हिन्दुस्तान में फ़ितना ए वहाबियत

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लेखक: फरोग़ काज़मी
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हिन्दुस्तान में फ़ितना ए वहाबियत

लेखकः- फ़रोग़ काज़मी


बिस्मिल्लाह हिर्रहमा र्निरहीम

इन्नल लज़ीना योअज़ूनल्लाहा व रसूलहू लआनहोमुल्लाहो फ़िद्दुन्या वल आख़ेरते वअअद्दालहुम अज़ाबन मोहीना।

(अल्अहज़ाब आयत 57)

बेशक जो लोग ख़ुदा और उस के रसूल को अज़ीयत देते हैं उन पर ख़ुदा ने दुनिया और आख़ेरत दोनों में लानत की है और उन के लिये रूस्वाई का अज़ाब तैयार कर रखा है।

(सूरा ए अहज़ाब आयत 57)


अरज़े मोअल्लिफ़

हिन्दुस्तान में फ़ितना ए वहाबियत के नाम से यह किताब दरहक़ीक़त मेरी असल किताब फ़ितना ए वहाबियत का आख़िरी हिस्सा है जिसे कुछ मुख़लेसीन की मुसलसल फ़रमाइश और इसरार पर हिन्दी रस्मुल ख़त में अलग से शाया किया जा रहा है ताकि हिन्दीदां तबक़ा भी इससे मुस्तफ़ीज़ हो सके।

इस आख़िरी बाब में हिन्दुस्तान की सरज़मीन पर वहाबियत की तौलीद व नशवोनुमा के साथ साथ ख़ुसूसी और ज़िमनी तौर पर 1905 से लेकर 1998 तक तक़रीबन सौ साला कज़ीया ए मदहे सहाबा और शियों की तरफ़ से चलायी जाने वाली तहरीक़ अज़ादारी के वाक़ेयात भी मरक़ूम जो ज़्यादा तर मुजाहिदे मिल्लत जनाब सैय्यद अशरफ़ हुसैन एडवोकेट मरहूम की किताब तहफ़्फ़ुज़े शियत और Victimization of Shia Minority (जिस का उर्दू तरजुमा जनाब इब्ने ज़की साहब ने किया था) से माख़ूज हैं। इसके अलावा इस ज़िमन में मुझे किताब फ़ितना ए वहाबियत की इशाअत के बाद सज्जाद अली ख़ां की किताब शियों की बेदारी के मुतालए का शरफ़ भी हासिल हुआ जिस की रौशनी में मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि इन किताबों में मदहे सहाबा और तहरीके अज़ादारी के जो वाक़ेआत तहरीर किये गये हैं उन में कहीं कहीं पर जानिबदाराना तर्ज़े अमल इख़्तियार किया गया है जिसकी बिना पर वाक़ेआत निगारी में बाज़ बाज़ मुक़ामात पर तज़ाद व इख़्तिलाफ़ पैदा हो गया है। मसलन मुजाहिदे मिल्लत जनाब सैय्यद अशरफ़ हुसैन साहब मरहूम की किताब तहफ़्फ़ुज़े शीअत से मैंने अपनी किताब फ़ितना ए वहाबियत के सफ़ा 178 पर तहरीर किया है किः-

30 मार्च 1936 को ही नवाब सुल्तान अली खां नाज़िम सिपहे अब्बासिया की क़यादत मे सोलह रज़ाकारों ने नारा ए तबर्रा बलन्द करते हुए खुद को इमामबाड़ा ग़ुफ़रांमआब के बाहर गिरफ़्तार करा दिया।

इस वाक़्ये को जनाब सज्जाद अली खां ने अपनी किताब शियों की बेदारी में नवाब सुल्तान अली खां के बजाये नवाब फ़रेदों मिर्ज़ा साहब मरहूम की क़यादत से ताबीर किया है और गिरफ़्तारियां पेश करने वालों की तअदाद 319 बतायी है। इस के अलावा मौसूफ़ ने यह भी तहरीर फ़रमाया है कि 31 मार्च 1936 को मौलाना सै 0 कल्बे हुसैन साहब क़िबला (कब्बन साहब) ने एक बड़े मजमें के साथ गिरफ़्तारी दी , 1 अप्रैल को मौलाना नसीरुल मिल्लत ने और 2 अप्रैल को क़ौमी लीडर जनाब सैय्यद अली ज़हीर साहब ने खुद को गिरफ़्तार कराया।

अपनी असल किताब फ़ितना ए वहाबियत के सफ़ह 205 पर अशरफ़ हुसैन साहब की किताब तहफ़्फ़ुज़े शीअत से मैंने कज्जन साहब की सुकूनत बन्जारी टोला तहरीर किया है जबकि सज्जाद अली खां साहब की सराहत के मुताबिक़ मरहूम की सुकूनत घंटा बेग की गढ़ैया थी। सफ़ा 216 पर मैंने तहफ़्फ़ुज़े शीअत से मक़सूद हुसैन की सुकूनत दरगाह हज़रत अब्बास ((अ.स.) ) तहरीर की थी जबकि मरहूम की सुकूनत कश्मीरी मोहल्ला है।

इसी क़िस्म की और भी छोटी छोटी ग़ल्तियां किताबत के बाद प्रूफ़ रीडिंग या वाक़ियात की असल किताब फ़ितना ए वहाबियत में मुम्किन हो सकती हैं। जिन के बारे मे क़ारइने कराम से मेरी दस्तबसता गुज़ारिश है कि वह इस ज़ैल में हमें मुतावज्जे करें ताकि आइन्दा एडीशन में उन्हें दूर किया जा सके।

आख़िर कलाम में यह वज़ाहत भी कर दूं कि इस हिन्दी किताब के साथ साथ असल किताब फ़ितना ए वहाबियत का मुतालेआ बहर हाल ज़रूरी है।

जिस में वहाबियत की मुकम्मल तारीख़ बड़े मोहक़्क़ेक़ाना अन्दाज़ में पेश की गयी है। मुझे उम्मीद है कि क़ारइने कराम मेरी इस कोशिश को मुस्तहसन नज़रों से मुलाहेज़ा फ़रमायेंगे।

वस्सलाम

ख़ादिमे मिल्लत

फ़रोग़ काज़मी


इब्तेदाईया

(अज़ अलहाज मौलाना सैय्यद ज़ाहिद अहमद साहब क़िब्ला मुजतहिद)

क़ुरआने मजीद मक्का और इस के इर्दगिर्द के इलाक़ों को हरम अमन इलाही की हैसियत से पेश करता है। जैसा कि इरशाद हैः- व मन दखलहू कान आमेना यानी जो इस घर में दाख़िल हुआ हो वह अमन के हिसार में आ गया है।

मुसलमानों के जद बुज़ुर्गवार हज़रत इब्राहीम ((अ.स.) ) ने भी बारगाहे ख़ुदा वन्दी में यह मुतालबा किया था कि रब्बे जअल हाज़ल बलादन आमेना परवर दिगार इस शहर (मक्का) को अमन व अमान की जगह क़रार दे।

अब सवाल यह पैदा होता है कि क्या हरमैन शरीफ़ैन के मौजूदा मुतावल्लियान इस इलाही शरीयत के हक़ीक़ी महाफ़िज़ हैं ? क्या इस्लामी मुमालिक के लीडरान वाक़यी ऐसा अमन व अमान रखते हैं कि इस इलाक़े में रूनुमा होने वाले अहम सियासी व इस्लामी मसाएल के बारे में होने वाले मिल्लते इस्लामिया के हक़ीक़ी नुमान्दों को आलमे इस्लाम के दर्दनांक हालात से आगाह कर सकें और इन्हे लाहए अमल बता सकें ? या फिर इस्लामी जमाअतों के दरमियान सिर्फ़ हम्बली जमाअत वालों को ही बोलने का हक़ है और आला उलूमे इस्लामी व मुअर्रिफ़ के दरमियान सिर्फ़ इब्ने तीमिया व इब्ने क़य्यम और मोहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब के ख़ुशक जामिद अफ़कार ख़यालात ही पेश किये जा सकते हैं क्या सैकड़ों समाजी , सियासी और सक़ाफ़ती मुबाहेस के दरमियान सिर्फ़ ज़्यारत अम्वात एहतेराम आसारे रेसालत और एहतेरामे औलियायी जैसे मौज़ूआत पर ही बहस की जानी चाहिए और क्या वहाबियत के मुख़ालेफ़ीन तकफ़ीर के डंडे से पीटते रहना चाहिए और उन पर लानतो मलामत की बौछार करते रहना चाहिए ? क्या हरामन आमेना का यही मतलब है ? और मैं नहीं जानता कि इन हालात को नज़र में रखते हुए क्या यह कहना ग़लत है कि काबा................... के क़ब्ज़े में हैं।

दरहक़ीक़त तमद्दुनो वहाबियत दीगर इस्लामी फ़िर्क़ों को तकफ़ीर मुसलमानों के दरमियान तफ़रेक़ा की ईजाद आसार वही। रिसालत की नाबूदी और यज़ीद इब्ने माविया जैसे दुनिया के तमाम ज़ालिमों की मावनत की बुनियादों पर क़ायम है। उन के पास जो ख़तीब व मुसन्निफ़ हैं वह सब दरबारी मुल्ला और शाही वाएज़ हैं। यह ऐसे वज़ीफ़े ख़्वार लोग हैं जो अपने आक़ा की सिखायी हुई बातों के अलावा कुछ नहीं जानते। यह बातें ग़ैर मन्तक़ी और ग़ैर बेबुनियाद नहीं हैं। इन बातों की दलील में हक़ायक़ अमीरूल मोमेनीन यज़ीद इब्ने माविया नामी वह बेहूदा किताब पेश की जा सकती है जो सऊदी वज़ारते उलूम की इजाज़त से शाया हुई है और जिस में यज़ीद जैसे फ़ासिक़ व फ़ाजिर इन्सान की भरपूर मदह की गयी है। जिस ने मिन्जनीक की मदद से ख़ाना ए काबा पर संगबारी की थी और अहले मदीना की इज़्ज़तो आबरू और उन के जानों माल को अपने ख़ूंख़ार और दरिंदा सिफ़त सिपाहियों के लिए मोबाह कर दिया था और मदीना क़त्लो ग़ारतगरी का मरक़ज़ बन गया था। इस हक़ीक़त को निगाह में रखते हुए कहा जा सकता है कि इस मुल्क (सऊदी अरब) में एक तरह की आज़ादि ए मुतलक़ और एक तरह की मुकम्मल पाबन्दी व घुटन का बोल बाला है। ऐसी किताबों की नश्र व इशाअत की आज़ादी है जिस में अमवी व अब्बासी ज़ालिंमों और जल्लादों की मदह व सना की गयी हो लेकिन वह किताबें क़तई तौर पर मम्नूं हैं जिनमें अहलेबैत ((अ.स.) ) नुबूवत का दिफ़ा किया गया है और फ़क़त इसकी किताबें ही नहीं बल्कि इस मुल्क की सरहद में दाख़िल होने वालीं हर किताब का एहतेसाब लाज़मी है और सऊदी वज़ारते इत्तेलात की मन्ज़ूरी के बाद ही किसी किताब को इस मुल्क में ले जाया जा सकता है।

अशशिया वत्तशय्यो पाकिस्तान के एक वहाबी मुसन्निफ़ की लिखी हुई किताब है जो सऊदी अरब से शायां हुई है इस किताब के सफ़ा 20 पर शेख़ मोहम्मद हुसैन मुज़फ़्फ़र का एक जुमला नक़ल कर के इसकी ख़ातिर ख़्वाह तफ़सीर की गयी है। ज़ैल में हम दोनों इबारतें नक़ल किये देते हैं ताकि वाज़ह हो जाये कि वहाबी मुसन्नेफ़ीन किस बेशर्मी के साथ लोगों पर शिक्र की तरफ़ दावत देने का इल्ज़ाम आयद करते हैं। मरहूम मुज़फ़्फ़र का बयान है कि त्तशय्यो की इब्तेदा इस से हो गयी जब पैग़म्बरे अकरम स 0 की दावत के साथ ही साथ अबुल हसन हज़रत अली (अ.स.) की पैरवी भी आगे बढ़ी।

पाकिस्तान का यह वहाबी मुसन्निफ़ शेख़ मुज़फ़्फ़र मरहूम के इस जुमले पर तन्क़ीद करते हुए लिखता हैः-

मुज़फ़्फ़र के क़ौल के मुताबिक़ पैग़म्बरे अकरम अली को अपनी नबूवत और रिसालत में शरीक क़रार देते थे।

अगर यह वहाबी मुसन्निफ़ नफ़सियाती ख़्वाहिशात का असीर न होता तो और अपने ज़मीर को वहाबियों के हाथों फ़रोख़्त न कर दिया होता और अगर शिया अक़ाएद की बिल्कुल इब्तेदायी बातों से भी वाक़िफ़ होता तो ऐसा मज़हक़ा ख़ेज़ एतेराज़ कभी न करता।

अगर इस तरह की दावत , शिर्क या नबूवत या रिसालत में शिरकत की दावत क़रार पाती है तो सब से पहले ख़ुद क़ुरआने मजीद ने यह काम अन्जाम दिया है क्योंकि क़ुरआन ख़ुदा और रसूल स 0 की इताअत की दावत के साथ ही साथ ऊलिल अम्र की इतातो पैरवी का भी हुक्म देता है।

अगर इस वहाबी मुसन्निफ़ की बात बिल फ़र्ज़ मुहाल सच मान ली जाए तो इस का मतलब हुआ कि रसूले ख़ुदा स 0 ने लोगों को तौहीद की दावत के बजाय (माज़ अल्लाह) शिर्क की दावत दी है क्योंकि ख़ुदा की इताअत के साथ साथ पैग़म्बरे अकरम स 0 ने बहुक्मे क़ुरआन ऊलिल अम्र की इतात की दावत भी दी है और दुनिया ऊलिल अम्र की कोई भी तौज़ीह करे। हज़रत अली (अ.स.) बहरहाल इस के मिस्दाक़ हैं।

यह हक़ीक़त तमाम आलमे इस्लाम पर रौशन है कि जब पैग़म्बरे अकरम को अपने अज़ीज़ो अक़रबा की दावत का हुक्म दिया गया और आयत नाज़िल हुई तो आप स 0 ने अपने अज़ीज़ो और रिश्तेदारों को बुलाया और इस मजलिस में अपनी नबूवत का ऐलान करते हुए फ़रमायाः-

तुम में से कौन है जो इस काम में मेरी मदद करे और तुम्हारे दरमियान में मेरा भाई , मेरा वसी और मेरा जानशीन बन जाये।

इस मौक़े पर हज़रत अली (अ.स.) के अलावा कोई न उठा , पैग़म्बर ने जुम्ला दो मरतबा इरशाद फ़रमाया लेकिन हज़रत अली (अ.स.) के अलावा किसी ने कोई जवाब न दिया तो आपने बड़ी वज़ाहत के साथ ऐलान कियाः-

तुम्हारे दरमियान यही मेरा भाई है , मेरा वसी , मेरा जानशीन है तुम लोग इस की बातों को सुनों और इसकी इताअतो पैरवी करो।

इस तारीख़ी सनद के मुताबिक़ शिया यह कहते हैं कि जब पैग़म्बर से लोगों को ख़ुदा की वहदानियत और अपनी रिसालत की तब्लीग़ के लिये कहा गया उसी वक़्त उन से ख़िलाफ़ते अली (अ.स.) की दावत के लिए भी कहा गया। चुनान्चे नबी स 0 की नबूवत और अली (अ.स.) की इमामत की दावत साथ ही साथ दी गयी।

मज़कूरा सूरते हाल के तहत क्या शियों के बारे में यह कहना दुरूस्त है कि वह यह कहते हैं कि पैग़म्बरे अकरम से यह कहा गया था कि वह अली (अ.स.) को अपनी नबूवत व रिसालत में शरीक करें।

दरहक़ीक़त शिया अक़ाएद के बारे में सुन्नी मुसन्नेफ़ीन बिलख़ुसूस वहाबियों ने जो किताबें लिखी हैं उन में दो तरह की अहम नक़ाएस पाये जाते हैं।

1 शिया अक़ाएद से नावाक़्फ़ियतः- यह ख़राबी और परेशानी हर दौर में हाकिम रही है और इस का सबब अमवी और अब्बासी जहन्नमी ताक़तों का वजूद था। जो दुनिया ए तसन्नुन की इल्मी महफ़िलों मे शिया अक़ाएद को पेश करने की इजाज़त नहीं देती थीं की दीगर मक़ातिब फ़िक्र की तरह लोग तशीय से भी आगाह हो सकें। वाज़ेह रहे कि अमवी और अब्बासी दौरे हुकूमत में शियों के अलावा हर मकतबे फ़िक्र के लोगों को इल्मी और इबादती मराकिज़ में अपनी बात कहने का हक़ हासिल था और शियों को कभी कभी मक़सूस हालात में इतना कम वक़्त दिया जाता था जो किसी ऐतबार से भी इस मुकातिब के ताअर्रुफ़ के लिये नाक़ाफ़ी होता था।

2. दुनिया ए तसन्नुन की इल्मी महफ़िलों में तालीम व तआलम और दर्स व तदरीस के ऐतबार से एक ऐसा इन्क़ेलाब रूनुमां हुआ जिस के तहत अक़ाएद व इल्म कलाम में नयी और सतही किताबों ने अल मवाक़िफ़ और शरह मक़ासिद जैसी पुरानी और अमीक़ किताबों की जानशीनी हासिल कर ली जिस का नतीजा यह हुआ कि किसी इस्लामी मुल्क में एक शख़्स ऐसा भी नहीं मिलता जो आठवीं सदी हिजरी की इन अहम किताबों का मुतालेआ करे।

इस सतही राह रविश की वजह से ही एहसान इलाही ज़हीर जैसे मुसन्निफ़ को दावते ख़िलाफ़त और दावते नुबूवत के दरमियान कोई फ़र्क़ महसूस नहीं होता और फ़िर्क़ा व तारीख़ जैसे अहम मौज़ू पर लिखी गयी उसकी किताब डालर की मदद से शायां हो जाती है। जबकि मुसन्निफ़ शिया अक़ाएद के अलिफ़ बे से भी वाक़्फ़ियत नहीं रखता।

हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) का इरशाद है किः- अपने दौर के हालात से वाक़िफ़ इन्सान नागवार हवादिस के हमलों से दो चार नहीं होता।

इस उसूल के तहत अहदे हाज़िर में आलमे इस्लाम के तल्क़ और अफ़सोसनाक हवादिस के बारे में इस लिए ग़ौर व फ़िक्र करते हैं ताकि हमें इस्लाम के हक़ीक़ी दुश्मनों का ताअर्रुफ़ हासिल हो जाये।

तक़रीबन सौ साल से ज़्यादा वक़्त और अरसा गुज़र चुका है कि इस्लाम के ख़िलाफ़ फ़िक्री और अक़ीदती जंग जारी है और मशरिक़ व मग़रिब के लशकर अपने मावनीन व अन्सार के साथ इस्लाम के ख़िलाफ़ पूरी तरह सफ़ बस्ता नज़र आते हैं और ऐसा कोई हफ़्ता नहीं गुज़रता जब कि मुख़तलिफ़ अनादीन की तरफ़ से इस्लाम और इस्लामी तालीमात के ख़िलाफ़ कोई किताब शायां न की जाती हो। इस से यह ज़ाहिर होता है कि इस्लामी दुनिया में इस्लाम और तशीय के अलावा कोई दूसरा मसला नहीं है।

इस के अलावा अगर यह किताबें मन्तिक़ी अन्दाज़ में होती तो भी कोई मुज़ाएक़ा नहीं था। इस वक़्त शिया उलमा की यह ज़िम्मेदारी होती कि वह मन्तिक़ी बातों का जवाब देते या उन्हें तसलीम कर लेते लेकिन अफ़सोस तो यह है कि यह किताबें इस्लामी तशय्यो और शिया उलमा के ख़िलाफ़ फ़ोहश और नाज़ेबा बातों से भरी हुई होती हैं और कभी कभी इन में मोहम्मद स 0 व आले मोहम्मद (अ.स.) ख़ुसूसन हज़रत अली (अ.स.) की शाने अक़दस में जसारतें और ग़ुस्ताख़ियां भी हुआ करती हैं।

इस क़िस्म की ग़ैर मन्तिक़ी किताबों के मवल्लेफ़ीन ज़्यादातर तबरी इब्ने कसीर और इब्ने ख़ुलदून जैसी अहम तारीख़ी किताबों में सनद क़रार देते हुए शिया अक़ायद को अब्दुल्लाह इब्ने सबा नामी यहूदी की ईजाद क़रार देते हैं और इस के बाद अपने मक़सद की तकमील के लिये और ईसाई माहिरीन ए उलूमे मशरिक़या मसलन दोज़ी , मिल्लर और हाग़ज़न वग़ैरा से मदद हासिल करते हैं। लेकिन शिया अक़ायद के बारे में शेख़ सद्दूक़ (अलमुतावफ़्फ़ी सन् 381 हिजरी) और शेख़ मुफ़ीद (अलमुतावफ़्फ़ी सन् 413 हिजरी) जैसे नामवर शिया उलमा की तहरीर करदा बातों को क़बूल नहीं करते बल्कि उस के बरअक्स यह कहते हैं कि यह शियों का प्रोपगंडा लिटरेचर है जबकि यह अमरे मुसल्लेमा है। यह फ़रीक़ैन की अहादीस के दरमियान ज़ईफ़ और ग़लत हदीसें भी मौजूद हैं और किसी हदीस या रिवायत को नक़ल करना उसके मज़मून पर एतेक़ाद की अलामत नहीं है क्योंकि अमवी और अब्बासी दौर में अहादिस ही के ज़रिये इस ज़माने के तारीख़ी अक़ाएद में तहरीफ़ और उलट फेर की कोशीश की गयी है। क्या इस तहक़ीक़ी दौर में किसी ऐसी किताब को क़ाबिले ऐतमाद या एतबारे क़रार दिया जा सकता है। जिस की बुनियाद फ़र्ज़ी हदीसों पर हो और जिसके रावी झूठे फ़रेबी और जाली हों ?

शियों और सुन्नियों के माबैन इन इख़्तेलाफ़ी मसायल को हल करने के लिए एक ऐसी इल्मी व इस्लामी अन्जुमन की तशकील मुफ़ीद व मोवस्सिर साबित हो सकती है जिस में मुख़तलिफ़ अफ़कार व ख़यालात को इल्मी और मन्तक़ी अन्दाज़ में पेश किया जा सके।

सरेदस्त वहाबियत और दीगर इस्लामी जमाअतों के दरमियान तौहीद व शिर्क के मुताअल्लिक़ मसाएल में जो इख़तेलाफ़ात पायें जाते हैं उन्हें ख़त्म करने के लिये यह मुनासिब नहीं है कि एक आला सतही इल्मी सेमिनार मुनअक़िद किया जाये और इसमें आज़ादी बयान का एहतेराम किया जाये हो सकता है कि मुख़तलिफ़ अफ़कार व ख़यालात के बाहमी टकराव के नतीजे में कोई ऐसी किरन चमक उठे जिसकी रौशनी में अक़ाएद पूरी तरह वाज़ेह हो जायें।

ज़ेरे नज़र किताब में मोहक़्क़ि बसीर , जनाब फ़रोग़ काज़मी ने इन तमाम मसाएल का तजज़िया किया है। जो वहाबियों और दीगर इस्लामी जमाअतों के दरमियान इख़तेलाफ़ व इन्तेशार का बाएस है। इस के अलावा क़ुरआने करीम और सुन्नते नबवी की रौशनी में इस्लामी नज़रियात को पूरी तरह वाज़ेह करने की कोशिश भी की गयी है।

अल्लाह करे ज़ोरे क़लम और ज़्यादा।

ख़ाक पा ए अहलेबैत

मौ 0 सैय्यद ज़ाहिद अहमद रिज़वी लखनवी

6 अगस्त 1997 ई 0


हिन्दुस्तान में फ़ितना ए वहाबियत

हिन्दुस्तान में वहाबियत का फ़ितना शाह वली उल्लाह मोहद्दिस के घर से नमूदार हुआ। हालांकि शाह साहब का मसलन सूफ़ीयाना था और बज़ाते खुद तसव्वुफ़ के क़ाएल व हमनवां थे।

शाह साहब के साहबज़ादों में शाह अब्दुल अज़ीज़ वग़ैरह भी वहाबियत के मसअले में कभी नुमाया नहीं हुए। मगर उसकी बाज़ किताबों से इस अम्र की निशानदेही होती है। उनके अफ़कारो रूझानात में वहाबियत का मोहलक जरासीम ग़ैर शउरी तौर पर इस अन्दाज़ से कार फ़रमा थे कि उन्हें ख़ुद भी इस ख़तरनाक मर्ज़ का एहसास न था। नीज़ बाज़ तारीख़ी शवाहिद से यह बात भी उभर कर सामने आती है कि इन हज़रात के दौर में वहाबियों की एक ख़ुफ़िया जमाअत मुस्लिम मुआशरे में इस तरह घुली मिली हुई थी कि उस की शिनाख़्त भी मुश्किल थी।

शाह वली उल्लाह और शाह अब्दुल अज़ीज़ वग़ैरा के बाद जब शाह इस्माइल का ज़माना आया तो उन्होंने आले सऊद से दरपर्दा साज़बाज़ कर के वहाबियत की हिमायत का ना सिर्फ़ खुल्लम खुल्ला एलान किया बल्कि उसकी पर्चमबरदारी भी ख़ुद क़ुबूल कर ली। जिसका नतीजा यह हुआ कि वहाबियों की ख़ुफ़िया जमाअत जो अब तक मसलहत और तक़य्या के पर्दे में लिपटी हुई मुसलमानों की नज़रों से पोशीदा थी मैदाने अमल में उतर आयी और उस ने अपने तबलीग़ी उमूर अंजाम देना शुरू कर दिया।

शाह इस्माइल के बाद नोज़ाएदाह जमाअत की क़यादत और सरबराही की तमाम तर ज़िम्मेदारियां सैय्यद अहमद ने सम्भाली। जिन के नाम के साथ वहाबी फ़िरक़ा उमूमन लफ़ज़े शहीद का इस्तेमाल करता है। वहाबी मिशन की तबलीग़ के लिए सऊदी हुकूमत की तरफ़ से दी जाने वाली ग़ैर मामूली मराआत मालो इम्दाद व वज़ायफ़ की करिश्मा कारियों ने दीगर मुमालिक के ज़मीर फ़रोश मौलवियों की तरह कुछ हिन्दुस्तानी कठमुल्लाओं को भी अपने सुनहरे जाल में फंसाया और उन्हीं कठमुल्लाओं के ज़रिये फ़ितना ए वहाबियत हिन्दुस्तान के मुख़तलिफ़ शहरों में फैली और फिर रफ़ता रफ़ता उस में इतनी शिद्दत पैदा हुई कि बड़े बड़े सुन्नी उलेमा और लाखों की तादात में सादाह लौह मुसलमान नजदी अक़ाएद के रेगिस्तानों में भटक कर गुमराह हो गये। यहां तक कि अक्सर उलेमा ने कुफ़्र इख़्तियार कर लिया और वह रसूले अकरम स 0 (अ.स.) की शाने अक़दस में बेअदबी व ग़ुस्ताख़ी पर आमादा हो गये। जैसा कि देवबंदियों के पेशवा मौलाना मोहम्मद क़ासिम तातूतरी के तहरीरी अफ़कार से वाज़ेह है। इन्क़ेलाबे हिजाज़ के बाद जब सऊदी फ़िरऔनों ने इब्ने तीमिया और इब्ने अब्दुल वहाब के शैतानी अफ़कार को अमली जामा पहनाते हुए पैग़म्बरे अकरम स 0 (अ.स.) के रोज़ा ए मुबारक को सनमे अकबर (बड़ा बेटा) क़रार दिया और एक बार फिर उन की काफ़ेराना जसारतों ने मक्का और मदीना के बाक़ी मांदा मज़ाराते मुक़द्देसा को मिस्मार व मुनहदिम करने के लिए अपने सफ़्फ़ाक व नजिस हाथों को बढ़ाया तो पूरे आलमे इस्लाम में एक कोहराम मच गया और करबो इज़तेराब के साथ ग़मों ग़ुस्से का एक तूफ़ान उठ खड़ा हुआ। चुनान्चे इस तूफ़ान के असरात हिन्दुस्तान के दीगर शहरों की तरह लखनऊ की पुरअमन व रवायती तहज़ीब पर मुरत्तब हुए और इस उभरते हुए फ़ितने को दबाने के लिये यहां के उमरा , उलमा और सूफ़ि ए कराम कमर बस्ता हुए। जिसके नतीजे में मौलवी अब्दुल बारी फ़िरंगी महली के ज़ेरे सरपरस्ती अन्जुमने ख़ुद्दामुल हरमैन क़ायम हुई और आल इण्डिया शिया कांफ़्रेंस के ज़ेरे एहतेमाम अन्जुमने तहफ़्फ़ुज़े माअसरमोताबर्रेका का क़याम अमल में आया। फिर एक माह बाद इन दोनों को नौ ए तशक़ील अन्जुमनों के बाहमी इशतेराक व तअव्वुन से रेफ़ा ए आम कल्ब पर एक अज़ीमुश्शान जलसा हुआ। जिस में बिला तफ़रीक़ शिया व सुन्नी उलमा ने बड़ी तादात में शिरकत की और तक़रीरों तजवीज़ के बाद तमाम हिन्दुस्तानी मुसलमानों की तरफ़ से एक एहतेजाजी मैमोरेंडम सऊदी हुकूमत को भेजा गया। जिस में मज़ाराते मुक़द्देसा के इन्हेदाम पर लानत मलामत के साथ ग़मों ग़ुस्से का इज़हार भी था।

जिस जलसा ए आम की अदीमुल मिसाल कामयाबी के बाद क़ैसरबाग़ बारादरी में हिजाज़ कांफ़्रेंस के इनेक़ाद का एहतेमाम हुआ जिसमें अहले सुन्नत की तरफ़ से फ़ुल्वारी शरीफ़ के मौलाना शाह मोहम्मद सुलेमान , शाह फ़ाक़िर इलाहाबादी , मौलाना अब्दुल माजिद बदायूनी , मौलाना मज़हरूद्दीन एडीटर , मौलाना अब्दुल बारी फ़िरंगी महली के हमराह तक़रीबन दो दर्जन दीगर उलमा ने शिरकत की नीज़ शियों की तरफ़ से मुमताज़ुल उलेमा सरकारे नासेरूल मिल्लत , सरकारे नजमुल मिल्लत , सरकारे उम्दतुल उलमा , फ़ख़रे क़ौम सैय्यद कल्बे अब्बास और सैय्यद अली ज़हीर वग़ैरा ने शिरकत फ़रमायी।

इस तारीख़ साज़ कांफ़्रेंस में फ़रीक़ैन की तरफ़ से घन गरज तक़रीरों के बाद इल्तेवा ए हज की तजवीज़ भी पेश हुई। जो इत्तेफ़ाक़ राय से मन्ज़ूर कर ली गयी। लेकिन अली बरादरान यानी मौलाना अली जौहर और मौलाना शौकत अली ने इस से इत्तेफ़ाक़ नहीं किया क्योंकि यह दोनों भाई आले सऊद के अफ़कारो नज़रियात से मुतास्सिर थे।

