अबुल हसन हज़रत इमाम मूसा काजि़म अ.स

बुक करेकशन

लेखक: मौलाना नजमुल हसन कर्रारवी
इमाम काज़िम (अ)

अबुल हसन हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ स )

(चौदह सितारे)

लेखकः नजमुल हसन कर्रारवी

नोटः ये किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क के ज़रीऐ अपने पाठको के लिऐ टाइप कराई गई है और इस किताब मे टाइप वग़ैरा की ग़लतीयो को ठीक किया गया है।

Alhassanain.org/hindi


काजि़मे आले मोहम्मद के तहम्मुल पर न जा

हाकिमे ज़ालिम यह जाने हैदरो ज़हरा हैं देख

दौलतो हशमत के नशे में ना इतना सर उठा

ऐ बनी अब्बास के फि़रऔन यह मूसा हैं देख

(साबिर थरयानी ‘‘कराची ’’)

मख़ज़ने जुम्ला फ़ुनून आपका क़ल्बे रौशन

मादने जुम्ला उलूम , आईनए प्रकाशित सलीम

आस्ताने दरे हज़रत का अगर देख ले औज

सूरते चखऱ् पये बोसा , झुके अरर्शे अज़ीम

हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ स . )

पैग़म्बरे इस्लाम रसूले करीम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) के सातवें जांनशीन , हमारे सातवें इमाम और सिलसिलाए अस्मत की नवीं कड़ी हैं। आपके वालिद माजिद हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) थे और आपकी वालदा माजदा जनाबे हमीदा ख़ातून जो बरबर या इन्दलिस की रहने वाली थीं। आपके मुताअल्लिक़ हज़रत इमामे बाक़र (अ.स.) ने इरशाद फ़रमाया है कि आप दुनिया में हमीदा और आख़ेरत में महमूदा हैं।

(शवाहिद अल नबूवत पृष्ठ 186 )

अल्लामा मोहम्मद रज़ा लिखते हैं कि आप साहेबे जमाल कमाल और निहायत दियानत दार थीं।

(जेनातुल ख़ुलूद पृष्ठ 29 )

अल्लामा मजलिसी का कहना है कि वह हर निसवानी आलाईश से पाक थीं।

(जिलाउल उयून पृष्ठ 270 )

अल्लामा शहर आशोब लिखते हैं कि जनाबे हमीदा के वालिद माजिद साएद बसरी थे। हमीदा ख़ातून की कुन्नियत लोलो (मोती) थी।

(मनाकि़ब जिल्द 5 पृष्ठ 76 )

हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) अपने आबाओ अजदाद की तरह इमाम मन्सूस आलमे ज़माना अफ़ज़ले काएनात थे। आप जुमला सिफ़ात हसना से भर पूर थे , आप दुनिया की तमाम ज़बाने जानते और इल्में ग़ैब से आगाह थे। आपके मुताअल्लिक़ इब्ने हजर मक्की लिखते हैं कि हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के इल्म , मारेफ़त कमाल और अफ़ज़लीयत में वारिस व जांनशीन थे। आप दुनिया के आबिदों में से सब से बड़े इबादत गुज़ार सब से बड़े आलिम और सब से बड़े सख़ी थे।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 121 ) और इब्ने तल्हा शाफ़ेई लिखते हैं कि आप बहुत बड़ी इज़्ज़त व क़द्र के मालिक इमाम और इन्तेहाई शान व शौकत के मुजतहिद थे। आपका इजतेहाद में नज़ीर न था। आप इबादत व ताअत में मशहूर ज़माना और करामत में मशहूरे कायनात थे। उन चीज़ों में आपकी कोई मिसाल न मिलती थी। आप सारी रात रूकु व सुजूद और क़याम व क़यूद में गुज़ारते और सारा दिन सदक़ा और रोज़े में बसर करते थे।

(मतालेबुस सुऊल 308 )

अल्लामा शिब्ली लिखते हैं कि आप बहुत बड़ी क़द्र व मंजि़लत के दुनिया में मुन्फ़रिद इमाम और ज़बर दस्त हुज्जते ख़ुदा थे। नमाज़ों की वजह से हमेशा सारी रात जागते थे और दिन भर रोज़ा रखते थे।(अनवारूल अख़्बार पृष्ठ 134 )

अल्लामा इब्ने सबाग़ मालिकी लिखते हैं कि आप अपने ज़माने के लोगों में सब से ज़्यादा आबिद और सब से ज़्यादा इल्म वाले और सब से ज़्यादा सख़ी और बुज़ुर्ग नफ़्स थे।(फ़ुसूल मोहम्मद व अरजहुल मतालिब पृष्ठ 451 )

अल्लामा हुसैन वाएज़ काशफ़ी लिखते हैं कि आप आबिद तरीन अहले ज़माना और करीम तरीन अहले आलिम थे। आपके फ़ज़ाएल व करामात बे शुमार हैं।(रौज़तुल शोहदा पृष्ठ 432 )

किताब रौज़तुल अहबाब में है कि आप व रूए क़द्र मंजि़लत बुज़ुर्ग तरीन अहले आलिम थे और अपने पदरे बुज़ुर्गवार की नस के मुताबिक़ उनके बाद वली अमरे इमामत हुये।

आपकी विलादत ब सआदत

हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) बतारीख़ 7 सफ़रूल मुज़फ़्फ़र 128 हिजरी मुताबिक़ 10 नवम्बर 745 ई0 यौमे शम्बा ब मुक़ाम अबवा जो मक्का व मदीने के बीच वाक़े है पैदा हुए।

(अनवारे नोमानिया पृष्ठ 126 व आलामुल वरा पृष्ठ 171 व जिलाउल उयून पृष्ठ 269 व शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 192 रौज़तुल शौहदा पृष्ठ 436 )

अल्लामा मजलिसी तहरीर फ़रमाते हैं कि पैदा होते ही आपने हाथों को ज़मीन पर टेक कर आसमान की तरफ़ रूख़ किया और कलमाए शहादतैन ज़बान पर जारी फ़रमाया। आपने यह अमल बिलकुल उसी तरह किया जिस तरह हज़रत रसूले ख़ुदा स. ने विलादत के बाद किया था। आपके दाहिने बाज़ू पर ‘‘ कलमाए तम्मत कल्मता रब्बेका सदक़ा व अदलन ’’ लिखा हुआ था। आप इल्मे अव्वलीन व आख़ेरीन से बहरावर मुतावल्लिद हुए थे। आपकी विलादत से हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) को बे हद मसर्रत हुई थी आपने मदीना जा कर अहले मदीना को दावते ताअम दी थी।(जिलाउल उयून पृष्ठ 270 ) आप दीगर आइम्मा की तरह मख़तून और नाफ़ बुरीदा मुतावल्लिद हुये थे।

इस्मे गिरामी कुन्नियत , अल्क़ाब

आपके वालिदे माजिद हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने ख़ुदा वन्दे आलम के मुअय्यन कर्दा नाम मूसा से मौसूम किया। अल्लामा मोहम्मद रज़ा लिखते हैं कि मूसा क़ब्ती लफ़्ज़ है और ‘‘ मू ’’ और ‘‘ सी ’’ से मुरक्कब है। मू के मानी पानी आर सी के मानी दरख़्त है। इस नाम से सब से पहले हज़रत कलीम अल्लाह मौसूम किये गये थे और इसकी वजह यह थी कि ख़ौफ़े फि़रऔन से मादरे मूसा ने आपको उस सन्दूक़ में रख कर दरिया में बहाया था जो ‘‘हबीब नजार ’’ का बनाया हुआ था और बाद में ताबूते सकीना क़रार पाया तो वह सन्दूक बह कर फि़रऔन और जबाने आसिया तक पानी के ज़रिये से उन दरख़्तों से टकराता हुआ जो ख़ास बाग़ में थे पहुँचा था लेहाज़ा पानी और दरख़्त के सबब से उनका नाम मूसा क़रार पाया था।(जन्नातुल ख़ुलूद पृष्ठ 29 ) आपकी कुन्नियत अबुल हसन , अबू इब्राहीम , अबु अली , अबु अब्दुल्लाह थी और आपके अल्क़ाब काजि़म , अब्दे सालेह , नफ़्से ज़किया , साबिर , अमीन , बाबुल हवाएज वग़ैरह थे। शोहरते आम्मा काजि़म को है और उसकी वजह यह है कि आप बद सुलूक के साथ एहसान करते और सताने वाले को माफ़ फ़रमाते और ग़ुस्से को पी जाते थे। बड़े हलीम बुर्दबार और अपने पर ज़ुल्म करने वाले को माफ़ कर दिया करते थे।

(मतालेबुस सुऊल पृष्ठ 273, शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 192, रौज़तुल शोहदा पृष्ठ 432, तारीख़े ख़मीस जिल्द 2 पृष्ठ 32 )

लक़्ब बाबुल हवाएज की वजह

अल्लामा इब्ने तल्हा शाफ़ेई लिखते हैं कि कसरते इबादत की वजह से अब्दे सालेह और ख़ुदा से हाजत तलब करने के ज़रिये होने की वजह से आपको बाबुल हवाएज कहा जाता है। कोई भी हाजत हो जब आपके वास्ते से तलब की जाती थी तो ज़रूर पूरी होती थी। मुलाहेज़ा हो।(मतालेबुल सुऊल पृष्ठ 278, सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 131 ) फ़ाजि़ल माअसर अल्लामा अली हैदर रक़म तराज़ हैं कि हज़रत का लक़ब बाबे क़ज़ा अल हवाएज यानी हाजतें पूरी हाने का दरवाज़ा भी था। हज़रत की जि़न्दगी में तो हाजतें आपके तवस्सुल से पूरी होती ही थीं शहादत के बाद भी यह सिलसिला जारी ही रहा और अब भी है। (अख़बार पायनियर इलाहाबाद मोअर्रेख़ा 10 अगस्त 1928 ई0 में ज़ेरे उन्वान इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के रौज़े पर एक अन्धे को बीनाई मिल गई। ख़बर शाया हुई है जिसका तरजुमा यह है कि हाल ही में रौज़ा ए काज़मैन शरीफ़ पर जो शहर बग़दाद से बाहर है एक मोजेज़ा ज़ाहिर हुआ है कि एक अन्धा और बूढ़ा सैय्यद निहायत मुफ़लिसी की हालत में रौज़े शरीफ़ के अन्दर दाखि़ल हुआ और जैसे ही उसने इमाम मूसी ए काजि़म (अ.स.) की रौज़े की ज़रीहे अक़दस को हाथ से मस किया वह फ़ौरन चिल्लाता हुआ बाहर की तरफ़ दौड़ा मुझे बीनाई मिल गई मैं देखने लगा हूँ इस पर लोगों का बड़ा हुजूम जमा हो गया और अकसर लोग इसके कपड़े तबर्रूक के तौर पर छीन झपट कर ले गए। इसको तीन दफ़ा कपड़े पहनाए गये और हर दफ़ा वह कपड़े टुकड़े हो गये। आखि़र रौज़ाए शरीफ़ के ख़ुद्दाम ने इस ख़्याल से कि कहीं इस बूढ़े सैय्यद के जिस्म को नुक़सान न पहुँचे इसको उसके घर पहुँचा दिया। इसका बयान है कि मैं बग़दाद के अस्पताल में अपनी आँख का इलाज करा रहा था बिल आखि़र सब डाँक्टरों ने यह कह कर मुझे अस्पताल से निकाल दिया कि तेरा मजऱ् ला इलाज हो गया है अब इसका इलाज ना मुम्किन है। तब मैं मायूस हो कर रौज़ा ए अक़दस इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) पर आया यहां आपके वसीले से ख़ुदा से दुआ की ‘‘ बारे इलाहा तुझे इसी इमाम मदफ़ून का वास्ता मुझे अज़सरे नव बीनाई अता कर दे। यह कह कर जैसे ही मैंने रौज़े की ज़री को मस किया मेरी आँख़ों के सामने रौशनी नमूदान हुई और आवाज़ आई जा तुझे फिर से रौशनी दे दी गई ’’ इस आवाज़ के साथ ही मैं हर चीज़ को देखने लगा।(अख़बार इन्क़ेलाब लाहौर , अख़बार अहले हदीस अमरतसर मोवर्रिख़ा 24 अगस्त 1928 0 )

अल्लामा इब्ने शहर आशोब लिखते हैं कि ख़तीब बग़दादी ने अपनी तारीख़ में लिखा है कि जब मुझे कोई मुश्किल दरपेश होती है मैं इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के रौज़े पर चला जाता हूँ और उनकी क़ब्र पर दोआ करता हूँ मेरी मुश्किल हल हो जाती है।(मनाक़िब जिल्द 3 पृष्ठ 125 प्रकाशित मुल्तान)

बादशाहाने वक़्त

आप 128 हिजरी में मरवान अल हमार उमवी के अहद में पैदा हुए। इसके बाद 132 हिजरी में पृष्ठ अब्बासी ख़लीफ़ा हुआ(अबुल फि़दा) 136 हिजरी में मन्सूर दवानीक़ी अब्बासी ख़लीफ़ा बना(अबुल फि़दा) 158 हिजरी में महदी बिन मालिके सलतनत हुआ।(हबीब अल सियर 169 हिजरी में हादी अब्बासी की बैैअत की गई। (इब्ने अलवरी) 170 में हारून रशीद अब्बासी इब्ने महदी ख़लीफ़ा ए वक़्त हुआ (अबुल फि़दा) 183 हिजरी में हारून के ज़हर देने से इमाम (अ.स.) ब हालते मज़लूमी क़ैदख़ाने में शहीद हुए।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा अख़बार अल ख़ुलफ़ा इब्ने राई)

नशोनुमा और तरबीअत

अल्लामा अली नक़ी लिखते हैं कि आपकी उमर के बीस बरस अपने वालिदे बुज़ुर्गवार हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के साए तरबीयत में गुज़रे एक तरफ़ ख़ुदा के दिए हुए फि़तरी कमाल के जौहर दूसरी तरफ़ इस बाप की तरबियत जिसने पैग़म्बर के बताए हुए मकारेमुल अख़्लाक़ की याद को भूली हुई दुनियाँ में ऐसा ताज़ा कर दिया कि उन्हें एक तरह से अपना बना लिया और जिसकी बिना पर मिल्लते जाफ़री नाम हो गया। इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) ने बचपना और जवानी का काफ़ी हिस्सा इसी मुक़द्दस आगोश में गुज़ारा यहाँ तक कि तमाम दुनिया के सामने आपके ज़ाती कमालात व फ़ज़ाएल रौशन हो गए और इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) ने अपना जां नशीन मुक़र्रर फ़रमा दिया। बावजूदे कि आपके बड़े भाई भी मौजूद थे मगर ख़ुदा की तरफ़ का मन्सब मीरास का तरका नहीं है बल्कि जा़ती कमालात को ढुंढता है। सिलसिलाए मासूमीन में इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) में बजाए फ़रज़न्दे अकबर के इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की तरफ़ इमामत का मुन्तकि़ल होना इसका सुबूत है कि मियारे इमामत में नसबी विरासत को मद्दे नज़र नहीं रखा गया है।

(सवानेह मूसा काजि़म पृष्ठ 4 )

आपके बचपन के बाज़ वाक़ेआत

यह मुसल्लेमात से है कि नबी और इमाम तमाम सलाहियतों से भर पूर मोतवल्लिद होते हैं। जब हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की उमर तीन साल की थी एक शख़्स जिसका नाम सफ़वान जम्माल था हज़रत इमाम जाफ़र सादिक (अ.स.) की खि़दमत में हाजि़र हो कर मुस्तफ़सिर हुआ कि मौला , आपके बाद इमामत के फ़राएज़ कौन अदा करेगा आपने इरशाद फ़रमाया ऐ सफ़वान ! तुम इसी जगह बैठो और देखते जाओ जो ऐसा बच्चा मेरे घर से निकले जिसकी हर बात मारफ़ते ख़ुदा से पुर हो और आम बच्चों की तरह लहो लआब न करता हो , समझ लेना कि ऐनाने इमामत इसी के लिये सज़ावार है। इतने में इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) बकरी का एक बच्चा लिये हुए बरामद हुए और बाहर आ कर इससे कहने लगेः अपने ख़ुदा का सजदा कर। यह देख कर इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने उसे सीने से लगा लिया।(तज़किरतुल मासूमीन पृष्ठ 192 )

