तारीखे इस्लाम भाग 3

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लेखक: जनाब फरोग़ काज़मी साहब
इतिहासिक कथाऐ

तारीखे इस्लाम भाग 3

लेखकः जनाब फरोग़ काज़मी साहब

नोटः ये किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क के ज़रीऐ अपने पाठको के लिऐ टाइप कराई गई है।

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फेहरिस्त

हज़रत अबुबकर बिन अबुक़हाफा 6

हुलियाः- 7

हज़रत अबुबकर का मुसलमान होना 8

हज़रत अली अ 0 की ख़ामोशी 31

क़ज़िया फ़िदक 34

मुस्लिमा क़ज़्ज़ाब 53

अहले हज़र मौत की बग़ावत- 56

अहले तहामा की बग़ावत 58

जम-ऐ-कुरान 59

हीरा पर हमला 69

फ़तहे उबल्ला 69

जंगे मज़ार 70

जंगे वलजा 70

जंगे उल्लीस 71

जंगे अनबार 71

जंगे दुमतुल जंदल 73

जंगे फ़राज 74

फ़तूहाते शाम 75

शाम पर हमले की तैयारियां 78

जंगे यरमूक 81

हज़रत अबूबकर की वफ़ात 84

अज़वाज व औलादें 89

उम्माल 91

हज़रत उमर बिन ख़त्ताब 92

हजरत उमर का तअर्रुफ़ 92

एक नज़र में अहदे ख़िलाफ़त के वाक़िया 94

दमिश्क़ पर चढ़ाई 96

जंगे फहल 100

फ़तह बेसान व तबरिया 100

जंगे मरजुल रोम सन् 15 हिजरी 101

फ़तहे हमस , हमात , सला जक़ीया और क़नसरीन वगैरा 102

फ़तेह हलब , व अनताकिया वग़ैरा 104

जंगे अजनादीन 105

फ़तह बैतुल मुक़द्दस 107

हम्स पर रोमीयो का हमला 109

ईरान से मार्काआराईयों 113

जंगे बवीब 118

जंगे क़ादसिया 119

फ़तेह मदायन 126

जनाबे शहर बानों का वाक़िया 129

जंगे जलूला 131

फ़तेह तिकरीत व मूसल वग़ैरा 132

फ़ारस पर लश्करकशी 133

फ़तहे अहवाज़ शोसतर वगै़रा 134

जंगे नेहावन्द 135

फ़तेह ख़ुरासान 139

इऱाक़ व ईरान का बन्दोबस्त 141

फ़तूहाते मिस्त्र 142

चार तक़बीरें 174

अबु शहमा का वाक़िया 181

शूरा , वफ़ात , अज़वाज और औलादें 190

हज़रत उस्मान बिन अफ़ान 200

इब्तेदाई हालात 202

पैग़म्बरे इस्लाम की पेशोनगोई 203

ख़िलाफ़ते उस्मानिया की इब्तेदा 206

निजामें हुकूमत 207

कूफ़ा 220

मुहासिरा और क़त्ल 274

मदफन 283

मुद्दते इक़तेदार 285

अज़वाज और औलादें 285


हज़रत अबुबकर बिन अबुक़हाफा

तारुफ़

तारीख़ की किताबों से यह पता नहीं चलता कि आकी तारीखे पैदाइश क्या है ? अलबत्ता बाज़ मुवर्रिख़ीन का ख़्याल है कि आप हज़रत रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अलैहे वालेही वस्सल्लम से सवा दो बरस या तीन बरस छोटे थे और सन् 583 में पैदा हुए। लेकिन सही बुख़ारी बाबुल हिज़रत की एक रवायत से पता चलता है कि जब रसूले अकरम स 0 मक्के से मदीने के लिये रवाना हुए तो आगे ऊँट पर हज़रत अबुबकर सवाए थे क्योंकि यह बूढ़े थे और उन्हें लोग पहचानते थे।

नाम की वजह तसमिया के बारे में मशहूर मिस्री मुवर्रिख़ मुहम्मद हुसैन हैकल का बयान है कि “ बकर अरबी में जवान ऊँट को कहते हैं। ” चूंकि हज़रत को ऊँटों की परवरिश व परदाख़्त और इलाज व मुआलेजे का शौक़ ज़्यादा था और आप इसी नाम से मशहूर हो गये। ”

जमान-ए-कुफ्र में हज़रत अबुबकर का असली नाम अब्दुल काबा था। इस्लामन लाने के बाद अब्दुल्ला हुआ लेकिन आपकी कुन्नियत ने किसी नाम को उभरने न दिया और सारी दुनिया आपको अबुबकर ही के नाम से जानती है।

हुलियाः-

अब्दुल रहमान बिन हाफ़िज़ अमरुद्दीन ने अपनी किताब “ अबुबकर की सवाहेह उमरी ” में तहरीर किया है कि “ हज़रत अबुबकर का रंग सफेद ज़र्दी माएल था। ” बदन छरहरा , पेशानी बाहर को निलकली हुई और आंखे अन्दर धंसी हुई मालूम होती थी। रुख़सार इस क़दर पिचके थे कि चेहरे की रगें उभरी रहती थी , दाढ़ी हर वक़्त ख़िज़ाब से रंगीन रहती थी और ख़ास बात यह थी कि हाथ की उंगलियो पर बाल नदारद थे।

इब्तेदाई ज़िन्दगीः

हज़रत अबुबकर के बचपन या जवानी के वाक़ियात बहुत कम तारीख़ की किताबों में मिलते हैं और जो वाक़ियात है भी उनसे यह पता नहीं चलता है कि आप की इब्तेदाई ज़िन्दगी के ख़दो ख़ाल क्या थे ? जिस वक़्त आप मुसलमान हुए उस वक़्त आपके वालिद अबुक़हफ़ा ज़िन्दा थे मगर यह पता नहीं चलता कि आप के वालिद पर आपके इस्लाम लाने का क्या असर हुआ और न ये मालूम है कि आपने अपनी ज़िन्दगी में अपने बाप अबुक़हाफ़ से क्या असर कुबूल किया।

वालदैनः-

हज़रत अबुबकर के वालिद का नाम उस्मान बिन आमिर और कुन्नियत अबुक़हाफ़ा थी। वालिदा का नाम सलमा था जो सख़र बिन अमरु की साहबज़ादी और अबुक़हाफा की चचा ज़ाद बहन थीं। फ़तेह मक़्क़ा के बाद सन् 6 हिजरी में उन्होंने इस्लाम कुबूल किया और 67 बरस की उम्र में सन् 14 हिजरी में वफ़ात पाई। इस तरह वह कुल चार साल कुछ माह मुसलमान रहे बाक़ी ज़िन्दगी कुफ़्र के अंधेरों में गुज़री।

हज़रत अबुबकर का मुसलमान होना

हज़रत अबुबकर के मुशर्रफ व इस्लाम होने का मसअला इख़तेलाफ़ी है। बाज़ उलमा का ख़्याल है कि हज़रत अबुबकर पहले शख़्स हैं जो पैग़म्बर स 0 के मबऊस व रिसालत होते ही इस्लाम लाये। बाज़ ने खुश एतक़ादी की बिना पर आप को हज़रत ख़दीजा स 0, हज़रत अली अलै 0 और हज़रत फ़ातेमा ज़हरा स 0 के बाद चौथे नम्बर पर रखा है और बाज़ का ख्याल है कि जिस वक़्त आप ने इस्लाम कुबूल किया है उस वक़्त पचास से ज़्यादा लोग मुसलमान हो चुके थे।

हज़रत अबुबकर के मुसलमान होने का असल सबब क्या था ? इस ज़ैल में शाह वली उल्लाह मोहद्दिस देहलवी का कहना है कि हज़रत अबुबकर के मुसलमान होनो का सेहरा काहिनों और नुजूमियों के सर है क्योंकि आपने नुजूमियों से सुन रखा था कि इस्लाम अनक़रीब तर्की करके सीरी दुनिया में फैल जायेगा इस लिये आपने इस्लाम इख़्तियार कर लिया।

शाह मोहद्दिस की तहरीर से ये बात वाज़ेह है कि इस्लाम के मुहासिन और उसकी अफ़ादियत के तहत हज़रत अबुबकर ने इस्लाम नहीं कुबूल किया बल्कि अपने मुफ़ाद , हुसूले मक़सद और मुस्तक़बिल को मद्दे नज़र रखते हुए दायरये इस्लाम में दाख़िल हुए थे।

सक़ीफ़ा की कार्रवाईः

पैग़म्बरे इस्लाम सब 0 की वफ़ात के बाद उनकी “ मौत व हयात ” के बारे में हज़रत उमर ने जो हंगामा “ ब-ज़ोरे शमशीर ” बरपा कर रखा था वह हज़रत अबुबकर की अफ़सूँगरी से ख़त्म हो गया मगर उसने अन्सार के ज़ेहनों में एक हलचल पैदा कर दी और उन्हें यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि तहरीरे वसियत पर हंगामा , जैश उसामा से तख़ल्लुफ़ और मौत ऐसी वाज़ेह हक़ीक़त से इन्कार आख़िर यह सब क्या है ? कहीं ये सब चीज़ें एक ही ज़ंजीर की कड़ियाँ तो नही हैं ? यह मसला इतना पेचिदा न था कि उन्हे किसी नतीजे पर पहुँचने में दुश्वारी होती। उन्होंने बड़ी आसानी से समझ लिया कि यह सारी तदबीरें ख़िलाफ़त के उसके अस्ल मक़सद से हटाने और दूसरी तरफ़ मुन्तकिल करने के लिये की जा रही हैं। चुनांचे उन्होंने हालात की तबदीली और मौक़े की नज़ाकत को नज़र में रखते हुऐ फ़ौरी तौर पर सक़ीफ़ा बनी साएदा में एक इजतेमा किया ताकि अन्सार में से किसी एक के हाथ पर बैयत करके वह मुहाजरीन के इस मनसूबे को नाकाम बना दें। अगर अन्सार को यह यक़ीन होता कि मुहाजरीन हज़रत अली अले 0 के बरसरे इक़तेदार आने में मज़ाहिम नहीं होंगे तो वह न यह बज़में मशावरत क़ायम करते औऱ न इस सिलसिले में जल्दबाजी से काम लेते। उनके दिलों की आवाज़ वही थी जो सक़ीफ़ा में बैयत के हंगामें के मौक़े पर बुलन्द हुई कि “ हज़रत अली अलै 0 के अलावा और किसी की बैयत नहीं करेंगे ”

बाहमीं चशमक औऱ आपसी रंजिश के बावजूद इस इजतेमा में “ ऊस औऱ “ ख़िज़रिज ” दोनों क़बीले शरीक हुए इसलिये कि उन दोनों को मुहाजरीन के एक तबक़ा की बालादस्ती गवारा न थी और न यह लोग मुहाजरीन के इक़तेदार को अपने हुकूक के तहफ़्फुज़की ज़मानत समझते थे।

ख़िज़रिज के लोग इस इजतेमा के इन्तेज़ाम व एहतेमाम में पेश थे और उन्हीं में की एक मुम्ताज़ शख़्सियत साद बिन अबादा सदर मजलिस थे जो नसाज़ी तबा की वजह से रिदा ओढ़े मसनद पर बैठे थे। उन्होंने अपनी तक़रीर में कहा , ऐ गिरोहे अन्सार। तुम्हें दीन में जो सबक़त और फ़ज़ीलत हासिल है वह अरब में किसी को भी हासिल नहीं है। पैग़म्बरे अकरम स 0 दस बरस तक अपनी क़ौम को ख़ुदा परस्ती की दावत देते रहे मगर गिनती के चन्द आदमियों के अलावा कोई उन पर ईमान न लाया और चन्द आदमियों के बस की बात यह नहीं थी कि वह आंहज़रत स 0 की हिफ़ाज़त का ज़िम्मा लेते और दीन की तक़वियत का सामना करते। ख़ुदा ने तुम्हें यह तौफ़ीद दी कि तुम ईमान लाये और पैग़म्बर स 0 के सीना सिपर रहे , मैदान जंग में उतरे और दुश्मनों से लड़े। तुम्हारी ही तलवारों सरे अरब के तरकशों के सर ख़म हुए और तुम्हारे ही ज़ारे बाज़ू से इस्लाम को औज व ऊरुज हासिल हुआ। पैग़म्बर स 0 दुनिया से रुख़सत हो चुके हैं , अब तुम्हारे अलावा मनसबे ख़िलाफ़त पर अपनी गिरफ़्त मजबूत कर लो।

साद बिन अबादा की इस तक़रीर की ताईद सबने की और कहा कि हम आप को मनसबे ख़िलाफ़त पर फ़ाएज़ देखना चाहते हैं। अगर यह मामला तन्हा अन्सार का होता ता बैयत की तक़मील के बात इसका फैसला साद के हक़ में हो चुका होता मगर इसके साथ यह ख़दशा भी लाहक़ था कि अगर मुहाजरीन ने मुख़ालिफत की तो क्या होगा ? चुनांचे इस ज़हनी ख़लिश के नतीजे में यह सवाल उठ खड़ा हुआ कि अगर मुहाजरीन ने मुख़ालेफत की तो इस मसले को किस तरह सुलझाया जा सकेगा। उस पर कुछ लोगों ने कहा हम में से हो और एक तुम में से। उस पर साद ने कहा कि यह पहली और आख़री कमज़ोरी होगी।

और यह हक़ीक़त है कि अगर अन्सार के अज़ाएम व इरादों से पुख़्तगी होती तो वह यह सोचते ही क्यों कि इक़तेदार को दो हिस्सों में तक़सीम किया जा सकता है बल्कि वह अपने नज़रियात व ख़्यालात को अगली जामा पहना देते और मुहाजरीन की मज़ाहमत से पहले बैयत कर चुके होते मगर उन्होंने एहसासे कमतरी में मुबतिला होकर मौक़ा हाथ से खो दिया।

इस इजतेमा में अगर चे “ ऊस ” के अफ़राद भी शरीक थे मगर उनकी शिरकत महज़ इस गरज़ से थी कि वह दूसरों के यह तअस्सुर न दें कि अन्सार में बाहमी इत्तेहाद व यकजहती नहीं है वरना दिल से उन्हें ख़िज़रिज का इक़तेदार हरगिज़ गवारा न था क्योंकि यह दोनों हरीफ़ व मुतहारिब ख़ानदान थे और इस्लाम में दाख़िल होने से कुछ अरसे पहले उनके दरमियान एक ख़ंरेज जंग भी हो चुकी थी जंग बास के नाम से मौसूम है। अगर चे इस्लाम ने काफ़ी हद तक उनकी बाहमीं कदूरतों को ख़त्म कर दिया था मगर इसे इन्सान की कमज़ोरी कहिये या इन्सानी फ़ितरत का ख़ासा कि वह एक दूसरे को हरीफ़ व मद्दे मुक़ाबिल ही की नज़रों से देखते रहे और एक का इम्तेयाज़ दूसरे को खटकता रहा। चुनांचे इस मौक़े पर भी ऊस के दो आदमियों ने मुख़बरी की और हज़रत उमर को ख़ुफ़िया तौर पर इस इजतेमा की इत्तेला दे दी जिस पर हज़रत उमर बहुत सटपटाये और अपने दो हमनवाओं के साथ इस इजतेमा को दरहम बरहम करने पर आमदा हो गये। इब्ने असीर का कहना है कि हज़रत उमर ने हज़रत अबुबकर को ख़बर दी और वह दोनों अबू उबैदा को साथ लेकर सक़ीफ़ा की तरफ़ तेज़ी से चल पड़े। (तारीख़ कामिल जिल्द 2 सफ़ा 222)

जब यह तीनों आदमी हांपते कांपते सक़ीफ़ा बनी साएदा में अचानक वारिद हुए तो अन्सार उन्हें देखकर हैरत ज़दा रह गये और राज़ के अफ़शा हो जाने से उन्हें अपनी कामयाबी मशकूक नज़र आने लगी । इधर ऊस को भी मौक़ा सिल गया कि वह उन मुहाजेरीन का सहारा ले कर अपने हरीफ क़बीला के मनसूबे को नाकाम बनायें। हज़रत उमर ने आते ही मजमें पर एक निगाह डाली और साद बिन उबैद को चादर में लिपटे हुए देख कर पूछा कि यह कौन है ? बताया गया कि यह साद बिन उबैदा हैं जो सदर मजलिस औऱ ख़िलाफ़त के उम्मीदवार हैं। हज़रत उमर की तेवरियां बदलीं और उन्होनें मजमें को मुख़ातिब करके कुछ कहना चाहा मगर अबुबकर ने इस ख़्याल से कि उनकी वजह से कहीं मामला बिग़़ न जाये उन्हें रोक दिया , खुद ख़ड़े हो गये और तक़रीर करते हुए कहा कि ख़ुदा ने पैग़म्बर स 0 को उस वक़त भेजा जब हर तरफ़ बुतों की पूजा हो रही थी , आप बुत परस्ती को ख़त्म करने और ख़ुदा परस्ती का पैग़ाम देने के लिये उठ खड़े हुए मगर अहले अरब ने अपना आबाई मज़हब छोड़ना गवारा न किया। ख़ुदा ने मुहाजेरान अव्वालीन को ईमान व तसदीक़ रिसालत के लिये मुनतख़ब किया। उन्होंने ईमान लाने के बाद अपने क़बीला वालों की ईज़ा रसानियों पर सब्र व ज़ब्त से काम लिया और तादाद में कम होने के बावजूद हरासां न हुए। उन्होंने रुए ज़मीन पर सबसे पहले अल्लाह की परसतिश और सबसे पहले अल्लाह के रसूल अ 0 पर ईमान लाये। यही लोग रसूल अल्लाह स 0 के कुन्बे के अफ़राद और उनके वली व दोस्त हैं , लेहाज़ा उनसे बढ़ कर नज़ा करेगा वह ज़ालिम क़रार पायेगा। ऐ गिरोहे अन्सार! तुम्हारी दीनी फज़ीलत और इस्लामी सबक़त भी नाक़ाबिल इनकार है। अल्लाह ने तुम्हें इस्लाम और पैग़म्बरे इस्लाम स 0 का हामी व मददगार बनाया और तुम्हारे शहर को दारुल हिज़रत क़रार दिया। हमारे नज़दीक मुहाजेरीन अव्वालीन के बाद तुम्हारा मर्तबा सबसे बुलन्द तर है , लेहाज़ा हम अमीर होंगे और तुम वज़ीर होंगे और कोई मामला तुम्हारे मशविरे के बग़ैर तय नहीं पायेगा।

हज़रत अबुबकर का यह ख़ुतबा उनकी मामला फ़हमीं और सियासी तदब्बुर का आईनादार है। यह सिर्फ़ मुदब्बराना सूझ बूझ का नतीजा था कि उन्होंने हज़रत उमर को इफ़तेताहा तक़रीर से मना कर दिया ताकि उनकी ज़बान से कोई ऐसा जुमला न निकल जाये जिससे अन्सार के जज़बात भड़क उठें और फिर उन्हें अपने ढ़र्रे पर लगाना मुश्किल हो जाये। अबुबकर की मसलहत अंग्रेज़ निगाहें देख रही थीं कि यह मौक़ा सख़्ती बरतने का नहीं है बल्कि नर्मी और हिक्मत अमली से काम निकालने का है। चुनांचे उन्होंने अपने नपे तुले अल्फ़ाज़ से अन्सार को मुतासिर करके उनका जोश कम किया। उन्हीं मुहाजिरीन का मुशीर क़रार दिया और विज़ारत की पेश कश से उनकी दिल जोई की। इस ख़ुतबे की नुमाया ख़ुसूसियत यह है कि फ़रीक़ मुख़ालिफ़ होते हुऐ भी अबुबकर ने अपने को इस इजतेमा में एक फ़रीक़ की हैसियत से पेश नहीं किया बल्कि वह अन्दाज़ इख़्तियार किया जो एक सालिस और ग़ैर जानिबदार शख़्स का होता है। और एक मुबस्सिर की तरह दोनों गिरोहों के मर्तबा व मुक़ाम का जाएज़ा लिया ताकि शऊरी या लाशऊरी तौर पर मुहाजेरीन व अन्सार का सवाल पैदा न हो जाये। अगर मुहाजेरीन व अन्सार का सवाल उठ खड़ा होता तो फिर ख़ुदा जाने हालात क्या रुख़ इख़्तियार करते। मुम्किन था कि क़ौमी व क़बाएली असबियत जो अरब की घुट्टी में पड़ी हुई थी उभर आती और हर गिरोह इक़तेदार को अपनाने की कोशिश करता , ख़ाना जंगी तक नौबत पहुंचती और कामयाबी मशकूक हो कर रह जाती। इस सिलसिले में मज़ीद एहतियात यह बरती कि अन्सार के मुक़ाबिले में आम मुहाजेरीन को लाने के बजाये मुहाजेरीन के एक ख़ास तबक़ा को जो अव्वलीन कहलाता था , पेश किया ताकि अन्सार को यह तअस्सुर दिया जा सके कि यहां क़ौमी व क़बाएली तक़ाबुल नहीं है बल्कि अवल्लियत व अफ़ज़लिल्यत के लिहाज़ से शख़्सी जाएज़ा है और फिर इस तअस्सुर को मुश्तहकाम करने के लिये जहाँ मुहाजेरीन अव्वलीन के औसाफ गिनवाये वहां अन्सार के औसाफ़ गिनवानें में भी फ़िराख़ दिली से काम लिया। यूं तो मुहाजेरीन के और भी औसाफ़ गिनवाये जा सकते थे मगर उन्होंने सिर्फ उन्हीं औसाफ़ का ज़िक्र किया जो नाक़ाबिल तरदीद थे।

अन्सार में शायद ही कोई ऐसा होगा जिसे यह एतराफ़ न हो कि मुहाजेरीन अव्वालीन में एक गिरोह इसलाम के मामले में अन्सार पर सबक़त रखता है और उनका क़बीला भी वही है जो हज़रत रसूले ख़ुदा स 0 का था कि उसकी तरदीद में आवाज़े बुलन्द हो जातीं और इसके नतीजे में इस्तेहक़ाक़ ख़िलाफत मुतासिर होता। अलबत्ता इस सिलसिले में यह कहा जा सकता था कि मुहाजेरीन की सबक़त भी तसलीम और पैग़म्बर स 00 का हम क़बीला होना भी गवारा मगर इससे इस्तेहाक़ ख़िलाफ़त का सुबूत किस शरयी दलील की रु से फ़राहम होता है और अगर यही इस्तेहक़ाक़ ख़िलाफ़त की दलील है तो क्या हज़रत अली अलै 0 मुहाजेरीन अव्वालीन में साबिक़ औऱ क़राबत के लिहाज़ से सबसे क़रीब तर नहीं हैं ? फिर उनके होते हुए किसी और का इस्तेहाक़ क्यों ? इस एतराज़ को अन्सार के हक़ विज़ारत का एलान करके दबा दिया गया इस तरह कि अगर अन्सार इस दलील को मुस्तरिद करके मुहाजेरीन के इस्तेहक़ाक़े ख़िलाफ़त पर मोतरिज़ होते तो इस दलील को भी मुस्तरीद करना पड़ता जो उनके इस्तेक़ाक़ विज़ारत के हक़ में थी। इस विज़ारत की पेश कश ने यह वसवसा भी अन्सार के दिलों से दूर कर दिया कि उनके हक़ूक़ पर कोई सख़्ती व ज़ियादती होगी। इसलिये कि विज़ारत जो तकमिलय ख़िलाफ़त पर कोई सख़्ती व ज़ियादती होगी। इसलिये कि विज़ारत जो तकमिलय ख़िलाफ़त है उनके हक़ूक़ के तहफ़्फुज़ की ज़मानत है। यह दूसरी बात है कि विज़ारत का कोई ओहदा न हज़रत अबुबकर के दौर में क़ायम हो सका और न हज़रत उमर के तवील दौर में। और जब ओहदा ही नहीं है तो ओहदा पर तक़रुरी का क्या सवाल ? अलबत्ता हज़रत उस्मान के दौर में विज़ारत के ओहदे के मसावी कातिब का ओहदा था मगर अमवी के होते हुए एक अन्सारी को यह एज़ाज़ कैसे मिल सकता था।

हज़रत अबुबकर की तक़रुरी से अफ़राद “ ऊस ” ने जो अपने हरीफ़ क़बीला “ ख़िज़ारिज ” की इमारत पर ख़ुश न थे , अच्छा असर लिया और सर झुकाये खामोश बैठे रहे लेकिन “ ख़िज़रिज ” ख़ामोश न रहे। उनके नुमाइन्दा हबाब बिन मनज़िर ख़ड़े हो गये और उन्होंने कहा की ऐ गिरोह अन्सार! तुम अपने मौख़ूफ पर मज़बूती से जमे रहो। यह लोग तुम्हारे ज़ेरे साया आबाद हैं , किसी में यह हिम्मत व जराएत नहीं हो सकती कि वह तुम्हारी राय की ख़िलाफ़वर्ज़ी कर सके। तुम्हारे पास इज़्ज़त , सरुत , ताक़त और शुजाअत सब कुछ है। न तुम तादाद में उनसे कम हो और न तजरुबे व जंगी महारत में यह तुम्हारे मुक़ाबिला कर सकते हैं। रसूलउल्लाह स 0 तुम्हारे शहर में आबाद हुए , तुम्हारी वजह से हरसरे आम अल्लाह की इबादत हुई , तुम्हारी तलवारों से क़बाएले अरब सरनगूं हुए , तुम्हारी वजह से इस्लाम का बोल बाला हुआ। तुम मनसबे ख़िलाफ़त के ग़ल्त दावेदार नहीं हो। अगर यह लोग तुम्हारा हक़ तसलीम नहीं करते तो फिर एक अमीर हमारा होगा और एक उनका होगा।

हबाब बिन मनज़िर के यह कहने पर बजाये इसके कि अन्सार के मक़सूल को कुछ तक़वियत हासिल होती फ़रीके सानी को उसकी तरदीद करके अपने मौकूफ़ को मज़बूत करने का मौका मिल गया। चुनानचे हजज़रत उमर ने फ़ौरन उसकी तरदीद करते हुए कहा , यह कहां हो सकता है कि एक वक़्त में दो हुक्मरां। खुदा की क़सम अरब इस पर क़तई रज़ामन्द न होंगे कि तुम्हें बरसरे इक़तेदार लायें जब कि नबी तुम में से नहीं हैं। लेकिन अरब को इससे इन्कार नहीं हो सकता कि हाकिम व वली अमर इस घराने से मुन्तख़ब हो जिस घराने में नबूवत है। लेहाज़ा जो पैग़म्बर स 0 की सल्तनत व इमारत के मामले में हम से टकरायेगा वह तबाह व बर्बाद होगा।

हज़रत उमर ने अपनी तक़रीर ख़त्म की तो हबाब फिर खड़े हुए और अन्सार से मुख़ातिब होकर पुर जोश लहज़े में कहा कि इसकी बातों पर ध्यान न धरो , तुम अपने मौकूफ़ पर क़ायम रहो , यह लोग ख़िलाफ़त में तुम्हारा हिस्सा रखना ही नहीं चाहते। लेहाज़ा अगर यह तुम्हारा मुतालिबा तसलीम न करें तो उन्हें अपने शहर से निकाल बाहर करो और जिसे चाहते हो उसे अमीर मुन्तख़ब कर लो। ख़ुदा की कसम तुम इनसे ज़्यादा ख़िलाफ़त के हक़दार हो क्योंकि तुम्हारी तलवारों से दीन फैला और लोग इस्लाम की तरफ़ झुके। अब अगर किसी ने मेरी बात की तरदीद की तो मैं अपनी तलवार से उसकी नाक काट लूंगा।

उस मुक़ाम पर ज़रुरत थी कि हबाब दौरे जाहेलियत की असबियत का मुज़ाहेरा करने के बजाये इस्लामी फ़ज़ा में बातचीत करते और तशद्दुद आमेज़ लहजा इख़्तियार करने के बजाये नर्म ग़ुफ़्तगारी इख़्तियार करते। चुनांचे को अपना हमनुवा बनाने में कामयाब न हो सके। अबुअबीदा जो मौक़ा व महल की नज़ाकत को समझ रहे थे ख़डे हो गये और उन्होंने अन्सार के दीनी जज़बात को झिंझोड़ते हुए कहा , ऐ गिरोहे अन्सार! तुमने हमारी नुसरत की , हमें अपने यहां पनाह दी , अब अपना तौर व तरीका न बदलो और साबका रोश पर बरक़रार रहो।

इस नर्म गुफ़्तारी का नतीजा यह हुआ कि ख़िज़रिज के लोग भी ढ़ीले पड़ गये और बशीर बिन साद ख़िज़रिजी ने हवा का रुख़ देखकर कहा कि ऐ गिरोहे अन्सार! अगर चे यह फज़ीलत हासिल है कि हमने मुशरेकीन से जेहाद किये और इस्लाम कुबूल करने में सबक़त हासिल की मगर हमारे पेशे नज़र सिर्फ़ अल्लाह की ख़ुशनूदी और उसके रसूल स 0 की इताअत थी। यह मुनासिब नहीं है कि हम दीन को दुनयावी सर बुलन्दी का ज़रिया बनायें और हुकूमत व इक़तेदार की तमन्ना करें। दीन तो अल्लाह की दी हुई एक नेमत है। पैग़म्बर स 0 कुरैश में से थे लेहाज़ा उनका क़बीला उनकी नियाबत का ज़्यादा हक़दार है। तुम लोग अल्लाह से डरो और ख़्वाह-म-ख़्वाह उनसे न उलझो। बशीर का यह कहना था कि अन्सार की यकजहती दरहम बहरम हो गयी , लोगों का रुख़ बदलने लगा , जो लोग इस तहरीक को लेकर उठे थे वही इसको कुचलने पर आमदा नज़र आने लगे। मुहाजेरीन को मौक़ा मिला कि वह इस अफ़रा तफ़री से फ़ाएदा उठायें चुनांचे अबुबकर खड़े हो गये और कहने लगे कि यह उमर है। और यह अबुउबैदा हैं। इन दोनों में से किसी एक की बैयत कर लो। उस पर हज़रत उमर ने कहा , आपका हक हम दोनों से ज़्यादा है , हाथ बढ़ाइये , हम आपकी बैयत करेंगे। हज़रत अबुबकर ने बग़ैर किसी तरद्दुद और तवक़्कुफ के अपना हाथ इस तरह आगे बढ़ा दिया कि गोया मामला तय शुदा हो मगर हज़रत उमर अभी बैयत करने न पाये थे कि बशीर बिन साद ने बढ़ कर अबुबकर के बढ़े हुए हाथ पर हाथ रख दिया और बैयत कर ली। फिर हज़रत उमर और अबु उबैदा ने बैयत की और इसके बाद ख़िज़रिज के लोग आगे बढ़े और उन्होंने बैयत की।

“ ऊस ” के नक़ीब असीद बिन हजीर ने ख़िज़ारिज को बैयत के लिये बढ़ते देखा तो अपने क़बीले वालों से उन्होंने कहा , खुदा की कसम! अगर ख़िज़रिज़ एक दफ़ा तुम पर हुक्मरां हो गये तो उन्हें हमेशा के लिये तुम पर फ़ज़ीलत व बरतरी हासिल हो जायेगी और वह तुम्हें इस इमारत में से कभी कोई हिस्सा नहीं देंगे लेहाज़ा उठो और अबुबकर की बैयत कर लो।

इस बैयत के हंगामें में हबाब बिन मनज़िर तलवार ले कर खड़े हो गये मगर उनके हाथ से तलवार छीन कर उन्हें बे दस्तो बा कर दिया गया। साद बिन आबाद पैरों तले रौंद दिये गये। हज़रत उमर की बन आई थी उनका जो नर्म लहजा शुरु में था अब सियासी ख़तरा टल जाने के बाद इसकी ज़रुरत नहीं रही , चुनानचे नर्म गुफ़्तारी ने सख़्तगीरी इख़्तियार की और साद बिन अबादा से तलख़ कलामी , हाथा पाई और दाढ़ी नोचने व नुचवाने की नौबत आ पहुंची। साद ने कहा यह मुनाफ़िक है जिस पर उमर ने कहा कि इसे क़त्ल कर दो , यह फ़ितना परदाज़ है।

साद बिन उबैदा जो अन्सार की जलीलुल कदर शख़्सियत और “ ख़िजरिज ” के रास व रईस थे , उनका जुर्म क्या था कि उन्हें गर्दन ज़दनी के क़ाबिल समझा गया और फितना परदाज़ करार दिया गया। अगर वह ख़िलाफ़त के उम्मीदवार थे तो दूसरे भी तशकीले ख़िलाफ़त ही के लिये आये थे। अगर हज़रत अबुबकर व हज़रत उमर का नज़रिया यह था कि पैग़म्बर स 0 की तजहीज़ व तकफ़ीन से पहले ख़िलाफत का तसफ़िया ज़रुरी है ताकि मुम्लिकात के नज़म व नसख़ में ख़लल न पड़े तो अन्सार का इजतेमा भी तो इसी ग़ैर आईनी व ग़ैर इस्लामी इजतेमा के ज़रिये ख़लीफ़ का इन्तेख़ाब किया था। और हज़रत उमर तो इसे हंगामी हालात की पैदावार समझते थे। चुनांचे वह कहा करते थे किः

“ अबूबकर की बैयत बै सोचे समझे नागहानी तौर पर हो गयी। आईन्दा अगर कोई ऐसा करे तो उसे क़त्ल कर दो ” ।

अल्लामा जमख़शरी का बयान है किः-

“ हज़रत अबुबकर ने ख़िलाफ़त का तौक़ इस तरह अपने गले में डाला जिस तरह छीना झपटी करके दूसरों के हाथ से कोई चीज़ छीनली जाती है या झपट्टा मार कर (चील की तरह) पंजों से उचक ली जाती है। ”

बावजूद यह कि हज़रत उमर इत तरीक़े कार के एक तरह से बानी थे मगर यह तरीक़ा हमेशा उनकी निगाहों में खटकता रहा और वह उसके दोहराने पर क़त्ल की सज़ा भी तज़बीज़ कर गये। क्या उनके नज़दीक यह तरीक़ेदार शरयी हुदूद के अन्दर न था ? अगर शरयी हुदूद के अन्दर और ज़ाबतए इस्लामी के मुताबिक था तो इसे दोहराने और उस पर अमल पैरा होने की सूरत में क़त्ल की सज़ा क्यों ? अगर शरयी हुदूद के बाहर था तो इस ग़लत और ग़ैर शरयी तरीक़कार से जो इन्तेख़ाब अमल में आया या इस इन्तेख़ाब पर जो इन्तेख़ाब हुआ वह क्यों कर सही क़रार पायेगा।

तशद्दुद आमेज़ बैयत

ख़िलाफ़त की मुहिम जब सर हो चुकी , हज़रत अबुबकर ख़लीफ़ा बन चुके और हज़रत उमर ख़लीफ़ा बना चुके तो यह लोग एक मुख़तसर सी जमाअत के साथ सक़ीफ़ा बनी साएदा से मस्जिदे नबवी की तरफ इस तरह रवाना हुए कि रास्ते में जो शख़्स भी नज़र आता था उसे पकड़ कर उसके हाथ अबुबकर के हाथों से मस करते और उससे बैयत लेते। बरार बिन आज़िब का बयान है कि यह लोग जिस किसी के पास से गुज़रते थे उसे खींच कर अबुबकर के सामने लाते और बैयत के लिये उसका हाथ पकड़कर उनके हाथों से मस करते ख़्वाह वह चाहे या न चाहे।

जब लोग मस्जिद नबवी में वारिद हुए तो कुछ हाशिये बरदारों को इधर उधर दौड़ाया गाय और उनसे कहा गया कि वह लोगों को पकड़ पकड़ कर बैयत के लिये ले आयें। चुनानचे कुछ लोग जमा किये गये और मस्जिद में जहां पास ही एक हुजरे में सरकारे दो आलम स 0 को गुस्ल व कफ़न दिया जा रहा था , तक़बीरों की गूंज , मैं बैयत का सिलसिला शुरु हो गया। बिलाज़री रक़मतराजड हैं कि “ हज़रत अबूबकर को मस्जिद में लाया गाया और लोगों ने उनकी बैयत की। अब्बास और अली अ 0 ने हुजरे से तकबीरों की आवाज़ें सुनीं वह अभी रसूलउल्लाह स 0 के गुस्ल से फ़ारिग़ न हुए थे ” ।

यह दुनिया की बेवफ़ाई और सर्द महरी की इन्तेहाई इबरत अंगेज़ मुरक़्का था कि एक तरफ़ सरकारे दो आलम स 0 की मय्यत रखी थी , रंज व ग़म से निढ़ाल आपके अज़ीज़ व अक़ारिब तजहीज़ व तकफ़ीन में मसरुफ़ थे और दूसरी तरफ़ इस ग़म अंगेज़ माहौल से बे नियाज़ हुक्मरां तबका़ तकबीर के नारों की गूंज में लोगों से बैयत ले रहा था। न किसी की आंख में आंसू थे न किसी के चेहरे पर मलाल के आसार। ऐसा लगता था जैसे कुछ हुआ ही न हो।

इस से इक़तेदार परस्तों के साथ अवाम की ज़ेहनियत का भी अन्दाज़ा होता है कि इक़तेदार की कूवत उन्हें कितनी जल्दी महसूस व मुतासिर करती है कि अज़ीम से अज़ीम हादसे के असरात भी मुज़महिल हो जाते हैं और वह फ़ौरन अपने आपको हुकूमत की ख़ुशनूदी व रज़ा जूई से वाबस्ता कर देते हैं। ऐसी सूरत में ये तवक़्को की ख़ुशनूदी व रज़ा जूई से वाबस्ता कर देते हैं। ऐसी सूरत में ये तवक़्को नहीं की जा सकती कि वह यह सोचने कि या इन्तेख़ाब क्यों और कैसे हुआ ? राये आम्मा के इसतेसवाब से हुआ या अरबाब हल व अक़द की सवाबे दीद का नतीजा था। अगर इस्तेसवाब राय से हुआ तो उन्हें इज़हारे राये कामौक़ा ही कब दिया गया और अगर यह अहले हल व अक़द का फ़ैसला है तो क्या मुहाजेरीन में तीन ही आदमी अहले हल व अक़द थे ? क्या हज़रत अली अलै 0? अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब ? सलमाने फ़ारसी , अबूज़र ग़फ़्फ़ारी , मिक़दाद , अम्मार यासिर , ज़ुबैर बिन अवाम और ख़ालिद बिन सईद ऐसे अमाएदीन व अकाबरीने मिल्लत और बनी हाशिम उनमें शामिल किये जाने के क़ाबिल न थे ? गर्ज़ आलम यह था कि लोग बे सोचे समझे हवा के रुख़ पर उड़ रहे थे वक़्त के सेलाब में बह रहे थे। अगर किसी ने नफ़रत व बेज़ारी का इज़हार किया या किसी क़िस्म की सदाये एहतेजाज बुलन्द की तो उसे डरा धमका कर या लालच दे कर ख़ामोश कर दिया गया और जिन लोगों की पुश्त पर ताक़त द कूवत थी उन्हें वक़्ती तौर पर नज़र अन्दाज़ कर दिया गया। चुनानचे सईद बिन उबैदा से फ़िलहाल बैयत का मुतालिबा ख़िलाफ़े मसलहत समझा गया और जब हज़रत उस्मान , अब्दुर रहमान बिन औफः सईद बिन अबी विकास , बनी उमय्या और बनी ज़हरा की तरफ़ से बैयत और ताईद हासिल हो गयी और हूकूमत में कुछ इस्तेहकाम पैदा हो चला तो उन्हें भी बैयत का पैग़ाम भेजा गया जिसके जवाब में सईद बिन उबैदा ने कहाः

“ ख़ुदा की कसम! मैं उस वक़्त तक बैयत नहीं करुंगा जब तक तीरों से अपना तरकश ख़ाली न करुं और अपने क़ौम व क़बीले के लोगों को लेकर तुम से जंग न कर लूं ”

हज़रत अबुबकर यह जवाब सुन कर ख़ामोश हो गये मगर हज़रत उमर ने बर फ़रोख़्त होते हुए कहा कि हम इससे बैयत लिये बग़ैर नहीं रहेंगे। उस पर बशीर बिन सईद ने कहा कि अगर सईद बिन उबैदा ने बैयत से इन्कार कर दिया है तो वह क़त्ल होना गवारा करेंगे मगर बैयत नही्ं करेंगे ओर अगर वह क़त्ल किये गये तो उनका ख़ानदान भी क़त्ल होगा और उनका ख़ानदान उस वक़्त तक क़त्ल न होगा जब तक क़बीला ख़िरुज क़त्ल न हो जाये और क़बीला ख़िज़रिज का क़त्ल होना उस वक़्त तक नामुम्किन है जब तक क़बीला ऊस ज़िन्दा है। दूर अन्देशी और मसलहत बीनी का तक़ज़ा यह है कि उन्हें उन्हीं के हाल पर छोड़ दिया जाये चुनानचे सईद बिन उबैदा हज़रत अबूबकर के दौर में मदीने में ही रहे मगर उन्होंने न हुक्मरां जमात से कोई ताल्लुक रखक न उनके साथ नमाज़ों में शरीक हुए , न उनके साथ हज किया और न ही उनकी किसी मजलिस में शरीक हुए। मगर जब हज़रत उमर का दौर आया तो उन्होंने एक दफ़ा सईद को रास्ते में देख कर कहा कि क्या तुम वही ? सईद ने कहा , हां मैं वहीं हूं और मेरा मौक़फ़ भी वही है मैं तुमसे अब भी इतना ही बेजार हूं जितना कि पहले था। हज़रत उमर ने कहा , फिर मदीना छोड़ कर चले क्यों नहीं जाते।

साद ख़तरा तो महसूस ही कर रहे थे हज़रत उमर के तेवरों को देख कर समझ गये कि किसी वक़्त भी उन्हें मौत के घाट उतार जा सकता है। चुनानचे वह मदीना छोड़ कर शाम चले गये और चन्द दिनों के बाद हूरान में किसी के तीरों का निशाना बन गये। इब्ने अबदरबा का कहना है किः

“ हज़रत उमर ने एक शख़्स को शाम रवाना किया और उससे कहा कि वह सईद से बैयत का मुतालिबा करे। अगर वह इन्कार करें तो उन्हें क़त्ल कर दे। वह शख़्स शाम पहुंचा और मुक़ाम हूरान में एक चार दीवारी के अन्दर सईद से मिला और उनसे बैयत का मुतालिबा किया। उन्होंने कहा , मैं हरगिज़ हरगिज़ बैयत नहीं करूँगा। इस पर उसने तीर मार कर उन्हें क़त्ल कर दिया। ”

यह शख्स मुहम्मद बिन मुस्लिमा या मुग़ीरा बिन शेबा बताया जाता है मगर मशहूर यह कर दिया गया कि सईद को किसी जिनने तीर मार कर हलाक कर दिया और उनके मरने पर एक शेर इस मफडहूम का पढ़ा कि हमने सरदारे ख़िज़रिज सईद बिन अबादा को क़त्ल कर दिया और इस पर तीर चलाया जो इसके दिल में पेवस्त हो गया।

हज़रत अबुबकर के दौर में सईद बिन उबैदा को न बैयत पर कोई मजबूर कर सका और न इस सिलसिले में उन पर कोई सख़्ती कर सका लेकिन उन कारेप्रदाज़ाने ख़िलाफ़त ने हज़रत अली अलै 0 से जल्द अज जल्द बैयत हासिल करने की कार्रवाई शुरु कर दी। चुनानचे आप दुनिया की नैरंगी और ज़माने के इन्क़लाब से उफसुरदा ख़ातिर होकर घर में बैठे ही थे कि हुकूमत की तरफ़ से बैयत का मुतालिबा हुआ। आपने और आपके साथ उन तमाम अफ़राद ने जो उस वक़्त घर के अन्दर मौजूद थे बैयत से इन्कार कर दिया। इस पर हज़रत उमर इस क़दर बरहम हुए कि वह आग और लड़कियां लेकर अमीरुल मोमेनीन अलै 0 का घर जलाने पहुँच गये और पैग़म्बरे अकमर स 0 की सोगवार बेटी फ़ातेमा जहरा सल 0 से यह मुतालिबा किया कि अली अल 0 को बाहर निकालों वरना हम इस घर में आग लगा कर सबको ज़िन्दा जला देंगे। बिन्ते रसूल स 0 जब इस हंगामे से बाख़बर हुई तो दरवाज़े के कऱीब आयी और फ़रमाया कि ऐ उमर! आख़िर क्या चाहते हो ? क्या हम सोगवारों क गर में भी चैन से बैठने न दोगे। कहा , ख़ुदा की क़सम अगर अली अलै 0 अबुबकर की बैयत नहीं करेंगे तो हम इस घर मे आग लगा देंगे। आपने फ़रमाया अबुल हसन के अलावा इस घर में रसूल स 0 की बेटी और उनके दोनों नवासे हसन अलै 0 और हुसैन अलै 0 भी हैं। कहा , हुआ करें। उमर के इस जवाब पर मासूमा-बे-इख़्तियार रो पड़ीं और फ़रमाया ऐ पदरे बुजूर्गवार! आपके दुनिया से रुख़सत होते ही हम पर कैसे कैसे ज़ुल्म ढ़ाये जा रहे हैं और आपकी उम्मत के लोग हमसे किस तरह फिर गये हैं। लेकिन हज़रत उमर पर मासूमा स 0 की इस आहो ज़ारी का कोई असर न हुआ और उन्होंने वही किया जो उन्हें नहीं करना चाहिये था। रसूल स 0 की बेटी के घर में आग लगा दी गयी और शोले बुलन्द होना शुरु हुए। हज़रत उमर के साथ जो लोग आये थे उनसे भी वह तशद्दुद देखो न गया। चुनानचे कुछ आग बुझाने में मसरुफ़ हुए और कुछ हज़रत उमर पर लानत मलामत करने लगे। मगर वह कब मानने वाले थे। उन्होंने जलते हुए दरवाज़े पर ऐसी लात मारी कि वह दुख़्तरे रसूल स 0 पर गिरा जिससे आपका पहलू शिकस्ता हुआ और मोहसिन की शिकमे मादर में शहादत वाक़े हो गयी।

ज़बीर बिन अवाम भी इस घर में मौजूद थे अगर चे वह हज़रत अबुबकर के दामाद थे लेकिन उन्होंने जब ये हाल देखा तो तलवार ले कर मुक़ाबिला के लिये बाहर निकल आये मगर सलमा बिन अशीम ने तलवार उनके हाथ से छीन ली और उन्हें गिरफ़्तार कर लिया। तबरी का बयान है कि “ ज़बीर ने तलवार खींच ली और बाहर निकल आये मगर ठोकर खाई और तलवार हाथ से छूट गयी। लोग उन पर टूट पड़े ओर उन्हें गिरफ़्तार कर लिया। ”

हज़रत उमर और उनके हमराही हज़रत अली को भी घर से निकाल कर बैअत के लिये हज़रत अबूबकर के पास ले आये। आपने बैअत के मुतालबे पर इहतिजाज करते हुए फ़रमायाः

“ मैं तुम्हारी बैअत हरगिज़ नहीं करुँगा , तुम्हें खुद मेरी बैअत करना चाहिए क्योंकि मैं तुमसे ज़्यादा ख़िलाफ़त का हक़दार हूँ। तुमने खिलाफ़त हासिल करने के लिये अन्सार के मुक़ाबले में यह दलील दी की तुम को नबी से क़राबत है और अब तुम जबरन अहलेबैत से ख़िलाफ़त छीनना चाहते हो। जिस दलील से तुमने अनसार के मुक़ाबले में अपना हक़ साबित किया है इसी दलील से मैं अपना हक़ तुम्हारे में साबित करता हूँ। ”

“ अगर तुम ईमान लाये हो तो इन्साफ़ करो वरना तुम उम्र से वाकिफ़ होकर जुल्म के मुरतकिब हुए हो ”

हज़रत अबूबक्र ख़ामोश बैठे रहे मगर हज़रत उमर ने कहा , जब कि तुम बैअत नहीं करोगे तुम्हें छोड़ा नहीं जायेगा। इस बात से ख़ैबर शिकन की पेशानी पर बल पड़े फ़रमाया , ऐर पिसरे ख़त्ताब! ख़ुदा की क़सम बैअत तो अलग रही मैं तेरी बातों पर ध्यान भी नहीं दूँगा। फिर आपने रसबस्ता राज़ को बेनक़ाब करते हुए फ़रमायाः

“ ख़िलाफ़त का दूध निकाला लो उसमें तुम्हारा भी बराबर की हिस्सा है। ख़ुदा की कसम तुम आज अबूबक्र की ख़िलाफ़त पर इसलिये जान दे रहे हो कि कल वह यही ख़िलाफ़त तुम्हें दे जाये ”

अमीरुलमोमिनीन अ 0 हज़रत अली के इन्कारे बैअत पर ईज़ा रसानी और इहानत का कोई पहलू उठा नहीं रखा गया। घर में आग लगायी गयी , गले में रस्सी डाली गयी और क़त्ल की धमकियाँ भी दी गयी। यह ऐसा तशद्दुद आमेंज तर्ज़े अमल था कि मुआविया बिने अबू सुफ़यान अबूबक्र के फ़रज़न्द मोहम्मद पर तन्ज़ किये बगै़र न रह सका और उसने उन्हें एक ख़त के जवाब में तहरीर कियाः

“ जिन लोगों ने सबसे पहले अली अ 0 का हक छीना और ख़िलाफ़त के सिलसिले में उनकी मुख़ालिफ़त पर साज़-बाज़ की वह तुम्हारे बाप अबूपक्र और उमर थे। उन्होंने अली अ 0 से बैअत का मुतालबा किया और जब जवाब इन्कार की सूरत में मिला तो दोनों मिलकर उन पर मसाएब ओ आलाम के पहाड़ तोड़ने का तहय्या कर लिया। ” इस बैअत के लिये शुद्दुद का जो सिलसिला रवा गया वह सरासर ग़ैर आएनी ओ गैर इस्लामी और नाजाएज़ था। दुनिया के किसी कानून में उसकी इजाज़त नहीं है कि किसी को अपनी राय बदलने पर मजबूर किया जाये और जब्र ओ तशदुदद के जरीए बैअत हासिल की जाये। अगर वह यह देखते कि हज़रत अली अ 0 पैगम्बरे इस्लाम के ज़माने से किसी जमाअत के कयाम की तैयारी कर रहे हैं और अब जो जमाअत के तआवुन से मुतवाज़ी हुकूमत क़ायम करके उनके इक़तिदार को ख़तरे ड़ालना चाहते हैं या शोरुशो हंगामा करके अमन ओ आमा को तबाह करना चाहते हैं तो इस तशद्दुद का भी सियासी जवाज़ हो सकता था और जब ऐसी सूरत ही न थी और न टकराव के कोई आसार थे तो फिर बैअत पर इतना इसरार क्यों ? मुमकिन है कि इसमें यह मसलहत कार फ़रमा रही हो कि इसी तरह बैअत लेकर अपने मौकिफ़ और तरीक़े कार के हक़ बजानिब होने का सबूत मुहय्या करें तो इस तरह की जबरी बैअत को बैअत नहीं कहा जा सकता-हज़रत अ 0 का इन्कार उसूल के तहत था। अगर तशद्दुद आख़िरी हद तक भी पहुँच जाता तो यह मुमकिन न था कि वह चमहूरियत के नाम पर क़ायम की हुई ग़लत हुकूमत की बैअत करके एक ऐसे उसूल को तसलीम कर लेते जिसकी कोई शरई सनद ही न थी। चुनाँचि आपने मुकम्मल सब्र ओ ज़ब्त के साथ मसाएब ओ आलाम का सामना किया। जुमहूरी ख़िलाफ़त को मना और न जुमहूर के उस इन्तिख़ाब को तसलीम किया।


हज़रत अली अ 0 की ख़ामोशी

हज़रत अली अ 0 ने इस मजमूही ख़िलाफ़त के ख़िलाफ एलानिया एहतेजाज किया और अपने हक़ की फ़ौक़ियत इसी दलील से साबित की जिस दलील की रु से बरसरे अक़तेदार तबक़े ने अन्सार को क़ाएल किया था। यह एहतेजाज दरहक़क़त इस निज़ामे सियासत के ख़िलाफ़ था जिसके तहत इन्तेख़ाबी हुकूमत को ख़िलाफत का और मुन्तख़ब हुक्मरां को ख़लिफ़ये रसूल स 0 का दर्जा दे दिया गया था। इस एहतेजाज में न हुकूमत की हवस काऱेफ़रमां थी और न ही अक़तेदार की ख़्वाहिश मुज़मिर थी आगर अमीरूल मोमेनीन अलै 0 को हुकूमत व अक़तेदार की हवस होती तो आप भी उन तमाम हरबों को इस्तेमाल करते जो सियासी ताक़त व कूवत हासिल करने के लिये काम में लाये जाते हैं मगर आपने इस सिलसिले में हर कार्रवाई को नज़रत अन्दाज़ कर दिया और अपने मौक़फ़ पर सख़्ती व मज़बूती से जमे रहे। चुनानचे सक़ीफ़ा में जब हज़रत अबुबकर का इन्तेख़ाब अमल में लाया जा रहा था तो अमूवी सरदार अबुसुफ़ियान मदीना में नहीं था। कहीं से वापस आ रहा था कि रास्ते में उसे इस अलमनाक वाक़िये की ख़बर मिली। उसने पूछा कि रसूल उल्ला स 0 के बाद मुसलमानों का ख़लीफ़ा कौन हुआ ? बताया गया कि लोगों ने अबुबकर के हाथ बर बैयत कर ली है। यह सुन कर अरब का माना हूआ फ़ितना परदाज़ सोच में पड़ गया और एक तजवीज़ ले कर अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब के पास आया और कहा , उमर वग़ैरा ने धांधली मचाकर ख़िलाफ़त एक तमीमी के हवाले कर दी है और ये ख़लीफा अपने बाद उमर को हमारे सरों पर मुसल्लत कर जायेगा। चलो , अली अले 0 से कहें कि वह घर का गोशा छोड़ें और अपने हक़ के लिये मैदान में उतर आयें। चुनांचे वह अब्बास अलै 0 को लेकर अली इब्ने अबीतालिब अलै 0 की ख़िदमत में हाजिर हुआ और चाहा कि उन्हें अपने क़बीले के ताव्वुन का यक़ीन दिला कर हुकूमत के ख़िलाफ़ मैदान में ला ख़ड़ा कर दे। चुनांचे उसने कहा , अफसोस है कि ख़िलाफत एक सस्ततरीन ख़ानदान में चली गयी। ख़ुदा की कसम अगर आप चाहें तो मैं मदीने की गलियो और कूचों को सवारों और प्यादों से भर दूं।

अमीरूल मोमेनीन अलै 0 के लिये यह इन्तेहाई नाज़ुक मरहला था क्योंकि आप पैग़म्बरे इस्लाम स 0 के सही वारिस व जानशीन थे और अबुसूफ़ियान ऐसा कूवत व क़बीले वाला शख्स आपके सामने खड़ा था जो हर तरह की मदद पर आमदा था। सिर्फ़ एक इशारा होता और मदीने में जंग के शोले भड़कने लगते मगर अली अलै 0 के तदब्बुर ने इस मौक़े पर मुसलमानों को फ़ितना व फ़साद और कुश्त व ख़ून से बचा लिया। आपकी दूर रस नज़रों ने फ़ौरन भांप लिया कि उसकी पेश कश में हमदर्दी व ख़ैर ख़्वाही का जज़बा नहीं है बल्कि यह क़बाएली तास्सुब और नसली इम्तेयाज़ को उभार कर मुसलमानों के दरमियान ख़ूरेज़ी कराना चाहता है ताकि इस्लाम में एक ऐसा ज़लज़ला आये और ख़ून का एक ऐसा धमाका हो जो इसकु बुनियादों को हिला कर रख दे। चुनानचे आपने इसकी तजवीज को ठुकराते हुए उसे झिड़क दिया और फ़रमायाः

“ ख़ुदा की कस्म! तुम्हारा मक़सद सिर्फ़ फ़ितना अंग्रेज़ी है। तुम ने हमेशा इस्लाम की बदख़्वाही की है। मुझे तुम्हारी हमदर्दी की ज़रुरत नहीं है। ”

इस मौक़े पर अमीरुल मोमेनीन हज़रत अली अलै 0 की ख़ामोशी , मसलहत बीनी और दूर अन्देशी , उनकी असाबते फ़िक्री की आईनादार थी क्योंकि इन हालात में मदीना अगर मरकज़े जंग बन जाता तो यह आग पूरे अरब को अपने लपेटे में ले लेती और मुहाजेरीन व अन्सार में जिस रंजिश की इब्तेदा हो चुकी थी वह बढ़ कर अपनी इन्तेहा को पहुंच जाती। मुनाफ़ेक़ीन की रेशा दवानियाँ अपना काम करतीं और इस्लाम की कश्ती ऐसे गिरदाब में पड़ जाती कि फिर उसको संभालना मुश्किल हो जाता।

जब यह ख़बर आम हुई कि अबुसुफियान बनि हाशिम को हुकूमत के ख़िलाफ़ उभार रहा है तो अरबाबे हुकूमत ने उसे लालच के जाल में जकड़ कर ख़ामोश कर दिया और उमर ने हज़रत अबुबकर से कहाः

“ अबुसुफ़ियान कोई न कोई फ़ितना ज़रुर खड़ा करेगा। रसूलउल्लाह स 0 इस्लाम के लिये उसकी तालीफ़े क़लब फ़रमाते थे। लेहाज़ा जो सदक़ात उसके क़बज़े में है उसी को दे दिये जायें। चुनानचे अबुबकर ने ऐसा ही किया और अबुसुफियान ख़ामोश हो गया और उसने अबुबकर की बैयत कर ली। ”

अबुसुफ़यान को सिर्फ़ सदक़ात ही से नहीं नवाज़ा गया बल्कि इस बैयत के सिले में उसके बेटे माविया को शाम की इमारत भी दे दी गयी जो अमवी इक़तेदार के लिये संगे बुनियाद साबित हुई।

क़ज़िया फ़िदक

फ़िदक पैग़म्बरे इस्लाम स 0 की ज़ाती मिलकियत में था। जब आयत “ जुलकुरबा ” नाज़िल हुई तो आपने दस्तावेज़ के ज़रिये अपनी साहबज़ादी फ़ातेमा ज़हरा स 0 के नाम मुन्तक़िल कर दिया जो आंहज़रतस 0 की ज़िन्दगी तक उन्हीं के क़बज़े व तसर्रुफ़ में रहा लेकिन हज़रत अबुबकर ने तख़्ते हुकूमत पर मुत्मकिन होने के बाद इस जाएदाद को हुकूमत की तहवील में ले लिया। इस पर जनाबे सैय्यदा स 0 ने अपने हक़ का दावा किया और असबाते दावा में हज़रत अली अलै 0 व उम्मे ऐमन की गवाहियां पेश कीं लेकिन हज़रत अबुबकर ने दावा को मुस्तरिद करते हुए कहा कि ऐ दुख़्तरे रसूल स 0! दो मर्दों या एक मर्द और दो औरतों के बग़ैर गवाही काफ़ी नहीं होती। जनाबे सैय्यदा ने जब देखा कि हज़रत अली अलै 0 और उम्मे ऐमन की गवाहियों को न तमाम क़रार देकर रसूल उल्लाह स 0 के हिबनामे से इन्कार किया जा रहा है तो उन्होंने मीरास की बिना पर फ़िदक का मितालिबा किया। मक़सद यह था कि अगर तुम इसे हिबा तस्लीम नहीं करते तो न करो मगर इससे तो इन्कार नहीं कर सकते कि फ़िदक रसूल उल्लाह स 0 की ज़ाती मिलकियत था और मैं शरअन उनकी वारिस हूँ लेहाज़ा जाएदाद मुझे मिलना चाहिये। अबुबकर ने कहा , अमवाले रसूल स 0 में विरासत का निफ़ाज़ नहीं हो सकता क्योंकि रसूल उल्लाह स 0 खुद फ़रमा गये हैं कि “ हम गिरोह अम्बिया किसी को अपना वारिस नहीं बनाते बल्कि जो छो़ड़ जाते हैं वह सदक़ा होता है। ” उस पर जनाबे फ़ातेमा ज़हरा ने फ़रमाय “ क्या अल्लाह की किताब में यह है कि तुम अपने बाप की मीरास के हक़दार बनो और मैं अपने बाप के वुरसा से महरुम रहूँ ” ?