मुख़तसर यह कि एक तरफ़ शिया और सुन्नी उलमा मिल कर फ़ितना ए वहाबियत के ख़िलाफ़ मुख़तलिफ़ अन्दाज़ की तहरीकें चला रहे थे और दूसरी तरफ़ इसी लखनऊ की सरज़मीन पर पाटा नालवी और मन्ज़ूर अहमद नोमानी ऐसे चन्द यज़ीद परस्तों और फ़ितना परदाज़ों के ज़ेरे साया वहाबियों के भेस में एक नया यज़ीदी फ़िरक़ा जन्म ले रहा था। जिसका नस्बुल ऐन और मक़सद सही मुसलमानों के दरमियान इफ़तेराक़ व इन्तेशार पैदा करना शिया सुन्नी इत्तेहाद को पारा पारा करना फ़िरक़ा ए वाराना फ़साद , तशद्दुद और ग़ुडा गर्दी के ज़रिए शहर के पुरसुकून व पुरअमन माहौल को दरहम बरहम करना मुसलमानों के मज़हबी जज़बात को उभार कर क़त्ल व ग़ारतगरी और लूट मार पर आमादा करना और यज़ीद जैसे फ़ासिक़ो फ़ाजिर और ज़ालिम इन्सान की हिमायत कर के उस के ज़ालिमाना व जाबिराना किरदार की परदा पोशी करना वग़ैरा था।

चुनान्चे यह ख़ारजी नासिबी और यज़ीदी गिरोह मुनज़्ज़म होकर पूरी तैयारी के साथ 1905 ई 0 में सरगर्मे अमल हुआ और उस ने शिया सुन्नी मुसलमानों को आपस में लड़ाने और शहर में फ़साद बरपा करने की ग़रज़ से जुलूस हाय अज़ा के सामने चारी यारी नज़में पढ़ने का शाख़्साना खड़ा किया। यह शियों के लिए इन्तेहाई दिल आज़ार और परेशानकुन मरहला था। चुनान्चे इस सिलसिले में शियों ने सब्रो ज़ब्त से काम लेते हुए हुकूमत और इन्तिज़ामिया को इस शरपसन्दी की तरफ़ मुतावज्जे किया। लेकिन यज़ीदी बाज़ न आये और आख़िरकार 13 फ़रवरी 1908 ई 0 को ऐन आशूर के दिन शिया सुन्नी फ़साद हो गया। इस ग़ैर मोतावक़्क़े फ़साद में दोनों फ़िरक़ों को जानी व माली नुक़सानात से दो चार होना पड़ा। कुछ बेगुनाह लोग मौत के घाट उतर गये। सैकड़ों अफ़राद बुरी तरह ज़ख़्मी हुए घरों और इमामबाड़ों को नज़रे आतिश किया गया। बहुत सी दुकानें लूट ली गयीं।

मिस्टर बटलर उस वक़्त लखनऊ के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट थे। उन्होंने अमन की बहाली के लिये मोअज़ेज़ीन ए शहर का एक जलसा तलब किया और उन की तरफ़ से एक अपील जारी कराई लेकिन जब बल्वाइयों पर इस अपील का कोई असर न हुआ और छुट पुट वारदातों का सिलसिला जारी रहा तो बटलर साहब ने हुकूमत की ताक़त को बरू ए कार लाकर शरपसन्दों की सरकशी को सख़्ती से कुचल दिया।

8 अप्रैल 1908 ई 0 को शियों का एक नुमाइन्दावफ़्द लेफ़्टिनेंट गर्वनर से मिला और उन्हें तमाम कैफ़ियतों से आगाह कराते हुए इन से चार यारी फ़ितने पर पाबन्दी आयद करने का मुतालबा किया। जिस के जवाब में गर्वनर ने यह यक़ीन दिलाया कि वह इस मसअले की जांच सरकारी सतह पर करायेंगे और फिर इन्क्वायरी रिपोर्ट के मुताबिक़ मुनासिब फ़ैसला करेंगे। शियों के वफ़द ने यह भी मुतालबा किया कि चूंकि आठवीं रबीउल अव्वल क़रीब है और हो सकता है कि इस मौक़े पर यज़ीदी फ़िरक़ा फिर गड़बड़ी पैदा करने की कोशीश करे लिहाज़ा मुनासिब यह होगा कि पुलिस फ़ोर्स का माक़ूल बन्दोबस्त कर के शियों को तहफ़्फ़ुज़ फ़राहम किया जाये ताकि वह आज़ादी और अमन की फ़िज़ा में अपने मरासिमे अज़ा को अन्जाम दे सकें। लेफ़्टिनेंट गर्वनर ने इस मुतालबे को मन्ज़ूर करते हुए ज़िला मजिस्ट्रेट को यह हुक्म जारी किया कि आठवीं रबीउलअव्वल के मौक़े पर अज़ादारों को मुकम्मल तहफ़्फ़ुज़ फ़राहम किया जाये। अज़ा के जुलूसों को पुलिस की निगरानी में रखा जाए और बलवाई अगर किसी क़िस्म की रुकावट डालें या फ़साद बरपा करने की कोशीश करें तो उन्हें पूरी ताक़त से कुचल दिया जाये। चुनान्चे इस हुक्म पर मुस्तैदी से अमल हुआ और शियों के जुलूस हाय अज़ा अपनी रिवायती शान व शौकत के साथ बरामत होकर ब ख़ैरियत अन्जाम पज़ीर हुए। उस के बाद 13 अक्टूबर 1908 ई 0 को लेफ़्टिनेंट गर्वनर की हिदायत पर मिस्टर जय ढिल्लो चीफ़ सेक्रेटरी ने गर्वनर की तरफ़ से चारयारी के ख़िलाफ़ एक इन्क्वायरी कमेटी तशक़ील दी जिस के चेयरमैन मिस्टर टी 0 सी 0 पगट आई 0 सी 0 एस 0 मुक़र्रर हुए और मेम्बरों में मिस्टर ए 0 सी 0 पी 0 आलयवर , एहतेशाम अली , मौलाना अब्दुल माजिद , मौलाना सैय्यद नासिर हुसैन साहब क़िबला , नासिरूल मिल्लत , मौलाना अब्दुल बारी फ़िरंगी महली , सैय्यद शहंशाह हुसैन , श्री राम बहादुर सी 0 आई 0 ई 0 और बाबू गंगा प्रसाद नामज़द हुए। यह कमेटी पगट कमेटी के नाम से मशहूर हुई और इस ने तक़रीबन डेढ़ माह की इन्क्वायरी के बाद अपनी जो रिपोर्ट गर्वनमेंट में पेश की वह ज़ैली नोकात पर मुशतमिल थी।

क. शियों और सुन्नियों के दरमियान अस्ल तनाज़ा ए लफ़ज़ चारयारी पर मुनहसिर है और चारयारी नज़मों का अज़ादारी के जुलूसों में पढ़ा जाना शियों के लिए इन्तेहाई दिलाज़ार फ़ेल है। (पैराग्राफ़ नम्बर 14)

ख. चारयारी नज़मों का ताज़ियों के सामने मुसलसल और मुतावातिर पढ़ा जाना इस बात की कोशीश पर मबनी है कि जुलूस हाय अज़ा चारयारी जुलूसों में तब्दील हो जायें। यह यक़ीनन एक नये फ़िरक़े की तरफ़ से नई बिदत और नई बात है। (पैराग्राफ़ नम्बर 76)

ग. हमारी राय में चारयारी नज़मों के ज़रिए ख़ुलफ़ाए सलासा की तारीफ़ अज़ादारी के जुलूसों में उसके जुज़ की हैसियत के एक नामुनासिब फ़ेल और शियों के लिए दिल आज़ार मरहला है। इसके ख़िलाफ़ कोई ज़ाबेता व क़ायदा मुरत्तब करना ज़रूरी है।

घ. हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि गर्वनमेंट की तरफ़ से जो नोटिस अशरा ए मोहर्रम , चेहल्लुम और 21 रमज़ान के मौक़े पर बयान किया जाता हैं इस में जुलूस हाय अज़ा के सामने या उन के रास्ते में या फिर उसके बाद शार ए आम पर चारयारी नज़मों का पढ़ना और इन नज़मों में ख़लफ़ा ए सलासा की तारीफ़ व तौसीफ़ को आमतौर पर मम्नू क़रार दिया जाये और मुस्तक़बिल में ऐसी नज़मों को शार ए आम पर पढ़ना क़ानूने वक़्त पर छोड़ दिया जाये। (पैराग्राफ़ नम्बर 30)

गर्वनमेंट ने मज़्कूरा इन्क्वायरी रिपोर्ट को मामूली तरमीम व तंसीख़ के बाद 7 जनवरी 1909 को मन्ज़ूर कर लिया और फिर 1909 से 1937 तक चारयारी फ़ितने पर मुकम्मल पाबन्दी नाफ़ीस रही।

मदहे सहाबा का जन्म –

1909 की इब्तेदा में गर्वनमेंट की तरफ़ से फ़ितना ए चारयारी पर मुकम्मल पाबन्दी आयद हो जाने के बाद यह यज़ीदी गिरोह जो इब्तेदा ए इस्लाम से ख़ानवादा ए रिसालत का बदतरीन दुश्मन था अंगारों पर लोटने लगा और इस फ़िक्र में रहने लगा कि किस तरह नवासा ए रसूल स 0 (अ.स.) की अज़ादारी को ख़त्म किया जाये और किस तरीक़े से मुसलमानों में तफ़रेक़ा पैदा कर के शिया और सुन्नी को एक दूसरे से अलग किया जाये। चुनान्चे ख़ारजियों और नास्बियों के इस गिरोह ने एक नए फ़ितने को जन्म दिया और उस का नाम मदहे सहाबा रखा।

इस्लामी दुनिया की तारीख़ में पहली बार इन यज़ीदियों ने मलिहाबाद जाकर जोश मलिहाबादी की दादी मरहूमा के ताज़िये के मुक़ाबले में झण्डा उठाने की मज़मूम कोशिश की लेकिन चूंकि मुसलमानों के नज़दीक यह एक नया और अजूबा फ़ितना था और चारयारी फ़ितने से वहां लोग बख़ूबी वाक़िफ़ थे। लिहाज़ा चन्द पठानी तमाचों ने फ़ितना परदाज़ों का सारा बुख़ार उतार दिया था। इस वाक़ाए का ज़िक्र जोश मलिहाबादी ने अपनी किताब यादों की बारात में तफ़्सील से किया है।

मलिहाबाद की पठानी सरज़मीन पर शिकस्त व हज़िमत और ज़िल्लतो रूस्वाई के बाद मुद्दतों तक यह गिरोह लखनऊ में बरसरे आम मदहे सहाबा के झण्डे के ख़ातिर गर्वनमेंट से इसरार करता रहा। लेकिन चूंकि इस्लाम में यह एक नई बिदत थी इस लिए गवर्नमेंट हमेशा उन के इसरार व मुतालेबात को ठुकराती रही।

यज़ीदियों का यह मुतालबा ऐसा था कि जैसा कि मौजूदा दौर में शुमाली हिन्दुस्तान में रावण के पुजारी यह मुतालबा कर रहे हैं कि उन्हें राम के मुक़ाबले में रावण की मदह का हक़ दिया जाये और ज़ाहिर है कि रावण की मदह कोई हिन्दू बरदाश्त नहीं कर सकता। बल्कि यह तो रावण का पूतला जलाना , उस पर लानतों मलामत करना और उस से बेज़ारी का इज़हार करना अपना धर्म समझता है। बिल्कुल इसी तरह शिया फ़िर्क़ा भी इन नामनेहाद सहाबा की तारीफ़ और तौसीफ़ को बर्दाश्त नहीं कर सकता। जिन लोगों ने इस्लाम और ख़ानवादा ए रिसालत के साथ ग़द्दारी की उन के ख़िलाफ़ साज़िशें और पैग़म्बरे इस्लाम उनकी बेटी फ़ात्मा ज़हरा (स.अ.) और उन के तामाद अली ए मुर्तज़ा (अ.स) और उन के नवासों पर ज़ुल्म व तशद्दुद के पहाड़ तोड़े उन के हुक़ूक़ को ग़स्ब किया और उन्हें बेरहमी और बे दर्दी के साथ क़त्म किया।

इन ज़ालिम व जाबिर सहाबियों की तारीफ़ जो वहाबियों और यज़ीदियों की नज़र में मदहे सहाबा है महज़ शियों को दिली व रूहानी अज़ीयत पहुंचाने के लिये की जाती है। जो आले रसूल से मोहब्बत रखते हैं वरना हक़ीक़त तो यह है कि मदहे सहाबा का मामूलाते इस्लामी से कोई वास्ता और ताल्लुक़ नहीं है और यह फ़ेल ख़ुद वहाबियों की शरीअत में बिदअत शिर्क और कुफ़्र है। नीज़ इसकी मुख़ालेफ़त सिर्फ़ शिया ही नहीं करते बल्कि ख़ुश अक़ीदा अहले सुन्नत की अकसरियत भी इसके ख़िलाफ़ है। काश क़ज़ीया ए मदहे सहाबा के बारे में वोटिंग के ज़रिये हज़रात अहले सुन्नत की राय मालूम की जाती तो मौजूदा सरकार पर इस क़ज़ीय का सारा भरम खुल जाता और मदहे सहाबा के शैदाइयों को अपनी ही क़ौम के हाथों ज़बर्दस्त शिकस्त का सामना करना पड़ता।

(आप ये किताब अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क पर पढ़ रहे है।)

इस मंज़िल में यह सवाल भी किया जा सकता है कि जब वहाबियों की शरीयत में मदहे सहाबा बिदअत , शिर्क और कुफ़्र है तो उनकी तरफ़ से जुलूस ए मदहे सहाबा का तक़ाज़ा क्यों है इस का सीधा सा जवाब यह है कि वहाबियों का मक़सूद मदहे सहाबा या झण्डा नहीं है बल्कि इस फ़ितने की आढ़ में वह मुसलमानों के दो फ़िरक़ों के दरमियान तफ़रिक़ा पैदा कर के सदियों से राएज जुलूसों को रोकना या ख़त्म करना चाहते हैं। जो नवासा ए रसूल हज़रते इमामे हुसैन (अ.स.) और उन के 72 साथियों की याद से वाबस्ता है और जिन लोगों ने ज़ुल्म के ख़िलाफ़ लड़ते हुए इस्लाम की बक़ा और तहफ़्फ़ुज़ के लिए दस मोहर्रम सन् 61 हिजरी को कर्बला के मैदान में अपनी जाने क़ुर्बान कर दीं।

दूसरा दौर –

मदहे सहाबा का फ़ितना 1909 से 1935 तक वहाबियों , ख़ारजियों , नासिबयों और यज़ीदों के ज़ेरे साया पलता और बढ़ता और जवान होता रहा। यहां तक कि चौथाई सदी की मुसलसल और पुर इसरार ख़ामोशी के बाद उस का सुकूत उस वक़्त टूटा जब 1935 में लखनऊ एसेम्बली सीट के लिए चौधरी ख़लीकुज़्ज़मा और सैय्यद अली ज़हीर एक दूसरे के मुक़ाबिल सफ़आरा हुए। फ़ितने को एक बार फिर जगाया ख़लीकुज़्ज़मा इस वादे पर एलेक़्शन जीते कि वह एसेम्बली में इस आवाज़ को बुलन्द कर के मदहे सहाबा पढ़ने का हक़ सरकार से दिलवाऐंगे। मगर मदहे सहाबा के शैदाइयों का यह ख़्वाब शर्मिंदा ए ताबीर न हो सका क्योंकि एलेक्शन जीतने के बाद चौधरी साहब ने इस मामले में ख़ामोशी इख़्तेयार कर ली थी। इस नाकामी के एहसास में यज़ीदियों के जज़्बात को क़दरे मुशतइल कर दिया था कि वह लोग ज़िद पर उतर आये और अपनी ख़िफ़्फ़त मिटाने के लिए उन्होंने हुकूमत की तरफ़ से आएद शुदा सारी पाबन्दियों को तोड़ दिया मुख़तलिफ़ मस्जिदों की दीवारों से मदहे सहाबा की आवाज़ टकराने लगी और यह हवा इस तरह फैली कि लखनऊ की पुरअमन हवा एक बार फिर ख़राब होने लगी। शियों ने इस सूरते हाल से ज़िला इन्तिज़ामियां के हुक्काम के मुत्तलआ किया लेकिन जब कोई तसल्ली बख़्श कार्यवाही नहीं की गयी तो मजबूरन शियों की तरफ़ से तबर्रा के धमाके होने लगे नतीजा यह हुआ कि पूरे शहर में अफ़रा तफ़री और कशीदगी का माहौल पैदा हो गया।

एलसप कमेटी और उसकी तहक़ीक़ाती रिपोर्ट –

मदहे सहाबा और तबर्रा की आवाज़ों से जब शहर में अबतरी व बदनज़मी फैली तो हुकूमत ने मजबूर होकर 10 अप्रेल 1937 को एक दो रूकनी मदहे सहाबा व तबर्रा तहक़ीक़ाती कमेटी बनायी जो हाई कोर्ट इलाहाबाद के जस्टिस मिस्टर एलिस और अलीगढ़ के ज़िला मजिस्ट्रेट मिस्टर एच 0 सी 0 दास पर मुश्तमिल थी और जिन उमूर की तहक़ीक़ात की ज़िम्मेदारी इस कमेटी को सौंपी गयी थी वह भी दोनुकाती थे।

1. गुज़िशता वाक़ेयात की रौशनी में गवर्नमेंट तजवीज़ मोअर्रेख़ा 7 जनवरी 1909 में जो उसूल और पोलिसी तय की गयी थी उस में किसी तब्दीली की ज़रूरत है या नहीं।

2. ज़िला हुक्काम ने इन मामलात (मदहे सहाबा या तबर्रा) के सिलसिले में जो तरीक़ा ए कार इख़्तेयार किया है उस में क्या तब्दीलियां मुम्किन हैं। दो माह की तहक़ीक़ात के बाद 2 जून 1937 में इस कमेटी ने अपनी जो रिपोर्ट गवर्नमेंट में पेश की वह मुन्दरजा ज़ैल सिफ़ारिशात पर मबनी थी –

1. पूरी तहक़ीक़ात और ग़ौरो ख़ौस के बाद हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि इस बात की कोई ज़रूरत नहीं है कि इन उसूलों पर पालीसियों में कोई तबदीली की जाये जो गवर्नमेंट तजवीज़ 7 जनवरी 1909 में मुन्दरजा है।

2. दूसरे सवाल के जवाब में हमारी तजवीज़ यह है कि जो तरीक़ा ए कार ज़िला हुक्काम ने लखनऊ में इख़्तेयार कर रखा है उस में भी फ़िलहाल किसी तब्दीली की ज़रूरत नहीं है बशर्ते कि इस तरीक़ा ए कार में कोई ऐसी बात ख़िलाफ़े क़ानून न हो जिस से सुन्नियों को परेशान करना मक़सूद हो और जिस बुनियाद पर मदहे सहाबाब का पढ़ना मम्नूं क़रार दिया जाये। मदहे सहाबा पर पाबन्दी आएद रखने के लिए यही काफ़ी है कि वह शिया फ़िर्क़े के लिए दिल आज़ार है या पब्लिक के लिए परेशानियों और दिक़्क़तों का सबब है।

इज़हारे ख़्याल

एलसप कमेटी ने जो अपनी इस रिपोर्ट में जो ख़्याल तजवीज़ की शक्ल में ज़ाहिर किया वह दर्जे ज़ैल है –

1.मदहे सहाबा का तक़ाबुल ताज़ियों के जुलूसों से सही नहीं है बल्कि मदहे सहाबा का सही तक़ाबुल तबर्रा से है और इस बिना पर हमारी राय से गवर्नमेंट तजवीज़ 7 जनवरी 1909 में कोई ऐसी बात नहीं है जिस से यह ज़ाहिर हो कि सुन्नियों के साथ तफ़रिक़ो नाइन्साफ़ी से काम लिया गया है।

2. अगर इस उसूल को तसलीम कर लिया जाए कि मदहे सहाबा के जुलूस निकाल कर या शारा ए आम पर मदहे सहाबा पढ़ कर सुन्नियों में तब्लीग़ की जा सकती है और यही तरीक़ा दुरूस्त है तो फिर यह बात दिक़्क़त तलब और दुशवार तलब होगी कि शियों को तबर्रा के ज़रिये अपनी क़ौम में तबलीग़ करने से क्यों कर रोका जा सकता है हालांकि शिया इस बात को मानते हैं कि शार ए आम पर तबर्रा मुनासिब नहीं लेकिन सुन्नियों को शार ए आम पर मदहे सहाबा पढ़ने की इजाज़त दी जाती है महज़ इस लिए कि वह इस बात का ऐलान करते फिरें कि पहले कि तीन ख़लीफ़ा क़ाबिले तारीफ़ हैं तो शिया भी अपने इस मौक़िफ़ में हक़ बजानिब होंगे। यह तीनों ख़लीफ़ा क़ाबिले लानत व बेज़ार हैं लिहाज़ा उन्हें भी तबर्रा पढ़ कर मज़हबी अक़ाएद की तबलीग़ की इजाज़त दी जाये।

3. सुन्नियों ने यह बहस की है कि मज़हबी पेशवाओं को क़ानूनन ममनू है और मदह कभी क़ाबिले ऐतेराज़ नहीं हो सकती। यह दोनों बातें ऐसी हैं जो मुकम्मल तौर पर वाज़ेह नहीं हैं। पहला अम्र तो यह है कि मज़हबीं पेशवाओं की जाएज़ तनक़ीद व तनक़ीस जो नेक नियती पर मब्नी हो और दूसरी फ़रीक़ की दिलआज़ारी की नियत से न हो जुर्म नहीं है। इसके अलावा बहुत सी ऐसी मिसालें भी हैं जिन में तारीफ़ भी इशतेआल अन्ग़ेज़ और दिलाज़ार हैं जैसे कि फ़ीस्ट रहनुमाओं की शान में तारीफ़ या क़सीदे जुलूस के रास्ते में क़ाबिले ऐतेराज़ हो सकते हैं।

मन्ज़ूरी तबसेरा

गवर्नमेंट ने एलसप कमेटी की सिफ़ारिश को एक तजवीज़ के ज़रिए मन्ज़ूर कर लिया और 19 मार्च 1038 को अपने फ़ैसले का ऐलान कर दिया। यह फ़ैसला भी 28 मार्च 1938 के गज़ेट में शायां हुआ जिसमें एलसप कमेटी की रिपोर्ट शायां हुई थी। यह अम्र भी क़ाबिले ग़ौर है की एलसप कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में पगट कमेटी की साबेक़ा रिपोर्ट और हुक्काम ज़िला के इस तर्ज़े अमल को जाइज़ क़रार दिया जो उन्होंने 1909 से मदहे सहाबा को ममनू क़रार देने के बारे में इख़्तेयार कर रखा था। इस के अलावा इस दो रुकनी कमेटी ने दो बातों को और वाज़ेह कर दिया अव्वल यह कि वहाबी सुन्नियों का यह दावा कि मदहा या तारीफ़ किसी पहलू से दिल आज़ार नहीं है , बिल्कुल ग़लत है महज़ हालात की बिना पर मदहा या तारीफ़ भी दिलाज़ार हो सकती हैं मसलन राम के भक्तों के सामने रावण की तारीफ़ , दूसरे यह कि अगर सुन्नियों की तरफ़ से इस बात पर इसरार है कि उन्हें शार ए आम पर मदहे सहाबा पढ़ने की इजाज़त दी जाये तो उसके जवाब में शियों का भी यह मुतालबा जाएज़ और दुरूस्त है कि उन्हें भी शार ए आम पर तबर्रा पढ़ कर अपने मक़सूस मज़हबी अक़ाएद की तबलीग़ का हक़ मिलना चाहिए। इन तमाम बातों और फ़ैसलों के बावजूद अगर किसी तरफ़ से यह यक़ीन दिलाया जाए कि मदहे साहाब दिल आज़ार नहीं हो सकती और शियों को मदहे सहाबा के जवाब में तबर्रा पढ़ने का हक़ नहीं है तो यह बात सरासर ग़लत और बे बुनियाद होगी। इस तरह एलसप कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में साफ़ तौर पर यह वाज़ेह कर दिया कि मदहे सहाबा के जवाब में शियों को तबर्रा पढ़ने का हक़ है।

30 मार्च 1939 का सियासी फ़ैसला –

1939 में जब यू 0 पी 0 कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश का निज़ामे हुकूमत सम्भाला और पंडित गोबिन्द वल्लभ पन्त वज़ीरे आला मुन्तख़ब हुए तो मदहे सहाबा का फ़ितना एक बार फिर उभर कर सामने आया। इस मरतबा इस फितने की क़यादत मशहूर यज़ीदी अलमबरदार और ख़ानदाने रिसालत के बदतरीन दुशमन मौलवी अब्दुल शकूर के हाथों में थी जिनका मक़सद ही मदहे सहाबा के नाम पर अज़ादारी को नुक़सान पहुंचाना और शिया सुन्नी झगड़े कराना था नीज़ उस वक़्त लखनऊ में जमाअत ए एहरार का काफ़ी ज़ोर था जो मौलवी अब्दुल शकूर की हम ख़्याल थी। इस पर सोने पर सुहागा की मुम्ताज़ कांग्रेज़ी कारकुन मौलवी अहमद हुसैन मदनी नाज़िम जमीयतुल अलमा ए हिन्द मौलवी अब्दुल शकूर के क़रीबी रिश्तेदार थे चुनान्चे उन्होंने इन यज़ीदियों की ख़्वाहिश के मुताबिक़ वज़ीरे आला गोविन्द वल्लभ पन्त पर यह कह कर ग़ैर उसूली और नाजाएज़ दबाव डाला कि आप सुन्नियों को जुलूसे मदहे सहाबा की इजाज़त दे देंगे तो मुसलमानों का अकसरियती फ़िरक़ा आप के साथ हो जायेगा और आइन्दा के लिये कांग्रेस के वोट महफ़ूज़ हो जायेंगे। इस दबाव का नतीजा यह हुआ कि शियों से मशविरा किये बग़ैर वज़ीरे आला ने सियासी मफ़ाद को मद्दे नज़र रखते हुए पहली बार क़ज़िया ए मदहे सहाबा पर हुकूमत की हिमायती मोहर सबद कर दी और 30 मार्च 1939 को एक सरकारी ऐलानिया जारी कर दिया जिसका तर्जुमा दर्जे ज़ैल है –

उत्तर प्रदेश सरकार यह ऐलान करती है कि वह लखनऊ के सुन्नियों को बारह वफ़ात के दिन शार ए आम पर एक जलसा करने और जुलूस की शक्ल में मदहे सहाबा पढ़ने का मौक़ा फ़राहम करेगी लेकिन उस के साथ एक शर्त यह होगी कि वक़्त जगह और रास्ते का तअय्युन ज़िला हुक्काम करेंगे।

तबर्रा ऐजीटेशन –

तबर्रा ऐजीटेशन की दास्तान बड़ी दर्दअंगेज़ और तूलानी है जिसे समेटने के लिये इस किताब में गुजांइश नहीं है। कुछ अहम वाक़ियात का तज़केरा इस लिए ज़रूरी है कि इन वाक़ेआत की रौशनी में हमारी मौजूदा या आइन्दा की नसलों को अपना लाहे अमल मुरत्तब करने में आसानी होगी। जुलूसे मदहे सहाबा के बारे में मौलाना मदनी की इन हतक कोशिशों और यू 0 पी 0 की नौज़ाएदा कांग्रेसी हुकूमत के रवैये का इल्म पहले से ही हो चुका था और शिया तंज़ीमों को इस बात का भी यक़ीन था कि वज़ीरे आला मिस्टर पन्त दबाव के तहत अन्क़रीब कोई न कोई यकतरफ़ा और जांबेराना फ़ैसला करने वाले हैं चुनान्चे उन्हें हालात के पेशे नज़र शिया पालिटिकल कांग्रेस की कमेटी ने 23 मार्च 1939 को सैय्यद अली ज़हीर साहब मरहूम की ज़ेरे सदारत मुनअक़िद होने वाले एक ख़ुसूसी और हंगामी जलसे में यह तय किया कि जुलूसे मदहे सहाबा के लिये सरकार और सुन्नियों के दरमियान जो सांठ गांठ चल रही है उस के ख़िलाफ़ 31 मार्च सन् 1939 ई 0 से कोई मुनज़्ज़म व मोअस्सिर तहरीक़ छेड़ दी जाये ताकि हुकूमत मनमानी न कर सके। इस फ़ैसने का आम ऐलान दूसरे दिन एक ऐसी मजलिस में किया गया जिसमें कई अकाबिर शिया उलमा और मुम्ताज़ शख़्सियतें मौजूद थीं। इसी ऐलान का अफ़सोसनांक नतीजा यह हुआ कि मौलवी अब्दुल शकूर ने मौलाना मदनी के ज़रिये इसकी ख़बर फौरी तौर पर वज़ीरे आला तक पहुंचा दी। वज़ीरे आला ने शियों की तरफ़ से कोई तहरीक़ शुरू करने से क़ब्ल ही 30 मार्च 1930 ई 0 को जुलूसे मदहे सहाबा के हक़ में यकतरफ़ा एलानिया जारी कर दिया जिसकी वजह से शियों में एक ज़बर्दस्त हैज़ान पैदा हो गया और पूरी क़ौम में ग़मों ग़ुस्से की आग भड़क उठी चुनान्चे वह पुरअमन तहरीक़ जो शिया पालिटिकल कांफ़्रेंस के मुताबिक़ 21 मार्च 1939 से शुरू होने वाली थी अचानक तबर्रा एजेटेशन की तरफ़ मुड़ गयी और जिस दिन मिस्टर गोविन्द पन्त की तरफ़ से मदहे सहाबा का सरकारी ऐलान जारी हुआ उसी दिन यानी 30 मार्च 1939 को ही नवाब सुल्तान अली ख़ां नाजिम सिपाहे अब्बासिया की क़यादत में 16 रज़ाकारों ने नारा ए तबर्रा बुलन्द करते हुए ख़ुद को इमामबाड़ा ए ग़ुफ़रांमाब के बाहर गिरफ़्तार करा दिया। शिया पालिटिकल कांफ़्रेंस और दीगर चन्द इदारों की तजवीज़ पर 31 मार्च 1939 से बाक़ायदा तारीख़साज़ ऐजीटेशन इमामबाड़ा ए आसफ़ी से शुरू हुआ और तबर्रा की मुसलसल धमाकों की अवाज़ें शहर की फ़िज़ा में गूंजने लगीं।

