शिओं के बुज़ुर्ग उलमा
अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क
अली पुत्र बाबवे क़ुम्मी अलैहिर्रहमा
शहीद मुतह्हरी का कथन
अबुल हसन पुत्र अली पुत्र हुसैन पुत्र मूसा पुत्र बाबवे एक प्रसिद्ध फ़कीह थे। वह अपने समय मे क़ुम के फ़कीहों व मुहद्दिसों के सरदार थे। समस्त शिया धार्मिक कार्यो मे उनसे सम्बन्ध स्थापित करते थे। उनका फ़तवा सबकी दृष्टी मे आदरनीय था।
उनकी श्रेष्ठता व पवित्रता का इस बात से अंदाज़ा लगाया जासकता है कि अगर किसी विषय मे अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम के कथन न मिलते हो और उस सम्बन्ध मे इनका फ़तवा मौजूद हो तो क्योकि उनका जीवन काल इमामे मासूम के समय से बहुत समीप था अतः हमारे फ़कीह उनके फ़तवे को हदीस के बराबर मानते थे।और उनके फ़तवे को उस विषय मे हदीस होने का आधार मानते थे। जैसा कि शहीदे अव्वल ने अपनी किताब ज़िकरी मे इस प्रकार वर्णन किया है। “हमारे फ़कीह क्योंकि उन पर पूर्ण रूप से विशवास करते थे अतः जिस विषय मे वह दलील (तर्क) नही रखते थे उस विषय के बारे मे अली पुत्र बाबवे क़ुम्मी के रिसाले से दली प्राप्त करते थे। ”
इब्ने नदीम का कथन
प्रसिद्ध इतिहासकार इब्ने नदीम अपनी किताब फ़हरिस्त मे लिखते हैं कि “इब्ने बाबवे अली पुत्र मूसा क़ुम्मी शियों के एक विशवसनीय फ़कीह थे। “
इमामे ज़माना की विशेष कृपा
अली पुत्र बाबवे क़ुम्मी इमामे ज़माना की कृपा के विशेष पात्र हुए तथा इमामे ज़माना का एक पत्र भी आदरनीय हुसैन पुत्र नोबख्ती की मध्यस्था से उनको प्रप्त हुआ। इस पत्र के सार का नजाशी ने अपनी किताब रिजाले नजाशी मे इस प्रकार वर्णन किया है। “ अबुल हसन पुत्र अली पुत्र हुसैन पुत्र मूसा पुत्र बाबवे क़ुम्मी जो क़ुम के लोगों के फ़कीह व उनके विशवसनीय हैं वह इराक़ आये। तथा अबुल क़ासिम हुसैन पुत्र रूह से मुलाक़ात कर उनसे कुछसवाल किये।तथा बाद मे कुछ बातों को लिखित रूप मे दिया और लिखने का कार्य अली पुत्र जाफ़र पुत्र असवद ने किया। इन लेखो मे से एक लेख के बारे मे उन्होने कहा कि इसको इमामे ज़माना की खिदमत (सेवा) मे भेज दिया जाये । इस पत्र मे इमाम से संतान प्राप्ति के लिए दुआ की प्रार्थना की गई थी। इस का उत्तर इमाम से इस प्रकार प्राप्त हुआ कि हमने अल्लाह से दुआ करदी है कि वह आपको संतान प्रदान करे। अतः आपको शीघ्र ही दो नेक बेटे प्राप्त होगें। ”
इसके बाद अबु जाफ़र व अबु अब्दुल्लाह नामक दो बेटे उनको प्राप्त हुए। अबु अब्दुल्लाह हुसैन पुत्र अबीदुल्लाह ने उल्लेख किया है कि मैंने अबु जाफ़र से सुना है कि वह बार बार कहते थे कि ” मैं इमामे ज़माना की दुआ से इस संसार मे आया हूँ। ” वह हमेशा इस पर गर्व करते थे।
अली पुत्र बाबवे क़ुम्मी की रचनाऐं
अली पुत्र बाबवे क़ुम्मी की अनेक रचनाऐं हैं इनमे से मुख्य इस प्रकार हैं। किताबे शराए इस किताब को उन्होने विशेष रूप से अपने पुत्र सदूक़ (रहमतुल्लाह अलैह) के लिए लिखा। उनकी अन्य रचनाऐं इस प्रकार हैं--- रिसालःतुल इखवान ,कुर्बुल असनाद ,तफ़सीरे क़ुऑने करीम ,किताबुन निकाह ,अन्नवादिर ,किताबुत्तौहीद ,अस्सलात ,मनासिके हज इत्यादि---
स्वर्गवास
आदरनीय अली पुत्र बाबवे क़ुम्मी का स्वर्गवास 329 हिजरी क़मरी मे हुआ। उनको क़ुम मे मासूमा के हरम के सहन के क़रीब (समीप) दफ़्न किया गया।
वह एक महानव विद्वान थे अल्लाह उन पर रहमत करे।
हुसैन पुत्र अबी अक़ील उमानी अलैहिर्रहमा
आयतुल्लाह मुतह्हरी का कथन
“ कहते हैं कि इब्ने अबी अक़ील उमानी यमनी थे क्योंकि उमान दरया ए यमन के किनारे की आबादीयो मे से एक है। वह जाफ़र पुत्र क़ुलवीय के उस्ताद थे और जाफ़र पुत्र क़ुलवीय शेख मुफ़ीद के उस्ताद थे। इब्ने अक़ील का फ़िक्ह मे स्थान स्थान पर उल्लेख मिलता है। हुसैन पुत्र अबी अक़ील जिनका लक़ब हिज़ा और कुन्नियत अबू अली है वह उमानी के नाम से प्रसिद्ध हैं।वह शेख मुफ़ीद के उस्ताद (गुरू) व शिया सम्प्रदाय के एक महान फ़कीह व मुतकल्लिम थे। यह शेख कुलैनी रहमतुल्लाह के समकालीन थे। ”
मरहूम मुदर्रिस का कथन
मुदर्रिस अपनी किताब रिहानःतुल अदब मे लिखते हैं कि “शेख मुफ़ीद अलैहिर्रहमा ने उनकी बहुत प्रशंसा की है। वह प्रथम व्यक्ति हैं जिन्होने इमामे ज़माना की ग़ैबते कुबरा के प्रथम चरण मे फ़िक़्ह को परिमार्जित किया व उसको असूल के क़वाइद (सिद्धान्तो)के अनुकूल बनाया। उन्होने इज्तेहाद के मार्ग को खोला और अहकामव उसूल के मध्य अनुकूलता स्थापित की। उनके बाद इब्ने जुनैद इस्काफ़ी उनके मार्ग पर चले इसी कारण फ़िक्ह मे इन दो महान फ़कीहों को क़दीमैन (अर्थात दो पुराने व्यक्ति)की उपाधि से याद किया जाता है।इब्ने अबी अक़ील उमानी अल्लामा हिल्ली व मुहक़्क़िक़ हिल्ली व बाद मे आने वाले विद्वानो की दृष्ठि के विशेष पात्र रहे हैं। वह नमाज़ मे अज़ान इक़ामत के वाजिब होने के पक्षधर थे तथा अज़ान व इक़ामत के बिना नमाज़ को बातिल(निष्फल) मानते थे। ”
मरहूम मिर्ज़ा अबदुल्लाह आफ़न्दी का कथन
मरहूम मिर्ज़ा अब्दुल्लाह आफ़न्दी अपनी किताब रियाज़ुल उलमा मे इनके बारे मे लिखते हैं कि “इब्ने अबी अक़ील एक महान फ़कीह व मुत-कल्लिम थे। उनके मत व कथन हमारी किताबों मे मिलते हैं। उमान मे अधिकतर खवारिज व नवासिब हैं परन्तु ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि वह तीसरी शताब्दी हिजरी क़मरी के बाद पश्चिम के किसी स्थान से आकर यहा बस गये होंगें। ”
नजाशी का कथन
नजाशी अपनी किताब रिजाल मे लिखते हैं कि “वह एक विशवसनीस फ़कीह व मुतकल्लिम थे। उनकी किताब (अल मुतःमस्सिक बे हबले आले रसूल) बहुत अधिक प्रसिद्ध है। शियों मे शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो खुरासान जाये व उनकी इस किताब को न खरीदे। मैंने अपने उस्ताद(गुरू) अबा अब्दिल्लाह से उनकी बहुत प्रशंसा सुनी है। ”
शेख तूसी का कथन
शेख तूसी अपनी किताब अल फ़हरिस्त मे लिखते हैं कि “इब्ने अबी अक़ील शियो के मुतःकल्लेमीन मे से एक थे।उनहोने फिक़्ह मे बहुत सी किताबें लिखी हैं। अल कर वल फ़र इमामत के विषय पर व अल मुतःमस्सिक बेहबेले आले रसूल फ़िक्ह विषय पर उनकी महत्वपूर्ण किताबे हैं। ”
स्वर्गवास
उनके स्वर्गवास की तिथि को जानने के लिए अनेक प्रयास किये गये परन्तु सही तिथि के ज्ञान मे सफलता प्राप्त न हो सकी। परन्तु उनके शेख कुलैनी के समकालीन होने से यह अनुमान लगाया जाता है कि उनका स्वर्गवास भी चौथी शताब्दी हिजरी क़मरी के उतरार्द्ध मे 330 से 350 के मध्य हुआ होगा।
वह एक महानव विद्वान थे अल्लाह उन पर रहमत करे।
मुहम्मद इब्ने जुनैद इस्काफ़ी अलैहिर्रहमा
मुहम्मद पुत्र अहमद पुत्र जुनैद इस्काफ़ी इस्काफ़ नामक स्थान पर पैदा हुए। (यह स्थान बसरे व नहरवान के मध्य स्थित था वर्तमान मे यह स्थान इराक़ मे है।) आपका परिवार एक शिक्षित व धार्मिक विचारधारा वाला परिवार था। भाग्य से आपको कार्य करने के लिए वह समय प्राप्त हुआ जब इस्लामी क्षेत्र अब्बासी खलीफ़ाओं से ताज़ा ताज़ा स्वतन्त्र हुए थे।
आदरनीय पैगम्बर के स्वर्गवास के बाद से लग भग 300 वर्षों तक शियों के लिए संकटमय परिस्थितियां रहीं। क्योँकि शिया अल्प संख्यक थे और बनी उमैय्या व बनी अब्बास के समस्त शासको का यह प्रयास किया कि शियों को इनके इमामों से दूर रखा जाये ताकि इनके बीच सम्बन्ध स्थापित न हो सके। अफ्रीक़ा से लेकर स्पेन तक व मिस्र से लेकर चीन की सीमा तक फैले बनी उमैया व बनी अब्बास के शासन मे शिया सम्प्रदाय घुटन के साथ जीवन व्यतीत कर रहा था। उन पर अपनी धर्म निष्ठा प्रकट करने पर भी प्रतिबँध था।चौथी शताब्दी हिजरी के मध्य मे शियो को थोड़ी स्वतन्त्रता प्राप्त हुई । क्योँकि एक ओर मिस्र मे फ़ातमियों का एक शक्ति शाली शासन स्थापित हो गया था तथा दूसरी ओर शाम नामक प्रान्त मे अपना शासन स्थापित करने वाला सैफ़ुद्दोला नामक शासक शियों के प्रति विन्रम था। इसी प्रकार पूर्वी दक्षिणी व उत्तरी ईरान मे शासन कर रहे गौरीयान ,सफ़ारियान ,ताहिरयान वँशके समस्त शासक शिया थेतथा उन्होने अब्बासी शासकों के विऱूद्ध विद्रोह करके अपने शासनक्षेत्र को अलग कर लिया था।सौभाग्य वंश इसी बीच आले बोया का शासन स्थापित हुआ व उन्होने अपने शासन को शाम व मिस्र तक विस्तृत किया। वह शिया विचार धारा से सम्बन्धित थे और उन्होने शियों के उत्थान के लिए बहुत प्रयास किये।