अबुबकर के इस ग़लत फैसले पर हज़रत फ़ातेमा ज़हरा स 0 को इतना सदमा हुआ कि आपने उनसे क़ता कलाम कर लिये और हमेशा उनसे नाराज़ व क़बीदा ख़ातिर रही। यह नाराजगी व बरहमी किसी हंगामी जज़बात का नतीजा न थी बल्कि दीनी एहसासात के तहत थी कि कुर्आन मजीद के अमूमी हुक्मे मीरास को पामाल और जिन्हें पैग़म्बर स 0 ने मुबाहिले में हक़ व सदाक़त का शहकार क़रार दिया था उनकी सदक़ बयानी को मजरुह किया गया था इसलिये इस रंज व मलाल ने इतना तूल खींचा कि मरते दम तक आपने अबुबकर से कलाम नहीं किया। इमाम बुख़ारी का बयान है किः

“ फ़ातेमा स 0 बिन्ते रसूल ने रसूल उल्लाह स 0 की वफ़ात के बाद अबुबकर से मुतालिब किया कि अल्लाह ने जो माल पैग़म्बरे अकरम को कुफ़्फार से लड़े बग़ैर दिलवाया था इसकी मीरास मुझे पहुंचती है , वह मुझे दिलवाया जाये। अबुबकर ने कहा रसूल उल्लाह स 0 फ़रमा गये हैं कि हम किसी को वारिस नहीं बनाते। इस पर फातेमा स 0 ग़ज़बनाक हुईं औऱ अबुबकर से मरते दम तक क़ता ताल्लुक किये रहीं। ”

अगर थोड़ी देर के लिये यह फ़र्ज़ कर लिया जाये कि फ़िदक न हिबा था न मौरुसी मिलकियत तो उसमें क्या मुज़ाएका थ कि अबुबकर क़राबते रसूल स 0 का पास व लिहाज़ करते हुए उसे फ़ातेमा स 0 के नाम कर देते जब कि हाकिम और वली अमर का यह हक़ तसलीम किया जाता है कि वह रियासत व मुम्लिकत के अमवाल व जाएदाद मे से जो चाहे और जिसे चाहे अपनी मर्ज़ी से दे सकता है। चनानचे मुहम्मदुल ख़ज़रमीं मिस्री तहरीर फ़रमाते हैं कि शरए इस्लमा हाकिम के लिये इस अमर से माने नहीं है कि वह मुसलमानों मे से जिसे चाहे अतिया दे औऱ जिसे चाहे न दे। चुनानचे ज़बीर बिन अवाम को अबुबकर ने वादी जरफ़ में जागीर दी और उमर ने भी वाली अक़ीक़ में जागीर अता की। उस्मान ने अपने दौर अक़तेदार में फ़िदक मरवान को दे दिया तो क्या अबुबकर जनाबे फ़ातेमा स 0 को फ़िदक बतौरे जागीर नहीं दे सकते थे ताकि उनकी नाराज़गी की नौबत ही न आती जब कि फ़ातेमा स 0 की नारज़गी की एहमियत पैग़म्बरे अकरम स 0 के इस इरशाद से उन पर ज़ाहिर थीः

“ ऐ फ़ातेमा स 0! अल्लाह तुम्हारे ग़ज़ब से ग़ज़बनाक और तुम्हारी ख़ुशनूदी से खुशनूद होता है। ”

इस अमर पर हैरत होती है कि किसी हुक्म शरई की बिना पर जनाबे फ़ातेमा ज़हरा का दावा मुस्तरिद किया गया जब कि आंहज़रत स 0 क़बज़ा दे कर हिबा की तक़मील कर चुके थे। अगर क़बज़ा न होता तो अबुबकर कह सकते थे कि चूंकि क़बज़ा नहीं हे लेहाज़ा यह हिबा नामुम्किन हैं और गवाहों को तलब किये बगैर दावा मुस्तरिद कर देते। गवाहों का तलब किया जाना ही इस बात की दलील है कि वह क़बज़ा तसलीम करते थे और चूंकि दलीले िमलकियत है इसलिये बरसबूत खुद अबुबकर पर था न कि दुख़्तरे रसूल स 0 पर। क्या मासूमा के बारे में यह शुब्हा हो सकता है कि वह फ़िदक की ख़ातिर ग़लत बयानी से काम लेंगी और इस चीज़ पर अपना हक़ ज़ाहिर करेंगी जिस पर उनका कोई हक़ न था जब कि उनकी रास्त गोई मुसल्लम है जैसा कि आयशा फ़रमाती है कि रसूल उल्लाह स 0 के अलावा मैंने किसी को भी फ़ातेमा से बढ़ कर रास्त गो नहीं पाया।

फिर जनाबे सैय्यदा स 0 ने जो गवाह पेश किये उनकी गवाही को नातमाम भी नहीं कहा जा सकता इसलिये कि रसूल उल्लाह स 0 एक गवाह और क़सम पर फै़सला कर दिया करते थे। अगर अबुबकर चाहते तो हज़रत अली अले 0 से क़सम लेकर जनाबे फ़ातेमा स 0 के हक़ में फैसला कर देते। कुतुब अहादीस में ऐसे वाक़ियात भी मिलते हैं जहां गवाहों की ज़रुरत ही महसूस नहीं की गयी और सिर्फ़ मद्दई की शख़्सियत को देखते हुए उसके दावा को दुरुस्त मान लिया गया या सिर्फ़ एक ही गवाह पर फैस़ला कर दिया गया। चुनानचे फ़रज़न्दाने सहीब ने जब मरवान की अदालत में दावा दायर किया कि रसूल उल्लाह स 0 उन्हें दो मकान और एक हुजरा दे गये थे तो मरवान ने कहा , इसका गवाह कौन है ? उन्होंने कहा , इब्ने उमर है। उसने इब्ने उमर को तलब किया औऱ उनकी शहादत पर फ़रज़न्दाने सीहब के हक़ में फैसला कर दिया।

इस मौक़े पर न इब्ने उमर की गवाही को न तमाम कहा गया और न उसके कुबूल करने में पस व पेश किया गया। तो क्या हज़रत अली अलै 0 का मर्तबा इब्ने उमर के बराबर भी न था जिनकी सच्चाई द सदाक़त हर दौर में शक व शुब्हे से बालातार थी। चुनानचे मामून अब्बसी ने एक मर्तबा उलमाये वक़्त को जमा करके उनसे दरियाफ़्त किया कि जिन लोगों ने फ़िदक के हिबा होने के बारे में गवाही दी है उनके मुतालिक़ तुम लोग क्या राय रखते हो ? सभी ने बएक ज़बान होकर कहा कि वह सादिक़ और रास्ता गो थे , उनकी सदाक़त पर कोई शुब्हा नहीं किया जा सकता। याकूबी का कहना है कि जब ओलाम ने उनकी सदक़ बयानी पर इत्तेफाक़ किया तो मामून ने फ़िदक औलादे फ़ातेमा स 0 के हवाले कर दिया और एक नविश्ता भी लिख दिया।

इस तरह जनाब सैय्यदा स 0 के दावेको मुस्तर्द करने का कोई जवाज़ न था इसलिये कि हज़रत अबुबकर ने जिस हदीस से अपने अमल की सेहत पर इस्तेदलाल किया वह कुर्आन के उमामात के सरीहन ख़िलाफ़ है। कुर्आन मजीद का वाज़ेह हुक्म है कि वले कुल्लिन जाअलना मवालेया मिम्मा तराकल वालेदेन वब अक़राबून “ जो तरका मां बाप और अक़रबा छोड़ जायें हम ने उनके वारिस क़रार दिये हैं। इस आयत की रु से तरकये रसूल स 0 को सदक़ा क़रार दे कर विरासत की नफ़ी का कोई जवाज़ नहीं। अगर अमवाले रसूल स 0 सदक़ा हो तो पैग़म्बर स 0 के लिये उन पर क़ब्ज़ा जाएज़ ही न था बल्कि जिस वक़्त उनकी मिल्कियत में आते हुज़ूरे अकरम स 0 उसी वक़्त उन्हें मिल्कियत से अलैहदा करके उनके असली हक़दारों के हवाले कर देते मगर आहंज़रत उन पर मालिकाना तौर पर क़ाबिज़ व मुतसरिफ़ रहे और अबुबकर को भी मिल्कियत से इन्कार न था। अगर इन्कार होतो तो हदीस ला नूरस का सहारा ढ़ूढ़ने के बजाये यह कहते कि फ़िदक रसूल उल्लाह स 0 की मिल्कियत ही कब था ? ज़ाहिर है कि मिल्कियत के बगै़र विरासत की नफ़ी एक बै मानी चीज़ है। जब पैगम्बर स 0 की मिल्कियत साबित है तो आयाते मीरास की रु से वारिसों का हक़ भी मुसल्लम होगा और यह हक़ किसी ऐसी हदीस की रु से साक़ित नहीं हो सकता जिसे अबुबकर के अलावा न किसी ने सुनी हो और न रिवायत की हो और न फ़िदक के अलावा ममलूकाते पैग़म्बर स 0 में कहीं इसका जि़क्र आया हो। हालांकि इस हदीस के अल्फ़ाज़ के उमूम का तक़ाज़ा यह था कि पैग़म्बर स 0 की तमाम मतरुका अशिया को भी अमूमी सदक़ा क़रार दिया जाता और मनकूल व ग़ैर मनकूला साज़ व सामान में कोई तफ़रीक़ न की जाती मगर मनकूला सामान व अशिया के बारे में पैग़म्बर स 0 के वारसान से कोई मुतालिबा नहीं किया जाता बल्कि सिर्फ़ फ़िदक ही को इस हदीस का मौरुद क़रार दिया जाता है। अगर यह तसलीम कर लिया जाये कि इस हदीस की निफ़ाज़ सिर्फ़ आराज़ी व ग़ैर मनकूला आशिया पर था तो अज़वाजे रसूल स 0 से उनके घरों को भी वापस लेना चाहिये था मगर उनसे वापसी का मुतालिबा तो दर किनार उनके मालिकाना हुकूक़ तसलीम किये जाते हैं। और इसी हक़ की बिना पर आयशा ने हुजरये रसूल स 0 में इमाम हसन अलै 0 को दफ़्न करने की इजाज़त नहीं दी और कहा कि “ यह मेरा घर है और मैं इजाज़त नहीं देती कि वह इसमें दफ़्न किये जायें। ”

इन वाज़ेह दलीलों और शहादतों के बाद हदीस की आड़ लेकर यह कहना कि अन्बिया का कोई वारिस नहीं होता हकाएक़ से चश्म पोशी और अमदन गुरेज़ करना है जब कि कुर्आन के मुक़ाबिले में फ़र्दे वाहिद की बयान करदा हदीस का कोई वज़न नहीं है और इस हदीस का वज़न ही क्या हो सकता है जिसकी सेहत से बिन्ते रसूल स 0 और वसीये रसूल स 0 ने इन्कार कर दिया हो। अगर जनाबे फ़ातेमा ज़हरा स 0 इस हदीस को हदीसे रसूल स 0 समझतीं तो कोई वजह नहीं थी कि वह अबुबकर से ग़ज़बनाक होतीं और अगर हज़रत अली अलै 0 ने इस हदीस को माना होता तो जनाबे सैय्यदा स 0 की हमनवाई करने के बजाये उन्हें इस बे महल नाराज़गी से मना करते बल्कि वाक़िआत से यह मालूम होता है कि अबुबकर ख़ुद भी इस हदीस की सेहत पर यक़ीन व एतमान नहीं रखते थे और उनके बाद आने वाले ख़ोलफ़ा ने भी इस की सहत को तसलीम नहीं किया। चुनानचे इब्तेदा में अबुबकर ने जनाबे फ़ातेमा स 0 का हक़ विरासत तसलीम करते हुए वागुज़ारी का परवाना भी लिख दिया था मगर उमर के दख़ल अन्दाज़ हो जाने पर उन्हें अपना फ़ैसला बदलना पड़ा जैसा कि अल्लामा मजलिसी ने तहरीर फरमाया हैः

“ अबुबकर ने जनाबे फ़ातेमा स 0 को फ़िदक की दस्तावेज़ लिख दी इतने में उमर आये और पूछा कि है क्यों है ? अबुबकर ने कहा कि मैं ने फ़ातेमा स 0 के लिये मीरास का वसीक़ा लिख दिया है जो उन्हेंबाप की तरफ़ से पहुंचती है। उमर ने कहा फिर मुसलमानों पर क्या सर्फ़ करोगे जब कि अहले अरब तुमसे जंग पर आमादा हैं और यह कह कर उमर ने वह तहरीर फ़ातेमा स 0 के हाथ से छीन कर चाक कर दी। ”

अगर अबुकर को इस हदीस की सेहत पर यक़ीन होता तो उसी वक़्त वह फ़िदक की वागज़ारी से साफ़ इन्कार कर देते , वसीका लिखने की नौबत ही न आती और उमर माने हुए तो इस बिना पर नहीं कि जनाबे सैय्यदा स 0 का दावा ग़लत है और अन्बिया का कोई वारिस नहीं होता बल्कि मुल्की ज़रुरियात और जंगी मसारिफ़ के पेश नज़र उन्होंने फ़िदक रोक लेने का ग़लत मशविरा दिया। अगर उभर के नज़दीक यह हदीस दुरुस्त होती तो वह यह कहते कि यह दावा बुनियादी दौर पर ग़लत है और फ़िदक देने का कोई जवाज़ नहीं है। इस मौक़े पर अगर चे उन्होंने दस्तावेज़ चाक की और फ़िदक देने में सद्देराह हुए मगर अबुबकर की पेश करदा वह हदीस से उनकी हमनुवाई जाहिर नहीं हुई। अगर इस हदीस को क़ाबिले वसूक़ व क़ाबिले एतमाद समझा गया होता तो फ़िदक किसी दौर में भी औलादे फातेमा स 0 को वापस ने दिया जाता। उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ ऐसा दूसरे ख़ुलफा ने उसके कमज़ोर पहलू ही को देखकर फ़िदक से दस्तब्रदारी का एलान किया होगा वरना उनका मुफ़ाद तो इसी में था कि इस हदीस की आ़ड़ लेकर इस पर अपना कब्ज़ा जमाये रखते जिस तरह बाज़ खुलफ़ा में इश हदीस का सहारा ले कर अपना कबज़ा बरकरार रखा था।

इरतेदाद व बग़ावत

ख़लिफ़ा हो जाने के बाद जब अबुबकर की ख़िलाफ़त की ख़बर मदीने के हदूद से निकल कर अतराफ़ व जवानिब में नशर हुई तो मुसलमानों के दरमियान ग़म व गुस्सा और नाराज़गी की एक आम लहर फैल गयी। तमाम क़बाएले अरब के दिलों में बेचैनी और ज़ेनहों में ऐसा तशवीश अंगेज इज़तेराब करवटे लेने लगा जिसने अनके एहसासात को मुतासिर करके उन्हें हुकूमत से अदमें ताव्वुन पर आमाद कर दिया। चुनानचे अरबों के कुछ क़बीले मुरतदीन के परचम तले भी जमा हो गये। हर तरफ़ से मुख़ालिफ़त के तूफ़ान उमडने लगे। इस शोरिश व हंगामे में बनी सक़ीफ़ औऱ कुरैश के अलावा अरब के तक़रीबन हर क़बीले शामिल हो गया जैसा कि इब्ने असीर का बयान है।

“ अहले अरब मुरत्तिद हो गये और सर ज़मीने अरब फ़ितना व फ़साद की आग से भड़क उठी। कुरैश औऱ बनी सक़ीफ़ के अलावा हर क़बीले तमाम का तमाम या इसमें का एक ख़ास गिरोह मुरतिद हो गया। ”

अबुबकर के दौर में जिन मुरतदीन ने सर उठाया उनके सरगोह पैग़म्बरे इस्लाम स 0 की ज़िन्दगी में ही मुरदित हो चुके थे। चुनानचे असवद अनसी , मुसलेमा कज़्जाब और तलीहा बिन ख़्वैलैद ने आंहज़रत स 0 के ज़मानये हयात ही में इस्लाम से नुनहरिफ़ होकर दावये नबूवत किया।

असवद अनसी आंहज़रत स 0 की ज़िन्दगी के आख़री दिनों में फ़िरोज़ दैलमी के हाथ से मारा गया। मसलेमा अबुबकर के दौर में लड़ता हुआ वहशी के हाथ के क़त्ल हुआ और तलीहा ने उमर के दौर में इस्लाम कुबूल कर लिया , इसी तरह अलक़मा बिन अलासा और सलमा बिन्तु मालिक ने पैग़म्बर के दौर में इरतेदार अख़तेयार किय और आंहज़रत स 0 के बाद लश्कर कशी की। अलबत्ता लक़ीत बिन मालिक पैग़म्बर स 0 के बाद मुरतिद हुआ और सजाह बिन्ते हारिस ने भी आप के बाद दावाये नबूवत किया। लक़ीत ने मुसलमानों से बुरी तरह शिकस्त खाई और सजाह मुसलेमा का ज़मीमा बन कर रह गयी और इससे निकाह करके उसने बक़िया ज़िन्दगी गुमनामी में गुज़ार दी। यहन थे वह मुरतदीन जिन्होंने अबुबकर के दौर में हंगामा अराई की और जिन क़बाएल को मुनकरीन ज़कात ने नाम से याद किया जाता है वह भी मद्दई याने नबूवत और उनके मुतबईन थे। चुनानचे हज़रत अबुबकर ने तलीहा के वाफ़िद ही के बारे में यह कहा था कि “ अगर उन्होंने इस रस्सी के देने से भी इन्कार किया जिससे ऊँट के पैर बांधे जाते हैं तो मैं उनसे जेहाद करुँगा। ”

यह इरतिदाद की फ़ितना पैग़म्बर की ज़िन्दगी ही में उठ खड़ा हुआ था और बाद में चन्द कबाएल भी इसी रौ में बह गये। लिकिन यह कहना कि पैगम्बर के बाद तमाम क़बाएल मुरतद हो गये न सिर्फ़ ख़िलाफ़े वाक़िआ है इस्लाम की सिदाक़त पर भरपूर हमला भी है। यह क़रीने क़यास बात ही नहीं है कि रसूले अकरम की वफ़ात के फ़़ौरन बाद यकबारगी तमाम क़बीले इस्लाम से मुनहरिफ़ होकर मुरतद हो जायें। क्या यह क़बैएल इस्लाम के फुतूहात और मुसलमानों की बढ़ती हुई ताक़त से मरऊब होकर इस्लाम लाये थे और पैग़म्बर की रिहलत से मरऊबियत का तास्सुर ख़त्म हो गया तो इस्लाम का तौक़ अपनी गरदनों से उतार फेंका ? इससे तो उन लोगों के नज़रिये को तक़वीयत हासिल होगी जो यह कहते हैं कि इस्लाम की इशाअत रसूले अकरम की पुरअम्न तबलीग़ का नतीजा न थी बल्कि अरबों को बरोज़े शमशीर मुसलमान बनाया गयी।

हक़ीक़त यह है कि बाज़ क़बाएल से जंग छे़ड़ने और उन्हें तहे तेग़ करने के लिये इरतिदादों बग़ावत का मुरतकिब क़रार दिया गया और उन क़बाएल को भी मुरतदीन में शुमार कर लिया गया जो अल्लाह की वहदनियत और रसूल कि रिसालत पर अक़ीदा रखते थे मगर हाकिमे वक़्त को बहैसियते ख़लीफ़-ए-रसूल तसलीम करने पर आमादा न थे। इसी जुर्म पादाश में उन्हें मुरतद और बाग़ी क़रार दे दिया गया और इस्लाम से ख़ारिज कर दिया गया। चुनानचे उमरो बिन हरीस ने ज़ैद बिने सईद से पूछा कि तुम रसूलुल्लाह की वफ़ात के मौक़े पर मौजूद थे ? कहा कि हाँ मैं मौजूद था। पूछा कि अबूबक्र की बैअत किस दिन हुई ? कहा उसी दिन जिस दिन रसूल की वफ़ात वाक़े हुई। पूछा किसी ने इख्तिलाफ़ तो नहीं किया ? कहा किसी ने इख़्तिलाफ़ तो नहीं किया मगर उसने जो मुरदत था या मुरतद होने वाला था।

यह जवाब उस अम्र का ग़म्माज़ है कि जिन्होंने हज़रत अबूबक्र की बैअत से इन्कार किया था उन्हें ज़हनी तौर पर मुरतद या मुरतद होने वाला क़रार दे लिया था हालाँकि इस इन्कारे बैअत के अलावा कोई और चीज़ नज़र नहीं आती जिससे उनका इरतिदाद साबित होता हो। जहाँ तक ज़कात रोक लेने का ताल्लुक है जो उन लोगों ने जब हज़रत अबूबक्र की ख़िलाफत ही को तसलीम नहीं किया तो उन्होंने ज़कात देने से भी इन्कार किया होगा। इस एतेबार से उन्हें मानेईने ज़कात तो कहा जा सकता है मगर मुरतदीन और मुनकरीन ज़कात कहने का कोई जवाज़ नहीं क्योंकि उन्होंने ज़कात तके वुजूब और उसकी मशऊरियत से इन्कार नहीं किया बल्कि वह हुकूमत को ज़कात देने से माने हुए। उसका वाजेह सबूत यह है कि वह नमाज़े पढ़ते थे और किसी ने उन पर तारिक्स्सलात का इल्ज़ाम आयद नहीं किया। अगर वह ज़कात के मुनकिर होते तो उन्हें नमाज़ का मुनकिर भी होना चाहिए था क्योंकि कुरान ए मजीद में बयासी मवाक़े पर नमाज़ और ज़कात का ज़िक्र एक साथ हुआ है और दोनों को यकसाँ अहम्मित दी गयी है तो फिर यह क्योंकर तसव्वुर किया जा सकता है कि वह नमाज़ के वुजूब का अक़ीदा रखते हुए ज़कात की मशऊरियत और उसके वुजूब से इन्कार कर देंगे।

अलबत्ता अगर वह ज़कात के वुजूब का इन्कार करते तो ज़रुरियात ए दीन में से एक अम्र ज़रुरु के इन्कार से उन पर हुक्म इरतिदाद आयद होता। मगर ज़कात रोक लेने और उसके हुकूमत की तहवील में न देने से उन्हें मुरतद नहीं कहा जा सकता बल्कि अगर वह सिरे से ज़कात ही न अदा करते और उस फ़रीज़ ए इलाही के तारिक होते जब भी उन पर कुछ ओ इरतिदाद का हुक्म नहीं लगाया जा सकता क्योंकि किसी अम्र वाजिब के तर्क होने से इरतिदाद लाज़िम नहीं आता और न उनसे जंग का जवाज़ पैदा होता है और उनका क़त्ल मुबाह हो सकता है। इसी बिना पर हज़रत अबूबक्र ने उन लोगों के ख़िलाफ़ क़दम उठाना चाहा तो सहाबा ने अबूबक्र की राय से इख्तिलाफ़ करते हुए इस इक़दाम की मुख़ालिफत की और हज़रत उमर ने भी वाज़ेह तौर पर कहाः

“ ऐ अबूबक्र ” तुम उनसे किन बिना पर जंग करोगे जब कि रसूलुल्लाह फ़रमा गये हैं कि मुझे लोगों से इस वक़्त तक जंग की इजाज़त दी गयी जब तक वह क़लम ए तौहीद नहीं पढ़ते। ”

मगर इस मौक़े पर न सहाबा के मुत्तफ़िक़ा फ़ैसले को क़ाबिले एतना समझा गया और न हज़रत उमर की बात मानी गयी बल्कि हज़रत अबूबक्र ने अपने मौक़फ़ पर बरक़रार रहते हुए ख़ालिद बिने वलीद को क़बाएले अरब पर तबाही ओ बरबादी के लिये मुसल्लत कर दिया। चुनानचे उन्होंने मालिक बिने नवीरा और उनके क़बीले बनी पर बू का क़त्ल आम करके तारीख़े इस्लाम में एक सियाह बाब का इज़ाफ़ा कर दिया और बिला इम्तियाज़ लोगों को मौत के घाट उतार दिया।

मालिक बिने नवीरा क़बील ए बनी यर बू के एक बलन्द पाया सरदार थे। मदीन ए मुनव्वरा मैं पैग़म्बर की ख़िदमत में हाज़िर होकर इस्लाम लाये और उन्हीं से आदाबे मज़हब ओ इहकामे शरीअत की तालीम हासिल की आँहज़रत ने उनकी ईमानदारी ओ दयानतदारी पर इतिमाद करते हुए उन्हें सदाक़त की वुसूली पर मामूर फ़रमाया था। यह पैग़म्बरे इस्लाम के आख़िरी ज़माने हयात तक सताक़त जमा करके भिजवाते रहे और जब आँहज़रत के इन्तिक़ाल की ख़बर मिली तो ज़कात की जमाआवरी से दस्तबरदार हो गये और अपने क़बीले वालों से कहा कि यह माल उस वक़्त महफूज़ रखो जब तक यह न मालूम हो जाये कि मुसलमानों का इक़तिदार क़ाबिले इत्मिनान हाथों में आया है।

उन्हीं दिनों में सज्जाह बिन्ते हारिन ने चार हज़ार का लश्कर इकट्ठा करके मदीने पर हमले का इरादा किया और जब वह लश्कर की क़यादत करते हुए बनी यरबू की बस्ती पर बताह के क़रीब जरवन के मुक़ाम पर पहुँची तो उसने मालिक बिन नवीरा को सुलह का पैग़ाम भेजा और उनसे तर्के जंग का मुआहिदा किया। इब्ने असीर का कहना है किः

“ सजाह ने हज़रत अबूबक्र से जंग का इरादा किया और मालिक बिने नवीरा को पैग़ाम भिजवाया और उनसे मसालिहात ओ तर्क जंग के मुआहिदे की ख़्वाहिश की जिसे मालिक ने कुबूल किया और उसे हज़रत अबूबक्र से जंग आज़मा होने से बाज़ रखा और बनी तमीम के क़बीलों पर हमलावर होने की तरग़ीब दी जिसे सजाह ने मंजूर किया। ”

उस वक़्ती मसालिहत और मुआहिद ए तर्क जंग को किसी तरह भी इरतिदाद या बग़ावत से ताबीर नहीं किया जा सकता क्योंकि इस मसालिहत और मुआहिदे से कोई ऐसी चीज़ ज़ाहिर नहीं होता जिसे इरतिदाद कहा जा सके बल्कि इस मुआहिदे सुलह में यह मसलिहत कारफ़रमा थी कि सजाह को ग़ैर मुस्लिम क़बाएल से जंग में उलझाकर इस्लाम के मरकज़े मदीने पर हमलावर होने से रोका जा सके। चुनानचे वह इस मसालिहत के ज़रीए उसे रोकने में कामयाब हो गये और उसका रुख़ बनी तमीम की तरफ़ मोड़कर उससे अलाहिदा हो गये। अगर उसे जुर्म क़रार दिया जाये तो तन्हा मालिक ही उसके मुजरिम नहीं बल्की वकी बिने मालिक भी जो उन्हें क़बाएल में ज़काएत की जमाअवरी पर मामूर थे इस मुआहिदे सुलह में शामिल थे लेकिन उनसे कोई मुवाख़िजा नहीं किया गया। सिर्फ़ मालिक और उनके क़बीले बिने यरबू को इधर-उधर मुनतशिर कर दिया था। ख़ालिद ने उनके तआकुब में लश्कर भेजा और उन्हें गिरफ़्तार करके लाया गया। अबू क़तादा अन्सारी ने जो ख़ालिद के लश्कर में शामिल थे , उन्हें असलहों से आरास्ता देख तो कहा , हम मुसलमान हैं , उन्होंने कहा हम भी मुसलमान हैं। कहा फिर यह हथियार तुम लोगों ने क्यों बाँध रखे हैं ? उन्होंने कहा , तुम क्यों हथियार लिये घूमते फिर रहे हो ? अबू क़तादा ने कहा , अगर तुम मुसलमान हो तो हथियार उतार दो। चुनानचे उन्होंने अपने हथियार उतार दिये और अबू क़तादा के साथ नमाज़ पढी।

बनी यरबू से हथियार उतरवाने के बाद मालिक को गरिफ़्तार करके ख़ालिद के सामने लाया गया।

मालिक की गिरफ़्तारी को सुन कर उनकी बीवी उम्मे तमीम बिन्ते मिन्हाल भी उनके पीछे बाहर निकल आई। याकूबी रक़म तराज़ हैं किः

“ उनकी बीवी उनके पीछे आई ख़ालिद ने उसे देखा तो वह उन्हें पसन्द गयी। ”

मालिक जो ख़ालिद के किरदार और उनकी तीनत व तबियत से वाक़िफ़ थे उन्हें इसके तेवर बदले हुए और ख़राब नज़र आये चुनान्चे वह समझ गये कि अब उन्हें रास्ते से हटा दिया जायेगा। अल्लामा इब्ने हजर का बयान है किः

“ जब ख़ालिद ने मालिक की बीवी को देखा जो हुस्न व जमाल न यक्ता थी तो मालिक ने उससे मुख़ातिब होकर कहा कि तूने मेरे क़त्ल का इन्तेज़ाम कर दिया है। ”

चुनान्चे ऐसा ही हुआ कि ख़ालिद ने एक बहाना तलाश कर लिया जिससे क़त्ल का जवाज़ पैदा कर लिया गया और वह यह कि गुफ़्तगू के दौरान मालिक की ज़बान एक दो बार यह जुमला निकला कि तुम्हारे साहब ने ऐसा किया वैसा किया।

इस पर ख़ालिद बिग़ड गये और उन्होंने कहा कि तुम उन्हें (अबूबकर को) बार बार हमारा साहब कहते हो , क्या तुम उन्हें अपना साहब नहीं मानते और साथ ही उन्होंने ज़रार बिन अज़वर को इशारा किया , उसने तलवार चलाई और मालिक का सर तन से जुदा हो गया। उसके बाद ख़लिद का लश्कर बनी यरबू पर टूट पड़ा और क़त्ले आम का सिलसिला शुरु हो गया। देखते ही देखते बारह सौ मुसलमान मौत के घाट उतार दिये गये और उनके कटे हुए सरों के चूल्हे बनाकर उन पर देगचियां चढ़ा दी गयीं।

इस क़त्ल व ग़ारत गरी और बरबरियत के बाद ख़ालिद ने मालिक की बीवी उम्मे तमीम से ज़िना की जिससे लश्कर में उनके ख़िलाफ़ आम नफ़रत की लहर पैदा हो गयी और अबु क़तादा अन्सारी इस वाक़िये से इतना मुतासिर हुए कि ख़ालिद का साथ छोड़ कर मदीने चले आये और अल्लाह की बाहगाह में यह अहद किया कि वह आइन्दा ख़ालिद के साथ किसी जंग में शरीक हीं होंगे।

अबुक़तादा की वापसी पर जब यह अफ़सोस नाक़ ख़बर मदीने में आम हुई तो अहले मदीना ने ख़ालिद पर लानत मलामत की और उमर भी बर-अफ़रोख़ता व बहरम हुए। चुनानचे जब ख़ालिब बिन वलीद पलट कर आये और फ़ातहाना अन्दाज़ में सर की पग़ड़ी में तीर आवेज़ा किये हुए शान व शौकत के साथ मस्जिदे नबवी में दाख़िल हुए तो हज़रत अबूबकर ने बढ़ कर उनका इस्तेक़बाल किया मगर उमर ने बढ़ कर उनकी पगड़ी से तीर खींच लिये और उन्हें तोड़ कर पैरों तले मसलते हुए कहाः

“ तूने एक मुसलमान को क़त्ल किया फिर उसकी बीवी के साथ ज़िना की , ख़ुदा की क़सम मैं तुझे संगसार किये बग़ैर नहीं रहूंगा। ”

उमर चाहते थे कि ख़ालिद को ज़िना के जुर्म में संगसार किया जाये या मालिक के क़सास में उन्हें क़त्ल किया जाये मगर अबुबकर ने यह कह कर टाल दिया कि ऐ उमर! इस के बारे में लब कुशाई न करो।

इसके बाद अबुबकर ने यह हुक्म दिया कि क़ैदियों को वापस कर दिया जाये और मालिक बिन नवीरा के बेगुनाह ख़ून की दैत बैतुल माल से अदा कर दी जाये।

इन वाकि़यात को देखने के बाद इस यक तरफ़ा जंग का जेहाद से ताबीर करना इस्लामी जेहाद के मफ़हूम को बदल देने के मुतारादिफ़ है। क्या इस्लाम इसकी इजाज़त देता है कि मुसलमानों को निहत्था करके उन्हें तये तेग़ कर दिया जाये , उनके काटे हुए सरों से चुल्हों का काम लिया जाये औऱ उनकी इज़्ज़त व हुरमत को पामाल किया जाये। यह इक़दाम न सिर्फ़ इस्लामी तालीमात के मनाफ़ी था बल्कि अबुबकर के हुक्म के ख़िलाफ़ भी था क्योंकि अबूबकर ने ख़ालिद को यह हिदायत दी थी कि अगर किसी बस्ती से अज़ान की आवाज़ सुनाई दे तो उस पर हमला न करना। मगर यहां अबुक़तादा अन्सारी , अब्दुल्लाह बिन उमर और दूसरे मुसलमान बनी यरबू को अज़ान व अक़ामत कहते और नमाज़े पढ़ते देखते हैं मगर उसके बावजूद उन्हें क़त्ल कर दिया जाता है।

इन्साफ़ का तक़ज़ा यह था कि ग़लत इक़दाम को ग़लत समझा जाता और एक फ़र्द के इक़दाम को हक़ ब-जानिब क़रार देने के लिये मुसलमानों की एक बड़ी तादाद पर इस्तेदाद का ज़ोर न दिया जाता। क्या किसी मुसलमान को मुरतिद क़रार देना कोई जुर्म नहीं है ? अगर ख़ालिद सहाबिये रसूल स 0 थे तो मालिक और उनके साथी भी जुमरए सहाबा में शामिल थे। यह बात तो आसानी से कह दी जाती है कि पैग़म्बर स 0 के वाद इरतेदाद आम हो गया और क़बीले के क़बीले मुरतिद हो गये मगर यह हक़ बात हके नाम से उनके सरों पर मुसल्लत किया गया था। रहा ज़कात की अदाएगी से इन्क़ार , जब उनकी नज़र में हुकूमत ही नाजाएज़ थी तो उसकी तहवील में ज़क़ात भी देते थे और इस्लामी एहकामात पर कारबन्द भी थे।

यह इस्लाम में पहला दिन था जब तावील का सहारा ले कर एक मुजरिम की जुर्म पोशी की गयी। फिर उसके बाद तो तावीलात के दरवाज़े खुल गये और हर जुर्म के लिये तावील की गुंजाइश निकाल ली गयी। चुनानचे तारीख़ में ऐसे वाक़ियात मिलते हैं जहां ख़ताये इजतेहादी की आड़ में हज़ारों मुसलमानों का ख़ून बहाया गया , सैक़ड़ो बस्तियां नज़रे आतिश कर दी गयीं और शहर के शहर उजाड़ दिये गये मगर किसी को हक़ नहीं था कि वह इसके ख़िलाफ़ ज़बान खोल सके क्योंकि यह तमाम हवादिस ख़ताये इजतेहादी की नतीजा था और ख़ताये इजतेहादी क़तई जुर्म नहीं है ख़्वाह नसे सरीह को पसे पुश्त डाल कर महरमात की इरतेकाब किया जाये या मुसलमानों के ख़ून से होली खेली जाये।

हैरत है कि हज़रत अबुबकर ने किसी उमूल के तहत ख़ालिद के जुर्म को तावील की ग़लती का नतीजा क़रार दिया या और उन्हीं मवाख़िज़ा से बाला तर समझ लिया। क्या क़त्ल मुस्लिम के अदमें जवाज़ में और बेवा के लिये इद्दा या कनीज़ के लिये इस्तेबराये के वजूब में अक़द व राये से तावील की गुंजाइश निकल सकीत है कि इस्लाम के सरही एहकाम की ख़िलाफ़वर्ज़ी को ख़ताये इजतेहादी क़रार दे दिया जाये और शरीयत को शख़्सी रुझाहानात और ज़ाती ख़्वाहिशात के ताबे कर दिया जाये। जुर्म बहरहाल जुर्म है।

मुस्लिमा क़ज़्ज़ाब

मुस्लिम बिन हबीब बनूं हनीफा से था। सन् 6 हिजरी या 10 हिजरी में अपनी क़ौम का नुमाइन्दा बन कर मदीने आया और पैग़म्बरे इस्लाम स 0 के हाथों पर मुसलमान हुआ। लेकिन जब वह पलट कर अपने वतन वापस गया तो वहां उसने अपनी कौम के लोगों से कहा कि मुहम्मद स 0 की मदद के लिये ख़ुदा ने मुझे भी मनसबे नबूवत पर फाएज़ कर दिया है। उसने यह दावा भी किया के मुझ पर वही नाज़िल होती है ओर इसके सुबूत ेमं एक फ़र्ज़ी कुर्आन भी मुरत्तब किया जिसकी जन्द आयतें बाज़ मोअर्रिख़ीन में रक़म की है जो लगूवियात , खुराफ़ात औऱ फह़शियात पर मुबनी है।

मुस्लिमा खुश इख़लाकी , नर्म गुफ़्तारी और शोबदाबाज़ी के फ़न में माहिर था। जो शख़्स उससे एक मर्तबा मिल लेते थे वह उसका गिरवीदा हो जाता था। यही सबब था कि उसने अपने एक मोतक़दीन पैदा कर लिये थे।

पैग़म्बरे इस्लाम स 0 ने अपनी ज़िन्दगी के आख़री अय्याम में उसकी सरकूबी के लिये लश्कर भेजने का इरादा किया था लेकिन बीमारी की वजह से आप मजबूर हो गये और उसे सर का मज़ीद का मौक़ा फ़राहम हो गया।

सन् 11 हिजरी में जब अबुबकर तख़्ते हुकूमत पर मुत्मकिन हुए तो उन्होंने मालिक बिन नवीरा के वाक़िे के बाद ख़ालिद बिन वलीद को बीस हज़ार के लश्कर के साथ उसकी सरकूबी को रवाना किया। मुस्लिमा ने चालीस हज़ार का लश्कर ले कर मुक़ाबिला किया। घमासान की जंग हुई जिसमें यह वहशी (क़ातिले हमज़ा) के हाथों ड़ेढ़ सौ साल की उम्र में मारा गया। यह जंग यमामा के क़रीब मुस्लिमा के हदीक़तुल रहमान से मुलहिक़ लड़ी गयी जो बाद में हदीक़तुल मौत के नाम से मशहूर हुआ। इब्ने ख़लदून के बयान के मुताबिक़ इस ख़ूंरेज जंग में मुस्लिमा के साथ इसके बीस हज़ार हमराही मारे गये और बाराह सौ या अट्ठारह सौ मुसलमान दरजये शहादत पर फ़ाएज़ हुए जिनमे व ओहद के जलीलुल क़दर सहाबा और सत्तर हाफ़िज़े कुर्आन भी शामिल हैं।

बनु हनीफ़ा की औरतों को क़ैद करके जब मदीने लाया गया तो उनमें खूला बिन्ते जाफ़र हनफ़िया भी थीं। जब उनके क़बीले वालों को उनकी असीरी का इल्म हुआ तो वह अमीरुल मोमेनीन हज़रत अली अलै 0 की ख़िदमत में हाज़िर हुए और उनसे दरख्वास्त की कि वह उन्हें कनीज़ी के दाग़ से बया कर उनकी ख़ानदानी इज़्ज़त व शराफत को बरक़रार रखें। चुनानचे अमीरुल मोमनीन अलै 0 ने उन्हें खरीद कर आज़ाद किया और फिर बाद में उनसे अक़द फरमाया। उन्हीं के बतन से मुहम्मदे हनफिया अलै 0 की विलादत वाक़े हुई।

ख़ालिद बिन वलीद ने इस जंग के दौरान अपनी हवसकारी का मुज़ाहिरा किया और बनु हनीफ़ा के एक शख़्स मजाअ की बेटी से जो यमामा भर में सबसे ज़्यादा खुबसूरत और हसीन थी , ज़बरदस्ती अक़द कर लिया जिस पर मुसलमानों में सख़्त बरहमी पैदा हो गयी थी।

तबरी , इब्ने असीर और इब्ने ख़लदून वग़ैरा ने तहरीर किया है कि यह जंग सन् 11 हिजरी में हुई और इसके इख़तेमाम तक अरब की तमाम बग़ावते फ़ेरों कर दी गयीं थी मगर साहबे तारीख़े ख़मीस का कहना है कि ये जंग माहे रबीउल अव्वल सन् 12 हिजरी में लड़ी गयी। (वल्लाह आलम)

अहले हज़र मौत की बग़ावत-

पैग़म्बरे अकरम स 0 की वफ़ात के बाद अहले बहरीन , अहले अमान और अहल़े यमन की तरह अहले हज़रत मौत ने भी अबूबकर की ख़िलाफ़त को तसलीम करने से इन्कार किया और सदाक़त व ज़कात की रक़में बैतुल माल में जमां करने के बजाये अपने पास महफूज़ कर लीं।

अहले हज़रत मौत पर ज़कात की वसूली के लिये उस वक़्त ज़्याद बिन लबीद आमिल मुकर्रर थे। एक दिन उन्होंने यजीद बिन माविया-तुल-क़री नामी एक नौजवान को ऊँट जबरदस्ती सदाक़त से मौसूम करके गल्लए शुतराने बैतुलमाल मे शामिल कर लिया। यज़ीद ने ज्यादा से खुशामद बरामद की और कहा , यह ऊँट मुझे बहुत अज़ीज है लिहाज़ा इस के बदले आप दूसरा ऊँट मुझसे लेकर इसे मुझे वापस कर दे। ज्याद ने कहा , यह ऊँट अगर सदाक़त बैतुलमाल में दाख़िल हो चुका है लिहाज़ा हम इसे वापस नहीं करेगी। यज़ीद हारिस बिन राका के पास जो वहाँ के रईसों में थे , आया और इनसे सारा हाल बयान करने के बाद वह ऊँट मुझे दिलवा दीजिये , मैं उससे ज़्यादा क़ीमत का ऊँट देने को तैयार हूं। हारिस ने ज़्याद से सिफ़ारिश की कहा वह ऊँट इस नौजवान को वापस कर दो और उसकी जगह उस से दूसरा ऊँट लेलो लेकिन ज़्याद बिन न लबीद ने हारिस की सिफ़ारिश को ठुकरा दिया और ऊँट वापस करने से साफ इन्कार कर दिया। इस पर हारिस को गुस्सा आया वह इस नौजवान को लिये हुये ऊँटों के गल्ले में आये और इस तरह कह तुम अपना खोल लो और अगर तुमसे कोई मुज़ाहमत करेगा तो मैं तलवार से उस का भेजा बाहर निकाल दूँगा। इसके बाद ज़ियाद लबीद से उन्होंने कहा कि हम ख़ुदा के हुक्म से इस के नबी के ताबा दार फ़रमारबरदार थे। जब तक वह ज़िन्दा रहे हम उनकी इताआत करते रहे , अब इनका इन्तेका़ल हो चुका है। अगर उनके अहलेबैत में से कोई इनको जानशीन होगा तो हम उसकी इताअत करेंगे पिसर अबूक़हाफ़ा को हम पर हकूमत करने का कोई हक़ नहीं है और न हम इससे कोई वास्ता व सरोकार रखना चाहते हैं। इसके बाद हारिस ने चन्द शेर पढ़े जिसमें उन्होंने ख़ानवादे रिसालत से अपनी कुरबत औऱ हज़रत अबूबकर से बरायत व बेज़ारी का इज़हार किया।

ज़ियाद उन शेरों को सुन कर इस क़दर खाएफ़ हुये कि वहां से भाग निकले। बनी जुबैद मे आये , उन से बात चीत हुई उन्होंने कहा , महाजरीन व अन्सार ने मिल कर हक़दारों से उनका हक छीन लिया। बख़ुदा रसूल अल्लाह इस वक़्त तक दुनिया से नहीं गए जब तक उन्होंने अपने जानशीन का ऐलान नहीं कर दिया। ऐ ज़ियाद तुम यहां से भाग जाओ क़ब्ल इस के हम तुम्हारी गरदन मारदे। ग़रज़ के जिस जिस क़बीले में ज़्यादा गये सभी ने यही जवाब दिया। आख़िर कार भाग कर दरबारे ख़िलाफ़त में पहुँचे और अबुबकर से मिलकर सारी दास्तान उन्हें सुनवाई। हज़रत अबूबकर ने चार हज़ार लश्कर ज़ियाद बिन लबीद को दे कर उन्हें फिर हज़र मौत की तरफ रवाना कर दिया। काफी दिनों तक जंग होती रही मगर जब कामयाबी की सूरत नज़र न आयी तो अबूबकर ने अकरमा बिन अबूजहल औऱ मुहाजिर बिन उमय्या को कुछ फौज़ दे कर ज़्याद की मदद के लिये रवाना किया। इन लोगों ने मिलकर अहले हज़र मौत को शिकस्त दी। हज़र मौत के साथ सौ अफ़राद क़त्ल हुये। इशात बिन क़ैस कुन्दी जो वहां का रास व रईस था , मुक़ामे महजरुल ज़बरक़ान से शिकस्त खा कर भागा और एक क़िला में महसूर हो गया। आख़िरकार किला भी फतेह हुआ और वह वहां से गिरफ़्तार हो कर दीगर क़ैदियों के साथ हज़रत अबुबकर के रु-बरी पेश हुआ। उसने माज़रत के साथ इस्लाम की तजदीद कर ली। हालांकि हज़रत उमर का इसरार था कि उसे क़त्ल कर दिया जाये मगर हज़रत अबूबकर न सिर्फ़ इसकी जान बख़्शी की बल्कि उन्होंने अपनी बहिन उम्मे फ़रवा को भी उसके हवाले कर के दोबारा बनी कन्दा का सरदार बना दिया , अशअस और उम्मे फ़रवा से एक बेटी जादा और तीन बेटे मुहम्मद , इसहाक़ और इस्माईल पैदा हुए। जादा बिन्ते असाअस बाद में इमाम हसन अ 0 के अक़्द मे आई और उसने माविया से सोज़ बाज़ करके आपको ज़हर दे दिया। मोहम्मद बिन अशअस मारकए करबला में उमरे साद के साथ था जो बाद में जनाब मुख़्तार की तलवार से क़त्ल हुआ।

अहले तहामा की बग़ावत

तहामा हिजाज़ का वह हिस्सा है जो मक्का औऱ तायफ़ को अपने दामन में समेटता हुआ समन्दर के किनारे नज्द तक फैला हुआ है। चुनानचे मक्का और तायफ़ के अलावा तहामा के दिगर शहरों के लोगों ने अबूबकर की नई हुकूमत को तस्ली म नहीं किया और सरकशी व सर ताबी पर उतर आये। इसी शोरिश को दबाने और शोरिश फ़रो करने के लिये हज़रत अबूबकर ने बनी क़ज़ाआ पर उमर आस को , तायफ़ के नवाह में माअन बिन हाजज़ा को और तहामा के जुनूबी हिस्सा में स्वीद बिन मक़रान को फ़ौजें दे कर रवाना किया। अहले तायाफ़ ने भी इनकी मदद की। चुनाचे चन्द झड़पो के बाद बगावत फ़रो हो गयी और अमन व अमान क़ायम हो गया।

जम-ऐ-कुरान

कुरान की जो आयते नाज़िल होती थी रसूल अकरम उन्हें लिखवा लिया करते थे और जो मुसलमान लिखना पढ़ना नहीं जानते थे वह भी अपने तौर पर लिख लिया करते थे। इस के अलावा आपन हज़रत ना़ज़िल शुदा आयतें लोगों को हिफ़्ज़ भी करा दिया करते थे। अक़रम मख़जूमी के मकान पर आप ने एक तिलाबवत ख़ाना भी खोल रखा था जहा मुसलमान जमा हो कर तिलावत किया करते थे। कभी कभी आप खुद भी कुरान पढ़कर सुनाते थे और लोगों से सुनते भी थे। जब आप मक्के से हिजरत कर के वारिदे मदीना हुये तो अहले सफ़ा की एक ज़मात को 80 आदमियों पर मुश्तमिल थी , आप ने कुरआन याद करने और लोगों को याद कराने पर मामूर फ़रमाया।

अबदुल्ला बिन मसूद को आनहज़रत ख़ुद कुरान हुफ़्ज करते थे क्योंकि उनकी क़िराअत और खुश अलहानी आप को पसन्द थी। हज़रत अली को उन तमाम लोगों पर फ़ौकि़यत और अप़ज़लियत हासिल थी जिन्हें कुरआन हिफ़्ज़ था और इब्तेदा ही से वह तनज़ील के मुताबिक उसे तहरीर करते जाते थे। इसी तरह माज़बीन जबील , अबुलदरदा , अबू अयूब अन्सारी , बतौर खुद अपने अपने पास कुरआन लिख कर रखा था। गरज पूरा कुरान आनहज़रात की हयात में ही मुतफ़र्रिक तौर पर मुतआददिद सहाबा के पास लिखा हुआ मौजूद था और सैक़ड़ो लोगों की ज़बानी भी याद था। अल्लामा सियोती ने तारीख़े खुलफ़ा में लिखा है कि हज़रत अली ने तनज़ील के मुताबिक़ पूरा कुरआन तहरीरी शक्ल मे जमा करके रसूल की ख़िदमत मे पेश किया। न जाने उम्मत ने उसे क्यों नहीं कुबूल किया और खुलफ़ा दूसरी तरतीब के दरपै हुये।

उन रिवायतों से पता चलता है कि कूरआन की तमाम आयतें आनहज़रत की ज़िन्दगी में ही ज़ाब्तए तहरीर में आ चुकी थी मगर हज़रत अली के आलावा किताबों की शक्ल में किसी के पास मुकम्मल कुरआन नहीं था। मुमकिन है इसका सबब यह रहा हो कि उस ज़माने में फन किताबत हक़र समझा जाता था इसलिये लोगों को इस से रग़बत भी न थी , दूसरे ये कि जो लोग पढ़े लिखे होतो थे और इस काम को तकमील तक पहुँचाने की सलाहियत व अहलियत रखते थे उन्हें सामाने किताबत मयस्सर नहीं था। चुनानचे जिन लोगों नें कुर्आन लिख कर रखा ता उनके कुर्आन की कैफ़ियत वह थी कि किसी ने खजूर के पत्तों पर लिख रखा था , किसी ने लक़ड़ी की तख्तियों पर , किसी ने पत्थरों पर , किसी ने बारीक चमड़े और किसी ने ऊँट की हड्डियाँ और पस्लियाँ पर। ग़र्ज़ कि कुर्आन ऐसी हालत में न था कि उसके बक़ा और दवाम की उम्मीद की जा सकती।

रसूल उल्लाह स 0 की रेहलत के एकसाल कुछ माह बाद जंगे यमामा शुरु हुई जिसमें सत्तर हाफिज़े कुर्अान क़त्ल कर दिये गये। इस सानिहे के बाद हज़रत अबुबकर से उमर ने फ़रमाया कि अगर तन्हा हुफ़्फाज़ पर कुर्आन के तहफ़्फुज़ का इनहेसार किया गया और जंगे यमामा की तरह दीगर जंगों में भी हाफ़िज़ क़त्ल होते रहे तो कुर्आन की बक़ा का मसला पेचीदा हो जायेगा और उसमें कमी वाक़ेय हो जाने का एहतेमाल रहेगा , इसिलये कुर्आन लिखवा कर जमा करा देना चाहिये। तमाम साहाबा ने उमर की इस तजवीज़ से इत्तेफाक़ किया। चुनानचे अबुबकर ने ज़ैद बिन साबित को इस काम की तकमील का ज़िम्मेदार क़रार दिया और कुछ लोगों को उनका मददगार बनाया। गर्ज़ कि उन्होंने चमड़ों , तख़्तियों , हड्डियों और खजूर के पततों पर लिखे हुए मुन्तशिर व मुताफ़र्रिक़ कुर्आन के पहले यकजां किया। फिर लोगों के दिलों और सीनों से अख़ज़ किया और बड़ी तहक़ीक़ व जुस्तजू के बाद इन्तेहाई सेहत व एहतियात के साथ एक मरकज़ पर जमा कर दिया। यह कुर्आन ख़त कूफ़ी में क़िरतास पर लिखा गया जिसका नुसख़ा किताब की सूरत में अबुबकर के पास रहा। उनके इन्तेक़ाल के बाद उमर के इन्तेक़ाल के बाद उनकी बेटी हज़रत हफ़सा के हाथ आया।

चूंकि अहदे ख़ोलफ़ये सलासा में मुसलसल फ़तुहात ने इस्लाम को दूर दराज़ मुमालिक और इलाकों में पहुंचा दिया था इस िलये ज़बान के अन्दाज़ा होना एक लाज़मी अमर था जिसे जंगी मुहिम्मत के दौरान उस्मान के दौर में उनके आलिमों और सरदानों ने महसूस किया और हुज़ीफ़ा यमानी ने हज़रत उस्मान को यह मशविरा दिया कि हफ़सा के पास कुर्आन का जो नुसख़ा है उसे नक़ल करा के तमाम मुमालिक में उसे मुशतहिर कर दिया जाये। उस्मान ने इस काम के लिये एक चार रुकनी कमेटी तशकील दी और उसमें ज़ैद बिन साबित , अब्दुल्लाह बिन ज़बीर , सईद बिन इलियास और अब्दुल्लाह बिन हारिस को नामज़द करके ज़ैद बिन साबित को इसका इनचार्ज बनाया और उन्हें हु्क्म दिया कि कुर्आन का ऐसा मेयारी नुसख़ा मुर्त्तब किया जाये जिसकी बुनियाद कुरैश की क़सात पर हो।

इस कमेटी ने हफ़सा के पास जो नुसखा महफूज़ था उसे नीज़ दीगर हुफ़्फ़ाज़ की दी हुई आयतों से दोबारा तक़ाबुल और छान बीन करके तहक़ीक़ व तजस्सुस के बाद सात नुसख़े तैयार किये और उन्हें इराक़ व शाम , मिस्र और दीगर बलादे इस्लामिया में भिजवा दिये। यह तो तारीख़ की बातें हैं। अब इस मौक़े पर जमा कुर्आन कमेटी के बा-सलाहियत मिम्बरान के हालात और सिन व साल का जाएज़ा भी ज़रुरी है।

(1) ज़ैद बिन साबितः- ज़ैद में कुर्आन जमा करने की अहलियत व सलाहियत क़तई नहीं थी। वह इस काम को पहाड़ के सरकाने से भी ज़्यादा मुश्किल समझते थे। सन् 9 हिजरी में उनकी उम्र ग्यारह साल की थी , जमा कुर्आन का काम सन् 11 हिजरी में जंगे समामा के बाद शुरु हुआ , बिन मुस्लिम आमिश ने रवायत की है कि जब हज़रत ज़ैद बिन साबित को कुर्आन की तदवीन का हुक्म दिया तो अब्दुल्लाह बिन मसऊद ने मुसलमानों के रुबरु एक ख़ुतबा दिया जिसमें उन्होंने कहा कि उसमान मुझे हुक्म देते हैं कि मैं कुर्आन को ज़ैद बिन साबित की क़रात के मुताबिक पढ़ूं। ख़ुदा की क़सम जब मैंने रसूल ख़ुदा स 0 से सत्तर सूरतें अखज़ की तो उस वक्त ज़ैद बच्चों के साथ खेला करता था।

1 एक दिन उमर बिन ख़त्ताब ज़ैद बिन साबित के पास आये। ज़ैद उस वक़्त अपन कनीज़ के सर में कंघी करा रहे थे , उमर को देखा तो सर खींच लिया और कहा , आपने क्यों ज़हमत की , मुझे बुलवा लेते और मैं खुद हाज़िर हो जाता। इस पर उमर ने कहा , यह वही नहीं है कि तुम इसमें कमी या ज़्यादती करो , यह एक राये व मशविरे की बात है , अगर मवाफ़िक़त करो तो बेहतर है वरना कुछ नहीं। ज़ैद ने इन्कार किया तो उमर ख़फ़ा होकर चले गये।

आख़ेरुल ज़िक्र रवायत से पता चलता है कि ज़ैद बिन साबित “ वही ” के मामले में कमी और ज़्यादती करते थे और तारीख़ी अबुल फ़िदा से इस अमर की निशान देही भी होती है कि उमर कुर्आन की कुछ आयतों में तरमीम व तनसीख़ चाहते थे जिसे ज़ैद ने नामंज़ूर कर दिया।

2 अब्दुल्लाह बिन ज़बीर- यह अबुबकर के नवासे थे। सन् 2 हिजरी में पैदा हुए , जमा कुर्आन के वक़्त उसमान के दौर में इनकी उम्र 23 साल की थी।

3 साद बिन आस- यह बनी उमय्या से थेश सन् 9 हिजरी में पैदा हुए , उस वक़्त उनकी उम्र 22 साल की थी। अब्दुल्लाह बिन मसूद के क़ौल नीज़ दीगर रवायतों से साबित है कि जमा कुर्आन कमेटी के अऱाकीन ज़ैद बिन साबित , अब्दुल्लाह बिन ज़बीर और सईद बिन आस की उम्र उस वक्त 22 साल और 24 साल के दरमियान थीं। अब्दुल्लाह बिन मसूद जिन्होंने रसूले अकरम स 0 से बराहे रास्त सत्तर सूरतें अख़िज़ की थीं , उनकी मौजूदगी में नौखे़ज़ , नो उम्र और न अहल लौंडों को कुर्आन जमा करने का अहम और मोहतात काम सुपुर्द करना इन्तेहाई हैरत अंगेज़ व ताज्जुब से ख़ेज़ बात है।

हज़रत अली अलै 0 ऐसी मुफ़स्सिर और मुदब्बिर शख़्सियत भी मौजूद थीं। तदवीन का काम उन्हें क्यों नहीं सुपुर्द किया गया या जमा कुर्आन कमेंटी का ज़िम्मेदार उन्हें क्यों नहीं क़रार दिया गया था उनका जमा करदा कुर्आन क्यों नहीं तलब किया गया ? इन तमाम बातों की तह में आले रसूल स 0 बिलख़ुसूस हज़रत अली अलै 0 से बुगज़ व अनाद का जज़बा कार फ़रमा नज़र आते हैं। अगर आप का जमा करदा कुर्आन कुबूल करके नाफ़िज कर दिया जाता तो इस्लाम की तबाही व बर्बादी का मनसूबा इब्तेदा ही में दम तोड़ देता। अस्ल मक़सद तो इस्लाम में तफ़रीक़ व इन्तिशार पैदा करना था और पैग़म्बर इस्लाम स 0 अपनी ज़िन्दगी ही में फरमां चुके थे मेरे बाद इस्लाम में तिहत्तर फि़र्क़े हो जायेंगे। आपकी रेहलत के बाद अहलेबैत अलै 0 पर हुकूमते वक़्त की मुक़तदिर हस्तियों ने जो इन्सानियत सोज़ मज़ालिम तोड़े उनसे तारीख़ के औराक़ पुर हैं।

अगर हज़रत अली अलै 0 का कुर्आन कुबूल कर लिया जाता तो मज़ीद किसी तफ़सीर की ज़रुरत लाहक़ न होती और न मदनी आयतें मक्की आयतों में न मक्की आयतें मदनी आयतों में ख़िल्त मिल्त होती। इसके अलावा नासिख़ व मनसूख़ आयतों की तमीज़ में भी दुश्वारी नहीं होती। कमसिन और न अहल लोगों के ज़िम्मे यह अहम काम सुपुर्द करने का नतीजा यह हुआ कि बलहिज़े तरतीबे नज़ूल आयतों को मुत्तर्ब न किया जा सका।

हज़रत अली अलै 0 ने रसूल उल्लाह स 0 की ज़बाने मुबारक हर आयत की तफ़सीर जिस तरह सुनी थी उसी तरह आपने अपने कुर्आन के हाशियें पर मरकूम कर दी थी। इसको तर्क कर देने से हर कस व ना कस को यह मौक़ा मिला कि वह अपने क़यास पर तफ़सीर करे। यही वजह है कि एक मुफ़स्सिर की तफ़सीर दूसरे मुफ़स्सिर से नहीं मिलती। इसकाम का अंजाम यह हुआ कि अक़ीदे बदले और तिहत्तर फ़िर्के आलमें वजूद में आ गये। क्या इस्लाम में इस अमल की ज़िम्मेदारी उन ख़ोलफ़ा पर आएद नहीं होती जो हज़रत अली अलै 0 से कुर्आन न तलब करने या हज़रत अली अलै 0 के कुर्आन को मुस्तरद करने के ज़िम्मेदार हैं।

हज़रत अबुबकर औऱ उस्मान के इस कारेख़ैर का सबसे बड़ा तारीक़ पहलू यह है कि हज़रत हफ़सा के कुर्आन के अलावा चारों तरफ से तमाम कुर्आनी नुसखे इकट्ठा करा के उनमें आग लगवा दी गयी और वह जलकर ख़ाक सियाह हो गये। अब्दुल्लाह बिन मसूल ने अपना कुर्आन जब हज़रत उस्मान के हवाले से इन्कार किया तो उन्हें बुरी तरह मारा पीटा गया और उनसे ज़बरदस्ती वह नुस्खा छीन कर नज़रे आतिश कर दिया गया।

फ़तूहाते इराक़

पहली सदी हिज़री में इराक़ का जुग़राफियाई पस मंज़र यह था कि अरब की शुमाली औऱ मशरिकी सरहदों से ईरान की सलतनत शुरु होती थी जिसका दारुल सलतनत मदायन था जो बग़दाद से क़रीब दरियाये दजला पर वाक़े था। दरियाये फुरात के दाहिने किनारे पर शहर हीरात आबाद था यह शहर अरब के मशहूर ख़ानदान मंज़र का पायए तख़्त था। जो छः बरस से ईरान पर हु्क्मरानी कर रहा था और कुछ अर्से से शहाने ईरान का बाजगज़ार हो गया था और ममलेकते ईरान का एक जुज़ समझा जाता था। बाबुल औऱ कलीदिया के क़दीम इलाक़े भी इसमें शामिल थे। चनानचे उस वक़्त इराक़ के मशरिक़ में ख़जिस्तान , इसरा और कलीदिया का कोहिस्तान , शुमाल में मेसोपोटामियां (अल जरीरा) का हिस्सा , मग़रिब और जुनूब में शाम और एक हिस्सा अरब का था और यही इराक़ का हुदूदे अरबा कहलाता था दजला और फुरात के दरमियान जो दोआबा था उसका निचला हिस्सा “ इराक अरब ” और ऊपरी हिस्सा “ अलजज़ाएर ” या “ जज़ीरतुल अरब ” के नाम से मौसूम था। मुसलमानों के हमले के वक़्त ईरान की हुकूमत में “ इराक़ अरब ” मेसोपोटामिया , फ़ारस , क़िरमान , माज़िन्दरान , ख़रासान और बलख़ शामिल थे जिसकी वजह से ईरान की सरहद तातार और हिन्दुस्तान से मिलती थी मगर इन इलाक़ों में ख़ाना जंगी की वजह से कमज़ोरी , शिकस्तगी और पज़ मुर्दगी के आसार पैदा हो गये थे। इराक़ का हाकिम मंज़र बिन नोमान मर चुका था और उसकी जगह अयाज़ बिन क़बसिया ताई हाकिम था। इस कमज़ोरी को देख कर “ इराक़ अरब ” में क़बीला वाएल के दो सरदारों मुसन्ना बिन हारिस और सुवैद अजली ने थोड़ा बहुत लश्कर इकट्ठा करके “ हीरा ” और “ अबला ” पर हमला करके वहां अपनी हुकूमत क़ायम करने की कोशिश की मगर चन्द ही दिनों में उन्हें यक़ीन हो गया कि किसी बैरूनी के बग़ैर कामयाबी मुम्किन नहीं है चुनानचे चारों तरफ़ नज़र के घोड़े दौड़ाये मगर उन दिलेर हाथों के सिवा जिन्होंने बहुत ही कम अर्से में तमाम अरब पर अपना तसल्लुत जमा लिया था , कोई पुश्त पनाह नज़र न आया इस लिये मसना बिन हारिस हज़रत अबुबकर के पास आकर मुसलमान हुआ और उनसे फ़ौजी इमदाद लेकर अपने इलाक़े की तरफ़ चल ख़डा हुआ। मगर तमाम तर कोशिशों के बावजूद वह कूफ़े से आगे न बढ़ सका तो हज़रत अबूबकर ने ख़ालिद बिन वलीद के लिये “ इराक़ अरब ” का मैदान तजवीज़ किया। चुनानचे महर्रम सन् 12 हिजरी (सन् 633) में उन्होंने एक तरफ़ तो ख़ालिद बिन वलीद को इराक़ जाने का हुक्म दिया और दूसरी तरफ़ अयाज़ बिनग़नम को दूमतुलजन्दल के रास्ते रवाना किया और उसे यह हिदायत की कि वह इसी रास्ते से जाकर ख़ालिद बिन वलीद से मिल जाये।


हीरा पर हमला

ख़ालिद बिन वलीद मंजिले तय करते हुए नवाज के मुक़ाम पर मुसना से मिले और “ सवाद ” के हाकिम इब्ने सलूबा को मुतबा करते हुए हीरा पहुंचे और दस हज़ार आदमियों से शहर का मुहासिरा कर लिया। हीरा में दो शाही महल “ क़सरे ख़ूरनिक़ ” और “ क़सरे अबीज़ ” जो इनतेहाई शानदार थे , उनको ताराज व मिस्मार किया। हाकिम हीरा “ अयास ” ने मग़लूब हो कर सुलह कर ली और जज़िया देना कुबूल किया। हाकिमे हीरा पर दस हज़ार और अहले हीरा पर 60 हज़ार दिरहम जज़िया मुक़र्रर हुआ। यह पहल जज़िया है जो मुसलमानों की तरफ से ग़ैर मुल्क पर आएद हुआ।

फ़तहे उबल्ला

हीरा का मार्का सर करने के बाद ख़ालिद ने 18 हज़ार की फ़ौज लेकर उबल्ला पर चढ़ाई की जिसमें मुसना की आठ हज़ार फ़ौज भी शामिल थी। उबल्ला के ईरानी गवर्नर हरमिज़ ने शहंशाई ईरान को इस हमला की इत्तेला देते हुए फ़ौरी तौर पर कुमक बहम पहुंचाये जाने का मुतालिबा किया और ख़ुद उसने ईला के क़रीब ख़ालिद से मुक़ाबिला किया और मारा गया इसका ताज जो एक लाख की मालियत का था और हाथी ख़लीफ़ के पास मदीने भेज दिया गया। बाक़ी माल फ़ौज़ में तक़सीम कर दिया गया।

जंगे मज़ार

“ उबल्ला ” की जंग में काम आने से पहले “ हरमीज़ ” ने शहंशाहे ईरान से मदद तलब की थी जिस पर शाह ईरान ने हवाज़ के गवर्नर क़ारन को पचास ह़ार की जमीयत दे कर रवाना किया था। चुनानचे इस फ़ौज ने नहर मुसना के किनारे मज़ार के मुक़ाम पर पड़ाद डाल रखा था। जब ख़ालिद का लश्कर वहां पहुंचा तो घमासान की जंग हुई। क़ारन के साथ तीस हज़ार ईरानी मारे गये , बहुत से असीर हुए। उन्हीं असीरों में हसन बसरी का बाप हबीब भी था जो नसरानी था। जो माले ग़नीमत हाथ आया उमें से ख़ुम्स का हिस्सा दरबारे ख़िलाफ़त में भेजा गया और बक़िया लश्करियों में तक़सीम हो गया।

जंगे वलजा

मज़ार में क़ारन की शिकस्त के बाद शाहे ईरान ने एक और नेबर्द आज़मां सूरमां को जो अपनी बहादुरी की वजह से “ हज़ार मर्द ” के नाम से मशहूर था , पचास हज़ार की सिपाह के साथ ख़ालिद के मुक़ाबिले को भेजा। माहे सफ़र सन् 12 हिजरी में कसकर और हीरा के दरमियान “ वजला ’ के मुक़ाम पर मुडभेड हुई और बीस दिन तक मारका आराई जारी रहा। आख़िरकार “ हज़ार मर्द ” मारा गया और मुसलमानों को फ़तेह हासिल हुई। इस जंग में मज़ार से भी ज़्यादा ईरानी मारे गये। इस फ़तहयाबी के बाद इराक़ अरब का बड़ा हिस्सा मुसलमानों के ज़ेरे तसल्लुत आ चुका था इसिलये ख़ालिद ने जाबजा अपने आमिल मुक़र्रर कर दिये।

जंगे उल्लीस

जंगे वलजा के बाद ख़ालिद अपनी फौज़ लेकर उल्लीस की तरफ़ बढ़ा। शाह ईरान ने बहमन जादू को जो उस वक़्त मक़शिनासा में था , मुक़ाबिले के लिये लिखा। उसने जाबान नामी अपने एक सरदार को रवाना कर दिया और कहा कि मैं भी बादशाह से मशविरा करके आता हूँ। जाबान एक लश्कर कसीर ले कर उल्लीस पहुंच गया। इधर शाहे ईरान की अलालत की वजह से बहमन को तवक्कुफ़ करना पड़ा और इधर जाबान और ख़ालिद में मुडभेड़ हो गयी। दोनो तरफ़ से ऐसी तलवारें चलीं कि खू़ की नदियां बहने लगी। आखिर कार मैदान मुसलमानों ही के हाथ रहा। यह लड़ाई हज़ार बतायी है। इसके बाद ख़ालिद ने इमगेशिया को तबाह व बर्बाद किया। माले ग़नीमत जब दरबारे ख़िलाफत में पहुंचा तो अबुबकर ने फ़रमाया कि “ औरतें ख़ालिद जैसा पैदा करने से क़ासिर हैं ” ।

जंगे अनबार

जंगे उल्लीस के बाद ख़ालिद बिनवलीद ने शाहे ईरान को पैग़ाम भेजा की मुल्क तुम्हारे हाथ से निकल चुका है। अब इस्लाम कुबूल करो या जज़िया दो। अगर उन दोनों बातों में से कोई बात कुबूल नहीं है तो मैदान में निकल आओ। इस पैग़ाम से ईरानी सख़्त परेशान हुए। आज़ादविया ने जो उस वक़्त ईरानी दरबार में मौजूद था , ईरान के अफ़सरों को मुख़ातिब करते हुए कहा कि तुम लोग बाहमी अख़तेलाफ में पड़े हो , इसलिये मुसलमानों के हौसले बड़ गये हौ और फ़ातेह की हैसियत से आगे बढ़ते चले आ रहे हैं अगर तुम सब लोग मुतफ़्फिक. हो जाओ और मुत्तहिद हो कर लड़ो तो उन नंगे भूके अरबों को मार भगाना कोई बड़ी बात नहीं है। आज़दविया की इस मुख़तसर सी गुफ़्तगू ने बड़ा काम किया। ख़ालिद के पैग़ाम बर कोजंग की वारनिंग के साथ वापस कर दिया गया और बहमन जादू को एक कसीर लश्कर के साथ मुक़ाबिला पर मुक़र्रर किया गया। बहमन ने शीरज़ाद को हज़ार फ़ौज के साथ अनबार के मज़बूत व मुसतहकम क़िले की हिफ़ाज़त पर मुक़र्रर किया और मेहमान नामी एक मशहूर सिपेह सलारा को एक दूसरे क़िले ऐनुल तमर पर मामूर किया और उसके साथ ख़ुद भी वहीं मुक़ीम हो गया।

ख़ालिद ने अपने सफ़ीर से जंग का जवाब सुनकर अनबार पर चढ़ाई कर दी और चारों तरफ़ से शहर को घेर लिया शीरज़ाद ने अपनी इस आहनी फौज़ को आगे किया जो सर से पांव तक लोहे में ग़र्क थी फ़क़्त आंख दिखाई पड़ती थी। मारका कार ज़ार गर्म हुआ तो ख़ालिद ने अपनी फ़ौज को हुक्म दिया कि तीर अन्दाज़ी करो और उनकी आंखे फोड़ दो। हज़ारों तीर चिल्लये कमान से एक साथ रेहा होने लगे और हज़ार हा ईरानी आंखों से महरुम हो गये। शीरज़ाद ने घबराकर सुलह का पैग़ाम दिया। ख़ालिद ने इस शर्त पर सुलह कर ली कि सारा माल व मता छोड़कर शहर से निकल जाओ। चुनानचे वह शहर से निकल गये। इस जंग को ज़ातुल उयून भी कहा जाता है। इसके बाद गिर्दों नवाह के लोगों ने भी ख़ालिद से सुलह कर ली। इसके बाद ख़ालिद ने क़िला ऐनुल तमर पर चढ़ाई कर दी जहां ईरानियों ने इस इलाक़े के अरब क़बीलों बनी सालिब वग़ैरा को भी मिला लिया जिन का सरदार अक़्क़ा था। पहले वही ख़ालिद के मुक़ाबिले में आया लेकिन उसे पकड़ कर क़त्ल कर दिया गया। उसके लश्कर को शिकस्त हुई और बुहत से लोग गिरफ़्तार कर लिये गये। यह सूरते हाल देख महरान और बहमन अपनी अपनी जाने बचा कर भाग निकले और जो क़िला के अन्दर रह गये थे वह सबके सब मारे गये। तमाम माल व असबाब लूट लिया गया। क़िले में चालीस लड़के भी पाये गये जो इन्जील की तालीम हासिल करते थे जो लोगों में तक़सीम कर दिये गये। उन्हीं में इब्ने सीरीन का बाप मुहम्मद , मूसा फ़ातेह इन्दलिस का बाप नसीर और हज़रत उस्मान का गुलाम हमरान भी था। इसी मुक़ाम पर बशीर बिन सईद अन्सारी का इन्तेक़ाल हुआ।

जंगे दुमतुल जंदल

ख़ालिद बिन वलीद जब ऐनुल तरम की जंग से फ़ारिग़ हुए तो अयाज़ बिन ग़नम ने जो दूमतुलजंदल के अरब नसरानियों से लड़ने के लिये भेजा गया था ख़ालिद को लिखा कि वह इसकीमदद करें क्योंकि कई माह से वह दूमतुलजंदल का मुहासिरा किये हुए पड़ा था और फ़तह की कोई सूरत नज़र नहीं आती थी। चुनानचे ख़ालिद ने ऐनुल तमर में अपना आमिल छोड़ कर दुमतुलजंदल की तरफ़ रुख़ किया। अकीदर बिन अब्दुल मलिक और जूदी बिन रबीया नसरानियों के सरदार थे। अकीदर ख़ालिद के आने की ख़बर सुन कर भाग खड़े हुआ मगर रास्ते में पकड़ा गया और क़त्ल कर दिया गया। एक तरफ़ से ख़ालिद ने दूमतुलजंदल पर हमला किया और दूसरी तरफ से अयाज़ बिन ग़नम अपने लश्कर को लेकर आगे बढ़ा। दोनों तरफ़ से अरबों ने शिकस्त ख़ाकर किले में पनाह ली और इसका दरवाज़ा बन्द कर लिया। जो लोग क़िले के बाहर मिले वह क़त्ल कर दिये गये और उनका सरदार जूदी भी मारा गया। असीराने बनी कलब के अलावा जो बनी तमीम की सिफ़ारिश पर छोड़ दिये गये थे , बाकी तमाम क़ैदी क़त्ल हुए उसके बाद क़िला भी फ़तेह कर लिया गया। बहुत से क़त्ल हुए और बहुत से असीर हुए।