सच तो यह है कि इस तारीख़ी ऐजीटेशन की कामयाबी ग़ैबी ताइदो इमदाद का नतीजा थी वरना ग़ैरे इरादी तौर पर बग़ैर किसी तैय्यारी के जिन हालात में इसकी इब्तेदा हुई थी वह इन्तेहाई मायूसकुन और हिम्मत शिकन थी पहली सब से बड़ी कमज़ोरी यह थी कि यह तबर्रा ऐजीटेशन बग़ैर किसी मन्सूबाबन्दी और तैय्यारी के शुरू किया गया था दूसरी यह कि उलमा ए कराम से इसकी मन्ज़ूरी नहीं ली गयी थी। चुनान्चे इन दोनों कमज़ोरियों से कुछ ना फ़हम और रवादार क़िस्म के लोगों ने यह फ़ाइदा उठाना चाहा कि उन्हें जेल जाने की शरयी हैसियत का शाख़्साना खड़ा किया और इसके ज़ैल में उलमा ए कराम से फ़तवा हासिल करने की भाग दौड़ शुरू कर दी। इस जाहिलाना भाग दौड़ का फ़ौरी और अमली जवाब सबसे पहले सरकार नसीरूल मिल्लत ने यह दिया कि पहली अप्रैल 1939 को उन्होंने तबर्राइयों की क़यादत करते हुए 660 मोमेनीन के साथ ख़ुद को गिरफ़्तार करा दिया यही वह दूरअन्देशाना एक़दाम था कि जिसने नाफ़ैहम को जेल जाने की शरयी हैसियत से आगाह कर दिया और तबर्रा की आबरू रख ली। इस अमली एक़दाम में जहां एक तरफ़ ऐजीटेशन में एक नई रूह वहां दूसरी तरफ़ इसतिफ़ता की सारी कोशिशों को यक़लख़त मुनजमिय कर दिया उस के बाद चूंकि सरकारे नासेरूल मिल्लत का नज़रिया जो उन के फ़रज़न्दे अकबर की गिरफ़्तारी के बाद तबर्रा एजीटेशन के हक़ में बख़ूबी वाज़ेह हो चुका था इस लिए दीगर शिया उलेमा ने भी इसकी ताइद फ़रमा दी और इस तरह यह एजीटेशन हिन्दुस्तान की तारीख़ में एक संगेमील बन गया और फिर उसमें इतनी तवानाई पैदा हो गई कि रोज़ाना 400- 400 500- 500 की तादाद में मोमेनीन तिलावते तबर्रा के बाद ख़ुद को गिरफ़्तारी के लिये पेश करने लगे और जा बजा नयी जेलें खुलने लगीं। मौलाना मदनी और मौलवी अब्दुल शकूर लखनऊ छोड़ कर भाग खड़े हुए और यू 0 पी 0 हुकूमत अपने ग़लत फ़ैसले पर अपना सर पीटने लगी।

ग़ैर मुनक़सिम हिन्दुस्तान के गोशे गोशे साहेबाने ईमान का एक ताक़तवर सैलाब उमड़ कर लखनऊ की तरफ़ तेज़ी से बढ़ रहा था और ज़िला हुक्काम उसे रोकने में नाकाम व परेशान थे। उत्तर प्रदेश के अलावा दिल्ली , गुजरात , पंजाब , महाराष्ट्र , बिहार , बंगाल , आसाम , झंग , सिंह और दीगर मक़ामात के शिया भी इस ऐजीटेशन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा ले रहे थे। ग़रज़ की हिन्दुस्तान की शिया आबादी का कोई हिस्सा ऐसा नहीं था कि जहां से मोमेनीन ए कराम के जत्थे न आये हों। शायद इसी जोशे इमानी से मुतास्सिर होकर अकबर इलाहाबादी ने शायरी के स्टेज से अपने इस शेर के ज़रिये हुकूमत को ललकारा था –

हाकिम न कोई चैन से बंगले में सोयेगा ,

झण्डा अगर उठा तो तबर्रा भी होयेगा।।

बहर हाल यह ऐजीटेशन अपनी पूरी क़ूवतो तवानाई के साथ तमाम सरकारी बंदिशों और पाबन्दियों की कोशिशों के बावजूद अज़मों इस्तेक़लाल की छांव में मुसलसल जारी रहा और शियों का जेल भरो आन्दोलन मदहे सहाबा की धज्जियां फ़िज़ां में बिखेरता रहा। इस ऐजीटेशन के बारे में जो बजाए ख़ुद एक मुस्तक़िल तारीख़ है हफ़्त रोज़ा अख़बार जंग 3 जुलाई 1939 के ख़ुसूसी शुमारे 208 के सफ़ ए तीन पर लिखा है कि मफ़ाद परस्त सियासत दाओं की शोबदाबाज़ी ने 30 मार्च को मदहे सहाबा के जुलूस की इजाज़त देकर शियों को तबर्रा बाज़ी का मौक़ा फ़राहम किया जो रफ़ता रफ़ता एक मुस्तक़िल ऐजीटेशन में तब्दील हो गया और इसमें पूरे हिन्दुस्तान के शिया शरीक हो गये। यक़ीकनन हुकूमत की तरफ़ से यह एक ग़ैर दानिशमंदाना एक़दाम था जिसका ख़ामियाज़ा सुन्नियों को ख़ुद भुगतना पड़ा उस वक़्त तक आम अन्दाज़े के मुताबिक़ गिरफ़्तार शुदागान की तादाद तक़रीबन 22 हज़ार तक पहुंच चुकी थी जबकि सरकारी बयान में यह तादाद 18 हज़ार बतायी जाती है।

5 जुलाई 1939 का कर्फ़्यू –

5 से 7 जुलाई 1939 तक तीन दिन इमामबाड़ा ए आसफ़ी के सामने लक्ष्मण टीला पर शाह पीर मोहम्मद का उर्स होने वाला था हुकुमत ए इन्तिज़ामिया ने इस उर्स की आढ़ लेकर ख़ुफ़िया तौर पर 4/5 जुलाई की दरमियानी शब में सिर्फ़ शियों के लिए 36 घंटे का कर्फ़्यू नाफ़िस कर दिया और सुन्नियों को टीले पर जाने की इजाज़त दे दी। यह इस लिये किया गया था कि शियों का ऐजीटेशन तअतुल की बिना पर कमज़ोरी का शिकार हो जाये। चुनान्चे 5 जुलाई की सुबह को सरगर्दा शिया लीडर जिन्हें कर्फ़्यू का कोई इल्म न था शिया पालिटिकल कांफ़्रेंस और तन्ज़ीमुल मोमेनीन के दफ़तरों नीज़ दीगर मक़ामात से गिरफ़्तार कर लिये गये और उन्हें जेल रवाना कर दिया गया जिससे एक परेशानी और इन्तेशार का आलम पैदा हो गया लेकिन चूंकि एजीटेशन का जारी रखना बहर हाल ज़रूरी था इस लिए सख़्त क़र्फ़्यू और चौकसी के बावजूद मुजाहिदे मिल्लत सय्यद अशरफ़ हुसैन अडवोकेट और उन के 6 साथी नज़ीर हुसैन सरांय माली ख़ां , दुल्हा साहब निवाज गंज , नवाबो साहब , पुत्ती मरहूम , कज्जन साहब और नवाब संझू साहब एक ख़ूफ़िया मक़ाम पर जमा हुए और इन में से तीन अफ़राद इमामबाड़ा ए आसफ़ी की पुश्त पर बहने वाले नाले के ज़रिये इमामबाड़े के अन्दर दाख़िल हो गए और सैय्यद अशरफ़ हुसैन मरहूम की क़यादत में तीन अफ़राद सुन्नियों के उस मजमे में शामिल हो गये जो लक्ष्मण टीले पर उर्स के लिये जा रहा था यह लोग लक्ष्मण टीला पहुंच कर सामने गये गेट से पुलिस वालों की आंखों में धूल झोंक कर इमामबाड़े के अन्दर पहुंच गये तो इमामबाड़े से तबर्रा का नारा बुलन्द हुआ जिसे सुन कर उर्स में शिरकत में आये हुए सुन्नियों में भगधड़ मच गयी और इन्तिज़ामिया के अफ़सरान और हुक्काम हैरत से एक दूसरे का मुंह तकते रह गये। इस इस्तेक़लाल और पामर्दी का नतीजा यह हुआ कि सैय्यद अशरफ़ हुसैन और उनके साथियों की गिरफ़्तारी के बाद हुक्काम को मजबूर हो कर कर्फ़्यू हटा लेना पड़ा और ऐजीटेशन के ख़िलाफ़ हुकूमत की सारी तदबीरे नाकाम हो गयी।

6 जुलाई 1939 का तारीख़ी दिन –

5 जुलाई कर्फ़्यू के दौरान मुजाहिदे मिल्लत सैय्यद अशरफ़ हुसैन और उनके साथियों की गिरफ़्तारी के बाद शिया क़ौम में एक नया जोश और वल्वला पैदा हो गया था चुनान्चे 6 जुलाई 1939 को मौलाना सैय्यद सईद साहब क़िब्ला (सईदुल मिल्लत) , मौलाना सैय्यद कल्बे हुसैन साहब क़िब्ला उर्फ़ कब्बन साहब , उम्दातुल उलमा मौलाना मिर्ज़ा मोहम्मद आलिम साहब क़िब्ला , मौलाना सैय्यद क़ायम मेंहदी साहब क़िब्ला , मौलाना सआदत हुसैन साहब क़िब्ला और फ़ख़रूल वायेज़ीन मुल्ला मोहम्मद ताहिर साहब क़िब्ला के साथ तक़रीबन दो दर्जन दीगर उलमा ए कराम और मोअज़्ज़ेज़ीन ने इमामबाड़ा ए आसफ़ी से अपनी गिरफ़्तारियां देने का ऐलान किया। जिसे सुनकर तक़रीबन 50 हज़ार शियों का एक जम्मेग़फ़ीर वक़्त से पहले ही इमामबाड़े में इकट्ठा हो गया। इनमें से हर एक अपने रहनुमाओं की क़यादत में गिरफ़्तारी का शरफ़ हासिल करने के लिए बेचैन मुज़तरिब था। मज़कूरा उलमा ए कराम और मोमेनीन को इमामबाड़ा ए आसफ़ी से बैरूनी गेट वाली सड़क तक पहुंचाने की ग़रज़ से सरकारे नासेरूल मिल्लत और सरकारे नजमुल मिल्लत भी तशरीफ़ लाये थे और तबर्रा के फ़लक शिगाफ़ नारों से शहर की फ़िज़ा गूंज रही थी ग़रज़ की एक तरफ़ शिया उलमा के साथ 50 हज़ार मोमेनीन का कसीर मजमा इमामबाड़ा ए आसफ़ी से बैरूनी गेट वाली सड़क की तरफ़ पेशक़दमी कर रहा था कि उनकी गिरफ़्तारी अमल में आ सके और दूसरी तरफ़ वज़ीरे आला के इशारे पर पुलिस और पी 0 एस 0 सी 0 के जवान इन पुर अमन और निहत्थे मजमे पर गोलियां बरसाने और लाठीचार्ज करने की तैयारी कर रहे थे। चुनान्चे मजमा जैसे ही इमामबाड़े के बैरूनी गेट से निकल कर बाहर सड़क पर आया और गिरफ़्तारी पेश करने के लिए आगे बढ़ा वैसे ही बग़ैर किसी वार्निगं के पुलिस की लाठियां बरसने लगीं। इस बरबरियत और तशद्दुद के नतीजे में मुताअद्दिद उलमा ए कराम और सैकड़ों की तादात में मोमेनीन बुरी तरह घायल हो गये और यावर हुसैन नामी एक नौजवान पुलिस की गोली का निशाना बन गया। हुक्कामे ज़िला इस ख़ुशफ़ैहमी में मुब्तेला थे कि पुलिस की ज़्यादती और गुंडागर्दी के बाद शियों के हौसले पस्त हो जायेंगे और ऐजीटेशन ख़त्म हो जायेगा लेकिन उन्होंने जब यह देखा कि हौसलों में और इस्ताहकाम पैदा हो गया है और ऐजीटेशन में मज़ीद तवानाई आ गयी है तो उनकी ख़ुश फ़ैहमी का सारा तिलस्म टूट गया और उनके चेहरों से मायूसी टपकने लगी।

मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद से वज़ीर ए आला की फ़रियाद –

लखनऊ के हालात जब इन्तेहायी बदतर और हुकूमत के कन्ट्रोल से बाहर हो गये तब नीज़ तबर्रा ऐजीटेशन में कहीं से कोई कमज़ोरी पैदा न हो सकी तो वज़ीर ए आला गोविन्द बल्लभ पन्त ने घबरा कर कांग्रेस पार्लियामेंटरी बोर्ड के सदर और सुन्नियों के मुम्ताज़ और वसीउन्नज़र आलिमेदीन मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद से राबता क़ायम किया और उनसे फ़रियाद की कि वह अपने रूसूक़ो असरात को बरूए कार लाकर किसी तरह तबर्रा ऐजीटेशन को ख़त्म करायें ताकि शहर में अमन बहाल हो सके और हालात मामूल पर आ सकें। मौलाना आज़ाद ने पहले तो वज़ीर ए आला की इस फ़रियाद को ठुकराते हुए इस मसले में पड़ने से साफ़ इन्कार कर दिया लेकिन बाद में वह पंडित जवाहर लाल नेहरू के कहने सुन्ने से राज़ी हो गये और चन्द सुन्नी उलमा के साथ लखनऊ तशरीफ़ ले आए और यहां उन्होंने अपने 17 रोज़ा क़याम के दौरान अव्वल से आख़िर तक के हालात का जायज़ा लिया। वज़ीर ए आला और ज़िला हुक्काम से गुफ़तुगू की और मौलाना मदनी और अब्दुल शकूर के साथ साथ दीगर सुन्नी लीडरान से भी उनका मुतमा ए नज़र मालूम किया। उसके बाद उन्होंने शिया रहनुमाओं से बातचीत की और उनसे दरख़्वास्त की कि वह तबर्रा ऐजीटेशन ख़त्म करा दें। मौलाना ने शिया मौलानाओ को यह यक़ीन दहानी भी कराई कि वह मदहे सहाबा के बारे में हुकूमत की तरफ़ से 30 मार्च 1939 जारी होने वाले ऐलानिया को मन्सूख़ करा देंगे। चुनान्चे मौलाना आज़ाद ऐसी ज़िम्मेदार शख़्सियत की यक़ीन दहानी के बाद शिया रहनुमाओं ने 8 माह दस दिन से चल रहे तबर्रा ऐजीटेशन को वापस ले लिया। जिन लोगों ने गिरफ़्तारियां दीं थीं उन्हें ग़ैरमशरूत तौर पर रिहा कर दिया गया और वह जेलों से अपने घरों को वापस आ गये। उसके चन्द ही रोज़ बाद गोविन्द वल्लभ पन्त की सूबाई हुकूमत भी हालात का शिकार हो कर ख़त्म हो गयी।

मौलाना आज़ाद का तारीख़ी बयान –

मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद का क़याम अगर लखनऊ में आठ दस दिन और होता तो वह यक़ीनन क़ज़ीया ए मदहे सहाबा को दफ़्न कर देते और किसी की हिम्मत न होती कि उनके ख़िलाफ़ आवाज़ बलन्द कर सके क्योंकि वह सुन्नी मुसलमानों के ऐसे मज़हबी रहनुमा थे जिनकी ज़बान से निकला हुआ हर लफ़ज़ एक हुक्म की हैसियत रखता था। लेकिन अफ़सोस है कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बाहमी इख़्तेलाफ़ात और पूरे मुल्क में फ़ैले हुए सियासी इन्तेशार ने पंडित नेहरू की तलबी पर उन्हें लखनऊ छोड़ने पर मजबूर कर दिया। ताहम मौलाना ने 30 अप्रैल 1940 को अपने एक बयान के ज़रिये मदहे सहाबा को बिदत क़रार दिया और सुन्नियों को मशविरा दिया कि वह इस बिदत से बाज़ रहें। रोज़नामा नेशनल हेरल्ड ने शायां होने वाले इस बयान के इख़तेबासात का उर्दू तरजुमा हसबे ज़ैल है –

मुझे इस अम्र को मानने में ज़रा भी पसोपेश नहीं है कि जुलूस ए मदहे सहाबा के बारे में यू 0 पी 0 हुकूमत का 30 मार्च 1939 को जारी होने वाला सरकारी ऐलानिया हालात के नाकाफ़ी मुशाहिदे और क़याम राय की ग़लती पर मब्नी था।

बारह वफ़ात की आमद के मौक़े पर मैं अपना फ़र्ज़ समझता हूं कि सुन्नियों से दरख़ास्त करें कि वह पूरे मसले के लिए एक ऐसा माक़ूल नुक़तह नज़र और ऐसा तर्ज़े अमल इख़्तियार करें जो सुन्नि और शियों के दरमियान बिरादराना यकजहती का ज़ामिन बन सके। सुन्नियों का अपनी तक़रीबाते मज़हबी में ख़ुलफ़ा ए सलासा की मदह का हक़ शक व शुभे से बाला तर है और कोई शख़्स भी माक़ूलियत की हल्की सी झलक के साथ उस हक़ पर ऐतेरात नहीं कर सकता। लेकिन जहां तक जुलूसे मदहे सहाबा का ताल्लुक़ है तो वह दरहक़ीक़त सुन्नियों के मज़हबी फ़राएज़ का कोई जुज़ नहीं। अलावा वह अज़ी ख़ालिस मज़हबी नुक़ता ए नज़र और फ़िक़ही लिहाज़ से इस मदहे सहाबा को मज़हब में एक नया फेल या ग़ैरे मामूली जिद्दत (बिदत) ही कहा जा सकता है और यह फेल चूंकि मुसलमानों के दोनों फ़िर्कों के दरमियान मेल व इत्तेहाद बुलन्द और अज़ीम मक़सद के मनाफ़ी हैं लिहाज़ा मज़हबी तौर पर इस पर पाबन्दी इन्तेहाई मुनासिब है।

मैं तमाम बा असर और बुलन्द मरतबा सुन्नी हज़रात से अपील करता हूं कि वह अपने असरात से काम लेकर जुलूसे मदहे सहाबा के कारकुनों को इस बात पर आमादा करें कि वह अपने इन जुलूसों के लिए इसरार न करें बल्कि मुस्लिम साल्मियत को बरक़रार रखने के ख़िदमात को अंजाम दें।

मौलाना आज़ाद के इस बयान से यू 0 पी 0 के सूबाई हुकूमत को अपनी ग़लती का एहसास हुआ चुनान्चे उस ने 11 नवम्बर , 1940 को अपने एक मुख़तसर एलानिया के ज़रिये जुलूसे मदहे सहाबा पर फिर पाबन्दी आएद कर दी। इस पाबन्दी के बाद यज़ीदियों की सारी कोशिशों पर पानी फिर गया इन के हौसले पस्त हो गये और इन के सरों से मदहे सहाबा का भूत इस तरह उतरा कि 22 साल तक उन्होंने दोबारा सर नहीं उठाया। यहां तक कि उन के बच्चे जवान हो गये और जवान बूढ़े हो कर पेवन्द ए ख़ाक हो गये। अलबत्ता इस तवील वक़्फ़े के दौरान यह ज़रूर हुआ कि कुछ फ़ितना परदाज़ों की तरफ़ से जुलूसे मदहे सहाबा का मामला मुक़दमे की शक्ल में मुख़्तलिफ़ अदालतों में समाअत व दादरसी के लिए पेश हुआ और हर अदालत ने इसे शरअंगेज़ दिलआज़ार और फ़ितनाओ फ़साद का सबब ठहराते हुए इस पर हुकूमत की तरफ़ से आएद शुदा पाबन्दी को जाएज़ क़रार दिया।

(आप ये किताब अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क पर पढ़ रहे है।)

तबलीग़ी जमाअतों का क़याम और उनकी सरगर्मियां –

तक़सीमे हिन्द के बाद मदहे सहाबा का फ़ितना ख़ामोशी की गहरी तहों में दबा हुआ था और ज़ेहनों में उसके नुक़ूश धुंधले पड़ चुके थे लेकिन जब 1952 का साल शुरू हुआ तो इलेक्शनी मुहिम की मसलहत अंग्रेज़ों और मुख़तलिफ़ सियासी पार्टियों की चीरा दस्तियों ने महज़ वोटों की ख़ातिर सुन्नियों को उनकी अकसरियत का एहसास दिलाकर और 1950 के आइना ए हिन्द में दिये गये मुसलमानों के मज़हबी हुक़ूक़ से उन्हें आगाह कर के इस फ़ितने को एक नये ढंग से उभारा और चूंकि कांग्रेस पार्टी भी अन्दरूनी तौर पर मुसलमानों की इजतेमाई क़ूवत को फ़िरकों में तबदील कर के उन्हें कमज़ोर बनाने की फ़िक्र में लगी हुई थी लिहाज़ा उसने भी अपने इन्तेख़ाबी मन्शूर में हर फ़िरक़े की मज़हबी आज़ादी का ऐलान किया इन दोनों बातों का मजमुयी नतीजा यह हुआ कि मुसलमानों के दरमियान कुछ ऐसी तबलीग़ी जमाअतें उभर कर आ गयीं जो अफ़कार व ख़यालात में वहाबियत से हम आहंग थीं। चुनान्चे इन जमाअतों ने अपने मसलक की तबलीग़ शुरू कर दी। इस में कोई शक नहीं कि इब्तेदा में इनकी तबलीग़ का दायरा कारे मज़हबी आज़ादी के साय में था मगर रफ़ता रफ़ता इसकी सूरते हाल तब्दील होती गयी और आज की यह कैफ़ियत है कि यह जमाअतें ख़ुफ़िया तौर पर सुन्नी मुसलमानों को अपने मुल्क , वतन , मुआशरे और मामूलाते इस्लामी से इन्हेराफ़ , ग़द्दारी , बग़ावत और सरकशी पर उक्साती हैं। इन में से बाज़ को पाकिस्तानी ख़ुफ़िया ब्यूरो की तरफ़ से जंगी तरबियत और असलहे की फ़राहमी के लिए कसीर तादात में माली इमदाद भी दी जाती है , जो बराहे रास्त दीगर इस्लामी मुमालिक के ज़रिए मौसूल होती है ताकि यह लोग हिन्दुस्तान की सालमियत यकजहती और अमनो सुकून को ग़ारत कर सकें , जैसा कि वादिये कश्मीर में हो रहा है।

यह जमाअतें एक तीर से कई शिकार करती हैं अव्वल यह कि मज़हब के नाम पर फ़ितनाओ फ़साद बरपा करके मुल्क के लिए ख़तरा पैदा करती हैं , दूसरे यह कि हिन्दुओं के ख़िलाफ़ मुसलमानों के दिलों में नफ़रत व फ़िरक़ा परस्ती को उभारती हैं और तीसरे यह कि शियों के ख़िलाफ़ ग़लत और बे बुनियादी प्रोपेगन्डे कर के उन्हें काफ़िर क़रार देती हैं।

ख़ानदाने रिसालत से अजली दुश्मनी की बिना पर यह जमाअतें नवासा ए रसूल हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) की अज़ादारी की भी सख़्त मुख़ालिफ़ है और सुन्नियों को इस अम्रे ख़ैर की अन्जाम देही से हत्तल इम्कान रोकने की भी कोशीश करती हैं ताकि शियों और सुन्नियों को दरमियान इख़्वत व मोहब्बत का जो रिश्ता सदियों से क़ायम है वह हमेशा के लिए ख़त्म हो जाये क्योंकि उन्हें यह अच्छी तरह मालूम है कि अज़ादारी शियों का मज़हबी जुज़ है और मुख़ालेफ़िने अज़ा को बर्दाश्त नहीं कर सकते।

इन जमाअतों की तरफ़ से मुनक़्क़ेदा जुलूसों में जो तक़रीरें होती हैं उनमें मुनाफ़ेरत और फ़िरक़ा परस्ती का ज़हर भरा होता है और इनके ज़रिये सुन्नियों को यह तरग़ीब दी जाती है कि वह हिन्दुओं और शियों से दामन कश रहें क्योंकि यह दोनों क़ौमें काफ़िर हैं। यह जमाअतें ऐसी किताबें और लिटरेचर शायां करती हैं जिसमें अहलेबैत व अतहार की दुश्मनी कारफ़रमा हो और जो इन जमाअतों के दिली मक़ासिद को पूरा करने में पूरी तरह मददगार साबित हों। नीज़ यह लोग तहरीर व तक़रीर , सीरत के जुलूसों , तब्लीग़ की टोलियों और दीनी कान्फ़ेंसों के ज़रिए अपने मक़सद को आवाम तक पहुंचाते हैं।

इन जमाअतों के सरकरदा अफ़राद व लीडरान मुख़्तलिफ़ नौइय्यत की तहरीक़ों को चलाने के साथ साथ अमली तौर पर सियासत में हिस्सा लेतें हैं ताकि वक़्त पड़ने पर वह हुक्मरां सियासी पार्टियों के रहनुमाओं से अपने लिए तहफ़्फ़ुज़ हासिल कर सकें।

मज़हब के नाम पर इन जमाअतों की तरफ़ से जो मुनाफ़ेक़ाना तहरीकें चल रही हैं वह तीन हिस्सों में मुशतमिल हैं , एक दीनी तालीम दूसरे सीरत की आड़ में मुफ़सेदाना जलसे और तीसरे तब्लीग़ी सरगर्मियां।

दीनी तालीम के नाम पर यह जमाअतें मरकज़ी और सूबाई हुकूमतों से बड़ी बड़ी रक़में माली इम्दाद के तौर पर हासिल करती हैं लेकिन इन रक़मों को वह शियों और हिन्दुओं के मज़हबी रूसूमात के ख़िलाफ़ तालीम पर ख़र्च करती हैं और इन के मदरसों में बच्चों को मुनाफ़ेरत , इफ़तेराक़ और इन्तेशार फैलाने का सबक़ पढ़ाया जाता है।

सीरत की आढ़ में जो जलसे होते हैं उनका बातनी मक़सूद तहफ़्फ़ुज़ नामूसे सहाबा है जो मदहे सहाबा की बदली हुई शक्ल हैं। मौजूदा दौर में इस तहरीक़ का ख़ुसूसी मरकज़ लखनऊ है जहां सीरत के जुलूसों के बजाय ख़ुलफ़ा ए सलासा को फ़ज़ीलतमआब साबित करने के लिए मुख़तलिफ़ मक़ामात पर सालाना जलसे और कांफ़्रेंसे मुन्अक़िद की जाती हैं और मन गढंत रवायात और अहादीस के हवाले से इनका तक़ाबुल व मवाज़ेना अहलेबैत व अतहार से किया जाता है ताकि यह लोग अपने ख़ताकार सहाबा की मुनाफ़ेक़ाना तर्ज़ की पर्दा पोशी कर सकें। चुनान्चे गुज़िश्ता 20 सितम्बर 1997 को भी तहफ़्फ़ुज़े नामूसे सहाबा के नाम पर एक कांफ़्रेंस शौकत अली के हाते वाक़ा ए रकाबगंज में मुनाक़िद की गयी थी जिस में मौलाना अब्दुल हसन नदवी (अली मियां) मुहतमिम दारूल उलूम नदवा की मौजूदगी में अहलेबैत अलैहमुस्सलाम की शाने अक़दस में ख़ुलकर ग़ुस्ताख़ियां की गयीं और मौलाना डॉ 0 कल्बे सादिक़ साहब क़िब्ला को उनकी पूरी शिया क़ौम के साथ ख़ारिज अज़ इस्लाम काफ़िर क़रार दे कर ज़ेहनी दीवालियापन का सुबूत पेश किया हालांकि डा 0 कल्बे सादिक़ साहब क़िब्ला बज़ाते खुद फ़िक्री तौर पर सुन्नियों के बहुत बड़े हमदर्द और हमनवां और इत्तेहादे बैनुल मुस्लेमीन के शैदाई हैं। इस के अलावा मौसूफ़ मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के नाएब सदर और मिल्ली काउन्सिल ऑफं इण्डिया के अहम रूकन भी हैं। अब देखना यह है कि यह कल्मागोह इदारे उन्हें ग़ैर मुस्लिम की हैसियत से मुस्तक़बिल में किस अन्दाज़ से क़बूल करते हैं।

इन जमाअतों की तीसरी तहरीक जो बज़ाहिर तबलीग़ी उमूर पर मब्नी है बड़ी मज़हक़ा ख़ेज़ भी है। इस तहरीक के तहत इस्लामी फिक़ व तारीख़ से नावाक़िफ़ व नाबलद और जाहिल मुबल्लेग़ीन जमाअतों की शक्ल में बोरियां बिस्तरा और लोटा थाली लेकर गली गली , कूचा कूचा , गांव गांव और शहरों शहरों की ख़ाक छानते रहते हैं। यह लोग जहां भी जाते हैं वहां इनकी ख़ुसूसी तवज्जो सुन्नियों के दरमियान अज़ादारी की मुख़ालेफ़त पर मरकूज़ रहती हैं। यह लोग मुसलमानों को डरा धमका कर और जहन्नुम के अज़ाब का ख़ौफ़ दिलाकर इन उमूरे ख़ैर की अन्जाम देही से मना करते हैं और शियों को बिदती और काफ़िर बताते हैं।

ग़रज़ की यह मुफ़सिद और फ़ितना परवर जमाअतें जो अरबाबे सियासत की ग़ल्तियों की पैदावार हैं और 1952 से अब तक सरगर्मे अमल हैं। पूरे हिन्दुस्तानी मुआशरे में हर क़ौम हर क़बीला और हर फ़िरक़े के दरमियान अपनी तब्लीग़ी सरगरमियों से नफ़रत , अदावत , बग़ावत और फ़िरक़ा परस्ती का ज़हर घोल रही है अगर उनकी तरफ़ ध्यान न दिया गया और इन पर क़ानूनी पाबन्दी न लगायी गयी तो एक दिन यह मुल्क की बक़ा के लिए बहुत बड़ा ख़तरा भी बन सकती है।

मदहे सहाबा क्या है –

मदहे सहाबा एक दिल आज़ार शय और झगड़े की शय है इस लिए कि सुन्नी हज़रात मदहे सहाबा में ज़्यादातर उन सहाबा की तारीफ़ व तौसीफ़ को अपना ईमानी फ़रीज़ा समझते हैं जो मुनाफ़ेक़त का लिबास पहन कर इस्लाम में दाख़िल हुए जिन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम के ख़िलाफ़ मुनाफ़ेक़ाना साज़िशें की , जिन्होंने ज़िन्दगी भर रसूले इस्लाम और उन के अहलेबैत को सताया जिन्होंने क़दम क़दम पर सरकारे दोआलम को अज़ीयतें पहुंचायीं। उनकी राह में कांटे बिछाये उनके अहकाम को ठुकराया और उन्हे वक़्ते आख़िर हिज़्यानगोह क़रार दिया , सुन्नी हज़रात उन सहाबा की मदह का हक़ चाहते हैं जिन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम की बेटी , दामाद और नवासों पर मज़ालिम के पहाड़ तोड़े और ख़ुद हुज़ूरे अकरम की शम्मे हयात को हमेशां के लिए गुल कर देने की नापाक सयी की जैसा कि तारीख़ी शाहिद के मुताबिक़ ग़ज़व ए तुबुर्के की वापसी पर पैग़म्बर के साथ पेश आने वाले अफ़सोसनाक वाक़ए से ज़ाहिर है कि उसकी सदाक़त में किसी तरह का कोई इख़्तेलाफ़ नहीं है।