उपरोक्त लिखित समस्त कारको ने यह स्थिति उत्पन्न की कि शिया दूर दूर के क्षेत्रों से आकर एकत्रित होने लगे तथा स्वतन्त्रता पूर्वक जीवन यापन करने लगे। उन्होने दीर्घ समय के बाद मिली इस स्वतन्त्रता का पूर्ण लाभ उठाया तथा अपने शिक्षण केन्द्र स्थापित कर अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम के विचारों को जनता तक पहुँचाने का कार्य आरम्भ किया । इसी समय इब्ने अबी अक़ील व इब्ने जुनैद ने सुन्नी सम्प्रदाय के विद्वानो से सम्बन्ध स्थापित किये।
इब्ने जुनैद के सम्बन्ध मे आयतुल्लाह मुतह्हरी का कथन
” इब्ने जुनैद इस्काफ़ी शेख मुफ़ीद अलैहिर्रहमा के एक गुरू हैँ उनकी मृत्यु सन् 381 हिजरी क़मरी मे हुई। कहा जाता है कि उन्होने 50 से अधिक किताबें लिखी हैं। फ़कीह इब्ने जुनैद व इब्ने अबी अक़ील को क़दीमैन (दो आदीकालीन फ़कीह) कहते हैं। इब्ने जुनैद के मत फ़िक़्ह मे सदैव दृष्टिगोचर होते रहते हैं। ”
नजाशी का कथन
मुहम्मद इब्ने जुनैद के सम्बन्ध मे प्रसिद्ध विद्वान नजाशी लिखते हैं कि ” मुहम्मद पुत्र अहमद पुत्र जुनैद अबु अली अलकातिब अल इस्काफ़ी का स्तित्व हमारे लिए गर्व हैं।वह उच्च कोटी के एक विशवसनीय विद्वान थे तथा उन्होने बहुतसी किताबें लिखी हैं। मैनें अपने बहुत से बुज़ुर्गों से सुना है कि उनके पास इमाम की एक तलवार व कुछ माल था उन्होने मृत्यु के समय इसके सम्बन्ध मे अपनी कनीज़ को वसीयत की थी । परन्तु वह सम्पत्ति उसके पास नष्ट हो गई। ”
सैयद सद्र का कथन
सैयद सद्र अपनी किताब तासी- सुश- शिया मे लिखते हैं कि ” मुहम्मद पुत्र अहमद पुत्र जुनैद हमारे बुज़ुर्ग फ़कीहों मे से एक हैं और वह कातिबे इस्काफ़ी के उप नाम से प्रसिद्ध हैं। उन्होने फ़िक़्ह के आधारिक नियमो व उप नियमों से सम्बन्धित बहुतसी किताबें लिखीं तथा फिक़्ह को व्यवस्थित किया। उन्होने फ़िक़्ह मे अनेक बाब (खण्ड) स्थापित किये तथा प्रत्येक बाब को अन्य बाबों से अलग रखा इस कार्य के लिए उन्होनें बहुत परिश्रम किया। अगर कोई मस्अला सरल व प्रत्यक्ष होता तो वह केवल फ़तवे का उल्लेख करते थे परन्तु अगर कोई मस्अला कठिन होता तो वह उसके आधारिक कारकों पर प्रकाश डालते व उसके तर्कों का भी वर्णन करते थे। और अगर किसी मस्अले मे विभिन्न विद्वानो के विभिन्न मत होते थे तो वह उनका भी वर्णन करते थे। उनकी मुख्य किताबें तहज़ीबुश शिया ले अहकामिश शरिया ,किताबुल अहमदी लिल फ़िक़हे मुहम्मदी ,अन्नुसरत लिल अहकामिल इतरत आदि हैं।नजाशी उनके सम्बन्ध मे लिखते है कि (उन्होने लग भग 200 मस्अलो का वर्णन किया है वह इब्ने बाबवे , (शेख सदूक़ के पिता) हुसैन पुत्र रोह नौबख्ती , (इमाम के तीसरे नायब) के समकालीन थे। उन्होने इब्नुल ज़ाफ़िर शलमग़ानी और अबु मुहम्मद हारून पुत्र मूसा आदि से रिवायत की है।) ”
मुहम्मद पुत्र जुनैद की रचनाऐं
मुहम्मद पुत्र जुनैद ने लग भग पचास किताबें फ़िक़्ह ,उसूल ,कलाम व अदब आदि विषयों पर लिखी हैं।इनमे से मुख्य किताबें इस प्रकार है----
1-अहकामुस्सलात
2-अहकामुत्तलाक़
3-अल मुखतसःरुल अहमदी लिल फ़िक़्हिल मुहम्मदी
4-अल इरतिया फ़ी तहरीमिल फ़ुक़ा
5-इज़ालःतुर्रान अन क़ुलूबिल इखवान
6-इस्तखराजुल मुराद अन मुखतलेफ़िल खिताब
7-अल इस्तनफ़ार इलल जिहाद
8-अल इस्तीफ़ा
9-अल इस्रा
10-अल इसफ़ार फ़ी रद्दे अलमुअय्यद
11-अल इशारात इला मा यनकरेहुल अवाम
12-इशकाल जुमलःतुल मवारीस
13-इज़हार मा सतरहु अहलुल इनाद मिन रिवायते अनिल आइम्मते फ़ी अम्रिल इजतिहाद
14-अल इफ़हाम ले उसूलिल अहकाम
15-अलफ़ा मसअलातुन
16-अलफ़िया दर कलाम
17-अमसालुल कुऑन
18-अल इनास बेआइम्मातिन नास
19-अल बिशारत वल क़िदार
20-तबसेरःतुल आरिफ़ व नक़दुज़ ज़ाइफ़
21-अत्तहरीर वत्तक़रीर
22-अत्तराफ़ी इला आलल मराक़ी
23-बनीतुस्साही बिल इलमिल इलाही
24-तहज़ीबुश शिया ले अहकामिश शरिया
25-हदाइक़ुल क़ुद्स
26-क़ुदसुत्तूर वा यनबूउन नूर फ़ी मानस्सलात अलन नबी
27-मुशकीलातुल मवारीस
28-अलमस्ह अलल खफ़ैन
29-किताबुल मस्ह अलल रिजलैन
30-अहकामुल अर्श
स्वर्गवास
मुहम्मद पुत्र जुनैद इस्काफ़ी सन् 381 हिजरी क़मरी मे स्वर्गवासी हुए।
वह एक महानव विद्वान थे अल्लाह उन पर रहमत करे।
शेख मुहम्मद कुलैनी अलैहिर्रहमा
जन्म
शेख मुहम्मद कुलैनी का जन्म ग्यारहवे इमाम हजरत हसन अस्करी अलैहिस्सलाम के समय मे सन्259 हिजरी क़मरी मे शहरे रै से 38 कि. मी. दूर कुलैन नामक स्थान पर हुआ था। आपके पिता याक़ूब एक श्रेष्ठ व्यक्ति थे उन्होने बचपन मे ही मुहम्द को प्रशिक्षित कर इस्लामी मान्यताओं से परिचित करा दिया था। शेख मुहम्मद कुलैनी तीसरी शताब्दी हिजरी के अन्तिम व चौथी शताब्दी हिजरी के प्रारम्भिक चरण मे शियों के उच्च कोटी के विद्वान थे वह फ़िक्ह व हदीस मे दक्ष थे। उनके द्वारा वर्णित हदीसों को सत्य व विशवासनीय माना जाता था। इसी कारण आपको सिक़्कतुल इस्लाम की उपाधि दी गयी थी।
क़ुम की यात्रा
शेख कुलैनी का काल हदीस का काल था। समस्त इस्लामी देशो मे हदीस का वर्णन करने ,हदीस को सुनने व हदीस को लिखने का अभियान चला हुआ था। शेख कुलैनी ने समय की अवश्यक्ता अनुसार शिया विचार धारा के विकास व उत्थान के लिए इस मार्ग पर चलना उचित समझा। और अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए अपने प्रियः जन्म स्थान कुलैन को त्याग कर क़ुम की ओर प्रस्थान किया। क़ुम उस समय मुहद्दिसो व रावियों का गढ़ था।
शेख कुलैनी के उस्ताद
क़ुम मे आने के बाद शेख कुलैनी ने उस समय के पवित्र व्यक्तित्व वाले उच्चय कोटी के आलिम (विद्वान) अहमद पुत्र मुहम्मद पुत्र ईसा से हदीस का ज्ञान प्राप्त करने लगे। तथा इस के साथ ही साथ उस समय के श्रेष्ठतम विद्वान अहमद पुत्र इदरीस से भी ज्ञान लाभ प्राप्त करने लगे। अहमद पुत्र इदरीस मुअल्लिम(शिक्षक) की उपाधि से प्रसिद्ध हैं। मुअल्लिम वह व्यक्ति हैं जिनके सम्बन्ध मे शेख तूसी ने अपनी किताब रिजाल मे लिखा है कि “वह हज़रत इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम के सहाबियों मे से थे और उनको इमाम के साथ रहने श्रेय प्राप्त हुआ था। ”
प्रसिद्ध विद्वान नजाशी मुअल्लिम के सम्बन्ध मे लिखते हैं कि “चूँकि मुल्लिम ने इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम से ज्ञान प्राप्त किया था। और क्योंकि वह शेख कुलैनी के गुरू हैं इस लिए उनको मुअल्लिम कहा जाता है। ”
शेख कुलैनी ने अपने ज्ञान मे वृद्धि हेतू उस समय के एक और महान विद्वान अब्दुल्लाह पुत्र जाफ़र हुमैरी से भी ज्ञान लाभ प्राप्त किया। अब्दुल्लाह वह महान विद्वान हैं जिनका उस समय के हदीस ,रिजाल व इतिहास के सभी विद्वान आदर करते थे। वह भी इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम के असहाब मे थे। उन्होने बहुत सी किताबे लिखी परन्तु इस समय उनकी (क़ुर्बुल असनाद) नामक केवल एक ही किताब मौजूद है।
शेख कुलैनी ने अन्य जिन लोगों से ज्ञान लाभ प्राप्त किया वह निम्ण लिखित हैं।
1-अहमद पुत्र मुहम्मद पुत्र आसिमे कूफ़ी
2-हसन पुत्र फ़ज़्ल पुत्र ज़ैद यमानी
3-मुहम्मद पुत्र हसन सफ़्फ़ार
4-सुहैल पुत्र ज़ियाद आदमी राज़ी
5-मुहम्मद पुत्र हसन ताय़ी
6-मुहम्मद पुत्र इस्माईल नेशापुरी
7-अहमद पुत्र मेहरान
शेख कुलैनी का क़ुम से प्रस्थान