सफ़वान कहता है यह देख कर मैं ने इमाम मूसा (अ.स.) से कहा साहब जा़दे ! इस बच्चे को कहिए की मर जाए। आप ने इरशाद फ़रमाया कि वाए हो तुम पर , क्या मौत व हयात मेरे ही इख़्तेयार में है।(बेहारूल अनवार जिल्द 11 पृष्ठ 266 )

अल्लामा मजलिसी लिखते हैं कि इमाम अबू हनीफ़ा एक दिन इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) से मसाएले दीनीया दरियाफ़्त करने के लिये हसबे दस्तूर हाजि़र हुए। इत्तेफ़ाक़न आप आराम फ़रमा रहे थे। मौसूफ़ इस इन्तेज़ार में बैठ गये कि आप बेदार हों तो अर्ज मुद्दआ करूं। इतने में इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) जिनकी उम्र उस वक़्त पाँच साल की थी बरामद हुए। इमाम अबू हनीफ़ा ने उन्हें सलाम कर के कहा , ऐ साहब ज़ादे बताओ कि इन्सान फ़ाएल मुख़्तार है या इनके फ़ेल का ख़ुदा फ़ाएल है ? यह सुन कर आप ज़मीन पर दो ज़ानू बैठ गये और फ़रमाने लगे , सुनो ! बन्दों के अफ़आल तीन हालतों से ख़ाली नहीं , या इनके अफ़आल का फ़ाएल सिर्फ़ ख़ुदा है या सिर्फ़ बन्दा है या दोनों की शिरकत से अफ़आल वाक़े होते हैं अगर पहली सूरत है तो ख़ुदा को बन्दे पर अज़ाब का हक़ नहीं , अगर तीसरी सूरत है तो भी यह इन्साफ़ के खि़लाफ़ है कि बन्दे को सज़ा दे और अपने को बचा ले क्यो कि इरतेक़ाब दोनों की शिरकत से हुआ है। अब ला मोहाला दूसरी सूरत होगी वह यह की बन्दा ख़ुदा फ़ाएल हो और इरतिक़ाबे क़बीह पर ख़ुदा उसे सज़ा दे।

(बिहारूल अनवार जिल्द 11 पृष्ठ 185 )

इमाम अबू हनीफ़ा कहते हैं कि मैं ने उस साहब ज़ादे को इस तरह नमाज़ पढ़ते हुए देख कर कि उनके सामने से लोग बराबर गुज़र रहे थे इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) से अर्ज़ किया कि आप के साहब ज़ादे मूसा काजि़म नमाज़ पढ़ रहे थे और लोग उनके सामने से गुज़र रहे थे। हज़रत ने इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) को आवाज़ दी , वह हाजि़र हुए , आपने फ़रमाया बेटा ! अबू हनीफ़ा क्या कहते हैं उनका कहना है कि तुम नमाज़ पढ़ रहे थे और लोग तुम्हारे सामने से गुज़र रहे थे। इमामे मूसा काजि़म (अ.स.) ने अर्ज कि बाबा जान लोगों के गुज़रने से नमाज़ पर क्या असर पड़ता है वह हमारे और ख़ुदा के दरमियान हाएल तो नहीं हुए थे क्यों कि वह तो रगे जान से भी ज़्यादा क़रीब है। यह सुन कर आपने उन्हें गले से लगा लिया और फ़रमाया कि इस बच्चे को असरारे शरीअत अता हो चुके हैं।

(मनाक़िब जिल्द 5 पृष्ठ 69 )

एक दिन अब्दुल्लाह इब्ने मुस्लिम और अबू हनीफ़ा दोनो वारिदे मदीना हुए। अब्दुल्लाह ने कहा चलो इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) से मुलाक़ात करें और उनसे कुछ इस्तेफ़ादा करें। यह दोनों हज़रत के दरे दौलत पर हाजि़र हुए। यहाँ पहुँच कर देखा कि हज़रत के मानने वालों की भीड़ लगी हुई है। इतने में इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के बजाए इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) बरामद हुए। लोगो ने सरो क़द ताज़ीम की , अगरचे आप उस वक़्त बहुत ही कम सिन थे लेकिन आपने उलूम के दरिया बहाना शुरू किये। अब्दुल्लाह वग़ैरा ने जो आपसे कुछ दूरी पर थे आपके क़रीब जाते हुए आपकी इज़्ज़त व मंजि़लत का आपस में तज़किरा किया। आखि़र में इमाम अबू हनीफ़ा ने कहा कि चलो मैं उन्हें उनके शियों के सामने रूसवा और ज़लील करता हूँ। मैं उनसे ऐसा सवाल करूगां कि यह जवाब न दे सकेंगे। अब्दुल्लाह ने कहा , यह तुम्हारा ख़्याले ख़ाम है वह फ़रज़न्दे रसूल स. हैं। अल ग़रज़ दोनों हाजि़रे खि़दमत हुए इमाम अबू हनीफ़ा ने इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) से पूछा साहब ज़ादे यह तो बताओ कि अगर तुम्हारे शहर में कोई मुसाफि़र आ जाए और उसे क़ज़ाए हाजत करनी हो तो क्या करे और उसके लिये कौन सी जगह मुनासिब होगी ? हज़रत ने बरजस्ता फ़रमाया ! मुसाफि़र को चाहिये कि मकानों की दीवारों के पीछे छुपे , हमसायों की निगाहों से बचे , नहरों के किनारों से परहेज़ करे जिन मुक़ामात पर दरख़्तों के फल गिरते हों उस जगह से परहेज़ करे। मकानों के सहन से अलहदा , शाहराहो और रास्तों से अलग मस्जिदों को छोड़ कर , ना कि़बले की जानिब मुह करे ना पीठ फिर अपने कपड़ों को बचा कर जहाँ चाहे रफ़ये हाजत करे। यह सुन कर इमाम अबू हनीफ़ा हैरान रह गये और अब्दुल्लाह कहने लगे कि मैं न कहता था कि यह फ़रज़न्दे रसूल स. हैं इन्हें बचपन ही में हर कि़स्म का इल्म हुआ करता है।

(बिहार , मनाक़िब व एहतिजाज)

अल्लामा मजलिसी तहरीर फ़रमाते हैं कि एक दिन हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) मकान में तशरीफ़ फ़रमा थे इतने में आपके नूरे नज़र इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) कहीं बाहर से वापस आए। इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने फ़रमाया , बेटे ज़रा इस मिसरे पर मिसरा लगाओ। ‘‘तन्नहाक अन अलक़बीह वल अमस्तोदा ’’ आपने फ़ौरन मिसरा लगाया। ‘‘ वमन औलियतन हसना फ़ज़दहा ’’ बुरी बातों से दूर रहो और उनका इरादा भी न करो। जिसके साथ भलाई करो भर पूर करो। फिर फ़रमाया इस पर मिसरा लगाओ। ‘‘ सतलक़ी मिन अदूका कुल कैद ’’ आपने मिसरा लगाया ‘‘ अज़ाका वल अदो फला तकदा ’’ तरजुमा 1. तुमहारा दुश्मन हर कि़स्म का मकरो फ़रेब करेगा , 2. जब दुश्मन मकरो फ़रेब करे तब भी उसे बुराई के क़रीब नहीं जाना चाहिये।

(बिहारूल अनवार जिल्द 11 पृष्ठ 36 )

हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की इमामत

148 हिजरी में इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की शहादत हुई। उस वक़्त से हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) बाज़ाते ख़ुद फ़राएज़े इमामत के जि़म्मेदार हुए। उस वक़्त सलतनते अब्बासिया के तख़्त पर मन्सूर दवानकी़ बादशाह था। यह वही ज़ालिम बादशाह था जिसको हाथों ला तादाद सादात मजा़लिम का निशाना बन चुके थे। तलवार के घाट उतारे गये , दीवारों में चुनवाये गये या क़ैद रखे गये थे। ख़ुद इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के खि़लाफ़ तरह तरह की साजि़शें की जा चुकी थीं और मुख़तलिफ़ सूरतों से तकलीफ़ें पहुँचाई गई थीं। यहाँ तक कि मन्सूर ही का भेजा हुआ ज़हर था जिससे आप दुनिया से से रूख़सत हुए थे। इन हालात में आपको अपने जानशीन के मुताअल्लिक़ यह क़तई अन्देशा था कि हुकूमते वक़्त उसे जि़न्दा न रहने देगी। इस लिए आपने आख़री वक़्त एक एख़्लाक़ी बोझ हुकूमत के कांधो पर रख देने के लिये यह सूरत एखि़्तयार फ़रमाई कि अपनी जायदाद और घर बार के इन्तेज़ामात के लिये पाँच शख़्सों की एक जमाअत मुक़र्रर फ़रमाई। जिसमें पहला शख़्स खुद ख़लिफ़ाए वक़्त मन्सूर अब्बासी था। इसके अलावा मोहम्मद बिन सुलैमान हाकिमे मदीना और अब्दुल्लाह अफ़ताह जो इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के सिन में बड़े भाई थे और हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) और उनकी वालेदा मुअज़्ज़मा हमीदा ख़ातून।

इमाम (अ.स.) का अन्देशा बिल्कुल सही था और आप का तहफ़्फ़ुज़ भी कामयाब साबित हुआ। चुनान्चे जब हज़रत की वफ़ात की इत्तेला मन्सूर को पहुँची तो उसने पहले तो सियासी मसलेहत से इज़हारे रंज किया। तीन मरतबा ‘‘ इन्ना लिल्लाहे व इन्ना इलैहे राजेऊन ’’ कहा और कहा अब भला जाफ़र का मिस्ल कौन है ? इसके बाद हाकिमे मदीना को लिखा कि अगर जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने किसी शख़्स को अपना वसी मुक़र्रर किया हो तो उसका सर क़लम कर दो। हाकिमे मदीना ने जवाब में लिखा कि उन्होंने तो पाँच वसी मुक़र्रर किये हैं जिनमें से पहले आप खुद हैं। यह जवाब सुन कर मन्सूर देर तक ख़ामोश रहा और सोचने के बाद कहने लगा कि इस सूरत में तो यह लोग क़त्ल नहीं किये जा सकते। इस के बाद दस बरस मन्सूर जि़न्दा रहा लेकिन इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) से कोई ताअररूज न किया और आप मज़हबी फ़राएज़े इमामत की अन्जाम देही में अमनो सुकून के साथ मसरूफ़ रहे। यह भी था कि इस ज़माने में मन्सूर शहरे बग़दाद की तामीर में मसरूफ़ था। जिससे 157 हिजरी यानी अपनी मौत से सिर्फ़ एक साल पहले फ़राग़त हुई। इस लिये वह इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के मुताअल्लिक़ किसी ईज़ा रसानी की तरफ़ मुतावज्जेह नहीं हुआ। मगर इस अहद से क़ब्ल वह सादात कुशी मे कमाल दिखा चुका था।

अल्लामा मक़रेज़ी लिखते हैं कि मन्सूर के ज़माने में बे इन्तेहा सादात शहीद किये गये हैं और जो बचे हैं वह वतन भाग गये हैं। इन्हीं तारीकीने वतन में हाशिम बिन इब्राहीम बिन इस्माईल अल दीबाज बिन इब्राहीम उमर बिनुल हसने मुसन्ना इब्ने इमाम हसन (अ.स.) भी थे। जिन्होने मुल्तान के इलाको में से ख़ान में सुकूनत इख़्तेयार कर ली थी।

(अल निज़ा व अल तख़ासम पृष्ठ 74 प्रकाशित मिस्र)

158 हिजरी के आखि़र में मन्सूर दवांक़ी दुनिया से रूख़सत हुआ और उसका बेटा मेहदी तख़्ते सलतन्त पर बैठा। शुरू में तो उसने भी इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के इज़्ज़तो एहतेराम के खि़लाफ़ कोई बरताव नहीं किया मगर चन्द साल बाद फिर वही बनी फ़ात्मा की मुख़ालेफ़त का जज़बा उभरा और 164 हिजरी में जब वह हज के नाम से हिजाज़ की तरफ़ गया तो इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) को अपने साथ मक्के से बग़दाद ले गया और कै़द कर दिया। एक साल तक हज़रत उसी क़ैद में रहे। फिर उसको अपनी ग़लती का एहसास हुआ और हज़रत को मदीने की तरफ़ वापसी का मौक़ा दिया गया।

मेहदी के बाद उसका भाई हादी 169 हिजरी में तख़्ते सलतन्त पर बैठा और फिर एक साल एक माह तक उसने सलतन्त की। उसके बाद हारून नशीद का ज़माना आया जिसमें इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) को आज़ादी की सांस लेना नसीब नहीं हुई।

(सवाने इमाम मूसा काजि़म पृष्ठ 5 )

अल्लामा तबरेसी तहरीर फ़रमाते हैं कि जब आप दरजाए इमामत पर फ़ाएज़ हुए उस वक़्त आपकी उम्र 20 साल की थी।

(आलामुलवुरा पृष्ठ 171 )

हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के बाज़ करामात

वाकि़याऐ शक़ीक़ बलख़ी

अल्लामा मोहम्मद बिन तलहा शाफ़ेई लिखते हैं कि आपके करामात ऐसे हैं कि इनको देख कर अक़्लें चकरा जाती हैं मिसाल के लिए मुलाहेज़ा हों 149 हिजरी में शक़ीक़ बलख़ी हज के लिये गये। इनका बयान है कि जब मुक़ामे क़ादसिया में पहुँचा तो देखा कि एक निहायत ख़ूब सूरत जवान जिनका रंग सांवला (गन्दुम गूं) था वह एक अज़ीम मजमे में तशरीफ़ फ़रमा हैं। जिस्म उनका ज़ईफ़ है वह अपने कपड़ों के ऊपर एक कम्बल डाले हुए हैं और पैरों में जूतियाँ पहने हुए हैं। थोड़ी देर बाद वह मजमें से हट कर एक अलाहेदा मक़ाम पर जा कर बैठ गए मैंने दिल में सोचा कि यह सूफ़ी हैं और लोगों पर ज़ादे राह के लिये बार बनाना चाहते हैं मैं अभी उसको ऐसी तम्बीह करूंगा कि यह भी याद करेगा , ग़जऱ् कि मैं इनके क़रीब गया। जैसे ही मैं उनके क़रीब पहुँचा , वह बोले ऐ , शक़ीक़ बदगुमानी मत किया करो यह अच्छा शेवा नहीं है। इसके बाद वह फ़ौरन उठ कर रवाना हो गये। मैंने ख़्याल किया कि यह मामला क्या है। उन्होंने मेरा नाम ले कर मुझे मुख़ातिब किया और मेरे दिल की बात जान ली। इस वाकि़ए से मैं इस नतीजे पर पहुँचा कि हो न हों यह कोई अब्दे सालेह हैं। बस यही सोच कर मैं उनकी तलाश में निकला और उनका पीछा किया , ख़्याल था कि वह मिल जाएं , मैं उनसे कुछ सवालात करूं , लेकिन न मिल सके। इनके चले जाने के बाद हम लोग भी रवाना हो हुए। चलते चलते जब हम वादिए फि़जा़ में पहुँचे तो हमने देखा कि वही जवान सालेह यहां नमाज़ में मशग़ूल हैं और उनके आज़ा व जवारे बेद की मानिन्द काँप् रहे हैं और उनकी आँखों से आँसू जारी हैं। मैं यह सोच कर उनके क़रीब गया की अब उनसे माफ़ी तलब करूँगा। जब वह नमाज़ से फ़ारिग़ हुए तो बोले ऐ शक़ीक़ ख़ुदा का क़ौल है कि जो तौबा करता है मैं उसे बख़्श देता हूँ। इसके बाद फिर रवाना हो गये। अब मेरे दिल में आया कि यक़ीनन यह बन्दाए आबिद कोई अबदाल हैं , क्यों कि दो बारा यह मेरे इरादे से अपनी वाक़फि़यत ज़ाहिर कर चुका है। मैंने हर चन्द फिर उनसे मिल ने की सई की लेकिन वह न मिल सके। जब मैं मंजि़ले जबाला पर पहँुचा तो देखा कि वही जवान एक कुएं की जगत पर बैठे हुए हैं , उसके बाद उन्होंने एक कूज़ा निकाल कर कुएं से पानी लेना चाहा , नागाह उनके हाथ से कूज़ा छूट कर कुऐं में गिर गया , मैंने देखा कि कूज़ा गिरने के बाद उन्होंने आसमान की तरफ़ मुँह कर के बारगाहे अहदियत में कहा मेरे पालने वाले जब मैं प्यासा होता हूँ तू ही सेराब करता है और भूखा होता हूँ तो तू ही खाना देता है , खुदाया ! इस कूज़े के अलावा मेरे पास और कोई बरतन नहीं है , मेरे मालिक! मेरा कूज़ा पूर आब बरामद कर दे। उस जवान सालेह का यह कहना था कि कुऐ का पानी बुलन्द हुआ और ऊपर तक आ गया। आपने हाथ बढ़ा कर अपना कूज़ा पानी से भरा हुआ ले लिया और वज़ू फ़रमा कर चार रकअत नमाज़ पढ़ी। उसके बाद आपने रेत की एक मुठ्ठी उठाई और पानी में डाल कर खाना शुरू किया। यह देख कर मैं अज़्र परदाज़ हुआ। मुझे भी कुछ इनायत हो मैं भूखा हूँ। आपने वही कूज़ा मेरे हवाले कर दिया जिसमें रेत भरी थी। ख़ुदा की क़सम। जब मैंने उसमे से खाया तो उसे ऐसा लज़ीज़ सत्तू पाया जैसा मैंने खाया ही न था। फिर उस सत्तू में एक ख़ास बात यह थी कि जब तक सफ़र में रहा , भूखा नहीं हुआ। इसके बाद आप नज़रों से ग़ायब हो गये। जब मैं मक्का मोअज़्ज़मा पहुँचा तो मैंने देखा कि एक बालू (रेत) के टीले के किनारे मशग़ूले नमाज़ हैं और हालत आपकी यह है कि आपकी आँखों से आँसू जारी हैं और बदन पर ख़ुशू व ख़ुज़ू के आसार नुमाया हैं आप नमाज़ ही में मशग़ूल थे कि सुबह हो गई , आपने नमाज़े सुबह अदा फ़रमाई और उससे उठ कर तवाफ़ का इरादा किया , फिर सात बार तवाफ़ करने के बाद एक मक़ाम पर ठहरे। मैंने देखा कि आपके गिर्द बेशुमार हज़रात हैं और सब बेइन्तेहां ताज़ीम व तकरीम कर रहे हैं। मैं चुंकि एक ही सफ़र में करामात देख चुका था इस लिये मुझे बहुत ज़्यादा फि़क्र थी कि यह मालूम करूं कि यह बुज़ुर्ग कौन हैं ? चुनान्चे मैं उनके गिर्द जो लोग जमा थे उनके क़रीब गया और मैंने पूछा कि यह साहबे करामात कौन हैं , उन्होंने कहा कि यह फ़रज़न्दे रसूल हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) हैं , मैंने कहा बेशक ऐसे करामात जो मैंने देखे वह इसी घराने के लिये सज़ावार हैं।

