाएक़ नहीं रह गए हैं और उनसे सुबह व शाम सर्द जंग सिर्फ़ कुफ़्फ़ार व मुशरेकीन से क़ुरबत पैदा करने या बरक़रार रखने की बुनियाद पर की जा रही है , अल्लाह इस इस्लाम पर रहम करे और इस उम्मत को अक़्ले सलीम इनायत फ़रमाए। वाज़ेह रहे के हज़रत इख़्तेयारी तौर पर किसी ऐसे शख़्स को ओहदा नहीं दे सकते हैं जिसका नसब मशकूक हो , यह काम इब्ने अब्बास ने ज़ाती तौर पर किया था , इसीलिये हज़रत ने नेहायत ही सख़्त लहजे में खि़ताब फ़रमाया है-)))

21-आपका मकतूबे गिरामी (ज़ियाद इब्ने अबिया के नाम)

इसराफ़ को छोड़कर मयानारवी इख़्तेयार करो और आज के दिन कल को याद रखो , बक़द्रे ज़रूरत माल रोक कर बाक़ी रोज़े हाजत (मोहताजी के दिन) के लिये आगे बढ़ा दो (फ़ुज़ूल ख़र्ची से बाज़ आओ)। क्या तुम्हारा ख़याल यह है के तुम मुतकब्बिरों में रहोगे और ख़ुदा तुम्हें मुतवाज़ेह अफ़राद जैसा अज्र देगा या तुम्हारे वास्ते सदक़ा व ख़ैरात करने वालों का सवाब लाज़िम क़रार देगा और तुम नेमतों में करवटें बदलते रहोगे , न किसी कमज़ोर का ख़याल करोगे और न किसी बेवा का जबके इन्सान को उसी का अज्र मिलता है जो उसने अन्जाम दिया है और वह उसी पर वारिद होता है जो उसने पहले भेज दिया है , वस्सलाम।

22-आपका मकतूबे गिरामी

(अब्दुल्लाह बिन अब्बास के नाम , जिसके बारे में ख़ुद इब्ने अब्बास का मक़ैला था

के मैंने रसूले अकरम (स 0) के बाद किसी कलाम से इस क़द्र इस्तेफ़ादा नहीं किया है जिस क़द्र इस कलाम से किया है)

अम्माबाद! कभी कभी ऐसा होता है के इन्सान उस चीज़ को पाकर भी ख़ुश हो जाता है जो उसके हाथ से जाने वाली नहीं थी और उस चीज़ के चले जाने से भी रन्जीदा हो जाता है जो उसे मिलने वाली नहीं थी लेहाज़ा तुम्हारा फ़र्ज़ है के उस आखि़रत पर ख़ुशी मनाओ जो हासिल हो जाए और उस पर अफ़सोस करो जो इसमें से हासिल न हो सके , दुनिया हासिल हो जाए तो इस पर ज़्यादा ख़ुशी का इज़हार न करो और हाथ से निकल जाए तो बेक़रार होकर अफ़सोस न करो , तुम्हारी तमामतर फ़िक्र मौत के बाद के बारे में होनी चाहिये।

23-आपका इरशादे गिरामी (जिसे अपनी शहादत से पहले बतौर वसीयत फ़रमाया है)

तुम सबके लिये मेरी वसीयत यह है के ख़बरदार ख़ुदा के बारे में किसी तरह का शिर्क न करना और हज़रत मोहम्मद (स 0) की सुन्नत को ज़ाया और बरबाद न करना इन दोनों को क़ायम रखो और इन दोनों पर चिराग़ों को रौशन रखो , इसके बाद किसी मज़म्मत का कोई अन्देशा नहीं है। मैं कल तुम्हारे साथ था और आज तुम्हारे लिये इबरत बन गया हूँ और कल तुमसे जुदा हो जाऊंगा , इसके बाद मैं बाक़ी रह गया तो अपने ख़ून का साहबे इख़्तेयार मैं ख़ुद हूँ वरना अगर मेरी मुद्दते हयात पूरी हो गई तो मैं दुनिया से चला जाऊंगा। मैं अगर माफ़ कर दूँ तो यह मेरे लिये क़ुरबते इलाही का ज़रिया होगा और तुम्हारे हक़ में भी एक नेकी होगी लेहाज़ा तुम भी माफ़ कर देना “ क्या तुम नहीं चाहते हो के अल्लाह तुम्हें बख़्श दे ” ख़ुदा की क़सम यह अचानक मौत ऐसी नहीं है जिसे मैं नापसन्द करता हूँ और न ऐसा सानेहा है जिसे मैं बुरा समझता हूँ , मैं उस शख़्स के मानिन्द हूँ जो रात भर पानी की जुस्तजू में रहे और सुबह को चश्मे पर वारिद हो जाए और तलाश के बाद अपने मक़सद को पा ले और फ़िर “ ख़ुदा की बारगाह में जो कुछ भी है वह नेक किरदारों के लिये बेहतर ही है। ”

सय्यद रज़ी- इस कलाम का एक हिस्सा पहले गुज़र चुका है लेकिन यहाँ कुछ इज़ाफ़ात थे लेहाज़ा मुनासिब मालूम हुआ के उसे दोबारा नक़्ल कर दिया जाए।(((-वाज़ेह रहे के इस माफ़ी से मुराद दुनिया में इन्तेक़ाम न लेना है के क़ातिल के जुर्म की दो हैसियतें होती हैं- वह इन्सानी दुनिया में एक ख़ून का ज़िम्मेदार होता है जिसके नतीजे में क़सास का क़ानून सामने आता है और मज़हबी दुनिया में हुक्मे इलाही की मुख़ालेफ़त का मुजरिम होता है जिसका अन्जाम आतिशे जहन्नम है। दुनिया के क़सास व इन्तेक़ाम में फ़सादात के अन्देशे होते हैं और अदावतों के शोले मज़ीद भड़क उठते हैं लेकिन आखि़रत के अज़ाब में कोई ख़तरा नहीं होता है। इसलिये साहेबाने अक़्ल व दानिश यहाँ के इन्तेक़ाम को नज़रअन्दाज़ कर देते हैं ताके मज़ीद फ़साद न पैदा हो सके और इस बात से मुतमईन रहते हैं के मुजरिम के लिये अज़ाबे जहन्नम ही काफ़ी है और ख़ुदा से बेहतर इन्तेक़ाम लेने वाला कौन है ?-)))

24-आपकी वसीयत (अपने अमवाल के बारे में जिसे जंगे सिफ़्फ़ीन की वापसी पर तहरीर फ़रमाया है)

यह बन्दए ख़ुदा , अली बिन अबीतालिब (अ 0) अमीरूलमोमेनीन का हुक्म है अपने अमवाल के बारे में जिसका मक़सद रिज़ाए परवरदिगार है ताके उसके ज़रिये जन्नत में दाखि़ल हो सके और रोज़े महशर के हौल से अमान पा सके। इन अमवाल की निगरानी हसन (अ 0) बिन अली करेंगे , बक़द्रे ज़रूरत इस्तेमाल करेंगे और बक़द्रे मुनासिब अनफ़ाक़ करेंगे। इसके बाद अगर उन्हें कोई हादसा पेश आ गया और हुसैन (अ 0) बाक़ी रह गए तो ज़िम्मेदार वह होंगे और इसी अन्दाज़ पर काम करेंगे। औलादे फ़ातेमा (अ 0) का हक़ अली (अ 0) के सदक़ात में वही है जो दीगर औलादे अली (अ 0) का है , मैंने निगरानी का काम औलादे फ़ातेमा (अ 0) को सिर्फ़ रिज़ाए इलाही और क़ुरबते पैग़म्बर (स 0) के ख़याल से सौंप दिया है के इस तरह हज़रत की हुरमत का एहतेराम भी हो आएगा और आपकी क़राबत का एज़ाज़ भी बरक़रार रहेगा। लेकिन इसके बाद भी वाली के लिये यह शर्त है के माल की असल को बाक़ी रखे और सिर्फ़ इसके समरात को ख़र्च करे , वह भी उन राहों में जिनका हुक्म दिया गया है और जिनकी हिदायत दी गई है और ख़बरदार इस क़रिया के नख़लिस्तान में से एक पौदा भी फ़रोख़्त न करे यहां तक के वह ज़मीन में दोबारा बोने के लाएक़ न रह जाए। मेरी वह कनीज़ें जिनसे मेरा ताल्लुक़ रह चुका है और उनकी औलाद भी मौजूद है या वह हामेला हैं , उनको उनकी औलाद के हिसाब से (बच्चे के हक़ में) रोक लिया जाए और उन्हीं का हिस्सा क़रार दे दिया जाए (वह उसके हिस्से में शुमार होगी)। इसके बाद अगर बच्चा मर जाए और कनीज़ ज़िन्दा रह जाए तो उसे आज़ाद कर दिया जाए के गोया इसकी ग़ुलामी ख़त्म हो चुकी है और आज़ादी हासिल हो चुकी है। सय्यद रज़ी- इस वसीयत में हज़रत का इरशाद “ वदिया भी फ़रोख़्त न किया जाए ’ इसमें वदिया से मुराद ख़ुर्मा के छोटे दरख़्त हैं जिसकी जमा वदी होती है और “ हती तशकल अरज़हा ग़रासा ’ एक फ़सीहतरीन कलाम है जिसका मक़सद यह है के ज़मीन में खजूर की दरख़्तकारी इतनी ज़्यादा हो जाए के देखने वाला इसकी असल हैसियत का अन्दाज़ा न कर सके और इसके लिये मसलए मुश्तबा हो जाए के शायद यह कोई दूसरी ज़मीन है। (((मोअर्रेख़ीन के बयान के मुताबिक़ अमीरूलमोमेनीन (अ 0) ने अपनी ज़िन्दगी में सिर्फ़ अरवाह व नुफ़ूस की सरज़मीनों को ज़िन्दा करने का काम अन्जाम नहीं दिया है , बल्कि माद्दी ज़मीनों में भी मुसलसल काम करते रहे हैं , ज़मीनों को क़ाबिले काश्त बनाया है , चश्मों को जारी किया है , दरख़्तों की सिंचाई की है और एक मज़दूर जैसी ज़िन्दगी गुज़ारी है और फिर अपनी सारी ज़हमतों और मेहनतों के नतीजे को राहे ख़ुदा में वक़्फ़ कर दिया है ताके बन्दगाने ख़ुदा इस्तेफ़ादा कर सकें और औलादे अली (अ 0) भी सिर्फ़ बक़द्रे ज़रूरत फ़ायदा उठा सके , ऐसा किरदार अब सिर्फ़ काग़ज़ात पर रह गया है वरना इसका वजूद दुनिया से अनक़ा हो चुका है अली (अ 0) वालों में देखने में नहीं आता है। सरबराहाने ममलिकत फोटो खींचवाने के लिये हाथ में फावड़ा और कुदाल ले लेते हैं वरना उन्हें ज़राअत से क्या ताल्लुक़ है , ज़मीनों का ज़िन्दा रखना अबूतुराब का काम था और उन्होंने इसका हक़ अदा कर दिया। बाक़ी सब दास्तानें हैं जो सफ़हे क़रतास पर महफ़ूज़ कर दी गई हैं और उनमें रोशनाई की चमक है , किरदार और हक़ीक़त की रोशनी नहीं है।-)))

25-आपकी वसीयत (जिसे हर उस शख़्स को लिख कर देते थे जिसे सदक़ात का आमिल क़रार देते थे)

सय्यद रज़ी- मैंने यह चन्द जुमले इसलिये नक़्ल कर दिये हैं ताके हर शख़्स को अन्दाज़ा हो जाए के हज़रत किस तरह सुतूने हक़ को क़ायम रखते थे

और हर छोटे बड़े और पोशीदा व ज़ाहिर उमूर में अद्ल के नमूने क़ायम फ़रमाते थे।

ख़ुदाए वहदहू लाशरीक का ख़ौफ़ लेकर आगे बढ़ो और ख़बरदार न किसी मुसलमान को ख़ौफ़ज़दा करना और न किसी की ज़मीन पर जबरन अपना गुज़र करना और जितना उसके माल में अल्लाह का हक़ निकलता हो उससे ज़र्रा बराबर ज़ायद (ज़्यादा) न लेना , और जब किसी क़बीले पर वारिद होना तो उनके घरों में घुसने के बजाए पहले उनके चश्मे और कनवीं पर वारिद होना और उसके बाद सुकून व वेक़ार के साथ उनकी तरफ़ जाना और उनके दरम्यान खड़े होकर सलाम करना और सलाम करने में कंजूसी से काम न लेना , इसके बाद उन से कहना के बन्दगाने ख़ुदा मुझे तुम्हारी तरफ़ परवरदिगार के वली और जानशीन ने भेजा है ताके मैं तुम्हारे अमवाल में से परवरदिगार का हक़ ले लूँ तो क्या तुम्हारे अमवाल में कोई हक़्क़े अल्लाह है जिसे मेरे हवाले कर सको ? अगर कोई शख़्स इन्कार कर दे तो उससे ज़्यादा तकरार न करना और अगर कोई शख़्स इक़रार करे तो उसके साथ इस अन्दाज़ से जाना के न किसी को ख़ौफ़ज़दा करना न धमकी देना , न सख़्ती का बरताव करना और न बेजा दबाव डालना जो सोना या चान्दी दे दें वह ले लेना और अगर चैपाया या ऊंट हों तो उनके मरकज़ पर अचानक बिला इजाज़त वारिद न हो जाना के ज़्यादा हिस्सा तो मालिक ही का है , उसके बाद जब चैपायों के मरकज़ तक पहुंच जाना तो किसी ज़ालिम व जाबिर की तरह दाखि़ल न होना न किसी जानवर को भड़का देना और न किसी को ख़ौफ़ज़दा कर देना और मालिक के साथ भी ग़लत बरताव न करना बल्कि माल को दो हिस्सों में तक़सीम करके मालिक को इख़्तेयार देना के वह जिस हिस्से को इख़्तेयार कर ले उस पर कोई एतराज़ न करना , फिर बाक़ी को दो हिस्सों पर तक़सीम करना और उसे इख़्तेयार देना और फिर उसके हिस्से पर एतराज़ न करना , यहांतक के उतना ही माल बाक़ी रह जाए जिससे हक़्क़े ख़ुदा अदा हो सकता है तो इसी को ले लेना बल्कि अगर कोई शख़्स पहले इन्तेख़ाब को मुस्तर्द करके दोबारा इन्तेख़ाब करना चाहे तो उसे इसका मौक़ा दो और सारे माल को मिलाकर फ़िर पहले की तरह तक़सीम करना और आखि़र में इस बचे माल में से हक़्क़े अल्लाह ले लेना , बस इसका ख़याल रखना के बूढ़ा , ज़ईफ़ कमर शिकस्ता , कमज़ोर और ऐबदार ऊंट न लेना और उन ऊंटों का अमीन भी उसी को बनाना जिसके दीन का एतबार हो और जो मुसलमानों के माल में नर्मी का बरताव करता हो। ताके वह वली तक माल पहुंचा दे और वह उनके दरम्यान तक़सीम कर दे , इस मौज़ू पर सिर्फ़ उसे वकील बनाना जो मुख़लिस , ख़ुदातरस अमानतदार और निगराँ हो , न सख़्ती करने वाला हो , न ज़ुल्म करने वाला , न थका देने वाला हो न शिद्दत से दौडाने वाला , इसके बाद जिस क़द्र माल जमा हो जाए वह मेरे पास भेज देना ताके मैं अम्रे इलाही के मुताबिक़ उसके मरकज़ तक पहुंचा दूँ। अमानतदार को माल देते वक़्त इस बात की हिदायत दे देना के ख़बरदार ऊंटनी और उसके बच्चे को जुदा न करे और सारा दूध न निकाल ले जो बच्चे के हक़ में मुज़िर हो , सवारी में भी शिद्दत से काम न ले और उसके और दूसरी ऊंटनियों के दरम्यान अद्ल व मसावात से काम ले। (((-दुनिया में कौन ऐसा सरबराहे ममलेकत है जो अपने एहकाम को इतनी शदीद पाबन्दियों में जकड़ दे और अपनी रिआया को इस क़द्र सहूलत दे दे , दुनिया के हुक्काम में तो इसका तसव्वुर भी नहीं किया जा सकता है , हैरतअंगेज़ अम्र यह है के इस्लाम के ख़ोलफ़ा में भी दूर-दूर तक इस किरदार का पता नहीं मिलता है और हुकूमत का आग़ाज़ ही जब्र , ज़ोर और असीरी व ख़ानासोज़ी से होता है। ज़रूरत है के इस वसीयत नामे को बग़ौर पढ़ा जाए और इसकी एक-एक दिफ़ा पर ग़ौर किया जाए ताके यह अन्दाज़ा हो के इस्लामी सल्तनत में रिआया का क्या मरतबा होता है। हक़्क़े अल्लाह की अदायगी में किस क़द्र सहूलत फ़राहम की जाती है और इन्सानों की तरह जानवरों के साथ किस तरह बरताव किया जाता है।-)))

थके मान्दे ऊंट को दम लेने का मौक़ा दे और जिसके खुर घिस गए हों या पांव शिकस्ता हों उनके साथ नर्मी का बरताव करे , रास्ते में तालाब पड़ें तो उन्हें पानी पीने के लिये ले जाए और सरसब्ज़ रास्तों को छोड़कर बेआब व ग्याह रास्तों पर न ले जाए वक़्तन-फ़वक़्तन आराम देता रहे और पानी और सब्ज़े के मुक़ामात पर ठहरने की मोहलत दे यहाँ तक के हमारे पास इस आलम में पहुचे तो हुक्मे ख़ुदा से तन्दरूस्त हो गए हों व उनकी हड्डियों के गूदे बढ़ चुके हों। थके मान्दे और दरमान्दा न हों ताके किताबे ख़ुदा और सुन्नते रसूल (स 0) के मुताबिक़ उन्हें तक़सीम कर सकें के यह बात तुम्हारे लिये भी अज्रे अज़ीम का बाएस और हिदायत से क़रीबतर है , इन्शाअल्लाह।

26-आपका अहदनामा (बाज़ गवर्नरो के लिये जिन्हें सदक़ात की जमाआवरी के लिये रवाना फ़रमाया था)

मैं उन्हें हुक्म देता हूँ के अपने पोशीदा उमूर और मख़फ़ी आमाल में भी अल्लाह से डरते रहें जहां उसके अलावा कोई दूसरा गवाह और निगरां नहीं होता है और ख़बरदार ऐसा न हो के ज़ाहेरी मामेलात में ख़ुदा की इताअत करें और मख़फ़ी मसाएल में इसकी मुख़ालेफ़त करें , इसलिये के जिसके ज़ाहिर व बातिन और क़ौल व फ़ेल में इख़्तेलाफ़ नहीं होता है वही अमानते इलाही का अदा करने वाला और इबादते इलाही में मुख़लिस होता है और फ़िर हुक्म देता हूं के ख़बरदार लोगों से बुरे तरीक़े से पेश न आएं और उन्हें परेशान न करें और न उनसे इज़हारे इक़तेदार के लिये किनाराकशी करें के बहरहाल यह सब भी दीनी भाई हैं और हुक़ूक़ की अदाएगी में मदद करने वाले हैं।

देखो इन सदक़ात में तुम्हारा हिस्सा मुअय्यन है और तुम्हारा हक़ मालूम है लेकिन फ़ोक़रा व मसाकीन और फ़ाक़ाकश अफ़राद भी इस हक़ में तुम्हारे शरीक हैं , हम तुम्हें तुम्हारा पूरा हक़ देने वाले हैं लेहाज़ा तुम्हें भी इनका पूरा हक़ देना होगा के अगर ऐसा नहीं करोगे तो क़यामत के दिन सबसे ज़्यादा दुश्मन तुम्हारे होंगे और सबसे ज़्यादा बदबख़्ती इसी के लिये है जिसके दुश्मन बारगाहे इलाही में फ़ोक़रा व मसाकीन , साएलीन , महरूमीन , मक़रूज़ और ग़ुरबत ज़दा मुसाफ़िर हों और जिस शख़्स ने भी अमानत को मामूली तसव्वुर किया और ख़यानत की चरागाह में दाखि़ल हो गया और अपने नफ़्स और दीन को ख़यानतकारी से नहीं बचाया , उसने दुनियां में भी अपने को ज़िल्लत और रूसवाई की मन्ज़िल में उतार दिया और आखि़रत में तो ज़िल्लत व रूसवाई उससे भी ज़्यादा है और याद रखो के बदतरीन ख़यानत उम्मत के साथ ख़यानत है और बदतरीन फ़रेबकारी सरबराहे दीन के साथ फ़रेबकारी का बरताव है।

(((- काश दुनिया के तमाम हुक्काम को यह एहसास पैदा हो जाए के फ़ोक़रा व मसाकीन इस दुनिया में बे आसरा और बे सहारा हैं लेकिन आखि़रत में उनका भी वाली व वारिस है और वहां किसी साहबे इक़्तेदार का इक़्तेदार काम आने वाला नहीं है। अदालते इलाही में शख़्सियात का कोई असर नहीं है हर शख़्स को अपने आमाल का हिसाब देना होगा और इसके मवाख़ेज़ा और मुहासेबा का सामना करना होगा। वहाँ न किसी की कुर्सी काम आ सकती है और न किसी का तख़्त व ताज। अफ़राद के साथ ख़यानत तो बरदाश्त भी की जा सकती है के वह इन्फ़ेरादी मामला होता है और उसे अफ़राद माफ़ कर सकते हैं लेकिन क़ौम व मिल्लत के साथ ख़यानत नक़ाबिले बरदाश्त है के इसकी मुद्दई तमाम उम्मत होगी और इतने बड़े मुक़दमे का सामना करना किसी इन्सान के बस का काम नहीं है-)))

27-आपका अहदनामा (मोहम्मद बिन अबीबक्र के नाम- जब उन्हें मिस्र का हाकिम बनाया)

लोगों के सामने अपने शानों को झुका देना और अपने बरताव को नरम रखना , कुशादारोई से पेश आना और निगाह व नज़र में भी सब के साथ एक जैसा सुलूक करना ताके बड़े आदमियों को यह ख़याल न पैदा हो जाए के तुम उनके मफ़ाद में ज़ुल्म कर सकते हो और कमज़ोरों को तुम्हारे इन्साफ़ की तरफ़ से मायूसी न हो जाए , परवरदिगार रोज़े क़यामत तमाम बन्दों से उनके तमाम छोटे और बड़े ज़ाहिर और मख़फ़ी आमाल के बारे में मुहासेबा करेगा उसके बाद अगर वह अज़ाब करेगा तो तुम्हारे ज़ुल्म का नतीजा होगा और अगर माफ़ कर देगा तो उसके करम का नतीजा होगा।

बन्दगाने ख़ुदा! याद रखो के परहेज़गार अफ़राद दुनिया और आखि़रत के फ़वाएद लेकर आगे बढ़ गए वह अहले दुनिया के साथ उनकी दुनिया में शरीक रहे लेकिन अहले दुनिया उनकी आखि़रत में शरीक न हो सके , वह दुनिया में बेहतरीन अन्दाज़ से ज़िन्दगी गुज़ारते रहे जो सबने खाया उससे अच्छा पाकीज़ा खाना खाया और वह तमाम लज़्ज़तें हासिल कर लीं जो ऐश परस्त हासिल करते हैं और वह सब कुछ पा लिया जो जाबिर और तकब्बुर अफ़राद के हिस्से में आता है। इसके बाद वह ज़ादे रराह लेकर गए जो मन्ज़िल तक पहुंचा दे और वह तिजारत करके गए जिसमें फ़ायदा ही फ़ायदा हो , दुनिया में रहकर दुनिया की लज़्ज़त हासिल की और यह यक़ीन रखे रहे के आखि़रत में परवरदिगार के जवारे रहमत में होंगे , जहां न उनकी आवाज़ ठुकराई जाएगी और न किसी लज़्ज़त में इनके हिस्से में कोई कमी होगी।

बन्दगाने ख़ुदा! मौत और उसके क़ुर्ब से डरो उसके लिये सरो सामान मुहैया कर लो के वह एक अज़ीम अम्र और बड़े हादसे के साथ आने वाली है , ऐसे ख़ैर के साथ जिसमें कोई शर न हो या ऐसे शर के साथ जिसमें कोई ख़ैर न हो , जन्नत या जहन्नम की तरफ़ उनके लिये अमल करने वालों से ज़्यादा क़रीबतर कौन हो सकता है तुम वह हो जिसका मौत मुसलसल पीछा किये हुए है , तुम ठहर जाओगे तब भी तुम्हें पकड़ेगी और फ़रार करोगे तब भी अपनी गिरफ़्त में ले लेगी वह तुम्हारे साथ तुम्हारे साये से ज़्यादा चिपकी हुई है। उसे तुम्हारी पेशानियों के साथ बान्ध दिया गया है और दुनिया तुम्हारे पीछे से बराबर लपेटी जा रही है , इस जहन्नम से डरो जिसकी गहराई बहुत दूर तक है और इसकी गर्मी बेहद शदीद है और इसका अज़ाब भी बराबर ताज़ा होता रहेगा।

वह घर ऐसा है जहां न रहमत का गुज़र है और न वहां कोई फ़रयाद सुनी जाती है और न किसी रंज व ग़म की कशाइश का कोई इमकान है अगर तुम लोग यह कर सकते हो के तुम्हारे दिल में ख़ौफ़े ख़ुदा शदीद हो जाए और तुम्हें इससे हुस्ने ज़न हासिल हो जाए तो इन दोनों को जमा कर लाो के बन्दे का हुस्ने ज़न उतना ही होता है जितना ख़ौफ़े ख़ुदा होता है और बेहतरीन हुस्ने ज़न रखने वाला वही है जिसके दिल में शदीदतरीन ख़ौफ़े ख़ुदा पाया जाता हो , मोहम्मद बिन अबी बक्र! याद रखो के मैंने तुमको अपने बेहतरीन लशकर अहले मिस्र पर हाकिम क़रार दिया है।

(((- बेहतरीन ज़िन्दगी से मुराद क़स्रे शाही में क़याम और लज़ीज़तरीन ग़िज़ाएं नहीं हैं , बेहतरीन ज़िन्दगी से मुराद तमाम असबाब हैं जिनसे ज़िन्दगी गुज़र जाए और इन्सान किसी हराम और नाजाएज़ में मुब्तिला न हो। मौत के आने का मतलब यह नहीं है के आखि़रत में या सिर्फ़ ख़ैर है या सिर्फ़ शर और मख़लूत आमाल वालों की कोई जगह नहीं है , मक़सद यह है के आखि़रत के सवाब व अज़ाब का फ़लसफ़ा यही है के इसमें किसी तरह का इख़लात व इमतेराज नहीं है , दुनिया के हर आराम में तकलीफ़ शामिल है और हर तकलीफ़ में आराम का कोई न कोई पहलू ज़रूर है लेकिन आखि़रत में अज़ाब का एक लम्हा भी वह है जिसमें किसी राहत का तसव्वुर नहीं है और सवाब का एक लम्हा भी वह है जिसमें किसी तकलीफ़ का कोई इमकान नहीं है। लेहाज़ा इन्सान का फ़र्ज़ है के उस अज़ाब से डरे और इस सवाब का इन्तेज़ाम कर ले-)))

अब तुमसे मुतालेबा यह है के अपने नफ़्स की मुख़ालफ़त करना और अपने दीन की हिफ़ाज़त करना चाहे तुम्हारे लिये दुनिया में सिर्फ़ एक ही साअत बाक़ी रह जाए और किसी मख़लूक़ को ख़ुश करके ख़ालिक़ को नाराज़ न करना के ख़ुदा हर एक के बदले काम आ सकता है लेकिन इसके बदले कोई काम नहीं आ सकता है।

नमाज़ उसके मुक़र्ररा औक़ात में अदा करना , न ऐसा हो के फ़ुर्सत हासिल करने के लिये पहले अदा कर लो और न ऐसा हो के मशग़ूलियत की बिना पर ताख़ीर कर दो। याद रखो के तुम्हारे हर अमल को नमाज़ का पाबन्द होना चाहिये। याद रखो के इमामे हिदायत और पेशवाए हलाकत एक जैसे नहीं हो सकते हैं नबी का दोस्त और दुश्मन यकसाँ नहीं होता है। रसूले अकरम (स 0) ने ख़ुद मुझसे फ़रमाया है के “ मैं अपनी इमामत के बारे में न किसी मोमिन से ख़ौफ़ज़दा हूँ और न मुशरिक से , मोमिन को अल्लाह उसके ईमान की बिना पर बुराई से रोक देगा और मुशरिक को उसके शिर्क की बिना पर मग़लूब कर देगा , सारा ख़तरा उन लोगों से है जो ज़बान के आलिम हों और दिल के मुनाफ़िक़। कहते वही हैं जो तुम सब पहचानते हो और करते वह हैं जिसे तुम बुरा समझते हो। ”

28-आपका मकतूबे गिरामी (माविया के ख़त के जवाब में जो बक़ौल सय्यद रज़ी आपका बेहतरीन ख़ुत्बा है)

अम्माबाद! मेरे पास तुम्हारा ख़त आया है जिसे तुमने रसूले अकरम (स 0) के दीने ख़ुदा के लिये मुन्तख़ब होने और आपके परवरदिगार की तरफ़ से असहाब के ज़रिये उनको क़ूवत व तवानाई मिलने का ज़िक्र किया है लेकिन यह तो एक बड़ी अजीब व ग़रीब बात है जो ज़माने ने तुम्हारी तरफ़ से छिपाकर रखी थी के तुम हमको उन एहसानात की इत्तेलाअ दे रहे हो जो परवरदिगार ने हमारे ही साथ किये हैं और उस नेमत की ख़बर दे रहे हो जो हमारे ही पैग़म्बर (स 0) को मिली है। गोया के तुम मक़ामे हिज्र की तरफ़ ख़ुरमे भेज रहे हो या उस्ताद को तीरअन्दाज़ी की दावत दे रहे हो। इसके बाद तुम्हारा ख़याल है के फ़ुलां और फ़ुलां तमाम अफ़राद बेहतर थे तो यह ऐसी बात है के अगर सही भी हो तो इस काम से तुम्हारा कोई ताल्लुक़ नहीं है और अगर ग़लत भी हो तो तुम्हारा कोई नुक़सान नहीं है। तुम्हारा इस फ़ाज़िल व मफ़ज़ूल , हाकिम व रिआया के मसले से क्या ताल्लुक़ है , भला आज़ादकरदा ग़ुलाम और उनकी औलाद को मुहाजेरीन अव्वलीन के दरम्यान इम्तियाज़ क़ायम करने , उनके दरजात का ताअय्युन करने और उनके तबक़ात के पहुंचाने का क्या हक़ है (यह तो उस वक़्त मुसलमान भी नहीं थे) अफ़सोस के जुए के तीरों के साथ बाहर के तीर भी आवाज़ निकालने लगे और मसाएल में वह लोग भी करने लगे जिनके खि़लाफ़ ख़ुद ही फ़ैसला होने वाला है।

(((- माविया ने ख़त अबू इमामा बाहेली के ज़रिये भेजा था और इसमें मुतादद मसाएल की तरफ़ इशारा किया था , सबसे बड़ा मसला हज़रात शैख़ीन के फ़ज़ाएल का था के हज़रत अली (अ 0) के साथ अकसरीयत उन्हीं अफ़राद की थी जो आपको सिलसिले से चौथा ख़लीफ़ा तस्लीम करते थे , अब अगर उनके बारे में अपनी सही राय का इज़हार कर दे तो क़ौम बदज़न हो जाएगी और मुआशरे में एक नया फ़ितना खड़ा हो जाएगा और अगर उनके फ़ज़ाएल का इक़रार कर लें तो गोया इन तमाम कलेमात की तकज़ीब कर दी जो कल तक अपनी फ़ज़ीलत या मज़लूमियत के बारे में बयान करते थे। हज़रत ने इस हस्सास सूरते हाल का बख़ूबी अन्दाज़ा कर लिया और वाज़ेह जवाब देने के बजाय माविया को इस मसले से अलग रहने की तलक़ीन फ़रमाई और उसे इसकी औक़ात से भी बाख़बर कर दिया के यह मसले सद्रे इस्लाम का है और उस वक़्त तो तुम्हारा बाप भी मुसलमान नहीं था तुम्हारा क्या ज़िक्र है ? लेहाज़ा ऐसे मसाएल में तुम्हें राय देने का कोई हक़ नहीं है , अलबत्ता यह बहरहाल साबित हो जाता है के इन फ़ज़ाएल में तुम्हारे ख़ानदान का कोई ज़िक्र नहीं है।-)))

ऐ शख़्स तू अपने लंगड़ेपन को देखकर अपनी हद पर ठहरता क्यों नहीं है और अपनी कोताह दस्ती को समझता क्यों नहीं है और जहां क़ज़ा व क़द्र का फै़सला तुझे पीछे हटा चुका है वहीं पीछे हट कर जाता क्यों नहीं है। तुझे किसी मग़लूब की शिकस्त या ग़ालिब की फ़तेह से क्या ताल्लुक़ है। तू तो हमेशा गुमराहियों में हाथ पांव मारने वाला और दरम्यानी राह से इन्हेराफ़ करने वाला है , मैं तुझे बाख़बर नहीं कर रहा हूँ बल्कि नेमते ख़ुदा का तज़किरा कर रहा हूं वरना क्या तुझे नहीं मालूम है के मुहाजेरीन व अन्सार की एक बड़ी जमाअत ने राहे ख़ुदा में जानें दी हैं और सब साहेबाने फ़ज़्ल हैं लेकिन जब हमारा कोई शहीद हुआ है तो उसे सय्यदुशशोहदा कहा गया है और रसूले अकरम (स 0) ने उसके जनाज़े की नमाज़ में सत्तर तकबीरें कही हैं। इसी तरह तुझे मालूम है के राहे ख़ुदा में बहुत सों के हाथ कटे हैं और साहेबाने शरफ़ हैं लेकिन जब हमारे आदमी के हाथ काटे गए तो उसे जन्नत में तय्यार और ज़ुलजनाहीन बना दिया गया और अगर परवरदिगार ने अपने मुंह से अपनी तारीफ़ से मना न किया होता तो बयान करने वाला बेशुमार फ़ज़ाएल बयान करता जिन्हें साहेबाने ईमान के दिल पहचानते हैं और सुनने वालों के कान भी अलग नहीं करना चाहते हैं। छोड़ो उनका ज़िक्र जिनका तीर निशाने से ख़ता करने वाला है , हमें देखो जो परवरदिगार के बराहेरास्त साख़्ता व परदाख़्ता हैं और बाक़ी लोग हमारे एहसानात का नतीजा हैं। हमारी क़दीमी इज़्ज़त और तुम्हारी क़ौम पर बरतरी हमारे लिये इस अम्र से मानेअ नहीं हुई के हमने तुमको अपने साथ शामिल कर लिया तो तुमसे रिश्ते लिये और तुम्हें रिश्ते दिये जो आम से बराबर के लोगों में किया जाता है और तुम हमारे बराबर के नहीं हो और हो भी किस तरह सकते हो जबके हममें से रसूले अकरम (स 0) हैं और तुममें से इनकी तकज़ीब करने वाला , हम में से असदुल्लाह हैं और तुममें से असदुल हलाफ़ , हम में सरदाराने जवानाने जन्नत हैं और तुम में जहन्नुमी लड़के , हममें सय्यदते निसाइल आलमीन हैं और तुम में हम्मालतल हतब और ऐसी बेशुमार चीज़ें हैं जो हमारे हक़ में हैं और तुम्हारे खि़लाफ़। हमारा इस्लाम भी मशहूर है और हमारा क़ब्ले इस्लाम का शरफ़ भी नाक़ाबिले इनकार है और किताबे ख़ुदा ने हमारे मुन्तशिर औसाफ़ को जमा कर दिया है , यह कहकर के “ क़राबतदार बाज़ बाज़ के लिये ऊला हैं ” और यह कहकर के “ इब्राहीम के लिये ज़्यादा क़रीबतर वह लोग हैं जिन्होंने उनका इत्तेबाअ किया है और यह पैग़म्बर (स 0) और साहेबाने ईमान और अल्लाह साहेबाने ईमान का वली है। (((-यह उस अम्र की तरफ़ इशारा है के रसूले अकरम (स 0) ने अपने हाथ की परवरदा लड़कियों का अक़्द बनी उमय्या में कर दिया और अबू सुफ़ियान की बेटी उम्मे हबीबा से ख़ुद अक़्द कर लिया हालांके आम तौर से लोग रिश्तों के लिये बराबरी तलाश करते हैं , मगर चूंके इस्लाम ने ज़ाहिरी कलमे को काफ़ी क़रार दिया है लेहाज़ा हमने भी रिश्तेदारी क़ायम कर ली और तुम्हारी औक़ात का ख़याल नहीं किया ताके मज़हब समाज पर हाकिम रहे और समाज मज़हब पर हुकूमत न करने पाए।-)))

यानी हम क़राबत के एतबार से भी ऊला हैं और इताअत व इत्त्तेबाअ के ऐतबार से भी , इसके बाद जब मुहाजेरीन ने अन्सार के खि़लाफ़ रोज़ सक़ीफ़ा क़राबते पैग़म्बर (स 0) से इस्तेदलाल किया और कामयाब भी हो गए , तो अगर कामयाबी का राज़ यही है तो हक़ हमारे साथ है न के तुम्हारे साथ और अगर कोई और दलील है तो अन्सार का दावा बाक़ी है।

