मनाज़िले आख़ेरत

बुक करेकशन

क़यामत

मरने के बाद क्या होगा

लेखकः शेख़ अब्बास क़ुम्मी

नोटः ये किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क के ज़रीऐ अपने पाठको के लिऐ टाइप कराई गई है और इस किताब मे टाइप वग़ैरा की ग़लतीयो को सही किया गया है।

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फेहरिस्त

अर्ज़े नाशिर (प्रकाशक) 8

दो शब्द 12

पहला हिस्सा 21

मआद क़यामत 21

मंज़िले अव्वल 24

दुनिया के साथ मोहब्बत 29

उक़बए (यमलोक) अव्वल 31

सकरात मौत (मरते समय की तक़लीफ) 31

वह आमाल जो मरने वाले के लिए जल्द राहत का सबब है। 40

उक़बए दोम 44

मौत के वक़्त हक़ से उदूल 44

आसानी ए मौत के आमाल 45

हिकायते अव्वल 48

मौत के बाद क़ब्र तक 53

क़ब्र 54

वहश्ते क़ब्र 55

वह चीज़ें जो वहश्ते क़ब्र के लिए मुफ़ीद हैं 61

उक़बए (प्रलय) दोम 62

तंगी व फ़िशारे क़ब्र 62

फ़िशारे क़ब्र के असबाब 63

वह आमाल जो अज़ाबे क़ब्र से नजात देते हैं 67

मुनकिर व नकीर का क़ब्र में सवाल 72

फ़स्ल सोम 83

बरज़ख़ (पर्दा) 83

तासीर व ताअसुर की शिद्दत 86

बरज़ख़ की लज़्ज़त फ़ानी (नाशवर) नहीं है 89

वादी उस्सलाम 97

वादिए बरहूत 99

बरज़ख़ वालों के लिए मुफ़ीद (लाभदायक) आमाल 102

फसल चहारुम 121

क़यामत प्रलय 121

क़यामत की सख़्ती से महफूज़ रखने वाले आमाल 125

सूरे इसराफ़ील 132

फ़स्ल पंजुम (पांच) 136

कुबूर (क़ब्रों से निकलना) 136

अहवाले क़यामत के लिए मुफ़ीद आमाल 140

क़ैफ़ियते हशर व नशर 143

फसल शश्शुम (छः) 149

नामए आमाल 149

आओ मेरे आमालनामा को पढ़ो 151

आमालनामों से इन्कार 153

फ़स्ल हफ़तुम (सात) 163

मीज़ाने आमाल 163

रवायाते हुस्ने ख़ुल्क 170

फ़स्ल हश्तुम (आठ) 190

हिसाब 190

मोवक़िफ़े हिसाब 190

हिबास कौन लगे ? 190

हिसाब किन लोगों का होगा ? 192

अहबात व तकफ़ीर 195

अहबात 196

तकफ़ीर 198

पुरसिशे आमाल 201

हुकुकुन्नास 204

फ़स्ल नहुम (नवी फस्ल) 211

हौज़े कौसर 211

ज़हूरे अज़मते आले मोहम्मद (अ 0 स 0) 213

लेवाएहम्द 213

हज़रत अली (अ 0 स 0) साक़िए कौसर होंगे 214

मुक़ामे महमूद 215

अली (अ 0) दोज़ख़ और बेहश्त के बांटने वाले हैं 216

शफ़ाअत 217

शिफ़ाअत किन लोगों की होगी 218

आराफ़ 219

फस्ल दहुम (दस) 223

पुले सिरात 223

जन्नत के महलात और उनका मसलिहा 264

जन्नत के कमरों का सामाने ज़ीनत 265

जन्नती (अपसराएं) और औरतें (स्त्रियाँ) 266

इतरियाते जन्नत (जन्नत की ख़ुशबू) 269

जन्नत के चराग़ 271

जन्नती नग़मात 272

जन्नत की न्यामतें और लज़्ज़तें 273

सहबाने ख़ौफ़े ख़ुदा के क़िस्से 276

शरायते तौबा (प्रायश्चित) 284

क़ाबिले तौबा गुनाह 285

क़िस्सा बलोहर व दास्ताने बादशाह 303

हिकायते आबिद और सग (कुत्ता) 317


अर्ज़े नाशिर (प्रकाशक)

अमीरुल मोमनीन हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया

“ तुम्हें मालूम होना चाहिए कि दुनियां ऐसा घर है कि इसके (अवाक़िब से) बचाव का सामान इसी में रहकर किया जा सकता है। औऱ किसी ऐसे काम से जो सिर्फ़ इसी दुनिया की ख़ातिर किया जाए , निजात नहीं मिल सकती , लोग इस दुनियां में आज़माइश में डाले गए हैं लोगों ने इस दुनिया के लिए हासिल किया होगा , उससे अलग कर दिए जाएंगे और इस पर उनसे हिसाब लिया जाएगा। दुनिया अक़लमन्दों के नज़दीक एक बढ़ता हुआ साया है। ” ( नहजुल बलाग़ा ख़ुतबा 61)

फ़िर फ़रमायाः-

अल्लाह के बन्दों! अल्लाह से डरो और मौत से पहले अपने आमाल का ज़ख़ीरा (भंडार) फ़राहम कर लो और दुनियां की फ़ानी (ऩाशवान) चीज़ें देकर बाक़ी रहने वाली चीज़ें ख़रीद लो , औऱ मौत के लिए आमदा हो जाऔ कि वह तुम्हारे सिरों पर मंडला रही है , ……….. अल्लाह ने तुम्हें बेकार पैदा नहीं किया न उसने तुम्हें बेक़ैदा बन्द छोड़ दिया है। मौत तुम्हारी राह में हायल है , उसके आते ही तुम्हारे लिए जन्नत या दोज़ख़ है। वह ज़िन्दगी के दिन जिसे हर गुज़रने वाला लम्हा कम कर रहा हो और हर साअत उसकी इमारत को ढ़ा रही हो। कम ही समझी जाने के लायक़ है और वह मुसाफ़िर जिसे हर नया दिन और नई रात खींचे लिए जा रहे हों। उसके मंज़िल तक पहुंचना जल्द ही समझना चाहिए और वह आज़मे सफ़र है। जिसके सामने हमेशा कामरानी या नाकामी का सवाल है। उसको अच्छे से अच्चा ज़ाद मुहैय्या करने की ज़रुरत हैं इसलिए इस दुनियां में रहते हुए इससे इतना तोशए आख़िरत ले लो जिसके ज़रिए कल अपने अल्लाह से डरे , अपने नफ़स के साथ ख़ैरख़्वाही करे (मरने से पहले) तौबा करे , अपनी ख़्वाहिशों पर क़ाबू रख़े चूंकि मौत उसकी निगाहों से ओझल है और उम्मीदें फ़रेब देने वाली हैं और शैतान उस पर छाया हुआ है जो गुनाहों को सजा कर उसके सामने लाता है। यहां तक की मौत उस पर अचानक टूट पड़ती है। (नहजुल बलाग़ा ख़ुतबा 62) ।

एक मुक़ाम पर फ़रमाया

( दुनियां में) चार तरह के लोग हैं। कुछ वह हैं , जिन्हें मुफ़सिदा इंगेज़ी से मानेह सिर्फ़ उनके नफ़्स का बेवक़्त होना उनकी धार का कुन्द होना और उनके पास का कम होना है। कुछ लोग वह हैं जो ऐलानिया शर फ़ैला रहे हैं , कुछ सिर्फ़ माल बटोरने या मिम्बर पर बलन्द होने के लिए , उन्होंने अपने नफ़सो को वक़्फ़ कर दिया है और दीन को तबाह व बरबाद कर डाला है। कितना ही बुरा सौदा है तुम दुनियां को अपने नफ़्स की क़ीमत औऱ अल्लाह के यहां की न्यामतों का बदल क़रार दे लो और कुछ लोग वह हैं जो आख़िरत वाले कामों से दुनिया तल्बी करते हैं और यह नहीं करते कि दुनियां के कामों से भी आख़िरत का बनाना मक़सूद रख़ें , यह लोग अल्लाह की पर्दापोशी से फ़ायदा उठाकर उसका गुनाह करते हैं। (नहजुल बलाग़ा खुतबा 32) ।

और फ़रमाया-

“ अल्लाह की तरफ़ वसीला ढूंढ़ने वालों के लिए बेहतरीन वसीला अल्लाह और उसके रसूल (स.अ.व.व. ) पर ईमान लाना है और उसकी राह में जिहाद करना कि वह इस्लाम की सरबलन्द चोटी हैं और कलमए तौहीद की वह फ़ितरत (की आवाज़) है और नमाज़ की पाबन्दी की वह एैन दीन है और ज़कात अदा करना कि वह फर्ज़ वाजिब है औऱ माह रमज़ान के रोज़े रख़ना कि वह अज़ाब की सिपर है और ख़ानए क़ाबा का हज व उमरा बजा लाना कि वह फ़ख़्र को दूर करते हैं और गुनाहों से धो देते हैं और अज़ीज़ों से हुस्ने सुलूक करना कि वह माल की फ़रावनी और उम्र की दराज़ी का सबब हैं और मख़फ़ी (छुपे) तौर पर ख़ैरात करना कि वह गुनाहों का कफ़्फ़ारा है और वह बुरी मौत से बचाता है। (ख़ुतबा 13) ।

मौत के बारे में फ़रमाया-

“ ख़ुदा की क़सम वह चीज़ जो सरासर हक़ीक़त है , हंसी खेल नहीं सर ता पा हक़ है , वह सिर्फ़ मौत है। ” ( नहजुल बलाग़ा खुतबा 108) ।

मौत के बाद क्या होगा ? अल्लामा शेख़ मुहम्मद अब्बास कुम्मी अलैहिर्रमा ने अपनी किताब मनाज़िले आख़िरह में इस अहम मसला पर कुर्आन व अहादिस की रौशनी में बड़ी आलीमाना बहस की है और हश्र व नश्र के उमूर को उजागर किया है।

चूंकि इस किताब का मुतालिया (अध्ययन) तमाम हक़ परस्त मोमिनों (धार्मिक लोगों) के लिए ज़रुरी और मशअले राह है इसलिए हम अब्बास बुक एजेन्सी के ज़रिए इस हिन्दी एडिशन को शाए (प्रकाशित) करने का शरफ़ हासिल कर रहे हैं जिस के लिये जनाब बी 0 ए 0 नक़वी एड़वोकेट हाई कोर्ट शुक्रिया के मुस्तहक़ हैं जिन्होंने अपना क़ीमती वक़्त लगा कर बेहतरीन तर्जुमा किया। ताकि मोमनीन व मोमिनात इससे इस्तेफ़ादा कर सकें और इसकी रौशनी में अपने नेक व सालेह आमाल के ज़रिए मनाज़िले आख़रह के लिए सामाने आख़िरत फ़राहम कर सकें।


दो शब्द

आज का युग आधुनिक युग के नाम से जाना जाता है औऱ आदमी इक्कीसवीं सदी में कदम रखने के लिए आतुर है , लेकिन धर्म किसी न किसी रुम में सदैव से है और प्रलय क़यामत तक रहेगा।

इमामिया मिशन , लखनऊ से प्रकाशित होने वाली छोटी-छोटी विभिन्न विषयों की धार्मिक पुस्तकों ने हमेशा हमें प्रभावित किया तथा विद्यार्थी जीवन से ही अवैतनिक सेक्रेटी जनाब इब्ने हुसैन नक़वी मरहूम की प्रेरणा पर उनमें से बहुत सी धार्मिक पुस्तकों का अनुवाद किया तथा उर्दू से नावाक़िफ़ लोगों ने उसका समुचित स्वागत किया , उसी समय मौलाए क़ायनात हज़रत अली (अ 0 स 0) के विचारों पर आधारित प्रसिद्ध धार्मिक पुस्तक “ नहजुल बलाग़ा ” का हिन्दी में अनुवाद करने का विचार हुआ और जनाब अली अब्बास तबातबाई के अनुरोध पर उसका अनुवाद किया।

प्रस्तुत पुस्तक “ मनाज़िले आख़िरह ” अपने विषय की एक मात्र ऐसी पुस्तक है , जिसमें आदमी के पैदा होने से मरने तक के विभिन्न अवतरणों पर भली-भांति हिकायतों सहित वर्णन किया गया है।

वास्तव में अल्लाह द्वारा पहले मनुष्य पैदा किया जाता है फ़िर उसे मौत आती है और फ़िर जि़न्दा किया जाएगा। इस तरह उसकी ज़िन्दगी के तीन भाग हैं- पहले ज़िन्दगी , फ़िर मौत और फ़िर ज़िन्दगी।

आज के व्यस्तम युग में आदमी ज़िन्दगी के दूसरे और तीसरे भाग से कम वाक़िफ़ है तथा समस्त धार्मिक पुस्तकें अरबी फ़ारसी एंव उर्दू में होने के कारण भी उसे कुछ मालूम नहीं है। इसलिए समय की आवश्यकता को देखते हुए , धार्मिक पुस्तकों का हिन्दी में होना परम आवश्यक है।

मैं समझता हूँ कि “ मनाज़िले आख़िरह ” के हिन्दी अनुवाद से सभी को विशेषकर युवा पीढ़ी और उर्दू से अनभिग्य लोगों को अत्यधिक लाभ पहुंचेगा ऐसी मुझे आशा है।

जैसा कि मज़कूरा बाला अय्ये करीमा से ज़ाहिर होता है कि इस आलमे कौनो मकां की कोई चीज़ अबस और बेकार नहीं है। इन्सान अपने इर्द गिर्द की चीज़ों और गर्दिशे लैलोनहार पर ग़ौर करे तो उस पर ये बात ज़ाहिर हो जाएगी कि इस आलमे मुमकिनात का ज़र्रा-ज़र्रा हिकमतों मसलहत से ख़ाली नहीं , इन्सान का एक बाल भी बग़ैर मसलहत के पैदा नहीं किया गया।

हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम ने मुफ़ज़्ज़ल से फ़रमाया कि बाज़ जुहला यह कहते हैं कि अगर फ़लां (अमुक) अज़ो (अंग) पर बाल न होते तो बेहतर था। वह यह नहीं जानते कि वह जगह मज़मए क़साफ़ात है और उस जगह से रुतुबात का एख़राज़ (बहाव) होता है , अगर ज़ायद मवाद और कसाफ़तें बालों की सूरत में रफ़ा न होती तो इंसान मरीज़ हो जाता। इसीलिए शरीअते मुतहरा का हुक्म है कि उनको जल्दी-जल्दी साफ़ किया करो। इसी तरह इन्सान के रगो पे , दन्दां नाखून बग़ैर हिक़मतों मसलहते परवर दिगारे आलम के पैदा नहीं होते। अगर इनमें से एक भी मफ़कूद (कम) हो तो इन्सान नाकि़स कहलाता है इन तमान चीज़ों से यह बात अच्छी तरह ज़ाहिर हो जाती है कि इस आलम को ख़लअते वजूद पहनाने वाला साहबे हिकमत है और कायनात की कोई चीज़ हिकमत से ख़ाली नहीं।

इसी तरह ईजादे इन्सान भी बेकार नहीं। अब सवाल पैदा होता है कि क्या इन्सान के पैदा करने का मक़सद यह माद्दी (मायावी) ज़िन्दगी ही है और उसके बाद वह नेस्तो नाबूद हो जाएगा। नहीं हरगिज़ नहीं। अगर ग़ौर किया जाये तो कोई इन्सान इस दुनिया में आसूदा हाल नहीं है और न ही किसी को सुकून हासिल है। तरह-तरह की तकालीफ़ मसायब व आलम बीमारियों , फ़ित्नों , ग़स्बे अमवाल और दोस्तों , व अज़ीज़ों की अमवात के मसायेब (तकलीफ़) को बरदाश्त करता है।

दिल बे ग़म दर ई आलम न माशद।

अगर बाशद बनी आदम न बाशद।

( तर्जुमा- इस आलम में कोई भी दिल ग़म से ख़ाली नहीं होगा , और अगर होगा भी तो वह आदम की औलाद से नहीं होगा)

अगर इन माद्दी वसायल को ही गरज़े ख़िलक़ते इन्सानी तसलीम कर लिया जाये जो कि मसायब व आलम से पुर है तो यह हिकमतों करम और सिफ़ाते कमालिया इलाहिया के मनाफ़ी होगा , और उसकी मिसाल ऐसी होगी जैसे कोई सख़ी किसी शख़्स को मेहमानी पर बुलाये और उसके लिए एक ऐसा मकान मुहैया करे , जिसमें तरह-तरह के दरिन्दे मौजूद हों , फ़िर उस कमरे में उसके लिए खाना चुन दिया जाय और जब वह लुक़मा उठायें तो तमाम दरिन्दे उससे वह लुक़मा छीनने के लिए हमला कर दे तो कोई अक़लमन्द ऐसी मेहमानी को मुफ़ीद और लायक़े तारीफ़ न समझेगा , बल्कि , ऐसी मेहमानी जो कि जान के लिए ख़तरा है , बेकार होगी। किसी चीज़ को बना कर बिगाड़ देना फ़ेले क़बीह है और ख़ल्लाके आलम से कोई फ़ेले (कार्य) क़बीह सरज़द होना नामुमकिन है।

बस यह बात कतई तौर पर साबित हो जाएगी कि इन्सान की मंज़िले मक़सूद यह माद्दी ज़िन्दगी नहीं बल्कि उसकी मंजिले मक़सूद ऐसी जगह है , जिसमें मौत नहीं , जिसमें हुज़्नों मलाल नहीं , जहां कि किसी चीज़ को फ़ना और ज़वाल नहीं है इन्सान जिसको अपनी मंज़िले मक़सूद समझे हुए हैं , यह तो उसकी गुज़रगाह है , और वह मन्ज़िल उस वक़्त तक पार नहीं की जा सकती , जब तक कि इन मनाज़िल के लिए बक़्द्र ज़रुरत तोशा और ज़ादे राह मुहैय्या न कर लिया जाये।

इसलिए हमें चाहिए कि हम अपनी ग़रज़े ख़िलक़त और मक़सद को समझने की कोशिश करें और उसके लिए ज़रुरी ज़ादे राह मुहैय्या करें , ज़ेरे नज़र किताब मनाज़िले आख़िरा में इन्हीं मनाज़िल का तज़किरा नेहायत दिलचस्प और उम्दा अन्दाज़ में पेश किया गया है , और इन मनाज़िल में दरपेश मुश्किलात और उनका इलाज अहादीस व अख़बारात की रोशनी मे ज़ाहिर किया गया है।

मुमकिन है कि कुछ पढ़ने वाले लोग इस किताब में दर्ज शुदा हिकायत व वाक़यात को महज़ क़िस्सा गोयी या झूठी रिवायत ख़्याल करते हुए यक़ीन न करें , इसलिए ज़रुरी समझ़ता हूं कि मरातिबे अख़बार का तज़किरा किया जाय ताकि पढ़ते वक़्त शुकूक व शुब्हात की गुंजाइश बाक़ी न रहे और ईमान व यक़ीन में इज़ाफ़ा हो।

“ हर वह चीज़ जो तेरे कानों तक पहुंचे जब तक तेरे पास उसके न होने पर अक़ली दलील न हो उसे मुमकिन ख़्याल कर। ”

मरातिबे अख़बार- हर वह ख़बर जिसके न होने पर कोई अक़ली और नक़ली दलील न हो , उस का इन्कार न करो।

दरजा दोम- इसके अलावा अगर उसके साथ दोस्ती और सिदक़ के शवाहिद भी मौजूद हों तो उसे कुबूल कर लेना चाहिए और इन्कार नहीं करना चाहिए।

दरजा सोम- अगर ख़बर देने वाला परवरदिगारे आलम की तरपञ से कोई बुरगजीदा हस्ती और सनद याफ़ता और मनसूसमिन अल्लाह मासूम हो तो वह मोजिज़ह है। इस सूरत में अगर अकेले अक़ल उसके अदम इमकान का हुक्म दे तो इसका इन्कार नहीं करना चाहिए। बल्कि बदरजा अव्वल , दरज़ा दोम की ख़बर के मुताबिक़ इसको कुबूल करते हुए मुतमईन हो जाना चाहिए।

जबकि एक मुनज्जिम या इल्मे हैय्यत का दावेदार यह दावा करे के फ़लां सय्यारे के गिर्द कई और सय्यारे या सितारे ऐसे ही चक्कर लगा रहे हैं जैसा कि चांद ज़मीन के गिर्द , तो कोई शख़्स इसका इन्कार नहीं करेगा , बल्कि मुमकिन ख़्याल करते हुए उसके दावे को तसलीम करेगा , क्योंकि जो ख़ालिक़े मुमकिनात एक चांद को पैदा कर सकता है , वह उस पर भी क़ादिर है कि , इसके अलावा भी कई चांद तख़लीफ़ (पैदा) फ़रमाये और जब इन चीज़ों की तसदीक़ अक़वाले मासूम से भी हो जाय तो इन्कार की कोई गुंजाइश बाक़ी नहीं रहती।

यही हालत उन रुयाये सादिक़ा और हिकायात की है , जो कि ज़ेरे नज़र किताब में दर्ज की गयी है। इसलिए सिर्फ़ हिकायात समझ कर इन्कार कर देना मुस्तहन नहीं है , जबकि उनका माख़ज़ सक्क़ए उल्मा की किताबें हैं।

इससे पहले मुरव्वजुल- एहकाम मौलाना गुलाम हुसैन साहब मज़हर ने पहला एडिशन पेश किया , जिसमें किताब मनाज़िले आख़िरा हाजी शेख़ अब्बास कुम्मी ताब सराह का तर्जुमा था और अस्ल किताब में बाज़ अलमनाज़िल और वाक़ियात के मफ़कूद होने के बाअस सिर्फ़ उसी के तर्जुमा को काफ़ी समझा गया।

अब ज़ेरे नज़र किताब दूसरा एडिशन बमए मुफ़ीद इज़ाफ़ा है , जिसमें इन तमाम ख़ामियों का अज़ाला कर दिया गया है , जो कि पहले एडीशन में मौजूद थे।

इस किताब की तरतीब व तालीफ़ का ज़्यादातर इन्हेसार अलमनाज़िल आख़िरा और आयत उल्ला सैय्यद अब्दुल हुसैन दस्दग़ैब मदज़िल्लूह की किताब “ अलमआद ” पर है। अलावा बरीं कुछ मुफ़ीद मतालिब और हिकायात मुन्दरजा ज़ैल किताबों से इ्कट्ठा की गयी हैं। अहसनुल फ़वायद , तफ़सीर उम्दतुल बिसयान , बहारुल अनवार , तफ़सीर अनवारुल नज़फ , ख़ज़ीनतुल जवाहर वग़ैरा। मौलाना मौसूफ़ ने इन ज़रुरी मुक़ामात पर इज़ाफ़ा फ़रमा कर इस किताब की अहमियत और ज़रुरत को और मोसर बना दिया है।

ख़ल्लाक़े आलम हमें इन मतालिब को समझ़ने और उन पर अमल करने की तौफ़ीक़ अता फरमाए और मरव्वजुल-एहकाम मौलाना गुलाम हुसैन साहब मज़हर जिन्होंने दिन-रात की कठिन मेहनत के बाद , इस को तरतीब दिया उन्हें अज्रे जज़ील अता फ़रमाए।

पेश लफ़्ज़

लेख़क विचारक अब्बास कुम्मी की पुस्तक मनाज़िले आख़िरह का हिन्दु अनुवाद “ मरने के बाद क्या होगा ” ? अब आप के सम्मुख है। हमारे समाज में विशेषकर नौजवान पीढ़ी में धार्मिक शिक्शा तथा धार्मिक ग्यान का सर्वथा अभाव सा हो गया है। जिसके अनेक कारणों में से एक कारण यह भी है कि हमारी धार्मिक पुस्तकें प्रायः अरबी , फारसी तथा उर्दू में हुआ करती हैं। अतः समय की मांग को देखते हुए हमारे कुछ उल्माओं , धार्मिक विचारकों तथा लेखकों ने धार्मिक ग्यान कोष का हिन्दी में अनुवाद करने का बेड़ा उठाया है। श्री बी.ए. नक़वी ऐसे ही जागरुक लेखकों एंव अनुवादकों में से एक हैं।

किसी रचना का मूल सृजन तो लेखक की रचनात्मक छ्मता पर आधारित होता है किन्तु किसी रचना का दूसरी भाषा में अनुवाद वह भी इतना स्वाभाविक कि वह उसी भाषा की मूल रचना प्रतीत हो , यह प्रत्येक व्यक्ति के बस में नहीं होता इसके लिए जिस महारत , कौशल तथा निपुणता की आवश्यकता होती है वह श्री बी.ए. नक़वी में पूर्णतयाः विद्यमान है।

श्री नक़वी ने केवल इसी पुस्तक का हिन्दी अनुवाद नहीं किया है वरन् वह इससे पूर्व बहुत सी अन्य धार्मिक पुस्तकों का भी अनुवाद कर चुके हैं जिसमें “ नहजुल बलाग़ा ” जैसी पुस्तक का अनुवाद एक अत्यंत ही महत्वपूर्ण कार्य है।

यद्यपि श्री नक़वी का पेशा वकालत है फिर भी साहित्य विशेषकर धार्मिक साहित्य तथा हिन्दी भाषा में उनकी विशेष रुचि है तथा समस्त धार्मिक पुस्तकों को आज की मांग को देखते हुए हिन्दी अनुवाद के परम हिमायती है।

चूंकि इस पुस्तक का पढ़ना समस्त मोमेनीन के लिए आवश्यक है , अतः श्री नक़वी ने इस पुस्तक को भारत में रहने वाले उन तमाम मोमेनीन तथा नौजवानों तक पहुंचाने का बेड़ा उठाया है जो उर्दू पढ़ना नहीं जानते हैं।

वास्तव में इस पुस्तक में मरने के बाद रुह को किन मनाज़िल से गुज़रना है इस पर प्रकाश डाला गया है , तथा दुनिया में रहते हुए आख़ेरत को संवारने का रास्ता भी बताया गया है , क्योंकि “ बदतरीन अमल वह है जो आख़ेरत को बरबाद कर दे ” ( मौला अली) “ बेहतरीन बात वह है जिसका दुनियां में फ़ायदा हो और आख़ेरत में इनाम मिले। ” ( मौला अली) आख़ेरत में रहना है लेहाज़ा सामाने आख़ेरत भेज दो। (मौला अली)।


पहला हिस्सा

मआद क़यामत

मआद (क़यामत) शब्द से निकला है जिसके मानी (अर्थ) लौटना है , चूंकि रुह (आत्मा) , दोबारा शरीर की और लौटती है , इसलिए इसको मआद (प्रसलय( कहते हैं। मआद उसूले दीन (धर्म के नियम) में से एक है जिस पर विश्वास (ऐतेक़ाद) करना हर मुसलमान के लिए ज़रुरी है , क्योंकि हर मनुष्य मरने के बाद दोबारा ज़िन्दा होगा और उसे अपने आमाल (कृत्यों) का फल मिलेगा।

मआद (क़यामत) का मसला जिसकी शुरुआत मौत और इसके बाद क़ब्र , बरज़ख़ (मरने के बाद से क़यामत तक का ज़माना) , क़यामते कुबरा (प्रलय) और आख़िर में जन्नत (स्वर्ग) या जहन्नम (नरक) हैं। मआद का हवासे ख़मसा ज़ाहिरा (देखने सुनने , सूंघने , चखने और छूने की पांच शक्तियां) के द्वार खोज करना असम्भव है और मआद (क़यामत) बुद्धि के तर्कों से सिद्ध है।

मरने के बाद क्या होगा ? सरकारे दो आलम ने वही (ईश्वरीय संदेश) के द्वारा इसकी ख़बर दी है। हर इन्सान का अपना मुक़ाम और आलम औऱ उसकी तलाश इस आलम और मुक़ाम की सीमाओं से आगे नहीं जाता। मिसाल के तौर पर वह बच्चा जो अपनी माँ के पेट की दुनियां और आलम में आबाद है , उसके लिए मुश्किल है कि वह पेट के बाहर आलमे बुजुर्ग के बे पायां फ़िज़ां और मौजूदात की खोज कर सके। इसी तरह असीर तबीयत व मादहे आलमे बातिर यानी मलकूत को नहीं समझ सकता , जब तक कि इस दुनियां से छुटकारा हासिल न करे। मरने के बाद आलम की खुसूसियात उस शख़्स के लिए जो इस आलम में आबाद है , ग़ैब (परोक्श) के हुक्म में है और उसकी मारिफ़त (परिचय) के लिए हुजूरे अकरम (स 0 अ 0) की अख़बार की तसदीक के सिवा कोई चारा नहीं। बस अगर कोई शख़्स यह कहे कि मेरी अक़ल से दूर है कि मरने के बाद क्या होगा तो उसकी बात बिल्कुल विश्वास के योग्य न होगी , क्योंकि उस आलम की खुसुसियात का अक़ल के साथ कोई सम्बन्ध (रब्त) नहीं है और जो कुछ हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स 0 अ 0) ने फ़रमाया है हमें उसका यक़ीने कामिल होना चाहिए , क्योंकि वह तमाम मासूम (पाक) हैं और महले नज़ूले वहीए परवरदिगार हैं।

क्या मुर्दा हर्फ़ करता है ?

यह शक जिन्होंने ज़ाहिर किया है , उनका ख़्याल है कि मुर्दा जमादात (जड़ वस्तुओं) की तरह है जैसे सूखी लकड़ी , फ़िर कब्र में सवाल व जवाब किससे होगा ?

जवाब- यह शक कम इल्मी , बेख़बरी और आख़िरत पर ईमान बिल ग़ैब न होने की दलील है। बोलना फ़क़त ज़बान का नतीजा है , अरवाह में नुत्फ़ और जुमबिश नहीं है। हैवान के अज़ा हरकत हैं। रुह जुमबिश नहीं करती। स्पष्ट उदाहरण है। आप नींद की हालत में ख़्वाब के वक़्त बातें करते हैं। मगर ज़बान औऱ होंठ हरकत नहीं करते। अगर कोई शख्स जाग रहा हो तो उसकी आवाज़ को नहीं सुनता , हालांकि वह जागने पर कहता है कि मैं अभी ख़्वाब में फलां के साथ बातें कर रहा था , इसी तरह दूर-दराज़ के मुल्कों की सैर भी कर लेता है मगर जिस्म बिस्तर पर मौजूद और महफूज़ रहता है।

ख़्वाब देखने का सबब

हज़रत मुसा बिने जाफ़र (अ 0 स 0) इरशाद फ़रमाते हैं कि दुनियां के शुरुआत में इन्सान नींद की हालत में ख़्वाब नहीं देखते थे , मगर बाद में इस दुनियां के बनाने वाले ने नींद की हालत में ख़्वाब दिखाने शुरु किए और उस की वजह यह है कि इस दुनिया के रचने वाले ने उस समय के लोगों की हिदायत के लिए एक पैग़म्बर को भेजा और उसने अपनी क़ौम को अताअत और अल्लाह की अबादत की दावत दी , मगर उन्होंने कहा अगर हम तेरे ख़ुदा की अबादत करें तो उसका बदला क्या देगा ? हालाकि तेरे पास हसमे ज़्यादा कोई चीज़ नहीं है तो उस पैग़म्बर ने इरशाद फ़रमाया कि अगर तुमने ख़ुदा की अताअत की तो तुम्हारा इनाम बेहश्त (स्वर्ग) होगी। अगर किनारा किया और मेरी बात को न सुना तो सजा़ जहन्नुम (नरक) होगी। उन्होंने पूछा दोज़ख़ और बेश्त क्या चीज़ है ? उस पैगम्बर ने दोज़ख़ और बेहश्त के अवसाफ़ (विशेषतायें) उनके सामने ब्यान किए और तशरीह (विवेचना) की। उन्होंने पूछा कि यह बेहश्त हमें कब मिलेगी। पैग़म्बर ने इरशाद फ़रमाया जब तुम मर जाओगे। कहने लगे हम देखते हैं कि हमारे मुर्दे बोसीदा होकर ख़ाक में मिल जाते हैं उनके लिए जिन चीज़ों की तूने तौसीफ़ की है , नहीं देखते और पैग़म्बर के इरशाद को झुठलाया। अल्लाह ने उनको ऐसे ख़्वाब दिखाए कि वह ख्वाब में खाते-पीते , चलते-फिरते , गुफ़तगू करते हैं और सुनते हैं , लेकिन जागने के बाद ख़्वाब में देखी हुई चीज़ों के असरात नहीं पाते। बस वह पैग़म्बर की ख़िदमत में हाज़िर हुए और अपने ख़्वाब उनके सामने बयान किए। पैग़म्बर ने इरशाद फ़रमाया कि अल्लाह ने तुम पर हुज्जत (तर्क-वितर्क) तमाम कर दी है कि मरने के बाद तु्म्हारी रुह (आत्मा) भी इसी तरह होती है , चाहे बदन मिट्टी में मिल कर मिट्टी हो जाय तुम्हारी रुह (आत्मा) क़यामत तक अज़ाब (यातना) में होगी और अगर नेक होंगे तो बेहश्त में खुदा की नेआमतों से लुत्फ़ उठाएगी। (मआद)-

मंज़िले अव्वल

इस सफ़र की पहली मंजिल मौत है।

मौत- मौत की तारीफ़ के बारे में उल्मा में एख़तलाफ़ है। कुछ मौत को अमरे वजूदी और कुछ अमरे अदमी कहते हैं। तहक़ीक़ शुदा बात है कि मौत अमरे वजूदी है और इस सूरत में इसकी तारीफ़ यह की गयी हैः-

“ मौत एक वजूदी सिफ़त है , जो हयात की ज़िद है। ” कुर्आन मजीद में हैः-

“ बाबरकत है वह ज़ात जिसके क़ब्ज़ए कुदरत में तमाम कायनात की बागड़ोर है , औऱ वह हर चीज़ पर क़ादिर है , जिसने ज़िन्दगी और मौत को इसलिए पैदा किया ताकि आज़माए कि तुममे से किसके आमाल अच्छे हैं। ”

इस आयत (सूत्र) में ज़िन्दगी और मौत की तख़लीफ़ का वर्णन किया। केवल अदम (दुनिया) की तख़लीफ़ नहीं होती अगर मौत अमरे अदमी होती तो लफ़्ज़ ख़ल्क़ कुर्आन में इस्तेमाल न किया जाता।

मौत हक़ीकतन बदन और रुह (आत्मा) के सम्बन्ध का ख़त्म होना है। रुह और बदन के सम्बन्ध को अनगिनत तशबीहात के ज़रिये ज़ाहिर किया गया है। जैसे मल्लाह और कश्ती और मौत ऐसे हैं , जैसे कश्ती को मल्लाह के एख़्तयार से अलग कर दिया जाय। रुह वह चराग़ है जो ज़ुल्मत कदाए बदन को रौशन करती है और तमाम अज़ा व जवारह रौशनी हासिल करते हैं। मौत इस चराग़ का जुदा करना है कि जब इसको जुदा किया जाय तो फिर तारीक हो जाएगा। इसके अतिरिक्त यह ताअल्लुक़ इस तरह नहीं कि रुह बदन में हुलूल करती है या बदन के अन्दर दाख़िल होती है। इसलिए दाख़िल होना या निकलना रुह के लिए ठीक नहीं है , बल्कि सिर्फ़ ताअल्लुक़ रखती है और इसी ताअल्लुक़ का टूट जाना मौत कहलाता है।

हम पर वाजिब है कि हम यह यक़ीन रखें कि मौत ख़ुदा के हुक्म से आती है। वही ज़ात जिसने मां के पेट से लेकर आख़िर दिन तक रुह का बदन से ताअल्लुक़ पैदा किया। वही रुह के बदन के साथ सम्बन्ध को ख़त्म भी करती है। वही हमें मारता है वही जिलाता है जैसे कुर्आन मजीद में हैः-

“ अल्लाह ही नफ़्स को मौत देता है। ”

बाज़ जाहिल लोग इज़राइल को बुरा कहते हैं और दुश्मन समझते हैं कि वह हमारी औलाद को और हमें औलाद से छीनता है औऱ यह नहीं समझते कि वह तो अल्लाह की तरफ़ से इस काम पर मामूर है औऱ वह उसके हुक्म के सिवा कुछ भी नहीं करता।

रुहे (आतमाएँ) कैसे क़ब्ज़ होती हैं ?

अहादीस मेराज के ज़िम्न में रुह के क़ब्ज़ होने की क़ैफ़ियत यह ब्यान की गयी है कि हज़रत इज़राईल के सामने एक तख़्ती मौजूद है जिस पर तमाम नाम तहरीर हैं , जिसकी मौत आ जाती है , उसका नाम तख़्र्ती से साफ़ हो जाता है।

फ़ौरन इज़राईल उसकी रुह क़ब्ज़ कर लेता है। आने वाहिद में यह मुमकिन है कि हज़ारहा इन्सानों के नाम साफ़ हो जांए और इज़राईल जैसा कि एक ही वक़्त में हज़ारों जिराग़ गुल किए जा सकते हैं इसलिए आश्चर्य नहीं करना चाहिए दरहक़ीक़त मारने वाला खुदा है , जैसा कि क़ब्ज़े रुह की निस्बत खुदा की तरफ़ दी गयी है।

“ तुम्हे मौत मलकुल मौत (इज़राईल) देता है , जो कि तुम पर मोवक्किल है। ”

एख और जगह इरशाद फ़रमाया-

“ जिन लोगों की फ़रिश्तों ने रुह कब्ज़ की उस वक़्त वह अपने आप पर जुल्म कर रहे थे। ”

इन्सान को मारने वाले इज़राईल और उसके अवान व अन्सार फ़रिश्ते हैं , ये तीनों दुरुस्त हैं क्योंकि इज़राईल और उसके अवान व अन्सार फरिशते अल्लाह के हुक्म से ही रुह को क़ब्ज़ करते हैं जैसा कि लश्कर बादशाह के हुक्म से दूसरी हुकूमत को फ़तह किया। दर हक़ीक़त फ़तूहात बादशाह की सूझ बूझ और हुकमरानी की वजह से होती है ये तमाम मिसालें हक़ीक़त को समझाने के लिए हैं वरना हक़ीक़त इससे बालातर है , दर हक़ीक़त ज़िन्दा करने वाला और मारने वाला ख़ुदा ही है।

ख़ुदा ने जैसा कि इस दुनिया को दारुल असबाब (परेशानियों का घर) क़रार दिया है , इसी तरह मौत के लिए भी वजह तै कि है , जैसे मरीज़ (रोगी) होना , क़त्ल होना , हादिसा (दुर्घटना) में मरना , गिर कर मरना वग़ैरह। यह तमाम मौत की वजह और बहाने हैं वरना कई लोग ऐसे हैं कि शदीद बीमारियों में मुबतिला होते हें और अच्छे हो जाते हैं , बस बैठे-बैठे मौत हो जाती है। यह वजह अकेले मौत का कारण नहीं अगर उम्र का वक्त पूरा हो गया तो अल्लाह उसकी रुह (आत्मा) क़ब्ज़ कर लेता है।

कुछ लोगों की रुह आसानी के साथ और कुछ की सख़्ती के साथ क़ब्ज़ की जाती है। रवायात (ब्यानों) में मौजूद है कि मरने वाला महसूस करता है , गोया (मानो) की उसके बदन को कैन्ची से काटा जा रहा है या चक्की में पासी जा रहा है और कुछ लोगों को ऐसा महसूस होता है मानों फूल सूंघ रहे हैं।

“ यह वह लोग हैं जिन की रुहें (आत्माए) फ़रिश्ते (देवता) उनसे कहते हैं सलाम अलैकुम , जो नेकियां तुम दुनियां में करते थे , उसके सिले (बदले) में जन्नत में बेख़टके चले जाओ। ”

यह भी समझ लेना ज़रुरी है कि यह भी कोई क़ायदए कुल्लिया (व्यापक नियम) नहीं है कि हर मोमिन (आस्तिक) की जान आसानी के साथ कब्ज की जाती है , बल्कि अक्सर मोमनीन कुछ गुनाहों की वजह से जान सख़्ती से निकलती है , ताकि मोमिन दुनिया में ही गुनाहों की कसाफ़तों (गन्दगी) से पाक (पवित्र) हो जाय। कफ़फारे (प्रायश्चित) के लिए यह सख़्ती अज़ाब (यम यातना) की ज़्यादती और आख़िरत (परलोक) के अज़ाब (यम यातना) का मुकद्दमा होती है।

“ तो जब फिरश्ते उन की जान निकालेंगे उस वक़्त उनके चेहरों और पुश्त पर मारते जायेंगे। ”

कभी कुफ़्फ़ार व फ़ासिक लोगों की जान आसानी से क़ब्ज़ होती है क्यों कि यह लोग अहले अज़ाब (यमयातना योग्य) में से हैं लेकिन अपनी ज़िन्दगी में कुछ अच्छे काम किए जैसे यतीम पर ख़र्च औऱ मज़लूम (असहाय) के दुख-दर्द को सुना , इसलिए उसका हिसाब उसी जगह बेबाक़ करने के लिए जान आसानी से निकलती हैं ताकि आख़रत में उसका कारे ख़ैर के मुआवज़ा का मुतालबा ख़त्म हो जाए।

वास्तव में क़ब्ज़े रुह काफ़िर (नास्तिक) के लिए पहली बदबख़्ती है , चाहे जान आसानी से निकले या सख़्ती के साथ और मोमिन (आस्तिक) के लिए मौत न्यातम और सआदत होती है। जांकनी में सख़्ती हो या आसानी इसी वजह से मोमिन (आस्तिक) या काफ़िर (नास्तिक) की निस्बत से आसानी से सख़्ती को कुल्लिया (नियम) क़रार नहीं दिया जा सकता (मआद)

दुनिया के साथ मोहब्बत

मौत से कराहत (घृणा) औऱ दुनियां से दोस्ती इस वजह से होती है कि इन्सान दुनियावी खुशी से लाभ उठाने वाला है जैसा कि अकसर लोगों का हाल है ग़लत और अक़ल के अनुसार बेजा है। दुनियां ब हज़ार दिक़्क़त हासिल होती है और हज़ारों मुसीबतें और सख़्तियां साथ लेकर आती है और फ़ना और ज़वाल है , बका़ और दवाम और वफ़ा नहीं है।

क्या ख़ूब शायर ने कहा हैः

दिलवर जहां मवन्द कि ई बेवफ़ा उरुस।

वाहेच कस शबे व मुहव्वत बसर न करद।

( अनुवाद – अपने दिल को दुनिया से न लगाओ क्यों कि यह बह बेवफ़ा उरुस (यानी दुल्हन) है जिसने किसी शख़्स के साथ भी एक रात मुहब्बत से बसर नहीं की।)

अलावा बरीं कुर्आन मजीद में दुनियां की मुहब्बत को कुफ़्फ़ार (नास्तिकों) की सिफ़ात में शुमार किया गया है।

“ कि कुफ़्फ़ार दुनियावी ज़िन्दगी पर राज़ी हो गये और उन पर मुतमइन (संतुष्ठ) हो गये। ”

दूसरी जगह इरशाद फ़रमाया-

“ क्या तुम आख़िरत को छोड़ कर दुनियावी ज़िनद्गी पर राज़ी हो गये हो। ”

यहूदियों के लिए फ़रमाया-

“ तुममें से हर एक की ख़्वाहिश है कि काश हज़ार साल दुनियां में उम्र पाता। ”

इस बारे में आयात और रवायाते कसीरा मौजूद हैं यहां पर मशहूर हदीसे नबवी दुनियाँ की दोस्ती तमाम गुनाहों की जड़ है का नक़्ल करना काफ़ी है।

मौत के साथ दोस्ती

महत्वपूर्ण बात यह है कि इन्सान अल्लाह से मिलने के महबूब समझ़े और मोमिन मौत को बुरा न समझे , और मौत की वहशतनाकी से डरता रहे , न कि मौत की ख़्वाहिश करता रहे। या करे , अपने नफ़्स की इस्लाह करे और ख़ैरात ज़्यादा करे और जब भी ख़ुदा उसके लिए मौत नियुक्त करे उसी हालत में उसको न्यामते खुदावन्दी समझे कि कितना जल्दी उसने दारुस्सवाब में पहुंचा दिया , अगर गुनहगार है तो यह समझे कि मौत के वसीले से गुनाहकारी के रिश्ते को ख़त्म कर दिया और सज़ा का काम मुस्तहक़ हुआ।

ख़ुलासा यह है कि मौत में ख़ुदा की रज़ा पर राज़ी रहे और दुरुलगुरुर से दारुल सुरुर में पहुंचे और दोस्तों के बसाल यानी मोहम्मद (स 0 अ 0) व आले मोहम्मद (स 0 अ 0) और आले अतहार और नेक रुहों की मुलाक़ात से खुश हो। इसी तरह जब तक परवरदिगारे आलम चाहे ताख़ीरे मौत और तूले उम्र पर राज़ी रहे ताकि इस दारुल फ़ना में आख़िरत की तुलानी सफ़र के लिए ज़्यादा तोशए सफ़र जमा कर सके , क्योंकि इस मंजिल तक पहुंचने के लिए घाटियां पेचीदा औऱ मुक़ामात दुश्वार हैं। इस जगह हम उनमें से कुछ मुक़ामात की तरफ़ इशारा करते हैं। (मआद)।

उक़बए (यमलोक) अव्वल

सकरात मौत (मरते समय की तक़लीफ)

और जान की सख़्ती के बारे में

“ और मौत की बेहोशी हक़ के साथ आ गयी यह वही तो है जिससे तुम किनारा करते थे। ”

यह उक़बा (यमलोक) बहुत कठिन है , जिसमें हर तरफ़ तो मर्ज़ (रोग) और दर्द की ज़्यादती , बंदिशे ज़बान , शरीर के अंगों की कमज़ोरी और दूसरी तरफ़ अहलो अयाल (परिवार) की चीख़ पुकार उनकी जुदाई , बच्चों की बेकसी और यतीमी (अनाथ होना) का ग़म , और उस पर यह ज़ुल्म की अपनी दौलत , मकानात जागीरों और उन नफ़ीस चीज़ों के ज़ख़ीरों की जुदाई का ग़म जिनके पाने के लिए उसने अपने बेशुमार वसायल से काम लेकर अपनी जि़न्दगी के मताए अज़ीज़ को सर्फ़ किया था , बल्कि अकसर ऐसा भी हुआ कि अकसर माल लोगों के जुल्म के ज़रिए ग़सब (अपभोग) किया था और जिस क़द्र माल से ताअल्लुक़ और क़ब्ज़ा होता गया वह मारगंज (सापों का ख़ज़ाना) बनता गया और वापस न किया , अब ऐसे वक़्त में अनपे बिगड़ते हुए कामों की तरफ़ मुतवजेह हुआ जबकि वक़्त गुज़र चुका और इस्लाह (सुधार) के रास्ते बन्द हो गये , जैसा कि अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अलै 0 स 0) ने की परवाह न की जो उसे जमा करने में दर पेश आते रहे , यहां तक कि अब वह इस दौलत से जुदा होने लगा औऱ वह माल उसके वारिसों के लिए बच रहा , जो उससे फ़ायदा उठा रहे हैं पस उसकी तकलीफ़ ग़ैरों के लिए और फ़वाएद पिछलों के लिए थे। ”

एक तरफ़ इस दुनिया से आलमे सानी (दूसरी दुनियां) में मुंतक़िल होने के ख़ौफ़ से उस की आंखे ऐसी ख़ौफ़नाक़ चीज़ें देखती हैं , जो उसने इससे पहले न देखी थीं।

“ हमने तेरी आंखों से पर्दा हटा दिया , पस तेरी नज़र तैर हो गयी। ”

वक़्ते एहतेज़ार (मौत का आख़िरी वक़्त) मरने वाला मलाएका के ग़ज़ब (प्रकोप) को अपने पास देखता है और फ़िक्रमन्द होता है कि उसके बारे में क्या हुक्म और सिफ़ारिश की जाती है

अक्सर रवायात में आया है कि रसूले अकरम (स 0 अ 0) और आइम्माए ताहरीन (अ 0 स 0) वक़्ते एहतेज़ार हर शख़्स के सिराहने नूरानी और मिसाली बदनों के साथ हाज़िर होते हैं इमाम रज़ा (अ 0 स 0) अपने असहाब में से एक मरने वाले शख़्स के पास तशरीफ़ ले गये , उसने आपके चेहरे पर निगाह की और अर्ज़ करने लगा कि अब रसूले खुदा (स 0 अ 0), हज़रत अली (अ 0 स 0), हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स 0 अ 0), इमाम हसन (अ 0 स 0) और इमाम हुसैन ता हज़रत मूसा बिन जाफ़र (अ 0 स 0) तमाम लोग हाज़िर हैं और आपकी सूरते नूरिया भी हाज़िर है। (बहार जिल्द सोम)।

यह बात मुसलमात में से है कि हर शख़्स एहतेज़ार के वक़्त अपनी मोहब्बत और मारिफ़त के अन्दाज़े के मुताबिक सरवरे क़ायनात पर आले अतहार (अ 0 स 0) से मुलाक़ात करता है चाहे काफ़िर (नास्तिक) हो या मोमिन (आस्तिक)। यह मुलाक़ात मोमेनीनके लिए न्यामते परवर दिगार औऱ मुनाफ़िक़ व काफ़िर के लिए क़हरे जब्बार।

एै गु़फ़्त फ़मई समुत यरेनी

जाँ फ़िदाई कलाम दिल जोयत।

काश सेज़ी हजार मर्ताबा मन

मरदमी ता बदीद मी रौयत।।

दूसरी तरफ़ शयातीन अपने आवान व अन्सार के साथ मोहतज़र को शक में डालने के लिए उसके पास जमा होते हैं जिस के ज़रिए उसका इमान छिन जाय और वह दुनिया से मुनकिर (निवर्ती) उठे , इस पर जुल्म यह कि मलकुल मौत की आमद का ख़ौफ़ कि वह किस हैयत (सूरत) में होगा और वह उसकी रुह (आत्मा) को किस तरह क़ब्ज़ करगा। आसानी के साथ या सख़्ती के साथ। हज़रत अली (अ 0 स 0) ने फ़रमायाः-

“ इस पर सकरात मौत जमा हो गये , जिनका वसफ़ ब्यान नहीं किया गया कि वह क्या लेकर उतरेंगे। ”

शेख़ कलीनी (र 0 अ 0) हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से रवायत करते हैं कि एक मरतबा हज़रत अमीरुल मोमनीन (अ 0 स 0) को आँखों का दर्द का आरज़ा हुआ हज़रत रसूले अकरम (स 0 अ 0) आपकी अयादत के लिए तशरीफ़ लाए देखा कि हज़रत अली (अ 0 स 0) दर्द की वजह से फ़रयाद कर रहे हैं। आपने पूछा कि यह फ़रयाद बेताबी और बेक़रारी की वजह से है , या दर्द की ज़्यादती की वजह से। अमीरुल मोमनीन ने अर्ज़ किया , या रसूल अल्लाह! मुझे अब तक इस शिद्दत का आरज़ा (रोग) कभी नहीं हुआ। हज़रत ने फ़रमाया ऐ अली! जब मलकुल मौत काफ़िर (नास्तिक) की रुह कब्ज़ करने के लिए आता है तो वह अपने साथ आग का एक गुर्ज़ लाता है , जिसके ज़रिए उसकी रुह को खींचता है , पस जहन्नुम उसे पुकारती है। जब अमीरुल मोमनीन (अ 0 स 0) ने यह बात सुनी तो उठ बैठे और अर्ज़ किया या रसूल अल्लाह (स 0 अ 0) इस हदीस का अआदा (पुनरावृत्ति) फ़रमाएं क्योंकि मुझे दर्द की तक़लीफ़ महसूस नहीं हो रही हैं औऱ पूछा आक़ा क्या आपकी उम्मत (अनुयायी) में से भी किसी की रुह इस तरह क़ब्ज़ की जाएगी। फ़रमाया हां तीन अश्ख़ास (लोगों) की जान मेरी उम्मत में से इस तरह क़ब्ज़ की जाएगी-

(1) ज़ालिम हाकिम।

(2) जिस शख़्स ने यतीमों का माल बज़रिए जुल्म ग़स्ब किया हो।

(3) झूठी गवाही देने वाले की।

इन्सान अपने आमाल नेक व बद का नतीजा जांकनी की आसानी और सख़्ती में भी देख लेता है कुछ तो ऐसे होते हैं कि अपनी बन्द आमाली की बिना पर मरते वक़्त काफ़िर (नास्तिक) हो जाते हैं।

रवायाते क़सीरा इस बात की शाहिद हैं कि सकरात मौत के वक़्त और बाद में हैज़ वाली , नफास वाली और जनाबत वाली लोगों का मोहतज़र (मरने वाले) के पास रहना मलाएकए रहमत के मुतनफ़्फ़िर और मैय्यत के लिए तक़लीफ़ का बयास है।

अललशराए मैं बा असनाद सदूक़ (र 0 अ 0) इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से रवायत है कि आपने फ़रमाया-

“ हायज़ा और जुनबी सकरात मौत के वक़्त (मोहतज़र के पास) न रहें , क्यों कि मलाएका इनसे मुतनफ़्फिर होते हैं। ”

किताब दारुसलाम में सैय्यद जलाल सिक़ा सैय्यद मुर्तज़ा नजफ़ी से मंकूल है कि उन्होंने फ़रमाया कि मैं इस साल जब कि इरब व इराक़ में ताऊन की वबा (बीमारी) आम थी। सनदुलउल्मा अलरासीख़ीन सैय्यद मोहम्मद बाक़र कज़वीनी के साथ सहने-अमीरुल मोमेनीन के दरमियान बैठा था और लोग इर्द-गिर्द जमा थे और आप हर एक के ज़िम्मे अमवात की ख़िदमत सुपुर्द कर रहे थे , कि एक अजमी नौजवान ज़व्वार उस मजमें के आख़िर में खड़ा था , जो सैय्यद मरहूम की ख़िदमत में हाज़िर होना चाहता था , लेकिन लोगों की कसरत हायल थी। उस नवजानव ने रोना शुरू किया और सैय्यद मरहूम मेरी तरफ़ मुतवजेह हुए और फ़रमाया जाकर उस नवजान से रोने का सबब मालूम करो। मैंने उसके पास जाकर रोने की वजह पूछी उसने कहा मेरी ख़्वाहिश है कि सय्यद मौसूफ़ मेरी तन्हा मैय्यत पर नमाज़े जनाज़ा पढ़ें। मैं देखता हूं कि बाज़ अवक़ात (कभी-कभी) बीस , तीस जनाज़े जमा होने पर एक ही बार नमाज़ पढ़ते हैं। मैंने उसकी हाजत सैय्यद मौसूफ़ की ख़िदमत में अर्ज़ की और आपने शरफ़े क़बूलियत बख़्शा। दूसरे दिन एक बच्चा मजमें के आख़िर में रोता हआ देखा पूछने पर मालूम हुआ कि यह बच्चा उस नौजवान अजमी का है , जिसने कब मुनफ़रद नमाज़े जनाज़ा की दरख़्वास्त की थी , आज वह ताऊन में मुबतिला है , और हालते एहतज़ार में हैं , उसने आक़ा की ख़िदमत में क़दम रंजा फ़रमाने की दरख़्वास्त की है ताकि शरफ़े ज़ियारत मुक़र्रर करने के बाद एयादत के लिए रवाना हुए मैं और चन्द असहाब भी साथ हो लिए। रास्ते में एक मर्द सालेह घर से निकला औऱ सैय्यद मौसूफ़ को देखकर खड़ा हो गया पूछा

क्या मेहमानी है ? मैंने कहा नहीं।

बल्कि मरीज़ की एयादत के लिए जाता हूँ उस मर्द ने कहा मैं भी आप के साथ चलता हूँ ताकि सयह सआदत हासिल करूं। जब हम मरीज़ के कमरे में पहुंचे तो सैय्यद मौसूफ़ पहले दाख़िल हुए और फ़िर हम एक-एक करके दाख़िल हुए। मरीज़ ने कमाले मुहब्बत और शऊर के साथ मुलाक़ात की और बैठने के लिए निशान देही की। जब वह मर्दे सालेह जो रास्ते में साथ हो लिया था , दाख़िल हुआ तो मरीज़ का चेहरा तब्दील हो गया औऱ तुर्शरु होकर देखा और हाथ से बाहर निकल जाने का इशारा किया और अपने बेटे को बाहर निकाल देने को कहा और उस मरीज़ की बेचैनी और अज़तराब बढ़ गया , हालांकि मरीज़ उससे वाकि़फ तक न था , चेजाए कि अदावत होती , वह मर्द बाहर चला गया। कुछ देर के बाद वह दोबारा दाख़िल हुआ और सलाम किया। मरीज़ उसकी तरफ़ मुतवज्जेह हुआ और बड़े ख़ुलूस और मोहब्बत के साथ ख़िताब किया और तआर्रुफ़ किया। थोड़ी देर के बाद हम सैय्यद मौसूफ़ के साथ उठ खड़े हुए और वह मर्दे सालेह भी साथ-साथ उठ खड़ा हुआ। रास्ते में मैने उससे मोहब्बत और अदावत का राज़ पूछा। उसने बुलाया कि मैं हालते जनाबत में घर से निकला ताकि हम्माम में जाऊँ। मगर वक़्त की वुसअत के पेशे नज़र पलट कर आप के साथ हो गया। हुजरे में दाख़िल होते ही जो कुछ मरीज़ से मुशाहदा किया उससे मैं समझ गया कि यह नफ़रत और एज़तराब मेरी हालते जनाबत की वजह से है। पस मैं अपने इतमिनान के लिए गया और गुस्ल (स्नान) करने के बाद दोबारा आ गया। अब की बार उसने कमाले खुलूस औऱ मोहब्बत का इज़हार किया। मुझे यक़ीन हो गया कि वह मेरी हालत जनाबत को समझ गया था जो कि मलाएकए रहमत औऱ मोहतज़र की बेचैनी का सबब है। (खज़ीनतुल जवाहर)

वह अमाल जिन की वजह से सकरात में आसानी होती है।

शेख़ सदूक़ ने इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से रवायत की है कि आपने फ़रमाया जो शख़्स चाहे कि अल्लाह ताला उसे सकरात मौत से बचाए उसे चाहिए कि वह रिश्तेदारों से सिला रहमी करे औऱ वाल्दैन से नेकी करे , जो शख़्स भी ऐसा करेगा , अल्लाह ताला उससे मौत की सख़्ती आसामन कर देगा औऱ वह अपनी ज़िन्दगी में कभी मुफ़लिस नहीं होगा।

रवायत में है कि रसूले अकरम (स 0 अ 0) एक नौजवान के एहतज़ार के वक़्त उसके पास पहुंचे और उसे लाइलाहा इल्लल्लाह पढ़े को कहा , लेकिन उसकी ज़बान बंद थी औऱ वह न कह सका। आपने दोबारा पढ़ने को कहा , मगर वह न कह सका , आपने तीसरी बार पढ़ने को कहा , वह फ़िर भी न कह सका। आँ हज़रत ने उस नौजवान के सिरहाने बैठी हुई औरत से मालूम किया इसकी माँ मौजूद है , उस औरत ने बताया मैं ही इसकी माँ हूँ आपने पूछा कि क्या तू इससे नाराज़ है , उसने कहा कि या हज़रत मैं इसकी रज़ा के साथ हूँ ज्यूँ ही उसने अपनी रज़ामन्दी के इज़हार के लिए अपने बेटे से कलाम किया तो फ़ौरन उसकी ज़बान खुल गयी। आँ हज़रत ने उसे कलमए तौहीद पढ़ने की तलक़ीन फ़रमाई तो उसने कलमा लाइलाहा इल्लल्लाह अपनी ज़बान पर जारी किया। फिर आपने उससे पूछा तू क्या देखता है , उसने अर्ज़ किया कि मैं एक क़बीहुलमंज़र आदमी को देखता हूँ , जिसकी लिबास गंदा औऱ बदबूदार है , मेरे पास आया और मेरे गले को दबोच लिया , फ़िर आँ हज़रत ने उसे यह कलमात पढ़ने को फ़रमाया-

“ या मई-यक़बलुल यसीरा व याफू अनिल-कसीर अक़बिल मिन्निल यसीर , वाफ़ो अन्निल-कसीरा इन्नका अनतल ग़फूरुर-रहीम! ”

जब उस नौजवान ने यह कलमात अपनी ज़बान पर जारी किए तब आँ हज़रत ने फ़रमाया-अब तूने क्या देखा है , उसने अर्ज़ किया कि मेरे पास एक खूबसूरत और खुश वज़ा आदमी आया है और वह सियाह (काला) शख़्स पुश्त फ़ेर कर जा रहा है आँ हज़रत ने यह कलमात दोबारा पढ़ने को कहा जब उसने इन कलमात को दोहराया तो आपने मालूम किया कि अब तू क्या देखता है। जवान ने बतलाया कि अब वह स्याहरु आदमी मुझे नज़र नहीं आता और नूरानी शक्ल मेरे पास मौजूद है , फ़िर इसी हालत में उस नौजवान ने वफ़ात पायी।

इस हदीस पर अच्छी तरह ग़ौर किया जाए तो मालूम होगा कि हकूक़े वाल्दैन के असरात किस क़द्र सख़्त हैं बावजूद ये कि इस शख़्स का शुमार आपके सहाबा (साथी) मैं था औऱ हुजूर जैसा करे पैकरे रहमत उसकी अयादत के लिए तशरीफ़ लाया औऱ उसके सरहाने बैठ कर ख़ुद उसे कलमए शहादत की तलक़ीन फ़रमायी , मगर वह उस वक़्त तक कलमए शहादत ज़बान पर जारी न कर सका , जब तक उसकी वाल्दा ने अपने बेटे से रज़ामन्दी का इज़हार नहीं किया।

इमाम जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम से मर्वी है कि सर्दियों और गर्मियों में अपने मोमिन (धर्मनिष्ठ) भाई को लिबास जन्नत अता करे औऱ मौत की सख़्ती आसान फ़रमाए औऱ तंगिए क़ब्र को फ़राख़ी व कुशादगी में तब्दील करें। हज़रत रसूले अकरम (स 0 अ 0) से मंकूल है कि जो शख़्स अपने मोमिन भाई को शीरीनी खिलाएगा , ख़ल्लाक़े आलम उससे मौत की सख़्ती को दूर फ़रमाएगा।

वह आमाल जो मरने वाले के लिए जल्द राहत का सबब है।

“ ला इलाहा इल्लल्लाहु हलीमुल करीम ला इलाहा इल्लल्लाहुल अलीयुल अज़ीम , सुबहानल्लाहे रब्बिस्समावातिस सबअे इल्लल्लाहु अलीयुल अज़ीम , सुबहानाल्लाहे रब्बिस्समावातिस सबअे व रब्बिल आरज़ीनस सबअे वमा-फ़ीहिन्ना वमा बैनहुन्ना वमा-फ़ौक़ हुन्ना वमा तहतहुन्ना वहुआ रब्बुल अरशिल अज़ीम वलहम्दो लिल्लाहे रब्बिल आलमीन ”

का मोहतज़र के करीब पढ़नाः-

शेख़ सद्दूक़ (र 0 अ 0) हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से रवायत करते हैं कि जो शख़्स माह रजब के आख़िरी दिन रोज़ा रखेगा हक़ ताला उसे सकराते मौत के बाद के खौफ़ से महफूज़ रखेगा।

24 रजब को रोज़ा रखना मोज़िबे सवाबे अज़ीम है। उनमें से एक यह है कि उसके पास मलकुल मौत खुबसूरत औऱ पाकीज़ा लिबास में मलबूस जवान की शक़्ल में शराबे तहूर का जाम हाथ में लिए रुह कब्ज़ करने के लिए आएगा और वह शराब जन्नत लबरेज़ जाम वक़्ते एहतज़ार उसे पीने के लिए देगा ताकि सकराते मौत उस पर आसान हो।

हज़रत रसूले अकरम (स 0 अ 0) से मर्वी है कि जो शख़्स सातवीं रजब की शब को चार नमाज़ इस तरह पढ़े कि हर रकत में सूरए हम्द एक मर्तबा सूरए तौहीद तीन मर्तबा , औऱ सूरए फ़लक़ औऱ सूरए वन्नास पढ़ें और फ़राग़त के बाद दुरूद शरीफ और तसबीह अरबआ , दस-दस मर्तबा पढ़े तो ख़ल्लाक़े आलम उसे अर्श के साए में जगह देगा और माहे रमज़ान के रोज़ादार के मुताबिक़ सवाब अता करेगा और उसके फ़ारिग होने तक मलाएका उसके लिए अस्तग़फ़ार करते रहेंगे और उसके लिए सकराते मौत को आसान औऱ फ़िशारे क़ब्र दूर फ़रमाएगा औऱ वह दुनिया से उस वक़्त तक नहीं उठेगा , जब तक कि वह अपनी जगह जन्नत में अपनी आंखों से न देख ले और महशर (प्रलय) की सख़्ती से महफूज़ रहेगा।

शेख़ कफ़अमी (र 0 अ 0) हज़रत रसूलसे अकरम (स 0 अ 0) से रवायत करते हैं कि जो शख़्स इस दुआ को हर रोज़ दस बार पढ़ेगा अल्लाह ताला उसके चार हज़ार गुनाहे कबीरा माफ़ फ़रमाएगा। और सकराते मौत , फ़िशारे कब्र और रोज़े क़यामत की एक लाख हौलनाकियों से नजात देगा शैतान औऱ उसके लश्कर से महफूज़ रखेगा और उसका कर्ज़ अदा होगा औऱ उससे रंजो ग़म दूर रहेगा। वह दुआ यह है-

“ आद्दतो लेकुल्ले हौलिन ला इलाहा इल्लल्लाहो व लेकुल्ले ग़म्मिन व हम्मिन माशाअल्लाह वलेकुल्ले नेअमतिन अलहम्दो लिल्लाहे वलिकुल्ली रुख़ाइन अश्शुकरो लिल्लाहे वलिकुल्ली ओजूबतीन सुब्हानाल्लाहे वलिकुल्ली ज़नबिन असतग़फिरुल्लाह वलिकुल्ली मुसीबतिन इन्नालिल्लाहे व इन्ना इलैहि राजिऊन वलिकुल्ली ज़ैकिन हसबियल्लाहो वलिकुले कज़ाइन व क़दरिन तवकल्तो ताअतिन वमासियतीन लाहौला वला कुव्वत इल्ला बिल्लाहिल अलीइल अज़ीम। ”

“ या असमअस्सामेइना , व या अब्सरल मुब्सेरीन व या अस्राअल हासिबिना वया अहकमल हकिमीन। ”

शेख़ कुलैनी (र 0 अ 0) हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से रवायत करते हैं कि आपने फ़रमायाः-

“ इज़ाजुलज़िलातिल अरज़ो ज़िलज़ालहा। ”

को नमाज़ नाफ़ला में पढ़ने से दिल तंग नहीं करना चाहिए , क्योंकि हक़ ताला ऐसे शख़्स को ज़लज़ला , बिजली और आफ़ते अरज़ोसमां से महफूज़ रखता है औऱ इस सूरे को एक मेहरबान फ़रिश्ते की शक्ल के पास भेजता है , जो उसके एहतज़ार के वक्त उसके पास बैठ जाता है मलकुल मौत से मुख़ातिब होकर फ़रमाता है कि ऐ मलकुल मौत इस वली अल्लाह के साथ मेहरबानी से पेश आना क्यों कि यह अक्सर मुझे पढ़ा करता था।


उक़बए दोम

मौत के वक़्त हक़ से उदूल

यानी मरते वक़्त हक़ से बातिल की तरफ़ पलट जाना और यह उस तरह है कि शैतान मरने वाले के पास हाज़िर होकर उसे वसवसए शैतानियत में मुबतिला करके शुकूक व शुबहात में डालता है। यहां तक कि वह उसे ईमान से ख़ारिज़ कर देता है , इसीलिए शैतान से पनाह मांगने के लिए दुआएं मंकूल हैं। जनाब फ़ख़रूल महक़क़ीन (र 0 अ 0) इरशाद फ़रमाते हैं कि जो शख़्स इससे महुफूज़ रहना चाहे उसे चाहिए कि ईमान और उसूले ख़मसा को दलायले क़तैया के साथ ज़ेहन में हाज़िर करे और खुलूसे दिल के यह वसवसए शैतानियां का रद साबित हो औऱ अक़ाएदे हक़क़ा के विद्र के बाद यह दुआ पढ़े-

“ अल्लाहुम्मा या अरहमर राहिमीन इन्नी क़द अवदातुका यक़ीनी हाज़ा व दीनी व अन्ता मुसतौदीन व क़द आमरतना बेहिफ़ज़िल वदाएई फ़रुद्ददोहू अलय्या वक़्ता हूज़ूरे मौत। ”

फ़ख़रुल मोहक़्क़ीन के इरशाद के मुताबिक़ मशहूर दोआए अदीला के मानी को समझ कर हुजूरे क़ल्ब के साथ पढ़ना मौत के वक़्त हक़ से उदूल के ख़तरे से सलामती के ख़्वाहिश मन्द के लिए मुफ़ीद है। शेख़ तूसी (र 0 अ 0) ने मोहम्मद बिन सुलेमान दलेमी से रिवायत की है कि मैंने इमाम जाफरे सादिक (अ 0 स 0) की ख़िदमत में अर्ज़ किया कि आपके पैरोकार शिया कहते हैं कि ईमान कीदो क़िस्में हैं।

अव्वल- ईमान मुस्तकिर व साबित।

दोम- जो बतौर अमानत सुपुर्द किया गया है और ज़ायल भी हो सकता है।

आप मुझे ऐसी दुआ तालीम फ़रमाएं कि जब भी मैं उसको पढ़ूं मेरा ईमान कामिल हो जाए और ज़ायल न हो , फिर आपने फ़रमाया इस दुआ को हर वाजिब नमाज़ के बाद पढ़ा करो।

“ रज़ीतो बिल्लाहे रब्बों व बेमोहम्मदिन सल्लल्लाहो अलैहे वआलेही नबीय्यन व बिल इस्लामे दीनन व बिन कुर्आने किताबन वबिल कआबते क़िबलतन व बेआलेइन वलेयव्वा इमामन व बिल मोहम्मदिन वल बिन अलीइन बल हुज्जते बिल सलवातुल्लाहे अलैहिम अइम्मतन अल्लाहुम्मा इन्नी रज़ीतो बेहिम आइम्मतिन फ़अरज़िनी लहुम इन्नका अला कुल्ले शयइन क़दीर। ”

आसानी ए मौत के आमाल

( इन चीज़ों के बाब में जो इस सख़्त अक़बा में मुफ़ीद हैं।)

नमाज़ का पाबन्दिए वक़्त के साथ अदा करना। एक हदीस में है कि क़ायनात के मशरिक़ व मग़रिब में कोई भी साहबे ख़ाना ऐसा नीहं कि मलकुल मौत पांचों नमाज़ों के अवक़ात में उन्हें पाबन्दिए वक़्त के साथ नमाज़ पढ़ने का आदी है तो मलकुल मौत उसे शहादतैन की तलक़ीन करता है और इब्लीस को उससे दूर भगाता है।

मनकूल (कथन) है कि हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) ने एक शख़्स को लिखा कि अगर तू चाहता है कि तेरा ख़ात्मा आमाले सालेह के साथ हो और तेरी रुह ऐसी हालत में कब्ज़ की जाय की तू अफ़ज़ल आमाल की हामिल हो तो अल्लाह ताला के हुकूक़ को बुजुर्ग व बरतर समझ न कि तू उसकी अता कर्दा नेअमतों को उसकी नाफ़रमानी में सर्फ़ करे और उसके हिल्म (शमा) से नाजाएज़ फ़ायदा उठाकर मग़रुर हो जाय। हर उस शख़्स को इज़्ज़त की निगाह से देख जिसको तू हमारे ज़िक्र में मशगूल पाये या वह हमारी मुहब्बत का दावा करे। इसमें तेरे लिये कोई ऐब नहीं कि तू उसे इज़्ज़त की निगाह से देखे ख़्वाह वह उसमें सच्चा हो या झूठा , इसमें तुझे तेरी सिदक़ नियत तुझे नफ़ा देगी और झूठ का नुकसान पहुंचेगा।

ख़ात्मा बिलख़ैर औऱ बदबख़्ती को नेक बख़्ती में तब्दील करने के लिए सहीफए कामिला की ग्यारहवीं दुआएं तमजीद ( “ या मनज़िकरह शऱूफज्जाकरीन ” ) का पढ़ना मुफ़ीद है और काफ़ी में मज़कूर दुआए तमजीद का पढ़ना मुफ़ीद है।

जीक़ाद के यकशम्बा (इतवार) वारिद शुदा नमाज़ को इस ज़िक्र शरीफ़ के साथ पढ़ना ज़्यादा मुफ़ीद है।

“ रब्बना ला तुज़िग़ कुलूबना बादा इज़ हदैतना व हबलना मिल्लदुनका रहमह इन्नका अनतल बहाब। ”

तसबीहे जनाबे सैय्यदा का पाबन्दी के साथ पढ़ना। अक़ीक़ की अंगूठी पहनना , खुसुसन (विशेषकर) सुर्ख़ अक़ीक़ की अगर उस पर मोहम्मद नबी अल्लाह व अलीयुन वली उल्लाह नक़श (लिखा) हो तो और बेहतर है सूरह “ क़द अफलहाल मोमिनुना ” का हर जुमा को पढ़ना औऱ इस दुआ को नमाज़ सुबह , नमाज़ मग़रिब के बाद सात बार पढ़ना-

“ बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर रहीम लाहौला वला कुव्वता इल्ल बिल्लाहिल अलीइल अज़ीम। ”

22 रजब की शब (रात) को आठ रकत नमाज़ इस तरीक़े से पढ़े कि हर रकत में “ अलहम्दो ” एक बार औऱ कुल या अय्योहल काफ़ेरुना ” सात बार पढ़े और ख़्तम होने के बाद दस बार दरुद शरीफ़ और दस बार अस्तग़फार पढ़े।

सैयद बिने ताऊस ने रसूले अकरम से रवायत की है कि जो शख़्स 6 शाबान को चार रकत नमाज़ इस तरह पढ़े कि हर रकत में सूरए हम्द एक बार और सूरए तौहीद पचास बार पढ़े तो हक़ ताला उसकी रुह (आत्मा) को बड़ी नर्मी के साथ क़ब्ज़ करेगा उसकी कब़् कुशादा होगी और वह अपनी क़ब्र से इस तरह उठेगा कि उसका चेहरा चौहदवीं के चांद की तरह रोशन होगा और कलमए शहादत ज़बान पर जारी होगा।

यह नमाज़े बईना नमाज़े हज़रत अमीरूल मोमिनीन (अ 0 स 0) की तरह है , जिसके फज़ाएल बेशुमार हैं। मैं इस जगह चन्द हिकायात का वर्णन करना मुनासिब मौजूँ समझता हूँ।

हिकायते अव्वल

फुज़ैल बिने अयाज़ से जो सुफ़िया में से थे , मनकूल है कि उनका एक फाज़िल (योग्य) शागिर्द था। वह एक बार जब बीमार हुआ , नज़आ के वक़्त उसके सिराहने आकर बैठ गया और सुरए यासीन की तिलावत शुरु की। उस मरने वाले शागिर्द ने कहा फ़िर ऐ उस्ताद इस सूरे को मत पढ़ो। फुज़ैल ने सुकूत एखतेयार किया , फ़िर उसे कलमए तौहीद “ लाइलाहा इल्लल्लाहो ” पढ़ने को कहा , मगर उसने पढ़ने से इन्कार कर दिया और कहा , कि मैं इससे बेज़ार हूँ “ अलअयाज़ बिल्लाहे ” औऱ वह इसी हाल में मर गया। फुज़ैल यह हाल देखकर सख़्त नाराज़ हुआ औऱ अपने घर चला गया और फ़िर बाहर न निकला। फुज़ैल ने उससे पूछा , तू तो मेरे फ़ाज़िल (योग्य) शागिर्दों में से था , तुझे क्या हुआ कि खुदावन्दे तआला ने तुझसे मारिफ़त (परिचय) का ख़ज़ाना छीन लिया और तेरा अंजाम (परिणाम) बुरा हुआ ? उसने जवाब दिया , इसकी तीन वजूहात (कारण) हैं , जो मुझमें थी-

अव्वल (प्रथम)- चुग़लख़ोरी “ हलाकत ” है हर चुग़लख़ोर तानाबाज़ के लिए। ”

दोम (द्वितिय)- हसद करना , “ हसद ईमान को इस तरह खाता है कि जिस तरह आग लकड़ी को (उसूले काफ़ी)। ”

सोम (तृतीय)- नुक़ता चीनी करना।

“ फ़ित्ना क़त्ल से भी ज़्यादा बड़ा है। ” मुझे एक बीमारी थी जिसके लिए डाक्टर ने यह तजवीज किया था कि मैं हर साल एक प्याला शराब पिया करूँ। अगर यह न पिया तो बीमारी नहीं छोड़ेगी , इसलिए मैं डाक्टर की हिदायत के मुताबिक़ शराब पीता रहा , इन्हीं तीन वजूहात की बिना पर जो मुझमें थी मेरा अंजाम (परिणाम) बुरा हुआ और मुझे इस हालत में मौत आ गयी।

मुझे इस हिकायत के सम्बन्ध में इस वाक़िया का वर्णन करना मुनासिब मालूम होता है जो शेख़ कुलैनी (र 0) ने अबू बसीर से रवायत की है। वह कहता है मैं हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) की ख़िदमत में हाज़िर था कि उम्मे ख़ालिद बिने माबदिया ने आप की ख़िदमत में हाज़िर होकर अर्ज़ किया कि मेरा इलाज नबीज़ तजवीज़ किया है , जो एक क़िस्म की शराब है औऱ जानती थी कि आप इससे कराहत (घृणा) करते हैं लिहाज़ा मैंने आपसे इस मामले में मालूम करना ज़्यादा अच्छा समझा। आपने फ़रमाया तुझे इसके पीने से किस बात ने रोका। अर्ज़ करने लगीं , क्योंकि मैं दीनी (धार्मिक) मआमलात में आपकी मोक़ल्लिद (अनुयायी) हूँ इस वजह से क़यामत के दिन यह कह सकूं कि जाफ़र बिने मोहम्मद ने मुझे हुक्म दिया था या मना फ़रमाया था , इमाम अलैहिस्सलाम अबू बसीर की तरफ़ मुख़तिब हुए। ऐ अबू मोहम्मद क्या तू इस औरत की बात और मसला की तरफ़ ध्यान नहीं देता। फ़िर उस औरत ने कहा , ख़ुदा की क़सम मैं तुझे इसमें से एक क़तरा (बूंद) भी पीने की इजाज़त नहीं देता ऐसा न हो कि इसके पीने से उस वक़्त पशेमान हो जब तेरी जान यहां तक पहुंचे औऱ गले की तरफ़ इशारा किया औऱ तीन बार कहा , फ़िर उस औरत से कहा कि क्या तू अब समझ गयी कि मैंने क्या कहा ?