असीरों को फ़रोख्त कर दिया गया। जूदी की दुख़्तर को ख़ालिद ने ख़रीद लिया और कुछ दिनों तक उसके साथ दुमतुलजंदल ही में मुक़ीम रहे।

जंगे फ़राज

ख़ालिद ने माहे रमज़ान में फ़राज़ पर चढ़ाई की जहां शाम व इराक़ की सरहदें मिलती हैं। रोमिये , ईरानियों और अरब के मुख़तलिफ क़बीलों ने मिल कर ख़ालिद का मुक़ाबिला किया। घमासान की जंग हुई , रुमी भाग खड़े हुए। ख़ालिद ने अपने लश्कर को हिदायत की कि वह तलवारें न रोकें। चुनानचे मारका और ताअक़्कुब में ग़नीम के एक लाख आदमीं मारे गये।

इसके बाद ख़ालिद ईरान के पायए तख़्त मदीन पर चढ़ाई के बारे में सोच ही रहे थे कि दरबारे ख़िलाफत से उन्हें शाम की तरफ़ कूच करने का मुहर्रम सन् 12 हिजरी में इराक की मुहिम पर मामुर हुए थे और सन् 13 हिजरी की इब्तेदा में शाम की तरफ़ भेज दिये गये।

फ़तूहाते शाम

शाम उन तमाम मुमालिक का मजमूआ था जो फुरात और बहरे रोम के दरमियान वाक़े थे। फ़नाक़िया और फ़िलस्तीन इस मुल्क की दो छोटी छोटी रियासतें थीं जो कुसतुनतुनिया से इल्हाक़ की बिना पर बादशाह हरकुल के ज़ेरे हुकूमत हो गयी थीं। इल्मे जुग़राफि़या के माहेरीन का कहना है कि फ़िलिस्तीन का इलाकाइस खित्ते के जुनूब में वाक़े है जो कोहे क़रमल से तबरिया झील के हिस्से तक और उरदून से बहरे रोम तक फैला हुआ है जिसमें रोमियों के ज़ेरे तसल्लुत क़ीसारिया , अरीहा (जरीको) येरुशलम , असक़लान , जाफ़ा और ज़ग़ारिया ऐसे मज़बूत और महफूज़ इलाकें भी शामिल थे। पटपालूस का शहर और वह ख़ित्ता जो बहरे लूत से ख़लीज अक़बा तक फैला हुआ था फ़िलिस्तीन ही में था। इस ख़ित्ते के शुमाल में उरदुन का सूबा था जिसमें एकर (अक्का) और टायर (सूर) जैसे महफूज़ मुक़ामात थे। फ़िलिस्तीन के शुमाली जानिब वह ज़रखे़ज और सरसब्ज़ व शादाब ख़ित्ता था जिसको इहले रोम सीरिया और अहले अरब शाम कहते हैं। इसमें हलब , हमस और अनताकिया जैसे तारीख़ी शहर शामिल थे। उन तमाम शहरों में रोमियों की फ़ौजी छावनिया थीं जिनमें कसीर तादाद में फ़ौज रहती थी।

रोमियों का वाय सराय (गवरनर जनरल) अनताकिया में रहता था और फ़िलिस्तीन , हमस , तमिश्क और उरदुन के गदरनर इसके मातहत हुआ करते थे। मुसलमान शाम के बाशिन्दों को बनी असगर कहते थे। अबुबकर ने जब ख़ालिद बिन वलीद को इराक़ की मुहिम पर रवाना किया था तो उन्होंने उन्हीं अय्याम में ख़ालिद बिन सईद को भी एक लश्कर का सरदार मुक़र्रर करके शाम की तरफ़ रवाना करना चाहा था लेकिन वह रवाना होने से पहले ही माजूल कर दिये गये। माजूली की वजह यह बताई जाती है कि जब लोगों ने अबुबकर की बैयत की थी तो ख़ालिद बिन सईद से भी उमर ने बैयत करने को कहा था लेकिन दो महीने तक उन्होंने बैयत नहीं की और हज़रत अली अलै 0 के हमनदा रहे। चुनानचे जब अबुबकर ने उन्हें अमीर बनाया और उमर को मालूम हुआ तो उन्होंने इन्तेक़ाम उन्हें इमारात से माजूल करा दिया। इसके बाद अबुबकर ने ख़ालिद बिन सईद को हु्कम दिया कि तुम मदीने छोड़ कर ख़ैबर ओर तबूक के दरमियान वाक़े तीमा नामी एक गांव में क़याम करो और ता हु्कमे सानी वहीं रहो औऱ गिर्दे नवाह के लोगों को जेहाद के लिये आमादा करकों चुनानचे ख़ालिद बिन सईद ने तीमा में अका़मत अक़तेयार की और चन्द ही दिनो में उन्होंने जेहाद के लिये एक बड़ा लश्कर तैयार कर लिया।

जब रोमियों को ख़ालिद बिन सईद की तैयारी का हाल मालूम हुआ तो उन्होंने शाम के सरहदी अरब क़बीलों बनी कलाब , बनी ग़सान , बनीलहम और बनी हेजा़म वग़ैरा को इस इलाक़े में लूट मार करने पर उकसा दिया। ख़ालिद बिन सईद ने जब अबुबकर को इस सूरते हाल मे मुत्तेला किया तो उन्होंने ख़ालिद को आगे बढ़ने का हुक्म दिया। चुनानचे ख़ालिद ने पेश क़दमी की और जब बाग़ियों और लुटेरों के क़रीब पहुंचे तो वह लोग भाग खड़े हुए और ख़ालिद बिन सईद ने उसी मुक़ाम पर अपने ख़ेमे नसब करके छावनी डाल दी। दूसरे दिन अबुबकर का पैग़ाम मौसूल हुआ कि आगे बढ़ते रहो मगर इस बात का ध्यान रखो कि पुश्त से हमला न होने पाये। ख़ालिद बिन सईद आगे बढ़े मगर अभी कुछ ही फ़ासला तय हुआ था कि बतरीक़ माहान नामी सरदार की क़यादत में रोमियों के एक दस्ते से मुडभेड़ हो गयी। इस मुख़तसर सी लड़ाई में बहुत से रोमी मारे गये और बतरीक़ फ़रार हो गया। ख़ालिद ने अबुबकर को इस वाक़िये की इत्तेला दी और मज़ीद कुमक के ख्वास्तगार हुए। चुनानचे अबुबकर ने वलीद बिन अकबा , जुल कलाअ और अक़रमा बिन अबुजहल को मय उनके लश्कर के साथ खालिद की मदद को रवाना कर दिया। इर कुमक के पहुंचते ही ख़ालिद बिन सईद ने जल्द बाज़ी और बद-एहतियाती से काम लेते हुए दमिश्क़ पर हमला कर दिया मगर बतरीक़ माहान जो चन्द रोज़ पहले फ़रार इख़्तियार कर चुका था। लशकरे कसीर के साथ सामने आया और ख़ालिद का रास्ता रोका और मारकए क़ारज़ार गर्म हो गया जिसमे ख़ालिद बिन सईद का बेटा सईद मारा गया औऱ ख़ालिद सख़्त नुक़सान के साथ शिकस्त ख़ाकर ऐसा भागे कि मदीने के करीब वादी जि़ल मराह में आ कर दम लिया। अकरमा शाम के क़रीब ही छः हज़ार का लश्कर लिये पड़े रहे।

शाम पर हमले की तैयारियां

इस शिकस्त के बाद अबुबकर ने अहले शाम से मारका आराई का मुकम्मल तहय्या कर लिया। तारीख़ आसिम कूफ़ी और फ़तूहाते इस्लामिया में है कि जब अबुबकर ने शाम पर लश्कर कशी का फ़ैसला किया तो उन्होंने मस्जिदे नबवी मे एक तक़रीर की और कहा “ तुम लोग इस बात से आगाह हो कि तमाम अरब एक ही मां बाप की औलादें हैं। ” मैंने मुक़म्मिम इरादा कर लिया है कि अरब का लश्कर शाम की तरफ़ फेजूं और रोमियों से जंग करके उन्हें कैफ़रे किरदार तक पहुंचाओ तुममें जो शख़्स फ़तेह पायेगा वह शोहरत व दौलत से हमकिनार होगा और जो मारा जाएगा वह बेहिश्त में अपना झण्डा गाड़ेगा और जेहाद का जो अजर खुदा की तरफ़ से मुक़र्रर है उसका अन्दाज़ा ग़ैर मुम्किन है ” ।

इस मुख़्तसर सी तक़रीर के बाद अबुबकर ने हज़रत अली अलै 0, उमर , उस्मान , तलहा , ज़बार , सईद बिन विक़ास और अबुउबैदा बिन जराअ वग़ैरा को तलब करके एक हंगामी जलसा मशावरत मुनअक़िद किया जिसमें अमाएदीन व अकाबरील जलसे ने अपने अपने ख़्यालात का इज़हार किया लेकिन हज़रत अलै 0 ख़ामोश रहे। जब हज़रत अली अलै 0 से कहा , ऐ अबुल हसन! कुछ आप भी फ़रमायें , इस बारे में आपका क्या ख़्याल है ? आपने फ़रमाया , ऐ अबुबकर! तुम लश्कर रवाना करोगे तब भी फ़तेह होगी और अगर ख़ुद इस मुहिम पर जाओगे और अल्लाह पर भरोसा रखोगे तो भी कामयाबी हासिल होगी क्योंकि मैं रसूल स 0 की ज़बाने मुबारक से यह जुमला बार बार सुन चुका हूँ कि दीने इस्लाम तमाम अदयान पर ग़ालिब रहेगा। इस पर अबुबकर ने कहा ऐ अबुल हसन! आपने मेरी आंखे खोल दी , मुझे तो इस हदीसे पैग़म्बर स 0 के बारे में कोई इल्म ही नहीं था। इसके बाद ख़लीफ़ा उमर की तरफ़ मुतावज्जे हुए और उन लोगों से उन्होंने काह , याद रखो , अली अलै 0 इल्मे पैग़म्बर स 0 के वारिस हैं और जो शख़्स इनके कलाम में शुब्हा करे वह मुनाफ़िक़ है , अब इस अमर में मेरी तरफ़ से कोई कोताही मुम्किन नहीं , मुझे उम्मीद है कि इस मुहिम में तुम लोग मेरा साथ दोगे।

इसके बाद मज़मे मुशावरत बरख़ास्त हुई तो अबुबकर ने मक्के , ताएफ़ और गमन वग़ैरा के आलिमों के नाम भी मकतूब रवाना किये और रोमियों व नसरानियाँ पर फ़ौज़ कशी का इरादा ज़ाहिर किया। चारों तरफ़ से सिमट सिमट कर लोग मदीने में जमा होने औऱ एक जंगी माहौल पैदा हो गया। चुनानचे सन् 13 हिजरी की इब्तेदा में अबुबकर ने इस मुहिम को सर करने के लये एक नया लश्कर तरतीब दिया जो चार हिस्सों पर मुश्तमिल था। अबु अबीदा बिन जराअ एक दसता फौज के साथ हमस पर मुक़र्रर किये गये उनके साथ अहले मदीना और सहाबा की एक बड़ी तादाद थी। उन्होंने अपना हेडक्वार्टर जाबिया को क़रार दिया। उमरु आस को इस दस्ते का सरदार मुक़र्रर किया जो फ़िलिस्तीन की तरफ़ भेजा गया था। उन्होंने अरबा में डेरा जमाया। यज़ीद बिन अबुसुफ़ियान को एक कसीर फ़ौज के साथ दमिश्क पर तैनात किया। उन्होंने बलक़ा में पड़ाव किया। उनकी फौज में ज़्यादा तर मक्के और तहामा के अरब शामिल थे। औऱ शरजील बिन हुस्ना एक बड़े फ़ौजी दस्ते के साथ उरदुन की तरफ़ रवाना किये गये। उन्होंने बुसरा के क़रीब क़याम किया। बलाज़री का कहना है कि इब्तेदा में हर एक जनरल के पास तीन तीन हज़ार सिपाह थी लेकिन मज़ीद इमदाद के बाद साढ़े सात सात हज़ार हो गयी थी। अबुसुफ़ियान के दूसरे साहबज़ादे माविया जिन्होंने आख़िर ख़िलाफ़त ही को ग़सब कर लिया रेज़र्व फौज़ के कमाण्डर मुक़र्रर किये गये। लेकिन इ्ब्ने ख़लदून का कहना है कि माविया को अबुबकर ने उनके भाई यज़ीद का मदद के लिये भेजा था। हाशिम बिन अतबा बिन अबी विक़ास और सईद बिन आमिर भी अफ़वाज के साथ रवाना किये गये। ग़र्ज़ कि जहां जहां से भी लोग जेहाद के इरादे से वारिदे मदीना होते थे वह जत्थों और गिरोहों की शक़्ल में शाम की तरफ़ रवाना कर दिये जाते थे।

अबुबकर का हुक्म था कि अगर चारों लश्कर एक जगह जमा हो जायें तो अबुअबीदा को चारों लश्करों का सरदार समझा जाये। अबुल फिदा का बयान है कि कुल लश्कर में सहाबा की मजमुई तादाद एक हजार थी जिसमें तीन सौ बदरी सहाबा थे और उन तीन सो में सौ सहाबा ऐसे भी थे कि वह अपनी मर्ज़ी के मुताबिक जिस अफ़सर के मातहत चाहे काम करने का इख़्तियार रखते थे।

बाज़ मोअर्रिख़ीन ने लिखा है कि इब्तेदा में कुल अफ़वाज की तादाद सिर्फ़ सात हज़ार थी लेकिन बढ़ते बढ़ते बाद में 35 या 36 हज़ार हो गयी थी। इब्ने असीर ने एक रिवायत में चालिस हज़ार लिखा है। सैय्यद अमीर का कहना है कि इस सलतनत के वसाएल और ताक़त को देखते हुए जिस पर हमला की ग़र्ज़ से यह लोग बढ़े थे चालिस या छियालिस हज़ार की तादाद बहुत कम थी। क़स्तुनतुनिया की रुमी हुकूमत चन्द सूबो के निकल जाने के बावजूद अब भी निहायत ताक़तवर थी। इसके वसाएल और सामाने हरब ग़ैर महदूद थे। इसमे एशियाए कोचक का वसीय जज़ीरा , शाम , फ़नीशिया , मिस्र ओर बहरे वक़ियानूस तक तमाम मुमालिक शामिल थे।

जंगे यरमूक

बादशाह हरकुल को जब इस्लामी अफ़वाज के मुनक़सिम व मुताफ़र्रिक़ होने नीज़ उनकी तादाद का हाल मालूम हुआ तो उस वक़्त वह फ़िलिस्तीन में ता। वहां से उसने मुल्क का हंगामी दौरा किया और दमिश्क़ व हमस से गुज़रता हुआ अनताकिया में आकर क़याम पज़ीर हो गया। उस दौरे का मक़सद लोगों को जंग पर तैयार करना था जिसके नतीजे में एक जमे गफ़ीर उसके गिर्द जमा हो गया। हज़रत अबुबकर की तरह उसने अपने भी तज़ारिक को 60 हज़ार की फौज के साथ अमरु आस की तरफ़ भेजा। जर्जा बिन नोदर को चालीस हज़ार का लश्कर दे कर यज़ीद बिन अबुसुफियान की तरफ़ रवाना किया। कीतार बिन नसतूरिस को साठ हज़ार के साथ अबुउबैदा के मुक़ाबिले में भैजा और दराक़िस को पचास हज़ार के साथ शरजील की तरफ़ रवाना किया।

मुसलमान सरदारों को जब रुम फ़ौजों की नक़ल व हरकत और उनकी तादाद का हाल मालूम हुआ तो उन्होंने एक दूसरे के पास क़ासिद दौड़ाकर आपस में यह तय किया कि सारी फ़ौजों को एक मरकज़ पर जमा कर लिया जाये चुनानचे चारों दस्ते माहे अप्रेल सन् 634 में दरियाये यरमूक के नज़दीक जोलान के मुक़ाम पर इकट्ठा हो गये।

यरमूक एक छोटा सा दरिया है जो हूरान से गुज़र कर तबरिया झील से चन्द मील के फ़ासले पर दरियाये जारड़न (उरदुन) से मिल जाता है। मुक़ाम इत्तेसाल से तक़रीबन तीस मील ऊपर की तरफ़ शुमाल जानिब इसका मोड़ निस्फ़ दाएरे की शक़्ल में वाक़े है और इस निस्फ़ दाएरे में एक ऐसा मैदान घिरा हुआ है जो एक बड़ी फौज के क़याम के लिये निहायत महफूज़ व मौजूं है। इस निस्फ़ दायरे की पुश्त पर एक ग़ार भी है जिसके अन्दर से मैदान का रास्ता है। इस जगह को वाक़सा कहते हैं। रोमियों ने उसे हर तरफ़ से घिरा हुआ देख कर दरिया के इस पार लश्कर उतारने के लिये महफूज़ मुक़ाम ख़्याल किया और उनकी फ़ौज मुसलमानों की तरफ़ से किसी कि़स्म का ख़्याल किये बग़ैर उसके अन्दर घुस गयी। मुसलमानों ने अपने दुश्मन की इस ग़लती को ताड़ लिया और उन्होंने दरिया के शुमाली रुख़ की तरफ़ से उसे अबूर करके ग़ार के पहलू में अपने क़दम जमा दिये और इस ताक में लगे रहे कि रोमियों के निकलते ही उन पर हमला आवर हो जायें। चुनांचे सफ़र से रबीउल आख़िर तक तीन महीने दोनों फ़ौज़ें एक दूसरे के इन्तेज़ार में डटी रहीं। यहां तक कि रबीउल आख़िर या जमादुल ऊला की इब्तेदा में ख़ालिद बिन वलीद भी लूट मार करते हुए अपनी 6 हज़ार फ़ौज के साथ वहां पहुँच गये। उस वक़्त वाक़िसा में रुमी अफ़वाज़ की तादाद दो लाख चालीस हज़ार थी और हरकुल का भाई तज़ारिक़ इस फ़ौज का सिपेह सलारे आज़म ता।

आखिरकार 30 जमादुस सानिया सन् 93 हिजरी मुताबिक़ 30 अगस्त सम् 634 को रुमी फौज अपनी छांवनी से निकल कर मुसलमानों पर हमला आवर हुई। मुसलमान भी मुक़ाबिल हुए। सख़्त घमासान करना पड़ा। मुसलमान मारते काटते हुए ख़नदक में दाख़िल हो गये और अन्दर ही अन्दर तज़ारिक़ के ख़ेमे तक पहुंच गये। एक लाख चालीस हज़ार रुमी मौत के घाट उतार दिये गये बाकिया भाग खड़े हुए और जो बचे वह क़ैद कर लिय गये। मुवर्रेख़ीन ने क़ैदियों की तादाद चालिस हज़ार तक बताई है। इस जंग में तीन हज़ार मुसलमान भी मारे गये जिनमें अकरमा बिन अबुजहल , उसका बेटा उमर और चचा हारिस , सलमा बिन हिश्शाम , उमरु बिन सईद , अबान बिन सईद , तुफ़ैल बिन उमर , अमरु आस का भाई हिश्शाम , सईद बिन हारिस बिन क़ैस , नुज़ैर बिन हारिस और जन्दिब बिन अमरु वग़ैरा शामिल हैं। मिस्टर अमीर अली लिखते हैं कि इस लड़ाई ने तमाम जुनूबी शाम को मुसलमानों के क़दमों में सर झुकाने पर मजबूर कर दिया।

यरमूक की जंग मे इतना माल हाथ आया कि एक एक सवार को चौबीस हज़ार मिसक़ाल और प्यादों को आठ आठ हज़ार मिसक़ाल सोना बतौर ग़नीमत मिला।

अकसर मोअर्रिखीन ने लिखा है कि जब यरमूक में मारकये क़ेताल गर्म था तो महमिया बिन ज़नीम नामी एक क़ासिद अबु अबीदा के पास आया और उसने उन्हें अबुबकर के इन्तेक़ाल और उमर के ख़लीफ़ा होने के बारे में ख़बर दी। और उसने उमर का एक नामा भी दिया जो ख़ालिद बिन वलीद की माज़ूली का परवानथा मगर अबु उबूदा ने उस वक़्त तक ख़ालिद से इस परवाने को छिपाये रखा जब तक दुश्मन पर मुकम्मल फ़तेह नहीं हो गयी।

हज़रत अबूबकर की वफ़ात

सक़ीफ़ा बनी साएदा में जमहूरियत पर ख़िलाफ़त की बुनियाद रखी गयी थी लेकिन बाद में क़ायम न रह सकी और नुमाइन्दा जमहूर ही के हाथों इसका तारोपूद बिखर गया और इसकी जगह नामजदगी ने ले ली। चुनानचे अबुबकर ने बिस्तरे मर्ग पर उमर को नामज़द करने का फ़ैसला किया और अब्दुल रहमान बिन औफ और उस्मान को बुला कर उनका ख्याल मालूम किया अब्दुल रहमान यह कह कर ख़ामोश हो गये कि आपकी राये साएब है लेकिन इनमें सख्ती व दुरुश्ती का उनसुर गालिब है उस्मान ने पूरी हमनवाई की और उम्मत के लिये इसे फ़ाले नेक करार दिया। इस बात चीत के बाद अबुबकर ने उन्हें रुख़सत कर दिया और फिर तन्हाई में उस्मान को दस्तावेज़े खि़लाफ़त तहरीर करने के लिये तल किया। जब दस्तावेज ख़िलाफ़त लिखवाने के लिये बैठे तो अभी सरनामा ही लिखवाया था कि बेहोश हो गये। उस्मान तो जानते ही थे कि क्या लिखवाना चाहते हैं। उन्होंने इस बेहोशी के वक़्फा में लिख दिया कि “ मैंने उमर बिन ख़त्ताब को ख़लीफ़ा मुक़र्रर किया है ” जब ग़शी से आंखे खुली तो पूछा क्या लिखा है ? उस्मान ने जो लिखा था पढ़ कर सुना दिया। कहा तुमने नाम लिखने में जल्दी इस लिये कि कि कहीं मैं मर न जाऊँ और मुसलमानों में इन्तेशार व इफ़तेराक़ पैदा हो जायें। उस्मान ने कहा , हां यही वजह थीष कहा खुदा तुम्हें जज़ाए ख़ैर दे।

इस वसीयत नामें की तहरीर के बाद आपने उमर को बुला कर कहा कि चयह वसीयत नामा अपने पास रखो और लोगों से इस पर अमल पैरा होने का अहदो व पैमान लो। उमर ने वह वसीयत नामा ले लिया और लोगों से अहद लिया कि इस दस्तावेज़ी हुक्म के पाबन्द रहेंगे। एक शख़्स ने पूछा कि इसमें क्या लिखा है ? उमर ने कहा कि इसका इल्म तो मुझे भी नहीं है अलबत्ता जो इसमें दर्ज है उसे में बा-रज़ा व रग़बत तसलीम करुंगा। उसने कहा “ लेकिन ख़ुदा की कसम मुझे मालूम है कि इसमें क्या लिखा है। तुम गुजिश्ता साल उन्हें ख़लिफ़ा बना चुके थे और अब वह तुम्हें ख़लीफ़ा बना कर जा रहे हैं। ”

जब यह ख़बर आम हुई तो कुछ लोग ख़ामोश रहे और कुछ ने एहतेजाज किया। चुनानचे मुहाजेरीन व अन्सार का एक गिरोह अबुबकर के पास आया और उसने कहा तुमने इब्ने ख़त्ताब को ख़लीफ़ा बना कर हम पर हाकिम ठहराया है , कल जब परवरदिगार के सामने पेश होगे तो क्या जवाब दोगे।

तलहा और उनके साथियों ने भी इस पर अपनी नापसन्दगी का इज़हार करते हुए कहा “ तुम ने लोगों पर उमर को ख़लीफा और हाकिम मुक़र्रर कर दिया है तुम जानते हो कि तुम्हारे होते हुए उनके हाथों कितनी नागवार सूरतों का सामना करना पड़ा है और अब उन्हें खुली छूट मिल जायेगी। तुम अपने परवर दिगार के हुजूर जा रहे हो , वह तुमसे इस बारे में ज़रुर सवाल करेगा। ”

ज़महूरी हुकूमतों का यह शेवा रहा कि जब तक इक़तेदार हासिल नहीं होता बड़े शद्दो मद से इन्तेख़ाब का हक़ अवाम के लिये तसलीम करती है और जब इन्तेख़ाब के बाद इक़तेदार हासिल हो जाता है तो फिर अहले हुकूमत अवाम की मर्ज़ी को नज़र अंदाज़ करके इक़तेदार हासिल हो जाता है तो फिर अहले हुकूमत अवाम की मर्ज़ी को नज़र अन्दाज़ करके इक़तेदार की कूवत और ताक़त के बल पर यह हक़ अपने लिये मख़सूस कर लेते हैं और सारी ज़महूरियत सिमट कर एक फ़र्द वाहिद या चन्द अप़राद में महदूद होकर रह जाती है। सक़ीफ़ा की जमहूरियत का भी यही नतीजा निकला और दो ही ढ़ाई बरस की मुख़तसर मुद्दत मे नामज़दगी की सूरत तबदील हो गयी। अगर यह नामज़दगी सही है तो ये मानना होगा कि ख़लीफ़ा का इन्तेख़ाब जमहूर की राय का ताबे नहीं है और अगर जमहूर की राये से वाबस्ता है तो इम नामज़दगी को किसी भी सूरत में दुरुस्त क़रार नहीं दिया जा सकता। अगर यह कहा जाये कि अबुबकर नुमाइन्दा जमहूर थे और जमहूर ने उन्हें सियाह व सफ़ेद का मालिक बना दिया था। अगर इसे तसलीम भी कर लिया जाये तो जमहूर ने इस्तेख़लाफ़ व इन्तेख़ाब का हक़ उनके सुपुर्द नहीं किया था और न किसी जमहूरी हुकूमत में किसी नुमाइन्दा जमहूर को यह हक़ दिया जाता है। इस सिलसिले में यह भी इतमेनान कर लिया था कि अवाम उमर को ही मसन्दे ख़िलाफ़त पर देखना चाहते हैं। अगर ऐसा ही था तो राय आम्मा पर एतमाद करते और नाम को सेग़ये राज़ में रख कर अवाम से अहदे इताअत लेने के बजाये उन की राय पर छो़ड़ देते और लोगों को अपने यहां जमा करके एलाने आम करते और उनका रद्दे अमल देख कर फैसला करते। उन्होंने इसका इज़हार भी किया तो उस्मान और अब्दुल रहमान बिन औफ़ से क्या जिनमें ऐएक ने मुख़ालिफ़त को बे सूद समझ कर हां में हां मिला दी और दूसरे ने इक़तेदारे नो को अपनी वफ़ादारी का ताअस्सुर देने से मशविरा ही मतलूब था तो अब्बास बिन अब्दुल मुत्तालिब और हज़रत अली अलै 0 भी मौजूद थे जिन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम स 0 का हाथ बटा कर इस्लाम को तकमील की मंजिल तक पहुंचाया था और तमाम आसाइशें तर्क करके अपनी ज़ात को सिर्फ़ इस्लाम और अहले इस्लाम के मुफ़ाद के लिये वक़्फ़ कर दिया था। सफ़ीफ़ा बनी साएदा में तो उन्हें न बुलाने का उज़्र था कि पैग़म्बर स 0 की तजहीज़ व तकफ़ीन को छोड़कर कैसे आते। मगर यह मशविरा न लेने में आख़िर क्या मसलहत थी। हैरत है कि गज़वात और दूसरे मामलात में तो उनसे मशविरे लिये जाते रहे और असाबते राय और बुलन्द नफ़सी का एतराफ़ किया जाता रहा मगर इस अहम मामले में उनकी राय को ग़ैर ज़रुरी समझा जाता है। क्या इसलिये उन्हें नज़र अन्दाज़ कर दिया गया कि इरशादे पैग़म्बर स 0 की रोशनी में इसे सान सक़लैन व सफ़ीन-ए-निजात का हक़ फाएक़ था और उन्हें सितवत व इक़तेदार से मुतअस्सिर करके अपना हमनवा नहीं बनाया जा सकता था।

बहर हाल जिन लोगों ने सक़ीफ़ा की बराये नाम जमहूरियत के आगे सरे तसलीम ख़म करके अबुबकर को ख़लीफ़ा मान लिया था उन्होंने इस नामज़दगी के आगे भी हथियार डाल दिये और उमर की ख़िलाफ़त तस्लीम कर लिया।

अबुबकर दो साल तीन माह दस दिन तख़्ते हुकूमत पर मुतमक्किन रहने के बाद 22 जमादुस सानिया 13 हिजरी मुताबिक 22 अगस्त सन् 634 को दुनिया से रुख़सत हो गये और इसी दिन हज़रत उमर ने इक़तेदार संभाल लिया।

आपके दौरे ख़िलाफ़त में ख़ास बात यह थी कि तौसीय हुकूमत और हुसूले इक़तेदार के नाम पर इस्लाम का सहारा ले कर तक़रीबन दो लाख अट्ठारा हज़ार बे गुनाह इन्सानों का ख़ून बहाया गया और इस कुश्त व ख़ून की होली में ज़्यादातर ख़ालिद बिन वलीद का हाथ था।

अज़वाज व औलादें

क़तीला बिन्ते अज़ा , उम्मे रुमान बिन्ते हारिस , असमा बिन्ते उमैस और हबीबा बिन्ते ख़ारजा बिन ज़ैद अन्सारी हज़रत अबुबकर की मनकूहा बीवियां थी , कतीला बिन्ते अब्दुल अज़ा के बतन से उसामा और अब्दुल्लाह थे। अब्दुल्लाह जंगे ताएफ़ में अबु मोहजिन तक़फ़ी के तीर से ज़ख़्मी होए और इसी ज़ख़्म की वजह से शव्वाल सन् 11 हिजरी में फ़ौत हो गये। असमा का निकाह जबीर बिन अवाम से हुआ था उनसे अब्दुल्लाह बिन जबीर पैदा हुए थे। मगर मसूदी ने मुरौवजुल ज़हब में लिखा है कि असमा ने जबीर से मुता किया था और इसी से अबद्ल्ला पैदा हुए। इब्ने असीर ने लिखा है कि जब अब्दुल्लाह जवान हुए तो अपने बाग जबीर से कहा कि मेरी शान अब ऐसी नहीं है कि उसकी मां के साथ वती की जाये। लेहाज़ा ज़ुबैर ने तलाक़ दे दी थी। अब्दुल्लाह बिन ज़बीर जब मारे गये तो इसी सदमें में 60 बरस की उम्र में असमा को हैज़ जारी हुआ और कुछ दिन बाद इन्तेक़ाल हो गया। दूसरी बीवी उम्मे रुमान बिन्ते हारिस से आएशा और अब्दुल रहमान पैदा हुए। आएशा का अक़द पहले जबीर बिन मुताइम से हुआ उसके बाद उबुबकर ने जबीर से तलाक़ हासिल करके उनका अक़द रसूल अकरम स 0 से करा दिया। अब्दुल रहमान का नाम इस्लाम लाने से क़बन अब्दुल काबा था। सुलह हुदैबिया के बाद इस्लाम लाये। जंगे जमल में अपनी बहन आएशा के साथ थे सन् 53 हिजरी में उनका इन्तेक़ाल हुआ। असमा बिन्ते उमैस से मुहम्मद बिन अबुबकर हुए। यह अपने ज़ोहद की वजह से आबिदे कुरैश कहलाते थे। हज़रत अबुबकर के बाद इनकी वालिदा हज़रत अली अलै 0 के अक़द में आयीं और उन्होंने हज़रत अली अलै के दामन तरबियत में परवरिश पाई। जंगे जमल व सिफ़्फीन में हज़रत अली अलै 0 के साथ रहे। सन् 37 हिजरी में हज़रत अली अलै 0 की तरफ़ से मिस्र के वाली मुक़र्रर हुए मगर इसी साल माविया ने आपको गधे की ख़ाल में सिलवाकर ज़िन्दा जलवा दिया। हबीब बिन्ते ख़ारजा के बतन से हज़रत अबुबकर की वफ़ात के छः दिन बाद उम्मे कुलसूम पैदा हुई जो तलहा बिन अब्दुल्लाह से मनसूब हुयीं।


उम्माल

मक्के में अताब बिन असीद अमवी , ताएफ़ में उस्मान बिन आस , सनआ में महाजिर बिन अबी उमय्या , जन्द में मेआजड बिन जबल , नजरान में जरया बिन अबदुल्लाह बिजली , हज़र मौत में ज़्याद बिन लबीद , बहरैन में अला हज़रमीं , ख़ूलान में याला बिन उमय्या , सवाद इराक़ में मसना बिन हारिस , बलादे शाम में ख़ालिद बिन वलीद और उनके मा तहत अबुअबीदा बिन जराअ , शरजील बिन हुसना औऱ यज़ीद बिन अबुसुफ़ियान व अमरु आस अबबकर की तरफ से उम्माल मुक़र्रर थे।


हज़रत उमर बिन ख़त्ताब

सन् 13 से 23 हिजरी तक

हजरत उमर का तअर्रुफ़

हज़रत उमर वाक़ए फ़ील के तेरह बरस के बाद कुरैशे मक्का की शाख़ बन अदी में एक ग़रीब लकड़हारे ख़त्ताब बिन नोफ़िल के यहां पैदा हुए। आपका असली नाम अमीर था जो अपनी शक़्ल बदल कर उमर हो गया। कुन्नियत अबुल हफ़स या अबु हफ़सा थी। लक़ब फ़ारुके आज़म मशहूर है मगर न जाने क्यों ? जब कि सरकारे दो आलम स 0 ने यह लक़ब हज़रत अली अलै 0 को मरहमत फ़रमाया था।

आपकी वालिदा हनतमा बिन्ते हाशिम बिन मुग़ीरा बिन अब्दुल्लाह अबुजहल की चचा ज़ाद बहन थीं। बाज़ ने हनतमा बिन्ते हिश्शाम यानी अबुजहल की हक़ीक़ी बहन तहरीर किया हैं और इस बारे में भी तारीख़ी श़वाहिद मौजूद हैं कि आप नसली हैसियत से हबश थीं।

आपकी हुलिया के बारे में मौलवी अब्दुल शकूर ने तहरीर किया है कि आपका रंग गोरा और सुर्ख़ी माएल था। ज़मानये क़हत में नामवाक़िफ ग़िज़ा के इस्तेमाल से काला हो गया था। रुख़सारों पर गोश्त बहुत कम था। क़द इतना लम्बा था कि जब लोगों के दरमियान ख़ड़े होते थे ऐसा लगता कि जैसे किसी सवारी पर बैठे हों। मौलवी मसीहुद्दीन काकोरवी का बयान है कि आप भींगा (एहवल) देखते थे। तरजुमा असदुल ग़ाबा में है कि आपकी सूरत क़बीलये सुदूस के लोगों से मिलती थी। क़द लम्बा औऱ दाढ़ी ऐसी घनी थी कि जब चूल्हा फूंकते थे धूंआ दाढ़ी के दरमियान से ख़ारिज होता था। इस्तियाब में है कि आपका क़द तवील , रंग सियाही माएल , सर गंजा , मूंछे लम्बी और दाढ़ी झाड़ी नुमा थी। पैरों से माक़िल थे। ऐसी मालूम होता था कि जैसे पैर बन्धे हुए हैं। बायें हाथ से काम काज करते थे। आपकी औलादों का यह कहना है कि काला पन हेमं नानिहाल से विरासत में मिला है। सीरते हलबिया में है कि आपके माकूल होने की वजह यह थी कि बचपन में खेल के दौरान ख़ालिब बिन वलीद ने आपक एक टांग तोड़ दी थी इसी दुश्मनी की बिना पर आपने ख़िलाफ़त का ओहदा संभालते ही ख़ालिद को माज़ूल कर दिया था।

आपके वालिद ख़त्ताब बचपन में आपसे ऊँट और बकरियां चराने का काम लेते थे। लेकिन इस मामले में वह कितना सख़्तगीर थे ? इसका अन्दाज़ा कामिल इब्ने असीर , अज़ालतुल ख़फ़ा , अलफ़ारुक़ और सीरत हज़रत उमर की इस रिवायत से होता है कि ज़मानये ख़िलाफ़त में आपका गुज़र एक मर्तबा ज़जनान के जंगलों की तरफ़ से हुआ तो उसे देख कर आपने फ़रमाया कि अल्लाहो अक़बर! एक ज़माना वह था कि मैं नमदे का एक कुर्ता पहन कर इस जंगल में बकरियां चराया करता था और जब कभी थक कर बैठ जाता था तो बाप के हाथ की मार खाता था।

अल्लामा इब्ने अबदरबा ने अमरु आस की ज़बानी एक रिवायत मरकूम की है जिसमें वह कहते हैं कि ख़ुदा की क़सम मैंने उमर और उनके बाप को देखा है कि दोनों के बदन पर क़तरान की अबा होती थी जिसको वह लपेटे रहते थे। अपने सरों पर लकड़ियों का बोझ लाद कर जंगलों से लाते और उसे फ़रोख्त करके अपनी गु़ज़र बसर करते थे। इब्ने अबिलहदी का कहना है कि जब आप अट्ठारह साल के हुए तो वलीद बिन मुग़ीरा के यहां नौकर हो गये थे। उसके ऊँट चराते और सामाने तिज़ारत की देख भाल करते। बाद में कुछ तरक़्की करके बाज़ारों में दलाली का पेशा करने लगे थे जो आप के ज़मानये ख़िलाफ़त तक जारी रहा। यह अमर भी मुताफ़क़्का तौर पर तसलीम शुदा है कि हालते कुफ़्र में आप इस्लाम और पैग़म्बरे इस्लाम स 0 के सख़्त तरीन दुश्मन थे यहां तक कि आपने क़त्ले पैग़म्बर स 0 का इरादा भी किया था मगर अपने मक़सद में नाकाम रहे। आपके मुकम्मल औऱ हैरत अंगेज़ ताज्जुब खेज़ वाक़ियात मालूम करने के लिये मोअल्लिफ़ की किताब अलख़ोलफ़ा हिस्सा दोयम का मुतालिया फ़रमाये।

एक नज़र में अहदे ख़िलाफ़त के वाक़िया

(1) तख़्ते ख़िलाफ़त पर मुतमक्किन होते ही ख़ालिद बिन वलीद की माज़ूली का परवाना जारी किया।

(2) सन् 13 हिजरी से सन् 15 हिजरी तक तमाम मुल्क शाम यानी दमिश्क , तबरिया , हमस , क़नसरीन , हलब , अन्ताकिया , कैसारिया , ग़ज़ा , औऱ बैयतुल मुक़द्दस पर तसल्लुत जमाया।

(3) सन् 14 हिजरी या 15 हिजरी में बसरा आबाद किया।

( 4) सन् 15 हिज़री ही में मशाहीरे इस्लाम के वज़ीफ़े मुक़र्रर किये और दफ़ातिर क़ायम किये।

( 5) सन् 16 हिजरी में हज़रत अली अलै 0 के मशविरों पर सन् हिजरी मुक़र्र किया।

( 6) सन् 17 व 18 हिजरी में जज़ीरा आरमीनिया वग़ैरा को फ़तेह किया

( 7) सन् 20 हिजरी में मिस्र औऱ सन् 21 हिजरी में असकनदरिया फ़तेह हुआ।

( 8) सन् 18 से 23 तक ईरान , आज़र बायजान , फ़ारस औऱ क़िरमान के इलाक़े फ़तेह हुए।

(9 ) आपके अहद में एक हज़ार छत्तीस शहर ममलेकते इस्लामिया में शामिल किये गये , चार हज़ार मस्जिदों की तामीर अमल में आई , एक हज़ार नौ सौ मिम्बर ख़ुतबा देने के लिये बनाये गये और जाँबजां शहरों में जामा मस्जिद की तामीर भी हुई।

( 10) तरावी का हुक्म जारी किया।

( 11) आप ही ने दुर्रा (ताज़ियाना) ईजाद किया।

( 12) क़ैदख़ाना भी आप ही की ईजाद है।

( 13) नमाज़े जनाज़ा की तकबीरें घटा कर उसे सिर्फ़ चार तकबीरों में मुनहसिर किया

( 14) मुताह को हराम क़रार दिया।

( 15) घोड़ों पर ज़कात मुक़र्रर की।

( 16) मैदानों की पैमाइश का तरीक़ा ईजाद किया।

( 17) इल्मे मीरास का हिसाब मुक़र्रर किया।

( 18) मसाजिद में क़ारी मुक़र्रर किया।

( 19) मस्जिदे नबवी की तौसी की।

( 20) अपने बेटे अबु शहमा को शराब ख़ोरी और ज़िना कारी के जुर्म में ताज़ियाने मार मार कर हलाक कर देना आपका मशहूर कारनामा है।

दमिश्क़ पर चढ़ाई

यरमूक की फ़तेह के बाद अबुअबीदा बिन जराअ ने बशीर बिन काब को अपना नाएब बना कर यरमूक में छोड़ा और ख़ुद सुफ़्फ़र की तरफ़ आगे बढ़े। वहां पहुँच कर ख़बर मिली कि शिकस्त खु़र्दा रुमी लश्कर नये साज़ो सामान और जंगी हथियारों के साथ फहल के मुक़ाम पर इकट्ठा हो रहा है। दमिश्क से मज़ीद कुक पहुंचने वाली है औऱ बादशाह हरकुल हमस में पड़ाव डाले हैं। अबुउबैदा ने हज़रत उमर को मुतला किया और सुफ़्फ़र ही में मुक़ीम रह कर जवाब के मुन्तज़िर रहे। हज़रत उमर का हुक्म मिला कि पहले शाम के दारुल हुकूमत दमिश्क पर चढाई करो और उसके साथ साथ अहले फ़हल , अहले हमस औऱ अहले फ़िलिस्तीन को भी जंग में उलझा रखो।

अबुउबैदा ने हथियार बन्द सवारों का एक दस्ता फ़हल का मुहासिरा करने के लिये भेज दिया और बक़िया फ़ौज के मुख़तलिफ़ हिस्से करके एक हिस्से को हमस और दमिश्क के दरमियान तैयनात किया और एक को दमिश्क़ व फ़िलिस्तीन के माबैन ठहरने का हुक्म दे कर ख़ुद ख़ालिद बिन वलीद को अपने साथ लेकर दमिश्क़ की तरफ़ बढ़े और उसे मग़रिब की तरफ़ से अबुउबैदा ने मशारिक़ की तरफ़ से ख़ालिद बिन वलीद ने शुमाल की तरफ़ से यज़ीद बिन अबुसुफ़ियान ने और जूनूब की तरफ़ से अम्र आस व शरजील ने घेर लिया। दमिश्क़ में उस वक़्त रोमियों का नामी गिरामी सिपेह सालार नसतास बिन नसतूस और उनका मज़हबी पेशवा बतरीक़ माहान हाकिम आला की हैसियत से मौजूद था। बाज़ रिवायतों के मुताबिक़ छः माह तक जारी रहा। इस्लामी फौज़े शहर पर मुनजनीक़ों के ज़रिये कभी पत्थर बरसातीं थी और कबी तीर बारानी करती थीं। असनाये महासिरा हरकुल ने अहले दमिश्क़ की मदद के लिये फौज़ें शहर पर मुनजनीकों के ज़रिये कभी पत्थर बरसाती थी और कभी तीर बरानी करती थीं। असनाये महासिरा हरकुल ने अहले दमिश्क़ की मदद के लिये फ़ौज की एक बहुद बड़ी तादाद रवाना की मगर जजुलकलाअ ने जो हमस और दमिश्क़ के दरमियान फ़ौज लिये पड़े थे मुज़ाहमत की और उस फ़ौज को पसपा करके दमिश्क़ में दाख़िल न होने दिया। बिलआख़िर मजबूर होकर मशरिक़ी दमिश्क के बाशिन्दों ने ख़ालिद बिन वलीद से सुलहा की दरख़्वास्त की मगर उन्होंने मंजूर न किया क्योंकि माल ग़नीमत के चक्कर में वह शहर को तलवार के ज़रिये फ़तेह करना चाहते थे। दूसरी तरफ़ मग़रिबी दमिश्क़ के बाशिन्दों में से तक़रीबन सौ आदमीं जिनमे अमाएदीन दमिश्क़ व पादरी शामिल थे , अबुउबैदा से सुलह के मुलतजी हुए। उन्होंने एक लाख दीनार पर मुहाएदा इन शराएत के साथ किया कि शहर का क़बज़ा मुसलमानों को दे दिया जाये। दमिश्क के शहरी अगर शहर को छो़ड़ना चाहें तो अपना माल व असबाब ले जा सकते हैं। सात गिरजा अहले दमिश्क के वास्ते छोड़ दिये जायेंगे बाक़ी मिस्मार कर दिया जायेंगे।

सुलह नामा जब तहरीर किया जा चुका तो अहले दमिश्क ने अबुउबैदा के लिये शहर का मग़रिबी दरवाज़ा “ बाबे जाबिया ” खोल दिया औऱ सौ आदमियों के साथ वह शहर पर तसल्लुत हासिल करने के लिये दाख़िल हो गये। मिस्टर ऐरविंग के बयान के मुताबिक मशरिकी दरवाज़े पर यह हादसा हुआ कि एक पादरी जिसका नास यसूअ था ख़ालिद के पास आया और उसने उनसे कहा कि अगर तुम मेरे ख़ानदान को अमान दो तो मैं तुम्हें शहर में दाख़िल होने का रास्ता बता दूं। उस पादरी के ज़रिये सौ अरब शहर पनाह की दीवार से अन्दर दाख़िल हुए और मश्रिक़ी दरवाज़ा खोल दिया। ख़ालिद लश्कर के हमराह शहर में दाख़िल हो गये और उन्होंने क़त्ल व ग़ारतगरी का बाज़ार गर्म कर दिया यहां तक कि ख़ूरेंजी करते हुए मरियम के गिरजा घर तक पहुंच गये। यहां उन्हें ये देख कर तअज्जुब हुआ कि अबुउबैदा और उनके साथी भी मौजूद हैं लेकिन उनकी तलवारें नयामें में है और शहर की औरतें और बच्चें उन्हें घेरे हुए हैं। ख़ालिद को ख़ूरेंजी करते देख कर अबुअबीदा ने उन्हें मना किया और कहा कि यह शहर हमने सुलहा की बुनियाद पर फ़तेह किया है , अब किसी शख़्स के क़त्ल का इक़दाम मुनासिब नहीं है। ख़ालिद ने कहा , तुमने सुलय क्यों की , पाबन्दी न की जायेगी तो मुसलमानों का एतमाद व एतबार मजरुह होगा और आइन्दा हमारे मुखालिफ़ कभी सुलहा की पेश कश नहीं करेंगे। ग़र्ज़ कि बड़ी रद्दो कद और जद्दो जेहद के बाद ख़ालिद ने क़त्ल व ग़ारतगरी और ख़ूंरेज़ी से हाथ उठाया। इस तरह सुलह की बुनियाद पर मुसलमानों ने दमिश्क़ पर फतेह हासिल की और वहां के बहुत से बाशिन्दों ने जिला वतनी इख़्तियार की।

जब फ़तेह दमिश्क़ की ख़बर दरबारे ख़िलाफ़त में पहुँची तो उमर ने अबुउबैदा को लिखा कि इराक़ से जो फौज आई थी उसे इराक़ वापस भैज दो। चुनानचे अबुउबैदा ने हाशिम बिन अतबा को इस फ़ौज का मरदार बना कर इराक़ की तरफ़ वापस कर दिया। दस हजा़र के इस लश्कर के मुक़दमतुल जैश की हैसियत से क़का़ बिन अमरु और दोनों बाज़ूओं पर अम्र बिन मालिक और रबी बिन आमिर थे।

तबरी का बयान है कि फ़तेह दमिश्क़ के बाद रजब सन् 14 हिजरी में अबुउबैदा ने ख़ालिद बिन वलीद को उनकी माजूली और अपनी इमारत से आगाह किया। उमर के हु्क्म को इतने दिनों तक उन्होंने सियासी मसलहत की बिना पर मग़फ़ी रखा था।

जंगे फहल

दमिश्क़ फ़तह करने के बाद अबुउबैदा ने यज़ीद बिन अबुसुफियान को दमिश्क़ में छोड़ा और खु़द दीगर फ़ौजी अफ़सरों और लश्करियों के साथ वहां से निकल कर फ़हल में ख़ेमा ज़न हो गये। रोमियों का सरदार सक़लार बिन मख़राक मुक़ाबिले में आया। सात दिन शब व रोज़ की लड़ाई के बाद आख़िरकार सक़लार मय 80 हज़ार रोमियों को मारा गया और बेशुमार माले ग़नीमत मुसलमानों के हाथ आया। बाज़ मोअर्रिख़ीन ने इस जंग को सन् 13 हिजरी में और बाज़ ने 14 हिजरी में तहरीर किया है। यह फ़र्क़ शायद इस लिये है कि मुहासिरा दमिश्क को बाज़ ने सत्तर दिन और बाज़ ने छः माह लिखा है।

फ़तह बेसान व तबरिया

फ़तह फ़हल के बाद अबुउबैदा और ख़ालिद ने हस पर चढ़ाई कर दी औऱ शरजील बिन हसना को कुछ फ़ौज दे कर बेसान पर और अवाला और सलमा को तबरिया पर हमला करने की ग़र्ज़ से रवाना कर दिया। चन्द झड़पों और मामूली ख़ूरेंज़ी के बाद उन दोनों शहरों के बाशिन्दों ने भी अहले दमिश्क़ की तरह सुलह कर ली। इस तरह उरदुन के शहर आसानी से मुसलमानों के क़बज़े में आ गये और उन्होंने अपनी फ़ौजी टुकड़ियों इन्तिज़ामी उमूर के लिये कज़बात व मज़ाफात में ठहरा दी। तबरी और इब्ने असीर ने फ़तेह दमिश्क , फ़तेह फ़हल और फ़तेह बेसान व तबरिया को सन् 13 हिजरी के वाक़ियात में दर्ज किया है।

जंगे मरजुल रोम सन् 15 हिजरी

फ़हल में रोमियों को शिकस्त देकर ख़ालिद औऱ अबुउबैदा अलग अलग रास्तों से हमस की तरफ़ रवाना हुए। हरकुल को जब यह ख़बर मालूम हुई तो उसने तोज़र बतरीक़ को उनके मुक़ाबिले पर भेजा जिसने दमिश्क़ के मग़रिब में मरजुर रोम के मुक़ाम पर ख़ालिद का रास्ता रोका और शग़िश रोमी ने जो क़सीर फ़ौज के साथ तोजर और अहले हमस की मदद पर मामूर था , अबुउबैदा की राह में डेरा जमाया। दमिश्क़ को मुसलमानों के हाथ से वापस लेने की ग़र्ज़ से तोज़र आगे बढ़ा। ख़ालिद को ख़बर हुई तो वह भी इसके पीछे हो लिये। यज़ीद बिन अबुसुफ़ियान को मालूम हुआ तो वह दमिश्क़ से निक़ल कर तोज़र के सामने आगाय और दोनों में जंग छिड़ गई। रोमी फौज़ यज़ीद बिन अबुसुफ़ियान से लड़ रही थी कि पिछे से ख़ालिद ने हमला कर दिया। नतीजा यह हुआ कि तोज़र की फौज़ में चन्द ही लोग बाक़ी बचे वरना सब के सब मौत के घाट उतर गये। काफ़ी माले ग़नीमत हाथ आया। आधा यज़ीद के हमराहियों ने ले लिया और आधा ख़ालिद के लश्करियों में तक़सीम हो गया। उसके बाद यजीद दमिश्क़ की तरफ़ पलट आया और ख़ालिद मरजुर रोम की तरफ़ लौट आये। यहाँ अबुअबीदा ने ख़ालिद की रवांगी के बाद शग़श से जंग छोड़ रखी थी। अभी कोई फ़ैसला न होने गाया था कि ख़ालिद भी पहुंच गये। घमासान की जंग हुई। शग़शऔर लतादाद रोमी मारे गये। मुसलमानों ने हमस तक ताकुब किया। हरकुल यह ख़बर सुनकर हमस से रोहा की तरफ़ भाग निकला।

फ़तहे हमस , हमात , सला जक़ीया और क़नसरीन वगैरा

मरजूर रोम की लड़ाई के बाद अबुउबैदा कने हमस का मुहासिरा कर लिया। हरकुल ने अहले जज़ारा को पैग़ाम भेजा कि हमस को मुसलमानो के हाथों से बचाने के लिये शाम की तरफ़ ज्यादा फ़ौज रवाना करें। चुनानचे अहले जज़ीरा की फ़ौजें शाम की तरफ़ रवाना हुई और इधर इराक से साद बिन अबी विकास ने अपनी फ़ौज के मुख़तलिफ़ दस्ते हीत और क़रक़ीसा वग़ैरा की तरफञ रवाना कर दिये कि रोमियों से वह उन शहरों को छीन लें। इसका नतीजा यह हुआ कि जज़ीरा की फ़ौज जज़ीरा की तरफ़ फिर पलट आई और जब हमस के मुहासिरे को एक माह का अरसा गुज़रा और अहले हमस को कुमक की तरफ़ से मायूसी हो गयी तो उन लोगों ने मजबूर होकर अबुउबैदा से दमिशक़् की शराएत पर सुलह कर ली। इसके बाद अबुउबैदा ने अबादा बिन सामित को हमस में अपना नाएब मुक़र्रर किया और वहां से निकल कर उन्होंने हमात , शीराज़ , लाज़क़ीया और क़नसरीन वग़ैरा को फ़तेह कर लिया। बिलाज़री और वाक़दी का बयान है कि हमस और उसके मज़ाफ़ात की फ़तेह के बाद शिकस्त ख़ुरदा रोमी इन्ताकिया में हरकुल के पास जमा हो गये। चुनानचे जोश में आकर उसने अपनी तमाम ममलेकत से फ़ौजें इकट्ठा करके मुसलमानों के मुक़ाबिले में रवाना कर दीं। अबुउबैदा ने जो मुकामात फ़तेह किये थे वहां के लोग उनके हुस्ने सुलूक के ऐसे गिरवीदा हो गये थे कि मज़हबी अख़तालाफ़ात के बावजूद वह अबुउबैदा के लिये जासूसी का काम अंजाम देने लगे। चुनानचे उन्होंने यरमूक के सामने देरुल जबम में हरकुल की फ़ौज़े जमा होने की ख़बर दी। अबुउबैदा ने अपने मातहत अफ़सरों से मशविरे के बाद मुनासिब समझा कि दमिश्क़ में जाकर और तमाम इस्लामी फ़ौजों को यक जाकर के मुक़ाबिला किया जाये। उसके बाद अबुउबैदा ने अहले हमस और आस पास के दीगर मफ़तुहा इलाक़ों के लोगों को बुलाकर जो ख़िराज उनसे वसाल किया था उसे वापस कर दिया और कहा कि इस वक़्त चूंकि हम दुश्मन से मसरुफ़े पैकार हैं औऱ तुम्हारी नुसरत व मुहाफ़िज़ नहीं कर सकते। इस पर हमस के यहूद व नसारा में कहा कि अभी तक हम पर जु़ल्म व सितम होता रहा। हम आपको अदालत व हुकूमत के मामले में यहूदियों से बेहतर समझते हैं , अगर आप अपने आमिल के साथ कुछ फौज हमस में छोड़ दें तो मुनासिब होगी। अबुउबैदा ने उनकी बात मान ली। औऱ जब मुसलमानों को मुकम्मल कामयाबी हासिल हो गयी तो उन लोगों ने ख़िराज अदा कर दिया।

फ़तेह हलब , व अनताकिया वग़ैरा

हमस , हमात और क़नसरीन वग़ैरा की मुहिम से फ़रिग़ होकर अबुउबैदा ने हलब की तरफ़ कुच किया। इस्लामी फ़ौजों के आने की ख़बर सुन कर अहले हलब क़िला बन्द हो गये। अयाज़ बिन ग़नम ने जो मुक़द्दमतुल जैश के अफ़सर थे , शहर का मुहासिरा कर लिया। वहां के लोगों ने इस शर्त पर सुलह कर ली कि ईसाई मुसलमानों को जज़िया देंगे और मुसलमान उन के मज़हबी अमूर नीज़ गिरजों के बारे में मोतरिज़ न होंगे। बाज़ मोअर्रेख़ीन का कहना है कि ईसाई हलब छो़ड़ कर अनताकिया चले गये थे और अनताकिया फ़तेह हो जाने के बाद सुलह करके वापस आये।

हलब को ज़ेर करके अबुउबैदा अनताकिया की तरफ़ बढ़े। यह शहर कुसतुनतुनिया का सानी और मशरिक़ी रोम में कैसर का दारुल हुकूमत था। यहां मुख़तलिफ़ मुक़ामात से ईसाई भीग भाग आ गये थे। मुसलमानों की आमद की ख़बर सुन कर अनताकिया से बाहर सफ़ आरा हुए मगर अबुउबैदा के हमले से पहले ही हज़ीमत उठाकर ईसाई फ़ौजें शहर के अन्दर चली गयीं। अबुउबैदा ने शहर का मुहासिरा किया। चन्द रोज़ बाद ईसाईयों ने मजबूर होकर जज़िया देने या जिला वतनी का मुहाएदा करके सुलह कर ली। जो ईसाई जज़िया न दे सका वह अनताकिया छोड़ कर किसी और सिमत चला गया लेकिन बाद में ईसाईयों ने बद अहदी की। अयाज़ बिन ग़नम और मुहम्मद बिन मुस्लिमा ने फिर जंग करके उन्हें ज़ेर किया और शराएते ऊला के मुताबिक़ फिर सुलह हो गयी।

फिर रोमियो का एक गिरोह मारा मसरीन और हलब के दरमियान मुसलमानों के ख़िलाफ़ मुजतमा हुआ। अबुऊबैदा ने अपने लश्कर को कूच का हुक्म दिया और लड़ कर उन्हें मुन्तशिर कर दिया। अवामुन नास के अलावा ईसाइयों के बहुत से मज़हबी पेशवा भी मैदाने जंग में मारे गये। बिल आख़िर अहले हलब की शराएत पर सुलह हुई औरर अबुउबैदा ने मुहायिदा तहरीर किया। इसके बाद अबुउबैदा ने चारों तरफ़ इस्लामी फ़ौजें फैला दीं और कनसरीन व अनताकिया के तमाम मज़फ़ात पर कबज़ा कर लिया। उसके बाद अबुउबैदा ने क़ोरिस , अबान , बालिस , क़ासरिन , जरहूमा बग़राज़ , ग़सान , तनुख़ , मरअश और हसनुल हदस (जिसे बनी उमय्या अपने दौर में “ वरबुल सलामा ” कहते थे) पर इस्लामी परचम लहरा दिये।

अबुउबैदा जिन जिन शहरों और इलाकों को फ़तेह करते जाते थे उनमे हज़रत उमर की हिदायत के मुताबिक अपनी तरफ़ से आमिल मुक़र्रर करके उसकी हिफ़ाज़त के लिये थोड़ी थोड़ी फ़ौज छोड़ते जाते थे।

जंगे अजनादीन

अमरु आस और शरजील ने जब बेसान के मज़ाफ़ाती इलाक़ों को भी फ़तेह कर लिया और अहले उरदुन ने डर कर मुसलिहत कर ली तो रोमी फ़ौजें ग़जा , अजनादीन और बेसान में जमा होना शुरु हुईं। अमरु आस और शरजील ने अबवाला अदर सलमा को उरदुन का ज़िम्मेदार बना कर अजनादीन की तरफ़ रुख किया जहां रोम का मशहूर सिपह सालार अरतबून अपनी फौजें लिये पड़े था और उसके अलावा उसने एक ब़ड़ी फ़ौज एलिया (बैतुल मुक़द्दस) और रमला में ठहरा रखी थी। अमरु आस ने इस मौक़े पर माविया इब्ने सुफ़ियान के ज़रिये एक तरफ़ अहले क़ीसारिया को जंगी सियासत में उलझा रखा था और दूसरी उन्होंने यह तदबीर इख़्तियार की कि अलक़मा बिन हकीम फ़ारासी और मसरुक़ अक्की को बैतुल मुक़द्दस पर हमला करने की ग़र्ज़ से रवाना कर दिया और अबु अय्यूब मालकी को रमला पर मुसल्लत कर दिया ताकि दुश्मनों की फ़ौज़ें जहां हैं वहीं उलझ कर रह जायें और अरतबून की मदद को न पहुंच सकें। गर्ज़ हर तरफ़ से मुतमईन हो जाने के बाद अम्र आस ने अजनादीन पर धावा बोल दिया। इस्लामी तलवारें चमकीं और रोमियों के सर मैदाने कारज़ार में लुढ़कने लगे। जब अरतबून की सारी फ़ौज कट गयी तो गयी तो अरतबून और उसके चन्द साथी भग कर बैतुल मुक़द्दस में पनाह गुजी हो गये। इब्ने ख़लदून का कहना है कि इस जंग का नतीजा यह हुआ कि नयाफ़ा , नाबलिस अमवनास और जबरीन अक्का , बैरुत , सैदा , लाज़क़ीया , आफ़मिया और अबनोला के लोगों ने बग़ैर जंग के मुसलमानों के लिये अपने दरवाज़े खोल दिये।

फ़तह बैतुल मुक़द्दस

मज़कूरा बाला तमाम इलाक़ों को ज़ेर करने के बाद अमरा आस ने बैतुल मुक़द्दस का मुहासिरा कर लिया और अबुउबैदा कभी क़नसरीन वग़ैरा पर इस्लामी परचम लहराते हुए इसी तरफ़ रवाना हुए यहां तक कि दोनों चरनैलों की फ़ौज़ें आपस में मिल गयीं। बैतुल मुक़द्दस के ईसाईयों ने जब यह हाल देखा और अबुउबैदा के आने की ख़बर से मुत्तेला हुए तो ख़ौफ़ व दहशत से वह हाथ पांव छोड़ बैठे। इस शर्त के साथ उन्होंने मसालेहत की ख़्वाहिश का इज़हार किया कि ख़लीफ़ये वक़्त खुद यहां आकर मुहाएदे की तकमील करें औऱ इस पर दस्तख़त करें। चुनानचे अबुउबैदा ने हज़रत उमर को पैग़ाम भेजा कि बैतुल मुक़द्दस की फ़तेह आप की तशरीफ़ आवरी पर मुनहसिर है। हज़रत उमर ने इस सिलसिले में अकाबरीन सहाबा से मशविरा किया। हज़रत उस्मान ने कहा कि आप ईसाइयों से सुलह हरगिज़ न करें क्योंकि वह लोग हिम्मत हार चुके हैं लेहाज़ा बग़ैर किसी क़ताल व जदाल के खुद ब खुद हथियार डा़ल देंगे। हज़रत अली अलै 0 ने इस राये से इख़्तिलाफ किया और कहा तुम्हें वहां जा कर सुलह कर लेनी चाहिये। हज़रत उमर ने हज़रत अली अलै 0 के मशविरे पर अमल किया और “ जाबिया ” पहुंच गये। अमाएदीन बैतुल मुक़द्दस भी वहां जमा हुए औऱ क़रारदाद सुलह पर गौ़र व ख़ौज़ के बाद सुलहनामा मुर्त्तब हुआ जिसमें यह शर्ते मरकूम हुईः

1. शहर या उसके मज़ाफ़ात में ईसाई कोई नया गिरजा तामीर नहीं करेंगे।

2. रात या दिन में किसी वक़्त गिरजा में मुसलमानों के दाख़िले पर कोई पाबन्दी न होगी।

3. कलीसाओं ओर गिरजाओं के दरवाज़े आम मुसाफ़िरों के लिये हर वक़्त खुले रखे जायेंगे।

4. ईसाई मुसलमान मुसाफ़िरों की तीन दिन दावत करेंगे और उनके साथ हुस्ने सुलूक व ख़न्दा पेशानी से पेश आयेंगे।

5. ईसाई ने अपने बच्चों को कुरआन की तालीम देंगे न अपने मज़हब का एलानिया एलान करेंगे और न किसी को ईसाई होने की तरग़ीब देंगे।

6. अगर कोई ईसाई अपना मज़हब तर्क करके मुसलमान होना चाहेगा तो उस पर कोई पाबन्दी न होगी।

7. तमाम ईसाई मुसलमानों का अदब व लिहाज़ करेंगे।

8. कोई भी ईसाई मुसलमानों का लिबास नहीं पहनेगा और न अमामा इस्तेमाल करेगा।

9. कोई भी ईसाई मुसलमानों के नाम पर अपने बच्चों का नाम नहीं रखेगा।

10. ईसाई हथियार नहीं लगायेंगे।

11. शराब फ़रोशी की क़तई मुमानियत होगी।

12. कोई भी ईसाई मुसलमानों के बाज़ार में अपना लिटरेचर फ़रोख़्त नहीं करेगा।

13. गिरजा के घण्टे ज़ोर ज़ोर से बजाने की इजाज़त न होगी।

14. कोई ईसाई किसी मुलमान को अपने यहां मुलाज़िम नहीं रखेगा।

15. किसी ईसाई का मकान मुसलमान के मकान से बुलन्द न होगा।

16. हर ईसाई शिनाख़्त के लिये अपने सर का अगला हिस्सा मुण्डवाया करेगा।

इन शिनाख़्त के साथ ईसाईयों ने जज़ीया देना कुबूल किया और शहर के दरवाज़े तमाम मुसलमानों के लिये खोल दिये गये। यह मुहाएदा सन् 15 हिजरी में हुआ और इस पर ख़ालिद बिन वलीद , अम्र आस , अब्दुल रहमान बिन औफ़ माविया बिन अबसुफियान ने भी अपनी शहादतें सब्त की। इस मुहाएदे के साथ ही अहले रमला ने भी इसी तरह का मुहाएदा कर लिया।

जब बैतुल मुक़द्दस पर मुसलमानों का मुकम्मल तसल्लुत हो गया तो अळकमा बिन हाक़िम निस्फ़ फिलिस्तीन के हाकिम मुकर्रर किये गये और उन्हें रमला में क़याम का हुक्म दिया गया। इसके बाद हज़रत खच्चर पर सवार होकर जाबिया से वारिदे बयतुलमुक़द्दस हुए। वहाँ उन्होंने एक उप़तादा मुक़ाम , सख़रा को साफ करके इस पर एक मस्जिद तामीर करने का हु्क्म दिया और दस दिन तक वहां क़याम के बाद मदीना की तरफ मराजेअत की।

हम्स पर रोमीयो का हमला

आरमीनिया और जज़ीरा के रोमामियों ने हर तरह की फ़ौजी इम्दाद देने का वायदा करके बादशाह हरकुल को हम्स पर हलमा करने के लिए उभारा। चुनानचे 17 हिजरी ( 638 ई 0) का मौसम बहार शुरु होते ही हरकुल ने आरमीनिया और जज़ीरा वालों की कमुक के भरोसे अपने बेटे की मातहती में एक लश्कर शाम की तरफ़ रवाना कर दिया। जिन शहरों को मुसलमानों ने फतेह किया थि वह भी हरकुल के लश्कर के साथ हो गये और अरब को ईसाई क़बायल ने भी अपनी हिमायत को इन से वाबस्ता कर दिया। मिस्र से जो फ़ौज आई थी इस ने शुमाली फिलिस्तीन पर क़ब्ज़ा कर लिया। इस तरह मुसलमान हर तरफ़ से नरग़े में घिर गये मगर मुस्तइदी , होशियारी , जोशे हमीयत , हरब व जरब व ज़र्ब की फ़नकारी और तवक्कुल ने इन का साथ दिया।