तारीख़ों की सराहत है कि तबूक़ की वापसी पर सरकारे दो आलम की सवारी ख़तरनाक पहाड़ी की ढलानों से उतर रही थी रात का गहरा अंधेरा था और इस अंधेरे में कुछ सहाबा अपने मकरूह चेहरों को नक़ाबों में छुपाए हुए हुज़ूरे अकरम को मौत के घाट उतारने के इरादे से घात लगाए खड़े थे एजाज़े ख़ुदावन्दी से अचानक बिजली चमकी और उसकी रौशनी इतनी देर तक क़ायम रही कि सरकारे दो आलम के नाक़े की मेहार थामे हुए हुज़ैफ़ा ए यमनी ने और नाक़े को हांकते हुए अम्मार ए यासिर ने इन सहाबा को अच्छी तरह पहचान लिया और उस के बाद सरकारे दोआलम ने भी हर सहाबी का नाम हुज़ैफ़ा को बताकर उन्हें राज़दारे गवाह बना दिया लेकिन उस के साथ ही आप ने हुज़ैफ़ा को इन नामों के इन्केशाफ़ से मना भी फ़रमा दिया ताकि इस्लाम में कोई फ़ितना पैदा न हो।

यह वह वाक़ेया है जिसके बाद हज़रते उमर हुज़ैफ़ा ए यमानी से बार बार पूछा करते थे के क्या इन साज़िशी मुनाफ़िक़ों में मेरा नाम भी शामिल है लेकिन हुज़ैफ़ा ताकीदे पैग़म्बर की वजह से हमेशा ख़ामोश रहते थे। आख़िरकार एक दिन ऐसा भी आया कि जब हज़रते उमर ने दिमाग़ी कचूकों और क़ल्बी टहूकों से मजबूर होकर ख़ुद अपने जुर्म का ऐतेराफ़ कर लिया और फ़रमाया –

या हुज़ैफ़ा बिल्लाह अना मेनल मुनाफ़ेक़ीन।

ऐ हुज़ैफ़ा ख़ुदा की क़सम मैं भी उन्हीं मुनाफ़ेक़ीन में से हूं।

अपनी रेहलत के आख़िरी अय्याम में पैग़म्बरे इस्लाम ने मिल्लते मुस्लेमा को दायमी इफ़्तेराक़ व इन्तेशार और अबदी फ़िरक़ा बन्दी से बचाने के लिए बड़े हाकीमाना अन्दाज़ से यहूदियों से जेहाद के लिए उसामा बिने ज़ैद की सरकरदिगी में एक लशकर तरतीब दिया और तमाम आयाने मदीना मुहाजेरीन व अंसार को जिन में हज़रत अबू बकर और हज़रत उमर वग़ैरह भी शामिल थे उस लशकर में जाने का हुक्म दिया लेकिन जब पैग़म्बरे अकरम के बार बार ताकीदी हुक्म के बावजूद यह लोग इस लशकर में शरीक नहीं हुए तो आपने उन सहाबा के ख़िलाफ़ लानत का हरबा इस्तेमाल करते हुए साफ़ लफ़ज़ों में फ़रमाया कि –

लअनल्लाहो मनतख़ल्लफ़ मिन हबीशुल असमा।

ख़ुदा लानत करे उन लोगों पर जिन्होंने लशकरे उसामा से रूगरदानी की। यह बात वाज़ेह रहे कि पैग़म्बर की लानत अबदी होती है।

10 हिजरी में हुज्जतुल वेदा की वापसी पर सूरा ए इन्शेराह की आयत सात और सूरा ए माएदा की आयत 67 के नूज़ूल के मुताबिक़ ख़ुदा के हुक्म पर पैग़म्बरे अकरम पर ग़दीरे ख़ुम के मक़ाम पर ज़ुलअशीरा में किये गये वादे के तहत अपने चचाज़ात भाई हज़रत अली इब्ने अबीतालिब (अ.स.) को अपना ख़लीफ़ा व जानशीन मुक़र्रर किया था लेकिन जब हुज़ूर ने दुनिया से रेहलत इख़्तियार की तो आपके जनाज़े को छोड़ कर जाने वाले उन्हीं साज़िशी सहाबा ने सक़ीफ़ा बनी सअदा में धींगा मुशती से हज़रते अबू बकर की ख़ेलाफ़त का ऐलान कर के हज़रत अली (अ.स.) से उनका हक़ छीन लिया। उसके बाद उनके लगे में रस्सी का फंदा डाल कर उन्हें ख़ींचते हुए दरबारे ख़िलाफ़त तक ले गये और उनके क़त्ल की धमकी दी। रसूल की बेटी के घर में आग लगा दी , उनके पहलू पर जलता हुआ दरवाज़ा गिराया जिस की वजह से मोहसिन नामी एक बच्चा शिकमे मादर में ही शहीद हो गया। हज़रत फ़ातमा को बाप के ग़म में रोने न दिया और जो जायदाद उन्हें उनके बाप ने दी थी उस पर ग़ासेबाना क़ब्ज़ा कर लिया।

अपनी हयाते ताहेरा की आख़िरी लम्हात सन् 11 ई 0 में सरकारे दो आलम ने उन्हीं सहाबा से फ़रमाया कि मुझे क़लम दवात और काग़ज़ दे दो ताकि मैं दस्तावेज़ी तौर पर ऊलुल अम्र के इश्काल को दूर कर दूं और तहरीरन यह बता दूं कि मेरे बाद उसके हक़दार कौन लोग होंगे लेकिन क़लम दवात और काग़ज़ मुहैया करने के बजाय इस मौक़े पर मौजूद तमाम सहाबा ख़ामोश रहे और हज़रत उमर की जसारत ने यह कह कर इस्लाम का सफ़ीना उसी मंज़िल में चकना चूर कर दिया कि इस मर्द को छोड़ दो यह हिज़यान बक रहा है।

जब मुसतनद तारीख़ों के आईने में इन साज़िशी सहाबा के किरदार की झलक पूरी तरह मौजूद है तो ज़ाहिर है कि इन सहाबा की मदह जब की जायेगी तो वह लोग जो पैग़म्बरे इस्लाम के फ़िदायी हैं और उनका कलमा पढ़ते हैं और उनके अहलेबैत से मोहब्बतो अक़ीदत रखते हैं इस मदह को किसी भी क़ीमत पर बर्दाश्त नहीं करेंगे। ख़्वाह उनके हक़ में उस का अन्जाम कुछ भी हो।

यह एक वाज़ेह और खुली हुई अक़ीदत है कि अगर इत्तेहादी ताक़तों के सामने हिटलर की तारीफ़ की जायेगी और नाज़ी तहरीक़ को सराहा जायेगा तो यह फ़ेल इत्तेहादियों के लिए क़तई तौर पर दिलाज़ार होगा। अगर कोई शख़्स उन यहूदियों की मदह करे जिन्होंने ईसाईयों की मदह के मुताबिक़ हज़रते ईसा को सूली दी थी तो ईसाई फ़िर्कां इस मदह को हरगिज़ हरगिज़ बर्दाश्त नहीं करेगा। अगर कोई महात्मा गांधी के क़ातिल नाथूराम गोडसे की मदहो सना करेगा तो हिन्दुस्तानी उस पर लानत व मलामत ज़रूर करेंगे। अगर कोई रावण की शान में क़सीदा पढ़ेगा तो यक़ीनन राम के अक़ीदत मंद ख़ामोश नहीं रहेंगे। बस बिल्कुल यही सूरत मदहे सहाबा की भी है। जब भी इन मुनाफ़िक़ व साज़िशी सहाबा की मदह की जायेगी तो कोई भी हक़ परस्त व इन्साफ़ पसन्द ख़्वाह वह शिया हो या सुन्नी किसी भी कन्डीशन में इस मदह को बर्दाश्त नहीं करेगा और दोनों फ़िर्कों के दरमियान लड़ाई झगड़े की सूरत हमेशा पैदा होती रहती है।


जुलूसे मदहे सहाबा पर इसरार क्यों ?

मौलाना अब्दुल अलीम फ़ारूक़ी का बयान –

आख़िर लखनऊ के कुछ सुन्नियों को मदहे सहाबा पर इसरार क्यों है ? इस ज़ैल में फ़िलहाल हम मौलवी अब्दुल शकूर के जानशीन वहाबियत के परचमबरदार और मदहे सहाबा के शैदायी मौलाना अब्दुल अलीम फ़ारूक़ी के उस बयान के ज़रूरी इख़्तेसाबात पर इकतेफ़ा करेंगे जो इन्टरव्यू की शक्ल में माहनामा बांगदरा के शुमारे माह जुलाई – अगस्त 1997 में शायां हुआ है।

सदाक़त व सच्चाई का यह मोजिज़ा है कि हक़ बात कभी कभी ग़ैरे इरादी तौर पर झूठों की ज़बान से निकल जाती है और इंसान ग़ैर दानिस्तां तौर पर वह सब कुछ उगल देता है जिसे वह दिल की गहराईयों में छुपाए रखना चहाता है। मौलाना अब्दुल अलीम फ़ारूक़ी ने अपने असलाफ़ की तरह जहां अहमक़ाना बकवास और बचकाना दरोग़गोई से काम लिया है वहां उनके बयान में उन्ही की ज़बान से मुतालेबा ए जुलूसे मदहे सहाबा की हक़ीक़त वाज़ेह हो गयी। चुनान्चे मौलाना मौसूफ़ अपने इन्टरवयू में फ़रमाते हैं –

मदहे सहाबा के सिलसिले में हमेशा यह बात पेशे नज़र रही है चूंकि शियों को यह हक़ है कि वह अपने इमामों और बुज़ुर्गों की तारीफ़ व तौसीफ़ बाहर निकल कर सड़क पर करते हैं , इसी अन्दाज़ की तारीफ़ का हक़ सुन्नियों को भी मिलना चाहिए। जहां तक मदहे सहाबा की बात है तो मदहे सहाबा क़ुरआन से साबित है , रह गया मामला जुलूस का तो फ़ोक़हा की सराहत है कि सहाबा ए कराम की मदह व सना शार ए आम पर उसी अन्दाज़ से करना चाहिए जिस अन्दाज़ से नउज़ो बिल्लाह से उनकी बुराई की जाती है। हम मदहे सहाबा को असल नहीं कहते बल्कि उसको सहाबा ए कराम की तारीफ़ व तौसीफ़ की इशाअत का ज़रिया समझते हैं। तमाम उलमा जानते हैं कि अगर किसी मुबाह चीज़ को कोई आदमी रोक दे तो फिर वही चीज़ ज़रूरी हो जाती है ऐसी सूरत में जबकि उस पर पाबन्दियां आयद हों तो फिर हमारा फ़र्ज़ है कि हम अपना शहरी हक़ इस्तेमाल करें और मदहे सहाबा का जूलूस निकालें अगर यह कहा जाये कि सड़क पर मदहे सहाबा नहीं हो सकती तो जैसा कि मैंने अर्ज़ किया कि फ़ोक़हा की सराहत है कि जब किसी जगह पर किसी चीज़ को रोका जाये तो उस जगह वाजिब भी हो जाती है लिहाजा ऐसी सूरत में हम को मदहे सहाबा पर इसरार है।

मौलाना मौसूफ़ के बयान का ख़ुसूसी मत्न मुंदरजा ज़ैल नुक़ात पर मब्नी है –

1. शियां चूंकि अपने इमामों और बुज़ुर्गों की तारीफ़ व तौसीफ़ बाहर निकल कर सड़क पर करते हैं इस लिए उसी अन्दाज़ की तारीफ़ का हक़ सुन्नियों को भी मिलना चाहिए।

2. मदहे सहाबा क़ुरआन से साबित है।

3. सहाबा ए कराम की मदह व सना शार ए आम पर उसी अन्दाज़ से करना चाहिए जिस अन्दाज़ से उनकी बुराई की जाती है।

4. जुलूसे मदहे सहाबा असल नहीं है।

5. फ़ोक़हा की सराहत है जब किसी जगह किसी चीज़ को रोका जाये तो उसी जगह पर वाजिब भी हो जाती है।

तन्क़ीद व तब्सेरा –

1.मौलाना अब्दुल अलीम फ़ारूक़ी के इस बयान से कि शिया चूंकि अपने इमामों और बुज़ुर्गों की तारीफ़ व तौसीफ़ बाहर निकल कर सड़कों पर करते हैं लिहाज़ा इसी अन्दाज़ की तारीफ़ का हक़ सुन्नियों को भी मिलना चाहिए। साफ़ तौर पर यह वाज़ेह है कि सुन्नियों की तारीफ़ से जुलूसे मदहे सहाबा का मुतालेबा अज़ादारी के रिवायती जुलूसों की ज़िद में है और हर साहेबे फ़ेहम इन्सान मौलाना मौसूफ़ के इस बयान से कि शिया ऐसा करते हैं तो सुन्नियों को भी ऐसा करने का हक़ मिलना चाहिए। यही मफ़हूम अख़ज़ करेगा कि जुलूसे मदहे सहाबा का मुतालेबा महज़ हासिदाना और शर पसन्दाना ज़िद का नतीजा है और यही वह सच्चाई है जिस की आड़ में मुख़ालेफ़ीन अज़ाए हुसैन (अ.स.) की तरफ़ से लखनऊ में शिया व सुन्नी फ़सादात की आग भड़काई जाती है और मुख़ालेफ़ीन ए अज़ा ए हुसैन (अ.स.) की तरफ़ से लखनऊ में शिया व सुन्नी फ़सादात की आग भड़काई जाती है और अज़ादारी के उन जुलूसों को रोकने की जद्दो जेहद की जाती है जो इज्तेमाई , रवायती , कस्टमरी है और जिन के अमीन सिर्फ़ शिया ही नहीं बल्कि हर मज़हबो मिल्लत के लोग हैं नीज़ यह जद्दो जेहद सिर्फ़ इस लिए है कि इन जुलूसों की बरामदगी से उन ज़ालिमों की नक़ाब कशाई होती है जो रसूले अकरम स 0 (अ.स.) की बेटी और दामाद और नवासों के मुसल्लेमुस सुबूत क़ातिल थे और जिन्हे मौलाना अब्दुल अलीम फ़ारूक़ी का मसलक ख़लीफ़तुल मुस्लेमीन तसलीम करता है।

मौलाना मौसूफ़ के इस बयान का यह पहलू इन्तेहाई अफ़सोसनांक और कर्ब आमेज़ है कि उन्होंने अपनी शातेराना दरोग़गोई को बरू ए कार लाते हुए ना जाने किस मसलहत की बिना पर जुलूस हाय अज़ा के दौरान नौहा व मातम के अमल को तारीफ़ व तौसीफ़ से ताबीर किया है जबकि वह ख़ुद भी जानते होंगे कि तारीफ़ व तौसीफ़ और नौहे व मातम में मानवी ऐतेबार से क्या फ़र्क़ है। नीज़ यह कि शिया अपने इमामों और बुज़ुर्गों की शान में उनकी विलादत के मौक़े पर बज़म ए मक़ासेदा के उनवान से तारीफ़ व तौसीफ़ की जिन महफ़िलो का इन्एक़ाद करते हैं वह शार ए आम पर या सड़कों पर नहीं होती बल्कि शियों के इमामबाड़ों , रौज़ों , मस्जिदों और घरों में होती हैं। अलबत्ता 1945 से पहले जशन ए फ़ातहे ख़ैबर के उनवान से क़सीदा ख़्वानी की एक महफ़िल अज़ीमुद्दौला पार्क में सय्यद ज़ामिन हुसैन साहब कम्पाउन्डर साकिन रईस मंज़िल , हुसैनाबाद के ज़ेरे एहतेमाम हुआ करती थी लेकिन उनके इन्तेक़ाल के बाद वह भी ख़त्म हो गयी। उसके बाद से अब तक शियों की तरफ़ से तारीफ़ व तौसीफ़ का कोई प्रोग्राम शार ए आम पर नहीं होता और न ही इस क़िस्म के प्रोग्राम के बारे में शियों का गर्वन्मेंट से कोई मुतालेबा है उनका हक़ बजानिब मुतालेबा सिर्फ़ जुलूस हाय अज़ा से मुताल्लिक़ है जो क़दीमी , रवायती और कस्टमरी है और जिन पर 20 बर्सों से ग़ैर क़ानूनी पाबन्दी नाफ़िस है।

हम मौलाना अब्दुल अलीम साहब के ममनून व मुताशक्किर हैं कि उनके इन्टरव्यू से यह हक़ीक़त उभर कर सामने आ गयी कि मुतालेबा ए जुलूसे मदहे सहाबा की तड़प सिर्फ़ और सिर्फ़ जुलूसे हाय अज़ा की ज़िद व मुक़ाबले में है वरना इस्लामी व शरई ऐतेबार से मदहे सहाबा के जुलूसों की कोई सदाक़त व असलियत नहीं है। जैसा कि मौलाना मौसूफ़ ने अपने बयान के फ़िक़रा नम्बर 4 में ख़ुद फ़रमाया है कि जुलूसे मदहे सहाबा असल नहीं है।

2. मौलाना अब्दुल अलीम फ़ारूक़ी ने बड़े वालेहाना अन्दाज़ में यह तो फ़रमाया है कि मदहे सहाबा क़ुरआन से साबित है लेकिन मौसूफ़ ने यह सराहत क्यों नहीं की कि वह और उनके हम मसलक अफ़राद मोमेनीन सहाबा की मदहो सना की ख़्वाहिश मन्द हैं या मुनाफ़ेक़ीन या मुशरेक़ीन की जबकि क़ुरआने करीम में रसूले अकरम के सहाबा को हतमी तौर पर दो हिस्सों में तक़सीम किया है। सहाबा का एक गरोह वह था जिसका ज़ाहिरो बातिन एक था जो दिलो जान से ईमान लाये ख़ुदा और रसूल की इताअत की और मोमिन कहलाए उनके बारे में क़ुरआन का इरशाद है कि –

इन्नललाहशतरा मेनल मोअमेनीना अन्फ़ोसाहुम व अमवालहुम बेअन्ना लहोमुल जन्नतो लक़ातेलूना फ़ी सबीलिल्लाहे फ़यक़तोलूना व यक़तोलून।

अल्लाह ने मोमेनीन से उनकी जानों और मालों को जन्नत के एवज़ ख़रीद लिया है। वह राहे ख़ुदा में क़ेताल करते हैं और क़त्ल कर दिये जाते हैं।

इन्नल्लाहा योहिब्बुल लज़ीना योक़ातेलूना फ़ी सबीलेही सअफ़्फ़न कअन्नहुम बुनयानुन मरसूस।

अल्लाह उन लोगों से यक़ीनन मोहब्बत रखता है जो सफ़ बांधकर ख़ुदा की राह में ऐसी साबित क़दमी से क़ेताल करते हैं गोया वह सीसा पिलाई हुई दीवारें –

व मेनन्न नासे मंय्यशरी नफ़सहू व तेग़ाआ मराज़ातिल्लाहे वल्लाहो रऊफ़ुम बिल एबाद।

लोगों में से वह भी हैं जो अल्लाह की रज़ा के लिए अपनी जान बेट देते हैं और अल्लाह ऐसे बन्दों पर मेहरबान है।

ग़रज़ कि सहाबा के उस गरोह की मदहा व सना क़ुरआन में जा बजा मौजूद है और अल्लाह ने अपनी इस मुक़द्दस किताब के आइने में इन ख़ुबसूरत ख़द्दो ख़ाल को उनके औसाफ़ व कमालात के साथ पेश किया है किसी की मजाल उनके दामने किरदार को दाग़दार बना सके या उनकी सीरत पर हमला आवर हो सके।

(आप ये किताब अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क पर पढ़ रहे है।)

अज़रूहे क़ुरआन दूसरा गरोह मुशरेक़ीन व मुनाफ़ेक़ीने सहाबा का है जो मुसलमान होने के बावजूद मुसलमान नहीं थे। उनकी मज़म्मत से क़ुरआने मजीद भरा पड़ा है और इस आसमानी किताब का शायद ही कोई हिस्सा ऐसा हो जिसमें उनकी मज़म्मत न की गयी हो और इन मुनाफ़ेक़ीन सहाबा में कुछ तो ऐसे ओछे और हलके पेट के थे कि बाज़ कि बाज़ औक़ाफ़ अपनी मुनाफ़ेक़त को छुपाने के लिए ऐसी हरकते कर बैठते थे कि जिन से उनकी मुनाफ़िक़त का भांडा फूट जाता था और मोमेनीन सहाबा समझ जाते थे कि यह मुनाफ़िक़ है। लेकिन कुछ मुनाफ़ेक़ीन ऐसे मोहतात और भारी पेट के थे जो किसी तरह अपनी मुनाफ़ेक़त की हवा भी किसी को न देते थे। यह लोग ऐसे छुपे रूस्तम थे कि मोमेनीन तो मोमेनीन अगर वही ए इलाही इनके बारे में निशानदेही न करती तो पैग़म्बरे इस्लाम की दूर रस और दूरबीन निगाहें भी इन से बेख़बर रह जाती। जैसा कि सूरा ए तौबा की आयत नम्बर 101 से वाज़ेह होता है।

उन सहाबा के बारे में क़ुरआने मजीद पुकार कर कह रहा हैः-

वमंय्योशाक़ेक़िरसूला मिम बअदे मातबय्येना लहुल होदा व यत बेअ ग़ैयरा सबीलिल मोअमोनीना नोवल्लीही मा तवल्ला व नोसल्लेही जहन्नम वस्साअत मसीरअ।

जो राहे रास्त इख़्तेयार करने के बाद रसूल से सरकशी करें और मोमेनीन के रास्ते से हटकर किसी और राह पर चले तो जिधर वह फिर गया है हम भी उसे उधर ही फेर देंगे और उसे जहन्नम में झोंक देंगे जो बहुत ही बुरा ठिकाना है।

उन्हीं सहाबा के बारे में अल्लाह तआला ने इरशाद फ़रमाया है कि

उलाएका जज़ाओहुम इन्ना अलैहिम तआनतुल्लाहे वल्मलाएकते वन्नासे अजमाईन।

यह वह हैं जिन के कारनामों के नतीजों पर अल्लाह के फ़रिश्ते और तमाम लोग लानत करते हैं।

एक दूसरी आयतः-

इन्नल्लज़ीना यूज़ूनल्लाह व रसूलहू ला अनहोमुल्लाहो फ़िद्दुनया वलआख़ेरह वअद्दालहुम अज़ाबन मोहीना।

वह लोग जो अल्लाह और रसूल को ईज़ा पहुंचाते हैं यक़ीनन उनके लिए दुनिया और आख़ेरत दोनों जगह अल्लाह की लानत और ज़िल्लत वाला अज़ाब है।

उन्हीं सहाबा के बारे में डॉ 0 मोहम्मद अबू बकर ख़ान मलिहाबादी जो किसी ज़माने मे तहरीक़े मदहे सहाबा के रूहे रवां थे राहे रास्त पर आने के बाद अपने एक तहक़ीक़ी मक़ाले में लिखते हैं –

सादा लोह मुसलमान और चालाक मुनाफ़ेक़ीन मरे नहीं थे बल्कि मुनाफ़ेक़त की नक़ाब चेहरों पर डाल कर मुसलमानों में घुल मिल गये थे और उस दिन का इन्तिज़ार कर रहे थे कि पैग़म्बर की आख़ें बन्द हों और वह सल्तनते इस्लामिया पर क़ब्ज़ा कर के ख़ूब गुलछर्रे उड़ायें। मुनाफ़ेक़ीन के नुक़ताए नज़र से वफ़ाते रसूल का वक़्त ही उस के लिए ही नेहायत मुनासिब व मसउब था कि वह भोले भोले मुसलमानों की मदद से अपनी आरज़ुऐं बरू ए कार लायें और 23 साल तक जिस बात को दिल की गहराइयों और मुनाफ़ेक़त के परदों में छुपाए हुए थे ज़ाहिर कर के रहें। रसूल के इन्तेक़ाल के बाद ही जब कि अभी हुज़ूर ए अकरम की तजहीज़ व तक़फ़ीन भी नहीं हुई थी जनाज़े को छोड़ कर सहाबा का यह एख़तेदार पसन्द गिरोह सक़ीफ़ा बनी साएदा में जमा हो गया और बिल आख़िर हज़रत अबू बकर ख़लीफ़ा बन गये।

मुनाफ़ेक़ीन ए सहाबा की सराहत डॉ 0 मोहम्मद अबू बकर ख़ां मलिहाबादी के इस इक़तेबात से हो जाती है उसके आगे हमें कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है अक़लमंद के लिए इशारा काफ़ी है। क़ुरआन का इरशाद है कि हक़ीक़त की तह तक पहुंचने वालो को अल्लाह दोस्त रखता है और हक़ीक़त की तह तक किसी अक़लमंद आदमी को पहुंचाने के लिए यह ज़रूरी नहीं है कि अलिफ़ से वस्सलाम तक सारा रिकार्ड उसके सामने रख ही दिया जाये। अगर मौलाना अब्दुल अलीम साहब अब किसी भी तजब्जुब का शिकार हों तो मुनासिब होगा कि मुझ नाचीज़ की किताब अल ख़ोलफ़ा हिस्सा अव्वल व दोम का मुतालेआ फ़रमायें इन्शाअल्लाह उनके सहाबा ए कराम की सारी हक़ीक़त वाज़ेह हो जायेगी।

3. सहाबा कराम की मदहो सना आम तौर पर इसी अन्दाज़ से करना चाहिए जिस अन्दाज़ से उनकी बुराई की जाती है।

इस बुराई के ज़ैल में अगर मौलाना अब्दुल अलीम फ़ारूक़ी का नैज़ा ए सुख़न शियों की तरफ़ है तो हम इनकी ख़िदमत में यह वाज़े कर देना चाहते हैं कि बदी या बुराई शियों के मसलक में एक नाजाएज़ मज़मूम फ़ेल है। अलबत्ता शिया उन सहाबा पर लानत ज़रूर करते हैं जो क़ुरआन और हदीस और तारीख़ की रौशनी में क़ाबिले लानत हैं। नीज़ जिन पर ख़ुदा और उसके रसूल ने भी लानत की है इसके अलावा शिया किसी सहाबी के बारे में कुछ नहीं कहते। अगर मौलाना मौसूफ़ के मसलक में बुराई के बदले मदह का यह उसूल जायज़ है तो क्या वह यह बता सकते हैं कि हज़रत अली अकरमुल्ला वजहू के बारे में इनका ख़्याल क्या है इनका शुमार सहाबा ए कराम में है या नहीं और अगर है तो इनकी मदहा व सना के बारे में आप क्या फ़रमायेंगे जबकि तारीख़ें गवाह हैं कि बुराई तो बुराई है लेकिन अहदे माविया में रसूल के उस इन्हे अम और अज़ीम तरीन सहाबी को उसके अज़ीज़ों के सामने ख़ुल कर गालियां दी जाती थीं जैसा कि मौलाना अबुल्आला मौदूदी ने अपनी किताब ख़िलाफ़त और मलूकियत में तहरीर फ़रमाया है कि –

एक और निहायत मकरूह बिदत हज़रत माविया के दौर में यह शुरू हुई कि वह खुद और उनके हुक्म से उनके तमाम गवर्नर ख़ुतबों में बरसरे मिम्बर हज़रत अली पर सब्र व शितम की बौछार कर करते थे हत्ता कि मस्जिदे नबवी में मिम्बरे रसूल पर ऐने रौज़ा ए नबवी के सामने हुज़ूर के महबूबतरीन को गालियां दी जाती थीं और हज़रत अली (अ.स.) की औलादें और इनके क़रीब तरीन रिश्तेदार अपने कानों से गालियां सुनते थे।

मौलाना अब्दुल अलीम साहब हमें यह बतायें कि हज़रत अली (अ.स.) की शान में की जानी वाली इस बुराई और उनकी मदहो सना किस अन्दाज़ में होना चाहिए। मौलाना क्या यह बात के ऐवज़ बता सकते हैं कि उनके ख़लीफ़तुल मुसलेमीन और ख़लीफ़तुल मुस्लेमीन के गवर्नरो का यह मज़मूम फ़ेल किस शरीयत और किस फ़िर्कें के तहत जाएज़ था। क्या यह बता सकते हैं कि मस्जिदे नबवी के अन्दर मिम्बरे रसूल पर और रौज़ा ए नबवी के सामने किसी को उसके अज़ीज़ों और रिश्तेदारों के सामने गालियां देना किस इस्लामी उसूल के तहत जाएज़ हो सकता है। क्या मौलाना मौसूफ़ यह बता सकते हैं कि जिस अन्दाज़ से हज़रत अली (अ.स.) को गालियां दी जाती थीं इसी अन्दाज़ से उनकी मदहा व सना सुन्नियों के यहां क्यों नहीं की जाती और उन्हें गालियां देने वालों को बुरा क्यों नहीं कहा जाता। आख़िर हज़रत अली (अ.स.) भी तो रसूल के सहाबी थे क्या इस मंज़िल में आप का यह उसूल ख़त्म हो जाता है कि सहाबा ए कराम की मदह व सना इसी अन्दाज़ से करना चाहिए जिस अन्दाज़ से इनकी बुराई की जाती है।

4. जुलूसे मदहे सहाबा अस्ल नहीं है – यह बात हम भी तसलीम करते हैं।

5. फ़ोक़हा की सराहत है कि जब किसी मोबाह चीज़ को किसी जगह रोकी जाये तो उसी जगह वह वाजिब भी हो जाती है।

अगर फ़ोक़हा की यह सराहत दुरूस्त है तो मौलाना अब्दुल अलीम साहब को चाहिए कि जिस तबर्रे को क़ुरआन ने भी मुबह क़रार दिया है और जो सुन्नते रसूल भी है उससे शियों को रोकने की कोशीश न करें वरना वही तबर्रा वाजिब हो कर मुख़ालेफ़ीन के लिए एक मुसीबत बन जाएगा।

मौलाना मौसूफ़ ने इन मज़कूरा ख़ुराफ़ाती बातों के अलावा अपने इन्टरव्यू के दौरान शियों और शियत पर पुराने तर्ज़ के जो हमले किये हैं इनके जवाबात शिया उलमा की तरफ़ से मुताद्दिद बार तहरीरी शक्ल में दिये जा चुके हैं और मुझ नाचीज़ की किताब अल ख़ोलफ़ा में भी यह जवाबात मौजूद हैं इत्मेनाने क़ल्ब के लिए मुलाहेज़ा फ़रमायी जा सकती है।

क़ज़ीया ए मदहे सहाबा का तीसरा दौर –

क़ज़ीया ए मदहे सहाबा का तीसरा दौर 1962 से शुरू होता है जब सैय्यद अली ज़हीर साहब मग़रिबी लखनऊ के हल्क़े इन्तेख़ाब से इसेम्बली के मेम्बर चुने गये और उन के मुख़ालिफ़ व शिकास्ताख़ुदी सियासी जमाअतों ने इस फ़ितने को नये ढ़ंग से फिर उभारा चुनान्चे इसी साल रबीउल अव्वल में पुल ग़ुलाम हुसैन की मस्जिद पर सहाबा के नाम तहरीर किये गये। दिल आज़ार और इश्तेआल अंगेज़ तक़रीरें हुईं। शियों को बुरा भला कहा गया और आइम्मा ए अतहार की शान में ग़ुस्ताख़ियां की गयीं। नेज़ लाउड स्पीकर पर जमकर मदहे सहाबा पढ़ी गयी जिसकी वजह से मग़रिबी लखनऊ में इन्तेशार फैल गया और शिया मुशतेअल हो गये मगर पुलिस की कसरत , चौकसी माक़ूल इन्तिज़ाम और एतेदाल पसन्द रहनुमाओं की बरवक़्त मदाख़ेलत ने शहर को एक हौलनाक फ़साद से बचा लिया।