तुम्हारा ख़याल है के मैं ख़ोलफ़ा से हसद रखता हूँ और मैंने सबके खि़लाफ़ बग़ावत की है तो अगर यह सही भी है तो इसका ज़ुल्म तुम पर नहीं है के तुमसे माज़ेरत की जाए , ( यह वह ग़लती है जिससे तुम पर कोई हर्फ़ नहीं आता) बक़ौल शायर

और तुम्हारा यह कहना के मैं इस तरह खींचा जा रहा था जिस तरह नकेल डालकर ऊंट को खींचा जाता है ताके मुझसे बैअत ली जाए तो ख़ुदा की क़सम तुमने मेरी मज़म्मत करना चाही और नादानिस्ता तौर पर तारीफ़ कर बैठे और मुझे रूसवा करना चाहा था मगर ख़ुद रूसवा हो गए।

मुसलमान के लिये इस बात में कोई ऐब नहीं है के वह मज़लूम हो जाए जब तक के वह दीन के मामले में शक में मुब्तिला न हो , और इसका यक़ीन शुबह में न पड़ जाए , मेरी दलील असल में दूसरों के मुक़ाबले में है लेकिन जिस क़द्र मुनासिब था मैंने तुमसे भी बयान कर लिया।

इसके बाद तुमने मेरे और उस्मान के मामले का ज़िक्र किया है तो इसमें तुम्हारा हक़ है के तुम्हें जवाब दिया जाए इसलिये के तुम उनके क़राबतदार हो लेकिन यह सच सच बताओ के हम दोनों में उनका ज़्यादा दुश्मन कौन था और किसने उनके क़त्ल का सामान फ़राहम किया था , उसने जिसने नुसरतत की पेशकश की और उसे बिठा दिया गया और रोक दिया गया या उसने जिससे नफ़रत का मुतालेबा किया गया और उसने सुस्ती बरती और मौत का रूख़ उनकी तरफ़ मोड़ दिया यहां तक के क़ज़ा व क़द्र ने अपना काम पूरा कर दिया , ख़ुदा की क़सम मैं हरगिज़ इसका मुजरिम नहीं हूँ और अल्लाह उन लोगों को भी जानता है जो रोकने वाले थे और अपने भाइयों से कह रहे थे के हमारी तरफ़ चले आओ और जंग में बहुत कम हिस्सा लेने वाले थे। मैं उस बात की माज़ेरत नहीं कर सकता के मैं उनकी बिदअतों पर बराबर एतराज़ कर रहा था के अगर यह इरशाद और हिदायत भी कोई गुनाह था तो बहुत से ऐसे लोग होते हैं जिनकी बेगुनाह भी मलामत की जाती है और “ कभी कभी वाक़ई नसीहत करने वाले भी बदनाम हो जाते हैं ” मैंने अपने इमकान भर इसलाह की कोशिश की और मेरी तौफ़ीक़ सिर्फ़ अल्लाह के सहारे है , उसी पर मेरा भरोसा है और उसी की तरफ़ मेरी तवज्जो है। ”

तुमने यह भी ज़िक्र किया है के तुम्हारे पास मेरे और मेरे असहाब के लिये तलवार के अलावा कुछ नहीं है तो यह कहकर तुमने रोते को हंसा दिया है , भला तुमने औलादे अब्दुल मुत्तलिब को कब दुश्मनों से पीछे हटते या तलवार से ख़ौफ़ज़दा होते देखा है ? “ ज़रा ठहर जाओ के हमल मैदान जंग तक पहुंच जाए ” ( शायर) (((-क़यामत की बातत है के माविया तलवार की धमकी साहबे ज़ुलफ़ेक़ार को दे रहा है जबके उसे मालूम है के अली (अ 0) उस बहादुर का नाम है जिसने दस बरस की उम्र में तमाम कुफ़्फ़ार व मुशरेकीन से रसूले अकरम (स 0) को बचाने का वादा किया था और हिजरत की रात तलवार की छांव में निहायत सुकून व इतमीनान से सोया है और बद्र के मैदान में तमाम रोसाए कुफ़्फ़ार व मुशरेकीन और ज़ामाए बनी उमय्या का तनो तन्हा ख़ात्मा कर दिया है।-))) अनक़रीब जिसे तुम ढूंढ रहे हो वह तुम्हें ख़ुद ही तलाश कर लेगा और जिस चीज़ को बईद ख़याल कर रहे हो उसे क़रीब कर देगा। अब मैं तुम्हारी तरफ़ मुहाजेरीन व अन्सार के लशकर के साथ बहुत जल्द आ रहा हूँ और मेरे साथ वह भी हैं जो उनके नक़्शे क़दम पर ठीक तरीक़े से चलने वाले हैं , इनका हमला शदीद होगा और ग़ुबारे जंग सारी फ़िज़ा में मुन्तशिर होगा। यह मौत का लिबास पहने होंगे और उनकी नज़र में बेहतरीन मुलाक़ात परवरदिगार की मुलाक़ात होगी , उनके साथ असहाबे बद्र की ज़ुर्रियत और बनी हाशिम की तलवारें होंगी। तुमने उनकी तलवारों की काट अपने भाई , मामू , नाना और ख़ानदान वालों में देख ली है और वह ज़ालिमों से अब भी दूर नहीं है। ”


29-आपका मकतूबे गिरामी (अहले बसरा के नाम)

तुम्हारी तफ़रिक़ा परवाज़ी और मुख़ालफ़त का जो आलम था वह तुमसे मख़फ़ी नहीं है लेकिन मैंने तुम्हारे मुजरिमों को माफ़ कर दिया , भागने वालों से तलवार उठा ली , आने वालों को बढ़कर गले लगा लिया , अब इसके बाद भी अगर तुम्हारी तबाह कुन आराए और तुम्हारे ज़ालिमाना उफ़कार की हिमाक़त तुम्हें मेरी उलफ़त और अहद शिकनी पर आमादा कर रही है तो याद रखो के मैंने घोड़ों को क़रीब कर लिया है , ऊंटों पर सामान बार कर लिया है और अगर तुमने घर से निकलने पर मजबूर ककर दिया तो ऐसी मारेका आराई करूंगा के जंगे जमल फ़क़त ज़बान की चाट रह जाएगी। मैं तुम्हारे इताअत गुज़ारों के शरफ़ को पहचानता हूँ और मुखलेफ़ीन के हक़ को जानता हूँ , मेरे लिये यह मुमकिन नहीं है के मुजरिम से आगे बढ़कर बेख़ता पर हमला कर दूँ या अहद शिकन से तजावुज़ करके वफ़ादार से भी तारिज़ करूं (वफ़ादार को भी लपेट लूं)।

30 -आपका मकतूबे गिरामी (माविया के नाम)

जो कुछ साज़ व सामान तुम्हारे पास है उसमें अल्लाह से डरो और जो उसका हक़ तुम्हारे ऊपर है उस पर निगाह रखो , उस हक़ की फ़ुरक़त की तरफ़ पलट आओ (उन हक़ को पहचानो) जिससे नावाक़फ़ीयत क़ाबिले माफ़ी नहीं है , देखो इताअत के निशानात वाज़ेह , रास्ते रौशन , शाहेराहें सीधी हैं और मन्ज़िले मक़सूद सामने है जिस पर तमाम अक़्ल वाले वारिद होते हैं। (((पहले अहले बसरा ने वफ़ादारी का एलान किया तो हज़रत ने उस्मान बिन हनीफ़ को गवर्नर बनाकर भेज दिया , इसकेबाद आइशा वारिद हूईं तो अक्सरीयत मुनहरिफ़ हो गई और जंगे जमल की नौबत आ गई लेकिन आपने आम तौर से सबको माफ़ कर दिया और आइशा भी मदीने वापस चली गईं , लेकिन माविया ने फ़िर दोबारा वरग़लाना शुरू कर दिया तो आपने यह तन्बीही ख़त रवाना फ़रमाया के जंगे जमल तो सिर्फ़ मज़ा चखाने के लिये थी , जंग तो अब होने वाली है लेहाज़ा होश में आजाओ और माविया के बहकाने पर राहे हक़ से इन्कार न करो-)))

और पस्त फ़ितरत इसकी मुख़ालफ़त करते हैं , जो इस हदफ़ से मुनहरिफ़ हो गया वह राहे हक़ से हट गया और गुमराही में ठोकरें खाने लगा , अल्लाह ने उसकी नेमतों को सल्ब कर लिया और अपना अज़ाब उस पर वारिद कर दिया , लेहाज़ा अपने नफ़्स का ख़याल रखो और उसे हलाकत से बचाओ के परवरदिगार ने तुम्हारे लिये रास्ते को वाज़ेह कर दिया है और वह मन्ज़िल बता दी है जहां तक उमूर को जाना है , तुम निहायत तेज़ी से बदतरीन ख़सारे और कुफ्ऱ की मन्ज़िल की तरफ़ भागे जा रहे हो , तुम्हारे नफ़्स ने तुम्हें बदबख़्ती में डाल दिया है और गुमराही में झोंक दिया है , हलाकत की मन्ज़िलों में वारिद कर दिया है और सही रास्तों को दुश्वार गुज़ार बना दिया है।

31-आपका वसीयत नामा (जिसे इमाम हसन (अ 0) के नाम सिफ़्फ़ीन से वापसी पर मक़ामे हाज़ेरीन में तहरीर फ़रमाया है)

यह वसीयत एक ऐसे बाप की है जो फ़ना होने वाला और ज़माने के तसरूफ़ात का इक़रार करने वाला है जिसकी उम्र ख़ातमे के क़रीब है और वह दुनिया के मसाएब के सामने सिपरअन्दाख़्ता है। मरने वालों की बस्ती में मुक़ीम है और कल यहाँ से कूच करने वाला है। उस फ़रज़न्द के नाम जो दुनिया में वह उम्मीदें रखे हुए है जो हासिल होने वाली नहीं हैं और हलाक होने वालों के रास्ते पर गामज़न है बीमारियों का निशाना और रोज़गार के हाथों गिरवी है , मसाएबे ज़माने का हदफ़ और दुनिया का पाबन्द है , उसकी फ़रेब कारियों का ताजिर और मौत का क़र्जदार है , अजल का क़ैदी और रंज व ग़म का साथी , मुसीबतों का हमनशीं है और आफ़तों का निशाना , ख़्वाहिशात का मारा हुआ और मरने वालों का जानशीन।

अम्माबाद! मेरे लिये दुनिया के मुंह फेर लेने , ज़माने के ज़ुल्म व ज़्यादती करने और आखि़रत के मेरी तरफ़ आने की वजह से जिन बातों का इन्केशाफ़ हो गया है उन्होंने मुझे दूसरों के ज़िक्र और अग़यार के अन्देशे से रोक दिया है , मगर जब मैं तमाम लोगों की फ़िक्र से अलग होकर अपनी फ़िक्र में पड़ा तो मेरी राय ने मुझे ख़्वाहिशात से रोक दिया और मुझ पर वाक़ेई हक़ीक़त मुनकशिफ़ हो गई जिसने मुझे इस मेहनत व मशक़्क़त तक पहुंचा दिया जिसमें किसी तरह का कील नहीं है और इस सिदाक़त तक पहुंचा दिया जिसमें किसी तरह की ग़लत बयानी नहीं है। ((-बाज़ शारहीन का ख़याल है के यह वसीयतनामा जनाब मोहम्मद हनफ़िया के नाम है और सय्यद रज़ी अलैहिर्रहमा ने इसे इमाम हसन (अ 0) के नाम बताया है , बहरहाल यह एक आम वसीयतनामा है जिससे हर बाप को इस्तेफ़ादा करना चाहिये और अपनी औलाद को इन्हीं ख़ुतूत पर वसीयत व नसीहत करना चाहिये वरना इसका मुकम्मल मज़मून न मौलाए कायनात पर मुनतबिक़ होता है और न इमामे हसन (अ 0) पर , और न ऐसे वसीयतनामे किसी एक फ़र्द से मख़सूस हुआ करते हैं। यह इन्सानियत का अज़ीमतरीन तसव्वुर है जिसमें अज़ीमतरीन बाप ने अज़ीमतरीन बेटे को मुख़ातब क़रार दिया है ताके दीगर अफ़रादे मिल्लत इससे इस्तेफ़ादा करें बल्कि इबरत हासिल करें।))

मैंने तुमको अपना ही एक हिस्सा पाया बल्कि तुमको अपना सरापा वजूद समझा के तुम्हारी तकलीफ़ मेरी तकलीफ़ है और तुम्हारी मौत मेरी मौत है इस लिये मुझे तुम्हारे मुआमलात की इतनी ही फ़िक्र है जितनी अपने मुआमलात की होती है और इसीलिये मैंने यह तहरीर लिख दी है जिसके ज़रिये तुम्हारी इमदाद करना चाहता हूँ चाहे मैं ज़िन्दा रहूं या मर जाऊं।

फ़रज़न्द! मैं तुमको ख़ौफ़े ख़ुदा और उसके एहकाम की पाबन्दी की वसीयत करता हूँ , अपने दिल को उसकी याद से आबाद रखना और उसकी रीसमाने हिदायत से वाबस्ता रहना के उससे ज़्यादा मुस्तहकम कोई रिश्ता तुम्हारे और ख़ुदा के दरम्यान नहीं है। अपने दिल को मोएज़ा से ज़िन्दा रखना और उसके ख़्वाहिशात को ज़ोहद से मुर्दा बना दिया। उसे यक़ीन के ज़रिये क़वी रखना और हिकमत के ज़रिये नूरानी रखना , ज़िक्रे मौत के ज़रिये क़ाबू में करना और फ़ना के इक़रार पर उसे ठहराना , दुनिया के हवादिस से आगाह रखना और ज़माने के हमले और लैल व नहार के तसर्रूफ़ात से होशियार रखना। उस पर गुज़िश्ता लोगों के अख़बार को पेश करते रहना और पहले वालों पर पड़ने वाले मसाएब को याद दिलाते रहना , उनके दयार व आसार में सरगर्मे सफ़र रहना और यह देखते रहना के उन्होंने क्या किया है और कहां से कहां चले गए हैं , कहां वारिद हुए हैं और कहां डेरा डाला है।

फिर तुम देखोगे के वह अहबाब की दुनिया से मुन्तक़िल हो गए हैं और दयारे ग़ुरबत में वारिद हो गए हैं और गोया के अनक़रीब तुम भी उन्हीं में शामिल हो जाओगे लेहाज़ा अपनी मन्ज़िल को ठीक कर लो और ख़बरदार आखि़रत को दुनिया के एवज़ में फ़रोख़्त न करना , जिन बातों को नहीं जानते हो उनके बारे में बात न करना और जिस चीज़ का तुमसे ताल्लुक़ नहीं हो उनके बारे में गुफ़्तगू न करना। जिस रास्ते में गुमराही का ख़ौफ़ हो उधर क़दम आगे न बढ़ाना के गुमराही के तहय्युर से पहले (सरगर्दानियां देखकर) ठहर जाना , हौलनाक मरहलों में वारिद हो जाने से बेहतर है नेकियों का हुक्म देते रहना ताके उसके अहल में शुमार हो और बुराइयों से अपने हाथ और ज़बान की ताक़त से मना करते रहना और बुराई करने वालों से अपने इमकान भर दूर रहना , राहे ख़ुदा में जेहाद का हक़ अदा कर देना और ख़बरदार इस राह में किसी मलामतगर की मलामत की परवाह न करना , हक़ की ख़ातिर जहां भी हो सख्तियो में कूद पड़ना और दीन का इल्म हासिल करना , अपने नफ़्स को नाख़ुशगवार हालात में सब्र का आदी बना देना और याद रखना के बेहतरीन अख़लाक़ हक़ की राह में सब्र करना है , अपने तमाम उमूर में परवरदिगार की तरफ़ रूजू करना के इस तरह एक महफ़ूज़तरीन पनाहगाह का सहारा लोगे और बेहतरीन मुहाफ़िज़ की पनाह में रहोगे , परवरदिगार से सवाल करने में मुखलिस रहना के अता करना और महरूम कर देना उसी के हाथ में है , मालिक से मुसलसल तलबे ख़ैर करते रहना और मेरी वसीयत पर ग़ौर करते रहना , इससे पहलू बचाकर गुज़र न जाना के बेहतरीन कलाम वही है जो फ़ायदेमन्द हो और याद रखो के जिस इल्म में फ़ायदा न हो उसमें कोई ख़ैर नहीं है और जो इल्म सीखने के लायक़ न हो उसमें कोई फ़ायदा नहीं है।

फ़रज़न्द! मैंने देखा के अब मेरा सिन बहुत ज़्यादा हो चुका है और मुसलसल कमज़ोर होता जा रहा हूँ लेहाज़ा मैंने फ़ौरन वसीयत लिख दी और इन मज़ामीन को दर्ज कर दिया के कहीं ऐसा न हो के मेरे दिल की बात तुम्हारे हवाले करने से पहले मुझे मौत आ जाए या जिस्म के नुक़्स की तरह राय को कमज़ोर तसव्वुर किया जाने लगे या वसीयत से पहले ही ख़्वाहिशात के ग़लबे और दुनिया के फ़ितने तुम तक न पहुंच जाएं के तुम भड़क उठने वाले मुंहज़ोर ऊंट की तरह हो जाओ क्योंके कमसिन का दिल उस ख़ाली ज़मीन के मानिन्द होता है जिसमें जो बीज डाला जाता है उसे क़ुबूल कर लेती है ,

लेहाज़ा क़ब्ल इसके के तुम्हारा दिल सख़्त हो जाए और तुम्हारा ज़ेहन दूसरी बातों में लग जाए मैंने तालीम देने के लिये क़दम उठाया ताके तुम अक़्ले सलीम के ज़रिये उन चीज़ों के क़ुबूल करने के लिये आमादा हो जाओ के जिनकी आज़माइश और तजुर्बे की ज़हमत से तजुर्बेकारों ने तुम्हें बचा लिया है इस तरह तुम तलाश की ज़हमत से मुस्तग़नी और तजुर्बे की कुलफ़तों से आसूदा हो जाओगे और तजुर्बे व इल्म की वह बातें (बेताब व मशक़्क़त) तुम तक पहुंच रही हैं के जिन पर हम मुत्तेलाअ हुए और फिर वह चीज़ें भी उजागर होकर तुम्हारे सामने आ रही हैं के जिन में से कुछ मुमकिन है , हमारी नज़रों से ओझल हो गई हों , ऐ फ़रज़न्द! अगरचे मैंने इतनी उम्र नहीं पाई जितनी अगले लोगों की हुआ करती थीं फिर भी मैंने उनकी कारगुज़ारियों को देखा , उनके हालात व वाक़ेआत में ग़ौर किया और उनके छोड़े हुए निशानात में सैर व सयाहत की यहां तक के गोया मैं भी उन्हीं में का एक हो चुका हूँ।

बल्कि उन सबके हालात व मालूमात जो मुझ तक पहुच गए हैं उनकी वजह से ऐसा है के गोया मैंने उनके अव्वल से लेकर आखि़र तक के साथ ज़िन्दगी गुज़ारी है , चुनान्चे मैंने साफ़ को गन्दे और नफ़े को नुक़सान से अलग करके पहचान लिया है और अब सबका निचोड़ तुम्हारे लिये मख़सूस कर रहा हूँ और मैंने ख़ूबियों को चुन चुन कर तुम्हारे लिये समेट दिया है और बे-मानी चीज़ों को तुमसे जुदा रखा है और चूंके मुझे तुम्हारी हर बात का उतना ही ख़याल है जितना शफ़ीक़ बाप को होना चाहिये और तुम्हारी एख़लाक़ी तरबीयत भी पेशे नज़र है। लेहाज़ा मुनासिब समझा है के यह तालीम व तरबीयत इस हालत में हो के तुम नौ उम्र और बिसाते दहर पर ताज़ा वारिद हो और तुम्हारी नीयत खरी और नफ़्स पाकीज़ा है और मैंने चाहा था के पहले किताबे ख़ुदा एहकाम शरा और हलाल व हराम की तालीम दूँ और उसके अलावा दूसरी चीज़ों का रूख़ करूं लेकिन यह अन्देशा पैदा हुआ के कहीं वह चीज़ें जिनमें लोगों के अक़ाएद व मज़हबी ख़यालात में इख़्तेलाफ़ है तुम पर उसी तरह मुश्तबा न हो जाएं जैसे उन पर मुश्तबा हो गई हैं , बावजूद यक इन ग़लत अक़ायद का तज़किरा तुमसे मुझे नापसन्द था मगर इस पहलू को मज़बूत कर देना तुम्हारे लिये मुझे बेहतर मालूम हुआ , इससे के तुम्हें ऐसी सूरते हाल के सिपुर्द कर दूँ जिसमें मुझे तुम्हारे लिये हलाकत व तबाही का ख़तरा है और मैं उम्मीद करता हूँ के अल्लाह तुम्हें हिदायत की तौफ़ीक़ देगा और सही रास्ते की राहनुमाई करेगा , इन वजह से तुम्हें यह वसीयत नामा लिखता हूँ।

बेटा याद रखो के मेरी इस वसीयत से जिन चीज़ों की तुम्हें पाबन्दी करना है उनमें सबसे ज़्यादा मेरी नज़र में जिस चीज़ की अहमियत है वह अल्लाह का तक़वा है और यह के जो फ़राएज़ अल्लाह की तरफ़ से तुम पर आएद हैं उन पर इक्तेफ़ा करो और जिस राह पर तुम्हारे आबाओ अजदाद और तुम्हारे घराने के अफ़राद चलते रहे हैं उसी पर चलते रहो क्योंके जिस तरह तुम अपने लिये नज़र व फ़िक्र कर सकते हो उन्होंने उस नज़र व फ़िक्र में कोई कसर उठा न रखी थी , मगर इन्तेहाई ग़ौर व फ़िक्र ने भी उनको उसी नतीजे पर पहुंचाया , के जो उन्हें अपने फ़राएज़ मालूम हों , उन पर इकतेफ़ा करें और ग़ैर मुताल्लुक़ चीज़ों से क़दम रोक लें लेकिन अगर तुम्हारा नफ़्स इसके लिये तैयार न हो के बग़ैर ज़ाती तहक़ीक़ से इल्म हासिल किये हुए जिस तरह उन्होंने हासिल किया था , इन बातों को क़ुबूल करे तो बहरहाल यह लाज़िम है के तुम्हारे तलब का अन्दाज़ सीखने और समझने का हो , न शुबहात में फान्द पड़ने और बहस व नज़ाअ में उलझने का और इस फ़िक्र व नज़र को शुरू करने से पहले अल्लाह से मदद के ख़्वास्तगार हो , और उससे तौफ़ीक़ व ताईद की दुआ करो , और हर उस वहम के शाएबे से अपना दामन बचाओ के तुम्हें शुबह में डाल दे या गुमराही में छोड़ दे , और फिर अगर तुम्हें इत्मीनान हो जाए के तुम्हारा दिल साफ़ और ख़ाशा (असर लेने की सलाहियत वाला) हो गया है और तुम्हारी राय ताम व कामिल हो गई है और तुम्हारे पास सिर्फ़ यही एक फ़िक्र रह गई है (तुम्हारा ज़ौक़ व शौक़ एक नुक्ते पर जम गया है) तो जिन बातों को मैंने वाज़ेह किया है उनमें ग़ौर व फ़िक्र करना वरना अगर हस्बे मन्शा फ़िक्र व नज़र का फ़राग़ (आसूदगी) हासिल नहीं हुआ है तो याद रखो के इस तरह सिर्फ़ शबकोर ऊंटनी की तरह हाथ पैर मारते रहोगे ; और अन्धेरे में भटकते रहोगे और दीन का तलबगार वह नहीं है जो अन्धेरों में हाथ पांव मारे और बातों को मख़लूत कर दे , इससे तो ठहर जाना ही बेहतर है।

फ़रज़न्द! मेरी वसीयत को समझो और यह जान लो के जो मौत का मालिक है वही ज़िन्दगी का मालिक है और जो ख़ालिक़ है वही मौत देने वाला है और जो फ़ना करने वाला है वही दोबारा वापस लाने वाला है और जो मुब्तिला करने वाला है वही आफ़ियत देने वाला है और यह दुनिया इसी हालत में मुस्तक़र रह सकती है जिसमें मालिक ने क़रार दिया है यानी नेमत , आज़माइश , आखि़रत की जज़ा या वह बात जो तुम नहीं जानते हो , अब अगर इसमें से कोई बात समझ में न आए तो उसे अपनी जेहालत पर महमूल करना के तुम इब्तिदा में जब पैदा हुए हो तो जाहिल ही पैदा हुए हो , बाद में इल्म हासिल किया है और इसी बिना पर मजहूलात की तादाद कसीर है जिसमें इन्सानी राय मुतहय्यरा रह जाती है (अभी कितनी ही ऐसी चीज़ें हैं के जिनसे तुम बेख़बर हो के उनमें पहले तुम्हारा ज़ेह्न परेशान होता है) और निगाह बहक जाती है और बाद में सही हक़ीक़त नज़र आती है , लेहाज़ा उस मालिक से वाबस्ता रहो जिसने पैदा किया है , रोज़ी दी है और मोतदिल बनाया है , उसी की इबादत करो , उसी की तरफ़ तवज्जो करो और उसी से डरते रहो , बेटा! यह याद रखो के तुम्हें ख़ुदा के बारे में इस तरह की ख़बरें कोई नहीं दे सकता है जिस तरह रसूले अकरम (स 0) ने दी हैं। लेहाज़ा उनको बख़ुशी अपना पेशवा और राहे निजात का क़ाएद तस्लीम करो , मैंने तुम्हारी नसीहत में कोई कमी नहीं की है और न तुम कोशिश के बावजूद अपने बारे में इतना सोच सकते हो जितना मैंने देख लिया है।

फ़रज़न्द! याद रखो अगर ख़ुदा के लिये कोई शरीक भी होता तो उसके भी रसूल आते और उसकी भी सल्तनत और हुकूमत के भी आसार दिखाई देते और इसके अफ़आल व सिफ़ात का भी कुछ पता होता , लेकिन ऐसा कुछ नहीं है लेहाज़ा ख़ुदा एक है जैसा के उसने ख़ुद बयान किया है , उसके मुल्क में उससे कोई टकराने वाला नहीं है और न उसके लिये किसी तरह का ज़वाल है। वह औलियत की हुदूद के बग़ैर सबसे अव्वल है और किसी इन्तेहा के बग़ैर सबसे आखि़र तक रहने वाला है। वह इस बात से अज़ीमतर है के उसकी रूबूबियत का असबाते फ़िक्र व नज़र के अहाते से किया जाए। अगर तुमने इस हक़ीक़त को पहचान लिया है तो इस तरह अमल करो जिस तरह तुम जैसे मामूली हैसियत , क़लील ताक़त , कसीर आजिज़ी और परवरदिगार की तरफ़ इताअत की तलब , इताब के ख़ौफ़ और नाराज़गी के अन्देशे में हाजत रखने वाले क्या करते हैं , उसने जिस चीज़ का हुक्म दिया है वह बेहतरीन है और जिससे मना किया है वह बदतरीन है।

फ़रज़न्द! मैंने तुम्हें दुनिया , उसके हालात , तसर्रूफ़ात , ज़वाल और इन्तेक़ाल सबके बारे में बाख़बर कर दिया है और आखि़रत और उसमें साहेबाने ईमान के लिये मुहैया नेमतों का भी पता बता दिया है और दोनों के लिये मिसालें बयान कर दी हैं ताके तुम इबरत हासिल कर सको और इससे होशियार रहो।

याद रखो के जिसने दुनिया को बख़ूबी पहचान लिया है उसकी मिसाल उस मुसाफ़िर क़ौम जैसी है जिसका क़हतज़दा मन्ज़िल से दिल उचाट हो जाए और वह किसी सरसब्ज़ व शादाब इलाक़े का इरादा करे और ज़हमते राह , फ़िराक़े अहबाब , दुश्वारी सफ़र , बदमज़गिए तआम वग़ैरा जैसी तमाम मुसीबतें बरदाश्त कर ले ताके वसीअ घर और क़रार की मन्ज़िल तक पहुंच जाए के ऐसे लोग उन तमाम बातों में किसी तकलीफ़ का एहसास नहीं करते और न इस राह में ख़र्च को नुक़सान तसव्वुर करते हैं और उनकी नज़र में इससे ज़्यादा महबूब कोई शै नहीं है जो उन्हें मन्ज़िल से क़रीबतर कर दे और अपने मरकज़ तक पहुंचा दे।

और इस दुनिया से धोका खा जाने वालों की मिसाल उस क़ौम की है जो सरसब्ज़ व शादाब मक़ाम पर रहे और वहां से दिल उचट जाए तो क़हत ज़दा इलाक़े की तरफ़ चली जाए के इसकी नज़र में क़दीम हालात के छट जाने से ज़्यादा नागवार और दुश्वारगुज़ार कोई शै नहीं है के अब जिस मन्ज़िल पर वारिद हुए हैं और जहां तक पहुंचे हैं वह किसी क़ीमत पर इख़्तेयार करने के क़ाबिल नहीं है।

बेटा! देखो अपने और ग़ैर के दरम्यान मीज़ान अपने नफ़्स को क़रार दो और दूसरे के लिये वही पसन्द करो जो अपने लिये पसन्द कर सकते हो और इसके लिये भी वह बात नापसन्द करो जो अपने लिये पसन्द नहीं करते हो , किसी पर ज़ुल्म न करना के अपने ऊपर ज़ुल्म पसन्द नहीं करते हो और हर एक के साथ नेकी करना जिस तरह चाहते हो के सब तुम्हारे साथ नेक बरताव करें और जिस चीज़ को दूसरे से बुरा समझते हो उसे अपने लिये भी बुरा ही तसव्वुर करना , लोगों की उस बात से राज़ी हो जाना जिससे अपनी बात से लोगों को राज़ी करना चाहते हो , बिला इल्म कोई बात ज़बान से न निकालना अगरचे तुम्हारा इल्म बहुत कम है और किसी के बारे में वह बात न कहना जो अपने बारे में पसन्द न करते हो।

याद रखो के ख़ुदपसन्दी राहे सवाब के खि़लाफ़ और अक़्लों की बीमारी है लेहाज़ा अपनी कोशिश तेज़तर करो और अपने माल को दूसरों के लिये ज़ख़ीरा न बनाओ और अगर दरम्यानी रास्ते की हिदायत मिल जाए तो अपने रब के सामने सबसे ज़्यादा ख़ुज़ूअ व ख़ुशूअ से पेश आना।

और याद रखो के तुम्हारे सामने वह रास्ता है जिसकी मसाफ़त बईद और मशक़्क़त शदीद है इसमें तुम बेहतरीन ज़ादे राह की तलाश और बक़द्रे ज़रूरत ज़ादे राह की फ़राहमी से बेनियाज़ हो सकते हो अलबत्ता बोझ हलका रखो और अपनी ताक़त से ज़्यादा अपनी पुश्त पर बोझ मत लादो के यह कराँबारी एक वबाल बन जाए और फिर जब कोई फ़क़ीर मिल जाए और तुम्हारे ज़ादे राह को क़यामत तक पहुंचा सकता हो और कल वक़्ते ज़रूरत मुकम्मल तरीक़े से तुम्हारे हवाले कर सकता हो तो उसे ग़नीमत समझो और माल उसी के हवाले कर दो क्योंके हो सकता है के फिर तुम ऐसे शख़्स को ढूंढो और न पाओ और जो तुम्हारी दौलतमन्दी की हालत में तुमसे क़र्ज़ मांग रहा है उस वादे पर के तुम्हारी तंगदस्ती के वक़्त अदा कर देगा तो उसे ग़नीमत जानो।

याद रखो! तुम्हारे सामने एक दुश्वारगुज़ार खाई है जिसमें हलका फुलका आदमी गरांबार आदमी से कहीं अच्छी हालत में होगा अैर सुस्त रफ़्तार तेज़ क़दम दौड़ने वाले की बनिस्बत बुरी हालत में होगा और इस राह में ला मुहाला तुम्हारी मन्ज़िल जन्नत होगी या दोज़ख़। लेहाज़ा उतरने से पहले जगह मुन्तख़ब कर लो और पड़ाव डालने से पहले इस जगह को ठीक ठाक कर लो , क्यूंके मौत के बाद ख़ुशनूदी हासिल करने का मौक़ा न होगा और न दुनिया की तरफ़ पलटने की कोई सूरत होगी। यक़ीन रखो के जिसके क़ब्ज़े में क़ुदरत में आसमान व ज़मीन के ख़ज़ाने हैं उसने तुम्हें सवाल करने की इजाज़त दे दखी है और क़ुबूल करने का ज़िम्मा लिया है और हुक्म दिया है के तुम मांगो के वह दे , रहम की दरख़्वास्त करो ताके वह रहम करे , उसने अपने ऊपर तुम्हारे दरम्यान दरबान खड़े नहीं किये जो तुम्हें रोकते हों न तुम्हें उस पर मजबूर किया है के तुम किसी को इसके यहां सिफ़ारिश के लिये लाओ तब ही काम हो और तुमने गुनाह किये हों तो उसने तुम्हारे लिये तौबा की गुन्जाइश ख़त्म नहीं की है , न सज़ा देने में जल्दी की है और न तौबा व अनाबत के बाद वह कभी ताना देता है (के तुमने पहले यह किया था , वह किया था) न ऐसे मौक़े पर उसने तुम्हें रूसवा किया के जहां तुम्हें रूसवा ही होना चाहिये था और न उसने तौबा के क़ुबूल करने में (कड़ी शर्तें लगाकर) तुम्हारे साथ सख़्तगीरी की है , न गुनाह के बारे में तुमसे सख़्ती के साथ जिरह करता है और न अपनी रहमत से मायूस करता है बल्कि उसने गुनाह से किनाराकशी को भी एक नेकी क़रार दिया है और बुराई एक हो तो उसे एक (बुराई) और नेकी एक हो तो उसे दस (नेकियों) के बराबर ठहराया है , उसने तौबा का दरवाज़ा खोल रखा है जब भी उसे पुकारो वह तुम्हारी सुनता है और जब भी राज़ व नियाज़ करते हुए उससे कुछ कहो वह जान लेता है। तुम उसी से मुरादें मांगते हो और उसी के सामने दिल के भेद खोलते हो , उसी से अपने दुख दर्द का रोना रोते हो और मुसीबतों से निकालने की इल्तिजा करते हो और अपने कामों में मदद मांगते हो और उसकी रहमत के ख़ज़ानों से वह चीज़ें तलब करते हो जिनके देने पर और कोई क़ुदरत नहीं रखता , जैसे उम्रों में दराज़ी , जिस्मानी सेहत व तवानाई और रिज़्क़ में वुसअत और इस पर उसने तुम्हारे हाथ में अपने ख़ज़ानों के खोलने वाली कुन्जियां दे दी हैं इस तरह के तुम्हें अपनी बारगाह में सवाल करने का तरीक़ा बताया , इस तरह जब तुम चाहो दुआ के ज़रिये उसकी नेमत के दरवाज़ों को खुलवा लो , उसकी रहमत के झालों को बरसा लो , हाँ बाज़ औक़ात क़ुबूलियत में देर हो तो उससे नाउम्मीद न हो , इसलिये के अतिया नीयत के मुताबिक़ होता है और अकसर क़ुबूलियत में इसलिये देर की जाती है के साएल के अज्र में इज़ाफ़ा हो , और उम्मीदवार को अतिये और ज़्यादा मिलें और कभी यह भी होता है के तुम एक चीज़ मांगते हो और वह हासिल नहीं होती मगर दुनिया या आखि़रत में इससे बेहतर चीज़ें तुम्हें मिल जाती हैं या तुम्हारे किसी बेहतर मफ़ाद के पेशे नज़र तुम्हें इससे महरूम कर दिया जाता है इसलिये के तुम कभी ऐसी चीज़ें भी तलब कर लेते हो के अगर तुम्हें दे दी जाएं तो तुम्हारा दीन तबाह हो जाए। लेहाज़ा तुम्हें बस वह चीज़ तलब करना चाहिये जिसका जमाल पाएदार हो अैर जिसका वबाल तुम्हारे सर न पड़ने वाला हो , रहा दुनिया का माल तो न यह तुम्हारे लिये रहेगा और न तुम उसके लिये रहोगे।

याद रखो! तुम आखि़रत के लिये पैदा हुए हो न के दुनिया के लिये , फ़ना के लिये ख़ल्क़ हुए हो न बक़ा के लिये , मौत के लिये बने हो न हयात के लिये , तुम एक ऐसी मन्ज़िल में हो जिसका कोई ठीक नहीं है और एक ऐसे घर में हो जो आखि़रत का साज़ो सामान मुहैय्या करने के लिये है और सिर्फ़ मन्ज़िले आखि़रत की गुज़रगाह है। तुम वह हो जिसका मौत पीछा कये हुए है जिससे कोई भागने वाला बच नहीं सकता है और उसके हाथ से निकल नहीं सकता है , वह बहरहाल उसे पा लेगी। लेहाज़ा उसकी तरफ़ से होशियार हो के वह तुम्हें किसी बुरे हाल में पकड़ ले और तुम ख़ाली तौबा के लिये सोचते ही रह जाओ और वह तुम्हारे और तौबा के दरम्यान हाएल हो जाए के इस तरह गोया तुमने अपने नफ़्स को हलाक कर दिया।