जब रोमियों ने हम्स पर हमले का इरादा किया तो अबू उबैदा ने भी इधर-उधर से फ़ौजे जमा करके हम्स के बाहर सफ़ें जमा जमा दी। क़िनसरीन से ख़लीद बिन वलीद भी आ गये और इन दोनों ने हज़रत उमर को तमाम हालात से मुत्तेला किया। हज़रत उमर ने चारों तरफ क़ासिद दौड़ाये। ईराक़ के सिपासलार साद बिन अबि विक़ास को लिखा कि इस हुक्म के मौसूल होते है फ़ौरी तौर पर क़ाआका बिन उमर को जो कूफ़े में मुक़ीम है चार हज़ार की फ़ौज के साथ हम्स की तरफ रवाना कर दो। सहल बिन अदी रक़ा की तरफ़ बढ़ कर जज़ीरा वालों को हम्स की तरफ बढ़ने से रोके। अब्दुल्लाह बिन एतबान नसीबैन होते हुये हेरान औऱ रुहा की तरफ़ बढ़े और वलीद बिन अक़बा आगे बढ़ कर अरब के क़बाएल रबिया और तनूख़ की रोक थाम करें जो जज़ीरा में अबाद है। जंग के मौक़े पर आयाज़ बिन ग़नम को इन सब सरदारों का सरदार समझा जाये औऱ इन के हुक्म पर अमल किया जाये। जज़ीरा वालो को जब मालूम हुआ कि इनके इलाक़े में इस्लामी फ़ौजे फैल गयी हैं तो वह रोमियों से अलहदा होकर अपने शहरों को बचाने की फ़कर में वापस चले गये और इसी असना में अबुउबैदा ने रोमियों पर हमला करके उन्हें पसपा कर दिया। मौलवी अमीर अहमद रक़म तराजड है कि मुसलमानों ने दुश्मन को सख़्त नुक़सान पहुंचाया और हरकुल का बेटा कुछ फौज़ के साथ जान बचाकर भागने में कामयाब हो गया और शाम को दोबारा मुसलमानों ने मसख़्खर कर लिया। इस वक़्त हम्स में अबुउबैदा शाम के गवर्नर जनरल थे और उनके मातहत कनसरीन में ख़ालिद बिन वलीद , दमिश्क़ में यज़ीद बिन अबू सूफ़ियान , लदन में माविया , फ़िलिस्तीन में अलक़मा और मूसल में अब्दुल्लाह बिन क़ैस गर्वनरी के ओहदों पर मामूर थे।

क़िसारया को चूकि मिस्र की तरफ़ से बराबर इमदाद मिलती रहती थई इस वजह से वह अरसे तक रोमियों के क़ब्जे में रहा लेकिन जब हरकुल के बेटे फिलीस्तीन के भागने की ख़बर पहुंची तो अहले किसारिया ने भी हाथ पांव छोड़ दिये और जान माल की हिफ़ाजत की शर्त रखी पर मुसलमानों की इताअत कुबूल कर ली और फतूहात शाम की तकमील हो गयी आखिर शिकस्त खाकर जब रोमियों को बिल्कुल मायूसी हो गयी तो उन्होंने इसी पर क़नाअत कर ली कि जब मौक़ा मिले इस्लामी इलाक़ों पर धावा बोल दिया जाय। जब यह बस भी न चला तो उन्होंने अपने और अरबों क दरम्यान नाकाबिले अबूर हद फ़ासिल क़ायम करने के लिये अपनी बाकी मान्दा एशियाई मक़बूज़ात की सरहदों पर एक वसीय व अरीज़ इलाक़े को नेसत व नाबूद और वीरान कर दिया। इस बदक़िस्मत इलाके में जितने भी शहर और क़रिया थे सब ज़मीन के बराबर कर दिये गये और क़िलों को मिसमार कर दिया गया। वहां के लोग शुमाल की तरफ़ जा कर आबाद हो गये। लेकिन यह कोताह बीनी और नाआक़बत अन्देशी की तदबीर भी कारगर न हुई। आयाज़ बिन ग़नम ने जो शुमाली शाम की कमान पर मुतअय्यन थे , कोहतारस को अबूर करके सालेशिया और तरतूस पर कब्ज़ा कर लिया और बहरे असवद तक फतेह का परचम लहराते चले गये यहां तक कि आचाज़ के नाम से एशियाए कोचक के रोमी थरथराने लगे । इसी ज़माने मुसलमानों ने अपनी सलाहियतों से काम ले कर जहाजों का बेड़ा भी तैयार कर लिया और थोड़े ही दिनों में वह समन्दरों पर भी काबिज़ हो गये।

जिस वक़्त अयाज़ बिन ग़नम एशियाए कोचक के इलाकों में फ़तेह वह कामरानी का परचम लहरा रहे थे इन के बीच मातेहत अफ़सरों ने जिन्हें साद बिन अबीविक़ास ने हज़रत उमर के हुक्म से रक़्क़ा , नसीबैन , हरान और रोहा की तरफ़ रवाना किया था , जज़ीरा और आरमीना के अकसर इलाक़ों को सुलह से और बाज़ को जंग करके फ़तेह कर लिया। इस तरह अरज़े रम , रक़्का , नसीबैन , रोहा , दारा , सम्बेसात , सरोज , रास कैफा , अरजुल बैज़ा , मनीह रास ऐन , मुबाफ़ारेक़ैन , कफ़्र तूसा , तूर अबदीन , मारदीन , मूसल , ज़ोज़ान , अरज़न , बदलीस , ख़लात और मुलतिया वग़ैरा सारे शहर और क़रिये सन् 16 हिजरी तक फ़तेह कर लिये।

ईरान से मार्काआराईयों

यह तहरीर किया जा चुका है कि मसन्ना बिन हारसा शैबानी हज़रत अबुबकर से जंगी मदद लेने की ग़र्ज़ से इराक़ से मदायन आये थे कि हज़रत अबुबकर का इन्तेकाल हो गया उनकी वसीयत के मुताबिक़ उमर ख़लीफ़ा हो गये। तख़्ते ख़िलाफ़त पर मुतमक्किन होते ही उन्होंने अबुबकर की छेडी हुई नातमाम जंगु मुहिम को मुक़द्दम समझा और लोगों को इराक़ जाने के लिये उभारना शुरु किया यहां तक कि तीन दिन तक मुताविर मुसलमानों को तरग़ीब व तहरीस के ज़रिये आमादा करते रहे लेकिन किसी ने कोई जवाब न दिया। आख़िर कार जनाबे मुख़तार के वालिद अबुअबीदा बिन मसूल कसक़फी ने इराक़ की मुहिम सर करने का बेड़ा उठाया। चुनानचे हज़रत उमर ने मुसन्ना को आगे रवाना कर दिया और उनसे कहा तुम चलो हम कुमक भेज रहे हैं। ग़र्जं अबुअबीदा को चार हज़ार फ़ौज का सरदार मुक़र्रर करके उन्होंने बाद में रवाना कर दिया। साद बिन अबीद अन्सारी और सीलत बिन कैस अन्सारी भी उनके हमराह हो लिये और एक माह बाद अबुअबीदा हीरा के मुक़ाम पर मुसन्ना के पार पहुंच गये। शाह ईरान ने रुस्तम बिन फ़रख़ज़ाद को जो बड़ा मुदब्बिर और शुजा था एक कसीरुल तादाद फ़ौज के साथ मुसलमानों के मुक़ाबिले में भेजा जिसने अबुअबीदा बिन मसूद सक़फ़ी के वहां पहुंचने से पहले ही मुसलमानों के मफ़तूहा इलाक़ों को क़बज़े में कर लिया था। नरसी और जाबान उसके दो मातहत सरदार हीरा के क़रीब तक आ गये थे। चुनानचे जाबान ने नमाज़िक में और नरसी ने कसकर में डेरा डाल रखा था। अबु अबीदा बिन मसूद ने अपनी फौज़ को अरासता करके नमाज़िक़ में मुक़ीम जाबान के लश्कर पर चढ़ाई कर दी काफ़ी ख़ूरेजी के बाद ईरानियों को शिकस्त हुई। जाबान और उसके हज़ीमत ख़ुर्दा साथियों ने भाग कर कस्कर में नरसी के पनाह ली।

जाबान की शिकस्त का हाल सुन कर रुस्तम ने बीस हज़ार की फ़ौज के साथ अपने एक सरदार जालीनूस को कसकर की तरफ़ रवाना किया जहां नरसी पहले ही से तीस हज़ार का लश्कर लिये हुए ख़ेमा ज़न था। लेकिन जूलीनूस के वहां पहुंचने से पहले ही लश्करे इस्लाम ने नरसी की फ़ौज़ को कसकर के क़रीब सक़ातिया के मुक़ाम पर तहस नहस कर दिया और जब कसकर औऱ सक़ातिया ईरानियों से ख़ाली हो गया तो मुसलमानों ने उनके शहर और क़सबात को जहां को लोगों ने इस्लाम कुबूल करने या जज़ीया देने से इन्कार किया था , तबाह व बर्बाद और वीरान कर दिया। नीज़ उनकी औरतों और बच्चों को गिरफ़्तार कर लिया। अहले सवाद ने ज़जीया के एवज सुलह कर ली।

इस कामयाबी व कामरानी के बाद अबुअबीदा बिन मसूद सक़फी जालीनूस से मुक़ाबिले के लिये आगे बढ़े और मुक़ाम मुबसियासा पर जो रुसमा के क़रीब वाक़े है , मुडभेड हुई लेकिन पहले हमले में ही जालीनूस की फ़ौज अरबी तलवारों की ताब न लाकर भाग ख़ड़ी हुई और अबुअबीदा ने कसकर पर क़बज़ा कर लिया और वहां के लोगों पर जज़िया क़ायम करके हीरा की तरफ़ वापस आ गये।

जंगे क़स नातिफ़ (जसर)

जालीनूस शिकस्त ख़ाकर मय अपने हज़ीमत खुर्दा लश्कर के जब रुस्तम के पास मदायन पुहंच तो रुस्तम ग़म व गुस्से में आपे से बहर हो गयी। उसने तीस हज़ार फ़ौज औऱ तीन सौ हाथियों की कुमक दे कर बहमन जादू को जालीनूस के साथ हीरा की तरफञ रवाना किया औऱ बहमन जादू को हुक्म दिया इस मर्तबा अगर जालीनूस भागे तो उसकी गर्दन उड़ा देना।

बहमन जादू रास्ते के शहरों और क़स्बों से भी अरबों के ख़िलाफ़ लोगों को जमा करता हुआ क़स नातिफ़ में आकर ख़ेमा ज़न हो गया। अबुअबीदा बिन मसूद सक़फ़ी बहमन जादू की आमद की ख़बर सुन कर मरुहा में आ गये। दरमियान में चूंकि दरियाये फुरात हाएल था इसलिये जंग रुकी रही।

फिर फ़रीक़ीन की राये से फुरात पर पुल बनाया गया और जब वह तैयार हो गया तो बहमन जादू ने अबुअबीदा से कहला भेजा कि पुल पाकर करके तुम हमारी तरफ़ आओ या हमें अपनी तरपञ आने की इजाज़त दो। अबुउबैदा ख़ुद फ़ौज लेकर बहमन के लश्कर पर जा पड़े और मैदाने कारज़ार गर्म कर दिया। ईरानियों ने अपने लश्कर के हाथियों को आके रखा था लेहाज़ा वह हाथियों ही पर से मुसलमानों पर तीरों की बारिश करने लगे। मुसलमान सवारों ने हाथियों पर हमला करने का इरादा किया। लेकिन उनके घोड़ों ने चूंकि कभी हाथी देखा न था इसलिये वह भड़क कर मैदान से भागे। यह हाल देख कर घोड़ों के सवार उनकी पुश्त से फांद पड़े और अबुउबैदा की क़यादत में पैदल ही हाथियों पर तलवारें लेकर टूट पड़े। ईरानियों ने तीरों से उन्हें रोकना चाहा मगर जज़बये शहादत और दस्त ब दस्त जंग होने लगी। कुछ ही देर के बाद बहमन जादू ने जब अपनी फ़ौज को मुन्तशिर होते देखा तो उसने हाथियों को आगे बढ़ाने का हुक्म दिया। अबुउबैदा ने मुसलमानों से पुकार कर कहा कि हाथियों पर हमला करो और उनकी सूंड़े काट डालों। यह कहकर अबुउबैदा आगे बढ़े और एक हाथी की सूंड उन्होंने काट दी। इसके सवार ने उन पर नेज़ा का वार किया लेकिन उसे ख़ाली दे कर दूसरे वार उन्होंने उस हाथी के दोनों अगले पांव उड़ा दिये। हाथी गिरा औऱ उसके सवार को अबुउबैदा ने बड़े आराम से ज़मीन पर हमेशा के लिये सुला दिया। अबुउबैदा की यह दिलेरी औऱ तेज़ी देखकर दीगर मुसलमानों ने भई वही रविश इख़्तियार की औऱ देखते ही देखते कई हाथी अपनी सूंड़े और पांव कटा कर ढे़र हो गये। अबुउबैदा एक हाथी के सामने पड़ गये उसने उनको पकड़ने का क़सद किया उन्होंने अपनी जान बचा कर उसकी सूंड पर वार किया। सूंड तोकट गयी लेकिन उसने आगे बढ़कर अबुउबैदा को अपने पैरों तले् रौंद डाला। अबुउबैदा की शहादत के बाद पै दर पै सात आदमियों ने इस्लामी परचम संभाला औऱ लड़ लड़ कर शहीद हो गये आठवें मुसन्ना थे जिन्होंने लवाए इस्लाम को लेकर दो बारा एक पुरजोश लड़ाई लका क़सद किया लेकिन इस्लामी फ़ौजियों की सफ़ें ग़ैर मुर्त्तब हो गयीं थी और यके बा दीगरे सात अलमब्रदारों की शहादत से लोग इधर उधर मुन्तशिर होने लगे थे। अब्दुल्लाह बिन मुरसिद ने यह हाल देख कर पुल के इस ख़्याल से तोड डाला कि मुसलमानों को भागने का रास्ता न मिलेगा तो वह ख़्वाह मख़्वाह जम कर लड़ेंगे। बहमन जादू ने अपने हमलों में और शिद्दत पैदा कर दी। नतीजा यह हुआ कि जो लोग मैदान में न ठहर सके वह फुरात में डूब गये और जो लड़ते रहे वह मारे गये। मुसन्ना , अरवा बिन के पास हीरा आया था और मुल्की जोश व ग़ैरत की वजह से मुसलमानों के साथ इस मारके में शरीक हो गया था , मारा गया और मुसन्ना बुरी तरह ज़ख़्मीं हुए। इस अर्से में पुल दोबारा दुरुस्त कर लिया गया था। चुनानचे मुसन्ना मय अपने बक़िया साथियों के साथ दुश्मनों से लड़ते हुए फुरात अबूर कर गये। इस जंग के आख़री शहीद सलीत बिन क़ैस थे जो पुल के पास लड़ते हुए मारे गये।

इस जंग में इस्लामी लश्कर 6 हज़ार आदमियों पर मुश्तमिल था। चार हज़ार लड़ने और फुरात में डूबने की वजह से ज़ाया हुए , दो हज़ार इधर उधर भाग गये औऱ तीन हज़ार बाकी बये। ईरानियों के छः हज़ार आदमीं काम आये। यह वाक़िया माहे शबान सन् 13 हिजरी का है।

जंगे बवीब

जब हज़रत उमर को अबुउबैदा बिन मसूद सक़फ़ी और दीगर मुसलमानों की शहादत व हज़ीमत की हाल मालूम हुआ तो उन्होंने मुसन्ना की मदद के लिये मुसलमानों से अपील की। सबसे पहले क़बीला बहीला ने अपनी आमदगी ज़ाहिर की मगर यह कहा कि शाम के आलावा हम और किसी तरफ़ नहीं जायेंगे। हज़रत उमर ने माले ग़नीमत के ख़ुम्स का चौथाई हिस्सा देने का वादा करके उन्हें इराक़ जाने पर राज़ी कर लिया औऱ क़बीला बहीला को जरीन बिन अब्दुल्लाह बिजली की क़यादत में मुसन्ना की इमदाद पर रवाना कर दिया। इधर मुसमा ने भी अफने जाती वसाएल से आस पास के अरब क़बिलों को खुतूत कर बहुत से आदमीं जमा कर लिये। अनस बिन हिलाल नमरी भा नसाराये बनी नम्र की एक जमीअते आज़म ले कर आ गया और कहा हम हम ईरानियों से लड़ेंगे।

रुस्तम और फ़ीरज़ान को जब यह ख़बर पहुंची तो दोनों ने मुत्ताहिदा तौर पर महरान नामी एक सरदार को भारी फ़ौज दे कर मुसलमानों के मुक़ाबिले पर रवाना किया। मुसलमानों ने कूफ़ा के क़रीब “ बवीब ” के मुक़ाम पर डेरा डाला और दूसरी तरफ़ दरिया के उस पार ईरानी लश्कर ख़ेमा ज़न हुआ। महरान ने मुसन्ना कसे कहला दिया कि दरिया अबूर करके तुम आओगे या हम आयें ? मुसन्ना ने कहा कि इस मर्तबा तुम ही आ जाओ। मरनान ने अपनी फौज़ के साथ दरिया अबूर किया और मुसलमानों के मुक़ाबिले पर आकर डट गया और उसने अपने लश्कर की तीन सफ़ों को जिनके साथ हाथी भी थे , आगे बढ़ाया। इधर से मुसन्ना पहले ही हमले में ईरानियों के कलब लश्कर तक पहुंच गये। उनके साथ अनस बिन हिलाल भी अपनी जमीयत के साथ मारते काटते आगे बढ़े। ईरानी भई जान छोड़कर लड़ते रहे यहां तक कि उनका सरदार महरान मुसन्ना के हाथ से मारा गया। उसका क़त्ल होना था कि ईरानियों के पांव मैदान से उख़ड़ गये और भगदड़ मच गयी। मुसलमानों ने घोड़े दौड़ा दौड़ा कर उन्हें कत्ल करना शुरु किया और इतने ईरानी मारे कि मुद्दतों बाद भी वहां हड्डियों के ढ़ेर नज़र आते थे। इब्ने ख़लदून और साहबे जैबुल सैर की रवायतों के मुताबिक़ तक़रीबन एक लाख आदमी मारे गये और मुसलमानों ने साबात तक ईरानियों का पीछा न छोड़ा और क़सबात व देहात को ताख़त व ताराज कर डाला नीज़ वहां के बाशिन्दों को गिरफ़्तार कर लिया।

इस लड़ाई से सवाद से दजला तक मुसलमानों का तसल्लुत हो गया और अहले फ़ारस ने मजबूरन दजला पार का इलाक़ा उनके हक़ में छोड़ दिया। इस के बाद मुसन्ना ने हीरा की तरफञ मराजेअत की। यह लड़ाई माहे रमज़ान सन् 13 हिजरी में हुई।

जंगे क़ादसिया

अमाएदीन व अकाबरीन ईरान ने मुसलमानों की मुसलसल फ़तूहात पर तशवीश का इज़हार करते हुए उसे बाहमी नाइत्तेफ़ाक़ी का समरा क़रार दिया और कुछ बुज़ुर्गों ने रुस्तम व फ़िरोज़ान को जो सलतनत के दस्त व बाज़ू थे और आपस में एक दूसरे से अख़ेतेलाफ़ रखते थे , इत्तेफाक़ व इत्तेहाद से काम करने पर आमादा कर लिया। इधर शहंशाह यज़देजुर्द ने अपने मुल्क से तमाम मरज़बानों को जमा कर लिया। इधर शहंशाह यज़देजुर्द ने अपने मुल्क से तमाम मरज़बानों को जमा करके उनसे मुल्क और रेआया की हिफ़ाज़त के बारे में सख़्त ताकीद की और बड़े बडे आज़मूदा कार सिपेहसालारों और चरनैलों को कसीरुल तादाद फौज़ों के साथ हीरा , अबला औऱ अम्बार की सरहदों पर तैनात कर दिया। मुसन्ना ने इन वाक़ियात की ख़बर दरबारें ख़िलाफ़त में दी। अभी वहां से कोई जवाब न आया था कि अहले सवाद ने अहद शिकनी करके बग़ावत कर दी। उनकी सरकूबी के लिये मुसन्ना ने ख़रुज करके ज़ीक़ार में क़याम किया और इस्लामी फ़ौज़ें तफ़ में ख़ेमा ज़न रहीं। यहां तक कि हज़रत उमर का हुक्म मौसूल हुआ कि तमाम इस्लामी अफ़वाज सिमट कर सरहदों पर चलीं जायें , अनक़रीब कुमक भी रवाना की जा रही हैं। इस हुक्म के बाद मुसन्ना फ़ौज़ों को ले कर बसरा के क़रीब मुक़ामे असी में मुक़ीम हुए।

उधर हज़रत उमर ने अपने उम्माल को एक गश्ती मुरासिला भेज कर फ़ौरी तौर पर प्यादो , सवारा और सामाने हर्ब व ज़रब तलब किया। चुनानचे जो लोग इराक़ के क़रीब थे वह वहीं से सीधे मुसन्ना के पास पहुंचे और जो इतराफ़ व जवानिब से आकर मदीने में जमा हो गये थे उनके साथ जरनैल बन कर खु़द हज़रत उमर ने इराक़ की तरफ़ जाना चाहा मगर हज़रत अली अलै 0 और बाज़ दीगर साहाब ने मना किया और कहा कि असहाबे पैग़म्बर स 0 में से किसी सहाबी को लश्कर का सिपह सालार बनाकर भेज दीजिये , अगर वह नाकाम रहा तो दूसरे को भेज दीजियेगा। इस तरह दुश्मनों पर ज़्यादा असर पड़ेगा। चुनानचे हज़रत उमर ने साद बिन अबी विक़ास को जो हवाज़िन में सदाक़त की वसूलियाबी पर मुक़र्रर थे , तलब करके जंगे इराक़ पर मामूर किया और चार हज़ार की सिपाह के साथ इराक़ की सिम्त रवाना कर दिया। फिर साद के बाद दो हज़ार यमानी और दो हज़ार नजदी जंगजू रवाना किये।

जब साद बिन अबी विक़ास “ बजूद ” के मुक़ाम पर पहुंचे तो उन्हें मालूम हुआ कि मुसन्ना बसबब उन ज़ख़्मों के कि जो उनके जिस्म पर मारका जसर में लगे थे , बशीर बिन ख़सासिया को अपना क़ायम मुक़ाम मुक़र्रर करके इन्तेक़ाल कर गये। उनके पास उस वक़्त साठ हज़ार आदमीं थे।

साद आगे बढ़े तो तीन हज़ार आदमी बनी असद के उनकी फ़ौज में शामिल हो गये। कूफ़े के क़रीब “ सैराफ़ ” के मुक़ाम पर साद का लश्कर जब पहुंचा तो अशअस बिन क़ैस कुन्दी अपने क़बीले के दो हज़ार आदमियों के साथ उनसे मिल गया।

सैराफ़ में अक़ामत के दौरान हज़रत उमर ने तलीहा बिन ख़वैलद असदी , अमरु बिन माद चकरब , आसिम बिन उमर शरजील बिन समत , औऱ ज़ात बिन हयान में से हर एक को काफ़ी-काफ़ी सिपह देकर एक दूसरे के पीछे साद की मदद के लिये रवाना किया यहां तक कि साद के पास तीस हज़ार और ब-रवायते छत्तीस हज़ार का लश्कर जमा हो गया। यहां मुसन्ना के भाई मुक़नी भी साद से आकर मिले और मुसन्ना ने बावक़्ते इन्तेक़ाल जो ज़रुरी हिदायतें दी थीं उन्होंने साद के गोशगुज़ार कीं। इसी सैराफ़ में क़याम के दौरान साद ने मुसन्ना की बेवा सलमा से जो इन्तेहाई हसीन व जमील थीं , निकाह कर लिया। इतने में साद को हज़रत उमर का हुक्म मिला कि आगे बढ़ कर क़ादसिया के मुक़ाम पर मोर्चा जमा दो।

साद ने क़ादसिया में दो माह क़याम किया मगर दुश्मनों में से किसी लड़ने वाले की सूरत तक दिखाई न दी। इश क़याम के दौरान जब रसद व ग़ल्ला की ज़रुरत होती तो लश्करी अम्बार और कसकर के दरमियान मवाज़ेआत पर धावा मारते और अपनी ज़रुरियात की चीज़ें वहां से लूट लाते थे।

ईरान के शहंशाह यज़दुजर्द को यह कैफ़ियत मालूम हुई तो उसने रुस्तम को मुसलमानों के मुक़ाबिला के लिये मामूर किया। चुनानचे उसने एक अज़ीम लश्कर के साथ साबात के मुक़ाम पर डेरा डाल दिया। साद बिन अबीविक़ास ने इस अमर की इत्तेला हज़रत उमर को दी। वहां से जवाब आया कि ख़ुदा कि ज़ात पर भरोसा रखो और चन्द ऐसे आदमियों को क़बल जंग शाह फारस के पास दावते इस्लाम के लिये भेजो जो बहस व मुबाहिसा का शऊर व सीलक़ा रखते हो।

साद ने चौदा बासलाहियत मुसलमानों को जिनमें नोमान बिन मक़रुन , जरीर बिन अब्दुल्लाह बिजली और तलीहा बिन ख़्वैलद असदी भी शामिल थे , सफ़ीर की हैसियत ये यज़दजुर्द के पास इस्लाम की दावत देने को रवाना कर दिया। जब यह लोग एवाने केसरा में दाख़िल हुए तो उस वक़्त यज़दजुर्द चांदी के सतूनों पर बने हुए एक सोने के तख़्त पर जो हीरे जवाहारात से मुरस्सा था , बैठा हुआ था और मख़सूसीन व मुलाज़मीन ज़़रक व बरक़ और जरीं लिबासेों में मबलूस उसके इर्द गिर्द जमा थे।

बेचारे सादगी पसन्द औऱ सीधे साधे मुसलमान धारीदार यमनी कपड़े पहने हुए उसकी ख़िदमत में हाज़िर हुए। उसने उन पर हेक़ारत की एक नज़र डाली औऱ पूछा क्यों आये हो ? सफ़ीरों के सरदार-नोमान बिन मुक़रिन ने कहा , हम आपको इस्लाम की तरफ़ दावत देने आये हैं। हमारा उसूल है कि हम दुश्मन से लड़ने से पहले तीन चीज़ें उसके सामने पेश करते हैं। कुबूले इस्लाम , जज़ीया , या जंग। बेहतर है कि आप इस्लाम कुबूल फ़रमां लें और तमाम झगड़ों से निजात हासिल कर लें।

यज़दजुर्द को मुसलमानों की इस जुराअत व हिम्मत पर सख़्त तअज्जुब हुआ। और वह बोला कि पहले तो तुम से ज़्यादा हक़ीर और पस्त कोई क़ौम न थी और आज यह दावे हैं। क़ैस बिन ज़रारा ने कहा , आपकी बातें दुरुस्त , मगर खुदा ने हम पर हस्ब व नस्ब में हमसे मुम्ताज़ पैग़म्बर भेजा और जो दीन हमें दिया वह सच्चा और निजात दिलाने वाला है। वही दीन हम आपके सामने पेश करते हैं। अब इसे कुबूल कीजिये वरना जज़ीया दीजिये। अगर इनमें से कोई बात क़ाबिले कुबूल नहीं है तो तलवार के फ़ैसले पर तैयार हो जाइये। यह सुन कर यजदुजर्द सख़्त नाराज़ व बरहम हुआ और मिट्टी का एक टोकरा आसिम बन अमरु के सर पर रखवा कर उन्हें वापस कर दिया। उन्होंने साद के पास वापस आकर कहा , फतेह मुबारक हो , दुश्मन ने ख़ुद ही अपनी ज़मीन हमें दे दी है।

इस वाक़िये के बाद भी रुस्तम साबात में पड़ा रहा और लश्करे इस्लाम ने जिसकी तादाद अब तस हज़ार से ऊपर हो चुकी थी कादसियचा के नवाह में लूट खसोट मचा दी। वहां की रेआया ने दरबारे ईरान में जब फ़रयाद की तो रुस्तम को आगे बढ़ने का हुक्म हुआ। चुनानचे उसने एक लाख बीस हज़ार की फ़ौज और 33 हाथियों के साथ साबात से चब कर हीरा में पड़ाव ड़ाला और वहां से कैच करके दूसरे दिन क़ादसिया आ गया। वहां उसने अपना एक क़ासिद भेज कर मुसलमानों से दरियाफ़्त किया कि अब क्या चाहते हो ? जवाब मिला , इस्लाम , जज़ीया या तलवार जैसा कि यज़दुजर्द से कहा गया था।

इस्लाम औऱ जज़ीया पर रुस्तम राज़ी न हुआ इसलिये उसके सामने जंग के अलावा कोई रास्ता न था। चुनानचे उसने जंग का एलान कर दिया। इस्लामी अफ़वाज ने भी अपनी साफ़ बन्दी की और माहे मोहर्रम सन् 14 हिजरी बरोज़ड दो शन्बा ज़ोहर के वक़्त लड़ाई शुरु हो गयी। हंगामे कारज़ार दूसरे या तीसरे दिन हज़रत उमर की हिदायत पर हाशिम बिन अतबा भी शाम से दस हज़ार का लश्कर लिये हुए आ धमके. इस मौक़े पर साद बिन अबिविकास अरकुन्निसा के मर्ज़ में मुबतिला हो गये थे लेहाज़ा उन्होंने ख़ालिद बिन अरफ़ता को अपनी जगह सिपेह सालार बना कर मुक़ाबिले के लिये फेज दिया और ख़ुद एक महल पर बैठ कर लड़ाई देखने लगे। “ एक पर एक ” की जंग में मुसलमान ईरानियों पर ग़ालिब रहे। उसके बाद जंगे मग़लूबा शुरु हुआ। मुसलमानों के घोड़े भड़के सवारों ने भी अपने घोड़ों को ख़ैरबाद कहा और तलवारें ले लेकर पैदल ही दुश्मन की सफ़ में घुस गये और मारते काटते रुस्तम के तख़्त तक पहुंच गये। उसने जब यह हाल देखा तो तख़्त छोड़ कर घोड़े पर बैठा और काफ़ी देर तक लड़ता रहा। आख़िर कार ज़ख्मों की ताब न लाकर भागा और दोपहर के वक़्त दरिया में कुद पड़ा। हिलाल नामी एक मुसलमान सिपाही उसका काम तमाम करके उसके तख़्त पर चढ गया। और पु्कार कर कहा कि हमने रुस्तम का ख़ातमा कर दिया है। यु सुनना था कि ईरानी भाग निकले। मुसलमानों ने दूर तक उनका तअक्कुब करके हज़ोरों को फ़ना के घाट उतार दिया।

सत्तर हज़ार दीनार का रुस्तम का कमर बन्द औऱ एक लाख दीनार की मालियत का उसका ताज हिलाल को दिया गया। औऱ दरफ़िश कावियानी (परचम) जो ज़रार बिन ख़ताब ने लूटा था , उससे तीस हज़ार दीनार का ख़रीदकर माले ग़नीमत में शामिल कर लिया गया। यह परचम जवाहरात से मुरस्सा था और बकौल इब्ने ख़लदून उसकी असल क़ीमत तक़रीबन दस लाख दीनार थी। साद ने माले ग़नीमत का ख़ुम्स दरबारे ख़िलाफ़त में रवाना किया जिसमें बे इन्तेहा नक़दी , जवाहारात , सोने चान्दी के बरतन , ज़रबफ़त के लिबास , घोड़े ख़च्चर औऱ हथियार शामिल थे। इस लड़ाई में साढ़े आठ हज़ार मुसलमान और एक लाख के करीब ईरानी मारे गये जिसें रुस्तम और जालीनूस दोनों शामिल थे। मौलवी अमीर अहमद का कहना है कि यह लड़ाई मार्च सन् 636 में हुई।

फ़तेह मदायन

क़ादसिया की जंग से “ कलदिया ” और “ ईराक़ अरब ’ की क़िस्मतों का अमली तौर पर फ़ैसला हो गया। कलदिया (सवाद) पर बग़ैर किसी मज़ाहेमत व मुख़ालिफ़त के फिर मुसलमानों का क़बज़ा हो गया। जंगे क़ादसिया के दो महीने बाद तक हज़रत उमर के हुक्म से साद वहीं मुक़ीम रहे और मुज़ाफ़ाते हीरा के क़रयों की तरफ़ रवाना हुए जहंक क़ादसिया से भाग कर ईरानियों ने क़याम किया था और जहां उनके नामी गिरमीं सरदार फ़ीरज़ान , रहमज़ान और महरान अपनी फ़ौजें लिये पड़े थे। बाबुल पहुंचकर ईरानियों से जंग हुई। ईरानियों ने शिकस्त खाई। मेहरान मदायन की तरफ , हरमिज़ान एहवाज़ की तरफ़ और फीरज़ान नेहादन्द की तरफ़ अपनी अपनी फ़ौजें लेकर भाग खड़े हुए।

इसके बाद साद ने कूसी और साबात फ़तेह करके मदायन पर चढ़ाई का इरादा किया और अपनी तमाम फौजें बहराशेर में मुजतमा की। मोअर्रेख़ीन ने इस फ़ौज की तादाद साठ हज़ार बताई है।बहराशेर के बारे में कहा जाता है कि यहां एक शेर पला हुआ था। जो बादशाहे ईरान से बेहद मानूस था। जब इस्लामी फौजें यहां पहुंची तो वह पड़प कर निकला मगर हाशिब बिन अतबा ने एक ही वार में इसका काम तमाम कर दिया। बहरहाल साद का लश्कर उस मुक़ाम पर दो माह दस दिन तक मुक़ीम रहा। इसका सबब यह था कि बहरा शेर और मदायन के दरमियान दरियाये दजला हाएल था और ईरानियों ने मेहरान के साथ मदायन में दाख़िले के बाद इसके पुलों को तोड़ दिया था। आख़िरकार एक दिन नमाज़ सुबह के बाद मुसलमानों ने दजला के पानी में अपने घोड़े डाल दिये और हाथ पैर मारते हुए उसे पार कर गये। ईरानी बे सर व सामानी की हालत में मदायन छोड़े कर हलवान की तरफ़ भागे। यज़दजुर्द ने माल व मता समैत अपने ख़ानदान को पहले ही हलवान की तरफ़ मुन्तक़िल कर दिया था , उसने जब मुसलमानों के आने की ख़बर सुनी तो ख़ुद भी भागकर हलवान में मुक़ीम हो हया। आख़िरकार अहले शहर ने जज़ीया देना कुबूल करके अपने को बचाया। उसके बाद साद क़सरे अबीज़ में (जहां शाही ख़ानदान के अफ़राद रहा करते थे) दाख़िल हुए और सरबराह की हैसियत से इसी शाही महल में क़याम किया। जाबजां से माले ग़नीमत इकट्ठा करके एक जगह जमा किया गया। उसमें बड़ी बड़ी नादिर व अजाएब रोज़गार चीज़ें थीं। एक सोने का घोड़ा था जिस पर चांदी का ज़ीन कसा हुआ था। उसकी पेशानी पर याकूत व ज़मर्रुद जड़े हुए थे। उसका सवार चांदी का था मगर वह भी हीरे जवाहेरात से लदा हुआ था। एक चांदी की ऊँटनी थी जिसकी पुश्त पर सोने का कजावा था और उसकी मेहार में बेश क़ीमत जवाहेरात पिरोये हुए थे। उसका सवार भी सोने का था और सर से पांव तक जवाहेरात से मुरस्सा था। मोअर्रिख़ अबुल फ़िदा का बयान है कि सोने चांदी और मुख़्तलिफ़ क़िस्म के साज़ों सामान की क़ीमत का अन्दाज़ा लगाना मुश्किल था। तबरी वग़ैरा ने लिखा है कि यह माल तीन अरब दीनार का था। खुम्स निकालने बाद साठ हज़ार फ़ौजियों में तक़सीम हुआ और हर एक के हिस्से में बाराह हज़ार दीनार आये। ख़ुम्स जो दरबारे ख़लिफ़त में भेजा गया उसमें एक फ़र्श भी था जिसका नाम थआ बहारिस्तान और जो 60x60 गज़ में अनवा व अक़साम के जवाहारात से बना हुआ था। शाहाने फ़ारस ख़ज़ां के मौसम में उससे मौसमे बहार का काम लेते थे और उसे बिछाकर उस पर शराब पीते थे। खुम्स का माल नौ सौ ऊँटों पर लाद कर बशीर बिन ख़सासिया के ज़रिये मदीना रवाना किया गया था।

तबरी वग़ैरा का कहना है कि मदायन की लूट के मौक़े पर बाज़ सिपाहियों को देखा गया कि वह सोने और चांदी में तमीज़ न कर पाते थे और बाज़ार में आवाज़ लगाते थए कि कोई शख़्स हमारे ज़र्द ताल को (जो सोने का होता था) सफ़ेद थाल जो (चांदी) से बदल ले।

उसके बाद हज़रत उमर ने साद बिन अबीविकास को मदायन की मक़बूज़ात का मुतावल्ली मुक़र्रर किया और हुज़ैफ़ा यमानी मक़बूज़ाते साहिले फ़ुरात के ख़िराज पर नीज़ उस्मान बिन हनीफ दजला के साहिल पर ख़िराज की वसूलियाबी पर मामूर किये गये।

साद बिन अबीविक़ास ने जलूला , तकरीत और मूसल के फ़तेह होने नीज कूफ़ा के बससाये जाने तक मदायन में क़याम किया। फ़तेह मदायन से दरियाये दजला का तमाम मग़रिबी इलाका मुसलमानों के क़बजे व तसल्लुत में आ गया।

जनाबे शहर बानों का वाक़िया

बाज़ मोअर्रेख़ीन मसलन वाक़दी वग़ैरा ने फ़तेह मदायन के असीरों में हज़रत शहर बानों बिन्ते यज़दोजुर्द मादरे इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलै 0 का दरबारे ख़िलाफ़त में आना भी तहरीर किया है जो मेरे नज़दीक ग़लत है। क्योंकि जिन मोअर्रेख़ीन ने फ़तेह मदायन के मौक़े पर शहर बानों का आना मरकूम किया है उन्होंने यह हिकायत भी लिखी कि “ जब हज़रत शहर बानों उमर के सामने पेश की गयीं तो आपने हुक्म दिया कि इस के तमाम ज़ेवरात उतार लो। चुनानचे एक शख़्स जब ज़ेवरात उतारने के लिये आगे बढ़ा तो जनाबे शहर बानों ने उसके मुंह पर एक ऐसा घूंसा मारा कि वह औंधे मुंह ज़मीन पर उलट गया। ” उमर ने ग़बनाक़ हो कर कहा कि इस लड़की से इस घूंसे का क़ेसास लिया जाये लेकिन हज़रत अली अलै 0 ने फ़रमाया कि उमर क्या तुझे मालूम नहीं कि रसूल उल्लाह स 0 ने तीन शख़्सों पर रहम करने को कहा हैं उमर ने पूछा किस पर ? फ़रमाया किसी क़ौम के इज़्ज़तदार पर जो ज़लील हो गया हो। दूसरे किसी क़ौम के अमरी पर जो फ़क़ीर हो गया हो और तीसरे उस आलिम पर जिससे लोग मसख़रा पर करतो हों। यह लड़की अपनी क़ौम में सबसे ज़्यादा इज़्ज़तदार औऱ अमीर है जो इस वक़्त ज़लील व फ़क़ीर की हैसियत से तेरे रुबरु खड़ी है। यक़ीनन क़ाबिले रहम है। हज़रत उमर ने माफ़ कर दिया और पूछा कि इस दुख़्तर को किसे दूं ? उस वक़्त देखा जनाबे शहर बानों दुज़दीदा निगाहों से हज़रत इमाम हुसैन अलै 0 की तरफ़ देख रही हैं। यह देख हज़रत उमर ने कहा कि इसने तो अपना शौहर ख़ुद ही पसन्द कर लिया। चुनानचे उन्होंने शहर बानों को मय ज़ेवरात के इमाम हुसैन अलै 0 के नज़र कर दी। “

यह मज़कूरा हिकायत मोअर्रेख़ीन के ज़हनी एख़्तेरा का नतीजा मालूम होती हैं क्योंकि यड़दजुर्द रबीउल सन् 11 हिजरी (सन् 632) में तख़्त नशीन हुआ। उस वक़्त उम्र अंग्रेज़ मोअर्रेख़ीन के बयान के मुताबिक़ 15 साल की और अरब मोअर्रेखीन के मुताबिक 21 साल की थीं। मदायन बइत्तेफाक़े मोअर्रेख़ीन सन् 16 हिजरी यानी सन् 636 में फ़तेह हुआ। उस वक़्त यज़दजुर्द की उम्र 20 या 26 सा से ज़्यादा नहीं हो सकती। अगर जनाबे शहर बानों को यज़दजुर्द की पहली औलाद मान लें यह भी फ़र्ज़ कर लें कि वह यज़दजुर्द की 18 या 19 बरस की उम्र में पैदा हुई तो फ़तेह मदायन के मौक़े पर उनकी उम्र 7 या 8 बरस से ज़्यादा नहीं हो सकती। इमाम हुसैन अलै , की विलादत बिलइत्तेफाक़ मोअर्रेख़ीन शाबान सन् 4 हिजरी में वाक़े हुई। इस हिसाब से फ़तहे मदायन के वक़्त आप की उम्र पौने बाराह बरस की थी। फिर इश रिवायत के मुताबिक़ जनाबे शहर बानों ऐसी थीं कि उनके एक घूंसे से एक मर्द उलट गया तो उनका ग्यारह बाहर साल के मच्चो को अपनी शौहरी के लिये के पसन्द करना क्योंकर क़रीन क़यास हो सकता है। औऱ अगर वह सात या आठ बरस की थीं तो एक नाबालिग और कमसिन लड़की से हज़रत उमर का क़ेसास लेना चे मानी दारद ? लेहाज़ा ये रिवायत ग़लत है और दुरुस्त यह है कि हज़रत शहर बानों सन् 36 हिजरी या सन् 37 हिजरी में हज़रत अली अलै 0 के अहदे ख़िलाफ़त में खुरासान से लाई गयीं थी।

जंगे जलूला

मदायन की शिकस्त के बाद ईरानियों ने जलूला में जंग की तैयारियां की और आज़र बाइजान , बाब और जबाल से फ़ौजी इमदाद हासिल करके एक बड़ा लश्कर जमा किया जिसका सरदार मेहरान राज़ी मुक़र्रर हुआ। शहर के चारों तरफ़ ख़ंदख़ें तैयार की गयी और रास्तों व गुज़रगाहों पर गोख़रु नुमा लोहे की कीलें बिछा दी गई। साद बिन अबीविक़ास ने ख़लीफ़ा को सूरते हाल मे सुत्तेला किया। जवाब आया कि हाशिम बिन अतबा को बारह हज़ार की जमीयत के साथ मुक़ाबिले पर रवाना करो औऱ मुक़द्दमुतल जैश पर क़का़ बिन अम्र को अफ़सर मुक़र्रर करो और बाद फ़तेह क़ाक़ा को सवाद व जबाल के दरमियानी इलाकों पर वाली बना दो।

हाशिम बिन अतबा ने अस्सी रोज़ तक जलूला का मुहासिरा जारी रखा। इस मुहासिरे के दौरान ईरानी वक़तन फ़वक़त निकल कर मुक़ाबिला करते रहे। आख़िरी लड़ाई इन्तेहाई सख़्त थी क्योंकि उस रोज़ ऐसी आंधियाँ चलीं कि बिल्कुल अंधेरा हो गया। अहले फ़ारस मजबूर होकर पीछे हटे लेकिन गर्दो गुब्बार की वजह से कुछ सुझाई न देता था। हज़ारों ख़ंदक़ में गिर गिर कर मर गये। ईरानियों ने जब यह हाल देखा तो उन्होंने खंदक़ पाट कर रास्ता बना लिया और अपने बचाव की तदबीर को ख़ुद ही ग़ैर मुस्तहकम कर दिया क्योंकि मुसलमानों ने इसी रास्ते से उन पर हमला कर दिया। यह हमला ऐसी सख़्त था कि ईरानियों के पांव उखड़ गये और वह उस तरफ़ भागने लगे जिस तरफ़ उन्होंने रास्तों में गोख़री नुमा कीलें बिछाई थीँ। नतीजा चह हुआ कि घोड़े ज़ख़्मी हो गये और वह प्यादा हो गये। मुसलमानों ने उन्हें गोख़रुओं पर दौड़ा दौड़ा कर मारना शुरु किया। एक लाख ईरानी मारे गये। यज़दजुर्द हलवान से रै की तरफ़ भाग खड़ा हुआ और क़ाक़ा ने हलवान पर क़बज़ा कर लिया औऱ करोड़ों का माले ग़नीमत हाथ आया।

फ़तेह तिकरीत व मूसल वग़ैरा

इस जंग के बाद तमाम अजम की आंखे खुल गयी और हर सूबे न अलग अलग अरबों के मुक़ाबिले में जंग की तैयारियां शुरु कर दें। चुनानचे सबसे पहले अहले जज़ीरा ने जिनकी सरहदें इराक़ व अरब से मुलहिक़ थीं , सर उठाया। साद ने अपने मातहत अफ़सरों की सरकिरदगी में फ़ौजें रवाना कीं। उन्होंने अबदुल्लाह बिन मोहतम को तक़रीत और मूसल पर , ज़रार बिन ख़त्ताब को मासिन्दान पर और उमर बिन मालिक को हीत व क़रकीसिया पर मुसल्लत कर दिया और उन लोगों ने यह तमाम इलाक़े फ़तेह कर लिये। उसके बाद सन् 17 हिजरी में अहले जज़ीरा ने रोमियों को हम्स फ़तेह करने की तरग़ीब देकर बुलाया तो मुसलमानों ने जज़ीरा व आमीनिया के बहुत से इलाक़े फ़तेह कर लिये।

फ़ारस पर लश्करकशी

हज़रत अबुबकर के ज़माने में अला हज़रमीं बहरैन के आमिल थे। हज़रत उमर ने उन्हें माजूल करके क़दामा बिन मज़ऊन को मामूर कर दिया था मगर सन् 15 हिजरी में अला को बहाल कर दिया। अला हर मामले में साद की तरफ़ से अपने दिल में हसद रखता था। चुनानचे क़ादसिया की जंग में साद जब कामयाब हुए तो अला को सख़्त रश्क पैदा हुआ और उसने हज़रत उमर की इजाज़त के बग़ैर अपनी फ़ौज़ें अपने मातहत अफ़सरों के जरिये समन्दर की राह से बिलादे फ़ारस में उतार दें। असतख़र के क़रीब ताऊस के मुक़ाम पर जंग हुई। अला के दो सरदार “ जारुद ” और “ सवार ” मारे गये और सख़्त फ़ौजी नुक़सान हुआ। हज़रत उमर को अला की इस हरकत का पता चला तो वह सख़्त बरहम हुए और अतबा बिन ग़रवान को जो सन् 14 हिजरी “ फ़तेह अबल्ला ” के वक़्त “ ख़रीबा ” में (जहां बाद में बसरा आबाद किया गया) मुक़ीम था , लिखा कि फ़ौरन एक लश्करे जर्रार मुसलमानों को बचाने के लिये फ़ारस की तरफ़ फेज दो , और अला को यह तहदीद हुक्म दिया कि तुम बहरैन से अपनी सारी फ़ौज ले कर सादबिन अबीविक़ास के पास चले जाओ। अथबा ने अबु सबरा बिन अबी रहम के मातहत बाराह हज़ार फ़ौज फ़ारस की तरफ रवाना कर दी। अहवाज़ क़रीब ईरानियों से जंग हुई। ईरानियों ने शिकस्त खाई। चूंकि आगे बढ़ने का हुक्म न था इसलिये मुसलमानों को रेहाई दिलाकर बसरा की तरफ़ मराजियत की।

फ़तहे अहवाज़ शोसतर वगै़रा

ईरानियों का सरदार हरमिज़ान क़ादसिया से भाग कर अहवाज़ चला आया था और उसने तसतर (शोस्तर) को अपना दारुल हुकूमत बना लिया था। चूंकि उसकी सरहद बसरा से मिली हुई थी औऱ बग़ैर उसको फ़तेह किये बसरा में अमन का क़याम मुम्किन नहीं था इसलिये साद बिन अबीविकास ने कूफ़े और बसरा से फौजें भेज कर अहवाज़ व शोस्तर पर चढ़ाई की। इस फ़ौज ने उन इलाकों को फ़तेह करके उन पर अपना तसल्लुत क़ायम कर लिया। हरमिज़ान ने इस शर्त पर अपने को हवाले कर दिया कि उसे दरबारे ख़िलाफ़त में भेज दिया जाये और हज़रत उमर जो फ़ैसला मुनासिब समझे वह करें। चुनानचे उसे अनस बिन मालिक और अहनफ़ बिन क़ैस की निग़रानी में हज़रत के पास भेज दिया गया। हज़रत उमर ने पूछा कि तुमने जो बदअहदी की है इसके बारे में हम से सज़ा की क्या उम्मीद करते हो। हरमिज़ान ने कहा कि मुझे अन्देशा है कि बताने से पहले ही तुम मुझे क़त्ल कर दोगे। हज़रत उमर ने कहा ऐसा नहीं होगा। उसने पानी मांगा जब पानी आया तो हाथ में कूजा लेकर उसने कहा कि हो सकता है कि इसे पीने से पहले तुम पानी न पी लोगे तुम्हें क़त्ल नहीं किया जायेगा। ये सुनकर कूज़ा उसने हाथ से रख दिया औऱ कहा कि अब मैं पानी नहीं पीता और इस शर्त के तहत तुम मुझे क़त्ल भी नहीं कर सकते क्योंकि जब तक मैं पानी नहीं पियूंगी तुम्हारी अमान में हूँ। अब तो हज़रत उमर सटपटाये औऱ कहने लगे तू झूठ कहता है। अनस बिन मालिक ने कहा , यह सच कहता है। आपने फ़रमाया है कि जब पानी नहीं पी लोगे उस वक़्त तक क़त्ल नहीं किये जाओगे औऱ लोगों ने भी अनस कगे क़ौल की ताईद की। तब उमर ने कहा कि तुमने मुझे धोका दिया लेकिम मैं धोका नहीं दूंगा , अब बेहतर है कि तुम मुसलमान हो जाओ। उसने कहा मैं पहले ही मुसलमान हो चुका हूं। यह कहकर उसने कलमये तौहीद पढ़ा और हज़रत उमर खुश हो गये। मदीने में रहने की उसको जगह दी और दो हज़ार दिरहम सालाना वज़ीफ़ा मुक़र्रर कर दिया।

जंगे नेहावन्द

जंगे जलूला के बाद यज़दजुर्द “ रय ” की तरफ़ भाग गया था। लेकिन वहां के रईसों ने उसकी इज़्ज़त व तक़रीम नहीं की इसिलये वह वहां ठहर न सका और असफ़हान व किरमान होता हुआ उसने खुरासान के एक मुक़ाम “ मख़ ” में उसने अक़ामत इख़्तियार की और वहां एक आतिश कदा बनवाकर इत्मेनान से रहने लगा। वह समझ रहा था कि मुसलमानों की फ़तुहात का सिलसिला सरहदी मुक़ामात पर तमाम हो जायेगा। लेकिन जब उसको यह मालूम हुआ कि इराक़ के साथ खुरासान भी हाथ से जाता रहा और हरमिज़ान जो हुकूमत का एक अहम सतून था , जिन्दा गिरफ़्तार कर लिया गया तो तैश मैं आकर लश्कर की फ़राहमीं में मसरुफ़ हुआ और इतराफ़ व जवानिब के उमराये मुमालकि से इसने इमदाद तलब की। चुनानचे दफ़तन तबरिस्तान , जरजान , सिंध , खुरासान , असफ़हान और हमदान में फिर से मुसलमानों के ख़िलाफ एक नया जोश पैदा हुआ और डेढ़ लाख की टिड्डी दल फ़ौज नहावन्द की तरफ़ बढ़ी। अब्दुल्ला बिन अतबान को गवर्नर कूफ़ा ने ख़लीफ़ा को ख़बर दी। हज़रत उमर ने अपने जाने के बारे में अकाबरीने हुकूमत का ख़्याल मालूम करना चाहा। कुछ लोगों ने जाने के लिये और कुछ ने लश्कर भेजने के लिये राये दी औऱ कुछ ने कहा कि शाम , यमन और हिजाज से फौज़ें भेजना मुनासिब होगा। सभी के मुख़लिफ़ मशविरे सुन्ने के बाद हज़रत अली अलै 0 ने फ़रमाया कि अगर अहले शाम को इस मुहिम में भेजा गया तो रोमी शाम पर हमला कर देंगे। अहले यमन को भेजियेगा तो हब्शा वाले उस पर काबिज हो जायेंगे। हिजाज़ से भेजियेगा तो इतराफ़ के अरबों से पीछा छुडाना मुश्किल हो जायेगा और अगर आप खु़द मुकाबिले के जायेंगे तो आपकी हालत देख कर उनके दिलों से आपका रोब और हैबत जाती रहेगी और वह पंजे झा़ड़ कर आपके पीछे पड़ जायेंगे बेहतर होगा कि बसरा और कुफ़े ही के लोग ईरानियों के मुक़ाबिले में सफ़ आरा हों , कसरत और क़िल्लत का ख़्याल महज बुजुदिली की दलील है। हज़रत उमर ने हज़रत अली अलै 0 ही के मशविरे पर अमल किया। चुनानचे नेमान बिन मुक़रिन जिनके साथ उस वक़्त अहले कूफ़ा का एक बड़ा गिरोह था , सरदारे लश्कर मुक़र्रर हुए और उनकी मातहती में कूफ़े व बसरा से तीस हज़ार की जमीयत ईरानियों के मुक़ाबिले में रवाना हुई। औऱ मदीने से भी अब्दुल्लाह बिन उमर की क़यादत में पांच हज़ार का एक मुसल्लह दस्ता भेजा गया। उसके अलावा हज़रत उमर ने उन फौज़ों को जो इलाक़ों अहवाज़ में थी , लिखा कि वह असफ़हान व फ़ारस के ईरानियों को मशगूल रखे़ं ताकि वह अहले नहावन्द की मदद को न पहुंच सकें। इस जंग में अब्दुल्लाह बिन अमरु , जरीर बिजली , मुग़ीरा बिन शेबा , अमरु बिन माद यकरब औऱ तलीहा वगै़रा बड़े बड़े सहाबी शामिल हुए।

गर्ज़ कि नेमान बिन मुक़रिन ने नहावन्द से 6 मील के फ़ासले पर वाक़े असीदहान नामी एक मुक़ाम पर पड़ाव डाल दिया। दूसरी तरफ से ईरानी लश्कर आगे बढ़ा और नहावन्द से मुलहिक़ कोहे अलबर्ज़ के दामन में ऐसी खूरेंज जंग हुई कि जिसने ईरान की तक़दीर का फ़ैसला कर दिया। मगर ठीक उस वक़्त जब मुसलमान फ़तेह का परचम लहरा रहे थे , नेमान बिन मुकऱिन जो ज़ख़्मों से चूर चूर हो चुका था , एक तीर खाकर घोड़े से गिरा और जां बहक हो गया और उसकी जगह हुज़ैफा यमानी सरदारे लश्कर हुए। नहावन्द के मारके औऱ तअक्कुब में एक लाख से ज़्यादा ईरानी मारे गये।

फ़तेह नहावन्द के बाद हुज़ैफ़ा ने वहीं क़याम किया। खुम्स निकाल कर जो माले ग़नीमत फ़ौज में तक़सीम हुआ उसमें सेसवारों को छः छः हज़ार औऱ प्यादों को दो दो हजार दीनार मिले। खुम्स जो दरबारे ख़िलाफ़त में भेजा गया था उसके साथ दो संदूक भई जवाहारात से भरे हुए थे जो केसरा परवेज़ ने नहावन्द के अज़ीमुश्शान आतिश कदा के मोबद हरबिज़ के पास अमानत रखवाये थे मोबिज़ ने जांबख़्शी के वादे पर हुज़ैफ़ा को बता दिया था।

फ़तहे नहावन्दे के बाद मुसलमानों ने दीनवर , हमदान , असफ़हान , रय , क़ोमस , जरजान और आज़र बाइजान वगै़ार पर मुख़्तलिफ़ जरनैलों की क़यादत में फ़तेह हासिल की और उनसे मुतअल्लिक दीगर इलाक़ों पर भी अपना तसल्लुत जमा लिया।


फ़तेह ख़ुरासान

फ़तहे जलूला के बाद यज़दजुर्रुद रय की तरफ़ चला गया था मगर वहां के मर्ज़बान आबान जादू ने उसकी तरफ़ कोई तवज्जो न दी तो वह कबीदा ख़ातिर हो कर असफ़हान गया। वहं भी फतूहाते इसलामी ने चैन से बैठने न दिया तो किरमान की तरफ़ आया और वहां से निकल कर उसने मरव में क़याम किया और यहां आतिश कदा बना कर रहने लगा। एहनिफ़ बिन कै़स ने सन् 18 हिजरी या सन् 22 हिजरी में ख़ुरासान पर चढ़ाई की औऱ तिबसीन होते हुए हरात पहुंचे और उसे लड़कर फ़तेह किया। इसके बाद वह मरव की तरफ़ बढ़े और नेशापूर की तरफ़ मुतरिब बिन अब्दुल्लाह नीज़ सरख़िस की तरफ़ हारिस बिन हसान को रवाना किया। यज़दजुर्द मुसलमानों की इस चढ़ाई का हाल सुनकर मरद शाहजान से भाग कर मरुज़ूद (मरुचक) की तरफ़ चला गया और एहनिफ़ ने बड़ी आसानी से मरव शाहजान पर क़बज़ा कर लिया। फिर उन्होंने मरुज़ूद पर चढ़ाई की। यज़दजुर्द यहां से बालिग़ भागा। एहनिफ़ बलिग़ पर भी चढ़ गये औऱ यज़दजुर्द शिकस्त खाकर वहां से भागा तो दरिया अबूर करता हुआ ख़ाक़ान तुर्क की हुकूमत में पहुंच गया। औऱ एहनिफ़ ने फ़़ौजें भेज कर ख़ूरासान को नेशापुर से तख़ारिस्तान तक फ़तहा कर लिया।

यज़दजुर्द ख़ा़क़ान तर्क के पासर पहुंचा तो उसने बड़ी आव भगत की औऱ एक फौज कसीर लेकर उसके हमराह ख़ुरासान की तरफ रवाना हुआ। यज़दजुर्द के हमराह आने का हाल मालूम हुआ तो वह अपनी फ़ौजे 7 लेकर मरुजूद पहुंच गये। ख़ाक़ान बलख़ होतो हुआ मरुजूद पहुंचा और यज़दजुर्द उससे अलाहिदा होकर मरव शाहजान की तरफ़ बढ़ा। एहनिफ़ के पास सिर्फ़ बीस हज़ार की लश्कर था लोहाज़ा उन्होंने खुले मैदान में लड़ाई को जंगी मसलहेत के ख़िलाफ़ तसव्वुर किया और नहर अबूर करके एक ऐसे मैदान में सफ़ बन्दी की और ख़ंदकें खोद कर मोर्चे क़ायम किये जिसकी पुश्त पर पहाड़ था। मोअर्रेख़ीन का कहना है कि एक मुद्दत तक फ़रीक़ीन की फ़ौज़ें अपना अपना मोर्चा संभाले पड़ी रहीं मगर जंग की नौबत नहीं आती थी। आख़िरकार एक दिन मुख़ालिफ फौज के तीन नाम गिरामीं तुर्क एहनिफ़ की ज़द में आ गये और उन्होंने उनका काम तमाम कर दिया तो ख़क़ान का जंग की तरफ़ से इरादा बदल गया और वह डेरा ख़ेमा समेट कर अपनी फ़ौज के साथ अपने वतन की तरफञ रवाना हो गये। यज़दजुर्द को जब यह ख़बर मिली तो उस वक़्त वह हारिस बिन नेमान को मरव शाहजान में महसूर किये हुए था। यह ख़बर सुनते ही उसने मुहासिरा तर्क किया और ख़ज़ाना व जवाहारात समेट कर ख़ाक़ान के पास जाने के लिये तैयार हुआ। उसके दरबारियों ने कहा कि तुर्को के एहद व पैमान का कोई भरोसा नहीं इस लिये बेहत होगा कि मुसलमानों से सलह कर ली जाये क्योंकि वह मुहाइदा औऱ वादे की पाबन्दी में तुर्कों से अच्छे हैं मगर यजदजुर्द ने उनकी बात न मानी जिसका नतीजा यह हुआ कि वह बलवा करके यज़दजुर्द पर टूट पड़े और उसका सारा माल व मता छीन लिया और वह बे सर व सामानी की हालत में दरिया अबूर करके ख़ाक़ान के पास चला गया और उससे अहद करके हज़रत उमर की ख़िलाफ़त तक तुर्कों के दारुल हुकूमत फरख़ाना में मुक़ीम रहा यहां तक कि हज़रत उस्मान के अहदे ख़िलाफ़त में अहले खुरासान ने बग़ावत की और सन् 31 हिजरी में यज़दजुर्द मारा गया।

ख़ुरासान की फ़तहायाबी के बाद हज़रत उमर ने मुसलमानों को आम लश्कर कशी का हुक्म दिया जिसके नतीजे में उन्होंने क़यामत बर्पा कर दी। तव्वज , असतख़र , किरमान सीसान , मकरान और बूरूज़ वगै़रा में जम कर ख़ून की होली खेली गयी और जो इलाका , जो शहर या जो क़रिया सामने पड़ा उसे लूट कर तबाह व बर्बाद और मिसमार कर दिया।

इऱाक़ व ईरान का बन्दोबस्त

जंगी महिम्मात के ख़ातेमे औऱ बगावतों के फ़रो हो जाने के बाद जब कुछ अमन क़ायम हुआ और मुसलमानों ने सुकून व इतमेनान की सांस ली तो उन्होंने मक़बूज़ा मुमालिक की बहाली और तरक़्की के लिये जद्दो जेहद शुरु कर दी। हज़रत अली बिन अबीतालिब अलै 0 के मशविरे पर हज़रत उमर ने ज़मीनों की पैमाइश कराई , मालगुज़ारी का नया तरीक़ा राएज किया , ज़मीनदारों पर आएद शुदा शाही टैक्स में तरमीम की , आबपाशी के लिये जाबजां नहरें खुदवायीं और काश्तकारों को वक़्त ज़रुरत तक़ावी की फ़राहमीं का इन्तेज़ाम किया। ज़मीनों औऱ जाएदादों की ख़रीद व फ़रोख़्त पर पाबन्दी औऱ उमरा की जाएदादें और उनके आतिश कदों का माल व मता जिन्हें उनके पुजारी छोड़कर भाग गये थे , सरकारी मिलकियत क़रार दिया।

फ़तूहाते मिस्त्र

सन् 18 ता 22

मिस्र का मुल्क अरसे से शाहाने कुसतुनतुनिया के ज़ेरे तसल्लुत चल आ रहा था। ईरानियों और रोमियों के दरमिया इस मुल्क की बाज़याबी के लिये कई बार जंगी झड़पें भी हो चुकी थीं और ईरानियों ने एक दफा उस पर क़बज़ा भई कर लिया था लेकिन रोमियों ने उन्हें मार भगाया। हज़रत उमर के ज़मानये ख़िलाफ़तच में मिस्र पर मकूक़स नामी एक क़िब्ती गवर्नर था। मिस्री ईसाइयों की तरह मज़हब के मामले में मकूक़स भी यूनानी गिरजा के ख़िलाफ़ याकूबी गिरज़ा का मौतकि़द था। जंग फ़ारस की अबतरी के ज़माने में उसने आज़ाद होने की कोशिश की थी। आंहज़रत स 0 ने भी इस्लाम की दावत उसे दी थी और उसने पैग़म्बरे इस्लाम स 0 की ख़िदमत में कुछ तहाएफ़ भी भेजे थे।

इसकंदरिया का मारका

सन् 18 हिजरी में शाम और उसके इतराफ़ में ताऊन की वबा फैली जिसमें मुबातिला होकर 25 हज़ार मुसलमान ज़ाया हो गये। मरने वालों में अबुउबैदा बिन जरा गवर्नर शाम और मेआज़ बिन जबल जो अबुउबैदा के बाद शाम के वाली मुक़र्रर हुए थेष शामिल थे।

ताऊन की वबा जब ख़त्म हुई तो हज़रत उमर मतूफ़ी मुसलमान का तरका तक़सीम करने की ग़र्ज़ से शाम आये। इस मौक़े को ग़नीमत जान कर अमरु आस ने जो मेआज़ के बाद शाम के गवर्नर हुए थे ख़लवत में हजरत उमर से कहा कि आप मुझे मिस्र फ़तेह करने की इजाज़त दे दीजिये। हज़रत उमर ने कहा कि अभी मफ़तूहा इलाकों में मुसलमानों के क़दम ब-ख़ूबी नहीं जमे , ताऊन ने हज़ारों जंग जू बहादुरों का काम तमाम कर दिया है और जितनी भी इस्लामी फौज़ें है वह इराक़ अरब , इराक़ अजम और शाम वगै़रा में मसरुफ़ हैं। ऐसी सूरत में किसी दूसरी तरपञ हमला करना दानिशमंदी के खिलाफ़ होगा। मगर चूंकि अम्र आस ने हज़रत उमर को पीरी तरह यक़ीन दिलाया और कहा कि मिस्र का फ़तेह कर लेना कोई बात नहीं है। इसलिये उन्होंने चार हज़ार सिपाह के साथ मिस्र की तरफञ जाने की इजाज़त दे दी मगर रवानगी के वक़्त यह भी कह दिया गया कि तुम जा तो रहे हो लेकिन जंग छिड़ने या न छि़ड़ने के बारे में हम खुदा से इस्तेख़ारा करेंगे और जो फैसला होगी उससे मुतालिक मेरी तहरीर इन्शाअल्लाह जल्द तुम्हारे पास पहुंच जायेगी। चुनानचे अम्र आस के चले जाने के बाद दूसरे या तीसरे दिन हज़रत उमर ने इस्तेख़ारा किया और उसके बाद उन्होंने ख़त लिखा कि मय हमराहियों के वापस चले आओ। क़ासिद अमरु आस के पास उस वक़्त पहुंचा जब वह शाम की सरहद से मुलहिक़ “ रफ़ा ” नामीं एक गांव में दाख़िल हो चुके थे। अमरु आस समझ गये कि ख़त का मक़सद हुक्मे वापसी के अलावा कुछ भी नहीं है इसलिये उन्होंने उस की वसूलियाबी में ताख़ीर से काम लेते हुए तेज़ क़दम आगे बढ़ाये और सरज़मीने मिस्र की बस्ती अऱीश तक पहुंच गये। वहां उन्होंने क़़ासिद से ख़त वसूल किया और तहरीर के ख़िलाफ़ मुसलमानों को धोका देते हुए कहा कि ऐ मुसलमानों ख़लीफडये वक़्त की इताअत पर आमादा रहो और क़दम आगे बढ़ाओ , अल्लाह मददगार है। ग़र्ज़ की लश्करे इस्लाम यलगार करता हुआ ” फ़रमां ” के मुक़ाम पर पहुंच गया जो मिस्र का एक सरहदी क़िला था। यहां रोमियों से मुडफेड़ हुई और एक माह तक मुक़ाबिला जारी रहा। बिलआख़िर मुसलमानों ने फ़तेह पाई और आगे बढ़े यहां तक कि वह “ बिलबीस ” के मुक़ाम पर पहुंचे। यह भी एक मुस्तहकम जंगी आमाजगाह थी। यहां भी मुसलमानों ने फ़तेह हासिल की। उस मुक़ाम पर मकूक़िस की बेटी रहती थी। अमरु आस ने उसे निहायत इज्ज़त व एहतेराम के साथ मकूक़िस के पास रवाना कर दिया। ज़ाहिर है कि अमरु आस की तरफ़ से हुस्न सुलूक का यह इक़दाम मकूकूस को मूसलमानों की तरफ़ से मुतअस्सिर के लिए काफ़ी था। उसके बाद “ ऐनुल शम्स ” को फतेह करके अम्र आस ने ख़लीफ़ा वक़्त को अपना कारनामों की तफ़सील से आगाह किया। कहां तो हज़रत उमर इस जंग के बारे में हिचकिचाहट और तज़बजुब का शिकार थे औऱ लड़ाई पर राज़ी न थे , कहां फतहेह व कामरानी का मुज़दए ख़ुशगवार सुन कर फ़ौरी तौर पर कुमक भेजने को तैयार हो गये और उन्होंने चार हज़ार सिपाहियों पर मुश्तमिल एक फ़ौजी दस्ता उजलत के साथ रवाना कर दिया। यह कुमक पहुंची तो अमरु आस ने बाबुल के क़िले को घेर लिया जो मकूक़स के दारुल हुकूमत “ मनफ़ ” का अहम जुज़ औऱ जंगी कुवतों का मरकज़े आला सतझा जाता था। मुसलमानों को इस क़िले पर बग़ैर किसी फ़ाएदे के जंग करना पड़ी औऱ इरसे तक फ़रीक़ैन की फ़ौज़ें एक दूसरे पर मौक़े व महल के हिसाब से हमला आवर होती रही। जब इस क़िले की तसखीर में ज़रुरत से ज्यादा ताख़ीर हुई तो अमरु आश ने हज़रत उमर को मज़ीद फ़ौज रवाना करने के लिये लिखा और जुबैर बिन अवाम की मातहती में चार हज़ार की सिपाह फिर आई। इश फ़ौज में मिक़दाद बिने असवद , अबादा बिने सामत और मुसलम बिने मख़लद ऐसे जांबाज़ औऱ बहादुर भी शामिल थे।