क़ुम उस समय शिया विचार धारा का मुख्य केन्द्र था। तथा मासूमीन अलैहिमुस्सलाम की हदीसों( प्रवचनो) के प्यासे व्यक्ति यहाँ आकर अपनी प्यास बुझाते थे। परन्तु शेख कुलैनी यहाँ पर पूर्ण रूप से तृप्त न हो सके और अपनी प्यास बुझाने के लिए उन्होने क़ुम से प्रस्थान किया और अहादीस का ज्ञान प्राप्त करने के लिए वह एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्राऐं करते रहे।अगर उन्हें किसी स्थान के बारे मे मालूम होता कि उस स्थान पर एक हदीस का जानने वाला व्यक्ति रहता है तो वह उस स्थान पर पहुँच कर उससे वह हदीस सुनते उसको याद करते व दूसरे स्थान की ओर प्रस्थान कर जाते। इसी प्रकार यात्रा करते हुए वह कूफ़े पहुँचे। कुफ़ा उस समय हदीस के महान विद्वान इब्ने उक़्दा का निवास स्थान था वह हदीस को याद करने मे विश्व विख्यात थे। उनको एक लाख हदीसें सनद के साथ याद थीं। उन्होने बहुत सी किताबे लिखी हैं उनमे सबसे प्रसिद्ध किताब रिजाल इब्ने उक़्दा नामक किताब है इस किताब मे उन्होने इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम के 4000 शिष्यों के नाम लिखें हैं और इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम की बहुत सी हदीसों का उल्लेख भी किया है। यह किताब शेख तूसी अलैहिर्रहमा के समय तक उपस्थित थी परन्तु बाद मे यह किताब लुप्त हो गई।
इसके बाद शेख कुलैनी अलैहिर्रहमा विभिन्न विद्वानो व मुहद्दिसों से ज्ञान लाभ प्राप्त करते हुए बग़दाद पहुँचे। जब वह बग़दाद पहुँचे तो उस समय तक उन्होने ज्ञान के क्षेत्र बहुत ख्याति प्राप्त करली थी। शिया उन पर गर्व करते थे व सुन्नी उनको आदर की दृष्टि से देखते थे। उनकी पवित्रता ,विद्वत्ता व श्रेष्ठता की ख्याति विश्व व्यापी हो गयी थी। उन के समकालीन सुन्नी विद्वान भी धार्मिक समस्याओं के समाधान के लिए उनसे सम्पर्क स्थापित करते थे।क्योंकि अन्य इस्लामी सम्प्रदायो के अनुयायी भी उनके फ़तवे को मानते थे इसी कारण वह सिक़्क़तुल इस्लाम कहलाने लगे। इस्लाम मे वह प्रथम व्यक्ति हैं जो इस उपाधि से सुशोभित हुए।
शेख कुलैनी ने अहले सुन्नत मे भी इस सीमा तक अपना वर्चस्प स्थापित किया कि इब्ने असीर नामक विद्वान ने पैगम्बर सल्लल्लाहो अलैहि वा आलिहि वसल्लम की एक हदीस लिखी कि आपने कहा कि “अल्लाह प्रत्येक शताब्दी के आरम्भ मे एक व्यक्ति को चुनता है जो उसके धर्म को जीवित रखे। ” बाद मे इब्ने असीर ने इस हदीस की व्याख्या करते हुए लिखा कि “प्रथम शताब्दी मे शिया मज़हब को जीवित करने वाले महम्मद पुत्र अली हज़रत इमाम बाक़िर अलैहिस्सलाम थे और दूसरी शताब्दी मे यह कार्य अली पुत्र मूसा अर्थात हज़रत इमाम अली रिज़ा ने किया। और तीसरी शताब्दी मे शिया सम्प्रदाय को जीवित करने का कार्य मुहम्मद पुत्र याक़ूब कुलैनी ने किया। ”
शेख कुलैनी का इल्मी मुक़ाम (विद्वत्तीय स्थान)
शेख कुलैनी अलैहिर्रहमा अपने समय के प्रसिद्ध विद्वान थे। उनकी श्रेष्ठता के लिए यही अधिक है कि उन्होने उस समय मे इल्म व तक़वे( ज्ञान व पवित्रता)के क्षेत्र मे प्रसिद्धि प्राप्त की जब इमाम ग़ैबते सुग़रा मे थे और उनके नायिब शियों के मध्य उपस्थित थे। तथा अपने ज्ञान व पवित्रता के लिए प्रसिद्ध थे और आदर की दृष्टि से देखे जाते थे। शेख कुलैनी ने उस समय शिया सम्प्रदाय का खुले आम प्रचार किया। शिया व सुन्नी दोनो सम्प्रदाय उनको आदर की दृष्टि से देखते थे।
शेख कुलैनी विद्वानों की दृष्टि मे
1-प्रसिद्ध विद्वान नजशी के अनुसार –“वह अपने समय मे शहरे रै मे शियों के पेशवा थे। उन्होने सबसे अधिक हदीसों को याद किया था तथा वह उस समय सबसे अधिक विशवसनीय समझे जाते थे। “
2-इब्ने ताऊस के अनुसार- “शेख कुलैनी समस्त लोगों के विशवासपात्र थे। ”
3-इब्ने असीर के अनुसार - “उन्होने तीसरी शताब्दी मे इमामिया(शिया) समप्रदाय को नया जीवन प्रदान किया। वह शिया सम्प्रदाय के एक महान व प्रसिद्ध विद्वान थे। ”
4-इब्ने हज्रे अस्क़लानी के अनुसार- “शेख कुलैनी मुक़तदर अब्बासी के शासन काल मे शियों के विद्वान व पेशवा थे। ”
5-मुहम्मद तक़ी मजलिसी के अनुसार- “वास्तविक्ता यह है कि शिया विद्वानो मे कुलैनी जैसा कोई दूसरा पैदा नही हुआ। अगर कोई उनकी किताबों को देखें और उनके द्वारा अर्जित की गई सूचनाओं पर अपने ध्यान को केन्द्रित करे तो उसको ज्ञात होगा कि वह अल्लाह की विशेष कृपा के पात्र थे। ”
शेख कुलैनी के शागिर्द (शिष्यगण)
शेख कुलैनी के अनेकानेक शिष्य हैं उनमे से मुख्य़ शिष्य़ इस प्रकार हैं।
1-इब्ने अबी राफ़े सुमैरी
2-अहमद पुत्र अहमद कातिब कूफ़ी
3-अहमद पुत्र अली पुत्र सईद कूफ़ी
4-अबु ग़ालिब अहमद पुत्र राज़ी
5-जाफ़र पुत्र मुहम्मद पुत्र क़ुलवीय क़ुम्मी
6-अली पुत्र मुहम्मद पुत्र मूसा दक़्क़ाक़
7-मुहम्मद पुत्र इब्राहीम नोमानी- जो इब्ने अबी ज़ैनब से प्रसिद्ध हैं। यह शेख कुलैनी के मुख्य शिष्य थे तथा उनके बहुत निकट समझे जाते थे। इन्होने शेख कुलैनी अलैहिर्रहमा की काफ़ी नामक किताब को व्यवस्थित किया है।
8-मुहम्मद पुत्र अहमद सफ़वानी यह भी शेख कुलैनी अलैहिर्रहमा के मुख्य शिष्यों मे से थे। इन्होने शेख की काफ़ी नामक किताब की किताबत की थी।
9-मुहम्मद पुत्र अहमद सनानी ज़ाहिरी
10-मुहम्मद पुत्र अली माजीलवीय
11-मुहम्मद पुत्र मुहम्मद पुत्र इसाम कुलैनी
12-हारून पुत्र मूसा
शेख कुलैनी की रचनाऐं
1-किताबे रिजाल
2-किताबे रद्द बर क़िरामेता
3-किताबे रसाईल आइम्मा अलैहिमुस्सलाम
4-किताबे ताबीरूर्रोया
5-मजमुआ ए अशार
6-किताबे काफ़ी यह शेख कुलैनी की एक महत्वपूर्ण किताब है तथा इस किताब को शिया सम्प्रदाय मे उच्चय स्थान प्राप्त है। यह किताब तीन भागों पर आधारित है
क-उसूले काफ़ी
ख-फरू-ए-काफ़ी
ग-रौज़ऐ-ए-काफ़ी
उसूले काफ़ी नामक भाग मे पैगम्बरे इस्लाम व आइम्मा-ए-मासूमीन अलैहिमुस्सलाम के 16199 पवित्र कथनो(हदीसों) को एकत्रित किया गया है। तथा यह भाग तीस खण्डों पर आधारित है जो इस प्रकार हैं —
अक़्ल ,फ़ज़्ल ,इल्म ,तौहीद ,हुज्जत ,ईमान व कुफ़्र ,दुआ ,फ़ज़ाइले क़ुऑन ,तहारत व हैज़ ,सलात ,ज़कात ,सौम ,हज ,निकाह ,इत्क़व तदबीर व मुकातेबा ,ईमान व नज़रात व कफ़्फ़ारात ,मइशत ,शहादात ,क़ज़ाया व अहकाम ,जनाइज़ व सदक़ात ,सैद व ज़बायेह ,अतअमाह व अशरबाह ,दवाजन व रवाजन ,ज़ी व तजम्मुल ,जिहाद ,वसाया ,फ़राइज़ ,हुदूद ,दीयात व रोज़ेह इस किताब का अन्तिम खण्ड है।
काफ़ी शेख कुलैनी की सबसे अधिक प्रसिद्ध किताब है। यह उनका महत्व पूर्ण कार्य है और इस किताब के समान दूसरी कोई भी किताब इतनी विश्वसनीयता नही रखती। इस सम्बन्ध मे इमामे ज़माना अज्जःलल्लाहु तआला फ़रःजुहु शरीफ़ का एक वाक्य मिलता है कि आपने कहा कि “काफ़ी हमारे शियों की आवश्यक्ताओं की पूर्ति हेतू काफ़ी है। ” काफ़ी शिया सम्प्रदाय की मुख्य चार किताबों मे प्रथम स्थान पर है।अन्य तीन किताबें इस प्रकार हैं---
1-मन ला यहज़ोरोहुल फ़कीह (लेखक शेख सदूक़ अलैहिर्रहमा)
2-तहज़ीब (लेखक शेख तूसी अलैहिर्रहमा)
3-इस्तेबसार ( लेखक शेख तूसी अलैहिर्रहमा)
स्वर्गवास
शेख कुलैनी अलैहिर्रहमा का स्वर्गवास सन् 329हिजरी क़मरी के शाबान मास मे बग़दाद मे हुआ। उनकी नमाज़े जनाज़ा अबु क़िरात नामक विद्वान ने पढ़ाई। शियों ने विशेष आदर के साथ आपको बग़दाद मे ही बाबे कूफ़ा नामक स्थान पर दफ़्न किया। इसी वर्ष इमामे ज़माना अलैहिस्सलाम के अन्तिम नायब अली पुत्र मुहम्मद सुमैरी अलैहिर्रहमा का भी स्वर्गवास हुआ। और इसी वर्ष ही इमाम महदी अलैहिस्सलाम की ग़ैबते कुबरा शुरू हुई।
वह एक महानव विद्वान थे अल्लाह उन पर रहमत करे।
मुहम्मद पुत्र बाबवे (शेख सदूक़) अलैहिर्रहमा
जन्म
इमामे ज़माना के तीसरे नायिब(प्रतिनिधि) हुसैन पुत्र रूह नोबख्ती के समय मे शेख सदूक़ के पिता अली पुत्र बाबवे क़ुम्मी बग़दाद गये। क्योंकि उनके कोई संतान नही थी इस लिए उन्हेने इमाम को एक पत्र लिखा जिसमे मे पुत्र प्राप्ति की इच्छा व्यक्त की। यह पत्र उन्होने हुसैन पुत्र रोह को दिया और कहा कि आप जब इमाम की सेवा मे जाना तो मेरा यह पत्र भी इमाम की सेवा मे प्रस्तुत कर देना। इसके बाद उनको इमाम का उत्तर प्राप्त हुआ कि हमने तुम्हारे लिए दुआ कर दी है अल्लाह शीघ्र ही तुमको दो पवित्र पुत्र प्रदान करेगा।