फ़रज़न्द! मौत को बराबर याद करते रहो और इन हालात को याद करते रहो जिन पर अचानक वारिद होना है और जहां तक मौत के बाद जाना है ताके वह तुम्हारे पास आए तो तुम एहतियाती सामान कर चुके हो और अपनी ताक़त को मज़बूत बना चुके हो और वह अचानक आकर तुम पर क़ब्ज़ा न कर ले और ख़बरदार अहले दुनिया को दुनिया की तरफ़ झुकते और इस पर मरते देख कर तुम धोके में न आ जाना के परवरदिगार तुम्हें इसके बारे में बता चुका है और वह ख़ुद भी अपने मसाएब सुना चुकी है और अपनी बुराइयों को वाज़ेह कर चुकी है। दुनियादार अफ़राद सिर्फ़ भौंकने वाले कुत्ते और फाउण्डेशऩ खाने वाले दरिन्दे हैं जहां एक-दूसरे पर भौंकता है और ताक़त वाला कमज़ोर को खा जाता है और बड़ा छोटे को कुचल डालता है , यह सब जानवर हैं जिनमें बाज़ बन्धे हुए हैं और बाज़ आवारा , जिन्होंने अपनी अक़्लें गुम कर दी हैं और नामालूम रास्ते पर चल पड़े हैं गोया दुश्वार गुज़ार वादियों में मुसीबतों में चरने वाले हैं जहां न कोई चरवाहा है हो सीधे रास्ते पर लगा सके और न कोई चराने वाला है जो उन्हें चरा सके। दुनिया ने इन्हें गुमराही के रास्ते पर डाल दिया है और इनकी बसारत को मिनाराए हिदायत के मुक़ाबले में सल्ब कर लिया है और वह हैरत के आलम में सरगर्दां हैं और नेमतों में डूबे हुए हैं , दुनिया को अपना माबूद बना लिया है और वह उनसे खेल रही है और वह इससे खेल रहे हैं और सबने आखि़रत को यकसर भुला दिया है।

ठहरो! अन्धेरे को छटने दो , ऐसा महसूस होगा जैसे क़ाफ़िले आखि़रत की मन्ज़िल में उतर चुके हैं और क़रीब है के तेज़ रफ्तार अफ़राद अगले लोगों से मुलहक़ हो जाएं।

फ़रज़न्द! याद रखो के जो शब व रोज़ की सवारी पर सवार है वह गोया सरगर्मे सफ़र है चाहे ठहरा ही क्यों न रहे और मसाफ़त क़ता कर रहा है चाहे इत्मीनान से मुक़ीम ही क्यों न रहे। यह बात यक़ीन के साथ समझ लो के तुम न हर उम्मीद को पा सकते हो और न अजल से आगे जा सकते हो , तुम अगले लोगों के रास्ते ही पर चल रहे हो लेहाज़ा तलब में नर्म रफ़्तारी से काम लो और कस्बे माश में मयानारवी इख़्तेयार करो , वरना बहुत सी तलब इन्सान को माल की महरूमी तक पहुंचा देती है और हर तलब करने वाला कामयाब भी नहीं होता है और न हर एतदाल से काम लेने वाला महरूम ही होता है , अपने नफ़्स को हर तरह की पस्ती से बलन्दतर रखो चाहे वह पस्ती पसन्दीदा चीज़ो तक पहुंचा ही क्यों न दे इसलिये के जो इज़्ज़ते नफ़्स दे दोगे उसका कोई बदल नहीं मिल सकता और ख़बरदार किसी के ग़ुलाम न बन जाना जबके परवरदिगार ने भी आज़ाद क़रार दिया है। देखो उस चीज़ में कोई ख़ैर नहीं है जो शर के ज़रिये हासिल हो और वह आसानी आसानी नहीं है जो दुश्वारी के रास्ते से मिले। (((-बेहतरीन फ़लसफ़ाए हयात और बलीग़तरीन मोएज़ा है अगर इन्सान फ़िक्रे सलीम और अक़्ले मुस्तक़ीम रखता हो , हर गुज़रने वाला दिन और हर बीत जाने वाली रात इन्सान की ज़िन्दगी में से एक हिस्सा कम कर देती है और इस तरह इन्सान मुसलसल सरगर्मे सफ़र है अगरचे मकानी एतबार से अपनी जगह पर मुक़ीम है और हरकत भी नहीं कर रहा है , हरकत सिर्फ़ मकान ही में नहीं होती है , ज़मान में भी होती है और यही हरकत इन्सान को सरहदे मौत तक ले जाती है-)))

ख़बरदार लालच की सवारियां तेज़ रफ़्तारी दिखलाकर तुम्हें हलाकत के चश्मों पर न वारिद कर दें और अगर मुमकिन हो के तुम्हारे और ख़ुदा के दरम्यान कोई साहबे नेमत न आने पाए तो ऐसा ही करो के तुम्हें तुम्हारा हिस्सा बहरहाल मिलने वाला है और अपना नसीब बहरहाल लेने वाले हो और अल्लाह की तरफ़ से थोड़ा भी मख़लूक़ात के बहुत से ज़्यादा बेहतर होता है। अगरचे सब अल्लाह ही की तरफ़ से होता है।

ख़ामोशी से पैदा होने वाली कोताही की तलाफ़ी कर लेना गुफ़्तगू से होने वाले नुक़सान के तदारूक से आसानतर है , बरतन के अन्दर का सामान मुंह बन्द करके महफ़ूज़ किया जाता है और अपने हाथ की दौलत का महफ़ूज़ कर लेना दूसरे के हाथ की नेमत के तलब करने से ज़्यादा बेहतर है। मायूसी की तल्ख़ी को बरदाश्त करना लोगों के सामने हाथ फैलाने से बेहतर है और पाकदामनी के साथ मेहनत मशक़्क़त करना फ़िस्क़ व फ़ुजूर के साथ मालदारी से बेहतर है।

हर इन्सान अपने राज़ को दूसरों से ज़्यादा महफ़ूज़ रख सकता है और बहुत से लोग हैं जो उस अम्र के लिये दौड़ रहे हैं जो उनके लिये नुक़सानदेह है। ज़्यादा बात करने वाला बकवास करने लगता है और ग़ौर व फ़िक्र करने वाला बसीर हो जाता है। अहले ख़ैर के साथ रहो ताके उन्हीं में शुमार हो और अहले शर से अलग रहो ताके उनसे अलग हिसाब किये जाओ। बदतरीन इनआम माले हराम है और बदतरीन ज़ुल्म कमज़ोर आदमी पर ज़ुल्म है। नर्मी नामुनासिब हो तो सख़्ती ही मुनासिब है। कभी कभी दवा मर्ज़ बन जाती है और मर्ज़ दवा और कभी कभी ग़ैर मुख़लिस भी नसीहत की बात कर देता है और कभी-कभी मुख़लिस भी ख़यानत से काम ले लेता है। देखो ख़बरदार , ख़्वाहिशात पर एतमाद न करना के यह अहमक़ों का सरमाया हैं अक़्लमन्दी तजुर्बात के महफ़ूज़ रखने में है और बेहतरीन तजुर्बा वही है जिससे नसीहत हासिल हो , फ़ुरसत से फ़ायदा उठाओ क़ब्ल इसके के रन्ज व अन्दोह का सामना करना पड़े , हर तलबगार मतलूब को हासिल भी नहीं करता है और हर ग़ायब पलट कर भी नहीं आता है।

फ़साद की एक क़िस्म ज़ादे राह का ज़ाया कर देना और आक़ेबत को बरबाद कर देना भी है , हर अम्र की एक आक़ेबत है और अनक़रीब वह तुम्हें मिल जाएगा जो तुम्हारे लिये मुक़द्दर हुआ है। तिजारत करने वाला वही होता है जो माल को ख़तरे में डाल सके , कभी थोड़ा माल ज़्यादा (तमाले फ़रावां) से ज़्यादा बाबरकत होता है। उस मददगार में कोई ख़ैर नहीं है जो ज़लील हो और वह दोस्त बेकार है जो बदनाम हो। ज़माने के साथ सहूलत का बरताव करो जब तक इसका ऊंट क़ाबू में रहे और किसी चीज़ को उससे ज़्यादा की उम्मीद में ख़तरे में मत डालो , ख़बरदार कहीं दुश्मनी और अनाद की सवारी तुमसे मुंहज़ोरी न करने लगे।

अपने नफ़्स को अपने भाई के बारे में क़तअ ताल्लुक़ के मुक़ाबले में ताल्लुक़ात , आराज़ के मुक़ाबले में मेहरबानी , कंजूसी के मुक़ाबले में अता , ( जब वह दोस्ती तोड़े तो तुम उसे जोड़ो , वह मुंह फेर ले तो तुम आगे बढ़ो और लुत्फ़ व मेहरबानी से पेश आओ , वह तुम्हारे लिये कन्जूसी करे तो तुम उस पर ख़र्च करो) , दूरी के मुक़ाबले में क़ुरबत , शिद्दत के मुक़ाबले में नर्मी और जुर्म के मौक़े पर माज़ेरत के लिये आमादा करो गोया के तुम उसके बन्दे हो और उसने तुम पर कोई एहसान किया है और ख़बरदार एहसान को भी बेमहल न क़रार देना और न किसी न अहल के साथ एहसान करना , अपने दुश्मन के दोस्त को अपना दोस्त न बनाना के तुम अपने दोस्त के दुश्मन हो जाओ और अपने भाई को मुख़लिसाना नसीहत करते रहना चाहे उसे अच्छी लगें या बुरी , ग़ुस्से को पी जाओ के मैंने अन्जामकार के एतबार से इससे ज़्यादा शीरीं कोई घूंट नहीं देखा है और न आक़ेबत के लेहाज़ से लज़ीज़तर , और जो तुम्हारे साथ सख़्ती करे उसके लिये नरम हो जाओ शायद कभी वह भी नरम हो जाए , अपने दुश्मन के साथ एहसान करो के इसमें दो में से एक कामयाबी और शीरींतरीन कामयाबी है और अगर अपने भाई से क़तअ ताल्लुक़ करना चाहते हो तो अपने नफ़्स में इतनी गुंजाइश रखो के अगर उसे किसी दिन वापसी का ख़याल पैदा हो तो वापस आ सके।

जो तुम्हारे बारे में अच्छा ख़याल रखे उसके ख़याल को ग़लत न होने देना , बाहेमी रवाबित की बिना पर किसी भाई के हक़ को ज़ाया न करना के जिसके हक़ को ज़ाया कर दिया फिर वह वाक़ेअन भाई नहीं है और देखो तुम्हारे घरवाले तुम्हारी वजह से बदबख़्त न होने पाएं और जो तुमसे किनाराकश होना चाहते हैं उसके पीछे न लगे रहो , तुम्हारा कोई भाई क़तअ ताल्लुक़ात में तुम पर बाज़ी न ले जाए और तुम ताल्लुक़ात मज़बूत कर लो और ख़बरदार बुराई करने में नेकी करने से ज़्यादा ताक़त का मुज़ाहिरा न करना और किसी ज़ालिम के ज़ुल्म को बहुत बड़ा तसव्वुर न करना के वह अपने को नुक़सान पहुंचा रहा है और तुम्हें फ़ायदा पहुंचा रहा है और जो तुम्हें फ़ायदा पहुंचाए उसकी जज़ा यह नहीं है के तुम उसके साथ बुराई करो।

और फ़रज़न्द!! याद रखो के रिज़्क़ की दो क़िस्में हैं , एक रिज़्क़ वह है जिसे तुम तलाश कर रहे हो और एक रिज़्क़ वह है जो तुमको तलाश कर रहा है के अगर ततुम उस तक न जाओगे तो वह ख़ुद तुम तक आ जाएगा। ज़रूरत के वक़्त ख़ुज़ूअ व ख़ुशू का इज़हार किस क़द्र ज़लीलतरीन बात है और बे नियाज़ी के आलम में बदसलूकी किस क़द्र क़बीह हरकत है। इस दुनिया में तुम्हारा हिस्सा इतना ही है जिससे अपनी आक़ेबत का इन्तेज़ाम कर सको , और किसी चीज़ के हाथ से निकल जाने पर परेशानी का इज़हार करना है तो हर उस चीज़ पर भी फ़रयाद करो जो तुम तक नहीं पहुंची है। जो कुछ हो चुका है उसके ज़रिये इसका पता लगाओ जो होने वाला है के मामलात तमाम के तमाम एक ही जैसे हैं और ख़बरदार उन लोगों में न हो जाओ जिन पर उस वक़्त तक नसीहत असरअन्दाज़ नहीं होती है जब तक पूरी तरह तकलीफ़ न पहुंचाई जाए इसलिये के इन्साने आक़िल अदब से नसीहत हासिल करता है और जानवर मारपीट से सीधा होता है ,, दुनिया में वारिद होने वाले हुमूम व आलाम को सब्र के अज़ाएम और यक़ीन के हुस्न के ज़रिये रद कर दो , याद रखो के जिसने भी एतदाल को छोड़ा वह मुनहरिफ़ हो गया , साथी एक तरह का शरीके नसब होता है और दोस्त वह है जो ग़ीबत में भी सच्चा दोस्त रहे। ख़्वाहिश अन्धेपन की शरीक कार होती है। बहुत से दूर वाले ऐसे होते हैं जो क़रीब वालों से क़रीबतर होते हैं और बहुत से क़रीब वाले दूर वालों से ज़्यादा दूरतर होते हैं।

(((- इस मसले का ताल्लुक़ दुनिया में इख़लाक़ी बरताव से है जहां ज़ालिमों को इस्लामी इख़लाक़ात से आगाह किया जाता है और कभी लश्करे माविया पर बन्दिश आब को रोक दिया जाना जाता है और कभी इब्ने मुलजिम को सेराब कर दिया जाता है। वरना अगर दीन व मज़हब ख़तरे में पड़ जाए तो मज़हब से ज़्यादा अज़ीज़तर कोई शै नहीं है और ज़ालिमों से जेहाद भी वाजिब हो जाता है। इसमें कोई शक नहीं है के इन्सान की ज़िन्दगी में बेशुमार ऐसे मौक़े आते हैं जहां यह एहसास पैदा होता है के जैसे इन्सान रिज़्क़ की तलाश में नहीं है बल्कि रिज़्क़ इन्सान को तलाश कर रहा है और इन्सान जहां जहां जा रहा है उसका रिज़्क़ उसके साथ जा रहा है। और परवरदिगार ने ऐसे वाक़ेआत का इन्तेज़ाम इसीलिये किया है के इन्सान को इसकी रज़्ज़ाक़ियतत और ईफ़ाए वादा का यक़ीन हो जाए और वह रिज़्क़ की राह में इज़्ज़ते नफ़्स या दारे आखि़रत को पहुंचने के लिये तैयार न हो-)))

ग़रीब वह है जिसका कोई दोस्त न हो , जो हक़ से आगे बढ़ जाए उसके रास्ते तंग हो जाते हैं और जो अपनी हैसियत पर क़ायम रहता है उसकी इज्ज़त बाक़ी रह जाती है तुम्हारे हाथों में मज़बूत तरीन वसीला तुम्हारा और ख़ुदा का रिश्ता है , और जो तुम्हारी परवाह न करे वही तुम्हारा दुश्मन है। कभी कभी मायूसी भी कामयाबी बन जाती है जब हर्स व लालच मूजिबे हलाकत हो , हर ऐब ज़ाहिर नहीं हुआ करता है और न हर फ़ुरसत का मौक़ा बार-बार मिला करता है , कभी कभी ऐसा भी होता है के आंखों वाला रास्ते से भटक जाता है और अन्धा सीधे रास्ते को पा लेता है , बुराई को पसे पुश्त डालते रहो के जब भी चाहो उसकी तरफ़ बढ़ सकते हो। जाहिल से क़तअ ताल्लुक़ आक़िल से ताल्लुक़ात के बराबर है , जो ज़माने की तरफ़ से मुतमईन हो जाता है ज़माना उससे ख़यानत करता है और जो इसे बड़ा समझता है उसे ज़लील कर देता है हर तीरअन्दाज़ का तीर निशाने पर नहीं बैठता है जब हाकिम बदल जाता है तो ज़माना बदल जाता है , रफ़ीक़ सफ़र के बारे में रास्ते पर चलने से पहले दरयाफ़्त करो और हमसाये के बारे में अपने घर से पहले ख़बरगीरी करो , ख़बरदार ऐसी कोई बात न करना जो मज़हकाख़ेज़ हो चाहे दूसरों ही की तरफ़ से नक़्ल की जाए।

ख़बरदार औरतों से मशविरा न करना के उनकी राय कमज़ोर और उनका इरादा सुस्त होता है , उन्हें परदे में रखकर उनकी निगाहों को ताक झांक से महफ़ूज़ रखो के परदे की सख़्ती उनकी इज़्ज़त व आबरू को बाक़ी रखने वाली है और उनका घर से निकल जाना ग़ैर मोतबर अफ़राद के अपने घर में दाखि़ल करने से ज़्यादा ख़तरनाक नहीं है , अगर मुमकिन हो के वह तुम्हारे अलावा किसी को न पहचानें तो ऐसा ही करो और ख़बरदार उन्हें उनके ज़ाती मसाएल से ज़्यादा इख़्तेयारात न दो इसलिये के औरत एक फूल है आौर हाकिम व मुतसर्रफ़ नहीं है। उसके पास व लेहाज़ को उसकी ज़ात से आगे न बढ़ाओ और उसमें दूसरों की सिफ़ारिश का हौसला न पैदा होने दो , देखो ख़बरदार ग़ैरत के मवाक़े के अलावा ग़ैरत का इज़हार मत करना के इस तरह अच्छी औरत भी बुराई के रास्ते पर चली जाएगी और बेऐब भी मशकूक हो जाती है।

अपने हर ख़ादिम के लिये एक अमल मुक़र्रर कर दो जिसका मुहासेबा कर सको के यह बात एक दूसरे के हवाले करने से कहीं ज़्यादा बेहतर है। अपने क़बीले का एहतेराम करो के यही तुम्हारे लिये परवाज़ का मरतबा रखते हैं और यही तुम्हारी असल हैं जिनकी तरफ़ तुम्हारी बाज़गश्त है और तुम्हारे हाथ हैं जिनके ज़रिये हमला कर सकते हो। अपने दीन व दुनिया को परवरदिगार के हवाले कर दो और उससे दुआ करो के तुम्हारे हक़ में दुनिया व आखि़रत में बेहतरीन फ़ैसला करे , वस्सलाम। (((-इस कलाम में मुख़्तलिफ़ अहतेमालात पाए जाते हैं -- एक एहतेमाल यह है के उस दूर के हालात की तरफ़ इशारा है जब औरतें 99फ़ीसदी जाहिल हुआ करती थीं और ज़ाहिर है के पढ़े लिखे इन्सान का किसी जाहिल से मश्विरा करना नादानी के अलावा कुछ नहीं है। दूसरा एहतेमाल यह है के इसमें औरत की जज़्बाती फ़ितरत की तरफ़ इशारा है के इस मशविरे में जज़्बात की फ़रमानी का ख़तरा ज़्यादा है लेहाज़ा अगर कोई औरत इस नुक़्स से बलन्दतर हो जाए तो इससे मश्विरा करने में कोई हर्ज नहीं है। तीसरा एहतेमाल यह है के इसमें उन मख़सूस औरतों की तरफ़ इशारा हो जिनकी राय पर अमल करने से आलमे इस्लाम का एक बड़ा हिस्सा तबाही के घाट उतर गया है और आज तक उसी तबाही के असरात देखे जा रहे हैं।-)))


32-आपका मकतूबे गिरामी (माविया के नाम)

तुमने लोगों की एक बड़ी जमाअत को हलाक कर दिया है के उन्हें अपनी गुमराही से धोके में रखा है और अपने समन्दर की मौजों के हवाले कर दिया है जहां तारीकियां उन्हें ढांपे हुए हैं और शुबहात के थपेड़े उन्हें तहो बाला कर रहे हैं नतीजा यह हुआ के वह राहे हक़ से हट गए और उलटे पांव पलट गए और पीठ फेरकर चलते बने और अपने हसब व नसब पर भरोसा कर बैठे अलावा उन चन्द अहले बसीरत के जो वापस आ गए और उन्होंने तुम्हें पहचानने के बाद छोड़ दिया और तुम्हारी हिमायत से भाग कर अल्लाह की तरफ़ आ गए जबके तुमने उन्हें दुश्वारियों में मुब्तिला कर दिया था और राहे एतदाल से हटा दिया था , लेहाज़ा ऐ माविया , अपने बारे में ख़ुदा से डरो और शैतान से जान छुड़ाओ के यह दुनिया बहरहाल तुमसे अलग होने वाली है और आखि़रत बहुत क़रीब है- वस्सलाम

33-आपका मकतूबे गिरामी (मक्के के गवर्नर कसम बिन अब्बास के नाम)

अम्माबाद! मेरे मग़रिबी इलाक़े के जासूस ने मुझे लिख कर इत्तेला दी है के मौसमे हज के लिये शाम की तरफ़ से कुछ ऐसे लोगों को भेजा गया है जो दिलों के अन्धे , कानों के बहरे और आंखों के महरूमे ज़िया हैं , यह हक़ को बातिल से मुश्तबा करने वाले हैं और ख़ालिक़ की नाफ़रमानी करके मख़लूक़ को ख़ुश करने वाले हैं इनका काम दीन के ज़रिये दुनिया को दोहना है और यह नेक किरदार , परहेज़गार अफ़राद की आखि़रत को दुनिया के ज़रिये ख़रीदने वाले हैं जबके ख़ैर उसका हिस्सा है जो खैर का काम करे और शर उसके हिस्से में आता है जो शर का अमल करता है। देखो अपने मनसबी फ़राएज़ के सिलसिले में एक तजुर्बेकार , पुख़्ताकार , मुख़लिस , होशियार इन्सान की तरह क़याम करना जो अपने हाकिम का ताबेअ और अपने इमाम का इताअतगुज़ार हो और ख़बरदार कोई ऐसा काम न करना जिसकी माज़ेरत करना पड़े और राहत व आराम में मग़रूर न हो जाना और न शिद्दत के मवाक़े पर कमज़ोरी का मुज़ाहेरा करना , वस्सलाम

34-आपका मकतूबे गिरामी

(मोहम्मद बिन अबीबकर के नाम , जब यह इत्तेलाअ मिली के वह अपनी माज़ूली और मालिके अश्तर के तक़र्रूर से रंजीदा हैं और फिर मालिके अश्तर मिस्र पहुंचने से पहले इन्तेक़ाल भी कर गए)

अम्माबाद! मुझे मालिके अश्तर के मिस्र की तरफ़ भेजने के बारे में तुम्हारी बदली की इत्तेलाअ मिली है। (((-तबरी का बयान है के हत्तात मजाशई एक जमाअत के साथ माविया के दरबार में वारिद हुआ माविया ने सबको एक एक लाख इनाम दिया और हत्तात को सत्तर हज़ार तो उसने एतराज़ किया , माविया ने कहा के मैंने इनसे इनका दीन ख़रीदा है , हत्तात ने कहा के तो मुझसे भी ख़रीद लीजिये ? यह सुनना था के माविया ने एक लाख पूरा कर दिया। अब्दुल्लाह बिन अब्बास के भाई थे और मक्के पर हज़रत के गवर्नर थे जो हज़रत की शहादत तक अपने ओहदे पर फ़ाएज़ रहे और उसके बाद माविया के दौर में समरक़न्द में क़त्ल कर दिये गए। मोहम्मद बिन अबीबकर जनाबे असमा बिन्ते उमैस के फ़रज़न्द थे जिन्होंने पहले हज़रत जाफ़रे तय्यार से अक़्द किया और उनसे जनाबे अब्दुल्लाह बिन जाफ़र पैदा हुए। इसके बाद अबूबक्र से अक़्द किया जिससे मोहम्मद की विलादत हुई और आखि़र में मौलाए कायनात (अ 0) से अक़्द किया जिससे यहया पैदा हुए और इस तरह मोहम्मद अबूबक्र के फ़रज़न्द और हज़रत के परवरदा थे। उन्हें मिस्र का गवर्नर बनाया , इसके बाद माविया और अम्र व आस के ख़तरे के पेशे नज़र उनकी जगह मालिके अश्तर का तक़रूर किया लेकिन माविया ने उन्हें रास्ते ही में ज़हर दिलवा दिया और इस तरह मोहम्मद अपने ओहदे पर बाक़ी रह गए लेकिन उन्हें माज़ूली से जो सदमा हुआ था उसके तदारूक में हज़रत ने यह ख़त इरसाल फ़रमाया।-)))

हालांके मैंने यह काम इसलिये नहीं किया के तुम्हें काम में कमज़ोर पाया था या तुमसे ज़्यादा मेहनत का मुतालेबा करना चाहा था बल्कि अगर मैंने तुमसे तुम्हारे ज़ेरे असर इ़क़्तेदार को लिया भी था तो तुम्हें ऐसा काम देना चाहता था जो तुम्हारे लिये मशक़्क़त के एतबार से आसान हो और तुम्हें पसन्द भी हो।

जिस शख़्स को मैंने मिस्र का गवर्नर क़रार दिया था वह मेरा मर्दे मुख़लिस और मेरे दुश्मन के लिये सख़्त क़िस्म का दुश्मन था। ख़ुदा उस पर रहमत नाज़िल करे जिसने अपने दिन पूरे कर लिये और अपनी मौत से मुलाक़ात कर ली। हम उससे बहरहाल राज़ी हैं , अल्लाह उसे अपनी रिज़ा इनायत फ़रमाए और उसके सवाब को मुज़ाएफ़ कर दे। अब तुम दुश्मन के मुक़ाबले में निकल पड़ो और अपनी बसीरत पर चल पड़ो जो तुमसे जंग करे उससे जंग करने के लिये कमर को कस लो और दुश्मन राहे ख़ुदा की दावत दे दो। इसके बाद अल्लाह से मुसलसल मदद मांगते रहो के वही तुम्हारे लिये हर मुहिम में काफ़ी है और वही हर नाज़िल होने वाली मुसीबत में मदद करने वाला है। इन्शाअल्लाह।

35-आपका मकतूबे गिरामी (अब्दुल्लाह बिन अब्बास के नाम - मोहम्मद बिन अबीबक्र की शहादत के बाद)

अम्माबाद! देखो मिस्र पर दुश्मन का क़ब्ज़ा हो गया है और मोहम्मद बिन अबीबक्र शहीद हो गए हैं (ख़ुदा उन पर रहमत नाज़िल करे) मैं उनकी मुसीबत का अज्र ख़ुदा से चाहता हूँ के वह मेरे मुख़लिस फ़रज़न्द और मेहनतकश गवर्नर थे। मेरी तेग़े बर्रान और मेरे दिफ़ाई सुतून , मैंने लोगों को उनसे मुलहक़ हो जाने पर आमादा किया था और उन्हें हुक्म दिया था के जंग से पहले उनकी मदद को पहुंच जाएं और उन्हें ख़ु़फिया और एलानिया हर तरह दावते अमल दी थी और बार-बार आवाज़ दी थी लेकिन बाज़ अफ़राद बादिले नख़्वास्ता आए और बाज़ ने झूटे बहाने कर दिये , कुछ तो मेरे हुक्म को नज़र अन्दाज़ करके घर ही में बैठे रह गए , अब मैं परवरदिगार से दुआ करता हूं के मुझे उनकी तरफ़ से जल्द कशाइशे अम्र इनायत फ़रमा दे के ख़ुदा की क़सम अगर मुझे दुश्मन से मुलाक़ात करके वक़्ते शहादत की आरज़ू न होती और मैंने अपने नफ़्स को मौत के लिये आमादा न कर लिया होता तो मैं हरगिज़ यह पसन्द न करता के उन लोगों के साथ एक दिन भी दुश्मन से मुक़ाबला करूं या ख़ुद उन लोगों से मुलाक़ात करूं।


36-आपका मकतूबे गिरामी (अपने भाई अक़ील के नाम जिसमें अपने बाज़ लश्करों का ज़िक्र फ़रमाया है और यह दर हक़ीक़त अक़ील के मकतूब का जवाब है)

पस मैंने उसकी तरफ़ मुसलमानों का एक लश्करे अज़ीम रवाना कर दिया और जब उसे इस अम्र की इत्तेलाअ मिली तो उसने दामन समेट कर फ़रार इख़्तेयार किया और शरमिंदा होकर पीछे हट गया तो हमारे लशकर ने उसे रास्ते मे जा लिया जबके सूरज डूबने के क़रीब था , नतीजा यह हुआ के दोनों में एक मुख़्तसर झड़प हुई और एक साअत न गुज़रने पाई थी के उसने भाग कर निजात हासिल कर ली जबके उसे गले से पकड़ा जा चुका था और चन्द सांसों के अलावा कुछ बाक़ी न रह गया था। (((-मसऊदी ने मेरूजुल ज़हब में सन 35हिजरी के हवादिस में इस वाक़ेए को नक़ल किया है के “ माविया ने अम्र व इब्नुलआस की सरकर्दगी में 4हज़ार का लशकर मिस्र की तरफ़ रवाना किया और इसमें माविया बिन ख़दीज जैसे और दीगर अफ़राद को भी शामिल कर दिया , मुक़ामे मसनात पर मोहम्मद बिन अबीबक्र ने इस लशकर का मुक़ाबला किया लेकिन असहाब की बेवफ़ाई की बिना पर मैदान छोड़ना पड़ा। इसके बाद दोबारा मिस्र के इलाक़े में रन पड़ा और आखि़र में मोहम्मद बिन अबीबक्र गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें जीते जी एक गधे की खाल में रखकर नज़रे आतिश कर दिया गया , जिसका हज़रत को बेहद सदमा हुआ और आपने इस वाक़ेए की इत्तेलाअ बसरा के गवर्नर अब्दुल्लाह बिन अब्बास को की और अपने मुकम्मल जज़्बात का इज़हार फ़रमा दिया यहां तक के अहले इराक़ की बेवफ़ाई की बुनियाद पर आरज़ूए मौत तक का तज़किरा फ़रमा दिया के गोया ऐसे अफ़राद की शक्ल भी नहीं देखना चाहते हैं जो राहे ख़ुदा में जेहाद करना न जानते हों और यह मौलाए कायनात का दर्से अमल हर दौर के लिये है के जिस क़ौम में जज़्बए क़ुरबानी नहीं है , अली अ 0न उन्हें देखना पसन्द करते हैं और न उन्हें अपने शियों में शामिल करना चाहते हैं।-)))

इस तरह बड़ी मुश्किल से उसने जान बचाई लेहाज़ा अब क़ुरैश और गुमराही में इनकी तेज़रफ़्तारी और तफ़रिक़े में इनकी गर्दिश और ज़लालत में इनकी मुंहज़ोरी का ज़िक्र छोड़ दो के इन लोगों ने मुझसे जंग पर वैसे ही इत्तेफ़ाक़ कर लिया है जिस तरह रसूले अकरम (स 0) से जंग पर इत्तेफ़ाक़ किया था , अब अल्लाह ही क़ुरैश को इनके किये का बदला दे के इन्होंने मेरी क़राबत का रिश्ता तोड़ दिया और मुझसे मेरे मांजाए की हुकूमत सल्ब कर ली।

और यह जो तुमने जंग के बारे में मेरी राय दरयाफ़्त की है तो मेरी राय यही है के जिन लोगों ने जंग को हलाल बना रखा है उनसे जंग करता रहूं यहां तक के मालिक की बारगाह में हाज़िर हो जाऊँ। मेरे गिर्द लोगों का इजतेमाअ मेरी इज़्ज़त में इज़ाफ़ा नहीं कर सकता है और न उनका मुतफ़र्रिक़ हो जाना मेरी वहशत में इज़ाफ़ा कर सकता है और मेरे बरादर अगर तमाम लोग भी मेरा साथ छोड़ दे तो आप मुझे कमज़ोर और ख़ौफ़ज़दा न पाएंगे और न ज़ुल्म का इक़रार करने वाला , कमज़ोर और किसी क़ाएद के हाथ में आसानी से ज़माम पकड़ा देने वाला और किसी सवार के लिये सवारी की सहूलत देने वाला पाएंगे बल्कि मेरी वही सूरतेहाल होगी जिसके बारे में क़बीलए बनी सलीम वाले ने कहा है “ अगर तू मेरी हाल के बारे में दरयाफ़्त कर रही है तो समझ ले के मैं ज़माने के मुश्किलात में सब्र करने वाला और मुस्तहकम इरादे वाला हूँ , मेरे लिये नाक़ाबिले बरदाश्त है के मुझे परेशान हाल देखा जाए और दुश्मन ताने दे या दोस्त इस सूरते हाल से रंजीदा हो जाए। ”

37-आपका मकतूबे गिरामी (माविया के नाम)

ऐ सुबहान अल्लाह! तू नई नई ख़्वाहिशात और ज़हमत में डालने वाली हैरत व सरगर्दानी से किस क़द्र चिपका हुआ है जबके तूने हक़ाएक़ को बरबाद कर दिया है और दलाएल को ठुकरा दिया है जो अल्लाह को मतलूब और बन्दों पर उसकी हुज्जत हैं। (((-मौलाए कायनात (अ 0) ने सरकारे दो आलम (स 0) को “ इब्ने उम्मी ’ के लफ़्ज़ से याद फ़रमाया है इसलिये केसरकारे दो आलम (स 0) मुसलसल आपकी वालदा माजिदा जनाबे फ़ातिमा बिन्ते असद को अपनी माँ के लफ़्ज़ से याद फ़रमाया करते थे “ इस मक़ाम पर आपने अपनी ज़ात को “ इब्ने अबीक ’ कह कर याद किया है और भाई नहीं कहा है ताके जनाबे अक़ील इस नुक्ते की तरफ़ मुतवज्जो हो जाएं के हम और आप एक ऐसे बाप के फ़रज़न्द हैं जिनकी ज़िन्दगी में ज़िल्लत के क़ुबूल करने और ज़ुल्म व सितम के सामने घुटने टेक देने का कोई तसव्वुर नहीं था तो आज मेरे बारे में क्या सोचना है और जेहादे राहे ख़ुदा के बारे में मेरी राय क्या दरयाफ़्त करता है , जब मेरा बाप उसके बाप के मुक़ाबले में हमेशा जेहाद करता रहा तो मुझे माविया के मुक़ाबले में हमेशा जेहाद करने में क्या तकल्लुफ़ हो सकता है आखि़रकार वह अबूसुफ़ियान का बेटा है और मैं अबूतालिब का फ़रज़न्द हूँ। इसी के साथ आपने इस हक़ीक़त का भी एलान कर दिया के मुक़ाबला करने वाले दो तरह के होते हैं बाज़ का एतमाद लश्करों और सिपाहियों पर होता है और बाज़ का एतमाद ज़ाते परवरदिगार पर होता है , लश्करों पर एतमाद करने वाले पीछे हट सकते हैं लेकिन ज़ाते वाजिब पर एतमाद करने वाले मैदान से क़दम पीछे नहीं हटा सकते हैं न उनका ख़ुदा किसी के मुक़ाबले में कमज़ोर हो सकता है और न वह किसी क़िल्लत व कसरत से मरऊब हो सकते हैं।-))) रह गया तुम्हारा उस्मान और उनके क़ातिलों के बारे में झगड़ना तो इसका मुख़्तसर जवाब यह है के तुमने उस्मान की मदद उस वक़्त की है जब मदद में तुम्हारा फ़ायदा था और उस वक़्त लावारिस छोड़ दिया जब मदद में इनका फ़ायदा था- वस्सलाम

38-आपका मकतूबे गिरामी (मालिके अश्तर की विलायत के मौक़े पर अहले मिस्र के नाम)

बन्दए ख़ुदा! अमीरूल मोमेनीन अली (अ 0) की तरफ़ से उस क़ौम के नाम जिसने ख़ुदा के लिये अपने ग़ज़ब का इज़हार किया जब उसकी ज़मीन में इसकी मासियत की गई और उसके हक़ को बरबाद किया गया। ज़ुल्म ने हर नेक व बदकार और मुक़ीम व मुसाफ़िर पर अपने शामियाने तान दिये और न कोई नेकी रह गई जिसके ज़ेरे साया आराम लिया जा सके और न कोई ऐसी बुराई रह गई जिससे लोग परहेज़ करते।

अम्माबाद! मैंने तुम्हारी तरफ़ बन्दगाने ख़ुदा में से एक ऐसे बन्दे को भेजा है जो ख़ौफ़ के दिनों में सोता नहीं है और दहशत के औक़ात में दुश्मनों से ख़ौफ़ज़दा नहीं होता है और फ़ाजिरों के लिये आग की गर्मी से ज़्यादा शदीदतर है और इसका नाम मालिक बिन अश्तर मज़हजी है लेहाज़ा तुम लोग उसकी बात सुनो और उसके अना व अम्र की इताअत करो जो मुताबिक़े हक़ हैं के वह अल्लाह की तलवारों में से एक तलवार है जिसकी तलवार कुन्द नहीं होती है और जिसका वार उचट नहीं सकता है , वह अगर कूच करने का हुक्म दे तो निकल खड़े हो और अगर ठहरने के लिये कहे तो फ़ौरन ठहर जाओ इसलिये के वह मेरे अम्र के बग़ैर न आगे बढ़ सकता है और न पीछे हट सकता है। न हमला कर सकता है और न पीछे हट सकता है। मैंने उसके मामले में तुम्हें अपने ऊपर मुक़द्दम कर दिया है और अपने पास से जुदा कर दिया है के वह तुम्हारा मुख़लिस साबित होगा और तुम्हारे दुश्मन के मुक़ाबले में इन्तेहाई सख़्तगीर होगा।

39-आपका मकतूबे गिरामी (अम्र इब्ने आस के नाम)

तूने अपने दीन को एक ऐसे शख़्स की दुनिया का ताबे बना दिया है जिसकी गुमराही वाज़ेह है और उसका परदाए उयूब चाक हो चुका है , वह शरीफ़ इन्सान को अपनी बज़्म में बिठाकर ऐबदार और अक़्लमन्द को अपनी मसाहेबत से अहमक़ बना देता है , तूने उसके नक़्शे क़दम पर क़दम जमाए हैं (((-इब्ने अबेल हदीद ने बिलाज़री के हवाले से नक़्ल किया है के उस्मान के मुहासरे के दौर में माविया ने शाम से एक फ़ौज यज़ीद बिन असद क़सरी की सरकर्दगी में रवाना की और उसे हिदायत देदी के मदीने के बाहर मुक़ाम ज़ी ख़शब में मुक़ीम रहें और किसी भी सूरत में मेरे हुक्म के बग़ैर मदीने में दाखि़ल न हों चुनांचे फ़ौज उसी मुक़ाम पर हालात का जाएज़ा लेती रही और क़त्ले उस्मान के बाद वापस शाम बुला ली गई , जिसका खुला हुआ मफ़हूम यह था के अगर इन्क़ेलाबी जमाअत कामयाब न हो सके तो इस फ़ौज की मदद से उस्मान का ख़ात्मा करा दिया जाए और उसके बाद ख़ूने उस्मान का हंगामा खड़ा करके अली (अ 0) से खि़लाफ़त सल्ब कर ली जाए। हक़ीक़ते अम्र यह है के आज भी दुनिया में उस शामी सियासत का सिक्का चल रहा है और इक़्तेदार की ख़ातिर अपने ही अफ़राद का ख़ात्मा किया जा रहा है ताके अपने जराएम की सफ़ाई दी जा सके और दुश्मन के खि़लाफ़ जंग छेड़ने का जवाज़ पैदा किया जा सके।

अफ़सोस के आलमे इस्लाम ने यह लक़ब ख़ालिद बिन अलवलीद को दे दिया है जिसने जनाबे मालिक बिन नवीरा को बेगुनाह क़त्ल करके उसी रात उनकी ज़ौजा से ताल्लुक़ात क़ायम कर लिये और इस पर हज़रत उमर तक ने अपनी बराहमी का इज़हार किया लेकिन हज़रत अबूबक्र ने सियासी मसालेह के तहत उन्हें “ सैफ़ुल्लाह ” क़रार देकर इतने संगीन जुर्म से बरी कर दिया- इन्नल्लाह .....)))