दूसरी हिकायत

शेख़ बहाई अतर उल्लाह “ मरक़दए कशकोल ” में ज़िक्र फ़रमाते हैं कि एक शख़्स जो ऐशो-इशरत में पला था , जब मरने के क़रीब हुआ तो उसे कलमए शहादतैन की तलक़ीन की गयी , मगर उसने शहादैन की जगह यह शेर पढ़ा।

“ कहां है वह औरत जो एक दिन मांदी ख़स्ता हालत में जा रही थी कि उसने मुझसे पूछा कि हम्माम मिनजानिब का रस्ता कौन सा है। ”

उसका इस शेर को पढ़ने का कारण यह था कि एक रोज़ एक पाक दामन और ख़ूबसूरत औरत अपने घर से निकली कि वह मशहूर व मारुफ़ हम्माम मिन जानिब की तरफ़ जाय , मगर वह हम्माम का रास्ता भूल गयी और रास्ता चलने की वजह से उसकी हालत बुरी हो रही थी कि एक शख़्स को मकान के दरवाज़े पर देखा। उस औरत ने उस शख़्स से हम्माम मिनजानिब का रास्ता पूछा। उसने अपने घर की तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि हम्माम मिन जानिब यही है। वह पाक़ दामन उस मकान को हम्माम समझ कर दाख़िल हुई , उस शख़्स ने फौरन मकान का दरवाज़ा बन्द कर लिया औऱ उससे ज़िना की ख़्वाहिश की। वह बेकस औऱत समझ गयी अब वह इसकी गिरफ़्त से बिना किसी तदबीर के नहीं बच सकती , इसलिए बड़ी मोहब्बत औऱ दिलचस्पी का इज़हार किया और कहा मेरा बदन गंदा और बदसूरत है , मैंने इसी वजह से नहाने का इरादा किया था। अब बेहतर है कि आप मेरे लिए इतर और बेहतरीन खुशबू लाएं , ताकि मैं आपके लिए अपने आप को मोअत्तर करुं , और कुछ खाना भी लाएं ताकि दोनों मिलकर खांए। हां जल्दी आना क्योंकि मैं आपकी सख़्त मुशताक हूँ। जब उस शख़्स ने उसको अपना सख़्त मुश्ताक पाया तो संतुष्ट होकर उसे अपने मकान पर बिठाया और ख़ुद खाना और इतर लाने के लिए बाहर निकला , ज्यों ही उसने अपना क़दम बाहर रखा वह औरत भी घर से भाग निकली और उसके चुंगल से निजात पायी , जब वह शख़्स वापस आया तो औरत को न पाकर दुख प्रकट करने लगा। अब जब उस आदमी के एहतेज़ार का वक़्त आया तो उसी औरत का ख़्याल उसके दिल मे था और इस गुज़रे हुए वाक़या को कलमए तौहीद के बजाए एक शेर में ब्यान करता है।

ऐ भाई! इस हिकायत पर गौ़र कर कि एक गुनाह (पाप) के इरादे ने उस मर्द को मरते वक़्त कलमए शहादत के इक़रार किस तरह मरग़श्ता (विमुख) किया) , हालांकि उससे वह फ़ेल (कार्य) सरज़द नहीं हुआ। केवल इसके कि उसने ज़िना (व्यभीचार) के इरादे से अपने घर में दाख़िल किया और ज़िना का इरतिकाब (पाप) नहीं किया। इसी तरह कि और बहुत सी हिकायात हैं।

शेख़ कुलैनी ने हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से रवायत की है , कि आपने फ़रमाया , जो शख़्स ज़कात की एक क़ैरात (सिक्का) भी रोके उसे इख़्तियार है कि मरते वक़्त हज अदा न करे।

लतीफ़ा

किसी आरिफ़ (ज्ञाता) से मनकूल (उधृत) है कि वह मोहतज़र के पास पहुंचे , हाज़रीन ने उनसे इलतिजा की कि इस मोहतज़र को तलक़ीन करे , उसने मोहतज़र को यह रूबाई पढ़ने को कहा-

गर मन गुनहा जुम्ला जां कर दस्तम!

लुत्फ़ तो उम्मीद अस्त गिर्द दस्तम।।

आजिज़ तर अज़ई मौं ख़्वाह का कनूं , हस्तुम।।

“ अगरचे मैंने तमाम दुनिया जहां के गुनाह कर डाले लेकिन मुझे उम्मीद है कि तेरी रहमत मेरा दामन पकड़ लेगी , तू कहता है कि मैं आजिज़ी के वक़्त के हाथ पकड़ लेता हूं इस वक़्त जिस क़द्र मैं आजिज़ हूँ उससे ज़्यादा औऱ कोई आजिज़ न होगा।

मौत के बाद क़ब्र तक

रुह (आत्मा) क़ब्ज होने के बाद रुह बदन से ऊपर ठहरी रहती है , फिर मोमिन (धर्मनिष्ठ) की रुह को , फ़िरश्ते (दूत) आसमान की तरफ़ ले जाते हैं औऱ काफ़िर (नास्तिक) की रुह को नीचे की है तो आवाज़ आती है मुझे जल्दी-जल्दी मंज़िल तक पहुंचाओ औऱ अगर काफ़िर (नास्तिक) है तो कहता है कि मुझे क़ब्र में ले जाने के लिए जल्दी न करो। गुस्ल (स्नान) के वक़्त मोमिन फ़िरश्तों के जवाब में कहता है जो पूछता हैं कि क्या तू वापस दुनिया में अपने परिवार के पास जाना चाहता है ? वह कहता है मैं नही चाहता कि दोबारा सख़्ती और मुसीबत औऱ परेशानी की तरफ़ वापस जाऊं।

मय्यत की रुह (आत्मा) गुस्ल और ताशीय जनाज़ा (अर्थी) के वक़्त हाज़िर होती है नहलाने वाले (ग़ुस्साल) को देखती है और बाज़ रवायात मे है कि नहलाने वाले (ग़स्साल) को देखती है और बाज़ रवायात में है कि नहलाते वक़्त और लिटाते वक़्त मय्यत को ऐसा महसूस होता है गोया किसी ने बाला ख़ाने से नीचे गिरा दिया और नहलाने वाले (ग़स्साल) के सख़्त हाथ ऐसे महसूस होते हैं गोया उसके जिस्म को पीटा जा रहा है , लिहाज़ा नहलाने वाले (ग़स्साल) को चाहिए कि वह नर्म हाथ लगाए ताकि तक़लीफ़ न हो। मय्यत हाज़रीन की बातों को सुनती है और उनकी शक्लों को पहचानती है , इसलिए चाहिए कि मय्यत के चारों तरफ़ जमा होने वाले लोग ज़्यादा बात न करें और आमद रफ़त ज़्यादा न करें। हायज़ा और नफ़सा औऱ जुनबी हज़रात मय्यत के पास इकट्ठा न हों , क्योंकि यह तमाम बातें मलाएकए रहमत की नफ़रत की वजह हैं। बल्कि ऐसे काम करने चाहिये जो नूजुले रहमते परवरदिगार का बायस है। जैसे यादे खुदा और तिलावते कलामे पाक वग़ैराह। एहतेज़ार , गुस्ल व कफ़न और दफ़न के वक़्त मज़हबी रूसूमात और मुस्तहबात की रियायत ज़रुर करनी चाहिए।

कुछ अख़बार में मोहददसीन ने फ़रमाया है कि दफ़न करने के बाद रुह बदन से दोबारा सम्बन्ध पैदा करती है और जब मशाइयत करने वालों को वापस घरों को जाते देखती है तो समझ लेती है कि अकेले छोड़ जा रहे हैं और बे आराम हो जाती है। हसरत भरी निगाह करती है कि जिस औलाद को तकलीफ़ के साथ पाला था पीठ फ़ेर कर जा रही है। अब सिवाय आमाल के कोई मूनिस व ग़मख़्वार नहीं है। सबसे पहली बशारत जो मोमिन (धर्मनिष्ठ) को क़ब्र में दी जाती है , वह यह है कि ऐ मोमिन! ख़ुदा ने तुझे और तेरे जनाज़ा (अर्थी) को मशाइयत करने वाले मोमनीन के तमाम गुनाह (पाप) बख़्श (शमा) दिए हैं।

फ़स्ल दोम

क़ब्र

आख़िरत (परलोक) की हौलनाक मंज़िलों में एक मंजिल क़ब्र है , जो हर दिन आवाज़ देती है “ अना बैतुल गुरबते ” मैं ग़रीब का घऱ हूँ , “ अना बैतुल वहशते ” मैं ड़रावना घर हूँ। ” “ अना बैतुद दूदे। ” मैं कीड़ों का घर हूँ। इस मंज़िल में बड़ी दुश्वार गुज़ार घाटियां हैं और बड़े हौलनाक मुक़ामात हैं। मैं इस जगह पर कुछ हौलनाक मुक़ामात का वर्णन करुँगा-

उक़बए (यमलोक) अव्वल

वहश्ते क़ब्र

किताब में है जब मय्यत को कब्र के पास लाया जाऐ तो फ़ौरन उसे क़ब्र में नहीं उतारना चाहिए। इसमें शक नहीं कि कब़र बड़ी हौलनाक़ जगह है और साहबे क़ब्र ख़ुदावन्दताला के ख़ौफ़े मालूमा से पहनाह मांगता है। मय्यत को थोड़ी देर के लिए कब्र से कुछ दूर रख देना चाहिए ताकि मय्यत कुछ सुस्ताकर क़ब्र की ख़ौफनाक़ मंज़िल के लिए हिम्मत और ताक़त पैदा कर सके , फिर थोड़ा चल कर रुक जाना चाहिए तब क़ब्र के पास चले जाय।

मजलिसी (र 0) इसकी तफसीर में फ़रमाते हैं कि अगरचे इन्सान की रुह बदन से जुदा हो जाती है और रुहे हैवानी ख़त्म हो जाती है लेकिन नफ़्से नातिक़ा ज़िन्दा होता है और उसका सम्बन्ध पूरी तरह से बदन से अलग नहीं होता।

क़ब्र की तारीकी , सवालाते मुनकिर व नकीर , फ़िशारे क़ब्र और दोज़ख़ का अज़ाब हौलनाक़ मरहला है। इसलिए दूसरों के लिए बायसे इबरत (उपदेश का कारण) है कि मय्यत के हालात पे ग़ौर व फ़िक्र करे , क्योंकि कल यही मराहिल (कठिन समस्याएँ) उसे भी दरपेश होंगे। एक हदीसे हसन में युनूस से मनकूल है (कथन) कि मैंने हज़रत मूसा क़ाज़िम (अ 0 स 0) से सुना कि हर उस घर का दरवाज़ा जिसका मैं ख़्याल करता हूं वही घर मेरे लिए तंग हो जाता है। आपने फ़रमाया औऱ यह इसलिए कि जब तू मय्यत को क़ब्र के पास ले जाय उसे थोड़ी सी मोहलत दे ताकि वह मुनकिर व नकीर के सवालात के लिए इस्तेताअत (शक्ति) पैदा कर सके इंतही।

बरआ बिने आज़िब से जो मशहूर सहाबी थे , मनकूल (कथन) है कि मैं एक मर्तबा रसूले अकरम (स 0 अ 0) के पास बैठा था कि आप की नज़र एक भीड़ पर पड़ी जो एक जगह इकट्ठा थी आपने दरयाफ़्त फ़रमाया कि यह लोग यहां पर क्यों इकट्ठा हुए हैं ? लोगों ने बतलाया कि यह क़ब्र खोदने के लिए इकट्ठा हुए हैं बरआ कहता है कि जब आँ हज़रत (स 0 अ 0) ने क़ब्र का नाम सुना जल्दी-जल्दी उनकी तरफ़ चल दिए और वहां पहुंच कर क़ब्र के एक किनारे पर बैठ गए और मैं आपके बिल मुक़ाबिल दूसरे किनारे पर बैठ गया , ताकि मैं देख सकूं कि आप क्या करते हैं ? मैंने देखा कि आप इतना ज़्यादा रोए कि आपका चेहरये मुबारक तर हो गया फिर हमारी तरफ़ मुख़ातिब होकर फ़रमाया-

यानी “ ऐ मेरे भाईयों! ” इसी मिस्ल मकान के लिए तैयारी करो। ”

शेख़ बहाई से मनक़ूल (कथन) है कि उन्होंने कुछ हाकिमों को देखा , जिन्हें मरते वक़्त सिर्फ़ हसरतो यास के और कुछ प्राप्त न हुआ। इस मरने वाले से पूछा गया कि तेरा यह हाल जो हम देख रहे हैं , किस वजह से है। उस मोहतज़र ने जवाब दिया कि आप उस आदमी के बारे में क्या गुमान (भ्रम) करते हैं जो एक लम्बे सफ़र पर बिना किसी ज़ादे राह के चला जाय और बग़ैर किसी मोनिस व ग़मख़्वार वहशतनाक क़ब्र में सुकूत करे और हाकिम आदिल के सामने बग़ैर किसी दौलत के पेश हो।

कुतुब रावन्दी से मनकूल (कथन) है कि हज़रत ईसा (अ 0 स 0) ने अपनी वालिदा मरयम (अ 0 स 0) को उनके इन्तिक़ाल के बाद आवाज़ देकर कहा – ऐ अम्मी! मेरे साथ कलाम (बात-चीत) करो। क्या आप दुनिया में वापसी की ख़्वाहिशमन्द हैं तो हज़रत मरयम ने जवाब दिया हाँ। इसलिए कि लम्बी सर्द रातों में नमाज़ पढ़ूं और लम्बे गरम दिनों में रोज़ा रखूं। ऐ जाने मन यह रास्ता सख़्त दर्दनाक है।

मनकूल है कि हज़रत फ़ातिमा (अ 0 स 0) ने हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अ 0 स 0) को वसीयत की थी कि जब मैं रहलत (इन्तिकाल) कर जाऊँ तो आप ही मुझे गुस्ल व कफ़न दीजिएगा औऱ खुद ही नमाज़े जनाज़ा पढ़ कर क़ब्र में उतरिएगा और लहद में लिटाकर मेरे ऊपर मिट्टी डालिएगा। फ़िर मेरे सिराहने मेरी सूरत के मुक़ाबिल बैठकर मेरे लिए कुर्आन ख़्वानी कीजिएगा और मेरे लिए ज़्यादा दुआ कीजिएगा , क्योंकि यह ऐसा वक़्त होता है , जिसमें मुर्दा ज़िन्दा के उन्स व मुहब्बत का मोहताज होता है जब जनाबे फ़ात्मा (अ 0 स 0) बिन्ते असद का इन्तिक़ाल हुआ तो मौला अमीरुल मोमिनीन (अ 0 स 0) रोते हुए सरवरे कायनात की ख़िदमत में हाज़िर हुए और अर्ज़ किया कि मेरी वालिदा का इन्तिक़ाल हो गया है। रसूले खुदा (स 0 अ 0) ने फ़रमाया मेरी वालिदा दुनिया से गुज़र गयीं , क्योंकि उनका पैग़म्बरे ख़ुदा से अजीब ताअल्लुक था। कुछ मुद्दत हुजूर मां की तरह रखा। हुज़ूर ने अपने पैरहन में कफ़न दिया। कुछ देर क़ब्र में लेट कर दुआ करते रहे , दफ़न करने के बाद हज़ूर कुछ देर क़ब्र पर खड़े रहे , फिर आवाज़ दी। “ अबनका , अबनका अली अक़ीला व अली जाफ़र ” हुज़ूर से पूछा इन आमाल की वजह क्या है ? तो आपने फ़रमाया कि एक दिन बरोज़े क़यामत बरहना (नंगे) उठने का ज़िक्र हुआ , तो फ़ातिमा बहुत रोयीं और मुझसे कहा कि अपने पैरनह (कपड़े) में कफ़न दिजिएगा और फ़िशारे क़ब्र से डरती थीं , इसलिए मैं खुद कब्र में लेट गया और दुआ की ताकि परवर दिगारे आलम उनको फ़िशारे क़ब्र से अमान दे और यह जो मैंने कहा है , ( अबनका) यह इस वजह से था कि मुनकिर व नकीर ने सवाल किया ख़ुदा कौन है ? जवाब दिया अल्लाह। फिर पैग़म्बर के मुत्तालिक़ पूछा तो जवाब दिया मोहम्मद (स 0 अ 0) जब इमाम के मुत्तालिक़ सवाल हुआ तो फ़ातिमा जवाब न दे सकीं। (मालूम होता है ख़ुम ग़दीर पर ख़िलाफ़ते अली अ 0 स 0 के ऐलान सरीह से क़ब्ल फ़ौत हुई) तो मैंने कहा कहो अली। (अ 0 स 0) आप का बेटा अली (अ 0 स 0) न कि जाफ़र औऱ न ही अक़ील। जनाबे फ़ातिमा (अ 0 स 0) इस जलालते शान की मालिक थीं कि तीन दिन तक हज़रत अली (अ 0 स 0) की पैदाइश के वक़्त ख़ानए काबा के अन्दर परवरदिगारे आलम की मेहमान रहीं अमीरुल मोमनीन जैसे मासूम व मुतहर बच्चे की परवरिश का महल आपका बदन रहा और आप दूसरी औरत थीं जो पैग़म्बर पर ईमान लायीं। इतनी इबादात के बावजूद इन अक़बात (परलोक) से डरती थीं और रसूले अकरम (स 0 अ 0) ने इनके साथ इस क़द्र मेहरबानियां फ़रमायीं। इतने वाक़ियात के होते हुए भी हम अपने हालात की फ़िक्र नहीं करते और फ़िशारे क़ब्र और क़यामत के रोज़ की बरहनी का ग़म नहीं करते (मआद)

सैय्यद बिन ताऊस अलैहिर्रहमह ने हज़रत रसूले अकरम (स 0 अ 0) से रवायत की है कि मय्यत पर क़ब्र में पहली रात से ज़्यादा सख़्त घड़ी कोई नहीं होती। इसलिए अपने मुर्दों पर सदक़े के ज़रिए रहम करो। अगर तुम्हारे पास सदक़ा देने के लिए कोई चीज़ मौजून नहीं है तो तुममें से कोई शख़्स मय्यत के लिए दो रकत नमाज़ इस तरह पढ़े कि रकत अव्वल में एक मर्तबा सुरए फ़ातेहा और दो मर्तबा कुलहो अल्लाहो अहद और दूसरी रकत में सूरए फ़ातेहा एक मर्तबा औऱ सूरए अलहकमल तकासर दस मर्तबा पढ़ें। फ़िर सलाम पढ़ कर नमाज़ को ख़त्म करे और इस तरह कहेः-

“ अल्लाहुम्मा सल्ले अला मोहम्मदीन व आले मोहम्मद वबअस सवाबहा इला क़बरे ज़ालिकल मैय्यते फुलां बिन फुलां। ”

अल्लाहतआला उसी वक़्त उस मय्यत की क़ब्र पर एक हज़ार मलायक के लिबास और बेहश्ती हुलले देकर भेजता है और उसकी क़ब्र को सूर फूँकने (क़यामत) तक वसीअ और फ़राक़ कर देता है और नमाज़ पढ़ने वाले को बेशुमार नेकियां अता करता है और उसके लिए चालिस दर्जे बुलन्द फ़रमाता है।

नमाज़ दीगर

क़ब्र में पहली रात को ख़ौफ़ को दूर करने के लिए दो रकत नमाज़ हदियए मय्यत इस तरह पढ़ो कि पहली रकअत में सूरए हम्द और आयतल कुर्सी एक मर्तबा दूसरी रकअत मे सूरए हम्द के बाद दस मर्तबा सूरए इन्ना अनज़लना पढ़ो और जब सलाम पढ़ लिया जाये तो कहो , “ अल्ला हु्म्मा सल्ले अला मोहम्मदिन व आले मोहम्मद वबअस सवाबहा इला क़ब्रे फ़लां। और इस जगह मय्यत का नाम लो। ”

हिकायत

मेरे उस्ताद सिक़ततुल इस्लाम नूरी नूर अल्लाह मरक़दह ने अपने उस्ताद मादनुल वलमआली मौलाना अलहाज मुल्ला फ़तेह अली सुल्ताना बादी इत्तर उल्लाह मज़जआ से दारुल सलाम में न नक़ल फ़रमाया है कि मेरी आदत थी कि मैं जब भी मोहिब्बाने अहलेबैत में से किसी की वफ़ात की ख़बर सुनता उसके लिए दफ़न की पहली रात को दो रकत नमाज़ पढ़ाता , चाहे मरने वाला मेरे वाक़िफ़कारों में से होता या कोई दूसरा औऱ मेरे सिवा किसी शख़्स को मेरी इस आदत का इल्म (ग्यान) न था। एक दिन मेरे दोस्तों में से एक शख़्स मुझे राद में मिला और मुझसे कहा कि मैंने कल रात ख़्वाब में एक शख़्स को देखा , जिसने उसी ज़माने में वफ़ात पायी थी। मैंने उससे मौत के बाद के हालात मालूम किए तो उसने मुझे जवाब दिया कि मैं सख़्ती औऱ बला में गिरफ़्तार था और अभी सज़ा भुगत ही रहा था फलां (अमुक) शख़्स मेरे लिए पढ़ी हुई दो रकअत नमाज़ मेरे लिए नजात (छुटकारा) की वजह बनी और उसने आपका नाम लिया और कहा कि ख़ुदा उस एहसान के बदले उसके बाप पर रहमत करे जो उसने मुझ पर किया। मुल्ला फतेह अली मरहूम ने उस वक़्त फ़रमाया कि उस शख़्स ने मुझसे उन नमाज़ के बारे में मालूम किया कि वह कौन सी नमाज़ है ? मैंने उसे अपनी आदत से आगाह किया , जिसको मैंने मुर्दों के लिए अपनाया था औऱ नमाज़े हदियए मय्यत की तरकीब बतायी।

वह चीज़ें जो वहश्ते क़ब्र के लिए मुफ़ीद हैं

इनमें से यह है कि नमाज़ का रुकूअ पूरा करता हो , चूनांचे हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़र से मर्वी है कि जो शख़्स नमाज़ में रुकूअ मोकम्मल अदा करता हो उसकी क़ब्र में वहशत (डर) दाख़िल न होगी और जो शख़्स “ लाइलाहु इल्लल्लाहु मालिकुल हक़्कुल मुबीन ” हर रोज़ सौ बार पढ़े। वह जब तक ज़िन्दा रहेगा , फ़क़्र व फ़ाक़ा से महफूज़ रहेगा और वहशते क़ब्र से मामून रहेगा औऱ वह तवन्गर (धनवान) हो जाएगा। उसके लिए बेहशत (स्वर्ग) के दरवाज़े खोल दिए जाएंगे। चूनांचे एर रवायत में वारिद है कि जो शख़्स सूरए यासीन को सोने से पहले पढ़े औऱ नमाज़ लैलातुल रग़ायब पढ़े वह वहशते क़ब्र से महफूज़ रहेगा। मैंने इस नमाज़ के फ़ज़ायल (गुण) को “ मफ़ातीह अलजनान ” में माहे रजब के आमाल के ज़ैल में दर्ज किया है। मनकूल है जो शख़्स माहे शाबान में बाहर दिन रोज़ा रखे तो उसकी क़ब्र में हर रोज़ सत्तर हज़ार फ़रिश्ते क़यामत तक ज़ियारत के लिए आते रहते हैं।

औऱ जो शख़़्स किसी की आयादत करता है तो अल्लाहताला उसके लिए एक फ़रिश्ते को मोवक्किल करता है जो मशहूर (प्रलय) तक उसकी क़ब्र में अयादत करता है। अबू सईद ख़दरी से मनकूल है कि मैंने हज़रत रसूले अकरम (स 0 अ 0) को हज़रत अली (अ 0 स 0) से फ़रमाते हुए सुना है कि आपने फ़रमाया ऐ अली! अपने अपने शियों को खुशखबरी सुना दो कि उनके लिए मौत के वक़्त मायूस वहशते क़ब्र और महशर (प्रलय) का ग़म नहीं होगा।

उक़बए (प्रलय) दोम

तंगी व फ़िशारे क़ब्र

. यह वह उक़बा (प्रलय) है कि जसका केवल आभास (तसव्वर) , ही इन्सान को दुनिया में बेचैन करने के लिए काफ़ी है। हज़रत अमीरूल मोमनीन (अ 0 स 0) ने फ़रमाया-

“ ऐ अल्लाह के बन्दो! मौत के बाद क़ब्र में जो कुछ उस शख़्स के साथ होगा जिसके गुनाह माफ़ न होंगे , वह मौत से ज़्यादा सख़्त है , उसकी तंगिए फ़िशार क़ैद और तन्हाई से डरो। बेशक क़ब्र हर रोज़ कहती है कि मैं तन्हाई का घर हूँ , हौलनाक घर मैं कीड़ों का घर हूँ और क़ब्र या तो जन्नत के बाग़ात में एक है या आग के गड़हों में से गड़हा। यहां तक कि आपने फ़रमाया बेशख क़ब्र से याद किया है वह यह है कि वह काफ़िर पर निनन्यानबे ( 99) अज़देह उसकी क़ब्र में मुल्लत करेगा , जो उसके गोश्त को नाच लेंगे और उसकी हड्डियों को तोड-डालेंगे और क़यामत तक इसी तरह बार-बार करते रहेंगे। अगर इनमें से एक अज़दहा ज़मीन की तरफ़ सांस ले डाले तो ज़मीन पर कोई सब्जी न उगने पाए। ऐ अल्लाह के बन्दों। तुम्हारे नफ़्स कमज़ोर और तु्म्हारे जिस्म नाजुक हैं , जिनके लिए कमज़ोर तरीन अज़दा काफ़ी हैं। ”

रवायत में है कि इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) रात के आख़िरी हिस्से में नींद से बेदार होकर अपनी आवाज़ को इतना बुलन्द करते हैं कि अहले ख़ाना इस आवाज़ को सुनते और आप फ़रमाते-

अपने लिए नेकी और भलाई , अज़ाबे मौत सकराते मौत , अज़ाबे क़ब्र , तनहाई क़ब्र वग़ैरा की दुआएं पढ़ते थे।

फ़िशारे क़ब्र के असबाब

पेशाब की नजासत से अदम ऐहतराज़ (बचना) या इसकी नजासत को मामूली समझना या नुक्ताचीनी करना , ग़ीबत करना , औऱ रिश्तेदारों से क़तआ ताअल्लुक़ी करना , अज़ाबे क़ब्र का बायस है।

हज़रत सअद बिन मआज़ अन्सार के रईस थे। रसूले ख़ुदा (स 0 अ 0) औऱ मुस्लमीन के नज़दीक इतने मोहतरम थे कि जब वह सवार होकर आते तो रसूल खुदा (स 0 अ 0) मुसलमानों को उनके इस्तक़ेबाल का हुक्म देते। ख़ुद पैग़म्बरे ख़ुदा (स 0 अ 0) उनके वारिद होने पर खड़े हो जाते। यहूदियों के साथ लड़ाई के वक़्त जेहाद में जाना उनके लिए ज़रुरी न था। सत्तर हज़ार फ़रिश्तों ने उनके ज़नाज़े में शिरकत की और रसूले ख़ुदा (स 0 अ 0) नंगे पैर शुरू से आख़िर तक जनाज़े के साथ रहे और कंधा दिया और फ़रमाया कि मलाएका की सफ़ें नमाज़े जनाज़ा के वक़्त मौजूद थीं और मेरा हाथ जिबराइल के हाथ में था औऱ साद के जनाज़ा की मशाइयत कर रहे थे। हुज़ूरे अकरम (स 0 अ 0) के नज़दीक इतने मोहतरम कि खुद आं हज़रत (स 0 अ 0) ने उनको अपने हाथ से क़ब्र में उतारा। सअद की वालिदा ने बेटे से मुख़ातिब होकर कहा कि ऐ सअद! “ हैनीयन लकल जन्नह ” बेटा तुझे जन्नत मुबारक हो। हज़रत ने फ़रमाया कैसे मालूम किया तेरा फ़रज़न्द जन्नती है ? तेरे बेटे सअद पर फ़िशारे क़ब्र हो रहा है।

दूसरी रवायत में है कि इमाम अलैहिस्सलाम ने साद के फ़िशारे क़ब्र का सबब पूछा तो आप (स 0 अ 0) ने फ़रमाया अपने अहलो अयाल के साथ बदअख़लाकी किया करता था , इसी वजह से फ़िशारे क़ब्र है , ( पनाह बखुदा) (ख़ज़ीनतुल जवाहर)।

ग़ौर का मुक़ाम है कि इतना बड़ा मोहतरम सहाबी भी फ़िशारे क़ब्र से नहीं बच सका।

एक रवायत (कथन) के मुताबिक फ़िशारे क़ब्र उन चीज़ों का कफ़्फ़ारा है , जिनको मोमिन (धर्मनिष्ठ) नष्ट (ज़ाया) कर देता है शेख़ सदूक (र 0 अ 0) हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से रवायत करते हैं कि एक आलिम (ग्यानी) को क़ब्र में कहा गया कि हम तुझे बतौर अज़ाबे खुदावन्दी एक सौ ताज़ियाने मारेंगे , उसने कहा तुझे बतौर बरदाशत की ताक़त नहीं , वह कम करते गये , यहां तक कि एक कोड़े तक पहुंचे और कहा कि अब एक ताज़ियाने के अलावा चारा नहीं। उसने कहा यह अज़ाब मुझे किस वजह से होगा। फ़रिश्तों ने कहा कि इसकी वजह यह है कि तूने एक रोज़ बग़ैर वुज़ू के नमाज़ पढ़ी थी और बूढ़े आदमी के पास से गुज़रा मगर उसकी इमदाद (सहायता) न की। बस उसे अज़ाबे ख़ुदा का एक ताज़ियानी मारा गया और उसकी क़ब्र आग से पुर हो गयी और आं हज़रत (स 0 अ 0) ने रवायत (कथन) है कि जब कोई मोमिन (धर्मनिष्ठ) बावजूद कुदरत (सामर्थ्य) अपने मोमिन भाई की हाजत (इच्छा) पूरी नहीं करता तो अल्लाहतआला उसकी क़ब्र में एक बड़ा अजदहा मुसल्लत करेगा जिसका नाम “ शुजा ” है जो हमेशा उसकी उंगलियों को काटता रहेगा।

एक दूसरी रवायत (कथन) में है कि वह उसकी अंगुश्त शहादत को क़यामत तक काटता रहेगा , चाहे उसका यह गुनाह (पाप) उसने बख्श दिया हो , अज़ाब का मुस्तहक़ रहेगा।

क्या ग़रीक़ (डूबने वाला) और सूली (फाँसी) चढ़ने वाले के लिए फ़िशारे क़ब्र है ?

कुलैनी (र 0 अ 0) युनूस से रवायत (कथन) करते हैं कि हज़रत इमाम रज़ा (अ 0 स 0) से पूछा गया कि जिस शख़्स को सूली पर चढ़ाया गया हो क्या उस पर भी फ़िशारे क़ब्र होता है (पिछले ज़माने में कुछ लोगों को सूली पर चढ़ाते थे औऱ मरने के बाद उसे नीचे नहीं उतारा जाता था , चूनांचे हज़रत ज़ैद शहीद तीन साल तक बराबर सूली पर लटके रहे।) इमाम (अ 0 सद) ने फ़रमाया हां अल्लाहताला हवा को हुक्म देता है और वह उसे फ़िशार करती है।

दूसरी रवायत (कथन) में हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से रवायत (कथन) है कि आपने फ़रमाया कि हवा और ज़मीन का परवरदिगार एक है। हवा को वही करता है और वह फ़िशार करती है और यह क़ब्र के फ़िशार से भी बदतर है। इसी तरह दरिया में ग़र्क (डूबने) होने वाले या जिसको दरिन्दे खा एक हों , फ़िशारे क़ब्र होता है।

न्यामते ख़ुदावन्दी का जिमाअ और कुफ़राने न्यामत भी फ़िशारे क़ब्र है।

वह आमाल जो अज़ाबे क़ब्र से नजात देते हैं

यह बहुत से आमाल है , मैं इस जगह पर उनमें से सिर्फ़ सत्तरह के वर्णन (ज़िक्र) करने पर संतुष्ठि (इकतिफ़ा) करूंगा।

1- हज़रत अमीरूल मोमनीन (अ 0 स 0) से रवायत (कथन) है कि जो शख़्स हर जुमा को सूरए निसां की तिलावत करता है , वह फ़िशारे क़ब्रे से महफूज़ रहेगा।

2- रवायत (कथन) है कि जो शख़्स सुरए ज़ख़रफ़ की तिलावत करता है हक़ताला उसे फ़िशारे क़ब्र से महफूज़ रखेंगे।

3- जो शख़्स सूरए नून वबक़लम को नमाज़े फ़रीज़ा या नाफ़िला में पढ़ता है , हक़ताला उसे फ़िशारे क़ब्र से पनाह देगा।

4- हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से मर्वी है कि जिस शख़्स का , जवाल रोज़े पंजशम्बा और ज़वाले जुमा के दरमियान इन्तिक़ाल हो जाय अल्लाहतआला उसे फ़िशारे क़ब्र महफूज़ रखेगा।

5- हज़रत इमाम रज़ा (अ 0 स 0) से मनकूल है कि नमाज़े शब तुम्हारे लिए मुस्तहब है , जो शख़्स रात के आख़िरी हिस्से में उठ कर आठ रकअत नमाज़े शब दो रक़अत नमाज़े शफ़आ , एक नमाज़े वित्र औऱ कुनूत में सत्तर बार अस्तग़फार पढ़ेगा , अल्लाहतआला उसे अज़ाबे क़ब्र और अज़ाबे जहन्नुम से महफूज़ रखेगा , उसकी उम्र दराज़ औऱ रोज़ी फ़राख़ होगी।

6- हज़रत रसूले अकरम (स 0 अ 0) से मनकूल है कि जो शख़्स सोते वक़्त सुरए अलहाकोमुत्तकासिर पढ़े वह अज़ाबे क़ब्र से महफूज़ रहेगा।

7- जो शख़्स हर रोज़ दस बार दुआ “ आद्दतो लेकुल्ले हौलिन लाइलाहा इल्लल्लाह ” पढ़े , वह अज़ाबे क़ब्र से महफूज़ रहेगा। (यह दुआ पहले दर्ज़ कर दी गयी है।)

8- जो शख़्स नजफ़े अशरफ़ में दफ़न हो , क्यों कि वहां की ज़मीन की यह ख़ासियत (विशेषता) है कि जो शख़्स भी इस में दफ़न किया जाय , उससे अज़ाबे क़ब्र और सवाले मुनकिर नकीर साक़ित (समाप्त) हो जाता है।

9- मय्यत के साथ ज़रीदतैन यानी दो तर लकड़ियों का रकना अज़ाबे क़ब्र के लिए मुफ़ीद है। रवायत (कथन) है कि मय्यत पर उस वक़्त तक अज़ाबे क़ब्र नहीं होता जब तक शाख़ें तर रहें। रवायत (कथन) है कि हज़रत रसूले खुदा (स 0 अ 0) एक ऐसी कब़्र के पास से गुज़रे , जिसकी मय्यत पर अज़ाब हो रहा था। आपने एक शाख़ तलब फ़रमायी , जिसके पत्ते उखाड़े गए थे , उसको दरमियान से काटकर दो हिस्से किए , एक हिस्सा मय्यत के सिरहाने रखा और दूसरा मय्यत के पांव की तरफ़ रख दिया। और क़ब्र पर पानी छिड़कना भी मुफ़ीद है , क्योंकि रवायत (कथन) में है कि मय्यत पर उस वक़्त तक अज़ाब नहीं होता , जब तक क़ब्र की ख़ाक़ उस पानी से तर रहती है।

10- दो शख़्स रजब की पहली तारीख़ को दस रकत नमाज़ इस तरह पढ़े कि हर रकत में सूरए हम्द के बाद तीन बार सूरए तौहीद पढ़े तो वह फ़िशारे क़ब्र और अज़ाबे रोज़े क़यामत से महफूज़ रहेगा और रजब की पहली रात को मग़रिब की नमाज़ के बाद बीस रकत नमाज़ सूरए हम्द और सुरए तौहीद के साथ पढ़ना अज़ाबे क़ब्र के लिए फ़ायदेमन्द है।

11- माह रजब में चार दिन रोज़ा रखना इसी तरह माह शाबान में बाहर रोज़े रखना फ़ायदेमन्द है।

12- सूरह “ तबारकल्लज़ी बेयदिहिल मुल्क ” को क़ब्र पर पढ़ना अज़ाबे क़ब्र से नजात देती है। चुनांचे कुतुब रावन्दी ने इब्ने अब्बास से नक़ल किया है कि एक शख़्स ने एक जगह ख़ेमा लगाया , उसे वहां पर क़ब्र के वजूद का इल्म न था , उसने सुरए अब्बास से नक़ल किया है कि एक शख़्स ने एक जगह ख़ेमा लगाया , उसे वहां कब्र के वजूद का इल्म न था , उसने सुरए “ तबारकल्लज़ी बेयादिहिल मुल्क ” की तिलावत की कि अचानक उसने एक अवाज़ (सदा) को सुना जो कह रहा था , यह सूरह नजात देने वाली है उसने इस वाक़िया को हज़रत रसूले अकरम (स 0 अ 0) के पास ब्यान किया , आपने कहा यह सूरह नजात देहन्दा और अज़ाबे क़ब्र से बचाती है।

शेख़ कुलैनी (र 0) हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़र (अ 0 स 0) से रवायत (कथन) करते हैं कि सूरए मुल्क अज़ाबे क़ब्र से बचाती है।

13- दआवते रावन्दी से मनकूल है कि हज़रत रसूले अकरम (स 0 अ 0) ने फ़रमाया जो शख़्स मय्यत को दफ़न करते वक़्त क़ब्र के पास तीन बार “ अल्लाहुम्मा इन्नी असअलोका बेहक़्के़ मोहम्मदिन व आले मोहम्मदिन अल्ला तोअज़्जिब हाज़ल मय्यते ” कहे हक़ताला क़यामत तक आज़बे क़ब्र से महफूज़ रखेगा।

14- शेख़ तूसी (र 0) ने मिस्बाहुल मुतहज़्द में हज़रत रसूले अकरम (स 0 अ 0) से रवायत की है कि जो शख़्स शबे जुमा को दो रकत नमाज़ इस तरह पढ़े कि हर रकत में सूरए हमद एक मर्तबा और “ इज़ा जुलज़िलातिल अरज़ो ” पन्द्रह मर्तबा पढ़े , हक़ताला उसे अज़ाबे क़ब्र और क़यामत के ख़ौफ़ से महफूज़ रखेगा।

15- पन्द्रह रजब की शब को तीस रकत नमाज़ इस तरह पढ़ना कि हर रकत में सूरए हम्द एक मर्तबा और सूरए तौहीद दस मर्तबा , अज़ाबे क़ब्र के लिए फ़ायदेमन्द है , इसी तरह 16 और 17 रजब की शब को यही नमाज़ पढ़ना मुफ़ीद है और पहली शाबान की शब सूरए हम्द और सूरए तौहीद के साथ सौ रकत नमाज़ पढ़ें और जब फ़ारिग़ हो तो पचास मर्तबा सूरए तौहीद पढ़ें और ऐसा ही 24 मर्तबा शाबान की शब को सौ रकत नमाज़ इस तरह पढ़े कि हर रकत में सूरए हम्द एक मर्तबा “ अज़ाजाआ नसरुल्लाहे ” दस मर्तबा और पन्द्रह रजब को पचास रकत सूरए हम्द , सुरए तौहीद , सूरए फलक़ और सूरए वन्नास के साथ पढ़ना , अज़ाबे क़ब्र के लिए फ़ायदेमन्द है , जैसा कि शबे आसूर सौ रकत पढ़ना। नमाज़ पढ़े और जब फ़ारिग़ हो तो पचास मर्तबा सूरए तौहीद पढ़ें और ऐसा ही 24 शबान की शब को सौ रकत नमाज़ इस तरह पढ़े कि हर रकत में सूरए हम्द एक मर्तबा “ इज़ाजाआ नसरुल्लाहे ” दस मर्तबा औऱ पन्द्रह रजब को पचास रकत सूरए हम्द , सूरए तौहीद , सूरए फलक़ और सूरए वन्नास के साथ पढ़ना , अज़ाबे क़ब्र के लिए फ़ायदेमन्द है , जैसा कि शबे आशूर सौ रकत पढ़ना।

16- ख़ाके शिफ़ा यानी इमाम हुसैन (अ 0 स 0) के मक़तल की ख़ाक , क़ब्र और कफ़न में रखना और आज़ाए सजदा पर मलना।

17- अनवारे नाआनियां में हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से रवायत (कथन) है कि आपने फ़रमाया अगर चालीस आदमी मय्यत के पास हाज़िर होकर कहें “ अल्ला हुम्मा इन्ना ला नआमो मिनहो इल्ला ख़ैरन व अन्ता आलमो बेहि मिन्ना फ़ग़फ़िर लहू। ” तो परवर दिगारे आलम उसको अज़ाबे क़ब्र से महफूज़ रखेगा , और आपसे रवायत (कथन) है कि बनी इसराइल में एक आबिद था , जिसके मुताबिक़ अल्लाहतआला ने हज़रत दाऊद (अ 0 स 0) को वही फ़रमायी कि यह रियाकार है। जब वह आबिद (अ 0 स 0) को वही फ़रमायी कि यह रियाकार है। जब वह आबिद मरा तो हज़रत दाऊद (अ 0 स 0) उसके जनाज़े में शरीक न हुए , मगर चालीस आदमियों ने उसकी नमाज़े जनाज़ा पढ़ी और कहा-

“ अल्लाहुम्मा इन्ना ला नालमो मिनहो इल्ला ख़ैरन व अन्ता आलमो बेहि मन्ना फ़गडफ़िरलहु। ”

फिर चालीस आदमी औऱ आए और उन्होंने भी यही गवाही दी , चूंकि उन्हे इसके बातिन की ख़बर न थी हज़रत दाऊद (अ 0 स 0) को वही हुई कि तूने इस पर नमाज़ क्यों नहीं पढ़ी। आपने अर्ज़ किया कि बारे इलाहा! तूने ही तो बताया था कि यह आबिद रियाकार है। आवाज़े कुदरत आयी वह ख़बर दुरुस्त थी , लेकिन लोगों ने हाज़िर होकर उसकी अच्छाई की गवाही दी , इसलिए मैंने उसके गुनाहों को बख़्श दिया।

यह ख़ल्लाक़े आलम का फ़ज़ली करम है कि उसने अपने बच्चों को बग़ैर किसी पूछगछ के अज़ाब से रिहा कर दिया।

इसी वजह से नेक लोग ख़ासकर साबक़ीन अपने कफ़न को तैयार करके आपने पास रखते थे और अपने मोमनीन (धर्मनिष्ठ) अहबाब से उस पर गवाही तहरीर करवाते थे , जब भी देखते मौत की याद ताज़ा हो जाती और आख़िरत का ख़ौफ़ बढ़ जाता। हमें भी चाहिए कि अपने कफ़नों पर गवाही तहरीर करवा कर और मोमनीन के दस्तख़त करवाने के बाद अपने पास रखें ताकि यह गवाही हमारी बख़शीश का ज़रिया हो।

उक़बए (यमलोक) सोम

मुनकिर व नकीर का क़ब्र में सवाल

जिन चीज़ों पर ऐतेक़ाद रखना मज़हबे शिया का जुज़ है , उनमें से एक यह भी है कि , “ सवाल मुनकिर व नकीर फ़िल क़बरे हक़ ” मुसलमानों के लिए अजमलन इसका मोतक़िद होना ज़रुरी है। अल्लामा मजलिसी (र 0) बेरुल अनवार और हक़्कुल यक़ीन में इरशाद फ़रमाते हैं कि अहादीसे मोअतबर से यह ज़ाहिर होता है कि सवाल और फ़िशारे क़ब्र बदन असली और रुह पर है।

क़ब्र में अक़ायद औऱ आमाल के बारे में सवाल किया जाता है यह सवालात हर मोमिन और काफ़िर से किए जाते हैं इसके अलावा बच्चे , दीवाने औऱ कम अक़्ल , बेवकूफ़ लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है ज़मानए बरज़ख़ में उनके लिए जज़ा या सज़ा नहीं है।

नमाज़ , रोज़ा , हज़ ज़कात , खुम्स औऱ मुहब्बते अहलेबैत (अ 0 स 0) औऱ उम्र औऱ माल के बारे में सवाल किए जाते हैं , जैसा कि इमाम ज़ैनुल आबदीन (अ 0 स 0) से एक रवायत (कथन) में मर्वी है कि अक़ाएदे इस्लामिया के बाद दरयाफ़्त किया जाता है।

“ अपनी उम्र को कहां ज़ाए करता रहा। माल कैसे कमााय औऱ कहां खर्च किया। ”

कुछ लोगों की ज़बानें गूंगी हो जाती हैं , खौफ़ की वजह से जवाब नहीं दे सकते या ग़लत जवाब देते हैं औऱ फ़रिश्तों के सवाल पर कहते हैं , तुम ख़ुदा हो। कभी कहते हैं , अगर दुनिया में इन अक़ाएद (श्रद्धाओं) से वास्ता रहा है तो ठीक-ठाक जवाब देता है सही जवाब देने वाले के लिए क़ब्र को उसकी हद्दे नज़र तक वसीह (बड़ा) कर दिया जाता है , और आलमे बरज़ख आराम और क़यामते ख़ुदावन्दी से फ़ायदा उठाते हुए गुज़ारा देता है और फ़रिश्ते उसके कहते हैं नई ब्याही औरत की तरह सो जा। (उसूले क़ाफी)

अगर काफ़िर (नास्तिक) और मुनाफ़िक (विरोधी) है और सही जवाब नहीं दे सका तो उसकी क़ब्र की तरफ़ जहन्नुम का दरवाज़ा खोल दिया जाता है और उसकी क़ब्र आग से पुर हो जाती है जैसा कि अल्लाह तआला का इरशाद हैः-

“ और अगर झुठलाने वाले गुमराहों में से है तो (उसकी) मेहमानी खौलता हुआ पानी है और जहन्नुम में दाख़िल कर देना। ”

हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से वारिद है , इन तीनों चीज़ों का मुनकिर हमारा शिया नहीं। ( 1) मेराज ( 2) सवाले क़ब्र ( 3) शफ़ाअत।

मर्वी (वर्णित) है कि क़ब्र में दो फ़रिश्ते ऐसी डरावनी सूरत में आते हैं कि उनकी आवाज़ बिजली की तरह गरज़दार और आंखे बिजली की तरह खेरह (चौंधयायी हुई) करने वाली होती हैं , वह आकर सवाल करते हैं-

(1) मन रब्बोका “ तेरा रब कौन है ” ?

(2) मन नबीका “ तेरा नबी कौन है ” ?

(3) मन दीनका “ तेरा दीन क्या है ” ?

(4) मन इमामेका “ तेरा इमाम कौन है ” ?

चूंकि इस हालत में मय्यत के लिए जवाब देना मुश्किल होता है , जैसा कि गुज़रा है औऱ वह मददगार का मोहताज होता है , इसलिए मय्यत को दो मुक़ामात पर इन एतेक़ादात की तलक़ीन की जाती है।

अव्वल- क़ब्र में उतारने के बाद- बेहतर यह है कि दायें हाथ से दायें कांधे और बायें हाथ से बांये कांधे को पकड़ कर उसके नाम के वक़्त हरकत देकर तलक़ीन करें।

दोम- जब मय्यत को दफ़न कर दिया जाय- सुन्नत है कि मय्यत का क़रीबी रिश्तेदार लोगों के चले जाने के बाद क़ब्र के सिराहने बैठकर बुलन्द आवाज़ में तलक़ीन पढ़े बेहतर है कि अपनी दोनों हथेलियों को क़ब्र पर रखे और अपने मुंह को क़ब्र के नज़दीक ले जाय। अगर किसी को तलक़ीन के लिए नायब मुक़र्रर करें तो यह भी दुरुस्त है। मर्वी (वर्णित) है कि जब तलक़ीन पढ़ी जाती है तो मुनकिर नकीर से कहता है , आओ चलें। उसकी हुज्जत के लिए तलक़ीन पढ़दी गयी है , अब पूछने की ज़रुरत नहीं और बह बग़ैर सवाल किए वापस चले जाते हैं।

तम्बीह- अगर कोई यह कहे कि तलक़ीन से मुर्दा को क्या फ़ायदा जब कि रुह निकल चुकी है , इसका जवाब यह है कि वह हमसे बेहतर कलाम को समझतो और सुनता है बल्कि जो भी इस जगह पहुंचता है , उसके लिए तमाम ज़बानों का समझ़ना यकसाँ है। अरबी हो या फ़ारसी , क्योंकि महदूदियत इस आलमे माद्दी का नतीजा है।

मन ला यहज़रहलफ़क़ीहे में है कि जब हज़रत अबूज़र (र 0) ग़फ़्फ़ारी के बेटे ज़र ने वफ़ात पायी तो आप उसकी क़ब्र के सिराहने बैठ गए , औऱ उसकी क़ब्र पर हाथ फ़ेर के कहा , ऐ ज़र ख़ुदा तुम पर रहमत करे। ख़ुदा कि क़सम तू मेरी निस्बत नेक था औऱ हुकूक़े फरज़न्दी को अदा करता रहा , अब जबकि तुझे मुझसे ले लिया गया , मैं तुझसे खुश हूं। बख़ुदा मुझे तेरी जान का कोई ग़म नहीं। मुझे अल्लाह के सिवा किसी से कोई हाजत नहीं। अगर मुझे मरने के बाद पेश आने वाली दुशवारियों का ख़ौफ़ न होता तो तेरे बजाय मैं ख़ुद मरने को तैयार होता , लेकिन मैं चाहता हूं कि चन्द रोज़ और गुनाहों की तौबा और उस आलम की तैयारी में सर्फ़ कर सकूं।

बेशक तेरी दुश्वारी के गम ने मुझे तेरा ग़म करने के बजाय इस चीज़ में मशग़ूल किया कि ऐसी इबादत औऱ अताअत करूँ जो तेरे लिए मुफ़ीद हो औऱ उस चीड़ ने मुझे तेरी जुदायी में घुलने से बाज़ रखा। खुदा की क़मस मैं इसलिए ग़मनाक नहीं कि तू फ़ौत हो गया और मुझ़से जुदा हो गया , बल्कि मैं इसलिए ग़मगीन हूँ कि तुझ पर क्या गुज़र रही होगी और तेरा क्या हाल होगा ? काश! मुझे इल्म होता कि तूने क्या कहा और तुझे क्या हुक्म मिला ? खुदावन्दा मैंने वह तमाम हुकूक़ बख़श दिए हैं , जो मेरे मुत्तालिक़ उस पर वाजिब थे औऱ तू उसे अपने हुकूक़ माफ़ फ़रमा जो तूने उस पर वाजिब फ़रमाए थे , क्यों तू अपनी बख़्शिश औऱ सख़ावत के एतबार से मुझसे ज़्यादा सज़ावार है।

हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से मनकूल (उदधृत) है कि जब मोमिन (धर्मनिष्ठ) को क़ब्र में दाख़िल किया जाता है तो नमाज़ उसके दायें , ज़कात उसके बायें तरफ़ औऱ (बर्रा) नेकी और एहसान उसके सिर पर सायाफ़िग़न होते हैं और सब्र उसके क़रीब होता है और जिस वक़्त दोनों फ़रिश्ते सवाल करते हैं तो सब्र नमाज़ ज़कात , औऱ नेकी से कहता है कि अपने मालिक को घेर लो , यानी मय्यत की हिफ़ाज़त करो , जब भी यह आजिज़ होता था तो मैं ही इसके नज़दीक होता था।

अल्लामा मजलिसी (र 0) महासिन में बसन्द सही इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) व इमाम मोहम्मद बाक़र (अ 0 स 0) से रवायत (कथन) करते हैं कि जब मोमिन मरता है तो उसके हमराह छः सूरते उसकी क़ब्र में दाख़िल होती हैं , जिनमें से एक दूसरों की निस्बत ज़्यादा नूरानी , पाकीज़ा औऱ मोअत्तर होती है , इनमें से एक दायें , दूसरी बायें , तीसरी सामने चौथी सिर की तरफ़ पांचवी पांव की तरफ़ खड़ी हो जाती है और जो सबसे ज़्यादा नूरानी होती है , वह सिर पर साया फ़िगन होती है , जिस तरफ़ से भी सवाल या अज़ाब आता है , तो उस तरफ़ खड़ी सूरत उसके और मय्यत के दरमियान हायल होकर रोकती है। नूरानी सूरत सबसे मुख़ातिब होकर कहती है। खुदा तुम्हें जज़ाए ख़ैर दे। तुम कौन हो ? दायें होकर कहती है। खुदा तुम्हें जज़ाए ख़ैर दे। तुम कौन हो ? दायें तरफ़ वाली कहती है , मैं उसकी नमाज़ हूँ। बायीं तरफ़ वाली कहती है मैं इसकी ज़कात हूँ। चेहरे के मुक़ाबिल वाली सूरत कहती है मैं उसका रोज़ा हूँ। सिऱ की तरफ़ वाली कहती है। मैं उसका हज व उमरा हूँ और जो सूरत उस के पांव की तरफ़ होती है वह कहती है मैं उसका वह एहसान हूँ जो यह मोमिन भाइयों के साथ करता था। यह तमाम सूरतें पिळती हैं कि तू कौन है , जो हम सबसे ज़्यादा नूरानी और ख़ूबसूरत है ? वह जवाब देती है मैं वलाए आले मोहम्मद सलवातुल्लाह अलैहिम अजमइन हूँ।

शेख़ सद्दूक (र 0) ने माहे शाबान के रोज़ों की फ़ज़ीलत के बारे में रवात (वर्णन) किया है कि जो शख़्स इस महीने में नौ रोज़े रखे तो मुनकिर व नकीर सवालात के वक़्त उस पर मेहरबान होंगे। हज़रत इमाम बाकर (अ 0 स 0) से एक रवायत (वर्णन) में उस शख़्स के लिए बेशुमार फ़ज़ीलत वारिद है , इन फ़जायल में से एक यह भी है कि हक़ तआला उससे मुनकिर व नकीर के ख़ौफ को दूर करता है , और उसकी क़ब्र से एक ऐसा नूर सातेअ होता है जो तमाम दुनिया को मुनव्वर कर देता है।

हज़रत रसूले अकरम (स 0 अ 0) से रवायत है कि ख़िजाब की चार विशेषताएं हैं इनमें से एक यह भी है कि मुनकिर व नकीर इससे हया (शर्म) करते हैं , इससे पहले आपको मालूम हो चुका है कि नज़फ़े अशरफञ की ज़मीन की यह विशेषता (ख़ासियत) है कि इस जगह पर दफ़न होने वाले से मुनकिर व नकीर का हिसाब साकि़त है। इस जगह पर उसकी ताईद में मैं हिकायत दर्ज करता हूँ।

हिकायत

अल्लाहमा मजलिसी (र 0) ने तोहफ़ा में इरशादुल कुलूब और फ़रहतुल ग़ोरा से नक़ल फ़रमाया है कि अहले कूफ़ा में से एक मर्द सालेह ने कहा कि मैं एक बारनी रात को मस्जिदे कूफ़ा में मौजूद था कि अचानक हज़रत मुस्लिम (अ 0 स 0) की तरफ़ वाले दरवाज़े को दस्तक दी गयी , ज्योंही दरवाज़े को खोला तो एक जनाज़ा अन्दर दाख़िल किया गया और उसे हज़रत मुस्लिम की क़ब्र की तरफ़ चबूतरे पर रखा गया। उनमें से एक पर नींद ग़ालिब हुई , उसने ख़्वाब में देखा कि दो शख़्स जनाज़ा के पास आए , उनमें से एख ने दूसरे से कहा , कि मेरा उसके ज़िम्मे इस क़द्र हिसाब है , चाहता हूं कि उसके नजफ़ में दफ़न होने से पहले वसूल कर लूं क्योंकि मैं उसके बाद उसके क़रीब नहीं जा सकूंगा। वह शख़्स ख़ौफ़ के मारे बेदार हुआ और अपने साथियों से तमाम हक़ीक़त ब्यान की। उन्होंने उसी वक़्त जनाज़े को उठाकर नजफ़े अशरफ़ की हदूद में दाख़िल किया ताकि हिसाब औऱ अज़ाब से नजात पाए।

मैं कहता हूँ खुदा भला करे , जिसने कहा किः-

“ जब मैं मर जाऊँ तो मुझे हज़रत अली (अ 0 स 0) के पहलू में दफ़न करना जो हसन (अ 0 स 0) और हुसैन (अ 0 स 0) के वालिद हैं क्योंकि मुझे उनके पड़ोस में जहन्नुम की आग का कोई डर नहीं औऱ न ही मुनकिर व नकीर का ख़ौफ़ रखता हूँ क्योंकि जब सहरा में ऊँट की रस्सी गुम हो जा तो मोहाफिज़ पर महफूज़ चीज़ का पेश करना आर है , जब तक वह उसकी हिफ़ाज़त में हो (हज़रत अली अ 0 स 0 के लिए यह आर है कि मलाएकए अज़ाब के सुपुर्द कर दें।) ”

हिकायत

उस्तादे अकबर मोहक़क़िए बहबहाई से मनकूल (उद्धृत) है कि आपने फ़रमाया कि मैंने एक बार हज़रत अबा अबदुल्ला अल हुसैन (अ 0 स 0) को ख़्वाबमें देखा और पूछा या हज़रत (अ 0 स 0) आप के क़रीब में दफ़न होने वालसे से भी सवाल होगा। आपने फ़रमाया किस फ़िरश्ते की जुर्रत है कि उससे सवाल करे। अरब की एक मिसाल है।

यानी “ फ़ला आदमी अपनी पनाह में आने वाले की हिमायत टिड्डी को पनाह देने वाले से ज़्यादा हिमायत करने वाला है। ”

इसका वाक़िया यूं है कि एक आदमी जो क़बीला “ तै ” के बादिया नशीनों में से था। उसका नाम मदलज बिने सुवैद था। एक दिन अपने ख़ेमे में बैठा था कि क़बीले तै के एक गिरोह को आते हुए देख़ा , जो अपना साज़ो सामान साथ उठाए हुए था , उसने पूछा क्या ख़बर है , उन्होंने कहा , कि बहुत से टिड्डीदल आपके ख़ेमें के क़रीब उतरे हुए हैं , हम उन्हें पकड़ने के लिए आए हैं। मदलज ने जब उनका इरादा मालूम किया तो फ़ौरन उठकर अपने घोड़े पर सवार हुआ औऱ नेज़े को सम्हाल कहा , खुदा की कसम जो भी इन टिड्डियों को नुकसान पहुंचाएगा , मैं उसे क़त्ल कर दूँगा।

“ यह टिड्डी दल मेरी पनाह लें और तुम इन्हें पकड़ने का इऱदा करो , ऐसा हरगिज़ नहीं होगा। ”

और यह बराबर उनकी हिमायत करता रहा , यहा तक कि धूप नि्ल आयी और वह टिड़्डी दल उड़ गये उस वक़्त उसने कहा यह टिड्डी दल मेरे पड़ोस मे मुताक़िल हुए है।

हिकायत

क़िताब हबलुलमतीन से मनकूल है कि मीर मुइनुद्दीन अशरफ़ ने जो रौज़ा इमाम रज़ा अली के नेक खुद्दामों में से था कहा कि मैंने ख़्वाब मे देखा कि मैं मुहाफिज़ ख़ानए मुबारिका में हूँ औऱ तजदीदे वुज़ू की ख़ातिर रौज़ए मुबारका से बाहर निकला ज्यों ही मैं अमीर शहर के चबूतरे के क़रीब पहुंचा तो मैंने एक बहुत बड़ी जमाअत को सहने मुतहर में दाख़िल होते हुए देखा जिन के आगे-आगे एक नूरानी और अज़ीमुश्शान हस्ती हैं और इन लोगों के हाथों में बेलचे हैं , ज्योंही वह सहने मुक़द्दस में पहुंचे , उस बुजुर्ग ने जो रहमनुमाई कर रहा था , एक ख़ास क़ब्र की तरफ़ इशारा करते हुए हुक्म दिया कि इस क़ब्र को ख़ोदकर ख़बीस को बाहर निकालो। जिस वक़्त उन्होंने क़ब्र को खोदना शुरु किया , मैंने एक शख़्स के क़रीब जाकर पूछा यह बुर्ज़गवार जिन्होंने हुक्म दिया है कौन हैं ? उसने कहा यह हज़रत अमीरुल मोमनीन (अ 0 स 0) हैं। इसी हालत में मैंने देखा कि आठवें इमाम ज़ामिन हज़रत इमाम रज़ा (अ 0 स 0) रौज़ए मुबारका से बाहर तशरीफ़ लाए और ख़िदमते हज़रत अमीरुल मोमनीन (अ 0 स 0) में पहुंच कर सलाम अर्ज़ किया। हज़रत अमीरुल मोमनीन (अ 0 स 0) ने सलाम का जवाब दिया। इमाम रज़ा (अ 0 स 0) ने अर्ज़ किया दाद जान मैं आपसे सवाल करता हूँ और उम्मीद है आप इस शख़्स को माफ़ फ़रमाएंगे क्योंकि इसने यहां आकर मेरी पनाह ली है। इसलिए आप मेरी ख़ातिर उसे माफ़ फ़रमाएंगे। हज़रत ने फ़रमाया आप जानते हैं कि यह फ़ासिक़ व फ़ाजिर औऱ शराब ख़ोर है। अर्ज़ किया मुझे इल्म है , लेकिन इसने मरते वक़्त अपने रिश्तेदारों को वसीयत की थी कि वह उसे मेरे जवार में दफ़न करें , मुझे उम्मीद है आप माफ़ फ़रमाएंगे।

हज़रत ने फ़रमाया , मैं उसे तुम्हारी ख़ातिर माफ़ करता हूँ और हज़रत तशरीफ ले गए। मैं ख़ौफ़ के मारे बेदार हुआ औऱ रौज़ाए मुबारका के दूसरे खुद्दामों को बेदार किया , और उस जगह पर पहुंचे , जिसे मैंने ख़्वाब में देखा था। हमने एक ताज़ा क़ब्र देखी , जिससे कुछ मिट्टी बिखरी पड़ी थी। मैंने पूछा क़ब्र किसकी है ? उन्होंने कहा एक इतराक आदमी की है , जिसे कल यहां दफ़न किया गया है।

हाजी अली बग़दादी इमाम अस्र (अ 0 स 0) अरवाहनालहुलफ़िदा की ख़िदमत से मुशर्रफ़ हुए और आप से सवालात नक़्ल किए गए। वह कहता है मैंने अर्ज़ किया आक़ा! क्या यह दुरुस्त है कि जो शख़्स शबे जुमा को इमाम हुसैन (अ 0 स 0) की ज़ियारत करे , उसे अमान है। फ़रमाया हां। ख़ुदा की क़सम आप की आंखों से आंसू भी जारी हुए और रोने लगे। मैंने अर्ज़ किया आक़ा मसला दरपेश है। फ़रमाया पूछो। मैंने अर्ज़ किया सन् 1269 हिजरी में हमने इमाम रज़ा (अ 0 स 0) की ज़ियारत की और एक बद्दू अरब जो मशरेक़ी नजफ़ अशरफ़ के इलाक़े से ताअल्लुक रखता था , उससे हमारी मुलाक़ात हुई , हमने उसकी दावत की और उससे पूछा कि विलायते इमाम रज़ा (अ 0 स 0) के बारे में तेरा क्या ख़्याल है ? उसने कहा बेहश्त है। आज पन्द्रह रोज़ से मैं इमाम रज़ा (अ 0 स 0) का मालस खा रहा हूँ मुनकिर व नकीर को क्या हक़ पहुंचता है कि वह क़ब्र में मेरे नज़दीक आएं। मेरा गोश्त व पोस्त उनके मेहमान ख़ाने का खाना ख़ाकर बना है इमामुल अस्र ने फ़रमाया यह सही है कि अली बिने मूसी रज़ा (अ 0 स 0) तशरीफ़ लाकर उसे मुनकिर व नकीर नजात दिलाएं। खुदा कि क़सम मेरा दादा ज़ामिन है।

फ़स्ल सोम

बरज़ख़ (पर्दा)

इन हौलनाक़ मंज़िलों में से एक मंजिल बरज़ख है। बरज़ख़ लोग़त (शब्द कोष) में उस पर्दा औऱ रुकावट को कहा जाता है , जो दो चीज़ों के दर्मियान हो और उनको आपस में न मिलने दे। मसलन कड़वा और शीरीं इकट्ठे दोनों दरिया मौज़ें मार रहै हैं और परवर दिगारे आलम ने उनके दर्मियान ऐसा पर्दा हायल कर दिया है , जो इन दोनों को आपस में मिलने नहीं देता। जैसा कि अल्लाहतआला ने फ़रमायाः-

“ उसी ने दो दरिया बहाए जो बाहम मिल जाते हैं , उनके दर्मियान एक हद्दे फ़ासिल (आड़) है , जिससे वह तजाउज़ नहीं करते। ” उस पर्दे को बरज़ख़ कहते हैं।

लेकिन इस्तेलाह के लिहाज़ से बरज़ख़ वह आलम (काल) है , जिसको परवर दिगारे आलम ने दुनियां और क़यामत के दर्मियान क़रार दिया है। हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) एक हदीस के जुज़्व में फ़रमाते हैं कि ख़ुदा कि क़सम मुझे तुम्हारे बरज़ख़ का ज़्यादा ख़ौफ़ है। रावी कहता है , मैंने अर्ज़ किया बरज़ख़ क्या है ? आपने फ़रमाया , वह मरने से क़यामत तक का ज़माना है (बेहार) और कुर्आन मजीद में है-

“ और इसके पीछे क़यामत तक का वक़्त बरज़ख है। ”

आलमे (काल) बरज़ख़ औऱ बदन

बरज़ख़ को आलमे मिसाली (उदाहरण काल) भी कहा जाता है , क्योंकि वह बज़ाहिर इसी आलम (काल) की तरह है , मगर शक्ल व सूरत मादह और उसके खुसुसियात के लिहाज़ से इस आलम से बिल्कुल भिन्न है। मरने के बाद जिस आलम (दशा) में हम वारिद होंगे। यह आलमे दुनियां उसकी निस्बत से ऐसा ही है जैसा कि शिकमे मादर (मां के पेट) को इस दुनिया से निस्बत है।

इसी तरह आलमे बरज़ख़ में बदन भी मिसाली होगा। अर्थात शक्ल व सूरत , आज़ा व जवारह के लिहाज़ से हुबहू इशी माद्दी (मायावी) बदन की तरह होगा मगर माद्दह का मोहताज न होगा , बल्कि हवा से भी ज़्यादा लतीफ़ होगा और कोई चीज़ मानेह न होगी , जो बदन मिसाली को एक तरफ़ से दूसरी तरफ़ की चीज़ को देखने में हायल हो। हज़रत सादिक़ आले मोहम्मद (अ 0 स 0) फ़रमाते हैं कि अगर तू उस बदन मिसाली को देख ले तो बेसाख़्ता कह उठे कि यही बदन है। लौ राएैतहू लकुलता होवा होवा।

अगर आप अपने मुर्दो बाप को ख़्वाब में देखें तो कहेंगे कि यह वही दुनियावी बदन है , हालांकि उश का जिस्म और माद्दा उसकी क़ब्र में है और उसकी सूरत बदन मिसाली है। बदन बरज़ख़ी या बदन मिसाली की आंखे , उन्हीं आंखों की तरह हैं , मगर उन आंखों के लिए तक़लीफ़ औऱ नज़र की कमज़ोरी नहीं है , और न ही कमज़ोरी की वजह से ऐनक की ज़रुरत है। इसी तरह बाक़ी अंगो की कमज़ोरी नहीं होती दांत नहीं गिरते। मोमिन (धर्रमनिष्ठ) जवानी के मज़े उड़ाता है और काफ़िर (नास्तिक) मुनाफ़िक़ बुढ़ापे की तकलीफ़ में मुबतिला होता है और उसके लिए अज़ाब का कारण होता है।

हुकमा व मुतकल्ललमीन उसको इस तस्वीर के साथ तश्बीह देते हैं , जो आईना में हासिल होती है लेकिन इसमें दो शर्ते हैं-

1- बदन मिसाली क़ायम बज़ात है न कि आईना का मोहताज।

2- बाशऊर और साहबे फ़हम व फ़रासत है। बख़िलाफ़ आईना की तस्वीर के।

इसकी नजीर वह ख़्वाह है जो हम देखते हैं , कि हम चश्मज़दन में दूर की मसाफ़त तै करके सरगोधा से कराची और दूसरे अन्य शहरों में पहुंच जाते हैं। वहां विभिन्न प्रकार के खानों , फ़लों औऱ पीने की चीज़ों और नग़मए दिलरुबा से लुत्फ़ उठाते हैं , जिसकी ताक़त अहले दुनियां में नहीं है। इसी तरह अरवाह भी बदने मिसाली के साथ विभिन्न प्रकार के खानों औऱ स्वादों से फ़ायदा उठाते हैं। अलबत्ता इस आलम की हर खाने-पीने की चीज़ लतीफ़ होती है और माद्दी कसाफ़तों से पाक है , जैसा कि रवायत से मुस्तफ़ाद है। एख ही चीज़ जन्नत में मोमिन के इरादे से मुख़तलिफ़ चीजों में तब्दील हो जाएगी। बेर सेब में फ़िर अगर ख़्वाहिश अंगूर की है तो वही अंगूर या दूसरे फलों में तब्दील हो जाएंगे , जैसा कि अमीर हमज़ा (अ 0 स 0) की रवायत (कथन) में ज़िक्र होगा। (मआद)