सन्311हिजरी क़मरी मे इमाम की दुआ के फल स्वरूप शेख सदूक़ का जन्म हुआ। शेख सदूक़ ने स्वयं अपनी किताब कमालुद्दीन मे इस बात का उल्लेख किया है।
शेख सदूक़ के व्यक्तित्व पर एक दृष्टि
शेख सदूक़ एक शिक्षित परिवार मे पैदा हुए थे।शेख सदूक़ के पिता क़ुम के उच्च कोटी के विद्वान थे। शेख सदूक़ के अनुसार उन्होने200से अधिक किताबे लिखीं। शेख सदूक़ ने प्रारम्भिक शिक्षा पूर्ण करने के बाद क़ुम के महान फ़कीहो व मुहद्दिसों से हदीस व फ़िक्ह का ज्ञान प्राप्त किया। उन्होने इस ज्ञान की प्राप्ति हेहू अपने पिता अली पुत्र बाबवे क़ुम्मी ,मुहम्मद पुत्र हसन पुत्र वलीद ,अहमद पुत्र अली पुत्र इब्राहीम क़ुम्मी ,हुसैन पुत्र इदरीस क़ुम्मी व इत्यादि से ज्ञान लाभ प्राप्त किया।
बोया वंश के शासन काल मे उन्होने शिया बाहुल्य़ स्थानो का भ्रमन किया। शेख सदूक़ 347 हिजरी क़मरी मे रै नामक स्थान पर अबुल हसन मुहम्मद पुत्र अहमद पुत्र अली असदी से जो इब्ने जुरादाह बरदई के नाम से प्रसिद्ध थे हदीस के क्षेत्र मे ज्ञान लाभ प्राप्त किया। 352हिजरी क़मरी मे उन्होने नेशापुर मे अबु अली हुसैन पुत्र अहमद बहीक़ी ,अबदुर्रहमान मुहम्मद पुत्र अबदूस से भी हदीस के क्षेत्र मे ज्ञान लाभ प्राप्त किया। इसी प्रकार उन्होने मरू नामक स्थान पर अबुल हसन मुहम्मद पुत्र अली पुत्र फ़कीह ,अबू यूसुफ़ राफ़े पुत्र अब्दुल्लाह ,से भी हदीस के क्षेत्र मे ज्ञान लाभ प्राप्त किया। अबु यूसुफ़ राफ़े वह महान व्यक्ति हैं जिन्होने कूफ़ा ,मक्का ,बग़दाद ,बलख व सरखस मे हदीसो को सुना था। ज्ञानीयो के लिए भ्रमन एक साधारण कार्य है। शेख सदूक़ के समय मे शिया एक सीमा तक स्वतन्त्रता का जीवन व्यतीत कर रहे थे। इसी कारण उन्होने ने सुन्नी बाहुल्य स्थानो की भी यात्राऐं की तथा शिया सम्प्रदाय को बातिल मानने वालों के सम्मुख शिया सम्प्रदाय की वास्तविक्ता को उजागर किया। उन्होने शिया सम्प्रदाय के ज्ञान ,फ़िक्ह ,हदीस ,को प्रकाशित किया। तथा इस प्रकार शिया सम्प्रदाय के उत्थान व विकास मे महत्वपूर्ण योगदान किया।
उनका ज्ञान व अध्यात्म के क्षेत्र मे इतना उच्चय स्थान था कि फ़कीहे अज़ीमुश्शानी ,व बहरूल उलूम जैसे शिया विद्वानो व फ़कीहो ने रईसुल मुहद्देसीन जैसी उपाधी के साथ उनका वर्णन किया है।
शेख सदूक़ शिया विद्वानो की दृष्टि मे
1-शेख तूसी उनके सम्बन्ध मे कहते हैं कि शेख सदूक़ अलैहिर्रहमा एक उच्चय कोटी के विद्वान ,व हाफ़िज़े हदीस थे। उन्होने लगभग 300 किताबें लिखी। ज्ञान व हिफ़ज़े हदीस के क्षेत्र मे पूरे क़ुम मे कोई उन से बढ़ कर न था।
2-मुहम्मद पुत्र इदरीस हिल्ली उनके सम्बन्ध मे लिखते हैं कि शेख सदूक़ अलैहिर्रहमा एक विश्वसनीय विद्वान ,अखबार (रिवायात) के विशेषज्ञ ,इल्मे रिजाल के महान ज्ञानी व हदीस के हाफ़िज़ थे।
3-अल्लामा बहरूल उलूम उनके सम्बन्ध मे लिखते हैं कि अबूजाफ़र मुहम्मद पुत्र अली पुत्र हुसैन पुत्र मूसा पुत्र बाबवे क़ुम्मी शियों के पेशवाओं मे से एक पेशवा व शरीअत के सतूनो मे से एक सतून (स्तंभ) हैं। वह मुहद्देसीन के सरदार हैं ।व जो कथन उन्होने आइम्मा ए सादेक़ीन से हमारी ओर परिवर्तित किये हैं वह उन मे सच्चे हैं। वह इमामे ज़माना की दुआ से पैदा हुए थे। इस प्रकार उनको यह श्रेष्ठता प्राप्त हुई।
शेख सदूक़ के असातेज़ा (गुरूजन)
मरहूम शेख अब्दुर्ऱहीम रब्बानी शीराज़ी ने शेख सदूक़ के जिन गुरूओं का वर्णन किया है उनमे से मुख्य इस प्रकार हैँ।
1-अली पुत्र बाबवे क़ुम्मी
2-मुहम्मद पुत्र हसन वलीद क़ुम्मी
3-अहमद पुत्र अली पुत्र इब्राहीम
4-अली पुत्र मुहम्मद क़ज़वीनी
5-जाफ़र पुत्र मुहम्मद पुत्र शाज़ान
6-जाफ़र पुत्र मुहम्मद पुत्र क़लवीय क़ुम्मी
7-अली पुत्र अहमद पुत्र मेहरयार
8-अबुल हसन खयूती
9-अबू जाफ़र मुहम्मद पुत्र अली पुत्र असवद
10-अबू जाफ़र मुहम्मद पुत्र याक़ूब कुलैनी
11-अहमद पुत्र ज़ियाद पुत्र जाफ़र हमदानी
12-अली पुत्र अहमद पुत्र अब्दुल्लाह क़रकी
13-मुहम्मद पुत्र इब्राहीम लीसी
14-इब्राहीम पुत्र इस्हाक़ तालक़ानी
15-मुहम्मद पुत्र क़ासिम जुरजानी
16-हुसैन पुत्र इब्राहीम मकतबी
शेख सदूक़ के शिष्यगण
1-शेख मुफ़ीद
2-मुहम्मद पुत्र मुहम्मद पुत्र नोमान
3-हुसैन पुत्र अब्दुल्लाह
4-हारून पुत्र मूसा तलाकिबरी
5-हुसैन पुत्र अली पुत्र बाबवे क़ुम्मी (भाई)
6-हसन पुत्र हुसैन पुत्र बाबवे क़ुम्मी (भतीजा)
7-हसन पुत्र मुहम्मद क़ुम्मी
8-अली पुत्र अहमद पुत्र अब्बास नजाशी
9-इल्मुल हुदा सैय्यिद मुर्तज़ा
10-सैय्य़िद अबुल बरकात अली पुत्र हुसैन जूज़ी
11-अबुल क़ासिम अली खिज़ाज़
12-मुहम्मद पुत्र सुलेमान हिमरानी
शेख सदूक़ की रचनाऐं
शेख तूसी ने वर्णन किया है कि शेख सदूक़ ने 300 किताबे लिखी हैं। तथा शेख तूसी ने अपनी किताब फ़हरिस्त मे उनकी 40 किताबो के नाम लिखे हैं। तथा शेख नजाशी ने अपनी किताब मे उनकी 189 किताबो का उल्लेख किया है।उनकी मुख्य किताबो के नाम इस प्रकार हैं।
1-मन ला यहज़रूल फ़क़ीह
2-कमालुद्दीन व इतमामुन् नेअमत
3-किताब आमाली
4-किताब सिफ़ाते शिया
5-किताब अयूनुल अखबार इमाम रिज़ा अलैहिस्सलाम
6-किताब मसादेक़हुल अखबार
7-किताब खिसाल
8-किताब ऐलालुश शराए
9-किताब तौहीद
10-किताब इसबाते विलायत अली
11-किताब मारफ़त
12-किताब मदीनःतुल इल्म
13-किताब मक़ना
14-किताब मुआनीयुल अखबार
15-किताब मशीखातहुल फ़कीह
“ मन ला यहज़रुल फ़कीह ” शेख सदूक़ की विश्व प्रसिद्ध किताब है। यह किताब अनेको बार प्रकाशित हो चुकी है। शेख सदूक़ ने इस किताब को बलख क्षेत्र के इलाक़ नामक एक गाँव मे बैठकर लिखा था। इस किताब की अनेको विद्वानो ने व्याख्या की है तथा कुछ ने इस पर नोट्स लिखे हैं।
शेख सदूक़ इस किताब की प्रस्तावना मे लिखते हैं कि जब तक़दीर मुझे खैंच कर इस गाँव मे लाई तो यहां पर मेरी भेंट सैय्यिद अबू अब्दुल्लाह (जो नेअमत के नाम से प्रसिद्धि रखते हैं।) से हुई। मैं उनसे मिलकर बहुत प्रसन्न हुआ । उन्होने कहा कि मुहम्मद बिन ज़करिया राज़ी ने तिब मे (चिकित्सा ज्ञान) एक किताब लिखी थी और उसका नाम मन ला यहज़रूत तबीब रखा था। तथा इस किताब मे तिब (चिकित्साज्ञान) से सम्बन्धित सब बातों को लिखा था। जहां पर कोई तबीब (चिकित्सक) नही होता था वहां पर इस किताब की महत्ता बहुत अधिक थी। उन्होने मुझ से कहा कि आप फ़िक्ह ,हलाल ,हराम व दीनी अहकाम पर एक किताब लिखे जिसमे सब मसाइल मौजूद हो और उस किताब का नाम ला यहज़रूल फ़कीह रखें। ताकि जो जिस हुक्म को चाहे उसमे देखे और उस पर विश्वास करे। मैने उनकी इस बात को स्वीकार किया तथा यह किताब मन ला यहज़रूल फ़कीह लिखी।
इस किताब की महत्ता इस बात से प्रकट होती है कि शिया सम्प्रदाय की चार मुख्य किताबो मे यह किताब दूसरे स्थान पर है। इस किताब के चार भाग हैं जिनको विभिन्न 544 खण्ड़ो पर विभाजित किया गया है। तथा इस किताब मे 5963 हदीसो का उल्लेख किया गया है। जिनमे से 3913 हदीसों का मुस्नद रूप से उल्लेख किया गया है ,तथा शेष 2050 हदीसों का मुरसल रूप मे उल्लेख किया गया है।
स्वर्गवास
शेख सदूक़ मुहम्मद पुत्र बाबवे क़ुम्मी सत्तर वर्ष से अधिक जीवित रहे। तथा उन्होंने 300 से अधिक किताबे लिखी। वह सन् 381 हिजरी क़मरी मे रै नामक शहर (यह शहर वर्तमान मे ईरान की राजधानी तेहरान के पास स्थित है) मे स्वर्गवासी हुए तथा वहीं पर उनकी समाधि बनायी गई।
वह एक महानव विद्वान थे अल्लाह उन पर रहमत करे।
मुहम्मद पुत्र मसूद अयाशी समर क़न्दी अलैहिर्रहमा
आयतुल्लाह मुतह्हरी का कथन ”
एक अन्य फ़कीह जो अली पुत्र बाबवे क़ुम्मी से थोड़ा पूर्व थे अयाशी समरक़न्दी हैं। जो अपनी तफ़सीर के कारण प्रसिद्ध हैं। इब्ने नदीम अपनी किताब अलफहरिस्त मे लिखते हैं कि “उनकी किताबे खुरासान मे प्रचलित थीं। मगर हमने अभी तक फ़िक्ह मे उनके नज़रयात( दृष्टिकोण) नही देखे।शायद उनकी फ़िक्ह की किताबे लुप्त हो चुकी हैं। ”