और उसके बचे खुचे की जुस्तजू की है जिस तरह के कुत्ता शेर के पीछे लग जाता है के उसके पन्जों की पनाह में रहता है और उस वक़्त का मुन्तज़िर रहता है जब शेर अपने शिकार का बचा खुचा फेंक दे और वह उसे खा ले , तुमने तो अपनी दुनिया और आखि़रत दोनों को गंवा दिया है , हालांके अगर हक़ की राह पर रहे होते जब भी यह मुद्दआ हासिल हो सकता था। बहरहाल अब ख़ुदा ने मुझे तुम पर और अबू सुफ़ियान के बेटे पर क़ाबू दे दिया तो मैं तुम्हारे हरकात का सही बदला दे दूंगा और अगर तुम बच कर निकल गए और मेरे बाद तक बाक़ी रह गए तो तुम्हारा आइन्दा दौर तुम्हारे लिये सख़्त तरीन होगा। वस्सलाम

40-आपका मकतूबे गिरामी (बाज़ गवर्नरो के नाम)

अम्माबाद! मुझे तुम्हारे बारे में एक बात की इत्तेलाअ मिली है , अगर तुमने ऐसा किया है तो अपने परवरदिगार को नाराज़ किया है। अपने इमाम की नाफ़रमानी की है और अपनी अमानतदारी को भी रूसवा किया है। मुझे यह ख़बर मिली है के तुमने बैतुलमाल की ज़मीन को साफ़ कर दिया है और जो कुछ ज़ेरे क़दम था उस पर क़ब्ज़ा कर लिया है और जो कुछ हाथों में था उसे धा गए हो लेहाज़ा फ़ौरन अपना हिसाब भेज दो और यह याद रखो के अल्लाह का हिसाब लोगों के हिसाब से ज़्यादा सख़्त है- वस्सलाम।

41-आपका मकतूबे गिरामी (बाज़ गवर्नरो के नाम)

अम्माबाद , मैंने तुमको अपनी अमानत में शरीककार बनाया था और ज़ाहिर व बातिन में अपना क़रार दिया था और हमदर्दी और मददगारी और अमानतदारी के एतबार से मेरे घरवालों में तुमसे ज़्यादा मोतबर कोई नहीं था , लेकिन जब तुमने देखा के ज़माना तुम्हारे इब्ने उम पर हमलावर है और दुश्मन आमादाए जंग है और लोगों की अमानत रूसवा हो रही है और उम्मत बेराह आौर लावारिस हो गई है तो तुमने भी अपने इब्ने उम से मुंह मोड़ लिया और जुदा होने वालों के साथ मुझसे जुदा हो गए और साथ छोड़ने वालों के साथ अलग हो गए और ख़यानतकारों के साथ ख़ाइन हो गए , न अपने इब्ने उम का साथ दिया और न अमानतदारी का ख़याल किया , गोया के तुमने अपने जेहाद से ख़ुदा का इरादा भी नहीं किया था।

(((- यह बात तो वाज़ेह है के हज़रत ने यह ख़त अपने किसी चचाज़ाद भाई के नाम लिखा है लेकिन उससे कौन मुराद है ? इसमें शदीद इख़्तेलाफ़ पाया जाता है , बाज़ हज़रात का ख़याल है के अब्दुल्लाह बिन अब्बास मुराद हैं वह बसरा के गवर्नर थे लेकिन जब मिस्र में मोहम्मद बिन अबीबक्र का हश्र देख लिया तो बैतुलमाल का सारा माल लेकर मक्के चले गए और वहीं ज़िन्दगी गुज़ारने लगे जिस पर हज़रत ने अपनी शदीद नाराज़गी का इज़हार फ़रमाया और इब्ने अब्बास के तमाम कारनामों पर ख़ते नस्ख़ खींच दिया और बाज़ हज़रात का कहना है के इब्ने अब्बास जैसे जब्र अलामता और मुफ़स्सिरे क़ुरान के बारे में इस तरह के किरदार का इमकान नहीं है लेहाज़ा इससे मुराद उनके भाई उबैदुल्लाह बिन अब्बास हैं जो यमन में हज़रत के गवर्नर थे लेकिन बाज़ हज़रात ने इस पर भी एतराज़ किया है के यमन के हालात में इनकी ख़यानतकारी का कोई तज़किरा नहीं है तो एक भाई को बचाने के लिये दूसरे को निशानाए रूस्तम क्यों बनाया जा रहा है। अब्दुल्लाह बिन अब्बास लाख आालिम व फ़ाज़िल व मुफ़स्सिरे क़ुरान क्यों न हों , इमामे मासूम नहीं हैं और बाज़ मामलात में इमाम या मुकम्मल पैरो इमाम के अलावा कोई साबित क़दम नहीं रह सकता है चाहे मर्दे आमी हो या मुफ़स्सिरे क़ुरान!-))))

और गोया तुम्हारे पास परवरदिगार की तरफ़ से कोई हुज्जत नहीं थी और गोया के तुम इस उम्मत को धोका देकर उसकी दुनिया पर क़ब्ज़ा करना चाहते थे और तुम्हारी नीयत थी के इनकी ग़फ़लत से फ़ायदा उठाकर उनके अमवाल पर क़ब्ज़ा कर लें। चुनान्चे जैसे ही उम्मत से ख़यानत करने की ताक़त पैदा हो गई तुमने तेज़ी से हमला कर दिया और फ़ौरन कूद पड़े और इन तमाम अमवाल को उचक लिया जो यतीमों और बेवाओं के लिये महफ़ूज़ किये गये थे जैसे कोई तेज़ रफ़्तार भेड़िया शिकस्ता या ज़ख़्मी बकरियों पर हमला कर देता है , फिर तुम उन अमवाल को हेजाज़ की तरफ़ उठा ले गए और इस हरकत से बेहद मुमतईन और ख़ुश थे और इसके लेने में किसी गुनाह का एहसास भी न था जैसे (ख़ुदा तुम्हारे दुश्मनों का बुरा करे) अपने घर की तरफ़ अपने मां बाप की मीरास का माल ला रहे हो। ऐ सुबहान अल्लाह , क्या तुम्हारा आखि़रत पर ईमान ही नहीं है और क्या रोज़े क़यामत के शदीद हिसाब का ख़ौफ़ भी ख़त्म हो गया हैं , ऐ वह शख़्स जो कल हमारे नज़दीक साहेबाने अक़्ल में शुमार होता था , तुम्हारे यह खाना पीना किस तरह गवारा होता है जबके तुम्हें मालूम है के तुम माले हराम खा रहे हो और हराम ही पी रहे हो और फिर अयताम (यतीमों) मसाकीन , मोमेनीन और मुजाहेदीन जिन्हें अल्लाह ने यह माल दिया है और जिनके ज़रिये उन शहरों का तहफ़्फ़ुज़ किया है , उनके अमवाल से कनीज़ें ख़रीद रहे हो और शादियां रचा रहे हो।

ख़ुदारा , ख़ुदा से डरो और उन लोगों के अमवाल वापस कर दो के अगर ऐसा न करोगे और ख़ुदा ने कभी तुम पर इख़्तेयार दे दिया तो तुम्हारे बारे में वह फ़ैसला करूंगा जो मुझे माज़ूर बना सके और तुम्हारा ख़ातेमा इसी तलवार से करूंगा जिसके मारे हुए का कोई ठिकाना जहन्नुम के अलावा नहीं है।

ख़ुदा की क़सम , अगर यही काम हसन (अ 0) व हुसैन (अ 0) ने किया होता तो उनके लिये भी मेरे पास किसी नर्मी का इमकान नहीं था और न वह मेरे इरादे पर क़ाबू पा सकते थे जब तक के उनसे हक़ हासिल न कर लूँ और उनके ज़ुल्म के आसार को मिटा न दूं।

ख़ुदाए रब्बुल आलमीन की क़सम मेरे लिये यह बात हरगिज़ ख़ुशकुन नहीं थी अगर यह सारे अमवाल मेरे लिये हलाल होते और मैं बाद वालों के लिये मीरास बनाकर छोड़ जाता , ज़रा होश में आओ के अब तुम ज़िन्दगी की आखि़री हदों तक पहुंच चुके हो और गोया के ज़ेरे ख़ाक दफ़्न हो चुके हो और तुम पर तुम्हारे आमाल पेश कर दिये गए हैं। इस मन्ज़िल पर जहां ज़ालिम हसरत से आवाज़ देंगे , और ज़िन्दगी बरबाद करने वाले वापसी की आरज़ू कर रहे होंगे और छुटकारे का कोई इमकान न होगा। (((-हज़रत अली (अ 0) के मुजाहिदात के इम्तियाज़ात में से एक इम्तियाज़ यह भी है के जिसकी तलवार आप पर चल जाए वह भी जहन्नमी है और जिस पर आपकी तलवार चल जाए वह भी जहन्नमी है इसलिये के आप इमामे मासूम और यदुल्लाह हैं और इमामे मासूम से किसी ग़लती का इमकान नहीं है और अल्लाह का हाथ किसी बेगुनाह और बेख़ता पर नहीं उठ सकता है। काश मौलाए कायनात के मुक़ाबले में आने वाले जमल व सिफ़्फ़ीन के फ़ौजी या सरबराह इस हक़ीक़त से बाख़बर होते और उन्हें इस नुक्ते का होश रह जाता तो कभी नफ़्से पैग़म्बर (स 0) से मुक़ाबला करने की हिम्मत न करते। यह किसी ज़ाती इम्तियाज़ का एलान नहीं है , यही बात परवरदिगार ने पैग़म्बर (स 0) से कही के तुम शिर्क इख़्तेयार कर लोगे तो तुम्हारे आमाल भी बरबाद कर दिये जाएंगे और यही बात पैग़म्बरे इस्लाम (स 0) ने अपनी दुख़्तरे नेक अख़्तर के बारे में फ़रमाई थी और यही बात मौलाए कायनात (अ 0) ने इमाम हसन और इमाम हुसैन (अ 0) के बारे में फ़रमाई है , गोया के यह एक सही इस्लामी किरदार है जो सिर्फ़ उन्हीं बन्दगाने ख़ुदा में पाया जाता है जो मशीयते इलाही के तर्जुमान और एहकामे इलाही की तमसील हैं वरना इस तरह के किरदार का पेश करना हर इन्सान के बस का काम नहीं है।-)))


42-आपका मकतूबे गिरामी

( बहरीन के गवर्नर अम्र बिन अबी सलमा मख़जू़मी के नाम जिन्हें माज़ूल करके नोमान बिन अजलान अज़्ज़रक़ी को मोअय्यन किया था)

अम्माबाद! मैंने नोमान बिन अजलान अज़्ज़र्क़ी को बहरीन का गवर्नर बना दिया है और तुम्हें उससे बेदख़ल कर दिया है लेकिन न इसमें तुम्हारी कोई बुराई है और न मलामत , तुमने हुकूमत का काम बहुत ठीक तरीक़े से चलाया है और अमानत को अदा कर दिया है लेकिन अब वापस चले आओ न तुम्हारे बारे में कोई बदगुमानी है न मलामत , न इल्ज़ाम है न गुनाह , असल में मेरा इरादा शाम के ज़ालिमों से मुक़ाबला करने का है लेहाज़ा मैं चाहता हूं के तुम मेरे साथ रहो के मैं तुम जैसे अफ़राद से दुश्मन से जंग करने और सुतूने दीम क़ायम करने में मदद लेना चाहता हूँ , इन्शाअल्लाह।

43-आपका मकतूबे गिरामी (मुस्क़ला बिन हबीरा अलशीबानी के नाम जो अर्द शीर ख़ुर्रह में आपके गवर्नर थे)

मुझे तुम्हारे बारे में एक ख़बर मिली जो अगर वाक़ेअन सही है तो तुमने अपने परवरदिगार को नाराज़ किया है और अपने इमाम की नाफ़रमानी की है , ख़बर यह है के मुसलमानों के माले ग़नीमत को जिसे उनके नैज़ों और घोड़ों ने जमा किया है और जिसकी राह में इनका ख़ून बहाया गया है , अपनी क़ौम के उन बद्दुओं में तक़सीम कर रहे हो जो तुम्हारे हवाख़्वाह हैं। क़सम उस ज़ात की जिसने दाने को शिगाफ़्ता किया है और जानदारों को पैदा किया है। अगर यह बातसही है तो तुम मेरी नज़रों में इन्तेहाई ज़लील हो गए हो और तुम्हारे आमाल का पल्ला हल्का हो जाएगा , लेहाज़ा ख़बरदार अपने रब के हुक़ूक़ को मामूली मत समझना और अपने दीन को बरबाद करके दुनिया आरास्ता करने की फ़िक्र न करना के तुम्हारा शुमार उन लोगों में हो जाए जिनके आमाल में ख़सारे के अलावा कुछ नहीं है।

याद रखो! जो मुसलमान तुम्हारे पास या मेरे पास हैं उन सबका हिस्सा उस माले ग़नीमत एक ही जैसा है और इसी ऐतबार से वह मेरे पास वारिद होते हैं और अपना हक़ लेकर चले जाते हैं।

44-आपका मकतूबे गिरामी

(ज़ियाद बिन अबिया के नाम जब आपको ख़बर मिली के माविया उसे अपने नसब में शामिल करके धोका देना चाहता है)

मुझे मालूम हुआ है के माविया ने तुम्हें ख़त लिखकर तुम्हारी अक़्ल को फ़िसलाना चाहा है और तुम्हारी धार को कुन्द बनाने का इरादा कर लिया है , लेहाज़ा ख़बरदार होशियार रहना , यह शैतान है जो इन्सान के पास आगे , पीछे , दाहिने बायें हर तरफ़ से आता है ताके उसे ग़ाफ़िल पाकर उस पर टूट पड़े और ग़फ़लत की हालत में उसकी अक़्ल सल्ब कर ले। (((-अमीरूल मोमेनीन (अ 0) का उसूले हूकूमत था के गवर्नरो पर हमेशा कड़ी निगाह रखते थे और उनके तसर्रूफ़ात की निगारानी किया करते थे और जहां किसी ने हुदूदे इस्लामिया से तजावुज़ किया , फ़ौरन तम्बीही ख़त तहरीर फ़रमा दिया करते थे और यही वह तजेऱ् अमल था जिसकी बिना पर बहुत से अफ़राद टूट कर माविया के साथ चले गए और दीन व दुनिया दोनों को बरबाद कर लिया , हबीरह उन्हीं अफ़राद में था और जब हज़रत ने उसके तसर्रूफ़ात पर तन्क़ीद फ़रमाई तो मुनहरिफ़ होकर शाम चला गया और माविया से मुलहक़ हो गया लेकिन आपका किरदार शाम के अन्धेरे में चमकता रहा और आज तक दुनिया को इस्लाम की रौशनी दिखला रहा है।-)))

वाक़ेया यह है के अबू सुफ़ियान ने अम्र बिन अलख़त्ताब के ज़माने में एक बेसमझी बूझी बात कह दी थी जो शैतानी वसवसों में से एक वसवसे की हैसियत रखती थी जिससे न कोई नसब साबित होता है और न किसी मीरास का इसतेहक़ाक़ पैदा होता है और इससे तमस्सुक करने वाला एक बिन बुलाया शराबी है जिसे धक्के देकर निकाल दिया जाए या प्याला है जो ज़ीने फ़रस में लटका दिया जाए और इधर-उधर ढलकता रहे। सय्यद रज़ी- इस ख़त को पढ़ने के बाद ज़ियाद ने कहा के रब्बे काबा की क़सम अली (अ 0) ने उस अम्र की गवाही दे दी और यह बात उसके दिल से लगी रही यहां तक के माविया ने उसके भाई होने का इदआ कर दिया। वाग़ल उस शख़्स को कहा जाता है जो बज़्मे शराब में बिन बुलाए दाख़िल हो जाए और धक्के देकर निकाल दिया जाए। और नूत मजबेज़ब वह प्याला वग़ैरा है जो मुसाफ़िर के सामान से बान्ध कर लटका दिया जाता है और वह मुसलसल इधर उधर ढलकता रहता है।

45-आपका मकतूबे गिरामी

(अपने बसरा के गवर्नर उस्मान बिन हुनैफ़ के नाम जब आपको इत्तेलाअ मिली के वह एक बड़ी दावत में शरीक हुए हैं)

अम्माबाद! इब्ने हुनैफ़! मुझे यह ख़बर मिली है के बसरा के बाज़ जवानों ने तुमको एक दावत में बुलाया था जिसमें तरह-तरह के ख़ुशगवार खाने थे और तुम्हारी तरफ़ बड़े-बड़े प्याले बढ़ाए जा रहे थे और तुम तेज़ी से वहां पहुंच गए थे। मुझे तो यह गुमान भी नहीं था के तुम ऐसी क़ौम की दावत में शिरकत करोगे जिसके ग़रीबों पर ज़ुल्म हो रहा हो और जिसके दौलतमन्द मदओ किये जाते हों , देखो जो लुक़मे चबाते हो उसे देख लिया करो और अगर उसकी हक़ीक़त मुश्तबा हो तो उसे फेंक दिया करो और जिसके बारे में यक़ीन हो के पाकीज़ा है उसी को इस्तेमाल किया करो। याद रखो! के हर मामूम का एक इमाम होता है जिसकी वह इक़्तेदा करता है और उसी को नूरे इल्म से कस्बे ज़िया करता है और तुम्हारे इमाम ने तो इस दुनिया में सिर्फ़ दो बोसीदा कपड़ों और दो रोटियों पर गुज़ारा किया है। मुझे मालूम है के तुम लोग ऐसा नहीं कर सकते हो लेकिन कम से कम अपनी एहतियात , कोशिश , उफ़्फ़त और सलामत रवी से मेरी मदद करो , ख़ुदा की क़सम मैंने तुम्हारी दुनिया से न कोई सोना जमा किया है और न उस माल व मताअ में से कोई ज़ख़ीरा इकट्ठा किया है और न इन बोसीदा कपड़ों के बदले कोई और मामूली कपड़ा मुहय्या किया है। (((-उस्मान बिन हुनैफ़ अनसार के क़बीलए औस की एक नुमायां शख़्सियत थे और यही वजह है के जब खि़लाफ़ते दोम में ईराक़ के वाली की तलाश हुई तो सबने बिलाइत्तेफ़ाक़ उस्मान बिन हुनैफ़ का नाम लिया और उन्हें अर्ज़े इराक़ की पैमाइश और इसके ख़ेराज की तअय्युन का ज़िम्मेदार बना दिया गया। अमीरूलमोमेनीन (अ 0) ने अपने दौरे हुकूमत में उन्हें बसरा का वाली बना दिया था और वह तल्हा व ज़ुबैर के वारिद होने तक बराबर मसरूफ़े अमल रहे और इसके बाद उन लोगों ने सारे हालात ख़राब कर दिये और बाला आखि़र हज़रत की शहादत के बाद कूफ़े मुन्तक़िल हो गए और वहीं इन्तेक़ाल फ़रमाया। उस्मान के किरदार में किसी तरह के शक व शुब्हे की गुन्जाइश नहीं है लेकिन अमीरूल मोमेनीन (अ 0) का इस्लामी निज़ामे अमल यह था के हुक्काम को अवाम के हालात को निगाह में रख कर ज़िन्दगी गुज़ारनी चाहिये और किसी हाकिम की ज़िन्दगी को अवाम के हालात से बालातर नहीं होनी चाहिये जिस तरह के हज़रत ने ख़ुद अपनी ज़िन्दगी गुज़ारी है और मामूली लिबास व ग़िज़ा पर पूरा दौरे हुकूमत गुज़ार दिया है।-)))

और न एक बालिश्त पर क़ब्ज़ा किया है और न एक बीमार जानवर से ज़्यादा ग़िज़ा हासिल किया है। यह दुनिया मेरी निगाह में कड़वी छाल से भी ज़्यादा हक़ीर और बेक़ीमत है , हां हमारे हाथों में उस आसमान के नीचे सिर्फ़ एक फ़िदक था मगर उस पर भी एक क़ौम ने अपनी लालच का मुज़ाहिरा किया और दूसरी क़ौम ने उसके जाने की परवाह न की और बहरहाल बेहतरीन फ़ैसला करने वाला परवरदिगार है और वैसे भी मुझे फ़िदक या ग़ैरे फ़िदक से क्या लेना देना है जबके नफ़्स की मन्ज़िल असली कल के दिन क़ब्र है जहां की तारीकी में तमाम आसार मुन्क़ता हो जाएंगे और कोई ख़बर न आएगी , यह एक ऐसा गढ़ा है जिसकी वुसअत ज़्यादा भी कर दी जाए और खोदने वाला उसे वसीअ भी बना दे तो बाला आखि़र पत्थर और ढेले उसे तंग बना देंगे और तह ब तह मिट्टी उसके शिगाफ़ को बन्द कर देगी। मैं तो अपने नफ़्स को तक़वा की तरबियत दे रहा हूँ ताके अज़ीम तरीन ख़ौफ़ के दिन मुतमइन होकर मैदान में आए और फिसलने के मुक़ामात पर साबित क़दम रहे। मैं अगर चाहता तो इस ख़ालिस शहद , बेहतरीन साफ़ शुदा गन्दुम और रेशमी कपड़ों के रास्ते भी पैदा कर सकता था लेकिन ख़ुदा न करे के मुझ पर ख़्वाहिशात का ग़लबा हो जाए और मुझे हिर्स व लालच अच्छे खानों के इख़्तेयार करने की तरफ़ खींच कर ले जाएं जबके मुमकिन है के हेजाज़ या यमामा में ऐसे अफ़राद भी हों जिनके लिये एक रोटी का सहारा न हुआ और शिकम सेरी का कोई सामान न हो। भला यह कैसे हो सकता है के मैं शिकम सेर होकर सो जाऊं और मेरी इतराफ़ भूके पेट और प्यासे जिगर तड़प् रहे हों। क्या मैं शाएर के शेर का मिस्दाक़ हो सकता हूं —” तेरी बीमारी के लिये यही काफ़ी है के तू पेट भर कर सो जाए और तेरे इतराफ़ वह जिगर भी हों जो सूखे चमड़े को भी तरस रहे हों ”

के न मेरा नफ़्स इस बात से मुतमईन हो सकता है के मुझे “ अमीरूल मोमेनीन ” कहा जाए और मैं ज़माने के नाख़ुशगवार हालात में मोमेनीन का शरीके हाल न बनूं और मामूली ग़िज़ा के इस्तेमाल में उनके वास्ते नमूना न पेश कर सकूं। मैं इसलिये तो नहीं पैदा किया गया हूं के मुझे बेहतरीन ग़िज़ाओं का खाना मशग़ूल कर ले और मैं जानवरों के मानिन्द हो जाऊं के वह बन्धे होते हैं तो उनका कुल मक़सद चारा होता है और आज़ाद होते हैं तो कुल मशग़ला इधर-उधर चरना होता है जहां घास फूस से अपना पेट भर लेते हैं और उन्हें इस बात की फ़िक्र भी नहीं होती है के उनका मक़सद क्या है , क्या मैं आज़ाद छोड़ दिया गया हूँ , या मुझे बेकार आज़ाद कर दिया गया है या मक़सद यह है के मैं गुमराही की रस्सी में आन्ध कर खींचा जाऊं। (((-आज दुनिया के ज़ोहद व तक़वा का बेशतर हिस्सा मजबूरियों की पैदावार है और इन्सान को जब दुनिया हासिल नहीं होती है तो वह दीन के ज़ेरे साया पनाह ले लेता है और ज़िक्रे आखि़रतत से अपने नफ़्स को बहलाता है लेकिन अमीरूल मोमेनीन (अ 0) का किरदार इससे बिलकुल मुख़्तलिफ़ है , आपके हाथों में दुनिया व आखि़रत का इख़्तेयार था , आपके बाज़ुओं में ज़ोरे ख़ैबर शिकमी और आपकी उंगलियों में क़ूवते रद्दे शम्स थी लेकिन इसके बावजूद फ़ाक़े कर रहे थे ताके इस्लाम में रियासत और हुकूमत ऐश परस्ती का ज़रिया न बन जाए और एहकाम अपनी सहूलियत का एहसास करें और अपनी ज़िन्दगी को ग़ुरबा के मेयार पर गुज़ारें ताके इनका दिल न टूटने पाए और इनके नफ़्स में ग़ुरूर न पैदा होने पाए , मगर अफ़सोस के दुनिया से यह तसव्वुर यकसर ग़ायब हो गया और रियासत व हुकूमत सिर्फ़ राहत व आराम और अय्याशी व ऐश परस्ती का वसीला बन कर रह गई। इन हालात की जुज़ी इस्लाह ग़ुलामाने अली (अ 0) के इस्लामी निज़ाम से हो सकती है और कुल इस्लाह फ़रज़न्दग अली (अ 0) के ज़ुहूर से हो सकती है। इसके अलावा बनी उमय्या और बनी अब्बास पर नाज़ करने वाले सलातीन इन हालात की इस्लाह नहीं कर सकते हैं। इन्सान और जानवर का नुक़्तए इम्म्तेयाज़ यही है के जानवर के यहाँ खाना और चारा मक़सदे हयात है और इन्सान के यहाँ यह अशया वसीलाए हयात हैं , लेहाज़ा इन्सान जब तक मक़सदे हयात और बन्दगीए परवरदिगार का तहफ़्फ़ुज़ करता रहेगा इन्सान रहेगा और जिस दिन इस नुक्ते से ग़ाफ़िल हो जाएगा उसका शुमार हैवानात में हो जाएगा।-)))

या भटकने की जगह पर मुंह उठाए फिरता रहूँ , गोया मैं देख रहा हूँ के तुम में से बाज़ लोग यह कह रहे हैं के जब अबूतालिब के फ़रज़न्द की ग़िज़ा ऐसी मामूली है तो उन्हें ज़ोफ़ ने दुश्मनों से जंग करने और बहादुरों के साथ मैदान में उतरने से बिठा दिया होगा। तो यह याद रखना के जंगल के दरख़्तों की लकड़ी ज़्यादा मज़बूत होती है और तरो ताज़ा दरख़्तों की छाल कमज़ोर होती है। सहराई झाड़ का ईन्धन ज़्यादा भड़कता भी है और इसके शोले देर में बुझते भी हैं। मेरा रिश्ता रसूले अकरम (स 0) से वही है जो नूर का रिश्ता नूर से होता है या हाथ का रिश्ता बाज़ुओं से होता है। ख़ुदा की क़सम अगर तमाम अरब मुझसे जंग करने पर इत्तेफ़ाक़ कर लें तो भी मैं मैदान से मुंह नहीं फेर सकता और अगर मुझे ज़रा भी मौक़ा मिल जाए तो मैं इनकी गर्दनें उड़ा दूंगा और इस बात की कोशिश करूंगा के ज़मीन को इस उलटी खोपड़ी और बेहंगम डील-डौल वाले से पाक कर दूँ ताके खलियान के दानों में से कंकर पत्थर निकल जाएं। (इस ख़ुतबे का आखि़री हिस्सा) ऐ दुनिया मुझसे दूर हो जा , मैंने तेरी बागडोर तेरे ही कान्धे पर डाल दी है और तेरे चंगुल से बाहर आ चुका हूँ और तेरे जाल से निकल चुका हूं और तेरे फिसलने के मुक़ामात की तरफ़ जाने से भी परहेज़ करता हूँ। कहाँ हैं वह लोग जिनको तूने अपनी हंसी मज़ाक़ की बातों से लुभा लिया था और कहां हैं वह क़ौमें जिनको अपनी ज़ीनत व आराइश से मुब्तिलाए फ़ितना कर दिया था , देखो अब वह सब क़ब्रों में रहन हो चुके हैं और लहद में दुबके पड़े हुए हैं। ख़ुदा की क़सम अगर तू कोई देखने वाली शै और महसूस होने वाला ढांचा होती तो मैं तेरे ऊपर ज़रूर हद जारी करता के तूने अल्लाह के बन्दों को आरज़ूओं के सहारे धोका दिया है और क़ौमों को गुमराही के गढ़े में डाल दिया है , बादशाहों को बरबादी के हवाले कर दिया है और उन्हें बलाओं की मन्ज़िल पर उतार दिया है जहां न कोई वारिद होने वाला है और न सादिर होने वाला। अफ़सोस! जिसने भी तेरी लग़ज़िश गाहों पर क़दम रखा वह फिसल गया और जो तेरी मौजों पर सवार हुआ वह ग़र्क़ हो गया , बस जिसने तेरे फन्दों से किनाराकशी इख़्तेयार की उसको तौफ़ीक़ हासिल हो गई , तुझसे बचने वाला इस बात की परवाह नहीं करता है के मन्ज़िल किस क़द्र तंग हो गई है। इसलिये के दुनिया इसकी निगाह में सिर्फ़ एक दिन के बराबर है जिसके एख़्तेताम का वक़्त हो चुका है। (((-बाज़ अफ़राद का ख़याल है के इन्सानी ज़िन्दगी में ताक़त का सरचश्मा इसकी ग़िज़ा होती है और इन्सान की ग़िज़ा जिस क़द्र लज़ीज़ और ख़ुश ज़ायक़ा होगी इन्सान उसी क़द्र हिम्मत और ताक़त वाला होगा हालांके यह बात बिल्कुल ग़लत और महमिल है। ताक़त का ताल्लुक़ लज़्ज़त व ज़ायक़े से नहीं है , क़ूवते नफ़्स और हिम्मते क़ल्ब से और इससे बालातर ताईदे परवरदिगार से के दस्ते क़ुदरत से सेराब होने वाला सहराई दरख़्त ज़्यादा मज़बूत होता है और इमकानात के अन्दर तरबियत पाने वाले अशजार इन्तेहाई कमज़ोर होते हैं के दस्ते बशर वह ताक़त नहीं पैदा कर सकता है जो दस्ते क़ुदरत से पैदा होती है। लफ़्ज़ों में यह बात बहुत आसान है लेकिन सजी सजाई दुनिया को तीन मरतबा तलाक़ देकर अपने से जुदा कर देना सिर्फ़ नफ़्से पैग़म्बर (स 0) का कारनामा है और उम्मत के बस का काम नहीं है। यह काम वही अन्जाम दे सकता है जो नफ़्स के चंगुल से आज़ाद हो , ख़्वाहिशात के फन्दों में गिरफ़्तार न हो और हर तरह की ज़ीनत व आराइश को अपनी निगाहों से गिरा चुका हो।-)))

तू मुझसे दूर हो जा , मैं तेरे क़ब्ज़े में आने वाला नहीं हूँ के तू मुझे ज़लील कर सके और न अपनी ज़माम तेरे हाथ में देने वाला हूँ के जिधर चाहे खींच सके , मैं ख़ुदा की क़सम खाकर कहता हूँ , और इस क़सम में मशीयते ख़ुदा के अलावा किसी सूरत को मुस्तशना नहीं करता। मैं इस नफ़्स को ऐसी तरबीयत दूंगा के एक रोटी पर भी ख़ुश रहे अगर वह बतौरे तआम और नमक बतौरे अदाम मिल जाए और मैं अपनी आंखों के सोने को ऐसा बना दूंगा जैसे वह चश्मा जिसका पानी तक़रीबन ख़ुश्क हो चुका हो और सारे आंसू बह गए हों , क्या यह मुमकिन है जिस तरह जानवर चारा खाकर बैठ जाते हैं और बकरियां घास से सेर होकर अपने बाड़े में लेट जाती हैं उसी तरह अली (अ 0) भी अपने पास का खाना खाकर सो जाए , उसकी आंखें फूट जाएं जो एक तवील ज़माना गुज़ारने के बाद आवारा जानवर और चराए हुए हैवानात की पैरवी करने लगे। खुशा नसीब उस नफ़्स के लिये जो अपने रब के फ़र्ज़ को अदा कर दे और सख्तियो के आलम में सब्र से काम ले , रातों को अपनी आंखों को खुला रखे यहां तक के नीन्द का ग़लबा होने लगे तो ज़मीन को बिस्तर बना ले और हाथों को तकिया , इन लोगों के दरम्यान जिनकी आंखों को ख़ौफ़े महशर ने बेदार रखा है और जिन के पहलू बिस्तरों से अलग रहे हैं उनके होंटों पर ज़िक्रे ख़ुदा के ज़मज़मे रहे हैं और उनके तूले अस्तग़फ़ार से गुनाहों के बादल छट गए हैं यही वह लोग हैं जो अल्लाह के गिरोह में हैं और याद रखो के अल्लाह का गिरोह ही कामयाब होने वाला है। इब्ने हनीफ़! अल्लाह से डरो , और तुम्हारी यह रोटियां तुम्हें हिर्स व लालच से रोके रहें ताके आतिशे जहन्नमसे आज़ादी हासिल कर सको।

(((- कहां दुनिया में ऐसा कोई इन्सान है जो साहबे जाहो जलाल , इक़्तेदार व बैतुलमाल हो , दुनिया में उसका सिक्का चल रहा हो और आलमे इस्लाम के ज़ेरे नगीं हो और इसके बाद या तो रातों को बेदारी और इबादते इलाही में गुज़ार दे या सोने का इरादा करे तो ख़ाक का बिस्तर और हाथ का तकिया बना ले , सलातीने ज़माना और हुक्कामे मुस्लेमीन तो इस सूरते हाल का तसव्वुर भी नहीं कर सकते हैं। इस किरदार के पैदा करने का क्या सवाल पैदा होता है।

वाज़ेह रहे के यह मौलाए कायनात की शख़्सी ज़िन्दगी का नक़्शा नहीं है , यह हाकिमे इस्लामी और ख़लीफ़तुल्लाह का मन्सबी किरदार है जिसे अवामी मफ़ादात आौर इस्लामी मुक़द्देरात का ज़िम्मेदार बनाया जाता है। इसके किरदार को ऐसा होना चाहिये और इसकी ज़िन्दगी में इसी क़िस्म की सादगी दरकार है , इन्सान के नफ़्से क़ुद्सी के पैदा करने का अज़म मोहकम करे वरना न इस्लामी तख़्त व इक़तेदार को छोड़कर ज़ुल्म व सितम की बिसात पर ज़िन्दगी गुज़ार दे और अपने को आलमे इस्लाम का हाकिम कहने और इरादा न करे वमा तौफ़ीक़ी इल्ला बिल्लाह-)))

46-आपका मकतूबे गिरामी (बाज़ गवर्नर के नाम)

अम्माबाद! तुम उन लोगों में हो जिनसे मैं दीन के क़याम के लिये मदद लेता हूँ और गुनहगारों की नख़वत को तोड़ देता हूँ और सरहदों के ख़तरात की हिफ़ाज़त करता हूँ लेहाज़ा अपने अहम उमूर में अल्लाह से मदद तलब करना और अपनी शिद्दत में थोड़ी नर्मी भी शामिल कर लेना , जहां तक नर्मी मुनासिब हो नर्मी ही से काम लेना और जहां सख़्ती के अलावा कोई चाराए कार न हो वहां सख़्ती ही करना , रिआया के साथ तवाज़ो से पेश आना और कुशादारवी का बरताव करना , अपना रवैया नर्म रखना और नज़र भर के देखने या कनखियों से देखने में भी बराबर का सुलूक करना और इशारा व सलाम में भी मसावात से काम लेना ताके बड़े लोग तुम्हारी नाइन्साफ़ी से उम्मीद न लगा बैठे और कमज़ोर अफ़राद तुम्हारे इन्साफ़ से मायूस न हो जाएं। वस्सलाम