तासीर व ताअसुर की शिद्दत

आलमें बरज़ख़ में बदन मिसाली का अदराक (पाना) क़वी होता है , हालांकि खुद लतीफ़तर है यह तमाम दुनिया के स्वादों (लज्ज़) औऱ फ़ल की शीरीनी जो हम ख़ाकर हासिल करते हैं , आलमें बरज़ख़ की लज्ज़ात और शीरीनी के मुक़ाबिले में बिल्कुल हेच है , क्योंकि उनकी अस्ल वहां होगी। यहां उनकी मिसाल है। हुरूल ऐन अगर इस आलमे दुनियां की तरफ़ सिर्फ़ एक बार देख लें और लेहाज़ा भर नक़ाब कुशाई करें तो नूरे आफ़ताब इसके मुक़ाबिले में तारीक नज़र आए और आंख़ें ख़ेरा हो जाएं। इसलिए जमाले मुतलक़ वहां पर मौजूद हैं। कुर्आन पाक में है-

“ जो कुछ ज़मीन में है , हमने उसको ज़मीन के लिए ज़ीनत क़रार दिया है ताकि उसके ज़रिए तुम्हारा इम्तेहान लें कि क़ौन इश ख़िलौने के साथ अपने दिल को बहलाता है और कौन उसके फ़रेब से अपने आप को बचाता है और हक़ की लज़्ज़त और जमाल वाक़ई सच्ची खुशी को तलब करता है। ”

इस इजमाल से अर्थ केवल आलमे बरज़ख़ की कुव्वते तासीर और शिद्दत ब्यान करना है , मुक़ाबिला मक़सूद नहीं है। किसी-किसी समय इस दुनियां वालों के इबरत के लिए वाक़यात भी पेश आते हैं , इश जगह पर इनमें से सिर्फ़ दो वाक़यात पेश करता हूं।

हिकायत

मरहूम नराक़ी ख़ज़ायान में अपने सिक़ए असहाब से नक़ल फ़रमाते हैं कि उन्होंने कहा मैं आलमे शबाब में अपने वालिदे बुजुर्गवार और रोफ़ाक़ा (दोस्तों) के साथ ईदे नौरोज़ के दिन असफ़हान में एक दोस्त से मुलाक़ात के लिए जा रहा था जिसका घर काफ़ी दूर क़ब्रिस्तान के क़रीब था। हम थकावट दूर करने और अहले कुबूर की ज़ियारत की ख़ातिर क़ब्रिस्तान में बैठ गए। हमारे एक साथी ने नज़दीकी क़ब्र से बतौर मिज़ाह कहा। ऐ सहाबे क़ब्र! क्या आज ईद के दिन हमारी पज़ीराई करोगे ? फ़ौरन क़ब्र से आवाज़ आई कि अगले हफ़्ते बरोज़ मंगल तुम मेरे मेहमान होना।

हम सभी लोग इस शख से खौफ़ज़दा हो गए कि हमारी ज़िन्दगियां खत्म होने वाली हैं और इस्लाह आमाल और वसीयतें करने लगे , लेकिन मंगल के दिन तक किसी के मरने की ख़बर न सुनी। उस रोज़ हम फिर इकट्ठा होकर उस क़ब्र की तरफ़ रवाना हुए। जब हम उसके पास पहुंचे तो हममें से एक ने कहा! ऐ साहेबे क़ब्र वायदा पूरा करो , आवाज़ आयी आओ। परवर दिगारे आलम ने आलमें बरजख़ का पर्दा आंखों से दूर किया औऱ चश्में मलकूती खुल गयी। हमने देखा कि एक नेहायत सरसब्ज़ व शादाब और साफ़ बाग़ है , जिसमें साफ़ पानी की नहरें जारी हैं। बाग़ मेवाहाय रंगारंग से लदे हुए हैं। दरख़्तों पर खुश अलहान परिन्दे सनाए परवर दिगार कर रहे हैं , यहां तक कि हम एक आरास्ता व पैरास्ता इमारत में पहुंचे जो इन बाग़ात के दर्मियान में थी। हम अन्दर दाख़िल हुए। एक निहायत हसीन व जमील शख़्स ख़िदमतगारों के दर्मियान मौजूद हैं ज्यों ही उसने हमें देखा अपनी जगह से उठा और इस्तेक़बाल किया और अज़्ख़्वाही की। अन्वाह व अक़साम के मेवाजात और मिठाईयां मौजूद थीं जिन का तसव्वर भी हम इस दुनियां में नहीं कर सकते। खाने इतने लज़ीज़ थे कि हमने इस क़द्र लज़्ज़त कभी किसी चीज़ में ना चक्खी थी , जितना भी हम खाते गए , सेर न होते थे , ख़्वाहिश बाक़ी रही कि यह खायें वह खायें। विभिन्न प्रकार के खाने , मज़े मुख़्तलिफ़ , बस हम खाने के बाद कुछ देर बैठे और फ़िर उठ खड़े हुए कि देखें , इस शख़्स का क्या इरादा है , वह हमारे साथ चला और हम बाग़ के दरवाज़े पर पहुंचे। मेरे वालिद ने उससे पूछा आप कौन हैं ? और परवर दिगारे आलम ने यह नेअमात कैसे अता की कि अगर तू चाहे तो तमाम आलम की मेहमान नवाज़ी कर सकता है और यह जगह कौन सी है ? उसने कहा कि मैं भी आपका हम वतन फलां (अमुक) मोहल्ले का क़स्साब (क़साई) हूँ और इन दरजात का मोजिब दो चीज़ें हैं।

मैंने अपने काम में कभी तौल में कमी नहीं की थी। अपनी उम्र में कभी भी अव्वल वक़्त पर नमाज़ अदा करना तर्क़ नहीं किया। ज्योंहि अल्लाह हो अकबर की आवाज़ कान में पड़ी तराजू रखकर वज़न करना छोड़ देता और नमाज़ की ख़ातिर मस्जिद की तरफ़ चल देता , इसलिए आलमे बरज़ख़ में यह जगह मुझे दी गयी। पिछले हफ़्ते आपने यह कलाम किया लेकिन मुझे अन्दर लाने की इजाज़त न थी। इस हफ़्ते इसकी इजाज़त ली , इसके बाद हममें से हर एक ने अपनी उम्र पूछी और उसने जवाब दिया और मुझसे कहा कि तू अभी पन्द्रह साल ज़िन्दा रहेगा , उसके बाद उसने ख़ुदा हाफ़िज़ कहा और हमने उसे वापस जाने को कहा और अचानक हमने अपने आप को उसी क़ब्र के सिराहने ख़ड़े पाया। (मआद)

बरज़ख़ की लज़्ज़त फ़ानी (नाशवर) नहीं है

आलमे बरज़ख़ की दूसरी विशेषताओं में से एक दवाम (स्थायित्व) और सबात है इस दुनिया में किसी चीज़ को बक़ा नहीं है अगर जमाल (सुन्दरता) है तो बुढ़ापे की स्याही से ख़त्म। ख़ुराक जब तक मुंह में है खुशमज़ा है , इसी तरह निकाह और खु़राक़ और मेवा को दवाम नहीं , कुछ वक़्त के बाद गल सड़ जाते हैं। किसी चीज़ को दवाम और सबात हासिल नहीं है लेकिन आलमे बरज़ख़ फ़साद पज़ीर नहीं है , क्योंकि वह चीज़ें तरकीबे माद्दा और अनासिर की मोहताज नहीं है। इसी दावे पर शाहिद वह कज़िया है। किताबे दारुस्सलाम में शेख़ महमूद ईराक़ी ने अल्लामा शेख़ महदी नराक़ी मरहूम से नक़ल किया है। उन्होंने फ़रमाया कि नजफ़ अशरफ़ में मुजावरत के ज़माने में सख़्त कहेत (अकाल) आया। एक दिन मैं अपने गर से बाहर निकला , जबकि बच्चे भूख और प्यास से तड़प रहे थे , ताकि वादी अलसलाम में अमवात की ज़ियारत के ज़रिए अपने ग़म को ग़लत करूँ। जब वहां पुहंचा तो देखा कुछ लोग एक जनाज़ा को लाए और मुझे भी साथ आने को कहा। मै उनके साथ चला। बस उन्होंने जनाज़े को एक वसीह बाग़ में दाख़िल किया और उसे आलीशान महल में रखा , जो हर तरह के सामानो ऐशो आराम से आरास्ता था। मैंने इधर-उधर देखा और पीछे से एक दरवाज़ा में दाख़िल हुआ और देखा कि एक जवान शाहाना लिबास पहने (मलबूस) सोने के तख़्त पर बैठा है। ज्योंही उसने मुझे देखा मेरा नाम लेकर मुझे सलाम किया औऱ अपनी तरफ़ बुला कर मुझे अपने पास तख़्त पर बैठाया और बड़ी इज़्ज़त की , और मुझसे कहा तूने मुझे नहीं पहचाना मैं वही साहबे जनाज़ा हूं जिसको तूने देखा था। मैं फलां (अमुक) शहर का रहने वाला शख़्स हूं और जिन अश्ख़ास को तूने देखा था , वह तमाम मलाएक नक़ाला थे , जिन्होंने मुझे मेरे शहर से इस बरज़ख़ी बेहश्त के बाग में मुंतक़िल किया है , ज्योंहि मैंने यह कलमात उस जवान से सुने मेरका ग़म दूर हो गया औऱ उस बाग़ की सैर करने लगा , ज्योंही बाग़ से बाहर निकला चन्द और महल देखे , जब उनके दरवाज़े पर निगाह की मां , बाप औऱ चन्द रिश्तेदारों पर निगाह पड़ी , उन्होंने मुझे दावत दी , उनके खाने निहायत लज़ीज़ थे। जब मैं खाने से लज़्ज़त महसूस कर रहा था। मुझे बीवी और बच्चों , की भूख याद आयी कि उन पर किस क़द्र भूख और प्यास ग़लबा है और मेरा चेहरा मुतग़य्यर हो गया। मेरे वालिद ने कहा। बेटा महदी! तुझे क्या हो गया ? मैंने कहा मेरे बच्चे और बीवी भूखें हैं। मेरे बाप ने कहा , यह चावलो का ढेर है। मैंने एबा को चावलों से भर लिया और उन्होंने कहा इसको उठा लो , ज्योंही मैंने एबा को उठाया , क्या देखता हूँ कि वही जगह है जहां मैं वादी अस्सलाम में खड़ा था , बाग़ नहीं है और एबा चावलों से भरा है। घर लाया। मेरे अयाल ने पूछा कहां से लाए हो ? मैंने कहा तुम्हें इससे क्या काम ? काफ़ी मुद्दत गुज़र गयी , उन्हीं में से खाते हुए , मगर अभी तक मौजूद हैं। ख़त्म नहीं हुए , बिल आख़िर मेरी बीवी ने इसरार किया औऱ महदी नराक़ी ने बताया , बीवी उठी ताकि उनमें से उठाए मगर चावल मौजूद न थे।

इस क़िस्सा के ब्यान करने का मतलब यह है कि इस आलम की न्यामत और लज़्ज़त को दवाम (स्थायित्व) है दूसरी तरफ़ जो आज़ाबे बरज़ख़ में मुबतिला हैं अगर उनकी आह व फ़रियाद की आवाज़ हमारे कानों में पहुंच जाय तो दुनियाँ की तमाम मुसीबते भूल जाएं।

बहारुल अनवार जिल्द 3 में है कि रसूले खुदा (स 0 अ 0) ने फ़रमाया कि क़ब्ल अज़ बेसत एक रोज़ मैं गोसफ़न्द चरा रहा था कि देखा कि गोसफ़न्द हैरत की हालत में है औऱ चरना छोड़कर खड़े हो जाते हैं , लेकिन कोई ऐसी चीज़ नज़र नहीं आती। बस नुजूले वही पर जिबरईल से मालूम किया तो उसने कहा कि जब अमवात की आलमे बरज़ख़ में चीख़ व पुकार की आवाज़ आती है तो जिन्नों और इन्सानों के सिवा हर हैवान सुनता है औऱ यह उस फ़रियाद का असर है।

आलमे बरज़ख़ के इस दुनिया में अज़ाब के बहुत से वाक़यात हैं , अगर इन तमाम को यहां नक़ल किया जाय तो किताब तवील होगी। सिर्फ़ वाक़या नक़ल किया जाता है।

किताबे दारुस्सलाम में आलिम , ज़ाहिद सैय्यद हाशिम बहरानी से नक़ल है कि उन्होंने फ़रमाया , नजफ़ अशरफ़ में एक अत्तार था कि हर रोज़ नमाज़े जुहर के बाद अपनी दुकान पर वह लोगों को वाज़ किया करता था और उसकी दुकान पर कभी लोगों की भीड़ से ख़ाली न होती थी। एक हिन्दी शाहज़ादा नजफ़े अशरफ़ में मुक़ीम था , उसे एक सफ़र दरपेश हुआ। उसने अपने जवाहरात और क़ीमती चीज़ें उस अत्तार के पास बतौर अमानत रख दीं। जब वह वापस आया तो उस अत्तार ने शाहज़ादे के मुतालिबे पर अमानत वापस करने से इन्कार कर दिया शाहज़ादा इस मामले में हैरान व परेशान हुआ और हज़रत अली (अ 0 स 0) की क़ब्र की पनाह ली , और अर्ज़ किया कि या अली (अ 0 स 0)! मैंने अपने वतन को छोड़कर आपकी क़ब्र के पास रिहाइश एख़्तयार किया और तमाम सामाम फ़लां अत्तार के पास अमानत रखा। अब वह मुलकिर हो गया और इस बात पर मेरा कोई गवाह नहीं है और सिवाय आपके मेरा कोई फरियादरस नहीं है रात को ख़्वाब में मौला अली (अ 0 स 0) ने फ़रमाया जब शहर के दरवाज़े खुल जांय तुम बाहर निकलना और जो शख़्स तुम्हें पहले मिले उससे अमानत तबल करना वह तुझे देगा। ज्योंही नींद से उठा शहर से बाहर निकला , सबसे पहले उसे एक बूढ़ा आबिद व ज़ाहिल मिला , जिसके कंधे पर ईंधन का गट्ठा था और वह अपने अहलो अयाल के लिए बेचना चाहता था। बस श्रम की वजह से सवाल न किया और वापस हरमे मुतहर में आ गया यही वाक़या दूसरी रात दरपेश आया और सुबह फ़िर वही बूढ़ा जाहिद मिला औऱ बग़ैर सवाल के वापस आ गया फ़िर तीसरी रात वही ख़्वाब देखा। सुबह वही बुजुर्ग मिला। उसको अपने हालात से आगाह किया और अमानत का मुतालबा किया। उस बुजुर्ग ने कुछ सोचने के बाद शाहज़ादे से कहा कि जुहर की नमाज़ के बाद अत्तार की दुकान पर आना तुझे अमानत दूंगा जुहर के वक़्त जब तमाम लोग जमा थे। उस बुजुर्ग आबिद ने अत्तार से कहा आज मुझे नसीहत करने का मौक़ा दो। उसने कुबूल किया , उस बुजूर्ग ने कहा-

ऐ लोगो! मैं फ़लां (अमुक) का बेटा फ़लां हूं और लोगों के अधिकारों (हक़) से सख़्त भयभीत हूँ। खुदा का शुक्र है कि दुनिया के माल की दोस्ती मेरे दिल में नहीं है और अहले क़नाअत हूँ और एकान्त के दिन काट रहा हूं और जो वाक़या मेरे साथ पेश आया , उसके बारे में तुम्हें बा ख़बर करना चाहता हूँ और तुम्हें अज़ाबे इलाही की सख़्ती और जहन्नुम से ड़राना चाहता हूं और रोज़े जज़ा की बाज़ गुजारशात तुम तक पहुंचाना चाहता हूँ। ध्यान से सुनो! मैं एक रोज़ क़र्ज़ का मोहताज हुआ और एक यहूदी से दस क़रान क़र्ज इस शर्त पर लिया कि हर रोज़ आधा करान उसे वापस कर दूंगा। बस दस दिन उसससे आधा क़रान वापस देता रहा , मगर उसके बाद वह मुझे नज़र न आया। उसके बारे में लोगों से पूछ़ा , उन्होंने कहा कि वववह बग़दाद चला गया है। मुझे और दूसरे लोगों को मौक़िफे हिसाब पर लाया गाय। मैं हिसाब से फ़ारिग़ होकर जन्नतियों के सससाथ जन्नत की तरफ़ चलने लगा , ज्यों ही पुले सरात पर पहुंचा जहन्नुम की आवाज़ सुनी बस उस यहूदी मर्द को देखा कि आग के शोले की तरह जहन्नुम से बाहर निकला और मेरे रास्ते में हायल हो गया और कहा मुझे पांच क़रान दो। उसके सामने अर्ज़ किया और कहा कि मैंने तुझे बहुत तलाश किया कि तुझे वापस देता , उसने कहा कि मैं तुझे उस वक़्त तक नहीं जाने दूंगा। जब तक तू मेरा मुतालबा पूरा न करेगा। मैंने कहा इस वक़्त मेरे पास तो हैं नहीं कि तुझे दूं। उसने कहा मुझे एक अंगुल अपने जिस्म में गाड़ने दो फिर गुज़र जाना। बस उसने अपनी एक अंगुश्त मेरे सीने में गाड़ दी और मैं उसकी सोज़िश (गर्मी) की वजह से फ़रियाद करता हुआ बेदार हुआ। देखा कि जिस जगह उसने उंगली गाड़ी थी , ज़ख़्म है और अब तक मजरुह (ज़ख़्मी) हूं जो दवाई भी करता हूं कारगर नहीं होती और उसने अपने सीने को खोलकर ज़ख़्म दिखलाया। जब लोगों ने देखा आह , फ़रियाद करने लगे और वह अत्तार अज़ाबे इलाही की सख़्ती से डरा और उस हिन्दी शहज़ादे को घर ले जाकर उसकी अमानत उसे वापस की और माफ़ी मांगी। (मआद)।

बदने जिस्मानी में रुह (आत्मा) की तासीर और क़ब्र के साथ तआल्लुक़

आलमें बरज़ख़ में रुह (आत्मा) या तो न्यामतों से बहरामन्द होती हैं या गुनाहों (पापों) की सज़ा के तौर पर अज़ाब में मुबतिला होती है , लेकिन मुमकिन है कि ताक़त रुह के वास्ते बदने ख़ाक़ी भी मुस्तासीर (प्रभावित) हो और वह भी अज़ाब की वजह से ख़ाकस्तर हो जाय या न्यामतों से बहरामन्द हो और मोअत्तर (सुगन्धित) देखा जाय और उन लोगों का यह कहना बेजा है कि मोमनीन की कब्र की ज़ियारत की क्या ज़रुरत है ? जबकि उनकी अरवाह (आत्माएं) क़ालिबे मिसाली में वादी अलसलाम में हैं जैसा कि मोहद्दिसे जज़ायरी ने अनवारे नामानिया के अबाख़िर (अंत) में नक़ल किया है , इसका जवाब यह है कि इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से रवायत (कथन) है कि बेशक अरवाह (आत्माए) वादी अलसलाम में हैं , लेकिन महले कुबूर के लिए उनके अरवाह (आत्माएं) अहातए इल्मियां रखते हैं , वह क़ब्र के ज़ायर (ज़ियारत करने वाले) को देखते हैं , जो कोई भी वहां आता है औऱ इमाम (अ 0 स 0) ने अरवाह को आफ़ताब (सूरज) के साथ तश्बीह (दी) कि आफ़ताब ज़मीन पर नहीं है और वह आसमान में है , लेकिन उसकी शोआएं (किरणें) जमीन की हर जगह का अहाता किए हुए होती हैं। इसी तरह अरवाह का अहाता इल्मिया है और महल क़बूर से ताअल्लुक़ है , जैसा कि जनाबे हुर बिने यज़ीद रियाही का वाक़या है। अनवारे नामानिया में मोहद्दिसे जज़ायरी तहरीर फ़रमाते हैं कि जिस वक़्त शाह इस्माइल सफ़वी कर्बला में वारिद हुआ , उसने कुछ लोगों से हुर के बारे में तान व तश्नीअ के अलफ़ाज़ सुने जो हुर को अच्छा नहीं समझते थे। उसने हुर की क़ब्र को खोदने का हुक्म दिया , उसने देखा तो हुर का बदन उसी तरह पड़ा है जैसा रखा गया था और कोई तब्दीली नही हुई और उस के सिर पर रुमाल बंधा हुआ है , जैसा कि तारीख़ में है कि रोज़े आशूरा सय्युश्शोहदा ने अपना रुमाल उसके ज़ख़्म पर बांधा था शाह ने खोलने का हुक्म दिया ताकि उसको अपने क़फन मे रखे ज्यों ही जुदा (अलग) किया गया ज़ख़्म से ख़ून बहने लगा , फ़िर ज़ख़म पर रुमाल बांधा तो ख़ून बन्द हो गया। शाह ने हुक्म दिया कि इसके बजाए दूसरा रुमाल बांध दो , जब ऐसा किया गया तो फ़िर भी ख़ून न रुका , बस नाचार उसी रुमाल को बांधा गया और बादशाह को उसके हुस्ने आक़बत पर यक़ीन हुआ , इसके बाद शाह नो रौज़ा तामीर करवाया और वहां ख़ादिम मुक़र्रर किया।

इसी तरह कुलैनी (र 0) की क़ब्र और इब्ने बाबूया और शेख़ सद्दूक़ के अबदान भी अपनी क़ब्रों में मोअत्तर (सुगंधित) पड़े हुए सही व सालिम देखे गए जैसे सो रहे हैं , यहां तक कि सद्दूक़ के नाख़ूनों पर उसी तरह मेंहदी के निशान मौजूद थे और उनके अबदान में ज़िन्दगी के आसार नज़र आते थे।

इस के विपरीत अगर कोई शख़्स अहले अज़ाब में से है , तो रुह के अज़ाब का असर (प्रभाव) उसके जिस्म पर क़बार में भी पाया जाता है , चुनांचे जिस वक़्त बनी अब्बास को बनी उमैया पर ग़लबा (आधिपत्य) हासिल हुआ और वह वारिदे दमिश्क हुए तो उन्होंने बनी उमैया की कुबूर को ख़बराब करना चाहा , ज्योंही यज़ीद मलून की क़ब्र को ख़ोदा तो उसमें सिर्फ़ एक मिट्टी की लकीर के और कोई चीज़ नज़र न आयी। कुम में एक शख़्स को क़ब्रिस्तान में दफ़न किया गया तो उसके क़ब्र से आग का शोला निकला , जिसने आस पास की तममा चीज़ों को जला कर राख कर दिया। इसी तरह पाकिस्तान में भी कई वाक़यात अक़बारात में प्रकाशित हुए हैं।

वादी उस्सलाम

मुमकिन है कुछ लोग के ज़ेहनों में यह सवाल पैदा हो कि इतना लम्बा चौड़ा आलमे बरज़ख़ कहां वाक़ेय है ? हमारी अक़्ल इसके समझने से विवश है। अलबत्ता रवायात में कुछ उदाहरणों का वर्णन मौजूद है , कि आ्रलमे बरज़ख़ उस आलमे ज़मीन व आसमान को मुहीत है , जैसा कि यह आलमें रहमे मादर को मुहीत है इससे ज़्यादा स्पष्ट उदाहरण से ताबीर करना मुश्किल है। अगर बच्चे मां के पेट में कहा जाय कि इस आलम के बाहर एक ऐसा आलम है कि शिकमें मादर की उसके सामने कोई वक़अत नहीं तो इसके लिए खोज करना मुश्किल है। इसी तरह हमारी महसूसात की खोज करने वाली अक़लें बरज़ख़ का इदराक (खोज) नहीं कर सकती , जैसा कि कुर्आन पाक में है-

“ कोई शख़्स सादिक़ ने हमें जो कुछ बताया है , उसकी तसदीक़ करना हम पर वाजिब है। ”

बस मुख़बिर सादिक़ ने हमें जो कुछ बताया है , उसकी तसदीक़ करना हम पर वाजिब है।

अहादीस में मौजूद है कि मशरिक़ म मग़रिब में जो मोमिन भी मरता है , उसकी रुह जिस्म मिसाली के साथ अमीरूल मोमनीन (अ 0 स 0) के करीब वादी उलसलाम में पहुंच जाती है। एक और जगह मरज़मीने नजफ़ अशरफ़ को मलकूते अलिया की नुमाइशगाह कहा गया है अगर रुह का ताअल्लुक़ आला इल्लीईन के साथ है और उसका जिस्म भी नजफ़ में दफ़न है तो वह ज्यादा सआदत का हामिल है , लेकिन अगर खुदा न करे किसी शख़्स का जिस्म नजफ़ में दफ़न किया जाए और उसकी रुह वादिए बरहूत में मुबतिलाए अज़ाब है तो उसकी रुह जिस्म के साथ इतसाल को मज़बूत करती है और वादी अलसलाम में उसका दफ़न बे असर नहीं होता , जैसा कि इसी किताब में बाज़ हिकायात से वाज़ेह (प्रकट) है। (मआद)

वादिए बरहूत

वादिए बरहूत वह बियाबान और खुश्क सहरा है जहां आबेदाना का नामोनिशान तक नहीं है। परिन्दे (पक्शी) भी ख़ौफ़ (भय) के मारे नहीं गुज़रते। यह वादी बरज़ख़ी अज़ाब का मज़हर है , जहां तक क़सीफ़ और ख़बीस अरवाह (आत्माएं) मुबतिलाए अज़ाब हैं और यह यमन में वाक़ेय है , मतलब को ज़ाहिर करने के लिये एक हदीस को नक़्ल करता हूं-

एक रोज़ एक आदमी मजलिसे ख़ातिमुल अम्बिया (अ 0 स 0) में आया जिसके चेहरे से वहशत के आसार ज़ाहिर थे , उसने अर्ज़ किया कि आक़ा! मैंने अजीब चीज़ देखी है , आप ने पूछा क्या देखा ? उसने बतलाया कि उशकी बीवी सख़्त मरीज़ा (रोगी) थी , उसने कहा , कि वादिए बरहूत के कुंए से अगर पानी लाए तो मैं ठीक हो जाऊंगी। (मादनी पानी से बाज़ जिल्दी अमराज़ का इलाज होता है)। बस मैंने मश्क और प्याला लिया ताकि पानी लाऊँ और रवाना हुआ। मैं वहशतनाक सहरा को देखकर बहुत डरा और उस वादी में कुए की तलाश करने लगा। अचानक ऊपर की तरफ़ से ज़ंजीर की आवाज़ सुनी औऱ नीचे आते हुए एक शख़्स को देखा , जिसने मुझसे कहा कि मुझे पानी दो , मैं प्यास से हलाक हो रहा हूं। जब मैंने पानी का प्याला देने के लिए सिर को ऊँचा किया , देखा की एक शख़्स के गले में ज़ंजीर है जब पानी का प्याला बढ़ाया तो उसको ऊपर खींच लिया गया , यहां तक कि वह क़्रसे आफ़ताब (सूरज) तक पहुंच गया। मैंने मश्क को पानी से भरना शुरू किया तो फ़िर उस शख़्स को आते देखा और उसने वही ख़्वाहिश (इच्छा) ज़ाहिर की , जब पानी देने लगा तो पहले की तरह ऊपर खींच लिया गया। इसी तरह तीन बार हुआ। मैंने मश्क का तसमा बांधा और तीसरी बार उसे पानी न दिया। मैं डरता हुआ आपकी ख़िदमत में हाज़िर हुआ ताकि मालूम करुं कि वह क्या मामला था। रसूले ख़ुदा (स 0 अ 0) ने फ़रमाया कि वह बदबख़्त क़ाबील है , जिसने अपने भाई हाबील को क़त्ल किया था। क़यामत तक इसी जगह इसी अज़ाब में मुबतिला रहेगा। यहां तक कि आख़िरत में जहन्नुम के सख़्त अज़ाब में मुबतिला होगा।

किताब नूरूल अबसार में सैयद मोमिन शबलंजी शाफ़ई अबुल कासिम बिने मोहम्मद से रवायत (वर्णन) करते हैं , उन्होंने कहा कि मैंने मसजिदुलहराम में मुक़ामे इब्राहिम के पास कुछ लोगों को जमा देखा और वजह पूछा , उन्होंने कहा कि एक राहिब मुसलमान हुआ है , और उसने मक्का में आकर अजीब वाक़या सुनाया है। मैं उसके पास गया तो देखा , एक बूढा हट्टा-कट्टा , पशमीना का लिबास पहने बैठा है और कह रहा है कि मैं एक रोज़ दरिया के किनारे अपने इबादत ख़ाने में बैठकर दरिया का नज़ारा कर रहा था कि मैंने गिदह की शक्ल एक बहुत बड़ा परिन्दा (पक्शी) देखा , जो एक पत्थर पर आकर बैठ गया और उसने इन्सानी बदन का चौथाई हिस्सा उगला , इसी तरह चार बार अज़ाए (अंग) इन्सानी को उगला , वह आदमी उठ कर पूरा मर्द बन गया , मैं यह देखकर सख़्त हैरान हुआ। फ़िर देखा कि वही परिन्दा आया और मर्द का चौथाई हिस्सा बग़ैर चबाए निगल गया और उड़ गया और उसी तरह चार बार किया , वापस आकर निगला और उड़ गया। मेरे ताअज्जुब की हद हो गया कि यह क्या मामला है ? और यह मर्द कौन है ? और उस पर अफ़सोस करने लगा कि काश! मैंने इससे पूछ लिया होता। फिर दूसरे रोज़ इसी तरह उस परिन्दे को देखा कि उसने एक पत्थर पर आकर एक चौधाई आदमी उगला और इसी तरह चार बार किया औऱ वह उठा औऱ पूरा आदमी बन गया। मैं अपने इबादतख़ाने से निकला औऱ उसके पास पहुंचकर पूछा कि तुझे उस ज़ात की क़सम जिसने तुझे पैदा किया तै बता कि तू कौन है ? उसने कहा मैं इब्ने मुलजिम हूं। मैंने पूछा कि तेरा क़िस्सा क्या है ? उसने कहा की मैंने अली बिने अबू तालिम (अ 0 स 0) को शहीद किया था। अल्लाहतआला ने इस परिन्दे को मेरा गुमाश्ता क़रार दिया है कि वह हर रोज़ मुझे इसी कि़स्म का अज़ाब दे , जैसा कि तूने देखा। बस मैं इबादतख़ाना से बाहर निकला और पूछा कि अली बिने अबू तालिम (अ 0 स 0) कौन हैं ? लोगों ने कहा मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के चचा ज़ाद भाई और उनके वसी हैं। बस मैंने इस्लाम कुबूल किया और हज और ज़ियारत क़ब्रे रसूले खुदा (स 0 अ 0) से मुर्शरफ़ हुआ। (मआद)।


बरज़ख़ वालों के लिए मुफ़ीद (लाभदायक) आमाल

कुतुब रावन्दी ने लब लबाब से नक्ल किया है कि एक ख़बर मैं हे कि माह रमज़ान की हर शबे जमा को मुर्दे अपने घरों के दरवाज़ों पर आकर फ़रियाद करते हैं और रोते हैं कि ऐ मेरे अहलो अयाल! ऐ मेरे रिश्तेदारों! मुझ़ पर ऐसी चीज़ों के ज़रिए मेहरबानी करो जिसके ज़रिए ख़ुदा तुम पर रहमत करे। हमें अपने दिल में जगह दो और भुलाने की कोशिश न करो। हम पर और हमारी बेक़सी पर रहम करो , यह सही है कि हम इस क़ैद में बड़ी सख़्ती , तंगी , आहोज़ारी और गमीं में मुबतिला हैं हम पर रहम करो और हमारे लिए दुआ और सदक़ा में बख़ल (कंजूसी) न करो , शायद ख़ुदा हम पर रहम करे , इससे पहले कि तुम भी हम जैसे हो जाओ , हाय अफसोस कभी हम भी तु्म्हारी तरह ताक़तवर हुआ करते थे। ऐ खुदा के बन्दों! हमारी बातें सुनों। और इन्हें मत भुलाओ। इसमें शक नहीं कि यह अज़ीम सरमाया , जिस पर तुम क़ाबिज़ हो , कभी हमारे तसर्रुफ में था। हमने उसको राहे खुदा में सर्फ़ न किया और लोगों का हक़ ग़सब करते रहे , जो हमारे बवाल की वजह बना और दूसरों के लिए फ़ायदेमन्द। हम पर एक दरहम नग़दी या रोटी या किसी चीड़ के टुकड़े से मेहरबानी करो। हम फ़रियाद करते हैं कि जल्दी ही तुम अपने नफूस पर गिरिया करोगे औऱ उस वक़्त का गिरिया कुछ फ़ायदा न देगा , जैसा कि हम रोये , मगर बे फ़ायदा। इसलिए हम जैसा होने से पहले कोशिश करो।

जामा अल अख़बार में मनकूल (उद्धृत) है कि एक सहाबी ने हज़रत रसूले अकरम (स 0 अ 0) से नक़ल किया कि आप ने फ़रमाया अपने मुर्दों को हदिया पहुँचाओ। मैंने पूछा मुर्दों के लिए हदिया क्या है ? आपने फ़रमाया सदक़ा औऱ दुआ और फ़रमाया मोमिन की रूहें हर जुमा को आसमाने दुनियां से अपने मकानों के सामने आकर फ़रियाद करती हैं और हर एक गिरिया ज़ारी करते हुए कहता है , ऐ मेरे घऱ वालों! ऐ मेरे बच्चों! ऐ मेरे वालदैन! ऐ मेरे रिश्तेदारों! ख़ुदा तुम पर रहमत करे , मुझ पर मेहरबानी करो , जो कुछ हमारे हाथ में था , उसका हिसाब व अज़ाब हम पर है और नफ़ा ग़ैरों के लिए। हर एक अपने अज़ीज़ों से फ़रियाद करता है कि मुझ पर एक दरहम या एक रोटी या कपड़े के ज़रिए मेहरबानी करो ताकि ख़ुदा तुम्हें बेहश्त का लिबास अता करे। बस रसूले ख़ुदा (स 0 अ 0) रो पड़े और हम भी रोने लगे। आं हज़रत (स 0 अ 0) में ज़्यादा रोने की वजह से ताक़त न रही। फ़िर फ़रमाया॰ यह तु्म्हारे दीनी भाई हैं। ऐशो इश्रत की ज़िन्दगी के बाद मिट्टी के ढेर तले दबे पड़े हैं। वह अपने नफूस पर अज़ाब व हलाकत की वजह से निदा (आवाज़) करते हैं और कहते हैं , काश! हम अपनी पूंजी अताअते ख़ुदा और उसकी रज़ामन्दी में ख़र्च करते तो आज तुम्हारे मोहताज न होते। आज हसरत व पशेमानी के साथ हम फ़रियाद कर रहे हैं कि जल्दी अपने मुर्दों को सदक़ा पहुँचाओ। इसी किताब में आं हज़रत (स 0 अ 0) से मर्वी है कि जो सदक़ा भी मय्यत के लिए दिया जाता है , उसे फ़रिश्ता एक नूरानी तबक़ में , जिसकी रोशनी सातों आसमानों को मुनव्वर करती है , लेकर उसकी क़ब्र के किनारे खड़े होकर अवाज़ देता है , अस्सलाम अलैकुम या अहलल कबूरे , ये हदिया तुम्हारे अहले ख़ाना ने तुम्हारी तरफ़ भेजा है। मय्यत उसको लेकर अपनी क़ब्र में दाख़िल करता है , और उसके ज़रिए उसकी क़ब्र फ़राक़ हो जाती है। आप (स 0 अ 0) ने फ़रमाया जो शख़्स सदक़ा के ज़रिए अपने मुर्दों पर मेहरबानी करता है , उसके लिए अल्लाहतआला के नज़दीक औहद पहाड़ के बराबर अज्र (सवाब) है और रोज़े क़यामत वह अर्श के साया में होगा , जबकि इसके अलावा और कोई साया न होगा और इस सदक़ा के ज़रिए ज़िन्दा और मुर्दा दोनों नजात हासिल करते हैं।

अल्लामा मजलिसी ज़ाद अलमआद में तहरीर फ़रमाते हैं कि अपने मुर्दों को फ़रामोश न करो , क्योंकि उन के हाथ आमाले रालेह से कोताह हैं और वह अपनी औलाद भाईयों और रिश्तेदारों की तरपञ से उम्मीदवार होते हैं और उनके एहसान के मुन्तज़र (प्रतिक्शारत) होते हैं। विशेषतया नमाज़े शब की दुआ करते वक़्त वाल्दैन के लिए दूसरों से ज़्यादा दुआ करो और उनके लिए अमाले सालेह बजा लाओ। एक ख़बर में है कि कुछ ऐसी औलाद भी हैं , जिनो वाल्दैन ने ज़िन्दगी मे तो आक़ (त्याग) कर दिया था , लेकिन उनकी वफ़ात के बाद अपने वाल्दैन के लिए आमाले सालेह करने की वजह से नेक हो जाते हैं। वाल्दैन और रिश्तेदारों के लिए बेहतरीन नेकी यह है कि उनका कर्ज़ अदा करो और उनके हकूके अल्लाह से आज़ाद कराये। हज और बाक़ी तमाम इबादत जो उनसे ज़िन्दगी में फ़ौत हुए थे , तबरअन या बतौर इजारा अदा करने की कोशिश करे।

एक हदीसे मोतबरा में मनकूल है कि इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) हर शब को अपनी औलाद और हर दिन को अपने वाल्दैन के लिए दो रक़त नमाज़ पढ़ा करते थे , पहली रकत में सूरए हम्द के बाद इन्ना अनज़लनाह और दूसरी रकत में इनना आतैना कल कौसर और बसन्दे सहीह इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से मलकूल है कि कभी-कभी मय्यत तंगी और सख़्ती में मुबतिला होती है और हक़ तआला उसे वुसअत अता करता है और उसकी तंगी को दूर करता है और उसे कहा जाता है कि जो ख़ुसी तुझे दी गयी है यह उस नमाज़ के बदले में है , जो तेर फ़लां (अमुक) मोमिन भाई ने तेरे लिए पढ़ी है। रावी ने पूछा क्या दो रकत में दो मुर्दों को शरीक किया जा सकता है ? आपने फ़रमाया हां। मय्यत इस दुआ व अस्तग़फार से खुश होता है जो उसके पास पहुंचती है और फ़रमाया , मय्यत के लिए नमाज़ , रोज़ा , हज और सदक़ा और बाक़ी तमाम आमाले सालेह और उनका सवाब जो मय्यत के लिए किए जाते हैं उसकी क़ब्र में दाख़िल होते हैं और दोनों के नामए आमाल में दर्ज होते हैं। एक और हदीस में फ़रमााय कि जो शख़्स मय्यत के लिए आमाले सालेह बजा लाता है तो हक़ ताला उसे दुगना करता है और मय्यत उससे फ़ायदा उठाती है।

मर्वी है जब कोई शख़्स मय्यत के लिए सदक़ा देता है तो हक़ तआला जिबरईल को हुकम देता है कि सत्तर हज़ार फ़रिश्तों को साथ लेकर इश क़ब्र पर जाओ। उनमें से हर एक फ़रिश्ता न्यामते खुदावन्दी से पुर (भरा हुआ) एक-एक तबक़ा उठा कर आता है और कहता है , ऐ वली अल्लाह तुम पर सलाम हो यह फ़लां (अमुक) मोमिन ने तेरी तरफ़ हदिया भेजा है , जिसकी वजह से उसकी क़ब्र मुनव्वर (प्रकाशित) हो जाती है और हक़ तआला उसे हज़ार शहर बेहश्त में अता फ़रमाता है और हुराने जन्नत से उसका अक़्द करता है और उसे हज़ार हुल्ले अता फ़रमाता है और उसकी एक हज़ार हाजात पूरी करता है।

मैं इस जगह कुछ सच्चे ख़्वाबों का ज़िक्र ज़रुरी समझता हूं ऐसा न हो कि तुम इन को शैतानी ख़्वाब या अफ़साना समझ कर तवज्जोह के क़ाबिल न समझो , बल्कि उन पर ग़ौर व फ़िक्र करो , क्योंकि उन पर ग़ौर करने से होश उड़ जाते हैं और नींद हराम हो जाती है।

फ़साना हा हमा ख़्वाब आवर्द फ़साना मन!

ज़हीशम ख़्वाब रबा या फ़साना अजबी अस्त!

“ तमाम अफ़साने ख़्वाब आवर होते हैं , लेकिन मेरी कहानी ऐसी अजीब है , जिसके सुनने से नींद उचाट हो जाती है। ”

हिकायत

मेरे उस्ताद सिक़ातुल इस्लाम अल्लामा नूरी इत्तरउल्लाह मरक़दह दारुल इसलाम में नक़ल फ़रमाते हैं कि मुझसे अल्लामा सैयद अली बिने फ़क़ीह नबील सैयद हसन अल हुसैनी अल असफ़हानी (र 0) ने ब्यान किया , उन्होंने फ़रमाया जब मेरे वालिद ने वफ़ात पायी , मैं उस वक़्त नजफ़े अशरफ़ में मुक़ीम था और इल्म हासिल करने में मशगूल था। मरहूम के काम मेरे भाइयों के ज़िम्मे थे , जिन की तफ़सील का मुझे इल्म न था। जब इन बुर्जुगवार के इन्तिक़ाल को सात महीने गुज़र गए तो मेरी वालिदा का भी इन्तिक़ाल हो गया। मरहूमा को नजफ़ लाकर दफ़न किया गया। एख दिन मैंने ख़्वाब में देखा जैसे मैं एक कमरा में बैठा हूं अचानक मेरे वालिद मरहूम तशरीफ़ लाए हैं , ताज़ीम की ख़ातिर उठा और उन्हें सलाम किया और वह मजलिस के दरमियान बैठ गए और मेरे सवालात पर तवज्जोह फ़रमायी , मुझे उस वक़्त मालूम हुआ कि वह मुर्दा है। मैंने उनसे मालूम किया क्या आप असफ़हान में फ़ौत हुए थे। मैं आपकों यहां कैसे देख रहा हूँ। आप ने फ़रमाया हां लेकिन मुझे वफ़ात के बाद नजफ़ अशरफ़ में जगह दी गयी है , अब मेरा मकान नजफ़ में है , मैंने पूछा क्या मेरी वालिदा मरहूमा भी आपके पास हैं , उन्होंने फ़रमाया नहीं। मैं उनके नफ़ीमें जवाब देने से खौ़फ़ज़दा हुआ , फिर उन्होंने फरमाया , वह भी नजफ़ में है , लेकिन उनका मकान और है। उस वक़्त मैं समझ गया कि मेरे वालिद आलिम थे और आलिम का मुक़ाम जाहिल के मुक़ाम से बलन्द होता है फ़िर मैंने उनके हालात के बारे में पूछा तो उन्होंने फ़रमाया मैं सख़्ती और मुसीबत में रहा हूं। अलहम्दो लिल्लाह अब मेरा हाल अच्छा है , और उस तंगी और सख़्ती से नजात मिल गयी है। मैंने तअज्जुब से पूछा , क्या आप भी तंगी और सख़्ती में रहे। फ़रमाया हां। हाजी रज़ा मशहूर नालबन्द , जो आक़ा बाबा के लड़के थे का मेरे ज़िम्मे कुछ हिसाब था , उसी के मुतालिबे से मेरा बुरा हाल हुआ। मैं सख्त मुताअजुब हुआ और इसी ताअज्जुब और ख़ौफ़ ने मुझे बेदार कर दिया। मैंने अपने भाई को इस अजीबो-ग़रीब ख्वाब से आगाह किया जो मरहूम का वसी था और उससे दरख़्वास्त की कि वह मुझे तहरीर करे कि क्या हाजी रज़ा मज़कूर का वालिद मरहूम से कुछ मुतालिबा था या नहीं। मेरे भाई ने मुझे तहरीर किया कि मैंने क़र्ज़ख़्वाहों के तमाम रजिस्टरों में तलाश किया , मगर आदमी का नाम नहीं मिला। मैंने दोबारा तहरीर किया कि उस आदमी से पूछो। मेरे भाई ने फ़िर जवाब तहरीर किया कि मैंने उससे पूछा था , उसने कहा कि मुझको उन से अट्ठारह तूमान लेने थे , जिनका सिवाय खुदा के मेरा और कोई गवाह न था। मरहूम की वफ़ात के बाद मैंने तुम से पूछा कि क्या मेरा नाम भी क़र्ज़ख्वाहों में है , तुमने कहा नहीं। मैने सोचा अगर मैं क़र्ज़ तलब करुं , तो मेरे पास साबित करने के लिए कोई तर्क और दलील नही है और मुझे मरहूम पर भरोसा था कि वह अपने रजि़स्टर में दर्ज कर लेंगे मैं समझ गया कि उनसे तसाहुल हो गया और वह भूल गए। बस मैंने वसूलीए क़र्ज़ से मायूस होकर इजहार न किया। जब मैंने आप का पूरा ख़्वाब उनसे ब्यान किया और उन का क़र्ज़ चुकाने की ख़्वाहिश की तो उन्होंने जवाब दिया कि हम उनको बरीउज़्ज़िमा कर चुके हैं , जबकि आपने मुझे क़र्ज़ से लाइल्मी का इज़हार किया था।

हिकायत

सकतुल इस्लाम नूरी नूरउल्ला मरक़दह हाजी मुल्ला अबुल हसन माज़न्दरानी से दारुल इस्लाम में नक़ल करते हैं कि मुल्ला जाफ़र इब्ने आलिम सालेह मुहम्मद हुसैन तबरसानी जो तेलक नामी बस्ती के रहने वाले थे , मेरी उनसे दोस्ती थी जब विकट ताउन का रोग फ़ैला , जिसने तमाम इलाक़ा को अपनी लपेट में ले लिया तो इत्तेफाक़ ऐसे हुआ कि लोगों की एक बहुत बड़ी संख्या फ़ौत हो गयी , जिन्होंने आपको वसी बनाया था और उनकी वसीयत के मुताबिक उनके माल को जमा कर लिया था , लेकिन वह अमवाल अभी अपने मसरफ़ पर ख़र्च न हुए थे कि वह भी ताऊन से हलाक हो गए और वह अमवाल बरबाद हो गए औऱ सही मसरफ़ पर ख़र्च न हुए। जब अल्लाहतआला के फ़ज़लोकरम से मैं हज़रत अबू अब्दुल्लाह अल हुसैन की क़ब्र की ज़ियारत से मुर्शरफ़ हुआ तो करबलाए मोअल्ला में मैंने एक रात ख़्वाब में देखा कि एख आदमी की गर्दन में जंज़ीर है , जिससे आग के शोले निकल रहे हैं और जिसको दोनों तरफ़ से दो आदमी पकड़े हुए हैं , ज़ंजीर वाले आदमी की ज़बान इतनी लम्बी हो चुकी है कि उसके सीने तक लटक आयी है , जब उसने मुझे देखा तो वह मेरे नज़दीक आया। मैंने देखा तो वह मेरा दोस्त मुल्ला जाफ़र था। मैंने उसके हाल पर आश्चर्य किया , उसने मेरे साथ बात करना चाही और फ़रियाद करना चाही इन दो लोगों ने ज़ंजीर को खींचा और पीछे हटा लिया। मैंने इसके हाल को तीन बार देखा और डर के मारे चीख़ निकली और जाग गया। मेरी इस चीख़ को सुनकर मेरे नज़दीक सोया हुआ एक आलिम भी जाग पड़ा। मैंने ख़्वाब के वाक़िया को उसके सामने ब्यान किया और इत्तेफ़ाकन वह वक़्त कि जब मैं जगा सहेन और हरम शरीफ़ के दरवाज़े खुलने का वक़्त था। मैंने अपने दोस्त से कहा कि बेहतर है कि हरम शरीफ़ में जाकर ज़ियारत करें और मुल्ला जाफ़र के लिए इस्तेग़फार करें। शायद अल्लाहतआला उस पर रहम करे अगर यह ख़्वाब रुयाए सादिक़ा में से है , फ़िर हम हरम शरीफ़ में दाख़िल हुए और अपने इरादे के मुताबिक़ अमल किया और उसे तक़रीबन बीस साल गुज़र चुके। मगर मुल्ला जाफ़र के बारे में कुछ ख़बर नही है , और मेरा शक यह है कि उस पर यह अज़ाब लोगों के अमवाल की तक़सीर की वजह से है। अल्लाहतआला ने मुझे अपने फज़लो करम से ख़ानए काबा की ज़ियारत और हज से फ़ारिग़ किया और मैं मदीना की तरफ़ वापस हुआ और मुझे इसी दौरान इस क़द्र रज़ा (रोग) हुआ कि मै चलने फ़िरने से मजबूर हो गया। मैंने अपने साथियों से इलतिजा किया कि मुझे गुस्ल दे कर लिबास तबदील करें और कंधों का सहारा देकर रसूले अकरम (स 0 अ 0) के रौज़ए मुबारका में ले जाएं। मेरे मरने से पहले मेरे दोस्तों ने मेरे कहने के मुताबिक़़ अमल किया जब मैं रोज़ए मुतहर में दाख़िल हुआ तो बेहोश हो गया। मेरे साथी मुझे छोड़कर अपने कामों में लग गए और जब मुझे होश आया तो मुझे कंधों पर उठाकर ज़रीह मुक़द्दस के पास ले गये। मैंने ज़ियारत की , फ़िर वह मुझे रौज़ा के अक़ब (पीछे) जनाबे सैय्यदा के मकान तक ले गए जो जनाबे सैय्यदा की ज़ियारतगाह है। मैं वहां बैठ गया औऱ ज़ियारत करने के बाद अपनी शिफ़ा के लिए दुआ की औऱ जनाबे सैय्यदा से मुख़ातिब होकर अर्ज़ की कि हम तक ऐसी रवायत पहुंची है , जिन से ज़ाहिर होता है कि आपको अपने फ़रज़न्द हज़रत इमाम हुसैन (अ 0 स 0) से ज़्यादा मुहब्बत है और मैं उनकी क़ब्र का मुजाविर हूं आप उनके वास्ते से ख़ुदा तआला से मेरे लिए शिफ़ाअत तलब करें फ़िर रसूले अकरम (स 0 अ 0) की ओर मुतवज्जेह हुआ और अपने हाजात तलब की और अपने तमाम मुर्दा दोस्तों के लिए आं हज़रत से शिफ़ाअत की इलतिजा की और हर एक का नाम लेकर दुआ की। यहां तक कि मुल्ला जाफ़र के नाम तक पहुंचा , उस वक़्त मुछे पुराना ख़्वाब याद आया। मैं बेहाल हो गया और मैंने ग़िडग़िडा कर उसके लिए मग़फ़िरत और शफ़ाअत की दुआ मांगी औऱ अर्ज़ किया कि मैंने मुल्ला जाफ़र को अबसे बीस साल पहले बुरे हाल में देखा था , मैं अपने ख़्वाब के सच्चा औऱ शैतानी होने के बारे में कुछ नहीं समझता। बहरहाल जहां तक मुमकिन था मैंने खुजू व ख़ुशू (विनय एंव नम्रता) के साथ उसके हक़ में बख़शिश की दुआ की। मैंने अपनी बीमारी में कमी महसूस की। उठा और बग़ैर दोस्तों के सहारे के मुक़ाम पर आया और मेरा मर्ज़ (रोग) जनाबे सैय्यदा की बरकत से दूर हो गया।

जब हम मदीना से चले तो ओहद के मुक़ाम पर ठहरने का इरादा किया। जब हम वहां पहुंचे तो वहाम पर शोहदाए ओहद की ज़ियारत की। वहां पर ख़्वाब में मैंने अपने दोस्त मुल्ला जाफ़र को देखा वह सफ़ेद लिबास में मलबूस सिर पर मोअत्तर (सुगंधित) दसतार सजाए हाथ में असा लिए मेरी तरफ़ बढ़े मुझे सलाम किया और कहा , “ मरहबा बाला ख़ोवतह वल सिदाक़ता ” दोस्त को दोस्त के साथ ऐसी ही अच्छा सुलूक करना चाहिए , जैसा तुमने मेरे साथ किया है। मैं उस वक़्त बड़ी तंगी और मुसीबत में था। तू अभी रौज़ए मुतहर से बाहर नहीं निकला था कि उन्होंने मुझे रिहा कर दिया। अभी दो या तीन रोज़ हुए कि मुझे हम्माम में भेजकर कसाफ़त (गन्दगी) को दूर किया और रसूले अकरम (स 0 अ 0) ने मेरे लिए यह लिबास भेजा और यह एबा जनाबे सैय्यदा ने अता फ़रमायी और अब बहम्दिल्लाह मेरा हाल बेहतर है और अब तेरी पेशवायी को अया हूं ताकि बशारत दूं। अब खुश हो कि तू तन्दुरुस्त होकर अपने ख़ानदान की तरफ़ जा रहा है और वह तमाम सलामती से है , इसी तरह अल्लाह का शुक्र अदा करते हुए मैं खुश व खुर्रम बेदार (जगा) हुआ।

शेख़ मरहूम फ़रमाते है कि अक़्लमन्द शख़्स के लिए बेहतर है कि वह इस ख़्वाब के हक़ायक़ में गौ़र व फ़िक़्र करे , क्योंकि यह उन चीज़ों में से है जो दिल की स्याही और आंखों की धूल को साफ़ कर देती है।

हिकायत

दारुस्सलाम में है , शेख अजल जनाब हाजी मुल्ला अली अपने वालिद माजिद जनाब हाजी मिर्ज़ा ख़लसील तेहरानी से नक़्ल करते हैं कि उन्होंने फ़रमाया कि मैं करबलाए मोअल्ला में था और मेरी वालिदा तेहरान में। मैंने एक रात ख़्वाब में देखा कि मेरी वालिदा ने मेरे पास आकर कहा बेटा! मैं मर चुकी हूं और मुझे तेरे पास लाया जा रहा है और मेरी नाक तोड़ दी गयी है। मैं डर कर ख़्वाब से जगा। इस वाक़्या के चन्द रोज़ बाद मुझे अपने भाई की तरफ़ से वालिदा की वफ़ात का ख़त मिला और उसमें तहरीर था कि आपकी वालिदा का जनाज़ा आपके पास भेज दिया है , जब जनाज़े वाले पहुंचे तो उन्होंने फ़रमाया कि तुम्हारी वालिदा का जनाज़ा कारवां सराय में ज़ूअल कफ़ल के नज़दीक छोड़ा है , क्योंकि हमारा अन्दाज़ था कि तुम नजफ़ अशरफ़ में होंगे। मैं ख़्वाब की सच्चाई को समझ गया , लेकिन मैं मरहूमा के इस बात पर हैरान था कि मेरी नाक तोड़ दी गयी है मैंने कफ़न को चेहरे से हटा कर देखा तो नाक टूटी हुई थीष मैंने उनसे इसकी वजह मालूम किया तो उन्होंने कहा कि हम इसके अलावा कोई वजह नहीं जानते कि हमने कारवां सराय में मरहूमा का जनाज़ा दूसरे जनाज़ों के आगे रख दिया , हम एक दूसरे से झगड़ पड़े। आपस के मार-पीट में जनाज़ा ज़मीन पर गिर पड़ा शायद उसी वक़्त मरहूमा को यह नुक़सान औऱ तकलीफ़ पहुंची। मैं अपनी वालिदा के जनाज़े को हज़रत अबुल फ़ज़लिल अब्बास (अ 0 स 0) के हरम में लाया और उनकी क़ब्र के बिलमुक़ाबिल रख दिया और आँ जनाब से मुख़ातिब होकर अर्ज़ किया कि ऐ अबुल फज़लिल अब्बास (अ 0 स 0) मेरी वालिदा नमाज़ रोज़ा को अच्छी तरह अदा करती थीं। अब आपके पास मौजूद हैं इनका अज़ाब और तकलीफ़ दूर फ़रमाएं। ऐ मेरे आक़ा! मैं आपके सामने उनकी पचास साला नमाज़ रोज़ा की ज़मानत देता हूं , फिर उनको दफ़न कर दिया औऱ उन के नमाज़ रोज़ा को अदा करना भूल गया।

कुछ अर्से के बाद मैंने ख़्वाब में देखा कि मेरे दरवाज़े के सामने बहुत शोरों गुल हो रहा है। बाहर निकल कर देखा तो मेरी वालिदा को एक दरख़्त के साथ बांधकर कोड़े लगाए जा रहे हैं। मैंने पूछा तुम इन्हें किस गुनाह के बदले में कोड़े लगा रहे हो। उन्होंने कहा हमें अबुल फज़लिल अब्बास (अ 0 स 0) ने इस काम पर मामूर किया है। यहां तक कि फ़लां रक़म अदा करें मैं क़मरे मैं दाख़िल हुआ और जिस क़द्र रक़म उन्होंने मांगी थी , उनको अदा कर दी और अपनी वालिदा को दरख़्त से आज़ाद कराया और मकान पर लाया और उनकी ख़िदमत में मशगूल हो गया। जब आंख खुली तो मैंने रक़म का हिसाब किया तो पता चला कि वह रक़म जो उन्होंने वसूल की थी पचास साल की इबादत के मुताबिक़ थी। मैंने इस रक़म को उठाया और सैय्यद अज़ल आका़ मीरज़ा सैय्यद अली रिज़वान उल्लाहे अलैहे साहबे किताब रियाज़ के पास लाया और अर्ज़ किया। यह रक़म पचास साल की इबादत की है , मेहरबानी करके यह हदिया मेरी वालिदा को पहुँचाएं।

हमारे उस्ताद साहबे दारुस्सलाम ने इस ख़्वाब के बारे में फ़रमाया है कि यह ख़्वाब उमूर और आक़बत के ख़तरात , अहदे खुदावन्दी में सुस्ती के अदम को ज़ाहिर करता है और अपने पसन्दीदा औलिया के मुक़ामात व मरातिब की बलन्दी पर दलालत करता है , जिसमें बसीरत की आंखों के साथ ग़ौरो फ़िक्र करने वाले पर कोई अम्र पोशीदा (छुपा) नहीं रहता।

हिकायत

यही बुजुर्गवार अपने वालिद सालेह से नक़्ल फ़रमाते हैं कि उन्होंने फरमाया कि तेहरान में एक हम्माम का ख़ादिम था , जिसे हम पादो कहा करते थे और वह नमाज़ , रोज़ा अदा नहीं करता था , एख दिन वह एक मेमार के पास गया और उससे कहा कि मेरे लिए एक हम्माम बना दो। मेमार ने कहा तू रक़म कहां से लाया है । पादो ने कहा तुझे इससे क्या गरज़ , तू रकम ले और हम्माम बना दे। इस मेमार ने उसके लिए हम्माम बनाया , जो उसके नाम से मशहूर हुआ और उसका नाम अली तालिब था। मरहूम हाजी मुल्ला ख़लील कहते हैं कि जब मैं नजफ़ अशरफ़ में था मैंने ख़्वाब में अली अली तालिब को वादी अलस्लाम में देखा। मैं हैरान हुआ और उससे पूछा कि तू इस मुक़ाम पर कैसे पहुंचा ज कि तू न नमाज़ पढ़ता था और न ही रोज़ा रखता था। उसने जवाब दिया ऐ फ़लां! जब मैं मरा तो मुझे तौक़ व ज़ंजीर में जकड़ दिया गया ताकि मुझे अज़ाब की तरफ़ ले जाया जाय कि हाजी मुल्ला मोहम्मद किरमान शाही ने ख़ुदा उनको जज़ाए खैर दे। फ़लां आदमी को मेरे लिए हज करने के लिए नायब मुक़र्रर किया और फ़लां को मेरे नमाज़ व रोज़ा का नायब मुक़र्रर किया और फ़लां-फलां को ज़कात और रद्दे मज़ालिम के लिए मुक़र्रर फ़रमाया और अब मेरे ज़िम्मे कोई चीज़ नहीं छोड़ी जो अदा न की हो और मुझे अज़ाब से नुजात दिलायी। खुदावन्द तआला उन्हें जज़ाए ख़ैर दे। मैं डर कर ख़्वाब से बेदार हुआ और हैरान था। कुछ अर्से के बाद एक जमात तेहरान से यहां पहुंची। मैंने उनसे अली तालिब का हाल किया , उन्होंने मुझे ऐसी ही ख़बर दी , जैसा मैने ख़्वाब में देखा था। यहां तक की हज व नमाज़ व रोज़ा के नायबीन के नाम इन नामों के मुताबिक़ थे जो मुझे ख़्वाब में बताए गये थे। अब यह बात छुपी नहीं रही कि यह ख़्वाब उन वारिशुदा अहादीस की तस्दीक़ करता है। जो नमाज़ , रोज़ा , हज औऱ बाक़ी सदक़ात के सवाब के मय्यत तक पहुंचने की दलालत करती हैं , क्योंकि मय्यत कभी तंगी और सख़्ती में मुबतिला होती है। मगर वह इन आमाल की वजह से जिनका सवाब उसे मिलता है। आराम व राहत पाता है , औऱ इस बात की भी तसदीक़ होती है कि कोई मोमिन (धर्मनिष्ठ) अगर मशरिक़ व मग़रिब में किसी जगह भी मेरे उसकी रुह (आत्मा) वादी अस्सलाम नजफ़ अशरफ़ में लायी जाती है और कुछ रवायात (कथन) में है कि यानी मैं उन्हें गिरोह दर गिरोह बातें करते देख रहा हूं। हाजी मुल्ला मोहम्मद किरमान शाही मज़कूर ओलमाए सालेहीन में से थे जो तेहरान में रहते थे।

हिकायत

आरिफ़ कामिल क़ाज़ी सईद कुम्मी (र 0) अरबैनात से नक़ल (उद्धृत) करते हैं कि मुझसे एक सक़्क़ा शख़्स ने ब्यान किया कि शेख़ बहाउद्दीन क़दस सरा एक दिन एक आरिफ़ से जो असफ़हान में एक मक़बरा के पास पनाह गुंजी था मिलने के लिए गया। उस आरिफ़ शख़्स ने कहा , मैंने आज से कुछ दिन पहले एक अजीबो ग़रीब मंजर (दृश्य) देखा औऱ वह यह कि कुछ लोग एख जनाज़ा को लाये और उसे फ़लां जगह दफ़न करके चले गए। थोड़ी देर के बाद ऐसी खुशबू पहुंची की इससे पहले ऐसी ख़ुशकुन खुशबू (सुगन्ध) न सूंघी थी। मैंने हैरान होकर दायें बायें देखा ताकि मालूम कर सकूं यह खुशबू कहां से आ रही है। अचानक मैंने देखा कि एक ख़ूबसूरत नौजवान शाही लिबास पहने क़ब्र की तरफ़ जा रहा है। वहां पहुंचकर क़्बर के क़रीब बैठ गया। मैं उस वाक़या से बहुत हैरान हुआ। मैंने देखा कि वह शख़्स अचानक गायब हो गया। यानी वह क़ब्र में दाख़िल हो गया। इस वाक़या को अभी थोड़ी देर गुज़री थी कि मुझे इतनी गंदी बदबू पहुंची की उससे ज़्यादा बदबू कभी न सूंघी होगी , फिर क्या देखता हूं कि उस नौजवान के पीछे एक कुत्ता जा रहा है। यहां तक क़ब्र पर पहुंचकर दोनों गायब हो गये , मुझे आशचर्य हुआ। मैं अभी हैरानगी में था कि अचानक नौजवान बाहर निकला। उसका हाल बुरा और जिस्म ज़ख्मी था जिस रास्ते से आया था उसी रास्ते से चला गया। मैं भी उसके पीछे चल दिया ताकि मैं उशकी हक़ीक़त हाल से वाक़फ़ियत हासिल करूँ। उसने मुझसे ब्यान किया कि मैं मय्यत के आमाल सालेह हूं और मुझे हुक्म दिया गया है कि मै उसके साथ क़ब्र में रहूं। अचानक यह कुत्ता जिसे तुम आता देख रहे हो , उसके बुरे आमाल थे मैंने चाहा कि उसे क़ब्र से निकाल कर उस का हक्क़े दोस्ती अदा करूँ , मगर उसने दातों से काटकर मेरा गोश्त नोच लिया और मुझे ज़ख़्मीं कर दिया। जैसा तुम देख रहे हो उसने मुझे इस क़ाबिल नहीं छोड़ा कि मैं उसके साथ रह सकूं। मैं बाहर आ गया और उसे छोड़ दिया , ज्यों ही आरिफ़े मकाशफ़ा ने इस हिकायत को शेख़ साहब से ब्यान किया तो शेख़ बहाउद्दीन आमली ने फ़रमाया। ठीक फ़रमाया , हम क़ायल हैं कि आमाल हालात की मुनासबत को ध्यान रखते हुए मिसाली सूरतें एख़्तियार करते हैं।

इस हिकायत की तसदीक़ शेख़ सद्दूक की इस रवायत (कथन) से भी होती है , जिसको उन्होंने अमाली के शुरु में दर्ज फ़रमाया है। इसका ख़ुलासा यह है कि क़ैस बिने आसिम मुकरी बनी तमीम की एक जमात के साथ रसूले अकरम (स 0 अ 0) की ख़िदमत में पहुंचा और आं हज़रत सल्लम से मुफ़ीद नसीहत की ख़्वाहिश की हुज़ूर (स 0 अ 0) ने उन्हें नसीहत करते हुए अपने मोअज़ा में यह भी इरशाद फ़रमाया , ऐ क़ैस जब तू दफ़न होगा , तेरे साथ एक साथी ज़रुर होगा , जो ज़िन्दा होगा और उस वक़्त तू मुर्दा होगा। अगर वह बाइज्ज़त होगा तो उसकी वजह से तू भी इज़्ज़त पायेगा और वह लाइल्म होगा तो तू भी बदबख्त होगा तू उसी के साथ मशहूर होगा और उसी से सवाल होगा। इस साथी को नेक बनाओ , क्योंकि अगर तू सालेह होगा तो तू उससे उन्स व मोहब्बत करेगा और अगर बुरा हुआ तो तू उससे डरता रहेगा और यह तेरे आमाल होंगे। क़ैस ने अर्ज़ किया या हज़रत! मैं चाहता हूं कि इम मोएज़ा को नज़्म किया जाच ताकि हम उस पर फ़क्र कर सकें जो कुछ हमने अरबों से हासिल किया है। हम उसे ज़ख़ीरा कर लें।

आं हज़रत (स 0 अ 0) ने हस्सान बिने साबित शायर को बुलाने के लिए किसी शख़्स को भेजा ताकि वह आकर उसको नज़्म करे! सलसाल बिने वलहमस उस वक़्त हाज़िर था उसने हस्सान बिने साबित के आने से पहले ही नज़्मे बनाते हुए कहा-

सदा सुनायी देगी तू भी उन्हीं मुर्दों में से उठेगा।

शेर नो 0 3 – और सिवाए ऐसे आमाल के जिनके ज़रिए खुदा राज़ी होता है , तुझे और किसी काम में मशगूल नहीं रहना चाहिए।

शेर नो 04- मौत के बाद इन्सान के वही आमाल साथी होते हैं , जो इससे पहले दुनियां में किया करता था।

शेर नं 0 5 – ख़बरदार , इन्सान दुनियाँ में अहलो अयाल (परिवार) के पास मेहमान हैं , जो कुछ दिन रहने के बाद कूच कर जाएगा।

शेख़ सद्दक (र 0) हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से रवायत (कथन) करते हैं कि हज़रत रसूले अकरम (स 0 अ 0) ने फ़रमाया कि हज़रत ईसा बिने मरयम (अ 0 स 0) एक ऐसी क़ब्र के पास से गुज़रे जिस की मय्यत पर अज़ाब हो रहा था , फ़िर एक साल बाद दोबारा हज़रत ईसा (अ 0 स 0) उसी कब्र के पास से गुज़रे तो देखा कि उस मय्यत पर से अज़ाबे क़ब्र उठ चुका था। अर्ज़ किया ऐ परवर दिगार! मैं पिछले साल इसी क़ब्र के पास से गुज़रा था , जबकि इस पर अज़ाब हो रहा था औऱ इससे वह अज़ाब उठ चुकरा था। हज़रत ईसा पर अल्लाह तआला की तरफ़ से वही नाज़िल हुई। ऐ रहुल्लाह! साहबे क़ब्र का एक नेक लड़का था जिसने बालिग़ होकर , गुज़रगार की इस्लाह (सुधार) की , यतीम (अनाथ) को पनाह दी और रहने के लिए जगह दी। इसलिए मैंने उसके लड़के के आमले सालेह (अच्छे कार्य) की वजह से उसके गुनाह बख़्श दिये।


फसल चहारुम

क़यामत प्रलय

आख़िरत की हौलनाक मंज़िलों में से एक क़यामत है जिसकी हौलनाक़ी और ख़ौफ़ हर ख़ौफ़ से सख़्त है। उसी के औसाफ़ में अल्लाह तआला ने इरशाद फ़रमाया-

“ क़यामत ज़मीन व आसमान पर रहने वाले मलायका , जिन व इन्स के लिए अपने शदाएद और हौलनाकियों के ऐतबार से संगीन और गरां और वह अचानक आ जाएगी। ”

कुतुब रावन्दी ने हज़रत जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से रवायत (कथन) की है कि हज़रत ईसा ने जिबरईल से पूछा , क़यामत कब बरपा होगी , ज्योंही जिबरईल ने क़यामत (प्रलय) का नाम सुना उसके जिस्म में इस क़द्र बरज़ातारी हुई कि वह गिर कर बेहोश हो गया , जब ठीक हुआ तो कहने लगा। ऐ रुहुल्लाह! क़यामत (प्रलय) के बारे में मसऊले मसायल से ज़्यादा इल्म नहीं और मज़कूरा बाला (उपरोक्त) आयत की तिलावत की।

शेख़ जलील अली बिने इब्राहिम कुम्मी (र 0) हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से रवायत करते हैं कि एक बार रसूले अकरम (स 0 अ 0) के पास जिबरईल तशरीफ़ फ़रमा थे। जिबरईल ने अचानक आसमान की तरफ़ देखा डर की वजह से उनका रंग जाफ़रान की तरह ज़र्द हो गया और रसूले अकरम (स 0 अ 0) की पनाह लेने लगा। रसूले अकरम (स 0 अ 0) ने उस जगह निगाह की जहां जिबरईल ने देखा था। आपने एक फ़रिश्ता को देखा , जो कि मशरिक़ व मग़रिब में पर फैलाए हुए है , गोया कि वह ज़मीन का गिलाफ़ है। वह फ़रिश्ता रसूले अकरम (स 0 अ 0) की तरफञ मुतवज्जेह हुआ और कहा ऐ मोहम्मद (स 0 अ 0)! मैं अल्लाहतआला का पैगा़म लेकर आया हूँ कि तुझे एख़्तियार है तू बादशाही औऱ रिसालत पसन्द करे या बन्दगी औऱ रिसालत। हज़रत जिबरईल की तरपञ मुतवज्जेह हुए देखा तो उसकी रंगत बहाल थी और बाहोश था। जिबरईल ने बन्दगी और रिसालत पसन्द करने को कहा! हज़रत (स 0) ने बन्दगी और रिसालत पसन्द फ़रमाई! उस फ़रिश्ते ने अपना दायां पांव उठाकर आसमाने अव्वल पर रखा और बायां पैर उठाकर आसमाने दोयम पर। इसी तरह आसमाने हफ़तुम (सातवें) तक गया और हर आसमान को एक क़दम बनाया और जितना बलन्द (ऊंचा) होता गया , छोटा होता गया। फ़िर आं हज़रत (स 0 अ 0) जिबरईल की तरफ़ मुतवज्जेह हुए और फ़रमाया मैंने तेरे ख़ौफ़ और तब्दीलिए रंग से ज़्यादा ख़ौफ़नाक चीज़ कभी नहीं देखी। जिबरईल ने अर्ज़ किया कि आप मुझे मलामत न करें। क्या आप जानते हैं कि यह फ़रिश्ता कौन है ? यह हाजल रब्बिल आलमीन इसराफ़ील था। जबसे अल्लाह तआला ने ज़मीन आसमान को पैदा किया , यह फ़रिश्ता इस हालत में नीचे नहीं उतरा। जब मैंने उसे ज़मीन की तरफ़ आते हुए देखा तो मैंने गुमान किया कि यह क़यामत (प्रलय) बरपा करने के लिए आ रहा है , और क़यामत के डर से मेरा रंग तब्दील हो गया , जैसा कि आपने मुशाहिदा फ़रमाया , ज्योंहि मुझे मालूम हुआ कि यह क़यामत बरपा करने के लिए नहीं आया , बल्कि आपको बरगुज़ीदह होने की खुशी सुनाने के लिए आया है तो मेरा रंग असली हालत पर आ गया और मेरे हवास दुरुस्त हो गये।

एक रवायत में है कि कोई फ़रिश्त आसमान व ज़मीन फ़िज़ा व पहाड़ , सहरा व दरिया में से ऐसा नहीं जो हर जुमा से इसलिए न डरता हो कि कहीं इस जुमा को क़यामत न बरपा हो जाय।

शायद आसमान , ज़मीन और तमाम चीज़ों के डरने से मुराद उनमें रहने वालों और उनके मुवक्कलीन का ख़ौफ़ हो। चुनान्चे मुफ़स्सरीन ने आयत (सूत्र) “ सक़ोलतफ़िस्समावाते वल अर्ज़े ” की तफ़सीर में यही ज़िक्र फ़रमाया है।

मर्वी है कि रसूले अकरम (स 0 अ 0) जिस वक़्त क़यामत (प्रलय) का तज़कीरा (वर्णन) फ़रमाते तो आपकी आवाज़ में सख़्ती औऱ रुख़सारों (गालों) पर सुर्ख़ी आ जाती थी।

शेख़ मुफ़ीद इरशाद में नक़ल फ़रमाते हैं कि जब रसूले अकरम (स 0 अ 0) गज़वए तबूक से मदीना की तरफ़ मराजअत फ़रमायी तो अमरू बिन मअदी कर्ब आप की ख़िदमत में हाजि़र हुआ। आं हज़रत (स 0 अ 0) ने उससे फ़रमाया , ऐ अमरू! इस्लाम कुबूल कर ताकि हक़तआला तुझे क़यामत के ख़ौफ़ से महफूज़ रखे। अमरू ने कहा , ऐ मोहम्मद! क़यामत क्या है ? मैं ऐसा शख़्स हूं कि मुझे खौफ़ आता ही नहीं।