(मतालेबुल सुऊल पृष्ठ 279, नूरूल अबसार पृष्ठ 135 व शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 193 सवाहेक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 121, अरजहुल मतालिब पृष्ठ 452 )

मुवर्रिख़ ज़ाकिर हुसैन लिखते हैं कि शक़ीक़ इब्ने इब्राहीम बल्ख़ी का इन्तेक़ाल 190 हिजरी में हुआ था।(तारीख़े इस्लाम जिल्द 1 पृष्ठ 59 )

इमाम शिबली लिखते हैं कि एक मरतबा ईसा मदाएनी हज के लिये गए और एक साल मक्का में रहने के बाद वह मदीना चले गये। इनका ख़्याल था कि वहां भी एक साल गुजा़रे गें , मदीना पहुँच कर उन्होंने जनाबे अबूज़र के मकान में क़याम किया। मदीने में ठहरने के बाद उन्होंने इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) वहां आना जाना शुरू किया। मदाईनी का बयान है कि एक शब को बारिश हो रही थी मैं उस वक़्त इमाम (अ.स.) की खि़दमत में हाजि़र था। थोड़ी देर के बाद आपने फ़रमाया कि ऐ ईसा तुम फ़ौरन अपने मकान चले जाओ क्यों कि तुम्हारा मकान तुम्हारे असासे पर गिर गया है और लोग सामान निकाल रहे हैं। यह सुन कर मैं फ़ौरन मकान की तरफ़ गया , देखा कि घर गिर चुका है और लोग मकान से सामान निकाल रहे हैं। दूसरे दिन जब हाजि़र हुआ तो इमाम (अ.स.) ने पूछा कि कोई चीज़ चोरी तो नहीं गई , मैंने अजऱ् कि एक तश्त नहीं मिलता जिसमें वज़ू किया करता था। आपने फ़रमाया वह चोरी नहीं गया बल्कि इन्हेदाम मकान से क़ब्ल तुम उसे बैतुल ख़ला में रख कर भूल गये हो , तुम जाओ और मालिक की लड़की से कहो वह ला देगी। चुनान्चे मैंने ऐसा ही किया और तश्त मिल गया।

(नूरूल अबसार पृष्ठ 135 )

अल्लामा जामी तहरीर फ़रमाते हैं कि एक शख़्स ने एक सहाबी के हमराह 100 दीनार हुजू़र मूसा काजि़म (अ.स.) की खि़दमत में बतौरे नज़र इरसाल किया वह उसे ले कर मदीना पहुँचा , यहाँ पहुँच कर उसने सोचा कि इमाम के हाथों में इसे जाना है लेहाज़ा पाक कर लेना चाहिये। वह कहता है कि मैंने इन दीनारों को जो अमानत थे शुमार किया 99 थे। मैंने उनमें अपनी तरफ़ से एक दीनार शामिल कर के 100 पूरा कर दिया। जब मैं हज़रत की खि़दमत में हाजि़र हुआ तो आपने फ़रमाया सब दीनार ज़मीन पर डाल दो। मैंने थोली खोल कर सब ज़मीन पर निकाल दिया। आपने मेरे बताए बग़ैर इसमे से मेरा वही दीनार जो मैंने मिलाया था निकाल कर मुझे दे दिया और फ़रमाया भेजने वाले ने अदद का लेहाज़ नहीं किया बल्कि वज़न का लेहाज़ किया है जो पूरा 99 होता है।

एक शख़्स का कहना है कि मुझे अली बिन यक़तीन ने एक ख़त दे कर इमाम (अ.स.) की खि़दमत में भेजा। मैंने हज़रत की खि़दमत में पहुँच कर उनका ख़त दिया , उन्होंने उसे पढ़े बग़ैर आस्तीन से एक ख़त निकाल कर मुझे दे दिया और कहा कि उन्होंने जो कुछ लिखा है उसका यह जवाब है।

(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 195 )

अबू बसीर का कहना है कि इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) दिल की बाते जानते थे और हर सवाल का जवाब रखते थे हर जानदार की ज़बान से वाकि़फ़ थे।

(रवाहल मुस्तफ़ा पृष्ठ 162 )

अबू हमज़ा बताऐनी का कहना है कि मैं एक मरतबा हज़रत के साथ हज को जा रहा था कि रास्ते में एक शेर बरामद हुआ , उसने आपके कान में कुछ कहा , आपने उसको उसी ज़बान में जवाब दिया और वह चला गया। हमारे सवाल के जवाब में आपने फ़रमाया कि उसने अपनी शेरनी की तकलीफ़ के लिये दुआ की ख़्वाहिश की , मैंने दुआ कर दी और वह वापस चला गया।

(तज़किरतुल मासूमीन पृष्ठ 193 )

अली बिन यक़तीन इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के ख़ास असहाब में से थे। 121 हिजरी में ब मुक़ाम कूफ़ा पैदा हुए और 182 हिजरी में ब मुक़ाम बग़दाद ब उम्र 57 साल फ़ौत हुए। उन्होंने कई किताबें भी लिखी हैं।

(रेजाल तूसी पृष्ठ 355 प्रकाशित नजफ़ अशरफ़)

ख़लीफ़ा मेंहदी अब्बासी और हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ स . )

मन्सूर दवानक़ी के बाद 157 हिजरी में मेंहदी अब्बासी ख़लीफ़ा ए वक़्त क़रार पाया। उसने अपनी जि़न्दगी में कुछ अच्छे काम भी किए हैं। उसने बहुत से मुलहिदों को ख़ाक में मिला दिया है। मानी जो फ़लसफ़ी था(मज़दक मुतवफ्फा चौथी सदी के शुरुआत से मख़लूत गुमराह कुन अक़ीदे की नशो नुमा करता था) को इसने क़त्ल करा दिया था। इसके अलावा वह आले मोहम्मद के साथ भी इसकी रविश मोतदिल थी लेकिन यह ऐतिदाल बहुत दिनों बाक़ी नहीं रहा और यह अपने आबाओ अजदाद के जादे पर बहुत थोड़े ही अर्से चल निकला और इस अम्र की कोशिश करने लगा कि आले मोहम्मद स. का कोई मोअज़जि़ज़ फ़र्द रहने न पाये बल्कि कोई ऐसा शख़्स भी महफ़ूज़ न रहे जो आले मोहम्मद स. को दोस्त रखता हो। तवारीख़ में है कि उसने याक़ूब इब्ने दाऊद को जो ज़ैदी मज़हब के थे अपना वज़ीरे आज़म बना कर रेफ़ाहे आम के तमाम काम इनसे लिए और यह मालूम होने के बाद कि यह दोस्तदारे आले मोहम्मद हैं उन्हे क़ैद कर दिया।

साहेबे हबीब उस सैर लिखते हैं कि याकू़ब हमेशा से दोस्त दाराने अहले बैत में से था। यहिया इब्ने जै़द और इब्राहीम बरादरे नफ़्से ज़किया के रफ़ीक़ों में से था। शहादते इब्राहीम के बाद मन्सूर ने उसे क़ैद कर लिया था। मेंहदी ने लाएक़ देख कर उसे वज़ीर बना लिया था।(तारीख़े इस्लाम जिल्द 1 पृष्ठ 56 ) जब लोगों ने मेंहदी को बावर करा दिया कि यह आले मोहम्मद स. का ख़ास दिलदादा है तो उस ने उनसे कहा कि मैं तुम्हें एक बाग़ एक लौड़ीं और एक लाख दिरहम देता हूँ तुम क़ैद ख़ाने में जा कर फ़ुला अलवी को क़त्ल कर दो। उन्होंने सब कुछ लेने के बाद इस अलवी को इसके दो रफ़ीको समैत कै़द ख़ाने से रेहा कर दिया और उसे काफ़ी माल दे कर इससे कहा कि यहाँ से चले जाओ। चुनान्चे वह किसी तरफ़ चले गये। चन्द दिनों के बाद इस कनीज़ ने जो उन्हें मिली थी मेंहदी से बता दिया कि उन्होंने अलवी को क़त्ल करने के बजाए रेहा कर दिया और यही नहीं बल्कि तेरे दिये हुए माल से उसे नवाज़ा भी है। मेंहदी ने आपकी तलाशी ली और वाक़ेयात का पता भी लगाया वाक़ेया चूंकि सही था इस वजह से वह बेरहम हो गया और उसने उन्हें क़ैद का हुक्म दे दिया। याकू़ब क़ैद कर दिये गये और मुद्दतुल उमर क़ैद में रहे।

अल्लामा शाफ़ेई लिखते हैं कि याक़ूब को मेंहदी के हुक्म से उस कुऐं में क़ैद किया गया जिसमें रौशनी न जा सकती थी। जिसके नतीजे में वह बिल्कुल अन्धे हो गये। याक़ूब उसी क़ैद ख़ाने में पड़े रहे यहाँ तक कि हारून रशीद का ज़माना आया और उसने उन्हें रेहा कर के मक्का मोअज़्ज़मा भेज दिया जहाँ यह 187 हिजरी में इन्तेक़ाल फ़रमा गये। इन्ना लिल्लाहे व इन्ना इलैहे राजेऊन।

(मरातुल जेनान जिल्द 1 पृष्ठ 419 प्रकाशित हैदराबाद दक्कन)


इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की बग़दाद में क़त्ल के लिये तलबी

जैसा कि मैंने ऊपर तहरीर किया है मेंहदी चन्द दिनों से ज़्यादा आले मोहम्मद स. का तरफ़ दार नहीं रहा। आखि़र वह वक़्त आ गया कि उसने इमाम (अ.स.) को मदीने से बग़दाद तलब कर लिया। इस तलबी का मक़सद यह था कि वहां बुला कर उन्हें क़त्ल करा दे। बहर सूरत इसी मक़सद के पेशे नज़र हुक्म पहुँचा कि आप बग़दाद हाजि़र हों। इमाम (अ.स.) हसबुल हुक्म वहां से रवाना हो गये।

अल्लामा शिबलंजी और अल्लामा जामी लिखते हैं कि आप मंजि़ले ज़बाला पर पहुँचे तो आप से अबूख़ालिद ने मुलाक़ात की। अबू ख़ालिद कहते हैं कि मैंने हज़रत मूसा काजि़म (अ.स.) को देखा कि आप उन लोगों की हिरासत में तशरीफ़ ला रहे हैं जो बग़दाद से आपको लाने के लिये भेजे गये थे। मैं हज़रत के क़रीब गया और मैंने सलाम किया , मुझे देख कर इमाम (अ.स.) ख़ुश हो गये और मुझसे फ़रमाने लगे कि फ़लां फ़लां चीज़ें ख़रीद कर अपने पास रख लेना जब मैं वापस आऊंगा तो ले लूगां। मैंने अजऱ् कि बहुत बेहतर। थोड़ी देर के बाद आपने फ़रमाया , अबू ख़ालिद रंजिदा क्यों हो ? मैंने अजऱ् कि , मौला आप दुशमनों के मुँह में जा रहे हैं , डरता हूँ कि जाने वह क्या करें। आपने फ़रमाया , घबराओ नहीं मैं इन्शा अल्लाह वापस आऊगां और अबू ख़ालिद सुनो तुम फ़लां तारीख़ ब वक़्त शाम मेरा इन्तेज़ार करना , यह फ़रमा कर आप रवाना हो गये और बग़दाद जा पहुँचे।

अल्लामा इब्ने तल्हा शाफ़ेई व अल्लामा जामी लिखते हैं कि बग़दाद पहुँचते ही आप क़ैद कर दिये गये। अल्लामा मजलिसी लिखते हैं कि थोड़े दिन क़ैद रखने के बाद मेंहदी ने आपको क़त्ल करा देना चाहा और इसी लिये इसने हमीद इब्ने क़हतबा को आधी रात के वक़्त बुला भेजा और उस से कहा कि मेरे और तुम्हारे बाप और भाई के दरमियान कितने अच्छे ताअल्लुक़ात थे और सुनों इस वक़्त मुझे तुम से एक ज़रूरी काम लेना है क्या तुम उसे कर सकोगे , इसने कहा कि हाँ ज़रूर करूगां और ऐ बादशाह अगर तामील इरशाद में मेरा माल , मेरी जान , मेरी औलाद हत्ता कि मेरा ईमान भी काम आजाए तो परवाह नहीं। ख़लीफ़ा मेंहदी ने कहा कि ख़ुदा तुम्हारा भला करे , मुझे तुमसे इसी की तवक़्क़ो थी। देखो काम यह है कि तुम इमाम मूसा काजि़म को सुबह होने से पहले क़त्ल कर दो। उसने कहा बेहतर है। बात तय हो गई , हमीद चला गया। मेंहदी सोने चले गया। अभी थोड़ी ही देर सोया था कि अमीरल मोमेनीन (अ.स.) ख़्वाब में तशरीफ़ लाये और उससे कहने लगे कि क्या तुम्हें हुकूमत इसी लिये दी गई है कि तुम अहले क़राबत को तबाह कर दो , होश में आओ और अपने इरादाऐ नजिस से बाज़ आओ। यह देख कर मेंहदी बेदार हो गया और उसने फ़ौरन हमीद को कहला भेजा कि मैंने जो हुक्म दिया है उस पर आज अमल न करना। इसी ख़्वाब की वजह से मेंहदी ने उन्हें रेहा कर के मदीने भेज दिया।

