अल्लामा इक़बाल की नज़मे

बुक करेकशन

लेखक: अल्लामा इक़बाल
शेर व अदब


अल्लामा इक़बाल की ये नज़मे हमने रे्ख्ता नामक साइट से ली है और इनको बग़ैर किसी कमी या ज़्यादती के मिनो अन एक किताबी शक्ल मे जमा कर दिया है। इन नज़मो की तादाद उन्तीस है।

अल्लामा इक़बाल की नज़मे

अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क


अबुल-अला-म 'अर्री

कहते हैं कभी गोश्त न खाता था म 'अर्री

फल-फूल पे करता था हमेशा गुज़र-औक़ात

इक दोस्त ने भूना हुआ तीतर उसे भेजा

शायद कि वो शातिर इसी तरकीब से हो मात

ये ख़्वान-ए-तर-ओ-ताज़ा म 'अर्री ने जो देखा

कहने लगा वो साहिब-ए-गुफ़रान-ओ-लुज़ूमात

ऐ मुर्ग़क-ए-बेचारा ज़रा ये तो बता तू

तेरा वो गुनह क्या था ये है जिस की मुकाफ़ात ?

अफ़्सोस-सद-अफ़्सोस कि शाहीं न बना तू

देखे न तिरी आँख ने फ़ितरत के इशारात!

तक़दीर के क़ाज़ी का ये फ़तवा है अज़ल से

है जुर्म-ए-ज़ईफ़ी की सज़ा मर्ग-ए-मुफ़ाजात!

