तारीखे इस्लाम-2 बुक पार्ट 2

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लेखक: जनाब फरोग़ काज़मी साहब
इतिहासिक कथाऐ

तारीखे इस्लाम भाग-2

(हालाते रसूले खुदा)

लेखकः फरोग़ काज़मी

अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क


(ये किताब शहीदे राबे ग्रुप मेरठ ने अपनी साइट शहीदे-राबे-डाट.काम shaheederabe.com के लिऐ टाइप कराई है)


अरब और उसके क़बीले

मोअर्रेख़ीन की इस्तेलाह में अरबों का शुमार (सामी अक़वाम) यानी साम बिन नूह की औलादों में किया जाता है जो बाबीलोन अशवरियों इबरानियों आरमियों और हबशियों पर मुशतमिल हैं।

दरअसल यह तमाम क़ौमे एक ही दरख़्त की शाखें हैं , इसकी जड़ें कहीं थी इस बारे में इख़तेलाफ हैं , बाज़ लोग बताते हैं , बाज़ जज़ीरए अरब को तरजीह देते हैं और बाज़ हबशा क़रार देते हैं। इस इख़तेलाफ़ की नौयियत कुछ भी हो मगर यह अमर तसलीम शुद्धा है कि ज़मानये क़दीम में यह तमाम क़ौमे मुनतशिर हो गयी थी , बाबिलों ने अशवरियों के साथ मिल कर इराक़ में सुकूनत एख़तियार की , फ़ीनक़ियों ने शाम का साहिली इलाक़ा आबाद किया , इबरानियों ने फिलिस्तीन और हबशियों ने हब्शा को अपना वतन करार दिया।

अरब जुग़राफियाई हैसियत से एक जज़ीरा नुमा है जो बर्रे आज़म एशिया के जूनूब व मग़रिब में वाक़े है। शुमाल में इस की सरहदें शाम की जुनूब में भी बहरे हिन्द ने उसे घेर रखा है , मग़रिब में बहरे अहमर है और शाम तक फैला हुआ है , दो हिस्सों में तक़सीम करता है यानि मग़रिबी और मशरिक़ी हिस्सा। मग़रिबी हिस्सा नशेबी इलाक़ा है और इसी लिए यह इलाका ग़ौर (नशेब) या गर्मी ज़ायदा होने की वजह से (तहामा) कहलाता है। मशिरीक़ी हिस्सा कुछ उभरता हुआ इराक़ और समावा तक फैल गया है , मुरतफा होने की वजह से इस इलाके को नजद कहा जाता है और उन दोनों हिस्सों के दरमियान जो इलाका है वह हिजाज कहलाता है इसलिए कि यह दोनों हिस्सो के माबैन हदे फ़ासिल है। वह हिस्सा जो नजद को लेता हुआ यमामा , बहरैन और अमान को भी असने साथ शामिल करता है (अरुज़) कहालाता है इसलिए कि यह यमन और नजद के दरमियान अरज़न फैला हुआ है। हिजाज़ से जुनूबी सिमत में जो मैदानी इलाक़ा है वह यमन कहलाता है इसलिए कि यह खान-ए-काबा से दाहिनी जानिब सर सबज़ो शादाब और बाबरकत है।

इन माज़कूरा इलाक़ों में अदनान , क़हतान का ख़ानदान आबाद है। क़हतानियों ने यमन में रहना शुरू किया जहाँ उनकी शानदार आबादी के साथ उनका रौशन मुस्तक़बिल और तमद्दुन ज़हूर पज़ीर हुआ लेकिन जब आबो हवा रास न आयी तो वह दूसरे इलाकों की तरफ़ मुन्तक़िल हो गये चुनाचे सालेबा बिन अम्र हिजाज़ के इलाक़ों में निकल गये जहाँ उनकी वजह से यहूदियों ने यसरिब पर ग़लबा पाया। (ऊस) और (ख़ज़रिज) यह दोनों क़बीले उसी सालेबा बिन अम्र की नस्ल से हैं। हारिस बिन अम्र जिसकी नस्ल (बनु ख़ज़ाआ) कहलायी हरम की सरज़मीन पर आबाद हुआ , इमरान बिन अम्र ने अमान की राह ली जहाँ उनकी औलाद (अज़अमान) के नाम से मशहूर हुई। नसर बिन अजद ने तहामा को अपना वतन क़रार दिया और उसका क़बीला (इशनूता) कहलाया। जफना बिन अम्र का पेशे दस्ता शाम में ख़ेमा ज़न हुआ उससे ग़सासना पैदा हुए। बनुहम हैरा में रहने लगे उन्हीं में नसर बिन रबिया थे जो हैरा के बादशाहों के जद्दे आला थे। अदनानियों ने हिजाज़ और उससे मुत्तासिल बायें जानिब के सबज़ाज़ार में बूदो बाश इख़तियार की जबकि कुरैश ने मक्का और उसके कुर्ब व जवार को अपने मसकन बनाया। कनाना के क़बायल ने तहामा को , बनुज़ियान ने हीमा व हरान के दरमियानी इलाक़े को और बनी सक़ीफ ने ताएफ़ को पसन्द किया। हवाज़म मशरिकी मक्का में , बनु असद कूफे में और बनु तमीम बसरा में बस गये। बकरस बिन वायल का क़बीता यमामा के साहिली इलाक़ों , बसरा और कूफा के दरमियान आबाद हो गया। मोअर्रेख़ीन ने अक़वामे अरसब को वायिदा , आरबा और मुसतरबा , तीन हिस्सों पर तक़सीम किया है।

पाइदाः- यह वह क़ौमे हैं जिनके हालात नामालूम और आसारे गुमशुदा हैं , तारीख उनके बारे में ऐसे इबहाम से काम लेती है जिससे न तो हक़ीक़त पर रौशनी पड़ती है और न मिजाज़ की तरदीद ही होती है , उसने मशहूर क़बीले आद , समूद , तिसम और जदीस थे जिनके बारे में कुरान का कहना है कि क़ौमे समूद एक सख़्त ग़ैबी आवाज़ के ज़रिये हलाक कर दी गयी और क़ौमे आद पर (बादे सर सर) का अजाब नाज़िल हुआ जिसके नतीजे में वह तबाह व बरबाद हो गयी। तिसम और जदीस के मुतालिक यह ख़्याल किया जाता है कि यह दोनो क़ौमे किसी औरत के चक्कर में आपस में कट मर गयी।

आरबाः- यह वह यमनी बाशिन्दे हैं जिनका नेसब चारब बिन क़हतान से मिलता है और जिन्हें तौरात मे यारह बिन यख़तान कहा गया है , इरबों का ख़्याल है कि यही बुजुर्ग उनकी ज़बान के बानी हैं चुनान्चे उन्हीं पर फ़ख्र करते हुए हसान बिन साबित न कहा था-

(तुमने हमारे बुजुर्ग या अरब से बात करना सीखी तब तुम्हारी ज़बान दुरुस्त हुई और तुम्हारे अन्दर तमददुनी निज़ाम पैदा हुआ वरना इससे पहले तुम्हरी ज़बान गूँगी थी और तुम जानवरों की तरह ब्याबानों में रहा करते थे।)

उन्हीं यमनियों में , हमीर के घराने से ज़ैदुल जमूर , क़सआ और सकासक वगैरा क़ाबिले जिक्र हैं। क़बायल कहलाते में मज़हिज , कुन्दा , हमदान , तह और लहम वग़ैरा मशहूर हैं। लहम की औलाद में मन्ज़र और उसके बेटे हैरा हैं। अज़द से ऊस व ख़ज़रिज मदीने में और ग़सासना शाम में सुकूनत पज़ीर हुए। यमन में हमीर की हुक्मरानी थी और उन्हीं की औलादों में अरसा दराज़ तक मुनहसिर रही।

मुस्तारिबाः- यह हज़रत इस्माईल (अ.स.) की औलादें हैं जो उन्नीसवीं सदी क़बल मसीह , हिजाज़ में आबाद हुयीं और शाहाने जरहम से दामादी के रिश्ते जोड़कर वहां मुस्तक़लन अक़ामत पज़ीर हो गयीं यहां उनकी नस्ल बकसरत फैली जिसे ज़माने के तारीक़ गोशों ने अपने दामन से ऊपर कोई सही नसब नामा नहीं बताती चुनानचे अरबी नस्ल का सही सिलसिलएक नसब अदनान पर ही ख़त्म हो जाता है , शायद इसीलिए रसूले अरबी (स.अ.व.व.) ने भी यह इरशाद फ़रमाया है कि मेरे सिलसिले नसब को अदनान तक पहुँचा कर ख़मोश हो जाया करो।

उन्हीं अदनान की नस्ल में क़सी इब्ने कलाम मुतवल्लिद हुए जो कुरैश कहलाये) क़सी की औलादों में अब्दे मनाफ़ हैं जिनेक सुल्ब से हाशिम मुतवल्लिद हुए। और हाशिम के नूरे नज़र अब्दुल मुत्तिलब हैं , उन्हीं की औलादों में हज़रत रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व.) के पदरे बुजुर्गवार हज़रत अब्दुल्लाह , अमीरूल मोमेनीन हज़रत अली (अ.स.) के वालिदे मोहतरम हज़रत अबुतालिब , और अब्बास वग़ैरा हैं। अलवी ख़ानदान हज़रत अली (अ.स.) से मनसूब हुआ जबकि अब्बासी सिलसिला अब्बास से वाबस्ता है। बनुउमैया , बनुतीम और बनीअदी वग़ैरा यह सब ग़ैर हाशिमी है उन लोगों का ख़ानदान बनु हाशिम से कोई इरतेबात नहीं है। इसके अलावा सिर्फ बनि हाशिम ही का घराना ऐसा है जिसके सर अरबी ज़बान व अदब और दीने इस्लाम का सेहरा है।

अहदे जाहेलियत में अरबों की हालत

किसी मुल्क की आबो हवा का उस मुल्क के बाशिन्दों की ज़िन्दगी , इख़लाक़ी और मुआशी व इजतेमायी निज़ाम पर बहुत पड़ता है और उनकी तबीअतें व आदतें इशी आबो हवा के मुताबिक नशो नुमा पाती है जज़ीरानुमा होने की वजह से अरब की ज़मीन ख़ुश्क , बन्जर और रेगिस्तानी थी। बारिश की क़िल्लत और पानी की अदम फ़राहमी की वजह से न तो वह ज़राअत के काबिल थी और न ही शहरी आबादी के लिए मौजूद थी। ग़ालेबन इसी बिना पर मोअर्रिख़ ने अरब क़ौमों को दो हिस्सों में तक़सीम किया है। एक गिरोह वह था जो भेड़ें और बकरियाँ वग़ैरा पालता था , खाना बदोशी की ज़िन्दगी गुज़ारता थआ और पानी व चारागाहों की जुस्तजुअ में एक मुक़ाम से दूसरे मुक़ाम की तरफ मुन्तक़िल होता रहता था , उसकी हैसियत और मुआशिरत चरवाहों से ज़्यादा नहीं थी। दूसरा गिरोह क़दरे तमद्दुन पसन्द था जो ज़राअत व तिजारत की तरफ़ मायल था और उसका रहन सहन सादगी का मजहर था। लेकिन उन दोनों गिरोह का क़ौमी और समाजी अन्दाज़ तौर तरीक़ा यक़सां था। अंग्रेज़ मोअर्रिख़ हीरो डूटिस लिखता है कि अरब क़ौल के सच्चे और इरादे के पुख़ता होते थे अपने रिश्तेदारों का बड़ा लिहाज़ करते थे. तेज़फहमी , तबियत की ग़वासी , लतिफा गोई और बज़ला सनजी में भी मशहूर थे। हथियारों के इस्तेमाल और शहसवारी में भी क़माल रखते थे , हवास के ऐसे तेज़ थे कि एक मुट्ठी रेत सूँघकर रेगिस्तान के तूल व अर्ज़ का अन्दाज़ा कर लेते थे।

मोअर्रिख़ अबुल फ़िदा लिखता है कि अरबों में जिहालत कूट कूट करस भरी थी. खूँरेजी , ग़ारत गिरी , बेरहमी और रहज़नी वग़ैरा से उन्हें कुदरती मैलान था , कुन्बा परवर ऐसे थे कि उमरें गुज़र जाती मगर कुन्बा बरक़रार रहता था। जिसके बारे में हुक्मा का क़ौल है कि ऊँट का गोश्त खाने की वजह से ऐसा था क्योंकि ऊँट इंतेहाई कीना परवर जानवर होता है , खु़र्द साल बच्चे देवता पर भेंट चढ़ाये जाते थे और लड़कियाँ ज़िन्दा दफ़्न कर दी जाती थीं। मुर्दा जानवरों का गोश्त , उनके लिए उमदा और लजीज़ तरीन ग़िज़ा थी) अलग़र्ज़ इस क़िस्म की क़बीह रसमें और आदतें इश नीम वहशी और आज़ाद मनिश क़ौम में बुरी तरह रिवाज पज़ीर हो गयी थी।)

तारीख़ बताती है अरब का पूरा मुआशरा एक ही रंग में रंगा हुआ था यह लोग ग़ैरुल्लाह की परस्तिश पर ईमान रखते थे। गोह , कच्छुए , मेंढ़क और साँप बिच्छू वग़ैरा तक खा जाते थे , क़हत व खु़शक साली के ज़माने में ऊँटों को ज़ख़्मी करके उनका ख़ून पिया करते थे। केमार बाज़ी बदकारी और शराब नोशी उनका महबूब मशग़ला था। एजाजुल तज़ील में है कि उनकी हराम कारी , बेहयाई और बेशर्मी की यह हालत थी कि कुँवारी लड़कियां और ब्याही औरतें दोनों ही जिना को फख़्र समझ़ती थी और जिस तरह मर्द किसी हसीन तरीन या मशहूर व मारूफ ख़ानदान की औरत से ज़िना करने के बाद अपने इस शैतानी फेल पर फख़्र व मुबाहात करता था और दूसरों से ब्यान करता था उसी तरह औरतें भी किसी नामी या मशहूर खानदान के मर्द से जिना का इरतेकाब करने के बाद अपने इस कारनामे पर फ़ख़्र करती और दूसरी औरतें और मर्द बरहैना हालत में खान-ए-काबा का तवाफ किया करते थे। पाब के मरने के बाद बेटा अपनी सौतेली माओं पर ज़बरदस्ती क़ाबिज़ व मुतसर्रिफ़ हो जाता था। यतीमों और बेवाओं का माल खाने में उन्हें ज़रा भी ताअम्मुल न होता , हक़ हमसायगी कोई चीज़ न था कि जिसका पास व लिहाज़ किया जाता। तालीम व तरबियत की परछाईयाँ भी उन पर न पड़ीं थीं।

(गिबन का कहना है कि आन हज़रत (स.अ.व.व.) के ज़हूर से पहले इन अरबों में सत्तर सौ लड़ाइयाँ हो चुकी और यह लड़ाइयाँ उस किस्म की होती थी कि अगर एक क़बीले का आदमी दूसरे क़बीले के किसी आदमी को क़त्ल कर देता था तो उसका कसास लेने के लिए पचास पचास बरस तक जंग होती रहता थी।)

अबुल फ़िदा ने लिखा है कि- (तमाम क़ौमें आज़दाना गुज़ारा करती थी मगर उनमें ज़रा ज़री सी बात पर खूंरेज़ियां हो जाया करती थी चुनानचे एक दफा बनि तग़लिब की एक औरत बिसवस नामी मेहमान की ऊँटनी एक शख़्स की चरागाह में चली गयी तो उस शख़्स ने ऊँटनी के थन काट दिये उस औरत ने अपने भाँजे से जहाँ वह मुक़ीम थी फ़रयाद की उसने चारगाह वाले को क़त्ल कर दिया। उस पर बनि बकर और बनि तग़लिब में और फिर रफ़्ता रफ़्ता एक दूसरे की हिमायत पर तमाम क़बीलों मे चालीस बरस (सन् 364 से 434 तक) लड़ाई होती रही जो हरब बसूस के नाम से मशहूर है और जिसमें अव्वल से आख़िर तक सत्तर हज़ार आदमी मारे गये। उसी तरह सन् 568 में वाहिस नाम की एक घोड़ी को घुड़ दौड़ में निकलते देख करस किसी शख़्स ने भड़का दिया उस पर चालीस बरस यानी सन् 608 तक जंग जारी रही और क़बीले के क़बीले कट मरे यहाँ तक कि 631 में जब बाज़ क़बीले मुशर्रफ ब-इस्लाम हुए उस वक़्त उस जंग का पूरा पूरा ख़ात्मा हुआ।

अरबी ज़बान

अरबी ज़बान दुनिया की क़दीम तरीन ज़बानों में से है। इस ज़बान की कई क़िस्में थी जिनमें से कुरैश और बनि हमीर की ज़बान सबसे आला और फ़सीह तर मानी जाती थी ख़ासकर कुरैस की ज़बान ख़ालिस अरबी ज़बान तसलीम की जाती थी कुरान का नजूल इसी ज़बान में हुआ है।

अहले अरब लिखना नहीं जानते थे अगर चे हज़रत अय्यूब और बनि हमीर को लिखना आता था। बनि हमीर एक अजीब पेचिदा तर्जे तहरीर रखते थे लेकिन बग़ैर हुकूमत की इजाज़त हासिल किये वह दूसरों को यह तर्ज़े तहरीर सिखाने से क़ासिर थे।

मुरामुर बिन मुर्राह अन्बारी जो पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) से क़बल करीस तर ज़माने में था , अरबी रस्मुल खत का मोजिद है। सैय्यद अमीर अली अपनी तारीख़े इस्लाम में लिखते हैं किः- (अरबी तहरीर का फन शियूअ इस्लाम से जरा ही पहले कुरैशः में राजेय हुआ था। अव्वलन उसे मुरामुर बिन मुर्राह ने ईजाद किया जो हीरा के करीब शहर अम्बार का बाशिन्दा था। अंबार से यह फ़ने तहरीरे हीरा में गया और अबुसुफ़ियान का बाप हीरा जब हैराह गया तो वहाँ उसने अस्लम बिन सदरा नामी एक शख़्स से इस फन को सीखा। फिर वापस आकर उसने अहले मक्का को सिखाया और आनन फानन यह फन कुरैश में फैल गया। हमीरियों का तरज़े तहरीर उससे मुख़तलिफ़ था जिसे ब़कूल इब्ने ख़लक़ान अलमुस्नद कहते थे उसके सब हुरुफ एक दूसरे से जुदा होते थे वह अवामुन-नास को इस फन के सीखने से रोकते थे और बग़ैर उनकी इजाज़त के कोई भी शख़्स उसका इस्तेमाल नहीं कर सकता था। जब इस्लाम शाया हुआ तो यमन में एक शख़स भी ऐसा न था जो लिखना पढ़ना जानता हो। ज़वाले ख़ानदान बनी उमय्या के वक़्त मतरुक कूफ़ी तरज़े तहरीर ने कोई सूरते अख़तियार कर ली थीं जिनमें सबसे आम सूरत का नाम नसख़ था। चौथी सदी के आख़िर और पाँचवी सदी के शुरू में नसख्र के दो बड़े खुश नवीसों अबुल हसन इब्ने बव्वाब और अबुतालिबुल मबारक ने उसे और भी तरक़्क़ी दी। सलाहुद्दीन अय्यूबी के दौरे हुकूमत में हम एक बड़े गोल ख़त का जिक्र सुनते हैं , यही नसख़ की तरक्की याफता सूरत थी और उसे सलस कहते हैं जो ईरानी खत नस्तालीक से मिलता हुआ था।

सैल अपने मुक़द्दमे तरजुमा कुरान ((स.अ.व.व.) 21) में लिखता है कि (मुरामुर के हुरूफ़ खते कूफी से बहुत मुशाबेह थे और हमीरी से बिल्कुल मुखतलिफ। अव्वलन कुरान भी उसी खत में लिखा गया था। यह ख़ूबसूरत हुरूफ जो अब देखे जाते हैं उन्हें इब्ने मक़ला वज़ीर मुक़तदर अब्बासी ने रसूले अकरम (स.अ.व.व.) की वफात के तीन बरस बाद कूफ़ी से ईजाद किये हैं इसी खत को चौथी सदी में अली बिन बव्वाब ने और संवारा मगर जिनसे मौजूदा सूरत में उसे पाया तो तकमील तक पहुँचाया वह ख़लीफा मोतसिम का कातिब दीवान याक़ीत मोतासमी था। इसी वजह से वह खत्तात के नाम से मशहूर है।)

इब्ने ख़लकान (जिल्द अव्वल (स.अ.व.व.) 125 में) लिखता हैः- (लोग हजरत उसमान के मुस्हिफ में कुछ ऊपर चालीस बरस अब्दुल मलिक बिन मरवान के अहद तक पढ़ते रहे लेकिन नुक़्ते न होने की वजह से इराक में तसहीफऴ बहुत होने लगी (यानी मतशाबा हुरूफ कुछ के कुछ पढ़े जाने लगे) उश पर हज्जाज बिन यूसुफ़ के हुक्स से उसके कातिब नसर बिन आसिम या यहिया बिन यामिर ने नुक्ते इजाद किये मगर ज़ेर ज़बर पेश की ग़ल्तियां बाक़ी रही इस लिए बाद में आराब या हरकात को वाज़ेह किया गया)

मुफताउल सआदा जिल्द अव्वल सफ़हा 73 में है कि खते अरबी बनि तय के कबीले बुलान से तीन शख़्सों ने इजाद किया है जो शहर अम्बार गये थे अव्वल उनमें मरामर हैं जसिने हरफों की शक़्लें वजडेह की और नुक्ते लगाये दूसरा अस्लम जिसने वसब व फसल करार दिया , तीसरा आमिर जिसने ज़ेर ज़बर पेश ईजाद किये। उसी किताब के (स.अ.व.व.) 80 में है के नुक़्ते और एराब हज़रत (अ.स.) की तलक़ीन से अबुल असूद वायली ने वाज़ेह किये हैं (और यही बात दुरूस्त मालूम होती है)

ज़मानए कदीम में तरीकए तहरीर यह था कि लोहे या पीतल की तलायी से लकड़ी या मोम की तख़तियों पर लफ़ज़ों को कन्दा किया जाता था। सबसे पहले मिस्रे वालों ने पेपर्स नामी दरख़्त के पत्तों को उन तखतियों के बजाये इस्तेमाल करना शुरू किया और उसी (पेपर्स) से अंग्रेज़ी लफज़ (पेपर) कागज़ के मानों में मुस्तामिल है।

आठवीं सदी ई 0 में पहले पहल रुई और रेशम से कागज़ तैयार हुआ। कागज़ की इजाद के बारे में अंग्रेज़ मोवर्रिख़ (गास्टियू लीबान) अपनी किताब तमद्दुम में लिखता है कि अहले यूरोप एक मुद्दत तक सिर्फ चमड़े पर लिखते रहे और यह इस कदर गिरां था कि किताबों की अशाअत बखुबी न हो सकती थी , चन्द रोज में यह इस कदर नायाब हो गया कि यूनान व रोम के राहेबान बड़ी बड़ी कदीम तसनीफानत के हुरूफ छील कर उनक सफ़हों पर अपने मज़हबी रसायल लिखने लगे और अगर अरबों ने कागज़ न ईजाद किया होता तो यह राहेबान कुल तसनीफात को जिन के वह मुहाफिज़ थे तलफ कर देते। स्कोरियल (स्पेन) के कुतुब खाने में जो सूती कागज पर लिखी हुयी सन् 1006 की किताब है वह युरोप के कुतुब खानों में सबसे क़दीम नुसखा है उसके देखने से मालूम होता है कि अरबों ही ने पहले पहल चमड़े के बदले कागज़ का इस्तेमाल किया है। यूरोप की जो सबसे पुरानी तहरीर कागज पर पायी जाती है वह सेण्ट लूई के नाम जानवील के खत है जो सन् 1270 में लिखा गया है।

मुख़तसर यह कि अरबों ने फसाहत व बलाग़त में अबरी ज़बान को दर्जा-ए-कमाल पर पहुँचा दिया था। इसको वह बहुत बड़ी फज़ीलत समझते थे और उस पर उन्हें बहुत बड़ा फख़्र और नाज़ था। शायरी में भी उन्हें अबूर हासिल था। जो नज़में मेयारी और आला दर्जा की होती थी वह शाही खज़ानों में ऱखी जाती थी। उनमें से वह सात नज़में जो सब-ए-मुअल्लेक़ात के नाम से मशहूर हैं खान-ए-काबा में लटकायीं गयी थीं , यह चूंकि मिस्री रोशनी कपड़े पर सोने के हुरूफ से लिखी हुई थी उस सबब से मज़हब्बात-भी कहलाती थी। मगर कलाम-उल-लाह ने उनका सारा गुरुर तोज़ दिया और वह एक छोटी सी आयत बनाने से भी क़ासिर रहे और बड़े बड़े फ़सीहाने अरब बोल उठे कि यह बशर कलाम नहीं है। इस वजह से कलामुल्लाह आन हज़रत (स.अ.व.व.) का सबसे बड़ा मोजिज़ा करार पाया जो रहती दुनिया तक क़ायम रहेगा।

दौरे जाहिलियत में अरबों की हुकूमत

ज़मान-ए-जाहेलियत में तमाम अहले बादिया (सहरायी अरबों) के यहाँ हुकूमत का अन्दाज़ यकसां था। जो ज़रुरतें आज की मुतदमद्दिन दुनियां में बीसों अफ़राद से पीरी हो सकती हैं वह सब तन्हा एक ही सरदार की जात में जमां हो जाती थीं। वही अमीर या बादशाह भी होता था , वही काज़ी , वही साहबे ख़ज़ाना और वही फौज का सरदार वग़ैरा। ग़र्ज़ कि तमाम कारोबार इसी शख़्से वाहिद की जात से वाबस्ता होते थे। अहले अरब के यहां जो होता था , उसी को अमीर बनाते थे अगर उनमें कई शख़्स उन औसाफ में का इन्तेख़ाब अमल में आता था और जब मुख़तलिफ़ क़बायल मुताफ़िक़ होकर किसी जंग पर आमादा होता और उन्हें एक ऐसा सरदार दरकार होता जो उन सब पर अफसरी करते तो वह तमाम सरदारों के नाम कुरा डालते थे और जिसका नाम निकल आता उसी की बिला उज़्र अपना अफसर मान लेते थे। यह हालत सहरायी और ख़ाना बदोश अरबों की थी जो जंग व जदल और लूट मार के आदी थे उसके बरअक्स जो शहरी और अहले मक्का थे उनके यहाँ खान-ए-काबा का ख़ादिम सरदारी का मुस्तहक़ होता था। लेकिन जब से ख़िदमते बैतुल्लाह कुरैश के घराने में आयी उस वक़्त से लोग हर मुआमले पर अफसर और सरदार शुमार होने लगे।

अरबों में बुत परस्ती का रिवाज़

जमानए जाहेलियत में अहले अरब किसी इलहामी मज़हब को नीहं मानते थे , उन्हे ख़ुदा के वजूद ही से इन्कार था। चूँकि वह गुनाहों के क़ायल भी न थे इसिलए उक़बा में सज़ा व जज़ा का तसव्वुर भी उनके ज़हनों से कोंसो दूर था। उनका अक़ीदा था कि इन्सान का वजूद दुनिया में एक दरख़्त या जानवर के मानिन्द है , वह पैदा होता है और मर जाता है। अक़सर उमें एतदाल पसन्द लोग भी थे जो रूह को ग़ैर फानी शै समझते थे और नेक व बद आमाल पर सज़ा व जज़ा के बारे में यक़ीन रखते थे इसलिए ज़रुरी था कि वह ऐसा तरीक़ा अपनाये जो उनके लिये रुहानी तसकीन का सबब बने लेकिन उनके पास कोई ऐसी तरीक़ा या उसूल न था कि जिस पर कारबन्द हो करस वह अपने लिए तसकीन का सामान फ़राहम करते। इसीलिए उन्होंने इन उसूलो की तरफ तरवज्जो दी जिन पर उनकी हमसाया क़ौमें गामज़न थीं। यही वह असबाब थे जिनकी बिना पर अरबों ने शाम के बुत परस्तों से बुत परस्ती का तौर तरीका सीखा। चुनानचे उमर बिन लाकर खान-ए-काबा में नसब किया और बुत परस्ती का बानी करार पाया।

उन लोगों ने बहुत से मोतक़िदार अपने ही वतन के इलहामी मज़हबों से और बहुत से ग़ैर मुल्की ख़यालात में अख़ज़ कर लिये थे और फिर उनको अपने तवहुम्मात से ख़ल्त-मल्त करके अपने माअबूदों को दीन व दुनिया के अख़तियारात दे रखे थे। बस फ़र्क सिर्फ़ यह था कि उनके अक़ीदे के मुताबिक दीनवी अख़ितयारात उनके माअबूदों के हाथों में थे और उक़बा के बारे में उनका ख़्याल यह था कि उनके बुत उनके गुनाहों की माफी के लिए ख़ुदा से शिफाअत का जरिया होंगे। चुनाचे ज़हूरे इस्लाम से पहले अरबों में बुत परस्ती की यही कैफीयत थी। जिन बुतों की वह परस्तिश करते थे उनकी तफ़सील मुवर्रेख़ीन की ज़बानी हसबे जैल है।

(1) हुबल- यह बहुत बड़ा बुत था जो खान-ए-काबा के अन्दर दाहिनी तरफ खड़ा किया गया था और ओहद की जंग में अबु सुफियान ने उसी से मदद मांगी थी मगर वह बुरी तरह शिकस्त से दो चार हुआ। फ़तेह मक्का के मौक़े पर हजरत अली 0 ने उस बुत को रेज़ा रेज़ा कर दिया।

(2) वुद-यह क़बीलए बनि काअब का बुत था। अम्र बिन अबदउद का माम उसी बुत के नाम से मुश्तक़ है।

(3) सवाये- यह कबीला मजहिज का बुत था।

(4) यागूस- कबीले बनि मुराद का बुत था।

(5) यऊख़- बनि हमदान का बुत था।

(6) नसर- यह भी कबीलए बनि हमदान का बुत था।

(7) उज़्ज़ा- कबीलए बनि ग़तफ़ान का बुत था।

(8) लात- यह एक ग़ैर तराशीदा बुत था जिसके बारसे मे लोगों का ख़्याल था कि इसमें उलूहियत की करिश्मा साज़ियाँ मुजतमा हैं। अरबों की जाहिलाना सरिश्त लात को देवी समझती थीं।

(9) मनात- यह एक बुलन्द क़ामत बुत था। उमर बिन हय्या ने समुन्द्र के किनारे से उसे निस्ब किया था। लात व मनात पर किसी ख़ास क़बीले का हक़ नहीं था बल्कि अरब के तमाम क़बीले उनकी परस्तिश करते थे।

(10) दवार- नौजवान औरतें इसकी परस्तिश और तवाफ करती थीं.

(11) असाफ- यह सिफा पर नसब था।

(12) नायला-मरवा पर था। असाफ व नायला को कुर्बानियां दी जाती थीं।

(13) नहीक-

(14) मतअम- यह दोनों बुत भी सिफ़ा व मरवा पर थे।

(15) जुल्कफीन- यह भी एक बुत था जिसे पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) जलवा दिया था।

(16) ज़ातुल अनवात- यह एक दरख़्त था जिसकी परस्तिश होती थी।

(17) अबाअब- यह एक बड़ा पत्थर ता जिस पर ऊँटों की कुर्बानी होती थी।

इन तमाम बुतों के अलावा खान-ए-काबा में हज़रत इब्राहीम का मुजस्समा था और उइसके हाथ में कुरान के तीर थे जो इज़लाम कहलाते थे। जनाबे मरयम का भी एक मुजस्मा था जिसमें हज़रत ईसा को आग़ोशे मादर में दिखाया गया था।

अरबों की रवायात से पता चलता है कि वुद , यागूस , सऊक , और नसर मशहूर लोगों के नाम थे जो अय्यामे जाहेलियत में गुज़रे हैं उनकी तस्वीरें पत्थरों पर मुनतकिल करके ख़ान-ए-काबा में रख दी गयीं थीं , एक मुद्दत के बाद उन्हें माअबूदियत का दर्जा दे कर लोग उन्हें पूजने लगते थे।

पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) का ख़ानदानी पस मन्ज़र

हज़रत इस्माईल (अ.स.) के हालात में हम तहरीरस करस चुके हैं कि हुक्में ख़ुदा वन्दी के तहत आप और आपकी वालिदा जनाबे हाजिरा को आपके पदरसे बुजुर्गवार हज़रत इब्राहीम (अ.स.) मक्क-ए-मोअज़्जमा की सर ज़मीन पर छोड़कर अपने वतन शाम वापस चले गये थे। फिर एजाज़े इलाही से वहाँ चश्में ज़मज़म का ज़हूर हुआ और पानी की वजह से क़बीलए जुरहूम वहाँ आकर आबाद हुआ और उसी कबीले की एक पाकीज़ा जुरहमीया ख़ातून से आपकी शादी हुई। उसके बाद आप और आपके वालिद ने मिलकर खान-ए-काबा की तामीर की।

जुरहमिया ख़ातून के बतन से आपकी बारह औलादें हुयीं जो आपके बाद खान-ए-काबा की देख भाल और इन्तेज़ामी उमूर की ज़िम्मेदार क़रार पाई। ग़र्ज़ कि रफ़्ता रफ़्ता आपकी नस्ब मक्का में बढ़ती रही यहाँ तक कि आप ही की नस्ल से फहर नामी एक बुजुर्ग पैदा हुए जिनके बारे में लोगों का ख़्याल है कि यही फहरे कुरैश कहलाये और उन्हीं की औलादें क़बीलए कुरैश के नाम से मौसूम हुयी। नीज़ हज़रत रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व.) भी उन्हीं फहर की नस्ल से थे।

कुरैश कौन था। यह एक संजीदा मसअला है उसकी अहमियत पर हम अपनी किताब (अलसख़ुल्फा) हिस्सा अव्वल में ख़ातिर ख़्वाह बहस कर चुके आज़म के ओलमा का यह दावा है कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) ने फरमाया था कि मेरे बाद मेरी ख़िलाफत सिर्फ खानदाने कुरैश ही में रहेगी। वग़ैरा वग़ैरा।

कुरैश के बारे मे इल्मे अन्साब के माहेरीन और इ्ल्मे तारीख के मोहक़्क़े क़ीन के दरमियान इख़तेलाफ़ है उनमें एक गिरोह का कहना है कि फहर और उनकी पूरी नस्ल कुरैश है जिसमें हज़रते शैख़ीन भी शामिल हैं जबकि दूसरा गिरोह कहता है कि सिर्फ़ कुसई इब्ने कलाब और उनकी नस्ल कुरैश है जिसमें अबदे मनाफ , अब्दुल मुत्तालिब , जनाबे अब्दुल्लाह , जनाबे अबूतालिब , हज़रत रसूले खुदा (स.अ.व.व.) और हज़रत अली (अ.स.) वग़ैरा है।

मुझे तो ऐसा लगता है कि शैख़ानी की ख़िलाफ़त के जवाज़ में पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) की मज़कूरा हदीसों और जनाबे फहर के कुरैश होने का शाख़ाना खड़ा किया गया है वरना तारीख़ी शवाहिद से यह बात आशकार है कि कुरैश का सिलसिला कुसई इब्ने कलाब से शुरू हुआ और वही कुरैश कहलाये जैसा कि अव्वलीन दौर के मुहक़्क़े क़ीन में अल्लामा अबदरबा का कहना है कि क़ुसई इब्ने कलाब ने चूंकि अरबों को एक मरकज़ पर जमां किया था इसलिए वह कुरैश कहलाये। कुरैश का अस्ल तक़र्रिश है और तक़र्रिश के मानी जमा करने वाले के हैं और क़सई को जमां करने वाला कहते हैं।

इब्ने असीर का कौल है कि जब अरबों को क़सई ने जमा कि तो उन्हें लोग कुरैश कहने लगे। और दूसरे लोगों का ख़्याल है कि जब कुसई इब्ने कलाम रहम के सरदार हुई तो उन्होंने बहुत बेहतर नुमाया काम अन्जाम दिये इसलिए लोग उन्हें कुरैशी कहने लगे और पहली मरतबा क़ुसई का यह नाम रखा गया यह लफ़्ज़ इज़्तेमा से निकला है यानि क़ुसई में अच्छा सिफतें जमा थीं इसलिए उन्हें कुरैश कहा जाता है।

तबरी का कहना है कि क़ुसई जब रहम (मक्का मोअज्ज़मा) में आकर मुक़ीम हुए तो वहाँ उन्होंने बहुत अच्छे काम किये इसलिए उन्हें लोग कुरैश कहने लगे और वही पहले शख़्स हैं जिन्हें यह नाम दिया गया।

अल्लामा शिबली फ़रमाते हैं कि क़ुसई ने इस क़दर शोहरत और एतबार हासिल किया कि बाज़ लोगों का ब्यान है कि कुरैश का लक़ब अदल उन्हीं को मिला चुनानचे अल्लामा अबदरबा ने अक़दुल फरीद में भी लिखा है और यह भी तसरीह की है कि क़ुसई ने चूँकि ख़ानदान को जमा करके काबे के आस पास बसाया इसलिए उनको कुरैश कहते हैं। क़ुरैश की वजह तसमिय में इख़्तेलाफ़ है बाज़ कहते हैं कि कुरैश के मानी जमा करने के हैं और क़ुसई ने लोगों को जमा करके एक रिश्ते मे मुन्सलिक किया इसिलए कुरैश कहलाये , बाज़ कहते हैं कि एक मछली का नाम है तो तमाम मछलियों को खा जाती , चूँकि क़ुसई बहुत बहुत बड़े सरदार थे इसलिए उन्हें मछली से तशबीह दी गयी।

उमवी हुक्मरान अब्दुल मलिक बिन मरवान ने मुहम्मद बिन जिबरील से पूछा , कुरैश का यह नाम कब से हुआ ? उसने कहा जब से लोग अलग अलग रहने के बाद हरम में इकट्ठा हुए क्योंकि तकर्रुश के मानी तजम्मा के हैं। इस जवाब पर अब्दुल मलिक ने कहा मैंने तो आज तक यह नहीं सुना बल्कि यह सुनता आ रहा हूँ कि क़ुरैश क़ुसई ही को कहते हैं और उनसे पहले यह नाम किसी का नहीं हुआ।

मज़कूरा तारीख़ी हवालों से यह बात साबित है कि कुरैश का सिलसिला सिर्फ़ कुसई इब्ने कलाम से शुरू हुआ फहर या उनकी नस्ल से इस कुरैशी सिलसिले का कोई ताल्लुक नहीं है। अब अगर पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) का यह क़ौल दुरूस्त है कि (ख़लीफ़ा कुरैश ही से होगा) तो ऐसी सूरत में हज़रात शैख़ीन की ख़िलाफ़त का महल ख़ुद बख़ुद ढेर हो जाता है।

क़ुसी इब्ने कलाब

पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) का नसब , अदनान तक मोतबर तारीख़ों और अनसाब की किताबों से साबित है जो हज़रत इसमाईल (अ.स.) के फ़र्ज़न्द क़ीदार की नस्ल से थे। तीसरी सदी ई 0 में अदनान के बेटे मोइद की उन्नीसवीं पुश्त में एक बुजुर्ग पैदा हुए जिनका नाम फ़हर इब्ने मलिक था , उन्हीं फहर की नस्ल से पाँचवी सदी ई 0 में क़ुसई हुए।

क़ुसई का अमल नाम ज़ैद और कुन्नियत अबुल मुग़ीरा थी , वालिदा का नाम फ़ात्मा बिन्ते सईद था। आपकी दो बीवियाँ थी एक का नाम आतिका बिन्ते ख़ालिख़ इब्ने लैक था और दूसरी का नाम हब्बा बिन्ते ख़लील ख़ज़ायी था। यह ख़लील कबीलये बनु ख़ज़ाआ के सरदार और उस दौर में खान-ए-काबा के मुतावल्ली थे। उन्होंने अपनी वफ़ात के वक़्त यह तौलियत अपनी बेटी हब्बा के सुपुर्द करना चाही मगर उन्होंने माकूल उर्ज़ के साथ उसे कुबूल करने से इन्कार कर दिया तो ख़लील ने यह ख़िदमत अपने एक क़रीबी अज़ीज़ व रिश्तेदार अबु ग़बशान ख़ज़ायके सुपुर्द कर दी , उसने इस अज़ीम शरफ को क़ुसइ इब्ने कलाब के हाथों फरोख़्त कर दिया , इस तरह आप खान-ए-काबा के मुन्तज़िम व मुतावल्ली क़रार पाये।

आप एक बुलन्द हौसला , जवां मर्द , नेक चलन , सख़ी और अज़ीमुल मरतबत इन्सान थे। आपके ज़माने में मक्का मुअज़्ज़मा आबादी के लिहाज़ से एबहुत ही मामूली गाँव था , बिखरी हुई और मुन्तशिर हालत में कहीं कहीं झोंपडियाँ और जाबजां डेरे पड़े हुए थे , आपने उन सबको तरतीब के बसाया और जो कबीले पहाड़ों और घाटियों में फैले हुए थे उन्हें समेट कर उस मैदान में जिसे बतहा कहते हैं जमां किया।

मुसलसल जद्दो जहद और जॉफिशानी के बाद आपको मक्के पर इक़तेदार हासिल हो गया और आप की ताजदारी तस्लीम कर ली गयी तो आपने खान-ए-काबा की दोबारा मरम्मत औरस ज़रुरी तामीर करायी , उसके चारों तरफ़ पत्थरों के मकामात बनवाये और मुख़तलिफ़ क़बायल के लोगों को वहाँ आबाद किया , उन पर सालाना टैक्स अदा किये जिसकी रक़म हज के ज़माने में हाजियों की मेज़बानी पर ख़र्च होती थी।

आपने अपने लिए एक मलह भी तामीर कराया दारूल नदवा बनवाया जो बड़े हाल की शक्ल में था और उसमें अमूरे आम्मा की अन्जाम देही , बाहमी इख़तेलाफ़ात को मदूर करने और ख़ान-ए-काबा के इन्तेज़ामी मुआमलात पर तबादलए ख़्यालात के लिए वक़तन फ़वक़तन अजनलास हुआ करते थे ।

हजाबत यानि ख़ान-ए-काबा की देख भाल और हिफाज़त का ओहदा , सक़ायत व रफ़ादत यानि हाजियों की मेज़बानी और उनके खाने पानी के इन्तेज़ाम का मनसब , क़यादत यानि बवक़्त जदाले फौज की सिपेह सालारी , सिदारत , यानि दारूल नदवा के इजलास में सदर होने का इस्तेहाक़ और लवाए यानि अलमबदारी का मनसब वग़ैरा तमाम अहम तरीन मनासिब आपकी ज़ात से वाबस्ता थे। इस तरह आप जुमला मज़हबी , इसलाही और मुल्की उमूर अपनी ज़ात में जमा करके ताजदारे हज और मज़हबी पेशवा बन गये।

सीरत इब्ने हश्शाम में है किः- (काअब बिन मालिक की औलाद में क़ुसई पहले शख्स हैं जिन्होंने ऐसी हुकूमत पायी जिससे उनकी क़ौम सब उनके ज़ेरे इताअत आ गयी चुनानचे हिजाबत , सक़ायत , रिफादत , दारूल नदवा और लवाए तमाम मनसब उन्हीं से मख़सूस हो गया। उनका फ़रमान क़ौम में एक मज़हबी कानून की तरह वाजिबुल अमल समझा जाता था।)

तबरी लिखता है कि क़ुसई आला मज़हबी उमूर और दीनवी मुआमलात को अपने हाथ में करके दीनवी हाकिम और मज़हबी पेशवा बन गये। वह जो भी करते उसमें किसी की मजाल नहीं थी कि मुख़ालफ़त या एतराज़ करे। मुज़महिल को अज़सरे नो मज़बूत और दुरुस्त किया है। अल्लामा दयार बकरसी फरमाते हैं कि क़ुसई की शान उनकी ज़िन्दगी में भी और उनके मरने पर मक़बूले ख़ास व आम थी , कोई उनके खिलाफ कुछ करता ही नहीं था। क़ुसई ने मक्का में एक कुआँ भी ख़ुदवाया था जिसका नाम अजूल था , यह पहला कुँआ था जो मक्के में खोदा गया।

क़ुसई ने सन् 480 में इन्तेक़ाल किया और मुक़ामे हुजून में दफ़्न हुये इसके बाद आपकी कब्र की ज़ियारत को लोग जाते थे और उसकी बड़ी ताज़ीम करते थे।

जनाबे क़ुसई अगर नबी , रसूल या इमाम न थे लेकिन नूरे मुहम्मदी के हामिल थे इसलिए आसमाने फज़ीलत के आपताब बन गये।

अबदे मनाफ़

जनाबे क़ुसई की छः औलादें थी-( 1) अब्दुल दार ( 2) अबदे मनाफ़ ( 3) अब्दुल अज़ा ( 4) अब्दुल क़सा ( 5) अब्दुल अबद ( 6) अब्दुल बर्रा।

अबदे मनाफ , क़सी की ज़ौजा सानिया हब्बी बिन्ते खलील ख़ज़ायी के बतन से मुतवल्लिद हुए। आपके वालिद ने आपका नाम मग़ीरा रखा और कुन्नियत अबु शमश करार पायी लेकिन जिस वक्त आप पैदा हुए तो आप की वालिदा ने अपने अक़ीदे के मुताबिक मक्का मोअज़म्मा में एक बुत (मनाफ़) के सामने डाल दिया था इस वजह से अबदे मनाफ कहे जाने लगे।

इससे मालूम हुआ कि क़ुसई ने आपका नाम अबदे मनाफ नहीं रखा जिससे यचह इलज़ाम आयद किया जा सके कि वह भी दूसरे अरबों की तरह बुत परस्ती करते थे। इस लक़ब (अबदे मनाफ) की ज़िम्मेदार क़ुसई की बीवी हब्बा बिन्ते ख़लील ख़ज़ायी हैं इसकी जि़म्मेदारी क़ुसई पर आयद नं होत और न ही आपकी बीवी के इस फेल पर ताज्जुब करना चाहिए क्योंकि जबबाज़ अन्बिया की बिवियाँ ईमन व मारफ़त के आला मदारिज तक नहीं पहुँच सकी तो हब्बा का ज़िक्र ही क्या है। उइसके अलावा यह रवायत हज़रात अहले सुन्नत की है , शियों के ओलमा इसके हमनवा नहीं हैं।

अल्लामा शिबली नेमानी का कहना है कि क़ुसई ने मरते वक़्त हरम मोहतरम तमाम मनासिब अपने बड़े बेटे अब्दुल दार को सुपुर्द किये थे जो अपने तमाम भाईयों में ना अहल था। इक़तेदारे अबदे मनाफ ने हासिल किया और उन्हीं का खानदान रसूल अल्लाह (अ.स.) का ख़ास खानदान है। इस इजमाल की तफ़सील में शम्सुल ओलमा डिप्टी नज़ीर अहमद साहब रक़्स तराज़ हैं कि- कुसई के यूँ तो कई फरज़न्द थे मगर ब लिहाज़े उम्र सबसे बड़े अब्दुल दार और ब-हैसियत फज़्ल व शरफ सबमें मुम्ताज़ अबदे मनाफ थे। अबदे नमाफ अपने वालिद की ज़िन्दगी ही में अज़मत व बुजुर्गी के साथ मशहूर हो गये थे और उनके फज़लों कमालात की दिलचस्प हिकायतें क़बायले अरब की ज़बानों पर रफ़्ता रफ़्ता आने लगीं थी चुनानचे उसी ज़माने में लोगो ने उनके वफूरे करसम और सख़ावत की वजह से उन्हें फैय्याज़ का लक़ब दे दिया था और सख़ावत की वजह से उन्हें फ़ैय्याज़ का लक़ब दे दिया था और क़बाएल में वह इसी लक़ब से पुकारे जाते थे मगर औलादे अकबर होने की वजह से क़ुसई , अब्दुल दार से ज़्यादा मोहब्बत करते थे और इसी मोहब्बत का नतीजा था कि उन्होंने अपनी वफात से क़बल खान-ए-काबा के तमाम ओहदे अब्दुल दार के नमाज़द कर दिये थे बल्कि एक अज़ीम मजमे में इसका ऐलान भी कर दिया था। एहतेज़ार के वक़्त कु़सई ने अब्दुल दार से कहा , बेटा! अगर चे तेरे दूसरे भाई फज़ल व शरफ़ में तुझ पर फौक़ियत रखते हैं- मगर मैंने खान-ए-काबा के तमाम मनासिब तेरे सुपुर्द करके तुझे उनमें मिला दिया है। अब जब तक तू खान-ए-काबा का दरवाज़ा न खोलेगा उनमें का कोई शख़्स उसमें दाख़िल नही हो सकता , जब तक तू लड़ाई का झण्डा नहीं उठायेगा उस वक़्त तक कोई आदमी लड़ाई में नहीं जा सकता। अब तेरे अलावा हज्जाज किसी का पानी नहीं पियेंगे अलग़र्ज़ अब्दुल दार , कुसई के बाद सरदार हुआ मगर बाद में उसने उन तमाम ओहदों में अपने भाई अपने मनाफ को भी शरीक करस लिया।

अल्लामा दयार बकरी ने मूसा बिन अक़बा से रवायत की है कि उसने हजर में एक नविश्ता पाया , जिसमें तहरी था कि (मैं मग़ीरा फरज़न्द क़ुसई हूँ और लोगों को हुक्म देता हूँ कि अल्लाह से डरते रहा करें और सेलए रहम करते रहें!

इस नविश्ते से पता चलता है कि अबदे मनाफ खुद भी इस नाम को पसन्द नहीं करते थे और अपने को मुग़ीरा कहते थे , बुत परस्ती से अलाहिदा थे और ख़ुदाये बरहक़ को ही अपना माअबूद समझते थे अगरस वह ख़ुदा के अलावा किसी को अपना माअबूद समझते तो अल्लाह से डरने या तक़वा इख़तियार करने हिदायदत न करते।

मुल्के शाम के एक मुक़ाम ग़ज़्ज़ह में आपने इन्तेक़ाल फ़रमाया , जहाँ आप तिजारत की ग़र्ज़ से तशरीफ़ लसे गये थे। आपकी शादी आतिका बिन्ते मर्राह सलीम से हुई थी।


हाशिम इब्ने अबदे मनाफ़

अबदे मनाफ़ के चार बेटे थे , जिनमें सबसे बड़े हाशिम और अब्दुल शमस थे क्योंकि यह दोनों तव्वम (जुड़वां) पैदा हुए थे इस तरह कि एक की ऊँगली दूसरे की पेशानी से चस्पा थी जिसे तलवार के ज़रिये अलहैदा किया गया और बे इन्तेहा खून बहा , जिसे नजूमियों ने बाहमी खूँरेज़ जंग से ताबीर किया। यह पेशिन गोई सही साबित हुई और दोनों खानदानों के दरमियान हमेशा मारकये कारज़ार गर्म रहा जिसका इख़तेताम बनि उमय्या का चिराग़ गुल होने के बाद सन् 133 हिजरी में हुआ।

आतिका बिन्ते मर्राह वह खातून है जिनका बतने मुताहर उस गौहरे नायाब का सदफ़ बना , अबदे मनाफ के सबसे छोटे बेटे मुत्तलिब थे जो हाशिम के साथ सुल्बी व बतनी इत्तेहाद रखते थे। आप (हाशिम) का अस्ल नाम (उमरूलउला) और कुन्नियत अबु नज़ला थी। क्योंकि तीर अन्दाज़ी में आपको कमाल हासिल था और यह फन हज़रत इस्माईल (स.अ.व.व.) से विरासतन मिला था।

हाशिम अपने किरदार की बदौलत दिलों पर छा गये , आपके ज़ाती औसाफ ने तमाम कुरैश की अज़मत को सिर्फ मक्का और हिजाज़ में नहीं बल्कि अरब और उसके मज़ाफ़ाती इलाक़ों में भी इस्तेक़लाली हैसियत अता की। अरबों की सोई हुयी मुआशरत को बेदार किया और उनके नज़र के धारे को मोड़ने में अहम रोल अदा किया। आपका हर तारेनफस इस्माईली रिश्ते का मज़हर था और अकसर किसी बशीर की आवाज़ आपके कानों से टकराती थी कि ऐ हाशिम! तुम्हें मुबारक हो कि अशरफे मौजूदात का ज़हूर तुम्हारी ही नस्ल से होगा। ऐसा भी होता था कि तारीकी में आपके जिस्म से शुआयें निकलती थीं।

बरहना जिस्मों को लिबात अता करना , भूकों को शिकम सेर करना , मर्राह सलीमा से हुई थी।

बरहैना जिस्मों को लिबात अता करना , भूकों को शिकम सेर करना , तंगदस्तो की दस्तगीरी करना और क़र्ज़दारों का क़र्जा अदा करना आपका शेवा और मामूल था। इन्तेहा यह थी कि जब आप कोई दावत करते या ख़्वान बिछड़ते तो मेहमानों से जो कुछ बच जाता था वह घर वापस नहीं जाता था बल्कि ग़रिबों और मिस्कीनों में तक़सीम करस दिया जाता था। यही वह ख़त व खाल थे जिन्हें एक नज़र देखने के लिए क़ैसरे रोम और शाहे हबश की गर्दनें बुलन्द रहती थी और वह लोग अपने यहाँ अक़्द के ख़्वासतगार थे मगर आपकी अज़मत ने उसे पस्त समझा।

कुरैश का दौरे इरतक़ा अगर चे क़ुसई इब्ने कलाम के जमाने से शुरू होता है लेकिन वह इब्तेदा थी। उसूल इरतेका के मुताबिक एक ही वक्त में मुम्किन नहीं होती बल्कि कतरसे को गुहर होने तक बहुत से तूफान देखने पड़ते हैं। क़ुसई की लियाकत , सलाहियत और अहलियत का हर साहबे नज़र मोतरिफ़ है उन्होंने अपनी कारगुज़ारी के दौर में गुजिशता गुमशुदा अजमतों को पाने के लिए मुल्क व क़ौम की बहबूदी पर मुनहसिर , तरतीबे निजाम की ख़ातिरस बहुत की कारआमद तदबीरें सोची और बेशतरस को जामेए अमल पहनाने में कामयाब भी हुए लेकिन हक़ीक़त यह है कि आपकी सारी तदबीरे और तजवीज़े हाशिम के हाथों नुक्तए कमाल तक पहुँचीं।

हरम के इन्तेज़ामी मुआमलात के बारे में हाशिम के दादा क़ुसई ही के ज़माने से कुछ शिकायतें चली आ रहीं थीं , अब्दुल दार के दौर में भी शिक़ायते ब-दस्तूर रहीं और रफ्ता रफ्ता जब उनमें अबतरी पैदा हुई तो जनाबे हाशिम ने मदाख़लत ज़रुरी समझी। अगर रहम का मुआमला न होता तो शायद आप यह इक़दाम न करते चुनानचे एक दिन आपने सब भाईयों को जमा किया और जो क़ाबिले इस्लाह उमूर थे उन्हें उनके पास रखा। चूँकि इस इकदाम मे हरम की खिदमत का बे लौस जज़बा कारेफरमां था इसलिए किसी ने मुख़ालिफत नहीं कि बल्कि सब इस बात पर मुतफ्फिक ग़र्ज़ कि हाशिम ने अपनी जमात को रिश्तए इत्तेहाद में मुन्सलिक करने के बाद , बनि अब्दुलदार को हरम की ख़िदमतों से दस्तबरदार होने का पैगा़म भेजा , उन लोगों ने इन्कार किया जिसकी बिना पर बाहम इख़तेलाफ़ात रुनूमां हुए यहाँ तक कि मारकए कारजार गर्म होने की सूरत पैदा होने लगी तो इन शरायत पर मुसालिहात हुई कि सक़ायत , रिफादत और दारूल नदवा के मनासिब हाशिम के पास रहे और हिजाबत व लिवाअ के मुआमलात को बनि अब्दुलदार देखें। इन तीनों ख़िदमतों को जिस खुश असलूबी से जनाबे हाशिम ने अन्जाम दिया वह इस्लाम की तारीख़ में यादगार है।

जनाबे हाशिम की क़ौमी ख़िदमात

कौन नाहमवार ज़हन ऐसा होगा जिसको अरब की बे सरो सामानी और बे माएगी का इल्म न हो। दुनिया जानती है कि इस दौर में यह वह इन्तेहाई मुफ़लिस और नादार थे और अपनी नादारी व बेनवाई की इस्लाह उनके बस की बात न थी और जब तक नादारी दूर न हो तमद्दुन व मुआशरती तरक़्क़ी हासिल नहीं हो सकती। यही वह हालत थी , जिसने जनाबे हाशिम जैसे हमदर्द को खड़े होने पर मजबूर कर दिया। आपने जंग खुरदा ज़ेहनों और दिलों को इकदाम व अमल से आशन किया। सूमसार ख़ौर क़ौम के दिल में नई उमंगों ने अंगड़ाई ली। अरसे दराज के बाद मज़बलों और गन्दगी के खण्डहरों मे नशोनुमा पाने वाले खयालात ने शाहीन के बाल व पर पैदा किये पस्ती , बुलन्दी की तरफ मायल हुई और रफ्ता रफ्ता मफ़लूकुलहाल क़ौम कारोबारी बन गयी। तमाम मशरिक़ी व मग़रीबी मुवर्रेख़ीन का इस अमर पर इत्तेफाक़ है कि परेशान हाल अरबों के दिलों दिमाग में व्योपार का शौक़ जनाबे हाशिम ने पैदा किया उससे क़ब्ल तिजारत बनि कतूरा , बनि सियारा और असहाब मदीन के दरमियान महदूद थीं।

यहाँ यह अमर काबिले तवज्जो है कि जनाबें हाशिम ने इस तारिकी के दौर में क़ौमी इस्लाह व बहबूद के लिए जो शाहराह तजवीज़ की वह आज के दौर में भी रहरवाने रह तर्की के पेशे नज़र हैं लेहाज़ा आसानी से यह नतीजा अख़ज़ किया जा सकता है कि क़ौमी ख़िदमत के लिए तक़रीबन ढेढ़ हज़ार साल क़लब हाशिमी नज़रियात इतने ही बुल-थें जितने कि आज किसी रिफारमर के हो सकते हैं।

अपनी क़ौम को तिजारत के रास्ते पर लाने के लिए जनाबे हाशिम ने अपना सरमाया भी लगाया और उनकी मुन्तशिर जमाअत को रिश्तेए इत्तेहाद में मुनसलिक ककरसे इन्सानियत का गुलदस्ता तैय्यार किया। तिजारत क़ाफिले तरतीब देने के बाद उनकी नक़ल व हरकत के उसूल मुय्यन किये। साल में दो बार मुख़तलिफ़ सिमतों में तिजारती सफर का दस्तूर मुरत्तब किया चुनानचे यह काफिले जाड़ों के दिनों में यमन व हब्शा जाते थे और गर्मियों में शाम और मज़ाफ़ात में तिजारत करते थे। इसी बिना पर जनाबे हाशिम को (ईलाफे कुरैश) कहा जाने लगा। यानि उनकी कोशिशों से बेजान क़ौम रेंगने और दौड़़ने लगी। कुरान ने भी इन समाईये जमीलो को महफूज किया और सूरये कुरैश यह कहता हुआ नाज़िल हुआ कि रसूल (स.अ.व.व.) के जद की बदौलत तुम को आज यह देखना नसीब हुआ , उसके बाद जद्दे हाशिम ने तुममें कुवते अमल बैदा की , सर्दी व गर्मी के दो सफर मुकर्रर करके तुम्हें सर्द व गर्म माहौल से रुशनास कराया , नशेब व फराज़ की ज़िन्दगी से आशना किया , बहशते सरां को मामूरए उलफ़्त बनाया , मुफलिसी व नादारी को शेर शिकमी से बदला , फिर इस कारसाज़ की तरफ क्यों नहीं झुकते ? जबीने अबुदियत को उसकी चौहकट पर ख़म क्यों नहीं करते ? दादा की बदौलत तुम को माद्दी राहत नसीब हुयी है तो उसके पोते के रूह पर परवर पैगा़म से नफ़से मुतमयिन्ना की मंज़िल पर क्यों नहीं पहुँचते ?

इसमें कोश शक नही कि जनाबे हाशिम की कोशिशों का नतीजा यह हुआ कि थोड़े ही दिनों मे कुरैश के हालात में नुमायां तौर पर तर्की और सुधार हुआ और उसके बाद वह लोग ख़ुद ही कारोबार में हमातन मसरूफ हो गये मगर उशके बावजूद हाशिमी करम उनका कफील व निगरां रहा। तबकाते इब्ने साद में है कि मक्का में कई साल मुतावातिर कहत पड़ा यहाँ मुसीबत को टालने के लिए हाशिम ने शाम का सफर इख़ितयार किया और वहाँ से गल्ला ख़रीदा , रोटियां पकवायी और उन्हं ऊँटों पर लाद कर मक्का की उस मख़लूक के सामने लाये जो मौत के साये में अपनी साँसे गिन रही थी। जिन ऊँटों पर फाख़ा काशों की ज़िन्दगी की बज़ाअत लद कर आयी थी उन्हें ज़िबह किया और उनके गोश्त से क़ोरमा तैयार कराके शाम से लायी हुई रोटियों को उसमें भिगवाया इस तरह सरीद तैयार हुयी जो अहले मक्का की शिकम सेरी का सबब बनी। यही ईसार था जिसने आपको हाशिम का ख़िताब दिया। हशम के माने तोड़ने के हैं और चूँकि आपने रोटियां तुड़वा कर सरीद तैयार कराया था इसलिए हाशिम कहलाये।

ख़ुदा ने आपकी नस्ल को गै़रफानी बुलन्दी अता की , चुनानचे बुख़ारी , मुस्लिम और तिरमिज़ी वग़ैरा में हज़रत आयशा से मरवी है कि पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने फरमाया , जिबरील का कहना है कि मैंने तमाम आलम छान डाला मगर किसी को ख़ुदा के हबीब से बेहतर व अफ़ज़ल नहीं पाया और ज़मीन का चप्पा चप्पा देख डाला मगर बनि हाशिम से बेहतर कोई खानदान नहीं मिला। क़ाज़ी अयाज़ ने (शिफाअ) में लिखा है कि ख़ुदा ने औलादे इब्राहीम में इस्माईल को , इस्माईल में कुरैश को और कुरैश में बनि हाशिम को पसन्द किया।

जनाबे हाशिम ने अपनी शादी अपने ही खानदान की एक ख़ातून से की थी मगर जब ज़िन्दगी के अवाखिर मे जब मदीने गये तो वहां क़बीले बनि अदी मेंम नजार की एक खातून से अक़द किया और वहीं अब्दुल मुत्तलिब (शीबा) की विलादत हुई। अब्दुल मुत्तलिब अबी आगोशे मादर ही में थे कि 510 में जनाबे हाशिम ने दुनिया को खैराबाद कहा और शाम में ग़ज्ज़ा के मुक़ाम पर दफ्न हुए।

हज़रत अब्दुल मुत्तलिब

आप हाशिम के जलीलुल क़दर साहब ज़ादे थे , सन् 467 में पैदा हुए वक्ते पैदाइश चूँकि आपके सर में जॉबजां सफेद बाल थे इसलिए आपकी मादरे गिरामी ने आपका नाम शीबा रका जो बाद में शीबतुल हम्द हुआ शीबा को अमद से इसलिए मुज़ाफ किया गया कि आपमें ममदूह होने की बे इन्तेहा अलामतें और सलाहियतें आशकार थीं।

आपके अलक़ाब आमिर , सैय्यदुल बतहा , साक़ियुल हज , साक़ियुल नीस , ग़ैसुल वरा , अबुल सादतुल अशरा और हफिरे ज़मज़म वग़ैरां हैं जो आपकी अज़मत और बुलन्द कारनामों के आईनये दार हैं।

आपका मशहूर व मारूफ नाम अब्दुल मुत्तलिब है जिसकी वजह तसमिया के बारे में कहा जाता है कि जब आप छः बरस या सात साब के थे तो खानदाने अबदे मनाफ का एक शख्स मदीने आया वहाँ उसने देखा कि कुछ नौ उम्र बच्चे तीर अन्दाज़ी में मसरूफ हैं उनमें एक ख़ूबसूरत बच्चा जब तीर चलाता है और वह निशाने पर पड़ता है तो वह कहता है कि मैं रईस बतहा का बेटा हूँ मैं हाशिम का फरज़न्द हूँ। यह सुनकर वह शख़्स क़रीब आया और बच्चे से पूछा कि तुम कौन हो ? जवाब मिला कि मैं शीबा बिन हाशिम बिन अबदे मनाफ हूँ। चुनानचे जब वह शख्स मदीने से मक्का आया तो उसने हाशिम के हक़ीक़ी भाई मुत्तलिब से सारा वाक़िया ब्यान किया मुत्तलिब उसी वक़्त एक तेज रफतार नाक़े पर सवार हो कर मदीने आपये और अपने भाई की यादगार को देखा तो तक़ाज़ा-ए-मोहब्बत की बिना पर बे अख़तियार रो पड़े। एक दिन वहाँ क़याम किया और दूसरे दिन अपने भावज की इजाज़त से भतीजे को साथ लेकरस मदीने वापस आये। अहले कुरैश ने शीबा को देखा तो कहने लगे मुत्तलिब अपने हमराह मदीन से गुलाम ले कर आये हैं। गर्ज़ कि उसी दिन से शीबा का नाम अब्दुल मुत्तलिब हुआ जो इस क़दर मशहूर हुआ कि लोग असल मान को भूल गये।

अब्दुल मुत्तलिब की वालिदा सलमा बिन्ते अम्र बिन ज़ैद बनि निजार के क़बीले ख़िज़रिज की एक मुम्ताज़ व पाकबहाज़ खातून थीं जिनकी अज़मत व शरफ के बारे में इब्ने हुश्शाम का कहना है कि (सलमा बिन्ते उमरू अपनी क़ौम में इन्तेहाई शरफ व अज़मत की मालेका थी इसीलिए वह कहा करती थी कि मैं उस वक़्त शादी नहीं करूँगी जब तक मेरा शौहर मेरी यह शर्त कुबूल नहीं करेगा कि वह मुझे मेरे उमूर में खुदमुख़्तार रहने वाले और मेरे मुआमलात में बेजा दखल अन्दाज़ा न करे।)

अल्लामा हलबी तहरीर फरमातें है कि हाशिम अपने एक तिजारती सफर के दौरान मदीने गये तो आप ने सलमा बिन्ते अम्र से इस शर्त पर शादी की कि जब विलादत का मौक़ा आयेगा तो वह अपने मैके में रहेगी। शमसुल ओलमा नज़ीर अहमद साहब फरमाते हैं कि उन्हीं खातून के बतन से एक वावाक़ार लड़का पैदा हुआ जो लोग आगे चलकर शीबतुल हमद और अब्दुल मुत्तलिब के नाम से मशहूर हुआ। यह लड़का अभी दूध पीता था कि हाशिम का पैमानए हयात छलक गया और वह अपने होनहार फरज़न्द को माँ की गोद में छोड़कर आलमे आख़रत का सफर इख़तियार करस गये।

मुवर्रेख़ीन का कहना है कि सात बरस तक अब्दुल मुत्तलिब अपनी वालिदा की आगोशे तरबियत में रहे उसके बाद वह अपने चचा मुत्तलिब के सायए आतफत में पले बढ़े और जवान हुए। ग़र्ज़ उम्र की इब्तेदायी मंज़िलें तय करके जब आप सिनेशऊर को पहुँचे तो फ़ज़ाएल व कमालात और शरफ व बुजुर्गों में अपने बाप हाशिम का आईना बन गये। कहा जाता है कि आप मुजीबुल दवात भी थे। आपने अपने ऊपर शराब समेत तमाम मुनशियात को हराम कर लिया था।

अब्दुल मुत्तलिब पहले शख़्स हैं जिन्होंने इबादत के लिए कोहे हरा का इन्तेख़ाब किया। सियर की किताबों में हैं कि आप माहे रमज़ान में गर छोड़कर कोहे हरा पर चले जाते थे और आलमें तन्हाई में ख़ुदा की वहदानियत , जलाल व अज़मत और सिफात व कमालात पर ग़ौर व फ़िक्र किया करते थे गुरबा व मसाकीन में निहायत व कमालात पर ग़ौर व फ़िक्र किया करते थे गुरबा व मसाकीन में निहायत कुशादा दिली और सेर चश्मी से खाना तक़सीम करते यहाँ तक कि आप के दस्तर ख़्वान से परिन्दों के लिये भी खाना उठाया जाता और पहाड़ की बुलन्दी पर फैला दिया जाता। इसीलिए आप को (मुत्तइमुल तैर) भी कहा जाता था।

तजदीदे ज़मज़म

जनाबे अब्दुल मुत्तलिब की ज़िन्दगी में एक बड़ा वाक़िया दोबारा चाहे ज़मज़म का बरामद होना है। इसके बारे में मोवर्रेख़ीन ने बड़ी बड़ी ज़मज़म का बरामद होना है। इसके बारेमं मोबर्रेख़ीन ने बड़ी बड़ी मूशिगाफ़ियां की हैं मगर असल वाक़िया यह है कि अब्दुल मुत्तलिब को इस अम्र की बशारत हुई कि इस्माईल (अ.स.) की याद को ताज़ा करो और उनके फैज़ को फिर जारी करसो बशारत देने वाले ने इस जगह की निशानदेही भी करस दी जो हवादीसे ज़माने से तहे ख़ाक हो चुकी थी तो आप अपने फरज़नद हारिस को लेकर वहाँ पहुँचे , उस वक़्त आपके यही एक फरज़न्द थे जिनकी वजह से आपकी कुन्नियत अबुल हारिस क़रार पायी। ग़र्ज़ कि आपने अपने फरज़न्द की मदद से उस मुक़ाम को ख़ोदना शुरू किया जब आसारे ज़मज़म नज़र आये और कुरैश को ख़बर हुई तो उन्होंने उस काम मे आपकी इनफ़रादियत को पसन्द नहीं किया , अपनी इशतेराकियत का सवाल उठाया और आमादा फसाद हुए। एक तरफ़ कुल कुरैश थे और दुसरी तरफ जनाबे अब्दुल मुत्तलिब तन्हा। चुनानचे मौक़े की नज़ाकत को नज़र में रखते हुए आपने यह तजवीज़ पैश की कि किसी को हकम बना लो जो वह कहे उस पर हम दोनों अमल करं। फैसला हुआ कि सईद बिन ख़ीसमा काहिन के पास चलो , जो शाम में रहता है वह जो कुछ भी तय कर देगा हम लोग उस पर अमल करेंगे। ग़र्ज़ कि कुरैश के हर क़बीले से एक एक करके 70 आदमी मुनतख़िब हुए दूसरी तरफ आले अबदु मनाफ से तेरह आदमी जनाबे अब्दुल मुत्तालिब के हमराह हुए और यह क़ाफ़िला चश्मों क़दम के साथ मक़्का से शाम की तरफ रवाना हुआ। अभी दो ही मंज़िलें तय हुयी थीं कि शाम व हिजाज़ के दरमियानी सहरा मे अब्दुल मुत्तालिब और उनके हमराहियों के पास अचानक पानी का ज़खीरा ख़त्म हो गया। हौलनाक सहरा में न तो कोई कुआँ था और नहीं कोई चश्मा था कि पानी की फराहमी मुम्किन हो सकती। प्यास की शिद्दत ने रफ्ता रफ्ता जनाबे अब्दुल मुत्तलिब और उनके साथियों को मौत के दहाने पर लाकर खड़ा कर दिया। अब ज़िन्दगी और मौत का सवाल था इसलिए जनाबे अब्दुल मुत्तालिब (अ.स.) ने मजबूरन फीरक़े मुख़लिफ़ से पानी तलब किया मगर उन लोगों ने साफ इन्कार कर दिया। इस मायूसी के बाद , जब अब्दुल मुत्तालिब ने यह महसूस किया कि अब मौत यकीनी है तो उन्होंने अपने साथियों से फरमाया कि अब तुम लोगों की क्या राय है ? लोगों ने कहा हम आपके हुक्म के पाबन्द है , जो बेहतर हो वह तरीक़ा इख़ितयार करें। फरमाया , मेरे ख़्याल में मुनासिब होगा कि तुम लोगों में हर शख़्स अपने लिए एक क़ब्र तैयार करे और मरने के बाद तमाम साथी उसको उस कब्र में दफ्न करें यहाँ तक कि आख़िर में एक शख़्स रह जायेगा तो उसकी मय्यत का ज़ाया होना तमाम मय्यतों के ज़ाया होने से बेहतर है। इस हुक्म की सब लोगों ने तामिल की और जब कब्र तैयार हो गयी तो मौत की मुन्तज़िर प्यासों की यह जमाअत लबे गोर बैठ गयी। जनाबे अब्दुल मुत्तलिब ने कहा कि कब्र में पाओं लटका कर बैठने से बेहतर है कि पानी फराहमी की एक आख़िरी कोशिश हम और करें , अगर पानी मयस्सर नहीं होता तो यह कब्रें मौजूद ही हैं। इक़दाम जुस्तुजू का यह आख़िरी क़दम उठाना था कि मसलहते ऐज़दी में आयी और सहरा का जिगर पसीज गया। देखन वालों ने देखा कि जनाबे अब्दुल मुत्तालिब सवार होके चले ही थे कि नाक़े के पाओं के नीचे से आबे हयात उबल पड़ा , पानी का निकलना था कि आपने नारए तकबीर बुलन्द किया। किश्ते ज़िन्दगानी में जान आ गयी , डूबी हुयी नबज़ें उभरने लगी , बैठा हुआ दिल जवान हो गया सभी ने खूब जी भर के पिया और अपनी मशकें भरी। अब्दुल मुत्तालिब ने कुरैश से भी कहा कि तुम लोग भी सेराब हो लो और अपनी मशकें भर लो क्योंकि मंज़िल अभी दूर है और उसके बाद इस सेहरा में पानी का अब सवाल नहीं। (ग़र्ज़ कि उन लोगों ने भी पिया और मशकें भरी लेकिन इस एजाज़े ख़ुदा वन्दी ने उनकी आँख़ें खोल दी उन्होंने कहा , ऐ अब्दुल मुत्तालिब! आबे ज़मज़म के बारे में तुम से झग़ा फुजूल है , ख़ुदा ने ख़ुद फैसला तुम्हारे ही हक में कर दिया और तुम्हें फ़तेह दे दी लेहाज़ा यही से वापस चलो और चाहे ज़मज़म पर शौक़ से क़ब्ज़ा करो हम लोग इससे दस्तबरदार होते हैं। चुनानचे दोनों फ़रीक़ उसी मुक़ाम से पलट आये और चाहे ज़मज़म जनाबे अब्दुल मुत्तालिब के हक़ में छोड दिया गया।

वापस आने के पाद आपने फिर ख़ुदाई शुरू की। यहाँ तक कि पानी के साथ साथ उसमें से दो अदद सोने की हिरनियां दो जिरेहं और दो तलवारें भी बरामद हुयीं जो क़बीलए जरहम मक्का से तर्क वतन करते वक़्त उसी में छोड़ कर कनकारों और पत्थरों से उसे पाट गया था। हिरनियों , ज़िरहों और तलवारों को देखकर अहले मक्का ने आप पर फिर हुजूम किया और कहा , इसमें हमारा भी हिस्सा है , जनाबे अब्दुल मुत्तालिब ने इन्कार किया मगर जब यह लोग न माने तो आपने फरमाया कि इसका फैसला कुरा या फाल के ज़रिये करलो। उन्होंने पूछा किस तरह ? फरमायाः कि दोनों हिरनियां अलग , जिरहें अलग और तलवार अलग रख दी जाये फिर दो तीर खान-ए-काबा की तरफ से , दो तुम्हारी तरफ से और दो हमारी तरफ से उन पर चलाये जायें जिसका तीर जिन चीज़ों पर लगे वह उसे ले जाये। ग़र्ज़ कि इस तजवीज़ पर सब राज़ी हुए चुनानचे जब तीर चलाये गये तो खान-ए-काबा की तरफ से फेंके गये दोनों तीर दोनों हिरनियों पर लगे और जनाबे अब्दुल मुत्तालिब के दोनों तीर ज़िराह और तलवार पर लगे , मुख़ालेफ़ीन ने जितने तीर चलाये वह सब खाली गये इस तरह उन्हें अब्दुल मुत्तालिब के मुक़ाबले में दूसरी शिकस्त का मुंह देखना पड़ा।

अब्दुल मुत्तालिब ने दोनों तलवारें खान-ए-काबा में बैरूनी फाटक पर लटका दीं और दोनों हिरनियों को तोड़कर उसके टुकड़े खान-ए-काबा के अन्दर आवेज़ान कर दिये। यह पहला सोना था जो जनाबे अब्दुल मुत्तालिब के हाथों हराम की ज़ीनत बना। तारीख़े कामिल में है कि दोनों हिरनिया उसी तरह खान-ए-काबा में रख दी गय जो बाद में चोरी हो गयीं।

ग़र्ज़ कि चाहे ज़मज़म की तजदीद हयाते अब्दुल मुत्तालिब का बहुत अज़ीम कारनामा है जिसे तारीख़ नज़र अन्दाज़ नहीं कर सकती। इसके ज़ैल में रूनुमा होने वाली मुख़ालिफ़त से जनाबे अब्दुल मुत्तालिब ने यह भी महसूस किया था कि बात बात पर कुरैश आपसे परसरे पैकार होने की कोशिश करते हैं तो आपने ख़ुदा का बारगाह में यह दुआ की कि ऐ पालने वाले! अगर तू मेरी हिमायत के लिये मुझे दस फरज़न्द अता कर दे तो मैं एक को तेरी राह में कुर्बान कर दूँगा।

यह कलेमात अब्दुल मुत्तालिब की दिल की गहराइयों से निकले थे इस लिए ख़ुदा ने उन्हें शरफे कुबूलियत से सरफराज़ करते हुए आपको दस औलादें अता करस दी जिन्हें तारीख़ हारिस , जुबैर , हजल , ज़रार , मुक़ीम , अबुलहब , अब्दुल्लाह , अबुतालिब , हमज़ा और अब्बास के नामों से याद करती है। यह औलादें मुख़तलिफ़ अज़वाज़ से थी जबकि अबदुल्लाह और अबुतालिब की वालिदा फात्मा बिन्ते उमरू थी।

जनाबे अब्दुल्लाह की कुर्बानी

फरज़न्दाने अब्दुल मुत्तालिब जब जवानी की सरहदों में दाखिल हुए तो आपको ख़ुदा की बारगाह में किये हुए अपने वायदे को वफा करने का ख़्याल आया , चुनानचे आपने अकाबरीने मक्का को जमां किया और उनके सामने अपने फरज़न्दों को तलब ककरे उनसे फरमाया कि तुम सब लोग मुझे दिल व जान से अज़ीज़ हों लेकिन खुदा का हक़ मुक़द्दम है मैंने अपने परवरदिगार से दुआ की थी कि अगर उसने मुझे दस फरज़न्द अता किय तो उनमें से एक को मैं उसकी राह में कुर्बान कर दूँगा। मेरी दुआ उसने कुबूल कर ली है , अब मुझे अपना वादा भी वफा करना है , लेहाज़ा तुम लोगों का इस बारे में क्या ख़्याल है ? यह सुनकर सभों ने सुकूत इख़तियार किया लेकिन एक में नूरे रिसालत अब्दुल्लाह जिनकी उम्र अभी सिर्फ ग्यारह साल की थी अपनी जगह से उठ खड़े हुए और उन्होंने वही जवाब दिया जो उनके जद इस्माईल (अ.स.) ने अपने वालिद हज़रत इब्राहीम (अ.स.) को दिया था , फरमायाः बेशक ख़ुदा का हक़ मुक़द्दम है और हम इसके अदा करने पर साबिर व शाकिर और रज़ामन्द हैं।

कमसिन शहज़ादे का यह जज़ब-ए-ईसार देखकर खुद जनाबे अबदुल्लाह का दिल भर आया यहाँ तक कि आपकी रेशे मुबारक आँसूओॆ से तर हो गयी। फिर आपने दीगर फरज़न्दों से दरयाफ्त किया कि तुम लोग इस सिलसिले में क्या कहते हो ? सभों ने एक ज़बान हो कर तसलीम व रज़ा का मुज़ाहेरा किया और कहा हम तहे दिल से राज़ी हैं , आप हमसे जिसे चाहे बारगाहे ईज़दी में कुर्बान कर दें। आपने इज़हारे शुक्र किया और फरमाया कि तुम लोग अपनी माओं से रूख़सत हो लो और उन्हें हक़ीक़ते हाल से आगाह भी कर दो।

ग़र्ज़ कि तमाम साहबज़ादे अपनी अपनी माओं से रूख़सत हो करस इकट्ठा हुए। और जनाबे अब्दुल मुत्तालिब उन्हें लेकर खाना-ए-काबा में आये कुरानदाज़ी के ज़रिये अपने ज़बीह का इन्तेख़ाब करना चाहा तो जानिबे आसमान हाथ बुलन्द करके फरमायाः- पालने वाले! तू जानता है कि मैने तेरी बारगाह में दुआ की थी कि अगर दस फरज़न्द मुझे अता हुए तो एक को तेरी बारगाह में कुर्बाह करूँगा , लेहाज़ा अब वक्ता आ गया है , अपने नूर से तारीकी का पर्दा चाक कर दें और नविश्तए वाज़ेह कर दे , मेरे माबूद! तेरी जुमला अमानतें तेरी बारगाह में मौजूद है जिसे चाहे अपने लिए मुन्तखब फरमा ले।

इसके बाद कुरान्दाजी हुई और कुरा जनाबे अब्दुल्लाह के नाम निकला। अब्दुल मुत्तालिब की आँखों में अँधेरा छा गया , सब औलादें गिरया व ज़ारी करने लगीं , सबसे ज़्यादा असर जनाबे अबूतालिब (अ.स.) पर था क्योंकि उनके हक़ीक़ी भाई थे चुनानचे आपने अब्दुल मुत्तलिब से कहा , बाबा जान , क्या यह नहीं हो सकता कि मेरे भाई अब्दुल्लाह के बजाये आप मुझे ज़िबह कर दें ? जनाबे अब्दुल मुत्तालिब ने जवाब दिया , बेटा! हुक्मे इलाही के खिलाफ मैं कुछ नहीं कर सकता।

अकाबरीन व अमाएदीने मक्कासे भी यह दर्दनाक मन्ज़र न देखा गया चुनानचे उन लोगों ने भी सैय्यदुल बतहा जनाबे अब्दुल मुत्तालिब से दरख़्वास की कि फिर एक बार कुरानदाज़ी कीजिए शायद किसी और के लिए निकले लेकिन दूसरी बार जब फिर अब्दुल्लाह ही के नाम कुरा निकला तो जनाबे अब्दुल मुत्तालिब (अ.स.) ने मज़ीद ताखीर को अज़्म व इस्तेकलाल के मुनाफी समझा और हामिले नूर रिसालत को ले कर कुर्बान गाह की तरफ रवाना हुए , आपके पीछे पीछे एक अज़ीम मजमा भी चला , कुर्बानगाह में पहुँचकरस आपने जनाबे अब्दुल्लाह को ज़िबह करने की ग़र्ज से लिटाया ही था कि चारों तरफ से फ़रयाद व फुग़ां की आवाजे बुलन्द होने लगीं इतने में मजमे को चीरता हुआ एक बुजुर्ग सामने आया जिस का नाम अकरमा बिन आमिर था। पहले उसने मजमे को इशारे से खामोश किया फिर अर्ज़ किया कि ऐ अब्दुल मुत्तालिब! आप सैय्यदुल बतहा है अगर आप कने अब्दुल्लाह को जबह कर दिया तो यह सुन्नत बन जाएगी और अन्जाम की ज़िम्मेदारी आप पर होगी। जनाबे अब्दुल मुत्तलिब ने फरमाया कि क्या मैं अपने परवरदिगार को नाराज़ करूँ ? अकरमा ने कहा हरगिज़ नहीं। मैं चाहता हूँ कि आप इस मसअले में किसी काहिन से बी मशविरा फरमा ले , शायद अब्दुल्लाह के बचने की कोई तरकीब निकल आये। अकरमा की इस बात पर तमाम हाजेरीन में इत्तेफाक किया और जनाबे अब्दुल मुत्तालिब को मजबूर किया कि इ्कदामें ज़बीह से कबल आप अकरमा की राय पर अमल ज़रुर करें।

शायद मसलेहतन और मशीयते इलाही का तकाजा भी यही था कि आप अकरमा के मशविरे को नजर अन्दाज न करें। बहरहाल एक बड़े मजमे के साथ अकरमा जनाबे अब्दुल मुत्तालिब और जनाबे अब्दुल्लाह को लिए हुए एक काहिन के पास आया और उसको तमाम हालात से मुत्तेला किया। उसने जनाबे अब्दुल्लाह को देखकर कहा इस लड़के का मर्तबा तमाम आलम पर बुलन्द हो कर रहेगा मैं इसकी रेहायी का तरीक़ा बतात हूँ , यह बताओ कि तुम्हारे यहाँ दैत कितनी है ? अकरमा ने कहा दस ऊँट। उसने कहा कि जाओ और दस ऊँट पर कुरा डालो और बराबर दस दस ऊँटों का इज़ाफ़ा करते रहो यहाँ तक कि सौ ऊँट पर कुरानदाज़ी करो , अगर उस पर भी कुरा अब्दुल्लाह ही के नाम निकले तो फिर उन्हें जबहे करना।

दूसरा दिन नमूदार हुआ , हज़रत अब्दुल मुत्तालिब फरज़न्द को साथ लेकर खान-ए-काबा में फिर तशरीफ लाये , सात मर्तबा तवाफ किया , तकमीले मक़सद की दुआ और जो वहाँ मौजूद थे उन्हें मुतावज्जे करते हुए फरमाया कि आज आप लोग मेरी कुर्बानी में दख्ल न दें।)

कुरा की कार्रवायी शुरू हुई पहले दस ऊँटों और अब्दुल्लाह के दरमियान कुरा डाला गया नतीजा जनाबे अब्दुल्लाह के हक़ में रहा , फिर दस दस ऊँटों का इज़ाफ़ा होता रहै और कुरा अब्दुल्लाह ही के नाम निकलता रहा , यहाँ तक कि सी का अदद मुकम्मल हुआ , मशियतें ईज़दी का रूख बदला , हैवानी कसरत इन्सानी वहदत का फ़िदयां नबी , कुरा ऊँटों के नाम निकला लेकिन अब्दुल मुत्तलिब का जज़ब-ए-कुर्बानी अभी मुतमईन नहीं हुआ आपने फरमाया , एक बार और कुरा डाला जाये , शायद कोई फरोगुज़ाश्त हो गयी हो , दूसरी बार फिर कुरा ऊँटों ही पर निकला तो इत्मिनान हासिल हुआ और बारगाहे ईजदी में जनाबे अब्दुल्लाह के बदले सौ ऊँटों की कुर्बानी पेश कर दी गयी। इस कुर्बानी ने इन्सानियत के दर्जे को दस गुना बुलन्द करस दिया क्योंकि पहले दैत दस ऊँटों की थी , अब सौ की हो गयी।

ख़ान-ए-काबा पर हमला

ख़ान-ए-काबा पर अबरहा की फौज कशी , हज़रत अब्दुल मुत्तालिब के अहद का अहम तरीन वाक़िया है। उसके बारे में मवर्रेख़ीन का ब्यान है कि-अबरहतुल अशरम (यमन का ईसाइ बादशाह) एक हासिद व मुतासिब इन्सान था उसने हसद और तास्सुब की बिना पर खान-ए-काबा की अज़मत व जलालत को कम करने नीज़ उसके विकार को घटाने के लिये यमन के दारूल हुकूमत सनआ में कुलीस नामी एक बहुत बड़ा गिर्जा बनवाया था , अब्ने साद का कहना है कि इस इमारत की तामीर मे सुर्ख , सफेद , जर्द और सियाह पत्थरों का इस्तेमाल हुआ था और यह इबादत गाह सोने चाँदी से मुजल्ला और हीरे जवाहरात से मुरस्सा थी। उसके दरवाजों पर सोना मढ़ा हुआ था जिन पर ज़रीं गुल मेखें जड़ी थीं और उसके सहन में एक बहुत बड़ा याकूत नसब था जो दुआओं का मरकज़ था। इस अजीमुश्शान इमारत की तैयारी के बाद अबरहा ने अहले यमन को हुक्म दिया था कि तमाम लोग मौसमें हज में खान-ए-काबा के बजाये इसी इबादत गाह का हज और तवाफ किया करेंगे चुनाचे अकसर क़बाएले अरब कई साल तक उसका हज और तवाफ करते रहे। मुनासिक भी यही अदा होते थे और इबादत व रियाज़त के लिए मुतअदि्द अफराद उसमें मोअतकिफ के ओहदों पर मामूर थे।

बैतुल्लाह पर अबरहा की फौजेकशी का सबब अकसर मोअर्रेख़ीन ने यह तहरीर किया है कि क़बीलए बहनि कनान का एक शख़्स मक्के मोअज़्ज़मा से सेनआ गया और वहाँ उसने उस गिरजा घर में रिसायी करके जारूब कशी की खिदमत अन्जाम देने लगा। कुछ दिनों बाद ब उसे एक रात फ़राहम हुआ तो उसने उसमें जॉबजा पैखाना व पेशाब किया और उसके तक़द्दुस को गन्दगी व ग़लाज़त से आलूदा करके वहाँ से भाग खड़ा हुआ। जब अबरहा को ये हाल मालूम हुआ तो वह इन्तेहाई ग़ज़बनाक हुआ और उसने ख्याल किया कि अरब के लोग जिनके दिल काबा की तरफ मायल हैं उस इबादत गाह से अदावत व कदूरत रखते हैं। और जब तक काबा निसमार न होगा इस इमारत की अजमत व बुज़ुर्गी में इज़ाफा मुमकिन नहीं है। चुनानचे वह इसी फिक्र में था कि ख़ान-ए-काबा पर किस अन्दाज़ से हमला किया जाये कि इसी असना में एक वाक़िया और नमूदार हुआ वह यह कि अरबों का अक काफिला तिजारत की ग़रज़ से वहाँ पहुँचा और इत्तेफ़ाक़ से उसी गिरजा से मुलहक पज़ीर हुआ। रात में उन लोगों ने खाना पकाने की गरज से आग रौशन की , हवा तेज थी जिसकी वजह से चिन्गारियां उड़कर इबादत गाह में दाखिल हुई और सारा साज़ व सामान जल कर खाक हो गया। यह हाल देखकर क़ाफ़िला तो वहाँ से फरार हो लिया मगर चूँकि यह नुकसान भी अरबों ही कि वजह से हुआ था इसलिए अबरहा के दिल में इन्तेक़ाम के शोले भड़क उठे और उसने तहय्या कर लिया कि जब तक वह अहले मक्का की इबादत गाह (खान-ए-काबा 0 को नेस्त व नाबूद नहीं कर देगा चैन से नहीं बैठेगा। चुनानचे उसने मुकम्मल तैयारी की और एक लाख दरिन्दा सिफत इन्सानों की फौज जिसमें चार सौ जन्गजू हाथी भी शामिल थे लेकर मक्के की तरफ़ चल पड़ा। और फौज़ों का यह सियाह बदल कोह व दश्त को अबूर करता हुआ सरज़मीने बतहा पर वारिद हुआ।

फौजो की कसरत और हाथियों का जमे ग़फीर देखकर अहले मक्का इस क़दर खौफज़दा और परेशान हुए कि जाये आफियत की तलाश में पहाड़ों की तरफ भागने लगे। पासबाने रहम हज़रत अब्दुल मुत्तालिब ने उन्हें तसल्ली व तशफी देते हुए फरमाया कि तुम लोग घबराओ नहीं अल्लाह के घर को कोई नुकसान नहीं पहुँच सकता उसका वही निगेहबान है और उसकी ताक़त व तवानायी के सामने अबरहा की फौज कोई हक़ीक़त व अहमियत नहीं रखती। अगर तुम पहाड़ों के बजाये हरम ही को जाये आफियत बनालो तो तमाम आफतों से महफूज रहोगे। मगर इस तसल्ली व तशफ़्फ़ी और यकीन दहानी के बावजूद लोगों के उखड़े हुए कदम अपनी जगह जम न सके और सब बैतुल्लाह को दुश्मनों के नरग़े में छोड़कर भाग खड़े हुए। सिर्फ किलीद बरबाद काबा अब्दुल मुत्तलिब और आपके घराने के अफ़राद रह गये।

खान-ए-काबा और उसके गिर्द व पेश के माहौल को वीरान व सुनसान देखकर हज़रत अब्दुल मुत्तलिब का दिल तड़प उठा चुनानचे आपने बारगाहे इलाही में अर्ज़ की कि ऐ पालने वाले! अब हमारा तू ही मुईन व मददगार है और खान-ए-काबा तेरा घर है तू ही इसकी हिफाज़त फरमा और तमाम आफ़तों से उसे महफूज़ रख।

इधर हज़रत अब्दुल मुत्तालिब की यह दुआ तमाम हुई और उधर पेशानिए कुदरत पर अबरहा और उसकी फौज के लिए क़हर व ग़ज़ब की शिकने नमूंदार होना शुरू हो गयी।

दूसरे दिन हज़रत अब्दुल मुत्तालिब को यह इत्तेला मिली की अबरहा के सिपाही आपके ऊँट जिनकी तादाद दो सौ थी ज़बरदस्ती अपनी फौज में हांक ले गये जो मक्के से एक मंज़िल के फासले पर खेमाज़न है तो आपने बड़े पुर एतमाद लहज़े में फरमाया कि मेरे नाक़ों में वह नाक़ें भी शामिल हैं जो अल्लाह की अमानत हैं और जायेरीन हरम की तवाज़े की ख़ातिर मख़सूस हैं मैं बहर हाल वापिस लूंगा। यह कहकर आपने दोश पर रिदा डाली और एक नाक़े पर सवार हो गये। अज़ीज़ों ने पूछा , कहाँ का इरादा है ? फ़रमाया , मैं अबरहा से मिलना चाहता हूँ जिसके सिपाहियों ने अल्लाह के माल पर क़ब्जा किया है। लोग सद्देराह हुए मगर उस मुजस्समये इस्तेक़लाल ने कहा , मैं अन्जाम से बाख़बर हूँ 1 मुझे जाने दो।

ग़र्ज कि हज़रत अब्दुल मुत्तालिब अबरहा के लश्कर की तरफ रवाना हुए और जब वहाँ पहुँचे तो मुख़ालेफ़ीन में एक हलचल मच गयी। जिसने देखा वह दम बखुद और हैरतज़दा रह गया। किसी ने पूछा , ऐ नूरे मुजस्समा! तुम कौन हो ? अपने नाम बताया और फरमाया कि मैं अबरहा से मिलना चाहता हूँ। दरबानों ने उसे मुत्तेला किया , उसने बारयाबी की इजाज़त दी लेकिन उसके साथ ही यह हुक्म दिया कि एहतियातन उनके गिर्द फौज की दीवार खड़ी कर दी जाये। चुनानचे सिपाहियों के साथ हाथियों की फौज भी दो रोया खड़ी कर दी गयी , यह हाथी मुसल्लह थे उनके सरों पर आहनी तोपे और सूंड़ों में बरहना तलवारें थी। हाशिम के नूरे नजर जब उनके दरमियान से गुजरने लगा तो उन्हें आज़ाद छोड़ दिया गया ताकि यह जनाबे अब्दुल मुत्तालिब का काम तमाम कर दें मगर अबरहा और उसका सारा लश्कर उस वक़्त मुतहैयर रह गया जब हाथियों के इस झूमते हुए पहाड़ ने हज़रत अब्दुल मुत्तालिब को बजाये गज़न्द पहुँचाने के आपके सामने सरे नियाज़ खम करके घुटने टेक दिये। नतीजा यह हुआ कि खौफ ज़दा करने वाले खुद ही खौफज़दा हो गये।

इस वाक़िये से बनि हाशिम की अज़मत व जलालत का अन्दाज़ा होता है कि उनमें हजो खिलाफते इलाहिया के मनसब पर फायज़ नहीं थे वह भी बातिल के मुक़ाबले में बहुत ही भारी भरकम थे। बहर हाल , अबरहा ने बढ़कर हज़रत अब्दुल मुत्तलि का इस्तेक़बाल किया , अपने पहलू में बैठाकर ज़हमत कशी का सबब पूछा। आपने फरमाया , तुम्हारे लुटेरे मेरे ऊँट हांक लाये हैं जो मैंने हाजियों क मेहमान नवाज़ी की ग़र्ज से फराहम किये थे , अगर मुनासिब मसझो तो उन्हें वापस कर दो अबरहा ने फौरन उनकी वापसी का हुक्म दिया और वह ऊँट वापस कर दिये गये। फिर अबरहा ने कहा , अगर कोई और हाजत हो तो ब्यान करो।

हाजत के बारे में यह सवाल गोया एक तरह शिकस्त का मुज़ाहिरा था। यक़ीनन इस मौक़े पर हज़रत अब्दुल मुत्तालिब की जगह कोई दूसरा शख़्स होता तो वह खान-ए-काबा के बहारे में ज़रुर कुछ न कुछ कहता मगर आप अपने यक़ीने कामिल के आईने में हरम का दरख़शां मुस्तक़बिल देख रहे थे और यह नहीं चाहते थे कि आइन्दा यह झगड़ा बाकी रहे लेहाज़ा खामोश रहे।

मेरा ख़्याल तो यह है कि दुश्मन के इस्तेक़लात में ख़ुद एक तज़लजुल पैदा हो चुका था और उसे अपनी फ़तेह मशकूक नज़र आ रही थी इसलिए जनाबे अब्दुल मुत्तालिब की खामोशी देखकर अबरहा ने खुद कहा कि हरम के लिए मुझसे क्यों नही कहते ? उसके जवाब मे आपने फरमाया कि उसका एक कारसाज़ है और वह मुझसे ज़्यादा बेहतर जानता है कि उसे क्या करना है ?

हालाँकि हज़रत अब्दुल मुत्तालिब का यह जवाब दरअसल अबरहा के तक़ाज़े का जवाब नहीं था बल्कि उन अल्फाज़ों के ज़रिये आपने वजूदे ख़ुदा और उसकी वहदानियत की पैयाम्बरी की थी। आख़िर में अबरहा ने कहा , अगर आप कहें तो इस शहर से वापस चला जाऊँ ?

हाशिम यादगार मुहाफ़िजे काबा का महरमे राज़ था , तक़दीरे काबा से उसके ज़मीर की आवाज़ भला क्यों कर मुतसादिम हो सकती थी , वह अगर कह देता तो अबरहा ज़रुर वापस चला जाता लेकिनअहले मक्का को उन काफिरों के बारे एहसान से दबना पड़ता और काबा की अज़मत ज़ेरे नका़ब रह जाती। ख़लीलुल्लाह की तामीर ज़बीह अल्लाह की मेहनतें दीगर तामिरात की हम पल्ला और अल्लाह की कुदरत व तवानायी मौज़ूये बहस बन जाती , इसलिए हज़रत अब्दुल मुत्तालिब यह कह कर वहाँ से वापस आ गये कि ख़ुदा अपने घर की हिफाज़त खुद करेगा उसके ख़िलाफ़ जो कुछ तुम्हारे दिल में है उसे पूरा करके अपना अन्जाम खुद ही देख लो।

हज़रत अब्दुल मुत्तालिब खुद तो चले आये मगर दबदबे हाशिमी के ग़ैरफानी नकूश कलबे दुश्मन पर छोड़ आये जिसके असरात अबरहा के इस एतराफ की शक्ल में ज़ाहिर हुए कि जब उसने कहा कि इस शख़्स की ज़बरदस्त हैबत मेरे दिल में बैठ गयी है। चुनानचे उसने अपने हमराइयों से मशविरा लिया कि तुम लोग बताओ कि अब क्या करना चाहिए ? लोगों ने तबाही व बरबादी का मशविरा दिया और कहा कि मक्के को लूट लें और खान-ए-काबा को मिसमार कर दें , यही आपके हक़ में बेहतर होगा। ग़र्ज़ अबरहा गय लश्कर अपने तख़रीबी इक़दाम को जमाये अमल पहनाने की ग़र्ज़ से आगे बढ़ा , और हज़रत अब्दुल मुत्तालिब मक्का खाली ककरे कोहे अबुक़बस पर इसलिए चले गये कि मशियते इलाही को अपना हुक्म नाफ़िज़ करने में तरद्दुद न हो , जिस तरह अन्बियाए साबेक़ीन ने इलाही क़हर व ग़ज़ब का निशाना बनाने वाली बस्तियों को छोड़ा था उसी तरह आपने भी मक्का खाली कर दिया।

अल्लाह से नुसरत का तलबगार इधर पहाड़ पर पहुँचा उधर हैवानियत के बल पर मुक़ाबला करने वाली जमाअत हरम की तरफ बढ़ी। मरज़िये कुदरत ने चाहा कि एक बार फिर ग़ाफिलों को चौंका कर इतमामे हुज्जत कर ली जाये , चुनानचे वह कोहे पैकर हाथी जो लश्कर के अलम की जगह था हरम तक पुहँचने से पहले ही एक जगह रूक गया , सारी तदबीरें नाकाम हो गयी मगर वह उस वक़्त तक आगे न बढ़ा जब तक उसका रूख काबे से दूसरी तरफ मोड़ा नहीं गया , लेकिन उसके बावजूद दुश्मनों की समझ में कुछ न आ सका और वह अपने इरादे पर कायम रहे। अलबत्ता इस दरमियान अबरहा ने मसलेहत की एक बार फिर नाकाम कोशिश की और एक मख़सूस क़ासिद जनाबे अब्दुल मुत्तालिब की ख़िदमत में भेज कर यह कहलाया कि अगर अहले मक्का हमारी इस इबादत गाह का तावान अदा कर दें जो उनकी वजह से जलकर खाक हो गयी है तो हम वापस जाने को तैयार हैं।

जनाबे अब्दुल मुत्तालिब ने फरमाया , बेगुनाह अफराद खताकारों के आमाल के जिम्मेदार नहीं ठहराये जा सकते , रहा हरम का सवाल तो उसके बारे में मैं पहले ही कह चुका हूँ कि जो उसका मुहाफिज़ है वह खुद उसकी हिफाजत करेगा , तुम अपने सरदार से कह दो कि वह हमला करे या वापस चला जाये मुझसे कोई मतलब नही है।

हज़रत अब्दुल मुत्तालिब का यह फैसला कुन जवाब सुनकर अबरहा आपे से बाहर हो गया चुनानचे उसने हुक्म दिया कि अब मसालिहत की कोशिशें बेकार हैं लेहाज़ा खाना-ए-काबा पर हमला करके उसे तबाह व बरबाद और मिसमार कर दिया जाये।

इस हुक्म के बाद , इधर अबरहा की सरकश अफवाज़ का तूफानी रेला अपने हाथियों को लेकर आगे बढ़ना शुरू हुआ , उधर अज़ाबे इलाही हरकत में आाया , और अबाबिलों के लश्कर ने अबरहा की फौज पर छोटी छोटी कनकरियां बरसा कर उसे जुगाली किया हुआ भुसा बना दिया। इस वाक़िये में क़हरे इलाही की शाने नुजूल भी अजीब व ग़रीब थी। न तो ज़मीन में शक हुयी , न आसमान में आग बरसी और न ही तेज़ व तन्द हवाओं का कोई , तूफान आया बल्कि छोटे छोटे परिन्दों ने मरकज़े ज़ुल्म पर नन्हीं नन्हीं कनकरियां इस तरह बरसायीं कि न हरम को कोई नुक़सान पहुँचा , न काबा की हुरमत पामाल हुई न कोई बेकुसूर हलाक हुआ और न ही कोई कुसूर वार बच सका। यह वाक़िया सन् 571 का है , अबरहा चूँकि महमूद नामी एक तवीलुल क़ामत हाथी पर सवार था इसलिए उसी की मुनासबत से यह साल आमुल फील कहलाया।


मज़लूम की हिमायत

अल्लामा इब्ने असीर रक़म तराज है कि हज़रत अब्दुल मुत्तालिब के पड़ोस में (अज़नियत) नामी एक यहूदी रहता था जो तिजारत पेशा होने की वजह से बहुत मालदार था। हरब बिन उमय्या जो जनाबे अब्दुल मुत्तालिब का मुसाहिब और मुआविया इब्ने अबु सुफियान का दादा था , महज़ इस बात पर उस यहूदी से बुगहज़ व हसद रखता था कि वह इतना मालदार क्यों है ? चुनानचे अपने हसद से मजबूर होकर उसने एक दिन कुछ सरफिरे लोगों को इस बात पर आमादा किया कि वह उस यहूदी को क़त्ल कर दें और उसका सारा माल लूट लें , उस पर हज़रत अबु बकर के दादा सगर बिन उमरू बिन काअब तीमी और आमिर बिन अबदे मनाफ ने मिल कर उसे क़त्ल कर डालाय़ वाक़िया की इत्तेला जब हज़रत अब्दुल मुत्तालिब को हुई तो आपने क़ातिलों का पता चलाने के िलए तफतीश शुरी की यहां तक कि क़त्ल में खुद हरब का हाथ है तो आप उसके पास तशरीफ ले गये और उस पर लानत व मलामत करते हुए फरमाया कि मकतूल के वारिसान को सौ ऊँटनियां बतौरे तवान अदा करो वरना क़ातिलों को मेरे हवाले कर दो। मगर हरब ने दोनों बातें मानने से साफ इन्कार कर दिया। उस पर हज़रत अब्दुल मुत्तालिब और हरब के दरमियान झगड़ा काफी बढ़ गया दोनों ने एक दूसरे को बुरा भला कहा और अपने को एक दूसरे से अफजल बताया। जब किसी तरह बात ख़त्म न हुई तो फ़रीक़ैन में मुनाजरे की ठहरी और दोनों इस बात पर रज़ा मन्द हुए कि हब्शा चल कर नज्जाशी से इस बात का फैसला कराया जाये कि दोनों में किस का शरफ व मर्तबा ज़्यादा है। चुनानचे दोनों नज्जाशी के पास पहुँचे मगर उसने उनके दरमियान पड़ने से इंकार कर दिया तब उन लोगों ने वापस आकर मक्का में हजरत उमर के दादा नुफ़ैल इब्ने अब्दुल उज्जा को मुनसिफ मुक़र्रर किया , उसने फैसला देते वक़्त हरब बिन उमय्या से कहा ति कुम एक ऐसे अज़ीमुश्शान इन्सान से अपनी हमसरी का दावा करते हो जो शरफ व बुजुर्गी , क़दो क़ामत , शान व शौकत , अज़मत व जलालत और इज़्ज़त व शोहरत में तुम पर फौक़ियत रखता है और इन्साफ की बात तो यह है कि तुम उसके मुक़ाबले में इन्तेहाई पस्त , हक़ीर और ज़लीन हो। यह सुनकर हरब बिन उमय्या को ग़ैज़ आ गया उसने कहा कि यह भी ज़माने का इन्केलाब है कि तुम्हारे ऐसा शख़्स मुनसिफ़ बनाया गया है।

इसके बाद हज़रत अबदुल मुत्तालिब ने हरब को अपनी मुसाहेबत से बाहर निकाल दिया और उससे सौ ऊँटनियाँ बतौरे तावान वसूल करके मक़तूल यहूदी के चचा ज़ाद भाई को दी नीज़ यहूदी का लूटा हुआ सामान भी वापस ले लिया।

वफ़ात व मदफ़न

वक़्ते वफ़ात हज़रत अब्दुल मुत्तालिब की उम्र क्या थी ? इसकी तहक़ीक़ एक दुशवार गुजार मरहला है , बाज़ रिवायतों में 86 साल , बाज़ में 110 साल और बाज़ में 120 साल और 140 साल तक ब्यान की गयी है। डिप्टी नज़ीर अहमद साहब ने 140 साल वाली रिवायत को इख़तियार किया है , अल्लामा मजलिसी अलैह रहमा और मौलवी शिबली नेहमानी ने 86 साल वाले क़ौल को तरजीह दी है। यही तहक़ीक़ मग़रिबी मुर्रेख़ीन की भी है चुनानचे प्रो 0 सैडयू ने खुलासा तारीख़ में हज़रत अब्दुल मुत्तालिब का साले विलादत सन् 467 तहरीर किया है और हज़रत रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व.) का साले विलादत सन् 571 माना गया है इस तरह आपकी उम्र आन हज़रत (स.अ.व.व.) 8 साल के हुए तो गोया सन् 578 में आपने इन्तेका़ल फरमाया। अगर यह हिसाब दुरुस्त है तो 76 साल की उम्र वाली रवायत यक़ीनन दुरुस्त करार पाती है मगर मुश्किल यह है कि जनाबे हाशिम का साले विलादत उस ज़माने में लोगोंने सन् 510 माना है और यह भी तय शुदा अमर है कि इसी साल जनाबे अब्दुल मुत्तालिब की विलादत वाक़े हुयी थी इस हिसाब से आपकी उम्र 86 साल क़रार पाती है। मुम्किन है जिन लोगों ने इस ज़माने में जनाबे हाशिम की वफात का ईसवी साल 510 लिखा है अपनी तहक़ीक़ में ग़लती की हो इसलिए कि जनाबे अब्दुल मुत्तालिब की उम्र का मुसद्देक़ा क़ौल कम अज़ कम 86 साल है इस हिसाब से आपकी विलादत सनव् 467 में साबित होती है और वही जनाबे हाशिम की वफात का साल भी होना चाहिए। मेरे ख़्याल में आपकी वफात बहर हाल सन् 578 में हुयी र आप हुजून में दफन हो गये।

हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने अब्दुल मुत्तलिब

आप हज़रत अब्दुल मुत्तालिब के छोटे साहब जादे , हज़रत हाशिम के पोते और हज़रत रसूले खुदा (स.अ.व.व.) के पदरे बुजुर्गवार थे , जिनकी कुर्बानी का तज़किरा हज़रत अब्दुल मुत्तालिब के हालात में हम कर चुके हैं।

शमशुल ओलमा तहरीर फरमाते हैं कि आप निहायत मतीन , संजीदा और शरीफ तबियत के इन्सान थे और न सिर्फ जलालत नसब बल्कि मुकारिमे एख़लाक़ की वजह से कुरैश में इम्तेयाज़ी नज़रों से देखे जाते थे। महासिने आमाल और लुत्फ गुफतार में अपना नज़ीर नहीं रखते थे।

इब्ने असीर का कहना है कि आपकी कुन्नियत अबु क़सम या अबु मुहम्मद या अबु अहमद थी , आप अपने भाईयों में सबसे छोटे मगर अपने वालिद को सबसे ज़्यादा अज़ीज़ थे।

हुस्न व जमान ऐसा था कि हज़रत युसूफ की तरह औरतें आपको देखगर अज़ खुद फ़रेफ़ता हो जाया करती थी और आपको कैफ व निशत से लुत्फ अन्दोज़ी की दावत दिया करती थीं चुनानचे इब्ने असीर एक औरत की कैफियत ब्यान करते हुए रकम तराज़ हैं कि उसने आपको अपनी तरफ रूजू करते हुए कहा कि ऐ जवान! अगर तुम इस वक़्त खुवाहिश पूरी कर दो तो उसके एवज़ तुम्हें सौ ऊँट दे सकती हूँ। उसके जवाब में आपने फरमाया कि हरमा कारी मरते दम तक मुझसे नहीं मुम्किन क्योंकि शरीफ और मोअज़िज़ शख़्स अपनी आबरू और मज़हब दोनों की हिफाज़त का जिम्मेदार होता है।

अल्लामा शिबली नोमानी तहरीर फरमाते है किः- जनाबे अब्दुल्लाह कुर्बानी से बच गये तो अब्दुल मुत्तालिब को उनकी शादी की फिक्र हुई। क़बीलए ज़हरा में हवब बिन अबदे मनाफ की साहब ज़ादी जिनका नाम आमना था क़ुरैश के तमाम खानदानों में मुम्ताज़ थी। जनाबे अब्दुल मुत्तालिब ने उनके साथ अब्दुल्लाह की शादी का पैग़ाम दिया जो मंजूर हुआ और अक़द हो गया। उस वक़्त का दस्तूर था कि दुल्हा शादी के बाद तीन दिन तक अपनी ससुराल में रहता था चुनानचे अब्दुल्लाह भी तीन दिन तक सुसराल में रहे उसके बाद वह अपने घर चले गये उस वक़्त आपकी उम्र 17 साल से कुछ ज़्यादा थी।)

उसके बाद लिखते हैं कि जनाबे अब्दुल्लाह शादी के बिद तिजारत की ग़र्ज़ से शाम की तरफ गये , वापस आते हुए मदीने में ठहरे और बीमार हो कर यही रह गय , अब्दुल मुत्तालिब को यह हाल मालूम हुआ तो उन्होंने अपने बड़े बेटे हारिस को उनकी ख़बरगीरी के लिये भेजा लेकिन जब वह मदीने पहुँचे तो जनाबे अब्दुल्लाह का इन्तेक़ाल हो चुका था , यह खानदान में सबसे ज़्यादा महबूब थे इस लिए पूरे कुनबे को बेहद सदमा हुआ। जनाबे अब्दुल्लाह ने तरके में ऊँट , बकरियाँ और एक कनीज , जिसका नाम उम्मेऐमन था छोड़ी थीं जो बाद में रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) को मिली।

अल्लाहमा इब्ने असीर का कहना है कि उस वक्त जनाबे अब्दु्लाह की उम्र 25 या 28 साल थी और हज़रत रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व.) कि विलादत से क़बल आपने इन्तेकाल किया। तारीख़े ख़मीस में है कि मुक़ामें अबुवा में आप दफन हुए।

हज़रत अबुतालिब इब्ने अब्दुल मुत्तालिब

वाक़िये फ़ील से ( 35) पैंतीस साल क़बल मक्का मोअज़्ज़मा में मुतबल्लिद हुए। तज़किरे निगारों ने आपके नाम में इख़तेलाफ़ किया है। बाज़ का कहना है कि आपका इसमें गिरामी अपने जददे आला के नाम पर अब्दे मनाफ था , बाज़ ने इमरान और बा़ ने शीबा तहरीर किया है।

(अबु तालिब) आपकी कुन्नियत हैं जो आपके साहब ज़ादे जनाबे तालिब के नाम से माअनून व मनसूब हैं और इसी कुन्नियत से सारी दुनिया आपको याद करती है। आपके अलक़ाब शेखुल बतहा , सैय्यदुल बतहा और रइसुल बतहा वग़ैरह है।

तैंतालिस ( 43) साल तक हज़रत अबुतालिब ऐसी बरगुज़िदा , बुलन्द पाया और अज़ीमुल मर्तबत हस्ती के ज़ेरे साया रह कर अपने तालीम व तरबियत हासिल की , उलूम व मुआरिफ की वादियों को तय किया , मुकारिमे एख़लाक़ और सिफात हसना से मुतसिफ हुए , तहज़ीब व तमद्दुन की बुलन्द क़दरों को ज़िन्दगी का शअर बनाया , और इलमी व अदबी रिफअतों के नुक़तए कमाल पर फायज होकर अपने दौर में एक बुलन्द पाया अदीब , मुम्ताज सुख़न तराज़ , अज़ीम मुफक्किर , अदीमुल मिसाल दानिशवर और बेहतरीन क़ायद तस्लीम किये गये।

इलमी अदबी और फिकरी सलाहियतों के साथ आप वजीह सूरत , बुलन्द क़ामत , पुर अज़म , पुर हौसला , पुर विकार , बारोब और भारी भरकम शख़्सियत के मालिक थे। चहरे से हाशिमी जलालत व तमकनत और खदो ख़ाल से कुरैशी सितवत आशकार थी। ज़बान से फ़साहत व बलाग़त के सोते फूटते थे और ब्यान से इल्म व हिक्मत के चश्में उबलते थे , ग़र्ज़ की आप अपने इस्लाफ के आला किरदार का नमूना और औलादे अब्दुल मुत्तालिब में आदात व अतवार के लिहज़ से अपने बाप की सीरत का आईना थे।

हज़रत अबुतालिब , एतदात पसन्दी , इन्साफ परवरी और हिल्म बरदारी के जौहर से आरास्ता थे। अरबे के नामवर हुक्मा व अदबा आपसे इस्तेफादा करते और इख़लाक़े फ़ाज़िला का दर्स लिया करते थे। चुनानचे एहनिफ बिन क़ैस से जो अरब में हिलम व बुरदबारी के लिहाज़ से सहर-ए-आफाक़ था पूछा गया कि तुमने यह हिलम व बुर्दबारी किस से सीखी ? कहा कि क़ैस इब्ने आसिम मुनकरी से , और क़ैस इब्ने आसिम से पूछा गया कि तुमने हिलम व बुर्दबरी का सबक़ किस से लिया ? उसने कहा , हकीमे अर अकसीम इब्ने सैफी से , और अकसीम इब्ने सैफी से पूय़ा गया कि तूने हिकमत , रियासत , सरदारी , सरबाही और हिलम व बुर्दबारी के उसूल किससे सीखे हैं तो उसने कहा , सरदारे अरब , और सरापां इल्म व अदब अबुतालिब इब्ने अब्दुल मुत्तालिब से हासिल किये हैं।

हज़रत अब्दुल मुत्तालिब ने जिस वक़्त दुनिया से सफरे आख़ेरत किया उस वक़्त हज़रत अबुतालिब की उम्र 43 साल की थी और यही वह मौक़ा था जब खान-ए-काबा की तोलियत , मक्के की इमारत , कुरैश की सियासत और पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) की तरबियत बराहे रास्त आपसे मुतअलिक हुई।

अल्लामा दयार बकरी रक़म तराज़ हैं कि (हाशिम के बाद हाजियों को खाना देने का शरफ़ अब्दुल मुत्तालिब को हासिल हुआ और फिर अब्दुल मुत्तालिब की वफात के बाद जहूरे इस्लाम तक इस अज़ीम ख़िदमत को अबुतालिब अन्जाम देते रहे)

दौलत इस दुनिया में तकमीले मक़सद और हुसूले मनसब के लिए एक बड़ा जरिया है मगर जनाबे अबुतालिब की क़यादत , सरदारी और मन्सबी सर बुलन्दी दौलत की मरहूने मिन्नत नहीं थी बल्कि उनकी फर्ज शनासी , हुस्ने अमल और किरदार की इनफ़ेरादियत ने उन्हें इज़्ज़त व अज़मत और सरदारी के मनसब तक पहुँचाया था।

आप अपने मुआशरे में एक ऐसा निज़ाम बरुये कार लाना चाहते थे कि असासे अदल व इन्साफ पर इस्तवार हो। न किसी की हक़ तलफी हो और न किसी पर बे-जाँ ज्यादती। चुनानचे इसी जज़बे के पेशे नज़र आपने अम्र बिन अलक़मा के खून के सिलसिले में (क़सामत) का तरीक़ा राएज़ किया। इस्लाम ने भी इस तरीक़े कार की अफादियत के पेशे नज़र उसे बरक़रार रखा। इब्ने अबिल हदीद ने तहरीर किया है।

(जमान-ए-जाहेलियत में अबुतालिब ने अम्र बिन अलक़मा के खून के बारे में पहले पहल क़सामत का तरीक़ राएज किया। फिर इस्लाम ने भी उसे आपने एहकाम में जगह दे दी)

दोस्ती ही दुश्मनी , किसी मौक़े पर हज़रत अबुतालिब हक़ व इन्साफ़ का दामन नहीं छोड़ते थे और आम हालात ही में जुल्म व ज़्यादती के खिलाफ़ न थे बल्कि जंग की मारका आराइयों में भी ग़ैर ज़रूरी क़ुश्त व खून के शदीद मुख़ालिफ थे। चुनानचे क़बल इस्लाम कुरैश और कबीलए क़ैस में एक जंग हुई जो हरबे फिजार के नाम से मौसूम है , इस जंग में बनि हाशिम ने भी कुरैश की हिमायत की , हज़रत अबुतालिब जिस दिन उस जंग में शिरकत फरमाते थे उस दिन अपने दुश्मनों के मुक़ाबले में कुरैश का पल्ला भारी रहता था , इसलिए क़ुरैश उनकी शमूलियत को वजहें कामरानी समझते और कहते कि आप बड़े या न लड़ें सिर्फ हमारे दरमियान मौजूद रहें क्योंकि आपकी मौजूदगी में हमा ढ़ारस रहती है और फतहा व जफ़र के आसार नज़र आते हैं। और इल्ज़ाम तराशी से बच कर रहोगे तो मैं तुम्हारी नज़रों से ओझल नहीं रहूंगा।

यह थी हज़रत अबुतालिब की बुलन्द नज़री कि जंग व क़ताल के पुरजोश हंगामों में इन्तेक़ामी और दिमाग़ी इक़दामात के हुदूद में फर्क व फ़ासला बरक़रार रखते हुए जुल्म और ज़्यादती को मायूब नज़रों से देखते थे और सिर्फ इसी हद तक जंग के हामी थे जहाँ तक वह उसूल हर्ब व ज़र्ब के हदों के अन्दर रह कर लड़ी जाये , उसे वहशत , बरबरियत और दरिन्दगी व खूँखारी से ताबीर न किया जा सके।

जौक़े सुख़न

हज़रत-अबुतालिब अपने दौर में सिर्फ एक मुदब्बिर व मुफक्किर और मोअल्लिमे इख़लाक ही न थे बल्कि एक बुलन्द पाया शायर और सुख़नदों भी थे। एक दीवान (दीवाने शेख़उल्ला अबातेह) के अलावा आपको गिरां माया आसकार का एक अजीम ज़खीरा तारीख व सैर की किताबों में बिखरा प़ड़ा है। यूँ तो सरज़मीने अरब शेरो शायरी का गहवारा थीं और अकाज़ के बाज़ारों नीज़ मेलो ठेलो में तफ़ाखुर व ख़ुदसताई की आवाज़ें क़साएद के पैकर में ढ़ल कर गूँजा करती थी मगर मानी व मतालिब के लिहाज़ से आपकी रविश दूसरों से मुख़तलिफ थी। आपके अशआर में न खुद सताई का जज़बा था और न इब्तेदाल व बाज़ारीपन का शायबा , बल्कि रवानी , सादगी , क़नाअत और नज़म व ज़ब्त के साथ उनमें इख़लाकी तालीमात और हक़ परस्ती व हक़ नवाज़ी का दस्र होता था। इसीलिए अमीरूल मोमेनीन हज़रत अली (अ.स.) आपके अशआर को इल्मी व इख़लाक़ी सरमाया समझते हुऐ फरमाते हैं- मेरे वालिद के अशआर पढ़ो और अपनी औलादों को पढ़ाओ , इसलिए कि वह दीने हक़ पर थे और उनके कलाम में इल्म व अदब का बड़ा ज़ख़ीरा है।

यतीमे अब्दुल्लाह की परवरिश व तरबियत

इन तमाम ख़ुसूसियात व इम्तियाज़ के अलावा नस्बी व खानदानी बुलन्दी के लिहाज़ से और रसूले खुदा (स.अ.व.व.) की तरबियत और इस्लाम के गिरां कदर ख़िदमात के एतबार से भी आपकी अज़मत मुसल्लम है। पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) ने आप ही के दामने आतफत में परवरेश पायी और आप ही के ज़ेरे साया जि़न्दगी का बेशतर हिस्सा बसर किया।

आन हज़रत (स.अ.व.व.) के वालिदे बुजुर्गवार जनाबे अब्दुल्लाह , आपकी विलादत से पहले ही इन्तेकाल फरमा चुके थे और जब आप छः बरस के हुए तो आप की वालिदा हज़रत आमेना भपी दुनिया से रूख़सत हो गयी। चुनानचे आप अपने दादा हज़रत अब्दुल मुत्तालिब की आग़ोश शफक्कत में परवरिश पाने लगे लेकिन दो ही बरस गुज़रे थे कि उन्होंने भी सफरे आख़िरत इख़तियार किया मगर क़बबे रेहलत अबुतालिब से यह खुसूसी वसीयत कर गये कि वह आन हज़रत की केफालत व निगेहदाश्त में कोई दक़ीक़ा उठा न रखे हालांकि जनाबे अबुतालिब खुद अपने भतीजे से इतनी मुहब्बत व क़ुरबत रखते थे कि जिसके बाद किसी वसीयत की जरुरत न थी चुनानचे जब उन्होंने आन हज़रत (स.अ.व.व.) के बारे में अपने वालिद की वसीयत को सुना तो फरमायाः बाबा जान! मुहम्मद (स.अ.व.व.) के बारे में वसीयत की ज़रुरत नहीं वह मेरा भतीजा और बेटा है।

हज़रत अब्दुल मुत्तालिब कसीर औलाद थे और वक़्त आख़िर उनके तमाम अज़ीज़ व अक़ारिब और बेटे उनके गिर्द व पेश जमां थे और उनमें से हर एक ब-आसानी इस बारे कफालत का मुतहम्मिल हो सकता था मगर अपने इन्तेहाई ब-सीरत व दूस अन्देशी से काम लेते हुए तरबीयत व केफालत का जिम्मेदार सिर्फ अबातालिब को क़रार दिया क्योंकि उन्होंने आन हज़रत (स.अ.व.व.) के साथ अबु तालिब के तर्ज़े अमल और बरताव से बखुबी अन्दाज़ा कर लिया था कि जो मुहब्बत और उलफत उन्हें यतीमें अब्दुल्लाह से है वह किसी दूसरे को नहीं है और तरबियत की तकमील के लिए मुहब्बत व शफक्कत के जज़बात बहर हाल ज़रुरी है। लेहाज़ा उनसे बेहतर कोई दूसरा इस ख़िदमत को अन्जाम नहीं दे सकता और बाद के हालात ने यह बता दिया कि हज़रत अब्दुल मुत्तालिब के जो तवक़्क़ोआत जनाबे अबुतालिब से वाबस्ता थे वह ग़लत न थे। इसके अलावा इस अमर से भी इन्तेख़ाब को तक़वियत पहुँची होगी कि अबुतालिब और अब्दुल्लाह में सुबली व बतनी यगानियत भी है लेहाज़ा जिस हमदर्दी और ग़मगुसारी या खुलूस व ईसार की उनसे तवक्क़ों हो सकती है वह दूसरे मुख़तलिफ़ुल बत्न भाईयों से नहीं हो सकती। और यह भी मुम्किन है कि आसमानी सहीफों में आन हज़रत (स.अ.व.व.) के बारे में पेंशिनगोईयों को पढ़कर और हज़रत अबुतालिब में इस्लाम परवरी व ईमान नाज़े मसीहा को उनके सुपुर्द किया हो।

बाज़ मोवर्रेख़ीन का कहना है कि हुज़ूर सरवरे कायनात की परवरिश व परदाख़्त के लिए हजरत अबुतालिब और जुबैर इब्ने अब्दुल मुत्तालिब के दरमियान कुरानदाजी हुयी थी और कुरा हज़रत अबुतालिब के नाम निकला था। एक क़ौल यह भी है कि जब उन दोनों के दरमियान मुआमला दरपेश हुआ तो हज़रत रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व.) ने अबुतालिब का दामन थामा और उन्हीं के किनारे आतेफत में रहने की ख़्वाहिश ज़ाहिर की।