अयाशी पहले सुन्नी थे और बाद मे शिया हुए। उनको अपने पिता से विरसे मे अत्याधिक सम्पत्ति मिली थी। उन्होने वह सम्पत्ति किताबों को जमा करने व अपने शिष्यों को प्रशिक्षित करने मे व्यय की।
मुहम्द पुत्र मसूद पुत्र मुहम्मद पुत्र अयाशी समरक़न्दी कूफ़ी जिनकी कुन्नियत अबूनस्र हैं। वह अयाशी के नाम से प्रसिद्ध हुए। वह एक़ महान फ़कीह व विद्वान थे। अर्बी साहित्य ,फ़िक्ह ,हदीस व तफ़्सीर मे पूर्ण रूप से दक्ष थे। वह शेख कुलैनी के समय मे शियों के बड़े फ़कीहों व विद्वानों मे गिने जाते थे।
मरहूम मुदर्रिस का कथन
रिहानतुल अदब नामक किताब का लेखक लिखता है कि “क्योंकि अयाशी समरकन्द के रहने वाले थे। और क्योंकि समरकन्द व बुखारे के आस पास सुन्नी सम्प्रदाय के अनुयायी रहते थे। अतः अयाशी भी सुन्नी फ़िक्ह का अनुसरण करते थे। बाद मे वह शिया हुए और फ़िक्हे जाफ़री पर आमिल (क्रियान्वित) हो गये। उन्होने अपने पिता से विरसे मे मिले तीस हज़ार दीनार को शिक्षा प्रसार व हदीस के प्रकाशन पर व्यय किया। उनका घर सदैव मस्जिद की तरह लोगों से भरा रहता था। जिनमे क़ारीयाने कुऑन ,मुहद्दिस (पैगम्बर व इमामो के कथन का उल्लेख करने वाले) ज्ञानी ,मुफ़स्सिर (कुऑन की व्याख्या करने वाले) की अधिकता होती थी। उनके घर मे विभिन्न समूह शिक्षा के विभिन्न कार्यों मे व्यस्त रहते थे। ”
मरहूम हाज आक़ा बुज़ुर्ग तेहरानी का कथन
“ अयाशी तफ़सीर के लेखक अयाशी ने इस्लामी विष्यों पर विभिन्न 200 किताबे लिखी हैँ। वह सिक़्क़ातुल इस्लाम शेख कुलैनी के समकालीन थे तथा इल्मे रिजाल के प्रसिद्ध विद्वान कुशी के गुरू थे। उनके पुत्र जाफ़र ने उनकी जिन किताबों के बारे मे वर्णन किया है उनमे से एक तफ़सीरे अयाशी मौजूद है। जिसका आधा भाग सूराए कहफ़ तक आस्तानाए क़ुदसे रज़वी मशहद ,किताब खने खियाबानी तबरेज़ ,किताब खाने शेखुल इस्लाम ज़नजान ,किताब खाना ए सैय्यद हसन सदरूद्दीन काज़मैन मे मौजूद है। ”
अल्लामा मजलिसी का कथन
“ अल्लामा मजलिसी बिहारूल अनवार के शुरू मे लिखते हैं कि तफ़सीरे अयाशी के दो क़दीम नुस्खे (पुरातन प्रति लिपी) देखे गये हैं। परन्तु इखतेसार (संक्षिप्ता) की वजह से उनकी सनद नही लिखी गई थी। ”
आयतुल्लाह सैय्यद हसन सद्र का कथन
“ तासीसुश- शिया लि उलूमिल इस्लाम किताब के लेखक ने दो स्थानो पर अयाशी का उल्लेख किया है। एक स्थान पर मुफ़स्सेरीन का उल्लेख करते हुए तथा दूसरे स्थान पर इतिहासकारो व सीरत के लेखकों का उल्लेख करते हुए। ”
वह पहले स्थान पर लिखते हैं कि अयाशी पुत्र मुहम्मद मस्ऊदी हमारे बुज़ुर्गों मे से एक हैं और वह अपनी तसनीफ़ात( रचनाओं) व तालीफ़ात( संकलनो) के लिए प्रसिद्ध हैं। उन्होने सीरत व इतिहास से सम्बन्धित जो किताबें लिखी हैं उनमे से मक्कातुल हराम ,अलमआरीज़ ,अन्बिया व ओलिया ,सीरते अबुबकर ,सीरते उमर ,सीरते उस्मान व सीरते मुआविया मुख्य हैं। शेख कुलैनी के अनुसार वह तीसरी शताब्दी हिजरी के विद्वानो मे थे।
दूसरे स्थान पर लिखते हैं कि अयाशी एक मुफ़स्सिर थे और उन्होने बहुत सी किताबे लिखी हैँ। उनके द्वारा लिखी गई तफ़सीर दो भागों पर आधारित थी परन्तु वर्तमान समय मे उनकी तफ़सीर का केवल प्रथम भाग ही हमारे पास है। उन्होने 200 के लग भग महत्वपूर्ण किताबें लिखी है। शेख कुलैनी के अनुसार वह तीसरी शताब्दी हिजरी के विद्वानों मे थे।
1380हिजरी क़मरी मे अल्लामा तबा तबाई ने तफ़सीरे अयाशी पर जो मुक़द्दमा( प्रारम्भिक नोट) लिखा है उसमे उन्होने अयाशी को एक महान व आदरनीय विद्वान के रूप मे याद किया है। और ईरान के कुछ पुस्तकाल्यों मे उनकी तफ़सीर के दूसरे भाग के मौजूद होने की आशंका व्यक्त की है।
मरहूम शेख अब्बास क़ुम्मी का कथन
शेख अब्बास क़ुम्मी अपनी किताब सफ़ीने मे लिखते हैं कि “अयाशी हमारे बुज़ुर्गो मे से एक है। वह जवानी मे शिया हुए और अली पुत्र हसन फ़त्ताल के शिष्यों मे से है। उन्होने कूफ़े बग़दाद व क़ुम के अन्य बुज़ुर्गों से भी ज्ञान लाभ प्राप्त किया। उन्होने अपने पिता से मिलने वाली समस्त सम्पत्ति को शिक्षा और हदीस के प्रचार प्रसार के लिए व्यय किया। ”
अयाशी की रचनाऐं
इब्ने नदीम ने अयाशी की 208 रचनाओं व संकलनो का उल्लेख किया है। जिनमे से 27 किताबे वर्तमान समय मे लुप्त हो गईं है। उनकी महत्वपूर्ण किताबो मे से एक तफ़सीरे अयाशी है जिसका केवल प्रथम भाग ही वर्तमान समय मे मौजूद है और द्वितीय भाग लुप्त हो चुका है। उनकी अन्य महत्वपूर्ण रचनाओ का इब्ने नदीम ने इस प्रकार उल्लेख किया है--- अस्सलात ,अत्तहारत ,मुख्तसरूस्सलात ,मुख्तसरूल हैज़ ,अल जनाइज़ ,मुख्तसरूल जनाइज़ ,अल-मनासिक ,अल आलिम वल मुताल्लिम ,अद्दावात ,अज़्ज़कात ,अल अशरबाह ,हद्दुश- शारूल अज़ाही इत्यादि।
स्वर्गवास
विद्वान ज़रकली ने अपनी किताब अल ऐलाम मे लिखा है कि अयाशी सन् 320 हिजरी क़मरी मे स्वर्गवासी हुए। इनके अतिरिक्त किसी अन्य लेखक ने अयाशी के स्वर्गवास के बारे मे नही लिखा।
अयाशी की संतान
अयाशी ने जाफ़र नामक अपने एक पुत्र को छोड़ा जो अपने समय के ज्ञानीयों व विद्वानो मे विशिष्ठ स्थान रखते थे। उन्होने अपने पिता की बहुतसी बाते उल्लेख की हैं।
अयाशी एक नेक व्यक्ति थे अल्लाह उन पर रहमत करे।
शेख मुफ़ीद अलैहिर्रहमा
मुहम्मद पुत्र मुहम्मद पुत्र नोमान जो शेख मुफ़ीद के नाम से प्रसिद्ध हैं उनका जन्म सन् 338 हिजरी क़मरी मे बग़दाद के निकट एक स्थान पर हुआ था। उन का परिवार शिया विचार धारा से सम्बन्धित था तथा उनके परिजन आले रसूल के प्रेम से फली भूत थे। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा घर पर हुई। तथा उच्च शिक्षा के लिए उन्होने बग़दाद की ओर प्रस्थान किया।
आयतुल्लाह मुतह्हरी का कथन
“ शेख मुफ़ीद का नाम मुहम्मद था और उनके पिता का नाम भी मुहम्मद था जो नोमान के पुत्र थे। शेख मुफ़ीद फ़कीह और मुतकल्लिम थे। इब्ने नदीम ने अपनी किताब अलफ़हरिस्त के दूसरे फ़न के पाँचवे मक़ाले मे शिया मुतः कल्लेमीन का उल्लेख करते हुए शेख मुफ़ीद को इब्ने मुअल्लिम लिखा है तथा उनकी बडी प्रशंसा की है। वह 338 हिजरी क़मरी मे पैदा हुए तथा 413 हिजरी क़मरी मे स्वर्गवासी हो गये। उन्होने फ़िक़्ह मे मक़ना नामक किताब लिखी जो बहुत प्रसिद्ध हुई। यह किताब वर्तमान समय मे भी प्रचलित है।शेख मुफ़ीद इस्लामिक संसार मे बहुत प्रसिद्ध हैं। अबु अली जाफ़री उनके सम्बन्ध मे कहते हैं कि शेख मुफ़ीद रात मे बहुत कम सोते थे तथा अपने समय को नमाज़ पढ़ने ,अध्ययन करने ,कुऑन की तिलावत करने व शिक्षण कार्य मे व्यतीत करते थे।शेख मुफ़ीद इब्ने अबी अक़ील के शिष्य थे। ”
शेख मुफ़ीद से पूर्व भी इल्मे कलाम शिया विचार धारा मे प्रचलित था। परन्तु क्योँकि शिया राजनीतिक दृष्टि से स्वतन्त्र नही थे और संकटमय परस्थितियों मे जीवन यापन कर रहे थे अतः इस कारण इल्मे कलाम की किताबे प्रकाशित न हो सकी थी। शेख मुफ़ीद से पूर्व शेख सदूक़ जो कि शिया सम्प्रदाय के सर्वे सर्वा थे उन्होने एक छोटी सतह पर इस कार्य को आरम्भ किया। आगे चलकर शेख मुफ़ीद ने अपने गुरू (शेख सदूक़) के मार्ग पर कार्य किया तथा इल्मे कलाम व उसूले फ़िक़्ह के आधारिक नियमो पर तर्क वितर्क करने की नीव डाली। तथा अपने से पूर्व के विद्वानो द्वारा किये गये प्रयासों को सफल बनाया व उसूले फ़िक्ह पर एक छोटी सी किताब लिखी जिसमे उसूले फ़िक़्ह के समस्त नियमो का वर्णन किया।
शेख मुफ़ीद शिया विद्वानो की दृष्टि मे
नजाशी की दृष्टि मे
“ मुहम्मद पुत्र मुहम्मद पुत्र नोमान पुत्र अब्दुस्सलाम पुत्र जाबिर पुत्र नोमान पुत्र सईद पुत्र जबीर (शेख मुफ़ीद) अलैहिर्रहमा की फ़िक़ह व उसूल मे प्रतिष्ठा तथा हदीस मे उनका सिक़ा होना इतना प्रसिद्ध है कि उनके परिचय की अवश्यक्ता नही है। ”