इबलीस की मजलिस-ए-शूरा

इबलीस

ये अनासिर का पुराना खेल ये दुनिया-ए-दूँ

साकिनान-ए-अर्श-ए-आज़म की तमन्नाओं का ख़ूँ

इस की बर्बादी पे आज आमादा है वो कारसाज़

जिस ने इस का नाम रखा था जहान-ए-काफ़-अो-नूँ

मैं ने दिखलाया फ़रंगी को मुलूकियत का ख़्वाब

मैं ने तोड़ा मस्जिद-ओ-दैर-ओ-कलीसा का फ़ुसूँ

मैं ने नादारों को सिखलाया सबक़ तक़दीर का

मैं ने मुनइ 'म को दिया सरमाया दारी का जुनूँ

कौन कर सकता है इस की आतिश-ए-सोज़ाँ को सर्द

जिस के हंगामों में हो इबलीस का सोज़-ए-दरूँ

जिस की शाख़ें हों हमारी आबियारी से बुलंद

कौन कर सकता है इस नख़्ल-ए-कुहन को सर-निगूँ

पहला मुशीर

इस में क्या शक है कि मोहकम है ये इबलीसी निज़ाम

पुख़्ता-तर इस से हुए खोई ग़ुलामी में अवाम

है अज़ल से इन ग़रीबों के मुक़द्दर में सुजूद

इन की फ़ितरत का तक़ाज़ा है नमाज़-ए-बे-क़याम

आरज़ू अव्वल तो पैदा हो नहीं सकती कहीं

हो कहीं पैदा तो मर जाती है या रहती है ख़ाम

ये हमारी सई-ए-पैहम की करामत है कि आज

सूफ़ी-ओ-मुल्ला मुलूकिय्यत के बंदे हैं तमाम

तब-ए-मशरिक़ के लिए मौज़ूँ यही अफ़यून थी

वर्ना क़व्वाली से कुछ कम-तर नहीं इल्म-ए-कलाम

है तवाफ़-ओ-हज का हंगामा अगर बाक़ी तो क्या

कुंद हो कर रह गई मोमिन की तेग़-ए-बे-नियाम

किस की नौ-मीदी पे हुज्जत है ये फ़रमान-ए-जदीद

है जिहाद इस दौर में मर्द-ए-मुसलमाँ पर हराम

दूसरा मुशीर

ख़ैर है सुल्तानी-ए-जम्हूर का ग़ौग़ा कि शर

तू जहाँ के ताज़ा फ़ित्नों से नहीं है बा-ख़बर

पहला मुशीर

हूँ मगर मेरी जहाँ-बीनी बताती है मुझे

जो मुलूकियत का इक पर्दा हो क्या इस से ख़तर

हम ने ख़ुद शाही को पहनाया है जमहूरी लिबास

जब ज़रा आदम हुआ है ख़ुद-शनास-ओ-ख़ुद-निगर

कारोबार-ए-शहरयारी की हक़ीक़त और है

ये वजूद-ए-मीर-ओ-सुल्ताँ पर नहीं है मुनहसिर

मज्लिस-ए-मिल्लत हो या परवेज़ का दरबार हो

है वो सुल्ताँ ग़ैर की खेती पे हो जिस की नज़र

तू ने क्या देखा नहीं मग़रिब का जमहूरी निज़ाम

चेहरा रौशन अंदरूँ चंगेज़ से तारीक-तर

तीसरा मुशीर

रूह-ए-सुल्तानी रहे बाक़ी तो फिर क्या इज़्तिराब

है मगर क्या इस यहूदी की शरारत का जवाब

वो कलीम-ए-बे-तजल्ली वो मसीह-ए-बे-सलीब

नीस्त पैग़मबर व-लेकिन दर बग़ल दारद किताब

क्या बताऊँ क्या है काफ़िर की निगाह-ए-पर्दा-सोज़

मश्रिक-ओ-मग़रिब की क़ौमों के लिए रोज़-ए-हिसाब

इस से बढ़ कर और क्या होगा तबीअ 'त का फ़साद

तोड़ दी बंदों ने आक़ाओं के ख़ेमों की तनाब

चौथा मुशीर

तोड़ इस का रुमत-उल-कुबरा के ऐवानों में देख

आल-ए-सीज़र को दिखाया हम ने फिर सीज़र का ख़्वाब

कौन बहर-ए-रुम की मौजों से है लिपटा हुआ

गाह बालद-चूँ-सनोबर गाह नालद-चूँ-रुबाब

तीसरा मुशीर

मैं तो इस की आक़िबत-बीनी का कुछ क़ाइल नहीं

जिस ने अफ़रंगी सियासत को क्या यूँ बे-हिजाब

पाँचवाँ मुशीर इबलीस को मुख़ातब कर के

ऐ तिरे सोज़-ए-नफ़स से कार-ए-आलम उस्तुवार

तू ने जब चाहा किया हर पर्दगी को आश्कार

आब-ओ-गिल तेरी हरारत से जहान-ए-सोज़-अो-साज़़

अब्लह-ए-जन्नत तिरी तालीम से दाना-ए-कार

तुझ से बढ़ कर फ़ितरत-ए-आदम का वो महरम नहीं

सादा-दिल बंदों में जो मशहूर है पर्वरदिगार

काम था जिन का फ़क़त तक़्दीस-ओ-तस्बीह-ओ-तवाफ़

तेरी ग़ैरत से अबद तक सर-निगूँ-ओ-शर्मसार

गरचे हैं तेरे मुरीद अफ़रंग के साहिर तमाम

अब मुझे उन की फ़रासत पर नहीं है ए 'तिबार

वो यहूदी फ़ित्ना-गर वो रूह-ए-मज़दक का बुरूज़

हर क़बा होने को है इस के जुनूँ से तार तार

ज़ाग़ दश्ती हो रहा है हम-सर-ए-शाहीन-अो-चर्ग़

कितनी सुरअ 'त से बदलता है मिज़ाज-ए-रोज़गार

छा गई आशुफ़्ता हो कर वुसअ 'त-ए-अफ़्लाक पर

जिस को नादानी से हम समझे थे इक मुश्त-ए-ग़ुबार

फ़ितना-ए-फ़र्दा की हैबत का ये आलम है कि आज

काँपते हैं कोहसार-ओ-मुर्ग़-ज़ार-ओ-जूएबार

मेरे आक़ा वो जहाँ ज़ेर-ओ-ज़बर होने को है

जिस जहाँ का है फ़क़त तेरी सियादत पर मदार

इल्तिजा-ए-मुसाफ़िर

ब - दरगाह - ए - हज़रत महबूब - ए - इलाही देहली

फ़रिश्ते पढ़ते हैं जिस को वो नाम है तेरा

बड़ी जनाब तिरी फ़ैज़ आम है तेरा

सितारे इश्क़ के तेरी कशिश से हैं क़ाएम

निज़ाम-ए-मेहर की सूरत निज़ाम है तेरा

तिरी लहद की ज़ियारत है ज़िंदगी दिल की

मसीह ओ ख़िज़्र से ऊँचा मक़ाम है तेरा

निहाँ है तेरी मोहब्बत में रंग-ए-महबूबी

बड़ी है शान बड़ा एहतिराम है तेरा

अगर सियाह दिलम दाग़-ए-लाला-ज़ार-ए-तवाम

दिगर कुशादा जबीनम गुल-ए-बहार-ए-तवाम

चमन को छोड़ के निकला हूँ मिस्ल-ए-निकहत-ए-गुल

हुआ है सब्र का मंज़ूर इम्तिहाँ मुझ को

चली है ले के वतन के निगार-ख़ाने से

शराब-ए-इल्म की लज़्ज़त कशाँ कशाँ मुझ को

नज़र है अब्र-ए-करम पर दरख़्त-ए-सहरा हूँ

किया ख़ुदा ने न मोहताज-ए-बाग़बाँ मुझ को

फ़लक-नशीं सिफ़त-ए-मेहर हूँ ज़माने में

तिरी दुआ से अता हो वो नर्दबाँ मुझ को

मक़ाम हम-सफ़रों से हो इस क़दर आगे

कि समझे मंज़िल-ए-मक़्सूद कारवाँ मुझ को

मिरी ज़बान-ए-क़लम से किसी का दिल न दुखे

किसी से शिकवा न हो ज़ेर-ए-आसमाँ मुझ को

दिलों को चाक करे मिस्ल-ए-शाना जिस का असर

तिरी जनाब से ऐसी मिले फ़ुग़ाँ मुझ को

बनाया था जिसे चुन चुन के ख़ार ओ ख़स मैं ने

चमन में फिर नज़र आए वो आशियाँ मुझ को

फिर आ रखूँ क़दम-ए-मादर-ओ-पिदर पे जबीं

किया जिन्हों ने मोहब्बत का राज़-दाँ मुझ को

वो शम-ए-बारगह-ए-ख़ानदान-ए-मुर्तज़वी

रहेगा मिस्ल-ए-हरम जिस का आस्ताँ मुझ को

नफ़स से जिस के खिली मेरी आरज़ू की कली

बनाया जिस की मुरव्वत ने नुक्ता-दाँ मुझ को

दुआ ये कर कि ख़ुदावंद-ए-आसमान-ओ-ज़मीं

करे फिर उस की ज़ियारत से शादमाँ मुझ को

वो मेरा यूसुफ़-ए-सानी वो शम-ए-महफ़िल-ए-इश्क़

हुई है जिस की उख़ुव्वत क़रार-ए-जाँ मुझ को

जला के जिस की मोहब्बत ने दफ़्तर-ए-मन-ओ-तू

हवा-ए-ऐश में पाला किया जवाँ मुझ को

रियाज़-ए-दहर में मानिंद-ए-गुल रहे ख़ंदाँ

कि है अज़ीज़-तर अज़-जाँ वो जान-ए-जाँ मुझ को

शगुफ़्ता हो के कली दिल की फूल हो जाए

ये इल्तिजा-ए-मुसाफ़िर क़ुबूल हो जाए

एक आरज़ू

दुनिया की महफ़िलों से उक्ता गया हूँ या रब

क्या लुत्फ़ अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया हो

शोरिश से भागता हूँ दिल ढूँडता है मेरा

ऐसा सुकूत जिस पर तक़रीर भी फ़िदा हो

मरता हूँ ख़ामुशी पर ये आरज़ू है मेरी

दामन में कोह के इक छोटा सा झोंपड़ा हो

आज़ाद फ़िक्र से हूँ उज़्लत में दिन गुज़ारूँ

दुनिया के ग़म का दिल से काँटा निकल गया हो

लज़्ज़त सरोद की हो चिड़ियों के चहचहों में

चश्मे की शोरिशों में बाजा सा बज रहा हो

गुल की कली चटक कर पैग़ाम दे किसी का

साग़र ज़रा सा गोया मुझ को जहाँ-नुमा हो

हो हाथ का सिरहाना सब्ज़े का हो बिछौना

शरमाए जिस से जल्वत ख़ल्वत में वो अदा हो

मानूस इस क़दर हो सूरत से मेरी बुलबुल

नन्हे से दिल में उस के खटका न कुछ मिरा हो

सफ़ बाँधे दोनों जानिब बूटे हरे हरे हों

नद्दी का साफ़ पानी तस्वीर ले रहा हो

हो दिल-फ़रेब ऐसा कोहसार का नज़ारा

पानी भी मौज बन कर उठ उठ के देखता हो

आग़ोश में ज़मीं की सोया हुआ हो सब्ज़ा

फिर फिर के झाड़ियों में पानी चमक रहा हो

पानी को छू रही हो झुक झुक के गुल की टहनी

जैसे हसीन कोई आईना देखता हो

मेहंदी लगाए सूरज जब शाम की दुल्हन को

सुर्ख़ी लिए सुनहरी हर फूल की क़बा हो

रातों को चलने वाले रह जाएँ थक के जिस दम

उम्मीद उन की मेरा टूटा हुआ दिया हो

बिजली चमक के उन को कुटिया मिरी दिखा दे

जब आसमाँ पे हर सू बादल घिरा हुआ हो

पिछले पहर की कोयल वो सुब्ह की मोअज़्ज़िन

मैं उस का हम-नवा हूँ वो मेरी हम-नवा हो

कानों पे हो न मेरे दैर ओ हरम का एहसाँ

रौज़न ही झोंपड़ी का मुझ को सहर-नुमा हो

फूलों को आए जिस दम शबनम वज़ू कराने

रोना मिरा वज़ू हो नाला मिरी दुआ हो

इस ख़ामुशी में जाएँ इतने बुलंद नाले

तारों के क़ाफ़िले को मेरी सदा दिरा हो

हर दर्दमंद दिल को रोना मिरा रुला दे

बेहोश जो पड़े हैं शायद उन्हें जगा दे

एक नौ-जवान के नाम

तिरे सोफ़े हैं अफ़रंगी तिरे क़ालीं हैं ईरानी

लहू मुझ को रुलाती है जवानों की तन-आसानी

इमारत किया शिकवा-ए-ख़ुसरवी भी हो तो क्या हासिल

न ज़ोर-ए-हैदरी तुझ में न इस्तिग़ना-ए-सलमानी

न ढूँड उस चीज़ को तहज़ीब-ए-हाज़िर की तजल्ली में

कि पाया मैं ने इस्तिग़्ना में मेराज-ए-मुसलमानी

उक़ाबी रूह जब बेदार होती है जवानों में

नज़र आती है उन को अपनी मंज़िल आसमानों में

न हो नौमीद नौमीदी ज़वाल-ए-इल्म-ओ-इरफ़ाँ है

उमीद-ए-मर्द-ए-मोमिन है ख़ुदा के राज़-दानों में

नहीं तेरा नशेमन क़स्र-ए-सुल्तानी के गुम्बद पर

तू शाहीं है बसेरा कर पहाड़ों की चटानों में

औरत

वजूद-ए-ज़न से है तस्वीर-ए-काएनात में रंग

उसी के साज़ से है ज़िंदगी का सोज़-ए-दरूँ

शरफ़ में बढ़ के सुरय्या से मुश्त-ए-ख़ाक उस की

कि हर शरफ़ है इसी दर्ज का दुर-ए-मकनूँ

मुकालमात-ए-फ़लातूँ न लिख सकी लेकिन

उसी के शोले से टूटा शरार-ए-अफ़लातूँ

गोरिस्तान-ए-शाही

आसमाँ बादल का पहने ख़िरक़ा-ए-देरीना है

कुछ मुकद्दर सा जबीन-ए-माह का आईना है

चाँदनी फीकी है इस नज़्ज़ारा-ए-ख़ामोश में

सुब्ह-ए-सादिक़ सो रही है रात की आग़ोश में

किस क़दर अश्जार की हैरत-फ़ज़ा है ख़ामुशी

बरबत-ए-क़ुदरत की धीमी सी नवा है ख़ामुशी

बातिन-ए-हर-ज़र्रा-ए-आलम सरापा दर्द है

और ख़ामोशी लब-ए-हस्ती पे आह-ए-सर्द है

आह जौलाँ-गाह-ए-आलम-गीर यानी वो हिसार

दोश पर अपने उठाए सैकड़ों सदियों का बार

ज़िंदगी से था कभी मामूर अब सुनसान है

ये ख़मोशी उस के हंगामों का गोरिस्तान है

अपने सुक्कान-ए-कुहन की ख़ाक का दिल-दादा है

कोह के सर पर मिसाल-ए-पासबाँ इस्तादा है

अब्र के रौज़न से वो बाला-ए-बाम-ए-आसमाँ

नाज़िर-ए-आलम है नज्म-ए-सब्ज़-फ़ाम-ए-आसमाँ

ख़ाक-बाज़ी वुसअत-ए-दुनिया का है मंज़र उसे

दास्ताँ नाकामी-ए-इंसाँ की है अज़बर उसे

है अज़ल से ये मुसाफ़िर सू-ए-मंज़िल जा रहा

आसमाँ से इंक़िलाबों का तमाशा देखता

गो सुकूँ मुमकिन नहीं आलम में अख़्तर के लिए

फ़ातिहा-ख़्वानी को ये ठहरा है दम भर के लिए

रंग-ओ-आब-ए-ज़िंदगी से गुल-ब-दामन है ज़मीं

सैकड़ों ख़ूँ-गश्ता तहज़ीबों का मदफ़न है ज़मीं

ख़्वाब-गह शाहों की है ये मंज़िल-ए-हसरत-फ़ज़ा

दीदा-ए-इबरत ख़िराज-ए-अश्क-ए-गुल-गूँ कर अदा

है तो गोरिस्ताँ मगर ये ख़ाक-ए-गर्दूं-पाया है

आह इक बरगश्ता क़िस्मत क़ौम का सरमाया है

मक़बरों की शान हैरत-आफ़रीं है इस क़दर

जुम्बिश-ए-मिज़्गाँ से है चश्म-ए-तमाशा को हज़र

कैफ़ियत ऐसी है नाकामी की इस तस्वीर में

जो उतर सकती नहीं आईना-ए-तहरीर में

सोते हैं ख़ामोश आबादी के हंगामों से दूर

मुज़्तरिब रखती थी जिन को आरज़ू-ए-ना-सुबूर

क़ब्र की ज़ुल्मत में है इन आफ़्ताबों की चमक

जिन के दरवाज़ों पे रहता है जबीं-गुस्तर फ़लक

क्या यही है इन शहंशाहों की अज़्मत का मआल

जिन की तदबीर-ए-जहाँबानी से डरता था ज़वाल

रोब-ए-फ़ग़्फ़ूरी हो दुनिया में कि शान-ए-क़ैसरी

टल नहीं सकती ग़नीम-ए-मौत की यूरिश कभी

बादशाहों की भी किश्त-ए-उम्र का हासिल है गोर

जादा-ए-अज़्मत की गोया आख़िरी मंज़िल है गोर

शोरिश-ए-बज़्म-ए-तरब क्या ऊद की तक़रीर क्या

दर्दमंदान-ए-जहाँ का नाला-ए-शब-गीर क्या

अरसा-ए-पैकार में हंगामा-ए-शमशीर क्या

ख़ून को गरमाने वाला नारा-ए-तकबीर क्या

अब कोई आवाज़ सोतों को जगा सकती नहीं

सीना-ए-वीराँ में जान-ए-रफ़्ता आ सकती नहीं

रूह-ए-मुश्त-ए-ख़ाक में ज़हमत-कश-ए-बेदाद है

कूचा गर्द-ए-नय हुआ जिस दम नफ़स फ़रियाद है

ज़िंदगी इंसाँ की है मानिंद-ए-मुर्ग़-ए-ख़ुश-नवा

शाख़ पर बैठा कोई दम चहचहाया उड़ गया

आह क्या आए रियाज़-ए-दहर में हम क्या गए

ज़िंदगी की शाख़ से फूटे खिले मुरझा गए

मौत हर शाह ओ गदा के ख़्वाब की ताबीर है

इस सितमगर का सितम इंसाफ़ की तस्वीर है

सिलसिला हस्ती का है इक बहर-ए-ना-पैदा-कनार

और इस दरिया-ए-बे-पायाँ की मौजें हैं मज़ार

ऐ हवस ख़ूँ रो कि है ये ज़िंदगी बे-ए 'तिबार

ये शरारे का तबस्सुम ये ख़स-ए-आतिश-सवार

चाँद जो सूरत-गर-ए-हस्ती का इक एजाज़ है

पहने सीमाबी क़बा महव-ए-ख़िराम-ए-नाज़ है

चर्ख़-ए-बे-अंजुम की दहशतनाक वुसअत में मगर

बेकसी इस की कोई देखे ज़रा वक़्त-ए-सहर

इक ज़रा सा अब्र का टुकड़ा है जो महताब था

आख़िरी आँसू टपक जाने में हो जिस की फ़ना

ज़िंदगी अक़्वाम की भी है यूँही बे-ए 'तिबार

रंग-हा-ए-रफ़्ता की तस्वीर है उन की बहार

इस ज़ियाँ-ख़ाने में कोई मिल्लत-ए-गर्दूं-वक़ार

रह नहीं सकती अबद तक बार-ए-दोश-ए-रोज़गार

इस क़दर क़ौमों की बर्बादी से है ख़ूगर जहाँ

देखता बे-ए 'तिनाई से है ये मंज़र जहाँ

एक सूरत पर नहीं रहता किसी शय को क़रार

ज़ौक़-ए-जिद्दत से है तरकीब-ए-मिज़ाज-ए-रोज़गार

है नगीन-ए-दहर की ज़ीनत हमेशा नाम-ए-नौ

मादर-ए-गीती रही आबस्तन-ए-अक़्वाम-ए-नौ

है हज़ारों क़ाफ़िलों से आश्ना ये रहगुज़र

चश्म-ए-कोह-ए-नूर ने देखे हैं कितने ताजवर

मिस्र ओ बाबुल मिट गए बाक़ी निशाँ तक भी नहीं

दफ़्तर-ए-हस्ती में उन की दास्ताँ तक भी नहीं

आ दबाया मेहर-ए-ईराँ को अजल की शाम ने

अज़्मत-ए-यूनान-ओ-रूमा लूट ली अय्याम ने

आह मुस्लिम भी ज़माने से यूँही रुख़्सत हुआ

आसमाँ से अब्र-ए-आज़ारी उठा बरसा गया

है रग-ए-गुल सुब्ह के अश्कों से मोती की लड़ी

कोई सूरज की किरन शबनम में है उलझी हुई

सीना-ए-दरिया शुआओं के लिए गहवारा है

किस क़दर प्यारा लब-ए-जू मेहर का नज़्ज़ारा है

महव-ए-ज़ीनत है सनोबर जूएबार-ए-आईना है

ग़ुंचा-ए-गुल के लिए बाद-ए-बहार-ए-आईना है

नारा-ज़न रहती है कोयल बाग़ के काशाने में

चश्म-ए-इंसाँ से निहाँ पत्तों के उज़्लत-ख़ाने में

और बुलबुल मुतरिब-ए-रंगीं नवा-ए-गुलसिताँ

जिस के दम से ज़िंदा है गोया हवा-ए-गुलसिताँ

इश्क़ के हंगामों की उड़ती हुई तस्वीर है

ख़ामा-ए-क़ुदरत की कैसी शोख़ ये तहरीर है

बाग़ में ख़ामोश जलसे गुलसिताँ-ज़ादों के हैं

वादी-ए-कोहसार में नारे शबाँ-ज़ादों के हैं

ज़िंदगी से ये पुराना ख़ाक-दाँ मामूर है

मौत में भी ज़िंदगानी की तड़प मस्तूर है

पत्तियाँ फूलों की गिरती हैं ख़िज़ाँ में इस तरह

दस्त-ए-तिफ़्ल-ए-ख़ुफ़्ता से रंगीं खिलौने जिस तरह

इस नशात-आबाद में गो ऐश बे-अंदाज़ा है

एक ग़म यानी ग़म-ए-मिल्लत हमेशा ताज़ा है

दिल हमारे याद-ए-अहद-ए-रफ़्ता से ख़ाली नहीं

अपने शाहों को ये उम्मत भूलने वाली नहीं

अश्क-बारी के बहाने हैं ये उजड़े बाम ओ दर

गिर्या-ए-पैहम से बीना है हमारी चश्म-ए-तर

दहर को देते हैं मोती दीदा-ए-गिर्यां के हम

आख़िरी बादल हैं इक गुज़रे हुए तूफ़ाँ के हम

हैं अभी सद-हा गुहर इस अब्र की आग़ोश में

बर्क़ अभी बाक़ी है इस के सीना-ए-ख़ामोश में

वादी-ए-गुल ख़ाक-ए-सहरा को बना सकता है ये

ख़्वाब से उम्मीद-ए-दहक़ाँ को जगा सकता है ये

हो चुका गो क़ौम की शान-ए-जलाली का ज़ुहूर

है मगर बाक़ी अभी शान-ए-जमाली का ज़ुहूर


जवाब-ए-शिकवा

दिल से जो बात निकलती है असर रखती है

पर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती है

क़ुदसी-उल-अस्ल है रिफ़अत पे नज़र रखती है

ख़ाक से उठती है गर्दूं पे गुज़र रखती है

इश्क़ था फ़ित्नागर ओ सरकश ओ चालाक मिरा

आसमाँ चीर गया नाला-ए-बेबाक मिरा

पीर-ए-गर्दूं ने कहा सुन के कहीं है कोई

बोले सय्यारे सर-ए-अर्श-ए-बरीं है कोई

चाँद कहता था नहीं अहल-ए-ज़मीं है कोई

कहकशाँ कहती थी पोशीदा यहीं है कोई

कुछ जो समझा मिरे शिकवे को तो रिज़वाँ समझा

मुझ को जन्नत से निकाला हुआ इंसाँ समझा

थी फ़रिश्तों को भी हैरत कि ये आवाज़ है क्या

अर्श वालों पे भी खुलता नहीं ये राज़ है क्या

ता-सर-ए-अर्श भी इंसाँ की तग-ओ-ताज़ है क्या

आ गई ख़ाक की चुटकी को भी परवाज़ है क्या

ग़ाफ़िल आदाब से सुक्कान-ए-ज़मीं कैसे हैं

शोख़ ओ गुस्ताख़ ये पस्ती के मकीं कैसे हैं

इस क़दर शोख़ कि अल्लाह से भी बरहम है

था जो मस्जूद-ए-मलाइक ये वही आदम है

आलिम-ए-कैफ़ है दाना-ए-रुमूज़-ए-कम है

हाँ मगर इज्ज़ के असरार से ना-महरम है

नाज़ है ताक़त-ए-गुफ़्तार पे इंसानों को

बात करने का सलीक़ा नहीं नादानों को

आई आवाज़ ग़म-अंगेज़ है अफ़्साना तिरा

अश्क-ए-बेताब से लबरेज़ है पैमाना तिरा

आसमाँ-गीर हुआ नारा-ए-मस्ताना तिरा

किस क़दर शोख़-ज़बाँ है दिल-ए-दीवाना तिरा

शुक्र शिकवे को किया हुस्न-ए-अदा से तू ने

हम-सुख़न कर दिया बंदों को ख़ुदा से तू ने

हम तो माइल-ब-करम हैं कोई साइल ही नहीं

राह दिखलाएँ किसे रह-रव-ए-मंज़िल ही नहीं

तर्बियत आम तो है जौहर-ए-क़ाबिल ही नहीं

जिस से तामीर हो आदम की ये वो गिल ही नहीं

कोई क़ाबिल हो तो हम शान-ए-कई देते हैं

ढूँडने वालों को दुनिया भी नई देते हैं

हाथ बे-ज़ोर हैं इल्हाद से दिल ख़ूगर हैं

उम्मती बाइस-ए-रुस्वाई-ए-पैग़म्बर हैं