इस रवायत से अमरू की शुजाअत व बहादुरी और ताक़ते क़ल्ब का अन्दाज़ा होता है मनकूल है कि वह अपने ज़माने के मशहूर बहादुरों में से था और बहुत से अजमी इलाकों की जीत उसी के हाथ से हुई और उसकी शमशीर समसाम मशहूर थी बयक वक़्त उसकी एक ज़रबत ऊँट के क़वायम को जुदा कर देती थी। उमर बिने ख़त्ताब ने अपने ज़माने में उससे ख़्वाहिश की कि वह अपनी तलवार उसे बतौर हदिया दे दे। अमरु ने तलवार पेश की। उमर बिने ख़त्ताब ने उसे इस ज़ोर के साथ एक जगह पर मारा ताकि उसका इम्तिहान ले। उस तलवार ने बिल्कुल कोई असर न किया। उमर ने उसे दूर फ़ेंक दिया और कहा कि यह तो कोई चीज़ नहीं। अमरू ने कहा ऐ बादशाह! तूने मुझसे तलवार तलब की थी न कि शमशीर ज़नी के लिए बाज़ू। उमर बिने ख़त्ताब अमरु के कलाम से गुस्से में आ गया और उससे नाराज़ हुआ , और बक़ौले उसे क़त्ल कर दिया।

जह अमरू ने कहा कि मैं क़यामत से ख़ौफ़ नहीं खाता तो हज़रत रसूले अकरम (स 0 अ 0) ने फ़रमाया , ऐ अमरू! वह खौफ़ ऐसा नहीं , जैसा कि तू उसे गुमान करता है। मुर्दो के लिए एक सूर फूंका जाएगा कि तमाम मुर्दे ज़िन्दा हो जाएंगे और कोई ज़िन्दा ऐसा न होगा जो कि मर न जाएगा (सिवाए उन लोगों के जिसे खुदा न मारना चाहे) फ़िर दूसरी बार सूर फूंका जाएगा , जिससे तमाम मुर्दे ज़िन्दा हो जाएंगे और सफ़ (क़तार) बाँध कर खड़े हो जाएंगे। जहन्नुम के शोले पहाड़ों की तरह होंगे और ज़मीन पर गिर रहे होंगे। हर ज़ी रूह का दिल बस्ता हो जाएगा और अपने-अपने माबूद को याद करेगा। नफ़सी-नफ़सी का आलम होगा। सिवाए उन लोगों के जिन्हें खुदा चाहेगा महफूज़ रखेगा। ऐ अमरू तू कहां भटक रहा है। अमरू ने अर्ज़ किया मैं इम अमरे अज़ीम के बारे में तमाम बातें सुन रहा हूँ और वह उसी वक़्त अनी क़ौम सहित ख़ुदा व रसूल पर ईमान लाया।

इस सिलसिले में बेहद रवायात वारिद है , जो क़यामत के अज़ीम ख़ौफ़ पर दलालत करती है। क़यामत की घड़ी इस क़द्र ख़ौफ़नाक और हौलनाक है कि आलमे बरज़ख़ और क़ब्र मे भी मुर्दे कांपते और डरते हैं , क्ंयोंकि जब बाज़ मुर्दे औलिया अल्लाह की दुआ से जि़न्दा हुए तो उनके बाल सफ़ेद थे , जब क़यामत के बारे में उनसे पूछा गया तो कहने लगहे कि जब हमें ज़िन्दा होने का हुक्म दिया गया तो हमने गुमान किया कि शायद क़यामत बरपा हो गयी और उसके ख़ौफ़ से हमारे बाल सफ़ेद हो गए।

क़यामत की सख़्ती से महफूज़ रखने वाले आमाल

अब मैं यहां पर चन्द ऐसे आमाल का वर्णन करता हूं जो क़यामत के शदाएद और सख़्तियों से महुफूज़ रखते हैं और वह दस उमूर हैं-

अव्वल- मर्वी है कि जो शख़्स सूरए युसूफ़ को हर रोज़ या हर शब (रात) तिलावत करेगा , वह शख़्स रोज़े कयामत (प्रलय) क़ब्र से इस तरह उठेगा कि वह हज़रत युसूफ़ की तरह हसीन होगा और क़यामत के ख़ौफ़ से महफूज़ रहेगा।

इमाम मोहम्मद बाक़र (अ 0 स 0) से मर्वी है कि जो शख़्स सुरए दुख़ान को नमाज़े नाफ़िला और फ़रीज़ा में पढ़े , वह क़यामत के रोज़ हर क़िस्म के ख़ौफ़ से महफूज़ रहेगा।

हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से मर्वी है कि जो शख़्स शब या जुमा का दिन सुरए अहक़ाफ़ की तिलावत करेगा तो वह शख़्स हर दीनवी व उख़रवी ख़ौफ़ से महफूज़ रहेगा और उन्ही लोगों से मनकूल है जो शख़्स सूरए वलअस्र की नमाज़े नाफ़िला में पढ़ेगा वह आख़िरत के दिन खुश व ख़ुर्रम होगा औऱ उसका चेहरा नूरानी और रौशन होगा , उसकी आंखे रोशन होंगी , यहां तक की वह जन्नत में दाखिल होगा।

दोम- शेख़ कुलैनी (र 0) इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से नक़्ल करते हैं कि हज़रत रसूले अकरम (स 0 अ 0) ने फ़रमाया जो शख़्स सफ़ेद रीश बैढ़े का एहतराम करे। अल्लाह तआला उसे क़यामत के ख़ौफ़ से महफूज़ रखेगा।

सोम- आं हज़रत ने फ़रमाया जो शख़्स मक्का मोअज्जमा जाते या आते हुए फ़ौत हो जाय। अल्लाह तआला उसे क़यामत के ख़ौफ़ से महफूज़ रखेगा। शेख़ सद्दूक़ (र 0) आँ हज़रत (स 0) से रवायत करते हैं कि आपने फ़रमाया जो शख़्स हरमे मक्का या हरमे मदीना में फ़ौत हे जाय “ ज़ादहुमल्लाहो शरफ़न व ताज़ीमन अल्लाह तआला उसे जुमला ख़ौफ़नाकियो से महफूज़ और बेख़तर उठाएगा। ”

चहारुम-

शेख़ कुलैनी (र 0) हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक (अ 0 स 0) से रवायत (कथन) करते हैं कि आपने फ़रमाया कि जो शख़्स हरमें मक्का में दफ़्न हो वह क़यामत के ख़ौफ़ से महफूज़ रहेगा।

पंजुम- शेख़ सद्दूक़ (र 0) हज़रत रसूले अकरम (स 0 अ 0) से नक़्ल फ़रमाते हैं कि जो शख़्स किसी बुराई या ग़लबए शहवत से सिर्फ़ अल्लाह तआला के ख़ौफ़ की वजह से इजतेनाब करे हक़तआला उस पर आतशे (आग) दोज़ख़ हराम कर देता है और उसे ख़ौफ़ क़यामत से महफूज़ रखता है।

शश्शुम (छठा)- आं हज़रत से मर्वी है कि आपने फ़रमाया कि जो शख़्स मर्द होते हुए ख़्वाहशाते नफ़सानी की मुख़ालिफत करता है अल्लाह तआला उसे क़यामत के ख़ौफ़ से महफूज़ रखता है।

हफ़तुम (सात)- शेख़ अजब अली बिने इब्राहिम कुम्मी (र 0) हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से रिवायत करते है जो शख़्स बावजूद कुदरत के अपने गुस्से को पी जाय अल्लाह तआला उसके दिल को ईमान से पुर करता है और ख़ौफ़े क़यामत से महफूज़ रखता है।

हशतुम (आठ)- अम्न मुतलक़ जिसके होते हुए कोई ख़ौफ़ नहीं , वह विलायते अली (अ 0 स 0) का इक़रार है। यह वह हसना (भलाई) है कि नब्ज़े कुर्आन में कोई नेकी इससे बड़ी नहीं है और इसका हामिल ख़ौफ़े क़यामत से महफूज़ रहेगा।

“ इन्नललज़ीना सबक़त लहुम मिन्नल हुस्ना ऊलाइका अन्हा मुबअदून , ला यसमऊना हसीसहा , वहुम फ़ी मश्तहत अनफुसूहुम ख़ालिदून , ला यह ज़नू हुमूल फ़ाज़उल अक़बरो वत्तलक़ाहुमुल मलाइकतो हाज़ा यौमे कुमुललज़ी कुन्तुम तूअदून। ”

( सूरए अम्बिया आयात 101 ता 103)

“ अलबत्ता जिन लोगों के वास्ते हमारी तरफ़ से पहले ही से भलाई (तक़दीर में लिखी जा चुकी) है वह लोग दोज़ख़ दूर रखे जाएंगे। यह लोग उसकी भनक भी नहीं सुनेंगे और यह लोग हमेशा अपनी मन मांगी मुरादों मे चैन से रहेंगे औऱ उन्हें क़यामत का बड़े से बड़ा ख़ौफ़ भी दहशत में न लाएगा , औऱ फ़रिश्ते उनसे कहेंगे कि यही वह दिन है , जिसका तुमसे वायदा किया गया था। ”

रसूले अकरम (स 0 अ 0) से मर्वी है कि आपने फ़रमाया या अली (अ 0 स 0) तू और तेरे शिया नज़अए अकबर के दिन अमान में होंगे और यह आयत (सूत्र) तुम्हारी तरफ़ राज़ेअ है और हसना से मुराद विलायत अली (अ 0 स 0) व आले अली (अ 0 स 0) है और कुर्आन में जैसा कि वायदा किया गया है।

“ जो शख़्स नेक काम करेगा , उसके लिए उसकी जज़ा , इससे कहीं बेहतर है और यह लोग उस दिन ख़ौफ़ व ख़तरे से महफूज़ (सुरक्शित) रहेंगे। ”

तफ़ासीर आम्मा कशाफ़ , सअलबी और कबीर में है कि जो शख़्स हसना के साथ वारिद होगा वह बरोज़ क़यामत अमन में होगा और हसना से मुराद अली अलैहिस्सलाम हैं , जो शख़्स आले मोहम्मद (स 0 अ 0) के साथ मर गया और तौबा के ज़रिए पाक हो गया , तो जब वह क़ब्र से निकलेगा तो उसके सिर पर बादल का साया होगा और क़यामत के दिन ख़ौफ़ से महफूज़ रहेगा और जन्नत में दाखिल होगा।

नहुम (नौ)- शेख़ सद्दूक (र 0) हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से रवायत करते हैं कि आपने फ़रमाया जो शख़्स परेशान और प्यासे मोमिन (धर्मनिष्ठ) भाई की अपनी कुव्वत औऱ ताक़त के ज़रिए अआनत करे और उसे ग़म से आसाइश मोहैया करे , या उसकी हाजत पूरी करने के लिए कोशिश करे तो हक़तआला उसे बहत्तर क़िस्म की न्यामतें अता करेगा। उनमें से एक तो यह कि दुनियाँ में उसके अम्र मआश की अपनी रहमत के ज़रिए इस्लाह फ़रमाएगा और बाक़ी इकहत्तर रहमतंह क़यामत की हौलनाकियों और ख़ौफ़ के लिए ज़ख़ीरा रखेगा।

बरादराने मोमनीन के कज़ाये हवायेज के बारे में बहुत सी रवायात मनकूल हैं अजां जुमला हज़रत इमाम मोहम्मद बाकि़र (अ 0 स 0) से मर्वी है कि अगर कोई शख़्स अपने मोमिन भाई की हाजत पूरी करने के लिए निकले तो हक़तआला उसके लिए पांच हज़ार सत्तर फ़रिश्तों को उस पर साया करने का हुक्म देता है और उसके बाहर क़दम रखने से पहले अल्लाह तआला उसके नामए आमाल में नेकियां दर्ज फ़रमाया है। हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से मनकूल है कि मोमिन भाई की हाजत पूरी करना अफ़ज़ल है। हज , हज , हज से यहां तक की आपने दस तक शुमार किया (यानी दस हज से अफज़ल है।)

मलकूल (उद्धृत) है कि बनी इसराइल में एक इबादत गुज़ार आबिद था , जिसने दूसरो की हाजात में कोशिश करना अपना फ़रीज़ा (कर्तव्य) समझ रखा था। शेख़ जलील शाज़ान बिने जिबरईल कुम्मी (र 0) ने हज़रत रसूले अकरम (स 0 अ 0) से रवायत की है कि आपने बेहश्त दोम के दरवाज़े पर लिखा हुआ “ लाइलाहा इल्लललाह मोहम्मदन रसूल अल्लाह अली अन वली अल्लाह ” हर चीज़ का हुलिया होता है और सरवरे क़ायनात का क़यामत का हुलिया चार ख़सलतें हैं-

1- यतीमों के सिरों पर दस्ते शफ़क़त फ़ेरना।

2- बेवा औरतों पर मेहरबानी करना।

3- मोमिन की हाजत पूरी करने के लिए जाना।

4- फुक़रा व मसाकीन की ख़बरगिरी वग़ैरा।

ओलमा व बुर्जगाने दीननन मोमनीन के कज़ाये हाजात के बारे में बहुत ऐहतिमाम किया करते थे और इस बाब में उनसे बहुत सी हिकायात मनकूल है , जिन के नक़ल करने की यहां कोई ख़ास आवश्यकता नहीं है।

दहुम (दसवां)- शेख़ कुलैनी (र 0) हज़रत इमाम रज़ा (अ 0 स 0) से नक़ल फ़रमाते हैं कि जो शख़्स मोमिन भाई की क़ब्र पर जाएगा और उस पर हाथ रखकर सात बार “ इन्ना अनज़लना फी लयलतिल क़दरे ” पढ़े हक़ ताला उसे महशर की सख़्ती से महफूज़ रखेगा।

दूसरी रवायत में है कि रूब क़िबला होकर हाथों को क़ब्र पर गाड़ना रोज़े क़यामत की हौलनाकियों के ख़ौफ़ से महफूज़ रखता है मुमकिन है कि पढ़ने वाले के लिए हो। चूनांचे रवायत (कथन) से ज़ाहिर है और मय्यत के लिए मुतहम्मिल है और बाज़ रवायत से इसी तरह ज़ाहिर होता है। बन्दा ने ख़ुद मजमूआ में देखा है कि शेख़ अबू अब्दुल्लाह मोहम्मद बिने मक्की आमली जो शेख़ शहीद मशहूर हैं अपने उस्ताद फक़रुल मोहक़्क़ीन आयतउल्ला अल्लामा हिल्ली की क़ब्र की ज़ियारत को गए और फ़रमाया कि मैं उस क़ब्र वाले से और उन्होंने अपने वालिद से और उन्होंने इमाम रज़ा (अ 0 स 0) से नक़ल किया है कि जो शख़्स अपने मोमिन भाई की क़ब्र की ज़ियारत करे और सूरए क़द्र पढ़ने के बाद यह दुआ पढ़ेः-

“ अल्लाहुम्मा जाफ़िल अर्ज़ा अनजुनूबिहिम वसाइद इलैका अरवाहहुम वज़िदहुम मिनका रिज़वान वअसकिन इलैहिम मिन रहमतिका मा तसेलो बिही वहदतहुम वतूनिस वहश्ताहुम इन्नका अला कुल्ली शैइन क़दीर। ”

वह शख़्स और मय्यत दोनों फ़जए अकबर से महफूज़ रहेंगे।

अल्लामा मजलिसी की शरह फ़कीहा में तहरीर करदा ब्यान के मुताबिक फख़रुल मोहक़्क़ीन की क़ब्र नजफ़ अशरफ़ में है और शायद उनके वालिद की क़ब्र के नज़दीक़ रिवाने मुतहर में है।

सूरे इसराफ़ील

ख़ल्लाक़े आलम जब दुनियाँ को ख़त्म करके क़यामत बरपा करने का इरादा करेगा , तो इसराफ़ील को हुक्म देगा कि वह सूर फूंके। सूर बहुत बड़ा और नूरानी है , जिसका एक सर और दो शाख़ें है। चूनांचे इसराफ़ील बैतुल मुक़द्दस में पहुंचकर कि़बलारु (पश्चिम की ओर मुंह करके) होकर सूर फूंकेगें , जब ज़मीन की तरफ़ वाली शाख़ से आवाज़ बरामद होगी तो ज़मीन वाले मर जाएंगे औऱ जब आसमान की तरफ़ वाली शाख़ से आवाज़ निकलेगी तो आसमान को हुक्म होगा “ मू तू ” तो वह भी मर जाएगा। नफ़ेह सूर के वक़्त इस दुनियाँ की तबाही का जो नक्शा कुर्आन ने पैश किया है वह यह है-

“ रहमान व रहीम के नाम से शुरु करता हूं जबकि क़यामत वाक़ेए हो जाए , जिसके वाकेए होने में कोई झूठ नहीं , वह पस्त करने वाली भी है और बुलन्द करने वाली भी जिस वक़्त ज़मीन हिलायी जाएगी , जैसा कि हिलाने का हक़ है और पहाड़ ऐसे उख़ाड़ दिए जाएंगे , जैसा कि उख़ाड़ने का हक़ है और वह इस तरह हो जाएंगे जैसे कि बिख़रे हुए ख़ाकी ज़रार्त। ” ( सूरह “ वाक़या आयत 1-16) ”

“ जिस रोज़ ज़मीन दूसरी ज़मीन से बदल दी जाएगी और आसमान (दूसरे आसमानों से) और सब ज़बरदस्त व यकता खुदा के हुज़ूर ख़डे होंगे। ” ( सू 0 “ इब्राहीम आयत 48) ”

“ जबकि आसमान फट जाएंगे औऱ तारे गिर कर तितर बितर हो जाएंगे और जबकि दरिया बहकर मिल जायेंगे और जबकि क़ब्रे उलट-पलट कर दी जाएंगी और हर नफ़स जान लेगा कि उसने आगे क्या भेजा है और पीछे क्या छोड़ा है। ”

( सू 0 अन्फ़तार , आ 0 1)

“ जबकि सूरज की रौशनी लपेट ली जाएगी और तारों की रोशनी जाती रहेगी और जबकि पहाड़ चलाये जाएंगे। ”

( सू 0 तकवीर , आ 0 1-3)

“ पस जब आंखे चौंधियां जाएंगी और चांद को गहन लग जाएगा ,

सूरज और चांद जमा कर दिए जाएंगे। ”

( सू 0 क़याम , आ 0 7-9)

“ यानी क़यामत अचानक आ जाएगी। ”

( सू 0 आराफ़ , आ 0 187)

लोग अपने-अपने कारोबार में मशगूल होंगे। कोई मवेशियों (जानवरों) को पानी पिला रहा होगा। कोई फैक्ट्री में मसरुफ़े कार होगा। कोई तराज़ू को ऊँचा-नीचा कर रहा होगा और कोई गुनाहों का इरतेकाब कर रहा होगा। सूर फूंके जाने से सब मर जाएंगे।

“ वसीयत करने की भी मोहलत न मिलेगी औऱ न ही अपने घरों की तरफ़ पलट कर जा सकेंगे। ”

( सू 0 यासीन , आ 0 50)

फ़िर निदा (आवाज़) क़हरे इलाही बलन्द होगी , ऐ अकड़ कर चलने वालों! औऱ सल्तनत व हुकूमत पर गुरुर करने वालों ऐ खुदाई के दावेदारों! आज वह तुम्हारी हुकूमतें और सल्तनतें कहां हैं ? लेमनिल मुलकुल यौम “ आज किसकी हुकूमत है। ” किसी को जवाब की ताक़त कहां। आवाज़े कुदरत आएगी “ लिल्लहिल वाहेदिल क़हहार “ आज क़हहार व जब्बार की हुकूमत है। ” ( अहसनुल , फ़वायद)।

दोबारा ज़िन्दगी- तमाम दुनियाँ जब तक खुदा चाहेगा इसी तरह तबाह रहेगी। किसी ने मासूम (अ 0 स 0) से सवाल किया कि इन दो नफ़ख़ात में कितनी मुद्दत का फ़ासला होगा , तो मासूम ने फ़रमाया चालीस साल औऱ दूसरी रवायत (कथन) के मुताबिक़ चार सौ साल का अर्सा। यही हालत रहेगी। उसके बाद चालीस दिन तक बारिश (वर्षा) होती रहेगी और हर ज़ी नफ़्स के ज़र्रात जमा हो जाएंगे और सबसे पहले इसराफ़ील अल्लाह तआला के हुक्म से ज़िन्दा होगा और उसे हुक्म होगा वह सूर फूंके औऱ मुर्दे ज़िन्दा होंगे। निदा (आवाज) आएगी।

“ ऐ बदनों से निकली हुई रुहों (आत्माओं) औऱ बिखरे हुए गोश्तों (मांसों) और बोसीदा हड्डियों और बिखरे हुए बालों वापस आकर जमा हो जाओ और हिसाब देने के लिए बढ़ो। ”

ज़मीन खुदा के हुक्म से अपने अन्दर की चीज़ों को उगल देगी “ व अख़रजतिल अरज़ो असक़ालहा ” और जो कुछ ज़मीन के अन्दर अब्दान प आश्या होंगी ज़लज़लए शदीदः के ज़रिए बाहर आ जायेगी औऱ एक ही दफ़ा तमाम लोग उठ खड़े होंगे , लेकिन तमाम लोगों का मंज़र (दृश्य) जुदा और कलाम जुदा होगा , नेक लोग खुदा का शुक्र अदा करते हुए निकलेंगे। अलहमदो लिल्लाहिललज़ी सद्दक़ना वआदहू। “ तमाम तारुफ़ें उसक ज़ात के लिए हैं , जिसने अपना वादा सच कर दिखाया , और कुछ वा हसरताह की फ़रियाद करते हुए क़ब्रों से निकलेंगे। ” कि हाय अफ़सोस! हमें किसने क़ब्रों से उठा दिया। ”

एक रवायत (कथन) में है कि एक पांव क़ब्र से बाहर और एक अन्दर होगा औऱ इसी तरह हैरत में ख़डे होंगे। तीस सौ साल गुज़र जाएंगे , और यह क़यामत के अज़ाब का मुक़द्दमा होगा। मोमनीन कहेंगे , परवर दिगार! जल्द असल जगह तक पहुंचा , ताकि जन्नत की लज़्ज़तों , से लुत्फ़ अन्दोज़ हों और कुफ़्फार कहेंगे , परवर दिगार यहीं रहने दे , क्योंकि यहां अज़ाब कुछ कम है। (मआद)।


फ़स्ल पंजुम (पांच)

कुबूर (क़ब्रों से निकलना)

यह हौलनाक वक़्त जब इन्सान अपनी क़ब्र से बाहर आएगा औऱ यह सख़्ततरीन और वहशतनाक घड़ियों में से है। हक़ तआला कुर्आन मजीद में इरशाद फ़रमाता है-

“ पस तू उनको छोड़ दे कि वह झगड़ते औऱ खेलते रहें यहां तक कि वह उस दिन से मुलाक़ात करे , जिनका उनसे वायदा किया गया है। उस दिन वह क़ब्रों से इस तरह जल्दी निकल पड़ेंगे , गोया वह झुण्ड़ों की तरफ़ दौड़ते जाते हैं , उनकी आंखें आजज़ी करने वाली होंगी , उन पर ज़िल्लत छायी हुई होगी , यही वह दिन है जिसका उनसे वायदा किया गया था। ”

( सू 0 मआरिज़ , आ 0 42-43)

इब्ने मसूद से रवायत (कथन) है कि उसने कहा कि मैं हज़रत अमीरूल मोमनीन (अ 0 स 0) की ख़िदमत में हाज़िर था कि आपने इरशाद फ़रमाया कि हर शख़्स के लिए क़यामत में पचास मौक़िफ़ हैं और हर मौक़िफ़ हज़ार साल का है।

यहां पहला मौक़िफ़ क़ब्र से खुरूज़ का है। इसमें इन्सान हज़ार साल नंगे पावद उरयां (नंगा) रुका रहेगा। भूख और प्यास की शिद्दत (तेज़ी) होगी , जो शख़्स वहदानियत , जन्नत व दोज़ख , बैसत हिसाब और क़यामत का इक़रार करता होगा और अपने पैग़म्बर का मिसद्दक़ होगा और उन पर खुदाए ताला की तरफ़ से नाज़िल किए हुए अहकामात पर ईमान रखता होगा। वह भूख और प्यास से महफूज़ (सुरक्शित) रहेगा। हज़रत अमीरुल मोमनीन नहजुल बलगा में इरशाद फ़रमाते हैं-

“ क़यामत का दिन वह दिन है जब ख़ुदा हिसाब और जज़ाए आमाल के लिए गज़िश्ता व आइन्दा में से तमाम ख़लाएक़ को जमा करेगा। यह तमाम लोग निहायत अजिज़ व ख़ाकसर बनकर हाजि़र होंगे और पसीना उनके मुँह तक पहुंच गया होगा और ज़लज़लए ज़मीन ने उनमें थरथरी पैदा कर दी होगी , उममें से नेक तरीन और खुशहाल तरीन वह शख़्स होगा , ( जिसने दुनिया मे किरदार (चरित्र) पसन्दीदा के बायस) (कारण) क़दम जमाने के लिए कोई जगह बना ली होगी और अपनी आसाइश (आराम) के लिए कोई फराख़ जगह बना लिया होगा। ”

शेख़ कुलैनी (र 0) हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ (अ 0 स 0) से रवायत (कथन) करते हैं कि रोज़े क़यामत लोग परवर दिगारे आलम के हुज़ूर में इस तरह ख़ड़े होंगे जैसे तरकश का तीर यानी जैसा कि तीर को तरकश में रख देने से उममें कोई जगह बाक़ी नहीं रहती , उसी तरह आदमी के खड़े होने में उस दिन जगह तंग होगी कि सिवाय क़दम रखने के कोई जगह न होगी और वह अपनी जगह से हरकत न कर सकेगा। मुजरिम शकलों से पहचाने जाएंगे , बल्कि यह मुक़ाम ज़्यादा अच्छा और मुनासिब है कि यहां पर कुछ लोगों के उन हालात का वर्णन किया जाय , जिन हालात में वह क़ब्रों से बाहर आयेंगे।

अव्वल- शेख़ सद्दूक़ (र 0) रवायत करते हैं कि इब्ने अब्बास ने हज़रत रसूले अकरम (स 0 अ 0) से रवायत की है कि आं हज़रत ने फ़रमाया कि हज़रत अली (अ 0 स 0) इब्ने अबी तालिब की फ़ज़ीलत (श्रेष्ठता) मे शक करने वाला क़यामत के दिन अपने क़ब्र से इस तरह बाहर निकलेगा कि उसकी गर्दन में तीन सौ शोबे (कांटे) वाला तौक़ होगा , जिसके हर हिस्से पर एक शैतान होगा , जिसके चेहरे से गुस्से की अलामत ज़ाहिर होगी और वह उसके चेहरे पर थूक रहा होगा।

दोम- शेख़ कुलैनी (र 0) हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़र (अ 0 स 0) से रवायत करते हैं कि हक़ तआला कुछ लोगों को उनकी कब्रों से इस तरह बरामद करेगा कि उनके हाथ और गर्दन इस क़द्र सख़्त बंधे होंगे कि वह उन को ज़र्रा बराबर भी हरकत न दे सकेगे , औऱ उन पर फरिश्ते मुक़र्रर होंगे जो उनको जज़र व तौबीख़ करते होंगे और उनको झिड़क कर यह कहते होंगे कि यह वह लोग हैं , जिन्हें अल्लाह तआला ने माल अता किया औऱ उसमें से अल्लाह ताला , का हक़़ अदा नहीं करते।

सोम- शेख़ सद्दूक़ (र 0) हज़रत रसूले अकरम (स 0 अ 0) से एक तूलानी (लम्बी) हदीस में ब्यान करते हैं कि जो शख़्स दो आदमियों के बीच चुग़लख़ोरी औऱ नुक़ताचीनी करता है , अल्लाह ताला उस पर क़ब्र में आग का अज़ाब मुसल्लत करता है , जो उसे क़यामत तक जलाता रहेगा। ज्योंही वह क़ब्र से बाहर आएगा। अल्लाह तआला उस पर बहुत बड़ा सांप मुसल्लत करेगा , जो उसके गोश्त को जहन्नुम में दाख़िल होने तक दांतो से काटता रहेगा।

चहारुम (चार)- आं हज़रत से मर्वी है कि जो शख़्स ग़ैर महरम औरत को देख़कर लुत्फ़ अन्दोज़ होता है। अल्लाह ताला उसे रोज़े क़यामत आतशी सलाखों में जकड़ा हुआ उठाएगा और अहले महशर के दर्मियान लाकर उसे दोज़ख में दाख़िल करने का हुक्म देगा।

पंजुम (पांच)- आं हज़रत से मर्वी है कि आपने फ़रमाया , शराबख़ोर रोज़े क़यामत में इस तरह उठेंगे कि उनके चेहरे स्याह (काले) आंखे दबी हुई , मुंह सिकुड़े और उनसे पानी बहता हुआ होगा। उनकी ज़बान को गुद्दी से निकाला जाएगा। इलमुल यक़ीन में मोहद्दिसे फ़ैज़ से मोतबर (विश्वसनीय) हदीस में वारिद है कि , शराबख़ोर रोज़े क़यामत इस तरह उठाए जाएंगे कि शराब का कूज़ा उनकी गरदन में और प्याला हाथ में और ज़मीन पर पड़े मुरदार से भी ज़्यादा गंदी बदबू आती होगी और उनके पास से हर गुज़रने वाला उन पर लानत करेगा।

शश्शुम (छठा)- शेख़ सद्दूक़ (र 0) आं हज़रत से रवायत (कथन) करते हैं कि दो ज़बानों वाला शख़्स बरोज़े क़यामत इस तरह मशहूर होगा कि उसकी एक ज़बान गुद्दी से और दूसरी ज़बान सामने से खींची गयी होगी और जबकि उससे आग का गोला भड़क कर उसके तमाम जिस्म को जला रहा होगा और कहा जाएगा कि यह वह शख़्स है जो दुनिया में दो ज़बाने रखता था औऱ वह रोज़े क़यामत इसी ज़रिया से पहचाना जाएगा।

हफ़्तुम (सात)- मर्वी है कि जब सूदख़ोर क़ब्र से निकलेगा तो उसका पेट इतना बड़ा होगा कि ज़मीन पर पड़ा हुआ होगा , वह इसको उठाने के लिए नीचे झकना चाहेगा , मगर न झुक सकेगा। इस निशानी को देखकर अहले महशर समझ लेंगे कि यह सूद ख़ाने वाला है।

हशतुम (आठ)- अनवारे नामानियां में रसूले खुदा (स 0 अ 0) से रवायत (कथन) है कि तम्बूरा (बीन वग़ैरा) बजाने वाले का चेहरा स्याह (काला) होगा और उसके हाथ में आग का तम्बूरा होगा , जो सिर में मार रहा होगा और सत्तर हज़ार अज़ाब देने वाले फ़रिश्ते (दूत) उसके सर और चेहरे पर आग के हरबे मार रहे होंगे और साहबे ग़िना (आवाज़ ख्वां) और गवैया और ढ़ोल बाजे वाले अंधे और गूंगे महशूर होंगे।

“ गुनाहगार लोग अपने चेहरों ही से पहचान लिए जाएंगे , तो पेशान के पट्टे और पांव पकड़े (जहन्नुम में) डाल दिए जाएंगे। ” ( मआद)

( सू 0 रहमान , आ 0 41)

अहवाले क़यामत के लिए मुफ़ीद आमाल

इस मौक़े के लिए बेशुमार मुफ़ीद चीज़ें हैं मैं यहां पर कुछ चीज़ों की तरफ़ इशारा करुंगा।

अव्वल (पहला)- एक हदीस में है कि जो शख़्स जनाज़ा (अर्थी) के साथ चलता है हक़ ताला उसके लिए कई फ़रिश्ते मुव्वकिल फ़रमाता है , जो क़ब्र से लेकर महशर तक उसका साथ देते हैं।

दोम (दूसरा)- शेख़ सद्दूक़ (र 0) हज़रत जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से रवायत करते हैं कि जो शख़्स किसी मोमिन के दुःख या दर्द को दूर करता है। अल्लाह तआला उसके आख़िरत के ग़मों को दूर करेगा और वह क़ब्र से खुश ख़ुर्रम उठेगा।

सोम (तीसरा)- शेख़ कुलैनी (र 0) और शेख़ सद्दूक (र 0) सुदीर सैरनी से तूलानी रवायत करते हैं और कहते हैं कि हज़रत इमाम जाफ़रे सादकि़ (अ 0 स 0) ने फ़रमाया , जब अल्लाह तआला किसी मोमिन को उसकी क़ब्र से उठायेगा तो उसके आगे-आगे एक जिस्म मिसाली भी होगा , जब भी वह कोई तकलीफ़ या रंज देखेगा , तो वह मिसाली जिस्म कहेगा कि तू ग़मगीन व रंजीदा न हो। तुझे अल्लाह की तरफ़ से बख़शीश और ख़ुशनूदी की बशारत हो और मुक़ामे हिसाब किताब तक वह मिसाली जिस्म उसे बराबर खुशखबरी फ़रमाएगा , और उसे जन्नत में दाख़िल किए जाने का हुक्म सुनाएगा , वह मिसाली जिस्म उसे बराबर खुशख़बरी सुनाता रहेगा। बस अल्लाह तआला उसका हिसाब आसान फ़रमाएगा , और उसे जन्नत में दाख़िल किए जाने का हुक्म सुनाएगा , वह मिसाली जिस्म उसके आगे-आगे होगा।

वह मोमिन उससे कहेगा , खुदा तुझ पर रहमत करे। तू मुझे मेरी क़ब्र से बाहर लाया और बराबर अल्लाह ताला की रहमत व खुशनूदी की बशारत देता रहा। तू कितना ही अच्छा रफ़ीक़ है और अब मैं उन बशारतों को अपनी आंखों से देख चुका हूं। मुझे इतना तो बता दे कि तू कौन है ? वह कहेगा मैं वह खुशी और मुरुर हूं जो दुनिया में तो अपने मोमिन भाई के दिल के लिए मुहैया करता था। बस अल्लाह तआला ने उसके बदले मुझे पैदा किया ताकि तुझे इस मुश्किल वक़्त में बशारत खुशख़बरी सुनाता रहूं।

चहारुम (चार)- शेख़ कुलैनी (र 0) हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से रवायत करते हैं कि आपने फ़रमाया जो शख़्स सर्दी या गर्मी में अपने मोमिन (धर्मनिष्ठ) भाई को लिबास (कपड़ा) पहनाता है , हक़ तआला पर वाजिब हो जाता है कि वह उसे जन्नत का लिबास पहनाए और उसकी मौत और क़ब्र की तकलीफ़ को दूर करे और जब वह क़ब्र से बाहर आएगा तो उससे फ़रिश्ते मुलाक़ात करेंगे और उसे खुशनुदिए ख़ुदा की बशारत देंगे। अल्लाह ताला ने इस आयऐ शरीफा में इसकी तरफ़ इशारा फ़रमाया है।

“ और फ़रिश्ते उनसे मुलाक़ात करेंगे (और कहेंगे) यही वह तुम्हारा दिन है , जिसका तुमसे वायदा किया गया था। ”

( सू 0 अम्बिया , आ 0 103)

पंजुम (पांच)- सैय्यद इब्ने ताऊस किताबे इक़बाल में रसूले अकरम (स 0 अ 0) से रवायत करते हैं कि जो शख़्स माहे शअबान मे एक हज़ार बार “ लाइलाहा इल्ललाहो वला नअबुदो इल्ला इय्याहो मुख़लिसीन लहुद्दीना वलव करिहल मुशरिकून। ” पढ़े , हक़ तआला उसके नामए आमाल में हज़ार साल की इबादत दर्ज फ़रमाता है और उसके हज़ार साल के गुनाहों को मिटा देता है और जब वह क़यामत के दिन अपनी क़ब्र से बाहर आएगा तो उसका चेहरा चौहदवीं के चांद की तरह रोशन और उसका नाम सिद्दीक़ीन में होगा।

शश्शुम (छठा)- दोआए ज़ौशान कबीरा का माह रमज़ान के अव्वल में पढ़ना मुफ़ीद है।

हफ़तुम (सात)- तक़वा और परहेज़गारी क़यामत का लिबास है। “ व लिबासुतक़वा ज़ालिका ख़ैर ” मुत्तक़ी और पहरहेज़गारी ख़ुदायी लिबास के साथ वारिदे महशर होंगे और यह वही लोग हैं जिनसे खुदा ने वायदा किया है कि वह बरोज़े क़यामत नगे महशूर न होंगे।

क़ैफ़ियते हशर व नशर

मैं इस मुक़ाम पर एक रवायत (कथन) नक़ल करता हूं जो ज़्यादा मुनासिब और ठीक है , शेख़ अमीनुद्दीन तब्रसी मजमउल ब्यान में बर्रा बिन आज़िब से नक़ल फ़रमाते हैं , उन्होंने कहा कि एक रोज़ मआज़ बिने जबल रसूले अकरम (स 0 अ 0) के पास अबू अय्यूब अन्सारी के घर बैठा हुआ था कि इस आयत “ युनफ़ख़ो फ़िस्सूरे फ़तातूना अफ़वाजन ” के बारे में दरयाफ़्त किया। यानी जिस दिन सूर फूंका जाएगा। लोग गिरोह दर गिरोह इकट्ठा होंगे। आं हज़रत ने फ़रमाया , ऐ मआज ! तूने मुझसे एक सख्त सवाल किया है। बस आं हज़रत की आंखों से आंसू जारी हुए और फ़रमाया मेरी उम्मत के लोग दस कि़स्मों पर मुश्तमिल अलग-अलग शक्लों में उठेंगे-

1- कुछ बन्दर की शक्ल में।

2- कुछ खंज़ीर (सुअर) की शक्ल में।

3- कुछ सिर के बल चलते हुए महशर में आयंगे।

4- कुछ अंधे होंगे चो चल फ़िर न सकेंगे।

5- कुछ बहरे और गूंगे होंगे जो कोई चीज़ समझ न सकेंगे।

6- कुछ की ज़बाने बाहर निकली हुई होंगी और मुंह से नापाक पानी बह रहा होगी , जिसको चूसते होंगे।

7- क़यामत के रोज़ जमा होने वाले कुछ लोगों के हाथ-पांव कटे हुए होंगे।

8- कुछ आतशी (आग) के पेड़ों की टहनियों के साथ लटक रहे होंगे।

9- कुछ मुरदार से भी ज़्यादा गंदे और बदबूदार होंगे।

10- कुछ क़तरान के लम्बे-लम्बे चोंगे पहने होंगे , जो तमाम जिस्म और खाल के साथ चस्पां होंगे।

वह लोग जो खंज़ीर (सूअर) की शक्ल में होंगे , हरामख़ोर होंगे। जैसे रिश्वत वग़ैरा , जो लोग सिर के लब खड़े होंगे और जो लोग अन्दे होंगे। यह वह लोग होंगे जो सख़्ती और जुल्म के साथ हुक्मरानी किया करते थे। बहरे और गूंगे वह लोग होंगे जो अपने इल्मो फ़ज़ल और आमाल पर तकब्बुर किया करते थे। अपनी ज़बानों को चूसने वाले उल्मा और काज़ी होंगे , जिनके आमाल , अक़वाल के मुख़ालिफ़ थे। जिनके हाथ-पांव कटे हुए होंगे यह वह लोग होंगे , जिन्होंने दुनिया में अपने हमसायों (पड़ोसियों) को तकलीफ़ें दी थीं। जो लोग आतशी (आग) तख़्तएदार पर लटकाए जाएंगे। यह वह लोग होंगे , जो बादशाहों और हाकिमों के पास नुक़ताचीनी और चुग़लख़ोरी किया करते थे। जो लोग मुरदार से ज़्यादा बदबूदार होंगे। यह वह लोग होंगे जो शहवत व लज्ज़त से लुत्फ़ अन्दाज़ होते थे औऱ हुक़ूक़ अल्लाह अदा न करते थे। जो लोग क़तरान के जुब्बों में जकड़े हुए होंगे , यह वही लोग हैं जो दुनिया में फ़ख़्र (गर्व) तकब्बुर किया करते थे।

मुहद्दिस फ़ैज़ एनुलयक़ीन में नक़ल फ़रमाते हैं कि कुछ लोग ऐसी शक्लों में महशूर होंगे कि बन्दर और खंज़ीर (सुअर) की शक्लें उनसे अच्छी होंगी।

और रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व. ) से रवायत है कि आपने फ़रमायाः-

“ बरोज़े महशर लोग तीन क़िस्मों में मशहूर होंगे। कुछ सवार होंगे कुछ पैदल चल रहे होंगे और कुछ चेहरों के लब। रावी ने पूछा या रसूल अल्लाह (स.अ.व.व. ) वह चेहरों के लब कैसे चलेंगे। तो आपने फ़रमाया जिस खुदा ने उनको पांव पर चलना सिखाया , वही उनको चेहरे के लब चलाने पर भी क़ादिर है। ”

वह दिन पचास हज़ार साल के बराबर होगा

“ (वह एक दिन) जिसका अन्दाज़ा पचास हज़ार बरस का होगा। ”

बहारुल अनवार जिल्द सोम में कुछ रवायत में मासूम (अ 0 स 0) से मनकूल है कि आपने फ़रमाया , क़यामत के पचास मौक़्क़िफ़ हैं , जिनमें से हर एक हज़ार साल का है और हर एक में मुजरिमों को एक हज़ार साल तक रोका जाएगा। इस मक़दार से मुराद ज़माने का हिस्सा है। वरना वह दिन ऐसा है , जिस दिन न सूरज होगा ना चांद।

यहां सिर्फ़ दुनियां के दिन के बराबर मक़दार ज़ाहिर की गयी है और इन्सान की आंख हर वह चीज़ देख लेगी , जो वह रात की तारीकी में नहीं देख सकती , जो आमाल दुनियां मे एक दूसरे से पोशीदा थे। वह तमाम ज़ाहिर और आशकारा हो जाएंगे।

एक दूसरी जगह इरशादे कुदरत है।

“ और हर वह चीज़ ज़ाहिर हो जाएगी , जिसका उन्हें गुमान (अन्दाज़) भी न था। ”

दुनिया जुल्म का घर है किसी को दूसरे के बातिन की ख़बर नहीं है , बल्कि अपने बातिन से भी बेख़बर है , लेकिन क़यामत हक़ीक़ी दिन है इसमें आफ़ताबे हक़ीक़त , रोज़े क़यामत पचास हज़ार साल के बराबर चमकता रहेगा ताकि हम समझ लें कि मैं क्या था और मेरे दूसरे साथी क्या थे ? इसमें पहला मौक़िफ़ हैरत है। जैसा गुज़रा है कि इन्सान कई साल तक क़ब्र के किनारे हैरान खड़ा रहेगा। उस हालत में ख़ौफ़ की वजह से सिवाय हमहमा के कोई आवाज़ नहीं सुनेंगे।

औऱ आवाज़ देना चाहेंगे मगर उनके दिल ख़ौफ़ के मारे गले को आ चुके होंगे।

किसी के गले से आवाज़ न निकल सकेगी फ़िर मौक़िफ़े सोहबत होगा कि एक दूसरे से अहवाल पुरसी करेंगे।

इसी तरह एक के बाद दूसरा मौक़िफ़ गुज़रता रहेगा तमाम लोग पतंगों की तरह बिखरे हुए होंगे।

उसके भाई-भाई से मां-बाप और अहले अयाल से भागेगा यह वह दिन है कि कोई शख़्स भाग नहीं सकेगा और फ़रिश्ते हर तरफ़ से उसका अहाता किए हुए होंगे।

“ ऐ जिन्न व इन्स अगर तुम ताक़त रखते हो भागने की भाग जाओ , आसमान व ज़मीन से ” इन्सान कहेगा ऐनल मफ़्फ़रो कहां भाग सकता हूँ।

हरगिज़ कोई नहीं भाग सकता। सिवाय परवर दिगारे आलम के हुज़ूर खड़ा होने के कोई ठिकाना नहीं। फ़िर सवाल का मौक़िफ़ आएगा। हर शख़्स अपने दोस्तों , रिश्तेदारों से सवाल करेगा कि कुछ नेकियां मुझे दे दो। बाप औलाद पर एहसान जताएगा कि तेरे लिए कितनी तकलीफ़ों के साथ सहूलियतें मुहैय्या की। खुद न खाता था , तुझे देता था , अब एक नेकी तो दे दो बेटा कहेगा बाबा मैं इस वक़्त आपसा ज़्यादा मोहताज हूँ। कोई किसी की फ़रियाद की तरफ़ ध्यान न देगा। (मआद)।


फसल शश्शुम (छः)

नामए आमाल

क़यामत की हौलनाक मंज़िलों में से एक मंज़िल नामए आमाल दिए जाने का है , चुनांचे हक़ तआला औसाफ़े क़यामत से फ़रमाते हैं-

“ और जिस वक़्त नामए आमाल खोले जाएंगे ” यह उन चीज़ों में से एक है , जिनका एतेक़ाद (विश्वास) रखना ज़रुरयाते दीन में से है। कुर्आन मजीन में है कि “ किरामन कतिबीन ” आमाल को लिखते हैं और वह जानते हैं जो कुछ तुम करते हो।

एक दूसरी जगह इन दोनों फ़रिश्तों को रक़ीब और अतीद के नाम से याद किया गया है।

इन्सान जो कुछ करता , देखता है , यहां तक कि वह नेकी के इरादे को भी तहरीर करते हैं। रावी ने इमाम अलैहिस्सलाम से पूछा कि वह नेकी की नियत कैसे मालूम करते हैं , ताकि वह तहरीर करें। हज़रत ने इरशाद फ़रमाया। इन्सान जिस वक़्त नेकी का इरादा करता है तो उसके मुंह से ख़शबू बलन्द होती है , जिससे फ़रिश्ता समझ लेता है कि उसने नेकी का इरादा किया है और जब वह बुराई का इरादा करता है तो उसके मुंह से बदबू निकलती है , जिसकी वजह से फ़रिश्ता को तकलीफ़ होती है जिससे वह वाक़िफ़ हो जाता है। इन्सान जब नेकी का इरादा करता है तो उशके नामए आमाल में एक नेकी लिख देते हैं और अगर वह इरादा के मुताबिक काम भी करे तो दस नेकियां लिखी जाती हैं और गुनाह उस वक़्त तक दर्ज नहीं होता जब तक अम्ली तौर पर न किया जाय , जैसे कि इस आयत से ज़ाहिर है।

“ जो शख़्स नेकी करेगा तो उसको उसका दस गुना सबाव अता होगा और जो शख़्स बदी करेगा तो उसकी सज़ा उसको बस इतनी ही दी जाएगी औऱ वह लोग (किसी तरह) सताए न जायेंगे। ”

लुत्फ़े ख़ुदावन्दी यह है कि जब कोई इन्सान गुनाह करता है और अतीद उसे लिखना चाहता है तो रक़ीब उससे कहता है कि उसको मोहलत दो , शायद पशेमान (शर्मिन्दा) होकर तौबा कर ले वह उसको पांच सात घंटे तक दर्ज नहीं करता। अगर तौबा न करे तो वह कहते हैं , यह बन्दा कितना बेहया और उसके नामए आमाल में एक गुनाह लिख देता है।

ज़ाहिर रवायात से पता चलता है कि हर इन्सान के दो आमाल नामे हैं एक वह जिसमें नेकिया दर्ज हैं दूसरा वह जिसमें गुनाह दर्ज हैं औऱ इनमें इन्सान का हर फ़ेल (कार्य) दर्ज होता है यहां तक कि वह फूंक भी जो आग जलाने के लिए निकाला जाता है।

शेख़ सूदूक (र 0) एतेकादिया में नक़ल फ़रमाते हैं , कि एक रोज़ अमीरूल मोमनीन अलैहिस्सलाम एक जगह से गुज़र रहे थे कि कुछ नवजवानों पर नज़र पड़ी जो लग़ोयात में मसरुफ़ थे और हंस रहे थे हज़रत ने फ़रमाया कि तुन अपने नामए आमाल को इन चीज़ों से कयों स्याह (काला) कर रहे हो। उन्होंने अर्ज़ किया अमीरूल मोमनीन (अ 0 स 0) क्या यह बातें भी तहरीर होती हैं आपने फ़रमाया हां। यहां तक कि वह सांस भी लिखा जाता है , जो बाहर निकाला जाता है , उस कांटे का सवाब भी जो रास्ते से हटाया औऱ वह पत्थर और छिलका जो लोगों के आराम के लिए रास्ते से हटाया जाता है यह मामूली अमल (कार्य़) भी बेकार नहीं होते। (मआद)।

आओ मेरे आमालनामा को पढ़ो

वह बच्चा जो मदरसा या स्कूल में फ़्रस्ट आत है , वह इतना खुश होता है कि अपने दोस्तों को आवाज़ देकर कहता है , आओ मेरे कारनामे को देखो कि मैं फ़स्रट (प्रथम) आया हूं। इशी तरह बरोज़े क़यामत मोमिन (धर्मनिष्ठ) अपने नामए आमाल को दांए हाथ में लेकर खुशी से अपने दोस्तों को आवाज़ देगा।

“ आओ मेरे नामए आमाल को पढ़ो। ” मेरा नमाज़ , रोज़ा और दूसरे आमाल कुबूल हो गये। मेरी तरफ़ देखो।

मैं दुनियां मे इस रोज़े हिसाब की मुलाक़ात से फ़िक़्रमंद (चिन्तित) था , आज मेरा हिसाब पूरा हो गया।

पस वह शख़्स खुशबख़्त है और बेहश्त में हमेशा आसूदा ज़िन्दगी में रहेगा।

लेकिन वह बदबख़्त बच्चा जो नाकाम हो जाय , वह गली कूचों में सिर झुकाए बुरे हाल में अपने मकान की तरफ़ रवाना हो जाता है। कभी यह आरज़ू करता है कि काश! मैं मर गया होता और कभी अपने-आपको हौसला देता है कि-

गिरते हैं शहसवार ही मैदाने जंग में- बस यही हाल इस वक़्त गुनाहगारों का होगा।

काश! मुझे मेरा नामए आमाल न दिया जाता औऱ मैं उसकी वजह से रुसवा (बदनाम) न होता और काश अपने हिसाब से वाक़िफ़ न होता , क्योंकि इसमें सिवाय अज़ाब और हसरत के कुछ भी नहीं करना , वह मौत जिससे मैं दुनिया में डरता था , हमेशा की मौत होती और उसके बाद यह ज़िन्दगी न होती। यह तलख़ी (कडुवाहट) उस मौत की तलख़ी (कडुवाहट) से भी ज़्यादा सख़्त है। और मेरे माल ने जिसको मैंने दुनिया में जमा किया था बेपरवाह न किया। मेरा वह ग़लबा और हुक्मरानी ख़त्म हो गयी और अब मैं ज़लील व रुसवा (बदनाम) हो गया हूँ।

जिस शख़्स को उसका आमाल नामा पुश्त (पीठ) के पीछे से दिया जाएगा (वह इस तरह की दांए हाथ को गर्दन से बांध दिया जाएगा और बायें हाथ को पुश्त के पीछे से करके नामए आमाल पसे पुश्त बायें हाथ में दिया जाएगा) और उससे कहा जाएगा कि पढ़ अपने आमाल को। वह कहेगा कि मैं पुश्त के पीछे से कैसे पढ़ सकता हूं। फिर उसकी गर्दन मरोड़ दी जाएगी या रवायत दीगर (दूसरे कथन के अनुसार) दाढ़ी से उशके सिर को पिछे की तरफ़ कर दिया जाएगा और पढ़ने को कहा जाएगा ।

औऱ वह तमाम गुनाहों की तफ़सील (विवरण) जो किए होंगे पढ़कर “ सबूरन ” की तदा (आवाज़) बलन्द करेगा।

“ वाय हम पर , इस किताब को क्या हो गया कि उसने कोई छोटी बड़ी चीज़ नहीं छोड़ी , जिसको न गिना हो और वह अपने हर अमल को सामने हाजि़र देखेंगे और तेरा रब किसी पर जुल्म नहीं करता। ” ( मआद)

आमालनामों से इन्कार

बाज़ (कुछ) रवायात से यह भी मुस्तफ़ाद होता है कि उस वक़्त कुछ ऐसे लोग भी होंगे जो ऐसे वक़्त में साफ़-साफ़ इंकार कर देंगे और कहेंगे , कि बारे इलाहा जो आमाल व अफ़आल , इस नामा में दर्ज हैं , ये हमारे नहीं है।

इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से मर्वी है कि उस वक़्त ख़ल्लाके आलम कातबाने आमाल को बतौर गवाह पेश करेगा। उस वक़्त वह कहेंगे कि बारे इलाहा! यह तेरे फ़रिश्ते हैं , तेरे ही हक़ में गवाही दे रहे हैं , वरना यह हक़ीक़त है कि हमने यह काम हरगिज़ नहीं किए और वह अपने दावे पर क़समें खायेंगे , जैसा कि कुर्आन मजीद में है-

“ जिस दिन कि ख़ल्लाक़े आलम उन्हें मबूस फ़रमायेंगा तो (वह आमाल बन्द न करने) पर इसी तरह क़समें खायेंगे जिस तरह तु्म्हारे लिए खाते हैं। ”

जब उनकी बेहयाई इस हद तक बढ़ जाएगी , तो उस वक़्त ख़ल्लाके आलम उनके मुंह पर मुहरें लगा देगा औऱ उनके आज़ा व जवारेह पुकार-पुकार कर गवाही देंगे।

“ आज हम उनके मुंहों पर मुहरें लगा देंगे और जो कारस्तानियां यह लोग (दुनियां में) कर रहे थे , खुद उनके हाथ हमको बता देंगे और उनके पांव गवाही देंगे।

एक दूसरे मुक़ाम पर फ़रमाया-

“ और जिस दिन अल्लाह के दुश्मन जहन्नुम के पास जमा किए जायेंगे , फिर रोके जायेंगे , यहां तक कि जब वह जहन्नुम में पहुंच जायेगे तो उनके काम और आंखे उनकी खालें उन बदआमालियों की गवाही देंगे। ”

और वह अपने आज़ा (अंगो) से कहेंगे-

तुम हम गर क्यों गवाही दे रहे हो ?

हमें उसी क़ादिरे क़य्यूम ने गोया किया , जो हर चीज़ को गोया करता है। उस वक़्त यह लाजवाब हो जाएंगे।

उनका यह इक़रार और इसरार उनकी बहुत बड़ी हिमाक़त (बेवकूफ़ी) की दलील है , वरना अगर वह इक़रार कर लेते तो इसमें शक न था कि रहीम व करीम की रहमतें वासएः उनके शामिले हाल होगी।

अनवारे नामानियां में एक रवायत में है कि जब आमाल तौले जाएंगे और आदमी की बुराईयां ज़्यादा होगी। मलायका को हुक्म होगा इसे जहन्नुम में डाल दें।

जब मलायका उसे लेकर चलेंगे तो वह पीछे मुड़कर देखेगा। इरशादे कुदरत होगा पीछे क्यों देखता है ? अर्ज़ करेगा पालने वाले मुझे तेरे मुत्तालिक़ यह हुस्ने ज़न तो न था कि तू आतश (आग) में झोंक देगा। इरशादे कुदरत होगा। ऐ मेरे मलायका मुझे अपनी इज्ज़त व जलाल की क़स्म। गो (यद्यपि) उसने दुनियां में एक दिन भी हुस्नेज़न क़ायम नहीं किया था , मगर अब दावा करता है , इसे जन्नत में दाख़िल कर दो। (अहसनुल फ़वायद)।

एयाशी हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से रवायत (कथऩ) करते हैं कि क़यामत (प्रलय) के दिन हर शख़्स को उसका नामए आमाल पकड़ाया जाएगा और उसे पढ़ने को कहा जाएगा।

बस अल्लाह तआला उसके देखने , बोलने , चलने के सभी अंगो को इकट्ठा करेगा। बस वह शख़्स कहेगा , हाय अफ़सोस! मेरे आमालनामा को क्या हो गया है ? कि उसमें मेरा कोई सग़ीरा , कबीरा (छोटा , बड़ा) गुनाह (पाप) नहीं छोड़ा गया , मगर उसका अहसा कर लिया गया है।

इब्ने क़ौलूया हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से रवायत करता है कि जो शख़्स रमज़ान के महीने में हज़रत इमाम हुसैन (अ 0 स 0) की क़ब्र की ज़ियारत करे या ज़ियारत के सफ़र (यात्रा) में फ़ौत (मृत्यु) हो जाय तो उसके लिए बेरोज़े क़याम कोई हिसाब किताब न होगा और वह बेख़ौफ़ व ख़तर दाख़िले जन्नत होगा।

अल्लामा मजलिसी तोहफ़ा में दो मोतबर (विश्वसनीय) असनाद (प्रमाण) के हवाले से रवायत (कथन) करते हैं कि हज़रत इमाम रज़ा (अ 0 स 0) ने फ़रमाया जो शख़्स दूर दराज़ से मेरी क़ब्र की ज़ियारत करेगा हम उसे बरोज़े क़यामत तीन चीज़ों से महफूज़ (सुरक्शित) रखेंगे।

1- उसे क़यामत की हौलनाक़ियों से महफूज़ रखेंगे , जबकि नेकूकार को नामाए आमाल उनके दायें हाथ में दिया जाएगा और बुरे आमाल वालों को बायें हाथ में देगा।

2- पुले सरात के अज़ाब से नजात मिलेगी।

3- मिज़ाने आमाल के वक़्त महफूज़ रहेगा।

हक्क़ुल यक़ीन में लिखा है कि हुसैन बिने सईद किताबे जुहद में हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से एक रवायत (कथन) ब्यान करते हैं कि अल्लाह तआला जब किसी मोमिन के हिसाब का इरादा करेगा तो उसके नामए आमाल को उसके दाहिने हाथ में देगा और अल्लाह ताला उसका खुद हिसाब लेगा , ताकि कोई दूसरा शख़्स उसके हिसाब से मुत्तिला (सूचित) न हो अल्लाह तआला अपने मोमिन बन्दे से कहेगा। ऐ मेरे ख़ास बन्दे , क्या तूने फलां (अमुक) काम भी किया था , तो वह मोमिन कहेगा परवर दिगार! मैंने किये हैं पस अल्लाह तआला फ़रमाएगा , मैंने उन गुनाहों (पापों) को तेरी ख़ातिर बख़्श दिया है और उनको नेकियों में तब्दील कर दिया है।

लोग उसको जन्नत में देख कर कहेंगे। सुब्हान अल्लाह यह आदमी कोई गुनाह (पाप) नहीं रखता।

अल्लाहतआला के फ़रमान “ जिस किसी को उसका नामए आमाल उसके दायें हाथ में दिया जाएगा तो वह ख़ुश व ख़ुर्रम अपने अहले ख़ाना के पास जाएगा। ” इसका यह मतलब है। रावी ने पूछा कि या हज़रत जन्नत में उसके घर वाले कौन होंगे , तो इमाम अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया बरोज़े क़यामत उसके अहले ख़ाना वही होंगे जो दुनियाँ में थे बशर्ते कि वह मोमिन हों। अगर अल्लाहतआला किसी बुरे शख़्स का हिसाब लेगा तो अल्लाहतआला उसका हिसाब ऐलानियां और औहले महशर के सामने लेगा और उस पर हुज्जत का ख़ात्मा करेगा और उसके नामए आमाल को बायें हाथ में पसे पुश्त देगा और वह हाय हलाकत , हाय हलाकत पुकारता हुआ वासिले जहन्नुम होगा और वह ऐसा शख़्स होगा , जो इस दुनियाए फ़ानी (नश्वर संसार) के अन्दर अपने अहेल ख़ानदान के साथ ऐशो इशरत की ज़िन्दग़ी गुज़ारता था और आख़िरत पर ईमान न रखता था और इसमें इशारा है कि अल्लाहतआला क़यामत के दिन मुनाफ़िकों और काफ़िरों (नास्तिक) के हाथों को पसे गर्दन बांध देगा और वज़ू हाथ धोने की दुआ में इन दोनों हालतों की तरफ़ इशारा किया गया है-

“ ऐ मेरे अल्लाह मेरा नामए आमाल मेरे दायें हाथ में देना। हमेशा जन्नत में जगह देना औऱ मुझसे मेरा हिसाब जल्दी फ़रमाना। ऐ अल्लाह मेरा नामए आमाल मेरे बायें हाथ मे पसे पुश्त न देना और बरोज़े क़यामत मेरी गरदन न लटकाना और मैं आग के शोलों से तेरी पनाह चाहता हूँ। ”

मैं इस मुक़ाम पर सैय्यद बिने ताऊस की रवायत को तर्बरुकन ब्यान करना मुनासिब समझता हूँ और उसका खुलासा (सूक्शम) यह है कि जब रमज़ान का महीना शुरू होता है तो इमाम ज़ैनुल आबदीन (अ 0 स 0) अपने गुलामों (सेवकों) औऱ लौंडियों (सेविकाओं) को उनके जरायम (अपराध) की सज़ा नहीं देते थे , बल्कि उन गुलामों और कनीज़ों के नाम और उस जुर्म की सज़ा को एक रजिस्टर में लिख देते थे , बजाय इसके कि वह उनकी ग़ल्ती की सज़ा उसी वक़्त दें। यहां तक की रमज़ान के महीने की आख़िरी रात को इन मुजरिमों (अपराधियों) को बुलाते , फ़िर वह किताब जिसमें उनके तमाम गुनाह (पाप) दर्ज होते उठा लाते और फ़रमाते क्या तुझे याद है कि फ़लां (अमुक) दिन तूने फ़लां जुर्म किया था और मैंने तुझे रज़ा नहीं दी थी। वह ग़ल्ती का ऐतराफ़ करते हुए अर्ज़ करते , यबना रसूल अल्लाह (स 0 अ 0) सचमुच हमसे यह गल्ती हुई। यहां तक कि हर एक को बुलवाकर ग़ल्तियों की तसदीक़ करवाते फ़िर उनके दरमियान खड़े हो जाते और पुकार कर कहते। तुम अपनी आवाज़ें ऊँची करके कहो , “ ऐ अली बिने हुसैन (अ 0 स 0) तेरे परवर दिगार ने भी इसी तरह तेरे आमाल गिन रखे हैं , जिस तरह तूने आमाल गिन रख़े हैं। ” अलालाहतआला के पास ऐसी की किताब मौजूद है जो खुद बोलती है और अल्लाहतआला तुम्हारा कोई छोटा बड़ा अमल नहीं छोड़ता , जो इसमें तहरीर न हो और इसी तरह जिस तरह तूने हमारे आमाल दर्ज कर रखें हैं तेरे आमाल दर्ज हैं , जिस तरह तू रब से बख़़शीश औऱ चश्म पोशी की उम्मीद रखता है कि वह तुझे माफ़ करदे इसी तू हमारे गुनाहों को माफ़ फ़रमा। ऐ अली (अ 0 स 0) बिने हुसैन तू अपने उस मुक़ाम को देख , जो तुझे बरोज़े क़यामत अपने परवर दिगार के सामने मिलेगा , क्योंकि अल्लाहतआला बड़ा आदिल (इन्साफ़ करने वाला) है और वह किसी पर राई के दाना के बराबर भी जुल्म व सितम नहीं करता। बस तुम हमसे दरगुज़र करो और माफ़ करो ताकि अललाहतआला तुझे क़यामत के दिन माफ़ करे क्योंकी अल्लाह तआला ने ख़ुद कलाम पाक में इरशाद फ़रमाया हैः-

और दरगुज़र और माफ़ कीजिए। क्या तुम पसन्द नहीं करते की अल्लाह ताला तुम्हे माफ़ कर दे और हज़रत अली बिन अलहुसैन गुलामों और कनीज़ों को बराबर ऐसे कलमात के ज़रिए तलक़ीन (उपदेश) फरमाते और उनके गुलाम आप से यही कलमात कहते रहते और उनके दर्मियान खड़े होकर रोते रहते औऱ रो-रो कर अल्लाह ताले से दुआएं मांगते रहते और कहा करते थे। ऐ खुदाया तूने हमें माफ़ कर देने का हुक्म दिया है ऐ अल्लाह हमने उन लोगों के जुल्म व सितम माफ़ कर दिए हैं। ऐ अल्लाह तू भी हमारी ग़ल्तियों को माफ़ फ़रमा। क्योंकि तू बेहतरीन माफ़ करने वाला है। ऐ अल्लाह! तूने हमें सवाली को दरवाज़े से ख़ाली वापस करने से मना फ़रमाया। बस तू हमें अपने दरवाज़े से ख़ाली हाथ वापस न कर! ऐ अल्लाह हम भी सवाली बनकर तेरे दरवाज़े पर आए हैं , और तेरे रहमों करम की उम्मीद रखते हैं। ऐ अल्लाह तू हमें नाउम्मीद और तहीदस्त वापस ना लौटा।

हज़रत इमाम ज़ैनुल आब्दीन (अ 0 स 0) ऐसे ही कलमात कहते हुए अपने गुलामों और कनीज़ों की तरफ मुहं करके फ़रमाते हैं के मैंने सबको माफ़ किया। क्या तुमने भी मेरी ग़ल्तियों को जो मैंने तुम्हारे साथ किए माफ़ कर दिया ? क्योंकि मैं ज़ालिम हाकिम हूँ औऱ खुद एक मेहरबान आदिल , हाकिम का महकूम और रियाया हूं तो गुलाम और कनीज़े अर्ज़ करते , ऐ आक़ा। हमने आपको माफ़ किया लेकिन आपने हम पर कोई जुल्म नहीं किया आप फ़रमाते हैं कि तुम कहो ऐ अल्लाह , तू अली (स 0 अ 0) बिन अल हुसैन को बख़्श दे , जैसा कि उसने हमें माफ़ कर दिया। ऐ अल्लाह तू इन्हें आग से छुटकारा दे , जिस तरह उन्होंने हमें गुलामी की क़ैद से आज़ाद कर दिया है।

बस जब ईदुल फ़ितर का दिन गुज़र जाता तो आप वह तमाम चीज़ें जो उन गुलामों औऱ कनीज़ों के पास होती बख़्श देते औऱ उनको दूसरों से बेनियाज़ कर देते और हर साल माह रमज़ान की आख़िरी शब को कमो बेश बीस गुलामों को आज़ाद फ़रमाते औऱ आप फ़रमाते थे कि अल्लाह माह रमज़ान की हर शब रोज़ा अफ़्तार करने के वक़्त सात लाख आदमियों को जहन्नुम की आग से आज़ाद करता है , जिनमें से हर एक जहन्नुम का सज़ावार और हक़दार होता है , और जब रमज़ान की आख़िरी रात होती है , तो अल्लाह ताला इतने लोगों को अज़ाद फ़रमाता है , जितने तमाम माह रमज़ान में आज़ाद होते हैं और मैं इस बात को बहुत पसन्द करता हूं कि हक़तआला देखे कि मैंने दुनियाँ में इस उम्मीद पर अपने गुलामों को आज़ाद किया था कि अल्लाह तआला मुझे जुहन्नुम की आग से आज़ाद फ़रमाए।

फ़रिश्ते नामए आमाल को रसूले ख़ुदा (स 0 अ 0) औऱ आइम्मए हुदा कि ख़िदमत में ले जाते हैं।

फ़रिश्ते इन्सान के नामए आमाल को रसूले ख़ुदा (स 0 अ 0) की ख़िदमत में पेश करते हैं , इसके बाद आइम्मए ताहरीन की ख़िदमत में सबसे आख़िर हज़रत इमाम ज़माना (अ 0 स 0) के हुज़ूर में हाज़िर होते हैं। इमाम दोनों दफ़्तरों को देखते हैं और अपने नाम लेवाओं के सहीफ़ए गुनाह को देखकर उनके लिए असतग़फ़ार करते हैं और जो ख़ताएं का़बिले इस्लाह हों , उनकी इस्लाह फञरमाते हैं , इसीलिए अपने शियों को फ़रमाते हैं कि जब तुम्हारा सहीफ़ए गुनाह मेरे पास आए तो चाहिए कि वह क़ाबिले इस्लाह हों गुनाहों क गट्ठर होने की वजह से ना क़ाबिले इस्लाह न हों , फ़िर वह आसमान की तरफ़ ले जाते हैं , यही मतलब इश आयत का है।

“ तुम बराबर अमल किए जाओ। तुम्हारे आमाल को ख़ुदा देख रहा है और उसका रसूल भी और कुछ ख़ालिस मोमनीन (आइम्मए ताहरीन) भी देख रहे हैं। ”


फ़स्ल हफ़तुम (सात)

मीज़ाने आमाल

हर तबक़ए फ़िक्र ने अपने-अपने ख़्याल के मुताबिक़ मिज़ाने आमाल के बारे में क़यास आराई की है। कुछ कहते हैं कि नामए आमाल का वज़न किया जाएगा। कुछ आमाल की सूरते जिस्मिया के वज़न के क़ायल हैं और तीसरा क़ौल यह है कि आमाले हसनेा को एक ख़ूबसूरत शक्ल में लाया जाएगा औऱ बुरे आमाल को बदसूरत शक्ल में। अल्लामा रहमतुल्ला जज़ायरी अनवारे नामानियां में फ़रमाते हैं कि अख़बार मुस्तफ़ीज़ा बल्कि शुरू से जो अम्र सराहतन साबित होता है , वह यह है कि आमाल मुजस्सम हो जायेंगे और खुद ही आमाल क़यामत के रोज़ वज़न किए जायेंगे। (अहसनुल फ़वायद)

कुछ रवायात में अधिकतम वज़न की जो हद (सीमा) यह की गयी है , जिसके मुताबिक़ आमाल को तौला जाएगा। वह अम्बिया और औसिया के आमाल हैं। चुनांचे एक जगह ज़ियारत में है अस्सलाम अला मिज़ानिल आमाल और हज़रत अली (अ 0 स 0) को मीज़ाने हक़ कहा गया है अव्वलीन व आख़रीन की नमाज़ का मीज़ान (तराज़ू) हज़रत अली की नमाज़ है। हज़रत जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) आले मोहम्मद (स 0 अ 0) से मर्वी है कि आपने फ़रमाया-

“ वह मीज़ान जिस पर मख़लूक़ात की इबादात व अफ़आल तौले जायेंगे वह अम्बिया व औसिया औऱ आले मोहम्मद (स 0 अ 0) हैं। ”

क़यामत के दिन देखा जायेगा कि उनकी नमाज़ हज़रत अली (अ 0 स 0) की नमाज़ के मुशाबेह है , वह खुशू और खूज़ू औऱ सिफ़ाते कमालिया जो हज़रत अली (अ 0 स 0) की नमाज़ में पाये जाते हैं हमारी नमाज़ में भी मौजूद हैं या नहीं। हमारी सख़ावत , शजाअत , रहमों करम , इन्साफ़ उनके अफ़आल (कार्य) से मिलते-जुलते हैं या नहीं। हमारे कार्य उनके कार्य के मुख़ालिफ़ हों , कि मीज़ाने हक़ अली से फ़िरकर उनके दुश्मनों ,, माविया व यज़ीद के किरदार (चरित्र) को अपना लें या अपने आपको उन रास्ते पर चलाएं , जिन्होंने फ़िदके जनाबे सैय्यदा को ग़सब किया (मआद)।

ख़ल्लाक़े आलम सूरए आराफ़ में फ़रमाते हैं-

“ क़यामत के दिन आमाल का तौला जाना बरहक़ है , जिसकी नेकियों का पलड़ा भीरा होगा , वही लोग , फ़लाह पाने वाले होंगे और जिसकी नेकियों का पलड़ा हल्का होगा यह वही लोग होंगे जिन्होंने हमारी आयत पर जुल्म करते हुए अपने आपको ख़सारे में डाल दिया। ”

और सूरए क़ारआ में फ़रमायाः-

“ शुरू अल्लाह , रहमान व रहीम के नाम से। खड़खड़ा डालने वाली क्या है ? ख़ड़ख़़डा डालने वाली , और तुझे क्या इल्म की खड़ाखड़ा डालने वाली क्या है ? जिस दिन लोग बिखरे हुए पत्तिगों की तरह हो जाएंगे और पहाड़ धुनी हुई रंगीन रुई की तरह हो जाएंगे। बस वह शख़्स जिसकी नेकियां वज़नी होंगी। वह पसंदीदा जि़न्दगी गुज़ारेगा और जिसकी नेकियों का वज़न का मोक जाएगा , उनका ठिकाना , हावया होगा और तुझे क्या इल्म की हावया क्या है ? वह भड़कती हुई आग है। ”

मीज़ाने आमाल को वज़नी करने के लिए मोहम्मद व आले मोहम्मद (स 0 अ 0) पर सलवात और हुस्ने ख़ल्क़ से बेहतर कोई अमल नहीं है। मैं इस मुक़ाम पर सलवात की फ़ज़ीलत में चंद रवायात नक़ल करता हूं। तीन रवायात मय हिकायात हुस्न खुल्क़ लिखकर अपनी किताब की फ़ज़ीलत देता हूं।

1- अव्वल (पहला)- शेख़ कुलैनी (र 0) बसनद मोतबर रवायत (कथन) करते हैं कि इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) या इमाम मोहम्मद बाक़र (अ 0 स 0) ने फ़रमाया कि मीज़ाने आमाल मोहम्मद व आले मोहम्मद (अ 0 स 0) पर सलवात से बढ़कर कोई चीज़ वज़नी नहीं। एक शख़्स के आमाल का वज़न किया जाएगा , जब वह हल्के नज़र आएंगे तो सलवात लाकर रखा जाएगा तो मीज़ान वज़नी हो जाएगी।

2- दोम (दूसरा)- रसूले अकरम (स 0 अ 0) से मर्वी है कि क़यामत के दिन मीज़ाने आमाल के वक़्त मैं मौजून हूंगा। जिस शख़्स का बुराइयों का पलड़ा भारी होगा। मैं उस वक़्त उसकी सलवात को जो उसने मुझ पर पढ़ी होगी , लाऊँगा , यहां तक की नेकियों का पलड़ा वज़नी हो जाएगा।

3- सोम (तीसरा)- शेख़ सद्दूक (र 0) हज़रत इमाम रज़ा (अ 0 स 0) ने नक़ल फ़रमाते हैं कि आपने फ़रमाया जो शख़्स अपने गुनाहों को मिटाने की ताक़त न रखता हो , उसे चाहिए कि वह मोहम्मद व आले मोहम्मद (स 0 अ 0) पर बहुत ज़्यादा दुरूद व सलवात पढ़ा करे , ताकि उसके गुनाह (पाप) ख़त्म हो जाएं।