अल्लामा जामी (अलैहिर् रहमा) लिखते हैं कि इमाम (अ.स.) वापस आ रहे थे और अबू ख़ालिद ज़बावली का हाल यह था कि जिस दिन से इमाम (अ.स.) ज़बाला से रवाना हुए थे यह बड़ी मुश्किलों से दिन रात काट रहे थे। जब वह दिन आया जिस दिन इमाम (अ.स.) ने पहुँचने का वायदा फ़रमाया था यह घर से निकल कर बग़दाद के रास्ते पर खड़े हो गये। सूरज डूबते ही उनका दिल डूबने लगा और उन्हें यह शुब्हा पैदा होने लगा कि शायद इमाम (अ.स.) पर कोई मुसिबत आ गई है। नागाह देखा कि ईराक़ की तरफ़ से ग़ुबार नमूदार हुआ और उस के आगे इमाम (अ.स.) ख़च्चर पर सवार चले आ रहे हैं। यह देख कर अबू ख़ालिद मसरूर हो गये और इस्तेक़बाद के लिये दौड़ पड़े। इमाम (अ.स.) ने फ़रमाया ऐ अबू खालिद अपने कहने के मुताबिक़ वापस आ गया हूँ लेकिन एक मौक़ा ऐसा भी आने वाला है कि बग़दाद जा कर वापस न आ सकूगां।

(नूरूल अबसार पृष्ठ 130, दमेए साकेबा जिल्द 3 पृष्ठ 13, बा हवालाए मनाकि़ब व बेहार जिल्द 9 पृष्ठ 64, शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 193, मतालेबुल सुऊल पृष्ठ 278 ) फिर वहां से रवाना हो कर आप मदीना ए मुनव्वरा पहुँचे और बा दस्तूर फ़राएज़े इमामत की अदाएगी में मसरूफ़ हो गये।

इमाम मूसा ए काजि़म (अ.स.) हादी अब्बासी की क़ैद में

तवारीख़ में है कि मेहदी के बाद उसका बेटा हादी अब्बासी 22 मोहर्रम 169 हिजरी मुताबिक़ 785 ई0 में तख़्ते खि़लाफ़त पर बैठा। मिस्टर ज़ाकिर हुसैन लिखते हैं कि हादी बड़ा खुद सर , खुद राय , जि़द्दी , ख़ूंख़ार और बे रहम था। शराब पीता और लहो आब में मसरूफ़ रहता था।

हादी को आले मोहम्मद (स. अ.) से वही बुग़्ज़ व एनाद था जो उसके आबाव अजदाद को था , उसी की सलतन्त में और उसी के अहद में हुकूमत में मदीने के गर्वनर ने इमाम हसन (अ.स.) की औलाद में से बाज़ अफ़राद का बादा ख़वारी का झूठा इल्ज़ाम लगवा कर पिटवाया और उनके गले में रस्सियां बंधवा कर मदीने के कूचे व बाज़ार में तशहीर कराया और कई सौ बनी हसन को क़त्ल कराया और उनकी नुमायां फ़र्द जनाबे हुसैन बिन अली बिन हसन मुसल्लस बिन हसने मुसन्ना का सर कटवा कर बग़दाद भिजवा दिया और पूरी ताक़त से सादात पर ज़ुल्म करता रहा।

(तारीख़े इस्लाम जिल्द 1 पृष्ठ 7 )

हादी ने हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के साथ वही कुछ किया जो इमाम के आबाव अजदाद के साथ करते आय थे।

अल्लामा इब्ने हजर मक्की लिखते हैं कि ख़लीफ़ा हादी बिन मेहदी ने हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) को कै़द कर दिया। बाप क़ैद की मुसिबतों को बरदाश्त कर ही रहे थे कि एक शब हज़रत अली (अ.स.) ने उसके सामने एक आयत पढ़ी जिसका तरजुमा यह है कि क्या इसी लिये तुम हाकिम बने हो कि फ़साद बरपा करो और क़तए रहम करो। इस ख़्वाब से वह बेदार हुआ और उसने फ़ौरन आपकी रेहाई का हुक्म दिया।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 122 व अरजहुल मतालिब पृष्ठ 453 )

हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के अख़लाक़ व आदात

अल्लामा अली नक़ी लिखते हैं कि हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) उस मुक़द्दस सिलसिले की एक फ़र्द थे जिसको ख़ालिक़ ने नौए इन्सान के लिये मेयारे कमाल क़रार दिया था। इसी लिये उनमें से हर एक अपने वक़्त में बेहतरीन इख़लाक़ व औसाफ़ का मुरक़्क़ा था। बे शक यह एक हक़ीक़त है कि बाज़ अफ़राद में बाज़ सिफ़ात इतने मुम्ताज़ नज़र आते हैं कि सब से पहले उन पर नज़र पड़ती है। चुनान्चे सातवें इमाम (अ.स.) में तहम्मुल व बरदाश्त और ग़ुस्सा ज़ब्त करने की सिफ़ात इतनी नुमाया थी कि आपका लक़ब काजि़म क़रार पा गया। जिसके मानी ही हैं ग़ुस्से को पीने वाला। आपको कभी किसी ने तुर्श रूई और सख़्ती के साथ बात करते नहीं देखा और इन्तेहाई नागवार हालात में भी मुस्कुराते हुये नज़र आये।

मदीने के एक हाकिम से आपको सख़्त तकलीफ़े पहुँची यहां तक कि वह जनाबे अमीर (अ.स.) की शान में भी नाज़ेबा अल्फ़ाज़ इस्तेमाल किया करता था मगर हज़रत ने अपने असहाब को हमेशा उसके जवाब देने से रोका।

जब अस्हाब ने उसकी ग़ुस्ताखि़यों की बहुत शिकायत की और कहा कि अब हमें ज़ब्त की ताब नहीं हमें उनसे इन्तेक़ाम लेने की इजाज़त दी जाऐ तो हज़रत ने फ़रमाया कि मैं ख़ुद उसका तदारूक करूगां। इस तरह उनके जज़्बात में सुकून पैदा करने के बाद हज़रत ख़ुद उस शख़्स के पास उसके ख़ेमों में तशरीफ़ ले गये और कुछ ऐसा एहसान और हुसने सुलूक फ़रमाया कि वह अपनी ग़ुस्ताखि़यों पर नादिम हुआ और अपने तरज़े अमल को बदल दिया। हज़रत ने अपने अस्हाब से सूरते हाल बयान फ़रमा कर पूछा कि जो मैंने उसके साथ किया वह अच्छा था या जिस तरह तुम लोग उसके साथ करना चाहते थे। सब ने कहा यक़ीनन हुज़ूर ने जो तरीक़ा इख़्तेयार फ़रमाया वही बेहतर था। इस तरह आपने अपने जद्दे बुजुर्गवार हज़रत अमीर (अ.स.) के उस इरशाद को अमल में ला कर दिख लाया जो आज तक नहजुल बलाग़ा में मौजूद है कि अपने दुश्मन पर ऐहसान के साथ फ़तेह हासिल करो क्यों कि यह दो कि़स्म की फ़तेह में ज़्यादा पुर लुत्फ़े कामयाबी है। बेशक इस लिये फ़रीक़े मुख़ालिफ़ के ज़र्फ़ का सही अन्दाज़ा ज़रूरी है और इसी लिये हज़रत अली (अ.स.) ने इन अल्फ़ाज़ के साथ यह भी फ़रमाया है कि ख़बरदार! यह अदम तशद्दुद का तरीक़ा न अहल के साथ इख़्तेयार न करना वरना उसके तशद्दुद में इज़ाफ़ा हो जायेगा।

यक़ीनन ऐसे अदम तशद्दुद के मौक़े को पहचानने के लिये ऐसी ही बालीग़ निगाह की ज़रूरत है जैसी इमाम (अ.स.) को हासिल थी मगर यह उस वक़्त में है जब मुख़ालिफ़ की तरफ़ से कोई ऐसा अमल हो चुका हो जो उसके साथ इन्तेक़ामी तशद्दुद का जवाज़ पैदा कर सके लेकिन अगर उसकी तरफ़ कोई एक़दाम अभी ऐसा न हुआ हो तो यह हज़रात बहर हाल उसके साथ ऐहसान करना पसन्द करते थे ताकि उसके खि़लाफ़ हुज्जत क़ायम हो और उसे ऐसे जारेहाना एक़दाम के लिये तलाश से भी कोई उज़्र न मिल सके बिल्कुल इसी तरह जैसे इब्ने मुल्जिम के साथ जनाब अमीर (अ.स.) को शहीद करने वाला था आखि़र वक़्त तक जनाबे अमीर (अ.स.) एहसान फ़रमाते रहे। इसी तरह मोहम्मद बिन इस्माईल के साथ जो इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की जान लेने के बाएस हुआ। आप एहसान फ़रमाते रहे यहां तक कि इस सफ़र के लिये जो उसने मदीने से बग़दाद की जानिब ख़लीफ़ा अब्बासी के पास इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की शिकायतें करने के लिये किया था। साढ़े चार सौ दीनार और पन्द्रह सौ दिरहम की रक़म ख़ुद हज़रत ही ने अता फ़रमाई थी जिसको वह ले कर रवाना हुआ था।

आपको ज़माना बहुत ना साज़गार मिला था न उस वक़्त वह इल्मी दरबार क़ायम रह सकता था जो इमामे जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के ज़माने में क़ायम रह चुका था। न दूसरे ज़राए से तबलीग़ो इशाअत मुमकिन थी। बस आपकी ख़ामोश सीरत ही थी जो दुनिया को आले मोहम्मद (अ.स.) की तालीमात से रूशेनास बना सकती थी। आप अपने मजमूओ में भी अकसर बिलकुल ख़ामोश रहे थे। यहां तक कि जब तक आपसे किसी अमर के मुताअल्लिक़ कोई सवाल न किया जाय आप गुफ़्तुगू में इब्तेदा भी न फ़रमाते थे। इसके बाद आपकी इल्मी जलालत का सिक्का दोस्त और दुश्मन सब के दिल पर क़ायम था और आपकी सीरत की बलन्दी को भी सब मानते थे। इसी लिये आम तौर पर आपको इबादत और शब जि़न्दा दारी की वजह से अब्दे सालेह के लक़ब से याद किया जाता था। आपकी सख़ावत और फ़य्याज़ी का भी शोहरा था और फ़ोक़राए मदीना की अकसर पोशीदा तौर पर ख़बर गीरी फ़रमाते थे। हर नमाज़े सुब्ह की ताक़ीबात के बाद आफ़ताब के बलन्द होने के बाद से पेशानी सजदे में रख देते थे और ज़वाल के वक़्त सर उठाते थे। क़ुरआने मजीद की निहायत दिलकश अन्दाज़ में तिलावत फ़रमाते थे खुद भी रोते जाते थे और पास बैठने वाले भी आपकी आवाज़ से मुताअस्सिर हो कर रोते थे।

(सवानेह मूसा काजि़म पृष्ठ 8 व आलामुल वुरा पृष्ठ 178 )

अल्लामा शिबलंजी लिखते हैं कि हज़रत मूसा काजि़म (अ.स.) का यह तरीक़ा और वतीरा था कि आप फ़की़रों को ढ़ूंढा़ करते थे और जो फ़क़ीर आपको मिल जाता था उसके घर में रूप्या पैसा अशरफ़ी और खाना , पानी पहुँचाया करते थे और यह अमल आपका रात के वक़्त होता था। इस तरह आप फ़ुक़राए मदीना के बे शुमार घरों का आज़ूक़ा चला रहे थे और लुत्फ़ यह है कि उन लोगों तक को यह पता न था कि हम तक सामान पहुँचाने वाला कौन है। यह राज़ उस वक़्त खुला जब आप दुनिया से रेहलत फ़रमा गये।

(नूरूल अबसार पृष्ठ 136 प्रकाशित मिस्र)

इसी किताब के पृष्ठ 134 में है कि आप हमेशा दिन भर रोज़ा रखते और रात भर नमाज़ें पढ़ा करते थे। अल्लामा ख़तीबे बग़दादी लिखते हैं कि आप बे इन्तेहा इबादत व रियाज़त फ़रमाया करते थे और ताअते ख़ुदा में इस दरजा शिद्दत बरदाश्त किया करते थे जिसकी कोई हद न थी।

एक दफ़ा मस्जिदे नबवी में आपको देखा गया कि आप सजदे में मुनाजात फ़रमा रहे हैं और इस दरजा सजदे को तूल दिया कि सुबह हो गई।

(दफ़यात अल अयान जिल्द 2 पृष्ठ 131 )

एक शख़्स आपकी बराबर बिला वजह बुराईयां करता था जब आपको इसका इल्म हुआ तो आपने एक हज़ार दीनार (अशरफ़ी) उसके घर पर बतौर इनाम भिजवा दिया जिसके नतीजे में वह अपनी हरकत से बाज़ आ गया।

(रवाएह अल मुस्तफ़ा पृष्ठ 264 )

इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की तसनीफ़ात

आपको अगरचे तसनीफ़ात का मौका़ ही नहीं नसीब हुआ लेकिन फिर भी आप उसकी तरफ़ मुतवज्जेह रहे हैं। आपकी एक तसनीफ़ जिसका जि़क्र अल्लामा चलपी बा हवाला हाफि़ज़ अबु नईम असफ़हानी किया है वह मसनदे इमाम मूसा काजि़म है।(कशफ़ुल ज़नून पृष्ठ 433 व अरजहुल मतालिब पृष्ठ 454 )

आपकी रिवायत की हुई हदीसे

आपसे बहुत सी हदीसें मरवी हैं जिनमें की दो यह हैं

1. आं हज़रत (स. अ.) फ़रमाते हैं कि लड़के का अपने वालेदैन के चेहरों पर नज़र करना इबादत है।

2. झूठ और ख़यानत के अलावा मोमिन हर आदत इख़्तेयार कर सकता है।

(नूरूल अबसार पृष्ठ 134 )

अहमद बिन हम्बल का कहना है कि आपका सिलसिलाए रवायत इतना अहम है कि ‘‘ लौ क़दी अल्लल मजनून ला फ़ाक़ेहा ’’ यानी अगर मजनून पर पढ़ कर दम कर दिया जाय तो उसका जुनून जाता रहे।

(मनाक़िब जिल्द 5 पृष्ठ 73 )

ख़लीफ़ा हारून रशीद अब्बासी और हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ स . )

पांच रबीउल अव्वल 170 हिजरी को मेहदी का बेटा अबू जाफ़र हारून रशीद अब्बासी ख़लीफ़ाए वक़्त बनाया गया। उसने अपना वज़ीरे आज़म यहीया बिन ख़ालिद बर मक्की को बनाया और इमाम अबू हनीफ़ा के शागिर्द अबू यूसुफ़ को क़ाज़ी क़ज़्ज़ाता का दरजा दिया। बा रवायत ज़ेहनी उसने अगरचे बाज़ अच्छे काम भी किये हैं लेकिन लहो लाब और हुसूले लज़्ज़ाते मम्नुआ में मुन्फ़रीद था।

इब्ने ख़ल्दून का कहना है कि यह अपने दादा मन्सूर दवानक़ी के नक़्शे क़दम पर चलता था फ़कऱ् इतना था कि वह बख़ील था और यह सख़ी। यह पहला ख़लीफ़ा है जिसने राग रागनी और मौसीक़ी को शरीफ़ पेशा क़रार दिया था। उसकी पेशानी पर भी सादात कुशी का नुमायां दाग़ है। इल्मे मौसीक़ी माहिर अबू इस्हाक़ इब्राहीम मौसली उसका दरबारी था। हबीब अल सैर में है कि यह पहला इस्लामी बादशाह है जिसने मैंदान में गेंद बाज़ी की और शतरंज के खेल का शौक़ किया। अहादीस में है कि शतरंज खेलना बहुत बड़ा गुनाह है। जामेए अल अख़बार में है कि जब इमामे हुसैन (अ.स.) का सर दरबारे यज़ीद में पहुँचा था तो वह शतरंज खेल रहा था। तारीख़ अल ख़ुल्फ़ा स्यूती में है कि हारून रशीद अपने बाप की मदख़ूला लौंड़ी पर आशिक़ हो गया। उसने कहा कि मैं तुम्हारे बाप के पास रह चुकी हूँ तुम्हारे लिये हलाल नहीं हूँ। हारून ने क़ाज़ी अबू युसूफ़ से फ़तवा तलब किया। उन्होंने कहा आप इसकी बात क्यों मानते हैं यह झूठ भी तो बोल सकती है। इस फ़तवे के सहारे से उसने उसके साथ बद फ़ेली (बलात्कार) की।