बुत-शिकन उठ गए बाक़ी जो रहे बुत-गर हैं

था ब्राहीम पिदर और पिसर आज़र हैं

बादा-आशाम नए बादा नया ख़ुम भी नए

हरम-ए-काबा नया बुत भी नए तुम भी नए

वो भी दिन थे कि यही माया-ए-रानाई था

नाज़िश-ए-मौसम-ए-गुल लाला-ए-सहराई था

जो मुसलमान था अल्लाह का सौदाई था

कभी महबूब तुम्हारा यही हरजाई था

किसी यकजाई से अब अहद-ए-ग़ुलामी कर लो

मिल्लत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल को मक़ामी कर लो

किस क़दर तुम पे गिराँ सुब्ह की बेदारी है

हम से कब प्यार है हाँ नींद तुम्हें प्यारी है

तब-ए-आज़ाद पे क़ैद-ए-रमज़ाँ भारी है

तुम्हीं कह दो यही आईन-ए-वफ़ादारी है

क़ौम मज़हब से है मज़हब जो नहीं तुम भी नहीं

जज़्ब-ए-बाहम जो नहीं महफ़िल-ए-अंजुम भी नहीं

जिन को आता नहीं दुनिया में कोई फ़न तुम हो

नहीं जिस क़ौम को परवा-ए-नशेमन तुम हो

बिजलियाँ जिस में हों आसूदा वो ख़िर्मन तुम हो

बेच खाते हैं जो अस्लाफ़ के मदफ़न तुम हो

हो निको नाम जो क़ब्रों की तिजारत कर के

क्या न बेचोगे जो मिल जाएँ सनम पत्थर के

सफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया किस ने

नौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया किस ने

मेरे काबे को जबीनों से बसाया किस ने

मेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया किस ने

थे तो आबा वो तुम्हारे ही मगर तुम क्या हो

हाथ पर हाथ धरे मुंतज़िर-ए-फ़र्दा हो

क्या कहा बहर-ए-मुसलमाँ है फ़क़त वादा-ए-हूर

शिकवा बेजा भी करे कोई तो लाज़िम है शुऊर

अदल है फ़ातिर-ए-हस्ती का अज़ल से दस्तूर

मुस्लिम आईं हुआ काफ़िर तो मिले हूर ओ क़ुसूर

तुम में हूरों का कोई चाहने वाला ही नहीं

जल्वा-ए-तूर तो मौजूद है मूसा ही नहीं

मंफ़अत एक है इस क़ौम का नुक़सान भी एक

एक ही सब का नबी दीन भी ईमान भी एक

हरम-ए-पाक भी अल्लाह भी क़ुरआन भी एक

कुछ बड़ी बात थी होते जो मुसलमान भी एक

फ़िरक़ा-बंदी है कहीं और कहीं ज़ातें हैं

क्या ज़माने में पनपने की यही बातें हैं

कौन है तारिक-ए-आईन-ए-रसूल-ए-मुख़्तार

मस्लहत वक़्त की है किस के अमल का मेआर

किस की आँखों में समाया है शिआर-ए-अग़्यार

हो गई किस की निगह तर्ज़-ए-सलफ़ से बे-ज़ार

क़ल्ब में सोज़ नहीं रूह में एहसास नहीं

कुछ भी पैग़ाम-ए-मोहम्मद का तुम्हें पास नहीं

जा के होते हैं मसाजिद में सफ़-आरा तो ग़रीब

ज़हमत-ए-रोज़ा जो करते हैं गवारा तो ग़रीब

नाम लेता है अगर कोई हमारा तो ग़रीब

पर्दा रखता है अगर कोई तुम्हारा तो ग़रीब

उमरा नश्शा-ए-दौलत में हैं ग़ाफ़िल हम से

ज़िंदा है मिल्लत-ए-बैज़ा ग़ुरबा के दम से

वाइज़-ए-क़ौम की वो पुख़्ता-ख़याली न रही

बर्क़-ए-तबई न रही शोला-मक़ाली न रही

रह गई रस्म-ए-अज़ाँ रूह-ए-बिलाली न रही

फ़ल्सफ़ा रह गया तल्क़ीन-ए-ग़ज़ाली न रही

मस्जिदें मर्सियाँ-ख़्वाँ हैं कि नमाज़ी न रहे

यानी वो साहिब-ए-औसाफ़-ए-हिजाज़ी न रहे

शोर है हो गए दुनिया से मुसलमाँ नाबूद

हम ये कहते हैं कि थे भी कहीं मुस्लिम मौजूद

वज़्अ में तुम हो नसारा तो तमद्दुन में हुनूद

ये मुसलमाँ हैं जिन्हें देख के शरमाएँ यहूद

यूँ तो सय्यद भी हो मिर्ज़ा भी हो अफ़्ग़ान भी हो

तुम सभी कुछ हो बताओ तो मुसलमान भी हो

दम-ए-तक़रीर थी मुस्लिम की सदाक़त बेबाक

अदल उस का था क़वी लौस-ए-मराआत से पाक

शजर-ए-फ़ितरत-ए-मुस्लिम था हया से नमनाक

था शुजाअत में वो इक हस्ती-ए-फ़ोक़-उल-इदराक

ख़ुद-गुदाज़ी नम-ए-कैफ़ियत-ए-सहबा-यश बूद

ख़ाली-अज़-ख़ेश शुदन सूरत-ए-मीना-यश बूद

हर मुसलमाँ रग-ए-बातिल के लिए नश्तर था

उस के आईना-ए-हस्ती में अमल जौहर था

जो भरोसा था उसे क़ुव्वत-ए-बाज़ू पर था

है तुम्हें मौत का डर उस को ख़ुदा का डर था

बाप का इल्म न बेटे को अगर अज़बर हो

फिर पिसर क़ाबिल-ए-मीरास-ए-पिदर क्यूँकर हो

हर कोई मस्त-ए-मय-ए-ज़ौक़-ए-तन-आसानी है

तुम मुसलमाँ हो ये अंदाज़-ए-मुसलमानी है

हैदरी फ़क़्र है ने दौलत-ए-उस्मानी है

तुम को अस्लाफ़ से क्या निस्बत-ए-रूहानी है

वो ज़माने में मुअज़्ज़िज़ थे मुसलमाँ हो कर

और तुम ख़्वार हुए तारिक-ए-क़ुरआँ हो कर

तुम हो आपस में ग़ज़बनाक वो आपस में रहीम

तुम ख़ता-कार ओ ख़ता-बीं वो ख़ता-पोश ओ करीम

चाहते सब हैं कि हों औज-ए-सुरय्या पे मुक़ीम

पहले वैसा कोई पैदा तो करे क़ल्ब-ए-सलीम

तख़्त-ए-फ़ग़्फ़ूर भी उन का था सरीर-ए-कए भी

यूँ ही बातें हैं कि तुम में वो हमियत है भी

ख़ुद-कुशी शेवा तुम्हारा वो ग़यूर ओ ख़ुद्दार

तुम उख़ुव्वत से गुरेज़ाँ वो उख़ुव्वत पे निसार

तुम हो गुफ़्तार सरापा वो सरापा किरदार

तुम तरसते हो कली को वो गुलिस्ताँ ब-कनार

अब तलक याद है क़ौमों को हिकायत उन की

नक़्श है सफ़्हा-ए-हस्ती पे सदाक़त उन की

मिस्ल-ए-अंजुम उफ़ुक़-ए-क़ौम पे रौशन भी हुए

बुत-ए-हिन्दी की मोहब्बत में बिरहमन भी हुए

शौक़-ए-परवाज़ में महजूर-ए-नशेमन भी हुए

बे-अमल थे ही जवाँ दीन से बद-ज़न भी हुए

इन को तहज़ीब ने हर बंद से आज़ाद किया

ला के काबे से सनम-ख़ाने में आबाद किया

क़ैस ज़हमत-कश-ए-तन्हाई-ए-सहरा न रहे

शहर की खाए हवा बादिया-पैमा न रहे

वो तो दीवाना है बस्ती में रहे या न रहे

ये ज़रूरी है हिजाब-ए-रुख़-ए-लैला न रहे

गिला-ए-ज़ौर न हो शिकवा-ए-बेदाद न हो

इश्क़ आज़ाद है क्यूँ हुस्न भी आज़ाद न हो

अहद-ए-नौ बर्क़ है आतिश-ज़न-ए-हर-ख़िर्मन है

ऐमन इस से कोई सहरा न कोई गुलशन है

इस नई आग का अक़्वाम-ए-कुहन ईंधन है

मिल्लत-ए-ख़त्म-ए-रसूल शोला-ब-पैराहन है

आज भी हो जो ब्राहीम का ईमाँ पैदा

आग कर सकती है अंदाज़-ए-गुलिस्ताँ पैदा

देख कर रंग-ए-चमन हो न परेशाँ माली

कौकब-ए-ग़ुंचा से शाख़ें हैं चमकने वाली

ख़स ओ ख़ाशाक से होता है गुलिस्ताँ ख़ाली

गुल-बर-अंदाज़ है ख़ून-ए-शोहदा की लाली

रंग गर्दूं का ज़रा देख तो उन्नाबी है

ये निकलते हुए सूरज की उफ़ुक़-ताबी है

उम्मतें गुलशन-ए-हस्ती में समर-चीदा भी हैं

और महरूम-ए-समर भी हैं ख़िज़ाँ-दीदा भी हैं

सैकड़ों नख़्ल हैं काहीदा भी बालीदा भी हैं

सैकड़ों बत्न-ए-चमन में अभी पोशीदा भी हैं

नख़्ल-ए-इस्लाम नमूना है बिरौ-मंदी का

फल है ये सैकड़ों सदियों की चमन-बंदी का

पाक है गर्द-ए-वतन से सर-ए-दामाँ तेरा

तू वो यूसुफ़ है कि हर मिस्र है कनआँ तेरा

क़ाफ़िला हो न सकेगा कभी वीराँ तेरा

ग़ैर यक-बाँग-ए-दारा कुछ नहीं सामाँ तेरा

नख़्ल-ए-शमा अस्ती ओ दर शोला दो-रेशा-ए-तू

आक़िबत-सोज़ बवद साया-ए-अँदेशा-ए-तू

तू न मिट जाएगा ईरान के मिट जाने से

नश्शा-ए-मय को तअल्लुक़ नहीं पैमाने से

है अयाँ यूरिश-ए-तातार के अफ़्साने से

पासबाँ मिल गए काबे को सनम-ख़ाने से

कश्ती-ए-हक़ का ज़माने में सहारा तू है

अस्र-ए-नौ-रात है धुँदला सा सितारा तू है

है जो हंगामा बपा यूरिश-ए-बुलग़ारी का

ग़ाफ़िलों के लिए पैग़ाम है बेदारी का

तू समझता है ये सामाँ है दिल-आज़ारी का

इम्तिहाँ है तिरे ईसार का ख़ुद्दारी का

क्यूँ हिरासाँ है सहिल-ए-फ़रस-ए-आदा से

नूर-ए-हक़ बुझ न सकेगा नफ़स-ए-आदा से

चश्म-ए-अक़्वाम से मख़्फ़ी है हक़ीक़त तेरी

है अभी महफ़िल-ए-हस्ती को ज़रूरत तेरी

ज़िंदा रखती है ज़माने को हरारत तेरी

कौकब-ए-क़िस्मत-ए-इम्काँ है ख़िलाफ़त तेरी

वक़्त-ए-फ़ुर्सत है कहाँ काम अभी बाक़ी है

नूर-ए-तौहीद का इत्माम अभी बाक़ी है

मिस्ल-ए-बू क़ैद है ग़ुंचे में परेशाँ हो जा

रख़्त-बर-दोश हवा-ए-चमनिस्ताँ हो जा

है तुनक-माया तू ज़र्रे से बयाबाँ हो जा

नग़्मा-ए-मौज है हंगामा-ए-तूफ़ाँ हो जा

क़ुव्वत-ए-इश्क़ से हर पस्त को बाला कर दे

दहर में इस्म-ए-मोहम्मद से उजाला कर दे

हो न ये फूल तो बुलबुल का तरन्नुम भी न हो

चमन-ए-दहर में कलियों का तबस्सुम भी न हो

ये न साक़ी हो तो फिर मय भी न हो ख़ुम भी न हो

बज़्म-ए-तौहीद भी दुनिया में न हो तुम भी न हो

ख़ेमा-ए-अफ़्लाक का इस्तादा इसी नाम से है

नब्ज़-ए-हस्ती तपिश-आमादा इसी नाम से है

दश्त में दामन-ए-कोहसार में मैदान में है

बहर में मौज की आग़ोश में तूफ़ान में है

चीन के शहर मराक़श के बयाबान में है

और पोशीदा मुसलमान के ईमान में है

चश्म-ए-अक़्वाम ये नज़्ज़ारा अबद तक देखे

रिफ़अत-ए-शान-ए-रफ़ाना-लका-ज़िक्र देखे

मर्दुम-ए-चश्म-ए-ज़मीं यानी वो काली दुनिया

वो तुम्हारे शोहदा पालने वाली दुनिया

गर्मी-ए-मेहर की परवरदा हिलाली दुनिया

इश्क़ वाले जिसे कहते हैं बिलाली दुनिया

तपिश-अंदोज़ है इस नाम से पारे की तरह

ग़ोता-ज़न नूर में है आँख के तारे की तरह

अक़्ल है तेरी सिपर इश्क़ है शमशीर तिरी

मिरे दरवेश ख़िलाफ़त है जहाँगीर तिरी

मा-सिवा-अल्लाह के लिए आग है तकबीर तिरी

तू मुसलमाँ हो तो तक़दीर है तदबीर तिरी

की मोहम्मद से वफ़ा तू ने तो हम तेरे हैं

ये जहाँ चीज़ है क्या लौह-ओ-क़लम तेरे हैं

जावेद के नाम

लंदन में उस के हाथ का लिखा हुआ पहला ख़त आने पर

दयार-ए-इश्क़ में अपना मक़ाम पैदा कर

नया ज़माना नए सुब्ह ओ शाम पैदा कर

ख़ुदा अगर दिल-ए-फ़ितरत-शनास दे तुझ को

सुकूत-ए-लाला-ओ-गुल से कलाम पैदा कर

उठा न शीशागरान-ए-फ़रंग के एहसाँ

सिफ़ाल-ए-हिन्द से मीना ओ जाम पैदा कर

मैं शाख़-ए-ताक हूँ मेरी ग़ज़ल है मेरा समर

मिरे समर से मय-ए-लाला-फ़ाम पैदा कर

मिरा तरीक़ अमीरी नहीं फ़क़ीरी है

ख़ुदी न बेच ग़रीबी में नाम पैदा कर

जिब्रईल ओ इबलीस

जिब्रईल

हम-दम-ए-दैरीना कैसा है जहान-ए-रंग-ओ-बू

इबलीस

सोज़-ओ-साज़ ओ दर्द ओ दाग़ ओ जुस्तुजू ओ आरज़ू

जिब्रईल

हर घड़ी अफ़्लाक पर रहती है तेरी गुफ़्तुगू

क्या नहीं मुमकिन कि तेरा चाक दामन हो रफ़ू

इबलीस

आह ऐ जिबरील तू वाक़िफ़ नहीं इस राज़ से

कर गया सरमस्त मुझ को टूट कर मेरा सुबू

अब यहाँ मेरी गुज़र मुमकिन नहीं मुमकिन नहीं

किस क़दर ख़ामोश है ये आलम-ए-बे-काख़-ओ-कू

जिस की नौमीदी से हो सोज़-ए-दरून-ए-काएनात

उस के हक़ में तक़्नतू अच्छा है या ला-तक़्नतू

जिब्रईल

खो दिए इंकार से तू ने मक़ामात-ए-बुलंद

चश्म-ए-यज़्दाँ में फ़रिश्तों की रही क्या आबरू

इबलीस

है मिरी जुरअत से मुश्त-ए-ख़ाक में ज़ौक़-ए-नुमू

मेरे फ़ित्ने जामा-ए-अक़्ल-ओ-ख़िरद का तार-ओ-पू

देखता है तू फ़क़त साहिल से रज़्म-ए-ख़ैर-ओ-शर

कौन तूफ़ाँ के तमांचे खा रहा है मैं कि तू

ख़िज़्र भी बे-दस्त-ओ-पा इल्यास भी बे-दस्त-ओ-पा

मेरे तूफ़ाँ यम-ब-यम दरिया-ब-दरिया जू-ब-जू

गर कभी ख़ल्वत मयस्सर हो तो पूछ अल्लाह से

क़िस्सा-ए-आदम को रंगीं कर गया किस का लहू

मैं खटकता हूँ दिल-ए-यज़्दाँ में काँटे की तरह

तू फ़क़त अल्लाह-हू अल्लाह-हू अल्लाह-हू

ज़ोहद और रिंदी

इक मौलवी साहब की सुनाता हूँ कहानी

तेज़ी नहीं मंज़ूर तबीअत की दिखानी

शोहरा था बहुत आप की सूफ़ी-मनुशी का

करते थे अदब उन का अआली ओ अदानी

कहते थे कि पिन्हाँ है तसव्वुफ़ में शरीअत

जिस तरह कि अल्फ़ाज़ में मुज़्मर हों मआनी

लबरेज़ मय-ए-ज़ोहद से थी दिल की सुराही

थी तह में कहीं दुर्द-ए-ख़याल-ए-हमा-दानी

करते थे बयाँ आप करामात का अपनी

मंज़ूर थी तादाद मुरीदों की बढ़ानी

मुद्दत से रहा करते थे हम-साए में मेरे

थी रिंद से ज़ाहिद की मुलाक़ात पुरानी

हज़रत ने मिरे एक शनासा से ये पूछा

'इक़बाल ' कि है क़ुमरी-ए-शमशाद-ए-मआनी

पाबंदी-ए-अहकाम-ए-शरीअत में है कैसा

गो शेर में है रश्क-ए-कलीम-ए-हमदानी

सुनता हूँ कि काफ़िर नहीं हिन्दू को समझता

है ऐसा अक़ीदा असर-ए-फ़लसफ़ा-दानी

है उस की तबीअत में तशय्यो भी ज़रा सा

तफ़्ज़ील - ए - अली हम ने सुनी उस की ज़बानी

समझा है कि है राग इबादात में दाख़िल

मक़्सूद है मज़हब की मगर ख़ाक उड़ानी

कुछ आर उसे हुस्न - फ़रामोशों से नहीं है

आदत ये हमारे शोरा की है पुरानी

गाना जो है शब को तो सहर को है तिलावत

इस रम्ज़ के अब तक न खुले हम पे मआनी

लेकिन ये सुना अपने मुरीदों से है मैं ने

बे - दाग़ है मानिंद - ए - सहर उस की जवानी

मज्मुआ - ए - अज़्दाद है 'इक़बाल ' नहीं है

दिल दफ़्तर - ए - हिकमत है तबीअत ख़फ़क़ानी

रिंदी से भी आगाह शरीअत से भी वाक़िफ़

पूछो जो तसव्वुफ़ की तो मंसूर का सानी

उस शख़्स की हम पर तो हक़ीक़त नहीं खुलती

होगा ये किसी और ही इस्लाम का बानी

अल - क़िस्सा बहुत तूल दिया वाज़ को अपने

ता - देर रही आप की ये नग़्ज़ - बयानी

इस शहर में जो बात हो उड़ जाती है सब में

मैं ने भी सुनी अपने अहिब्बा की ज़बानी

इक दिन जो सर - ए - राह मिले हज़रत - ए - ज़ाहिद

फिर छिड़ गई बातों में वही बात पुरानी

फ़रमाया शिकायत वो मोहब्बत के सबब थी

था फ़र्ज़ मिरा राह शरीअत की दिखानी

मैं ने ये कहा कोई गिला मुझ को नहीं है

ये आप का हक़ था ज़े - रह - ए - क़ुर्ब - ए - मकानी

ख़म है सर - ए - तस्लीम मिरा आप के आगे

पीरी है तवाज़ो के सबब मेरी जवानी

गर आप को मालूम नहीं मेरी हक़ीक़त

पैदा नहीं कुछ इस से क़ुसूर - ए - हमादानी

मैं ख़ुद भी नहीं अपनी हक़ीक़त का शनासा

गहरा है मिरे बहर - ए - ख़यालात का पानी

मुझ को भी तमन्ना है कि 'इक़बाल ' को देखूँ

की उस की जुदाई में बहुत अश्क - फ़िशानी

'इक़बाल ' भी 'इक़बाल ' से आगाह नहीं है

कुछ इस में तमस्ख़ुर नहीं वल्लाह नहीं है

ज़ौक़ ओ शौक़

क़ल्ब ओ नज़र की ज़िंदगी दश्त में सुब्ह का समाँ

चश्मा - ए - आफ़्ताब से नूर की नद्दियाँ रवाँ !

हुस्न - ए - अज़ल की है नुमूद चाक है पर्दा - ए - वजूद

दिल के लिए हज़ार सूद एक निगाह का ज़ियाँ !

सुर्ख़ ओ कबूद बदलियाँ छोड़ गया सहाब - ए - शब !

कोह - ए - इज़म को दे गया रंग - ब - रंग तैलिसाँ !

गर्द से पाक है हवा बर्ग - ए - नख़ील धुल गए

रेग - ए - नवाह - ए - काज़िमा नर्म है मिस्ल - ए - पर्नियाँ

आग बुझी हुई इधर , टूटी हुई तनाब उधर

क्या ख़बर इस मक़ाम से गुज़रे हैं कितने कारवाँ

आई सदा - ए - जिब्रईल तेरा मक़ाम है यही

एहल - ए - फ़िराक़ के लिए ऐश - ए - दवाम है यही

किस से कहूँ कि ज़हर है मेरे लिए मय - ए - हयात

कोहना है बज़्म - ए - कायनात ताज़ा हैं मेरे वारदात !

क्या नहीं और ग़ज़नवी कारगह - ए - हयात में

बैठे हैं कब से मुंतज़िर अहल - ए - हरम के सोमनात !

ज़िक्र - ए - अरब के सोज़ में ,फ़िक्र - ए - अजम के साज़ में

ने अरबी मुशाहिदात , ने अजमी तख़य्युलात

क़ाफ़िला - ए - हिजाज़ में एक हुसैन भी नहीं

गरचे है ताब - दार अभी गेसू - ए - दजला - ओ - फ़ुरात !

अक़्ल ओ दिल ओ निगाह का मुर्शिद - ए - अव्वलीं है इश्क़

इश्क़ न हो तो शर - ओ - दीं बुतकद - ए - तसव्वुरात !

सिदक़ - ए - ख़लील भी है इश्क़ सब्र - ए - हुसैन भी है इश्क़ !

म 'अरका - ए - वजूद में बद्र ओ हुनैन भी है इश्क़ !

अाया - ए - कायनात का म 'अनी - ए - देर - याब तू !

निकले तिरी तलाश में क़ाफ़िला - हा - ए - रंग - ओ - बू !

जलवतियान - ए - मदरसा कोर - निगाह ओ मुर्दा - ज़ाऐक़

जलवतियान - ए - मयकदा कम - तलब ओ तही - कदू !

मैं कि मिरी ग़ज़ल में है आतिश - ए - रफ़्ता का सुराग़

मेरी तमाम सरगुज़िश्त खोए हुओं की जुस्तुजू !

बाद - ए - सबा की मौज से नश - नुमा - ए - ख़ार - ओ - ख़स !

मेरे नफ़स की मौज से नश - ओ - नुमा - ए - आरज़ू !

ख़ून - ए - दिल ओ जिगर से है मेरी नवा की परवरिश

है रग - ए - साज़ में रवाँ साहिब - ए - साज़ का लहू !

फुर्सत - ए - कशमुकश में ईं दिल बे - क़रार रा

यक दो शिकन ज़्यादा कुन गेसू - ए - ताबदार रा

लौह भी तू , क़लम भी तू ,तेरा वजूद अल - किताब !

गुम्बद - ए - आबगीना - रंग तेरे मुहीत में हबाब !

आलम - ए - आब - ओ - ख़ाक में तेरे ज़ुहूर से फ़रोग़

ज़र्रा - ए - रेग को दिया तू ने तुलू - ए - आफ़्ताब !

शौकत - ए - संजर - ओ - सलीम तेरे जलाल की नुमूद !

फ़क़्र - ए - 'जुनेद '-ओ - 'बायज़ीद 'तेरा जमाल बे - नक़ाब !

शौक़ तिरा अगर न हो मेरी नमाज़ का इमाम

मेरा क़याम भी हिजाब ! मेरा सुजूद भी हिजाब !

तेरी निगाह - ए - नाज़ से दोनों मुराद पा गए

अक़्ल ,ग़याब ओ जुस्तुजू ! इश्क़ ,हुज़ूर ओ इज़्तिराब !

तीरा - ओ - तार है जहाँ गर्दिश - ए - आफ़ताब से !

तब - ए - ज़माना ताज़ा कर जल्वा - ए - बे - हिजाब से !

तेरी नज़र में हैं तमाम मेरे गुज़िश्ता रोज़ ओ शब

मुझ को ख़बर न थी कि है इल्म - ए - नख़ील बे - रुतब !

ताज़ा मिरे ज़मीर में म 'अर्क - ए - कुहन हुआ !

इश्क़ तमाम मुस्तफ़ा ! अक़्ल तमाम बू - लहब !

गाह ब - हीला मी - बरद ,गाह ब - ज़ोर मी - कशद

इश्क़ की इब्तिदा अजब इश्क़ की इंतिहा अजब !

आलम - ए - सोज़ - ओ - साज़ में वस्ल से बढ़ के है फ़िराक़

वस्ल में मर्ग - ए - आरज़ू ! हिज्र में ल़ज़्जत - ए - तलब !

एेन - ए - विसाल में मुझे हौसला - ए - नज़र न था

गरचे बहाना - जू रही मेरी निगाह - ए - बे - अदब !

गर्मी - ए - आरज़ू फ़िराक़ ! शोरिश - ए - हाव - ओ - हू फ़िराक़ !

मौज की जुस्तुजू फ़िराक़ ! क़तरे की आबरू फ़िराक़ !