4- चहारुम (चार)- दावाते रावन्दी से मनक़ूल (उद्धृत) है कि रूसले अकरम (स 0 अ 0) ने फ़रमाया जो शख़्स हर शबो रोज़ तीन-तीन बार मेरी हुज्जत और शौक़ के सबब मुझ पर सलवात पढ़े तो अल्लाह तआला पर यह हक़ हो जाता है कि वह उस शख़्स के दिन औऱ रात के गुनाहों को बख़्श दे।

5- पंजुम (पांच)- आं हज़रत (स 0 अ 0) से मर्वी है कि आपने फ़रमाया कि मैंने अपने चचा हमज़ा बिने अब्दुल मुतलिब औऱ अपने चचाज़ाद भाई जाफ़र बिने अबी तालिब (अ 0 स 0) का ख़्वाब में देखा कि उनके सामने सदर (बेर) का एक तबक़ पड़ा है। थोड़ी देर खाने के बाद वह बेर अंगूरों में तब्दील हो गये , जब थोड़ी देर खा चुके तो वह अंगूर आला किस्म के खजूर बन गए। वह लोग उनको खाते रहे। फिर मैंने उनके क़रीब पहुंचकर मालूम किया। मेरे मां बाप आप पर कुर्बान हों। वह कौन-सा अमल आपने किया है , जो सब आमाल से बेहतर है और जिसकी वजह से आपको यह नेआमतें मिली। उन्होंने अर्ज़ किया कि हमारे मां-बाप आप पर कुर्बान हों। वह अफ़ज़ल आमाल आप पर सलावत और हाजियों को पानी पिलाना औऱ मोहब्बते अली (अ 0 स 0) बिने अबी तालिब है।

6- शश्शुम (छः)- आं हज़रत (स 0 अ 0) से मर्वी है कि जिस शख़्स ने मुझ पर किताब में तहरीर करके सलवात भेजी तो जब तक इस किताब में मेरा नाम मौजूद रहेगा उस वक़्त तक फ़रिश्ते उसके लिए इस्तेग़फ़ार करते रहेंगे।

7- हफ़तुम (सात)- शेख़ कुलैनी (र 0) हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से रवायत करते हैं कि आपने फ़रमाया कि जब भी पैग़म्बर का ज़िक्र ख़ैर हो तो तुम्हें आप (स 0 अ 0) पर सलवात पढ़ना चाहिए। इस तरह जो शख़्स एक बार आं हज़रत पर सलवात पढ़ेगा , अल्लाह तआला फ़रिश्तों की हज़ार सफों में उस पर हजार बार सलवात भेजता है अल्लाह तआला और मलायका की सलवात की वजह से तमाम मख़लूक़ात उस पर सलवात भेजेगी। बस जो शख़्स इस तरफ़ रग़बत नहीं करता वह जाहिल और मग़रूर है और खुदा व रसूल और उसके अहलेबैत ऐसे शख़्स से बेज़ार हैं।

मआनी अल अख़बार में हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से आया “ इन्नल्लाह वमलायकतहू युसल्लूना अलन्नबीय ” के मानी में रवायत की गयी है। उन्होंने फ़रमाया। अल्लाह तआला की तरफ़ से सलवात का मतलब रहमत है औऱ मलायका की तरफ़ से तज़किया (बचाव) है और लोगों की तरफ़ से दुआ है। इसी किताब मे है कि रावी ने कहा कि हम मोहम्मद (स.अ.व.व. ) व आले मोहम्मद पर कैसे सलवात भेजे तो फ़रमाया तुम कहोः-

“ सलवातुल्लाह व सलवातो मलाएकतिही वअन्बेयाएही व रुसुलिही व जमिअ ख़लक़िही अला मोहम्मदिन व आले मोहम्मदिन वस्सलामो अलैहि व अलैहिम वरहमतुल्लाहे व बरकातोह। ”

रावी कहता है मैंने पूछा कि जो शख़्स यह सलवात रसूले अकरम (स.अ.व.व. ) पर भेजे उसके लिए कितना सवाब है। आपने फ़रमाया वह गुनाहों (पापों) से इस तरह पाक हो जाता है जैसै कि वह अभी मां के पेट से पैदु हुआ हो।

8- हश्तुम (आठ)- शेख़ अबुल फतूह राज़ी हज़रत रसूले अकरम (स.अ.व.व. ) से रवायत करते हैं , आपने फ़रमाया कि शबे मैराज जब मैं आसमान पर पुहंचा तो वहां पर मैंने एक फ़रिश्ता देखा , जिसके हज़ार हाथ और हर हाथ की हज़ार उंगलियां थीं और वह अपनी उंगलियों पर किसी चीज़ का हिसाब कर रहा था मैने जिबरईल से पूछा कि यह फ़रिश्ता कौन है ? और किस चीज़ का हिसाब कर रहा है ? जिबरईल ने कहा कि यह फ़रिश्ता क़तराते बारिश को शुमार करने पर मामूर है ताकि मालूम करे कि आसमान से ज़मीन पर कितने क़तरात (बूंदे) गिरे हैं। मैंने उससे पूचा क्या तू जानता है कि जब से अल्लाह तआला ने ज़मीन को पैदा किया है अब तक कितने क़तरे (बूंदे) आसमान से ज़मीन पर गुरे हैं तो उसने कहा कि ऐ रसूले खुदा (स.अ.व.व. ) मुझे उस ख़ुदा की क़मस जिसने आपको हक़ के साथ मख़लूक की तरफ मबऊस फ़रमाया है। मैं आसमान से ज़मीन पर नाज़िल होने वाले तमाम क़तराते बारिश की तफ़सील भी जानता हूं कितने क़तरात (बूंदे) जंगलों में और कितने आबादी में , कितने बागों में , कितने क़तरात शोरे ज़मीन पर औऱ कितने क़ब्रिस्तान में गिरे हैं। हज़रत (स 0 अ 0) ने फ़रमाया मुझे इसके हिसाब में कुव्वते याद्दाश्त पर हैरानी हुई तो उस फ़रिश्ते ने कहा या रसूल अल्लाह! (स.अ.व.व. ) इस कुव्वते याद्दाश्त और हाथों और इन उंगलियों के बावजूद एक चीज़ का शुमार (गिनती) मेरी ताक़त और कुव्वत से बाहर है। मैंने पूछा वह कौन-सा हिसाब है। उसने कहा कि आप की उम्मत के लोग जब एक जगह इकट्ठे बैठकर आपका नाम लेते हैं और फ़िर आप पर सलवात भेजते हैं तो उनकी इस सलवात का सवाब मेरी ताक़त और शुमार से बाहर होता है।

9- नहुम (नौ)- शेख़ कुलैनी (र 0) रवायत करते हैं कि जो शख़्स इस सलवात “ अल्लाहु्म्मा सल्लेअला मोहम्मदिव वआले मोहम्मदेनिल अवसियाअल मरज़ीयीन बेअफ़ज़ले सलवातिका वबारिक अलैहिम बेअफज़ले बरकातिका वबस्सलामो अलैहे व अलैहिम वरहमतुल्लाहे वबरकातोह ” की हर जुमा की अस्र के वक़्त सात बार पढ़े तो अल्लाह तआला हर बन्दे की तादाद के मुताबिक़ नेकियां जारी करता है और उसके उस रोज़ के आमाल कुबूल फ़रमाता है और यह भी वारिद है कि इस क़द्र सवाब होगा , जिस क़द्र तमाम लोगों की आंखों में नूर होगा।

10- दहुम (दस)- मर्वी है कि जो शख़्स नमाज़े सुबह औऱ नमाज़े ज़ुहर के बाद “ अल्लाहुम्मा सल्लेअला मोहम्मदिन वआले मोहम्मदिन व अज्जिल फ़राजहुम ” ।

पढ़े। वह उस वक़्त तक न मरेगा , जब तक वह ज़माना (अ 0 स 0) को न देख ले।

रवायाते हुस्ने ख़ुल्क

पहली रवायत (कथन)

अनस बिने मालिक से मनकूल (उद्धृत) है कि एक दफ़ा मैं रसूले अकरम (स.अ.व.व. ) की ख़िदमत में मौजूद था और आं हज़रत के जिस्म पर बुरदी (यमनी चादर) थी जिसके किनारे ग़लीज़ और फ़टे हुए थे। अचानक एक आराबी ने आकर आपकी चादर को इस क़द्र सख़्त खींचा कि उस चादर के किनारे ने आपकी चादर पर सख़्त असर किया और कहने लगा , ऐ मोहम्मद (स.अ.व.व. )! इन दोनों ऊँटों को इस माल से लाद दो , क्योंकि यह माल माले ख़ुदा है न कि तेरे बाप का। आं हज़रत सल्लम ने इसके जवाब में ख़ामोशी इख़्तियार की औऱ आं हज़रत (स.अ.व.व. ) ने फ़रमाया कि यह माल माले ख़ुदा का है और मैं खुदा का बन्दा हूं। फ़िर फ़रमाया कि ऐ आराबी क्या में तुझसे क़सास (बदला) न ले लूं। आराबी ने इन्कार किया। आं हज़रत ने फ़रमाया क्यों ? उस बद्दू ने अर्ज़ किया। या हज़रत बुराई का बदला बुराई से लेना आपका शेवा (चरित्र) नहीं है आं हज़रत ने मुस्कुरा कर हुक्म दिया , इसके एक ऊँट पर जौ और दूसरे पर खजूरें लाद दो औऱ इस पर रहम फ़रमाया।

मैंने इस मुक़ाम पर इश रवायत (कथन) को केवल मिसाल के तौर पर और तबरुकन ज़िक्र किया। न कि आं हज़रत और आइमए हुदा का हुस्ने ख़लक़ ब्यान करना मक़सूद था , क्योंकि ख़ल्लाक़े आलम ने जिस हस्ती को कुर्आन पाक में ख़ुल्के अज़ीम के लक़ब (पद) से याद फ़रमाया हो , और उल्माए फ़रीक़ैन आप की सीरत और स्वभाव आदि के मुत्तालिक़ बड़ी-बड़ी किताबें लिख चुके हों औऱ उन्होंने आपकी विशेषताओं के अशरे अशीर का भी तज़किरा न किया हो तो मेरा इस बारे में ज़िक्र करना समाहत होगी।

तर्जुमा अशआऱ

1- हज़रत मोहम्मद (स.अ.व.व. ) कोनैन और अरब व अजम के सरदार हैं।

2- वह ख़ल्क़ व ख़ुल्क़ में सभी अम्बिया से अफ़ज़ल हैं और इल्मों फ़ज़ल मे इनका कोई हमसर (बराबर) नहीं है।

3- तमाम दुनियां रसूले अकरम (स.अ.व.व. ) की ममनून हैं , क्योंकि आप ही की बदौलत वह खुश्की (सूखे) औऱ समुन्द्र से वाकिफ़ (परिचित) हुए।

4- वह ऐसे रसूल हैं जो सूरी (ज़ाहिरी) और मानवी (बातनी) हर लिहाज़ से कामिल हैं , जो अल्लाह तआला ने आपको अपना हबीब नियुक्त फ़रमाया।

5- आपके हुस्न का जौहर न तक़सीम होने वाला है और न ही आपके मोहासिन में आपका कोई शरीक है।

6- आपके मुत्तालिक़ इल्म की बारयाबी यहां तक है कि बशर (इन्सान) हैं और ऐसे बशर (इन्सान) कि तमाम मख़लूक़ात से आला और अफ़ज़ल (श्रेष्ठतम) हैं।

दूसरी रवायत (कथन)

अस्साम बिने मुतलक़ शामी से मनकूल (उद्धृत) है , वह कहता है कि जिस वक़्त मैं मदीनए मुनव्वरा में दाख़िल हुआ तो मैंने हज़रत इमाम हुसैन (अ 0 स 0) बिने अली (अ 0 स 0) को देखा। मैं आपके चरित्र और नेक किरदार से अत्यधिक आशचर्य चकित हुआ और मेरे अन्दर हसद (ईष्य्रा) पैदा हुआ कि मैं अपनी इस दुश्मनी को ज़ाहिर करूं जो उनके बाप अली (अ 0 स 0) से थी। बस मैं आपके नज़दीक पहुंचा और कहा कि क्या तू ही अबुतुराब का बेटा है ? तुझे मालूम होना चाहिए कि अहले शाम हज़रत अमीरूल मोमनीन (अ 0 स 0) को अबुतुराब से ताबीर करते थे और वह इस नाम से आं जनाब अली (अ 0 स 0) की बुराई करते थे और हर वक़्त अबुतुराब कहा करते थे , गोया कि हल्ली व हलल (मुराद लिबास) आं जनाब को पहनाते। अलमुख़्तस (संक्शेप में) अस्साम कहता है कि मैंने इमाम हुसैन (अ 0 स 0) से कहा कि तू ही अबुतुराब का बेटा है। आपने फ़रमाया हाँ।

“ पस मैंने इमाम हुसैन और उनके वालिद को गालियां देने में कोई कसर न छोड़ी। ”

“ पस आप ने मुझ पर रहमत व मेहरबानी की निगाह दौड़ायी। ”

और फ़रमाया-

तर्जुमाः- “ तू दर गुज़र और नेक़ी का हुक्म दे और जाहिल लोगों से किनारा कर। ”

इस आयए करीमा मैं आं हज़रत (स.अ.व.व. ) के मकारिम एख़लाक़ की तरफञ इशारा है। अल्लाह तआला ने पैग़म्बरे इस्लाम को लोगों को बुरे एख़लाक़ पर सब्र करने का हुक्म दिया औऱ बुराई का बदला बुराई के साथ देने से मना फ़रमाया और बेवकूफ़ लोगों से किनारा कश रहने का हुक्म दिया और वसवसए शैतानी से खुदा की पनाह का हुक्म दिया , फ़िर आपने फ़रमायाः-

“ (ऐ अस्साम) अहिस्तगी एख़्तियार कर औऱ अपने काम को आसान और हल्का बना और अल्लाह से मेरे और अपने लिए बख़शीश तलब कर। ”

अगर तू मदद चाहेगा त मैं तेरी इमदाद करूँगा , अगर तू बख़शिश का तलबगार है तो मैं तुझे अता करूंगा। अगर नसीहत (उपदेश) का तालिब (इच्छुक) है तो मैं तुझे नसीहत करुंगा। हज़रत इमाम हुसैन (अ 0 स 0) ने चूंकि अपनी फ़रासत और इल्मे इमामत से इसकी शर्मिन्दगी को मालूम कर लिया और इरशाद फ़रमायाः-

तर्जुमाः- “ आज के दिन तुम पर कोई मलामत नहीं , अल्लाह तआला तुम्हें माफ़ करे और वह सबसे ज़्यादा रहम करने वाला है। ”

( सू 0 युसूफ़ , आ 0-92)

यह आयए करीमा हज़रत यूसुफ़ के कलाम की हिकायत है जो उन्होंने अपने भाईयों से उनकी तक़सीरात (ग़ल्तियों) की माफ़ी के वक़्त इऱशाद फ़रमायी थी।

पस हज़रत इमाम हुसैन ने फ़रमाया कि क्या तू शाम का रहने वाला है ? मैंने अर्ज़ किया हां- तो आपने फ़रमाया “ शशनातून अरफ़ोहा मिन अख़ ज़मिन ”

यह एक जर्बुल मिस्ल है , जिससे आपने मिसाल दी , जिसका मतलब यह है कि अहले शाम का हमें गालियां देना आदत है , जिसको माविया उनके दर्मियान (बीच) सुन्नत छोड़ गया है , फ़िर आपने फ़रमायाः- “ हय्यनल्लाहो व इयाका ”

“ अल्लाह हमें और उसे ज़िन्दा रखे ” तेरी जो हाजत है , खुले दिल और खुशी से मां , वह पूरी होगी तू मुझे इन्शाल्लाह , इस बारे में अच्छा पाएगा। अस्साम ने कहा कि मैं अपनी बेबाकी औऱ इन गालियों के बदले इमाम हुसैन का यह नेक अख़लाक़ देखकर सख़्त शर्मिन्दा हुआ और ज़मीन मेरे लिए तंग हो गयी और चाहता था कि ज़मीन जगह दे तो गड़ जाऊँ। पस धीरे-धीरे खिसकने लगा ताकि दूसरे लोगों के बीच छिप जाऊँ और आप मेरी तरफञ मुतवज्जेह न हों और मुझे न देख सकें , लेकिन उस दिन के बाद आप और आपके वालिद से ज़्यादा औऱ कोई मेरा दोस्त न था।

साहबे कश्शाफ़ ने आयए शरीफा जिसको हज़रत सैयदुस शोहदा (अ 0 स 0) ने हज़रत युसूफ़ के हुस्ने ख़ल्क की तमसील के तौर पर ब्यान फ़रमाया है उसका यहाँ पर पूरी तरप ज़िक्र करना मुनासिब और सही है और वह यह रवायत (कथन) है कि जब बरादराने युसूफ (अ 0 स 0) ने आपको पहचान लिया तो आपने वालिदे बुर्जुग़वार की तरफ़ अपने भाईयों को पैग़ाम दिया। बरादराने युसुफ़ ने कहा जिस वक़्त तू हमें सुबह व शाम अपने दस्तरख़्वान पर बुलाता है तो हमें इस गुनाह (पाप) और कुसूर की वजह से जो हमने तेरे साथ किया शर्म आती है , तो हज़रत युसुफ़ फ़रमाने लगे तुम मुझसे क्यों शर्माते हो। तुम ही तो मुझे इस इज़्ज़त व शरफ़ पर पहुंचाने का सबब हो। अगरचे अब मैं मिस्र वालों पर हुकमत कर रहा हूं। मगर वह अब भी मुझे पहली निगाह से देखते हैं और कहा करते हैं-

“ पाक है वह ज़ात जिसने बीस दिरहमों से ख़रीदे हुए गुलाम को इस बलन्द मर्तबा (मुक़ाम) पर पहुंचाया। ”

हक़ीक़त यह है कि मैंने यह इज्ज़त आपही की वजह से पायी है और लोगों की नज़रों में आप ही की वजह से इज़्ज़तदार हूं क्योंकि उन्होंने अब पहचान लिया है कि मैं तुम्हारा भाई हूं और गुलान नहीं हूं बल्कि हज़रत इब्राहिम ख़लीलउल्लाह की औलाद से हूं और मर्वी है कि जब हज़रत याकूब (अ 0 स 0) और हज़रत युसुफ़ (अ 0 स 0) एक दूसरे से मिले तो , हज़रत याकूब ने पूछा , ऐ मेरे बेटे! मुझे बता कि तेरे सिर पर क्या गुज़री तो हज़रत युसुफ़ ने अर्ज़ किया , ऐ अब्ब जान! आप मुझसे न पूछें कि मेरे भाईयों ने मेरे साथ क्या सुलूक किया , बल्कि आप पूछें कि अल्लाह तआला ने मरेे साथ क्या किया।

तीसरी रवायत (कथन)

शेख़ सद्दूक (र 0) और दूसरों से मर्वी है कि मदीनए मुनव्वरा में ख़लीफ़ा दोयम की औलाद में से एक शख़्स मूसा काज़िम (अ 0 स 0) को बराबर तकलीफ़ देने के लिए तैयार रहात। आपको मोमनीन (अ 0 स 0) को गालियां देता। एक दिन एख शख़्स ने अर्ज़ किया , अगर आप इजाज़त दें तो हम उस फ़ासिक़ फ़ाजिर को मार डालें। हज़रत ने उनको इस काम से मना किया और सख़्त नाराज़ हुए और पूछा वह कहां है ? उन लोगों ने कहा कि वह मदीना के क़रीब एख जगह खेती तकरता है हज़रत अपने गधे पर सवार होकर उस जगह पहुंचे जहां वह आराम कर रहा था। आप गधे पर सवार खेद में दाख़िल हुए। उस शख़्स ने आवाज़ देकर कहा मेरी खेती को ख़राब न करो। आप उसी हालत में चलते गए यहां तक की उसके पास पहुंचे और उसके पास बैठ गए और खुश होकर खंदा करने लगे कि इस खेती पर कितना ख़र्च आया। उसने कहा कि एक सौ अशर्फ़ी। फ़िर आपने पूछा , इस खेत से तुझे कितना फल मिलने की उम्मीद है , उसने कहा मैं ग़ैब तो नहीं जानता। फ़िर इमाम (अ 0 स 0) ने फ़रमाया़ मैं तुझे बताऊं कि तेरा कितना अन्दाज़ा है , जो तुझे पहले हासिल करता हूं। बस हज़रत ने रुपयों की थैली निकाली , जिसमें तीन हज़ार अशर्फियां थीं , उश शख़्स के हवाले कीं और फ़रमाया , इसे ले और अबी तेरी खेती बाक़ी है। अल्लाह तआला तुझे जब तक तू ज़िन्दा रहेगा , रोज़ी देता रहेगा।

उस शख़्स ने आपके सिर को बोसा दिया और आपसे दरख़्वास्त की कि आप मुझे बख्श दें और माफ़ फ़रमाएं। इस पर आप मुस्कुराए औऱ घर वापस लौट आए। फ़िर उस दिन के बाद लोग उस शख़्स को मस्जिद में बैठा हुआ पाते और जब कभी भी उसकी निगाह आपके चेहरे पर पड़ती तो कह उठता।

“ अल्लाहो आलमो हैसो यजअलो रिसालताहु। ” ( इनआम- 153)

उसके साथियों ने उससे पूछा तेरा वाक़या क्या है ? तो उसने कहा , मैं पहले जो कुछ कहा करता था , तुम सुनते रहते थे और अब जो कुछ कहता हूँ उसको सुनो। फ़िर उसने आपको दुआएं देना शुरु कर दी इस पर उसके साथी , उससे झगड़ने लगे और वह भी उनसे झग़ड़ने लगा। बस हज़रत न उन लोगों से फ़रमाया कि जो इरादा तुम इस शख़्स के बारे में रखते थे , वह बेहतर था या जो कुछ मैंने इरादा किया है , वह बेहतर है। मैंने थोड़ी सी रक़म के बदले , उसकी इस्लाह कर दी और उस बुराई को मिटा दिया।

हिकायत हुस्ने ख़ुल्क़

एक दिन मालिक बिने अश्तर बाज़ारे कूफ़ा से गुज़र रहे थे उनके जिस्म पर खद्दर का लिबास था और अमामा भी खद्दर का था। एक बाज़ारी शख़्स ने जो आप को नहीं पहचानता था। नफ़रत की नज़र से देखा और ठट्ठा मज़ाक करते हुए आपकी तरफ़ गुलैल से एक ढेला फ़ेंका। हज़रत मालिक ख़ामोशी से गुज़र गए और कोई बात तक न कही। लोगों ने उस बाज़ारी से कहा , क्या तू नहीं जानता की तूने किस शख़्स के साथ ठट्ठा मज़ाक किया है ? उसने कहा मैं नहीं पहचानता। तब उन्होंने उसे बताया कि यह शख़्स अमीरुल मोमनीन का दोस्त मालिक बिने अश्तर था। यह सुनते ही उस शख़्स पर लरज़ा तारी हो गया और मालिक के पीछे दौड़ा की उनसे माफ़ी मौंगे। मालिक उस वक़्त मस्जिद में नमाज़ पढ़ रहे थे जब आप नमाज़ से फ़ारिग़ हुए तो वह शख़्स आपके क़दमों पर गिर पड़ा और क़दम चूमने लगा। हज़रत मालिक ने उससे वजह मालूम की तो उसने कहा कि मैं इस गुस्ताख़ी और बे अदबी की माफ़ी चाहता हूँ जो मुझसे आपके बारे में सरज़द हुई। मालिक बिने अश्तर ने कहा कोई बात नहीं। खुदा की क़सम मैंने मस्जिद में दाख़िल होने से पहले आपके लिए अल्लाहतआला से इस्तेग़फ़ार की है।

मालिक बिने अश्तर ने हज़रत अमीरूल मोमनीन से इस क़द्र एख़लाके हस्ना की तालीम हासिल की कि सालारे लश्कर औऱ बहादुर तरीन आदमी होने के बावजूद भी उस शख्स की बदतमीज़ी पर उसे कुछ न कहा , बल्कि उसके लिए दोआए मग़फ़िरत की।

हज़रत मालिक इस क़द्र बहादुर और शुजा थे कि इब्ने अबी अल हदीद कहता है कि अगर अरब औऱ अजम के अन्दर कोई शख़्स कसम उठा कर कहे कि अमीरुल मोमनीन हज़रत अली अलैहिस्सलाम के सिवा मालिक बिने अश्तर से ज़्यादा कोई शख़्स बहादुर औऱ शुजा नहीं है , तो मेरा ख्याल है कि उसकी यह बात सच्ची होगी। मैं इसके अलावा और क्या कहूं ? कि उसकी ज़िन्दगी ने अहले शाम को मिटा दिया और उसकी मौत ने अहले ईराक़ को! और हज़रत अली अलैहिस्सलाम उनके बारे में इरशाद फ़रमाते हैं कि अश्तर का मेरे नज़दीक वही मर्तबा है जो मेरा रसूल अकरम (स.अ.व.व. ) के नज़दीक था (यह मेरा ऐसा ही कुव्वते बाज़ू है , जैसा में रसूले खुदा का था) और हज़रत ने अपने दोस्तों को मुख़ातिब करके फ़रमाया। काश! तुममे एक या दो आदमी मालिक बिने अश्तर की तरह होते। मालिक का दुश्मनों पर रोब व दबदबा हुज़ूर के इन अशआर से मालूम होता है-

तर्जुमा अश्आर (अनुवाद कविता)

1- मैं अपने माल कसीर (अधिक) को बाक़ी रखूं (बख़ील हो जाऊँ) और बलंदनामी के कामों से इनहराफ़ करूं और अपने मेहमान से रूखेपन के साथ मुलाक़ात करूं।

2- अगर मैं माविया पर ऐसी लूट बरपा न करूं जो जानों को लूटने से किसी दिन भी ख़ाली न हों।

3- वह गा़रतगरी ऐसे घोड़ों के ज़रिए हो जो भूतों की तरह पतली कमर वाले हैं , जो घमासान की जंग रोशन रौ नवजवानों के साथ सुबह करते हैं।

4- और इन नवजवानों के लिए हथियार इस तरह गरम हो चुके हैं , गोया वह बिजली की चमक है या आफ़ताबो (सूरज) की किरणें (इतनी तेज़ी औऱ फुर्ती से तलवार चलाते हैं) , जैसे बिजली।

अलमुख़्तसर (संक्शेप में) मालिक बिने अश्तर की जलालत , बहादुरी , शानो शौकत , और हुस्ने अख़लाक़ ने आपको बलन्द दर्ज़े पर पहुंचा दिया , क्योंकि एख बाज़ारी आदमी के इस्तेहज़ा करने से आपकी तबियत पर ज़र्रा बराबर भी फ़र्क़ न पड़ा और न ही आप नाराज़ हुए बल्कि वह मस्जिद में पहुंचकर , इस आदमी के लिए नमाज़ औऱ बख़शीश की दुआ मांगते हैं। अगर आप उनकी बहादुरी को अच्छी तरह देखें तो आपको मालूम होगा कि उनका अपने नफ़्स (ज़मीर) और ख़्वाहिशात पर इस क़दर कंट्रोल था कि उनकी यह बहादुरी उनकी जिस्मानी बहादुरी से कहीं ज़्यादा थी , और हज़रत अली अलैहिस्सलाम का फ़रमान है-

“ सबसे ज़्यादा बहादुर वह शख़्स है , जो ख़्वाहिशाते नफ़सानी पर ग़ालिब है। ”

हिकायत

शेख़ मरहूम मुस्तदरक के ख़ात्मे में अफ़ज़लुल्हुक्काम व अलमुतकलमीन वज़ीर आज़म जनाब ख़्वाज़ा नसीरुद्दीन तूसी कदस सरा ने नक़ल करते हैं कि एक दिन ख़्वाजा साहब के हाथ में एक कागज का टुकडा पहुंचा , जिसमें आपके मुत्तालिक़ सब्बो शतम में एक बदतरीन फ़िकरा यह भी था , “ ऐ कल्ब बिने कल्ब ” ख़्वाजा नसीरुद्दीन (र 0) ने उस कागज़ को पढ़ा तो संजीदगी और मतानत के साथ उसका जवाब लिखा , जिसमें किसी क़िस्म का बुरा फ़िक़रा न थाष अपनी इबारत में तहरीर किया कि “ ऐ शख़्स तेरा मुझे कुत्ता कहना ठीक नहीं ” क्योंकि उसके चार टांगे होती हैं , जिन पर वह चलता है , और उसके पंजों के नाख़ून लम्बे-लम्बे होते हैं , लेकिन इसके बर ख़िलाफ़ मैं सीधे क़द वाला इन्सान हूं औऱ यह बात बिल्कुल रौशन है कि न तो मेरे कुत्ते की तरह पंजे हैं , बल्कि मेरे नाख़ून तो पोशीदा हैं और मैं तो बोलने और हंसने वाला इन्सान हूं और मरे यह ख्वास (विशेषता) कुत्ते के ख्वास के बर ख़िलाफ (विरुद्ध) है। ” यह जवाब लिख कर दिया और उसकी अदम मौजूदगी में उसे अपना दोस्त ज़ाहिर किया।

इतने बड़े जलीलुल क़द्र मोहक्क़िक़ से यह अज़ीम ख़ुल्क कोई अनोख़ी बात नहीं। अल्लामा हिल्ली (र 0) ख़्वाजा नसीरुद्दीन तूसी (र 0) के मुत्तालिक़ फ़रमाते हैं , यह शेख़ अपने ज़माने के ओल्मा से अफ़ज़ल तरीन थे , औऱ उलूमे अक़लिया व नक़लिया , व इल्मो हिकामत औऱ अहकामे शरीआ , मज़हबे हक़्क़ा के बारे में बहुत सी कितबे लिखीं हैं और यह साहबे एख़लाक के लिहाज़ से उन तमाम बुजुर्गों से अफ़ज़ल व अरफ़ा थे , जिनको मैंने मुशाहिदा किया है , मैं आपके एख़लाक़ को इस शेर से वाज़े करता हूं-

हर बुए कि अज़ मुश्क व क़रनफल शनोई।

अज़ दोस्त आं ज़ुल्फ़ चूं सुम्बुल शनोई।।

“ जो खुशबू मुश्क और क़रनफ़ल (लोंग) से आती है , वह महबूबा की सुम्बुल जैसी ज़ुल्फ़ों की खुशबू का भला क्या मुक़ाबला कर सकती हैं। ”

र ख़्वाजा तूसी (र 0) ने यह तमाम एख़लाक़े हसना अमल किरदारे आइम्मा से लिए हैं , क्या आपने यह बात नहीं सुनी कि हज़रत अमीरुल मोमनीन अलैहिस्सलाम ने किसी शख़्स को क़म्बर को गालियां देते हुए सुना और क़म्बर ने भी वैसी जवाब देना चाहा तो हज़रत अमीर अलैहिस्सलाम ने क़म्बर को पुकार कर फ़रमाया महलन या क़म्बरो “ ऐ क़म्बर ख़ामोश रहो। ” यह गालियां देने वाले हमारी ख़ामोशी से ख़्वार (ज़लील) होगा और अपनी ख़ामोशी से अल्लाह तआला को खुश रख और शैतान को ग़लबा दिलाकर दुश्मन को शिकंजा में फंसा। मुझे उस ख़ुदा की क़सम जिसने दाने को फाड़ कर पौधे को उगाया और जिसने इन्साम को पैदा किया। मोमिन के लिए अपने हिल्म से बढ़कर ख़ुदा को राज़ी करने वाली कोई चीज़ नहीं और मोमिन अपनी ख़ामोशी के अलावा औऱ किसी चीज़ से शैतान को गुस्सा नहीं दिला सकता। बेवकूफ़ को क़ब्ज़े में लाने के लिए जवाब में ख़ामोशी से बढ़कर औऱ कोई हथियार नहीं।

अलमुख़्तसर मुख़ालिफ़ और मुवाफ़िक़ तमाम लोग ख़्वाजा तूसी (र 0) की तारीफ़ करते हैं। जरजी ज़ैदान आदाब कलज़ातुल अऱबिया के तरजुमों में तहरीर करते हैं कि आपके कुतुबख़ाने में चार लाख किताबें मौजूद थीं। आप इल्मे नुजूम और फ़लसफ़ा के इमाम थे। इसी फ़ारसी के हाथ में बलादे मुग़लिया के बहुते से अवक़ाफ़ इल्म की ख़ातिर वक़्त किए गए थे और आप घटाटोप अंधेरे में रौशनी का मीनार थे।

मैंने किताबे फ़वायदे रिज़विया में जो तराजुम (अनुवाद) उल्माए इमामिया में से एक है का तर्जुमा भी अपनी बिसात के मुताबिक किया , जिसमें मैंने लिखा कि शैख़ तूसी (र 0) का ख़ानदान जबरुद के बादशाहों में से वशाहर नामी ख़ानदान से ताल्लुक रखता है , जो कुम से दस फ़रसख़ के फ़ासले पर आबाद है , लेकिन आपकी विलादत बासआदत तूस के शहर में “ 11” जमादिउल अव्वल सन् 597 हिजरी में हुई और आप की वफ़ात बरोज़े इतवार 18 ज़िल हिज 672 हिजरी को बक़आ मुनव्वरा काज़मिया में हुई और आपकी क़ब्र पर यह अल्फाज़ तहरीर हैं।

“ यानी उनका कुत्ता अपने बाज़ू फ़ैलाए बैठा है। ”

कुछ लोगों ने आपकी तारीख़े वफ़ात को इस तरह नज़्म किया है ,

नसीर मिल्लते दीं पादशाह किश्वरे फ़ज़ल।

यगाना ऐ कि चे ओ मादरे ज़माना नज़ाद।

बसाल शशसदो हफ़तादो दू बज़िलहिज्जा।।

बरोज़े हजदहुम दर गुज़श्ते दर बग़दाद।

“ वह मिल्लत औऱ दीन के नसीर ममलकते फ़ज़ल के बादशाह ” थे।

जमाने में उनका जैसा बेमिसाल कोई पैदा नहीं हुआ। वह ज़िल हिज़ 672 हिजरी को बग़दाद में दफ़न हुए। ”

हिकायत

एक रवायत (कथन) में है कि एक दिन शेख़ अलफुक़हा हाजी शेख़ जाफ़र साहब कशफुल गतआ असफ़हान में नमाज़ शुरू करने से पहले ग़रीबों में ख़ैरात तक़सीम कर रहे थे। जब माल बांद चुके तो नमाज़ में मशगूल हो गए। सादात में से एक आदमी नमाज़ के बाद उठा और शेख़ साहब के पास आकर कहा कि मेरे दादा का माल मुझे दो। आपने फ़रमाया तू देर से पहुंचा अब मेरे पास कोई माल नहीं , जो मैं तुझे दूं। वह सैय्यद ग़जबनाक हुआ और शेख़ साहब के मुहं पर थूक दिया आप उठे औऱ दामन फ़ैलाकर सफ़ों में फ़िरने लगे और फ़रमाने लगे , तुममें से जो भी मेरी दाढ़ी को अज़ीज़ रखता है वह इस सैय्यद की मदद करे। बस लोगों ने शेख़ के दामन को रक़म से भर दिया और आपने वह तमाम रक़म सैय्यद के हवाले कर दी और फ़िर नमाज़ में मशगूल हो गए।

ग़ौर कीजिए शेख़ किस क़द्र एख़लाके हमीदा के मालिक थे। यह वह बुजुर्गवार हैं , जिन्होंने हालते सफ़र में कशपुलग़ता , जैसी किताब फ़िक़ा में तहरीर फ़रमायी औऱ आप फ़रमाया करते थे कि अगर फ़िक़ा की तमाम किताबें बरबाद हो जाये तो मैं अपनी याद्दाश्त की बदौलत बाबुल तहारत से लेकर बाबुल दय्यात तक लिख सकता हूं और आपकी सारी औलाद में बड़े-बड़े ज़लीलुल क़द्र उल्मा और फुक़्हा थे। सक़अतुल इस्लाम नूरी (र 0) पके हालात के बारे में फ़रमाते हैं अगर कोई शख़्स शेख़ जापञर को सुबह के वक़्त की मुनाजात और आदाबे सनन और खुशूअ व खुज़ूअ में ग़ौरो फ़िक़्र करे तो उस पर आपकी अज़मत (श्रेष्ठता) ज़ाहिर हो जाएगी। आप अपने मुख़ाताबात में अपने नफ़्स से मुख़ातिब होकर फ़रमाते थे कि तू पहले जअीफ़र यानी छोटी नदी था , फ़िर दरिया बन गया। शेख़ जाफ़र कश्ती और समन्दर बन गया , फिर ईराक़ और उसके तमाम मुसलमानों का सरदार बन गया। उनका अपने नफ़्स से यह ख़िताब इसलिए था कि इतनी बुजुर्गी औऱ इज़्ज़त मिलने पर भी मैं अपने शुरु के तकलीफ़ और मुसीबतों का ज़माना नहीं भूला। आप उन्हीं लोगों में से हैं , जिनके बारे में हज़रत अमीर (अ 0 स 0) ने अहनफ़ बिने क़ैस को अवसाफ़ बताते थे।

वह एक लम्बी हदीस है , जो हज़रत अली (अ 0 स 0) ने अपने असहाब की शान में जंगे जमल के बाद अहनफ़ बिने क़ैस से फ़रमायी थी , उसके जुमला फुक़रात यह हैं-

“ ……….अगर तुम उनको रात के उस वक़्त देखो जबकि आंखों में नींद ग़ालिब होती है। हर कि़स्म की आवाज़े बन्द होती हैं , परिन्दे अपने आशियानों में आराम कर रहें होते हैं तो यह लोग क़यामत औऱ वादागाह के डर से जाग रहे होते हैं , जैसा कि अल्लाहतआला ने अपने कलाम पाक में इरशाद फ़रमाया है , “ क्या अब इन बस्ती वालों को अमन है ? ” नहीं , हम उन पर उस वक़्त अज़ाब नाज़िल करेंगे जब यह सो रहे होंगे। बस यहग लोग क़यामत के ख़ौफ़ की वजह से शब्बेदारी करते हैं। कभी उठकर ख़ौफ़े ख़ुदा से रो-रोकर नमाज़ पढ़ते हैं और कभी रो-रोकर मेहराब में तसबीह व तक़दीसे ख़ुदा ब्यान कर रहे होते हैं और वह तारीक रातों में गिड़गिड़ा कर हम्दो सना कर रहे होते हैं। ऐ अहनफ , अगर तू इनको रात के वक़्त ख़ड़े हुए देखे तो उनकी कमरें झुकी हुई और कुर्आन मजीद की सूरतें नमाज़ में पढ़ते नज़र आएंगे औऱ ज़्यादा रोने और फ़रियाद की वजह से वह इस तरह मालूम होंगे यानी आग ने उनको घेर लिया है और वह उनके हलक़ तक पुहंच गयी है और जब यह रोएंगे तो तू यह शक करेगा कि उनकी गर्दने जंज़ीरों में जकड़ी हुई हैं , अगर तू उनको दिन के वक़्त देखे तो वह एक ऐसी क़ौम नज़र आएगी जो ज़मीन पर आहिस्ता चलते हैं और लोगों से अच्छा कलाम करते हैं और जब जाहिल लोग उनसे मुख़ातिब हो तो उनको सलाम करते हैं उनका जब लग़ोयात के नज़दीक से गुज़र होता है तो वह उनके पास से बाइज्ज़त गुज़र जाते हैं और अपने क़दमों को तोहमत से बचाते हैं , और उनकी ज़बाने गूंगी होती हैं कि वह लोगों की इज्ज़त के ख़िलाफ़ कोई बातें करें और अपने कानों को फुज़ूल बातें सुनने से रोके रखते हैं और अपनी आंखों को गुनाहों की तरफ़ निगाह न करने के सुरमा से सजाए हुए होते हैं और वह दारुल सलाम में दाख़िले का इरादा रखते हैं , जिसमें जो शख़्स दाख़िल हो गया , वह शक व शुब्हा और ग़म से मामून रहा।

यहां पर एक राहिब के अज़ीमुश्शान कलाम में से कुछ नक़ल करना मुनासिब है और वह यह है कि जो क़सम ज़ाहिद से नक़ल किया गया है। उसने कहा मैंने एक राहिब को बैतुल मुक़द्दस के दरवाज़े पर ख़स्ता हाल देखा। मैंने उससे कहा मुझे वसीयत कर। उसने कहा तो उस आदमी की तरह बन जिनको दरिन्दों ने वहशतनाक कर रखा हो और माज़ूर व ख़ायफ़ हो और डर रहा हो कि अगर वह हरकत करे तो वह उसे फाड़ डाले या नोच डाले। उसकी रात ख़ौफ़नाक होती है , जबकि उसमें बहादुर खुश होते हैं। फ़िर उसने पुश्त फ़ेरी और मुझे छोड़ दिया मैंने उससे कहा कुछ और ब्यान फ़रमाएं तो उसने कहा कि प्यासा थोड़े पानी पर भी क़नाअत कर लेता है।

हिकायत

मनकूल (उद्धृत) है कि एक रोज़ काफ़उल क़फ़ात साहब बिने अबाद ने शरबत तलब किया तो उसके एक गुलाम ने उसे शरबत का प्याला हाज़िर किया। साहब ने जब पीने का इरादा किया तो , उसके ख़्वास में से एक ने कहा , कि इस शरबत को न पी , क्यों कि इसमें ज़हर मिला हुआ है। जिस गुलाम ने साहब को वह प्याला पकड़ाया था , वह अभी पास खड़ा था। साहब ने कहा , तेरे इस क़ौल (कथन) की दलील क्या है ? उस आदमी ने कहा , उस गुलाम को जो यह प्याला लाया है , पिलाकर तर्जुबा कर लिजिए मालूम हो जाएगा। साहब कने कहा मैं इसकी इजाज़त नहीं देता और न ही जायज़ मसझता हूं। फ़िर उसने कहा किसी हैवान कगो पिला दीजिए। साहब ने कहा कि मैं हैवान को ज़हर पिला कर ख़त्म करना और सज़ा देना जायज़ नहीं समझता। उन्होंने प्याला वापस किया और ज़मीन पर फ़ेक देने का हुक्म दिया और उस गुलाम को नज़रों से दूर हो जाने को फ़रमाया कि आइन्दा मेरे घर में दाख़िल न होना , लेकिन शहर में रहने की इजाज़त है और इससे क़तए ताअल्लुक (सम्बन्ध विच्छेद) न किया जाय और फ़रमाया कि शक व शुबहात पर यक़ीन नहीं करना चाहिए और रोज़ी रोक कर सज़ा देना भी अच्छी बात नहीं।

साहब बिने अबाद आल बोया के वज़ीरों में से एक वज़ीर था जो मलजाय ख़्वास व अवाम और मरजए मिल्लत व दौलत और मोअज़्ज़ि व मोकर्रम था और यह वह शख़्स था , जो शायरी में फज़लों कमाल और अरबियत में यकताए ज़माना और दुनिया में अजूबा था।

मलक़ूल है कि जब यह इमला लिखने के लिए बैठता तो बहुत से लोग उससे इस्तेफ़ादा करने के लिए उसके गिर्द जमा हो जाते और इतनी ज़्यादा तादाद हो जाती की छः आदमी तो सिर्फ़ उसके इमले को लोगों को पढ़ कर सुनाने में मशगूल रहते। उसके पास लुग़त की इतनी ज़्यादा किताबें थी कि जिससे साठ ऊँट बार हो सकते थे और उल्मा , फज़ला उलूईन और सादात कराम की इज़्ज़त व तौक़ीर किया करता था और उनको तसनीफ़ व तालीफ़ का शौक़ दिलाता था। इन ही की ख़ातिर शेख़ फ़ाज़िले ख़बीर जनाब हसन बिन मोहम्मद कुम्मी ने तारीख़े कुम तालीफ़ की और शेख़ अजल रईसुल मोहद्दसीन जनाब सद्दूक (र 0) ने किताब ओयून अक़बारुर्ज़ा तसनीफ़ फ़रमायी और उन्हीं की वजह से शआलबी ने यतुमतुद्दहर को जमा किया और उल्मा व फुकहा और सादात व शोअरा (कवि) पर उसका एहसान व फ़ज़ल बहुत मशहूर था। हर साल बग़दाद के फुकहा के पास पांच हज़ार अशर्फियां भेजता। और जो शख़्स भी माहे रमज़ान में अस्र के बाद उसके पास जाता तो उसे रोज़ा अफ़्तार किए बग़ैर वापस न आने देता। तक़बरीबन हर शब माह रमज़ान को एक हज़ार आदमी उसके घर पर रोज़ा अफ़तार करते और माह रमज़ान में वह इस क़द्र सदक़ात व ख़ैरात पर रक़म ख़र्च करता , जितना वह बाक़ी साल में ख़र्च करता था और उसने अमीरुल मोमनीन (अ 0 स 0) की तारीफ़ में बहुत से अश्आर लिखे और आप (स.अ.व.व. ) के दुश्मनों की हजों ब्यान की।

उनकी वफ़ात 24 सफ़र 385 हिजरी में रेके मुक़ाम पर हुई और उनके जनाज़े को उठा कर असफ़हान में लाकर दफ़न किया गया। आपका मज़ार अब भी असफ़हान में मशहूर है।

“ वससलाम व रहमतुल्लाह अलैहा। ”


फ़स्ल हश्तुम (आठ)

हिसाब

मोवक़िफ़े हिसाब

उन ख़ौफ़नाक मोवाक़िफ़ में से जिनका ऐतक़ाद (विश्वास) हर मुसलमान के लिए ज़रुरी है , मुक़ामे हिसाब भी है. परवरदिगारे आलम कुर्आन मजीद में इरशाद फ़रमाता है-

“ लोगों के हिसाबे आमाल का वक़्त नज़दीक है , लेकिन वह ग़फ़लत में मदहोश हैं और (इसमें ग़ौरो फ़िक़् और तैयारी से) गुरेज़ कर रहे हैं। ”

दूसरी जगह इरशादे कुदरत हैः-

“ और कितनी बस्ती वालों ने अपने परवरदिगार और रसूलों के हुक्म से सरकशी की , फिर हमने उनका हिसाब बड़ी सख़्ती से लिया और हुमने एक नाशिनासा सा अज़ाब दिया। बस उन्होंने अपने किए का फल चख लिया और उनके कामों का अंजाम नुक़सानदेह हुआ। अल्लाह तआला ने उनके लिए सख़्त अज़ाब तैयार किया। बस ऐ अक़ल वालों , अल्लाह तआला से डरते रहो। ”

हिबास कौन लगे ?

अगरचे कुर्आन और हदीस के उमूमन से यही मुस्तफ़ीद होता है कि हर शख़्स हिसाब खुद खुदावन्द आलम लेगा।

लेकिन बाज़ रवायात से ज़ाहिर होता है कि मलायका कराम इस काम को अंजाम देंगे। कुछ अख़बार व आसार से यह मतलब वाज़े होता है कि अम्बिया का हिसाब खुद खुदावन्द आलम लेगा औऱ अम्बिया अपने औसिया का हिसाब लेंगे और औसिया अपनी उम्मत का हिसाब लेंगे।

“ बेरोज़े क़यामत तमाम लोगों को उनके इमामे ज़माना के साथ बुलाएंगे। ” ( अहसनुल क़वायद)

बहारुल अनवार जिल्द 3 अमाली शेख़ मुफ़ीद (र 0) में बसन्द मुतसिल हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से रवायत है कि आपने फ़रमाया-

“ जब रोज़े क़यामत होगा तो इल्लाह तआला हमें अपने शियों का हिसाब लेने के लिए मुक़र्रर फ़रमाएगा। बस हम अपने शियों से हकूक़ अल्लाह के बारे में सवाल करेंगे और अल्लाह तआला उनको माफ़ कर देगा और शियों के ज़िम्मे हमारे जो हुकूक़ होंगे , हम खुद उनको माफ़ कर देंगे फिर आपने यह आयत तिलावत फ़रमायीः-

“ बेशक वह हमारी ही तरफ़ लौटाए जाएंगे , फ़िर बेशक उनका हिसाब हम ही लेंगे। ”

इसी किताब में मासूम से रवायत (कथन) है कि हुकूक अल्लाह और हुकूक़ इमाम अलैहिस्सलाम के बख़्शे जाने के बाद फ़रमाया-

“ ……..यानी जो मज़ालिम और हुकूकुन्नास शियों के ज़िम्मे होंगे , हज़रत रसूले खुदा (अ 0 स 0) हुकूक़ का मतालिबा करने वालों को अदा कर देंगे। ”

परवरदिगारे आलम हमें उम्मते ख़ातमुल अम्बिया अलैहे व आलेहे व सल्लम और शियाने अहलेबैत अलैहिस्सलाम में शुमार करे और हमारा हश्र उन्हीं के साथ हो। (आमीन सुम्मा आमीन)।

शियों के लिए यह खुशखबरी है कि बेरोज़े क़यामत परवर दिगारे आलम हर क़ौम के हिसाब के लिए उसके इमाम को मुक़र्रर फ़रमाएगा और वह उनके आमाल का हिसाब लेगा और हमारा हिसाब हुज्जत इब्नुल हसन इमामे ज़माना (अ 0 स 0) लेंगे , लेकिन जिस वक़्त हमरुसियाह अपने सिरों को झुकाए उनके सामने पेश होंगे और दामन उनकी दोस्ती से पुर होंगे , तो उम्मीद है कि वह हमाऱी शफ़ाअत करेंगे। खुदा का शुक्र है कि हमारा हिसाब उस करीम इब्ने करीम के सुपुर्द होगा , जो खुदा के नज़दीक आला मरातिब का मालिक है। (मआद)

हिसाब किन लोगों का होगा ?

क़यामत (प्रलय) के दिन हिसाब के लिए लोग चार गिरोहों में होंगे। कुछ लोग ऐसे होंगे जो बग़ैर हिसाब के बेहश्त में दाख़िल होंगे और यह मुहब्बाने (अ 0 स 0) से वह लोग होंगे , जिनसे कोई फ़ेले हराम सरज़द न हुआ होगा या वह तौबा के बाद दुनियां से रुख़सत हुए होंगे।

दूसरा गिरोह इसके बर ख़िलाफ़ होगा , जो बग़ैर हिसाब के जहन्नुम में दाख़िल किए जायेंगे और उन्हीं के बारे में यह आयत है-

तर्जुमा- “ कि जो शख़्स दुनियाँ से बेईमान उठेगा , उसका हिसाब नहीं किया जाएगा , और न ही आमालनामा खोला जाएगा शेख़ कुलैनी (र 0) हज़रत इमाम ज़ैनुल आब्दीन अलैहिस्सलाम से रवायत करते हैं कि मुशरिकों के आमाल नीहं तौले जाएंगे , क्योंकि हिसाब और मीज़ान और आमाल के खोले जाने का ताअल्लुक अहले इस्लाम के साथ है। काफ़िर (नास्तिक) और मुशरिक नब्स कुर्आन हमेशा अजाब में रहेंगे।

तीसरा गिरोह उन लोगों का है , जिनको मौक़िफ़े हिसाब में रोक लिया जाएगा। यह वह लोग हैं जिनके गुनाह (पाप) नेकियों पर ग़ालिब होंगे। जब यह रुकावट उनके गुनाहों का कफ़्फ़ारा हो जाएगी तो उनको नजात मिल जाएगी।

चूनांचे रसूले अकरम (स.अ.व.व. ) ने इब्ने मसूद (र 0) को फ़रमाया कि बाज़ लोग एक सौ साल मौकिफ़े हिसाब में रोके जाएंगे और फ़िर वह जन्नत में जाएंगे।

“ इन्सान एक गुनाह के बदले सौ साल तक रोका जाएगा ” लेकिन गुनाह का वर्णन नहीं कि किस गुनाह के बदले रोका जाएगा , लिहाज़ा मोमनीन को चाहिए कि वह हर गुनाह से दूरी रखे ताकि मौक़िफ़े हिसाब पर रुकावट न हो। (मआद)

शेख़ सद्दूक (र 0) हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) से रवायत करते हैं कि क़यामत के दिन दो अहलेबैत से मुहब्बत करने वालों को रोका जाएगा , उसमें से एक दुनियाँ में मुफ़लिस और फक़ीर और दूसरा दौलतमन्द होगा। वह फ़क़ीर अर्ज़ करेगा , परवर दिगार मुझे किस वजह से रोका गया है। मुझे तेरी इज़्ज़तों जलाल की क़स्म तूने मुझे कोई हुकूमत या सल्तनत न दी थी , जिसमें मैं अदालत या जुल्मों सितम करता और न ही तूने मुझे इस क़द्र माल दिया था कि मैं वाजिब कर्दा हकूक़ को अदा करता या ग़सब करता और तूने मुझे इस क़द्र रोज़ा अता की थी , जिसको तूने मेरे लिए काफ़ी समझा और मैंने उसी पर क़िफ़ायत की। बस अल्लाह तआला का हुकम होगा। ऐ बन्दए मोमिन! तू सच कहता है और उसे दाख़िले बेहश्त किया जाएगा।

दूसरा दौलतमन्द इतनी देर खड़ा रहेगा कि उसके खड़ा रहने से इतना पसीना जारी होगा जिससे चालीस ऊँट सेराब हो सकें , फिर उसको बेहश्त में दाख़िल किया जाएगा। जन्नत में वह फ़क़ीर उससे पूछेगा , तुझे किस चीज़ की वजह से इतनी देर रोके रखा गया। वह कहेगा कई चीज़ों की बराबर तक़सीरात के लम्बे हिसाब ने मुझे रोक रखा , यहां तक की अल्लाह तआला ने अपनी रहमत से निवाज़ा और मुझे माफ़ फ़रमाय औऱ मेरी तौबा को कुबूल फ़रमाया , फिर वह फ़क़ीर से पूछेगा , तू कौन है ? वह जवाब देगा , मैं वही फ़क़ीर हूं जो मैदाने हश्र में तेरे साथ था , फ़िर वह ग़नी कहेगा तुझको जन्नत की न्यामतों में इस क़द्र तब्दील कर दिया है कि मैं उस वक़्त तुझे न पहचान सका। (मतालिब)

चौथा गिरोह उन लोगों का होगा जिनके गुनाह उनकी नेकियों से ज़्यादा होंगे। बस अगर शफ़ाअत औऱ परवर दिगारे आलम की रहमत और फ़ज़लों करम शामिले हाल होगा तो वह नजात हासिल करके जन्नत में चले जायेंगे वरना उनको उस जगह पर अज़ाब में डाल जाएगा , जो ऐसे लोगों के लिए मख़सूस होगा , यहां तक कि गुनाहों से पाक हो जांय और इस अज़ाब से नजात मिल जाय , फिर उनको बेहश्त में भेज दिया जाएगा।

जिस इन्सान के दिल में ज़र्रा भर भी ईमान होगा वह जहन्नुम में बाक़ी न रहेगा , बिल आख़िर जन्नत में दाख़िल होगा। जहन्नुम में सिर्फ़ काफ़िर (नास्तिक) और मआनदीन बाक़ी रह जाएंगे।

अहबात व तकफ़ीर

“ जो लोग काफ़िर (नास्तिक) हैं उनके लिए डगमगाहट है खुदा ने जो चीज़ नाज़िल फ़रमायी है , उन्होंने उसको ना पसन्द किया तो खुदा ने उनके आमाल ज़ाए कर दिए। ”

( स 0 मोहम्मद , 8-9)

दूसरी जगह इरशादे कुदरत है-

“ जिन लोगों ने ईमान कुबूल किया और अच्छे काम किए और जो (किताब) मोहम्मद पर उनके परवर दिगार की तरफ़ से नाज़िल हुई है , वह बरहक़ है , इस पर ईमान लाए तो ख़ुदा ने उनके पिछले गुनाह उनसे दूर कर दिए और उनकी हालत संवार दी। ”

( सू 0 मोहम्मद- 2)

अहबात

अगर कोई आदमी अपनी शुरी ज़िन्दगी में दायरए इस्लाम में रहकर नेक कामों में मशगूल रहा , मगर मरते वक़्त हक़ से फ़िर गया और कुफ़्र की हालत पर मरा हो तो उसे इस्लाम की हालत में किए हुए आमाल फ़ायदा न देंगे और वह नेकियां बेकार हो जाएंगी।

अगर कोई कहे कि कुर्आन मजीद में है-

“ जो शख़्स ज़र्रा बराबर भी नेकी करेगा , उसका अज्र उसको मिलेगा। ”

इसका जवाब यह है कि कुफ्र पर मरने वाले ने अपने हाथ से ही अपनी नेकियों को बरबाद कर दिया। काफ़िर (नास्तिक) के अज्र को बाक़ी रखना खुदा के लिए मोहाल है कि वह उसको जन्नत में दाख़िल करे , बल्कि उसकी नेकियों की तलाफ़ी दुनियाँ में ही कर दी जाती है , जैसे मौत की आसानी , मरीज़ न होना और माद्दी (मायावी) वसायल के ज़रिए जैसा कि गुज़र चुका है।

और मुमकिन है इन नेकियों की वजह से अज़ाब में तख़फ़ीफ़ हो , जैसा कि हातिमताई और नौशेरवां जो सख़ावत में ज़रबुल मसल है , जहन्नुम में होंगे , मगर आग उनको न जलाएगी , जैसा कि कुर्आन में इरशाद मौजूद है।

और दूसरी जगह इरशाद फ़रमाया-

“ जिन लोगों ने हमारी आयात (सूत्रों) और आख़िरत की मुलाक़ात को झुठलाया उनके तमाम आमाल बरबाद हो गए , उन्हें बस आमाल की सज़ा या जज़ा मिलेगी जो वह करते हैं। ”

( सू 0 आराफ़ , आ 0-147)

इसी तरह बहुत से आयात (सूत्रों) से वाज़ेह (स्पष्ट) है कि कुफ़्र औऱ शिर्क से आमाल बरबाद हो जाते हैं।

इसी तरह दूसरे गुनाह (पाप) भी नेक आमाल को बरबाद कर देते हैं और दरजए कुबूलियत तक नहीं पहुंचते। जैसे वालदैन के नाफ़रमान बेटे के लिए हुज़ूर ने फ़रमाया-

“ ऐ वाल्दैन के ना फ़रमान तेरा जो जी चाहे करता फ़िर , तेरा कोई अमल कुबूल नहीं है , अगर किसी शख़्स के पीछे वालिदा की आहें और बद्दुआएं हों और वह पहाड़ों के बराबर भी आमाल करें तो वह आग मे जलाया जाएगा। इसी तरह तोहमत औऱ हसद जैसा कि हदीस में है- ”

“ हसद (ईर्ष्या) ईमान को इस तरह खाता है जिस तरह आग लकडियों को खाती है। ” ( मआद)।

सक़अतुल इस्लाम कुलैनी (र 0) मोआन अनन अबुबसीर से रवायत (कथन) करते हैं कि इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0 स 0) ने फ़रमाया , यानी “ कुफ्र की जड़ें तीन हैं ” – हिर्स , तकब्बुर और हसद (ईर्ष्या)। ” यह जड़ें ज्यूं-ज्यूं मज़बूती इख़्तियार करती जाएंगी , ईमान रुख़सत होता जाएगा और नेक आमाल बरबाद होते जाएंगे और इन्सान दोज़ख़ का ईंधन बन जाएगा , जैसा कि शैतान के तमाम , आमाल तकब्बुर की वजह से बरबाद हो गए और सिर्फ़ आख़िरत तक उम्र ज़्यादा मिली। पूरा वाक़िया कुर्आन मजीद में मौजूद है।

तकफ़ीर

तक़फ़ीर के माने क़फ़्फ़ारा है। यानी उन गुनाहों का महो करना , जो उससे सादिर हुए हैं। ईमान कुफ़्र के साब्क़ा (पूर्व) गुनाहों को मिटा देता है अगर कोई शख़्स शुरु उम्र में काफ़िर (नास्तिक) रहा और फ़िर इस्लाम ले आया तो उसके पहले वाले गुनाह ख़त्म हो जाएंगे और उनका हिसाब न होगा। इसी तरह मुसलमान के गुनाह (पाप) सच्ची तौबा से ख़त्म हो जाते हैं। उन्हीं के बारे में कुर्आन मजीद में आया है।

यानी ख़ल्लाक़े आलम इनके गुनाहों को नेकियों में तब्दील कर देता है।

बहारुल अनवार जिल्द 15 में रवायत (कथन) है कि एक शख़्स हज़रत ख़ातिमुल अम्बिया (स.अ.व.व. ) के पास आया और अर्ज़ किया कि , “ आका मेरा गुनाह (पाप) बहुत बड़ा है , ( वह गुनाह दरगोर किया था) आप मुझे ऐमा अमल बतलांए की पपरवदिगारे आलम मेरे इस गुनाह को माफ़ फरमाए। आपने फ़रमाया क्या तेरी वालिदा ज़िन्दा हैं ? उसने अर्ज़ किया नहीं। (मालूम होता है कि वालिदा के साथ नेकी इस गुनाह का बेहतरीन इलाज है।) आपने फ़रमाया क्या ख़ाला मौजूद हैं ? उसने अर्ज़ किया हां। या रसूल अल्लाह! आपने फ़रमाया जा और उसके साथ नेकी कर। (वालिदा के साथ ताअल्लुक़ होने की वजह से ख़ाला से नेकी करना वालिदा से नेकी करने के बराबर है।) बाद में फ़रमाया “ लौ काना उम्मोहू ” अगर उसकी वालिदा जि़न्दा होती तो इस गुनाह के असर को ज़ायल करने के लिए उसके साथ नेकी करना यक़ीन , उससे बेहतर था। (मआद)।

हिकायत अहबात व तकफ़ीर के मुत्तालिक़

किताबे मोतबरा में मनकूल (उद्धृत) है कि ज़मानए साबिक़ में दो भाई थे। एक मोमिन ख़ुदा परस्त और दूसरा काफ़िर (नास्तिक) बुत परस्त और वह दोनों एक मकान में रहते थे बुत परस्त ऊपरी मंजिल पर और खुदा परस्त निचली मंजिल पर। बुत परस्त अमीर कबीर और ऐशो ईशरत की ज़िन्दगी गुज़ार रहा था और खुदा परस्त फ़क़्रोफ़ाक़ा और बेनवाई की ज़िन्दगी में मुबतिला था। कभी-कभी उसका बुत परसत भाई उससे कहता कि अगर तू बुत को सजदा करे तो मैं तुझे दौलत में शरीक कर लूंगा। तू क्यों इतनी तलख़ और तकलीफ़ देह ज़िन्दगी गुज़ार रहा है। आ और इस बुत को सज्दा कर ताकि दोनों इकट्ठे ऐश की ज़िन्दगी गुज़ारें। उसका मोमिन (धर्मनिष्ठ) भाई इसके जवाब में कहता कि ऐ मेरे भाई! तू क्यों खुदा और रोज़े जज़ा से ख़ौफ़ ज़दा नहीं होता। बुत खुदा नहीं आ और खुदा का इबादत कर और खुदा के अज़ाब से डर , यहां तक की इस क़ीलो-क़ील में काफ़ी मुद्दत गुज़र गयी जब भी दोनों भाई मुलाकात करते एक दूसरे से इसी किस्म की बातें करते। यहां तक कि एक रात खुदा परस्त अपने हुजरे में बैठा था कि बुत परस्त भाई के हुजरे से लज़ीज़ खाने की खुशबू उसके मशाम में पहुंची औस उसने अपने नफ़स से कहा कि कब तक खुदा की इबादत करता रहेगा और या अल्लाह कहता रहेगा , हालाकिं इस उम्र तक तुझे नया लिबास और नर्म ग़िज़ा (खाना) नसीब नहीं हुयी और ख़ुश्क रोटी खाते-खाते बूढ़ा हो चुका है और दांत खुश्क खाने को चबा नहीं सकते। मेरा भाई सच कहता है , चलो और उसके बुत की पूजा करो ताकि उसका अच्छा खाना खा कर लुत्फ़ उठाओ। उठा और ऊपरी मंज़िल की तरफ़ भाई के पास जाने के लिए रवाना हुआ ताकि उसके मज़हब (धर्म) बुत परस्ती को कुबूल करे।

इधर उसके बुत परस्त भाई की यह हालत है कि सोच-विचार में है कि मैं इस बुत परस्ती को नहीं समझ सका और न ही कुछ फ़ायदा हुआ। चलो और अपने भाई के पास जाकर ख़ुदा की इबादत करो और वह ऊपर की मंज़िल से उतरा और सीढ़ियों पर दोनों भाईयों की मुलाक़ीत हुई। एक दूसरे से वाक़िया बयान किया , इधर इज़राइल को हुक्म हुआ कि दोनों भाईयों की रुह (आत्मा) क़ब्ज़ कर लो। वह दोनों मर गए और जो इबादत उस ख़ुदा परस्त ने की थी तमाम आमाल उस बुत परस्त के नामए आमाल में लिखे , जो इस इरादे से चला था और जो बुत परस्त के गुनाह थे , वह खुदा परस्त के नामए आमाल में दर्ज हो गए , जो कुफ्र की नीयत से हुजरा से निकला था। तमाम उम्र इबादत में गुज़ार दी , मगर मौत इस्लाम पर। यह अहबात और तकफ़ीर की आला (श्रेष्ठ) और उम्दा मिसाल है।

ऐ बरादर! शैतान तेरा सब से बड़ा दुश्मन है आख़िर वक़्त तक हक़ से फ़ुसलाने की कोशिश में रहता है , अपने ख़्यालात को मुजाहदाते क़सीरा और इबादात के ज़रिए हक़ का आदी बना , ताकि शैतान के हरबे कारगर न हो सकें और तू हक़ पर क़ायम और दायम रहे।

पुरसिशे आमाल

कुर्आन पाक़ में इरशादे ख़ुदा वन्दी है।

हम ज़रुर बिलज़रुर अम्बिया और उनकी उम्मतों से सवाल करेंगे कि तुम्हें लोगों की तरफ़ हक़ की दावत देने के लिए भेजा गया था , क्या तुमने मेरे अहकाम उन तक पहुंचाए थे ? अर्ज़ करेंगे परवरदिगार! हमने तेरे अहकाम पहुंचाने में ज़र्रा भर नर्मी नहीं की। पूछा जाएगा तुम्हारा गवाह कौन है ? तमाम अर्ज़ करेंगे , परवरदिगार तेरी ज़ात के अलावा ख़ातिमुल अम्बिया हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.व.व. ) गवाह हैं , जैसा कि कुर्आन में हैः

“ और इसी तरह तुमको आदिल उम्मत बनाया ताकि औऱ लोगों के मुक़ाबिले में तुम गवाह बनो और रसूल (मोहम्मद , स 0 अ 0) तुम्हारे मुक़ाबिले में गवाह बने। ”

( सू 0 आल इमरान- 138)

इसी तरह हज़रत ईसा (अ 0 स 0) से पूछा जाएगाः-

“ ऐ ईसा इब्ने मरियम क्या तूने उनको कहा था कि तुम मेरी और मेरी वालिदा की परस्तिश करो ? ”

हज़रत ईसा (अ 0 स 0) के बदन में अज़मते ख़ुदावन्दी के रोब से लरज़ा तारी होगा और अर्ज़ करेंगे परवरदिगार! अगर मैंने यह कहा होता तो तुझे भी इल्म होता। मैंने तो कहा था “ इन्नी अब्दुल्ला ” कि , मैं तो ख़ुदा का बन्दा हूं तुम्हारे पास किताब लेकर औऱ नबी बनकर आया हूँ। तुम उसकी इबादत करो , जिसने मुझे और तुम्हें पैदा किया। फ़िर उनकी उम्मतों से सवाल किया जाएगा कि क्या तुम्हारे पैग़म्बरों ने आज के दिन से मुत्तालिक़ा क़ज़ाया की ख़बर नहीं दी थी ? सभी कहेंगे की ख़बर धी थी। दूसरे न्यामते परवरदिगार के मुत्तालिक़ सवाल होगा कि उनसे क्या सुलूक किया था ?

क्या न्यामतों पर शुक्र अदा किया था , या कुफ़राने न्यामत किया था ? न्यामतों की पुरसिश के बारे में मुख़तलिफ़ रवायत (कथन) है , जिनकों इस तरह इकट्ठा किया गया है कि न्यामतों के मुख़्तलिफ़ दर्जें है और अहम तरीन न्यामत वलायते आले मोहम्मद है , बल्कि नईमे मुतलक़ हैं।

इमाम अलैहिस्सलाम ने क़तादह से पूछा तुम आम्म (सुन्नी) “ सुम्माल्तुस अलुन्ना यौमएज़िन अनिन्नईम ” से क्या मुराद लेते हो ? उसने अर्ज़ किया रोटी और पानी वग़ैरा के बारे में पूछा जाएगा।

इमाम अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया कि खुदा करीमतर है कि वह इसके मुत्तालिक सवाल करे( अगर तुम किसी को अपने दस्तरख़्वान पर बुला कर रोटी खिलाओ , तो क्या उसके बाद तुम उसके मुत्तालिक पूछा करते हो) उसने अर्ज़ किया फ़िर नईम से क्या मुराद है ? हज़रत ने फ़रमाया , इस न्यामत से मुराद हम आले मोहम्मद (स 0 अ 0) की विलायत हैं। पूछा जाएगा कि तुमने आले मोहम्मद के साथ क्या सुलूक किया। किस क़द्र मोहब्बत और ताबेदारी की ? दुश्मनों से पूछा जाएगा कि तुमने इस न्यामत से दुश्मनी करके कुफ़राने न्यामत क्यों किया।

तर्जुमाः- अल्लाह की न्यामत को पहचानने के बाद उसका इन्कार करते हैं।

ख़ुराक के बारे में तो इतना पूछा जाएगा कि हलाल से कमाया था या हराम से। इमें असराफ़ क्यों किया था ? हराम पर क्यों खर्च करते रहे मैं सवाल करता रहा मगर तुमने न दिया। “ अलमालो माली वलफुक़राओ अयाली ” फुक़रा का सवाल मेरा सवाल था।

शेख़ सद्दूक (र 0) से रवायत (कथन) है कि क़यामत के दिन किसी आदमी के क़दम अपनी जगह से उस वक़्त तक न उठेंगे , यहां तक की उससे चार चीज़ों के बारे में पूछ न लिया जाय।

तर्जुमा-

1- तूने अपनी उम्र को किन चीज़ों में बरबाद किया ?

2- अपनी जवानी किन कामों में तबाह की ?

3- माल कैसे कमाया औऱ कैसे ख़र्च किया ?

4- और वलायते आले मोहम्मद के बारे में सवाल होगा ?