बहर हाल- यह इन्तेख़ाब किसी बिना पर हुआ हो , इस बात से इन्कार मुम्किन नहीं कि यह अल्लाह के ख़ुसूसी लुतफ़ व करम का नतीजा था और मशीयते ईजदी भी यही चाहती थी कि यह अमानत अबुतालिब ही के सुपुर्द हो और उन्हीं की पाकीज़ा आग़ोश में परवान चढ़े। चुनानचे कुदरत ने आन हज़रत पर जो एहसानात फरमाये उनमें से इस एहसान का खास तौर पर तज़किरा करते हुए फरमाया कि (अलम यज्जेदिक यतीमा फ़ाआवा) (क्या उसने तुम्हें यतीम पाकर पनाह नहीं दी ?) मुफसेरीन का इत्तेफाक है कि इस पनाह से मुराद हज़रत अबुतालिब का साया आतेफत और आग़ोशे शफ़क़्कत है।

ग़र्ज जनाबे अबुतालिब ने अपने बाप की वसियत के मुताबिक आन हज़रत (स.अ.व.व.) को अपनी आग़ोशे तरबियत में ले लिया और वह तमाम फराएज़ जो एक मुरर्बी व निगरां के हो सकते हैं इन्तेहाई हुस्न व खूबी से अन्ज़ाम दिये और इस तरह मुहब्बत व दिलसोज़ी से तरबियत की कि हर मोवर्रिख़ के क़लम ने उसका एतराफ किया है। इब्ने साद लिखते हैं कि (अबुतालिब रसूले खुदा (स.अ.व.व.) से बेइन्तहा मुहब्बत करते थे और अपनी औलाद से ज़्यादा उन्हें चाहते थे , अपने पहलू में सुलाते और जब कहीं बहर जाते तो उन्हें अपने साथ ले जाते थे)

हज़रत अबुतालिब ने इब्तेदा ही से सरवरे कोनैन (स.अ.व.व.) की ज़िन्दगी का गहरा मुतालिया किया ता आपके आदात व अतवार और सीरत व किरदार को अच्छी तरह देखा भाला था , फिर हज़रत अब्दुल मुत्तालिब की मिसाली खुददारी और रकऱखाव के बावजूद आन हज़रत (स.अ.व.व.) के साथ उनवका शफ़क़्क़त आमेज रवय्या भी धेखा लेहाज़ा वह यह सोचने पर मजबूर थे कि यह बच्चा आम बच्चों की सतह से बुलन्द तर और ग़ैर मामूली अज़मत व रिफअत का मालिक है इसलिए जहाँ आपके रगोपै में आन हज़रत (स.अ.व.व.) की मुहब्बत सरायत किये हुए थी वहाँ अक़ीदत व इरादत से भी उनके दिलका गहवारा खाली नहीं ता , और अक़ीदत व मुहब्बत के यही वह मिले जुले जज़बात थे जिन्होंने आपको हर क़िसम की कुर्बानी पर आमादा कर दिया।


करामाते मुहम्मदी और अबुतालिब

हज़रत अबुतालिब , करामाते मुहम्मदी में जिस करामत का मुशाहिदा सुबह व शाम करते थे वह यह थी कि जब आन हज़रत (स.अ.व.व.) दस्तर खान पर मौजूद होते तो खाना ख़्वाह कितना ही कम क्यों न होता सब शिक्म सेर होकर खाते , फिर भी खाना बच जाता था। इसलिए आपना यह मामूल क़रार दे लिया था कि जब तक आन हज़रत (स.अ.व.व.) दस्तर खान पर तशरीफ न लाते कोई शख्स उस वक़्त तक खाना न खाता। अगर दस्तर ख्वान से कोई दूध का प्याला उठाता तो यह कहकर आप उसे रोक देते कि पहले मेरे भतीजे मुहम्मद (स.अ.व.व.) को पी लेने दो फिर पीना। चुनानचे हुजूर (स.अ.व.व.) पी लेते तो दूसरे पीते और सबके सब सेराब व शिकम सेर हो जाते। यह देखकर जनाबे अबुतालिब आन हज़रत (स.अ.व.व.) से फरमाते कि तुम बड़े ही बाबरकत हो।

हज़रत अबुतालिब एक मर्तबा आन हज़रत (स.अ.व.व.) के साथ कहीं जा रहे थे। जब मुक़ामे अरफा से तीन मील के फासले पर मुक़ाम ज़िलमिजाज़ में पहुँचे तो आपने प्यास महसूस की और आन हज़रत (स.अ.व.व.) से फरमाया कि क्या आस पास कहीं पानी मिल सकता है ? आन हज़रत (स.अ.व.व.) अपने नाक़े से उतरे और एक पत्थर पर ठोकर मारी , पानी का धारा बह निकला। फ़रमाया चचा पानी पी लीजिए। जब आप पानी से सेर व सेराब हो चुके तो पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने दोबारा ठोकर मारी जिससे उबलता हुआ चश्मा ख़ुश्क हो गया।

हज़रत अबुतालिब उन्हीं आसारे ख़ैरो बरकत को देखकर आन हज़रत (स.अ.व.व.) की ज़ात अक़दस को अपनी दुआओं का वसीला बनाते और उन्हीं के तवस्सुल से बारगाहे ईजदी में अपनी अर्ज़दाश्त पेश करते। चुनानचे बारिश न होने की वजह से एक दफा मक्का में शदीद कहा पड़ गया , लोग खुशक साली से बेहद परेशान व मुज़तरिब हुए। लात व मनाफ और उज़्ज़ा के सामने फ़रयाद की तदबीरे सोची गयी मगर उनमें से एक बुजुर्ग ने कहा , कहीं भटकर रहे हो ? जबकि तुम्हारे दरमियान यादगारे इब्राहीम (अ.स.) औरफरज़न्दे इस्माईल (अ.स.) मौजूद हैं। लोगों ने कहा , क्या उस से मुराद अबुतालिब हैं ? उस बुजुर्ग ने कहा , हाँ। बस , यह सुनना था कि सब उठ खड़े हुए और खान-ए-अबुतालिब पर तशगाने हयात का मजमा इकट्ठा हो गया। लोगों ने मुद्दआ बयान किया। अबुतालिब , उठकर हरम सराये गये और कलीदे रहमत की उँगलियां थामे हुए बाहर तशरीफ लाये। फिर खान-ए-काबा का रूख किया और वहाँ पहुँचकर रूकन से तकिया करके बैठ गये , आन हज़रत (स.अ.व.व.) को अपनी गोद में बिठाया और आपकी अंगुश्ते मुबारक को आसमान की तरफ बुलन्द फरमा कर दुआ की। बारिश के कोई आसार न थे लेकिन देखते ही देखते तेज़ व तुंद हवायें चलने लगीं , अबरे रहमत झूम के उठा और इस शिद्दत से बरसा कि सूखी हुई ज़मीने सेराब हो गयी और खुशक दरखतों में हरयाली व शादाबी आ गयी। हज़रत अबुतालिब ने जोश अक़ीदत में एक क़सीदा इस मौके पर रसूले खुदा (स.अ.व.व.) की शान में फरमाया जो सौ अशआर से जायद पर मुश्तमिल है इसमे आपने फरमाया कि क्या कहना इस नूरे मुजस्सम का कि जिसके रूये अनवर की बरकत से अबरे करम बरस पड़ता है। जो यतीमों की उम्मीद गाह और बेवाओं के लिए जाये पनाह है और हलाक होने वाले जिसके दामने रहमत से मुतामस्सिक हो कर निजात पाकर फज़ले खुदावन्दी के मरकज़ बन जाते हैं।

मज़कूरा वाकियात से पता चलता है कि खानवादहे बनि हाशिम मरजाए खलाएक रहा और इसी सिलसिले इब्राहीमी व इस्माईली की कड़ियों से लोगों की मुश्किलात हल होती रहें। हुकूमत और अमारत उनके क़ब्ज़े में रही हो या न रही हो मगर यह खुसूसियत ज़रुरी थी कि तमाम आलम के लिए यह ख़ानदान चारा साज़ रहा और माद्दी कसाफत उसकी रूहानियत पर असर अन्दाज न हो सकी। खुलपा के दौर में भी उसकी मिसालें मौजूद हैं।

पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) और हज़रत अबुतालिब का तिजारती सफर

हज़रत अबुतालिब , गेहूँ और इत्रयातके मारूफ ताजिर थे और कुरैश दस्तूरूल अमल के मुताबिक़ ब-ग़रज- तिजारत साल में एक मर्तबा शाम की तरफ जाया करते थे। चुनान्चे जब शाम जाने का वक्त करीब आया तो आपने आनहज़रत (स.अ.व.व.) से भी अपने सफर का तज़किरा किया मगर अपन साथ आपको ले जाने का कोई ख़्याल ज़ाहिर नहीं किया क्योंकि उस वक़्त आन हज़रत (स.अ.व.व.) की उम्र सिर्फ नौ साल की थी और वह दूर दराज़ सफ़र की सऊबतें बर्दाश्त करने क़ाबिल न थे। मगर जब आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने यह महसूस किया कि चचा उन्हें अपने साथ नहीं ले जाना चाहते तो आप जनाबे अबुतालिब से लिपट गये और साथ चलने की ख़्वाहिश ज़ाहिर की। अबुतालिब को भी आपकी जुदाई गवारा न थी इसलिए वह आपको साथ ले जाने पर आमादा हो गये और फरमायाः- (ख़ुदा की क़सम मैं उन्हें अपने साथ ले जाऊँगा , हम कभी एक दूसरे से जुदा नहीं हो सकते।)

ग़र्ज़ कि आपने हजूरे अकरम (स.अ.व.व.) को साथ लिया और शाम की तरफ रवाना हुए। रास्ते में सरकारे दो आलम का नाक़ा आगे रहता था और अबर का एक टुकड़ा साया किये हुए आपके साथ चलता था। जहाँ पानी नायाब होता वहाँ अबरे करम बरस पड़ता और जहाँ यह काफिला क़्याम पज़ीर होता वहाँ के हौज़ व तालाब पानी से लबरेज़ हो जाते और सूखी वादियां सरसबाज़ व शादाब हो जाती। मंज़िले तय होती रहीं यहाँ तक कि यह काफ़िला वारिदे बसरा हुआ जहाँ जरजीस इब्ने रबिया ने जो बहीरा के नाम से मशहूर था ताजदारे मदीना को देखा और उन तमाम आसार का मुशाहिदा किया जो ख़ातेमुल अन्बिया के लिए मख़सूस थे।

उसने आन हज़रत (स.अ.व.व.) को और क़रीब से देखने के लिए तमाम अहले काफिला की दावत का एहतमाम किया। लेकिन कुरैश जब दावत में शिरकत के लिए वहाँ गये तो आपको साथ नहीं ले गये बल्कि सामान की निगरानी के लिए छोड़ गये। बहीरा ने जब आपको न देखा तो उसने कुरैश से पूछा कि तुम्हारे साथ और भी कोई है ? उन्होंने कहा हाँ एक बच्ची है जिसे सामान की निगरानी पर मामूर कर आये हैं। बहीरा ने कहा , उसे ज़रुर बुलवाओ। जब आन हज़रत (स.अ.व.व.) तशरीफ लाये तो उसने आपको सर से पाओं तक ग़ौर से दाख फिर पैराहन हटा कर दोशे मुबारक पर मोहरे नबूवत का मुशाहिदा फरमाया , मेरा बेटा है। बहारी ने कहा , यह आपका बेटा नहीं हो सकता क्योंकि मेरे इल्म की बिना पर इसके वालिद को ज़िन्दा ही न होना चाहिये। जनाबे अबुतालिब ने फरमाया तुम ठीक कहते हो , इसके वालिद मेरे हक़ीक़ी भाई थे जिनका इन्तेक़ाल हो चुका है। बहीरा ने कहा इन्हें वापस ले जाओ और नबी मुरसल हैं। अहले क़ाफिला में से कुछ लोगों ने पूछा कि तुमने यह क्यों कर जाना कि यह नबी व रसूल हैं ?कहा , जब तुम्हारा क़ाफिला पहाड़ की बुलन्दी से नीचे उतर रहा था तो मैंने देखा कि तमाम शजर व हजर सर बा सजदा है और जिस तरफ यह बच्चा जाता है अंबर साया किये हुए चलता है , इसके अलावा उसके हस्ब व नस्ब , शक्ल व शुमाएल और खदो खाल का तज़किरा मैंने आसमानी सहीफों मे भी पढ़ा है इसलिए मैं यक़ीन की मंज़िल में हूँ। इस सफर के बाद , सरकारे रिसालत ने फिर कोई सफर नहीं किया और न जनाबे अबुतालिब तहफ्फुज़ के ख़्याल से आपको कहीं बाहर ले गये।

आन हज़रत (स.अ.व.व.) का अक़द

बचपन के हदुद से तजाउज़ करके पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने जवानी की सरहदों में क़दम रखा तो जनाबे अबुतालिब को आपको रोज़गार और मइश्त की फिक्र हुई। उस वक़्त मक्का में एक मोअज़्जि़ व मालदार ताजिर खातून जनाबे खदीजा बिन्ते खुवैलद थीं जोअपने तिजारती नुमाइन्दे मुख़तलिफ़ शहरों में भेजा करती थीं। आपने आन हज़रत (स.अ.व.व.) को खदीजा का कारसोबार सँभालने का मशविरा दिया और खुद भी जनाबे खदीजा से सिफारिश की कि वह जिन शरायत पर दूसरों को माल तिज़रत दे कर दीगर शहरों में भेजती हैं उन्हीं शरायत पर मेरे भतीजे को भी माल दिया करें। जनाबे खदीजा ने हज़रत अबुतालिब की यह बात मान ली और शरायत तय करने के बाद काफी मिक़दार में तिजारती माल आन हज़रत (स.अ.व.व.) के हवाले कर दिया। आप कुछ अर्से तक कारोबारी अमूर अंजाम देते रहे और उसमें इन्तेहाई कामयाबी हासिल की। जनाबे खदीजा भी आपको कारोबार से मुतमईन और सच्चाई व इमानदारी से बेहदत मुतासिर हुयीं। आखिर कार उन्होंने आपके पासक किसी जरिये से अक़द का पैग़ाम भिजवाया जिसे आपने अपने पचचा से मशविरे के बाद मंजूर कर लिया। इब्तेदाई मराहिल यह होने के बाद हज़रत अबुतालिब , ने हज़रत हमज़ा , अब्बास और दूसरे बनि हाशिम व अकाबरीने कुरैश को हमराह लिया और सरकारे दो आलम के साथ हज़रत खदीजा के मकान पर आये बज़में अक़द आरास्ता हुई , हज़रत अबुतालिब ने निकाह का खुतबा पढा जिसमें आपने फरमायाः

(तमाम हमद उस अल्लाह के लिये है जिसने हमें जुर्रियते इब्राहीम , नसले इस्माईल , औलादे मआद और सुल्बे मजर से पैदा किया। अपने घर का निगेहबान और हरम का पासबान बनाया और उसे हमारे लिये हज का मुक़ाम और जाये अमन करार दिया , नीज़ हमें लोगों पर हाकिम बनाया। यह मेरे भतीजे मुहम्मद (स.अ.व.व.) बिन अब्दुल्लाह है , जिस शख्स से भी उनका मवाज़ाना किया जायेगा तो शरफे निजाबत और अक़ल व फज़ीलत में उनका मर्तबा भारी रहेगा , अगर चे दौलत उनके पास कम है लेकिन दौलत तो एक ढ़लती , हुई छांव और पलट जाने वाली चीज़ है , खुदा की कसम उसका मुस्तकबिल अज़मत आफरी है और उनसे एक अज़ीम ख़बर का जहूर होगा।

यह खुतबा अगर चे मुख़तसर है मगर उससे हज़रत अबुतालिब के अक़ायद व नज़रियात और सरकारे दो आलम (स.अ.व.व.) के मुतालिक उनके ख़्याल का बड़ी हद तक अन्दाज़ा होता है। उन्होंने खुतबा की इब्तेदा अल्लाह ताला की हमदो सना से की है जिससे उनकी तौहीद परस्ती पर रौशनी प़ड़ती है। हमदो सना के बाद जुरियते इब्राहीमी व नसले इस्माईली से अपनी वाबस्तगी का इज़हार करके खान-ए-काबा की निगरानी , हरम की पासबानी और अमेतुन्नास पर हुक्मरानी का ज़िक्र किया है , इससे सिर्फ यही अमर वाजेह नही होता कि वह नसले इब्राहीमी में से होने की बिना पर इन मनसूबों और उहदों पर फायज़ होते चले आ रहे थे बल्कि इस अमर की भी निशान देही होती हैं कि वह हरम के ओहदों के अलावा उनकी तालिमात के भी विरसेदार थे अगर वह उनकी तालिमात से बेगाना और उनके दीन व आईन से बे तालुक़ होते तो इस इन्तेसाब पर फख़र का कोई मोरिद ही न था। इस शरफ़े इन्तेसा और खुसूसी इम्तेयाज़ के बाद आन हज़रत के कमाले फ़हम व फरासत् और बुलन्दी अक़ल व दानिश का तजकिरा किया है और उनके मुहासिन व कमालात के मुकालबे में माले दुनिया की बेक़दरी व वक़अती को वाजेह किया है इस तरह कि उसे ढ़लते हुए साये से ताबीर किया है यानि जिस तरह साया अपना कोई मुस्तक़िल वजूद नहीं रखता और उसका घटना व बढ़ना किसी दूसरी शै के ताबे होता है इसी तरह माल दुनिया भी ग़ैर मुस्तकिल और आरज़ी है लेहाज़ा इस माल के ज़रिये जो सर बुलन्दी और अज़्ज़त हासिल होगी वह साया के मानिन्द नापायेदार होगी। आख़िर में आपने आन हज़रत से दरख़शिन्दा मुस्तक़बिल , उलूये मंजेलत और आलमगीर नबूवत की तरफ़ इशारा किया है कि वह अनक़रीब आसमाने हिदायत पर न्यैरे दख़शां बनकर चमकेगें और अपनी तालिमात की रौशनी में भटकी हुई इन्सानियत को सिराते मुस्तक़ीम से हमकिनार करेंगे।

इस ख़ुतबे के बाद आपने अकद का सईफा पढ़ा और आन हज़रत को शहजादीये अरब जनाबे ख़दीजा से मुनसलिक कर दिया।

हज़रत अबु तालिब का इस्लामी नज़रिया

जब सरकारे दो आलम (स.अ.व.व.) कारवाने हयात की चालिस मंजिले तय कर चुके तो कुदरत ने जिस मक़सद के लिये ख़लक किया था उसकी तकमील के लिये मामूर फमाया और हिदायते आलम का बारेगिरां उनके काँधों पर रखा। आप कुफ्र व शिरक के घटा टोप अँधेरों में हिदायत का चिराग़ जलाने और इस्लाम का पैग़ाम घर घर पुहँचाने के लिये उठ खड़े हुए। बेअसत के इब्तेदायी सालों में दायरये तबलीग़ महदूद और दावते इस्लाम के इजहार में एहतियात बरती जाती थी। नमाज़ के लिए तन्हाई के मौके ढूंढ़े जाते थे। हुजूरे अकरम (स.अ.व.व.) कभी मकानों में छुप कर इबादत करते और कभी हज़रत अली (अ.स.) को हमराह लेकर पहाड़ों की घाटियों में निकल जाते और वहाँ नमाज़ अदा करते। एक मर्तबा जनाबे अबुतालिब ने उन दोनों भाईयों को पहाड़ की खाई में नमाज़ पढ़ते देख लिया। आपने हज़रत अली (अ.स.) को बुलाया और उनसे पूछा कि यह कौन सा दीन है जो तुमने अख़तियार किया है ? आपने कहा , मैं अल्लाह और उसके रसूल मुहम्मद (स.अ.व.व.) बिन अब्दुल्लाह (स.अ.व.व.) के दीन पर हूँ। यह सुन कर जनाबे अबुतालिब ने फरमाया कि (तुम उनसे चिमट रहो यह तुम्हें नेकी व हिदायत का रास्ता बतायेगा)

अगर अबुतालिब , कुफ्र पसन्द और इस्लाम दुश्मन होते तो आन हज़रत (स.अ.व.व.) से यह ज़रुर कहते कि आप मुझ से पूछे बगै़र , मेरे बच्चे को अपने नये मज़हब की राह पर लगाने वाले और बाप बेटे के दरमियान जहनी व नजरयाती तफरिक़ा डलवाने वाल कौन होते हैं ? और हज़रत अली (अ.स.) भी कहते कि तुम इस झगड़े में न पड़ो और अपने बाप के दीन व आईन पर क़ायम रहो। इसिलए कि हर इन्सान अपनी औलाद को अपने ही दीन मज़हब पर देखना पसन्द करता है। मगर जनाबे अबुतालिब पैग़म्बर (स.अ.व.व.) से कुछ पूछने या हज़रत अली 0 को मना करने के बजाय उन्हें आन हज़रत (स.अ.व.व.) की पैरवी का हुक्म देते है। यह इस अमर का वाज़ेह सुबूत है कि यह कुफ्फारे मुशरेकीन के मुशरेकाना इबादात व रसूल को पसन्दीदा नजरों से नहीं देखते थे वरना बुत परस्ती के मुक़ाबले में इस तर्ज़ इबादत को अमर ख़ैर से ताबीर न करते और हजरत अली (अ.स.) से यह न कहते कि मोहम्मद (स.अ.व.व.) के मसलक पर मज़बूती से जमें रहो वह तुम्हें नेकी और भलायी के रास्ते पर ले जायेंगे। इस वाकिये से यह हक़ीकत बड़ी हद तक आशकार हो जाती है कि जनाबे अबुतालिब जेहनी तौर पर पूरी तरह इस्लाम से हमआहंग और उसकी पज़ीरायी पर हमातन आमादा थे।

आन हज़रत (स.अ.व.व.) को दरपर्दा तबलीग़ करते हुए जब तीन बरस गुज़र गये और चौथा साल शुरू हुआ तो एलानिया तबलीगे इस्लाम का हुक्म आया आप ने जनाबे अबुतालिब के मकान पर एक दावत का एहतमाम किया और अपने अजीज व अकारिब को जमा करके उन्हें अल्लाह का पैग़ाम सुनाया कि वह बुतों की परस्तिश छोड़ दें और खुदा की इबादत करें। हज़रत अबुतालिब कुरैश के तेवरों को समझ रहे थे कि वह अपने कदीम रस्में रिवाज़ के खिलाफ कोई आवाज सुनना गवारा नहीं करेगें और आप हज़रत (स.अ.व.व.) के खिलाफ उठ खड़े होंगे लेहाजा आपने यह मुनासिब समझा कि पहले ही उनके गोश गुजार कर दें कि वह इब्ने अब्दुल्लाह को तन्हा व बेसहारा न समझें बल्कि हम उनके दस्त व बाजू बनकर उनके साथ होंगे और हर लम्हा उनके सीने सिपर रहेंगे चुनानचे आपने जज़बए हक परस्ती से शुरू हो कर पुरएतमाद लहजे में फरमाया। (ख़ुदा की कसम जब तक हम ज़िन्दा दुश्ननों से उनकी हिफाज़त करेंगे।)

जब पैग़्बर (स.अ.व.व.) की आवाज़ पर घर की चार दीवारी से निकल कर मक्का की कुफ्र परवर फिज़ा में गूँजी तो रद्दे अमल के तौर पर मुख़ालफ़त के तूफान उठ खड़े हुए जो लोग आँखे बिछाते थे वह आँखे दिखाने लगे और जो फूल बरसाते थे वह आपकी राह में कांटे बिछाने लग। कुरैश ने कदम कदम पर तबलीग़े हक़ की राह में रूकावटें खड़ी की वह कौन सी मुश्किल थी जो आपके रास्ते में हायल न की गयी हो और वह कौन सा हरबा था जो इस्तेमाल न किया गया हो। मगर अज़्मे पैग़म्बर ने किसी मुश्किल को मुश्किल नहीं समझा और आप कुरैश की मवानिदान सरगर्मियों के बावजूद हमातन अपने तबलीग़ी कामों में मसरूफ रहे। कुरैश ने यह हाल देखा तो वह एक वफ़द की शक्ल में अबुतालिब के पास आये और कहा , आप अब्दुल्लाह के बेटे का तौर व तरीक़ा देख रहे हैं उसने चन्द भोले भाले लोगों को बहला फुसलाकर अपने दीन में दाख़िल कर लिया है। हम इस से रूबरू बातें करना चाहते हैं और आप भी उसे मुतनबेह करें कि वह अपना रवय्या बदल दें और इस नये दीन से दस्तबरदार हो जाये। हज़रत अबुतालिब ने कुरैश के खतरनाक तेवरों को भांप लिया। खामोशी से उठ कर आन हज़रत कहना चाहते हैं अगर मुनासिब समझें तो उनकी बात सुन ले वरना जैसा कहें मैं उन्हें जवाब दूँ। आन हज़रत (स.अ.व.व.) बाहर तशरीफ लाये और उनसे पूछा कि क्या कहना चाहते हो ? उन्होंने कहा कि हम यह चाहते हैं कि आप हमारे बुतों से न कोई सरोकार रकें न इन्हें बुरा भला कहें और न हमारे दीन पर हमला करें। अगर आपने हमारा यह मुतालिबा मान लिया तो हम आपके किसी काम में दखल अन्दाज़ी नहीं करेगे। वरना- ---------- (आपने फरमाया कि मैं यही तो कहता हूँ कि अल्लाह एक है उसी की इबादत करो और इसे छोड़कर अपने खुदसाख्ता खुदाओं की परस्तिश न करो। और यह मेरा फर्ज़े मनसबी है कि मैं बुत परस्ती की मजम्मत और ख़ुदा परस्ती की तबलीग़ करूँ। अबुतालिब की वजह से कुरैश और तो कुछ कह न सके अलबत्ता यह जरुर कहा , यह तो अजीब बात है। इसके बद सब के सब मुंह लटकाकर चले गये।

इस मौक़े पर हज़रत अबुतालिब ने अपने हुस्ने तदबीर और हिकमते अमली से ऐसा रवय्या एख़तियार किया कि कुरैश के भड़के हुए जज़बात मज़ीद न भडकने पाये। अगर नर्म रूई के बजाये सख़्त रवय्या इख़तियार किया जाता तो दुश्मनी और अनाद की आघ और भड़क उठती और कुफ्फार की तशद्दुद पसन्द तबियतें और सख्ती व तशद्दुद पर उतर आयें। इस मसलहत के अलावा दावते फिक्र का अहम मकसद भी उसकमें शामिल था कि कुरैश चिराग़ पा होने के बजाये ठण्डे दिल से आन हज़रत (स.अ.व.व.) की बाते सुनें उन पर ग़ौर करें और अपने मोतक़ेदात और उनकी तालिमात का जायेज़ा लेकर हक़ व बातिल का फैसला करे और जिस तरह दीगर मुआमलात में उनकी रास्त गोई व सच ब्यानी तस्लीम करते आये हैं , दीन के बारे में भी उनकी सच्चाई का एतराफ करे और सोचें कि जिस ने चालिस बरस की उम्र तक कभी झूठ नहीं बोला हो वह यकबारगी इतना बड़ा झूट कैसे बोल सकता है कि रिसालत और अल्लाह की नुमायन्दगी का दावा करने लगे , मगर कुरैश अपने अकीदों से दस्तबरदार होने पर तैयार न थे और न ही उनकी मुनजमिद तबियतों में बाआसानी तबदीली हो सकती थी। उन्होंने देखा कि उनके अक़ायद का तहाफ्फुज उसी वक़्त मुम्किन है जब इस दाइये हक का खातमा कर दिया जाये। मगर अबुतालिब के होते हुए उन्हें आन हज़रत (स.अ.व.व.) पर हमला करने की जुराअत भी तो न थी चुनानचे उन्होंने अबुतालिब की हिमायत व सरपरस्ती को खत्म करने के लिए यह खेल खेला कि कुरैश के एक खूबसूरत नौजवान अमारा इब्ने वलीद को अबुतालिब के पास लाये और कहा कि आप उसे अपना बेटा बना लें और मुहम्मद (स.अ.व.व.) की हिमायत से दस्तबरदार हो जायें। जनाबे अबुतालिब ने उनकी यह अनोखी फरमाइश सुनी तो फरमाया। (यह अच्छा इन्साफ है कि मैं तुम्हारे बेटे को लेकर पालू और अपना बेटा तुम्हारे हवाले कर दूँ ताकि तुम उसे क़त्ल कर दो , खु़दा की क़सम यह कभी नहीं हो सकता।)

कुरैश का यह मुतालिबा इन्सान के फितरी लगाओ , जज़बाये मुहब्बत से बे खबरी या अमदन उससे बेरूखी पर मुबनी था कि अबुतालिब अपने हक़ीक़ी भतीजे को खूँखार दरिन्दों के हवाले कर दें और अजनबी और बेगाने को लेकर उसकी परवरिश करें। एक मामूली सतह का इन्सान भी उसे गवारा नहीं कर सकता , यह जानके अबुतालिब ऐसा बाहिम्मत , इन्सान , जो पनाह मांगने वालों के लिये भी मजबूती और तन्देही से जम जाता हो , वह अपने जिगर बन्द को इस आसानी से खून आशाम तलवारों के सुपुर्द कर दे और अपनी हमीयत , मुरैव्वत और शरफ का कुछ भी पास व लिहाज़ न करे।

कुरैश की इस पेशकश से उनकी पस्त ज़ेहनियतों का अन्दाज़ा किया जा सकता है कि वह आन हज़रत (स.अ.व.व.) की दुश्मनी में किस हद तक होश व ख़ेरद के तक़ाज़ों से दूर हो चुके थे कि ऐसे बेतुकी बातों पर उतर आये। यह अमर ग़ौर तलब है कि ऐसे कमफ़िक्र लोगों को समझाना बुझाना और उनके इरादों को नाकाम बनाना कितना दुश्वार था , और इन दुशवारियों को दूर करने में क्या अबुतालिब के अलावा किसी और का भी अमल दखल था ? तारीख़ किसी और का नाम बताने से क़ासिर है। ग़र्ज़ कुरैश का यह हरबा नाकाम हो गयचा और उनकी सख़्त और सितम रानियों के बावजूद इस्लाम की आवाज़ दबने के बजाये उभरती ही गयी।

अब कुरैश को यह फ़िक्र लाहक़ हुई कि अगर आन हज़रत (स.अ.व.व.) की आवाज से मुतासिर होकर लोग इसी तरह दायरये इस्लाम में दाखिल होते रहे और यह सिलसिला यूँ ही जारी रहा तो एक दिन यह मुख़तसर सी जमाअत मक्का की सियासत पर छा जायेगी और उन्हें पैरों तले रौंद कर उनके इक़तेदार को मलिया मेट कर देगी। जब उन्हें इन्क़ेलाबे नो के जेरे असर अपना इकतेदार नज़र आया तो चन्द बड़े और बुज़ुर्ग अबुतालिब के पास फिर आये और उनसे कहा कि पहली बार हम खामोश होकर चले गये थे मगर अब पैमानए सब्र लबरेज हो चुका है , हम कहाँ तक आपकी बुजुर्गी और अज़मत का लिहाज़ करे , बिल आखिर हमें वह कद़म उठाना ही पड़ेगा जो अब तक इस तवक्कों पर नहीं उठा कि शायद यह आवाज़ दब जाये। अब आप अपने भतीजे को सख्ती से समझा दें कि वह खामोश हो जायें और आसमानी बातों का सिलसिला ख़त्म कर दें वरना आप दरमियान से हट जायें और हमें दो टूक फैसला कर लेने दें। जनाबे अबुतालिब ने जब उनके बिगडे हुए तेवर देखे तो आन हज़रत (स.अ.व.व.) के पास आये और फरमाया कि सरदारे कुरैश पिर जत्था बाँध कर आये हैं , आप कोई ऐसा तरीक़ा इख़ितयार करें जिससे कि उनके जज़बात मुशतइल न हों , वरना अन्देशा है कि वह अचानक आपको क़त्ल कर देंगे। मैं तन्हा कहाँ तक उनका मुक़ाबला करूँगा। जनाबे अबुतालिब की जबान से यह अल्फाज़ सुन कर पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की आँखों में आँसू भर आये और भराई हुई आवाज में आपने फरमायाः- चचा! मैं तो उन्हें नेकी और हक परस्ती की दावत देता हूँ और मेरे मनसब का तक़ाज़ा भी यही है कि मैं उन्हें अल्लाह के एहकाम व पैग़ाम से मुत्तेला करूं , खुदा की कसम , वह लोग मरेे एक हाथ पर चाँद , और दुसरे हाथ पर सूरज रख दें जब भी मैं एलाने हक़ और तबलीग़े इलाही से दस्तबदार नहीं हो सकता। यह कहकर आप वहाँ से चल दिये। अबुतालिब ने जब पैग़म्बर (स.अ.व.व.) को जाते देखा तो बूढ़े जिस्म पर लरज़ा तारी हो गया आवाज़ दे कर पैगम़्बर (स.अ.व.व.) को रोका और खुद एतमादी के साथ फरमायाः- ब्रादर ज़ादे! जाइये और जो समझ में आये वह कीजिये , खुदा की क़सम मैं आपका साथ नहीं छोड़ूंगा।

हज़रत अबुतालिब के इस जवाब से सरवरे क़ायनात (स.अ.व.व.) के आँसूओं का मदावा हो गया , दिल के हौसले बढ़ गये और तन्हाई व बेयारी का एहसास जाता रहा।

इस तजदीदे अहद के बाद हज़रत अबुतालिब ने सरदाराने कुरैश की तरफ रूख किया और उनसे कहा , आप लोग क्यों खडे हैं , जाईये और जो बन पड़े वह कीजिये , खुदा की कसम मेरे भतीजे की ज़बान कभी झूट से आशना नहीं हुई। िस जवाब से रसूले अकरम (स.अ.व.व.) की सदाक़त और इस्लाम की सच्चाई पर जनाबे अबुतालिब के यक़ीन व इमान का पता चलता है।

कुरैश के उन वफ़दों में अगर चे अबुतालिब को एक वास्ता व ज़रिया ठहराया जाता रहा है मगर वह किसी मौके पर कुफ्फारे कुरैश के मसलक व नज़रिये की ताईद व हमनुवायी करते नज़र नहीं आते अगर वह इन नज़रियात के हमनवा होते तो जहाँ पैग़म्बरे (स.अ.व.व.) को कुरैश का पैग़ाम पहुँचाते थे वहाँ यह भी कह सकते थे कि आप उनके मज़हब के खिलाफ़ कुछ न कहें न उनके बुतों की मज़म्मत करें , मगर तारीख़ यह बताने से क़ासिर है कि आपने किसी मौक़े पर भी आपकी हमनवाई की हो। कुरैश भी उनके तर्ज़े अमल से यह अच्छी तरह समझ गये थे कि उनकी तमाम तर हमदर्दियाँ अपने भतीजे के साथ हैं और उनसे यह उम्मीद नहीं की जा सकी कि वह आन हज़रत (स.अ.व.व.) का नुसरत व हिमायत से दस्तबदार हो कर उनका साथ छोड़ देंगे लेहाज़ा उन्होंने मजीद कुछ कहना सुनना बेसूद समझा और एक माज़ क़ायम करके पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) को तरह तरह की अजीयतें देना और सतान शुरू कर दिया। खभी ढ़ेले मारते , कभी कूड़ा फेंकते , कभी काहिन , कभी मजनून और आसेहब ज़दा कहते और जब आप मसरूफे नमाज होते तो मज़ाक उड़ाते।


ख़ून और गोबर

पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) एक दिन खान-ए-काबा के पास मसरूफे नमाज थे कि अबुजहल ने हरम में बैठे हुए कुछ लोगों से कहा कि तुम में कौन है जो उनकी नमाज़ को निजासत और गन्दगी से आलूदा कर दे। अबदुल्लाह बबिनज़बरी उठा और खून व गोर ले कर आपके चेहरए अक़दस पर मल दिया। नमाज़ से फारिग़ होकर पैगम्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) सीधे अबुतालिब के पास आये। अबुतालिब ने आपकी यह हालत देखी तो उनका खून खौलने लगा। पूछा , किसने यह हरकत की है ? फरमाया , अब्दुल्लाह इब्ने अलज़बरी की। जनाबे अबुतालिब ने तलवार हाथ में ली और खान-ए-काबा की तरफ चल पड़े। अब्दुल्लाह इब्ने जबरी और दसूरे लोगों ने जब जनाबे अबुतालिब को बरहैना तलवार के साथ देखा तो उनके होश उड़ गये। आपने गरज कर कहा कि अगर तुम में कोई भी अपनी जगह से हिला तो गर्दन उड़ा दूँगा। उसके बाद आपने खून और गोबर लेकर अबुजहल समैत एक के बाद एक के चहरों पर मला और नफरीन व मलामत करते हुए वापस आये।

आसतीनों के खंजर

एक मर्तबा ऐसा इत्तेफाक़ हुआ कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) शाम तक घर न पलटे तो हज़रत अबुतालिब को फिक्र दामनगीर हुई। क्योंकि इन हालात में यह अन्देशा था कि कुरैश आन हज़रत (स.अ.व.व.) को कहीं गायब न कर दें या कत्ल न कर डालें। जहाँ जहाँ आन हज़रत (स.अ.व.व.) के मिलने का इम्कान था वहाँ वहाँ अपने ढूण्डा मगर कहीं पता न चल सका। आपने तमाम हाशिमी जवानों को बुलाया और उनसे कहा कि तुम लोग अपनी अपनी आसतीनों में तेज़ धार वाले खंजर छिपा कर सरदाराने कुरैश में से एक एक के पहलू में बैठ जाओ और एक शख़्स अबुजहल के पास बैठ जाये। अगर यह पता चले कि मुहम्मद (स.अ.व.व.) कत्ल कर दिये गयचे हैं तो तुम लोग एक दम उन पर टूट पड़ना और सब को बे दरेग़ क़त्ल कर देना। हाशिमी जवानों ने खंजर सँभाले और कुफ्फाराने कुरैश के सरदारों को अपनी ज़द में ले लिया। जनाबे अबुतालिब इधर पैग़ाम (स.अ.व.व.) की तलाश में सरगर्दां थे कि कोहे सफ़ा की जानिब जानिब से ज़ैद बिन हारिसा आते दिखायी दिये। आपने उनसे पूछा कि तुमने मेरे भतीजे को भी कहीं देखा है ? उन्होंने कहा , हाँ मैं उन्हीं के पास से आ रहा हूँ वह कोहे सफ़ा के दामन में तशरीफ़ फ़रमा हैं। कहा उन्हें बुलाकर ले आओ , ख़ुदा की कसम जब तक मैं अपनी आँखों से उन्हें ज़िन्दा व सलामत नहीं देख लूँगा घर नहीं जाऊँगा। ज़ैद ने जाकर आन हज़रत (स.अ.व.व.) को जनाबे अबुतालिब की परेशानी का हाल बताया तो आप फौरन वहाँ से उठ कर चचा के पास आये और अपनी सलामती का उन्हें यक़ीन दिलाया।

दूसरे दिन जनाबे अबुतालिब पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) और तमाम हाशिमी जवानो को लेकर सरदाराने कुरैश की बज़म में पहुँचे और अपने जवानों से फरमाया कि कल तुम लोग जो चीज़ छिपाये हुए थे उसे उन सरदारों के सामने ज़ाहिर कर दो। सभों ने अपनी अपनी आसतीनों से खंजर निकाे और उन्हें हवा में बुलन्द कर दिया। कुफ्फारे कुरैश ने पूछा , यह खंजर किस लिए है ? हज़रत अबुतालिब ने फरमाया कल दिन भर मेरा भतीजा ग़ायब था , अन्देशा हुआ कि तुम लोगों उसे कहीं क़त्ल तो नहीं कर दिया लेहाज़ा मैंने इन हाशिमी जवानों को तुम पर मुसल्लत कर दिया था कि मुहम्मद (स.अ.व.व.) के क़त्ल की ख़बर सुनना तो किसी को भी ज़िन्दा न छोड़ना। इन तेज़ धार खंजरों को तुम लोग अच्छी तरह देख भाल लो , खुदा की कसम अगर मेरे भतीजे पर कोई आँच अयी तो मैं तुम में किसी को ज़िन्दा नहीं छोडूँगा। अबुतालिब के यह खूँखार तेवर देख कर कुफ्फारे कुरैश में भगदड़ मच गयी। सारी महफिल तितर बितर हो गयी। भगाने वालों मे अबुजहल सबसे आगे था।

शोअबे अबुतालिब

कुफ़्फ़ारे क़ुरैश और बनी हाशिम में रक़ीबाना चशमक पहले ही से थी। अब उनकी मोआनदाना रविश के नतीजे में इख़तेलाफ़ात की खलिज वसीय से वसीय तर हो गयी और उनकी सारी दुश्मनी व अदावत खुल कर सामने आ गयी। कुरैश का अनाद इस हद तक बढ़ा कि उन्होंने बनि हाशिम से कता मरासिम व तअल्लुक़ात का फैसला कर लिया और उन्हें मजबूर कर दिया कि वह शहर का गोशा छोड़ कर पहाड़ों की घाटियों में पनाह लें। इस ज़ेल में कुफ्फारे मक्का ने मुत्तहिद होकर एक मुआहिदा भी मुरत्तब किया जिसमें यह क़रारदार मरकूम हुई कि कोई शख्स , बनि हाशिम की किसी फर्द से न किसी क़राबत का इज़हार करेगा , न उनके साथ तिजारती तअल्लुकात क़ायम करेगा , न उन के लिए सामने खुर्द नोश फराहम करेगा और न उनसे कोई वासता व ताल्लुक रखेगा जब तक अबुतालिब , मुहम्मद (स.अ.व.व.) इब्ने अब्दुल्लाह को हमारे हवाले न कर दें। यह मुआहिदा मुहर्रम सन् 7 नबवी में मनसूर बिन अकरमा ने लिखा।

शोअबे अबुतालिब , जिस में हाशिमी खानवादा महसूर व नजर बन्द किया गया था , पहाड़ का एक दर्रा था लेकिन यह मुक़ाम भी कुरैश की दस्तरस से महफूज़ न था हर वक़्त यह खतरा लाहक़ रहता कि अचानक किसी सिमत से हमला न हो जाये चुनानचे इस खतरे के पेशे नज़र अपनी रातें जाग कर गुज़ारते थे। पैग़म्बर (स.अ.व.व.) के सोने की जगह तब्दील करते रहते थे और आपके बिस्तर पर अपने बच्चों में से किसी को और बिलउमूम अपने छोटे साहबज़ादे हज़रत अली (अ.स.) को सुला दिया करते थे ताकि रात के अँधेरों में हमला हो तो उनको कोई बेटा काम आ जाये मगर आन हज़रत (स.अ.व.व.) पर आँच न आने पाये।

यह दौर वह था जब ख़ित्तए अरब में चन्द गिने चुने आदमियों के अलावा बनिये इस्लाम का न कोई हामी था न मददगार , अपने बेगाने सभी मुख़ालिफत पर तुले हुए थे। बस सिर्फ एक अबुतालिब थे जो आपकी हिमायत व पुश्त पनाही में पहाड़ की तरह अपने मौकफ़ पर डटे रहे। न किसी मौक़े पर उनका साथ छोड़ा और न उनकी नुसरत व एआनत से हाथ उठाया। यह अबूतालिब ही की हिमायत व पासदारी का नतीजा था कि आन हज़रत (स.अ.व.व.) उनकी दस्तरत से बाहर और रेशा दावानियों से महफूज़ रहे ग़र्ज़ की जनाबे अबुतालिब ने मआशी मुकातेआ के बाद अपनी औलाद को खतरे में डालकर आन हजरत (स.अ.व.व.) के तहफ्फुज़ का इन्ते़ज़ाम किया। इसमें शक नहीं कि अगर आप अरब के चीरा दोस्तों और कुरैश के फितना परदाज़ों के नारवां मजालिम को रोकने के लिए खड़े न होते तो मजालिमें कुरैश की तारीख़ मौजूदा तारीख से कहीं ज्यादा दर्दनाक और अलम अंगेज़ होती।

मुखतसर यह है कि मुसलसल तीन बरस तक कुफ्फारे कुरैश की तरफ से यह मुआशी मुकातेआ जारी रहा और (शोअबे) की सऊबतों ने खानवादए बनि हाशिम पर जिस्मानी व रूहानी तकालीफ के अलावा रिजक की उसअतों को भी तंग कर दिया। खाने पीने को कुछ मयस्सर न था। दरख़़तों की पत्तियां शिकम परवरी का ज़रिया थीं , अगर अशयाये खुर्दनी में कोई कुछ भेजना चाहता तो कुरैश मज़ाहेमत करेत। जनाबे खदीजा के भतीजे हकीम बिन हज़ाम को जब यह हाल मालूम हुआ तो उन्होंने गेहूँ की एक बोरी फुफी की ख़िदमत में रवाना की। रास्ते में जिहालत का बोरा (अबुजहल) मिल गया , तसादुम हुआ उसने छीन्ना चाहा तो एक शख़्स अबुल बख़तरी ने उसे समझाया कि अगर एक शख़्स अपनी फुफी को कुछ भेज रहा है तो तुझसे क्या सरोकार ? लेकिन वह बोरा जिहालत से इस क़दर लबरेज तथा कि उकी समझ में कुछ न आया बिल आख़िर अबुल बख़तरी ने भी फैसला किया कि उसके मरकज़ को खटखटाने की ज़रुरत है चुनानचे उनके हाथ में कमान थी जिसे उन्होंने इस ज़ोर से अबुजहल के सरपर रसीद कियाकि सतूने जिहालत ज़मीन पर ढ़ेर हो गया और ग़ल्ला की वह बोरी जनाबे खदीजा तक पहुँच गयी। शब व रोज़ इसी तरह गुज़रते रहे। एक दिन हुजूरे अकरम (स.अ.व.व.) ने अबुतालिब से फरमाया कि चचा! कुरैश के मुआहिदे को दीमक ने चाट चाट कर खत्म कर दिया और अब उसमें खुदा के नाम के अलावा कुछ बाकी नहीं है।

इस ख़बर पर जनाबे अबुतालिब ने इसी तरह यकीन किया जिससे कोई वही का यकीन कर ले। एतमाद का यह आलम कि आपने भतीजे से इसके बाद मज़ीद कुछ पूछने की ज़रूरत महसूस ही न की। दूसरे दिन खानए काबा में आये और सरदाराने कुरैश को मुख़ातिब करते हुए फरमाया कि मेरे भतीजे ने मुझ को खबर दी है कि तुम्हारे मुआहिदे को दीमक चाट गयी और उसमें सिर्फ ख़ुदा का नाम बाकी है। मुआहिदा देखा गया कुफर की तहरीर दीमक चाट चुकी थी और सदाक़ते रसूले अरबी (स.अ.व.व.) के ग़ैरफानी नक़ूश उमर चुके थे। इस वाकिये के बाद बनि हाशिम को शोअब से रिहायी नसीब हुयी।

इख़फाये इस्लाम

इब्तेदाये बेअसत में जबकि दावते इस्लाम मग़फी थी , रसूले अकरम (स.अ.व.व.) मुसलमानों को इज़हारे इस्लाम से खुद मना फरमाते थे और यह तहफ्फुज़ इस्लाम का एक इन्तेहाई हकीमाना तरीक़ा था। इस हिदायत के मुताबिक बहुत से मुसलमान अपने इस्लाम को पोशीदा रखे हुए थे और दूसरा शख़्स उनके ईमान व इस्लाम से आगाह न था। वह लोग इसी हद तक इस्लामी अमूर का लिहाज रखते जहाँ तक उनके हालात इजाज़त देते थे। बल्कि जब इस्लाम एक जमाती और गिरोही शक्ल में उभर कर अपने पैरों पर खड़ो होने की सयी कर रहा था तो उस वक़्त भी कुछ मुसलमान ऐसे थे जो अपने इस्लाम को अपने सीनो में छिपाये हुए थे और वह लोगों के दरमियान एक गैर मुस्लिम की हैसियत से जाने और पहचाने जाते थे , वह अपने हालात की कमजोरियों का बाअज खानदानी मसलहतों की बिना पर अपने ईमान को मगफ़ी रखने पर मजबूर थे। अगर चे वह कुफ्फार के साथ उठते और बैठते ते और बज़ाहिर उन्हीं में शुमार होते थे लेकिन ज़हनी तौर पर वह इस्लामी फ़ात्मा जो सईद इब्ने जैद को ब्याही थी अपने शौहर के साथ इस्लाम इख़तियार कर चुकीं थी मगर वह अपने इस्लाम को मग़फी रखती थीं क्योंकि उनके भाई हज़रत उमर और उनके वालदैन सबके सब काफिर थे) नीज़ उनकी तरफ़ से तशद्दुद का ख़तरा था। इसी तरह नईम इब्ने अब्दुल्लाह जो क़बीलये अदी से थे मुसलमान हो चुके थे मगर अपने कबीले के डर से वह अपने इस्लाम को पोशीदा रखते थे। ग़र्ज़ इसी तरह मुख़तलिफ़ कबीलों के मुतअद्दिद अफ़राद इस्लाम ला चुके थे मगर वह लोग कबायली पाबन्दियों और सख़्त गोरियों की वजह से इस्लाम को पोशिदा रखते थे।

हिजरत के बाद जब मदीने में इस्लामी हुकूमत की तशकील अमल में आ चुकी थी उस वक्त भी मक्का में एक ऐसी जमाअत मौजूद थी जो दरपर्दा इस्लाम की पाबन्द थी। अम्मे रसूल (अ.स.) , इब्ने अब्बास भी इसी खुफिया जमाअत की एक फर्द थे। चुनानचे अबु राफे का कहना है कि मैं अब्बास इब्ने अब्दुल मुत्तालिब का गुलाम था और पैग़म्बर (स.अ.व.व.) के अजीज़ों के घरों में इस्लाम जलवा गर हो चुका था , और उम्मे फज़ल (जौजये अब्बास) इस्लाम से मुशर्रफ हो चुके थे हमारा इस्लाम अयां था लेकिन अब्बास का इस्लाम मग़फी था क्योंकि वह क़ौमस को अपना मुख़तलिफ़ बनाने के हक़ में नहीं थे।

यह लोग इस्लाम को पोशीदा रख कर दीने हक की वह ख़िदमात अन्जाम दे रहे थे जो इज़हारे इस्लाम के बाद मु्म्किन न थी। उन्हीं लोगों के ज़रिये कुफ्फारे कुरैश की रेशा दुनियों और नक़ल व हरकत की खबर रसूले अकरम (स.अ.व.व.) के पास मदीने पुहँची थीं जिनसे इस्लाम का भरपूर मुफाद वाबस्ता था और उन्हीं खबरों की बिना पर पैग़म्बर (स.अ.व.व.) , आइन्दा दर पेश हालात में फायदा उठाते थे और हमेशा उनसे अपना राबता क़ायम रखते थे। अल्लामा इब्ने अब्दुल बर ने अब्बास इब्ने अब्दुल मुत्तालिब के हालात में लिखा है कि वह मुशरेकीन से मुतालिक तमाम खबरे तहरीरन पैगम़्बर (स.अ.व.व.) के पास भेजते रहते थे जिससे मुसलमानों को बड़ी तक़वियत फराहम होती थी हालांकि अब्बास यह चाहते थे कि वह पैगम्बर (स.अ.व.व.) के पास चले जायें मगर आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने उन्हें लिखा कि मक्का में तुम्हारा क़याम मदीने से ज्यादा बेहतर और फायदेमन्द है।)

मालूम हुआ कि उन लोगों का अख़फ़ाये इस्लाम पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की मर्जी और इजाज़त से था अगर यह अख़फ़ा इस्लाम के मनाफी होता तो आन हज़रत (स.अ.व.व.) इस अमर की कभी इजाज़डत नहीं देते। बहर हाल अख़फ़ाए इस्लाम इस्लाम के मनाफी कतई नहीं हैं और इस्लाम का मगफ़ी रखा जाना , दीने पैगम्बर (स.अ.व.व.) में इसी तरह मोरिदे इबादत व एतमाद है जिस तरह इस्लाम का एलानिया इकरार। और अगर असबाते ईमान के लिए जबानी इकरार व एलाम को जरुरत करार दिया जाये तो यह शर्त हर हाल में ग़ैर ज़रुरी होगी कि वह मख़सूस लफ्ज़ों में हो तो मोतबर है वरना नहीं। जब यह क़ैद ज़रूरी नहीं तो जनाबे अबुतालिब के इकरारे वहदानियत और रिसालत से इन्कार मुम्किन नहीं क्योंकि उन्होंने मुत्ताइद बार मुख़तलिफ़ अल्फाज़ में आन हज़रत की नबूवत का एतराफ किया है।

ईमाने अबुतालिब

पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) की हिमायत व नफरत में जनाबे अबुतालिब की पामदी , फिदाकारी और जॉनिसारी तारीख़े इस्लामी की वह मुसल्लमा हक़ीक़त है जिससे आज तक किसी को इन्कार की जुराअत न हो सकती। लेकिन अफसोस है कि कुछ लोगों ने इस नफरत और फिदाकारी की अस्ल रूह को मज़मूम करने की कोशिश की है। चुनानचे इस बात पर जोर दिया जाता रहा है कि यह नफरत मज़हबी व एतक़ादी जज़बों के ज़ेरे असर थी बल्कि इस में कराबत दारी और अजीज़दारी के जज़बात कारफरमा थे भला वह क्योंकर उनकी पासदारी व हिमायत न करते ?

यह बात इस हद तक तो दुरुस्त है कि आनहज़रत (स.अ.व.व.) अबुतालिब के करीबी परवर्दा खास और हकीकी भाई की यादगार थे और यह भी मुसल्लम है कि अरबों में कराबत दारी का पास व लिहाज़ ज्यादा किया जाता है जैसा कि पैगम्बर की वफात के बा खुलफ़ा के तर्जे अमल से वाजेह है , मगर कितनी ही अजाजदारी व कराबतदारी क्यों न हो कोई शख़्स अपने दीन व इमान और मज़हब के मुकाबले में कराबतदार , अज़ीज़दारी या रिश्तेदारी का ख़्याल नहीं करता। यह जानके अपने अक़ायद के ख़िलाफ़ अवाज़ उठाने में तआव्वुन करे और अपने माबूदों की तज़लील व तौहीन के सिलसिले में हाथ बटायें , मगर जनाबे अबुतालिब का किरदार यह नज़र आता है कि वह बुतों को बुरा भला कहने पर पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की हौसला अफज़ायी फ़रमाते हैं और इस्लामी अमूर की तबलीग़ में उनका हाथ बटाते हैं। इस तर्जे अमल को किसी तरह कराबतदारी का नतीजा क़रार नहीं दिया जा सकता। और अगर यह मान लिया जाये पैग़म्बर से अबुतालिब की वालहाना अकीदत व मुहब्बत बर बनाये कराबत ती तो सवाल यह पैदा होता है कि इन्सान अपने बेटों से ज़्यादा कराबत रखता है या भतीजे से ? ज़ाहिर है कि जो कराबत अपनी औलाद से होती है वह भाई की औलाद से नहीं होती। अगर इस नफरत में नसबी क़राबत का जज़बा कारफ़रमा होता तो जनाबे अबुतालिब अपने बेटों की जि़न्दगी खतरे में डाल कर उन्हें पैग़म्बर (स.अ.व.व.) के बिस्तर पर सोने का हुक्म न देते बल्कि भतीजे के तहाफुज पर औलाद के तहाफुज को मुक़द्दम रखते। तारीख़े आलम में एक भी मिसाल ऐसी पेश नहीं की जा सकती कि किसी ने एक ऐसे शख़स की खातिर जिसके नजरियात को वह बातिल और दावे को गलत समझता हो , महज कराबत की बिना पर अपनी औलाद को हलाकत की आग में दीदा व दानिस्ता ढ़केला हो। इससे साफ ज़ाहिर है कि इस नफ़रत में जो अपनी नौइयत के एतबार से मुनफर्द थी , कराबत का जज़बा यह हरगिज कार-फ़रमा नहीं था बल्कि एक मज़हबी , दीनी , इमानी और रूहानी राबता था जो जनाबे अबुतालिब को पैगम्बर (स.अ.व.व.) की नफरत हिमायत के मुआमले में सरगर्म अमल रखते हुए था। अबुलहब और पैगम्बर इस्लाम (स.अ.व.व.) के दरमियान भी तो रिश्ता था वह भी आपका चचा था , नसबी कराबत के बिना पर आखिर वह क्यों नफरत व हिमायत के लिये खड़ा नहीं हुआ ? इस करीबी रिश्ते की बिना पर वह दुश्मनी और अनाद के मजाहिरों ही से बाज़ रहता। इसी तरह हजरत इब्राहीम और अज़र में रिश्ता था वह भी खीलले खुदा का चचा था , आखिर वह उनकी ईज़ा रसानी के दर पे क्यों हुआ ?इस रिश्ते से क़वी तर रिश्ता नूह (अ.स.) और उनके फरज़न्द के दरमियान था , उनके दरमियान मुनाफ़ेरत की खलीज क्यों हायल रही ? सिर्फ इस लिये कि उनके दरमियान मज़हबी हम आहंगी न थी। यही हाल जनाबे नूह (अ.स.) और लैत (अ.स.) की बीवियों का भी है। मेरे ख़्याल में हज़रत अबुतालिब की नफरत व हिमायत को कराबत पर महमूल करना एक तरह से उनकी गिरा क़दर काविशों और मेहनतों पर पानी फेरना है।

हज़रत अबुतालिब के इस तर्जे अमल को देखने के बाद कि उन्होंने अपनी ज़िन्दगी का हर लम्हा आन हज़रत (स.अ.व.व.) की ख़िदमत नफरत और हिमायत कर दिया था , हर मुतावाजिन ज़ेहन आसानी से यह फैसला , कर सकता है कि वह पैग़म्बर की सदाकत व रिसालत के क़ायल और कुफ़्फारे मक्का के मुशरेकाना अक़ायद व आमाल से बेज़ार थे। अगर बेजा़र न होते तो रसूल (स.अ.व.व.) की नुसरत व हिमायत में इस तनदेही से आमादा न होते और न उनकी वजह से दुनिया व जहाँ की दुश्मनी मोल लेते। यह वाज़ेह सुबूत है कि उनका दिल इमान की शुआओं से रौशन और सिद्क़ व सफा की ज़ौपाशियों से मुनव्वर था और उनके कलब पर अल्लाह की वहदानियत और रसूल (स.अ.व.व.) की रिसालत के ताबिन्दा नकूश सब्त थे नीज़ वह दिल की गहराइयों से नबूवत की तसदीक कर चुके थे और इसी तसदीक़े क़लबी और यक़ीनी बातनी का नाम ईमान है , जैसाकि काज़ी अज़दुद-दीन ने तहरीर फ़रमाया है कि (हमारे नज़दीक ईमान यह है कि उन चीज़ों में रसूल (स.अ.व.व.) की तसदीक़ की जाये जिनका शरीयत में वारिद होना सराहतन साबित है और यही अकसर आइम्मा का मसलक है जैसे क़ाज़ी बाक़लानी और उस्ताद इसहाक़ असफरायनी वग़ैरा।

जब अकाबरीन ओलमाये जमहूर और मुहके़ीन के नज़दीक क़लबी तसदीक़ और बातनी एतक़ाद ही नाम ईमान है तो फिर हज़रत अबुतालिब के ईमान से इनकार की क्या वजह है ? जबकि नशरे इस्लाम , तबलीग़े दीन और नुसरते रसूल (स.अ.व.व.) के सिलसिले में आपका तर्जे अमल और किरादारही आपके कलबी तसदीक और बातनी एतक़ाद का ज़िन्दा सुबुत और ईमान की वाज़ेह शहादत है।

इस तरह हज़रत अबुतालिब के वह बेशुमार अशआर जो मुख़तलिफ़ मवाफ़े पर आपने इरशाद फरमाये हैं , जज़बए ईमान , जोशे अक़ीदत , अतराफे सदाक़त और इस्लाम बीनीये इस्लाम से लाज़वाल मुहब्बत के आईनेदार हैं। यह अशआर अरबी ज़बान में हैं , इख़्तेसार के ख्याल से उर्दू तर्जुमा पर मुबनी चन्द नमूने पेश ख़िदमत हैं , मुलाहेज़ा फरमायें।

(1) जब कुफ्फारे मक्का ने हज़रत अबुतालिब से शिकायत की कि आप अपने भतीजे (मुहम्मद (स.अ.व.व.) ) को इस बात से रोकें कि वह हमारे खु़दाओं और हमारे दीन को बुरा भला कहते हैं तो आपने रसूल (स.अ.व.व.) से फरमाया , कि बेटा तुम तबलीग़े हक़ को जारी रखो बाखुदा जब तक मैं जिन्दा हूँ कुफ्फार के हात तुम तक नहीं पहुँच सकते और जब तक मेरे बाजुओं में ताक़त है यह लोग तुम्हें कोई गज़न्द नहीं पहुँचा सकते।

(2) जब कुफ्फारे अहद नामे को दीमक दफ्तर बेमानी की तरह चाट गयीतो हजरत अबुतालिब ने कुरैश को यह कहकर आगाह किया कि बस इसमें अल्लाह का नाम बाकी रह गया है मुनकेरीन को यक़ीन न आया तो आपने उनके जुल्म , ज़िद को अपने अशआर में नज़म किया , जिनमें से बाज़ का मफहूम यह है कि अहद नामा की सरगुज़श्त मुकामे इबरत है जब बे खबरों को उसकी ख़बर दी जाती है तो वह आईना हैरत हो जाता है इस अहद नामें में जो कुफ्र व अनाद की बातें थी उन्हें अल्लाह ने महो कर दिया और मुजस्समए सदाकत (रसूल (स.अ.व.व.) के ख़िलाफ जो जहर उगला गया था वह नक्श बरआब हो कर रह गया है और ख़ुदा का शुक्र है के मुखालेफीन की तमाम बातें साबित हुयीं।

(3) एक शेर में हज़रत रसूल ख़ुदा (स.अ.व.व.) की तरफ से इशारा करके आपने फरमाया , आप अमीन और अल्लाह के अमीन हैं जिसमें झूट की गुंजाइश नहीं , आप बेहूदा बातों से पाक और रास्त गुफतार हैं।

(4) एक शेर में आप फरमाते हैं , आप वही अल्लाह के रसूल (स.अ.व.व.) हैं जिनका हमें इल्म है और आप ही पर रब्बुल इज़्ज़त की तरफ से कुरान नाज़िल हुआ है।

(5) एक शेर में फरमाते हैं , मुझे यक़ीन है कि मुहम्मद (स.अ.व.व.) का दीन दुनिया के तमाम दीनों से बेहतर है।

(6) एक शेर में फरमाया , परवर दिगारे आलम अपनी नुसरत से उनको दस्तगीरी करे और इस दीन को जो सरासर हक़ है गलबा दे।

इस्लाम की सदाकत , दीनकी हक़ानियत और आन हज़रत (स.अ.व.व.) की रिसालत के सुबूत में हज़रत अबुतालिब के अशआर इस कसरत से हैं कि इब्ने शहर आशोब माजन्दानी ने मुत्शाबिहात अल्कुरान में सुरह हज की आयत वल्यन्सुरन नहू अल्लाह मन यनसराहु) के ज़ैल में तहरीर फ़रमाया है कि हज़रत अबूतालिब के वह अशआर जो उनके ईमान व तसदीक़े रिसालत पर रौशनी डालते है तीन हजार से ज़्यादा है। इब्ने अबिल हदीद ने आपको मुख़तलिफ अशआर दर्ज करने के बाद तहरीर किया है किः

(यह अशआर तवातुर से नक़ल होते आए हैं , अगर मुताफर्रिक़ तौर पर उनमें तवातिर न भी हो तो मज़मूयी तौर पर बहर हाल मुतावातिर है क्योंकि वह एक ही अमर की निशानदेही करते हैं जो उन सबमें कदरे मुशतरक है और वह क़दरे मुशतरक मुहम्मद (स.अ.व.व.) की सदाकत का एतराफ है।)

जब यह सारी हक़ीक़तें आपताब की तरह रौशन व मुनव्वर हैं तो फिर क्या वजह है कि हज़रत अबुतालिब के मसलये ईमन से इन्कार किया जाता है ? क्या इस जुर्म की पादाश में कि उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) को पाला पोसा और परवान चढ़ाया ? क्या इस गुनाह के एवज़ कि उन्होंने कुफ़्फ़ारे क़ुरैश से उनका तहफ़्फुज़ किया ? क्या इस कुसूर पर कि उन्होंने मुशरकीन की साजिशों को नाकाम बनाया ? क्या इस ख़ता पर कि उन्होंने जान माल औलाद की कुर्बानी तक से दरेग़ नहीं किया ? क्या इस जुर्म पर कि उन्होंने अपने अशआर के जरिये पैग़ामे नबूवत अरब के गोशे गोशे में पहुँचाया ? अगर इन तमाम बातों का जवाब नफी में है तो फिर ईमाने अबुतालिब के मुआमले में ताअस्सुब और तंग नज़री क्यों ? जबिक आइम्मये अहलेबैत में से किसी एक ने भी जनाबे अबुतालिब के ईमान में शक व शुबहा का इज़हार नहीं किया बल्कि सबके सब उनके ईमान पर मुत्तफिक़ व मुत्ताहिद हैं। इस इत्तेफाक़ व इत्तेहाद को इजतेमा अहलेबैत से ताबीर किया जाता है और यह इजतेमाये ओलमाये इस्लाम के नज़डदीक एक मुस्तनिद माअखिज़ , हुज्जत और सनद का दर्जा रखता है चुनानचे अबुल कराम अब्दुल इस्लाम इब्ने मुहम्मद तहरीर फरमाते हैं किः

(आइम्मये अहलेबैत इस अमर पर मुत्ताफ़िक़ हैं कि अबुतालिब मुसलमान मरे और जो बात अहलेबैत के मसलब के ख़िलाफ़ हो , वह इस्लाम मे ग़ैर मोअतबर है)

अल्लामा तबरी रकम तराज है कि- (अबुतालिब के ईमान पर अहलेबैत (अ.स.) का इजतेमा साबित है जो हुज्जत और सनद है।)

हज़रत अली अ.स. का इरशाद है। (अबुतालिब उस वक्त तक मौत से हम किनार नहीं हुए जब तक उन्होंने अपनी तरफ से हज़रत रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व.) को राज़ी व खुशनूद नहीं कर लिया।

(ताज्जुब है कि अल्लाह ने रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व.) को यह हुक्म दिया कि वह किसी मुसलान औरत को काफिर के निकाह में न रहने दें और फात्मा बिन्ते असद जो इस्लाम में सबक़त करने वाली ख़्वातीन में से हैं वह मरते दम तक अबुतालिब की ज़ौजियत में रही।)

इस मुक़ाम पर यह अमर मलहूज़ रहे कि फात्मा बिन्ते असद अवाइले बेअसते में इस्लाम से मुशतरफ हुयीं और बादे इस्लाम दस बरस तक हज़रत अबुतालिब (अ.स.) - की ज़ौजियत में रहीं। अगर उन दोनों में मज़हबी इख़तेलाफ़ात होता तो इसका लाज़मी नतीजा यह था कि उनके दरमियान आये दिन तकरार और मज़हबी निजाअ रहती मगर कोई तारीख़ यह नहीं बताती कि उनमें कोई बाहमी झगड़ा या नज़रयाती टकराओ हुआ हो।

इमामे जाफ़रे सादिक (अ.स.) से एक शख़्स ने कहा कि कुछ लोग यह कहते हैं कि हज़रत अबुतालिब काफिर थे तो आपने फरमाया कि वह लोग झूटें हैं वह तो पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की नबूवत का एतराफ व इक़रार करते हुए कहते हैं किः क्या तुम्हें नहीं मालूम कि हमने मुहम्मद (स.अ.व.व.) को वैसा ही नबी पाया है जैसे कि मूसा (अ.स.) थे जिनका तज़किरा पहली किताबों में मौजूद है।)

इमामे अली रजा (स.अ.व.व.) अबान इब्ने महमूद को इसके एक मकतूब के जवाब में तहरीर फरमायाः- (अगर तुम अबुतालिब के ईमान का इक़रार नहीं करोगे तो तुम्हारी बाज़गश्त दोज़ख़ की तरफ होगी)

इमामे हसन तारीख़ी शवाहिद व अक़वाले आइम्मा की मौजूदगी में ईमाने अबुतालिब पर कुफ्र के पर्दों का डाला जाना हैरत अंगेज़ व ताज्जुब खेज़ है। मेरा ख़्याल तो यह है कि यह सब कुछ इसलिए किया गया कि आप हज़रत अली (अ.स.) के बाप थे। वरना दुनिया रौशनी और तारीकी का फर्क़ ज़रुर महसूस करती और इस के दीनी ज़ौक़ में में कु्फ्र व ईमान का इम्तेयाज़ी शऊर ज़रुर पैदा होता। अगर रौशनी की शुआयें नज़रों को अपनी तरफ़ मुतावज्जे कर रही हों किसी अँधे इन्सान को चारों तरफ अँधेरा ही अँधेरा नज़र आये तो इसके यह माने हरगिज़ नहीं कि कि नूर या रौशनी का वजूद नहीं है वह तो अपनी जगह एक मुसल्लम हकीक़त है , बस इसी तरह अबुतालिब का ईमान भी एक ताबिन्दा हक़ीक़त है इससे वही शख़्स इन्कार कर सकता है जो सूरज की रौशनी और चाँद की चाँदनी से इन्कार का आदी हो या फिर ताअस्सुब की वजह से अँधा हो)

वफ़ाते अबुतालिब (अ.स.)

हज़रत अबुतालिब , दीन के मुहाफिज़ , इस्लाम के पुश्त पनाह और पैग़म्बरे इस्लाम क(स.अ.व.व.) के लिए एक दिफायी हिसार व मुस्तहकम क़िला थे। उन्होंने सख़्स से सख़्त मुश्किलात का मर्दाना वार मुक़ाबिला किया और किसी मौके- पर न हरफे शिकायत लब पर आया न जबीन पर शिकन आयी। अपनी जवानी व पीरानासाली में एक लम्हे के लिए भी पैग़म्बरे इस्लाम की हिफाज़त से ग़ाफिल और इस्लामी ख़िदमात में कोताही के मुर्तकब नहीं हुए बल्कि बिस्तरे मर्ग पर भी उनका ज़ेहन इस्लाम और पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) के तहफ्फुज़ की फिक्रों से खाली न था , चुनानचे जब शोअबे अबुतालिब की पैहम व मुसलसब और जाँ गुज़ार मुसीबतों के नतीजे में सेहत न जवाब दे दिया और मौत के आसार नज़र आने लगे तो शियुख़ व आमायेदीन कुरैश को तलब किया और उन्होंने अमानते सदक़ ब्यानी , सेला रहमी , फुक़रा की अयानत व दस्तगीरी और खान-ए-काबा के एहतराम की हिदायत के बाद आन हज़रत (स.अ.व.व.) की हिफाज़त व नुसरत की वसीयत करते हुए फरमाया-

मैं तुम्हें मुहम्मद (स.अ.व.व.) के साथ भलायी की वसियत करता हूँ वह कुरैश में अमीन और अरब में सादिक हैं और उनमें वह तमाम सिफते मौजूद हैं जिनकी मैंने तुम्हें वसीयत की है। वह ऐसी चीज़ ले आये हैं , जिसके दिल मोअतरफ और ज़बानें अदावत के ख़ौफ से चुप हैं। खुदा की कसम गोया यह मन्ज़र मैं अपनी आँखों से देख रहा हूँ कि अरब के फुकरा और एतराफ व जवानिब के बाद या नशीन लोग उनकी आवाज़ पर लब्बैक कह करे हैं। मुहम्मद (स.अ.व.व.) उन्हें लेकर सख़्तियों के भँवर में उतर पड़े हैं और अरब के सरबुलन्द और सरदार ज़लील हो रहे हैं और उनके घर उज़ड रहे हैं और कमज़ोर नादार अफराद बरसरे अक़तेदार आगे हैं -------------- और उन्हें अपनी क़यादत सौंप दी है। ऐ गिरोहे कुरैश! तुम भी मुहम्मद (स.अ.व.व.) के दोस्त और उनकी जमाअत के मददगार बन जाओ। ख़ुदा की क़सम जो भी उनके बताये हुये रास्ते पर चलेगा , वह खुस बख़्त होगा। अगर मुझे और ज़िन्दगी मिलती और मेरी मौत में ताख़ीर होती तो मैं उनकी नुसरत से हाथ न उठाता , उनके दुश्मनों के हमलों को रोकता और मसायब व आलाम से उन्हें बचाता)

इस अमूमी वसीयत के बाद औलादे अब्दुल मुत्तालिब से खिताब करते हुये फरमातेः-

(जब तक तुम मुहम्मद (स.अ.व.व.) की बातों पर अमल और उनके एहकाम की पैरवी करते रहोगे , ख़ैर व सआदत से बहरामन्द रहोगे , उनकी पैरवी करो , उनाक हाथ बटाओ और हिदायत याफता बनों)

ज़िन्दगी के आख़िरी लम्हों में पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की सदाक़त की गवाही देना , ख़ैरो रआदत और रोश्दो हिदायत को उनके इत्तेबा से वाबस्ता करना एतराफे रिसालत व तस्दीक़े नबुवत नहीं है तो फिर क्या है ? क्या यह हिदायत आमोज़ व ईमान अफ़रोज़ कलमात उनके इस्लाम के आईनेदार नहीं है ?

जब वसीयत करके अपने फरीज़े से सुबुकदोश हो गये तो मौत के आसार ज़ाहिर हुए , चहरे का रंग बदला , पेशानी पर पसीनाआया और पैग़म्बर का सबसे बड़ा मददगार व नासिर और सरपरस्त व ग़मगुसार छियासी ( 86) बरस की उम्र में दुनिया से रुख़सत हो कर जवारे रहमत में पुहँच गया। आन हज़रत (स.अ.व.व.) पर ग़मों का पहाड़ टूट पड़ा , आँखों में आँसू आ गये और गुलुगीर आवाज़ में आपने अपने इब्ने अम हज़रत अली (अ.स.) से फरमायाः- जाओ उन्हें गुस्ल दो , कफ़न पहनाओ और दफ़न का सामान करो , ख़ुदा उनकी मग़फरत करे और अपनी रहमत उनके शामिले हाल रखे।)

आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने गुस्ल व कफन की अन्जाम देही पर हज़रत अली (अ.स.) को मामूर फरमाया , हालांकि आप अपने भाईयों में सबसे छोटे थे। इसकी वजह यह हो सकती है कि अकील और तालिब उस वक़्त तक दायरे इस्लाम से बाहर थे और अबुतालिब ऐसे मुस्लिम व मोमिन का गुस्ल व कफन किसी ग़ैर मुस्लिम से मुतालिक नहीं किया जा सकता था। हज़रत जाफर इस्लाम ला चुके थे मगर वह उस वक़्त हब्शा में थे। यह चीज़ भी अबुतालिब के इस्लाम व ईमान पर रौशनी डालती है। इसिलिए कि हज़रत अबुतालिब अगर काफिर होते तो उनका गुस्ल व कफन हज़रत अली (अ.स.) के बजाये उनकी हम मज़हगब हम मुस्लिक औलाद के सुपुर्द किया जाता। क्योंकि एक मुसलमान से यह ख़िदमत नहीं ली जा सकती कि वह एक काफिर को गुस्ल व कफन दे। ग़र्ज़ हज़रत अली (अ.स.) ने गुस्ल व कफन दिया। आन हज़रत (स.अ.व.व.) तशरीफ फरमां थे और अपने मोहसीन व मरब्बी चचा को कफन में लपेटा हुआ देखकर बहुत रोये और फरमायाः

(ऐ चचा! आपने बचपन में पाला , यतीमी में मेरी केफालत की , बड़े होने पर आपने मेरी नुसरत व हिमायत की। ख़ुदा वन्दे आलम मेरी तरफ से आपको जज़ाये खैर दे)

जब जनाज़ा उठा तो आप (स.अ.व.व.) कन्धा देते हुए शुरु से आख़िर तक शरीके जनाज़ा रहे और इस कोहे सब्र व सिबात को कोहे हजून के दामन में दफ़न करके वापस आये।

आन हज़रत (स.अ.व.व.) के लिये जनाबे अबुतालिब की मौत एक अज़ीम सानेहा थी उनका सबसे बड़ा हामी व पुश्तपनाह दुनिया से रुखसत हुआ था और आप खूँखार दुश्मनों के नरग़े में बे यारो मददगार रह गये थे , अगर चे मुसलमानों की तादाद बढ़ गयी थी मगर उनमें अबुतालिब ऐसा बाअसर कोई न था जो कुरैश के बढ़ते हुए का अन्सदाद कर सके चुनानचे उनके उठ जाने के बाद कुरैश के मज़ालिम में श शिद्ददत पैदा हो गयी और पर जुल्म व सितम के पहाड़ टूटने लगे। इब्ने हश्शाम का कहना है किः-

जब अबुतालिब वफात पा गये तो कुरैश ने आन हज़रत (स.अ.व.व.) को इतनी तकलीफें दी कि अबुतालिब की ज़िन्दगी में सताने की इतनी हिम्मत व हवस उनके दिलों में पैदा न हो सकती थी)

जनाबे अबुतालिब की वफ़ात का ग़म अभी ताज़ा था कि उनकी रेहलत के एक महीने पांच दिन बाद जनाबे खदीजा ने भी इन्तेक़ाल फरमाया , इस हादसे , का भी रसूल अकरम (स.अ.व.व.) के दिल पर काफी असर हुआ। आपने उन दोनों का यकसां गम मनाया अपने हुज़्नों मलाल की याद बाक़ी रखने के लिये इस साल का नाम (अमुल हुज़न) (ग़म व अन्दोह का साल) रखा और फ़रमायाः-

(इन दिनों में इस उम्मत पर दो अज़ीम हादसे एक साथ वारिद हुए हैं। मैं कुछ नहीं कह सकता कि इन दोनों सदमों से कौन सा सदमा मेरे लिये ज़्यादा करब व इस्तेराब का बाअस है।

आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने हज़रत अबुतालिब और हज़रत खदीजा की वफात को अपनी उम्मत के लिये एक हादसा अज़ीम क़रार दिया है , इसलिए कि इब्तेदाये बेअसत में यही वह दो हँस्तियां थी जिन्होंने इस्लाम की नशरो अशाअत में नुमाया किरादर अदा किया और पैग़म्बरे अकरम (स.अ.व.व.) की नुसरत व हिमायत का बेड़ा उठाया , एक ने अफनी सारी दौलत आन हज़रत (स.अ.व.व.) के क़दमों पर नियोछावर कर दी और दूसरा इस्तेबदादी ताक़तों के मुक़ाबले में सीना सिपर होकर खड़ा हो गया अगर एहसान शनासी का जज़बा और हुस्ने ख़िदमात का एहसास हो तो यह दोनों मौतें जो पैग़म्बर की ज़िन्दगी का अज़ीम हादसा थीं , उम्मत के लिये भी एक नाक़ाबिले फ़रामोश अल्मिया होंगी। हज़रत अबुतालिब की रेहलत के बारे में मोअर्रेख़ीन का कहना है कि आपका इन्तेक़ाल निस्फ माहे शवाल या ज़ीक़ाद सन् 10 को हुआ।

औलादें

इ्ब्ने क़तीबा का कहना है कि हज़रत अबुतालिब के चार बेटे , तालिब , अक़ील , जाफर , हज़रत अली (अ.स.) थे और उन सबमें दस दस बरस की छोटायी बड़ायी थी। दयार बकरी का कहना है कि उन बेटों के अलावा आपकी तीन बेटियाँ , रबता , जमाना और फाख़ता (उम्मे हानी) थीं। जनाबे अबुतालिब के बारे में मोअर्रेखीन का कहना है कि मुशरेकीन मक्का ने जब आपको जंगे बदर के मौक़े पर रसूल अकरम (स.अ.व.व.) के मुक़ाबले में अपने साथ ले जाना चाहा तो उन्होंने अपने अशआर में यह हुआ की थी कि परवर दिगार! अगर चे इन भेडियों के ग़ोल में हूँ लेकिन मेरी दिली मुद्दआ है कि मुशरेकीन मसलूब व मग़लूब हों चुनानचे जब उनकी दुआ कुबूल हुयी तो तालिब का पता न मक़तूलों में चला , न वापस आये और न क़ैद हुये। वाज़ेह रहे कि हाशिमी खानवादे की हिजरत के बाद आप मक्का ही में मुकीम रहे और हालते तक़य्या में रह कर इस्लाम की ख़िदमात अन्जाम देते रहे। आप लावलद थे। अक़ील सन् 560 में पैदा हुए आपकी कुन्नियत अबुयज़ीद थी , यह हुदैबिया के मौक़े पर मुशर्रफ बाइस्लाम हुये और सन् 8 हिजरी में मदीने आ गये। आपने जंगे मौता में शी शिरकत की थी। बहुत बड़े नस्साब थे और क़बायले अरब की नसबी कैफियत से बखुबी वाकिफ थे। 66 साल की उम्र में ही में 50 हिजरी मुताबिक सन् 670 में इन्तेक़ाल किया। जनाबे जाफर सूरत व सीरत में रसूल अल्लाह (स.अ.व.व.) से बहुत मुशाबेह थे। इब्तेदा ही में ईमान व इस्लाम से मुशर्रफ हुए , आपने हिजरते हब्शा और हिजरते मदीना दोनों में शिरकत की। जंगे मौता मे आपके दोनों हाथ क़लम हो गये तो आपने अलम दाँतों से सँभाला बिलआख़िर दर्ज-ए-शहादत पर फ़ायज़ हुये आप के मुतालिक रसूल अल्लाह (स.अ.व.व.) ने फरमाया है कि उनके हाथों के एवज़ जन्नत में दो ज़मुर्रुदें के पर अता फरमाये हैं और आप फरिश्तों के हमराह परवाज़ किया करते हैं। आपके जिस्म पर नब्बे ( 90) ज़ख़्म कारी लगे थे इक्तालिस साल की उम्र में शहादत पाई। आपकी ज़ौजा आसमां और मुहम्मद इब्ने जाफर का नाम ज़्यादा नुमायां है। यही अब्दुल्लाह , हज़रत जैनब (स.अ.व.व.) के और मुहम्मद , हज़रत उम्में कुलसूम के शौहर थे। हज़रत अली (अ.स.) का ज़िक्र आइन्दा किया जायेगा।


हज़रत फ़ात्मा बिन्ते असद

फ़ात्मा बिन्ते असद , जनाबे अबुतालिब की ज़ौज़ा और हज़रत अली (अ.स.) की मादरे गिरामी थी। आपके वालिद असद , क़बील-ए-बिन्ते आमिर के बतन से हज़रत हाशिम के फरज़न्द थे। इस लिहाज़ से आप हाशिम की पोती , रसूल अल्लाह (स.अ.व.व.) की फूफी और हरमे अबुतालिब होने की बिना पर चची भी थीं। जब आन हज़रत (स.अ.व.व.) जनाबे अबुतालिब की किफ़ालत में आये तो आप ही की गोदे पैग़म्बर ऐसे हादिये अकबर और रहबरे आज़म की ग़हवारये तरबियत बनी। अगर जनाबे अबुतालिब ने पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की निगेहदाश्त व तरबियत में बाप के फ़रायज़ अन्जाम दिये तो फात्मा बिन्ते असद ने इस तरह मुहब्बत से देख भाल की कि यतीमें अब्दुल्लाह को माँ की कहमा का एहसास न होने दिया। आप अपने बच्चों से ज़्याद उनका ख़्याल रखती थीं और उनके मुकाबले में अपनी औलाद की कोई फिक्र व परवा न करतीं। मुहब्बत , शफक़्कत और इल्तेफात का यह आलम था कि जब खुरमें के दरखतों में फल आता तो रोज़ाना सुबह तड़के उठकर खुरमों के कुछ साफ़ सुथरे दाने चुनकर अपने बच्चों से छिपा कर अलहैदा रख देतीं थी और जब बच्चे इधर होते तो चुपके से आन हज़रत (स.अ.व.व.) की खिदमत में पेश करती थीं। इसी तरह जब दस्तर ख्वान बिछता तो इस पर से कुछ खाना उठाकर अलग रख देतीं ताकि आन हज़रत (स.अ.व.व.) अगर दोबारा खाने की खुवाहिश करें तो वह उन्हें दे सकें।

रसूले अकरम (स.अ.व.व.) भी उन्हें माँ समझते थे , माँ कहकर पुकारते थे और माँ ही की तरह इज़्ज़त व एहतराम करते थे चुनानचे आप (स.अ.व.व.) उनकी शफ़क़्क़ात व मुहब्बत का एतराफ करते हुये फरमाते हैं किः- अबुतालिब के बाद उन से ज़्यादा कोई मुझ पर शफीक़ व मेहरबान न था।

आन हज़रत (स.अ.व.व.) फात्मा बिन्ते असद की मादरना शख़्सियत से इस कदर मुतासिर थे कि मनसबे रिसालत पर फायज़ होने के बाद , अपने फराएज़े मनसबी से वक़्त निकाल कर उनके यहाँ तशरीफ लाते और अकसर दोपहर के औक़ात उन्हीं के साये में गुज़ारते थे। इब्ने साद ने तहरीर किया है कि रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) आपकी ज़ियारत को आते और दोपहर को वहीं इस्तेराहत फरमाते।)

जनाबे अबुतालिब हाशमी थे तो फ़ातिमा बिन्ते असद भी हाशिमिया थीं। मादरी और पिदरी दोनों निसबतों से हाशमी होने का शरफ सबसे पहले अबुतालिब की औलादों को हासिल हुआ जैसा कि इब्ने क़तीबाने तहरीर किया है कि फ़ातिमा बिनते असद पहली ख़ातून हैं जिनके बत्न हाशमी औलादें हुईं।

फ़ात्मा बिन्ते असद इस खानवादे से ताल्लुक रखती थीं जो तहज़ीब व मुआशरत और इख़लाक़ व किरदार के एतबार से दूसरे खानदानों से मुम्ताज़ जाहेलियत के असरात से बेगाना और इन्सानी इक़दार का नुमाइन्दा। आपमें थीं। आप अपने आबा व अजदाद की तरप मसलके इब्राहीमी की पाबन्द , दीन की पैख और कुफ्र व शिरक की अलाइशों से पाक व साफ थीं चुनानचे आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने हज़रत अली से ख़लक़ी व सुल्बी इश्तेराक के सिलसिले में फरमायाः-

(खुदाये बुज़ुर्ग व बरतर नें हमें हज़रत आदम की सुल्ब से पाक़ीज़ा सुलबों और शिकमों की तरह मुन्तक़िल किया जिस सुल्ब से मैं मुन्तक़िल हुआ उसी सुल्ब से मेरे साथ अली (अ.स.) भी मुन्तक़िल हुए यहाँ तक कि ख़ुदा ने मुझे आमना के शिकम से और अली (अ.स.) को फात्मा बिन्ते असद के शिकमे मुबारक से पैदा किया।

फ़ात्मा बिन्ते अशद ख़ानदानी रिफ़अत , नस्बी शराफ़त और पाकीज़ा सीरत के साथ , बैयत और हिजरत में भी सबक़त का शरफ रखती हैं। इब्ने सबाग़ मालकी ने तहरीर फरमाया है कि फ़ात्मा बिन्ते असद इस्लाम लायीं , पैग़म्बर (स.अ.व.व.) के साथ हिजरत की और साबिकुल इस्लाम ख्वातीन में से थी।

आप रियाज़त , एबादत , जोहद , तक़वा और तहारत के बुलन्द दरजात पर फायज़ थीं। रसूले अकरम (स.अ.व.व.) से जब फिशारे कब्र , हश्रों नश्र और हिसाब व किताब का तज़किरा सुनतीं तो ख़ौफ़ व दहशत से लरज़ जातीं। एक मर्तबा आपने पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की ज़बान से जब ये सुना की लोग क़यामत के दिन बरहैना महशूर होंगे तो फरमाने लगी कि यह तो बड़ी रुसवायी की बात है। पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने फरमाया कि मैं अल्लाह से दुआ करूँगा कि वह आपको बरहैना न महशर करे।

4 हिजरी में जब आपने रेहलत फरमायी तो हज़रत अली (अ.स.) , रोते हुए आन हज़रत (स.अ.व.व.) को इत्तेला देने आये और अर्ज़ की कि मेरी मादरे गिरामी ने इन्तेक़ाल किया। यह ख़बर सुनकर आन हज़रत (स.अ.व.व.) भी बे इख़तियार रोये और फरमाया कि ख़ुदा की कसम वह सिर्फ तुम्हारी ही नहीं बल्कि मेरी भी माँ थी। और उसी वक़्त उठ खड़े हुए। सहाबा भी सर झुकाये साथ हो लिये। घर आये। मरहूमा की पेशानी को बोसा दिया और अपना पैराहन उतार कर दिया कि इसे कफन के तौर पर पहना दिया जाये। और जब गुस्ल व कफन के बाद जनाजा घर से बाहर निकला तो आपने आगे बढ़कर काँधा दिया जन्नतुल बक़ी तक सरो पा बरहैना साथ रहे। चन्द आदमियों को जगह की निशान देही करके कब्र खोदने पर मामूर किया और जब क़ब्र खुद कर तैयार हुयी तो खुद बा नफ़से नफ़ीस उसमें उतरे। उसे किनारों से और खोंद कर कुशादा किया और अपने हाथों से लहद तैयार की फिर आप थोड़ी देर के लिये उस लहद में लेट गये और दायें बायें करवटे लेने के बाद बाहर आये और रोते हुये फरमायाः

(ऐ मादरे गिरामीं , खुदा आपको जज़ाये ख़ैर दे आप बेहतरीन माँ थीं)

इस इम्तेयाज़ी बरताव को देख कर कुछ सहाबा कहने लगे , या रसूल अल्लाह! यह बरताव किसी और के लिये आपसे सरज़द नहीं हुआ। फरमाया कि मेरे चचा अबुतालिब के बाद , मरहूमा के एहसानात मेरे सर पर सबसे ज़्यादा है। ख़ुद भूकी रह कर मेरा पेट भरती थीं और ख़ुद फटे पुराने कपड़े पहन कर मुझे अच्छा लिबास पहनाती थीं , खुत तकलीफ़ें बरदाश्त करके मेरे लिये राहत व आराम का सामान फराहम करती थीं। मैंने अपना पैरहन उन्हें इसलिये दिया कि हश्र में वह परदा पोश महशूर हों और बहद में इस लिये लेटा हूँ कि फिशारे कब्र से महफूज़ रहें। एहले सुनन्त के मुम्ताज आलिम शेख़ अली मरजूकी तहरीर फरमाते हैं किः-

(पैग़म्बरे अकरम (स.अ.व.व.) ने फ़ात्मा बिन्ते असद को ख़ुद दफन किया और उन्हें अपने पैराहन का कफ़न दिया। इस मौक़े पर आन हज़रत (स.अ.व.व.) को)

फ़रमाते सुना गया कि (आपका फरज़न्द , आपका फ़रज़न्द) जब आन हज़रत (स.अ.व.व.) से इस बारे में पूछा गया तो आपने फरमाया कि अन्बिया के बारे में जब सवाल हुआ तो आपने बा आसानी जवाब दिया लेकिन जब इमाम के बारे में पूछा गया तो आप तरदुद में मुबतिला हुयीं चुनानचे मैंने आप का फरज़न्द , आपका फरज़न्द कह कर अली अ.स. के नाम के मुताबिक तलकीन करदी।)

फात्मा बिन्त असद की तदफीन जन्नतुल बक़ी में हुयी मगर जब इसके चारों तरफ चार दिवारी बनायी गयी तो आपकी क़ब्रे मुताहर इसके हुदूद से बाहर आ गयी और अब एक ख़स्ता व ख़राब रहगुज़र पर वाक़े है जब हजुज्जाज व ज़ायरीन उधर से गुज़रते हैं तो उस कब्र पर भी फातेहा ख्वानी के लिये खड़े हो जाते हैं जो ज़माने के दस्तबुर्द से अभी तक महफूज़ हैं।

हक़ीक़ते अहमदी

(और (वह वक़्त भी याद करो) जब मरियम के बेटे ईसा (अ.स.) ने कहा , ऐ बनि इसराईल! मैं तुम्हारे पास ख़ुदा का भेजा हुआ (पैग़म्बर) आया हूँ जो किताबे (तौरेत) मेरे सामने मौजूद है इसकी तसदीक़ करता हूँ और यचह खुश ख़बरी सुनात हूँ कि मेरे बाद जो पैग़म्बर आने वाला है उसका नाम अहमद होगा। फिर जब वह उनके पास खुली हुयी निशानियां लेकर आये तो उन लोगों ने कहा कि यह तो सरिहन जादू है।) (सूराऐ सफ आयत 6)

क़ुरान मजीद की इस आयत से पता चलता है कि हज़रत ईसा इब्ने मरियम ने अपने बाद आने वाले रसूल के बारे में जो बशारत दी थी उसमें पेग़म्बरे आखेरूल ज़मां का नाम अहदम बताया था। और मुफसेरीन का कहना है कि इन्जील मैं (अहमद) के नाम से आने वाले नबी की बशारत मौजूद थी मगर ईसाइयों के नारवां अमले तहरीफ़ ने उसे ख़त्म कर दिया। लेकिन इश अमर की वज़ाहत किसी मुफ़स्सिर ने नहीं की कि रसूल (स.अ.व.व.) का नाम अहमद कैसे था ? बल्कि सिर्फ उन्ही हदीसों के नक़ल पर हर एक ने इक्तेफा की है जिन को खुद रसूल उल्लह (स.अ.व.व.) ने इरशाद फरमाया है कि मेरा नाम अहमद था।

बेशक हमारा यह अक़ीदा और ईमान है कि आन हज़रत (स.अ.व.व.) का एक नाम अहमद भी था लेकिन यह नहीं मालूम कि कैसे था ? कब था ? और कहाँ थी ? इसके साथ ही अहादीसे नबवी पर भी हमारा ईमान है लेकिन अहादीस से अगर यह न मालूम हो कि अहमद नाम की हक़ीक़त क्या है तो हम मुशतश्रेक़ीन और ग़ैर मुस्लिमों के सवालात एतराज़ात और इल्ज़ामात का क्या जवाब देंगे ? जैसा कि ईसाइ कहते हैं कि जब हमारी किताबों से मुहम्मद (स.अ.व.व.) को यह मालूम हुआ कि आने वाले नबी का नाम अहमद होगा तो (माअज़ अल्लाह) उन्होंने कुरान की आयत गढ़ ली और ज़बानी भी कहना शुरू कर दिया कि मेरा नाम अहमद है हालांकि उनका नाम मुहम्मद था) इस ज़ेल में एक ईसाइ मुसन्निफ के अअस्सुरात व अल्फ़ाज़ मुलाहेज़ा हों वह लिखता है किः-

(बच्चे का नाम मुहम्मद रखा गया , यह नाम अरबों में बहुत कम मिलता था लेकिन था। इस लफज़ का ----- माद्दा हम्द है जिस से मुहम्मद (स.अ.व.व.) के माने क़ाबिले तारीफ़ के निकलते हैं , और हम्द ही से अहमद बना है। इन्जील के कुछ अरबी तरजुमों में सरयानी लफज़ (पैरा वलेट) का ग़लत तरजुमा अहमद किया गया है और यह महफूम मुसलमानों की ईसाइयों और यहूदियों की गुफ्तगू में ज़्याद मक़बूल हो गया क्योंकि उनके कहने के मुताबिक़ इसी नाम से उनकी किताबों में रसूल के लिये पेशिन गोई थी --------- मूनटास के ब्यान से पता चलता है कि (पैरा क्लेट की आमद का वायदे के बहुते से मफहूम बिगाड़ कर मुत्ताइन किये जा सकते हैं यह मुम्किन है कि उन्हीं में से एक मुन्तख़ मफहूम मुहम्मद के सामने ब्यान किया गया हो और इसी से यह आयत बना ली गयी हो जो सूरये सफ में है---------

हमें तारीख़ के सफहात में मुहम्मद (स.अ.व.व.) का नाम अहमद कहीं नहीं मिलता। ख़ुद आपके बताने के बाद कि मैं ही अहमद हूँ , इस नाम का चलन हो और न आपके दादा हज़रत अबद्दुल मुत्तालिब ने आपका नाम सिर्फ़ मुहम्मद (स.अ.व.व.) रखा था और बचपन मे तमाम अहले मक्का आपको इसी नाम से पुकारते थे। सादिक़ व अमीन के लक़ब से भी याद करते थे लेकिन अहमद का नाम कोई ज़िक्र नहीं था। पहली मर्तबा आप ही के दहने अक़दस से यह इन्केशाफ हुआ कि आप ही अहमद हैं तो क्या अहमद नाम की हक़ीक़त को मालूम करने के लिये तहक़ीक़ ज़रुरी नहीं है जबकि ईसा (स.अ.व.व.) का यह क़ौल भी कुरान में मौजूद है कि मेरे बाद रसूल आने वाला है उसका नाम अहमद होगा ? क्या मुहम्मद (स.अ.व.व.) का परवरदिगार इस अमर से वाक़िफ़ न था कि इससे एतराज़ का दरवाज़ा खुलेगा और ईसाइ फिर्क़ा नबीये करीम (स.अ.व.व.) की सदाक़त व तक़द्दुस पर ज़र्ब लगाने की कोशिश करेगा ? क्या मुहम्मद (स.अ.व.व.) अलग अहमद नाम की हक़ीक़त कुछ और है जिस की तरफ गुज़िशता उम्मतों को मुतावज्जेह किया गया है ?

मुअर्रिख़ की जुस्तजू आमेज़ फिक्र जब तारीख़ की संगालख़ वादियों को ज़ेर ककरे इस हकी़क़त को तलाश करती है तो पता चलता है कि मुहम्मद मुस्तफा (स.अ.व.व.) का नाम अहमद , दर असल आलमे अरवाह में था। क्योंकि जिस्मानी पैकर इख़तियार करने से पहले भी वजूद था। इसकी दलील यह है कि हमारी रुहें पहले ख़लक़ हुयी बाद में हमें जिस्म अता करके इस दुनिया में भेजा गया , क़यामत तक पैदा होने वाले इन्सानों की रूहें अब भी मौजूद हैं और उन्हीं रूहों की दुनिया में खुदा वन्दे आलम ने हम से अपनी रूबूवियत का इक़रार लिया था जैसा कि कुरान कहता है।

(ऐ रसूल (स.अ.व.व.) ! (लोगो को वह वक़्त याद दिलाओ) जब कि तुम्हारे परवर दिगार ने बनी आदम की पुश्तों से उनकी नस्लों को निकाल कर उन्हें एक दूसरे पर गवाह बनाकर उनसे इक़रार लिया था कि क्या मैं तुम्हारा परवरदिगार नहीं हूँ ? सभों ने कहा बेशक तू हमारा परवरदिगार है और हम इसके गवाह हैं। (यह हमे इस लिये कहा कि ऐसा न हो) कहीं तुम क़यामत के दिन बोल उठो कि हम तो इस से बेख़बर थे या यह कह बैठो कि (हम क्या करें) हमारे तो बाप दादाओं ही ने पहले शिरक किया था और हम तो उनकी औलाद थे (कि) उनके बाद (दुनिया में आये) तो क्या हमें उन लोगों के जुर्म की सज़ा में हलाक करेगा जो पहले ही (ग़लत) बातिल कर चुके हैं। (अल आराफ़ आयत 171 ता 173)

इन आयात के ज़ैल में शिया और सुन्नी मुफ़स्सेरीन का इस बात पर इज़्तेमा है कि यह इक़रार , (अहदे अलस्त) का है जब दुनिया में कुछ न था चुनानचे हाफिज़ इब्ने क़य्यिम् अपनी किताब (अलरूह) में रक़म तराज़ है कि ज़ाहिर है कि यह अहद रूहों से लिया गया था क्योंकि उस वक़्त जिस्म कहाँ थे ? फिर लिखते हैं कि काअब क़रज़ी फरमाते हैं कि सब रूहों ने जिस्मों के पैदा किये जाने से पहले अल्लाह की रबूवियत और उसकी माफ़रत का इक़रार किया था।

रूहानी दुनिया में रह कर जब हमने अपने परवरदिगार की रूबूवियत का इक़रार किया था तो उस वक़्त भी रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व.) मनसबे रिसालत पर फ़ायज़ थे जैसा कि आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने खुद फरमाते है कि मैं उस वक़्त भी नबी (स.अ.व.व.) था जब आदम (अ.स.) आबो गिल के दरमियान थे। और तफ़सीर से पता चलता है कि उस वक़्त आपका इस्मे मुबारक अहमदे मुजतबा (स.अ.व.व.) था यानि अल्लाह और मलाएका के नज़दीक आपका नाम अहमद था। मालूम हुआ कि मुहम्मद (स.अ.व.व.) और अहमद एक ही शख़्सियत की दो जुदा जुदा हक़ीक़ते हैं। और यही तमाम सुफ़ियाए कराम का मुत्तफिक़ अक़ीदा भी है। मुजादिदे अलिफ़ सानी कहते हैं कि (अहमद हज़रत रसूले खुदा (स.अ.व.व.) का दूसरा नाम है कि आप आसमान वालों में इसी नाम से मारूफ है। फिर फरमाते है कि (इस इस्मे मुबारक को ज़ाते अहद जल्लेशानेह के साथ बहुत तक़र्रुन है और दूसरे इस्म मुहम्मद से यह इस्म एक मंज़िल अल्लाह के नज़दीक ज़्यादा करीब है। सीरते मुहम्मदिया में है कि आपका नाम मलायक़ा के दरमियान अहमद और इन्सानों में मुहम्मद (स.अ.व.व.) मशहूर है।

साबेका किताबों और मुत्ताइद निशानियों से यह बात आशकार है कि मुहम्मद (स.अ.व.व.) ही आख़िरी रसूल थे लेकिन हज़रत ईसा (स.अ.व.व.) दरअस्ल इस हक़ीक़त की तरफ़ लोगों के ज़ेहनों को मुतावज्जे करना चाहते थे कि आखिरी रसूल (स.अ.व.व.) वही होगा जो आसमानी और रूहानी दुनिया का पहला रसूल था और यही उन्होंने बनि इस्राईल को बताया कि वह रसूल जो आसमान पर तुम्हारा और हमारा सबरा रसूल अहमद के नाम से था वह मेरे बाद जिस्मानी हैसियत से आखिरी रसूल बन कर आने वाला है।

इन्जील और तौरैत में अहमद नाम की हक़ीक़त के बहारे में मुफस्सेरीन ने जो अपने ख़्यालात ज़ाहिर किये हैं उन्हें नक़ल न करते हुए हम हिन्दुओं की मज़हबी किताबों और (बौद्ध) मज़हब में अहमद की हक़ीक़त से मुतालिक़ चन्द नमूने पेश करना चाहते हैं जो यक़ीनन क़ारेईन की मालूमात में इज़ाफा का सबब होंगे।

ऋगुवेद में है कि-

(अहमद ने सबसे पहली क़ुरबानी दी और सूरज जैसा हो गया। वाज़ेह रहे कि क़ुरआन में रसूल अल्लाह अलैहे वसल्लम को (सेराजन मुनीर) (चमकता हुआ सूरज) कहा गया है)

अथर वेद में है कि-

(अहमद वह है जो लौटते हैं तो रौशन और ताक़तवर रहबर साबित होते हैं , मख़लूक़ात की हिफाज़त हर पहलू से करते हैं और बेहतरीन नेजात दहिन्दा साबित होते हैं।

बाइबिल के अलावा , वेदों की किताबों में भी हक़ीक़ते अहमदी का पता चलता है चुनानचे यजुरवेद में है किः-

(उर्दू तरजुमा) (वह तमाम उलूम का सरचश्मा अहमद) अज़ीम तरीन शख़सियत है , यह रौशन सूरज के मानिन्द अँधेरेों को दूर भगाने वाला है इस सिराजे मुनीर को जान लेने के बाद ही मौत को जीता जा सकता है। निजात का और कोई रास्ता नही है) (यजुर वेद)

लेकिन अब उनके तरजुमों में इमतेदादे ज़माना चाबुक दस्ती से काम ले रहा हैऔर जान बूझ कर ग़ल्तियाँ की जा रही हैं। मसलन पहले मंत्र में लफज़े अहमद इस्तेमाल हुआ है। इस लफज़ को दो हिस्सों यानि अहम-अत में तक़सीम करके तरजुमा किया जा रहा है। संस्कृत ज़बान में (दाल) की जगह (ते) इस्तेमाल होता है।

बौद्ध मत में (बुद्धा) का लफज़ पैग़म्बर के हम मानी है। गौतम बुद्ध ने अपने चेले नन्दा को मुख़ातिब करके फरमाया , ऐ नन्दा! न तो मैं पहला बद्धा हूँ और न आखिरी।

पहले बुद्ध के बारे में डा 0 राधा किष्ण अपनी किताब (रिकवरी ऑफ फैथ) में तहरीर फरमाते हैं कि जापान में पहले बुद्धा का नाम अमिताभ मिलता है।) और जापान में इस का तलफ़्फुज़ (आमिद) है यानि (अहमद) लफज़े अमिताभ (उम्मत) और (आभा) दो लफज़ों से मुरक्कब है (उम्मत अहमद का बिगड़ा हुआ तलफ़्फुज़ है और (आभा) के माने नूर के हैं इस तरह अमिताभ के माने नूरे अहमद हुए। यानि बोद्ध इज़्म में यह हक़ीक़त पनाह है कि पहला पैग़म्बर (नूरे अहमद) था।

अब देखिये कि हदीसें क्या कहती हैं ?

अबु हुरैरा से मरवी है कि एक दिन सहाबा ने पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) से पूछा कि या रसूल अल्लाह! नबूवत आप पर किस वक़्त वाजिब हुई ? आपने फरमाया कि उस वक़्त , जब आदम रूह और जिस्म के दरमियान थे। तिरमिज़ी का कहना है कि यह हदीसे एहसन है।

अन्सबी से रवायत है कि मैं ने हज़रत रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व.) से पूछा या रसूल आप कब नबी थे फरमाया जब आदम आबो गिल के दरमियान थे। इस हदीस को इमाम बुखारी ने अपनी तारीख़ में और अबु नईम ने अपने हुलिया में रवायत किया है और हाकिम ने उसे सही कहा है।

अहादीस से सिर्फ अतना ही मालूम नहीं होता कि पैग़म्बर आख़ेरूल ज़मा की नबूवत तख़लिख़े आदम से पहले थी बल्कि यह भी आशकार होता है कि हज़रत अहमद मुजतबा (स.अ.व.व.) की ख़िलख़त तमाम मलायका , जमीन व आसमान , कायनात , दीगर मख़लूक़ात और अरशे इलाही से भी पहले हुयी थी और बाद में खुदा ने आपकी ज़ात को तमाम मख़लूकात व कायनात अर्ज़ी व समावी की ख़िलख़ल का ज़रिया बनाया। चुनानचे शेख़ अहमद सरहिन्दी कहते हैं किः-

कुदसी में आया है कि मैं एक मग़फ़ी ख़ज़ाना था और जब चाहा कि पहचाना जाऊँ तो मैंने मख़लूक़ को ख़ल्क किया।)

इस हदीस को इमामे ग़जाली और मोहियुद्दीन ने भी बयान किया है हदीसे क़ुदसी में रसूले अऱबी की शान में यह अलफाज़ भी मिलते हैं कि अगर तू न होता तो मैं ज़मीन व आसमान को पैदा न करता और न ही अपनी रूबूवियत का इज़हार करता।

इसी हदीस को देलमी ने मसनदे फिरदौस में इब्ने अब्बास से नक़ल किया है। यह हीदसे मवाहिब में भी मरक़ूम हुई है नीज़ हाकिम ने भी अपनी मुस्तदरक में उसे जगह दी है इसके बाद अल्लामा सुबकी ने शिफउल सक़ाम में उसे बरक़ारर रखा है। अल्लामा बिलक़ीनी ने अपने फ़तावे में बरक़रार रखा है लेहाज़ा इस की सेहत पर कोई शुबहा नहीं किया जा सकता।

मुनदर्जा बाला शवाहिद से पता चलता है कि तमाम मख़लूकात में सबसे पहली तख़लीफ़ नूरे अहमदी की थी जैसा कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) का क़ौल है कि सबसे पहले अल्लाह ने मेरा नूर ख़ल्क़ फरमाया।

इश क़ुर्रये अर्ज़ पर इन्सानी वजूद को करोड़ेों साल गुज़र चुके हैं। लातादाद अज़मतों , पस्तियों और रोशनी के मीनारों को समेटता हुआ वक़्त आगे बढ़ता जा रहा है इस आख़िरी घड़ी की तरफ़ जब एक धमाके से उन तमाम अजाएबात का सिलसिला ख़त्म हो जायेगा और एक नबी और अबदी हयात का आगाज़ होगा। वक़्त के साथ साथ अक़ले इन्सानी भी इरतेका की मंज़िले तय कर रही हैं और अपनी तक़र्की के नुक्तये कमाल पर पहुँच कर यह मादी अक़ल भी फना हो जाने वाली है।

अब से चौदह सौ साल क़लब जब अक़ले इन्सानी ताफुलियत की सरहदों से निकल कर बलूग़ियत की तरफ मायल हुयी तो ख़ालिक़े कायनात ने अपने हबीब मुहम्मद (स.अ.व.व.) को दुनिया में इस आख़िरी किताब के साथ भेजा जिस में आखिरी सिरे तक दर पेश आने वाले तमाम मसाएल का हल मौजूद है। कुरान करीम आन हज़रत (स.अ.व.व.) का सबसे बड़ा मोजिज़ा है और इस के अजाएबात रहती दुनिया तक बाक़ी रहेगे। इन्सानी अक़ल इल्मे इलाही का एहाता नहीं कर सकती। जिस मुक़ाम पर पहुँच कर यह मफलूज व लाचार हो जाये वहाँ उसे अलीम व बसीर व ख़बीर की आवाज़ सुनने की कोशिश करनी चाहिये।

रहा साइंस का सवाल- जब वह इंसान की इब्तेदा को दरयाफत नहीं कर सकी तो कायनात की तख़लीफ़ का इल्म उसे क्यों कर हो सकता है ? इस मैदान में वह अभी अँधेरे में ही हाथ पैर चला रही है इसके अलावा और कुछ नहीं है।


अबुल क़ासिम , हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व .)