अल्लामा स्यूती यह भी लिखते हैं कि बादशाह हारून रशीद ने एक लौंड़ी ख़रीद कर उसके साथ उसी रात बिला इस्तेबरा जिमआ (सम्भोग) करना चाहा। क़ाज़ी अबू युसूफ़ ने कहा कि इसे किसी लड़के को हिबा कर के इस्तेमाल कर लिजिये।

अल्लामा स्यूती का कहना है कि इस फ़त्वे की उजरत क़ाज़ी अबू युसूफ़ ने एक लाख दिरहम ली थी।

अल्लामा इब्ने ख़ल्क़ान का कहना है कि अबू हनफि़या के शार्गिदों में अबू युसूफ़ की नज़ीर न थी। अगर यह न होते तो इमाम अबू हनीफ़ा का जि़क्र भी न होता।

तारीख़े इस्लाम मिस्टर जा़किर हुसैन मे ब हवाला सहाह अल अख़बार में है कि हारून रशीद का दरजा सादात कुशी में मन्सूर के कम न था। उसने 176 हिजरी में हज़रत नफ़्से ज़किया (अल रहमा) के भाई यहीया को दीवार में जि़न्दा चुनवा दिया था। उसी ने इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) को इस अन्देशे से कि कहीं वह वली अल्लाह मेरे खि़लाफ़ अलमे बग़ावत बलन्द न कर दें अपने साथ हिजाज़ से ईराक़ में ला कर क़ैद कर दिया और 183 हिजरी में ज़हर से हलाक कर दिया। अल्लामा मजलिसी तहफ़्फ़ुज़े ज़ाएर में लिखते हैं कि हारून रशीद ने दूसरी सदी हिजरी में इमाम हुसैन (अ.स.) की क़ब्र मुताहर की ज़मीन जुतवाई थी और क़ब्र पर जो बेरी का दरख़्त बतौरे निशान मौजूद था उसे कटवा दिया था। जिलाउल उयून और क़म्क़ाम में बाहवाला अमाली शेख़ तूसी मरक़ूम है कि जब इस वाक़ेए की इत्तला जरीर इब्ने अब्दुल हमीद को हुई तो उन्होंने कहा कि रसूले ख़ुदा (स अ व व ) की हदीस ‘‘ अलाअन अल्लाह क़ातेअ अल सिदरता ’’ बेरी के दरख़्त काटने वाले पर ख़ुदा की लानत , का मतलब अब वाज़े हुआ।

(तस्वीरे करबला पृष्ठ 61 प्रकाशित देहली पृष्ठ 1338 )

हारून रशीद का पहला हज और इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की पहली गिरफ़्तारी

मोहम्मद अबुल फि़दा लिखता है कि एनाने हुकूमत लेने के बाद हारून रशीद ने 173 हिजरी मे पहला हज किया।

अल्लामा इब्ने हजर मक्की तहरीर फ़रमाते हैं कि ‘‘ कि जब हारून रशीद हज को आया तो लोगों ने इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के बारे में चुग़ली खाई कि उनके पास हर तरफ़ से माल चला आता है। इत्तेफ़ाक़ से एक रोज़ हारून रशीद ख़ानाए काबा के नज़दीक हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) से मुलाक़ी हुआ और कहने लगा तुम ही हो जिनसे लोग छुप छुप कर बैयत करते है। इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) ने फ़रमाया कि हम दिलों के इमाम हैं और आप जिसमों के। फिर हारून रशीद ने हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) से पूछा कि तुम किस दलील से कहते हो कि हम रसूल (स अ व व ) की ज़ुर्रियत हैं हालांकि तुम अली की औलाद हो और हर शख़्स अपने दादा से मुन्तसिब होता है नाना से मुन्तसिब नहीं होता। हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) ने फ़रमाया कि ख़ुदा ए करीम क़ुरान मजीद में इरशाद करता है ‘‘वमन ज़मुरैत दाऊद सुलैमान व अयूबा व ज़करया व यहया व इसा ” और ज़ाहिर है कि हज़रत ईसा बे बाप के पैदा हुए थे तो जिस तरह महज़ अपनी वालेदा की निस्बत से ज़ुर्रियत अम्बिया में मुल्हक़ हुए उसी तरह हम भी अपनी मादरे गिरामी जनाबे फ़ात्मा (स अ व व ) की निस्बत से जनाबे रसूले खुदा (स अ व व ) की ज़ुर्रियत में ठहरे। फिर फ़रमाया कि जब आयत मुबाहेला नाजि़ल हुई तो मुबाहेले के वक़्त पैग़म्बरे ख़ुदा (स अ व व ) ने सिवा अली (अ.स.) और फ़ात्मा (स अ व व ) और हसन हुसैन (अ.स.) के किसी को नहीं बुलाया इस लिहाज़ से हज़रत हसन (अ.स.) व हज़रत हुसैन (अ.स.) ही रसूल अल्लाह (स. अ.) के बेटे क़रार पाए।

(सवाएके़ मोहर्रेक़ा पृष्ठ 122, नूरूल अबसार पृष्ठ 134 अरजहुल मतालिब पृष्ठ 452 )

अल्लामा इब्ने ख़ल्क़ान लिखते हैं कि हारून रशीद हज करने के बाद मदीना मुनव्वरा आया और ज़्यारत करने के लिये रौज़ा ए मुक़द्देसा नबी (स. अ.) पर हाजि़र हुआ। उस वक़्त उसके गिर्द क़ुरैश और दीगर क़बाएले अरब जमा थे , नीज़ हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) भी साथ थे। हारून रशीद ने हाज़ेरीन पर अपना फ़ख़्र ज़ाहिर करने के लिये क़ब्रे मुबारक की तरफ़ मुख़ातिब हो कर कहा , सलाम हो आप पर ऐ रसूल अल्लाह (स. अ.) ऐ इब्ने अम (मेरे चचा जा़द भाई) हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) ने फ़रमाया कि सलाम हो आप पर मेरे पदरे बुजुर्गवार यह सुन कर हारून के चेहरे का रंग फ़क़ हो गया और उसने हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) को अपने हमराह ले जाकर क़ैद कर दिया।

(दफ़ायात अल अयान जिल्द 2 पृष्ठ 131 व तारीख़े अहमदी पृष्ठ 349 )

अल्लामा इब्ने शहर आशोब तहरीर फ़रमाते हैं कि जिस ज़माने में आप हारून रशीद के क़ैद ख़ाने में थे हारून ने आप का इम्तेहान करने के लिये नेहायत हसीन जमील लड़की , आपकी खि़दमत करने के लिये क़ैद ख़ाने में भेज दी। हज़रत ने जब उसे देखा तो लाने वाले से फ़रमाया कि हारून से जा कर कह देना कि उन्होंने यह हदिया वापस दिया हैं। ‘‘ बल अन्तुम बहदयातकम तफर हूना ’’ वह अताए तौबा लक़ा तो इससे तुम ही ख़ुशी हासिल करो। उसने हारून से वाकि़या बयान किया। हारून ने कहा कि इसे ले जाकर वहीं छोड़ आओ और इब्ने जाफ़र से कहो कि न मैंने तुम्हारी मरज़ी से क़ैद किया और न तुम्हारी मरज़ी से तुम्हारे पास यह लौंड़ी भेजी है , मैं जो हुक्म दूँ तुम्हे वह करना होगा। अल ग़रज़ वह लौंड़ी हज़रत के पास छोड़ दी गई।

चन्द दिनों के बाद हारून ने एक शख़्स को हुक्म दिया कि जा कर पता लगाए कि इस लौंड़ी का क्या रहा। उस ने जो क़ैद ख़ाने में जा कर देखा तो वह हैरान रह गया। वह भागा हुआ हारून के पास आ कर कहने लगा कि वह लौंड़ी तो ज़मीन पर सजदे में पड़ी हुई सुब्बूहुन क़ुद्दूसुन कह रही है और इसका अजब हाल है। हारून ने हुक्म दिया कि उसे इसके सामने पेश किया जाए , जब वह आई तो बिल्कुल मबहूस थी। हारून ने पूछा कि बात क्या है ? उसने कहा कि जब हज़रत के पास गई और उनसे कहा कि मैं आपकी खि़दमत के लिये हाजि़र हुईं हूँ तो आपने एक तरफ़ इशारा कर के फ़रमाया कि यह लोग जब कि मेरे पास मौजूद हैं मुझे तेरी क्या ज़रूरत है। मैंने जब उस सिम्त को नज़र की तो देखा कि जन्नत आरास्ता है और हूरो गि़लमान मौजूद हैं , उनका हुस्नों जमाल देख कर मैं सज्दे में गिर पड़ी और इबादत करने पर मजबूर हो गई। ऐ बादशाह ! मैंने वह चीज़े कभी नहीं देखीं जो क़ैद ख़ाने में मेरी नज़र से गुज़रीं। बादशाह ने कहा कि कहीं तूने सोने की हालत में ख़्वाब न देखा हो। उसने कहा ऐ बादशाह! ऐसा नहीं है मैंने आलमे बेदारी में बचश्मे ख़ुद सब कुछ देखा है। यह सुन कर बादशाह ने उस औरत को किसी महफ़ूज़ मुक़ाम पर पहुँचा दिया और उसके लिये हुक्म दिया कि इसकी निगरानी की जाय ताकि यह किसी से यह वाक़ेया बयान न करने पाय। रावी का बयान है कि इस वाकि़ये के बाद वह ता हयात मशग़ूले इबादत रही और जब कोई उसकी नमाज़ वग़ैराह के बारे में कुछ कहता था तो यह जवाब में कहती थी कि मैंने अब्दे सालेह हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) को इसी तरह करते देखा है। यह पाक बाज़ औरत हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की वफ़ात से कुछ दिनों पहले फ़ौत हो गई।(मनाक़िब इब्ने शहर आशोब जिल्द 5 पृष्ठ 63 )

क़ैद ख़ाने से आपकी रेहाई आप क़ैद खा़ने में तकलीफ़ से दो चार थे और हर कि़स्म की सखि़्तयां आप पर की जा रही थीं कि नागाह बादशाह ने एक ख़्वाब देखा जिससे मजबूर हो कर उसने आपको रेहा कर दिया।

अल्लामा इब्ने हजर मक्की बहवाला अल्लामा मसूदी लिखते हैं कि एक शब को हारून रशीद ने हज़रत अली (अ.स.) को ख़्वाब में इस तरह देखा कि वह एक तेशा (एक तरह का हथियार) लिये हुए तशरीफ़ लाये हैं और फ़रमाते हैं कि मेरे फ़रज़न्द को रेहा कर दे वरना मैं अभी तुझे कैफ़रे किरदाद तक पहुँचा दूँगा। इस ख़्वाब को देखते ही उसने रेहाई का हुक्म दे दिया और कहा कि अगर आप यहां रहना चाहें तो रहिये और मदीना जाना चाहते हैं तो वहां तशरीफ़ ले जाइये आपको इख़्तेयार है।

अल्लामा मसूदी का कहना है कि इसी शब को हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) ने हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ ) को ख़्वाब में देखा था।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 122 प्रकाशित मिस्र) अल्लामा जामी लिखते हैं कि मदीने रवाना करते वक़्त हारून ने आप से ख़ुरूज का शुबहा जा़हिर किया। आपने फ़रमाया कि ख़ुरूज व बग़ावत मेरे शायाने शान नहीं है , ख़ुदा की क़सम मैं ऐसा हरगिज़ नहीं कर सकता।(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 192 )

हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) और अली बिन यक़तीन बग़दादी

क़ैद ख़ाना ए रशीद से छूटने के बाद हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) मदीना ए मुनव्वरा पहुँचे और बदस्तूर अपने फ़राएज़े इमामत की अदायगी में मशग़ूल हो गये। आप चूंकि इमामे ज़माना थे इस लिये आपको ज़माने के तमाम हवादिस की इत्तेला थी। एक मरतबा हारून रशीद ने अली बिन यक़तीन बिन मूसा कूफ़ी बग़दादी को जो कि हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के ख़ास मानने वाले थे और अपनी कार करदिगी की वजह से हारून रशीद के मुक़र्रेबीन में से थे। बहुत सी चीज़ें दीं जिनमें ख़ेलअते फ़ाख़ेरा और एक बहुत उमदा कि़स्म का सियाह ज़रबफ़त का बना हुआ चोग़ा था जिस पर सोने के तारों से फूल कढ़े हुये थे और जिसे सिर्फ़ ख़ुल्फ़ा औद बादशाह पहना करते थे। अली बिन यक़तीन ने अज़ राहे तक़र्रूब व अक़ीदत उस सामान में और बहुत सी चीज़ों का इज़ाफ़ा कर के हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की खि़दमत में भेज दिया। आपने उनका हदिया क़ुबूल कर लिया लेकिन उसमें से इस लिबास मख़सूस को वापस कर दिया जो ज़रबफ़त का बना हुआ था और फ़रमाया कि उसे अपने पास रखो यह तुम्हारे उस वक़्त काम आयेगा जब ‘‘ जान जोखम ’’ में पड़ी होगी। उन्होंने यह ख़्याल करते हुए कि इमाम ने न जाने किस वाकि़ये की तरफ़ इशारा फ़रमाया हो उसे अपने पास रख लिया। थोड़े दिनों के बाद इब्ने यक़तीन अपने एक ग़ुलाम से नाराज़ हो गये और उसे अपने घर से निकाल दिया। इसने जा कर रशीद ख़लीफ़ा से इनकी चुग़ली खाई और कहा कि आप ने जिस क़दर खि़लअत उन्हें दी है उन्होंने सब का सब हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) को दे दिया है और चूंकि वह शिया हैं इस लिये इमाम को बहुत मानते हैं। बादशाह ने जैसे ही यह बात सुनी वह आग बबूला हो गया और उसने फ़ौरन सिपाहियों को हुक्म दिया कि अली बिन यक़तीन को इसी हालत में गिरफ़्तार कर लाऐं जिस हाल में वह हों। अलग़रज़ इब्ने यक़तीन लाए गये , बादशाह ने पूछा मेरा दिया हुआ चोग़ा कहाँ है ? उन्होंने कहा बादशाह मेरे पास है। इसने कहा मैं देखना चाहता हूँ और सुनों ! अगर तुम इस वक़्त उसे न दिखा सके तो मैं तुम्हारी गरदन मार दूँगा। उन्होंने कहा बादशाह मैं अभी पेश करता हूँ। यह कह कर उन्होंने एक शख़्स से कहा कि मेरे मकान में जा कर मेरे फ़ुलां कमरे से मेरा सन्दूक उठा ला। जब वह बताया हुआ सन्दूक ले आया तो आपने उसकी मोहर तोड़ी और चोग़ा निकाल कर उसके सामने रख दिया। जब बादशाद ने अपनी आंखों से चोग़ा देख लिया तो उसका ग़ुस्सा ठन्डा हुआ और ख़ुश हो कर कहने लगा कि अब मैं तुम्हारे बारे में किसी की कोई बात न मानूँगा।

(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 194 )

अल्लामा शिबलन्जी लिखते हैं कि फिर उसके बाद रशीद ने और बहुत सा अतिया दे कर उन्हें इज़्ज़त व ऐहतराम के साथ वापस कर दिया और हुक्म दिया कि चुग़ली करने वालों को एक हज़ार कोड़े लगाए जाऐं चुनान्चे जल्लादो ने मारना शुरू किया और वह पाँच सौ कोड़े खा कर मर गया।

(नूरूल अबसार पृष्ठ 130 )

अली बिन यक़तीन को उलटा वज़ू करने का हुक्म

अल्लामा तबरसी और अल्लामा इब्ने शहर आशोब लिखते हैं अली बिन यक़तीन ने हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) को एक ख़त लिखा जिसमें तहरीर किया कि हमारे दरमियान इस अमर में बहस हो रही है कि आया मसह काब से असाबा (उंगलियों) तक होना चाहिये या उंगलियों से काब तक , हुज़ूर इसकी वज़ाहत फ़रमायें। हज़रत ने उस ख़त का एक अजीब व ग़रीब जवाब तहरीर फ़रमाया , आपने लिखा कि मेरा ख़त पाते ही तुम इस तरह वज़ू शुरू करो तीन मरतबा कुल्ली करो , तीन मरतबा नाक में पानी डालो , तीन मरतबा मुह धो अपनी दाढ़ी अच्छी तरह भिगो , सारे सर का मसा करो , अन्दर बाहर कानों का मसा करो तीन मरतबा पाँव धो और देखो मेरे इस हुक्म के खि़लाफ़ हरगिज़ हरगिज़ ना करना। अली बिन यक़तीन ने जब इस ख़त को पढ़ा तो वह हैरान रह गये लेकिन यह समझते हुए मौलाई आलमा बेमा क़ाला आपने जो कुछ हुक्म दिया है उसकी गहराई और उसकी वजह का अच्छी तरह आपको इल्म होगा। इस पर अमल करना शुरू कर दिया।