अबादात

तर्जुमा- “ सबसे पहले बन्दे से जिसका हिसाब होगा , वह नमाज़ है। ”

क्या नमाजॉ वाजिब वक़्त पर अदा करता रहा है , क्या इस उमूदे दीन और वसायाए अम्बिया को सहा अदा करता रहा है या रियाकारी करता रहा। इसके बाद रोज़ा हज़ ज़कात , खुम्स व जिहाद के बारे में हिसाब होगा और ज़कात व ख़ुम्स के हक़दार दामन पकड़कर मुतालिबा करेंगे।

हुकुकुन्नास

ख़ल्लाक़े आलम का अपने बन्दों के साथ दो कि़स्म का मामला होगा। ( 1) अदल ( 2) फ़ज़लों करम।

(1) जिस शख़्स के ज़िम्मे किसी इन्सान का कोई हक़ होगा। उसकी नेकियां लेकर साहबे हक़ को दी जाएगी। मसलन ग़ीबत , तोहमत , यानी ग़ीबत करने वाले औऱ तोहम लगाने वाले की नेकियां उसको दी जाएंगी , जिसकी ग़ीबत की गयी है , और उसके गुनाह (पाप) ग़ीबत करने वाले को दिए जाएंगे। इस बारे में सरीहन रवायात मौजूद है। चूनांचे रौज़ए काफ़ी में हज़रत अली बिनअल हुसैन (अ 0 स 0) से एक बड़ी हदीस में क़यामत के दिन ख़लाएक़ के हिसाब का ज़िक्र किया गया है। इस हदीस के आख़िर में आपने एक शख़्स के जवाब में इरशाद फ़रमाया , जिसने पूछा था कि ऐ फ़रज़न्दे रसूल (स 0 अ 0)! अगर किसी मुसलमान का किसी काफ़िर (नास्तिक) से हक़ का मुतालिबा हो , वह तो दोज़ख़ में होगा। उसकी तलाफ़ी कैसे होगी ? उसके पास नेकियां तो हैं नहीं ? आपने फ़रमाया , इस हक़ के वज़न के मुताबिक़ उस काफ़िर (नास्तिक) के अज़ाब में अज़ाफ़ा कर दिया जाएगा। फ़रमाया ज़ालिम की नेकियां बक़द्र जुल्म मज़लूम (असहाय) को दी जाएंगी। उस शख़्स ने अर्ज़ किया कि अगर उस ज़ालिम मुसलमान के पास नेकियां न हो , तो आपने फ़रमाया उस मज़लूम के गुनाहों का बोझ , इस ज़ालिम पर डाल दिया जाएगा और यही अदल (इन्साफ़) का तक़ाज़ा है।

लसालिउल अख़बार में पैग़म्बरे ख़ुदा (स 0 अ 0 स) से मनकूल (उद्धृत) है कि आपने सहाबा से पूछा कि क्या तुम जानते हो कि मुफ़लिस कौन है ? सहाबा ने अर्ज़ किया या रसूल अल्लाह (स.अ.व.व. )! हममें मुफ़लिस वह है , जिसके पास रुपया-पैसा और माल व मताअ न हो। आपने फ़रमाया-

“ मेरी उम्मत का मुफ़लिस वह शख़्स है , जो क़यामत के दिन नमाज़ , रोज़ा , हज , ज़कात के साथ आए , लेकिन उसने किसी को गालियां दी होंगी। किसी का माल खाया होगा। किसी को क़त्ल किया होगा। किसी को पीटा होगा। इसलिए इन मज़लूमों में से हर एक को उसकी नेकियां दी जाएंगी और वह नेकियां उसकी होंगी , अगर उनसे पहले नेकियां ख़त्म हो गयीं तो उनके गुनाह (पाप) उस ज़ालिम पर

डाल दिया जाएगें और उसे आग में डाल दिया जाएगा। (मआद)

अल्लामा जज़ायरी अपनी किताब में एक हदीस नक़्ल फ़रमाते हैं अगर कोई शख़्स एक दरहम अपने ख़सम को वापस कर दे तो यह हज़ार बरस की इबादत , हज़ार गुलाम आज़ाद करने और हज़ार हज , उमरा , बजा लाने से बेहतर है।

एक और जगह मासूमीन (अ 0 स 0) से नक़ल फ़रमाते हैं-

“ यानी जो शख़्स अपने तलबगारों को राज़ी करे उसके लिए बग़ैर हिसाब के जन्नत वाजिब हो जाती है और जन्नत में उसे हज़रत इस्माइल (अ 0 स 0) की रिफ़ाक़ात हासिल होगी। ”

(2) मआमला बफ़ज़्ले ख़ुदावन्दी- ऐसे वक़्त में जबकि किसी शख़्स के ज़िम्मे हुकूकुन्नास हों औऱ वह उनकी वजह से रोक लिया गया हो तो उस वक़्त अल्लाह तआला का फ़ज़्ल अगर शामिल हुआ तो नजात हासिल हो जाएगी। उस वक़्त कुछ लोग अपने-अपने पसीने में गोता खा रहे होंगे। ख़ल्लाक़े आलम फ़ज़्लो करम से बेहश्ती महलात को ज़ाहिर करेगा और उस शख़्स को जो मुतालिबा रखता है , निदा (आवाज़) दी जाएगी , ऐ मेरे बन्दे से मुतालिबा करने वाले! अगर चाहता है तो इस महल में दाख़िल हो जा और मेरे इस बन्दे को अपना हक़ माफ़ करके रिहा कर दे। खुशक़िस्मत है वह बन्दा जिसके शामिले हाल परवरदिगारे आलम का फ़ज़्लों करम हो जाए। अगर खुदा उसके मामले की इस्लाह न करे तो मामला सख़्त है। इमाम ज़ैनुल अब्दीन (अ 0 स 0) उस के खौफ़ से गरिया करते और दुआ फ़रमाते थेः-

“ इलाही हमारे साथ अपने फ़ज़्ल के ज़रिए मामला कर न कि अदल (इन्साफ़) के साथ ऐ करीम। ”

दोआए अबू हमज़ा सुमाली के अल्फ़ाज़ ज़्यादा मौज़ूं हैं और नमाज़ रद्दे मज़ालिम बेहतरीन अमल है। चार रकत की नीयत करे और पहली रकत में “ अलहम्द ” के बाद पच्चीस बार “ कुलहुअल्लाह ” दूसरी में पचास बार , तीसरी में पचहत्तर बार , चौथी में सौ बार और सलाम फ़ेर कर दुआ करे।

हिकायत

शेख़ शहीद अलैहे रहमा के मकातिब से यह कहानी मनक़ूल (उद्धृत) है कि अहमद बिने अबी अलहवारी ने कहा मेरी ख़्वाहिश थी कि मैं अबू सलमान दुर्रानी (अब्दुल रहमान बिने अतिया मशहूर व मारुफ़ ज़ाहिद जिसने 235 हिजरी में दमिश्क के क़रिया दारिया में वफ़ात पायी और वही उसकी क़ब्र मशहूर है) और अहमद बिने अबी अलहवारी (उसके असहाब में से हैं) को ख़्वाब मशहूर है) और अहमद बिने अबी अबहबारी (उसके असहाब में से है) को ख़्वाब में देखूं यहा तक कि एक साल के बाद मैंने उन्हें ख़्वाब में देखा। मैंने उनसे पूछा , ऐ उस्तादे गरामी! अल्लाहतआला ने तेरे साथ क्या सुलूक किया ? अबू सलमान ने कहा , ऐ अहमद! एक बार बाबे सग़ीर से आते हुए एक ऊँट पर घास लदी हुई देखी , सब मैंने उसमें से एक शाख़ पकड़ी। मुझे याद नहीं कि मैंने उससे ख़िलाल किया या उसे दाँतों में जाले बग़ैर दूर फ़ेंक दिया। अभ एक साल गुज़रने वाला है कि मैं अभी तक उसी शाख़ के हिसाब में मुबतिला हूँ।

यह हिकायत बईद अज़क़यास नहीं है , बल्कि यह आययए करीमा इश की तसदीक़ करती है।

“ ऐ बेटे दुरुस्त है कि राई के बराबर भी नेकी या बदी अगर आसमान व ज़मीन या किसी पत्थर में भी हुई तो उसे हिसाब के वक़्त पेश किया जाएगा औऱ उसके मुत्तालिक़ सवाल किया जाएगा। ”

( सू 0 लुक़मान – 16)

और हज़रत अमीरुल मोमनीन (अ 0 स 0) एक खुत्बे में इरशाद फ़रमाते हैं-

“ क्या बरोज़े क़यामत नफ़सों से राई के बराबर नेकी या बदी का हिसाब नहीं किया जाएगा। ? ” और हज़रत अली (अ 0 स 0) ने मोहम्मद बिने अबी बकर (र 0) को एक कागज़ पर तहरीर करके भेजा था-

“ ऐ अल्लाह के बन्दों तुम्हें इल्म होना चाहिए कि बरोज़े क़यामत अल्लाहतआला तुमसे छोटे बड़े हर अमल के बारे में पूछेगा। ” और इब्ने अब्बास को एक ख़त में तहरीर फ़रमायाः-

“ क्या तू हिसाब के मनाक़शा से नहीं डरता ” ?

अस्ल में मनाक़शा बदन में कांटा चुभने को कहते हैं , जिस तरह कांटा निकालने के लिए बारीक बीनी काविश का सामना करना पड़ता है इसी तरह बरोज़े क़यामत हिसाब में भी बारीक बीनी और काविश का सामना होगा। कुछ मोहक़्कीन ने कहा है कि बरोज़े क़यामत मीज़ान के ख़ौफ़ से कोई शख़्स भी महफूज़ (सुरक्शित) न होगा , बल्कि वह शख़्स जिसने दुनियाँ में अपने आमाल व अक़वाल औऱ ख़तरात व लहज़ात का हिसाब मीज़ाने शरा के साथ कर लिया होगा , महफूज़ होगा। इसी तरह एक हदीम मर्वी है कि आं हज़रत (स.अ.व.व. ) ने फ़रमाया , “ ऐ लोगों! ” क़यामत के दिन हिसाब होने से पहले अपने आमाल का हिसाब कर लो और क़यामत के दिन आमाल का वज़न होने से पहले अपने आमाल का वज़न कर लो।

हिकायत

तौबा बिने समा के बारे में नक़ल किया गया है कि वह शबो रोज़ अक्सर अपने नफ़स का मुहासिबा किया करता था। एक दिन उसने अपनी गुज़िश्ता ज़िन्दगी के दिनों का हिसाब लगाया तो उसने अन्दाज़ा लगाया कि अब तक उसकी साठ साल उम्र गुज़र चुकी है , फिर उसने सालों के दिन बनाए तो वह इक्कीस हज़ार छः सौ दिन बने। उसने अफ़सोस करते हुए कहा क्या मैं इक्कीस हज़ार छः सौ गुनाहों के साथ अपने परवरदिगार के हुज़ूर में पेश हूंगा। यह अल्फाज़ कहते ही वह बेहोश हो गया और उशी बेहोशी में मर गया। एक रवायत में है कि एक बार रसूल अकरम (स.अ.व.व. ) बिना घास की ज़मीन पर तशरीफ़ फर्मा थे , कि वहां पर असहाब को ईंधन जमा करने का हुक्म दिया। सहाबा ने अर्ज़ किया या रसूल अल्लाह (स.अ.व.व. )! हम ऐसी ज़मीन पर उतरे हुए हैं जहां पर ईंधन मिलना मुश्किल है। आपने फ़रमाया जिस किसी से जितना मुमकिन हो इकट्ठा करें। बस उन्होंने ईंधन लाकर हुजूर के सामने रख दिया और एक ढ़ेर लग गया। हुज़ूर ने ईंधन की तरफ़ देखकर फ़रमाया कि इसी तरह रोज़े क़यामत लोगों के गुनाह भी जमा होंगे। इससे मालूम होता है कि आपने इसलिए हुक्म दिया है कि सहाबा (साथी) को इल्म हो जाए कि जिस तरह वे घास मैदान में ईंधन नज़र नहीं आता , लेकिन तलाश करने के बाद ढ़ेर लग गया। इसी तरह तुम्हारे गुनाह तुम्हें नज़र नहीं आते , लेकिन जिस दिन गुनाहों की जुसतजू और तलाश होगी और हिसाब होगा तो बेशुमार गुनाह इकट्ठा हो जाएंगे , चुनांचे तौबा बिने समा ने अपनी तमाम उम्र में हर रोज़ एक गुनाह फर्ज़ किया। इसी वजह से उसके इक्कीस हज़ार गुनाह (पाप) बन गए।


फ़स्ल नहुम (नवी फस्ल)

हौज़े कौसर

उन तमाम मुसल्लम मामलों में जिनका ज़िक्र कुर्आन मजीद और रवायते अम्मा और ख़ासा में मौजूद है। हौज़े कौसर भी है और यह वह ख़ैरे कौसर है , जो ख़ल्लाक़े आलम ने हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.व.व. ) को अता की। बहुत सी किताबें जैसे बसायरुल दरजात मआलमुल जुल्फा और बहारुल अनवार जिल्द 2 में मर्वी हैं कि अब्दुल्ला बिने सनान ने हज़रत अबी जाफ़र अल सादिक (अ 0 स 0) से हौज़े कौसर के बारे में पूछा तो हज़रत ने फ़रमाया इसकी तूल (दूरी) बसरा से सनाए यमन तक के अन्दाज़े के बराबर है। अब्दुल्ला ने ताअज्जुब किया। हज़रत ने फ़रमाया कि क्या तू उसको देखना चाहता है , उसने अर्ज़ किया हां। या बिने रसूल अल्लाह! हज़रत उसको मदीने से बाहर लाए और अपने पांव को ज़मीन पर मारा। अब्दुल्लाह कहता है। हुक्मे इमाम से मेरी आंखे रौशन हो गयीं और पर्दा दूर हो गया। मैंने देखा कि एक नहर बह रही है और जहां मैं और इमाम (अ 0 स 0) खड़े हैं , वह एक जज़ीरा है। उस नहर में एक तरफ़ बर्फ़ से ज़्यादा सफ़ेद पानी और दूसरी तरफ़ दूध जारी है और बीच में सुर्ख़ याकूत की तरह शराबन तहूरा बह रहा है। उससे ज़्यादा ख़ूबसूरत चीज़ कभी न देखी थी और न ही दूध और पानी के बीच इस तरह शराब देखा था। मैंने अर्ज़ किया कि मेरी जान आप पर कुर्बान हो। यह नहर कहां से निकल रही हैं आपने फ़रमाया जैसा कि कुर्आन में ज़िक्र है कि बेहश्त में दूध , पानी और शराब का चश्मा है , यह नहर उसमें जारी है। इस नहर के दोनों किनारों पर दरख़्त हैं और दरख़्तों के बीच दूरे जन्नत अपने वालों को लडकाए हुए हैं कि उससे ज़्यादा खूबसूरत बाल कभी न देखे थे और हर एक के हाथ में इस क़द्र खुबसूरत बर्तन है कि ऐसा बर्तन दुनियां में नहीं देखा। हज़रत एक के क़बरीब गए और पानी मांगा। उस हूर ने बर्तन को उस नहर से पुर करके आं हज़रत (अ 0 स 0) को दिया और आदाब किया। इमाम (अ 0 स 0) ने मुझे दिया। मैंने कभी इतनी लताफ़त और लज़्ज़त न चक्ख़ी और इस क़द्र मुश्क की खुश्बू कभी न सूंघी थी। मैंने अर्ज़ किया कि मेरी जान आप पर कुर्बान हो , जो कुछ मैंने आज देखा है , उन चीज़ों का मुझे गुमान भी न था। हज़रत ने फ़रमाया , यह उससे कमतर है , जो हमारे शियों के लिए मोहय्या की गयी है , जिस वक़्त वह मरता है , उसकी रुह इन्हीं बाग़ात और नहरों में फ़िरती और नहाती है और मेवों से लुत्फ़ उठाती है। (मआद)।

रसूले ख़ुदा (स 0 अ 0) ने हज़रत अली (अ 0 स 0) से फ़रमाया , हौज़े कौसर अर्शे आज़म के नीचे ज़ारी है उसका पानी दूध से ज़्यादा सफ़ेद , शहद से ज़्यादा मीठा , घी से ज़्यादा नर्म है। उसके कंकर ज़बरजद , याकूत और मरजान हैं। उसकी घास जाफ़रान और मिट्टी मुश्क अज़फर है। उसके बाद आं हज़रत ने अपना हाथ अमीरुल मोमनीन (अ 0 स 0) के पहलू पर रखा और फ़रमाया ऐ अली (अ 0 स 0) यह नहर मेरे और तुम्हारे लिए है और तुम्हारे महबूबों के लिए है। (अहसनुल फ़वायद) हुसैनियों के लिये एक खुसूसियत यह भी है। हज़रत सादिक़े आलेमोहम्मद (अ 0 स 0) फ़रमाते हैं कि “ ग़मे हुसैन ” ( अ 0 स 0) में रोने वाला हौज़े कौसर पर खुश व खुर्रम वारिद होगा और हौज़े कौसर उसको देख कर खुश होगा (मआद)

ज़हूरे अज़मते आले मोहम्मद (अ 0 स 0)

ख़ल्लाक़े आलम जिस तरह दूसरी न्यामतों का इज़हार क़यामत के रोज़ फ़रमाएगा , उसी तरह अज़मत व शान और जलालते मोहम्मद व आले मोहम्मद (अ 0 स 0) का भी इज़हार फ़रमाएगा।

लेवाएहम्द

अब्दुल्ला बिने सलाम ने रसूले खुदा (स.अ.व.व. ) की ख़िदमत में अर्ज़ किया या रसूल अल्लाह सल्लल्लाह अलैहे वाआलेही वसल्लम लवा अलहम्द की क़ैफ़ियत क्या है ? आगाह फ़रमाएं। आपने फ़रमाया इश का तूल (दूरी) हज़ार बर्स की राह के बराबर होगा , उसका सुतून सुर्ख़ याकूत और उसका क़ब्ज़ा सफ़ेद मोतियों का , उसका , फ़रेरा सब्ज़ (हरा) ज़मरुद का होगा। एक फ़रेश मशरिक़ की तरपञ दूसरा मग़रिब की तरफञ और तीसरा औसत में और उसके ऊपर तीन सतरें तहरीर होंगी।

1- बिस्मिल्लाह अर्रहमानिर्रहीम।

2- अलहम्दो लिल्लाहे रब्बिल आलमीन।

3- लाइलाहा इल्लललाहो , मोहम्मदुर रसूलुल्लाह अलीयुन वलीयुल्लाहे।

हर एक सत्तर हज़ार साल कह राह के बराबर लम्बी होगी। उसने पूछा उसको कौन उठाएगा ? आपने फ़रमाया उसको वही उठाएगा जो दुनियाँ में मेरा अलम उठा रहा होगा यानी अली इब्ने अबी तालिब (अ 0 स 0) जिसका नाम अल्लाहतआला ने ज़मीन व आसमान की पैदाइश से पहले लिखा , उसने फ़रमाया मोमनीन , दोस्ताने खुदा , खुदा के शिया , मेरे शिया और मोहिब और अली (अ 0 स 0) के शिया और मोहिब उसके साए में होंगे। बस उनका हाल और अंजाम बहुत अच्छा है , और अज़ाब है उस शख़्स के लिए जो अली के बारे में मुझे या अली (अ 0 स 0) को मेरे बारे में झुठलाए या इस बारे में झगड़ा करे , जिसमें खुदा वन्दे आलम ने उसको क़ायम किया हो।

हज़रत अली (अ 0 स 0) साक़िए कौसर होंगे

“ वा अन्ता साहिबो हौज़ी ” एक हदीस के हिस्से में फ़रमाया ऐ अली! तू ही साक़िए कौसर है। ख़स्साल शेख़ सद्दूक (र 0) ने जनाबे अमीरूल मोमनीन (अ 0 स 0) से मर्वी है कि मैं हौज़े कौसर पर रसूले खुदा (स.अ.व.व. ) के साथ हूंगा और मेरी इतरत भी वहां मेरे साथ होगी , जो शख़्स हमारी मुलाक़ात का ख़्वाहिश मन्द है , उसे चाहिए कि हमारे क़ौल व फ़ेल पर अमल करे , क्योंकि हर घर से कुछ नजीब व शरीफ़ होते हैं , हमार लिए और हमारे मुहिब्बों के लिए शिफाअत साबित है। बस हौज़े कौसर पर मुलाक़ात करने की कोशिश करो , क्योंकि हम वहां से अपने दुश्मनों को हटाएंगें औऱ हम अपने मुहिब्बों को सेराब करेंगे। जो शख़्स उसका एक घूंट पी लेगा , वह हरगिज़ प्यासा न होगा।

बुख़ारी वग़ैरह में है कि जब कुछ असहाब को कौसर से दूर हटाया जाए तो रसूले खुदा (स.अ.व.व. ) फ़रमाएंगे , “ या रब्बी असहाबी असहाबी ” या अल्लाह यह तो मेरे असहाब हैं। “ फ़युक़ालों लातदरी मा अहदस बादक ” तुम्हें इल्म नहीं कि उन्होंने तुम्हारे बाद क्या किया , अहदास व बिदअत फ़ैलाए। इसी तरह मुस्लिम मय शरह नौवी जिल्द 2 सफ़ा 249, बुख़ारी जिल्द 2 सफ़ा 975 पर मौजूद है। (अहसनुल फ़वायद)।

मुक़ामे महमूद

तफ़सीर फुरात बिने इब्राहिम कूफ़ी में हज़रत सादिक़ आले मोहम्मद अलैहिस सलाम के असनाद से जनाब रिसालत मआब सल्ललाहे अलैहे वा आलेही व सल्लम से एक लम्बी रवायत में मर्वी है , जिसका खुलासा यह है , चूंकि खल्लाक़े आलम ने मुझसे वायदा फ़रमाया है-

उसे वह ज़रुर पूरा करेगा और क़यामत के दिन तमाम लोगों को इकट्ठा करेगा और मेरे लिए एक मिम्बर नसब किया जाएगा , जिसके हज़ार दर्जे होंगे और हर दर्जा ज़बरजद , ज़मर्रूद याकूत और तिला (सोने) का होगा। मैं उसके आख़िरी दर्जे पर चढ़ जाऊँगा। उस वक़्त जिबरइल आकर लवा अलहम्द मेरे हाथ में देंगे और कहेंगे या मोहम्मद (स.अ.व.व. ) यह वह मुक़ामे महमूद है , जिसका परवरदिगारे आलम ने तुझसे वायदा किया था , उस वक़्त में जनाब अली (अ 0 स 0) से कहूंगा या अली (अ 0 स 0) तुम ऊपर चढ़ो , चुनांचे वह मिम्बर पर चढ़ेंगे और मुझसे एक दर्जा नीचे बिला फ़सल बैठेंगे तब मैं लवा अलहम्द उनके हाथ में दे दूंगा।

अली (अ 0) दोज़ख़ और बेहश्त के बांटने वाले हैं

फ़िर मेरे पास रिज़वाने जन्नत बेहश्त (स्वर्ग) की कुंजियाँ लेकर आएगा औऱ मेरे हवाले कर देगा और इस के बाद जहन्नुम (नर्क़) का ख़ाज़िन (ख़जांची) जहन्नुम की कुंजियां मेरे हवाले कर देगा। मैं यह कुंजियां हज़रत अली (अ 0 स 0) के हवाले कर दूंगा

( “ या अलीयो अंता क़सीमुन्नारे वलजन्नत ” ) ।

“ ऐ अली तू जन्नत और जहन्नुम का तक़सीम करने वाला है। ”

उस वक़्त जन्नत और जहन्नुम मेरी और अली (अ 0 स 0) की , इससे ज़्यादा फ़रमा बरदार होगी , जितनी कोई फ़राम बरदार दुल्हन अपने शौहर की अताअत करती है और इस आयत “ अलक़िया फञी जहन्नमा कुल्ला कफ़्फ़ारिन अनीद। ” का यही मतलब है , “ यानी ऐ मोहम्मद (स.अ.व.व. ) व अली (अ 0 स 0) तुम दोनों हर काफ़िर (नास्तिक) और सरकश (बदमाश) को जहन्नुम में झोंक दो। ”

शफ़ाअत

तफ़सीरे कुम्मी में जनाब समाआ से रवायत (कथन) है कि किसी ने हज़रत सादिक आले मोहम्मद (अ 0 स 0) की ख़िदमत में अर्ज़ किया क़यामत के दिन जनाब पैग़म्बर (स 0 अ 0) इस्लाम की शिफ़ाअत किस तरह होगी ? आपने फ़रमाया जब लोग पसीने की कसरत से मुज़तरिब और परेशान हो जाएंगे। इसी नफ़सी नफ़सी के आलम में लोग तंग आकर जनाबे आदम (अ 0 स 0) की ख़िदमत में मग़रज़ शिफ़ाअत हाजि़र होंगे। वह अपने तर्क ऊला का उज़्र पेश करेंगे और माज़रत चाहेंगे। फ़िर उनकी हिदायत के मुताबिक जनाबे नूह (अ 0 स 0) की ख़िदमत में हाज़िर होंगे। वह भी माज़र ख़्वाही करेंगे। इसी तरह हर साबिक़ नबी उनको अपनी बाद वाले नबी की ख़िदमत में भेजेगा। यहां तक कि जनाबे ईसा (अ 0 स 0) की ख़िदमत में पहुंचेंगे। वह उनको सरकारे ख़त्मी मरतब सल्लललाहो अलैहे व आलेहि वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर होने का मशविरा देंगे।

चुनांचे लोग उनकी ख़िदमत में अपनी मुश्किलात दूर करने की दरख़्वास्त पेश करेंगे। आं जनाब उनके हमराह बाबुल रहमान तक तशरीफ लाएंगे और वहां सजदा रेज़ हो जाएंगे। उस वक़्त इरशादे रब्बुल इज़्ज़त होगा-

तर्जुमा- “ ऐ हबीब सर उठाओ और शिफाअत करो , तुम्हारी शिफ़ाअत मक़बूल है और जो कुछ मांगना हो मागों , तुम्हे अता किया जाएगा। ”

( आइम्मां की शिफ़ाअत के बारे में हिसाब की फ़स्ल में तफ़सील गुज़र चुकी है।)

ख़्ससाल शेख़ सद्दूक (र 0) में जनाब रसूल खुदा से मनकूल है कि तीन गिरोह बारगाह इलाही में शफ़ाअत करेंगे और उनकी शफ़ाअत कुलूब होगी। अम्बिया , ओलमा और शोहदा। (अहसनुल फ़वायद)।

बहारुल अनवार जिल्द सोम में है कि रसूले अकरम (स.अ.व.व. ) ने इरशाद फ़रमाया कि शिआने अली (अ 0 स 0) को हक़ीर न समझो , उनमें से एक-एक़ शख़्स क़बीले रबीआ व मुज़र की तादाद के मुताबिक़ गुनाहगारों की शिफ़ाअत करेगा।

शिफ़ाअत किन लोगों की होगी

बहारुल अनवार में है कि रसूले खुदा (स.अ.व.व. ) ने फ़रमाया-

“ शफ़ाअत मेरी उम्मत के उन लोगों के लिए है जो गुनाहे क़बीरा के मुरतकिब होंगे , और जो नेकूकार हैं वह इससे बेनियाज़ हैं। ”

जनाब रसूले खुदा (स अ व व. ) ने फ़रमाया-

“ मैं बरोज़े क़यामत चार शख़्सों की ज़रुर शिफ़ाअत करूंगा , एक वह शख़्स जो मेरी जुर्रियत की इज्ज़त व तौक़ीर करेगा। दूसरा वह शख़्स जो मेरी जुर्रियात की हाजात पूरी करे। तीसरा वह जो उनकी मतलब बरारी करने में कोशिश करे। चौथा वह जो दिल व ज़बान से उनके साथ मुहब्बत करे। ” ( सवायक़)।

एक और जगह सादिके आले मोहम्मद (अ 0 स 0) ने फ़रमाया-

“ जो शख़्स नमाज़ को हक़ीर समझ़े , उसको हमारी शफ़ाअत नसीब न होगी ”

जनाब बाक़रुल उलूम फ़रमाते हैं-

“ हमारा शिया वह है जो हमारी ताबेदारी करे और हमारी मुख़ालिफ़त न करे ” अगर वाजिबात की बजा आवरी और मोहरमात की परवाह न की तो वह शिआने अली (अ 0 स 0) की फ़ेहरिश्त से ख़ारिज हो जाएगा और वह शफ़ाअत का भी हक़दार नहीं रहेगा। (अहसनुल फ़वायद)

मब मुख़्तसर यह कि अहले ईमान को हमेशा ख़ौफ़ व उम्मीद के दर्मियान रहना चाहिए , जो मोमनीन की सिफ़त (गुण) हैं। इरशादे कुदरत है-

“ वह खुदा की रहमत की उम्मीद रखते हैं और उसके अज़ाब से डरते हैं। ” (मआद)

आराफ़

(1) अख़बार अहले बैत (अ 0 स 0) की बिना पर आराफ़ सिरात पर वह ऊँचा मुक़ाम है , जिस पर मोहम्मद व आले मोहम्मद (अ 0 स 0) तशरीफ़ फ़रमा होंगे। हर शिया और अहले बैत से मुहब्बत करने वाले की पेशानी से नूर साते होगा। गोया वह पुले सिरात पर गुज़रने के लिए विलायते अली (अ 0 स 0) का टिकट है। सवायक में है-

कोई शख़्स उस वक़्त तक पुले सिरात से नहीं गुज़र सकता , जब तक उसके पास अली (अ 0 स 0) का टिकट न होगा। कुर्आन मजीद में है-

यानी आराफ़ पर कुछ लोग होंगे , यहां रजाल से मुराद मुहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.व.व. ) और हज़रत अली (अ 0 स 0) हैं तमाम सेरात पर गुज़रने वाले को पहचानते होंगे उनके चेहरे की निशानियों से।

(2) आराफ़ की दूसरी तफ़सीर यह की गयी है कि यी एक दीवार है जैसा कि कुर्आन मजीद में इरशादे कुदरत है-

“ जिस दिन तुम मोमिन मर्दों और औरतों को देखोगे कि उनके ईमान का नूर उनके आगे-आगे और दाहिनी तरफ़ चल रहा होगा , तो उनसे कहा जाएगा , तुमको बशारत हो कि आज तुम्हारे लिए वह बाग़ है , जिनके नीचे नहरें जारी हैं और तुम उनमें हमेशा रहोगे , यही तो बड़ी कामयाबी है उस दिन मुनाफ़िक़ मर्द और औरतें ईमानदारों से कहेंगे , एक नज़र हमारी तरफ़ बी करो कि हम भी तुम्हारे नूर से रोशनी हासिल करें , उनसे कहा जाएगा कि तुम पीछे दुनियाँ में लौट जाओ और वहीं किसी औऱ नूर की तलाश करो। फिर उनके दर्मियान एक दीवार खड़ी कर दी जाएगी , जिसमें एक दरवाज़ा होगा और उसके अन्दर की जानिब रहमत और बाहर की तरफ़ अज़ाब होगा। ”

इसकी तफ़सीर में कहा गया है कि वह नूर अक़ायद और विलायते आले मोहम्मद (स.अ.व.व. ) का नूर होगा औऱ यह नूर हर एक की मारिफ़त और अक़ायत के दर्जे के मुताबिक होगा और वह दायीं तरफ़ होगा और बाज़ का नूर इतना रोशन होगा कि वह बमुश्किल अपने क़दमों की जगह देख सकेगा। कुछ का नूर हद्दे नज़र से भी ज़्यादा होगा और बाज़ का इतना कमज़ोर की कभी ख़त्म हो जाएगा और कभी रौशन। वह हैरान व परेशान आवाज़ देंगे।

“ परवरदिगार हमारा नूर कामिल फ़रमा ” ताकि हम मंज़िल तक पहुंच सके। इस जगह किसी दूसरे का नूर काम नहीं देगा। मुनाफ़िक़ीन और गुनाहगार ख़्वाहिश करेंगे कि वह उनके अनवार से फ़ायदा उठाएं। मगर कोई फ़ायदा न होगा और उनके दर्मियान दीवार हायल कर दी जाएगी और यही आराफ़ है-

“ मुनाफ़क़ीन मोमनीन से पुकार कर कहेंगे (क्यों भाई) क्या हम कभी तुम्हारे साथ न थे। मोमनीन कहेंगे थे तो ज़रुर , मगर तुमने खुद अपने आपको बला में डाला और हमारे हक़ में गर्दिशों के मुन्तज़िर रहे और दीन में शक किया औऱ तुम्हें तुम्हारी तमन्नाओं ने धोखे में रखा यहां तक की खुदा का हुक्म आ पहुंचा और शैतान ने खुदा के बारे में तुम्हें फ़रेब दिया अब कोई चारा नहीं , तुम्हारी जगह आग है। ”

(3) आराफ़ जन्नत और जहन्नुम के बीच व जगह है जहां मुस्तफ़ीन सीधे सीधे लोग , कम अक़्ल और सादा लोह औरतें , दीवाने और नाबालिग़ बच्चे और वह लोग जो दो नबियों के दर्मियान के ज़माने में हो , जिसको जमानए फ़िरत कहा गया है , या वह लोग , जिनको ज़हूरे हुज्जत का इल्म नहीं हुआ। यह तमाम उस जगह होंगे कि वहां बेहश्तियों की तरह न्यामतें और खुशी नहीं है , लेकिन अज़ाब मुबतिला भी नहीं। शेख़ सादी ने ख़ूब नक्शा खींचा है-

हुराने बहश्तीरा दोज़ख बुवद आराफ़।

अज़ दोज़ खयां पुर्स की आराफ़ बेहश्त अस्त।।

“ हूराने बेहश्त के नज़दीक आराफ़ दोज़ख़ है , लेकिन अगर दोज़ख़ियों से पूछा जाए तो वह कहेंगे कि आराफ़ जन्नत है।


फस्ल दहुम (दस)

पुले सिरात

यह भी आख़ेरत की उन हौलनाक मंज़िलों में से एक है जिन पर इजमालन एतक़ाद रखना हर मुसलमान के लिए फ़र्ज़ और ज़रुरियाते दीन में से हैं।

सिरात लुग़त (शब्द कोष) में बमानी रास्ता है और इस्तिलाह शराह में वह रास्ता मुराद है जो जहन्नुम के ऊपर से गुज़रता है।

एक रवायत (कथन) में मासूम (अ 0स 0) से मनकूल (उद्धृत) है कि पुले सरात बाल से भी ज़्यादा बारीक (महीन) और तलवार से ज़्यादा तेज और आग से ज़्यादा गर्म है ख़ालिस मोमिन (धर्मनिष्ठ) उस पर से बिजली की तरह तेज़ गुज़र जाएंगे। बाज़ लोग बड़ी मुश्किल के साथ गुज़रेंगे औऱ आख़िर में नजात पाएंगे और बाज़ लोग फ़िसल कर जहन्नुम में गिर पड़ेंगे। यह पुले सरात दुनियाँ के सराते मुस्तक़ीम का नमूना है , जो हज़रत अमुीरूल मोमनीन (अ 0स 0) औऱ आइम्मए ताहरीन (अ 0स 0) की अताअत और पैरवी है। जो शख़्स दुनियाँ में सराते मस्तक़ीम (अहले बैते रसूल) (स 0अ 0) से गुफ़तार व किरदार के ज़रिए उदूल करते हुए बातिल की तरफ़ मायल था , वह क़यामत के रोज़ बतौर सज़ा पुले सरात से फ़िसल कर जहन्नुम में गिर पड़ेगा। सूरए हम्द में सराते मुस्तक़ीम से दोनों की तरफ़ इशारा है। (अहले बैत का रास्ता और पुले सरात) अल्लामा मजलिसी (र 0) अपनी किताब हक्कुल यक़ीन में शेख़ सद्दूक़ (र 0) के हवाले से नक़्ल करते हैं , कि उन्होंने फ़रमाया कि रोज़े क़यामत के मुत्तालिक़ अक़ीदा और नज़रिया यह है कि हर उक़बा अपने नाम अलाहिदा एक फ़र्ज़ औऱ वाजिब रखता है जो अल्लाह के अवामिर व नवाही में से एक है। बस जो शख़्स क़यामत के रोज़ इस उक़बा में पहुंचेगा , जो इस वाजिब के नाम से मौसूम है। अगर उस शख़्स से इस वाजिब में तक़सीर वाक़ये हुई होगी , तो उसको उक़बा में हज़ार साल नज़र बन्द रखा जाएगा , फ़िर वह इस वाजिब को हक्के खुदा से तलब करेगा। अगर वह शख़्स अपने साबिक़ा नेक आमाल की बदौलत या खुदा की रहमत औऱ बख़शीश के सहारे नजात और छुटकारा पा लेगा तो फ़िर दूसरे उक़बा में पहुंचेगा।

इसी तरह एक के बाद दूसरे उक़बात पार करता रहेगा और हर अक़बा से उस मुत्तालिक़ा वाजिब के मुत्तालिक़ा सवाल होगा। बस अगर तमाम से सलामती के साथ पूरा उतरेगा तो वह आख़िरकार दारुल बक़ा में पहुंच जाएगा और इस जगह उसे एक ऐसी ज़िन्दगी नसीब होगी , जिसमें उसे कभी मौत न आएगी और इसमें बग़ैर मेहनत और तकलीफ़ के आराम और सुकून पाएगा और अलालहतआला के जवारे रहमत में अम्बिया सिद्दिक़ीन , हजजुल्लाह और बन्दगाने खुदा में सालहीन के साथ रहेगा , लेकिन अगर कोई शख़्स किसी उक़बा में उसके मुत्तालिक़ा वाजिब में कोताहि के बायस बन्द कर दिया गया तो उसको साबिक़ा नेकियां अगर अपने हक़ के ज़रिए नजात न दिला सकीं तो वह अल्लाह की रहमत से भी महरूम रहेगा और उसके पांव फ़िसलेंगे और जहन्नुम में गिर पड़ेगा।

हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़र (अ 0स 0) से रवायत (कथन) की गयी है कि जब यह आएत नाज़िल की गयी।

“ यानी उस रोज़ जहन्नुम को लाया जाएगा ” इस आयत के मानी रसूले अकरम (स.अ.व.व. ) से मालूम किया गया तो आपने फ़रमाया कि जिबरईल ने मुझे बतलाया है कि जब अल्लाहतआला अव्वल से लेकर आख़िर तक हर चीज़ को क़यामत के दिन इकट्ठा करेगा , तो एक लाख , फ़रिश्ते बड़ी तकलीफ़ औऱ मुसीबत के साथ हज़ार डोरियों के साथ जहन्नुम को लाएंगे और जहन्नुम के अन्दर बड़ा जोश-ख़रोश , तोड़ने-फो़ड़ने की सख़्त आवाज़ होगी बस उस वक़्त उससे एक ऐसी हौलनाक आवाज़ निकलेगी कि , जिस आवाज़ को अल्लाहतआला ने लोगों का हिसाब लेने के लिए रोक रखा है और तमाम हलाक हो जाएंगे। हर इन्सान फ़रिश्ता औऱ पैग़म्बर फ़रियाद कर रहे होंगे। रब्बे नफ़सी , नफ़सी यानी ऐ अल्लाह मुझे अपनी पनाह दे और हर पैग़म्बर अपनी उम्मत के बारे में दुआ करेगा रब्बे उम्मती उम्मती बस वह पैग़म्बर अपनी उम्मत को लेकर उश पुल पर गुज़ारेगा , जो उस पर रखा जाएगा। किसी को उस पर से गुज़रने के सिवा चारा न होगा। कुर्आन मजीद में हैः-

“ तुममें से ऐसा कोई भी नहीं जो जहन्नुम पर से होकर न गुज़रे (क्योंकि पुले सिरात इसी पर है) यह तुम्हारे परवरदिगार पर हतमी और लाज़मी (वादा) है , फिर हम परहेज़गारों को बचाएंगे और गुनाहगारों को घुटनों के बल उसमें छोडेंगे। ”

फ़िर फ़रमाया इस रास्ते पर सात उक़बात हैं , हर उक़बा के लिए मौकिफ़ है और हर मौक़िफ़ सत्तर हज़ार फ़रसख़ (फ़सल) का है और हर उक़बा पर सत्तर हज़ार फ़रिश्ते मामूर (मुक़र्रर) हैं तमाम लोग उन सातों उक़बात से गुज़रेंगे।

उक़बा अव्वल (पहला)

सिला रहमी , अमानत औऱ विलायत है

जिस शख़्स ने दुनिया में वाल्दैन (माता-पिता) से रहमत क़ता की होगी , वह दुनियां में कम उम्र होगा। उसके माल में बरकत न होगी और आख़िरत में उसे पुले सिरात पर पहले मौक़िफ़ पर रोक लिया जाएगा औऱ क़ता रहमी हायल होगी। कुर्आन में इसकी तबीह वारिद है-

“ और उस खुदा से डरो जिसके वसीले से आपस में एक दूसरे से सवाल करते हो और क़त रहम से भी डरो। ”

बस अगर तुम्हारा कोई रिश्तेदार बीमार हो तो उसकी अयादत करो। अगर मोहताज है तो उसकी दस्तगिरी करो। उसकी हाजतरवाई करो और ख़ास दिनों में जैसे ईद वग़ैरा में उससे मुलाक़ात करो।

दूसरा मौक़िफ़ अमानत है अलबत्ता अमानत माल के साथ हुी मुख़तस नहीं बल्कि अगर किसी ने यह कहा कि यह बात तेरे पास अमानत है किसी से न कहना। अगर उसने किसी शख़्स को बतला दी तो उसने ख़्यानत की (अलजालिसे बिल अमानत) अगर किसी को रुसवा किया तो उसके साथ ख़्यानत की। या अगर किसी ने तुम्हारे घर माल गिरवीं रखा और वायदे पर तुमने वापस न किया तो यह भी ख़्यानत है और यही इजारह का हाल है कि अगर मुद्दते इजारह ख़त्म होने के बाद उसको वापस न किया तो ख़्यानत है।

सक़तलुल इस्लाम हुसैन बिने सईद एहवाज़ी हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़र (अ 0स 0) से रवायत करते हैं कि एक शख़्स ने हज़रत अबुज़र (र 0) को खुशख़बरी दी की तेरे बेटे बहुत से गोसफ़न्द लाए हैं और तेरे माल में अब अज़ाफ़ा हो गया है , तो अबूज़र (र 0) ने कहा कि उनकी ज़्यादती मेरे लिए खुशी का बायस नहीं है और न ही मैं उसे अच्छा समझता हूँ क्योंकि मैं तो बक़द्रे कि़फ़ायत औऱ कम चीज़े को पसन्द करता हूं ताकि ज़्यादा की हिफ़ाज़त की फ़िक्र मुझे मशगूल न रखे और मैं ग़ाफ़िल (लापरवाह) न हो जाऊँ , क्योंकि मैंने पैग़म्बरे खुदा से सुन रखा है कि क़यामत के दिन पुले सिरात के दोनों तरफ़ रहम और अमानत होगी। जब सिला रहमी करने वाला और अमानतो का अदा करने वाला शख़्स पुल सिरात से गुज़रेगा तो उसे उनकी तरफ़ न गुज़ारा जाएगा ताकि वह आतिश (आग) में न गिर पड़े।

दूसरी रिवायत (कथन) में है कि अगर ख़्यानत करने वाला। क़त रहमी करने वाला गुज़रेगा तो उन दोनों ख़सलतों की मौजूदगी में कोई दूसरा अमले सालेह उसे फ़ायदा न देगा और पुल सिरात से जहन्नुम में गिर पड़ेगा।

विलायत

इसी उक़बा में तीसरा मौक़िफ़ विलायत है। उसी के बारे में सुन्नी , शिया की कितबों में बेशुमार रवायात मौजूद हैं कि विलायत से मुराद विलायते अली (अ 0स 0) है। तफ़सीर सालबी वग़ैरा में है आयत “ वाक़िफ हूँ हुम इन्नाहुम मसऊलून ” इनको ठहराव अभी इनसे कुछ पूछना है “ मसऊलूना अन विलायते अली इब्ने अबी तालिब ” उससे विलायते अली (अ 0स 0) के बारे में न पूछ लिया जाए कि दुनिया में दिल व ज़बान से अली वलीउल्लाह का इक़रार व एतक़ाद रखते थे या नहीं।

अल्लामा हमोयनी और तबरी जो कि दोनों अहले सुन्नत के अजल आलिमों में से है। रसूले खुदा (स.अ.व.व. ) से रवायत (कथन) करते हैं कि आप (स 0अ 0) ने फ़रमाया ऐ अली (अ 0स 0) जो शख़्स तेरी विलायत का मु्ंकिर (इन्कार) होगा वह सिरात से रद्द किया जाएगा और सवायक़े मोहरिक़ा में है कि जिसके पास विलायते अली (अ 0स 0) का पासपोर्ट होगा , वह गुज़र जाएगा। इस बारे में रवायत (कथन) बेशुमार हैं , जिनको ऐख़्तसार की वजह से ज़िक्र नहीं किया जा रहा है।

उक़बए दोम (दो)

नमाज़

इस उक़बा में नमाज़े वाजिब यौमिया व नमाज़े आयात व क़ज़ा के लिए ठहराया जाएगा , जिसके लिए पहले हिसाब के बाब में ज़िक्र गुज़र चुका है-

हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0स 0) की आख़िरी वसीयत यह है-

“ जिसने नमाज़ को सबुक समझा उसको हमारी शफ़ाअत नसीब न होगी। ”

कुर्आन मजीद में इरशादे कुदरत है-

“ उन नमाज़ियों की तबाही है , जो अपनी नमाज़ से ग़ाफ़िल हैं और दिखावा करते हैं। ”

तारिके नमाज़ प्यासा मरता है , प्यासा क़ब्र से उठता है। तमाम लोगों को चाहिए कि वह खुद अमल करें और दूसरों को ताकीद करें। अपने बच्चों को बालिग होने से पहले आदी बनाए , क्योंकि उस अमल का फ़ल बच्चे के वाल्दैन को भी मिलेगा , जो बच्चा वालदैन की कोशिश से आमाल बजा लाता है। बालिग होने से पहले के आमाल का सवाब वाल्दैन को मिलता है। बालिग होने के बाद उनके अपने नामए आमाल में दर्ज होता है। एक पैग़म्बर अपने असहाब के साथ एक़ क़ब्र के पास से गुज़रे तो आपने फ़रमाया , जल्दी गुज़र जाओ , क्योंकि सहाबे क़ब्र पर अज़ाब हो रहा है। एक साल के बाद जब दोबारा गुज़र हुआ तो वहां अज़ाब ख़त्म हो चुका था। अर्ज़ किया परवरदिगार! क्या हुआ ? अब यह मैय्यत अज़ब मे नहीं है। निदा (आवाज़) आई। इस शख़्स का एक नाबालिग़ बच्चा था। उसको मक़तब में भेजा गया औऱ उस्तादने उसको बिस्मिल्लाह हिर्रहमानिर्रहीम पढ़ाई। जिस वक़्त उसके बेटे ने मुझे रहमान व रहीम की सिफ़ात से याद किया तो मैंने उसके वाल्दैन से अज़ाब ख़त्म कर दिया क्योंकि वह बच्चे की ख़िलक़त के लिए वास्ता थे। मुझे हया आयी कि वह मुझे रहमान व रहीम की सिफ़ात से याद करे और मैं उसके वाल्दैन पर अज़ाब करूँ।

“ ऐ ईमान वालों! अपने नफ़सों को और अहलो अयाल को आग से बचाओ , जिसका ईँधन इन्सान और पत्थर हैं। ”

फ़िर उसके बाद अपने क़रीबी रिश्तेदारों को अमर बिल मारुफ़ और नहीं अनल मुन्किर के ज़रिए डराओ।

उक़बा सोम (तीसरा)

ज़कात

अगर किसी शख़्स ने एक दरहम के बराबर खुम्स या ज़कात मुस्तहक़ीन को अदा न की होगी तो उसको इस उक़बा में रोक लेंगे और मानउज़्ज़कात के बारे में रवायत (कथन) है कि हुज़ूर (स.अ.व.व. ) ने फ़रमाया उसकी गर्दन में “ अक़रा ” अज़दहा लिपटा हुआ होगा। (अक़रा उस अज़दहा को कहते हैं , जिसके बाल ज़हर की ज़्यादती की वजह से गिर गए हों) दूसरी रवायत में है कि जो शख्स खेती की ज़कात न देता होगा , उसकी गर्दन में उम ज़मीन के सातों तबक़ात का तौक़ होगा और इसी तरह वलीउल असर्र अज्जल्लाहो फ़राजह का जब ज़हूर होगा तो ज़कात अदा न करने वाले को क़त्ल कर देंगे और जो सोना , चांदी मसकूक का ज़ख़ीरा होगा तो क़यामत के रोज़ उन दरहम व दीनार को आग में सुर्ख़ करके उसकी पेशानी और पहलू को दागा जाएगा , जैसा कि कुर्आन मजीद में इऱशाद खुदा वन्दी है-

“ जिस दिन वह (सोना , चांदी) जहन्नुम की आग में गरम किया जाएगा , फ़िर उससे उनकी पेशानियां और उनके पहलू और उनकी पीठें दाग़ी जाएंगी , (और उनसे कहा जाएगा) यह वह है जिसे तुमने (दुनियाँ) में जमा करके रखा था तो अपने जमा किए का मज़ा चखों। ”

ज़काते माल और ज़काते बदन (फ़ितरह) में कोई फ़र्क़ नहीं है। खु़म्स के बारे में अहकाम बहुत सख़्त हैं और बेशुमार रवायतें मौजूद हैं , सिर्फ़ एक रवायत जो काफ़ी वग़ैरह में हज़रत सादिक़ (अ 0स 0) से मर्वी है पर संतोष करता हूं। आपने फ़रमाया उस रोज़ सख़्त तरीन वक़्त वह होगा , जब कि मुस्तहक़ीन ख़ुम्स उस शख़्स के दामन को पकड़ कर अपने हक़ का मुतालिब करेंगे और उस मौक़िफ़ में उसे रोक लेंगे , जब तक कि वह शख़्स मुतालिबा को पूरा न कर देगा। ऐसे शख़्स के लिए किस क़द्र तक़लीफ़ देह वह हालात होंगे , जबकि शफ़ाअत करने वाले भी उसेस ख़ुम्स का मुतालिबा करेंगे और उसके ख़िलाफ़ होंगे।

उक़बए चहारुम (चार)

रोज़ा

चौथ उक़बा मे रोज़ा हायल होगा अगर उस फ़रीज़ा (कर्तव्य) को अदा करता रहा तो आसानी से गुज़र जाएगा। वरना रोक लिया जाएगा। “ अस्सौमो जुन्नतह ” रोज़ा आग के लिए ढ़ाल है। “ हुज़ूर (स.अ.व.व. ) ने फ़रमाया रोज़ादार के लिए दो खुशियां हैं , एक इफ़तार के वक़्त औऱ दूसरे इन्दा लक़ाइल्लाहे ” खुदा से मुलक़ात के वक़्त ” और वह पुल सिरात पर से आसानी के साथ गुज़र जाएगा और अल्लाह की बारगाह में पहुंच जाएगा।

उक़बा पंजुम (पांच)

हज

अगर किसी शख़्स के लिए उसकी उम्र में हज वाजिब हो जाय और तमाम शरायत भी पूरी हो जाएं और हज अदा न करे तो उसे इस मौकि़फ़ में रोक दिया जाएगा , बल्कि हदीस में है कि मौत के वक़्त उसे कहा जाता है-

तू यहदूी मर या नसरानी तेरा इस्लाम से कोई वास्ता नहीं।

कुर्आन मजीद में तारीके हज को काफ़िर (नास्तिक) कहा गया है-

“ और लोगों पर वाजिब है कि मेहज़ खुदा के लिए ख़ानए कआबा का हज करें , जिन्हें वहां तक पहुंचने की इस्तआत है। (कुदरत हो) औऱ जिसने बावजूद कुदरत हज से इन्कार किया तो याद रखो खुदा सारे जहां से बे परवाह है। ”

उक़बा शश्शुम (छः)

तहारत

हज़रत इब्ने अब्बास की रवायत के मुताबिक़ तहारत तीन हैं इससे मुराद वजु , गुस्ल और तयम्मुम हैं और बाज़ इससे मुराद मुतलक़ तहारत लेते हैं , अगर कोई शख़्स तहारत का लिहाज़ नहीं रखता , ख़ास तौर पर मर्द और औरतें जो जनाबत का गुस्ल मुकम्मल शरायत के साथ वक़्त पर अंजाम नहीं देते , उनको इस मौक़िफ़ पर रोका जाएगा। औरतों को चाहिए कि बाक़ी गुस्लों को भी अपने वक़्त पर अंजाम दें और गफ़लत से काम न लें , जैसा कि जुहला मे रवाज हो चुका है , बल्कि नजासात से परहेज़ न करने वाले को क़ब्र में भी फ़िशार होता है , जैसा कि इस बाब में रवायत (कथन) नक़ल की गयी है।

उक़बा हफ़तुम (सात)

मज़ालिम

इसको कभी उक़बा अदल के साथ और कभी हुकूकुन्नास के साथ ताबीर किया जाता है और कुर्आन मजीद में इसी उक़बा के बारे में कहा गया है-

“ बेशक तेरा रब तेरी घात में है। ” इसकी तफ़सीर में कहा गया है कि लोग पुल सिरात पर से इस तरह गुज़रेंगे कि बाज़ हाथों से पकड़ रहें होंगे। बाज़ का एक पांव फ़िसल रहा होगा और वह दूसरे पांव का सहारा लेते होंगे औऱ उन लोगों के इर्द गिर्द फ़रिश्तें खड़े होंगे। खुदावन्द तू बड़ा हलीम और बुर्दबार है। अपने फज़लों करम से इन्हें माफ़ फ़रमा और सलामती के साथ गुज़ार दे। उस वक़्त लोग चिमगादड़ों की तरह जहुन्नुम में गिर रहे होंगे , जो शख़्स अल्लाहतआला की रहमत के ज़रिए नजात पा गया। वह पुले सिरात से पार हो जाएगा और कहेगा अल्हम्दो लिल्लाह अल्लाहतआला ने अपनी नेमात को मेरे आमाले सालेह के ज़रिए पूरा किया औऱ इन नेकियों में इज़ाफ़ा फ़रमाया , मैं शुक्र अदा करता हूँ कि उसने अपने फ़ज़लों करम से मुझे नजात दी , जबकि मैं मायूस हो चुका था , इसमें शक नहीं की परवरदिगारे आलम अपने बन्दों के गुनाह माफ़ करने वाला है और नेक आमाल को सराहने वाला है।

अगर किसी ने किसी शख़्स को बेजा तकलीफ़ दी होगी तो वह पांच सौ साल तक उस मौक़िफ़ में बन्द रहेगा और उसकी हड्डिया गल जाएंगी।

जिसने किसी का माल खाया होगी , चालीस साल तक इसी जगह क़ैद रहेगा , फिर उसे जहन्नुम मे फ़ेंक दिया जाएगा। बाज़ रवायात मे है कि एक दरहम के मुक़ाबिले मे ज़ालिम की सात हज़ार रकअ़त मक़बूल नमाज़ें मज़लूम को दी जाएंगी और दूसरी तफ़सीलात (विवरण) फ़सल हिसाब में गुज़र चुकी हैं।

हिकायत

अल्लामा बहाउद्दीन सैय्यद अली बिन सैय्यद अब्दुल करीम नीली नजफ़ी जिनकी तारीफ़ जिस क़द्र हो कम है और जो फख़रुल मोहक़्क़ीन शेख़ शहीद के शागिर्द हैं अपनी किताब अनवारुल मज़िया के फ़ज़ायल अमीरुल मोमनीन में यह हिकायत अफने वालिद से नक़ल करते हैं कि उनके आबाई गांव नीला में एक आदमी रहता था जो वहां की मस्जिद का मुतवल्ली था। एक दिन वह घर से बाहर न निकला , जब उसे बाहर बुलाया गया तो उसने उज़्र ख़्वाही की। जब उसके उज़्र की तहक़ीक़ की गयी तो मालूम हुआ कि उसका बदन आग से जब गया। सिवाय रानों के जो ज़ानूओं तक महफूज़ हैं और वह दर्दों अलम की वजह से बेक़रार है। उससे जलने की वजह पूछा गया तो उसने कहा , मैंने ख़्वाब में देखा कि क़यामत बरपा है और लोग सख़्त तकलीफ़ में हैं , क्योंकि ज़्यादा लोग जहन्नुम की तरफ़ और बहुत थोड़े जन्नत की तरप़ जा रहे हैं और मैं उन लोगों में से था जिन्हें जन्नत की तरफ़ भेजा गया। ज्योंहि मैं बेहिश्त की तरफ़ जाने लगा तो मैं एक लम्बे चौड़े पुल की तरफ़ पहुंचा जिसे लोग पुल सिरात कहते थे। बस मैं उस पर से गुज़रने लगा , जिनता पार करता गया , उसका अर्ज़ कम और लम्बाई ज़्यादा होती गयी , यहां तक की मैं ऐसी जगह पर पहुंच गया , जहां से वह तलवार से ज़्यादा तेज़ थी और उसके नीचे एक अज़ीम वादी है , जिसमें सियाह (काली) आग है और आग से चिनगारियां पहाड़ों की तरह निकल रहीं थीं और बाज़ लोग बच निकलते थे और बाज़ लोग आग मे गिर जाते थे और मैं एक से दूसरी तरफ़ उस शख़्स की तरह मायल होता जिस की ख़्वाहिश यह हो कि जल्दी से अपने-अपने आप को पुल सिरात के आख़िर तक पहुँचाए और आख़िर में पुल की उस जगह पर पहुंचा , जहां मैं अपनी हिफ़ाज़त न कर सका और आचानक आग में गिर पड़ा , यहां तक की आग की इन्तेहाई गहराई में पहुंच गया। वहां आग की एक ऐसी वादी थी कि मेरा हाथ नीचे नहीं लगता था और आग मुझे नीचे से नीचे ले जा रही थी , मैंने इस्तेग़ासा न किया और मेरी अक़्ल मुझसे ख़त्म हो रही थी और सत्तर साल की राह के बराबर नीचे चला गया। बस मुझे इलहाम हुआ और मैंने या अली बिने अबी तालिब अग़िसनी या मौलाई या अमीरुल मोमनीन कहा तो वादी के किनारे एक शख़्स को खड़ा देखा। मेरे दिल में ख़्याल पैदा हुआ कि यही अली इब्ने अबी तालिब है। मैंने कहा ऐ मेरे आक़ा अमीरुल मोमनीन (अ 0स 0) तो आपने फ़रमाया , अपना हाथ इधर ला। बस मैंने अपना हाथ हज़रत अली (अ 0स 0) की तरफ़ किया। आपने मुझे खींच कर बाहर वादी के किनारे पर निकाल लिया। फ़िर आपने अपने मुबारक हाथों से इन दोनों रानों से आग को अलग किया और मैं ख़ौफ़ से बेदार हो गया और अपने आपको ऐसा पाया , जैसा अब तुम भी देख रहे हो , और मेरा बदन सिवाए उस जगह के जहां इमाम (अ 0स 0) ने हाथ फ़ेरा था , आतशज़दा है। बस उसने तीन माह तक मरहम पट्टी की , तब कीहं जाकर जली हुई जगह अच्छी हुई , इसके बाद जिससे भी इस हिकायत को नक़ल करता वह बुख़ार में मुबतिला हो जाता और बहुत कम महफूज़ रहते।

पुल सिरात से गुज़रने में आसानी पैदा

करने वाले चन्द आमाल

अव्वल (पहला)- सिला रहमी और अमानत के अलावा जो गुज़रा , सैय्यद इब्ने ताऊस किताबे इक़बाल में रवायत (कथन) करते है कि जो शख़्स माहे रजब की पहली रात मग़रिब की नमाज़ के बाद हम्द औऱ तौहीद के साथ बीस रकत नमाज़ व दो सलाम पढ़े तो वह शख़्स और उसके अहले आयाल अज़ाबे क़ब्र से महफूज़ रहेंगे और वह बग़ैर हिसाब के बिजली की तरह पहुल सिरात पर से गुज़र जाएगा।

दोम (दूसरा)- मर्वी है कि जो शख़्स माहे रजब में छः रोज़े रखे , वह रोज़े कयामत अमान में होगा और बग़ैर हिसाब के बिजली की तरपह पुल सिरात से गुज़र जाएगा।

सोम (तीसरा)- मर्वी है कि जो शख़्स 29 शाबान की शब को दस रकत नमाज़ बा दो सलाम इस तरह पढ़े कि हर रकत मे एक दफ़ा सूरए हम्द और दस दफ़ा अलहाकोमुत्तकासुरो दस मर्तबा माऊज़ , तीन और दस मर्बा सुरए तौहीद पढ़े तो हक़तआला उसे मुजदहदीन का सवाब अता करेगा और उसकी नेकियां वज़नी होंगी और हिसाब को उसके लिए आसान फ़रामएगा और वह पुल सिरात पर से बिजली की चमक की तरह गुज़र जाएगा।

चहारुम (चार)- फ़सले साबिक़ में गुज़र है कि जो शख़्स हज़रत इमाम रज़ा (अ 0स 0) की ज़ियारत दूर दराज़ से करेगा तो इमाम अलैहिस्सलाम तीन जगहों पर उसके पास तशरीफ़ लाएंगे और रोज़े क़यामत की हौलनाकियों से उसे नजात दिलाएंगे , जिनमें से एक पुल सिरात भी है।

फसल याज़दहुम (ग्यारह)

दोज़ख़

दोज़ख़ (नरक) वह वादी है , जिसकी तह का पता नहीं और उसकें गज़बे इलाही की आग भड़क रही है , जिसे उख़रवी क़ैदख़ाना कहा जा सकता है। उसमें तरह-तरह के सख़्त अज़ाब और बलाए हैं जो हमारी समझ से बालातर हैं। हक़ीक़तन यह जन्नत की जि़द हैं , क्योंकि उसमें तरह-तरह की न्यामतें , लज़्ज़तें औऱ आराम व सुकून हैं , लेकिन जहन्नुम में बे आरामी और सख़्ती मौजूद है। राहत और सुकून का नाम तक नहीं ।

हम इस जगह कुर्आन की रौशनी में उसूले अज़ाब का तज़किरा करते हैं मश्ते नमूना अज़ ख़रदारे।

जहन्नुमियों का तआम (खाना) और शराब

सूरए वाक़या में ख़ल्लाक़े आलम का इरशाद है-

“ फिर तुमको ऐ गुमराहों , क़यामत की तकज़ीब करने वालों , यक़ीनन तुम्हे जहन्नुम में थूहर के पेड़ों में से खुराक खाना होगी। ” यह वह पेड़ है जो जहन्नुम की तह से उगता है , इसके फ़ल इतने तल्ख़ (कड़वे) और बदनुमा हैं , गोया सांग के फ़न , जिनको हाथ लगाने से दिल ख़ौफ़ज़दा हो। यह जहन्नुमियों का खाना है।

“ पस वह इसी से खा-खाकर पेट भरेंगे , फ़िर उसके ऊपर खौलता हुआ पानी पीना होगा। ”

एक रवायत (कथन) में है कि ख़ल्लाक़े आलम दोज़खियों पर प्यास को मुसल्लत करेगा और काफ़ी देर के बाद उनको गरम पानी जो पीप में मिला हुआ होगा , पीने को दिया जाएगा और प्यास की वजह से ज़्यादा पी जाएंगे। दूसरी जगह इरशाद है-

मर्वी है कि अगर उस पानी में से एक क़तरा (बूंद) पहाड़ पर डाला जाए तो उसकी ख़ाक़ (मिट्टी) तक नज़र न आए फशारेबून शोरबलहीम वह इस गर्म पानी को इस तरह पिएंगे , जैसे मुद्दत का प्यासा ऊँट बड़े-बड़े घूंट भरता है (डगड़गा के) हीम अहीम की जमा (बहुवचन) है वह ऊँट जो दर्दे हयाम में मुबतिला हो। यह मर्ज़ इस्तेसक़ा से मिलता-जुलता है , जो ऊँटों को होती है और उसकी वजह से वह जिस क़द्र भी पानी पीता है , सेराब नहीं होता। यहं तक की हलाक हो जाता है , यही हाल जहन्नुमियों का होगा।

“ हाज़ा नुजुलहुम यौमद्दीन ” यह ज़कूम औऱ हमीम क़यामत के दिन उनके लिए पेशकश होगी। यानी इब्तेदाई और अज़ाब का मुक़द्दमा होगा , लेकिन जो कुछ उनके लिए जहन्नुम में तैयार किया गया है , वह इससे भी ज़्यादा सख़्त है , जो शरह व ब्यान के क़ाबिल नहीं है।

“ थूहर का दरख़्त ज़रुर गुनहगारों को खाना होगा (यानी कुफ़्फ़ार औऱ मुर्शकीन को खाने के लिए दिया जाएगा) और वह पिघले हुए तांबे की तरह पेटों में उबाल खाएगा , जैसा कि खौलता हुआ पानी उबाल खाता है। ”

और उससे अतड़ियां और ओझड़ियां गल जाएंगी , इसी पानी को उनके सिरों पर गिराया जाएगा , जिसकी वजह से उनका तमाम जिस्म गल जाएगा।

ऐसी हालत में उनसे अजाब कम नहीं किया जाएगा , जैसा कि कुर्आन मजीद मैं है-

“ न तो उनसे अज़ाब कम किया जाएगा और न ही उनको मोहलत दी जाएगी। ” और सूरए निसां में इरशादे कुदरत है-

“ जब उनकी खालें गल जाएंगी तो हम उनके लिए नयी खालें बदल कर पैदा कर देंगे , ताकि वह अच्छी तरह अज़ाब का मज़ा चखें ” सूरए मुज़म्मिल में इरशादे कुदरत है-

“ बेशक हमारे पास बेडियां भी हैं और जलाने वाली आग भी और गले में फ़ंसने वाला खाना (जो नीचे न उतरेगा) और दर्दनाक अज़ाब भी है। ”

जहन्नुम के खानों में से एक ग़िसलीन है , जैसा कि कुर्आन में है “ वलातआमुन इल्ला मन ग़िसलीना ” मजमअल बहरैन में है , दोज़खियों के पेटों से जो खाना बाहर निकलेगा , वही खाना उनको दुबारा दिया जाएगा। सूरए ग़ाशिया में इरशादे कुदरत है-

“ उन्हें एक खौलते हुए चश्में से पानी दिया जाएगा , उनको ख़ारदार झाड़ी जो हन्जुल से ज़्यादा कड़वी और मुरदार से ज़्यादा बदबूदार होगी , खाने को दी जाएगी जो न मोटा करेगी और ने भूख ख़त्म करेगी। ”

“ सूरए इब्राहिम में है किः-

“ इनको सदीद पिलाया जाएगा। ” यह वह ख़ून और गंदगी है , जो ज़िनाकार औरतों की शर्मगाह से ख़ारिज होगी। जहन्नुमियों को पानी के लिए दी जाएगी। सूरए नबा में है बाज़ मुफ़सरीन फ़रमाते हैं ग़स्साक़ , वह चश्मा (कुआ) है , जो दोज़ख में है , जिसमें ज़हरीले जानवरों की ज़हर घुल रही है , उसमें से पीने के लिए दिया जाएगा।

जहुन्नुमियों का लिबास (कपड़ा)

सूरए जह में ख़ल्लाके़ आलम का इरशाद है-

“ इनके लिए आग के कपड़े क़ता किए जाएंगे जो इन्हें पहनाए जाएंगे , औऱ इनके सरों पर खौलता हुआ बदबूदार पानी डाला जाएगा , जो इनके बतनों और खालों को गला देगा। ” सूरए इब्राहिम में इरशादे कुदरत है-

“ उनके लिबास क़तरान के होंगे और उनके चेहरों को आग से ढंका जाएगा। ”

क़तरान सियाह और बदबूदार चीज़ है , बाज़ उससे मुराद तारकोल लेते हैं। यह वह चीज़ें हैं जिनकी दुनियाँ की किसी चीज़ से तशबीह नहीं दी जा सकती।

मर्वी है कि अगर जहन्नुमियों के लिबास में से एक ज़मीन और आसमान के दर्मियान लटका दिया जाए तो तमाम अहले ज़मीन उन की बदबू और गर्मी की वजह से झुलस कर मर जाएंगे।

जहन्नुमियों की हथकड़ियाँ और बेड़ियाँ

कुर्आन मजीद में है-

“ गुनाहगार निशानियों से पहचाने जाएंगे (उनकी आंखें कबूदी और चेहरे स्याह होंगे। पस उनको पेशानी के बालों से पकड़ा जायगा और बाज़ पांव से गिरफ़्तार किये जायेंगे ” यानी बाज़ लोगों को पेशानी के बासों से गिरफ़्तार दोज़ख मे डाला जाएगा और बाज़ लोगों को पांव से आग के ज़रिए खींचा जाएगा।

आग जहन्नुमियों को देखकर जोश में आ जाएगी और वह उनको पकड़ने के लिए आगे बढ़ेगी।

“ इतने बड़े-बड़े अंगारे बरसते होंगे , जैसे बड़े बज़े महल गोया ज़र्द रंग के ऊँट हैं। ” इरशादे कुदरत है-

“ फञिर एक ज़ंजीर में जिसका तूल सत्तर गज़ का होगा , जकड़े जाएंगे। ”

एक और जगह सूरए मोमिन में इरशादे कुदरत है-

“ उनको भारी-भारी तौक़ और वज़नी ज़ंजीरों में जकड़ कर जहन्नुम में भड़कती हुई आग के अन्दर डाला जाएगा। ”

“ वह लोग जिन्होंने ख़ुदा के बारे में दरोग़गोई की (झूठ बोला) , उनके चेहरे स्याह होंगे , आग उनके चेहरों को जला कर बदशक्ल बना देगी , जैसा कि गोसफ़न्द की भुनी हुई बुरी दांत ज़ाहिर होंगे और होंठ लटक रहे होंगे। ”

जहन्नुमियों का बिस्तर

कुर्आन मजीद में इरशादे कुदरत है-

“ उनके लिए जहन्नुम की आग का बिछौना होगा और उनके ऊपर से आग ही का ओढ़ना होगा और हम ज़ालिमों को ऐसी ही सज़ा देते हैं। ”

आग उनका तख़्त होगी , जिस पह वह बैठेंगे और आग ही को पियेंगे।

मुवक्कलीने जहन्नुम

सूरए तहरीम में ख़ल्लाक़े आलम का इरशाद है-

“ जहन्नुम पर तुरशरी और तुन्द मिज़ाज फ़रिश्ते मुक़र्रर हैं , जो जहनुम्मियों पर ज़र्रा बराबर रहम नहीं करते और ख़ुदा के हुक्म की नाफ़रमानी नहीं करते। ”

“ ख़ाजि़ने जहन्नुम के पास लोहे के गुर्ज़ हैं , जो जहन्नुमियों के सरों पर बरसाते हैं ”

जन्नती दोज़ख़ियों को आवाज़ देकर कहते हैं कि परवरदिगारे आलम ने जो कुछ हमारे साथ वायदा किया था , उसको पूरा कर दिया है और हमने अपने आमाल का सवाब हासिल कर लिया है , क्या तुमने भी वह चीज़ें मुकम्मल देख ली हैं , जिन तकालीफ़ का वादा परवरदिगारे आलम ने गुनहगारों के साथ किया था। उश वक़्त दोज़ख़ी आवाज़ देंगे , हां! हमने उस वादे को हक़ पाया। परवरदिगारे आलम की तरफ़ से एक निदा देने वाला निदा देगा कि ज़ालिमों पर ख़ुदा की लानत है और सूरा अलमुतक़फ़्फ़ीन में है-

आज मोमिन (धर्मनिष्ठ) काफ़िरों (नास्तिकों) की हंसी उड़ाएंगे , जैसा कि यह लोग दुनियां में मोमनीन (धर्मनिष्ठ) का मज़ाक़ उड़ाया करते थे।

दोज़ख़ियों को शैतान की मुसाहिबत हासिल होगी , जैसा की जन्नती एक दूसरे के साथ एक दूसरे से मुलाक़ात करते हैं , और एक दूसरे से मिलकर लुत्फ़ उठाते हैं दोज़ख़ी एक दूसरे के दुश्मन हैं और एक दूसरे से नफ़रत करते हैं। परवरदिगारे आलम ने कुर्आन में इसका तज़किरा फ़रमाया है।

“ जो शख़्स परवरदिगारे आलम की याद से ग़ाफ़िल और अंधा है हम उशके लिए शैतान को उस पर मुसल्लत करेंगे , जो उस का साथी होगा जो उन्हें राहे हक़ से भटकाते थे और वह गुमान करते थे कि वह उनको हिदायत कर रहे हैं , जब हम उस शैतान को जहन्नुम में उसके साथ लाएंगे जो कि उसकी सज़ा की जगह है , तो उस वक़्त वह शख़्स कहेगा , काश! तेरे और मेरे दर्मियान मशरिख़ और मग़रिब के बराबर दूरी होती। तू मेरा कितना बुरा साथी है कि तेरे कुर्ब की वजह से मेरा अज़ाब और सख़्त हो गया और मुझे ज़्यादा तकलीफ़ हो रही है। ”

मर्वी है कि दोनों एक ही ज़ंजीर में जकड़ कर दोज़ख में डाले जाएंगे , सूरए बकर में खल्लाक़े आलम का इरशाद है-

“ (कितना सख़्त वह वक़्त होगा) जब पेशवा लोग अपने पैरवों से पीछा छुड़ाएंगे और (बचश्म खुद) अज़ाब के देखेंगे और उनके बाहमी ताअल्लुक़ात टूट जाएंगे और पैरवो कहने लगेंगे कि अगर हमें फ़िर दुनियां में पलटने को मिले तो हम भी उन पर इसी तरह तबर्रा (अलग हो जाया) करें जिस तरह ऐन वक़्त पर यह लोग हमसे तबर्रा करने लगे हैं। ”

दोज़ख़ियों की एक दूसरे के साथ दुश्मनी के बारे में सूरए अनकबूत के अन्दर इरशादे कुदरत है-

“ फ़िर क़यामत के रोज़ तुममें से हर कोई एक दूसरे से बेज़ारी करेगा और एक दूसरे पर लानत करेगा। ”

सूरए जख़रफ़ में इरशाद होता है-

“ दोस्त उस दिन बाहम एक दूसरे के दुश्मन होंगे , सिवाय परहेज़गारों के। ” मर्वी है कि हर वह दोस्ती जो तक़र्रुबे खुदा की बिना पर न होगी तो वह आख़िरत मे दुश्मनी में तब्दील हो जाएगी। जब गुनाहगार अज़ाब से तंग आ जाएंगे और नाउम्मीद हो जाएंगे तो वह ख़ाज़िने जहन्नुम से कहेंगे जैसा कि सूरए जख़रफ़ में हैं-

“ ऐ मालिक (दरोग़ए जहन्नुम कोई तरकीब करो) कि तुम्हारा परवरदिगार हमें मौत ही देदे। वह जवाब देगा कि तुमको इसी हाल में रहना है। हम तो तुम्हारे पास हक़ लेकर आए हैं। अगर तुममें सो बहुतेरे हक़ बात से चिढ़ते हैं। ”

जहन्नुम के दरवाज़े

कुतबे मोतबरा अनवारे नामानियों औऱ बहारुल अनवार वग़ैरा में रवायत (कथऩ) है कि जिस वक़्त ज़िबरईले अमीन इस आयत मुबारिका को लेकर नाज़िल हुआ , तो जनाबे सरवरे क़ायनात ने फ़रमाया , ऐ भाई जिबरईल! मेरे लिए जहन्नुम के अवसाफ़ (गुण) ब्यान कर। जिबरईल ने ब्यान किया या रसूल अल्लाह (स.अ.व.व. ) जहन्नुम के सात दरवाज़े हैं। एक दरवाज़े से दूसरे दरवाज़े तक सत्तर साल की राह का फ़ासला है और हर दरवाज़े की गर्मी से सत्तर गुना ज़्यादा उसके अन्दर गर्मी है।

1- हवाया- मुनाफ़िकीन (विरोधी) और कुफ़्फ़ार (नास्तिकों) और फ़राअना के लिए है।

2- जहन्नुम व जहीम- यह मुश्रकीन की जगह है।

3- सक़र- यह साबियों का ठिकाना है।

4- लज्ज़ी- यह इब्लीस (शैतान) और उसके पैरोकारों और मजूसियों की जगह है।

5- हतमा- यह यहूदियों की जगह है।

6- सयीर- यह नसारा की जगह है।

7- जिस वक़्त जिबरईल सातवें पर पहुंचा तो ख़ामोश हो गया। हज़रत रसूले अकरम (स.अ.व.व. ) ने फ़रमाया ब्यान करो कि सातवां किन के लिए है अर्ज़ किया की यह आपकी उम्मत के मुतकब्बिरों के लिए है जो बग़ैर तौबा कर मर जाएंगे।

हज़रत ने सर ऊपर बलन्द फ़रमाया और ग़श तारी हो गया , जब होश में आए फ़रमाया। ऐ जिबरईल मेरी मुसीबत को दोबाला कर दिया। क्या मेरी उम्मत भी जहन्नुम में दाख़िल होगी ? औऱ रोने लगे जिबरईल भी आपके साथ रोने लगा। हुज़ूर ने कुछ दिन किसी से बात न की और जब नमाज़ शुरु फ़रमाते तो रोना शुरु कर देते। आप (स 0अ 0) के असहाब भी रोनो लगते और आप से रोने की वजह दरयाफ़्त करते , लेकिन किसी को रोने की वजह न मालूम हो सकी। जनाब अमीरुल मोमनीन (स 0अ 0) के दरवाज़े पर इकट्ठा हुए। मासूमा (स 0अ 0) चक्की पीस रहीं थीं और इस आयत की तिलावत फ़रमा रहीं थीं- “ वल आख़िरतो ख़ैरूँ व अबक़ा ” (और आख़िरत (की ज़िन्दगी) बेहतरीन और बाक़ी रहने वाली है।) बस उन्होंने जनाबे सैय्यदा के वालिदे बुर्ज़ुगवार रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व. ) के रोने की कैफ़ियत आप से ब्यान की। जिस वक़्त जनाबे सैय्यदा (स 0अ 0) ने क़िस्सा सुना। चादर ओढ़ी , जिसमें बाहर जगहों पर खजूर के पत्तों से टांके लगे हुए थे। आपने रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व. ) और असहाब की हालत देखकर रोना शुरू किया सलमान जो इन असहाब में मौजूद थे। जनाबे सैय्यदा (स 0अ 0) की उस पुरानी और फ़टी हुई चादर को देखकर मत्ताअजुब हुए और कहा-