तराना- ए- मिल्ली

चीन - ओ - अरब हमारा हिन्दोस्ताँ हमारा

मुस्लिम हैं हम वतन है सारा जहाँ हमारा

तौहीद की अमानत सीनों में है हमारे

आसाँ नहीं मिटाना नाम - ओ - निशाँ हमारा

दुनिया के बुत - कदों में पहला वो घर ख़ुदा का

हम इस के पासबाँ हैं वो पासबाँ हमारा

तेग़ों के साए में हम पल कर जवाँ हुए हैं

ख़ंजर हिलाल का है क़ौमी निशाँ हमारा

मग़रिब की वादियों में गूँजी अज़ाँ हमारी

थमता न था किसी से सैल - ए - रवाँ हमारा

बातिल से दबने वाले ऐ आसमाँ नहीं हम

सौ बार कर चुका है तू इम्तिहाँ हमारा

ऐ गुलिस्तान - ए - उंदुलुस वो दिन हैं याद तुझ को

था तेरी डालियों में जब आशियाँ हमारा

ऐ मौज - ए - दजला तू भी पहचानती है हम को

अब तक है तेरा दरिया अफ़्साना - ख़्वाँ हमारा

ऐ अर्ज़ - ए - पाक तेरी हुर्मत पे कट मरे हम

है ख़ूँ तिरी रगों में अब तक रवाँ हमारा

सालार - ए - कारवाँ है मीर - ए - हिजाज़ अपना

इस नाम से है बाक़ी आराम - ए - जाँ हमारा

'इक़बाल 'का तराना बाँग - ए - दरा है गोया

होता है जादा - पैमा फिर कारवाँ हमारा


तराना- ए- हिन्दी

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा

हम बुलबुलें हैं इस की ये गुलसिताँ हमारा

ग़ुर्बत में हों अगर हम रहता है दिल वतन में

समझो वहीं हमें भी दिल हो जहाँ हमारा

पर्बत वो सब से ऊँचा हम - साया आसमाँ का

वो संतरी हमारा वो पासबाँ हमारा

गोदी में खेलती हैं इस की हज़ारों नदियाँ

गुलशन है जिन के दम से रश्क - ए - जिनाँ हमारा

ऐ आब - रूद - ए - गंगा वो दिन है याद तुझ को

उतरा तिरे किनारे जब कारवाँ हमारा

मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना

हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा

यूनान ओ मिस्र ओ रूमा सब मिट गए जहाँ से

अब तक मगर है बाक़ी नाम - ओ - निशाँ हमारा

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी

सदियों रहा है दुश्मन दौर - ए - ज़माँ हमारा

'इक़बाल ' कोई महरम अपना नहीं जहाँ में

मालूम क्या किसी को दर्द - ए - निहाँ हमारा

तस्वीर- ए- दर्द

नहीं मिन्नत - कश - ए - ताब - ए - शुनीदन दास्ताँ मेरी

ख़मोशी गुफ़्तुगू है बे - ज़बानी है ज़बाँ मेरी

ये दस्तूर - ए - ज़बाँ - बंदी है कैसा तेरी महफ़िल में

यहाँ तो बात करने को तरसती है ज़बाँ मेरी

उठाए कुछ वरक़ लाले ने कुछ नर्गिस ने कुछ गुल ने

चमन में हर तरफ़ बिखरी हुई है दास्ताँ मेरी

उड़ा ली क़ुमरियों ने तूतियों ने अंदलीबों ने

चमन वालों ने मिल कर लूट ली तर्ज़ - ए - फ़ुग़ाँ मेरी

टपक ऐ शम्अ आँसू बन के परवाने की आँखों से

सरापा दर्द हूँ हसरत भरी है दास्ताँ मेरी

इलाही फिर मज़ा क्या है यहाँ दुनिया में रहने का

हयात - ए - जावेदाँ मेरी न मर्ग - ए - ना - गहाँ मेरी

मिरा रोना नहीं रोना है ये सारे गुलिस्ताँ का

वो गुल हूँ मैं ख़िज़ाँ हर गुल की है गोया ख़िज़ाँ मेरी

दरीं हसरत सरा उमरीस्त अफ़्सून - ए - जरस दारम

ज़ फ़ैज़ - ए - दिल तपीदन - हा ख़रोश - ए - बे - नफ़स दारम

रियाज़ - ए - दहर में ना - आश्ना - ए - बज़्म - ए - इशरत हूँ

ख़ुशी रोती है जिस को मैं वो महरूम - ए - मसर्रत हूँ

मिरी बिगड़ी हुई तक़दीर को रोती है गोयाई

मैं हर्फ़ - ए - ज़ेर - ए - लब शर्मिंदा - ए - गोश - ए - समाअत हूँ

परेशाँ हूँ मैं मुश्त - ए - ख़ाक लेकिन कुछ नहीं खुलता

सिकंदर हूँ कि आईना हूँ या गर्द - ए - कुदूरत हूँ

ये सब कुछ है मगर हस्ती मिरी मक़्सद है क़ुदरत का

सरापा नूर हो जिस की हक़ीक़त मैं वो ज़ुल्मत हूँ

ख़ज़ीना हूँ छुपाया मुझ को मुश्त - ए - ख़ाक - ए - सहरा ने

किसी को क्या ख़बर है मैं कहाँ हूँ किस की दौलत हूँ

नज़र मेरी नहीं ममनून - ए - सैर - ए - अरसा - ए - हस्ती

मैं वो छोटी सी दुनिया हूँ कि आप अपनी विलायत हूँ

न सहबा हूँ न साक़ी हूँ न मस्ती हूँ न पैमाना

मैं इस मय - ख़ाना - ए - हस्ती में हर शय की हक़ीक़त हूँ

मुझे राज़ - ए - दो - आलम दिल का आईना दिखाता है

वही कहता हूँ जो कुछ सामने आँखों के आता है

अता ऐसा बयाँ मुझ को हुआ रंगीं - बयानों में

कि बाम - ए - अर्श के ताइर हैं मेरे हम - ज़बानों में

असर ये भी है इक मेरे जुनून - ए - फ़ित्ना - सामाँ का

मिरा आईना - ए - दिल है क़ज़ा के राज़ - दानों में

रुलाता है तिरा नज़्ज़ारा ऐ हिन्दोस्ताँ मुझ को

कि इबरत - ख़ेज़ है तेरा फ़साना सब फ़सानों में

दिया रोना मुझे ऐसा कि सब कुछ दे दिया गोया

लिखा कल्क - ए - अज़ल ने मुझ को तेरे नौहा - ख़्वानों में

निशान - ए - बर्ग - ए - गुल तक भी न छोड़ उस बाग़ में गुलचीं

तिरी क़िस्मत से रज़्म - आराइयाँ हैं बाग़बानों में

छुपा कर आस्तीं में बिजलियाँ रक्खी हैं गर्दूं ने

अनादिल बाग़ के ग़ाफ़िल न बैठें आशियानों में

सुन ऐ ग़ाफ़िल सदा मेरी ये ऐसी चीज़ है जिस को

वज़ीफ़ा जान कर पढ़ते हैं ताइर बोस्तानों में

वतन की फ़िक्र कर नादाँ मुसीबत आने वाली है

तिरी बर्बादियों के मशवरे हैं आसमानों में

ज़रा देख उस को जो कुछ हो रहा है होने वाला है

धरा क्या है भला अहद - ए - कुहन की दास्तानों में

ये ख़ामोशी कहाँ तक लज़्ज़त - ए - फ़रियाद पैदा कर

ज़मीं पर तू हो और तेरी सदा हो आसमानों में

न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दोस्ताँ वालो

तुम्हारी दास्ताँ तक भी न होगी दास्तानों में

यही आईन - ए - क़ुदरत है यही उस्लूब - ए - फ़ितरत है

जो है राह - ए - अमल में गामज़न महबूब - ए - फ़ितरत है

हुवैदा आज अपने ज़ख़्म - ए - पिन्हाँ कर के छोड़ूँगा

लहू रो रो के महफ़िल को गुलिस्ताँ कर के छोड़ूँगा

जलाना है मुझे हर शम - ए - दिल को सोज़ - ए - पिन्हाँ से

तिरी तारीक रातों में चराग़ाँ कर के छोड़ूँगा

मगर ग़ुंचों की सूरत हूँ दिल - ए - दर्द - आश्ना पैदा

चमन में मुश्त - ए - ख़ाक अपनी परेशाँ कर के छोड़ूँगा

पिरोना एक ही तस्बीह में इन बिखरे दानों को

जो मुश्किल है तो इस मुश्किल को आसाँ कर के छोड़ूँगा

मुझे ऐ हम - नशीं रहने दे शग़्ल - ए - सीना - कावी में

कि मैं दाग़ - ए - मोहब्बत को नुमायाँ कर के छोड़ूँगा

दिखा दूँगा जहाँ को जो मिरी आँखों ने देखा है

तुझे भी सूरत - ए - आईना हैराँ कर के छोड़ूँगा

जो है पर्दों में पिन्हाँ चश्म - ए - बीना देख लेती है

ज़माने की तबीअत का तक़ाज़ा देख लेती है

किया रिफ़अत की लज़्ज़त से न दिल को आश्ना तू ने

गुज़ारी उम्र पस्ती में मिसाल - ए - नक़्श - ए - पा तू ने

रहा दिल - बस्ता - ए - महफ़िल मगर अपनी निगाहों को

किया बैरून - ए - महफ़िल से न हैरत - आश्ना तू ने

फ़िदा करता रहा दिल को हसीनों की अदाओं पर

मगर देखी न उस आईने में अपनी अदा तू ने

तअस्सुब छोड़ नादाँ दहर के आईना - ख़ाने में

ये तस्वीरें हैं तेरी जिन को समझा है बुरा तू ने

सरापा नाला - ए - बेदाद - ए - सोज़ - ए - ज़िंदगी हो जा

सपंद - आसा गिरह में बाँध रक्खी है सदा तू ने

सफ़ा - ए - दिल को क्या आराइश - ए - रंग - ए - तअल्लुक़ से

कफ़ - ए - आईना पर बाँधी है ओ नादाँ हिना तू ने

ज़मीं क्या आसमाँ भी तेरी कज - बीनी पे रोता है

ग़ज़ब है सत्र - ए - क़ुरआन को चलेपा कर दिया तू ने

ज़बाँ से गर किया तौहीद का दावा तो क्या हासिल

बनाया है बुत - ए - पिंदार को अपना ख़ुदा तू ने

कुएँ में तू ने यूसुफ़ को जो देखा भी तो क्या देखा

अरे ग़ाफ़िल जो मुतलक़ था मुक़य्यद कर दिया तू ने

हवस बाला - ए - मिम्बर है तुझे रंगीं - बयानी की

नसीहत भी तिरी सूरत है इक अफ़्साना - ख़्वानी की

दिखा वो हुस्न - ए - आलम - सोज़ अपनी चश्म - ए - पुर - नम को

जो तड़पाता है परवाने को रुलवाता है शबनम को

ज़रा नज़्ज़ारा ही ऐ बुल - हवस मक़्सद नहीं उस का

बनाया है किसी ने कुछ समझ कर चश्म - ए - आदम को

अगर देखा भी उस ने सारे आलम को तो क्या देखा

नज़र आई न कुछ अपनी हक़ीक़त जाम से जम को

शजर है फ़िरक़ा - आराई तअस्सुब है समर उस का

ये वो फल है कि जन्नत से निकलवाता है आदम को

न उट्ठा जज़्बा - ए - ख़ुर्शीद से इक बर्ग - ए - गुल तक भी

ये रिफ़अत की तमन्ना है कि ले उड़ती है शबनम को

फिरा करते नहीं मजरूह - ए - उल्फ़त फ़िक्र - ए - दरमाँ में

ये ज़ख़्मी आप कर लेते हैं पैदा अपने मरहम को

मोहब्बत के शरर से दिल सरापा नूर होता है

ज़रा से बीज से पैदा रियाज़ - ए - तूर होता है

दवा हर दुख की है मजरूह - ए - तेग़ - ए - आरज़ू रहना

इलाज - ए - ज़ख़्म है आज़ाद - ए - एहसान - ए - रफ़ू रहना

शराब - ए - बे - ख़ुदी से ता - फ़लक परवाज़ है मेरी

शिकस्त - ए - रंग से सीखा है मैं ने बन के बू रहना

थमे क्या दीदा - ए - गिर्यां वतन की नौहा - ख़्वानी में

इबादत चश्म - ए - शाइर की है हर दम बा - वज़ू रहना

बनाएँ क्या समझ कर शाख़ - ए - गुल पर आशियाँ अपना

चमन में आह क्या रहना जो हो बे - आबरू रहना

जो तू समझे तो आज़ादी है पोशीदा मोहब्बत में

ग़ुलामी है असीर - ए - इम्तियाज़ - ए - मा - ओ - तू रहना

ये इस्तिग़्ना है पानी में निगूँ रखता है साग़र को

तुझे भी चाहिए मिस्ल - ए - हबाब - ए - आबजू रहना

न रह अपनों से बे - परवा इसी में ख़ैर है तेरी

अगर मंज़ूर है दुनिया में ओ बेगाना - ख़ू रहना

शराब - ए - रूह - परवर है मोहब्बत नौ - ए - इंसाँ की

सिखाया इस ने मुझ को मस्त बे - जाम - ओ - सुबू रहना

मोहब्बत ही से पाई है शिफ़ा बीमार क़ौमों ने

किया है अपने बख़्त - ए - ख़ुफ़्ता को बेदार क़ौमों ने

बयाबान - ए - मोहब्बत दश्त - ए - ग़ुर्बत भी वतन भी है

ये वीराना क़फ़स भी आशियाना भी चमन भी है

मोहब्बत ही वो मंज़िल है कि मंज़िल भी है सहरा भी

जरस भी कारवाँ भी राहबर भी राहज़न भी है

मरज़ कहते हैं सब इस को ये है लेकिन मरज़ ऐसा

छुपा जिस में इलाज - ए - गर्दिश - ए - चर्ख़ - ए - कुहन भी है

जलाना दिल का है गोया सरापा नूर हो जाना

ये परवाना जो सोज़ाँ हो तो शम - ए - अंजुमन भी है

वही इक हुस्न है लेकिन नज़र आता है हर शय में

ये शीरीं भी है गोया बे - सुतूँ भी कोहकन भी है

उजाड़ा है तमीज़ - ए - मिल्लत - ओ - आईं ने क़ौमों को

मिरे अहल - ए - वतन के दिल में कुछ फ़िक्र - ए - वतन भी है

सुकूत - आमोज़ तूल - ए - दास्तान - ए - दर्द है वर्ना

ज़बाँ भी है हमारे मुँह में और ताब - ए - सुख़न भी है

नमी - गर्दीद को तह रिश्ता - ए - मअ 'नी रिहा कर्दम

हिकायत बूद बे - पायाँ ब - ख़ामोशी अदा कर्दम

तारीख की दुआ

(उंदुलुस के मैदान - ए - जंग में)

ये ग़ाज़ी ये तेरे पुर - असरार बंदे

जिन्हें तू ने बख़्शा है ज़ौक़ - ए - ख़ुदाई

दो - नीम उन की ठोकर से सहरा ओ दरिया

सिमट कर पहाड़ उन की हैबत से राई

दो - आलम से करती है बेगाना दिल को

अजब चीज़ है लज़्ज़त - ए - आश्नाई

शहादत है मतलूब - ओ - मक़्सूद - ए - मोमिन

न माल - ए - ग़नीमत न किश्वर - कुशाई

ख़याबाँ में है मुंतज़िर लाला कब से

क़बा चाहिए उस को ख़ून - ए - अरब से

किया तू ने सहरा - नशीनों को यकता

ख़बर में नज़र में अज़ान - ए - सहर में

तलब जिस की सदियों से थी ज़िंदगी को

वो सोज़ उस ने पाया उन्हीं के जिगर में

कुशाद - ए - दर - ए - दिल समझते हैं उस को

हलाकत नहीं मौत उन की नज़र में

दिल - ए - मर्द - ए - मोमिन में फिर ज़िंदा कर दे

वो बिजली कि थी नारा - ए - ला - तज़र में

अज़ाएम को सीनों में बेदार कर दे

निगाह - ए - मुसलमाँ को तलवार कर दे

तुलू- ए- इस्लाम

दलील - ए - सुब्ह - ए - रौशन है सितारों की तुनुक - ताबी

उफ़ुक़ से आफ़्ताब उभरा गया दौर - ए - गिराँ - ख़्वाबी

उरूक़ - मुर्दा - ए - मशरिक़ में ख़ून - ए - ज़िंदगी दौड़ा

समझ सकते नहीं इस राज़ को सीना ओ फ़ाराबी

मुसलमाँ को मुसलमाँ कर दिया तूफ़ान - ए - मग़रिब ने

तलातुम - हा - ए - दरिया ही से है गौहर की सैराबी

अता मोमिन को फिर दरगाह - ए - हक़ से होने वाला है

शिकोह - ए - तुर्कमानी ज़ेहन हिन्दी नुत्क़ आराबी

असर कुछ ख़्वाब का ग़ुंचों में बाक़ी है तू ऐ बुलबुल

नवा - रा तल्ख़ - तरमी ज़न चू ज़ौक़ - ए - नग़्मा कम - याबी

तड़प सेहन - ए - चमन में आशियाँ में शाख़ - सारों में

जुदा पारे से हो सकती नहीं तक़दीर - ए - सीमाबी

वो चश्म - ए - पाक हैं क्यूँ ज़ीनत - ए - बर - गुस्तवाँ देखे

नज़र आती है जिस को मर्द - ए - ग़ाज़ी की जिगर - ताबी

ज़मीर - ए - लाला में रौशन चराग़ - ए - आरज़ू कर दे

चमन के ज़र्रे ज़र्रे को शहीद - ए - जुस्तुजू कर दे

सरिश्क - ए - चश्म - ए - मुस्लिम में है नैसाँ का असर पैदा

ख़लीलुल्लाह के दरिया में होंगे फिर गुहर पैदा

किताब - ए - मिल्लत - ए - बैज़ा की फिर शीराज़ा - बंदी है

ये शाख़ - ए - हाशमी करने को है फिर बर्ग - ओ - बर पैदा

रबूद आँ तुर्क शीराज़ी दिल - ए - तबरेज़ - ओ - काबुल रा

सबा करती है बू - ए - गुल से अपना हम - सफ़र पैदा

अगर उस्मानियों पर कोह - ए - ग़म टूटा तो क्या ग़म है

कि ख़ून - ए - सद - हज़ार - अंजुम से होती है सहर पैदा

जहाँबानी से है दुश्वार - तर कार - ए - जहाँ - बीनी

जिगर ख़ूँ हो तो चश्म - ए - दिल में होती है नज़र पैदा

हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे - नूरी पे रोती है

बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा - वर पैदा

नवा - पैरा हो ऐ बुलबुल कि हो तेरे तरन्नुम से

कबूतर के तन - ए - नाज़ुक में शाहीं का जिगर पैदा

तिरे सीने में है पोशीदा राज़ - ए - ज़िंदगी कह दे

मुसलमाँ से हदीस - ए - सोज़ - ओ - साज़ - ए - ज़िंदगी कह दे

ख़ुदा - ए - लम - यज़ल का दस्त - ए - क़ुदरत तू ज़बाँ तू है

यक़ीं पैदा कर ऐ ग़ाफ़िल कि मग़लूब - ए - गुमाँ तू है

परे है चर्ख़ - ए - नीली - फ़ाम से मंज़िल मुसलमाँ की

सितारे जिस की गर्द - ए - राह हों वो कारवाँ तो है

मकाँ फ़ानी मकीं फ़ानी अज़ल तेरा अबद तेरा

ख़ुदा का आख़िरी पैग़ाम है तू जावेदाँ तू है

हिना - बंद - ए - उरूस - ए - लाला है ख़ून - ए - जिगर तेरा

तिरी निस्बत बराहीमी है मेमार - ए - जहाँ तू है

तिरी फ़ितरत अमीं है मुम्किनात - ए - ज़िंदगानी की

जहाँ के जौहर - ए - मुज़्मर का गोया इम्तिहाँ तो है

जहान - ए - आब - ओ - गिल से आलम - ए - जावेद की ख़ातिर

नबुव्वत साथ जिस को ले गई वो अरमुग़ाँ तू है

ये नुक्ता सरगुज़िश्त - ए - मिल्लत - ए - बैज़ा से है पैदा

कि अक़्वाम - ए - ज़मीन - ए - एशिया का पासबाँ तू है

सबक़ फिर पढ़ सदाक़त का अदालत का शुजाअत का

लिया जाएगा तुझ से काम दुनिया की इमामत का

यही मक़्सूद - ए - फ़ितरत है यही रम्ज़ - ए - मुसलमानी

उख़ुव्वत की जहाँगीरी मोहब्बत की फ़रावानी

बुतान - ए - रंग - ओ - ख़ूँ को तोड़ कर मिल्लत में गुम हो जा

न तूरानी रहे बाक़ी न ईरानी न अफ़्ग़ानी

मियान - ए - शाख़ - साराँ सोहबत - ए - मुर्ग़ - ए - चमन कब तक

तिरे बाज़ू में है परवाज़ - ए - शाहीन - ए - क़हस्तानी

गुमाँ - आबाद हस्ती में यक़ीं मर्द - ए - मुसलमाँ का

बयाबाँ की शब - ए - तारीक में क़िंदील - ए - रुहबानी

मिटाया क़ैसर ओ किसरा के इस्तिब्दाद को जिस ने

वो क्या था ज़ोर - ए - हैदर फ़क़्र - ए - बू - ज़र सिद्क़ - ए - सलमानी

हुए अहरार - ए - मिल्लत जादा - पैमा किस तजम्मुल से

तमाशाई शिगाफ़ - ए - दर से हैं सदियों के ज़िंदानी

सबात - ए - ज़िंदगी ईमान - ए - मोहकम से है दुनिया में

कि अल्मानी से भी पाएँदा - तर निकला है तूरानी

जब इस अँगारा - ए - ख़ाकी में होता है यक़ीं पैदा

तो कर लेता है ये बाल - ओ - पर - ए - रूह - उल - अमीं पैदा

ग़ुलामी में न काम आती हैं शमशीरें न तदबीरें

जो हो ज़ौक़ - ए - यक़ीं पैदा तो कट जाती हैं ज़ंजीरें

कोई अंदाज़ा कर सकता है उस के ज़ोर - ए - बाज़ू का

निगाह - ए - मर्द - ए - मोमिन से बदल जाती हैं तक़दीरें

विलायत पादशाही इल्म - ए - अशिया की जहाँगीरी

ये सब क्या हैं फ़क़त इक नुक्ता - ए - ईमाँ की तफ़्सीरें

बराहीमी नज़र पैदा मगर मुश्किल से होती है

हवस छुप छुप के सीनों में बना लेती है तस्वीरें

तमीज़ - ए - बंदा - ओ - आक़ा फ़साद - ए - आदमियत है

हज़र ऐ चीरा - दस्ताँ सख़्त हैं फ़ितरत की ताज़ीरें

हक़ीक़त एक है हर शय की ख़ाकी हो कि नूरी हो

लहू ख़ुर्शीद का टपके अगर ज़र्रे का दिल चीरें

यक़ीं मोहकम अमल पैहम मोहब्बत फ़ातेह - ए - आलम

जिहाद - ए - ज़िंदगानी में हैं ये मर्दों की शमशीरें

चे बायद मर्द रा तब - ए - बुलंद मशरब - ए - नाबे

दिल - ए - गरमे निगाह - ए - पाक - बीने जान - ए - बेताबे

उक़ाबी शान से झपटे थे जो बे - बाल - ओ - पर निकले

सितारे शाम के ख़ून - ए - शफ़क़ में डूब कर निकले

हुए मदफ़ून - ए - दरिया ज़ेर - ए - दरिया तैरने वाले

तमांचे मौज के खाते थे जो बन कर गुहर निकले

ग़ुबार - ए - रहगुज़र हैं कीमिया पर नाज़ था जिन को

जबीनें ख़ाक पर रखते थे जो इक्सीर - गर निकले

हमारा नर्म - रौ क़ासिद पयाम - ए - ज़िंदगी लाया

ख़बर देती थीं जिन को बिजलियाँ वो बे - ख़बर निकले

हरम रुस्वा हुआ पीर - ए - हरम की कम - निगाही से

जवानान - ए - ततारी किस क़दर साहब - नज़र निकले

ज़मीं से नूरयान - ए - आसमाँ - परवाज़ कहते थे

ये ख़ाकी ज़िंदा - तर पाएँदा - तर ताबिंदा - तर निकले

जहाँ में अहल - ए - ईमाँ सूरत - ए - ख़ुर्शीद जीते हैं

इधर डूबे उधर निकले उधर डूबे इधर निकले

यक़ीं अफ़राद का सरमाया - ए - तामीर - ए - मिल्लत है

यही क़ुव्वत है जो सूरत - गर - ए - तक़दीर - ए - मिल्लत है

तू राज़ - ए - कुन - फ़काँ है अपनी आँखों पर अयाँ हो जा

ख़ुदी का राज़ - दाँ हो जा ख़ुदा का तर्जुमाँ हो जा

हवस ने कर दिया है टुकड़े टुकड़े नौ - ए - इंसाँ को

उख़ुव्वत का बयाँ हो जा मोहब्बत की ज़बाँ हो जा

ये हिन्दी वो ख़ुरासानी ये अफ़्ग़ानी वो तूरानी

तू ऐ शर्मिंदा - ए - साहिल उछल कर बे - कराँ हो जा

ग़ुबार - आलूदा - ए - रंग - ओ - नसब हैं बाल - ओ - पर तेरे

तू ऐ मुर्ग़ - ए - हरम उड़ने से पहले पर - फ़िशाँ हो जा

ख़ुदी में डूब जा ग़ाफ़िल ये सिर्र - ए - ज़िंदगानी है

निकल कर हल्क़ा - ए - शाम - ओ - सहर से जावेदाँ हो जा

मसाफ़ - ए - ज़िंदगी में सीरत - ए - फ़ौलाद पैदा कर

शबिस्तान - ए - मोहब्बत में हरीर ओ परनियाँ हो जा

गुज़र जा बन के सैल - ए - तुंद - रौ कोह ओ बयाबाँ से

गुलिस्ताँ राह में आए तो जू - ए - नग़्मा - ख़्वाँ हो जा

तिरे इल्म ओ मोहब्बत की नहीं है इंतिहा कोई

नहीं है तुझ से बढ़ कर साज़ - ए - फ़ितरत में नवा कोई

अभी तक आदमी सैद - ए - ज़बून - ए - शहरयारी है

क़यामत है कि इंसाँ नौ - ए - इंसाँ का शिकारी है

नज़र को ख़ीरा करती है चमक तहज़ीब - ए - हाज़िर की

ये सन्नाई मगर झूटे निगूँ की रेज़ा - कारी है

वो हिकमत नाज़ था जिस पर ख़िरद - मंदान - ए - मग़रिब को

हवस के पंजा - ए - ख़ूनीं में तेग़ - ए - कार - ज़ारी है

तदब्बुर की फ़ुसूँ - कारी से मोहकम हो नहीं सकता

जहाँ में जिस तमद्दुन की बिना सरमाया - दारी है

अमल से ज़िंदगी बनती है जन्नत भी जहन्नम भी

ये ख़ाकी अपनी फ़ितरत में न नूरी है न नारी है

ख़रोश - आमोज़ बुलबुल हो गिरह ग़ुंचे की वा कर दे

कि तू इस गुलसिताँ के वास्ते बाद - ए - बहारी है

फिर उट्ठी एशिया के दिल से चिंगारी मोहब्बत की

ज़मीं जौलाँ - गह - ए - अतलस क़बायान - ए - तातारी है

बया पैदा ख़रीदा रास्त जान - ए - ना - वान - ए - रा

पस अज़ मुद्दत गुज़ार उफ़्ताद बर - मा कारवाने रा

बया साक़ी नवा - ए - मुर्ग़ - ज़ार अज़ शाख़ - सार आमद

बहार आमद निगार आमद निगार आमद क़रार आमद

कशीद अब्र - ए - बहारी ख़ेमा अंदर वादी ओ सहरा

सदा - ए - आबशाराँ अज़ फ़राज़ - ए - कोह - सार आमद

सरत गर्दम तोहम क़ानून पेशीं साज़ दह साक़ी

कि ख़ैल - ए - नग़्मा - पर्दाज़ाँ क़तार अंदर क़तार आमद

कनार अज़ ज़ाहिदाँ बर - गीर ओ बेबाकाना साग़र - कश

पस अज़ मुद्दत अज़ीं शाख़ - ए - कुहन बाँग - ए - हज़ार आमद

ब - मुश्ताक़ाँ हदीस - ए - ख़्वाजा - ए - बदरौ हुनैन आवर

तसर्रुफ़ - हा - ए - पिन्हानश ब - चश्म - ए - आश्कार आमद

दिगर शाख़ - ए - ख़लील अज़ ख़ून - ए - मा नमनाक मी गर्दद

ब - बाज़ार - ए - मोहब्बत नक़्द - ए - मा कामिल अयार आमद

सर - ए - ख़ाक - ए - शाहीरे बर्ग - हा - ए - लाला मी पाशम

कि ख़ूनश बा - निहाल - ए - मिल्लत - ए - मा साज़गार आमद

बया ता - गुल बा - अफ़ोशनीम ओ मय दर साग़र अंदाज़ेम

फ़लक रा सक़फ़ ब - शागाफ़ेम ओ तरह - ए - दीगर अंदाज़ेम

नया शिवाला

सच कह दूँ ऐ बरहमन गर तू बुरा न माने

तेरे सनम - कदों के बुत हो गए पुराने

अपनों से बैर रखना तू ने बुतों से सीखा

जंग - ओ - जदल सिखाया वाइज़ को भी ख़ुदा ने

तंग आ के मैं ने आख़िर दैर ओ हरम को छोड़ा

वाइज़ का वाज़ छोड़ा छोड़े तिरे फ़साने

पत्थर की मूरतों में समझा है तू ख़ुदा है

ख़ाक - ए - वतन का मुझ को हर ज़र्रा देवता है

आ ग़ैरियत के पर्दे इक बार फिर उठा दें

बिछड़ों को फिर मिला दें नक़्श - ए - दुई मिटा दें

सूनी पड़ी हुई है मुद्दत से दिल की बस्ती

आ इक नया शिवाला इस देस में बना दें

दुनिया के तीरथों से ऊँचा हो अपना तीरथ

दामान - ए - आसमाँ से इस का कलस मिला दें

हर सुब्ह उठ के गाएँ मंतर वो मीठे मीठे

सारे पुजारियों को मय पीत की पिला दें

शक्ति भी शांति भी भगतों के गीत में है

धरती के बासीयों की मुक्ती प्रीत में है

नानक

क़ौम ने पैग़ाम - ए - गौतम की ज़रा परवा न की

क़द्र पहचानी न अपने गौहर - ए - यक - दाना की

आह बद - क़िस्मत रहे आवाज़ - ए - हक़ से बे - ख़बर

ग़ाफ़िल अपने फल की शीरीनी से होता है शजर

आश्कार उस ने किया जो ज़िंदगी का राज़ था

हिन्द को लेकिन ख़याली फ़ल्सफ़ा पर नाज़ था

शम - ए - हक़ से जो मुनव्वर हो ये वो महफ़िल न थी

बारिश - ए - रहमत हुई लेकिन ज़मीं क़ाबिल न थी

आह शूदर के लिए हिन्दोस्ताँ ग़म - ख़ाना है

दर्द - ए - इंसानी से इस बस्ती का दिल बेगाना है

बरहमन सरशार है अब तक मय - ए - पिंदार में

शम - ए - गौतम जल रही है महफ़िल - ए - अग़्यार में

बुत - कदा फिर बाद मुद्दत के मगर रौशन हुआ

नूर - ए - इब्राहीम से आज़र का घर रौशन हुआ

फिर उठी आख़िर सदा तौहीद की पंजाब से

हिन्द को इक मर्द - ए - कामिल ने जगाया ख़्वाब से

नाला- ए- फ़िराक़

जा बसा मग़रिब में आख़िर ऐ मकाँ तेरा मकीं

आह ! मशरिक़ की पसंद आई न उस को सरज़मीं

आ गया आज इस सदाक़त का मिरे दिल को यक़ीं

ज़ुल्मत - ए - शब से ज़िया - ए - रोज़ - ए - फ़ुर्क़त कम नहीं

''ताज़ आग़ोश - ए - विदाइ 'श दाग़ - ए - हैरत चीदा अस्त

हम - चू शम - ए - कुश्ता दर - चश्म - ए - निगह ख़्वाबीदा अस्त ''

कुश्ता - ए - उज़लत हूँ आबादी में घबराता हूँ मैं

शहर से सौदा की शिद्दत में निकल जाता हूँ मैं

याद - ए - अय्याम - ए - सलफ़ से दिल को तड़पाता हूँ मैं

बहर - ए - तस्कीं तेरी जानिब दौड़ता आता हूँ मैं

आँख को मानूस है तेरे दर - ओ - दीवार से

अज्नबिय्यत है मगर पैदा मिरी रफ़्तार से

ज़र्रा मेरे दिल का ख़ुर्शीद - आश्ना होने को था

आइना टूटा हुआ आलम - नुमा होने को था

नख़्ल मेरी आरज़ूओं का हरा होने को था

आह ! क्या जाने कोई मैं क्या से क्या होने को था !