उन्होने बहुत सी किताबें लिखी उनकी मुख्य किताबें इस प्रकार हैँ-- अल मक़ना ,अल अरकान फ़ी दआईमुद्दीन ,अल ईज़ाह वल अफ़साह ,अल इरशाद ,अल अयून वल महासिन इत्यादि।
शेख तूसी की दृष्टि मे
“ मुहम्मद पुत्र मुहम्मद पुत्र नोमान जो इब्ने मुअल्लिम के नाम से प्रसिद्ध हैं। वह शिया इमामिया सम्प्रदाय के मुतःकल्लिम थे। वह अपने समय मे शियों का नेतृत्व करते थे और फ़िक़्ह व कलाम मे उनसे बड़ा कोई विद्वान नही था। उनकी बुद्धि व स्मरण शक्ति बहुत अधिक थी। वह सवालो का फ़ौरन जवाब देने मे माहिर( निपुण) थे। उन्होने छोटी बड़ी 200 से अधिक किताबे लिखी हैं। ”
शेख मुफ़ीद सुन्नी विद्वानो की दृष्टि मे
इब्ने हज्रे अस्क़लानी
“ शेख मुफ़ीद बहुत बड़े आबिद ,ज़ाहिद ,अहले ख़ुशु व तहज्जुद थे। वह सदैव ज्ञान से सम्बन्धित कार्यों मे व्यस्त रहते थे। उनसे बहुत से लोगों ने ज्ञान लाभ प्राप्त किया। समस्त शिया ज्ञान के क्षेत्र मे उनके ऋणी हैं। उनके पिता वासित नामक शहर मे रहते थे और वहीँ पर शिक्षण कार्य करते थे। वह अकबरी नामक स्थान पर स्वर्गवासी हुए कहा जाता है कि अज़दुद्दोलाह उनसे भेंट करने गया था। ”
इब्ने उम्माद हंबली
“ शेख मुफ़ीद शिया सम्प्रदाय के एक बुज़ुर्ग थे तथा फ़िक़्ह उसूल व कलाम के विशेष ज्ञाता थे। उन्होने समस्त फ़िरक़ो(सम्प्रदायों) के अनुयाईयों के साथ विचार विमर्श व तर्क वितर्क किया। आले बोया के शासन काल मे उनका विशेष स्थान था। वह बहुत नमाज़े पढ़ते ,रोज़ा रखते व दान देते थे।वह गेहूँवे रँग व दुबले शरीर वाले व्यक्ति थे तथा अच्छे वस्त्र धारण करते थे। 76 वर्ष जीवित रह कर उन्होने 200 से अधिक किताबे लिखीं। अज़दुद्दोलाह उनसे भेंट के लिए गया था। वह रमज़ान मास मे स्वर्गवासी हुए उनके अन्तिम संस्कार मे 80000 से अधिक लोग सम्मिलित हुए। उन पर अल्लाह की रहमत हो। ”
याफ़ई की दृष्टि मे
“ शेख मुफ़ीद शिया इमामिया सम्प्रदाय के शेख थे और वह इब्ने मुअल्लिम के नाम से प्रसिद्ध थे । उन्होने बहुतसी किताबें लिखी हैं। वह इल्मे कलाम ,फ़िक़्ह व मनाज़रे मे निपुण थे।वह समस्त विचार धाराओं के व्यक्तियो से मनाज़रा(तर्क वितर्क) करते थे। आले बोया के शासन काल मे उन्होने आदरपूर्वक जीवन व्यतीत किया। वह सन् 413 हिजरी क़मरी मे स्वर्गवासी हुए। ”
शेख मुफ़ीद के उस्ताद (गुरू जन)
शेख मुफ़ीद ने अनेको विद्वानो से ज्ञान लाभ प्राप्त किया है अतः सबका उल्लेख कठिन है। इनके मुख्य गुरू जन इस प्रकार है---
1-इब्ने क़ुलवीय क़ुम्मी
2-शेख सदूक़
3-इब्ने वलीद क़ुम्मी
4-अबु ग़ालिब
5-इब्ने जुनैद इस्काफ़ी
6-अबु अली सूली बसरी
7-अबु अब्दुल्लाह सफ़वानी इत्यादि
शेख मुफ़ीद के शागिर्द (शिष्यगण) शेख मुफ़ीद अलैहिर्रहमा के मुख्य शिष्य इस प्रकार हैं---
1-सैय़्यद मुर्तज़ा इल्मुल हुदा
2-सैय्यद रज़ी
3-शेख तूसी
4-नजाशी
5-अबुल फ़तहे कराचकी
6-अबु अली जाफ़र
7-अब्दुल ग़नी इत्यादि
शेख मुफ़ीद की रचनाऐं
शेख मुफ़ीद अलैहिर्रहमा ने 200 से अधिक किताबे लिखी हैं जिनमे से मुख्य इस प्रकार हैं---
1-फ़िक़्ह विषय से सम्बन्धित किताबे — अलमक़ना ,अल फ़राइज़ुश शरिया वा अहकामुन निसा
2-इल्मे कुऑन से सम्बन्धित किताबें — अल कलाम फ़ी दलाइलिल कुऑन ,वुजूहे ऐजाज़े कुऑन ,अन्नुसरतो फ़ी फ़ज़लिल कुऑन ,अल बयान फ़ी तालीफ़िल कुऑन ,
3-इल्मे कलाम व अक़ाइद से सम्बन्धित किताबें –अवाइलुल मक़ालात ,नक़्ज़े फ़ज़ीलःतुल मोतःज़लेह ,अल अफ़साह ,अल ईज़ाह ,अल अरकान इत्यादि।
स्वर्गवास
शेख मुफ़ीद अलैहिर्रहमा 75 वर्ष जीवित रहे तथा अपनी महान सेवाऐं प्रदान कर के 413 हिजरी क़मरी मे बग़दाद मे स्वर्गवासी हुए। सैय्यद मुर्तुज़ा इल्मुल हुदा ने उनकी नमाज़े जनाज़ा पढ़ाई। शिया सुन्नी सम्प्रदाय के लग भग 80000 व्यक्ति आपकी नमाज़े जनाज़ा मे सम्मिलित हुए। उनको हज़रत इमाम मुहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम के हरम मे उनके गुरू इब्ने क़ुलवीय की कब्र के बराबर मे दफ़्न किया गया।
वह एक महान व पवित्र विद्वान थे अल्लाह उन पर रहमत करे।
सैय्यिद मुर्तज़ा अलमुल हुदा अलैहिर्रहमा
सैय्यिद मुर्तज़ा अलमुल हुदा का नाम अली था। वह 355 हिजरी क़मरी मे बग़दाद के एक सम्मानित सैय्यिद परिवार मे पैदा हुए। उनके माता पिता दोनो सैय्यिद थे तथा पाँच पीढीयों के अन्तर से उनका सम्बन्ध हज़रत इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम से मिलता है। इस प्रकार कि अली पुत्र हुसैन पुत्र मूसा पुत्र मुहम्मद पुत्र मूसा पुत्र इब्राहीम पुत्र हज़रत इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम पुत्र हज़रत इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम।
अल्लामा हिल्ली ने उनको शिया इमामिया समुदाय का मुअल्लिम कहा है। वह एक महान फ़क़ीह ,मुतःकल्लिम ,अदीब थे। फ़िक़्ह के क्षेत्र मे उनके मत अब भी विद्वानो की दृष्टि का केन्द्र बिन्दु हैँ।फ़िक़्ह विषय पर लिखी गयी उन की "इन्तेसार" व "जमलुल इल्म वल अमल" नामक दोनो किताबें बहुत प्रसिद्ध हैँ। वह अपने समय मे उच्च कोटी के अद्वितीय विद्वान थे उनकी विद्वत्ता के कारण उनको चौथी शताब्दी हिजरी का मरूजुज़ जहब या मुजद्दिदे मज़हब कहा जाता है। वह तीस वर्षों तक हज व हरमैन के सर्वे सर्वा व उच्चतम न्यायधीश के पद पर कार्यरत रहे। उन्होने तथा उनके भाई सैय्यिद शरीफ़ ने शेख मुफ़ीद अलैहिर्रहमा से ज्ञान प्राप्त किया। तथा शेख मुफ़ीद के स्वर्ग वास के बाद वह शिया सम्प्रदाय के मरजा बने।
अल्लामा हिल्लि ने उनके सम्बन्ध मे लिखा है “कि वह शिय़ा सम्प्रदाय के मुअल्लिम थे तथा शिया सम्प्रदाय का एक स्तम्भ समझे जाते थे।आज तक(सन्693 हिजरी क़मरी) उनके द्वारा लिखी गईं किताबों से ज्ञान लाभ प्राप्त किया जा रहा है। ”
शेख इज़्ज़ुद्दीन अहमद उनके अर्बी व्याकरण के ज्ञान के सम्बन्ध मे लिखते हैं कि “अगर कोई सौगन्ध खाकर यह बात कहे कि अलमुल हुदा अर्बी मे अरबो से अधिक ज्ञान रखते थे ,तो न उसने कोई झूट बोला और न कोई गुनाह किया। ”
सैय्यिद मुर्तुज़ा सुन्नी विद्वानो की दृष्टि में
सैय्यिद मुर्तज़ा का इल्मी वजूद( विद्वानी स्तित्व) सुन्नी विद्वानो की दृष्टि का भी केन्द्र बना। उनकी अत्याधिक रचनाओं ने सभी को अपनी ओर आकृषित किया।
प्रसिद्ध सुन्नी विद्वान खलकान उनके सम्बन्ध मे लिखते हैं कि “वह एक प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। दीन व मुसलमानो के अहकाम से सम्बन्धित उनकी अनेकानेक पुस्तकें इस बात की साक्षी हैं कि वह पैगम्बर के महान तथा प्रतिष्ठित परिवार की एक कड़ी थे। ”
एक मिस्री विद्वान उन के सम्बन्ध मे लिखते हैं कि “मैनें सैय्यिद मुर्तज़ा की किताब -ग़रर व दरर- से नह्व के क्षेत्र मे (अर्बी व्याकरण) जो ज्ञान लाभ प्राप्त किया वह अन्य किसी भी लेखक की किताब से प्राप्त न कर सका। ”
सैय्यिद मुर्तज़ा की शिक्षा का आरम्भ
इस दुनिया मे कुछ खवाब (सपने) अवश्य रूप से सत्य व साकार होते हैं। ऐसे ही सपनो मे से एक सपना वह था जो शेख मुफ़ीद अलैहिर्रहमा ने देखा था। एक रात्री शेख मुफ़ीद अलैहिर्रहमा ने सपने मे देखा कि हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा हसन व हुसैन सलामुल्लाह अलैहिमा को लेकर आईं व कहा कि ऐ शेख तू इन दोनो बच्चों को फ़िक्ह का ज्ञान प्रादान कर। शेख मुफ़ीद जागने पर बहुत अच्मभित हुए। उसी दिन सुबह सवेरे फ़ातिमा नाम की एक सैय्यिद स्त्री अपने साथ दो छोटे बच्चो को लेकर आई व शेख से कहा कि मै इन दोनो बच्चों को आपके पास इस लिए लाई हूँ कि आप इनको फ़िक़्ह का ज्ञान प्रदान करें और यह कह कर दोनो बच्चों को शेख के सपुर्द कर दिया। शेख को अपने रात्री के सपने का फल मिल गया था। अतः उन्होने अपना सपना इस महान स्त्री को सुनाया तथा बच्चो के शिक्षण कार्य को स्वीकार कर लिया।यह स्त्री सैय्यिद मुर्तज़ा व सैय्यिद रज़ी की माता थी। शेख ने परिश्रम के साथ दोनो भाईयो को ज्ञान प्रदान किया जिसके फल स्वरूप दोनो भाई आगे चलकर महान विद्वान बने।