“ हाय अफसोस! कैसरो कसरा की बेटियां तो सुनहरी कुर्सियों पर बैठी हैं , लेकिन रसूल अल्लाह (स.अ.व.व. ) की बेटी के पास कपड़े नहीं है। ”

जब जनाबे सैय्यदा (स 0अ 0) अपने बाबा की ख़िदमते अक़दस में हाज़िर हुई , सलाम अर्ज़ किया और अर्ज़ किया बाबा। सलमान ने मेरी चादर देखकर ताअज्जुब किया है। मुझे उस ख़ुदा की क़सम जिसने आपको हक़ के साथ माबऊस किया। पांच साल से हमारे घर में सिर्फ़ एक बिछौना है। दिन में उस पर ऊँट को चारा डालते हैं और रात में हम उसको अपना बिछौना बनाते हैं और हमारे बच्चों के लिए खजूरों के पत्तों से भरा हुआ खाल का गद्दा है। बस हज़रत (स.अ.व.व. ) ने सलमान की तरफ़ रुख़ फ़रमाया और इरशाद फ़रमाया-

जनाबे सैय्यदा (स 0अ 0) ने हुज़ूर को देखा कि शिद्दते गिरया की वजह से आपके चेहरे का रंग ज़र्द हो चुका था , और आपके रुख़सारों का गोश्त गल चुका था और ब रवायते काशफ़ी सजदे में रोने की वजह से ज़मीन आंसूओं से तर हो चुकी थी सिद्दीक़ए ताहिरा ने अर्ज़ किया कि मेरी जान आप पर कुर्बान हो। यह गिरया किस वजह से है ? आप (स.अ.व.व. ) ने इरशाद फ़रमाया!ऐ फ़ातिमा! गिरया क्यों न करुं। जिबरईल जहन्नुम के औसाफ़ के मुत्तालिक़ आयत लेकर आया है और उसने बताया कि जहन्नुम का एक दरवाज़ा , जिसमें सत्तर हज़ार आग के शागाफ़ (छेद) हैं और हर शिगाफ़ में सत्तर हज़ार आग के ताबूत हैं और हर ताबूत में सत्तर हज़ार किस्म का अज़ाब है , ज्योंही जनाबे सैय्यदा ने यह अवसाफ़ जनाबे रसूले खुदा (स.अ.व.व. ) से सुने बेहोश होकर गिर पड़ीं , और यह कहा , जो इस आग में दाख़िल हुआ हलाक हुआ। जब होश में आयीं तो अर्ज़ किया कि ऐर बेहतरीन ख़लायक़! यह अज़ाब किनके लिए है ? आपने इरशाद फ़रमाया , जो ख़्वाहिशे नफ़स की पैरवी करते हुआ नमाज़ को ज़ाए (नष्ट) कर दें और फ़रमाया यह जहन्नुम का कमतरीन अज़ाब है।

बस हुज़ूर के सहाबा वहां से निकले और हर एक नौहा व फ़रियाद करता था , हाय सफ़र दूर है , और ज़ादे राह बहुत कम और कुछ लोग यह कह रहे थे कि काश मेरी वालिदा मुझे न जानती और मैं जहन्नुम का तज़किरा न सुनता और अम्मारे यासर कह रहे थे कि काश! मैं परिन्दा होता और मुझ पर हिसाब और अक़ाब न होता। बिलाल सलमान के पास हाज़िर हुए और पूछा क्या ख़बर है ? सलमान ने कहा तुझ पर औऱ मुझ पर वाय हो। मेरा और तेरा इस कतान के लिबास के बाद आग का लिबास होगा और हमें ज़क्कूम का खाना दिया जाएगा। (ख़ज़ीनतुल जवाहर)

जहन्नुम के अज़ाब की सख़्ती से मुत्तालिक़

चन्द रवायात (कथन)

1- बसन्दे मोत्तबर अबु बसीर से मनक़ूल है कि मैंने इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0स 0) की ख़िदमत में अर्ज़ किया कि या बिने रसूल अल्लाह (स 0अ 0)! आप मुझे अज़ाबे खुदा वन्दी से डराएं क्योंकि मेरा दिल बहुत सख़्त हो गया है। आपने फ़रमाया ऐ अबु मोहम्मद! तैयार हो जा , लम्बी ज़िन्दगी के वास्ते , जिसे आख़िरत की ज़िन्दगी कहते हैं , और जिसकी कोई इन्तेहा नहीं है , तू उस जि़न्दगी की फ़िक्र कर और तैयारी कर क्योंकि एक रोज़ जिबरईल हज़रत रसूले अकरम (स.अ.व.व. ) की ख़िदमत में ग़मगीन और रंजीदा हाज़िर हुए , हालांकि इससे पहले वह खुशो-खुर्रम आया करते थे। आं हज़रत (स.अ.व.व. ) ने उसे देखकर फ़रमाया! ऐ जिबरईल! तुझे क्या हो गया है कि आज तू ग़मगीन और नाराज़ दिखायी देता है तो जिबरईल ने अर्ज़ किया कि वह धौंकनी जो जहन्नुम के आग को भड़काने के लिए धोंकी जाती थी आज उसे हटा कर रख दिया गया है। आं हज़रत (स.अ.व.व. ) फ़रमाने लगे कि जहन्नुम की धौंकनी क्या है ? जिबरईल ने अर्ज़ किया या मोहम्मद (स.अ.व.व. ) अल्लाह के हुक्म के मुताबिक़ हज़ार साल तक इस धौंकनी के साथ जहन्नुम की आग को हवा दी गयी। यहां तक की सफ़ेद हो गयी। फ़िर हज़ार साल तक उसे फूंका गया। यहां तक की वह स्याह (काली) हो गयी और अब वह बिल्कुल स्याह और तारीक है , अगर एक क़तरा ज़रीह (जो जहन्नुमियों के पसीना और ज़िनाकारों की फुरूज की आलाइश है , जिसको जहन्नुम की आग से बड़ी-बड़ी डेगों में पकाया और जोश दिया गया और जहन्नुमियों को पानी के बदले दिया जाता है) का इस दुनियाँ के समुन्द्रों में डाला जाय , तो यह तमाम दुनियाँ इस एक क़तरे की ग़न्दगी से ख़त्म हो जाय और अगर सत्तर गज़ लम्बी ज़ंजीर जो जहन्नुमियों के गले में डाली जाती है का एक हल्क़ा इस दुनियाँ पर रख दिया जाये तो इस हल्क़े की गर्मी से यह तमाम दुनियाँ पिघल जाए और अगर दोज़खियों के कुर्तों में से एक कुर्ता ज़मीन व आसमान के दर्मियान लटका दिया जाए तो यह तमाम दुनियाँ इस क़नीज़ से निकलने वाली बदबू से हलाक हो जाएगी। जब जिबरईल ने यह ब्यान किया तो जिबरईल और रसूले अकरम (स.अ.व.व. ) दोनों ने गरिया किया। बस हक़तआला ने यह देखकर एक फ़रिश्ता आपके पास भेजा। इस फ़रिश्ते ने कहा कि अल्ललाहतआला बाद तोहफ़ए दुरुदो सलाम के फ़रमाता है कि मैंने आप को इस अज़ाब से महफूज़ रखा है। इसके बाद जब भी जिबरईल आप के पास हाजि़र होते खुश व खुर्रम आते।

हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0स 0) फ़रमाते हैं कि उस दिन अहले जहन्नुम आतिशे जहन्नुम और अज़ाबे इलाही की अज़मत को जान लेंगे और अहले बेहश्त उसकी अज़मत और न्यामतों को जान लेंगे। जब अहले जहन्नुम को जहन्नुम में दाख़िल किया जाएगा , तो वह सत्तर साल की कोशिश के बाद कहीं दोबारा जहन्नुम के किनारे पहुंचेगे तो फ़रिश्ते लोहे की गुर्ज़ उनके सिरों पर मारेंगे। यहां तक की वह जहन्नुम की तह में पहुंच जाएंगे और उनके बदन की ख़ाल फ़िर नयी हो जाएगी ताकि अज़ाब उन पर ज़्यादा असर अन्दाज़ हो। फिर आपने अबु बसीर से फ़रमाया क्या अब तेरे लिए काफ़ी है , तो उसने अर्ज़ किया , बस अब मुझे काफ़ी है।

2- एख हदीस में इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0स 0) से मनकूल (उद्धृत) है कि हज़रत रसूले अकरम (स.अ.व.व. ) ने फ़रमाया कि जब मैं शबे मेराज आसमाने अव्वल पहुंचा तो मैंने जिस फ़रिश्ते को भी देखा वह खुशो-खुर्रम नज़र आया। मगर एक फ़रिश्ता ऐसा देखा कि मैंने उससे अज़ीमतर फ़रिश्ता कोई न देखा था , उसकी शक्ल से बैबत और गैज़ो ग़ज़ब के आसार ज़ाहिर थे उसने दैसरे फ़रिश्तों की तरह मेरी ताज़ीम व तकरीम की , लेकिन वह फ़रिश्ता मुझे देखकर दूसरे फरिश्तों की तरह न मुस्कुराया और न ही हंसा। मैंने जिबरईल से पूछा यह फ़रिश्ता कौन है ? कि मैं उसे देखकर सख़्त खौफ़ज़दा हूं। जिबरईल ने अर्ज़ किया सचमुच आपको इससे डरना चाहिए क्योंकि हम भी इसे देखकर डरते हैं। यह फ़रिश्ता ख़ाज़िने (खंजांची) जहन्नुम है। जिस दिन से अल्लाहतआला ने उसे ख़ाज़िने जहन्नुम बनाया है। अब तक यह मुसलसल अल्लाहतआला के दुश्मनों के ख़िलाफ़ ज़्यादा ग़ज़बनाक और रंजीदा हो रहा है और जिस वक़्त अल्लाहतआला इस फ़रिश्ते को अपने दुश्मनों से इन्तिक़ाम लेने का हुक्म देगा तो यह बड़ी सख़्ती के साथ उनसे इन्तिक़ाम लेगा। अगर उसने किसी से हंस कर मुलाक़ात की होती तो आज यह ज़रुर आपके साथ भी हंस कर मुलाक़ात करता और ख़ुशी व मसर्रत का इज़हार करता। बस मैंने उस फ़रिश्ते को सलाम कहा औऱ उसने मेरे सलाम का जवाब दिया और मुझे जन्नत की ख़ुशख़बरी दी। बस मैंने जिबरईल से कहा कि उन की शानो शौकत और रोबो दबदबा की वजह से जो कि आसमानों में है तमाम अहले समावात इसकी अताअत करते हैं। ऐ जिबरईल! उस ख़ाज़िने जहन्नुम से अर्ज़ करो कि वह मुझे दोज़ख़ दिखा। बस ख़ाज़िने जहन्नुम ने पर्दा हटाया और जहन्नुम के दरवाज़ों में से एक दरवाज़े को खोला तो आग के शोले आसमान की तरफ़ बलन्द हुए और तमाम आसमान पर छा गए और भड़कने लगे और वहशत तारी हो गयी। बस मैंने जिबरईल से कहा कि ख़ाजिन से कहो कि वह दोबारा पर्दा डाल दे। बस खजि़न ने उन शोलों को जो कि आसमान की तरफ़ बुलन्द हुए थे , वापस अपनी जगह पर लौटने को कहा तो वह दोबारा वापस लौट आए।

3- बासन्दे मोअ़तबर हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक (अ 0स 0) से मनकूल है कि अल्लाहतआला ने कोई शख़्स ऐसा पैदा नहीं किया कि उसका एक ठिकाना जन्नत और एक दोज़ख में न हो। जब अहले जन्नत , जन्नत में और अहले दोज़ख , जहन्नुम में पहुंच जाएंगे तो उस वक़्त मुनादी अहले जन्नत से पुकार कर कहेगा कि जहन्नुम की तरफञ देखो बस वह उसे देखेंगे। उन्हे जहन्नुम के अन्दर अपना वह मुक़ान नज़र आएगा कि अगर वह गुनहगार होते तो यह उनकी मंजिल होती। बस वह उसे देखकर इतने खुश होंगे कि अगर बेहश्त में मौत होती तो वह खुशी से मर जाते और यह खुशी इस वजह से होगी की अलहम्दो लिल्लाह व शुकरन लिल्लाह , इसने हमें दोज़ख़ से नजात दी। इशी तरह अहले जहन्नुम से कहा जाएगा की ऊपर नज़रें उठा कर देखो। यह तुम्हारी जन्नत के अन्दर मंजि़ल है। अगर तुम अल्लाह की अताअत और फ़रमाबरदारी करते तो तुम इस मुक़ाम पर होते। बस वह ग़म की वजह से इस क़्द्र निढ़ाल हो जाएंगे कि अगर दोज़ख़ में मौत होती तो वह ग़म के मार मर जाते। इसलिए दोज़खियों के बेहिश्त वाले मुक़ामात जन्नतियों को दे दिए जाएंगे। यहीं इस आयत (सूत्र) की तफ़सीर हैं , जिसमें अहले बेहश्त की शान में कहा गया है कि यही उनके वारिस हैं , जोकि बेहश्त को बतौर मीरास हासिल करेंगे और वह उसमें हमेशा रहेंगे।

4- आं हज़रत (स.अ.व.व. ) से मर्वी है कि जब जन्नती जन्नत और दोज़खी दोज़ख़ में दाख़िल होंगे तो उस वक़्त अल्लाहतआला की तरफ़ से एक मुनादी निदा (आवाज़) देगा कि “ ऐ अहले जन्नत व अहले दोज़ख! अगर मौत किसी शक्ल में तुम्हारे सामने आए तो क्या तुम उसको पहचान लोगे ?” वह कहेगा हम नहीं पहचान सकते। बस मौत को जन्नत और दोज़ख़ के दर्मियान गोसफ़्नद की शक्ल में लाया जाएगा और उन तमाम लोगों से कहा जाएगा कि देखो यह मौत है। बस उस वक़्त अल्लाहतआला उसके ज़िबह कर देगा और अहले जन्नत से मुख़ातिब होकर कहेगा कि अब तुम हमेशा लिए जन्नत में रहोगे और तुम पर मौत वाक़य नहीं होगी। फ़िर अहले दोज़ख़ से मुख़ातिब होकर फ़रमाएगा कि तुम हमेशा जहन्नुम में रहोगे और तुम पर भी मौत वाक़य नहीं होगी और अल्लाहताला का वह फ़रमान जो कि उसने अपने बन्दों से इरशाद फ़रमाया है- “ वा अनज़रहुम यौमल हसरते इज़ कुज़ियल अमरे ” (सूरए मरयम आएत- 39) ऐ रसूल (स 0अ 0स) आप इन लोगों को उस हसरत वाले दिन से डराएं , जबकि हर शख़्स के काम का आख़िरी फ़ैसला हो जाएगा और यह लोग उस दिन से ग़ाफ़िल और सुस्त हैं। ” अल्लाहतआला अहले बेहिश्त और अहले दोज़ख़ को हुक्म देगा कि तुम हमेशा-हमेशा के लिए अपनी-अपनी जगहों पर रहो और उनके लिए कभी मौत नहीं होगी और उस दिन अहले जहन्नुम हसरत और अफ़सोस करेंगे और उनकी तमाम उम्मीदें ख़त्म हो जाएंगी।

5- हज़रत अमीरुल मोमनीन (अ 0स 0) से मर्वी है। आपने फ़रमाया , कि गुनहगारों के लिए आग के दर्मियान नक़ब लगायी गयी है। उनके पांव में ज़ंज़ीर (कपड़े) तांबे के होंगे और जुब्बे आग के पहनाए जाएंगे औऱ वह सख़्त अज़ाब में मुबतिला होंगे , जिसमें सख़्त गर्मी होगी और उन पर जहन्नुम के दरवाज़े बन्द कर दिए जाएंगे और इन दरवाज़ों को हरगिज़ नहीं खोला जाएगा और उन पर कभी बादे नसीम दाख़िल न होगी और न ही उनका रंजो ग़म दूर होगा। उनका अज़ाब शदीदतर और ताज़ा होता रहेगा। न उनका घर ख़त्म होगा और न ही उम्र ख़त्म होगी , और वह अल्लाहतआला से अपनी मौत की ख़्वाहिश करेंगे और अल्लाहतआला उनके जवाब में इरशाद फ़रमाएगा कि तुम हमेशा के लिए इस अज़ाब में रहो।

6- बसन्दे मोअ़तबर हज़रत इमामे जाफ़रे सादिक़ (अ 0स 0) से मर्वी है कि जहन्नुम के अन्दर एक कुआं है , जिससे अहले जहन्नुम इस्तेफ़ादा करेंगे और यह जगह हर मुतकब्बिर और मग़रुर (घमण्डी) के लिए मख़सूस होगी और हर शैतान मुतमर्रिद के लिए और उस मुतकब्बिर के लिए जो कि रोज़े क़यामत पर ईमान रखता था , और हर दुश्मने अहले बैत के लिए होगा और आपने फ़रमाया जिस शख़्स का अज़ाब कमतरीन (छोटा) होगा , वह आग के समन्दर में होगा और उसके जूते आग के और बन्दे नालैन भी आग के होंगे , जिसकी गर्मी की शिद्दत की वजह से उसके दिमाग़ का मग़ज़ देग़ की तरह जोश खाने लगेगा। वह गुमान (शक) करेगा कि तमाम अहले जहन्नुम से बदतरीन अज़ाब उसका है। हालांकि उसका अज़ाब तमाम अहले जहन्नुम से आसान तर होगा।

फसल दोवाज़ दाहुम (बारह)

जन्न (स्वर्ग)

जन्नत के लुग़वी माने (शाब्दिक अर्थ) दरख़्तों से हरा भरा बाग़ है। ज़मीन पर हो या आसमान पर (मुंजिद)। इस्तेलाहे शरीयत में वह जगह , जो परवरदिगारे आलम नें आख़िरत में मोमनीन (धर्मनिष्ठों) और नेक लोगों के लिए बनायी है , जिसमें वह हमेशा रहेंगे। सिफ़ात अलशिया में इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0स 0) से मर्वी है कि , आप (स 0अ 0) ने फ़रमाया-

“ जो शख़्स चार चीज़ों का इन्कार करे , वह हमारे शिया में से नहीं है। ( 1) मेराजे जिस्मानी ( 2) क़ब्र में सवाल व जवाब का होना। ( 3) जन्नत व जहन्नुम का मख़लूक़ होना ( 4) शफ़ाअत। ”

कुर्आन मजीद की आयत वाज़ेह (स्पष्ट) तौर पर जन्नत व दोजख़ के मख़लूक़ होने पर दाल है-

जैसे ओहद्दतलिल मुत्तकत़ीना। “ जन्नत मुत्ताक़ियों के लिए मोहय्या की गयी है। ” उज़ लिफ़तिल जन्नतो लिल मुत्तक़ीना “ जन्नत की तफ़सील का समझना इस दुनियाँ वालों के लिए मुहाल है। ” बस इजमाली अक़ीदा रखना चाहिए और बारीकियों में जाने की ज़रुरत नहीं की वह कहां है ? कैसी है ? उसकी मिसाल ऐसी है जैसा कि रहमेमादर (मां के पेट में) में बच्चे के लिए इस दुनियाँ की इत्तिला , कुर्आन मजीद में है-

“ उन लोगों की कार गुज़ारियों के बदले में कैसी-कैसी आंखों की ठंडक उनके लिए ढकी छुपी रखी है , उसको तो कोई शख़्स जानता ही नहीं। कुर्आन मजीद में जन्नत की न्यामतों के मुत्तअलिक़ इरशाद है- ”

“ जन्नतियों के लिए हर वह चीज़ वहां मौजूद होगी , जिसकी वह ख़्वाहिश करेंगे , और हमारे पास इससे ज़्यादा हैं। ” दूसरी जगह इरशाद फ़रमायाः-

“ जन्नती लोगों को जिस चीज़ की ख़्वाहिश होगी , उनके पास हमेशा होगी। ”

मुख़्तसर यह है कि जन्नत वह जगह है , जहां नाकामी और तकलीफ़ नहीं है। कमज़ोरी , मर्ज़ और बुढ़ापा नहीं है। सुस्ती और बेआरामी का वजूद नहीं है। वहां हर हैसियत से मुतलक़न सलामती और सुकून है , इसी वजह से इसका दूसरा नाम दारुस्सलाम है।

जन्नतियों की सल्तनत (राज्य)

जन्नत उनकी हक़ीक़ी सल्तनत है जिस पर उनको पूरी कुदरत और एख़्तियार होगा और जो कुछ वह चाहेंगे हो जाएगा नाफ़रमानी न होगी “ इन्ना अहलल जन्नते मुलूकन ” बेशक जन्नती लोग दर हकीक़त बादशाह हैं , सूरए दहर में इरशाद कुदरत है-

“ और जब तुम वहां निगाह उठाओगे तो हर तरह की न्यामतें और अज़ीमुश्शान सल्तनत पाओगे। ”

बाज़ रवायात (कथन) में है कि अदना (साधारण) बेहश्ती जब अपनी जन्नत की मिलकियत को देखेगा तो वह हज़ार वर्ष की राह के मुताबिक़ पाऐगा , जिसमें मलायका भी उस मोमीन की इजाज़त के बग़ैर न जा सकेंगे।

जन्नत का तूलो अर्ज़ (क्शेत्रफल)

जन्नत की चौड़ाई ज़मीन व आसमान के अन्दाज़े के बराबर है। मनकूल है कि जिबरईल ने एक दिन इरादा किया कि जन्नत का तूल (दूरी) मालूम करें। तीस हज़ार साल उड़ा आखि़र थक गया और अल्लाहतआला से मदद मांगी और कुव्वत (शक्ति) तलब की। तीस हज़ार बार और हर बार तीस हज़ार उड़ा आख़िर थक गया। बस मुनाजात की कि ख़ुदा वन्दा ज़्यादा तै किया है या ज़्यादा बाक़ी है। एक हूर हुराने बेहश्त में से एक ख़ेमा से बाहर निकली और आवाज़ देकर कहा , ऐ रुहुल्लाह! किस लिए इतनी तकलीफ़ उठाता है। अभी तो सिर्फ़ इतना उड़ा है कि मेरे सहेन से बाहर नहीं निकला। जिबरईल ने पूछा तू कौन है ? उसने कहा मैं एख हूर हूँ जो एक-एक मोमिन (धर्मनिष्ठ) के लिए पैदा की गयी हूं। (सूरए हदीद , तफसीर उम्दतुल ब्यान-)

जन्नतियों के खाने

जन्नती लोगों के लिए हर वह खाना मौजूद होगा , जिसकी वह ख़्वाहिश करेंगे। कुर्आन मजीद में इरशादे कुदरत है-

“ और हर किस्म का मेवा जन्नत में मौजूद होगा और हर मौसम में होगा , कोई रोकने वाला न होगा , जिस मौसम में जो मेवा चाहे खा ले। ” एक जगह इरशादे कुदरत है-

“ और जिस मेवा को चाहेंगे खायेंगे और जिस परिन्दे के गोश्त की ख़्वाहिश करेंगे हर क़िस्म का गोश्त मौजूद होगा। (भुना हुया या जोश हुआ)। ”

अबु सईद ख़दरी ने रसूले खुदा (स.अ.व.व. ) से रवायत की है कि आपने फ़रमाया , बेहश्त में परिन्दे उड़ते फ़िरते हैं और हर परिन्दे के सत्तर हज़ार पर हैं। जिस वक़्त मोमिन खाने का इरादा करेगा तो उनमें से एक परिन्दा उसके दस्तरख़्वान पर आ बैठेगा और अपने पैरों को झाड़ेगा। हर पर से एक खाना निकलेगा , जो बर्फ़ से ज़्यादा सफ़ेद , शहद से ज़्यादा लज़ीज़ , मुश्क से ज़्यादा खुशबूदार , जो दूसरे खानों के मुशाबे न होगा , उसके बाद परिन्दा उड़ जाएगा।

“ जन्नत में फ़ल , खजूरें और अनार होंगे। एक और जगह इरशाद फ़रमाया-

“ बग़ैर कांटे की बेरियां और गुथे हुए केले और लम्बी-लम्बी छांव होगी। “ अंगूरों के बाग होंगे। ”

जन्नत के मशरुबात (पेय जल)

इरशाद कुदरत है-

“ इसमें पानी की नहरें जिनमें ज़रा भी बू नहीं और दूध की नहरें , जिनका मज़ा बदला नहीं , और शराब की नहरें जो पीने वालों को लज्ज़त देती हैं और साफ़ व शफ्फ़ाफ़ शहद की नहरें जारी हैं। ” एक और जगह इरशा कुदरत है-

“ उनको मुहर बन्द ख़ालिस शराब पिलायी जाएगी , जिसमें महरे मुश्क होंगी , और उसकी तरफ़ शायक़ीन को रग़बत करनी चाहिए और उसमें तसनीम की आमेजि़श होगी। वह एक चश्मा है , जिससे मुक़र्रबीन पीयेंगे। ” सूरए दहर में इरशादे कुदरत है-

“ वहां इनको एक ऐसी शराब पिलायी जाएगी , जिसमें ज़ंजबील की आमेज़िश होगी , यह एक जन्नत में चश्मा है जिसका नाम सलसबील है। ” दूसरी जगह इरशादे कुदरत है-

“ वहां शराब के साग़र पीएंगे , जिसमें काफूर की आमेज़िश होगी। ”

जन्नत के अन्दर यह मुख़तलिफ़ क़िस्म के चश्में है , जिनकी लज़्ज़त (स्वाद) और ख़ासियत (विशेषता) दूसरे से जुदा है , जिनकी मुनासिबत की वजह से इसका नाम रखा गया है और वह तमाम चश्में कौसर से अहम तरीन हैं जो कि अर्श के नीचे से जारी है , इनकी ज़मीन घी से ज़्यादा नर्म और कंकरियां , ज़बरजद , याकूत व मरजान हैं और घास , ज़ाफ़रान और मिट्टी मुश्क से ज़्यादा खुशबूदार और बेहश्त में नहर की सूरत में जारी है , और अर्सए महशर में हौज़ के नाम से मौसूम है।

जन्नतियों का लिबास (कपड़ा)

और ज़ेवरात (आभूषण)

सूरए कहफ़ में ख़ल्लाक़े आलम का इरशाद है-

“ जन्नत में दमकते हुए सोने के कंगन से संवारे जाएंगे और उन्हें बारीक रेशम (करेब) और मोटे रेशम (बाफ़त) और अतलस की पोशाकें पहनायी जाएंगी। ” एक और जगह सूरतुल हज में इरशादे कुदरत है-

“ वहां सोने के कंगन और मोतियों के हार और रेशम का लिबास होगा। ”

हज़रत रसूले अकरम (स.अ.व.व. ) से मर्वी है कि जिस वक़्त मोमिन (धर्मनिष्ठ) जन्नत के अन्दर अपने महल में दाख़िल होगा , उसके सिर पर करामत का ताज होगा। सत्तर बेहश्ती हुलले जो मुख़्तलिफ़ क़िस्म के जवाहरात और मोतियों से मुरस्सा होंगे , पहनाए जाएंगे। अगर उनमें से एक लिबास को इस आलमे दुनियां के लिए फ़ैलाया जाए तो देख न सकें।

इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0स 0) से मर्वी है कि ख़ल्लाक़े आलम हर जुमा को मोमिनों के लिए जन्नत में एक फ़रिश्ते को हुल्लए जन्नती (जन्नत का लिबास) बतौरे ख़िलअत करामत फ़रमाता है। बम मोमिन उनमें से एक को कमर के साथ बांधता है औऱ दूसरे को कांधे पर रखकर जिस तरफ से गुज़रता है , उस हुल्ले के नूर से गिर्द व नवाह रौशन हो जाते हैं।

जन्नत के महलात और उनका मसलिहा

कुर्आन मजीद में ख़ल्लाक़े आलम का इरशाद है-

“ और परवरदिगारे आलम तुम्हें ऐसे बाग़ात में दाख़िल करेगा , जिनमें नहरें जारी हैं और महलात पाको पाकीज़ा है , जिनमें तुम हमेशा रहोगे और यह बहुत बड़ी कामयाबी है। ”

मसाकिने तैय्यबा की तफ़सीर में रसूले अकरम (स.अ.व.व. ) से मर्वी है कि आपने फ़रमाया जन्नत में मोतियों से बना हुआ एक महल है , जिसमें सत्तर घर याकूते सुर्ख़ के हैं और हर घर में सत्तर कमरे सब्ज़ ज़र्मरुद के और हर कमरे में सत्तर तख़्त हैं और हर तख़्त पर रंगा रंग के सत्तर फ़र्श और हर फ़र्श पर एक हुरूल एैन बैठी है और हर कमरे में सत्तर दस्तरख़्वान हैं और हर दस्तरख़्वान पर सत्तर क़िस्म का खाना है और हर कमरे में एक गुलाम और कनीज़ हैं। खुदा मोमिन को इस क़द्र ताक़त देगा कि सब औरतों से ख़लवत करे और सब खाना खाने कि ताक़त देगा यह आख़िरत में बड़ी न्यामत है। सूरए ज़मर में इरशाद कुदरत है-

“ उनके लिए ऊंचे-ऊंचे महल और बाला ख़ाने होंगे , जिनके नीचे नहरें जारी होंगी। ”

“ मिन फ़ौक़हा गोरफुन ” की तफ़सीर में इमाम मोहम्मद बाक़र (स.अ.व.व. ) ने फ़रमाया कि हज़रत अली (अ 0स 0) ने रसूले खुदा (स.अ.व.व. ) से इसकी तफ़सीर पूछी कि यह बाला ख़ाने किस चीज़ से बने हुए हैं। फ़रमाया ऐ अली! अल्लाहतआला ने इन बाला ख़ानों की दीवारें मोती , याकीत और ज़बरजद से तैयार की हैं। इनकी छत सोने की है , जो चांदी के तारों से आरास्ता हैं। हर बाला ख़ाने के हज़ार दरवाज़े हैं और दरवाज़े पर एक हज़ार फ़रिश्ते हैं और इनमें बड़े-बड़े बलन्द और नर्म रेशमी फ़र्श , रंगा-रंग के बिछे हुए हैं , जिनमें मुश्क़ अम्बर और काफूर भरा हुआ है।

जन्नत के कमरों का सामाने ज़ीनत

कुर्आन मजीद में इरशादे कुदरत है-

“ वह जन्नती तख़्तों पर बैठे हुए तकया लगाए हुए होंगे और यह उसकी नेकी की जज़ा और सवाब है। ” सूरए ग़ासिया में है-

“ उनमें ऊँचे-ऊँचे तख़्त होंगे और उनके किनारे गिलास रखें होंगे , गाव तकिए क़तारों में रखे और मसनदे बिछी होंगी। ” सूरए वाक़या में ख़ल्लाक़े आलम का इरशाद है।

“ वह तख़्तों पर बैठे होंगे , औऱ यह तख़्त तीन सौ हाथ ऊँचा है , जिस वक्त उस पर बैठना जाहेंगे वह नीचा हो जाएगा , वह उन पर तकिया लगाए हुए बैठे होंगे , सूरए रहमान में इरशादे कुदरत है- ”

“ वह ऐसे फ़रशों पर बैठे होंगे , जिनके अन्दर अतलस होगा और उनके ऊपर अबहर होंगे जिनकी हक़ीक़त का खु़दा को इल्म है , इस्तबरक़ , ज़फञज़पफ , नमारक और ज़राबी की हकी़क़त देखने से मालूम होती है समझाने के लिए वुसअत कहां ?”

जन्नत के बर्तन

“ उनके सामने चांदी के साग़र और शीशे के नेहायत साफ़ गिलासों में दौर चल रहा होगा और उनका शीशा कांच का नहीं बल्कि चांदी के होंगे , जो ठीक अन्दाज़े के मुताबिक़ बनाए गंए हैं , उनमें सफ़ेदी चांदी की और सफ़ाई शीशे की होगी। ”

“ जन्नतियों के लिए ऐसे लडक़े जिनके कानों में गोशवारे लटक रहे होंगे , आबख़ोरे और अबरीक़ और प्याले जो मुख़तलिफ़ क़िस्म के जवाहरात और सोने-चांदी के बने हुए होंगे , लेकर शराबे तहूर का दौर चलाएंगे। ”

जन्नती (अपसराएं) और औरतें (स्त्रियाँ)

चूंकि जन्नत में सबसे बड़ी न्याम जिस्मानी हूरें हैं , इसलिए कुर्आन मजीद में इनका ज़िक्र भी ज़यादा है। उनको इस नाम से याद करने की इल्लत और वजह .यह है कि हूर के माने है गोरे रंग वाली और ऐन के मानी हैं बड़ी और काली आंख , क्योंकि उनकी आंख की स्याही निहायत सियाह (काली) और सफ़ेदी निहायत सफ़ेद। सुरए वाक़या में इरशाद कुदरत है-

“ हूराने जन्नत मिस्ल मोती के जो कि सदफ़ में पोशीदा और (गर्द व गुबार से साफ़ जोकि लोगों के हाथ न लगे) महफूज़ हैं। ”

सूरए रहमान के अन्दर इरशादे कुदरत है-

“ इनमें पाकदामन ग़ैर की तरफ़ आंख़ उठाकर न देखने वाली हूंरे होंगी , जिनको किसी जिन और इन्सान ने न छुआ होगा। ”

“ गोया वह याकूत और मरजान हैं। ”

यानी याकूत की सी सुर्ख़ी और सफ़ेदी और रौशनी मरजान जैसी “ उनकी गोरी-गोरी रंगतो में हल्की-हल्की सुर्खी , ऐसी मालूम होती होगी , गोया वह छिपाए हुए अण्डे हैं।

मर्वी है कि हूर सत्तर हुल्ले (कपड़े) पहने होगी , तब भी उनकी पिंडलियों का मग़ज़ उनके अन्दर से नज़र आ रहा होगा। जैसे सफ़ेदी याकूत में इस क़द्र नर्म व नाज़ुक बदन होंगे।

अब्दुल्ला बिने मसूद से रवायत (कथन) है कि रसूले खुदा (स.अ.व.व. ) से सुना , आप फ़रमाते थे कि बेहश्त में नूर पैदा होगा और बेहश्ती कहेंगे , यह नूर कैसा है ? कहा जाएगा यह नूर हूर के दातों का है , जो अपने शौहर के रुबरू हंसी है।

दूसरी जगह कुर्आन मजीद में इरशादे कुदरत है-

“ हमने हूरों को बग़ैर मां-बाप के पैदा किया और हमने उनको बाकरह (कुआंरी) ” नाज़ करने वाली और शौहरों की आशिक़ बनाया , जो हम उम्रे हैं।

सब की सब सोलह साल की होंगी और जन्नती मर्दों की उम्रें तैंतीस साल होगी। बाल घुंघराले , बदल गोरे , चेहरे बालों से साफ़ होंगे। सूरए बक़्र में इरशादे खुदावन्दी है-

“ और जन्नत में मोननीन के लिए पाक व पाकीज़ा औरतें होंगी जो हर कसाफ़ते हैज़ वग़ैरा से पाक होंगी और वह (मोमीन) इस (जन्नत) में हमेशा रहेंगे। ”

यह हूरें मुतकब्बिर व मग़रूर (घमण्डी) न होंगी और एक दूसरे की ग़ैरत न करेंगी।

मर्वी है कि हूर के दायीं बाज़ू पर नूरानी हरफ़ों में “ अलह्मदो लिल्लाहिललज़ी सदक़ना वादहु ” और बायें बाज़ू पर अलहम्दो लिल्लाहे अज़हबा अन्नल हुज़ाना ” लिखा हुआ होगा।

रसूले अकरम (स.अ.व.व. ) से एक मुफ़स्सल हदीस के ज़िम्न में मर्वी है कि आपने फ़रमाया कि जब ख़ल्लाक़े आलम ने हूर को ख़ल्क़ फरमाया तो उसके दायें शाने पर मोहम्मदन रसूल अल्लाहे और बायें शाने पर अलीउन वली उल्लाहे , पेशानी पर अल हसन ओर ठुड्डी पर अल हुसैन और दोनों लंबे बालों पर बिसमिल्ललाहिर्रहमानिर्रहीम नूरानी हरफ़ में लिखा हुआ था। इब्ने मसूद ने पूछा आक़ा! यह क़रामत किस शख़्स के लिए हैं। आप (स.अ.व.व. ) ने इरशाद फ़रमाया जो शख़्स हुरमत और ताज़ीम का लिहाज़ रखते हुए बिसमिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम कहे तो-

जो औरतें दुनियाँ से बाईमान जाएंगी , जन्नत में उनका जमाल हुरों से ज़्यादा होगा। ” कुर्आन मजीद में है-

“ जन्नत में औरतें होंगी और हुस्ने खुल्क़ से आरास्ता और हुस्ने ख़िलक़त से पैरास्ता हैं। ”

दुनियाँ की औरतों में से जो जन्नत में जाएंगी वह मुराद है। अल्लामा मजलिसी (र 0) हज़रत सादिक़ (अ 0स 0) से रवायत (कथन) फ़रमाते हैं कि ख़ैरातुन हेसान से वह औऱतें मुराद हैं जो मोमिन , आरिफ़ और शिया हैं , वह दाख़िले जन्नत होंगी और उनका अक़्द मोमिन के साथ होगा।

मर्वी है कि जिस औरत ने दुनियाँ में शादी न की होगी , या उनके शौहर जन्नत में न होंगे , तो वह जन्नत में जिस जन्नती की तरफ़ मायल होंगी , उसके साथ उसका निकाह होगा और अगर उसके शौहर जन्नत में हैं , तो उनका अक़्द उनकी ख़्वाहिश के मुताबिक़ उनके साथ कर दिया जाएगा। अगर दुनियां में ज़्यादा शौहर थे तो जिसकी ख़िलक़त उम्दा और नेकियां ज़्यादा होंगी उसके साथ उसका अक़द कर दिया जाएगा।

इतरियाते जन्नत (जन्नत की ख़ुशबू)

सूरए रहमान में मौक़िफ़े हिसाब में परवरदिगारे आलम के सामने हाज़िर होने से डरने और गुनाहों से बचने के बारे में परवदिगारे आलम का इरशाद है-

“ और उसके लिए जो परवरदिगारे आलम के सामने (मौक़िफ़े हिसाब में) क़याम से डरे उसके लिए दो बाग होंगे ” (जो हर क़िस्म के मेवों , घास और फूलों से सजे हुए होंगे)

अल्लामा मजलिसी (र 0) ने रसूले खुदा (स.अ.व.व. ) से नक़ल किया है कि अगर जन्नती हूरों में से एक हूर तारीक रात में असमाने अव्वल पर से ज़मीन की तरफ़ देखे तो खुशबू से तमाम ज़मीन मोअत्तर हो जाय।

इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0स 0) से मर्वी है कि इत्तरे जन्नत की खुशबू हज़ार साल की राह से पहुंच जाएगी। बेहश्त की मिट्टी मुश्क से बनी हुई है।

रवायाते कसीरा (अति कथन) से मालूम होता है कि जन्नत के दरों दीवार और ज़मीन जिस पर ज़ाफ़रान जैसी उगी हुई घास है। तमाम मोअत्तर हैं और जन्नत की खुशबू का असर यह है कि अभी जन्नत में पहुंचने के लिए कई हज़ार साल की राह बाक़ी होगी और बूढ़ा जन्नती जवान हो जाएगा।


जन्नत के चराग़

सूरए दहर में इरशादे कुदरत है-

जन्नत में जन्नतियों को आफ़ताब (सूरज) की गर्मी और जाड़े का सर्दी न होगी। वहां पर मौसम में मोतदिल होगा। उन्हे आफ़ताब और माहताब की रौशनी की ज़रुरत नहीं होगी , बल्कि जन्नत में हर एक के लिए उसके आमाले सालेह और ईमान का नूर काफ़ी होगा।

जैसा कि रवायत में गुज़रा है कि हूराने जन्नत का नूर आफ़ताब के नूर पर ग़ालिब होगा और यह चलते-फिरते चिराग होंगे। जन्नती मकानों पर जो मोती , मूंगे , याकूत व मरजान व ज़बरजद ज़र्मरुद जड़े हुए हैं , वह मुख़्तलिफ़ रंगों की रोशनी से अजीब समा पैदा किए होंगे। फ़र्श , बर्तन और लिबास मुख़तलिफ़ रंगों में ज़ियापाशियां कर रहे होंगे और यह नूरानी क़न्दीलें जन्नत को बक़या नूर बना रही होंगी।

अब्दुल्ला इब्ने अब्बास से रवायत है कि जन्नती एक दिन मामूल से ज़्यादा रोशनी पाएंगे। अर्ज़ करेंगे कि परवरदिगार! तेरा वादा था कि जन्नत में सूरज की रौशनी और सख़्त सर्दी न लगेगी। आज क्या हो गया ? कहीं सूरज तो नहीं निकल गया। आवाज़ आएगी यह सूरज नहीं है , बल्कि सैय्यदुल औसिया यानी अलीए मुर्तज़ा और सय्यदह फ़ात्मा ज़हरा (अ 0स 0) आपस में लताफ़त की बातें करते हुए हंसते हैं और यह रौशनी उनके दन्दाने नूरानी का असर है , जो जन्नत की रौशनी पर ग़ालिब आ गया।

जन्नती नग़मात

यह दुनियावी तरह-तरह की न्यामतें और लज़्ज़तें जन्नती लज़्ज़तों का मामूली हिस्सा भी नहीं है। वहां हक़ीक़त और असल मौजूद होगी। सदए कामिल और खुशकुन नग़मात जन्नत में होंगे। अगर जन्नती नग़मात की आवाज़ अहले दुनिया के कानों तक पहुंच जाए तो उनके सुनने से पहले हलाक हो जाएं।

चूनांचे लहने दाऊदी में परवरदिगारे आलम से यह असर अता किया था कि जब वह हज़रत दाऊद (अ 0स 0) इस लहेन में ज़बूर की तिलावत फ़रमाते थे , तो हैवान आपके इर्द-गिर्द मदहोश हो जाते थे और जब यह आवाज़ इन्सानों के कानों में पड़ती तो गिर पड़ते और बाज़ हलाक हो जाते।

हज़रत अमीरूल मोमनीन (अ 0स 0) नहजूल बलागा में हालाते अम्बिया के तहत एक ख़ुतबे में इरशाद फ़रमाते हैं , कि हज़रत दाऊद (अ 0स 0) जन्नत में लोगों को अपने लहेन से लुत्फ़ अन्दोज़ फ़रमाएंगे और अहले जन्नत के क़ारी होंगे। इस जुमले से पता चलता है कि वह जन्नतियों को जन्नत के नग़मात से लुत्फ़ अन्दोज़ फ़रमाएंगे और जन्नती उनको सुनने की ताक़त भी रखते होंगे।

तफ़सीर मजमउल ब्यान में रसूले खुदा (स.अ.व.व. ) से मर्वी है कि जन्नत के नग़मों में से बेहतरीन नग़मा वह होगा , जो हूराने जन्नत अपने शौहरों के लिए पढ़ेंगी और वह आवाज़ ऐसी होगी जो जिन्नों , इन्सानों ने न सुनी होगी। मगर आलाते मौसिक़ी के साथ यह नग़मात न गाए जाएंगे। एक रवायत (कथन) में है कि बेहश्ती परिन्दे मुख़तलिफ़ नग़मात गाते होंगे।

हज़रत सादिक़ आले मोहम्मद (अ 0स 0) से पूछा गया , कि जन्नत में ग़िना व सुरुर होगा जतो आपने इरशाद फ़रमाया कि जन्नत में एक दरख़्त है। ख़ुदा वन्दे आलम के हुक्म से हवा उसे हरकत देगी और उससे ऐसी सुरीली आवाज़ पैदा होगी कि किसी इन्सान ने इतना उम्दा साज़ और नग़मा न सुना होगा और यह उस शख़्स को नसीब होगा , जिस शख़्स ने दुनीयाँ में ख़ौफ़े खुदा की वजह से ग़िना की तरफ़ कान न धरे होंगे।

जन्नत की न्यामतें और लज़्ज़तें

जन्नत में तरह-तरह की न्यामतें होंगी इरशादे कुदरत है-

“ तुम अगर खुदा की न्यामतों को शुमार करना चाहो तो उसका अहसार व अहाता नहीं कर सकते। ”

जिन तक हमारी अक़लों की रसाई नामुमकिन हैं। हक़ायक़ और मारफ़े इलाहिया की ख़्वाहिश पूरी होगी।

तफ़सीरे साफ़ी में “ वअक़बल मअज़ुहुम अला बअज़िन यतासाअलून ” के ज़िम्न में तहरीर है कि जन्नती एक दूसरे के साथ मारिफ़े इलाहिया के बारे में मुज़ाकिरा करेंगे।

इसके अलावा जन्नती लोग जिनके वाल्दैन , औलाद और दोस्त दुनिया से बेईमान रुख़सत होंगे और जन्नत में दाख़िल होने की सलाहियत रखते होंगे , उनकी शिआअत करेंगे और उनको अफने पहलू मे लाएंगे और यह मोमिन के इकराम व एहतराम की ख़ातिर होगा। कुर्आन मजीद में है।

“ हमेशा रहने के बाग़ जिनमें वह आप जाएंगे और उनके बाप , दादा और उनकी बीवियां और उनकी औलाद में से जो लोग नेकूकार हैं ,” और जिस वक़्त जन्नती जन्नत में चले जाएंगे तो एक हज़ार फ़रिश्ते जो ख़ल्लाक़े आलम की तरफ़ से मोमनीन की ज़ियारत और मुबारकबादी के िलए मामूर हैं आएंगे और मोमिन के महल जिसके हज़ार दरवाज़े हैं हर दरवाज़े से एक-एक फ़रिश्ता दाखि़ल होकर उसे सलाम करेगा और मुबारकबादी देगा। कुर्आन पाक मे इसी तरफ़ इशारा किया गया है-

“ और फ़रिश्ते तुम्हारे पास हर दरवाज़े से आएंगे (और कहेंगे) तुम पर सलामती हो। ”

इससे बढ़कर मोमनीन के साथ परवरदिगारे आलम का मुकालमा है , जिसके बारे में कुछ रवायत (कथन) मिलती है , लेकिन यहां पर सिर्फ़ सूरए यासीन की इस आयत “ सलामुन क़ौलन मिररबबिर रहीम ” को काफ़ी समझता हूँ। “ मेहरबान परवरदिगार की तरफ़ से सलामती का पैग़ाम। ”

तफ़सीर मिनहज में जाबिर इब्ने अब्दुल्ला ने रसूले अकरम (स.अ.व.व. ) से रवायत की है कि आपने फ़रमाया , कि जब जन्नती जन्नत की न्यामतों में ग़र्क़ होंगे तो उन पर एक नूर साते होगा और उससे आवाज़ आयगी अस्सलामो अलैकुम या अहल्ल जन्नते , इस जगह यह कहा जा सकता है कि दुनियाँ में जो कुछ बरगुज़दी पैग़म्बरों को हासिल था कि वह परवरदिगारे आलम से हम कलाम होते थे , मेराज वग़ैरा , आख़िरत में वह जन्नतियों को नसीब होगा।

इसके अलावा मोहम्मद व आले मोहम्मद अलैहिस्सलाम की जन्नत में हमसायगी कुछ कम न्यामत नहीं है , चूनांचे रसूले अकरम (स.अ.व.व. ) ने इरशाद फ़रमाया , ऐ अली (अ 0स 0)। तेरे शिया जन्नत में नूरानी मिम्बरों पर बैठे होंगे। उनके चेहरे (चौहदवीं के चांद की तरह) सफ़ेद होंगे वह जन्नत मे हमारे हमसाये (पड़ोसी) होंगे।

और जन्नत में हमेशगी और न्यामात का ख़लूद जैसा कि ज़िक्र हो चुका है , सबसे बुजुर्ग न्यामत हे। जन्नत मे मोमनीन एक दूसरे के सामने भाईयों की तरह जन्नती तख़्तों पर बैठे होंगे।

(आमने सामने तख़्तों पर बैठे होंगे) , औऱ एक दूसरे की दावतें उड़ाते होंगे , जैसा कि रवायत में मौजूद है।

मर्वी है कि हर रोज़ जन्नत मे उलुल अज़्म अम्बिया में से एक मोमिन की मुलाक़ात , व ज़ियारत के लिए हाज़िर होगा और उस रोज़ तमाम लोग उस बुजुर्गवार के मेहमान होंगे और जुमेरात को ख़ातिमुल अम्बिया के मेहमान होंगे और बेरोज़े जुमा बमुक़ाम कुर्ब हज़रत अहदीयत जल्ला व ओला मेहमान नवाज़ी की जाएगी। (मआद)।

सहबाने ख़ौफ़े ख़ुदा के क़िस्से

(1) एक फ़ासिक़ नौजवान का किस्सा

शेख़ कुलैनी (र 0) बसन्दे मोअतबर हज़रत अली (अ 0स 0) बिने हुसैन (अ 0स 0) से रवायत करते हैं कि एक शख़्स अपने अहलो अयाल (परिवार) के साथ किश्ती (नाव) में सवार हुआ और तक़दीरे इलाही से किश्ती टूट गयी। तमाम सवार गर्क़ (डूब) हो गए , मगर उस शख़्स की बीवी एक तख़्त पर बैठी समुद्र के दूर उफ़तादा जज़ीरा मे पहुंच गयी और उस जज़ीरा के अन्दर एक रहज़न (डाकू) मर्दे फ़ासिक़ रहता था , जिसने किसी क़िस्म का फिस्क़ो फुजूर (अपराध) न छोड़ा था जब उसने उस औरत को देखा तो पूछा कि क्या तू इन्सान है या जिन ? उस औरत ने कहा मैं इन्सान हूँ। इसके अलावा उसने उस औरत से और कोई बात न की और उसके साथ लिपट कर मुजामियत करने का इरादा किया। जब वह इस अम्ले क़बीह की तरफफ़ मुत्तवजेह हुआ तो उस फ़ासिक़ ने औरत को मुज़तरिब और कांपते देखा। उस फ़सिक़ ने पूछा तू कि़स वजह से मुज़तरिब है। उसने आसमान की तरफ़ इशारा करते हुए कहा , अल्लाहतआला के ख़ौफ़ से उसने कहा , क्या तूने आज तक कभी यह काम किया है ? उस औरत ने कहा , खुदा की क़सम ज़िना हरगिज़ नहीं किया। उस फ़ासिक़ ने कहा , जबकि तूने आज तक कोई बुरा काम नहीं किया , तो फ़िर किस वजह से खुदा से डरती है। हालांकि मैं तुझे इस काम पर मजबूर कर रहा हूं तू खुद अपनी रज़ामन्दी से नहीं कर रही , इसके बावजूद इस क़द्र ख़ौफ़ज़दा है। इसलिए मैं तुझसे ज़्यादा खुदा से डरने का हक़दार हूं क्योंकि मैंने इससे पहले भी बहुत से गुनाह (पाप) किए हैं। बस वह फ़ासिक़ इस काम से बाज़ रहा और उस औरत से कोई बात किए बग़ैर घर की तरफ़ रवाना हुआ और दिल में किए हुए गुनाहों पर नादिम (शर्मिन्दा) और तौबा (प्रायश्चित) करने का इरादा कर लिया। रास्ते में उसकी मुलाक़ात एक राहिब से हो गयी और वह दोनों एक दूसरे के रफ़ीक़ बन गए। जब वह थोड़ी राह चल चुके तो सूरज की गर्मी बढ़ने लगी। राहिब ने उस जवान से कहा , गर्मी ज़्यादा बढ़ गयी है तू दुआ कर की खुदावन्द तआला बादल को फेजे और वह हम पर साया कर दे। जवान ने कहा मैंने कोई नेकी और अच्छा काम नहीं किया , जिसकी बिना पर ख़ुदावन्द तआला से हाजत तलब करने की हिम्मत करुँ। राहिब ने कहा मैं दुआ करता हूं तुम आमीन कहना।

बस उन्होंने ऐसा ही किया। थोड़ी देर बाद एक बादल आकर उनके सिर पर साया फ़िगन हुआ और वह उसके साये में चलने लगा। जब वह काफ़ी रास्ता तै कर चुका तो उनके रास्ते अलग हो गए। जवान अपने रास्ते पर और राहिब अपने रास्ते पर चलने लगा औऱ बादल का साया जवान के साथ हो लिया और साहिब धूप में रह गया। राहिब ने जवान से कहा तू मुझसे बेहतर है क्योंकि तेरी दुआ मुस्तजाब हुई और मेरी दुआ मुस्तजाब न हुई। बताओ वह कौन-सा नेक काम तूने किया है कि जिसकी बदौलत तू इस करामत का मुस्तहक़ हुआ। जवान ने अपने क़िस्से को नक़ल किया। तब राहिब ने कहा चूंकि तूने ख़ौफ़ ख़ुदा की वजह से तर्क़े गुनाह का मुस्म्म इरादा कर लिया। इसलिए अल्लाहतआला ने तेरे पिछले गुनाह माफ़ कर दिए तू कोशिश कर कि इसके बाद भी नेक रहे।

(2) बहलोल नब्बाश का क़िस्सा

शेख़ सद्दूक (र 0) रवायत करते हैं कि एक दिन मआज़ दिने जबल (र 0) रोते हुए हुजूरे अकरम (स.अ.व.व. ) की ख़िदमत में हाज़िर हुए और सलाम किया। आं हज़रत (स.अ.व.व. ) ने सलाम का जवाब दिया और पूछा ऐ मआज़! तेरे रोने का सबब क्या है ? उसने अर्ज़ किया या रसूल अल्लाह (स.अ.व.व. )! दरवाज़े पर एक ख़ूबसूरत नौजवान खड़ा इस तरह रो रहा है , जैसे कोई औरत अपने नौजवान बेटे की मय्यत पर रोती है। वह आपकी ख़िदमत में हाजि़र होने की इजाज़त चाहता है। आं हज़रत ने फ़रमाया उसे अन्दर बुला लाओ , बस मआज़ गया और नौजवान को अन्दर बुला लाया। नौजवान ने अन्दर दाख़िल होकर सलाम अर्ज़ किया। आं हज़रत (स.अ.व.व. ) ने सलाम का जवाब दिया और पूछा। ऐ नौजवान तेरे रोने की वजह क्या है ? उसने अर्ज़ किया या रसूल अल्लाह (स.अ.व.व. )! मैं क्यों न रोऊँ जबकि मुझसे गुनाहे अज़ीम सरज़द हुआ है। अगर अल्लाहतआला मुझसे इस गुनाह का मोआख़ज़ा करे तो वह मुझे जहन्नुम में भेजेगा और मुझे यक़ीन है कि वह मुझसे ज़रुर मोआख़ज़ा करेगा और कभी न बख़शेगा। आं हज़रत (स.अ.व.व. ) ने फ़रमाया क्या तूने शिर्क किया है ? उसने अर्ज़ किया , मैं मुशरिक बनने से ख़ुदा की पनाह चाहता हूं। आं हज़रत (स.अ.व.व. ) ने पूछा क्या तूने किसी को नाहक़ क़त्ल किया है ? उसने नफ़ी में जवाब दिया। आपने फ़रमाया अगर तेरा गुनाह पहाड़ों से भी अज़ीमतर है तो भी ख़ुदा बख़्श देगा। उसने अर्ज़ किया हुजूर! मेरा गुनाह तो पहाड़ो से भी अज़ीमतर है। आपने फ़रमाया अगर तेरा गुनाह सातों ज़मीनों , दरियाओं , दरख़्तों और जो कुछ उनमें हैं , उससे भी बड़ा है तो खुदा वन्दे आलम इस गुनाह को भी बख़्श देगा। उस नौजवान ने अर्ज़ किया हुज़ूर मेरा गुहना , इन सबसे अज़ीमतर है। आं हज़रत (स.अ.व.व. ) ने फ़रमाया अगर तेरा गुनार सितारों , आसमानों , अर्श व कुर्सी जैसी भी अज़ीम है तो अल्लाहतआला उसे बख़्श देगा। तब आं हज़रत (स.अ.व.व. ) ने उसकी तरफ़ नाराज़ होकर देखा और फ़रमाया , ऐ नौजवान! तेरा गुनाह बड़ा है या परवरदिगारे आलम! बस उस नौजवान ने सिर झुका कर अर्ज़ किया। मेरा परवरदिगार हर ऐब से पाको-साफ़ है। कोई चीड़ उससे बड़ी नहीं है। बल्कि मेरा परवरदिगार हर चीज़ से बुजुर्ग व आला है। आं हज़रत (स.अ.व.व. ) ने फ़रमाया , कि अल्लाहतआला के सिवा कौन गुनाहे अज़ीम बख़्शने वाला है। उस नौजवान ने अर्ज़ किया। बखुदा या रसूल अल्लाह! उसके सिवा कोई नहीं औऱ ख़ामोश हो गया। फ़िर आं हज़रत (स.अ.व.व. ) ने इरशाद फ़रमाया , ऐ नौजवान! अपने गुनाह से आगाह कर। उस नौजवान ने अर्ज़ किया या रसूल अल्लाह ! (स.अ.व.व. ) सात साल तक मैं क़बरों को खोद कर कफ़न चोरी करता रहा। एक रोज़ एक अन्सारी लड़की की मय्यत को दफ़न किया गया। जब रात हुई तो मैंने पहले की तरह क़ब्र खोदकर और मय्यत को बाहर निकाल कर उसका कफ़ऩ उतार लिया और उसको नंगा क़ब्र के किनारे छोड़़कर चल दिया। उसी वक्त शैतान ने मेरे दिल में वसवसा पैदा किया और उस लड़की को मेरी नज़रों में ख़ूबसूरत कर दिखाया और शैतान ने मुझ़से कहा क्या तूने इसके सफ़ेद बदन को नहीं देखा और उसकी मोटी रानों को नहीं देखा। यहां तक की शैतान ने मुझ पर ग़लबा हासिल कर लिया और मैं वापस क़ब्र की तरफ़ लौटा और उस मय्यत के साथ मुजामेअत करके अपना मुंह सियाह किया और मय्यत को उसी हालत में छोड़कर वापस हुआ। अचानक मैंने अपने पीछे से एक आवाज़ सुनी की लानत हो कि बरोज़े क़यामत जब अहले महशर के सामने अल्लाहतआला के हुज़ूर झग़ड़ा पेश होगा , कि तूने मुझे मुर्दों के दर्मियान नंगा किया। क़ब्र से बाहर निकाल कर मेरा कफ़न चुराया और मुझे जनाबत की हालत में नंगा छोड़ दिया. और इसी नजिस (अपवित्र) हालत में महशूर हूंगी और ऐ जवान तेरी जवानी जहन्नुम में जले। बस जवान ने अर्ज़ किया , मुझे यक़ीन है कि इन आमाल के होते हुए , जन्नत की बू भी नहीं सूंघ सकूंगा। हुज़ूर ने फ़रमाया , ऐ फ़ासिक़! मेरी नज़रों से दूर हो जा , क्योंकि मैं डरता हूं कि कहीं तेरे साथ मुझे भी आतिशे दोज़ख़ न जला दे , क्योंकि तू जहन्नुम के इतना क़रीब है।

(यह बात छिपी न रहे कि आं हज़रत (स.अ.व.व. ) का उस नौजवान को इस तरह दूर करना सिर्फ़ उसके दिल में ज़्यादा ख़ौफ़ पैदा करने की वजह से था ताकि वह ज़्यादा इल्तिजा करे और लोगों से ताअल्लुक़ात तोड़ कर हक़तआला से तौबा करे ताकि वह कुबूल करे। चुनांचे उसने तौबा की और वह कुबूल हुई।)

आं हज़रत (स.अ.व.व. ) ने बार-बार उसे यही हुक्म दिया यहां तक की वह नौजवान दरबार से बाहर निकला , मदीने के बाज़ार में आकर कुछ दिनों के लिए खाना ख़रीदा और वह मदीना के किसी पहाड़ पर चला गया और टाट का लिबास पहन कर इबादत में मशगूल हो गया और अपने हाथों को गर्दन में डाल कर फ़रियाद करता रहा।

“ ऐ परवरदिगार तेरा बन्दा बहलोल तेरे हुज़ूर में हाथ गर्दन में डाले खड़ा है। ” ऐ अल्लाह तू मुझे और मेरे गुनाहों को भी जानता है ऐ खुदाया मैं अपने किए गुनाहों पर परेशान हैं और मैंने तेरे पैग़म्बर के पास जाकर तौबा का इज़हार किया है। उशने मुझे अपने पहलू से दूर भगा कर मेरे ख़ौफ़ को बढ़ाया है) बस मैं तुझे तेरी अज़मत व जलालत और असमाए आज़म का वास्ता देकर सवाल करता हूं। कि मुझे अपनी रहमत से मायूस न करना। यहां तक की चालीस दिन तक यह अलफ़ाज़ दोहराता रहा और इस क़द्र रोया कि हैवानात और दरिन्दे भी उसे देख़कर रोते थे। जब चालीस दिन गुज़र चुके तो उसने अपने हाथों को आसमान की तरफ़ उठा कर दुआ की और अर्ज़ किया। ऐ मेरे परवरदिग़ार! तूने मेरी हाजत को क्या किया। अगर तूने मेरी दुआ को कुबूल किया और मेरे गुनाहों को माफ़ कर दिया है तो तू अपने पैग़म्बर को वही नाज़िल फ़रमा ताकि मैं भी अपनी दुआ के मुत्तालिक़ जान लूं और ऐ खुदा अगर तूने मेरी दुआ कुबूल नहीं फ़रमायी और मुझे अभी तक नहीं बख़्शा तो मुझे अज़ाब में मुबतिला कर और ऐसी आग भेज जो मुझे जला डाले या मुझे इस दुनियाँ के अन्दर सख़्स मुसीबत में मुबलिता कर , लेकिन खुदाया मुझे रोज़े क़यामत के अज़ाब से नजात दे। बस अल्लाहतआला ने उसकी तौबा कुबूल होने पर आयत नाज़िल फ़रमायी।

“ और वह लोग जब कोई बदी कर गुज़रते हैं या अपनी जानों पर जुल्म करते हैं तो अल्लाहतआला को याद करके अपने गुनाहों की माफ़ी चाहते हैं और अल्लाहताला के सिवा कन है जो गुनाहों को माफ़ कर सकता है ? और जो कुछ वह कर चुके , इस पर जन बूझ कर इसरार नहीं करते। यही वह लोग हैं , जिनकी जज़ा उनके रब की तरफ़ बख़शीश और जन्नत है , जिनके नीचे नहरें बहती हैं , वह इसमें हमेशा रहने वाले हैं और अमल करने वालों का कितना अच्छा अज्र है। ”

जब यह आयते करीमा नाज़िल हुई तो आं हज़रत (स.अ.व.व. ) अफने घर से बाहर तशरीफ़ लाए और इस आयते करीमा की तिलावत भी करते थे और बहलोल की हालत मालूम करते थे मआज़ (र 0) ने अर्ज़ किया या रूसल अल्लाह! हमने सुन रखा है कि वह फ़लां जगह रहता है। आं हड़रत (स.अ.व.व. ) अपने कुछ सहाबा (सर 0) कराम के हमराह उस पहाड़ की तरफ़ मुत्तवजेह हुए और वहां तशरीफ़ ले गए और देखा कि वह नौजवान (महलोल) दो पत्थरों के दर्मियान अपने दोनों हाथों को गले में डाले खड़ा है और उसका चेहरा सूरज की गर्मी की वजह से सियाह (काला) और बराबर रोने की वजह से पल्कें गिर चुकी हैं औऱ वह कह रहा है कि ऐ मेरे परवरदिगार तूने तुझे अशरफुल मख़़लूक़ात (इन्सान) पैदा किया और मुझे अच्छी शक्ल व सूरत से नवाज़ा। काश! मैं यह भी जान लेता की तू मेरे साथ क्या करेगा। तू मुझे आग में जलाएगा या अपने ज्वार में मुझे बेहश्त के अन्दर जगह देगा। ऐ अल्लाह तूने मुझ पर बड़े-बड़े ऐससान किए और तेरी न्यामतों का हक़ मुझ पर ज़्यादा है हाय अफ़सोस काश! मैं अपना अन्जाम भी जानता होता कि तू मुझे अपनी रहमत के ज़रिए बेहश्त में भेजेगा , या मुझे ज़लील करके दोज़ख़ में भेजेगा। ऐ अल्लाह मेरा गुनाह ज़मीन व आसमान और अर्श व कुर्सी से भी बड़ा है कितना अच्छा होता अगर मैं यह भी जान लेता कि मेरा गुनाह तू बख़्श देगा या बरोज़े क़यामत मुझे ज़लील व रुसवा करेगा। वह जवान इस क़िस्म की बातें कर रह था और रो रहा था और अपने सिर पर ख़ाक डालता था , जंगह के हैवान व दरिन्दे उसके गिर्द हल्क़ा बांधे हुए थे और परिन्दे उसके सिर पर साफ़ (लाइन) बांधे खड़े थे और उसको देख रहे थे। बस आँ हज़रत (स.अ.व.व. ) उसके पास तशरीफ़ लाए और उसके हाथों को गर्दन से खोला और अपने दस्ते मुबारक से उसके सिर से मिट्टी को निकाला और फ़रमाया। ऐ बहलोल! तुझे खुशख़बरी हो कि अल्लाहतआला ने तुझे दोज़ख़ की आग से आज़ाद कर दिया और आं हज़रत (स.अ.व.व. ) ने अपने सहाबा (र 0) को मुख़ातिब करके फ़रमाया ऐ मेरे सहाबा! तुम भी बहलोल की तरह अपने गुनाहों की माफ़ी मांगो , फिर इस आयते करीमा की तिलावत फ़रमायी और बहलोल को जन्नत की खुशख़बरी सुनायी।

अल्लामा मजलिसी (र 0) ने ऐनुल हयात में इसी हदीस के ज़ैल में जो कुछ फ़रमाया है , उसका खुलासा है कि इन्सान को जानना चाहिए कि तौबा (प्रायश्चित) करने की कुछ शरायत और असबाब भी हैं।

शरायते तौबा (प्रायश्चित)

तौबा (प्रायश्चित) करने की पहली शर्त यह है कि इन्सान अल्लाहतआला की अज़मत व बुजुर्गी को देखकर सोचे कि उसने कितने बुजुर्ग व बरतर खुदा की नाफ़रमानी की और फ़िर अपने गुनाह की बुजुर्गी को देखे कि किस क़द्र गुनाह मुझसे सरज़द हुआ , और फिर गुनाहों की सज़ा देखे , जो अल्लाहतआला ने दुनियाँ और आख़िरत में उसके लिए मुक़र्रर कर रखी है , जो आयात और अहादीस से वाज़ेह है , औऱ यही निदामत इन्सान को तीन चीज़ों पर आमाद करती है , जिन तीन चीज़ों से तौबा मुरक्कब है।

पहली चीज़ यह है कि बन्दे और अल्लाहतआला का ताअल्लुक जो इस गुनाह की वजह से टूट चुका है , वह बहाल हो जाए।

दोम यह कि वह अपने किए पर नादिम (शर्मिन्दा) हो और अगर गुनाह का तदारुक मुमकिन हो तो तदारुक भी करे।

क़ाबिले तौबा गुनाह

कुछ क़ाबिले तौबा गुनाह यह हैं-

पहले किस्म का गुनाह वह है जिसका ताअल्लुक करने वाले के अलावा किसी दूसरे इन्सान से मुत्तालिक़ न हो , बल्कि उसकी सज़ा सिर्फ़ आखि़रत का अज़ाब ही हो , जैसे मर्द का सोने की अंगूठी और अबरेशम का लिबास ज़ेबे तन करना , क्योंकि इस गुनाह की तौबा दोबारा न पहनने का पक्का इऱादा करना और किए पर पशेमन होना ही क़यामत के दिन उसके अज़ाब से बचने के लिए काफ़ी है।

दोम जिस गुनाह का ताअल्लुक़ करने वाले के अलावा दूसरे शख़्स से भी हो और उसकी कुछ क़िस्मे हैं-

1- हुकूक़ अल्लाह 2- हुकूकुल इबाद।

अगर किसी के ज़िम्मे किसी का हक़ हो या उसके ज़िम्मे किसी कि़स्म का माल हो मसलन उसने कोई ऐसा गुनाह किया हो कि उसके बदले एक गुलाम आज़ात करना हो तो अगर वह ऐसा करने पर क़ादिर है तो जब तक वह ऐसा न करेगा तो सिर्फ़ निदामत से उसके गुनाह का अज़ाब नहीं टल सकता , बल्कि उस पर वाजिब है कि उस गुनाह का कफ़्फ़ारा अदा करे और अगर उसके जि़म्मे माल के अलावा कोई चीज़ मसलन उससे नमाज़ और रोज़े कज़ा हो गए हों तो उसके उनकी कज़ा बजा लानी चाहिए अगर उसने कोई ऐसा काम किया है कि जिसकी वजह से इस शरीयते खुदा की हद लगायी गयी हो। मसलन उसने शराब पी हो और हाकिमे शरह के सामने साबित न हो सकी हो तो उसे चाहिए कि वह खुद तौबा करे और उस का इज़हार न करे और उसे यह भी इख़्तियार है कि वह हाकिमे शरह के सामने इक़रार करे ताकि वह इस पर शरई हद लगाए , लेकिन इज़हार न करना बेहतर है। अगर हुकुकुल नास में से हो , मसलन उसके ज़िम्में किसी शख़्स का माल हो तो उस पर वाजिब है कि वह माल अस्ल वारिस तक पुहंचाये र अगर माल के अलावा हो यानी उसने किसी को गुमराह किया हो तो उसे चाहिए कि वह उसको सही रास्ते पर लगाए। अगर वह हद का मुस्तहक़ है मसलन उसने फोहश (फूहड़) बात कही है तो अगर कहने वाला आलिम शख़्स है तो चूंकि ह उसकी अहानत की वजह है तो हद जारी होने से पहले , उसको अपना मर्तबा देखना होगा और अगर वह इस फ़ेल (कार्य) की शरई मारिफ़त से नावाक़िफ़ हो तो इसके बारे में एख़तिलाफ़ है। अकसर उल्मा का ऐतीक़ाद यह है कि इस बात का कहना चूंकि अहानत है और तकलीफ़ की वजह है। इसलिए उसे तकलीफ़ पहुंचाना ज़रुरी नहीं और यही ग़ीबत के बारे में भी है।

(3) हरारते जहन्नुम की याद में धूप में लेटने वाले का क़िस्सा

इब्ने बाबूया मे मर्वी है कि एक रोज़ अकरम (स.अ.व.व. ) गर्मी की वजह से दरख़्त के साया में तशरीफ़ फ़रमा थे। अचानक एक आदमी आया और अपने लिबास को उतार कर गर्म ज़मीन पर लेटने लगा और कभी पेट को और कभी पेशानी को तपती हुई ज़मीन पर रगड़ता और अपने नफ़स से मुख़ातिब होकर कहता देख अल्लाहतआला का अज़ाब इस गर्मी से अज़ीमतर है।

हज़रत रसूले अकरम (स.अ.व.व. ) ने उसकी तरफ़ देखा तो उसने अपना लिबास (कपड़ा) पहन लिया। आं हज़रत (स.अ.व.व. ) ने उसको बुलाकर फ़रमाया , ऐ शख़्स! मैंने तुझको ऐसा करते देखा है , जो किसी दूसरे शख़्स को करते हुए नहीं देखा। बता तुझे किस चीज़ ने ऐसा करने पर मजबूर किया। उसने अर्ज़ किया कि इसका सबब सिर्फ़ खौफ़े खुदा है और अल्लाहतआला का अज़ाब इस तकलीफ़ से ज़्यादा सख़्त है , जिसके बरदाश्त (सहन) करने की मुझमें ताक़त नहीं।

आं हज़रत (स.अ.व.व. ) ने फ़रमाया कि तू खुदा से ऐसे ही डर रहा है , जैसा कि डरने का हक़ है , और अल्लाहतआला भी तेरे इस ख़ौफ़ और फ़ेल पर फ़रिश्तों में फ़ख़्र व मुबाहात कर रहा है। बस आं हज़रत (स.अ.व.व. ) ने अपने साहबियों से मुख़ातिब होकर फ़रमाया उस आदमी के पास चले जाओ , ताकि वह तुम्हारे लिए दुआ करे , जब वह तमाम उसके नज़दीक गए तो उसने कहा , ऐ खुदाया हम तमाम लोगों को हिदायत और राहेरास्त पर ला और परहेज़गाी को हमारा ज़ारदेराह बना और हमारा बेहश्त में दाखिला फ़रमा।

(4) ज़िनाकार औरत और आबिद का क़िस्सा

हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़र (अ 0स 0) से मनकूल (उद्धृत) है कि बनी इसराईल में एक ज़िनाकारा औरत थी , जिसने बनी इसराइल के बहुत से नवजवानों को अपना फ़रेफ़ता बना रखा था। एक दिन कुछ नवजवानों ने आपस में मशविरा किया अगर फ़लां (अमुक) आबिद भी उस औरत को देखे तो उस पर आशिक़ हो जाए। औरत ने जब उनका यह मश्विरा सुना तो उसने क़सम खाई कि मैं आज घर न जाऊंगी , जब तक की उस आबिद को अपना फ़रेख़्ता न बना लूं। बस वह उसी रात ज़ाहिद के घर गयी और उसके घर पर दस्तक दी और कहा कि ऐ आबिद मुझे आज रात पनाह दे ताकि आज रात में तेरे घर में गुज़ारूं। आबिद ने इन्कार कर दिया तो उस औरत ने कहा कि बनी इसराइल के कुछ नौजवान मेरे साथ ज़िना का इरादा रखते हैं और मैं उनसे भाग कर तुझसे पनाह मांगती हूं अगर दरवाज़ा न खोला तो वह पहुंच जाएंगे और मुझे रुसवा करेंगे। आबिद ने जब यह अलफ़ाज़ सुनें तो दरवाज़ा खोल दिया। जब यह औरत आबिद के घर में दाख़िल हो गयी तो उसने अपने लिबास उतार फेंक़ा। आबिद ने जब उस औरत के हुस्नों जमाल को देखा तो वह बेएख़्तियार (बेचैन) हो गया और अपने हाथ उसकी तरफ़ बढ़ाया , मगर उसी वक़्त ख़ौफ़े ख़ुदा से हाथ को खींच लिया और चूल्हे पर रखी हुई देग के अन्दर दाख़िल कर दिया। उस औरत ने पूछा तू क्या कर रहा है ? उस आबिद ने जवाब दिया मैं अपने हाथ को इस ग़ल्ती की सज़ा के तौर पर जला रहा हूं। बस वह औरत जल्दी से बाहर निकली और बनी इसराइल को ख़बर दी कि आबिद अपने हाथ को जला रहा है , जब वह लोग आए तो देखा कि उसका तमाम हाथ जल चुका था।