अब्र - ए - रहमत दामन - अज़ - गलज़ार - ए - मन बर्चीद - ओ - रफ़त

अंदकै बर - ग़ुंचा हाए आरज़ू बारीद - ओ - रफ़्त

तू कहाँ है ऐ कलीम - ए - ज़र्रा - ए - सीना - ए - इल्म !

थी तिरी मौज - ए - नफ़स बाद - ए - नशात - अफ़ज़ा - ए - इल्म

अब कहाँ वो शौक़ - ए - रह - पैमाई - ए - सहरा - ए - इल्म

तेरे दम से था हमारे सर में भी सौदा - ए - इल्म

''शोर - ए - लैला को कि बाज़ - आराइश - ए - सौदा कुनद

ख़ाक - ए - मजनूँ - रा ग़ुबार - ए - ख़ातिर - ए - सहरा कुनद ''

खोल देगा दश्त - ए - वहशत उक़्दा - ए - तक़दीर को

तोड़ कर पहुँचूँगा मैं पंजाब की ज़ंजीर को

देखता है दीदा - ए - हैराँ तिरी तस्वीर को

क्या तसल्ली हो मगर गिरवीदा - ए - तक़रीर को

''ताब - ए - गोयाई नहीं रखता दहन तस्वीर का

ख़ामुशी कहते हैं जिस को है सुख़न तस्वीर का ''

फ़रमान- ए- ख़ुदा

उठ्ठो मिरी दुनिया के ग़रीबों को जगा दो

काख़ - ए - उमरा के दर ओ दीवार हिला दो

गर्माओ ग़ुलामों का लहू सोज़ - ए - यक़ीं से

कुन्जिश्क - ए - फ़रोमाया को शाहीं से लड़ा दो

सुल्तानी - ए - जम्हूर का आता है ज़माना

जो नक़्श - ए - कुहन तुम को नज़र आए मिटा दो

जिस खेत से दहक़ाँ को मयस्सर नहीं रोज़ी

उस खेत के हर ख़ोशा - ए - गंदुम को जला दो

क्यूँ ख़ालिक़ ओ मख़्लूक़ में हाइल रहें पर्दे

पीरान - ए - कलीसा को कलीसा से उठा दो

हक़ रा ब - सजूदे सनमाँ रा ब - तवाफ़े

बेहतर है चराग़ - ए - हरम - ओ - दैर बुझा दो

मैं ना - ख़ुश ओ बे - ज़ार हूँ मरमर की सिलों से

मेरे लिए मिट्टी का हरम और बना दो

तहज़ीब - ए - नवी कारगह - ए - शीशागराँ है

आदाब - ए - जुनूँ शाइर - ए - मशरिक़ को सिखा दो

फ़रिश्ते आदम को जन्नत से रुख़्सत करते हैं

अता हुई है तुझे रोज़ ओ शब की बेताबी

ख़बर नहीं कि तू ख़ाकी है या कि सीमाबी !

सुना है ख़ाक से तेरी नुमूद है लेकिन

तिरी सरिश्त में है कौकबी ओ महताबी !

जमाल अपना अगर ख़्वाब में भी तू देखे

हज़ार होश से ख़ुश - तर तिरी शकर - ख़्वाबी

गिराँ - बहा है तिरा गिर्या - ए - सहर - गाही

इसी से है तिरे नख़्ल - ए - कुहन की शादाबी !

तिरी नवा से है बे - पर्दा ज़िंदगी का ज़मीर

कि तेरे साज़ की फ़ितरत ने की है मिज़्राबी !

फ़ुनून- ए- लतीफ़ा

ऐ अहल - ए - नज़र ज़ौक़ - ए - नज़र ख़ूब है लेकिन

जो शय की हक़ीक़त को न देखे वो नज़र क्या !

मक़्सूद - ए - हुनर सोज़ - ए - हयात - ए - अबदी है

ये एक नफ़स या दो नफ़स मिस्ल - ए - शरर क्या !

जिस से दिल - ए - दरिया मुतलातिम नहीं होता

ऐ क़तरा - ए - नैसाँ वो सदफ़ क्या वो गुहर कया !

शायर की नवा हो कि मुग़न्नी का नफ़स हो

जिस से चमन अफ़्सुर्दा हो वो बाद - ए - सहर क्या !

बे - मोजज़ा दुनिया में उभरतीं नहीं क़ौमें

जो ज़र्ब - ए - कलीमी नहीं रखता वो हुनर क्या

मस्जिद- ए- क़ुर्तुबा

सिलसिला - ए - रोज़ - ओ - शब नक़्श - गर - ए - हादसात

सिलसिला - ए - रोज़ - ओ - शब अस्ल - ए - हयात - ओ - ममात

सिलसिला - ए - रोज़ - ओ - शब तार - ए - हरीर - ए - दो - रंग

जिस से बनाती है ज़ात अपनी क़बा - ए - सिफ़ात

सिलसिला - ए - रोज़ - ओ - शब साज़ - ए - अज़ल की फ़ुग़ाँ

जिस से दिखाती है ज़ात ज़ेर - ओ - बम - ए - मुम्किनात

तुझ को परखता है ये मुझ को परखता है ये

सिलसिला - ए - रोज़ - ओ - शब सैरफ़ी - ए - काएनात

तू हो अगर कम अयार मैं हूँ अगर कम अयार

मौत है तेरी बरात मौत है मेरी बरात

तेरे शब - ओ - रोज़ की और हक़ीक़त है क्या

एक ज़माने की रौ जिस में न दिन है न रात

आनी - ओ - फ़ानी तमाम मोजज़ा - हा - ए - हुनर

कार - ए - जहाँ बे - सबात कार - ए - जहाँ बे - सबात

अव्वल ओ आख़िर फ़ना बातिन ओ ज़ाहिर फ़ना

नक़्श - ए - कुहन हो कि नौ मंज़िल - ए - आख़िर फ़ना

है मगर इस नक़्श में रंग - ए - सबात - ए - दवाम

जिस को किया हो किसी मर्द - ए - ख़ुदा ने तमाम

मर्द - ए - ख़ुदा का अमल इश्क़ से साहब फ़रोग़

इश्क़ है अस्ल - ए - हयात मौत है उस पर हराम

तुंद ओ सुबुक - सैर है गरचे ज़माने की रौ

इश्क़ ख़ुद इक सैल है सैल को लेता है थाम

इश्क़ की तक़्वीम में अस्र - ए - रवाँ के सिवा

और ज़माने भी हैं जिन का नहीं कोई नाम

इश्क़ दम - ए - जिब्रईल इश्क़ दिल - ए - मुस्तफ़ा

इश्क़ ख़ुदा का रसूल इश्क़ ख़ुदा का कलाम

इश्क़ की मस्ती से है पैकर - ए - गुल ताबनाक

इश्क़ है सहबा - ए - ख़ाम इश्क़ है कास - उल - किराम

इश्क़ फ़क़ीह - ए - हराम इश्क़ अमीर - ए - जुनूद

इश्क़ है इब्नुस - सबील इस के हज़ारों मक़ाम

इश्क़ के मिज़राब से नग़्मा - ए - तार - ए - हयात

इश्क़ से नूर - ए - हयात इश्क़ से नार - ए - हयात

ऐ हरम - ए - क़ुर्तुबा इश्क़ से तेरा वजूद

इश्क़ सरापा दवाम जिस में नहीं रफ़्त ओ बूद

रंग हो या ख़िश्त ओ संग चंग हो या हर्फ़ ओ सौत

मोजज़ा - ए - फ़न की है ख़ून - ए - जिगर से नुमूद

क़तरा - ए - ख़ून - ए - जिगर सिल को बनाता है दिल

ख़ून - ए - जिगर से सदा सोज़ ओ सुरूर ओ सुरूद

तेरी फ़ज़ा दिल - फ़रोज़ मेरी नवा सीना - सोज़

तुझ से दिलों का हुज़ूर मुझ से दिलों की कुशूद

अर्श - ए - मोअल्ला से कम सीना - ए - आदम नहीं

गरचे कफ़ - ए - ख़ाक की हद है सिपहर - ए - कबूद

पैकर - ए - नूरी को है सज्दा मयस्सर तो क्या

उस को मयस्सर नहीं सोज़ - ओ - गुदाज़ - ए - सजूद

काफ़िर - ए - हिन्दी हूँ मैं देख मिरा ज़ौक़ ओ शौक़

दिल में सलात ओ दुरूद लब पे सलात ओ दुरूद

शौक़ मिरी लय में है शौक़ मिरी नय में है

नग़्मा - ए - अल्लाह - हू मेरे रग - ओ - पय में है

तेरा जलाल ओ जमाल मर्द - ए - ख़ुदा की दलील

वो भी जलील ओ जमील तू भी जलील ओ जमील

तेरी बिना पाएदार तेरे सुतूँ बे - शुमार

शाम के सहरा में हो जैसे हुजूम - ए - नुख़ील

तेरे दर - ओ - बाम पर वादी - ए - ऐमन का नूर

तेरा मिनार - ए - बुलंद जल्वा - गह - ए - जिब्रील

मिट नहीं सकता कभी मर्द - ए - मुसलमाँ कि है

उस की अज़ानों से फ़ाश सिर्र - ए - कलीम - ओ - ख़लील

उस की ज़मीं बे - हुदूद उस का उफ़ुक़ बे - सग़ूर

उस के समुंदर की मौज दजला ओ दनयूब ओ नील

उस के ज़माने अजीब उस के फ़साने ग़रीब

अहद - ए - कुहन को दिया उस ने पयाम - ए - रहील

साक़ी - ए - रबाब - ए - ज़ौक़ फ़ारस - ए - मैदान - ए - शौक़

बादा है उस का रहीक़ तेग़ है उस की असील

मर्द - ए - सिपाही है वो उस की ज़िरह ला - इलाह

साया - ए - शमशीर में उस की पनह ला - इलाह

तुझ से हुआ आश्कार बंदा - ए - मोमिन का राज़

उस के दिनों की तपिश उस की शबों का गुदाज़

उस का मक़ाम - ए - बुलंद उस का ख़याल - ए - अज़ीम

उस का सुरूर उस का शौक़ उस का नियाज़ उस का नाज़

हाथ है अल्लाह का बंदा - ए - मोमिन का हाथ

ग़ालिब ओ कार - आफ़रीं कार - कुशा कारसाज़

ख़ाकी ओ नूरी - निहाद बंदा - ए - मौला - सिफ़ात

हर दो - जहाँ से ग़नी उस का दिल - ए - बे - नियाज़

उस की उमीदें क़लील उस के मक़ासिद जलील

उस की अदा दिल - फ़रेब उस की निगह दिल - नवाज़

आज भी इस देस में आम है चश्म - ए - ग़ज़ाल

और निगाहों के तीर आज भी हैं दिल - नशीं

बू - ए - यमन आज भी उस की हवाओं में है

रंग - ए - हिजाज़ आज भी उस की नवाओं में है

दीदा - ए - अंजुम में है तेरी ज़मीं आसमाँ

आह कि सदियों से है तेरी फ़ज़ा बे - अज़ाँ

कौन सी वादी में है कौन सी मंज़िल में है

इश्क़ - ए - बला - ख़ेज़ का क़ाफ़िला - ए - सख़्त - जाँ

देख चुका अल्मनी शोरिश - ए - इस्लाह - ए - दीं

जिस ने न छोड़े कहीं नक़्श - ए - कुहन के निशाँ

हर्फ़ - ए - ग़लत बन गई इस्मत - ए - पीर - ए - कुनिश्त

और हुई फ़िक्र की कश्ती - ए - नाज़ुक रवाँ

चश्म - ए - फ़िराँसिस भी देख चुकी इंक़लाब

जिस से दिगर - गूँ हुआ मग़रबियों का जहाँ

मिल्लत - ए - रूमी - निज़ाद कोहना - परस्ती से पीर

लज़्ज़त - ए - तज्दीदा से वो भी हुई फिर जवाँ

रूह - ए - मुसलमाँ में है आज वही इज़्तिराब

राज़ - ए - ख़ुदाई है ये कह नहीं सकती ज़बाँ

नर्म दम - ए - गुफ़्तुगू गर्म दम - ए - जुस्तुजू

रज़्म हो या बज़्म हो पाक - दिल ओ पाक - बाज़

नुक़्ता - ए - परकार - ए - हक़ मर्द - ए - ख़ुदा का यक़ीं

और ये आलम तमाम वहम ओ तिलिस्म ओ मजाज़

अक़्ल की मंज़िल है वो इश्क़ का हासिल है वो

हल्क़ा - ए - आफ़ाक़ में गर्मी - ए - महफ़िल है वो

काबा - ए - अरबाब - ए - फ़न सतवत - ए - दीन - ए - मुबीं

तुझ से हरम मर्तबत उंदुलुसियों की ज़मीं

है तह - ए - गर्दूं अगर हुस्न में तेरी नज़ीर

क़ल्ब - ए - मुसलमाँ में है और नहीं है कहीं

आह वो मरदान - ए - हक़ वो अरबी शहसवार

हामिल - ए - ख़ल्क़ - ए - अज़ीम साहब - ए - सिद्क - ओ - यक़ीं

जिन की हुकूमत से है फ़ाश ये रम्ज़ - ए - ग़रीब

सल्तनत - ए - अहल - ए - दिल फ़क़्र है शाही नहीं

जिन की निगाहों ने की तर्बियत - ए - शर्क़ - ओ - ग़र्ब

ज़ुल्मत - ए - यूरोप में थी जिन की ख़िरद - राह - बीं

जिन के लहू के तुफ़ैल आज भी हैं उंदुलुसी

ख़ुश - दिल ओ गर्म - इख़्तिलात सादा ओ रौशन - जबीं

देखिए इस बहर की तह से उछलता है क्या

गुम्बद - ए - नीलोफ़री रंग बदलता है क्या

वादी - ए - कोह - सार में ग़र्क़ - ए - शफ़क़ है सहाब

लाल - ए - बदख़्शाँ के ढेर छोड़ गया आफ़्ताब

सादा ओ पुर - सोज़ है दुख़्तर - ए - दहक़ाँ का गीत

कश्ती - ए - दिल के लिए सैल है अहद - ए - शबाब

आब - ए - रवान - ए - कबीर तेरे किनारे कोई

देख रहा है किसी और ज़माने का ख़्वाब

आलम - ए - नौ है अभी पर्दा - ए - तक़दीर में

मेरी निगाहों में है उस की सहर बे - हिजाब

पर्दा उठा दूँ अगर चेहरा - ए - अफ़्कार से

ला न सकेगा फ़रंग मेरी नवाओं की ताब

जिस में न हो इंक़लाब मौत है वो ज़िंदगी

रूह - ए - उमम की हयात कश्मकश - ए - इंक़िलाब

सूरत - ए - शमशीर है दस्त - ए - क़ज़ा में वो क़ौम

करती है जो हर ज़माँ अपने अमल का हिसाब

नक़्श हैं सब ना - तमाम ख़ून - ए - जिगर के बग़ैर

नग़्मा है सौदा - ए - ख़ाम ख़ून - ए - जिगर के बग़ैर


मार्च1907

ज़माना आया है बे - हिजाबी का आम दीदार - ए - यार होगा

सुकूत था पर्दा - दार जिस का वो राज़ अब आश्कार होगा

गुज़र गया अब वो दौर - ए - साक़ी कि छुप के पीते थे पीने वाले

बनेगा सारा जहान मय - ख़ाना हर कोई बादा - ख़्वार होगा

कभी जो आवारा - ए - जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसेंगे

बरहना - पाई वही रहेगी मगर नया ख़ारज़ार होगा

सुना दिया गोश - ए - मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िर

जो अहद सहराइयों से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगा

निकल के सहरा से जिस ने रूमा की सल्तनत को उलट दिया था

सुना है ये क़ुदसियों से मैं ने वो शेर फिर होशियार होगा

किया मिरा तज़्किरा जो साक़ी ने बादा - ख़्वारों की अंजुमन में

तो पीर - ए - मय - ख़ाना सुन के कहने लगा कि मुँह - फट है ख़्वार होगा

दयार - ए - मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है

खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र - ए - कम - अयार होगा

तुम्हारी तहज़ीब अपने ख़ंजर से आप ही ख़ुद - कुशी करेगी

जो शाख़ - ए - नाज़ुक पे आशियाना बनेगा ना - पाएदार होगा

सफ़ीना - ए - बर्ग - ए - गुल बना लेगा क़ाफ़िला मोर - ए - ना - तावाँ का

हज़ार मौजों की हो कशाकश मगर ये दरिया से पार होगा

चमन में लाला दिखाता फिरता है दाग़ अपना कली कली को

ये जानता है कि इस दिखावे से दिल - जलों में शुमार होगा

जो एक था ऐ निगाह तू ने हज़ार कर के हमें दिखाया

यही अगर कैफ़ियत है तेरी तो फिर किसे ए 'तिबार होगा

कहा जो क़ुमरी से मैं ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा - ब - गिल हैं

तू ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगा

ख़ुदा के आशिक़ तो हैं हज़ारों बनों में फिरते हैं मारे मारे

मैं उस का बंदा बनूँगा जिस को ख़ुदा के बंदों से प्यार होगा

ये रस्म - ए - बज़्म - ए - फ़ना है ऐ दिल गुनाह है जुम्बिश - ए - नज़र भी

रहेगी क्या आबरू हमारी जो तू यहाँ बे - क़रार होगा

मैं ज़ुल्मत - ए - शब में ले के निकलूँगा अपने दर - माँदा कारवाँ को

शरर - फ़िशाँ होगी आह मेरी नफ़स मिरा शोला - बार होगा

नहीं है ग़ैर - अज़ - नुमूद कुछ भी जो मुद्दआ तेरी ज़िंदगी का

तू इक नफ़स में जहाँ से मिटना तुझे मिसाल - ए - शरार होगा

न पूछ 'इक़बाल ' का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की

कहीं सर - ए - राहगुज़ार बैठा सितम - कश - ए - इंतिज़ार होगा

मिर्ज़ा ' ग़ालिब '