रावी का बयान है कि अली बिन यक़तीन की मुखा़लेफ़त बराबर दरबार में हुआ करती थी और लोग बादशाह से कहा करते थे कि यह शिया हैं और तुम्हारे मुख़ालिफ़ है। एक दिन बादशाह ने अपने ख़ास मुशीरों से कहा कि अली बिन यक़तीन की शिकायत बहुत हो चुकी है अब मैं ख़ुद छुप कर देख़ूँगा और यह मालूम करूँगा कि वज़ू क्यों कर करते हैं और नमाज़ कैसे पढ़ते हैं। चुनान्चे उसने छुप कर आपके हुजरे में नज़र डाली तो देखा कि वह अहले सुन्नत के उसूल और तरीक़े पर वज़ू कर रहे हैं। यह देख कर उनसे मुतमईन हो गया और उसके बाद से किसी के कहने को बावर नहीं किया। इस वाकि़ये के फ़ौरन बाद हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) का ख़त अली बिन यक़तीन के पास पहुँचा जिसमें मरक़ूम था कि ख़दशा दूर हो गया अब तुम इसी तरह वज़ू करो जिस तरह ख़ुदा ने हुक्म दिया है यानी अब उल्टा वज़ू न करना बल्कि सीधा और सही वज़ू करना और तुम्हारे सवाल का जवाब यह है कि उंगलियों के सर से काबेईन तक पाँव का मसा होना चाहिए।

(आलामुल वरा पृष्ठ 170, मनाक़िब जिल्द 5 पृष्ठ 58 )

वज़ीरे आज़म अली बिन यक़तीन को हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की फ़हमाईश

अल्लामा हुसैन बिन अब्दुल वहाब तहरीर फ़रमाते हैं कि मोहम्मद बिन अली सूफ़ी का बयान है कि इब्राहीम जमाल जो हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के सहाबी थे , ने एक दिन अबुल हसन अली बिन यक़तीन से मुलाक़ात के लिये वक़्त चाहा उन्होंने वक़्त न दिया। उसी साल वह हज के लिये गये और हज को हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) भी तशरीफ़ ले गये। इब्ने यक़तीन हज़रत से मिलने के लिये गये उन्होंने मिलने से इन्कार कर दिया। इब्ने यक़तीन को बड़ा ताअज्जुब हुआ। रास्ते मुलाक़ात हुई तो हज़रत ने फ़रमाया कि तुम ने इब्राहीम से मुलाका़त करने से इन्कार किया था इस लिये मैं भी तुम से नहीं मिला और उस वक़्त तक न मिलूगाँ जब तक तुम उनसे माफ़ी न मांगोगे और उन्हें राज़ी न करोगे। इब्ने यक़तीन ने अजऱ् की मौला मैं मदीने में हूँ और वह कूफ़े में है , मेरी मुलाक़ात है कैसे हो सकती है ? फ़रमाया तुम तन्हा बक़ी में जाओ , एक ऊँट तय्यार मिलेगा इस पर सवार हो कर कूफ़ा के लिये रवाना हो चश्में ज़दन में वहां पहुँच जाओगे। चुनान्चे वह गये और ऊँट पर सवार हो कर कूफ़ा पहुँचे , इब्राहीम के दरवाज़े पर दक़्क़ुलबाब किया। आवाज़ आई कौन है ? कहा मैं इब्ने यक़तीन हूँ। उन्होंने कहा तुम्हारा मेरे दरवाज़े पर क्या काम है ? इब्ने यक़तीन ने जवाब दिया , सख़्त मुसीबत में मुबतिला हूँ , ख़ुदा के लिये मिलने का वक़्त दो। चुनान्चे उन्होंने इजाज़त दी। इब्ने यक़तीन ने क़दमों पर सर रख कर माफ़ी मांगी और सारा वाक़ेया कह सुनाया। इब्राहीम जमाल ने माफ़ी दी। फिर इसी ऊँट पर सवार हो कर चश्में ज़दन में मदीने पहुँचे और हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की खि़दमत में हाजि़र हुए। इमाम ने फिर माफ़ कर दिया और मुलाक़ात का वक़्त दे कर गुफ़्तुगू फ़रमाई।

(ऐनुल मोजेज़ात पृष्ठ 122 प्रकाशित मुल्तान)

हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के हुक्म से बादल का एक मर्दे मोमिन को चीन से तालेक़ान पहुँचाने का वाकि़आ

हारून रशीद का एक सवाल और उसका जवाब

यह मुसल्लम है कि हज़रात मोहम्मद व आले मोहम्मद , मोजिज़ात करामात और उमूरे ख़रक़ आदात में यकताए काएनात थे , रजअत शमस , शक़्क़ुल क़मर और हज़रत अली (अ.स.) का एक गिरोह समेत चादर पर बैठ कर ग़ारे अस्हाबे कहफ़ तक सफ़र करना उसके शवाहेद हैं।

अल्लामा मोहम्मद इब्ने शहर आशोब तहरीर फ़रमाते हैं कि ‘‘ खा़लिद बिन समा बयान करते हैं कि एक दिन हारून रशीद ने एक शख़्स को तलब किया था अली बिन सालेह तालक़ानी , पूछा तुम ही वह हो जिसको बादल चीन से उठा कर तालक़ान लाए थे ? कहा हाँ। इसने कहा बताओ क्या वाक़ेआ है , यह क्यों कर हुआ ? तालक़ानी ने कहा कि मैं किश्ती में सवार था नागाह जब मेरी कश्ती समुन्दर के इस मक़ाम पर पहुँची जो सब से ज़्यादा गहरा था तो मेरी कश्ती टूट गई। तीन रोज़ मैं तख़्तों पर पड़ा रहा और मौजें मुझे थपेड़े लगाती रहीं , फिर समुन्द्र की मौजों ने मुझे ख़ुश्की में फेंक दिया। वहाँ नहरे और बाग़ात मौजूद थे , मैं एक दरख़्त के साए में सो गया। इसी असना में मैंने एक ख़ौफ़नाक आवाज़ सुनी , डर के मारे बेदार हो गया। फिर दो घोडो को आपस में लड़ते हुए देखा। ऐसे ख़ूब सूरत घोड़े कभी नहीं देखे थे। उन्होंने जब मुझे देखा , समुन्दर में चले गये। मैंने इसी असना में एक अजीब अल खि़ल्क़त परिन्दे को देखा जो आ कर बैठ गया। पहाड़ के ग़ार के क़रीब मैं दरख़्त में छुपे हुए इसके क़रीब गया ताकि इस को अच्छी तरह देख सकूँ। परिन्दे ने जब मुझे देखा तो उड़ गया। मैं उसके पीछे चल पड़ा। ग़ार के क़रीब मैंने तसबीह व तहलील तकबीर और तिलावते क़ुरआने मजीद की आवाज़ सुनी। मैं ग़ार के क़रीब गया। आवाज़ देने वाले ने आवाज़ दी ‘‘ ऐ अली बिन सालेह तालक़ानी ’’ ख़ुदा तुम पर रहम करे। ग़ार में अन्दर आ जाओ। मैं ग़ार के अन्दर चला गया , वहां एक अज़ीम शख़्स को देखा। मैंने सलाम किया , उसने जवाब दिया। फिर फ़रमाया कि ऐ बिन सालेह तालक़ानी तुम मादन उल क़नूज़ हो। भूख , प्यास और ख़ौफ़ के इम्तेहान में पास हुए हो। अल्लाह ताअला ने तुम पर रहम किया है , तुम्हें नजात दी है। तुम्हें पाकीज़ा पानी पिलाया है। मैं उस वक़्त को जानता हूँ जब तुम कश्ती पर सवार हुए और समुन्दर में रहे , तुम्हारी कश्ती टूट गई कितनी दूर तक मौजों के थपेड़े खाती रही। तुम ने अपने आप को समुन्दर में गिराने का इरादा किया , अगर ऐसा करते तो खुद मौत को दावत देते। बड़ी मुसिबत उठाई। मैं उस वक़्त को भी जानता हूँ जब तुम ने नजात पाई और दो ख़ूब सूरत चीज़ें देखीं। तुम ने परिन्दे का पीछा किया। जब उसने तुम्हे देखा तो आसमान की तरफ़ उड़ गया। अल्लाह ताअला तुम पर रहम करें , आओ यहाँ बैठ जाओ। जब मैंने उस शख़्स की बात सुनी तो उस से कहा , मैं तुम्हें अल्लाह ताअला का वास्ता दे कर पूछता हूँ यह बताओ कि मेरे हालात तुम को किसने बताऐ ? फ़रमाया उस ज़ात ने जो ज़ाहिरो बातिन की जानने वाली है। फिर फ़रमाया कि तुम भूखे हो। मैंने अजऱ् की बेशक भूखा हूँ। यह सुन कर आपने अपने लबों को हरकत दी और एक दस्तरख़्वान रूमाल से ढ़का हुआ हाजि़र हो गया। उन्होंने दस्तरख़्वान से रूमाल को उठा लिया। फ़रमाया अल्लाह ताअला ने जो रिज़्क़ दिया है आओ उसे खाओ। मैंने खाना खाया , ऐसा पाकीज़ा खाना कभी न खाया था फिर मुझे पानी पिलाया , मैंने ऐसा लज़ीज़ और मीठा पानी कभी नहीं पिया था। फिर उन्होंने दो रकअत नमाज़ पढ़ी और मुझ से फ़रमाया कि ऐ अली घर जाना चाहते हो , मैंने अजऱ् कि मैं वतन से बहुत दूर हूँ (चीन के इलाक़े में पडा हूँ) मेरी मदद कौन कर सकता है और मैं क्यो कर यहाँ से वतन जा सकता हूँ ? उन्होंने फ़रमाया घबराओ नहीं हम अपने दोस्तों की मदद किया करते हैं। हम तुम्हारी मदद करेंगे। फिर उन्होंने दुआ के लिये हाथ उठाया , नागाह बादल के टुकड़े आने लगे और ग़ार के दरवाज़े को घेर लिये। जब बादल उनके सामने आया तो उसने बाहुक्मे ख़दा सलाम किया ‘‘ ऐ अल्लाह के वली और उसकी हुज्जत आप पर सलाम हो। उन्होंने जवाबे सलाम दिया। फिर बादल के एक टूकड़े से पूछा कहां का इरादा है और किस ज़मीन के लिये तुम भेजे गये हो। उसने ज़मीन का नाम लिये और वह चला गया। फिर अब्र का एक टुकड़ा सामने आया और आ कर सलाम किया। उन्होंने जवाब दिया। पूछा कहां जाने के लिये आया है ? कहा तालक़ान जाने का हुक्म दिया गया है। ऐ ख़ुदा ए वहदहू ला शरीक का इताअत गुज़ार अब्र जिस तरह अल्लाह की दी हुई चीज़ें उड़ा कर लिये जा रहा है इसी तरह इस बन्दाए मोमिन को भी ले जा। जवाब मिला ब सरो चश्म (सर आंखों पर) फिर उन्होंने बादल को हुक्म दिया कि ज़मीन पर बराबर हो जा , वह ज़मीन पर आ गया , फिर मेरे बाज़ू को पकड़ कर उस पर बैठा दिया। बादल अभी उड़ने भी न पाया था कि मैंने उनकी खि़दमत में अजऱ् की , मैं आपको अल्लाम ताअला की क़सम और मोहम्मद (स.अ.व.व.) और आइम्मा ए ताहेरीन (अ.स.) का वास्ता दे कर पूछता हूँ कि आप यह फ़रमाइये आप हैं कौन ? आप का इस्मे गेरामी (नाम) क्या है ? इरशाद फ़रमाया ! ऐ अली बिन सालेह तालक़ानी मैं ज़मीन पर अल्लाह की हुज्जत हूँ और मेरा नाम मूसा बिन जाफ़र (मूसा काजि़म) है। फिर मैंने उनके आबाव हजदाद की इमामत का जि़क्र किया और उन्होंने बादल को हुक्म दिया और वह बलन्द हो कर हवा के दोश पर चल पड़ा। ख़ुदा की क़सम न मुझे कोई तकलीफ़ पहुँची और न ख़ौफ़ ला हक़ हुआ। मैं थोडी़ देर में वतन ‘‘ तलक़ान ’’ जा पहुँचा और ठीक उस सड़क पर उतरा जिस पर मेरा मकान था। यह सुन कर हारून रशीद ने जल्लादों को हुक्म दे कर उसे इस लिये क़त्ल करा दिया कि वह कहीं इस वाकि़ये को लोगों में बयान न कर दे और अज़मते आले मोहम्मद और वाज़े न हो जाय।

(मनाक़िब इब्ने शहर आशोब जिल्द 3 पृष्ठ 121 प्रकाशित मुल्तान)


हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) और फि़दक के हुदूदे अरबा

अल्लामा युसूफ़ बग़दादी सिब्ते इब्ने जोज़ी हनफ़ी तहरीर फ़रमाते हैं कि एक दिन हारून रशीद ने हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) से कहा कि आप ‘‘ फि़दक ’’ लेना चाहें तो मैं दे दूँ। आपने फ़रमाया कि मैं जब उसके हुदूद बताऊगां तो तू उसे देने पर राज़ी न होगा और मैं उसी वक़्त ले सकता हूँ जब उसके पूरे हुदूद दिये जायें। उसने पूछा कि उसके हुदूद क्या हैं ? फ़रमाया पहली हद अदन है , दूसरी हद समर कन्द है तीसरी हद अफ़रीक़ा है , चौथी हद सैफ़ अल बहर है जो ख़ज़र्र और आरमीनिया के क़रीब है। यह सुन कर हारून रशीद आग बबूला हो गया और कहने लगा फिर हमारे लिये क्या है ? हज़रत ने फ़रमाया कि इसी लिये तो मैंने लेने से इन्कार किया था। इस वाकि़ये के बाद ही से हारून रशीद हज़रत के दरपए क़त्ल हो गया।

(ख़वास अल उम्मता अल्लामा सिब्ते इब्ने जौज़ी पृष्ठ 416 प्रकाशित लाहौर)

हारून रशीद अब्बासी की सादात कुशी

हमीद बिन क़हतबा और उसका वाक़ेआ

तवारीख़ में है कि हारून रशीद तामीरे बग़दाद और दीगर मुल्की मसरूफि़यात की वजह से थोड़े अर्से तक सादात कुशी की तरफ़ मुतवज्जा न हो सका लेकिन जब उसे ज़रा सा सुकून हुआ तो उसने अपने आबाई जज़बात को बरूए कार लाने का तहय्या कर लिया और इसकी सई शुरू कर दी कि ज़मीन पर आले मोहम्मद का कोई बीज भी बाक़ी न रहने पाए , चुनान्चे उसने पूरा हौसला निकाला और हर मुमकिन सूरत से उन्हें तबाह व बरबाद कर दिया।

उलमा का कहना है कि उसने ग़ुन्ड़ों के गिरोह क़त्ले सादात के लिए मुक़र्रर कर दिये थे और ख़ुद अपनी हुकूमत के आला हुक्काम को ख़ुसूसी हुक्म भेज दिया था कि सलतनत व हुकूमत को पूरी ताक़त से सादात की तलाश की जाए और इनमें से एक को भी जि़न्दा ना छोड़ा जाए।