(विलादत)

हज़रत आदम (स.अ.व.व.) की ख़िलक़त से नौ लाख साल क़लब और वाज़ रवायतों के मुताबिक चार पाँच लाख साल कबल , परवरदिगारे आलम ने आपके नूर को अपने नूर से ख़लक़ फरमाया। तख़लीक़े आदम (स.अ.व.व.) के बाद यह नूर मुख़तलिफ़ असलाबे ताहेरा में होता हुआ जब सुलबे जनाबे अबदुल्लाह इब्ने अब्दुल मुत्तालिब तक पहुँचा तो बशरियत के पैकर में ढ़ल कर बतने जनाबे आमना बिन्ते वहब से सरज़मीने मक्का पर शोअबे बनी हाशिम (जो बाद में शोअबे अबुतालिब कहलाया) मैं आशकार हुआ।

आपकी विलादत बा सआदत के मौक़े पर जो वाक़ियात व हालात रूरुमा हुए वह इन्तेहाई हैरत अंगेज़ व ताज्जुब ख़ेज़ हैं। मसलन-आपकी वालिदा को बारे हमल महसूस नहीं हुआ , वह तौलीद की कसाफतों से पाक व साफ थीं , आप मख़तून व नाफ बरीदां पैदा हुए , दुनिया में वारिद होते ही आपकी पेशानी से ऐसा नूर ज़ाहिर हुआ जिसकी रोशनी से कायनात जगमगा उठी पैदा होते ही आपने सजदये ख़ालिक अदा किया फिर दोनों हाथों को ज़मीन पर टेक कर अपना सर जानिबे आसमान बुलन्द किया और फरमाया , अल्लाहो अकबर , उसके बाद आपने (ला इलाहा इल्ल लाह अना रसूल अल्लाह) के कलेमात ज़बाने मुबारक पर जारी किये जुन्हें सुन कर दुनियाए कुफ्र के ज़मीन व आसमान लरज़ उठे और ऐसा जलज़ला आया कि ऐवाने किसरा के चौदह कंगूरे टूट कर फर्श पर ढ़ेर हो गये , काशान में सावा की वह झील जिसकी परस्तिश होती थी खुशक हो गयी , दजला में तुग़यानी इस क़दर बढ़ी कि उसका पानी सेलाब बन कर महले किसरा में दाख़िल हुआ और फिर तमाम इलाक़ों में दूर दूर तक फैल गया , ब रिवायत इब्ने वाज़ेहुल मतूफी 262 हिजरी शैतान को रजम किया गया और उसका आसमान पर जाना क़तई बन्द हो गया। आतिश कदये फ़ारस की वह आग जो एक हज़ार साल से मुसलसल रौशन थी दफतन बुझ गयी और दुनिया के तमाम बुत झुक गये।

मूबज़ान मूबज़ का ख़्वाब

फारस के एक जय्यद आलिम मूबजा़न मूबज़ ने इसी रात ख़्वाब में देखा कि कुछ तुन्द व सरकश ऊँट कुछ अरबी घोड़ों को दरयाए दजला से गुज़ार कर बला व फारस में मुताफ़र्रिक़ कर रहे हैं। यह अजीब व ग़रीब ख़्वाब इस की इल्मी दस्तरस से बाहर था लेहाजा उसने उसे बादशाहे वक़्त (नौ शेरवां) से ब्यान किया। उसने अपने हीरा के गवर्नर नोमान बिन मनज़िर के पास एक क़ासिद भेज कर यह पै़ग़ाम कहलवाया कि हमारे आलिम दीन ने एक ख़्वाब देखा है लेहाज़ा तुम वहाँ से किसी ऐसे दाना व अक़लमन्द शख़्स को हमारे पास रवाना करो जो ख़्वाबों की ताबीरों का इल्म रखता हो , ताकि वह हमें इस ख्वाब की ताबीर से मुतमईन करा सके। नेमान बिन मुनज़िर ने अब्दुल मसीह इब्ने अम्रल ग़सानी नामी एक शख्स को बादशाह की ख़िदमत में भेज दिया। जब वह वहाँ पहुँचा तो बादशाह ने उससे मुबज़ान का ख़्वाब ब्यान किया और ताबीर का ख़्वाहिश मन्द हुआ। उसने कहा ,मेरा मामू सतीह काहिन जो शाम के एक मुक़ाम जारबिया में रहता है , इस फन का बहुत बड़ा माहिर है लेहाज़ा वही इस ख़्वाब की ताबीर बता सकता है। ग़र्ज़ कि बादशाह ने उसी वक़्त अब्दुल मसीह को शाम रवाना कर दिया।

सतीह काहिन के बारे में कहा जाता था कि वह अजीबुल ख़िलक़त इन्सान था , उसके जिस्म में जोड़ व बन्द थे , वह उठने बैठने से माज़ूर था मगर जब उसे गुस्सा आता तो उठ कर बैठ जाता था , बदन भर में खोपड़ी की हड्डी के अलावा और कोई दूसरी हड्डी न थी उसका मुँह उसके सीने में था। जब घर या बाहर के लोग उसे कहीं ले जाना चाहते तो उसके जिस्म को चटायी की तरह लपेट कर गठरी बना लेते और फिर बीठ या कँधे पर रख कर ले जाते थे और जब उससे कुछ पूछना होता तो उसे खूब झिझोड़ते थे तब कहीं वह आधा होकर ग़ैब का हाल बताता था।

अब्दुल मसीह जिस वक़्त उसके पास पहुँचा , उस वक्त उशकी उम्र व रवायते आमा छः सौ साल और ब रवायते हयातुल कुलूब नौ सौ साल की थी और वह आलमें एहतज़ार में था ताहम उसने अब्दुल मसीह के कुछ कहे बगै़र अज़ खुद वाकिया ब्यान कर दिया और कहा कि जब नौशेरवा की नस्ल से चौदाह अफराद हुक्मरानी कर चुकेंगे तो हुकूमत इसके खानदान से निकल जायेगी , नीज़ एक अज़ीम हस्ती जो आलमे वजूद में आ चुकी है उसका दीन मशरिक़ से मग़रिब तक फैल जायेगा। इतना कह कर उसने दम तोड़ दिया।

मजमा-उल बहरैन में काहिन के मानी साहिर (जादूगर) के हैं। बाज़ का ख्याल है कि काहिन के कब्ज़े में जिन होते थे , बाज़ का ख्याल है कि कहानत एक इल्म है जो हिसाब से ताल्लुक रखता है , बाज़ का ख़्याल है कि शैतान जब आसमान पर जाता था तो वहाँ से ख़बरें लाता था और शैतानी अफ़राद को बताता था दुनिया में दो बड़े काहिन गुज़रे हैं एक सतीह और दूसरे का नाम शक था। रसूले अकरम (स.अ.व.व.) की विलादत के बाद फने कहानत ख़त्म हो गया।

तारीख़ , दिन और सने विलादत

रसूले अकरम (स.अ.व.व.) की तारीख़े विलादत में इख़तेलाफ़ है चुनानचे इस ज़ैल में औलमाये अहले सुन्नत की एक जमाअत ने जिन मुख़तलिफ़ तारीख़ों का ताईन किया है उनके बारे में अल्लामा अब्दुल बाक़ी ज़रक़ानी ने शरहे मवाहिब में निस्फ दरजन अक़वाल नक़ल किये हैं , और उन अक़वाल में आपके विलादत की तारीख़ दूरसी , आठवीं , दसवीं , बारहवीं , सत्तरहवीं , और अठारवीं रबीउल अव्वल बतायी गयी है। शिब्ली नोमानी ने सीरतुन नबी में नवीं रबीउल अव्वल को फौक़ीयत दी है जो उनकी अपनी खुद साख़ता तहक़ीक़ है। तारीख़ की मोतबर व मुस्तनद किताबों में कहीं इसका वजूद नहीं है।

बहरहाल , तफसीर , हदीस और तारीख़ के मोहक्क़े क़ीन अहले मुन्नत हज़रात की अकसरियत इस अमर पर मुतफ्फ़िक व मुत्ताहिद है कि आपकी तारीख़े विलादत बाहर रबीउल अव्वब बरोज़ दो शम्बा सन् एक आमुल फ़ील मुताबिक 26 अगस्त सन् 570 है जबकि शिया ओलमा बिल इत्तेफाक़ सत्तरह रबीउल अव्वल को तसलीम करते हैं। यौमे विलादत के बारे में फ़रीक़ैन का इत्तेफाक़ है कि आपकी विलादत दो शन्बा के दिन बादे तुलूये आफताब वाक़े हुई , मुस्लिम इब्ने क़तावा अन्सारी से मरवी एक तूलानी हदीस इसके मुताअलिक मौजूद है जिसकी सनद के बारे मे इमाम कस्तलानी ने मवाहिब लदुनिया में यह तहरीर फरमाया है कि यह हदीस इस बात पर दलालत करती है कि आपकी विलादत दिन के वक़्त बादे तुलुए आफताब वाके हुई और इसी हदीस में दो शन्बे के दिन का तय्युन भी है।

मुक़ामे विलादत के बारे मे ज़रक़ानी फ़रमाते हैं कि शोअबे हाशिम मेंवह मकान जहाँ आपकी विलादत हुयी थी (ज़क़ाके मुकिक) के नाम से मौसूम था और बक़ौल इब्ने असीर वही मकान था जिसे आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने जनाबे अक़ील इब्ने अबुतालिब (अ.स.) को हिबा फरमाया था बाद में उनकी औलादों ने उसे मुहम्मद बुन यूसुफ सक़फ़ी (जो हुजाज बिन यूसुफ सक़फ़ी का भाई था) के हाथ बय कर दिया था। इसके बाद अपने ज़माने में जब हारून रशीद हज की ग़र्ज़ से मक्का आया तो उसने मुहम्मद बिन यूसुफ के वुरसा से यह मकान खरीद कर इस जगह एक मस्जिद बनवायी जो अब तक (मौलुदुन नबी) के नाम से तमाम मुसलमानों की ज़्यारत गाह है।

सैय्यद अमीर अली इस्परिट ऑफ इस्लाम में तहरीर किया है कि जिस साल आन हज़रत (स.अ.व.व.) पैदा हुए वह साल कसराये नौशेवां का चालिसवां साले जुलूस था।

दुआ-ए-सलामती

इब्ने साद का बयान है कि जब आन हज़रत (स.अ.व.व.) पैदा हुए तो जनाबे आमना ने एक शख़्स के ज़रिये विलादत की इत्तेला हज़रत अब्दुल मुत्तालिब को दी इस वक्त आप खान-ए-काबा के मक़ाम हजर में अपने फरज़न्दों और क़ौम के कुछ मख़सूस अफराद के साथ तशरीफ फरमां थे। पोते की विलादत की ख़बर सुन कर बेहद मसरूर हुए और उसी वक्त उठ कर खड़े हो गये , आपके हमराही भी साथ हो लिये। जब आप जनाबे आमना के पास तशरीफ लाये तो उन्होंने तमाम हालात व रूदाद से आपको मुत्तेला फरमाया। उसके बाद आपने मौलूद को आग़ोश में लिया और सीने से लगये हुए सीधे खान-ए-काबा में आये। ख़ुदा वन्दे आलम का शक्रिया अदा किया और मंजूम अल्फाज में आन हजरत (स.अ.व.व.) की सलामती के लिये दुआ और मंजूम अल्फाज में आन हजरत (स.अ.व.व.) की सलामती के लिये दुआ फरमायी। आपने फरमाया , परवर दिगार! इस नेयमत के एवज़ में किस जबान से तेरी हमद व सना करूँ , पालने वाले! तूने हमें वह फरज़न्द अता किया है जो मेरे लख़्ते दिल अब्दुल्लाह की याद गार और तमाम ख़लाएक़ में पाक व पाकीज़ा है। ऐ रूकन व मक़ाम के मालिक! तू इस मौलूद को अपने हिफ्ज़ों अमान में रख यहाँ तक कि मैं उसे अपनी आँखो से जवान देखूँ , परवरदिगार! इसे हासिदों की नज़रे बद से महफूज़ रख और उन्हें रूसवा कर जो इसका बुरा चाहें।

तक़रीबे अक़ीक़ा और रस्मे नामगुजारी

(बहीक़ी ने दलाएलुल नबुवता में तहरीर फरमाया है कि आन हज़रत (स.अ.व.व.) की विलादत के सातवें दिन अब्दुल मुत्तालिब ने तक़रीबे अक़ीक़ा मुनअकिद करके कुरैश को मदऊ किया। जब लोग खाने से फारिग़ हुए तो उन्होंने अब्दुल मुत्तालिब से पूछा कि इस मौलूद का नाम क्या रखा है ? जिस की विलादत की खुशी में हमको मदऊ किया। अब्दुल मुत्तालिब ने फरमाया मुहम्मद (स.अ.व.व.) ! लोगों ने कहा वैसे नाम क्यों नहीं रखे जैसे कि अब तक इस घराने में होते हैं अब्दुल मुत्तालिब ने कहा मैंने इस नियत से यह नाम रखा है कि अल्लाह ताला इस बच्चे को मम्दूह फरमाये समावात में और मख़लूके ख़ुदा ज़मीन पर इसकी मदह हो।)

अल्लामा दयार बाकरी तारीख़े ख़ुमीस में रक़म तराज़ है कि रसूले अकरम (स.अ.व.व.) की विलादत के मौक़े पर अब्दुल मुत्तलिब ने ऊँट ज़बहा कराये और क़बील-ए-कुरैश के लोगों की दावत की। जब खाने से फराग़त हुयी तो लोगों ने पूछा कि जिस मौलूद की खुशी में आपने हमें मदऊ किया है उसका नाम क्या रखा है ? आपने फरमाया , मुहम्मद (स.अ.व.व.)। इस पर लोगों ने कहा कि क्या आपको अपने बुजुर्गों के नामों से रग़बत नहीं है ? आपने फरमाया कि मैंने यह नाम इसलिये रखा है ताकि यह बच्चा ज़मीन व आसमान पर महमूद हो। यह क़ौल भी तारीख़ों में मिलता है कि आप की मादरे गिरामी ने बशारत की बिना पर आपका यह नाम रखा था।

अलक़ाब और कुन्नियत

इस्लामी कुतुबे तफासीर , अहादीस और तारीख़ में आपके कसीरूल तादाद अलक़ाब महरूम हैं। इमाम समहूदी ने (अख़बारूल वफ़ा) में आपके निन्नानवे अल्क़ाब मय तौज़ीहात के बड़ी तफसील से क़लम बन्द फरमाते हैं उनमें एक मशहूर तरीन लक़ब ख़ातुमुल नबीईन भी जो नसे कुरानी मनसूस व मख़सूस है।

तिरमज़ी ने जबीर इब्ने मुतइम से आन हज़रत (स.अ.व.व.) का यह क़ौल नक़ल किय है कि मेरे अलक़ाब में हाशिर , जिसके जेरे क़दम लोग महशूर होंगे , माही यानि जिसके सबब से अल्लाह ताला कुफ्र को मिटा देगा और आक़िब (बाद में आने वाला) भी है। काज़ी अयाज़ ने किताब (शिफा) में लिखा है कि ख़ुदा के नामों में से एक नाम सादिक़ है और हदीस में रसूले करीम (स.अ.व.व.) का नाम भी सादिक़ व मसदूक़ आया है नीज़ ख़ुदा के नाम मौला और वली भी हैं जिनके मानी हाकिम और ऊला बित्तसर्रुफ़ के हैं और उन्हीं माने में अल्लाह ताला फरमाता है इन्नमा वलीकुमुल्लाहो व रसूलोह और रसूल (स.अ.व.व.) ने फरमाया (अना वली उन कुल्ले मोमेनिन) नीज़ हक़ ताला इरशाद फरमाता है कि (अल नबी ऊला बिल मोमेनीन मिनअन फुसेहिम) और जनाबे पैग़म्बरे ख़ुदा (स.अ.व.व.) ने फरमाया है मन कुन्तों मौलाहो फाअली उन मौला हो। आपकी कुन्नियत के बारे में फ़रीक़ैन का मुताफ़ेक़ा फैसला है कि (अबुल क़ासिम) थी।

रज़ाअत व परवरिश

अहले इस्लाम का कहना यह है कि जनाबे आमना के बाद सरकारे दो आलम (स.अ.व.व.) को सूबिया और हलीमा सादिया ने दूध पिलाया। कुछ मुवर्रेख़ीन ने यह लिखा है कि इस सआदत की तक़दीम का शरफ सूबिया की खुश क़िसमती का हिस्सा था जिसे अबुलहब ने अपनी कनीज़ी से आज़ाद कर दिया था , उनके बाद आन हज़रत (स.अ.व.व.) की ख़िदमाते रज़ाअत से हलीमा सादिया मुशर्रफ हुयी) चुनानचे इब्ने साद का कहना है कि आमना लके बाद , सबसे पहले रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) को सूबिया ने अपने बेटे मसरूह का दूध पिलाया क्योंकि हलीमा उस वक़्त नहीं आयीं थी। आन हज़रत (स.अ.व.व.) के क़बल सूबिया ही ने हज़रत हमज़ा इब्ने अब्दुल मुत्तालिब और अबु सलमा बिन अब्दुल असद मख़जूमी को भी अपना दूध पिलाया था)

अल्लामा ज़रकानी हज़रत आमना की मुद्दते रज़ाअत के बारे मे रक़म तराज़ है कि आपने हुजूर अकरम (स.अ.व.व.) को कुल नौ दिन दूध पिलाया , बाज़ कहते हैं कि तीन दिन पिलाया और बाज को ख़्याल है कि सात दिन तक पिलाया। इन अक़वाल को साहबाने सीरत से साहबे तारीख़ खमीस ने लिखा है।

सूबिया के अय्यामे रज़ाअत की कोई खास मुद्दत किसी तारीख़ में नहीं मिलती। अलबत्ता ज़रक़ानी की तहरीर से यह वाज़ेह है कि हलीमा के आने से पहले सूबिया ने चन्द रोज़ तक आन हज़रत (स.अ.व.व.) को दूध पिलाया इसके बाद यह ख़िदमत हलीमा से मुतालिक़ हो गयी। ब्यान किया जाता है कि सूबिया की रज़ाअत के दौरान अरब के क़दीम दस्तूर के मुताबिक़ औरतों की मुख़तलिफ़ जमाअतें दूध पिलाने का काम तलाश करती हुयीं मक्का आयीं थी उसी क़ाफिले में हलीमा सादिया भी थी। चुनानचे हलीमा की हमराही औरतों को तो शरफ़ा और रउसा के बच्चे रज़ाअत के लिये मिल गये मगर हलीमा को इत्तेफ़ाक़ से कोई बच्चा नहीं मिला , वह इसी फिक्र व तलाश में हज़रत अब्दुल मुत्तालिब के दौलत सरां तक पुहँची , जनाबे आमना ने उन्हें अपने यतीम बच्चे की रज़ाअत के लिये मुक़र्रर करना चाहा मगर यह जान कर कि बच्चा यतीम है उन्होंने कुछ पस व पेश किया , इसलिए कि रज़ाअत के एवज़ माली मुनाअफत की उम्मीद बच्चे के बाप ही से हुआ करती है। फिर अपने मुतालिक़ यह सोच कर कि मैं मोअत्तिल रह जाऊँगी , उन्होंने इस ख़िदमत को कुबूल कर लिया और आन हज़रत (स.अ.व.व.) को अपने हमराह ले कर मक्के मोअज़्ज़मा से अपने मसकन की तरफ पलट आयीं।

इब्ने अस्हाक़ ने अपनी (सीरत) में तहरीर फरमाया है कि रसूले अक़रम (स.अ.व.व.) छः बरस तक हलीमा सादिया के पास उनके क़बीले मे परवरिश पाते रहे। जिलसमा ने इस छः साला मुद्दत में यह उसूल क़ायम रखा है कि हर छः माह बाद आपको अपने हमराह लेकर मक्का में आती थी और हफ्ता दस दिन जनाबे आमना के घर रह कर फिर वापल ले जातीं थी।

अल्लामा अब्दुल बाक़ी ज़रक़ानी का ब्यान है कि रज़ाअत के दो बरस तमाम हुये तो हलीमा हस्बे दस्तूर आप को जनाबे आमना के पास मुस्तक़िल तौर पर छोड़ने के लिये आयी मगर चूँकि उन दिनों मक्का में वबायी इमराज़ की कसरत थी , आबो हवा मुवाफिक़ न थी इसलिए हज़रत आमना की ख्वाहिश पर वह फिर अपने साथ वापस ले गयी और मज़ीद दो साल तक अपने पास रखा उसके बाद लाकर पहुँचा गयी।

उसके बाद ज़रक़ानी ने तमाम इख़तेलाफ़ी अक़वाल को जमा करके अपनी राय से यह फैसला किया कि (क़ौल रायज यही है कि आप चार बरस के सिन में अपनी वालिदा के पास वापस चले आये।

इसमें कोई कलाम नहीं कि तमाम मोअर्रेख़ीन , मोहद्दीस और मुफ़स्सेरीन ने सूबिया और हलीमा सादिया के मुतालिक़ यह तहरीर किया है कि उन औरतों ने सरकारे दो आलम (स.अ.व.व.) को दूध पिलाया था , मगर अक़ले सलीम रज़ाअत की इन रिवायत को कुबूल करने से क़ासिर है क्योंकि दुनिया की कोई तारीख़ नहीं बताती कि किसी नबी को उसकी माँ के अलावा किसी ग़ैर औरत ने अपना दूध पिलाया हो और न ही हज़रत आदम (अ.स.) से ईसा (अ.स.) तक किसी मिसाल के ज़रिये इसकी ताईद होती है। हज़रत इब्राहीम (अ.स.) और हज़रत मूसा (अ.स.) के वाक़ियात गवाह हैं कि किन नासाज़गार हालात में कुदरत ने उनकी माँओं को उन तक पहुँचाया है और जब माँ के पहुँचने में किसी मजबूरी की वजह से ताख़ीर हुई तो ख़ुद उसी बच्चे के अँगूठे से दूध का धारा जारी कर दिया , जैसा कि हज़रत इब्राहीम (अ.स.) के लिये हुआ। मतलब यह था कि अगर बच्चे को माँ का दूध दस्तियाब न हो सके तो भी वह शिकम सेर होता है। समझ में नहीं आता कि अन्बिया-ए-मासबक़ के उसूलों और तरीक़ों से हट कर रसूल अकरम (स.अ.व.व.) को माँ के अलावा किसी दूसरी औरत के दूध पिलाने को क्यों कर तसलीम किया जाये , खुसुसन ऐसी सूरत में जबकि यह अमर तस्लीम शुदा हो कि दूध से जो गोश्त पोस्त और खून बनता है वह नसब के गोश्त व पोस्त के मानिन्द होता है और दूध पीने से वह रिश्ता नाजाएज़ हो जाता है जो नसब से होता है। फिर ऐसी सूरत में जबकि आपकी माँ मौजूद थीं और अहदे रज़ाअत के बाद तक जि़न्दा रहीं हैं। लेहाज़ा फितरी तौर पर यह ख़्याल पैदा होता है कि आन हज़रत (स.अ.व.व.) को जनाबे आमना ने दूध पिलाया था और सूबिया व हलीमा ने आपकी परवरिश व परदाख़्त के फरायज़ अन्जाम दिये थे। इस नज़रिये को कुरान मजीद की इस आयत से भी तक़वियत पहुँचती है जिसमें ख़ुदा वन्दे आलम हज़रत मूसा (स.अ.व.व.) के लिये इरशाद फरमाता है किः- (हमने दूध पिलाये जाने के नसवाल से पहले ही मूसा (अ.स.) पर तमाम दाईयों के दूध को हराम कर दिया था)

(कुरान मजीद पारा 22, रुकू 4)

भला यह क्यों कर मुम्किन है कि खु़दा वन्दे आलम हज़रत मूसा (अ.स.) को तो माँ के दूध के अलावा दीगर औरतों के दूध से बचाने का इतना एहतमाम करे और फख़रे मूसा हज़रत मुहम्मद मुसतफा (स.अ.व.व.) को इस तरह नज़र अन्दाज़ कर दें कि ऐसी औरतें उन्हें दूध पिलाये जिन का इस्लाम भी वाजे नहीं है।

इस्तेक़ा और नमू

जौहरे क़ुदसिया ने आपकी कुवते नमू में इस क़दर इरतेक़ा पैदा कर दिया था जो नबूवत की खुसूसियत को फ़ितरते इन्सानी की अमूमियत से बिल्कुल अलाहिदा करार देता है। इस हक़ीक़त को ज़रक़ानी अपनी शरह में यूँ ब्यान फरमाते हैं कि जनाबे रिसालते माब (स.अ.व.व.) जब दो माह के हुए तो घुटनियों चलने लगे , तीन माह के हुए तो खड़े होने लगे , चार माह में दीवार का सहारा लेकर चलने लगे। पाँच माह में आपके अन्दर कुवते रफ़तार पैदा हो गयी और छः माह में सुरअत की ताक़त आ गयी। आठवें मीने आपने बोलना शुरू किया और दस माह में फ़साहत व बलाग़त से कलाम करने लगे।

जनाबे आमना की रेहलत

जब आप छः बरस के हुए तो आपकी मादरे गिरामी आपको अपने साथ लेकर जनाबे अब्दुल्लाह की कब्र की ज़्यारत को मक्का से मदीना तशरीफ़ लायी और वहाँ एक माह तक मुक़ीम रहीं। इसी असना में बीमार पड़ी और वापसी में अबुवा के मुक़ाम जो मदीने से तक़रीबन 33 या 34 किलो मीटर की दूरी पर वाक़े हैं , आपने इन्तेक़ाल फरमाया और वहीं मदफून हुयीं। आपकी ख़ादमा उम्मे एमन वहाँ से आपको अपने हमराह ले कर मक्का वापस आयीं। जब आप आठ बरस के हुए तो आपके मुशफिक़ व मेहरबान दादा हज़रत अब्दुल मु्त्तालिब भी दुनिया से रुख़सत हो गये। हज़रत अब्दुल मुत्तालिब के बाद आपके चाचा हज़रत अबुतालिब और चची फ़ात्मा बिन्ते असद ने तरबियत के फरायड़ अपने ऊपर आयद किये। जैसा कि तबरी का बयान है किः- (वाक़ए फील से आठ बरस बाद हज़रत अब्दुल मुत्तालिब इन्तेका़ल फरमा गये और आन हज़रत (स.अ.व.व.) के बारे में हज़रत अबुतालिब को वसियत फरमा गये क्योंकि हज़रत अबुतालिब और हज़रत अब्दुल्लाह का मनसब हज़रत अबुतालिब को तफ़वीज़ हुआ फिर आन हज़रत हमेश अबुतालिब के हमराह रहे।) वाक़ियात की मुकम्मल तफसील जनाबे अबुतालिब बिन अब्दुल मुत्तालिब के हालात में मरकूम हो चुकी है।


सीरत व किरदार की बुलन्दी

जब आप छः बरस के हुए तो आपकी मादरे गिरामी आपको अपने साथ लेकर जनाबे अब्दुल्लाह की कब्र की ज़्यारत को मक्का से मदीना तशरीफ लायी और वहाँ एक माह तक मुक़ीम रही। इसी असना में बीमार पड़ीं और वापसी में अबुवा के मुक़ाम जो मदीने से तक़रीबन 33 या 34 किलो मीटर की दूरी पर वाक़े है , आपने इन्तेक़ाल फरमाया और वहीं मदफून हुयीं। आपकी ख़ादमा उम्मे ऐमन वहाँ से आपको अपने हमराह लेकर वापस आयीं। जब आप आठ बरस के हुए तो आपके मुशफिक़ व मेंहरबान दादा हज़रत अब्दुल मुत्तालिब भी दुनिया से रूख़सत हो गये। हज़रत अब्दुल मुत्तालिब के बाद आपके चचा हज़रत अबुतालिब और चची फात्मा बिन्ते असद ने तरबियत के फरायज़ अपने ऊपर आयद किये। जैसा कि तबरी का बयान है कि- (वाक़ए फील से आठ बरस बाद हज़रत अब्दुल मुत्तालिब इन्तेकाल फरमा गये और आन हज़रत (स.अ.व.व.) के बारे में हज़रत अबुतालिब को वसियत फरमा गये क्योंकि हज़रत अबुतालिब और हज़रत अब्दुल्लाह मांजाये भाई थे इस ख़ुसुसियत की वजह से आन हज़रत (स.अ.व.व.) की विलायत का मनसब हज़रत अबुतालिब को तफवीज़ हुआ फिर आन हज़रत हमेशा अबुतालिब के हमराह रहे।) वाक़ियात की मुकम्मल तफसील जनाबे अबुतालिब बिन अब्दुल मुत्तालिब के हालात में मरकूम हो चुकी हैं।

मुदब्बिरे कुदरत ने फितरते सालेहा के आला जौहरों से पैकरे रिसालत को मुरत्तब किया था। बचपन ही से पाकीज़गी , तहारत , तहज़ीब , शाइस्तगी , एहतियात , सब्रो रज़ा और हया व इफ्फत के बे मिसाल मुहासिन आपके आदात व अतवार और सीरत व किरदार से मुनसलिक थे जिसका एहसास हर मुशाहिद को होता था। ज़मानए जाहेलियत के ग़लत और फरसूदा मरासिम से हमेशा दामवन कश रहते थे। मुहब्बत , मुरव्वत , इन्साफ , दयानतदारी , अमानतदारी , रास्त गुफ्तारी , हकूक़ हमसायगी , मुआशरत , हिलम , और बरदाशत में आप खुसूसी इम्तेयाज़ात के मालिक थे। इसी लिये कुरैश के लोग आपको अमूमी तौर पर (अमीन) के लक़ब से याद किया करते थे।

हल्फुल फुजूल

हज़रत रसूले खुदा (स.अ.व.व.) की उम्र 20 बरस हुयी तो कुरैश के माबैन एक बाहमी मुआहिदा हुआ जिसे हल्फुल फुजूल कहते हैं। इस मुआहिदे के लिये बनी हाशिम , बनी ज़हरा और बनी तमीम के मुन्तख़ब मुमाइन्दे अब्दुल्लाह बिन जदआन तमीमी के मकान पर जमा हुये और हलफ की बुनियाद पर यह अहद किया कि हम हमेशा मज़लूमों की मदद व हिमायत करेंगे ख़्वाह वह कहीं के बाशिन्दे हों। हम ज़ालिमों से इस वक़्त मुक़ाबला करेंगे जब तक मज़दूर को उसका हक़ न मिल जाये। इस मुआहिदे के मोहर्रिक रसूले अकरम (स.अ.व.व.) के एक चचा जुबैर इब्ने अब्दुल मु्त्तालिब थे। इब्ने साद का कहना है कि यह मुआहिदा माहे ज़ीक़ाद में हुआ और यह तमाम साबिक़ा मुआहिदों में सबसे अफज़ल व अशरफ था।

इम मुआहिदे में बनि हाशिम की हैसियत से आन हज़रत (स.अ.व.व.) बनफसे नफीस खुद शरीक हुए और मबऊस बा रिसालत होने के बाद भी उसके अलमबरदार रहे। चुनानचे आप फरमाया करते थे कि निफाज़े दीने इस्लाम के बाद भी कोई शख़्स इस मुआहिदे की बिना पर मुझे आवाज़ दें तो मैं हाज़िर हूँ।

वाज़ेह रहे कि इस मुआहिदे में सिर्फ बनि हाशिम , बनि ज़हरा और बनि तीम के मुमाइन्दे ही शरीक थे। बनि उमय्या की किसी फर्द का नाम तारीख़ की किसी किताब में नहीं मिलता। मेरे ख़्याल में इसकी वजह सिर्फ यही हो सकती है कि यह क़बीला फितरतन ज़ालिम और तशद्दुद का खूगर था और इसके अफ़राद जिहालत के अँधेरों में रह कर सफ़्फ़ाकी , मक्कारी , खूँरेजी और मज़ालिम को अपनी मयोशत का मुस्तक़ील ज़रीया समझते थे।


ख़ाना आबादी

पच्चीस ( 25) साल की उम्र में जब आन हज़रत (स.अ.व.व.) के हुस्ने सीरत , दयानतदारी , रास्तबाज़ी और सिदक़ व सफ़ा की शोहरत आम हो गयी नीज़ आपको सादिक़ व अमीन का ख़िताब दिया जा चुका तो जनाबे खदीजा बिन्ते खुलीद ने जो इन्तेहाई पाकीज़ा नफस व पाक सीरत , खुश अतवार व खुश इख़लाक़ और अरब में सबसे ज़्यादा दौलत मन्द खातून थीं , आपके पास अफनी शादी का पैगा़म पहुँचाया जो मंजूर हुआ और हज़रत अबुतालिब ने आपका निकाह पढ़ा। मुवर्रेख़ीन का बयान है कि हज़रत ख़दीजा का मेहर बारह औन्स सोना और 25 ऊँट मुक़र्रर हुआ जिसे हज़रत अबुतालिब ने उसी वक़्त अदा कर दिया। जनाबे खदीजा की तरफ से अक़द पढ़ने वाले उनके चचा अम्र बिन असद थे। इस शादी की तफसीले हालात जनाबे अबुतालिब में मरकूम हो चुकी है।

इन्हेदाम व तामीरे काबा

जब हज़रत रसूले खुदा (स.अ.व.व.) की उम्र पैंतीस ( 35) साल की हुई तो कुरैश मक्का ने ख़ान-ए-काबा को मुन्हदिम करके अज़ सर नो तामीर का मनसूबा तैयार किया। इसका सब यह ब्यान किया जाता है कि पहाड़ों की दरमियानी वादी का बहाव काबे की सिमत था और उस वक़्त ख़ान-ए-काबा के गिर्द सिर्फ एक क़द्दे आदम ऊँची चारदीवारी थी छत वग़ैरा न थी इस लिये जब सेलाब आता था तो उसका पानी दीवारों के ऊपर से इमारत के अन्दर दाख़िल हो जाता था और उसमें शिगाफ़ पैदा कर देथा था जिस से उसके इन्हेदाम का ख़तरा लाहक़ होगया था। दूसरा सबब यह बताया जाता है कि उस वक़्त ख़ान-ए-काबा के दरमियान एक कुँए के अन्दर ख़ज़ाना था जो चोरी हो गया। इब्ने साद का कहना है कि यह ख़ज़ाना तलाई व नुकरई ज़ेवरात और एक सोने के बने हुए हिरन पर मुश्तमिल था जो चोरी हुआ लेहाज़ा कुरैश ने यह तय किया कि ख़ान-ए-काबा की मौजूदा इमारत को मुन्हदिम करके अज़सरे न इसकी तामीर अमल में लायी जाये और उसे मुसक़्क़फ़ कर दिया जाये। ताकि किसी ख़तरे का अन्देशा न रहे।

तारीख़ बताती है कि आग़ाज़े इन्हेदाम व तामीर से कबल कुरैश की एक बुजुर्ग व मुम्ताज़ शख़्सियत अबुवहब बिन अम्र बिन आएज़ बिन इम्रान बिन फखजूम ने खड़े होकर यह ऐलान किया कि ऐ गिरोहे कुरैश , इस बात का ध्यान रहे कि बैतुल्लाह की तामीर में हलाल की कामयाबी के अलावा तुम्हारी हराम की कमायी मसलन जिनाकारी का मुआवज़ा , सूद का रुपया और ग़ासेबाना का कोई रूपया पैसा न लगने पाये।

इस ऐलान से अन्दाज़ा होता है कि कुरैश मे शरियते इब्राहीमी के हराम व हालाल का तसव्वुर मौजूद था यह और बात है कि बेशतर अफराद अमली तौर पर इस के पाबन्द न रहें हों।

इस ख़्याल से कि यह शरफ किसी एक खानदान से मख़सूस न रहे कुरैश ने काबे की इस जदीद तामीर को मुख़तलिफ़ हिस्सों में तक़सीम कर दिया था। चुनानचे बैरूनी दरवाज़े का हिस्सा औलादे अबदे मनाफ व ज़हरा से मुताल्लिक़ हुआ , रूकने असूद और रूकने यमानी की दरमियानी दीवार बनि मख़जूम और दीगर कुरैशी खानदानों के हिस्से में आयीं , पुश्त की तरफ बनि अब्दुल दार व बनि असद के हिस्से में आया। इस तक़सीम के नतीजे में इन्हेदाम व तामीर का काम तो मुकम्मल हो गया मगर जब इस हिस्से की तामीर का वक़्त आया जहाँ हजरे असवद नस्ब होना था तो तमा क़बिलों में इख़तेलाफ़ पैदा हो गया और हर क़बीला इस कोशिश में मसरूफ हो गया कि यह शरफ उसी को हासिल हो जिसका अन्जाम यह हुआ कि .तलवारें बुलन्द होने लगीं और कश्त व खून का अन्देशा पैदा हो गया। इब्ने इसहाक़ का ब्यान है कि यह क़बायल आपस ही में जंग पर आमादा हो गये यहाँ तक कि बिनि अब्दुल दार ने एक प्याले में खून भर कर अपने सामने रखा और बनि अदी के साध मिलकर जान देने का अहद किया और अपने हाथ उस खून में डुबो दिये। इसकी वजह से तामीरी काम एक हफ्ते तक मुअत्तिल रहा। बिल आख़िर इस झगड़े को ख़त्म करने के लिये कुरैश के एक मोअम्मर शख़्स अबु उमय्या बिन मुग़ीरा की तजवीज़ पर यह हुआ कि कल जो शख़्स सबसे पहले ख़ान-ए-काबा में दाख़िल हो उसे सालिम मुक़र्रर किया जाये और वह जो फैसला करे उसे सब मान लें। चुनानचे दूसरे दिन वक़्त सहर ख़ान-ए-काबा में जो चेहरा नज़र आया वह हज़रत मुहम्मद मुस्तफा (स.अ.व.व.) का था जिसे देखते ही सब खुश हो गये और कहने लगे कि यह तो हमारे अमीन हैं। हम सब उनके फैसले पर राज़ी हैं।

इसके बाद सारा मुआमला आन हज़रत (स.अ.व.व.) के रूबरू पेश हुआ। आपने फरमाया , एक कपड़ा लाओ चुनानचे वह लाया गया। आपने दोशे मुबारक से अपनी अबा उतार कर ज़मीन पर बिछायी और हजरे असवद को उठा कर उसमें रख दिया , फिर फरमाया कि तुममें से हर क़बीले का एक आदमी इसको गोशा पकड़े , इस तरह हर क़बीले के नुमाइन्दा अफराद ने उसको उठाया और उस मुक़ाम तक ले आये जहाँ उसको रखा जाना था आपने बढ़कर अपने दस्ते मुबारक से हजरे असवद को उठाकर उसकी जगह पर नसब कर दिया और हुजूर (स.अ.व.व.) की इस हिकमते अमली से एक फितनये अज़ीम का अद्दे बाब हो गया।

बेअसत और नुजुले कुरान की इब्तेदा

हज़रत रसूले खुदा (स.अ.व.व.) ने बेअसत से दो साल क़बल (अज़तीस साल की उम्र में) कोहेहिरा के एक ग़ार को जिसकी लम्बाई चार हाथ और चौड़ाई डेढ़ हाथ थी अपनी इबादत गुज़ारी के लिये मुनतख़ब फ़रमा लिया था और उसी ग़ार में बैठ कर आप इबादत व रियाज़त के साथ साथ कमाले मारफत के आईने में जमाल व जलाले इलाही का मुशाहिदा फरमाते और ख़ान-ए-काबा को देख कर दिली सुकून व क़लबी इत्मिनान महसूस करते। कभी कभी खाने की अशया और पीने का पानी भी अपने हमराह ले जाते और चार चार छः छः दिन क़याम फरमाते नीज़ रमज़ानुल मुबारक का पूरा महीना वहीं गुज़ारते थे।

मुवर्रेख़ीन का ब्यान है कि जब आपकी उम्र चालीस साल एक यौम की हुई तो एक दिन आप इसी आलमे तन्हाई मे मसरूफ इबादत थे कि कानों में आवाज़ आई (या मुहम्मद (स.अ.व.व.) ) आपने इधर उधर देखा मगर कोई दिखायी नहीं दिया। फिर आवाज़ आयी और फिर आपने देखा मगर कोई दिखायी न दिया। फिर आवाज़ आयी और फिर आपने देखा तो आपकी नज़र एक नूरानी मख़लूक़ पर पड़ी। वह हज़रत जिबरील (अ.स.) थे , उन्होंने काह या मुहम्मद (स.अ.व.व.) ! पढ़ो (इक़रा) आपने फरमाया (मा अकरओ) क्या पढ़ुँ ? जिबरील ने कहा , इक़रा बइसमे रब्बेकल लज़ी ख़ल्क़ा। फिर आपने सब कुछ बढ़ दिया क्योंकि इल्में , कुरान आपको पहले ही से था।

जिबरील (अ.स.) की तहरीके इक़रा का मक़सद सिर्फ यह था कि नुजूले कुरान की इब्तेदा हो जाये। इसके बाद आपने जिबरील के साथ वजू किया और ज़ोहर की नमाज़ अदा करके अपने घर तशरीफ लाये। हज़रत ख़दीजतुल कुबरा और हज़रत अली (अ.स.) से सारा वाक़िया ब्यान किया , दोनों ने इज़हारे ईमान किया और नमाज़े असर बाजमात पढ़ी गयी। यह इस्लाम की पहली नमाज़ थी जिसमें बानिये इस्लाम इमाम और ख़दीजा व अली (अ.स.) मामूम थे। यह वाक़िया 27 रजबुल मुरज्जब सन् 41 आलमुल फील मुताबिक़ 610 का है।

साबेक़ीने इस्लाम

तारीख़े बताती हैं कि सिद्दीक़ए ताहिरा हज़रत ख़दीजतुल कुबरा के बाद वह पहली शख़्सियत जिसने तसदीक़े रिसालत करके अपने साबेक़ा ईमान का इज़हार किया , सिद्दीक़े अकबर व फ़ारूक़े आज़म हज़रत अली इब्ने अबुतालिब (अ.स.) की थी। इब्ने इसहाक़ कहते हैं कि मुर्दों में सबसे पहले जो शख़्स आन हज़रत (स.अ.व.व.) पर ईमान लाया और तसदीक़े रिसालत की वह अली (अ.स.) थे। तबरी ने ज़ैद बिन अरक़म , जाबिर इब्ने अब्दुल्लाह और अफीफे कुन्दी वग़ैरा से इब्ने इसहाक़ के इस क़ौल की तसदीक़ की है। ग़र्ज़ कि हज़रत अली (अ.स.) के साबिकुल इस्लाम व साबिकुल ईमान होने के बारे में इस कसरत से तारीख़ी शवाहिद और रवायात मौजूद हैं कि अगर उन्हें जमा किया जाये तो एक मुस्तक़िल किताब तैयार हो सकती है। हज़रत रसूल खुदा (स.अ.व.व.) ने खुद भी इसकी तसदीक़ फरमायी है चुनानचे दार क़तनी ने अबु सईद ख़दरी से इमामे अहमद ने हज़रत उमर से , हाकिम ने मआज़ से और अक़ीली ने हज़रत आयशा से रवायत की है कि हज़रत (स.अ.व.व.) ने फरमाया कि मुझ पर ईमान लाने वालों में सबसे पहले शख़्स अली अब हैं और हज़रत अली (अ.स.) का क़ौल है कि मैने सबसे पहले इस्लाम ज़ाहिर किया। अल्लामा अब्दुर्रहमान बिन ख़लदून फरमाते हैं कि हजरत ख़दीजा के बाद फ़ौरन हज़रत अली ईमान लाए। मुवर्रिख़ अबुल फिदा का कहना है कि जनाब ख़दीजा रज़ी अल्लाहताला अन्हा के अव्वल ईमान लाने और मुसलमान होने में किसी को कोई इख़्तेलाफ़ नहीं है मगर उनके बाद यह इख़्तेलाफ़ है कि अव्वलन कौन इमान लाया जबिक साहेबान सीरत और बहुत से अहले इल्म का बयान है कि मरदों में हज़रत अली बिन अबीतालिब नौ , दस या ग्यारह साल की उम्र में सबसे पहले मुशर्रफ़ ब इसलाम हुए।

अफीफे कुन्दी की इस रवायत से भी इसकी तसदीक होती है जिसमें उन्होंने चश्मदीद गवाह की हैसियत से यह वज़ाहत की है (कि मैंने बेइस्त के बाद आन हज़रत (स.अ.व.व.) को नमाज़ पढ़ते इस हालत में देखा है कि उनके पीछे जनाबे ख़दीजा और हज़रत अली (अ.स.) खड़े थे। उस वक़्त तक कोई इस्लाम न लाया था।

इस रवायत को अल्लामा अब्दुल बर ने इस्तेआब जीम 2 सफा 225 मतबूआ हैदराबाद दकन में , इब्ने असीर जज़री ने असदुलग़ाबा जीम 2 सफा 494 तारीख़े कामिल जीम 2 सफा 20 और तबरी ने तारीख़ कबीर जीम 2 सफा 212 मतबूआ मिस्र में नकल किया है। उनके अलावा शायरे मशरिक़ अल्लामा अक़बाल फरमाते हैं कि)।

मुस्लिमे अव्वल शाहे मर्दां अली (अ.स.) इश्क़ रा सरमायए ईमाँ अली (अ.स.)

यह अमर भी वाज़ेह रहे कि हज़रत अली (अ.स.) का रोज़े अज़ल ही से मुस्लिम और मोमिन होना साबित है लेहाज़ा उनके बारे में (इस्लाम लाने) उनके मुतालिक़ इस्लाम या ईमान लाने का जुमला इस्तेमाल हुआ है उससे इज़हारे इस्लाम व ईमान ही मुराद लेना चाहिये।

अल्लामा तबरिसी की एक रवायत से पता चलता है कि उसी दौर में हज़रत अली इब्ने अबुतालिब (अ.स.) के एक दूसरे के भाई जनाबे जाफरे तय्यार भी इस फेहरिस्त में शामिल हो चुके थे चुनानचे इब्तेदा में जो नमाजे़ं हुयी थीं और उनमें रसूल (स.अ.व.व.) के पीछे जो सफ क़ायम होती थी वह हज़रत अली (अ.स.) जाफर (अ.स.) , ज़ैद (अ.स.) और जनाबे ख़दीजा (स.अ.व.व.) पर मुशतमिल थी।

जनाबे ज़ैद के इस्लाम के बारे में इब्ने हश्षाम का कहना है कि-

(इब्ने इसहाक़ कहते हैं कि ज़ैद बिन हारसा बिन शरजील बिन काअब बिन अब्दुल अज्ज़ा बिन अमराउल क़ैस गुलाम रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) हज़रत अली (अ.स.) के बाद इस्लाम लाये और नमाज़ पढ़ी)

इब्ने हश्शाम के इस क़ौल को तबरी ने भी अपनी तारीख़ में लफज़ व लफज़ नक़ल किया है। इसके बाद तबरी फिर कहते हैं कि ज़ैद के बाद हजरत अबुबकर बिन अबुक़हाफ़ा इस्लाम लाये। इब्ने हश्शाम सफा 76 में भी यही इबारत मरक़ूम है और अल्लामा शिबली ने भी यही तरतीब नक़ल की है लेकिन तबरी ने आपको इस्लाम से मुतालिक़ तमाम रवायतों को जमा करने के बाद यह भी लिखा है किः-

(मुहम्मद इब्ने साद नाक़िल हैं कि मैंने अपने बाप से पूछा कि आप लोगों मे हज़रत अबुबकर क्या सबसे पहले इस्लाम लाये ? तो उन्होंने कहा कि नहीं , उनसे पहले पचास से ज़्यादा लोग इस्लाम ला चुके थे)

अगर तबरी की इस रिवायत को नज़र अन्दा़ज़ करके हम तरतीबे मशहूरा के मुताबिक बिल फ़र्ज़ मुहाल हज़रत अबुबकर को चौथे नम्बर पर मान भी लें तो पाँचवे अबुज़रे गफ़्फ़ारी , छटे ख़ालिद इब्ने सईद अबुल आस और सातवें उमर इब्ने अबसतुल सलमा साबेक़ीन इस्लाम साबित होते हैं। लेकिन तारीख़ व हदीस की किताबों में उन बुजुर्गों के बारे में इस क़दर इख़तेलाफ़ है कि कोई मवर्रिख़ व मोहक़्क़ि यह फैसला न कर सकेगा कि आख़ेरूल ज़िकर तीनों हजरात में कौन पहले इस्लाम लाया ? तबरी फरमाते हैं किः-

(वाक़ेदी का क़ौल है कि उन बुजुर्गों के साथ ख़ालिद इब्ने सईद बिन आस इस्लाम लाये वह शुमार में पाँचवे मुसलमान थे फिर अबुज़र इस्लाम लाये। वह चौथे थे या पाँचवे , हमारे नज़दीक इस इख़तेलाफ़ कसीर है कि उन तीनों बुजुर्गों ख़ालिद , अबुज़र और उमर बिन अबिस्ता में कौन पहले इस्लाम लाया)

यह है इस्लामी तारीख़ों का ब्यान और इस्लामी हदीसों की शान की आज तक यही न तय हो पाया कि उन तीनों बुजुर्गों में कौन साहब पहले इस्लाम लाये एक हज़रत अबुबकर को साबिकुल इस्लाम या सबक़त फिल इस्लाम सािबित करने की कोशिश मे हुकुमत के ज़ेरे असर ओलमा , मुहद्देसीन , मुफ़स्सेरीन और मुहक़्क़ेक़ीन ने तारीख़ों और हदीसों का दफतर इस तरह तहस नहस कर दिया कि हक़ीक़त का पता ही न चल सके। हालाँकि उमर इब्ने अबसतुल सलमा के बार में इमाम अब्दुल बर ने इस्तेआब में यह तहरीर किया है कि उन्हीं अहले किताब में से एक शख़्स ने यह बशारत दी थी कि मक्के में एक ऐसा शख़्स जाहिर होगा जिसका दीन अफज़ल तरीन होगा जब उसके ज़हूर की ख़बर सुनना तो तुम उसकी पैरवी करना। चुनानचे उमर इब्ने अबसता मक्के में आया करता था और पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) के बारे में लोगों से पूछा करते थे यहाँ तक कि एक मर्तबा उमर बिन अबसता को मालूम हुआ कि एक शख़्स मक्के में पैदा हुआ है जो साबे़का दीन से मुनहरिफ है नीज़ उन्हे यह भी पता चला कि आन हज़रत (स.अ.व.व.) मग़फी हैं और तमाम कुरैश आपकी मुख़ालफ़त पर उतर आये हैं।

इस वाक़िये से ज़ाहिर है कि बुजुर्ग हज़रत के इस्लाम लाने की दास्तान बहुत बाद की है। फिर सबक़त का दावा कैसा ? सच तो यह है कि इमाम अब्दुल बाद की इस तहरीर ने इब्ने हश्षाम और तबरी राबेअन और ख़ामेसन पर पानी फेर दिया।

तबरी और इब्ने हश्षाम की तहरीर से पता चलता है कि हजरत अबुबकर जब मुसलमान हो चुके तो उन्ही की तहरीक पर कुछ दिनों के बाद हजरत उसमान , ज़ुबैर बिन अवाम , अब्दुल रहमान बिन औफ , सईद साद बिन अबीवकास और तलहा इब्ने अब्दुल्लाह ने इस्लाम इख़तेयार किया। हालाँकि असल वाक़िया यह है कि हज़रत अबुबकर की तहरीक पर मुसलमान नहीं हुए थे , बल्कि उनका इस्लाम हजरत अली इब्ने अबुतालिब (अ.स.) की कोशिशों का नतीजा था। तक़दीम व ताख़ीर के लेहाज़ से भी यह गिरोह मुवख़िर है क्योंकि तारीख़ों से इस अमर की निशानदेही होती है कि उन लोगों से पहले हज़रत अबुज़र गफ़्फ़ारी के हमराह अम्मार बिन यासीर , तुफ़ैल इब्ने उमर दूसी , ज़माद बिन सालबा , सहीब रूमी , उसमान बिन मज़ऊन और अबु फकीह वग़ैरा इस्लाम की नेमत से सरफराज़ हो चुके थे।

कानून तक़य्ये पर अमलदरामद

आग़ाज़े रिसालत से दीन बरस की मुद्दत तक कानूने तक़य्ये पर अमल होता रहा और मग़फी तौर पर इस्लाम की तबलीग़ होती रही जैसा कि इब्ने साद का बयान है-

(वही निजात होने के बाद इब्तेदा में तीन साल तक आन हज़रत (स.अ.व.व.) ख़ुफिया तौर पर तबलीग़ करते रहे यहाँ तक कि इज़हारे नबूवत का हुक्म आया)

मशियते खुदा वन्दी के सात मसहलत का तक़ाज़ा भी यही था कि सरकारे दो आलम (स.अ.व.व.) दावते इस्लाम को फिल्हाल मग़फी रखें। क्योंकि उस वक़्त सरकश और खूँखार कुफ्फार व मुशरेकीन के दरमियान आपकी ज़ात ऐसी थी जैसे कि बत्तीस दाँतों के दरमियान ज़बान होती है। यह सिर्फ आन हज़रत (स.अ.व.व.) ही का सब् व सबात और अज़में इस्तेक़लाल था कि अहदे जाहेलियत के खून आशाम माहौल में अपनी अज़ीम ज़िम्मेदारियों को इन्तेहायी राज़दारी , खबरदारी और खुश असलूबी के साथ आपने अन्जाम दिया यहाँ तक कि खुदा परस्तों की एक जमाअत तैयार हो गयी।

इन अय्यामे अख़फा में जब नमाज़ का वक़्त आता तो सरकारे ख़तमी मुरतबत (स.अ.व.व.) किसी पहाड़ की खायी में चले जाते और वहाँ अपनी नमाज़ अदा करते इब्ने असीर का ब्यान है कि चाश्त की नमाज़ आप हरम ही में अदा करते थे क्यों कि यह नमाज़ कुरैश के मज़हब में भी जारी थी।

तारीखे इस्लाम का यह एक अहम मसअला है कि इस्लाम क्यों कर फैला ? मुख़ालफ़ीन इस्लाम ने इसका ज़रिया तलवार बताया है , जबकि यह एक वाज़ेह हक़ीक़त है कि इब्तेदाई दौर में इस्लाम के हाथ में न तलवार थी न उसकी अपनी कोई फौज थी और न ही कोई रिसाल तैयार हुआ था कि उसके ज़रिये मुख़ालेफ़ीन के मज़ालिम और तशद्दुद का दिफाअ मुम्किन होता। अहले इस्लाम के लिये क़दम क़दम पर ख़तरात थे , जान व माल का अन्देशा था , मौत का साया था और अपने तहाफुज़ की ज़िम्मेदारियां। लेहाज़ा इश ख़ास पहलू को नज़र अन्दाज़ नहीं किया जा सकता कि इस्लाम से वाबस्ता होने वाले कौन और किस क़िस्म के लोग थे ?

यह अमर सबमें मुशतरक था कि यह लोग कुरैश के मनासिबे आज़म में से कोई मनसब नहीं रखते थे बल्कि ज़्यादा तर ऐसे अफराद थे जिन्हें जाह व दौलत के दरबार में जगह भी नहीं मिल सकती थी मसलन सहीब और अबुफकीह वग़ैरा। चुनानचे आन हज़रत (स.अ.व.व.) जब उन लोगों को लेकर हरम जाते थे तो रऊसाए कुरैश हँस कर कहते थे कि यही वह लोग हैं जिन पर ख़ुदा ने एहसान किया है। कुफ्फार के नज़दीक उनाक इफलास उनकी तहक़ीर का बाअस था लेकिन अगर हक़ बीं नज़रों से देखा जाये तो यही चीज़ थी जो उन्हें ईमान की दौलत से माला माल कर सकती थी। न उन्हें सरमायादारी से कोई सरोकार था और न इस बात का ख़ौफ था कि अगर बुत परस्ती छोड़ देंगे तो काबे का कोई मनसब हाथ से जाता रहेगा। ग़र्ज़ कि उनके दिल इस कसाफत से पाक व साफ़ थे जो कुरैश के दिलों में समाई हुई थी। शायद यही वजह है कि अन्बिया के इब्तेदायी पैरो हमेशा नादार व मुफलिस लोग हुवा करते थे। ईसाइयत के अरकान अव्वलीन माही गीर थे। हज़रत नूह (अ.स.) के मुक़्ररेबीन ख़ास के बारे मे कुफ्फार को कहना पड़ा किः- हम तो बज़ाहिर यह देखते हैं कि तेरी पैरवी उन्हीं लोगों ने कही जो रज़ील हैं।

मज़कुरा हालात की बिना पर मुख़ालेफ़ीन इस्लाम का यह दावा किस क़दर लगो , मुहमत और मज़हका खेज़ है कि इस्लाम तलवार के ज़ोर से फैला। यह बात और है कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) के बाद खुलफा के दौर में जो फतूहाते इस्लाम के नाम पर हुयीं उनमें मुल्क गीरी की हवस कारफरमां थी।

मुख़लिफ़ीन इस्लाम अगर थोड़ी देर के लिए ताअस्सुब का चश्मा उतार दें तो यह हक़ीक़त उन पर वाज़ेह हो जायेगी कि इस्लाम न कोई नयही शरियत लाया न उसने अपने निसाब व एहकामाते शरयीं के बारे में कोई दावा किया बल्कि वह तमाम अन्बिया व मुरसलीन की गुज़िश्ता शरियतों को कामिल और मुकम्मल करने के लिये नाज़िल किया गया है। यही सबब है कि इस्लाम ने अपनी हक़ानियत की बिना पर जिस रफ़्तार से तरक़्की की मंज़िलें तय की हैं इसकी मिसाल किसी दूसरे मज़हब में नहीं मिलती।

दावते ज़ुलअशीरा

मखफी तबलीग़ के जब तीन बरस गुजर गये और बेइस्त का चौथा साल शुरू हुआ तो एलानिया तबलीग़ व दावत का हुक्म आया कि (वन्ज़ुर अशीरतकल अक़रीबन) अपने क़रीबी रिश्तेदारों को तबलीग़ करो।

इस आयत के नाज़िल होने के बाद आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने जनाबे अबुतालिब के घकर को मरकज़े तबलीग़ क़रार दिया और हज़रत अली (अ.स.) , से फरमाया कि वह औलादे अब्दुल मुत्तालिब के खाने का इन्तेज़ाम करें और उन्हें पैगाम दें कि वह शरीके दावत हों। हज़रत अली (अ.स.) ने कुछ गोश्त , एक प्याला दूध और सवा तीन सेर आटे की रोटियाँ का इन्तेज़ाम किया और औलादे अब्दुल मुत्तालिब को खाने पर तलब किया। मुक़र्रर वक़्त पर तक़रीबन चालीस अफराद इकट्ठा हुए उनमें आन हज़रत (स.अ.व.व.) के चचा अबुतालिब , हमज़ा इब्ने अब्बास और अबुलहब भी शामिल थे। अगर चे खाने वालों की तादाद को देखते हुए खाना कम था मगर खुदा ने उस थोड़े से खाने में इतनी बरकत दी कि सबने शिकम सेर होकर खाया फिर भी बचा रहा। जब यह लोग खाने से फारिग़ हुये तो आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने खड़े होकर चाहा कि अपनी रिसालत का ऐलान करके उन्हें खुदा परस्ती की दावत दें कि अबुलहब ने लोगों को मुख़ातिब करते हुये कहा कि मुहम्मद (स.अ.व.व.) तुम्हें तुम्हारे आबाओ अजदाद के दीन से बहकाना और गुमराह करना चाहते हैं , उनकी बातों पर तवज्जो न करना वरना अन्देशा है कि तुम बहक जाओगे। अबुलहब की इस शर अंगेज़ी का नतीजा यह हुआ कि मजमें में इन्तेशार पैदा हो गया और सब लोग उठ खड़े हुये और पैग़म्बरे अकरम (स.अ.व.व.) जो कुछ कहना चाहते थे वह न कह सके। दसूरे दिन हज़रत अली (अ.स.) के ज़रिये उन्हें दावत दी गयी और वह लोग फिर जमा हुये और जब खाने से फराग़त हुई तो पैग़म्बरे अकरम (स.अ.व.व.) फिर फरिज़ये तबलीग़ अद करने खड़े हुये , अबुलहब ने फिर रख़ना अन्दाज़ी करना चाही मगर जनाबे अबुतालिब ने मुआन्दाना रविश को देख कर उसे डाँटा और कहा कि (ऐ बदबख़्त! तुझे इन बातों से क्या वास्ता। (यह सुन कर अबुलहब को फिर बोलने की हिम्मत न हुई और वह घुटनों में सर देकर ख़ामोश बैठ गया। फिर हज़रत अबुतालिब ने मजमें से मुख़ातिब होकर फरमाया कि तुम लोग अपनी अपनी जगह पर सुकून व इत्मिनान से बैठे रहो और पैग़म्बर (स.अ.व.व.) से कहा कि आप जो कहना चाहते हैं कहिये हम उसे सुनेंगे और उस पर अमल करेंगे आन हज़रत (स.अ.व.व.) की ढारस बन्धी और आपने मजमे से ख़िताब करते हुये फ़रमाया-

(ऐ फरज़न्दाने अबुल मुत्तालिब! ख़ुदा की क़सम मैं नहीं जानता कि अरब मों कोई शख़्स इस चीज़ से बेहतर चीज़ लाया हो जो मैं तुम्हारे लिये लेकर आया हूँ। मैं तुम्हारे लिये दुनिया व आख़रत की भलाई ले कर आया हूँ और ख़ुदा ने मुझे हुक्म दिया है कि मैं इस भलाई की तरफ तुम्हें दावत दूँ। तुम में कौन शख़्स है जो इस सिलसिले में मेरा मददगार बनने के लिये तैयार है ? मैं वादा करता हूँ कि वही मेरा भाई , मेरा वसी और मेरा जॉनशीन क़रार पायेगा।)

दो चार आदमियों के अलावा कोई भी इस ऐलान पर खुश न था चे जाएकि कि उनमें से कोई दस्ते ताअव्वुन बढ़ाता या नुसरत व हिमायत का वादा करता। सब सर झुकाये हुए चुप बैठे रहे कि दफतन उस ख़माश फिज़ां में अली (अ.स.) की आवाज़ सुकूत और सन्नाटे को तोड़ती हुई गूँजी , या रसूल उल्लाह! मैं आपका मुआविन व मददगार और सीना सिपर हूँगा , अगर किसी ने आपको टेढ़ी नज़रों से देखा तो मैं उसकी आँखे फोड़ दूँगा और किसी ने शरअंगेज़ी की तो उसका पेट फाड़ दूँगा। आन हज़रता (स.अ.व.व.) ने फरमाया , ऐ अली (अ.स.) ! तुम ज़रा तवक़्कुफ़ करो शायद इन बड़ों में से कोई शख़्स मेरी आवाज़ पर लब्बैक कहे। जब तीन मर्तबा कहने के बाद भी हाज़रीन की तरफ से कोई जवाब न मिला तो आपने अली (अ.स.) को अपने करीब बुलाया उनके सर पर हाथ रखा और फरमायाः-

(यक़ीनन यह मेरा भाई वसी मेरा जॉनशीन है और तुम सब को लाज़िम है कि इसकी इताअत करो।)

क़ुरैश ने यह ऐलान सुना तो उनके होंटो पर एक तहक़ीक आमेज़ मुस्कुराहट नमूदार हुई। कनखियों से एक दुसरे को देखा और उशे एक मजहक़ा खेज़ बात समझ कर उसका मज़ाक उड़ाया , कुछ मनचलों ने हज़रत अबुतालिब से यह तक कहा कि तुम भी अपने बेटे की बात मानो और उसकी इताअत करो।

अगर चे उस वक़्त हज़रत अली (अ.स.) की बातों पर कुरैश ने कोई तवज्जो नहीं दी और एक सरसरी व ब सरोपा बात समझ कर उसका तमसखुर उड़ाया मगर दुनिया ने डरा धमका कर देखा लियाकि इस कमसिन और नौखेज़ बच्चे ने भरी महफ़िल मे जो वादा किया था उसे पूरी तरह निभाया। दुश्मनों के नरग़े में तलवारों के साये में यह साबित कर दिया कि पैग़म्बर (स.अ.व.व.) के ऐलान के मुताबिक़ आन हज़रत (स.अ.व.व.) की जॉनशीन और क़ायम मुक़ामी का इससे बढ़कर कोई हक़दार नहीं है।

अमीरूल मोमनीन (अ.स.) के ईफ़ाये अहद के नतीजे में पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) पर भी यह फर्ज़ आयद होता था कि वह अली (अ.स.) की खिलाफ़त व नियाबत का उमूमी ऐलान करके दुनिया को यह बता दे कि अगर अली (अ.स.) ने अपनी जान खतरे में डाल कर अपने वादे की तकमील की है तो मैं भी अपने वादे को पूरा करके दुनिया से रुखसत होना चाहता हूँ। चुनानचे इसी एहसासे फर्ज़ के तहत और हुक्मे इलाही के मुताबिक अलविदा की वापसी पर ग़दीरे खुम के मुक़ाम पर (मन कुनतो मौला फाअली उन मौला) कह कर आपने अली (अ.स.) की खिलाफ़त और हाकमीयत का ऐलान किया। यह ऐलान उसी दावते अशीरा की सदाये बाज़गश्त और अली के ईफ़ाये अहद व हुस्न ख़िदमात का अमली एतराफ़ था।

इस दावते अशीरा के ऐलान से हज़रत अली (अ.स.) की खिलाफ़त की बुन्यादी हैसियत पर भी रौशनी पड़ती है , इस तरह कि पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने इस उमूमी दावते इस्लाम के मौक़े पर सिर्फ तीन चीज़ों का ऐलान किया। एक तौहीद , दूसरे रिसालत और तीसरे हज़रत अली (अ.स.) की वसायत व ख़िलाफ़त। तौहीद व रिसालत के ऐलान के साथ साथ इस नियाबत व ख़िलाफ़त का ऐलान उसकी असासी व बुनयादी हैसियत को वाज़े करने के लिये काफ़ी है। लेहाज़ा तौहीद व रिसालत अगर उसूले इस्लाम में दाख़िल है तो हज़रत अली (अ.स.) की इमामत भी इस्लाम का एक अहम रूकन शुमार होगी और जिस तरह इस्लाम के लिये तौहीद व रिसालत का इक़रार ज़रुरी है उसी तरह अली 0 की वसायत व नियाबत का इक़रा भी लाज़मी होगा।

नुसरते रसूल का आग़ाज़

रसूले अकरम (स.अ.व.व.) ने जब एलानिया तबलीग़े इस्लाम का आगाज़ किया तो कुरैश को हज़रत अबुतालिब का थोड़ा बहुत पास व लेहाज़ था , उन्होंने बराहे रास्त लड़ने के बजाये अपने बच्चों को यह सिखाया कि वह आन हज़रत (स.अ.व.व.) को जहाँ पायें परेशान करें और उन पर पत्थर फेंके ताकि वह तंग आकर बुत परस्ती के खिलाफ कहना सुनना छोड़ दें और इस्लाम की तबलीग़ से किनारा कश होकर घर में बैठ जायें। चुनानचे जब पैग़म्बर घर से निकलते तो कुरैश के लड़के के पीछे लग जाते। कोई ख़स व ख़ाशाक़ फेंकता और कोई ईंट पत्थर मारता। आन हज़रत (स.अ.व.व.) आजुर्दा ख़ातिर होते , अज़ीयतें बर्दाश्त करते मगर ज़बान से कुछ न कहते , और न कुछ कहने का महल था , इसलिए कि बच्चों से उलझना और उनके मुँह लगना किसी भी मज़हब और संजीदा इन्सान को ज़ेब नहीं देता। एक मर्तबा हज़रत अली (अ.स.) ने आपके जिस्में मुबारक , पर चोटों के निशान देखे तो पूछा या रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) यह आपके जिस्म पर निशान कैसे हैं ? पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने भर्राई हुई आवाज़ में कहा कि ऐ अली कुरैश खुद तो सामने आते नहीं अपने बच्चों को सिखाते पढ़ाते हैं कि वह मुझे जहाँ पायें तंग करे। मैं जब भी घर से बाहर निकलता हूँ तो वह गलियों और बाज़ारों मे जमां हो जाते हैं और मुझ पर पत्थर बरसाते हैं यह उन्हीं चोटों के निशानात हैं। हज़रत अली (अ.स.) ने यह सुना तो वह बेचैन हो गये और कहा कि या रसूल उल्लाह आईन्दा आप तन्हा कहीं न जायें , जहाँ जाना हो मुझे साथ ले जायें। आप तो उन बच्चों से मुक़ाबला करने से रहे मगर मैं तो बच्चा हूँ , मैं उन्हें ईंट का जवाब पत्थर से दूँगा और आईन्दा उन्हें जुराअत न होगी कि वह आपको अज़ीयत दें या आपका रास्ता रोकें। चुनानचे दूसरे दिन जब पैग़म्बर (स.अ.व.व.) घर से निकले तो अली (अ.स.) को भी साथ ले लिया। हस्बे आदत कुरैश के लड़के हजूम करके आगे बढ़े। देखा कि पैगम़्बर (स.अ.व.व.) के आगे अली (अ.स.) खड़े हैं। वह लड़के भी अली 0 (अ.स.) के सिन व साल के होंगे उन्हें अपने हम सिन के मुक़ाबले में तो बड़ी जुराअत दिखाना चाहिये थी मगर अली (अ.स.) के बिगड़े हुए तेवर देख कर झिझके। फिर हिम्मत करके आगे बढ़े। उधर अली (अ.स.) ने अपनी आस्तीनें उल्टी और बिफरे हुए शेर की तरह उन पर टूट पड़े। किसी का हाथ तोड़ा , किसी का सर फोड़ा , किसी को ज़मीन पर पटख़ा और किसी को पैरों तले रोंदा। बच्चों का हुजूम अपने ही सिन व साल के एक बच्चे से पिट पिटा कर भाग खड़ा हुआ और घर जाकर अपने बड़ों से फरयाद की कि अली (अ.स.) ने हमें बुरी तरह मारा पीटा है। मगर बड़ों की यह हिम्मत न हो सकी कि फरज़न्दे अबुतालिब से कुछ कहें , क्योंकियह सब कुछ उन्हीं के ईमा पर होता था। उसके बाद से बच्चे जब पैग़म्बर के साथ अली (अ.स.) को देखते तो कहीं दुबक कर बैठ जाते थे या इधर उधर मुन्तशिर हो जाते।

इस वाक़िये के बाद हज़रत अली (अ.स.) को ख़ज़ीम के लक़ब से याद किया जाने लगा जिसके मानी हड़डी पसली का तोड़ने वाला है। चुनानचे जंगे ओहद में जब आप तलहा इब्ने अबितलहा के मुक़ाबले के लिये निकले तो उसने पूछा कि मेरे मुक़ाबले में आने वाला कौन है ? आपने फरमाया मैं अली इब्ने अबुतालिब (अ.स.) हूँ। तलहा ने देखा कि उसका मुक़ाबला अली (अ.स.) से है तो उसने कहा। (ऐ खज़ीम! मैं समझता था कि मेरा मुक़ाबले में आने की जुराअत तुम्हारे अलावा और किसी को न होगी।

इस मौक़े पर तलहा ने आपको बचपन के लक़ब से याद किया , ऐसा मालूम होता है कि कुरैश के बच्चों में यह भी शामिल था और हज़रत अली (अ.स.) से अपनी हड़़ड़ी पसील तुड़वा चुका था।


मजम-ए-आम में एलाने रिसालत

जब दावते अशीरा के मौक़े पर महदूद तबलीग़ के मराहिल तय हो गये तो हुक्म आया कि (फासदेह बेमा तूमरू आरिज़ अनिल मुशरेकीन) (तुम्हें जिस दावत का हुक्म दिया गया है उसे मुशरेकीन की परवा किये बग़ैर ज़ाहिर कर दो)

इस हुक्मे रब्बानी के तहत आप कोहे सफ़ा पर तशरीफ़ ले गये और एक एक क़बीले का नाम लेकर आवाज़ दी कि या मुआशरे कुरैश , या बनी फहर या बनी , ग़ालिब , या बनी लवी , या बनी अदी आओ मेरी बात सुनो।

यह आवाज़ सुनकर लोग कोहे सफ़ा की तरफ़ दौ़ड़ पड़े क्योंकि उस वक़्त मक्का का दस्तूर था कि जब कोई अहम मुआमला दपरपेश होता तो पहाड़ पर चढ़कर आवाज़ दी जाती थी और लोग उस आवाज़ पर अपना तमाम काम काज छोड़कर जमा हो जाते थे। चुनानचे जब हदे निगाह तक एक बड़ा मजमा इकट्ठा हो गया तो आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने उसे ख़िताब करते हुए फरमाया कि अय्योहन नास! अगर मैं तुम्हें ख़बर दूँ कि इस पहाड़ के अकब में तुम पर हमला करने के लिये लश्कर छिपा हुआ है तो तुम लोग क्या मेरी इस बात का यक़ीन करोगे ?

मजमे से एक साथ सैकड़ों आवाज़े बुलन्द हुयीं , क्यों नहीं! आप हमारे अमीन हैं और हमने आपके मुँह से कभी कोई झूट नहीं सुना।

जब आप अवाम से यह अहद व इक़रार ले चुके तो फ़रमाया , अगर तुम लोग मुझे सादिक़ और अमीन समझते हो तो सुनो कि अल्लाह ने मुझे अपना रूसल बनाकर इस बात पर मामूर किया है कि मैं तुम्हें हिदायत करूँ , हक़ की तरग़ीब दूँ और यह बता दूँ कि तुम लोग जो बुत परस्ती करते हो और बाद आमालियों में मुबतला हो उसका नतीजा जहन्नुम का अज़ाब है।

यह पूरी कौ़म के लिये एक पैग़ामे इन्क़ेलाब था लेकिन बद बख़्तों की समझ मे न आया चुनानचे वह लोग हंसने और कहकने लगे और आपस में तरह तरह की चेमिगोईयां करने लगे। आप अपनी बात कह कर पहाड़ से नीचे उतर आये मगर उसी वक़्त से आप और कुरैश के दरमियान हक़ व बातिल की कशमाकश शुरी हो गयी जिसमें आपको सख़्त मुश्किलात व मसाएब का सामना करना पड़ा।

आन हज़रत (स.अ.व.व.) पर मज़ालिम

अवामी सतह पर एलाने रिसालत के बाद अहले मक्का की तरफ से रसूले अकरम (स.अ.व.व.) पर एक लामुतनाही मज़ालिम का सिलसिला शुरू हो गया। जिन लोगों ने आपको सादिक़ व अमीन का ख़िताब दिया था वही लोग मजनून , काहिन , जादूगर और न जाने क्या क्या कहने लगे।

जब आप घर से बाहर निकलते तो कुरैश आपकी रहगुज़र में कांटे बिछाते , आप पर कूड़ा करकट और गंदगी फेंकते , आपका मज़ाक उड़ाते और तरह तरह की सऊबतें और तकलीफ़े पहुँचाते लेकिन आप सब्र से काम लेते और खामोश रहते और जब पैमाना लब्रेज़ होता तो बस ज़बान से सिर्फ इतना कहत कि क्या यही हक हमसायेगी है ?

इस ईज़ा रसानी , अदावत और दुश्मनी में जो लोग ज़्यादा सरगर्मे अमल थे उनमें अबुसुफियान , अबुलहब , अबुजहल , वलीद बिन मुग़ीरा , आस इब्ने वायल , अतबा बिन रबिया , अक़बा बिन अबीमोईत , अबुलबख़तरी , उमय्या बिन हलफ , असूद बिन अबदे यगूस , नसर बिन हरस और अख़निस बिन शरीक वगै़रा का नाम मशहूर है। यह कुरैश की बाअसर , मुक़तदर और ताक़तवर हँस्तियां थी लेकिन उनकी जाहेलियत और तहजी़ब व तमद्दुन से नाशिनासी का यह आलम था कि जब सरकारे दो आलम (स.अ.व.व.) मसरूफे नमाज़ होते तो यह बदबख़्त आवाज़ें करते , बेहूदा और लग़ो कलेमात बकते , मुत्ताहिद होकर तालियां और सीटियां बजाते नीज़ अरकाने नमाज़ की नक़लें उतारते। उन मूज़ियों के नज़दीक यह बड़ी मामूली और ख़फफ बातें थीं। लेकिन इन हरकात से भी जब आन हज़रत (स.अ.व.व.) के सब्रो तहाम्मुल और इस्तेक़लाल व सिबात में कोई फर्क़ न आया तो यह लोग आपको जिस्मानी आज़ार व तकलीफें पहुँचाने पर मुतफ़्फ़िक़ व मुत्ताहिद हो गये चुनानचे तबरी का कहना है कि एक मर्तबा आन हज़रत (स.अ.व.व.) ख़ान-ए-काबा में नमाज़ पढ़ रहे थे कि अक़बा इब्ने अबीमईत अमूमी आया और उसने अपनी चादर को बल देकर रस्सी की तरह बना लिया , जब आप सजदे में गये तो उसने वह चादर आपकी गर्दन में डाल दी और पेंच कर पेंच देने लगा यहाँ तक कि गुलुए मुबारक पर चादर का हलक़ा इस क़दर तंग हो गया कि आपका दम रूकने लगा , इतने में अबुबकर कहीं से आ गये और यह हाल देखा तो अपने दोनों हाथ उस चादर के हलके में डाल कर उसे आपकी गर्दन से जुदा कर दिया और कहा , ऐ क़ौम के लोगों! अफसोस है कि ऐसे शख़्स की जान चाहते हो जो कहता है कि खु़दा मेरा परवरदिगार है।)

इस रिवायत में इमाम इब्ने कय्युम इतना इज़ाफ़ा और फ़रमाते हैं कि इस हमदर्दी के नतीजे में चन्द शरीर हज़रत अबुबकर पर टूट पड़े और उन्हें जूतों , लातों और घूंसो से बुरी तरह मारी पीटा।

एक दिन रउसाए कुरैश ख़ान-ए-काबा में मौजूद थे कि हुजूर (स.अ.व.व.) तशरीफ लाये और नमाज़ पढ़ने लगे। अबुजहल ने कहा , काश इस वक़्त निजासत भरी ऊँट की ओझड़ी होती तो मुहम्मद (स.अ.व.व.) की गर्दन में डाल दी जाती। अक़बा ने काह में अभी लात हूँ चुनानचे वह गया और कहीं से ऊँट की ओझडी उठा लाया। आप जब मसरूफे सजदा हुए तो उसने वह ओझड़ी आपकी गर्दन में डाल दी। खुशी के मारे कुरैश एक दूसरे पर गिरे पड़़ते थे। किसी ने जाकर हज़रत फात्मा ज़हरा (स.अ.व.व.) को ख़बर की , अगर चे वह उस वक़्त सिर्फ पाँच परस की थीं लेकिन दौड़ी हुयी आयीं और ओझड़ी हटा कर अक़बा को बुरा भला कहा और बद्दुआयें दी।

जब उन मसाएब पर भी रिसालते माअब (स.अ.व.व.) ने अपनी तबलीग़ी उमीर और दीनी तालीम के नशर व अशाअत में कोई कमी नहीं की तो कुफ्फारे कुरैश ने आपस में मशवरा करके दुनियावी माल व सरवत की तरग़ीब व तहरीस की बुनियाद पर एक दूसरा रास्ता आख़तियार किया चुनानचे अतबा बिन रबिया कुरैश का नुमाइन्दा बन कर आन हज़रत (स.अ.व.व.) के पास आया और उसने कहा कि ऐ मुम्मद (स.अ.व.व.) ! अगर तुम हमारे खुदाओं की तौहीन से बाज़ आओ और अपने मौक़फ़ से दस्तबरदार हो जाओ तो जो मांगोगे हम तु्म्हें देने को तैयार हैं अगर तुम कुरैश के किसी बड़े घराने की हसीन व जमील औरत से निकाह के खुवाहिश मन्द हो तो हम उसका इन्तेजाम कर दें , अगर माल व दौलत मन्द हो जाओ , अगर बादशाहत की ख्वाहिश है तो हम तुम्हें अपना बादशाह तसलीम कर सकते हैं और अगर यह सब कुछ नहीं है तुम्हारा वाहमा तुम्हारे इख़तियार से बाहर है तो हम किसी माहिर तिब से तुम्हारा मुआलेज़ा कराने पर तैयार हैं ख्वाहा इस काम में कितनी ही दौलत क्यों न खर्च हो।

जब अतबा अपनी गुफ़तगू ख़त्म कर चुका तो आपने फ़रमायाः-

(हा 0 मीम- तनज़ीलुम) मिनर रहमानिर रहीम , किताबुन फुस्सेलतु आयातहु कुरानन अरबीयन लेक़ौमिन यालामून -------- जब आन हज़रत (स.अ.व.व.) फाइन्ना आराज़ू फक़ुल अनज़रतोकुम साएका मिसले साएक़ा आदिन व समूद) तक पहुँचे तो अतबा ने कहा , ऐ मुहम्मद (स.अ.व.व.) ! बस! और वापस आकर उसने कुरैश के सरदारों से कहा कि वल्लाह मैंने मुहम्मद (स.अ.व.व.) की ज़बान से ऐसा कलाम सुना है कि जिसकी मिसाल मुम्किन ही नहीं है। शायरी , सहर या कहानत से उसका कोई ताल्लुक़ नहीं। मेरा ख़्याल तो यह है कि तुम लोग मुहम्मद (स.अ.व.व.) का जादू तुम पर भी चल गया। अतबा ने कहा जो कुछ मैंने देखा और सुना था वह बता रहा हूँ अगर नहीं मानते तो न मानों। इब्ने हश्शाम की तहक़ीक़ के मुताबिक़ इस गुफत व शुनीद की मोहर्रिक खु़द अतबा बिन रबिया था और यह वाक़ियात हज़रत हमज़ा बिन अब्दुल मुत्तालिब के इस्लाम इख़्तियार करने के बाद के हैं।


साबेक़ीने इस्लाम पर कुरैश के मज़ालिम

साबेक़ीन इस्लाम की फहरिस्त मज़लूमीन में पहला नम्बर आले यासीर का है। जनाबे यासीर यमन के रहने वाले थे। गुरबत और नन्गदस्ती से परेशान होकर मक्के में आये और अबुहज़ीफा की कनीज़ समिय्या से शादी करके वही आबाद हो गये। समिय्या के बतन से दो बेटे जनाबे अम्मार अब्दुल्लाह और एक साहबज़ादी मुतवल्लिद हुयीं। ज़हूरे इस्लाम के बाद पैग़म्बर असालम (स.अ.व.व.) की दावत पर यह पूरा घराना मुसलमान हुआ लेकिन घर मे दौलते ईमान के सिवा कुछ न था। उनकी गुरबत , नादारी और बेचारगी की वजह से इसलाम लाने की पादाश में कुरैश उन पर तरह तरह के ज़ुल्म करते थे। अल्लामा दयार बकरी रक़म तराज़ है। कि जब इस्लाम को ख़ुदा ने ज़ाहिर फरमाया तो यासिर , उनके साहबज़ादे अम्मार और अब्दुल्लाह नीज़ उनकी बीवी समिय्या मुसलमान हुए। उनका इस्लाम इब्तेदाये इस्लाम ही से क़दीम था और यह वह बुर्जगवार थे। जिन पर ख़ुदा की राह में ज़ालिमों की तरफ से बे हिसाब जुल्म ढ़ाया गाय। एक दिन जब कुरैश उन पर मज़ालिम के पहाड़ तोड़ रहे थे तो इत्तेफाक़ से आन हज़रत (स.अ.व.व.) भी उधर से गुज़रे। जब आपने उस घराने का यह हाल देखा तो बेचैन हो गये और फरमाया कि ऐ परवरदिगार! तू आले यासिर को उनके आमाल के बदले में बख़्श दे।

इब्ने शहाब और तबरी की रिवायत के मुताबिक अबुजहल अबुलहब ने जनाबे यासिर और सुमिय्या के जिस्मों को नैज़े की अनी से छेद छेद कर उन्हें मार डाला रसूल अल्लाह सल्लललाहो अलैहे वआलेही वसल्लम ने ताज़ियत फ़रमाई और अम्मार यासिर से फ़रमाया कि आले यासिर सब्र करो बेहिश्त तुम्हारी वादगाह है।

अल्लामा दयार बकरी फ़रमाते हैं कि अबुजहल कमबख़्त ने यासिर की बीवी समिया को नैज़े की अनी से कोंच कोंचकर मार डाला ग़रीब यासिर का भी एसी शदीद ज़बों से ख़ातमा कर दिया मुवर्रिख़ ज़ाकिर हुसैन का कहना है कि यह इसलाम के शहीदे अव्वल हैं। हज़रत अम्मार यासिर के बारे में मुवर्रेख़ीन का बयान है कि कुफ़्फ़ारे कुरैश उन्हे जलती हुई रेत पर बरहना लेटा कर उनके जिस्म पर गरम पत्थर रखते थे , लोहे की गरम ज़ेरह पहनाते थे , दुर्रे मारते थे और खाना पानी बन्द कर देते थे लेकिन इन तमाम मज़ालिम के बावजूद आप इस्लाम से मुनहरिफ़ न हुए और न ही आपके पाये इस्तेक़लाल मे कभी कोई जुमबिश और लग़जिश पैदा हुई आपके मुतअल्लिक़ इरशादे पैगम़्बर है कि ईमान अम्मार के गोश्त व ख़ून का जुज़ है।

(2) ख़बबा बिन अरस-क़बीलये तमीम से थे- ज़मानये जाहेलियत में गुलाम बना कर फरोख़त किये गये और एक खातून ने उन्हें ख़रीद लिया। यह उस वक़्त इस्लाम लाये जब आन हज़रत (स.अ.व.व.) अरक़म के घर में मुक़ीम थ और सिर्फ छः या सात अशख़ास इस्लाम ला चुके थे। कुरैश ने उन्हें तरह तरह की तकलीफें. दीं। एक दिन .दहकते हुए अँ.गारों पर उन्हें चित लिटाया गया और एक शख़्स उनकी छाती पर पाओं रख कर खड़ा हो गया ताकि करवट न बदलने पायें। यहाँ तक कि अँगारे पीठ के नीचे सर्द होकर कोयला बन गये। ख़ब्बाब ने यह वाकिया मुद्दतों बाद हज़रत उमर से ब्यान किया और अपनी पीठ खोल कर उन्हें दिखाई जिस पर जाबजां अँगारों से जलने के निशानात वाज़ेह थे।

ख़ब्बाब ज़मानये जाहेलियत में नज्जारी का काम करते थे। बाज़ड लोगों ज़िम्मे उनकी मज़दूरी बक़ाया थी। मांगते तो जवाब मिलता कि जब तक तुम ख़ुदा की वहदानियत और मुहम्मद (स.अ.व.व.) की नबूवत से इन्कार न करोगे एक कौड़ी न मिलेगी।

(3) हज़रत बिलाल-यह वही बिलाल हैं जो मोअज़्जि़न मशहूर है। उमय्या बिन ख़लफ़ के गुलाम और हब्शउल नसल थे। आप पोशीदा तौर पर इब्तेदा ही में ज़ेवरे ईमान से आरास्ता हो चुके थे और हसबे इरशाद पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ख़ुफिया तरीक़े से अल्लाह की इबादत किया करते थे। रफता रफता यह ख़बर उमय्या इब्ने ख़लफ को मालूम हुई तो उसने गुलामों को हुक्म दिया कि सुबह सूरज निकलते ही उनके तमाम जिस्म में बबूल के काँटे पेवस्त कर दिये जायें और जब आफताब की हरारत से जमीन खूब गर्म हो तो उन्हें धूप में चित लिट कर उन पर जलते हुए वज़नी पत्थर रख दिये जायें ताकि यह हिल न सकें फिर उसके चारों तरफ आग रौशन कर दी जाये काति उसकी गर्मी से उनका बदन झुलसता रहे और जब शाम हो जाये तो हाथ पैर बाँधकर कोठरी में डाल दिया जाये और बारी बारी उन्हें ताज़याने लगाये जायें यहाँ तक कि फिर सुबह हो और फिर यही अमल जारी रखा जाये।

हज़रत बिलाल को इस जॉ कनी के आलम में एक मुद्दत गुज़री।

ईमान का नूर आपके दिल में जगमगाता रहा और आप ज़बान से अल्लाह की रबूवियत और रसूल (स.अ.व.व.) की रिसालत का इक़रार करते रहे। जब आन हज़रत (स.अ.व.व.) को उन अन्दोहनाक वाक़ियात की ख़बर हुई तो आप ने अब्बास के जरिये उनके मालिक से उन्हें ख़रीद लिया।

(4) सहीब रूमी- यह रूमी मशहूर ज़रुर हैं लेकिन दरहक़ीक़त रूमी नही थे. उनके वालिद सनाने किसरा की तरफ से अब्बला के हाकीम थे और उनका ख़ानदान मूसल में आबाद था। रूमियों ने मूसल पर हमला किया और जिन लोगों को क़ैद करके ले गये उनमें सहीब भी थे यह रोम ही में पले बढ़े और जवान हुए इसलिए अरबी ज़बान से नावाक़िफ थे। एक अरब ने उन्हें खरीद लिया था। इसलिए यह मक्का में आये यहाँ आने के बाद अब्दुल्लाह बिन जदआन ने उन्हें खरीद कर आज़ाद कर दिया। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने जब इस्लाम की तबलीग़ शुरू की तो जनाबे अम्मार बिन यासिर के साथ यह भी मुसलमान हुए कुफ्फारे कुरैश उन पर इतना तशद्दुद करते थे कि उनके होश व हवास मुअत्तिल हो जाते थे। जब उन्होंने मदीने को हिजरत कहना चाही तो कुरैश ने कहा कि जाना है तो अपना सारा माल व मताअ छोड़कर जाओ चुनानचे आप खाली हाथ मक्के से रवाना हुए और मदीने आ गये।)

(5) अबु फकीह- आपका अस्ल नाम अफ़लह और कुन्नियत अबूफ़कीह थी सफ़यान बिन उमय्या के गुलाम थे हज़रत बिलाल के साथ मुसलमान हुए सफ़वान को जब मालूम हुआ तो उसने चन्द सख़्त दिल लोगों को इस बात पर मामूर किया कि वह आपके पांव में रस्सी बाँद कर तपती हुई रेत पर बरहना घसीटा करें चुनानचे जब आप घसीटे जाते तो खाल उधड़ जाती थी और सारा जिस्म लहुलुहान हो जाता था। एक दिन आपके सीने पर इतना वज़नी पत्थर रखा गाय कि ज़बान बाहर निकल पड़ी थी।

(6) .हज़रत अबुबकर बिन कहफ़ा-तारीख़े खमीस में (मुन्तक़ी) के हवाले से मरकूम हैं कि इस्लाम अबी इब्तेदाई मराहिल में थआ कि हज़रत अबुबकर ने रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) से इसरार किया कि अब आप खुफिया तबलीग़ के बजाये एलानिया कार तबलीग़ अन्जाम दें। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने उन्हें समझाया कि ऐ अबुबकर नासमझी की बातें न करो अभी इसका मौक़ा नहीं है क्योंकि हम क़लीलुल तादाद हैं मगर हज़रत अबुबकर ने जि़द की और किसी तरह न माने बिल आख़िर आन हजरत (स.अ.व.व.) मजबूर होकर एक नवाही मस्जिद में तशरीफ ले गये। कुफ्फारे कुरैश को ख़बर हुई तो वह भी वहाँ जमा होना शुरू हो गये। हज़रत अबुबकर खुतबा देने की ग़र्ज़ से खड़े हुए उस पर इस क़दर इन्तेशार व हैजान पैदा हुआ कि सारे मुशरेकीन आप पर टूट पड़े और मारने लगे। अतबा बिन रबिया भी उनमें शामिल था उसने पाँव से जूते निकाले जो पेवन्द दार थे और इस तरकीब से मारना शुरी किया कि जिधऱ पेवन्द होता था उसी को चहरे की तरफ घुमा देता था हज़रत अबुबकर का मुँह ऐसा सूज गया था कि चेहरे पर नाक नहीं मालूम होती थी। रसूले अकरम (स.अ.व.व.) ने बीच बचाओ की बड़ी कोशिश की मगर मुशरेकीन बाज़ न आये इतने में इत्तेफाक़ से बनि तीम के कुछ लोग वहां पहुँच गये और अबुबकर को उनके हाथों से छुडाकर एक चादर में लिटाया और बेहोशी की हालत में घर ले गये। शाह वली उल्लाह मोहददिस ने तहरिर किया है कि हज़रत अबुबकर का इश्लाम काहिनो और नुजुमियों का मरहूने मिन्नत है क्योंकि आपने सुन रखा था कि यह मज़हब अनक़रीब तक़र्की करके दुनिया भर में फैल जायेगा इस लिए वह मुसलमान हो गये थे।

मोहददिस देहलवी की तहरीर से पता चलता है कि इस्लाम के मुहासिन और उसकी अफादियत की बिना पर हज़रत अबुबकर ने उसे कुबूल नही किया बल्कि काहनों और नुजूमियों के कहने से किसी मुफाद को नज़र में रखते हुए दायरए इस्लाम में दाख़िल हुए थे।

(7) हज़रत उसमान बिन अफ़ान- हज़रत उसमान के मुसलमान होने की ख़बर जब उनके चचा को हुई तो वह बदबख़्त आपको खजूर के पेड़ में करता था। इसी तरह जुबैर बिन अवाम का चचा च़टाई में लपेट कर उनकी नाक में धुआ दिया करता था। इसी तरह ज़ुबैर बिन अवाम का चचा चटाई में लपेट कर उनकी नाक में धुआँ दिया करता था। मसअब बिन उमैर के इस्लाम लाने पर उनकी काफिरा माँ ने उन्हें घर से निकाल दिया था। साद इब्ने अबीविक़ास अगर चे अपने क़बीले में मोअजिज़ व मुक़तदिर थे मगर वह भी कुरैश के मज़ालिम से न बच सके। हज़रत उमर के चचा ज़ाद भाई सईद बिन ज़ैद जब इस्लाम लाये तो उमर उन्हें रस्सी से बाँधकर पीटा करते थे।

मुसलमान औरतें भी मज़ालिम से मुसतसना न थीं हज़रत उमर अपनी कनीज़ लबीना को इस क़दर मारते थे कि थक जाते और थोड़ी देर दम लेकर फिर मारना शुरू कर देते थे। अबुजहल ने अपनी कनीज़ ज़नीरा को इतना मारा कि वह अँधी हो गयी। नहदिया और उम्मे जबीस भी कनीजें थीं उनका भी यह हाल था।

साबेक़ीन इस्लाम की यह दर्द अंगेज़ दास्तां एक ऐसी रौशन और ताबिन्दा हक़ीक़त है जिस से इन्कार मुम्किन नहीं है।

हिजरते हब्शा ( 5) पाँच बेइस्त

आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने जब यह देखा कि मुसलमानों पर कुफ्फारे कुरैश के मज़ालिम का सिलसिला बतदरीज बढ़ता जा रहा है और मक्के में उन ग़रीबों पर तंग होती जा रही है तो उनके तहाफुज़ को नज़र में रखते हुए आपने उन्हें हिजरत का हुक्म दिया और फरमाया कि तुम्हारे लिये बेहतर है कि तुम लोग यहाँ से हिजरत करके हब्शा की तरफ चले जाओ क्योंकि वहाँ का बादशाह रहमदिल और इन्साफ पसन्द है इसलिए हुकूमत में कोई शख़्श किसी शख़्स पर जुल्म नहीं करता लेहाज़ा जब तक मक्के के हालात साज़गार न हों तुम लोग वहीं क़याम करो।

इस हुक्मे पैग़म्बर (स.अ.व.व.) के मुताबिक ग्यारहं मर्दों और चार औरतों पर मुश्तमिल पहला क़ाफिला मक्के से हब्शा की तरफ रवना हुआ उसमें हज़रत उसमान और उनकी ज़ौजा रूक़य्या , जुबैर बिन अवाम , आमिर बिन रबिया और उनकी ज़ौजा लैला अबु सलमा और उनकी ज़ौजा उम्मे सलमा अबु हुज़ैफ़ा बिन अतबा और उनकी ज़ौजा सहल बिन्ते सहील , अब्दुल्लाह बिन मसऊद , अब्दुल रहमान बिन औफ , मआसब बिन उमैर , सुहैल इब्ने बैज़ाअ , हातिब बिन अम्र और उसमान बिन मज़ऊन शामिल थे। यह नबूवत के पाँचवे साल माहे रज़ब का वाक़िया है।

जब यह क़ाफिला हबशा पहुँचा तो वहाँ के बादशाह नजाशी ने उन महाजिरींन का ख़ैर मकदम किया , हुस्ने सुलूक व कशादा दिली के साथ पेश आया और उन्हें अमान व मज़हबी आज़ादी दी। इब्ने हश्शाम , उम्मुल मोमेनीन उम्मे सलमा का क़ौल ख़ुद उनकी ज़बानी नक़ल करते हैः-

(जब हम लोग हब्शा में वारिद हुए तो वहाँ के बादशाह हमारे साथ नमीं और रहम दिली से पेश आया हम लोग अमन व चैन से अपने दीन पर क़ायम रहे और आज़ादी से ख़ुदा की इबादत करत रहे न हमें कोई सताने वाला था और न हम मकरूहात सुनते थे।)

पन्द्रह इन्सानी पर मुबनी महाजिरीन की इस मुख़तसर सी जमात को हब्शा में रहते अभी दो ही माह गुज़रे थे कि किसी ने यह मशहूर कर दिया कि मक्के में सारे कुरैश मुसलमान हो गये। ज़ाहिर है कि इस ख़बर के बाद मुहाजिरीन को अपने मरकज़ की तरफ पलट आना चाहिये था चुनानचे यही हुआ कि यह जमाअत हब्शा से मक्के के लिये फिर रवाना हो गयी मगर जब इस जमाअत के लोग मक्के के क़रीब पहुँचे तो उन पर यह हक़ीक़त आशकार हुई कि कुफ्फारे कुरैश पहले से ज़्यादा दुश्मनी पुर उतर आये हैं। यक़ीनन एक हौसला शिकन और परेशान कुन ख़बर थी जिसे सुन कर अब्दुल्लाह इब्ने मसऊद तो हब्शा की तरफ फिर पलट गये और बाकी़ लोगों ने मग़फी तौर पर ऐसे लोगों के यहाँ क़याम किया जो मुसलमान हो चुके थे या उनके दिलों में इस्लामी जज़बा पैदा हो चुका था।

इधर मक्के में खुफिया तौर पर लोग कसमापुर्सी और बेचारगी की हालत में रह कर अपने ईमान व इस्लाम की हिफाज़त कर रहे थे और उधर कुफ्फ़ार की तरफ से रोज़ ब रोज़ जुल्म व सितम का बाज़ार गर्म होता जा रहा था लेहाज़ा मुसलमानों की इज़्ज़त , जान , माल और विक़ार को ख़तरे में देखर नबूवत के सातवें साल सरवरे दो आलम (स.अ.व.व.) ने फिर हिजरत का हुक्म सादिर फ़रमाया।

इस मर्तबा बच्चों के अलावा 33 मर्द और 18 औरतें मुताफर्रिक़ तौर पर हब्शा गये और आखिर में जाफर इब्ने अबुतालिब की क़यात में एक बड़ा क़ाफिला रवाना हुआ जिसमें औरतों और मर्दों की तादाद पचास बतायी गयही है। इस तरह मुहाजिरीन की मजमूयी तादाद 101 तक पहुँच गयी।

इब्ने हष्शाम ने मुहाजिरीन के नामों की जो फेहरिस्त तरतीब दी है उसमें उन्होंने छियासी नाम मर्दों के और अट्ठारा नाम औरतों के मरक़ूम किये हैं उससे मुहाजिरीन की मजमूयी तादाद 104 मालूम होती है। इब्ने साद रक़म तराज़ हैं कि कुल मुहाजिरीन की तादाद 101 थी जिसमें 83 मर्द 11 कुरैशी औरतें और 7 दीगर क़बीलों की औरतें शामिल थीं।

अकसर मोअर्रिख़ीन का ख़्याल है कि हिजरत सिर्फ उन्हीं लोगों ने की जिनका कोई हामी और मददगारी नही था लेकिन इब्ने हष्शाम या इब्ने साद ने मुहाजिरीन की जो फेहरिस्त मुरत्तब की है उसमें हर दर्जे के लोग नज़र आते हैं। हज़रत उसमान बनि उमय्या से थे जो अरब में सबसे ज़्यादा मालदार और ताक़तवर क़बीला था , हज़रत जाफर इब्ने अबुतालिब ख़ुद रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व.) के ख़ानदान से थे। अब्दुल रहमान बिन औफ और अबुसीरा वग़ैरा मामूली शख़्सियत के लोग नहीं थे इस बिना पर ज़्यदा क़यास यह है कि कु़रैश के मज़ालिम सिर्फ़ ग़रीबों और नादारों तक महदूद नहीं थे बल्कि बड़े लोग भी उनके जुल्म व सितम से परशान थे। अजीब बात यह है कि जो लोग ज़्यादा मज़लूम थे और जिन्हें अँगारों के बिस्तर पर सोना पड़ा था मसलन यासिर , अम्मार और बिलाल वग़ैरा उन लोगों के नाम फेहरिस्ते मुहाजिरीन में नहीं है या तो उनकी बे सरो सामानी इस हद तक पहुँची हुई थी कि सफर करना ही दुश्वार था या फिर यह लोग ईमान व इरफान की इस बुलन्दी पर थे जहाँ मज़ालिम और तशद्दुद की परवा नहीं रह जाती।

कुफ़्फ़ारे कुरैश को उन मुहाजिरीन से कोई ज़ाती अदावत नहीं थी बल्कि उन्हें इस (तहरीक) से अदावत थी जो उनके बातिल नज़रियात और ख़ुद साख़ता खुदाओं के खिलाफ तदरीज फैलती जा रही थी। पहली हिजरत के दौरान हब्शा के हालात व वाक़ियात यह सुन चुके थे अब उन्हें यह अन्देशा पैदा हो गया था कि कहीं वहाँ इस तहरीक को फलने फूलने का मौक़ा न मिल जाये लेहाज़ा इस मर्तबा उन्होंने मुहाजिरीन का पीछा किया मगर कुफ्फार के पहुँचने से पहले यह लोग किश्तियों पर सवार हो चुके थे और किश्तियां रवाना हो चुकीं थी इसलिए वह कुफ्फार के पन्जों से निकल कर हिफ़ज़ों अमान के साथ हब्शा पहुँच गये।

नज्जाशी के दरबार में हज़रत जाफर का तबलीग़ी कारनामा

साबिक़ा मुराअत खुसूसी की तरह हब्शा में मुहाजिरीन को इस मर्तबा भी अमान मिला , आज़ादी नसीब हुची और यह लोग खुशगवार फज़डा में सुकून व इत्मिनान की ज़िन्दगी बसर करने लगे। मुसलमानों का यह इत्मिनान व सुकून कुफ्फार को कब गवारा था ? लेहाज़ा उन्होंने अम्र बिन आस और अब्दुल्लाह बिन रबिया को अपने नुमाइन्दों की हैसियत से तोहफे तहाएफ देकर नज्जाशी के दरबीर में भेजा इस दोरूकनी वफ़द ने बादशाह के रूबरु हाजि़र होकर अपने मारूज़ात पेश किये और कहा कि मक्के के कुछ शर पसन्द लोग भाग कर आपके मुल्क में पनाह ले चुके हैं। हमारा मुतालिबा है कि उन्हें हमारे हवाले कर दिया जाये। नज्जाशी ने कहा , जब तक हम दूसरे फरीक़ की बातें न सुन लें उस वक़्त तक कोई फैसला नहीं कर सकते।

चुनानचे हज़रत अली 0 (अ.स.) के भाई महाजिरीन ने सलारे आज़म हज़रत जाफर इब्ने अबुतालिब दरबार में तलब किये गये और जब मुहाजिरी की जमाअत के साथ वह दरबार मे तलब में हाज़िर हुए तो नज्जाशी ने पूछा कि आप लोगों के उसूल व अक़एद क्या हैं ? और कुरैश मक्का आपके खिलाफ क्यों हैं ? इन सवालों के जवाब मे हज़रत जाफर ने अपनी तक़रीर इस तरह शुरु कीः-

(ऐ बादशाह! हमारे मुल्क के लोग जाहिल और तहज़ीब व तमद्दुन से नाआशन थे। मुरदार जानवरों का गोश्त उनकी ख़ुराक और बेहूदा गुफतनी उनका शेवा था। इन्सानियत , हमदर्दी , मेहमान नवाज़ी और हमसायग़ी के हुकूक से बिल्कुल) ही नाबलद थे न किसी आईन का पास व लिहाज़ था और न किसी क़ानून व ज़ाबत के पाबन्द थे हमारे पूरे मुल्क पर जाहेलियत पूरी तरह मुसल्लत थी कि इन हालात में ख़ुदा ने अपने फज़ल व करम से हमारे दरमियान एक रसूल भेजा जिस की अमानत व दयानत सिदक़ व सफ़ा , हसब व नसब और ज़ाहद व तक़वा से हम अच्छी तरह वाक़िफ थे , उसने हमे शिरक व बुत परस्ती की गुमराही से निकाला , मुकारिमे इखलाक़े व उसवए हस्ना का दर्स दिया , तौहीद की दावत दी , गुनाहों से बचने , नमाज़ पढ़ने रोज़ा रखने ज़कात अदा करने और सच बोलने की तलक़ीन फरमायी। हामारा कुसूर सिर्फ यह है कि हम उस नबी की नबूवत और ख़ुदा की वहदानियत पर ईमान लाये। बस इसी जुर्म में हमारी क़ौम हम सख़्ती और तशद्दुद करने पर तुले गय है वह चाहती है कि हम अल्लाह की इबादत तर्क करके लकड़ी , मिट्टी और पत्थरों से बने हुए बुतों की परस्तिश करें। लेहाज़ा उनके जुल्म और तशद्दुद से बचने के लिये हमने आपके मुल्क में पनाह ली है।)

इस तक़रीर का नज्जाशी के दिल पर गहरा असर पड़ा और उसने उस कलामे ख़ुदा को सुनने की तमन्ना का इज़हार किया जो रसूल अल्लाह (स.अ.व.व.) पर नाज़िल हुआ था हज़रत जाफर ने सुरये मरियम की तिलावत फरमायी जिसे सुन कर बख़्खाशी की आँखों में आँसू आ गये। उसने आन हज़रत की सदाक़त व नबूवत का एतराफ किया और कहा बे शक यह वही रसूल है जिनके तशरीफ लाने की ख़बर हज़रत ईसा मसीह ने दी है , खुदा का शुक्र है कि मैं उनके ज़माने में हूँ।

इसके बाद बादशाह ने कुरैश के भेजे हुए तहाएफ़ वापस कर दिये और मुहाजिरीन को उनके हवाले करने से साफ इन्कार कर दिया बिल आख़िर कुरैश के दोनों नुमाइन्दे मायूसी की हालत में मक्के वापस आ गये , और मुसलमान एक अरसे तक हब्शा में रह कर निहायत चैन व सुकून की ज़िन्दगी बसर करते हैं।

दारूल अरक़म में आन हज़रत (स.अ.व.व.) का क़याम

मुहाजिरीने हब्शा के मक्के से चले जाने के बाद भी आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने अपनी तबलीगी सरगर्मियां बादस्तूर जारी रखीं और नये नये लोग दायरये इस्लाम में दाख़िल होते रहे। यह देखकर कुफ़्फार ने आप को और ज़्यादा सताना शुरू कर दिया यहाँ तक कि हुजूर (स.अ.व.व.) को मजबूर होकर अपने बाक़ी मांदा साथियों के साथ अक़रम बिन अबी अरक़म के घर में पनाह लेना पड़ा। यह मकान कोहे सफ़ा पर वाक़े था वहाँ आप एक माह दो दिन मुक़ीम रहे और लोगों को दावते इस्लाम देते रहे। बाज़ मोअर्रिख़ीन का कहना है कि इसी मकाम में कयाम के दौरान हज़त हमज़ा और उनके तीन दिन बाद हज़रत उमर ने इस्लाम क़ुबूल किया। लेकिन तारीख़े ख़मीस में अल्लाह दयार बकरी ने इस बात को ग़लत क़रार दिया है वह कहते हैं कि हज़रत हमज़ा ने 2 बेइस्त में इस्लाम कुबूल किया था लेकिन मसलहतन उन्होंने अपने इस्लाम को पोशीदा रखा और बिल आख़िर अबुजहल की बत्तमिज़ियों की वजह से 6 बेइस्त मे उसे ज़ाहिर कर दिया। मेरे नज़दीक यही दुरुस्त भी है।

हज़रत उमर का मुसलमान होना

हज़रत उमर ने इस्लाम क्यों कर कुबूल किया ? इसकी तफसील का इजमाल यह है कि रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) के बदतरीन दुश्मन और हज़रत उमर के मामू अबूजहब ने कुफ्फारे मक्का के एक मजमे में यह ऐलान किया कि जो शख़्स मुहम्मद (स.अ.व.व.) का सर काट कर लायेगा उसे सौ ऊँट या चालीस हज़ार दिरहम इनाम में दिये जायेंगे

हज़रत उमर भी अपने मामू अबुजहल की तरह पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) के बदतरीन दुश्मन थे चुनानचे उन्होंने काह यह काम मैं अन्जाम दूँगा। घर आये , तलवार ली और दारूल अरक़म की तरफ जहाँ रसूले अकरम (स.अ.व.व.) मुक़ीम थे , चल पड़़े। रास्ते में नईम इब्ने अब्दुल्लाह अदवी से मुलाक़ात हुई जो अपने को मग़फी रखे हुए थे। उन्होंने पूछा ऐ उमर! तलवार लेकर कहाँ चले ? कहा मुहम्मद (स.अ.व.व.) को क़त्ल करने। उन्होंने कहा कि फिर तो तुम्हें बनी अबदे मनाफ़ ज़िन्दा नहीं छोडेंगे। उस पर उमर ने तलवार निकाल ली और कहने लगे कि मालूम होता है कि तू भी दीन से निकल गया। नईम ने कहा , पहले अपनी बहन फ़ात्मा और बहनोई सईद बिन ज़ैद की ख़बर ले कि वह भी मुसलमान हो गये हैं। यह सुनना था कि ग़ैज़ व ग़ज़ब का बिफरा हुआ तूफ़ान बहनोई के घर की तरफ़ मुड़ गया। जिस वक़्त यह दरवाज़े पर पहुँचे उस वक़्त दोनों मियां बीवी सूरये ताहा की तिलावत कर रहे थे आवाज़ सुनकर घर में घुसे और बहनोई पर टूट पड़े दोनों मे खूब जमकर मारपीट हुई। बहन ने बीच बचाओ की कोशिश की तो उस बेचारी की नाक पर एक ज़ोरदार घूँसा जड़ दिया जिससे वह लहू लुहान हो गयी इस हरकत पर आपके बहनोई ने वह ज़बरदस्त ख़ातिर की कि दिन में तारे दिखायी देने लगे आख़िर कार जान बचाकर भागे और सीधे अरक़म के घर पहुँचे। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने आपकरे ख़तरनाक इरादों को भाँप लिया , आगे बढ़े , कलाई पकड़़ी और फिशार देना शुरू किया। यह मुहम्मदी फिशार कुछ ऐसा था कि आप घुटनों के बल ज़मीन पर बैठ गये। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने फरमाया , ऐ उमर अब बता तेरा क्या इरादा है ? फिशार कि शिद्दत ने जब आपको यह यक़ीन दिला दिया कि अब जान का मुश्किल है तो कहने लगे कि हुजूर (स.अ.व.व.) मैंतो इस्लाम कुबूल करने की ग़र्ज़ से हाजिर हुआ था। मुख़तसर ये कि आन हज़रत (स.अ.व.व.) एक तरफ हज़रत उमर की कलाई थामें हुए फिशार दे रहे थे और दूसरी तरफ़ हज़रत उमर क जबान पर अशहदों अन ला इलाहा इल्ललाह मुहम्मदन रसूल उल्लाह के कलेमात जारी हो रहे थे। इब्ने असीर का कहना है कि आपने 26 मर्दों और 23 औरतों के बाद इस्लाम कबूल किया।

कुछ मोअर्रेख़ीन का कहना है कि हज़रत उमर जब वलीद बिन मुग़ीरा के तिजारती क़ाफिले के सात रोम के सफर पर थे तो वहाँ के राहीबों ने यह पेशीनगोई की थी कि इस्लाम के तवस्सुल से आपको हुकूमत मिलेगी इस वजह से आप मुसलमान हुए। यह वाकिया अज़ालतल ख़िफा में भी है , मसऊदी ने भी लिखा है और तबरी ने भी यही वाकिया ब्यान किया है। बहर हाल वाकिया कुछ सही , यह बात तवातुर से साबित है कि हज़रत उमर का इस्लाम खुलूस और अक़ीदत से आरी था।

बैतुल्लाह में एलानिया पहली नमाज़

अल्लामा दयार बकरी का ब्यान है कि मुसलमान होने के बाद हज़रत उमर ने पैग़म्बे इस्लाम (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में यह अर्ज़दाश्त पेश की किः- या रसूल अल्लाह! जब हम हक पर और कुफ़्फार बातिल पर हैं तो क्या वजह है कि हम अपने दीन को छुपायें फिरें ? आप आज मुशरेकीन की परवा किए बग़ैर हमारे साथ खान-ए-काबा में तशरीफ ले चलें , हम नमाज़ वहीं पढ़ेंगे।) आन हज़रत ने फरमाया कि मुसलमानों की तादा कुफ्फार के मुक़ाबिल में अभी बहुत कम है और जो हालात हैं उन्हें तुम देख रहे हो लेहाज़ा अभई ज़ब्त व सब्र से काम लो इन्शाअल्लाह तुम्हारी यह खुवाहिश भी एक दिन पूरी होगी। मगर हज़रत उमर अपनी ज़िद के आगे भला कब मानने वाले थे ? इसरार करके आन हज़रत (स.अ.व.व.) को खान-ए-काबा तक इस तरह ले गये कि ख़ुद शमशीरे बकफ आगे आगे थे , दाहिने और बायें हज़रत अबुबकर व दीगर असहाब चल रहे थे। जब यह लोग खान-ए-काबा में दाखिल हुए तो मुशरेकीन ने मज़ाहमत करना चाही। हज़रत अली (अ.स.) हमज़ा , उमर , अबुबकर और असहाब भी आसतीने सूत कर आगे बढ़े। आख़िरकार मुशरेकीन खौफ व दहशत की वजह से भाग खड़े हुए और आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने एलानिया नमाज़ पढ़ी। (तारीख़े ख़मीस)

इसमें शक नहीं कि हुजूरे अकरम (स.अ.व.व.) को हज़रत उमर ने बिल ऐलान नमाज़ पढ़वा दी मगर उसका अन्जाम यह हुका कि कुफ्फारे कुरैश की आतिशे अदावत इस तरह भ़ड़की कि आन हज़रत (स.अ.व.व.) को तमाम बनि हाशिम समेत तीन बरस तक मुसलसल शोअबे अबुतालिब में महसूर रहना पड़ा जिसकी मुकम्मल तफसील अबुतालिब (अ.स.) के हालात में मरकूम हो चुकी है।

ताएफ़ का सफ़र

हज़रत अबुतालिब (अ.स.) की वफात के बाद मक्के की सर ज़मीन का चप्पा चप्पा पैगम्बर इस्लाम (स.अ.व.व.) के लिए खारज़ार बन गया था और मुशरेकीन की ईज़ारसानियों में एक दम से शिद्दत पैदा हो गयी थी। आपने सोचा कि कुछ दिनों के लिए उनकी नज़रों से ओझल हो जाना ज़्यादा मुनासिब होगा , इससे उनका वक़्ती जज़बा मुख़ालिफ भी कुछ कम हो जायेगा और इस्लाम के हलक़ए तबलीग़ में उसअत भी पैदा हो जायेगी। चुनानचे इसी ख़्याल के तहत आप ज़ैद बिन हारसा को अपने हमराह ले कर ताएफ़ की तरफ़ रवाना हो गये। इब्ने साद का कहना है कि यह माहे शव्वाल की आख़िरी तारीखों में बेइस्त से दसवी साल का वाक़िया है।

ताएफ़ मक्के मोअज़्जमा से पचास साठ मील की दूरी पर एक सर सबज़ व शादाब मुक़ाम है जहाँ के मेवे दुनिया भर में तमशहूर हैं। ख्वाजा मुहम्मद लतीफ़ फरमाते हैं किः- (ताएफे मक्का से तबरी का ब्यान है कि वहाँ क़बीले सक़ीफ़ का मुसतक़र ताएफ में आन हज़रत (स.अ.व.व.) दस दिन तक क़्याम पज़ीर रहे। वहाँ के मक़सूसीन से मिले और उन्हें दावते इस्लाम दी मगर उन लोगों ने कुबूल करने से इन्कार कर दिया बल्कि उन्होंने इस अन्देशे के तहत कि कहीं हमारी क़ौम के नौजवानों पर इस तबलीग़ का असर न हो जाये , आपसे यह तक कह दिया कि आप हमारे शहर से चले जाये और कहीं दूसरी जगह क़्याम करें। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि उन लोगों ने अपनी क़ौम के जाहिलों और ऊबाशों को आपकी ईज़ा रसानी के लिए उभार दिया और वह लोग आपको पत्थर मारने लगे। उन पत्थरों के मुक़ाबले में ज़ैद बिन हारसा तनहा आपकी सिपर बनते थे जिसकी वजह से उनके सर में बहुत से ज़ख़्म आ गयचे और आन हज़रत (स.अ.व.व.) के पाये मुबारक से खून जारी हो गया।

इस हालत में आप ताएफ से रुख़सत होकर मक्के की जानिब फिर वापस हुए। मगर यह आलम था कि अब हरम में भी आपके लिए कोई जाये पनाह न थी। आप कोहे हिरा तक पहुँचे तो आपने दस्तूरे अरब के मुताबिक़ मुतीम बिन अदी को जो जनाबे अबुतालिब के क़दीम दोस्तों में थे , पैग़ाम भेजा कि मैं तुम्हारी पनाह में आना चाहता हूँ , पुराने तालुक़ात की बिना पर मुतीम ने सब मनजूर कर लिया और अपनी औलादों नी़ ख़ास अज़ीज़ों से कहा कि तुम सब मुसल्लह हो जाओ इसलिए कि मैंने मुहम्मद (स.अ.व.व.) को अपनी पनाह में ले लिया है। चुनानचे वह सब हथियारों से लैस होकर खान-ए-काबा के इर्द गिर्द जमा हो गये। जिसके बाद ज़ैद बिन हारसा के साथ आप मस्जिदुल हराम तक तशरीफ लाये , रुकन के पास पहुँचे , इस्तेमाल किया , दो रकत नमाज़ पढ़ी और फिर मुतीम बिन अदी और उनकी औलादों के घेरे में अपने घर तक तशरीफ लाये।

मसाएब की शिद्ददत

हज़रत रसूले खुदा (स.अ.व.व.) की जिस्मानी ईज़ा रसानियों के जितने भी वाक़ियात हैं जैसे पत्थरों की बारिश और सरे मुबारक पर खस व ख़ाशाक वग़ैरा का डाला जाना , यह सब इसी दौर से मुतालिक़ हैं , जब आपके सर से जनाबे अबुतालिब (अ.स.) का साया उठ चुका था। मगर यह आन हज़रत (स.अ.व.व.) का सब्रों इस्तेक़लात था कि चचा की वफात के बाद , आप सिर्फ चन्द रोज़ गोशा नशीन रहे फिर ताएफ का सफर इख़तियार करके तल्ख़ तजुर्बा किया और उसके बाद पलटे तो मुतीम इब्ने अदी से पनाह ले कर मक्के में दाखिल हुए , मगर इस अमर हक़ीक़त से आप अच्छी तरह वाक़िफ थे कि मैं पनाह लेने दुनिया में नहीं आया बल्कि गुमराहियों के सेलाब में डूबी हुई इस दुनिया को अपने साये रहमत में पनाह देने आया हूँ। इसिलए आपने घर पहुँच कर मुतीम बिन अदी का शुक्रिया अदा किया और फरमाया कि बस अब आपकी ज़िम्मेदारी ख़त्म हुई आप अपनी पनाह के बार से शुबकदोश कर दीजिये।

इसके बाद आप मक्के की गलियों , सड़कों और बाज़ारों में निकलते तो ज़्यादा तर हज़रत अली (अ.स.) आपके साथ होते मगर तन्हा वह भी क्या करते जब मशियते खु़दा वन्दी नहीं चाहती थी कि आन हज़रत (स.अ.व.व.) फिलहाल किसी माद्दी कूवत को बरुये कार लाकर मुशरेकीन का मुक़ाबला करें।

चढ़ती हुई जवानी के आलम में हज़रत अली (अ.स.) का यह ज़ब्ते तहम्मुल , उनके लिये यक़ीनन एक सख़्त इम्तेहानी मरहला था मगरवह भी इस हक़ीक़त से बेगाना न थे कि उनका जिहाद पर बिनाये मसलहत इसी अमर का मुतक़ाज़ी है कि वह सब्रों इस्तेक़लाल से काम लें। ताकि तबलीग़े हक़ की राह में कोई रुकावट पैदा न हो।

अकसर ऐसा भी होता था कि किसी ख़ास सबब की बिना पर हज़रत अली (अ.स.) या ज़ैद बिन हारसा पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) के साथ न होते तो उस वक़्त कुफ्फार के हौसले और भी बुलन्द हो जाते और दिल खोलकर वह आपको तकलीफें पहुँचाते मगर आपको सब्रों सबात का यह हाल था कि आप दुश्मनों की तरफ मुड़कर भी नहीं देखते थे। और जब भी मौक़ा हाथ आता कारे तबलीग़ में कोताही न करते , ख़ुसूसन जब हज का ज़माना आता और लोगों की तलवारें नयामो में चली जाती तो आप इधर उधर से आने वाले क़बाइल के ख़ेमों तशरीफ ले जाते और हर एक को दावते हक़ देते मगर उसका नतीजा भी क्या होता ? इब्ने साद का कहना है कि अरब का हर एक क़बीला आपकी दावत पर लब्बैक न कहता था बल्कि आपको आज़ार पहुँचाता था, पत्थर मारता था और गालियां देता था।


शक़क़ुल कमर का वाक़िया

अल्लामा दयार बक़री ने तारीख़े खमीस में लिखा है कि बेइस्त के नवें साल शकुल क़मर का मोज़िज़ा वाक़े हुआ। मवाहिब लदुनिया में है कि यह वाक़िया हिजरते नबुवी से पाँच बरस पहले का है।

इब्ने अब्बास से मरवी है कि हज के ज़माने में चौदहवीं शब को अबुजहल एक यहूदी और कुछ मुशरेकीन के साथ हज़रत रसूले खुदा (स.अ.व.व.) के पास आया और कहने लगा तुम अअपनी नबूवत का कोई सरीही मोजिज़ा दिखाओ ? आपने पूछा आखिर तू क्या चाहता है ? तो उसने यहूदी से मशविरा करके कहा , इस चाँद को दो टुकड़े करके दिखाओ ? आपने दुआ की और उँगली से इशारा किया चाँद दो टुकडे हो गया और दोनों टुकड़ों के दरमियान इस क़दर फासला हुआ कि कोहे हिरा बीच में नज़र आने लगा। थोड़ी देर तक यही कैफियत बरक़रार रही तो अबुजहल कहने लगा कि ऐ मुहम्मद (स.अ.व.व.) ! यह नज़र बन्दी है। मक्के से जो लोग बाहर गये हैं वह वापस आ जायें तो उनसे पूछूँ ? अगर वह तसदीक़ करेंगे तो मानूगा। जब बाहर से कुछ लोग वापस आये और उन्होंने भी शकुल क़मर की तस्दीक़ की तो कहने लगा कि मुहम्मद (स.अ.व.व.) ने सारी दुनिया की नज़र बन्दी की थी।

इस वाक़िये को इब्ने मसऊद , अनस बिन मालिक हुजै़फ़ा इब्ने उमर और जबीर इब्ने मुतीम वगैरा ने भी ब्यान किया है और आइम्मा मासूमीन (अ.स.) ने भी इसकी सराहत की है , सहाबये कराम भी इसके मज़हर हैं और तमाम ओलमा का भी इत्तेफाक़ है कि यह वाक़िया हुआ। बाज़ कज फहमों का कहना है कि यह वाकिया असारे क़यामत में से है और आइन्दा ज़हूर पज़ीर होगा अगर होता तो दूसेर मुमालिक के लोग भी उसे देखते हालाँकि उन्हें यह ख़बर नही है कि हिन्दुस्तान में भी यह मोजिज़ा देखा गया था , उस वक़्त यहाँ मदारियों की हुमूमत थी और बहारे दारूल सल्तनत था। तारीख़ फरशिता में यह वाक़िया मरक़ूम है।

अहले यसरब की बेदारी

वह हक़ का पेगा़म बर तो तलबगाराने हक़ की तलाश में था , वह अबरे रहमत जो प्यासों की जुस्तजू में था और वह दस्ते गीर जो इस फिक्र मे था कि कोई इसका सहारा लेने पर तैयार हो जाये आख़िर कार कुछ तलबगारों , प्यासों और सहारा लेने वालों को पा ही गया। चुनानचे साद का ब्यान है कि

(वह वक़्त आ गया कि अल्लाह की मशीयत मुक़त़ी हुई कि वह अपने दीन को नुमाया करले , अपने रसूल की मदद करे और अपने वादे को पूरा करे तो उसने आपको अन्सार के उस गिरोह तक पहुँचा दिया जिसके हक़ में इज़्ज़त और सरफराज़ी लिखी थी।)

आज का मदीना उस दौर में यशरब कहलाता था। यहाँ के दो ताक़त वर क़बीले उस और ख़ज़रिज थे जो बुत परस्ती और बाहमी जंग व जदाल में मसरूफ थे। बहुत से यहूदी भी यहाँ मुद्दत से आबाद थे जो तौरेत के मन्दरजात से वाक़िफ थे और उन्होंने अपने बुजुर्गों से भी हज़रत रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व.) के ज़ाहिर होने और उस सर ज़मीन पर आकर आबाद होने की बशारत सुन रखी थी चुनानचे वह लोग इन क़बायल ऊस व ख़ज़रिज के सामने पैग़म्बर (स.अ.व.व.) के बारे मे अक्सर व बेशतर तज़किरे किया करते थे और उन से कहा करते थे कि जब ख़ुदा का आख़िरी रसूल (स.अ.व.व.) इस शहर में तशरीफ लायेगा तो तुम्हारी यह बुत परस्ती ख़त्म हो जायेगी और तुम्हें उसके सामने सारे इताअत ख़म करना होगा। इन ख़बरों से अहले मदीना के ज़ेहनों में भी आन हज़रत (स.अ.व.व.) की आमद को एक तसव्वुर पैदा हो गया था।

हज़रत रसूले खु़दा (स.अ.व.व.) चूँकि मौसमे हज में हर क़बीले के लोगों से मिलने की सायी करते थे लेहाज़ा इसी ज़ेल में आप यशरब से आने वाले अफ़राद की तरफ़ भी पुहँच गये जो उस वक़्त अपना सर मुड़वा रहे थे। इब्ने साद का कहना है कि आप उनके पास बैठ गये और उन्हें इस्लाम की दावत दी और कुरान पढ़कर सुनाया जिस पर उन लोगो ने लब्बैक कही और ईमान लाये। फिर हज से फारिग़ होकर यही लोग मदीने गये और उन्होंने अपनी क़ौम के अफराद को इस्लाम की तरफ रुजू किया जिससे काफी लोगों ने कुबूल किया। रफ्ता रफ्ता अन्सार का कोई घर ऐसा न रहा जहाँ पैग़म्बरे इस्लाम का तज़किरा न हो।

इब्ने साद का ब्यान है कि अहले मदीना सबसे पहले इस्लाम लाने वाले असअद बिन ज़रार और ज़कवान बिन अब्दे क़ैस थे। इस वाक़िया की असल हक़ीक़त यह है कि असअद बिन ज़रारा और अबुलहसीम बिन तय्येहान दो एसे शख़्स यसरब में थे जो अपनी अक़ल सलीम की रहनुमायी से खुदा के लाशरीक होने के बारे मे आपस में गुफ़्तगू किया करते थे। चुनानचे यह असअद और ज़कवान दोनों एक बाहमी झगड़े के सिलसिले में अतबा बिन रबिया के पास मक्के गये तो अतबा ने कहा आज -कल एक शख़्स हमारे लिये मुसीबत बना हुआ है जिसकी वजह से किसी और बात की फुरसत नही है। उसका दावा है कि वह अल्लाह का रसूल (स.अ.व.व.) है। वह आसमान की बातें करता है और बुत परस्ती से लोगों को मना करता है। अतबा से यह सुनकर यह लोग उठे तो ज़कवान ने असअद से कहा कि यह तो वही दीन मालूम होता है जिसके बारे में तुम अपना ख़्याल ज़ाहेर किया करते हो। चलो , इस सिलसिले में उस शख़्स से कुछ बात करें जो अपने को रसूल (स.अ.व.व.) कहता है। इस तरह यह दोनों आन हज़रत (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में हाजिर हुए आप ने उनके सामने इस्लाम की अफ़ादियत और उसूलों पर रौशनी डाली और दोनों ने उसी वक़्त इस्लाम कुबूल कर लिया। फिर यह दोनों मदीने वापस आये तो असअद ने अबुलहसीम से सारा वाक़िया ब्यान किया जिसे सुनकर अबुलहसीम ने कहा कि मैं भी तुम्हारे साथ यह गवाही देता हूँ कि वह अल्लाह के रसूल हैं। इश तरह वह भी इस्लाम लाये। यह अबुलहसीम वही हैं जो अमीरूल मोमेनीन हज़रत अली (अ.स.) के बड़े गहरे और मुख़लिस दोस्त थे जिनका ज़िक्र नहजुल बलाग़ा में मौजूद है।

अल्लामा तबरी ने आलामुल वरा में मुफ़स्सिरे क़ुरान अली बिन इब्राहीम अलेहुर रहमा के हवाले से इस वाकिये का पस मंजर बड़ी तफसील व तशरीह के साथ मरकूम किया है। फरमाते हैं कि ऊस व ख़ज़रिज़ में मुद्दत दराज़ से ऐसी जंग थी कि दिन और रात में किसी वक़्त यह लोग अपने जिस्म से हथियार जुदा नहीं करते थे चुनानचे उनके दरमियान जो आख़िरी मारका हुआ वह बग़ास का था जिसमें क़बीला ऊस , ख़ज़रिज के मुक़ाबले में फतहयाब हुआ था। असअद बिन ज़रारा और ज़कवान बिन क़ैस दोनों का ताअल्लुक़ ख़ज़रिज से था यह लोग माहे रजब में उमरे के दौरान इस मक़सद के तहत मक्के गये कि अहले मक्का को क़बीलये ऊस के ख़िलाफ अपना हलीफ बनायेंगे। असअद बिन ज़रारा और अतबा बिन रबिया में पुरानी दोस्थी थी इसिलए असअद ने अतबा ही के यहाँ क़याम किया और अपना मक़सद बयान किया। अतबा ने कहा अव्वल तो तुम्हारा शहर हम से दूर है दूसरे यह कि आज कल हमें एक ऐसी फिक्र है कि जिसकी वजह से किसी दूसरी मुहीम में हम हाथ नहीं डाल सकते इस पर असअद ने तफ़सील पूछी तो अतबा ने जनाबे रिसालत माब (स.अ.व.व.) और उनकी दावते इस्लामी का हाल ब्यान किया।

यह लोग अपने यहाँ के यहूदियों से आखिरी रसूल (स.अ.व.व.) और उनकी दावते तौहीद के बारे में सब कुछ सुन चुके थे लेहाज़ा उन्होंने पूछा कि वह इस वक़्त कहाँ है ? कहा , हुजरए इस्माईल (अ.स.) में बैठे हैं मगर उनके पास न जाना और न उनका कलाम सुना वरना वह जादूगर हैं तुम पर सहर का असर ज़रुर हो जायेगा। असअद ने कहा , मैं उमरे का एहराम बाँधे हुए हूँ , तवाफ की ग़र्ज से मेरा उधर जाना लाज़मी है। अतबा ने कहा , अच्छा , तो फिर जाओ मगर अपने कान बन्द रखना ताकि उसकी बातें तुम न सुन सको।

उस वक़्त तो असअद ने मेज़बान से कहने पर अमल किया और अपने कानों में रूई रख ली मगर दौराने तवाफ उसने सोचा कि मुझसे बढ़कर जाहिल कौन होगा कि मैं मक्का से अपने शहर वापस जाऊँ और इस अहम वाकिये के मुतालिक़ जो मक्के में रुनूमा है कुछ न मालूम करूँ ? यह तो इन्तेहाई हिमाक़त है। यह ख़्याल आते ही उसने रूई कानों से निकाली और आन हज़रत (स.अ.व.व.) के क़रीब आकर उसने दस्तूरे अरब के मुताबिक सलाम किया। रसूले अकरम (स.अ.व.व.) ने सर उठाकर उसे देखा और फरमाया अल्लाह ने हमको इससे बेहतर सलाम का तरीक़ा बताया है जो अहले बेहिश्त का सलाम है यानि सलामुन अलैकुम! असअद ने कहा और क्या चीज़ें हैं जिनकी तरफ़ आप दावत देत हैं ? आपने फरमाया ,

(इस अमर की गवाही कि अल्लाह के सिवा और कोई माबूद नहीं है और यह कि मैं अल्लाह का पैग़म्बर हूँ और मैं उस अमर की दावत देना चाहता हूँ कि किसी भी शय को अल्लाह के साथ शरीक न करो। माँ बाप से हुस्ने सुलूक और एहसान करो और फक़रो फाक़े के ख़ौफ से अपनी औलाद को क़त्ल न करो क्योंकि परवरदिगार का इरशाद है कि हम तुम्हें रिज़्क पहुँचाने वाले हैं। फहश कामों से परहेज़ करो ख़्वाह वह ज़ाहिर में हो या बातिन में। किसी वे गुनाह को क़त्ल न करो किसी यतीम के माल पर नज़र न डालो। नाप तोल में इन्साफ से काम लो और अल्लाह के अहद को पूरा करो। यह सब हिदायतें तुम्हारे लिये हैं शायद तुम इन्हें कुबूल कर लो।)

एक तरफ आन हज़रत (स.अ.व.व.) की तक़रीरी गुफ्तगू आगे बढ़ रही थी और दूसरी तरफ़ सुनने वाले के दिलो दिमाग़ में हक़ की रौशनी पैदा हो रही थी चुनानचे इधर आपकी तक़रीर का सिलसिला ख़त्म हुआ और उधर असअद की ज़बान से बेसाख़्ता कलेमात निकले कि मैं गवाही देता हूँ , बेशक अल्लाह के सिवा कोई दूसरा ख़ुदा नहीं है और आप यक़ीनन अल्लाह के पैग़म्बर हैं।

इसके बाद असअद ने कहा या रसूल उल्लाह मैं यसरब के क़बीले ख़िज़रिज़ से हूँ और हमारे नीज़ क़बीला ऊस के दरमियान ब्रादराना तालूक़ात मुनक़ेता हैं अगर आपकी वजह यह तअल्लुक़ात इस्तवार हो जाये तो यक़ीनन हम पर आपका बहुत बड़ा एहसान होगा।

इस गुफ्तगू के बाद असअद रुख़सत हुए और उन्होंने आकर अपने साथी ज़कवान को तमाम हालात से मुत्तेला किया और कहा कि यह वही आख़िरी रसूल हैं जिनके बारे मे यहूदी ओलमा हमें बताया करते थे , चलो तुम भी इस्लाम कुबूल कर लो। चुनानचे ज़कवान भी रसूले अकरम (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में हाज़िर हुए और उन्होंने भी इस्लाम कुबूल कर लिया फिर दोनों ने मदीने में आकर तबलीग़ की जिस के नतीजे में बहुत लोग मुसलमान हुए।

मेराज ए नबी (स.अ.व.व.)