फ़िक्र - ए - इंसाँ पर तिरी हस्ती से ये रौशन हुआ

है पर - ए - मुर्ग़ - ए - तख़य्युल की रसाई ता - कुजा

था सरापा रूह तू बज़्म - ए - सुख़न पैकर तिरा

ज़ेब - ए - महफ़िल भी रहा महफ़िल से पिन्हाँ भी रहा

दीद तेरी आँख को उस हुस्न की मंज़ूर है

बन के सोज़ - ए - ज़िंदगी हर शय में जो मस्तूर है

महफ़िल - ए - हस्ती तिरी बरबत से है सरमाया - दार

जिस तरह नद्दी के नग़्मों से सुकूत - ए - कोहसार

तेरे फ़िरदौस - ए - तख़य्युल से है क़ुदरत की बहार

तेरी किश्त - ए - फ़िक्र से उगते हैं आलम सब्ज़ा - वार

ज़िंदगी मुज़्मर है तेरी शोख़ी - ए - तहरीर में

ताब - ए - गोयाई से जुम्बिश है लब - ए - तस्वीर में

नुत्क़ को सौ नाज़ हैं तेरे लब - ए - एजाज़ पर

महव - ए - हैरत है सुरय्या रिफ़अत - ए - परवाज़ पर

शाहिद - ए - मज़्मूँ तसद्दुक़ है तिरे अंदाज़ पर

ख़ंदा - ज़न है ग़ुंचा - ए - दिल्ली गुल - ए - शीराज़ पर

आह तू उजड़ी हुई दिल्ली में आरामीदा है

गुलशन - ए - वीमर में तेरा हम - नवा ख़्वाबीदा है

लुत्फ़ - ए - गोयाई में तेरी हम - सरी मुमकिन नहीं

हो तख़य्युल का न जब तक फ़िक्र - ए - कामिल हम - नशीं

हाए अब क्या हो गई हिन्दोस्ताँ की सर - ज़मीं

आह ऐ नज़्ज़ारा - आमोज़ - ए - निगाह - ए - नुक्ता - बीं

गेसू - ए - उर्दू अभी मिन्नत - पज़ीर - ए - शाना है

शम्अ ये सौदाई - ए - दिल - सोज़ी - ए - परवाना है

ऐ जहानाबाद ऐ गहवारा - ए - इल्म - ओ - हुनर

हैं सरापा नाला - ए - ख़ामोश तेरे बाम दर

ज़र्रे ज़र्रे में तिरे ख़्वाबीदा हैं शम्स ओ क़मर

यूँ तो पोशीदा हैं तेरी ख़ाक में लाखों गुहर

दफ़्न तुझ में कोई फ़ख़्र - ए - रोज़गार ऐसा भी है

तुझ में पिन्हाँ कोई मोती आबदार ऐसा भी है

मोहब्बत

उरूस - ए - शब की ज़ुल्फ़ें थीं अभी ना - आश्ना ख़म से

सितारे आसमाँ के बे - ख़बर थे लज़्ज़त - ए - रम से

क़मर अपने लिबास - ए - नौ में बेगाना सा लगता था

न था वाक़िफ़ अभी गर्दिश के आईन - ए - मुसल्लम से

अभी इम्काँ के ज़ुल्मत - ख़ाने से उभरी ही थी दुनिया

मज़ाक़ - ए - ज़िंदगी पोशीदा था पहना - ए - आलम से

कमाल - ए - नज़्म - ए - हस्ती की अभी थी इब्तिदा गोया

हुवैदा थी नगीने की तमन्ना चश्म - ए - ख़ातम से

सुना है आलम - ए - बाला में कोई कीमिया - गर था

सफ़ा थी जिस की ख़ाक - ए - पा में बढ़ कर साग़र - ए - जम से

लिखा था अर्श के पाए पे इक इक्सीर का नुस्ख़ा

छुपाते थे फ़रिश्ते जिस को चश्म - ए - रूह - ए - आदम से

निगाहें ताक में रहती थीं लेकिन कीमिया - गर की

वो इस नुस्ख़े को बढ़ कर जानता था इस्म - ए - आज़म से

बढ़ा तस्बीह - ख़्वानी के बहाने अर्श की जानिब

तमन्ना - ए - दिली आख़िर बर आई सई - ए - पैहम से

फिराया फ़िक्र - ए - अज्ज़ा ने उसे मैदान - ए - इम्काँ में

छुपेगी क्या कोई शय बारगाह - ए - हक़ के महरम से

चमक तारे से माँगी चाँद से दाग़ - ए - जिगर माँगा

उड़ाई तीरगी थोड़ी सी शब की ज़ुल्फ़ - ए - बरहम से

तड़प बिजली से पाई हूर से पाकीज़गी पाई

हरारत ली नफ़स - हा - ए - मसीह - ए - इब्न - ए - मरयम से

ज़रा सी फिर रुबूबियत से शान - ए - बे - नियाज़ी ली

मलक से आजिज़ी उफ़्तादगी तक़दीर शबनम से

फिर इन अज्ज़ा को घोला चश्मा - ए - हैवाँ के पानी में

मुरक्कब ने मोहब्बत नाम पाया अर्श - ए - आज़म से

मुहव्विस ने ये पानी हस्ती - ए - नौ - ख़ेज़ पर छिड़का

गिरह खोली हुनर ने उस के गोया कार - ए - आलम से

हुई जुम्बिश अयाँ ज़र्रों ने लुत्फ़ - ए - ख़्वाब को छोड़ा

गले मिलने लगे उठ उठ के अपने अपने हमदम से

ख़िराम - ए - नाज़ पाया आफ़्ताबों ने सितारों ने

चटक ग़ुंचों ने पाई दाग़ पाए लाला - ज़ारों ने

राम

लबरेज़ है शराब - ए - हक़ीक़त से जाम - ए - हिंद

सब फ़लसफ़ी हैं ख़ित्ता - ए - मग़रिब के राम - ए - हिंद

ये हिन्दियों की फ़िक्र - ए - फ़लक - रस का है असर

रिफ़अत में आसमाँ से भी ऊँचा है बाम - ए - हिंद

इस देस में हुए हैं हज़ारों मलक - सरिश्त

मशहूर जिन के दम से है दुनिया में नाम - ए - हिंद

है राम के वजूद पे हिन्दोस्ताँ को नाज़

अहल - ए - नज़र समझते हैं इस को इमाम - ए - हिंद

एजाज़ इस चराग़ - ए - हिदायत का है यही

रौशन - तर - अज़ - सहर है ज़माने में शाम - ए - हिंद

तलवार का धनी था शुजाअ 'त में फ़र्द था

पाकीज़गी में जोश - ए - मोहब्बत में फ़र्द था

रूह- ए- अर्ज़ी आदम का इस्तिक़बाल करती है

खोल आँख ज़मीं देख फ़लक देख फ़ज़ा देख !

मशरिक़ से उभरते हुए सूरज को ज़रा देख !

इस जल्वा - ए - बे - पर्दा को पर्दा में छुपा देख !

अय्याम - ए - जुदाई के सितम देख जफ़ा देख !

बेताब न हो मार्का - ए - बीम - ओ - रजा देख !

हैं तेरे तसर्रुफ़ में ये बादल ये घटाएँ

ये गुम्बद - ए - अफ़्लाक ये ख़ामोश फ़ज़ाएँ

ये कोह ये सहरा ये समुंदर ये हवाएँ

थीं पेश - ए - नज़र कल तो फ़रिश्तों की अदाएँ

आईना - ए - अय्याम में आज अपनी अदा देख !

समझेगा ज़माना तिरी आँखों के इशारे !

देखेंगे तुझे दूर से गर्दूं के सितारे !

नापैद तिरे बहर - ए - तख़य्युल के किनारे

पहुँचेंगे फ़लक तक तिरी आहों के शरारे

तामीर - ए - ख़ुदी कर असर - ए - आह - ए - रसा देख

ख़ुर्शीद - ए - जहाँ - ताब की ज़ौ तेरे शरर में

आबाद है इक ताज़ा जहाँ तेरे हुनर में

जचते नहीं बख़्शे हुए फ़िरदौस नज़र में

जन्नत तिरी पिन्हाँ है तिरे ख़ून - ए - जिगर में

ऐ पैकर - ए - गुल कोशिश - ए - पैहम की जज़ा देख !

नालंदा तिरे ऊद का हर तार अज़ल से

तू जिंस - ए - मोहब्बत का ख़रीदार अज़ल से

तू पीर - ए - सनम - ख़ाना - ए - असरार अज़ल से

मेहनत - कश ओ ख़ूँ - रेज़ ओ कम - आज़ार अज़ल से

है राकिब - ए - तक़दीर - ए - जहाँ तेरी रज़ा देख !