अल्लामा मजलिसी ‘‘ अब्दुल्लाह बज़ार नेशापुरी के हवाले से ’’ हाकिम ईरान हमीद इब्ने क़हतबा तूसी का एक ख़त लिखते हैं। इब्ने क़हतबा कहते हैं कि मैं इस लिये रौज़ा नमाज़ नहीं करता कि मुझे इल्म है कि मैं बख़्शा नहीं जा सकता और बहर सूरत जहन्नुम में जाऊँगा। ऐ अब्दुल्लाह! तुम से क्या बताऊँ अभी थोड़े अर्से की बात है कि हारून रशीद ने मुझे रात के वक़्त जब कि वह तूस आया हुआ था और मैं भी इत्तेफ़ाक़न आ गया , बुलाया और मुझे हुक्म दिया कि तुम इस ग़ुलाम के साथ जाओ और यह मेरी तलवार हमराह लेते जाओ , यह जो कहे वह करो। मैं इसके हुक्म से ग़ुलाम के साथ हो लिया। ग़ुलाम मुझे एक ऐसे मकान में ले गया जिसमें फ़ात्मा बिन्ते असद रसूल अल्लाह (स. अ.) और अली (अ.स.) की ज़ौजा बुतूल की औलाद क़ैद थी। ग़ुलाम ने एक कमरे का दरवाज़ा खोला और मुझ से कहा कि इन सब को क़त्ल कर के इस कुएं में डाल दो , मैंने उन्हें क़त्ल किया और कुएं में डाल दिया। फिर दूसरा कमरा खोला और मुझ से कहा कि इन सब को क़त्ल कर के कुऐं में डालो , मैंने उन्हें भी क़त्ल किया। मगर तीसरा कमरा खोला और मुझ से कहा कि उन्हें भी क़त्ल करो। मैंने उन्हें भी क़त्ल किया। ऐ अब्दुल्लाह इन सब मक़तूलों की तादाद साठ थी। इनमें छोटे , बड़े , बूढ़े , जवान और सभी कि़स्म के सादात थे। ऐ अब्दुल्लाह जब मैं आख़री कमरे के क़ैदी सादात को क़त्ल करने लगा तो आखि़र में एक नेहायत नूरानी बुजुर्ग बरामद हुए और मुझ से कहने लगे , ऐ ज़ालिम ! क्या रसूल अल्लाह (स अ व व ) को मुँह नहीं दिखाना है ? और क्या खुदा की बारगाह में तुझे नहीं जाना है ? यह तू क्या कर रहा है। इसका कलाम सुन कर मेरा दिल काँप गया और उन पर मेरा हाथ न उठा। इतने में ग़ुलाम ने मुझे डाँट कर कहा हुक्मे अमीर में क्यों देर करता है। उसके यह कहने पर मैंने उन्हें भी तलवार के घाट उतार दिया। अब मेरी नमाज़ और मेरा रौज़ा मुझे क्या फ़ायदा पहुँचा सकता है।

हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की दोबारा गिरफ़्तारी

अल्लामा इब्ने शहर आशोब , अल्लामा तबरसी , अल्लामा अरबली , अल्लामा शिबलन्जी तहरीर फ़रमाते हैं कि 169 -70 हिजरी में हादी के बाद हारून तख़्ते खि़लाफ़त पर बैठा। सलतनत अब्बासीया के क़दीम रवायत जो सादात बनी फ़ात्मा (स अ व व ) की मुख़ालेफ़त मे थे इसके पेशे नज़र थे। खुद इसके बाप मन्सूर का रवय्या जो इमामे जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के खि़लाफ़ था उसे मालूम था। उसका यह इरादा की जाफ़रे सादिक़ के जानशीन को क़त्ल कर डाला जाए यक़ीनन उसके बेटे हारून को मालूम हो चूका होगा वह तो इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की हाकीमाना वसीयत का इख़्लाक़ी दबाव था जिसने मन्सूर के हाथ बांध दिये थे और फिर शहर बग़दाद की तामीर की मसरूफ़ीयत थी जिसने उसे उस जानिब मुतावज्जे नहीं होने दिया था। अब हारून के लिये उनमें से कोई बात माने नहीं थी तख़्ते सलतनत पर बैठ कर अपने अख़्तेदार को मज़बूत करने के रखने के लिये सब से पहले यह ही तसव्वर पैदा हो सकता था कि इस रूहानियत के मरक़ज़ को जो मदीने महल्ला बनी हाशिम में क़ाएम है तोड़ने की कोशिश की जाए मगर एक तरफ़ इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) का मोहतात और ख़ामोश तरज़े अमल और दूसरी सलतनत की अन्दुरूनी मुश्किलात उनकी वजह से 9 बरस तक हारून रशीद को भी किसी खुले हुऐ तशद्दुद का इमाम के खि़लाफ़ मौक़ा न मिला।

इसी दौरान में अब्दुल्लाह इब्ने हसन के फ़रज़न्द याहिया दरपेश हुआ वह अमान दिये जाने के बाद तमाम अहदो पैमान को तोड़ कर दर्द नाक तरीक़े पर क़ैद रखे गये और फिर क़त्ल किये गए बावजूद कि याहिया के मामलात से इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) को किसी तरह का सरो कार न था बल्कि वाक़ेयात से साबित होता है कि हज़रत उनको हुकूमते वक़्त की मुख़ालफ़त से मना फ़रमाते थे। मगर अदावते बनी फ़ात्मा का जज़बा जो याहिया बिन अब्दुल्लाह की मुख़ालेफ़त के बहाने से उभर गया था इसकी ज़द से हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) भी महफ़ूज़ न सके। इधर याहिया बिन खा़लिद बर मक्की जो वज़ीरे आज़म था अमीन (फ़रज़न्द हारून रशीद) के अतालिक़ ताफरबिन मोहम्मद अशअस की रक़ाबत में इसके खि़लाफ़ यह इल्ज़ाम क़ाएम किया कि यह इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के शियों में से है और इनके इक़तिदार का ख़्वाह है।

बराह रास्त उस का मक़सद हारून को जाफ़र से बरग़श्ता करना था लेकिन बिल वास्ता इसका ताअल्लुक़ हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के साथ भी था इस लिये हारून को हज़रत की ज़रर रसानी की फि़क्र पैदा हो गई इस दौरान में यह वाकि़या पैदा हुआ कि हारून रशीद हज के इरादे से मक्का मोअज़्ज़मा में आया। इत्तेफ़ाक़ से इसी साल हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) भी हज को तशरीफ़ लाए हुए थे। हारून ने अपनी आँख से इस अज़मत व मरजीयत का मुशाहेदा किया जो मुसलमानों में इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के मुतालिक़ पाई जाती थी। इससे इसके हसद की आग भी भड़क उठी। इसके बाद इसमें मोहम्मद बिन इस्माईल की मुख़ालेफ़त ने और इज़ाफ़ा कर दिया वाक़ेया ये है कि इस्माईल इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के बड़े फ़रज़न्द थे और इस लिये उनकी जि़न्दगी में आम तौर पर लोगों का ख़्याल यह था कि वह इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के क़ायम मुक़ाम हो गये मगर उनका इन्तेक़ाल इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के ज़माने में ही हो गया और लोगों का ख़्याल ग़लत साबित हुआ फिर भी बाज़ सादा लौह असहाब इस ख़्याल पर क़ायम रहे कि जा नशिनी का हक़ इस्माईल और औलादे इस्माईल में मुनहासिर है। उन्होंने इमाम हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की इमामत को क़ुबूल नहीं किया चुनान्चे इस्माईलिया फि़रका़ बन गया मुख़्तसर तादाद में सही अब दुनिया में मौजूद थे। मोहम्मद इन ही इस्माईल के फ़रज़न्द थे और इस लिये मूसा काजि़म (अ.स.) से एक तरह की मुख़ालेफ़त पहले से रखते थे। मगर चुंकि इनके मानने वालों की तादाद बहुत ही कम थी और वह हज़रात कोई नुमाया हैसियत न रखते थे इस लिये ज़ाहिरी तौर पर इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के यहां आमदो नफ़्त रखते थे और ज़ाहिरी तौर पर क़राबत दारी के तालुक़ात क़ाएम किए हुए थे।

हारून रशीद ने इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की मुखालफ़त की सूरतों पर ग़ौर करते हुए याहिया बर मक्की से मशविरा लिया कि मैं चाहता हूँ कि औलादे अबू तालिब में से किसी को बुला कर इससे मूसा इब्ने जाफ़र के पूरे हालात दरयाफ़्त करूं। याहिया जो ख़ुद अदावत बनी फ़ात्मा में हारून से कम न था इसने मोहम्मद बिन इस्माईल का पता दिया कि आप इनको बुला कर दरयाफ़्त करें तो सही हालात मालूम हो सकेंगे चुनान्चे उसी वक़्त मोहम्मद बिन इस्माईल के नाम ख़त लिखा गया।

शहनशाहे वक़्त का ख़त जो मोहम्मद बिन इस्माईल को पहुँचा तो उसने अपनी दुनियांवी कामयाबी का बेहतरीन ज़रिया समझ कर फ़ौरन बग़दाद जाने का इरादा कर लिया मगर इन दिनों हाथ बिल्कुल ख़ाली थे , इतना रूपया पैसा मौजूद न था कि सामाने सफ़र करते मजबूरत इसी डेवढी पर आना पड़ा जहां करम व अता में दोस्त व दुश्मन की तफ़रीक़ न थी। इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के पास आ कर बग़दाद जाने का इरादा ज़ाहिर किया। हज़रत ख़ूब समझते थे कि इस बग़दाद के सफ़र का पस मन्ज़र और इसकी बुनियाद क्या है। हुज्जत तमाम करने की ग़रज़ से आप ने सफ़र का सबब दरयाफ़्त किया। उन्होंने अपनी परेशान हाली बयान करते हुए क़र्ज़दार बहुत हो गया हूँ कि शायद वहां जा कर कोई सूरत बसर अवक़ात की निकले और मेरा क़र्ज़ा अदा हो जाए। हज़रत ने फ़रमाया वहां जाने की ज़रूरत नहीं है , मैं वादा करता हूँ कि तुम्हारा क़र्ज़ा अदा करूगां और जहां तक होगा। तुम्हारे ज़रूरयाते जि़न्दगी भी पूरी करता रहूँगा। अफ़सोस है कि मोहम्मद ने इसके बाद बग़दाद जाने का इरादा नहीं बदला। चलते वक़्त हज़रत से रूख़सत होने लगे तो अज्र किया कि मुझे वहां के मुताअल्लिक़ कुछ हिदायत फ़रमाई जाएं , हज़रत ने उसका कुछ जवाब न दिया। जब उन्होंने कई मरतबा इस्रार किया तो हज़रत ने फ़रमायाः बस इतना ख़्याल रखना कि मेरे ख़ून में शरीक न होना और मेरे बच्चों की यतीमी के बाएस न बनना। कुछ और हिदायत फ़रमाइये , हज़रत ने उसके अलावा कुछ कहने से इन्कार किया। जब वह चलने लगे तो हज़रत ने साढ़े चार सौ दीनार और पन्द्रह सौ दिरहम उन्हें मसारिफ़े सफ़र के लिये अता फ़रमायें। नतीजा वही हुआ जो हज़रत के पेशे नज़र था। मोहम्मद बिन इस्माईल बग़दाद पहुँचे और वज़ीरे आज़म बर मक्की के मेहमान हुए। उसके बाद यहीया के साथ हारून के दरबार में पहुँचे। मसलेहते वक़्त की बिना पर बहुत ताज़ीमो तकरीम की गई। गुफ़्तुगू के दौरान हारून ने मदीने के हालात दरयाफ़्त किये। मोहम्मद ने इन्तेहाईं ग़लत बयानियो के साथ वहां के हालात का तज़किरा किया और यह भी कहा कि मैंने आज तक नहीं देखा और न सुना कि एक मुल्क में दो बादशाह हों। उसने कहा ! कि इसका क्या मतलब ? मोहम्मद ने कहा कि बिल्कुल उसी तरह जैसे आप बग़दाद में सलतनत कर रहे हैं मूसा काजि़म मदीने में अपनी सलतनत क़ायम किये हुए हैं , अतराफ़ मुल्क से उनके पास खि़राज पहुँचता है और वह आपके मुक़ाबले के दावे दार हैं। उन्होंने बीस हज़ार अशरफी की एक ज़मीन ख़रीदी है जिसका नाम ‘‘ सैरिया ’’ है। (शिबलन्जी) यही बाते थीं जिनके कहने के लिये यहीया बर मक्की ने मोहम्मद को मुन्तखि़ब किया था। हारून का ग़ैज़ो ग़ज़ब इन्तेहाई इशतेआल के दरजे तक पहुँच गया उसने मोहम्मद को दस हज़ार दीनार अता कर के रूख़सत किया। ख़ुदा का करना यह कि मोहम्मद को इस रक़म से फ़ायदा उठाने का एक दिन भी मौक़ा नहीं मिला इसी शब को उनके हलक़ में दर्द पैदा हुआ ग़ालेबन ‘‘ ख़न्नाक ’’ हो गया और सुबह होते होते वह दुनिया से रूख़सत हो गये। हारून को यह ख़बर पहुँची तो अशरफि़यों के तोड़े वापस मंगवा लिये मगर मोहम्मद की बातों का असर उसके दिल पर ऐसा जम गया था कि उसने यह तय कर लिया कि इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) का नाम सफ़हे हसती से मिटा दिया जाय। चुनान्चे 169 हिजरी में फिर हारून रशीद ने मक्कए मोअज़्ज़मा का सफ़र किया और वहां से मदीना ए मुनव्वरा गया। दो एक रोज़ क़याम के बाद कुछ लोग इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) को गिरफ़्तार करने के लिये रवाना किये। जब यह लोग इमाम (अ.स.) के मकान पर पहुँचे तो मालूम हुआ कि हज़रत रौज़ा ए रसूल (स अ व व ) पर हैं। उन लोगों ने रौज़ा ए पैग़म्बर (स अ व व ) की इज़्ज़त का भी ख़्याल न किया। हज़रत उस वक़्त क़ब्रे रसूल (स अ व व ) के नज़दीक नमाज़ में मशग़ूल थे। बे रहम दुश्मनों ने आपको नमाज़ की ही हालत में क़ैद कर लिया और हारून के पास ले गये।

मदीना ए रसूल (स अ व व ) के रहने वालों में बे हिसी इसके पहले भी बहुत दफ़ा देखी जा चुकी थी। यह भी इसकी एक मिसाल थी कि रसूल (स. अ.) के फ़रज़न्द रौज़ा ए रसूल (स अ व व ) से इस तरह गिरफ़्तार कर के ले जाया जा रहा था मगर नाम नेहाद मुसलमानों में एक भी ऐसा न था जो किसी तरह की आवाज़े एहतेजाज बलन्द करता। यह 20 शव्वाल 179 हिजरी का वाकि़या है।

हारून इस अन्देशे से कि कोई जमाअत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) को रिहा कराने की कोशिश न करे दो महमिले तैय्यार कराईं। एक में इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) को सवार कराया और उसको एक बहुत बड़े फ़ौजी दस्ते के हल्क़े में बसरे रवाना किया और दूसरी महमिल जो ख़ाली थी उसे भी इतनी ही तादात की हिफ़ाज़त में बग़दाद रवाना किया। मक़सद यह था कि आपके महले क़याम और क़ैद की जगह को भी मशक़ूक बना दिया जाए। यह निहायत हसरत नाक वाकि़या था कि इमाम के अहले हरम और बच्चे वक़्ते रूख़सत आपको देख भी न सके और अचानक महल सरा में सिर्फ़ यह इत्तेला पहुँच सकी कि हज़रत सलतनते वक़्त की तरफ़ से क़ैद कर लिये गये हैं। इससे बीवियों और बच्चों में कोहराम बरपा हो गया और यक़ीनन इमाम के दिल पर भी जो इसका सदमा हो सकता है वह ज़ाहिर है मगर आपके ज़ब्तो सब्र की ताक़त के सामने हर मुश्किल आसान थी।

मालूम नहीं कितने हेर फेर से यह रास्ता तय किया गया था कि पूरे एक महीने सत्तरह रोज़ के बाद 7 जि़ल्हिज्जा को आप बसरे पहुँचाये गये। एक साल तक आप बसरे में क़ैद रहे। यहां का हाकिम हारून का चचा ज़ाद भाई ईसा बिन जाफ़र था। शुरू में तो उसे सिर्फ़ बादशाह के हुक्म की तामील मद्दे नज़र थी बाद में उसने ग़ौर करना शुरू किया कि आखि़र उनके क़ैद किये जाने का सबब क्या है।

इस सिलसिले में उसको इमाम (अ.स.) के हालात और सीरते जि़न्दगी इख़लाक़ो अवसाफ़ की जुस्तुजू का मौक़ा भी मिला और जितना उसने इमाम की सीरत का मुतालेआ किया उतना उसके दिल पर आपकी बलन्दीए इख़लाक़ और हुसैन किरदार का असर का़यम होता गया। अपने इन असरात से उसने हारून को मुत्तला भी किया। हारून पर इसका उल्टा असर हुआ। ईसा के बारे में बदगुमानी पैदा हो गई इस लिये उसने इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) को बग़दाद में बुला भेजा और फ़ज़ल बिन रबी की हिरासत में दे दिया और फिर फ़ज़ल का रूझान शिअत की तरफ़ महसूस करके यहीया बर मक्की को उसके लिये मुक़र्रर किया।