47-आपकी वसीयत (इमाम हसन (अ 0) और इमाम हुसैन (अ 0) से- इब्ने मुलजिम की तलवार से ज़ख़्मी होने के बाद)

मैं तुम दोनों को यह वसीयत करता हूं के तक़वाए इलाही इख़्तेयार किये रहना और ख़बरदार दुनिया लाख तुम्हें चाहे उससे दिल न लगाना और न उसकी किसी शै से महरूम हो जाने पर अफ़सोस करना , हमेशा हर्फ़े हक़ कहना और हमेशा आखि़रत के लिये अमल करना और देखो ज़ालिम के दुश्मन रहना और मज़लूम के साथ रहना। मैं तुम दोनों को और अपने तमाम अहल व अयाल को और जहां तक मेरा यह पैग़ाम पहुंचे , सब को वसीयत करता हूं के तक़वाए इलाही इख़्तेयार करें , अपने उमूर को मुनज़्ज़म रखें , अपने दरम्यान ताल्लुक़ात को सुधारे रखें के मैंने अपने जद्दे बुज़ुर्गवार से सुना है के आपस के मामलात को सुलझाकर रखना आम नमाज़ और रोज़े से भी बेहतर है। देखो यतीमों के बारे में अल्लाह से डरते रहना और उनके फ़ाक़ों की नौबत न आजाए और वह तुम्हारी निगाहों के सामने बरबाद न हो जाएं और देखो हमसाये के बारे में अल्लाह से डरते रहना के उनके बारे में तुम्हारे पैग़म्बर (स 0) की वसीयत है और आप (स 0) बराबर उनके बारे में नसीहत फ़रमाते रहते थे यहां तक के हमने ख़याल किया के शायद आप वारिस भी बनाने वाले हैं। (((- यह इस बात की अलामत है के इस्लाम का बुनियादी मक़सद मुआशरे की इस्लाह समाज की तन्ज़ीम और उम्मत के मामलात की तरतीब है और नमाज़ रोज़े को भी दर हक़ीक़त इसका एक ज़रिया बनाया गया है वरना परवरदिगार किसी की इबादत और बन्दगी का मोहताज नहीं है और इसका तमामतर मक़सद यह है के इन्सान पेश परवरदिगार अपने को हक़ीर व फ़क़ीर समझे और इसमें यह एहसास पैदा हो के मैं भी तमाम बन्दगाने ख़ुदा में से एक बन्दा हूँ और जब सब एक ही ख़ुदा के बन्दे हैं और उसी की बारगाह में जाने वाले हैं तो आपस के तफ़रिक़े का जवाज़ क्या है और यह तफ़रिक़ा कब तक बरक़रार रहेगा। बालाआखि़र को एक दिन उसकी बारगाह में एक दूसरे का सामना करना है। इसके बाद अगर कोई शख़्स इस जज़्बे से महरूम हो जाए और शैतान उसके दिल व दिमाग़ पर मुसल्लत हो जाए तो दूसरे अफ़राद का फ़र्ज़ है के इस्लामी क़दम उठाएं और मुआशरे में इत्तेहाद व इत्तेफ़ाक़ की फ़िज़ा क़ायम करें के यह मक़सदे इलाही की तकमील और इरतेक़ाए बशरीयत की बेहतरीन अलामत है , नमाज़ रोज़ा इन्सान के ज़ाती आमाल हैं , और समाज के फ़साद से आंखें बन्द करके ज़ाती आमाल की कोई हैसियत नहीं रह जाती है। वरना अल्लाह के मासूम बन्दे कभी घर से बाहर ही न निकलते और हमेशा सजदए परवरदिगार ही में पड़े रहते।-)))

देखो! अल्लाह से डरो क़ुरआन के बारे में के इस पर अमल करने में दूसरे लोग तुमसे आगे न निकल जाएं और अल्लाह से डरो नमाज़ के बारे में के वह तुम्हारी दीन का सुतून है। और अल्लाह से डरो अपने परवरदिगार के घर के बारे में के जब तक ज़िन्दा रहो उसे ख़ाली न होने दो के अगर उसे छोड़ दिया गया तो तुम देखने के लाएक़ भी न रह जाओगे। और अल्लाह से डरो अपने जान और माल और ज़बान से जेहाद के बारे में और आपस में एक दूसरे से ताल्लुक़ात रखो। एक दूसरे की इमदाद करते रहो और ख़बरदार एक दूसरे से मुंह न फे़र लेना , और ताल्लुक़ात तोड़ न लेना और अम्रे बिल मारूफ़ और नहीं अनिल मुनकिर को नज़र अन्दाज़ न कर देना के तुम पर इशरार की हुकूमत क़ाएम हो जाए और तुम फ़रयाद भी करो तो उसकी समाअत न हो।

ऐ औलादे अब्दुल मुत्तलिब! ख़बरदार मैं यह न देखूं के तुम मुसलमानों का ख़ून बहाना शुरू कर दो सिर्फ़ इस नारे पर के “ अमीरूल मोमेनीन (अ 0) मारे गए हैं ” मेरे बदले में मेरे क़ातिल के अलावा किसी को क़त्ल नहीं किया जा सकता है।

देखो अगर मैं इस ज़रबत से जानबर न हो सका तो एक ज़रबत का जवाब एक ही ज़रबत है और देखो मेरे क़ातिल के जिस्म के टुकड़े न करना के मैंने ख़ुद सरकारे दो आलम (स 0) से सुना है के ख़बरदार काटने वाले कुत्ते के भी हाथ पैर न काटना। (((- कौन दुनिया में ऐसा शरीफ़ुन्नफ़्स और बलन्द किरदार है जो क़ानून की सरबलन्दी के लिये अपने नफ़्स का मवाज़ना अपने दुश्मन से करे और यह एलान कर दे के अगरचे मुझे मालिक ने नफ़्सुल्लाह और नफ़्से पैग़़म्बर (स 0) क़रार दिया है और मेरे नफ़्स के मुक़ाबले में कायनात के जुमला नफ़्सों की कोई हैसियत नहीं है लेकिन जहां तक इस दुनिया में क़सास का ताल्लुक़ है मेरा नफ़्स भी एक ही नफ्स शुमार किया जाएगा और मेरे दुश्मन को भी एक ही ज़र्ब लगाई जाएगी ताके दुनिया को यह एहसास पैदा हो जाए के मज़हब की तरजुमानी के लिये बलन्द किरदार की ज़रूरत होती है और समाज में ख़ूरेज़ी और फ़साद के रोकने का वाक़ई रास्ता क्या होता है , यही वह अफ़राद हैं जो खि़लाफ़ते इलाहिया के हक़दार हैं और उन्हीं के किरदार से इस हक़ीक़त की वज़ाहत होती है के इन्सानियत का काम फ़साद और ख़ूरेज़ी नहीं है बल्कि इन्सान इस सरज़मीन पर फ़साद और ख़ूरेज़ी की रोक थाम के लिये पैदा किया गया है और इसका मन्सब वाक़ेई खि़लाफ़ते इलाहिया है।)))

48-आपका मकतूबे गिरामी (माविया के नाम)

बेशक बग़ावत और दरोग़ गोई इन्सान को दीन और दुनिया दोनों में ज़लील कर देती है और इसके ऐब को नुक्ताए चीनी करने वाले के सामने वाज़ेह कर देती है। मुझे मालूम है के तू इस चीज़ को हासिल नहीं कर सकता है जिसके न मिलने का फ़ैसला किया जा चुका है के बहुत सी क़ौमों ने हक़ के बग़ैर मक़सद को हासिल करना चाहा और अल्लाह को गवाह बनाया तो अल्लाह ने उनके झूठ को वाज़ेह कर दिया (((-आपने माविया को होशियार करना चाहा है के यह ख़ूने उस्मान का मुतालबा कोई नया नहीं है , तुझसे पहले अहले जमल यह काम कर चुके हैं और उनका झूठ वाज़ह हो चुका है , और वह दुनिया व आखि़रत की रूसवाई मोल ले चुके हैं , अब तुझे दोबारा ज़लील व ख़्वार होने का शौक़ क्यों पैदा हुआ है , तेरा रास्ता रूसवाई और ज़िल्लत के सिवा कुछ नहीं है-))) उस दिन से डरो जिस दिन ख़ुशी सिर्फ़ उसी का हिस्सा होगी जिसने अपने अमल के अन्जाम को बेहतर बना लिया है और निदामत उसके लिये होगी जिसने अपनी मेहार शैतान के इख़्तेयार में दे दी और उसे खींचकर नहीं रखा। तुमने मुझे क़ुरानी फ़ैसले की दावत दी है हालांके तुम उसके अहल नहीं थी और मैंने भी तुम्हारी आवाज़ पर लब्बैक नहीं कही है बल्कि क़ुरान के हुक्म पर लब्बैक कही है।

49-आपका मकतूबे गिरामी (माविया ही के नाम)

अम्माबाद! दुनिया आखि़रत से रूगरदानी कर देने वाली है और इसका साथी जब भी कोई चीज़ पा लेता है तो इसके लिये हिर्स के दूसरे दरवाज़े खोल देती है और वह कभी कोई चीज़ हासिल करके उससे बेनियाज़ नहीं हो सकता है जिसको हासिल नहीं कर सका है , हालांके उन सबके बाद जो कुछ जमा किया है उससे अलग होना है और जो कुछ बन्दोबस्त किया है उसे तोड़ देना है और तू अगर गुज़िश्ता लोगों से ज़रा भी इबरत हासिल करता तो बाक़ी ज़िन्दगी को महफ़ूज़ कर सकता था। वस्सलाम

50-आपका मकतूबे गिरामी (लशकर के सरदारो के नाम)

बन्दए ख़ुदा , अमीरूल मोमेनीन अली बिन अबीतालिब (अ 0) की तरफ़ से सरहदों के मुहाफ़िज़ों के नाम , याद रखना के वाली पर क़ौम का हक़ यह है के उसने जिस बरतरी को पा लिया है या जिस फ़ारिग़ुल बाली की मन्ज़िल तक पहुंच गया है उसकी बिना पर क़ौम के साथ अपने रवैये में तबदीली न पैदा करे और अल्लाह ने जो नेमत उसे अता की है उसकी बिना पर बन्दगाने ख़ुदा से ज़्यादा क़रीबतर हो जाए और अपने भाइयों पर ज़्यादा ही मेहरबानी करे।

याद रखो मुझ पर तुम्हारा एक हक़ यह भी है के जंग के अलावा किसी मौक़े पर किसी राज़ को छिपाकर न रखूं और हुक्मे शरीअत के अलावा किसी मसले में तुम से मशविरा करने से पहलूतही न करूं , न तुम्हारे किसी हक़ को उसकी जगह से पीछे हटाऊँ और न किसी मामले को आखि़री हद तक पहुंचाए बग़ैर दम लूँ और तुम सब मेरे नज़दीक हक़ के मामले में बराबर हो , इसके बाद जब मैं इन हुक़ूक़ को अदा करूंगा तो तुम पर अल्लाह के लिये शुक्र और मेरे लिये इताअत वाजिब हो जाएगी और यह लाज़िम होगा के मेरी दावत से पीछे न हटो और किसी इस्लाह में कोताही न करो , हक़ तक पहुंचने के लिये सख्तियों में कूद पड़ो के तुम इन मामलात में सीधे न रहे तो मेरी नज़र में तुम से टेढ़े हो जाने वाले से ज़्यादा कोई हक़ीर व ज़लील न होगा उसके बाद मैं उसे सख़्त सज़ा दूंगा और मेरे पास कोई रिआयतत न पाएगा , तो अपने ज़ेरे निगरानी अम्रा से यही अहद व पैमान लो और अपनी तरफ़ से उन्हें वह हुक़ूक़ अता करो जिनसे परवरदिगार तुम्हारे उमूर की इस्लाह कर सके , वस्सलाम।

(((- यह इस्लामी क़ानून का सबसे बड़ा इम्तियाज़ है के इस्लाम हक़ लेने से पहले हक़ अदा करने की बात करता है और किसी शख़्स को उस वक़्त तक साहबे हक़ नहीं क़रार देता है जब तक वह दूसरों के हुक़ूक़ अदा न कर दे और यह साबित न कर दे के वह ख़ुद भी बन्दए ख़ुदा है और एहकामे इलाहिया का एहतेराम करना जानता है , इसके बग़ैर हुक़ूक़ का मुतालेबा करना बशर को मालिक से आगे बढ़ा देने के मुरादिफ़ है के अपने वास्ते मालिके कायनात भी क़ाबिले इताअत नहीं है और दूसरों के वास्ते अपनी ज़ात भी क़ाबिले इताअत है , यह फ़िरऔनियत और नमरूदियत की वह क़िस्म है जो दौरे क़दीम के फ़राअना में भी नहीं देखी गई और आज के हर फ़िरऔन में पाई जा रही है , कल फ़िरऔन अपने को फ़राएज़ से बालातर समझता था और आज वाले फ़राएज़ को फ़राएज़ समझते हैं और इसके बाद भी अदा करने की फ़िक्र नहीं करते हैं।-)))

51-आपका मकतूबे गिरामी (टैक्स वसूल करने वालों के नाम)

बन्दए ख़ुदा , अमीरूल मोमेनीन अली (अ 0) की तरफ़ से ख़ेराज वसूल करने वालों की तरफ़

अम्माबाद! जो शख़्स अपने अन्जामकार से नहीं डरता है वह अपने नफ़्स की हिफ़ाज़त का सामान भी फ़राहम नहीं करता है , याद रखो तुम्हारे फ़राएज़ बहुत मुख़्तसर हैं और उनका सवाब बहुत ज़्यादा है और अगर परवरदिगार ने बग़ावत और ज़ुल्म से रोकने के बाद उस पर अज़ाब भी न रखा होता तो उससे परहेज़ करने का सवाब ही इतना ज़्यादा था के उसके तर्क करने में कोई शख़्स माज़ूर नहीं हो सकता था , लेहाज़ा लोगों के साथ इन्साफ़ करो , उनके ज़रूरियात के लिये सब्र व तहम्मुल से काम लो के तुम रिआया के ख़ज़ानेदार , उम्मत के नुमाइन्दे और आइम्मा के सफ़ीर हो , ख़बरदार किसी शख़्स को उसकी ज़रूरत से रोक न देना और उसके मतलूब की राह में रूकावट न पैदा करना और ख़ेराज वसूल करने के लिये उसके सरदी या गर्मी के कपड़े न बेच डालना और न उस जानवर या ग़ुलाम पर क़ब्ज़ा कर लेना जो उसके काम आता है और किसी को पैसे की ख़ातिर मारने न लगना और किसी मुसलमान या काफ़िर ज़मी के माल को हाथ न लगाना मगर यह के उसके पास कोई ऐसा घोड़ा या असलहा हो जिसे दुश्मनाने इस्लाम को देना चाहता है तो किसी मुसलमान के लिये यह मुनासिब नहीं है के यह अशयाअ दुश्मनाने इस्लाम के हाथों में छोड़ दे और वह इस्लाम पर ग़ालिब आ जाएं। देखो किसी नसीहत को बचाकर न रखना , न लशकर के साथ अच्छे बरताव में कमी करना और न रिआया की इमदाद में और न दीने ख़ुदा को क़ौत पहुंचाने में , अल्लाह की राह में उसके तमाम फ़राएज़ को अदा कर देना के उसने हमारे और तुम्हारे साथ जो एहसान किया है उसका तक़ाज़ा यह है के हम उसके शुक्र की कोशिश करें और जहां तक मुमकिन हो उसके दीन की मदद करें के क़ौत भी तो बालाआखि़र ख़ुदाए अज़ीम का अतिया है।


52-आपका मकतूबे गिरामी (शहरो के गर्वनरो के नाम- नमाज़ के बारे में)

अम्माबाद- ज़ोहर की नमाज़ उस वक़्त तक अदा कर देना जब आफ़ताब का साया बकरियों के बाड़े की दीवार के बराबर हो जाए और अस्र की नमाज़ उस वक़्त तक पढ़ा देना जब आफ़ताब रौशन और सफ़ेद रहे और दिन में इतना वक़्त बाक़ी रह जाए जब मुसाफ़िर दो फ़रसख़ जा सकता हो। मग़रिब उस वक़्त अदा करना जब रोज़ेदार इफ़्तार करता है और हाजी अरफ़ात से कूच करता है और इशा उस वक़्त पढ़ना जब श़फ़क़ छिप जाए और एक तिहाई रात न गुज़रने पाए , सुबह की नमाज़ उस वक़्त अदा करना जब आदमी अपने साथी के चेहरे को पहचान सके। इनके साथ नमाज़़ पढ़ो कमज़ोरतरीन आदमी का लेहाज़ रखकर , और ख़बरदार इनके लिये सब्र आज़मा न बन जाओ। (((-वाज़ेह रहे के यह ख़त रूसा शहर के नाम लिखा गया है और उनके लिये नमाज़े जमाअत के औक़ात मुअय्यन किये गये हैं , इसका असल नमाज़ से कोई ताल्लुक़ नहीं है , अस्ल नमाज़ के औक़ात सूरए इसरा में बयान कर दिये गये हैं यानी ज़वाले आफ़ताब , तारीकीए शब और फ़ज्र और उन्हीं तीन औक़ात में पांच नमाज़ों को अदा हो जाना है। , जिसमें तक़दीम देना ख़ैर नमाज़ी के इख़्तेयार में है के फ़ज्र के एक डेढ़ घन्टे में दो रकअत कब अदा करेगा या ज़ोहर व अस्र के छः घण्टे में आठ रकअत किस वक़्त अदा करेगा या तारीकीए शब के बाद सात रकत मग़रिब व इशा कब पढ़ेगा , सरकारी जमाअत में इस तरह की आज़ादी मुमकिन नहीं है , इसका वक़्त मुअय्यन होना ज़रूरी है ताके लोग नमाज़ में शिरकत कर सकें , लेहाज़ा हज़रत ने इस दौर के हालात पेशे नज़र एक वक़्त मुअय्यन कर दिया , वरना आज के ज़माने में दो फ़रसख़ रास्ता पांच मिनट में तय होता है जो क़तअन इस मकतूबे गिरामी में मक़सूद नहीं है-)))

53-आपका मकतूबे गिरामी

( जिसे मालिक बिन अश्तर नग़मी के नाम तहरीर फ़रमाया है , उस वक़्त जब उन्हें मोहम्मद बिन अबीबक्र के हालात के ख़राब हो जाने के बाद मिस्र और उसके एतराफ़ का गवर्नर मुक़र्रर फ़रमाया और यह अहदनामा हज़रत के तमाम सरकारी ख़ुतूत में सबसे ज़्यादा मुफ़स्सिल और महासिन कलाम का जामा है)

बिस्मिल्लाहिर रहमानिर्रहीम

यह वह क़ुरान है जो बन्दए ख़ुदा , अमीरूल मोमेनीन अली (अ 0) ने मालिक बिन अश्तर नग़मी के नाम लिखा है जब उन्हें ख़ेराज जमा करने , दुश्मन से जेहाद करने , हालात की इस्लाह करने और शहरों की आबादकारी के लिये मिस्र का गवर्नर क़रार देकर रवाना किया।

सबसे पहला अम्र यह है के अल्लाह से डरो , उसकी इताअत को इख़्तेयार करो और जिन फ़राएज़ व सुन्ना का अपनी किताब में हुक्म दिया गया है उनका इत्तेबाअ करो के कोई शख़्स उनके इत्तेबाअ के बग़ैर नेक बख़्त नहीं हो सकता है और कोई शख़्स उनके इन्कार और बरबादी के बग़ैर बदबख़्त नहीं क़रार दिया जा सकता है , अपने दिल , हाथ और ज़बान से दीने ख़ुदा की मदद करते रहना के ख़ुदाए “ इज़्ज़्समहू ” ने यह ज़िम्मेदारी ली है के अपने मददगारों की मदद करेगा और अपने दीन की हिमायत करने वालों को इज़्ज़त व शरफ़ इनायत करेगा।

दूसरा हुक्म यह है के अपने नफ़्स के ख़्वाहिशात को कुचल दो और उसे मुंह ज़ोरियों से रोके रहो के नफ़्स बुराइयों का हुक्म देने वाला है जब तक परवरदिगार का रहम शामिल न हो जाए इसके बाद मालिक यह याद रखना के मैंने तुमको ऐसे इलाक़े की तरफ़ भेजा है जहां अद्ल व ज़ुल्म की मुख़्तलिफ़ हुकूमतें गुज़र चुकी हैं और लोग तुम्हारे मामलात को इस नज़र से देख रहे हैं जिस नज़र से तुम उनके आमाल को देख रहे थे और तुम्हारे बारे में वही कहेंगे जो तुम दूसरों के बारे में कह रहे थे , नेक किरदार बन्दों की शिनाख़्त इस ज़िक्रे ख़ैर से होती है जो उनके लिये लोगों की ज़बानों पर जारी होता है लेहाज़ा तुम्हारा महबूबतरीन ज़ख़ीराए अमले स्वालेह को होना चाहिये , ख़्वाहिशात को रोक कर रखो और जो चीज़ हलाल न हो उसके बारे में नफ़्स को सर्फ़ करने से कंजूसी करो के यही कंजूसी इसके हक़ में इन्साफ़ है चाहे उसे अच्छा लगे या बुरा , रिआया के साथ मेहरबानी और मोहब्बतत व रहमत को अपने दिल का शोआर बना लो और ख़बरदार इनके हक़ में फाड़ खाने वाले दरिन्दे के मिस्ल न हो जाना के उन्हें खा जाने ही को ग़नीमत समझने लगो। के मख़लूक़ाते ख़ुदा की दो क़िस्में हैं , बाज़ तुम्हारे दीनी भाई हैं और बाज़ खि़लक़त में तुम्हारे जैसे बशर हैं जिनसे लग़्ज़िशें भी हो जाती हैं और उन्हें ख़ताओं का सामना भी करना पड़ता है और जान बूझकर या धोके से उनसे ग़लतियां भी हो जाती हैं। लेहाज़ा उन्हें वैसे ही माफ़ कर देना जिस तरह तुम चाहते हो के परवरदिगार तुम्हारी ग़लतियों से दरगुज़र करे के तुम उनसे बालातर हो और तुम्हारा वलीए अम्र तुमसे बालातर है और परवरदिगार तुम्हारे वाली से भी बालातर है और उसने तुमसे उनके मामलात की अन्जामदही का मुतालबा किया है और उसे तुम्हारे लिये ज़रियाए आज़माइश बना दिया है और ख़बरदार अपने नफ़्स को अल्लाह के मुक़ाबले पर न उतार देना। (((-यह इस्लामी निज़ाम का इम्तेयाज़ी नुक्ता है के इस निज़ाम में मज़हबी तास्सुब से काम नहीं लिया जाता है बल्कि हर शख़्स को बराबर के हुक़ूक़ दिये जाते हैं। मुसलमान का एहतेराम उसके इस्लाम की बिना पर होता है और ग़ैर मुस्लिम के बारे में इन्सानी हुक़ूक़ का तहफ़्फ़ुज़ किया जाता है और उन हुक़ूक़ में बुनियादी नुक्ता यह है के हाकिम हर ग़लती का मवाख़ेज़ा न करे बल्कि उन्हें इन्सान समझ कर उनकी ग़लतियों को बरदाश्त करे और उनकी ख़ताओं से दरगुज़र करे और यह ख़याल रखे के मज़हब का एक मुस्तक़िल निज़ाम है “ रहम करो ताके तुम पर रहम किया जाए ’ अगर इन्सान अपने से कमज़ोर अफ़राद पर रहम नहीं करता है तो उसे जब्बार समावात व अर्ज़ से तवक़्क़ो नहीं करनी चाहिये , क़ुदरत का अटल क़ानून है के तुम अपने से कमज़ोर पर रहम करो ताके परवरदिगार तुम पर रहम करे और तुम्हारी ख़ताओं को माफ़ कर दे जिस पर तुम्हारी आक़ेबत और बख़्शिश का दारोमदार है-)))

इसलिये के लोगों में बहरहाल कमज़ोरियां पाई जाती हैं और उनकी परदापोशी की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी वाली पर है लेहाज़ा ख़बरदार जो ऐब तुम्हारे सामने नहीं है उसका इन्केशाफ़ न करना , तुम्हारी ज़िम्मेदारी सिर्फ़ उयूब की इस्लाह कर देना है और ग़ायबात का फ़ैसला करने वाला परवरदिगार है जहां तक मुमकिन हो लोगों के उन तमाम उयूब की परदा पोशी करते रहो जिन अपने उयूब की परदापोशी की परवरदिगार से तमन्ना करते हो , लोगों की तरफ़ से कीना की कर गिरह को खोल दो और दुश्मनी की हर रस्सी को काट दो और जो बात तुम्हारे लिये वाज़ेह न हो उससे अन्जान बन जाओ और हर चुग़लख़ोर की तस्दीक़ में उजलत से काम न लो के चुग़लख़ोर हमेशा ख़यानततकार होता है चाहे वह मुख़लेसीन ही के भेस में क्यों न आए।

( मशावेरत) देखो अपने मशविरे में किसी कंजूसी को शामिल न करना के वह तुमको फ़ज़्ल व करम के रास्ते से हटा देगा और फ़क़्र व फ़ाक़े का ख़ौफ़ दिलाता रहेगा और इसी तरह बुज़दिल से मशविरा न करना के वसह हर मामले में कमज़ोर बना देगा , और हरीस से भी मशविरा न करना के वह ज़ालिमाना तरीक़े से माल जमा करने को भी तुम्हारी निगाहों में आरास्ता कर देगा , यह कंजूसी , बुज़दिली और लालच अगरचे अलग-अलग जज़्बात व ख़साएल हैं लेकिन इन सबका क़द्रे मुश्तर्क परवरदिगार से सूए ज़न है जिसके बाद इन ख़सलतों का ज़हूर होता है।

( वोज़रात): और देखो तुम्हारे वज़ीरो में सबसे ज़्यादा बदतर वह है जो तुमसे पहले अशरार का वज़ीर रह चुका हो और उनके गुनाहों में शरीक रह चुका हो , लेहाज़ा ख़बरदार! ऐसे अफ़राद को अपने ख़्वास में शामिल न करना के यह ज़ालिमों के मददगार और ख़यानत कारों के भाई बन्द हैं और तुम्हें इनके बदले बेहतरीन अफ़राद मिल सकते हैं जिनके पास उन्हीं की जैसी अक़्ल और कारकर्दगी हो और उनके जैसे गुनाहों के बोझ और ख़ताओं के अम्बार न हों , न उन्होंने किसी ज़ालिम की उसके ज़ुल्म में मदद की हो और न किसी गुनाहगार का उसके गुनाह में साथ दिया हो , यह वह लोग हैं जिनका बोझ तुम्हारे लिये हल्का होगा और यह तुम्हारे बेहतरीन मददगार होंगे और तुम्हारी तरफ़ मोहब्बत का झुकाव भी रखते होंगे और अग़यार से मुहब्बत भी न रखते होंगे। उन्हीं को अपने मख़सूस जलसो में अपना मुसाहब क़रार देना और फिर उनमें भी सबसें ज़्यादा हैसियत उसे देना जो हक़ के हर्फे तल्ख़ को कहने की ज़्यादा हिम्मत रखता हो और तुम्हारे किसी ऐसे अमल में तुम्हारा साथ न दे जिसे परवरदिगार अपने औलिया के लिये न पसन्द करता हो चाहे वह तुम्हारी ख़्वाहिशात से कितनी ज़्यादा मेल क्यों न खाती हो।

मसाहेबत: अपना क़रीबी राबेता अहले तक़वा और अहले सदाक़त से रखना और उन्हें भी इस अम्र की तरबीयत देना के बिला सबब तुम्हारी तारीफ़ न करें और किसी ऐसे बेबुनियाद अमल का ग़ुरूर न पैदा कराएं जो तुमने अन्जाम न दिया हो के ज़्यादा तारीफ़ से ग़ुरूर पैदा होता है और ग़ुरूरे इन्सान को सरकशी से क़रीबतर बना देता है।

देखो ख़बरदार! नेक किरदार और बदकिरदार तुम्हारे नज़दीक एक जैसे न होने पाएं के इस तरह नेक किरदारों में नेकी से बददिली पैदा होगी और बदकिरदारों में बदकिरदारी का हौसला पैदा होगा। हर शख़्स के साथ वैसा ही बरताव करना जिसके क़ाबिल उसने अपने को बनाया है और याद रखना के हाकिम में जनता से हुस्ने ज़न की उसी क़द्र तवक़्क़ो करनी चाहिये जिस क़द्र उनके साथ एहसान किया है और उनके बोझ को हलका बनाया है और उनको किसी ऐसे काम पर मजबूर नहीं किया है जो उनके इमकान में न हो , लेहाज़ा तुम्हारा बरताव इस सिलसिले में ऐसा ही होना चाहिये जिससे तुम जनता से ज़्यादा से ज़्यादा हुस्ने ज़न पैदा कर सको के यह हुस्ने ज़न बहुत सी अन्दरूनी ज़हमतों को खत्म कर देता है और तुम्हारे हुस्ने ज़न का भी सबसे ज़्यादा हक़दार वह है जिसके साथ तुमने बेहतरीन सलूक किया है। (((-इन बातो में ज़िन्दगी के मुख़तलिफ़ हिस्सो के बारे में हिदायत का ज़िक्र किया गया है और इस नुक्ते की तरफ़ तवज्जो दिलाई गई है के हाकिम को ज़िंदगी के किसी भी हिस्से से ग़ाफ़िल नहीं होना चाहिये और किसी मोक़े पर भी कोई ऐसा क़दम नहीं उठाना चाहिये जो हुकूमत को तबाह व बरबाद कर दे और आम जनता के फ़ायदे को ग़फलत की नज़र करके उन्हें ज़ुल्म व सितम का निशाना बना दे-)))

सबसे ज़्यादा बदज़नी का हक़दार वह है जिस का बरताव तुम्हारे साथ ख़राब रहा हो , देखो किसी ऐसी नेक सुन्नत को मत तोड़़ देना जिस पर इस उम्मत के बुज़ुर्गों ने अमल किया है और उसी के ज़रिये समाज में उलफ़त क़ायम होती है और जनता के हालात की इस्लाह हुई है और किसी ऐसी सुन्नत को ईजाद न करना जो गुज़िश्ता सुन्नतों के हक़ में नुक़सानदेह हो के इस तरह अज्र उसके लिये होगा जिसने सुन्नत को ईजाद किया है और गुनाह तुम्हारी गर्दन पर होगा के तुमने उसे तोड़ दिया है।

ओलमा के साथ इल्मी मुबाहेसे और हुकमा के साथ सन्जीदा बहस जारी रखना उन मसाएल के बारे में जिनसे इलाक़े के काम की इस्लाह होती है और काम क़ायम रहते हैं जिनसे गुज़िश्ता अफ़राद के हालात की इस्लाह हुई है। और याद रखो के जनता के बहुत से तबक़ात होते हैं जिनमें किसी की इस्लाह दूसरे के बग़ैर नहीं हो सकती है और कोई दूसरे से मुस्तग़नी नहीं हो सकता है। उन्हीं में अल्लाह के लशकर के सिपाही हैं और उन्हीं में आम व ख़ास काम के कातिब हैं उन्हीं में अदालत से फ़ैसले करने वाले हैं और उन्हीं में इन्साफ़ और नर्मी क़ायम करने वाले गवर्नर हैं उन्हीं में मुसलमान अहले ख़ेराज और काफ़िर अहले ज़िम्मा हैं और उन्हीं में तिजारत और सनअत (तिजारत पेशा व अहले हरफ़ा) वाले अफ़राद हैं और फिर उन्हीं में फ़ोक़रा और मसाकीन का पस्त तरीन तबक़ा भी शामिल है और सबके लिये परवरदिगार ने एक हिस्सा मुअय्यन कर दिया है। और अपनी किताब के फ़राएज़ या अपने पैग़म्बर की सुन्नत में इसकी हदें क़ायम कर दी हैं और यह वह अहद है जो हमारे पास महफ़ूज़ है। फ़ौजी दस्ते बहुक्मे ख़ुदा से जनता के मुहाफ़िज़ और वालियों की ज़ीनत हैं , उन्हीं से दीन की इज़्ज़त है और यही अम्न व अमान के वसाएल हैं। रईयत का (नज़्म व नस्क़) काम का क़याम उनके बग़ैर नहीं हो सकता है और यह दस्ते भी क़ायम नहीं रह सकते हैं। जब ततक वह ख़ेराज न निकाल दिया जाए जिसके ज़रिये से दुश्मन से जेहाद की ताक़त फ़राहम होती है और जिसपर हालात की इस्लाह में एतमाद किया जाता है और वही इनके हालात के दुरूस्त करने का ज़रिया है और इसके बाद इन दोनों सनफ़ों (तबक़ों) का क़याम काज़ियों आमिलों और कातिबों के तबक़े के बग़ैर नहीं हो सकता है के यह सब अहद व पैमान को मुस्तहकम बनाते हैं मामूली और ग़ैर मामूली मामलात में उनपपर एतमाद किया जाता है , इसके बाद उन सबका क़याम सौदागरों और सनअतकारों पर होता है के वह वसाएले हयात को फ़राहम करते हैं , बाज़ारों को क़ायम रखते हैं और लोगों की ज़रूरत का सामान उनकी ज़हमत के बग़ैर फ़राहम कर देते हैं। इसके बाद फ़ोक़रा व मसाकीन का पस्त तबक़ा है जो मदद का हक़दार है और अल्लाह के यहां हर एक के लिये सामाने हयात मुक़र्रर है और हर तबक़े का वाली पर इतनी मिकदार में हक़ है जिससे इसके अम्र की इस्लाह हो सके और वाली इस फ़रीज़े से ओहदा बरआ नहीं हो सकता है जब तक इन मसाएल का एहतेमाम न करे और अल्लाह से मदद तलब न करे और अपने नफ़्स को हुक़क़ की अदाएगी और इस राह के ख़फ़ीफ़ व सक़ील पर सब्र करने के लिये आमादा न करे लेहाज़ा लशकर का सरदार उसे क़रार देना जो अल्लाह , रसूल और इमाम का सबसे ज़्यादा मुख़लिस , सबसे ज़्यादा पाकदामन और सबसे ज़्यादा बरदाश्त करने वाला हो। (((-इस मुक़ाम पर अमीरूलमोमेनीन (अ 0) ने समाज को 9हिस्सों पर तक़सीम किया है और सबके ख़ुसूसियात , फ़राएज़ , अहमियत और ज़िम्मेदारियों का तज़किरा फ़रमाया है और यह वाज़ेह कर दिया है के एक काम दूसरे के बग़ैर नहीं हो सकता है लेहाज़ा हर एक का फ़र्ज़ है के दूसरे की मदद करे ताके समाज की मुकम्मल इस्लाह हो सके और मुआशरा चैन और सुकून की ज़िन्दगी जी सके वरना इसके बगै़र समाज तबाह व बरबाद हो जाएगा और इसकी ज़िम्मेदारी तमाम तबक़ात पर यकसां तौर पर आयद होगी।-)))

फ़ौज का सरदार उसको बनाना जो अपने अल्लाह का और अपने रसूल (स 0) का और तुम्हारे इमाम का सबसे ज़्यादा ख़ैरख़्वाह हो सबसे ज़्यादा पाक दामन हो , और बुर्दबारी में नुमायां हो , जल्द ग़ुस्से में न आ जाता हो , उज़्र माज़ेरत पर मुतमइन हो जाता हो , कमज़ोरों पर रहम खाता हो और ताक़तवरों के सामने अकड़ जाता हो न बदख़ोई उसे जोश में ले आती हो और न पस्त हिम्मती उसे बिठा देती हो , फिर ऐसा होना चाहिये के तुम बलन्द ख़ानदान , नेक घराने और उमदा रिवायात रखने वालों और हिम्मत व शुजाअत और जूद व सख़ावत के मालिकों से अपना रब्त व ज़ब्त बढ़ाओ क्योंके यही लोग बुज़ुर्गियों का सरमाया और नेकियों का सरचश्मा होते हैं फिर उनके हालात की इस तरह देख भाल करना , जिस तरह माँ बाप अपनी औलाद की देखभाल करते हैं , अगर उनके साथ कोई ऐसा सलूक करो के जो उनकी तक़वीयत का सबब हो तो उसे बड़ा न समझना और अपने किसी मामूली सुलूक को भी ग़ैर अहम न समझ लेना (के उसे छोड़ बैठो) क्योंके इस हुस्ने सुलूक से उनकी ख़ैरख़्वाही का जज़्बा उभरेगा और हुस्ने एतमाद में इज़ाफ़ा होगा और इस ख़याल से के तुमने उनकी बड़ी ज़रूरतों को पूरा कर दिया है , कहीं उनकी छोटी ज़रूरतों से आंख बन्द न कर लेना , क्योंके यह छोटी क़िस्म की मेहरबानी की बात भी अपनी जगह फ़ायदाबख़्श होती है और वह बड़ी ज़रूरतें अपनी जगह अहमियत रखती हैं और फ़ौजी सरदारों में तुम्हारे यहां वह बुलन्द मन्ज़िलत समझा जाए , जो फ़ौजियों की एआनत में बराबर का हिस्सा लेता हो और अपने रूप्ये पैसे से इतना सलूक करता हो जिससे उनका और उनके पीछे रह जाने वाले बाल-बच्चों का बख़ूबी गुज़ारा हो सकता हो। ताके वह सारी फ़िक्रों से बेफ़िक्र होकर पूरी यकसूई के साथ दुश्मन से जेहाद करें इसलिये के फ़ौजी सरदारों के साथ तुम्हारा मेहरबानी से पेश आना इनके दिलों को तुम्हारी तरफ़ मोड़ देगा।