अल्लामा ज़ीशान हैदर जव्वादी रक़म तराज़ है-

(27 रजब की शब आलमे इस्लाम में वह अज़ीर रात है जिसे (शबे मेराज) कहा जाता है। मेराज की दास्तान कुरान मजीद में दो मुक़ाम पर तफसील के साथ ब्यान हुई है। एक मर्तबा सूरये असरा में और दूसरी मर्तबा सूरये वननज्म में। बाज़ ओलमाये कराम ने उन्हें खुसूसियात के पेश नज़र यह रास्ता इख़तियार किया है कि सरकारे दो आलम (स.अ.व.व.) को कम अज़ कम दो मर्तबा मेराज हुई है। एक का हाल सूरये असरा में ब्यान हुआ है जिसका ज़ाहिर सफ़र मस्जिदे अक़सा पर तमाम हो गया था और दूसरी का तज़किरा सूरये वननज्म में है जहाँ सिदरतुल मुनतहा और क़ाबा क़ौसैन तक तजकिरा है। इस सिलसिले में यह इहतेमाल भी पाया जाता है कि यह दो सफर हों और यह इहतेमाल भीहै कि एक ही सफर दो मरहलों में हों। एक मरहला मस्जिदे अक़सा पर तमाम हुआ और दूसरा मरहला मस्जिदे अक़सा से शुरू हुआ हो और अरशे आज़म पर तमाम हुआ हो। बहर हाल सूरते वाक़िया कुछ भी हो। न सरकार (स.अ.व.व.) की मेराज में कोई शक हो सकता है और रवायात के पेशे नज़र तादाद में कोई शक किया जा सकता है।)

तारीख़े अबुलफ़िदा में है कि जनाबे अबुतालिब की वफात से क़बल मेराज हुई जबकि जौज़ी का ख्याल है कि हज़रत अबुतालिब की वफाक ते बाद नबूवत के बारहवें साल मेराज हुई। तफसीर सेयवती में अम्र बिन शुऐब से मरवी है कि हजिरत से एक साल पहले सत्तरवीं रबीअव्वल की शब में आन हज़रत (स.अ.व.व.) मर्तबे मेराज पर फायज़ हुए। मुल्ला अली क़ारी शरहफिक़ए अकबर में फरमाते हैं कि वाक़िया मेराज जसदि यानि रसूले मक़बूल का बहालत बेदारी समावत व मुक़ामाते आलिया की सैर फरमान हक़ है और उसकी हदीसें तारीख़े मुत्ताइदा से साबित है बस जो शख़्स कि मेराजे जिस्मानी की तरदीद कर ले और उसकी सेहत पर ईमान न लाये वह गुमराह और बिदअदी है। इब्ने इसहाक़ और इब्ने जरीर ने हज़रत आयशा से रवायत की हैकि शबे मेराज रसूल (स.अ.व.व.) का जसदे अक़दस अपनी जगह पर बरक़ारर रहा और अल्लाह ताला ने अपनी रूहें अतहर को आसमानों की सैर करायी।

मुनदर्जा बाला तहरीरों से यह बात वाज़ेह और आशकार हो जाती है कि मेराजे पैग़म्बर (स.अ.व.व.) के सिलसिले में ओलमा , मोअर्रेख़ीन और मुहद्देसीन ने क़दम क़दम पर इख़तेलाफ़ किया है मेराज की इब्तदा कहाँ से हुई ? कब हुई ? किस शक्ल मे हुई ? जिस्मानी हुई या रूहानी ? वह कौन सी तारीख़ और कौन सा साल था ? चौदह सौ बरस के अरसे में ओलमा तय न कर सके। इस ज़ैल में जानबीन के ओलमा की तरफ़ से ख़ूब ख़ूब ख़ामा फरसाइयां और मार्का आराइयां हुयीं हैं और मोहकि़क़ तूसी , इमाम ग़ज़ाली हैं और हर तरीक़ें से हुजूरे अकरम (स.अ.व.व.) की मेराजे जिसमानी और उसकी माकूलियत के तमाम असबाब व मुशाहेदात को एन इमकानी क़रार दिया है और यही दुरूस्त भी है क्योंकि आंहज़रत की ख़िलक़ते नूरी थी और नूर की रफ्तार का अन्दाज़ा इसस हो सकता है कि इन्सानी आँख का नूर एक सेकेण्ड से भी कम वाक़फ़े में चाँद और सितारों का जायेज़ा ले लेता है तो जो नूरे मुजस्सम हो उसका आसमान पर जाना , वहाँ की सैर करना और इस वक़फ़े में पलट आना कि जज़ीरे दर हिलती रहे , ताज्जुब खेज़ हरगिज़ नहीं हो सकता।

शिया ओलमा ने मेराज की जो हक़ीक़त ब्यान की है वह यह है कि 27 रजब सन् 216 बेइस्त की रात को ख़ल्लाक़े आलम ने अपने हबीब हज़र मुहम्मद मुस्तफा (स.अ.व.व.) को जिबरील और बुर्राक़ के ज़रिये क़ाबा क़ौसैन की मंजि़ल पर तलब फरमाया और वहाँ हज़रत अली इब्ने अबुतालिब (अ.स.) की ख़िलाफत व इमामत से मुतालिक़ हिदायतें दी। इसी मुबारक और इरतेक़ायी सफर को मेराज के नाम से याद किया जाता है। यह सफर उम्मे हानि बिन्ते जनाबे अब्दुल मुत्तालिब के घर से शुरू हुआ था। आप पहले बैतुल मुक़द्दस गये और वहाँ से आसमान पर रवाना हुए। तमाम आसमानी मनाज़िल को तय करते हुए जब आप सिदरतुन मुनतहा तक पहुँचे तो जिबरील ने कहा या रसूल उल्लाह अगर इसके आगे मैं एक क़दम बढ़ा तो जल जाऊँगा। चुनानचे वहाँ आप ने जिबरील को छोड़ा और रफरफ पर बैठकर आगे बढ़े। रफरफ एक नूरी तख़्त था जो नूर के दरिया में रवां दवां था। यहाँ तक कि आप इस मंज़िले मक़सूद तक पुहँच गये जहाँ से आप और हिजाबात व अनवारे इलाही के दरमियान सिर्फ दो कमानों का फासला रह गया , वहाँ परवर दिगार ने आपसे अली (अ.स.) के लहजे में बातें कीं और आप वापस आये। आपकी वापसी के वाद उम्मते इस्लामिया पर पाँच वक़्त की नमाज़ वाजिब की गयी।

मदीना और अन्सार

मदीने का असली नाम यसरब था। बनि अमालेक़ा में यसरब नामी एक रईस क़बीले ने इस शहर को अपने नाम से आबाद किया था। रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) ने जब यहाँ क़याम फ़रमाया तो उसका नाम मदीनतुल नबी हुआ और कसरते इस्तेमाल की वजह स मदीना कहा जाने लगा।

बख़्ते नसर ने जब बैतुल मुक़द्दस पर हमला करके उसे तबाह व बरबाद और यहूदियो का क़त्ले आम किया तो वह परेशानी के आलम में वहाँ से मुनतशिर हो कर इधर उधर भागे और मुख़तलिफ़ मुक़ामात पर पनाह गुज़ीर हुए। उन्हीं अय्याम में कुछ यहूदी यहाँ भी आकर आबाद हुए और रफ्ता रफ्ता उनकी नस्लों ने यसरब के पूरे इलाक़े पर अपना तसल्लुत जमा लिया और वहाँ के क़दीम बाशिन्दों से हुकूमत भी छीन ली जिसके नतीजे में उनकी अमारत व इक़तेदार का असर वादिउल क़ुरा तीमा और ख़ैबर तक फैल गया।

अन्सार-क़हतान (जुरहुम ऊला) की औलाद से यमन के बाशिन्दे थे। यमन में जब सेले अरम का वाकिया रुनूमाहुआ तो यह लोग भी वहाँ से निकल कर मदीने में आबाद हुए। (ऊस और ख़ज़रिज़)। यह दोनं भाई थे और तमाम अन्सार उन्हीं दोनों भाईयों की नस्ल से हैं। जब यह खानदान मदीने में आबाद हुआ उस वक़्त वहाँ यहूदियों का इक़तेदार व असर था। आस पास के तमाम इलाक़े उनके क़बज़े में थे और वह लोग दौलत से माला माल थे और चूँकि औलाद की कसरत से उनकी तादाद काफी बढ़ चुकी थी इसलिए उनके मुख़तलिफ़ क़बीले बन गये थे और उन लोगों ने दूर दूर तक बस्तियां बसा ली थी।

अन्सार कुछ ज़माने तक अलग रहे लेकिन उनका इक़तेदार व असर देखकर बिल आख़िर उनके हलीफ़ बन गये और एक मुद्दत तक ह हालात बरक़रार रही लेकिन अब अन्सार का ख़ानदान भी फैलता जाता था और इक़तेदार हासिल करता जाता था इसलिए यहूदियों ने दूर अन्देशी के तहत उनसे अपने तमाम मुहायिदे जो बाहमी मराआत के बारे में थे , तो़ड दिये। फिर यहूदियों में फैतून नामी एक रईस पैदा हुआ जो इन्तेहाई बदकार और अय्याश था। उसने यह हुक्म दिया कि जो भी दोशीज़ा लड़की ब्याही जाये वह पहले उसके शाबिस्ताने ऐश में लायी जाये। यहूद ने तो इसको गवारा कर लिया जब अन्सार की नौबत आयी तो उन लोगों ने सरताबी की उस वक़्त अन्सार का सरदार मालिक इब्ने अजलान नामी एक शख़्स था। उसकी बहन की शादी हुई तो ऐन शादी के दिन घर से वह बे पर्दा निकलकर मालिक इब्ने इजलान के सामने से गुज़री तो मालिक को ग़ौरत आयी वह उठकर घर में आया और बहन को ड़ाँटा फटकारा। उसने कहा , कल फैतून के इशरत क़दे में जो होगा वह इस पेबर्दगी से कहीं ज्यादा है। मालिक ने कहा तू इसकी परवाह न कर मैं देख लूंगा।

दूसरे दिन जब हस्बे दस्तूर मालिक की बहन दुल्हन बनकर फैतून की ख़लवतगाह में गयी तो मालिक भी औरतों की लिबास पहनकर सहेलियों के साथ वहाँ गया और फैतून को क़त्ल करके शाम की तरफ भाग खड़ा हुआ। शाम में ग़सानियों की हुकूमत थी और अबुहीला नामी एक शख़्स वहाँ का हुक्मरान था उसने जब यह हालात सुने तो एक लश्कर ले कर वह मदीने आय़ा वहाँ उसने यहूदियों की दावत की और दावत के बाद एक एक क़त्ल कर दिया इस तरह यहूदियों का इक़तेदार ख़त्म हो गया और अन्सार ने पूरी कुवत हासिल कर ली। उन्होने मदीने और उसके गिर्द नवाह में छोटे छोटे किले बनाये और एक ज़माने तक मुत्ताहिद रहे लेकिन फिर अरब की सख़्त खूँरेज़ लडाईयाँ हुयी। सबस आखिरी लड़ाई जो तारीख़ में बेग़ास के नाम से मशहूर है इस तरह हुई कि ऊस और खिज़रिज दोनों खानदानों के तमाम नामवर अफ़राद लड़ ल़़ कर मर गे और यह हालात हो गयी कि उन्होंन कुरैशे मक्का के पास सिफारिश भेजी कि हम को अपनी हलीफ बना लीजिये बुत परस्त थे ताहम यहूदियों से मेल जोल था इसलिए वह नबूवत और कुतबे आसमानी से गोश आशना थे। यहूदियों ने मदीने में जो मदारिस क़ायम किये थे उन्हें बैतुल मदारिस कहा जाता था और उनमें तौरैत की तालीम दी जाती थी। उससे यहूद के इल्मो तफ़वुक़ का इसर अनसार की तबियतों पर पड़ता था यहाँ तक कि अन्सार में जिसकी औलाद जि़न्दा नहीं रहती थी वह मन्नत मानता था कि बच्चा ज़िन्दा रहेगा तो वह उसे यहूदी बनायेगा। यहूदी अमूमन बा यक़ीन और अक़ीदा रखते थे कि एक पैग़म्बर अभी और आने वाला है। इस बिना पर अन्सार में पहला शख़्स जो इस्लाम से मुशर्रफ हुआ वह सुवैद बिन सामित था जिसके बारे में मोअर्रेख़ीन तहरीर किया है कि वह एक बहुत बड़ा शायर , दानिश्वर , शुजा और दिलेर था। और इल्मी फ़ज़ल व कमाल में आफाफ़ी शोहरत का मालिक था अपने क़ौम व क़बीले मे वह कामिल के लक़ब से पुकारा जाता था।

अल्लामा शिबली रक़म तराज़ है कि सुईद बिन सामित को इमसाल लुक़मान का एक नुसख़ा मिल गया था जिसको वह आसमानी सहीफा समझता था। वह एक दफा हज को गया। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने उसके हालात सुने तो खुद उसके पास तशरीफ ले गये उसने इमसाल लुक़मान पढ़कर सुनाया आपने फरमाया मेरे पास इससे बेहतर चीज़ है। यह कह कर कुरान मजीद की चन्द आयतें पढ़ीं। सुईद ने तहसीन की। अगर चे वह मदीने वापस आकर जंगे बगा़स में मारा गया लेकिन इस्लाम का मोतेकि़द हो चुका था।

बईते अक़बा औला

(अहले यसरब की बेदारी) के ज़ेल में असअद बिन ज़रारा और ज़कवान बिन क़ैस के मुतालिक़ हम यह तहरीर कर चुके हैं कि क़बीलयते ख़िज़रिज के यचह दोनों हज़रात अव्वलन रसूले अकरम (स.अ.व.व.) की मुलाक़ात से शरफयाब हुए , इस्लाम लाये और फिर मक्के से मदीने में वापस आकर उन्होंने इस्लाम की तबलीग़ की और दीगर लोगों को मुसलमान किया। और हक़ीक़तन वाक़िया भी यही है लेकिन बाज़ मोअर्रिक़ ने इस पहली जमात को जिसके ज़रिये इस्लाम मदीने में पहुँचा , छः अफराद पर मुशतमिल बताया है।

इसके बाद इब्ने सईद का ब्यान है कि दूसरे साल फिर मौसमें हज में मदीने से बारह आदमी मक्के मोअज़्ज़मा गये और उन्होंने हज़रत रसूले खु़दा (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में हाज़िर हो कर आपको हाथों पर बैअत की और इसलाम कुबूल किया। फिर यह लोग मदीने वापस हुए और उनकी तबलीग़ से इस्लाम हर तरफ मदीने में फैल गया। अभी तक अशद बिन ज़रारा मुसलमानों को नमाज़े जमात पढ़ाते थे इस के बाद क़बीले ऊस व ख़िज़रिज़ ने मिल कर आन हज़रत (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में एक अर्ज़दाश्त पेश की कि कोई हाफिज़े कुरान हमारी तरफ भेज दें ताकि वह हमें नमाज़ पढ़ाये और कुरान हिफज़ कराये चुनानच आपने उनकी इस दरख़्वास्त पर मसअब बिन उमैर को रवाना किया। यह असद बिन ज़रारा के मकान पर फरोकश हुए और लोगों को कुरान की तालीम देने लगे। लेकिन तबरी की रवायत यह बताती है कि असद और ज़कवान ही ने आन हज़रत (स.अ.व.व.) से यह दरख़्वास्त की थी कि हमारे साथ एक आदमी भेज दें जो हमें कुरान पढ़ाये और इस्लाम की तबलीग़ करें उस पर आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने मुसाब बिन अमीर को रवाना किया)

(मुसाब एक कम उम्र नौजवान थे। जिन्होने अपने दौलतमंद वालैदेन के घर में बड़े नाज़ व नेअम से परवरिश पायी थी और अपने तमाम भाई बहनों में सबसे ज़्यादा माँ बाप के चहीते थे। कभी मक्के से बाहर क़दम न निकाला था मगर उन्होंने जब इस्लाम इख़तियार किया तो उनके वालदैन ने उन पर बड़ी सख्तियां की और घर से निकाल दिया चुनानचे यह रसूल अल्लाह (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में आ गये और उन्होंने आन हज़रत (स.अ.व.व.) के साथ शोअबे अबुतालब में रहकर मुहासिरे की सख़्तियाँ भी झेली। उस वक़्त तक जितना भी कुरान नाज़िल हुआ था वह सब उन्होंने हिफज़ कर लिया था और रसूल (स.अ.व.व.) के साथ रहकर मसाएले शरिया से वाक़िफ हो गये थे। पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने उन्हें हुक्म दिया कि वह मदीने जायें चुनानचे वह मदीने पुहँचे और असद के यहाँ क़याम किया। रोज़ान यह क़बीले खिज़रिज के लोगों के पास जाते थे और उन्हें इस्लाम की दावत दिया करते थे। ज़्यादा तर नौजवान तबके उनकी तबलीग़ से मुतासिर होकर इस्लाम कुबूल करने पर आमादा होता था।

उन बारह आदमियो ने पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) के हाथों पर जहाँ बैअत की और इस्लाम इख़तेयार किया वह अक़बा यानि पहाड़ की एक खाई थी जो मक्के से थोड़े फासले पर शुमाल की जानिब वाक़े है। मोअर्रिख़ अबुल फिदा का कहना है कि इस अहद के सात बैयत हुई कि ख़ुदा का कोई शरीक न करो , चोरी न करो , ज़िनाकारी से बचो और अपनी औलाद को क़त्ल न करो। यही वह बहैयत है जो बैयते अक़बा ऊला के नाम से मशहूर है।

बैयते अक़बा सानिया

माह ज़िलहिज सन् 12 बइस्त में मसअब बिन अमीर 75 आदमियों का एक क़ाफिला जिसमें दो औरतें भी शामिल थीं लेकर मदीने से मक्के आये और उन्होंने रसूले अकरम (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में पेश किया। चूँकि उश वक़्त किसी तफसीली गुफ़्तगू का मौक़ा नहीं था इसिलए आपने फरमाया कि हज से फराग़त के बाद 12 ज़िलहिज को जब रात की तारीकी छा जाये और सन्नाटा हो जाये तो कामोशी से मुक़ामे अक़बा के निचले हिस्से मे स लोग आकर जमा होना तो वहाँ तफसील से गुफ्तगू होगी। चुनानचे वह लोग मोअय्यना वक़्त पर अब्बास इब्ने अब्दुल मुत्तालिब की क़यादत में वहाँ पहुँच गये। लेकिन बकौ़ल अल्लामा तबरी आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने अक़बा के मुक़ाम पर गुफ्तगू मुनासिब न समझी और उन्हें ख़ान-ए-अब्दुल मुत्तालिब में जमा होने का हुक्म दिया और पूरी बात चीत वहाँ हुई इस मौक़े पर जनाबे हमज़ा और हज़रत अली (अ.स.) भी मौजूद थे। अहले मदीना में ज़्यादा तर ऐसे थे जो मसअब बिन अमीर की तहरीक पर इस्लाम कुबूल कर चुके थे और कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने अभी तक यह शरफ हासिल नहीं किया था उनमें अब्दुल्लाह इब्ने अबी भी शामिल थे।) गुफ्तगू का आगाज़ जनाबे अब्बास बिन अब्दुल मुत्तालिब की एक फसीह व बलीग़ तक़रीर से हुआ जिसके बाद अहले मदीने की तरफ़ से बरा बिन मारूर खड़े हुए और उन्होंने कहा-

(जो कुछ आपने फरमाया वह हम ने सुना। हम आपको इत्मेनान दिलाते हैं कि हमने खूब सोच लिया है और तय कर लिया है कि सच्चाई और वफादारी में किसी तरह की कोई कमी न करेंगे और पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) की नुसरत में अपनी जानें कुर्बान करने में कोई दरेग़ न करेगें)

यह सुनकर आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने चन्द आयते कुरानी की तलावत फ़रमायी और बैअत के लिये हाथ बढ़ाया। जिस पर सबसे पहले बर्रा इब्ने मारूर और मक़ौले अबुल हसीम बिन तबहान ने बैयत की। उसके बाद बाक़ी आदमियों ने बैयत की और जो उनमें से मुलमान न थे उन्होंने उसी वक़्त इस्लाब कुबूल किया।

अल्लामा तिबरसी का कहना है कि बैयत के बाद आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने अहले मदीने से फरमाया कि तुम लोग अपने में से बाहर नक़ीबों (ज़िम्मेदार मुमाइन्दों) को मुनतख़ब करके उनके नाम बताओ जो तुम्हरी तरफ़ से जवाब देही के जिम्मेदार हो। चुनानचे क़बीलये ख़िज़रिज में से नौ आदमी असद बिन ज़रारा , बर्रा इब्ने मारूर , अबुद्लालह बिन हाज़म (जनाबे जाबिर के वालिद) सफ़े बिन मालिक , साद बिन अबादा , मंज़र बिन अम्र , अब्दुल्लाह इब्ने रवाहा , साद बिन रबी और एबादा बिन सामित नक़ीब मुकर्रर हुए नीज़ क़बीले ऊस से तीन आदमी अबुल हसीम बिन तीहान , असीद बिन हजीर और साद बिन ख़ीमसा मुक़र्रर हुए। उसके बाद उन लोगों ने आन हज़रत (स.अ.व.व.) से मदीने चलने के लिये इसरार किया तो आपने फरमाया कि अभी हुक्मे इलाही का मुन्तज़िर हूँ। इस्लाम की तारीख़ में यह बैयत , बैयते अक़बा सानिया के नाम से मौसूम है।

असहाब की रवानगी

जब किसी मिशन की तकमील के लिये एक पूरी जमियत तैयार हो चुकी हो तो ऐसी हालत में महज़ अपनी जान की तहाफ़्फुज़ के ख़ातिर मरकज़ छोड़ कर किसी दूसरी जगह मुनतक़िल हो जाना फरार के मुतरादिफ है। फ़रार करने वाला यह नहीं सोचता कि दूसरों का क्या हाल होगा। मगर मिशन के मक़सद की ख़ातिर किसी मुनासिब मरकज़ की तलाश करके अपनी जगह से हरकत करना हिजरत करने वाला पूरे साज़ो सामान और इन्तेजा़म के साथ हिजरत करता है उसके सामने फक़्त अपनी जान का मसला नहीं होता बल्कि पूरी जमाअत के मुफाद का मसला होता है। अगर रसूले अकरम (स.अ.व.व.) को सिर्फ अपनी जान बचा कर जाना होता तो मदीने वालों की इतनी बड़ी जमाअत मौजूद थी जो आपको अपनी मय्यत में ले जाना चाह रही थी मगर आपने उनकी दरख़्वास्त कुबूल नहीं किया और यह कह दिया कि (आभी मैं हुक्मे इलाही का मुन्तजिर हूँ)

यह हुक्मे इलाही क्या था ? इन तमाम इन्तेज़ामी ऊमूर की तकमील जो जमाअत के तहाफुज़ और इख़लाक़ी जिम्मेदारियों के तक़ाज़ों को पूरा करने के लिये बहर हाल ज़रुरी थी। चुननचे अहद व पैमान के बाद अहले मदीना तो वापस चले गये मगर कुफ्फारे मक्का को जब यह हाल मालूम हुआ तो उन्होंने अज़ सरे नौ मुसलमानों पर मज़ालिम और तशद्दुद की बारिश कर दी यहाँ तक कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) के क़त्ल का मनसूबा भी तैयार कर लिया। इन्हीं नासाज़गार और जान लेवा हालात की नज़ाकत के पेशे नज़र आपने तमाम मुसलमानों को यह हुक्म दिया कि वह लोग रफ़्ता रफ्ता मदीने की तरफ रवाना हो।

तीरख़ी की यह सराहत है कि इस हुक्मे पैग़म्बर (स.अ.व.व.) के बाद मक्के में चार छः आदमियों के अलावा कोई मुसलमान नहीं रह गया। या तो वह लोग रह गये जो क़ैद थे या फिर वह हर गये जो दरमांदा और बीमार थे जिनका जाना किसी तरह मुम्किन ही न था।

पैग़म्बर इस्लाम (स.अ.व.व.) की हिजरत

पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) की हिजरत के पस मन्ज़र में आम इन्सान ज़ेहन सतही तौर पर यह सोचता है कि मुशरेकीन मक्का ने चूँकि आपके क़त्ल का इरादा कर लिया था इसलिये आपने हिजरत फरमायी। इससे यह महसूस होता है कि आनहज़रत (स.अ.व.व.) की हिजरत महज़ जान बचाने की ख़ातिर थी। हालाँकि तारीख़ यह निशान देही करती है कि पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने हिजरते हब्शा के मौक़े पर ही अपनी हिजरत का मनसूबा ज़ेहनी तौर पर मुर्त्तब कर लिया थआ और अब अमली हैसियत से यह हिजरत इसी मनसूबे की तकमील थी।

ज़ाहिर है कि कुफ्फारे कुरैश को आनहज़रत या मुसलमानों से ज़ाती अदावत या दुश्मनी होती तो वह लोग हिजरत से खुश होते कि सर का दर्द गया। मगर उन्हें तो इस मक़सद और मिशन से दुश्मनी थी जिसकी तरक़्क़ी से वह ख़ुद अपने लिये खतरा महसूस कर रहे थे लेहाज़ा जब उन्होंने यह देखा कि मुसलमानों को अहले यसरब की हिमायत और पुश्त पनाही हासिल हो गया है तो उन्हें यह फिक्र लाहक़ हुई कि जिस तरह तमाम मुसलमान तरके वतन करके मदीने की तरफ जा रहे हैं उसी तरह अगर पैग़म्बर (स.अ.व.व.) भी चले गये तो यही जमाअत एक दिन हमारे ख़िलाफ उठ खड़ी होगी। इस लिए उन्होंने फैसला किया कि मक्का छोड़ने से पहले ही आन हज़रत (स.अ.व.व.) की शम्मे हयात गुल कर दें ताकि आइन्दा कोई गुंजाइश ही न रह जाये। इससे साफ़ ज़ाहेर है कि क़त्ल के अन्देशे की बिना पर पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की हिजरत नहीं हुई बल्कि इरादा-ए-हिजरत के बाद आपके क़त्ल का मनसूबा तैयार किया गया। जैसा कि इब्ने साद का बयान है किः- (जब मुशरेकीन ने दैखा कि असहाबे पैग़म्बर (स.अ.व.व.) अपने साथ औरतों और बच्चों को भी ऊस व ख़िज़रिज की तरफ ले गये हैं तो वह यह समझे कि वह उनके लिये का़बिले इत्मेनान और महफूज़ मुक़ाम है और वह एक ताक़तवर जमात है तो उन्हें अन्देशा हुआ कि रसूल (स.अ.व.व.) भी वहाँ पहुँच जायेंगे लेहाज़ा यह लोग दारूल नदवा में जमा हुए तो आपके बारे में बाहम मशविरा करें।)

अल्लामा तबरिसी का बयान है कि दारूल नदवा में अशराफे कुरैश में से चालिस अफराद का मजमा था और शुरका पर यह पाबन्दी थी कि चालीस बरस से कम उम्र का कोई आदमी शरीक न हो सिर्फ एक अतबा बिन रबिया (मुआविया का नाना) ऐसा था जिसकी उम्र चालीस साल से कुछ कम थी।

अल्लामा दायर बकरी का कहना है कि (इस मजलिसे मुशवरत में बनी हाशिम के अलावा तमाम क़बीलों के सरकिरदा अफराद ने शिरकत की। बनि अब्दुल शमस से अतबा , शीबा और अबुसुफियान। बनि नौफिल से तईमा इब्ने अदी व जबीर इब्ने मोतम व हारिस बिन आमिर। बनि अब्दुल दार से नफ़र बिन हारिस , बनि असद से अबुल बख़तरी , इब्ने हष्शाम , ज़मआ इब्ने असवाद से नबिया और मुनबा पिसराने हज्जाज। बनि जमा से उमय्या इब्ने ख़लफ। इन अमाएदीन व शयूख़ के अलावा और लोग भी शरीक हुए और नज्द का एक बूढ़ा भी उनमें आकर शामिल हो गया।)

उनमें से एक शख्स ने कार्रवायी का आग़ाज़ करते हुए कहा कि तुम लोगों को मालूम है कि मुसलमानों ने बाहर के लोगों से राबता क़ायम कर लिया है और वह किसी वक़्त भी बड़ी ताक़त बन कर उभर सकते हैं। हमें इस मसले पर ग़ौर व फिक्र करने की ज़रुरत है। अगर इसकी रोक थाम न की गयी तो क़वी अन्देशा है कि वह एक न एक दिन मुहम्मद (स.अ.व.व.) की क़यादत में हम पर चढ़ायी कर देंगे लेहाज़ा कोई ऐसी तदबीर करना चाहिये कि इस्लाम का किस्सा तमाम हो जाये और मुहम्मद (स.अ.व.व.) को ऐसी इबरतनाक सज़ा दी जाये कि आइन्दा किसी को हमारे दीन व मज़हब के ख़िलाफ़ लब कुशाई की जसारत न हो। आस इब्ने वायल उमय्या बिन ख़लफ़ और अबी बिन ख़लक़ ने कहा कि हमारी राय यह है कि मुहम्मद (स.अ.व.व.) को तौक़ व जंज़ीर में जकड़ कर किसी कोठरी में बन्द कर दिया जाये यहाँ तक कि क़ैदे तन्हाई में वह भूक और प्यास से तड़प तड़प कर मर जायें। उस पर शेख़ नजदी ने कहा कि यह इक़दाम मुनासिब न होगा , अगर ऐसा किया गया तो उनके क़ौम क़बीले और मानने वाले हमला करके उन्हें निकाल ले जायेंगे और तुम मुँह देखते रह जाओगे। अतबा , शीबा और अबुसुफियान ने कहा कि उन्हें जिला वतन कर देना चाहिये ताकि हमारे ख़ुदाओं के खिलाफ कोई आवाज़ हम तक न पहुँचे। शेख़ नजदी की इस राये से भी इख़तेलाफ़ किया और कहा वह जहाँ भी जायेंगे अपनु कुवते लिसानी से लोगों को अपना हमनवा बना कर तुम्हारे ख़िलाफ उठ खड़े होंगे , फिर न तुम उन्हें रोक सकोगे और न उनका मुक़ाबला कर सकोगे। अबुजहल ने कहा कि मेरी राय यह है कि हर क़बीले से मज़बूत और ताक़तवर जवावन मुनख़तब किये जायें और वह सब मिल कर उन्हें क़त्ल कर दें। इस सूरत में किसी एक क़बीले या एक फर्द को मुलाज़िम क़रार न दिया जा सकेगा बल्कि तमाम क़बाएल उसमें शरीक समझे जायेंगे और बनि हाशिम के इम्कान से यह बाहर होगा कि यह तमाम क़बायले अरब से जंग छेड़े या ख़ून का बदला खून चाहें लेहाज़ा वह क़सास के बजाये दैत पर राज़ी हहो जायेंगे और हम सब मिलकर बड़ी आसानी से दैत अदा कर देंगे। यह राय सबने पसन्द की और शेख़ नजदी ने भी उसे सराहा।

इस क़रार दाद को अमली जामा पहनाने के लिये यह तय किया गया कि सरे शाम आन हज़रत पर कड़ी नज़र रखे ताकि हमले कु सुन गुन पाकर इधऱ उधर न हो जायें और जब अँधेरा छा जाये तो तमाम नौजवान घऱ के अन्दर घुस कर उन्हें क़त्ल कर दें।

इधर कुफ्फारे कुरैश सरवरे कायनात (स.अ.व.व.) के क़त्ल का मनसूबा तैयार कर रहे थे और उधऱ नापाक अज़ाएम से पैग़म्बर (स.अ.व.व.) को बाख़बर कर दिया चुनानचे कुराने मजीद में इरशादे इलाही है किः-

(ऐ रसूल (स.अ.व.व.) ! वह वक़्त याद करो जब कुफ्फार तुम्हारे ख़िलाफ मनसूबा तैयार कर रहे थे कि तुम्हें किसी जगह बन्द कर दें या कत्ल कर डालें या जिला वतन कर दें। वह अपना मनसूबा तैयार कर रहे थे और अल्लाह अपना मनसूबा बना रहा था और अल्लाह से बढ़कर किसी का मनसूबा नहीं हो सकता) (इन्फाल आयत 30)

इब्ने सईद का ब्यान है कि जिबरीले अमीन रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व.) के पास आये और आपको वाकि़ये की इत्तेलाह दी और यह हुक्मे इलाही पहुँचाया कि आज की रात आप अपने बिस्तर पर आराम न फरमायें।

उसके बाद आपने हज़रत अली (अ.स.) को तलब किया और कहा ऐ अली (स.अ.व.व.) ! कुरैश ने यह फैसला किया है कि वह आज की रात मुझे क़त्ल कर दें और मेरे अल्लाह ने मुझे यह हुक्म दिया है कि मैं मक्का छोड़करस मदीने चला जाऊँ और तुम्हें अपने बिस्तर पर सुला दूँ लेहाज़ा तुम मेरी सबज़ चादर ओढ़कर मेरे बिस्तर पर सो जाओ तुम्हें दुश्मनों से महफूज़ रखेगा।

हज़रत अली (अ.स.) ने बजाये इसके कि अपने बारे में मज़ीद इत्मेनान किया हो या यह कहा हो कि आख़िर मेरी जीन भी तो ख़तरे में पड़ जायेगी या किसी और को सुलाने का मशविरा दिया हो या कोई उज़्र व बहाना तलाश किया हो , यह पूछा कि या रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) ! क्या मेरे सोने से आपकी जान बच जायेगी ? फरमाया , हाँ अगर तुम मेरे बिस्तर पर सो जाओ तो मैं मुशरेकीन की गिरफ्त से आज़ाद होकर निकल जाऊँगा। यह सुन कर अली (अ.स.) ने सजदये शुक्र के लिये अपनी पेशानी ज़मीन पर रख दी। इब्ने शहर आशोब माजि़न्दरानी का कहना है कि अली (अ.स.) वह हैं जिन्होंने सबसे पहले सजदये शुक्र अदा किया और सबसे पहले अपना चेहरा ख़ाक पर रखा।

सजदे से सर उठाने के बाद फरमाया , या रसूल अल्लाह! आप हुक्मे इलाही की तामील करें और तशरीफ ले जायें मैं आपके बिस्तर पर सोऊँगा। पैग़म्बरे अकरम (स.अ.व.व.) ने एक मुट्ठी ख़ाक ली और कुफ्फारे कुरैश की आँखों में झोंकते हुए ग़ारे सूर की तरफ इधर रवाना हुये और उधर अली (अ.स.) आपकी चादर ओढ़कर बे खटके उनके बिस्तर पर सो गये। जब ख़ल्लाक़े कायनात ने यह मंज़र देखा तो मलायेका से फरमायाः- तुममें कुछ मेरे बन्दे ऐसे हैं जो मेरी खुशनूदी की ख़ातिर अपनी जान तक बेच देते हैं और ख़ुदा ऐसे बन्दों पर बड़ा ही मेहरबान और शफक़्कत करने वाला है) (अल बक़रा आयत 207)

अल्लामा दयार बकरी लिखते हैः-

(हिजरत की शब जब अली इब्ने अबुतालिब (स.अ.व.व.) बिस्तरे रसूल पर सोये तो अल्लाह ने जिबरील व मीकाईल की तरफ़ वही की कि मैंने तुम दोनों में रिश्तये उख़ूवत क़ायम किया है और एक की ज़िन्दगी दूसरे से दराज़ की है। तुम में कौन है जो अपनी ज़िन्दगी दूसरे को दे दे। ये ख़ामोश रहे तो खु़दा ने फरमाया कि तुम अली (अ.स.) के मिस्ल क्यों न हुए मैंने उन्हें मुहम्मद (स.अ.व.व.) का भाई बनाया वह अपनी जान पर खेल कर मेरे हबीब के बिस्तर पर सो रहे हैं तुम दोनों जाओ और जाकर दुश्मनों से अली (अ.स.) की हिफाज़त करो चुनानचे जिबरील सरहाने और मीकाईल पांयती की जानिब बैठ गये और कहना शुरू किया कि ऐ फ़रज़न्दे आबुतालिब! तु्म्हें मुबारक हो कि अल्लाह आज की रात तुम पर फख़र कर रहा है)

एक तरफ़ तो जिबरईल और मीकाईल की निगरानी और हिफाज़त में शाने बेनियाज़ी के साथ बिस्तरे पैग़म्बर (स.अ.व.व.) पर महवे ख़्वाब थे और दूसरी तरफ़ ख़ुदा का हबीब अपने माबूद की निगरानी में अपनी मंज़िल की तरफ़ बढ़ रहा था।

हुदूदे मक्का से बाहर निकल कर रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) ने यह महसूस किया की जैसे कोई नाक़ा सवार आपका ताअक़्कुब कर रहा है। आपर तेज़ी से आगे बढ़ने लगे तेज़ रफ़्तारी के सबब से आपक पाये अक़दस पहाड़ी इलाक़े की नाहमवार ज़मीन पर पड़े हुये एक पत्थर से इस तरह टकराया कि सारी ऊँगलियाँ लहूलुहान हो गयीं। लेकिन नाक़े सवार का पुर इसरार ताअक़्कुब बराबर जारी रहा। आख़िर कार पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने आते हुए नाक़े सवार को बग़ौर देखा तो अन्दाज़ा हुआ कि शायद अबुबकर हैं। आप ठहर गये। पैग़म्बरी अन्दाज़ा ग़लत नही था , आने वाले हज़रत अबुबकर ही थे। इस अन्देश के तहत कहीं दुश्मनों को ख़बर न हो जाये पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने हजरत अबुबकर को भी अपने साथ ले लिया और मुख़तसर सा सफर तय करके ग़ारे सूरे तक पहुँचे और ब-हुक्मे इलाही उसमें दाख़िल हो गये)

इसके बाद ब - हुक्मे ख़ुदा मकड़ी ने ग़ार के दहने पर जाला तान दिया , कूतरों ने अण्डे दे दिये और बबूल का एक दरख़्त भी रूईदा हो गया ताकि ग़ार के अन्दर पैग़म्बर ( स अ व व .) की मौजूदगी पर दुश्मनों को शक व शुबा न हो सके।

(कुफ़्फ़ारे कुरैश रात भर घर का मुहासिरा किये पड़े रहे और अन्दर झाँक कर जब पैगम़्बर (स.अ.व.व.) की ख़्वाब गाह देखते तो यह समझ कर मुत्मईन हो जाते कि पैग़म्बर (स.अ.व.व.) चादर ओढ़े सो रहे हैं। जब सुबह हुई तो तलवारें सौंत करस अन्दर दाख़िल हुये। हज़रत अली (अ.स.) ने आहट पाकर चादरस उलट दी। चेहरों के रंग उड़ गये। घबराकर पूछा , मुहम्मद (स.अ.व.व.) कहाँ है ?आपने फरमाया कि क्या मेरे सुपुर्द कर गये थे जो मुझसे पूछ रहे हो ? अल्लाह बेहतर जानता है कि वह कहाँ है। कुफ्फार इस जवाब पर नाकाम हो चुके थे और पैगम़्बर (स.अ.व.व.) उनके हाथों से बच कर जा चुके थे।)

(अपनी इस नाकामी के बाद कुफ्फारे कुरैश के मशविरे पर अबुजहल ने यह ऐलान किया कि जो शख़्स मुहम्मद (स.अ.व.व.) का सर काट कर या ज़िन्दा गिरफ्तार कर लायेगा उसे सौ ऊँट इनाम में दिये जायेंगे। यह ऐलान सुन कर बहुत से लोग आन हज़रत (स.अ.व.व.) को तलाश करते हुए इधर उधर निकले। सब तो नाकाम रहे लेकिन सराक़ा इब्ने मालिक नाम का एक शख़्स खोज लगाता हुआ ग़ार तक पहुँचा उसकी आहट पाकर अबुबकर रोने लगे। ऐसे नाज़ुक वक़्त पर अबुबकर का यह गिरया पैग़म्बर (स.अ.व.व.) को क़त्ल करा देने के लिये काफी ता लेकिन जब पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने यह फरमाया कि रोता क्यों है अल्लाह हमारे साथ है तो वह चुप हो गये।)

(यक्कुम रबी अव्वल चौदह बेइस्त को पंजशन्बा की शब में कुफ्फार ने आन हज़रत (स.अ.व.व.) के घर का मुहासेरा किया दो रबी अव्वल यौमे जुमा आग़ाज़े सहर से कुछ पहले आप ग़ारे सूर में फरोक्श हुये और चार रबी अव्वल यकशंबा तक वहाँ क़याम पज़ीर रहे। चौथे दिन हज़रत अली (अ.स.) जब कुफ्फारे कुरैश की तरफ से कुछ मुतमईन हुये तो अब्दुल्लाह बिन अरक़ीत और आमिर बिन फहीरा के हमराह सवारी ले कर रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में हाज़िर हुए और उन्होंने ग़ार से निकल कर मय अबुबकर के मदीने की तरफ रवाना कर दिया। एक हफ़्ते मुसलसल सफ़र की सऊबतें बर्दाश्त करने के बाद बारह रबी अव्वल को आप मदीने पहुँचे और तीन मील के फासले पर बनि अम्र इब्ने औफ की बस्ती क़बा में क़यामक किया)

रसूले अकरम (स.अ.व.व.) की हिजरत के बाद अमीरूल मोमेनीन हज़रत अली (अ.स.) तीन दिन तक मक्के में रहे और जिन लोगों की अमानतें आन हज़रत (स.अ.व.व.) की तहवील में थी उन्हें वापस की और चौथे दिन फात्मा बिन्ते मुहम्मद (स.अ.व.व.) , फात्मा बिन्ते असद फात्मा बिन्ते जुबेर को महमिलों पर सवार करके मदीने की तरफ रवाना हुये। कुरैश को ब यह मालूम हुआ कि अली (अ.स.) भी मक्का छोड़कर जा चुके हैं तो उन्हें अपनी ज़िल्लत का एहसास हुआ और उन्हें रोकने के लिये आठ सवारों का एक दस्ता उनके ताअक़्क़ुबमे रवाना किया ताकि वह उन्हें रास्ता ही में रोक लें और मजबूर करके वापस लायें। जब अली अव मक्के से पच्चीस मील के फासले पर कोहे ज़जनान के क़रीब पहुँचे तो यह लोग भी पहुँच गये। उन लोगों को देख कर आपने औरतों की महमिलें पीछे की जानिब दामने कोह में ठहरा दीं और खुद आगे बढ़कर खड़े हो गये। उन्होंने आपको घेरे में लेकर सख़्त लेहज़े में कहा कि आप मक्के वापस चलें और अगर आप वापसी के लिये तैयार न हुये तो हम ज़बरदस्ती ले जायेंगे। हज़रत ने सुनी अनसुनी कर दी और हिसार तोड़कर आगे बढ़े। हरब बिन उमय्या के गुलाम जेनाह ने तलवार खींच ली और रास्ता रोक कर ख़डा हो गया। असद उल्लाह के तेवर बदले , क़बज़ये शमशीर पर हाथ रका और क़दम आगे बढाया। जेनाह ने हमला किया। आपने उसका वार ख़ाली देकर उसके दो टुकड़े कर दिये। उसके साथियों ने यह मंज़र देखा तो भाग खड़े हुए और जिधर से आये थे उधर ही वापस चले गये

अमीरूल मोमेनीन ने वह रात कोहे ज़जनान के दामन मे बसर की और सुबह होते ही मदीने की तरफ चल दिये। गर्मी का मौसम , बादे समूम के थपेड़े। झेलते हुए रेगज़ारों और तपते हुए सहराओं का पापियादा सफर पैरों में छाले पड़ पड़ के खाल उधड़ गयी थी मगर एक लगन थी जो आगे बढ़ाये लिये जा रही थी एक वलवला था जो खींचे लिये जा रहा था। आख़िर मंजिलें तय करते हुए मुक़ामे क़बा में आन हज़रत (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में बारेयाब हुए। रसूले खुदा (स.अ.व.व.) ने आगे बढ़कर उन्हें सीने से लगाया आँखों में आँसू छलक आये अपने हाथों से जिस्म पर पड़ी हुयी गर्द झाड़ी पैरों के ज़ख्मों में अपना लोआबे दहन लगाया और उन्हें साथ लेकर मदीने में वारिद हुये

मु्फ्ती जाफ़र हुसैन क़िबला फ़रमाते हैं- (हज़रत अली (अ.स.) ने बिस्तरे रसूल (स.अ.व.व.) पर सोकर जिस सरफरोशी व जॉबाज़ी का मुजाहिरा किया वह तारीख़ों मे अपनी मिसाल नहीं रखता। उन्हें पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की ज़बानी मालूम हो चुका था कि कुफ्फारे कुरैश आन हज़रत (स.अ.व.व.) के क़त्ल का फैसला कर चुके हैं और वह आज ही की रात है जिस में वह अपने नापाक इरादों की तकमील करेंगे। ऐसे पुरहौल व पुर ख़तर मौक़े पर जबकि चारों तरफ खून के प्यासों का नरगा था , खिंची हुई तलवारों का घेरा था और हर आन दुश्मनों के हमले आवर होने का अन्देशा था। आप इत्मेनान क़लब और सुकूने ख़ातिर के साथ पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की चादर ओढ़कर उनके बिस्तर पर सो गये। न दुश्मनों के अज़ाएम से ख़ौफ़ज़दा हुये। न तलवारों की चमक से हेरासॉ। न किसी क़िस्म का हुज़्न व करब था न ख़ौफ़ व इज़तराब। अगर कुछ भी खौफ़ व ख़तरा महसूस करतो त समो को बजाये चौकन्ना होकर बैठ जाते या सिर्फ आँखें बन्द करके लेटे रहते। मगर आज की रात अपनी जान से बे नियाज़ होकर तहफ़्फुज़े रिसालत का फ़रीज़ा अदा करना थआ और जागने के बजाये सोकर इत्मेनान बेख़ौफी और अज़्मे जॉसिपारी की झलक दिखाना थी। उन्हें कोई तशवीश थी तो बस यह कि पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की ज़िन्दगी पर आँच न आपने पाये और वह दुश्मनों के नरग़े से निकल कर सही व सालिम मंज़िलें मक़सूद पर पहुँच जायें अपनी जान रहे या जाय।

इस मौक़े पर ---------- अली (अ.स.) बिस्तरे रसूल (स.अ.व.व.) पर न सोते ----------- या बिस्तर छोड़कर किसी गोशे में छुप जाते तो कुफ्फार बिस्तरे रसूल (स.अ.व.व.) को खाली पाकर उसी वक़्त ताअक़्कुब में निकल खड़े होते और ग़ार में पनाह लेने से पहले अपनी गिरफ़्त में ले लेते इसका नतीजा साफ ज़ाहिर है कि या तो पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की ज़िन्दगी ख़त्म कर दी जाती या ज़ाहिरी असबाब की बिना पर हिजरत का इरादा पायए तकमील को न पहुँचता और इस्लाम के नशरो करोग़ की राहें जो हिजरत के नतीजे में खुलीं न खुलती और वह फतुहात जो इस हिजरत के बाद हासिल हुए कभी हासिल न होते। हज़रत अली (अ.स.) ही ने तलवारो के साये में सो कर फ़तेह व नुसरत की राहें हमवार कीं और परचमे इस्लाम की सर बुलन्दी का सामान किया बिला शुबहा इस्लाम का फरोग़ व इस्तेहकामे हिजरत का समरा है और हिजरत की तकमील हज़रत अली (अ.स.) के जान पर खेलने का नतीजा है)

आन हज़रत (स.अ.व.व.) का इस्तेक़बाल

मोअर्रिख़ इब्ने साद का ब्यान है कि मदीने में यह ख़बर आम हो चुकी थी कि सरकारे दो आलम (स.अ.व.व.) मक्के से रवाना होकर यहाँ पहुँचने ही वाले हैं लेहाज़ा आपके इस्तेक़बाल को अहले मदीना बेचैन व मुज़तरिब थे उनका यह हाल था कि सैकड़ों की तादाद में लोग शहर से बाहर निकल कर आ जाते और जब धूप की शिद्दत नाक़ाबिले बर्दाश्त हो जाती तो मायूस होकर लौट जाते।

अल्लामा तबरसी ने लिखा है कि सिर्फ मर्द ही नहीं बल्कि औरतें और बच्चे भी रोज़ाना सुबह घर छोड़ शहर से बाहर निकल जाते और ज़ेरे आसमान आफताब की गर्मी और धूप की शिद्दत के बावजूद खड़े होकर इन्तेज़ार करते। चुनानचे जिस रोज़ हुजूर (स.अ.व.व.) वारिदे मक्का हुये उस दिन भी वहाँ के लोग सुबह से दोपहर तक इन्तेजा़र करने के बाद वापस जाने ही वाले थे कि एक यहूदी ने जो किसी टीले पर खड़ा था पुकार कर कहा , ऐ अहले मदीना! जिसके इन्तेज़ार में तुम लोग बेचैन थे , वह आ गया! यह सुनते ही सब दौड़ पड़े और तकबीर की आवाज़े चारों तरफ गूँजने लगी। इस मौक़े पर अहले मदीना की खुशियों का कोई ठिकाना नहीं था , कनीज़ें और औरतें तक एक दूसरे को मुबारकबाद दे रही थीं और हर ज़बान पर यह कलमा था कि रसूले खुदा (स.अ.व.व.) आ गये। यह वाक़िया 12 रबी अव्वल 14 बेइस्त मुताबिक़ 6 सितम्बर 622 का है।

बैरूने मदीना पहले आप जिसके मकान में फरोकश हुये , उसकने नाम में इख़तेलाफ़ है , बाज़ का कहना है कि क़बीलये बनी अम्र बिन औफ के एक बुजुर्ग कुलसूम इब्ने हदम के मकान में क्याम फरमा हुये और बाज़ का कहना है कि साद इब्ने ख़ेशमा के यहाँ ठहरे। मगर तबरी का कहना है कि आन हज़रत (स.अ.व.व.) कुलसूम बिन हदम ही के मकान पर ठहरे थे लेकिन चूँकि साद की बीवी बच्चे नहीं थे और उनका मकान मर्दाना था इसलिये दिन में आप वहाँ लोगों से मुलाक़ात के लिये तशरीफ ले जाते थे जिसकी वजह से लोगों ने समझा होगा कि आपका क़याम साद बिन ख़ेमशा के यहाँ है।

मस्जिदे क़बा का संगे बुनियाद

कुलसूम बिन हदम के यहाँ सरकारे दो आलम (स.अ.व.व.) का क़याम तक़रीबन दो हफ़्ते रहा। इसी क़याम के दौरान आपने वहाँ एक मस्जिद का संगे बुनियाद रखा जो मस्जिदे क़बा के नाम से मशहूर है इसको ज़ूकिबलातैन और कुवते इस्लाम भी कहते हैं क्योंकि बाज़ रवायात के मुताबिक़ इसी मस्जिद में तबदीले क़िबला का हुक्म आया और इस्लाम को यहीं से कुवत मिली। बाज़ मोअर्रेख़ीन का कहना है कि मदीने आने के बाद हुजूर (स.अ.व.व.) ने सबसे पहले जिस मस्जिद में नमाज़ पढ़ी वह यही है। आपको इस मस्जिद से इतनी मुहब्बत थी कि जब तक हयात रहे हर हफ्ते मदीने से आकर उसमें एक मर्तबा नमाज़ ज़रुर पढ़ते थे। शायद इसी वजह से हदीस में है कि इस मस्जिद में दो रकत नमाज़ का सवाब एक उमरे के बराबर है। (इस मस्जिद का तज़किरा कुरान में मौजूद है।


शहरे मदीनें मे हुजूर (स.अ.व.व.) का दाख़िला

हज़रत अली 0 के बाआफियत पहुँचने के बाद आन हज़रत (स.अ.व.व.) तीन या चार दिन मज़ीद कुलसूम के मकान पर फरोकश रहे इसके बाद मुसल्लेह मुसलमानों के एक बड़डे मजमे के साथ आप शहरे मदीने में दाखि़ल हुये। हर शख़्स की यह तमन्ना थी कि आन हज़रत (स.अ.व.व.) हमारे यहाँ कयाम फरमां हों मगर आपको किसी की ख़ातिर शिकनी कब गवारा थी ? फरमाया , मेरे नाक़े की मेहार छोड़ दो , यह खुदा के हुक्म से मुझे जिसके दरवाज़े पर ले जायेगा वही ठहर जाऊँगा चुनानचे मेहार छोड़ दी गयी , वह चला और आगे बढ़ता रहा यहाँ तक कि उस मुक़ाम पर पहुँचा जहाँ मस्जिदे नबवी है वहाँ आपने नमाज़ अदी की उसके बाद नाक़ा वहाँ से चल कर थोड़ी दूर पर वाक़े अबु अय्यूब अन्सारी के मकान के सामने बैठ गया। वह अपनी क़िस्मत पर नाज़ करते हुये खुशी खुशी आन हज़रत (स.अ.व.व.) को अपने घर ले गये और वहाँ आप क़याम पज़ीर हुये।

मस्जिदे नबवी की तामीर

अबु अय्यूब अन्सारी के मकान से मुतस्सिल जिस ज़मीन पर मस्जिदे नबवी की तामीर अमल में लाई गयी वह अल्लामा तबरसी के क़ौल के मुताबिक़ क़बीले ख़िज़रिज़ के दो यतीम बच्चों की मिलकियत थी और यह दोनों बच्चे असद बिन ज़रारा की तौलियत व केफ़ालत में थे। मगर इब्ने जरीर तबरी का कहना है कि उन दोनों यतीमों का ताल्लुक़ बनी निजार से था और यह मआज़ बिन अफरा के ज़ेरे कफालत थे।

यह ज़मीन , अपने दामन में कुछ खजूर के दरख़्तों और ज़मानये जाहेलियत के मुशरेकीन की कुछ बोसीदा कुहना क़ब्रों को लिये बरसों से उफ़तादा पड़ी हुई थी। और , चूँकि मदीने में उस वक़्त मुसलमानों की नमाज़े जमात के लिये कोई मख़सूस व मुस्तक़िल जगह न थी इसलिये अल्लाह के हबीब (स.अ.व.व.) ने चाहा कि वहाँ एक मस्जिद तामीर हो जाये चुनानचे आपने असहा व अन्सार से फरमाया कि तुम लोग इस ज़मीन के मालिकों से कहो कि वह इसे मेरे हाथ फ़रोख़्त कर दें ताकि मैं यहाँ एक मस्जिद बनवा दूँ। यतीमों से बात की गयी। वह इस शर्त पर राज़ी हुए कि बगै़र क़ीमत उसे हुजूर (स.अ.व.व.) के हक़ में हिबा कर दं मगर आपको यह गवारा न हुआ और आपने उनकी शर्त कुबूल करने से इन्कार किया। बिल आख़िर असद बिन ज़रारा या मेआज़ बिन अफरा के समझाने पर वह बच्चे क़ीमत लेने पर तैयार हुये और सरकारे दो आलम (स.अ.व.व.) ने दस दिरहम की क़ीमत पर उसे ख़रीद लिया।

जब यह मरहला तय होगया तो आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने असहाब से फरमाया कि वह दरख़्तों को काट दें , क़ब्रों को हटा दें , और ज़मीन को हमवार कर दें चुनानचे दरख़्त काट दिये गये , क़ब्रों को बैरून मदीना किसी नामालूम मुक़ाम पर मुन्तक़िल कर दिया गया और ज़मीन हमवार कर दी गयी। इसके बाद मस्जिद का तामीरी महला शुरू हुआ।

मुसलमानों आलम के मुस्निफ मिस्टर ए 0 के 0 हमीद फरमाते हैं किः- सबसे पहला काम जो सरकार (स.अ.व.व.) ने मदीने पहुँचकर कर किया वह मस्जिदे नबवी की तामीर थी , जिसकी दीवारे कच्ची ईंटों से तीन गज़ ऊँची बनायी गयीं , नौ फिट छत डाली गयी और खजूर के तनों से शहतीरों का काम लिया था।)

खान-ए-काबा को अगर यह शरफ है कि इस के मेमार और मज़दूर हज़रत इब्राहीम (अ.स.) ख़लील उल्लाह और उनके फरज़न्द जनाबे इस्माईल अ) थे तो मस्जिद नबवी को भी यह शरफ , फज़ीलत और खुसूसियत हासिल है कि उसकी तामीर में फ़ख़रे अन्बिया हज़रत मुहम्मद (स.अ.व.व.) ने दीगर मुसलमानों के साथ मेमार और मज़दूर दोनों की हैसियत से काम किया। तबरी का कहना हैः-

(मस्जिद की तामीर का काम आपने खुद किया और असहाब व अन्सार व मुजाहरीन ने आपका साथ दिया)

साठ गज़ लम्बी और चव्वन गज़ चौड़ी इस अज़ीम तरीन मस्जिद का संगे बुनियाद रखने के लिये खुदायी के मौक़े पर पहला फावड़ा खुद हुजूर अकरम (स.अ.व.व.) ने अपने दस्ते मुबारक से चलाया।

सरवरे कौनैन (स.अ.व.व.) का यह जज़बये तामीर देखकर , फिर मुसलमानों में यह ताब कहाँ ती कि वह इस सआदत से महरूम रहते , तमाम सहाबा , मुहाजरीन , अन्सार और मोतक़दीन , जिन में बड़े बड़े दौलत मन्दाने क़बाएल और रूसा शामिल थे , सबके सब फावड़े और कुदालें ले कर टूट पडे और बुनियाद खोदने व मिट्टी फेंकने का काम अन्जाम देने लगे। ख़ालिस अक़ीदत और कामिले इरादत का यह हाल था कि जिन नाज़ परवर्दा जिस्मों पर ज़र्री अबायें थीं वह सरसें पाओं तक ख़ाक आलूदा हो गये और जिन सरों पर क़ीमती अमामे थे वह गर्द व गुब्बार से ढ़क गये। इब्ने हष्शाम का कहना है कि इस सआदत से सरफराज़ होने वालों में पहला नम्बर हज़रत अम्मार बिन यासीर का है जिन्होंने सबसे पहले इस मस्जिद की तामीर में हाथ लगाया।

इमाम क़स्तलानी और अल्लामा ज़रक़ानी ने तहरीर फरमाया है किः-

तमाम मुसलमान एक-एक ईंट उठाते थे और अम्मारे यासिर दो-दो ईँट एक अपने हिस्से की और एक हज़रत रसूले ख़ुदा की उठा कर लाते थे , आं हज़रत उनके साथ-साथ होते , उनके जिस्म से गर्दा गुब्बार साफ़ करते और फ़रमाते ऐ अम्मार। तुम्हें मुबारक हो कि सबके लिए एक सवाब और तुम दोहरे सवाब के मुस्तहक़ हो और दुनियां में दूध तुम्हारी आख़री गेज़ा होगी।

इसके बाद ज़रक़ानी रकमतराज़ हैं किः-

बुख़ारी ने अपने बाज़ नुस्खों में और मुस्लिम व तिरमिज़ी वग़ैरा ने बाअसनाद लिखा है कि आप (स.अ.व.व.) ने इस मौक़े पर यह भी फरमाया था कि ऐ अम्मार! इब्ने हष्शाम की तहरीर का खुलासा यह है किः-

आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने फरमाया , अम्मार मेरी आँखों और नाक का दरमियानी हिस्सा है लेकिन उसे एक बाग़ी गिरोह क़त्ल करेगा) 3

मोहद्दस शिराज़ी रौज़तुल अहबाब में रक़म तराज़ हैः-

(हर सहाबी एक ईँट उठाता था और अम्मार दो ईँटे उठाते थे। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने उनके जिस्म से ख़ाक झ़ाड़ते हुए फरमाया कि अम्मार मेरी दोनों आँखों के बराबर है मगर अफसोस कि उसे बाग़ी गिरोह क़त्ल कर देगा। 4

ग़र्ज़ कि तामीर का काम निहायत सरगर्मी , मुस्तैदी और तेज़ी के साथ मुसलसल व मुतावातिर जारी रहा और आक़िरक़ार सात माह में मस्जिद और अज़वाजे रसूल (स.अ.व.व.) के मकानात बन कर तैयार हो गये। तबरी का ब्यान है कि इस से क़बल आन हज़रत (स.अ.व.व.) किसी मुअय्यना जगह पर नमाज़ नहीं पढ़ते थे बल्कि मुख़तलिफ मुक़ामात पर जहाँ नमाज़ का वक़्त आ जाता था वहाँ पढ़ लिया करते थे

अल्लामा शिबली फरमाते हैं किः-

यह मस्जिद हर क़िस्म के तकल्लुफात से बरी और इस्लाम की सादगी की तस्वीर थी। कच्ची ईँटों की दीवारें , बर्ग खुरमें के छप्पर और खजूर के सतून थे। क़िबला बैतुल मुक़द्दस की तरफ रखा गया था लेकिन जब क़िबले की तरफ बदल गया तो शुमाली जानिब एक दरवाज़ा नया क़ायम कर दिया गया। फर्श चूँकि बिल्कुल ख़ाम था , बारिश में कीचड़ हो जाती थी , एक दफा सहाबा नमाज़ के लिये आये तो वह अपने साथ कंकरियाँ लाये और अपनी नशिस्त गाहों पर बिछा लीं आन हजरत (स.अ.व.व.) ने पसन्द फरमाया और संगरेज़ों का फर्श बनवा दिया। मस्जिद के सिरे पर एक मुस्सक़फ़ चबूतरा था जो सफ़ा कहलाता था यह उन लोगों के लिये था जो इस्लाम लाये थे और घरबार नहीं रखते थे

अज़वाज के मकानात ख़ाम ईँटों के थे , उनमें पाँच हुजरे ऐसे भी थे जो सिर्फ़ खजू़र की टट्टियों के बने थे। जो हुजर ईँटों के थे उनकी भी अन्दरूनी हिस्से टट्टियों के थे उनकी तरतीब यह थी कि उम्मे सलमा , उम्मे हबीबा , जवेरिया , मैमूना और ज़ैनब बिन्ते हजश के मकानात अक़ब मे थे और सोदा , सफीया और आय़शा के मकानात मस्जिद के सामने थे।

यह मकानात दस दस हाथ लम्बे और छः छः हाथ चौड़े थे। छत की ऊँचाई इतनी कम थी कि आदमी खड़े होकर छत छू लेता था उन मकानों के दरवाज़ों पर कम्बल का पर्दा पड़ा रहता था और रातों को रौशनी का कोई इन्तेज़ाम नहीं था। आन हज़रत (स.अ.व.व.) के पड़ोस में अबु अय्यूब अन्सारी का , साद बिन अबादा , अम्मार बिन हज़म और साद बिन मआज़ के मकानात थे।

हज़रत उमर ने अपने दौरे हुकूमत में इस मस्जिद को वसी किया मगर साख़्त वही रही , हज़रत उस्मान बिन अफान जब ख़लीफा हुए तो उन्होंने इस में तग़य्युरात पैदा किये और उसे पत्थरों से मुनक़्कश व मुस्तहकम किया वलीद बिन अब्दुल मलिक के दौर में यह मस्जिद और ज़्यादा वसी की गयी और अज़वाजे पैग़म्बर (स.अ.व.व.) के मकानात इस में शामिल कर लिये गये , मामून रशीद ने उसे इस तरह मुज़ैय्यन किया कि उसके सारे ख़ुदा खाल तबलीद हो गये। चुनानचे जब जुनून मिस्री जो मजजूब थे , मदीने आये तो उन्होंने बेताबी की हालत में तमाम शहर की ख़ाक छान डाली मगर उन्हें मस्जिद नवबी न मिली। उनका ख़्याल था कि मस्जिद अपनी असली हालत पर होगी। जब लोगों ने बताया तो कहने लगे , यह तो किसी बादशाह की महल रहां है। मैं वह कच्ची ईँटों वाली मस्जिद ढूँढता हूँ जो दरख्ते खुरमा की लकडियों से आरास्ता थी , जिस पर कंकरियों का फ़र्श था और जिस पर आन हज़रत (स.अ.व.व.) और उनके साथी नमाज़ पढ़ा करते थे और जिसका ज़र्रा ज़र्रा सरकार के जस्मे अतहर से मस हुआ था। यह कहकर रोने लगे। कुछ देर खामोश खड़े रहे और फिर अपनी राह ली।

असहाबे सुफ़्फ़ा

सुफ़्फ़ा- सायेबीन , ऐवान ख़ाना , या उस दालान को कहते हैं जिसकी छत पटी हुई हो। रसूले अकरम (स.अ.व.व.) ने मस्जिद नवबी से मुलहिक़ एक किनारे पर सायेबान तैयार करके मुफ़्लिस , नादार और बेघर असहाब को उसमें आबाद कर दिया था जिनकी तादाद औरतों समें तक़रीबन चार सौ लथी। आन हज़रत (स.अ.व.व.) के पास जब कहीं से सदक़े का खाना वग़ैरा आता तो उनके पास भेज देते औऐर जब दावत का खाना आता तो खुद भी उन लोगों के साथ बैठ कर खाते। आप उन लोगों से बड़ी मुहब्बत और शफ़क़्क़त के साथ पेश आते और इन्तेहाई हुस्ने सुलूक का बरताव रवां रखते थे। जनाबे फ़ात्मा ज़हरा (स.अ.व.व.) ने एक मर्तबा आपसे दरख़्वास्त की कि बाबा जान! चक्की पीसते पीसते मेरे हाथों में छाले पड़ गये हैं अगर मुनासिब हो तो मुझे एक कनीज़ इनायत कर दें। आपने फरमाया बेटी! असहाबे सुफ़फा और उनकी औरतें इफलास के मारे हुए और फाका ज़दा हैं , उनमें से किसी औरत को व तुम्हारी कनीज़ कैसे क़रार दूँ ? बेहतर है कि तुम 34 मर्तबा अल्लाहो अकबर 33 मर्तबा अलहमदो लिल्लाह और 33 मर्तबा सुबहानअल्लाह कह लिया करो यह तुम्हारे हक़ में लौड़ी से कहीं बेहतर है। यह तसबीह ज़हरा (स.अ.व.व.) आज तक जारी है और हर नमाज़ के बाद पढ़ी जाती है।

नमाज़ व ज़कात

रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) के वारिदे मदीने होने के एक माह बाद नमाज़े पँजगाना की 17 रकतें क़रार पायीं जो आज तक जारी व सारी हैं। इससे पहले सिर्फ मग़रिब की नमाज़ में तीन रकतें मुक़र्र थी बाक़ी नमाजें दो-दो रकतों पर तमाम होती थीं। इब्ने खलदून का कहना है कि इसी साल ज़कात भी वाजिब हुई जिसे सदक़ा भी कहते हैं और इसी साल जुमा यौमुल सिबत क़रार पाया।

अज़ान व अक़ामत

मस्जिद नबवी की तामीर व तकमील के बाद पांचो वक़्तों की नमाज़े बाजमात पढ़ी जाने लगीं लेकिन चूँकि एलाने नमाज़ का उस वक़्त कोई बाक़ायदा इन्तेज़ाम नहीं था इसलिये लोग आगे पीछे आया करते थे। जो जिस वक़्त आ गया उसने नमाज़ पढ़ ली जिसका नतीजा यह होता था कि जमात में नमाज़ियों की तादाद बहुत कम होती थी।

इस्लाम ने चूँकि इबादते इलाही के तमाम संजीदा तरीक़ों मे इजतेमा व इत्तेहाद के उसूल को मद्दे नज़र रखा है इसिलये यह परागन्दगी व तफरीक , मिज़ाजे रिसालत पर बार गुज़रती थी और हुजूर (स.अ.व.व.) की नापसन्दगी का बाअस होती थी। इस लिये तमाम मुसलमानों को वक़्त मोअय्ना पर मस्जिद में आने और जमाअत के साथ नमाज़ अदा करने के लिये आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने अज़ान की शक्ल में एलाने आम का तरीक़ा बताया जो पहले ही से मनशाये कुदरत और ईमाये मशीयत के मुताबिक़ तय हो चुका था लेकिन उसका निफाज़ मस्जिद की तकमील तक इलतेवा में था। चुनानचे आपने बिलाल को बुलाया , उन्हें अज़ान के अरकान की तालीम दी और इरशाद फरमाया कि आज स नमाज़ के वक़्त इसी तरह ऐलान किया करो ताकि उसे सुनकर हर मुसलमान मस्जिद में आ जाये। इस मौक़े पर इत्तेफाक़ से सहाबिये रसूल अबदुल्लाह बिन ज़ैद भी मौजूद थे , अज़ान के अरकान सुन कर उन्होंने कहा , या रसूल अल्लाह (स.अ.व.व.) ! चन्द रोज़ पेशतर मैंने ख़्वाब में अज़ान का यही तरीक़ा देखा है।

अल्लामा इब्ने हजर ने फतहुलबरी में लिखा है कि पैग़म्बर (स.अ.व.व.) के सिवा और किसी के ख़्वाब से हुक्मे शरयी साबित नहीं हो सकता। काफी में इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) का इरशाद है कि शबे मेराज , आन हज़रत (स.अ.व.व.) जब बैतुल मामूम में तशरीफ ले गये तो नमाज़ का वक़्त हो चुका था , जिबरील (अ.स.) ने अज़ान दी और इक़ामत की। इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ.स.) से मरवी है कि जब हज़रत जिबरील हुक्मे अज़ान लेकर नाज़िल हुए तो उस वक़्त हज़रत (स.अ.व.व.) का सरे मुबारक हज़रत अली इब्ने अबुतालिब (अ.स.) की आगोश में था , जिबरील ने अज़ान व इक़ामत कही , जब रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) बेदार हुए तो पूछा या अली तुमने भी सुना ? फरमाया हाँ , पूछा कि याद भी कर लिया है ? कहा हाँ ,। फरमाया कि बिलाल को बुलाकर तालीम कर दो , चुनानचे हज़रत अली (अ.स.) ने बिलाल को तरीक़ये अज़ान तालीम फरमाया।

हक़ीक़त सिर्फ इतनी है कि जिबरील के ज़रिये अ़ज़ान व इक़ामत बहुक्मे ख़ुदा , आन हज़रत (स.अ.व.व.) और हजरत अली (अ.स.) तक पहुँची और उन्होंने जनाबे बिलाल को तालमी फरमा दिया लेकिन अफसोस है कि हुकूमते उमवी के हाथों बिके हुए कुछ मोअर्रेख़ीन व मोहद्देसीन ने इस वाकिये को कुछ लोगों के ख्वाब सा ताबीर करके उसे चीसतां बना दिया है। क़स्तलानी का कहना है कि वह वाक़िया सन् 2 हिजरी का है।


हज़रत सलमान फारसी

हज़रत सुलमान फारसी एक ग़रीब किसान के यहाँ असफहान में पैदा हुए थे। ईसाइयों की सोहबत में रह कर उनके ख़्यालात ईसाइयत से मुतासिर हो गये थे लेकिन दिल उसे कुबूल नहीं करता था। चुनानचे हक़ की तलाश में निकले और शाम गये , वहाँ एक अरसे तक छः राहबियों की सोहबत में यके बा दिगरे रहे , जब एक राहिब मरता तो वह उन्हें दूसरे के सुपुर्द कर जाता था , यहाँ तक कि आख़िरी राहिब ने यह बताया कि अब तुम अरब चले जाओ वहाँ नबी आख़िरूल ज़मा (स.अ.व.व.) का ज़हूर हुआ है और उनकी पुश्त पर मोहरे नबूवत है। ग़र्ज़ जनाबे सलमान फारसी एक अमीर क़ाफिले के साथ वादीउल कुरा तक पहुँचे। वहाँ उसने उन्हें एक यहूदी के हाथ फरोख़्त कर दिया। उसने अपने एक रिश्ते के भाई के हाथ बेच डाला वह आपको मदीने ले आया।

जब रसूल (स.अ.व.व.) मक्के से हिजरत करके मदीने में तशरीफ ले आये तो उसी साल माहे जमादुल अव्वल में हुजूर (स.अ.व.व.) की पुश्त मुबारक पर किसी तरह मोहरे नबूवत देखकर ईमान ले आये। उस वक़्त आपकी उम्र ढ़ायी सौ या साढ़े तीन सौ साल की थी। सन् 5 हिजरी में दो ओक़िया सोना देकर आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने आपको उस यहूदी से आज़ाद करा लिया। कहा जाता है कि जनाबे सलमान फ़ारसी , आन हज़रत (स.अ.व.व.) तक पहुँचने से पहले दस जग बिके थे।

जंगे खंदक में ख़ंदक खोद कर लड़ने का तरीक़ा आप ही ने बताया था और ख़ंदक खोदने में सबसे दुगना काम भी किया था। बाद में उमर बिन ख़त्ताब ने अपने दौर में आपको मदाइन का हाकिम बनाया था मगर यह मज़दूरी करके अपनी गुज़र बसर करते थे। मोहताज नवाज़ , फकीर दोस्त और अहले सफ़ा से थे। सन् 35 हिजरी में वफात हुई।

अब्दुल्लाह इब्ने अबीसलूल मुनाफिक़

अब्दुल्लाह इब्ने सलूल नामी सरदार को क़बीलयें ख़िज़रिज के लोग अपना फ़रमारवा बनाना चाहते थे मगर जब आनहज़रत (स.अ.व.व.) वारिदे मदीना हुए तो उन लोगों के ख़्यालात बदल गये।

अब्दुल्लाह एक खुश इख़लाफ़ व वज़नदार इन्सान था। बज़ाहिर पैग़म्बर (स.अ.व.व.) के साथ वह इन्तेहाई अदब व एहतराम और खुश इख़लाक़ी व वज़ादारी से पेश आता था मगर दिल ही दिल में आपसे हसद भी रखता था। उसने कुछ लोगों को अपा हम ख़्याल बना लिया था और कभी कभी उनके साथ मुसलमानों की मजलिसों और नाशिस्तों मे आ जाता था। आन हज़रत (स.अ.व.व.) को जब उशके दरपर्दा हसद और अदावत की ख़बर हुई तो आपने उसका और उसके साथियों का नाम मुनाफ़िक़ रखा। यह लोग एक अरसे तक मदीने में आन हज़रत (स.अ.व.व.) की मुख़ालेफ़त करते रहे। इब्ने ख़लदून का कहना है कि उनके अलावा मुनाफ़िकों के सरदार ख़िज़रिज़ से जद बिन क़ैस , क़बीला ऊस से हरस बिन सुहैल , इबाद बिन हनीफ़ और मरबा बिन क़ीज़ी वग़ैरा भी थे और यहूदियों में से जो बज़ाहिर इस्लाम के हमनवा और उसकी पनाहगाह में थे मगर कुफर में डूबे हुए थे , साद बिन ख़नीस , ज़ैद बिन लसीत , राफे बिन ख़जीमा रफाआ बिन ज़़ैद और कनाना बिन ख़बूरा वग़ैरा थे।

मवाख़ात (भाई-चारा)

हिज़रत के बाद , मदीने में मुहाजिरीन और अनसार बाहम इस तरह घुल मिल गये थे गोया उनके दरमियान वतनी व क़ौमी तफरिक़ा कभी था ही नहीं। उनके रहन सहन और बाहमी तालूक़ात से ऐसा महसूस होता था कि यह सब एक ही कुनबे के अफराद हैं और एक ही खानदान से वाबस्ता हैं। उनका माले मुशतरक , इज़्ज़त व आबरू मुशतरक और दुख सख मुशतरक था और पूरी ज़िन्दगी मुकम्मल इत्तेहाद , यगानिगत और यकजहती का बेमिसाल नमूना थी। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने इस मुहब्बत व उख़ूवत को मज़बूत तर करने के लिये जिस तरह मक्के में मुसलमानों के दरमियान मुवाख़ात क़ायम की थी इसी तरह मदीने में भी मुहाजिरीन और अन्सार के दरमियान भाई चारा क़ायम किया और एक को दूसरे का भाई बनाया ताकि रंग व नसल और क़ैमियत व वतनियत के इम्तेयाज़ात ख़त्म करके उनमें मसावात और बराबरी का एहसास पैदा करे ताकि तालूक़ात की खुशगवारी को क़ायम रखते हुए वह एक दूसरे के दुख दर्द में शरीक हों। मुहब्बत व ईसार के तकाज़ों पर अमल करें और इत्तेहाद यकजहती का नमूना क़रार पायें।

हुक्मा के नज़दीक उख़ूवत के रवाबित इत्तेहाद पसन्द अफराद में ही मुसतहकम हो सकते हैं और अगर मिज़ाज़ों में इ्त्तेहाद पसन्द अफराद में ही मुस्तहकम हो सकते हैं और अगर मिज़ाज़ों में इत्तेहाद पसन्दी न हो तो वक्ती तौर पर किसी ग़र्ज़ या मसलहत की बिना पर उख़ूवत का रिश्ता जोड़ा भी जाये तो उसमें दवाम व इस्तेहकाम पैदा नहीं हो सकता। पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) ने इसी इत्तेहाद पसन्दी और मिज़ाज की यकरंगी पर उख़ूवत की बुनियाद रखी और बाहमी रिश्ते क़ायम करने से पहले मुख़तलिफ़ अफ़राद के तबई रूझान व ज़ेहनी मिलान का जाएज़ा ले लिया होगा और जिन दो फरदों के एख़लाक़ व आदात में मुमासिलत देखी उन्हें आपस में एक दूसरे का भाई बनाया होगा चुनानचे मक्के में आपने अबुबकर व उमर के दरमियान उसमान और अब्दुल रहमान इब्ने औफ़ के दरमियान , और तलहा व जुबैर के दरमियान भाई चारा क़ायम किया। उनकी हम आहंगी व यकरंगी खिलाफ़त शूरा और जमल के वाक़ियात से नुमायां व आशकार है। इसी तरह मदीने में ज़हनी व तबयी रूझानात को देखते हुए हज़रत अबुबकर को ख़ारज़ा बिन ज़ैद का , हज़रत उमर को अतबान इब्ने मालिक का , हज़रत उसमान को ऊस इब्ने साबित का , अबुअबीदा को साद इब्ने मुआज़ का , अब्दुल रहमान इब्ने औफ को साद इब्ने रबिया का , जुबैर को सलमा इब्ने सलामा का , तलहा को काब इब्ने मालिक का , अम्मार यासीर को क़ैस इब्ने साबित का और सलमान फारसी को अबुदर्दा का भाई क़रार दिया। ग़र्ज़ उफ़तादे तबआ के लिहाज़ से जो जिससे मेल खाता नज़र आया उसे उसका भाई बनाया और जो पचास अन्सार के दरमियान रिश्तये उख़ूवत क़ायम किया उन्हें भाईचारे के मज़बूत बन्धनों से जोड़ा! मगर ऐसा कोई शख़्स नज़र न आया जिससे हज़रत अली (अ.स.) का रिश्तये अखूत जोड़ा जाता। और किसी के साथ यह रिश्ता जोड़ा भी नहीं जा सकता था , इसलिये कि दावते जुलअशीरा के क़ौल व क़रार की रू से अली (अ.स.) पैगम्बर (स.अ.व.व.) के भाई क़रार पा चुके थे। फिर फी आपने इस अहदे उखूवत की तजदीद के लिये जिस तरह मक्के में सिलसिलए उख़ूवत क़ायम करते हुए उन्हें अपना भाई क़रार दिया था , मदीने में भी अली (अ.स.) ही के शरफे उख़ूवत से सरफ़राज़ फरमाया।

अल्लामा अब्दुल बर तहरीर फरमाते हैः-

(रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) ने एक दफा मुहाजरीन के दरमियान भाई चारा क़ायम किया और दूसरी दफा मुहाजरीन व अन्सार में और दोनों मर्तबा अली (अ.स.) से फरमाया कि तुम दुनिया व आख़रत में मेरे भाई हो।)

इस उख़ूवत से मुराद आम इस्लामी उख़ूवत हरगिज़ नहीं है जो आयए इनमल मोमेनीन उख़ूवतुन (अहले ईमान आपस में भाई भाई) की रू से सभी अहले ईमान को हासिल थी बल्कि ऐसी उख़ूवत मुराद है जो अवामी उख़ूवत की सतह से बुलन्द तर और इन्तेहाई कुरबत व वाबस्तगी की आईनदार है। अगर उससे आम अखूत मुराद होती तो मोमिन होने के एतबार से हज़रत अली (अ.स.) को पहले ही से हासिल थी और उसके साथ ही इब्ने अम होने की वजह से नसली उख़ूवत भी हासिल थी फिर इस मुज़ाहिरए उख़ूवत की ज़रूरत ही क्या थी ? कोई वजह न थी कि हज़रत अली (अ.स.) शुरू में उख़ूवत के लिये मुन्तख़ब न होने पर आज़रदा ख़ातिर होते और पैगम़्बर (स.अ.व.व.) से गिला करते। चुनानचे आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने सहाबा को जब एक दूसरे का भाई बनाया और अली (अ.स.) को अखूत के लिए मुन्तख़ब न फरमाया तो हज़रत के दिल को ठेस लगी और आँखों में आँसू लिये हुए पैगम्बर (स.अ.व.व.) की ख़िदम में हाज़िर हुए और अर्ज़ की कि या रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) ! आपने मुहाजरीन व अन्सार को एक दूसरे का भाई बनाया है मगर मुझे नज़र अन्दाज़ कर दिया है और किसी उख़ूवत के क़ाबिल मसझा ही नहीं। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने यह शिकवा सुना तो अली (अ.स.) को गले से लगाया और फरमाया , (ऐ अली तुम दुनिया में भी मेरे भाई हो और आख़रत में भी)

इस उख़ूवत ने न सिर्फ अखूत पर जेला की बल्कि तमाम मुहाजरीन व अन्सार के मुक़ाबले में हज़रत अली 0 (अ.स.) की फज़ीलत व बरतरी और इख़लाक़ व किरदार में पैग़म्बर (स.अ.व.व.) से मुमासिलत को भी वाज़े कर दिया। इसलिये कि ये इन्तेख़ाब इशका सुबूत है कि सिर्फ अली (अ.स.) ही आन हज़रत (स.अ.व.व.) के सिफात के आईनादार और शरफ़े उख़ूवत के सज़ावार थे और उनके अलावा कोई दूसरा इस उख़ूवत का अहल न था। अगर होता तो पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की नज़र उस पर पड़़ती इस लिये कि इस इन्तेख़ाब का ताल्लुक नस्बी क़राबत से नहीं है बल्कि सिफात , अलम और किरदार से है। शायद यही वजह थी कि हज़रत अळी (अ.स.) मिम्बर से फरमाया करते थे कि (मैं अल्लाह का बन्दा और उसके रसूल (स.अ.व.व.) का भाई हूँ)

यहूदियों से मुहायिदा

मदीने में यहूदियों के मुख़तलिफ़ क़बीले मुद्दतों से आबाद थे जिमें बनि क़ीनक़ा बनी कुरेज़ा ख़रीज़ला और बनि नज़ीर मुम्ताज़ और नुमाया हैसियत के मालिक थे। यह लोग क़दीम आसमानी किताबों के मुन्दरजात पर यकीन रखते थे और इसी बिना पर पैग़म्बर आख़रूल ज़मा (स.अ.व.व.) के आने की पेशिन्गोई करते थे।

रसूले अकरम (स.अ.व.व.) जब मदीने में तशरीफ लाये और आपकी कुव्वत व ताक़त बढ़ना शुरू होई तो उन यहूदियों के पेशवाओं को अपना इक़तेदार ख़तरे में दिखाई देने लगा इस लिये वह इस्लाम कुबूल करने पर आमादा न हुए। उन्होंने तय किया कि अपने मज़हब पर कायम रहते हुए पैग़म्बरे इस्लाम से ऐसा मुहायिदा कर लें जिससे उनका मौकफ़ और जान व माल महफूज हो जाये और मुस्तक़बिल में किसी ख़तरे का अन्देशा न रहे।

चुनानचे बक़ौल अल्लामा तबरसी उनका एक बफ़द आन हज़रत (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में हाज़िर हुआ और उसने कहा कि सरदस्त हम आपसे मुहायिदा करना चाहते हैं जिसके शरायत यह होंगे कि हम लोग किसी जंग मे न आपकी हिमायत करेंगे और मुख़ालेफ़त। हम किसी जंग में न आपको मदद देंगे और न आप के खिलाफ किसी की इमदाद करेंगे। हम आपके असहाब में किसी से कोई ताअरूज़ करेंगे और न यह चाहेंगे कि आप या आपके असहाब हम से या हमारी क़ौम के किसी आदमी से ताअरूज़ करें।

ग़र्ज़ कि हज़रत रसूले खुदा (स.अ.व.व.) ने उन्हीं शरायत की रौशनी में उनसे इस शर्त के साथ मुहायिदा किया कि अगर उन्होंने इस अहद नामों की कोई ख़िलाफवर्ज़ी की तो हम उनकी जान व माल के ज़िम्मेदार नहीं होंगे। यहूद के तीनों मुम्ताज़ क़बीलों में हर क़बीले के लिये एक एक दस्तावेज़ लिखी गयी जिसकी तहरीर के वक़्त बनि नज़ीर से हयी बनि अखतब , बनि कुरैज़ा से काब बिन असीद और क़बीला बनि क़ीनक़ा से मख़रीफ़ जो उन में सबसे ज़्यादा मालदार थे , मौजूद थे।

क़दीम व मुस्तनिद आलम अली बिन इब्राहीम बिन हाशिम ने इस तारीख़ी मुहायिदे की शराएत को बड़ी तफसील के साथ वाज़ेह फरमाया है जिसका खुलासा हस्बजैल है।

(1) यह मुहायिदा मुहम्मद (स.अ.व.व.) और उन दीगर अक़वाम के दरमियान है जो मुसलमानों से कारोबार करते हैं।

(2) बनि औफ के यहूदियों को मुसलमानों में शुमार किया जायेगा।

(3) अगर कोई बैरूनी दुश्मन इस मुहायिदे में शरीक होने वाली क़ौमों पर हमला आवर होगा तो सब मिल कर इस का दिफा करेंगे।

(4) इस मुहायिदे में शरीक होने वाली क़ौमें , समाजी व इक़तेसादी मुआमलात में एक दूसरे की मोईन व मददगार रहेंगी।

(5) ग़ैर मुहायदीन के मुक़ाबले में मुहायेदीन की एक अलाहिदा जमाअत शुमार होगी।

(6) मुहाजरीने कुरैश अपने मुजरिमों की जानिब से दैत की अदायगी के जिम्मेदार होंगे। अपने क़ैदियों को खुद ही फिदया देकर छुड़ायेंगे और यह काम उसूल व इन्साफ के तहत होगा।

(7) बनि हारिस , बनि सोयदा , बनि औफ , बनि जशम , बनि नज्जार , बनि अम्र बिन नबीत और बनि ऊस अपनी जमाअत के ख़ुद ज़िम्मेदार होंगे और हस्बे साबिक़ अपनी अपनी दैयत बाहम मिल कर अदा करेंगे। अपने क़ैदियों को फिदया देकरस आज़ाद करायेंगे।

(8) कोई मुसलमान किसी दूसरे मुसलमान के आज़ाद करदा गुलाम की मुख़ालिफ़त नहीं करेगा।

(9) मुसलमानों पर फ़र्ज़ होगा कि वह हर ऐसे शख़्स की बिल ऐलान मुख़ालिफत करे जो फितना व फसाद बरपा करता हो , ख़ल्क़े ख़ुदा को सताता हो , सरकशी इख़तेयार करता हो और दूसरों की जायदाद या माल ग़सब करना चाहता हो। ऐसे शख़्स को सज़ा देने में तमाम मुसलमान आपस में मुत्तफिक़ व मुत्ताहिद रहेंगे ख़्वाह वह शख़्स उनमें से किसी का फरज़न्द ही क्यों न हो ?

(10) किसी मुसलमान को यह हक़ न होगी कि वह किसी मुसलमान को किसी महारिब (लड़ने वाले) के बदले में क़त्ल करें या किसी मुसलमान के मुक़ाबिले में किसी महारिब की मदद करे।

(11) अगर कोई मुसलमान किसी मुसलमान को पनाह देगा तो उसकी पाबन्दी तमाम मुसलमानों पर लाज़मी होगी ख्वाह पनाह देने वालों अदना दर्जा का मुसलमान क्यों न हो।

(12) जिन यहूदियों ने हमारे साथ मुहायिदा किया है उनके मुतालिक मुसलमानों पर वाजिब है कि उनके साथ भाई चारे का बरताव करें उन पर जुल्म न करें बल्कि उनकी मदद करें।

(13) जब अल्लाह की राह में जंह हो तो कोई मुसलमान दूसरे मुसलमान को छोड़कर दुश्मन से उस वक़्त तक सुलह नहीं करेगा जब तक वह सुलह तमाम मुसलमानों के लिये क़ाबिले कुबूल न हो।

(14) जो मुसलमान जेहाद फि सबीलिल्लाह में शहीद होंगे उनके पसमुन्देगान की किफालत तमाम मुसलमानों पर वाजिब होगी।

(15) इस मुहायिदे के तहत यहूदियों पर लाज़िम होगी कि वह जंग की हालत में जब कि मुसलमान बरसरे पैकार हों उनकी माली इमदाद करें।

(16) मुहायेदीन में कोई शख़्स मुहम्मद (स.अ.व.व.) की इज़ाज़त के बगै़र फौजी इक़दाम नहीं करेगा।

(17) किसी ज़र्ब या ज़ख्म का बदला लेने में कोई रुकावट नहीं डाली जायेगी और जो अहद शिकनी करेगा वह सज़ा का मुस्तहक होगा।

(18) पहाड़ों से घिरा हुआ यसरब का मैदान मुहायेदीन के लिये हरम के मुतरादिफ होगा।

(19) अहले मुहायिदा में अगर कोई हादिसा या इख़्तेलाफ़ रुनूमा हो जिसकी वजह से नक़्से अमन का सन्देशा हो तो उसके फैसले के लिये ख़ुदा और उसके रसूल (स.अ.व.व.) से रुजू किया जायेगा।

(20) यसरब पर हमले की सूरत में हम जमाअत को इस हिस्से की मदाफियत करना होगी जो इसके बिलमुक़ाबिल होगा।

(21) मुहायेदीन में कोई जमाअत इस मुहायिदे की ख़िलाफवर्ज़ी नहीं करेगी।

यह मुहायिदा दुनिया का सबसे पहला दस्तूरे इत्तेहाद और सहीफ़ए अमन था जो ताजदारे यसरब व बतहा हज़रत मुहम्मद मुस्तफा (स.अ.व.व.) की हिक्मते अम्ली से मुर्त्तब हुआ और सन् 2 हिजरी में इसका निफाज़ अमल में आया।

हज़रत फ़ात्मा ज़हरा सलवातुल्लाह अलैहा का अक़द सन् 2 हिजरी

हज़रत फात्मा ज़हरा (स.अ.व.व.) जनाबे ख़दीजतुल कुबरा के बतन से पैग़म्बर इस्लाम (स.अ.व.व.) की अज़ीज़ तरीन और इक़लौती साहबज़ादी थी। बेइस्त के पाँचवे साल मक्के में विलादत हुई और अभी पाँच बरस का सिन था कि माँ का साया सर से उठ गया और आपकी परवरिश व परदाख़्त की तन्हा ज़िम्मेदारी पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) पर आ पड़ी। आप शब व रोज़ की मसरूफियातों के बावजूद इस गौहरे असमत व तहारत की देख भाल भी करते और तालीम व तरबियत पर भी पूरी तवज्जों फरमाते।

आपने अपनी इल्मी व अम्ली तालिमात से मासूमा (स.अ.व.व.) के फितरी जौहर को इस तरह निखारा कि कमसिनी में ही ज़नानें आलम के लिये नमूनये अम्ल क़रार पायीं। अगर आप एक तरफ शक्ल व सूरत में पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की तस्वीर थीं तो दूसरी तरफ़ उनके महासिन व कमालात का भी कामिल तरीन मुर्रक़ा थीं। अगर चलती थीं तो पैग़म्बर (स.अ.व.व.) के चलने का शुबा होता था और बोलती थीं तो हामिले वही के बोलने का धोका होता था

जनाबे फात्मा ज़हरा (स.अ.व.व.) दामने रिसालत में परवरिश पाकर उस मर्तबे आलिया पर फायज़ हुई कि पैग़म्बर (स.अ.व.व.) उन्हें उम्मे अबीहा , अदीला मरियम और सय्यदतुल निसाइल आलामीन के लक़ब से याद फरमाते थे। और जब पैग़म्बरे अकरम (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में हाज़िर होती तो आन हज़रत (स.अ.व.व.) बे साख़्ता ताज़ीम के लिये खड़े हो जाते। हज़रत आयशा फरमाती हैं कि जब जनाबे फात्मा (स.अ.व.व.) रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व.) के पास आती तो आन हज़रत (स.अ.व.व.) खड़े हो जाते , बोसा देते , खुश आमद कहते और हाथ थाम कर उन्हें अपनी मसनद पर बिठाते। 1

मदीन-ए-मुनव्वरा में वरूद के बाद जब जनाबे सैय्यदा (स.अ.व.व.) सिने बलूग़ को पहुँची तो कुरैश के सरकिरदा अफराद की तरफ से ख़्वास्तगारी के पैग़ाम आने लगे मगर आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने कुछ लोगों के पैग़ाम पर मुँह फेर लिया और साफ जवाब दे दिया। और कुछ लोगों से फरमाया कि फात्मा का मुआमला अल्लाह के हाथ में है वह जहाँ चाहेगा निस्बत ठहरा देगा।

जब रसूल (स.अ.व.व.) की तरफ से किसी को हिम्मत अफज़ा जवाब न मिला तो बाज़ सहाबा ने हज़रत अली (अ.स.) को मशविरा दिया कि आप पैग़म्बर (स.अ.व.व.) के भाई और क़रीब तीन अज़ीज़ हैं आपका खून और खानदान एक है आप भी पैग़ाम दीजिये। कोई वजह नहीं कि आपकी दरख़्वास्त पर पैग़म्बर (स.अ.व.व.) इन्कार करें। फरमाया कि मुझे आन हज़रत (स.अ.व.व.) से अर्ज़ करते हुए हिजाब महसूस होता है। उन लोगों ने इसरार किया तो कहा , अच्छा किसी मुनासिब मौक़े पर आन हज़रत (स.अ.व.व.) से अर्ज़ करूँगा। चुनानचे एक दिन ज़रुरी कामों से फारिग़ होकर आन हज़रत (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में हाजि़र हुए और एक गोशे में सर झुकाकर बैठ गये। पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने आपको ख़ामोश देखा तो समझ गये कि इस ख़ामोशी में कोई अर्जदाश्त छुपी हुई है। फरमाया , ऐ अली (अ.स.) ! कुछ कहना चाहते हो ? अर्ज़ किया हाँ। फरमाया कि फिर कहो। अली (अ.स.) के चेहरे पर शर्म की सुर्खी दौड़ गयी। निगाहों को नीचा करके दबी ज़बान में कहा , या रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) आपने बचपन से मुझे पाला पोसा है मुझ पर आपके एहसानात मेरे माँ बाप से भी बढ़ कर हैं , आब मे मज़ीद एहसान का उम्मीदवार होकर हाज़िर हुआ हूँ। ये सुन कर पैग़म्बर (स.अ.व.व.) के चेहरे पर मुसर्रत व शादमानी की लहर दौड़ गयी। फरमाया , कुछ देर ठहरो में अभी आता हूँ। यह कह कर घर के अन्दर तशरीफ ले गये और फात्मा ज़हरा (स.अ.व.व.) से कहा , बेटी! अली (अ.स.) रिश्ते की दरख़्वास्त ले कर आये हैं , तुम्हारी क्या मर्ज़ी है ? फ़ात्मा (स.अ.व.व.) सर झुकाये ख़ामोश बैठी रहीं और कोई जवाब न दिया। पैग़म्बर (स.अ.व.व.) समझ गये कि ये ख़ामोशी इज़हारे रज़ामन्दी है। और फिर वापस आकर हज़रत अली (अ.स.) से फरमाया कि हाँ ऐसा ही होगी। अब तुम ज़रे मेहर का इन्तेज़ाम करो। हज़रत अली (अ.स.) ने कहा या रसूल उल्लाह! मेरे पास ज़ेरह तलवार और एक ऊँट के अलावा कुछ नहीं है। फरमाया , तलवार और ऊँट रहने दो , ज़िरा फ़रोख़्त कर डालो। आपने वह ज़ेरह हज़रत उसमान का हाथ चार सौ अस्सी दिरहम में फरोख़्त कर दी और उस रक़म से बतौरे मेहर आन हज़रत (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में पेश कर दिया। आपने उन दिरहमों में से कुछ दिरहम , हज़रत अबुबकर को दिये और अम्मार यासीर व चन्द सहाबा को उनके हमराह किया ताकि वह घर गिरस्ती का कुछ सामान खरीद लायें और कुछ दिरहम बिलाल को दिये और फरमाया कि इस रक़म से खुशबू का सामान यानि इत्र वग़ैरा खरीद लाओ।

माहे ज़ीक़ाद सन् 2 हिजरी को मस्जिदे नबूवी में महफिले अक़द आरास्ता हुई। तमाम सहाबा ने शिरकत की। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने खुतबा पढ़ा , फसाहत की कलियाँ चिटकीं , बलाग़त के फूल खिले और तरफ़ैन से ईजाब व कुबूल हुआ और यह मुबारक तक़रीबे इन्तेहाई सादगी के साथ आन हज़रत (स.अ.व.व.) की दुआए ख़ैर व बरकत पर ख़त्म हुई।

पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने दावते वलीमे के सिलसिले में गोश्त और रोटियों का इन्तेज़ाम किया और अली (अ.स.) ने रौग़न और खजूरें मोहय्या कीं। दावत का एळाने आम था सब मुहाजिर व अन्सार शरीक हुए , ज़न व मर्द ने शिकम सेर होकर खाना खाया।

सरवरे दो आलम (स.अ.व.व.) की दुख़्तर और सरज़मीने हिजाज़ की मुतमौवल तरीन ख़ातून जनाबे ख़दीजा (स.अ.व.व.) की बेटी को जो जहेज़ दिया गया वह एक पैराहन , एक ओढ़नी , एक चादर , खजूर की रस्सी से बनी हुई एक चार पाई , दो तोशकें , एक में ऊन एक में खजूर की छाल भरी थी। चमज़े के चार तकिये। एक चटाई एक चक्की , एक मशकीज़ा , एक घड़ा , चन्द मिट्टी के प्याले और एक लगन पर मुश्तमिल था जिन की मजमूयी क़ीमत उसी दिरहम थी। जब आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने अपनी अज़ीज़ बेटी के जहेज़ को देखा तो आँख में आँसू आ गये। एक एक चीज़ को उलटा , पलटा और आसमान की तरफ से उठा कर फरमाया कि खुदाया , इन लोगों को बरकत दे जिनके बरतन ज़्यादा मिट्टी के होते हैं।

जब दिन ने अपना दामन समेटा , रात ने सियाह पर्दे आवेज़ा किये , अक़द परवीन ने जबीं ने फलक पर अफशों चुनी और मश्शातए फितरत ने ऊरूसे सिपहर को सितारों से आरास्ता किया तो पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने जनाबे फात्मा ज़हरा (स.अ.व.व.) को अपने ख़च्चरे शहबा पर सवार किया। तकबीर की आवाज़ों से मदीने की फज़ायें गूँज उठी। हर तरफ से मुबारक सलामत और ख़ैरो बरकत की सदायें बुलन्द हुई , तहमीद व तक़दीस के नग़में दरो दीवार से टकराये अन्सार व मुहाजिरीन की औरतें रजज़ ख़्वानी करती हुई साथ साथ , सलमान फारसी लजाम थामे हुए आगे आगे और पैग़म्बर (स.अ.व.व.) और तमाम बनि हाशिम तलवारें बुलन्द किये हुए पीछे पीछे। इस शानो शौकत से यह जुलूस रवाना हुआ और मस्जिद नबवी का तवाफ़ करके मंज़िले मक़सूद पर पहुँचा। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने बेटी का हाथ पकड़ कर अली (अ.स.) के हाथ में दिया और फरमाया , तुम्हें दुख़्तरे रसूल मुबारक हो फिर पानी का एक प्याला तलब किया और अली (अ.स.) व फात्मा (स.अ.व.व.) के सर व सीनें पर छिड़का और फरमाया , परवरदिगार इन दोनों को बरकत दे और इनकी नसल व औलाद में भी बरकत अता कर।

यह रिश्तये अज़वाज इस लिहाज़ से बड़ी अहमियत रखता है कि एक तरफ उससे नसले पैग़म्बर (स.अ.व.व.) का सिलसिला क़ायम रहा और दूसरी तरफ़ उन दुश्मनाने दीन की रूसियाही का सामान हुआ। जिन्होंने आन हज़रत (स.अ.व.व.) को बे औलाद का ख़िताब दे रखा था अगर चे पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की नरीना औलादें ज़िन्दा न रहीं मगर हसन (अ.स.) हुसैन (अ.स.) फरज़न्दाने दुख़्तर होने के एतबार से अबनाये रसूल (स.अ.व.व.) क़रार पाये और उन्हीं दोनों से आपकी नस्ल फूली , फली और चली नीज़ दुनिया के गोशे गोशे में जुर्रियते रसूल (स.अ.व.व.) कहलाई चुनानचे आन हज़रत (स.अ.व.व.) का इरशाद है किः

खुदावन्दे आलम ने हर नबी की जुर्रियत को उसके सुल्ब में क़रार दिया और मेरी जुर्रियत को अली इब्ने अबुतालिब (स.अ.व.व.) के सुल्म में रखा। 1

औलादे सुल्बी हो या दुख़तरी , दोनों औलाद का दर्जा रखती हैं। औलाद दुख़्तरी को औलाद न समझना ज़मानये जाहेलियत के ग़लत नज़रियात की पैदावार है। इस दौर में बाज़ अफराद इसको बर्दाश्त ही न कर सकते थे कि वह अपनी लड़कियों का अज़वाजी रिश्ता क़ायम करकते उन्हें दूसरों की कनीज़ी में दे दें यहाँ तक कि बाज़ क़बायल में लड़कियों को जि़न्दा दफ़्न कर देना इज़्ज़त का मेयार क़रार पा चुका था और जिन क़बायल में लड़कियाँ हलाक़त से बच कर ब्याही जाती थीं उनकी औलाद को औलाद नहीं समझा जाता था।

पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) ने बेटी के बेटों को अपना फरज़न्द क़रार देकर दौरे जाहेलियत की ग़ल्त ज़ेहनियत पर कारी ज़र्ब लगाई और इस हक़ीकत को अमलन नुमायाँ किया कि जिस तरह बेटे की औलाद , औलाद होती है उसी तरह बेटी की औलाद भी औलाद है और निस्बते मादरी भी एतबार के इसी दर्जे पर है जिस दर्जे पर निस्बते पेदरी है चुनानचे पैग़म्बर (स.अ.व.व.) जब भी फरज़न्दाने ज़हरा (स.अ.व.व.) का ज़िक्र करते तो उन्हें बेटा कह कर याद करसते और हसनैन (अ.स.) भी उन्हें बाप कह कर ख़िताब करते और अमीरूल मोमेनीन को बाप के बजाये (अबुल हसन) कह कर पुकारते अलबत्ता वफाते पैग़म्बर (स.अ.व.व.) के बाद उन्हें बाप कह कर पुकारना शुरा किया और अमीरूल मोमेनीन भी उन्हें औलादे फात्मा (स.अ.व.व.) होने की बिना पर फरज़न्दे रसूल समझते थे चुनानचे जंगे सिफ्फ़ीन में जब ईमामे हसन (अ.स.) क़ेताल के लिये बढ़े तो आपने फरमाया-

मेरी तरफ़ से इस जवान को रोक लो कि इसकी मौत मुझे ख़स्ता व बे हाल न कर दे क्योंकि मैं उन दोनों नौजवान (हसन (अ.स.) और हुसैन (अ.स.) ) को मौत के मुँह में देने से इसलिए गुरेज़ करता हूँ कि कहीं उनके मरने से रसूल (स.अ.व.व.) की नस्ल न क़ता हो जाये।

मुहम्मद बिन तलहा शाफई ने मतालिबुल सऊल में तहरीर किया है कि हज्जाज बिन यूसुफ सक़फी को जब यह मालूम हुआ कि आमिर शबी हसन (अ.स.) व हूसैन (अ.स.) का जब ज़िक्र करते हैं तो उन्हें फरज़न्दाने रसूल कह कर याद करते हैं। हज्जाज इस पर बर अफ़रोख़्ता हुआ और उन्हें बाज़ पुर्स के लिये तलब किया। जब शबी उस के यहाँ पहुँचे तो देखा कि मजलिस में कूफे व बसरे के ओलमा व ऐयान जमा हैं। हज्जाज ने शोबी से मुख़ातिब होकर कहा , मैंने सुना है कि तुम हसन (अ.स.) और हुसैन (अ.स.) को फरज़न्दानें रसूल कहते हो हालाँकि वह उनके बेटे न थे बल्कि उनकी बेटी फात्मा (स.अ.व.व.) के बेटे थे और बेटी से सिलसिलए निस्बत नहीं चला करता। शेबी कुछ देर खोमोश रहे और फिर कुरान मजीद की इस आयत की तिलावत कीः-

वमिन जुर्रियते दाऊद व सुलेमान व अय्यूब व युसूफ व मूसा व हारून कज़ालेका नजज़िल मोहसनीन व ज़करिया व यहया व ईसा व इल्यास कुल मिनल सालेहीन-------------------

और इब्राहीम की नस्ल में दाऊद व सुलेमान व अय्यूब व युसूफ , मूसा और हारून को भी हिदायत की और हम यूँ ही नेकू कारों को सिला देते हैं और जक़रिया , यहया , ईसा और इल्यास को हिदायत की यह सब ख़ुदा के नेक बन्दों में से शामिल थे

इस आयत की तिलावत के बाद कहा कि इस में हज़रत ईसा (स.अ.व.व.) को भी जुर्रियते इब्राहीम में शुमार किया गया है और यह इस वजह से कि वह मादरी सिलसिला से उन तक मुनतही होते हैं। जब मरियम बिन्ते इमरान की निस्बत से हज़रत ईसा (स.अ.व.व.) को जुर्रियते इब्राहीम (अ.स.) में शुमार किया जा सकता है तो फात्मा (स.अ.व.व.) बिन्ते रसूल (स.अ.व.व.) की निस्बत से हसन (अ.स.) हुसैन (अ.स.) को जुर्रियते रसूल में क्यों नहीं समझा जा सकता जबकि सूरत यह है कि जनाबे मरियम और हज़रत इब्राहीम अ) में तीन पुश्तों का फासला है और फ़ात्मा व रसूल (स.अ.व.व.) में कोई फ़ासला हायल नहीं है। यह सुन करस हज्जाज से कोई जवाब न बन पड़ा और वह ख़ामोश हो गया।


तहवीले क़िबला सन् 2 हिजरी

दुनिया की हर क़ौम , हर गिरोह और हर मज़हब का एक इन्तियाज़ी शेआर होता है जिसके बग़ैर उस क़ौम की मुस्तक़िल हस्ती नहीं क़ायम रह सकती। इसलाम ने यह शेआर नमाज़ के क़िबले को क़रार दिया है। जो असल मक़सद के अलावा और बहुत से एहकाम व असरार का जामा है। इस्लाम का खुसूसी और नुमाया वस्फ़ , मसावात , जमहूरियत और अम्ल है यानि तमाम मुसलमान यकसां और मुत्ताहिद नज़र आयें। मज़हबे इस्लाम का रूकने आज़म नमाज़ है जिससे रोज़ाना पाँच वक़्त साबक़ा पड़ता रहता है नमाज़ की असली सूरत यह है कि जमाअत के साथ अदा की जाये। इसी बिना पर नमाज़े जमाअत में एक इमाम होता है इसलिए ज़रुरी है कि सबका मरजए अमल भी एक नज़र आये। यही वह उसूल है कि जिसकी बिना पर नमाज़ के लिये एक ख़ास क़िब्ला क़रार पाया और इस शआर का दायरा इस क़दर वसी किया गया कि क़िबले की तरफ रूख करना ही कुफ्र के दायरे से निकल आना है।

क़िबला किस सिम्त क़रार दिया जाये ? यह इस्लाम और पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) के सामने एक अहम मसला था। यहूदी और ईसाइ बैतुल मुक़द्दस को क़िबला समझते थे क्योंकि उनकी कौ़मी और मज़हबी हस्ती बैतुल मुक़द्दस से वाबस्ता थी। इस उसूल के तहत बुतशिकन इब्राहीम (अ.स.) के जॉनशीन का क़िबला सिर्फ काबा हो सकता था जो इस मुवहिदे आज़म की यादगार और तौहीद का सबसे बड़ा मज़हर है।

पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) जब तक मक्के में थे दो मसले एक साथ दरपेश थे। मिलल्ते इब्राहीम की तासीस व तजदीद के लेहाज़ से काबे की तरफ रूख करने की ज़रुरत थी , और , शक्ल ये थी कि क़िबले की जो अस्ली गर्ज़ थी यानि इम्तियाज़ व एख़तेसारा , वह नहीं हासिल हुई थी क्योंकि मुशरेकीन और कुफ़्फ़ार भी काबे ही को अपना क़िबला समझते थे। इस बिना पर आन हज़रत (स.अ.व.व.) मुक़ामे इब्राहीम पर नमाज़ पढ़ते थे जिसका रूख बैतुल मुक़द्दस की तरफ था। इस तरह दोनों ही क़िब्ले सामने आ जाते थे।

मदीने में दो गिरोह आबाद थे मुशरेकीन जिनका क़िबला काबा था , और अहले किताब जो बैतुल मुक़द्दस की तरफ रूख करके नमाज़ अदा करते थे। शिरक के मुक़ाबले में यहूदियत और नसरानियत दोनों को तरजीह थी इसिलए आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने एक मुद्दत यानि तक़रीबन 16 महीनों तक बैतुल मुकद्दस की तरफ़ नमाज़ अदा की लेकिन जब मदीने में इस्लाम ज़्यादा फैल गाय तो अब कोई ज़रुरत न थी कि अस्ल किबला को छोड़कर दूसरी तरफ़ रूख़ किया जाता। चुनानचे यह आयत नाज़िल हुई कि तुम अपना मुँह मस्जिदुल हराम की तरफ़ फेर दो और जहाँ कहीं रहो उसी तरफ़ फ़िरो। मुफसेरीन का कहना है कि आयत का नाज़िल होना था कि दफ़तन क़िबला तबदील हो गया। इब्ने हष्शाम और तबरी का ब्यान है कि क़िबले की तहवील शाबान के महीने में मंगल के दिन मदीने में आन हज़रत (स.अ.व.व.) की तशरीफ आवरी के अट्ठारा माह बाद वाक़े हुई और इब्ने साद के मुताबिक़ 15 शाबान थी।

मदाहिबे लदुनिया , तारीख़ मदीना और शहरे ज़रक़ानी में है कि तहवील क़िबला का वाक़िया मस्जिद क़िबलतैन में वाक़े हुआ। सराकरे दो आलम नमाज़ पढ़ ही रहे थे कि तीसरी रकत में तबदीले क़िबले का हुक्म नाज़िल हुआ और उसी वक़्त आपने नाम रूख़ काबे की तरफ फेर दिया जब कि ख़ुदा फरमाता है कि मैंने तुझ को इस क़िबले की तरफ फेर दिया जिससे तू राज़ी था।) 2

एक रवायत में है कि आन हज़रत (स.अ.व.व.) मस्जिदे कुबा में जो मदीने में से डेढे कोस के फासले पर है नमाज़ ज़ोहर में मशगूल थे और दो रसकते पढ़ चुके थे कि तबदीले क़िबला का हुक्म नाज़िल हुआ और आन हज़रत (स.अ.व.व.) बैतुल मुक़द्दस की तरफ से खान-ए-काबा की तरफ़ रुख करके पढ़ी इसी लिए मस्जिद को जूक़िबलतें यानि दो क़िबले वाली मस्जिद कहते हैं।

जिहाद का हुक्म

बेइस्त के बाद तेरह बरस तक सरकारे दो आलम (स.अ.व.व.) , मुशरेकीने मक्का के मज़ालिम सहते रहे। और जब मक्के से हिजरत करके मदीने में तशरीफ फरमां हुए तो कुफ्फार व मुशरेकीन के ख़िलाफ इन्तेक़ामी कार्रवाई का कोई तसव्वुर आपके ज़ेहन में नहीं था लेकिन कुरेश जो अपने मनसूबों की नाकामी पर पेच व ताब खा रहे थे और आन हज़रत (स.अ.व.व.) के जान बचाकर निकल जाने पर कफे अफसोस मल रहे थे फितना व शोरिश के लिये उठ खड़े हुए और मुसलमानों को घकर से बेखर करने के बाद इस्लाम की तौसीय व तर्क़ी को रोकने के लिये हरब व पैकार पर उतर आये और मुसलमानों को अपनी तागूती ताक़त से कुचलने का फैसला कर लिया। पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) जिन्होने मक्के में पुर अमन तरीक़े से ज़ेहनी इन्क़ेलाब पैदा करना चाहा था और क़बायेल यहूद से मदीने में सुलह व अम्न का तहरीरी मुहायिदा किया ता वह कुरैश की शरअंगेज़ियों के बावजूद यह नहीं चाहते थे कि जंग की नौबत आये और कुश्त व खून की गर्म बाज़ारीहो मगर कुरैश की शरपसन्दी व फितना अंगेज़ी ने जब मुसलमानों के सुकून व इत्मिनान को दरहम बरहम कर दिया और उनके सरों पर जंग मुसल्लत करस दी तो इसके अलावा कोई चारा न था कि जारेहाना हमलों के ख़िलाफ मुदाफेआना क़दम उठाया जाये। चुनानचे आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने उस वक़्त तक जंग का नाम नहीं लिया और न किसी को लड़ने की इजाज़त दी जब तक कुरैश व यहूद ने आपको जंग के लिये मजबूर नहीं कर दिया और कुदरत ने कुफ़्फ़ार के बढ़ते हुए जुल्म व तशद्दुद को रोकने के लिये इजाज़त नहीं दे दी। चुनानचे अल्लाह ताला का इरशाद हुआः-

(जिन (मुसलमानों) के ख़िलाफ़ (काफिर) लड़ा करते हैं अब उन्हें भी जंग की इजाज़त है। इस बिना पर कि उन पर मज़ालिम हुए हैं और यक़ीनन अल्लाह उनकी मदद पर क़ादिर है। (कुरआन मजीद सूरये हज आयत 36)

यह बात ढ़की छुपी नहीं है कि कुफ़्फार ने पहले मुसलमानों को जिला वतन किया और फिर उनके ठिकानों पर हमला आवर होकर उन्हें ख़त्म करने की ठान ली। इस सूरत में उनके ख़िलाफ़ अगर एलाने जंग न किया जाता तो खुद मुसलमानों की बक़ा ख़तरे में पड़ सकती थी। बेशक इस्लाम अमन व सलामती मुहाफिज़ और सुलहा व आशती का पैग़म्बर है मगर उसके यह मानि नहीं है कि दुश्मन की चीरा दस्तीयों और फित्ना अंगेज़ियों को देखते हुए जान बूझकर खामोश राह जाये और उन्हें मन मानी की खुली छूट दे दी जाये। अल्लाह ने मज़लूम व सितम रसीदा लोगों को हक़ दिया है कि वह दुश्मन की बढ़ती हुई सतीज़ा करियों के इन्सदाद और अपनी जान व माल के तहाफुज़ के लिये इमकानी जद्दो जहद करें। ज़ाहिर है कि जिस जमाअत से जीने और साँस लेने का हक़ छीन लिया जाये उसके लिए जंग के अलावा चारा कार ही क्या रह जाता है। अगर जंग मज़मूम और क़ाबिले नफरत शै है तो उसके इरतेक़ाब का इल्ज़ाम उस पर आयद होगा जिसने अज़खुद जंग छेड़कर इन्सानी हुकूक पर दस्तदराज़ियां की हों और कमज़ोर व नातवां को अपने मज़ालिम का निशाना बनाया हो लेकिन जो मज़लूम की हिमायत , फितने के इन्सदाद , जमाअती हुकूक़ के तहाफुज़ और एतक़ाद व अमल की आज़ादी के लिये दुश्मन से टकराये वह हरगिज़ मूरिदे इल्ज़ाम नहीं क़रार दिया जा सकता।

इस्लाम , (सलम) से मुश्तक़ है जिसके मानी सुलह के है। इस नाम ही से ज़ाहिर है कि इस्लाम बुनियादी तौर पर खूँरेज़ी का मुख़ालिफ़ , हरब व पैकार का दुश्मन और सारी दुनिया के लिये अमन व सलामती का पैग़ाम है और इसमें रंग व नस्ल और क़ौम व वतन के तास्सुब और अक़ाएद के इख़तेलाफ़ की बिना पर फौजकशी व सफ आराई की क़तअन गुंजाइश नहीं है और न मुल्कगीरी को इस्लाम और इस्लामी तालिमात से दूर का वास्ता है। इस्लाम सिर्फ़ दो सूरतों में जंग की इजाज़त देता है एक यह कि दुश्मन मुसलमानों के इस्तेहाद के लिये मरकज़े इस्लाम पर हमला आवर हो और बगै़र जान व माल और नामूस का तहाफुज़ ग़ैर मुम्किन हो। दूसरी सूरत यह है कि दुश्मन जंगी तैयारियों में सरगर्मे अमल हो और ढ़ील देने की सूरत में उसकी असकरी कूवत व मादरी वसायल के बढ़ जाने का अन्देशा हो चुनानचे उन्हें दो सूरतों में जब कि जंग नागुज़ीर थी , पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) ने अलमे जंग बुलन्द किया और मुसलमानों को इजाज़त दी कि वह हिफ़ाज़त खुद अख़ितयारी और इस्लाम की बक़ा के लिये दुश्मनों से लड़ें।

अगर चे इब्तेदा में मुसलमान कुफ़्फार के मुक़ाबले में हर लिहाज़ से कमज़ोर थे मगर दुश्मन की कसरत व कूवत और अपनी बे सरो सामानी के बावजूद मैदाने हरब व ज़र्ब में उतर आये कभी बदर के कुँओं पर उनसे टकराये , कभी औहद की पहाडियों में लड़े और कभी मदीने के हुदूद में रह कर मदाख़ेलत की। यह मुक़ामात महले वक़ू के लिहाज़ से (दारूल) इस्लाम (मदीने से क़रीब और (दारूल कुफ्र) मक्के से फासले पर वाक़े है। उन जंगी मेहाज़ों का नकशा देख कर हर बाबसीरत इन्सान बाआसानी फैसला कर सकता है कि जारेहाना इक़दाम किस की तरफ से हुआ और मदाफआना क़दम किसने उठाया। अगर इस्लाम का एक़दाम जारेहाना होता तो जंगों के जाएवक़ू को दुश्मन के मसकन के करीब होना चाहिए था और मुसलमानों के महल व मुक़ाम से दस्तूर लेकिन हर महाज़े जंग इस्लाम के मरकज़ के क़रीब नज़र आता है और कुफ़्फ़ार के मरकज़ से दूर। जो इस अमर की वाज़े दलील है कि पेशक़दमी दुश्मन की जानिब से हुई और मुसलमान इस पेशक़दमी को रोकने की ग़र्ज़ से सफ आरा हुए। अलबत्ता ख़ैबर एक ऐसी जगह है जो इस्लाम के मरकज़ से दूर यहूदियों की जाये क़रार थी मगर अमर वाक़िया यह है कि यह वही लोग थे जो अहद शिकनी के नतीजे में मदीने से निकाले गये थे और अब एक गरां लश्कर शिकनी के नतीजे में मदीने से निकाले गये थे और अब एक गरां लश्कर के साथ मुसलमानों पर हमला आवर होने के लिये पर तोल रहे थे और गिर्दवनवाह के क़बीलों से मुहायिदा करके जंगी तैयारियाँ मुकम्मल कर चुके थे अगर पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) पेशक़दमी न करते और आगे बढ़ कर उनका रास्ता न रोकते तो वह पूरी तैयारी के साथ मदीने पर हमाल आवर होते और मुसमलानों के लिये इस उमजे हुए सेलाब का रोकना मुश्किल हो जाता।

इस हक़ीकत से इन्कार नहीं किया जा सकता कि पैगम़्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) के बाद इस्लाम के नाम पर कुछ जारेहाना जंगे भी लड़ी गयीं जिन में इख़लाक़ी हुदूद और जेहादे इस्लामी के शराएत व आदाब को नज़र अन्दाज़ किया गया। अगर चे एक तबक़े ने क़हर व ग़लबे को हक़ का मेयार क़रार दे कर इस क़िस्म की जांगो को भी जेहादे इस्लामी में शामिल कर लिया है और क़त्ल व खूँरेज़ी के ज़रिये हासिल होने वाली कामयाबी को हक़ व सदाकत की कामयाबी का नाम दिया है मगर इस्लाम न ऐसे इक़दामात का हामी है और न उन जंगो की ज़िम्मेदारी इस्लाम पर आयद होती है इसलिये कि न वह इस्लामी तालीमात के ज़ेरे असर लड़ी गयीं और न उनमें कोई इस्लामी मुफ़ाद मुज़मिर था। इस्लाम का वाज़े ऐलान है। ला इकराहा फिद्दीन। दीन के मामले में कोई ज़बरदस्ती नहीं है और कुरआने मजीद में जिस क़दर भी आयतें जिहाद के मुतालिक़ वारिद हुई हैं वह उन्हीं मवाक़े के लिये है जहाँ दुश्मने इस्लाम की आवाज़ को कूवत व ताक़त से दबाने और मुसलमानों की जमीअत को कुचलने के लिये लश्कर कशी करता है। इस्लाम की तरफ से न जारहाना इक़दाम की इजाज़त है और न ज़बरदस्ती किसी पर अपने अक़ाएद को मुसल्लत करने की हिदात है। उन जंगों की जि़म्मेदारों उन शहंशाहों पर आयद होती है जिन्होंने मुल्कगीरी व किशवर कुशाई के लिये फौज कशी की और गिर्दोपेश के अमन पसन्द मुल्कों को जेहाद की आड़ में पामाल किया। इस तरह अमने आम्मा में ख़लल डाल करस इस्लाम की सुलह जूई और अमन पसन्दी को दाग़दार कर दिया और अपने ज़ालिमाना तर्ज़ेअमल से कुछ लोगों को यह कहने का मौका़ फराहम कर दिया कि इस्लाम का फैलाओ तलवार और दबाव का मरहून है।

इक़सामे जेहाद

दौरे रिसालत में जेहाद दो तरह के होते थे। एक वह जिस में पैग़म्बर इस्लाम (स.अ.व.व.) खुद बा नफ्से नफ़ीस शिरकत फरमाते थे , इसको मोअर्रिख़ीन की इस्तेलाह में गजवा कहते हैं। दूसरा वह जिसने आन हज़रत (स.अ.व.व.) ख़ुद नहीं जाते थे बल्कि किसी दूसरे को अपने क़ायम मुक़ाम की हैसियत से भेजते थे इसकोसरया कहा जात है। इस्लामी ग़जवात की तादाद 16 से 27 तक और सरयो की तादाद 56 बतायी जाती है।

मज़वात की इस फेहरिस्त में जंगे ओहद , जंगे बद्र , जंगे बनि क़ुरैजा , जंगे मरयसी , जंगे ख़ैबर , जंगे वदिउल क़ुरा , फ़तहे मक्का और जंगे हुनैन बहुत मशहूर हैं जिनमें क़िताल वाक़े हुआ।

ग़ज़वा अबवा (सन् 2 हिजरी)

अबुवा मक्के की जानिब मदीने से तीन मील के फासले पर वाक़े है। इज़ने जेहाद का पहले अमलदरामद इसी मुक़ाम पर हुआ। सबब यह बय्ान किया जाता है कि यहाँ कुफ़्फ़ारे कुरैश क़बीलये बनि सरवर को अपना हरीफ बना कर मुसलमानों कर हमला आवर होने की ग़र्ज़ से जमा हुए थे। आन हज़रत (स.अ.व.व.) दो सौ आदमी लेकर मुक़ाबिले को निकले मगर लड़ाई की नौबत नहीं आयी और कुरैश भाग खड़े हुए। क़बीलये बनि सरवन ने आन हज़रत (स.अ.व.व.) से यह मुहायिदा किया कि न हम कुरैश का साथ देंगे और न मुसलमानों के मामले में दख़ल अन्दाजी़ करेंगे। इब्ने खलदून का कहना है कि इसी गज़वे में हज़रत हमज़ा अलमबदार थे और हज़रत हमज़ा का अलम पहला अलम है जो इस्लाम में तैयार किया गया।

सरया राबिग़ (सन् 2 हिजरी)

मक्के से कुछ कुरैश मसला होकर निकले थे , उनके मुक़ाबले में साठ मुहाजरीन अबुअबीदा बनि हारिस की सरबराही में रवाना किये गये। मुक़ामे वतन राबिग़ पर सिर्फ तीरों से मुक़ाबला हुआ। कुफ़्फार भाग गये। इस सरया में बरवायत हबीबुल सैर मुसता बिन असासा अलमबदार थे और कुरैश की तरफ से उनका सरदार अबुसुफियान बिन हरब था।

सरया सैफुल बहर (सन् 2 हिजरी)

अबुजहल की क़यादत में कुछ मुशरेकीन कुरैश जंगी इमदाद के लिये मक्के से शाम की तरफ जा रहे थे कि यह ख़बर मदीने पहुँची। 30 मुहाजिरीन के साथ हज़रत हमज़ा उनके मुक़ाबले के लिये भेजे गये। समुन्द्र के किनारे सैफुल बहर के मुक़ाम पर मुडभेड़ हुई मगर मजदी बिन उमर जहनी ने जो मुसलमानों और कुफ्फ़ार दोनों का हलीफ़ था बीच में प़ड़ कर लड़ाई न होने दी। उस वक़्त अबु मुरसिद ग़नवी अलमब्रदार था।

सरया खुरार (सन् 2 हिजरी)

साद बिन अबी विक़ास 20 मुहाजरीन के साथ एक क़ाफिले की ख़बर पर मामूर हुए। खुरार तक गये क़ाफिला न मिला तो वापस पलट आये।

ग़जूवा जुलअशीरा (सन 2 हिजरी)

आन हज़रत (स.अ.व.व.) को यह मालूम हुआ कि अबु सुफियान के साथ बहुत से कुफ़्फ़ारे कुरैश तिजारत की ग़र्ज़ से शाम की तरफ जा रहे हैं। आप (स.अ.व.व. ) दो सौ साथियों को लेकर उनकी तलाश में निकले। हज़रत अली (अ.स.) और हज़रत हमज़ा भी आपके साथ थे। जुलअशीरा के मुक़ाम पर पहुँचे तो यह मालूम हुआ कि क़ाफिला निकल चुका है। आपने मराजियत फरमायी और उसी सफ़र में बनि मुदलेज और बनि हमजा के साथ मुहायिदा फरमाया।

अल्लामा दयार बकरी का ब्यान है कि इसी सफर में अमीरूल मोमेनीन हज़रत अली (अ.स.) एक दरख़्त के नीचे जब आराम करने के बाद आन हजरत (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में आये तो आपने देखा कि जिस्म ख़ाक आलूद है। आपने प्यार से अबुतराब कह कर पुकारा उसी दिन से हज़रत अली (अ.स.) की कुन्नियत अबुतुराब हुई 1। इस सफर में अलमदार हमज़ा बिन अब्दुल मुत्तालिब थे।


जंगे बद्र (सन् 2 हिजरी)

मदीने के यहूदी ने अगर चे पैगम़्बर इस्लाम (स.अ.व.व.) की आमद पर उनसे यह मुहायिदा कर लिया था कि अगर मदीने पर हमला हुआ तो वह दुश्मनों के ख़िलाफ एक दूसरे की मदद करेंगे। मगर पैगम्बर (स.अ.व.व.) की बढ़ती हुई कूवत व ताक़त को देख कर उन्हें ख़ुद अपना इक़तेदार ख़तरे मे नज़र आया तो उन्होंने कुरैश से राबिता कायम कर लिया और मुसलमानों के ख़िलाफ रेशा दवानाइयां शुरू कर दी। चुनानचे फितना व फसाद को हवा देने के लिये करज़ इब्ने जाबिन फेहरी ने मदीने की चरागाहों पर हमला किया और अहले मदीना के मवेशी हांक कर अपने साथ ले गया। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने वादी सिफवान तक इसका पीछा किया मगर वह हाथ न आया। इन हालात में ज़रुरत थी कि उन लोगों की नकल व हरकत पर नज़र रखी जाये ताकि बरवक़्त उनकी शरअंगेजियों को तदारूक किया जा सके। उसी देख भाल के लिये आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने अब्दुल्लाह बिन हजिश को चन्द आदमियों के हमराह नख़ला की जानिब रवाना किया जो मक्के और तायफ़ के दरमियान एक मशहूर जगह थी जब यह लोग नख़ला में वारिद हुए तो कुरैश का एक काफिला जो तायफ़ से माले तिजारत लेकर आ रहा था फरोक्श हुआ। अब्दुल्लाह इब्ने हजश के हमराहियों मे से एक शख़्स वाक़िद इब्ने अब्दुल्लाह तमीमी ने कुरैश के अम्र बिन हज़रमी को तीर मार कर हलाक कर दिया और उसमान इब्ने अब्दुल्लाह व हकम इब्ने कीसाम को गिरफ़्तार कर लिया। अब्द्ल्लाह इब्ने हजश उन दोनों असीरों और क़ाफिले के माल व मता को समेट कर मदीने चले आये। ये वाक़िया चूँकि माहे रजब की आख़िरी तारीख़ में हुआ था जिसमें जंग व क़ताल ममनू है इसलिए आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने अब्दुल्लाह बिन हजश की सरज़निश की और दोनों असीरों को आज़ाद और क़ाफिले को लूटा हुआ माल वापिस कर दिया। अगर चे यह इन्फेरादी फेल था जो पैगम़्बर (स.अ.व.व.) की इजाज़त के बग़ैर सरज़द हुआ मगर इससे कुरैश को जंग छोड़ने का बहाना मिल गया और उन्होंने इब्ने हज़रमी के क़सास का ढ़िंढ़ोरा पीट कर जंगी तैयारियाँ शुरू कर दी और यह तय किया कि अबू सुफ़यान की वापसी पर मुसलमानों पर हमला कर दिया जाए अबु सुफ़यान तेजारती काफ़ेला लेकर शाम गया हुआ था। और उसे वापसी पर मदीने से गुज़रना था क्योंकि मदीना कुरैश के क़ाफिलों की गुज़रगाह था। इधर अहले मक्का इसकी वापसी के मुंतज़िर थे कि उसने शाम से पलटते हुए अहले मक्का को सुमसुम इब्ने उमर ग़फारी के ज़रिये यह ग़लत और शऱअंगेज़ पैग़ाम भेजा कि मुसलमान धावा बोलकर माल लूटना चाहते हैं। लेहाज़ा तुम जंगी हथियारों के साथ निकल पड़ो। कुरैश पहले ही से जंग के लिये आमादा थे फौरन उठ खड़े हुए। इधर अबुसुफियान ने आम रास्ता छोड़ समुन्द्र का साहिली रास्ता इख़ितयार किया और जद्दा होते हुए आठवें दिन मक्के पहुँच गया।

जब कुरैश का लश्करस बद्र के क़रीब पहुँचा तो उसे क़ाफिले के सही व सालिम पहुँचने की इत्तेला मिली बनि ज़हरा के चन्द लोगों ने कहा कि क़ाफिला तो आ चुका है अब जंग की क्या ज़रूरत है ? हमें वापस पलट जाना चाहिये। मगर अबुजहल जंग से दस्तबरदार होने पर तैयार न हुआ और अपनी ज़िद पर अड़ा रहा। अबुजहल की ज़िद और हटधर्मी से साफ ज़ाहेर है कि कुरैश के पेशे नज़र क़ाफिले का बचाओ न था बल्कि वह हर हालत में जंग छेड़ना और अहले मदीना को ताराज व तबाह करना चाहते थे। चुनानचे कुरैश की इस रविश को देखकर बनि ज़हरा वापस चले आये और जंग में शरीक न हुए।

मदीने में यह ख़बर आम हो चुकी थी कि अबुसुफियान का क़ाफिला बारबरदार ऊँटों पर सामाने तिजारत लादकर उधर से गुज़रेगा मगर इसके साथ ये ख़बरें भी पहुँच रही थीं कि कुरैश का लश्कर पूरे जंगी साज व सामान के साथ मदीने पर हमला आवर होने को पर तौल रहा है। मुसलमान कम और बेसरोसमानी की हालत में थे और कुरैश की मुसल्लेह व मुन्तज़िम फौज से दूबदू होकर लड़ने से बचना चाहते थे. और रह रह कर उनकी निगाहें रह गुज़र की तरफ उठती तथीं कि अबुसुफियान के क़ाफिले से मुठभेड़ हो जायें तो बेहतर है क्योंकि वह गिनती के लोग होंगे और उन्हें ज़ेर कर लेना कोई मुश्किल अमर न होगा।

उमवी हवाख़्वहों की ख़ुद साख़्ता रवायात पर एतमाद करते हुए बाज़ मोअर्रेख़ीन ने यह लिख डाला है कि पैगम़्बर इस्लाम (स.अ.व.व.) (माज़ अल्लाह) अबुसुफियान के क़ाफिले को लूटने के लिये निकले थे मगर अचानक कुरैश का सामना हो गया और जंग छिड गयी। बेशक बाज़ लोगों की नजरे माले दुनिया पर थी और वह क़ाफिले को लूटना भी चाहते थे मगर तारीख़ नवीसों की यह सितम ज़रीफी है कि उन्होंने पैग़म्बर इस्लाम (स.अ.व.व.) को भी इसमें शरीक कर लिया और सिर्फ क़ाफिले का लूटना ही इस मुहिम का मक़सद क़रार दे लिया चुनानचे बुख़ारी तक ने ये लिख दिया है-

रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) तो कुरैश के तिजारती क़ाफिले के इरादे से निकले थे मगर अल्लाह ने नागहानी तौर पर उनका और उनके दुश्मनों का सामना करा दिया।

अगर पैगम़्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) का यह इक़दाम क़ाफिला लौटने की ग़र्ज़ से होता तो यह मुसलमानों की खुवाहिश के ऐन मुताबिक़ था , लेहाज़ा कोई वजह न थी कि वह क़ाफिले में चालिस से ज़्यादा अफ़राद न थे और मुसलमानों की तादाद तीन सौ से ऊपर थी। यह ख़ौफ व हेरास और एहसास नागवारी सिर्फ कुरैश के लश्करस ही से हो सकता है जिससे देफ़ाअ की सकते वह अपने अन्दर नहीं पते थे। इस तजज़िये की रौशनी में बहर हाल यह तसलीम करना पड़ेगा कि आन हज़रत (स.अ.व.व.) क़ाफिले के ताअक़्कुब में हरगिज़ नहीं निकले बल्कि कुरैश की पेशक़न्दी को रोकने की ग़र्ज़ से सफआरा हुए थे। चुनानचे हज़रत अली (अ.स.) का इरशाद है किः-

पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) बद्र के बारे में पूछा करते थे। जब हमें मालूम हुआ कि मुशरेकीन आगे बढ़ आये हैं तो रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) बद्र की जानिब रवाना हुये बद्र एक कुँए का नाम है जहाँ हम लोग मुश्रेकीन से पहले पहुँच गये थे। 2