सैय्यिद मुर्तज़ा के गुरू जन
शेख मुफ़ीद अलैहिर्रहमा के अतिरिक्त सैय्यिद मुर्तज़ा ने इब्ने नबाता व शेख हसन बाबवे से भी ज्ञान लाभ प्राप्त किया।
सैय्यिद मुर्तज़ा के शिष्यगण
सैय्यिद मुर्तज़ा ने अनेका नेक शिष्यो को प्रशिक्षित किया इनमे से मुख्य शिष्य इस प्रकार हैं---शेख तूसी ,क़ाज़ी पुत्र बिराज ,अबु सलाह हलबी ,अबुल फ़ताह कराजकी ,सालार पुत्र अब्दुल अज़ीज़ देलमी इत्यादि।
सैय्यिद मुर्तज़ा की रचनाऐं
सैय्यिद मुर्तज़ा ने बहुतसी किताबे लिखीं जो उनकी महानता व विद्वत्ता का परिचय कराती है। परन्तु मरहूम मुदर्रिस ने अपनी किताब रिहानःतुल अदब मे उनकी लग भग 72 किताबो का नाम के साथ उल्लेख किया है। इनमे से मुख्य किताबें इस प्रकार हैं---
1-अल इन्तेसार
2-जमःलुल इल्मे वल अमल
3-अज़ ज़रिया फ़ी उसूलिश शरिया
4-अल मोहकम वल मुताशाबेह
5-अल मुखतःसर
6-मा तफ़र्रदता बेहिल इमामिया मिन मसाइलिल फ़िक़्हिया
7-अल मिस्बाह
8-अन्नासिरयात
9-अल आमाली
10-दुरारुल फ़वाइद इत्यादि।
अलमुल हुदा लक़ब (उपाधि) का कारण
अधिकतर इतिहास कारो ने आप की इस उपाधि का कारण यह लिखा है कि अबू सईद मुहम्मद पुत्र हुसैन जो खलीफ़ा क़ादिर बिल्लाह का वज़ीर था। वह सन् 420 हिजरी क़मरी मे बीमार हुआ तथा उसने सपने मे देखा कि अमीरूल मोमेनीन अली अलैहिस्सलाम ने उससे कहा कि अलमुल हुदा से कहो कि वह तुम्हारे स्वास्थय के लिए दुआ करे। मैने उन से प्रश्न किया कि अलमुल हुदा कौन हैं ?उन्होने उत्तर दिया कि अली पुत्र हुसैन मूसवी अलमुल हुदा हैं। जब वह जागे तो उन्होने सैय्यिद मुर्तज़ा के पास एक पत्र लिखा जिसमे उनसे दरख्वास्त(विनती) की कि आप मेरे स्वास्थय के लिए दुआ करने का कष्ट करें तथा इस पत्र मे उन्होने सैय्यिद मुर्तज़ा को अलमुल हुदा की उपाधि से सम्बोधित किया । सैय्यिद ने वज़ीर से कहा कि आप मुझे अलमुल हुदा जैसी उपाधि के साथ पत्र न लिखा करें । वज़ीर ने कहा कि अल्लाह की सौगन्ध मुझे अमीरूल मोमेनीन अली अलैहिस्सलाम ने आदेश दिया है कि आप को अलमुल हुदा की उपाधि से सम्बोधित करू। जब वज़ीर सैय्यिद मुर्तज़ा की दुआ से स्वस्थ हो गये तो उन्होने खलीफ़ा के सम्मुख अपने सपने का वर्णन किया। तथा कहा कि सैय्यिद मुर्तज़ा यह उपाधि धारण नही करना चाहते हैं। खलीफ़ा ने सैय्यिद मुर्तज़ा के पास संदेश भेजा कि जो उपाधि आपको आपके पूर्वज की ओर से प्रदान की गई है उसका धारण करना आपके लिए श्रेष्ठ है। आप इसको धारण करे व इससे मना न करेँ। इसके पश्चात आदेश दिया कि समस्त लोग सैय्यिद मुर्तज़ा को अलमुल हुदा की उपाधि से सम्बोधित करें। इस प्रकार आप इस उपाधि से प्रसिद्ध हो गये।
स्वर्गवास
सैय्यिद मुर्तज़ा अलमुल हुदा सन् 436 हिजरी क़मरी मे बग़दाद मे स्वर्गवीसी हुए। अबु अली जाफ़री व सालार पुत्र अब्दुल अज़ीज़ ने उनको ग़ुस्ल दिया और उनके बेटे ने उनकी नमाज़े जनाज़ा पढ़ाई। तथा उनको उनके ही घर मे दफ़्न कर दिया गया। कुछ समय बाद उनके जनाज़े को कर्बला परिवर्तित किया गया तथा हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के हरम मे उनको दफ़्न किया गया।
वह एक महान व पवित्र विद्वान थे अल्लाह उन पर रहमत करे।
शेख अबु जाफ़र तूसी अलैहिर्रहमा
जन्म
महान विद्वान ,फ़क़ीह ,मुहद्दिस ,मुफस्सिर ,अबुजाफर मुहम्मद पुत्र हसन पुत्र अली तूसी का जन्म सन् 385 हिजरी क़मरी के रमज़ान मास मे तूस(ईरान) मे हुआ था।
शिक्षा
शेख तूसी ने प्रारम्भिक शिक्षा अपनी जन्म भूमी तूस मे ही प्राप्त की।उन्होंने सन् 408 हिजरी क़मरी मे उच्च शिक्षा प्राप्ति के लिए बग़दाद की ओर प्रस्थान किया। उस समय बग़दाद इस्लामिक शिक्षा का मुख्य केन्द्र था। तथा यहाँ पर शेख मुफ़ीद अलैहिर्रहमा शिया सम्प्रदाय का नेतृत्व कर रहे थे। अतः बग़दाद पहुँच कर शेख तूसी मुख्य रूप से शेख मुफ़ीद अलैहिर्रहमा के शिष्य बन गये। और शेख मुफ़ीद अलैहिर्रहमा के जीवन के अन्तिम चरण तक उन से ज्ञान लाभ प्राप्त करते रहे। साथ ही साथ वह हुसैन पुत्र अब्दुल्लाह ग़ज़ायरी ,इब्ने जुनैद इस्काफ़ी ,अबु सल्त अहवाज़ी जैसे अन्य महान विद्वानो से भी ज्ञान लाभ प्राप्त करते रहे।अपनी बुद्धिमत्ता लगन व परिश्रम के कारण वह शीघ्र ही अपने गुरू शेख मुफ़ीद के दृष्टि पात्र बन गये। तथा अपना अधिकतर समय अपने गुरू की सेवा मे व्यतीत करने लगे। सन् 413 हिजरी क़मरी मे शेख मुफ़ीद के स्वर्गवास के बाद इस महान शिक्षण केन्द्र व शिया सम्प्रदाय का नेतृत्व उस समय के महान विद्वान व शेख मुफ़ीद के मुख्य शिष्य सैय्यिद मुर्तज़ा इल्मुल हुदा की ओर हस्तान्तरित हुआ। अतः शेख तूसी शेख मुफ़ीद के बाद सैय्यिद मुर्तज़ा अलैहिर्रहमा के शिष्य बन गये और उन से ज्ञान लाभ प्राप्त करने लगे। सैय्यिद मुर्तज़ा अलैहिर्रहमा ने जब शेख तूसी मे विशेष योग्यताओं का अनुभव किया तो उन्होने शेख के ऊपर विशेष रूप से ध्यान देना शुरू किया। इस प्रकार शेख ने 23 वर्षों के लम्बे समय तक अपने द्वितीय गुरू सैय्यिद मुर्तज़ा अलैहिर्रहमा से ज्ञान लाभ प्राप्त किया। सैय्यिद मुर्तज़ा अलैहिर्रहमा ने शेख को मुख्य रूप से शिक्षण कार्य के लिए नियुक्त किया तथा उनके लिए 12 दीनार प्रति मास का वेतन भी निश्चित किया।
शेख तूसी अलैहिर्रहमा की मरजिअत
सन् 436 हिजरी क़मरी मे सैय्यिद मुर्तज़ा इल्मुल हुदा अलैहिर्रहमा के स्वर्गवास के बाद शिया सम्प्रदाय के नेतृत्व व मरजिअत के उत्तरदायित्व को शेख तूसी अलैहिर्रहमा ने संभाला। उस समय तक वह अपने ज्ञान व बुद्धिमत्ता के कारण शिया सम्प्रदाय मे अपनी साख बना चुके थे। अतः समस्त इस्लामी क्षेत्रों से ज्ञान के प्यासे व्यक्ति लम्बी लम्बी यात्राऐं करके बग़दाद आने लगें ताकि शेख तूसी से ज्ञान लाभ प्राप्त कर सकें। इस प्रकार शेख तूसी से 300 से अधिक शिया तथा कई सौ सुन्नी सम्प्रदाय के व्यक्तियों ने ज्ञान लाभ प्राप्त किया।
तदरीसे कलाम की कुर्सी पर शेख की नियुक्ति
शेख तूसी अलैहिर्रहमा के ज्ञान व तक़वे के चर्चे केवल इराक़ वासीयों के मुख तक ही सीमित नही रहे अपितु उनका तक़वा व ज्ञान समस्त इस्लामी क्षेत्रों मे चर्चा का विषय बन गया। अतः उनके ज्ञान व तक़वे के कारण अल क़ाइम बे अमरिल्लाह नामक अब्बासी शासक के समय मे तदरीसे कलाम की कुर्सी पर उनकी नियुक्ति की गई। उस समय यह पद बहुत महत्ता का प्रतीक था तथा देश के सबसे बड़े विद्वान को इस पद पर नियुक्त किया जाता था। इस से यह प्रतीत होता है कि उस समय पूरे इस्लामी क्षेत्र मे शिया व सुन्नी दोनों सम्प्रदायों मे शेख तूसी से बड़ा कोई विद्वान नही था।
नजफ़े अशरफ़ के होज़े इल्मिया की स्थापना
सन् 447 हिजरी क़मरी मे तुर्काने सलजूक़ी ने बग़दाद पर आक्रमण किया तथा वहाँ के शासको को परिजित कर अपने शासन की स्थापना की। इस शासन की स्थापना के बाद से शिया सम्प्रदाय पर होने वाले अत्याचारो मे वृद्धि हो गई। उन के घरों को आग लगा दी गई उनकी सम्पत्ति को लूट लिया गया तथा प्रत्यक्ष रूप से उनकी हत्याऐं की गईं। वह सुन्नी विद्वान जो शेख की तदरीसे कलाम की कुर्सी पर नियुक्ति के कारण शेख से ईर्श्या रखते थे उन्होने अवसर से लाभ उठाया तथा शेख के घर व पुस्तकालय को आग लगा दी। इससे शिया सम्प्रदाय को बहुत हानी हुई शिया विचार धारा की बहुत सी महत्वपूर्ण किताबे इस दुर्घटना के बाद लुप्त हो गईँ। यह अत्याचार दिन प्रति दिन बढ़ता गया। इब्ने असीर नामक इतिहास कार ने सन् 499 हिजरी क़मरी की घटनाओं का उल्लेख करते हुए लिखा है कि “इस वर्ष बग़दाद मे श्ख अबू जाफ़र तूसी जो शिया सम्प्रदाय के फ़क़ीह थे उनके घर को आग लगा कर विध्वंस कर दिया गया। ”
इस घटना के बाद शेख तूसी अलैहिर्रहमा ने बग़दाद से नजफ़े अशरफ़ की ओर प्रस्थान किया। नजफ़े अशरफ़ उस समय एक छोटा सा गाँव था। जिसमे केवल आदरनीय इमाम अली अलैहिस्सलाम के कुछ प्रेमी ही जीवन यापन करते थे। यहाँ पहुचने पर शेख तूसी अलैहिर्रहमा ने होज़े इल्मिया (शिया सम्प्रदाय मे इस्लामिक शिक्षण केन्द्र को कहते हैं) की स्थापना की। जो आगे चलकर शिया सम्प्रदाय का विश्व विख्यात शिक्षण केन्द्र बना।