हुक्मरानों के लिये सबसे बड़ी आंखों की ठण्डक इसमें है के शहरों में अद्ल व इन्साफ़ बरक़रार रहे और जनता की मोहब्बत ज़ाहिर होती रहे और उनकी मोहब्बत उसी वक़्त ज़ाहिर हुआ करती है के जब उनके दिलों में मैल न हो , और उनकी ख़ैर ख़्वाही उसी सूरत में साबित होती है के ववह अपने हुक्मरानों के गिर्द हिफ़ाज़त के लिये घेरा डाले रहें। इनका इक़्तेदार सर पड़ा बोझ न समझें और न उनकी हुकूमत के ख़ात्मे के लिये घड़ियां गिनें , लेहाज़ा उनकी उम्मीदों में वुसअत व कशाइश रखना , उन्हें अच्छे लफ़्ज़ों से सराहते रहना और उनमें के अच्छी कारकर्दगी दिखाने वालों के कारनामों का तज़किरा करते रहना , इसलिये के इनके अच्छे कारनामों का ज़िक्र बहादुरों को जोश में ले आता है और पस्त हिम्मतों को उभारता है , इन्शाअल्लाह जो शख़्स जिस कारनामे को अन्जाम दे उसे पहचानते रहना और एक का कारनामा दूसरे की तरफ़ मन्सूब न कर देना और उसकी हुस्ने कारकर्दगी का सिला देने में कमी न करना और कभी ऐसा न करना के किसी शख़्स की बलन्दी व रफ़अत की वजह से उसके मामूली काम को बढ़ा समझ लो और किसी के बड़े काम को उसके ख़ुद पस्त होने की वजह से मामूली क़रार दे लो। जब ऐसी मुश्किलें तुम्हें पेश आएं के जिनका हल न हो सके और ऐसे मुआमलात के जो मुश्तबा हो जाएं तो उनमें अल्लाह और रसूल (स 0) की तरफ़ रूजू करो क्योंके ख़ुदा ने जिन लोगों को हिदायत करना चाही है उनके लिये फ़रमाया है - “ ऐ ईमान दारों अल्लाह की इताअत करो , और उसके रसूल (स 0) की और उनकी जो तुम में साहेबाने अम्र हों ” तो अल्लाह की तरफ़ रूजू करने का मतलब यह है के उसकी किताब की मोहकम आयतों पर अमल किया जाए और रसूल की तरफ़ रूजु करने का मतलब यह है कि आपके उन मुत्तफ़िक़ अलिया इरशादात पर अमल किया जाए जिनमें कोई इख़्तेलाफ़ नहीं (मक़सद उनकी सुन्नत की तरफ़ पलटाना है , जो उम्मत को जमा करने वाली हो तफ़रिक़ा डालने वाली न हो)।

क़ज़ावतः फिर उसके बाद तुम ख़ुद भी उनके फ़ैसलों की निगरानी करते रहना और उनके अताया में इतनी वुसअत पैदा कर देना के उनकी ज़रूरत ख़त्म हो जाए और फिर लोगों के मोहताज न रह जाएं उन्हें अपने पास ऐसा मरतबा और मुक़ाम अता करना जिसकी तुम्हारे ख़्वास भी लालच न करते हों के इस तरह वह लोगों के ज़रर पहुंचाने से महफ़ूज़ हो जाएंगे। मगर इस मामले पर भी गहरी निगाह रखना के यह दीन बहुत दिनों अशरार के हाथों में क़ैदी रह चुका है जहां ख़्वाहिशात की बुनियाद पर काम होता था और मक़सद सिर्फ़ दुनिया तलबी था।

उम्मालः इसके बाद अपने आमिलों के मामलात पर भी निगाह रखना और उन्हें इम्तेहान के बाद काम सिपुर्द करना और ख़बरदार ताल्लुक़ात या जानिबदारी की बिना पर ओहदा न दे देना के यह बातें ज़ुल्म और ख़यानत के असरात में शामिल हैं और देखो इनमें भी जो मुख़लिस और ग़ैरतमन्द हों उनको तलाश करना जो अच्छे घराने के अफ़राद हों और उनके इस्लाम में साबिक़ जज़्बात रह चुके हों के ऐसे लोग ख़ुश इख़लाक़ और बेदाग़ इज़्ज़त वाले होते हैं , इनके अन्दर फ़िज़ूल ख़र्ची की लालच कम होती है और यह अन्जामकार पर ज़्यादा नज़र रखते हैं। इसके बाद इनके भी तमाम एख़राजात का इन्तेज़ाम कर देना के इससे उन्हें अपने नफ़्स की इस्लाह का भी मौक़ा मिलता है और दूसरों के अमवाल पर क़ब्ज़ा करने से भी बेनियाज़ हो जाते हैं और फिर तुम्हारे अम्र की मुख़ालेफ़त करें या अमानत में रख़ना पैदा करें तो उन पर हुज्जत तमाम हो जाती है। इसके बाद उन गवर्नरो के आमाल की भी तफ़तीश करते रहना और निहायत मोतबर क़िस्म के अहले सिद्क़ व सफ़ा को उन पर जासूसी के लिये मुक़र्रर कर देना के यह तर्ज़े अमल (((-इस मुक़ाम पर क़ाज़ियों के हस्बेज़ैल सिफ़ात का तज़किरा किया गया है-

1. ख़ुद हाकिम की निगाह में क़ज़ावत करने के क़ाबिल हो।

2. तमाम जनता से अफ़ज़लीयत की बुनियाद पर मुन्तख़ब किया गया हो।

3. मसाएल में उलझ न जाता हो बल्कि साहेबे नज़र व स्तमबात हो।

4. फ़रीक़ैन के झगड़ों पर ग़ुस्सा न करता हो।

5. ग़लती हो जाए तो उस पर अकड़ता न हो।

6. लालची न हो।

7. मुआमलात की मुकम्मल तहक़ीक़ करता हो और काहेली का शिकार न हो।

8. शुबहात के मौक़े पर जल्दबाज़ी से काम न लेता हो बल्कि दीगर मुक़र्ररा क़वानीन की बुनियाद पर फ़ैसला करता हो।

9. दलाएल को क़ुबूल करने वाला हो।

10. फ़रीक़ैन की तरफ़ मराजअ करने से उकताता न हो बल्कि पूरी बहस सुनने की सलाहियत रखता हो।

11. तहक़ीक़ातत में बेपनाह क़ूवते सब्र व तहम्मुल का मालिक हो।

12. बात वाज़ेह हो जाए तो क़तई फ़ैसला करने में तकल्लुफ़ न करता हो।

13. तारीफ़ से मग़रूर न होता हो ।

14. लोगों के उभारने से किसी तरफ़ झुकाव न पैदा करता हो।-)))

उन्हें अमानतदारी के इस्तेमाल पर और जनता के साथ नर्मी के बरताव पर आमादा करेगा और देखो अपने मददगारों से भी अपने को बचाकर रखना के अगर उनमें कोई एक भी ख़यानत की तरफ़ हाथ बढ़ाए और तुम्हारे जासूस मुत्तफ़िक़ा तौर पर यह ख़बर दें तो इस शहादत को काफ़ी समझ लेना और इसे जिस्मानी एतबार से भी सज़ा देना और जो माल हासिल किया है उसे छीन भी लेना और समाज में ज़िल्लत के मक़ाम पर रख कर ख़यानतकारी के मुजरिम की हैसियत से रू शिनास कराना और ज़ंग व रूसवाई का तौक़ उसके गले में डाल देना।

ख़ेराजः ख़ेराज और मालगुज़ारी के बारे में वह तरीक़ा इख़्तेयार करो जो मालगुज़ारों के हक़ में ज़्यादा मुनासिब हो के ख़ेराज और अहले ख़ेराज के सलाह ही में सारे तुम्हारे सारे मुआशरे की सलाह है और किसी के हालात की इस्लाह ख़ेराज की इस्लाह के बग़ैर नहीं हो सकती है , लोग सबके सब इसी ख़ेराज के भरोसे ज़िन्दगी गुज़ारते हैं , ख़ेराज में तुम्हारी नज़र माल जमा करने से ज़्यादा ज़मीन की आबादकारी पर होनी चाहिये के माल की जमाआवरी ज़मीन की आबादकारी के बग़ैर मुमकिन नहीं है और जिसने आबादकारी के बग़ैर मालगुज़ारी का मुतालेबा किया उसने शहरों को बरबाद कर दिया और बन्दों को तबाह कर दिया और उसकी हुकूमत चन्द दिनों से ज़्यादा क़ायम नहीं रह सकती है। इसके बाद अगर लोग गरांबारी , आफ़ते नागहानी , नहरों की ख़ुश्की , बारिश की कमी , ज़मीन की ग़रक़ाबी की बिना पर तबाही और ख़ुश्की की बिना पर बरबादी की कोई फ़रियाद करें तो उनके ख़ेराज में इस क़द्र तख़फ़ीफ़ कर देना के उनके काम की इस्लाह हो सके और हख़बरदार यह तख़फ़ीफ़ तुम्हारे नफ़्स पर गरां न गुज़रे इसलिये के तख़फ़ीफ़ और सहूलत एक ज़ख़ीरा है जिसका असर शहरों की आबादी और हुक्काम की ज़ेब व ज़ीनत की शक्ल में तुम्हारी ही तरफ़ वापस आएगा और इसके अलावा तुम्हें बेहतरीन तारीफ़ भी हासिल होगी और अद्ल व इन्साफ़ के फैल जाने से मसर्रत भी हासिल होगी , फिर उनकी राहत व रफ़ाहियत और अद्ल व इन्साफ़ , नरमी व सहूलत की बिना पर जो एतमाद हासिल किया है उससे एक इन्सानी ताक़त भी हासिल होगी जो बवक़्ते ज़रूरत काम आ सकती है। इसलिये के बसा औक़ात ऐसे हालात पेश आ जाते हैं के जिसमें एतमाद व हुस्ने ज़न के क़द्रदान पर एतमाद करो तो निहायत ख़ुशी से मुसीबत को बरदाश्त कर लेते हैं और इसका सबब ज़मीनों की आबादकारी ही होता है। ज़मीनों की बरबादी अहले ज़मीन की तंगदस्ती से पैदा होती है और तंगदस्ती का सबब हुक्काम के नफ़्स का जमाआवरी की तरफ़ रूझान होता है और उनकी यह बदज़नी होती है के हुकूमत बाक़ी रहने वाली नहीं है और वह दूसरे लोगों के हालात से इबरत हासिल नहीं करते हैं।

कातिबः इसके बाद अपने मुन्शियों के हालात पर नज़र रखना और अपने काम को बेहतरीन अफ़राद के हवाले करना और फिर वह ख़ुतूत जिनमें रमूज़े (राज़) सल्तनत और इसरारे ममलेकत हों उन अफ़राद के हवाले करना जो बेहतरीन अख़लाक़ व किरदार के मालिक हों और इज़्ज़त पाकर अकड़ न जाते हों के एक दिन लोगों के सामने तुम्हारी मुख़ालेफ़त की जराअत पैदा कर लें और ग़फ़लत की बिना पर लेन-देन के मामलात में तुम्हारे अमाल के ख़ुतूत के पेश करने ((( ‘- यह इस्लामी निज़ाम का नुक्तए इम्तेयाज़ है के इसने ज़मीनों पर टैक्स ज़रूर रखा है के पैदावार में अगर एक हिस्सा मालिके ज़मीन की मेहनत और आबादकारी का है तो एक हिस्सा मालिके कायनातत के करम का भी है जिसने ज़मीन में पैदावार की सलाहियत दी है और वह पूरी कायनात का मालिक है वह अपने हिस्से को पूरे समाज पर तक़सीम करना चाहता है और उसे निज़ाम की तकमील का बुनियादी अनासिर क़रार देना चाहता है , लेकिन इस टैक्स को हाकिम की सवाबदीदा और उसकी ख़्वाहिश पर नहीं रखा है जो दुनिया के तमाम ज़ालिम और अय्याश हुक्काम का तरीक़ाए कार है बल्कि उसे ज़मीन के हालात से वाबस्तता कर दिया है ताके टैक्स और पैदावार में राबेता रहे और मालिकाने ज़मीन के दिलों में हाकिम से हमदर्दी पैदा हो , पुरसूकून हालात में जी लगाकर काश्त करें और हादसाती मवाक़े पर ममलेकत के काम आ सकें वरना अगर अवाम में बददिली और बदज़नी पैदा हो गई तो निज़ाम और समाज को बरबादी से बचाने वाला कोई न होगा।-)))

और उनके जवाबात देने में कोताही से काम लेने लगें और तुम्हारे लिये जो अहद व पैमान बान्धें उसे कमज़ोर कर दें और तुम्हारे खि़लाफ़ साज़बाज़ के तोड़ने में आजिज़ी का मुज़ाहिरा करने लगे देखो यह लोग मामलात में अपने सही मक़ाम से नावाक़िफ़ न हों के अपनी क़द्र व मन्ज़िलत का न पहचानने वाला दूसरे के मुक़ाम व मरतबे से यक़ीनन ज़्यादा नावाक़िफ़ होगा। इसके बाद उनका तक़र्रूर भी सिर्फ़ ज़ाती होशियारी , ख़ुश एतमादी और हुस्ने ज़न की बिना पर न करना के अकसर लोग हुक्काम के सामने बनावटी किरदार और बेहतरीन खि़दमात के ज़रिये अपने को बेहतरीन बनाकर पेश करने की सलाहियत रखते हैं। जबके इसके पसे पुश्त न कोई इख़लास होता है और न अमानतदारी पहले इनका इम्तेहान लेना के तुमसे पहले वाले नेक किरदार हुक्काम के साथ इनका बरताव क्या रहा है फिर जो अवाम में अच्छे असरात रखते हों और अमानतदारी की बुनियाद पर पहचाने जाते हों उन्हीं का तक़र्रूर कर देना के यह इस अम्र की दलील होगा के तुम अपने परवरदिगार के बन्दए मुख़लिस और अपने इमाम के वफ़ादार हो अपने जुमला शोबों के लिये एक-एक अफ़सर मुक़र्रर कर देना जो बड़े से बड़े काम से मक़हूर न होता हो और कामों की ज़्यादती पर परागन्दा हवास न हो जाता हो , और यह याद रखना के इन मुन्शियों में जो भी ऐब होगा और तुम उससे चश्मपोशी करोगे इसका मवाख़ेज़ा तुम्हीं से किया जाएगा।

इसके बाद ताजिरों और सनअतकारों के बारे में नसीहत हासिल करो और दूसरों को उनके साथ नेक बरताव की नसीहत करो चाहे वह एक मुक़ाम पर काम करने वाले हों या जाबजा गर्दिश करने वाले हों और जिस्मानी मेहनत से रोज़ी कमाने वाले हों। इसलिये के यही अफ़राद मुनाफ़े का मरकबज़ और ज़रूरियाते ज़िन्दगी के मुहैया करने का वसीला होते हैं। यही दूर दराज़ मुक़ामात बर्रो बहर कोह व मैदान हर जगह से इन ज़ुरूरियात के फ़राहम करने वाले होते हैं जहां लोगों की रसाई नहीं होती है और जहांतक जाने की लोग हिम्मत नहीं करते हैं , यह वह अमन पसन्द लोग हैं जिनसे फ़साद का ख़तरा नहीं होता है और वह सुलह व आश्ती वाले होते हैं जिनसे किसी शोरिश का अन्देशा नहीं होता है।

अपने सामने और दूसरे शहरों में फैले हुए इनके मुआमलात की निगरानी करते रहना और यह ख़याल रखना के मैं बहुत से लोगों में इन्तेहाई तंग नज़री और बदतरीन क़िस्म की कन्जूसी पाई जाती है , यह मुनाफ़े की ज़खी़राअन्दोज़ी करते हैं और ऊंचे ऊंचे दाम ख़ुद ही मुअय्यन कर देते हैं जिससे अवाम को नुक़सान होता है और हुक्काम की बदनामी होती है , लोगों को ज़ख़ीराअन्दोज़ी से ममना करो के रसूले अकरम (स 0) ने इससे मना फ़रमाया है। ख़रीद व फ़रोख़्त में सहूलत ज़रूरी है जहां आदिलाना मीज़ान हो और वह क़ीमत मुअय्यन हो जिससे ख़रीदार या बेचने वाले किसी फ़रीक़ पर ज़ुल्म न हो , इसके बाद तुम्हारे मना करने के बावजूद अगर कोई शख़्स ज़ख़ीराअन्दोज़ी करे तो उसे सज़ा दो लेकिन इसमें भी हद से तजावुज़ न होने पाए। (((-बाज़ शारेहीन की नज़र में इस हिस्से का ताल्लुक़ सिर्फ़ किताबत और अनशाए से नहीं है बल्कि हर शोबाए हयात से है जिसकी निगरानी के लिये एक ज़िम्मेदार का होना ज़रूरी है और जिसका इदराक अहले सियासत को सैकड़ों साल के बाद हुआ है और हकीमे उम्मत ने चैदह सदी क़ब्ल इसस नुक्ताए जहानबानी की तरफ़ इशारा कर दिया था। इसमें कोई शक नहीं है के तिजारत और सनअत का मुआसेरे की ज़िन्दगी में रीढ़ की हड्डी का काम करते हैं और उन्हीं के ज़रिये मुआशरे की ज़िन्दगी में इस्तेक़रार पैदा होता है , यही वजह है के मौलाए कायनात ने इनके बारे में ख़ुसूसी नसीहत फ़रमाई है और उनके मुफ़सेदीन की इस्लाह पर ख़ुसूसी ज़ोर दिया है। ताजिर में बाज़ इम्तेयाज़ी ख़ुसूसियात होते हैं जो दूसरी क़ौमों में नहीं पाए जाते हैं- 1. यह लोग फ़ितरन सुलह पसन्द होते हैं के फ़साद और हंगामे में दुकान के बन्द हो जाने का ख़तरा होता है 2. इनकी निगाह किसी मालिक और अरबाब पर नहीं होती है बल्कि परवरदिगार से रिज़्क़ के तलबगार होते हैं 3. दूर दराज़ के ख़तरनाक मेवारिद तक सफ़र करने की बिना पर इनसे तबलीग़े मज़हब का काम भी लिया जा सकता है जिसके शवाहिद आज सारी दुनिया में पाए जा रहे हैं।-)))

इसके बाद अल्लाह से डरो उस पसमान्दा तबक़े के बारे में जो मसाकीन , मोहताज , फ़ोक़रा और माज़ूर अफ़राद का तबक़ा है जिनका कोई सहारा नहीं है इस तबक़े में मांगने वाले भी हैं और ग़ैरतदार भी हैं जिनकी सूरत सवाल है उनके जिस हक़ का अल्लाह ने तुम्हें मुहाफ़िज़ बनाया है उसकी हिफ़ाज़त करो और उनके लिये बैतुलमाल और अर्जे ग़नीमत के ग़ल्लात में से एक हिस्सा मख़सूस कर दो के उनके दूर इक़्तादा का भी वही हक़ है जो क़रीब वालों को है और तुम्हें सबका निगरां बनाया गया है लेहाज़ा ख़बरदार कहीं ग़ुरूर व तकब्बुर तुम्हें इनकी तरफ़ से ग़ाफ़िल न बना दे के तुम्हें बड़े कामों के मुस्तहकम कर देने से छोटे कामों की बरबादी से माफ़ न किया जाएगा लेहाज़ा न अपनी तवज्जो को इनकी तरफ़ से हटाना और न ग़ुरूर की बिना पर अपना मुंह मोड़ लेना जिन लोगों की रसाई तुम ततक नहीं है और उन्हें निगाहों न गिरा दिया है और शख़्सियतों ने हक़ीर बना दिया है उनके हालात की देखभाल भी तुम्हारा ही फ़रीज़ा है लेहाज़ा इनके लिये मुतवाज़ेह और ख़ौफ़े ख़ुदा रखने वाले मोतबर अफ़राद को मख़सूस कर दो जो तुम तक उनके मामलात को पहुंचाते रहें और तुम ऐसे आमाल अन्जाम देते रहो जिनकी बिना पर रोज़े क़यामत पेशे परवरदिगार माज़ेर कहे जा सको के यही लोग सबसे ज़्यादा इन्साफ़ के मोहताज हैं और फिर हर एक के हुक़ूक़ को अदा करने में पेशे परवरदिगार अपने को माज़ूर साबित करो।

और यतीमों और कबीरा सिन बूढ़ों के हालात की भी निगरानी करते रहना के इनका कोई वसीला नहीं है और यह सवाल करने के लिये खड़े भी नहीं होते हैं ज़ाहिर है के इनका ख़याल रखना हुक्काम के लिये बड़ा संगीन मसला होता है लेकिन क्या किया जाए हक़ तो सबका सब सक़ील ही है , अलबत्ता कभी कभी परवरदिगार इसे हल्का क़रार दे देता है इन अक़वाम के लिये जो आाक़ेबत की तलबगार होती हैं और इस राह में अपने नफ़्स को सब्र का ख़ूगर बनाती हैं और ख़ुदा के वादे पर एतमाद का मुज़ाहिरा करती हैं। और देखो साहेबाने ज़रूरत के लिये एक वक़्त मुअय्यन कर दो जिसमें अपने को उनके लिये ख़ाली कर लो और एक उमूमी मजलिस में बैठो उस ख़ुदा के सामने मुतवाज़ेह रहो जिसने पैदा किया है और अपने तमाम निगेहबान पोलिस , फ़ौज ऐवान व अन्सार सबको दूर बैठा दो ताके बोलने वाला आज़ादी से बोल सके और किसी तरह की लुकनत का शिकार न हो के मैंने रसूले अकरम (स 0) से ख़ुद सुना है के आपने बार-बार फ़रमाया है के वह उम्मत पाकीज़ा किरदार नहीं हो सकती है जिसमें कमज़ोर को आज़ादी के साथ ताक़तवर से अपना हक़ लेने का मौक़ा न दिया जाए। ”

इसके बाद उनसे बदकलामी या आजिज़ी कलाम का मुज़ाहिरा हो तो उसे बरदाश्त करो और दिले तंगी और ग़ुरूर को दूर रखो ताके ख़ुदा तुम्हारे लिये रहमत के एतराफ़ कुशादा कर दे और इताअत के सवाब को लाज़िम क़रार दे दे , जिसे जो कुछ दो ख़ुशगवारी के साथ दो और जिसे मना करो उसे ख़ूबसूरती के साथ टाल दो। (((-मक़सद यह नहीं है के हाकिम जलसए आम में लावारिस होकर बैठ जाए और कोई भी मुफ़सिद , ज़ालिम फ़क़ीर के भेस में आकर उसका ख़ात्मा कर दे , मक़सद सिर्फ़ यह है के पोलिस , फ़ौज मुहाफ़िज़ दरबान लोगों के ज़रूरियात की राह में हाएल न होने पाएं के न उन्हें तुम्हारे पास आने दें और न खुलकर बात करने का मौक़ा दें , चाहे इससे पहले पचास मक़ामात पर तलाशी ली जाए के ग़ोरबा की हाजत रवाई के नाम पर हुक्काम की ज़िन्दगीयों को क़ुरबान नहीं किया जा सकता है और न मुफ़सेदीन को बेलगाम छोड़ा जा सकता है हाकिम के लिये बुनियादी मसले इसकी शराफ़त , दयानत , अमानतदारी का है इसके बाद इसका मरतबा आम मशविरे से बहरहाल बलन्दतर है और इसकी ज़िन्दगी अवामुन्नास से यक़ीनन ज़्यादा क़ीमती है और इसका तहफ़्फ़ुज़ अवामुन्नास पर उसी तरह वाजिब है जिस तरह वह ख़ुद इनके मफ़ादात का तहफ़्फ़ुज़ कर रहा है।-)))

इसके बाद तुम्हारे मामलात में बाज़ ऐसे मामलात भी हैं जिन्हें ख़ुद बराहे रास्त अन्जाम देना है जैसे हुक्काम के उन मसाएल के जवाबात जिनके जवाबात मोहर्रिर अफ़राद न दे सकें या लोगों के उन ज़रूिरयात को पूरा करना जिनके पूरा करने से तुम्हारे मददगार अफ़राद जी चुराते हों और देखो हर काम को उसी के दिन मुकम्मल कर देना के हर दिन का अपना एक काम होता है इसके बाद अपने और परवरदिगार के रवाबित के लिये बेहतरीन वक़्त का इन्तेख़ाब करना जो तमाम औक़ात से अफ़ज़ल और बेहतर हो अगरचे तमाम ही औक़ात अल्लाह के लिये शुमार हो सकते हैं अगर इन्सान की नीयत सालिम रहे और जनता इसके तुफ़ैल ख़ुशहाल हो जाए।

और तुम्हारे वह आमाल जिन्हें सिर्फ़ अल्लाह के लिये अन्जाम देते हो उनमें से सबसे अहम काम इन फ़राएज़ का क़याम हो जो सिर्फ़ परवरदिगार के लिये होते हैं अपनी जिस्मानी ताक़त में से रात और दिन दोनों वक़्त एक हिस्सा अल्लाह के लिये क़रार देना और जिस काम के ज़रिये इसकी क़ुरबत चाहते हो उसे मुकम्मल तौर से अन्जाम देना न कोई रख़ना पड़ने पाए और न कोई नुक़्स पैदा हो चाहे बदन काो किसी क़द्र ज़हमत क्यों न हो जाए , और जब लोगों के साथ जमाअत की नमाज़ अदा करो तो न इस तरह पढ़ो के लोग बेज़ार हो जाएं और न इस तरह के नमाज़ बरबाद हो जाए इसलिये के लोगों में बीमार और ज़रूरतमन्द अफ़राद भी होते हैं और मैंने यमन की मुहिम पर जाते हुए हुज़ूरे अकरम (स 0) से दरयाफ़्त किया था के नमाज़े जमाअत का अन्दाज़ क्या होना चाहिये तो आपने फ़रमाया था के अपनी जनता से देर तक अलग न रहना के हुक्काम का जनता से पसे पर्दा रहना एक तरह की तंग दिली पैदा करता है और उनके मामलात की इत्तेलाअ नहीं हो पाती है और यह पर्दादारी उन्हें भी उन चीज़ों के जानने से रोक देती है जिनके सामने यह हेजाजात क़ायम हो गए हैं और इस तरह बड़ी चीज़ छोटी हो जाती है और छोटी चीज़ बड़ी हो जाती है। अच्छा बुरा बन जाता है और बुरा अच्छा बन जाता है और हक़ बातिल से मख़लूत हो जाता है और हाकिम भी बाला आखि़र एक बशर है वह पसे पर्दा काम की इत्तेलाअ नहीं रखता है और न हक़ की पेशानी पर ऐसे निशानात होते हैं जिनके ज़रिये सिदाक़त के इक़साम को ग़लत बयानी से अलग करके पहचाना जा सके। और फिर तुम दो में से एक क़िस्म के ज़रूर होगे , या वह शख़्स होगे जिसका नफ़स हक़ की राह में बज़ल व अता पर माएल है तो फिर तुम्हें वाजिब हक़ अता करने की राह में परवरदिगार हाएल करने की क्या ज़रूरत है और करीमों जैसा अमल क्यों नहीं अन्जाम देते हो , या तुम बुख़ल की बीमारी में मुब्तिला हो गे तो बहुत जल्दी लोग तुमसे मायूस होकर ख़ुद ही अपने हाथ खींच लेंगे और तुम्हें परदा डालने की ज़रूरत ही न पड़ेगी। हालांके लोगों के अकसर ज़रूरियात वह हैं जिनमें तुम्हें किसी तरह की ज़हमत नहीं है जैसे किसी ज़ुल्म की फ़रयाद या किसी मामले में इन्साफ़ का मुतालेबा। (((यह शायद उस अम्र की तरफ़ इशारा है के समाज और अवाम से अलग रहना वाली और हाकिम के ज़रूरियाते ज़िन्दगी में शामिल है वरना इसकी ज़िन्दगी 24घन्टे अवामुन्नास की नज़र हो गई तो न तन्हाइयों में अपने मालिक से मुनाजात कर सकता है और न ख़लवतों में अपने अहल व अयाल के हुक़ूक़ अदा कर सकता है। परदादारी एक इन्सानी ज़रूरत है जिससे कोई बेनियाज़ नहीं हो सकता है। असल मसला यह है के इस परदादारी को तूल न होने पाए के अवामुन्नास हाकिम की ज़ियारत से महरूम हो जाएं आौर इसका दीदार सिर्फ़ टेलीवीज़न के पर्दे पर नसीब हो जिससे न को ई फ़रयाद की जा सकती है और न किसी दर्दे दिल का इज़हार किया जा सकता है , ऐसे शख़्स को हाकिम बनने का क्या हक़ है जो अवाम के दुख दर्द में शरीक न हो सके और इनकी ज़िन्दगी की तलखियों को महसूस न कर सके , ऐसे शख़्स को दरबारे हुकूमत में बैठ कर “ अना रब्बोकुमुल आला ” का नारा लगाना चाहिये और आखि़र में किसी दरया में डूब मरना चाहिये इस्लामी हुकूमत इस तरह की लापरवाही को बरदाश्त नहीं कर सकती है। इसके लिये कूफ़े में बैठकर हज्जाज और यमामा के फ़ोक़रा को देखना पड़ता है और इनकी हालत के पेशे नज़र सूखी रोटी खाना पड़ती है-)))

इसके बाद भी ख़याल रहे के हर वाली के कुछ मख़सूस और राज़दार क़िस्म के अफ़राद होते हैं जिनमें ख़ुदग़र्ज़ी दस्ते दराज़ी और मुआमलात में बेइन्साफ़ी पाई जाती है लेहाज़ा ख़बरदार ऐसे अफ़राद के फ़साद का इलाज इन असबाब के ख़ातमे से करना जिनसे यह हालात पैदा होते हैं। अपने किसी भी हाशियानशीन और क़राबतदार को कोई जागीर मत बख़्श देना और उसे तुमसे कोई ऐसी तवक़्क़ो न होनी चाहिये के तुम किसी ऐसी ज़मीन पर क़ब्ज़ा दे दोगे , जिसके सबब आबपाशी या किसी मुशतर्क मामले में शिरकत रखने वाले अफ़राद को नुक़सान पहुंच जाए के अपने मसारिफ़ भी दूसरे के सर डाल दे और इस तरह इस मामले का मज़ा इसके हिस्से में आए और उसकी ज़िम्मेदारी दुनिया और आखि़रत में तुम्हारे ज़िम्मे रहे। और जिस पर कोई हक़ आएद हो उस पर इसके नाफ़िज़ करने की ज़िम्मेदारी डालो चाहे वह तुमसे नज़दीक हो या दूर और इस मसले में अल्लाह की राह में सब्र व तहम्मुल से काम लेना चाहिये इसकी ज़द तुम्हारे क़राबतदारों और ख़ास अफ़राद ही पर क्यों न पड़ती हो और इस सिलसिले में तुम्हारे मिज़ाज पर जो बार हो उसे आखि़रत की उम्मीद में बरदाश्त कर लेना के इसका अन्जाम बेहतर होगा।

और अगर कभी जनता को यह ख़याल हो जाए के तुमने उन पर ज़ुल्म किया है तो उनके लिये अपने बहाने का इज़हार करो और उसी ज़रिये से उनकी बदगुमानी का इलाज करो के इसमें तुम्हारे नफ़्स की तरबीयत भी है और जनता पर नर्मी का इज़हार भी है और वह उज्ऱख़्वाही भी है जिसके ज़रिये तुम जनता को राहे हक़ पर चलाने का मक़सद भी हासिल कर सकते हो। और ख़बरदार किसी ऐसी दावते सुलह का इन्कार न करना जिसकी तहरीक दुश्मन की तरफ़ से हो और जिसमें मालिक की रज़ामन्दी पाई जाती हो के सुलह के ज़रिये फ़ौजों को क़द्रे सुकून मिल जाता है और तुम्हारे नफ़्स को को भी उफ़्कार से निजात मिल जाएगी और शहरों में भी अम्न व अमान की फ़िज़ा क़ायम हो जाएगी , अलबत्ता सुलह के बाद दुश्मन की तरफ़ से मुकम्मल तौर पर होशियार रहना के कभी कभी वह तुम्हें ग़ाफ़िल बनाने के लिये तुमसे क़ुरबत इख़्तेयार करना चाहता है लेहाज़ा इस सिलसिले में मुकम्मल होशियारी से काम लेना और किसी हुस्ने ज़न से काम न लेना और अगर अपने और उसके दरम्यान कोई मुआहेदा करना या उसे किसी तरह की पनाह देना तो अपने अहद की पासदारी व वफ़ादारी के ज़रिये करना और अपने ज़िम्मे को अमानतदारी के ज़रिये महफ़ूज़ बनाना और अपने क़ौल व क़रार की राह में अपने नफ़्स को सिपर बना देना के अल्लाह के फ़राएज़ में ईफ़ाए अहद जैसा कोई फ़रीज़ा नहीं है जिस पर तमाम लोग ख़्वाहिशात के इख़्तेलाफ़ और उफ़कार के तज़ाद के बावजूद मुत्तहिद हैं और इसका मुशरेकीन ने भी अपने मुआमलात में लेहाज़ रखा है के अहद शिकनी के नतीजे में तबाहियों का अन्दाज़ा कर लिया है तो ख़बरदार तुम अपने अहद व पैमान से ग़द्दारी न करना और अपने क़ौल व क़रार में ख़यानत से काम न लेना और अपने दुश्मन पर अचानक हमला न कर देना। (((-इसमें कोई शक नहीं है के सुलह एक बेहतरीन तरीक़ाए कार है और क़ुरान मजीद ने इसे ख़ैर से ताबीर किया है लेकिन इसके मानी यहय नहीं हैं के जो शख़्स जिन हालात में जिस तरह की सुलह की दावत दे तुम क़ुबूल कर लो और उसके बाद मुतमईन होकर बैठ जाओ के ऐसे निज़ाम में हर ज़ालिम अपनी ज़ालिमाना हरकतों ही पर सुलह करना चाहेगा और तुम्हें उसे तस्लीम करना होगा , सुलह की बुनियादी शर्त यह है के उसे रिज़ाए इलाही के मुताबिक़ होना चाहिये और उसकी किसी दिफ़ा को भी मरज़ीए परवरदिगार के खि़लाफ़ नहीं होना चाहिये जिस तरह के सरकारे दो आलम (स 0) की सुलह में देखा गया है के आपने जिस जिस लफ़्ज़ और जिस जिस दिफ़ाअ पर सुलह की है सब की सब मुताबिक़े हक़ीक़त और ऐन मर्ज़ीए परवरदिगार थीं और कोई हर्फ़ ग़लत दरमियान में नहीं था “ बिस्मेका अल्लाहुम ” भी एक कलमाए सही था , मोहम्मद बिन अब्दुल्लाह भी एक हर्फ़े हक़ था और दुश्मन के अफ़राद का वापस कर देना भी कोई ग़लत एक़दाम नहीं था , इमामे हसन (अ 0) मुज्तबा की सुलह में भी यही तमाम ख़ुसूसियात पाई जाती हैं जिनका मुशाहिदा सरकारे दो आलम (स 0) की सुलह में किया जा चुका है। और यही मौलाए कायनात (अ 0) की बुनियादी तालीम और इस्लाम का वाक़ई हदफ़ और मक़सद है-)))

इसलिये के अल्लाह के मुक़ाबले में जाहिल व बदबख़्त के अलावा कोई जराअत नहीं कर सकता है और अल्लाह ने अहद व पैमान को अम्न व अमान का वसीला क़रार दिया है जिसे अपनी रहमत से तमाम बन्दों के दरम्यान आम कर दिया है और ऐसी पनाहगाह बना दिया है जिसके दामने हिफ़ाज़त में पनाह लेने वाले पनाह लेते हैं और इसके जवार में मन्ज़िल करने के लिये तेज़ी से क़दम आगे बढ़ाते हैं लेहाज़ा इसमें कोई जालसाज़ी , फ़रेबकारी और मक्कारी न होनी चाहिये और कोई ऐसा मुआहेदा न करना जिसमें तावील की ज़रूरत पड़े और मुआहेदा के पुख़्ता हो जाने के बाद उसके किसी मुबहम लफ़्ज़ से फ़ायदा उठाने की कोशिश न करना और अहदे इलाही में तंगी का एहसास ग़ैर हक़ के साथ वुसअत की जुस्तजू पर आमादा न कर दे के किसी अम्र की तंगी पर सब्र कर लेना और कशाइश हाल और बेहतरीन आक़ेबत का इन्तेज़ार करना इस ग़द्दारी से बेहतर है जिसके असरात ख़तरनाक हों और तुम्हें अल्लाह की तरफ़ से जवाबदेही की मुसीबत घेर ले और दुनिया व आखि़रत दोनों तबाह हो जाएं।