1963 – इस साल हुक्कामे ज़िला ने बारावफ़ात के मौक़े पर एहतियातन दफ़ा 144 के तहत मीलादों वग़ैरा में लाउड स्पीकर के इस्तेमाल पर पाबन्दी आएद कर दी थी जिस पर सुन्नियों की तरफ़ से बरहमी का इज़हार करते हुए सख़्त एहतेजाज किया गया और सारा ग़म व ग़ुस्सा रसूले अकरम पर इस तरह उतारा गया कि इन की शान में 11 रबीउल अव्वल को मुनअक़िद होने वाले मीलादों को मुलतवी कर दिया। मगर इस के बावजूद कुछ शर पसन्द लोगों ने जबरदस्ती लाउड स्पीकर लगाकर मीलाद करने की कोशीश की जिस पर पुलिस ने लाठी चार्च किया और भगदड़ के नतीजे में मुताअद्दि अफ़राद ज़ख़्मी हुए।

1964 – इस साल कुछ कांग्रेसी रहनुमाओं के इशारे पर ज़िला हुक्काम ने लाउड स्पीकर के साथ साथ मदहे सहाबा व तबर्रा पर से भी पाबन्दी हठा ली थी जिस के नतीजे में वह पुर अमन माहौल जो 1940 से बरक़रार था वह दरहम बरहम हो गया और शंहशाह बिल्डिगं की महफ़िल से वापस आता हुआ एक शिया नौजवान बादशाह हुसैन पुल ग़ुल हुसैन की गली में क़त्ल किया गया और मुन्ज़म तरीक़े से कुछ देर शियों पर भी हमला किया गया जिस की वजह से इन्हें शदीद चोटें आयीं। हुक्काम ज़िला ने फिर मजबूर हो कर दफ़ा 144 लगा दी। तमाम मीलाद रोक दिये गये झगड़े का फिर से आग़ाज़ हो गया।

1965 – इस साल सुन्नियों की तरफ़ से एक नई जदीद जिद्दत की गयी कि बहुत ही ख़ुफ़िया और राज़दाराना तरीक़े से शहर के बाहर काले पहाड़ नामी एक मक़ाम पर मदहे सहाबा का जुलूस निकाला गया। शियों को जब इस की ख़बर हुई तो उन्होंने हुक्कामे ज़िला से इसके ख़िलाफ़ एहतेजाज किया।

1966 – इस साल बाराह वफ़ात के अवसर पर सुन्नियों की तरफ़ से काले पहाड़ों पर जुलूसे मदहे सहाबा निकालने की ज़बरदस्त तैयारी की गयी थी। शिया भी गुज़िश्ता साल के वाक़ए से चौकन्ना हो चुके थे चुनान्चे जब इन्हें जुलूसे मदहे सहाबा के बारे में यह ख़बर मालूम हुई तो उन्होंने भी एक अर्ज़दाश्त बारह वफ़ात के दिन शर्ग़ा पार्क से कर्बला ए दियानतुद्दौला तक एक जुलूस ए तबर्रा निकालने की ज़िला हुक्काम के रू ब रू पेश की मगर हुक्काम चूंकि सुन्नियों की हिमायत में थे इस लिए वह शियों को धोके में रखने के लिए यह यक़ीन दिलाने की कोशीश करते रहे कि मदहे सहाबा की इजाज़त नहीं दी जायेगी लेकिन जब बाराह वफ़ात के दिन पुलिस की टोलियों के साथ सुन्नियों को काले पहाड़ों की तरफ़ जाते देखा तो शिया भी कश्मीरी मोहल्ले के शर्ग़ा पार्क में जमा हो गये और जैसे ही इन्हें यह इत्तेला मिली कि मदहे सहाबा के जुलूस सुन्नियों की तरफ़ से उठ रहे हैं तो उन्होंने भी शर्गा पार्क से भी जुलूसे तबर्रा निकाला और दरगाह हज़रत अब्बास (अ.स.) होते हुए करबला दियानतउद्दौला तक ले गये। इस जुलूस की मज़ाहमत न सुन्नियों की तरफ़ से की गयी न पुलिस की तरफ़ से की गयी लेकिन जब मिलादों का सिलसिला शुरू हुआ तो शियों की दिल आज़ारी के लिए रात रात भर मदहे सहाबा पढ़ी जाने लगी। बिल आख़िर तन्ज़ीमे मिल्लत की जानिब से फिर तबर्रायी मीलादो का जवाबी सिलसिला शुरू किया गया और अलल ऐलान मदहे सहाबा के मुक़ाबले में तबर्रा के नारे बुलन्द होने लगे जिस पर सुन्नियों ने बौख़ला कर हुक्कामे ज़िला को अपने ऐतेमाद में ले लिया और शियों की यकतरफ़ा गिरफ़्तारियों का सिलसिला शुरू हो गया। पुलिस और इन्तिज़ामियां के अफ़सरान और हुक्काम इस ख़ुश फ़हमी में थे कि गिरफ़्तारियों के ज़रिये शियत और अक़लियत को दबा दिया जाये मगर इन का यह ख़्याल महज़ ख़याले ख़ाम हुआ। गिरफ़्तारियां होती रहीं मुक़दमें क़ायम होते रहे और तबर्रायी मिलादों का यह सिलसिला जारी रहा।

सूरते हाल काफ़ी बिगड़ चुकि थी और मस्जिद तहसीन अली ख़ां चौक के नज़दीक तीन हज़ार सुन्नियों के महमे को तेरह तबर्राइयों ने हवास बाख़्ता कर दिया था और एक मिनारा मस्जिद का सारा प्रोग्राम दरहम बरहम हो गया था चुनान्चे इन तेरह तबर्राई शियों को पुलिस ने फ़ौरी गिरफ़्तार कर लिया और इन पर दफ़ा 153 के तहत मुक़दमा क़ायम कर दिया गया। ज्यूडेश्नल मजिस्ट्रेट के पी 0 अग्रवाल की अदालत में मुक़दमा चला सुन्नियों के मौलवी गवह बनकर आये एड़ी चोटी का ज़ोर लगाया मगर फ़ाज़िल मजिस्ट्रेट ने तमाम मुल्ज़ेमान को बइज़्ज़त बरी कर दिया। जिन अफ़राद पर यह मुक़दमा क़ायम किया गया था उनके असमा ए गिरामी हस्बे ज़ैल हैं –

1. सैय्यद अशरफ़ हुसैन एडवोकेट

2. डॉ 0 हुज़ूर नवाब

3. क़ारी सैय्यद अली मियां ज़ैदी

4. सैय्यद अली रज़ा

5. ज़ाकिर हुसैन

6. अली ज़हीर , मैदान एल 0 एच 0 ख़ां

7. मोहम्मद अमीर

8. इम्तियाज़ हुसैन

9. मोहम्मद मियां

10. ख़ादिम अब्बास

11. क़ादिर मेहदी

12. एकराम हुसैन

13. बाबू साहब , तिरमिनी गंज।

(आप ये किताब अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क पर पढ़ रहे है।)

1967. यह साल आम इन्तेख़ाबात का साल था। लखनऊ में मग़रिबी हल्क़े से शाकिर अली सिद्दीक़ी व सतही हल्क़े से बाबू विरेन्द्र कुमार और मशरिक़ी हल्क़े से डॉ 0 से सिध्दू कांग्रेस के टिकट पर एसेम्बली के लिए इलेक्शन लड़ने के लिए मसरूफ़ थे। 1962 के आम इन्तेख़ाबात में मग़रिबी हल्क़े से सैय्यद अली ज़हीर और वस्ती हल्क़े से बाबू महावीर प्रसाद एडवोकेट कामयाब हो चुके थे लिहाज़ा यह लोग भी कांग्रेस ही के टिकट पर इलेक्शन के मैदान पर उतरने के ख़्वाहिशमंद थे। यह वह ज़माना था कि जब कांग्रेस पार्टी ख़ुद दो नुमायां हिस्सों में तक़सीम थी। एक हिस्से की क़यादत श्री चन्द्र भानु गुप्ता कर रहे थे और दूसरे हिस्से के सरबराह मिस्टर कमला पति त्रिपाठी थे। शाकिर अली सिद्दक़ी चन्द्र भानु गुप्ता वाली पार्टी में शामिल थे जो कमला पति त्रिपाठी की पार्टी से ज़्यादा ताक़तवर थी।

चुनान्चे इल दोनों पार्टियों के नये उम्मीदवारों ने सुन्नियों से वोट हासिल करने के लिए मदहे सहाबा का झगड़ा खड़ा कर दिया अन्जामकार शाकिर अली सिद्दीक़ी सुन्नियों की तरफ़ से खुल कर सामने आये और इनकी क़यादत में सुन्नियों की तरफ़ से इम मीलादों की आढ़ में मदहे सहाबा का सिलसिला जारी हुआ जिनका वुजूद पहले कभी न था। शियों ने इस सूरते हाल के बारे में ज़िला हुक्काम को बार बार मुतावज्जे किया मगर जब कोई तवज्जे नहीं की गई तो इदारा ए तन्ज़ीमे मिल्लत की तरफ़ से सदर कांग्रेस के कमला पति त्रिपाठी को एक अरज़दाश्त पेश की गयी जिनमें यह इस्तेदुआ की गयी कि शाकिर अली सिद्दीक़ी चूंकि एक तंग नज़र और मुतास्सिब इन्सान हैं लिहाज़ा इन्हें कांग्रेस का टिकट नहीं देना चाहिए। चुनान्चे इनके अर्ज़ेदाश्त के बिना पर इन्हें कांग्रेस पार्टी ने टिकट नहीं दिया और वह शियों पर इस क़दर बरहम हुए कि उन्होंने फ़ितना ए मदहे सहाबा में और भी शिद्दत पैदा कर दी। शिया पहले तो सब्रोतहम्मुल से काम लेते रहे लेकिन जब पानी सर से ऊचां होने लगा तो उन्होंने इन्तिज़ामिया के हुक्काम से फिर जुलूसे तबर्रा की मांग की। इस का नतीजा यह हुआ कि बारह वफ़ात के मौक़े पर दफ़ा 144 के तहत मदहे सहाबा और तबर्रा दोनों पर फिर पाबन्दी आयद कर दी गयी। मगर इस पाबन्दी में ख़ुदा जाने क्यों यह नुक़्स रह गया या रहने दिया गया कि इसमें शर ए आम पर मीलादों में मदहे सहाबा पढ़ने न पढ़ने के सिलसिले में कोई वज़ाहत नहीं थी। चुनान्चे सुन्नियों ने इस नुख़्स का फ़ायदा उठाया और बारह वफ़ात का दिन ग़ुज़रते ही रात से मीलादों और मदहे सहाबा का ज़ोरदार सिलसिला शुरू हो गया। यह सूरते हाल देख कर शियों ने फ़ौरी तौर पर ज़िला हुक्काम से राब्ता क़ायम किया और इन्हें मुतावज्जे किया लेकिन जब ज़िला इन्तेज़ामिया की तरफ़ से लाउड स्पीकर के इस्तेमाल पर पाबन्दी नाफ़िज़ करने के अलावा और कोई कार्यवाही अमल में नहीं लायी गयी तो मजबूर हो कर शियों की तरफ़ से जवाबी महफ़िलों का सिलसिला शुरू किया गया और चारों तरफ़ तबर्रा की आवाज़ें गूंजने लगी। आख़िरकार फ़रीक़ैन की गिरफ़्तारियां अमल में आयीं और मुक़दमों की भाग दौड़ और कश्माकश में यह साल तमाम हुआ।

1968. इस साल हालात कशीदा रहे। शिया और सुन्नी दोनों फ़िरक़ों पर ज़िला इन्तिज़ामियां की तरफ़ से दफ़ा 107 के तहत कार्यवाही की गयी और कुछ मुक़द्देमात ताज़ीराते हिन्द दफ़ा 188 के तहत सुन्नियों पर क़ायम किये गये।

1969. यह साल शियों के लिए इन्तेहायी करब व इज़तेराब और परेशानियों का साल था। इलेक्शन हो चुके थे यू 0 पी 0 में कांग्रेस पार्टी बरसरे इक़तेदार आ चुकी थी और मिस्टर चन्द्र भानु गुप्ता वज़ीरे आला बन चुके थे और सूरते हाल यह थी कि इलेक्शन में कांग्रेस का नुमायां साथ देने की वजह से सुन्नियों पर हुकूमत पर और हुकूमत का झुकाव सुन्नियों की तरफ़ था इस लिए शियों और सुन्नियों के दरमियान जो मुताबाज़अ हालात थे वह रोज़ ब रोज़ बिगड़ते जा रहे थे और सिन्नी फ़िरक़ा किसी क़ानून का पाबन्द नहीं रह गया था। हर शख़्स को एक मुन्ज़म फ़साद का यक़ीन था। चुनान्चे शियों लीडरों की तरफ़ से वज़ीरे आला को एक ख़त लिखा गया और इस में कहा गया कि हम आप से मिल कर शिया सुन्नी मसअले पर बात करना चाहते हैं। वज़ीरे आला की तरफ़ से जवाब आया कि वफ़्द में शामिल होने वालों के नामों और मुतालेबात की फ़ेहरिस्त भेजी जाये। शिया लीडरों ने वफ़्द में शामिल होने वालों के नामों और मुतालेबात की फ़ेहरिस्त भेज दी। उम्मीद थी कि वज़ीरे आला से मुलाक़ात और गुफ़्तुगू के बाद हालात सुधर जायेंगे लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ न वज़ीरे आला की तरफ़ से पलट कर कोई जवाब आया और न ही उन्होंने शिया वफ़्द से मुलाक़ात की कोई मन्ज़ूरी दी। इस तरज़े अमल से शिया लीडरान समझ गये कि हुकूमत की यह ख़ामोशी किसी बड़े साज़िशी तूफ़ान का पेशे ख़ेमा है चुनान्चे उन्होंने यह फ़ैसला किया कि मुतफ़्फ़ेक़ा तौर पर कोई लाहाये अमल मुरत्तब कर के शियों को आइन्दा पेश आने वाले ख़तरात के इमकानात से आगाह व बाख़बर कर दिया जाये और यह बता दिया जाये कि अब हमें क्या तरीक़ा ए कार इख़्तियार करना है। लेकिन क़ब्ल उसके कि कोई दिफ़ाई लाह ए अमल मुरत्तब किया जाता शिया लीडरों के दरमियान बाहमी इख़्तेलाफ़े राय की बिना पर जनाब सैय्यद अशरफ़ हुसैन साहब एडवोकेट ने बा हैसियते जनरल सेक्रेटरी इदारा ए तंज़ीमे मिल्लत अशरा ए मोहर्रम के दौरान पम्पफलेट की शक्ल में एक अपील छपवाकर सात और आठ मोहर्रम को मुनअक़िद होने वाली मजलिस में तक़सीम करायी। जिसका मक़सद एक ऐसी जमात की तशक़ील पर मब्नी था जो तमाम मसायबों आलाम बरदाश्त करते हुए मदहे सहाबा का जवाब सिर्फ़ तबर्रा से दे सकें। इस जमात के मेम्बरान की अलामत सब्ज़ टोपी मोअय्यन की गयी थी।

इस अपील का मन्ज़रे आम पर आना था कि चारों तरफ़ हलचल मच गयी। सियासते जदीद ने यह प्रोपेगेन्डा शुरू कर दिया कि सब्ज़ टोपियों पर तबर्रा लिखा है और यह तबर्रायी टोपी है सिन्नी फ़िरक़े के जो शर पसन्द अफ़राद अब पहले ही से बलवाओ फ़साद की तैयारी में मसरूफ़ थे वह भी इस टोपी के ख़िलाफ़ मैदाने अमल में उतर आये और मग़रिबी हल्क़े का माहौल इन्तेहाई गर्म हो गया।

ताबूत पर हमला 23 अप्रैल 1969 –

5 सफ़र 1386 हिजरी को आठ बजे शब में सुन्नियों की तरफ़ से एक ताबूत पर एक मुनज़्ज़म हमला किया जो दरगाह हज़रत अब्बास (अ.स.) से बरामद हो कर जुलूस की शक्ल में कज्जन साहब के मकान वाक़ा ए दरीवालों , रूस्तम नगर जा रहा था। चुनान्चे जैसे ही ताबूत अपने रवायती अन्दाज़ में घण्टा बेग की गढ़ैया के चौराहे पर पहुंचा सुन्नियों ने उस पर ज़बरदस्त पथराव किया। शिया इस बलाये नागहानी से मुक़ाबले के लिए क़तई तैयार नहीं थे ताहम ज़ख़्मी होने के बावजूद उन्होंने इस पथराव का जवाब पथराव से दिया और ताबूत की हिफ़ाज़त करते हुए उसे मंज़िले मक़सूद तक पहुंचा दिया और जब यह सब कुछ हो गया तो हुक्कामो अफ़सरान जाय वारदात पर पहुंचे। पुलिस भारी तादात में तैनात कर दी गयी लेकिन इस वाक़्ये ने शियों की आंखों से ग़फ़लत के पर्दे हटा दिये थे और उन की समझ में आ गया था कि आइन्दा बारह वफ़ात के मौक़े पर सख़्त ख़तरात का सामना है।

ज़िला हुक्काम का जांबेदाराना रवैया

इस अफ़सोसनांक वाक़्ये के रवैये के बाद ज़िला हुक्काम ने सुन्नियों के ख़िलाफ़ कोई क़ानूनी कार्यवाही नहीं की और न ही उनकी गिरफ़्तारियां अमल में लायी गयीं। बल्कि शियों के ख़िलाफ़ उल्टी कार्यवाही यह की गयी कि दफ़ा 144 आयद कर के शियों के ताबूतों , ताज़ियों और अलमों को उनके घरों और इमामबाड़ों में महसूर कर दिया गया और यह हुक्म जारी कर दिया कि बग़ैर इजाज़त कोई भी ताज़िया सड़क पर नहीं लगाया जा सकता। इस हुक्म के तहत ताज़ियों को दफ़्न करने में कुछ दुशवारियां और रूकावटें तो पैदा हुयीं लेकिन इसके साथ ही एक फ़ायदा यह भी हुआ कि शिया लीडरों के दरमियान जो इख़्तेलाफ़ात थे वह दूर हो गये और सब मिल कर अज़ादारी के ख़िलाफ़ रूनुमा होने वाले हर ख़तरे से मुक़ाबले के लिए तैयार हो गयें। एक शिया नौजवान पर क़ातिलाना हमला 23 मई 1969 की रात में तक़रीबन बारह बजे अन्जुमनें शमशीरे हैदरी के अहमद अब्बास नामी एक नौजवान पर जो नाज़िम साहब के इमामबाड़े की शब्बेदारी में शिरकत की ग़रज़ से जा रहा था पुल ग़ुलाम हुसैन के कुछ सुन्नियों ने क़ातिलाना हमला किया लेकिन वह बुरी तरह ज़ख़्मी हो जाने के बावजूद मोअज़्ज़िज़ाना तौर पर अपनी जान बचाने में कामयाब हो गया रात ही में थाना सआदतगंज में रिपोर्ट दर्ज करायी गयी और सुबह को ज़िला हुक्काम से राब्ता क़ायम किया गया लेकिन इन तमाम कार्यवाहियों के बावजूद पुलिस अफ़सरान और ज़िला हुक्काम ख़ामोश रहे।

26 मई का फ़साद –

26 मई 1969 को आठवीं रबीउलअव्वल थी चुप ताज़िये का जुलूस अपनी रवायती शानो शौकत के साथ विक्टोरिया स्ट्रीट चौक अकबरी गेट महमूद नगर और पुल ग़ुलाम हुसैन से गुज़र कर ग्यारह बजे दिन से रौज़ा ए काज़मैन पहुंच चुका था। शिया लीडरान और पुलिस व इन्तिज़ामिया के अफ़सरान और हुक्काम मुतमइन हो गये थे कि झगड़े फ़साद का ख़तरा टल चुका है लेकिन उन्हें यह ख़बर नहीं थी कि ख़ुफ़िया तौर पर सुन्नियों ने चुप ताज़िया गुज़र जाने के बाद ठीक बारह बजकर तीस मीनट पर मुनज़्ज़म फ़साद का मनसूबा तैयार कर रखा है। आठवीं रबीउलअव्वल की दोपहर को आम तौर पर शियों के घर मजलिस और मातमी दस्तों में मर्दों की शिरकत से ख़ाली होते हैं चुनान्चे मुक़र्रेरा वक़्त के मुताबिक़ बारह बजकर तीस मिनट पर महमूद नगर के वहाबी सुन्नियों ने एक मातमी दस्ते पर ज़बरदस्त पथराव किया और उसके साथ ही पूरे शहर में शियों पर मुनज़्ज़म हमले शुरू हो गये। गोलियां चलायीं गयीं दस्ती बमों छुरियों और चाक़ुओं का आज़ादाना इस्तेमाल किया गया। शियों के सैकड़ों मकानों और दुकानों में आग लगा दी गयी। काज़मैन से ले कर मौलवीगंज , मालवीगंज से गोलागंज और वज़ीरगंज तक वज़ीरगंज से हुसैनाबाद और मुफ़्तीगंज तक बयक वक़्त लूट मार और क़त्लोग़ारतगरी का बाज़ार गर्म कर दिया गया। इस मुनज़्ज़म फ़साद के लिए बाहर से गुंडे और बदमाश बुलाये गये थे जिस के नतीजे में पांच बेकुसूर शिया मोहम्मद यामीन ( 18), अफ़्रोज़ मिर्ज़ा ( 26), आफ़ाक़ हुसैन उर्फ़ कज्जन ( 35), सैय्यद मोहम्मद अब्बास ( 30), और हकीम मुर्तुज़ा ( 80) इन्तेहायी बेरहमी से शहीद कर दिये गये। हज़ारो तादाद में औरतें , बच्चे , बूढ़े , जवान ज़ख़्मी हुए बल्वाईयों ने इमामबाड़ा गुफ़रानमाब , इमामबाड़ा आग़ाबाक़र , इमामबाड़ा तहसीन अली ख़ान को नज़रे आतिश कर दिया। अलम , ताबूत , ज़री , मिम्बर और दिगर मुक़द्दस नवादेरात सब जल कर राख हो गये। महमूद नगर में वाक़ए मिर्ज़ा ज़ैना की मस्जिद को लूटा गया। इस में तोड़ फोड़ की गयी क़ुरआन के पारे फाड़े और जलाये गये नीज़ तस्बीहों सज्दागाहों और जानमाज़ों को पैरों तले रौंदा गया। चौक मण्डी के कुछ वहाबी और शर पसन्द कबढ़ियों ने मौलाना कल्बे आबिद साहब के मकान वाक़ये जौहरी मोहल्ला पर तीन बार हमला और पथराव कर के उसे लूटने की कोशिश की लेकिन हर बार उन्हें नाकामी का मुंह देखना पड़ा।

(आप ये किताब अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क पर पढ़ रहे है।)

सुन्नयों की तरफ़ से किये गये इस मुनज़्ज़म हमले के दौरान शियों को तीन तरह की ताक़तों का सामना था। अव्वल सुन्नयों को जो मुस्लेह भी थे और जिनके साथ बाहरी गुण्ड़ों और बदमाशों की तादात ज़्यादा थी और दूसरे मुस्लेह पुलिस से जो पूरी तरह सुन्नयों की तरफ़दारी और मदद कर रही थी और शियों पर डण्डे बरसा रही थी। इस लाठी चार्ज के दौरान मौलाना सैय्यद कल्बे सादिक़ साहब बुरी तरह ज़ख़्मी हुए और पुलिस ज़ख़्मी कर के गिरफ़्तार कर के उन्हें ले गयी और हवालात में बन्द कर दिया और हुक्कामे ज़िला ने उनकी गिरफ़्तारी को सीग़ा ए राज़ में रखा। आख़िर कार डॉ 0 पी 0 बी 0 कपूर की मुसलसल कोशिशों से शियों को मौलाना की गिरफ़्तारी का हाल मालूम हो सका। तीसरी ताक़त शियों के मुक़ाबले में जो सफ़आरा थीं और अरबाबे सियासत की थी जो मिस्टर चन्द्रभानु गुप्ता वज़ीरेआला से बराबर राब्ता क़ायम किये हुए थे और उन से मशविरा कर के ज़िला हुक्काम को क़दम क़दम पर हिदायतें दे रहे थे। इन तीनों ताक़तों से निपटने के अलावा शियों के लिए सब से ज़्यादा परेशानी और मजबूरी की बात यह थी कि उन्हें अपने अलमों और ताज़ियों की हिफ़ाज़त के साथ साथ ही उन बेशुमार औरतों और बच्चों की हिफ़ाज़त का ख़्याल भी था जो ज़्यारत के लिए जमा हुए थे और बलवाईयों के नरग़े में घिर गये थे। चुनान्चे शियों ने अपनी जानों पर खेल कर इस आतिशी और ख़ूनी माहौल में इस ज़िम्मेदारी को भी अन्जाम दिया और औरतों और बच्चों को उनके घरों तक पहुंचाया इस अफ़रा तफ़री और कशमाकश मे शाम हो चुकी थी चुनान्चे शियों ने सब्रो तहम्मुल से काम लेते हुए आठवीं की रात बड़े करबो इज़्तेराब में गुज़ारी और दूसरे दिन नवीं रबीउलअव्वल के दिन इन्तेक़ामी जज़बे के तहत सुन्नियों के साथ वही सुलूक किया जो उन्होंने शियों के साथ किया था इस जवाबी कार्यवाही की शिद्दत से हुक्कामे ज़िला भी बौखला उठे और उन्होंने ग़ैरेमुअय्येना मुद्दत का कर्फ़्यू नाफ़िस कर दिया।

नाना जी देश मुख का दौरा –

अख़बारों के ज़रिये जब इस फ़साद और शियों की तबाही और बरबादी का हाल नाना जी देश मुख को मालूम हुआ तो वह फ़ौरन लखनऊ आये और डॉ 0 पी 0 डी 0 कपूर के हमराह उन्होंने फ़साद ज़दा इलाक़ों का दौरा किया और फ़रीक़ैन के लीडरों से गुफ़्तुगू के बाद इस नतीजे पर पहुंचे कि सियासी साज़िश के तहत मन्सूबामन्द तरीक़े से फ़साद सुन्नियों ने किया है और मदहे सहाबा व तबर्रा के सिलसिले में शियों का मोअक़्क़िफ़ व मुतालेबा जायज़ है। नाना जी देश मुख ने डॉ 0 कपूर प्रताप नारायन और दीगर जनसंगी लीडरों के साथ जेल का भी दौरा किया और वहां भी शियों से बातचीत कर के फ़साद के बारे में ज़रूरी मालूमात फ़राहम की। उसके बाद उन्होंने अपने एक अख़बारी बयान में गुप्ता सरकार से मुतालेबा किया कि मदहे सहाबा और तबर्रा पर पाबन्दी लगा कर शार ए आम पर इसका पढ़ना मम्नूं क़रार दिया जाये और चूंकि यह फ़साद सुन्नियों की मुनज़्ज़म साज़िश का खुला हुआ नतीजा है लिहाज़ा हाई कोर्ट के किसी जज के ज़रिये इसकी तहक़ीक़ात ज़रूरी है।

बारह वफ़ात –

30 मई 1969 का दिन बारह वफ़ात का दिन था सुन्नी लीडरों की दर्ख़ास्त और वज़ीरे आला के हुक्म से सुबह सात बजे से शाम के 6 बजे तक कर्फ़्य् हटा लिया गया था। लेकिन दफ़ा 144 का नेफ़ाज़ बदस्तूर बरक़रार था और इन हंगामी हालात के बावजूद सुन्नियों के काले पहाड़ों पर जुलूसे मदहे सहाबा की इजाज़त हुक्कामे ज़िला ने किसी सियासी दबाव के तहत दे दी थी। शियों को जब इस इजाज़त का हाल मालूम हुआ तो उन्होंने भी हुकूमत व इन्तिज़ामियां के इस यकतरफ़ा रवैये पर अफ़सोस ज़ाहिर करते हुए जुलूस ए तबर्रा के बारे में एक दरख़ास्त ज़िला मजिस्ट्रेट को दी जिस में यह इस्तेदवा थी कि शियों को भी कश्मीरी मोहल्ले से शहदरे की मस्जिद तक जुलूसे तबर्रा की इजाज़त दी जाये लेकिन सुन्नियों के साथ इम्तियाज़ी बरताब की बिना पर शियों की यह दर्ख़ास्त ख़ारिज कर दी गयी। चुनान्चे यह तय किया गया कि ज़िला हुक्काम की मोमानेअत के बावजूद जुलूसे तबर्रा निकाला जाये और दफ़ा 144 तोड़ कर गिरफ़्तारियां दी जायें।

ग़रज़ के तय शुदा प्रोग्राम के मुताबिक़ दफ़ा 144 की ख़िलाफ़वर्ज़ी करते हुए पांच अफ़राद पर मुशतमिल मुजाहेदीन की एक जमाअत ने जुलूस ए मदहे सहाबा के मुक़ाबले में कश्मीरी मोहल्ले से जुलूसे तबर्रा निकाला और पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार कर के दफ़ा 153 – ए और दफ़ा 118 के तहत मुक़दमा क़ायम किया और जेल भेज दिया। जिन मोमेनीन की गिरफ़्तारियां अमल में आयीं उनके नाम हस्बे ज़ैल हैं –

1. मुजाहिदे मिल्लत सैय्यद अशरफ़ हुसैन एडवोकेट ,

2. सैय्यद काज़िम हुसैन , साकिन तालकटोरा ,

3. क़ासिम रज़ा साकिन बन्जारी टोला ,

4. मोहम्मद अमीन साकिन मैदान एल 0 एच 0 ख़ान और

5.इम्तियाज़ हुसैन साकिन रूस्तम नगर।

21 अगस्त का दूसरा फ़साद –

21 अगस्त 1969 को जमादुल आख़िर की नौचन्दी जुमेरात थी और शियों की तरफ़ से यह बात तय हो गयी थी कि इस नौचन्दी के मौक़े पर अलमों के जुलूस बरामद होते हुए उन्हें रोका नहीं जायेगा लेकिन हुक्कामे ज़िला ने रातोरात शिया लीडरान को इस बात पर राज़ी कर लिया कि जुलूस मुलतवी तक दिये जायें चुनान्चे जुलूस का इल्तेवा में आ गया और शिया लीडरान की तरफ़ से मोमेनीन को इल्तेवा की कोई इत्तेला नहीं दी गयी नतीजा यह हुआ कि बेख़बरी में शिया आवाम मौलवीगंज में वाक़्ये मस्जिदे नासिरी में इकट्ठा होने लगे जहां से अलम उठने वाला था। दूसरी तरफ़ से कसीर तादात में मुस्लेह सुन्नी पहले से ही हमला करने के इरादे से एक घर में जमा हो गये थे। चुनान्चे जैसे ही अलम बरामद हो कर मस्जिद के बाहर आया और या हुसैन की सदायें सुन्नियों के कानों में पहुंची उन्होंने इस जुलूस पर हमला कर दिया। इस अचानक और ग़ैर मुतावक़्क़े हमले के दौरान कई शिया बुरी तरह से ज़ख़्मी हुए और दो अफ़राद हकीम सैय्यद मुरतुर्ज़ा हुसैन और सैय्यद मोहम्मद अब्बास साकिनाने गोलागंज ज़ख़्मों की ताब न लाकर चल बसे। यह वाक़ेया पुलिस की लापरवाही और बद इन्तिज़ामी और शिया लीडरान की ग़फ़लत के नतीजे में रूहनुमां हुआ।