(5) हारसा (र 0) बिने मालिक सहाबी का क़िस्सा

हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0स 0) से मनकूल है कि एख दिन रसूले अकरम (स.अ.व.व. ) ने सुबह की नमाज़ अदा करने के बाद हारसा बिने मालिक की तरफ़ देखा , जिसका सिर बराबर जागंने की वजह से नीचे गुर रहा था (ऊँघ रहा था) और उसके चेहरे का रंग ज़र्द हो चुका था। उसका बदन कमज़ोर और आंखे अन्दर धंस चुकी थीं। आं हज़रत (स.अ.व.व. ) ने उस जवान से पूछा तूने किस आलम में सुबह की और अब तेरा क्या हाल है ? हारसा ने अर्ज़ किया या रसूल अल्लाह (स.अ.व.व. )! मैंने सुबह यक़ीन के साथ की। हज़रत (स.अ.व.व. ) ने इरशाद फ़रमाया , हर दावे की दलाल होती है। तेरे इस यक़ीन पर क्या दलील है। उसने अर्ज़ किया या रसूल अल्लाह (स.अ.व.व. ) मेरे यक़ीन पर वह चीज़ गवाह है जो मुझे बराबर ग़मगीन और परेशान रखती है , रातों को बेदारी और दिनों को रोज़ा रखने पर आमादा रखती है और इसी यक़ीन की वजह से मेरा दिल इस दुनियाँ से उकता चुका है और तमाम दुनियावी चीज़ों को मेरा दिल मकरुह और बुरा ख़्याल करता है और मेरा खुदा पर यक़ीन इस दर्जा पर पहुँच चुका है , गोया मैं क़यामत के दिन के हिसाब के लिए बनाए गए अर्श को बचश्मे खुद देख रहा हूं और तमाम महशूर लोग मेरी आंखों के सामने हैं औऱ उनके दर्मियान खड़ा अहले बेहश्त को कुर्सियों पर बैटे बेहश्त की न्यामतों से मुस्तफ़ैज़ तकिये लगाए एक दूसरे से मुहब्बत भी गुफ़्तगू में मशगूल देख रहा हूं। उसी तरह अहले जहन्नुम को भी जहन्नुम के अन्दर अज़ाब में मुबतिला फ़रियाद करते देख रहा हूं। गोया जहन्नुम की वहशतनाक आवाज़ अब भी मेरे कानों में आ रही है। बस हज़रत रसूले अकरम (स 0अ 0स) ने अपने सहाबा की तरफ़ मुख़ातिब होकर इरशाद फ़रमाया , देखो अल्लाहतआला ने उसके दिल को नूरे ईमान से किस तरह रौशन कर दिया और इसके बाद आपने हारसा (र 0) से इरशाद फ़रमायाः-

ऐ हारसा! तू अपनी इस हालत पर हनेशा के लिए साबित क़दम रह। उस जवान ने अर्ज़ किया या रसूल अल्लाह (स 0अ 0)! आप दुआ करें कि अल्लाहतआला मुझे शहादत नसीब करे। बस आपने दुआ फ़रमायी। फ़िर चन्द रोज़ के बाद हुज़ूर (स.अ.व.व. ) ने उसे हज़रत जाफ़रे तैय्यार (र 0) के साथ जेहाद के लिए भेजा और वह नौ आदमियों के बाद दरजए शहादत पर फ़ायज़ हुआ।

हदीसे अबु दरदा (र 0) व मुनाजात

हज़रत अमीर (अ 0स 0)

इब्ने बाबूया अरवह बिने जुबैर से रवायत (कथन) करते हैं कि उसने कहा एक दिन रसूले अकरम (स.अ.व.व. ) सहाबा (र 0) के मजमें में तशरीफ़ फ़रमा थे कि हम अहले बदर और अहले बैते रिज़वानुल्लाह अलैहिम अजमईन की इबादत व आमाल का तज़किरा करने लगे।

अबू दादा ने कहा , ऐ क़ौम! मैं चाहता हूं कि तुम्हें ऐसे शख़्स का पता बताऊँ जिसकी दौलत तमाम सहाबियों से कम है लेकिन उसके आमाल और इबादात सबसे ज़्यादा है। लोगों ने पूछा कि वह कौन शख़्स है। अबु दरदा (र 0) ने कहा वह अली (अ 0स 0) बिने अबु तालिब है , जब उसने अमीरुल मोमनीन (अ 0स 0) का नाम लिया तो तमाम लोगों ने उसकी तरफ़ से मुँह फ़ेर लिया। इस पर एक अन्सारी ने कहा , ऐ अबु दरदा , तूने आज एक ऐसी बात कही , जिसमें तेरा किसी न साथ नहीं दिया। उसने जवाब दिया। मैंने जो कुछ देखा था , तुमसे वही ब्यान किया और तुम भी वही कहते हो , जो कुछ तुमने दूसरे से सुना है। (कलाम बक़्रद मारिफ़त है) मैं एक ख़िदमत में पहुंचा। मैंने देखा कि हज़रत अली (अ 0स 0) अपने साथियों से दूर खजूरों के दरख़्तों की पीछे छिपे हुए हैं और दर्दनाक और ग़मनाक आवाज़ के साथ कह रहे हैं-

“ ऐ अल्लाह! मुझसे कितने हलाक कर देने वाले गुनाह सरज़द हुए हैं और बजाए इसके तू मुझे इन गुनाहों की सज़ा देता तूने हिलम से काम लिया और मुझसे कितनी बुराईयां , हुई , मगर तूने मुझे रुसवा व ज़लील न किया बल्कि मुझ पर रहम किया। ऐ अल्लाह! अगर मेरी यह उम्र तीर मासियत में गुज़र गयी और मेरे नामए आमाल में गुनाह ज़्यादा होते गए तो मैं तेरी बख़शिश और खुशनूदी के अलावा किसी और चीज़ की ख़्वाहिश न करूँगा।

बस मैंने उस आवाज़ का पीछा किया और मुझे यक़ीन हो गया कि यह आवाज़ हज़रत अमीरुल मोमनीन (अ 0स 0) की है इसलिए मैं उस आवाज़ को सुनने के लिए दरख्तों में छुपकर बैठ गया। मैंने देखा कि हज़रत अली (अ 0स 0) नाज़ की बहुत सी रकातें पढ़ रहे हैं और जब भी नमाज़ से फ़ारिग़ होते हैं तो वह दुआओं , आरजुओं और रोने में लग जाते हैं। हज़रत अली (अ 0स 0) की वह दुआएं जो रात को पढ़ रहे थे यह हैं-

“ ऐ अल्लाह! जब मैं तेरी बख़शिश और मेहरबानी को याद करता हूं तो गुनाह मुझ पर आसान मालूम होते हैं औऱ जब मैं तेरे सख़्त अज़ाम को याद करता हूं तो यह गुनाह मुझ पर बड़ी मुसीबत बन जाते हैं। हाय अफ़सोस! जिस दिन मैं अपने इन भूले हुए गुनाहों को नामए आमाल में क़यामत के दिन लिखा हुआ पाऊँगा , जिन्हें तूने अपनी कुदरत कामिला के साथ लिख रखा है। हाय अफ़सोस! उस वक़्त पर जिस वक़्त तू फ़रिश्तों को हुक्म देगा कि उसे पकड़ लो। मुझे इस तरह पकड़े और क़ैद किए जाने पर अफ़सोस है। क़ैदी भी ऐसा जिसके गुनाह के पादाश में उसके कुंचे को भी नजात न मिल सके और उसका क़बीला उसकी फ़रियाद रसी के लिए न पहुंच सकेगा और उसकी इस हालतेज़ार पर तमाम अहले महशर रहम खायेंगे। हाए वह आग जो जिगर और गुर्दो को जला देती ह। हाय वह आग जो सिर की खोपड़ी को जला देती है। ”

बस हज़रत अली (अ 0स 0) इसके बाद बहुत रोए यहां तक कि मुझे हज़रत अमीरूल मोमनीन (अ 0स 0) की आवाज़ तक न सुनाई दी। मैंने अपने दिल में कहा। शायद ज़्यादा बेदारी की वजह से हज़रत को नींद आ गयी है। मैंने इरादा किया कि हज़रत अली (अ 0स 0) को सुबह की नमाज़ के बेदार करूँ। मैंने आपको बहुत हरकत दी। मगर आपने हरकत न की और ख़ुश्क लक़ी की तरह आपका बदन बेहिस हो चका था। मैने इन्नालिल्लाहे वा इन्ना इलैहे राजेऊन पढ़ा और दौड़ कर हज़रत फ़ात्मा सलवात उल्लाहे अलैहा के घर पर जाकर इत्तिला दी और जो कुछ मैंने देखा था तमाम क़िस्सा कह सुनाया। जनाबे सैय्यदा सलामुल्लाह अलैहा ने फ़रमाया कि ऐ अबुदरदा ख़ौफ़े ख़ुदा की वजह से हज़रत की हालत अकसर इसी तरह हो जाती है बस मैं पानी ले गया और हज़रत (अ 0स 0) के चेहरे पर छिड़का तो वह होश में आ गए , और नज़र उठा कर मेरी तरफ़ देखा तो मैं रो रहा था। हज़रत (अ 0स 0) ने मुझसे रोने की वजह पूछी तो मैंने जो कुछ देखा था , कह सुनाया और अर्ज़ किया कि यही मेरे रोने की वजह है तो हज़रत अली (अ 0स 0) ने फ़रमाया-

ऐ अबुदरदा! क्या तूने समझ लिया है कि मैं ज़रुर जन्नत में जाऊँगा , जिस वक़्त तमाम गुनाहगार अपने अज़ाबों का यक़ीन कर चुकेंगे और बड़े तन्दख़ूं औऱ सख्त मिज़ाज फ़रिश्ते अपने घेरे में लिए होंगे और खुदाए जब्बार के नज़दीक ले जाएंगे और इस हालत में तमाम दोस्त मुझे अकेला छोड़ देंगे और तमाम अहले दुनियाँ मुझ पर रहम करेंगे। क्या तू भी उस दिन ऐसी हालत में मुझ पर रहम करेगा , जबकि मैं बतौर मुजरिम अल्लाहतआला के हुज़ूर में खड़ा हूंगा , जिस पर कोई राज़ पोशीदा न होगा।

बस अबुदरदा ने कहा , खुदा की क़सम मैने रसूल अकरम (स.अ.व.व. ) के सहाबियों में से कोई भी इतना इबादत गुज़ार नहीं देखा।

मैं इस मुनाजात का तज़कीरा इन ही अलफ़ाज़ के साथ मुनासिब समझता हूँ जिन अल्फाज़ के साथ हज़रत अली (अ 0स 0) ने उस रात अपनी ज़बाने मुबारक से अदा की थी , ताकि हर शख्स रात की तारीकी में नमाज़े शब के दौरान वह मुनाजात पढ़े। चूनांचे शेख़ बहाई (र 0) ने अपनी किताब मुफ़ाताहुल फ़लाह में इस मुनाजात को इस तरह लिखा है-

“ इलाही कम मिन मोअेक़तिन हल्लत अन मुक़ाबलतेहा बेनेअमतेका व कमामिन जरीरतिन तकर्रमत अन कशफ़ेहा बेकरमेका इलाही इन ताला फ़ी इसयानेका उमरी व अज़ोमा फ़िस्सोहफ़े ज़म्बी फ़आना बेमुअम्मेलीन ग़ैरा गुफ़राने का वला अजाबेराज़िन ग़ैरां रिज़वानेका , इलाही उफ़क्केरो फ़ी अफ़वेका फ़तहूनो अज़कोंरुल अज़ीम मिन अखज़ेका फ़ताज़मो अलंय्या बलीय्यती आह इन अलना क़राअतो फ़िस्सोहोफ़ सय्येअतुन अना नसीहा व अन्त मोहसीहा फ़तकूला ख़ोजूहो फ़यालहू मिम्माख़ूजिन लातुनजीहे अशीरतोहू वलां तफ़ओहू क़बालतोहू आह मिननारिन तनज़ीजुल अक़बाद वलाक़ोबा आह मिननारिन नज़्ज़अतिन लिश्शवा आह मिन ग़मरतिम मिन लहाबातिन लज़ा। ”

मोमनीन की तंबीह के लिए चन्द मिसाल (उदाहरण)

मिस्ले अव्वल

बलोहर कहता है कि एक बार कोई शख़्स जंगल में जा रहा था , कि मस्त हाथी उसके पीछे हो लिया। वह शख़्स डर के मारे भागने लगा , लेकिन हाथी ने भी पीछा न छोड़ा। जब उस आदमी ने देखा कि हाथी बिल्कुल क़रीब आ गया है तो सख़्त बेचैन हुआ। देखा कि क़रीब ही एक ग़ैर आबाद कुंआ था , जिसके किनारे खड़े हुए पेड़ों की डालें , उसमें झुकी हुईं थीं। वह उसकी शाखों को पकड़ कर कुएं में लटक गया। जब उसने इन शाख़ों की तरफञ नज़र की तो उसे मालूम हुआ कि दो बड़े-बड़े चूहे , जिनमें एख सफ़ेद और एक स्याह है , इन डालों को तेजी से काट रहे हैं। जब पांव के निचे नज़र की तो चार अजगर अपने सूराख़ों से बाहर निकल रहे थे और जब कुएं के अन्दर देखा तो एक बड़ा अजगर अपने मुँह को खोलकर उसे निगलने वाला था , जब ऊपर को सिर उठाया तो एक डाल शहद से भरी हुई नज़र आयी। वह उस शहद को चूसने में मशगूल हो गया। बस उस शहद की शीरीनी और लज़्ज़त ने उस आदमी को इन सांपों के ख़तरात से ग़ाफ़िल कर दिया , जो किसी वक़्त भी उसका काम तमाम कर सकते थे। बस वह कुंआ दुनियाँ है , जो मुसीबतों और बलाओं से पुर है और टहनियां इन्सान की उम्र हैं और वह स्याह और सफ़ेद चूहे दिन और रात हैं , जो इन्सान की उम्र को लगातार काट रहे हैं , और वह सांप इन्सान के अनासिरे अरअबा हैं , जिनसे इन्सान मुरक्कब है और वह सौदा , सफ़रा , बलग़म औऱ ख़ून हैं। इनमें से किसी एक का भी इल्म नहीं कि कब और किस उनसुर की वजह से वह हलाक हो जाएगा और वह अजगर इन्सान की मौत है , जो हमेशा उसके इन्तिज़ार में है और शहद जिसको चूसने में मगन है। वह इस दुनिया की लज़्ज़तें और ऐश व आराम है।

इन्सान के मौत से ग़ाफ़िल होने और मौत के बाद वाले अज़ाब से बेपरवाह और दुनिया की लज़्ज़तों में मगर रहने की मिसाल ऊपर लिखी मिसाल (उदाहरण) से बेहतर नहीं हो सकती। हमें उस मिसाल का बग़ौर मुतालिया (अध्य्यन) करना चाहिए। शायद किसी वक़्त इस ख़्वाबे ग़फ़लत से बेदारी का सबब बन जाए।

हज़रत अमीरूल मोमनीन (अ 0स 0) से रवायत है कि एक दिन वह बसरा के बाज़ार में जा रहे थे तो लोगों को ख़रीद फ़रोख़्त में मशगूल देखकर बहुत रोए और उन लोगों से मुख़ातिब होकर फ़रमाया। ऐ दुनिया के गुलामों , और ऐ अहले दुनिया के हाकिमों! तुम तो अपने दिनों को झूठी कसमें खाने और सौदागरी में और रातों को मीठी नींद में गुज़ार देते हो और इन लज्ज़तों की वजह से आख़िरत के अज़ाब से ग़ाफ़िल हो। तुम किस दिन आखत़िरत के सफ़र के लिए जादे राह मोहय्या करोगे और कब अपनी आख़िरत और मआद (वापसी) की फिक़्र करोगे।

मैं मुनासिब समझता हूं कि इस जगह चन्द अशआर का ज़िक्र करूँ। तवालत (ज़्यादा बढ़ जाने) के ख़ौफ़ से सिर्फ़ तर्जुमा पर इक्तिफ़ा करता हूं।

1- ऐ अपनी उम्रे अज़ीज़ को गफ़लत में गुज़ारने वाले इन्सान तूने कौन से आमाल आख़िरत के लिए किए हैं और तेरे वह आमाल कहां हैं

2- ऐ इन्सान! यह तेरे सफ़ेद बाल तेरी मौत के क़ासिद हैं अब तू ही बता कि आख़िरत के तवील (लम्बे) सफ़र के लिए तेरे पास किस क़द्र ज़ादे राह है।

3- तुझे इल्मों अमल के लिहाज़ से फ़रिश्ता होना चाहिए था , लेकिन तूने अपनी कोताह हिम्मत और ताक़त के सहारे दुनिया में मकर व फ़रेब का जाल बिछा रखा है।

4- तूझे किस तरह हूराने जन्नत की सोहबत हासिल होगी , जब कि तू हैवान की तरह मामूली घास और पानी की तरफ़ लपकता है। (चौपाया ख़सलत है)

5- यु दुनियाँ चन्द रोज़ा है तू कोशिश कर ताकि कहीं अल्लाहताला के इनामात से महरूम न हो जाए।

शेख़ अलमशाएख़ निज़ामी गंजवी

के अशआर का तर्जुमा

1- ऐ निज़ामी तू बचपन की बातों को छोड़ क्योंकि बचपन की हालत तो मस्ती और मदहोशी का वक़्त था।

2- जब इन्सान की उम्र बीस या तीस साल हो जाए तो फ़िर उसे ग़ाफ़िल और सुस्त नहीं होना चाहिए।

3- इन्सान के लिए चालीस साल तक ऐश व आराम होता है चालीस साल के बाद इन्सान के बाल गिरने लगते हैं। (कमज़ोरी)।

4- और पचास साल के इन्सान की तन्दुरुस्ती और सेहत जवाब देत जाती है। आंखे , धंस जाती हैं और पांव में सुस्ती आ जाती है।

5- और जब साठ साल को पहुंच जाता है , तो वह हर काम को छोड़कर बैठ जाता है और जब सत्तर साल को पहुंचता है तो उसका निज़ामें तन्फ़्फुस बिल्कुल मफ़लूज (बेकार) हो जाता है।

6- और जब अस्सी और नब्बे साल की उम्र को पहुंचता है तो हर क़िस्म की बीमारियों और तकलीफ़ घेर लेती हैं।

7- अगर वह सौ साल को पहुंच जाए तो उसकी जि़न्दगी उसके लिए मौत होती है।

8- सौ साल की उम्र वें वह शिकारी कुत्ता जो हिरनों को कभी दौड़ कर पकड़ता था। अब कमज़ारी की वजह से उसको हिरन भी पकड़ सकता है और उस पर गालिब आ सकता है।

9- ऐ इन्सान जब तेरे बाल सफ़ेद होने लगें तो समझ ले कि अब तेरी मायूसी के दिन आ रहे हैं।

10- अब तेरा कफ़नपोश जिस्म रुई की तरह हो गया है , लेकिन अब भी रुई के टुकडे को अपने कान से बाहर नहीं निकाल रहा है। (मौत सिर पर है और मोअत्तर (सुगन्धित) रहने का शौक़ अब भी बदस्तूर है)

किसी दूसरे शायर ने कहा है

1- नीलगूँ फ़लक (नीले आकाश) की गर्दिश की वजह से मेरी उम्र के साठ साल गुज़र चुके हैं।

2- इस बीती हुई ज़िन्दगी में हर साल के ख़ात्में पर गुज़री हुई खुशियों पर अफ़सोस करता हूं।

3- मैं उस ज़माने की गर्दिश पर खुश हूं क्योंकि उसने मुझे सब कुछ देकर फ़ेर लिया है।

4- मेरे हाथ-पांव की ताक़त जवाब दे चुकी है और मेरे चेहरे का रंग उड़ गया है और बाल सफ़ेद हो गए हैं।

5- सुरैया ने अपना ताअल्लुक मुझसे तोड़ लिया है , मेरे दांतो की चमक भी धीरे-धीरे जाती रही (यानी मेरा तआल्लुक़ सुरैया से था , अब बुढ़ापे ने सब कुछ ले लिया , यहां तक की दांतो की चमक भी।)

6- यह बिल्कुल सही है दुनियाँ धोखा है , क्योंकि उसके गुनाह का बोझ ज़्यादा और उम्मीद लम्बी हो जाती है , (गुनाह की बख़शिश की उम्मीद पर गुनाह ज़्यादा करता है।)

7- दुनियाँ में कूच का नक़्क़ारा बज रहा है और तमाम हम सफ़र अपने-अपने सफ़र पर चले जा रहे हैं।

8- हाय अफ़सोस! क़यामत के लिए ज़ादे राह नहीं है , क्योंकि सफ़र तवील (लम्बा) है।

9- मेरे कंधों पर (गुनाहों का) बोझ पहाड़ से भी ज्यादा वज़नी है , बल्कि पहाड़ भी मेरे इस बोझ पर तारीफ़ करते हैं (कि किस क़द्र बोझ उठाए हुए हैं)

10- मेरे गुनाहों की बख़शिश कोई मुश्किल काम नहीं ,

(क्योकि वह गफुरूर्र रहीम है) यह मसल मशहूर है कि सेलाब के दामन में कभी-कभी बहार भी होती है।

11- ऐ मेरे परवरदिगार! अगर तेरी मेहरबानी और फ़ज़ल मेरी दस्तगिरी न करे और सिर्फ़ मेरी पाक दामनी पर मुझे छोड़ दे।

12- तो ऐसी हालत में मैं सीधा जहन्नुम में जाऊँगा और तू मेहरबानी करे तो जन्नत में जा सकता हूं और अगर अदल करे तो मेरे आमाल की कोताही मुझे जहन्नुम में पहुंचा देगी)

13- ऐ परवरदिगार मैं बेवकूफ़ इन्सान अपने किए पर नादिम हूं क्योंकि मैं गुनाहों के समुन्द्र में ग़ाते लगा रहा हूं।

14- मेरे अल्लाह तू ही मेरा ख़ालिक़ और मोहसिन है और बख़शने वाला है , क्योंकि तू ही अपनी बख़शिश और रहमत से इन्सान को नवाज़ात है।

“ रसूले अकरम (स.अ.व.व. ) ने फ़रमाया कि जिन लोगों की उम्र चालीस साल हो जाए। वह उस खेती की तरह हैं जिसके काटने का मौसम क़रीब हो और पचास साला लोगों को आवाज़ आती है तुमने अपने आगे कौन से आमाल भेजे और पिछे क्या रखा और साठ साला को हुक्म होता है कि क़यामत के हिसाब के लिए बढ़ो और सत्तर साला को आवाज़ आती है कि तुम अपने आपको मुर्दो में शुमार करो। ” हदीम में आया है कि मुर्ग अपनी ज़बान में कहता है-

ऐ ग़ाफ़िलों! अल्लाह का नाम लो और उसे याद करो।

हंगामे सफ़ेद दम खुरदम सहरी

दानी चराहमी कुन्द नौहा गरी।

नमदन्द दर आइना सुबह

कज़ उमर शबी गुज़िश्त ती बेख़बरी।

तर्जुमा- “ क्या तू जानता है कि सुबह सादिक़ के वक़्त मुर्ग किस वजह से नौहगार होता है , क्योंकि उसे सुबह के आइने में नज़र आता है कि तेरी उम्र बक़द्र रात कम हो गयी है , लेकिन तू अभी बेख़बर है। ”

शेख़ जामी ने कितना अच्छा कहा है

दिलाता के दरई काख़ मिजाजी।

कनी मानिन्द तिफलां खाक़ बाज़ी।।

ऐ दिल तू कब तक इस मजाज़ी महल (दुनियाँ) के अन्दर बच्चों की तरह मिट्टी से खेलता रहेगा।

तवई अन दस्त परवर मुर्ग़ गुस्ताख़।

कि बूदत आशियाँ बैरून अज़ईन काख़।।

तू ही गुस्ताख़ परिन्दे (नफ़स) की परवरिश करने वाला हाथ हैं , हालांकि तेरा मुक़ाम (यहान नहीं बल्कि) इस महल से बाहर है (आख़िरत)।

चरा अज़ां आशयां बेगाना गश्ती।

चूदोना मुर्ग वीराना गश्ती।।

तू उस आशयाने (आख़िरत) से क्यों बेगाना हो गया और रज़ील परिन्दों की तरह इस वीरने (दुनिया) में सरगर्दा है।

बेफ़िशां बालों परज़ आमेज़िश खाक़।

बा पर ता कंगरह इवाने अफलाक़।।

अपने पर व बाल इस दुनियाँ की अलाइशों (गन्दगी) से पाक कर ताकि तू इवाने अफ़लाक़ (अर्श) के कूंगरों तक परवाज़ कर सके।

बबइं दर रख़्स अरज़क तिलस्तनान।

रिदए नूर बर आलम फ़शनाँ।

तू इस नीले आसमान को रख़्स में देखेगा औऱ इस दुनियां पर नूरानी चादर डाल देगा।

हमा दौरे जहां रोज़ी गिरफ़्ता।

बमक़सद राह फ़िरोज़ी गिरफ़्ता।।

इस दुनियां के हर दौर में लोगों को रोज़ी मिलती रही है और अपने मक़सद में कामयाबी हासिल करते रहे हैं।

खलील आसादरर दर मुल्क यक़ींज़न।

नवाए ला उहिब्बुल आफ़िलीन ज़न।।

और हजरत इब्राहिम (अ 0स 0) की तरह सल्तनते यक़ीन में यक़ीन के साथ रह औऱ उनकी तरह ला उहिब्बुल आफ़ेलीन (मैं डूबने वालों को दोस्त नहीं रखता) का नारा लगा।

क़िस्सा बलोहर व दास्ताने बादशाह

मिस्ले दोम (दो)

दुनिया और अहले दुनिया की मिसाल कि उन्होंने दुनिया के साथ दिल लगा कर किस तरह धोखा खाया है। बलोहर ने कहा है कि किसी शहर में लोगों की यह आदत थी की वह किसी ऐसे अजनबी शख़्स को जो उनेक हालात से बेख़बर होता , तलाश करके लाते और एक साल के लिए उसे बादशाह और हाकिम बना लेते। वह शख़्स जब तक उनके हालात से बेख़बर रहात और ख़्याल करता कि वह हमेशा के लिए उन पर हुकूमत करता रहेगा। जब एक साल गुज़र जाता तो अहले शहर उसे ख़ाली हाथ नंगा करके शहर बदर कर देते और वह ऐसी परेशानियों में मुबतिला हो जाता , जिनका उसके दिल में कभी ख़्याल भी न गुज़रा होता और इस मुद्दत में वह बादशाह मुसीबतों में घिरा हुआ , इन अशआर का मिसदाक़ नज़र आता-

ए करदा शराब हुब्बे दुनियां मस्तत।

होशियार नशीं कि चर्ख साज़ पस्तत।

मग़रुर जहां मशो की चूं रंगे हिना।

बेश अज़दो सह रोज़ी नबूद दर्दसता।।

तर्जुमा- “ ऐ इन्सान तुझे हुब्बे दुनियाँ की शराब ने मस्त कर रखा है अब होशियार हो जा कि आसमान अब तुझे ज़लील व रुसवा करने वाला है। ”

तू दुनियाँ की इस आरज़ी (अस्थायी) हुकूमत पर तकब्बुर (गर्व) न कर क्योंकि यह मेंहदी के रंग की तरह दो तीन दिन के बाद तेरे हाथ में न रहेगी। “

एक बार उन्होंने एक अजनबी को अपना हाकिम व बादशाह मुक़र्र किया। वह आदमी अपनी सूझ-बूझ की वजह से समझ गया कि मैं इनमें नावाकिफ़ और अजनबी हूँ इसलिए उनसे उन्स पैदा न किया। उसने एक ऐसे शख़्स को बुलाया , जो उसके शहर का रहने वाला था और इन लोगों के हालात से बाख़बर था। उसने अपने बारे में शहर वालों के रवैय्या के बारे में मालूम किया। उस आदमी ने कहा कि एक साल के बाद यह लोग तुझे फ़लां जगह पर खाली हाथ भेज देंगे। इसलिए मैं तुझे मुख़लिसाना मशविरा देता हूं कि इस दौरान तुझसे जिस क़द्र मुमकिन हो सके माल व दौलत उस जगह इकट्ठा कर ले ताकि जब एक साल के बाद तुझे वहां भेजा जाय तो उस माल व दौलत के बाअस (द्वारा) आऱाम व सुकून की ज़िन्दगी बसर कर सके। बादशाह ने उसके मशविरह के मुताबिक़ अमल किया। जब एक साल गुज़र गया और उसे शहर बदर कर दिया गया तो वह उस मुक़ाम पर पहुंच कर अपने पहले से भेजे हुए माल की बदौलत ऐश व आराम की ज़िन्दगी बसर करने लगा। हक़तआला का कुर्आन पाक में इरशाद है-

“ जो आमाले सालेह बजा लाता है , वह शख़्स अपने नफ़स के आराम व असाइश के लिए करता है। ”

हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक (अ 0स 0) फ़रमाते हैं कि आदमी के आमाले सालेह , इस अमल करने वाले से पहले जन्नत में पहुंच जाते हैं और उसके लिए मकान तैयार करते हैं। हज़रत अमीरुल मोमनीन (अ 0स 0) अपने मुख़्तसर इरशादात में फ़रमाते हैं-

“ ऐ फ़रज़न्दे आदम (अ 0स 0) तू अपने नफ़स का खुद वसी बन जा और अपने माल से ऐसा काम कर कि वह तेरे बाद भी असर करने वाला साबित हो , जबकि माल तेरे हाथ में न होगा। ”

किसी शायर ने क्या ख़ूब कहा है-

बर्ग़ ऐंशी बग़ोर ख़वीश क़ब्र सत।

किस न्यारद ज़पस तू पेश फ़रसत।।

क़ब्र में जाने से पहले जि़न्दगी के पत्ते (आमाले सालेह) वहां भेज क्योंकि तेरे चले जाने (मौत) के बाद कोई नहीं तुझे भेजेगा।

खू रुपोश व बख़शाई व रोज़ी रसां।

निगाहें मी चेदार ज़ बहरे कसां।

तुझे अपने लिए लिबास और खाने पीने का सामान और रोज़ी खुद मुहैय्या करनी चाहिए , बख़िलाफ़ इसके तू लोगों के अमवाल पर नज़र जमाए हुए है। (कि वह भेजेंगे)।

ज़र्द न्यामत अकनं बदेह कान तस्त।

कि बाद अज़ तू बैरून ज़ फ़रमान तस्त।।

तू अपना माल व दौलत इससे क़ब्ल राहे खुदा में दे जबकि यह तेरे हाथ से चला जाए। (तुझे मौत आ जाए)।

तू बाखुद बबर तू शरह ख़्वेश्तन।

कि शफ़क़त नयायद ज़ फ़रज़न्द व ज़न।।

तू अपना ख़र्च खुद अपने साथ ले जा क्योंकि बाद में कोई फ़रज़न्द या ज़ौजा खर्च नहीं देता।

गमें ख़्विशहर जि़न्दगी ख़ोर की ख़विश।

बमुर्दा न परवाज़ दाअज़ हिर्स ख़विशा।।

तुझे अपनी आख़िरत की फ़िक्र ज़िन्दगी के दौरान करनी चाहिए , क्योंकि मुर्दा आदमी कुछ नहीं कर सकता।

बग़म ख़वारगी सर अंगुश्त तू।

बख़ारद कसे दरजहां पुश्त तू।।

तेरे बाद आख़िरत मे इस दुनियाँ का कोई शख़्स उंगली के पोर के बराबर भी तेरी इमदाद न कर सकेगा।

“ रसूले पाक (स.अ.व.व. ) ने इरशाद फ़रमाया कि तुम अच्छी तरह जान लो कि हर श़ख़्श अपने भेजे हुए आमाल की तरप बढ़ने वाला है और दुनियां में छोड़े हुए पर पशेमान होने वाला है। ”

आमाली मुफ़ीद नेशापुरी और तारीख़े बग़दाद से मनक़ूल (कहा हुआ) है कि एक बार हज़रत अमीरुल मोमीन (अ 0स 0) ने हज़रत ख़िज्र (अ 0स 0) को ख़्वाब में देखा और उनसे नसीहत (उपदेश) तलब की। हज़रत ख़िज़्र (अ 0स 0) ने अपने हाथ की हथेली हज़रत अली (अ 0स 0) को दिखायी तो आपने उस पर रौशन ख़त में यह लिखा हुआ देखा-

तर्जुमा- “ तू मुर्दा था , ख़ल्लाक़े आलम ने तुझे ज़िन्दगी अता की और अन क़रीब तू फ़िर मुर्दा हो जाएगा। दुरालबक़ा (आख़िरत) के लिए घर तैयार कर और दारुलफ़ना (दुनियाँ) के घर की तामीर छोड़ दे। ”

बादशाह और वज़ीर का क़िस्सा

मिस्ले सोम (तीन)

कहते हैं कि एक अक़लमन्द साहबे फ़हमों फ़रासत और मेहरबान बादशाह था। वह हेशा रियाया की तरक़्क़ी में कोशों रहता था और उनके मामलात की तह तक पहुंच जाता और उसका वज़ीर , सच्चाई ईमानदारी से मुत्तसिफ़ रियाया की तरक़्क़ी की इस्लाह में बादशाह का बेहतरीन साथी था और वह उसका बेहतरीन विश्वास पात्र औऱ सलाहकार था। दोनों एक दूसरे से कोई राज़ छुपा कर न रखते थे। वज़ीर उल्मा व सालहीन की ख़िदमत से बहरोबर था और उनसे हक़ की बातें सुन चुका था और दिल व जान से उन पपर कुर्बान था। उसका दिल तर्के दुनियाँ की तरफ़ राग़िब था , लेक़िन बतौर तक़य्या बादशाह की ख़िदमत में हाज़िर होकर बुतों की ताज़ीम औऱ सजदा किया करता था ताकि बादशाह नाराज़ होकर उसे जानी नुक़सान न पहुंचाए। बादशाह की इंतेहाई मेहरबानी औऱ शफ़क़त के बावजूद वह उसकी गुमराही औऱ ज़लालत से अकसर ग़मगीन औऱ अफ़सुर्दा रहा करता था और वह ऐसे मौक़े की तलाश में था कि कहीं मुनासिब वक़्त में फुरसत के लम्हात मय्यसर आंए , ताकि वह बादशाह को हिदायत व नसीहत कर सके। यहां तक की एक रात जब तमाम लोग सो चुके तो बादशाह ने वज़ीर से कहा आओ सवार होकर शहर के चक्कर लगाएँ , ताकि पता चल सके कि लोग कैसी ज़िन्दगी गुज़ार रहे हैं , औऱ कंधों पर जो बोझ है , उसके आसार देख सकें। वज़ीर ने कहा बहुत अच्छा ख़्याल है।

बस दोनों सवार होकर शहर का चक्कर लगाने लगे , इस सैर के दौरान जब वह एक मज़बला के क़रीब हुआ तो बादशाह की नज़र उस रौशनी पर पडी जो मज़बला की तरफ़ से आ रही थी। बादशाह ने वज़ीर से कहा , हमें इस रौशनी का पीछा करना चाहिए ताकि इसकी पूरी कैफ़ियत मालूम कर सकें। बस वह घोंड़ो से उतर कर पैदल चलने लगे , यहां तक वह उस जगहं पर पहुंचे , जहां से रौशनी आ रही थी। जब उन्होंने उस सूराख़ से देखा तो एक बद शक्ल फ़क़ीर बोसीदा लिबास पहने मज़बला पर गंदगी का तकिया लगाए बैठा है और हाथ में तम्बूरा लिए बजा रहा है और सामने मिट्टी का शराब से पुर लोटा पड़ा है , उसके सामने बदख़िलक़त व बदशक्ल , बोसीदा लिबास पहने एक औरत ख़ड़ी है। जब वह फ़क़ीर शराब तलब करता है तो वह औरत नाचना शुरु कर देती है। जब वह शराब नोश करता तो औरत उसकी मदद सराई करती जैसा कि लोग बादशाहों की तारीफ़ करते हैं और वह भी उस औरत की मदह सराई करता और सय्यदतुन निसां के अलक़ाब से नवज़ता। वह दोनों एक दूसरे के हुस्नों जमाल की तारीफ़ करने और निहायत खुशी व सुरुर की ज़िन्दगी बसर कर रहे थे।

बादशाह और वज़ीर काफ़ी देर तक उनके पास खड़े उनका तमाशा देखते रहे और वह उनकी कसाफ़त के बावजूद लज्ज़त व खुशी पर आश्चर्य चकित रहे थे। इसके बाद वह वापस पलटे तो बादशाह ने वज़ीर से कहा , मेरे ख़्याल से हम दोनों ने इस क़द्र खुशी और लज्ज़त न उठायी होगी , जितनी यह मर्द और औरत ऐसी कसीफ़ हालत में इस रात लुत्फ़ अन्दोज़ हो रहे हैं और मेरा गुमान है कि यह रोज़ इसी तरह लुत्फ़ अन्दोज़ होते होंगे , क्योंकि वज़ीर ने बादशाह से यह हक़ीक़त आशना अल्फ़ाज़ सुने , तो मौक़ा को ग़नीमत समझ कर कहा कि ऐ बादशाह सलामत! यह हमारी दुनिया और आपकी बादशाहत और दुनियावी आराम व सुकून इन लोगों की नज़रों में जो हक़ीक़ी बादशाह को जानते हैं। उस वीरान और गंदे घर की तरह हैँ। हमारे मकान जिनको तामीर करने में हम इन्तेहाई मेहनत व काविश से काम करते हैं , उन लोगों की नज़रों में ऐसे ही हैं जैसे हमारी नज़रों में उन दो बदसूरत इन्सानों की शक्ल दिखायी दे रही है और हमारा इस फ़ानी (नश्वर) दुनीयाँ की ऐश व इशरत में मगन रहना हक़ीक़त पसन्द लोगों की नज़रों मे ऐसा ही है , जैसा कि यह दोनों खुशी के मवाक़े मयस्सर न होने की सूरत में खुशी मना रहे हैं।

बादशाह ने वज़ीर से कहा , क्या तू ऐसे लोगों को जानता है जो इन सिफ़ात (गुणों) से मुत्तसिफ़ (गुणवान) हों वज़ीर ने जवाब दिया हां। मैं उन लोगों को जानता हूँ। बादशाह नेपूछा वह कौन लोग हैं ? औऱ कहाँ हैं ? वज़ीर ने कहा वह ऐसे लोग हैं , जो अल्लाहतआला के दीन के आशिक़ औऱ ममलिकते आख़िरत औऱ उसकी लज्ज़़ात (स्वादों) से वाक़िफ़ हैं और हमेशा आख़िरत की सआदत के तालिब रहते हैं। बादशाह ने वज़ीर से पूछा आख़िरत क्या है ?

वज़ीर ने जवाब दिया वह ऐसी लज्ज़त और आराम है , जिसके बाद सख़्ती औऱ तकलीफ़ नहीं होगी। वह ऐसी दौलत है , जिसके बाद इन्सान किसी का मोहताज नहीं रहता। बस वज़ीर ने एख़तियार (संक्शेप) के साथ मुल्के आख़िरत के अवसाफ़ (गुण) ब्यान किए। यहां तक कि बादशाह ने कहा , क्या तू इस सआदत को हासिल करने और इस मंज़िल में दाख़िल होने का कोई वसीला भी जानता है वज़ीर ने कहा हां वह घर उस शख़्स के नसीब में होता है , जो उस राह की तलाश करता है।

बादशाह आख़िरत का इस क़द्र मुश्ताक़ हुआ कि वज़ीर से कहने लगा तूने इससे पहले मुझे इस घर की राह क्यों न बतलायी और उन औसाफ़ को मेरे सामने क्यों न ब्यान किया। वज़ीर ने अर्ज़ किया , मैं तेरे बादशाही रोब और दबदबे से डरता था। बादशाह ने कहा जो अवसाफ़ तूने मेरे सामने ब्यान किए हैं , यह क़ाबिले सजा़ न थे और न ही बरबाद करने के क़ाबिल थे , बल्कि उनकी तहसील के लिए कोशिश करनी चाहिए ताकि हम उन अवसाफ़ से मुत्तासिफ हो सकें और कामयाबी और कामरानी हो सके। वज़ीर ने कहा बादशाह सलामत! अगर आप इजाज़त दें तो मैं और आख़िरत के अवसाफ़ ब्यान करुं ताकि उसके बारे में आपका यक़ीन और पुख्ता हो जाए।

बादशाह ने कहा बल्कि मैं तुम्हें हुकम देता हूं कि आप सुबह व शाम इसी काम में लगे रहें ताकि मैं दूसरे काम में मशगूल न हो जाऊँ। इस क़िस्म की बातों को हाथ से न जाने देना चाहिए। क्योंकि यह बहुत अजीबो ग़रीब काम है और उसे आसान न समझ़ना चाहिए और ऐसे अच्छे फ़रीज़े से ग़ाफ़िल न रहना चाहिए। इसके बाद वज़ीर ने इसी क़िस्म की बातों से बादशाह को नेकी की तब्लीग़ (शिक्शा) की और सआदतों अब्दी पर फ़ायज़ कर दिया।

मैं बतौर तबर्रुक और मोमनीन की बसीरत में इज़ाफ़े के लिए यहां पर हज़रत अली (अ 0स 0) के खुतबे के चन्द कलमात का ज़िक्र मुनासिब समझता हूँ-

“ ऐ लोगों! इस फ़रेबकार दुनिया से बचों , क्योंकि इसने अपने आप को सिर्फ़ ज़ेबो ज़ीनत के ज़रिए दिलों को धोखा देकर बातिल की तरफ़ मायल कर रखा है और झूठे वादों के ज़रिए तुम्हारी उम्मीदों को छीन रखा है। यह दुनिया एक ऐसी बनाव सिंगार वाली औरत है , जिसने सिर्फ़ अपनी शादी रचाने के लिए ज़ाहरी ज़ीनत से धोखा दे रखा है जो अपने हुस्न व ज़माल के जलवे का परतव दिखाकर तमाम लोगों को अपना गिरवीदा और आशिक़ बनाने और फ़िर अपने ही हाथ से पनपने वाले शौहरों को तहस-नहस कर डाले। बस न तो बाक़ी आशख़ास गुज़िश्ता से इबरत हासिल करते हैं और न ही आख़िरी लोग उसके मोत्तक़दीन (मानने वाले) पर बुरे असरात की वजह से अपने आपको उसके असर से बचाते हैं। ”

हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0स 0) से मनकूल है आपने फ़रमाया , कि दुनिया हज़रत ईसा (अ 0स 0) के पास नीली आंखो वाली औरत की शक्ल में आयी। हज़रत ने उससे पूछा कि तूने कितने शौहर किए है ? उसने जवाब दिया बेशुमार हैं। आपने पूछा क्या सबसे तलाक़ ली ? उसने कहा बल्कि सबको मार डाला। हज़रत ईसा ने फ़रमाया। अफ़सोस है उन लोगों पर जो आइन्दा उससे अक़्द करेंगे कि वह उसके पहले शौहरों से इबरत हासिल नहीं करते।

हज़रत ने दुनियाँ की पस्ती और कमीनगी को ब्यान करते हुऐ फ़रमाया , कि अल्लाहतआला ने इसी वजह से अपने औलिया और दोस्तो से उसको अपने दुश्मनों के लिए छोड़ दिया। इसीलिए हज़रत मोहम्मद (स.अ.व.व. ) को भूख और प्यास की ज़्यादती की वजह से पेट पर पत्थर बांधे देख कर पसन्द फ़रमाया। मूसा कलीमउल्लाह ने भूख की वजह से घास खाकर गुज़ारा किया। यहां तक की घास की सब्ज़ी आप के पेट से नज़र आती थी , क्योंकि आपका गोश्त झड़ गया था और जिस्म की जिल्द पतली हो गयी थी। आप नबियों और वलियों का तज़कीरा करते हुए फ़रमाते हैं कि अम्बिया तो इस दुनियाँ को बमंज़िला मुरदार समझते थे , जिसका खाना हलाल नहीं कि वह सेर होकर खाते , मगर ज़रुरत के वक़्त खाते कि सांस आती रहे और रुह परवाज़ न करे (कु्व्वतुन ला यमूतू) , यह अम्बिया की नज़रों में ऐसा मुरदार है , जिसके पास से गुजरने वाला इन्सान उसकी बदबू से बचने के लिए अपने मुहँ और नाक को ढांप लेता है ताकि बदबू से महफूज़ रहे। इसी वजह से वह दुनियाँ इस क़द्र हासिल करते थे कि वह अपनी असल मंज़िल तक पहुंच सकें और अपने आपको सेर नहीं करते थे और अम्बिया उन लोगों पर ताअज्जुब करते हैं , जो कि दुनियाँ को इकट्ठा करके अपनी शिकमों को पुर करते हैं और अपने इस फ़ेल (कार्य) पर राज़ी हैं कि वह दुनियाँ की न्यामत से बहरावर हैं।

ऐ मेरे भाइयों! खुदा की क़सम यह दुनियां किसी की ख़ैरख़्वाह नहीं है , बल्कि यह तो मुरदार से भी ज़्यादा गंदी और मकरुह है , लेकिन जो चमड़ा रंगने का काम करता है , उसे चमड़े की बदबू तकलीफ़देह नहीं मालूम होती , क्योंकी वह उससे मानूस हो जाता है। मगर वहां से गुज़रने वाला सख़्त तकलीफ़ उठाता है औऱ आं हज़रत (स.अ.व.व. ) ने फ़रमायाः

“ ऐ इन्सान! तू अहले दुनिया को दुनिया की तरफ़ लपकते देख कर इस दुनियाँ की तरफ़ रग़बत न कर क्योंकि वह इसकी ख़ातिर एक दूसरे से झगड़ते रहते हैं। वह तो भौंकते हुए कुत्ते हैं और अपने शिकार की तरफ़ आवाज़ें देते हुए भागने वाले दरिन्दे हैं , जो एक दूसरे को खा रहे हैं। ग़ालिब अपने मग़लूब को और बड़ा छोटे को लुक़मए नजल बना रहा है। ” हकीम सनाई ने ख़ूब इस मतलब को नज़्म किया है-

ई जहां बर मिसाल मुरदार यस्त।

कर गसान गर्द और हज़ार-हज़ार।।

यह दुनियाँ एक मुरदार की मिसाल है कि जिसके इर्द-गिर्द हज़ारों गिदहें खाने के लिए आ बैठीं हैं।

ई मराँ राहमी ज़न्द मुख़लिब।

आँमराँ ई हमीं ज़ल्द मिन्क़ार।।

इनमें से एक दूसरी को पंज़ा मार रही हैं , दूसरे उसे चोंच मार रही है।

आख़िरा लामर बगजर न्द हमा।

वज़ हमा बाज़ माँद ई मुरदार।।

आख़िरकार तमाम गिदहें मुरदार को छोड़कर चली जाती हैं और वह मुरदार वहीं पड़ा रहता है।

ऐ सनायी अज़ई सगां बरज़मीं।

गोशा-ए-गीर अज़ाई जहां हमवार।।

ऐ सनाई इस जहां (आख़िरत) को संवारने के लिए इश ज़मीन के कु्त्तों से अलगवा एख्तियार कर।

हां वहां ता तराचा खुद बाकुनन्द।

मुश्ती इब्लीस दिद्ह तर्रार।।

ख़बरदार! यह मुरदार खाने वाले तुझे दुनियाँ के लालच में ख़त्म कर डालेंगे , क्योंकि इब्लीस ने इनकी आँखों में धूल झोंक रखी है।

“ हज़रत अली (अ 0स 0) फ़रमाते हैं , खुदा की क़सम मेरी आंखों में यह दुनियाँ ख़िनज़ीर की बग़ैर की हड्डियों से जो कि मजज़ूम के हाथ में हो ज़्यादा ज़लालतर हैं। ”

यह दुनियाँ की सबसे ज़्यादा तहक़ीर है , क्योंकि हड्डियाँ बदतरीन चीज़ हैं और फ़िर ख़िनजीर की हड्डियाँ इस पर तुर्रा यह कि वह मज़जूम के हाथ में हैं। उनमे से हर एक दूसरे से ज़्यादा बदतरीन औऱ नजिस तरीन है।


हिकायते आबिद और सग (कुत्ता)

मिस्ले चहारुम (चार)

“ यह ऐसे शख़्स की मिसाल है जो कि न्यामते ख़ुदावन्दी से सरफ़राज़ ज़िनद्गी के दिन गुज़ार रहा था , लेकिन जैसे ही इम्तेहान और इब्तिला का वक़्त आया कुफ़राने नयामत का मुतर्किब हुआ और मनअमें हक़ीक़ी के दरवाज़े को छोड़ कर गैरुल्लाह की तरफ़ रुख़ किया और ऐसे फ़ेल (कार्य) का इरतेकाब किया जो उसके लिए मुनासिब न था। इस मसल को शेख़ बहाई ने अपनी किताब कशकोल में नज़्म किया है , जिसको हम यहां नक़्ल करते हैं। तवालत के डर से महज़ तर्जुमा पर इक़्तिफ़ा किया है। शायक़ीन हज़रात असल (मूल) किताब की तरफ़ रुजूअ करें। ”

एक आबिद कोहे (पहाड़) लिबनान के एक ग़ार में असहाबे कहफ़ की तरह रहा करता था , उसने अल्लाहतआला के सिवा हर चीज़ से दूरी एख़्तियार कर रखी थी , और वह तन्हाई को अपनी इज़्ज़त का ख़ज़ाना समझता था। सारा दिन रोज़े के साथ गुज़ार देता और शाम के वक़्त उसे एक रोटी मिल जाती थी , जिसमें से आधी रात और आधी सहरी के वक़्त खा लेता था और इस क़नाअत की वजह से उसका दिल बहुत खुश था। इसी तरह वह ज़िन्दगी के दिन गुज़ार रहा था। वह किसी हाल में भी पहाड़ से जंगल की तरफ़ जाने को तैयार न था। अचानक एक रात उसको रोटी न पहुंची तो वह आबिद भूख की वजह से कमज़ोर व लाग़र हो गया , उसने बमुश्किल मग़रिब और इशा की नमाज़ पढ़ी , क्योंकि उसका दिल फ़िक्रे ग़िज़ा की वजह से शक व शुबहा में मुब्तिला था। खाने की नामौजूदगी की वजह से बेताबी ने न इबादत करने दी और न सोने दिया , जब सुबह हुई तो वह आबिद इस दिल पज़ीर मुक़ाम को छोड़ कर खाने की तलाश में पहाड़ से उतरकर एक क़रीबी देहात में आया , जहां के लोग आतिश परस्त (अग्नि पूजक) और दग़ाबाज़ थे। आबिद ने एक आतिश परस्त के दरवाज़े पर दस्तक दी और उसने उसे दो जौ की रोटीया दी। उसने वह रोटियां ले लीं और बड़ी खुशी से उस आतिश परस्त के दरवाज़े पर दस्तक दी और उसने उसे दो जौ की रोटियां दीं। उसने वह रोटीयां ले लीं और बड़ी खुशी से उस आतिश परस्त का शुक्रिया अदा किया और अपने दिल पज़ीर मुक़ाम की तरफ़ जाने का इरादा किया ताकि वहां जाकर इन रोटियों से रोज़ा इफ़्तार करे। आतिश परस्त की सराय में एक पालतू कुत्ताथा , जिसकी भूख की वजह से सिर्फ़ हड्डियां और रगें बाक़ी नज़र आ रही थीं। वह कुत्ता इस क़द्र भूखा था कि अगर कोई मुसव्विर (चित्रकार) रोटी की तस्वीर ही उसके सामने बना देता तो वह खुशी से फूला न समाता और अगर ज़बान पर रोटी का नाम आ जाता तो वह उसके ख़्याल में बेहोश हो जाता। वही कुत्ता उस आबिद के पीछे दौड़ने लगा और क़रीब आकर पीछे से उस आबिद का दामन पकड़ लिया। उस आबिद ने उनमें से एक रोटी कुत्ते के सामने फ़ेंक दी और चलता बना , ताकि वह उसे काट न ले , लेकिन कुत्ता वह रोटी खाकर फ़िर आबिद के पीछे हो लिया ताकि फ़िर उसको तकलीफ़ पहुंचाए। आबिद ने खौफ़ के मारे दूसरी रोटी भी कुत्ते के आगे फेंक़ दी , ताके कुत्ते के काटने से महफूज़ रहे , कुत्ता वह दूसरी रोटी भी खा़कर फ़िर उस आदमी के पिछे चल दिया और वह उसके साए में पीछे चल रहा था और भौंक कर उसके दामन को फ़ाडने और काटने की कोशिश कर रहा था। जब आबिद ने कुत्ते की यह हालत देखी , तो उसकी तरफ़ मुख़ातिब होकर कहा कि मैंने तुझ जैसा बेयहा कुत्ता कभी नहीं देखा। ऐ कुत्ते! तेरे मालिक ने मुझे सिर्फ़ दो रोटियाँ दीं थी और वह भी तुझ बदफ़ितरत ने छीन लीं। तेरा दुबारा मेरे पीछे दौड़कर मेरा लिबास (कपड़े) फाड़ने का क्या मक़सद है ? उस कुत्ते ने गोया होकर कहा , ऐ साहबे कमाल! मैं बेहया नहीं बल्कि तू अपनी आंखें को संभाल।

मैं बचपन से इस आतिश परस्त के वीराने में मुक़ीम हूँ और उसकी भेड़ों को चराता औऱ उनकी रखवाली करता हूँ और यह कभी मुझे रोटी देता और कभी हड्डियों की मुश्त मेरे सामने डाल देता है और कभी मुझे रोटी देना भूल जाता है और भूख की वजह से मेरा का तमाम होने लगता है ऐसा भी होता है कि कई दिन तक मुझ कमज़ोर को रोटी और हड्डियों का निशान तक नज़र नहीं आता और मैं भूखा रहता हूँ और कभी इस बूढ़े आतिश परस्त के पास न अपने लिए रोटी होती है और न मेरे लिए। चूंकि मैंने इस दरवाज़े पर परवरिश पायी है। इसलिए मैं रोटी की ख़ातिर किसी और के दरवाज़े पर नहीं जाता। मैं उस बूढ़े आतिश परस्त के दरवाज़े पर कभी उसकी न्यामतों का शुक्रिया अदा करता हूँ और कभी रोटी न मिलने पर सब्र करता हूँ। बस यह मेरा काम है और तुझे जब सिर्फ़ एक रोटी न मिली तो तेरे सब्र की बुनियादें चकनाचूर हो गयीं और तू राज़िक़े मुतलक़ के दरवाज़ से मुंह फ़ेर कर एक आतिश परस्त के दरवाज़े पर आ खड़ा हुआ। तूने सिर्फ़ एख रोटी की ख़ातिर अपने दोस्त (खुदा) को छोड़ दिया औऱ उसके दुश्मन के साथ (रोटी के लिए) दोस्ती क़ायम कर ली। ऐ मर्दे दाना! अब तू खुद इन्साफ़ कर कि तू ज़्यादा बेहया है या मैं। आबिद ने कुत्ते की यह बातें सुनकर अपने आप पर अफ़सोस करते हुए अपना हाथ सिर पर मारा और बेहोश हो गया। (शेख़ बहाई (र 0) अपने आपको ख़िताब करते हुए कहते हैं) ऐ कुत्ते के नफ़्स वाले बहाई! तू क़नाअत और सब्र इस बूढ़े आतिश परस्त के कुत्ते से सीख। अगर तेरे लिए सब्र के दरवाज़े बन्द हैं (तू साबिर नहीं) तू तो उस आतिश परस्त के कुत्ते से ज़्यादा बदतर है।

कितना अच्छा होगा अगर यहां पर शेख़ सादी (र 0) का कलाम नक़्ल कर दिया जाए कि इन्सान अश्रफुल मख़ूलका़त है और कुत्ता ज़लील-तरीन मौजूदात में से है औऱ तमाम अक़्लमन्द लोग , इस पर मुत्तफ़िक़ हैं कि हक़ शिनास कुत्ता ना शुकरे इन्सान से बेहतर हैं , क्योंकि कुत्ता एक लुक़में को भी कभी नीहं भूलता अगरचे उसको सौ बार भी क्यों न पत्थर मारे जाएं। इसके मुक़ाबिले में अगर किसी कमीने शख़्स को सारी उम्र भी नवाज़ते रहो , लेकिन वक़्त आने पर मामूली सी बात पर भी जंग पर उतर आएगा।

इस जगह पर दिलों को रौशन और आंखों को मुनव्वर वाली बात का तज़किरा कितना मुनासिब है।

हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0स 0) और गुलाम

मर्वी है कि हज़रत जाफ़रे सादिक़ (अ 0स 0) का एक गुलाम था , जब आप मसजिद की तरफ़ खच्चर पर सवार होकर जाते तो वह आफके हमराह होता और जब आप (अ 0स 0) ख़च्चर से उतर कर पैदल मस्जिद की तरफ जाते तो वह गुलाम खच्चर की निगहबानी करता। एख दिन वह गुलाम मस्जिद के दरवाज़े पर खच्चर को पकड़े बैठा था। अचानक अहले ख़ुरासान से कुछ मुसाफ़िर आए उनमें से एक शख़्स ने इस गुलाम से कहा , ऐ गुलाम! क्या तू अपने आक़ा इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0स 0) से अपनी जगह मुझे गुलाम रखवाने की गुज़ारिश करेगा। उसके बदले में मैं अपना तमाम माल व दौलत तुझे दे दूंगा। गुलाम ने कहा हां। मैं ज़रुर अपने आक़ा से इस मक़सद के लिए इजाज़त तलब करुंगा। बह वह गुलाम हज़रत की ख़िदमत में गया और अर्ज़ करने लगा। ऐ आक़ा! मैं आप पर कुर्बान जाऊँ। आप मेरी तवील ख़िदमत से बख़ूबी वाक़िफ़ हैं क्या जब भी अल्लाहतआला मुझे माल मुहैय्या करे तो आप मुझे उससे मना फ़रमाएंगे। हज़रत ने फ़रमाया , मैं वह माल तुझको अपने पास से दूंगा , लेकिन किसी और के हाथ से लेने से रोकूंगा। बस इस गुलाम ने उस ख़ुरासानी का क़िस्सा ब्यान किया तो हज़रत (अ 0स 0) ने फ़रमाया , अगर तू हमारी ख़िदमत करना ना पसन्द करता है और वह हमारी ख़िदमत को पसन्द करता है तो हमने उस आदमी को कुबूल किया और तुझे इजाज़त है।

जब वह गुलाम पुश्त फ़ेर कर जाने लगा तो आपने उसे दोबारा तलब फ़रमाया , और इरशाद फ़रमाया , तेरी इस ख़िदमत के बदले में मैं तुझे एक नसीहत करता हूं जो तुझे नफ़ा देगी और वह यह है कि जब क़यामत का दिन आएगा तो उस रोज़ हज़रत मोहम्मद (स.अ.व.व. ) अल्लाहतआला के नूर से वाबस्ता होंगे और हज़रत अली (अ 0स 0) रसूले अकरम (स.अ.व.व. ) के साथ मुसलिक होंगे , और बाक़ी आइमए अतहार (अ 0स 0) हज़रत अली (अ 0स 0) के साथ वाबस्ता होंगे और हमारे शिया हमारे दामनों से वाबस्ता होंगे , जिस जगह हम होंगे , हमारे शिया हमारे साथ होंगे। गुलाम ने जब यह अलफ़ाज़ सुने तो उसने कहा , या हज़रत मैं आपकी ख़िदमत छोड़कर कभी नहीं जाऊँगा , और आख़िरत को इस दुनियाँ पर तरजीह देता हूँ।

जब वह गुलाम उस खुरासनी के पास पहुंचा तो उस खुरासनी ने कहा , ऐ गुलाम , क्या वजह है जिस खुशी से तू हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0स 0) की ख़िदमत में गया था , उस तरह वापस नहीं हुआ। गुलाम ने इमाम (अ 0स 0) का तमाम कलाम उस खुरासनी से ब्यान किया और उस आदमी को लेकर इमाम (अ 0स 0) की ख़िदमत में पहुंचा। हज़रत ने इस खुरासनी की मुहब्बत और दोस्ती को कुबूल फ़रमाया और उसे उस गुलाम को एक हज़ार अशर्फी देने का हुक़्म दिया।

यह फ़क़ीर (लेख़क) भी अपने आक़ा इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0स 0) की ख़िदमत में अर्ज़ करता है , ऐ आक़ा! जब से मैंने अपने नफ़्स (आत्मा) को पहचाना है उस वक़्त से मैं आपके दरवाज़े पर खड़ा हूँ और मेरा यह गोश्त व पोस्त भी आपकी न्यामतों का परवरदा है और मुझे उम्मीद है कि आप भी मेरी इस आख़िरी उम्र में मेरी निगेहदाश्त फ़रमाएंगे और मुझे अपने घर से दूर न फ़रमाएंगे और मैं अपनी ज़लील व मोहताज ज़बान से यही अर्ज करता रहूंगा-

मैं आप की पनाह से कैसे इनहराफ़ करूं , जबकि यह सब बुजुर्गी मुझे आपकी मुहब्बत के सिले (बदले) में मिली है-

ऐ मेरे आक़ा! मुझे वह दिन देखना नसीब न हो जब मैं आपके दरवाज़े को छोड़कर किसी और दरवाज़े पर ख़डा हूं। (अल्लाह करे इससे पहले मुझे मौत आ जाए)

इल्म , अमल के साथ (ग्यान कार्य के साथ) और जेहल व पस्ती (अग्यान्ता एंव गिरावट मिस्ल पंचुम (पांच)

अबुल क़ासिम राग़िब असफ़हानी अपनी किताब “ ज़रिया ” में तहरीर फ़रमाते हैं कि एक दाना आदमी एक ऐसे शख़्स के पास से गुज़रा जो अपने घर के दरवाज़े पर बैठा हुआ था , जिसके घर का अन्दरूनी हिस्सा बड़ा सजा हुआ था। फ़र्श पर शाही कालीनें बिछी हुईं थीं , लेकिन मालिक खुद जाहिल व नादान था और ज़ेवरे इल्म से मुज़य्यन था और बसूरत इन्सान फ़ज़ायल से बहरावर न था।

हकीम ने जब इस ज़ाहरी ठाठ-बाठ को देखा तो इस मर्द पर नफ़रीन की और उसके चेहरे पर थूक दिया। वह शख़्स हकीम के इस फ़ेल (कार्य) पर बड़ा झुंझलाया और कहा तूने यह किस क़द्र कमीनगी और बेवकूफी की है। दाना ने कहा यह बेवकूफ़ी नहीं बल्की दानाई है , क्योंकि थूक हमेशा इंतेहाई पस्त (गिरा) मुक़ाम पर फ़ेंका जाता है और मैं तेरे इम मकान के अन्दर तेरे चेहरे से ज़्यादा बदतर और पस्त कोई जगह नहीं देखी और तुझे इस थूक के लिए मुनासिब समझा इसलिए मैंने तेरे मुंह पर थूक दिया।

उस दाना ने इस नौजवान को दनायत व जेहल जैसी बुराईयों से दस्तबरदार होने के लिए तम्बीह की कि घर की सजावट और ज़ेबो ज़ीनत निजात का सबब नहीं (जबकि क़ल्ब व दिमाग़ इल्म व अमल के जे़वरात से आरास्त न हों) और यह बात भी छुपी न रहनी चाहिए कि इल्म हमेशा अमल के साथ मुफ़ीद है और व अमल का आलिम होना उसे कुछ फ़ायदा नहीं देता।

कहने वाले ने क्या ख़ूब कहा है-

नीस्त अज़ बहर आस्मां अज़ल।

नर्दबान पाया व ज़ा इल्म व अमल।।

आसमान पर चढ़ने के लिए अगर कोई सीढ़ी नहीं है तो तेरे लिए इल्म व अमल बेहतरीन सीढ़ी है।

इल्म सूई दर इला बुरद।

न सूई मुल्क व मालो जाह।।

इल्म ही तुझे बारगाहे एज़दी तक ले जा सकता है न कि माल व जाह।

हर कि रा इल्म नींगरा हस्त।

दस्त ओ ज़ानसरी कोताह अस्त।।

बेइल्म गुमराह है और बेवकूफ़ का हाथ उस दरवाज़े पर पहुंचने से कोताह है।

कार बे इल्म तुख़्म दर शुरह अस्त।

इल्म बेकार जि़न्दह दरगोर अस्त।।

अमल इल्म बग़ैर के शोरदार (ऊसर) ज़मीन में बीज बोने के मिस्ल है और बग़ैर अमल के इल्म ज़िन्दा दरगोर होने के बराबर है।

हुज्जत इज़ देस्त दर गर्दन।

ख़्वान्दन इल्म वकार न करदन।।

आलिम बिला अमल का इल्म इस आलिम कि गर्दन में हुज्जते खुदा का तौक़ है।

ता तू दर इल्म बा अमल नरसी।

अमालमी फ़ाज़िल वली न किसी।।

जब तू इल्म के मुताबिक़ अमल न करेगा तो तू कभी आलिम फ़ाज़िल या वली नहीं बन सकता।

इल्म दर मज़बला फरज़ नायद।

कि क़दम बाहदस नमी पायद।।

इल्म गन्दगी में नशो नुमां नहीं पा सकता जैसै कि तू गंदी जगह चलना पसन्द नहीं करता , बद फ़ितरत इल्म हासिल नहीं कर सकता बल्कि वह इल्म की वजह से बुराई करेगा।

चन्द अज़ई तिरहात मोहताए।

चश्म हाय दरदो लाफ कजा ले।।

ऐ इन्सान तू कब तक हीला बाज़ी और लाफ़ गज़ाफ़ में लगा रहेगा।

दानिश आं खूबतर ज़बहर बसिह।

कि बदानी कि मी नादानी हेच।।

इल्म अक़्ल के साथ व दानिश हर उस तस्बीह से बेहतर है जो खुदनुमायी और बड़ाई को ज़ाहिर करे-

“ हज़रत ईसा (अ 0स 0) ने फ़रमाया , लोगों में बदतरीन वह शख़्स है , जो इल्म के लिहाज से तो मशहूर हो , लेकिन अमल के लिहाज़ से मजहूल हो। ” हकीम सनाई फ़रमाते हैं-

ऐ हवा हाई तू खुदा इंगेज़।

दे खुदायान तो खुदा अज़ार।।

खुदा तेरी ख़्वाहिशात पर मुवाख़्ज़ह करे और तेरी हवस के बुतों को खुदा तबाह करे।

रह रहा गुर्द ई अज़ आनी ग़म।

ग़ज्ज़ा न दानिस्तांई आराफ़ी ख़्वार।।

क्योंकि तूने हवस परस्ती की बदौलत अस्ल रास्ता गुम कर दिया है और तूने आख़िरत संवारी नहीं बल्कि ख़राब कर ली।

इल्म कज़ तू तराना बस्तान्द।

जेहल अज़ आं इल्म बा बूद सद बार।।

ऐ इन्सान तेरे लिए सिर्फ़ वही इल्म बेहतर है जो तेरी (तू) यानी खुदनुमाई को ख़्तम कर दे , अगर वह (तू) जुदा न कर सके तो ऐसे इल्म से जेहालत व दरजहा बेहतर है।

ग़ोल बाशद न आलम आं कि आज़द।

बशनबी गुफ़त व शनवी किरदार।

जो शख़्स पन्दो नसाए की बातें ज़्यादा करे , लेकिन किरदार न रखता हो , वह आलिम नहीं बल्कि शैतान है।

आलमत ग़ाफलस्त व तू ग़ाफिल।

ख़फ़ता रा ख़फ़ता के कुनद बेदार।।

क्योंकि आलिम और ग़ाफ़िल दोनों जाहिल हैं और सोया हुआ शख़्स सोए हुए को बेदार नही कर सकता।

के दर आयद फ़रिश्ता नकनी।

सगेरूर दूर व सूरत अज़ दीवार।।

ऐ इन्सान तू उस वक़्त तक फ़रिश्ता सीरत नहीं बन सकता जब तक ख़्वाहिशात के कुत्ते बिल्कुल ख़त्म न करे।

वह वूदान न दिल की अन्दरवी।

कि दो जुज़ बाशद ज़िया व अक़ार।।

ऐसा आदमी दिल नहीं रखता बल्कि उसके अन्दर गन्दे पानी की नदी है , जिसमें कछुवे और झींगर परवरिश पाते हैं।

सायक़ व क़ासिद वा सरातउल्ल।

बजे़ कुर्आ बदां बज़े अख़्यारा।।

ऐ इन्सान कलाम अल्लाह और सीरत (मोहम्मद व आले मोहम्मद) के अलावा तुझको सच्चा रहबर व क़ायद कोई नहीं मिलेगा जो तुझे सिराते मुस्तक़ीम पर गामज़न कर दे।

इख़तेतामियाँ (समाप्ति)

इस किताब की तकमील सिब्ते जलील हज़रत ख़ैरुल वरा (स 0अ 0) हज़रत इमाम हसन मुजतबा (अ)स 0) की विलादत ब सआदत के रोज़ 15 रमज़ानुल मुबारक 1347 हि 0 को हुई। चूंकि इस किताब की तकमील एक मुबारक महीने में हुई , इसलिए ज़्यादा मुनासिब होगा कि इसका ख़ातमा भी अच्छी दुआ पर किया जाए।

अव्वल (पहला)- शेख़ मुफ़ीद अपनी किताब “ मक़अना ” के जलीलल क़द्र सक़हा अली बिने मेहरयार की ज़बानी इमाम अबु जाफ़र जवाद (अ 0स 0) से रवायत (कथन) करते हैं कि इस मुबारक महीने के शुरु से आख़िर तक दिन या रात में इस दुआ का ज़्यादा पढ़ना मुस्तहब है-

“ या ज़ल्लज़ी काना क़ब्ल कुल्ला शयइन सुम्मा ख़लका कुल्ला शयइन सुम्मा यबक़ा वयग़ना कुल्ला शयइन य ज़ल्लज़ी कमिसलिही शयइन वया ज़ल्लज़ी लयसा फ़िस्समावातिलउुला वला फ़िल अरज़ीनस्सुफ़ला वला फ़ौक़ाहुन्ना वला तहतहुन्ना वला बयनहुन्ना इलाहुईं योअवदो ग़ैरोहू लकल हम्दो हम्दन लायक़वा अला एहसायही इल्ला अन्ता फ़सल्ले अला मुहम्मदिव वआलि मुहम्मदिन सलावातन ला यक़वा अला अहसाइहा इल्ला अन्ता ”

दोम (दो)- शेख़ कुलैनी (र 0) और दूसरे ओल्मा रवायत (कथन) करते हैं कि हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0स 0) ने यह दुआ ज़रारह को ज़मानए ग़ैबत इमामल अस्र (अ 0स 0) में अपने शियों के इम्तिहान और इब्तिला से हिफ़ाज़त के बारे में तालीम फ़रमायी थी-

सोम (तीन)- उल्माए कराम तहरीर फ़रमाते हैं , कि इमाम अल अस्र (अ 0स 0) की ग़ैबत के ज़माने में तकालीफ़ से महफूज़ रहने के लिए दुआए इमामल अस्र “ अज्जल्लाहो फरजा ” पढ़ना और आप के वजूदे मुक़द्दस के नाम का सदक़ा देना निहायत मुफ़ीद है और तमाम वारिद शुदा दुआओ में एक यह भी है कि तमजीद हक़तआला और मोहम्मद व आले मोहम्मद (स.अ.व.व. ) पर दुरुद पढ़ने के बाद यह दुआ पढ़ना चाहिए।

“ अल्लाहुम्मा कुल ले वलीयकल हुज्जतिब निल हसनि सलवातुका अलैहि वअला आबाइहि फ़ी हज़िहिस्साअति वफ़ी कुल्ली साअतिवं वलीयव वहाफ़िज़व वक़ायदव वनासिरंव वदलीलव व अएनन हत्ता तुस्कीनहु अरज़का तवअवं तुमत्तीअहू फीहा तवील ”

बरोज़े जुमा और शबे जुमा एस दुरूद शरीफ़ को पढ़ना बेहद सवाब है।

“ अल्लाहुम्मा सल्लेअला मोहम्मदिन वआले मोहम्मद कअफ़ज़ले मासल्लयता वबारकता वतरहमता अलाईबराहिमा वआले इब्राहिमा इन्नका हमीदुन मजीद , वलानतुल्लाहि अला अदाए आलि मुहम्मदिन मिनल अव्वलीन वलआख़िरीन अलफ़ामर्रत ”

“ ख़ुदा के नाम से (शुरू करता हूं) जो बड़ा मेहरबान , निहायत रहम वाला है अस्र की क़सम , बेशक इन्सान घाटे में है , सिवाय उनके जो लोग ईमान लाए औऱ अच्छा काम करते और आपस में हक़ का हुक्म और सब्र की वसीयत करते रहे।

[[अलहम्दो लिल्लाह किताब (मनाज़िले आख़ेरत) पूरी टाईप हो गई खुदा वंदे आलम से दुआगौ हुं कि हमारे इस अमल को कुबुल फरमाऐ और इमाम हुसैन (अ.) फाउनडेशन को तरक्की इनायत फरमाए कि जिन्होने इस किताब को अपनी साइट (अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क) के लिऐ टाइप कराया। 11.6.2018

मनाज़िले आख़ेरत

मनाज़िले आख़ेरत

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कैटिगिरी: क़यामत
पन्ने: 16