अब उमरो आस के पास बारह हज़ार की फ़ौज हो गई थी मगर रुमी अपनी होशियारी से मुसलमानों को क़िले पर दस्तरस की मोहलत नहीं देते थे। जब सात माह इसी तरह गुज़र गये तो एक दिन जुबैर बिने अवाम क़िले के एक पहलू को देख़कर फ़सील पर चढ गये। रुमी दूसरी तरफ़ मुसलमानों के हमले को रोकने में मसरुफ़ थे कि अचानक उन्हें अपनी पुश्त पर नारे तकबीर का दिल हिला देने वाला गुलगुला सूनायी दिया। पलट कर देखा तो उनके सरों पर खून आशाम तलवारें चमक रही थीं। वह जान बचाकर भागे और जुबैर ने फ़सील से उतरकर क़िले का दरवाज़ा खोल दिया। फिर तो सारी फ़ौज किले के अन्दर दाखि़ल हो गयी औऱ रुमी सिपाह क़िले के शाही महल में महसूर होकर मुक़ाबला करने लगी। मकूकस भी उस क़िले में मौजूद था वह वहां से निकल कर जज़ीरे रौज़े की तरफ़ चला गया जो दरयाए नील के वसत में था।

जब मुसलमानों को इस किले पर मुकम्मल तसर्रुफ़ हिसाल हो गया तो मक़ूक़स ने उमरो आस के पास क़ासिद भेज कर सुलह की ख़वाहिश ज़ाहिर की औऱ हस्बे ज़ैल शराएत पर सुलह नामे की तकमील अमल में आयी।

1. तमाम कि़बती दो दिरहम सालाना जज़िया अदा करेंगे।

2. इस जजि़ये से नाबालिग , सिन रसीदा बूढ़े , राहिब , औऱतें और माज़ूर अशख़ास मुसतरना होंगे।

3. हर शहर में मुसलमानों की सुकूनत के लिये एक जगह मख़सूस रखी जायेगी।

4. क़िब्ती मुसलमानों की तीन दिन तक मेहमानदारी करेंगे।

5. जो क़िबतियों की तरह उन शराएते सुलह की पाबन्दी नहीं करेगा वह सिर्फ़ उसी वक़्त तक मिस्र में रह सकता है जब तक मकूक़स क़ैसरे रोम से उस मुआहिदे के बारे में मन्जूरी या मामन्जूरी न हासिल करें। इसके बाद क़िबतियों की मर्दुम शुमारी की गयी तो साठ लाख से ज़्यादा क़िबती जज़िया अदा करने के क़ाबिल दर्ज रजिस्टर किये गये। इश लिहाज़ से फ़तेह की इब्तिदाई मरहलों में जज़िया की मजमूई रक़म एक क़रो़ड़ बीस लाख दीनार क़रार पायी।

जब मकूक़स ने उन तमाम हालात की इत्तिला क़ैसरे रोम को दी तो उसने मकूक़स पर बड़ी लानत ओ मलामत की और लिखा कि तूने ऐसी ज़लील सुलह क्यों की जब कि एक लाख से ज़्यादा रुमी फ़ौज तेरे पास थी। मैं हरगिज़ इस सुलह को तसलीम नहीं करता।

कै़सरे रोम ने इसी तरह के मलामत आमेज़ खुतूत असकंदरिया और दीगर मक़ामात के रुमी सरदारों को भी रवाना किये और उन्हें नई कुमक के साथ मुसलमानों से मुक़ाबले का हुक्म दिया।

क़ैसरे रोम का ख़त देखकर मकूकूस ने अमरु आस से कहा कि मैं तो सुलह कर चुका , अब मेरे लिये अहदे शिकनी मुम्किन नहीं है। किबती क़ौम भी मुहायिदे की पाबन्दी करेगी। उसके बाद रोमी फ़ौजें सिमट कर मुसलमानों से नबर्द आज़माई करती रही और पसपा होती रही यहां तक कि मुसलमानों में असकन्दारिया पर धावा बोल दिया। क़बती मुसलमानों के लिये रास्तो में पुल बनाने और रसद रसानी का काम अंजाम दे रहे थे।

असकन्दरीया का शहर बहरे रोम के साहिल पर वाक़े होने की वजह से बहत मुस्तहकम था। क़ैसरे रोम (हरकुल) बहरी रास्ते से यहां फ़ौजी इमदाद और सामाने जंग व रसद वग़ैरा भेजता रहता था और ख़ुद भी आने को तैयार था मगर इस्तेसक़ा के मर्ज़ में मुबतिला होने की वजह से उसी असमा में मर गया। उसके मरने से रोमियों की कमर टूट गयी और हौसले पस्त पड़ गये। बहुत से रोमी सरदार असकनदरिया छोड़ कर कुसतुनतुनिया की तरफ़ चले गये। इधर मुसलमानों ने मुहासिरे के दैरान हर तरह की सख़्तियां करके रोमियों को तंग कर रखा था औऱ जब मौक़ा मिलता शहर पर हमला आवर होकर दो चार सौ का ख़ातेमा कर देते। यहां तक कि माहे मुहर्रम सन् 20 हिजरी बरोज़ जुमा मुताबिक़ 22 दिसम्बर सन् 640 में मुसलमानों ने दुनिया का सबसे बड़ा , दौलत मन्द और आबद शहर मिस्र 14 माह के मुहासिरे के बाद फ़तेह कर लिया।

मोअर्रेख़ीन का बयान है कि मुसलमानों ने जब असकनदरिया को फ़तेह किया तो उस वक़्त शहर में चार हज़ार अज़ीमुश्शान महल , चार हज़ार हम्माम , चार सौ सैर गाहे , बाहर हज़ार सबज़ी फ़रोशों की दुकानें और चालीस हज़ार जज़िया देने वाले यहूदी मौजूद थे। साहिल पर एक सौ से ज़्यादा बड़े जहाज़ लंगर अन्दाज़ थे जिन पर रोमियों ने अपना माल व असबाब और बाल बच्चे सवार कर रखे थे। उस वक़्त शहर की आबादी का अन्दाज़ा औरतों और बच्चों को छोड़कर पांच लाख किया गया था।

असकन्दरिया का कुतुबख़ाना

अंग्रेज़ मोअऱ्रिख़ एयरविंग का बयान है कि अमरु आस बजाते ख़ुद एक अच्छा शायर और इल्म दोस्त इन्सान था। फ़तेह मसकन्दरिया के बाद वहां के ईसाई आलिम “ यहिया नहवी ” (जान दी गरमैरीन) से उसकी दोस्ती हो गयी। एक दिन यहिया नहबी ने अपने ऊपर अम्र आस का ज़्यादा इल्तेफ़ात देखकर एक ऐसे ख़जाने का पता बताया जो अब तक मुसलमानों की नज़र से पोशीदा था।

यह ख़ज़ाना किताबों का ज़खीरा था जो “ कुतुबखाना असकन्दरिया के नाम से मशहूर था। हिया नहवी ने इस कुतुब ख़ाने का पता बताते हुए अमरु आस से कहा कि यह कुतुबखाना आप मुझे मरहमत फ़रमा दें तो मैं आपका एहसान मन्द और ममनून व मुताशक्किर हूंगा। यहिया की इस दरख्वास्त पर अमरुआस मसझ गया कि यह ज़रुरी कोई बड़ी चीज़ है चुनानचे उसने यहिया से कहा कि मैं पहले ख़लीफ़ये वक़्त से इस अमर की इजाज़त ले लूं उसके बाद आपको दे दूंगा। उसके बाद अम्र आस ने हज़रत उमर को एक ख़त लिखा जिसमें यहिया नहवी की खूबियां बयान करते हुए उन्होंने वह कुतुबख़ाना उसे मरहमत किये जाने की सिफ़ारिश की। हज़रत उमर उन्होंने वह कुतुबख़ाना उसे मरहमत किये जाने की सिफारिश की। हज़रत उमर ने जवाब लिखा है कि अगर ये किताबें कुरआन की हमनवाई करती हैं तो उनकी कोई ज़रुरत नहीं है क्योंकि कुरआन काफ़ी है और अगर कुरआन से मुताबेक़त नहीं रखते तो नुक़सान देह हैं लेहाज़ा हर हाल में उन्हें जाया कर देना चाहिये।

अमरु आस ने ख़लीफ़ा के हुक्म की पूरी पूरी तामील की और अपनी इल्म दोस्ती का यह सुबूत फ़राहम किया कि उसने उन अज़ीम किताबों के अज़ीम सरमाये को शहर के चार हज़ार हम्मामों में भिजवा दिया जो छःमाह तक ईन्धन का काम देता रहा। इस अज़ीम कुतुबख़ाना का बानी टूलीमी सोटीर (बतलीमूस सोतीर) था और यह ब्रोकेवन की एक बड़ी इमारत में क़ायम किया गया था , उसके बाद हर बादशाह उसे तकक़्क़ी देता रहा यहं तक कि उस कुतुबखाने में चार लाख किताबों के नादिर व नायाब नुसख़े जमा हो गये। उसके अलावा तीन लाख किताबें सराप्यन के माबदगाह रखी गयी थीं। बरक्यून का कुतुबख़ाना तो क़ैसर की जंग में नज़रे आतिश हो गया था मगर सराप्यून वाला बाक़ी था और कलू पतरा ने “ परमगस ” का कुतुबख़ाना भी उसी में शामिल कर दिया था जो मार्क अनटोनी ने उसे दिया था औऱ जिसमें दो लाख किताबें थी। इम्तेदादे ज़माने के हाथों इस कुतुबख़ाने को बहाल कर दिया जाता था औऱ कुछ इज़ाफ़ा भी उसमें कर दिया जाता था। चुनानचे जिस वक़्त मुसलमानों ने असकन्दरिया को फ़तेह किया तो कुतुब ख़ाना इली हालत में ता जो बयान की गयी।

शहंशाह जलालुदीन मुहम्मद अकबर के दरबारी क़ाज़ी अहमद बिन नसरुल्लाह ने अपनी तसनीफ़ “ अलफ़ी ” में काज़ी साएद बिन अहमद इन्दीलीमी मतुफ़ी सन् 462 हिजरी की किताब “ तबक़ातुल उमम ” से लक़ल किया है कि हज़रत अली अलै 0 ने जब सुना कि हज़रत उमर ने उन किताबों के जलाने का हुक्म दिया तो आपने एहतेजाजन उमस से फ़रमाया कि किताबों में बेशतर के मज़ामिन कुरआन के मुताबिक हैं बस फ़र्क़ इतना है कुरआन मुजमिल है औऱ हर शख़्स उन मज़ामिन को उससे इस्तेम्बात नहीं कर सकता। और अगर बिलफ़र्ज़ वह किताबें कुरआन के ख़िलाफ़ भी हैं तो भी उनका जलाना दुरुस्त नहीं इसिलये कि हो सकता है वह साबेक़ा शरीयतों पर मुश्तमिल हों और शरीयतों का नज़रे आतिश किया जाना किसी भी तरह जाएज़ न हीं हैं। मगर जनाब उमर पर हज़रत अली अलै 0 की इस गुफ़्तगू का ज़र्रा बराबर भी असर न हुआ और आख़िरकार कितबों का यह अज़ीम ख़ज़ाना उनके हु्क़्म से जला दिया गया। इस वाक़िये को मुतक़द्देमीन में बहुत से ओलमा व मोअर्रेख़ीन ने तहरीर किया है।

फ़तूहात का तक़ीदी जाएज़ा

इस अमर में कोई शक नहीं कि हज़रत उमर के अहदे ख़िलाफत-में इस्लामी फ़तूहात के नामम पर मुल्कग़ीरी और माले ग़नीमत की हवस ने मुसलमानों को अबुउबैदा मबन जराअ , ख़ालिद बिन अबी विक़ास , अमरु बिन आ , जबीर बिन अवाम , अहनफ बिन क़ैस , हाशिम बिन अतबा और यज़ाद बिन अबुसुफियान ऐसे जरनलों औऱ कमाण्डरों नीज़ अफ़सरों की क़यादत में बड़ी बड़ी कामयाबियों से हमकिनार किया और उन्होंने जबर व इस्तेबदाद , जुल्म व तशद्दुद लूट मार , आतिश ज़नी , ख़ंरेजी और क़त्ल व ग़ारत गरी को अपना शोआर बनाकर ग़ैर मुमालिक पर हमला किया , उन्हें अपना गुलाम बनाया और उनकी ज़ाएदादों पर काबिज़ होकर ऐश व आराम की ज़िन्दगी बसरस करने लगे।

अज़ीम फ़ातेहीने आलम की फेहरिस्त में हज़रत उमर का नाम बड़े क़र्रोफ़र से लिया जाता है और फख़रिया अंदाज में कहा जाता है कि आपपके दौर में मफ़तूहा व मक़बूजा मुमालिक के हुद्दे अरबा का रक़बा तक़रीबन दो लाख पच्चीस हज़ार एक सौ तीन मुरब्बा मील पर मोहीत था औऱ आपकी बिसाते हुकूमत मक्का मोअज़्ज़मा से शुमाल की तरफ़ 483 मील , मशरिक़ की तरफ़ 1087 मील औऱ मग़रिब की तरफ़ शाम , मिस्र , इराक़ , आरमीनिया , आजर बाइजान , फ़ारस रोम , ख़ुरामान , किरमान और बिल्लौचिस्तान के कुछ हिस्सों तक फैली हुई थी लेकिन उसके बावजूद उस मफ़तूहा वुसअत पर न तो कोई अकली दलील क़ाएम हो सकती है और न ही उसे इस्लामी व शरयी ज़वियए निगाह से देखा जा सकता है। उसकी वजह है कि जब कोई हक़ पसन्द औऱ नुकता संज वाक़िया निगार उन फ़तूहात पर ग़ौर करेगा तो यह सवाल उसके ज़ेहन में उभरेगा कि हज़रत अबुबकर के बाद पहली सदी के इब्तेदाई दौर में हज़रत उमर अपने वक़्त के हलाकू नादिरशाह और महमूद ग़ज़नवी थे या नाएबे रसूल सल 0? अगर मौसूफ़ अव्वलुल ज़िक्र हैसियत के हामिल थे तो सवाल यह है कि आपके पास वह कौन सा जादू था जिसने चन्द सहरा नशीनों को उभार कर तूफ़ान की तरह फ़ारस व रोम का दफ़्तर उलटने पर मजबूर कर दिया ? आख़िर उसके अलल व असबाब क्या थे ? जब कि दौरे रिसालत के तमाम इस्लामी ग़ज़वात से आपका फ़रार साबित है।

अगर आपको ख़लीफ़यते रसूल स 0 मान लिया जाये तो सवाल ये है कि आपकी यह फ़तूहात किन उसूलों के तहत जाएज़ क़रार पायेगी ? क्या मुल्कगीरी , क़त्ल व ग़ारतगरी , फ़ितना व फ़साद और तबाही व बर्बादी के अलमनाक वाक़ियात किसी दीनी रहबर , रुहानी पेशवा और मज़हबी रहनुमा के शायानेशान हो सकते हैं ? क्या रसूले अकरम स 0 ने इन ज़ालेमाना व जारेहाना इक़दामात की हमनवाई की है ? या किसी मुल्क पर फ़ौजकशी करके उसे तबाह व बरबाद और वहां के अवाम को बेसबब क़त्ल किया है ? क्या किसी और पैग़म्बर , नबी , हादी और दीनी पेशवा ने तबलीग़ व हिदायत की मंज़िलों में मुल्कगीरी के लिये बेगुनाहों के ख़ून से अपने दामन को दाग़दार बनाया है ? क्या अल्लाह की तरफ से अन्बिया व मुरसलीन का तर्ज़े अमल यह था कि जिस मुल्क के लोग ख़ुदा को न मानें , उसकी वहदानियत का इक़रार न करें और उसके दीन को कुबूल न करें तो वह उस पर हमला करके उसे तबाह व बर्बाद कर दें और वहां के अवाम को मौत के घाट उतार दें , उनकी औरतों को बेवा और बच्चों को यतीम कर दें। अगर उन तमाम बातों का जवाब नफ़ी में है तो ग़ैरशरयी थीं और उनका इस्लाम से कोई तअल्लुक़ नहीं था।

फिर हज़रत उमर की उन फ़तूहात को मौसूफ़ का ज़ाती कारनामा भी नहीं कहा जा सकता। इसिलये कि आप फ़रमान रवा ज़रुर थे मगर दैरे रिसालत से लेकर अपने दौर तक न किसी मारके में शरीक हुए न जेहाद के लिये कभी तवलार बुलन्द की। आपने हज़रत अली अलै 0 से अकसर व बेशतर जंगी मशवीरे ज़रुर किये मगर चूं कि आपकी सुजाअत से वह अच्छी तरह वाक़िफ थे इसलिये आपने हमेशा जंग के मैदान में जाने से उनको रोका ताकि रसूल स 0 के बाद इस्लाम के माथे पर शिकस्त का टीक न लग पाये।

दरहक़ीक़त आपके अहद के जंगी कारनामे दौरे रिसलत के उनके नबर्द आज़मा और आज़मूदा कार कमाण्डरों और जरनलों के मरहूने मिन्नत है जिन्हें तक़दीर के चक्कर ने आपके दौरे हुकूमत से मुत्तसिल कर दिया था और जिन्होंने उन फ़तूहात का सेहरा आफके सर बान्ध कर हुकूमत की नमक ख़्वारी का हक़ अदा कर दिया।

इस्लामी तारीख़ के ऐवान में बाज़ मुतास्सिब मोअर्रेख़ीन की यह आवाज़ भी सुनाईदेती है कि हज़रत अबुबकर और हज़रत उमर ने बड़े बड़े मुल्क फ़तेह किये , इस्लाम को वुसअत दी और इसे बामें तरक़्क़ी तक पहुंचाया मगर हज़रत अली अलै 0 ने कोई मुल्क़ फ़तेह नहीं किया न इस्लामी मुमालिक मैं किसी जुज़ का इज़ाफ़ा किया और न ही मुसलमानों के ऐश व इश्ररत का कोई सम्मान किया।

इसका सीधा सा जवाब है कि हज़रत आदम अलै 0, हज़रत नूह अलै 0, हज़रत इब्राहिम अलै 0 यह सब कुछ करते तो हज़रत अली अलै 0 भी यक़ीनन उसकी पैरवी करते। मगर चूंकि उन हादियों और रहबरों ने ऐसा नीहं किया इसिलये हज़रत अली अलै 0 ने भी इस मामले में ख़ामोशी इख़्तियार की क्योंकि आपका शुमार भी उन्हीं हादियों में है जैसा कि आंहजरत सल 0 ने फ़रमायाः

“ जो शख़्स ” आदम अलै 0 को उनके इल्म में , नूहअ 0 को उनके फ़हम में , इब्राहिम अलै 0 को उनके हिल्म में , यहियाअलै 0 को उनके जोहद में और मूसाअलै 0 को उनकी हैबत में देखना चाहे तो उसे लाज़िम है कि हज़रत अली अलै 0 को देखे। “

इस हदीस के ज़ैल में अल्लामा फख़रुदीन राज़ी का कहना है कि “ यह हदीस साबित करती है कि उन सेफ़ात (इल्म , फ़हम , ज़ोहद और हैबत) में हज़रत अली अलै 0 मज़कूरा अन्बिया के बराबर थे। और इसमें कोई शक नहीं कि यह तमाम अन्बिया सहाबा से अफ़ज़ल थे और यह कुल्लिया है कि जो शख़्स अफ़ज़ल के बराबर होगा वह भी अफ़ज़ल होगा। “

आहंज़रत सल 0 ने भी हज़रत अली अलै 0 को अपनी ज़ात के मिसल् क़रार दिया है। फ़रमाते हैं किः

“ हर नबी की कोई मिसाल उसकी उम्मत में ज़रुर होती है और मेरी उम्मत मे मेरी मिसाल अली अलै 0 हैं। “

वाज़ेह हो गया कि हज़रत अली अलै 0 का मर्तबा चूंकि अन्बिया मुरसलीन के मसावी था इसलिया आपके लिये यह मुनासिब नहीं था कि एहकामे इलाहिया के ख़िलाफ कोई क़दम उठाते।

हज़रत अबुबकर के दौर में जो फ़तूहाते जुज़वी तौर पर अमल में आी वह उन्हें क्योंकर नसीब हुई या हज़रत उमर के दौर में सहरा नशीनों ने फ़ारस व रोम का दफ़्तर क्योंकर उलट दिया ? इसका सबब यह है कि उस वक़्त के बद्दुओं और जाहिल अरबों को जहाद का ग़लत मफ़हूम बताया गया और यह बात उनके ज़ेहन नशीं कराई गयी कि ख़लीफ़ये वक्त जिस मज़हब को फ़ना करने का हुक्म सादर करे , जिस क़ौम को तबाह व बर्बाद करने का इशारा करे वहीं दरअसल जेहाद है जिसको ख़ुदा औऱ रसूल स 0 ने हर मुसलमान पर वाजिब किया है। जो शख़्स इस पर अमल करेगा वह बेहिश्त का हक़दार होगा वरना जहन्नुम का मुस्तहक़ क़रार पायेगा। उन्हें यह बावर कराया गया कि अगर कोई काफ़िर शख़्स इस्लाम कुबूल करने से इन्कार करे तो तलवार के ज़ोर से उस पर क़ाबू हासिल करो। उस पर भी कामयाबी न हो तो उसे क़त्ल कर दो और उसका माल व असबाब लूट लो। जाहिल और सादा लोह अरबों को माले ग़नीमत के दाम में भी गिरफ़्तार किया गया और उनके ज़ेहनों पर यह अक़ीदा मुसल्लत कर दिया गया कि एक ऐसा दामे फ़रेब था कि जिसने तमाम मफ़लूकुल हाल और उसरत जडद अरबों को जकड़ लिया और वह ऐश व इशरत की ज़िन्दगी का ख़्वाब देखने लगे। इसकी दलील ईरान पर हमला के दौरान रुस्तम और मुग़ारा के दरमियान होने वाली वह गुफ़्तगू है जिसे तरीख़ ने ज़ब्त कर लिया है चुनानचे रुस्तम ने मुगीरा से पूछा कि तुम लोग हमारे मुल्क में कयों आये हो ? मुग़ीरा ने जवाब दिया कि अल्लाह ने अपने रसूल स 0 कि ज़रिये हमे बड़ी बड़ी नेमतों से सरफ़राज़ फरमाया है और उन नेमतों में से एक नेमत तुम्हारे मुल्क में पैदा होने वाला गल्ला भी है जिसके बग़ैर हम जि़न्दा भी नहीं रह सकते। रुस्तम ने कहा , इस ख़्वाहिश में तुम क़त्ल हो जाओगे। उस पर मुग़ीरा ने कहा कि हमें कोई फिक़्र नहीं है। क्योंकि हम क़त्ल होकर बेहिश्त में जायेंगे औऱ वहां की लज़्ज़तों से लुत्फ़ अन्दोज़ होंगे और अगर बच गये तो तुम हमें जज़िया दोगे।

मुग़ीरा की ग़ुफ़्तगू से साफ़ ज़ाहिर है कि इन फ़तूहात की ग़र्ज़ सिर्फ़ यह थी कि उमदा ग़िज़ायें हासिल की जायें , अच्छले लिबास पहने जायें औऱ दुनिया की तमाम लज़्ज़तों के साथ ऐश व आराम की ज़िन्दगी बसर की जाये।

मुग़ीरा के इन ख़्याल में इतनी पुख़्तगी थी कि उसने ईरानी बादशाह यज़दजर्द को भी वही जवाब दिया जो उसके सिपाह सालार रुस्तम को दिया थआ उसके साथ उसने ख़ुदा के बारे में यह भी कहाः

“ हमारे ख़ुदा ने अपने रसूल स 0 के ज़रिये हम लोगों को हुक़्म दिया है कि जो लोग मज़हब इस्लाम कुबूल न करें उनसे जज़िया लो और अगर वह जज़िया देने से इन्कार करें तो उनसे क़ेताल करो। ”

ला इकराहा फ़िद्दीने के मफ़हूम व मक़सद से बेनियाज़ व बेगाना मुग़ीरा की यह गुफ़्तगू ख़ुदा पर इफ़तरा व बोहतान के मुतरिदिफ़ नहीं है तो फिर क्या है ? इस जंगी मुहिम के दौरान अबरब के मशहूर ख़तीबों ने मैदाने कारज़ार में जो ख़ुतबे दिये उनसे भी साफ़ ज़ाहिर है कि वह मुसलमानों को यह लालच देते थे कि अगर तुम फ़तहयाब व कामयाब हुए तो तुम्हारे लिये माले ग़नीमत की इन्तेहा नहीं है और जैसा कि क़ैस ने अपनी तक़रीर के दौरान कहा कि “ लोगों। घमासान की जंग करो क्योंकि तुम्हार सामने माले ग़नीमत है और पुश्त पर जन्नत। ”

और रबी बिन बिलाद ने कहाः “ ऐ अरब वालों। अपने मजहब और माले दुनिया के लिये जो खोल कर लड़ो। ”

शोअरा भी अपनी नज़मों में उन्हीं ख़्यालात को पिरोकर मुसलमानों के जजबात को बरअगेख्ता करते रहे जिसका नतीजा यह हुआ कि लोगों ने क़स्में खा लीं और मरने मारने पर तुल गये।

यही वह कामयाबी था जो फ़तूहात में ढ़लती गयी औऱ फ़तुहात का सेलाब तमाम इस्लामी उसूलों को कुचलता हुआ आगे बढ़ता गया। फ़ारस व रोम की शिकस्त और तबाही व बर्बादी के अलल व असबाब यह थे कि हज़रत उमर के अहद में उन मुल्कों का सितारा अक़बाल गुरुब हो चुका था और दूसरा फ़रमानें रवां ऐसा नहीं था जो इस दम तोड़ती हुई हुकूमत के पैकर में तवानाईयां भर सके। दरबार के अमाएदीन व अराकीन साज़िशों में मुनहमिक़ थे और साजिशों की बदौलत तख़्ते नशीनों में बराबर तबदीलियत हो रही थीं। चुनानचे तीन ही चार साल के अन्दर छः या सात फ़रमावाओं के हाथों में ज़मामे हुकूमत आई और निकल गयी। दूसरी वजह यह थी कि नौशेरवां से कुछ पहले मजूकिया फ़िर्क़ा काफ़ी ताक़तवर था जो कुफ्र इल्हाद की तरफ़ माएल था। हालांकि नौशेरवां ने तलवार के ज़ोर से उन्हें पस्पा भी किया लेकिन उनकी कूवत में कमी नहीं आई। मुसलमानों ने जब फ़ारस की ज़मीन पर क़दम रखा तो यह फ़िर्रक़ा भी उन्हें अपना पुश्त पनाह समझ कर उनके साथ हो लिया। ईमाइयों में नसटूरीन फ़िर्क़ा जिसे किसी हुकूमत में पनाह न मिलती थी वह भी मुसलमानों के साये में आकर मुख़ालेफ़ीन के मज़ालिम से मुहफूज़ हो गया। इस तरह मुसलमानों को दो बड़े फ़िरक़ों की कुमक और हमदर्दी मुफ़्त में हासिल हो गयी। रोम की हुकूमत के साथ ईसाइयों के बाहमी इख़्तेलाफ़ात दुश्मनी की हद तक पहुंच गये थे इसलिये मुसलमान अपने मक़सद में कामयाब-रहे और फतूहात के दरवाज़े उन पर खुल गये।

अन्देशा व इन्तेबाह

सीरत , अहादीस और तफ़ासीर की किताबों से पता चलता है कि रसूले अकरम स 0 अपने बाद मुसलमानों की इस ऐश तलबी , दुनिया परस्ती और मुल्कगीरी के तसव्वुर से फिक्रमन्द और परेशान थे और चूंकि उन फ़तूहात के अंजाम और पेचो ख़म से आप बाख़बर थे इसलिये आपने बार बार अपने सहाबा को मुतनब्बेह करते हुए फ़रमाया कि तुम लोग मेरे बाद मेरी तालीमात को फ़रामोश न कर डालना , इस्लाम के मसक़सद को पामाल न करना और मुल्कगीरी की हवस में शरीयत की रुह को मजरुह न करना। चुनानचे कभा आपने फरमायाः

“ मुझे इस बात का ख़ौफ़ नहीं है कि मेरे बाद तुम मुश्रिक हो जाओगे बल्कि मुझे अंदेशा इस बात का है कि तुम दुनिया परस्ती में मुबतिला हो जाओगे। ”

कभी मिंबर से यह आगाही दी किः

“ तुम्हारे मुस्तक़बिल के बारे में मुझे यह अन्देशा है कि दुनिया की चमक दमक तुम पर अपने दरवाज़े खोल देगी। ”

कभी मतनब्बेह किया किः

“ मुझे यह डर है कि मेरे बाद तुम लोगों पर ज़मीन की बरकतें और आसइशें व जेबाइश की राहें कुशादा हो जायेंगी। ”

कभी इरशाद फ़रमायाः

“ मुझे इस का डर नहीं कि तुम फ़कर में मुब्तिला होंगे बल्कि मुझे यह डर है कि तुम पर दुनिया इस तरह कुशादा हो जायेगी जैसे कि तुम्हारे क़ब्ल वालों पर थी और तुम लोग इस दुनिया की परसतिश इस तरह करोगे जैसे तुम्हारे क़ब्ल वाले करते थे। नतीजा यह होगा कि दुनिया तुम्हें भी इसी तरह हलाक गुमराह) कर देगी जिस तरह तुम्हारे क़बल वालों को कर चुकी है। ”

कभी पैग़म्बरे अकरम सल 0 ने अपने किसी मोतबर सहाबी से फ़रमाया “ अगर तुम ज़िन्दा रहे तो देखोगे ” कि किसरा परवर दिगार से इस तरह मिलेंगे कि उनके औऱ खुदा के दरमियान कोई तरजुमा न होगा तो वह जिधर देखेंगे उन्हें जहन्नुम की आग के सिवा कुछ न दिखाई देगा। “ हुजूरै अकरम सल 0 ने अपने सहाबा को इश अंदेशे से भी मुतनब्बेह किया किः

“ देखो , मेरे बाद तुम लोग का़फ़िर न हो जाना कि बे वजह दूसरों की गर्दनें उड़ाने लगो। ”

यह तमाम हदीसें इस अमर की बय्यन दलील हैं कि पैग़म्बरे इस्लाम सल 0 बेजा मफ़तूहा , हमला आवरी , मुल्कगीरी , दुनिया परस्ती और सरमायादारी को इन्तेहाई नफ़रत की निगाह से देखते थे औऱ मुसलमानों को उनसे दूर रहने की हिदायत भी फ़रमाते रहते थे लेकिन अफ़सोस कि आपके बाद खिलाफ़ते ऊला व ख़िलाफ़ते सानिया में वही हुआ जो नहीं होना चाहिये था।

इस्लामी और ग़ैर –इस्लामी फ़तूहात

इस्लामी तारीख़ का यह पहलू इन्तेहाई उजागर है कि पैग़म्बरे इस्लाम स 0 को जब इस्लाम की तबलीग़ व अशाअत औऱ मुसलमानों की अयानत व केफ़ालसत के लिये सरमाया की ज़रुरत दरपेश हुई तो आपने न तो काफ़िरों के यहां डाका डाला , न उनका माल व असबाब लूटा , न उन पर मज़ालिम किये , न उन्हें शहर बदर किया , न उनकी जाएदादें हड़प की और न उनके घरों को तबाह व बर्बाद किया। न उनके मुल्कों पर हमला आदर हो कर उन्हें तलवार या ताक़त के बल पर अपनी ग़ुलामी के लिये मजबूर किया बल्कि उसके बरअक्स उनके ज़ेहनों में वहदानियत का तसव्वुर रासिख़ करने , अल्लाह के दीन को उन तक पहुंचाने और अमन , इत्तेहाद नीज़ इन्सानियत का दर्स देने में हुस्ने इख़लाक़ के साथ हमा तन मसरुफ़ रहे।

आपका मिशन और बुनियादी नज़रिया यह था कि रंग व नस्ल की तफ़रीक़ को ख़त्म किया जाये , इन्सान को इन्सानी हुकूक से आगाह किया जाये , लोग सिफ़ाते हुसना से मुत्तसिफ़ और जेवरे इख़लाक़ से आरास्ता हों। तौहीद पर ईमान लायें , वहदानियत का क़लमा पढ़ें और उसकी बुजूर्गी व बरतरी को तसलीम करें। उसकी बारगाह में अपना सरे नियाज़ ख़म करके शराफ़त हासिल करें। चुनानचे इसी नज़रिये औऱ मिशन के तहत आपने तबलीग़े इस्लाम के इब्तेहदाई दौर में कुफ़्फ़ारे मक्का को इस्लाम की दावत भी दी और उन्हे खुदा की वहदानियत , इबादत औऱ इताअत की तरफ़ मुतावज्जे भी किया।

दुनिया की नज़रों से यह तारीख़ी हकीक़त पोशीदा नहीं है कि आंहज़रत सल 0 ने जब बुतपरस्ती की एलानिया मुख़ालिफ़त की तो आपका यह तर्ज़े अमल कुफ़्फ़रे मक्का की काफेराना फ़ितरत पर सख़्त नागवार गुज़रा। चुनानचे कुरैश की चन्द सरबरावुरदा शख़्सियतें जनाबे अबुतालिब अलै 0 की ख़िदमत में आयीं और उनसे तुर्श लहजे में इस अमर की शिकायत की कि तुम्हारा भतीजा (मोहम्मदसल 0) हमारे ख़ुदाओं की तौहीन करता है , उसे समझा लो , वरना हम हम उसे बर्दाश्त नहीं करेंगे। उस मौक़े पर जनाबे अबुतालिब ने उन्हें नर्मी से समझा बुझाकर रुख़सत कर दिया। लेकिन चूंकि बिनाये मुख़ासिम्त बरक़रार थी और आंहज़रत सल 0 अपने फ़र्ज़े मनसबी से दस्तकश न होने पर मजबूर थे इसलिये अहले मक्का को दोबारा फिर हज़रत अबुतालिब अलै 0 के पास आना पड़ा। उन्होंने फिर कहा कि तुम्हारा भतीजा अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आता और तुम उसके ख़िलाफ़ कोई क़दम उठा नहीं सकते लेहाज़ा तुम दरमियान से हट जाओ। और अगर यह भी मुम्किन नहीं तो मैदान में उतर आओ ताकि हम दोनों का फ़ैसला तलवार के ज़रिये हो जाये। इस वफ़द में कुरैश के तमाम रऊसा मसलब अबुसुफ़ियान , शीबा और अतबा वग़ैरा शामिल थे।

हज़र अबुतालिब अलै 0 के लिये यह मरहला यक़ीनन सख़्त था। एक तरफ़ नबूवत के तहफ़्फुज़ का एहसालसस और दूसरी तरफञ कुफ़्फारे मक्का की धमकियां और बदले हुए तेवर। आपकी दूरे रस निगाहें ने इस नज़ाकत को अच्छी तरह महसूस कर लिया था कि काफ़िरों का पैमान-ए-सब्र लबरेज़ हो चुका है। यह मामला किसी वक़्त भी कोई ख़तरनाक सूरत इख़्तियार कर सकता है। अगर यह लोग आमादए पैकार हुए तो उनसे तन्हा मुक़ाबिला आसान न होगा।

उन्हें ख्यालल व एहसास के रद्दो अमल में जनाबे अबुतालिब अलै 0 के चेहरे पर तरद्दुद के आसार मुरत्तब हुए पैग़म्बरे इस्लाम सल 0 ने देखा कि शफ़ीक़ व मेहरबान चाचा के पाये सबात में लग़ज़िश के इमकानात हैं तो आबदीदा हो गये और फ़रमाया “ ख़ुदा की क़सम अगर यह लोग मेरे एक हाथ पर आफ़ताब औऱ दूसरे पर माहताब लाकर रख दें तो भी मैं अपने फ़र्ज़ मनसबी से मुंह नहीं मोड़ सकता। ”

इस पैग़म्बरी आवाज़ और सदाक़त आमेज़ लहजे ने जनाबे अबुतालिब अलै 0 के दिल में एक नया जोश और नया वलवला पैदा कर दिया। चुनानचे उन्होंने फ़रमाया “ अगर तुम्हारा मौकफ़ और फ़ैसला अटल है तो तुम अपना काम अंजाम देते रहो। मैं वादा करता हूं कि जब तक मेरे जिस्म में जान है कुफ़्फा़र तुम्हारा एक बाल भी बाका नहीं कर सकते। ”

अगर पैग़म्बर इस्लाम सल 0 या आपके चचा के दिल में हुसूले ज़र , जहां बानी हुक्मरानी या मुल्की फ़तूहात का कोई जज़बा कारफ़रमा होता तो वह इस मौक़े पर कुफ़्फ़ार को आसानी से अपना हमनवा बना सकते थे। उनसे कहते कि क्यों मेरी मुख़ालिफ़त कर करम बस्ता हो , इस्लाम कुबूल कर लो ताकि दुनिया की दौलत पर क़ाबिज़ हो सको , मुसलमान हो जाओ ताक़ि दूसरे मुल्क़ों के ख़ज़ाने लू़ट कर अपना घर भर सको। मेरे कूवते बाज़ू मब जाओ इराक़ , ईरान , शाम और मिस्र वग़ैरा पर हमला करके उन्हें ताराज किया जा सके। लेकिन आपने ऐसा नहीं किया और उनके इस एहतेजाज को सख़्ती से ठुकरा दिया।

जब हालात कुछ साजगार हुए और इस्लाम की कूवत अहदे तफूलियत से गुज़र कर जवानी की सरहद की तरफ़ बढ़ने लगी तो कुफ्फ़ार मक्का के दिलों में अदावत व नफ़रात और रशक व हसद के शोले पूरी शिद्दत से भड़क उठे जिसके नतीजे रसूले अकरम सल 0 को मुतअद्दिद ग़ज़वात का सामना करना पड़ा।

पैग़म्बरे इस्लाम सल 0 के दौर में जो ग़वात हुए या जो जंगे लड़ी गयीं वह सिर्फ़ देफ़ाई और इस्लाम के मुफ़ाद में थीं। रसूल उल्लाह सल 0 की तरफ़ से किसी जंग में इ्ब्तेदा नहीं की गयी। न किसी क़िस्म का जारेहाना क़दाम अमल में आया न बरबरियत औऱ तशद्दुद का मुज़ाहिरा किया था। इसके बर ख़िलाफ़ हज़रत उस्मान से पहले हज़रत अबुबकर और उनके बाद हज़रत उस्मान के दौर में इरा़क़ , ईरान , शाम औऱ मिस्र के साथ दीगर दूर दराज़ के मुमालिक पर मुल्कगिरी के लिये हमले किये गये। उन्हें दिल खोल कर लूटा गया , वहां के अवा को तशद्दुद का निशाना बनाया गया , उन पर मज़ालिम के पहाड़ तोड़े गये , उन्हें शहर बदर किया गया औऱ उनके घरों को तबाह बर्बाद और वीरान किया गया।

इन फ़तूहात का उसूल यह नज़र आता है कि जहां तक मुम्किन हो दुनिया की दौलत हासल की जाये , मुल्कों को फ़तेह किया जाये और वहां के अवाम को मज़ालिम और तशद्दुद के ज़रिये इस अमर पर मजबूर किया जाये कि वह मुसलमान हों या जज़ीया दें। और अगर यह दो सूरतें मुम्किन न हो तो तलवार के पानी से सेराब हों। क्या इन फ़तूहात को उसूली औऱ इस्लामी कहा जा सकता है ? हरगिज़ नहीं।

दीनी व मज़हबी इस्लाहें

इस्लाम के एहकाम फ़ितरते इन्सानी के ऐन मुताबिक़ हैं और इसका कोई हुक्म ऐसा नहीं है जिसमें इन्सान के फ़ितरे तक़ाज़ों को मलहूज़े ख़ातिर न रखा गया हो। फुरुए दीन में इस्लाम के इस्तेसनाई एहकाम और मराआत ख़ुद इस बात की दलील हैं कि इस्लाम दीने फ़ितरत है। इसके एहकाम नाक़ाबिले अमल नहीं है। ख़ास सूरतों मसलन बीमारी वग़ैरा की हालत में खड़ो होकर नमाज़ पढ़ने या रोज़ा रखने के एहकाम में तबदीली भी हो जाती है जैसे बैठ कर या लेट कर इशारों में नमाज़ पढ़ना औऱ रमज़ान के रोज़े दूसरे दिनों में कज़ा रखना वगैरा। इसी तरह कोई शख़्स ख़ास वजूहात की बिना पर एक मुद्दत तक अपनी ज़ौजा से अलकग रहे और उसके कूवते बरदाश्त , शहवानी ख़्वाहिशात औऱ जज़बात की फ़रावानी के आगे दम तोड़ती नज़र आये तो क्या वह अपनी इस जिन्सी ख़्वाहिशात की तकमील के लिये ऐसा तरीक़ा इख़्तियार करे जो इस्लामी एहकाम के मनाफ़ी हो ? या वह अपने फ़ितरी तकाज़ों को पूरा करने के लिये इस्लाम ने चन्द क़यूद , पाबन्दियों और शराएत के साथ जो मराआती एहकाम दिये हैं उन पर अमल पैरा होकर ज़िना के इरतेकाब से महफूज़ रहे। उन्हीं ख़ास मराआती एहकाम में से एक हु्कम का नाम “ मुताह ’ है जिसकी तक़सीम दो हिस्सों पर मुश्तमिल है। ( 1) मुताउल हज ( 2) मुताउल निसा।

“ मुताउल हज ” को “ तमतो बिलहज ” भी कहते हैं। तमता के मानी लुत्फ़ अन्दोज़ी के हैं। इसमें इन्सान उमरा और हज के दरमियान अपनी औरतों से लुत्फ़ अन्दोज़ हो सकता है मगर यह सिर्फ़ उन लोगों के लिये है जो हुदूदे मक्का के कमसे कम 80 किलोमीटर या उससे ज़्यादा फ़ासलों पर आबाद हों।

“ मुताउल निसा ” की तारीफ़ यह है कि किसी औरत से किसी मुक़र्रर मुद्दत के लिये महर के अवज़ अक़द किया जाये और मुद्दत तमाम होने पर वह औरत अलैहदा हो जाये और इतनी मुद्दत तक इद्दे की हालम में रहे कि हमल का शुब्हा जाता रहे। मुताह के बारे में कुरआन का इरशाद है किः

“ जिन औरतों से तुमने मुताह किया हो , उन्हें उनका मोअय्यना मेहर दे दो। और मेहर के मुक़र्रर हो जाने के बाद आगर आपस में (कम व बेश पर) राज़ी हो जाओ तो उसमें तुम पर कोई गुनाह नहीं है। बेशक ख़ुदा हर चीज़ से वाकिफ़ और मसलहतों का पहचानने वााल है। ” (अलनिसा 24)

एक मुक़ाम पर इरशादे बारी हैः

“ लोगों। जो तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से तुम पर नाज़िल किया गया है उसकी पैरवी करो। ”

एक दूसरे मुक़ाम पर इरशाद हुआः

“ जो शख़्स खुदा की किताब के मुताबिक़ हुक्म न दे वह काफ़िर है। ”

(माएदा 44)

और सूरा कहफ़ में इरशाद हुआः

“ खुदा अपने हुक्म में किसी को शरीक नहीं बनाता। ” (अलक़हफ़ 26)मालूम हुआ कि हुक्मे मुताह सिर्फ़ खुदा की तरफ़ से था और इस हुक्म में तरमीम व तनसीख़ का हक़ खुदा के अलावा रसूला अकरम सल 0 को भी नहीं था। आपका फ़र्ज़े मनसबी यह था कि आप इस हुक्म इलाही को मुसलमानों पर नाफ़िज़ करें। चुनानचे इशी हुक्म से मुतअल्लिक़ अब्दुल्लाह बिन मसूद की रिवायत है किः

“ हम हज़रत रसूल खुदा सल 0 के साथ जंगों में जाचा करते थे औऱ हमारे पासर कोई सामान मुक़तेज़ाये फ़ितरत को पूरा करने का नहीं होता था तो हम ने रसूल उल्लाह सल 0 से कहा कि हम क्यों न अपने आजा़ये शहवानी को क़ता करा दें। आंहज़रत ने इसकी मुमानियत फ़रमाई और हमें इस अमर की इजाज़त दी कि हम औरतों से मुनासिब मेहर प अक़द कर लिया करें। ”

“ अब्दुल्लाह बिन मसूद ने कहा हम लोग जवान थे , हमने रसूल उल्लाह सल 0 की ख़िदमत में अर्ज़ किया कि हम अपने आज़ाये शहवानी को क़ता क्यों न करा दें। ”

सही मुस्लिम में ग़ज़वात का तज़किरा नहीं है जिससे ज़ाहिर होता है कि ज़मानये अमन में भी अगर ज़ौजा न हो तो नफ़सानी ख़्वाहिशात की क़मील के लिये इस्लाम अक़दे मुताह की इजाज़त देता है और इब्तेदये इस्लाम में मुताह के जवाज़ की ओलमा व मुफ़्स्सेरीन अहले सुन्नत ने तसलीम किया है। चुनानचे अल्लामा फ़ख़रुद्दीन राज़ी तफ़सीरे कबीर में रकम तराज़ है किः

“ यह अमर मुतफ़्फ़िक़ अलैह है कि मुताह इब्तेदाये इस्लाम में राएच व जाएज़ था। इस पर तमाम उम्मत का इजामा है कि किसी को इख़्तेलाफ़ नहीं है। ”

मगर अफ़सोस कि हज़रत उमर ने अपने ज़ाती इजतेहादी की बिना पर ख़ुदा व रसूल सल 0 के इस हुक्म को अपने दौर ख़िलाफ़त में कालअदम क़रार दिया जैसा कि सहाबिये सल 0 जाबिर बिन अब्दुल्लाह अन्सारी का बयान है किः

“ हम लोग रिसालते माब सल 0 के पूरे ज़माने में और हज़रत अबुबकर के पूरे दौरे ख़िलाफ़त में नीज़ उमर के निसफ ज़माने ख़िलाफ़त तक बराबर मुताह करते थए मगर हज़रत उमर ने अपने निस्फ़ ज़माने ख़िलाफत के बाद यह कह कर मुताह की मुमानियत कर दी कि मुताउल हज और मुताउल निसा रसूल सल 0 के ज़माने में हलाल थे लेकिन मैं उन्हें हरार क़रार देता हूं औऱ अब जो शख़्स मुताह करेगा उसे मैं सज़ा दूंगा। ”

इमरान बिन हसीन से रिवायत है कि हम रसूल उल्लाह सल 0 के ज़माने में मुताह किया करते थे और आंहज़रत सल 0 ने कभी मना नहीं किया और न उसके बारे में ख़ुदा ने कोई नासिख़ आयत उतारी।

अबी नज़रा से रिवायत है किः

“ मैंने जाबरि बिन अब्दुल्लाह अन्सारी से कहा कि इब्ने ज़बीर लोगों को मुताह से रोकता है और इब्ने अब्बास इसकी इजाज़त देते हैं। जाबिर ने कहा ज़मानये रसूल सल 0 और ज़मानये अबुबकर में हम मुताह किया करते थे। जब हज़रत उमर हाकिम हुए तो उन्होंने कहा कि कुरआन है तो हुवा करे , रसूल सल 0 है तो हुआ करे , मुताउल हज औऱ मुताउल निसा दोनों ज़मानये रसूल सल 0 में जारी थे लेकिन मैं तुम लोगों को उन दोनों से मना करता हूँ। ”

सही मुस्लिम में तो यहा तक है कि हज़रत उमर ने फ़रमाया कि अल्लाह ने अपने रसूल सल 0 के लिये जो चाहा मुबाह कर दिया। अब कोई शख़्स औरतों से ताल्लुक पैदा करगा तो मैं उसे संगसार कर दूंगा। ”

इन रिवायतों से पता चलता है कि हज़रत उमर की नज़डर में न कुरआन की कोई अहमियत थी और न हुक्मे इलाही का कोई पास व लिहाज़ था। क्या हुक्मे ख़ुदा और रसूल सल 0 को ठुकराने के बाद कोई मुसलमान मुसलमान रह सकता है ?

इस मौक़े पर हज़रत आयशा की यह रिवायत क़ाबिले तवज्जो है जिसमें आप फरमाती हैः

“ रसूल उल्लाह सल 0 ने यह फ़रमाया कि जो शख़्स हमारे दीन में कोई ऐसी बात ईजाद करे या कोई ऐसा अमल करे जिसके मुतअल्लिक हमारा हुक्म न हो तो वह शख़्स मरदूद है। ”

तरावीह

तरावीह दरहक़ीक़त हज़रत उमर की ज़हनी इख़तरा का नाम है अहदे रिसालत या उसके बाद हज़रत अबुबकर के दौरे ख़िलाफ़त में तरावही का कोई वजूद नहीं था। यह बात तारीख़ी एतबार से मुस्तहकम , मुसल्लम औऱ यक़ीनी है।

रसूले अक़रम सल 0 ने नमाज़े इस्तसक़ा (वह नमाज़ जो बारिश न होने की सूरत में मख़सूस तरकीब के साथ पढ़ी जाती है) के अलावा तमाम सुन्नती नमाज़ों में जमाअत को नाजाएज़ क़रार दे दिया था। उसी पर हज़रत अबुबकर के ज़माने में भी अमब होता रहा लेकिन माहे रमज़ान सन् 14 हिजरी में हज़रत उमर ने मुसलमानों पर यह हुक्म नाफ़िज़ किया कि हर मुसलमान रात भर तरावीह में गुज़ारे और मस्जिद में खड़ा रहे।

इस अज़ीयत रसां हुक्म में क्या मसलहत कारेफ़रमां थी ? यह हज़रत उमर ही जानें। बहरहाल यह फ़रमान दूसरे शहरों में भी रवाना कर दिया गया और इस पर अमल की सख़्त ताकीद कर दी गयी। मदीनें में दो क़ारी मुक़र्रर कर दिया गये ताकि वह तमाम रात मुसलमानों को तरावही पढ़ायें।

बाज़ मोअर्रेख़ीन का कहना है कि हज़रत उमर ने एक रात मसाजिद का मुआएना किया औऱ नमाज़ियों को मुख़तलिफ अन्दाज़ में मसरुफ़े इबादत पाया तो उसी शब तरावीह का यह फ़रमान जारी किया।

बुख़ारी ने अपनी “ तरावीह ” में अब्दुल क़ारी से यह रिवायत नक़ल की है किः

“ मैं उमर के साथ था , जब वह मस्जिद में दाख़िल हुए तो उन्होंने नमाज़ियों केो मुतफ़र्रिक़ हालत में देख कर कहा कि मैं इन्हें मजमें में देखना चाहता हूँ औऱ फिर आपने तरावही का हुक्म करके अबी बिन काब को इमाम मुक़र्रर किया। जब दूसरी रात आई तो फिर गये तो इजतेमाई मंज़र देखा औऱ फ़रमाया कि क्या अच्छी बिद्अत है। ”

अल्लामा क़सतलानी का कहना है कि हज़रत उमर ने इसको बिद्अत से इसलिये ताबीर किया कि रसूल उल्लाह या हज़रत अबुबकर के ज़माने में इस क़िस्म का कोई इजतेमा न था। अल्लामा सेनन्नी लिखते हैं कि हज़रत उमर ने तरावीह ईजाद की। उम्मे वलद की बैय से मना किया। नमाज़े मय्यत में चार तकबीरें कर दीं। अमीरुल मोमेनीन का लक़ब इख़्तियार किया औऱ मुताह को हराम करार दिया।

अल्लामा अबदरबा ने इस्तेयाब में , इब्ने सादने तबक़ात में और इब्ने शहना ने रौज़तुल मुनाज़िर में सन् 23 हिजरी के वाक़ियात में हज़रत उमर की उन खुसूसियात का ज़िक्र किया है।

मौलवी वहीदुज ज़म ख़ा हैदराबादी इस बिदअत के ज़ेल में तहरीर फ़रमाते हैं कि बिदअत की दो क़िस्में हैं। हसना औऱ सय्या। बिदअत शरयी हमेशा सय्या होती है जिसकी तारीफ़ ओलमा ने यह की है कि दीन में कोई ऐसी नई बात पैदा की जाये कि जिसकी दलील किताब व सुन्नत से न हो।

इस बिदअत के बारे में बाज़ ओलमाये अहले सुन्नत का यह ख़्याल है कि हज़रत उमर ने अपनी हिकमते अमलीस से ऐसी चीज़ ईजाद की है जिससे रसूल उल्लाह स 0 ख़ुद ग़ाफिल थे। यह महज़ अक खुश फ़हमी हैं वरना हकीक़त तो यह है कि हज़रत उमर ख़ुद एहकामे रिसालत की हिकमतों से बेबहरा थे। पैग़म्बरे इस्लाम सल 0 ने नमाज़े मुसतहेब्बात को इस लिये ग़ैर मशरुअ क़रार दिया था कि नमाज़ मुस्तहब को इन्सान अपने माबूर से मुनाजात के लिये इख़्तियार तौर पर अदा करता है। उसे ऐसी तन्हाई तौबा के साथ मुनाजात कर सके और उसके साथ ही इजतेमाई फ़ाएदा यह हो कि घर के बच्चे भी मसूद ने आंहज़रत सल 0 से सवाल किया कि नमाज़ घर में अफ़ज़ल है या मस्जिद में ? तो आपने फ़रमाया कि मेरा घर मस्जिद से मुलहिक़ है लेकिन मैं गै़र वाजिब नमाज़ें घर में ज़्यादा पसन्द करता हूं।

इब्ने माजा व इब्ने ख़ज़ीमा वग़ैरा ने ज़ैद बिन साबित के ज़रिये आंहज़रत सल 0 से रिवायत की है कि बाज़ नमाज़ों के तवस्सुल से अपने घरों को बुजूर्ग बनाओ और बुख़ारी व मुस्लिम ने यह रिवायत नक़ल की है कि आंहज़रत सल 0 ने नमाज़ वाले घर को “ ज़िन्दा घर ” औऱ बग़ैर नमाज़ वाले घर को “ मुर्दा घर ” से ताबीर किया है।

हज़रत उमर ने इस बिदअत को मुसलमानों पर मुसल्लत करके उन तमाम इजतेमाई , मज़हबी औऱ तरबीयती फ़वाएद से महरुम कर दिया जिनके लिये सरकारे रिसालत ने नमाज़ मुस्तहब को फ़रादा क़रार दिया था।

चार तक़बीरें

पैग़म्बरे इस्लाम सल 0 पॉच तक़बीरों के साथ नमाज़े ज़नाज़ा पढ़ा करते थे। हज़रत उमर ने उस नमाज़ में तबदीली करके चार तकबीरों में उसे मुनहसिर कर दिया जैसा कि अल्लामा सयुती ने तारीखुल ख़ोलफ़ा औऱ इब्ने शहना ने रौज़तल मुनाजि़र में तहरीर फ़रमाया है औऱ इमाम अहमद बिन हम्बल ने अब्दुल आला से रिवायत की है कि ज़ैद बिन अरक़म ने एक जनाज़े पर पांच तकबीरों के साथ नमाज़ पढ़ी तो एक शख़्स ने एतराज़ किया कि यह हज़रत उमर के हुक्म के ख़िलाफ़ है। उन्होंने कहा कि मैंने रसूलस उल्लाह सल 0 के साथ यूं ही पढ़ी है लेहाज़ा मैं इसे क़यामत तक तर्क नहीं कर सकता। इमाम अहमद ने यह रिवायत भई नक़ल की है कि यहिया ने हुज़ैफ़ा के गुलाम ईसा के साथ नमाज़ पढ़ी , उन्होंने पांच तकबीरें कह कर यह एलान किया कि मैंने सुन्नते रसूल सल 0 पर अमल किया है।

इससे यह पता चलता है कि सुन्नते रसूल सल 0 में तबदीली को हज़रत उमर अपना हक़ समझते थे।

हज़रत उमर के फैसले

(1) हज़रत उमर ने एक मजनू औ ज़ानिया औरत को संगसार का हुक्म दिया। हज़रत अली अलै 0 को पता चला तो उन्होंने उस औरत को लोगों से छुड़कर उसकी जान बचा ली। लोगों ने हज़रत उमर से शिकायत की उन्होंने आपको तलब किया। आप गुसेसे में तशरीफ़ ले गये और फ़रमाया कि क्या तुम्हें नहीं मालूम कि मजनून , नाबालिग़ और सोता हुआ शख़्स एहकाम से मुस्तसना है। उमर ने कहा हां यह दुरुस्त है । फ़रमाया कि इस औरत का जुनून एक मशहूर बात है। इसलिये मुम्किन है कि वह वक़्ते अमल भी रहा हो। फिर यह हद किस तरह जारी हो सकती है हज़रत उमर ने अपनी इस ग़लती का एतराफ़ किया। इस वाक़िये को इमाम बेहेक़ी ने और इमाम अहमद ने अपनी मसनिद में लिखा है।

(2) हज़रत उमर के पास एक ज़िना कार औरत लाई गयी। बिला तहक़ीक आपने उसकी संगसारी का हुक्म सुना दिया। इस फ़ैसले पर हज़रत अली अलै 0 ने हज़रत उमर को टोका कि तुम्हें तहक़ीक़ करना चाहिये था , शायद इसके पास कोई उज़्र होता। हज़रत अली अलै 0 के इस मशविरे पर हज़रत उमर ने उसका बयान लिया। उसने बताया कि मुछ पर प्यास का ग़लबा था मैं ने एक शख़्स से पानी मांगा। उसने बदनियती का मुज़ाहिरा किया , मैंने हत्तल इम्कान सब्र किया लेकिन जब सब्र व तहम्मुक का दामन हाथ से छूटने लगा और मजबूर हो गयी तो इस बुरे फ़ेल पर तैयार हो गयी। यह सुनकर हज़रत उमर ने कहा , अल्लाहो अकबर! तौबा नस कुरआन हद से मुस्तसना है। इस वाक़िये को बेहेक़ी ने सनन में और इब्ने क़ीम ने अलतरीक़े हिकमत फ़िस सियासतुल शरिया में नक़ल किया है।

(3) एक ज़िनाकार औरत हज़रत उमर के पास लाई गयी और वह हामला थी लेकिन हज़रत उमर ने उसे संगसार किये जाने का हुक्म दे दिया तो मेआज़ ने तौबा दिलाई कि अगर औरत ख़ताकार है तो इसके शिकम में तो बच्चा है उसने क्या ख़ता की है ? आपने अपने हुक्म को फ़ौरन बातिल क़रार दिया और फ़रमाया कि औरतें मेआज़ड का मिस्ल पैदा करने से क़ासिर हैं। इस वाकि़ये को मुहम्मद बिन मुख़लिद अत्तार ने फ़वाएद मे नक़ल किया है।

(4) हज़रत उमर की अदालत में एक शख़्स के क़त्ल का मामला पेश हुआ जिसमें एक मर्द और एक औरत का हाथ था। हज़रत उमर ने तशवीश का इज़हार किया तो हज़रत अली अलै 0 ने फ़रमाया कि अगर एक सरक़े के मामले दो शरीक हो तो क्या दोनों के हाथ कता न होंगे ? कहा ज़रुर होंगे। आपने फ़रमाया बस यही हुक्म यहां भी जारी होगा। इस वाक़िये को अहमद अमीन ने फ़ज़रुल इस्लाम के सफ़ा 237 पर रक़म किया है।

(5) हज़रत उमर ने कुछ पूछने के लिये एक औरत को तलब किया तो डर के मारे उसका हमल साक़ित हो गया। हज़रत उमर घबराये और उन्होंने ओलमा फ़ुक़हा से मसला दरियाफ़्त किया। सब ने कहा कोई हरज नहीं है। हज़रत अली अलै 0 ने फ़रमाया कि अगर यह हुक्म रेआयतन सादर हुआ है तो धोका है और अगर अजतेहाद है तो ग़लत है। लेहाज़ा आप पर शरई फ़र्ज़ है कि आप एक गुलाम आज़ाद करें। हज़रत उमर ने इस मशविरे पर अमल किया। इस वाक़िये को इब्ने अबील हदीद ने नक़ल किया है।

(6) क़दामा बिन मज़ऊन ने शराब पी तो उन्हें पकड़ कर हज़डरत उमर के पास लाया गया। उन्होंने उस पर हद जारी करने का क़सद किया। क़दामा ने कहा कि यह कुरआन के हुक्म के ख़िलाफ़ है क्योंकि उसमें है कि ईमान और अमले सालेह वालों के लिये खाने पीने पर कोई पाबन्दी नहीं है , मैं मोमिन , मुत्तक़ी और मुज़ाहिद हूँ। यह सुन कर हज़रत उमर ख़ामोश हो गये और लोगों से मशविरा करने लगे। इब्ने अब्बास ने हुरमते शराब की आयत से इस्तदाल किया औऱ कहा कि क्या हराम काम का अंजाम देने वाला शख़्स भी मुत्तक़ी और परहेज़गार हो सकता है ? उस पर हज़रत उमर ने इस्तेफ़ता किया और अस्सी कोड़ों की सज़ा दी। इस वाक़िये को हाकिम ने मुस्तरदरिक में नक़्ल किया है।

(7) एक औरत को अन्सार के एक नौजवान से इश्क़ हो गया उसने अपनी जिन्सी प्यास बुझाने के लिये उस नौजवान को अपनी गिरफ़्त में लेना चाहा लेकिन वह किसी तरह नज़ान्द नहीं हुआ तो वह औरत इन्तेक़ाम पर उतर आई और उसने यह तरकीब की कि एक अण्डा तोड़ कर उसकी सफ़ेदी अपनी शर्मगाह पर और उसे मुलहिक़ लिबास पर मल ली और उसी हालत में हज़रत उमर के पास जाकर यह फ़रियाद कीकि फ़लां शख़्स ने मेरी आबरुरेज़ी की है। हज़रत उमर ने उस नौजवान को तलब किया और चाहा कि उस पर हद जारी करे। उसने कहा , आप मुझे सज़ा देने से पहले तहक़ीक व तफ़तीश क्यों नहीं करते कि उसके बयान में कहां तक सदाक़त है ? बिलआख़िर यह मामला हज़रत अली अलै 0 के सामने रखा गया आपने फ़रमाया कि इस औरत के लिबास को गरम पानी में डाल दिया जाये चुनानचे उसका लिबास गर्म पानी में डाला गया और अण्डे की सफ़ेदी उम पर जम गयी और उसकी बदबू से पता चल गया कि यह अण्डे की सफ़ेदी है। तनबीह पर उसने खुद भी इक़रार कर लिया और वह नौजवान हज़रत उमर के ताज़ियानों से बच गया। इस वाक़िये को भी इब्ने क़ीम ने तरीकुल हिकमता के सफ़ा 48 पर रक़म किया है।

मुग़ीरा बिन शोबा की वाक़िया

अबल्ला में जहां जंगे जलूला के बाद सन् 16 हिजरी में बसरा की आबादकारी अमल में आई , अतबा बिन ग़ज़वान सन् 14 हिजरी में सबसे पहले गवर्नर मुक़र्रर किया गये। छः माह बाद अतबा का इन्तेक़ाल हो गया तो उनकी जगह मुग़ीरा बिन शेबा गवर्नर हुए मगर दो ही बरस के बाद रबीउल अव्वल सन् 17 हिजरी में यह माजडूल कर दिया गये और उनकी जगह अबू मूसा अशरी की तक़र्रुरी अमल में आई। बाज़े मोअर्रिख़ीन ने यह भी लिखा है कि अतबा के बाद मजाशा बिन मसूद औऱ उनके बाद मुग़ीरा वगै़रा ने यह बताई है कि मुग़ीर और अबुबकर दोनों पड़ोसी थे और आमने सामने वाला खानों में रहते थे। उन दोनों के मकानों के दरमियान रास्ता मुश्तरिक था औऱ ख़िड़िकियां बिलमुक़ाबिल थी। एक दिन अबुबकर के बालाख़ाने पर उसके चन्द साथी बैठे आपस में बातें कर रहे थे कि अचानक तेज़ हवा का एक झोंका आया जिससे ख़िड़की खुल गयी। अबुबकर उसे बन्द करने उठे तो उन्होंने देखा कि मुग़ीरा के कमरे की खिड़की भी खुली है औऱ वह दुनिया व माफ़िहा से बे ख़बर एक औरत की दोनों टांगों के बीच तेज़ी से हिल रहे हैं। अबुबकर ने यह मंज़र देख कर अपने साथियों नाफ़े बिन कलदा , ज़्याद बिन अबीया और शब्बल बिन माबिद बिजली वग़ैरा से कहा , आओ भाईयों। और एक दिल चसप करिश्मा देखों। उन्होंने देखा तो पूछा कि यह औरत कौन है ? अबुबकर ने कहा यह हज्जत बिन अतीक की बीवी उम्मे जमील बिन्ते अफ़क़म है इसका ताल्लुक़ क़बीलये आमिर बिन सासिया से है। यह उमरा व शुरफ़ा के तसकीने नफ़्स का सामान फ़राहम करती है। वह बोले , हमने तो सिर्फ़ निचला हिस्सा ही देखा है। अबुबकर ने कहा , खड़े रहो अभी चेहरा भी देख लेना. चुनानचे जब मुग़ीरा ने उसे छोड़ा और वह लड़खड़ाती हुई उठी तो उन लोगों का शक व शुबहा यकीन में बदल गया और उन लोगों ने भी उसे पहचान लिया।

जब मुग़ीरा ज़ोहर की नमाज़ पढ़ने आये तो अबुबकर ने उन्हें रोका औऱ हज़रत उमर को इस वाक़िये की इत्तेला दी। हज़रत उमरने मुग़ीरा औऱ अबुबकर को मय गवाहों के तलब किया। मुग़ीरा ने अपनी सफ़ाई में यह बयान दिया कि मैं अपनी बीवी के साथ अपने घर में मुजामियत कर रहा था। इनका देखना क्यों कर जाएज़ हुआ ? अबुबकर , शब्बल औऱ नाफ़े ने गवाही दी कि हमने मुग़ीरा को उम्मे जमील ही के साथ ज़िना करते देखा है। मगर ज़्याद ने यह गवाही दी कि मैंने मुग़ीरा को एक औरत की दोनों टांगों के दरमियान हिलते देखा है उसके पैरों में मेंहदी लगी थी और वह ऊपर को उठे हुए थे। उसकी शर्मगाह खुली हुई थी औऱ ज़ोर ज़ोर से सांस लेने की आवाज़ आ रही थी। हज़रत उमर ने पूछा , क्या तुम उस औरत को पहचानते हो ? कहा नहीं , चुनानचे हज़रत उमर ने मुग़ीरा को छोड़ दिया औऱ तीनों गवाहों पर दरोग़गोई की हद जारी की।

तीरीख़े इब्ने ख़लकान तरजुमा यज़ीद बिन ज़्याद में है कि जब ज़्याद गवाही के लिेय आये तो हज़रत उमर ने कहा कि वह शख़्स आ गया जिसकी ज़बान से मुहाजेरीन में से एक शख़्स रुसवाई से बच जायेगा। तबरी ने लिखा है कि मुग़ीरा ने खुशामद दरामद करके ज़्याद को मिला लिया था और उससे कहा थआ कि वह बात न कहता जो तुमने नहीं देखी क्योंकि अगर तुम मेरे औऱ उस औरत के पेट के दरमियान भी होते भी तुम मुझे दख़ूल करते हुए न देख पाते। इब्ने ख़लकान का बयान है कि जब हज़रत उमर ने पूछा तो ज़्याद ने कहा कि मैंने मुग़ीरा को उस औरत की टांगे उठाये हुए इस तरह देखा है कि ख़ुसिये उसकी रानों के दरमियान रगड़ खा रहे थे।

शदीद धक्के और बुलन्द सांस की आवाज़ सुनी है और इस तरह नहीं देखा जिस तरह सुरमादानी में सलाई जाती है।

इस गवाही के बाद हज़रत उमर ने कहा कि ऐ मुग़ीरा उठो और इन तीनों गवाहों को हद इफ़तेरा के कोड़े मारो। चुनानचे मुग़ीरा ने अस्सी अस्सी कोड़े तीनों को मारे।

कुरआन मजीद में ज़िनाकार मर्द और औरत दोनों की “ हद ” मोअय्यन है और इसके साथ चार आदिल गवाहों की शर्त भी है मगर वह शर्त कहीं नहीं है कि गवाह इस तरह गवाही दे जिस तरह हज़रत उमर ने फ़रमाया है. जब कि दौरे रिसालत में भी कुछ सहाबा ज़िना के मुरतकिब हुए हैं और उन पर “ हद ” जारी करने के लिये गवाह भी तलब किये गये हैं मगर सुरमादानी में सलाई वाली शर्त नहीं रखी गयी सिर्फ़ मोतबर और आदिल गवाहों के चश्मदीद बयानात पर एतमाद करके फ़ैसला कर दिया।

हज़रत उमर के तजवीज़ किरदा इस ताज्जुल ख़ेज़ निसाब शहादत को आपके अव्वालियात में शामिल किया जाना चाहिए कि आपने न सिर्फ़ सुरमादानी और सलाई की शर्त रख कर मुग़ीरा को बरी कर दिया बल्कि उसके हाथों से गवाहों की पिटाई भी करा दी जिसमें अबुबकर सब से ज़्यादा ज़ख़्मी हुए।

अबु शहमा का वाक़िया

अम्र बिन आस के हलके अक़तेदार में हज़रत उमर के साहबज़ादे अबु शहा ने एक दिन शराब पी। अम्र आस ने उसका सर मुण्डवा कर उसके भाई अब्दुल्लाह के सामने उस पर शरई हद जारी की और ज़ख़्मी हालत में हज़रत उमर के पास इस ख़त के साथ रवाना कर दिया कि मैंने अबु शहमा पर तमाम शराएते इस्लामी के साथ बिला रेआयत शरई हद जारी कर दी और और अब आपकी ख़िदमत में रवाना कर रहा हूं।

अब्दुल्लाह बिन उमर भाई को लेकर बाप की ख़िदमत में पहुंचे। शफ़क्क़ते पेदरी का तक़ाज़ा तो यह था कि आप अबु शहमा को समझाते बुझाते , तसल्ली देते और ग़ैर शरई इक़दाम से आइन्दा बाज़ रहने की नसीहत फरमाते। हद जारी करने का सवाल ही पैदा नहो होता था क्योंकि वह पहले ही अम्र आस के हाथों जारी हो चुकी थी। लेकिन आपने अबु शहमा को देखते ही ताजियाना उठाया और उन्हें पीटने लगे। अबु शहमा ने फ़रयाद की कि अब्बा जान! मैं बीमार हूँ मर जाऊँगा। आपने एक न सुनी और अज़ सारे नौ हद जारी करके क़ैदख़ाने में डाल दिया जहां अबु शहमा ने दम तोड़ दिया।

यह वाक़िया उस वक़्त और ज़्यादा इबरत अंगेज़ और अफ़सोसनाक हो जाता है जब तारीख़ यह बताती है कि हज़रत उमर खु़द भी शराब के बेदह शौक़ीन थे। उनका अपने शराबी बेटे पर शराब नोशी के इल्ज़ाम में हद जारी करना कहां तक दुरुस्त है ? जब कि अम्र आस उस पर शरयी हद का ख़ातेमा कर चुका था। फिर अबु शहमा ने अपने बाप से बीमारी की उज़्र भी किया था तो क्या इस्लामी शरीयत में किसी बीमार पर हद जारी हो सकती है और क्या हद के बाद इन्सान पर क़ैद की सख़्तियां मुसल्लत की जा सकती हैं ? एहकामाते इलाहिया के बारे में अगर अमरु आस क़ाबिले एतमाद था तो दोबारा आपने हद जारी करने की ज़हमत क्यों फ़रमाई ? औऱ अगर अम्र आस का यह इक़दाम शरयी एतबार से दुरुस्त नहीं था तो ऐसे शख़्स को आपने मुसलमानों पर हाकिम क्यों बनाया ?