ला- इलाहा- इल्लल्लाह

ख़ुदी का सिर्र - ए - निहाँ ला - इलाहा - इल्लल्लाह

ख़ुदी है तेग़ फ़साँ ला - इलाहा - इल्लल्लाह

ये दौर अपने बराहीम की तलाश में है

सनम - कदा है जहाँ ला - इलाहा - इल्लल्लाह

किया है तू ने मता - ए - ग़ुरूर का सौदा

फ़रेब - ए - सूद - ओ - ज़ियाँ ला - इलाहा - इल्लल्लाह

ये माल - ओ - दौलत - ए - दुनिया ये रिश्ता ओ पैवंद

बुतान - ए - वहम - ओ - गुमाँ ला - इलाहा - इल्लल्लाह

ख़िरद हुई है ज़मान ओ मकाँ की ज़ुन्नारी

न है ज़माँ न मकाँ ला - इलाहा - इल्लल्लाह

ये नग़्मा फ़स्ल - ए - गुल - ओ - लाला का नहीं पाबंद

बहार हो कि ख़िज़ाँ ला - इलाहा - इल्लल्लाह

अगरचे बुत हैं जमाअत की आस्तीनों में

मुझे है हुक्म - ए - अज़ाँ ला - इलाहा - इल्लल्लाह

लेनिन

ख़ुदा के हुज़ूर में

ऐ अन्फ़ुस ओ आफ़ाक़ में पैदा तिरी आयात

हक़ ये है कि है ज़िंदा ओ पाइंदा तिरी ज़ात

मैं कैसे समझता कि तू है या कि नहीं है

हर दम मुतग़य्यर थे ख़िरद के नज़रियात

महरम नहीं फ़ितरत के सुरूद - ए - अज़ली से

बीना - ए - कवाकिब हो कि दाना - ए - नबातात

आज आँख ने देखा तो वो आलम हुआ साबित

मैं जिस को समझता था कलीसा के ख़ुराफ़ात

हम बंद - ए - शब - ओ - रोज़ में जकड़े हुए बंदे

तू ख़ालिक़ - ए - आसार - ओ - निगारंदा - ए - आनात

इक बात अगर मुझ को इजाज़त हो तो पूछूँ

हल कर न सके जिस को हकीमों के मक़ालात

जब तक मैं जिया ख़ेमा - ए - अफ़्लाक के नीचे

काँटे की तरह दिल में खटकती रही ये बात

गुफ़्तार के उस्लूब पे क़ाबू नहीं रहता

जब रूह के अंदर मुतलातुम हों ख़यालात

वो कौन सा आदम है कि तू जिस का है माबूद

वो आदम - ए - ख़ाकी कि जो है ज़ेर - ए - समावात

मशरिक़ के ख़ुदावंद सफ़ेदान - ए - फ़िरंगी

मग़रिब के ख़ुदावंद दरख़शिंदा फ़िलिज़्ज़ात

यूरोप में बहुत रौशनी - ए - इल्म - ओ - हुनर है

हक़ ये है कि बे - चश्मा - ए - हैवाँ है ये ज़ुल्मात

रानाई - ए - तामीर में रौनक़ में सफ़ा में

गिरजों से कहीं बढ़ के हैं बैंकों की इमारात

ज़ाहिर में तिजारत है हक़ीक़त में जुआ है

सूद एक का लाखों के लिए मर्ग - ए - मुफ़ाजात

ये इल्म ये हिकमत ये तदब्बुर ये हुकूमत

पीते हैं लहू देते हैं तालीम - ए - मुसावात

बेकारी ओ उर्यानी ओ मय - ख़्वारी ओ अफ़्लास

क्या कम हैं फ़रंगी मदनियत की फ़ुतूहात

वो क़ौम कि फ़ैज़ान - ए - समावी से हो महरूम

हद उस के कमालात की है बर्क़ ओ बुख़ारात

है दिल के लिए मौत मशीनों की हुकूमत

एहसास - ए - मुरव्वत को कुचल देते हैं आलात

आसार तो कुछ कुछ नज़र आते हैं कि आख़िर

तदबीर को तक़दीर के शातिर ने किया मात

मय - ख़ाना ने की बुनियाद में आया है तज़लज़ुल

बैठे हैं इसी फ़िक्र में पीरान - ए - ख़राबात

चेहरों पे जो सुर्ख़ी नज़र आती है सर - ए - शाम

या ग़ाज़ा है या साग़र ओ मीना की करामात

तू क़ादिर ओ आदिल है मगर तेरे जहाँ में

हैं तल्ख़ बहुत बंदा - ए - मज़दूर के औक़ात

कब डूबेगा सरमाया - परस्ती का सफ़ीना

दुनिया है तिरी मुंतज़िर - ए - रोज़ - ए - मुकाफ़ात

वालिदा मरहूमा की याद में

ज़र्रा ज़र्रा दहर का ज़िंदानी - ए - तक़दीर है

पर्दा - ए - मजबूरी ओ बेचारगी तदबीर है

आसमाँ मजबूर है शम्स ओ क़मर मजबूर हैं

अंजुम - ए - सीमाब - पा रफ़्तार पर मजबूर हैं

है शिकस्त अंजाम ग़ुंचे का सुबू गुलज़ार में

सब्ज़ा ओ गुल भी हैं मजबूर - ए - नमू गुलज़ार में

नग़्मा - ए - बुलबुल हो या आवाज़ - ए - ख़ामोश - ए - ज़मीर

है इसी ज़ंजीर - ए - आलम - गीर में हर शय असीर

आँख पर होता है जब ये सिर्र - ए - मजबूरी अयाँ

ख़ुश्क हो जाता है दिल में अश्क का सैल - ए - रवाँ

क़ल्ब - ए - इंसानी में रक़्स - ए - ऐश - ओ - ग़म रहता नहीं

नग़्मा रह जाता है लुत्फ़ - ए - ज़ेर - ओ - बम रहता नहीं

इल्म ओ हिकमत रहज़न - ए - सामान - ए - अश्क - ओ - आह है

यानी इक अल्मास का टुकड़ा दिल - ए - आगाह है

गरचे मेरे बाग़ में शबनम की शादाबी नहीं

आँख मेरी माया - दार - ए - अश्क - ए - उननाबी नहीं

जानता हूँ आह में आलाम - ए - इंसानी का राज़

है नवा - ए - शिकवा से ख़ाली मिरी फ़ितरत का साज़

मेरे लब पर क़िस्सा - ए - नैरंगी - ए - दौराँ नहीं

दिल मिरा हैराँ नहीं ख़ंदा नहीं गिर्यां नहीं

पर तिरी तस्वीर क़ासिद गिर्या - ए - पैहम की है

आह ये तरदीद मेरी हिकमत - ए - मोहकम की है

गिर्या - ए - सरशार से बुनियाद - ए - जाँ पाइंदा है

दर्द के इरफ़ाँ से अक़्ल - ए - संग - दिल शर्मिंदा है

मौज - ए - दूद - ए - आह से आईना है रौशन मिरा

गंज - ए - आब - आवर्द से मामूर है दामन मिरा

हैरती हूँ मैं तिरी तस्वीर के एजाज़ का

रुख़ बदल डाला है जिस ने वक़्त की परवाज़ का

रफ़्ता ओ हाज़िर को गोया पा - ब - पा इस ने किया

अहद - ए - तिफ़्ली से मुझे फिर आश्ना इस ने किया

जब तिरे दामन में पलती थी वो जान - ए - ना - तवाँ

बात से अच्छी तरह महरम न थी जिस की ज़बाँ

और अब चर्चे हैं जिस की शोख़ी - ए - गुफ़्तार के

बे - बहा मोती हैं जिस की चश्म - ए - गौहर - बार के

इल्म की संजीदा - गुफ़्तारी बुढ़ापे का शुऊर

दुनयवी एज़ाज़ की शौकत जवानी का ग़ुरूर

ज़िंदगी की ओज - गाहों से उतर आते हैं हम

सोहबत - ए - मादर में तिफ़्ल - ए - सादा रह जाते हैं हम

बे - तकल्लुफ़ ख़ंदा - ज़न हैं फ़िक्र से आज़ाद हैं

फिर उसी खोए हुए फ़िरदौस में आबाद हैं

किस को अब होगा वतन में आह मेरा इंतिज़ार

कौन मेरा ख़त न आने से रहेगा बे - क़रार

ख़ाक - ए - मरक़द पर तिरी ले कर ये फ़रियाद आऊँगा

अब दुआ - ए - नीम - शब में किस को मैं याद आऊँगा

तर्बियत से तेरी में अंजुम का हम - क़िस्मत हुआ

घर मिरे अज्दाद का सरमाया - ए - इज़्ज़त हुआ

दफ़्तर - ए - हस्ती में थी ज़र्रीं वरक़ तेरी हयात

थी सरापा दीन ओ दुनिया का सबक़ तेरी हयात

उम्र भर तेरी मोहब्बत मेरी ख़िदमत - गर रही

मैं तिरी ख़िदमत के क़ाबिल जब हुआ तू चल बसी

वो जवाँ - क़ामत में है जो सूरत - ए - सर्व - ए - बुलंद

तेरी ख़िदमत से हुआ जो मुझ से बढ़ कर बहरा - मंद

कारोबार - ए - ज़िंदगानी में वो हम - पहलू मिरा

वो मोहब्बत में तिरी तस्वीर वो बाज़ू मिरा

तुझ को मिस्ल - ए - तिफ़्लक - ए - बे - दस्त - ओ - पा रोता है वो

सब्र से ना - आश्ना सुब्ह ओ मसा रोता है वो

तुख़्म जिस का तू हमारी किश्त - ए - जाँ में बो गई

शिरकत - ए - ग़म से वो उल्फ़त और मोहकम हो गई

आह ये दुनिया ये मातम - ख़ाना - ए - बरना - ओ - पीर

आदमी है किस तिलिस्म - ए - दोश - ओ - फ़र्दा में असीर

कितनी मुश्किल ज़िंदगी है किस क़दर आसाँ है मौत

गुलशन - ए - हस्ती में मानिंद - ए - नसीम अर्ज़ां है मौत

ज़लज़ले हैं बिजलियाँ हैं क़हत हैं आलाम हैं

कैसी कैसी दुख़्तरान - ए - मादर - ए - अय्याम हैं

कल्ब - ए - इफ़्लास में दौलत के काशाने में मौत

दश्त ओ दर में शहर में गुलशन में वीराने में मौत

मौत है हंगामा - आरा क़ुलज़ुम - ए - ख़ामोश में

डूब जाते हैं सफ़ीने मौज की आग़ोश में

ने मजाल - ए - शिकवा है ने ताक़त - ए - गुफ़्तार है

ज़िंदगानी क्या है इक तोक़ - ए - गुलू - अफ़्शार है

क़ाफ़िले में ग़ैर फ़रियाद - ए - दिरा कुछ भी नहीं

इक मता - ए - दीदा - ए - तर के सिवा कुछ भी नहीं

ख़त्म हो जाएगा लेकिन इम्तिहाँ का दौर भी

हैं पस - ए - नौह पर्दा - ए - गर्दूं अभी दौर और भी

सीना चाक इस गुलसिताँ में लाला - ओ - गुल हैं तो क्या

नाला ओ फ़रियाद पर मजबूर बुलबुल हैं तो क्या

झाड़ियाँ जिन के क़फ़स में क़ैद है आह - ए - ख़िज़ाँ

सब्ज़ कर देगी उन्हें बाद - ए - बहार - ए - जावेदाँ

ख़ुफ़्ता - ख़ाक - ए - पय सिपर में है शरार अपना तो क्या

आरज़ी महमिल है ये मुश्त - ए - ग़ुबार अपना तो क्या

ज़िंदगी की आग का अंजाम ख़ाकिस्तर नहीं

टूटना जिस का मुक़द्दर हो ये वो गौहर नहीं

ज़िंदगी महबूब ऐसी दीदा - ए - क़ुदरत में है

ज़ौक़ - ए - हिफ़्ज़ - ए - ज़िंदगी हर चीज़ की फ़ितरत में है

मौत के हाथों से मिट सकता अगर नक़्श - ए - हयात

आम यूँ उस को न कर देता निज़ाम - ए - काएनात

है अगर अर्ज़ां तो ये समझो अजल कुछ भी नहीं

जिस तरह सोने से जीने में ख़लल कुछ भी नहीं

आह ग़ाफ़िल मौत का राज़ - ए - निहाँ कुछ और है

नक़्श की ना - पाएदारी से अयाँ कुछ और है

जन्नत - ए - नज़ारा है नक़्श - ए - हवा बाला - ए - आब

मौज - ए - मुज़्तर तोड़ कर तामीर करती है हबाब

मौज के दामन में फिर उस को छुपा देती है ये

कितनी बेदर्दी से नक़्श अपना मिटा देती है ये

फिर न कर सकती हबाब अपना अगर पैदा हवा

तोड़ने में उस के यूँ होती न बे - परवा हवा

इस रविश का क्या असर है हैयत - ए - तामीर पर

ये तो हुज्जत है हवा की क़ुव्वत - ए - तामीर पर

फ़ितरत - ए - हस्ती शहीद - ए - आरज़ू रहती न हो

ख़ूब - तर पैकर की उस को जुस्तुजू रहती न हो

आह सीमाब - ए - परेशाँ अंजुम - ए - गर्दूं - फ़रोज़

शोख़ ये चिंगारियाँ ममनून - ए - शब है जिन का सोज़

अक़्ल जिस से सर - ब - ज़ानू है वो मुद्दत इन की है

सरगुज़िश्त - ए - नौ - ए - इंसाँ एक साअत उन की है

फिर ये इंसाँ आँ सू - ए - अफ़्लाक है जिस की नज़र

क़ुदसियों से भी मक़ासिद में है जो पाकीज़ा - तर

जो मिसाल - ए - शम्अ रौशन महफ़िल - ए - क़ुदरत में है

आसमाँ इक नुक़्ता जिस की वुसअत - ए - फ़ितरत में है

जिस की नादानी सदाक़त के लिए बेताब है

जिस का नाख़ुन साज़ - ए - हस्ती के लिए मिज़राब है

शोला ये कम - तर है गर्दूं के शरारों से भी क्या

कम - बहा है आफ़्ताब अपना सितारों से भी क्या

तुख़्म - ए - गुल की आँख ज़ेर - ए - ख़ाक भी बे - ख़्वाब है

किस क़दर नश्व - ओ - नुमा के वास्ते बेताब है

ज़िंदगी का शोला इस दाने में जो मस्तूर है

ख़ुद - नुमाई ख़ुद - फ़ज़ाई के लिए मजबूर है

सर्दी - ए - मरक़द से भी अफ़्सुर्दा हो सकता नहीं

ख़ाक में दब कर भी अपना सोज़ खो सकता नहीं

फूल बन कर अपनी तुर्बत से निकल आता है ये

मौत से गोया क़बा - ए - ज़िंदगी पाता है ये

है लहद इस क़ुव्वत - ए - आशुफ़्ता की शीराज़ा - बंद

डालती है गर्दन - ए - गर्दूं में जो अपनी कमंद

मौत तज्दीद - ए - मज़ाक़ - ए - ज़िंदगी का नाम है

ख़्वाब के पर्दे में बेदारी का इक पैग़ाम है

ख़ूगर - ए - परवाज़ को परवाज़ में डर कुछ नहीं

मौत इस गुलशन में जुज़ संजीदन - ए - पर कुछ नहीं

कहते हैं अहल - ए - जहाँ दर्द - ए - अजल है ला - दवा

ज़ख़्म - ए - फ़ुर्क़त वक़्त के मरहम से पाता है शिफ़ा

दिल मगर ग़म मरने वालों का जहाँ आबाद है

हल्क़ा - ए - ज़ंजीर - ए - सुब्ह - ओ - शाम से आज़ाद है

वक़्त के अफ़्सूँ से थमता नाला - ए - मातम नहीं

वक़्त ज़ख़्म - ए - तेग़ - ए - फ़ुर्क़त का कोई मरहम नहीं

सर पे आ जाती है जब कोई मुसीबत ना - गहाँ

अश्क पैहम दीदा - ए - इंसाँ से होते हैं रवाँ

रब्त हो जाता है दिल को नाला ओ फ़रियाद से

ख़ून - ए - दिल बहता है आँखों की सरिश्क - आबाद से

आदमी ताब - ए - शकेबाई से गो महरूम है

उस की फ़ितरत में ये इक एहसास - ए - ना - मालूम है

जौहर - ए - इंसाँ अदम से आश्ना होता नहीं

आँख से ग़ाएब तो होता है फ़ना होता नहीं

रख़्त - ए - हस्ती ख़ाक - ए - ग़म की शोला - अफ़्शानी से है

सर्द ये आग इस लतीफ़ एहसास के पानी से है

आह ये ज़ब्त - ए - फ़ुग़ाँ ग़फ़लत की ख़ामोशी नहीं

आगही है ये दिलासाई फ़रामोशी नहीं

पर्दा - ए - मशरिक़ से जिस दम जल्वा - गर होती है सुब्ह

दाग़ शब का दामन - ए - आफ़ाक़ से धोती है सुब्ह

लाला - ए - अफ़्सुर्दा को आतिश - क़बा करती है ये

बे - ज़बाँ ताइर को सरमस्त - ए - नवा करती है ये

सीना - ए - बुलबुल के ज़िंदाँ से सरोद आज़ाद है

सैकड़ों नग़्मों से बाद - ए - सुब्ह - दम - आबाद है

ख़ुफ़्तगान - ए - लाला - ज़ार ओ कोहसार ओ रूद बार

होते हैं आख़िर उरूस - ए - ज़िंदगी से हम - कनार

ये अगर आईन - ए - हस्ती है कि हो हर शाम सुब्ह

मरक़द - ए - इंसाँ की शब का क्यूँ न हो अंजाम सुब्ह

दाम - ए - सिमीन - ए - तख़य्युल है मिरा आफ़ाक़ - गीर

कर लिया है जिस से तेरी याद को मैं ने असीर

याद से तेरी दिल - ए - दर्द आश्ना मामूर है

जैसे काबे में दुआओं से फ़ज़ा मामूर है

वो फ़राएज़ का तसलसुल नाम है जिस का हयात

जल्वा - गाहें उस की हैं लाखों जहान - ए - बे - सबात

मुख़्तलिफ़ हर मंज़िल - ए - हस्ती को रस्म - ओ - राह है

आख़िरत भी ज़िंदगी की एक जौलाँ - गाह है

है वहाँ बे - हासिली किश्त - ए - अजल के वास्ते

साज़गार आब - ओ - हवा तुख़्म - ए - अमल के वास्ते

नूर - ए - फ़ितरत ज़ुल्मत - ए - पैकर का ज़िंदानी नहीं

तंग ऐसा हल्क़ा - ए - अफ़कार - ए - इंसानी नहीं

ज़िंदगानी थी तिरी महताब से ताबिंदा - तर

ख़ूब - तर था सुब्ह के तारे से भी तेरा सफ़र

मिस्ल - ए - ऐवान - ए - सहर मरक़द फ़रोज़ाँ हो तिरा

नूर से मामूर ये ख़ाकी शबिस्ताँ हो तिरा

आसमाँ तेरी लहद पर शबनम - अफ़्शानी करे

सब्ज़ा - ए - नौ - रस्ता इस घर की निगहबानी करे


शिकवा

क्यूँ ज़याँ - कार बनूँ सूद - फ़रामोश रहूँ

फ़िक्र - ए - फ़र्दा न करूँ महव - ए - ग़म - ए - दोश रहूँ

नाले बुलबुल के सुनूँ और हमा - तन गोश रहूँ

हम - नवा मैं भी कोई गुल हूँ कि ख़ामोश रहूँ

जुरअत - आमोज़ मिरी ताब - ए - सुख़न है मुझ को

शिकवा अल्लाह से ख़ाकम - ब - दहन है मुझ को

है बजा शेवा - ए - तस्लीम में मशहूर हैं हम

क़िस्सा - ए - दर्द सुनाते हैं कि मजबूर हैं हम

साज़ ख़ामोश हैं फ़रियाद से मामूर हैं हम

नाला आता है अगर लब पे तो माज़ूर हैं हम

ऐ ख़ुदा शिकवा - ए - अर्बाब - ए - वफ़ा भी सुन ले

ख़ूगर - ए - हम्द से थोड़ा सा गिला भी सुन ले

थी तो मौजूद अज़ल से ही तिरी ज़ात - ए - क़दीम

फूल था ज़ेब - ए - चमन पर न परेशाँ थी शमीम

शर्त इंसाफ़ है ऐ साहिब - ए - अल्ताफ़ - ए - अमीम

बू - ए - गुल फैलती किस तरह जो होती न नसीम

हम को जमईयत - ए - ख़ातिर ये परेशानी थी

वर्ना उम्मत तिरे महबूब की दीवानी थी

हम से पहले था अजब तेरे जहाँ का मंज़र

कहीं मस्जूद थे पत्थर कहीं माबूद शजर

ख़ूगर - ए - पैकर - ए - महसूस थी इंसाँ की नज़र

मानता फिर कोई अन - देखे ख़ुदा को क्यूँकर

तुझ को मालूम है लेता था कोई नाम तिरा

क़ुव्वत - ए - बाज़ू - ए - मुस्लिम ने किया काम तिरा

बस रहे थे यहीं सल्जूक़ भी तूरानी भी

अहल - ए - चीं चीन में ईरान में सासानी भी

इसी मामूरे में आबाद थे यूनानी भी

इसी दुनिया में यहूदी भी थे नसरानी भी

पर तिरे नाम पे तलवार उठाई किस ने

बात जो बिगड़ी हुई थी वो बनाई किस ने

थे हमीं एक तिरे मारका - आराओं में

ख़ुश्कियों में कभी लड़ते कभी दरियाओं में

दीं अज़ानें कभी यूरोप के कलीसाओं में

कभी अफ़्रीक़ा के तपते हुए सहराओं में

शान आँखों में न जचती थी जहाँ - दारों की

कलमा पढ़ते थे हमीं छाँव में तलवारों की

हम जो जीते थे तो जंगों की मुसीबत के लिए

और मरते थे तिरे नाम की अज़्मत के लिए

थी न कुछ तेग़ज़नी अपनी हुकूमत के लिए

सर - ब - कफ़ फिरते थे क्या दहर में दौलत के लिए

क़ौम अपनी जो ज़र - ओ - माल - ए - जहाँ पर मरती

बुत - फ़रोशीं के एवज़ बुत - शिकनी क्यूँ करती

टल न सकते थे अगर जंग में अड़ जाते थे

पाँव शेरों के भी मैदाँ से उखड़ जाते थे

तुझ से सरकश हुआ कोई तो बिगड़ जाते थे

तेग़ क्या चीज़ है हम तोप से लड़ जाते थे

नक़्श - ए - तौहीद का हर दिल पे बिठाया हम ने

ज़ेर - ए - ख़ंजर भी ये पैग़ाम सुनाया हम ने

तू ही कह दे कि उखाड़ा दर - ए - ख़ैबर किस ने

शहर क़ैसर का जो था उस को किया सर किस ने

तोड़े मख़्लूक़ ख़ुदावंदों के पैकर किस ने

काट कर रख दिए कुफ़्फ़ार के लश्कर किस ने

किस ने ठंडा किया आतिश - कदा - ए - ईराँ को

किस ने फिर ज़िंदा किया तज़्किरा - ए - यज़्दाँ को

कौन सी क़ौम फ़क़त तेरी तलबगार हुई

और तेरे लिए ज़हमत - कश - ए - पैकार हुई

किस की शमशीर जहाँगीर जहाँ - दार हुई

किस की तकबीर से दुनिया तिरी बेदार हुई

किस की हैबत से सनम सहमे हुए रहते थे

मुँह के बल गिर के हू - अल्लाहू - अहद कहते थे

आ गया ऐन लड़ाई में अगर वक़्त - ए - नमाज़

क़िबला - रू हो के ज़मीं - बोस हुई क़ौम - ए - हिजाज़

एक ही सफ़ में खड़े हो गए महमूद ओ अयाज़

न कोई बंदा रहा और न कोई बंदा - नवाज़

बंदा ओ साहब ओ मोहताज ओ ग़नी एक हुए

तेरी सरकार में पहुँचे तो सभी एक हुए

महफ़िल - ए - कौन - ओ - मकाँ में सहर ओ शाम फिरे

मय - ए - तौहीद को ले कर सिफ़त - ए - जाम फिरे

कोह में दश्त में ले कर तिरा पैग़ाम फिरे

और मालूम है तुझ को कभी नाकाम फिरे

दश्त तो दश्त हैं दरिया भी न छोड़े हम ने

बहर - ए - ज़ुल्मात में दौड़ा दिए घोड़े हम ने

सफ़्हा - ए - दहर से बातिल को मिटाया हम ने

नौ - ए - इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया हम ने

तेरे काबे को जबीनों से बसाया हम ने

तेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया हम ने

फिर भी हम से ये गिला है कि वफ़ादार नहीं

हम वफ़ादार नहीं तू भी तो दिलदार नहीं

उम्मतें और भी हैं उन में गुनहगार भी हैं

इज्ज़ वाले भी हैं मस्त - ए - मय - ए - पिंदार भी हैं

उन में काहिल भी हैं ग़ाफ़िल भी हैं हुश्यार भी हैं

सैकड़ों हैं कि तिरे नाम से बे - ज़ार भी हैं

रहमतें हैं तिरी अग़्यार के काशानों पर

बर्क़ गिरती है तो बेचारे मुसलामानों पर

बुत सनम - ख़ानों में कहते हैं मुसलमान गए

है ख़ुशी उन को कि काबे के निगहबान गए

मंज़िल - ए - दहर से ऊँटों के हुदी - ख़्वान गए

अपनी बग़लों में दबाए हुए क़ुरआन गए

ख़ंदा - ज़न कुफ़्र है एहसास तुझे है कि नहीं

अपनी तौहीद का कुछ पास तुझे है कि नहीं

ये शिकायत नहीं हैं उन के ख़ज़ाने मामूर

नहीं महफ़िल में जिन्हें बात भी करने का शुऊर

क़हर तो ये है कि काफ़िर को मिलें हूर ओ क़ुसूर

और बेचारे मुसलमाँ को फ़क़त वादा - ए - हूर

अब वो अल्ताफ़ नहीं हम पे इनायात नहीं

बात ये क्या है कि पहली सी मुदारात नहीं

क्यूँ मुसलामानों में है दौलत - ए - दुनिया नायाब

तेरी क़ुदरत तो है वो जिस की न हद है न हिसाब

तू जो चाहे तो उठे सीना - ए - सहरा से हबाब

रह - रव - ए - दश्त हो सैली - ज़दा - ए - मौज - ए - सराब

तान - ए - अग़्यार है रुस्वाई है नादारी है

क्या तिरे नाम पे मरने का एवज़ ख़्वारी है

बनी अग़्यार की अब चाहने वाली दुनिया

रह गई अपने लिए एक ख़याली दुनिया

हम तो रुख़्सत हुए औरों ने सँभाली दुनिया

फिर न कहना हुई तौहीद से ख़ाली दुनिया

हम तो जीते हैं कि दुनिया में तिरा नाम रहे

कहीं मुमकिन है कि साक़ी न रहे जाम रहे

तेरी महफ़िल भी गई चाहने वाले भी गए

शब की आहें भी गईं सुब्ह के नाले भी गए

दिल तुझे दे भी गए अपना सिला ले भी गए

आ के बैठे भी न थे और निकाले भी गए

आए उश्शाक़ गए वादा - ए - फ़र्दा ले कर

अब उन्हें ढूँड चराग़ - ए - रुख़ - ए - ज़ेबा ले कर

दर्द - ए - लैला भी वही क़ैस का पहलू भी वही

नज्द के दश्त ओ जबल में रम - ए - आहू भी वही

इश्क़ का दिल भी वही हुस्न का जादू भी वही

उम्मत - ए - अहमद - ए - मुर्सिल भी वही तू भी वही

फिर ये आज़ुर्दगी - ए - ग़ैर सबब क्या मअ 'नी

अपने शैदाओं पे ये चश्म - ए - ग़ज़ब क्या मअ 'नी

तुझ को छोड़ा कि रसूल - ए - अरबी को छोड़ा

बुत - गरी पेशा किया बुत - शिकनी को छोड़ा

इश्क़ को इश्क़ की आशुफ़्ता - सरी को छोड़ा

रस्म - ए - सलमान ओ उवैस - ए - क़रनी को छोड़ा

आग तकबीर की सीनों में दबी रखते हैं

ज़िंदगी मिस्ल - ए - बिलाल - ए - हबशी रखते हैं

इश्क़ की ख़ैर वो पहली सी अदा भी न सही

जादा - पैमाई - ए - तस्लीम - ओ - रज़ा भी न सही

मुज़्तरिब दिल सिफ़त - ए - क़िबला - नुमा भी न सही

और पाबंदी - ए - आईन - ए - वफ़ा भी न सही