वह कुफ्र व इस्लाम के दरमियान पहला मारका रुनुमा होने वाला था। मुसलमान असलहा जंग के लिहाज़ से कमज़ोर और कुफ़्फार की मुतावक़्क़ा तादाद के मुक़ाबले में कम थे इसलिये पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने ज़रूरी समझा कि अन्सार मुहाजरीन का नज़रिया मालूम करें कि वह कहाँ तक अज़्म व सिबात के साथ दुश्मन का मुक़ाबिला कर सकते हैं चुनानचे आन हज़रत (स.अ.व.व.) के इस्तेफ़सार पर लोगों ने मुख़तलिफ़ जवाबात दिये। कुछ हौसला शइकन थे और कुछ हिम्मत अफज़ां। सही मुस्लिम में है कि हज़रत अबु बकर और हज़रत उमर के जवाब पर आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने मुँह फेर लिया। मिक़दाद इब्ने असूद ने पैग़म्बर (स.अ.व.व.) के चेहरे पर जब तक़द्दुर के आसार देखे तो कहा , या रसूल उल्लाह! हम बनि इसराईल नहीं है कि जिन्होंने हज़रत मूसा (स.अ.व.व.) से कहा था कि तुम्हारा ख़ुदा और तुम दोनों लड़ो और हम यहाँ बैठे हैं। उस ज़ाते गिरामी का क़सम जिसने आपको ख़लअते रिसालत पहनाया है हम आपके आगे पीछे और दाये बायें रह कर लड़ेंगे यहाँ तक कि अल्लाह आपको फ़तह व कामरानी अता करे। इस जवाब से पैग़म्बर (स.अ.व.व.) का तकद्दुर जाता रहा और आपने मिक़दाद के हक़ में दुआयें ख़ैर फ़रमायी। फिर अन्सार की तरफ रूख करके पूछा कि तुम लोगों की क्या राय है ? साद इब्ने माज़ अन्सारी ने बड़ी गर्म जोशी से कहा , या रसूल उल्लाह! हम आप पर ईमान लाये और इताअत का अहद व पैमान किया अगर आप समुन्द्र में फाँदेगे तो हम भी आपके साथ फाँदेंगे और कोई चीज़ हमारी राह में हायल न होगी। आप अल्लाह का नाम लेकर उठ खड़े हों , हम में एक फर्द भी पीछे नही रहेगी। पैग़म्बर (स.अ.व.व.) इस जवाब पर खुश हुए और फरमाया।

ख़ुदा की क़सम! अब मैं दुश्मनों के गिर कर मनरे की जगहों को अपनी आँखों से देख रहा हूँ।

रसूले करीम (स.अ.व.व.) तीन सौ तेरह आदमियों की एक मुख़तसर जमीअत के साथ जिन में 77 मुहाजरीन और बाक़ी अन्सार थे , मदीने से निकल खड़े हुए और बदर के कुऐ से कुछ फासले पर पड़ाव डाल दिया। यह अन्देशा तो था ही कि कहीं दुश्मन अचानक हमला न कर दे या शब खून न मारे आपने पेश बन्दी करते हुए हजरत अली (अ.स.) , साद इब्ने अबी विक़ास और जुबैर बिन अवाम को हुक्म दिया कि वह आगे बढ़कर दुश्मन का ठिकाना मालूम करें और देखें कि वह यहाँ से कितने फासले पर हैं। यह तीनों देखते भालते हुए बदर के कुऐं तक पहुँच गये वहाँ पर चन्द आदमियों को देखा , जो उन्हें देखते ही भागे। हज़रत अली (अ.स.) ने उनमें से दो को दौ़ड़कर पकड़ लिया अपने साथ आन हज़रत (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में ले आये। सहाबा उन्हें देखते ही उनमें गिर्द जमा हो गये और पूछा कि तुम कौन हो ? कहा , हम कुरैश के सक़्क़ा हैं उन्होंने हमें पानी लाने के लिये भेजा था। सहाबा ने कुरैश का नाम सुना तो उनके तेवर बिगड़ गये और मार पाट कर उनसे कहलवाना चाहा कि हम कुरैश के गुलाम नहीं हैं बल्कि अबुसुफियान के आदमी हैं। पैग़म्बर (स.अ.व.व.) नमाज़ में मशगूल थे। जब नमाज़ से फारिग़ हुए तो फरमाया , यह अजीब बात है कि वह सच बोलते हैं तो तुम उन्हें पीटते हो और झूट बोलते हैं तो उन्हें छोड़ देते हो , यह कुरैश ही के आदमी हैं। फिर आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने उनसे पूछा गय़ की तो उन्होंने अबु सूफियान के क़ाफिले से लाइल्मी का इज़हार किया और बताया कि कुरैश का लश्कर यहाँ से तीन मील के फासले पर मौजूद है , आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने पूछा लश्करस की तादाद क्या है ? कहा , हमें तादाद का सही इल्म नहीं है अलबत्ता कभी नौ और कभी दस ऊँट महर किये जाते हैं। फरमाया कि फिर उनकी तादाद नौ सौ से लेकर एक हज़ार तक है। फिर दरयाफ्त फरमाया कि उनमें नुमाया और सरकर्दा अफ़राद कौन कौन हैं ? उन्होंने चन्द सरदाराने कुरैश के नाम लिये। उस पर आपने फरमाया कि , मक्के ने तो अपने जिगरपारों को मैदान में उडेंल दिया है।

यह ख़बर सुनकर लश्कर इस्लाम ने हरकत की और बदर के कुऐ की जानिब रवाना हो गया। लश्करे कुरैश वादीये बदर के आख़िरी किनारे पर रेत के एक टीले के पास ख़ेमा ज़न था। उनकी तादाद एक हज़ार के लगभग थी और सात ऊँट , तीन सौ घोड़े उनके साथ थे , नैज़ों , तलवारों और हथियारों की कोई कमी न थी उसके बरअक्स मुसलमान तादाद में कम और सामाने जंग के लिहाज़ से इन्तेहाई कमज़ोर थे उनके पास जंगी असलहों में से चन्द तलवारें और गिनती की चन्द ज़िरहें थी और सिर्फ दो घोड़े थे। एक पर मिक़दद सवार थे और दूसरा मुरसिद की सवारी था।

जब कुरैश का लश्कर अपने मुक़ाम से हट कर मुसलमानों के मुक़ाबिल सफआरा हो गया तो आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने भी फौज की सफें , और मैमना व मैसरा तरतीब दे कर अन्सार का अलम साद बिन अबादा को और मुहाजिरीन का अलम हज़रत अली इब्ने अबुतालिब (स.अ.व.व.) के सुपुर्द फरमाया।

इब्ने कसीर ने तहरीर किया है किः-

रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) ने बद्र के दिन अलमे जंग हज़रत अली (अ.स.) को दिया उस वक़्त आपकी उम्र बीस साल की थी।

जब दोनों लश्कर बिलमुक़ाबिल हुए तो दुश्मन की सफों से अतबा इब्ने रबिया उसका भाई शीबा और बेटा वलीद , निकल कर मुबारिज़ तलब हुए। मुसलमानों के लश्कर से औफ इब्ने हारिस मऊज़ इब्ने हारिस और अब्दुल्लाह इब्ने रवाहा मुक़ाबिले के लिये निकले। अतबा ने पूछा , तुम कौन हो ? कहा हम अन्सारे मदीना हैं। अतब ने कहा , वापस जाओ , तुम हमारे हम मर्तबा नहीं हो। फिर उसने आन हज़रत (स.अ.व.व.) को पुकार कर कहा , ऐ मुहम्मद (स.अ.व.व.) ! हमारे मुक़ाबिले में हमारे हमसर लोगों को भेजो जो हमारी क़ौम में से हों। यह तीनों अपनी सफों में वापस आ गये। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने जब कुरैश की यह ज़ेहनियत देखी तो वह अन्सार को अपना हरीफ व मुदेमुक़ाबिल नहीं समझतें तो उनकी जगह अबीदा इब्ने हारिस , हमज़ा इब्ने अब्दुल मुत्तालिब और अबी इब्ने अबुतालिब को भेजा। अतबा का मुतालिबा तो यह था कि उनके मुक़ाबले में कुरैश आये मगर पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने न सिर्फ कुरैश बल्कि अब्दुल मुत्तालिब के जिगर परों को मुन्तख़ब किया ताकि किसी को यह कहने का मौक़ा न मिले कि पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने अपने अज़ीज़ों को रोके रखा और दूसरों को जंग के शोलों में झोंक दिया। हालाँकि हज़रत अबीदा सत्तर ( 70) साल के बूढ़े थे और हज़रत अली (अ.स.) अबी नौख़ेज़ थे और पहली मर्तबा एक नेर्बद आज़मां की हैसियत से मैदाने कारज़ार में उतरे थे। जब अतबा को मालूम हुआ कि अली (अ.स.) , हमज़ा (अ.स.) और अबीदा लड़ने आये हैं तो कहा यह बराबर की जोड़ है। हज़रत अबीदा , अतबा से , हज़रत हमज़ा शीबा से और हज़रत अली (अ.स.) , वलीद से दो दो हाथ करने के लिये आगे बढ़े , वलीद ने हमला करना चाहा मगर अली (अ.स.) ने एक तीर मार कर उसे बेबस कर दिया। तीर खाते ही वह अपने बाप अतबा के दामन में पनाह लेने के लिये भागा मगर फ़रज़न्दे अबुतालिब ने इस तरह घेरा कि वह जान तोड़ कोशिश के बावजूद तलवार की ज़़द से बच न सका और बाप की गोद में पहुँचने से पहले मौत की आगोश में सो गया। जब अमीरूल मोमेनीन (अ.स.) वलीद के क़त्ल से फारिग़ हुए तो मुसलमानों ने पुकार कर कहा , ऐ अली (अ.स.) ! शीबा आपके चचा हमज़ा पर छाया जा रहा है। आपने आगे बढ़ कर देखा कि दोनों आपस में गुथे हुए हैं। तलवारे कुन्द हो चुकी हैं और ढ़ाल के टुकड़े पड़े है तो आपने आगे बढ़ कर शीबा पर वार किया और तलवार से उसका सर उड़ा दिया। अब हज़रत अली (अ.स.) और हमज़ा अतबा की तरफ बढ़े जो जनाबे अबीदा से निबर्द आज़म था। देखा कि अबीदा बुरी तरह घायल हो कर मुक़ाबले की सकत खो चुके हैं। क़रीब था कि अतबा जनाबे अबीदा काकाम तमाम कर दें कि हज़रत अली (अ.स.) और हमज़ा की तलवारें चमकीं और अतबा की लाश ख़ाक पर तड़पती हुई नज़र आने लगी। अभीदा सख़्त ज़ख़्मी हो चुके थे अली (अ.स.) और हमज़ा ने मिल कर उन्हें उठाया और हुजूरे अकरम (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में लाये) आपने अबीदा का सर अपने ज़ानू पर रखा आँखों में आँसू आ गये जो अबीद के चेहरे पर गिरे उन्होंने आँखें खोल कर पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की तरफ देखा और कहा या रसूल उल्लाह! क्या मैं भी शहीदों में महसूब हूँगा ? फरमाया , हाँ आप भी शहीदों मे शुमार होंगे। अबीदा ने कहा , काश आज अबुतालिब ज़िन्दा होते तो देखते कि हमने उनकी बात को झूठा नहीं होने दिया।

हज़रत अबीदा का पैर कट चुका था और पिन्डली की हड़्ड़ी से गूदा बह रहा था इसलिये वह जॉबर न हो सके और मैदाने बद्र की वापसी के दौरान वादीये सफ़रा में इन्तेक़ाल फरमां गये और वहीं दफ़्न हुए।

अतबा व शीबा वग़ैरा कुरैश के माने हुए सूरमां थे लेहाज़ा उनके क़त्ल के बाद मुश्रेकीन पर ख़ौफ व हेरास छा गया। जब अबुजहल ने उनका हौसला टूटते देखा तो उसने चीख़ चीख़ कर उन्हें उभारा और उनकी हिम्मत बन्धाई। तईमा इब्ने अदी को जोश आया और वह मस्त हाथी की तरह झूमता हुआ निकला और हज़रत अली (अ.स.) के नैज़े का शिकार हो गया। उसके बाद अब्दुल्लाह इब्ने मंज़िर और हुरमुल इब्ने उमर गरजते , दनदनाते हुए निकले , अली (अ.स.) ने उन्हें भी तलवार की बाढ़ पर रख कर लुक़मये अजल बना दिया इसी तरह हज़ला पेचो-ताब खाता हुआ अली के सामने आया और एक वार मे ठण्डा हो गया यह अबु सुफियान का बेटा और मुआविया का भाई था।

अमीरूल मोमेनीन (अ.स.) की तलवार ने जब आठ दस मुश्रेकीन का खून पिया तो दुश्मनों की सफों में खलबली मच गयी और दूबदू लड़ने के बजाये जंगे मग़लूबा के लिये बढ़ने लगे। हुजूर (स.अ.व.व.) ने जब यह देखा कि दुश्मन इजतेमाई हमले के लिये आगे बढ़ रहे हैं तो आपने भी इस्लाम के जॉनिबदारों को मुश्रेकीन पर इजतेमायी हमले का हुक्म दिया। चुनानचे एक साथ तलवारें बेन्याम हुई , कमानें कड़कीं और ऐसा घमासान का रन पड़ा कि तलवारों की झन्कार और तीरों की बौछार से मैदाने कारज़ार गूँज उठा। मुसलमान सफों को चीरते और मुश्रेकीन को तहे तेग़ करते हुए आगे बढ़ने लगें। बिल आख़िर हज़रत अली (अ.स.) 9 और हज़रत हमज़ा के पुरज़ोर हमलों ने दुश्मनों के क़दम उख़ाड़ दिये और वह इस तरह तितर बितर हुए कि जिस तरह शेर के हमलाआवर होने पर भेड़ें तितर बितर हो जाती हैं।

सीद से रवायत है कि मैंने बद्र के दिन अली (अ.स.) को लड़ते देखा है उनक सीने से घोड़े की हिनहिनाने की सी आवाज़े निकल रही थीं वह बराबर रजज़ पढ़ रहे थे और जब मैदान से पलटे तो उनकी तलवार खून से रंगीन थी। 1

जंग आख़री मरहले में दाख़िल हो चुकी थी , मुश्रेकीन का ज़ोर टूट चुका था। अबुजहल , उसका भाई आस नीज़ दिगर सरदाराने कुरैश कत्ल हो चुके थे चुनानचे मुख़ालेफ़ीने इस्लाम शिकस्त की आख़री मंज़िल पर पहुँच गये और उन्होंने जवाले आफ़ताब के बाद हथियार डाल दिये।

यह इस्लाम का पहला ग़ज़वा था जिसमें कुफ़्फ़ार के सत्तर आदमी क़त्ल हुए और सत्तर ही गिरफ़्तार हुए। बाक़ी अफराद ने भाग भाग कर अपनी जानें बचायी। मुसलमानों में सिर्फ चौदह आदमी शहीद हुए जिनमें छः मुहाजिर और आठ अन्सार थे। हज़रत अली (अ.स.) इब्ने अबुतालिब (अ.स.) की तलवार से हलाक होने वालों की तादाद पैंतीस बतायी जाती है।

यह फ़तेह तो दरअसल हक व सदाक़त , अदल व इन्साफ और अज़मे अमल की फ़तेह , हज़रत अली (अ.स.) के बाजुओं की रहींने मिन्नत है और आप ही के सर इस जंग की कामयाबी व कामरानी का सेहरा है। यह जंग 17 रमजान बरोज़ जुमा सन् 2 हिजरी में वाक़े हुई।

सन् 2 हिजरी के दीगर ग़ज़वात व मुख़्तलिफ़ वाक़ियात

• माहे शाबान में रमज़ानुल मुबारक के रोज़े फ़र्ज़ किये गये और फितरे का हुक्म आया।

• माहे शव्वाल में ग़ज़वा कुरक़तुल कदर वाक़े हुआ। बनि सलीम व बनि गतफ़ान पर आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने चढ़ाई की जिसके नतीजे में वह लोग फरार हुए और उनके पाँच सौ ऊँटों पर मुसलमानों का क़ब्ज़ा हुआ।

• माहे ज़ीक़दा में ग़ज़वा बनि क़ीनक़ा वाक़े हुआ और सात सौ यहूदी मदीने से शाम की तरफ़ जिला वतन किये गये।

• माहे ज़िलहिज में ग़ज़वा सवीक़ रूनुमा हुआ। उसका वाक़िया यह है कि जंगे बद्र के बाद अबुसुफियान ने क़सम खायी थी कि जब तक मक़तूलीन का बदला नहीं लूँगा उस वक़्त तक न सर में तेल डालूंगा और न औरत के पास जाऊँगा चुनानचे वह दो सौ सवारों को लेकर रसूले अकरम (स.अ.व.व.) की तलाश में निकला और मदीने से तीन मील की दूरी पर वाक़े एक गाँव में घुस कर वहाँ के लोगों के घरों में उसने आग लगा दी और दो आदमियों को क़त्ल कर दिया। आन हज़रत (स.अ.व.व.) को मालूम हुआ तो आपने उसका ताअक्कुब किया मगर वह भाग निकला और भागते वक़्त सत्तू क कुछ बोरियाँ छोड़ गया इसलिये यह ग़ज़वा सवीक़ के नाम से मशहूर हुआ।

• माहे रजब में क़िबला तबदील हुआ।

• इसी साल रोमियों ने ईरानियों को शिकस्त दी। इसी साल बकर बिन वायल और कसरी के दरमियान जंग हुई जिसमें ईरानियों का क़त्ले आम हुआ।

• मुहाजिरे अव्वल उसमान बिन मज़ऊन का इन्तेकाल हुआ और वह आन हज़रत (स.अ.व.व.) के हुक्म से बक़ी में दफ़्न हुए इसी साल मुश्रेकीन का सरदार अब्दुल्लाह बिन रबिया भी फ़ौत हुआ।

सन् 3 हिजरी

जंगे ओहद

मारका-ए- बद्र की शिकस्ते फाश ने मुश्रेकीन मक्का को निढ़ाल व बेहाल करके उन पर एक सकूत का आलम तारी कर दिया था। मगर उनकी यह आरज़ी ख़ामोशी उस समुन्द्र के मानिन्द थी जिसकी गहराईयों में तूफानी लहरें मचल रही हो। और उस जवाला मुखी की तरफ थीं जिसके सीने में लावा सुलग रहा हो। उनके दिलों में ग़म व गुस्सा और इन्तेक़ाम के शोले भड़क रहे थे चुनानचे इस ख़्याल के तहत कि कहीं जज़बये इन्तेका़म सर्द न पड़ जाये अबुसुफियान ने मक़तूलीन के वरसा पर रोने की पाबन्दी आयद कर दी थी। तबरी का ब्यान है कि एक शख़्स , जिसके तीन बेटे बदर में मारे गये लोगों की नज़रों से छिप कर मदीने से बाहर रोया करता था। और औरतें भी अरब के दस्तूर के मुताबिक़ अपने वरसा पर उस वक़्त तक नहीं रोती थीं जब तक उनका बदला न चुका लिया जाये।

तारीख़ से पता चलता है कि शिकस्त की निदामत , जानी व मानी नुक़सानात के एहसास , ज़ब्त गिरये की घुटन और जज़बये इन्तेकाम की शिद्दत ने उन मुश्रेकीन को एक फैसला कुन जंग के लिये फिर उभारा और यह तैयारियों में मसरूफ हो गये और अक़रेमा इब्ने अबुजहल , सफ़वान बिन उमय्या अब्दुल्लाह इब्ने रबिया और दूसरे सरकरदा लोगों ने गुज़िशता साल की तिजारत का मुशतरका मुनाफा जो पचास हज़ार मिसक़ाल सोना और एक हज़ार ऊँटों की सूरत में था जंगी मसारिफ के लिये मख़सूस कर दिया ताकि माली एतबार से मज़बूत होकर मुसलमानों से जंग लड़ी जा सके। लेहाज़़ा कुरैश मख़ारिजे जंग की तरफ से मुतमइन हो गये थे मगर उन्हें जंगजू अपराद की कमी का एसास था इस का तदारूक उन्होंने यूँ किया कि चन्द आतिश बयान शायरों और ख़तीबों को अपना नुमाइन्दा बना कर मुख़तलिफ़ क़बायल की तरफ भेज दिया कि वह लोग मुसलमानों के खिलाफ लोगों के जज़बात को उभार कर उन्हें कुरैश के तआवुन पर आमादा करें चुनानचे एक शायर अबुअज़्ज़ा अम्र इब्ने अब्दुल्लाह तहामा में आया और तहामा व बनी केनाना को अपने कलाम से मुतासिर करके कुरैश का हमनवा बना लिया और उनके सात आदमी कुरैश के लश्कर में शामिल हो गये और इसी तरह बढ़ते बढ़ते लश्कर की तादाद तीन हज़ार तक पहुँच गयी।

अबुसुफियान की ज़ौजा हिन्दा , जिसका बाप अतबा , भाई वलीद और बच्चा शीबा बदर में मारे गये थे उसने भी सुलगती हुई चिन्गारी को भड़कता हुआ शोला बनाने मं कोई कसर उठा न रखी और चौदह औरतों की सरकर्दा बन कर फौज में शामिल हो गयी। उन औरतों में ख़ालिद बिन वलीद की बहन फात्मा , अम्र इब्ने आस की बीवी रीता , अकरम इब्ने अबु जहल की ज़ौजा उम्मे हकीम बिन्ते हारिस , तलहा इब्ने उस्मान की बीवी सलागा बिन्ते सईद , हारिस इब्ने अबुसुफियान की बीवी रमला बिन तारिक़ और सफवान इब्ने उमय्या की बीवी बिर्रा इब्ने मसऊद भी शरीक थी। उन औरतों के शामिल होने का मक़सद यह था कि वह मैदाने कारज़ार में जंग आज़माओं के जज़बात को भड़कायें और पसपायी की सूरत में उन्हें गै़रत दिला कर मैदान में वापस लायें।

अबुसूफियान की क़्यादत में जब यह लश्कर मक्के से रवाना हुआ तो अब्बास इब्ने अब्दुल मुत्तलिब ने बनि ग़फ़्फार के एक शख़्स के ज़रिये आन हज़रत (स.अ.व.व.) को पैग़ाम भेजा कि कुरैश का लश्कर मदीने पर हमला आवर होने के लिये मक्के से निकल चुका है आप इस यलगा़र को रोकने का बन्दोबस्त कर लें ऐसा न हो कि वह आचानक हमला कर दे। इस बरवक़्त इत्तेला के मिलते ही आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने दो आदमियों को मदीने के बाहर भेजा कि वह देखें भाले कि यह ख़बर कहाँ तक दुरुस्त है। उन्होंने पलट कर बताया कि अब्बास की भेजी हुई इत्तेला सही है और कुरैश का लश्कर मारधाड़ करता हुआ इतराफे मदीना में पहुँच चुका है और किसी वक़्त भी वह हमला आवर हो सकता है।

मोअर्रिखी़न ने आम तौर पर यह लिख दिया है कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) मदीने मे महसूर रह कर यह जंग लड़ना चाहते थे मगर राय आम्मा से मुतासिर हो कर आप मदीने से बाहर निकल पड़े। अगर यह तसलीम कर लिया जाये कि पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की यही राय थी तो इस पर अमलदरामद करने में क्या क़बाहत थी ? जबकि तारीख़ यह बताती है कि जो लोग बाहर निकलने पर इसरार कर रहे थे उन्होंने पैग़म्बर (स.अ.व.व.) को हथियारों से आरास्ता होकर बाहर निकलते देखा तो कहने लगे या रसूल उल्लाह! अगर आप मदीने में रह कर दुश्मनों का मुक़ाबला करना चाहते हैं तो हमें इसेस इन्कार नहीं है। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने फरमायाः-

(नबी के लिये यह मुनासिब नहीं कि जब वह जंग का लिबास पहन ले तो वह जंग किये बग़ैर उसे उतारे) 1

पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) के यह अल्फाज़े इत्मेनाने क़लब , इस्तेक़लाले है। जिससे यह साफ ज़ाहिर है कि आप किसी ख़ारजी दबाओ के ज़रे असर शहर से निकलने पर मजबूर नहीं हुए बल्कि जोशे शुजाअत और वलवलए जेहाद का तक़ाज़ा ही यही थी का लश्करे ग़नीम से खुले मैदान में मुक़ाबला किया जाये। पैग़म्बर (स.अ.व.व.) का यह इरशाद न सिर्फ उनके नाक़ाबिले तसख़ीर अजडाएम और हौसलों की बुलन्दी का तरजुमान है बल्कि तमाम मुसलमानों के लिये भी अज़म व अमल का एक ज़री दर्स है।

चुनानचे आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने इब्ने मकतूम को मदीने में मुन्तज़िम व निगरां मुक़र्रर किया और 14 शव्वाल सन् 3 हिजरी को नमाज़े जुमा के बाद एक हज़ार की जमीयत के साथ मदीने से निकल खड़े हुए और एक क़रीबी रास्ते से कोहे ओहद की जानिब रवाना हो गये जहाँ कुरैश का लश्कर 12 शव्वाल से पड़ाव डाले हुए था। अभी पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने आदा रास्ता तय किया होगा कि अब्दुल्लाह इब्ने अबी अपने तीन सौ साथियों समेत लश्कर से कट कर मदीने वापस आ गया। अब मुसलमानों की तादाद सिर्फ सात सौ रह गयी जिन्हें तीन हज़ार जंगजूओं से मुक़ाबला करना था। पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने उन्ही सात सौ लश्करियों के साथ पहाड़ के दामन में पड़ाओ डाल दिया। और दूसरे दिन 15 शव्वाल को दोनों तरफ़ की फौजों ने अपने अपने मोर्चे संभाल लिये। मुश्रेकीन की तादाद बहुत ज़्यादा थी और जंगी असलहे भी इफ़रात मिक़दार में मोहय्या थे। इस लश्कर में सात सौ ज़िरा पोश थे। तीन हज़ार ऊँट और दो सौ घोड़े थे। जबकि मुसलमानों के पास सिर्फ एक सौ ज़िरेह और दो अदद घोड़े थे। फौज की क़िल्लत और सामाने जंग की कमी की वजह से ज़रुरत थी कि लश्कर को इस तरह तरतीब दिया जाये कि दुश्मन को हर सिम्त से हमला करने का मौक़ा न मिल सके चुनानचे तहाफुज़ी तदाबीर के पेशे नज़र आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने कोहे ओहद को पसे पुश्त रख और मदीने पर पचस कमानदारों का एक दस्ता अब्दुल्लाह इब्ने जबीर के ज़ेरे निगरानी ख़ड़ा कर दिया और उसे ताकीद कर दी कि ख़्वाह फतह हो या शिकस्त , जब तक उसे हुक्म न दिया जाये किसी हालत में वह अपना मोर्चा न छोड़े। जंगी हिकमते अमली के एतबार से ये कार्रवाई निहायत ज़रुरी थी , अगर यह इन्तेज़ाम न किया जाता तो कुफ़्फार उधर से हमला आवर हो कर लश्करे इस्लाम को पने मुहासिरे में ले लेते और मुसलमानों को अपनी जाने बचाना मुश्किल हो जाता।

इस नज़म व इन्सेराम के बाद आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने बक़िया लश्कर की सफ़ बन्दी की। मैमना पर साद बिन एबादा और मैसरा पर असीद इब्ने हफ़ीर को मुकर्रर करके रायते जंग हज़रत अली (अ.स.) इब्ने अबुतालिब और लवाये मसअब इब्ने उमैर को दिया।

कुफ़्फ़ार ने भी अपने लश्कर को तरतीब दिया। मैमना का सरदार ख़ालिद इब्ने वलीद और मैसरा का अकरमा इब्ने अबुजहल को बनाया। सवारों का अफ़सर अम्र इब्ने आस और तीर अन्दाज़ों का सरदार अब्दुल्लाह इब्ने रबिया को मुक़र्रर किया। क़लबे लश्कर में जहाँ कुरैश ने अपना मशहूर बुत हुबल , एक ऊँट पर लाद रखा था , अबुसुफियान जाकर खड़ा हो गया और लश्कर का परचम बनि अब्दुलदार की एक फर्द तलहा इब्ने उसमान के सुपुर्द किया गया। जब सब कील काटा दुरुस्त हो चुका तो मुश्रेकीन ने (ऐले हुबल) (हुबल का बोल बाला रहे) का नारा लगाया और हिन्द के साथ दूसरी औरतें सफों से आगे निकल कर लश्करियों में जोश पैदा करने के लिये दफ के साज़ पर ठुमक ठुमक कर गाने लगीं। तीन शेरों का तरजुमा मुलाहेज़ा फरमायें।

1. हम सितारों की बेटियाँ हैं , क़ालीनों पर नाज़ों अदा से इस तरह चलते हैं जिस तरह सुबुकरू परिन्दा चलता है।

2. हमारी मांग में मुश्क भरी है और गर्दनों में मोती जगमगा रहे हैं अगर तुम आगे बढ़ोगे तो हम तुम्हें गले से लगा लेंगे।

3. हम तुम्हारे लिये मसन्द बिछा कर तुम्हें जामे सुरूर व निशात पिलायेंगे और तुम ने अगर पीठ मोड़ी तो हम तुम्हें छोड़़ देंगे गोया तुम से कभी चाहत ही न रही हो।

यह तराना ख़त्म हुआ , तबले जंग की आवज़ गूँजी और दस्त ब दस्त जंग का आग़ाज़ हुआ। मुश्रकेीन का अलमब्रदार तलहा इब्ने उसमान मैदान में आया और उसने तन्ज़ आमेज़ लहजे में पुकार कर कहा। मुसलमनों! तुम्हारा अक़ीदा है कि तुम में से कोई मारा जाये तो वह जन्नत में जाता और हममें से कोई क़त्ल हो तो उसका ठिकाना जहन्नुम है। लेहाज़ा तुम में से जो जन्नत चाहता हो वह मुझ से लड़े। हज़रत अली 0 (अ.स.) उसके मुक़ाबले को निकले। तलहा ने झपट कर आप पर तलवार का वार किया। आपने उसका वार ख़ाली देकर वह तलवार मारी की एक साथ उसकी दोनों टाँगे कट गयी और लड़खड़ा कर ज़मीन पर ढ़ेर हो गया। मुसलमानों ने नाराये तकबीर बुलन्द की। अमीरूल मोमेनीन ने उसका सर काटना चाहा तो देखा कि वह बरहना है , इस हालत में आपने उस पर दूसरा वार करना मुनासिब न समझा और तड़पता सिसकता यूँ ही छोड़ दिया। आख़िर उसने थोड़ी देर ज़मीन पर सर पटकने के बाद दम तोड़ दिया। तलहा के मारे जाने से मुश्रेकीन के हौसले परस्त हो गये और आम बेदिल सी पैदा हो गयी। एक एक करके लड़ने के बजाये उन्होंने इजतेमायी हमला कर दिया। मुसलमानों ने भी क़दम आगे बढ़ाये , कमाने कड़कीं , तलवारों से तलवारें टकरायीं और घमासान की लड़ाई शुरू हो गयी। हज़रत अली (अ.स.) और हमज़ा के हमलों से दुश्मनों की सफें उलटने लगी और एक तहलका मच गया।

अबु दजाना अन्सारी अपन सर में सुर्ख़ पट्टी बाँदे हुए जिस तलवार से दुश्मनों पर हमला कर रहे थे वह रसूल ख़ुदा (स.अ.व.व.) ने मरहमत फरमायी थी। आप सफों को तहोबाला करते हुए वहाँ तक पुहँच गये जहाँ कुफ्फ़ार की औरतें दफ़ बजा जबा कर अपने नग़मों से लश्करियों में जोश पैदा कर रहीं थी आपने तलवार उठायी और चाहा कि हिन्द बिन्ते अतबा को ठिकाने लगा दें मगर इस ख़्याल से हाथ रोक लिया कि रसूल (स.अ.व.व.) दी हुई तलवार को एक नजिस व नापाक औरत के खून से रंगना मुनासिब नहीं है।

तलहा बिन उसमान के बाद उसमान बिन अबी तलहा ने लश्कर का अलम बुलन्द किया था। हज़रत अली (अ.स.) फौज़े रोंदते कुचलते उसके करीब पहुँचे और तलवार का वह हाथ मारा कि उसका सर तन से जुदा हो गया। ग़र्ज़ कुरैश का जो शख़्स भी परचम अपने हाथ में लेता अली 0 (अ.स.) के हाथों मौत के मुँह में चला जाता यहाँ तक कि आपने आठ अलमब्रदारों को मौत के घाट उतार दिया। इब्ने असीर का ब्यान है कि जिसने कुरैश के तमाम परचम ब्रदारों का ख़ातमा किया वह अली (अ.स.) थे) 1

परचम ब्रदारों के क़त्ल से मुसलमानों के हौसले बढ़ गये थे लेहाज़ा वह निहायत बे जिगरी से सीनों को छेदते , सरों का उड़ाते और सफों को उलटते आगे बढ़ते रहे यहाँ तक कि मुश्रेकीन के पाओं मैदान से उखड़ गये। हुबल को ख़ाक आलूद छो़ड़ कर अबु सूफियान भाग खड़ा हुआ और उसके साथ कुरैश की औरतें भी लहंगे और पाईन्चे समेट समेट कर इधर उधर फगने लगीं , लश्करी भी एक तरफ को भागे। मुसलमानों ने जब मैदान ख़ाली होते और फोजों को भागते हुए देखा तो उन पर हिर्स व तमा की कमज़ोरी ग़ालिब आ गयी और वह दुश्मन की तरफ से ग़ाफिल होकर माले ग़नीमत पर टूट पड़े। पहाड़ी दर्रे पर तैयनात अब्दुल्लाह बिन जबीर के दस्ते ने जब माले ग़नीमत लुटते देखा तो वह भी दौड़ पड़ा। तबरी का कहना है किः- वह लोग ग़नीमत ग़नीमत की सदा बुलन्द करने लगे , अब्दुल्लाह ने कहा ठहरो। कया तुम्हें रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) का फ़रमान याद नहीं है , मगर उन्होंने ठहरने से इन्कार कर दिया और माले ग़नीमत लूटने के लिये अपनी जगह छोड़ कर चल दिये। 2

कमान्दारों की इस नाआक़बत अन्देशी और बेसबरी का नतीजा यह हुआ कि दर्रे को ख़ाली पाकर मुश्रेकीन के दो सौ आदमियों की एक जमीअत ने खालिद बिन वलीद और अकरमां बिन अबुजहल की क़्यादत में अक़ब से मुसलमानों पर अचानक हमला कर दिया और इस हमले को देख कर भागते हुए कुफ़्फ़ार फिर पलट आये और वह सामने से हमला आवर हो गये।

इस दो तरफ़ा यलग़ार से मुसलमान ऐसे हवास बाख़्ता हुए कि गर्द व गुबार की वजह से वह अपने आदमियों को भी न पहचान सके और बगै़र देखे भाले एक दूसरे पर तलवारें चलाने लगे और जंग का सारा नक़शा पलट गया , जीती हुई जंग शिकस्त में तबदील हो गयी। कुछ मुसलमान शहीद हुए कुछ ज़ख़्मी हो गये और कुछ भाग खड़े हुए। तबरी का कहना है किः-

(आन हज़रत (स.अ.व.व.) के असहाब आपको छोड़कर भाग निकले उनमें से कुछ मदीने पहुँच गये , हालाँकि पैग़म्बर (स.अ.व.व.) उन्हें पुकारते रहे कि ऐ बन्दगाने ख़ुदा! ऐ अल्लाह के बन्दों मेरे पास आओ , मेरे पास आओ।) 1

और कुरान मजीद कहता है-

(अज़ तजसअदून तलून) जब तुम पहाड़ पर चढ़े जा रहे थे

अला ओहद वल रसूल यदउकुम और रसूल पीछे से तुम्हें पुकार

यदउकुम फ़ी अख़राकम रहा था मगर तुम मुड़कर भी न देखते ते)

इस अफ़रा तफ़री और नफ़सा नफ़सी के आलम मे अनस इब्ने नज़र का गुज़र उस पहाड़ की चोटी की तरफ हुआ उन्होंने देखा कि कुछ सर छुपाये हुए बैठे हैं तो उन्होंने हैरत व इस्तेजाब से उन्हें देखा और कहा तुम लोग यहाँ क्या कर रहे हो ? उन लोगों ने कहा , रसूल उल्लाह तो क़त्ल कर दिये गये।

कहा कि तुम ज़िन्दा रह कर क्या करोगे ?

अल्लामा तबरी ने पहाड़ की चोटी पर बैठने वालों में हज़रत उमर और तलहा बिन अब्दुल्लाह का खुसूसियत से नाम लिया है और उनकी बाहमी गुफ़्तगू भी तहरीर की है जिसेस उनके ख़्यालात की तरजुमानी होती है वह लिखते हैः-

(चट्टान पर बैठने वालों में से कुछ लोगों ने कहा कि काश हमें कोई क़ासिद मिल जाता जिसके ज़रिय हम अबुसुफ़ियान के पास अमान की दरख़्वास्त करते। मुहम्मद (स.अ.व.व.) तो क़त्ल हो चुके , मुनासिब है कि हम अपनी क़ौम (मुश्रकेीन) की तरफ़ पलट जायें क़बल उसके कि वह आकर हमें भी क़त्ल कर दें) 2

सही बुख़ारी में है कि हज़रत उमर और तलहा के साथ हज़रत अबुबकर और हज़रत उसमान भी भागे और दुरेमन्शूर और कनजुल आमाल में है कि यह हज़रात भी पहाड़ की चोटी पर चढ़ गये थे और तफ़सीरे दुरे मंशूर सफ़हा 288, ज़िल्द 2 और तफ़सीरे इब्ने जरिर में है कि हज़रत उमर ने कहा कि जब जंगे ओहद में काफ़िरों ने मुसलमानों को शिकस्त दी तो मैं भाग कर पहाड़ पर चढ़ गया और उस वक़्त मेरी यह हालत थी कि पहाड़ी बकरी की तरह कूदता फिरता था। और इमामे राज़ी ने तफ़सीरे कबरी जिल्द 3, (स.अ.व.व.) 74 में लिखा है कि भागने वालों में हज़रत उमर भी हैं मगर वह इब्तेदा में नहीं भागे और दूर नहीं गये बल्कि भाग कर पहाड़ पर रूके हैं नीज़ गुरेज़ करने वालों में उसमान भी थे जो साद और अक़बा के साथ दूर तक भाग गये थे और तीन दिन के बाद वापस तशरीफ़ लाये।

इब्ने असीर ने असदुल ग़ाबा में हज़रत अली 0 से रिवायत की है कि आपने फरमायाः- जब आम भगदड़ मची तो पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) मेरी नज़रों से ओझल हो गये मैंने मक़तूलीन की लाशों में देखा भाला मगर कहीं नज़र न आये चुनानचे मेरे लिये यही बेहतर था कि मैं लड़ते लड़ते क़त्ल हो जाऊँ मैंने तलवार निकाली और दुश्मन की सफों पर टूट पड़ा जब कुफ्फार का रेला तितर बितर हुआ तो मैने देखा कि पैगम़्बरे अकरम (स.अ.व.व.) मैदान में साबित क़दम खड़े हैं।

इससे मालूम होता है कि हज़रत अली (अ.स.) पैग़म्बर (स.अ.व.व.) को तन्हा छोड़ कर एक लम्हे के लिये भी मैदान से इधर उधऱ नहीं हुए। अपनी जान से बेनयाज़ होकर दुश्मन की सफों पर हलमा आवर होते रहे , तीरों तलवारों के वार सहते रहे और पैग़म्बर (स.अ.व.व.) के सीना सिपर होकर मुश्रेकीन की फौजों को दरहम बहरम करते रहे इब्ने साद का बयान है कि ओहद के दिन जब लोग भाग खड़े हुए तो अली (अ.स.) रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) के साथ साबित क़दम रहने वलों में थे और आपने मौत पर पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की बैयत की) 2

इसी हंगामाये दारोगीर में सबा इब्ने अब्दुल उज़ा हज़रत हमज़ा के सामने से गुज़रा , आपने उसे ललकारा और कहा , ऐ ख़तना करने वाली के बेटे ठहर कहाँ जाता है ? यह कहकर आप उस पर झपट पड़े और तलवार का ऐसा हाथ मारा कि वह उसी जगह ठंडा हो गया। जबीर इब्ने मुताअम (जिसका चचा तईमा इब्ने अदी हज़रत अली (अ.स.) के हाथों जंगे बद्र में क़त्ल हुआ था) अपने ग़ुलामों वहशी से यह वादा किया था कि अगर वह मुहम्मद अली और महज़ा में से किसी एक को भी क़त्ल कर देगा तो वह उसे आज़ाद कर देगा और हिन्द ने भी अपने शबिस्ताने ख़लवत में नेहाल करने का ख़्वाब दिखाया था चुनानचे वहशी के लिए पैग़म्बर इस्लाम या हज़रत अली को क़त्ल करना तो मुश्किल था मगर वह हज़रत हमज़ा की ताक में लगा रहा और मौक़ा मिलते ही उसने अपी पूरी कुव्वत से अपना माल उनकी तरफ़ फेंका जो नाफ़ पर लगा और पेट को चीरता हुए दूसरी तरफ़ निकल गया इस मुहलिक़र्ब के बावजूद आप उसकी तरफ़ दौड़े मगर कूवत ने साथ न दिया और फ़र्शे ख़ाक पर गिर कर शहादते उज़मा पर फ़ाएज़ हुए।

जंग अमलन ख़त्म हो चुकी थी। कहा जाता है कि इस ग़ज़वा में सत्तर ( 70) मुसलमान शहीद हुए। मुशरेकीन ने अगर चे मक़तूलीने बद्र का बदला ले लिया था मगर उस पर उनका जोशे इन्तेक़ाम फ़रो न हुआ , उन्होंने इन्सानियत को बलाये तक़ रखकर लाशों से भी बदला लिया। चुनानचे माविया इब्ने मुग़ीरा बिन अबुलआस ने हज़रत हमज़ा की मय्यत की नाक काटी और हिन्द बिन्ते अतबा ने उनका शिकम चाक करके कलेजा चबाया और उँगलियां काट कर उनका हार बनाया। उसकी देखा देखी दूसरी औरतों ने भी शहीदों के नाक कान काटे और उन्हें रस्सियों में पिरो कर गले में पहना। अबुसुफियान ने भी हज़रत हमज़ा की लाश की बेहुरमती की और नैज़े की अनी से उनके चेहरे को मज़रूब किया। उस बदबख़्त का जज़बाए इन्तेक़ाम इस्लाम लाने के बाद भी बदस्तूर बरक़रार रहा चुनानचे हज़रत उस्मान के दौरे ख़िलाफ़त में उसने हज़रत हमज़ा की क़ब्र पर ठोकर मारी और कहा ऐ अबुअमारा (हमज़ा) वह हुकूमत जिस पर आपस में तलवारें चलाते थे आज हमारे लड़के के हाथ में है जिससे वह खेल रहे है) 1

इस ख़ूनी मारके में दो औरतों का किरदार जो मैदान जंग में ज़ख़्मों की मरहम पट्टी और पानी पिलाने के लिये थीं , फ़रामोश नहीं किया जा सकता। उनमें से एक उम्मे अमारा नसीबा बिन्ते काब हैं जिनका शौहर ज़ैद इब्ने आसिम और दो बेटे हबीब और अब्दुल्लाह उस जंग में शहीद हुए थे , उस ख़ातून ने जब देखा कि पैग़म्बर इस्लाम (स.अ.व.व.) तीरों की ज़द मे हैं तो आन हज़रत (स.अ.व.व.) के आगे खड़ी हो गयी और तीरों को अपने सीने पर रोक रोक कर पैग़म्बर (स.अ.व.व.) का बचाव करती रहीं और जब इब्ने क़मय्या तलवार लेकर आन हज़रत (स.अ.व.व.) पर हमला आवर हुआ तो तलवार लेकर उसके मुक़ाबले में खड़ी हो गयी यहाँ तक कि आपके बाज़ूओं पर तलवार पड़ी और हाथ कट गया।

दूसरी ख़ातून उम्मे ऐमन हैं , जिन्होंने मुसलमानों को जंग से पीठ मोड़ कर भागते दखा तो उनकी ग़ैरत ईमानी जोश में आयी। और तो कोई बस चल न सका , मिट्टी और ख़ाक उठा कर उनके चेहरों पर फेंकती जाती थीं कि अपनी तलवार मुझे देता जा और यह तकला लेता जा और घर में बैठ कर सूत कात। 2

उन औरतों के मुक़ाबले में मर्दों के किरदार को देखा जाये तो मैदान छोड़ने वालों की फेहरिस्त में ऐसे ऐसे लोगों के नाम भी तारीख़ के सफ़हात पर बस्त हं जिनकी ज़ात से इस कठिन मरहले पर सिबाते क़दम की उम्मीद की जा सकती थी। मगर हज़रत अळी (अ.स.) , अबुदजाना , सुहैल इब्ने हनीफ , आसिम इब्ने साबित , मिक़दाद इब्ने अम्र , साद इब्ने माज़ , असीद इब्ने हफ़ीर और जुबैर इब्ने अवाम के अलावा और कोई साबित क़दम नज़र नहीं आता बल्कि उनमें से भी अकसर मैदान से रुगिरदा हो गये थे और फिर पलट कर आये थे। उन पलट कर वापस आने वालों में एक हज़रत अबुबकर भी थे। जैसा कि वह ख़ुद कहते है-

(औहद के दिन रसूल उल्लाह को छोड़कर जाने वालों में सबसे पहले पलट कर आया) 3

अगरचे इस क़ौल में यह सराहत नहीं कि यह वापसी कब और किस वक़्त हुई ? लेकिन वाक़ियात से यह ज़ाहिर है कि आपकी वापसी ख़ातमए जंग के बाद हुई इसलिए कि अगर जंग के दौरान उनकी वापसी होती तो किसी न किसी मौक़े पर तलवार चलाने या तलवार खाने वालों में उनका नाम ज़रुर आता जब कि लड़ने वालों में भी मजरूह हुआ या उसने किसी को मज़रू किया , उसका नाम तारीख़ में आये बगै़र नहीं रहा। यहाँ तक कि तलहा की एक उंगली पर ज़रा सी ख़राश आ गई थी तो उसे भी तारीख़ ने महफुज़ कर लिया। अलबत्ता उनका नाम आता है तो उस मौक़े पर जब जंग तमाम हो गई और पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) चन्द लोगों के साथ पहाड़ की घाटी में तशरीफ़ फरमां हुए।

हज़रत उमर के मुतालिक़ हम तहरीर कर चुकें है कि वह पहाड़ की चोटी पर थे और अबुसुफियान से अमान हासिल करके अपने साबक़े दीन की तरफ पलट जाने के बारे मे सोच रहे थे। चुनानचे वह ख़ुद भी एतराफ करते हैं किः-

(हम ओहद के दिन रसूल उल्लाह को छोड़कर पहाड़ की चोटी पर चढ़ गये थे)

हज़रत उस्मान बिन अफ़ान उस गिरोह में शामिल थे जो तीन दिन बाद पलट कर आया था। चुनानचे इब्ने असीर का कहना है किः-

(उन भागने वालों में उस्मान इब्ने अफ़ान और दूसरे लोगो शामिल थे जो औस में तीन दिन ठहरने के बाद नबीये अकरम (स.अ.व.व.) के पास आये। आपने देखा तो फ़रमाया कि तुम लोग तो बहुत दूर निकल गये थे) 2

हज़रत अली (अ.स.) उस ग़ज़वा में जिस साबित क़दमी और पामर्दी से लड़े वह इस्लामी जेहाद का एक अज़ीम नमूना और तारीख़ का एक मिसाली कारनामा है। हालांकि आप पै दर पलै हमलों से निढ़ाल और तीरों व तलवारों से घायल हो चुके थे। अल्लामा सीवती का ब्यान है कि ओहद के दिन आपके जिस्म पर तलवार की सोलह ज़रबें कारी लगीं थी। 3 तारीख़ों की सराहत से पता चलता है कि इस जंग में सराकरे दो आलम (स.अ.व.व.) की पेशानीये अक़दस पर कारी ज़ख़्म आया और आपके दो दाँत भी शहीद हुए।

इस ग़ज़वा में मुसलमानों को फ़तहा तो न हासिल हो सकी फिर भी हज़रत अली (अ.स.) , जनाबे हमज़ा और दूसरे चन्द जॉबाज़ों की साबित क़दमी ने इस्लाम को शिकस्त की बदतरीन सूरत से बचा लिया। शिकस्त किसी नागहानी हादसे की वजह से नहीं हुई बल्कि यह इख़तेलाफ़ राय और मुसलमानों की बेज़ाबतिगी का क़हरी नतीजा थी।


शोहदाये औहद की तदफ़ीन

अब शोहदाए ओहद की मय्यतों की तदफ़ीन का मरहला दर पेश था। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने सबसे पहले हज़रत हमज़ा की मय्यत पर इस आलम में नमाज़े जनाज़ा अदा की कि आपकी आँखों से ज़ारोक़तार आँसू जारी थे। इब्ने मसऊद कहते हैं कि हमने रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) को इस तरह रोते कभी नहीं देखा जिस तरह आप हज़रत हमज़ा पर रोये थे। 4 हज़रत हमज़ा की नमाज़े जनाज़ा से फारिग़ होकर आप दूसरे शोहदा की तरफ़ मुतवज्जा हुए और फ़रदन फ़रदन उनकी मय्यतो पर नमाज़ पढ़ी , फिर दो दो करके तमाम शोहदा खून आलूद कपड़ों में दफ़्न कर दिये गये और हज़रत हमज़ा के साथ अब्दलुल्लाह इब्ने हजश दफ़्न हुए। रवायत में यह भी है कि उन्हें तन्हा दफ़्न किय गया। शोहदाये ओहद के कुछ लाशे मदीने के कब्रिस्तान बक़ी में भी दफ़्न हैं जिन्हें उनके वुरसा पहले ही उठा लाये थे।

मराजियत

आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने 22 शव्वाल को ओहद से मदीने के लिये मराजियत फ़रमायी। और जब अन्सार के मुहल्ले से गुज़रे तो आपने खुवातीन के रोने और नौहा व मातम की आवाज़े सुनीं। दरयाफ़्त करने पर मालूम हुआ कि अन्सार की औरतें ओहद में शहीद होने वाले अज़ीज़ों और रिश्तेदारों पर पर गिरया कर रही हैं। आप की आँखो में आँसू आ गये और फ़रमाया , क्या हमज़ा पर रोने वालियां नहीं हैं ? अन्सार ने सुना तो अपनी औरतों से कहा कि वह आन हज़रत (स.अ.व.व.) के यहाँ हज़रत हमज़ा का पुरसा देने जायें और उन पर गिरया व मातम करें चुनानचे अन्सार की औरतें जनाबे फ़ातमा ज़हरा (स.अ.व.व.) के घर में जमां हुई और अपने अज़ीज़ों की तरह हज़रत हमज़ा पर नौहा व मातम किया , आन हज़रत (स.अ.व.व.) मस्जिद में तशरीफ़ फ़रमां रहे और रोने वालियो के हक़ में दुआए ख़ैर करते रहे। इब्ने साद का कहना है कि अन्सार की औरतों में आज तक यह दस्तूर चला आ रहा है कि जब उनके यहाँ किसी का इन्तेक़ाल होता है तो मरने वाले पर गिरया से पहले हज़रत हमज़ा पर गिरया करती हैं। 1

तीसरी हिजरी के मुख़तलिफ़ वाक़ियात

• ओहद की जंग के चन्द ही दिनों के बाद ग़जवए हमरतुल असद ज़हूर पज़ीर हुआ। चूँकि अबुसुफ़ियान का इरादा व नज़रिया इस्तेहसाले इस्लाम का था इसलिये वह ओहद से निकल कर आठ मील के फा़सले पर एक मुक़ाम रुहा में ख़ेमाज़न हो गया और मदीने पर हमले की तैयारी करने लगा। आन हज़रत (स.अ.व.व.) को मालूम हुआ तो बावजूद इसके की आपके जिस्म पर आये हुए ज़ख़्म अभी मुन्दामिल न हुए थे , मुजाहेदीन की एक जमाअत के साथ रूहा की तरफ चल पड़े। यह सुन कर कि मदीने से मुसलमानों का एक बड़ा लश्कर आ रहा है तो अबुसुफियान अपना डेरा ख़ेमा उख़ाड़ कर भाग निकला लेकिन उसके दो आदमी अबुअज़ा शायर और मुआविया इब्ने मुग़ीरा पकड़े गये जिन्हें मुसलमानों ने मौत के घाट उतार दिया।

• इसी साल हज़रत इमामे हसन अलैहिस्सलाम की विलादत वाक़े हुई।

• रसूलउल्लाह (स.अ.व.व.) ने इसी साल हफ़सा बिन्ते उमर से अक़द फ़रमाया।


(सन् 4 हिजरी)

सरिया अबु सलमा

मुहर्रम सन् 4 हिजरी में पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) को मालूम हुआ कि तलहा और खुलीद मदीने पर हमला की ग़र्ज़ से पेश क़दमी कर रहे हैं। आपने अबु सलमा की क़दायत में एक सौ पचास मुहाजिरीन व अन्सार की एक जमीअत मदाफ़ियत के लिये रवाना की। मुश्रकेीन मरऊब होकर इधर उधऱ मुन्तशिर होगये और मुसलमानों को कोई न मिल सका। आख़िरकार ये लोग मदीने वापस आ गये।

सरिया इब्ने अनीस

सफ़र सन् 4 हिजरी में सुफ़ियान बिन ख़ालिद जो कोहिस्तानी क़बीले ग़िज़्ज़त का रईस आज़म था मुश्रेकीन के इशारों पर हमले की तैयारी में मसरूफ़ हुआ। आन हज़रत (स.अ.व.व.) को पता चला तो आपने अब्दुल्लाह इब्ने अनीस को एक फौजी दस्ते के साथ उसकी तनबीह को भेजा। इब्ने अनीस ने वहाँ पहुँच कर किसी तरकीब से सुफ़ियान इब्ने ख़ालिद को क़त्ल कर दिया और वापस चले आये।

रजीय का अलमिया

इस अलमिया का इजमाल यह है कि क़बाएले अज़ल और फ़ारा ने पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) के पास अपना एक वफ़द भेजा और कहलवाया कि हम लोग इस्लाम लाना चाहते हैं लेहाज़ा चन्द मुबलेग़ीन को आप हमारे यहाँ भेज दें ताकि वह हमें कुरान व इस्लाम की तालीम दें। चुनानचे आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने मुरसिद इब्ने अबी मुरसिद ग़नवी की ख़्यादत में छः अफ़राद को अपने असहाब में से रवाना किया। जब यह लोग बतन रजीय में 1 पहुँचे तो मेज़बानों ने उनके साथ ग़द्दारी की और क़बीले हज़ील के लोगों को उनके ख़िलाफ़ उभार दिया और उन्होंने हमला करके सभी को क़त्ल कर दिया। 2

दूसरी रवायत यह है कि जब बनि हुज़ील के लोगों ने उन मुसलमानों पर हमला किया तो यह लोग भी मुक़ाबले पर आमादा हुए जिसके नतीजे में मुरसिद और उनके दो साथी मौक़े ही पर क़त्ल हो गये। बाक़ी तीन को उन्होंनें क़ैदी बना लिया और मक्के की तरफ़ ले चले , उनमें से भी एक सहाबी ने रास्ते में लड़कर जान दे दी बाक़ी दो को उन मलऊनों ने कुरैश के एक शख़्स के हाथ फ़रोख़्त कर दिया। जिसने जान लेवा ईज़ा रसानी के बाद फाँसी पर लटका दिया।

वाक़िया बैरे मऊना

माहे सफ़र सन् 4 हिजरी में क़बीले बनि आमिर का एक सरदार अबुबरा आमिर बिन मालिक , नज्द से मदीने आया और आन हज़रत (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में बारयाब हुआ। आप ने उसे इस्लाम की दावत दी। उसने कहा कि मुझे कोई पसोपेश नहीं है इस से क़बल यह होगी कि आप तबलीग़ के लिये एक जमाअत मेरे साथ रवाना करें जो वहाँ के लोगों को इस्लाम की दावत दें और उन्हें हमवार करें। आपने फ़रमाया कि अहले नज्द से अन्देशा है कि वह कहीं मेरे आदमियों को गुज़िन्द न पहुँचाये। अबुबरा ने कहा कि वह मेरी पनाह में होंगे और में उनके तहाफुज़ का ज़िम्मेदार हूँगा। इस अहद व पैमाने के बाद आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने अपने असहाब से सत्तर सहाबियों को अपने एक मकतूब के साथ नज़्द रवाना कर दिया। उन लोगों ने नज़्द पहुँच कर बर मऊना में क़्याम किया और एक सहाबी हिराम बिन मुल्जान को आन हज़रत (स.अ.व.व.) का वह मकतूब देकर अबुबरा के भतीजे आमिर बिन तुफ़ैल के पास भेजा जो सरदारे क़बीला था। आन हज़रत (स.अ.व.व.) का नाम सुनकर वह मलऊन इस क़दर आग बगूला हुआ कि उसने हिराम को क़त्ल करा दिया और अपने क़बीले वालों को मरमऊना में क़्याम पज़ीर मुसलमानों पर हमले के लिये उकसाया मगर उन लोगों ने अबुबर्रा के अहद व पैमान कि बिना पर इन्कार कर दिया चुनानचे उसने दूसरे क़बायल की मदद से मुसलमानों पर हमला किया और उन्हें तहे तेग़ कर दिया। सिर्फ़ दो सहाबी बचे जिन में से एक काअब इब्ने ज़ैद थे जो मक़तूल समझकर ग़लती से छोड़ दिये गये थे दूसरे अम्र बिन उमय्या थे जो कै़द कर लिये गये थे मगर बाद में आमिर ने उन्हें अपनी माँ की एक मिन्नत के सिलसिले में आज़ाद कर दिया। रेहाई के बाद अम्र बिन उमय्या की तरफ़ वापस पलटते हुए जब क़राक़तुल कदर के मुक़ाम पर पहुँचे तो उन्हें बनि आमिर के दो आदमी नज़र आये। वह उनकी ताक मे लग गये। ग़र्ज़ वह दोनों जब एक दरख़्त के साये में आराम करने की ग़र्ज से लेटे और उनकी आँख लगी तो अम्र ने अपने साथियों के क़सास में उन्हें क़त्ल कर दिया और मदीने आ गये।

ग़ज़वा बनी नज़ीर

मदीने पहुँचने पर उम्र बिन उमय्या को मालूम हुआ कि उसने बनी आमिर के दो आदमियों को क़त्ल किया है उन्हे पैगम़्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) तहरीरी अमान नामा दे चुके थे और जब आन हज़रत (स.अ.व.व.) इस वाक़िये से मुत्तला हुए तो आपने फ़रमाया कि हमें उन दोनों मक़तूलीन का खून बहा देना चाहिये। और चूँकि आप क़बायले यहूद , बनि क़नीक़ा , बनि कुरैज़ा और बनि नज़ीर से बाहमी तआउन व साज़गारी कामुहादयिदा किये हुए थे लेहाज़ा आपने चाहा कि उन दोनों मक़तूलों के खूनबहा के सिलसिले में बनि नज़ीर से कुछ रक़म बतरे क़र्ज़ या बतौरे एआनत हासिल करें चुनानचे इस ज़रेदेयत के मुतालिक़ उन्हें पैग़ाम भिजवाया , उन्होंने कहलवाया कि आप हमारे यहाँ तशरीफ लायें जैसा फ़रमायेंगे उस पर अमल किया जायेगा। पैग़म्बरे अकरम (स.अ.व.व.) चन्द सहाबा के हमराह बनि नजीर की आबादी में जो मदीने से मुत्तासिल थी , तशरीफ़ ले गये और काब बिन अशरफ़ नामी एक शख़्स के मकान की दीवार से टेक लगा कर बैठ गये। शायद क़ातलाना मन्सूबा पहले ही से तैयार था इसलिये बनि नज़ीर के कुछ लोगों ने एक शख़्स अम्र इब्ने हिजाश यहूदी को इस अमर पर मामूर किया कि वह इस दीवार पर चढ़कर जिसके नीचे आन हज़रत (स.अ.व.व.) तशरीफ़ फ़रमां हैं एक भारी पत्थर ऊपर से गिरा दें ताकि मुहम्मद (स.अ.व.व.) का काम तमाम हो जाये। लेकिन चूँकि ख़ुदा हबीब का ख़ुद मुहाफिज़ था इसलिये बदतरीन फेल के इरतेकाब से पहले ही जिबरईल के ज़रिये पैग़म्बर (स.अ.व.व.) को आगाह कर दिया। जैसा कि इब्ने ख़लदून ने लिखा है कि अल्लाह ने बज़रिये वही अपने पैग़म्बर (स.अ.व.व.) को इस वाक़िये की इत्तेला दी।

अब इस वही इलाही के बाद ज़ाहिर है कि पैगम़्बर (स.अ.व.व.) का वहाँ रूकना ख़तरे से ख़ाली न था चुनानचे आप तेज़ी से उठे और मदीने वापस आ गये। और मुहम्मद इब्ने मुसलमा के ज़रिये उन्हें पैग़ाम भेजा कि तुम लोगों ने मुहायिदा की ख़िलाफ़वर्ज़ी करते हुए मेरे क़त्ल का इक़दाम किया है लेहाजा़ दस दिन के अन्दर अपना तमाम जमा जत्था समेट कर यहाँ से निकल जाओ और किसी दूसरी जगह सुकूनत इख़तियार करो। बनि नज़ीर ने जब पैग़म्बर (स.अ.व.व.) का यह तहदीदी हुक्म सुना तो वह ख़ाएफ हुए और मदीना छोड़ने पर तैयार हो गये मगर रईसुल मुनाफ़ेक़ीन अब्दुल्लाह इब्ने अबी के भड़काने से कि दो हज़ार की जमीयत से तुम्हारी मदद करूँगा , उन्होंने मदीना छोड़ने का अपना इरादा तर्क कर दिया और आन हज़रत (स.अ.व.व.) के पास कहलवा दिया कि हम अपने घरों को नहीं छोड़ेंगे आपसे जो करते बन पड़े वह कर लीजिये।

यह एक तरह से दावते जंग व क़ताल थी। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने एक मुख़तसर सा लश्कर तरतीब दिया इसका अलम हज़रत अली (अ.स.) के सुपुर्द फ़रमाया 2 और उनके क़िलों की तरफ़ पेश क़दमी के लिये उठ खड़े हुए।

बनि नज़ीर ने जब इस्लामी लश्कर को आते देखा तो वह क़िला बन्द हो गये। मुसलमानों के क़िले को चारों तरफ़ से घेर लिया। बनि नज़ीर ने मुहासिरा देखा तो अन्दर से पत्थर और तीर बरसाने लगे मगर मुहासिरा तोड़ने में कामयाब न हुए चन्द चहूदी निकले ताकि तीरों की जद पर लेकर मुसलमानों को घेरा उठा लेने पर मजबूर करें। उनमें से एक शख़्स ने पैगम़्बर (स.अ.व.व.) का ख़ेमा तक कर तीरमारा। उधर पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने अपना ख़ेमा वहाँ से हटाकर एक पहा़ड़ी के दामन में नसब करने का हुक्म दिया और इधर हज़रत अली (अ.स.) उस तीर अन्दाज़ का पता लगाने के लिये उठ खड़े हुए। और एक तरफ़ चल दिये। सहाबा ने पैग़म्बर (स.अ.व.व.) से पूछा कि अली (अ.स.) किधर गये ? फ़रमाया , कहीं गये होंगे अभी वापस आ जायेंगे , इतने में हज़रत अली (अ.स.) एक यहूदी का सर लिये हुए तशरीफ़ लाये और उसे पैग़म्बर (स.अ.व.व.) के क़दमों में डाल दिया। और फ़रमाया , यही वह बदबख़्त है जिसने आपके ख़ेमे पर तीर मारा था। यह यहूदियों का मशहूर तीर अन्दाज़ ग़लूल है और अभी इसके नौ साथी क़िले के बाहर घूम रहे हैं अगर चन्द आदमी मेरे साथ चलें तो उन्हें भी पकड़ा जा सकता है। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने अबुदजना , सुहैल इब्ने हनीफ़ और दो चार आदमी आपके साथ कर दिये और आप उनके साथ निकल खड़े हुए। अभी थोड़ी ही दूर गये होंगे कि वह यहूदी नज़र आये आपने उन्हें घेकर कर वही सबको मौत के घाट उतार दिया।

बनि नज़ीर ने जब देखा कि उनके आठ दस आदमी मारे गये और अब्दुल्लाह इब्ने अबी के दो हज़ार आदमियों का कहीं पता नही है तो उन्हें सिकस्त व हज़ीमत का एतराफ़ करते हुए आन हज़रत (स.अ.व.व.) को पैग़ाम भिजवाया कि अगर आप हमारी जान बख़्शी करें तो हम इस सरज़मीन को छोड़ने पर तैयार हैं। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने अपनी रज़ मन्दी ज़ाहिर करते हुए फ़रमाया , कि उन्हें असलहा साथ ले जाने की इजाज़त नही दी जा सकती बाक़ी अपनी तमाम चीज़ों वह अपने साथ ले जा सकते हैं। चुनानचे यहूदियों ने अपने हाथों से अपने घरों को मिसमार किया मकानों के दरवाज़े और ख़ि़ड़कियाँ जो कुछ वह लाद सकते थे छ- सौ ऊँटों पर लादा और गाते बजाते हुए चल दिये उनमें से कुछ लोग शाम के इलाक़ें की तरफ़ चले गये और एक गिरोह जिसमें सलाम इब्ने अबुल हक़ीक़ , कुनान इब्ने रबीय और हई इब्ने अख़तब भी शामिल थे ख़ैबर में आकर आबाद हो गया बनि नज़ीर की ज़मीनें और बाग़ात माले ही फ़ी होने की बिना पर पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की मिलकियत क़रार पाये जैसा कि हज़रत उमर का कहना है कि बनि नज़ीर के अमवाल जो अल्लाह ने अपने रसूल (स.अ.व.व.) को दिलवाये वह आन हज़रत (स.अ.व.व.) की ख़ास मिलकियत थी। यह वाक़िया रबीउलअव्वल सन् 4 हिजरी में ग़ज़वा ओहद के छः माह बाद हुआ.

मुख़तलिफ़ वाक़ियात

• हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) की विलादत हुई

• आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने हज़रत उम्मे सलमा से अक़द फरमाया।

• हज़रत अली इब्ने अबुतालिब (अ.स.) की मादरे गिरामी हज़रत फ़ात्मा बिन्ते असद ने रेहलत फ़रमायी।

ग़ज़वा ज़ातुर जेक़ा

क़ौमें यहूद और कुफ़्फ़ारे कुरैश की मुश्तरका साज़िश ने अरब के तमाम क़बायल को इस्लाम के इस्तेसाल और मुख़ालेफ़त पर आमादा और हमवार कर लिया था जिसके नतीजे में छोटे बड़े क़बीले रोज़ अफजडूं सर उठा करते और मदीने पर फ़ौज कशी के ख़्वाब देखा करते थे। चुनानचे मुहर्रम सन् 5 हिजरी में क़बाएले इ्न्नमा रूसालेबा ने भी मदीने पर चढ़ाई का मन्सूबा बनाया और फौज़ें जमा करने लगे। आन हज़रत (स.अ.व.व.) को ख़बर हुई तो आप चार सौ सहाबा की एक जमीअत के साथ वहाँ पहुँचे। हजूर (स.अ.व.व.) की आमद का हाल सुन कर इधर उधऱ से आय़े हुए लोग भाग खड़े हुए और उन दोनों क़बीलों के अफ़राद भी पहाड़ों के दामन में मुन्तशिर हो गये। आन हज़रत (स.अ.व.व.) वहाँ एक हफ्ते मुक़ीम रहे मगर जब सामने कोई नहीं आया तो आपने मराजियत इख़्तेयार की और मदीने वापस आ गये।

ग़ज़वा दूमतुलजन्दल

दो मुतुलजन्दल के नसरानी सरदार इकीदर बिन अब्दुल मलिक ने भी इसी साल मदीने पर हलमा करने की ग़र्ज़ से मुख़तलिफ क़बाएल को जमा किया। आन हज़रत (स.अ.व.व.) भी एक हज़ार का लश्कर लेकर उसकी सर कूबी को रवाना हुए मगर जब आप वहाँ पहुँचे तो वह अपनी अपनी भेड़ें और बकरियाँ छोड़ कर फ़रार हो चुके थे जो मुसमलानों के क़बज़े मे आये। आन हज़रत (स.अ.व.व.) वापस हुए और 25 रबीउस्सानी को वारिदे मदीना हुये।

ग़ज़वा बनि मुसतलिक़

इसको ग़ज़वा मुरयसी भी कहा जाता है। यह दूसरी शाबान सन् 5 हिजरी में वकू पज़ीर हुआ। इसका मुख़तसर क़िस्सा यह है कि अरब के अबीज़रार की क़यादत में मदीने पर हलमा आवर होना चाहा। आन हज़रत (स.अ.व.व.) कने मुरयसी के पास उसका मुक़ाबला किया। 2 दीगर क़बाएल के अफ़राद जो बनि मुसतालिक़ की मदद के लिये इकट्ठा हुए थे सर पर पाँव रख कर भाग खड़े हुए। हारिस और उसके क़बीले के दस अफ़राद मौत के घाट उतार दिये गये दो सौ आदमियों की तादाद असीर हुयी। पाँच हज़ार भेड़ें और एक हज़ार ऊँट मुसलमानों के हाथ आये। हारिस की बेटी जूवेरिया मुसलमान होकर आन हज़रत (स.अ.व.व.) की ज़ौजियत में आयी। इस मौक़े पर सहाबा ने कहा कि हरमे रसूल (स.अ.व.व.) के अइज़्ज़ा व अक़रूबा क़ैद नीहं रह सकते चुनानचे तमाम क़ैदियों को छोड दिया जाये।

इफ़क का वाक़िया

इस ग़जवा (बनि मुसतालिक़) के सफ़र में आन हज़रत (स.अ.व.व.) की ज़ौजा हज़रत अयशा भी आपके साथ थीं चुनानचे वापसी में एक मुक़ाम पर मंजिल के दौरान उनकी हैकल कहीं गिर गयी जिसकी तलाश मे वह इस क़दर मसरूफ व सरगर्दा हुई कि आन हज़रत (स.अ.व.व.) का काफ़िला आगे बढ़ गया। आपके सारबान ने भी यह ख़्याल न किया कि आप महमिल से ग़ायब हैं चुनानचे वह भी ऊँट की मेहार थाम कर चलता बना और मोहतर्मा जंगल व बियांबान में तन्हा रह गयीं। आपने भी सोचा कि जब सारबान को महमिल के ख़ाली होने का एहसास होगा तो वह खुद ही पलट कर आयेगा इसलिए मुतमईन हो कर एक मुक़ाम पर सो गयी। क़ाफ़िले के पीछे सफ़वान बिन मुआतिल नामी एक नौजवान शख़्स गिरी पड़ी चीज़ों की देख भाल पर मामूर था। उसने हज़रत आयशा को जब तन्हा सोते हुए देखा तो अपने साथ ऊँट पर बिठा कर ले आया।

जो लोग आसतीन पैग़म्बर के साँप थे वह कब चूकने वाले थे ? उन्होंने हज़रत आयशा की इस परेशानी और सरगरदानी को उनीक बदनियती पर मामूल किया और उन पर तोहमतें आयद करके उनका मज़ाख़ उड़ाया। इस इल्ज़ाम व इस्तेहज़ा में जो लोग ज़्यादा नुमाया और पेश पेश थे उनमें हज़रत अबुबकर की ख़ाला ज़ाद बहन के साहबज़ादे , मुस्तह बिन असासा , अब्दुल्लाह बिन अभी मुनाफिक़ , ज़ैद बिन रफ़ाआ , हिसान बिन साबित , और हमना बिन्ते हजअश वग़ैरा के नाम ख़ास तौर पर क़ाबिले ज़िक्र हैं।

मुँह से नुकली हुई बात कोठे चढ़ी और तमाम लश्कर में शोहरा हो गया। आन हज़रत (स.अ.व.व.) को भी सख़्त सदमा हुआ यहाँ तक कि आपने आयशा के बारे में हज़रत अली 0 से मशविरा तलब किया उन्होंने फरमाया तलाक़ दे कर अलग कीजिये आपके लिये औरतों की कमी नहीं हैं। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने एक माह तक आयशा को मुँह नहीं लगाया। जब कुरान की आयत नाज़िल हुई तो आप को भी इत्मेनान हुआ और हज़रत अली (अ.स.) भी मुतमईन हुए और उसके साथ ही इत्तेहाम कुनिन्दा अफ़राद को अस्सी अस्सी कोड़े लगाये गये। इस वाक़िये के बाद हज़रत आयशा ने हज़रत अली (अ.स.) को कभी माफ़ नहीं किया। हमेशा नफ़रत करती रहीं और आपकी तरफ़ से उम्र भर बत्तारीन दुश्मनी के मुज़ाहेरे होते रहे। 1


ग़ज़व-ए-एहज़ाब (जंगे ख़न्दख़)

जिला वतन यहूदियों की एक बड़ी तादाद मदीने से निकलकर खै़बर और उसके आसपास आबाद हो गयी थी नीज़ उनके इक़तेसादी व मआशी हालात भी एतदाल पर आ गये थे मगर मुसलमानों से इन्तेक़ाम के एहसास ने उन्हें चैन से बैठने न दिया। खुद उनमें इतना दम ख़म तो था नहीं कि यह लोग अहले इस्लाम के मुक़ाबिले में सफ़आरा होकर उनसे निपटने में कामयाब हो जाते लेहाज़ा उन्होंने तय किया कि कुरैश और दीगर क़बाएल से फौज़ी इमदाद हासिल करके मदीने पर चढ़ाई की जाये। चुनानचे कुनाना बिन रबयी सलाम बिन मिशकम , हयी इब्ने अख़तब और बनि वायल के चन्द सरदारों के साथ बीस आदमियों की एक जमाअत मक्के आयी और उसने कुरैश के सरदारों से जंग के बारे में बात चीत की। इस्लाम दुश्मनी में कुफ़्फ़ारे कुरैश यहूदियों से कम न थे। दोनों ने अपने सीने दीवारे काबा से मस करके बाहम यह अहद व पैमान किया कि हम मुसलमानों के ख़िलाफ़ उस वक़त तक जंग जारी रखेंगे जब तक उनका इस्तीसाल नहीं हो जाता।

जब कुरैश से सारे मुआमलात तय हो चुके और क़ौल व क़रार हो चुका तो यहूदियों ने बि ग़तफ़ान का रुख़ किया और उन्हें भी अपने साथ मिलाने में कामयाब हो गये इसी तरह बनि कनाना और दूसरे क़बाएल से साज़बाज़ करके उन्होंने चार हज़ार की जमाअत फ़राहम कर ली और मदीने पर हमला करने के लिये निकल खड़े हुए। रास्ते मे बनि मुर्रा , बनि असद , बनि फ़ज़ारा और बनि अशजआ के लोग भी आकर शामिल होते रहे इस तरह रफ़्ता रफ़्ता उनकी तादाद दस हज़ार तक पुहँच गयी। उन लोगों के पास चार हज़ार ऊँट तीन सौ घोड़े , आलाते जंग और रसद का सामान फ़रावानी से था और यह हर तरह मज़बूत व मुस्तहकम थे।

बनि ख़ज़ाआ के दो चार लोगों ने पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) को जब उन तमाम कैफियात व हालास से आगाह किया तो दुश्मन कीकसरत व ताक़त को नज़र में रखते हुए आपने भीसहाबा को जमा करके दिफ़ा के तरीक़े कार के बारे में मशविरा किया। सलमाने फ़ारसी ने कहा कि अहले अज़म का दस्तूर है कि जिधर से दुश्मन के हमला आवर होने का अन्देशा होता है उधर ख़न्दक़ खोद लेते हैं। हमें भी इस पर अमल करना चाहिए। यह तजवीज़ इत्तेफ़ाक़ राय से मन्जू़र की गयी और आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने इस पर अम्लदरामद का हुक्म दे दिया।

पहाड़ों , नख़लिस्तानों और मकानों की वजह से मदीना तीन तरफ़ से बिल्कुल महफूज़ था अलबत्ता पूरब की तरफ़ से आने वाले के लिये कोई रूकावट न थी और उधर ही दुश्मन के हमलावर होने का ख़तरा भी था लेहाज़ा आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने उसी रूख़ पर ख़त खींच कर हद क़ायम की और ख़न्दक़ की तैयारी के लिये मुहाजरीन व अन्सार के दस दस आदमियों पर चालीस चालीस हाथ ज़मीन तक़सीम कर दे और पूरी मेहनत व कूवत से खुदायी का काम शुरू हो गया। अपने असहाब के साथ सरकारे दो आलम (स.अ.व.व.) खुद भी इस काम में लगे रहे। हज़रत सलमाने फ़ारसी इस मुस्तैदी से खुदायी करते कि तन्हा उनका काम दस आदमियों के बराबर होता था। इसी तेज़ रफ़्तारी को और महारत को देख कर मुहाजरीन व अन्सार ने उन्हें अपने अपने गिरोह में शामिल करना चाहा और हर गिरोह ने यह कहना शुरू कर दिया कि सलमान हममें से हैं लेकिन आन हज़रत (स.अ.व.व.) न दो गिरोह को यह कहकर ख़ामोश कर दिया कि सलमान मेरे अहले बैत में से शामिल हैं।

बहर हाल , रात दिन एक करके मुसलमानों ने एक सिरे से दूसरे सिरे तक 3 मील लम्बी , 5 गज़ चौड़ी और 5 गज़ गहरी ख़न्दक़ खोद कर तैयार कर ली तो आन हज़रत (स.अ.व.व.) तीन हज़ार मुसलमान जॉबाजो के साथ कोहे सलाअ के दामन में क़ायम फ़रमा हुए। आप (स.अ.व.व.) ने ख़न्दख़ के अन्दरूनी किनारे पर आठ हिफाज़ती चौकियां क़ायम कीं और हर चौकी पर एक एक दस्ता मुक़र्रर किया ताकि मुशरेकीन ख़न्दक़ पार करके अन्दर आने की कोशिश करे तो दस्ता उन पर पत्थराव करके उन्हें आगे बढ़ने से रोक द। चुनानचे यहूद व मुशरेकीन जब नवाबे मदीना में पहुँचे तो ख़न्दक को देख हक़्का बक्का रह गये और कहने लगे ख़ुदा की क़सम यह तदबीरी चाल ऐसी है जो अरबों की समझ और बिसात से बाहर है।

यहूद व कुरैश अपनी फौजी बरतरी और हथियारों की फरावनी की बिना पर यह यक़ीन रखते थे कि वह मदीने पहुँचते ही मुसललमानों पर टूट पड़ेंगे और उन्हें अपनी तलवारों की बाढ़ पर रख लेंगे मगर इस नयी जंगी तदबीर ने न सिर्फ़ उनके बढ़ते हुए क़दम रोक दिये बल्कि उनकी कसरत व कूवत के मुक़ाबले में मुसलमानों की क़िल्लत व कमज़ोरी का बड़ी हद तक तदारुक भी कर दिया।

पैगम़्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) ने मदीने में जिन क़बायल से मुहाइदा किया थाकि यह दुश्मन के ख़िलाफ़ मुसलमानों से ताऊन करेंगे उनमें यहूदियों का एक बड़ा क़बीला बनि कुरैज़ा भी था। अबुसुफ़ियान को यह फ़िक्र हुई कि अगर यह क़बीला मुसलमानों के साथ जंग में शामिल हो गया तो उनकी कूवत बढ़ जायेगी चुनानचे उसने क़बीला बनि नज़ीर के एक सरदार हयी बिन इख़तब को बनि कुरैज़ा के सरदार काब इब्ने असद के पास भेजा कि वह उसे कुरैश की मदद पर आमादा करें। ग़र्ज़ कि हयी काब के घर आया , दस्तक दी , काब ने पूछा कौन है ? कहा मैं हयी इब्ने इख़तब हूँ। काब समझ गया कि वह किस मक़सद से आया है। उसने मिलने से पहले तो इन्कार किया मगर बाद में हायी के भर्रे में आकर बात चीत पर तैयार हो गया और दोनों में बहस छिड़ गयी। नतीजा यह हुआ कि यही ने अपनी चर्ब ज़बानी से फुसलाकर उसे अपना हम ख़्याल बना लिया। पैगम़्बर (स.अ.व.व.) से किया हुआ तहरीरी मुहाइदा चाक कर दिया गया और कुरैज़ा एलालिया तौर पर कुरैश के मददगार बन गये।

जब आन हज़रत (स.अ.व.व.) को बनि कुरैज़ा की अहद शिकनी व बद अहदी का इल्म हुआ तो साद इब्ने माअज़ को आपने उनके यहाँ भेजा कि वह समझा बुझा कर उन्हें राहे रास्त पर लायें। साद ने उन्हे बहुत समझाया बुझाया मगर उनकी तमाम कोशिशें नाकाम हो गयीं और मुहायिदे के ख़िलाफ़ अपनी ज़िद पर अड़े रहे।

इन परेशान कुन और हिम्मत शिकन हालात में मुसलमानों के दरमियान घबराहट और बेचेनी का पैदा हो जाना कोई ताअजुब ख़ेज़ अमर नहीं था क्योंकि एक तरफ़ दुश्मन की दल बादल फौजें घेरा डाले हुए थीं दूसरी तरफ़ शहर के अन्दर बनि कुरैज़ा घात लगाये बैठे थे और तीसरी तरफ़ खुद .मुसलमानों में एक अच्छी ख़ासी तादाद मुनाफ़ेकीन की थी जो खुद भी डरे सहमें जा रहे थे और दूसरों में भी बददिली और बेहौसलगी पैदा कर रहे थे। चुनानचे उन्होंने हीले बहाने करके मैदान से खिसकना शुरू कर दिया और पैग़म्बर (स.अ.व.व.) से कहा कि हमारे घर अकेले औरतें तन्हा और लूट मार का अन्देशा है लेहाज़ा हमें वापस जाने दिया जाये।

यहाँ तक कि एक शख़्स मआतब इब्ने क़शीर ने जो बदरी होने का इम्तेयाज़ भी रखता था यह कह दिया किः-

(मुहम्मद (स.अ.व.व.) तो हमसे यह वायदा कर चुके थे कि हम क़ैसर व नक़सरा के ख़ज़ानों पर हाथ साफ करेंगे और अब यह हालात है कि हममें कोई रफ़ाये हाजत के लिये जाता है तो वह अपनी जान को महफूज़ नहीं समझता।)

अलबत्ता मुसलमानों में कुछ अहले ईमान ऐसे भी थे जो न तो दुश्मनों की कसरत व ताक़त को ख़तरे में लाते थे और न ही परेशानियों और सख़्तियों से घबराते थे बल्कि वह ऐसे थे कि मसाएब व आलाम की शिद्दत में उनका ईमान व हौसल और बढ़ता था , खुद एतमादी का जौहर और निखरता था। चुनानचे उनके बारे में कुरान कहता है किः-

(जब सच्चे ईमानदारों ने कुफ्फार के जमघटों को देखा तो कहने लगे कि यह वही चीज़ है जिसके लिये अल्लाह और उसके रसूल (स.अ.व.व.) ने वादा किया था और ख़ुदा और रसूल (स.अ.व.व.) ने सच कहा था। और उससे उनका ईमान और जज़बाये और ज़्यादा हो गया।

मुसलमानों के लिये यक़ीनन यह एक सख़्त इम्तेहानी और आज़माइशी मौक़ा था क्योंकि मुहासिरे को सत्ताइस दिन गुज़र चुके थे और वह सर्दी की शिद्दत व रसद की अदम फ़राहमी की वजह से ख़सताहाल हो चुके थे। दरमियान ख़न्दक़ हायल थी जिसकी वजह से दस्त व दस्त जंग की नौबत नहीं आती थी सिर्फ पत्थरों और तीरों का तबादला होता रहता था। आख़िरकार उन लोगों ने फ़ैसला किया कि किसी तरह पहरेदारों की नज़रों से बच कर ख़न्दक़ पार करें और मुसलमानों पर टूट पड़ें। चुनानचे उनके सरदार देखते भालते हुए ख़न्दक़ के एक ऐसे हिस्से पर पहुँचे जिसकी चौड़ाई कम थी और वहहाँ हिफ़ाज़त का भी कोई ख़ास इन्तेजा़म न था। उन्होंने खड़े होकर अन्दाज़ा लगाया कि यहाँ से घोड़ों को महमेज़ करके ख़न्दख़ को उबूर किया जा सकता है। इश काम के लिये कुरैश के मशहूर शहसवार और अरब क माने हुए देव पैकर शमशीर ज़न उमरी बिन अब्देवुद आमरी , अकरमा बिन अबुजहल , हसल बिन अमरी , मुन्बा इब्ने उसमान , ज़रार बिन ख़ताब फ़हरी , नौफ़िल इभ्ने अब्दुल्लाह और हीरह बिन अबी वहब को मुन्तखब किया गया। उन्होंने आगे बढ़कर घोड़ों को एड़ लगायी और ख़न्दक़ उबूर करने में कामयाब हो गये। यह मरहला सर होनाथा कि कुरैश के पज़मुर्दा हौसला में अज़ सर नौ तवानाई आ गई और अबु सुफ़ियान व ख़ालिद बिन वलीद ने फ़ौरन लश्कर की सफ़ बन्दी कर दी ताकि उन शहसवारों को अन्जाम देखने के बाद वह फौजों को ख़न्दक़ के उस पार उतार दें और जंग मग़लूबा शुरू कर दें।

ख़न्दक़ फाँदने वालों में यूँ तो सभी आमज़मूदा कार और जंग आज़डमा थे मगर उनमें अम्र इब्ने अब्द वुद सबसे ज़्यादा मशहूर व बहादुर था जो अमादे अरब के नाम से पुकारा जाता था। उसने (हल मिन मुबारिज) की आवाज़ बुलन्द की जिसे सुन कर बाज़ अकाबरीने सहाबा के होश व हवास उड़ गये। हज़तर उमर ने पैग़म्बरे अकरम (स.अ.व.व.) से फ़रमाया , या रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) ! इससे कौन लड़ सकता है ? एक मर्तबा मैं उसके साथ तिजारती क़ाफ़िला लेकर शाम की तरफ़ जा रहा था कि रास्ते में यलील के मुक़ाम पर एक हज़ार रहज़नों ने रात के वक्त क़ाफिले पर हमला कर दिया। तमाम अहले क़ाफ़िला अपना सामान छोडकर भाग खड़े हुए। अम्र उस वक़्त सो रहा था उसकी आँख खुली तो जल्दी में उसने ढ़ाल की जगह एक ऊँट का बच्चा उठा लिया और रहज़नों पर हमला करके सबको भगा दिया।

उस मौक़े पर मुसलमानों में अज़म व हिम्मत और जोश व वलवला पैदा करने की ज़रुरत थी मगर हज़रत उमर के इस ब्यान ने उन्हें ख़ौफ़ व दहशत में मुबतला कर दिया। अल्लामा दयार बकरी का कहना है कि तमाम असहाब बेहिस व हरकत थे और ऐसा मालूम होता था जैसे कि उनके सरों पर तायर बैठे हों। 1

ग़र्ज़ कि अम्र बिन अब्दवुद आगे बढ़ा और उसने मुसलमानों को ललकारते हुए कहा कि तुममें कौन है जो मेरे मुक़ाबले को निकले ? मगर किसी तरफ़ से कोई जवाब न मिला और न ही किसी को उसके मुक़ाबले मे आने की हिम्मत हुई। पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने भी मुसलमानों से फ़रमाया कि इस कुत्ते को जवाब देने कौन जाता है ? हज़रत अली ख़न्दक़ का किनारा छोड़कर हाज़िरे ख़िदमत हुए और कहा या रसूल उल्लाह! मैं इससे लडूंगा। आन हजरत (स.अ.व.व.) ने फ़रमाया , अभी ठहरों और यह देखो कि कोई और भी तैयार होता है या नहीं। अम्र ने फिर आवाज़ दी। हज़रत अली (अ.स.) ने फिर इजाज़त चाही। पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने फिर फ़रमाया कि अभी ठहो। जब अम्र ने तीसरी मर्तबा ललकारा और तन्ज़ करते हुए उसने कहा कि मुसलमानों! तुम्हारी वह जन्नत क्या हुई जिसमें मरने के बाद तुम्हें जाना है और वह दोज़ख क्या हुआ जो तुम्हारे कहने के बमूजिब हमारा ठिकाना है। आओ या तुम जन्नत में जाओ या मुझे दोज़ख में भेजो।

अम्र के बार बार ललकारने के बावजूद लश्करे इस्लाम मुसलसल सन्नाटा छाया रहा। लोग एक दूसरे को कनखियों से दखते थे और चुप साध लेते थे किसी को हिम्मत व जुराअत न होती थी कि वह आगे बढ़कर उस दुश्मने इस्लाम को जवाब देता और उसका गुरूर तोड़ता। हज़रत अली (अ.स.) ने जब उस क़ाफिर की मुबारिज़ तलबी और मुसलमानों की खामोशी देखी तो पेच व ताब खाते हुए उठे और पैग़म्बर (स.अ.व.व.) से फ़रमाने लगे या रसूल उल्लाह! अब मुझे बदबख़्त से दो दो हाथ कर लेने दीजिये। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने हज़रत अली के अज़म व इस्तेकलाल , खुद एतमादी और हिम्मत व शुजाअत के जौहर को परखने के लिये फ़रमाया , या अली (अ.स.) , यह अम्र इब्ने अब्दोवुद है। हज़रत अली (अ.स.) ने कहा , वह अम्र है तो हुवा करे मैं भी अबुतालिब का बेटा हूँ।

हज़रत अली (अ.स.) के इस जवाब के बाद पैग़म्बर (स.अ.व.व.) चन्द लम्हों तक खामोश रहे जैसे वही का इन्तेज़ार कर रहे हों। फिर आप ने अपना अमामा सहाब उनके सर पर रखा , अपनी ज़िरा ज़ातुल फुज़ूल पहनायी कमर में जुलफ़ेख़ार बाँधी और , बारगाहे अहदियत में हाथ उठा कर अर्ज़ किया कि परवरदिगार! तूने उबैदा को बदर के दिन और हमज़ा को ओहद के दिन उठा लिया , अब सिर्फ़ अली (अ.स.) रह गये हैं , पालने वाले! तू उनकी हिफ़ाज़त फ़रमाना और मुझे अकेला न छोड़ना।

ग़र्ज़ कि पैग़म्बरी दुआओं के साये में हज़रत अली (अ.स.) ने इधऱ मैदा का रुख किया और उधर मुरसले आज़म की ज़बान से निकले हुएये अल्फ़ाज़ फज़ाओं में गूँजने लगे (आज कुल्ले ईमान कुल्ले कुफ्र के मुक़ाबले की तरफ़ बढ़ रहा है)

हज़रत अली (अ.स.) आगे बढ़कर अम्र के बिल मुक़ाबिल हुए और उसके रजज़िया अशआर के जवाब में अपने दो शेर पढ़े जिसमें फ़रमायाः

( 1) ऐ अम्र! होशियार होजा कि तेरी ललकार का जवाब देने वाला आ गया जो कमज़ोर नहीं बल्कि बड़ी कूवत व बसीरत वाला और रास्तबाज़ है और सच्चाई ही हर रूस्तगार के लिये वजहे कामरानी है।

(2) ऐ बदबख़्त! मुझे उम्मीद है कि मैं एक ऐसी ज़र्ब से तेरे लिये बैन करने वाली औरतों का इन्तेज़ाम कर सकूँगा जिसका तज़किरा हमेशा होता रहे।

अम्र ने दस्तूरे अरब के मुताबिक़ पूछा कि मेरा हरीफ़ व मद्दे मुक़ाबिल कौन है ? अमीरूब मोमेनीन (अ.स.) ने फ़रमाया कि मैं। अली इब्ने अबुतालिब हूँ। अम्र ने कहा क्या लश्करे इस्लाम में तुम्हारे सिवा और कोई नहीं जो मुझसे मुक़ाबले के लिये आता ? तुम तो मेरे दोस्त के बेटे हो मैं नहीं चाहता कि तुम पर हाथ उठाऊँ लेहाज़ा तुम वापस चले जाओ। हज़रत अली (अ.स.) ने फ़रमाया , लेकिन मैं तुम्हारा ख़ून बहाना पसन्द करता हूँ।

अहले सुन्नत के मशहूर आलिम मसदिक़ इब्ने शबीब का कहना है कि अम्र ने अबुतालिब से अपनी दोस्ती का इज़हार महज़ इस बिना पर किया कि वह अपनी जान बचाना चाहता था क्योकि वह जंगे बदर में देख चुका था कि जो भी अली (अ.स.) के मुक़ाबले में गया वह बचकर न आया इसलिये उसने चाहा कि अली (अ.स.) से लड़ने की नौबत न आये और उनके बजाये मुक़ाबला किसी दूसरे से हो। मैदान में उतरने के बाद पहलू तही तो कर नहीं सकता था इसलिये उसने अबुतालिब (अ.स.) की दोस्ती की आड़़ ली ताकि अली (अ.स.) से लड़ाई न हो और उसकी कमज़ोरी पर पर्दा भी पड़ा रहे।

जब अम्र ने देखा कि हीले बहाने से जान छुड़ान मुश्किल है तो वह आमादए पैकार हो गया। हज़रत अली (अ.स.) प्यादा थे और प्यादा हमेशा सवार की ज़द में होता है लेहाज़ा आपने चाहा कि उसे भी घोड़े से नीचे उतरवा लें। चुनानचे फ़रमाया ऐ अम्र मैंने सुना है कि हरीफ़ अगर मैदान में तुम सी तीन बातों की दरख़्वास्त करता है तो उनमें से एक बात तुम ज़रुर मान लेते हो। उसने कहा हाँ। फ़रमाया कि फिर मेरी पहली दरख़्वास्त यह है कि इस्लाम कुबूल कर लो। उसने कहा कि यह नहीं हो सकता कि मैं अपने आबाई दीन को छोड़़ दूँ। आपने फ़रमाया कि दूसरी दरख़्वास्त तुमसे यह है कि तुम मैदान छोड़कर भाग लो और अपने लश्कर के मुँह पर थूक कर अपने घर की राह पकड़ो। उसने कहा कि मैदान से भागना मर्दो का शीवा नहीं होता मैं यह गवारा नहीं कर सकता कि कुरैश की औरतें मेरे फ़रार पर मुझे ताने दें। फ़रमाया कि अगर तुम ये भी नहीं मानते तो फिर घोड़े से नीचे उतर आओ। यह सुनकर अम्र ताब खाता हुआ घोड़े से कूद पड़ा और उसके अगले पिछले चारों पैर काट दिये।

घोड़े की कोंचे काट देना बज़ाहेर एक बेमानी सी बात लगती है मगर ऐसा नहीं है। इसका मक़सद यह ताअस्सुर देना था कि मैंने घोड़े के पैरों को क़ेता करके अपने लिये राहे फ़रार बन्द कर दी है अब क़त्ल किये या क़त्ल हुए बगै़र मैदान से हटने का सवाल पैदा नहीं होता और मुम्किन है कि वह ग़र्ज़ भी रही हो कि इस तरह अपनी कूवत व ताक़त और तेग़ज़नी का मुज़ाहिरा करके वह अपने मुक़ाबिल को मरऊब व मुतासिर करे ताकि वह मुक़ाबले से पहेल ही हिम्मत हार बैठे क्योंकि नफ़सियाती हैसियत से अगर हरीपञ को अपनी ताक़त व तवानाई से मुतासिर कर लिया जये तो उसकी कूवते मदाफ़ियत मुज़महिल पड़ जाती है और उस पर आसानी से क़ाबू किया जा सकता है मगर हज़रत अली (अ.स.) कया मरऊब व मुतासिर होते जो बड़े बड़े बहादुरों और सूरमाओंको ख़ातिर में न लाते थे और ईमान की यह शान है कि वह कुफ्र के मुक़ाबिले में कमज़ोर पड़ जायें लेहाज़ा आपने अम्रल के इस मुजा़हरे शमशीर ज़नी को कोई अहमियत नहीं दी और उसे मौक़ा दिया कि वह पहले हमला करें। चुनानचे वह हमला आवर हुआ और आपने ढ़ाल पर उसका वार उचटता हुआ आपके सर पर लगा और पेशानी ख़ून से रंगी हो गयी।

अब कुल्ले ईमान की तलवार कुल्ले कुफ्र का सर काटने के लिये नियाम से बाहर निकली। और आप जवाबी हमले के लिये शेर की तरह झपटे और उसके पैरों पर इस तरह तलवार मारी कि दोनों टाँगें कट कर अलग हो गयीं। अम्र लड़खड़ा कर ज़मीन पर गिरा। और आपने तक़बीर का नारा बुलन्द किया और उसके सीने पर सवार होकर सर काट लिया। सहाबा गर्दो गुब्बार की वजह से यह मंज़र तो न देख सके थे लेकिन तकबीर की आवाज़ से मझ गये अली 0 (अ.स.) फ़ातेह व कामरां हुए और अम्र मारा गया। इतने में गुबार का दामन चाक हुआ तो लोगों ने देखा कि हज़रत अली (अ.स.) एक हाथ में खून आलूद तलवार लिये और दूसरे हाथ में अम्र का सर लिये इस तरह झूमते हुए चले आ रहे हैं जिस तरह शेर हल्की फुवार में झूमता और बल खाता हुआ चलता है।

हज़रत अली (अ.स.) को इस तरह आते देख कर अकाबरीने सहाबा में से किसी ने कहा कि अली (अ.स.) तो रऊनत आमेज़ क़दम उठा रहे हैं। पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने सुना तो फ़रमाया कि मैदाने जंग में अल्लाह को यही चाल पसन्द है। ग़र्ज़ जब कुफ्र का मारका सर करके हज़रत अली (अ.स.) पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में बारयाब हुए तो आपने उन्हें सीने से लगाया और उनकी इस अज़ीम ख़िदमत का एतराफ़ करते हुए फ़रमाया कि आज यौमें ख़न्दख़ अली (अ.स.) की एक ज़रबत इबादते सक़लैन से बेहतर है। 1

हज़रत उमर शायद बड़ी अमीक़ व ताअज्जुब खेज़ नज़रों से इस जंग का मुशाहिदा फ़रमा रहे थे चुनानचे उन्होंने जब यह देखा कि अरबों के आम दस्तूर के मुताबिक़ अली (अ.स.) ने तो अम्र की ज़िरा उतारी है और न ही उसकी तलवार वग़ैरा पर क़ब्ज़ा किया है तो आपने पूछा या अली (अ.स.) ! आपने अम्र कि ज़िरा क्यो नहीं उतारी ? फ़रमाया , मुझे शर्म दामन गीर हुई कि मैं उसकी लाश को बरहना करके उसकी ज़िरा उतारूँ.।

यह थी हज़रत अली (अ.स.) की सेर चश्मी व कुशादा नज़री की जहाँ माले ग़नीमत मुजाहिद की सबसे बड़ी कमज़ोरी हो वहाँ अली (अ.स.) की बुलन्द किरदारी व आला ज़रफ़ी का यह आलम कि न तो जज़बये जेहाद में दुनयावी तमा की आमेज़िश होने पाई और न मक़तूल की बेश क़ीमत ज़िरा पर नज़र पड़ी चुनानचे हज़रत की इस आला ज़रफ़ी का एतराफ़ खुद अम्र की बहन ने इन अल्फाज़ में किया कि मेरे भाई का क़ातिल कोई शरीफ़ और आला ज़रफ़ इन्सान है। लोगों ने बताया कि तेरा भाई अली इब्ने अबुतालिब के हाथों क़त्ल हुआ है तो उसने बरजस्ता दो शेर बढ़े जिन का मफ़हूम यह है किः-

(1) अगर अम्र का क़ातिल अली (अ.स.) के अलावा कोई और होता तो रहती दुनिया तक मै इस पर गिरया करती।

(2) मगर इसका क़ातिल तो वह है जिसमें कोई ऐब और बुरायी नहीं है और जिसका बाप सरदारे मक्का के नाम से पुकारा जाता था।

अम्र के मारे जाने के बाद उसके साथियों के क़दम उखड़ गये और फिर किसी को मुबारिज़ तलबी की हिम्मत व जुराअत न हुई। सबके सब बदहवासी के आलम में ख़न्दक़ की तरफ़ भागे। हज़रत अली (अ.स.) ने फिर आगे बढ़कर घेरा डाला और अम्र के बेटे हसल पर तलवार का एक वार करके उस वहीं ढेर कर दिया। नौफ़िल इब्ने अब्दुल्लाह ख़न्दक़ फाँदते हुए उसमें गिरा हज़रत अली (अ.स.) भी उसमें कूद पड़े और एक ही वार मे उसके दो टुकडे कर दिये। मुन्बा इब्ने उसमान ख़न्दक़ अबूर करते हुए किसी के तीर से ज़ख़्मी हुआ जो मक्के पुहँच कर मर गया। अकरमा अपना नैज़ा फेंक कर हीरा के साथ भागा और ख़न्दक़ फाँकर अपने लश्कर में पहुँच गया। ज़रार इब्ने ख़त्ताब फ़हरी को हज़रत उमर ने भागते देखा तो उन्हें भी जोश आया और वह उस के पीछे दौड़े उसने पलट कर आप पर हमला करना चाहा फिर न जाने क्या सोच कर हाथ रोक लिया और यह कहता हुआ आगे बढ़ गया कि ऐ उमर! इस एहसान को याद रखना।

इन नामवर सूरमाओं के मारे जाने से कुफ़्फ़ार के हौसले टूट चुके थे और हिम्मतें पस्त हो गयीं थी , अब वहाँ प़ड़े रहना मौत को मज़ीद दावत देने के मुतरादिफ़ था चुनानचे वह मुहासिरा उठाने के बारे में सोच ही रहे थे कि दूसरी रात मे बादोबारां का सख़्त तूफान आया जिसने कुफ़्फ़ार के ख़ेमों को उखाड़ कर फेंक दिया ऊँटों और घोड़ों को इधर उधऱ मुन्तशिर कर दिया , चूल्हों पर चढ़ी हुई पतिलियाँ और देंगें उलट गईं। खुला मैदान , आँधी और झक्कड़ का ज़ोर , सख़्त सर्दी और तारीकी का आलम , एक को एक सुझाई न देता था और न किसी को किसी का होश था। अब इसके सिवा कोई चारा न था कि वह मुहासिरा उठाकर अपनी राह लें। अबु सुफ़ियान नेकहा अब यहाँ ठहरना बेसूद है इतने दिन हम मुहासिरा डाले पड़े रहे मगर नुक़सान के सिवा कुछ हाथ न आया। यह कह कर वह उठ खड़ा हुआ दूसरों ने उसे जाते देखा तो वह भी उसके साथ भाग निकले और रातों रात मैदान साफ़ हो गया। सुबह को मुसलमानों ने जब मैदान ख़ाली देखा तो सजदये शुक्र अदा करके फ़तेह व कामरानी के नारे लगते हुए अपने घरों की तरफ़ लौट पड़े।

इस मारके मुशरेकीन के चार आदमी मारे गये जिन में से अम्र इब्ने अब्दवुद , नौफिल इब्ने अब्दुल्लाह और हसल बिन अम्र हज़रत अली (अ.स.) के हाथ से क़त्ल हुए। मुन्बा बिन उस्मान ज़ख़्मी हो कर भागा और मक्के में जा कर मर गया। हज़रत उमर ने ज़रार इब्ने ख़त्ताब का पीछा ज़रुर किया मगर एक तरह से उन्हें ख़ुद ही उस काफ़िर का ममनूने एहसान होना पड़ा। दुनिया इस हक़ीक़त से इन्कार नहीं कर सकती कि इस जंग व कामरानी तन्हा ज़ाते अली (अ.स.) के गिर्द तवाफ करती हुई नज़र आती हैं। यह जंग माहे ज़ीक़दा सन् 5 हिजरी मुताबिक़ मार्चे या अप्रैल सन् 627 में लड़ी गयी।

जंगे ख़न्दक़ और महारब-ए-तालूत व जालूत में मुमासेतल

ग़ज़वाये ख़न्दक़ और महारबये तालूत व जालूत में बड़ी हद तक मुशाबेहत व मुमासलत पाई जाती है। जिस तरह ख़न्दक़ मे मुसलमानों की सिपाह कम और कुफ़्फ़ार की तादाद कई गुना ज़्यादा थी उसी तरह तालूत की फौज़ मुख़तसर और उसके मुक़ाबिले जालूत का लश्कर पूरे सहराये उरदुन पर मुहीद था। जिस तरह मुसलमान दुश्मन की कसरत व कूवत से हरासां थे उसी तरह तालूत के लश्कर पर खौफ़ व हरास छाया था। जिस तरह अम्र इब्ने अब्दवुद असलहे से लैस घोड़े पर सवार होकर मुबारिज़ तलब हुआ उसी तरह जालूत ज़िरा बख़तर से आरास्ता होकर और हाथी पर सवार होकर मैदान में आया। जिस तरह अमरी के मुक़ाबिले में हज़रत अली (अ.स.) के अलावा किसी को हिम्मत न हुई उसी तरह जालूत के मुक़ाबिले में हज़रत दाऊद (अ.स.) के अलावा किसी को जुराअत न हो सकती। जिस तरह हज़रत दाऊद (अ.स.) दुश्मन के मुक़ाबिले में प्यादा थे उसी तरह हज़रत अली (अ.स.) अम्र के मुक़ाबिले में प्यादा थे। जिस तरह हज़रत दाऊद (अ.स.) के जिस्म पर हज़रत मूसा (अ.स.) की ज़िरा ठीक उतरी उसी तरह हज़रत अली (अ.स.) के जिस्म पर पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) की ज़िरा पूरी उतरी। जिस तरह हज़रत दाऊद (स.अ.व.व.) अपने भाईयों में सबसे छोटे थे उसी तरह हज़रत अली (अ.स.) अपने भाईयों में सबसे छोटे थे , जिस तरह हज़रत अली (अ.स.) औलिया में जंगजू और बहादुर थे। शेख़ अली अलावुलदीन फ़रमाते हैं कि अन्बिया में दाऊद अलैहिस्सलाम और औलिया में हज़रत अली रज़ी उल्लाह अना जंग आज़माओं के इमाम व सरख़ील थे। 1

जिस तरह पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) ने अम्र को कुत्ते की लफ़्ज़ से याद किया उसी तरह हज़रत दाऊद ने जालूत को कुत्ते से बदतर क़रार दिया था। जिस तरह जालूत के मारे जाने से तमाम लश्कर भाग खड़ा हुआ था उसी तरह अम्र के क़त्ल होने से मुशरेकेीन के क़दम उखड़ गये और रातों रात मैदान ख़ाली करके फ़रार हुए। जिस तरह जालूत का क़ातिल लालूत की सल्तनत का वारिस और उसका दामाद क़रार पाया उसी तरह अम्र का क़ातिल भी दामादे पैग़म्बर (स.अ.व.व.) और वारिसे मसन्दे ख़िलाफ़त था। इस मुमासिलत व मुशबिहत पर नज़र करने के बाद हाफ़िज़ यहिया इब्ने आदम के इस क़ौल की हक़ीक़त नुमाया हो जाती है किः

(हज़रत अली (अ.स.) के अम्र को कत्ल करने की तशबीह किसी वाक़िये से दी जाती है तो उससे जिस का ज़िक्र कुरान मजीद की इस आयत में है (फिर उन लोगों ने अल्लाह के हुक्म से दुश्मनों को शिकस्त दी और दाऊद (अ.स.) ने जालूत को क़त्ल किया।)

बनि क़ुरैज़ा सरकूबी

जांगे एहज़ाब जब यहूद व मुश्रेकीन के मुशतरका महाज़ की शिकस्त व हज़ीमत पर ख़त्म हुई तो मदीने में कदम रखते ही पैगम़्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) ने क़बीला बनि कुरैज़ा की सरकूबी के लिये फ़ौजी़ अक़दाम का इरादा किया जिन्होंने हयी इब्ने अख़तब की बातों मे आकर मुहायिदा की खिलाफ़ वर्ज़ी और मुसलमानों से ग़द्दारी करके हमला आवरों का एलानिया साथ दिया था। चुनानचे हुज़ूरे अकरम (स.अ.व.व.) ने हज़रत अली (अ.स.) की क़ेयादत में तीस ( 30) ख़िज़रिजियों का एक हरावल दस्ता उनकी तरफ़ रवाना किया। तबरी का कहना है कि पैगम्बर (स.अ.व.व.) ने अली (अ.स.) को रायते जंग दे कर बतौर मुक़द्दमतुल जैश बनि कुरैजा की तरफ भेजा।

बनि कुरैजा , समझ 20 थे कि अहद शिकनी की पादाश में उनसे मुवाख़िजा ज़रुर होगा इसिलये ख़न्दक में कुफ़्फ़ार की पसपाई के बाद ही वह अपने घरों को छोड़कर एक क़िले में मुन्तक़िल हो गये थे। उनका ख़्याल था कि इस कि़ले का सर करना मुसलमानों की ताक़त व कूवत से बाहर है।

जब हज़रत अली (अ.स.) इस क़िले के पास पहुँचे और ज़मीन पर अलम गाड़ा तो किले की दीवारों पर चढ़कर यहूदियों ने आन हज़रत (स.अ.व.व.) को बुरा भला कहना शुरी किया और गालम गलौज पर उतर आये। हज़रत अली (अ.स.) ने पैगम्बर (स.अ.व.व.) के ख़िलाफ़ जब उनके नाशाइस्ता कलेमात सेने तो इस ख़्याल से वापस पलने कि आन हजरत (स.अ.व.व.) को वहाँ जाने से रोक दें और खुद ही उन लोगों से निमट लें। अभी आप कुछ दूर चले थे कि देखा हुज़ूरे अकरम (स.अ.व.व.) तशरीफ़ ला रहरे हैं। आपने कहा या रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) ! आप क़िले के क़रीब न जायें। फ़रमाया , वह मुझे देखर बदज़बनी व मदक़लामी की हिम्मत नहीं करेंगे। गर्ज़ कि आप वहाँ तशरीफ ले गये और किले के सामने ही अपना ख़ेमा नसब करने का हुक्म दिया। ख़ेमए रिसालत का नसब होना था कि मुसलमानों ने चारों तरफ से किले को घेर लिया और आमदो रफ़्त के तमाम रास्ते बन्द कर दिये। महसूरीन में हयी इब्ने अख़तब भी था।

बनि कुरैश के रईस काब इब्ने असद ने जब यह देखा कि मुसलमानों का मुहासिरा सख़्त होता जा रहा है तो उसने अपने क़बीले वालों से कहा कि मुहम्मद (स.अ.व.व.) की नबूवत का तज़किरा आसमानी किताबों में मौजूद है। लेहाज़ा बेहतर है कि हम उनकी नबूअत का एतराफ़ करके इस्लाम कुबूल कर लें। उन्होंने काब की बातों को ठुकरा दिया और इस्लाम कुबूल करने से इन्कार कर दिया। काब ने कहा अगर तुम लोग इस्लाम कुबूल करने पर तैयार नहीं हो तो अपनी औरतों और बच्चों को ठिकाने लगाओ और बाहर फ़िक्र से ख़ाली होंगे और तुम पूरी यकसूई व तन्देही से लड़ सकोगे। उन्होंने कहा , वहा , यह क्यों कर मुम्किन है कि हम अपने बच्चों और औरतों के खून से अपने हाथों को रंगीन करें। काब ने कहा फिर तुम लोग अक़ल व ख़ेरद से खाली और अपने बारे में खुश फ़हमी में मुबतिला हो।

यहूद को मुहासिरा में घेरे हुए पच्चीस दिन हो चुके थे वह इतने दिनों तक तीर और पत्थर बरसाते रहे मगर मुसलमानों का हिसार तोड़ने में कामयाब न हो सके। जब मुहासिरा की शिद्दत से तंग आ गये तो उन्होंने निबाश इब्ने क़ैस के ज़रिये पैग़म्बर (स.अ.व.व.) से दरख़्वास्त की कि हम हथियार डालने पर तैयार हैं बशर्त कि हमारी जान बख़्शी की जाये और हमें अपना माल असबाब ले जाने की इजाज़त दी जाये। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने फ़रमाया , यह हमें मन्ज़ूर नहीं है। कहा , फिर हम अपना सारा माल व असबाब यही छोड़ देते हैं , सिर्फ़ औरतों और बच्चों को लेकर निकल जाने की इजाज़त दे दी जाये। आप (स.अ.व.व.) ने फ़रमाया यह भी नहीं हो सकता , बल्कि गैर मशरूत तौर पर अपने आपको हमारे सुपुर्द करना होगा और जो हम मुनासिब समझेंगे वह फ़ैसला करेंगे। निबाश ने पलट कर बनि क़ुरैजा को आन हज़रत (स.अ.व.व.) के जवाब से आगाह किया। उन्होंने रसूल ख़ुदा (स.अ.व.व.) के पास पैग़ाम कहलवाया कि अबुलबाबा अन्सारी को हमारे पास भेजिये ताकि हम उनसे बात चीत करके कोई आख़री फ़ैसला कर सकें। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने अबुलबाबा को भेज दिया। उन लोगों ने अबुलबाबा से कहा तुम्हारी क्या राय है क्या ग़ैर मशरूत तौर पर हम अपने को मुहम्मद (स.अ.व.व.) के सुपुर्द कर दें ? अबुलबाबा ने अपने गले पर हाथ फेर कर इशारे से बताया कि क़त्ल कर दिये जाओगे। चुनानचे अबुलबाबा का इशारा पाकर उन्होंने अपने आपको पैग़म्बर (स.अ.व.व.) के हवाले करने से साफ़ इन्कार कर दिया। तबरी रक़म तराज़ है कि जब बनि कुरैज़ा को यह एहसास हुआ कि ग़ैर मशरूत तौर पर आन हज़रत (स.अ.व.व.) के फ़ैसले पर इनहेसार कर लेने का नतीजा क़त्ल होगा तो उन्होंने कहा , हम साद इब्ने मआज़ को सालिस तस्लीम करते हुए उनके फ़ैसले को मान लेंगे। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने भी साद इब्ने मआज़ को सालिस बनाये जाने की इजाज़त दे दी और फ़रमाया कि दोनों फरीक़ के लिये उनका जो भी फ़ैसला होगा वह क़ाबिले तस्लीम होगा।

साद इब्ने मआज़ जंगे एहज़ाब में तीर से ज़ख्मी हो कर मस्जिद नबूवी के क़रीब रफ़ीदा अन्सारिया के ख़ेमे में पड़े थे। उन्हें सवारी पर लाया गया। उन्होंने यह फ़ैसला किया कि बनि कुरैज़ा के मर्दों को क़त्ल कर दिया जाये। औरतों , कनीजों और बच्चों को गुलाम बना लिया जाये और उनके अहवाल व इम्लाक को मुसलमानों मे तक़सीम कर दिया जाये।

इस फ़ैसले पर अम्लदरामद हुआ। उनके मर्दों को क़त्ल कर दिया गया। औरतों और बच्चों को असीर कर लिया गया और उनका माल व मताअ तक़सीम कर दिया गया।

यह सज़ा बज़ाहिर बड़ी सख़्त और हौलनाक ज़ाहिर होती है मगर हालात का जाएज़ा लिया जाये और उसका पस नज़र देखा जाये तो यह एतराफ़ करना पड़ेगा कि वह हक़ीक़तन इसी सज़ा के मुस्तहक़ थे। वह कौन सा हुस्ने सुलूक था जिससे पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने उन्हें महरूम रखा हो , वह कौन सी रेआयत और नेकी थी जो उनके साथ रवाना रखी गयी हो। मदीने में क़याम फ़रमां होने के बाद पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) ने उनके साथ ख़ुसूसी मराआत बरतीं। अमन व सुलह का मुहायिदा किया और उसका पूरा एहतराम मलहूज़ रखा , मज़हबी आज़ादी दी , जान व माल की हिफ़ाज़त का ज़िम्मा लिया और उनके मोआशी व मोआशरती हुकूक़ का तहाफुज़ किया और जब बनि नज़डीर ने मुहायिदा शिकनी की और उन्हें मदीने से जिला वतन होना पड़ा तो उनसे मुहायिदा की तजदीद करके आन हजरत (स.अ.व.व.) ने उनके साबेका़ हकूक बरक़रार रखे लेकिन उसके बावजूद उन्हें जब भी मौक़ा मिला यह लोग दग़ व फ़रेब से बाज़ न आये और दुश्मनों के दस्त व बाज़ू बनकर इस्लाम की तबाही व बरबादी पर तुले रहे चुनानचे जंगे बद्र में उन लोगों ने दुश्मनों से साज़बाज़ की और उन्हें हथियार बहम पहुँचाये उसके बाद जंगे एहज़ाब में मुसलमानों के ख़िलाफ़ यहूद व मुश्रेकीन से फिर पूरा तआवुन किया और उन नाशइस्ता हरकत पर नादिम व शर्मसार होने के बजाये खुल्लम खुल्ला बग़ावत पर उतर आये और बद फितरती का सुबूत देते हुए पैग़म्बर (स.अ.व.व.) को दुशनाम तराज़ियों का निशाना बनाया। इन हालात में अगर उन्हें ज़िन्दा छोड़ दिया जाता तो यह लोग यक़ीनन अहले मदीना के लिये एक मुस्तक़िल दर्द सर और ख़तरा बन जाते और बनि नज़ीर की तरह यह भी दुश्मनाने इस्लाम से साज़बाज़ करके मुसलमानों पर फौज़ कशी करते और मदीना व इतराफ़े मदीना के अमन आमा को गारत व बरबाद करते रहते।

जो सज़ा उनके लिये तजवीज़ की गई वह कोई नयी और अनोखी सज़ा न थी। अगर दुनिया की तारीख़े बग़ावत और उस पर मुरत्तब होने वाली सज़ाओं पर नज़र की जाये तो उन अहद शिकन , सरकश और ख़तरनाक बागियों की सज़ाये क़त्ल पर कोई ताज्जुब न होगा। तारीख़ बताती है कि बागियों को ऐसी ऐसी सज़ायें दी जाती थीं जिन्हें सुन कर अब भी इन्सान लरज़ा बर अन्दाम हो जाता है। कोल्हू में पिसना , शिकन्जे में कसना , आग में झोकना हाथों और पैरों में मेंखे ठोक कर उलटा लटकाना। बस्तियों की बस्तियाँ जला देना , क़ब्रों से लाशें निकाल कर उन्हें पामाल करना वग़ैरा बागियों की आम सज़ायें थी। इसके बावजूद बनि कुरैज़ा के लिये क़त्ल की सज़ा तो तजवीज़ की जाती है मगर उसमें कोई करब अफ़ज़ा पहलू पैदा नहीं किया जाता बल्कि एक आम तरीक़े से उन्हें मौत के घाट उतारा जाता है। चुनानचे इस बग़ावत का मोहर्रिक अव्वल और इस्लाम का दुश्मने आज़म हयी इब्ने अकतब जब क़तल के लिये अमीरूल मोमेनीन हज़रत अली (अ.स.) की ख़िदमत में पेश किया जाता है तो वह एतराफ़ करता है कि यह एक शरीफ़ाना क़्तल है जो एक शरीफ़ के हाथों अन्जाम पा रहा है) और फिर वह अमीरूल मोमेनीन (अ.स.) से यह फ़रमाइश करता है कि जब आप मुझे क़त्ल करें तो मेरा लिबास उतार कर मुझे बरहैना न करें। जिस पर हज़रत ने फ़रमाया कि दुश्मन को क़त्ल करने के बाद उसे उरयां करना हमारा शीवा नहीं है। चुनानचे आपने अपने मामूल के मुताबिक़ उसे क़त्ल करने के बाद उसका लिबास नहीं उतारा। वाक़दी का कहना है कि इस मारके में मक़तूलीन की तादाद 750 तक थी और उन औरतों , कनीज़ों और बच्चों की तादाद जिन्हें गुलामों की हैसियत से फ़रोख़्त कर दिया गया , एक हज़ार थी। 1

मुक़तलिफ़ वाक़ेयात

• साद बिन एबादा की वालिदा अम्र बिन्ते मसऊद ने रेहलत इख़तेयार की।

• माहे जमादुल आख़िर में चाँद ग्रहन हुआ और आन हज़रत स ने नमाज़े ग्रहन पढ़ी।

• अरब के कई क़बीले आन हज़रत (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में हाज़िर हो कर मुशर्रफ़ बाइस्लाम हुए

• माहे ज़ीक़ाद में आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने जै़नब बिन्ते हज़श से अक़द फ़रमाया। और आयते हिजाब नाज़िल हुई

• औरतों को पर्दे में रखने का इसी साल हुक्म हुआ।

• मुबतना लड़के की मनकूहा से आज़ाद हो जाने और इद्दत की मुद्दत पूरी होने के बाद निकाह की इजाज़त दी गयी।

• इसी साल पानी की अदम फ़राहमी पर तयम्मुम का हुक्म आया और नमाज़े ख़ौफ़ की दाग़बील भी इसी साल पड़ी।


(सन् 6 हिजरी)

ग़ज़वा बनि लहियान

रजी से कुछ लोगों ने मदीने में आकर आन हज़रत (स.अ.व.व.) के रूबरू इस्लाम कुबूल किया और यह ख्वाहिश ज़ाहिर की कि तबलीग़ के लिय कुछ लोगों को हमारे साथ भेज दिया जाये चुनानचे छः आदमियों को आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने उन लोगों के साथ भेज दिया। रजीय पहुँचने पर उन लोगों ने आन हज़रत (स.अ.व.व.) के आदमियो को क़त्ल कर दिया। क़सास के लिये पैग़म्बर (स.अ.व.व.) बनि लहियान पर चढ़ाई की मगर वह लोग इधऱ उधर भाग निकले और कोई हाथ न आये तो आपने 14 दिन वहाँ क़याम के बाद मराजियत फरमायी।

गज़वाऐ ज़ीक़ुर्द

ऐइना बिल हसीन फ़ज़ारी नामी एक शख़्स ने आन हज़रत (स.अ.व.व.) की ऊँटनियां जंगल से पकड़ लसी थी। जेहाद की ग़र्ज़ से आप मदीने से रवाना हुए और 4 रबीउलअव्वल को जी खुर्द के मुक़ाम पर पहुँचे जो मदीने से ख़ैबर की तरफ़ 20 मील के फ़ासले पर वाक़े हैं वहाँ आपकी ऊँटनियां आपको मिल गयीं इसलिए आप वापस आ गये।

नोट- बाज़ मोअर्रेख़ीन ने ग़ज़वा बनि मुसतालिक़ और अफक का वाक़िया इसी साल लिखा है और ग़ज़वा जातुल रेक़ा का तज़किरा भी इसी साल में किया है जो मेरे नज़दीक दुरुस्त नहीं है यह तमाम वाक़ियात सन् 5 हिजरी में रुनूमा हुए और यही दुरुस्त भी है।

मारकये हुदैबिया

मक्के मोअज़्ज़मा सरकारे दो आलम (स.अ.व.व.) का आबाई वतन और मौलिद व मसकन था। यहीँ आपने अपनी ज़िन्दगी के तिरपन बरस गुज़ारे और यहीं पर पहले पहल वही इलाही का खुश आहंग नग़मा सुना। और फिर तेरह बरस तक यह मुबतरक सर ज़मीन वही की आवाज़ों से गूँजती रही। अगर चे अहले मक्का के रवय्ये से तंग आकरआप को घरबार चोड़ना पड़ा मगर अकसर मक्के का तज़किरा और उसे देखने का इश्तेयाक़ ज़ाहिर करते रहते थे। एक मर्तबा आपने अपने एक ख़्वाब का तज़किरा करते फ़रमाया कि मैंने देखा है कि मैं मस्जिदुल हराम में दाख़िल हुआ और खा़न-ए-काबा का तवाफ़ कर रहरा हूँ। यह ख़्वाब कर सहाबा ने आपसे मक्के चलने और उमरा व तवाफ़ बजा लाने का इसरार किया। चुनानचे आपने उनके इसरार पर मक्के जाने का इरादा किया और मदीने के गिर्द व पेश के लोगों को भी साथ चलने की दावत दी। चौदह सौ या पन्द्रह सौ पच्चीस मुसलमानों की जमीअत आपके साथ जाने पर तैयार हुई जिसे लेकर रोज़े दोशन्बा अव्वल माहे ज़ीकद सन् 6 हिजरी को आप मदीने से रवाना हुए। वादी ज़िल हलीफ़ा से सभों ने अपने हथियारों को उतार कर एहराम बाँधा ताकि कुरैश को यह इत्मेनान हो जाये कि मुसलमानों के पेशे नज़र जंग व क़ताल नहीं है बल्कि सिर्फ़ आदाब व रूसूमे ज़ियारत का बजालाना है। मगर जब यह क़ाफ़िला असफ़ान के क़रीब पहुँचा तो कुरैश काफ़िर सतादा बसर इब्ने अबु सुफ़ियान आन हज़रत (स.अ.व.व.) कि ख़िदमत में हाज़िर हुआ और उसने कहा कि आपकी आमद का ख़बर सुन कर कुरैश वादी ज़ी तवी में जमा हो चुके हैं और ख़ालिद बिन वलीद को एक दस्ता सिपाह के साथ इस ग़र्ज़ से रवाना किया है कि वह आपको आगे बढ़ने और मक्के में दाख़िल होने से रोक दें। आन हज़रत (स.अ.व.व.) रास्ता बदला और शनयतुल मुराद की तरफ़ से होते हुऔ हुदैबिया में उतर पड़े। ख़ालिद बिन बलीद ने पलट कर कुरैश को इत्तेलाह दी कि मुसलमानों ने रास्ता बदल दिया है और हुदैबिया की तरफ़ जा चुके हैं। कुरैश ने बदील इब्ने वरका़ ख़िजाई को बनि खुज़ाआ के चन्द आदमियों के हमराह आन हज़रत से गुफ़्त शुनीद के लिये भेजा। हुदैबिया पहुँच कर उसने आन हज़रत (स.अ.व.व.) से कहा कि आप यही से वापस चले जायें और मक्के में जाने का इरादा तर्क कर दें। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने फ़रमाया , हम ख़ान-ए-काबा का तवाफ़ और मरासिमें ज़ियारत बजा लाने को आये हैं जंग के इरादे से नहीं आये लेहाज़ा कुरैश को हमारी तरफ़ से मुत्मईन रसहना चाहिये। बदील ने पलट कर आन हज़रत (स.अ.व.व.) का पैग़ाम कुरैश को पहुँचाया। उन्होंने कहा कि हम ने माना कि उनका इरादा जंग का नहीं है मगर इसके बावजूद हम उन्हें मक्के में दाखिल नहीं होने देंगे और अगर वह सीना ज़ोरी करेंगे तो हम पूरी कूवत व ताक़त से उन्हें रोकेंगे। उरवा इब्ने मसूद सक़फी ने कहा इसमें हमारा क्या नुकसान है कि वह आयें और उमरा व तवाफ़ के बाद फिर पलट जायें। कुरैश ने कहा कि अहले अरब उसे हमारी कमज़ोरी पर मामूल करेंगे। उरवा ने कहा फिर मुझे इजाज़त दी जाये कि मैं मुहम्मद (स.अ.व.व.) से बात चीत करके इस मुहायिदे को सुलझाने की कोशिश करूं। कुरैश ने उसे इजाज़त दी और पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में हाज़िर हुआ और उनसे कहा कि ऐ मुहम्मद (स.अ.व.व.) ! कुरैश आप ही का ख़ानदान व क़बीला है में यह पहली मिसाल होगी कि किसी ने अपनी क़ौम को तबाह व बरबाद किया हो। कुरैश नहीं चाहते कि आप मक्के में दाख़िल हों और अगर आपने ज़बरदस्ती दाख़िल होना चाहा तो उसका लाज़मी और यक़ीनी नतीजा जंग है। और जब जंग छिडेगी तो यही ऊबाश लोग जो आपके इर्द मण्डला रहे हैं भागते नज़र आयेंगे। उस पर हज़रत अबुबकर ने उरवा को एक मोटी सी ग़लीज़ गाली दी। उरवा ने पूछा , यह कौन है ? उसे बताया गया कि यह अबुबकर है। उसने कहा ऐ अबुबकर! तुम्हारा एक एहसान मुझे याद है वरना इसी वक़्त तुम्हारी इस बदज़बानी का जवाब तुम्हें दे देता। उरवा के हिल्म व ज़्बत और एहसान शनासी से पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) ने उसकी मुतावाज़िन तबीअत का अन्दाज़ा कर लिया। और उसके मुन्सफ़ाना जज़बात की झिन्जोडते हुए फरमाया , यह काहँ का इन्साफ़ है कि हमें उमरा और तवाफ़ से रोका जाये जब हम न तो जंग के इरादे से आये हैं और न जंग करना चाहते हैं। उरवा आन हज़रत (स.अ.व.व.) की इस गुफ़्तगू से मुतासिर हुआ और पलट कर उसने कुरैश को बताया कि मैंने क़ैसर व किसरा और नजाशी के पुरशिकोह दरबारों को देखा है मगर जो शान व शौकत और अक़ीदत व एहतराम मुहम्मद (स.अ.व.व.) के यहाँ नज़र आता है वह कहीं नहीं है। हमें चाहिये कि उन्हें उमरा और तवाफ़ से न रोकें और पुर अमन रहते हुए उन्हें मक्के में आने की इजाज़त दे दें। मगर कुरैश ने एक न सुनी और अपनी ज़िद पर अड़े रहे। हलीस इब्ने अलक़मा ने जब उनकी हट धर्मी देखी तो कहाः-