दीवाने अता

हज़रत उमर ने सन् 15 हिजरी में “ दीवाने अता ” का इस्तेख़ारा किया तो एक रजिस्टर की शक्ल में था। इसका मक़सद फ़ौजी निज़ाम को दुरुस्त करने के लिये फ़ौजियों की पेंशन औऱ अमाएदीन व अक़ाबरीने इस्लाम , अज़वाजे पैगम्बर सल 0, असहाबे बदर और मुहाजेरीन वग़ैरा को वज़ाएफ़ मुक़र्रर करना था। इस काम के लिये अक़ील बिन अबीतालिब अलै 0, जबीर बिन मुताम औऱ मोहज़मा बिन नोफ़िल पर मुश्तमिल एक कमेटी बनाई गयी जिसने पेंशन दारान वज़ीफ़ा कुनिन्दीगान के असमा दर्जे रजिस्टर किये। इन्द्रजात के बाद जब रजिस्टर मुरत्तब हो गया तो उसका नाम “ दीवाने अता ” रखा गया। अज़ालतुल ख़फ़ा में है कि सबसे पहले रजिस्टर में अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब का नाम दर्ज किया गया उसके बाद यके बा दीगरे क़बाएल के नामों से ग़ुज़र कर यह सिलसिला बनी अदी पर तमा हुआ। इस फ़ेहरिस्त की रु से जो तंख़्वाहें और वज़ाएफ मुक़र्रर किये गये उनकी तफ़सील मंदर्जा ज़ैल है।

(1)

अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब

12,000 दिरहम सालाना

(2)

हज़रत आयशा

12,000 दिरहम सालाना

(3)

दीगर अज़वाजे पैग़म्बर

10,000 दिरहम सालाना

(4)

असहाबे बदर

5 ,000 दिरहम सालाना

(5)

असहाबे हुदैबिया

4 ,000 दिरहम सालाना

(6)

मुहाजेरीन क़बल फ़तहे मक्का

3 ,000 दिरहम सालाना

(7)

मुहाजिरीन हब्शा

4 ,000 दिरहम सालाना

(8)

शुरकाये जंग क़ादसिया

2 ,000 दिरहम सालाना

(9)

क़ादसिया व यरमूक के बाद के मुजाहेदीन

1,000 दिरहम सालाना

(10)

मसना की फ़ौज

5 00 दिरहम सालाना

(11)

अहले यमन

4 00 दिरहम सालाना

(12)

लीत की फौज

3 00 दिरहम सालाना

(13)

रबी की फ़ौज

25 0 दिरहम सालाना

(14)

अहले बदर की बीवियां

5 00 दिरहम सालाना

(15)

अहले हुदैबिया की बीवियां

5 00 दिरहम सालाना

(16)

अहले क़ादसिया की बीवियां

200 दिरहम सालाना

जनाबे सलमान फ़ारसी को अहले बदर में शामिल करके उनकी भी पांच हज़ार दिरहम सालाना तंख्वाह मुक़र्रर हुई। मुहाजेरीन हब्शा में हज़रत उम्मे सलमा का नाम दर्ज रजिस्टर करके चार हज़ार तंख्वाह मुक़र्रर की गयी। असामा बिन ज़ैद का चार हज़ार और अब्दुल्लाह बिन उमर का तीन हज़ार मुक़र्रर हुआ। तलहा बिन अबीदउल्लाह अपने भाई उस्मान को लाये तो उनका भी आठ सौ दिरहम मुक़र्रर हुआ और जब नज़र बिन अनस आये तो उनके दो हज़ार दिरहम सालाना मुक़र्रर हुए। (कामिल , तर्जुमा इब्ने ख़लदून , बा तंख़्वाह परचे नवीस भी मुक़र्रर किये थए जो बात बात की इत्तेला उन्हें दिया करते एथ। तबरी ने लिखा है कि उमर के जासूस हर लश्कर के साथ रहते थे जो हर वाक़िये की इत्तेला उन्हें दिया करते थे।

वाक़ियात सन् 16 हिजरी

हज़रत उमर ने हज़रत अली के मशविरे पर यक्कुम मुहर्रम से सन् हिजरी जारी किया। अहले फ़िरंग सन् हिजरी 16 जुलाई सन् 622 से शामार करते हैं।

अब्दुल्लाह बिन उमर ने सफ़िया बिन्ते अबुउबैदा से अक़द किया।

वाक़ियात सन् 17 हिजरी

ख़ालिद बिन वलीद माज़ूल किये गये।

मस्जिदुल हराम की तौसीय अमल में आई।

कूफ़ा आबाद होकर इराक़ का दारुल हुकूमत क़रार पाया।

वाक़ियात सन् 18 हिजरी

शाम में ताऊन की वबा फैली। इस वबा में अबुउबैदा बिन जराअ , मआज़ बिन जबल , यज़ीद बिन अबुसुफि़यान , हरस बिन हश्शाम , सुहैल बिन अम्र , अतबा बिन सुहैल , और आमिर बिन ग़ीलान सक़फ़ी के हमराह 25 हज़ार मुसलमान फौत हो गये। यह बीमारी चूंकि क़रया अमवास से शुरु हुई थी इसलिये वह ताऊने अमवास के नाम से मशहूर हुआ।

यज़ीद बिन अबुसुफ़ियान की हलाकत के बाद हज़रत उमर ने माविया बिन अबुसुफ़ियान को दमिश्क़ का गवर्नर मुक़र्रर किया।

इसी साल काबुल एहबार ने इस्लाम कुबूल किया।

इसी साल हिजाज़ में ऐसा सख़्त क़हत पड़ा कि ज़मीन की मिट्ठी राख बन कर हवा में उड़ने लगी इसी सबब से इस साल का नाम आमुर-रमादा रखा गया।

वाक़दी का कहना है कि अयाज़ बिन ग़नम ने रुहा , रक़्क़ा औऱ हर्रान इसी साल फ़तेह किया।

वाक़ियात सन् 20 हिजरी

हज़रत उमर ने अपने साले क़दामा को बहरैन की गवर्नरी से माज़ूल करके उसकी शराब नोशी पर “ हद ” जारी की और इसकी जगह अबुबकर को बहरैन और यमामा का वाली मुकर्रर किया।

इसी साल साद बिन अबी विकास कूफ़े की गवर्नरी से माज़ूल हुए और उनकू जगह अम्मार यासिर वाली मुकर्रर हुए।

हज़रत उमर ने ख़ैबर के यहूदियों को जिवा वतन करके वादी-उल-कुरा में आबाद किया और नजरान के यहूदियों को कूफ़े की तरपञ जिला वतन करके उनकी रेहाइशगाहों को मुसलमानों में तक़सीम कर दिया।

इस साल अम्मार यासिर ने अपने अहदे गवर्नरी से इस्तेफ़ा दे दिया। हज़रत उमर ने उनकी जगह कूफ़ा पर जबीर बिन मुताम को गवर्नर मुकर्रर किया औपर उन्हें उस मनसबे से माज़ूल व महरुम करके उनकी जगह मुगीरा बिन शैबा को गवर्नर बनाया।

इसी साल अमरु आस के ख़ाला ज़ाद भाई अक़बा बिन नाफ़े फ़हरी ने ज़वीला व बर्का का दरमियानी इलाक़ा फतेह किया जिसमें सुलह हुई।

इस साल में अमीर बिन साद , हौरान , हमस , कंसरीन , औऱ अलजज़ाएर पर औऱ माविया दमिश्क , उरदुन , फ़िलिस्तीन , अनताकिया और मारा व मसरीन पर मुतीन थे।

इसी साल अला हज़रमीं आमिले वहरैन ने वफ़ात पाई और उनकी जगह अबुहूरैरा गवर्नर मुकर्रर हुए।

वाकियात सन् 22 हिजरी

इस साल माविया बिलाद रोम से लड़ा और दस हज़ार सवारों के साथ रोम में दाख़िल हुआ।

इसी साल यज़ीद बिन माविया और अब्दुल मलिक बिन मरवान पैदा हुआ।

हज़रत उमर का तर्ज़े हुकूमत

हज़रत उमर का तर्ज़ व निज़ामें हुकूमत अहले शूरा का मरहूने मिन्नत था। रोज़ाना मस्जिद नबवी में नमाज़ व खुतबा के बाद एक मजलिस शूरा का इनएक़ाद अमल में आता था जिसमें अकरब के अमाएदीन व अकाबरीन उमूरे सल्तनत के बारे में अपने मशविरे पेश करते थे और इन्तेहाई ग़ौर व फिक़्र के बाद उन पर अमल दरामद किया जाता था। इसके अलावा भी हर शख़्स को अपनी राये देने का हक़ हासिल था। हुकूमत के तमाम अहम मामलात इसी मजलिस में तय होते थे औऱ हज़रत उस्मान , अब्दुल रहमान बिन औफ़ , मेआज़ बिन जबल , ओबी बिन कूब , ज़ैद बिन साबित , तलहा बिन अबीदुल्लाह और ज़बीर बिन अवाम इस मजलिसे शूरा के ख़ुसूसी मुशीरकार थे। जब कोई पेचीदा मामला जेरे बहस आता और वह दुशवार तलब होता तो हज़रत अली अलै 0 से कभी कभी मशविरा तलब किया जाता था।

मजलिसे शूरा के अलावा ख़ास ख़ास मामलात के लिये एक और मजलिस “ मजलिसे मुहाजेरीन ” भी कायम थी जिसमें रोज़ मर्रा की ज़रुरियात और इन्तेज़ामात के बारे में फैसले हुआ करते थए। आम रेआया को भी इन्तेजामी उमूर में मदाख़िल का हक़ था।

मक्का , मदीना , शाम , जज़ीरा , मसरा , कूफा , मिस्र , एलिया (बैतुल मुक़द्दस) , हमस , रमला , खुरासान , आज़र बाइजान , फ़ारस , ताएफ़ , सनआ , जंद और बहरैन मुमालिक मुहरुसा के सूबे थे। हर सूबे में हाकिम (आमिल या वाली) सिक्रेट्री (कातिब या मुंशी) कलेक्टर (साहेबुल ख़िराज) पुलिस आफ़ीसर (साहबे अहदास) अफ़सर ख़ज़ाना (साहबे माल) मुक़र्रर थे उनके अलावा एक फ़ौजी अफ़सर (क़ाएद) भी होता था।

हर सूबे में कई कई ज़िले औऱ परगने थे जहां मुख़्तलिफ़ हुक्काम मुक़र्रर थे। आमिल को वक़्ते तक़र्रुरी जो फ़रमान जारी किया जाता था उसमें उस के इख़्तियार व फ़राएज़ की तफ़सील दर्ज होती था जिसे आमिल रेआया के मजमे आम में पढ़ कर सुनाता था और लोग उसके मुक़र्ररा इख़्तियारात से वाक़िफ व बाख़बर होकर उसे अपने इख़्तियार की हद से बाहर नहीं निकलने देते थे। हज के मौक़े पर तमाम मुमालिक के आमिल बुलाये जाते थे और वहां के लोग भी आते थे जिनसे आमिल के आमाल के बारे में दरियाफ़्त किया जाता थआ औऱ अगर कोई शिकायत होती तो इसका तदारुक किया जाता था। मुसलमानों से ज़कात ली जाती थी , ज़मीन पर पैदावार का तसवां हिस्सा मुक़र्रर था। जंगी ख़िदमत हर मुसलमान पर लाज़मी थी। ग़ैर मुमालिक से जो लोग ब-गरज़ तिजारत आते थे उनसे माले तिजारत पर दस फ़ीसदी टैक्स वसूल किया जाता था। माले ग़नीमत का पांचवा हिस्सा हुकूमत का हक़ था बाक़ी सब फौज में तक़सीम हो जाता था। उफ़तादा ज़मीनें आबादकारी की शर्त पर आबाद कारों को दी जाती थीं। मुमलिके मुरुसा में आबपाशी के लिये नहरें , तालाब औऱ बन्द बनवाये गयें थे। रेआया के आराम व आसाइश के लिये जाबजां सड़कों , पुलों , शफाखानों , मस्जिदों और रैन बसेरों की तामीर अमल में लाई गई थी। बड़े बड़े शहरों में मुतअद्दिद कैदख़ाने बनवाये गये थे जिनमें क़ैदियों को रखा जाता था। मौलवी सैय्यद अमीर अली अपनी तारीख़े इस्लाम में रक़म तराज़ हैं कि हज़रत उमर के अहदे हुकूमत में जितने भी काम रफ़ाहे आम के हुए वह सब के सब हज़रत अली के मशवरों के मरहूने मिन्नत हैं।

इ्ब्तेदा में मुकदमाता के फ़ैसले आमिलों के सुपुर्द थे मगर जब हुकूमत मुस्तहकम हो गयी तो जगह जगह क़ाज़ी मुक़र्रर कर दिये गये। क़ाज़ी की अदालत में फ़रीकैन मसावी तौर पर बगै़र किसी मज़ाहमत के आते जाते थे। फ़तवों के लिए खास मुसतनद फ़ाज़िल थे जिनकी निगरां ह़ज़रत आयशा थीं।

फ़ौजदारी के मुक़दमात कें इब्तेदाई तफ़तीश पुलिस करती थी फिर मुलज़िमों का चालान करके क़ाज़ी की अदालत में फेज देती थी। पुलिस के फ़राएज़ में लोगों की जान व मानल की हिफ़ाज़त , दुकानदारों के नाप तौल की देखभाल , सड़कों के किनारे दुकानों की तामीर की रोक थाम , जानवरों पर ज़्यादा बोझ लादने और शराब फ़रोख़्त करने वालों से मवाख़िज़ा भी शामिल था। मदीना , कूफ़ा , बसरा , मूसल , क़सतात , दमिश्क , हमस , उरदुन , और फ़िलिस्तीन फ़ौजी मराकिज़ थे जहां चार चार सौ घोड़ों के असतबल , फ़ौजी बैरीके , अजनास व रसद के गोदाम , फ़ौजी दफ़ातिर और मकानात थे। उनके अलावा सरहदी मुकामात पर भी फ़ौजी छांवनियां थीं जहां हम वक्त फ़ौजें पड़ी रहतीं थीं।

शूरा , वफ़ात , अज़वाज और औलादें

तख्ते हुकूमत पर हज़रत उमर को दस साल छः माह चार दिन गुज़रे थे कि मुग़ीरा बिन शेबा के गुलाम अबु लोलो फ़ीरोज़ ने किसी बात पर बिगड़ कर उनके शिकम में खंज़र उतार दिया। लोग उन्हें ज़ख्मीं हालत में घर लाये मुआलिज बुलाया गया मगर घाव इतना गहरा था कि जब नबीज़ पिलाई गयी तो वह ज़ख्म के रासते से बाहर निकल बड़ी और उनकी ज़िन्दगी की सारी उम्मीदें ख़त्म हो गयी।

मिजाज़ पुरसी के लिये आये हुए कुछ सहाबा भी इस मौक़े पर मौजूद थे। उन्होंने हज़रत उमर की हालत बिगड़ती देखकर मशविरा दिया कि उपने बाद ख़िलाफ़त के लिये किसी को नामजद कर जाइये। उन्होंने हसरत भरे लहजे में कहा , किसे नामज़द करुँ ? काश अबुउबैदा ज़िन्दा होते तो खि़लाफत उनके सुपूर्द करता और जब अल्लाह मुझ से पूछता तो मैं कहता कि उसके सुपुर्द कर आया हूँ जिसे तेरे नबी ने अमीने उम्मत कहा था। या फिर अबु हुअफ़ा का गुलाम सालिम ज़िन्दा होता तो यह मनसब उसके हवाले कर देता। जिसके बारे में पैग़म्बर सल 0 ने फ़रमाया था कि वह अल्लाह से बे हद मोहब्बत रखने वाला है। मुग़ीरा बिन शोबा ने कहा , अपने बेटे अब्दुल्लाह को नामज़द कर दीजिये। उस पर हज़रत उमर ने फ़रमाया , ख़ुदा तुझे ग़ारत करे , मैं ऐसे शख़्स को किस तरह ख़लीफ़ा बना दूं जो अपने बीवी को तलाक़ देने से भी बे खबर है।

इब्ने हजर मक्की रक़म तराज़ है कि हज़रत उमर का यह इशारा उस वाक़िये की तरफञ है कि जब अब्दुल्लाह ने अपनी बीवी को हैज़ की हालत में तलाक़ दे दी थी और जिस पर आंहज़रत सल 0 ने हज़रत उमर से फ़रमाया था कि इससे कहो कि वह इससे रुजु कर ले।

हज़रत उमर ने मुग़ीरा की बात को रद करने के बाद हाज़रीन से मुख़ातिब होकर कहा कि अगर मैं किसी को ख़लीफा मुक़र्रर करुं तो कोई हरज नहीं है इसलिये कि अबुबकर ने मुझे ख़लीफ़ा मुक़र्रर किया औऱ वह मुझ से बेहतर थे और अगर मुकर्रर न कुरुं तो उस में भी कोई मुज़ाएका नहीं है इसलिये कि पैग़म्बर सल 0 ने किसी को जानशीन मुक़र्रर किया और वह हम दोनों से बेहतर थे। इसी असना में हज़रत आयशा ने अब्दुल्लाह बिन उमर के ज़रिये उन्हें यह पैग़ाम भिजवाया कि उम्मत का इन्तेशार में छोड़ने के बजाये किसी को ख़लीफ़ा मुक़र्रर कर जायें औऱ ख़ुद अब्दुल्लाह ने भी जानशीन की नामजदगी पर ज़ोर दिया। हज़रत उमर ने कहा कि ग़ौर व फ़िक्र के बाद मैंने यह तय किया है कि अली बिन अबीतालिब अलै 0 उस्मान बिन अफ़ान , अब्दुल रहमान बिन औफ़ , साद बिन अबी विकास , ज़बीर बिन अवाम और तलहा बिन अबीदुल्लाह को नामज़द करके एक मजलिसे शुरू की तशकील करुं यह लोग इस लायक हैं। कि अपने में से किसी एक को ख़लीफ़ा मुन्तख़ब कर लें।

जब तन्हाई का मौक़ा हाथ आया तो कहा , अगर यह लोग अली अलै 0 की ख़िलाफ़त पर इत्तेफाक़ कर लेंगे तो वह उम्मत को हक़ व सदाक़त की राह पर ले जायेंगे। अब्दुल्लाह बिन उमर ने कहा , तो फिर आपको उन्हें बराहे रास्त ख़लीफ़ा मुक़र्रर कर देना चाहिये। हज़रत उमर ने कहा कि “ वह हरगिज़ मुझे गवारा नहीं है। ”

मजलिसे शूरा का ख़ाका मुकम्मल करने के बाद मुन्तख़ब अरक़ान को अपने यहां तलब किया ताकि उन्हें मजव्वेज़ा लाहए अमल से आगाह कर दें। जब अरकाने शूरा जमा हो गये तो हज़रत उमर ने कहा , मुझे ऐसा लगता है कि तुम में से हर शख़्स ख़िलाफत का तालिब है। इस पर जुबैर ख़ामोश न रह सके और उन्होंने कहा कि हमें ख़िलाफ़त की तलब क्यों न हो , हम सबक़त और क़राबत मे या मर्तबा व मुक़ाम में तुमसे कम नहीं हैं। अगर तुम ख़लिफ़ा हो सकते हो तो हमारे हाथों में भी ख़िलाफ़त की बाग डोर आ सकती है। हज़रत उमर ने कहा , ऐ जुबैर। तुम हरीस , कज ख़ुल्क़ औऱ तंग दिल हो। गुस्से में हो तो काफ़िर और खुश हो तो मोमिन। अगर तुम्हें ख़िलाफ़त मिल गयी तो तुम सेर आध सेर जौ के लिये लोगों से लड़ते फिरोगे। फिर तलहा के बारे में कहा कि तलहा ज़न मुरीद और गुरुर का पुतला है। अगर वह ख़लीफ़ा हुआ तो ख़िलाफत की अंगूठी अपनी बीवी को पहना देगा। अब्दुल रहमान बिन औफ़ के लिये कहा कि वह उम्मत का फ़िरऔन है। और उस्मान बिन अफ़ान के लिये कहा कि वह क़बीला परस्त और कुन्बा परवर हैं उन्हें अपने क़बीले वालों के अलावा दूसरा कोई नज़र ही नहीं आता।

इस एतराफ़ का तक़ाज़ा तो यह था कि आप मजलिस शूरा की तशकील के बजाये अपने इख़्तियाराते ख़ुसूसी से किसी एक शख़्स को अपनी मर्जी के मुताबिक ख़लीफ़ा नामजद कर देते जैसा कि हज़रत अबुबकर ने आपके साथ किया था। लेकिन एतराफ़ के बावजूद आपने शूरा की तशकील इस लिये ज़रुरी समझी कि इस तशकील में भी आपके मक़सद की तक़मील मुज़मिर थी और इसके अरकान , तरीक़ये कार , तरीक़ये इन्तेख़ाब और लाहए अमल में वह तमाम असबाब पिन्हा थे जिनके ज़रिये खिलाफ का ऱुख़ इसी तरफ मुड रहा था जिधर आप मोड़ना चाहते थे। चुनानचे एक मामूली सूझ बूझ रखने वाला इन्सान भी बड़ी आसानी से इस नतीजे पर पुहंच सकता है कि इस मजलिसे शूरा की तशकील और हिकसमेत अमली में हज़रते उस्मान की कामयाबी के तमाम असबाब फ़राहम थे। क्योंकि अब्दुल रहमान बिन औफ़ उस्मान का बहनोई था औऱ साद बिन अबी विक़ास अब्दुल रहमान का अज़ीज़ व हम क़बीला था लेहाज़ा उन दोनों से किसी एक को भी उस्मान के खिलाफ़ तसव्वुर नहीं किया जा सकता। तीसरे तलहा थे जो अब्दुल रहमान और उस्मान की तरफ़ इसलिये माएल थे कि वह हज़रत अली अलै 0 से मुनहरिफ़ थे क्योंकि यह तीमी थे और अबुबकर के ख़लीफ़ा हो जाने की वजह से बनी तीम और बनी हाशिम में निज़ा की दाग़बेल पड़ चुकी थी। बाक़ी रहे जुबैर , वह ब-फ़र्ज़े मोहाल हज़रत अली अलै 0 का साथ भी देते तो उनकी तन्हाई की अहमियत ही क्या थी ?

हज़रत उमर की हिकमते अमली ने इन्तेख़ाब का जो तरीक़ा तजवीज किया थी वह यह था कि अगर फ़रीक़ीन में राय हदिन्दीगान की तादाद निस्फ़ निस्फ़ हो यानी तीन एक तरफ़ औऱ तीन दूसरी तरफ़ हों तो ऐसी सैरत में अब्दुल्लाह बिन उमर को सालिस बनाया जाये औऱ जिस फ़रीक़ के मुतअल्लिक़ वह हुक़् दे वहीं फ़रीक अपने में ख़लीफ़ा का इन्तेख़ब कर ले औऱ अगर लोग इस पर रज़ामन्द न हों तो अब्दुल्लाह इश फ़रीक़ का साथ दें जिसकी तरफ अब्दुल रहमान बिन औफ़ हों और अगर दूसरे लोग इसकी मुख़ालिफत करें तो उन्हें इस मुत्तफ़िक़ा फ़ैसले की ख़िलाफ़ वर्ज़ी के जुर्म में क़त्ल कर दिया जाये।

आपने एक तरहफ ते यह किया और दूसरी तरफ यह किया कि अब्दुल्लाह को इस अमर की ताक़ीद कर दी कि इख़्तेलाफ़ की सूरत में तुम अब्दुल रहमान का साथ देना इसके बाद आपने अबु तलहा अन्सारी को हुक्म दिया कि वह बचास शमशीर जन ले कर उन छः अफराद के सरों पर मुसल्लत से जायें और उन्हें किसी दूसरे काम में मश़गूल न होने दें। सहीब को हुक्म दिया कि वह नमाज़े जमाअत पढ़ाये और जमाअत को एक घर में बन्द करके तलवारें उनके सरों पर लटका दें। और अगर अरकाने शूरा के दरमियान तीन दिन के अन्दर फैसला न हो सके तो सबकी गर्दनें उड़ा दी जायें और मामला आम मुसलमानों के सुपुर्द कर दिया जाये ताकि वह जिसे चाहे अपना ख़लीफ़ा चुन लें।

हज़रत अली बिन तालिब अलै 0 की दूर रस निगाहों ने हज़रत उमर की इस हिकमते अमली और तरीक़ये इन्तेख़ाब को क़बल अज़़ वक़्त भांप लिया कि वह ख़िलाफ़त उस्मान की हो गयी जैसा कि आपने इब्ने अब्बास से फ़रमाया

“ ख़िलाफ़त का रुख़ हमसे मोड़ दिया गया है। इब्ने अब्बास ने कहा यह क्यो कर ? फ़रमाया मेरे साथ उस्मान को भी लगा दिया गया है और कहा गया है कि अक़सरियत का साथ दो औऱ अगर दो एक पर और दो एक पर रज़ामन्द हो तो तुम उन लोगों का साध दो जिन में अब्दुल रहमान बिन औफ़ हैं। चुनानचे साद अपने चचेरे भाई अब्दुल रहमान का साथ देगा और अब्दुल रहमान तो उस्मान का बहनोई होता ही है। ”

बे हर कैफ़ हज़रत उमर की वफ़ात के बाद उनके हुक्म के बमोजिब हज़रत आयशा के हुजरे में यह इजतेमा औऱ दरवाज़े पर अबु तलहा अन्सारी पचास शमशीर बकफ़ आदमियों को ले कर खड़ा हो गया। कार्रवाई की इब्तेदा तलहा ने की और कहा कि गवाह रहना कि मैं अपना हक़ राय दहिन्दगी उस्मान के हवाले करता हूं। इस पर जुबैर ने अपना हक़ राय दहिन्दगी हज़रत अली अलै 0 को सौंप दिया। फिर साद ने अपनी राय अब्दुल रहमान के हवाले कर दी। अब अरकाने शूरा में सिर्फ़ हज़रत अली अलै 0 उस्मान और अब्दुल रहमान रह गये। अब्दुल रहमान ने कहा मैं इस शर्त पर अपने हक़ से दस्तब्रदार होने को तैयार हूं कि आप दोनों हज़रत अपने मैं से एक के इन्तेख़ाब का हक़ मुझे दे दें। या आप दोनों में से कोई एक दस्तबरदार होकर यह हक़ मुझ से ले ले। यह एक ऐसा जाल था जिसमें हज़रत अली अलै 0 को हर तरफ़ से जकड़ लिया गया था। आप या तो दस्तबरदार हो जाते या फिर अब्दुल रहमान को अपनी मन मानी करने देते। पहली सूरत आपके लिये मुम्किन ही न थी कि अपने हक से दस्तबरदार हो कर आप खुद उस्मान या अब्दुल रहमान को मुऩ्तख़ब करते। इसलिये आप जमें रहे और अब्दुल रहमान ने अपने को इससे अलैदा करके यह इख्तियार संभाल लिया औऱ हज़रत अली अलै 0 से मुख़ातिब होकर कहा कि मैं इस शर्त पर आपकी बैयत करता हूँ कि आप किताबे खुदा , सुन्नते रसूल सल 0 और सीरते शैख़ैन पर अमल पैरा होने का वादा फ़रमायें। आपने फरमाया कि मैं शैख़ीन की सीरत पर अमल नहीं करुँगा बल्कि किताबे खुदा और सुन्नते रसूल सल 0 के साथ अपने मसलक पर चलूंगा। तीन मर्तबा दरयाफ़्त करने के बाद जब हज़रत अली अलै 0 की तरफ़ से यही जवाब मिला तो हज़रत उस्मान के सामने यह शर्त रखी गयी। उनके लिये इन्कार की कोई वजह न थी। उन्होंने अब्दुल रहमान की शर्त माल ली और उनकी बैयत हो गयी।

इस तरह हज़रत उमर की सियासी हिकमतें अमली और ग़लत तरीक़ा कार ने ख़िलाफ़त की बाग डोर बनी उमय्या की एक ऐसी फ़र्द के हाथों में सौंप दी जिसकी कुनबा परवरी ने इस्लाम का बेड़ा ग़र्क़ कर दिया।

हज़रत उमर की वफ़ात

26 ज़िलहिज सन् 23 हिजरी मुताबिक़ सन् 644 को हज़रत अबुलोलो फ़िरोज़ के दो धारे खंजर से जख़्मीं हुए औऱ तीन दिन बाद यक्कम मुहर्रम सन् 24 हिजरी को उनकी वफ़ात वाक़े हुई।

अज़वाज

सात औरतों का हज़रत उमर की ज़ौजियत में आना तारीख़ी एतबार से साबित है। आपकी गपहली बीवी का नाम ज़ैनब बिन्ते मज़ऊन था। दूसरी बीवी क़रतीबा बिन्ते अबीं उमय्या मख़जूमीं तीसरी बीवी मलिका बिन्ते जरुल ख़ेज़ाई थीं जिनकी कुन्नियत उम्मे कुलसूम थी। क़रतिबा का तअल्लुक कबीलये कुरैश औऱ मलक़िया का तअल्लुक़ कबीलये ख़जाआ से था लेकिन उन दोनों बीवियों को हज़रत उमर ने सन 6 हिजरी में तलाक़ दे दी थी। सन् 7 हिजरी में महदीने आकर हज़रत उमर ने आसिम बिन साबित की साहबज़ादी जमीला (जिनका अस्ल नाम आसैब था) से अक़द गिया लेकिन बदकिस्मती से वह भी तलाक़ की जद में आ गयीं। सन् 12 हिजरी में आपने अपनी चचेरी बहन आतिका बिन्ते ज़ैद से अक़द किया। हज़रत उर की एक बीवी उम्मे हक़ीम थीं जो हारिस बिन हश्शाम की बेटी थीं और एक ज़ीजा का लमा फ़कीहायमीना था जिनके वालदैन और नसब के बारे में पता नहीं चलता।

औलादें-

आपकी औलादों में लड़कियों की तादाद ज़्याद है जिनमें हज़रत हफ़सा ज़्यादा मशहूर व मुमताज़ हैं जो अपने साबेका़ शौहर ख़नीस के इन्तेक़ाल के बाद रसूल उल्लाह सल 0 के अक़द में आ गयं थीं लेकिन कुछ ख़ास वजूद की बिना पर आंहज़रत सल 0 ने उन्हें तलाक दे दी थी और बाज़ तारीख़ी सराहत के मुताबिक़ बाद ेमं फिर रुजू कर लिया धा। हफ़सा और अब्दुल्लाह दोनों हक़ीक़ी भीई और बहन थे और उनकी मा ज़ैनब बिन्ते माज़ून थीं। बीक़ी मुख़तलिफ़ बीवियों से आपकी छः औलादें थीं जिनके नाम बिल तरतील अब्दुल्लाह , आसिम अबुशहमा , अब्दुल रहमान , ज़ैद और मजीर किताबों में मरकूम हैं।

अब्दुल्लाह फ़िक़ा और हदीस के ओलमा में शुमार होते ते। अब्दुल्लाह अपने बाप की तरहं पहलवानों के शौक़ीन थे। अबु शहमा को शराब पीने की आदत थी जिनका अंजाम गुजिश्ता सफ़हात में आप पढ़ चुके हैं।


हज़रत उस्मान बिन अफ़ान

(सन् 24 हिजरी के सन् 25 हिजरी तक)

हज़रत उस्मान का तअर्रुफ़

आप का नाम उस्मान बिन अफ़ान और कुन्नियत अबु अब्दुल्लाह व अबु अमरु थ। “ ग़नी ” और “ जुलनूरीन ” के अलक़ाब सलातीने बनी उमय्या की तरफ़ से अतिया है। नासल का ख़िताब उम्मुल मोमेनीन हज़रत आयशा ने मरहमत फ़रमाया था।

वालिद का नाम अफ़ान बिन अबुल आस बिन उमय्या बिन अब्दुल शम्स था। वालिदा अरदी बिन्ते करीज़ बिन रबिया थीं जो आपके वालिद अफ़ान की ज़ौजियत में आने से पहले अक़बा बिन अबी मुईत की ज़ौजियत में थीं। अक़बा से एक लड़का वलीद पैदा हुआ जो आपका सौतेला भाई था। इसी वलीद बिन अक़बा को पैग़म्बरे इस्लाम सल 0 ने फ़ासिक़ व फ़ाजिर क़रार दिया था औऱ इसी वलीद के बारे में हज़रत इमाम हसन अलै 0 का इरशाद है कि ये सफूरिया के एक यहूदी का नुतफ़ा था।

अक़ीदत मन्दाने उस्माने उन्हें पैग़म्बरे इस्लाम सल 0 के सिलसिलए नसब में शुमार करते है जो सरीहन ग़लत है। इसलिये कि आपका नस्बी उमय्या अब्द शम्स का बेटा नहीं था बल्कि ज़कवान नामी वह एक रुमीं गुलाम था जिसे पस्त , ज़लील और कमतर होने नीज़ वलदियत नामालूम होने की वजह से लोग उमय्या कह कर पुकारा करते थे लेहाज़ा इसी नाम से वह मशहूर हुआ और इसी नाम की निस्बत से उसकी औलाद बनी उमय्या कहलाई। अल्लाम इब्ने हजर इस्तेक़लानी का कहना है किः

“ जब सालिब माविया के दरबार में पहुंचे तो उन्होंने दौराने गुफ़्तगू माविया से कहा कि तुम लोग यह झूठा दावा करते हो कि उमय्या अबदे शम्स का बेटा था हालांकि सच यह है कि वह ज़कवान नामी , अबदे शम्स का एक रुमी गुलाम था जिसे पस्त और हक़ीर समझ कर लोग उमय्या कहते थे। ”

इस रिवायत की ताईद शरीक़ बिन एवज़ और माविया के दरमियान होने वाले मुनाज़िरे से भी होती है और यही कुछ दग़फ़ल सहाबी रसूल सल 0 और माविया के माबैन होने वाले मुकालिमें में भी है जिसे हम अपनी किताबुल ख़ोलफ़ा हिस्सा दोम में नक़ल कर चुके हैं।

बहरहा , तारीख़ी शवाहिद से यह पता चलता है कि उमय्या अब्दुल शम्स का बेटा हनीं था बल्कि वह एक मजहूलुल नसब गुलाम था लेहाज़ा ऐसी सूरत में हज़रत उस्मान का रसूले अकरम सल 0 के सिलसिले नसब में शुमार किया जाना ग़लत है।

उसम्मानी ख़ानवादा

हज़रत उस्मान के हक़क़ी वालिद अफ़ान बिन अबुल आस मख़न्नस थे। सौतेला बाप अक़बा बिन अबी मुईत शराब ख़ाना चलाता था। आपकी बहन आमेना मशातागरी करती थी। बहनोई हुक्म बिन कनान क़बीला बनी मख़जूम का हज्जाम था। चचा हक़म बिन आस जानवरों को बधिया किया करता था और आप का नाना क़साई था।

इब्तेदाई हालात

ताऱीख़ हमेशा उन लोगों के हालात क़लम बन्द करती है जिन्होंने इब्तेदा ही मैं अपने सिफ़ात व कमालात की बिना पर तारीख़ के धारे को अपनी तरफ़ मोड़ लिया ा फिर कोई शख़्स क़ौम व मुल्क के लिये ऐसी कुर्बानियां पेश करे जो तारीख़ का जुज बन जायें या कोई शख़्स किसी आला मर्तबा पर पहुंच कर खुद अपने अब्तेदाई हालात का तज़कीरा करे और वह इतनी अहमियत व हम्मागीरी का हामिल हो कि तारीख़ खुद बढ़ कर इसके तज़किरे को अपने दामन में समेटने के लिये मजबूर हो जाये। मग़र यह सूरत उसी वक़्त मुम्किन होती है जब तज़किरा करने वाला शख़्स खुद अपने हालात से शरमिन्दा न हो। शायद यही वजह है कि हज़रत उस्मान के इब्तेदाई हालाद बाज़ दूसरे सहाबा की तरह तारीख़ की गिरफ़्त से बाहर और अहदे जाहिलियत की तारीक़ी में हैं। खुद हज़रत उस्मान का अपने बारे में कहना है कि मैं ऐसे ख़ानदान से हूं जो क़लीलुल माश और फ़क़र व फ़ाक़ा का गहवारा था।

पैग़म्बरे इस्लाम की पेशोनगोई

अबु हूरैरा का बयान है कि रसूल उल्लाह सल 0 ने फ़रमाया कि बनी उमय्या में से एक जब्बार मेरे तख़्त पर बैठेगा जिसकी नाक से ख़ूने रोआफ़ जारी होगा।

उस पेशानगोई के बारे में साहबे रौज़तुल एहबाब का कहना है कि जब हज़रत उस्मान तख़्ते ख़िलाफ़त पर मुत्मकिन हुए तो तीन माह तक उनकी नकसीर फूटा की और नाक से ख़ून होता रहा। अल्लामा जलालुद्दीन सेतवी ने भी “ तारीखुल ख़ोलफ़ा ” में हज़रते उस्मान की नकसीर फ़ूटने का तज़किरा किया है।

शूरा का अन्जाम

हज़रत उमर को जिन छः शख़्सियतों में मुनहसिर किया था उनमें से हर एक ख़लीफ़ा के लिये उम्मीदवार था। लोग हज़रत अली अलै 0 की तरफ़ माएल थे क्योंकि वह बनी उमय्या की सल्तनत से ख़ौफ़ ज़दा थे। दूसरी तरफञ मुहाजेरीन हज़रत अली अलै 0 और उनकी इस्तेक़ामत से खाएफ थे। शायद उन में से अकसर को बैतुल माल , इजतेमाईत औऱ हुकूमत के बारे में हज़रत अली अलै 0 के नज़रियात का इल्म था। अन्सार की अकसरियत हज़रत अली अलै 0 के साथ औऱ अक़लियत उस्मान के साथ थी। ऐसा इस लिये था कि वह कुरैश की हुकूमत से ख़ौफ़ज़दा थे औऱ मस्जिदे नबवी में जो गुफ़्तगू हुई थी इसमें बनी उमय्या पर सक़ीफ़ा का क़बाएली ताअस्सुब छाया हुआ था। यह गुफ़्तगु हज़रत उस्मान की बैयत से पहले हुई थी।

लेहाज़ा हज़रत अली अलै 0 मुसलमानों की अक़सरियत की तरफ से और उस्मान कुरैशी अरसदू करीसी की जानिब से अम्मीदवार थे।

शूरा का नतीजा यह हुआ कि उमवी हुकूमत पर क़ाबिज हो गये और हज़रत उमर ने जिन लोगों को शूरा में नामज़द किया था उनमें हज़रत अली अलै 0 के अलावा सभों के सरों पर इक़तेदार का भूत सवार हो गया और यही भूत शूरा से बाहर भी कुरैश की दूसरी शख़्सियतों पर सवार था। क्योंकि उन्हें मालूम था कि हज़रत उमर ने कुरैश में से जिन लोगों को उम्मीदवार बनाया है वह उनसे किसी चीज़ में अफ़ज़ल न थे। शूरा ने अंसार के ज़ेहनों पर भी बुरा असर छोड़ा। क्योंकि सक़ीफ़ा में उनसे वादा किया गया था कि वह हुकूमत में शरीक होंगे लेकिन वह महरुम कर दिये गये थे औऱ इस पर यह सितम था कि उनके क़दीम हरीफ़ यानि मक्के के वह मुश्रिक जो उन के साथ बरसरे पैकार हैं बरसरे अक़तेदार आ गये थे।

ख़िलाफत की तमा रखने वाले पसे पर्दा अन्सार को अपने गिर्द जमा करते और अपनी दौलत और क़बीला की ताक़त से भी इस्तेफ़ादा करते थे नीज़ दूसरे कबाएल से रिश्ते बनाते थे। चुनानचे उस्मान के दिनों में कुरैश अपने मक़सद के लिये अलल एलान सामने आ गये।

यह शूरा ही का नतीजा था कि मुख़तलिफ शख़्सियतों को पसन्द करने वाले यह एहज़ाब आलमे वजूद में आ गये। यह शख़्सियतें अपने ज़ाती मफ़ाद की ख़ातिर इक़तेदार पर कबज़ा जमाने के लिये उस्मान के ख़िलाफ की जाने वाली अवामी शिकायतों से भी फाएदा उठाती थी। चुनानचे इब्ने अब्दुल्लाह ने माविया का एक एतराज़ नक़ल किया है जिसमें वह कहता है किः

“ उमर ने छः आदमियों में शूरा काएम करके मुसलमानों में तफ़रिक़ा औऱ उनके ख़यालात में इख़्तेलाफ पैदा किया है क्योंकि उनमें से हर एक ख़िलाफ़त की तमा रखने लगा और इसकी क़ौम भी इसकेसाथ इस तमा में शरीक थी। ”

यही वह हवादिस थए जिनसे मुसलमानों को दो चार होना पड़ा और उन्हीं हादसात में से हर हादसे ने दूसरे हादसे पर असर डाला औऱ उसके साथ साथ हुकूमत को चलाने , तक़सीम अमवाल और इजतेमाई उमूर में उस्मान के ग़लत असलूब कार ने भी असर किया जिसकी वजह से लोग इस्लामी उसूलों से मुनहरिफ़ हो गये यहां तक कि यह हादसात इस इन्तेहा पर पुहंचे कि हज़रत उस्मान के ख़िलाफ़ अवामी ग़म व गुस्सा का सेलाब उठ खड़ा हुआ और आपके क़त्ल की शक़्ल में शूरा का अंजाम सामने आ गया।

हज़रत उमर की हिक़मते अमली ने शूरा के एक तीर से दो शिकार किये। एक हज़रत उस्मान को लुक़्मा अजल बनाया और दूसरे बनी उमय्या को इक़तेदार व इस्तेहकाम अता करके अमीरुल मोमेनीन हज़रत अली अलै 0 के क़त्ल का सामना भी फ़राहम कर दिया।

ख़िलाफ़ते उस्मानिया की इब्तेदा

हज़रत आय़शा और हफ़सा की वसातत ने जिस तरह हज़रत अबुबकर व उमर को सर सब्ज़ किया इसी तरह अब्दुल रहमान बिन औफ़ से इज़ार बन्दी रिशते ने हज़रत उस्मान को तख़्ते ख़िलाफत तक पहुंचाया। लेकिन यह नहीं मालूम कि आप ने किस तारीख़ को हुकूमत का कारोबार संभाला ? बाज़ मोअर्रेख़ीन ने यक्कुम मोहर्रमुल हराम सन् 24 हिजरी तहरीर किया है और यही तारीख़ ज़्यादा करीन क़यास है। तारीख़ कुछ सही। मगर यह हक़ीक़ते कुल्लिया है कि आपने हुसूले ख़िलाफ़त के वक़्त किये गये किताबे खुदा और सुन्नते रसूल सल 0 पर अमल के वादे को यकसर फ़रामोश कर दिया था और ख़लीफ़ा होते ही उसकी ख़िलाफ़ वर्ज़ियां शुरु कर दी थीं। सिर्फ़ इस बात पर आप की तवज्जे मरकूज़ होकर रह गयी थी कि किस तरह सीरते शैख़ीन की इस्लाम दुश्मनी को जारी रखा जाये और किस तरकीब से ऐसे हालात पैदा कर दिये जायें कि क़यामत तक इस्लाम को फलने फूलने का मौक़ा न मिल सके। ग़ालेबन आपके इसी रुझहान को महसूस करके अरब के माने हुए फ़ितना परदाज अबुसुफ़ियान ने आपको यह तरग़ीब दी थी कि

“ बनी तीम और बनी अदी के बाद अब ख़िलाफ़त तुम्हारे हाथ आई है उसे गेन्द की तरह घुमाओ , फिराओ और नचाओ और बनी उमय्या को इसकी मेखें बनाकर उसे हमेशा के लिये मुस्तहकम कर लो। यह सिर्फ दुनियावी हुकूमत है दीन से इसका क्या ताल्लुक ? मेरे नज़दीक जन्नत व दोज़ख़ वा सजा व जजा कुछ नहीं है। ”

निजामें हुकूमत

सक़ीफ़ा में परवान चढ़ने वाली ख़िलाफ़त इब्तेदा ही से मलूकियत की तरफञ माएल रही। इसका असल मक़सद तालीमाते इस्लामी , सुन्नते पैग़म्बरी , एहक़ामे शरीयत , हुकूके बशरियत और इन्सानी क़दरों को बालाये ताक़ रख कर तख़्त व ताज की ख्वाहिशात , मुल्कगिरी की हवस और इक़तेदार की तमन्ना के तहत एक ऐसी शहंशाही निज़ाम क़याम करना था जिसका ख़्वाहिशाते नफ़्स की तकमील दीनी फ़रीज़ा की अदाएगी क़रार पाये।

औऱ चूंकि असहाबे सलासा ने तज़किया नफ़स या अल्लाह के हुकूक़ की अदाएगी के लिये इस्लाम कुबूल नहीं किया था बल्कि सिर्फ़ जहां बानी उनका मतमए नज़र था इसलिये वह निज़ामें इस्लामी व निज़ामें इलाही को ख़ालिस शहंशाही निज़ाम में ज़म करने की जद्दो जेहद में मसरुफ़ रहे। वह एक ऐसे निज़ाम की कोशिश में सरगर्दाँ रहे जिसमें हुसूले मनफ़ेअत की हर इम्कानी कोशिश मुस्तहसन समझी जाये ख़्वाह वह मुनफ़ेअत दूसरों पर जबर व तशद्दुद औऱ मज़ालिम के ज़रिये ही क्यों न हासिल हो।

यह सिलसिला ख़िलाफ़ते ऊला से ख़िलाफ़ते सालसा तक बराबर जारी व सारी रहा और ग़ालेबन यही वजह है कि बाज़ मोअर्रिख़ीन ने अहदे सलासा के निज़ामे हुकूमत को दीनी , मजहबी और इलाही निज़ाम तस्लीम करने से इन्कार किया है जैसा कि मिस्र के मोअर्रिख़ , डा 0 ताहा हुसैन का कहना है किः

“ जो लोग इन निज़ाम (ख़ोलफ़ाये सलासा के निज़ामे हुकूमत) को इलाही निजा़म तसव्वुर करते हैं वह हक़ीक़त में इन अल्फ़ाज़ व कलेमात से धाखा खाते हैं जो ख़ोलफ़ा के ख़ुतबात में पढ़ते हैं नीज़ इन रिवायत से जो ख़ोलफ़ा के बारे में आम तौर से मशहूर हैं और जिनमें अल्लाह का जिक्र , अल्लाह का हुक्म और उसकी सुल्तानी व इताअत का तडकिरा है। यह लोग ख़्याल करते हैं कि यह अलफ़ाज़ और यह रवायात इस बात का सुबूत है कि इनका निज़ामें हुकूमत आसमानी था हालांकि उनमें सिर्फ़ एक बात की तरफ़ इशारा है जो बिल्कुल आम लेकिन साथ ही साथ बहुत अहम है और वह यह कि “ ख़िलाफ़त ” ख़ोलफ़ा और आम मुसलमानों के माबैन एक मुहाएदा है। “

“ अकसर लोग ख़़्याल करते हैं कि इस अहद का निज़ाम एक इलाही निज़ाम है जो आसमान से उतरा है हालांकि वाक़िया यह नहीं है , अस्ल बात ख़लीफ़ा औऱ रेआया के दिलों का मुताअस्सिर होना है। ” इसका मतलब यह हुआ कि ख़ोलफ़ाये सलासा का राएज करदा निज़ाम न तो इस्लामी था न इलाही। बल्कि इस निज़ाम का मक़सद यह था कि आम मुसलमा उनके राएज करदा निज़ाम को अल्लाह का राएज करदा निज़ाम समझ़ कर उनके हर जाएज़ व नाजाएज़ एहकाम व अफा़ल को कुबूल करते रहें और इससे यह भी वाज़ेह है कि ख़ोलफ़ाये सलासा के ज़ेहन में निज़ामें इस्लामी निज़ामे इलाही या निज़ामें आसमानी का कोई तसव्वुर नहीं था और वह सिर्फ़ एक दुनियावी हुक्मराँ की हैसियत रखते थे।

यहां यह सवाल किया जा सकता है कि वह मुसलमान या सहाबा जो हमा वक़्त जमाल व कमाले रिसालत का मुशाहिदा किया करते थे और जिन्होंने सोच समझ कर इस्लाम कुबूल किया था या जो सीरते रसूल सल 0 से मुतअस्सिर थे औऱ जिनके दिलों में ईमान का चिराग़ रौशन था औऱ जो इस अमर से बख़ूबी वाकि़फ़ ते कि रसूल सल 0 दुनिया पर हुकूमत करने नहीं आये बल्कि दुनिया को अमन , उखूवत और सलामती का दर्स देने आये हैं औऱ जो यह भी जानते थे कि रसूले अकरम सल 0 के दिल में फ़तूहात और माले ग़नीमत की तमन्ना नहीं थी बल्कि वह खुलक़े अज़ीम बन कर इन्सानी क़दरों को बुलन्द करने , इख़्लाक़ बशरी को संवारने , तौहीद का दर्स देने और मरहलए आख़रत को आसान बनाने के लिये आये हैं। वह लोग अक़ल व बसीरत क्यों खो बैठे कि उन्होंने ख़ुलफ़ाये सलासा के इन ख़तरनाक इरादों और मनसूबों को न समझा और इनके ग़ैर इस्लामी रंग ढंग औऱ रवय्ये को महसूस करते हुए भी उन्हें ख़लीफ़ये रसूल सल 0 की हैसियत दे दी ?

इसका जवाब यह है कि तलवार , ताक़त , दौलत औऱ खुसूसन ज़हनों की नीम पुख़्तगी ने हक़ाएक व अक़ाएद पर गहरे पर्दे डाल दिये थे जि़सकी वजह से यह लोग ख़ुलफ़ा की हर बात को हक़ीक़त समझ कर मिज़ाज़ में गुम हो गये।

मुल्कगीरी की तमन्ना ने दौरे अव्वल में फुतूहात का बाज़ार गर्म करके माले ग़नीमत की शक्ल मे जो सरमाया हासिल किया इसका बेशतर हिस्सा बग़ावतों के फरों करने , हुकूमत के इस्तेहकाम और अफ़वाज़ की तज़ीमकारी पर ख़र्ज हुआ. जो बच गया वह मुसलमानों में तक़सीम के बाद ख़लीफ़ा के घरेलू बैतुल माल में जमा हो गया। रफ़्ता रफ़्ता फ़तुहात का यही सिलसिला दूसरे दौर में दाख़िल होकर मंज़िले कमाल पर पुहंचा और सारी दुनिया की दौलत सिमट कर मदीने में ढेर हो गयी। लेकिन हज़रत उमर की जमा ख़ोरी ने उसे वक़्ते आख़िर हज़रत उस्मान के हवाले कर दिया और हज़रत उस्मान हज़रत उमर के मफ़तूहा मुमालिक और उनके ख़़ज़ानों के मालिक व मुख़तसर बन गये।

हज़रत उस्मान के अहद में इफ़राते ज़र का यह हाल था कि एक बीय़ा ज़मीन पर लगे हुए बाग़ की मामूली क़ीमत चार लाख दिरहम थी औऱ एक मामूली नस्ल का घोड़ा एक लाख दिरहम में ख़रीदा जाता था।

अल्लामा जलालुद्दीन सेतवी ने उस्मानी अहद में मफ़तूहा मुमलिक से माले ग़नीमत के तौर पर हासिल होने वाली दौलत के बारे में तहरीर किया है किः

“ सन् 30 हिजरी में ख़ुरासान के अकसर शहर नेशापुर , तूस , सरखुस , मरव और बीहक़ वग़ैरा फ़तेह हुए। उन वसीय शहरों की फ़तूहात के बाद दौलत व माले ग़नीमत के अन्बार लग गये तो हज़रत उस्मान ने खज़ाना बनाया और तमाम लोगों को वज़ीफ़ा व यौमिया तक़सीम किया। दौलत की फ़रावानी का यह आलम था कि हर शख़्स को एक एक लाख बदर से हमानियान (सोलह अरब रुपया) दिया गया। ”

दौलत की इस रेल पेल में हज़रत उस्मान ने तक़सीमे अमवाल का जो ग़ैर मसावी तरीक़ा इख़्तियार किया वह मुसलमानों के लिये ग़ैर मानूस औऱ तकलीफ़ देह था। आप शूरा के अराकीन , कुरैश के बड़े लोगों और अपने रिश्तेदारों को खुसूसी तौर पर बहुत ज़्यादा माल देते थे। अगर यह सारा माल उनकी अपनी कमाई का होता किसी के लिये एतराज की गुंजाइश न होती। लेकिन यह माल बैतुल माल से दिया गया था जिसमें तमाम मुसलमान शरीक़ थे। मुस्तज़ाद यह कि मुख़्तलिफ़ शहरों में हज़रत उस्मान के नुमाइन्दे भी उनकी पैरवी करते और वह भी अपने अजीज़ों और रिश्तेदारों को तरजीहन ज़्यादा माल दिया करते थे।

हज़रत उस्मान ने दौलतमन्द तबक़े की दौलत को मज़ीद बढ़ावा देने के लिये यह तरीक़ा भी राएज़ किया कि वह माले ग़नीमत में हासिल हुई अपनी ज़मीनों के उन इलाको़ं में मुन्तकिल कर सकते हैं जहां वह मुक़ीम हैं। यानी अगर किसी शख़्स की ज़मीन शाम में है तो वह उसके एवज़ उस शख़्स से अपनी ज़मीन का तबादला कर सकता है जिसकी आराजी हिजाज़ या दूसरे अरब मुमालिक में है।

इस तरीक़येकार से दौलतमन्द तबक़े ने फ़ाएदा उठाया और अपनी बेपनाह दौलत से मुख़्तलिफ़ मफ़तूहा इलाकों में ज़मीनों की ख़रीदारी शुरु कर दी औऱ अपने मज़दूरों व गुलामों को उनकी काश्त पर लगाया जिसके नतीजे में उनकी ज़मीनें सोना उगलने लगीं और उनकी दौलत दन दूनी रात चौगूनी के तनासुब बढ़ने लगी जिसका खुलासा मसूदी की ज़बान में यूं है किः

“ ज़ुबैर की दौलत मसरा , कूफ़ा , मिस्र और अस्कन्दरिया में पचास हज़ार दीनार , एक हज़ार घोड़े , एक हजार गुलाम औऱ ला महदूद जागीर तक पुहंय गयी थी। तलहा बिन अबीदुल्लाह को सिर्फ़ इराक़ के ग़ल्ला से एक हज़ार दीनार यौमिया की आमदनी थी। अब्दुल रहमान बिन औफ़ के पास एक सौ घोड़ें , एक हज़ार गायें और दस हज़ार भेड़ें थीं। इसके अलावा उनके इन्तेक़ाल के वक़्त उनकी दौलत के आठवें हिस्से का एक चौथाई अट्ठासी हज़ार तक पहुंच गया था। जब ज़ैद बिन साबित का इन्तेकाल हुआ तो उसका सोना और चांदी कुल्हाड़ों से काट काट कर टुकड़े किया गया। इसके अलावा जो नक़द रक़म उसने छोड़ी थी वह एक लाख दीनार पर मुश्तमिल थी।

लैला बिन मीनता मरा तो उसने तीन लाख की जागीर के अलावा पांच लाख दीनार नक़द छोड़े। खुद हज़रत उस्मान ने मरते वक़्त मदीने में एक लाख पचास हज़ार दीनार , दस लाख दिरहम नक़द उसके अलावा वादीउल कुरा में , हुनैन में और दीगर मुक़ामात पर एक लाख दीनार की जायदाद , हज़ारों की तादाद में ऊँट घोड़े और मुतअद्दिद महल छोडें। ”

इस दौलतमन्द तबके के बरअक्स गुरबत और अफ़लास का मारा हुआ एक मुफ़लिस व नादार तबक़ा भई था जिसके पास न ज़मीनें थी और न माल व दौलत। इस तबक़े में मेहाजे जंग पर लड़ने वाले जाँबाज़ सिपाही औऱ उनके अहले व अयाल शामिल थे जिनके बारे में हज़रत उस्मान का कहना था कि लड़ने वाले मुसलमानों को सिर्फ़ मामूली उज़रत का हक़ है बाक़ी सारा माले ग़नीमत अल्लह के लिये है।

जब सारा माले ग़नीमत अल्लाह के लिये था तो क्या हज़रत उस्मान अल्लाह थे या अल्लाह के बेटे ? जो उसकी मिल्कियत को अपनी मिलकियत समझ कर उसके माल पर अपना दस्ते तसर्रुफ़ दराज़ किये हुए थे ?

बहरहाल , हज़रत उस्मान ने अपनी इस नाक़िस और ग़लत हिक़मते अमली से इन दोनों तबकों के दरमियान अदम मसावात की एक ख़लीज पैदा कर दी। चुनानचे एक तरफञ दौलत मन्द तबक़े की दौलत में रोज़ अफ़जूँ इजाफ़ा होता गया और दूसरी तरफ़ गरीब व मुफ़लिस तबक़े की गुरबत औऱ बढ़ती गयी। आख़िरक़ार इस ग़ैर मुनसिफ़ाना निज़ाम ने मुसलमानों को बहुत जल्द यह एहसास दिला दिया कि उन्होंने इक़तेदारे इस्लामी को ग़लत औऱ सफ़्फ़ाक़ हाथों के हवाले कर दिया है।

इसमें कोई शक नहीं कि हज़रत उस्मान ने अपने अहद में जो बदउनवानियां की उन पर किीस दर्दमन्द इन्सान का दिल दुखे बग़ैर नहीं रह सकता। रह सकता। बड़े बड़े जलूलुलस क़दर सहाबा तो गुमनामियों के गोशों मे पड़ें हों , इफ़लास उनका मुक़द्दर बन चुका हो , गुरबत उन्हें घेरे हुए हो और बेतुलमाल पर तसल्लुत हो तो बनी उमय्या का। तमाम चरागाहों में चौपाये चरें तो उनके , महलात तामीर हों तो उनके , हुकूमत के मरकज़ी ओहदों पर फ़ाएज़ हों तो उन्हीं के नौख़ेज व ना तजरबेकार अप़राद। और अगर कोई दर्दमन्द इन्सान उन तमाम बदउवानियों व बेऐतदालियों के खिलाफ़ आवाज़े एहतेजाज बुलन्द करें तो उसे शहर बदर कर दिया जाये।

ज़कात व सदक़ात जो फ़ुक़रा व मसाकीन का हक़ था औऱ बैतुल माल जो तमाम मुसलमानों का सरमाया था , उसका मसरफ़ क्या करार दिया गया था ? ज़ैल के चन्द नमूनों से वाज़ेह है।

(1) हकम बिन आसिम को (जिसे पैग़म्बरे इस्लाम सल 0 ने मदीने से निकाल दिया था) न सिर्फ़ सुन्नते रसूल सल 0 बल्कि सीरते शैख़ीन की भी खिलाफ़वर्ज़ी करते हुए उसे हजऱरत उस्मान ने फिर मदीने में वापस बुला लिया और बैतुल माल से एक लाख दिरहम अता किये।

(2) वलीद बिन अक़बा को (जिसे कुरआन ने फ़ासिक़ व फ़ाजिर कहा है) एक लाख दिरहम मरहमत किये।

(3) मरवान बिन हकम से जब अपनी बेटी अबान का निकाह किया तो उसे बैतुल माल से एक लाख दिरहम दिये।

(4) हारिस बिन हकम से अपनी बेटी आयशा का अक़द किया तो उसे भी बैतुल माल से एक लाख दिरहम फ़रमाया।

(5) अबुसुफ़ियान बिन हरब को बतौरे खुशनूदी दो लाख दिरहम बैतुल माल से दिये।

(6) मरवान बिन हकम को अफ़रीक़ा का खुम्स जो पांच लाख दिरहम सालाना था दे दिया।

(7) अब्दुल्लाह बिन ख़ालिद को बैतुल माल से चार लाख दिरहम दिये।

(8) मदीने में बहज़ूर एक जगह थी जिसे रसूले अकरम सल 0 ने मुसलमानों के लिये वक़्फ़ आम क़रार दिया था , हारिस बिन हकम को दे दी।

(9) मरवान को बाग़े फ़िदक अताये ख़ुसरवाना के तौर पर दिया।

(10) मदीना औऱ उसके नवाह की चरागाहों में बनी उमय्या के जानवरों के इन वाक़ियात से साफ़ ज़ाहिर है कि हज़रत उस्मान ने ख़िलाफ़त हासिल करते वक़्त अब्दुल रहमान बिन औफ़ से किताबे ख़ुदा और सुन्नते रसूल सल 0 नीज़ सीरते शैख़ीन पर अमल का जो वादा अरकाने शूरा के सामने किया था उससे सिर्फ़ मुकर ही नहीं गये बल्कि ख़िलाफ़त मिल जाने के बाद उसे हवा में उड़ा दिया। यहां तक कि आपके नाक़िस निज़ामे हुकूमत ने बनी उमय्या औऱ बनी हाशिम के दरमियान अदावत की दबी हुई आग का फिर मुश्तइल कर दिया। जो तक़रीबन सौ साल तक भड़कती रही।

क़त्ल हरमिज़ान-

“ हरमिज़ान ” अहवाज़ का ईरानी सूबेदार था जो हज़रत उमर के ज़माने में फ़तहे अहवाज के बाद असीर हो कर मदीने आया था और रसूले अकरम सल 0 के चचा अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब के हाथ पर मुसलमान हो गया था। बैतुलमाल से उसे दो हज़ार दिरहम सालाना वज़ीफ़ा भी मिलता था।

हज़रत उमर जिस दिन अबुलोलो फ़िरोज़ के ख़ंजर से ज़ख्मी हुए उसके दूसरे दिन अब्दुल रहमान बिन अबुबकर ने अब्दुल्लाह बिन उमर से बताया कि कल मैंने अबुलोलो , हरमिज़ान और जफ़ीना नसरानी को एक जगह बैठकर आपस में कुछ राज़ व नियाज़ की बातें करते देखा था। यह लोग मुझे देखकर इधर-उधर मुंतरिश होने लगे तो उनमें से एक के पास से एक दोधारी खंजर भी गिरा था। फिर अब्दुल रहमान ने उस खंजर की शिनाख़्त बताई तो अब्दुल्लाह बिन उमर ने उसको वैसा ही पाया जैसा कि हज़रत उमर के ज़ख्मी होने के बाद उन्होंने अपने चन्द साथियों की मदद से अबुलोलो के हाथ से छीना था। चुनानचे उन्हें गुमान हुआ कि यह तीनों अफराद उमर के क़त्ल में शरीक थे। इशी गुमान और शक व शुब्हा की बिना पर वह ग़ैज़ व ग़ज़ब की हालत में हरमिज़ान के घर की तरफ़ रवाना हुए और जाते ही उसका काम तमाम कर दिया फिर जफ़ीना नसरानी के यहां पहुंचकर उसके क़त्लस किया , उसके बाद अबुलोलो के खर में घुसे और उसकी यतीम बच्ची को मौत के घाट उतार दिया।

जब अन्सार व मुहाजेरीन की मुक़दतर हस्तियों को इस तेहरे क़त्ल की इत्तेला हुई तो कुछ लोग अबीदुल्लाह बिन उमर के पास आये और उनके इस फ़ेल पर उन्हें लानत मलामत और तहदीद व तख़्वीफ़ की। अबीदुल्लाह ने जवाब दिया कि मैं अजमियों में से एक को भी ज़िन्दा नहीं छोड़ूगा और उनके साथ बहुत से मुहाजेरीन को भी क़त्ल कुरूंगा। उस पर अबीदुल्लाह बिन उमर औऱ साद बिन अबी विक़ास में सख़्त तू तू मैं मैं , हाथा पाई , गालम गलोज़ और गुत्थम गुत्था हुई यहांम तक कि साद बिन अबीविक़ास ने अबीदुल्लाह बिन उमर की तलवार छीन ली औऱ उन्हे बाल पकड़ कर दे मारा और घसीटते हुए अपने कमरे तक ले गये और बन्द कर दिया। चुनानचे जब तक हज़रत उस्मान के लिये शूरा होता रहा अबीदुल्लाह बिन उमर को बन्द रखा गया। बैयत के दूसरे दिन हज़रत उस्मान के सामने इस तेहरे क़त्ल का पहला मुक़दमा पेश हुआ।

हज़रत उस्मान ने अन्सार व मुहाजेरीन के सरबआवुर्दा अफराद को जमा किया और उनसे पूछा कि अबीदुल्लाह बिन उमर के बारे में तुम्हारी क्या राय है जिसने हरमिज़ान , ज़फ़ीना औऱ अबुलोली की यतीम लड़की को बेजुर्म व ख़ता क़त्ल किया है।

बनी हाशिम ने ख़ून और क़त्ल के बदले क़त्ल का मुतालिबा किया। कुय़ मुहाजेरीन व अन्सार भी अबीदुल्लाह को क़त्ल किये जाने के हक़ में थे लेकिन अमरु बिन आस के साथ एक गिरोह अबीदुल्लाह का तरफ़दार भी तथा जो यह कह रहा था किकल बाप मारा गया है आज बेटा मारा जाये , यह कभी नहीं हो सका। इन मुताज़ाद गिरोहों में बहस व मुबाहिसा के बाद जब हंगामा आराई की नौबत आ पहुंची तो अमरु आस ने उस्मान से कहा कि यह वाक़िया आपके ख़लीफा होने से पहलेस का है इसिलये आप इश मामले में न पड़िये औऱ किसी तरह अफने सर से लबा टालिये। उस्मान ने कहा ठीक है , मैं इसकी दैत बैतुलमाल से अदा किये देता हूँ। उस पर हज़रत अली अलै 0 ने फ़रमाया कि तुम्हे यह मजाज़ नहीं है कि दैत बैतुलमाल से अदा करो। उस्मान ने कहा अच्छा तो मैं यह रक़म अपनी जेबे खास से अदा करुंगा। चुनानचे उन्होंने दैत की रक़म अदा कर दी और अबीदुल्लाह बिन उमर को छोड़ दिया।

मुन्दर्जा बाला अक़तेबासात तारीख़ तबरी , इब्ने असीर , रौज़तुल एहसाब और हबीबुल सैर से माख़ूज हैं। तबक़ात इब्ने साद में है कि जब उस्मान ख़लिफ़ा बना दिये गये तो उन्होंने मुहाजेरीन व अन्सार को बुलाया और कहा कि मुझे इस शख़्स (अबीदुल्लाह बिन उमर) के बारे में मशविरा दो जिसने दीन में रखना पैदा किया। मुहाजेरीन व अन्सार ने इत्तेफ़ाक़ करके मक़तूलीन का वाबी बनाया। लोगों की अक़सरियत अबीदुल्लाह के साथ थी जो हरमिज़ान और जफीना के लिये कहते थे कि वह तो क़त्ल हो ही गये , क्या तुम लोग यह चाहते हो कि उमर के बाद उनका बेटा भी क़त्ल कर दिया जाये ?