मालूम होता है कि इमाम के इख़्लाक़ और अवसाफ़ की कशिश हर एक पर अपना असर डालती थी इस लिये ज़ालिम बादशाह को निगरानों की तबदीली की ज़रूरत पड़ती थी। सब से आखि़र में इमाम (अ.स.) सिन्दी बिन शाहक के क़ैद ख़ाने में रखे गये , यह बहुत ही बे रहम और सख़्त दिल था। मुलाहेज़ा हो।(मनाक़िब जिल्द 5 पृष्ठ 68 व आलामुल वुरा पृष्ठ 180, कशफ़ल ग़म्मा पृष्ठ 108, नूरूल अबसार पृष्ठ 136, सवानेह मूसा काजि़म पृष्ठ 15 )

इमाम (अ.स.) का क़ैद ख़ाने में इम्तेहान और इल्मे ग़ैब का मुज़ाहेरा

अल्लामा शिब्लनजी लिखते हैं कि जिस ज़माने में आप हारून रशीद के क़ैद ख़ाने में सखि़्तयां बरदाश्त फ़रमा रहे थे इमाम अबू हनीफ़ा के शार्गिद रशीद अबू युसूफ़ और मोहम्मद बिन हसन एक शब क़ैद ख़ाने में इस लिये गये कि आपके बहरे इल्म की थाह मालूम करें और देखें कि आप इल्म के कितने पानी में है। वहां पहुँच कर उन लोगों ने सलाम किया , इमाम (अ.स.) ने जवाबे सलाम इनायत फ़रमाया। अभी यह हज़रात कुछ पूछने ना पाय थे कि एक मुलाजि़म डयूटी ख़त्म कर के घर जाते हुए आपकी खि़दमत में अर्ज परदाज़ हुआ कि मैं कल वापस आऊँगा अगर कुछ मंगाना हो तो मुझ से फ़रमा दीजिये मैं लेता आऊँगा। आपने इरशाद फ़रमाया मुझे किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं। जब वह चला गया तो आपने अबू युसूफ़ वग़ैरा से कहा कि यह बेचारा मुझसे कहता है कि मैं उस से अपनी हाजत बयान करूं ताकि यह कल उसकी तकमील व तामील कर दे लेकिन उसे ख़बर नहीं कि यह आज रात को वफ़ात पा जायेगा। इन हज़रात ने जो यह सुना तो सवाल जवाब के बग़ैर ही वापस चले आये और आपस में कहने लगे कि हम इन से हलालो हराम , वाजिबो सुन्नत के मुताअल्लिक़ सवालात करना चाहते थे। ‘‘ फ़ा अख़ाज़ा यतकलम माआना इल्म अल ग़ैब ’’ मगर यह तो हमसे इल्में ग़ैब की बाते कर रहे हैं। उसके बाद उन दोनों हज़रात ने उस मुलाजि़म के हालात का पता लगाया तो मालूम हुआ कि वह नागहानी तौर पर रात ही में वफ़ात कर गया। यह मालूम करके इन हज़रात को सख़्त ताअज्जुब हुआ।

(नूरूल अबसार पृष्ठ 146 )

अल्लामा अरबली लिखते हैं कि इस वाकि़ये के बाद यह हज़रात फिर इमाम (अ.स.) की खि़दमत में हाजि़र हो कर अर्ज़ परदाज़ हुए कि हमें मालूम था कि आपको सिर्फ़ इल्मे हलालो हराम में ही महारत हासिल है लेकिन क़ैद ख़ाने के मुलाजि़म के वाकि़ये ने वाज़े कर दिया कि आप इल्म अल मनाया और इल्मे ग़ैब भी जानते हैं। आपने इरशाद फ़रमाया कि यह इल्म हमारे लिये मख़्सूस है। इसकी तालीम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स. अ.) ने हज़रत अली (अ.स.) को दी थी और उनसे यह इल्म हम तक पहुँचा है।

हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की शहादत

अल्लामा शिब्लन्जी लिखते हैं कि जब हारून रशीद ने बसरे में एक साल क़ैद रखने के बाद ईसा इब्ने जाफ़र वालिये बसरा को लिखा कि मूसा बिन जाफ़र (इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) को क़त्ल कर के बादशाह को उनके वुजूद से सुकून दे दे तो उसने अपने हमर्ददों से मशवेरे के बाद हारून रशीद को लिखा कि ऐ बादशाह इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) में मैं ने एक साल के अन्दर कोई बुराई नहीं देखी यह शबो रोज़ नमाज़ रोज़े में मसरूफ़ व मशग़ूल रहते हैं अवाम और हुकूमत के लिये दुआए ख़ैर किया करते हैं और मुल्क की फ़लाह व बहबूद के ख़्वाहिश मन्द हैं भला मुझ से क्यों कर हो सकता है कि मैं उन्हें क़त्ल कर के अपनी आक़ेबत बिगाड़ूं।

ऐ बादशाह ! मैं उनके क़त्ल करने में अपने अन्जाम और अपनी आक़ेबत की तबाही देख रहा हूँ और सख़्त हरज महसूस करता हूँ लेहाज़ा तू मुझे इस गुनाहे अज़ीम के इरतेक़ाब से माफ़ कर बल्कि मुझे हुक्म दे दे कि मैं उन्हें क़ैदे मशक़्क़त से रिहा करूं। इस ख़त को पाने के बाद हारून रशीद ने आखि़र में यह काम सन्दी बिन शाहक के हवाले किया और इसी से आपको ज़हर दिलवा कर शहीद करा दिया। ज़हर खाने के बाद आप तीन रोज़ तक तड़पते रहे , यहां तक कि वफ़ात पा गये।

(नूरूल अबसार पृष्ठ 137 )

अल्लामा जामी लिखते हैं कि ज़हर खाते ही आपने फ़रमाया कि आज मुझे ज़हर दिया गया है कल मेरा बदन ज़र्द हो जायेगा और तीसरे रोज़ काला हो जायेगा और उसी दिन मैं इस दुनियां से रूख़सत हो जाऊँगा। चुनान्चे ऐसा ही हुआ।

(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 193 )

अल्लामा इब्ने हजरे मक्की लिखते हैं कि हारून रशीद ने आपको बग़दाद में क़ैद कर दिया और ता-हयात क़ैद रखा। आपकी वफ़ात के बाद हथकड़ी और बेड़ी कटवाई गई। आपकी वफ़ात हारून रशीद के ज़हर से हुई जो उसने सन्दी इब्ने शाहक के ज़रिये से दिलवाया था। जब आपको खाने या ख़ुरमा में ज़हर दिया गया तो आप तीन रोज़ तक तड़प ते रहे। यहां तक कि इन्तेक़ाल हो गया।

(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 132, अरजहुल मतालिब पृष्ठ 454 )

अल्लामा इब्ने अल साई अली बिन अल नजब बग़दादी लिखते हैं कि आप को ज़हर से इन्तेहाई मज़लूमी की हालत में शहीद कर दिया गया।

(अख़बारूल ख़ुलफ़ा)

अल्लामा अबुल फि़दा लिखते हैं कि क़ैद खा़ने रशीद में आपने वफ़ात पाई।

(अबुल फि़दा जिल्द 2 पृष्ठ 151 )

अल्लामा दायरे बकरी लिखते हैं कि आपको हारून रशीद के हुक्म से यहीया इब्ने ख़ालिद बर मक्की वज़ीरे आज़म ने ख़ुरमे में ज़हर दे कर शहीद कर दिया।(तारीख़े ख़मीस जिल्द 2 पृष्ठ 320 )

अल्लामा जामी लिखते हैं कि आपको हारून रशीद ने बग़दाद में ला कर ता उम्र क़ैद रखा आखि़र में अपने वज़ीरे आज़म यहीया इब्ने ख़ालिद बर मक्की के ज़रिये से क़ैद ख़ाने में ज़हर दिलवा दिया और आप वफ़ात पा गये।

(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 193 )

अल्लामा मजलिसी तहरीर फ़रमाते हैं कि आपको कई मरतबा ज़हर दिया गया लेकिन आप हर बार महफ़ूज़ रहे। एक मरतबा आपने वह ख़ुरमा उठा कर जिसमें ज़हर था ज़मीन पर फ़ेंक दिया जिसे हारून के कुत्ते ने खा लिया और वह मर गया कुत्ते के मरने की ख़बर से हारून रशीद को शदीद रंज हुआ और उसने ख़ादिम से सख़्त बाज़ पुर्स की।(जिलाउल उयून पृष्ठ 173 )

आपकी तारीख़े वफ़ात

आप की वफ़ात हसरत आयात बतारीख़ 25 रजबुल मुरज्जब 183 हिजरी यौमें जुमा वाक़े हुई। आपकी उम्र उस वक़्त 55 साल की थी।

(मतालेबुल सुऊल पृष्ठ 282, अलाम अल वरा पृष्ठ 171 व शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 192, नूरूल अबसार पृष्ठ 137 वगै़रह) अपने 14 साल हारून रशीद के क़ैद ख़ाने में गुज़ारे।

मिर्ज़ा दबीर कहते हैं

मौला पर इन्तेहाए असीरी गुज़र गई।

जि़न्दान में जवानी व पीरी गुज़र गई।।

वफ़ात के बाद आपकी नाअशे मुबारक क़ैद ख़ाने से हथकड़ी और बेड़ी समेत निकाल कर बग़दाद के पुल पर डाल दी गई और नेहायत तौहीन आमेज़ अलफ़ाज़ में आपके और आपके मानने वालों को याद किया गया लोग अगरचे बादशाह के ख़ौफ़ से नुमाया तौर पर मज़हमत की जुरअत ना करते थे ताहम एक गिरोह ने जिसके सरदार सुलेमान बिन जाफ़र इब्ने अबी जाफ़र थे हिम्मत की और नाअशे मुबारक दुश्मनों से छीन कर ग़ुस्लों कफ़न का बन्दो बस्त किया। ढ़ाई हज़ार का कि़मती कफ़न दिया , जिस पर पूरा क़ुरआन लिखा हुआ था। नेहायत तुज़ुक व एहतिशाम से जनाज़ा ले कर चले इन लोगों के गरेबान ग़में इमामे मज़लूम में चाक थे यह इन्तेहाई ग़म व अलम के साथ जनाज़े को ले कर मक़बरा क़ुरैश में पहुँचे। हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) नमाज़ व दफ़न के लिये मदीना से ब ऐजाज़ पहुँच चुके थे। आपने नमाज़ पढ़ाई और अपने वालिदे माजिद को सुपुर्दे ख़ाक फ़रमाया।

(आलामुल वुरा पृष्ठ 170 अनवारे नोमानिया पृष्ठ 127 जिन्नात अल ख़लूद पृष्ठ 130 जिलाउल उयून पृष्ठ 275 )

तदफ़ीन के बाद हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) वापस मदीना तशरीफ़ ले गए। मदीने वालों को जब आपकी शहादत की इत्तिला मिली तो कोहराम बरपा हो गया। मातम और अदाए ताज़ीयत का सिलसिला मुद्दतों जारी रहा।

(जिलाउल उयून पृष्ठ 276 )

अल्लामा मोहम्मद बिन तलह शाफ़ेई लिखते हैं कि आप की तदफ़ीन के एक अर्से बाद अयान मुल्क से एक शख़्स ने वफ़ात की , लोगों की ख़्वाहिश पर उसे आप ही के मक़बरे में दफ़न कर दिया गया। एक शब उसने अपने ख़ादिम को ख़्वाब में आगाह किया। उसने देखा कि मक़बरे में आग लगी हुई है और इससे धुआं फ़ैल रहा है और बदबू फैल रही है , सुबह को उसने बादशाहे वक़्त को बाख़बर किया , बादशाह ने क़ब्र ख़ुदवाई तो आग के आसार मौजूद थे और क़ब्र में मैय्यत का वजूद ना था वह जल कर ख़ाक स्तर हो गई थी।

(मतालिबुल सुऊल पृष्ठ 281 )

तादादे औलाद

सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 122 में है कि आपके 37 औलाद थीं। अल्लामा तबरसी , अल्लामा अरबली और हज़रत शैख़ मुफ़ीद लिखते हैं कि आप के 19 लड़के 18 लड़कियाँ थी जिनके नाम यह हैं।

1.हज़रत इमाम रज़ा (अ स ) , 2. इब्राहीम , 3. अब्बास , 4. क़ासिम , 5. इस्माईल , 6. जाफ़र , 7. हारून , 8. हसन , 9.अहमद , 10. मोहम्मद , 11. हमज़ा , 12. अब्दुल्लाह , 13. इस्हाक़ , 14. अबीद अल्लाह , 15. ज़ैद , 16. हसन , 17. फ़ज़ल , 18. हुसैन , 19. सुलैमान , 20. फ़ात्मा , 21. कुबरा , 22. रूक़य्या , 23. आलीया , 24. रूक़य्या सुग़रा , 25. कुलसूम , 26. उम्मे जाफ़र , 27. लबाह , 28. ज़ैनब , 29. ख़तीजा , 30. आलीहा , 31. आमना , 32. हुसना , 33. बरयह , 34. उम्मे सलमा , 35. मैमूना , 36. उम्मे कुलसूम , 37. उम्मे अबीहा व ब़क़ौले उम्मे अब्दुल्लाह व बक़ौले उम्मे असमा।

(आलामुल वुरा पृष्ठ 181 कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 103 , इरशाद पृष्ठ 330 , नूरूल अबसार पृष्ठ 137)

आपकी यह औलादें मुख़तलिफ़ बीबीयों से थे।

[[अलहम्दो लिल्लाह ये किताबः अबुल हसन हज़रत इमाम मूसा काजि़म अ.स जो कि किताबः चौदह सितारे एक हिस्सा है , पूरी टाईप हो गई खुदा वंदे आलम से दुआगौ हुँ कि हमारे इस अमल को कुबुल फरमाऐ और इमाम हुसैन फाउनडेशन को तरक्की इनायत फरमाए कि जिन्होने इस किताब को अपनी साइट (अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क) के लिऐ टाइप कराया। ]]

17-4-2016


फेहरिस्त

हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ स ) 2

आपकी विलादत ब सआदत 5

इस्मे गिरामी कुन्नियत , अल्क़ाब 6

लक़्ब बाबुल हवाएज की वजह 7

बादशाहाने वक़्त 9

नशोनुमा और तरबीअत 9

आपके बचपन के बाज़ वाक़ेआत 10

हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की इमामत 14

हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के बाज़ करामात 17

ख़लीफ़ा मेंहदी अब्बासी और हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ स ) 23

इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की बग़दाद में क़त्ल के लिये तलबी 26

इमाम मूसा ए काजि़म (अ.स.) हादी अब्बासी की क़ैद में 29

हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के अख़लाक़ व आदात 30

इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की तसनीफ़ात 35

आपकी रिवायत की हुई हदीसे 35

ख़लीफ़ा हारून रशीद अब्बासी और हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ स ) 36

हारून रशीद का पहला हज और इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की पहली गिरफ़्तारी 38

हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) और अली बिन यक़तीन बग़दादी 43

अली बिन यक़तीन को उलटा वज़ू करने का हुक्म 45

वज़ीरे आज़म अली बिन यक़तीन का हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की फ़हमाईश 47

हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के हुक्म से बादल का एक मर्दे मोमिन को चीन से तालेक़ान पहुँचाने का वाकि़आ 48

फि़दक के हुदूदे अरबा 53

हारून रशीद अब्बासी की सादात कुशी 53

दोबारा गिरफ़्तारी 55

इमाम (अ.स.) का क़ैद ख़ाने में इम्तेहान और इल्मे ग़ैब का मुज़ाहेरा 63

हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की शहादत 65

आपकी तारीख़े वफ़ात 67

तादादे औलाद 69

अबुल हसन हज़रत इमाम मूसा काजि़म अ.स

अबुल हसन हज़रत इमाम मूसा काजि़म अ.स

बुक करेकशन

लेखक: मौलाना नजमुल हसन कर्रारवी
कैटिगिरी: इमाम काज़िम (अ)
पन्ने: 5