देखो ख़बरदार! नाहक़ ख़ून बहाने से परहेज़ करना के इससे ज़्यादा अज़ाबे इलाही से क़रीबतर और पादाश के एतबार से शदीदतर और नेमतों के ज़वाल , ज़िन्दगी के ख़ात्मे के लिये मुनासिबतर कोई सबब नहीं है और परवरदिगार रोज़े क़यामत अपने फ़ैसले का आग़ाज़ ख़ूंरेज़ियों के मामले से करेगा , लेहाज़ा ख़बरदार अपनी हुकूमत का इस्तेहकाम नाहक़ ख़ूंरेज़ी के ज़रिये न पैदा करना के यह बात हुकूमत को कमज़ोर और बेजान बना देती है बल्के तबाह करके दूसरों की तरफ़ मुन्तक़िल कर देती है और तुम्हारे पास न ख़ुदा के सामने और न मेरे सामने अमदन क़त्ल करने का कोई बहाने नहीं है और इसमें ज़िन्दगी का क़सास भी साबित है अलबत्ता अगर धोके से इस ग़लती में मुब्तिला हो जाओ और तुम्हारा ताज़ियाना तलवार या हाथ सज़ा देने में अपनी हद से आगे बढ़ जाए के कभी कभी घूंसा वग़ैरा भी क़त्ल का सबब बन जाता है , तो ख़बरदार तुम्हें सलतनत का ग़ुरूर इतना ऊंचा न बना दे के तुम ख़ून के वारिसों को उनका हक़्क़े ख़ूं बहा भी अदा न करो।

और देखो अपने नफ़्स को ख़ुद पसन्दी से भी महफ़ूज़ रखना और अपनी पसन्द पर भरोसा भी न करना और ज़्यादा तारीफ़ का शौक़ भी न पैदा हो जाए के यह सब बातें शैतान की फ़ुरसत के बेहतरीन वसाएल हैं जिनके ज़रिये वह नेक किरदारों के अमल को ज़ाया और बरबाद कर दिया करता है।

और ख़बरदार जनता पर एहसान भी न जताना और जो सलूक किया है उसे ज़्यादा समझने की कोशिश भी न करना या उनसे कोई वादा करके उसके बाद वादा खि़लाफ़ी भी न करना के यह तर्ज़े अमल एहसान को बरबाद कर देता है और ज़्यादती अमल का ग़ुरूर हक़ की नूरानियत को फ़ना कर देता है और वादा खि़लाफ़ी ख़ुदा और बन्दगाने ख़ुदा दोनों के नज़दीक नाराज़गी का बाएस होती है जैसा के उसने इरशाद फ़रमाया है के “ अल्लाह के नज़दीक यह बड़ी नराज़गी की बात है के तुम कोई बात कहो और फिर उसके मुताबिक़ अमल न करो। ” (((- वाज़ेह रहे के दुनिया में हुकूमतों का क़याम तो विरासत , जमहूरियत , असकरी इन्क़ेलाब और ज़ेहानत व फ़रासत तमाम असबाब से हो सकता है लेकिन हुकूमतों में इस्तेहकाम अवाम की ख़ुशी और मुल्क की ख़ुशहाली के बग़ैर मुमकिन नहीं है और जिन अफ़राद ने यह ख़याल किया के वह अपनी हुकूमतों को ख़ूँरेज़ी के ज़रिये मुस्तहकम बना सकते हैं उन्होंने जीतेजी अपनी ग़लत फ़हमी का अन्जाम देख लिया और हिटलर जैसे शख़्स को भी ख़ुदकुशी पर आमादा न होना पड़ा , इसीलिये कहा गया है के मुल्क कुफ्ऱ के साथ तो बाक़ी रह सकता है लेकिन ज़ुल्म के साथ बाक़ी नहीं रह सकता है और इन्सानियत का ख़ून बहाने से बड़ा कोई जुर्म क़ाबिले तसव्वुर नहीं है लेहाज़ा इससे परहेज़ हर साहबे इक़्तेदार और साहबे अक़्ल व होश का फ़रीज़ा है और ज़माने की गर्दिश के पलटते देर नहीं लगती है-)))

और ख़बरदार वक़्त से पहले कामों जल्दी न करना और वक़्त आजाने के बाद सुस्ती का मुज़ाहेरा न करना अैर बात समझ में न आए तो झगड़ा न करना और वाज़ेह हो जाए तो कमज़ोरी का इज़हार न करना हर बात को इसकी जगह रखो और हर अम्र को उसके महल पर क़रार दो।

देखो जिस चीज़ में तमाम लोग बराबर के शरीक हैं उसे अपने साथ मख़सूस न कर लेना और जो हक़ निगाहों के सामने वाज़ेह हो जाए उसके ग़फ़लत न बरतना के दूसरों के लिये यही तुम्हारी ज़िम्मादारी है और अनक़रीब तमाम काम से परदे उठ जाएंगे और तुमसे मज़लूम का बदला ले लिया जाएगा अपने ग़ज़ब की तेज़ी अपनी सरकशी के जोश अपने हाथ की जुम्बिश और अपनी ज़बान की काट पर क़ाबू रखना और उन तमाम चीज़ों से अपने को इस तरह महफ़ूज़ रखना के जल्दबाज़ी से काम न लेना और सज़ा देने में जल्दी न करना यहांतक के ग़ुस्सा ठहर जाए और अपने ऊपर क़ाबू हासिल हो जाए , और इस अम्र पर भी इख़्तेयार उस वक़्त तक हासिल नहीं हो सकता है जब तक परवरदिगार की बारगाह में वापसी का ख़याल ज़्यादा से ज़्यादा न हो जाए।

तुम्हारा फ़रीज़ा यह है के माज़ी में गुज़र जाने वाली आदिलाना हुकूमत और फ़ाज़िलाना सीरत को याद रखो रसूले अकरम (अ 0) के आसार और किताबे ख़ुदा के एहकाम को निगाह में रखो और जिस तरह हमें अमल करते देखा है उसी तरह हमारे नक़्शे क़दम पर चलो और जो कुछ इस इस अहदनामे में हमने बताया है उस पर अमल करने की कोशिश करो के मैंने तुम्हारे ऊपर अपनी हुज्जत को मुस्तहकम कर दिया है ताके जब तुम्हारा नफ़्स ख़्वाहिशात की तरफ़ तेज़ी से बढ़े तो तुम्हारे पास कोई बहाना न रहे , और मैं परवरदिगार की वसीअ रहमत और हर मक़सद के अता करने की अज़ीम क़ुदरत के वसीले से यह सवाल करता हूँ के मुझे और तुम्हें इन कामों की तौफ़ीक़ दे जिनमें इसकी मर्ज़ी हो और हम दोनों इसकी बारगाह में और बन्दों के सामने बहाना पेश करने के क़ाबिल हो जाएं , बन्दों की बेहतरीन तारीफ़ के हक़दार हों और इलाक़ों में बेहतरीन आसार छोड़ कर जाएं , नेमत की फ़रावानी और इज़्ज़त के रोजाफ़ज़ों इज़ाफ़े को बरक़रार रख सकें और हम दोनों का ख़ात्मा सआदत और शहादत पर हो के हमस ब अल्लाह के लिये हैं और उसी की बारगाह में पलट कर जाने वाले हैं। सलाम हो रसूले ख़ुदा (स 0) पर और उनकी तय्यब व ताहिर आल पर और सब पर सलाम बेहिसाब। वस्सलाम


54-आपका मकतूबे गिरामी

( तल्हा व ज़ुबैर के नाम जिसे अम्र बिन अलहुसैन अलख़ज़ाई के ज़रिये भेजा था और जिसका ज़िक्र अबूजाफ़र इसकाफ़ी ने किताबुल मक़ामात में किया है)

अम्माबाद! अगरचे तुम दोनों छिपा रहे हो लेकिन तुम्हें बहरहाल मालूम है के मैंने खि़लाफ़त की ख़्वाहिश नहीं की , लोगों ने मुझसे ख़्वाहिश की है और मैंने बैअत के लिये एक़दाम नहीं किया है। जब तक उन्होंने बैअत करने का इरादा ज़ाहिर नहीं किया है तुम दोनों भी उन्हीं अफ़राद में शामिल हो जिन्होंने मुझे चाहा था और मेरी बैअत की थी और आम लोगो ने भी मेरी बैअत न किसी सल्तनत के रोब दाब से की है और न किसी माल व दुनिया की लालच में की है। (((- अबूजाफ़र इसकाफ़ी मोतजे़लह के शुयूख़ में शुमार होते थे और उनकी सत्तर तसनीफ़ात थीं जिनमें एक “ किताबुल मक़ामात ” भी थी , इसी किताब में अमीरूल मोमेनीन (अ 0) के इस मकतूबे गिरामी का तज़किरा किया है और यह बताया है के हज़रत ने इसे इमरान के ज़रिये भेजा था जो फ़ोक़हाए सहाबा में शुमार होते थे और जंगे ख़ैबर के साल इस्लाम लाए थे और अहदे माविया में इन्तेक़ाल किया था।- इसकाफ़ी जाहज़ के मआसिरों में थे और उन्हें इस्काफ़ की निस्बत से इस्काफ़ी कहा जाता है जो नहरवान और बसरा के दरम्यान एक शहर है)))

पस अगर तुम दोनों ने मेरी बैअत अपनी ख़ुशी से की थी तो अब ख़ुदा की तरफ़ रूजू करो और फ़ौरन तौबा कर लो। और अगर मजबूरन की थी तो तुमने अपने ऊपर मेरा हक़ साबित कर दिया के तुमने इताअत का इज़हार किया था और नाफ़रमानी को दिल में छिपाकर रखा था और मेरी जान की क़सम दोनों इस राज़दारी और दिल की बातों को छिपाने में महाजेरीन से ज़्यादा सज़ावार नहीं थे और तुम्हारे लिये बैअत से निकलने और इसके इक़रार के बाद इन्कार कर देने से ज़्यादा आसान रोज़े अव्वल ही इसका इन्कार कर देना था , तुम लोगों का एक ख़याल यह भी है के मैंने उस्मान को क़त्ल किया है तो मेरे और तुम्हारे दरम्यान वह अहले मदीना मौजूद हैं जिन्होंने हम दोनों से अलाहेदगी इख़्तेयार कर ली है , इसके बाद हर शख़्स इसी का ज़िम्मेदार है जो उसने ज़िम्मेदारी क़ुबूल की है। बुज़ुर्गवारों! मौक़ा ग़नीमत है अपनी राय से बाज़ आ जाओ के आज तो सिर्फ़ जंग व आर का ख़तरा है लेकिन इसके बाद आर व नार दोनों जमा हो जाएंगे , वस्सलाम।

55-आपका मकतूबे गिरामी (माविया के नाम)

अम्माबाद! ख़ुदाए बुज़ुर्ग व बरतर ने दुनिया को आखि़रत का मुक़दमा क़रार दिया है और उसे आज़माइश का ज़रिया बनाया है ताके यह वाज़ेह हो जाए के बेहतरीन अमल करने वाला कौन है , हम न इस दुनिया के लिये पैदा किये गये हैं और न हमें इसके लिये दौड़-धूप का हुक्म दिया गया है , हम यहाँ फ़क़त इसलिये रखे गए हैं के हमारा इम्तेहान लिया जाए और अल्लाह ने तुम्हारे ज़रिये हमारा और हमारे ज़रिये तुम्हारा इम्तेहान ले लिया है और एक को दूसरे पर हुज्जत क़रार दे दिया है लेकिन तुमने तावीले क़ुरान का सहारा लेकर दुनिया पर धावा बोल दिया और मुझसे ऐसे जुर्म का मुहासेबा कर दिया जिसका न मेरे हाथ से कोई ताल्लुक़ था और न ज़बान से , सिर्फ़ अहले शाम ने मेरे सर डाल दिया था और तुम्हारे जानने वालों ने जाहिलों को और क़याम करने वालों ने ख़ाना नशीनों को उकसा दिया था लेहाज़ा अब भी ग़नीमत है के अपने नफ़्स के बारे में अल्लाह से डरो और शैतान से अपनी ज़माम छुड़ा लो और आखि़रत की तरफ़ रूख़ कर लो के वही हमारी और तुम्हारी आखि़री मन्ज़िल है , उस वक़्त से डरो के इस दुनिया में परवरदिगार कोई ऐसी मुसीबत नाज़िल कर दे के असल भी ख़त्म हो जाए और नस्ल का भी ख़ात्मा हो जाए , मैं परवरदिगार की ऐसी क़सम खाकर कहता हूं जिसके ग़लत होने का इमकान नहीं है के अगर मुक़द्दर ने मुझे और तुम्हें एक मैदान में जमा कर दिया तो मैं उस वक़्त तक मैदान न छोड़ूंगा जब तक मेरे और तुम्हारे दरम्यान फ़ैसला न हो जाए।

56-आपकी वसीयत (जो शरीह बिन हानी को उस वक़्त फ़रमाई जब उन्हें शाम जाने वाले हर अव्वल दस्ते का सरदार मुक़र्रर फ़रमाया)

सुबह व शाम अल्लाह से डरते रहो और अपने नफ़्स को इस धोकेबाज़ दुनिया से बचाए रहो और इस पर किसी हाल में एतबार न करना और यह याद रखना के अगर तुमने किसी नागवारी के ख़ौफ़ से अपने नफ़्स को बहुत सी पसन्दीदा चीज़ों से न रोका तो ख़्वाहिशात तुमको बहुत से नुक़सानदेह काम तक पहुंचा देंगी लेहाज़ा अपने नफ़्स को रोकते टोकते रहो और ग़ुस्से में अपने ग़ैज़ व ग़ज़ब को दबाते और कुचलते रहो।

(((- यह अमीरूलमोमेनीन (अ 0) के जलीलुलक़द्र सहाबी थे , अबू मिक़दाद कुन्नीयत थी और आपके साथ तमाम मारेकों में शरीक रहे , यहां तक के हज्जाज के ज़माने में शहीद हुए , हज़रत (अ 0) ने उन्हें शाम जाने वाले हर अव्वल दस्ते का अमीर मुक़र्रर किया तो मज़कूरा हिदायात से सरफ़राज़ फ़रमाया ताके कोई शख़्स इस्लामी पाबन्दी से आज़ादी का तसव्वुर न कर सके।-)))

57-आपका मकतूबे गिरामी (अहले कूफ़ा के नाम- मदीने से बसरा रवाना होते वक़्त)

अम्माबाद! मैं क़बीले से निकल रहा हूँ या ज़ालिम की हैसियत से या मज़लूम की हैसियत से , या मैंने बग़ावत की है या मेरे खि़लाफ़ बग़ावत हुई है , मैं तुम्हें ख़ुदा का वास्ता देकर कहता हूँ के जहां तक मेरा यह ख़त पहुंच जाए तुम सब निकल कर आ जाओ , इसके बाद मुझे नेकी पर पाओ तो मेरी इमदाद करो और ग़लती पर देखो तो मुझे रज़ा के रास्ते पर लगा दो।

58-आपका मकतूबे गिरामी (तमाम शहरों के नाम - जिसमें सिफ़्फ़ीन की हक़ीक़त का इज़हार किया गया है)

हमारे मामले की इब्तिदा यह है के हम शाम के लशकर के साथ एक मैदान में जमा हुए जब बज़ाहिर दोनों का ख़ुदा एक था , रसूल एक था , पैग़ाम एक था , न हम अपने ईमान व तस्दीक़ में इज़ाफ़े के तलबगार थे , न वह अपने ईमान को बढ़ाना चाहते थे। मामला बिल्कुल एक था सिर्फ़ इख़्तेलाफ़ ख़ूने उस्मान के बारे में था जिससे हम बिलकुल बरी थे और हमने यह हल पेश किया के जो मक़सद आज नहीं हासिल हो सकता है उसका वक़्ती इलाज यह किया जाए के आतिशे जंग को ख़ामोश कर दिया जाए और लोगों के जज़्बात को पुरसूकून बना दिया जाए , इसके बाद जब हुकूमत को इस्तेहकाम हो जाएगा और हालात साज़गार हो जाएंगे तो हम हक़ को उसकी मन्ज़िल तक लाने की ताक़त पैदा कर लेंगे। लेकिन क़ौम का इसरार था के इसका इलाज सिर्फ़ जंग व जेदाल है जिसका नतीजा यह हुआ के जंग ने अपने पांव फेला दिये और जम कर खड़ी हो गई , शोले भड़क उठे और ठहर गए और क़ौम ने देखा के जंग ने दोनों के दांत काटना शुरू कर दिया है और फ़रीक़ैन में अपने पन्जे गाड़ दिये हैं तो वह मेरी बात मानने पर आमादा हो गए और मैंने भी उनकी बात को मान लिया और तेज़ी से बढ़ कर उनके मुतालबए सुलह को क़ुबूल कर लिया यहां तक के उन पर हुज्जत वाज़ेह हो गई और हर तरह का उज्ऱ ख़त्म हो गया। अब इसके बाद कोई इस हक़ पर क़ायम रह गया तो गोया अपने नफ़्स को हलाकत से निकाल लिया वरना इसी गुमराही में पड़ा रह गया तो ऐसा अहद शिकन होगा जिसके दिल पर अल्लाह ने मोहर लगा दी है और ज़माने के हवादिस उसके सर पर मण्डला रहे हैं। (((-यह इस अम्र की तरफ़ इशारा है के हज़रत ने माविया और उसके साथियों के इस्लाम व ईमान का इक़रार नहीं किया है बल्कि सूरतेहाल का तज़किरा किया है। हक़ीक़ते अम्र यह है के माविया को ख़ूने उस्मान से कोई दिलचस्पी नहीं थी , वह शाम की हुकूमत और आलमे इस्लाम की खि़लाफ़त का तमाअ था लेहाज़ा कोई सन्जीदा गुफ़्तगू क़ुबूल नहीं कर सकता था , हज़रत ने भी इमामे हुज्जत का हक़ अदा कर दिया और इसके बाद मैदाने जेहाद में क़दम जमा दिये ताके दुनिया पर वाज़ेह हो जाए के जेहादे राहे ख़ुदा फ़रज़न्दे अबूतालिब (अ 0) का काम है , अबू सुफ़ियान के बेटे का नहीं है।-)))

59-आपका मकतूबे गिरामी (असवद बिन क़तबा वालीए हलवान के नाम)

अम्माबाद! देखो अगर वाली के ख़्वाहिशात मुख़्तलिफ़ क़िस्म के होंगे तो यह बात उसे अक्सर औक़ात इन्साफ़ से रोक देगी लेकिन तुम्हारी निगाह में तमाम अफ़राद के मामलात को एक जैसा होना चाहिये के ज़ुल्म कभी अद्ल का बदल नहीं हो सकता है। जिस चीज़ को दूसरों के लिये बुरा समझते हो उससे ख़ुद भी इजतेनाब करो और अपने नफ़्स को उन कामों में लगा दो जिन्हें ख़ुदा ने तुम पर वाजिब किया है और इसके सवाब की उम्मीद रखो और अज़ाब से डरते रहो।

और याद रखो के दुनिया दारे आज़माइश है यहां इन्सान की एक घड़ी भी ख़ाली नहीं जाती है मगर यह के यह बेकारी रोज़े क़यामत हसरत का सबब बन जाती है और तुमको कोई शै हक़ से बेनियाज़ नहीं बना सकती है और तुम्हारे ऊपर सबसे बड़ा हक़ यह है के अपने नफ़्स को महफ़ूज़ रखो और अपने इमकान भर जनता का एहतेसाब करते रहो के इस तरह जो फ़ायदा तुम्हें पहुंचेगा वह उससे कहीं ज़्यादा बेहतर होगा जो फ़ायदा लोगो को तुमसे पहुंचेगा , वस्सलाम।

60-आपका मकतूबे गिरामी (उन गवर्नरो के नाम जिनका इलाक़ा फ़ौज के रास्ते में पड़ता था )

बन्दए ख़ुदा अमीरूल मोमेनीन अली (अ 0) की तरफ़ से

इन ख़ेराज जमा करने वालों और इलाक़ों के वालियों के नाम जिनके इलाक़े से लश्करों का गुज़र होता है।

अम्माबाद! मैंने कुछ फ़ौजें रवाना की हैं जो अनक़रीब तुम्हारे इलाक़े से गुज़रने वाली हैं और मैंने उन्हें उन तमाम बातों की नसीहत कर दी है जो उन पर वाजिब हैं के किसी को अज़ीयत न दें और तकलीफ़ को दूर रखें और मैं तुम्हें और तुम्हारे अहले ज़िम्मा को बता देना चाहता हूँ के फ़ौज वाले कोई दस्त दराज़ी करेंगे , तो मैं उनसे बेज़ार रहूंगा मगर यह के कोई शख़्स भूक से मुज़तर हो और उसके पास पेट भरने का कोई रास्ता न हो , उसके अलावा कोई ज़ालिमाना अन्दाज़ से हाथ लगाए तो उसको सज़ा देना तुम्हारा फ़र्ज़ है , लेकिन अपने सरफिरों को समझा देना के जिन हालात को मैंने मुस्तशना क़रार दिया है उनमें कोई शख़्स किसी चीज़ को हाथ लगाना चाहे तो उससे मुक़ाबला न न करें और टोकें नहीं , फिर उसके बाद मैं लशकर के अन्दर मौजूद हूँ अपने ऊपर होने वाली ज़्यादतियों और सख्तियो की फ़रयाद मुझसे करो अगर तुम दिफ़ाअ करने के क़ाबिल नहीं हो जब तक अल्लाह की मदद और मेरी इमदाद शामिल न हो , मैं इन्शाअल्लाह अल्लाह की मदद से हालात को बदल दूँगा। (((-इस ख़त में हज़रत ने दो तरह के मसाएल का तज़किरा फ़रमाया है , एक का ताल्लुक़ लशकर से है और दूसरे का उस इलाक़े से जहां से लशकर गुज़रने वाला है। लशकरवालों को तवज्जो दिलाई है के ख़बरदार जनता पर ज़ुल्म न होने पाए के तुम्हारा काम ज़ुल्म व जौर का मुक़ाबला करना है , ज़ुल्म करना नहीं है और रास्ते के अवाम को मुतवज्जो किया है के अगर लशकर में कोई शख़्स बर बिनाए इज़तेरार किसी चीज़ को इस्तेमाल कर ले तो ख़बरदार उसे मना न करना के यह उसका शरई हक़ है और इस्लाम में किसी शख़्स को उसके हक़ से महरूम नहीं किया जा सकता है। इसके बाद लशकर की ज़िम्मेदारी है के अगर कोई मसला पेश आ जाए तो मेरी तरफ़ रूजू करे और अवाम की भी ज़िम्मेदारी है के अपने मसाएल की फ़रियाद मेरे पस पेश करें और सारे मुआमलात को ख़ुद तय करने की कोशिश न करें।-)))

61-आपका मकतूबे गिरामी (कुमैल बिन ज़ियाद के नाम जो बैतुलमाल के आमिल थे और उन्होंने फ़ौजे दुश्मन को लूटमार से मना नहीं किया)

अम्माबाद! इन्सान का उस काम को नज़र अन्दाज़ कर देना जिसका ज़िम्मेदार बनाया गया है और उस काम में लग जाना जो उसके फ़राएज़ में शामिल नहीं है एक वाज़ेह कमज़ोरी और तबाहकुन फ़िक्र है। और देखो तुम्हारा अहले क़िरक़िसया पर हमला कर देना और ख़ुद अपनी सरहदों को मोअत्तल छोड़ देना जिनका तुमको ज़िम्मेदार बनाया गया था। इस आलम में के उनका कोई दिफ़ाअ करने वाला और उनसे लश्करों को हटाने वाला नहीं था एक इन्तेहाई परागन्दा राय है और इस तरह तुम दोस्तों पर हमला करने वाले दुश्मनों के लिये एक वसीला बन गए जहां न तुम्हारे कान्धे मज़बूत थे और न तुम्हारी कोई हैबत थी , न तुमने दुश्मन का रास्ता रोका और न इसकी शौकत को तोड़ा , न अहले शहर के काम आए और न अपने अमीर के फ़र्ज़ को अन्जाम दिया।

62-आपका मकतूबे गिरामी (अहले मिस्र के नाम ,मालिके अश्तर के ज़रिये जब उनको मिस्र का गर्ननर बनाकर रवाना किया)

अम्माबाद! परवरदिगार ने हज़रत मोहम्मद (स 0) को आलमीन के लिये अज़ाबे इलाही से डराने वाला और मुरसलीन के लिये गवाह और निगरां बनाकर भेजा था लेकिन उनके जाने के बाद ही मुसलमानों ने उनकी खि़लाफ़त में झगड़ा शुरू कर दिया , ख़ुदा गवाह है के यह बात मेरे ख़याल में भी न थी और न मेरे दिल से गुज़री थी के अरब इस मन्सब को उनके अहलेबैत (अ 0) से इस तरह मोड़ देंगे और मुझसे इस तरह दूर कर देंगे के मैंने अचानक यह देखा के लोग फ़लाँ शख़्स की बैअत के लिये टूटे पड़े हैं तो मैंने अपने हाथ को रोक लिया यहाँ तक के यह देखा के लोग दीने इस्लाम से वापस जा रहे हैं और पैग़म्बर के क़ानून को बरबाद कर देना चाहते हैं , तो मुझे यह ख़ौफ़ पैदा हो गया के अगर इस रख़्ने और बरबादी को देखने के बाद भी मैंने इस्लाम और मुसलमानों की मदद न की तो इसकी मुसीबत रोज़े क़यामत उससे ज़्यादा अज़ीम होगी जो आज इस हुकूमत के चले जाने से सामने आ रही है जो सिर्फ़ चन्द दिन रहने वाली है और एक दिन उसी तरह ख़त्म हो जाएगी जिस तरह सराब की चमक दमक ख़त्म हो जाती है या आसमान के बादल फट जाते हैं तो मैंने इन हालात में क़याम किया यहां तक के बातिल ज़ाएल हो गया और दीन मुतमइन होकर अपनी जगह पर साबित हो गया। (((-जनाबे कुमैल मौलाए कायनात के मख़सूस असहाब में थे और बड़े पाये के आलिम व फ़ाज़िल थे लेकिन बहरहाल बशर थे और उन्होंने माविया के मज़ालिम के जवाब में यही मुनासिब समझा के जिस तरह वह हमारे इलाक़े में फ़साद फेला रहा है , हम भी उसके इलाक़े पर हमला कर दें ताके फ़ौजों का रूख़ उधर मुड़ जाए मगर यह बात इमामत के मिज़ाज के खि़लाफ़ थी लेहाज़ा हज़रत ने फ़ौरन तम्बीह कर दी और कुमैल ने भी अपने एक़दाम के नामुनासिब होने का एहसास कर लिया और यही इन्सान का कमाले किरदार है के ग़लती पर इसरार न करे वरना ग़लती न करना शाने इस्मत है शाने इस्लाम व ईमान नहीं है। जनाबे कुमैल की ग़ैरतदारी का यह आलम था के जब हज्जाज ने उन्हें तलाश करना शुरू किया और गिरफ़्तार न कर सका तो उनकी क़ौम पर दाना , पानी बन्द कर दिया , कुमैल को इस अम्र की इत्तेलाअ मिली तो फ़ौरन हज्जाज के दरबार में पहुंच गए और फ़रमाया के मैं अपनी ज़ात की हिफ़ाज़त की ख़ातिर सारी क़ौम को ख़तरे में नहीं डाल सकता हूँ और ख़ुद मोहब्बते अहलेबैत (अ 0) से दस्तबरदार भी नहीं हो सकता हूँ लेहाज़ा मुनासिब यह है के अपनी सज़ा ख़ुद बरदाश्त करूं जिसके नतीजे में हज्जाज ने उनकी ज़िन्दगी का ख़ात्मा करा दिया।-)))

ख़ुदा की क़सम अगर मैं तनो तन्हा उनके मुक़ाबले पर निकल पड़ूं और उनसे ज़मीन छलक रही हो तो भी मुझे फ़िक्र और दहशत न होगी के मैं उनकी गुमराही के बारे में भी और अपने हिदायत याफ़्ता होने के बारे में भी बसीरत रखता हूँ और परवरदिगार की तरफ़ से मन्ज़िले यक़ीन पर भी हूं और मैं लक़ाए इलाही का इश्तियाक़ भी रखता हूं और इसके बेहतरीन अज्र व सवाब का मुन्तज़िर और उम्मीदवार हूँ। लेकिन मुझे दुख इस बात का है के उम्मत की ज़माम अहमक़ों और फ़ाजिरों के हाथ में चली जाए और वह माले ख़ुदा को अपनी इमलाक और बन्दगाने ख़ुदा को अपना ग़ुलाम बना लें , नेक किरदारों से जंग करें और फ़ासिक़ों को अपनी जमाअत में शामिल कर लें , जिनमें वह भी शामिल हैं जिन्होंने तुम्हारे सामने शराब पी है और उन पर इस्लाम में हद जारी हो चुकी है और बाज़ वह भी हैं के जो उस वक़्त तक इस्लाम नहीं लाए जब तक उन्हें फ़वाएद नहीं पेश कर दिये गए , अगर ऐसा न होता तो मैं तुम्हें इस तरह जेहाद की दावत न देता और सरज़न्श न करता और क़याम पर आमादा न करता बल्कि तुम्हें तुम्हारे हाल पर छोड़ देता के तुम सरताबी भी करते हो और सुस्त भी हो।

क्या तुम ख़ुद नहीं देखते हो के तुम्हारे एतराफ़ कम होते जा रहे हैं और तुम्हारे शहरों पर क़ब्ज़ा हुआ जा रहा है , तुम्हारे मुमालिक को छीना जा रहा है और तुम्हारे इलाक़ों पर धावा बोला जा रहा है। ख़ुदा तुम पर रहम करे अब दुश्मन से जंग के लिये निकल पड़ो और ज़मीन से चिपक कर न रह जाओ वरना यूँ ही ज़िल्लत का शिकार होगे , ज़ुल्म सहते रहोगे और तुम्हारा हिस्सा इन्तेहाई पस्त होगा , और याद रखो के जंग आज़मा इन्सान हमेशा बेदार रहता है और अगर कोई शख़्स सो जाता है तो उसका दुश्मन हरगिज़ ग़ाफ़िल नहीं होता है , वस्सलाम।


63- आपका मकतूबे गिरामी

( कूफ़े के गवर्नर अबूमूसा अशअरी के नाम , जब यह ख़बर मिली के आप लोगों को जंगे जमल की दावत दे रहे हैं और वह रोक रहा है)

बन्दए ख़ुदा , अमीरूल मोमेनीन अली (अ 0) का ख़त अब्दुल्लाह बिन क़ैस के नाम-

अम्माबाद! मुझे एक ऐसे कलाम की ख़बर मिली है जो तुम्हारे हक़ में भी हो सकता है और तुम्हारे खि़लाफ़ भी , लेहाज़ा अब मुनासिब यही है के मेरे क़ासिद के पहुंचते ही दामन समेट लो और कमर कस लो और फ़ौरन बिल से बाहर निकल आओ और अपने साथियों को भी बुला लो। (((-सूरते हाल यह थी के उम्मत ने पैग़म्बर (स 0) के बताए हुए रास्ते को नज़रअन्दाज़ कर दिया और अबू बक्र के हाथ पर बैअत कर ली लेकिन अमीरूल मोमेनीन (अ 0) की मुश्किल यह थी के अगर मुसलमानों में जंग व जेदाल का सिलसिला शुरू कर देते हैं तो मसीलमा कज़्ज़ाब और तलीहा जैसे बदअयान को मौक़ा मिल जाएगा और वह लोगों को गुमराह करके इस्लाम से मुनहरिफ़ कर देंगे इसलिये आपने सुकूत इख़्तेयार फ़रमाया और खि़लाफ़त के बारे में कोई बहस नहीं की लेकिन मुरतदों के हाथों इस्लाम की तबाही का मन्ज़र देख लिया तो मजबूरन बाहर निकल आए के बाला आखि़र अपने हक़ की बरबादी पर सुकूत इख़्तेयार किया जा सकता है , इस्लाम की बरबादी पर सब्र नहीं किया जा सकता है-)))

इसके बाद हक़ साबित हो जाए तो खड़े हो जाओ और कमज़ोरी दिखलाना है तो नज़रों से दूर हो जाओ , ख़ुदा की क़सम तुम जहां रहोगे घेरकर लाए जाओगे और छोड़े नहीं जाओगे यहां तक के दूध मक्खी के साथ और पिघला हुआ मुनजमिद के साथ मख़लूत हो जाए और तुम्हें इत्मीनान से बैठना नसीब न होगा और सामने से इस तरह डरोगे जिस तरह अपने पीछे से डरते हो , और यह काम इस क़द्र आसान नहीं है जैसा तुम समझ रहे हो , यह एक मुसीबत कुबरा है जिसके ऊँट पर बहरहाल सवार होना पड़ेगा और इसकी दुश्वारियों को हमवार करना पड़ेगा और इसके पहाड़ को सर करना पड़ेगा लेहाज़ा होश के नाखन लो और हालात पर क़ाबू रखो और अपना हिस्सा हासिल कर लो और अगर यह बात पसन्द नहीं है तो उधर चले जाओ जिधर न कोई आव भगत है और न छुटकारे की सूरत , और अब मुनासिब यही है के तुम्हें बेकार समझकर छोड़ दिया जाए के सोते रहो और कोई यह भी न दरयाफ़्तत करे के फ़लां शख़्स किधर चला गया , ख़ुदा की क़सम यह हक़ परस्त का वाक़ई इक़दाम है और मुझे बेदीनों के आमाल की कोई परवाह नहीं है , वस्सलाम।

64- आपका मकतूबे गिरामी (माविया के जवाब में )

अम्माबाद! यक़ीनन हम और तुम इस्लाम से पहले एक साथ ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे लेकिन कल यह तफ़रिक़ा पैदा हो गया के हमने ईमान का रास्ता इख़्तेयार कर लिया और तुम काफ़िर रह गए और आज यह इख़्तेलाफ़ है के हम राहे हक़ पर क़ायम हैं और तुम फ़ित्ना में मुब्तिला हो , तुम्हारा मुसलमान भी उस वक़्त मुसलमान हुआ है जब मजबूरी पेश आ गई और सारे अशराफ़े अरब इस्लाम में दाखि़ल होकर रसूले अकरम (स 0) की जमाअत में शामिल हो गए।

तुम्हारा यह कहना के मैंने तल्हा व ज़ुबैर को क़त्ल किया है और आइशा को घर से बाहर निकाल दिया है और मदीना छोड़कर कूफ़े और बसरा में क़याम किया है तो इसका तुमसे कोई ताल्लुक़ नहीं है , न तुम पर कोई ज़ुल्म हुआ है और न तुमसे माज़ेरत की कोई ज़रूरत है। और तुम्हारा यह कहना के तुम महाजेरीन व अन्सार के साथ मेरे मुक़ाबले पर आ रहे हो तो हिजरत तो उसी दिन ख़त्म हो गई जब तुम्हारा भाई गिरफ़्तार हुआ था और अगर कोई जल्दी है तो ज़रा इन्तेज़ार कर लो के मैं तुमसे ख़ुद मुलाक़ात कर लूं और यही ज़्यादा मुनासिब भी है के इस तरह परवरदिगार मुझे तुम्हें सज़ा देने के लिये भेजेगा और अगर तुम ख़ुद भी आ गए तो इसका अन्जाम वैसा ही होगा जैसा के बनी असद के शाएर ने कहा थाः “ वह मौसमे गरमा की ऐसी हवाओं का सामना करने वाले हैं जो नशेबों और चट्टानों पर संगरेज़ों की बारिश कर रही हैं ’ (((- माविया ने हस्बे आदत अपने इस ख़त में चन्द मसाएल उठाए थे , एक मसला यह था के हम दोनों एक ख़ानदान के हैं तो इख़्तेलाफ़ की क्या वजह है ? हज़रत ने इसका जवाब यह दिया यह इख़्तेलाफ़ उसी दिन शुरू हो गया था जब हम दाएराए इस्लाम में थे और तुम कुफ्ऱ की ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे। दूसरा मसला यह था के जंगे जमल की सारी ज़िम्मेदारी अमीरूल मोमेनीन (अ 0) पर है ? इसका जवाब यह है के इस मसले का तुमसे कोई ताल्लुक़ नहीं है लेहाज़ा इसके उठाने की ज़रूरत नहीं है। तीसरा मसला अपने लशकर के मुहाजेरीन व अन्सार में होने का था ? इसका जवाब यह दिया गया के हिजरत फ़तहे मक्का के बाद ख़त्म हो गई और फ़तहे मक्का में तेरा भाई गिरफ़्तार हो चुका है जिसके बाद तेरे साथी औलाद तलक़ा तो हो सकते हैं महाजेरीन कहे जाने के क़ाबिल नहीं हैं।-)))

और मेरे पास वही तलवार है जिससे तुम्हारे नाना , मामू और भाई को एक ठिकाने तक पहुंचा चुका हूँ और तुम ख़ुदा की क़सम मेरे इल्म के मुताबिक़ वह शख़्स जिसके दिल पर ग़िलाफ़ चढ़ा हुआ है और जिसकी अक़्ल कमज़ोर है और तुम्हारे हक़ में मुनासिब यह है के इस तरह कहा जाए के तुम ऐसी सीढ़ी चढ़ गए हो जहां से बदतरीन मन्ज़र ही नज़र आता है के तुमने दूसरे के गुमशुदा की जुस्तजू की है और दूसरे के जानवर को चराना चाहा है और ऐसे अम्र को तलब किया है जिसके न अहल हो और न उससे तुम्हारा कोई बुनियादी लगाव है। तुम्हारे क़ौल व फ़ेल में किस क़द्र फ़ासला पाया जाता है और तुम अपने चचा और मामूं से किस क़द्र मुशाबेह हो जिनको बदबख़्ती और बातिल की तमन्ना ने पैग़म्बर (स 0) के इनकार पर आमादा किया और उसके नतीजे में अपने अपने मक़तल में मर-मरकर गिरे जैसा के तुम्हें मालूम है , न किसी मुसीबत को दिफ़ाअ कर सके और न किसी हरीम की हिफ़ाज़त कर सके , उन तलवारों की मार की बिना पर जिनसे कोई मैदाने जंग ख़ाली नहीं होता और जिनमें सुस्ती का गुज़र नहीं है।