इस वाक़्ये के ज़ैल में 22 अगस्त 1969 की सुबह को गिरफ़्तारियां हुईं जिस में सुन्नियों में हाजी ग़ुलाम ज़ैनुलआबेदीन , नज़र अहमद एडवोकेट और सग़ीर अहमद एडवोकेट के साथ तक़रीबन दो दर्जन अफ़राद को पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया और शियों में सिर्फ़ सैय्यद अशरफ़ हुसैन एडवोकेट की गिरफ़्तारी अमल में लायी गयी क्योंकि मौसूफ़ ने यह ऐलान कर दिया था कि हकीम मुर्तुज़ा हुसैन और मैय्यद मोहम्मद अब्बास के ख़ून का बदला सुन्नियों के ख़ून से चुकाया जायेगा।

मौलाना सैय्यद मुज़फ़्फ़र हुसैन , ताहिर जरवली और मौलाना सैय्यद कल्बे सादिक़ की गिरफ़्तारियां –

8 सितम्बर , 1969 को जब कि शहर के हालात क़द्रे पुरसुकून हो चले थे मुम्ताज़ कांग्रेसी और वहाबी मसलक के अलमबरदार मौलवी असद मदनी साहब लखनऊ तशरीफ़ लाये उन्होंने वज़ीरेआला मिस्टर चन्द्रभानु गुप्ता से मुलाक़ात की और इस बात की शिकायत की कि 21 अगस्त के फ़साद के सिलसिले में सुन्नियों के तीन लीडरों को हिरासत में ले लिया गया है लेकिन शियों के सिर्फ़ एक लीडर को गिरफ़्तार किया गया है पुलिस का यह दरीक़ा ए कार दुरूस्त नहीं है आप एस 0 एस 0 पी 0 को यह हिदायत दें कि वह कम से कम दो शिया लीडरों को और गिरफ़्तार करें चुनान्चे फ़ौरी तौर पर अहकाम जारी किये गये और अहकाम के नतीजे में क़ानून के तहत मौलाना सैय्यद मुज़फ़्फ़र हुसैन , ताहिर जरवली और मौलाना सैय्यद कल्बे सादिक़ साहब जेल भेज दिये गये।

सह रोज़ा एजीटेशन –

18 दिसम्बर 1969 को माहे रजब की नौचन्दी थी शियों ने सिविल नाफ़रमानी का फ़ैसला कर लिया था और हुक्काम उन्हें चक्कर में डालना चाहते थे लेकिन डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के इशारों पर नाचने वाले शियों लीडरों की एक न चली क्योंकि आवाम का पैमाना सब्र व तहम्मुल से लबरेज़ हो चुका था चुनान्चे आसफ़ी इमामबाड़े में मोमेनीन का बहुत बड़ा इज्तेमा हुआ जिसमें वलवला अंगेज़ तक़रीरें हुईं। मुझ नाचीज़ ने भी उस वक़्त के हालात पर एक नज़्म पढ़ी और आख़िरकार शियों की तरफ़ से एहतेजाजी गिरफ़्तारियां पेश करने का सिलसिला जारी रहा। जो तीन दिन तक मुतावातिर चलता रहा। इस एजीटेशन की ख़ामोश क़यादत निगरानी के साथ मौलाना सैय्यद कल्बे आबिद साहब क़िब्ला , मौलाना सैय्यद अली नासिर सईद आबाक़ाती (आग़ा रूही) , नवाब साजिद अली ख़ां , और डॉ 0 हुज़ूर नवाब वग़ैरा अपने कुछ मुख़लिसतरीन साथियों के साथ कर रहे थे।

इस सह रोज़ा एजीटेशन में पांच हज़ार बहत्तर शिया ख़ुद को गिरफ़्तार करा के जहां गुप्ता हुकूमत के मुंह पर भरपूर तमाचा मारा था वहां सुन्नियों की हिम्मतों को पस्त करते हुए ज़िला हुक्काम पर भी यह साबित कर दिया था कि आप के ख़रीदे हुए शिया लीडर कुछ और हैं और शिया अवाम का जज़्बा ए ईमानी कुछ और है। इस से क़ब्ल जबकि सिविल नाफ़रमानी तहरीर का तज़किरा किया जाता था और 1939 के तबर्रा एजीटेशन की याद दिलायी जाती थी तो कुछ अहले राय शिया हज़रात को भी बुख़ार चढ़ने लगता था और वह मसलहत व नासाज़िये हालात दरिया में ग़ोते लगाने लगते थे। ऐसा क्यों था ? इस लिए कि वह फ़ितरतन सरकारी पिट्ठू थे और अपनी पस्त हिम्मती व बेअमली के आइने में पूरी क़ौम को देखना चाहते थे जो ग़लत था , चूंकि अहले राय अपनी जगह अहले राय हैं और अहले ईमान अहले ईमान हैं। चुनान्चे जब ईमान की कसौटी का वक़्त आया तो अहले राय गोशा ए आफ़ियत में नज़र आय और अहले ईमान मैदाने अमल में दिखायी दिये और इसके साथ ही दुनिया ने यह भी देख लिया कि हुसैनियत पर जब भी वक़्त पड़ेगा अहले ईमान इसी तरह डट कर मुक़ाबला करेंगे जिस तरह उनके अस्लाफ़ करते थे।

शिया अवाम को यह बात याद रखनी चाहिए कि कोई क़ौम अपने मुतालिबात को उस वक़्त तक नहीं मनवा सकती जब तक वह ज़माने के लिहाज़ से क़ुरबानियां न पेश करें। अगर शिया एक बार इज़्ज़त व बावेक़ार क़ौम की तरह ज़िन्दगी गुज़ारना चाहते है और अपना शुमार ज़िन्दा क़ौमो में कराना चाहते हैं तो उन्हें अपने जाएज़ मुतालिबात के ज़ैल में हर वक़्त क़ुरबानियों के लिए तैयार रहना चाहिए ख़्वाह वह हिन्दुस्तान के किसी हिस्से में क्यों न हों। यह परेशानियां लखनऊ ही के शियों तक महदूद नहीं हैं। वहाबियो की बढ़ती हुई शूरिश के तहत आज नहीं तो कल शियों के ख़िलाफ़ इस क़िस्म के मसाएल पैदा किये जायेंगे और शियों को अपनी क़ुरबानियों को और जज़्बा ए ईसार को बरू ए कार लाकर इन मसाएलों का सामना करना होगा।

शिया अख़बारों की ख़िदमात –

26 मई 1969 के भयानक फ़साद के बाद शिया अख़बारों ने भी मुजाहिदाना तरज़ व अमल इख़्तियार कर के सुन्नी अख़बारों की बदतमीज़ी का भी मुंह तोड़ जवाब दिया उनकी यह जद्दो जेहद यक़ीनन हुसैनी तहरीक़ के एक जुज़ की हैसियत रखती है। जिन अख़बारों ने इस मुजाहिदा में हिस्सा लिया उनमें इन्क़ेलाबी अज़्म , इत्तेहादे हिन्द , नौजवान , मुजाहेदा और एलाने हक़ के नाम सरे फ़ेहरिस्त हैं। चुनान्चे इन अख़बारों को एडीटरों पब्लिशरों , और प्रिंटरों में जनाब अली मिर्ज़ा इन्क़ेलाबी , क़ारी अली मियां ज़ैदी व रियाज़ हैदरी , आकाश भारती व जाफ़र हुसैन बरलासी , मौलाना मोहसिन साहब और नवेज़ साहब एडीटर एलाने हक़ की गिरफ़्तारियां भी अमल में आयीं और उन पर दफ़ा 153 ए के तहत मुक़दमा क़ायम किया गया लेकिन यह लोग अदालत से बरी हो गये।


सुलह की कोशिश –

26 मई 1969 के फ़साद के बाद सुलह की तीन बार कोशिश की गयी पहली बार करनल बशीर ज़ैदी , मजलिस मुशावेरत के मौलाना अतीक़ुर्रहमान और जमाअते इस्लामी के मौलाना यूसुफ़ साहब देहली से तशरीफ़ लाये और इन लोगों ने शिया व सुन्नी लीडरों से तबादला ए ख़्याल किया। लेकिन कोई हल न निकल सका इस लिए वापस चले गये दूसरी बार यही हज़रात लखनऊ तशरीफ़ लाये और मसला तय होते होते रह गया। तीसरी और आख़िरी कोशिश उस वक़्त के वज़ीरे आला मिस्टर चन्द्र भान गुप्ता ने की जो बज़ाहिर कामयाब हुए और एक समझोते पर फ़रीक़ैन ने दस्तख़त की जिसे आम इस्तेलाह में 1969 का मुहायदा कहा जाता है और इस पर फ़रीक़ैन के नुमाइन्दों ने 24 सितम्बर 1969 की रात को तक़रीबन दो बजे गवर्नमेंट गेस्ट हाउस में दस्तख़त किये और 26 सितम्बर 1969 को सरकारी मुहकम ए दाख़िला की तरफ़ से एक प्रेस नोट जारी किया गया जिसमें सुलह के शरायत बयान किये गये थे और कहा गया था –

यह समझौता गेस्ट हाउस में वज़ीरे आला श्री सी 0 बी 0 गुप्ता की तरफ़ से शिया व सुन्नी नज़रबन्दों और शिया व सुन्नी नुमाइन्दों को दिये गये एक डिनर के मौक़े पर तवील तबादला ए ख़्याल के बाद हुआ। इस मौक़े पर नज़म व नुस्क़ और मुहकम ए दाख़िला के आला अफ़सरान के अलावा वज़ीरे लोकल सेल्फ़ गवर्नमेंट मिस्टर अतीक़ुर्रहमान भी मौजूद थे। वज़ीरे आला श्री गुप्ता ने शिया व सुन्नी लीडरों को बराहे रास्त डिस्ट्रिक्ट जेल में डिनर का दावत नामा भेजा था। यह नज़र बन्द जो साढ़े नौ बजे रात को पुलिस गाड़ियों पर जेल से गेस्ट हाउस आये थे। समझोता होने के बाद सीधे अपने घरों को गये।

1969 का मुहायदा –

यह मुहायदा अंग्रेज़ी ज़बान में टाइप किया गया था। जिसका उर्दू तरजुमा हस्बे ज़ैल है –

1. शिया अपने जुलूस व अलम भी निकालेंगे और मामूल के मुताबिक़ अपने मीलाद भी करेंगे लेकिन वह शार ए आम पर किसी अन्दाज़ में भी तबर्रा नहीं पढ़ेंगे। इन मीलादों में शिया पैग़म्बर स 0 (अ.स.) और अपने इमामों वग़ैरह की मदह व सना ऐसे अन्दाज़ में करेंगे कि इससे सुन्नियों के एहसासात व जज़्बात को ठेस न पहुंचे।

2. सुन्नी अपने मीलाद अपने उसी अन्दाज़ में करेंगे जिस तरह वह करते आए हैं। जिन में वह हज़रत पैग़म्बर और उन के सहाबा की ज़िन्दगी तालीमात और कारनामे उसी अन्दाज़ में बयान करेंगे जैसे कि वह अभी तक बयान करते रहे हैं। ऐसे मीलादों में हज़रत पैग़म्बर और उनके सहाबा की मदह व सना ऐसे अन्दाज़ में की जायेगी कि उससे शियों के मज़हबी ऐसास व जज़बात को ठेस न पहुंचे।

3. अलमों मीलादों मजलिसों और जुलूसों के सिलसिले में कोई नई बात नहीं की जायेगी जिन मीलादों अलमों मजलिसों और जुलूसों का इन्देराज त्योहारों के रजिस्टरों में हैं इनका तसलीम करना दोनों फ़िरक़ों के लिए लाज़मी होगा। कोई फ़रीक़ किसी जवाबी मीलाद या तक़रीब का इनेक़ाद नहीं करेगा और दोनों फ़रीक़ हर ऐसी कार्यवाही से इज्तेनाब करेंगे जिसका मक़सद दूसरे के मज़हबी एहसासात और जज़बात को ठेंस पहुंचाना हो।

एलानिया में कहा गया है कि दोनों फ़िर्क़ों के दरमियान जो समझौता हो गया है उसके पेशे नज़र हुकूमत ने उन सात अफ़राद को जो शिया सुन्नी तनाज़े के सिलसिले मे तदार की नज़रबन्दी क़ानून के तहत बन्द रहे रिहा कर दिया है। नज़र बन्द लीडरों के नाम यह हैं – 1. क़ारी मोहम्मद सिद्दीक़ , 2. नज़ीर अहमद एडवोकेट , 3. हाजी ग़ुलाम ज़ैनुलआबेदीन , 4. मिस्टर सग़ीर हुसैन (सुन्नी) , 5. मौलाना सैय्यद मुज़फ़्फ़र हुसैन ताहिर जरवली , 6. मौलाना सैय्यद कल्बे सादिक़ और 7. सैय्यद अशरफ़ हुसैन एडवोकेट

इस मुहायदे पर मज़कूरा नज़रबन्द सातों अशख़ास के अलावा मौलाना सआदत हुसैन , मौलाना मिर्ज़ा मोहम्मद आलिम , मौलाना सैय्यद अली नासिर सईद आबाक़ाती (आग़ा रूही) , हाजी वसी अहमद एहरारवी और हाजी अमीर सलोनवी के भी दस्तख़त हैं।

मुहायदे की क़ानूनी हैसियत –

इस मुहायदे की कोई क़ानूनी हैसियत नहीं है इस लिए कि –

1. फ़रीक़ैन (शिया , सुन्नी) की तरफ़ से जिन लीडरों ने जिस वक़्त इस मुहायदे (समझौते) पर दस्तख़त किये थे उस वक़्त इन लीडरों के पास इनकी क़ौम की तरफ़ से कोई मुख़तार नामा या ख़ुसूसी इजाज़त नामा नहीं था और न ही यह लीडरान दस्तूरे हिन्द की मौजूदा जमूरी व इन्तेख़ाबी आइने के तहत दोनों क़ौमों के चुने हुए नुमाइन्दे थे। वह इस अम्र के मजाज़ होते कि पूरी क़ौम की तरफ़ से किसी समझोते या मुहायदे पर दस्तख़त की ज़िम्मेदारी को सर अन्जाम देते। क़ानून की नज़र में ख़ुद साख़्ता नुमाइंदगी कोई माने नहीं रखती।

2. सरकार की तरफ़ से जो एलानिया शायां किया गया है उस में इस मुहायदे की मन्ज़ूरी का कोई एलान नहीं है यानि सरकार ने यह नहीं कहा कि वह इस मुहायदे को मन्ज़ूर करती है।

(आप ये किताब अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क पर पढ़ रहे है।)

3. सब से बड़ी ख़ामी इम मुहायदे में यह है कि सरकारी मुशाहेदीन की कोई ऐसी जमाअत नहीं बनायी गयी जो दोनों फ़िरक़ों की मज़हबी तक़रीबात में यह देखती कि कौन फ़िरक़ा किस फ़िरक़े की दिल आज़ारी कर रहा है या कौन फ़िरक़ा कोई नई जिद्दत कर रहा है। अगर सरकार की तरफ़ से ग़ैर जानिबदार मुशाहेदीन मुक़र्रर किये जाते और मौक़े पर उन्हें फ़ैसला करने और उसे फ़ौरी तौर पर ज़िला हुक्काम के ज़रिये नाफ़िस करने का हत्मी इख़तेयार दे दिया जाता तो यह बात अमनो आमान के मुस्तक़बिल के लिए कारगर साबित हो सकती थी।

क्या खोया क्या पाया –

इस मुहायदे के ज़ैल में शिया- सुन्नी दोनों फ़िरक़ों ने कामयाबी और नाकामयाबी के तअस्सुरात का इज़हार किया और काफ़ी दिनों तक इस पर तनक़ीदों तब्सेरा होता रहा लेकिन दरहक़ीक़त देखना यह चाहिए कि इस मुहायदे के बाद दोनों फ़िरक़ों ने क्या खोया और क्या पाया –

1. शियों ने अपना बुनियादी और मज़हबी हक़ क़रार दे कर शार ए आम पर तबर्रा पढ़ने का मुतालबा सरकार से भी नहीं किया अलबत्ता इसका मुतालबा उस वक़्त किया जब सुन्नियों की तरफ़ से जुलूसों और मीलादों में शियों की दिलाज़ारी के लिए दानिस्ता तौर पर मदहे सहाबा पढ़ी जाने लगी चुनान्चे शार ए आम पर तबर्रा न पढ़ने का मुहायदा कर के शियों ने कोई नई चीज़ नहीं खोयी और न सुन्नियों को इस एलान से कुछ हासिल हुआ।

2. जब तक मस्जिदों और इमामबाड़ों , घरों और दीगर प्राइवेट जगहों पर तबर्रा पढ़ने का सवाल है तो यह शिया उसी तरह आज़ाद हैं जिस तरह वह इस मुहायदे के पहले थे क्योंकि मुहायदे सिर्फ़ शार ए आम तक महदूद है और मस्जिदों और इमामबाड़ों या घरों वग़ैरह में तबर्रा पढ़ने या न पढ़ने में कोई वज़ाहत नहीं है।

3. मुहायदे की शर्तें मुअय्यन करते वक़्त सुन्नी लीडरों ने अपने जुलूस में मदहे सहाबा पढ़ने का कोई मुतालेबा नहीं किया और न ही उन सहाबा के नामों की कोई वज़ाहत की जिनकी शान में वह मदहे करना चाहते हैं। इसके सरीही मानें यह हैं कि वह अपने इस मुतालबे से दस्तबरदार हो गये और मुस्तक़बिल में उन्हें जुलूसे मदहे सहाबा के मुतालबे का हक़ नहीं रहा।

4. वहाबी सुन्नियों की तरफ़ से मदहे सहाबा की आढ़ में अहलेबैते रसूल स 0 (अ.स.) की शान में जो बत्तमीज़ियां और ग़ुस्ताख़ियां की जाती थीं वह इस मुहायदे की रूह से मुमकिन नहीं है।

5. मुहायदे की दफ़ा 10 इमामों के बाद वग़ैरह का लफ़्ज़ शियों के लिए यह गुन्जाइश पैदा करता है कि वह भी सहाबा व ताबेईन की मदहे कर सकते हैं।

6. इस मुहायदे में यह तज़किरा नहीं है कि शिया तहरीरी या तक़रीरी तौर पर ख़ोलफ़ाये सलासा की सीरत को तारीख़ की रोशनी में बयान नहीं कर सकते हैं।

1974 का फ़साद और मुहायदे की तजदीद –

शियों ने 1969 के मुहायदे पर पूरी तरह अमल किया और वह ज़िला हुक्काम के साथ वक़्तन फ़ौक़्तन ताव्वुन भी करते रहे लेकिन सुन्नियों की तरफ़ से इस मुहायदे की ख़िलाफ़ वर्ज़ियां बराबर होती रहीं , यहां तक कि उन्होंने मुताअद्दिद बार शहर में फ़ितना व फ़ासद बरपा करने की कोशीश भी की लेकिन ज़िला इन्तिज़ामियां की चौकसी की बिना पर नाकाम रहे। लेकिन इन नाकामियों के दौरान कुछ शर पसन्द लोग 1970 में एक शिया नौजवान लाडले मिर्ज़ा साकिन भदेवां में क़ातिलाना हमला कर के उसे मौत के घाट उतारने में कामयाब भी हुए।

पांच बरस की ख़ामोशी के बाद 16 मार्च 1974 चेहलुम के दिन फिर लखनऊ में उस वक़्त लूट मार और आतिशज़नी का बाज़ार गररम हो गया जब पाटानाला के सुन्नियों ने एक पुरअमन मातमी जुलूस पर जारहाना हमला कर दिया और इस में दो दर्जन शिया बहुत बुरी तरह ज़ख़्मी हो गये। उस वक़्त की बहुगुढ़ां सरकार ने हमलावरों पर क़ाबू तो पा लिया लेकिन हालात की कशीदगी छुटपुट वारदातों और ख़ौफ़ो वहशत का सिलसिला छह माह तक जारी रहा और शियों के जुलूस मुलतवी रहे यहां तक कि मिस्टर हेमवती नन्दन बहुगुड़ा ने वज़ीरे आला की हैसियत से दोनों फ़िरक़ों के लीडरों को तलब किया और अमन की बहाली के लिए उन से गुफ़्तगू की चुनान्चे उस गुफ़्तगू के ज़ैल में एक दूसरा मुहायदा अमल में आया जिसका उर्दू तरजुमा मुन्दरजा ज़ैल है –

1. शिया और सुन्नी 1969 में किये गये मुहायदे पर अमल करेंगे लेकिन शियों को अपने इन मज़हबी जुलूसों पर कुछ पाबन्दी आयद करना होगी जो पाटानाला और पुल ग़ुलाम हुसैन से हो कर गुज़रते हैं।

2. जुलूस में जाने वालों की तादात और जुलूस का वक़्त उस के निकालने का तरीक़ा मुअय्यन होगा।

3. इन जुलूसों पर आगे लगायी जाने वाली पाबन्दी के बारे में तफ़सील और तरीक़ा लखनऊ के ज़िला हुक्काम वक़्तन फ़ौक़्तन मौजूदा सूरते हाल के तहत तय करेंगे और ज़िला हुक्काम का यह फ़ैसला दोनों फ़िरक़ों को मानना पड़ेगा।

1977 का फ़साद –

जब तक हेमवती नन्दन बहुगुड़ां की सरकार रही उस वक़्त तक लखनऊ में शिया सुन्नी झगड़ा नहीं हुआ लेकिन जब हिन्दुस्तान में इमेर्जेंसी का नेफ़ाज़ अमल में आया और वज़ीरे आज़म मिसिस इन्दिरा गांधी के साहबज़ादे मिस्टर संजय गांधी और मिस्टर बहुगुंड़ा के दरमियान सियासी इख़्तिलाफ़ात की वजह से बहुगुडां सरकार ख़त्म हो गयी तो शहर का वहाबी तबक़ा एक मरतबा फिर सरगर्मे अमल हो गया यह तक कि 3 मार्च 1977 को ऐन बारह वफ़ात के दिन फ़साद की आग फिर भड़क उठी। बलवाईयों ने इस मरतबा विक्टोरिया गंज में वाक़ा ए शाहीख़ैरातख़ाना को अपना निशाना बनाया जो ग़रीब बेवाओं और लावारिस औरतों की पनाह गाह है। हमलावरों ने इस ख़ैरात ख़ाने पर चारों तरफ़ से हमला कर के बेवाओं और लावारिस औरतों का सामान लूटा और उन्हें बुरी तरह मारा और कई घरों में आग लगा दी इसी तरह की शख़ावत और बरबरियत का मुज़ाहेरा दूसरे इलाक़ों में किया गया।

इसी साल 23 मार्च को दूसरा हमला अन्जुमन सदर मातम शाहे इन्सोंजां पर किया गया जो नौचन्दी जुमेरात की वजह से अपने अलमे मुबारक के साथ पुल ग़ुलाम हुसैन से गुज़री थी चुनान्चे बहुत से लोग ज़ख़्मी हुए और देखते ही देखते पूरे शहर में फ़साद की आग भड़क उठी। हुक्काम ने कर्फ़्यू नाफ़िस कर के हालात को क़ाबू में किया लेकिन इसी कर्फ़्यू के दौरान रामगंज के वहाबियों ने हुसैनाबाद पुलिस चौकी के सामने डा 0 रईस आग़ा नामी एक शिया समाजी कारकुन को चाकुओं से मौत के घाट उतार दिया जिससे हालात मज़ीद बदतर हुए लेकिन शियों ने सब्र व तहम्मुल का मुज़ाहेरा किया और क़दम क़दम पर ज़िला हुक्काम के साथ अमन की बहाली में लगे रहे।

जुलूस हाय अज़ा पर पाबन्दी –

23 मार्च 1977 के इस फ़साद के बाद इसी सियासी दबाव के तहत अज़ादारी के तमाम जुलूसों पर हुकूमत की तरफ़ से ग़ैरे मुअय्येना मुद्दत के लिए पाबन्दी लगा दी गयी जिसका कोई जवाज़ नहीं था।

इस ग़ैरे आयनी व ग़ैरे पाबन्दी के ख़िलाफ़ शिया लीडरों ने बार बार हुकूमत से राबता क़ायम कर के एहतेजाज किया लेकिन जब कोई नतीजा बरामद न हुआ तो इदारा ए तन्ज़ीम मिल्लत के ज़ेरे एहतेमाम इमामबाड़े में एक जलसा ए आम का इन्ऐक़ाद किया गया और जलसे के एहतेमाम पर 21 जुलाई 1977 से 24 जुलाई 1977 तक शियों की तरफ़ से बड़ी तादात में एहतेजाजी गिरफ़्तारियां पेश की गयीं।

माहे रमज़ानुल मुबारक का भयानक फ़साद –

सैय्यद अली ज़हीर साहब साबिक़ वज़ीरे क़ानून के ज़ेरे सदारत 18 सितम्बर 1977 को इमामबाड़े आसफ़ी में शियों का एक बहुत बड़ा जलसा हुआ और उस में यह तय किया गया कि अगर हुकूमत जुलूस हाय अज़ा पर लगी पाबन्दी को नहीं ख़त्म करती तो माहे शव्वाल की नौचन्दी से जेल भरों आन्दोलन माहे ज़ीक़ाद में काउन्सिल हाउस के सामने धरना और भूख हड़ताल और माह ज़िलहिज से मुल्कगीर तहरीक शुरू की जायेगी लेकिन इसी दौरान वज़ीरे आज़म मिस्टर मोरारजी देसाई इत्तेफ़ाक़ से लखनऊ आये और शिया लीडरों ने उन से मिल कर लखनऊ के शिया सुन्नी मसाएल और हालात से उन्हें आगाह करते हुए जुलूस हाय अज़ा से पाबन्दी हटाने और शियों के रूके हुए जुलूसों को उठवाने का मुतालबा किया। वज़ीरे आज़म ने शिया लीडरों की बातों को हमदर्दी से सुना और वज़ीरे आला राम नरेश यादव से गुफ़्तगू के बाद उन्हें हुक्म दिया कि 21 रमज़ानुल मुबारक को हज़रत अली (अ.स.) के यौमे शहादत पर शियों के जुलूस उठा दिये जायें चुनान्चे वज़ीरे आज़म के जाने के बाद वज़ीरे आला ने पुलिस व ज़िला इन्तिज़ामियां की एक मीटिंग में यह हिदायत दी कि हज़रत अली (अ.स.) की शहदत के मौक़े पर 21 रमज़ान को शियों के जुलूस उठवा दिये जायें।

इस मौक़े पर ज़िला हुक्काम ने एहतियाती तदबीर के तहत शहर के तमाम हस्सास इलाक़ों में ज़बरदस्त पुलिस और पी 0 ए 0 सी 0 का इन्तिज़ाम किया कि कोई नाख़ुशगवार वाक़ेया न होने पाये। चुनान्चे 28 सितम्बर 1977 को सुबह 4 बजे नजफ़ से हज़रत अली (अ.स.) का वह ताबूत जिसके बानी हसन मिर्ज़ा थे उठा के अपने रवायती शान व शौकत के साथ करबला ताल कटोरा के लिए रवाना हो गया। इस के बाद दिगर मक़ाम से ताबूत बरामद हो कर शिया सोगवारों का कसीर मजमा इन ताबूतों के साथ बड़े पुरसुकून और पुरअमन अन्दाज़ में करबला तालकटोरा की तरफ़ बढ़ रहा था कि अचानक बिल्लौचपुरा के चौराहे पर वहाबियों का एक बहुत बड़ा हुजूम शियों पर हमलाआवर हुआ और देखते ही देखते शहर का काफ़ी हिस्सा फ़साद की लपेट में आ गया और लखनऊ की सरज़मीन एक बार फिर शियों के हक़ में क़त्लगाह बन गयी।

इस मरतबा वहाबी सुन्नियों ने बहुत ख़ुफ़िया तरीक़े से फ़साद की स्कीम तैयार की थी और लूट मार और क़त्ल व ग़ारत के लिए बाहर से गुण्डे व बदमाश व पेशावर क़ातिल बुलाये गये थे जिसके नतीजे में शियों को काफ़ी जानी व माली नुक़सान से दो चार होना पड़ा।

ज़िला हुक्काम की ज़बरदस्ती कोशिशों पुलिस व पी 0 ए 0 सी 0 की मुस्तैदी और सख़्त कर्फ़्यू के बावजूद 18 अक्टूबर 1977 तक आगज़नी छुरेबाज़ी और क़त्ल की छुटपुट वारदातें होती रहीं। इस फ़साद के मुख़तलिफ़ मरहलों में जो शिया मारे गये हैं उनके नामों की फ़ेहरिस्त मुन्दरजा ज़ैल है –

1. मिर्ज़ा मोहम्मद अक़ील , मुफ़्तीगंज

2. बशारत हुसैन , गढ़ी पीर ख़ान

3. क़ारी हसन रज़ा , कंघी वाली गली

4. इक़बाल हुसैन , भदेवां

5. अकबर हुसैन , भदेवां

6. तक़ी हुसैन , हैदरगंज

7. बादशाह हुसैन उर्फ़ बाबू मियां , मशकगंज

8. मक़सूद हुसैन , कश्मीरी मोहल्ला

9. हैदर अब्बास , कटरा अबू तुराब खां

10. सज्जाद हुसैन , कटरा आज़म ख़ां

11. सख़ी हुसैन , झवांइ टोला

12. असरारूल हसन , चिकमण्डी

13. नईम अब्बास , नज़रबाग़ , कानपुर

फ़ैसला कुन एक़दाम –

29 ज़िल्हिज्जा 12 दिसम्बर इमामबाड़ा आसफ़ी में शियों का जलसा ए आम हुआ और उसमें बिलाइत्तेफ़ाक़े राय मुन्दरजा तजावीज़ पास की गयीं –

1. शिया एहतेजाजन उस वक़्त तक अज़ादारी के जुलूस नहीं निकालेंगे जब तक हुकूमत जुलूस हाय अज़ा पर लगी पाबन्दी को ख़त्म नहीं करतीं।

2. शिया मदहे सहाबा किसी क़ीमत पर बर्दाश्त नहों करेंगे और अगर वहाबी सुन्नी सरकारी इजाज़त के बग़ैर शहर में किसी हिस्से से जुलूसे मदहे सहाबा निकालेंगे तो शिया भी इन जुलूसों के जवाब में तबर्रा का जुलूस निकालेंगे।