(ऐ गिरोहे कुरैश हम तुम्हारे हलीफ़ सही मगर हमने इस बात पर तुमसे अहद व पैमान नहीं किया कि जो ख़ान-ए-काबा मुरासिम ताज़ीम बजा लाने की ग़र्ज़ से आये उसे तुम मना करो।)

जब इन सिफ़ारिशों का कोई नतीजा न निकला तो आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने ख़राश इब्ने उमय्या ख़िज़ायी को अपनी सवारी के ऊँट पर सवार करके कुरैश के पास भेजा मगर कुरैश कोई बातचीत करने के बजाये उनके क़त्ल पर तैयार हो गये। हलीस और उनके ज़ेरे असर क़बाएल ने जब यह देखा कि कुरैश हलीस को क़त्ल कर देना चाहता है तो वह उनके हक़ में सिपर बन गये हैं और तलवारों के नरग़े से निकाल कर वापस भेज दिया। अलबत्ता कुरैश ने अपनी ज़ेहनी शिकस्त खुरदगी का मुज़ाहिरा करते हुए आन हज़रत (स.अ.व.व.) का ऊँट काट डाला और उसके टुकड़े टुकड़े कर दिये।

इस वाक़िये के बाद आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने हज़रत उमर को कुरैश के पास रवाना करना चाहा लेकिन उन्होंने यह कहकर साफ़ इन्कार कर दिया कि (मक्के में मेरे क़बीले (बनि अदी) की कोई फ़र्द नहीं है जो मेरी हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी ले सके। मुझे उनसे अपनी जान का ख़तरा है आप उस्मान को भेज दीजिये वह मुझसे ज़्यादा बाअसर है।

हज़रत उमर के इस इन्कार से आन हज़रत (स.अ.व.व.) के दिल को यक़ीनन ठेंस पहुँची होगी और आपको उरवा की यह बात याह दाई होगी कि (मै आपको गिर्दों पेश ऐसे ऊबाश लोगों को देख रहा हूँ जो जंग छिड़ने पर भाग खड़े होंगे)

बहर हाल आपने हज़रत उस्मान को इस काम कर मामूर फरमाय और उनके अक़ब में दर मुहाजरीन का एक वफ़द और रवाना कर दिया। जब यह लोग मक्के में पहुँचे तो उस्मान ने अबुसुफ़ियान और दीगर अकाबरीने कुरैश को आन हज़रत (स.अ.व.व.) का पैग़ाम दिया कि वह तवाफ़े काबा की ग़र्ज़ से आये हैं और जंग का कोई इरादा नहीं रखते. मगर कुरैश ने उनकी बात भी न मानी और वापस भेजने के बजाये अपनी हिरासत में रोक लिया। उन लोगों के रोक लिये जाने से मुसलमानों में यह अफ़वाह फैल गयी कि हज़रत उस्मान और दूसरे मुहाजिर सब क़त्ल कर दिये गये।

चूँकि यह लोग सफ़ीर की हैसियत से वहाँ गये थे और सफ़ीरों का क़्तल आईन के ख़िलाफ़ था इसलिये मुसलमानों में ग़म व गुस्से की लहर दौजड़ गई और वह कहने लगे कि हम इस क़त्ल का बदला लिये बग़ैर मदीने वापस नहीं जायेंगे। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने मुसलमानों को जंग पर आमादा देखा तो इस ख़्याल से कहीं यह वक़्ती और हंगामी जोश न हो , उन्हों एक बबूल के पेड़ के नीचे जमा किया और उनसे इस अमर पर बैयत ली कि जंग छिड़ जाने की सरत में वह मैदान से मुँह नहीं मोड़ेंगे और जान की बाज़ी लगा कर दुश्मन का मुक़ाबला करेंगे। 3

इस बैयत को बैयते रिज़वान कहा जाता है क्योंकि ख़ुदा वन्दे आलम ने इस पर अपनी रज़ा व खुशनूदी का इज़हार फरमाया है। इस बैयत की तक़मील जब हो चुकी तो मामूल हुआ कि हज़रत उस्मान वग़ैरह के क़त्ल किये जाने की ख़बर ग़लत थी। चुनानचे क़त्ल इसके कि फ़रीक़ीन के दरमियान कोई जंगी झड़प हो वह लोग बाख़ेरियत वापस आ गये। इस वापसी का लाज़मी नतीजा यह होना चाहिये था कि मुसलमानों ने बर अंगेख़ता जज़बात में ठहराओ पैदा हो जाये। दूसरी तरफ़ मुश्रेकीन भी लड़ाई के हक़ में न थे वह लोग सिर्फ अपनी बात को बुलन्द बाला देखना चाहते थे ताकि क़बाएले अरब पर उनकी धाक जमी रहे। चुनानचे इस वाक़िये के बाद उन्होंने हौयेतब और सुहैल बिन अम्र को सुलहा की गुफ़्तगू के लिये भेजा। पैग़म्बर (स.अ.व.व.) भी जंग के रवादार न थे उन्होंने सुलहा पर अपनी रज़ा मन्दी का इज़हार किया बात चीत के लिये हज़रत अली (अ.स.) इब्ने अबुतालिब (अ.स.) को मुन्तख़ब फ़रमाया जब कि तबरी ने तहरीर किया है किः-

(कुरैश ने सुहैल इब्ने अम्र और हौयतब का सुलह के लिये इख़तेयारात दे कर भेजा और आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने हज़रत अली (अ.स.) को सुलहा की गुफ़्तगू के लिये मुन्तख़ब फरमाया) 1

जब दोनों फरीक़ में बातचीत शुरू हुई तो कुरैश के मुमाइन्दों ने यह महसूस करते हुए कि फरीक़ सानी जगं के हक़ में नहीं हे इस पर बेज़ा शराएत आयद न करना शुरू करदी चुनानचे बड़ी रद व क़दह के बाद हस्ब जेल शराएत पर समझौता हुआ।

(1) मुसलमान इस साल बग़ैर उमरा अदा किये वापस जायेंगे।

(2) आइन्दा साल उमरा की ग़र्ज़ से आ सकते हैं मगर मक्के मे तीन दिन से ज़्यादा क़याम नहीं कर सकते।

(3) मुसलमान अपने हमराह तलवार के अलावा दीगर जंगी हथियार नहीं ला सकते और तलवार भी न्याम के अन्दर रहेगी।

(4) क़बाइले अरब में हर क़बीले को इस अमर का इख़तेयार होगा कि वह फ़रीक़ैन में से किसी भी फ़रीक़ से मुहायिदा करे और हलीफ़ व मुआहिद क़बाएल पर भी इन शरायत की पाबन्दी लाज़मी होगी।

(5) मक्के वालों में से अगर कोई शख़्स मुसलमानों के यहाँ चला जायेगा तो मुसलमान इस बात के पाबन्द होंगे कि वह उसे वापस कर दें और अगर मुसलमानों का कोई आदमी कुरैश के यहाँ आ जायेगा तो उसे वापस नहीं किया जायेगा।

(6) इस मुहायिदे की मुद्दत मेयाद दस बरस की होगी इस अरसे में न किसी आने जाने वाले को रोका जायेगा और न कोई लड़ाई झगड़ा होगा।

यह तमाम शराएतें क़रीब क़रीब कुरैश ही के हक़ में थी और वह इन शराएत को मनवाये बगै़र किसी तरह सुलहे पर आमादा न थे इन हालात में सुलह से उहदाबरआ होना कोई आसान काम नथा जब कि कुरैश का भी एक तबक़ा सुलह के हक़ में न था और मुसलमानों की अकसरियत भी इन शरायते सुलह पर मुतमईन न थी। अब दो ही सूरतें थी. या तो उनके मुतालिबात को तस्लीम किया जाये या उनसे जंग छेड़ दी जाये।

पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) की नज़रें जगं के नताएज पर भी थीं और सुलहा के फ़वाएद व मसालेह पर भी। अगर पैगम्बर (स.अ.व.व.) इन शराएत के मुक़ाबिले में जो बज़ाहिर मुसलमानों की कमज़ोरी व बेबसी का आईनादार थीं , जंग करते और बिलफ़र्ज़ फ़ातहे भी हो जाते तो इसका नतीजा यह होता कि कुरैश और मुसलमानों के दरमियान इतनी मुनाफ़ेरत बढ़ जाती कि वह कभी इस्लाम के क़रीब भी न फटकते। नीज़ जंग से यह बात भी उभर कर सामने आती है कि पैगम़्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) तबियतन सुलह पसन्द न थे। इसलिए आपने जंग पर सुलह को तरजीह दी और अमन पसन्दी का सुबूत मोहय्या किया।

अब मुहायिदे की तहरीर का मामला दर पेश हुआ सुहैल ने उसमें भी क़दम क़दम पर उलझनें पैदा की। चुनानचे जब हज़रत अली (अ.स.) दस्तावेज़ तहरीर करने लगे तो आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने फ़रमाया कि पहले बिस्मिल्लाह हिर रहमानिर रहीम लिखो। सुहैल ने कहा , हम नहीं जानते कि अलरहमान क्या होता है इसके बजाए (बाइस्मकल्ला हुम्मा) 1 लिखिये जो हमारा यहाँ का दस्तूर है। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने उलढना मुनासिब न समझा। उसके बाद हज़रत अली (अ.स.) ने यह फ़िक़रा लिखा कि (यह वह मुहायिदा है जो अल्लाह के रसलू (स.अ.व.व.) मुहम्मद (स.अ.व.व.) ने सुहैल इब्ने अम्र से किया है। सुहैल ने फिर एतराज़ किया और कहा हम उन्हं अल्लाह का रसूल कब समझते हैं ? अगर रसूल ही समझते होते तो मक्के में दाख़ले से मानेय न होते लेहाज़ा इसके बजताये सिर्फ़ मुहम्मद (स.अ.व.व.) बिन अब्द्ल्लाह लिखा जाये। हज़रत अली (अ.स.) ने क़लम रोक लिया और फ़रमाया ख़ुदा की क़सम मैं लफ्ज़े रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) नहीं काटूंगा। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने फ़रमाया लाओ मुझे दो। चुनानचे आपने ख़ुद ही लफ़्ज़े रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) पर ख़त खींच दिया और हज़रत अली (अ.स.) से मुख़ातिब होकर फ़रमाया , एक दिन तुम्हे भी इस कि़स्म की आज़माइश से दो चार होना पड़ेगा। 2

जब दस्तावेज क़लाम बन्द हो गई तो दोनं फ़रीक़ के गवाहों ने उस पर शहादते सब्त की और उसका एक नुस्ख़ा रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) के सुपुरद किया गया और एक नुस्ख़ा सहल इब्ने अम्र को दिया गया।

इस सुलह की गुफ़्तगू से लेकर तहरीरे मुहायिदे तक तमाम मराहिल आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने ख़ुद अपनी राय से तय किये। और इस पूरी कार्रवाई में न सहाबा को शरीके मशविरा किया और न उनकी राय की ज़रूरत महसूस की गई अलबत्ता एक हज़रत अली (अ.स.) थे जो शरायते सुलह की गुफ़्तगू से लेकर तहरीरे मुहायिदे तक पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) के शरीक कार थे। अकसर सहाबा सुलह और उसके शरायत के सख़्त मुख़ालिफ़ ते यह तवक़्का लिये हुए थे कि वह अलल ऐलान मक्के में दाख़िल होकर उमर और तवाफ़ से सरफ़राज़ होंगे मगर जब क़रारदाद सुलह की रू से यही से वापसी तय पा गई तो उनमें एक हैजाना सा पैदा हो गया और यह बेचैनी और हैजानी कैफ़ियत इस हद तक बढ़ी कि उनके दिलों में शकूक़ व शुबहात पैदा हो गये चुनानचे तबरी का कहनाहै किः- पैग़म्बर (स.अ.व.व.) के असहाब जब मदीने से निकले थे तो उन्हें फतेह में कोई शक व शुमा न था मगर जब उन्होंने सुलह और वापसी की सूरत देखी और यह देखा कि रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) ने ज़ाती तौर पर शरायत मन्ज़ूर कर लिये हैं तो उन लोगों के दिलों में एक बड़ा ख़दशा पैदा हुआ और क़रीब था कि वह हलाकत में मुबातिला हो जाते।) 1

हज़रत उमर इस सुलह पर सबसे ज़्यादा बरअफ़ोख़ता थे उनकी नाराज़गी इस हद तक बढ़ी कि वह गुस्से में पेच व ताब खाते हुए आं हज़रत (स.अ.व.व.) के पास आये और कहा क्या आप पैगम़्बर (स.अ.व.व.) बरहक़ नही हैं ? फ़रमाया कि यक़ीनन मैं अल्लाह का रसूल हूँ। कहा , क्या आपने यह नहीं कहा था कि हम ख़ान-ए-काबा का तवाफ़ करायेंगे ? फ़रमाया कि मैंने यह तो नहीं कहा कि यह इसी साल होगा। कुछ सब्र से काम लो , जो भी हुआ है वह अल्लाह के हुक्म से हुआ और इसमें उसके हुक्म की नाफ़रमानी नहीं कर सकता। पैगम़्बर (स.अ.व.व.) के समझाने के बावजूद हज़रत उमर की उलझनें कम न हुई और वह गुस्से में भरे हुए हज़रत अबुबकर के पास आये और उनसे भी वही उखड़ी उखड़ी सी बातें की जो आपने पैग़म्बर (स.अ.व.व.) से की थीँ। उन्होंने कहा , ऐ उमर! तू उनकी रकाब थामे रहो और भागने की कोशिश न करो में गवाही देता हूँ कि वह ख़ुदा के रसूल हैं। 2

हज़रत अबुबकर को पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की रिसालत की यक़ीन दहानी कराने की ज़रुरत इसलिये महसूस हुई कि हज़रत उमर की गुफ़्तगू से साफ़ ज़ाहिर था कि उनहें आन हज़रत (स.अ.व.व.) कि रिसालत मशकूक व मुशतबहा नज़र आ रही है। चुनानचे ख़ुद हज़रत उमर ने भी अपने शकूक व तज़बजुब का इहज़हार इन अल्फाज़ में किया है (ख़ुदा कि क़सम मैंने जब से इस्लाम कुबूल किया है मुझे रसूल (स.अ.व.व.) की रिसालत पर ऐसा शक नहीं हुआ।) 3

साहाबा की बरहमी और नाराज़गी का यह आलम था कि जब आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने मुहायिदा सुलह को अमली जामा पहनाते हुए उन्हें हुक्म दिया कि कुर्बानियां करो और सरके बाल मुण्डवाओ तो कुछ देरस पहले जो लोग पैग़म्बर (स.अ.व.व.) के हर इशारे पर सरे इताअत ख़म करते थे वही नाफ़रमानी पर उतर आये और बार बार कहने के बावजूद पर मण़्डवाने और कुर्बानी करने पर आमादा न हुए. तबरी का कहना है ख़ुदा की क़सम आन हज़रत (स.अ.व.व.) के तीम मर्तबा हुक्म देने के बावजूद कोई भी तामील के लिये खड़ा न हुआ। 4

पैग़म्बरे अकरम (स.अ.व.व.) ने जब इस सूरते हाल का मुशाहिदा फ़रमाया तो कबीदा ख़ातिर होकर उठे और हज़रत उम्मे सलमा के ख़ेमें में ख़ामोशी से बैठ गये। उम्मे सलमा ने चेहरये अक़दस पर जब आसारे मलाल देखे तो वजह पूछी। आपने सहाबा की नाफ़रमानी और बे-एतनाई का शिकवा किया। उम्मे सलमा ने कहा आप किसी को मजबूर न करें और ख़ुद जाकर कुर्बानी करें और सर के बाल मुण्डवा कर एहराम उतार दें।

आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने बाहर निकल कर कुर्बानी की और सर मुण्डवा कर एहराम उतार दिया। जब सहाबा ने देखा कि पैग़म्बर (स.अ.व.व.) के फ़ैसले में कोई तबदीली मुम्किन नही है तो मजबूरन कुछ लोगों ने सर मुण्डवा दिया और कुछ ने अपने बाल छोटे करा दिये। तबरी का बयान है कि गुस्से की हालत में वह एक दूसरे का सर इस तरह मूण्ड रहे थे जैसे एक दूसरे को क़त्ल कर रहा हो। 5

इस सुलह की मसलहतों को अकसर मुसलमान अपनी कोताह नज़री को वजह से न समझ सके थे और सुलह के मौक़े पर या उसके बाद भी क़बीदा ख़ातिर रहे मगर जब उसके नतीजे में उन्हें दीनी व सियासी एतबार से वह काम्याबियां हासिल हुई जिनकी वह तवक़्के भी न कर सकते थे तो उनकी आँखे खुल गयीं और उन्हे पैगम़्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) की दूर अन्देशी , अन्जाम बीनी और हक़ीक़ती रसी का एतराफ़ करना पडा। ख़ुदा वन्दे आलम ने आन हज़रत (स.अ.व.व.) के इस इक़दाम सुलह को फ़तेह में से ताबीर किया है जिसका जिक्र कुरान में मौजूद है।

अबुजिन्दल और अबुबसीर का वाक़िया

मुहायिदे की शर्त अभी ज़ाबतए तहरीर में न आई थी कि सुहैल इब्ने अम्र का बेटा अबुजिन्दल जो इस्लाम लाने के जुर्म में कुरैश के हाथों क़ैदो बन्द की सऊबतें झेल रहा था निगेहबानों की नज़र बचा कर निकला और पा ब ज़न्ज़ीर पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में हाज़िर हो गया और कहा , या रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) ! मुझे अपने हम रकाब रहने की इजाज़त दीजिये। जब सुहैल ने अपने बेटे को देखा तो आन हज़रत (स.अ.व.व.) से उसने कहा हमारे दरमियान मुहायिदा हो चुका है कि हमारा जो आदमी भाग कर आयेगा उसे वापस किया जायेगा लेहाज़ा अबुजिन्दल को वापस कीजिये। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने फरमाया , अभी मुहायिदा ख़त्म कर देंगे आख़िरकार पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने अबुजिन्दल को सब्रो तहाम्मुल की हिदायत के बाद सुहैल के हवाले कर दिया। जब अबुजिन्दल उठ कर चलने लगा तो हज़रत उमर भी उसके साथ खड़े हुए उसे अपने बाप सुहैल के क़त्ल पर उभारा। अबुजिन्दल ने कहा , (ऐ उमर! तुम हुक्मे रसूल (स.अ.व.व.) की बजाआवरी का मुझसे ज़्यादा हक़ नहीं रखते। 1

कुफ़्फारे कुरैश ने अपनी इस शर्त को अमलन मनवा कर यह समझ लिया कि उन्होंने बाजी जीत ली हालाँकि यह शर्त मुसलमानों के लिये क़तई ज़रररेसाँ न थी इसलिए कि अगर कोई शख़्स इस्लाम से मुन्हरिफ़ होकर कुरैश के यहाँ चला जाता है तो वह इरतेदाद के बाद जुमरये मुसलेमीन में शामिल किये जाने के क़ाबिल ही कब रहता है किसी भाग निकलने वाले की वापसी पर मुसिर थे तो उसे वापस कर देने में मुसलमानों का नुक़सान ही क्या था जबकि वह मक्के में रह कर भी मुसलमान रह सकता था और शराएते सुलह की रू से कोई शख़्स उसे इस्लामी आमाल व इबादात से रोकने का मजाज़ न था। अलबत्ता यह शराएत कुरैश के लिये इन्तेहाई नुक़सान दे साबित हुई और उनके जान व माल की तबाही का सबब बन गई। चुनानचे इस सुलह की तकमील के बाद कुरैश का एक शख़्स अबुबसीर अतबा इब्ने असीद मुसलमान होकर चोरी छिपे मदीने चला आया। कुरैश ने अपने दो आदमियों को ख़त देकर मदीने भेजा और उसकी वापसी का मुतालिबा किया। आन हज़रत (स.अ.व.व.) के सुलहे नामे की शर्त के मुताबिक़ अबुबसीर को बुला कर उससे फरमाया कि तुम उनके हमराह मक्के चले जाओ। अबुबसीर उनके साथ हो लिया। जब ये लोग वादी जुलहलीफ़ा में दाखिल हुए तो अबुबसीर ने उनमें से एक की तलवार की बड़ी तारीफ़ की। उसने कहा हाँ वाक़ई मेरी तलवार बहुत उमदा दहै और ये कह कर तलवार नियाम से निकाल ली। अबुबसीर ने देखने के बहाने से वह तलवार ले ली और उसी खी तलवार से उसी को मौत के घाट उतार दिया। दूसरे ने जब देखा कि उसका साथी मारा गया तो वह भी डर के मारे भाग खड़ा हुआ और मदीने पहुँच कर रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) से फ़रयादी हुआ कि अबुबसीर ने मेरे साथी को क़त्ल कर दिय है और मुझे भी उससे अपनी जान का ख़तरा है इतने में अबुबसीर भी वापस आ गया और पैग़म्बर (स.अ.व.व.) से कहा या रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) आपने मुझे इनके हवाले कर दिया था और मुहायिदा की रद से अब कोई ज़िम्मेदारी आप पर आयद नहीं होती लेहाज़ा दोबार मुझे इसके साथ मक्के जाने के लिये न कहा जाये। पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने फरमाया कि ये शख़्स जंग की आग भड़काना चाहता है अगर इसकी हिमायत की गई तो यह कुरैस से जंग के मुतरादिफ़ होगा। अबुबसीर समझ गया कि आन हज़रत (स.अ.व.व.) उसे वापस किये बगै़र नहीं रहेंगे। उसने मौक़ा देखकर समुन्द्र की तरफ़ रूख़ किया और साहिल के दामन में सुकूनत पज़ीर हो गया। उधर अबजिन्दल को जो मक्के में नज़र बन्द था जब यह पता चला कि अबुबसीर साहिल की तरफ़ निकल गया तो उसने चुपके से उधर का रूख़ किया और रफ़्ता रफ़्ता यह जगह मक्के से भाग निकलने वालों की पनाह गाह ब गीई और मजी़द सत्तर मुसलमान आकर वहाँ आबाद हो गये और सबने अपनी ताक़त को यकज़ां करके एक मज़बूत जत्था बना लिया। चुनानचे जब कुरैस के क़ाफ़िले उधऱ से गुज़रते तो ये उन पर छापे मारते और उन्हें लूट लेते। कुरैश जब उनके हाथों तंग आ गये तो उन्होंने आन हज़रत (स.अ.व.व.) को यह पैग़ाम भेजा कि आप उन लोगों को अपने यहाँ बुला लें हम आइन्दा किसी ऐसे शख्स से ताअर्रूज़ नहीं करेगें जो मुसलमान होकर यहाँ से आपके पास चला जायेगा। चुनाचे आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने अबुबसीर को कहलवा भेजा कि वह मदीने चला आये। कैफ़ियत तारी थी। उसने अबुजिन्दल से कहा तुम मदीने चले जाओ ग़र्ज़ कि अबुजिन्दल मदीने चला आया और कुरैश की यह तदबीर उनकी शिकस्त में तबलीद हो गई।

मुख़तलिफ़ वाक़ियात

• बाज़ मोअर्रिख़ का कहना है कि शराब उशी साल हराम हुई जबकि अक़सर ने सन् 4 हिजरी में उसका हराम होना तहरीर किया है।

• हज़रत आयशा की वालिदा उम्मे रूमान की रेहलत वाक़े हुई।

• पैग़म्बरे अकरम (स.अ.व.व.) ने उम्मे हबीबा से अक़द फ़रमाया।


(सन् 7 हिजरी)

तबलीग़ी मकतूबात

कुरैश की मुख़ालफतें , ख़ुफिया साज़िशें और दरपर्दा रेशा दवानाईयां अब तक इस्लाम की तौसीय व तबलीग़ और नशरो अशाअत में सुद्देराह थी लेकिन सुलहे हुदैबिया के बाद इस्लाम आज़ाद हो चुका था और उसके लिए तबलीग़ व इशाअत के रास्ते खुल चुके थे इसिलये वहाँ की वापसी पर सराकेर दो आलम (स.अ.व.व.) ने दीगर मुमालिक के ताजिरों और बादशाहों को मकतूबात के ज़रिये इस्लाम की दवात देने का फ़ैसला किया। चुनानचे सन् 7 हिजरी के अवाएल में आपने अपने नाम की एक मुहर बनवाई जिस पर (मुहम्मद रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) ) कन्दा कराया। उसके बाद आपने शाहाने आलम को ख़तूत लिखे।

उन दिनों अरब के गिर्द चार बड़ी हुकूमतें क़ायम थीं ( 1) हुकूमते ईरान जिसका असर वस्त एशिया से इराक़ तक फैला हुआ था। ( 2) हुकूमते रोम जिसमें एशियाये काचिक , फिलिस्तीन , शाम और युरोप के बाज़ हिस्से शामिल थे ( 3) मिस्र ( 4) हुकूमते हबश जो मिस्री हुकूमत के जुनूब से लेकर बहरे कुलज़ुम के मग़रिबी साहिल पर हिजाज़ व यमन के मुतावाज़ी क़ायम थी और उसका असर सहराये आज़म अप़रीक़ा के तमाम आला इलाकों पर था।

आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने बादशाहे हबश नजाशी , क़ैसरे रोस हर कुल , गवर्नर मिस्र जरीह इब्ने मक़कूस , शाह ईरान खुसरू परवेज़ , गवर्नरे यमन बाज़ान और वालीए दमिश्क हारिस वग़ैरा के नाम खुतूत रवाना किये।

मुख़तलिफ़ बादशाहों पर आपके खुतूत का मुख़तलिफ़ असर हुआ। नजाशी ने इस्लाम कुबूल कर लिया। शाह ईरान इस क़द्र आपे से बाहर हुआ कि उसने आपके ख़त को पाश पाश कर दिया , क़ासिद को ज़लील करके निकल दिया और यमन के गवर्नर को लिखा कि मदीने के दीवाने को ग़िरफ़्तार करके मेरे पास भेजो। उसने कुछ सिपाही मदीने भेजे ताकि वह हुज़ूरे अकरम (स.अ.व.व.) को गिरफ़्तार करे। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने फ़रमाया कि तुम्हें कुछ ख़बर भी है मरी गिरफ़्तारी का हुक्म जारी करने वाला मर गय। सिपाही जब यमन पहुँचे तो उन्हें मालूम हुआ कि शाहे यमन मर चुका है। चुनानचे जब यह ख़बर आम हुई तो हज़ारों काफिर मुसलमान हो गये। क़ैसरे रोम ने आपके ख़त की ताज़ीम की। गवर्नर मिस्र ने आपका ख़त अपनी आँखों से लगाया और क़ासिद की बड़ी ख़ातिर व मदारात की और बेश क़ीमत तहायफ़ के साथ रूख़सत किया। उन तोहफ़ों में मारया क़िब्तिया , उसकी बहन शीरीं (ज़ौजा हिसान बिन साबित) दुलदुल नामी एक ख़च्चर और याफूरिया माबूर नामी एक ख़्वाज़ा सरां भी शामिल था। 1 आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने अपने क़ासिदों में वही कलबी को क़ैसरे रोम , अब्दुल्लाह बिन ख़ज़ाफ़ा तसहमी को शाहे ईरान हातिब बिन बलतआ को अज़ीमे मिस्र , अम्र बिन उमय्या को हब्शा के बादशाह नजाशी , सलीत बिन अम्र को यमामा और शुजा बिन वहब असदी को शाम की तरफ़ रवाना किया था।

मारकऐ-ख़ैबर

ख़ैबर , इबरानी ज़बान में क़िला व हिसार के मानों में इस्तेमाल होता है और एक क़ौल यह भी है कि क़ौमे अमालेक़ा में ख़ैबर और यसरब नाम के दो भाई थे वह जहाँ आबाद हुए वह जगह उनके नाम से मौसूम हो गयी चुनानचे यसरब के नाम यसरब (मदीना) आबाद हुआ और ख़ैबर के नाम पर ख़ैबर आबाद हुआ जो मदीने से तक़रीबन अस्सी ( 80) मील की दूरी पर शाम व हिजाज़ की सरहदों पर वाक़े है। यह मुक़ाम अपने सरसब्ज़ व शादाब खेतों , बागों और नख़लिस्तानों की वजह से दूर दूर तक मशहूर था. मगर उसके साथ ही यह इलाक़ा यहूदियों की आमाजगहं और उनकी जंगी कूवतों का मरकज़ भी था। उन्होंने दिफ़ायी इस्तेहकाम के पेशे नज़र यहाँ छोटे बड़े सात कि़ले तामीर कर रखे थे और उन क़िलों में मजमूई तौर पर चौदह हज़ार यहूदी आबाद थे जिन में वह यहूदी भी शामिल थे जो मदीने से जिला वतन होकर यहाँ आबाद हो गये थे और उन्होंने ओहद और ख़न्दक की जंगों में मुश्रकेीन का खुल कर साथ दिया था।

सुलैह हुदैबिया के बाद यह लोग इस ग़लत फ़हमी में मुबतिला हो गये कि मुसलमानों ने कुरैश से दब कर सुलह कर ली है और अब दुश्मन से टकराने की हिम्मत उनमें नहीं है। चुनानचे उनमें ज़राएत पैदा हुई और उन्होंने मुसलमानों की सुलह पसन्दाना रविश को कमज़ोरी पर महमूल करते हुए इस्लामी मरकज़ मदीने पर हमला करके उसे ताराज व बरबाद करने का मनसूबा बनाना शुरू कर दिया ताकि अपनी जिला वतनी और ग़ज़वये एहजा़ब की निदामत व ख़िफ़्फ़त का बदला ले सकें। उन्होंने अपनी कसरत व कूवत में मज़ीद इज़ाफ़े के लिये बनि ग़तफ़ान से जो ख़ैबर से छः मील की दूरी पर आबाद थे मुहायिदा किया कि अगर वह मुसलमानों के ख़िलाफ़ जंग में उनका साथ देंगे तो उन्हें खैबर की निस्फ़ पैदावार दी जायेगी। बनि ग़तफ़ान ने उसे मन्ज़ूर किया और उनके चार हज़ार नबर्द आज़मां उन यहूदियों के परचम तले जमा होकर लड़ने मरने पर तैय्यार हो गये।

पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) को जब यह मालूम हुआ कि ख़ैबर के यहूदी मदीने पर हमले करने के लिये तुल रहे हैं तो आपनी तादीबी कार्रवाई ज़रूरी समझी ताकि फ़ितना परवर और शर अंगेज़ ताक़तों को कुचल कर अमन को बरक़रार रखा जा सके। चुनानचे हुदैबिया से मराजियत के बाद आपने बीस दिन मदीने में क़याम फरमाया और सोलह सौ सहाबियों के साथ जिनमें दो सौ सवार और बाक़ी पियादा थे ख़ैबर की तरफ़ रवाना हुए। जब लश्करे इस्लाम ख़ैबर के नवाह में दाख़िल हुआ तो सुबह का वक़्त था। ख़ैबरी यहूदी अपने कन्धों पर फावड़े रके और हाथों में बेलचे लिये अपने खेतों में काम करने की ग़र्ज़ से जा रहे थे कि उन्होंने इस्लामी फ़ौजों को देखे। बढ़ते हुए क़दम रुक गये। और लोग बदहवास होकर अपने क़िलों की तरफ़ भागे। मुसलमानों ने उन्हें भागते देखा तो सदाये तकबीर बुलन्द की और पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने फ़रमाया।

(खैबर बरबाद हो गया। जब हम किसी क़ौम की सरह पर उतरते हैं तो उन पर क्या बुरा वक्त पड़ता है) 1

पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) को चूँकि यह इल्म हो चुका था कि बनि ग़तफ़ान , अहले ख़ैबर के हलीफ़ व मुआहिद हैं और वह जंग में उनका साथ देंगे इसिलये आपने अहले ख़ैबर और बनि ग़तफ़ानकी आबादी के दरमियान मुक़ामे रजीय में अपना पड़ाव डाला ताकि वह अहले ख़ैबर की मदद को पहुँच न सकें। और यही हुई की जब वह लोग ख़ैबरियों की मदद के इरादे से निकले तो दरमियान में मुसलमानों का लश्कर हायल देख कर ठहर गये और अपनी तबाही के पेशे नज़र अपने अपने घरों में दबक कर बैठ गये।

मुसलमान ख़ैबर के मुहासिरे की ग़र्ज़ से आगे बढे। यहूदियों ने अपनी औरतों और बच्चों को तो क़िले कतीबा में महफूज़ कर दिया और खुद दूसरे क़िले में जमां होकर मुसलमानों पर तीरों और पत्थरों की बारिश करने लगे। दिफ़ायी कार्रवाई के नतीजे में मुख़तसर मुख़तसर झड़पों के बाद मुसलमानों ने मुतअद्दिद क़िलों पर अपना तसल्लुत जमां लिया मगर जिस क़िले पर फ़तहे , कामरानी का दारोमदार था वह इब्ने अबुल हक़ीक़का क़िला था जो कमूस नामी एक पहाड़ी की ढ़लान पर वाक़े होने की वजह से क़िलए क़मूस के नाम से मशहूर था , उसके सामने एक गहरी ख़न्दक़ थी और यह क़िला अपनी मज़बूरी व पायेदारी की वजह से नाक़ाबिले तसख़ीर समझा जाता था।

ग़जवात में सिपाह सलारी के फ़राएज़ आम तौर पर ख़ुद पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) अन्जाम देते थे और अलमबर्दारी का मन्सब ख़ास तौर पर अमीरूल मोमेनीन अली इब्ने अबुतालिब (अ.स.) के सुपुर्दा किया जाता था मगर इत्तेफ़ाक़ से इस मौक़े पर आन ह़रत (स.अ.व.व.) दर्दे शक़ीक़ा में मुबतिला थे और हज़रत अली (अ.स.) आशोब चश्म की वजह से लश्कर के साथ न आ सके थे। इससे कुछ लोगों को अपनी धाक जमाने के मौक़ा फ़राहम हुआ चुनानचे उन्होंने अज़ खुद अलम लेकर क़िले क़मूस को फ़तह करने की ठान ली। पहले हज़रत उमर ने अलम हाथो में लिया और एक फौज़ी दस्ते के साथ क़िले परहमला आवर होने के लिये आगे बढ़ा मगर उधर से मरहब व अन्तर के सात जब रेला दिया तो हज़ीमत उठाकर वापस पलट आये उनके बाद हज़रत अबुबकर को जोश आया और वह अलम लेकर बढ़े मगर उनके बनाये कुछ न बन पड़ी और नाक़ाम वापस आ गये हज़रत उमर ने फिर दोबारा अलम लिया मगर इस मर्तबा भी नाकाम पलटे और अपनी ख़िफ्फ़त मिटाने के लिय फौज को इस हज़ीमत का ज़िम्मेदार ठहराया लेकिन फौज़ ने खुद उन्हें नामर्द और बुज़दिल क़रार दिया जैसा कि अल्लामा तबरी ने तहरीर किया है किः- (हज़रत उमर कुछ लोगों के साथ उठ खड़े हुए और ख़ैबरियों से मुठभेड़ होते ही भाग निकले और रसूल (स.अ.व.व.) के पास वापस आ गये इस मौक़े पर फौज़ वाले कहते थे कि उमर ने नामर्दी और बुज़दिली दिखाई और उमर कहते थे कि फौज़ बुज़दिल निकली) 1

रसूले अकरम (स.अ.व.व.) के दर्द सर में कुछ कमी हुई तो ख़ेमे के बाहर तशरीफ़ लाये और इस मज़हका खेज़ हजी़मत से फौज़ में बुज़दिली के आसार देख कर आपने फरमायाः

(ख़ुदा की क़सम कल मैं अलम उस मर्द को दूँगा जो कर्र व ग़ैरे फ़र्रार और बढ़ बढ़ के हमले करने वाला होगा। वह ख़ुदा और रसूल को दोस्त रखता होगा और ख़ुदा व रसूल उसको दोस्त रखते होंगे। नीज़ वह मैदान से उस वक़्त तक न पलटेगा जब तक खुदा उसके दोनों हाथों को फतहा से हमकिनार न कर दें) 2

आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने सरदारे लश्कर के इस इल्जा़म के बावजूद कि फौज़ ने बुज़दिली का मुज़ाहिरा किया , फौज़ में कोई तबदिली नहीं की बल्कि सरदारे लश्कर को बदलने का ऐलान फरमाया इसलिये कि फौज़ का हौसला सरदार के सिबाते क़दम का मरहूने मिन्नत होता है। जब उसके क़दम उखड़ जायेंगे तो फौज़ के जमने का सवाल नहीं हुआ करता। और हदीस के अल्फाज़ (कर्रार ग़ैरे फ़र्रार) का भी तज़किरा करते। बहरहाल यह एलाने नबवी एक रौशन आईना है जिस में तसरीह भी है और तलमीह भी। मदहा भी और तनज़ भी। इसमें फ़तहे ख़ैबर के ख़दोख़ाल भी नज़र आते हैं और पलट कर आने वालों के चेहरे मेहरे भी दिखाई देते हैं। इबारत की गूँज में नवेदे फ़तेह भी है और अल्फाज़ के पर्दे में असबाबे शिकस्त पर तबसिरा भी नीज़ आने वाले कल के बारे में मुसलमानों को मुज़दए कामरानी भी। यह इल्म व यक़ीन महज़ वही के नतीजे में मुम्किन है क्योंकि अगर यह ऐलान अज़ खुद होता तो पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) इस तरह इत्मिनान व यक़ीन के साथ अताये इल्म को कल से वाबस्ता न करते और न इस तरह यक़ीनी कामयाबी व फ़तेह मन्दी का ऐलान फ़रमाते। जब कि उनके लिये हुक्मे ख़ुदा ये ता कि अगर वह किसी अमर को कल से वाबस्ता करें तो हतमी तौर में यह न कहें कि मैं कल ऐसा करूँगा। मगर यहाँ मशियते बारी के इसतेसना के बग़ैर पूरे एतमाद व सूख़ से आपका यह फ़रमाना कि कल ज़रुर ऐसा होगा , इश अमर का वाज़ेह सुबूत है कि अताये इल्म में कुदरत का भरपूर इशारा कार फ़रमा था और पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की ज़बान सिर्फ़ मंशाये इलाही की तरजुमानी कर रही थी।

इस हदीस के इल्फाज़ अगर चे मुख़तसर हैं मगर एक एक लफ़्ज़ मुनाकि़ब व फ़ज़ीलत का दफ़्तर और हामिले रायत की इन्फ़िरादियत व अफज़लियत का आईना है।

पहली सिफ़त यह ब्यान हुई है कि वह मर्द होगा। यह क़ैद अगर तौज़ीही है तो इस का मतलब यह है कि वह हिम्मत व मर्दानगी के जौहर से आरास्ता होगा और तेगे सिना के साये में मर्दाना वार लड़ेगा और अगर एहतराज़ी है तो यह दूसरोंकी शुजाअत व मर्दानगी पर नत्ज़ है कि मर्द होना और है और बाशक्ल मर्द होना और है। मर्द वह है जो मैदाने जंग में उतरने के बाद पीछे न हटे। और बशक्ले मर्द वह है जो जंग छिड़ने से पहले बड़े बड़े दावे करें मगर जब दुश्मन का सामना हो तो अपनी जान बचा कर भाग निकले।

दूसरी सिफ़त यह ब्यान हुई कि वह कर्रार ग़ैरे फ़र्रार होगा। क़र्रार के बाद ग़ैरे फ़र्रार कहने की बज़ाहिर कोई ज़रुरत न थी इसलिए कि क़र्रार के माने मुसलसल हमला करने वाले के हैं। और मुसलसल हमला करने वाला होगा वह मैदान छोड़कर जा नहीं सकता। ग़ालेबन यह कहने की ज़रुरत इस लिए महसूस फ़रमायी कि अलम की आस लगाने वाले खुद अपना जाएज़ा ले लें कि उनके क़दम मैदाने जंग में डगमगायें तो नहीं , अगर कदम उखड़ चुके हैं तो वह अपने दिलों को अलम की आरज़ू से खाली रखें और आगे बढ़ने की कोशिश न करें।

तीसरी सिफ़त यह ब्यान फरमाई गयी कि (वह खुदा और रसूल को दोस्त रखता हैः) यह मुहब्बत और दोस्ती ही का करिश्मा है कि इन्सान अल्लाह की राह में हर मुसीबत खुशी खुशी बरदाश्त कर लेता है और जिस क़द्र यह जज़बये मुहब्बत पायेदार होता जाता है उतना ही जोशे अमल बढ़ता है अगर कोई शख़्स मुहब्बत की आला तरीन मंज़िल पर फ़ाएज़ होता है तो बातिल कूवतों से टकराना , ख़तरों में फाँद पड़ना या जान दे देना इसके नज़दीक कोई बात ही नहीं होती और अगर दिल इस जज़बए इश्क व शैफ़तगी से ख़ाली है तो न क़दमों में सिबात आता है और न मैदाने जंग की सख़्तियां झेलने की कूवत पैदा होती है।

चौथी सिफ़त यह ब्यान हुई कि ख़ुदा और रसूल भी उसको दोस्त रखते हैं , यह इस दोस्ती का माहिस्ल है जो बन्दे को ख़ुदा और उसके रसूल (स.अ.व.व.) से होती है इसलिये कि जब उसके आमाल अल्लाह की दोस्ती और रज़ा तलबी की ख़ातिर हैं तो फिर अललाह की खुशनीदू और दोस्ती से सरफ़राज़ी भी यक़ीनी अमर है और फिर इस मौक़े के एतबार से दोखाजाये तो शुजाअत व सिफ़त हैं जिसे अल्लाह खुसूसी तौर पर दोस्त रखता है। चुनानचे एक हदीस में वारिद हुआ है कि अल्लाह शुजाअत को दोस्त रखता है ख़्वाह वह साँप के मारने ही से क्यों न ज़ाहिर हो। जब यह मामूली मुज़ाहिराये शुजाअत ख़ुदा की दोस्ती का बाअस हो सकता है तो वह शुजाअत जिसका इज़हार दुश्माने ख़ुदा और रसूल के मुक़ाबिले में हो उसे अल्लाह क्यों कर दोस्त रखेगा और कुरान भी गवाही देता है कि दुश्मनाने दीन के मुक़बिले में जुराएत व हिम्मत और सिबाते क़दम बन्दे को अल्लाह का महबूब बना देता है। चुनानचे इरशादे इलाही हैः- (इन्नल्लाह योहिब्बुल लज़ीना योक़ातेलून फ़ी सबीलिल्लाहे सफ़्फ़न कानाहुम नबियानुन मरसूस) अल्लाह उन लोगों को दोस्त रखता है जो उसकी राह में परा बाँध कर लड़ते हैं।

पाँचवी सिफ़्त यह ब्यान फ़रमायी कि ख़ुदा वन्दे आलम उसके हाथों पर क़िला फतहे करेगा। जब सिबाते क़दम हो तो खुदा की ताईद भी शामिले हाल होती है और ताईदे इलाही के नतीजे में फ़तेह व कामरानी भी ज़रुरी है। यह फ़तेह इतनी यक़ीनी थी कि हुदैबिया से पलटते हुए उसकी बशारत पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) को इन लफ़्ज़ों में दी जा चुकी थी कि (व असाबेही फ़तेह क़रबन) उन्हें जल्दी ही फ़तेह दी जायेगी) इसीलिये पैगम़्बर (स.अ.व.व.) ने भी फ़रमाया कि ख़ुदा उसके हाथों पर फ़तेह देगा यानि अल्लाह ने फ़तह की ख़ुशख़बरी दती और पैगम़्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) की भी फ़तेह होगी।

बहरहाल- पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) के इस ऐलान के बाद हर ज़बान पर इसी के तज़किरे और चर्चे होने लगे कि देखिये कल अलम किसको मिलता है ? सहाबा में कोई नुमाया शख़सियत ऐसी न थी जिसे ये तवक़्को न रही हो कि कल अलम उसी को मिलेगा बल्कि वह अफ़राद भी उम्मीदवारो की फ़हरिस्त में खुद को सबसे अफ़ज़ल व बरतर समझ रहे थे जो अलम लेकर क़िस्मत आज़माईश कर चुके थे। चुनानचे इब्ने असीर ने लिखा है किः

(कुरैश में हर एक यह उम्मीद रखता था कि कल वही अलमदार होगा) 1

अगर उन लोगों ने हदीसे पैगम़्बर (स.अ.व.व.) की लफ़्ज़ों पर गौ़र किया होता और फिर अपने माज़ी की तरफ़ मुड़कर देखा होता तो यक़ीनन इस क़ौले मुरसल (स.अ.व.व.) का एक एक हर्फ़ उनकी शम्मये उम्मीद की भड़कती हुई लौ को बुझाने के लिये काफ़ी था मगर तफावुक़ पसन्द इन्सानों की तबीअत का ख्वाह कामयाबी की उम्मीद कितनी ही मौहूम क्यों न हो। हज़रत ली (अ.स.) की तरफ़ से उन्हें इत्मिनान था कि वह आशोबे चश्म की वजह से मैदान मे नहीं जा सकते। ब हममें से ही किसी को अलम दिया जायेगा।

कल के इन्तेज़ार में सहाबा ने करवटें बदल बदल रात गुज़ारी और जब सुबह हुई तो सबके सब पैग़म्बर (स.अ.व.व.) के ख़ेमे के सामने दरे ख़ेमा पर नज़रें जमा कर बैठ गये। बुख़ारी का कहना है कि वह सुबह सुबह रसूल उल्लाह के पास जमा हो गये और हर एक यह उम्मीद लगाये हुए था कि अलम उसी को मिलेगा।) सफों को चीरते हुए आगे बढ़ते , किसी ने गर्दन बुलन्द की औऐर कोई घुटनों के बल ऊँचा हुआ ताकि पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की नज़र उन पर पड़ सके। यँ तो हर एक अलम लेने के लिये बेचैन व बेक़रार था मगर कुछ लोगों का इज़तेराब इस हद तक बढ़ा कि तारीख़ में उनका नाम आऐ बग़ैर न रह सका। उनमें एक हज़रत उमर भी हैं जो खुद फ़रमाते हैं किः

(मुझे उस दिन से पहले कभी सरदार की ख़्वाहिश नहीं हुई मगर उस दिन ऊँचा होकर और गर्दन लम्बी करके यह उम्मीद कर रहा ता कि रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) अलम मुझे ही देंगे)

बुरीदा असलमीजो ग़जव-ए-ख़ैबर में मौजूद थे फ़रमाते है-

(जब दूसरा दिन हुआ तो अबुबकर और उम दोनों ने अलम के लिये अपनी अपनी गर्दने बुलन्द की)

साद इब्ने अबीविकास काब्यान है कि —

(मैं पैग़म्बर (स.अ.व.व.) के सामने पलथी मारे बैठ गया फिर उठा और आपके मुलमुक़ाबिल खड़ा हो गया) 4

पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) से किसी के शुजआना कारनामें ढके छिपे न थे कि किसी के गर्दन बुलन्द करने या घुटनियों के भल ऊँचा होने से आप मुतासिर होते या किसी को अमदन नज़र अन्दाज़ कर देते या नज़रों से ओझल होने की वजह से भूल जाते। आपने मजमें पर एक नज़र डाली और फ़रमाया अली (अ.स.) कहाँ है ? किसी को सानों गुमान भी न था कि अली (अ.स.) का नाम लिया जायेगा। चारों तरफ शोर उठा कि उनकी आँखें दुख रही हैं। इरशाद हुआ किसी को भेजो और उन्हें बुलवाओ चुनानचे सलमा इब्ने अकवा गये और उन्हें ले कर आये। एक रिवायत से यह ज़ाहिर है कि हज़रत अली (अ.स.) बाएजाज़े इलाही पैग़म्बरे अकरम (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में पहुँचे और एक रिवायत में है कि जिबरील (अ.स.) आपको लेकर हाज़िरे ख़िदमत हुए। बहरहाल , हज़रत अली (अ.स.) जब तशरीफ़ ले आये तो आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने आपका सर अपने जानू पर रख कर लोआबे दहन लगाया और फ़रमाया , परवरदिगार! उन्हें गर्मी और सर्दी के असरात से महफूज़ रख और दुश्मन के मुक़ाबिले में उनकी नुसरत व इमदाद फ़रमा। लोआबे दहन के लगते ही आपका आशोबे चश्म जाता रहा और आँकें इस तरह हो गई जैसे कोई तकलीफ़ ही न रही हो।

उसके बाद आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने अपने दस्ते मुबारक से अमीरूल मोमेनीन (अ.स.) को ज़ेरह पहनाई , तलवार मरहमत की और अलम सुपुर्द करके ख़ैबर को फ़तेह करने का हुक्म दिया। हज़रत अली (अ.स.) अलम लेकर उठ खड़े हुए और जाते वक़्त पैगम्बर (स.अ.व.व.) से पूछा कि कब तक लडूँ ? फ़रमाया जब तक फ़तेह न हासिल हो जाये। हज़रत अळी (अ.स.) तेज़ी से कि़ले की तरफ़ बढ़े और क़रीब पहुँच कर अलम को एक पत्थर पर गाड़ दिया। एक यहूदी ने किले के ऊपर से यह मन्ज़र देखा तो मुतहैय्यर होकर उसने पूछा आप कौन हैं ? कहा मैं अली इब्ने अबुतालिब हूँ। उसने जब आपका नाम सुना और तेवर देखे तो पुकार कर कहा , ऐ यहूदियों! अब तुम्हारी शिकस्त और मौत यक़ीनी है।

क़िला क़मूस की मज़बूती पर यहूदियों को बड़ा नाज़ था और पहले परचम ब्रदारों की नाकाम से उनके हौसले बढ़े हुए थे मगर अपनी ही जमाअत में एक आदमी से जब यह हौसला शिकन अल्फाज़ सुने तो उनमें खलबली मच गई और उनके दिलों पर एक ख़ौफ़ व दहशत तारी हो गयी। अल लश्करे इस्लाम में से भी काफ़ी लोग वहाँ पहुँच गये और क़िले के सामने सफ़ बन्दी करके खडे हो गये। मरहब का भाई हारिस फ़ौज का एक दस्ता लेकर क़िले के बाहर निकला। और उसने एक दम हमला करके दो मुसलमानों को मौत के घाट उतार दिया। हज़रत अली (अ.स.) ने जब ये देखा तो वह तेज़ी से आगे बढ़े , बिजली की तरह तलवार चमकी और हारिस का सर तन से जुदा होकर पत्थरीली ज़मीन पर लुढ़कने लगा। मरहब ने अपने भाई का यह अन्जाम देखा तो उसकी आँखं में खून उतर आया। उसने यके बाद दीगरे दो ज़िरहें पहनी , सर पर तराशा हुआ पत्थर का ख़ौद रखा और दो तलवारें और तीन भाल का नैज़ा लेकर क़िले से बाहर आये और रजज़ ख़्वानी करता हुआ मुबारिज़ तलबह हुआ। मरहब ऐसा देवपैकर और शहज़ोर था कि उसके ललकारने पर किसी को हिम्मत न हुई कि वह उसके मुक़ाबले को निकलता। अल्लामा दयार बकरी रक़म तराज़ है कि मुसलमानों में से किसी के बस की बात न थी कि जंग में उसका मद्दे मुक़ाबिल होता। 1

हज़रत अली (अ.स.) अब्ने अबुतालिब (अ.स.) ने मरहब का रजज़ सुना तो आप भी रजज़ पढ़ते हुए उसकी तरफ़ बढ़े। अशआर का उर्दू तरजुमां यह है कि मैं वह हूँ कि मेरी माँ ने मेरा नाम हैदर रखा है मैं शेरे नर और बेशये शुजाअत का असद हूँ। मैं वह हूँ कि जिसकी कलाई शेर की तरह मज़बूत और गर्दीन मोटी है। मैं तुम पर ऐसा वार करूंगा जो जोड़ो बन्द को तोड़ दे और हरीफ़ों को दरिन्दों का लुक़मा बने के लिये छोड़ दें। मैं एक शरीफ़ , बाइज़्ज़त और ताक़तवर जवान की तरह तुम्हें मौत के घाट उतारूँगा और क़त्ल करूँगा।

मरहब ने आगे बढ़कर हज़रत अली (अ.स.) पर तलवार का वार करना चाहा मगर आप ने उसका वार खाली देकर उसके सर पर ऐसी कारी ज़र्ब लगाई कि तलवार उसके ख़ोद को काटती हुई , सर की हट्टियों को अबूर करती हुई और उसे दो हिस्सों में चीरती हुई ज़मीन पर ठहरी। मरहब पहाड़ की तरहं गिरा और गरिते ही उसने दम तोड़ दिया। मरहब के मारे जाने से यहूदियों के हौसले शिकस्ता हो गये थे। इधर हज़रत अली (अ.स.) की तलवार ने दो चार का और काम तमाम किया बस फिर क्या था भगदड़ मच गई। आप जंग करते हुए आगे बढ़ रहे थे कि भागते हुए एक यहूदी ने आपके हाथ पर वार किया जिससे आपकी सिपर छूट कर गिर पड़ी। आपने एजाज़ी कूवत व ताक़त से क़िले के दरवाज़े का एक पट उखाड़ लिया और सिपर की जगह उससे काम लेने लगे। अबु राफ़े का ब्यान है कि मेरे हमराह सात आदमी थए और मैं आठवां था हम सबने पूरी कोशिश की कि इस दरवाज़े को पलट दें मगर हम लोग उसे जुंबिश भी न दे सके 1। हज़रत उमर को भ इस पर बड़ी हैरत थी चुनानचे उन्होंने हज़रत अली (अ.स.) से पूछा कि आप कि आप ने सिपर की जगह इतना बड़ा बोझा कैसे उठाया ? आपने फ़रमाया , वह मुझे अपनी सिपर से ज़्यादा वज़नी नहीं मालूम हुआ। 2

ग़र्ज़ कि हज़रत अली (अ.स.) के हमलों की ताब न लाकर सारे यहूदी क़िले के अन्दर भाग भाग कर पनाह गुंर्जी हो गये और क़िले का मक़सूस आहनी दरवाज़ जो चालीस आदमियों की कुवत से खुलता था , बन्द कर लिया गया। अमीरूल मोमेनीन आगे बढ़े और उसे पकड़ कर झटका दिया , दोनों पट उखड़ कर आपको हाथों में आ गये और फ़तेह ने झूम कर आपके दोनों क़दम चूम लिये। यह हैरत अंगेज़ कूवत कूवते रूहानिया का करिश्मा थी। चुनानचे अमीरूल मोमेनीन (अ.स.) ने खुद इरशाद फ़रमाया है कि मैंने ख़ैबर का दरवाज़ा अपनू कूवत से नीहं बल्कि रब्बानी कुवत से उखाड़ा है। 3

उस जंग में 63 यहूदी क़त्ल हुए , पन्द्रह मुसलान दरजए शहादत पर फ़ायज़ हुए। यहूदियों की कुछ औरतें भी असीर हुयीं जिनमें हय्या इब्ने अख़तब की बेटी सफ़िया भी थी जो आज़ाद होने के बाद रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व.) के हरम में दाख़िल हुई। यहूदी क़ैदियों को इस शर्त पर रेहा किया गया कि वह ख़ैबर की ज़मीनों पर काशतकार की हैसियत से काम करेंगे और पैदावार का निस्फ़ हिस्सा मुसलमानों को देते रहेंगे।

ख़ैबर का इलाक़ा बड़ी शादाब व ज़रख़ेज़ था। अहले हिजाज़ड की ग़िजाई ज़रुरियात का बेशतर हिस्सा यही से फ़राहम होता था। जब यह इलाक़ा मफतूह होकर मुसलमानों के क़ब्ज़े में आया तो उनके लिये माआशी उसअत की राहें खुल गई और वह मुहाजेरीन जो मक्का से निकलने के बाद फ़क्रों इफ़लास में मुबातिला थे , न सिर्फ मुआशी एतबार से असूदा हो गये बल्कि ज़मीनों और जगीरों के मालिक बन गये। अब्दुल्लाह इब्ने उमर का ब्यान है कि फ़तहे ख़ैबर के बाद हमें पेट भर खाना मिला। 1 और उम्मुल मोमेनीन हज़रत आयशा फरमाती हैं कि जब ख़ैबर फ़तहे हुआ तो हम खुश हुए कि अब जी भर के खजूरे खाने को मिलेगी। 2 बलाज़री ने फ़तवउल बलदान में तहरीर किया है कि ख़ैबर की पैदावर में से अज़वाजे रसूल (स.अ.व.व.) में हर एक को हर साल अस्सी वसक 3 ख़ुर्मों और बीस बीस वसक़ जौ मिलता था।

जाएदादे फ़िदक

ख़ैबर के नवाह में फ़िदक एक सरसबज़ व शादाब और ज़रखेज़ इलाका था जहाँ पहले पहल फ़िदत इब्ने हाम ने ड़ेरा डाला था और उन्हीं के नाम से यहाँ की आबादी मौसूम थी। ख़ैबर की तरह ये क़रिया भी यहूदियों का मसकन था जिन्होंने आबपाशी के वसाएल मोहय्या करके यहाँ की उफ़तादा ज़मीनों को लहलहाते हुए खेतों और हरे भरे बागों में बदल दिया था। याकूत हमूदी का कहना है कि यह गांव और उसके गिर्द व नवाहे की ज़मीन उबलते हुए चश्मों और नख़्लिस्तानों की आमा जगह थी। 4

फ़तहे ख़ैबर के बाद यहाँ के यहूदियों पर मुसलमानों का वह रोब व दबदबा तारी हुआ कि उन लोगों ने बग़ैर लड़े भिड़े पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) की इताअत कुबूल कर ली और उसी में अपनी आफ़ियत समझी कि फ़िदक की ज़मीनों से दस्तब्रदार हो कर पैदावार के निस्फ़ पर आन हज़रत (स.अ.व.व.) से मुसलेहत करें चुनानचे उन्होंने रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में यह पैग़ाम भेजा कि जिन शर्तों पर अहले ख़ैबर को उनकी ज़मीनों पर काश्त की इजाजत दी गई है उन्हीं शर्तों पर हमें भी इजाज़त मरहमत कर दी जाये ताकि आपकी तरफ़ से आइन्दा हमें कोई अन्देशा न रहे। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने उसे मन्ज़ूर फ़रमाते हुए हज़रत अली (अ.स.) को वहाँ के सरदार यूशा बिन नून के पास शराएत व तफ़सिलात तय करने के लिये भेजा। बात चीत के बाद फ़रीक़ैन के दरमियान यह तय पाया कि फ़िदक के बाशिन्दे अपनी ज़मीनों को मिलकियत से दस्तब्रदार होकर काश्तकार की हैसियत से उन पर काश्त करेंगे और उनकी कुल पैदारवार का निस्फ़ हिस्सा हज़रत रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व.) को देंगे। इस मुसालेहात के नतीजें में फ़िदक का इलाक़ा आन हज़रत (स.अ.व.व.) की जाती मिलकियत क़रार पाया। क्योंकि इस्लामी नुक़्तये नज़र से जो इलाक़े मुसलमानों की लश्कर कशी के नतीजे में मफ़तूह होते हैं उन्हे ग़नीमत कहा जाता है और उनमें मुसलमानों का हक़ होता है और जो जंग व क़ेताल के बग़ैर हासिल होते हैं उन्हें शरयी इस्तेलाह फ़ी इन्फ़ाल से ताबीर किया जाता है और वह सिर्फ पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की ज़ाती मिलकियत क़रार पाते हैं। यह फ़िदक भी माले फ़ी था जो मुसलमानों की मुजाहिदाना सरगर्मियों के बगै़र मफ़तूह हुआ था इसलिये ये ख़ालिस रसूल (स.अ.व.व.) की मिलकियत था इसमें मुसलमानों का कोई हक़ नहीं था। जैसा कि तबरी का कहना है कि फ़िदक़ ख़ालिस रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) की मिलकियत का इस पर मुसलमानों ने न घोड़े दौड़ाये और न ऊँट। (बिल्कुल यही इबारत बिलाज़री ने फ़ुतहूल बलदान में तहरीर की है 2 । याकूत हमवी का कहना है कि ख़ुदा वन्दे आलम ने यह गांव पैग़म्बरे अकरम (स.अ.व.व.) को सात हिजरी में सुलह के नतीजे में दिलवाया 3।

कुरानी सराहत और ओलमा की तसरीहात के बाद इस में क़तअन कोई गुंजाइशे शक व शुब्हा नहीं रहा जाती कि फ़िदक रसूल (स.अ.व.व.) की मिलकियत ख़ासा था। जिसमें उन्हें हर तरह का हक़ तसर्रुफ़ हासिल था चुनानचे इसी हक़ मिल्कियत व तसर्रुफ़ की बिना पर आपने यह गांव जनाबे फ़ात्मा ज़हरा (स.अ.व.व.) को अपनी ज़िन्दगी में एक दस्तावेज़ के ज़रिये हिबा फ़रमा दिया था। अल्लामा जलालुद्दीन सेवती ने इब्ने मरदूइया और इब्ने अब्बास से रिवायत ली है कि जब यह आयत नाज़िल हुई कि (ऐ अल्लाह के रसूल तुम अपने क़राबतदारों को उनका हक़ दे दो) तो आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने फ़िदक़ फ़ात्मा ज़हरा (स.अ.व.व.) को अता कर दिया। 4 क़ाज़ी सना उल्लाह पानी पती ने तबरानी के हवाले से यही कुच तहरीर फ़रमाया है। 5

आन हज़रत (स.अ.व.व.) की हयात तक फ़िदक जनाबे फ़ात्मा ज़हरा (स.अ.व.व.) के क़ब्ज़े व तसर्रूफ़ में राह लेकिन वफ़ाते पैग़म्बर (स.अ.व.व.) के बाद हुकूमत की तहवील में ले लिया गया। जनाबे सय्यदा (स.अ.व.व.) ने हुकूमत के ख़िलाफ़ मुक़दमा भी किया मगर उनका दावा मुस्तरद कर दिया गया। मसला फ़िदक किन वजूह कि बिना पर यह दावा ख़ारिज किया गया।

मुहाजेरीने हब्शा की वापसी

फ़तहे ख़ैबर के दिन जाफ़र इब्ने अबुतालिब (स.अ.व.व.) , उनकी बीवी असमां बिन्ते उमैस , अबुमूसा अशअरी और उनके ख़ानदान के दीगर पांच अफ़राद हबशा से खै़बर में आन हज़रत (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में वापस आये आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने जनाबे जाफ़र वग़ैरा को देखा तो बेहद खुश हुए और फ़रमाया कि मैं नहीं कह सकता कि जाफ़र के आने की मुझे ज़्यादा ख़ुशी है या ख़ैबर के फ़तेह होने की।

इब्ने ख़लदून ने लिखा है कि मुश्रेकीने मक्का के मज़ालिम से तंग आकर जो लोग आन हज़रत (स.अ.व.व.) के हुक्म पर हबशा की तरफ़ हिजरत कर गये थे उनमें से कुछ हिजरते मदीने से क़बल वापस आ गये थे और कुछ जंगे ख़ैबर के दो बरस क़बल मदीने में वापस आ गये मादूदे चन्द लोग बाकी रह गये थे वह ख़ैबर फ़तेह होने के बाद वापस आये। उन वापस आने वालों में जाफ़र इब्ने अबुतालिब (स.अ.व.व.) , उनकी ज़ौज़ा असमा बिन्ते उमैस उनके बेटे अब्दुल्लाह मुहम्मद , और ख़ालिद बिन सईद उनकी बीवी आमना और बेटा सईद , उम्मे खालिद , उमरू बिन आस , अबुमूसा अशरी , असूद इब्ने नौफिल , जहम बिन क़ैस उनके बेटे अम्र , ख़ज़ीमा , हारिस बिन ख़ालिद बिन सख़र , उस्मान इब्ने रबिया , मोअम्मर बिन अब्दुल्लाह और अबु अम्र मालिक बिन रबिया वग़ैरा शामिल थे. उनकी वापसी के वासते पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने अम्र बिन उमय्या ज़मरी को नज्जाशी के पास भेजा था।

रजअते शम्स (सूरज पलटना)

ख़ैबर की वापसी पर , वादिउल कुरा की तरफ़ पेश क़दमी फ़रमाते हुए पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) लश्कर समत जब सहबा के मुक़ाम पर पहुँचे और वहाँ क़्याम पजीर हुए तो गरूबे आफ़ताब से क़बल आप पर नज़ूले वही का सिलसिला शुरू हुआ जो काफ़ी देर तक जारी रहा। उस वक़्त आन हज़रत (स.अ.व.व.) का सरे अक़दस हज़रत अली (अ.स.) के ज़ानू पर था। नज़ूले का सिसिला मुनक़ता हुआ तो आपने आँखे खोलीं तो फ़रमाया ऐ अली (अ.स.) तुमने नमाज़े अस्र पढ़ी या नहीं। कहा , या रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) , आपका सरे मुबारक मेरी गोद में था और मसरूफ़े वही थे , कैसे पढ़ता ? फ़रमाया , क्या सूरज डूब गया ? कहा , हाँ! फ़रमाया तो फिर उसे पलटाओ। कहा , क्यों कर पलटाऊँ ? फ़रमाया , उसे हुक्म दो वह पलटेगा। चुनानचे आपने हुक्म दिया , सूरज पलटा और उस वक़्त तक गुरूब नहीं हुआ जब तक आपने नमाज़ नहीं पढ़ली। बाज़ रवायतों से यह भी पता चलता है कि अबुतुराब ने ज़मीन पर दोनों हाथो को टेक कर उसे इस तरह घुमाया कि सूरच नमूदार हो गया।

ग़ज़वा-ए-वादी-उल कुरा

सहबा से चलकर हुजूरे अकरम (स.अ.व.व.) वादिउल कुरा में जलवा अफ़रोज़ हुए यहाँ यहूदियों से झड़पें हुयी जिसके नतीजे में ग्यारह यहूदी मारे गये बहुत से भाग खड़े हुए बाक़ी ने हथियार डाल दिये और काफ़ी माले ग़निमत मुसलमानों के हाथ आया। बिल आख़िर उन लोगों ने जज़या देना मन्जूर किया और समझौता हो गया। इसी तरह तीमा के यहूदियों ने भी जज़या के एवज़ आन हज़रत (स.अ.व.व.) से सुलह कर ली।

उमरा-ए-कज़ा

बर बिनाये मुहायिदा माहे ज़ीक़ाद सन् 7 हिजरी में सरकारे दो आलम (स.अ.व.व.) , दो हज़ार इन्साम व मुहाजेरीन और सत्तर ऊँटो को लेकर उमरा की ग़र्ज़ से मक्केय मोअज़म्मा की तरफ़ रवाना हुए। आपके साथ वह लोग भी थे जो पिछले साल हुदैबिया से वापस आ गये थे। यह उमर-ए-कज़ा था। मसुलमान तीन दिन तक मक्के मे क़याम के बाद वापस आये और उस मुक़ाम के दौरान बहुत से अहले मक्का ने इस्लाम कुबूल किया।

मुख़तलिफ़ वाक़ियात

• इसी उमरे के (अय्यामे एहराम) के दौरान आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने मैमूना बिन्ते हारिस से आख़िरी अक़द फरमाया उस वक़्त मैमूना की उमर 51 साल की थी।

• उसी साल अबु हुरैरा जो यहूदी थे मुसलमान हुए और तीन साल तक अहदे रिसालत में रहे। आपने पांच हजार , तीन सौ चार हदीसें नक़ल की हैं। लेकिन अब्दुल्लाह इब्ने उमर , हज़रत आय़शा और हज़रत अली (अ.स.) वग़ैरा उन्हें काज़िव व झूटा कहते थे।


जंगे मौता

इस जंग की इजमाली क़ैफियत यह है कि रसूले अकरम (स.अ.व.व.) ने इस्लाम दावत देने के लिये दीगर सलातीन व उमरा की तरह शाम के ईसाइ फ़रमानंरवां शराजील बिन अम्र के पास भी हारिस इब्ने अमीर को अपना सफ़ीर बना कर भेजा जिसे शराजील ने मौता के मुक़ाम पर क़त्ल कर दिया। शराजील का यह जारहाना इक़दाम इस्लामी तौहीन के साथ साथ बैनुल अक़वामी कानून की ख़िलाफ़वर्ज़ी पर मुबनी था इसलिये आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने उसकी तरफ़ एक लश्कर भेजने का फ़ैसला किया और तीन हज़ार मुस्लम जाँबाज़ों को अपने गुलाम ज़ैद की क़यादत में मौता की तरफ़ रवाना कर दिया नीज़ उसके साथ यह ताकीद व हिदायत भी फ़रमा दी कि अगर ज़ैद इस लड़ाई में शहीद हो जायें तो उनके बाद जनाबे जाफ़र इब्ने अबुतालिब (अ.स.) फिर उनके बाद अब्दुल्लाह इब्ने रवाहा अलमब्रदारी व सिपेह सलारी के फ़राएज़ अन्जमा दें। चुनानचे जब यह मुख़तसर सी इस्लामी फौज़ मौता पहुँची तो मालूम हुआ कि शराजील ने तीन हज़ार के मुक़ाबले में एक लाख का लश्कर जमा कर रखा है लेकिन चूँकि हुक्मे रसूल था इस लिये क़सरत का लिहाज़ न करते हुए ज़ैद ने जंग की और चालिस दुश्मनों को मौत के घाट उतारने के बाद दर्जे शहादत पर फ़ाएज़ हुए। उनके बाद हस्बे ताक़ीद पैग़म्बर (स.अ.व.व.) हज़रत जाफ़रे तय्यार ने लश्कर का अलम संभाला और दुश्मनों पर टूट पड़े। सत्तर आदमियों को क़त्ल करने के बाद आपका दाहिना हाथ क़लम हुआ। अलम को आपने दांतो से थाम कर बायें हाथ से हमला किया और फिर कुछ को ठिकाने लगाया बिल आख़िर बायां हाथ भी क़ता हो गया और चूंकि सर से पांव तक आपके जिस्म पर तीरों , तलवारों और भालों के नब्बे ज़ख़्म कारी लग चुके थे और काफ़ी खून बह चुका थे इसलिये नातवानी कि बिना पर आप फ़ऱ्शे ख़ाक कर बैठ गये और एक शकी ने तलवार मार कर आपके दो टुकड़े कर दिये। मोअर्रिख़ीन का कहना है कि आपकी पुश्त पर कोई ज़ख्म नहीं थी। यह इस बात का सुबूत है कि वक़्ते आख़िर तक आपने मैदान से मुहं नहीं मोड़ा। आपके बाद अलमदारी के फ़राएज़ अब्दुल्लाह इब्ने रवाहा ने अन्जाम दिये और बहोतों को मार कर वह भी शहीद हुए। जब मुसलमानों ने यह हाल देखा तो वह एक दम से लश्करे ग़नीम पर टूट पड़े और इस तरह लड़े कि उन्हें पसपा कर दिया। अल्लामा दयार बकरी का कहनाहै कि ख़ातमये जंग पर अहले इस्लाम हज़रत जाफ़रे तय्यार की लाश को अपने साथ मदीने ले आये थे जो बादे नमाज़ वहीं पर दफ़्न कर दी गयी। वक़्ते शहादत हज़रत जाफ़रे तय्यार की उमर 41 साल की थी। आन हज़रत (स.अ.व.व.) का क़ौल है कि ख़ुदा ने दोनों हाथों के एवज़ जाफ़रे तय्यार को ज़मर्रूद के दो पर अता फ़रमाये हैं और वह मलाएका के साथ बेहिश्त में परवा़ किया करते हैं। यह जंग मुसलमानों ने जमादुल अववल सन् 8 हिजरी में लड़ी और बारह सहाबी दर्जें शहादत पर फ़ाएज़ हुए।

फ़तहे मक्का

हुदैबिया में कुरैश और अहले इस्लाम के दरमिया जो मुहायिदा हुआ थआ उसमें यह शर्त भीथी कि दोनों फ़रीक़ दस बरस तक जंग व क़ताल से किनारा कश रहेंगे और उनकेसाथ उनके हलीफ़ भी इस मुहायिदे की पाबन्दी करेंगे और अगर किसी फ़रीक़ या उसके हलीफ़ ने कोई ख़िलाफ़वर्ज़ी की तो दूसरी फ़रीक़ मुहायिदे सुलहा का पाबन्द नहीं रहेगा।

कुरैश के हलीफ़ क़िबला बनुबकर और मुसलमानों के हलीफ़ बनुख़ज़ाआ में पहले से रंजिश व चुपक़लिश चली आ रही थी और दोनों क़बीले आपस में लड़ते भिड़ते रहते थे। मगर कुरैश और मुसलमानों की बाहमी जंगो की वजह से उनकी आपस की लड़ाइयां कुछ अरसे तक मुलतवी थी और दोनों अपने अन्दरूनी अख़तेलाफ़ात को नज़र अन्दाज़ करके मुसलमानों के मुक़ाबले के मुत्ताहिद हो चुके थे।

क़ुरैश और अहल इस्लाम के दरमिया जब एक तवील अरसे के लिये मुहायिदा हो गया तो एक रात बनुबकर ने बनुख़ज़ाआ पर हमला करके उन काएक आदमी मार डाला जिसकी वजह से दबी हुई रंजिश फिर उभर आई और दोनों क़बीलों के दरमियान जंग के शोले फिर भड़कने लगे। अगर चे बनुख़ज़आ किसी तरह कमज़ोर न थे और बनुबकर के लिये बहुत काफ़ी थे मगर कुरैश ने बनुबकर को हथियार बहम पहुँचाये और अकरमा बिन अबुजहल , सफ़वान इब्ने उमय्या और सहल इब्ने अम्र , जिन्होंने कुरैश की तरफऱ़ से सुलेहनामा पर दस्तख़त किये थे , बनुबकर के साथ शामिल होकर बनुख़ज़ाआ से जंग करते रहे। यहां तक कि बनुख़ज़ाआ ने अपनी जानें बचाने के लिये ख़ान-ए-काबा में पनाह ली मगर हरम की ज़मीन भी उनमें से चालिस आदमियों का एक वफ़द अम्र बनि सालिम की सरबराही में मदीने आया और पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) को कुरैश की बदअहदी और अपनी तबाही व बरबादी का हाल सुनाया।

बनुख़ज़ाआ की फ़रयाद पर आँहज़रत (स.अ.व.व.) ने उनकी मदद का वादा फ़रमाया और कुरैस को पैग़ाम भिजवाया कि वह बनुख़ज़ाआ के मक़तूलीन का ख़ून बहा अदा करें या बनुअकरमां की हिमायत से दस्तबरदार हो जायें और अगर इन दोनों बातों सेकोई बात उनके लिये क़ाबिले कुबूल न हो तो मुहायिदे सुलहा को ख़त्म समझें। कुरैस ने उन दोनों बातों के मानने से इन्कार कर दिया और साफ़ साफ़कह दिया कि हम न ख़ून बहा अदा करेंगे और न बनुबकर की हिमायत से दस्तबर्दार होगें। कुरैश की शोरिदा सरी के नतीजे में आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने ऐलान कर दिया कि अब हमारे और कुरैश के दरमियन कोई मुहायिदा नहीं रहा।

इस ऐलान के बाद कुरैश में ख़लबली मच गई और अहद शिकनी के हौलनाक नताएज उनकी नज़रों के सामने रक्स करने लगे। यह देखते हुए कि मुसलमानों से मुक़ाबिला उनके बस से बाहर है उन्होंने मुहायिदा सुलह को बऱरार रखना चाहा चुनानचे उन्हों अबुसुफ़ियान को मदीने भजा ताकि वह हिकमते अलमी से काम लेकर मुहायिदे की तजदीद करायें।

जब अबुसुफ़िान मदीने आया तो वह सबसे पहले अपनी बेटी उम्मे हबीबा के घर गया जो रसूल (स.अ.व.व.) के हरम में दाख़िल थी। उम्मे हबीबा ने अपने बाप को देखा तो पैग़म्बर (स.अ.व.व.) का बिस्तर तह कर दिया। अबुसुफ़ियान ने बेटी के इस तर्ज़े अमल को देखा तो कहा , क्या में इस बिस्तर पर बैठने के क़ाबिल नहीं हूँ ? उम्मे हबीबा ने कहा यह पैग़म्बर (स.अ.व.व.) का बिस्तर है और तुम मुशरिक हो लेहाजा़ मुझे यह गवारा नहीं कि तुम इस बिस्तर पर बैठो। अबुसुफ़ियान मुंह बिसूर कर रह गया और वहां से चल कर आन हड़रत (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में हाज़िर हुआ और तजदीदे मुहायिदा की ख़्वाहिश का इज़हार किया। जब आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने उसकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया तो वह अबुबकर के पास आये और कहा आप रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व.) से हमारी सिफ़ारिश कीजीये। अबुबकर ने अपनी माज़ूरी ज़ाहेर की। तो वह हज़रत उमर के पास आया मगर उन्होने भी उसे कोई उम्मीदे अफ़ज़ां जवाब नहीं दिया। बहरहाल जब वह हर तरफ़ से मायूस हो गया तो हज़रत अली (अ.स.) की ख़िदमत में हाज़िर हुआ और उनसे कहा कि आप पैग़म्बर (स.अ.व.व.) से हमारी सिफ़ारिश कर दें। हज़रत अली (अ.स.) ने कहा , रसूल उल्लाह जो इरादा कर चुके हैं उसमें दख़ल अन्दाज़ी का हक़ किसी को नहीं हे लेहाज़ा हम उनसे कुछ नहीं कह सकते। जनाबे फ़ात्मा ज़हरा (स.अ.व.व.) भी उस मौक़े पर वहाँ तशरीफ़ फ़रमां थी , अबुसुफ़ियान ने उनसे कहा ऐ दुख़्तरे रसूल (स.अ.व.व.) ! अगर आप अपने बेटे हसन (अ.स.) को हुक्म दें कि वह पैग़म्बर (स.अ.व.व.) से इतना कह दे कि मैंने दोनों फ़रीक़ में बीच बचाव करा दिया है तो वह रहती दुनियां तक सरदारे अरब कहलायेंगे। जनाबे फ़ात्मा (स.अ.व.व.) ने फ़रमाया कि हसन (अ.स.) अभी बच्चे हैं और एक बच्चे की बातों से क्या सरोकार है ? अबुसुफ़ियान को जब कामयाबी की कोई सूरत नज़र न आई तो उसने हज़रत अली (अ.स.) से कहा कि अगर आप कुछ नहीं कर सकते तो मुझे मशविरा दीजिये कि मैं क्या करूँ ? फ़रमाया , तुम खुद ही एक तरफ़ा तजदीदे सुलह का ऐलान करके मक्के वापस चले जाओ। उसने कहा इस ऐलान से हमें कुछ फ़ायदा होगा ? फ़रमाया कुछ नहीं कहा जा सकता! कहा अच्छा , मैं फिर यह ऐलान किये देता हूँ। चुनानचे उसने मस्जिद नबवी में खड़े होकर कहा (मै दोनों फ़रीक़ीन के दरमियान मुहायिदे सुलहा की तजदीद करता हूँ। यह कहकर वह मक्के वापस चला गाय।

जब अबुसूफियान मक्के पहुँचा तो कुरैश ने पूछा , क्या कारनामा अन्जाम दे कर आये हो ? उसने सारा वाक़िया ब्यान किया और कहा कि अली (अ.स.) के मशविरे पर मैने तजदीदे मुहायिदे का ऐलान कर दिया है। कुरैश ने पूछा , क्या मुहम्मद (स.अ.व.व.) ने भी उसे तस्लीम किया है ? कहा नहीं। उस पर लोगो ने कहा कि तुम कितने लड़े बेवकूफ हो , होशो हवास रखते हुए भी यह न समझ सके कि यकतरफ़ा ऐलान कोई मने रखता है जब तक दूसरा फ़रीक़ उसे तस्लीम न करे। अली (अ.स.) ने तुम्हारे साथ बड़ा शाइस्ता मज़ाक़ किया है जिसका कोई फ़ायदा हमेंनहीं पहुँच सकता।

कुरैश और बनुबकर के मज़ालिम , तशद्दुद , खूँरेज़ी और बदअहदी से पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) बहुत मुतासिर और कबीदा ख़ातिर थे। और मुहायिदेकी रू से इस बात के पाबन्द थे कि आप बनुख़ज़ाआ की मदद फ़रमाते चुनांचे आपने अहले मदीने को जंग की तैयारी का हुक्म दिया और बैरूने मदीने के मुसलमानों को भी यह पैग़ाम भिजवाया कि वह जंगी हथियारों के साथ फ़ौरी तौर पर मदीने पहुँचे।

चारों तरफ़ से लोग सिमट कर मदीने में जमा होने लगे मगर किसी को यह नहीं मालूम था कि कौन सी मुहिम दरपेश है , कहाँ जाना है और किससे मोर्चा लेना है ? क्योंकि आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने इस अमर का पूरा एहतराम किया था कि अहले मक्का को ख़बर न होने पाये और मुसलमान यकबारगी उनके सरों पर पहुँच जाये। सहाबा में जिन्हें मालूम हो चुका था कि मक्के पर चढा़ई का इरादा है उन्हें भही आन हज़रत (स.अ.व.व.) की तरफ़ से यह ताक़ीद फ़रमां दी गई थी कि वह उसे मुक़म्मल तौर पर पोशीदा रखें और किसी से इसका तज़किरा न करें। मगर हातिब इब्ने बलता नामी एक शख़्स ने जिसके बाल बच्चे मक्के में थे सुराग़ लगाया और उसने अम्र इब्ने अब्दुल मुत्तालिब की एक कनीज़ सारा को एहले मक्के पर हमले की तैयारियों से मुतालिक़ एक ख़त लिख दिया और कहा कि वह इस ख़त को कुरैश तक पहुँचा दे। आन हज़रत (स.अ.व.व.) को वही के ज़रिये उसकी इत्तेला बहम पुहँचायी गयी। आपने फ़ौरन हज़रत अली (अ.स.) और जुबैर बिन अवनाम को उस कनीज़ के ताअक़्कुब में रवाना किया कि वह उसे जहां पायें गिरफ़्तार करके ले आयें। अभी वह वादी हलाफ़ तक पुहँची थी कि गिरफ़्तार कर ली गई। दरयाफ़्त करने पर उसने बताया कि मेरे पास कोई तहरीर नहीं है। जुबैर ने उसके सामान को देखा भाला मगर उसमें कुछ न निकला। हज़रत अली (अ.स.) ने फ़रमाया कि हमें रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) ख़बर दे चुकें है इसलिय ऐसा हो ही नहीं सकता कि इसके पास कोई ख़त न हो ये कह कर आपने सख़्ती के सात उससे ख़त का मुतालिबा किया और कहा कि तुम ने ज़रा भी हील व हुज्जत से काम लिया तो हम तुम्हारी जामा तलाशी लेने पर मजबूर होंगे। इस धमकी का नतीजा यह हुआ कि उसने अपने बालों के जूड़े से एक ख़त निकाल कर पेश कर दिया। हज़रत अली (अ.स.) उसे ख़त समैत लेकर पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में हाज़िर हुए और उसने आन हज़रत (स.अ.व.व.) से सारी सरगुज़श्त ब्यान कर दी। हुजूरे अकरम (स.अ.व.व.) ने तमाम असहाब को जमा करके फ़रमाया कि मैंने तहक़दन कह दिया था कि इस इक़दाम को मग़फ़ी रखा जाये मगर तुममें से एक शख़्स ने इस राज़ को फ़ाश करने की नाका़म कोशिश की है लेहाज़ा जिसने यह नामुनासिब हरकत की है वह ख़ुद ही बता दे वरना वह रूसवा हुए बग़ैन नहीं रह सकेगा। हातिब ने यह सुना तो वह लरज़ता कांपता खड़ा हुआ और उसने अपनी इस ग़लती का एतराफ़ कर लिया। ऐसे ही मवाक़े हुआ करते थे कि हज़रत उमर की ग़ैरते ईमानी जोश मे आती थी चुनानचे उस मौक़े पर भी आपने फ़रमाया (या रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) ! मुझे इजाज़त दीजिये कि मैं इसकी गर्दन उड़ा दूँ क्योंकि ये मुनाफ़िक है। 1 मगर पैग़म्बरे अकरम (स.अ.व.व.) ने दरगुज़र से काम लिया और उसे माफ़ कर दिया।

दसवीं माहे रमज़ान सन् 8 हिजरी को हज़रत रसूले खुदा (स.अ.व.व.) दस हज़ार मुसल्लह मुसलमानों के साथ मदीने से निकल खड़े हुए। चा सौ सहाबा घोड़ों पर सवार आपके इर्द गिर्द थे बाक़ी लोग पैदल चल रहे थे। जब मंज़िल व मंज़िल बढ़ते हुए (सनितुल एक़ाब) तक पहुँचे तो उम्मे रसूल (स.अ.व.व.) , अब्बास इब्ने अब्दुल मुत्तालिब अफन अहले अयाल के साथ पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में हाजिर हुए , उन्होने अपने मुतालेक़ीन को मदीने भिजवा दिया। और खुद आन हज़रत (स.अ.व.व.) के साथ हो गये। आगे बढ़कर मक्के से बाहर मील की दूसीर पर आन हज़रत अ(स.अ.व.व.) ने पड़ाव डाला।

उसके बाद अब्बास , आन हज़रत (स.अ.व.व.) के ख़च्चर पर सवार होकर इस ख़्याल से बाहर निकले कि अगर कोई आदमी मिल जाए तो इसके ज़रिया कुरैश को यह पैग़ाम भिजवाये कि वह रसूले ख़ुदा की ख़िदमत में हाज़िर हो कर अमान की दरख़्वास्त करें और इस्लाम कुबूल करके अपनी जानों का तहफ़्फुज़ कर लें। बुसुफियान के मदीने से नाकाम आने के बाद कुरैश को यह एहसास था कि मुसलमान उन्हें अहद शिकनी की सज़ा देने के लिये कोई न कोई क़दम ज़रुर उठायेंगे इसलिये वह अक़सर रातों को मक्के के गिर्द चक्र्कर लगाते और हालात पर नज़र रखने के लिये गश्त करते थे। चुनानचे अबुसुफियान , हकीम बिन ख़राम और बदील इब्ने बरक़ा इसी मक़सद के तहत मक्के के इतराफ़ में गश्त लगा रहे थे कि वह लोग एक तरफ़ आग की रौशनी और फ़ौजियों की नक़ल व हरकत देखकर हैरत ज़दा रह गये।

अभी यह लोग क़्यास आराइयाँ कर ही रहे थे कि अब्बास से मुलाक़ात हो गयी। अबुसुफ़ियान ने पूछा कि तुम्हें मालूम है कि यह फौज़े कैसी हैं ? कहा , यह अज़ीम फ़़ौजे पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) के अलावा और किसी की हो सकती हैं , आन हज़रत (स.अ.व.व.) दस हज़ार मुसल्लह मुसलमानों के साथ मक्के की तरफ़ बढ़ रहे हैं और सुबह होते ही हमला आवर होंगे जिसके नीतजे में तुम में से कोई शख़्स ज़िन्दा नहीं बच सकेगा। ये सुनकर अबुसुफ़ियान के होश उड़ गये और वह कांपने लगा। उसने अब्बास इब्ने अब्दुल मुत्तालिब से कहा कि अब हमे बचाओ की क्या सूरत हो सकती है ? अब्बास ने कहा तुम मेरे पीछे सवारी पर बैठ जाओ और चलो , मैं आन हज़रत (स.अ.व.व.) से कह सुनकर तुम्हें अमान दिला दूँगा।

जब अब्बास इब्ने अब्दुल मुत्तालिब अबुसुफ़ियान को लिये हुए लश्करे इस्लाम के दरमियान से ग़ज़रे तो हज़रत उमर ने अबुसुफ़़ियान को देख लिया , वह भागते हुए रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) के पास गये और कहा या रसूल उल्लाह! अबुसुफ़ियान हमारे लश्कर के दरमियान है , यह मौक़ा बहुत अच्छा है अगर आप इजाज़त दें तो मैं इसकी गर्दन मार दूँ। अब्बासने हज़रत उमर की यह गुफ़्तगू सुनी तो उन्होंने कहा , ऐ उमर! अगर अबुसुफ़ियान तुम्हारे क़बीले बनि अदी से होता तो तुम कभी ऐसी बात न कहते 1। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने अब्बास से फ़रमाया कि आज की रात उसे अपने ख़ेमें में ठहराओ और कल सुबह मेरे पास ले आओ। दूसरी सुबह को उसे रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में हाज़िर किया गया। आपने फ़रमाया , ऐ अबुसुफ़ियान! क्या तुम्हें अब भी मालूम नहीं हुआ कि अल्लाह के सिवा कोई दूसरा माबूद नहीं है ? कहा , अगर अल्लाह के अलावा कोई और माबूद होता तो वह इस आड़े वक़्त मे मेरे काम ज़रुर आता। फ़रमाया कि क्या तुमने अब नहीं पहचाना कि मैं अल्लाह का रसूल हूँ ? कहा इसके बारे में मेरा ज़ेहन साफ नहीं है। अब्बास ने कहा ऐ अबुसुफ़ियान अगर अपनी जान की ख़ैर चाहते हो तो इस्लाम क़ुबूल कर लो वरना किसी के हाथ से मारे जाओगे।

जब अबुसुफ़ियान को मुसलमान हुए बगै़र अपनी जान बचती हुई नज़र न आई तो बा हालते मजबूरी उसने बज़ाहिर कलमा पढ़ लिया और मुसलमानों की सफ़ में शामिल हो गया। अब्बास ने सिफ़ारिश की कि या रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) ! अबुसुफियान , मिज़ाजन और फ़ितरतन जाह पसन्द है इस लिये इसको कोई इम्तिया़ज़ी हैसियत देकर इसकी दिल जुई की जाये। आपने फ़रमाया , जो अबुसुफ़ियान के घर में पनाह लेगा उसे भी अमान दी जायेगी नीज़ जो अपने घरों का दरवाज़ा बन्द करेगा वह भी महफूज़ रहेगा।

अबुसुफ़ियान जब मुसलमान होकर मक्के में आया तो कुरैश ने हालात मालूम करने के लिय उसे चारों तरफ़ से घेर लिया। उसने बताया कि मुहम्मद (स.अ.व.व.) एक लश्करे ज़र्रार लेकर आये हैं तुम लोग उनका मुकाबिला नहीं कर सकते लेहाज़ा बेहतर है कि इस्लाम कुबूल कर लो वरना सब के सब मारे जाओगे। इकी बीवी हिन्द बिन्ते अतबा ने जब यह सुना तो आगे बढ़कर उसने अबुसुफ़ियान की दाढ़ी पकड़ी और कहा ऐ लोगों! इस बूढ़े अहमक़ को क़त्ल कर डालो। अबुसुफ़ियान ने कहा याद रखो अगर तुमने इस्लाम लाने में ज़रा भी पसो पेस की तो तुम्हारी भी गर्दन उड़ा दी जाएगी।

कुरैश अभी सोच ही रहे थे कि क्या करना चाहिए किचारों तरफ़ इस्लाम के परचम लहराने लगे और देखते ही देखते मक्के की फज़ा पर छा गये। हज़रत अली इब्ने अबुतालिब (अ.स.) हाथ में अलम लिये और लश्कर की क़यादत करते हुए बड़ी शाने बेनियाज़ी के साथ दाख़िले मक्का हुए।

कुरैश में इतनी ताक़त व कुव्वत न थी कि वह मुसलमानों के इस बढ़ते हुए सेलाब को रोकते लेहाज़ा अपने घरों में दबक कर बैठ गये और कल जिन लोगों के लिये मक्के के दरवाज़े बन्द किये थे आज उनके लिये फ़तह व कामरानी के दरवाज़े खुल गये। यह इस्लाम की अमन पसन्दी और हक़ व सिदाक़त की फ़तह थी जिसमें न जंग की नौबत आई और न जंग की ज़रुरत महसूस की गई। मगर हर जमाअत में कुछ अफ़राद ऐसे भी होते हैं जिनकी उफ़तादें तबियत अनम पसन्दी के ख़िलाफ़ होती है और वह ज़रुरत हो या न हो सख़्ती व तशद्दुद का मुज़ाहेरा किये बगै़र नहीं रहते चुनानचे ख़ालिद इब्ने वलीद जो फ़तहे मक्का से कुछ ही पहले मुसलमान हुए थे और हिस्से से आगे बढ़ते वक़्त अपने साथियों के साथ क़बीला बनुबकर पर हमला आवर हो गये और उन्होंने जंग छेड़ दी। कोहे हजून से गुज़रते हुए पैग़मबरे इस्लाम (स.अ.व.व.) ने जब तलवारों की चमक देखी तो सख़्त बरहम हुए और फ़रमाया कि इस कुश्त व खून को फ़ौरन बन्द किया जाये मगर इतने में बनुबकर के मुत्ताइद आदमी मारे जा चुके थे। साहबे रौज़तुल सफ़ा ने सत्तर कुफ़्फ़ार और दस मुसलमानों का मारा जाना लिखा है।

पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) जब मक्के के बालाई सिमत से शहर में दाख़िल हुए तो उस वक़्त आप क़सूरा नामी एक नाक़े पर सवार थे। आप सीधे ख़ान-ए-काबा के पास आये और उसका तवाफ़ किया। तवाफ़ से फ़ारिग़ हुए तो देखा कि अमाएदीने कुरैश सर झुकाये खड़े हैं। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने उन से पूछा कि तुम लोग ख़ुद ही बताओ कि तुम्हारे साथ क्या सुलूक किया जाये ? उन लोगों ने कहा कि हम आपकी नसबी शराफ़त के पेशे नज़र सिर्फ़ भलाई की उम्मीद कर सकते हैं। आपने फ़रमाया , जाओ तुम सब आज़ाद हो तुम से कोई मवाख़िज़ा नहीं किया जायेगा।

यह पैगम़्बरे अकरम (स.अ.व.व.) की आला ज़रफ़ी , बुलन्द किरदारी और कुशादा नज़री का करिश्मा था कि जो लोग आपके ख़ून के प्यासे थे और हर वक़्त दुश्मनी व अनाद पर कमरबस्ता रहते थे वही हलक़े बगोशे इस्लाम होकर आपका कलेमा पढ़ने लगे और कल का यतीन न सिर्फ उनके जिस्मों बल्कि उनके दिलों दिमाग़ और ज़मीर व विजदान पर भी हुकूमत करने लगा। कुरैस की धाक ख़त्म हो गई , कुफ़्र का शरीज़ा बिखर गया और इस्लाम का परचम सरज़मीने बतहा पर भी लहराने लगा।

मुशरेकीन का अन्जाम

फतहा मक्के के दौरान इस्लाम कुबूल करने वालों में अकसरियत ऐसे लोगों की थी जिन्होंने बेबस होकर जबरन व क़हरन इस्लाम कुबूल किया था , क्योंकि अक़ाएद व नज़रियात में यक लख़त तबदीली इन्सानी उफ़तादे तबआ के खिलाफ़ है। उन इस्लामी लवादा ओढ़ने वालों के अलावा कुछ लोग ऐसे भी थे जो अपने कुफ्र पर बज़िद थे और वक़्ती तौर पर मक्के से चले गये थे या इधर उधर रूपोश हो गये थे। यह लोग इस्लाम के लिये खतरनाक साबित हो सकते थे इसलिये ज़रुरत थी कि उन्हें संगीन सजा़यें दे कर फ़ितना व शर क उभरने से पहले उसे हमेशा के लिये दबा दिया जाये। पैग़म्बरे अकरम (स.अ.व.व.) ने अगर अमूमी तौर पर अमान का ऐलान कर दिया था मगर चन्द फ़ितना परदाज़ों के बारे में यह हुक्म भी दिया था कि उन्हें जहाँ पाओ क़त्ल कर दो। चुनानचे उन अफ़राद में से अब्दुल्लाह बिन हन्ज़ल और उसकी कनीज़ जो रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) की हजो गाया करती थीं , हबेरिस इब्ने मुक़ीस इब्ने सबाबा अपने कैफ़रे किरदार तक पहुँचाये गये और कुछ लोगों की जान बख़्शी भी की गयी! जैसे कि अब्दुल्लाह इब्ने अबी सरह ने हज़रत उस्मान की पनाह हासिल कर ली और उन्हीं कि सिफ़ारिश पर उसे छोड़ दिया गया। अकरमा इब्ने अबुजहल यमन की तरफ़ भाग गया मगर उसकी बीवी उम्मे हकीम ने उसके लिये अमान की दरखरस्त की तो उसे भी अमान दे दी गई।

बुतों का अन्जाम

मुशरेकीन कुरैश के ज़ौके बुतपरस्ती ने ख़ान-ए-काबा को सनमकदा और सरज़मीने मकके को बुतोंका मसकन बना रखा था। कुरैस का सबसे बड़ा देवता हुबल था जो ख़ान-ए-काबा के अन्दर एक बुलन्द मक़ाम पर नसब था और उसके आस पास सैंकड़ों बुत एक दूसरे से जु़ड़े बन्दधे रखे थे और साल के 360 दिनों में हर एक दिन एक बुत की परस्तिश के लिये मख़सूस था। अहले मक्का की देखा देखी इतराफञ व जवानिब के लोग भी बुत परस्ती की तरफ़ माएल थे चुनानचे हज के मौसम में जब वह मक्के आते तो हरम से पत्थर उठा कर ले जाते और उन्हें बुतों की शक्ल व सूरत में तराश कर अपने यहां नसब कर लेते यहां तक कि तमाम अरब में बुत परस्ती आम हो गई और हर क़बीले ने अपने लिये अलहैदा अलहैदा बुत बना लिये। मक्के से एक मंज़िल के फ़ासले पर मुक़मे नख़ला में उज़्ज़ा की मूरती नसब थी जो कुरैश और बनि कुनान की अक़ीदत का मुश्तरिक मरकज़ थी। ताएफ में लात नसब था जो बनि सक़ीफ़ का देवता था , मदीने से कुछ फ़ासले पर मनात नसब था जो ऊस व खिज़रिज और ग़सान का देवता कहलाता था। क़बीलये हमदान नजरान में याकूक़ की पूजा करता था. यनी के अतराफ़ में बनि हज़ील का बुत सिवाअ नसब था और दूमताउल जन्दल में बनि कलब का देवता वुद था। इशी तरह मुख़तलिफ़ क़बीलों में मुख़तलिफ़ देवताओं और देवियों की पूजा होती थी। वह बुतपरस्ती उन बे जान और अक्ल व शऊर से आरीपत्थरोंको ख़ुदा का ख़ुदा का शरीकेकार समझते थे और उनके सामने गिड़गिड़ाते , झोलियां फैलाते और मुरादें मांगते थे और यह समझने से क़ासिर थे कि पत्थर आख़िर पत्थर है उसकीक्या ताक़त कि ये किीस को कुछ दे सके या किसी से कुछ ले सके।

मक्के पर फौज कशी का यह मक़सद हरगिज़ नहीं था कि पैगम़्बर अकरम (स.अ.व.व.) अपनी हुकुमत को वुसअत दें या फातेह व ताजदार कहलायें बल्कि आपका असल मक़सद बुत परस्ती को ख़त्म करके तौहीद का परचम बुलन्द करना था चुनानचे मक्के को ज़ेरे नगीं करने के बाद आपने सबसे पहले बुतों की शिकस्त व रेख़्त पर तवज्जो फ़रमायी और हजऱत अली (अ.स.) को अपने हमराह लेकर ख़ान-एकाबा में दाख़िल हुए। दरो दीवार पर बनी हुई फरिश्तों और नबियों की फ़र्ज़ी तस्वीरों को खुरच खुरच के मिटाया। फिर जहां तकहाथ पहुँच सकता था वहां तक रखे हुए बुतों को तोड़ा. हुबल और उसके साथ कई बड़े बड़े बुत एक बुलन्द मुक़ाम पर नसब थे जहां हाथ नहीं पहुँच सकता था , हज़रत अली (अ.स.) ने कहा या रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) आप मेरे कन्धों पर सवार होकर उन बुतों को नीचे उतारे , आप ने फ़रमाया ऐ अळी (अ.स.) तुम नबूवत का बोझ न उठा सकोगे लेहाज़ा बेहतर है कि तुम अपने पांव मेरे शानों पर रखकर खडे हो जाओ। ग़र्ज़ कि हज़रत अली (अ.स.) , रसूल (स.अ.व.व.) के कान्धों पर सवार हुए और ऊपर से बुतों को उठा उठा कर नीचे पटका। उस वक्त हज़रत रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व.) ने हज़रत अळी (अ.स.) से पूछा , या अली (अ.स.) इस वक्त तुम अपने तई कैसा पाते हो ? कहा या रसूल उल्लाह! ऐसा लगता है कि तमाम पर्दे मेरी आँखों के सामने से उठ गये हैं और मेरा सर गोया अर्शे आज़म पर है और जिस चीज़ की तरफ़ हाथ बढ़ाता हूँ वह मेरे हाथ में आ जाती है। आपने फ़रमाया या अली (अ.स.) तुम्हें मुबारक हो कि तुम कारे ख़ुदा अन्जाम दे रहेहो और मुझे मुबारक हो कि मैं इस वक़्त बारे हक़ व इमामत उठाये हूँ।

हज़रत अली (अ.स.) जब सनमे अकबर हुबल को तोड़ने के बाद दोशे पैग़म्बर (स.अ.व.व.) से नीचे तशरीफ़ लाये तो आपने मुसकुराते हुए पैग़म्बर (स.अ.व.व.) से कहा , यार रसूल उल्लाह! मैं इतनी बुलन्दी से कूदा हूँ फिरभी मुझे हैरत है के मरे जिस्म पर कोई चोट तो क्या ख़राश तक नहीं आई। पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने फ़रमाया , चोट क्यों कर आती ? अल्लाह के रसूल (स.अ.व.व.) ने तुम्हें बुलन्द किया है और जिबरील ने तुम्हें बाआफ़ियत उतारा है। दर हक़ीक़त यह अली (अ.स.) की मेराज थी जो साहबे मेराज के कान्धों पर हुई।

तहरीरे काबा के बाद आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने हज़रत अली (अ.स.) की क़यादत में चन्द लोगों को इतराफ़ व जवानिब के बुतों को तोड़ने के लिये भेजा और सारे बुत मिस्मार कर दिये गये। रफ़्ता रफ़्ता ज़ोहर का वक़्त हुआ , बिलाल ने सक़फ़े काबा पर खड़़े होकर अज़ान दी हज़रत (स.अ.व.व.) ने नमाज़े जमात पढ़ाई और खुतबा दिया।

बैयते आम

ख़ान-ए-काबा में बुत शिकनी और नमाज़े ज़ोहरैन अदा करने के बाद आन हज़रत (स.अ.व.व.) कोहे सफ़ा पर तशरीफ़ फ़रमां हुए , हज़रत अली (अ.स.) को अपने पहलू में बिठाया , हज़रत उमर नीचे खड़े हुए और बैयते आम का सिलसिला शुरू हुआ। चुनानचे पहले मर्दों ने बेयत की। एक एक शख़्स आन हज़रत (स.अ.व.व.) के सामने से गुज़रता जाता था और बैयत करता जाता था। उसके बात औरतों की बारी आई। उनकी बैयत इस तरह हुई कि आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने अपने देस्ते मुबारक पर कपड़ा लपेट लिया था ताकि किसी न महरम औरत का हाथ आपके हाथ से मस न हो।

मर्दों के आख़िरी सफ़ में आख़िरी शख़्स अबुसुफ़ियान का बेटा माविया था जिसने बैयत की और औरतों की आख़िरी सफ़ में हिन्द बिन्ते अतबा ज़ौज़ा अबुसुफ़ियान (जिगर ख़्वाजा हमज़ा) थी जो चन्द औरतों के साथ भेस बदल कर आई थी बेहद खौफ़ज़दा थी। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने फ़रमाया कि मैं तुम औरतों से उन बातों के तहत बैयात लेता हूँ कि आज के बाद से तुम लोग किसी को ख़ुदा का शरीक नहीं करोगी , चोरी नहीं करोगी , जिना नहीं करोगी और किसी पर तोहमत व बोहतान नहीं लाओगी। मोअर्रिख़ज़ाकिर हुसैन ने हाशिये परतहरीर फरमाया है कि जब आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने हिन्द से कहा कि चोरी न करना तो उसने काह कि अबुसुफ़ियान एक बख़ी ल शख़्स है क्या उसका माल भी चोरी से न लूँ उस पर आन हजरत (स.अ.व.व.) ने उसे देख कर पहचान लिया और फ़रमाया कि क्या तू हिन्दा है ? हिन्द क़दमों में गिर पड़ी और कहा या रसूल उल्लाह! मेरा साबेक़ा कुसूर माफ़ कर दीजिये चुनानचे आपने उसका कुसूर माफ़ कर दिया।

वाक़-ए-ग़मीज़ा

फ़तेह मक्के के बाद हुज़ूरे अकरम (स.अ.व.व.) अभी मक्के ही में तशरीफ़ फ़रमां थे कि आपने मुख़तलिफ़ व फूद इतराफ़ व जवानिब इस ग़र्ज़ से रवाना किये कि वह लोगो को तालीमाते इस्लामी से आगाह करके उन्हें इस्लाम की दावत दें। इस सिलसिलेमें आप ने ख़ालिद बिन वलीद को भी तीन सौ पचास आदमियों की जमीअत के साथ बनि ख़ज़ीमा के पास भेजा और इस अमर की ताकद़ फ़रमायी कि वह किसी पर न हाथ उठायें और न किसी से लड़ाई झगड़ा करें बल्कि अपना दायराकार सिर्फ तबलीग़ तक महदूद रखें।

जहूरे इस्लाम के क़बल , ज़माने जाहेलियत में ख़ालिद का चचा फ़ाकेह इब्ने मुग़ीरा और अब्दुल रहमान का बाप औफ़ यमन से वापसी के दौरान बनि इब्ने मुग़ीरा और अब्दुल रहमान का बाप औफ़ यमन से वापसी के दौरान बनि ख़ज़ीमा के चन्द नौजवानों के हाथों मारे गये थे। कुरैश ने इन्तेक़ाम के लिये उन पर चढ़ाई की उन लोगों ने ख़ून बहा दे कर सुलह सफ़ाई कर ली थी और मामला रफ़ा दफ़ा हो गया था। ख़ालिद इब्ने वलीद वफ़िद की सरब्राही करते हुए जब वहां पहुँचे तो उनके इन्तेक़ामी जजबात एक दम से भड़क उठे चुनानचे वह मक्के से दो मंज़िल के फ़ासले पर चाहे ग़मीज़ा के क़रीब उतर पड़े। यह कुँआ बनि ख़जीमा की मिलकियत था और उसी के आस पास वह लोग आबाद थे। जब उन लोगों ने ख़ालिद को लशकर के हमराह अपने कुंओं के क़रीब पड़ाव डाले देखा तो उन्हें अन्देशा हुआ कि ख़ालिद कहीं इन्तेक़ाम के लिये जंग न छेड़ दे। लेहाज़ा उन्होंने हिफ़ाज़त खुद अख़तेयारी के तहत हथियार बांध लिये। ख़ालिद न उन्हें मुसल्लेह देखा तो पूछा तुम लोग कौन हो ? कहा , हम मुसलमान हैं , हमने अपनी आबादी में मस्जिद बना रखी है जिसमें अज़ानें देते हैं और नमाज़े पढते हैं। ख़ालिद ने कहा जब तुम मुसलमान हो तो ये हथियार क्यों बान्ध रखे हैं ? कहा हमने यह हथियार इसलिए बान्धे हैं कि साबेक़ा दुश्मनी कि बिना पर कहीं तुम जंग व क़ताल पर न उतर आओ। ख़ालिद ने ने कहा तुम लोग इत्मिनान रखो हम जंग की ग़र्ज़ से नहीं आये हैं और न जंग करेंगे. अपने यह हथियार उतार कर रख दो। उन्होंने कहा कि जब हम मुसलमान हैं तो अल्लाह और उसके रसूल (स.अ.व.व.) के ख़िलाफ़ कोई क़दम नहीं उठायेंगे। 1 यह कहकर उन्होंने हथियार उतारना चाहा तो उन्हीं में से एक शख़्स हजदम ने कहा कि ग़ैर मुसल्लह होने से पहले ये सोच लो कि ख़ालिद तुम्हें मौत के घाट उतार देगा। मगर उन लोगों ने कहा कि जाहेलियत और जंग वजदल का दौर ख़त्म हो चुका है , वह भी मुसलमान है और हम भी इस्लाम ला चुके हैं और इस हैसियत से हम एक दूसरे के भाई हैं लेहाजा़ अपनों से ख़तरा और अन्देशा कैसा। ग़र्ज़ सभों ने हथियार उतार कर रख दिये और बेदस्त व पा हो गये तो ख़ालिद ने अपने हमराहियों को हुक्म दिया कि सबको ग़िरफ़्तार कर लो और उनके हथियार छीन लो। चुनानचे उन्हे रस्सियों में जकड़ कर उनके हथियार लेलिये गये और फिर एक एक करके उन्हें क़त्ल कर दिया गया। अब्दुल रहमान बिन औफ़ जो इस मुहिम में शरीक थे ख़ालिद की इस ग़द्दारी और इक़दामे क़त्ल पर बहुत बिग़डे और दोनों के दरमियान तकरार शुरू हो गई। अब्दुल रहमान ने कहाः- तुमने दौरे इस्लाम में दौरे जाहेलियत की हरकत की है। ख़ालिद ने कहा , मैंने तुम्हारे बाप औफ़ का इन्तेका़म लिया है। अब्दुल रहमान ने कहा तू झूट कहता है मैंने ख़ुद अपने बाप के क़ातिल को क़त्ल कर दिया था यह तू ने अपने चचा फ़ाकेह इब्ने मुग़ीरा के ख़ून का बदला लिया)। 1 याकूबी का ब्यान है कि (अब्दुल रहमान इब्ने औफ़ ने कहा कि ख़ुदा की कसम ख़ालिद ने उन लोगों को तहे तेग़ किया जो इस्लाम ला चुके थे। ख़ालिद ने उन से कहा , मैंने तुम्हारे बाप औफ़ के इन्तेका़म में उन्हें क़त्ल किया है , अब्दुल रहमान ने कहा ऐसा नहीं है बल्कि तुम ने अपने चचा फ़ाकेहा इब्ने मुग़ीरा का बदला लिया है। 2

जब पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) को इस इजतेमाई क़त्ल का हाल मालूम हुआ तो आपको बहुत सदमा पहुँचा। आप क़िबलये-रू खड़े हुए और अपने हाथों को ज़ेरे आसमान बुलन्द करके तीन मर्तबा फरमायाः-

(ख़ुदा वन्दा! मैं तेरी बारगाह में ख़ालिद बिन वलीद के इस फ़ेल से इज़हारे बेज़ारी करता हूँ-

ख़ालिद इब्ने वलीद का यह इक़दाम सरासर इस्लामी तालीमात के मुनाफ़ी था। इस्लाम इसका क़तअन रवादार नहीं है कि बिला वजह किसी काफ़िर को भी क़त्ल किया जाये अगर मैदाने जंग में कोई काफिर तलवार देख कर कलमा पढ़ ले तो इस्लाम उस पर भी हमला आवर होने की इजाज़त नहीं देता चुनानचे उसमा बिन ज़ैद ने एक मुहिम में एक ऐसे शख़्स को क़त्ल कर दिया जिसने तलवार को देखकर कलमा पढ़ लिया था जब आन हज़रत (स.अ.व.व.) को मालूम हुआ तो आपने उसामा की सरज़निश की। उसामा ने कहा उसने तलवार के डर से कलमा पढ़ लिया था। फ़रमाया , क्या तुमने उसके दिल में झांक कर देखा था ? यह जानके कि वह मुसलमाल जो मस्जिद तामीर करके अज़ाने देते और नमाज़ें पढ़ते हों उनसे फ़रेब कारी और ग़लत ब्यानी करके हथियार रखवाये जायें और फिर दौरे जाहेलियत के ख़ून का बदला लेने के लिये उनके ख़ून से होली खेली जाये। हालाँकि पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने फ़तहे मक्के के मौक़े पर दौरे जाहेलियत के क़त्ल के इन्तेका़म को ख़त्म करते हुए साफ़ तौर पर यह फरमां दिया था कि ज़मानये जाहेलियत के ख़ून का इन्तेका़म , क़ौमी मुफ़ाख़िर और खून बहा मैंने अपने क़दमों के नीचे रौन्द डाले हैं।)

ग़र्ज़ की ख़ुदा की बारगाह में ख़ालिद बिन वलीद की तरफ़ से इज़हारे बज़ारी के बाद आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने हजरत अली (अ.स.) को तलब फ़रमाया और उनसे कहा कि तुम यमन से आया हुआ माल लेकर बनि ख़ज़ीमा के पास जाओ और एक एक आदमी का ख़ून बहा अदा करो और उनाक जो नुक़सान हुआ है उसकी तलाफ़ी करो। हज़रत अली (अ.स.) चाहे ग़मीज़ा पर गये। मक़तूलीन के वारिसों को बुला कर उनका ख़ून बहा अदा किया और उनके तमाम नुक़सानात की तलाफ़ी की जब सबका ख़ून बहा दा कर चुके तो पूछा अब किसी और का मुतालिबा बाक़ी तो नहीं रहा। कहा , अब हमारा कोई मुतालिबा नहीं है। फ़रमाया अभी मेरे पास कुछ माल बच रहा है लेहाजा़ मैं उसे वापस ले जाने के बजाये हज़रत रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व.) की तरफ़ से तुम्हें देता हूँ। उसके बाद आप वापस तशरीफ़ लाये और पैगम़्बरे अकरम (स.अ.व.व.) से तमाम वाक़िया ब्यान किया तो आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने फ़रमाया-

(मेरे माँ बाप तुम पर फ़िदा हों , तुमने जो कुछ किया है वह मुझे सुर्ख़ बालों वाले ऊँटों से ज़्यादा पसन्द हो।)

ग़ज़वा हुनैन

हुनैन , मक्के और ताएफ़ के दरमियान फेलै हुए पहाड़ों के दरमियान एक वादी का नाम है जिसके एक तरफ़ हमवार मैदान है और दूसरी तरफ़ गहरे खड़ , दुशवार गुज़ार खाइयों और पुर पेंच व डेठे मेढे रास्ते हैं।

फ़तहे मक्के के बाद तमाम क़बाएले अरब पर मुसलमानों की धाक बैठ गई थी। लेकिन बनि सकीफ़ बनि हवाज़िन और उनके हलीफ़ों की मुश्रेकाना सरगर्मियों , और मुनाफ़ेक़ाना काविशों में कोई कमी नहीं आई थी। चुनानचे यह क़बीले हस्बे दस्तूर दुश्मनी व अनाद पर तुले रहे। बनि हवाज़िन के एक सरदार मालिक इब्ने औफ़ नसरी ने बनि जशम व बनि नसर को अपने साथ मिला कर एक लश्कर तरतीब दिया और पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) से फ़ैसला कुन जंग का तहैय्या किया।

बनि सक़ीफ़ जिन्होंने रसूले अकरम (स.अ.व.व.) पर सन्गबारी करके उन्हें ताएफ़ से बहार निकाला था , वह भी उनके मुआविन व मददगार बन कर उठ खड़े हुए। मालिक इब्ने औफ़ ने बनि साद को पैग़ाम भेजा कि वह भी मुसलमानों के ख़िलाफ़ जंग में उनका साथ दें लेकिन बनि साद ने आमादगी ज़ाहिर न की और यह कहकर इन्कार किया कि मुहम्मद (स.अ.व.व.) , हमारे क़बीलें पले और बढ़े हैं हम उनके मुक़ाबिले में सफ़ आरा नहीं हो सकते मगर मालिक ने जब उन पर ज़ोर दिया तो उनके कुछ आदमी भी इस मुहिम में शरीक़ हो गये और मालिक के लश्कर की तादाद चार पांच हज़ार तक पहुँच गई। अबूजख़ल सिपहसालार मुक़र्रर हुआ और यह लोग अपनी अपनी औरतों , बच्चो , मवेशियों और भेड बकरियों को साथ लेकर बड़े ज़ोर व शोर से निकल खड़े हुए। इस लश्कर में हर्ब व ज़र्ब के फ़न का मशहूर माहिर दरीद इब्ने समा भी शामिल था। उसकी उम्र एक सौ बीस ( 120) बरस की थी और वह चलने फिरने से माज़ूर था मगर उसे हौदज में बिठा कर इस ग़र्ज़ से लाया गया था कि वक़्ते ज़रुरत उसके तजरबात से फ़ायदा उठाया जा सके। चुनानचे जब लश्कर ने वादी औतास में पड़ाव डाला तो उसने पूछा कि ये कौन सी जगह हैं ? बताया गया कि यह वादी औसात है। उसने कहा यह जगह हरब व पैकार के लिये मौज़ू रहेगी , इसलिए , कि यह न ज़्यादा पथरीली और सख़्त है और न ही ज़्यादा रेतीली और नर्म है। इतने में इसके कानों में बच्चों के रोने , औरतों के छींकने और भेड़ बकरियों के मिमयाने की आवाज़ें आई। उसने मालिक बिन औफ़ को बुलाकर पूछा यह आवाज़ें कैसी हैं ? मालिक ने औरतें बच्चे भी साथ हैं , कहा इन्हें क्यों साथ लाए हो ? कहा कि बाल बच्चों के हतो हुए कोई शख़्स मैदान छोड़ने का क़स्द नहीं करेगा। कहा , जब मैदान से क़दम उखड जाते हैं तो औरतों और बच्चों का ख़्याल उखड़े हुए क़दमों को रोक नहीं सकता। दानिशमन्दी का तक़ाज़ा तो यह था कि तुम औरतों और बच्चों को साथ न लाते। अगर शिकस्त हुई तो ऐसी रूसवायी का सामना होगा जिसे पुश्ते तक मिटाय न जा सकेगा। फिर पूछा , क्या बनि काब व बनि कलाब भी तुम्हारे साथ हैं ? कहा वह लोग शरीक नहीं हुए। कहा अगर तुम्हारा मुकद्दर यावरी करता तो वह भी शरीक होते। हमारी राय तो ये है कि हम अपनी बस्तियों में वापस चले। अगर मुसलमान हम पर हमला आवर हुए तो हम अपना बचाओ वहां आसानी से कर सकेंगे और जिन क़बीलों ने हमारा साथ नहीं दिया इस सूरत में वह भी हमारा साथ देने पर आमादा हो जायेंगे। मालिक ने उसकी राय से इत्तेफ़ाक न किया , दरिद ने कहा तुम जानों और तु्म्हारा काम , मैं आइन्दा किसी मामले में दख़ल न दूँगा।

जब पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) को यह मालूम हुआ कि बनि हवाज़िन व बनि सक़ीफ़ जंग के इरादे से निकल खड़े हुए हैं तो आपने अब्दु्ल्लाह बिन अबीहदरिद को भेजा कि उनक नक़ल व हरकत की ख़बर लायें , उन्होंने घूम फिर कर तमाम हालात का जाएजा लिया और पलट कर आन हज़रत (स.अ.व.व.) को ख़बर दी कि दुश्मन जंग का इरादा कर चुका है हमें उसकी पेशक़दमी को रोकने के लिये तैयार रहना चाहिये। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने हज़रत उमर को बुलाया और अबीहदरिद से जो कुछ सुना था उसका ज़िक्र कर दिया। हज़रत उमर से मुख़ातिब होकर कहाः- ऐ उमर! चूँकि तुम हक़ के झुटलाने के आदी हो इसलिये मुझे झुटलाते हो। 1

आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने इब्ने अबी हदरीद की इत्तेला पर एतमाद करते हुए लशर को सफ़बन्दी का हुक्म दिया। और 6 शव्वाल सन् 8 हिजरी को बारह हज़ार का एक अज़ी लश्कर लेकर चल पड़े। उन बारह हज़ार में दस हज़ार अन्सार व मुहाजेरीन जो मदीने से आपके हमराह आये थे और दो हज़ार की तादाद नौ मुस्लिमों की थी जो फ़तहे मक्के के बाद मुसलमान हुए थे।

दुश्मनों के मुक़ाबिले में मुसलमानों की तादाद तीन गुना ज़्यादा थी इस क़सरत ने बेशतर मुसलमानों में एक नख़वत की सी कैफ़ियत पैदा कर दी थी चुनानचे हज़रत अबुबकर ने इस क़सरत पर गुरुर व घमण्ड का मुज़ाहिरा करते हुए फ़रमाया कि आज तादाद की कमी की बिना पर हम शिकस्त नहीं खा सकते।

वादी हुनैन में पहुंच कर पहले सी से दुश्मन ने दर्रों और ग़ारों में मोर्चे संभाल लिये थे। चुनानचे मुसलमान सुबह होते जब इस वादी में दाख़िल हुए और तंग व ढ़लान रास्तों को तय करते हुए आगे बढ़े तो दुश्मनों ने क़मीनगाहों से निकल कर लश्करे इस्लाम पर तीरों और पत्थरों की बारिश शुरू कर दी। मुसलमान इस नागहानी हमले के लिये तैयार न थे। लश्र में आग भगदड़ मच गई। सबसे पहले मुक़देमतुल जैश ने राहे फ़रार इख़तियार की जिसके सरबराह ख़ालिद इब्ने वलीद थे। जब अक़ब में आपने वालों ने ख़ालिद को अपने दस्ते के साथ भागते देखा तो वह भी भागे यहां तक कि एक दूसरे की ख़बर न रही। जिधर जिसने मुंह उठाया उधर निकल खड़ा हुआ। भागने वालों में क़तावा भी शामिल थे चुनानचे उनका ब्यान है कि मुसलमानों ने राहे फ़रार इख़्तेयार की और मैं भी उनके साथ भागा। अचानक मैंने देखे कि उमर बिन ख़त्ताब भी तेज़ी से भाग रहे हैं , कहा ऐ उमर क्या हो गया है तुम लोगो को , तो आपने फ़रमाया कि भागते रहो रसूल उल्लाह की यही मर्ज़ी है।)

हदीस व सैर की किताबों में तो इस फ़रार का तज़किरा तफ़सील से है ही मगर कुरान ने भी इस पर खुले हुए लफ़्ज़ों में तबसिरा किया है किः-

(मुसलमानों! ख़ुदा ने कई मुक़ामात पर तुम्हारी मदद की , ख़ुसूसन जंगे हुनैन के दिन जब तुम्हें अपनी कसरत ने माज़ूर कर दिया था फिर वह कसरत तुम्हें कुछ भी काम न आई और तुम ऐसे घबराये कि बावजूद अपनी उसअत के ज़मीन तुम पर तंग हो गई और तुम पीठ फेर कर भाग निकले।) (कुरान )

रईसुल मुनाफ़ेक़ीन अबुसुफ़ियान ने जब मुसलमानों को सर पर पांव रखकर भागते देथा तो कहा , अभी क्या है यह लोग शिकस्त का सहर टूट गया है और कुछ लोगों ने कहा कि मुसलमानों से लात व हुबल ने अपनी पामाली का बदला लिया है।

यह लोग अगर चे लश्करे इस्लाम में शामिल थे मगर दिल से शरीक न थे और न उनसे यह तवक़्क़ो की जा सकती थी कि जंग का नक़शा बिगड़ने की सूरत में साबित क़दम रहेंगे मगर ताज्जुब तो इस बात पर है कि बैयते रिज़वान में शरीक होने वाले और मौत पर अहद व पैमान बांधने वाले भी साबित क़दम न रह सके। देखते ही देखते बारह हज़ार का जम्म़े ग़फ़ीर छट गया और पैग़म्बरे अकरम (स.अ.व.व.) के पास सिर्फ़ चन्द आदमी रह गये। एक रवायत की बिना पर हज़रत अली (अ.स.) इब्ने अबुतालिब , अब्बास इब्ने अब्दुल मुत्तालिब , अबुसुफ़ियान बिन हारिस और अब्दुल्लाह इब्ने मसऊद , सिर्फ़ चार आदमी साबित क़दम रहे और एक रवायत की बिना पर दस आदमी यानि अली इब्ने अबुतालिब (अ.स.) अब्बास इब्ने अब्दुल मुत्तालिब , फ़ज़ल इब्ने अब्बास , अबुसुफ़ियान बिन हारिस , रबिया इब्ने हारिस , अब्दुल्लाह इब्ने जुबैर और अतबा व मआतिब पिसरान अबुलहब नीज़ ऐमन इब्ने अबीद बाक़ी रहे। पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) अपने ख़च्चर पर सवार मैदान में खड़े थे अब्बास और फ़ज़ल आपके दायें बायें इस्तादा थे। अबुसुफ़ियान अक़ब से ज़ीन पकड़े हुए थे और हज़रत अली (अ.स.) पैग़म्बर (स.अ.व.व.) के सामने तलवार से दुश्मनों की चलग़ार को रोके रहे थे बाक़ी जॉबाज़ आन हज़रत (स.अ.व.व.) के इर्द गिर्द घेरा आले डाले हुए थे। दुश्मनों का ज़ोर बढ़ता जा रहा था। मालिक इब्ने औफ़ पैग़म्बर (स.अ.व.व.) पर हमला आवर होने के इरादे से आगे बढ़ा। ऐमन इब्ने अबीद ने उसका हमला रोका और दिफ़ा करते हुए शहीद हो गये।

हुजूरे अकरम (स.अ.व.व.) ने मुसलमानों को मैदान छोड़कर जाते देखा तो आवाज़ दी कि ऐ अल्लाह के बन्दों कहा जा रहे हो ? जब इस आवाज़ पर कोई पलटता नज़र न आया तो आपने अब्बास से फ़रमाया , ऐ चचा तुम्हारी आवाज़ बुलन्द है तुम्हीं उन्हें पुकारो. अब्बास ने पहाड़ी पर चड़कर उन्हें आवाज़ दी कि ऐ अन्सार व मुहाजेरीन , ऐ बैयते रिज़वान वालों , पैग़म्बर (स.अ.व.व.) को छोड़ कर कहां भागे जा रहे हो आओ और आन हज़रत (स.अ.व.व.) की नुसरत करो।