कभी हम से कभी ग़ैरों से शनासाई है

बात कहने की नहीं तू भी तो हरजाई है

सर - ए - फ़ाराँ पे किया दीन को कामिल तू ने

इक इशारे में हज़ारों के लिए दिल तू ने

आतिश - अंदोज़ किया इश्क़ का हासिल तू ने

फूँक दी गर्मी - ए - रुख़्सार से महफ़िल तू ने

आज क्यूँ सीने हमारे शरर - आबाद नहीं

हम वही सोख़्ता - सामाँ हैं तुझे याद नहीं

वादी - ए - नज्द में वो शोर - ए - सलासिल न रहा

क़ैस दीवाना - ए - नज़्ज़ारा - ए - महमिल न रहा

हौसले वो न रहे हम न रहे दिल न रहा

घर ये उजड़ा है कि तू रौनक़ - ए - महफ़िल न रहा

ऐ ख़ुशा आँ रोज़ कि आई ओ ब - सद नाज़ आई

बे - हिजाबाना सू - ए - महफ़िल - ए - मा बाज़ आई

बादा - कश ग़ैर हैं गुलशन में लब - ए - जू बैठे

सुनते हैं जाम - ब - कफ़ नग़्मा - ए - कू - कू बैठे

दौर हंगामा - ए - गुलज़ार से यकसू बैठे

तेरे दीवाने भी हैं मुंतज़िर - ए - हू बैठे

अपने परवानों को फिर ज़ौक़ - ए - ख़ुद - अफ़रोज़ी दे

बर्क़ - ए - देरीना को फ़रमान - ए - जिगर - सोज़ी दे

क़ौम - ए - आवारा इनाँ - ताब है फिर सू - ए - हिजाज़

ले उड़ा बुलबुल - ए - बे - पर को मज़ाक़ - ए - परवाज़

मुज़्तरिब - बाग़ के हर ग़ुंचे में है बू - ए - नियाज़

तू ज़रा छेड़ तो दे तिश्ना - ए - मिज़राब है साज़

नग़्मे बेताब हैं तारों से निकलने के लिए

तूर मुज़्तर है उसी आग में जलने के लिए

मुश्किलें उम्मत - ए - मरहूम की आसाँ कर दे

मोर - ए - बे - माया को हम - दोश - ए - सुलेमाँ कर दे

जींस - ए - ना - याब - ए - मोहब्बत को फिर अर्ज़ां कर दे

हिन्द के दैर - नशीनों को मुसलमाँ कर दे

जू - ए - ख़ूँ मी चकद अज़ हसरत - ए - दैरीना - ए - मा

मी तपद नाला ब - निश्तर कद - ए - सीना - ए - मा

बू - ए - गुल ले गई बैरून - ए - चमन राज़ - ए - चमन

क्या क़यामत है कि ख़ुद फूल हैं ग़म्माज़ - ए - चमन

अहद - ए - गुल ख़त्म हुआ टूट गया साज़ - ए - चमन

उड़ गए डालियों से ज़मज़मा - पर्दाज़ - ए - चमन

एक बुलबुल है कि महव - ए - तरन्नुम अब तक

उस के सीने में है नग़्मों का तलातुम अब तक

क़ुमरियाँ शाख़ - ए - सनोबर से गुरेज़ाँ भी हुईं

पत्तियाँ फूल की झड़ झड़ के परेशाँ भी हुईं

वो पुरानी रविशें बाग़ की वीराँ भी हुईं

डालियाँ पैरहन - ए - बर्ग से उर्यां भी हुईं

क़ैद - ए - मौसम से तबीअत रही आज़ाद उस की

काश गुलशन में समझता कोई फ़रियाद उस की

लुत्फ़ मरने में है बाक़ी न मज़ा जीने में

कुछ मज़ा है तो यही ख़ून - ए - जिगर पीने में

कितने बेताब हैं जौहर मिरे आईने में

किस क़दर जल्वे तड़पते हैं मिरे सीने में

इस गुलिस्ताँ में मगर देखने वाले ही नहीं

दाग़ जो सीने में रखते हों वो लाले ही नहीं

चाक इस बुलबुल - ए - तन्हा की नवा से दिल हों

जागने वाले इसी बाँग - ए - दिरा से दिल हों

यानी फिर ज़िंदा नए अहद - ए - वफ़ा से दिल हों

फिर इसी बादा - ए - दैरीना के प्यासे दिल हों

अजमी ख़ुम है तो क्या मय तो हिजाज़ी है मिरी

नग़्मा हिन्दी है तो क्या लय तो हिजाज़ी है मिरी

शुआ- ए- उम्मीद

सूरज ने दिया अपनी शुआओं को ये पैग़ाम

दुनिया है अजब चीज़ कभी सुब्ह कभी शाम

मुद्दत से तुम आवारा हो पहना - ए - फ़ज़ा में

बढ़ती ही चली जाती है बे - मेहरी - ए - अय्याम

ने रेत के ज़र्रों पे चमकने में है राहत

ने मिस्ल - ए - सबा तौफ़ - ए - गुल - ओ - लाला में आराम

फिर मेरे तजल्ली - कदा - ए - दिल में समा जाओ

छोड़ो चमनिस्तान ओ बयाबान ओ दर - ओ - बाम

सर- गुज़िश्त- ए- आदम

सुने कोई मिरी ग़ुर्बत की दास्ताँ मुझ से

भुलाया क़िस्सा - ए - पैमान - ए - अव्वलीं में ने

लगी न मेरी तबीअत रियाज़ - ए - जन्नत में

पिया शुऊर का जब जाम - ए - आतिशीं मैं ने

रही हक़ीक़त - ए - आलम की जुस्तुजू मुझ को

दिखाया ओज - ए - ख़याल - ए - फ़लक - नशीं मैं ने

मिला मिज़ाज - ए - तग़य्युर - पसंद कुछ ऐसा

किया क़रार न ज़ेर - ए - फ़लक कहीं मैं ने

निकाला काबे से पत्थर की मूरतों को कभी

कभी बुतों को बनाया हरम - नशीं मैं ने

कभी मैं ज़ौक़ - ए - तकल्लुम में तूर पर पहुँचा

छुपाया नूर - ए - अज़ले ज़ेर - ए - आस्तीं मैं ने

कभी सलीब पे अपनों ने मुझ को लटकाया

किया फ़लक को सफ़र छोड़ कर ज़मीं मैं ने

कभी मैं ग़ार - ए - हीरा में छुपा रहा बरसों

दिया जहाँ को कभी जाम - ए - आख़िरीं मैं ने

सुनाया हिन्द में आ कर सुरूद - ए - रब्बानी

पसंद की कभी यूनाँ की सरज़मीं मैं ने

दयार - ए - हिन्द ने जिस दम मिरी सदा न सुनी

बसाया ख़ित्ता - ए - जापान ओ मुल्क - ए - चीं मैं ने

बनाया ज़र्रों की तरकीब से कभी आलम

ख़िलाफ़ - ए - मअ 'नी - ए - तालीम - ए - अहल - ए - दीं मैं ने

लहू से लाल किया सैकड़ों ज़मीनों को

जहाँ मैं छेड़ के पैकार - ए - अक़्ल - ओ - दीं मैं ने

समझ में आई हक़ीक़त न जब सितारों की

इसी ख़याल में रातें गुज़ार दीं मैं ने

डरा सकीं न कलीसा की मुझ को तलवारें

सिखाया मसअला - ए - गर्दिश - ए - ज़मीं मैं ने

कशिश का राज़ हुवैदा किया ज़माने पर

लगा के आईना - ए - अक़्ल - ए - दूर - बीं मैं ने

किया असीर शुआओं को बर्क़ - ए - मुज़्तर को

बना दी ग़ैरत - ए - जन्नत ये सरज़मीं मैं ने

मगर ख़बर न मिली आह राज़ - ए - हस्ती की

किया ख़िरद से जहाँ को तह - ए - नगीं मैं ने

हुई जो चश्म - ए - मज़ाहिर - परस्त वा आख़िर

तो पाया ख़ाना - ए - दिल में उसे मकीं मैं ने

साक़ी- नामा

हुआ ख़ेमा - ज़न कारवान - ए - बहार

इरम बन गया दामन - ए - कोह - सार

गुल ओ नर्गिस ओ सोसन ओ नस्तरन

शहीद - ए - अज़ल लाला - ख़ूनीं कफ़न

जहाँ छुप गया पर्दा - ए - रंग में

लहू की है गर्दिश रग - ए - संग में

फ़ज़ा नीली नीली हवा में सुरूर

ठहरते नहीं आशियाँ में तुयूर

वो जू - ए - कोहिस्ताँ उचकती हुई

अटकती लचकती सरकती हुई

उछलती फिसलती सँभलती हुई

बड़े पेच खा कर निकलती हुई

रुके जब तो सिल चीर देती है ये

पहाड़ों के दिल चीर देती है ये

ज़रा देख ऐ साक़ी - ए - लाला - फ़ाम

सुनाती है ये ज़िंदगी का पयाम

पिला दे मुझे वो मय - ए - पर्दा - सोज़

कि आती नहीं फ़स्ल - ए - गुल रोज़ रोज़

वो मय जिस से रौशन ज़मीर - ए - हयात

वो मय जिस से है मस्ती - ए - काएनात

वो मय जिस में है सोज़ - ओ - साज़ - ए - अज़ल

वो मय जिस से खुलता है राज़ - ए - अज़ल

उठा साक़िया पर्दा इस राज़ से

लड़ा दे ममूले को शहबाज़ से

ज़माने के अंदाज़ बदले गए

नया राग है साज़ बदले गए

हुआ इस तरह फ़ाश राज़ - ए - फ़रंग

कि हैरत में है शीशा - बाज़ - ए - फ़रंग

पुरानी सियासत - गरी ख़्वार है

ज़मीं मीर ओ सुल्ताँ से बे - ज़ार है

गया दौर - ए - सरमाया - दार गया

तमाशा दिखा कर मदारी गया

गिराँ ख़्वाब चीनी सँभलने लगे

हिमाला के चश्मे उबलने लगे

दिल - ए - तूर - ए - सीना - ओ - फ़ारान दो - नीम

तजल्ली का फिर मुंतज़िर है कलीम

मुसलमाँ है तौहीद में गरम - जोश

मगर दिल अभी तक है ज़ुन्नार - पोश

तमद्दुन तसव्वुफ़ शरीअत - ए - कलाम

बुतान - ए - अजम के पुजारी तमाम

हक़ीक़त ख़ुराफ़ात में खो गई

ये उम्मत रिवायात में खो गई

लुभाता है दिल को कलाम - ए - ख़तीब

मगर लज़्ज़त - ए - शौक़ से बे - नसीब

बयाँ इस का मंतिक़ से सुलझा हुआ

लुग़त के बखेड़ों में उलझा हुआ

वो सूफ़ी कि था ख़िदमत - ए - हक़ में मर्द

मोहब्बत में यकता हमीयत में फ़र्द

अजम के ख़यालात में खो गया

ये सालिक मक़ामात में खो गया

बुझी इश्क़ की आग अंधेर है

मुसलमाँ नहीं राख का ढेर है

शराब - ए - कुहन फिर पिला साक़िया

वही जाम गर्दिश में ला साक़िया

मुझे इश्क़ के पर लगा कर उड़ा

मिरी ख़ाक जुगनू बना कर उड़ा

ख़िरद को ग़ुलामी से आज़ाद कर

जवानों को पीरों का उस्ताद कर

हरी शाख़ - ए - मिल्लत तिरे नम से है

नफ़स इस बदन में तिरे दम से है

तड़पने फड़कने की तौफ़ीक़ दे

दिल - ए - मुर्तज़ा सोज़ - ए - सिद्दीक़ दे

जिगर से वही तीर फिर पार कर

तमन्ना को सीनों में बेदार कर

तिरे आसमानों के तारों की ख़ैर

ज़मीनों के शब ज़िंदा - दारों की ख़ैर

जवानों को सोज़ - ए - जिगर बख़्श दे

मिरा इश्क़ मेरी नज़र बख़्श दे

मिरी नाव गिर्दाब से पार कर

ये साबित है तो इस को सय्यार कर

बता मुझ को असरार - ए - मर्ग - ओ - हयात

कि तेरी निगाहों में है काएनात

मिरे दीदा - ए - तर की बे - ख़्वाबियाँ

मिरे दिल की पोशीदा बेताबियाँ

मिरे नाला - ए - नीम - शब का नियाज़

मिरी ख़ल्वत ओ अंजुमन का गुदाज़

उमंगें मिरी आरज़ूएँ मिरी

उम्मीदें मिरी जुस्तुजुएँ मिरी

मिरी फ़ितरत आईना - ए - रोज़गार

ग़ज़ालान - ए - अफ़्कार का मुर्ग़ - ज़ार

मिरा दिल मिरी रज़्म - गाह - ए - हयात

गुमानों के लश्कर यक़ीं का सबात

यही कुछ है साक़ी मता - ए - फ़क़ीर

इसी से फ़क़ीरी में हूँ मैं अमीर

मिरे क़ाफ़िले में लुटा दे इसे

लुटा दे ठिकाने लगा दे इसे

दमा - दम रवाँ है यम - ए - ज़िंदगी

हर इक शय से पैदा रम - ए - ज़िंदगी

इसी से हुई है बदन की नुमूद

कि शोले में पोशीदा है मौज - ए - दूद

गिराँ गरचे है सोहबत - ए - आब - ओ - गिल

ख़ुश आई इसे मेहनत - ए - आब - ओ - गिल

ये साबित भी है और सय्यार भी

अनासिर के फंदों से बे - ज़ार भी

ये वहदत है कसरत में हर दम असीर

मगर हर कहीं बे - चुगों बे - नज़ीर

ये आलम ये बुत - ख़ाना - ए - शश - जिहात

इसी ने तराशा है ये सोमनात

पसंद इस को तकरार की ख़ू नहीं

कि तू मैं नहीं और मैं तू नहीं

मन ओ तू से है अंजुमन - आफ़रीं

मगर ऐन - ए - महफ़िल में ख़ल्वत - नशीं

चमक उस की बिजली में तारे में है

ये चाँदी में सोने में पारे में है

उसी के बयाबाँ उसी के बबूल

उसी के हैं काँटे उसी के हैं फूल

कहीं उस की ताक़त से कोहसार चूर

कहीं उस के फंदे में जिब्रील ओ हूर

कहीं जज़ा है शाहीन सीमाब रंग

लहू से चकोरों के आलूदा चंग

कबूतर कहीं आशियाने से दूर

फड़कता हुआ जाल में ना - सुबूर

फ़रेब - ए - नज़र है सुकून ओ सबात

तड़पता है हर ज़र्रा - ए - काएनात

ठहरता नहीं कारवान - ए - वजूद

कि हर लहज़ है ताज़ा शान - ए - वजूद

समझता है तू राज़ है ज़िंदगी

फ़क़त ज़ौक़ - ए - परवाज़ है ज़िंदगी

बहुत उस ने देखे हैं पस्त ओ बुलंद

सफ़र उस को मंज़िल से बढ़ कर पसंद

सफ़र ज़िंदगी के लिए बर्ग ओ साज़

सफ़र है हक़ीक़त हज़र है मजाज़

उलझ कर सुलझने में लज़्ज़त उसे

तड़पने फड़कने में राहत उसे

हुआ जब उसे सामना मौत का

कठिन था बड़ा थामना मौत का

उतर कर जहान - ए - मकाफ़ात में

रही ज़िंदगी मौत की घात में

मज़ाक़ - ए - दुई से बनी ज़ौज ज़ौज

उठी दश्त ओ कोहसार से फ़ौज फ़ौज

गुल इस शाख़ से टूटते भी रहे

इसी शाख़ से फूटते भी रहे

समझते हैं नादाँ उसे बे - सबात

उभरता है मिट मिट के नक़्श - ए - हयात

बड़ी तेज़ जौलाँ बड़ी ज़ूद - रस

अज़ल से अबद तक रम - ए - यक - नफ़स

ज़माना कि ज़ंजीर - ए - अय्याम है

दमों के उलट - फेर का नाम है

ये मौज - ए - नफ़स क्या है तलवार है

ख़ुदी क्या है तलवार की धार है

ख़ुदी क्या है राज़ - दरून - हयात

ख़ुदी क्या है बेदारी - ए - काएनात

ख़ुदी जल्वा बदमस्त ओ ख़ल्वत - पसंद

समुंदर है इक बूँद पानी में बंद

अंधेरे उजाले में है ताबनाक

मन ओ तू में पैदा मन ओ तू से पाक

अज़ल उस के पीछे अबद सामने

न हद उस के पीछे न हद सामने

ज़माने के दरिया में बहती हुई

सितम उस की मौजों के सहती हुई

तजस्सुस की राहें बदलती हुई

दमा - दम निगाहें बदलती हुई

सुबुक उस के हाथों में संग - ए - गिराँ

पहाड़ उस की ज़र्बों से रेग - ए - रवाँ

सफ़र उस का अंजाम ओ आग़ाज़ है

यही उस की तक़्वीम का राज़ है

किरन चाँद में है शरर संग में

ये बे - रंग है डूब कर रंग में

इसे वास्ता क्या कम - ओ - बेश से

नशेब ओ फ़राज़ ओ पस - ओ - पेश से

अज़ल से है ये कशमकश में असीर

हुई ख़ाक - ए - अदाम में सूरत - पज़ीर

ख़ुदी का नशेमन तिरे दिल में है

फ़लक जिस तरह आँख के तिल में है

ख़ुदी के निगह - बाँ को है ज़हर - नाब

वो नाँ जिस से जाती रहे उस की आब

वही नाँ है उस के लिए अर्जुमंद

रहे जिस से दुनिया में गर्दन बुलंद

ख़ुदी फ़ाल - ए - महमूद से दरगुज़र

ख़ुदी पर निगह रख अयाज़ी न कर

वही सज्दा है लाइक़ - ए - एहतिमाम

कि हो जिस से हर सज्दा तुझ पर हराम

ये आलम ये हंगामा - ए - रंग - ओ - सौत

ये आलम कि है ज़ेर - ए - फ़रमान - ए - मौत

ये आलम ये बुत - ख़ाना - ए - चश्म - ओ - गोश

जहाँ ज़िंदगी है फ़क़त ख़ुर्द ओ नोश

ख़ुदी की ये है मंज़िल - ए - अव्वलीं

मुसाफ़िर ये तेरा नशेमन नहीं

तिरी आग इस ख़ाक - दाँ से नहीं

जहाँ तुझ से है तू जहाँ से नहीं

बढ़े जा ये कोह - ए - गिराँ तोड़ कर

तिलिस्म - ए - ज़मान - ओ - मकाँ तोड़ कर

ख़ुदी शेर - ए - मौला जहाँ उस का सैद

ज़मीं उस की सैद आसमाँ उस का सैद

जहाँ और भी हैं अभी बे - नुमूद

कि ख़ाली नहीं है ज़मीर - ए - वजूद

हर इक मुंतज़िर तेरी यलग़ार का

तिरी शौख़ी - ए - फ़िक्र - ओ - किरदार का

ये है मक़्सद गर्दिश - ए - रोज़गार

कि तेरी ख़ुदी तुझ पे हो आश्कार

तू है फ़ातह - ए - आलम - ए - ख़ूब - ओ - ज़िश्त

तुझे क्या बताऊँ तिरी सरनविश्त

हक़ीक़त पे है जामा - ए - हर्फ़ - ए - तंग

हक़ीक़त है आईना - ए - गुफ़्तार - ए - ज़ंग

फ़रोज़ाँ है सीने में शम - ए - नफ़स

मगर ताब - ए - गुफ़्तार रखती है बस

अगर यक - सर - ए - मू - ए - बरतर परम

फ़रोग़ - ए - तजल्ली ब - सोज़द परम

हज़रात- ए- इंसाँ

जहाँ में दानिश ओ बीनिश की है किस दर्जा अर्ज़ानी

कोई शय छुप नहीं सकती कि ये आलम है नूरानी

कोई देखे तो है बारीक फ़ितरत का हिजाब इतना

नुमायाँ हैं फ़रिश्तों के तबस्सुम - हा - ए - पिन्हानी

ये दुनिया दावत - ए - दीदार है फ़रज़ंद - ए - आदम को

कि हर मस्तूर को बख़्शा गया है ज़ौक़ - ए - उर्यानी

यही फ़रज़ंद - ए - आदम है कि जिस के अश्क - ए - ख़ूनीं से

किया है हज़रत - ए - यज़्दाँ ने दरियाओं को तूफ़ानी

फ़लक को क्या ख़बर ये ख़ाक - दाँ किस का नशेमन है

ग़रज़ अंजुम से है किस के शबिस्ताँ की निगहबानी

अगर मक़्सूद - ए - कुल मैं हूँ तो मुझ से मावरा क्या है

मिरे हंगामा - हा - ए - नौ - ब - नौ की इंतिहा क्या है

हिन्दुस्तानी बच्चों का क़ौमी गीत

चिश्ती ने जिस ज़मीं में पैग़ाम - ए - हक़ सुनाया

नानक ने जिस चमन में वहदत का गीत गाया

तातारियों ने जिस को अपना वतन बनाया

जिस ने हिजाज़ियों से दश्त - ए - अरब छुड़ाया

मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है

यूनानियों को जिस ने हैरान कर दिया था

सारे जहाँ को जिस ने इल्म ओ हुनर दिया था

मिट्टी को जिस की हक़ ने ज़र का असर दिया था

तुर्कों का जिस ने दामन हीरों से भर दिया था

मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है

टूटे थे जो सितारे फ़ारस के आसमाँ से

फिर ताब दे के जिस ने चमकाए कहकशाँ से

वहदत की लय सुनी थी दुनिया ने जिस मकाँ से

मीर - ए - अरब को आई ठंडी हवा जहाँ से

मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है

बंदे कलीम जिस के पर्बत जहाँ के सीना

नूह - ए - नबी का आ कर ठहरा जहाँ सफ़ीना

रिफ़अत है जिस ज़मीं की बाम - ए - फ़लक का ज़ीना

जन्नत की ज़िंदगी है जिस की फ़ज़ा में जीना

मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है

हिमाला

ऐ हिमाला ऐ फ़सील - ए - किश्वर - ए - हिन्दुस्तान

चूमता है तेरी पेशानी को झुक कर आसमाँ

तुझ में कुछ पैदा नहीं देरीना रोज़ी के निशाँ

तू जवाँ है गर्दिश - ए - शाम - ओ - सहर के दरमियाँ

एक जल्वा था कलीम - ए - तूर - ए - सीना के लिए

तू तजल्ली है सरापा चश्म - ए - बीना के लिए

इम्तिहान - ए - दीदा - ए - ज़ाहिर में कोहिस्ताँ है तू

पासबाँ अपना है तू दीवार - ए - हिन्दुस्ताँ है तू

मतला - ए - अव्वल फ़लक जिस का हो वो दीवाँ है तू

सू - ए - ख़ल्वत - गाह - ए - दिल दामन - कश - ए - इंसाँ है तू

बर्फ़ ने बाँधी है दस्तार - ए - फ़ज़ीलत तेरे सर

ख़ंदा - ज़न है जो कुलाह - ए - मेहर - ए - आलम - ताब पर

तेरी उम्र - ए - रफ़्ता की इक आन है अहद - ए - कुहन

वादियों में हैं तिरी काली घटाएँ ख़ेमा - ज़न

चोटियाँ तेरी सुरय्या से हैं सरगर्म - ए - सुख़न

तू ज़मीं पर और पहना - ए - फ़लक तेरा वतन

चश्मा - ए - दामन तिरा आईना - ए - सय्याल है

दामन - ए - मौज - ए - हवा जिस के लिए रूमाल है

अब्र के हाथों में रहवार - ए - हवा के वास्ते

ताज़ियाना दे दिया बर्क़ - ए - सर - ए - कोहसार ने

ऐ हिमाला कोई बाज़ी - गाह है तू भी जिसे

दस्त - ए - क़ुदरत ने बनाया है अनासिर के लिए

हाए क्या फ़र्त - ए - तरब में झूमता जाता है अब्र

फ़ील - ए - बे - ज़ंजीर की सूरत उड़ा जाता है अब्र

जुम्बिश - ए - मौज - ए - नसीम - ए - सुब्ह गहवारा बनी

झूमती है नश्शा - ए - हस्ती में हर गुल की कली

यूँ ज़बान - ए - बर्ग से गोया है उस की ख़ामुशी

दस्त - ए - गुल - चीं की झटक मैं ने नहीं देखी कभी

कह रही है मेरी ख़ामोशी ही अफ़्साना मिरा

कुंज - ए - ख़ल्वत ख़ाना - ए - क़ुदरत है काशाना मिरा

आती है नद्दी फ़राज़ - ए - कोह से गाती हुई

कौसर ओ तसनीम की मौजों को शरमाती हुई

आईना सा शाहिद - ए - क़ुदरत को दिखलाती हुई

संग - ए - रह से गाह बचती गाह टकराती हुई

छेड़ती जा इस इराक़ - ए - दिल - नशीं के साज़ को

ऐ मुसाफ़िर दिल समझता है तिरी आवाज़ को

लैला - ए - शब खोलती है आ के जब ज़ुल्फ़ - ए - रसा

दामन - ए - दिल खींचती है आबशारों की सदा

वो ख़मोशी शाम की जिस पर तकल्लुम हो फ़िदा

वो दरख़्तों पर तफ़क्कुर का समाँ छाया हुआ

काँपता फिरता है क्या रंग - ए - शफ़क़ कोहसार पर

ख़ुश - नुमा लगता है ये ग़ाज़ा तिरे रुख़्सार पर

ऐ हिमाला दास्ताँ उस वक़्त की कोई सुना

मस्कन - ए - आबा - ए - इंसाँ जब बना दामन तिरा

कुछ बता उस सीधी - साधी ज़िंदगी का माजरा

दाग़ जिस पर ग़ाज़ा - ए - रंग - ए - तकल्लुफ़ का न था

हाँ दिखा दे ऐ तसव्वुर फिर वो सुब्ह ओ शाम तू

दौड़ पीछे की तरफ़ ऐ गर्दिश - ए - अय्याम तू

नोटः ये किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क के ज़रीऐ अपने पाठको के लिऐ किताबी शक्ल मे जमा की गई है और इस किताब टाइप वग़ैरा की ग़लतीयो पर काम नही किया गया है।

अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क ( 05.12.2016 )


फेहरिस्त

अबुल-अला-म ' अर्री 2

इबलीस की मजलिस-ए-शूरा 2

इल्तिजा-ए-मुसाफ़िर 7

एक आरज़ू 10

एक नौ-जवान के नाम 12

औरत 13

गोरिस्तान-ए-शाही 13

जवाब-ए-शिकवा 21

जावेद के नाम 33

जिब्रईल ओ इबलीस 34

ज़ोहद और रिंदी 35

ज़ौक़ ओ शौक़ 38

तराना - ए - मिल्ली 42

तराना - ए - हिन्दी 44

तस्वीर - ए - दर्द 45

तारीख की दुआ 52

तुलू - ए - इस्लाम 54

नया शिवाला 62

नानक 63

नाला - ए - फ़िराक़ 64

फ़रमान - ए - ख़ुदा 66

फ़रिश्ते आदम को जन्नत से रुख़्सत करते हैं 67

फ़ुनून - ए - लतीफ़ा 68

मस्जिद - ए - क़ुर्तुबा 68

मार्च 1907 76

मिर्ज़ा ' ग़ालिब ' 78

मोहब्बत 79

राम 81

रूह - ए - अर्ज़ी आदम का इस्तिक़बाल करती है 82

ला - इलाहा - इल्लल्लाह 84

लेनिन 85

वालिदा मरहूमा की याद में 87

शिकवा 98

शुआ - ए - उम्मीद 108

सर - गुज़िश्त - ए - आदम 109

साक़ी - नामा 111

हज़रात - ए - इंसाँ 122

हिन्दुस्तानी बच्चों का क़ौमी गीत 123

हिमाला 124

अल्लामा इक़बाल की नज़मे

अल्लामा इक़बाल की नज़मे

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लेखक: अल्लामा इक़बाल
कैटिगिरी: शेर व अदब
पन्ने: 7

अल्लामा इक़बाल की ये नज़मे हमने रे्ख्ता नामक साइट से ली है और इनको बग़ैर किसी कमी या ज़्यादती के मिनो अन एक किताबी शक्ल मे जमा कर दिया है। इन नज़मो की तादाद उन्तीस है।