इस मामले में शोर गुल और इख़्तिलाफ़ जब हदल से बढ़ गया तो अमरु आस ने उस्मान से कहा कि यह वाक़िया आपकी ख़िलाफ़त से पहले का है लेहाज़ा उसे दरगुज़र कीजिये। अमरु की इस बात से लोग मुन्तशिर हो गये। उस्मान भी मान गये और हरमिज़ान , जफ़ीना नीज़ अबुलोलो की लड़की का ख़ून बहा दे दिया गया।

तबरी में अबी रजज़ा ने अपने वालिद से रिवायत की है कि मैंने अबीदुल्लाह बिन उमर को इसहालत में देखा है कि वह उस्मान से हाथा पाई कर रहे थे कि ख़ुदा तुझे ग़ारत करे , तूने ऐसे शख़्स को क़त्ल किया है जो नमाज़ पढ़ता था , तेरा छोड़ना किसी तरह हक़ नहीं है।

ताज्जुब है कि हज़रत उस्मान ने उसे क्योंकर छोड़ दिया औऱ सिर्फ़ छो़ड़ा ही नहीं बल्कि ख़ून बहा की रक़म भी अपने पास से पैदा करने को तैयार हो गये। मुम्किन है कि आपके दिल में यह ख़्याल पैदा हुआ हो कि यह ख़िलाफ़त तो अबीदुल्लाह के बाप ही की मरहूने मिन्नत है इस लिये एहसानमन्द और हयादार ख़लीफ़ा को तीन बे गुनाह जानों का क़सास लेते हुए शर्म आई हो। क्योंकि मक़तूलीन ग़ैर अरब थए और इनका कोई वाली व वारिस न था। इसके अलावा यह फ़ाएदा भी मददे नज़र रहा होगी कि दैत की रक़म भी मक़तूलीन का वाली होने की वजह से हज़रत उस्मान ही को मिलने वाली थी।

गवर्नर की माज़ूली औऱ तक़र्री

कूफ़ा

हज़रत उस्मान ने जब तख़्ते ख़िलाफत पर क़दम रखा तो उस वक़्त कुफ़ा था गवर्नर मुगीरा बिन शेबा था , उन्होंने उसे माज़ूल करके साद बिन अबी विक़ास को बवर्नर मुक़र्रर किया लेकिन एक साल भी नहीं गुजरा था कि साद भी माज़ूल हुए औऱ हज़रत उस्मान ने उन्हे हटा कर उनकी जगह वलीद बिन अक़बा बिन अबी मुईत को गवर्नरी के ओहदे पर फ़ाएज़ कर दिया।

साद बिन अबी विक़ास को माज़ूल किये जाने की वजह आम तौर पर मोअर्रेख़ीन यह बयान करते हैं कि बैतुल माल के ख़जांची अब्दुल्लाह बिन मसूद से क़र्ज़ के लेन देन के मामले में उनका झगड़ा हो गया था क्योंकि साद ने बैतुल माल से कुछ क़र्ज़ा लिया था जिसे वक़्त मुक़र्ररा पर उन्होंने अदा नहीं किया था। लेकिन मिस्री मोअर्रिख़ डाक्टर ताहा हुसैन की नज़र में यह वजह माकूल नहीं है। चुनानचे वह तहरीर फ़रमाते हैं किः

“ साद बिन अबी विक़ास का अब्दुल्लाह बिन मसूद से क़र्ज़े के मामले में झगड़ा कोई इतना बड़ा मसला न था कि उन जैसे सहाबी को माज़ूल कर दिया जाता जब कि कर्ज़ से वह मुनकिर न थे महज़ उसकी अदाएगी के लिए थोड़ी सी मोहलत चाहते थे। मेरा ख़्याल तो यह है कि हज़रत साद की माज़ूली का अस्ल सबब यह है कि बनी उमय्या और आले अबी मोईत ने विलायत हासिल करने के लिये जल्दबाजी , तकाज़े औऱ मुख़्तलिफ़ हीले इख़्तियार करना शुरु कर दिये। उन्होंने हज़रत उस्मान पर दबाओ डाल रखा था कि उनके लिये हुकूमत तक पहुंचने का रास्ता साफ़ करें। इसका सुबूत यह है कि जब हज़रत उस्मान ने साद को माज़ूल किया तो उनकी जगह सहाब-ए-कबार या मुहाजिर व अन्सार में से किसी को मुतमईन नहीं किया। न तलहा को फेजा , न ज़ुबैर को , न अब्दुल रहमान को न मुहम्मद बिन मुस्लिमा को और न अबु तलहा को। उन्होंने भेजा तो वलीद बिन अक़बा को , हालांकि मुसलमानों को वलीद पर कोई एतमाद न था। ”

वलीद अक़बा हज़रत उस्मान की मौं अरदी बिन्ते करीज़ के बतन से उनका सौतेला भाई और मुस्लिमुल सुबूत फ़ासिक था। इसके फ़िस्क की गवाही कुरआन ने दी है नीज़ पैग़म्बरे इस्लाम सल 0 ने उसे जहन्नुमी क़रार दिया है। यह तमाम रात अपने मुसाहेबीन औऱ अरबाबे निशात के साथ शराब नोशी में मशग़ूल रहता था। जब मोअज़्ज़िन नमाज़ के लिये उसे ख़बरदार करता तो वह नशे की हालत में मस्जिद में जाता और नमाज़ियों को नमाज़ पढ़ाता। कभी कभी सुबह की दो रकत के बजाये चार रकत पढ़ा के कहता कि अगर तुम लोग कहो तो और ज़्यादा पढ़ा दूं। यह भी कहा जाता है कि जब वह सजदे में जाता तो काफ़ी देर तक पड़ा रहता थआ और कहा करता था कि परवर दिगार! “ तू भी पी और मुझे भी पिला ” । चुनानचे एक बार जो लोग उसके पीछे पहली सफ़ में थे उनमें से किसी ने कहा कि हम तुझ पर ताज्जुल नहीं करते बल्कि हैरत और ताज्जुब उस पर है कि जिसने तुझे हम पर अमीर और वाली मुक़र्रर किया है।

जब वलीद के फ़िस्क़ औऱ शराब नोशी की ख़बर मुसलमानों में आम हुई तो एक गिरोह ने जिसमें अबुज़र औऱ अबु ज़ैनब वग़ैरा शामिल थे मस्जिद में वलीद पर हुजूम किया। उस वक़्त वह शराब के लशे में धुत था। उन लोगों ने उसे होशियार करना चाहा मगर जब वह किसी तरह होश में नहीं आया तो उसकी अंगूठी जिस पर मोहर कुन्दा थी उसके हाथ से उतार ली औऱ उन लोगों ने मदीने आकर हज़रत उस्मान से वलीद की शराब नोशी का सारा हाल बयान किया और सुबूत में वह अंगूठी पेश की लेकिन हज़रत उस्मान ने शिकायत कुनिन्दगान के सीने पर दो लत्ती रसीद करते हुए उन्हें डांट फटकार कर भगा दिया। हज़रत उस्मान के कि़रदार का वह तज़ाद फिक़्र अंगेज़ है कि वह शरीयते मुहम्मदी और दीने इलाही को तबाह करने वालों पर इन्तेहाई मेहरबान थे और उनके या अपनी ज़ात के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वालों के लिये इन्तेहाई सख्त और शकी-उल-क़लब।

बसरा-

बसरा के गवर्नर अबुमूसा अशरी थे जो हज़रत उस्मान के रिश्तेदारों की नज़र में कांटे की तरह खटक रहे थे। आख़िरकार उस्मान ने उन्हें भी निकाल बाहर किया और उनकी जगह अपने मामू ज़ाद भाई अब्दुल रहमान बिन आमिर को गवर्नर बनाया।

मिस्र

मिस्र में अमरु आस गवर्नर था। हज़रत उमर की वसीयत के मुताबिक़ हज़रत उस्मान ने कुछ अर्से तक उसे बरक़रार रखा और अपनी हिकमते अमली से रफ़्ता रफ़्ता अब्दुल्लाह बिन साद के लिये रास्ता हमवार करना शुरु कर दिया। चुनानचे पहले अफ़रीक़ा की फ़तेह के लिये उसे सिपेह सालार बना कर भेजा औऱ फिर मिस्र का वाली ख़िराज बना दिया और अमरु आस की ख़िदमात को जंगी अमूर तक महदूद कर दिया। इश तरह एक सूबे के दो हाकिम हो गये। अब नताज़ेआत का पैदा होना लाज़मीं था और जब तनाज़ेआत ज़हूर पज़ीर होने लगे तो अमरु आस को माज़ूल करके अब्दुल्लाह बिन साद को मुकम्मल तौर पर मिस्र के गवर्नर बना दिया।

यह अब्दुल्लाह बिन साद हज़रत उस्मान का रज़ाई भाई और हज़रत रसूले ख़ुदा सल 0 का मातूब था। फ़तह मक्का के दिन आंहज़रत सल 0 ने उसका ख़ून मुबाह कर दिया था। यह शख़्स आंहज़रत सल 0 को तरह तरह की अज़ीयतें दिया करता थआ और कुरआन का मज़ाक़ उड़ाया करता था।

शाम

शाम में माविया बिन अबुसुफियान हज़रत उमर के दौर से गवर्नर था। उसका शुमार तलक़ा में होता था और उसकी इस्लाम भी मुहमल और नाम निहाद था लेकिन चूंकि उमवी था इसलिये क़ौम परस्ती के फ़ितरी तकाज़ों के तहत हज़रत उस्मान की तमाम तर नवाजिशें औऱ मेहरबानियां उसके साथ थीं। चुनानचे हज़रत उस्मान ने माविया के लिये इस सूबे में दिये जब कि हज़रत उमर के ज़माने में यहां अलग अलग आमिल मुक़र्रर हुआ करते थे।

अगर हज़रत उस्मान की दीनी ग़ैरत उनके क़बाएली असबियत पर ग़ालिब होती तो वह माविया की हुकूमत व ताक़त को मज़ीद बढ़ावा न देते। माविया और उसकी औलादें ने आले रसूल सल 0 पर जो मज़ालिम के पहाड़ तोड़े उनसे तारीख़ के औराक़ भरे पड़े हैं और सारी दुनिया वाकिफ़ है। क्या हज़रत उस्मान इस ज़िम्मेदारी से बच सकते हैं।

सहाबा पर हज़रत उस्मान के मज़ालिम

अबुज़र ग़फ़्फ़ारी

हज़रत अबुज़र गफ़्फ़ारी मदीने से मश्रिक़ की जानिब वाक़े एक छोटे से गांव “ रबज़ा ” के रहने वाले थे। आपका असल नाम अनदिब बिन जनादा था। जब रसूले अकरम सल 0 के बारे में सुना तो मक्के आये और ख़िदमते पैग़म्बर सल 0 में बारयाब होकर इस्लाम कुबूल किया जिस पर कुफ़्फ़ारे कुरैश ने उन्हे तरह तरह की तकलीफ़ें और अज़ीयतें पहुंचाई मगर आपके सिबाते क़दम में लग़ज़िश न आई। इस्लाम कुबूल करने वालों में आप पांचवे नम्बर पर शुमार किये जाते हैं। इस बक़ते इस्लामी के साथ आपके ज़ोहद व तक़वा का यह आलम था कि रसूले अकरम सल 0 ने फ़रमाया , मेरी उम्मत में अबुज़र ज़ोहद व विरा में ईसा बिन मरयम की मिसाल है।

आप हज़रत उमर के ज़मानये ख़िलाफ़त में शाम जले गये थे और हज़रत उस्मान के ज़मानये ख़िलाफ़त में भी वहीं मुकीम रहे औऱ शब व रोज़ हिदायत व तबलीग़ गिरां गुज़रता था क्योंकि आप हज़रत उस्मान की रसमायादारी , अक़रुबा परवरी और बेराह रवी पर खुल्लम खुल्ला नक़द व तबसिरा किया करता था। मगर उसके बावजूद माविया के कुछ बनाये न बनती थी। आख़िरकार उसने उस्मान को लिखा कि अगर अबुज़र कुछ दिनों और यहां मुकीम रहे तो अतराफ़ के तमाम लोगों को आपकी तरपञ से मरगश्ता कर देंगे लेहाज़ा इसका इन्साद होना चाहिये। उसके जवाब में उस्मान ने माविया को लिखा कि अबुज़र को किसी सरकश , बेकजावा और तेज़ रफ़्तार ऊँट पर सवार करके तुन्दखू बे रहम और संग दिल रहबर को साथ मदीने की तरफ़ भेज दो। चुनानचे हज़रत अबुज़र जब मदीने पहुंचे तो अज़ीयत नाक सवारी की वजह से आपकी रानों का गोश्त जुदा हो चुका था और सिर्फ़ हड्डियों की सफ़ेदी ज़ाहिर हो रही थी। लेकिन मदीने पहुंच कर भी आपकी ज़बाने सदाक़त खामोश न रह सकी थी। मुसलमानों को रसूल सल 0 का ज़माना याद दिलाते , निज़ामें हुकूमत पर तंज़ करते , सरमायादारी की मुख़ालिफ़त करते और शाहाना ठाट बाट की बरसरे आम मज़म्मत करते।

हज़रत उस्मान के लिये जनाबे अबुज़र का यह तर्ज़ अमल नाक़ाबिले बर्दाश्त था। चनानचे आपने उन्हें एक दिन बुलाया और कहा कि मैंने सुना है कि तुम कहते हो कि बनी उमय्या की तादाद तीस हज़ार तक पुहंच जायेगी तो वह अल्लह के शहरों को अपनी जागीरें , उसके बन्दों को अपना गुलाम और उसके दीन को फ़रेबकारी का ज़रिया क़रार दे लेंगे।

अबुज़र ने कहा बेशक मैंने पैग़म्बर सल 0 से यह हदीस सुनी है। उस्मान ने कहा , तुम झूट कहते हो। फ़िर अपने मुसाहेबीन को मुखातिब करते हुए पूछा कि तुमसमे से किसी ने पैग़म्बर सल 0 की ज़बान से यह हदीस सुनी है ? सबने जवाब नफ़ी में दिया। जिस पर अबुज़र ने फ़रमाया कि इस हदीस के बारे में अमीरूल मोमेनीन हज़रत अली अलै 0 से पूछा जाये वही इसकी हक़ीक़त बतायेंगे। चुनानचे हज़रत अली अलै 0 को बुला कर दरियाफ़्त किया गया तो आपने फ़रमाया कि अबुज़र सज कहते हैं। उस्मान ने कहा , आप किस बिना पर इस हदीस की सेहत की गवाही दे रहे हैं ? फ़रमाया , मैंने पैग़म्बर सल 0 को यह कहते सुना है कि “ ज़मीन के ऊपर और आसमान के नीचे अबुज़र से ज़्यादा सच बोलने वाला कोई नहीं है। ”

अब उस्मान के पास कोई जवाब न था। अगर झुटलाते तो पैग़म्बर सल 0 की तकज़ीब लाज़िम आती लेहाज़ा पेच व ताब खा कर रह गये और कोई तरदीद न कर सके। अब सरमााय परस्ती के ख़िलाफ़ अबुज़र की सदाए एहतेजाज और बुलन्द होने लगी यहां तक कि आप जब उस्मान को देखते तो इश कुरआनी आयत की तिलावत शुरु कर देते

“ (तर्जुमा) जो लोग सोना और चांदी जमा करते हैं और अल्लाह की राह में उसे ख़र्च करते उन्हे दर्दनाक अजाब की ख़बर सुना दो कि जिस दिन उनका जमा किया हुआ चांदी और सोना दोज़ख की आग में तपाया जायेगा और उसेस उनकी पेशानियां दाग़ी जायेंगी और उनसे कहा जायेगा कि ह वही है जिसे तुमने अपने लिये ज़ख़ीरा किया था तो अब ज़खीरा अन्दोज़ी का मज़ा चखो। ”

हज़रत उस्मान ने अपनी तीनत , फ़ितरत और आदत के मुताबिक अबुज़र को भी माल व ज़र का लालच दिया मगर इस ताएरे आज़ाद को सुनहरी जाल में जकड़ न सके। तशद्दुद और सख़्ती से भी काम लिया मगर ज़बान बन्द न कर सके। आख़िर कार हज़रत उस्मान को ज़ालिमाना रविश ने इस हक़ परस्त को मदीना छोड़ देने और रबज़ा की तरफ़ चले जाने पर मामूर किया गया कि वह उन्हें मदीने से बाहर निकाल दें। यह शाही फ़रमान भी जारी हुआ कि वक़्ते रुख़सत कोई भी शख़्स अबुज़र से कलाम न करे और न उन्हें अलविदा कहे। मगर अमीरुल मोमेनीन हज़रत अली अलै 0, हज़रत इमाम हसन अलै 0 और अम्मार यासिर वग़ैरा ने इस फ़रमान की कोई परवा नहीं की और यह तमाम हज़रात अशकबार आंखों के साथ हज़रत अबुज़र के साथ दूर तक रुख़सत करने के लिये जाते।

जिला वतनी के बाद रबज़ा में अबुज़र की ज़िन्दगी इन्तेहाई मसाएब व आलाम में कटी। आपके फ़रज़न्द “ ज़र ” ओर अहलिया ने यहीं इन्तेकाल किया। जो भेड़ बकरियां गुज़ारा के िलये पाल रखी थीं वह भी हलाक हो गयीं सिर्फ़ एक बेटी रह गयी थी जो बापके साथ तमाम दुखों में बराबर की शरीक थी। जब सरो सामाने ज़िन्दगी नापैद हो गये औऱ मुसलसल फ़ाक़ों पर फ़ाक़े होने लगे तो उसने अबुज़र से कहा , बाबा यह जि़न्दगी के दिन अब कैसे कटेंगे , कहीं आना जाना चाहिये औऱ रिज़क का सामान फ़राहम करना चाहिये। बेटी की इस तजवीज़ पर अबुज़र उसे , हमराह ले कर सहरा की तरफ़ निकल खड़े हुए मगर घास फूस औऱ दरख़्तों के पत्ते भी मयस्सर न आ सके। आख़िरकार थक कर एक जगह बैठ गये। सहरा की रेत इकट्ठा की औऱ उस पर सर रख कर लेट गये। इसी आलमें गुरबत में आपकी सांसें उख़ड़ने लगीं और निजाई कैफ़ियत तारी हो गयी। जब अबुज़र की दुख़्तर ने यह हाल देखा तो सरा सीमा व मुज़तरिब होकर कहने लगी कि बाब जान! अगर आपने इस लक़ व दक़ सहरा मे इन्तेक़ाल फ़रमाया तो मैं क्यों कर कफ़न दफ़न का इन्तेज़ाम करुंगी। आपने फ़रमाया , बेटी घबराओं नहीं , रसूल उल्लाह सल 0 ने मुझसे फरमाया था कि ऐ अबुज़र तुम आलमे गुरबत में इऩ्तेक़ाल करोगे और कुछ अराक़ी तुम्हारी तजहीज़ व तकफ़ीन करेंगे। लेहाज़ा अगर मैं दुनिया से रुख़सत हो जाऊँ तो एक चादर मेरे ऊपर डाल देना और सरे राह जाके बैठ जाना। जब इधर से कोई क़ाफिला गुज़रे तो उसेस कहना कि सहाबिये रसूल सल 0 अबुज़र ने इन्तेक़ाल किया है।

चुनानचे अबुज़र की रेहलत के बाद उनकी बेटी सरे राह जाकर बैठ गयी। कुछ देर बाद एक क़ाफ़िला नमूदार हुआ जिसमें हिलाल बिन मालिक , एहनिफ बिन क़ैस तमीमी , असअसा बिन सूहान अबदी , असूद बिन क़ैस तमीमी और मालिक बिन हारिस अशतर वग़ैरा शामिल थे। जब उन्होंने हज़रत अबुज़र के इन्तक़ाल की ख़बर सुनी तो इस बेकसी की मौत पर तड़प उठे। सवारियां रोक ली गयीं और तजहीज़ व तकफ़ीन के लिये सफ़र मुलतवी कर दिया गया। मालिके अशतर ने जो कफ़न दिया उसकी क़ीमत चार हज़ार दिरहम थी यह लोग तजहीज़ व तकफ़ीन के फ़राएज़ अंजाम देने के बाद रुख़सत हुए और अबुज़र की बेटी को भी अपने हमराह ले गये। यह वाक़िया 8 ज़िलहिज सन् 32 हिजरी का है। एक रिवायत में है कि मालिके अशतर और उनके साथियों ने कफ़न व दफ़न से फ़ारिग़ होकर अबुज़र हक़ में दुआये मग़फे़र की और उस्मान के लिये बद दुआ की।

हज़रत अम्मार बिन यासिर

आपका नाम अम्मार और वालिद का नाम यासिर था जो नसलन यमनी थे। आपकी वालिदा समय्या क़बीलये मख़ज़ूम से थीं। आपने इब्तेदा ही में अपने वालदैन के साथ कुबूलियते इस्लाम का शरफ़ हासिल किया और उसकी पादाश में कुफ़्फारे कुरैश के हाथों बड़े बड़े मसाएब व आलाम बर्दाश्त किये। कुरैश अपने माबूदों (बुतों) की तारीफ़ व तीसीफ़ और रसूल अक़रम सल 0 को बुरा भला कहने के लिये आपको चिलचिलाती धूप और उगलती हुई गर्म रेत पर दिन दिन भी बरैहना लिटाये रखते औऱ कहते कि हम तुम्हें उस वक़्त तक न छोड़ेंगे जब तक तुम मुहम्मद सल 0 की बुराई और हमारे खुदाओं की तारीफ़ व तौसीफ़ नहीं करोगे। मगर अम्मार की पेशानी पर लब न आात और आपकी ज़बान हम्दे इलाही और तौसरीफ़े मुहम्मदी सल 0 में रतबुल लिसान रहती। यह हाल देख कर पैग़म्बरे अकरम सल 0 को सदमा होता और वह आप और आपके वालदैन के खुदा से रहमत के तलबगार होते। कुरआन ने भी आपके इस्लामी सिबात औऱ सरमदी ईमान के तज़किरे किये हैं।

हज़रत अम्मार यासिर को “ जुलहिजरतैन ” का खिताब दिया जाये तो ग़लत न होगा , इसिलये कि आपने दो हिज़रते की हैं। पहले हब्शा की तरपञ और फिर मदीने की तरपञ।

दीगर सहाबा की बनिस्बत मस्जिदे नबवी की तामीर में आपका हिस्सा ज़्यादा है। इसिलये कि दीगर सहाबा अगर एक ईंट या पत्थर लाते तो आप दो लाते थे। आपने जंगे खंदक के मौके़ पर खंदक़ की खुदाई में भी आम मुसलमानों से ज़्यादा हिस्सा लिया और हर इस्लामी जंग में पैग़म्बरे इस्लाम सल 0 के दोश रहे औऱ किसी जंग के मैदान से राहे फ़रार इख्तियार नहीं की।

उमर बिन ख़त्ताब ने आपको कूफ़े का गवर्नर मुक़र्रर किया और फिर कुछ ही अर्से बाद माज़ूल कर दिया और पूछा कि इस माज़ूली से आप नाराज़ तो नहीं हुए ? अम्मार ने जवाब दिया कि जिस वक़्त आपने मुझे गवर्नर बनाया था , मैं उस वक़्त भी खुश नहीं ता और अब माज़ूल हो गया हूं तब भी खुश नहीं हूं। यह थी अम्मार की साफ़ गोई और शाने बे नियाज़ी।

हज़रत अबुज़र गफ़्फ़ारी के बाद अम्मार यासिर दूसरे सहाबी थे जिन्होंने हज़रत उस्मान की बदउनवानियों और एतदालियों के ख़िलाफ एलानिया आवाज़े एहतेजाज बुलन्द की और उसके बदले मसाएब व आलाम का शिकार हुए।

एक दिन हज़रत उस्मान ने बैतुलमाल से एक इन्तेहाई बेश क़ीमत हीरा निकलवाकर अपनी किसी बीवी या बेटी के ज़ेवर में जड़वा दिया। लोगों को इसका पता चला तो उन्होंने हज़रत उस्मान पर लानत मलामत की और अपने ग़म व गुस्से का इज़हार किया। हज़रत उस्मान भी तैश में आ गये उन्होंने बरसरे आम यह एलान किया कि सारा माले ग़नीमत हमारा है , हम जो मुनासिब समझेंगे वह करेंगे , किसी का इसमें क्या इजारा ? उस पर हज़रत अली अले 0 ने फ़रमाया कि अगर तुम ऐसा करोगे तो तुम्हे रोक दिया जायेगा और तुम्हारे औऱ बैतुलमालस के दरमियान दीवार ख़ड़ी कर दी जायेगी। हज़रत अम्मार यासिर भी इस मौक़े परक मौजूद ते। वह खड़े हो गये औऱ कहा कि मैं अपने ख़ुदा को गवाह करके कहता हूं कि इस मामले की मुख़ालिफ़त करने वालों मे मेरा नाम सरे फेहरिस्त शामिल कर लिया जाये बस , इस जुमले पर हज़रत उस्मान ने अम्मार को गिरफ़्तार करा लिया औऱ अपने हाथों से उन्हें इतना मारा कि वह बेहोश हो गये।

मगर , पैगम्बरे इस्लासम सल 0 का यह बे बाक सहाबी फिर भी अपनी हक़ परस्ती व हक़ बयानी पर अड़ा रहा औऱ उसके पाये सिबात में कोई लग़जिश न आई। एक मौक़े पर कुछ सहाबा ने हज़रत उस्मान को एक ख़त लिखा औऱ उसमें उनके तर्ज़े अमल पर मलामत व नसीहत की। यह ख़त लेकर अम्मार यासिर उस्मान के पास आये और उसका इब्तेदाई हिस्सा उन्हें पढ़ कर सुनाया , जिस पर उस्मान ने उन्हें गालिया दी और लातों औऱ घूंसो से बुरी तरह मारा। उस वक़्त हज़रत उस्मान के पैरों में चरमीं मौज़े थे , उनकी एक लात हज़रत अम्मार के पेट पर भी पड़ी जिससे पेटका पर्दा फ़ट गया और इस बूढ़े सहाबी को फुतक का आरज़ा हो गया। मोआर्रिख़ आसमे कूफ़ी का बयान है किः

“ हज़रत अबुज़र ग़फ़्फ़ारी के इन्तेक़ाल की ख़बर उस्मान के दरबार में पहुंची तो उस वक़्त अम्मार यासिर भी वहां मौजूद थे। आपने इन्ना लिल्लाह व इन्ना इलैहे राजेऊन का कलमा ज़बान पर जारी किया औऱ फ़रमाया कि अबुज़र पर अल्लाह अपनी रहमतें नाज़िल करें। इस पर ख़लीफ़ा उस्मान ने गुस्सा होकर कहा कि ऐ नालाएक़ तेरा भी यही हाल होगा। मैं अबुज़र को मदीने से निक़ाल कर पशेमान नहीं हूं ------------ अम्मार ने कहा ख़ुदा की कसम , मेरा यह हाल न होगा। उस्मान ने कहा , इसे धक्के दो और शहर से निकाल दो औऱ उसी जगह पहुंचा दो जहं अबुज़र को पहुंचाया था। अम्मार ने कहा , ख़ुदा की क़मस मुझे कुत्तों और भेडि़यों की हमसाएगी तेरे करीब रहने से ज़्यादा पसन्द हैं। ”

इस गुफ़्तुगू के बाद हज़रत उस्मान ने अम्मार को भी जिला वतन करने का फ़ैसला कर लिया मगर जब यह खबर आम हुई तो क़बीलये बनी मख़जूम के वह लोग जो अम्मार यासिर के क़रीबी रिश्तेदार थे , हज़रत अली अलै 0 की ख़िदमत में हाज़िर हुए औऱ उनसे फ़रयादे रस हुए किः

“ आज हम उस्मान की इस नाशाइस्ता गुफ़्तुगू और बेहूदा फ़ैसले के सिलसिले में आपके पास आये हैं जो उसने अम्मारे के बारे में किया है। अगर वह अम्मार को शहर से बाहर निकाल देगा तो हमारे हाथों से भी ऐसा हादसा ज़हूर में आ जायेगा जिससे वह तमाम उम्र पछतायेगा। ”

हज़रत अली अलै 0 ने बनी मख़ज़ूम के वफ़द के तेवरों को महसूस किया औऱ उस्मान के पास आकर कहा कि तुमने इससे पहले अबुज़र को जो इन्तेहाई नेक , मुत्तकी , परहेज़गार , सच्चा मुसलमान और हज़रत रसूल ख़ुदा सल 0 का बेहतरीन सहाबी था , मदीने से निकाल दिया और वह बेचारा बे किसी की हालत में परदेस रबाज़ा) ही में चल बसा। तुम्हारे इस तशद्दुद ने मुसलमानों को बरगश्ता किया। अब तुमने यह इरादा किया है कि अम्मार को भी मदीने से निकाल बाहर करो। अल्लाह से ख़ौफ़ खाओ औऱ असहाबे पैग़म्बर सल 0 को अज़ीयतें देने से बाज़ आ जाओ।

उस्मान को हज़रत अली अलै 0 की यह बातें नागवार गुज़रीं। मोआर्रिख़ आसम कूफ़ी का कहना है कि उस्मान ने गुस्से से बेकाबू होकर हज़रत अली अलै 0 से भी गुस्ताख़ी और बदकलामी की और आपको भी मदीने से निकाल देने की धमकी दी। उस पर हज़रत के तेवर बदले औऱ फरमाया कि अगर तेरे दिल में यह हसरत है तो आज़मा के देख ले। ख़ुदा की क़सम , तमाम फ़सादात तेरी ज़ात से हैं और मैं देखता हूं कि तुझ से ऐसे उमूर सरज़द हो रहे हैं जो हुदूदे शरीयत से बाहर हैं। यह कहकर आप उस्मान के पास से उठकर चले आये। हज़रत उस्मान ने जब हज़रत अली अलै 0 के माथे पर ग़ैज़ व ग़ज़ब के आसार देखे तो मजबूर होकर उन्होंने अम्मर की ज़िला वतनी का ख़्याल तर्क कर दिया।

अब्दुल्लाह बिन मसूद

अब्दुल्लाह बिन मसूद का ताल्लुक़ क़बीलये बनी ज़हरा से था। आप साबेक़ीन मुसलेमीन में से थे। आप ही ने सबसे पहले बुलन्द आवाज़ से कुरआन मजीद की तिलावत की , उससे पहले किसी की यह हिम्मत न हुई थी। कुफ़्फ़ारे कुरैश ने आपको इस फ़ेल पर इतना मारा था कि आप लहू लुहान हो गये थे।

मुशर्रफ़ बइस्लाम होने के बाद से आपके रसूल उल्लाह सल 0 की ख़िदमत व फ़रमांबरदारी को अपना शेयार बना लिया था। आप पैग़म्बरे इस्लाम सल 0 के कफ़श बरदार भी थे , आपकी नालैन पैरों में पहनाते और आपके साथ आगे आगे चलते।

आप हब्शा और मदीना , दोनों हिजरतों से सरफ़राज़ थे। जंगे बदर से लेकर उसके बाद तक के तमाम ग़ज़वात में शरीक रहे। मोअर्रेख़ीन का कहना है कि यह रफ़्तार व गुफ़्तार और तीर व तरीक़ में रसूल सल 0 के मुशाबा थे।

हज़रत उमर ने उन्हें उमूरे दीन की तालीम देने के लिये और जनाबे अम्मार यासिर को हाकिम बना कर कूफ़े भेजा था औऱ कूफ़े वालों को तहरीरन यह ताकीद की थी कि तुम लोग इन दोनों हज़रात की पैरवी करना और इनकी बातों पर अमल करना।

इब्ने मसूद अहले कूफ़ा को कुरआन औऱ दीन की तालीम देते रहे यहां तक कि जब वलीद कुफ़े का गवर्नर मुक़र्रर हुआ तो उस वक़्त आप बैतुल माल के ख़ज़ाची भी थे।

बैतुलमाल से वलीद ने कुछ कर्ज़ लिया और वक़्ते मोअय्यना पर जब उसने वह रक़म अदा नहीं की तो अब्दुल्लाह बिन मसूद ने तक़ाज़ा किया।

वलीद ने इस तक़ाज़ा की शिकायत हज़रत उस्मान से की। इस पर उस्मान ने इब्ने मसूद को लिखाः

“ तुम सिर्फ़ हमारे खज़ाची हो। वलीद ने बैतुलमाल से जो रक़म ली है उसकी तक़ाजा़ न करो। ”

हज़रत उस्मान का यह शाही हुक्म जब मौसूल हुआ तो खुद्दार अब्दुल्लाह बिन मसूद ने बैतुलमाल की कुंजियां वलीद के सामने फेंक दी औऱ कहा के मैं तो उपने आपको तमाम मुसलमानों का ख़जांची तसव्वुर करता था , तुम्हारा ख़जांची होना मुझे मंज़ूर नही है। अल्लामा बिलाज़री का बयान है कि वलीद के सामने कुंजियां फेंकने के बाद आपने यह कहा किः

“ जो शख़्स शरीयत में उलट फेर करेगा उसे खुदा भी उलट देगा और जो तबदीली का मुरतकिब होगा वह अल्लाह के कहर व ग़ज़ब में आयेगा। तुम्हारे “ साहब ” (उस्मान) ने उलट फेर भी किया है औऱ तबदीली के मुरतकिब भी हुए हैं वरना क्या रसूल सल 0 के सहाबी साद बिन अबी विक़ास इस क़ाबिल थे कि उन्हें माजूल किया जाता ? और तुम इश क़ाबिल थे कि तुम्हें मुसलमानों पर हाकिम मुक़र्रर किया जाता ?

इब्ने मसूद अकसर यह भी कहा करते थे कि सबसे ज़्यादा सही क़ौल अल्लाह का कलाम है और सबसे उमदा हिदायत मुहम्मदे मुसतफा सल 0 की हिदायत है और बदतरीन उमूरे शरियत में नई नई बातें है और हर नई बात बिदअत है और हर बिदअत गुमराही है औऱ हर गुमराही का ठिकाना जहन्नुम है।

वलीद बिन अक़बा ने उन तमाम बातों के बारे में तफ़सील से उस्मान को लिखा और उसके साथ ही यह भी तहरीर किया कि इब्ने मसूद आप पर मुख़तलिफ़ क़िस्म के इल्ज़ामात आयद करते हैं और अहले कूफ़ा के दरमियान आफको बुरा भला कहते हैं। उस्मान ने जवाब मे वलीद को लाख कि इब्ने मसूद को फ़ोरी तौर पर हमारे पास मदीने रवाना कर दो। चुनानचे अब्दुल्लाह बिन मसूद जब वारिदे मदीना हुए और हज़रत से मिलने की ग़र्ज़ से मस्जिद नबवी में दाख़िल हुए तो उस वक़्त उस्मान मिम्बर से ख़ुतबा दे रहे थे. इब्ने मसूद पर नज़र पड़ी तो कहने लगेः

“ लोगों ” तुम्हारे दरमियान वह जानवर आ रहा है जो अपनी ख़ुराक़ को पैरों तले रौंदता है और उस पर लीद करता है। ”

हज़रत आयशा ने अपने हुजरे से पुकार कर कहाः

“ उस्मान खुदा का ख़ौफ़ कर , सहाबी-ए-रसूल सल 0 की शान में ऐसी गुस्ताख़ियां करता है। ”

लेकिन हज़रत उस्मान ने आयशा की एक न सुन और मिम्बर से छलांग मार कर इब्ने मसूद के पैरों तले रौंद डाला जिस्से आपकी पस्लियां शिकस्ता हो गयीं।

इस जुल्म के बाद भी हज़रत उस्मान को तसल्ली नहीं हुई। चुनानचे उन्होंने इब्ने मसूद का वज़ीफ़ा भी बन्द कर दिया और मदीने से बाहर आने जाने पर मुकम्मल पाबन्दी भई आयद कर दी।

बिलाजरी ने तहरीर किया है कि जब इब्ने मसूद मरजुल मौत में मुबतिला हुऐ तो उस्मान उनकी अयादत को आय़े और दोनों में बाहम इस तरह गुफ़्तगू हुई।

उस्मान - आपको क्या तकलीफ़ है ?

इब्ने मसूद - अपने गुनाहों का ख़ौफ़ है।

उस्मान - आप क्या चाहते हैं ?

इब्ने मसूद - अपने परवरदिगार की रहमत

उस्मान - आपका वज़ीफ़ा फिर जारी कर दूं ?

इब्ने मसूद - जब ज़रुरत थी तो बन्द कर दिया , अब ज़रुरत नहीं तो ज़ारी करना

चाहते हैं।

उस्मान - आपके बच्चों के काम आयेगा।

इब्ने मसूद - मेरे बच्चों का कफ़ील खुदा है।

उस्मान - मेरी बख़्शिश के लिये खुदा से दुआ कीजिये।

इब्ने मसूद - मैं खु़दा से कहूंगा कि वह आपसे मेरा इनतेक़ाम ले।

ताऱीख़ इब्ने कसीर में है कि जब उस्मान ने यह कहा कि वज़ीफ़ा आपके बच्चों के काम आयेगा तो इब्ने मसूद ने जवाब दिया कि आप मेरे बच्चों को नादारी का अन्देशा न करें। मैंने उन्हें ताक़ीद कर दी है कि वह हर रात सूरये वाक़िया की तिलावत करते रहेंगे तो कभी फ़क़र व फ़ाक़ा में मुबतिला न होंगे।

हज़रत उस्मान जब चले गये तो इब्ने मसूद ने वसीयत की कि वह मेरी नमाज़े जनाज़ा न पढायें। चुनानचे जब आपने इन्तेक़ाल किया तो किसी ने उस्मान को ख़बर तक न दी। अम्मार यासिर ने नमाज़े जनाज़ा पढाई और यह बरगुज़िदा सहाबी सन् 32 हिजरी में दुनिया से रुख़सत होकर आंहज़रत सल 0 से जा मिला।

फ़त्तूहाते उस्मानियाः

हज़रत अबूबकर और उमर के दौर में हुकूमत के नमक ख़्वार सिपेहसालारों , चरनैलों और फ़ौजी कमाण्डरों ने अरब के नंगे और भूखे क़बाएल के साथ मिल कर मुल्कगीरी और माले ग़नीमत के नाम पर ग़ैर इस्लामी फ़तूहात का जो लामुतनाही सिलसिला क़ाएम किया था इसका तसलसुल हज़रत उस्मान के दौर में भी बरकरार रहा। चुनानचे 25 हिजरी में हज़रत उस्मान ने वाली मिस्र अब्दुल्लाह बिन साद के नाम यह फ़रमान जारी किया कि वह अप़रीक़ा की तरफ़ पेश क़दमी करे औऱ इश इलाक़े को अपने मफ़तूहा इलाक़ों में शामिल कर ले। अब्दुल्लाह बिन साद एक क़सीर फ़ौज लेकर तेवनस की तरफ़ रवाना हुआ मगर वह इस मुहिम में नाकाम रहा।

सन् 27 हिजरी में हज़रत उस्मान ने एक लश्कर जिसमें सहाबा की एक बड़ी तादाद शामिल थी , अब्दुल्लाह की मदद के लिये रवाना किया ताकि वह तेवनस पर दो बारा हमला करके उस पर फ़तेह हासिल करें। चुनानचे तेवनस फतेह हुआ। उसके बाद स्पेन फ़तह हुआ। इशी साल माविया ने बहरी रास्ते से क़बस पर चढ़ाई करके उसे फ़तेह किया जबकि हज़रत उमर के दौर में माविया की निगाहें क़बरस पर थीं लेकिन चूंकि उमर बहरी जंग से ख़ौफ खाते थे इसलिये इजाज़त नहीं दी थी। इसी साल अरज़ान वग़ैरा भी मफ़तूहा इलाकों में शामिल हुए।

हज़रत उमर के दौर के बेशतर मफ़तूहा मुमालिक हज़रत उस्मान के अहद में बाग़ी हो गये थे। चुनानचे उनकी बग़ावतों को फ़रो करने में भी हज़रत उस्मान को दुशवार गुज़ार मरहलों का सामना करना पड़ा। सन् 26 हिजरी में इसतख़र और क़सा वग़ैरा फ़तेह हुए। सन् 30 हिजरी में ख़ुरासान औऱ उसके बेशतर शहर नीशापुर , तूस , सरख़िस , मरव , बीहक़ और बहुत से इलाक़े मफ़तूहा मुमालिक में शामिल हुए। आज़र बाइजान का इलाक़ा जो हज़रत उमर के दौर में फ़तेह हो चुका था फिर बाग़ी हो गया लेकिन उसकी बग़ावत को वलीद बिन अक़बा ने सख़्ती से कुचल दिया और वहां के लोगो से आठ लाख सालाना ख़िराज पर सुलह हो गयी।

इन उस्मानी फ़तूहात का तज़किरा इस कर्रो फ़र से किया जाता है जैसे यह तमाम फ़तूहात सिर्फ़ उन्हीं की तदवबीर और फ़रास्त का नतीजा हों हालांकि हक़ीक़त यह है कि यह फ़तुहात वरसा हैं इस जंगी मुआशरे का जो हज़रत उमर के दौर में पूरी तरह तशकील पा चुका था। फ़ौजी छांवनियां क़ायम हो चुकीं थीं जिनमें बेशुमार मुलाजि़म पेशा फ़ौज रहती थी जिसे मसरुफ़ रख़ना भी ज़रुरी था। इस लिहाज़ से हज़रत उस्मान की फ़तूहात उमर बिन ख़त्ताब के अहद की जंगो का तसलसलु थीं और इन फ़तुहात और क़ामरानी का सेहरा सूबाई गवर्नर , सिपेह सालारों और जरनलों के सर है न कि हज़रत उस्मान के। अलबत्ता उस्मानी दौर में एक नयी जारेहत शुरु हुई और वह थी बहरी जंगों की जिसमें सीरते शैख़ीन का कोई दख्ल न था और न आपकी हौसलामन्दी कारफ़रमां थी। यह मुहिम सिर्फ़ बनी उमय्या के सफ़्फ़ाक और ग़ासिब गवर्नर माविया बिन अबुसुफ़ियान की जाह पसन्दी का नतीजा थी।

मस्जिदुल हराम की तौसीय

सन् 26 हिजरी में हज़रत उस्मान ने हरम काबा की तौसीय व तजदीद का हुक्म दिया। पहले तो उन्होंने आस पास के लोगों से उनके मकानों औऱ ज़मीनों को ख़रीदना चाहा मगर जब कुछ लोगों ने इन्कार किया तो उनके घरों को ज़बरदस्ती मिस्मार करा दिया। जब लोगों ने फ़रमाया कि औऱ इन्साफ़ का मुतालिबा किया तो आपने उन्हें क़ैद ख़ानों में डाल दिया। दाल में ब-मुश्किल तमाम अब्दुल्लाह बिन ख़ालिद की सिफ़ारिश पर उन्हें छोड़ा गया। (तबरी)

मस्जिदे नबवी की तौसीय

अल्लाहमा जलालुद्दीन सेतवी ने तहरीर किया है कि सन् 26 हिजरी में हज़रत उस्मान ने मस्जिद नबवी की तौसीय की और तराशीदा पत्थरों से उसकी तामीर अमल में लाई गयी। सूतून भी पत्थरों के बनावाये गये और छत में सागवान की लकड़ी इस्तेमाल की गयी नीज़ मस्जिद का तूल 160 हाथ और अरज 150 हाथ रखा गया। (तारीखुल खुलफा)

मिना में उस्मानी नमाज़

कितबे खुदा , सुन्नते रसूल सल 0 और रिवायते मुतावातिरा से साबित है कि सफ़र के दौरान नमाज़ क़सर हो जाती है ख्वाह वह ख़ौफ़ व दहशत का आलम हो या सुकून व इत्मिनान का। चुनानचे रसूले अकरम सल 0 ने अपनी हायात में “ क़सर ” के इस अमल को जारी रखा और आपकी रेहलत के बाद हज़रत अबूबकर और उमर भी इसी सुन्नत पर अमल पैरा रहे। तारीखों से इस अमर की निशानदेही होती है कि हज़रत उस्मान भी अपनी ख़िलाफ़त के इब्तेदाई अय्याम में इसी सुन्नते रसूल सल 0 और सीरते शेख़ीन पर कारबन्द रहे लेकिन बाद में न जाने क्यों इसकी मुख़ालिफ़त पर कमर बस्ता हो गये और कुरआन व सुन्नत के मुक़ाबिले में अपनी ज़ाती इजतेहाद से काम लेते हुए इसे तर्क कर दिया जैसा कि मुस्लिम ने अपनी सही में इब्ने उमर से रिवायत की है कि “ इब्ने उमर कहते हैं कि मिना में रसूल सल 0 अबुबकर और उमर ने क़स्र की नमाज़ें पढ़ी लेकिन हज़रत उस्मान ने इतमाम किया। ”

हारिस बिन वहाब से बुख़ारी में मरवी है कि हमने मिना में पैग़म्बरे इस्लाम सल 0 के साथ निहायत सुकून के आलम में नमाज़े क़स्र पढी हैं।

अब्दुल रहमान बिन यज़ीद से मरवी है कि हज़रत उस्मान ने मिना में नमाज़ तमाम पढ़ी तो इसकी इत्तेला अब्दुल्लाह बिन मसूद को की गीय। उन्होंने इन्ना लिल्लाहे व इन्ना इलैहे राजेऊन पढ़ कर काह कि यह ख़िलाफ़ते सुन्नते रसूल सल 0 व सीरते शैख़ीन है। (बुख़ारी व मुस्लिम)

मुस्लिम की दीगर रिवायतः

हज़रत अनस से रिवायत है कि मैंने आंहज़रत सल 0 के साथ मदीने में तमाम और जुलहलीफ़ में क़स्र नमाज़ पढ़ी। इब्ने अब्बास से मरवी है कि में मदीने से मक्का और मक्के से मदीने के सफ़र में आहंहज़रत सल 0 के साथ रहा और आप बराबर क़स्र के माज़ पढ़ते रहे।

इब्ने अबी शीबा से रिवायत है कि आंहज़रत सल 0 ने नेक क़िरदार अफ़राद की निशानियों में कस्र का जि़क्र भी फ़रमाया है।

लैला बिन उमय्या ने हज़रत उमर से पूछा कि हम लोग अमन की हालत में अपनी नमाज़े क्यों कस्र करें ? उन्होंने कहा कि मैं खुद इसी उलझन में था लेकिन आंहज़रत सल 0 से सवाल किया तो आपने फ़रमाया कि क़ब्र सदक़-ए-ख़ुदा है , इसे कुबूल करो।

ज़हरी कहते हैं कि मैंने अरवा से पूछा कि आयशा को यह क्या हो गया है कि वह सफ़र मे पूरी नमाज़ पढ़तीं है ? उन्होंने जवाब दिया कि आयशा ने तावील की है।

सही मुस्लिम की मज़कूरा रिवायात से पता चलता है कि किताबे ख़ुदा , सुन्नते रसूल सल 0 और सीरते शैख़ीन की हज़रत उस्मान की नज़र में कोई अहमियत नहीं थी। नीज़ हज़रत आयशा भी इस फेल में शरीक थीं। एक रिवायत से इस अमर की निशानदेही भी होती है कि हज़रत उस्मान नमाज़ के अजज़ा में भी तहक़ीक़ कर लिया करते थे औऱ सजदे में जाते वक़्त बुलन्द होते वक़्त तकबीर को तर्क कर दिया करते थे। जैसा कि इमाम अहमद बिन हम्बल ने इमरान बिन हसीन से रिवायत की हैः

“ उन्होंने (इमरान बिन हसीन) ने कहा कि मैंने अली अलै 0 की इमामत में नमाज़ अदा की तो मुझे रसूल उल्लाह सल 0 की नमाज़ याद आ गयी। मैं पहली सफ़ में हज़रत के पीछे ही था , जब आप रुकू में जाते औऱ बुलन्द होते तो तक़बीरे कहते मगर उस्मान ने उन्हें उस वक़्त तर्क कर दिया जब वह बूढे हो गये थे। ”

इसी तरह सुन्नते पैग़म्बरी बरबाद हुई औऱ उसकी जगम सुन्नते ख़ुलफ़ा और सुन्नते सहााब ने ले ली। यक़ीनन इस्लाम में यह एक बिदअत है औऱ हर बिदअत ज़लालत है और हर ज़लालत का नतीजा गुमराही है।

सीरते शैख़ीन-

गुज़िश्ता सफ़हात में हम यह तहरीर कर चुके हैं कि सक़ीफ़ा बनी सादा में सहाबियत , अन्सारियत और क़राबत को तज़वीरी चालों से शिकस्त हुई और “ दुम कटे ” इजमा की बदौलत हज़रत अभुबकर ख़लीफ़ा बन गये। इस इजमा की नाफ़हम मुसलमानों की एक बड़ी जमाअत ने सीरतें शैख़ीन से ताबीर करते हुए हुज्जत क़रार दिया मगर जब हज़रत अबुबकर ने वक़्ते आख़िर हज़रत उस्मान को उनकी तज़वीरी कोशिशों का समरा वसीयतनामे की शक्ल में दे कर अपने बाद के लिये ख़लीफ़ा बनाया तो यह इझमाल ख़त्म हो गया और सीरत के टुकड़े मसलहत की हवा में उड़ गये। अब इस रविश को मुसलमान क्या कहें ? सीरत या सुन्नत ? लेकिन यह भी उस वक़्त फ़ेना से हमकिनार हो गयी जब अबुलोलो के खंज़र ने हज़रत उमर की ज़िन्दगी पर मौत का साया डाला। अब न इजमा रहा न नस और न वसीयत , बल्कि शूरा का तरीक़ा राएज हुआ और उसें जान बूझ कर ऐसी शख़्सियतों को नामज़द किया गया जिनके तवस्सुल से ख़िलाफ़त बन हाशिम के बजाये हतमी तौर पर बनी उमय्या तक पहुंचे और जब ऐसा होगा तो बनी उमय्या की देरीना दुश्मन बनी हाशिम को चैन न लेने देगी क्योंकि दौलत , दाक़त और इक़तेदार सब कुछ बनी उमय्या के हाथों में होगा और बनी हाशिम उससे हमेशा के लिये महरुम होंगे।

यह वह ख़ामोश इन्तेक़ाम था जो रसूले अकरम सल 0 के क़त्ल का इरादा करने वाले और उनकी बज़्म में बैठने वाले ने लिया। चुनानचे इशी इन्तेक़ामी कार्रवाई की बुनियाद पर हज़रत उस्मान बिन अफ़ान मुसलमानों के तीसरे ख़लीफ़ां बन बैंठे। महज़ इस ज़बानी व ज़ोहरी इक़रार पर कि वह सीरते शैख़ीन पर अमल करेंगे क्योंकि वह इस हक़ीक़त से वाक़िफ़ थे कि “ सीरते शैखीन ” सिर्फ़ आले रसूल सल 0 से दुश्मनी औऱ अदावत का नाम है।

ग़ालेबन यही वजह थी कि हज़रत उस्मान ने सीरते शैख़ीन के साथ साथ सुन्नते रसूल सल 0 को भी पामाल किया और जिन मलऊनों को आंहज़रत सल 0 ने अपनी ज़िन्दगी में जिला वतन कर दिया था उन्हें फिर इज़्ज़त व एहतेराम के साथ मदीने वापस बुला लिया जब कि हज़रत अबुबकर व उमर ने यह जसारत नहीं की।

हज़रत उस्मान के इस इक़दाम को अगर हम सीरते शैख़ीन से ताबीर करें तो इसका मतलब यह होगा कि शैख़ीन की सीरत यह थी कि उस्मान रसूल उल्लाह सल 0 की मुख़ालिफत करते वरना हकम बिन आस और मरवान बिन हक़म जिन पर पैग़म्बर सल 0 ने लानत की थी और यह कह कर उन्हें मदीने से निकाला था कि इनके हाथों मेरी उम्मत तबाही व बर्बादी में मुबतिला होगी , वापस क्यों बुलाते ?

बाज़ मोअर्रिख़ीन का ख़्याल है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल 0 ने हकम औऱ उसके बेटे मरवान की तरफ़ जिला वतन किया था और बाज़ का कहना है कि राबज़ा की तरफ़ भेजा था। चुनानचे तारीख़ ख़सीस में इब्ने ख़लकान के हवाले से रिवायत है किः

“ जब उस्मान की बैयत हो चुकी तो उन्होंने हज़रत अबुज़र ग़फ़्फ़ारी रहमतुल्लाह अलैहा को रबज़ा में फिकवा दिया सिर्फ़ इस खता पर कि वह लोगों को तर्क दुनिया का दर्स दिया करते थे और हकम बिन आस को जिसे रसूल सल 0 ने रबज़ा मे फिकवाया था , मदीने वापस बुला लिया हालांकि यह काम न हज़रत अबुबकर ने किया और न उमर ने। ”

इस रिवायत से ज़ाहेर है कि हज़रत उस्मान ने हज़रत अबुज़र गफ़्फ़ारी को उसी मुक़ाम पर जिला वतन किया जिस मुकाम पर रसूले अकरम सल ने हकम बिन आस और मरवान बिन हकम को जिला वतन किया था। क्या हज़रत उस्मान का यह फ़ेल रसूल उल्लाह सल 0 से सरीह इन्तेक़ाम न था ? क्या इस उस्मानी तर्ज़े अमल को दुनिया के मुसलमान सीरते शैख़ीन का नाम दे सकते हैं ?

दूसरे यह कि हज़रत उस्मान के तख़्ते हुकूमत पर बैठते ही बनी उमय्या की बन आई। बैतुल माल का दरवाज़ा उनके लिये खोल दिया गया और कुन्बापरवरी और सेला रहमीं के परहे में इस्लामी ख़ज़ाना लूटा जाने लगा , दौलत के फ़र्श पर कैफ़ व सुरुर , ऐश व निशात और शराब व कबाब की महफ़िलें गर्म होने लगीं। ज़लील व पस्त घरानो के नौखेज़ , नौ उम्र और बदकिरदार लौंडों को असहाबे रसूल पर मुक़द्दम किया जाने लगा। सहाबा माज़ूल किये गये अबुमूसा अशरी को बसरा से हटाकर उस्मान ने उनकी जगह अब्दुल्लाह बिन आमिर को मुक़र्रर किया। मिस्र से अमरु आस को हटाया तो उसकी जगह अपने रज़ाई भाई अबदुल्लाह बिन साद बिन अबी सरहा का तक़र्रुर किया हालांकि उसके मुरतिद होने की वजह से पैग़म्बरे इस्लाम सल 0 ने उसका ख़ून मुसलमानों के लिये मुबाह कर दिया था। कूफ़े से अम्मार यासिर को हटाया गया। इसके अलावा और भी बहुत सी अहम तबदीलियां की जिसमें उन्होंने हर लिहाज़ से अपने क़राबत दारों को मलहूज़ ख़ातिर रखा। मुसलमान सोंचे , समझें और फ़ैसला करें कि क्या यह सीरते शैख़ीन थी ? लुत्फ़ की बात तो यह है कि उस्मान ने सीरते शैख़ीन औऱ सुन्नते रसूल सल 0 की ख़िलाफ़वर्ज़ी करते हुए जब हकम बिन आस को मदीने में बुलाया तो उसे बैतुल माल से एक लाख दिरहम भी मरहमत किये। क्या यह मुसलमान था ? इसी तरह हारिस बिन हकम को बाज़ारे मदीना की आमदनीं का एक बड़ा हिस्सा और मरवान बिन हकम को अफ़रीक़ा का ख़ुम्स और फ़िदक हिबा कर दिया क्योंकि यह दोनों आपके दामाद थे। अब्दुल्लाह बिन ख़ालिद जब मिलने आये तो उसे चार लाख दिरहम दिये। वलीद बिन अक़बा जिसे कुरआन ने फ़ासिक़ कहा है , एक लाख दिरहम औऱ अबुसुफ़ियान को दो लाख दिरहम मरहमत फ़रमाये।

सहाबिये रसूल सल 0 अबुमूसा अशरी का बयान है कि हज़रत उमर के दौरे ख़िलाफ़त में जब सोना चांदी या ज़ेवरात वग़ैरा बाहर से आते थे तो वह उन्हें मुसलमानों में तक़सीम करते थे लेकिन एक मर्तबा जब मैं इस क़िस्म की चीज़ें लेकर उस्मान के पास पहुंचा तो उन्होंने सारा माल अपनी बीवियों और लड़कियों के हवाले कर दिया। इस तर्ज़ अमल पर मुझे बेहद सदमा हुआ। चुनानचे मैंने उनसे कहा कि आपसे पहले तो यह नहीं होता था कि मुसलमानों का माल ख़लीफ़ा की बीवियों और बेटियो की मिल्कियत बन जाये। इस पर उन्होंने जवाब दियाकि उमर अपनी राय से क़म करते थे और मैं अपनी राय पर चलता हूं। क्या यह सीरते शैख़ीन थी ?

हज़रत उस्मान के दौर में ज़ैद बिन साबित बैतुलमाल के इंचार्ज उन्होंने एक दिन उस्मान से इस रक़म का तज़किरा किया जो सालाना इख़राजात के बाद बैतुलमाल की तहवील में बाक़ी थी। उस्मान ने ज़ैद से कहा वह तुम ले लो जब कि इस रक़म की तादाद एक करोड़ दिरहम से ज़्यादा थी। क्या उन्हीं बदउनवानियों और बेएतदालियों का नाम सीरते शैख़ीन है ?