अब्बास इब्ने अब्दुल मुत्तालिब की आवाज़ पर कुछ लोग पलट आये। हज़रत अली (अ.स.) ने उन्हे अपने परचम के नीचे जमां किया और दुश्मन पर हमला करने की ग़र्ज़ से आगे बढ़े और टूट पड़े. तलवारें सरों और ढालों से टकरा टकरा कर चिन्गारियां उगलने लगीं। बनि हवाज़िन का अलमबर्दार सियाह परचम लिये ऊँट पर सवार रजज़ पढता हुआ आगे बढ़ा। हज़रत अली (अ.स.) ने पीछे से तलवार मार कर उसके ऊँट के पै कर दिया और ऊँट के साथ अबू जखल भी गिरा अभई संभलने भी न पाया था कि आप ने एक वार में उसके दो टुकड़े कर दिये अबुजहल का क़त्ल होना था कि दुश्मनों के पांच उखड़ गये और वह गिरते पड़ते मैदान से भाग खड़े हुए। दुश्मन को मुन्तशिर होते देखकर वह मुसलमान जो आस पास रूपोश थे निकल पड़े और उन्होंने काफ़िरों को तलवार की बाढ़ पर रख लिया। कुछ क़त्ल हुए कुछ क़ैद कर लिये गये. मुसलमानों ने उनके मवेशियों , भैड़ बकरियों और दूसरे साज़ों सामान को अनी तहवील में ले लिया और औरतों व बच्चों को जंगी इसीर बना लिया।

इस ग़ज़वा में जर मुसलमान शहीद हुए और सत्तर कुफ़्फ़ारमौत के घाट उतारे गये। माले ग़नीमत में चौबीस हज़ार ऊँट चालिस हज़ार से ज़्यादा भेड़ें और बकरियां। और चालिस हज़ार औक़िया चाँदी मुसलमानों के हाथ लगा। इस फ़तहे व कामरानी में सबसे बड़ा हिस्सा हज़रत अली (अ.स.) का है जिन्होंने अपनी जान की बाज़ी लगा कर पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की हिफ़ाज़त की और एक लम्हे के लिये भी मैदान से हटना गवारा न किया।


जंग औतास

हुनैन का मारका सर होने के बाद वहां क़याम के दौरान पैगम़्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) ने अबुआमिर अशरी की क़यादत में एक लश्कर बनि हवाज़िन की सरकूबी के लिये ऊतास रवाना किया जो हुनैन और ताएफ़ के दरमियान वाक़े है। क़बीलये हवाजि़न से जंग हुई और उनके नौ आदमियों को मौत के घाट उतार कर अबुआमिर शहीद हुए। उनकी शहादत के बाद उनके भतीजे अबुमूसा अशरी ने फौज़ की कमान संभाली। सैकड़ों हवाज़िन मारे गये और लश्करे इस्लाम फ़तहायाब हुआ। तबरी , कामिल , अबुलफ़िदा , रौज़तुल हयाब और हबीबुल सैर वग़ैरा में है कि इस जंग में चौबीस हज़ार ऊँट छः हज़ार गुलाम , चालीस हज़ार से ज़्यादा गौसफ़िन्द और चार हज़ार औखिया 1 चाँदी मुसलमान को बतौर माले ग़नीमत हासिल हुआ जिसे अबुमूसा अशरी आन हज़रत (स.अ.व.व.) कि ख़िदमत में हाज़िर हुए। हुज़ूर (स.अ.व.व.) ने हुक्म दिया कि जितना भी माले ग़नीमत है आबाद बिन बशीर अन्सारी के ज़ेरे निगरानी मुक़ाम जाराना 1 में जमां रखा जाये।

ताएफ़ का मुहासिरा

बनि सक़िफ़ और उनके सरदार मालिक इब्ने औफ़ नसरी ने हुनैन से भाग कर ताएफ़ ले ली थी और साल भर का सामाने रसद और आलाते जंग जमा करके क़िला बन्द हो गये थे क्योंकि उन्हें मुसलमानों से यह धड़का था कि वह उनकी सरकूबी ज़रूर करेंगे। चुनाचने लश्करे इस्लाम ने आन हज़रत (स.अ.व.व.) की क़यादत व सरबराही में ताएफ़ का रूख़ किया और क़िले के सामने पड़ाव डालकर उन्हें मुहासिरे में ले लिया। दौनों तरफ़ तीरों का तबादला होता रहा मगर चूँकि मुसलमान खुले हुए मैदान मे और बनि सक़ीफ़ क़िला बन्द थे इसलय वह मुसलमानों की बानिस्बत ज़्यादा महफूज़ थे. एक दिन बनि सकी़फ़ ने क़िले की फ़ैसल से मुसलमानों पर इस क़दर तीर बरसाये कि कई मुसलमान शहीद और मुतादिद ज़ख़्मी हो गये। जब दुश्मन को ज़ेर करने की कोई सूरत नज़र न आई तो सलमान फ़ारसी ने मिनजनीक़ के ज़रिये किले की दीवार पर संगबाज़ी का मशविरा दिया। चुनानचे मिनज़नीक़ के ज़रिये बड़े बडे पत्थर फेंके गये और क़िले की दीवार में सिगाफ़ डाल दिया गया। जब मुसलमानों ने इस शिगाफ़ के रास्ते से क़िले के अन्दर दाख़िल होना चाहा तो बनि सक़ीफ़ ने लोहे की दहकती हुई सलाखें ऊपर से फेंकी जिसकी वजह से मुसलमान मजबूर होकर पीछे हटे और क़िले को सर करने में कामयाब न हो सके।

इसी मुहासिरे के दौरान पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) ने हज़रत अली (अ.स.) को इस अमर पर मामूर किया कि वह एक दस्ते के हमराह ताएफ़ के गिर्द व नवाह में जायें और जहां कहीं बुतख़ाना नज़र आये उसे मिस्मार कर दें। हज़रत अली (अ.स.) रवाना हए। अभी रात की तारीकी छटने भी ने पाई थी कि क़बीलये बनि शसम की तरफ़ आपका गुज़र हुआ उन्होंने मुज़ाहेमत की और उनमें से एक नामवर जंगजू आगे बढ़कर मुबारिज़ तलब हुआ हज़रत अली (अ.स.) ने एक ही वार में उसे ठिकाने लगा दिया। बनि शासम ने उसे क़त्ल होते देखा तो वह पीछे हट गये और फिर किसी को मुक़ाबिले में आने की हिम्मत न हो सकी। अमीरूल मोमेनीन (अ.स.) ने क़दम आगे बढ़ाया और बनि हवाज़िन व बनि सक़ीफ़ का जो भी बुतख़ाना नज़र आया उसे तोड़ फ़ोड़ कर बराबर कर दिया जब तमाम इलाक़ा बुतों से पाक हो गया तो वापस पलटे। पैग़म्बरे अकरम (स.अ.व.व.) ने उन्हें कामयाब व कामरान वापस आने पर मुबारकबाद दी और गोशों मे खड़े होकर बड़ी देर तक राज़ व नियाज़ की बातें की। कुछ लोगों को यह राज़दाराना अन्दाज़े गुफ्तगू नागवार हुआ कहने लगे कि आज तो इब्ने अम से सरगोशियों का सिलसिला दराज़ हो गया है। हज़रत उमर बरदाशत न कर सके उन्होंनें आख़िरकार रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) से कह दे कि आप अली (अ.स.) से देर तक ख़लवत में बाते करते हैं और हमें क़रीब फटकने भी नहीं देते इस पर आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने फ़रमाया कि मैने अली (अ.स.) से बाते नहीं की बल्कि अल्लाह ताला ने की है। 1

उन्हें अय्यामे मुहासिरे में नाफ़े इब्ने ग़ीलान बनि सक़ीफ़ के चन्द सवारों को लेकर क़िले से बाहर निकला , हज़रत अली (अ.स.) ने उसका ताअक्कुब किया और विज नाम की एक वादी में उसे क़त्ल कर दिया उसके क़त्ल होते ही उसके साथी भाग खड़े हुए और फिर महसूरीन को बाहर निकलने की जुराअत न हो सकती। इस अरसे में ताएफ़ के इतराफ़ में रहने वालों ने इस्लाम कुबूल कर लिया और बनि सक़ीफ़ के कुछ गुलाम भी क़िले से बाहर निकल कर आज़ादी के वादे पर मुसलमान हो गये।

मुसलमानों को मुहासिरा किये हुए बीस दिन हो चुके थे मगर क़िला फ़तेह होता हुआ नज़र न आता था चुनानचे आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने बनि सक़ीफ़ को उनकी हालत पर छोड़ कर मुहासिरा उठा लेना मुनासिब समझा और यह ऐलान फ़रमाया कि कल हम यहां से वापस चलेंगे। चुनानचे दूसरे दिन सुबह के वक़्त सहाबा ने मुहासिरा उठा लिया। कुछ लोगों ने आन हज़रत (स.अ.व.व.) से कहा कि या रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) ने बद दुआ के बजाये फ़रमाया। परवर दिगार। बनि सक़ीफ़ को हिदायत फरमा और उन्हें मेरे पास हाज़िर कर। 2

सरकारे दो आलम (स.अ.व.व.) की दुआ का नतीज़ा थोड़े ही अरसे के बाद ज़ाहिर हुआ और बनि सक़ीफ़ का एक नुमाइन्दा वफ़द मदीने में आकर रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में हाज़िर हो गया और कहा या रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) , हम इस्लाम कुबूल करेत हैं मगर हमारी इस्तेदुआ है कि बनि सक़ीफ़ के बुत लात को तीन बरस तक तोड़ा न जाये मगर पैगम़्बर (स.अ.व.व.) ने उनकी यह बात माने से इन्कार कर दिया तो उन लोगों ने कहा कि अगर आप नहीं मानते तो उसे तोड़ने के लिए किसी और को मामूर फ़रमायें हम लोग उसे अपने हाथों ने नहीं तोड़ेंगे। आन हज़रत ने उनकी यह बात मान ली। इस वफ़द ने पलट कर अपने क़बीले वालों से सारी गुफ़्तगू नक़ल की और उन्हें समझाया तो वह सबके सब गै़र मुशरूत तौर पर मुसलमान हो गये।

ग़नाएम की तक़सीम

पांचवी ज़ीक़ाद को ताएफ़ के सफ़र से पलट कर पैगम़्बरे इस्लाम जब जाराना में क़याम फ़रमा हुए तो बहुत से मुसलमानों ने माने ग़नीमत की तक़सीम पर इसरार किया और कहा या रसूल उल्लाह ऊँटों भेडों बकरियों को यही बांट दीजिए चुनाचने आपने इजाज़त दी और तक़सीम शुरू हो गई आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने अपने खुमुस में से नौ मुस्लिमों को उनकी दिलजूई और तालिफ़े कलब के लिये सौ ऊँट दिये। उनमें अबुसुफ़ियान और उसके दोनों बेटे यज़ीद व माबिया भी शामिल थे और आम तौर से हर शख़्स को चार ऊँट पर उन्होने कहना शुरू किया कि आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने अपने रिश्तेदारों और क़बिले वालों के साथ इम्तियाज़ी सुलूक दिया है हालाँकि हमने उस वक़्त दस्ते ताउन बढ़ाया जब कोई मुआविन मददगार नहीं था। उनका यह शिकवा आन हज़रत (स.अ.व.व.) के कानों तक पहुँचा तो आपने उन्हें जमा किया और इरशाद फरमाया कि मैनें उन लोगों के साथ यह बरताव महज़ इस बिना पर किया है कि वह साबित क़दम रहें और बददिल होकर इस्लाम से बरगश्ता न हों। क्या तुम लोग इस पर खुश नहीं हो कि उनके साथ भेड़ बकरियां और तुम्हारे साथ ख़ुदा का रसूल है ? यह सुना था कि अन्सार की आँखों में आँसू आ गये और वह कहने लगे या रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) हम इस तक़सीम पर दिल व जान से राज़ी हैं।

अब्बास इब्ने मरदास असलमी शायर भी आम हिस्से से ज़्यादा का ख़्वाहिश मन्द था चुनानचे उसने शिकवा आमेज़ अशआर कह कर इस तक़सीम पर अपनी नाराज़गी का इज़हार किया। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने फ़रमाया , उसकी ज़बान काट दो। पैग़म्बर (स.अ.व.व.) का मक़सद था कि उसे कुछ और दे दिलाकर उसकी ज़ुबान पर मोहरे ख़मोशी लगा दो मगर वह यही समझा कि उसकी ज़बान काटने का हुक्म हुआ है। यह सज़ा सुनकर वह कांप उठा और जब हज़रत अली (अ.स.) ने उसेस आपने साथ चलने को कहा तो ग़िड़ग़िड़ाने लगा और कहा आप कहां ले जायेंगे ? फरमाया रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) ने जो हुक्म दिया उस पर अमल करने के लिये। चुनानचे आप उस को लिये हुए उस जगह आये जहां ग़नीमत के ऊँट चर रहे थे आपने फ़रमाया कि इन ऊँटों में से और ऊँट ले कर सौ की तादाद पूरी कर लो और तुम भी मौअल्लेफ़तुल कुलूब लोगों की सफ़ में शामिल हो जाओ या फिर उन्हीं चार ऊँटों पर क़ेनाअत करो। उसने कहा , या अली (अ.स.) ! यो चार ऊँट मुझे गवारा हैं मगर यह गवारा नहीं है कि मेरा शुमार मोअल्लेफ़तुल कुलूब में हो।

इस तक़सीम के बाद आन हज़रत (स.अ.व.व.) मक्के मोअज़्जमा में मुक़ीम हुए वहां मुनासिके उमरा वग़ैरा बजा लाये और अताब इब्ने असीद को आमिले मक्का मुक़र्रर किया मआज़ इब्ने जबल को कुरान व एहकामे शरीआ की तालीम पर मामूर फ़रमाया। फिर मक्के से रवाना होकर ज़िलहिज़ की इब्तेदा में वारिदे मदीना हुए।


यमन में इस्लाम की तबलीग़

सन् 8 हिजरी में आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने ख़ालिद बिन वलीद को सहाबा की एक जमाअत के साथ त.बलीग़े इस्लाम के लिये यमन भेजा जहां यह लोग छः माह तक क़याम पज़ीर रह कर लोगों को इस्लाम की दावत देते रहे मगर उनकी तबलीग़ी कोशिशें बारआवर न हुई। बरा इब्ने आज़िब जो इस जमाअत में शरीक थे कहते हैं कि ख़ालिद बिन बलीद की बात किसी ने न मानी। जब आन हज़रत (स.अ.व.व.) को ख़ालिद बिन वलीद की क़यादत में इस मिशन की नाकामी का इल्म हुआ तो आपने हज़रत अली (अ.स.) को इस फ़रीज़े की अदायगी पर मामूर फ़रमाया और उन्हें हिदायत दी कि अगर कोई अपनी मर्ज़ी से तुम्हारे साथ रहना चाहे तो वह रह जाये वरना ख़ालिद और उसकी पूरी जमात को मीदने वापस भेज दो। बरा इब्ने अज़िब का बयान है कि मैं भी अळी (अ.स.) के साथ रूक गया। जब अहले यमन को यह मालूम हुआ कि ख़ालिद यहां से चला गया है और तबलीग़ की हैसियत से हज़रत अली (अ.स.) आयें है तो वह सब एक जगह पर जमां हो गये। हज़रत अली (अ.स.) नमाज़े सुबहा से फ़ारिग़ होकर उनके पास गये। रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) का वह ख़त जो अहले यमन के नाम था पढ़ कर सुनाया उसके बाद इस्लाम के मुहासिन पर एक फ़सीह व बलीग़ खुतबा दिया। उसका असर यह हुआ कि जो लोग ख़ालिद की छः माह की तबलीग़ से टस सेमस न हुए थे इस्लाम की ख़ूबियों के मोतरिफ़ होकर हलक़ा बगोशे इस्लाम हो गये। तबरी का कहना है कि तमाम बनि हमदान एक ही दिन में मुसलमान हो गये। हज़रत अली (अ.स.) ने आन हज़रत (स.अ.व.व.) को जब मुज़दा भेजा तो और आपने सजदये शुक्र अदा किया। इसके बाद तीन मर्तबा फ़रमाया कि अहले हमदान पर मेरा सलाम हो। 2

क़बीलये हमदान के इस्लाम लाने के बाद , यमन में इस्लामी तरक़्की की , राहें खुल गई और जूक़ दर जूक़ लोग दायरये इस्लाम में दाख़िल होने लगे। देखते ही देखते कुफ़्र की घटायें छट गयी और इस्लाम का सूरज वहां भी अपनी आब व ताब के साथ चमकने लगा।

मुख़तलिफ़ वाक़ेयात

• माहे ज़िलहिज में मारिया क़बतिया के बतन से आन हजरत के फ़रज़न्द इब्राहीम पैदा हुए जो एक साल तीन माह तक ज़िन्दा रहने के बाद इन्तेक़ाल फ़रमां गये।

• अबुसुफ़ियान , अरवा बिन मसूद सख़फ़ी , अकरमा इब्ने अबुजहल , शीबा बिन अस्मान ऐदी , हज़रत अबुबकर के वालिद अबुक़हाफ़ा , हकीम बिन हिज़ाम , मालिक बिन औफ़ नसरी और अबु सुफ़ियान के दोनों बेटे यज़ीद माविया मुसलमान हुए।

• सन् 8 हिजरी के आख़िर में आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने आला हज़रमी को हाकिमे बहरैन के पास भेजा , वह मुसलमान हुआ और उसने यहूदियों , मजूसियों पर ज़ज़िया आयद किया।

• मक्के और हुनैन की फ़तहा के बाद हज़रत अली (अ.स.) ने कुर्ब व जवार के बुतों को तोड़ा और मिस्मार किया।

(सन् 6 हिजरी)

बनि तमीम की सरकूबी

सन् 6 हिजरी में इस्लामी हुकूमत मुसतहकम हो चुकी थी और पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) उसके सरबराह व फ़रमांरवा तस्लीम किये जा चुके थे। दीगर इस्लामी वाजेबात के साथ मुसलमानं पर ज़कात भी वाजिब क़रार पा चुकी थी और हर मुतमउल मुसलमान वाज़िबउल अदारक़म बैतुल माल में जमा करता था। जो लोग मुसलमान नहीं थे वह भी जज़या देते थे। और यही ख़िराज था जौ पैगम़्बर (स.अ.व.व.) के अहद में रेआया से वसूल किया जाता था चुनानचे आपने उन मुतालेबात की वसूलियाबी के लिये कुछ आमिल मुक़र्रर फ़रमाये और एक आमिल को क़बीला बनि काब की तरफ़ भी रवाना किया। मगर क़बीला बनी तमीम के कहने सुनने और बरगलाने भड़काने से बनि काब के लोग मुसलमान और मुतवौल्लम होने के बावजूद ज़कात की अदायेगी से मुन्हरिफ़ हो गये। और नौबत यहां तक पहुँची कि आमिल को अपनी जान बचाकर वहां से भागना पड़ा वह मदीने आया और आन हज़रत (स.अ.व.व.) की ख़दिमत में बारयाब होकर उसने आपको तमाम हालात से मुत्तेला किया। हुज़ूरे अकरम (स.अ.व.व.) ने अय्यना बिन हसन अन्फ़रारी की क़यादत में पचास मुसल्लह सवारों का एक दस्ता मुख़ालेफ़ीन की सरकूबी के लिये रवाना किया मगर जंग की नौबत नहीं आई और वह लोग भाग निकले अलबत्ता कुछ क़ैदी हाथ आये जिन्हें अय्यना ने आन हज़रत (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में हाज़िर किया। अभी कोई सज़ा तजवीज़ न हो पाई थी कि बनि तमीम के कुछ सरदार आये और माफ़ी तलाफ़ी के बाद उन्हें छोड़कर ले गये।

सरया वादी-उल-रमल

वादीउल रमल में जमा होकर कुछ शरपसन्दों ने मदीने पर शबख़ून मारने का मन्सूबा तैयार किया लेकिन वह अभी मुनासिब मौक़े की तलाश ही में थे कि किसी के ज़रिये पैग़म्बर (स.अ.व.व.) को इसकी इत्तेला हो गई. यह लोग मुनज्ज़म और बाक़ायदा फौज़ की सूरत में न थे बल्कि रहज़नों और क़ज्ज़ाकों का एक जत्था ता जो लूट मार और क़त्ल व ग़ारत गारी की ग़र्ज से रमल के मुक़ाम पर जमा हो गया था। आन हज़रत सल 0 ने उन्हें मुन्तशिर व मुतफ़र्रिक़ करने के लिये हज़रत अबुबकर की क़यादत में एक फ़ौजी दस्ता रवाना किया। चुनानचे जब ये लोग वहां पहुँचे तो वह इधर उधर छुप गये। मुसलमान यह समझे कि वह उन्हें देखकर फ़रार हो गये हैं लेहाज़ा रात बसर करने के लिये वहीं उतर पड़े और बेखटके आराम से सो गये। जब निस्फ़ शब गुज़री तो दुश्मनों ने कमिनगाहों से निकल कर अचानक हमला कर दिया जिससे मुसलमानों में सर सररासीमगी फैल गई वह हड़बड़ा कर उठे , हथियार टटोले और फिर संभलकर कुछ देर लड़े मगर नतीजे में कुछ मारे गये , कुछ ज़ख्मी हुए और कुछ भाग खड़े हुए। हज़रत अबुबकर की इस शिकस्त व हज़ीमत के बाद आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने हज़रत उमर को दुश्मनों की सरकूबी पर मामूर किया। यह अब एक दस्ता फौज़ लेकर गये मगर दुश्मनों के हौसले बढ़े हुए थे जब उन्होंने इस इस्लामी दस्ते को आते देखा तो दाहने बायें से यकबारगी टूट पड़े और इस तरह ताबड़ तोड़ हमले किये कि मुसलमानों के क़दम जम न सके चुनानचे सबसे पहले सिपहसालार दस्ता हज़रत उमर ने राहे फ़रार इख़तेयार की उनके पीछे दस्ता भागा और उन लोगों ने सीधे मदीने में आकर दम लिया।

उन दिनों हज़ीमतों के बाद आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने हज़रत अली को सिपेहसालार की हैसियत से भेजा और उन शिकस्त ख़ुरदा लोगों को भी उनके साथ जाने का हुक्म दिया। हज़रत अली (अ.स.) जब रवाना हुए तो आपने दो मुख़तलिफ़ तदबीरों इख़तियार की अव्वल ये कि आपने वह रास्ता बदल दिया जिस रास्ते से हज़रत अबुबकर व हज़रत उमर वग़ैरा गये थे दूसरे यह कि आपने दिन में आराम किया और रात में सफ़र किया यहां तक कि ख़ामोशी से आगे बढ़ते हुए दुश्मनों के सरों पर पहुँच गये और अभी सूरज की किरनों ने पहाड़ों को छुवा भी न था कि उनके सरों पर तलवारें चमकने लगीं। वह लोग इस नागहानी हमले की ताब न ला सकें ग़र्ज़ कि कुछ मारे गये और कुछ भाग निकले। और मुसलमान फ़तहा व कामरानी का परचम लहराते हुए मदीने की तरफ़ पलट पड़े।

सरया बनि तय

फ़तहे मक्का के बाद ख़ान-ए-काबा से बुतों का सफ़ाया हो चुका था। नज़वा ताएफ़ के दौरान बनि सक़ीफ़ व बनि हवाज़िन के बुत तोड़े जा चुके थे और मुख़तलिफ़ क़बीलों और इलाक़ों में सनम कदे वीरान हो चुके थे मगर बनि तय का बुतख़ाना अबी ज्यों का त्यों बाक़ी था जिसमें फ़लस नाम का एक बुत उनकी अक़ीदत व इरादत का मरकज़ था। पैग़म्बरे अकरम (स.अ.व.व.) ने उसे भी मुन्हदिम करने का इरादा किया और रबीउल आख़िर 26 हिजरी में हज़रत अली (अ.स.) को बनी तय की बस्तियों की तरफ भेजा ताकि वह उनके बुतखानों को मिसमार करें और सनम परस्ती की ज़ंजीरों में जकड़े हुए इन्सानों को वहदउ लाशरीक की परस्तिश की तरफ़ माएल करें।

हज़रत अली (अ.स.) ने डेढ़ सौ अन्सार की जमीअत के साथ बनि तय की बस्तियों का रूख किया। बनि तय का सरदार अदी इब्ने हातिम लश्करे इस्लाम की आमद पर अपने अहल व अयाल को लेकर शाम की तरफ़ निकल गया और वहां उसने पनाह ले ली। हज़रत अली (अ.स.) ने मुहल्ला आले हातिम पर हमला करके उनके बुतख़ाने को मिसमार कर दिया। जिससे तीन क़ीमती ज़िरहें और तीन तलवारें रसूब , मुख़ज़ूम और यमानी दस्तयाब हुयीं। यह अरब की मशहूर तलवारें थी जिन्हें हारिस इब्ने अबी शिमर ने बुतख़ाने की नज़र किया था। उसके अलावा बहुत सा माले ग़नीमत चन्द क़ैदी और भेड़ बकरियं के गल्ले मुसलमानों के हाथ लगे। हज़रत अली (अ.स.) ने ग़नीमत और असीरों को लेकर पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में हाज़िर हुए। उन असीरों में हातिम की बेटी सफ़ाना भी थी जिसे मस्जिद से मुत्तासिल एक जगह जहां कनीज़ें ठहराई जाती थी ठहराया गया। उन्हीं अय्याम में पैग़म्बर (स.अ.व.व.)उधऱ से हो के गुज़रे तो उसने कहा , यहा रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) ! मेरा बाप मर चुका है और कोई पुरसाने हाल नहीं है , मुझपर एहसान कीजिये और मुझे छोड़ दीजिये। फ़रमाया तुम कौन हो ? कहा मैं अदी इब्ने हातिम की बहन सफ़ाना हूँ। फ़रमाया वही अदी जो अल्लाह और रसूल (स.अ.व.व.) से मुँह मोड़कर चला गया है और यह कह कर आप आगे बढ़ गये। दूसरे दिन फिर गुज़र हुआ तो उसने फिर रेहाई की इलतेजा की आपने वही जवाब दिया जो दे चुके थे और आगे निकल गये। सफ़ाना कहती हैं कि अब रेहाई से न उम्मीदी हो गई। तीसरे दिन जब रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) उधर से गुज़रने लगे तो मुझे कुछ कहने की हिम्मत न हुई क्योंकि दो दफ़ा मेरी इलतेजा ठुकराई जा चुकी थी। मैं अभी सोच ही रही थी कि कुछ अर्ज़ करूं या ख़ामोश रहूं कि आन हज़रत (स.अ.व.व.)ने अक़ब से एक शख़्स ने मुझे इशारा किया कि मैं उनसे रेहाई के बारे में फिर कहूँ! मेरी हिम्मत बन्धी और मैंने अर्ज़ किया कि या रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) मुझे मेरी क़ौम में रूसवा न कीजिये मैं बनि तय के सरदार हातिम की बेटी हूँ मेरा बाप फ़य्याज़ और सख़ी था। फ़रमाया इसे आज़ाद कर दिया जाये यह उस बाप की बेट है जो करीमुल नफ़्स और बुलन्द इख़लाक़ का मालिक था। फिर सवाना की तरफ़ मुतावज्जे हुए और फ़रमाया , तुम चन्द दिन सबर करो जब क़ाबिले एतमाद लोग मिल जायेंगे तो तुम्हें उनके साथ ब-हिफाज़त तुम्हारे अजीज़ों तक पहुंचा दिया जायेगा। सफ़ाना कहती है कि मैंने लोगों से दरयाफ़्त किया कि वह कौन था जिसने मुझसे इशारे से कहा था कि मैं पैग़म्बर (स.अ.व.व.) से रेहाई कि फिर दरख़्वास्त करूं तो मुझे बताया गया था कि वह रसूल उल्लाह के इब्ने अम हज़रत अली (अ.स.) इब्ने अबीतालिब (अ.स.) थे। चन्द दिनों के बाद बनि क़ज़ाआ का एक क़ाफ़िला मदीने आया सफ़ाना ने पैगम्बर (स.अ.व.व.) से अर्ज़ किया कि मुझे उसके साथ जाने की इजाज़त दी जाये पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने उसके ज़ाद राह का इन्तेज़ाम किया और उन लोगों के साथ रवाना कर दिया।

सफ़ाना जब वहां पहुँची तो उसने अपने भाई अदी से सारा वाक़िया ब्यान किया और ये मशविरा दिया कि वह भी इस्लाम कुबूल करे चुनानचे यह मदीने आये और पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में हाज़िर होकर इस्लाम से मुशर्रफ़ हुए और वह कभी हज़रत अली (अ.स.) के असहाब मुख़लिसिन में शामिल होकर जमाल व सिफ़्फ़ीन और नहरवान के मारकों में आपके हमरेकाब रहा।

ग़ज़वा तबूक

शाम के तिजारती क़ाफ़िले के ज़रिये मदीने में यह ख़बर फैली की क़ैसरे रोम (हक़ुल) अपनी फ़ौजों के साथ मुसलमानों पर हमला आवर होने के लिये आगे बढ़ रहा है और तमाम ईसाई क़बाएल , बनि ग़सान बनि लहम औऐर बनि आमला वग़ैरा उसके परचम के नीचे जमा हो गये हैं। पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) ने इत्तेलात की बिना पर मुक़ाबिले की तैयारियां शुरू कर दीं और मुसलमानों को हुक्म दिया कि वह दुश्मनों की पेश क़दमी को रोकने के लिये तैयार हो जायें।

अब तक मुसलमानों ने जितनी भी लड़ाइयां लड़ी थी वह उन्हीं के मुल्क तक महदूद थी किसी बाहरी मुल्क से सफ़आराई की नौबत नहीं आयी थी चुनाचे यह पहला मौक़ा था कि यह जंग मुल्क के बाहर और उस दौर की सबसे बड़ी हुकूमत से मुतावक़्के थी जिसके फ़तुहात का सिलसिला बिलाद फ़रस तक फैला हुआ था।

मुसलमानों ने जब पैग़म्बर (स.अ.व.व.) का हुक्म सुना तो जोश व ख़रोश के बजाये वह सुस्ती व बददिलों का मुज़ाहेरा करने लगे। इस बददिली की एक वजह ये भी थी कि कुछ अर्से से ख़ुश्क साली के बाअस पैदावार कम हो रही थी लेकिन इस साह हर वक़्त और ज़रूरी मिक़दार में बारिश हो जाने की वजह से फ़सल अच्छी और तैयार खड़ी थी इसलिये वह उसे छोड़ कर जाना नहीं चाहते थे और दूसरी वजह यह थी कि इन्तेहाई शिद्दत की गर्मी पड़ रही थी , दूर का सफ़र था और सवारियों की क़िल्लत , लेहाज़ा उन सब्र आज़म हालात में मुसलमान हिम्मत हार कर जंग से बचने के लिये हीले बहाने करने लगे। उनके बारे में कुरान का इऱशाद है किः-

ऐ ईमान वालों! तुम्हें क्या हो गया है कि जब तुमसे कहा जाता है कि ख़ुदा की राह में जेहाद के लिये निकलो तो तुम्हारे पाओं ज़मीन में गड़ जाते हैं। क्या तुम आख़ेरत के बजाये दुनिया की चन्द रोज़ा जि़न्दगी को पसन्द करते हो ? याद रखो कि दुनियावी जि़न्दगी का साज़ व सामान आख़ेरत के मुक़ाबिले में बहुत थोड़ा है।) (सूरा तौबा आयत 38)

जब तहदीदी आयतों के ज़रिये मुसलमानों पर दबाओं पड़ा और उन्हें क़दम आगे बढ़ाये बग़ैर कोई चारा कार नज़र न आया तो वह मारे मदीने व इतराफ़े मदीने से माली व फ़ौज़ी कुमक हासिल करके तीस हज़ार का लश्कर तरतीब दिया और माहे रजब सन् 6 हिजरी में मदीने से निकल पड़े और सनयतुल विदा मे पहला पड़ाव डाला। अब्दुल्लाह इब्ने अबी भी अपने गिरोह को लेकर सनयतुल विदा के नशेबी इलाक़े में ख़ेमा ज़न हुआ मगर जब रसूल उल्लाह सब लश्कर लेकर आगे बढ़े तो वह अपनी जमात समेत वापस आ गया।

मुसलमानों की इस अज़ीम अकसरियत के चले जाने के बाद उन मुनाफ़ेकीन से जो मदीने में रह गये थे या रासते से पलट आये थे वह अन्देशा था कि अगर लश्करे इस्लाम को शिकस्त हुई या सफ़र की मुद्दत तवील हुई तो वह आन हज़रत (स.अ.व.व.) का घर बार लूट लेंगे और उनके अहल व अय़ाल को शहर से बाहर निकाल देंगे। चुनानचे इस सूरते हाल के पेशे नज़र तदबीर और दूर अन्देशी का तक़ज़ा ये था कि मदीने के अन्दर एक ऐसे शख़्स को निगरां के तौर पर छोड़ा जाये जो बहादुर , बे ख़ौफ़ और दुश्मनों के अज़ाएम को कुचलने पर क़ादिर हो। इसी ज़रूरत की बिना पर पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) ने हज़रत अली (अ.स.) इब्ने अबीतालिब (अ.स.) को अपना नायब और क़ायम मुक़ाम बनाकर मदीने में छोड़ा ताकि कुफ्र व निफ़ाक़ की तागूती ताक़तों को सर उठाने का मौक़ा न मिल सके और अगर कुछ फ़ितना दिया जाये। मदीने में मुनाफ़ेकीन को हज़रत अली (अ.स.) की यह मौजूदगी बुरी तरह ख़ली और जब उनका कोई बस न चल सका तो वह कहने लगे कि पैग़म्बर (स.अ.व.व.) उन्हें बार ख़ातिर समझ कर अपना बोझ हलका करने के लिये यहाँ छोड़ गये हैं। 1

हज़रत अली (अ.स.) ने मुनाफ़ेकीन की ज़बान से जब इस क़िस्म की तन्जिया बातें सुनी तो आपकी ग़ैरत उसे बर्दाश्त न कर सकी। हथियार लगाये और लश्कर के पीछे चल दिये और मदीने से कुछ फ़ासले पर जरफ़ नामी एक मुक़ाम पर पैगम़्बर (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में हाज़िर हुए। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने पूछा ऐ अली (अ.स.) कैसे आये ? अर्ज़ किया! या रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) ! मीदने के कुछ मुनाफ़िक ये कहते हैं कि आपने बरे ख़ातिर समझ कर मुझे वहां छोड़ा है। आपने फ़रमाया वह झूट बोलते हैं , मैंने तु्म्हें मीदने में इसलिये छोडा है कि वहां की हालत मेरे या तुम्हारे रहने ही से दुरुस्त रह सकती है। 2 और तुम ही मेरे अहलेबैत और मेरी उम्मत में मेरे जॉनशीन और क़ायम मुक़ाम हो। और क्या तुम इस पर राज़ी नहीं हो कि तुम्हें मुझसे वही निसबत है जो हारून को मूसा (अ.स.) से थी , यह और बात है कि मेरे बाद कोई नबी नहीं होगा। 3

हज़रत अली (अ.स.) यह नवेद मसर्रत सुनकर खुश खुश मदीने वापस आ गये और लश्करे इस्लाम शाम की तरफ़ कूच कर गया। जब यह लश्कर तबूक के मुक़ाम पर पहुँचा और वहां ख़ेमा ज़न हुआ तो दुश्मनों की तलाश शुरू हुई मगर दूर दूर तक तो रूमी फौज़ें नज़र आई और न ही ऐसे आसार दिखाई दिये जिनसे दुश्मन के जंगी अज़ाएम का पता चलता। आन हज़रत बीस दिन तक वहां क़याम फ़रमा रहे मगर किसी तरफ़ से दुश्मन की नक़ल व हरकत की कोई ख़बर सुनाई न दी और शामी तिजारती क़ाफिले की फैलाई हुई अफ़वाह ग़लत साबित हुई।

बीस दिन तक वहां अपने क़याम के दौरान आन हज़रत (स.अ.व.व.) इत्तराप व जवानिब के सरदारों के पास वफूद भेजे कि वह इसलाम कुबूल करें या जज़िया देकर इस्लामी रेआया में शामिल हों चुनानचे ईला का सरदार योहना इब्ने रूबा हाजिर हुआ और उसने तीन सौ दीनार जज़िया पर मुसालेहत कर ली इसी तरह जरबा इज़रा और मक़ना के ईसाइयों ने भी जज़िया के एवज़ पैगम़्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) से अमान हासिल कर ली।थ जब आन हज़रत (स.अ.व.व.) दुश्मनों की तरफ़ से मुतमईन हो गये तो आपन मराजेअत का हुक्म सादिर फ़रमाया और लश्कर मदीने की तरफ़ पलट पड़ा।

वाक़िया उक़बा

यह इस्लामी तारीख़ का वह शर्मनाक और इबतर अंगेज़ अलमिया है जो पैगम़्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) के क़त्ल की साजिश पर मबनी है। इसका अलमनाक पहलू है कि गज़वा तबूक की वापसी पर पैगम़्बर (स.अ.व.व.) की सवारी को। ज़ी फ़तक नामी पहाड़ की एक ख़तरनाक खाई से गुज़रना था चुनानचे लश्कर में यह ऐलान कर दिया गया कि जब तक आन हज़रत (स.अ.व.व.) का नाक़ा बाख़ैरियत गुज़र न जाये कोई शख़्स खाई में कदम न रखे। कुछ लोगों ने मन्सूबा बनाया कि पैगम़्बर (स.अ.व.व.) के नाक़े को भड़का दिया जाये। जब वह भड़क कर किसी गहरी खड़ में गिरेगा तो खुद बख़ुद उनका काम तमाम हो जायेगा।

रात तारीक थी , हुजूरे अकरम (स.अ.व.व.) का नाक़ा तन्ग रास्तों की ढलानों से आहिस्ता आहिस्ता उतर रहा था कि अचानक बिजली चमकी जिसकी रौशनी में बाराह सवार दिखाई दिये जो पने चेहरों की नक़ाबों में छिपाये आन हज़रत (स.अ.व.व.) की तरफ़ तेज़ी से बढ़ रहे थे। हुज़ूरे अकरम (स.अ.व.व.) ने उन्हें डांट कर भगाया फिर आपने नाक़े की मोहर थाम हुए हुज़ैफ़ा यमानी नीज़ नाक़े को हांकने हुए अम्मार यासीर को उनके नामों से आगाह किया और उसके साथ ही यह ताकीद भी फ़रमा दी कि उन मुनाफ़ेक़ीन के नामों को पोशीदा रखना वरना उम्मत में फ़ितना फ़साद का अन्देशा है। मगर इस ताक़ीद के बावजूद उन लोगों के नाम परदये ख़फ़ा में न रह सके और मौक़े व मौक़े ज़ाहिर होते रहे चुनानचे एक मर्तबा इमाम हसन (अ.स.) ने माविया से फ़रमाया (क्या तुझे वह दिन याद नहीं कि जो बारह आदमी रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) के नाक़े को भड़काने के लिये खाई में जमा हुए थे उनमें तेरा बाप अबुसुफ़ियान भी था। 1

सरकारे दो आलम (स.अ.व.व.) की रेहालत के बाद हज़रत उमर भी हुज़ैफ़ासे बार बार पूछा करते थे कि ऐ हुज़ैफा! क्या उन साज़िशियों में मेरा भी नाम शामिल है ? हज़रत उमर के इस इस्तेफ़सार पर हुज़ैफा ख़ामोश रहते आख़िर कार एक दिन ज़हनी कचोंको और दिली टहोकों से मजबूर होकर हज़रत उमर ने भी यह एतराफ़ कर लिया कि (या हुज़ैफ़ा बिल्लाहे अनामिनल मुनाफ़ेकीना) ऐ हुजैफ़ा ख़ुदा की क़सम मैं भी मुनाफ़ेकीन मे।

मस्जिद ज़रार का इन्हेदाम।

क़बीला ख़िज़रिज़ का अबूआमिर नामी एक शख़्स जो तौरैत व इन्जील का आलिम था मदीने में रहा करता था और वह बराबर लोगों से आन हज़रत (स.अ.व.व.) की तारीफ़ करता और औसाफ़ व मुहासिन ब्यान किया करता था मगर जब आप मक्के से हिजरत करके मदीने में सकुनत पज़ीर हुए और लोग आपकी तरफ़ मुतावज्जे होने लगे तो वह रशक व हसद की आग में जलने लगा और आन हज़रत (स.अ.व.व.) का दुश्मन हो गया यहां तक कि जंगे बदर के बाद वह मदीने से भाग कर कुफ़्फ़ारे मक्का से जा मिला और उन्हीं की तरफ़ से ओहद की जंग में शरीक हुआ और सबसे पहले लश्करे इस्लाम पर उसी ने तीर मारा उसके बाद जंगे हुनैन में भी शरीक रहा और जब कुछ न बन बड़ा तो बादशाहे रोम हरकुल के हशिया बदारों में शामिल हो गया और वहां से उसने मुनाफ़ेक़ों को लिखा कि मस्जिदे कबा के पास तुम लोग मस्जिद बनाओ ताकि जिस वक़्त में मदीने में आऊँ तो दरस व तदरीस में मशगूल हो जाऊँ मगर हक़ीक़तन उसकी ग़र्ज़ तामीर कुछ और ही थी चुनानचे सालेबा बिन हातिब वग़ैरा बाराह मुनाफ़ेकों ने एक मस्जिद तैयार की और जब हज़रत रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व.) तबूक की मुहिम पर जाने लगे तो उन मुनाफ़ेकों ने आपसे उस मस्जिद में नमाज़ पढ़ने की ख़्वाहिश ज़ाहिर की ताकि उसकी हैसियत मुसलमानों की नज़र में क़ाबिले एहतराम बन जाये। आपने तबूक की वापसी पर उस मस्जिद में नमाज़ पढ़ने का वादा फ़रमाया और ख़ातमये मुहिम पर जब वापसी अमल में आई तो हस्बे वादा आपने उस में नमाज़ पढ़ने का क़सद किया ही था कि परवरिदगार का हुक्म हुआ कि ऐ रसूल (स.अ.व.व.) ! इस मस्जिद में नमाज़ न पढ़ना बल्कि इसके क़रीब भी न जाना , इसे मिस्मार करके उसकी जह मज़बला बनवा दो क्योंकि इसकी तामीर में इबादत का जज़बा शामिल नहीं है। हुक्म की तामील हुई और वह मस्जिद ढ़ा दी गई और वहां मज़बला क़ायम कर दिया गया। आम तौर पर मोअर्रिख़ीन और मुफ़स्सेरीन का ख़्याल यह है कि मुनाफ़ेकीन ने इस मस्जिद को इस्लाम के ख़िलाफ़ साज़िशों का मसकन और क़िला बनाने की ग़र्ज़ से तामीर किया था।

वाक़िया ईला

पैग़म्बर इस्लाम (स.अ.व.व.) ने उम्मुल मोमेनीन हज़रत खदीज़तुल कुबरा की हयात में कोई दूसरा अक़द नहीं फ़रमाया अलबत्ता उनकी वफ़ात के बपाद एक के बाद दीगर उन्नीस औरतें आपकी ज़िन्दगी में दाख़िल हुई जिसमें मारिया किब्तिया और रेहाना कनीज़ें थीं और उम्मे शरीक व उम्मे सुहैल ने अपना नफ़्स आपको हिबा कर दिया था। उन चार औरतों के अलावा उम्मे सलमा , मैमूना , सौदा , ज़ैनब बिन्ते हजश , जवेरिया , उम्मे हबीबा , आयशा , हफ़सा , ज़ैनब बिन्ते हज़ीमा , ज़ैनब बिन्ते उमैस , खूला और मसनारा वग़ैरा से आपने अक़द किया था। उन औरतों में अव्वलिल ज़िक्र दोनों औरतों हज़रत ख़दीजा के बाद तमाम अज़वाज़ में सबसे अफ़ज़ल थी और आख़ेरूल ज़िक्र दोनों औरतें आन हज़रत (स.अ.व.व.) की सोहबत से फैज़याब न हो सकीं।

पैग़म्बरे अकरम (स.अ.व.व.) ने हर बीबी के लिये अलग अलग हुजरे बनवाये थे और सब की बारी के दिन मुक़र्रर कर दिये थे। आपके मामूल था कि हर एक के पास एक एक रात बसर करते थे मगर रोज़ाना सुबहा को थोड़ी थोड़ी देर के लिये हर एक के पास हो लेते थे।

रोम के बादशाह मकूक़िश ने मारया क़िब्तिया को तोहफ़े में कनीज़ की हैसियत से आन हज़रत (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में पेश किया था चुनानचे जब वह वारिदे मदीना हुई तो पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने तमाम अज़वाज से अलग अबुअय्यूब अन्सारी के घर में उन्हें उतारा जहां ख़ुद आपने हिजरत के बाद सबसे पहले क्याम फ़रमाया था। मारिया की इताअत , फ़रमां बर्दारी ख़िदमात , हुस्ने इक़लाक़ और हुस्ने सलूक की वजह से आन हज़रत (स.अ.व.व.) का इलतेफ़ात उनकी तरफ़ से ज़्यादा था इसलिये आयशा और हफ़सा जो हज़रत उमर की बेटियां थीं मरारिया की तरफ़ से अपने अपने दिलों मे नफ़रत , अदावत , बुग़ज़ और रशक व हसद रखती थीं और आन हज़रत (स.अ.व.व.) का वहां आना जाना उस पर बेहद शाक़ गुज़रता था।

एक मर्तबा आन हज़रत (स.अ.व.व.) के पास कहीं से शहद आया आपने उसे मारिया के सुपुर्द कर दिया और जब वहां तशरीफ ले जाते तो थोड़ी देर तक ठहर कर शहद नोश फ़रमाते और मारिया से बातें करते। आयशा और हफसा को जब आपकी शहद नोशी का हाल मालूम हुआ तो दोनोंम ने बाहम मशविरा करके यह मनसूबा बनाया कि आन हज़रत (स.अ.व.व.) की शहद नोशी ख़तम की जाये ताकि आपका वहां जाना छूटे। चुनानचे एक दिन मारिया के घर से शहद नोशी के बाद जब आप आयशा के याहं तशरीफ़ लाये तो उन्होंने आपरकी नाक बन्द की। आप सख़्त मुतअज्जिब हुए और फ़रमाया कि मैने तो सिर्फ शहद पिया है! कहा , फिर शहद की मक्खियों ने मग़ाफ़ीर के फूल चूसे होंगे। उसके बाद आप हफ़ास के यहां गये तो उन्होंने भी यही हरक तकी और आन हज़रत (स.अ.व.व.) लसे लड़ने झगड़ने लगीं। आपने फ़रमाया , अच्छा मैं आज से वह शहद नहीं पियूंगी। मगर यह मारिया को न मालूम हो वरना उसकी ख़ातिर शिकनी होगी। हफ़सा अपनी हमराज़ हज़रत आयशा से कब यह बात छिपाने वाली थीं , जैसी ही आन हज़रत तशरीफ ले गये फ़ौरन उठीं और जा कर हज़रत आयशा से सब कुछ जड़ दिया और यह मुज़दा सुनाया कि आज से पैग़म्बर (स.अ.व.व.) का शहद के बहाने मारिया के यहां जाना छूटा।

इस वाक़िये के दो ही चार दिन बाद एक दूसरा वाक़िया ज़ूबहर पजीर हुआ और वह यह कि जनाबे हफ़सा अपनी बारी के दिन अपने मैके चलीं गयीं आन हज़रत (स.अ.व.व.) तमाम ज़रूरी अमूर से फ़ारिग़ हो कर रात में जब हफ़ासा के घर आये तो आपने वही आराम फ़रमाया और मारियो को अपनी ख़िदमत में तलब कर लिया। हफ़सा दूसरे दिन जब पलट कर आयी तो आयशा की ज़बानी उन्हें पैगम़्बर (स.अ.व.व.) और मारिया के इस्तराहात का हाल मालूम हुआ। फिर क्या था ? वह आन हज़रत (स.अ.व.व.) पर चढ़ दौडी और थिरक धिरक गुस्ताख़ाना लहजे में कहने लगीं कि आपने मेरी इज्ज़त व हुरतमत का भी ख़्याल न किया और एक कनीज़ को मेरे बराबर कर दिया। गज़ब ख़ुदा का मेरा ही घर , मेरा ही बिस्तर मेरी ही बारी और वह कनीज़! ग़र्ज़ की आपने ऐसा हंगामा बरपा किया कि आन हज़रत (स.अ.व.व.) को यह कहना पड़ा कि मै आइन्दा मारिया की तरफ़ से मोहतात रहूँगा मगर तुम इस राज़ को किसी पर ज़ाहिर न करना। यह कहकर पैग़मबर (स.अ.व.व.) घर से बाहर निकले उधऱ आप आयशा के घर पहुँचे और उनसे सारा हाल ब्यान कर दिया कि आज मैंने यह कारे नुमाया अन्जाम दिया है।

हज़रत हफ़सा की इस हरकत से आन हज़रत (स.अ.व.व.) को इस क़दर दिली सदमा पहुँचा कि आपने उन्हें तलाक दे दी और उन्तीस दिन तक जौजा के क़रीब नहीं गये यहां तक कि साहाब में यह ख़बर मशहूर हो गयी कि हुज़ूरे अकरम (स.अ.व.व.) ने तमाम अज़वाज को तलाक़ दे दी। 1 कुरान मजीद में सूरये तहरीम का नूज़ुल उन्हीं वाक़ियात का नतीजा है 2।


तबलीग़े सूरये बरात

मरासिमे हज में कुफ़्फ़ारे मुश्रेकीन के दरमियान उरयां तवाफ़ की ग़ैर मज़हबी व ग़ैर शाइस्ता भी जारी थी जिसका इन्सदाद ज़रुरी था। रसूले अकरम (स.अ.व.व.) ने अब तक उन्हें तवाफ़ और दूसरे अरकाने हज की बजा आवरी से मना नहीं किया मगर जब सूरये बारात की इब्तेदाई आयतें कुफ़्फ़ारे मुश्रेकीन से इज़हारे बेज़ारी के सिलसिले में नाज़िल हुई तो हुक्म ख़ुदा वन्दी के तहत उन्हें रोकना ज़रुरी हो गया। चुनानचे तीसर ज़िलहिज सन् 6 हिजरी को पैगम़्बर (स.अ.व.व.) ने हज़रत अबुबकर को अमीरे हज बना कर उस काम पर मामूर किया कि वह हज के मौक़े पर सूरये बरात की तबलीग़ भी करें।

हज़रत अबुबकर कुर्बानी के बीस ऊँटों के साथ तीन सौ हाजियों का एक क़ाफिला लेकर मदीने से रवाना हुये। अभी रास्ते ही में थे कि आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने हज़रत अली (अ.स.) इब्ने अबीतालिब (अ.स.) को तलब फ़रमाया और उन्हें हुक्म दिया कि तुम मेरे रफ़्तार नाक़े ग़ज़बा पर जाओ और अबुबकर से सूरये बरात की आयतें लेकर इस कार तबलीग़ को अन्जाम दो क्योंकि ख़ुदा का हुक्म है कि इस काम को मैं ख़ुद अन्जाम दूँ या वह शख़्स जो मेरे अहलेबैत में से हों। हज़रत अली (अ.स.) इस हुक्मे पैग़म्बर (स.अ.व.व.) के तहत तेज़ी के साथ मदीने से मक्के की तरफ़ रवाना हुए और मुक़ामे अरज पर अबुबकर से जा मिले। और उनसे सूरये बरात की वह आयतें लेकर उन्हें वापस भेज दिया। इब्ने असीर का कहना है किः-

(पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने हज़रत अबुबकर को सूरये बरात दे कर भेजा फिर रास्ते से उन्हें वापस बुला लिया और फ़रमाया कि इसकी तबलीग़ के लिये वह शख़्स मुनासिब है जो मेरे घर वालों से हो।)

तबरी का बयान है किः-

(रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) ने अबुबकर को सूरये बरात की आयतें देकर भेजा और उन्हें अमीरे हज मुक़र्रर किया जब वह वादी ज़िल हलीफ़ा में मस्जिदे शजरा तक पहुँचे तो उनके पीछे हज़रत अली (अ.स.) को रवाना किया जिन्होंने आयतें उनसे ले लीं। अबुबकर पैग़म्बर (स.अ.व.व.) के पास वापस चले आये और कहा या रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) क्या मेरे बारे में कुछ नाज़िल हुआ है ? आपने फ़रमाया उन आयतों की तबलीग़ मुझसे मुतालिक़ हैं या उससे जो मेरे अहले बैत में से हों। 2

शाह वली उल्लाह मोहद्दिस रक़म तराज़ हैं कि शैख़ीन में अबुबकर के साथ हज़रत उमर भी थे मगर दोनों ही माज़ूल किये गये। 3 और ख़ुद हज़रत अबुबकर का ब्यान है कि रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) ने मुझे सूरये बरात दे कर रवाना किया था कि मैं हज के मौक़े पर यह ऐलान करूं कि इस साल के बाद कोई काफ़िर व मुश्रिक ख़ान-ए-काबा का बरहैना तवाफ़ न करे , जन्नत में सिर्फ़ मोमिन ही जायेगा और अगर रसूले अकरम (स.अ.व.व.) से किसी का कोई मुहायिदा है तो वह वक़्त मुक़र्रर तक ही रहेगा आइन्दा कोई तीसीय न होगी और ख़ुदा और उसका रसूल (स.अ.व.व.) मुश्रेकीन से बुरी उज़-ज़िम्मा है। अभी मैंने सिर्फ तीन दिन की मुसाफ़त तय की थी रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) ने एक ते़ नाक़े पर हज़रत अली (अ.स.) को मेरी तरफ़ भेजा और उन्हें ताकीद की कि वह मुझसे सूरये बरात लेकर उसकी तबलीग़ ख़ुद करें। चनानचे अली (अ.स.) ने वही किया जो हुक्मे पैग़म्बर (स.अ.व.व.) था और मैं मायूसी की हालत में मदीने वापस आ गया और जब पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में हाज़िर हुआ तो नाकामी व नामुरादी के एहसास ने मुझ पर गिरया तारी कर दिया जब दिल कुछ ठहरा तो मैंने रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) से पूछा कि क्या मेरे मुतालिक़ कोई ख़ास बात रूनुमा होई है। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने फ़रमाया कि ख़ुदा ने मुझे हुक़्म दिया था कि सूरये बारात की तबलीग़ में ख़ुद करूँ या वह शख़्स करे जो मेरी आल में शामिल हो। 4

हज़रत अली इब्ने अबीतालिब (अ.स.) ने मक्के में पहुँच कर अरफ़ात मशअरूल हराम और मिना में खड़े होकर उन आयतों की तिलावत की और ऐलान फ़रमाया जिन मुशरेकीन ने बद अहदी की है उनसे किये हुए मुहायिदे चार माह के बाद ख़त्म हो जायेंगे और कोई काफ़िर व मुश्रिक ईमान लाये बग़ैर ख़ान-ए-काबा के हुदूद में आन तवाफ़ करने और हज करने का मजाज़ न होगा लेहाज़ा आइन्दा कोई काफ़िर यहां न आये।

इस ऐलान से कुफ़्फ़ार व मुश्रेकीन की पेशानियों पर बल पड़े मगर किसी को रोकने टोकने की जुराअत न हो सकती बल्कि वह इस्लामी तसल्लुत व इक़तेदारके आगे बेबस होकर इस्लाम की आड़ लेने पर मजबूर हो गये। अल्लामा तबरी का ब्यान है किः-

(मुश्रेकीन एक दूसरे को बुरा भला कहते हुए वापस हुए और कहने लगे कि जब कुरैश मुसलमान हो गये तो तुम्हारे लिये चारा कार ही क्या है चुनानचे वह भी मुसलमान हो गये।)

ये काम इतना आसान न था जितना नज़र आता है। मुश्रेकीन से मुहायिदे ख़त्म किये जा रहे थे। हज और मु्स्जिदुल हरम मे दाख़िले से उन्हें रोका जा रहा था इस सूरत में मुम्किन था कि वह वग़ावत और सरकशी पर उतर आते। उन्हीं ख़तरात के पेशे नज़र पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) भी हज़रत अली (अ.स.) की तरफ़ से मुताफ़क्किर और उनकी वापसी के लिये बेचैनी से मुन्तज़िर थे। जब हज़रत अबुज़र ने आमद की इत्तेला दी तो फिक्र व परेशानी दूर हुई। ख़ुशी से चेहरा खिल उठा। आपने सहाबा के मजमे के साथ शहर से बाहर निकल कर हज़रत अली (अ.स.) का इस्तेक़बाल किया और अपने साथ लेकर मदीने में दाख़िल हुए।

इस मौक़े पर हज़रत अबुबकर की माज़ूली और हज़रत अली (अ.स.) की तक़र्रुरी पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की जाती राये का नतीजा न थी बल्कि वहीये इलाही के तहत थी और कुदरत का कोई काम मसलहत और हिकमत से खाली तसव्वुर नहीं किया जा सकता। इसमें भी यह मसलहत कार फ़रमां रही होगी कि काम और काम के अन्जाम देने वाले की अहमियत को नुमायां कर दिया जाये चुनानचे अगर शुरू ही मे अली (अ.स.) को भेज दिया जाता तो काम की अहमियत दब कर रह जाती और कहे वाले यह कह सकते थे कि इस काम को सर अन्जाम देने की सलाहियत हज़रत अली (अ.स.) में भी थी और अबुबकर में भी। मगर एक माज़ूली और दूसरे की तक़र्रुरी और वह भी इस ऐलान के साथ कि यह काम सिर्फ़ नबी या उसके करने का है जो नबी से हो , उस काम की अहमियत नुमायां हो गई और काम की अहमियत से ही काम को अन्जाम देने वाले की अहमियत का अन्दाज़ा होता है।

इस सिलसिले में यह अमर भी ग़ौर तलब है कि जब हज़रत अबुबकर एक जुज़वी अमर की तबलीग़ के लिये सज़वार साबित न हुए तो पैग़म्बर (स.अ.व.व.) के बाद उनकी नियाबत और जॉनशीन के क्यों कर अहल हो सकते हैं ?

अब्दुल्लाह इब्ने अबुमुनाफ़िक़

मुनाफ़ेक़ीन का सरदार अब्दुल्लाह इब्ने अबी जब भी बीमार हुआ तो हामिल ख़ुल्क़े अज़ीम हज़रत रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व.) उसकी अयादत को तशरीफ़ ले गये। उसने कहा आप अपना एक पैरहन मुझे इनायत कर दें ताकि वह मेरे क़फ़्न के काम आये और जब मैं मर जाऊँ तो मेरे जनाज़े पर नमाज़ पढ़ायें। आपने उसकी फ़रमाइश पर पैरहन उसे दे दिया मगर जब वह मर गया और आप नमाज़ पढ़ने के इरादे से खड़े हुए तो जिबरील ने आपका दामन थाम लिया और कहा या रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) ! ख़ुदा का हुक्म है किः-

(इन मुनाफ़ेक़ों में से जो मर जाये तो न कभी किसी पर नमाज़े ज़नाज़ा पढ़ना और न उसकी कब्र पर जा कर खड़े होना। यक़ीनन उन लोगों ने ख़ुदा और उसके रसूल (स.अ.व.व.) के साथ कुफ़्र किया और बदकारी की हालत में मर भी गये) (तौबा आयत 84)

इस आयत के नजूल के बाद पैग़म्बरे अकरम (स.अ.व.व.) ने नमाज़ नहीं पढ़ी। जब कुर्ते के बारे में हज़रत उमर के साथ कुछ लोगों ने एतराज़ किया तो आपने फ़रमाया कि मैं जानता हूँ कि उससे उसको कोई फ़ायदा नहीं पहुँचेगा मगर यह कि उसकी वजह से उसके रिश्तेदार और अहले क़बीला मुसलमान होंगे इसलिये मैंने दे दिया। चुनानचे मुनाफ़ेकीन के साथ आपके रहम व करम का हाल सुनकर क़बीलये ख़िज़रिज के एक हज़ार लोग मुसलमान हो गये।

मुख़तलिफ़ वाक़ियात

• रजब सन् 6 हिजरी में हबश के बादशाह असहमा नजाशी का इन्तेक़ाल हुआ। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने सहाबा की जमात के सात उसकी ग़ायबाना नमाज़े जनाज़ा पढ़ी और फ़रमाया कि वह मुसलमान था।

• माहे शाबान में हज़रत उस्मान बिन अफ़ान की ज़ौजा कुलसूम का इन्तेक़ाल हुआ।

• सन् 6 हिजरी के आख़िर में मुसलमान होने के लिये तहाएफ़ व हदाया के साथ मुख़तलिफ़ मुमालिक से वफूद आना शुरू हुए और यह सिलसिला सन् 10 हिजरी के वक़्त तक जारी रहा।

• शाहाने हमीर और बाशिन्दगाने यमन ने इस्लाम कबूल किया।

• बक़ौल तबरी इस सन् में मुसलमानों पर सदक़ात वाजिब हुए (सन् 10 हिजरी)


अबु आमिर का वाक़िया

अबु आमिर , बदवी , और सहराई क़बीलये आमिर बिन तुफ़ैल का सरदार और एक वजीह व ख़ुबसूरत और आन बान का इन्सान था। अकाज़ 1 के मेल में इस की तरफ़ से यह ऐलान किया जाता था कि जिसके पास बार बरदारी के लिये जानवर न हों , जो शख़्स नंगा भूका हो या जिसे किसी ज़ालिम की तरफ़ से ख़तरा लाहक़ हो वह अबु आमिर के पास आये और उससे राबता क़ायम करे। वह उसे जानवर देगा , खाना खिलायेगा , उसकी सतर पोशी का इन्तेज़ाम करेगा और उसे तहाफुज़ देगा। अपनी इसी फ़य्याज़ी की बदौलत वह मुश्रेकीन के दरमियान बहुत मशहूर और हर दिल अजीज़ हो गया था।

इस्लाम का उरूज और पैगम़्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) का जाहो हमश देख कर वह रशक व हसद में मुबतिला हुआ और अदावत ने उसके दिल में इस तरह सर उठाया कि एक दिन वह अपने चचा अरबद के साथ इस इरादे से आन हज़रत (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में हाज़िर हुआ कि मौक़ा मिले तो उन्हें क़त्ल कर दें 2। मगर जब यह अमर उसके लिये नामुम्किन नज़र आया तो उसने पैगम़्बर (स.अ.व.व.) से कहा आप मुझ से दोस्ती कर लें। फ़रमाया , जब तक तू मुसलमान नहीं होता उस वक़्त तक़ मैं तेरी तरफ़ दोस्ती का हाथ नहीं बढ़ा सकता। अब आमिर ने कहा कि अगर मैं मुसलमान हो जाऊँ तो क्या आप उस पर क़ेनाअत करेंगे कि सहराई अरबों पर मेरी और शहरी लोगों पर आप की हुकूमत रहे ? आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने फ़रमाया , यह मुम्किन नहीं। अब आमिर ने कहा फिर मेरे मुसलमान होने से क्या फ़ायदा ? हुज़ूर (स.अ.व.व.) ने फ़रमाया सारे मुसलमान तेरे भाई हो जायेंगे। उसने कहा , मैं ऐसे भाईयों से बाज़ आया और मुंह बनाकर अपने मसकन की तरफ़ रवाना हुआ मगर रास्ते में उसे ताऊन की बीमारी ने घेरा और वह हलाक हो गया। बाज़ मोअर्रिख़ीन ने इस वाकिये को सन् 6 हिजरी के वाक़ियात में शामिल किया है।

सरया बनि ज़ुबैद

क़बीला बनि मज़जह की एक शाख़ बनि जुबैद का सरदार अम्र बिन मोइद यकरब मदीने आया और पैगम़्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) की ख़दिमत में हाज़िर हुआ। आपने उसे इस्लाम की दावत दी। उसने और उसके क़बीले के आदमियों ने जो उसक साथ थे इस्लाम कुबूल कर लिया। अम्र का बाप माद यकरब दरे जाहेलियत में मारा गया था , उसने आन हज़रत (स.अ.व.व.) से अपने बपाप के क़ातिल से क़सास लेने का इरादा ज़ाहेर किया। हुज़ुरे अकरम (स.अ.व.व.) ने फ़रमाया कि जाहेलियत के खून का क़सास ख़तम किया जा चुका है। उस वक़्त तो वह ख़ामोश रहा मगर वहां से पलट कर बग़ावत व सरकशी पर उतर आया और बनि हारिस इब्ने काम पर हमला करके उन्हें क़त्ल किया और इस्लाम से मुन्हरिफ़ होकर मुस्तरद हो गया।

पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) को जब उसके शर व फ़साद की इत्तेला हुई तो आपने हज़रत अली (अ.स.) को तीन सौ मुसल्लेह अफ़वाज़ के साथ यमन जाने का हुक्म दिया ताकि वह उन शोरिशों को दबायें। मगर उसके साथ ही यह ताक़ीद भी फ़रमा दी कि अगर वह लोग लड़ाई छेड़ें तो लड़ना वरना ख़ुद इब्तेदा न करना।

इस लश्कर के साथ एक लश्कर और आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने ख़ालिद इब्ने वलीद की मातहती में क़बीलये बनि जाफ़ी की तरफ़ रवाना किया और ख़ालिद को हिदायत दी कि अगर किसी मुक़ाम पर दोनों लश्कर यकजां हो जायें तो दुश्मन से जंग छिड़ने की सूरत में दोनों लश्करों के सरदार अली इब्ने अबुतालिब होंगे।

हज़रत अली (अ.स.) ने फ़ौज के अगले हिस्से का सरदार ख़ालिद इब्ने सईद को और ख़ालिद इब्ने वलीद ने अबुमूसा अशरी को मु़क़र्रर किया और दोनों लश्कर अपनी अपनी मंज़िल की तरफ़ रवाना हो गये। जब ख़ालिद बिन वलीद जाफ़ी की तरफ़ बढे और उन्हें लश्करे इस्लाम की आमद का पता चला तो वह दो गिरोहों में बट गये एक गिरोह यमन चला गया और एक गिरोह बनि जुबैद से जा मिला। हज़रत अळी (अ.स.) को बनि ज़ाफ़ी की इस तक़सीम का हाल मालूम हुआ तो आपने ख़ालिद को पैग़ाम भेजा जिस मुका़म पर मेरा क़ासिद तुम्हें मिले वहीं रूक जाओ , मगर ख़ालिद ने इस ख़्याल से कि अगर दोनों फौज़ों का इलहाक़ हो गया तो अफसरी जाती रहेगी कि ठहरने से इन्कार कर दिया और बज़ोमे ख़ुद आगे बढ़ गया। हज़रत अली (अ.स.) ने ख़ालिद इब्ने सईद से कहा कि फौजड़ का एक दस्ता ले कर जाओ और ख़ालिद बिन वलीद जहां मिले वहीं रोक दो ख़ालिद बिन सईद ने आगे बढ़कर उन्हें पेशक़दमी से रोक दिया अमीरूल मोमेनीन हज़रत अली (अ.स.) जब वहां पहुँचे तो हुक्म अदूली पर ख़ालिद बिन वलीद की सरज़निश की और दोनों लश्करों को एक एकर ककरे चल दिये। जब कसर के मुक़ाम पर पहुँचे तो बनु जुबैद से मुडभेड़ हुई। अम्र इब्ने मोइद यकरब अगर चे अरब का मशहूर जंग आज़मा और तेग़े ज़न था मगर हज़रत अली (अ.स.) को अपने मुक़ाबले में देख कर भाग खडा हुआ। उसका भतीजा और भाई मारा गया और उसकी बीवी सलमा और बच्चे असीर कर लिये गये और बहुत सा माले ग़नीमत हाथ आया।

हज़रत अली (अ.स.) ने माले ग़नीमत के खुम्स में से एक क़नीज़ ले ली थी। ख़ालिद इब्ने वलीद ने बरा इब्ने आज़िब के हाथ एक ख़त पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में भेजा जिसमें हज़रत अली (अ.स.) के इस इक़दाम की सख़्त लब व लहजे में शिकायत की। जब आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने वह ख़त पढ़ा तो आपके चेहरे का रंग मुताग़य्यर हो गया और बरा से मुखाति़ब हो कर फ़रमायाः- तुम इस शख़्स के बारे में क्या राय रखते हो जो अल्लाह और उसके रसूल (स.अ.व.व.) को दोस्त रखता है और अल्लाह व रसूल (स.अ.व.व.) उसको दोस्त रखते हैं।

बस ने पैगम़्बर (स.अ.व.व.) के चेहरें पर जब ग़ैज़ के आसार देखे तो कहा या रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) मैं अल्लाह और उसके रसूल (स.अ.व.व.) के ग़जब से पनाह मांगता हूँ। मैं तो सिर्फ़ एक पैगम़्बर की हैसियत से हाज़िर हुआ हूँ। ये सुन कर आन हज़रत (स.अ.व.व.) ख़ामोश हो गये।

हज़रत अली (अ.स.) को इस माल में हर तरह का हक़ तसर्रूफ़ हासिल था और उनका हिस्सा भी एक ख़ादेमा से कहीं ज़्यादा था मगर वह लोग जो अपने दिलों में अनाद लिये हुए थे ऐस ही मौक़े की तलाश में रहते थे कि कोई ऐसी बात हाथ लगे जिससे पैग़म्बर (स.अ.व.व.) को उनके ख़िलाफ़ किया जा सके चुनानचे उस मौक़े पर भी पैग़म्बर (स.अ.व.व.) के जज़बात को उनके ख़िलाफ़ भड़काने की कोशिश की गई मगर हज़रत अली (अ.स.) को मोरिदे तान बनाने की कोशिश करने वाले खुद ही आन हज़रत (स.अ.व.व.) के गैज़ व गज़ब का हदफ बन गये।

मुबाहिला

यमन के शुमाली कोहिस्तान में सनआ से दस मंजि़ल के फ़ासले पर तेहरान एक जरख़ेज़ मुक़ाम था जो छोटी बड़ी तिहत्तर बस्तियों पर मुशतमिल था और उन बस्तियों में कम व बेश चालीस हज़ार ईसाई बस्ते थे जो पहले तो अहले अरब की तरह बुतपरस्त थे मगर फ़ेमियून नामी एक मसीही राहिब जो अपा वतन रोम छोड़ कर यहां आबाद हो गया था , ने यहां के बाशिन्दों कीो दीन ईसवी की तालीम दी और थोड़े दिनों में उसकी तबलीग़ के नतीज़े में तमाम आबादी ने ईसाइयत कुबूल कर ली और नज़रान ईसाईयों का एक अहम मरकज़ बन गया। उन्होंने मज़हबी मुरासिम अदा करने के लिये एक कलीसा बनवाया जो ऊँट की खालों से मढ़ी हुई एक बुलन्द व बाला इमारत थी और उसे काबे नजरान कहा जाता था। इस कलिसा की औक़ाफ़ की सालाना आमदनी दो लाख से ज़्यादा थी जिससे राहिबों और मज़हबी पेशवाओं की परवरिश होती थी।

जब इस्लाम को उरूज हासिल हुआ और मुतहारिब गिरोह सरनिगू हो गये तो आन हज़रत (स.अ.व.व.)ने नजरान के नसारा को भी एक ख़त लिख कर इस्लाम कुबूल करने या जज़िया देने की दावत दी। जब नजरान के असक़िफे आज़म ने आन हज़रत का मकतूब पढ़ा तो उसने इलाक़े के तमाम सरबरा-वुर्दा लोगों को जमा करके सूरते हाल से उन्हें मुतला किया और कहा हमें ग़ौरे फिक्र के बाद कोई हल तजवीज़ करना चाहिये। आख़िर कार बड़ी रदोकद्र के बाद ये तय हुआ कि अहले इल्म का एक वफ़द मदीने जाये और पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) से गुफ़्तगू करे। अगर बात चीत से कोई हल निकल आये तो बेहतर वरना कोई और तदबीर सोची जायेगी। चुनानचे चौदह आदमियों का एक व फ़द आकिब , सईद और अबुहारिस के ज़ेरे क़यादत मदीना रवाना हुआ उनमें अबुहारिसा ईसाई दुनिया का असक़िफ़े आज़म और मशहूर आलिम था और सईद और आक़िब दोनों तदबीरों फ़रास्त और मुआमला फ़हमी में मुम्ताज़ थे। जब ये वफ़िद मदीने मे दाख़िल हुआ तो अहले मीदने उनके ज़र्क व बर्क़ लिबास रेश्मी अबायें और सज धज देखकर हैरत में पड़ गये क्योंकि उससे पहले कोई वफ़द इस आन बान से यहां नहीं आया था। जब वह बने ठने मस्जिद में दाख़िल हुए तो आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने उनके हाथों में सोने की अँगूठियां और जिस्मों पर दीबा व हरब के लिबास देख कर उनकी तरफ़ से मुंह फेर लिया। और बात नहीं की। वह तेवरियों पर बल डाले हुए मस्जिद से बाहर निकले तो देखा कि हज़रत अस्मान और अब्दुल रहमान बिन औफ़ सामने चले आ रहे हैं। उन्होंने हज़रत उस्मान को मुख़ातिब किया और शिकवा आमेज़ लहज़े में कहने लगे कि मुहम्मद (स.अ.व.व.) ने हमें पैग़ाम भेजा और जब हम हाज़िर हुए तो मुहं फेर लिया और सलाम का जवाब तक नही दिया। हज़रत उस्मान ने कहा मेरी समझ में नहीं आता कि रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) ने ऐसा क्यों किया ? आप हज़रत अली (अ.स.) के पास चले आयें वही उसका असल सबब बता सकेंगे। चुनानचे यह लोग हजरत अली (अ.स.) की ख़िदमत में हाज़िर हुए और पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की बे इल्तेफ़ाती का शिकवा किया। आप ने फ़रमाया कि तुम लोग यह सोने की अँगूठियाँ और रेशमी लिबास उतार कर सीधे सादे कपड़े पहन कर जाओ रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व.) तुम्हें बारयाब होने का मौक़ा ज़रुर देंगे। चुनानचे उन्होंने ऐसा ही किया और सरकारे दो आलम (स.अ.व.व.) ने नमाज़े अस्र से फ़ारिग़ होकर मुख़्तलिफ़ मसाएल पर उनसे गुफ़्तगू की और जब उन्हें इस्लाम की दावत दी तो वह कहने लगे कि हम तो पहले ही से मुसलमान हैं। फ़रमाया , तुम मुसलमान क्यों कर हो सकते हो ? सुअर का गोश्त खातो हो , सलीब की परस्तिश करते हो और हज़रत ईसा इब्ने मरयम को ख़ुदा का बेटा कहते हो। उन्होंने कहा बेशक मसीह इब्ने अल्लाह हैं। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने फ़रमाया हज़रत ईसा की मिशाल अल्लाह के नज़दीक हज़रत आदम (स.अ.व.व.) की सी है जिसे मिट्टी से ख़ुदा ने पैदा किया और कहा हो जा और वह हो गया।

हज़रत ईसा (स.अ.व.व.) के बारे में यहूद नसारा दोनों तज़बजुब में मुबतिला थे। यहूद आपकी नस्बत बेहूदा बदगुमानिया रखते थे और नसारा मुबतिला थे। यहूद आपकी नस्बत बेहूदा बदगुमानिया रखते थे और नासा आपको ख़ुदा का बेटा कहते थे। आन हज़रत (स.अ.व.व.) के इस क़ौल का मतलब यह था कि जब ख़ुदा ने अपनी कुदरते कामेला से हज़रत आदम (स.अ.व.व.) को मिट्टी से पैदाकरदिया तो ईसा (स.अ.व.व.) को बग़ैर पाग के सिर्फ़ माँ के पेट से पैदा कर देना क्या ताज्जुब ख़ेज़ है और अगर ईसा (अ.स.) का बग़ैर बाप के पैदा होना खुदा का बेटा होने की दौलत है तो आदम (स.अ.व.व.) के माँ बाप दोनों नहीं थे इस लिये बदर्जा ऊला उन्हें ख़ुदा का बेटा होना चाहिये।

हुजूरे अकरम (स.अ.व.व.) ने उन्हें लाख समझाया कि ईसा मसीह को ख़ुदा का बेटा न कहो मगर वह न माने और कज हसी पर उतर आये। चुनानचे ख़ुदा का हुक्म हुआ किः-

(ऐ रसूल (स.अ.व.व.) ) जब तुम्हारे पास इल्म (कुरान) आ चुका है उसके बाद ये लोग ईसा (अ.स.) के बारे में तुम से हुज्जत करें तो उनसे कहो कि आओ इस तरह फ़ैसला करें कि हम अपने बेटों को लायें तुम अपने बेटों को लाओ , हम अपनी औरतों को लायें तुम अपनी औरतों को लाओ हम अपने नफ़सों को लायेंत तुम अपने नफ़सों को लाओ और फिर अल्लाह के सामने गिड़गिड़ायें और झूटों पर लानत के बाद ख़ुदा से अज़ाब के ख़्वास्तगारहों।) (आले इम्रान आयत 61)

ग़र्ज़ की बात क़सम क़समी और मुबाहिला पर ठहरी। जिस दिन वह मुबाहिला होने वाला था उस दिन अकाबरीने साहाबा नहा धो कर और बन संवर के हुजूर (स.अ.व.व.) के दरे दौलत पर सुबहा तड़के ही से इस आस के साथ जमा हो गये कि शायद आन हज़रत (स.अ.व.व.) की निगाह इन्तेख़ाब उनकी तरफ़ उठे और वह अपने साथ ले लें मगर आपने सुबह की नमाज़ से फ़ारिग़ होकर हज़रत सलमान फ़रसी को एक सुर्ख़ कम्बल और चार लक़़डियां देकर मैदाने मुबाहिले की तरफ़ रवाना किया कि वह वहां इस कम्बल का शामियाना खड़ा कर दें और ख़ुद इस शान से बरामद हुए कि इमामे हुसैन (स.अ.व.व.) को गोद में उठाया , हज़रत इमाम हसन (अ.स.) का हाथ थामा , हज़रत फ़ात्मा ज़हरा (स.अ.व.व.) को अपने पीछे किया और हज़रत अली (अ.स.) को आगे। गोया आपने बेटों की जगह नवालों को , औरतों की जगह अपनी पारए जिगर हज़रत फ़ातमा (स.अ.व.व.) को और नफ़सों की जगह हजरत अली (अ.स.) को लिया। फिर आपने यह दुआ फ़रमायी कि ख़ुदा वन्दा! हर नबी (स.अ.व.व.) के एहलेबैत होते हैं , यह भी मेरे एहलेबैत हैं इन्हें हरबुराई से महफूज़ और पाकों पाकीज़ा रख।

अलग़र्ज़ जब आप इस शान से मैदान में वारिद हुए तो नसारा का सरदार आक़िब उन्हें देखकर कहने लगा कि ख़ुदा की क़सम मैं एसे चेहरे देख रहा हूँ कि अघर यह पहाड़ को अपनी जगह से हट जाने को कहें तो यक़ीनन वह हट जायेगा। बस इसमें ख़ैरियत है कि मुबाहिले से हाथ उठाओ वरना क़यामत तक नस्ले नसारा मं कोई शख़्स ज़िन्दा न बचेगा। आख़िरकार अहले नज़रान ने मुबाहिले से दस्तबर्दार होकर जज़िया देना कुबूल कर लिया और मैदान से हट गये। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने फ़रमाया कि ख़दी की क़सम अगर ये लोग मुबाहिला करते तो ख़ुदा वन्दे आलम उन्हें सुअर और बन्दर की शक्लों में मसख़ कर देता और यह मैदान आग बन जाता और नजरान का एक मुतन्नाफ़िस हत्ता कि चिडियां तक न बचती। यह हज़रत अली (अ.स.) की आला फज़ीलत है कि ख़ुदा के हुक्म से नफ़से रसूल क़रार पायें और तमाम अन्बिया से अफ़ज़ल ठहरे। 1

ये फ़तहे व सरफ़राज़ी तीरख़े आलम में अपनी नौवियत के लेहाज़ से मुनफ़रिद है कि एक तरफ़ गिने चुने सिर्फ़ पाँच अफ़राद हैं जिनमें एक ख़ातून और दो कमसिन बच्चे हैं न जिस्मों पर ज़िरहें हैं और न हाथों में तलवारें है। वह सिर्फ़ यक़ी की कुवत और एतमाद की ताक़त से बहरान के नुमाइन्दा वाफ़िद को बे-दस्त व पा करके अपनी सदाक़त का लोहा मनवा लेते हैं और उनके तमरिद व शिकवा को कुचल कर उनकी गर्दनों में बाजिगुज़ारी का तौक़ डाल देते हैं। यह वाक़िया है कि ईसाईयों ने मुबाहिले से इन्कार करके अपनी शिकस्त और इस्लाम की फतेह का अमलन एतराफ कर लिया। अगर उन्हें अपने मस्लक की सेहत और अक़ीदे की सदाक़त पर एतमाद होता तो कभी मुबाहिले से गुरेज़ न करते और जज़िया गुरेज़ करके अपने अक़ायद की न पुख़ती का सुबूत न देते।

हुज्जत विदा

हज़रत रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व.) 25 ज़ीक़द सन् 10 हिजरी को हज़ारों मुसलमान के साथ मदीने से हज के लिये रवाना हुए। इस सफ़र में तमाम ऊमेहातुल मोमेनीन और हज़रत फातमा ज़हरा (स.अ.व.व.) भी आपके हमराह थी। जब ज़ोहर के करीब वादी जुलहलीफ़ा में पहुँचे तो आपने गुस्ल के बाद एहराम बाँधा। सहाबा ने भी एहराम बाँधे और सबने मिलकर तलबिया किया तो (लब्बैक अल्लाहुम्मा लब्बैक) की सदाओं से दश्त व सहरा गूँज उठे।

हज़रत अली (अ.स.) यमन में थे। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने उन्हें ख़त भेजा कि वह वहां से सीधे मक्के पहुँच कर हज में शरीक हों। आप अपने दस्ते के साथ वहां से रवाना हुए और रास्ते में लश्कर की क़यादत एक शख़्स के सुपुर्द करके आगे बढ़े और वादी यलमिल से एहराम बाँधकर आन हज़रत (स.अ.व.व.) के पहुँचने से पहले मक्के पहुँच गये। पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने आपको देखा तो चेहार फ़रते मसर्रत से खिल उठा। पूछा कि ऐ अली (अ.स.) तुमने किस नियत से एहराम बाँधा है ? कहा इशके लिये आपने कुछ तहरीर नहीं फ़रमाया था इसलिये मैंने अपनी नियत से वाबस्ता कर दिया था कि जो आपकी नियत होगी वही मेरी नियत होगी। मैं अपने पीछे कुर्बानी के चौबीस ऊँट छोड़ आया जो लश्कर के साथ यहाँ पहुँचेंगे , आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने फ़रमाया मेरे साथ हमराह कुर्बानी के छियासठ ऊँट हैं और तुम मुनासिके हज और कुर्बानी के ऊँटों में मेरे साथ हो। इसके बाद हज़रत अली (अ.स.) ने यमन में तमाम रूदाद , जज़िया और ग़नायम की तफ़सील बयान की और अर्ज़ किया कि मैं अमवाले ग़नीमत और जज़िया वग़ैरा लश्कर के सुपुर्द करके शाम ज़ियारत में पहले चला आया हूँ। फ़रमाया कि तुम अपने हमराइयों के पास जाओ और उन्हें लेकर जल्द मक्के पहुँच जाओ। हज़रत अली (अ.स.) पैग़म्बर (स.अ.व.व.) से रूख़सत होकर वापस पलटे अभी थोड़ा सा रास्ता तय किया होगा कि लश्कर को आते देखा , जब वह लोग क़रीब पहुँचे तो आपने मुशाहिदा किया कि सभों ने इजाज़त के बग़ैर यह पारचे क्यों तक़सीम किये हैं ? कहा , कि उन लोगों ने इसरार किया था कि ये पारये उन्हें दिये जायें और फिर बाद में वापस ले लिये जायें। फ़रमाया , इन्हें आन हज़रत (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में पेश करने से पहले इस्तेमाल में नहीं लाया जा सकता। ग़र्ज़ की लोगों ने वह पारचे उतार दिये और जब पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में पहुँचे तो हज़रत अली (अ.स.) की इस सख़्त गीरी का शिकवा किया। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने खड़े होकर फ़रमाया , ऐ लोगों! अली (अ.स.) का गिला न करो वह अल्लाह के मुहायिदे में सख़्त गीर हैं। 1

हुज्जतुल विदा से पेश्तर दो तरह के हज हुआ करते थे , एक हज अफ़राद और दूसरा हज कुरान। उन दोनों में उमरा एक जुदागाना और मुस्तक़िल अमल की हैसियत रखता है जो आमाले हज बजा लाने के बाद किया जाता है। फ़र्क सिर्फ इतना है कि हज कुरान में कुर्बानी के जानवर साथ होते हैं और हज अफ़राद में कुर्बानी के जानवर साथ नहीं होते। इस मौक़े पर आया (वतमलुज हज वल उमरतुल्लाहे) अल्लाह के लिये हज और उमरा पूरा करां , नाज़िल हुआ तो हज में एक तीसरी क़िस्म का इज़ाफ़ा हो गया जिसे हज तमतओ कहा जाता है। हज तमतओ में उमरा हज हही का एक जुज़ होता है जो अय्यामे हज में हज से पहले अदा किया जाता है। चुनानचे उसकी सूरत ये है कि पहले उमरा करके एहराम खोल दिया जाता है और आठ ज़िलहिज को यौमे तरविया के मौके पर एहराम बान्ध लिया जाता है उसके बाद आमाले हज अदा किये जाते हैं। उसे हज तमत्तो इस लिये कहते हैं कि उमरा और हज के दरमियानी वक़फ़ा मे एहराम के क़यूद उठ जाते हैं और जो चीज़ें ऐहराम की हालत में जाएज़ नहीं हैं उनसे तमत्तो हुआ जा सकता है यह हज सिर्फ़ उन लोगों के लिये है जो मक्के से अड़तालिस मील से ज़्यादा के फ़ासले पर आबाद हों।

पैग़म्बरे अकरम (स.अ.व.व.) के साथ इस सफ़र में ज़्यादातर वह लोग थे जिनके साथ कुर्बानी के जानवर नहीं थे। आन हजरत (स.अ.व.व.) ने उन्हें हुक्म दिया कि वह हज की नियत को उमरे की नियत से बदल लें और उमरे के बाद एहराम उतार दें और हज तमत्तों बजा लायें और जिन लोगों के साथ कुर्बानी के जानवर हैं वह एहराम बान्धे रखें। आन हज़रत (स.अ.व.व.) के साथ चूँकि कुर्बानी के ऊँट थे इसलिये आपका हज , हज कुर्बान था और हज़रत अली (अ.स.) की नियत चूँकि पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की नियत हज की ताबे थी इसिलये दोनों ने एहराम नहीं खोले जब लोगं ने पैग़म्बर (स.अ.व.व.) और हज़रत अली (अ.स.) को एहराम बान्धे देखा तो यह आपने एहराम खोलने में पसो पेश करने लगे , और साबेक़ा तीरीक़े हज से मानूस तबीयतों पर यह अमर इन्तेहाई शाक़ गुज़रा चुनानचे वह बदस्तूर एहराम बान्धे रहे पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने उन्हें तामीले हुक्म से पहलू तही करते देखा तो सख़्त रंजीदा हुए और ग़ैज़ व ग़ज़ब की शिकनें माथे पर उभर आयीं। हज़रत आयेशा का ब्यान है कि रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) ज़िलहिज्जा की चौथी या पांचवी तारीख़ को ग़ैज व ग़ज़ब की हालत में मेरे पास आये मैने कहा या रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) किसने आपको ग़ज़बनाक किया है ? ख़ुदा उसे वासिले जहन्नुम करे। फ़रमाया क्या तुम्हें ख़बर नहीं है कि मैने लोगों को एक हुक्म दिया था मगर वह तरद्ददु व तज़ुबज़ुब में प़ड़ गये हैं अगर मुझे मालूम होता कि सूरते हाल यह पेश आयेगी तो मैं कुर्बानी के जानवर अपने साथ लाने के बजाये यहाँ से ख़रीद लेता और इन लोगों के साथ एहराम खोल देता। 1

जिस तरह आन हज़रत (स.अ.व.व.) की ज़िन्दगी में कुछ लोगों ने हज तमत्तो की मुख़लिफ़त की उसी तरह आन हज़रत सल 0 के बाद भी उसकी मुख़ालेफ़त करते रहे और हुकम शरयी के मुक़ाबिले में अपनी राय को तरजीह देते रहे चुनानचे इमरान इब्ने जसीन का कहना है कि हज तमत्तो की आयत कुराने मजीद में नाज़िल हुई है और हज़रत रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व.) ने हमें इसका हुक्म दिया था और बाद में कोई ऐसी आयत नाज़िल नहीं हुए जो पहली आयत को मनसूख़ करती और न रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) ने आख़िरी सांस तक मना फ़रमाया अलबत्ता एक शख्स ने अपनी ज़ाती राय से जो चाहा वह कह दिया।) 1

शरेह मुस्लिम नूदी ने तहरीर किया है कि इस मुराद उमर बिन ख़त्ताब है इसलिये कि सबसे पहले उन्होंने हजे तमत्तो से मना किया था बाक़ी रहे वग़ैरा तो वह लोग उस मसले में उन्हीं के ताबे थे। 2

बहर हाल 8 जिलहिज बरोज़े पंचशन्बा आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने हुक्म दिया कि जिन लोगों ने उमरे के बाद एहराम खोल दिये थे वह एहराम बान्ध लें। जब एहराम बान्धे जा चुके तो आप मक्के से मिना में तशरीफ़ लाये और दूसरे दिन नमाज़े सुबह के बाद मिना से अरफात की तरफ़ रवाना हो गये। क़बले इस्लाम कुरैश ने ये दस्तूर बना रखा था कि वह मशअरल हराम तक पहुँच कर रूक जाते और कहते कि हम अहले हरम हैं , हरम के बाहर नीहं निकलेंगे अलबत्ता दूसरे लोग अरफ़ात में चले जाते। कुरैश का ख़्याल था कि पैग़म्बर (स.अ.व.व.) भी मिना से निकल कर मशअरूल हराम में रूक जायंगे और आगे नहीं बढ़ेंगे मगर हुक्मे कुरानी की बिना पर आप अरफ़ात की तरफ़ चल दिये और वहां पहुँच कर नमरा में ख़ेमा ज़न हुए। ज़ोहर व अस्र की नमाज़ एक साथ अदा की गुरूबे आफ़ताब तक वकूफ़ फ़रमाया और बाद गुरूबे आफ़ताब वहां से चल कर मशअरूल हराम में तशरीफ फ़रमा हुए और मग़रिब व इशा की नमाज़ एक साथ पढ़ी। मशअरूल हराम में रात गुजरने के बाद ईद के दिन सुबह के वक़्त मिना में आये र तीस ऊँट अपने हाथ से नहर किये और बक़ीया ऊँटों को नहर करने पर हज़रत अली (अ.स.) को मामूर फ़रमाया। कुर्बानी से फ़ारिग़ होकर सर मुण्डवाया और एहराम खोल दिया और उसी दिन मक्के मोज्जमां पहुँच कर खान-ए-काबा का तवाफ किया और सफ़ा मरवा की सई से फ़राग़त हासिल करके मिना में वापस आ गये जहां आपने 13 ज़िलहिज तक क़याम फ़रमाया और रमी जमरात का फरीजा अदा किया। जब तमाम अरकान व आमाले हज से फ़ारिग हो चुके ते 14 जिलहिज को मुसलमानों की कसीर जमीअत के साथ अपने मदीने की तरफ़ मराजिअत फरमायी।

ग़दीरे ख़ुम

मदीने की तरफ़ वापसी के दौरान आपके साथ तक़रीबन एक लाख चौबीस हज़ार का मजमा था जो मुख़तलिफ़ शहरों और बस्तियों से सिमट कर जमा हो गया था और अब फरीजें से सुबक दोशी के बाद खुश खुश अपने घरों को पलट रहा था। कुछ लोग मदीने पहुँच कर अलग होने वाले थे और कुछ लोगों को रास्ते ही से अलग हो जाना था। जैसे जैसे उनकी बस्तियां करीब आती जाती थी उनकी रफ़्तार में तेज़ी आती जा रही थी चुनानचे कुछ आगे बढ़ गये थे। कुछ पीचछे चले आ रहे थे कि मुक़ामे हजफ़ा से तीन मील के फासले पर एक पुरख़ार वादी में जो ग़दीरे ख़ुम कहलाती थी उन्हें ठहर जाने का हुक्म दिया गया। यह हुक्म इतना अचानक और नागाहानी था कि लोग हैरत से एक दूसरे का मुंह तकने लगे कि यहां मंज़िल कैसी ? क्यों कि ये जगह न तो क़ाफ़िले के ठहरने के लिये मौज़ूं थी न गर्मी से बचने का कोई सामान था और न धूप से बचाओ के लिये साया और न ही उधर से गुज़रते हुए अरबों को इस मुक़ाम पर मंज़िल करते देखा गया था।

यहां अहले क़ाफिले को रोकने का मक़सद ये था कि पैग़म्बर इस्लाम (स.अ.व.व.) मुसलमानों को ख़ुदा के एक अहम फ़ैसले से आगाह करना चाहते थे और उसके उमूमी ऐलान के लिये मुनासिब मौक़े व महल के मुन्तजिर थे और इसके मुनासिब तर कोई और मौक़ा नहीं हो सकता था क्योंकि थोड़ी देर के बादे ये मजमा मुताफ़र्रिक़ और परागन्दा होने की बज़ाहिर कोई सूरत न थी। आलमे इस्लाम के हर कोने और हर ख़ित्ते के लोग जमा थे और उनके मुन्तशिर होने से पहले यह हुक्म उनके गोशगुज़ार कर देना ज़रूरी था। फिर इस बेआब व गियाह सहरा में क़ाफिले को रोकने की एक वजह यह भी हो सकती थी कि अगर मामूलन इस मुक़ाम पर काफ़िला ठहरा करते तो यह मसझा जा सकता था कि आराम और सफ़र की थकान दूर करने के लिये मंज़ील की गई है और जिमनन एक ऐलान भी कर दिया गया है जिससे इस ऐलान की एहमियत कम हो जाती। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने इसकी इहमियत को बरक़रार रखने के लिये ऐसी जगह का इन्तेख़ाब फ़रमाया जो कभी काफ़िलों की आराम गाह न बनी थी ताकि ये वाज़ेह हो जाए कि यहां ठहरने का मक़सद आराम व इस्तेराहत नहीं है बल्कि मामले की एहमियत का तक़ाज़ा यह है कि ख़्वाह कितनी ही ज़हमतों और तक़लीफ़ों का सामना क्यों न करना पड़े इस जलते हुए मैदान में चलते हुए क़ाफिले को रोक लिया जाये और सबको कारसाज़े मुतलक़ के फैसले स आगाह कर दिया जाये। और फैसला आन हज़रत (स.अ.व.व.) की नियाबत व जॉनशीन से मुतालिक़ था।

इससे बेशतर दावते अशीरा के एक महदूद दायरे में और ग़ज़वये तबूक व तबलीग़े सूरये बरात के मौक़े पर पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की ज़बान से मुख़तिलफ़ पैराओं , इशारों और कनायों में ऐसे कलेमात सुने जा चुके थे जिन से एक इन्साफ़ पसन्द और ग़ैर जानिबदार इन्सान यह नतीजा अक़ज़ करने पर मजबूर था कि पैग़म्बर (स.अ.व.व.) हज़रत अली (अ.स.) को अपना नायब व जॉनशीन मुक़र्रर करना चाहते हैं और दूसरी तरफ़ यह भी देखने में आता था कि कुछ लोगों की ज़बाने अली (अ.स.) के ख़िलाफ ख़्वाह मख़ाह शिकवा रेज़ रहती हैं और उनके मामूली मन्सब पर भी उनकी दिली कदूरतें चहरों से आशकार हो जाती हैं वह भला इसे क्यों कर ठण्डे दिल से गवारा करेंगे और उसे अमली जामा पहनाने देंगे। पैग़म्बर (स.अ.व.व.) भी इन बातों से बेख़बर न थे। वह बाज़ चेहरों के उतार चढ़ाव से उनकी दिली कैफियतों को भाँप रहे थे और उनके हरकात व सकनात से उनके इरसादों को समझ रहे थे कि यह मुख़ालिफ़त किये बग़ैर नहीं रहेंगे और हर मुम्किन तरीक़े से रोड़े अटकायेंगे। इसलिये मिजाज़ शिनास कुदरत यह चाहता था कि कुदरत की तरफ़ से उन लोगों के शर से तहाफुज़ का जि़म्मा ले लिया जाये तो फिर उसका अमूमी ऐलान किया जाये चुनानचे अल्लाह की तरफ़ से तहाफुज़ की ज़िम्मेदारी के साथ ये हुक्म हुआ किः-

(ऐ रसूल (स.अ.व.व.) ! तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से जो हुक्म तुम्हें दिया गया है उसे पहुँचा दो अगर तुमने ऐसा न किया तो गोया तुमने कोई पैग़ाम पहुँचाया ही नही और अल्लाह हर हाल में तुम्हें लोगों के शर से महफूज़ रखेगा।)

(मायदा आयत- 67)

अल्लामा काज़ी शूकानी रक़म तराज़ है।

(अबु सईद खजरी कहते है कि आयत (या अय्योहर रसूल बल्लिग़ मा उन्ज़ेला अलैका) ग़दीरे ख़ुम में हज़रत अली (अ.स.) इब्ने अबोतालिब (अ.स.) के बारे में नाज़िल हुई। 1

इस तहदीदी हुक्म के बाद ताख़ीर की गुंजाइश।. न थी। पैग़म्बर (स.अ.व.व.) सवारी से उतरे। साथ वाले भी उतर पड़े हय्या अला ख़ैरिल अमल की आवाज़ पर आगे बढ़ जाने वाले पलटे और पीछे रह जाने वाल तेज़ी से बढ़े और तमाम मजमा सिमट कर यकजा हो गया। दोपहर का वक़्त , गर्म हवाओं के थपेड़े झुलसा देने वाली गर्मी , जलता हुआ रेगिस्तान और आफ़ताब की शोलगी , चन्द बबील के दरख़्तों के अलावा न कहीं साया न सबज़ा। सहाबा ने अबायें कन्धों से उतार कर पैरों के गिर्द लपेट लीं और इस जलती हुई ज़मीन पर हमा तन गोश होकर बैठ गये। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने बबूल के दो दरख़्तों के दरमियान ऊँटों के कजाओं का मिम्मबर तैयार कराया और उस पर जलवा अफरोज़ हुये। जै़द बिन अरक़म कहते हैं-

(रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) मक्के और मदीने के दरमियान खुम के मुक़ाम पर ख़ुतबा देने के लिये खड़े हुए और ख़ुदा की हमद व सना के बाद फ़रमाया कि ए लोगों! वह वक़्त क़रीब है कि मेरे परवरदिगार की तरफ़ से पैग़़ाम आ जाये और उस पर लब्बैक कहूं लेहाज़ा इस से क़बल में तुम्हारे दरमियान दो गरांकद्र चीज़े छोड़ जाता हूँ एक अल्लाह की किताब जिसमें नूर व हिदायत है और दुसरे मेरे अहलेबैत , अगर तुम इन दोनों से तमस्सुक रखोगे तो कभी गुमराह न होंगे। 2

इन कलेमात के बाद तीन मर्तबा बुलन्द अवाज़ से फ़रमाया कि (अलसत ऊला बेकुम मिनकुम बे नफ़सेकुम) क्या मैं तुम पर खुद तुमसे ज़्यादा हक़ तसर्रूफ़ नहीं रखता ? सबने हम आवाज़ होकर कहा , बेशक आप हमसे ज़्यादा हमारे नफ़सों पर हक़ तसर्रूफ़ रखते हैं। अपनी हाकमियत का इक़रार लेने के बाद आपन ने हज़रत अली (अ.स.) को अपने हाथों पर बुलन्द किया और फरमायाः- ऐ लोगों! अल्लाह मेरा मौला है औ मैं तमाम मोमेनीन का मौला हूँ और मैं उनके नफ़सों से ज़्यादा उन पर हाकि़म व मुतसर्रिफ़ हूँ याद रखो कि जिस का मैं मौला हूँ उसके यह अली भी मौला हैं खुदाया उसे दोस्त रख जो इन्हें दोस्त रखे और उसे दुश्मन रख जो इन्हें दुश्मन रखें। 1

इब्ने अब्दुल बर ने तहरीर किया है किः-

(पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने ग़दीरे खुम के दिन फ़रमाया कि जिसका

मैं मौला उसक अली मौला हैं ऐ अल्लाह जो इन्हें दोस्त

रखे तू उसे दोस्त रख और जो इन्हें दुश्मन रखे तू उसे

दुश्मन रख।) 1

इस ऐलान के बाद आन हज़रत (स.अ.व.व.) फ़राज़े मिम्बर से नीचे तशरीफ़ लाये और नमाज़े ज़ोहर बा बाजमात अदा की नमाज़ से फ़ारिग़ हो कर अपने ख़ेम में तशरीफ़ ले गये और लोगों को हुक्म दिया कि वह अली (अ.स.) के पास जायें और उन्हें इस मन्सबे आलिया पर फाएज़ होने की खुशी में मुबारक बाद दें चुनानचे सहाबा ने तबरीक व तहनियत के कलेमात अपनी ज़बानवों से अदा किये उम्मेहातुल मोअमेनीन और दूसरी ख़्वातीनव ने भी इज़ाहरे मसर्ररत करते हुए मुबारकबाद दी और हज़रत उमर के अल्फ़ाज़े तहनियत तो अब तक इस्लामी तारीख़ के औराक़ पर मौजूद हूं किः- मुबारक हो ऐ फ़रज़न्दे अब तालिब (अ.स.) आज से आप हर मोमिन और हर मोमिना के मौला हो गये। 3

इधर मुबारक बाद का सिलसिला जारी था और उधर जिबरईल अमीन ने पैगम़्बरे अकरम (स.अ.व.व.) को तकमीले दीन व इतमामे नेअमत का रूह परवर मुज़दा सुनाया कि (अलयौम अकमलत लकुम दीनकुम व अत्तमतो अलैकुम नेअहमती व रज़ीयत लकुमुल इस्लाम दीना) आज मैंने तुम्हारे दीन को हर लेहाज़ से कामिल कर दिया और तुम पर अपनी नेअमतें तमाम कर दी और तुम्हारे लिये दीने इस्लाम को पसन्द किया। जलालुद्दीन सेवती अब सईद खजरी से रवायत करते हैं कि जब रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) ने ग़दीरे ख़ुम के दिन हज़रत अली (अ.स.) को अपनी जगह नसब कर दिया और उनकी विलयत का ऐलान कर दिया तो जिबरीले अमीन आयत अलयौम अक़मलतो लकुम दीनाकुम लेकर आन हज़रत (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में नाज़िल हुए। 4

इमामुल मोहद्देसीन हाफ़िज अब्दुर्राब ने ग़दीरे ख़ुम के सिलसिले में सौ सहाबये कराम से हदीसें नकल की हैं इमाम राजी़ और इमाम शाफई ने अस्सा सहाबियों से इमाम अहमद बिन हम्बल ने तीस सहाब से और तबरी ने पचहत्तर ( 75) सहाबा से हदीसे नक़ल की हैं उनके अलावा अल्लामा ज़हबी और नेसाई वग़ैरा ने उसे मुतावातिर माना है लेहाज़ा इस वाक़े मे शक व शुबहा की कोई गुंजाइश नहीं है। इसमें तावीलात से तो काम लिया जाता रहा है लेकिन अस्ल वाक़िये को झुटलाया न जा सका और न अल्फाज़े हदीस की सेहत से इन्कार किया जा सका क्योंकि इस हदीस की कसरत पर नज़र करने के बाद वही शख़्स इस वाक़िये से इन्कार कर सकता है जो मुशाहिदात व बदीहात के इन्कार का आदी हो। इल्मुल हुदा में सैय्यद मुर्तज़ा ने फ़रमाया है कि वाक़ए ग़दीर से इन्कार चाँद सूरज से इन्कार के बराबर है। अल्लामा मुक़बली ने कहा है कि अगर वाक़ए ग़दीर यक़ीनी नहीं तो फिर दीन की कोई बात यक़ीनी नहीं है।

फ़रीक़ैन के ओलमा व मोहद्देसीन का इस पर इत्तेफ़ाक है कि पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने एक अज़ीम इजतेमा के अन्दर अपनी हाकिमयत और अव्वलियत का इक़रार लेने के बाद फ़रमाया कि जो मुझे अपना मौला समझता है वह अली (अ.स.) को भी अपना मौला समझे मगर लफ़्ज़े मौला का मन पसन्द माने पहना कर हक़ीक़त को निगाहों से ओझल करने की कोशिश की गई इस लिये कि अगर ये तसलीम कर लिया जाता कि इस हदीस की रू से जो हैसियत रसूल की उम्मत से है वही हैसियत अली (अ.स.) की है तो सक़ीफ़ा बनि साअदा की कार्रवाई का कोई जवाज़ न रह जाता चुनानचे कभी ये कहा गया की इसके माने दोस्त के हैं और कभी यह तावील की गई कि इसके माने नासिर व मददगार के हैं। लेकिन सोचने , समझने और ग़ौर करने की बात यह है कि एक जलते हुए सहरा में लाखों मज़में में जो अपने घरों में पहुँचने के लिये बेचैन था सिमटना जबकि क़ाफिले का हिस्सा अ़ब में रह गया था और अगला रला तीन मील आगे निकल गया था , कांटों को हटा कर सुलगती हुई ज़मीन पर जगह बनाना , ऊँटों के कजावों को जमा करके मिन्बर बनाना और पैग़म्बरे अकरम (स.अ.व.व.) का अपने हाकिम व ऊला बित-तसर्रूफ़ होने का इक़रार लेना क्या सिर्फ़ ये बताने के लिये था कि जिसका मैं दोस्त हूँ उसके अली (अ.स.) भी दोस्त हूँ ? या जिसका में मददगार हूँ उसके अली (अ.स.) भी मददगार हैं ? कोई भी साहबे अक़ल ये बावर नहीं करेगा कि ये एहतमाम व इनसेराम महज़ इतनी सी बात के लिये था। क्यों उन लोगों से अली (अ.स.) की रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) से दोस्ती और वाबस्तगी पोशीदा थी ? या अवाएले उम्र से इस्लाम व अहले इस्लाम की नुसरत में हज़रत अली (अ.स.) के कारनामे ढ़के छिपे और तारूफ के मोहताज थे ? या अल्लाह का इऱशाद कि मोमेनीन क्या मर्द क्या औरतें आपस मे एक दूसरे के दोस्त हैं , इस दोस्ती के इज़हार के लिये काफी नहीं था और क्या पैग़म्बर (स.अ.व.व.) अपनी हाकिमाना हैसियत मनवाये बगै़र इस मक़सद में कामयाब नहीं हो सकते थे ? बिला शुबहा दोस्त व नासिर के माने मुराद लेने से यह तमाम चीज़ें बेमाने व बेहक़ीक़त होकर रह जायेंगी और फिर इस पर भी नजर डालिये कि पैगम़्बर (स.अ.व.व.) को नुसरत व दोस्ती का ऐलान से क्या ख़तरा हो सकता था कि कुदरत को ये कहना प़ड़ा कि (ख़ुदा तुम्हें लोगों के शर से महफूज़ रखेगा) और फिर यह ख़तरा बैरूनी ख़तरा भीनहीं हो सकता इसलिये कि तमाम बैरूनी ख़तरो का इन्साद किया जा चुका था। अभ अगर ख़तरा था तो अन्दरूनी ख़तरा था और ये इसी सूरत में मुम्किन था जब पैग़म्बर (स.अ.व.व.) का ऐलान एक तबक़े के सियासी मसालेह से मुतसादिम होता।

यह तमाम क़राईन व शवाहिद इस बात का सुबूत हैं कि इस मुक़ाम पर मौला के माने हाकिम व मुतसर्रिक़ के हैं और जिस तरह आन ज़रत (स.अ.व.व.) की विलायत व हाकिमयत का इक़रार ज़रूरी है इसी तरह अली (अ.स.) की विलायत व हाकिमयत का इक़रार भी लाज़मी है और इसी माने की तौज़ी के पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने अपनी हाकिमाना व मुतसर्रेफ़ाना हैसियत का इक़रार लिया था वरना इसकी ज़रूरत ही न थी। हज़रत उमर ने भी मुबारकबाद कुछ मसझ कर ही पेश की होगी। अगर इसमें कोई नुमायां पहलू न होता तो फिर तहनियत या मुबारकबाद की ज़रूरत ही क्या थी ? अगर इन्साफ़ व हक़ पसन्दी से काम लिया जाये तो कोई शुब्हा बाक़ी नही रहता कि ये ऐलान इसी ऐलान की सदाये बाज़गश्त था जो वाकि़ये ग़दीर से बीस बरस पहले दावते अशीरा के एक महदूद हलक़े में किया गया था कि (ये मेरा भाई मेरा वली अहद और मेरा जॉनशीन है इसकी सुनों और मानों) 1

इस ग़दीरी ऐलान से न सिर्फ़ मसअले ख़िलाफ़त में इस मसअले की अहमियत व बुनियादी हैसियत भी नुमायां हो जाती है अगर चे सरकारे दो आलम (स.अ.व.व.) ने बेइस्त से हिजरत तक और हिजरत से हुज्जतुल विदा तक उन तमाम एहकाम की तबलीग़ की जो वक़तन फ़वक़तन आप पर नाज़िल होते रहे और मुसलमान उन एहकाम पर अमल भी करते रहे चुनानचे वह नमाज़े पढ़ते , रोज़े रखते , ज़कात देते और जेहद में शरीक होते थे और हज के मौक़े पर भी चारों तरफ़ से सिमट कर जमा हो गये थे मगर कुरान की आयत (अगर तुमने ये न किया तो गोया कोई पैग़ाम पहुँचाया ही नहीं) से ज़ाहिर है कि इस आख़िरी तबलीग़ के बग़ैर तमाम एहकाम की तबलीग़ न तमाम बल्कि क़लअदम थी। अल्लाह ने किसी हाकिम की तबलीग़ को किसी दूसरे हुक्म की तबलीग़ पर मौक़ूफ़ नहीं रखा मगर यहां पैग़म्बरे अकरम (स.अ.व.व.) की तेईस साला तबलीग़ को सिर्फ़ इस तबलीग़ पर मुन्हसिर किया गया है इस तरह कि अगर यह तबलीग़ न होती तो दीन नातमाम रह जाता और कारे रिसालत पाये तकमील को न पहुँचता। इससे दो चीज़ों का सुबूत मिलता है एक तो यह कि हज़रत अली (अ.स.) की हाकमाना हैसियत इस्लाम में अस्ल व असास की है और दूसरे आमाल व एहकाम की हैसियत फुरू की है जिस तरह बुनियाद के बग़ैर कोई इमारत रस्तेहकाम नहीं पा सकती उसी तरह इस आख़री ऐलानके बग़ैर रिसालत न तमाम रहती और दीने इस्लाम तमाम व कमाल की मंज़िल तक न पहुँचता। (लेहाज़ा रिसालत को अगर उसूल में शुमार किया जा सकता है तो जिसे तकमिलये तबलीग़े रिसालत क़रार दिया गाय है उसे भी उसूल में शामिल होना चाहिये।

गवर्नरों की तक़रूरी

हुज्ज़तुल विदा से वापसी कर पैग़म्बरे अक़रम (स.अ.व.व.) को ख़ुदा मौसूल हुई कि हाकिमे यहम बाजा़न का इन्तेक़ाल हो गया जो मुसलमान होने की वजह से यमन की हुकूमत पर बदस्तूर व बिला शिरकत ग़ैर बहाल रखा गया था। उसकी वफ़ात पर आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने यमन को मुक़़तलिफ़ सूब में तक़सीम करके हर सूबे के लिये गवर्रनरों की तक़र्रूरी की चुनानचे सनआ में तकसीम करके हर सूबे के लिये ग़वर्रनरों की तक़र्रूरी की चुनानचे सनआ में बाज़ान के बेटे शहर को गवर्नर बनाया , हमदान में आमिर बिन शहर हमदानी को मुक़र्रर किया , मारब में अबु मूसा अशरी , जनिद में यला बिन उमय्या , अक और अशर में ताहिर इब्ने अबी हाला , नजरान , जमआ और जबीदे के दरमियानी इलाकों में सईद बिन आस , नजरान में अम्र बिन हजम , हज़र मौत में ज़्याद बिन अबदी और सकासिक में अकाशा बिन सूर को गवर्नरी के ओहदों पर फायज़ किया। इब्ने ख़लदून का ब्यान है कि इस वाक़िये से पहले अदी बिन हातिम बिन तय के , असद और मालिक बिन नवीरा बिन हज़ला के , हज़रत अली (अ.स.) बनि नजरान के और आला हज़रमी बहरैन के सदक़ात व जज़ियात की वसूलियाबी पर मुक़र्र थे और बनु सईद का सदक़ा उन्हीं में से दो आदमियों पर तक़सीम कर दिया गया था। हज़रत अली (अ.स.) नजरान का सदक़ा व जज़िया वसूल करके हुज्जतुल विदा में आकर शरीक हो गये थे।

असूद अनसी का वाक़िया

अस्ल नाम अबहला बिन काब , लक़ब जुलखेमार और कुन्नियत असूद थी। कहफ़ हिनाद नामी एक क़रिये में पैदा हुआ और वहीं पल पढ़ कर जवान हुआ। शोबदा बाज़ी में मुम्ताज़ और इल्म कहानत का बड़ा आलिम था। उसके हुस्ने इख़लाक़ और शीरीं कलामी की बिना पर बहुत जल्द लोग उससे मानूस हो जाते थे। सन् 6 हिजरी में मुसलमान हुआ उसके बाद मुरतिद होकर उसने अपनी नबूवत का दावा किया। मज़हिज और नजरान के लोगों ने इसकी इताअत कुबूल कर ली और अहले नजरान नवे मुत्ताहिद होकर पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) की तरफ़ से मुक़र्रर करदा मुसमलान आमिलों अम्र बिन हज़म और ख़ालिद सईद को अपने यहां से निकाल बाहर िकया और ङसर का नज़म व नस्क़ मुकम्मल तौर पर असूद के हवाले कर दिया दूसरी तरफ़ कै़स इब्ने यागूस ने हमला करके फ़रदा बिन मुसीक को जिला वतन कर दिया जो बनि मुराद पर आन हज़रत (स.अ.व.व.) की तरफ़ से आमिल थे। उसके बाद असूद अनसी ने सात सौ सवारों को लेकर सनआ पर चढ़ाई की और शहर बिन बाज़ान को क़त्ल कर दिया नीज़ इसकी बीवी से अक़द कर लिया इस तरह वह सनआ , हज़रमौत , ताएफ़ और अदन के तमाम दरमियानी इलाक़ों पर काबिज़ व मुतसर्रिफ़ हो गया। और बहरैन का भी कुछ हिस्सा उसने अपने क़ब्ज़े में ले लिया। इस वाक़िये से उन इलाक़ोंके अकसर मुसलमान मुरतद हो गये। अम्र बिन माद यकरब भी जो मुसलमान हो गया था ख़िलद बिन सईद से अलहैदा होकर असूद से मिल गया और असूद ने उसे मज़हिज की सरदारी दे दी। ग़र्ज़ कि यमन में जब आम बग़ावत फैल गई तो अम्र बिन सईद से अलहैदा होकर असूद से मिल गया और असूद ने उसे मज़हिज की सरदारी दे दी। ग़र्ज़ कि यमन में जब आम बग़ावत फैल गई तो अम्र बिन हज़म और ख़ालिद बिन सईद ने मदीने मं आकर आन हज़रत (स.अ.व.व.) से सारा वाक़िया ब्यान किया। पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने एक क़ासिद की मारफ़त एक मकतूब अबुमूसा अशरी , मआज़ और तहिर के पास रवाना किया जो इस हंगामें की वजह से रूपोश थे। इस में आपने तहरीर फरमाया कि अगर तुम लोगों से मुम्किन हो सके तो असूद अनसी को क़त्ल करे दो।

शहर की बीवी जिसे असूद ने शहर के क़त्ल के बाद अपनी बीवी बना लिया था फिरोज़ नामी एक शख़्स की चचा ज़ाद बहन थी जो सन् 10 हिजरी में मुसलमान हुआ था असूद से अपने बहनोई शहर के ख़ून का क़सास लेना चाहता था उधऱ क़ैस इब्ने यागूस असूद के गुरूर व नख़वत की वजह से पेच व ताब खाता था , आन हज़रत (स.अ.व.व.) के आमिलों अबुमूसा अशरी वग़ैरा ने उन दोनों को मिला लिया। असूद का फ़िरोज़ और क़ैस का हाल मालूम हुआ तो उसने उन्हें क़त्ल करना चाहा। वह लोग अपनी जान के ख़ौफ से छिप गयेमगर उन लोगों ने असूद की बीवी से जो दरपर्दा रखा। एक रात मौक़ा पाकर फ़िरोज़ और क़ैस असूद के घर के अन्दर घुस गये और उसे ज़बह कर डाला। गर्दन पर खन्जर चलते वक़्त जब असूद के नरखऱ़रे से ग़रगराहट की आवाज़ बुलन्द हुई तो दरबानों ने उसकी बीवी से पूछा कि क्या मामला है उसने कहा कि नबी पर वही नाज़िल हो रही है।

सुबह हुई तो शहर पर इस्लामी परचम लहरा रहा था। और यह ऐलान किया गया कि असूद मारा गया। इस ऐलान को सुन कर सनआ व नजरान के तमाम इलाक़े मुरतदीन से ख़ाली हो गये। आन हज़रत (स.अ.व.व.) आमिल हस्बे साबिक़ अपने अपने इलाक़ों में फिर वारिद हुए और सनआ के आमिल मआज इब्ने जबल मुकर्रर हुये।

दीगर मुदईयाने नबूवत

हुज्जतुल विदा की वापसी के बाद जब सरकारे दो आलम (स.अ.व.व.) की अलालत का सिलसिला शुरू हुआ और उसकी ख़बर इतराफ़ व जवानिब में आम हुई तो इस मौक़े से फ़ायदा उठाते हुए मुख़तलिफ़ क़बाएल में मुतअददिद लोगों ने नबूवत का दावा किया मसलन बनि हनीफ़ा में मुस्लिमा कज़ाब यमामा बनुअसद में तलीहा बिन ख़ुवैलद./सजआ बिन हारिस तभी मा वग़ैरा इब्ने ख़लेदून का बयान है कि हुज्जतुल विदा के बाद असूद केज़मानए खुरूज में मुसलेमा क़ज़्ज़ाब यमामा में और तलीहा बिन ख़्वैलद बनूअसद में नबूवत के मुद्दई हुए लेकिन उनकी सरकूबी को हर तरफ़ से इस्लामी लश्कर निकल पड़ा। मुसलेमा का एक ख़त आन हज़रत (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में इस मज़मून का आया कि मैं तुम्हारे काम में तुम्हारा शरीक हूँ इसलिये ममलिकते इस्लामिया की निसफ़ जम़ीने मेरी और निसफ़ आपकी हैं। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने जवाब में तहरीर फ़रमाया कि सारी ज़मीन अल्लाह की है वह जिसे चाहे उसका वारिस व मालिक बनाये और भलाई आख़ेरात से डरने वालों के लिये है। आन हज़रत (स.अ.व.व.) का यह ख़त लेकर हबीब बिन ज़ैद बिन आसिम गये थे लेकिन मुस्लिमा ने उनके दोनों हाथ और पांव कटवा दिये।

मुख़तलिफ़ वाक़ियात

• रमज़ान सन् 10 हिजरी मे बनी ग़सान और बनि अमीर के लोगों ने इस्लाम कुबूल किया। शव्वाल में सलमान , आजुद और जरश के वफूद मदीने आये और मुसलमान हुए।

• इसी साल हज़रत अली (अ.स.) के हाथ पर बैयत करके हमदान का पूरा क़बीला एक ही दिन में मुसलमान हुआ। इसी साल बनि मुराद और अबदे कैस मुसलमान हुए इसी अशअस बिन क़ैस कन्दी का वफ़द आया और कन्दा के बहुत से लोग मुसलमान हुए और इसी साल कनाना , हज़रमौत , बनि महारिब , बनि मज़हिज , ख़ूलान और तय वग़ैरा के लोगों ने इस्लाम कुबूल किया। तबरी का कहना है कि अदी बिन हातिम का वफ़द भी इसी सन् में आया।

(सन् 11 हिजरी)

जैश उसामा

पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) ने दावते इस्लाम के सिलसिले में हारिस बिन अमीर अज़दी को अफना सफ़ीर बना कर हाकिम मसरा के पास भेजा था मगर रास्ते में बलक़ा के हाकिम शरजील बिन अम्र ग़सानी ने उन्हें ग़िरफ़्तार करके क़त्ल करा दिया आन हज़रत (स.अ.व.व.) के इसकी इत्तेला हुई तो आपने ती न हज़ार का एक लश्कर ज़ैद इब्ने हारिसा , जाफ़र इब्ने अबीतालिब और अब्दुल्लाह इब्ने रवाहा की सरकरदगी में तरतीब दिया और फ़रमायाकि अगर ज़ैद शहीद हो जायें तो अब्दुल्लाह इब्ने रवाहा सिपेह सलाह होंगे। जब यह लश्कर मआन में पहुँचा तो मालूम हुआ कि हरकुल रोम , रोम व शाम की फ़ौजों के साथ बलक़ा में छावनी डाले प़डा है। मुसलमानों को दुश्मनों की कसरत व कूवत का पता चला तो हरासां होकर मेआन में रूक गये और कहने लगे हमें मदीने से मज़ीद कुमक तलब करना चाहिये मगर अब्दुल्लाह इब्ने रवाहा ने लश्कर का हौसला बढ़ाया और कहा कि हमें दुश्मनों की कसरत से मरऊब नहीं होना चाहिये और आगे बढ़कर मुक़ाबिला करना चाहिये। मुसलमानों की हिम्मत बन्धी और उन्होंने क़दम आगे बढ़ा दिये जब बलक़ा के एक क़रिया मशारिफ़ में पहुँचे तो दुश्मन की नक़ल व हरकत को देख कर मौता की तरफ़ मुड़ गे ताकि किसी मुनासिब मुक़ाम पर दुश्मन से बरसरे पैकार हो सकें। जब मौत में पहुँचे तो एक मैदान में सफ़ बन्दी की , दुश्मन ने भी वहां पहुँच कर सफें जमा दीं और मारका कार ज़ार शुरू हो गया। ज़ैद बिन हारसा अलम लेकर लड़ने निकले और शहीद हो गये। उनके बाद ज़ाफर इब्ने अबीतालिब अलम लेकर मैदान में उतरे , किसी की तलवार पड़ी और आप का दाहिना हाथ क़लम हो गया आपने बायें हाथ से अलम संभाला जब वह भी क़ता हो गया तो अलम को सीने से लगाया और ज़ख़्मों से चूर चूर होकर मनसबे शहादत पर फ़ायज़ हुए फिर अब्दुल्लाह इब्ने रवाहा ने अलम संभाला और जंग करते हुए वह भी शहीद हो गये। अब्दुल्लाह के बाद लोगों ने ख़ालिद बिन वलीद को सरदार मुक़र्रर किया उन्होंने थोड़ी देर लडाई को जारी रखा लेकिन जब रात का अंधेरा फेला और जंग रुक गई तो उन्होंने मौका ग़नीमत जानकर रातों रात मैदान खाली कर दिया और सीधे मदीने का रूख़ कर लिया। जब यह शिकस्त ख़ुर्दा लश्कर मदीनामें पहुंचा और लोगों को उनके फ़रार का हाल मालूम हुआ तो मर्द तो मर्द औरतों ने भी मिट्टी उठा उठा कर उनके मुंह फर फेंकना शूरू की और उन्हें भगोडों के नाम से याद किया। यह लोग शर्म के मारे मुंह छिपाते फिरते थे। सलमा बिन हिशाम ने जो इस लश्कर में शरीक थे मस्जिद में आना छोड़ दिया था इसलिय कि जब वह मस्जिद में आते तो लोग कहते कि तुम हो जो अल्लाह की राह से भाग निकले थे। 1

ये वाक़िया जमादुल अव्वल सन् 8 हिजरी मे रूनुमा हुआ था जिसका इजमाली हाल सन् 8 हिजरी के वाक़ियात में आप पढ़ चुके हैं। लेकिन अभी तक शोहदाये मौता के क़ेसास के लिये कोई क़दम नहीं उठाया गया था। शायद पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) किसी मसलेहत की बिना पर उसे अपनी ज़िन्दगी के आख़िरी दिनों के लिये उठा रखना चाहते थे चुनानचे अपनी बीमारी के अय्याम में एक अट्ठारा साला नौजवान उसामा बिन ज़ैद के ज़रे क़यादत आप ने एक लश्कर तरतीब दिया और तमाम मुहाजेरीन व अन्सार को उनकी मातहती में हुकूमते रोम से मुक़ाबिले के लिये जाने पर मामूर किया। इब्ने साद का कहना है किः-

(मुहाजेरीन व अन्सार अव्वलीन में कोई नुमाया फ़र्द ऐसी न थी जिसे इश जंग में शिरकत के लिये न कहा गयचा हो उन लोगों में अबुबकर , उमर बिन ख़त्ताब , अबीदा इब्ने जराह , साद इब्ने अबी विक़ास , साद इब्ने ज़ैद , क़ताबा इब्ने नोमान और सलमा इब्ने असलम इब्ने हुरैश भी शामिल थे।) 1

पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) ने अपनी अलालत के बावजूद अपने हाथों से अलम सज कर उसामा को दिया थो उनके साथ जाने के बजाये मुसलमानों ने उनकी अफ़सरी पर अन्छर बाजियां शूरी कर दीं और खुल कर एतराज़ात करने लगे। किसी ने कहा ये अभी नौ उम्र व नातजुर्बा कार हैं और किसी ने उन्हें गुलाम का बेटा कह कर अपनी फ़ज़ीलत और बरतरी का इज़हार किया। हुजूरे अकरम (स.अ.व.व.) के कानों में जब उनकी नुकता चीनियों की सदायं पहुँची तो आप बुख़ार की हालत में सर पर पट्टी बाँधें हुए बाहर आये और फ़रमाया-

अगर तुम लोगं उसामा की अमारत पर मोतरिज़ हो तो

उस से पहले भी उसके बाप की अमारत पर तानाज़नी कर

चुके हो ख़ुदा की क़सम वह अमारत का सज़ावार था और

मेरी नज़रों में दूसरों से ज़्यादा पसन्दीदा था और उसके बाद

ये भी मेरी नज़रों में दूसरों से ज़्यादा पसन्दीदा और अज़ीज़ है। 2

उसके बाद घर के अन्दर तशरीफ़ ले गये और आप पर मर्ज़ को ग़लबा हुआ मगर इस हालत में भी आपकी ज़बाने मुबारक पर यही फ़िक़रा था कि उसामा के लश्कर को जल्दी भेजो , जल्दवा रवाना करो।

उसामा आपकी मिज़ाज़ पुरसी के लिये आये और उन्होंने कहा या रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) ! आपकी सेहत के बाद लश्कर की रवानगी बेहतर होगी , फ़रमाया तुम लश्कर को लेकर फ़ौरन चले जाओ इस अरम में ज़रा भी ताख़ीर मुनासिब नहीं है। उसामा वहां से उठ खड़े हुए और जाने की तैयारियों में लग गये। उधर पैगम़्बर (स.अ.व.व.) पर मर्ज़ का मज़ीद दवाब बढ़ गया और ग़शी की क़ैफियत तारी हो गीई। मगर जब तबियत क़दरे संभली तो फिर यही पूछा कि क्या लश्कर रवाना हो गया ? बताया गया कि अभी जाने की तैयारियां हो रही हैं। ये सुनकर हुजूर की पेशानी पर नागवारी की शिकनें उभरी और फ़रमाया कि उसामा के लश्कर को जल्द रवाना करो , खुदा लानत करे उन पर जो इस लश्कर में शरीक न हों।)

आन हज़रत (स.अ.व.व.) की मुसलसल ताक़ीद व तहदीद पर उसामाका लश्कर रवाना तो हुआ मगर मदीने से तीन मील की दूरी पर जर्फ़ नामी एक मुक़ाम पर उसे ठहर जाना पड़ा क्योंकि पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की सख़्त ताकी़द के बावजूद हज़रत अबुबकर और हज़रत उमर वग़ैरा इस में शरीक नहीं हुए थे। इतने में उसामा को हज़रत अयशा का ये पैग़ाम मिला कि आन हज़रत (स.अ.व.व.) की हालत नाजुक है लेहाज़ा लश्कर को पलट आना चाहिये।

पैग़म्बर (स.अ.व.व.) का हुक्म अहले इस्लाम के नज़दीक हुक्मे इलाही का तरजुमान होता है और उसकी मुख़ालेफ़त हुक्मे इलाही की मुख़ालेफ़त है मगर उसके बावजूद यह ताक़ीदी फ़रमान हवा में उड़ा दिया जाता है और मामूरीन में से कोई इस पर अमल पैरा होता नज़र नहीं आता। काग़ज़ व क़लम के तलब करने पर तो हिज़यान की आड़ में ख़िलाफ़ वर्ज़ीं का जवाज़ पैदा कर लिया गया मगर इश हुक्म की मुख़ालेफ़त का क्या जवाज़ है ?