3. मौजूदा हुकूमत अम्नो अमान और नज़्म व नस्क़ क़ायम करने में नाकाम रही है और सियासी व समाजी दबाव के तहत शर पसन्दों और क़ानून शिकनी करने वालों की हौसला अफ़ज़ायी कर रही है।

इल्तवा का ऐलान –

मौलाना सैय्यद कल्बे आबिद साहब क़िब्ला ने जुलूस हाय अज़ा या मजलिस को मुलतवी किये जाने के इस फ़ैसले से मुत्तफ़ेक़ नहीं थे लेकिन इस के बावजूद शिया क़ौम के कुछ मसलहत परवर लीडरों ने जो ज़िला हुक्काम के ताबा व फ़रमाबरदार थे मौलाना मौसूफ़ की तरफ़ से ख़ुफ़िया तौर पर एक प्रेस नोट जारी कर दिया कि –

शिया लखनऊ के जलसा ए आम मुनअक़िदा इमामबाड़ा आसफ़ी में इत्तेफ़ाक़े राय से यह तय पाया है कि हुकूमत के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ कि जुलूस हाय अज़ा को उठाने के लिए कुछ नाक़ाबिले क़ुबूल शरायत मन्ज़ूर करना लाज़मी हैं। शियाने लखनऊ अय्यामे अज़ा के तमाम उमूमी मरासिम अज़ादारी की बजाअवरी को मुलतवी करते हैं। इस फ़ैसले के मुताबिक़ हुसैनियां गुफ़रानमाब में मुनअक़िद होने वाली मजलिस बेशमोल मजलिस शाम ए ग़रीबां जो आल इण्डिया रेडियो से रिले होती है इस साल मुलतवी की जाती है।

मौलाना सैय्यद कल्बे आबिद साहब क़िब्ला ने जाने किस मजबूरी या दबाव की बिना पर इस ऐलान की तरदीद नहीं कर सके जिस का नतीजा यह हुआ कि दो साल पुरानी एक रिवायत इस वक़्त टूट गयी जब इमामबाड़ा आसफ़ी से पहली मोहर्रम को निकलने वाली शाही ज़री भी नहीं निकाली गयी। यक़ीनन यह मसलहत बिनी और दूरअन्देशी के ख़िलाफ़ ऐसा ग़लत एक़दाम था जिस का ख़िमयाज़ा आज पूरी शिया क़ौम अज़ादारी पर आयद शुदा पाबन्दी की शक्ल में भुगत रही है।

शिया एक्शन कमेटी का एक़दाम और धरना –

कौमी मुजाहिद शेख़ अमीर अहमद की तहरीक व तजवीज़ पर पहली मोहर्रमुल हराम 1398 हिजरी , 19 दिस्मबर , 1977 को शिया क़ायदीन और इदारों के ओहदेदारों पर मुशतमिल शिया एक्शन कमेटी का क़याम अमल में लाया गया और इसी रोज़ इमामबाड़े नाज़िम साहब में एक जलसा ए आम का इन्एक़ाद कर के यह फ़ैसला किया गया कि अज़ादारी के जुलूसों पर आयदशुदा ग़ैरक़ानूनी पाबन्दी के ख़िलाफ़ दूसरी मोहर्रम 14 दिसम्बर से काउन्सिल हाउस के सामने धरने और अलामती भूख हड़तालों का सिलसिला शुरू किया जायेगा। चुनान्चे वक़्ते मुअय्ययेना पर हज़ारों लोग धरने और भूख हड़ताल पर बैठ गये और यह सिलसिला मजलिस व मातम नेज़ शिया लीड़रों की तक़रीरों के साथ साथ नवीं मोहर्रम की शब में ग्यारह बजे तक जारी रहा और रोज़ाना हज़ारों की तादाद में शियों ने अमली तौर पर इस तहरीक में हिस्सा लिया।

यौम ए आशूरा और गिरफ़्तारियां –

आशूर 1398 का सोगवार सूरज तुलूअ हो चुका था। शियों के एहसासात व जज़बात मातम व सीनाज़नी के लिये इन के दिलों में घुट घुट कर करवटें बदल रहे थे आंखें अश्कबार थी। तमाम इमामबाड़े वीरान व सुनसान नज़र आ रहे थे अज़ाख़ानों पर हसरत व उदासी बरस रही थी और मज़लूमे करबला के अज़ादार ख़ून के आंसू रो रहे थे। यह सब इस लिये था कि एक तरफ़ इल्तवा ए मरासिम ए अज़ा की कशमाकश थी तो दूसरी तरफ़ मोमेनीन को अज़ादारी पर लगी सरकारी पाबन्दी ने बेबस व मजबूर कर रखा था चुनान्चे इन हालात के पेशेनज़र शिया क़ायदीन ने मुत्तफ़ेक़ा तौर पर यह फ़ैसला किया कि आज हम अपने हुक़ूक़ की बाज़याबी के लिए इमामबाड़ा ए आसफ़ी से ग़ैर मुअय्ययेना तादाद में गिरफ़्तारियां पेश करेंगे।

इस ऐलान का होना था कि लखनऊ के शिया चारों तरफ़ से उमंड़ पड़े और देखते ही देखते इमामबाड़ा आसफ़ी में दो लाख शियों का मजमा इकट्ठा हो गया और या हुसैन , या हुसैन की सदाओं से शहर की फ़िज़ा गूंजने लगी इस कसीर तादाद मजमे में मर्द , औरत , बच्चे , बूढ़े और जवान सभी शामिल थे।

दूसरी तरफ़ हुक्कामे ज़िला को जब यह ख़बर मालूम हुई तो वह भी बौख़ला गया। उन्होंने शिया क़ायदीन से राब्ता क़ायम कर के सूरते हाल का जायज़ा लिया और इस के बाद शहर में आने जाने वाली तमाम गाड़ियों , रोड़ों पर की बसों और पुलिस व पी 0 ए 0 सी 0 के ट्रकों का रूख़ इमामबाड़ा ए आसफ़ी की तरफ़ मोड़ दिया गया ताकि गिरफ़्तारियां पेश करने वालों को ले जाया जा सके। इस मौक़े पर पी 0 ए 0 सी 0 अफ़सरान की तादाद कितनी थी इस का अन्दादाज़ा नहीं किया जा सकता।

बहरहाल इमामबाड़ा आसफ़ी में एक मुख़तसर सी मजलिस के बाद पहले दौर में मुजाहिदे मिल्लत सैय्यद अशरफ़ हुसैन की क़यादत में मोमेनीन का जो जत्था मातम व सीनाज़नी करता हुआ इमामबाड़े के बैरूनी गेट से बरामद हुआ वह तक़रीबन ( 80) अस्सी हज़ार शियों पर मुश्तमिल था। बाहर ट्रक पर तैनात ज़िला इन्तिज़ामिया के अफ़सरान व हुक्काम और पुलिस व पी 0 ए 0 सी 0 के हज़ारों नौजवान इस जत्थे को देख कर घबरा गये लेकिन जब उन्होंने इन मातमदारों के बेमिसाल नज़्म व नस्क़ व डिसप्लिन , तहज़ीब व शाएस्तगी और मज़हबी जोश व ख़रोश को देखा तो उनके हैरत व इस्तेजाब की कोई इन्तेहा न रही। वह लोग मबहूत व हैरतज़दा हो कर सकते के आलम में इस कसीर मजमे को जिन में छोटे छोटे बच्चे , बूढ़े और जवान सभी शामिल थे पुलिस की गाड़ियों की तरफ़ गिरफ़्तारियां देने के लिये अज़ ख़ुद बढ़ते देख रहे थे और उनकी तारीफ़ व सताइश कर रहे थे बाज़ अफ़सरान की आंखें नम थीं और बाज़ आंखें छलक रहीं थीं।

मोमेनीन की इस तादाद को देखते हुए पुलिस व इन्तिज़ामियां की तरफ़ से फ़ौरी तौर पर मुहय्या की गयी 65 गाड़ियां कुछ भी न थीं। आनन फ़ानन में वह छतों तक भर गयीं इस के बाद भी लाखों का बेक़रार मजमा सड़क पर मातम व सीना ज़नी करता रहा और जब हुक्काम ए ज़िला ने मज़ीद गाड़ियों के सिलसिले में माज़रत की तो यही मजमा पुलिस लाइन की तरफ़ बढ़ने लगा। इस कैफ़ियत को देख कर ज़िला हुक्काम बेहत परेशान हो गये और उन्होंने इस बढ़ते हुए सैलाब को रोकने के लिए ख़ुशामद दरामद कर के मौलाना सैय्यद कल्बे आबिद साहब क़िब्ला का सहारा लिया। चुनान्चे मौलाना की एक आवाज़ पर मोमेनीन के बढ़ते हुए क़दम रुक गये और लोग अपने अपने घरों की तरफ़ वापस होने लगे। जिन लोगों ने गिरफ़्तारियां दी थीं उन्हें भी दो बजे रात में उनके घरों तक सरकारी गाड़ियों से यह कह कर पहुंचा दिया गया कि जेल में जगह नहीं है।

शिया मंच की कोशिश –

जब जुलूस हाय अज़ा पर आयद शुदा पाबन्दी को चौदह साल गुज़र गये और मुसलसल जद्दो जेहद के बाद वुजूदे पाबन्दी ख़त्म किये जाने के बारे में कोई फ़ैसला न हो सका। नेज़ मिस्टर अटल बिहारी वाजपेयी , लखनऊ पार्लियामेंटरी हल्क़ा ए इन्तेख़ाबी से पहली बार पार्लियामेंट के मेम्बर चुने गये और यू 0 पी 0 में इन की पार्टी बरसरे इक़तेदार हुई तो मुझ हक़ीर ने शिया मंच की तरफ़ से बहैसियत जनरल सेक्रेटरी और मिस्टर हसन लखनवी ने बहैसियत सदर 7 जुलाई 1991 (इतवार) को आल इण्डिया शिया यतीम ख़ाना , काज़मैन रोड , लखनऊ में उन्हें एक इस्तेक़बालिया दिया जिस में उन के साथ मुताद्दिद तुज़रा यू 0 पी 0 भारतीय जनता पार्टी के सदर कलराज मिश्र और अक़लियती इदारे के सदर मिस्टर तनवीर उस्मानी भी तशरीफ़ लाये। नेज़ तक़रीबन दस हज़ार शिया और पांच सौ हिन्दुओं पर मुशतमिल मनमदा के साथ कई मेम्बराने इसेम्बली भी इस मौक़े पर मौजूद थे और इस इस्तेक़बालिया जलसे की सदारत मौलाना सैय्यद ज़ाहिद अहमद साहब क़िबला फ़रमा रहे थे।

चुनान्चे मैंने अपनी मुख़तसर सी इस्तेक़बालिया तक़रीर के दौरान मज़कूरा तमाम हज़रात की मौजूदगी में मिस्टर अटल बिहारी वाजपेयी को साबेक़ा हुकूमत की तरफ़ से जुलूस हाय अज़ा पर नाफ़िसशुदा पाबन्दी की तरफ़ मुतावज्जे किया और इस सिलसिले में एक तहरीर मेमोरेन्डम इन की ख़िदमत में पेश करते हुए इन से अपील की कि वह अपने असरात व रुसूख़ को बरूएकार ला कर इस पाबन्दी को ख़त्म करायें।

मिस्टर वाजपेयी ने दस हज़ार शियों के सामने अपनी तक़रीर के दौरान यह एतेराफ़ किया कि साबिक़ हुकूमत की तरफ़ से शियों के जुलूसों पर लगी यह आयद शुदा पाबन्दी उसूलन ग़ैर क़ानूनी है और उन्होंने यह वादा किया कि मिस्टर कल्याण सिंघ वज़ीरे आला से गुफ़्तगू कर के बारे में मालूमात फ़राहम करेंगे और इसे ख़त्म करने की कोशीश करेंगे क्योंकि अज़ादारी के जुलूस सिर्फ़ शियों ही के मज़हबी जुलूस नहीं हैं बल्कि यह लखनवी तहज़ीब व तमद्दुन का आइना है और इन्हें हिन्दु फ़िर्क़ा भी इन्तेहायी अक़ीदत व एहतेराम के साथ अन्जाम देता है।

(आप ये किताब अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क पर पढ़ रहे है।)


मौलाना सैय्यद ज़ाहिद अहमद साहब क़िब्ला का एक़दाम –

जुलूस हाय अज़ा की बहाली के सिलसिले में की गयी शिया मंच की इस कोशीश को मौलाना सैय्यद ज़ाहिद अहमद साहब क़िब्ला ने अपने ज़ाती असरात की बुनियाद पर कुछ और बढ़ाया।

मौलाना मौसूफ़ ने दिल्ली के कुछ मोअज़्ज़िज़ तरीन शियों और कुछ मुमताज़ सियासी शख़्सियतों को अपने हमराह ले कर मिस्टर लाल कृष्ण आडवानी और मिस्टर सिकन्दर बख़्त वग़ैरह की रिहायशगाहों पर उन से मुलाक़ात की और सख़्ती से जुलूस हाय अज़ा की बहाली का मुतालिबा किया यहां तक कि मौलाना ने भा 0 ज 0 पा 0 के सेन्ट्रल आफ़िस में मजलिस व मातम का इन्एक़ाद कर के मिस्टर कल्याण सिंघ वज़ीरे आला यू 0 पी 0 को भी इस बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया।

दिल्ली से लखनऊ वापसी पर मौलाना मौसूफ़ मिस्टर अटल बिहारी वाजपेयी , मिस्टर लाल जी टन्डन और वज़ीरे आला कल्याण सिंघ से भी मिले नतीजा यह हुआ कि मौलाना की यह कोशीश बारावर हुई और मुख़तलिफ़ सरकारी मीटिंगों के बाद मिस्टर कल्याण सिंघ ने यह फ़ैसला किया कि अज़ादारी के जुलूसों पर साबेक़ा हुकूमतों की तरफ़ से लगायी गयी पैबन्दी चूंकि ग़लत और नाजायज़ है इस लिये इसे ख़त्म कर के शियों को उन का हक़ दे दिया जाये। मगर अफ़सोस कि कुछ मसलेहत परवर शिया उलमा ही ने इन तमाम कोशिशों और कार्यवाहियों पर यह कह कर पानी फेर दिया कि भा 0 ज 0 पा 0 चूंकि एक फ़िर्क़ा परस्त और मुस्लिमकश जमात है लिहाज़ा अगर इस के दौर ए इक़्तेदार में जुलूस हाय अज़ा उठे तो फ़साद हो जायेगा।

वाक़यात ए ख़ुदसोज़ी –

लखनऊ में जुलूस हाय अज़ा पर गर्वनमेंट की तरफ़ से आयद शुदा पाबन्दी का बीसवां ( 20) साल शुरू हुआ तो इमाम हुसैन (अ.स.) के कुछ जांनिसारों ने उलमा ए कराम से मशविरे के बग़ैर एक अन्जुमन कारवाना ए हयात की ज़ेरेएहतेमाम इस पाबन्दी के ख़िलाफ़ ग़ैर मोअय्येना मुद्दत की अलामती भूख हड़ताल का एक प्रोग्राम किया और इस प्रोग्राम के तहत 10 अप्रैल 1997 से दरगाह हज़रत अब्बास (अ.स.) रोड पर अलामती भूख हड़ताल शुरू कर दी गयी लेकिन इस मुख़ल्लेसाना एहतेजाजी तहरीक के ज़ैल में 13 अप्रैल 1997 को एक इन्तेहायी करबआमेज़ वाक़ेया यह पेश आया कि मोहम्मद हुसैन उर्फ़ बब्बू और यूसुफ़ हुसैन उर्फ़ भोपाली नाम के जज़बाती नौजवानों ने जुलूस हाय अज़ा की बहाली के बुतालिबे के तहत ख़ुदसोज़ी कर ली। बुरी तरह से जले और झुलसे नौजवानों को फ़ौरी तौर पर मेडिकल कालेज ले जाया गया जहां से बेहतर इलाज की सहूलत के पेशे नज़र वह दोनों संजय गांधी मेडिकल इंस्टीट्यूट (पीजीआई) मुन्तक़िल कर दिये गये लेकिन इन्तेहायी नाज़ुक हालत की बिना पर वहां के डाक्टर भी हिम्मत छोड़ बैठे और उन्होंने इन दोनों जवानों को दिल्ली ले जाने का मशविरा दिया चुनान्चे वह दोनों दिल्ली ले जाये गये और वहीं उन दोनों की शम्मा ए हयात गुल हो गयी।

इस ग़ैर मुतावक़्क़े , ग़ैर मामूली क़ुरबानी ने सिर्फ़ अलामती भूख हड़ताल की इस तहरीक को नया मोड़ दे कर आसमान पर पहुंचाया बल्कि शियों के एहसासात को भी बुरी तरह झिंझोड़ कर रख दिया। चुनान्चे इस वाक़्ये ख़ुदसोज़ी के बाद लोगों के दिलों में भरपूर जोश व वलवला पैदा हो गया और इस दिन बरादरम बाक़र अली ख़ां रविश लखनऊ ने हल मिन नासेरिन यनसुरना की उनवान से एक पम्फ़लेट अवाम में तक़सीम कर के दरगाह हज़रत अब्बास (अ.स.) में मोमेनीन का एक जलसा तलब किया और डेढ बजे रात में तमाम शिया उलमा से राबता क़ायम कर के उन्हें मुत्तहिद होने और इस तहरीक में शामिल होने की दावत दी।

उलमा ए कराम अभी किसी ठोस लह ए अमल के बारे में ग़ौर व फ़िक्र कर ही रहे थे कि 16 अप्रैल 1997 को एक तीसरे नौजवान इशरत अल्ताफ़ उर्फ़ गुड्डू ने भी अज़ादारी के नाम पर ख़ुदसोज़ी कर ली और दूसरे या तीसरे दिन लखनऊ में इलाज के दौरान वह भी चल बसा।

इधर बब्बू और भोपाली की लाशों को दिल्ली से लखनऊ लाने की शिया क़यादत के मुतालिबे पर हुकूमत का रवैया धोकेबाज़ी का रहा वह यक़ीन दिलाती रही कि मरहूमीन की लाशें लखनऊ लायी जा रही हैं मगर इन्हें ख़ामोशी से बघरा ज़िला मुज़फ़्फ़र नगर में दफ़्न कर दिया गया। इस सूरते हाल ने पूरी शिया क़ौम में ग़म व ग़ुस्से की एक लहर पैदा कर दी और मर्द व औरत , बूढ़े , बच्चे जवान सब के सब सर से कफ़न बांध कर मैदान में आने पर तैयार हो गये और शिया क़यादत ने हुकूमत को अल्टीमेटम दिया कि बक़रीद की नमाज़ के बाद बड़े इमामबाड़े से छोटे इमामबाड़े तक एहतेजाजी जुलूस निकाला जायेगा , अगर हुकूमत रोक सकती हो तो रोके।

इस अल्टीमेटम में इतना वेक़ार व एतेमाद था कि हुकूमत का सारा ग़ुरूर चकना चूर हो गया। इसने ज़िला हुक्काम और पुलिस अफ़सरान को यह अहकामात जारी किये कि अगर शिया फ़िर्क़ा किसी तरह का कोई भी जुलूस निकालने की कोशीश करे तो इसे सख़्ती से कुचल दिया जाये। चुनान्चे 9 ज़िलहिज्जा की रात में आसफ़ी इमामबाड़े को चारों तरफ़ से घेर लिया गया रास्ते सील कर दिये गये बड़े इमामबाड़े से छोटे इमामबाड़े तक शाही सड़क को कई जगह बल्लियों के ज़रिये मुस्तहकम रुकावटें पैदा कर दी गयीं ताकि मजमा आगे न बढ़ सके और मसला पुलिस पी 0 ए 0 सी 0 नेज़नीम फ़ौजी दस्तों का एक जाल बिछा दिया गया।

मोहतरमा मायावती वज़ीरे आला हुक्म हाकिम व अफ़सरान से बराबर राब्ता किये हुये थीं और हुक्काम इस इंतिज़ार में थे कि बक़रीद की नमाज़ तमाम होने पर मजमा जैसे ही बाहर सड़क पर निकले वैसे ही वह इस पर ज़ुल्मों सीतम शुरू कर दें लेकिन जब मरदों , औरतों औऱ बच्चों पर मुशतमिल तक़रीबन दो लाख का मजमा मोहतरमा मायावती की सारी कोशिशों को रौंदता हुआ अलमें मुबारक के साथ इमामबाड़े के बाहर आया तो हाकिम व अफ़सरान हैरत से एक दूसरे का मुंह तकते रह गये। पुलिस व पी 0 ए 0 सी 0 की राइफ़लें झुक गयीं और सारी रूकावटें और बंदिशें टूट गयीं और अलमे मुबारक अपनी शाने बेनियाज़ी के साथ जांबाज़ मोमेनीन के झुरमुट में छोटे इमामबाड़े तक पहुंच गया। यह मायावती सरकार की पहली शिकस्त फ़ाश थी और इस जुलूस की क़यादत उलमा ए कराम फ़रमा रहे थे।

इस अज़ीम कामयाबी के बाद अन्जुमन कारवाना ए हयात के ज़ेरेएहतेमाम शुरू की गयी तहरीक पर भरपूर जवानी आ गयी। शहर की तमाम अन्जुमनें शिया वकील , शिया शोअरा और तमाम उलमा व ज़ाकेरीन सब के सब इस तहरीक में शामिल हो गये और दरगाह हज़रत अब्बास रोड़ पर धने अलामती भूख हड़ताल और मजलिस व मातम का एक सिलसिला इस अन्दाज़ से आगे बढ़ा कि मोहतरमा मायावती सरकार को पसीने आने लगे यहां तक कि वह शियों की इस तहरीक के सामने घुटने टेकने पर मजबूर हो गयीं। आख़िरकार उन्होंने सरकारी सतह की एक दोरूकनी कमेटी तशकील दे कर शियों के जुलूसों के मामले को इस के हवाले कर दिया ताकि वह अपनी रिपोर्ट की रोशनी में किसी हतमी फ़ैसले की सिफ़ारिश कर सकें। इस वक़्त यह दो रूकनी कमेटी मिस्टर आर 0 के 0 चौधरी और मिस्टर लाल जी टन्डन नगर विकास मंत्री पर मुशतमिल थी।

लखनऊ के फ़ितना परदाज़ वहाबियों को जब इस सरकारी कमेटी के क़याम का पता चला तो वह भी बेचैन हो गये और उन्होंने कमेटी के मेम्बरान से अज़ ख़ुद राब्ता क़ायम कर के क़ज़ीया ए मदहे सहाबा को उभारा और इस सिलसिले में अपनी सरगर्मियां तेज़ कर दीं। लुत्फ़ की बात तो यह है कि एक तरफ़ वहाबी रहनुमा इस कमेटी के दोनों मेम्बरान को अपने ग़लत मौक़ूफ़ के शीशे में उतारने की कोशिशों में दिलोजान से मसरूफ़ थे और दूसरी तरफ़ शिया क़यादत इस ख़ुश फ़हमी के तहत मुतमइन थी कि कमेटी को ग़रज़ होगी तो वह ख़ुद ही इस से राब्ता क़ायम करेगी।

मौलाना ज़ाहिद हुसैन साहब क़िब्ला इस मौक़े पर हज के लिये तशरीफ़ ले गये थे जब वह वापस आये और उन्हें हालात की नज़ाकत का इल्म हुआ तो उन्होंने मिस्टर लाल जी टन्डन से मिल कर इन की सरकारी रिहाइशगाह पर शिया क़ायदीन से गुफ़्तगू के लिये एक मीटिंग का एहतेमाम किया जिस में मौलाना हमीदुल हसन साहब , मौलाना मिर्ज़ा मोहम्मद अतहर साहब , मौलाना सैय्यद अली नासिर सईद आबाक़ाती आग़ा रूही साहब , मौलाना ज़हीर अहमद इफ़्तेख़ारी साहब के साथ दीगर उलमा व ज़ाकेरीन शरीक हुए और गुफ़्तुगू का सिलसिला चार घंटे तक जारी रहा। यहां तक कि इस मीटिंग के एहतेमाम पर मिस्टर लाल जी टन्डन ने ज़िला इन्तिज़ामिया के इन आला हुक्काम व अफ़सरान को जो वहां मौजूद आशरा ए मोहर्रम के दौरान माक़ूल इन्तिज़ामात की हिदायतें दीं और यह हुक्म दिया कि शियों को परेशान न किया जाये। इस के बाद मौलाना सैय्यद ज़ाहिद अहमद साहब क़िब्ला बग़रज़ ज़ियारत ईरान और ईराक़ के सफ़र पर रवाना हो गये और जारी शुदा तहरीक के मुख़तलिफ़ मरहलों से गुज़र कर माहे मोहर्रम तमाम हो गया।

मौलाना सैय्यद कल्बे जव्वाद साहब क़िब्ला की क़यादत –

मौलाना सैय्यद कल्बे जव्वाद साहब क़िब्ला की क़यादत में शियों की इस तहरीक को उस वक़्त एक नये मोड़ पर ले आयी जब उनकी दावत पर मौलाना अब्दुल्ला बुख़ारी साहब और दिल्ली शिया मस्जिद के शाही इमाम मौलाना सैय्यद अली साहब तक़वी शियों की हिमायत में दिल्ली से लखनऊ तशरीफ़ लाये और मौलाना बुख़ारी और मौलवी अब्दुल अलीम फ़ारूक़ी के दरमियान अज़ादारी और मदहे सहाबा के मसले पर 1 जून 1997 को हाजी ग़ुलाम हुसैन की रिहायिशगाह पर अच्छी ख़ासी झड़प हो गयी। इस ग़ैर मुतावक़्क़े झड़प तल्ख़ कलामी और तूतू मैंमैं की बुनियादी वजह यह थी कि मौलाना अब्दुल्लाह बुख़ारी ने मौलवी अब्दुल अलीम फ़ारूख़ी से पूछा कि क्या शिया मुसलमान नहीं हैं तो जवाब में उन्होंने शियों को मुसलमान मानने पर साफ़ तौर पर इन्कार कर दिया इस पर बुख़ारी साहब ने मौलवी अब्दुल अलीम की सरज़निश करते हुए फ़रमाया कि आप का यह अहमक़ाना नज़रिया आप को मुबारक यह बात अच्छी तरह समझ लीजिए कि मैं जब यहां आयां हूं तो शियों के जुलूसों को उठवा कर रहूंगा। अब रह गया मदहे सहाबा का मसला तो वह सुन्नियों का कोई मज़हबी जुज़ नहीं है।

मौलाना बुख़ारी की इस गुफ़्तुगू की ख़बर ने ज़िला हुक्काम को भी परेशानी में मुबतेला कर दिया चुनान्चे वज़ीरे आला मिस मायावती को मुत्तेला किया और तीन जून 1997 को वज़ीरे आला के हुक्म से मौलाना अब्दुल्लाह बुख़ारी और मौलाना सैय्यद कल्बे जव्वाद सहित तक़रीबन डेढ़ दर्जन मुअज़्ज़िज़ शिया व सुन्नी शख़्सियतों को हिरासत में ले लिया गया। इस गिरफ़्तारी की ख़बर जब जंगल की आग की तरह शहर में फैली तो हर शिया व सुन्नी अज़ादार घर से बाहर निकल पड़ा देखते ही देखते बाज़ार बन्द हो गये , सड़के जाम कर दी गयें और हर दरो दीवार से या हुसैन की सदायें टकराने लगीं। हज़ारों का मजमा एहतेजाज करता हुआ विधान सभा के गेट पर पहुंच गया और शहर में कशीदगी पैदा होने लगी बिगड़ती हुई सूरते हाल को देख कर मोहतरमा मायावती को मजबूरन यह हुक्म देना पड़ा कि मौलाना अब्दुल्लाह बुख़ारी और उनके तमाम साथियों को जो हिरासत में हैं फ़ौरी तौर पर रिहा कर दिया जाये। यह मोहतरमा मायावती की दूसरी शिकस्त थी।

ग़रज़ की मौलाना अब्दुल्लाह बुख़ारी और दीगर हनफ़ी उलमज़हब सुन्नी उलमा की तशरीफ़ आवरी व हौसला अफ़ज़ायी ने शियों की तरफ़ से जारी शुदा तहरीक को मज़ीद तक़वीयत अता की और वह लखनऊ से जाते वक़्त यह कह कर गये कि हम लोग उस वक़्त तक लखनऊ बार बार आयेंगे जब तक जुलूस हाय अज़ा से पाबन्दी ख़त्म नहीं होती। चुनान्चे अपने इस वादे के तहत चेहलुम से एक दिन क़ब्ल बज़रिया ए ट्रेन दिल्ली से फ़िर लखनऊ के लिए रवाना हो गये ताकि वह कर्बला ए तालकटोरा में जुलूस हाय अज़ा की मौजूदा नौइय्यत का मुशाहेदा करें और उन शियों का इज्तेमायीं शुक्रियां अदा करें जिन्होंने उनकी गिरफ़्तारी पर एहतेजाज किया था। लेकिन मौलाना अब्दुल्लाह बुख़ारी के दिल्ली से लखनऊ रवाना होने की ख़बर चूंकि ख़ुफ़िया ब्योरो के ज़रिये यू 0 पी 0 की वज़ीरे आला मोहतरमा मायावती को फ़राहम हो चुकी थी इस लिए मौलाना मौसूफ़ को ग़ाज़ियाबाद या उसके मुल्हक़ किसी स्टेशन के क़रीब हुक्काम व अफ़सरान की एक जमाअत ने ट्रेन रोक कर उतार लिया और वापस उन्हें दिल्ली रवाना कर दिया। यह ख़बर जब लखनऊ के शियों तक पहुंची तो उमूमी तौर पर ग़मो ग़ुस्से की एक लहर दौड़ गयी और हर शख़्स यह मुतालेबा करने लगा कि जिस तरह भी मुम्किन हो मौलाना बुख़ारी को चेहलुम के दिन लखनऊ लाया जाये।

इस मुतालबे में जब शिद्दत पैदा होने लगी और हालात ख़राब होने लगे तो मौलाना सैय्यद कल्बे जव्वाद साहब दरगाह हज़रत अब्बास रोड के जारी शुदा धरने पर तशरीफ़ लाये और वहां पर मौजूदा तक़रीबन पन्द्रह बीस हज़ार शियों की राय मालूम करने के बाद उन्होंने यह ऐलान किया कि अगर मायावती सरकार चेहल्लुम के मौक़े पर एक बजे दिन तक मौलाना अब्दुल्लाह बुख़ारी को लखनऊ नहीं लाती तो हम दो बजे दिन में एहतेजाजन आसफ़ी इमामबाड़े से अलम उठा कर करबला ए तालकटोरा तक ले जायेंगे।