इसके अलावा हज़रत उस्मान ने सुन्नत रसूल सल 0 और सीरत शैख़ीन के ख़िलाफ़ जो इक़दाम किये उनकी मुख़तसर फ़ेहरिस्त में उम्मुल मोमेनीन हज़रत आयशा के वज़ीफ़े में तख़क़ीफ़ , अब्दुल्लाह बिन मसूद और अबुज़र ग़फ़्फ़ारी के वज़ाएफ़ का बन्द किया जाना , अशतर सहाबिये रसूल स 0 को मय बीस आदमियों के मदीने से बाहर निकलवाना औऱ उन्हें क़ैद करना। रसूल सल 0 के बरगुज़िदा सहाबियो को जिला वतन करना। अम्मार यासिर और इब्ने मसूद को बुरी तरह ज़द व कोब कराना। कुरआन के जलवाना , अब्दुल्लाह बिन उमर पर बावजूद यह कि वह हरमिज़ान , हफ़ीज और अबुलोलो की कमसिन व यतीम बच्ची के क़ातिल थे , हद न जारी करने औऱ मिना में कस्र के बजाये पूरी नमाज़ अदा करना वग़ैरा शामिल है।

इनके अलावा भी तमाम उस्मानी लग़ज़िशों और ख़ताओं से तारीख़ सफ़हात भरे पड़े हैं। यही वह सीरते शैख़ीन थी जिसे ठुकराकर अमीरुल मोमेनीन हज़रत अली अलै 0 इब्ने अबीतालिब अलै 0 ने शूरा में ख़िलाफ़त कुबूल करने से साफ़ इन्कार कर दिया था।

मुसलमानों में हैजान-

तशद्दुद , मज़ालिम , जबर , इस्तेबदाद , तज़लीले सहाबा , कुन्बा परवरी और नफ़स परस्ती के साथ साथ आम रेआया के जाएज़ उमूर में ग़फ़लत , लापरवाई , सुस्ती और काहेली ने हज़रत उस्मान के ख़िलाफ़ मुसलमानों में इज़तेराब व बेचैनी की लहर पैदा करके उन्हें एक हैजानी सूरतें हाल से दो चार कर दिया था। हर शख़्स पेच व ताब खा रहा था और उनकी बेराह रवी को नफ़रत की निगाह से देखता था। चुनानचे अबुज़रे ग़फ़्फ़ारी की तौहीन व तज़लील और उनकी जिला वतनी की वजह से बनी गफ़्फ़ार और उनके हलीफ़ क़बाएल , अब्दुल्लाह बिन मसूद की पस्लियां तुड़वाने और उनका कुरआन जलवाने की वजह से बनी हज़ील और उनके हलीफ़ बनी ज़हरा। अम्मार यासिर को बेदर्दी से पिटवाने के बाअस बनी मख़ज़ूम और उनके हलीफ़ क़बीले और मुहम्मद बिन अबुबकर के क़्त्ल का सरोसामान करने की वजह से बनी तीम के दलों में ग़म व गुस्से का एक तूफान करवटें ले रहा था।

दूसरे सूबों के मुसलमान भी उस्मान के अम्मला के हाथों नालां व परेशान थे। यह लोग दौलत की सरशारियों और बादएक इशरत की सरमस्तियों की बिना पर जो चाहते थे कर गुज़रते थे। न उनके दिलों में ख़ौफ़े खुदा था न मरकज़ की तरफ़ से एताब का डर था औऱ न किसी बाज़ पुर्स का अन्देशा। लोग उनके पंजे इस्तेबदाद से निकलने के लिये फड़फड़ाते थे मगर कोई उनके करब व अज़ीयत सुनने के लिये आमादा न होता था। नफ़रत के जज़बात उफर रहे थे मगर उन्हें दबाने के कोई फिक़्र की जाती थी।

डॅाक्टर ताहा हुसैन उन उस्मानी अम्मालों के बारे में तबसेरा करते हुए फ़रमाते हैं किः

“ यह अम्माल ऐसी हुकूमत के अहल ने थे जिसका निज़ाम इस्लामी उसूलों यानी अदल व इन्साफ़ , मसावात और पाबन्दी अहद पर क़ायम हो जिसका वादा उस्मान ने क़ौम से किया था कि वह कुरआन व सुन्नत औऱ सीरत अबुबकर व उमर पर क़ायम रहेंगे और उससे किसी क़िस्म का इन्हराफ़ नहीं करेंगे। बल्कि यह अहल थे इस हुकूमत के कि जिसका निज़ाम कूवत , शौक़त , दबदबा , गुरूर और जबर व इस्तेबदाद पर क़ायम हो ” । (अल फ़ितनतुल कुबरा)

सहाबा भी बददिल थे क्योंकि वह देख रहे थे कि अमने आलम तबाह हो रहा है , नज़म व नसफ़ तहोबाला और इस्लामी ख़दो ख़ाल मसतख़ किये जा रहे हैं लेहाज़ा वह भी खामोश न रह सके और जब पानी सर से ऊँचा हो गया तो उन्होंने हज़रत आयशा की सरबराही में हज़रत उस्मान को काफ़िर क़रार दे दिय और उनके क़ताल की ज़मीन हमवार करने में हमा तन मसरुफ़ हो गये।

हजरत उस्मान से हज़रत आयशा का ख़तेलाफ

दूसरे दौरे ख़िलाफ़त में हज़रत आयशा की ज़ात हज़रत उमर के खुसूसी तवज्जो का मरकज़ बनी रही। उन्होंने उनके साथ इम्तियाज़ी व तरजीही सुलूक रवा रखें। वजाएफ व अताया मे यह तमाम अज़वाजे रसूल सल 0 पर मुक़द्दम थीं। हज़रत उमर ने शरयी एहकाम और फ़ेक़ही मसाएल में भई उन्हे इक़तेदार का मालिक बनाया और रफ़्ता रफ्ता वह कूवत व ताक़त दे दी कि यह बाद में आने बाले हर हाकिम से टकरायें और इसके लिये दर्द सर बन गयीं।

हज़रत उस्मान की ख़िलाफ़त के इब्तेदाई दौर में हज़रत आयशा उनकी सरगर्म हिमायती रहीं , उनकी मुख़ालेफ़त का ख़्याल भी मोहतरमा के दिल में नहीं था यहां तक कि जब हज़रत आयशा ने दीगर अज़वाज के साथ उस्मान के दौर में हज बैतुल्लाह का इरादा किया तो ज़रुरी समझा कि पहले वह हज़रत उस्मान से इजाज़त हासिल कर लें। चुनानचे ख़ुद उनका बयान है किः

“ जब उमर मर गये और उस्मान ख़लीफ़ा हुए तो उम्मे सलमा , मैमूना , उम्मे हबीबा और मैंने उस्मान से हज की इजाज़त चाही। उस्मान ने कहा कि उमर की तरह मैं भी तुम्हारे साथ हज करना चाहता हूं जो भी मेरे साथ चलना चाहे चले। फिर उस्मान ने हम सब के साथ हज किया। ”

वसूक़ के साथ यह नहीं कहा जा सकता कि हज़रत उस्मान और हज़रत आयशा के दरमियान इख़्तिलाफ की इब्तेदा कब से हुई। आम तौर पर मोअर्रेख़ीन का ख़्याल है कि हज़रत उमर ने अपने ज़माने में तमाम अज़वाजे रसूल सल 0 के लिये दस दस हज़ार की रक़म बतौरे वज़ीफ़ा मुक़र्रर फरमाई थी औऱ तरजीही बुनियादी पर हज़रत आयशा के बाराह हज़ार मुक़र्रर किये थे। जब उस्मान का ज़माना आया तो उन्होंने आयशा के वज़ीफे में दो हज़ार तख़फ़ीफ़ करके उशे भी दस हज़ार कर दिया ताकि मामला मसावी रहे। यह फ़ेल हज़रत आयशा को नागवार गुज़रा और वह उस्मान पर सख्त बरहम हुई। यहीं से दोनों के दरमियान इख़्तिलाफ़ की इब्तेदा हुई और रफ़्ता रफ़्ता इस इख़्तिलाफ़ ने ख़तरनाक सूरत इख़्तियार कर ली।

हज़रत आयशा ही वह पहली ख़ातून हैं जिन्होंने उस्मान के क़त्ल पर लोगों को उभारने और मुत्तहिद करने में नबी की ज़ौजियत का भरपूर फाएदा उठाया और यह कहकर “ इस नासिल को क़त्ल कर दो क्योंकि काफ़िर हो गया है ” , दुनियाए इस्लाम में इन्क़ेलाब बर्पा कर दिया चुनानचे बिलाज़री का कहना है किः

“ हज़रत आयशा की पहली वह ज़ात है जिसने उस्मान की मुख़ालिफ़त में अवाज़ बुलन्द की , उनके मुख़ालेफ़ीन के लिये जाये पनाह बनी और उनसे आमादा पैकार लोगों की क़यादम की। उस वक़्त पूरे मसलेकते इस्लामिया में हज़रत अबुबकर के ख़ानदान बनी तौमर से बढ़ कर हज़रत उस्मान का कोई दुश्मन न था। ”

हज़रत आयशा के इख़्तिलाफ़ का सबब वज़ीफ़ा में तख़फीफ़ के अलावा हज़रत उस्मान की वह ज़्यादतियाँ वह मज़ालिम और वह तशद्दुद भी हो सकता है जिसेस तमामत सहाबा और मुसलमान नालां थे। तलहा व जुबैर की वह मिली भगत भी हो सकती है जिसके ज़रिये वह अमारत के ख़्वाहां थे और जिसकी तसवीर उस्मान के क़त्ल के बाद जंगे जमल के मौक़े पर उभर कर सामने आई।

बहरहाल जो कुछ भी हो , उससे इन्कमार नहीं किया जा सकता कि आपकी जात वह खामोश चिंगारी थी जिसने ख़िलाफ़ते सालिसा की पूरी इमारत को जला कर ख़ाक सियाह कर दिया और फिर अलग की अलग रहीं। मगर तरीख़ उन वाक़ियात पर खामोश नहीं रह सकती थी चुनानचे मोअर्रिख़ीन ने सब कुछ लिख मारा।

इख़्तिलाफ़ की इस आग को जिन वाक़ियात ने अपने दामन की हवा दे कर भड़काया और शोलों में तबदीली किया उनमें सबसे पहला वाकिया वलीद बिन अक़बा का है।

हज़रत उस्मान ने अपने दौरे ख़िलाफ़त में साद बिन अबी विक़ास को माज़ूल करके वलीद बिन अक़बा को कूफ़े का गवर्नर बनाया। हम लिख चुके हैं कि वलीद बिन अक़बा उस्मान का सौतेला भाई था। यह माना हुआ फ़ासिक़ था और उसके फ़िस्क़ की गवाही कुरआन ने दी है। जब कि साद बिन अबी विक़ास वह शख़्स थे जिन्होंने हज़रत उमर के हुक्म से कूफ़े की बुनियाद डाली थी औऱ वहां इस्लामी फ़ौजों को आबाद किया था। ईरान की जंग में भी साद उन अफ़वाज के सिपेहसलार थे और उन्हीं के ज़ेरे क़यादत ईरान फ़तेह हुआ था जिसकी वजह से इस्लामी लश्कर में उनकी महबूबियत व मक़बूलियत बहुत ज़्यादा थी , लोग उनका एहतेराम करते थे और उन्हें इज्ज़त की नज़र से देखते थे। चुनानचे जब वलीद गवर्नर होकर आया तो साद ने कहा।

“ हमें नहीं मालूम कि हमारे बाद तुम अक़लमन्द हो गये हो या हम अहमक ” । उस पर वलीद ने कहा “ घबराइये नहीं , यह बादशाहत है , यहां एक कम सुबह नाशता करती है तो दूसरी क़ौम शाम का खाना खाती है ” । साद ने कहा “ कसम है खुदा की , तुम लोग ख़िलाफ़त को बादशाहत ही बना कर दम लोगो ” ।

इस गुफ़्तगु से अन्दाज़ा होता है कि हज़रत उस्मान ने ऐसे शख़्स को मुसलमानों पर गवर्नर की हैसियत से मुसल्लत किया था जो ख़िलाफ़त को बादशाहत के दायरे में महदूद समझता था।

साद की माज़ूली और वलीद की तक़र्री तमाम मुसलमानों को नागवार गुज़री। लोगों ने कहाः

“ उस्मान ने बहुत बड़ी तब्दीली की है कि अबु इस्हाक़ (साद) जो नर्म मिज़ाज , मेहरबान , आलिम , सालेह और सहाबिये रसूल सल 0 थे , को माज़ूल करके अपने फ़ासिक़ व फ़ाजिर औऱ अहमक़ भाई को हम मुसलमानों पर हाकिम मुकर्रर किया है। ”

वलीद बिन अक़बा ने कूफ़ा का नज़म व नसक़ अपने हाथ में लेते ही सबसे पहले अब्दुल्लाह बिन मसूद को अपने पैकाने इस्तेबदाद का निशाना बनाया जैसा कि हम तहरीर कर चुके हैं कि वलीद की शिकायतों पर हज़रत उस्मान ने इब्ने मसूद को इतना पिटवाया कि इनकी पस्लियां टूट गयीं। इस सहाबिये रसूल सल 0 की दास्ताने मसाएब सुन कर मुसलमानों में ग़म व गुस्सा की लहर का पैदा होना एक फ़ितरी अमल था।

वलीद के जराएम की तूलानी फ़ेहरिस्त में मसाजिद की बेहुरमती भी शामिल है जिसे नज़र अन्दाज़ नहीं किया जा सकता अबुल फ़रा असफ़ेहीन का बयान है किः

“ हज़रत उस्मान ने जब वलीद को कूफे का गवर्नर बनाकर भेजा तो नसरानी शएर अबु ज़बीद उसके पास आया। उसे मस्जिद से मुलहिक़ अक़ील बिन अबी तालिब अलै 0 के घर में ठहराया। बाद में वलीद ने वह घर अक़ील से लेकर अबुज़बीद को दे दिया और वह उसमें रहने लगा। कूफ़े के नज़दीक वलीद की यह पहली क़ाबिले एतराज़ हरकत थी क्योंकि अबुज़बीद अपने घर से निकल कर जूते पहने हुए मस्जिद के अन्दर दाख़िल होता और दरमियान से चलता हुआ वलीद के पास पहुंचता , उसके साथ वहां बैठ कर शराब पीता , गपशप करता और फिर पलटता तो नशे की हालत में झूमता हुआ मस्जिद के दरमियान से गुज़र कर अपने घर में चला जाता ” ।

बिलाज़री रक़म तराज़ हैं

वलीद ने अबुज़बीद के लिये सुवर के गोश्त औऱ शराब का कोटा मुक़र्रर कर दिया था जो इसे बराबर मिलता रहता था। दूसरा वाक़िया एक साहिर का है जिसे मसूदी ने लिखा हैः

“ वलीद ने कूफ़े के नवाह में रहने वाले एक यहूदी शोबदा बाज़ के बारे में जब सुना तो उसे बुलवाया औऱ मस्जिदे कूफ़ा में उसकी शोबदा बाज़ी के मुज़ाहिरे एहतेमाम किया। उसने वलीद को कुछ शोबदे दिखलाये। उसने एक बड़ा हाथी दिखलाया जो सहने मस्जिद में घोड़े की पीठ पर सवार था , फिर वह ऊँट बन गया जो पहाड़ पर चल रहा था , इफर उसने एक गधे की शक्ल इख़्तियार की और जिसके मुहं में दाख़िल हुआ पाख़ाने के मुक़ाम से निकल गया। फिर उसने एक शख़्स की गर्दन मार दी , सर को जिस्म से अलैहदा कर दिया , फिर तलवार फेरी तो वह आदमीं खड़ा हो गया ” ।

इस तमाशा के वक़्त कुछ अहले कुफ़ा भी वहीं मौजूद थे। उनमें जनदिब बिन काब अज़दी भी थे लाहौल पढ़ने लगे , वलीद पर लनात की और तलवार से इस शोबदा बाज़ यहूदी का सर उड़ा दिया और कहा कि सारी महफ़िल दरहम मरहम हो गयी और तमाशाइयों में भगदड़ मच गयी। वलीद ने जनदब को क़त्ल करना चाहा मगर क़बीलये अज़द माने हुआ। ग़र्ज़ कि जनदब क़ैद कर दिये गये। क़ैदख़ाने के दरौग़ा ने जब जनदब को रात भर इबादते ख़ुदा में मशगूल देखा तो उसने उनसे कहा कि क़ैदख़ाने से निकल भागों वरना सुबह होते ही वलीद तुम्हें क़त्ल कर देगा। चुनानचे वह निकल भागे। जब सुबह होते हुई तो वलीद ने जनदब को क़ैदख़ाने से तलब किया। दरौग़ा ने कहा कि वह क़ैद की हिरासत से फ़रार हो गये। उस पर वलीद ने दरौग़ा ही को क़त्ल कर दिया।

मस्जिद की बे अदबी व बे हुरमती , वलीद का शराब पीकर सुबह की दो रकत के बजाये यार रकत नमाज़ पढ़ाने का और मुसल्ले पर क़ै करने का वाक़िया भी शामिल है जिसके बारे में मसूदी का कहना है कि वलीद की इस हरकत पर नमाज़ियों ने उस पर पथराव किया और वह ज़ख़्मी हो कर कराहता हुआ दारुल अमारा में दाख़िला हुआ।

वलीद की उन्हें तमाम बातों और बेराह रवी की शिकायतें ले कर अबु ज़ैनब जनदब , इब्ने ज़बीर और अबु हबीबा ग़फ़़्फारी वग़ैरा उस्मान के पास पहुंचे औऱ उन्हे तमाम हालात से आगाह किया। मगर उन्होंने कोई तवज्जों न की बल्कि उल्टे शिकायत कुनिन्दगान को डांटा फ़टकारा और उनके सीनों पर हाथ मारकर कहा मेरी नज़रों के सामने से दैर हो जाओ। यह लोग मायूस होकर हज़रत आयशा की ख़िदमत में आये और उनसे सारा माजरा बयान किया और कहा हम वलीद की शिकायत करने उस्मान के पास आये थे लेकिन उलटे फ़कारे गये।

ज़री से मंकूल हैः

“ कूफ़े के कुछ लोग वलीद की शिकायत लेकर उस्मान के पास आये तो उन्होंने कहा कि तुम लोग जब अपने हाकिम से नाराज़ हो तो उस पर झूटी तोहमतें और ग़लत इल्ज़ाम आयद करते हो। सुबह होने दो , तुम लोगो को सख़्त सजायें दूंगा। उन लोगों ने हज़रत आयशा की पनाह ली। सुबह हुई तो उस्मान ने आयशा के घर से आवाज़ें सुनीं और कहा कि इराक़ के फ़ासिकों और ख़ारजियों के लिये आयशा के घर के सिवा कोई ठिकाना नहीं है। उस्मान की यह बात आयशा के कानों में भी पहुंची। उन्होंने पैग़म्बर सल 0 की नालैन उठाकर उस्मान को मुख़ातिब किया और कहा , तुमने इस नालैन पहनने वाले की रविश छोड़ दी है। बाहम तक़रार शुरु हूई। यहां तक कि आवाज़ें सुन कर लोग इकट्ठा हो गये। बाज़ कहते थे कि आयशा सच कहतीं हैं , बाज़ का कहना ता कि औरतों को इससे क्या मतलब , मर्दों के साथ उनकी जूती पैज़ार और ढेलबाज़ी कैसे ?”

यह भी कहा जाता है कि हज़रत आयशा और उस्मान के दरमियान इस मामले को लेकर बड़ी “ तू तू मैं मैं ” और धींगामुश्ती हुई और आपस में एक दूसरे पर जूते फेंके गये। पैग़म्बर सल 0 के बाद मुसलमानों के दरमियान यह पहला झगड़ा और फ़साद था।

इन वाक़ियात पर ग़ौर करने से मालूम होता है कि तमाम अक़ाबरीने सहाबा और हक़परस्त मुसलमान हज़रत उस्मान के तर्ज़े अमल से नालां थे और हज़रत आयशा उनकी कायद थीं। उन्हीं की ताक़त व कूवत ती कि उन्होंने अवाम को उस्मान के ख़िलाफ़ मुत्तहिद व मुनज्ज़म कर दिया था। ऐसे वक़्त में जब कि दुनिया की निगाहें रसूल उल्लाह सल 0 के तब़र्रुक़ात देखने को तरस रही थी , आपने पैग़म्बर सल 0 की नालैन मुबारक निकाल लोगों में हैज़ान वर्षा कर दिया और ऐसी आग लगा दी जो उस्मान के ख़ून से बुझी।

हज़रत उस्मान पर पथराव

हज़रत उस्मान का रज़ाई भाई अब्दुल्लाह बिन साद बिन अबी सरह मिस्र का गवर्नर था जिसके जुल्म व इस्तेबदाद से अहले मिस्र जब जंग और परेशान आ चुके तो वह फ़रवाद की ग़र्ज़ से मदीने की तरफ़ बढ़े और शहर के क़रीब पुहंचकर वादिये जिख़शब में उन लोगों ने पड़ाव डाला। वहां से उन्होंने एक शख़्स के ज़रिये हज़रत उस्मान की ख़िदमत में एक तहरीरी अर्ज़दाश्त भेजी जिसमें यह मुतालिबा किया कि इब्ने साद के मज़ालिम , तशद्दुद और बेराहेरवी की सिलसिला बन्द किया जाये , मौजूदा रविश को बदला जाये और आइन्दा के लिये मुतबादिल व माकूल इन्तेज़ाम किया जाये।

हज़रत उस्मान ने इस अर्ज़दाश्त पर गौ़र करने या तवज्जे देने के बजाये क़ासिद को डांटा फ़टकारा औऱ उसकी गुद्दी में हाथ देकर अपने दरबार से बाहर कर दिया। इस गुरुर व तुग़यान और नारवा सुलूक पर मिस्री वफ़द के लोग बिफ़र गये और मुख़ालिफ़ाना नारे बुलन्द करते हुए शहर में दाख़िल हुए और अहले मदीने से हुकूमत की सितमरानियों और हज़रत उस्मान के इस गै़रउसूली बरताव का शिकवा किया। इधर बसरा और कूफ़े के लोग भी अपनी अपनी शिकायतें लेकर हज़ारों की तादाद में मदीने आये हुए थे , चुनानचे वह लोग भी अहले मिस्र के हमनवा हो गये औऱ मदीने वालों की पुश्तपनाही पर एक जे ग़फीर ने हज़रत उस्मान को घेर कर उन्हे पाबन्दे मसकन बना दिया मगर मस्जिद में आने जाने पर कोई रुकावट नहीं थी। इस मुहासिरे के बावजूद सुलगते हुए माहौल में हज़रत उस्मान ने पहले जुमे में जो ख़ुतबा दिया उसमें मिस्र , कूफ़ा और बसरा वालों पर लानत मलामत की औऱ उन्हें बुरा भला कहा। नतीजा यह हुआ कि तमाम लोग मुश्ताइल हो गये और हज़रत उसमान पर चारों तरफ़ से पत्थरों की बरसात होने लगी यहां तक की वह बेहोश हो गये और मिम्बर से नीचे गिर पड़े।

हज़रत अली अलै 0 से फ़रयाद

जब हज़रत उस्मान को होश आया और उन्हें यह एहसास हुआ कि हालात बिगड़ चुके हैं तो मुश्किल कुशाई के लिये उन्होंने हज़रत अली अलै 0 का सहारा लिया और उनसे फ़रयाद की कि इस आई हुई बला को किसी तरह टालें। अमीरुल मोमेनीन अलै 0 ने फरमाया कि मैं किस बिना पर उन्हें वापस जाने के लिये कहूं जब कि इनके मुतालिबात हक़ ब-जानिब हैं। उस्मान ने कहा , आप इन लोगों से जो भी मुहायिदा करेंगे मैं उसका पाबन्द रहूंगा। ग़र्ज़ कि हज़रत अली अलै 0 अहले मिस्र के वफ़िद से मिले और उनसे गुफ़्तगू की। वह लोग इस शर्त पर जाने के लिये आमादा हो गये कि तमाम मज़ालिम ख़त्म किये जायें। मिस्र के गवर्नर को माज़ूल करके उसकी जगह मुहम्मद बिन अबुबकर का तक़र्रुर अमल में लाया जाये और आइन्दा के लिये इस बेराहेरवी से तौबा की जाये।

हज़रत अली अलै 0 ने पलट कर उनके मुतालिबात उस्मान के सामने रखे जिसे बेचून व चारा उन्होंने मंज़ूर कर लिया। हज़रत अली अलै 0 ने अहले मिस्र को उनके मुतालिबात पूरे किये जाने की यक़ीन दहानी करा दी और वह लोग मुन्तशिर हो गये।

मरवान की फ़रेबकारी

मरवान हज़रत उस्मान का भतीजा और दामाद था। हम तहरीर कर चुके हैं कि पैग़म्बर इस्लाम सल 0 ने उसे और उसके बाप को मदीने से जिला वतन कर दिया था मगर हज़रत उस्मान ने सुन्नते सल 0 और सीरते शैख़ीन की ख़िलाफ़ वर्ज़ी करते हुए न सिर्फ़ उसे बल्कि उसके बाप हकम को भी मदीने वापस बुला लिया और उस पर मेहरबानियों , नवाज़िशों और कसीर माल व ज़र के साथ फ़िदक का इलाक़ा उसके हवाले कर दिया। तारीख़ों से पता चलता है कि मरवान तमाम उस्मानी हुकूमत के उमूर पर हावी था। उस्मान नाम के ख़लीफ़ा थे वरना ख़िलाफ़त व हुकूमत के तमाम मसाएल मरवान ही तय करता था।

हज़़रत आयशा का बयान है कि आंहज़रत सल 0 ने मरवान के बाप हकम पर वक़्त लानत की थी जब वह उसके सलब में था इसलिये वह भी लानते रसूल सल 0 का एक जुज़ है।

ज़बीर बिन मुताम से रिवायत है कि हम लोग पैग़म्बर सल 0 की ख़िदमत में हाज़िर थे कि इधर से हकम गुज़रा। उसे देख कर आंहज़रत सल 0 ने फ़रमाया कि इसके सुलब में जो बच्चा है उसके हाथों मेरी उम्मत परेशानी और अज़ाब में मुबातिला होगी।

अब्दुल रहमान बिन औफ़ से मरवी है कि मदीने में जो बच्चा पैदा होता था वह आंहज़रत सल 0 की ख़िदमत में लाया जाता था। चुनानचे मरवान जब पैदा हुआ था उसकी मां उसे लेकर पैग़म्बर सल 0 की ख़िदमत में हाज़िर हुई। आपने देखा तो फ़रमाया “ यह मलऊन बिन मलऊन है ” ।

बहरहाल हज़रत अली अलै 0 की यक़ीन दहानी पर जब अहले मिस्र चले गये और मामला रफ़ा दफ़ा हो गया तो दूसरे दिन मरवान ने हज़रत उस्मान से कहा कि अली अलै 0 की दख़ल अन्दाज़ी से मिस्र की बला तो टल गयी अब आप दूसरे शहरों के लोगों की रोक थाम के लिये कोई ऐसा बयान दें जिसेस आईन्दा लोग रुख़ न करें उस्मान ने कहा क्या बयान दूँ ? कहा आप यह बयान दें कि मिस्र के कुछ लोग अफ़वाहें सुन कर ग़लत फहमीं की बुनियाद पर मदीने में जमा हो गये थे और जब उन्हें यक़ीन हो गया कि जो वह सुनते थे सब ग़लत था तो वह मुतमईन होकर वापस चले गये। हज़रत उस्मान मरवान की इस फ़रेबकारी से मुबतिला हो गये और उन्होंने उसके कहने के बमोजिब मस्जिदे नबवी में खुतबे के बाद यह बयान दे दिया।

हज़रत उस्मान के मुंह से इस सरीही झूठ का निकलना था कि मस्जिद में हड़बोग मच गय। लोगों ने चीख़ चीख़ कर कहना शुरु किया कि ऐ उस्मान! इस झूठ से तौबा करो और खु़दा से माफ़ी मांगों वरना तुम्हारा ख़ून बहा दिया जायेगा। हंगामा इतना बढ़ा कि आख़िरकार हज़रत उस्मान को तौबा करते ही बन पड़ी। मस्जिद से लानत मलामत की सौग़ात लेकर हज़रत उस्मान जब घर में दाख़िल हुए तो मरवान ने फिर उनसे कुछ कहना चाहा मगर हज़रत उस्मान की बीवी नाएला ने उसे आडे़ हाथों लिया और कहा कि अब तुम चुप रहो , किसी वक़्त तुम्हारी बाते उनके लिये मौत का पेशे ख़ेमा बन जायेंगी।

मरवान को नाएला की यह बात नाग़वार गुज़री। उसने बिगड़ते हुए कहा कि तुम्हे हुकूमत व ख़िलाफ़त के मामलात में दख़ल देने का कोई हक़ नहीं है। तुम उसकी बेटी तो हो जिसे मरते दम तक वज़ू करना भी नहीं आय़ा। नाएला ने बुरअफ़ोख़ता होते हुए कहा कि तू झूठा है औऱ बोहतान रखता है। मरे बापको कुछ कहने के बजाये अपने बापके गरेबान में झांककर देख और अपनी हक़ीक़त पर निगाह डाल , क़सम बाख़ुदा “ अगर बड़े मियां ” (उस्मान) का ख़्याल न होता तो ऐसी ख़री खरी सुनाती कि लोग कानों पर हाथ धर लेते। उस्मान ने जब बात बढ़ते देखी तो दोनों के दरमियान बीच बचाव किया र कहा , कहो क्या कहना चाहते हो ?

मरवान ने कहा , मस्जिद में आप तौबा करके क्यों आये ? मेरे नज़दीक तो गुनाह पर अड़े रहना इश तौबा से कहीं बेहतर था। क्योंकि गुनाह ख़्वाह किसी हद तक बढ़ जायें तौबा की गुंजाइश बाक़ी रहती है। मारे बांधे की तौबा , तौबा नहीं होती। इश तौबा का नतीजा देख लीजिये दरवाज़े पर हुजूम इकट्ठा है। हज़रत उस्मान ने कहा , मुझे जो करना था वह कर आया , अब इऱ हुजूस से तुम ही निपट लो , मेरे बस का यह रोग नहीं है।

हज़रत उस्मान के इस कहने पर मरवान बाहर आया और मजमे से मुख़ातिब होकर उसने कहा , तुम लोग यहां क्यों जमा हो , क्या लूट मार का इरादा है ? या घर पर धावा बोलना चाहते हो ? याद रखो कि तुम लोग आसानी के साथ इक़तेदार हम से नहीं छीन सकते। यहां से मुहं काला करो और भाग जाओ खुदा तुम्हे ज़लील व रुसवा करे।

लोगों ने जब यह बदला हुआ नक़शा देखा तो गैज़ व गज़ब में भरे हुए वहां से सीधे अमीरुल मोमेनीन हज़रत अली अलै 0 के पास आये और उन्हें सारी रुदाद से मुत्तेला किया। हज़रत अली अलै 0 को भी गुस्सा आया चुनानचे वह उसी वक़्त उस्मान के यहां गये और उनसे कहा , तुमने मुसलानों की क्या दुरगत बनाई है , एक बेदीन व बदकिरदार की ख़ातिर दीन से हाथ उठा लिया है औऱ अक़ल को भी छोड़ बैठे हो। तुम्हें अपने वादों का कुछ तो पास व लिहाज़ होना चाहिये। याद रखो! मरवान तुम्हें ऐसे अंधे कुंए में फ़ेकेगा जिससे निकलना तुम्हारे लिये मुम्किन न होगा। तुम मरवान की सवारी बन चुके हो जिस तरह चाहे वह तुम पर चढ़े और जिस ग़लत राह पर चाहे तुम्हें डाल दें। आइन्दा मैं तुम्हारे किसी मामले में दख़ल नहीं दूंगा। जो जी में आये वह करो। अब तुम जानो और तुम्हारा काम।

यह कह कर हज़रत अली अलै 0 जब चले आये तो उस्मान की बीवी नाएला ने उनसे कहा कि मरवान से पीछे छुड़ाइये वरना वह आपकी पेशानी पर एसा कलंक का टाकी लगायेगी जो तमाम उम्र मिटाये न मिटेगा। आप एक ऐसे शख़्स के इशारों पर चल रहे हैं जो समाज में ज़लील औऱ लोगों की नज़म में गिरा हुआ है। अली इब्ने अलीतालिब अलै 0 को राज़ी कीजिये वरना याद रखिये कि इन बिगड़े हुए हालात पर काबू पाना न आपके बस में और न ही मरवान के इख़्तियार में। (तबरी)

ग़र्ज़ कि बीवी के कहने सुनने पर हज़रत उस्मान रात के परतदे में छुपकर हज़रत अली अलै 0 के घर आये औऱ उन्होंने उनसे अपनी बेबसी व लाचारी का रोना रोया। आपने फ़रमाया , अब तुम्हारी ज़ात पर एतमाद करना बजात खुद अफने आपको फ़रेब में मुबतिला करना है। लेहाज़ा अब मैं तुम्हारी कोई जि़म्मेदारी लेने को तैयार नही हूं जो रास्ता तुम मुनासिब समझो वह इख़्तियार करो।

हज़रत का यह जवाब सुनकर उस्मान वहां से मायूसी की हालत में पलटे और जब कुछ न बन पड़ी तो हज़रत अली अलै 0 पर उलटे यह इल्ज़ाम आयद करना शुरु कर दिया कि इन तमाम हंगामों के पसेपुश्त अली अलै 0 का हाथ है।

मुहम्मद बिन अबुबकर के साथ उस्मानी फ़रेब

मुहम्मद बिन अबुबकर का क़िस्सा मिस्र से शुरु होता है। बिलाज़री ने सईद बिन मुसय्यब से रिवायत की है कि हज़रत उस्मान ने बाहर साल हुकूमत की और इस अर्स में उन्होंने ऐसे लोगों को आमिल मुक़र्रर किया जिन्हें पैग़म्बर सल 0 की सोहबत का शरफ़ हासिल न था। यह लोग ऐसे मज़ालिम और ऐसी हरकतों के खूगर थे जो असहाबे रसूल सल 0 के लिये माक़ाबिले बर्दाश्त थे। उनकी शिकायतें हज़रत उस्मान से की जातीं लेकिन वह कोई तवज्जो न देते न उन्हें माज़ूल करते। आख़िर ज़मानये ख़िलीफ़त में उन्होंने अपने खा़नदान वालों को बहुत सर चढ़ा लिया और हर जगह हाकिम मुक़र्रर कर दिया। उनहीं हाकिमों में अब्दुल्लाह बिन साद बिन अबी सरा भी था। यह अबदुल्लाह बिन मसूद , अबुज़र ग़फ़्फारी औऱ अम्मार यासिर के साथ तरह तरह के मज़ालिम औऱ बदसुलूकियां कर चुका था जिसकी वजह से क़बाएल हज़ील , बनी ज़हरा , बनी गफ़्फ़ार औऱ बनी मख़रुम के लोग बरहम थे। चन्द बरस यह हाकिम रहा होगा कि मिस्र वाले इसकी शिकायतें लेकर हज़रत उस्मान के पास पहुंचे। वक़्ती तौर पर उस्मान ने उसकी तन्बीह की औऱ ख़फ़गी फरे खुतूत लिखे लेकिन उसने कोई परवा न की बल्कि उसकी जसारतें और बढ़ गयीं। जो लोग शिकायतें लेकर उस्मान के पास गये थे , उन्हें उसने मारा पीटा और एक शख़्स को क़त्ल भी कर डाला। आजिज़ होकर फिर सात सौ की तादाद में मिस्र के लोग मदीने रवाना हुए। उन लोगों ने नमाज़ों के वक़्त असहाबे पैग़म्बर सल 0 से मुलाक़ातें की और उनसे अब्दुल्लाह बिन साद की ज़्यातियों के बारे में सब कुछ बताया। तलहा ने उस्मान से इस मामले में सख़्त लब व लहजे में गुफ़्तगू की। हज़रत आयशा ने भी कहलाया कि मिस्र वालों के मामले में इन्साफ़ किया जाये। हज़रत अली अलै 0 भी अहले मिस्र के तरजुमान बन कर उस्मान के पास गये और फ़रमाया कि यह लोग सिर्फ यह चाहते हैं कि अब्दुल्लाह को हटा कर किसी दूसरे को हाकिम मुक़र्रर कर दीजिये और उनके साथ इन्साफ़ किजिये। उस्मान ने कहा जिसे यह लोग कहें हाकिम मुक़र्रर कर दूं। लोगों ने मुहम्मद बिन अबुबकर के लिये कहा। हज़रत उस्मान ने मुहम्मद बिन अबुबकर को बुला कर मिस्र का परवाना लिख दिया और उनके साथ मुहाजेरीन व अन्सार की एक जमाअत कर दी कि वह मिस्र जायें और अब्दुल्लाह की ज़्यादतियों की तहक़ीक़ात करें।

अभी मुहम्मद बिन अबुबकर और उनके साथ हिजाज़ की सरहदें पार करके दरियाये कुलजुम के किनारे आबाद एक मुक़ाम “ ईला ’ तक पहुंचे थे कि उन्हें एक हब्शी नाक़े सवार नज़र आया जो अपने को इस तरह बकटुट दौड़ाये चला जा रहा था जैसे वह किसी का पीछा कर रहा हो। मुहम्मद बिन अबुबकर के साथियों को उस पर शुबहा हुआ , उन्होंने उसे रोका और पूछा कि तुम कौन हो ? उसने कहा , में ख़लीफ़ा उस्मान का गुलाम हूं। पूछा की कहां का इरादा है ? उसने कहा कि मिस्र का। पूछा किसके पास जा रहे हो ? कहा वालिये मिस्र के पास। लोगों ने कहा वालिये मिस्र तो हमारे साथ हैं , तुम किसके पास जा रहे हो ? उसने कहा अब्दुल्लाह बिन साद बिन अबी पूछा फिर किस मक़सद से जा रहे हो ? उसने कहा नहीं मालूम। लोगों ने कहा इसकी तलाशी ली जाये।

चुनानचे तलाशी ली गयी लेकिन पास से कोई चीज़ बरामद नहीं हुई केनान बिन बशर ने कहा , इसका मशकीज़ा देखो। जब मशकीज़ा देखा गया तो उसमें से सीसे की एक नलकी बरामद हुई जिसमें ख़त रखा हुआ था जो सील बन्द लिफ़ाफ़े में था। यह ख़त हज़रत उस्मान की तरपञ से अब्दुल्लाह बिन साद बालियों मिस्र के नाम था जिसमें तहरीर था किः

“ जब मुहम्मद बिन अबुबकर और उनके साथी तुम्हारे पास पहुंचे तो किीस तदबीर से उन्हे कत्ल कर दो और जो परवानये तक़रीर मुहम्मद के पास है उसे मनसूख समझो औऱ अपने मनसब पर क़ायम रहो ” ।

ख़त पढने के बाद सब पर सन्नाटा छा गया और हज़रत उस्मान की इर फ़रेबकारी पर लोग हैरत से एक दूसरे के मुंह तकने लगे और उनके दरमियान सरासीमगी और गैज़ व गज़ब की एक लहर दौड़ गयी।

अब आगे बढ़ना मौत को दावत देना था चुनानचे मुहम्मदबिन अबुबकर ने ख़त को तमाम लोगों के सामने सरबमुहर किया और उस हब्शी गुलाम को लेकर अपने हमराहियों के साथ मदीने की तरफ़ पलट पड़े।

मदीने पहुंच कर उन लोगों ने हज़रत अली अलै 0, तलहा , जुबैर , साद बिन अबी विकास और दूसरे असहाबे पैग़म्बर सल 0 को जमा किया और वह ख़त सहाबा के दरमियान रखा गया जिसे देख कर सब अंगुश्त बदन्दां और शशदर रह गये। कोई शख़्स ऐसा न था जो हज़रत उस्मान को बुरा भला न कह रहा था।

तलहा , जुबैर साद और अम्मार वग़ैरा मुहम्मद बिन अबुबकर के हमराह हज़रत उस्मान के घर पहुंचे और वह ख़त उनके सामने रख कर पूछा कि इस पर मोहर किस की है ? उस्मान ने कहा मेरी। पूछा तहरीर किस की है ? कहा मेरे कातिब की। पूछा यह गुलाम किस का है ? कहा मेरा। पूछा यह सवारी किस की है ? कहा सरकारी। पूछा भेजा किसने है ? कहा मुझे नहीं मालूम।

लोगों ने कहा यह कैसे मुम्किन है कि आपका गुलाम , आप ही की सवारी पर बैठ कर जाये और उसके पास ऐसा फ़रमान हो जिस पर आपकी मोहर लगी हो और आपको पता तक न हो। जब आपकी बेबसी व बेचारगी का यह हाल है तो ख़िलाफ़त से दस्तबरदार हो जाइये ताकि कोई ऐसा शख़्स आये जो मुसलमानों के अमूर की देख भाल कर सके।

हज़रत उस्मान ने कहा यह हरगिज़ नहीं हो सकता कि मैं इस पैरहन को उतार दूं जिसे अल्लाह ने मुझे पहनाया है। अलबत्ता तौबा किये लेता हूं उस पर लोगों ने कहा कि तौबा कि मिट्टी तो उसी दिन ख़राब हो गयी जब मरवान आपके दरवाज़े पर भरे मजमे के सामने आपकी तरजूमानी कर रहा था। रही सही कसर इस ख़त ने पूरी कर दी , अब हम आपके आपके दामे फरेब में आने वाले नहीं हैं। और अगर यह कारनामा मरवान का है तो आप उसे हमारे हवाले कीजिये ताकि हम उससे बाज़ पुर्स कर सकें वरना समझा जायेगा कि वह ख़त आप ही के हुक्म से लिखा गया है।

मरवान उस वक़्त हज़रत उस्मान के घर में मौजूद था लेकिन उसे उन्होंने सहाबा के हवाले करने से इन्कार कर दिया और वह लोग हज़रत उस्मान को कोस्ते हुए वापस लौट आये।

क़त्ल उस्मान का फ़तवा और उस पर अमल दरामद

मोअर्रिख़े आसमे कूफ़ा का बयान है किः

“ जब उम्मुल मोमेनीन आयशा ने देखा कि तमाम लोगों ने उस्मान के ख़िलाफ़ एका कर लिया है तो उन्होंने उस्मान से कहा कि तुमने मुसलामानों के बैतुलमाल को अपनी जात के लिये मख़सूस कर लिया ------------ बनी उमय्या को आज़ादी दे दी कि जिस तरह वह चाहे (मुसलमानों का माल) लूटें , उन्हें हर शहर का हाकिम बना दिया और उम्मते पैग़म्बर सल 0 को तंगी व उसरत में मुबतिला कर दिया। ख़ुदा तुमसे अपनी बरकतों को रोक ले और ज़मीन की भलाइयों से तुम्हें महरुम कर दे। अगर तुम नमाज़ न पढते तो ऊँट की तरह तुम्हे नहर कर दिया जाता ” ।

“ खुदा वन्दे आलम ने काफ़िरों की मिसाल नूह अलै 0 और लूत अलै 0 की बीवियों से दी है कि यह दोनों हमारे नेक बन्दों के तसर्रुफ़ में थीं , दोनो ने अपने शौहरों से दग़ा की मगर कुछ बिगाड़ न सकीं और उनसे कहा कि जहन्नुम में दाख़िल होने वालों के साथ तुम भी दाख़िल हो जाओ। ” (तहरीम आयत 10)

अव्वल इस ख़त ने जिसे मिस्र जाते वक़्त मुहम्मद बिन अबुबकर ने हज़रत उस्मान के हब्शी गुलाम के पास से बरामद किया था , दूसरे उनके सख़्त फ़िक़रों ने हज़रत आयशा को जिनके मिजाज़ में पहले ही से हिद्दत भरी हुई थी और जो गैज़ व ग़ज़ब के आलम में अपने आपे में नहीं रहती थीं , एक दम से मुश्तइल कर दिया और इस अमर पर मजबूर कर दिया कि वह हज़रत उस्मान के कुफ़्र और उनके वाजिबुल क़त्ल होने के बारे में फ़तवा जारी कर दें। चुनानचे आपने फ़रमाया उक़तोलो नासलन फ़क़द कफ़रा “ इस नासिल को क़त्ल कर दो कि यह काफ़िर हो गया है। ”

उम्मुल मोमेनीन की ज़बान से इश फ़तवे का सादर होना था कि यह ख़बर इस तरह फैल गयी जैसे आग सूखे पत्तों में फैल जाती है। मुख़ालेफ़ीने उस्मान आपस में मुत्ताहिद होने लगे। तलहा , ज़बीर , हफ़सा , उमर बिन आस , अब्दुल रहमान बिन औफ़ , माविया बिन अबुसुफियान , अबुमूसा अशरी , इब्ने मसूद , अम्मार यासिर , मालिके अशतर , अब्दुल्लाह बिन उमर , आमिर बिन क़ैस तमीमी , जन्दिब बिन क़ाब अज़दी , अबु ज़ैनब , हिजजा बिन अदी और साबित बिन क़ैस हमदानी वग़ैरा ने हमनुवाई की। क़बीलये बनी ह़ज़ील , बनी ज़हरा , बनी गफ़्फ़ार , बनी मख़जूम , बनी साएदा , बनी खजाआ , बनी तीम और बनी साद वग़ैरा ने उम्मुल मोमेनीन के इस फ़तवे को सराहा। अहले मदीना , अहले कूफा , अहले सबरा और अहले मिस्र ने लब्बैक कही।

इधर हज़रत आयशा ने अपने इस फ़तवे की हम्मागीरी का जाएज़ा लिया और जब उन्हें यक़ीन हो गया कि क़त्ले उस्मान के लिये तलवार तैयार हो चुकी है तो वह हज के बहाने से मदीना छोड़ के मक्के की तरफ़ रवाना हो गयी ताकि उनकी अदम मौजूदगी में जो कुछ होना है वह हो जाये।

हजरत आयशा ने जब तक यह फ़तवा नहीं दिया था , हज़रत अली अलै अल 0 और दूसरे सहाबा की जद्दो जेहद से यह उम्मीद क़ायम थी कि शायद हज़रत उस्मान और मुसलमानों के दरमियान कोई समझौता हो जाये मगर इस फ़तवे के बाद हज़रत उस्मान की ज़िन्दगी पर मौत की मुहर लग गयी।

इश फ़तवे का असर इस वजह से और बढ़ गया। कि उन्होंने ऐसे मौक़े पर यह फ़तवा दिया जब पानी सर से ऊँचा हो चुका था। मुसलमानों में फूट पड़ चुकी थी और मुस्लिम मुआशिरा दो गिरोह में तक़सीम हो चुका था। एक तरफ़ हाकिमों का घराना यानी बानी उमय्या थे जिनकी हर शहर पर हुकूमत थई और दूसरी तरपञ वह मुसलमान थे जो नादार , मफ़लूकुल हाल , फ़का़कश और परेशान हाल थे। हज़रत आयशा के इस फ़तवे पर सहाबाये कराम के इजमा व इत्तेफ़ाक़ के बाद हज़रत उस्मान के लिये सिर्फ़ दो रास्ते थे। या तो वह ख़िलाफत से दस्तबरदार हो जाते या आम मुसलमानों से जंग करते और बिल्कुल यही सूरत दीगर मुसलमानों के लिये भी थी वह गोशा नशीन हो जाये या फ़िर वह हज़रत उस्मान या उनके मुख़ालेफ़ीन के साथ शामिल हो कर मैदान में उतर गये। चुनानचे अराकीने शूरा में हज़रत अली अलै 0 और साद बिन अबी विकास ने गोशा को पसन्द किया और तलहा व जुबैर वग़ैरा ने आम मुसलमानों में शामिल होकर क़त्ले उस्मान को तरजीह दी।

अक़तलूनासला असला का असर यह भी हुआ कि हज़रत उस्मान की जि़न्दगी के आख़री अय्याम मेंलोग उन्हें नासल कह कर पुकारने लगे औऱ उनसे बदकलामियां करने लगे। चुनानचे सब से पहले जिसने उस्मान को नासल कहा वह जबला बिन उमर सादी थे। तबरी ने रवायत कीहै कि हज़रत उस्मान जबला बिन सादी की तरफ़ से गुज़रे तो वह अपने सहन में बैठे हुए थे , उन्होंने कहा ऐ नासल! ख़ुदा की कसम , मैं तुझे ज़रुर क़्तल करुंगा और ऊँठट की पीठ पर बिठा कर पहाड़ों की तरफ़ निकाल बाहर करुंगा।

दूसरे बुजुर्ग सहाबी जिन्होंने हज़रत उस्मान के मुहं पर उन्हें नासल कहा वह जहजाह ग़फ़्फ़ारी थे। हातिब से रिवायत है कि जहजाह ने उस्मान को नासल कहा और उनका असा छीन कर अपने घुटनों से तोड़ दिया। कुछ किताबों में अबु हबीबा से रिवायत है जहजाह गफ़्फ़ारी उस्मान के लिए एक ऊँट , चादर और हत्थकड़ी व बेड़ी लेकर आये और कहा , ऐ नासल! चल तुझे पहना ओढ़ाकर ऊँट पर बिठाएं और दुख़ान पहाड़ की चोटी पर छोड़ आयें।

इन रिवायतों से पता चलता है कि हज़रत आयशा के फ़तवे के बाद हज़रत उस्मान की शख़्सियत तमाम मुसलमानों की नज़र में बिल्कुल ही गिर चुकी थी। अगर ज़िन्दा रहते भी तो बेक़ार थे लेहाज़ा इस ज़िल्लत व रुसवाई की जि़न्दगी से उनके लिये मौत ही बेहतर थी।

मुहासिरा और क़त्ल

तारीख़ों से पता चला है कि हज़रत आयशा ने न सिर्फ़ क़त्ल उस्मान का फ़तवा दिया था बल्कि मुख़तलिफ़ शहरों में खतूत फेज कर मुसलमानों को उनके ख़िलाफ़ उठ खड़े होने की तरग़ीब भी दी थी। और इब्ने अब्बास से भी आपने फ़रमाया थाः

“ उस्मान के सारे मामलात रौशनी में आ चुके हैं और अल्लाह ने आपको फ़साहत व बलाग़त और कुवत गोयाई से नवाज़ा है लेहाज़ा आपको चाहिये कि अपनी तक़रीरों मुसलमानों को उस्मान की तरफ़ से बरगश्ता कर दें। ”

मगर इब्ने अब्बास आपके चकमें में नहीं आये क्योंकि वह जानते थे कि हज़रत आयशा उस्मान को क़ाफिर क़रार दे कर उनके क़त्ल का फ़तवा दे चुकी है औऱ अगर वह कत्ल हो गये तो यह मुज़लेमा किस कि गर्दन पर जायेगा।

बहरहाल हज़रत आयेशा ने अफने फ़तवे की हम्मागीरी और कूवत , ज़ाती असरात व रसूख़ औऱ ला महदूद वसाएल की बदौलत हज़रत उस्मान के ख़िलाफ़ अपने मिशन में ज़बरदस्त कामयाबी हासिल की यहां तक कि मिस्र , कूफ़ा औऱ बसरा के मुसलमानों का सेलाब आपकी इस अवाज़ पर उमण्ड कर मदीने की गलियों औऱ कूचों में फैल गया औऱ हज़रत उस्मान को उनके घर ही में महसूर कर दिया गया। बिलाज़री का बयान है किः

“ लोगों ने हज़रत उस्मान का मुहासिरा कर लिया। इस वजह से कि उन्होंने लोगों के मुतालिबात मंज़ूर नहीं किये नीज़ इस वजह से कि हज़रत आयशा ने उनके क़त्ल का फतवा सादिर कर दिया था और मुख़तलिफ़ शहरों में खुतूत भेज कर मुसलमानों को उनके ख़िलाफ़ उठ खड़े होने की तरग़ीब दी थी। ”

मुहासिरा चालिस दिन तक जारी रहा जिसकी क़यादत तलहा के हाथ में थी। इब्तेदा में मुहासिरे की रविश ज़्यादा सख़्त न थी। उस्मान मस्जिद नबवी में नमाज़ की ग़र्ज़ से आते जाते थे। फिर तलहा ने इस आने जाने पर भी पाबन्दी आयद कर दी और नमाज़ ख़ुद पढ़ाने लगे नीज़ उन्होंने बैतुल माल पर भी क़बज़ा कर लिया। हालात की संगीनी के तहत हज़रत उस्मान ने अपने पर एतमाद आमिलों को अपनी मदद के लिये आवाज़ दी और उन्हें खुतूत लिये। आपने शाम के हाकिम माविया को लिखाः

“ वाज़ेह हो कि अहले मदीना काफ़िर हो गये हैं , उन्होंने बैयत तोड़ दी है औऱ इताअत से मुंह फेर लिया है लेहाज़ा तुम शाम को फ़ौजों को तेज़ व तुंद सवारियों के ज़रिये मेरी तरफ़ भेजो ” ।

माविया को जब यह ख़त मिला तो उसने तौख़िफ से काम लिया और असहाबे रसूल सल 0 से मुख़ालिफ़त नीज़ उनसे बरसरे पैकार होने को मायूब औऱ ख़िलाफ़े मसलेहत जाना क्योंकि वह एक कुहना मशक़ सियासत दां था और इस अमर से बख़ूबी वाक़िफ़ था कि तमाम सहाबा उस्मान की मुख़ालिफ़त पर यक जहती से मुतफ़्फ़िक़ हैं।

बसरा के गवर्नर को लिखाः

“ कुछ सरकश , बाग़ी और ज़ालिम लोगों ने जो मदीने के रहने वाले हैं , बसरे , कूफ़ा औऱ मिस्र के बाशिन्दों के साथ मिल कर औऱ मुझ से बरगशता होकर मेरे घर का मुहासिरा कर लिया है। लेकिन मैं अभी तक उनके दस्तरस से बाहर हूं। हर चन्द उन्हें नसीहत करता हूं और उनकी रज़ामन्दी को मद्दे नज़र रखते हुए किताबे खुदा और सुन्नते रसूल सल 0 पर चलने का वादा करता हूं मगर वह ज़रा भी कान नहीं धरते। मेरे क़त्ल या मुझे खिलाफ़त से अलैहदा करने पर मुसिर हैं और मैं उनकी ख़्वाहिश पूरी करने यानी ख़िलाफ़त से अलैहदा हो जाने की बानिस्बत मौत से ज़्यादा सहल और आसान समझता हूं। मैंने तुम्हें सूरते हाल से मुत्तेला कर दिया। लाज़िम है कि तुम मेरी मदद करो औऱ मज़बूत व बहादुर लोगों को जमीयत को मेरी तरफ़ फ़ौरन रवाना करो। ”

इन खुतूत के जवाब में कोई मदद तो नहीं आई मगर यह ज़रुर हुआ कि उस्मान के मुख़ालेफीन को इस बात का इल्म हो गया कि ख़लीफ़ा ने अपने आमिलों से फ़ौजी इमदाद मांगी है ताकि वह हम से जंग कर सके।

ज़ाहिर है कि इस ख़्याल ने मुख़ालेफीन के ज़हनों में क़त्ले उस्मान के सिलसिले में “ उजलत ” के तसव्वुर को जन्म दिया होगा और शायद यही वजह है कि तुम मुहासिरे का दाएरा यकबारगी हज़रत उस्मान पर तंग कर दिया गया। रसद व खुरदनी के तमाम ज़राए मुनक़ता कर दिये गये यहां तक कि आप पर पानी भी बन्द कर दिया गया।

अब हालात क़ाबू से बाहर थें उस्मान ने सोचा कि जान बचाने की यही सूरत मुम्किन है कि हज़रत आयशा के कद़मों में सर रख दिया जाये।

चुनानचे उन्होंने एक आख़री कोशिश और की। उन्होंने मरवान बिन हकम और अब्दुल रहमान बिन एताब को उम्मुल मोमेनीन के पास उस वक़्त भेजा जब मोअज्ज़मा मदीने से निकलने के लिये रखते सफ़र बान्ध चुकी थीं।

हज़रत उस्मान के नुमाइन्दों ने उनसे फ़रयाद की और कहा कि ख़लीफ़ा पर मुहसिरे का दाएरा मज़ीद तंग कर दिया गया है। मुनासिब होगा कि आप मक्के का सफ़र मुलतवी कर दें क्योंकि मदनीने में आपकी मौजूदगी उनके बचाव का ज़रिया बन सकती है। हज़रत आयशा ने नाक भी सिकोड़ते हुए जवाब दियाः

“ खुदा कि क़सम , मेरा दिल तो यह चाहता है कि उस्मान मेरे इन थैलों में से किसी एक थैले में बन्द होते और मैं खुद उन्हें ले जाकर किसी समुन्दर में गर्क़ कर देती। ”

हज़रत आयशा की ज़बान से यह खुश्क और दो टूक जवाब सुनकर हज़रत उस्मान के नुमाइन्दे बे नीलो मुराम वापस आ गये और रही सही यह उम्मीद भी ख़त्म हो गयी।

मुहासिरे की शिद्दत , ख़ूरदनी आशिया की अदम फ़राहमीं और बन्दिशों आब ने हज़रत उस्मान को मुज़तरिब व नीम जान कर दिया था। खुसूसन प्यास ने जब मजबूर किया तो आप काशानये ख़िलाफ़त की छत पर चढ़ गये औऱ वहं से मुहासिरीन को आवाज़ दे कर पूछा , क्या तुममे अली अलै 0 भी हैं ? लोगों ने कहा , यहां अली अलै 0 का क्या काम। फिर पूछा साद हैं ? कहा नहीं। फिर कहा क्या तुममे कोई ऐसा है जो मुझ पर रहम करे और मेरा यह पैग़ाम अली अलै 0 तक पहुंचा दे कि वह मेरे लिये पानी की कुछ सबील करें।

जब यह ख़बर हज़रत अली अलै 0 को मिली तो वह तलहा के पास आये और कहा , यह मुनासिब नहीं कु तिम उस्मान पर पानी बन्द रखो। मैं पानी की कुछ मुश्कें भेज रहा हूं , उन्हें उस्मान के पास जाने दो।

बात साहबे जुलफ़िक़ार की थी , तलहा की क्या मज़ाल थी कि वह इन्हेराफ़ करते। चुनानचे हज़रत अली अलै 0 ने तीन मश्के पीनी की उस्मान के पास रवाना कीं जो उन तक पहुंची।

सहाबिये रसूल सल 0, नयार बिन अयाज के क़त्ल का वाक़िया भी क़त्ले उस्मान में उजलत का सबब बना। वह यह कि बिन अयाज़ हज़रत उस्मान को नसीहत करने की गर्ज़ से उनके घर की तरफ़ बढ़ें और मुहासिरीन में शामिल होकर उन्हें आवाज़ दी। जब उस्मान ने ऊपर से झांक कर देखा तो नयार ने कहा , ऐ उस्मान! ख़ुदा के लिये ख़िलाफ़त से दस्तबरदार हो जाओ औऱ मुसलमानों को ख़ून ख़राबे से बचा लो। अभी वह इताना ही कह पाये थे कि उस्मान के आदमियों में किसी ने उन्हें तीर का निशाना बनाकर ख़त्म कर दिया। इस हादसे ने मुसलमानों को यकबारगी मुश्ताइला करके आफे से बाहर कर दिया। पहले तो लोगों ने नयार के क़ातिल को तलब किया मगर उसमान , ने यह कहकर उसे मुहासिरीन के हवाले करने से इन्कार कर दिया कि यह नहीं हो सकता कि मैं अपने एक मददगार को तुम्हारे सुपुर्रद करुँ।

हज़रत उस्मान की इस सीनाज़ोरी ने भड़कती हुई आग को और हवा दे दी। नतीजा यह हुआ कि जोश में आकर लोगों ने उनका दरवाज़ा फूंक दिया। कुछ लोग अन्दर घुसने के लिये आगे बढ़े थे कि मरवान बिन हकम , साद बिन आस और मुग़ीरा बिन अख़नस अपने अपने जत्थों के साथ उन पर टूट पड़े और दरवाज़े ही पर कुश्त व ख़ून शुरु हो गया। लोग घर के अन्दर घुसना चाहते थे मगर उन्हें बाहर ढकेल दिया जाता था। इतने में अमरु बिन अन्सारी ने जिनका मकान हज़रत उस्मान के मकान से मुत्तसिल था , अपने घर का दरवाज़ा खोल दिया औऱ कहा , भाईयों। आओ इधर से आगे बढ़ो। चुनानचे मुहासिरीन उस मक़ान के रास्ते से काशानये ख़िलाफ़त की छत पर पहुंचे और वहां से सहन में उतर कर तलवारें सौंत लीं।

अशतर जब उस्मान को क़त्ल करने की नियत से आगे बढ़ें तो उनहोंने देखा कि वह तन्हा हैं औऱ मुदाफ़ेअत करने वाला कोई नहीं है तो उन्होंने इस हालत में क़त्ल को बुज़दिली पर महमूल किया और पलट आये। मुस्लिम बिन कसीर कूफ़ी ने कहा , मालूम होता है कि तुम उस्मान से डर गये। अशतर ने कहा मैं डरा नहीं हूं , चूंकि उस्मान निहत्ते , तन्हा और बेबस हैं , कोई उनकी मदाफ़ेअत करने वाला नहीं है , इस लिये मेरी ग़ैरत ने गवारा नहीं किया कि मैं ऐसे शख़्स पर हाथ उठाता। इतने मे मुहम्मद बिन अबुबकर आगे बढ़े , उन्होंने छपट कर उस्मान की दाढ़ी पकड़ी। उस्मान ने कहा ऐ भतीजे! मेरी दाढ़ी छोड़ दे। अगर तेरा बाप (अबुबकर) ज़िन्दा होता तो वह भी मेरी दाढ़ी पर हाथ न डालता। मुहम्मद ने कहा , अगर मेरा बाप जि़न्दा होता तो वह कभी तुझे उन फ़ेलों की इजाज़त ने देता जिनकी वजह से तू काफिर हो गया है। यह कहकर मुहम्मद ने वह बेलचा जो उनके हाथ में था , उस्मान की गर्दन पर रसीद किया जिससे कारी ज़ख़्म आया। इतने में कुनान बिन बशीर ने उस्मान के सर पर गुरज़ का वार किया। सूदान बिन हमरान ने तलवार मारी औऱ हज़रत उस्मान बुरी तरह ज़ख़्मीं होकर ज़मीन पर ढ़ेर हो गये। आफ़क़ी ने एक ज़र्ब लगाई और एक मिस्री ने उस्मान की नाक काट ली मगर उस्मान की बीवी नाएला जो बड़ी क़वी हेकल थीं , ने उसकी तलवार पकड़ ली। इतने में उस्मान के एक गुलाम ने इस मिस्री पर तलवार का वार करके उसका काम तमाम कर दिया। यह देख़ कर कंनबरा बिन वहब ने क़ंनबरा को मार डाला। इसी असना में अमरु बिन हमक़ जस्त लगाकर उस्मान के सीने पर सवार हो गया और उसने नौ ज़ख़्म लगाये और कहा कि तीन ज़ख़्म मैंने अल्लाह की राह में लगाये हैं और छः ज़ख़्म इस कीना की तरफ़ से हैं जो उस्मान के लिये मेरे दिल में था। उमर ने चाहा कि उस्मान का सर काट लें मगर औरतें रोने पीटने लगीं लेहाज़ा वह इस इरादे से बाज़ रहे।

जब हज़रत उस्मान का काम तमाम हो चुका तो लोगों ने उनका घर लूटा जिसमें दिरहमों से भरी हुई दो बोरियां बरामद हुई। जिन लोगों ने हज़रत उस्मान के महसूरी के वाक़ियात क़लमबन्द किये हैं उनमे से अकसर ने लिखा है कि जिस दिन उस्मान क़त्ल हुए उस दिन तलहा अपने चेहरे पर नक़ाब डाले हुए लोगों की नज़रों से पोशीदा थे और छुप छुप कर हज़रत उस्मान पर तीर चला रहे थे। यह भी रिवायत है कि जब मुहासरीन को उस्मान के घर में दाख़िल होने का रास्ता न मिला तो तलहा ही ने अम्र के घर से उन्हें उस्मान के घर में दाख़िल किया। तबरी ने लिखा है कि लोग अम्र बिन हज़म अन्सारी के घर में दाखिल हुए। उनका घर हज़रत उस्मान के घऱ के पहलू में था। कुछ देर जंग व जदल का सिलसिला जारी रहा। उसके बाद सवदान बिन हमरान बाहर निकला औऱ उसने पुकार कर कहा , तलहा कहां है ? हमने उस्मान को क़त्ल कर दिया।

यह वाक़िया 18 ज़िलहिज सन् 35 हिजरी जुमें के दिन बाद नमाज़े अस्र ज़हूर पज़ीर हुआ। उस वक़्त हज़रत उस्मान की उम्र 82 साल की थी। मुद्दते मुहासिरा चालीस दिन औऱ बाज़ रिवायतों के मुताबिक़ उन्चास दिन बताई जाती है।

मदफन

मोअर्रिख़ीन का कहना है कि हज़रत उस्मान की लाश तीन दिन तक मज़बला पर पड़ी रही औऱ बलवाइयों ने उसे दफ़्न होने न दिया यहां तक कि आपकी एक टांग कुत्ते खा गये। (आसम कूफ़ी)

दफ़्न के बारे में एक मिस्री मुसलमान बुज़ूर्ग अब्दुल्लाह बिन सवाद का कहना है कि मैं उन्हीं मुसलमानों के क़ब्रिस्तान में दफ़्न नहीं होने दूंगा क्योंकि वह मुसलमान नहीं थे। इस गुफ़्तगू के ज़ैल में उसके पास यह दलील थी कि जब उस्मान ख़लीफ़ा हुए औऱ अबुसूफ़ियान ने यह कहा कि अब ख़िलाफ़त तुम्हारे हाथ आई है इसे गेंद की तरह नचाओ। खेलो और इसे हमेशा के लिये बनी उमय्या में मुनहसिर कर दो। मेरे नज़दीक हिसाब व किताब , अज़ाब व सवाब , हश्र व नश्र और जन्नत व दोज़ख़ कोई चीज़ नहीं है। तो उन्होंने इस कलमये कुफ़्र पर शरयी हद क्यों नहीं जारी की और अबुसुफ़ियान को मुसलमानों के बेतुलमाल से दो लाख दिरहम क्यों दिये ?

मुम्किन है कि अब्दुल्लाह बिन सवाद की इस ग़ुफ़्तगू के पस मंज़र में हज़रत आयशा का वह फ़तवा भी कार फ़रमां रहा हो जिसके तहत उन्होंने हज़रत उस्मान को क़ाफ़िर कह कर वाजिबुल क़त्ल करार दिया था।

बहरहाल वजह कुछ सही , हज़रत उस्मान की लाश तीन दिन तक पड़ी रही औऱ उन्हें मुसलमानों के क़ब्रिस्तान में दफ़्न नहीं होने दिया गया। आख़िरकार जबीर बिन मुताइम और हकीम बिन हज़ाम हज़रत अली अलै 0 की ख़िदमत में आये और उनसे मिन्नत समाजत की कि वह किसी तरकीब से उस्मान को दफ़्न करा दें। हज़रत अली अलै 0 ने बलवाइयों से राबता क़ायम करके उन्हें हमवार किया कि वह उस्मान की मय्यत को दफ़्न हो जाने दें। ग़र्ज़ वह लोग मान तो गये मगर इसके बावजूद उनमें से कुछ पत्थर ले कर रास्ते में बैठ गये औऱ जब उस्मान का जनाज़ा उधऱ से गुज़रा तो उन्होंने पथराव कर दिया। बड़ी मुश्किलों से आप यहूदियों के कब्रिस्तान हश कोकब में एक दीवार के नीजे दफ़्न किया जा सके।

तबरी ने अबी करब (जो उस्मान की तरफ से बैतुलमाल की निगरां था) से रिवायत की है कि हज़रत उस्मान बाद मग़रिब दफ़्न हुए। उनकी मय्यत में मरवान बिन हकम ,त तीन गुलाम औऱ उनकी एक बेटी शरीक थी जो चिल्ला चिल्ला कर रोने लगी तो लोगो ने नासिल नासिल कह कर पत्थर फेंकना शुरु कर दिया। क़रीब था कि मय्यत संगसार हो जाती। आख़िरकार हश कोकब में एक दीवार के तले उन्हें दफ़्न कर दिया गया।

इब्ने क़तीबा का कहना है कि बलवाइयों के ख़ौफ़ से मय्यत तीन दिन तक पड़ी रही। आख़िरकार आयशा दुख़्तरे उस्मान औऱ बाहर दीगर इशख़ास ने मग़रिब व इशा के दरमियान मकान की पुश्त का दरवाज़ा तोड़ कर मय्यत को उसी पर लिटाया औऱ क़ब्रिस्तान की तरफ़ ले गये। दरवाज़े का वह पट जिस पर मय्यत को रखा गया था चौड़ाई में इस क़दर कम था कि आपकी बची हुई टांग के नीचे लटक रही थी और जल्दी जल्दी चलने की वजह से उनका सर उस तख़्ते पर “ ख़ट खट ” बोल रहा था। इसी आवाज़ पर बलवाइयों ने पथराव किया। इब्ने ख़लदून व इब्ने क़तीबा के बयान के मुताबिक़ हज़रत उस्मान का गुस्ल व कफ़न या नमाज़े जनाज़ा नहीं हुई।

जिस दीवार के ज़ेरे साया हज़रत उस्मान की क़ब्र थी , माविया ने अपने दौरे हुकूमत में वह दीवार गिरा दी औऱ मुसलमानों को हुक्म दिया कि वह अपने मुर्दों को उस्मान की क़ब्र के आस पास दफ़्न करें ताकि इसका सिलसिला मुसलमानों के क़बरिस्तान से मिल जाये। उसी वक़्त से वह हिस्सा जहां हज़रत उस्मान की क़ब्र थी , बनी उमय्या वाला क़ब्रिस्तान कहा जाने लगा।

मुद्दते इक़तेदार

हज़रत उस्मान ग्यारह साल ग्यारह माह और चौदह दिन तख़्ते इक़तेदार पर रहे। इस मुद्दत में आपने इस्लाम औऱ मुसलमानों का इस तरह बेड़ा ग़र्क़ किया कि हज़रत आयशा के हुक्म पर मौत के घाट उतार दिये गये।

अज़वाज और औलादें

हज़रत उस्मान की आठ बीवियां रुक़य्या , उम्मे कुलसूम , फ़ाख़ता बिन्ते ग़ज़वान , उम्मे उमर बिन्ते जन्दिब बिन अम्र , फ़ातेमा बिन्ते वलीद बिन्त मुग़ीरा मख़ज़ूमी , मलीका बिन्ते अतीबा , रमला बिन्ते शीबा और नाएला बिन्ते फ़राफ़ज़ा कलबिया नसरानिया थीं। हज़रत उस्मान की इन बीवियों की फ़ेहरिस्त में रुक़क़या औऱ उम्मे कुलसूम को मुसलमानों का एक फ़िर्क़ा रसूले अकरम सल 0 की सुलबी बेटियां क़रार देता है हालांकि हक़ीक़त यह है कि वह हज़रत ख़दीजा की बहने हाला की बेटियां थी। जिन्हें पैग़म्बर सल 0 ने जनाबे ख़दीजा से अक़द के बाद पाला था और वह आप ही से मनसूब हो गयी थी जैसा कि अबुल क़ासिम - उल - कूफ़ी - उल - मतूफ़ी सन् 352 हिजरी ने तहरीर फ़रमाया है किः

“ जब रसूल सल 0 ने हज़रत ख़दीजा से अक़द फ़रमाया तो उसके थोड़े अर्से बाद हाला का इन्तेक़ाल हुआ उसने तीन लड़कियां , रुक्क़या , ज़ैनब और उम्मे कुलसूल छोड़ीं जो पैग़म्बर सल 0 और खदीजा की गोद में पलीं और इस्लाम से क़बल यह दस्तूर था कि अगर कोई बच्चा किसी की गोद मे परवरिश पाता तो वह उसी से मनसूब किया जाता था। ”

हज़रत उस्मान की सतरह औलादें हुई जिनकी तफ़सील हस्बेज़ेल हैं।

उम्मे कुलसूम से कोई औलाद नहीं हुई। रुक़्क़या से अब्दुल्लाह पैदा हुए। छः बरस की उम्र में मुर्ग़ ने उनकी आंख में चोंच मारी और वह बीमार होकर मर गये। फिर फ़ाख़ता ने एक लड़के को जन्म दिया उसका नाम भी अब्दुल्लाह रखा गया। उम्मे अमरु बिन्ते जन्दिब से अमरु पैदा हुए , उनके बाद अबान हुए जिनकी किन्नियत अबु सईद थी फिर ख़ालिद और उमर पैदा हुए। उसके बाद मरियम पैदा हुईं जिनका निकाह सईद बिन आस से हुआ। फ़ातेमा बिन्ते वलीद बिन मुग़ीरा मख़जूमी से वलीद और सईद दो लड़के और एक लड़की उम्मे सईद हुई जो अब्दुल्लाह बिन उमर को ब्याही गयी। मलीका बिन्ते अतीबा से अब्दुल्लाह मुल्क पैदा हुए जो पचपन ही में इन्तेक़ाल कर गये। रमला बिन्ते शीबा से दो लड़कियां आयशा और उम्मे अबान हुईं जो फ़राफ़ज़ा से मरियम (उम्मे ख़ालिद) अरदा औऱ उम्मे अबान सुग़रा तीन लड़कियां हुईं जिनमें मरियम अम्र बिन वलीद ने बिन अक़बा बिन अबी मईत से ब्याही गयीं।

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[[अलहम्दो लिल्लाह किताब (तारीखे इस्लाम भाग-3) पूरी टाईप हो गई खुदा वंदे आलम से दुआगौ हुं कि हमारे इस अमल को कुबुल फरमाऐ और इमाम हुसैन (अ.स.) फाउनडेशन को तरक्की इनायत फरमाए कि जिन्होने इस किताब को अपनी साइट (अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क) के लिऐ टाइप कराया। 12 .5 .2018

तारीखे इस्लाम भाग 3

तारीखे इस्लाम भाग 3

बुक करेकशन

लेखक: जनाब फरोग़ काज़मी साहब
कैटिगिरी: इतिहासिक कथाऐ
पन्ने: 9