शेख तूसी के सम्बन्ध मे विभिन्न विद्वानो के कथन
आयतुल्लाह मुतह्हरी ”
शेख अबु जाफ़र तूसी जो शेखुत्ताएफ़ा की उपाधि से प्रसिद्ध हैं वह इस्लामिक संसार के एक चमकते हुए सितारे है।उन्होने इल्मे उसूल ,तफ़सीर ,कलाम ,रिजाल व हदीस मे बहुतसी किताबें लिखी हैँ वह खुरासान के रहने वाले थे।वह सन्385 हिजरी क़मरी मे पैदा हुए व 23 वर्ष की आयु मे उन्होने सन् 408 हिजरी क़मरी मे बग़दाद की यात्रा की तथा अपने जीवन के अन्तिम चरण तक इराक़ ही मे रहे। सैय्यिद मुर्तज़ा इल्मुल हुदा के स्वर्गवास के बाद उन्होने मरजिअत के उत्तर दायित्व को संभाला। उन्होने पाँच वर्षों तक शेख मुफ़ीद अलैहिर्रहमा से भी ज्ञान लाभ प्राप्त किया। वह अपने गुरू सैय्यिद मुर्तज़ा के स्वर्गवास के बाद 12 वर्षों तक बग़दाद मे रहे।जब दुर्घटनों की एक श्रृंखला मे उनके घर को जला कर ध्वंस कर दिया गया तो उन्होने नजफ़ की ओर प्रस्थान किया तथा वहाँ पर होज़े इल्मिया की स्थापना की।वह सन् 460 हिजरी क़मरी मे वहीँ पर स्वर्गवासी हुए। ”
नजाशी
“ अबु जाफ़र मुहम्मद पुत्र हसन पुत्र अली तूसी हमारे बुज़ुर्गों मे से एक हैं वह एक विश्वसनीय विद्वान थे तथा शेख मुफ़ीद के शिष्य थे। उन्होने तहज़ीबुल अहकाम ,इस्तबसार ,अन्निहायाह ,अलमफ़्साह ,फ़हरिस्त ,अल मबसूत ,अल इहाज़ ,मा योलल वमा लायोलल ,अल जुमल वल अक़ूद ,अत्तिबयान जैसी महान किताबें लिखी हैं। ”
बहरूल उलूम
अल्लामा सैय्यिद महदी बहरूल उलूम शेख तूसी अलैहिर्रहमा के सम्बन्ध मे लिखते हैं कि “मुहम्मद पुत्र हसन तूसी एक महान विद्वान थे। उन्होंने आइम्मा-ए- मासूमीन अलैहिमुस्सलाम के बाद शिया इमामिया सम्प्रदाय का नेतृत्व किया।वह उसूल व फ़रू के मुहक़्क़िक़ हैं।तथा उन्होने नक़ली व अक़ली (उल्लेखित व बुद्धि पर आधारित) ज्ञान को व्यवस्थित किया। उन्होने धर्म व मज़हब से सम्बन्धित जो भी मत प्रकट किये वह हमारे लिए विश्वसनीय है। ”
शेख तूसी की रचनाऐं
शेख तूसी ने अपने जीवन काल मे बहुत सी किताबें लिखी हैं इन्मे से मुख्य किताबें इस प्रकार हैं---
1-इस्तबसार
2-तहज़ीबुल अहकाम
3-अन्निहाया
4-अलमफ़्साह
5-अल फ़हरिस्त
6-अल मबसूत
7-अल इहाज़ा
8-अल जुमल वल उक़ूद
9-अत्तिबयान
10-रिसाला-ए-तहरीमे फ़ुक़ा
11-मसाइले दमिशक़ियाह
12-मसाइले हलबियाह
13-मसाइले हाइरियाह
14-मसाइलुल यासिया
15-मसाइले जीलानियाह
16-मसाइल दर फ़र्क़ मयाने नबी व इमाम
17-रिसालाह नक़्ज़ बर इब्ने शाज़ान
18-मिस्बाहुल मुजतहिद
19-उनसुत्तौहीद
20-मुखतःसरूल मिस्बाह ,इत्यादि
शेख तूसी का स्वर्गवास
शेख तूसी अलैहिर्रहमा सन् 460 हिजरी क़मरी मे शाबान मास की 22वी तिथि को नजफ़े अशरफ़ मे स्वर्गवासी हुए। उनको उनके निवास स्थान पर ही दफ़्न किया गया। बाद मे उनका निवास स्थान मस्जिद के रूप मे परिवर्तित होगया।
वह एक महान व पवित्र आत्मा वाले विद्वान थे अल्लाह उन पर रहमत करे।
शेख अबुस्सलाह हलबी अलैहिर्रहमा
शेख अबुस्सलाह हलबी का नाम तक़ी था इसी कारण वह तक़ीयुद्दीन कहलाए जाते थे। वह शेख नजमुद्दीन के पुत्र थे। उनका जन्म सन् 347 हिजरी क़मरी के लग भग हलब नामक शहर मे हुआ था। हलब अच्छी जल वायु तथा उपजाऊ भूमी वाला एक प्राचीन शहर है। धार्मिक किताबों मे उल्लेख मिलता है कि हज़रत (आदरनीय) इब्राहीम अलैहिस्सलाम अपने भेड़ों को चराने के लिए यहाँ पर लाये थे। वह जुमे के दिन अपनी भेड़ों के दूध को यहाँ पर दान किया करते थे। यहाँ पर हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम से सम्बन्धित दो स्थान हैं जो आज भी लोगों के दर्शन का केन्द्र बने हैं। प्रचीन समय मे यहाँ पर अनेक विद्वानो ने जन्म लिया। इनमे से दो विद्वान बहुत प्रसिद्ध हुए – तक़ीयुद्दीन व हमज़ा पुत्र अली जिनको हलबियान कहा जाता है।
शेख तक़ीयुद्दीन पाँचवी शताब्दी हिजरी क़मरी मे एक महान फ़क़ीह ,मुहद्दिस ,मुफ़स्सिर ,व सिक़ा विद्वान के रूप मे प्रसिद्ध हुए।
शेख अबुस्सलाह हलबी के असातीद (गुरू जन)
शेख अबुस्सालेह हलबी ने अपनी उच्च शिक्षा महान् विद्वान व फ़क़ीह सैय्यिद इल्मुल हुदा व शेख तूसी अलैहिर्रहमा से ग्रहण की। तथा कुछ समय तक महान फ़क़ीह अब्दुल अज़ीज़ देलमी से भी ज्ञान लाभ प्राप्त किया। उन्होने शाम व हलब के क्षेत्र मे सैय्यिद मुर्तज़ा इल्मुल हुदा के प्रतिनिधी के रूप मे धार्मिक कार्यों का संचालन किया। सैय्यिद मुर्तज़ा के स्वर्गवास के बाद उन्होने इसी क्षेत्र मे शेख तूसी का प्रतिनिधित्व किया। इससे ज्ञात होता है कि प्राचीन समय मे भी वर्तमान की तरह मराजे कराम विभिन्न क्षेत्रो मे अपने प्रतिनिधी नियुक्त करते थे। ताकि शीघ्रता पूर्वक जनता की धार्मिक कठिनाईयों का समाधान हो सके।
शेख अबुस्सलाह हलबी के सम्बन्ध मे विद्वानो के दृष्टि कोण
1-मरहूम मिर्ज़ा अब्दुल्लाह आफ़न्दी ” शेख तक़ीयुद्दीन पुत्र नजमुद्दीन पुत्र अब्दुल्लाह हलबी सैय्यिद मुर्तज़ा व शेख तूसी अलैहिर्रहमा के शिष्य थे।क्योंकि वह शेख तूसी के शिष्य थे इस लिए शेख ने अपनी किताब अल फ़हरिस्त मे उनका उल्लेख करते हुए लिखा है कि वह सैय्यिद मुर्तज़ा और मेरे शिष्य हैं।इसके बाद उन्होने अबुस्सलाह के विशवस्नीय होने की घोषणा की है। यह उनकी महानता का लक्षण है। ”
2-अल्लामा मुहम्मद बाक़िर ख़ुन्सारी “अबुस्सलाह तक़ीयुद्दीन पुत्र नजमुद्दीन पुत्र अब्दुल्लाह हलबी शिया सम्प्रदाय के इल्मे रिजाल के विद्वानो की दृष्टि मे एक विशवसनीय व्यक्ति हैं। वह हलब क्षेत्र के फ़कीहों मे से एक हैँ तथा खलीफ़तुल मुर्तज़ा की उपाधि से प्रसिद्ध हैँ। और इस उपाधि का कारण यह है कि उन्होने अपने उस्ताद का इसी प्रकार प्रतिनिधित्व किया जिस प्रकार इब्ने बिराज ने शेख तूसी का प्रतिनिधित्व किया है। यह प्रतिनिधित्व या शिक्षण मे किया गया या फिर न्याय के क्षेत्र मे कुछ भी रहा हो यह प्रतिनिधित्व उनकी उत्तमता व श्रेष्ठता का प्रतीक है। ”
3-साहिबे अमलुल अमल “अबुस्सलाह हलबी जिनसे इब्ने बिराज ने बहुत सी रिवायात की हैं वह शेख तूसी के समकालीन थे। वह एक महान विद्वान फ़क़ीह तथा मुहद्दिस थे। उनकी किताब तक़रीबुल मआरिफ़ श्रेष्ठ किताब है।मैने उनकी अलकाफ़ी नामक किताब को भी देखा है जिसमे उन्होने फ़िक़्ह के विभिन्न विषयो को व्यवस्थित रूप से वर्णित किया है।यह किताब हमारी फ़िक़्ह मे विशवसनीय समझी जाती है। ”
आयतुल्लाहिल उज़मा ख़ूई ” शेख तूसी ने उनके बारे मे लिखा है कि उन्होने सैय्यिद मुर्तज़ा से और मुझ से ज्ञान प्राप्त कियाहै और वह एक विशवसनीय व्यक्ति हैं। उन्होनो कई किताबें भी लिखी हैं जो इस प्रकार हैं –अल बिदायाह ,अल काफ़ी शरहे ज़खीराए सैय्यिद मुर्तज़ा। “
शेख अबुस्सलाह की रचनाऐं
1-अल बिदायाह
2-अल काफ़ी
3-दफ़ए शुब्हिल मुलाहिदाह
4-शरहे ज़खीरा-ए- इल्मुल हुदा
5-शाफ़िया
6-अल इद्दाह
7-अल काफ़ी
8-अल लवामे
9-अल मुरशद फ़ी तरीक़िल मुता अब्बद
स्वर्गवास
शेख अबुस्सलाह अल्लाह के मार्ग मे एक लम्बा जीवन व्यतीत करने के बाद 100 वर्ष की आयु मे सन् 447 हिजरी क़मरी मे हलब मे ही स्वर्गवासी हुए। उनको हलब मे ही दफ़्न किया गया।
वह एक महान विद्वान व महान व्यक्ति थे अल्लाह उन पर रहमत करे।
फेहरीस्त
शिओं के बुज़ुर्ग उलमा 1
अली पुत्र बाबवे क़ुम्मी अलैहिर्रहमा 2
हुसैन पुत्र अबी अक़ील उमानी अलैहिर्रहमा 5
मुहम्मद इब्ने जुनैद इस्काफ़ी अलैहिर्रहमा 9
शेख मुहम्मद कुलैनी अलैहिर्रहमा 17
मुहम्मद पुत्र बाबवे (शेख सदूक़) अलैहिर्रहमा 30
मुहम्मद पुत्र मसूद अयाशी समर क़न्दी अलैहिर्रहमा 42
शेख मुफ़ीद अलैहिर्रहमा 48
सैय्यिद मुर्तज़ा अलमुल हुदा अलैहिर्रहमा 57
शेख अबु जाफ़र तूसी अलैहिर्रहमा 66
नजफ़े अशरफ़ के होज़े इल्मिया की स्थापना 69
शेख अबुस्सलाह हलबी अलैहिर्रहमा 76
फेहरीस्त 81