इस जैश की तशकील की मसलहत और उसके जेल में ख़िलाफ़ वर्ज़ी के अलल व असबाब को समझने के लिये ज़रुरी है कि इस वाक़िये के पस मन्ज़र का जाएज़ा लिया जाये और इन हालात का जाएज़ा लिया जाये जिन हालात के तहत हज़रत रसूल खुदा (स.अ.व.व.) ने मुहाजेरीन व अन्सार को उसामा के ज़ेरे क़यादत मदीने से रवानगी का हुक्म दिया था।

तारीख़ बताती है कि हुज्जातुल विदा के बाद से पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की तबीयत नासाज़ रहने लगी थी और यही बीमारी मौत का पेशे ख़ेमा बनी। आन हज़रत (स.अ.व.व.) हुज्जातुल विदा और ग़दीरे खुम के खुतबों में यह ख़बर दे चुके थे कि मेरी रेहलत का ज़माना क़रीब है और उसके बाद भी अक़सर व बेशतर आपकी ज़बान से यह कलेमात सुने गये जो एक तरह से मौत का वाज़े ऐलान थे और सहाबा भी समझ रहे थे कि रहमतों का वह आसमान को तेईस साल से उनके सरों पर सायाफ़ेगन था पेवन्दे ख़ाक होने वाला है। चुनानचे अब्दु्ल्लाह इब्ने मसऊद कहते हैं कि हमारे पैगम़्बर (स.अ.व.व.) ने क महीने पहले अपने रेहलत की ख़बर दे दी थी। 2

सरकारे दो आलम (स.अ.व.व.) एक तरफ़ अपने सफ़रे आख़ेरत की ख़बर दे रहे थे और दूसरी तरफ़ ऐसे फ़ितनों के रूनुमा होने की पेशिनगोईयां भी फरमां रहे थे जो शबे तारीक की तरह उफ़क़े इस्लाम की तरफ़ बढ़ रहे थे और दीने हक़ की नूरानी फ़ज़ा पर मोहीत हो जाना चाहते थे चुनानचे अपनी ज़िन्दगी के आख़िरी अय्याम में एक रात जन्नतुल बकी में तशरीफ़ ले गये , अहले कुबूर के हक़ मं दुआये मग़फ़ेरत की और उन पर सलाम के बाद फ़रमाया- (जिस हाल में जिन्दा लोग हैं उसे देखते हुए यह हाल तुम्हें मुबारक हो , अब तू काली रातो की तरह फ़ितने पै दर पै बढ़ते चले ा रहे हैं और जो फ़ितना उठेगा वह पहले फ़ितने से बत्तर होगा। 1

इन हालात में कि एक तरफ़ सफ़र आख़रत का वक़्त क़रीब तर है और दूसरी तरफ़ फ़ितने सर उठाते नज़र आ रहे हैं , उन फ़ितनों का इन्सेदाद ज़रुरी था या मौता के उन शहीदों का क़ेसास , जिन्हें शहीद हुए दो ढ़ाई साल का अरसा गुज़र चुका था और इस अर्से में इधर कोई तवज्जो की गयी और न कोई अमली इक़दाम किया गाय अगर दुश्मन हमला आवर होता तो फ़ौजी इक़दाम बहरहाल ज़रुरी था मगर उनमें से कोई एक बात भी न थी। न दुश्मन ने चढ़ाई की थी न मुल्क गीरी की हवस का सवाल था अचानक उसकी अहमियत का इतना एहसास क्योंकि जब ग़शी से आँख खुलती है तो बारबार यही फ़रमाते हैं कि जिस तरह बन पड़े लश्कर को भेज दो और मैं अपनी ज़िन्दगी में इस बात से मुतमईन हो जाऊँ कि लश्कर जा चुका है। फिर इश ताकीद ने तहदीद की सूरत इख़तेयार कर ली और फ़रमाया कि जो लश्कर में शरीक होकर जाने से गुरेज़ करे वह अल्लाह की लानत का सज़ावार है। तारीख़ गवाह है कि इससे पहले हुजुरे अकरम (स.अ.व.व.) ने यह तहदीद लेहज़ा इख़्तेयार नहीं किया था बल्कि जंग व जेहाद जाने मे अगर किसी ने उज्र किया तो उसका उज्र। मन्ज़ूर कर लिया और अगर किसी ने कोई मजबूरी ज़ाहिर की तो उसे फ़ुर्सत दे दी , मगर यहां तो बस एक ही अटल फैसला है कि मदीना खाली करो और चले जाओ। इस फ़ेसले में न तो रद्दो बदल की गुँजाइश है और न तरमीम की हालाँकि ज़िन्दगी के आख़िरी लम्हात में हर इन्सान की यह ख़्वाहिश होती है कि इसके एहबाब व असहाब और अजीज़ व अक़रूबा सब इसके गिर्द जमा रहे , तज़हीज़ व तकफ़ीन में हिस्सा लें और नमाज़ जनाज़े में शरीक हों।

इसकी वजह सिर्फ़ यह थी कि आन हज़रत (स.अ.व.व.) अपने हल्क़े बगोशों की तरफ़ से मुतमईन न थे क्योंकि कुछ लोग आपकी ख़बर अलालत सुन कर इस्लाम से मुनहिरफ़ हो रहे थे और कुछ लोगों के तौर तरीक़े यह बता रहे थे कि वह इक़तेदार की राहे हमवार करने की फ़िक्र में लगे हैं।

पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) मुख़तलिफ़ मौक़े पर और खुसूसन ग़दीरे खुम के मौक़े पर यह ऐलान कर चुके थे कि उनके बाद अली (अ.स.) ख़लीफ़ा और वलीए अमर होंगे मगर इसके साथ कुछ मुश्किलात भी आपके पेश नज़र थीं , आप देख रहे थे कि कुछ लोगों की नज़रों में अली (अ.स.) का मामूली इम्तेया़ज़ भी कांटे की तरह खटकता है और वह बात बात पर शिकायतों का दफ़्तर खोल देते हैं। यक़ीनन यह लोग दावते जुलअशीरा के अहद व पैमान और ग़दीरे ख़ुम के ऐलानको अमली शक्ल में देख कर मजाहिम होंगे और जिनका बूढों ने आपकी ज़िन्दगी में उसामा की क़यादत को उनकी नौ उम्री की वजह से तस्लीम नहीं किया वह हज़रत अली (अ.स.) को किस तरह बिलाचून व चरा नुमाइन्दा इस्लाम और ख़लीफ़ा रसूल तसलीम करेंगे ? क्या उनकी कम उम्री पर एतराज़ न होगा ? हालाँकि पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने एक नौजवान को उन बुजुर्गों पर अमीर व क़ायद मुक़र्रर करके इस एतराज़ की गुंजाइश ख़त्म कर दी थी फिर भी हज़रत अली (अ.स.) इससे बच न सके और कहा गाय कि वह अभी जवान है और ख़िलाफ़त व अमारत के लिये कोई उम्र रसीदा और बूढ़ा आदमी ही मजूं हो सकता है।

अगर ग़ौर व फ़िक्र की निगाहों से देखा जाये तो इस इमर में कोई हक़ व शुबहा नहीं रहता कि लश्करे उसामा की तशकील में जहां यह मक़सद कार फ़रमां था कि शोहदाये मौता का इन्तेका़म लिया जाये वहां यह अहम मक़सद भी मुज़मिर था कि जिन लोगं से यह अन्देशा हो सकता था कि वह हज़रत अली (अ.स.) की ख़िलाफ़त की अमली तक़मील में मज़ाहिम होंगे उन्हें इतने अरसे के लिये मदीने से बाहर भेज दिया जाये कि जब वह पलट कर आयें तो ख़िलाफ़त अपने असल मरकज़ पर मुस्तक़र हो चुकी हो और तमाम रख़ना अन्दाजियों का सद्देबाब हो चुका हो। हालाँकि सराकेर दो आलम (स.अ.व.व.) बखूबी इस अमर से भी वाक़िफ थे कि यह लोग जाने वाले नहीं है मगर पैग़म्बर (स.अ.व.व.) होने की हैसियत से बहरहाल आपका यह फ़र्ज़े मनसबी था कि ख़ामोश रहने के बजाये मुसलसल जद्दो जहद करते रहें और लोगों की नाफ़रमानी व ख़िलाफ़वर्ज़ी से घबरा कर सिपर अन्दाख़्ता न हों। चुनानचे आन हज़रत (स.अ.व.व.) का यह इसरार रायेगा नहीं गया कम अज़ कम इससे अतना तो ज़रुर हुआ कि लोगों के दिलों में छिपी हुई वहसे इक़तेदार नुमांया होकर सामने आ गयी और उनके इस इक़तेदार की शरयी हैसियत भी वाज़े हो गयी। इस तरह यह एक आसाबी जंग थी झो अन्दर ही अन्दर लड़ी जा रही थी। उधऱ पैग़म्बर (स.अ.व.व.) उन्हें लश्कर के साथ जाने के लिये कहते थे इधर वह लोग जाते और कभी मिजाज़ पुरसी के हीले से , कभी सामाने जंग की फ़राहमी के बहाने से फिर पलट आते। ग़र्ज़ की पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने तमाम कोशिशें सर्फ कर दीं मगर उन्हें न जाना था न गये। यहां तक कि हुजुरे अकरम (स.अ.व.व.) इस दुनिया से रूख़सत हो गये।

पैग़म्बरे अकरम (स.अ.व.व.) की ज़िन्दगी में तो उनका हुक्म हवस हुक्मरानी के बोझ तले दब कर रह जाता है और बार-बार ताक़ीद व तहदीद के बावजूद बोझल क़दमों में जुन्बिश पैदा नहीं होती मगर जब ख़िलाफ़त का मसला हल कर लिया जाता है तो सब से पहले लश्करे उसामा की रवानगी का इन्तेजाम किया जाता है ताकि इस तरह हुक्मे रसूल (स.अ.व.व.) की नाफ़रमानी का धब्बा भी धुल जाये और यह तअस्सुर भी दिया जा सके कि हुक्मे रसूल (स.अ.व.व.) का इस कद्र पास व लेहाज़ था कि इक़तेदार की बाग डोर हाथ में लेते ही फ़ौरन लश्कर रवाना कर दिया गया। अगर चे एक कसीर तादाद ने इसकी मुख़ालेफ़त भी की थी मगर हज़रत अबुबकर का इसरार था कि लश्कर को ज़रुर रवाना होना चाहिये और जिसे चन्द दिन पहले इमारत व सरदारी का अहल नहीं समझा गया था उसे अहल समझ लिया गया। अन्सार की राय ये थी कि लश्कर की रवानगी मुलतवी कर दी जाये और अगर मुलतवी न की जाये तो उसामा के बजाये किसी मोअम्मर शख़्स को लश्कर की अमारत व सरदारी सुपुर्द कर दी जाये चुनानचे हज़रत उमर ने अन्सार के ख़्यालात की तरजुमानी करते हुए हज़रत अबुबकर से कहा कि उसामा को बर तरफ़ कर दिया जाये जिस पर अबुबकर ने उमर की दाढ़ी पर हाथ डाल दिया और झिटकते हुए कहा किः (ऐ पिसरे ख़त्ताब! इसे रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) ने सरदार मुक़र्रर किया है और तू कहता है कि मैं उसे अलहैदा कर दूँ।)

अगर लश्कर की रवानगी में हुक्मे रसूल (स.अ.व.व.) का एहतराम मलहूज़ था तो एहतराम का तक़ाज़ा यह भी था कि उसामा की माज़ूली का मुतालिबा न किया जाता इस लिये कि वह रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) के मुन्तख़ब करदा थे और रसूल (स.अ.व.व.) ने उन लोगों से ख़फ़गी का भी इज़हार कियचा धा जिन्होंने उनकी अमारत पर नुक्ता चीनी की थी। अगरचे हज़रत उमर अन्सार के पैग़म्बर थे मगर इस माज़ूली में वह भी उनके हमनवा थे। इसलिये कि वह अगर हमनवा न होते तो वह अन्सार के पैग़ाम्बर बन कर आने के बजाये खुद उनसे यह कह देते कि उसामा रसूल (स.अ.व.व.) के मुक़र्रर करदा हैं तुम लोग उनकी माज़ूली का मुतालिबा करने वाले कौन हो ? या यह भी कह सकते थे कि तुम लोग ख़ुद अबुबकर के पास चले जाओ और उनसे कहो कि उसामा बो बर तरफ़ कर दें और हज़रत अबुबकर भी हज़रत उमर की दाढ़ी पर हाथ साफ़ करने के बजाये अन्सार पार बिगड़ते।

बहर हाल अबुबकर के कहने सुनने से उसामा की अमारत तो कर ली मगर फिर भी कुछ लोग उनसे किनारा कश रहे। जाहिर है कि हज़रत अबुबकर हुकूमत की ज़िम्मे दारियों की वजह से न गये होंगे कि क्या उसामा को यह हक़ हासिल था कि जिन लोगों के रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) ने नाम ले लेकर मामूर फ़रमाया हो वह उन्हें इजाज़त दे कर रूखसत कर दें ? जबकि उनकी हैसियत सिर्फ़ एक सिपेहसलार की थी और वह क़तअन इस के मजाज ने थे कि जिसे चाहें साथ लें जिसे चाहें छोड़ दें।

इमामते नमाज़

दौराने अलालत जब तक पैगम़्बरे अकरम (स.अ.व.व.) की कूवत व तवानाई साथ देती रही आप मस्जिद में बराबर आते जाते और नमाज़ पढ़ाते रहे लेकिन जब मुर्ज़ ने इन्तेहाई शिद्दत इख़तेयार कर ली तो यह सिलसिला बन्द करना प़ड़ा। चुनानचे दोशन्बे के दिन जब सुबह की अज़ान हके बाद हज़रत बिलाल ने हाज़िर होकर नमाज़ के लिये पैगम़्बर (स.अ.व.व.) को मुतावज्जे किया तो आपने फरमाया कि मैं अपने अन्दर इतनी सक्त नहीं पाता कि मस्जिद तक चल कर नमाज़ पढा सकूँ लेहाज़ा किसी शख़्स से कहो कि वह नमाज़ पढ़ा दे। चुनानचे आप मर्ज़ की सख़्ती की परवा न करते हुए फ़ौरन उठ खड़े हुए कि कहीं ऐसा न हो कि उनमें से कोई नमाज़ पढ़ा दे। और यह इमामत ख़िलाफ़त का पेश ख़ेमा बन जाये। फ़ज़ल इब्ने अब्बास और हज़रत अली (अ.स.) के शानों पर हाथ रखा और सहारा लिये हुए मस्जिद में तशरीफ़ लाये। देखा कि हज़रत अबुबकर मेहराब की तरफ़ बढ़ रहे हैं आपने उन्हें हाथ के इशारे से पीछे हटने को कहा और ख़ुद आगे बढ़कर नमाज़ पढ़ाई।

वाक़िया सिर्फ़ इतना ही है मगर इसे बुनियाद करार दे कर वह क़िस्सा गढ़ लिया गया कि पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने हज़रत अबुबकर को नमाज़ पढ़ाने पर मामूर फ़रमाया था और ख़ुद उनके अक़ब या पहलू में बैठ कर नमाज़ पढ़ी और इसी बिना पर उन्हें मनसबे ख़िलाफ़त के लिये मुनतख़ब किया गया क्योंकि पैगम़्बर (स.अ.व.व.) जिसे नमाज़ के मसले में आपना नायाब क़रार दें वही एहकामे शरीया के निफ़ाज़ व इजरा में उनका ख़लीफ़ा जानशीन हो सकता है।

अब देखना यह है कि हज़रत अबुबकर ख़ुद रसूल (स.अ.व.व.) के मुक़ाबले पर खड़े हो गये थे या रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) ने उन्हें हुक्म दिया था ? और अगर यह फ़र्ज़ कर लिया जाये कि आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने उन्हें दिया तो क्या नमाज़ की इमामत दलीले ख़िलाफ़त बन सकती हैं ?

इस ज़ैल में जो रवायात तारीख़ व अहादीस की किताबों में मरकूम हैं उनमें इतना तज़ाद है कि उनकी सेहत पर यक़ीन व एतमाद नहीं किया जा सकता क्योंकि एक रवायत का मुद्दआ कुछ है और दूसरी रवायत इसके ख़िलाफ़ कुछ और कहती है चुनानचे किसे सही माना जाये और किसे ग़लत कहा जाये। हैरत यह है कि इन मुतज़ाद रवायात में अकसर हज़रत आयशा से मरवी है। इन रवायात का तज़ाद ही इसल दावे को कमज़ोर साबित करने के लिये बहुत काफ़ी था चे जाए कि वह नमाज़ के मसले उसूल व ज़वाबात के भी मुनाफी है। इस मुक़ाम पर चन्द रवायतें दर्ज की जाती हैं ताकि अरबाबे फिक्र व नज़र खुद ही फ़ैसला कर लें कि उन मुतजाद रवायात से कहां तक असबाते मुद्दुआ में मदद ली जा सकती है ?

इब्ने हब्शाम का ब्यान है किः-

(बिलाल ने आन हजरत (स.अ.व.व.) से नमाज़ के लिये अर्ज़ किया तो अब्दुल्लाह बिन जेमा से आपने फ़रमाया कि किसी से कहो कि वह नमाज़ पढ़ा दे। अब्दुल्लाह कहते हैं कि मैं बाहर निकला तो देखा कि लोगों में हज़रत उमर मौजूद हैं मैंने उमर से कहा कि आप नमाज़ पढ़ा दीजिये जब उन्होंने तकबीर कही और उनकी आवाज़ बुलन्द हुई तो पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने पूछा कि अबुबकर कहां हैं ? अल्लाह यह नहीं चाहता कि मुसलमानों को उमर नमाज़ पढ़ायें। फिर आपने अबुबकर को बुलवाया मगर वह उस वक़्त आये जब आन हज़रत (स.अ.व.व.) ख़ुद नमाज़ पढ़ा चुके थे फिर अबुबकर ने लोगों को नमाज़ पढ़ाई।)

इस रवायत से मालूम होता है कि आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने इब्तेदा में किसी ख़ास शख्स को नमाज़ के लिये मोअय्यन नहीं किया ब्लकि अब्दुल्लाह पर छोड़ दिया कि वह जिसे चाहे नमाज़ के लिे कह दें और इस उमूमी इजाज़त की बिना पर अब्दुल्लाह ने हज़रत उमर से कह दिया और जब वह नमाज़ शुरू कर चुके तो आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने अबुबकर को नमाज़ पढ़वाने के लिये बुलवा भेजा क्योंकि अल्लाह नहीं चाहता था कि उमर नमाज़ पढ़ायें मगर अबुबकर के आने तक उमर नमाज़ पढ़ा चुके थे और हज़रत अबुबकर ने फिर से नमाज़ पढ़ाई। इस रवायात पर हैरत होती है कि जब आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने अब्दुल्लाह से कह दिया था कि वह किसी से नमाज़ के लिये कह दें और उन्होंने हजरत उमर से कह दिया तो हज़रत अबुबकर के पीछे आदमी दौड़ने की क्या ज़रुरत थी ? और अगर अल्लाह को हज़रत उमर का नमाज़ पढ़ाना गवारा नहीं था तो आन हज़रत (स.अ.व.व.) अब्दुल्लाह को पहले सी यह ताक़ीद फ़रमा देते कि देखो उमर से न कहना क्योंकि अल्लाह की मर्ज़ी उनके ख़िलाफ़ है ऐसी सूरत में न हज़रत उमर को ख़जालत का सामना होता और आदाये नमाज़ की ज़रुरत होती।

इब्ने साद तराज़ हैं-

(जब हज़रत उमर ने तकबीर कही तो रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) ने कहा , नहीं , नहीं फरजन्दे अबुक़हाफ़ा कहां है ? यह सुन कर सफ़ें दरहम बरहम हो गयीं और हज़रत उमर नमाज़ छोड़कर अलग हो गये। रावी कहता है कि अभी हम अपनी अपनी जगह पर थे कि मोहल्लये सक़ से अबुबकर आ गये और उन्होंने आगे बढ़कर नमाज़ पढ़ा दी।)

इर रवायात से यह मालूम होता है कि हज़रत रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व.) ने हज़रत अबुबकर को पैग़ाम भेजा था कि वह नमाज़ पढ़ायें और जब वह नमाज़ के लिये खडे हुए तो आन हज़रत ख़ुद भी दो आदमियों का सहारा लेकर दाख़िले मस्जिद हुए और हज़रत अबुबकर के पहले में बैठकर नमाज़ पढ़ी। आन हज़रत (स.अ.व.व.) का अबुबकर को इमामत पर मामूर करना और फिर ख़ुद भी बिला तवक़्कुफ मस्जिद में चले आना जबकि ख़ुद से चलने फिरने की सकत न थी ज़ेहन में ये शुबहा पैदा किये बग़ैर नहीं रहता कि क्या पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने उन्हें कहलवाया था या वह अज़खुद आ गये थे ? अगर पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने कहलवाया था तो फिर मर्ज़ की शिद्दत के बावजूद खुद मस्जिद में आने की ज़हमत क्यों गवारा की ? और अगर पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने कहलवाया नहीं था तो अबुबकर मेहराबे मस्जिद तक कैसे पहुँच गये ? रवायात तो यह नहीं बताती बराहे रास्त पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने ख़ुद उनसे कहा था। कहीं ऐसा तो नहीं कि जिस तरह अब्दुल्लाह इब्ने ज़ोमा ने हज़रत उमर से कह दिया था उसी तरह किसी शख़्स ने उनसे भी कह दिया हो और वह मुसल्ले पर खड़े हो गये हों और जब पैग़म्बर (स.अ.व.व.) को इत्तेला हुई हो तो वह दो आदमियों का सहारा लेकर मस्जिद में हो ताकि ख़ुद इमामत के फ़राएज़ अन्जाम दें वरना उसके अलावा बीमारी की हालत में मस्जिद में आने की वजह और क्या हो सकती है। इस रवायात का यह जुज़ कि अबुबकर रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) के मुक़तदी थे और दसूरे लोग अबुबकर की इक़तेदा कर रहे थे , किस क़दर मज़हका खेज़ और बेमानी है। इस लिये कि अगर हज़रत अबुबकर इमाम थे तो फिर वह मामून नहीं हो सकते और अगर रसूले अकरम (स.अ.व.व.) इमाम थे तो फिर अबुबकर सिर्फ़ मुक़तदी व मामूम ही हो सकते हैं क्योंकि एक ही नमाज़ में एक ही शख़्स इमाम भी हो और मामूम भी यह बात समझ में आने वाली हरगिज़ नहीं है वरना हर पिछली सफ़ वालों को अगली सफ़ वालों की इक़तेदा जायज़ होनी चाहिये।

तबरी एक रवायत यह भी लिखते हैं किः-

(आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने फ़रमाया कि किसी को भेज कर अली (अ.स.) को बुला दो। हज़रत आयशा ने कहा , काश आप अबुबकर को बुलाते , हफ़सा नेकहा कि काश आप हज़रत उमर को बुलाते। इतने में वह सब आन हज़रत (स.अ.व.व.) के पास जमां हो गे तो आपने फ़रमाया , तुम लोग चले जाओ अगर मुझे ज़रुरत होगी तो मैं तुम्हें बुलवा लूँगा , चुनानचे वह उठ कर चले गये। फिर रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) ने पूछा क्या नमाज़ का वक़्त हो गया है फ़रमाया कि अबुबकर को कहो कि वह नमाज़ पढ़़ायें। हज़रत आयशा ने कहा वह नर्म दिल हैं आप हज़रत उमर को हुक्म दें। फ़रमाया कि अच्छा तो फिर उमर को दो , हज़रत उमर ने कहा मैं अबुबकर के होते हुए सबक़त नहीं कर सकता। उस पर हज़रत अबुबकर आगे बढ़े इतने में रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) ने कुछ इफ़क़ा महसूस किया तो हुजूरे से बाहर आये अबुबकर ने आपकी आहट महसूस की तो पीछे हटना चाहा आपने उनके दामन को ख़ीचा और जहां खड़े थे वहीं खड़े रहने दिया और ख़ुद बैठ गये जहां से अबुबकर ने केरअत छोड़ी थी वहीं से आपने केरअत शुरू कर दी।) 1

इस रवायत में चन्द बातें ऐसी भी आ गयी हैं जिन से असल वाक़िये को समझने में मदद ली जा सकती है। एक बात तो बिल्कुल वाज़े और अया है कि आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने हज़रत अली (अ.स.) को बुलाने की ख़्वाहिश का इज़हार किया। मगर किस लिये ? इस सिलसिले मे रवायत ख़ामोश है। लेकिन रवायत का आख़िरी हिस्सा कि पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ने पूछा कि क्या नमाज़ का वक़्त हो गया है जिस का जवाब हां में दिया गया इससे इतना तो मालूम हो गया कि हज़रत अली (अ.स.) को इस वक़्त बुलाया गया था जब नमाज़ का वक़्त हो चुका था और नमाज़ के वक़्त तलब करने का मक़सद इसके सिवा और क्या हो सकता है कि उनसे नमाज़ के लिये कहा जाये। ये इतनी साफ़ बात थी कि हज़रत आयशा और हफ़ज़ा भी समझ गयीं कि उन्हें नमाज़ पढ़ाने के लिये कहा जाये। ये इतनी साफ़ बात थी कि हज़रत आयशा और हफ़ज़ा भी समझ गयी कि उन्हें नमाज़ पढ़ाने के लिये बुलाया जा रहा है। इसी बिना पर उन्होंने हज़रत अबुबकर और हज़रत उमर का नाम लिया कि काश उन्हें बुलाया जाता। अगर हुज़ूरे अकरम (स.अ.व.व.) ने हज़रत अली (अ.स.) को सिर्फ़ मुलाक़ात या किसी ज़ती काम के बुलाया होता तो कोई वजह न थी कि दरमियान में अबुबकर और उमर को हायल किया जाता उन लोगों का नाम सिर्फ़ इस सूरत में लिया जा सकता था जब बुलवाने का मक़सद और काम की नौवियत वाज़ेह और और वह चाहती हो कि इस काम की अन्जाम देही का सेहरा उनके बाप के सर बन्धे। ये चीज़ भी नज़र अन्दाज़ नहीं की जा सकती कि इधर उन लोगों का नाम लिया जाता है और उधर वह पहुँच जाते है। इस बरवक़्त आमद से अगर ये नतीजा अखज़ किया जाये तो ग़लत न होगा कि वह आन हज़रत (स.अ.व.व.) के मर्ज़ की शिद्दत देखर यह समझ रहे थे कि आप खु़द तो नमाज़ के लिये मस्जिद में पहुँचे न सकेंगे यह ख़िदमत किीस और ही के सुपुर्द करेंगे लेहाजा़ नमाज़ के व्क़त आस पास ही रहना चाहते ताकि आयशा या हफ़सा की तरफ़ से इशरा मिलते ही फ़ौरन हजूर (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में हाज़िर हो जायें और आप हमें नमाज़ पढ़ने की इजाज़त दे दें ताकि इस बुनियाद अमरत पर ख़िलाफ़त का महल आसानी से तामीर किया जा सके। मगर हुज़ूर (स.अ.व.व.) उन्हें ह कहकर रूख़सत कर देते हैं कि तुम्हारी ज़रूरत नहीं है लेहाज़ा तुम लोग चले जाओ , जब ज़रुरत होगी तो तुम्हें बुला लेंगे। इन लफ़ज़ों से साफ़ जाहिर है कि आन हज़रत (स.अ.व.व.) उस वक़्त तख़लिया चाहते थे ताकि जिस मक़सद के लिये अली (अ.स.) को बुलवा भेजा है उसमें दख़ल अन्दाज़ी न होने पाये। अगर आन हज़रत (स.अ.व.व.) यह चाहते कि हज़रत अबुबकर नमाज़ पढ़ायें तो उसी वक़्त उनसे कह देते कि तुम नमाज़ पढ़ा देना जबिक नमाज़ का वक़्त भी हो चुका था और वह मौजूद थे मगर उनसे आप इशारतन व कनायतन भी कुछ नहीं कहते और उधर वह हुजरे से बाहर निकलते हैं और उन्हें पैग़ाम मौसूल होता है कि वह नमाज़ पढ़ायेंगे। इस मुक़ाम पर यह सवाल पैदा होता है कि रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) ने उनसे ख़ुद क्यों न कह दिया , दूसरों से कहलवाने में क्या मसहलत थी ? और जिससे कहलवाया गया वह कौन था ? तो इसका जवाब अलावा उसके और क्या हो सकता है कि उन्होंने कहा गया और न कहलवाया गया बल्कि जिसने उनका नाम पेश किया था उसी ने उनसे कहलवा भी दिया होगा।

इस मौक़े पर हज़रत आयशा ने हज़रत अबुबकर की नर्म दिली का अज़्र करके हज़रत उमर का नाम लिया और रसूल उल्लाहग (स.अ.व.व.) से यह भी कहा कि उन्हें कह दीजिये कि वह नमाज़ पढ़ाये। अगर हक़ीक़तन वह यही चाहती थी कि हज़रत अबुबकर के बजाये हज़रत उमर नमाज़ पढ़ायें तो जब आन हजरत (स.अ.व.व.) ने हज़रत अली (अ.स.) को बुलाने की ख़्वाहिश ज़ाहिर की थी उस वक़्त हज़रत अबुबकर का नाम ही न लिया होता मगर उस वक़्त तो यह कहना कि काश अबुबकर को बुलवाया होता और अब उनकी नर्म दिली का उज़्र करके हज़रत उमर का नाम पेश कर दिया जाता है। इससे ज़्यादा हैरत में डाल देने वाली बात यह है कि आन हज़रत (स.अ.व.व.) भी आयशा की हाँ में हाँ मिलाकर कह देते हैं कि अच्छा उमर ही से कह दो कि वह नमाज़ पढ़ायें हाँलाँकि अब्दुल्लाह इब्ने ज़ोमा की रवायत में गुज़रत चुका है कि जब आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने उमर की सदाये तकबीर सुनी तो बर अफ़रोख़ता हो गये और फ़रमाया कि उनकी इमामत न अल्लाह को पसन्द और न मुसलमानों को गवार है लेकिन इस रवायत की रू से बड़ी खुशी के साथ इजाज़त दी जा रही है। अब किसको सही समझा जाये और किसकोग़लत। यह तो हो नहीं सकता कि जिसकी इमामत से अल्लाह बेज़ार हो उसको आयशा की सिफ़ारिश पर पैग़म्बर (स.अ.व.व.) इजाज़त दे दें। और जब हज़रत उमर से कहा जाता है कि आप नमाज़ पढ़ा दें तो वह कहते हैं कि हज़रत अबुबकर के होते हुए मैं कैसे नमाज़ पढ़ा दूँ। यह इस अमर का अमली एतराफ़ है कि फ़ाज़िल पर मफ़़ज़ूल को फ़ौकियत नहीं दी जा सकती तो इमामते नमाज़ में ऐसे तस्लीम कर लेने के बाद ख़िलाफ़त में नज़र अन्दाज़ करने का क्या जवाज़ हो सकता है ? इस मौक़े पर यह बात किसी मसहलत पर मुबनी होगी वरना पहली रवायत की बिना पर जब अब्दुल्लाह ने उनसे नमाज़ पढ़ाने को कहा था तो उन्होने यह कहा कि अबुबकर आते ही होंग दो मिनट उनका इन्तेज़ार कर लो , बल्कि वह फ़ौरन तैयार हो गये यह दूसरी बात है कि पढ़ी पढ़ाई नमाज़ न पढ़ने के बराबर होगी या बीच में अधूरी छोड़ना पड़ी। और रवायत की रू से उन्होंने हज़रत अबुबकर पर सबक़त मुनासिब नहीं समझी और उन्होंने आगे खड़ा कर दिया मगर वह नमाज़ के लिये खड़े ही हुए थे कि पैग़म्बर (स.अ.व.व.) भी पहुँच गये। चन्द लम्हों पहले तो आपने अपनी मजबूरी का इज़हार फ़रमाया था फिर क्यों चले आये ?

क़रीने क्यास यह बात नज़र आती है कि हज़रत अली (अ.स.) की तबली पर कुछ लोगों को यह ख़दशा हुआ कि पैग़म्बर (स.अ.व.व.) कीहं उनसे नमाज़ के लिये न कह दें। उन्होंने पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की तरफ़ से आज़ ख़ुद अबुबकर से कह दिया कि आप नमाज़ पढ़ाये और जब वह दूसरों के कहने से ख़ड़े हो गये तो पैग़म्बर (स.अ.व.व.) उन्हें रोकने के लिये जिस तरह भी बन पड़ा मस्जिद में तशरीफ़ लाये और उन्हें हटा कर ख़ुद नमाज़ पढ़ाई।

इस रवायत में बड़ी चाबुकदस्ती से यह जुमला भी दर्ज कर दिया गया है कि आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने वहां से कराअत शुरू की जहां से अबुबकर ने छोड़ी थी ताकि उनकी नमाज़ रसूल (स.अ.व.व.) की नमाज़ से जु़डी रहे और यह नमाज़ भी हज़रत उमर की नमाज़ की तरह कलअदम न समझी जाये मगर यह बात समझ में न आई कि क़राअत को बीच से शुरू करने से क़राअत न तमाम रहेग और कराअत के नाक़िस व नातमाम होने की सूरत में नमाज़ ही सही नहीं होती।

मज़कूरा रवायतों से मिलती जुलती एक रवायत सही बुख़ारी 1 में भी मरक़ूम है लेकिन इस इज़ाफ़े के साथ कि रसूले अकरम (स.अ.व.व.) ने हज़रत अयशा को युसूफ़ वलियां करार दिया है और जिस के बारे में साहबे सीरत हलबिया का कहना है कि आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने आयशा को (युसुफ़ वालिया) इसलिये कहा कि जिस तरह ज़ुलैखां ने ज़नाने मिस्र को अपने यहां ज़ियाफ़त के लिये जमा किया था हालाँकि इस इजतेमा का मक़सद जियाफ़त न था बल्कि वह ये चाहती थीं कि मिस्र की औरतें हजरत युसुफ को दखकर उन्हं मोहब्बत के मामले में मजबूर समझें इसी तरह हज़रत आयशा दिल दिल से तो यह चाहती थी कि हज़रत अबुबकर नमाज़ पढ़ायें और ज़ाहिर यह करती थी कि वह उनकी इमामत की ज़रा भी ख़्वाहिश मन्द नहीं है। जिस तरह ज़ुलैख़ा के मामे में जाहिर कुछ था बातिन कुछ इसी तरह यहां भी ज़ाहिर में बेनियाज़ी थी और बातिन में ख़्वाहिश व तलबगारी। जैसा कि शुम्सुल ओलमा ड़िप्टी नज़ीर अहदम साबह ने तहरीर फ़रमाया है कि आय़शा दिल से बाप की इमामत और ख़िलाफ़त सभी कुछ चाहती थी।

बहर हाल , इन रवायात और उनके बाहमी तज़ाद को देख कर क़तअन इस पर एतमाद नहीं किया जा सकता कि आन हजरत (स.अ.व.व.) हज़रत ने अबुबकर को नमाज़ पढ़ाने पर मामूर किया था और न उनके मामूर किये जाने का सवाल पैदा होता था क्योंकि उन्हीं दिनों में आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने हज़रत अबुबकर और हज़रत उमर को दीगर सहाबा के साथ उसामा की मतहती में मदीने से बाहर निकाल कर लश्कर कशी का हुक्म दिया था और ज़िन्दगी के आख़िरी लम्हों तक ताक़ीद पर ताकीद फ़रमाते रहे थे। फिर यह क्यों कर तसव्वुर किया जा सकता है कि एक तरफ़ तो सरकारे दो आलम (स.अ.व.व.) ने उन्हें मदीने छोड़ने का हुक्म दें और दूसरी तरफ़ उन्हें मदीने ही मं नमाज़ पढ़ाने पर मामूर फ़रमायें। यह इमामत का शाख़साना इसलिये ख़ड़ा किया गया है कि हज़रत अबुबकर की ख़िलाफ़त की सेहत पर दलील क़ायम की जा सके। इब्ने हजर मक्की ने तो इस इमामत को अबुबकर की ख़िलाफ़त पर नस का दर्जा दे दिया है चुनानचे वह फरमाते हैं कि इस इमामत की बिना पर तमाम ओलमा इस के क़ायल हैं कि हज़रत अबुबकर की ख़िलाफ़त नस्सी थी। 2

अगर वाक़ियन आन हज़रत (स.अ.व.व.) इससे अबुबकर की ख़िलाफ़त पर नस करना चाहते तो ज़ोफ़ व नक़ाहत के आलम में मस्जिद में आने और अबुबकर को हटा कर नमाज़ पढ़ाने या उनके पहलू में बैठ कर नमाज़ पढ़ने की क्या ज़रूरत थी ? क्या यह ख़िलाफ़त की अहलियत व सलाहियत पर नस की जा रही थी ? या उसके ख़िलाफ़ सबूत बहम पहुँचाया जा रहा था। अगर यह फ़र्ज़ कर लिया जाये कि नमाज़ की इमामत दलीले ख़िलाफ़त हैं तो जब पैगम़्बर (स.अ.व.व.) ने हज़रत उमर को उनकी आवाज़े तकबीर सुन कर रोक दिया था तो फिर अपने बाद हज़रत अबुबकर ने उन्हें किस दलील की बिना पर नामजद किया था। इमामते नमाज़ को नस क़रार देने से पहेल ज़रूरी है कि इममते नमाज़ और ख़िलाफ़त में तलाजुम साबित किया जाये। अगर तलाजुम नहीं है तो फिर यह ख़िलाफ़त ही दलील क्यों ? और अगर तलाजुम हो तो फिर उन लोगों को ख़िलाफ़त से महरूम रखने को क्या जवाज़ है जिन्हें अपनी ज़िन्दगी में पैग़म्बर (स.अ.व.व.) खुद वक़्तन फ़वक़तन नमाज़ पढ़ाने का हुक्म देते रहे। चुनानचे आन हज़रत (स.अ.व.व.) जब ग़ज़वात में तशरीफ़ ले जाते तो नमाज़ की इमामत किसी न किसी से मुतालिक़ कर जाते थे , खुसूसन इब्ने मकतूब को जो नाबीना थे छोड़ जाते थे जैसा कि इब्ने क़तीबा तहरीर फ़रमाते हैं कि (रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) आम ग़ज़वात के मौक़े पर इब्ने उम्मे मकतूम को मदीने में छोड़ जाते थे ताकि वह लोगों को नमाज़ पढायें) 3

क्या इस इमामत से जो हज़रत अबुबकर की इमामत से बलिहाज़ मुद्दते तवील पर होती थी किसी को यह गुमान भी हुआ ता कि आन ह़रत (स.अ.व.व.) इब्ने उम्मे मकतूम को अपना ख़लीफ़ा व जॉनशीन मुक़र्रर करना चाहते हैं। इसके अलावा अपनी मौजूदगी में भी मुख़तलिफ़ मवाक़े पर मुक़तलिफ़ अशख़ास को इमामत की ख़िदमत सुपुर्द कर देते थे जिन में अबुलबाबा , सबा इब्ने अरफ़जा , अत्ताब इब्ने असीद , साद इब्ने अबादा , अबुज़रे ग़फ़्फ़ारी , जैद़ इब्ने हारसा , अबुसलमा मख़रूमी और अब्दुल्लाह इब्ने रवाहा शामिल थे। क्या उन लोगों में से जो बाहुक्मे पैग़म्बर (स.अ.व.व.) नमाज़ पढ़ाते रहे थे किसी एक ने भी इस नमाज़ से इस्तेहक़ाक़े ख़िलाफ़त को साबित करना चाहा था ? अगर ऐसा नहीं है तो फिर उसी नमाज़ को दलील ख़िलाफत क़रार देने के क्या मानी ? जबकि उसे दलील ख़िलाफ़त समझने वालों के नज़दीक यह दलीले अदालत भी नहीं बन सकती क्योंकि उनके मसलक में हर फ़ासिक व फ़ाजिर के पीछ नमाज़ जाएज़ है चुनानचे अबुहुरैरा का ब्यान है कि नमाज़ हर अच्छेऔर बुरे मुसलमान के पीछे पढ़ी जा सकती है ख़्वाह वह गुनाहाने कबीरा का मुरतकिब क्यों न होता हो। 1

क़लम व क़िरतास का अलमिया

इस्लाम रसूले अकरम (स.अ.व.व.) की ज़िन्दगी का सरमाया था जिसे ख़ून पसीना एक करके आपने मंज़िले तकमील तक पुहँचाया था। हर इन्सान का फ़ितरी ख़्वाहिश यह होती है कि उसकी मेहनतों और रियाज़तों का समर इम्तेदादे ज़माने से महफूज़ और तख़रीब कारों से बचा रहे। वह जि़न्दगी में भी उसकी निगेहदश्त करता है और वक़्ते आख़िर में भी उसकी तरफ़ से मुतमइन होकर दुनिया से रुख़सत होना चाहता है और जहां तक मुम्किन होता है ज़बानी या तहरीर वसीयत की शक्ल में उसका मुतक़बिल महफूज़ कर जाता है। ऐसी सूरत में क्या यह तसव्वुर किया जा सकता है कि पैगम़्बरे अकरम (स.अ.व.व.) इस्लाम के तहाफुज़ की फ़िक्र और उसकी बक़ा की तदबीर से ग़ाफ़िल रहे होंगे। जब कि आपकी फ़र्ज़ शनसी व मुबज़ी ज़िम्मेदारी का तकाज़ा यह था कि आप हर इस तदबीर क बरुवेकार लाये जिसेस इसालम का मुसतक़बिल महफूज़ रहे और उसके ख़िलाफ़ हर तख़रीबी कार्रवाई का सद्देबाब हो जाये। इस अहम ज़रुरत के पेशे नज़र आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने अपने सफ़रे आख़रत से तीनदिन पेशतर कागज़ व कलम तलब किया ताकि एक नविश्ता लिख कर छोड़ जायें जो रहती दुनिया तक हिदायत का काम दें और उम्मते मुस्लिमा ज़लालत व गुमराही से महफूज़ रहे मगर कुछ लोग इस तहरीर में आड़े आये और हज़रत उमर ने कहा कि पैगम्बर (स.अ.व.व.) पर मर्ज़ का ग़लबा है हमारे पास अल्लाह की किताब मौजूद है र हमारे लिये वह काफ़ी है। 2

ये बुखारी की रवायत है और बुख़ारी में यह वाक़िया इन अल्फाज़ में दर्ज हैः आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने फ़रमाया कि तुम एक कागज़ लाओ मैं तुम्हारे लिए एक नविश्ता लिख दूँ जिसके बाद तुम कभी गुमराह नहीं होंगे इस पर लोग आपस में झगड़ने लगे हालाँकि नबी के पास झगड़ा मुनासिब न था लोगों ने कहा कि रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) पर हिज़यानी कैफ़ियत तारी है। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने फ़रमाया मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो मैं जिस हाल मैं हूं वह बेहतर है इस से कि जिसकी तरफ़ तुम मुझे बुलाते हो। 1

जब झगड़े ने तूल खींचा और शोर व गुल की आवाज़ें बुलन्द हुई तो पर्दे के पीछे से अजवाज़ें पैगम्बर (स.अ.व.व.) ने कहा , कि पैग़म्बर (स.अ.व.व.) जो मांगते है दो दो हज़रत उमर ने कहा कि तुम चुप रहा , तुम वही युस वालिया हो , जब पैगम़बर (स.अ.व.व.) बीमार पडते हैं तो आंसू बहाती हो और जब तन्दरूस्त हो जाते हैं तो उनकी गर्दन पर सवार हो जाती है। इस पर आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने फ़रमाया कि यह तुम से तो बेहतर ही हैं। 2

पर्दे के अक़ब से यह आवाज़ आती रही मगर किसी ने उसकी तरफ़ तवज्जो नहीं दी और क़लम व काग़ज़ पेश करने से माने रहे हुज़ुरे अकरम (स.अ.व.व.) को दुनिया वालों की बेवफाई का ग़म , हुक्म की ख़िलाफ़ वर्ज़ी का मलाल , हिज़ान की तोहमत का सदमा और उस पर चीख़ व पुकार की दर्दे सरी , चुनानचे आपने कबीदा ख़ातिर होकर कहा (कुमू अन्नी यानी मेरे पास से दूर हो जाओ।)

तारीख़े इस्लाम का यह कितना अज़ीम अलमिया है कि सरकारे दो आलम (स.अ.व.व.) अपनी उम्मत की बहबूदी और उसे गुमराही से बचाने के लिये बसीयत लिखना चाहते हैं मगर उनकी आवाज़ शोर व गुल में दब कर रह जाती है और हसरत व अन्दोह के आलम में वह दुनिया से रुख़सत हो जाते हैं। इब्ने अब्बास इस वाक़िये को याद करक इतना रोते थे कि संगरेज़ें आँसूओं से तर हो जाते थे और गुलूगीर आवाज़ में कहते थे कि यह कितनी बड़ी मुसीबत है कि सहाबा के इख़तेलाफ़ और उनके शोर व हंगामे की वजह से रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व.) वसीयत न लिख सके। 3

इस वाक़िये में ताविलात का सहारा लिया गाय और अल्फाज़ के माने व मफ़हूम बदलने की कोशिश की गयी और पूरे मजमे को इस जुर्म का मुरतकब क़रार देकर असल मुजरिम की शख़्सियत पर पर्दा डाला गया मगर यह सब कोशिशें ब सूद साबित हुई और हक़ीकत छुपाये छिप न सकी। बुख़ारी की दोनों मुन्दर्जा रवायतों की यही सूरत है चुनानचे पहली रवायत में जहा पैग़म्बर (स.अ.व.व.) पर मर्ज़ के ग़लबे का ज़िक्र है कहने वाले नाम (हज़रत उमर) दर्ज किया गया है और दूसरी रवायत में जहां क़ौले पैग़म्बर (स.अ.व.व.) को हिज़यान से ताबीर किया गया है ताबीर करने वाले के नाम को छिपाने की कोशिश की गई है यानि जिस रवायत के अल्फाज़ हल्के और सुबक हैं वहा कहने वाला का नाम ज़ाहेर कर दिया जाता है और जिस रवायत के अल्फाज़ दुरुस्त , मज़मूम और नाज़ेबा हैं वहां कहने वाले का नाम नहीं लिया जाता मगर इस पर्दा पोसी से कोई नतीजा नहीं निकलता इस लिये कि जब सबी कह रहे थे तो जिसका किरदार उन सबमें नुमाया रहा हो वह उनसे अलहैदा क्यों कर तसव्वुर किा जा सकता है अगर ऐसा होता तो तारीख़ में बड़ी जली सुर्ख़ियों से उसका नाम आता और उस पर मदह व सताइश के फूल बरसाये जाते अलबत्ता बाज़ रवायत में कुल के बजाये बाज़ की तरफ़ निसबत है जैसा कि इब्ने साद तहरीर करते हैं कि कुछ लोगों ने जो वहां मौजूद थे यह कहा कि रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) शिद्दते मर्ज़ में बहकी बहकी बातें कर रहे हैं।) 1

इस रवायत में कहने वालों के दायरा पहले से महदूद हो गया है फिर भी लफ्ज़े बाज से कहने वाले की सही निशानदेही नहीं होती अलबत्ता शेख़ शहाबुद्दीन ख़फ़ाजी ने बाज़ दूसरे ओलमा की तरह इस (बाज़ पर से पर्दा उठाया है और साफ़ साफ़ लिख दिया है कि हजरत उमर ने कहा कि रसूले उल्लाह (स.अ.व.व.) बहकीबहकी बातेंकर रहे हैं।) 2

पैग़म्बरे अकरम (स.अ.व.व.) पर हिज़यान की तोहमत ख़्वाह किसी तरफ़ से हो इन्तेहाई का मुज़ाहिरा है। नबूवत का अदना इरफ़ान रखने वाला थी इन लफ़्ज़ों को सुन कर लरज़ उठता है कि वही की तरजुमानी करने वाली ज़बान हिजयान आशना कैसे हो गई. हैरत है कि एक तरफ़ तो आपके लबों की हर जुंबिश को वही इलाही के ज़ेरे असर और हर हुक्म को हुक्मे रब्बानी का तरजुमान जाना जाता है और दूसरी तरफ़ हिज़यान की तोहमत आयद करके हुज़ूर (स.अ.व.व.) के इरशादात को बेएतमाद बनाने की कोशिश भी की जाती है। क़लम व कागज़ के तलब करने और वसीयत लिखने में बदहवासी की बात ही कौन सी थी बल्कि आपका इरशाद तो यह था कि (मैं एक नविश्ता लिख दूँ ताकि तुम कभी गुमराह न हों) आपके कमाले अक़ल और सेहते हवास का वाज़े तरीन सुबूत है फिर हिज़यान की तोहमत का क्या जवाज रह जाता है।

हुक्मे रसूल (स.अ.व.व.) से सरताबी के जवाज़ में यह तावील भी पेश की जाती है की दीन की तकमील हो चुकी थी वहीं का सिलसिला मुनक़ता हो चुका था लेहाज़ा अब किसी तहरीर की ज़रुरत ही क्या थी। बेशक दीन की तकमील हो चुकी थी मगर तकमील के माने यह तो नहीं है कि उम्मत भी तकमील हो चुकी थी अगर ऐसा होता तो न मुसलमानों के अक़ाएद में तसादुम होता न नज़रियात में तज़ाद पाया जाता और न ही मुसलमान मुख़तलिफ़ फ़िर्कों में तक़सीम होते यह बाहमी तफ़रिक़ा और गिरोह बन्दी सिर्फ़ गुमराही का नतीजा है जिसे दीन की तकमील रोक़ न सकी। उन्हीं फि़क्री व एतक़ादी गुमराहियों का सद्देबाब करने के लिये पैग़म्बर (स.अ.व.व.) नविशता तहरीर करना चाहते थे और यह कहना कि इस की ज़रुरत ही क्या थी तो हमें इश की ज़रुरत व अदम ज़रूरत पर फ़ैसला और राय ज़नी करने के बजाये रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) पर इस का फ़ैसला छोड़ देना चाहिये अगर वह इसकी ज़रूरत व अहमियत न समझते तो क़लम व काग़ज़ क्यों तलब करते। जब उन्होंने इस अमर को ज़रुरी समझा तो हमें ग़ैर ज़रुरी कहने का हक़ कहां से पहुँचता है और यह बात तो बिल्कुल ग़लत और बेबुनियाद है कि वही मुनकेता हो चुकी थी इसिलिये यह हुक्मे वही के मुताबिक़ न था। इन नज़रियात के हामिल अफ़राद को यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिये किि वही का सिलसिला पै़गम्बर अकरम (स.अ.व.व.) की आख़िरी सांस तक क़ायम रहा। चुनानचे अनस बिन मालिक से रवायत है कि अल्लाह ने पैगम़्बर (स.अ.व.व.) पर वही का सिलसिला उनके मरते दम तक जारी रखा और सबसे ज़्यादा वही उस दिन नाज़िल हुई जिस दिन आपने रेहलत फ़रमायी। 3

इससे साफ़ ज़ाहिर है कि पैगम़्बर (स.अ.व.व.) जो कुछ कह रहे थे या जो कुछ करना चाहते थे वह वही इलाही के मातहत था मगर सियासी मसलहतों के पेशे नज़र न सिर्फ़ इसके आगे दीवार खड़ी कर दी बल्कि हिज़यान से ताबीर कर दिया गया ताकि रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) अगर लिख भी जायें तो उसे यह कह कर मुस्तरद किया जा सके कि यह हिज़यानी हालत में लिखी हुई तहरीर है जो क़ाबिले अमल नहीं है।

यह भी देखना ज़रूरी है कि आख़िर रसूले अकरम (स.अ.व.व.) क्या लिखना चाहते थे और उसकी ज़रुरत क्यों पेश आई ? तारीख़ व हदीस की किताबें गवाह हैं कि पैग़म्बर (स.अ.व.व.) बिस्तरे मर्ग पर भी और उससे पहले भी बारबार फ़रमाते ते किः-

(मैं तुमसे दो गरांक़द्र चीज़ें छोड़े जाता हूँ एक अललाह की किताब है जो एक मज़बूत रस्सी के मानिन्द और जिसकी एक सिरा आसमान और एक ज़मीन पर है और दूसरी मेरी इतरत (अहलेबैत (अ.स.) ) है और यह दोनों एक दूसरे से जुदा न हों यहा तक कि मेरे पास हौज़े कौसर पर वारिद हो। अगर तुम उन से वाबस्ता रहे तो मेरे बाद कभी गुमराह न होंगे और उनमें एक दूसरे से बढ़ कर हैं। 1

और जब रेहलत का ज़माना क़रीब आया तो अली (अ.स.) को हाथें पर बुलन्द करके फ़रमाया-

(यह अली (अ.स.) कुरान के साथ हैं और कुरान इनके साथ है यह एक दूसरे से जुदा न होंगे यचहां तक कि हौज़े कौसर पर पहुँचे , मैं इन दोनों से पूछूँगा कि तुम उनके हक में कैसे सिबात हुए। 2

पहली हदीस में हुजूरे अकरम (स.अ.व.व.) ने कुरान और अहलेबैत के इत्तेबा को ज़लालत व गुमराही से तहाफुज़ की सिपर क़रार दिया है जिसे इन लफ़्ज़ों में ब्यान किया है कि (मेरे बाद तुम कभी गुमराह न होंगे) इसेसे हर जी शऊर और बाहमी इन्सान यह नतीजा अखज़ कर सकता है कि आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने गुमराही से बचने के लिये जिस चीज़ का क़ौलन ऐलान किया था उसी को अमलन तहरी में लाना चाहते थे ताकि हर लेहाज़ से हुज्जत तमाम हो जाये और आपके बाद रहनुमाई के लिये उन्हीं पर इनहेसार किया जाये गोया एक तरह से यह आपकी नियाबत व जॉनशीनी का दस्तावेज़ थी जिसका आप पहले से इज़ाहर करते चले आ रहे थे और ग़दीरे ख़ुम में भई इसका ऐलान कर चुके थे। इस ऐलान से अगर चे फ़रीज़ये तबलीग़ अदा हो गया था मगर जैश उसामा में बाज़ लोगों के मुख़तलिफ़ तबलीग़ अदा हो गया ता मगर जैश उसामा में बाज़ लोगों के मुख़तलिफ़ और दूसरे क़राईन से ज़ाहिर हो रहरा था कि कुछ लोग इस की अमली तबलीग़ में माने होंगे इसलिये आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने ज़बानी ऐलान को तक़वीयत देने के लिये इसे तहरीरी शक्ल में पेश करना ज़रुरी समझा ताकि इस तहरीरी दस्तावेज़ के होते हुए इसके ख़िलाफ़ कोई तख़रीबी इक़दाम मुम्किन न हो सके। हज़रत उमर भी इस बात से बेख़बर न थे कि रसूले अकरम (स.अ.व.व.) कुरान के साथ अहलेबैत के इत्तेबा को ज़रुरी समझते हैं और हज़रत अली (अ.स.) के बारे मे वसीयत लिखना चाहते हैं और यह चीज़ उनके मुस्तक़बिल की राह में हायल हो सकती इसलिये उन्होंने हसबोना किताबुल्लाह का नारा बुलन्द करके इसकी ज़रुरत ही से इन्कार कर दिया। यह फि़करा अगर चे एक हंगामी ज़रुरत व मसलहत की बिना पर अपने अक़ाएद की बुनियाद क़ायम कर ली और कुरान के अलावा हदीस तक की ज़रुरत से इन्कार कर दिया। हालाँकि कुरान को काफ़ी कहने के बावजूद हज़रत उमर ख़ुद इस के नाकाफ़ी होने का एतराप़ करते हुए हदीसों के मोहताज नज़र आते हैं। चुनानचे ख़िलाफ़त के मसले में जब मुहाजेरीन व अनसार के दरमियान झगड़े की सूरत पैदा हुई तो आपने कुरान को झगड़े के ख़त्म करने का ज़रिया क़रार देने के बजाये (अलआइम्मतो मिन कुरैश) (इमाम कुरैश में से होंगे) अपने नाजाएज़ हक़ की फ़ौक़ियत का इस्तेदलाल किया और विरासते रसूल (स.अ.व.व.) के बारे में कुरान से दलील ढूँढने के बजाये एक वज़ई हदीस (हम गिरोहे अन्बिया किसी को अपना वारिस नहीं छोड़ते) पर एतबार व एतमाद किया। और जिन मौक़ों पर उन्होंने (लौला अलीउल हलाक उमर) (अगर अली न होते तो उमर हलाक हो जाते) कहा वहां कुरान को बालाये ताक़ रख कर हजरत अली (अ.स.) से मदद व रहनुमाई के तलबगार रहे। इससे यह बात वाज़ेह हो जाती है कि वह कुरान को काफ़ी कहते हुए भी नाकाफ़ी समझते थे और सिर्फ़ कुरान ही पर इनहेसार नहीं करते थे बल्कि हदीसों को भी क़ाबिले अम्ल समझते थे और यह हक़ीक़त भी है कि कुरान अपनी जामीयत के बावजूद अपने हक़ीक़ी तरजुमान के बग़ैर काफ़ी नहीं हो सकता वरना फिर तो रसूल (स.अ.व.व.) की ज़रुरत से भी इन्कार करना पड़ेगा।

रसूले अकरम (स.अ.व.व.) का सफ़रे आख़रत

अपनी रेहलत से एक दिन क़बल आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने हज़रत अली (अ.स.) को तलब करके फ़रमाया कि ऐ अली (अ.स.) ! मुझे महसूस होता है कि मौत मुझसे क़रीब तर होती जा रही है लेहाज़ा मैं इस दुनिया से रूख़सत हो जाऊँ तो तुम ही मुझे गुस्ल देना , क़फन पहनाना और क़ब्र में उतारना। मैंने लोगो से जो वादे कर लिये हैं उन्हें पूरा करना और जैश उसामा की तैयारी के सिलसिले में मुझ पर जो क़र्ज़ा है उसे अदा कर देना।

दूसरे दिन काशनाये नबूवत पर मौत के बाद मण्डराने लगे और आन हज़रत (स.अ.व.व.) पर निज़ा की कैफियत तारी हो गई वक़्त करीब था कि आपकी रूह अपने मरकज़ की तरफ़ परवाज़ कर जाये कि ग़शी से आँखें खोलीं और फ़रमाया , मेरे हबीब को बुलाओ। हज़रत आयशा का ब्यान है किः-

(जब पैगम़्बर (स.अ.व.व.) का वक़्त करीबआया तो आपने फ़रमाया कि मेरे हबीब को बुलाओ तो मैंने अपने वालिद अबुबकर को बुलाया , उन्हें देखकर रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) ने मुँह फेर लिया। फिर फ़रमाया , कि मेरे हबीब को बुलाओ , कोई हज़रत उमर को बुला लाया आपने उनकी तरफ़ से भी मुँह फेर लिया , तीसरे मर्तबा फिर फ़रमाया कि मेरे हबीब को बुलाओ तो अली (अ.स.) को बुलाया गया। जब वह आये तो आपने उन्हें चदर में ले लिया और कुछ राज़ व नियाज़ करने लगे , यहां तक कि आप इन्तेक़ाल फ़रमाय गये उस वक़्त आपका हाथ अली (अ.स.) के ऊपर रखा था।) 1

सही बुख़ारी , सिर्रूउलआलीमीन , अलवाफ़ी और मिशकात की रवायातों से इस बात का सुबुत फ़राहम होता है कि हुज़ूर सरवरे कायनात (स.अ.व.व.) को मदीने में बिस्तरे अलालत पर ज़हर दे कर शहीद कर दिया गया। 2

यह आलमे इस्लाम का अज़ीम तरीन हादसा था जो 28 सफ़र सन् 11 हिजरी बरोज़ पंचशन्बा रूनुमा हुआ। इस सानिहे से यूं तो हर शख़्स मुतासिर था मगर आन हज़रत (स.अ.व.व.) के अफ़रादे ख़ानदान और बनि हाशिम पर ग़म अन्दोह का पहाड़ टूट पड़ा। दुख़तरे रसूल (स.अ.व.व.) का यह हाल था कि गोया उनसे ज़िन्दगी छिन गई हो उनके बच्चे नाना के ग़म में तड़प रहे थ और हज़रत अली (अ.स.) की दुनिया बदल चुकी थी रगो में खून मुनहमिद होकर रह गया था और इन्तेहाई सब्रो ज़ब्त के बावजूद आपकी आँखों से आँसूओं का सेलाब उमण्ड रहा था आप ने रोते हुए अपना हाथ आन हज़रत (स.अ.व.व.) के चेहरये अक़दस से मस किया और अपने मुँह पर फेरा , मय्यत की आँखें बन्द की और लाशे अतहर को चादर से ढ़क दिया और हस्बे वसीयत गुस्ल व कफ़न की तरफ़ मुतावज्जे हो गये। इब्ने साद कहते हैः-

(जब रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) ने इन्तेक़ाल फ़रमाया तो आप कासरे अक़दस हज़रत अली (अ.स.) की गोद में था और अली (अ.स.) ही ने आप को गुस्ल दिया। फ़जडल अब्ने अब्बास आन हज़रत (स.अ.व.व.) को संभाले हुए थे और असामा पानी देते जाते थे। 2

जब अमीरूल मोमेनीन (अ.स.) गुस्ल से फ़ारिग़ हो गये तो क़फ़न पहनाया और तन्हा नमाज़ पढ़ी। मस्जिद में जो लोग मौजूद थे वह बाहम मशविरा कर रहे थे कि किसे नमाज़े जनाज़ा की इमामत पर मुक़र्रर करें और कौन सी जगह दफ़्न के लिये तजवीज़ करं। कुछ लोगों की राय थी कि सहने मस्जिद में दफ़्न किये जायें और कुछ कह रहे थे कि जन्नतुल बक़ी में दफ़्न हों। हज़रत अली (अ.स.) को मालूम हुआ तो बाहर तशरीफ़ लाये और फ़रमाया कि पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ज़िन्दगी में भी हमारा इमाम व पेशवा थे और रेहलत के बाद भी हमारे इमाम व पेशवा हैं वह उसी मुक़ाम पर दफ़्न किये जायेंगे जहां उन्होंने रेहलत फ़रमायी है। चुनानचे बनि हाशिम फिर मुहाजेरीन और फिर अन्सार ने बारी बानी नमाज़ अदा की अलबत्ता एक गिरोह जो तशकीले हुकूमत की फिक्र में था तजहीज़ व तकफ़ीन में शिरकत और नमाज़े जनाज़े की सआदत से महरूम रहा। नमाज़े जनाज़े के बाद उसी हुजरे में जहां आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने इन्तेका़ल फ़रमाया था ज़ैद इब्ने सुहैल से कब्र ख़ुदवाई गई। हज़रत अली (अ.स.) ने अपने हाथों से कब्र में उतारा और आफ़ताबे रिसालत लोगों की नज़रों से पोशीदा हो गया।

पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) की वफ़ात से मदीने की फ़िज़ां सोगवार थी , माहौल पर कर्बनाक सुकूत छाया हुआ था , दरोदिवार पर वहशत बरस रही थी , हर शख़्स अशकबार था , हर घर मातम कदा बना हुआ था , मुसलमान मस्जिदे नबूवी और उसके गिर्द व पेश जमा थे कि अचानक इस गम अंगेज़ माहौल में एक आवाज़ बुलन्द हुईः-

(कुछ मुनाफ़िकों का यह ख़्याल है कि रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) वफ़ात पा गये हालाँकि ख़ुदा की क़सम वह मरे नहीं हैं बल्कि अपने परवरदिगार के पास गये हैं , जिस तरह मूसा इब्ने इमरान गये थे और चालिस रातें अपनी क़ौम से पोशीदा रहने के बाद पलट आये थे इसी तरह रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व.) भी पलट कर आयेंगे और उनके हाथों और पैरों को काटेंगे जो यह कहते हैं कि पैग़म्बर वफ़ात पा गये हैं। 1

फिर तहदीदी लहज़े में यही आवाज़ गूँजीः-

(जो शख़्स यचह कहेगाकि रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) मर गये हैं मैं उसकी गर्दन उडा दँगा। पैगम़्बर (स.अ.व.व.) तो आसमान पर उठ गये हैं। 1

ये आवाज़े हज़रत उमर के दहन से निकल रही थी जो इस बात पर अड़े हुए थे कि रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) ज़िन्दा हैं और उनकी मौत की ख़बर मुनाफ़ेकीन ने उड़ाई है। उन्होंने अपनी बरहैना तलवार से लोगों को डरा धमका कर उनकी ज़बानों पर जबरन व क़रहन पहरा बिठा दिया ताकि इसके खिलाफ़ कोई आवाज़ बुलन्द न हो इब्ने कसीर का ब्यान है किः-

हज़रत उमर खड़े होकर खुतबा देने लगे और सरकार दो आलम (स.अ.व.व.) की वफ़ात के बारे में लब कुशाई करने वालों को क़त्ल की धमकियों देने लगे और कहने लगे कि रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) अभी बेहोश प़ड़े हैं अगर उन्हें होश आय गया तो तुम्हारी जानों की ख़ैर नहीं है वह तुम्हे क़त्ल कर देंगेऔर तुम्हारे हाथ पैर काट डालेंगे।

हज़रत उमर की इस क़हरी आवाज़ का असर यह होना ही था कि लोगों के ख़्यालात मुन्तशिर और परागन्दा हो जायें , ज़ेहनों के रूख मुंड़ जायें और मौज़ूए सुखन बदल जाये चुनानचे अफ़सुरदा व सोगवार मज़मा हैरत से एक दूसरे का मुँह तकने लगा और ग़मज़दा माहौल में यह चेमिनगोइयां शुरू हो गई कि क्या वाक़ई पैग़म्बर इस्लाम (स.अ.व.व.) ज़िन्दा हैं या रेहलत फ़रमां गये ? अगर चे सुनने वालों का ज़ेहन इस बात को तस्लीम करने पर तैयार न था और तस्लीम करने की कोई वजह थी मगरदबी दबी ज़बान में इज़हार , ख़्याल के अलावा किसी मे यह हिम्मत व जुराएत न हुई कि वह यह कहता कि अन्दर चलकर आन हज़रत (स.अ.व.व.) की मय्यत देख कर यह इत्मिनान कर लिये जाये। क्योंकि जि़न्दगी को अपना वजूद साबित करने में किसी मुश्किल का सामना नीहं पड़़ता और न मौत को अपना सुबूत मोहय्या करने मे कोई दुश्वारी पेश आती है लेकिन सब ख़ामोश हैं और हज़रत उमर को तलवार घुमाते देखकर न उनके ख़िलाफ़ कुछ कहते बन पड़ती है और न हां में हां मिलाने के लिये कोई तैयार है इसलिये कि हज़रत उमर कभी यह कहते हैं कि आन हज़रत (स.अ.व.व.) बेहोशी की हालत में हैं , कभी यह कहते हैं कि आसमान पर उठ गये और कभी यह कहते हैं कि वह मूसा (अ.स.) की तरह ग़ैबत इख़तेयार कर चुके हैं। कि बातको सही कहा जाये और किसको ग़लत।

अगर इसे बेहोशी कहा जाये तो बेहोशी और मौत में वाज़ेह फ़र्क़ है। बेहोशी में सांस की आमद व शुद का सिलसिला बरक़रार रहता है और मौत में यह सिलसिला क़ेा हो जाता है। लेहाज़ा वह इस अलामत से दूसरों को भी क़ायल कर सकते थे तलवार के बल बूत पर डराने धमकाने की ज़रूरी ही क्या थी ? और अगर आसमान पर उठ जाने वाली बात को सही समझा जाये तो यह समझ में आने वाली बात ही नहीं है। इसलिये कि ये इरतेफ़ा सिर्फ़ रूह का था या जिस्म भी शरीख था अगर सिर्फ रूह ने आसमान की तरफ़ परवाज़ की थी तो ज़ाहिर है कि इसी का नाम मौत है और अगर जिस्म भी साथ था तो यह मुशाहिदे के ख़िलाफ़ था क्योंकि जिस्म अपने मुक़ाम पर मौजूद था। और अगर यह ग़ैबत थी तो कैसी थी और क्यों थी ? क्या आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने अपनी ज़िन्दगी मे इसके बारे में कोई ज़िक्र या इशारा किया था ? और फिर इसमें और हज़रत मूसा (अ.स.) की ग़ैबत मं क्या मुमासिलत ? हज़रत मूसा (अ.स.) तो जिस्म व रूह के साथ चालिस रातों के लिये तूर पर गये थे और तौरेत लेकर पलट आये थे और यहां आन हज़रत (स.अ.व.व.) का जनाजा़ बेहिस वहरकत आँखों के सामने मौजूद था न कहीं नक़ल मकानी हुई न उनका जसदे अतहर नज़रों से ओझल हुआ। फिर वह कौन सी चीज़ ग़ायबप हुई थी जिसके मुतालिक यह कहा गया कि वह पलट आयेंगे। इसी ग़ैबत को हजरत मूसा (अ.स.) की ग़ैबत से तशबीह देने का तक़ाजा़ तो यह था कि जिस तरह हज़रत (अ.स.) गै़बत के दिनों मे अपने भाई हारून को नायब व जॉनशीन बना कर छोड गये थे उसी तरह पैग़म्बर (स.अ.व.व.) भी किसी को अपना जॉनशीन बना कर उम्मत में छोड़ जाते और फिर उनके मुक़र्रर करदा नायाब की निशानदेही की जाती मगर उधर ज़ेहन का रूख नहीं मुड़ता या मसलहतन इस का ज़िक्र ज़बान पर नहीं आता।

इसके अलावा यह बात भी दरियाफ़्त तलब है कि वह मुनाफ़ेक़ीन कौन थे जिन्होंने आन हज़रत (स.अ.व.व.) की मौत की ख़बर उड़ाई थी जबकि यह ख़बर ख़ुद हुज़ूर के घर के अन्दर से आई थी जहाँ अज़वाजे पै़ग़म्बर (स.अ.व.व.) , जनाबे फ़ात्मा ज़हरा (स.अ.व.व.) , हज़रत अली , हज़रत हसन (अ.स.) , हज़रत हुसैन (अ.स.) , अब्बास , अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास , फ़जल इब्ने अब्बास , अब्दुल्लाह इब्ने जाफ़र और दूसरे बनि हाशिम मौजूद थे। क्या ये अफ़राद भी मुनाफ़ेक़ीन में शामिल थे ?

ग़र्ज़ कि सरकारे दो आलम (स.अ.व.व.) की मौत के सिलसिले में हज़रत उमर ने उलझाव तो पैदा ही कर दिया था और ख़ुदा जाने वह कब तक इस उलझाओ को बरकरार ऱखते अगर हज़रत अबुबकर आन हज़रत (स.अ.व.व.) की रेहलत की ख़बर सुन कर मुहल्ले सख़ से न आ जाते और लोगों को मुख़ातिब करके यह ऐलान न करते किः-

(जो शख़्स मुहम्मद (स.अ.व.व.) की परस्तिश करता है उसे मालूम होना चाहिये कि मुहम्मद (स.अ.व.व.) वफ़ात पा गये। फिर यह आयत पढ़ी कि (मुहम्मद (स.अ.व.व.) अल्लाह के रसूल ही तो हैं और उनसे पहले भी रसूल गुज़र चुके हैं अगर वह अपनी मौत मर जायें या क़त्ल कर दिये जायें तो तुम उलटे पैरों कुफ्र की तरफ पलट जाओगे और जो उलटे पैरों कुफ़्र की तरफ़ पलटेगा वह अल्लाह का कुछ नहीं बिगाड़ सकता और ख़ुदा जल्द ही शुक्रगुज़ार को बदला देगा। 1

हज़रत उमर ने हज़रत अबुबकर की ज़बान से जब यह तक़रीर सुनी तो वह हैरत व इस्तेज़ाब का इज़हार करते हुए कहने लगे कि। क्या यह आयते कुरान में हैं ? मुझे तो यह मालूम ही न था कि यह कुरान की आय़त हैः- फिर कहा ऐ लोगों यह अबुबकर हैं जिन्हें मुसलमानों में सबक़त हासिल है , उनकी बैयत करो।

हज़रत उमर के इस इन्कारे , पुर ज़ोर और फ़ोरी एतराफञ को देख कर हर ग़ैर जानिबदार शख़्स यह नतीजा अख़िज़ कर सकता है कि यह इन्कार किसी मसलहत की बिना पर रहा होगा वरना जिस पर ख़बरे मार्ग इस हद तक असर अन्दाज़ हो िक वह अपने होश व हवास खो बैठे वह इस क़ाबिल कब रह सकता है कि मय्यत रखी हो और वह गुस्ल व क़फ़न और दूसरे अमूर से बे नियाज़ हो कर हुकूमत की तदबीर व फिक़्र करने लगे और सफे मातम से उठकर सक़ीफ़ा बनि साएदा में अन्सार स बहस व मुबाहिसा और धींगामुश्ती करके अपने हक़ को साबित करें और यह भूल जाये कि पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की मय्यत अभई गुस्ल व क़फ़न के मरहले से नहीं गुज़री। हुकूमत व इक़तेदार के सामने जिस शख़्स को पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की तजहीज़ व तकफ़ीन का फ़िक्र व परवा न हो उसके लिये यह क्यों कर सोचा जा सकता है कि वह इन्तेक़ाल की ख़बर सुनकर अपने होश व हवास खो बैठा होगा और इसी जुनूनी हालत में उसने वफ़ाते पैग़म्बर (स.अ.व.व.) से इन्कार कर दिया होगा। हक़ीक़त यह है कि हज़रत उमर इतने बेख़बर न थे कि उन्हें पैगम़्बर (स.अ.व.व.) की मौत का यक़ीन न होता या उनके हवास इस क़दर मुतासिर होते कि वह तलवार घुमा गुमा कर आयें , बायें , शायें बकने लगते जो क़तअन ख़िलाफ़े मुशाहिदा था लेहाज़ा यह तस्लीम करना पड़ता है कि यह वक़्ती और हंगामी इन्कार बाज़ अहम सियासी मसालेह की बिना पर था।

इस सियासी मसलहत को समझने के लिये वाक़ियात और उनके पस मन्ज़र पर एक सरसरी नज़र डालने की ज़रूरत है। तारीख़ गवाह है कि हज़रत अली (अ.स.) दावते इस्लाम के दौरे आगाज़ से ज़मानये एहतेशाम तक इस्लाम की ख़िदमत व नुसरत पर कमर बसता रहे और पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) उन्हीं के ज़रिये इस्लाम और इस्लामी तालीमात को तहाफुज़ फ़राहम करना चाहते थे जिसका ऐलान दावते जुलअशीरा से लेकर हुज्जतुल विदा तक और हुज्जतुल विदा से लेकर ज़ि्न्दगी की आख़िरी सांस तक मुख़तलिफ़ तरीख़ों से करते रहे इसी बिनी पर सहाबये कराम , मुहाजेरीन और अन्सार को इस अमर में ज़रा भी शुबा न था कि अली (अ.स.) ही मसनदे ख़िलाफ़त पर मुतमकिन होंगे। इब्ने अबिल हदीद का कहना है कि (मुहाजेरीन व अन्सार की अक़सिरयत को इसमें शक नहीं था कि पैग़म्बर (स.अ.व.व.) के बाद अली(अ.स.) ही वलीये होंगे। 2

(यही वजह थी कि रसूल (स.अ.व.व.) की ज़िन्दगी के आख़िरी दौर यानि सन् 8 हिजरी के अवाएल में ही कुछ शरपसन्दों और मुनाफ़ेक़ीनों ने आपके ख़िलाफ़ साज़िशों का आगाज़ कर दिया था जिसकी सबसे बड़ी दलील सूरहे मुनाफ़ेकून का नुजूल है। यह तमाम साज़िशों रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) के इर्द गिर्द रहने वाले अफ़राद और मुनाफ़िक़े सहाबा की आग़ोशे मुनाफ़ेक़त में पल और बढ़ रही थी। उनका ख़ास सबब पैगम़्बर (स.अ.व.व.) की जॉनशीनी , इस्लामी क़यादत और इक़तदार का मसला था।)

(इन साजिशों में शिद्दत व सरअत उस वक़्त पैदा हुई जब सन 6 हिजरी में पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) तीस हज़ार ( 30000) का लश्कर लेकर शहनशाहे रोम (हरक़ुल) के मुक़ाबिले को निकले और तबूक नामी बस्ती में उन्नीस दिन तक क़याम फ़रमां रहे मगर चूंकि जंग की नौबत नहीं आई इस लिये बीसवें दिन आपने मराजेअत फ़रमायी।)

(वाज़ेह रहे कि इस मारके में रसूल ऊकर् (स.अ.व.व.) तमाम जंगों के फ़ातेह हज़रत अली (अ.स.) को अपने साथ नहीं ले गय जिस पर अमीरूल मोमनीन अली इब्ने अबुतालिब (अ.स.) कबीदा ख़ातिर हुए और आपने शिकवा भी किया हूजुर (स.अ.व.व.) ने फ़रमाया ऐ अली (अ.स.) तुम मेरे जॉनशीन और ख़लीफ़ा हो इसलिये तुम्हारा यहां रहना और मेरा वहां जाना मुनासिब था। 1 और मदीने की हालत सिर्फ मेरे या तुम्हारे रहने ही से दुरूस्त रह सकती है। 2

दहने नबूवत से निकले हुए जुमलों से साज़शी यक़ीनन यह समझ गये होंगे कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) ने हज़रत अली (अ.स.) को अपना ख़लीफ़ा और जॉनशीन मुक़र्रर करना तय कर लिया है चुनानचे साज़शी गिरोह ने तबूक की वापसी पर रसूले अकरम (स.अ.व.व.) की शम्मे हयात गुल कर देने की नाकाम व नापाक कोशिश भी की जो तारीक़ में (वाक़ए अक़बा) के नाम से मशहूर है। इसमें कोई शक नहीं कि यह इक़दाम इस्लाम में पहला शैतानी इक़दाम था।

इस वाक़िये के बाद इसी सन् 6 हिजरी में एक वाक़िया और रूनुमा हुआ जिसने मुनाफ़ेक़ीन की साज़शी मसरूफ़ियात में मज़ीद तेज़ी पैदा कर दी और वह यह कि माहे ज़िलहिज में आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने हज़रत अबुबकर को सूरये बरात की तबलीग़ पर मामूर फ़रमाया फिर यह कहकर माज़ूल कर दिया कि इस काम के बारे में परवरदिगार का हुक्म है कि इसे मैं करूं या जो मेरी जुर्रियत में शामिल हो कोई दूसरा इसे अन्जाम देने का मजाज़ नहीं है। चुनानचे रास्ते मं हज़रत अली (अ.स.) ने जब सूरये बराअत की आयतें उनसे लेकर उन्हें मदीने वापस किया तो ये रसूल (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में आकर रो पडे। 3 जाहिर है कि हज़रत आयशा अबुबकर की बेटी थी लेहाज़ा बाप की तौहीन व तज़लील पर उन्हें फ़ितरतन सदमां ज़रुर होगा। एक रवायत से यह भी पता चलता है कि हज़रत अबुबकर के साथ हज़रत उमर भी थे और वह भी माज़ूल किये गये।

सन् 10 हिजरी में पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) ने आख़िरी फ़रीज़ये हज अदा किया। अल्लामा तरीही का कहना है कि इस मौक़े पर अबुबकर , उमर , अबुअबीदा , अब्दुल रहमान और हुज़ैफ़ा के गुलाम सालिम ने ख़ान-ए-काबा में यह अहद किया कि वह ख़िलाफ़त को बनि हाशिम में नहीं जाने देंगे ख़्वाह इस सिलसिले में कुछ भी करना पड़े। लुत्फ की बात तो यह है कि एक तरफ़ साज़िशी हज़रत अली (अ.स.) की ख़िलाफ़त से महरूम रखने के लिये खान-ए-काबा में अहद व पैमान बाँध रहे थे और दूसरी तरफ़ परवर दिगारे आलम अपन रसूल (स.अ.व.व.) को हुक्म दे रहा था कि ऐ रसूल! तुम पर जो कुछ नाज़िल किया गया है उसे फ़ौरन पहुँचा दो और अगर तुमने ऐसा न किया तो गोया कारे रिसालत अन्जाम ही नहीं दिया।

रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) जब हज से फ़ारिग़ हुए और उनके साथ एक अज़ीम काफ़िला पलटा तो आप (स.अ.व.व.) ने जुलअशीरा मे किये गये वादे और हुक्मे इलाही के मुताबिक़ (मन कुन्तों मौला का हाज़ा अली उन मौला) कह कर मुसलमानों पर अपने जैसा हाकिम बना दिया। और इस सन् 10 हिजरी में अबनाअना , निसाअना व अनफ़ुसना की अमली तफ़सीर के ज़रिये अहलेबैत (अ.स.) में शामिल हज़रत का तार्रूफ़ भी करा दिया।

साशियों-और-साज़िशों से पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) बेख़बर हरगिज़ न थे अगर बेख़बर होते तो अपनी ज़िन्दगी के आख़िरी अय्याम में ऐेसे अहकाम सादिर न फ़रमाते जिनसे अकाबरीने साहाब ने न सिर्फ़ इख़तेलाफ़ किया बल्कि ऐसी नाफ़रमानियों और गुस्ताख़ियों पर उतर आये कि सरवरे क़ायनात (स.अ.व.व.) को लानत जैसा अबदी हरबा इस्तेमाल करना पड़ा। जैश उसामा के वाक़ियात से यह तमाम बातें आशकार हैं।इस वाक़िये के बाद तमाम साज़िशी ख़ुल कर सामने आ गये वहां तक कि वक़्ते आख़िर सब सरवरे कायनात (स.अ.व.व.) ने उम्मते मुस्लिना को गुमराही से बचाने और ख़िलाफ़त सरवरे कायनात (स.अ.व.व.) ने उम्मते मुस्लिमा को गुमराही से बचाने और ख़िलाफ़त के इशकाल को दूर करने के लिये क़लम व कागज़ का मुतालिब किया तो आपके इस मुतालिबे को हिज़यान से ताबीर कर दिया गया।

इन तमाम उमूर से साफ़ ज़ाहिर है कि सहाबा में एक गिरोह ऐसा भी था जो नबूवत व ख़िलाफ़त को एक ही घर में देखना पसन्द न करता था। इस न नापसन्दीदगी की वजह यह थी कि वह लोग खु़द अपनी हुकूमत क़ायम करना चाहते थे। चुनानचे उन्होंने पैगम़्बर (स.अ.व.व.) की ज़िन्दगी ही में इक़तेदार का रास्ता हमवार करना शुरू कर दिया और हर इस कार्रवाई के आगे दीवार खड़ी करने की कोशिश करने लगे जो उनके मुक़ासिद की राह में हायल हो सकती थी रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) बिस्तरे मर्ग पर क़लम काग़ाज़ तलब करते हैम मगर हंगामा खड़ा करके उन्हेी वसीयत नामा लिखने से रोक दिया जाता है ताकि अली (अ.स.) की नियाबत के मुताअल्लिक तहरीरी दस्तावेज़ न छोड़ जायें। फिर उन्हीं अय्याम मे एक को हुक्म देते हैं कि वह लश्करे उसामा में हों मगर उसे अमलन मुस्तरद कर दिया जाता है कि उन की अदम मौजूदगी की वजह से ख़िलाफ़त किसी दूसरी तरफ़ मुनतक़िल न हो जाये और जब पैगम्बर (स.अ.व.व.) दुनिया से रेहलत फ़रमाते हैं तो इस ख़तरे का इन्सेदाद भी ज़रूरी समझा जाता है कि कहीं अन्दर ही अन्दर अली (अ.स.) के हाथ बर बैयत न हो जाये और ऐसा हो भी जाता अगर अमीरूल मोमेनीन (अ.स.) ये गवारा कर लेते कि पैग़म्बर (स.अ.व.व.) के गुस्ल व कफ़न से पहले बैयत हो जाये मगर उन्होंने इसे गवारा न किया। चुनानचे बिलज़री का कहना है किः- जब रसूले खुदा (स.अ.व.व.) रेहलत फ़रमा गये तो अब्बास ने कहा ऐ अली (अ.स.) ! बाहर निकलये ताकि मैं लोगों के रूबरू आपकी बैयत करूं मगर अली (अ.स.) ने इन्कार किया और कहा कि कौन हमारे हक़ से इन्कार कर सकता है और कौन हम पर मुसल्लत हो सकता है। अब्बास ने कहा फिर देख लीजियेगा कि ऐसा हो कर रहेगा।) 1

हज़रत उमर भी इसी साज़िशी गिरोह की एक फ़र्द थे जो नबूवत और ख़िलाफ़त को एक ही घर में देखना न चाहता था , उन्हें यह अन्देशा लाहक़ हुआ कि अली (अ.स.) के हक़ में अब्बास की तरफ़ से बैयत की तहरीक कहीं अमली शक्ल न इख़तियार कर जाये इसलिये वह इस तहरीक को उभरने से पहले दबा देना चाहते थे चुनानचे उस वक़्त कोई तदबीर न सूझी तो पैग़म्बर (स.अ.व.व.) के ज़िन्दा होने का शाख़साना खड़ा कर दिया ताकि अली (अ.स.) के हाथ पर फ़ौरी बैयत का सवाल ही पैदा न हो।

यह तदबीर एक हद तक कामयाब हुई और लोगो ने हज़रत (स.अ.व.व.) की मौत व हयात का मसला छिड़ गया और वह हज़रत अबुबकर के आने तक इसी मसले में उलझे रहे यहां तक कि उनके आते ही वह तमाम शोर व हंगामे जो आन हज़रत (स.अ.व.व.) को ज़िन्दा साबित करने के लिये था एक दम ख़त्म हो गया और उन्होंने ऐसा जादू चलाया कि हज़रत उमर ने फ़ौरन अपना मौक़फ़ बदल दिया और आन हज़रत (स.अ.व.व.) की रेहलत के एतराफ़ के साथ हज़रत अबुबकर की बैयत का मुतालिबा भी शुरू कर दिया। यह मुतालिबा उन्हें तसव्वुरात व ख़्यालात का रद्दे अमल था जो ख़िलाफ़त के सिलसिले में उनके ज़ेहन मे नशोंनुमा पा रहे थे और जसिके बारे में आख़िरी हज के दौरान खान-ए-काबा में अहद व पैमान हो चुका था। वरना जब दावा ये है कि ख़िलाफ़त जमहूर की राय पर मुनहसिर है तो बैयत के मुतालेबात का जवाज़ ही क्या था जबकि न अभी इन्तेख़ाब अमल में आया था न राय आमा मालूम की जा सकती थी। ग़र्ज़ इस मुतालबए बैयत के बाद ये हक़ीकत छिप नहीं सकती कि वफ़ाते रसूल (स.अ.व.व.) से हज़रत उमर का इन्कार न हवास की परागन्दगी की बिना पर था और आयते कुरनी से बे ख़बरी व नावाक़फ़ियत की वजह से बल्कि सियासी ज़रूरत के पेशे नज़र था ताकि ख़िलाफ़ते रसूल (स.अ.व.व.) के सिलसिले में कोई आवाज़ अली (अ.स.) के हक़ में बुलन्द हो तो उसे दबाया जा सके और फिर जमहूर की आड़ लेकर अपनी मर्ज़ी की हुकूमत क़ायम की जा सके। चुनानचे सक़ीफ़ा के वाक़ियात इस अमर के गवाह है कि इस साज़शी गिरोह के अराकीन ने पैगम़्बर (स.अ.व.व.) की तजहीज़ व तक़फ़ीन पर हुकूमत की तशकील को मुक़द्दम समझा और अन्सार को सियासी शिकस्त दे कर हुकूमत क़ायम कर ली। यह कामयाबी जमहूर की मरहूने मिन्नत न थी बल्कि हज़रत उमर की सियासी बसीरत और मौक़े शनासी की एहसान मन्द थी।)

अज़वाजे पैग़म्बर (स.अ.व.व.)

तारीख़ गवाह है कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) की पहली शादी हज़रत ख़दीजतुल कुबरा बिन्ते खुलीद से हुई थी और उनकी ज़िन्दगी मे आपने कोई दूसरा अक़द नहीं फ़रमाया। पच्चीस ( 25) बरस तक उम्मुल मोमेनीन ख़दीजा आप की रफ़ीक़ये हयात , दुख सुख की साथी और मोईन व मददगार है पच्चीस साल के बाद जब आप की उम्र पचास साल की थी तो मौत के हाथों ने उस पुर अज़मत व बाविक़ार और फ़रमाबरदार व ग़मगुसार बीवी को आपसे जुदा कर दिया। उन मोअज़्ज़मा के इन्तेक़ाल के बाद आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने ख़ुद उनकी इताअत गुज़ारी का ज़िक्र करते हुए एक मौक़े पर फ़रमाया है कि (खु़दा ने मुझे ख़दीजा से बेहतर बीवी अता नहीं की वह उस वक़्त मुझ पर ईमान लायीं जब तमाम लोग मेरे मुन्किर थे , उस वक़्त उन्होंने मेरी रिसालत की तसदीक़ की जब सब मुझे झुटला रहे थे और उस वक़्त उन्होंने मुझे मालो ज़र से सहारा दिया जब सबने मुझे महरूम कर रखा था। 1

वफ़ाते ख़दीजा के बाद सिर्फ़ तेराह साल आन हज़रत (स.अ.व.व.) इस दुनिया में और ज़िन्दा रहे और इस तेरह बरस के अर्से में एक के बाद दीगर मुताअदि्द औरतों को अज़वाज की हैसियत से अपने ऐवाने ज़िन्दगी मे दाख़िल किया , उनमें कुछ कनीज़ें कुछ मुतलेक़ा और बक़ीया औरतें बेवा थीं।

इन मुसलसल व मुतावातिर शादियों का मक़सद वह हर गिज़ नहीं था जो आम तौर पर किसी औरत के लिये किसी मर्द के दिल में होता है बल्कि हक़ीक़त यह है कि ये तमाम शादियां मसलहतें इलाही और बसीरते नबूवी का नतीजा थी क्योंकि आन हज़रत (स.अ.व.व.) दीनी पेशवा और मज़हबी रहनुमा होने के साथ साथ एक उभरती हुई इस्लामी ममलेकत के ताजदार व सरबराह बी ते इस लिये इस्लाम के तबलीग़ी उमूर में सहूलतों और आसानियों के पेशे नज़र आपने अरब के मुक़तलिफ़ और बा-असर क़बीलों में अज़वाजी रिश्ते क़ायम करके उनकी मुश्रेकाना और काफ़िराना सरगर्मियों पर मोहरे हिदायत सब्त की। दूसरी यह कि आप चूँकि इन्सानियत के अलमबदार और हकूक़े बशरी के मुहाफिज़ भी थे इसलिये मर्दों के हुकूक़ में इरतेक़ाई जद्दो जेहद के साथ अपने ईसार व अमल के ज़रीये औरतों के हुकूक और नसवानी विकार को भी आप इतना सरबुलन्द , मोहकम और पायेदार कर देना चाहते थे कि बाद में आने वाला ज़माना औरत को पस्त , जलील और कमतर न समझे या उसके हुकूक को पामाल करने की जसारत न करे। ये अमल यक़ीनी है कि अगर आपको मसलहत ईज़दी के साथ साथ मोहताज कनीज़ों , लावारिस बेवाओं और ग़रीब नादार औरतो का ख़्याल या उनके हुकूकका पास व लेहाज़ न होता तो हज़रत खदीज़ा की वफ़ाते के बाद आप हरगिज़ हरगिज़ दूसरा अक़द न फ़रमाते। अपनी पुरआलाम और मशगूल तरीन ज़िन्दगी के आख़िरी तेरह साला दौर में आपने मुसलसल व पै दर पै शादियां करके औरत के लिये शरयी व कानूनी हदबन्दी की , अज़वाजी रिश्ते के तक़द्दुस का ऐलान किया और अदल व मसावात का एक ऐसा निज़ाम दुनिया के सामने पेस किया कि जिसके बाद क़यामत तक किसी कानून या निज़ाम की ज़रुरत महसूस न हो। हुजूरे अक़रम (स.अ.व.व.) के फ़र्ज़े मनसबी का तकाज़ा यही था चुनानचे उम्मुल मोमेनीन हज़रत ख़दीजा की वफ़ात के बाद जिन औरतों को आपने अपनी जौज़ियात का शरफ़ बख़शा उनका मुक़तसर तारुफ़ दर्ज ज़ैल है।

(1) उम्मुल मोमेनीन सूदा बिन्ते ज़मआ

आपका नस्बी सिलसिला आमिर बिन लवी पर मुंतही होता है। कुन्नियत उम्मुल असूद थी। आपकी पहली शादी सकरान इब्ने अम्र बिन अब्दुल शम्स से हुई थी जिसेस एक लड़का अब्दुल रहमान पैदा हुआ था जो किसी इस्लामी गज़वा में शहीद हो गया। आप अवाएले बइस्त में मुसलमान हुई और आपने शोहर सकरान के हमराह हिजरते हब्शा से सरफ़राज़ हुई। जब सकरान का इन्तेक़ाल हो गा तो हज़रत ख़दीजा की वफ़ात के बाद आन हज़रत (स.अ.व.व.) का इन्तेक़ाल हो गया तो हज़रत ख़दीज़ा की वफ़ात के बाद आन हज़रत (स.अ.व.व.) के अक़द मे आई। कुछ ख़ास वजूहात की बिना पर पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) ने सन् 8 हिजरी में आपको तलाक़ देना चाहा मगर आपने खुशामद दरामद की और यह कहा कि आप मुझसे कोई सरोकार न रखें लेकिन अपनी ज़ौजियत में रहने दें ताकि बरोज़े ताकि बरोज़े क़यामत में आपकी आवाज़ में महशूर हो सकूं। इस मिन्नत व समाजात और आजिज़ी के नतीजे में पैग़म्बरे अकरम (स.अ.व.व.) ने आपको तलाक़ देने का इऱादा तर्क कर दिया। बकौ़ल साहबे रौज़तुल एहबाब आपसे पांच हदीसें मरवी हैं।

(2) उम्मुल मोमेनीन आयशा बिन्ते अबुबकर

हदीस और रवायात और तारीख़ के मजाज़ी पर्दों में लिपटी हुई उम्मुल मोमेनीन आयशा की पुरइसरार शख़्सियत आलमे इस्लाम में मोहताजे तारूफ़ नहीं है। हर शख़्स जानता है कि आप ख़लिफ़ये अव्वल हज़रत अबुबकर बिन क़हाफ़ा बिन उस्मान बिन आमिर की तुलौवुन मिजाज़ बेटी है।

आपकी वालिदा उम्मे रूमान बिन्ते आमिर बिन औयमर बिन अब्दुल शम्स हज़रत अबुबकर के अख़द में आने से पहले अब्दुल्लाह बिन हारिस बिन संजरा की बीवी थी और उनका ताअल्लुक बनि कनआन से था मगर अंग्रेज़ मोअर्रिख़ कोर्ट फ़िरेशलर आलमानी का कहना है कि असकंदरिया की रहने वाली यूनानी नज़ाद थी।)

हज़रत आयशा की विलादत के बारे में मिस्री मोअर्रिख़ अब्बास महमूद अक़ाद का कहना है कि 8 यह अमर मोहक़िक़ नहीं हो सकता कि हज़रत आयशा किस सन् में पैदा हुई ताहम अग़लब ख़्याल यह है कि उनकी विलादत हिजरते नबूवी से ग़्यारह या बारह साल क़बल हुई (अंग्रेज़ मोअर्रिख़ आलमानी ने अपनी किताब (आयशा बाद अज़ पैग़म्बर (स.अ.व.व.) ) में साबित बिन अरतात का जो क़ौल नक़ल किया है उससे पता चलता है कि आप का साले विलादत सन् 1 बेइस्त है।

पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) की ज़ौजियत का शरफ़ हासिल करने से पहले आप जबीर इब्ने मोतिम की बीवी थी जो हनूज़ हालते कुफ़्र पर क़ायम था।) हज़रत अबुबकर ने जबीर ते तलाक़ ले कर आपका अक़दे सानी किया।) इस तरह तक़रीबन बीस बरस की उमर में आप पैग़म्बर इस्लाम (स.अ.व.व.) की जौज़ियात से मुशर्रफ़ हुई। आपको कुंवारी साबित करने के लिये छः साल की उम्र में पैग़म्बर (स.अ.व.व.) से शादी की जो दास्तान ब्यान की जाती है वह मेरी तहक़ीक़ के मुताबिक फ़र्जी है।

रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) की ज़ौजियत और खुलक़े अज़ीम की सोहबत से सरफ़राज़ होने के बावजूद आप दिली इरफ़ाने नबूवत से आरी व नाआशना थी आपकी निगाहों में नबी (स.अ.व.व.) और नबूवत की यह क़द्र मंज़िलत थी कि जब आप आन ह़रत से किसी बात पर नाराज़ हो जातीं तो नबी (स.अ.व.व.) कहना छोड़ देती थी और इब्राहीम का बाप कह कर मुख़ातिब करती थीं।)

क़दम क़दम पर पैग़म्बर (स.अ.व.व.) के लिये क़र्ब के लिये क़्रब अज़ीयत और कशमकश की दीवार खड़ी करना आपका मशग़ला और मामूल था जिसमें हज़रत उमर की साहबज़ादी हफ़सा आपकी मुईन व मददगार और सहीम व शरीक रहती थी चुनानचे एक बार उन दोनों फ़रमाबारदार बीवियों ने बाहमी साज़बाज़ करके पैग़म्बरे अकरम (स.अ.व.व.) के ख़िलाफ़ ऐसा मनसूबा तैयार किया कि जिससे तन्ग व परेशान होकर सरकारे दो आलम (स.अ.व.व.) ने अल्लाह की तरफ़ से हलाल शै को अपने ऊपर हराम कर लिया था और ये करबनाक सिलसिला एक माह तक जारी रहा जैसा कि बुख़ारी ने तहरीर किया है कि (रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) ने एक माह तक अज़वाज से कोई राबता नहीं रखा और अलहैदा चटाई पर सोते रहे।)

हज़रत आयशा की निसवानी सरिश्त में रश्क , हसद , जबहन , नफ़रत , अदाव , ग़बित , ऐबजूई खुद परस्ती हट धर्मी और क़ीना परवरी का माद्दा बदर्जा अतम कार फ़रमां था जिसकी वजह से आप आले रसूल (स.अ.व.व.) खुसूसन हज़रत अली (अ.स.) और हज़रत फात्मा ज़हरा (स.अ.व.व.) की बदतरीन दु्श्मन थीं यहाँ तक कि मासूमा (स.अ.व.व.) ने हज़रत उम्मे सलमा से इस अमर की वसीयत कर दी थी कि आयशा मेरे जनाज़े पर न आये। आपकी अदावत व दुश्मनी का पता इससे भी चलता है कि आपने हज़रत इमाम हसन (अ.स.) के जनाज़े पर तीरों की बारिश कराई और हज़रत अली (अ.स.) से जमल के मैदान में महाज़ आराई की।

इस अमर से इन्कार नहीं किया जा सकता कि आप एक आज़ीम सियासत दा , मुदब्बिर और आलेमा व फ़ाज़ेल थीं चुनानचे अहदे शैख़ीन में आपको हुकूमत की बेटी होने का शराफ़ हासिल था। इक़तेदार परस्तों का मुकम्मल इल्तेफ़ात आपकी ज़ात से वाबसता था और आपको वह खुसूसी हकूक हासिल थे जिनसे आन हज़रत (स.अ.व.व.) की दूसरी बीवियां महरूम थीं। वज़ाएफ व अताया में भा दीगर अज़वाज पर मुक़द्दम थीं चुनानचे हज़रत उमर ने अपने दौरे हुकूमत में रसूल (स.अ.व.व.) की बीवियों में हर एक का दस हज़ार और आपका बारह हज़ार वज़ीफ़ा मुक़र्रर किया था लेकिन हज़रत उस्मान ने अपने दौर में आपको दो हज़ुपर कम करके दीगर अज़वाज़ के मसावी कर दिया।

सन् 56 हिजरी में जब मुआविया अपने फ़ासिख़ व फ़ाजिर बेटे यजीद की बैयत का रास्ता हमवार करने की ग़र्ज़ से मदीने आया तो आप हुजूर इब्ने अदी के क़त्ल के मामले में उससे उलझ गयीं। नतीजा यह हुआ कि माविया जहाँ मुक़ीम था उस घर में उसने एक कुंवा ख़ुदवाया और उसके बहाने को ख़सी ख़ाशाक़ से ढककर उस पर आबनूस की एक कुर्सी रखवाई। दूसरे दिन उसने आपको दावत पर बुलाया। जब आप तशरीफ़ लायीं और उस कुर्सी पर जलवा अफ़रोज़ हुई तो बगै़र कुछ कहे सुने सीधे कुवें के अन्दर चलीं गयीं। उसके बाद माविया ने उस कुएं में चूना भरवा कर उसका मुंह बन्द करा दिया और मक्के की तरफ़ रवाना हो गया। उस वक़्त आपकी उम्र तकरीबन 65 या 70 साल की थी। आपसे दो हज़ार दो सौ दस हदीसें मरवी हैं।

(3) उम्मुल मोमेनीन हफ़सा बिन्ते उमर

हज़रत हफ़सा , ज़ैनब बिन्ते मज़ऊन के बतन से हरत उमर की साहबज़ादी थीं , आपकी शादी पहले ख़नीस बिन हुज़ैफ़ा से हुई थी जो मुहाजरीन हबश और मुजाहेदीन बदर से थे। गज़वये ओहद के बाद उनका इन्तेक़ाल हो गया और आप बेवा हो गई तो हज़रत उमर ने हज़रत अबुबकर और हज़रत उस्मान से आपका अक़द करना चाहा मगर उन दोनों ने साफ़ इन्कार कर दिया तो उन्होंने हज़रत (स.अ.व.व.) से आपका अक़द कर दिया लेकिन कुछ दिनों के बाद एक राज़ को तशत अज़बाम करने केी बिना पर आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने आपको तलाक़ दे दी। इस तलाक़ के बाद हज़रत उमर तमाम उम्र रोतें और फ़रमाते थे किः- अगर आले ख़त्ताब में कोई ख़ैरो ख़ूबी होती तो रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) मेर बेटी हफ़सा को तलाक़ न देते। हज़रत हफ़सी का इन्तेक़ाल साठ बरस की उम्र में हुआ और उनसे साठ हदीसें मरवी हैं।

(4) उम्मुल मोमेनीन ज़ैनब बिन्ते हज़ीमा

ज़ैनब बिन्ते हज़ीमा बिन हारिस , पहले आपका अक़द तुफ़ैल बिन हारिस बिन अब्दुल मुत्तालिब से हुआ था लेकिन तुफ़ैल ने तलाक़ दे दी तो आपने उसके भाई अबीदा बिन हारिस से अक़द कर लिया। अबीदा ग़ज़वा में शहीद हो गये तो आप अब्दुल्लाह इब्ने हजश के अक़्द में आई जब वह भी जंगे ओहद मे शहीद हुए तो माहे रमज़ान सन् 3 हिजरी में आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने आपसे निकाह किया। कुल आठ माह सरकारे दो आलम (स.अ.व.व.) के घर में रह कर आपने माहे रबीउस्सानी सन् 4 हिजरी में वफ़ात पाई आपका लक़ब उम्मुल मसाकीन था।

(5) उम्मुल मोमेनीन उम्मे सलमा बिन्ते सुहैल

हज़रत उम्मे सलमा का असल नाम हिन्द था। आप आतिका बिन्ते अब्दुल मुत्तलिब के बतन से सहल बिन मु़ग़ीरा बिन अब्दुल्लाह मख़जूमी की साहबज़ादी थी। आपकी पहली शादी अब्दुसलमा बिन अब्दुल्लाह से हुई थी। और अबुसलमा से आपके चार ब्चेच अम्र , दर्रा सलमा और ज़ैनब थे आपने मक्के से हबशा और मदीना दोनों हिजरते क। अबु सलमा की वफ़ात जंगे औहद में ज़ख़्म खाने के सबब से हुई। और जब उम्मे सलमा बेवा हो गयीं। उसके बाद माहे शव्वाल सन् 14 हिजरी में उम्मे सलमा को आन हज़रत (स.अ.व.व.) की ज़ौजियत का शरफ़ हासिल हुआ। आपका शुमार आन हज़रत (स.अ.व.व.) की मुख़लिस व ग़मगुसार बीवियों में है और आप अहलेबैत (अ.स.) के लिये अपने दिल में हमदर्दी व जॉनिसारी का जज़बा रखती थीं। आपका इन्तेक़ाल सन् 61 हिजरी में वाक़ये कर्बला और हज़रत इमामे हुसैन (अ.स.) की शहादत के बाद हुआ उस वक़्त आप की उम्र 84 साल की थी जन्नतुल बक़ी में दफ़्न हुआ आप से 378 हदीसें मरवी हैं।

(6) उम्मुल मोमेनीन ज़ैनब बिन्ते हजश

अस्ल नाम बर्रा था। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने ज़ैनब नाम रखा। और कुन्नियत उम्मुल हक़ीम थी। नीज़ मां का नाम उम्मिया बिन्ते अब्दुल मुत्तलिब था। आपका पहला निकाह ज़ैद बिन हारिसा से हुआ मगर चूँकि दोनों के मिज़ाज़ में हम आहंगी नहीं थी इसलिये ज़ैद ने आपको तलाक़ दे दी और उसके बाद माहे ज़ीक़द सन् 5 हिजरी में आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने आपसे अक़द फरमाया। उशी मौक़े पर आयए हिजाब नाज़िल हुई। हज़रत आय़शा का ब्यान है कि उस वक़्त अज़वाजे पैग़म्बर (स.अ.व.व.) में कोई औरत ज़ैनब बिन्ते हजश से ज़्यादा मुत्तक़ी , परहेज़गार , मुख़ैयर , सदक़ा देने वाली और सेलए रहम करने वाली नहीं थी। सन् 20 हिजरी या 21 हिजरी में 52 साल की उम्र में आपने इन्तेक़ाल फ़रमाया और बकी में दफ़्न हुई। आप से ग्यारह हदीसें मरवी हैं।

(7) उम्मुल मोमेनीन जुवेरिया बिन्ते हारिस बिन अबु ज़रार

आप जुलशकर बिन मसाफ़े बिन सिफ़वान की बीवी थीं जब वह जंगे मरसीय में मारा गया तो आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने माहे रमज़ान सन् 6 हिजरी में आप से अक़द किया. सन् 55 हिजरी में 65 साल की उम्र में मदीने में फ़ौत हुई। आपसे सात हदीसें मरवी हैं।

(8) उम्मुल मोमेनीन उम्मे हबीबा बिन्ते अबुसुफ़ियान

असल नाम रमला या हिन्द था। आपक मां का नाम सफ़िया बिन्ते अबुल हास बिन उमय्या था जो हज़रत उस्मान बिन अफ़ान की थीं। आपका निकाह पहले अबीदा बिन हजश असदी से हुआ था और अवाएले इस्लाम में दोनों ने इस्लाम कुबुल करके हबशा की तरफ़ हिजरत की थी वहीं आपने बतन से एक लड़की हबीबा पैदा हुई और वहीं अबीदुल्लाह ने ईसाइ मज़हब इख़तेयार कर लिया। सन् 6 हिजरी में जब अबीदुल्लाह शारब पी कर मर गया तो आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने बादशाह हबश (नज़्जाशी) के ज़रिये उम्मे हबीबा को अक़द का पैग़ाम दिया। सन् हिजरी में हबीबा मैदीने आई और आन हज़रत (स.अ.व.व.) के शरफ़े ज़ौजियात से सरफ़राज़ हुई आपने सन् 44 हिजरी में मदीने में इन्तेक़ाल फ़रमाया। आपसे 65 हदीसें मरवीं हैं।

(9) उम्मुल मोमेनीन सफ़ीया बिन्ते हयी बिन अख़तब

आप यहूदी बनी नज़ीर से थीं आपका सिलसिलए नसब हज़रत हारून (अ.स.) पर मुन्तही होता है। आप सालम इब्ने मशकम को ब्याही थीं। जब दोनों में जुदाई वाक़ेय हुई तो कनान बिन रबी बिन अबिल हक़ीक़ ने आपको अपनी ज़ौजियत में ले लिया। कनान जंगे ख़ैबर में मारा गया और क़ैद होकर आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने उन्हें अपनी ज़ौजियात में लिया। मंजि़ले सहबा में ज़फ़ाफ़ वाक़ेय हुआ उस वक़्त उनकी उम्र 17 साल की थी हज़रत आयशा और हफ़्शा आपको बहुत सताती थीं जिस पर आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने मुत्तइद बार दोनों की सरज़निश की। सफ़ीया की वफ़ात सन् 52 हिजरी में वाक़ेया हुई और जन्नतुल बक़ी में दफ़्न हुईं। आपसे दस हदीसें मरवी हैं।

(10) उम्मुल मोमेनीन मैमूना बिन्ते हारिस बिन हज़न

आपका असल नाम बर्रा था आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने बदल कर मैमूना रखा। आपकी वालदा हिन्द बिन्ते औफ़ बिन ज़हीर बिन हरब , बनि हमीर या बनि कनान से थीं। उनके पहले शौहर उमैस ख़मसी से असमा बिन्ते उमैस थी जो अव्वलन ज़ाफ़र बिन अबुतालिब , सानियन हज़रत अबुबकर और सालिसन हज़रत अली (अ.स.) के अक़द में आई। दूसरे सलमा बिन्ते उमैस थीं जो हज़रत हमज़ा की ज़ौजियत में थी और तीसरे जै़नब बिन्ते उमैस थीं जो शद्दा बिन हाद की बीवी थीं। मैमूना उम्मुल फ़ज़ल और उम्मे ख़ालिद यह तीनों बहने अपनी मां के दूसरे शौहर हासिर बिन हज़न बिन बहीर बिन हज़त से थीं , मैमूना ज़मानये जाहेलियत मे मसऊद बिन उमर सक़फ़ी की बीवी थीं , दोनों में मुफ़ारेक़त हुई तो हवीतब बिन अब्दुल उज्जा की ज़ौजियत में आय़ीं और हवीतब के इन्तेक़ाल के बाद आन हज़़रत (स.अ.व.व.) की ज़ौजियत मुशर्रफ़ हुई। उम्मु फ़ज़ल अब्बास अम पैग़म्बर (स.अ.व.व.) की ज़ौजा थीं और उम्मे ख़ालिद वलीद बिन मुग़ीरा को मनसूब थीं। मैमूना का इन्तेक़ाल सन् 51 हिजरी में हुआ और मंज़िले शरफ़ मे मदफ़ून हुई। आपसे 76 हदीसें मरवी हैं।

मज़कूरा दस अज़वाज मे ज़ैनब बिन्ते ख़ज़ीमा ने आन हज़रत (स.अ.व.व.) की ज़िन्दगी में इन्तेक़ाल किया बाक़ी 6 अज़वाज वफ़ाते पैग़म्बर (स.अ.व.व.) के वक़्त जि़न्दा थीं उन बीवियों के अलावा असमा बिन्ते नेमान कुन्दिया से भी अक़द फ़रमा था मगर ज़फ़ाफ़ से पहले उसको उसके क़बीले में वापस भेज दिया। उसके तलाक़ का सबब हज़रत आयशा व हफ़सा का रशक व हसद था।

कनीज़ें

(1) मारिया क़िबतिया बिन्ते शमऊन और उनकी बहन सैरीन का रूकन्द्रिया के बादशाह मक़ूकश ने बतौर हदिया आन हज़रत (स.अ.व.व.) के पास भेजा था। आन हज़रत (स.अ.व.व.) ने मारिया को अपने पास रखा और सैरीन को हिसान बिन साबित के हवाले कर दिया। मारिया से आन हज़रत (स.अ.व.व.) के फ़रज़्नद इब्राहीम पैदा हुए जो एक साल तीन माह ज़िन्दा रह कर दुनिया से रूख़सत हुए और सीरीन से एक लड़का अब्दुल रहमान बिन हिसान पैदा हुआ। सन् 16 हिजरी मारिया ने इन्तेक़ाल किया और बक़ी में दफ़्न हुई।

(2) एक कनीज़ ज़नैब बिन्ते हजिश ने आन हज़रत (स.अ.व.व.) की ख़िदमत में पेश की थी।

(3) जमीला नामी एक कनीज़ क़ैदियों में आयीं थी।

औलादें

उम्मुल मोमेनीन हज़रत ख़दीजा के बतन से ख़ुदा वन्दे आलम ने आन हज़रत (स.अ.व.व.) को फ़ात्मा ज़ेहरा (स.अ.व.व.) नाम की एक कुदसी सिफ़ात बेटी और क़ासिम व अब्दुल्लाह नाम के दो बेटे मरहमत किये। जनाबे क़ासिम बेइस्त से दो साल क़बल मक्के में पैदा हुए और दो ही साल ज़िन्दा रह कर इन्तेक़ाल फ़रमां गये उन्हीं के नाम से सरवरे दो आलम (स.अ.व.व.) की कुन्नियत अबुलक़ासिम क़रार पाई। और अब्दुल्लाह भी जो तैयब व ताहिर के नाम से मशहूर हैं क़बल बेइस्त मक्क़े ही मैं पैदा हुए थे और आलमे तफ़ूलियत में ही दुनिया से रूख़सत हो गये। आन हज़रत (स.अ.व.व.) के एक साहबज़ादे इब्राहीम मारिया क़िब्तिया के बतन से पैदा हुए ते जो सवा साल के होकर सन् 10 हिजरी में वफ़ात पा गये। उन औलादों के अलावा पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व.) के और कोई औलाद नहीं थी। ख़ुदा ने आप की औलादों में सिर्फ़ निसाइल आलामीन ह़रत फ़ात्मा ज़हरा (स.अ.व.व.) को बकैदे हयात रखा और उन्हीं से आपकी नस्ल चली।

आपकी दुख़्तरन रबिया में ज़ैनब , रूक़य्या और उम्मे कुलसूम थीं जो हज़रत ख़दीजा की बहेन हाला की साहबज़ादियां थी और चूँकि यह लड़किया हज़रत ख़दीजा के पास रहतीं थी और आन हजरत (स.अ.व.व.) के ज़ेरे केफ़ालत थीं इसलिए हज़रत ख़दीजा की लड़कियां कहलायीं जैसा कि अबुलक़िसिमुल कूफीउल मतूफ़ीसन 352 हिजरी का ब्यान है किः-

(जब रसूल उल्लाह (स.अ.व.व.) ने हज़रत ख़दीजा से अक़द किया तो उसके थोड़े अरसे बाद उनकी बहन हाला का इन्तेक़ाल हुआ उसने तीनों लड़कियों रूक़य्या ज़ैनब और उम्मे कुलसूम छोड़ीं जो पैग़म्बर (स.अ.व.व.) और खदीजा की आग़ोशे तरबियत में पलीं और इस्लाम से क़बल ये दस्तूर था कि अगर कोई बच्चा किसी गोद में परवरिश पाता था तो वह उसी से मनसूब किया जाता था।)

अल्लामा सैय्यद ज़ीशान हैदर जवादी तराज़ है किः-

(आप (हज़रत फ़ात्मा ज़हरा (स.अ.व.व.) ) सरकारे दो आलम (स.अ.व.व.) की इक़लौती थीं और ज़ेनब व उम्मे कुलसूम और रूक़य्या सरकार (स.अ.व.व.) की रबीबी थीं जिन के बारे में इख़तेलाफ़ है कियह जनाबे ख़दीजा की बेटियां थीं या जनाबे ख़दीजा बा करा थीं और उनकी बहन हाला की बेटियां थीं और उसकी वाज़ेह तरीन दलील यह है कि रसूले अकरम (स.अ.व.व.) का अक़द पच्चीस साल की उम्र में बेइस्त से 15 साल पहले हुआ है पांच साल तक कोई औलाद नहीं हुई और उन तीनों बेटियों का अक़द बेइस्त से पहले अतबा व अतीबा फ़रज़न्दाने अबुलहब और अबुलआस बिन रबी से हो चुका था और अब यह बात तक़रीबन नामुम्किन और बईद अज़ क़्यास हैं कि दस साल के अन्दर तीनों बेटियां पैदा भी हुई और उनका अक़द भी हो जाये जबकि दरमियान में क़ासिम और अब्दुल्लाह की विलादत का वक़फ़ा भी रखना पड़ेगा।)

(फिर अगर किसी सूरत से उन्हें दुख़्तराने पैग़म्बर (स.अ.व.व.) तस्लीम भी कर लिया जाये ताकि यह वह दुख़्तरान में जिनका अक़द कुफ़्फ़ार से हो चुका है और क़ुफ़्फार से अक़द हो जाने के बाद मुसलमान से अक़द न उसे मुस्तहक़े मनसब बना सकता है और न जुलनूरीन। जुलनूरीन होने के लिए लड़की का नूर होना ज़रूरी है और यह शरफ़ सिद्दीक़ये ताहेर (स.अ.व.व.) क अलावा किसी को हासिल नहीं है।)


फेहरिस्त

अरब और उसके क़बीले 3

अहदे जाहेलियत में अरबों की हालत 7

अरबी ज़बान 11

दौरे जाहिलियत में अरबों की हुकूमत 15

अरबों में बुत परस्ती का रिवाज़ 16

पैग़म्बरे इस्लाम ( स अ व व .) का ख़ानदानी पस मन्ज़र 19

क़ुसी इब्ने कलाब 22

अबदे मनाफ़ 26

हाशिम इब्ने अबदे मनाफ़ 29

जनाबे हाशिम की क़ौमी ख़िदमात 32

हज़रत अब्दुल मुत्तलिब 35

तजदीदे ज़मज़म 38

जनाबे अब्दुल्लाह की कुर्बानी 43

ख़ान - ए - काबा पर हमला 47

मज़लूम की हिमायत 56

वफ़ात व मदफ़न 57

हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने अब्दुल मुत्तलिब 59

हज़रत अबुतालिब इब्ने अब्दुल मुत्तालिब 61

जौक़े सुख़न 65

यतीमे अब्दुल्लाह की परवरिश व तरबियत 66

करामाते मुहम्मदी और अबुतालिब 70

पैग़म्बरे इस्लाम ( स अ व व .) और हज़रत अबुतालिब का तिजारती सफर 72

आन हज़रत ( स अ व व .) का अक़द 75

हज़रत अबु तालिब का इस्लामी नज़रिया 78

ख़ून और गोबर 87

आसतीनों के खंजर 87

शोअबे अबुतालिब 89

इख़फाये इस्लाम 92

ईमाने अबुतालिब 95

वफ़ाते अबुतालिब ( अ स .) 104

औलादें 109

हज़रत फ़ात्मा बिन्ते असद 112

हक़ीक़ते अहमदी 117

अबुल क़ासिम , हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ( स .अ .व .व .)127

(विलादत ) 127

तारीख़ , दिन और सने विलादत 130

अलक़ाब और कुन्नियत 134

रज़ाअत व परवरिश 135

जनाबे आमना की रेहलत 139

सीरत व किरदार की बुलन्दी 141

ख़ाना आबादी 144

इन्हेदाम व तामीरे काबा 144

बेअसत और नुजुले कुरान की इब्तेदा 147

साबेक़ीने इस्लाम 149

कानून तक़य्ये पर अमलदरामद 154

नुसरते रसूल का आग़ाज़ 161

मजम - ए - आम में एलाने रिसालत 165

आन हज़रत ( स अ व व .) पर मज़ालिम 166

साबेक़ीने इस्लाम पर कुरैश के मज़ालिम 171

हिजरते हब्शा ( 5) पाँच बेइस्त 177

नज्जाशी के दरबार में हज़रत जाफर का तबलीग़ी कारनामा 181

दारूल अरक़म में आन हज़रत ( स अ व व .) का क़याम 184

हज़रत उमर का मुसलमान होना 184

बैतुल्लाह में एलानिया पहली नमाज़ 187

ताएफ़ का सफ़र 188

मसाएब की शिद्ददत 190

शक़क़ुल कमर का वाक़िया 192

अहले यसरब की बेदारी 193

मेराज ए नबी ( स अ व व .) 199

मदीना और अन्सार 202

बईते अक़बा औला 205

बैयते अक़बा सानिया 208

असहाब की रवानगी 210

पैग़म्बर इस्लाम ( स अ व व .) की हिजरत 211

आन हज़रत ( स अ व व .) का इस्तेक़बाल 223

मस्जिदे क़बा का संगे बुनियाद 224

शहरे मदीनें मे हुजूर ( स अ व व .) का दाख़िला 226

मस्जिदे नबवी की तामीर 226

असहाबे सुफ़्फ़ा 232

नमाज़ व ज़कात 233

हज़रत सलमान फारसी 236

अब्दुल्लाह इब्ने अबीसलूल मुनाफिक़ 237

मवाख़ात ( भाई - चारा ) 238

यहूदियों से मुहायिदा 242

हज़रत फ़ात्मा ज़हरा सलवातुल्लाह अलैहा का अक़द सन् 2 हिजरी 247

तहवीले क़िबला सन् 2 हिजरी 256

जिहाद का हुक्म 258

इक़सामे जेहाद 264

ग़ज़वा अबवा ( सन् 2 हिजरी ) 264

सरया राबिग़ ( सन् 2 हिजरी ) 265

सरया सैफुल बहर ( सन् 2 हिजरी ) 265

सरया खुरार ( सन् 2 हिजरी ) 266

ग़जूवा जुलअशीरा ( सन 2 हिजरी ) 266

जंगे बद्र ( सन् 2 हिजरी ) 268

सन् 2 हिजरी के दीगर ग़ज़वात व मुख़्तलिफ़ वाक़ियात 280

सन् 3 हिजरी 281

जंगे ओहद 281

शोहदाये औहद की तदफ़ीन 298

तीसरी हिजरी के मुख़तलिफ़ वाक़ियात 299

(सन् 4 हिजरी ) 301

सरिया अबु सलमा 301

सरिया इब्ने अनीस 301

रजीय का अलमिया 301

वाक़िया बैरे मऊना 302

ग़ज़वा बनी नज़ीर 304

मुख़तलिफ़ वाक़ियात 308

ग़ज़वा दूमतुलजन्दल 309

ग़ज़वा बनि मुसतलिक़ 309

इफ़क का वाक़िया 310

ग़ज़व - ए - एहज़ाब ( जंगे ख़न्दख़ ) 312

जंगे ख़न्दक़ और महारब - ए - तालूत व जालूत में मुमासेतल 327

बनि क़ुरैज़ा सरकूबी 329

मुक़तलिफ़ वाक़ेयात 335

(सन् 6 हिजरी ) 337

ग़ज़वा बनि लहियान 337

गज़वाऐ ज़ीक़ुर्द 337

मारकये हुदैबिया 338

अबुजिन्दल और अबुबसीर का वाक़िया 350

मुख़तलिफ़ वाक़ियात 353

(सन् 7 हिजरी ) 354

तबलीग़ी मकतूबात 354

मारकऐ - ख़ैबर 356

जाएदादे फ़िदक 370

मुहाजेरीने हब्शा की वापसी 373

रजअते शम्स ( सूरज पलटना ) 374

उमरा - ए - कज़ा 375

मुख़तलिफ़ वाक़ियात 376

जंगे मौता 377

फ़तहे मक्का 379

मुशरेकीन का अन्जाम 390

बुतों का अन्जाम 391

बैयते आम 394

वाक़ - ए - ग़मीज़ा 395

ग़ज़वा हुनैन 400

जंग औतास 408

ताएफ़ का मुहासिरा 408

ग़नाएम की तक़सीम 412

यमन में इस्लाम की तबलीग़ 415

(सन् 6 हिजरी ) 417

बनि तमीम की सरकूबी 417

सरया वादी - उल - रमल 418

सरया बनि तय 420

ग़ज़वा तबूक 422

वाक़िया उक़बा 426

मस्जिद ज़रार का इन्हेदाम। 428

वाक़िया ईला 429

तबलीग़े सूरये बरात 434

अब्दुल्लाह इब्ने अबुमुनाफ़िक़ 438

अबु आमिर का वाक़िया 441

सरया बनि ज़ुबैद 442

मुबाहिला 445

हुज्जत विदा 451

ग़दीरे ख़ुम 456

गवर्नरों की तक़रूरी 466

असूद अनसी का वाक़िया 467

दीगर मुदईयाने नबूवत 470

जैश उसामा 471

इमामते नमाज़ 483

क़लम व क़िरतास का अलमिया 496

रसूले अकरम ( स अ व व .) का सफ़रे आख़रत 505

अज़वाजे पैग़म्बर ( स अ व व .) 521

(1)उम्मुल मोमेनीन सूदा बिन्ते ज़मआ 523

(2)उम्मुल मोमेनीन आयशा बिन्ते अबुबकर 524

(3)उम्मुल मोमेनीन हफ़सा बिन्ते उमर 527

(4)उम्मुल मोमेनीन ज़ैनब बिन्ते हज़ीमा 528

(5)उम्मुल मोमेनीन उम्मे सलमा बिन्ते सुहैल 528

(6)उम्मुल मोमेनीन ज़ैनब बिन्ते हजश 529

(7)उम्मुल मोमेनीन जुवेरिया बिन्ते हारिस बिन अबु ज़रार 530

(8)उम्मुल मोमेनीन उम्मे हबीबा बिन्ते अबुसुफ़ियान 530

(9) उम्मुल मोमेनीन सफ़ीया बिन्ते हयी बिन अख़तब 531

(10) उम्मुल मोमेनीन मैमूना बिन्ते हारिस बिन हज़न 531

कनीज़ें 532

औलादें 533

फेहरिस्त 536

तारीखे इस्लाम-2 बुक पार्ट ٢

तारीखे इस्लाम-2

बुक करेकशन

लेखक: जनाब फरोग़ काज़मी साहब
कैटिगिरी: इतिहासिक कथाऐ
पन्ने: 30