और तुमने जो बार बार उस्मान के क़ातिलों का ज़िक्र किया है तो उसका आसान हल यह है के जिस तरह सबने बैअत की है पहले मेरी बैअत करो उसके बाद मेरे पास मुक़दमा लेकर आओ , मैं तुम्हें और ततुम्हारे मुद्दआ अलैहम को किताबे ख़ुदा के फ़ैसले पर आमादा करूंगा लेकिन इसके अलावा जो तुम्हारा मुद्दआ है वह एक धोका है जो बच्चे को दूध छुड़ाते वक़्त दिया जाता है , और सलाम हो उसके अहल पर।

65-आपका मकतूबे गिरामी (माविया ही के नाम)

अम्माबाद! अब वक़्त आ गया है के तुम काम का मुशाहेदा करने के बाद उनसे फ़ायदा उठा लो के तुमने बातिल दावा करने , झूठ और ग़लत बयानी के फ़रेब में कूद पड़ने , जो चीज़ तुम्हारी औक़ात से बलन्द है उसे इख़्तेयार करने और जो तुम्हारे लिये ममनूअ है उसको हथिया लेने में अपने इस्लाफ़ का रास्ता इख़्तेयार कर लिया है और इस तरह हक़ से फ़रार और जो चीज़ गोश्त व ख़ून से ज़्यादा तुमसे चिमटी हुई है उसका इनकार करना चाहते हो जिसे तुम्हारे कानों से सुना है और तुम्हारे सीने में भरी हुई है , तो अब हक़ के बाद खुली हुई गुमराही के अलावा क्या बाक़ी रह जाता है। और वज़ाहत के बाद धोका के अलावा क्या है ? (((- इब्ने अबी अल हदीद का बयान है के माविया रोज़े ग़दीर मौजूद था जब सरकारे दो आलम (स 0) ने हज़रत अली (अ 0) के मौलाए कायनात होने का एलान किया था और उसने अपने कानों से सुना था और इसी तरह रोज़े तबूक भी मौजूद था जब हज़रत ने ऐलान किया था के अली (अ 0) का मरतबा वही है जो हारून का मूसा के साथ है और उसे मालूम था के हुज़ूर ने अली (अ 0) की सुलह को अपनी सुलह और उनकी जंग को अपनी जंग क़रार दिया है , मगर इसके बावजूद उसकी सेहत पर कोई असर नहीं हुआ के इसका रास्ता उसकी फूफी उम्मे हबील और उसके मामू ख़ालिद बिन वलीद जैसे अफ़राद का था जिनके दिल व दिमाग़ में न इस्लाम दाखि़ल हुआ था और न दाखि़ल होने का कोई इमकान था।-)))

लेहाज़ा शुबह और उसके दसीसेकारी पर मुश्तमिल होने से डरो के फ़ित्ना एक मुद्दत से अपने दामन फैलाए हुए है और उसकी तारीकी ने आंखों को अन्धा बना रखा है। मेरे पास तुम्हारा वह ख़त आया है जिसमें तरह-तरह की बेजोड़ बातें पाई जाती हैं और उनसे किसी सुलह व आश्ती को तक़वीयत नहीं मिल सकती है और इसमें वह ख़ुराफ़ात हैं जिनके ताने-बाने न इल्म से तैयार हुए हैं और न हिल्म से , इस सिलसिले में तुम्हारी मिसाल उस शख़्स की है जिसका हुसूल मुश्किल है और जिसके निशानात गुम हो गए हैं और जहां तक उक़ाब परवाज़ नहीं कर सकता है और उसकी बलन्दी सिताराए उयूक़ से टक्कर ले रही है।

हाशा वकला यह कहां मुमकिन है के तुम मेरे इक़तेदार के बाद मुसलमानों के हल व उक़द के मालिक बन जाओ या मैं तुम्हें किसी एक शख़्स पर भी हुकूमत करने का परवाना या दस्तावेज़ दे दूं लेहाज़ा अभी ग़नीमत है के अपने नफ़्स का तदारूक करो और उसके बारे में ग़ौरो फ़िक्र करो के अगर तुमने उस वक़्त तक कोताही से काम लिया जब अल्लाह के बन्दे उठ खड़े हों तो ततुम्हारे सारे रास्ते बन्द हो जाएंगे और फिर इस बात का भी मौक़ा न दिया जाएगा जो आज क़ाबिले क़ुबूल है , वस्सलाम। (((-माविया ने हज़रत से मुतालबा किया था के अगर उसे वलीअहदी का ओहदा दे दिया जाए तो वह बैअत करने के लिये तैयार है और फ़िर ख़ूने उस्मान कोई मसला न रह जाएगा। आपने बिलकुल वाज़ेह तौर पर इस मुतालबे को ठुकरा दिया है और माविया पर रौशन कर दिया है के मेरी हुकूमत में तेरे जैसे अफ़राद की कोई जगह नहीं है और तूने जिस मक़ाम का इरादा किया है वह तेरी परवाज़ से बहुत बलन्द है और वहां तक जाना तेरे इमकान में नहीं है। बेहतर यह है के अपनी औक़ात का इदराक कर ले और राहे रास्त पर आ जाए।-)))

66-आपका मकतूबे गिरामी

(अब्दुल्लाह बिन अब्बास के नाम , जिसका तज़किरा पहले भी दूसरे अलफ़ाज़ में हो चुका है)

अम्माबाद! इन्सान कभी-कभी ऐसी चीज़ को पाकर भी ख़ुश नहीं होता है जो जाने वाली नहीं थी और ऐसी चीज़ को खोकर भी रन्जीदा हो जाता है जो मिलने वाली नहीं थी लेहाज़ा ख़बरदार तुम्हारे लिये दुनिया की सबसे बड़ी नेमत किसी लज़्ज़त का हुसूल या जज़्बाए इन्तेक़ाम ही न बन जाए बल्कि बेहतरीन नेमत बातिल के मिटाने और हक़ के ज़िन्दा करने को समझो और तुम्हारा सुरूर उन आमाल से हो जिन्हें पहले भेज दिया है और तुम्हारा अफ़सोस उन काम पर हो जिसे छोड़कर चले गए हो और तमामतर फ़िक्र मौत के बाद के मरहले के बारे में होनी चाहिये।

67-आपका मकतूबे गिरामी (मक्के के गवर्नर क़ुसम बिन अलअबास के नाम)

अम्माबाद! लोगों के लिये हज के क़याम का इन्तेज़ार करो और उन्हें अल्लाह के यादगार दिनों को याद दिलाओ , सुबह व शाम उमूमी जलसे रखो , सवाल करने वालों के सवालात के जवाबात दो , जाहिल को इल्म दो और ओलमा से तज़किरा करो , लोगों तक तुम्हारा कोई तर्जुमान तुम्हारी ज़बान के अलावा न हो और तुम्हारा काई दरबान तुम्हारे चेहरे के अलावा न हो , किसी ज़रूरतमन्द को मुलाक़ात से मत रोकना के अगर पहली ही मरतबा उसे वापस कर दिया गया तो उसके बाद काम कर भी दोगे तो तुम्हारी तारीफ़ न होगी , जो अमवाल तुम्हारे पास जमा हो जाएं उन पर नज़र रखो और तुम्हारे यहां जो अयालदार और भूके प्यासे लोग हैं उन पर सर्फ़ कर दो बशर्ते के उन्हें वाक़ई मोहताजों और ज़रूरतमन्दों तक पहुंचा दो और उसके बाद जो बच जाए वह मेरे पास भेज दो ताके यहाँ के मोहताजों पर तक़सीम कर दिया जाए।

अहले मक्का से कहो के ख़बरदार मकानात का किराया न लें के परवरदिगार ने मक्के को मुक़ीम और मुसाफ़िर दोनों के लिये बराबर क़रार दिया है। (आकिफ़ मुक़ीम को कहा जाता है और यादी जो बाहर से हज करने के लिये आता है) अल्लाह हमें और तुम्हें अपपने पसन्दीदा आमाल की तौफ़ीक़ दे , वस्सलाम।

(((- खुली हुई बात है के यह अम्रे वजूबी नहीं है और सिर्फ़ इस्तेहबाबी और एहतेरामी है वरना हज़रत (अ 0) ने जिस आयते करीमा से इस्तेदलाल फ़रमाया है उसका ताल्लुक़ मस्जिदुल हराम से है , सारे मक्के से नहीं है और मक्के को मस्जिदुल हरामम मिजाज़न कहा जाता है जिस तरह के आयते मेराज में जनाबे उम हानी के मकान को मस्जिदुल हराम क़रार दिया गया है वैसे यह मसला ओलमाए इस्लाम में इख़्तेलाफ़ी हैसियत रखता है और अबू हनीफ़ा ने सारे मक्के के मकानात को किराये पर देने को हराम क़रार दिया है और इसकी दलील अब्दुल्लाह बिन अम्रो बिनअल आस की रिवायत को क़रार दिया गया है जो ओलमाए शिया के नज़दीक क़तअन मोतबर नहीं है और हैरत अंगेज़ बात यह है के जो अहले मक्का अपने को हनफ़ी कहने में फ़ख़्र महसूस करते हैं वह भी अय्यामे हज के दौरान दुगना चैगना बल्कि दस गुना किराया वसूल करने ही को इस्लाम व हरमे इलाही की खि़दमत तसव्वुर करते हैं , और हज्जाजे कराम को “ ज़यूफ़ल रहमान ’ क़रार देकर उन्हें “ अर्ज़ुल रहमान ” पर क़याम करने का हक़ नहीं देते हैं।-)))

68-आपका मकतूबे गिरामी (जनाबे सलमान फ़ारसी के नाम-अपने दौरे खि़लाफ़त से पहले)

अम्माबाद! इस दुनिया की मिसाल सिर्फ़ सांप जैसी है जो छूने में इन्तेहाई नर्म होता है लेकिन इसका ज़हर इन्तेहाई क़ातिल होता है , इसमें जो चीज़ अच्छी लगे उससे भी किनाराकशी करो के इसमें से साथ जाने वाला बहुत कम है , इसके हम्म व ग़म को अपने से दूर रखो के इससे जुदा होना यक़ीनी है और इसके हालात बदलते ही रहते हैं। इससे जिस वक़्त ज़्यादा इन्स महसूस करो उस वक़्त ज़्यादा होशियार रहो के इसका साथी जब भी किसी ख़ुशी की तरफ़ से मुतमईन होता है यह उसे किसी नाख़ुशगवार के हवाले कर देती है और उन्स से निकाल कर वहशत के हालात तक पहुंचा देती है , वस्सलाम।

69-आपका मकतूबे गिरामी (हारिस हमदानी के नाम)

क़ुरान की रीसमाने हिदायत से वाबस्ता रहो और उससे नसीहत हासिल करो , उसके हलाल को हलाल क़रार दो और हराम को हराम , हक़ की गुज़िश्ता बातों की तस्दीक़ करो और दुनिया के माज़ी से उसके मुस्तक़बिल के लिये इबरत हासिल करो के इसका एक हिस्सा दूसरे से मुशाबेहत रखता है और आखि़र अव्वल से मुलहक़ होने वाला है और सबका सब ज़ाएल होने वाला और जुदा हो जाने वाला है , नामे ख़ुदा को इस क़द्र अज़ीम क़रार दो के सिवाए हक़ के किसी मौक़े पर इस्तेमाल न करो , मौत और उसके बाद के हालात को बराबर याद करते रहो और उसकी आरज़ू उस वक़्त तक न करो जब तक मुस्तहकम असबाब न फ़राहम हो जाएं , हर उस काम से परहेज़ करो जिसे आदमी अपने लिये पसन्द करता हो और आम मुसलमानों के लिये नापसन्द करता हो और हर उस काम से बचते रहो जो तन्हाई में किया जा सकता हो और अलल एलान अन्जाम देने में शर्म महसूस की जाती हो और इसी तरह हर उस काम से परहेज़ करो जिसके करने वाले से पूछ लिया जाए तो या इन्कार कर दे या माज़ेरत करे , अपनी आबरू का लोगों के तीरे मलामत का निशाना न बनाओ और हर सुनी हुई बात को बयान न कर दो के यह हरकत भी झूठ होने के लिये काफ़ी है और इसी तरह लोगों की हर बात की तरदीद भी न कर दो के यह अम्र जेहालत के लिये काफ़ी है , ग़ुस्से को ज़ब्त करो , ताक़त रखने के बावजूद लोगों को माफ़ करो , ग़ज़ब में हिल्म का मुज़ाहेरा करो , इक़्तेदार पाकर दरगुज़र करना सीखो ताके अन्जामकार तुम्हारे लिये रहे अल्लाह ने जो नेमतें दी हैं उन्हें दुरूस्त रखने की कोशिश करो और उसकी किसी नेमत को बरबाद न करना बल्कि उन नेमतों के आसार तुम्हारी ज़िन्दगी में वाज़ेह तौर पर नज़र आएं।

और याद रखो के तमाम मोमेनीन में सबसे बेहतर इन्सान वह है जो अपने नफ़्स , अपने अहल व अयाल और अपने माल की तरफ़ से ख़ैरात करे के यही पहले जाने वाला ख़ैर वहां जाकर ज़ख़ीरा हो जाता है और तुम हो कुछ छोड़ कर चले जाओगे वह तुम्हारे ग़ैर के काम आएगा , ऐसे शख़्स की सोहबत इख़्तेयार न करना जिसकी राय कमज़ोर और उसके आमाल नापसन्दीदा हों के हर साथी का क़यास उसके साथी पर किया जाता है , सुकूनत के लिये बड़े शहरों का इन्तेख़ाब करो के वहां मुसलमानों का इज्तेमाअ ज़्यादा होता है और उन जगहों से परहेज़ करो जो जो ग़फ़लत , बेवफ़ाई और इताअते ख़ुदा में मददगारों की क़िल्लत के मरकज़ हों , अपनी फ़िक्र को सिर्फ़ काम की बातों में इस्तेमाल करो और ख़बरदार बाज़ारी अड़डों पर मत बैठना के यह शैतान की हाज़िरी की जगहें और फ़ितनों के मरकज़ हैं , ज़्यादा हिस्सा उन अफ़राद पर निगाह रखो जिनसे परवरदिगार ने तुम्हें बेहतर क़रार दिया है के यह भी शुक्रे ख़ुदा का एक रास्ता है , जुमे के दिन नमाज़ पढ़े बग़ैर सफ़र न करना मगर यह के राहे ख़ुदा में जा रहे हो या किसी ऐसे काम में जो तुम्हारे लिये बहाना बन जाए और तमाम काम में परवरदिगार की इताअत करते रहना के इताअते ख़ुदा दुनिया के तमाम कामों से अफ़ज़ल और बेहतर है। ((-वाज़ेह रहे के जुमे के दिन तातील कोई इस्लामी क़ानून नहीं है , सिर्फ़ मुसलमानों का एक तरीक़ा है , वरना इस्लाम ने सिर्फ़ बक़द्रे नमाज़ कारोबार बन्द करने का हुक्म दिया है और इसके बाद फ़ौरन यह हुक्म दिया है के ज़मीन में मुन्तशिर हो जाओ और रिज़्क़े ख़ुदा तलाश करो , मगर अफ़सोस के जुमे की तातील के बेहतरीन रोज़े इबादत को भी अय्याशियों और बदकारियों का दिन बना दिया गया और इन्सान सबसे ज़्यादा निकम्मा और नाकारा उसी दिन होता है , इन्ना लिल्लाहे व इन्ना इलैहे राजेऊन-)))

अपने नफ़्स को बहाने करके इबादत की तरफ़ ले आओ और उसके साथ नर्मी बरतो , जब्र न करो और उसी की फ़ुर्सत और फ़ारिग़ुलबाली से फ़ायदा उठाओ , मगर जिन फ़राएज़ को परवरदिगार ने तुम्हारे ज़िम्मे लिख दिया है उन्हें बहरहाल अन्जाम देना है और उनका ख़याल रखना है और देखो ख़बरदार ऐसा न हो के तुम्हे इस हाल में मौत आ जाए के तुम तलबे दुनिया में परवरदिगार से भाग रहे हो , और ख़बरदार फ़ासिक़ों की सोहबत इख़्तेयार न करना के शर बालाआखि़र शर से मिल जाता है , अल्लाह की अज़मत का एतराफ़ करो और उसके महबूब बन्दों से मोहब्बत करो और ग़ुस्से से इजतेनाब करो के यह शैतान के लश्करों में सबसे अज़ीमतर लशकर है , वस्सलाम।


70-आपका मकतूबे गिरामी

( आमिले मदीना सहल बिन हनीफ़ अन्सारी के नाम , जब आपको ख़बर मिली के एक क़ौम माविया से जा मिली है)

अम्माबाद! मुझे यह ख़बर मिली है के तुम्हारे यहाँ के कुछ लोग चुपके से माविया की तरफ़ खिसक गए हैं तो ख़बरदार तुम इस अदद के कम हो जाने और इस ताक़त के चले जाने पर हरगिज़ अफ़सोस न करना के इन लोगो की गुमराही और तुम्हारे सुकूने नफ़्स के लिये यही काफ़ी है के वह लोग हक़ व हिदायत से भागे हैं और गुमराही और जेहालत की तरफ़ दौड़ पड़े हैं यह अहले दुनिया हैं लेहाज़ा इसी की तरफ़ मुतवज्जेह हैं और दौड़ लगा रहे हैं , हालांके उन्होंने इन्साफ़ को पहचाना भी है , सुना भी है और समझे भी हैं और उन्हें मालूम है के हक़ के मामले में हमारे यहाँ तमाम लोग बराबर की हैसियत रखते हैं इसीलिये यह लोग ख़ुदग़र्ज़ी की तरफ़ भाग निकले , ख़ुदा उन्हें ग़ारत करे और तबाह कर दे।

ख़ुदा की क़सम उन लोगों ने ज़ुल्म से फ़रार नहीं किया है और न अद्ल से मुलहक़ हुए हैं , और हमारी ख़्वाहिश सिर्फ़ यह है के परवरदिगार इस मामले में दुश्वारियों को आसान बना दे और नाहमवारी को हमवार कर दे।

71-आपका मकतूबे गिरामी

( मन्ज़र बिन जारुद अबदी के नाम जिसने बाज़ आमाल में ख़यानत से काम लिया)

अम्माबाद! तेरे बाप की शराफ़त ने मुझे तेरे बारे में धोके में रखा और मैं समझा के तू उसी के रास्ते पर चल रहा है और उसी के तरीक़े पर गामज़न है , लेकिन ताज़ा तरीन अख़बार से अन्दाज़ा होता है के तूने ख़्वाहिशात की पैरवी में कोई कसर नहीं उठा रखी है और आख़ेरत के लिये कोई ज़ख़ीरा नहीं किया है , आखे़रत को बरबाद करके दुनिया को आबाद कर रहा है और दीन से रिश्ता तोड़कर क़बीले से रिश्ता जोड़ रहा है। अगर मेरे पास आने वाली ख़बरें सही हैं तो तेरे घरवालों का ऊंट और तेरे जूते का तस्मा भी तुझसे बेहतर है और जो तेरा जैसा हो उसके ज़रिये न रखने को बन्द किया जा सकता है न किसी अम्र को नाफ़िज़ किया जा सकता है और न उसके मरतबे को बलन्द किया जा सकता है न उसे किसी अमानत में शरीक किया जा सकता है , न माल की जमाआवरी पर अमीन समझा जाऐ लेहाज़ा जैसे ही मेरा यह ख़त मिले फ़ौरन मेरी तरफ़ चल पड़ो , इन्शाअल्लाह।

सय्यद रज़ी- मन्ज़र बिन अलजारूदः यह वही शख़्स है जिसके बारे में अमीरूल मोमेनीन (अ 0) ने फ़रमाया था के यह अपने बाज़ुओं को बराकर देखता रहता है और अपनी चादरों में झूम कर चलता है और जूती के तस्मों को फूंकता रहता है (यानी इन्तेहाई मग़रूर और मुतकब्बिर क़िस्म का आदमी है)

72-आपका मकतूबे गिरामी

( अब्दुल्लाह बिन अब्बास के नाम)

अम्माबाद! न तुम अपनी मुद्दते हयात से आगे बढ़ सकते हो और न अपने रिज़्क़ से ज़्यादा हासिल कर सकते हो , और याद रखो के ज़माने के दो दिन होते हैं , एक तुम्हारे हक़ में और एक तुम्हारे खि़लाफ़ और यह दुनिया हमेशा करवटें बदलती रहती है लेहाज़ा जो तुम्हारे हक़ में है वह कमज़ोरी के बावजूद तुम तक आ जाएगा और जो तुम्हारे खि़लाफ़ है उसे ताक़त के बावजूद तुम नहीं टाल सकते हो।

73-आपका मकतूबे गिरामी

( माविया के नाम)

अम्माबाद! मैं तुमसे ख़त व किताबत करने और तुम्हारी बात सुनने में अपनी राय की कमज़ोरी और अपनी दानिशमन्दी की ग़लती का एहसास कर रहा हूँ और तुम बार-बार मुझसे अपनी बात मनवाने और ख़त व किताबत जारी रखने की कोशिश करने में ऐसे ही हो जैसे कोई बिस्तर पर लेटा ख़्वाब देख रहा हो और उसका ख़्वाब ग़लत साबित हो या कोई हैरतज़दा मुंह उठाए खड़ा हो और यह क़याम भी उसे महंगा पड़े और यही न मालूम हो के आने वाली चीज़ इसके हक़ में मुफ़ीद है या मुज़िर , तुम बिलकुल यही शख़्स नहीं हो लेकिन इसी के जैसे हो और ख़ुदा की क़सम के अगर किसी हद तक बाक़ी रखना मेरी मसलेहत न होता तो तुम तक ऐसे हवादिस आते जो हड्डियों को तोड़ देते और गोश्त का नाम तक न छोड़ते और याद रखो के यह शैतान ने तुम्हें बेहतरीन काम की तरफ़ रूजू करने और उमदा तरीन नसीहतों के सुनने से रोक रखा है और सलाम इसके अहल पर।

74-आपका मुआहेदा (संधी)

( जिसे रंबीया और अहले यमन के दरम्यान तहरीर फ़रमाया है और यह हश्शाम की तहरीर से नक़्ल किया गया है)

यह वह अहद है जिस पर अहले यमन के शहरी और देहाती और क़बीलए रंबीया के शहरी और देहाती सबने इत्तेफ़ाक़ किया है के सबके सब किताबे ख़ुदा पर साबित रहेंगे और उसी की दावत देंगे , जो उसकी तरफ़ दावत देगा और उसके ज़रिये हुक्म देगा उसकी दावत पर लब्बैक कहेंगे , न उसको किसी क़ीमत पर फ़रोख़्त करेंगे और न उसके किसी बदल पर राज़ी होंगे।

(((- अरब के वह क़बाएल जिनका सिलसिलाए नसब क़हतान बिन आमिर तक पहुंचता है उन्हें यमन से ताबीर किया जाता है और जिन का सिलसिला रंबीया बिन नज़ार से मिलता है उन्हें रंबीया के नाम से याद किया जाता है , दौरे जाहेलीयत में दोनों में शदीद इख़्तेलाफ़ात थे लेकिन इस्लाम लाने के बाद दोनों मुत्तहिद हो गए , वलहम्दो लिल्लाह।-)))

इस अम्र के मुख़ालिफ़ और इसके नज़र अन्दाज़ करने वाले के खि़लाफ़ मुत्तहिद रहेंगे और किसी सरज़न्श करने वाले की सरज़न्श पर इस अहद को तोड़ेंगे और न किसी ग़ैज़ व ग़ज़ब से राह में मुतासिर होंगे , और न किसी क़ौम को ज़लील करने या गाली देने का वसीला क़रार देंगे , इसी बात पर हाज़ेरीन भी क़ायम रहेंगे और ग़ायबीन भी इसी पर कम अक़्ल भी कारबन्द रहेंगे और आलिम भी , इसी की पाबन्दी साहेबाने दानिश भी करेंगे और जाहिल भी , फिर इसके बाद उनके ज़िम्मे अहदे इलाही और मीसाक़े परवरदिगार की पाबन्दी भी लाज़िम हो गई है और अहदे इलाही के बारे में रोज़े क़यामत भी सवाल किया जाएगा- कातिब अली (अ 0) बिन अबी तालिब |

75-आपका मकतूबे गिरामी

( माविया के नाम , अपनी बैअत के इब्तेदाई दौर में जिसका ज़िक्र वाक़दी ने किताबुल जमल में किया है)

बन्दए ख़ुदा , अमीरूल मोमेनीन अली (अ 0) की तरफ़ से माविया बिन अबी सुफ़ियान के नाम

अम्माबाद! तुम्हें मालूम है के मैंने अपनी तरफ़ से हुज्जत तमाम कर दी है और तुमसे किनारा कशी कर ली है मगर फिर भी वह बात होकर रही जिसे होना था और जिसे टाला नहीं जा सकता था , यह बात बहुत लम्बी है और इसमें गुफ़्तगू बहुत तवील है लेकिन अब जिसे गुज़रना था वह गुज़र गया और जिसे आना था वह आ गया। अब मुनासिब यही है के अपने यहां के लोगों से मेरी बैअत ले लो और सबको लेकर मेरे पास हाज़िर हो जाओ , वस्सलाम।

76-आपकी वसीयत

( अब्दुल्लाह बिन अब्बास के लिये , जब उन्हें बसरा का वाली क़रार दिया)

लोगों से मुलाक़ात करने में उन्हें अपनी बज़्म में जगह देने में और उनके दरम्यान फ़ैसला करने में वुसअत से काम लो और ख़बरदार ग़ैज़ व ग़ज़ब से काम न लेना के यह शैतान की तरफ़ से हलकेपन का नतीजा है और याद रखो के जो चीज़ अल्लाह से क़रीब बनाती है वही जहन्नम से दूर करती है और जो चीज़ अल्लाह से दूर करती है वही जहन्नम से क़रीब बनाती है।

77-आपकी वसीयत

( अब्दुल्लाह बिन अब्बास के नाम- जब उन्हें ख़वारिज के मुक़ाबले में एतमामे हुज्जत के लिये इरसाल फ़रमाया)

देखो उनसे क़ुरान के बारे में बहस न करना के उसके बहुत से वुजूह व एहतेमालात होते हैं और इस तरह तुम अपनी कहते रहोगे और वह अपनी कहते रहेंगे , बल्कि उनसे सुन्नत के ज़रिये बहस करो के इससे बच कर निकल जाने का कोई रास्ता न होगा।

78-आपका मकतूबे गिरामी

( अबू मूसा अशअरी के नाम)

- हकमीन के सिलसिले में इसके एक ख़त के जवाब में जिसका तज़़़किरा सईद बिन यहया ने “ मग़ाज़ी ’ में किया है)

कितने ही लोग ऐसे हैं जो आखे़रत की बहुत सी सआदतों से महरूम हो गए हैं , दुनिया की तरफ़ झुक गए हैं और ख़्वाहिशात के मुताबिक़ बोलने लगे हैं मैं उस अम्र की वजह से एक हैरत व इस्तेजाब की मन्ज़िल में हूँ जहां ऐसे लोग जमा हो गए हैं जिन्हें अपनी ही बात अच्छी लगती है , मैं उनके ज़ख़्म का मदावा तो कर रहा हूँ लेकिन डर रहा हूँ के कहीं यह मुनजमिद ख़ून की शक्ल न इख़्तेयार कर ले।

और याद रखो के उम्मते पैग़म्बर (स 0) की शीराज़ाबन्दी और उसके इत्तेहाद के लिये समझ से ज़्यादा ख़्वाहिशमन्द कोई नहीं है जिसके ज़रिये मैं बेहतरीन सवाब और सरफ़राज़ी आखि़रत चाहता हूँ और मैं बहरहाल अपने अहद को पूरा करूंगा चाहे तुम इस बात से पलट जाओ जो आखि़री मुलाक़ात तक तुम्हारी ज़बान पर थी , यक़ीनन बदबख़्त वह है जो अक़्ल व तजुर्बे के होते हुए भी इसके फ़वाएद से महरूम रहे , मैं तो इस बात पर नाराज़ हूँ के कोई शख़्स हर्फ़े बातिल ज़बान पर जारी करे या किसी ऐसे अम्र को फ़़ासिद कर दे जिसकी ख़ुदा ने इस्लाह कर दी है लेहाज़ा जिस बात को तुम नहीं जानते हो उसको नज़रअन्दाज़ कर दो के शरीर लोग बड़ी बातें तुम तक पहुंचाने के लिये उड़कर पहुंचा करेंगे , वस्सलाम।


79-आपका मकतूबे गिरामी

( खि़लाफ़त के बाद , लशकर के सरदारो के नाम)

अम्माबाद! तुमसे पहले वाले सिर्फ़ इस बात से हलाक हो गए के उन्होंने लोगों के हक़ रोक लिये और उन्हें रिश्वत देकर ख़रीद लिया और उन्हें बातिल का पाबन्द बनाया तो सब उन्हीं के रास्तों पर चल पड़े।


फेहरीस्त

इमाम अली के मकतूबात (पत्र) 1

मुक़द्देमा 2

इमाम अली के मकतूब (पत्र) 3

1- आपका मकतूबे गिरामी (जो मदीने से बसरे की जानिब रवाना होते हुए अहले कूफ़ा के नाम तहरीर किया )4

2- आपका मकतूबे गिरामी (जिसे अहले कूफ़ा के नाम बसरा की फ़तेह के बाद लिखा गया) 5

3-आपका मकतूबे गिरामी (अपने क़ाज़ी शरीह के नाम) 5

4- आपका मकतूबे गिरामी (लशकर के कुछ सरदारो के नाम )8

5- आपका मकतूबे गिरामी (आज़रबाईजान के गवर्नर अशअस बिन क़ैस के नाम )8

6-आपका मकतूबे गिरामी 9

7-आपका मकतूबे गिरामी 10

8-आपका मकतूबे गिरामी (जरीर बिन अब्दुल्लाह बजली के नाम जब उन्हें माविया की फ़हमाइश के लिये रवाना फ़रमाया )11

9-आपका मकतूबे गिरामी (माविया के नाम )11

10-आपका मकतूबे गिरामी (माविया ही के नाम )13

11-आपका मकतूबे गिरामी (दुश्मन की तरफ़ भेजे हुए एक लशकर को यह हिदायतें फ़रमाईं )15

12-आपकी नसीहत (जो माक़ल बिन क़ैस रियाही को उस वक़्त फ़रमाई है जब उन्हें तीन हज़ार का लशकर देकर शाम की तरफ़ रवाना फ़रमाया है) 16

13-आपकी नसीहत 17

14-हिदायत (अपने लशकर के नाम सिफ़्फ़ीन की जंग के आग़ाज़ से पहले) 18

15-आपकी दुआ (जिसे दुश्मन के मुक़ाबले के वक़्त दोहराया करते थे )19

16-आपका मकतूब गिरामी (जो जंग के वक़्त अपने असहाब से फ़रमाया करते थे) 19

17-आपका मकतूबे गिरामी (माविया के नाम उसके एक ख़त के जवाब में) 20

18-हज़रत का मकतूबे गिरामी (बसरा के गवर्नर अब्दुल्लाह बिन अब्बास के नाम) 22

19-आपका मकतूबे गिरामी (अपने बाज़ गवर्नरो के नाम) 22

20-आपका मकतूबे गिरामी (ज़ियाद बिन अबिया के नाम) 23

21-आपका मकतूबे गिरामी (ज़ियाद इब्ने अबिया के नाम) 24

22-आपका मकतूबे गिरामी 24

23-आपका इरशादे गिरामी (जिसे अपनी शहादत से पहले बतौर वसीयत फ़रमाया है) 25

24-आपकी वसीयत (अपने अमवाल के बारे में जिसे जंगे सिफ़्फ़ीन की वापसी पर तहरीर फ़रमाया है) 26

25-आपकी वसीयत (जिसे हर उस शख़्स को लिख कर देते थे जिसे सदक़ात का आमिल क़रार देते थे) 28

26-आपका अहदनामा (बाज़ गवर्नरो के लिये जिन्हें सदक़ात की जमाआवरी के लिये रवाना फ़रमाया था) 31

27-आपका अहदनामा (मोहम्मद बिन अबीबक्र के नाम- जब उन्हें मिस्र का हाकिम बनाया) 32

28-आपका मकतूबे गिरामी (माविया के ख़त के जवाब में जो बक़ौल सय्यद रज़ी आपका बेहतरीन ख़ुत्बा है) 36

29-आपका मकतूबे गिरामी (अहले बसरा के नाम) 42

30 -आपका मकतूबे गिरामी (माविया के नाम) 42

31-आपका वसीयत नामा (जिसे इमाम हसन (अ 0) के नाम सिफ़्फ़ीन से वापसी पर मक़ामे हाज़ेरीन में तहरीर फ़रमाया है) 43

32-आपका मकतूबे गिरामी (माविया के नाम) 63

33-आपका मकतूबे गिरामी (मक्के के गवर्नर कसम बिन अब्बास के नाम) 63

34-आपका मकतूबे गिरामी 64

35-आपका मकतूबे गिरामी (अब्दुल्लाह बिन अब्बास के नाम - मोहम्मद बिन अबीबक्र की शहादत के बाद) 66

36-आपका मकतूबे गिरामी (अपने भाई अक़ील के नाम जिसमें अपने बाज़ लश्करों का ज़िक्र फ़रमाया है और यह दर हक़ीक़त अक़ील के मकतूब का जवाब है) 67

37-आपका मकतूबे गिरामी (माविया के नाम) 69

38-आपका मकतूबे गिरामी (मालिके अश्तर की विलायत के मौक़े पर अहले मिस्र के नाम) 70

39-आपका मकतूबे गिरामी (अम्र इब्ने आस के नाम) 71

40-आपका मकतूबे गिरामी (बाज़ गवर्नरो के नाम) 72

41-आपका मकतूबे गिरामी (बाज़ गवर्नरो के नाम) 73

42-आपका मकतूबे गिरामी 77

43-आपका मकतूबे गिरामी (मुस्क़ला बिन हबीरा अलशीबानी के नाम जो अर्द शीर ख़ुर्रह में आपके गवर्नर थे) 77

44-आपका मकतूबे गिरामी 78

45-आपका मकतूबे गिरामी 79

46-आपका मकतूबे गिरामी (बाज़ गवर्नर के नाम) 86

47-आपकी वसीयत (इमाम हसन (अ 0) और इमाम हुसैन (अ 0) से- इब्ने मुलजिम की तलवार से ज़ख़्मी होने के बाद) 87

48-आपका मकतूबे गिरामी (माविया के नाम) 90

49-आपका मकतूबे गिरामी (माविया ही के नाम) 90

50-आपका मकतूबे गिरामी (लशकर के सरदारो के नाम) 91

51-आपका मकतूबे गिरामी (टैक्स वसूल करने वालों के नाम) 92

52-आपका मकतूबे गिरामी (शहरो के गर्वनरो के नाम- नमाज़ के बारे में) 94

53-आपका मकतूबे गिरामी 95

54-आपका मकतूबे गिरामी 120

55-आपका मकतूबे गिरामी (माविया के नाम) 121

56-आपकी वसीयत (जो शरीह बिन हानी को उस वक़्त फ़रमाई जब उन्हें शाम जाने वाले हर अव्वल दस्ते का सरदार मुक़र्रर फ़रमाया) 122

57-आपका मकतूबे गिरामी (अहले कूफ़ा के नाम- मदीने से बसरा रवाना होते वक़्त) 123

58-आपका मकतूबे गिरामी (तमाम शहरों के नाम - जिसमें सिफ़्फ़ीन की हक़ीक़त का इज़हार किया गया है) 123

59-आपका मकतूबे गिरामी (असवद बिन क़तबा वालीए हलवान के नाम) 124

60-आपका मकतूबे गिरामी (उन गवर्नरो के नाम जिनका इलाक़ा फ़ौज के रास्ते में पड़ता था )125

61-आपका मकतूबे गिरामी (कुमैल बिन ज़ियाद के नाम जो बैतुलमाल के आमिल थे और उन्होंने फ़ौजे दुश्मन को लूटमार से मना नहीं किया) 126

62-आपका मकतूबे गिरामी (अहले मिस्र के नाम ,मालिके अश्तर के ज़रिये जब उनको मिस्र का गर्ननर बनाकर रवाना किया) 127

63-आपका मकतूबे गिरामी 130

64-आपका मकतूबे गिरामी (माविया के जवाब में )131

65-आपका मकतूबे गिरामी (माविया ही के नाम) 133

66-आपका मकतूबे गिरामी 135

67-आपका मकतूबे गिरामी (मक्के के गवर्नर क़ुसम बिन अलअबास के नाम) 136

68-आपका मकतूबे गिरामी (जनाबे सलमान फ़ारसी के नाम-अपने दौरे खि़लाफ़त से पहले) 137

69-आपका मकतूबे गिरामी (हारिस हमदानी के नाम) 138

70-आपका मकतूबे गिरामी 141

71-आपका मकतूबे गिरामी 141

72-आपका मकतूबे गिरामी 142

73-आपका मकतूबे गिरामी 143

74-आपका मुआहेदा (संधी) 144

75-आपका मकतूबे गिरामी 145

76-आपकी वसीयत 145

77-आपकी वसीयत 146

78-आपका मकतूबे गिरामी 146

79-आपका मकतूबे गिरामी 148

फेहरीस्त 149

इमाम अली के मकतूबात (पत्र)

इमाम अली के मकतूबात (पत्र)

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लेखक: सैय्यद रज़ी र.ह
कैटिगिरी: इमाम अली(अ)
पन्ने: 15