कर्फ़्यू का नेफ़ाज़ –

बक़रीद के दिन बड़े इमामबाड़े से छोटे इमामबाड़े हुसैनाबाद तक जाने वाले एहतेजाजी जुलूस पर मोहतरमा मायावती को अनानियत व ताक़त के अन्जाम का तल्क़ तजुरबा हो चुका था इस लिए मौलाना सैय्यद कल्बे जव्वाद के इस एलान के ख़िलाफ़ उन्होंने यह मुसतैदी दिखायी कि ज़िला हुक्काम व पुलिस अफ़सरान का एक आला सतही हंगामी जलसा तलब कर के उन्हें हुक्म दिया कि शियों के इलाक़ों में कर्फ़्यू नाफ़िज़ कर के उस में इतनी शिद्दत पैदा कर दी जाये कि एक भी शिया घर से बाहर नहीं निकल सके चुनान्चे चेहलुम की शब में बग़ैर किसी ऐलान के कर्फ़्यू का ऐलान अमल में आ गया। क़दम क़दम पर पुलिस व पी 0 ए 0 सी 0 की कम्पनियां तैनात कर दी गयीं और शियों की नक़लों हरकत पर कड़ी निगाह रखी जाने लगी लेकिन इन तमाम कार्यवाहियों , तदबीरों और सख़्तियों के बावजूद ना तो शियों के हौसले मुताज़लज़ल थे और न ही उनका जज़्बा ए ईमानी मुज़महिल था और न ही उनके चेहरों पर तरद्दुद की कोई शिकन थी।

मौलाना सैय्यद कल्बे जव्वाद साहब के ऐलान के मुताबिक़ इमामबाड़ा आसफ़ी से अलमे मुबारक का उठ कर करबला ए तालकटोरा तक ले जाना चूंकि एक यक़ीनी अम्र था इस लिए चेहलुम का सूरज निकलते ही पुलिस और पी 0 ए 0 सी 0 के साथ हुक्कामे ज़िला की सरगर्मियां काफ़ी बढ़ गयीं थी और इस प्रोंग्राम को नाकाम बनाने की कोशिशों में वह दिलो जान से मसरूफ़ थे यहां तक कि ज़िला हुक्काम व पुलिस अफ़सरान ने मौलाना मौसूफ़ के मकान को भी घेर रखा था और उन्हें इस बात पर आमादा किया जा रहा था कि वह वक़्ते मुक़र्रेरा से पहले ही ख़ुद को रज़ाकाराना तौर पर गिरफ़्तार करा दें ताकि शियों की इजतेमायी सूरत पैदा ही न हो लेकिन मौलाना मौसूफ़ हुक्काम की इस तजवीज़ पर अमल पैरा होने के लिए तैयार न थे। उनका जवाब यह न था कि अगर आप हमें गिरफ़्तार करना ही चाहते हैं तो जिस वक़्त हम एहतेजाज करें उस वक़्त गिरफ़्तार करें। ग़रज़ कि मौलाना सैय्यद कल्बे जव्वाद साहब ठीक ग्यारह बजे दिन में मोमेनीन की एक मुख़तसर सी जमाअत के साथ अपनी क़यामगाह से आसफ़ी इमामबाड़े जाने के लिए जैसे ही बाहर सड़क पर आये वैसे ही पुलिस के आला अफ़सरान ने उन्हें अपनी हिरासत में ले लिया।

यह ख़बर टेलीफ़ोन के ज़रिये जब शियों में आम हुई तो पूरी क़ौम में ग़म व ग़ुस्से की लहर पैदा हो गयी। गली गली कूचे कूचे से अलम उठने लगे और तमाम सरकारी बन्दिशों को तोड़ता हुआ इन्सानी सरों का सैलाब सड़कों पर उमड़ पड़ा जिसे देख कर ज़िला हुक्काम और पुलिस व पी 0 ए 0 सी 0 के अफ़सरान दम ब ख़ुद रह गये। डेढ़ दो लाख के मजमे पर लाठी चार्ज किया जाना या गोलियों का बरसाना कोई आसान काम न था। हां इस लिये शियो के बिखरे हुए हुजूम पर क़ाबू हासिल करने के लिए मौलाना सैय्यद कल्बे जव्वाद साहब को फ़ौरी तौर पर रिहा कर दिया गया। मौलाना की रिहायी से पहले जिन हज़ारों शियों ने एहतेजाज करते हुए ख़ुद को गिरफ़्तार करवाया था उन्हें जेल भी भेज दिया गया।

मौलाना सैय्यद कल्बे जव्वाद साहब ने अपने दिलेराना अक़दाम और क़ौम के साथ ईमानदारी व वफ़ादारी के बिना पर अरबाबे हुकूमत की नज़र पर चढ़ चुके थे और वह उन्हें किसी तदबीर से जेल की सलाख़ों के पीछे नज़र बन्द कर देना चाहते थे। चुनान्चे चेहलुम के दूसरे दिन मायावती सरकार के एक दूसरे नुमाइन्दे ने सियासी नौइय्यत के एक शिया आलिम को एतेमाद में ले कर दो बजे रात को थाना चौक में मौलाना के ख़िलाफ़ एक झूठी रिपोर्ट दर्ज करायी जिसमें उन्हें शियों की तमाम सरगर्मियों का ज़िम्मेदार क़रार दिया गया और इसी रिपोर्ट की बुनियाद पर तीसरे दिन सुबह साढ़े तीन बजे के क़रीब क़ौमी सलामती एक्ट के तहत उन्हें गिरफ़्तार कर के ललितपुर जेल में नज़रबन्द कर दिया गया लेकिन यह सिलसिला ज़्यादा दिनों तक क़ायम न रह सका क्योंकि मौलाना की गिरफ़्तारी के ख़िलाफ़ पूरे हिन्दुस्तान के शियों ने एहतेजाज शुरू कर दिया था और यू 0 पी 0 की हालत ख़ास तौर पर बिगड़ने लगी थी इस लिये हुकूमत ने घबरा कर तेरहवें दिन दो रबीउलअव्वल को मौलाना सैय्यद कल्बे जव्वाद को नीज़ उन तमाम शिया हज़रात को जो चेहलुम के दिन गिरफ़्तार हुए थे ग़ैर मशरूत तौर पर रिहा कर दिया गया और जो मुक़द्देमात शियों के ख़िलाफ़ क़ायम किये गये थे वह वापस ले लिये गये थे। यह मायावती सरकार की तीसरी शिकस्त थी।

दो रूकनी तहक़ीक़ाती कमेटी –

क़ज़ीया ए मदहे सहाबा की अज़ सरे नौ तहक़ीक़ात और जुलूस हाय अज़ा की बहाली पर ग़ौरो फ़िक्र के लिए मोहतरमा मायावती वज़ीरे आला ने जो दो रूकनी कमेटी तशकील दी थी उसकी तमाम कार्यवाहियां यह हुकूमत और शियों के माबैन चल रही कशमकश की वजह से मफ़ज़ूल व मुंजमिद रही और यह कमेटी अपना एक भी तहक़ीक़ाती क़दम आगे न बढ़ा सकी।

जब माहौल कुछ साज़गार हुआ और जुलूस हाय अज़ादारी की बहाली के बारे में शियों का मुतालेबा अपनी जगह बरक़रार रहा तो पहली कमेटी के मेम्बरान की तब्दीली के बाद मोहतरमा मायावती ने जो दुबारा कमेटी बनायी उसमें उन्होंने होम सेक्रेटरी और डायरेक्टर जनरल आफ़ पुलिस को नामज़द किया नीज़ ए 0 सी 0 एन 0 कन्वेनर मुक़र्रर हुए।

इस कमेटी ने अपनी तहक़ीक़ात के ज़ैल में पहला क़दम यह उठाया कि उसने शिया और सुन्नी लीडरों के पास 28 जून 1997 को एक सरकारी मकतूब रवाना किया जिसमें यह पूछा गया था कि –

1. आप हुकूमत से क्या चाहते हैं ?

2. क़ज़ीया क्या है ?

3. दूसरे फ़िर्क़े से क्या तवक़्क़ोआत रखते हैं ?

4. मुमकिन हल क्या है ?

इसका जवाब 15 जुलाई को शियों की तरफ़ से यह दिया गया कि –

1. शिया फ़िर्क़ा जिन जुलूसों का मुतालेबा कर रहा है वह कस्टमरी है और पुलिस रिकार्ड में दर्ज हैं।

2. सुन्नी फ़िर्क़ा जिन जुलूसों का मुतालेबा कर रहा है क्या वह कस्टमरी जुलूस हैं जो पुलिस रिकार्ड में दर्ज हैं।

3. क्या हुकूमत और इन्तिज़ामियां उम्मते मुसलेमा के एक फ़िर्क़े को किसी नए मज़हबी जुलूस की इजाज़त दे सकती है और दूसरे फ़िर्क़े को मना कर सकती है।

4. क्या हुकूमत और इन्तिज़ामिया को किसी मक़सूस फ़िर्क़े को तमाम मज़हबी जुलूसों पर बीस साल तक पाबन्दी लगाये रखने का हक़ हासिल है।

मशवेरा –

1. उन जुलूसों को निकलवाया जाये जो मज़हबी और कस्टमरी हैं।

2. किसी फ़िर्क़े को एक तरफ़ा तौर पर अगर कोई नया जुलूस दिया जाये तो दूसरे फ़िर्क़े को भी नया जुलूस दिया जाये।

3. मज़हबी और बुनियादी हुक़ूक़ में रोड़ा अटकाने वालों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्यवाही की जाये।

हुकूमत से तवक़्क़ोआत –

1. हुकूमत व इन्तिज़ामिया , क़ानून शिकनी और क़ानून के ग़लत इस्तेमाल को बन्द करें।

2. दफ़ा 144 के तहत दिये गये इख़्तेयारात का हुकूमत व इन्तिज़ामिया सही इस्तेमाल करे और ग़ुलाम अब्बास केस में सुप्रीम कोर्ट की तरफ़ से दी हुई हिदायत की पाबन्दी करें।

3. दफ़ा 144 के तहत जारी किये गये एहकाम की मुद्दत हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की हिदायत के तहत महदूद होना चाहिए।

4. ईमानदारी और फ़र्दशिनासी का सुबूत दिया जाये।

दूसरे फ़िर्क़े से तवक़्क़ोआत –

1. एक दूसरे के जज़बात का लिहाज़ रखा जाये।

2. एक दूसरे के मज़हबी उमूर को रूकावट न पैदा की जाये।

3. किसी नये जुलूस का मुतालेबा करते वक़्त दूसरे फ़िर्क़े के मसावी हुक़ूक को मलहूज़े ख़ातिर रखा जाये।

सुन्नियों की तरफ़ से भेजे गये जवाब में सिर्फ़ जुलूसे मदहे सहाबा के मुतालिबे पर ज़ोर दिया गया था। अलबत्ता क़मर मीनाई साहब सज्जाद नशीन शाह मीना साहब ने मदहे सहाबा की मुख़ालेफ़त करते हुए जुलूस ए मोहम्मदी का मुतालेबा किया था और अज़ादारी के जुलूसों की बहाली के बारे में सिफ़ारिश की थी।

पहली मीटिंग –

सरकारी तौर पर पहली मीटिंग 23 जुलाई 1997 को सात बजे रखी गयी थी। अब सवाल यह पैदा हुआ कि शिया नुमाइन्दों की हैसियत से इस मीटिंग में कौन कौन हज़रात शिरकत करेंगे। चुनान्चे इस ज़ैल में 23 जुलाई को सुबह साढ़े आठ बजे एक हंगामी जलसा शिया क़ायदीन का जलसा मौलाना सैय्यद कल्बे सादिक़ साहब के मकान पर तलब किया गया जिसमें तमाम उलमा ए कराम के साथ साथ जनाब जावेद मुर्तुज़ा साहब एडवोकेट और जनाब हुसैन अब्बास साहब एडवोकेट और दीगर मोअज़्ज़ेज़ीन को भी शिरकत की दावत दी गयी और इस जलसे में शिरकत के लिये मौलाना सैय्यद हमीदुल हसन साहब , मौलाना आग़ा रूही साहब , मौलाना अदीबुल हिन्द साहब , मौलाना मिर्ज़ा मोहम्मद अतहर साहब , मौलाना ज़हीर अहमद इफ़्तेख़ारी साहब , मिर्ज़ा जावेद मुर्तुज़ा साहब नीज़ हुसैन अब्बास साहब एडवोकेट और दीगर मोअज़्ज़ेज़ीन हज़रात ने शिरकत की। मौलाना सैय्यद कल्बे सादिक़ साहब क़िब्ला और मौलाना सैय्यद कल्बे जव्वाद साहब क़िब्ला तो वहां मौजूद थे ही। चुनान्चे मौलाना सैय्यद कल्बे सादिक़ साहब ने गुफ़्तगू का आग़ाज़ करते हुए फ़रमाया कि सरकार की तरफ़ से आज शाम को सेक्रेट्रियेट में एक मीटिंग रखी गयी इस सिलसिले में दो चीज़ें सामने हैं अव्वल यह कि मीटिंग में कौन कौन लोग जायें और दूसरे यह कि वहां क्या बात करें ? इस पर मौलाना मिर्ज़ा मोहम्मद अतहर साहब ने फ़रमाया कि जो लोग बात करने अब तक जाते रहे हैं वहीं लोग जायेंगे। मिर्ज़ा जावेद मुर्तुज़ा साहब ने कहा कि यह मसला आज का नहीं है बल्कि बीस साल पुराना है जो लोग अब तक बात करते रहे हैं वह वही पुरानी बाते करेंगे लिहाज़ा मेरी राय है कि चार हज़रात मौलाना मिर्ज़ा मोहम्मद अतहर साहब , मौलाना सैय्यद कल्बे सादिक़ साहब , मौलाना आग़ा रूही साहब और मौलाना सैय्यद हमीदुल हसन साहब बात करने न जायें बल्कि किसी पांचवे शख़्स को अपना नुमाइन्दा मुक़र्रर कर दें। एक मौलाना सैय्यद कल्बे जव्वाद साहब हो जायें और दो आदमी शिया वोकला में से मुन्तख़ब कर लिये जायें क्योंकि यह मामला बुनियादी तौर पर क़ानूनी है। उसके अलावा नौजवान ज़ाकेरीन अन्जुमन हाय मातमी और मोमेनीन में से एक एक नुमाइन्दा हो जाये और यही लोग हुकूमत व इन्तिज़ामिया से गुफ़्तुगू करें। इस पर मौलाना हमीदुल हसन साहब जलसे से वाक आउट कर गये और उनके पीछे मौलाना मोहम्मद अतहर साहब भी उठ कर चले गये। चुनान्चे उस दिन शाम को सरकारी मीटिंग में शिया फ़िर्क़े की तरफ़ से मौलाना सैय्यद कल्बे जव्वाद साहब , मौलाना अदीबुल हिन्दी साहब , मौलाना आग़ा रूही साहब और मिर्ज़ा जावेद मुर्तुज़ा साहब ने शिरकत की और शिया सुन्नी मसले के बारे में कोई गुफ़्तुगू नहीं हुई बल्कि यह तय पाया कि ए 0 सी 0 एम 0 2 के लेटर के जो जवाबात फ़रीक़ैन ने दिये हैं उनकी नक़लें एक दूसरे को फ़राहम कर दी जायें और जिन अफ़राद को कमेटी ने नुमाइन्दा तसलीम कर लिया है इन में से कोई शख़्स किसी मजबूरी के तहत शिरकत नहीं कर सकता तो वह इस बात के लिये मजाज़ होगा कि उन्हें तसलीम शुदा मेम्बरान में से किसी को अपना नुमाइन्दा क़रार दे सकता है।

(आप ये किताब अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क पर पढ़ रहे है।)

दूसरी मीटिंग –

दूसरी मीटिंग 18 अगस्त 1997 को हुई उसमें शिया या सुन्नी मसायल के बारे में कोई क़ाबिले ज़िक्र गुफ़्तगू नहीं हुई बल्कि मामले को टाल दिया गया।

तीसरी मीटिंग –

यह मीटिंग 30 अगस्त 1997 को एन 0 एक्स 0 सी 0 में हुई। इस में अथारटीज़ ने कहा कि –

1. कुछ रवायती फ़ंक्शन अब भी अंजाम दिये जा रहे हैं।

2. दोनों फ़िर्क़ों ने एक जगह बैठ कर कोई अमली फ़ारमूला मुश्तरका तौर पर तय कर लें।

3. मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को भी इस मले के हल में शरीक करें।

4. बदले हुए हालात के पेशे नज़र कस्टमरी जुलूस तब्दीली चाहते हैं।

5. मौलाना क़मर मीनाई साहब जो जुलूस चाहते हैं वह कस्टमरी नहीं हैं और न ही वह उसके बारे में कोई सुबूत पेश कर सकते हैं लिहाज़ा उन्हें बातचीत से अलग कर दिया गया है।

मौलाना मिर्ज़ा मोहम्मद अतहर साहब ने कहा कि –

1. 1977 के बाद से कौन सी ऐसी नयी बात हो गयी है कि शियों के जुलूस नहीं उठ रहे हैं।

2. सुन्नी फ़िर्क़ा हम से क्या चाहता है और वह हमे क्या देना चाहते हैं ?

मौलाना आग़ा रूही साहब ने कहा –

हम पाटानाला और पुल ग़ुलाम हुसैन का रास्ता छोड़ देंगे। बड़े रास्तों से उठायेंगे और जुलूसों की तादाद भी कम कर देंगे।

मिर्ज़ा जावेद मुर्तुज़ा साहब ने कहा –

हम को कस्टमरी जुलूसों और बिदत में फ़र्क़ करना होगा।

उसके बाद यह तय पाया कि कमेटी आइन्दा शियों और सुन्नियों की मुशतरका मीटिंग करायेगी।

चौथी मीटिंग –

4 सितम्बर 1997 को सुबह साढ़े नौ बजे योजना भवन में मुनअक़िद हुई जिस में शियों की तरफ़ से मौलाना हमीदुल हसन साहब , मौलाना अदीबुल हिन्दी साहब , मौलाना कल्बे सादिक़ साहब , मौलाना मिर्ज़ा मोहम्मद अतहर साहब , मौलाना ज़हीर इफ़्तेख़ारी साहब , मिर्ज़ा जावेद मुर्तुज़ा साहब एडवोकेट और एम 0 एम 0 ताहिर साहब ने शिरकत की और सुन्नियों की तरफ़ से फ़ज़्ले आलम एडवोकेट , शेख़ सग़ीर हसन अहमद सिद्दीक़ी , अब्दुल अलीम फ़ारूक़ी , अब्दुल अज़ीम फ़ारूक़ी और हाजी ग़ुलाम हसनैन ने शिरकत की। अच्छे और ख़ुशगवार माहौल में गुफ़्तुगू हुई और इस बात पर फ़रीक़ैन मुत्तफ़िक़ थे कि मसले का हल निकलना चाहिये और अमनो अमान का अमल क़याम में आना चाहिये।

पांचवी मीटिंग –

5 सितम्बर 1997 को हुयी इस में मिस्टर जावेद मुर्तुज़ा ने कहा कि रवादारी या फ़िर्क़ा की बिना पर कोई समझौता मुम्किन नहीं।

छठी मीटिंग –

छठी मीटिंग 7 सितम्बर 1997 को हुई। इस मीटिंग में फ़रीक़ैन के दरमियान जब कुछ लेने और देने का मसला ज़ेरे ग़ौर आया तो मिस्टर जावेद मुर्तुज़ा ने फिर अपने मोक़िफ़ को दोहराया और कहा कि फ़िर्क़ा या अक्सरियत की बिना पर कोई सौदेबाज़ी नहीं की जा सकती और न ही किसी शख़्स को लेनदेन का हक़ इख़्तेयार है क्योंकि जो कस्टमरी जुलूस हैं उनका हक़ क़ानूनी तौर पर बीस बरस की मुद्दत में मुसतहकम होता है और उसको आसानी से ख़त्म नहीं किया जा सकता।

डायरेक्टर जनरल और पुलिस ने कहा –

यह बात आप किस बुनियाद पर कह रहे हैं ? इस पर जावेद मुर्तुज़ा साहब ने इलाहाबाद हाई कोर्ट की वह नज़ीर पेश की जिस में इस बात की वज़ाहत मौजूद है कि न तो ख़ुदसाख़ता लीडर और ना कि हुकूमत व हुक्काम के मुन्तख़ब करदा चन्द अफ़राद किसी कौम की बुनियाद पर कोई मुहायदा कर सकते हैं और न समझौता क्योंकि क़ौम में बिला शक व शुब्हा नाबालिग़ अफ़राद भी होते हैं जिन की तरफ़ से अदालत के ज़रिए मुक़र्ररकरदा क़ानूनी वली ही मुहायदा कर सकता है। मिस्टर जावेद मुर्तुज़ा ने मज़ीद कहा था कि शेख़ सग़ीर इस मीटिंग में मौजूद हैं और 1969 और 1974 के समझौतों पर इन के भी दस्तख़त हैं लेकिन यह ख़ुद इन मुहायदों को नहीं मानते और जो लोग इन को बहैसियत सुन्नी लीडर के यहां लाये हैं वह भी इन मुहायदों पर इनकार कर रहे हैं। इस के बाद मिस्टर जावेद मुर्तुज़ा ने सुन्नियों के नुमाइन्दों को मुख़ातिब करते हुए कहा कि आप लोग अपने को सुन्नी फ़िर्क़े का नुमाइन्दा कह रहे हैं। क़मर मीनाई साहब भी अहले सुन्नत की नुमाइन्दगी कर रहे हैं जब कि वह आप लोगों को अपना नुमाइन्दा नहीं मानते। इस पर डी 0 जी 0 पी 0 ने कहा बराये मेहरबानी आप इस मीटिंग में न क़ानून की कोई बात करें और न ही 1969 के मुहायदों का ज़िकर करें।

डी 0 जी 0 पी 0 के इस कहने पर मिस्टर जावेद मुर्तुज़ा ने ख़ामोशी इख़्तेयार की और ख़त्मे मीटिंग के दूसरे दिन दो रूकनी सरकारी कमेटी को यह ख़त लिख कर भेज दिया कि मसले का हल सिर्फ़ क़ानून और आइन के दायरे के अन्दर रह कर ही हल किया जा सकता है और हाई कोर्ट व सुप्रीम कोर्ट के अहकामात को नज़र अन्दाज़ नहीं किया जा सकता बल्कि इन का एहतेराम भी ज़रूरी है लिहाज़ा मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि जिस सरकारी कमेटी में क़ानून और आईन के हवाले से बात करने की मुमानेअत ह उस में शामिल रहने से कोई फ़ायदा नहीं है इस लिए मैं अपने आप को कमेटी की कार्यवाही से इस वक़्त तक के लिये अलग करता हूं जब तक कमेटी की तरफ़ से मुझे यह यक़ीन दहानी न करादी जाये कि यह कमेटी क़ानून और आइने के दायरे में रह कर नेज़ हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले की रौशनी में काम करेगी।

सातवीं मीटिंग –

सातवीं मीटिंग 14 सितम्बर को हुई। इस मीटिंग में फ़रीक़ैन के दरमियान कुछ ख़ास बात नहीं हुई और यह 16 सितम्बर के लिये मुलतवी हो गये।

आठवीं मीटिंग –

16 सितम्बर 1997 को शाम के साढ़े आठ बजे मुनअक़िद की गयी इस मीटिंग की कार्यवाही के दौराना मौलाना सैय्यद कल्बे सादिक़ साहब क़िब्ला ने यह कहकर अपना एक फ़ारमूला पेश किया कि इस फ़ारमूले को रशीद अहमद शेरवानी साहब जमाते इस्लामी के शफ़ी मोनिस साहब , मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और मस्लिस मुमशाबेरत के अहम अफ़राद नेज़ हज़रत मौलाना अली मियां नदवी की ताईद हासिल है। फ़ारमूले की इबारत मुन्दरजा ज़ैल है --

हिन्दुस्तान एक जमहूरी मुल्क है और यहां हर मज़हब व फ़िरक़े को अपने अपने मज़हबी रूसूम अपनी अपनी इबादतगाहों के अलावा शार ए आम पर भी इन्जाम देने की उसूली तौर पर मुकम्मल क़ानूनी आज़ादी हासिल है बशरते कि इन की ग़रज़ मुस्तनद मज़हबी रूसूम की अन्जामदही हो। किसी दूसरे मज़हब या फ़िरक़े की दिल आज़ारी न हो।

इस लिये मुसलमानों को भी बहैसियते उम्मत और इस उम्मत के तमाम फ़िरक़ों को बहैसियत फ़िरक़ा इस बात का क़ानूनी हक़ हासिल है कि वह दीगर मुसतनद मज़हबी रूसूम के साथ अपने अपने मज़हबी बुज़ुरगों और रहनुमाओं की पैदाइश या वफ़ात व शहादत के मौक़े पर मज़हबी इजतेमाआत करें या शार ए आम पर जुलूस निकालें लेकिन किसी मज़हब या फ़िरक़े को इस बात की आज़ादी न होनी चाहिये कि वह इन जुलूसों में कोई ऐसी बात कहे या करें जो दूसरे मज़हब या फ़िरक़े के लिये दिल आज़ार हो। किसी मज़हबी फ़िरक़े या जुलूस के शोरका को इस बात की इजाज़त नहीं होना चाहिये कि वह दूसरे मज़हब या फ़िरक़े के किसी बुज़ुर्ग या रहनुमा के बारे में नाज़ेबा और तौहीन आमेज़ कलामात कहे या ऐसे कलामात परचमों पर लिखे या किसी ऐसे शख़्स की तारीफ़ करें या इसका नाम परचम पर लिखें जो दूसरे फ़िरक़े के किसी बुज़ुर्ग या रहनुमा के क़त्ल में मूलव्विस (शामिल) हो।

शार ए आम पर बारमद होने वाले जुलूसों के सिलसिले में शहर में बसने वाले दूसरी क़ौमों का लिहाज़ भी ज़रूरी है इस लिये ऐसे जुलूसों की तादाद को कम से कम रखा जाना चाहिये।

चूंकि मुख़तलिफ़ अक़वाम व मज़हब और मुख़तलिफ़ फ़िरक़ों के दरमियान बाहमी रवाबित व ताल्लुक़ात में नज़दीकी व दूरी पैदा होती रहती है। इस लिये जहां तक मुमकिन हो सके एक मज़हब या फ़िरक़े का जुलूस , रास्ते की मौजूदगी में दूसरे मज़हब या फ़िरक़े की घनी आबादी से न गुज़ारें।

मज़कूरा बाला रहनुमा उसूल की रौशनी में और शहर में अमन व अमान की बरक़रारी को नज़र में रखते हुए जुलूसों की तादाद अवक़ात और रास्ते का तअय्युन मुक़ामी इन्तिज़ामियां की ज़िम्मेदारी होना चाहिये।

मज़कूरा फ़ारमूले की दस फ़ोटे कापियां मौलाना सैय्यद कल्बे सादिक़ साहब क़िब्ला अपने साथ लाये थे जो उन्होंने कुछ लोगों में तक़सीम कीं। हुक्काम ने इन्हीं कापियों में से एक कापी की मज़ीद फोटो कापियां करा के दीगर लोगों में तक़सीम कीं। इस के बाद कहा गया कि इस फ़ारमूले पर ग़ौर करने के लिये वक़्त दरकार होगा लिहाज़ा अगली मीटिंग में इस पर तबादलाए ख़्याल किया जायेगा।

इस फ़ारमूले की इबारत अरबाबे अक़्ल व होश को ग़ौर व फ़िक्र की दावत देती है।

मदहे सहाबा लखनऊ के कुछ अफ़राद की ईजाद

(सैय्यद शहाबुद्दीन)

मुसलमानों में इत्तेहाद ख़ुसूसन हिन्दुस्तान में इस की ज़रूरत व हुकूमत के पेशे नज़र मिल्लत का दर्द रखने वाले अफ़राद किस क़दर तशवीश में मुब्तेला हैं ? इस का अन्दाज़ा इस ख़त से होता है जो लखनऊ के शिया सुन्नी क़ज़ीय का दोनों फ़िरक़ों के दरमियान बातचीत के बावजूद अभी तक कोई हल न निकलने पर मारूफ़ मुस्लिम रहनुमा और दानिशवर सैय्यद शहाबुद्दीन ने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदर मौलाना अली मियां नदवी और नाएब सदर मौलाना सैय्यद कल्बे सादिक़ साहब क़िब्ला को तहरीर किया है। सैय्यद शहाबुद्दीन साहब ने इन दोनों रहनुमाओं को मुख़ातिब करते हुए अपने ख़त में लिखा है कि –

मेरी नज़र में अज़ादारी एक क़दीम रवायत है जो पूरे मुल्क में मनायी जाती है और जिसमें सुन्नी हज़रात भी शिरकत करते हैं जब कि जुलूसे मदहे सहाबा सिर्फ़ लखनऊ के कुछ अफ़राद की ईजाद है जो उन्होंने अज़ादारी और तबर्रा के जवाब में की है। अब जब कि शियों ने इस बात की यक़ीन देहानी करा दी है कि वह जुलूस हाय अज़ा के दौरान तबर्रा नहीं करेंगे तो इन दोनों बातों को एक दूसरे से नहीं जोड़ना चाहिए कि मौक़े पर लखनऊ में शिया और सुन्नी हज़रात को मुशतरका तौर पर जुलूस और जुलूसों का इन्एक़ाद करना चाहिए। यह बात तसल्ली बख़्श है कि शिया क़ायदीन इस अम्र पर राज़ी हो गये हैं कि जुलूसों के रास्तों में तब्दीली लायी जाये ताकि सुन्नी अक्सरियत वाले मोहल्लों से बचा जाये।

(रोज़ नामा सहाफ़त , शुमारा 277, जिल्द 7 बुध , 15 अक्टूबर , 1997 मुताबिक़ 16 जमादिउस्सानी , 1418 हिजरी)

मौलाना नदवी से एक मुलाक़ात

जनाब सैय्यद शहाबुद्दीन साहब के मज़कूरा ख़त की तहरीक पर मेरे दिल में यह ख्याल पैदा हुआ कि क्यों न मौलाना अली मियां नदवी से मिल कर जुलूस हाय अज़ा और क़ज़ीया ए मदहे सहाबा के बारे में इनके अफ़कारो ख़्यालात का जाएज़ा लिया जाये ? चुनान्चे इस ख़्याल के तहत 18 अक्टूबर 1997 को मैंने नदवा टेलीफोन कर के मौलाना मौसूफ़ की मौजूदगी और प्रोग्राम के मुताल्लिक़ दरयाफ़्त कया तो मुझे यह बताया गया कि हज़रत अपने वतन राय बरेली में तशरीफ़ फ़रमा हैं। मैं दो बजे दिन में बज़रिया ए बस लखनऊ से राय बरेली रवाना हुआ और यह मेरी ख़ुश क़िस्मती थी कि मौलाना मौसूफ़ के दरमियान जवाब व सवाब की शक्ल में जो गुफ़्तुगू हुई इस में मौलाना के सख़्ती से मना करने के बावजूद भी इस किताब में शामिल कर रहा हूं ताकि हक़ीक़त वाज़ेह हो जाये।

(सलाम। रहमत , मिजाज़ पुरसी के और रस्मी बातचीत के बाद..........)

सवाल – क्या आप मेरी किसी किताब के लिये कोई इन्टरव्यू देना पसन्द करेंगे ?

जवाब – हरगिज़ नहीं। इस लिये कि मैं किसी किताब के मुसन्निफ़ , मौवल्लिफ़ या किसी अख़बार की रिपोर्टर को इन्टरव्यू देना पसन्द नहीं करता। अलबत्ता आप के और मेरे माबैन वतनी रिश्ते की बुनियाद पर इन्टरव्यू से हट कर ज़ाती गुफ़्तुगू मुमकिन है मगर शर्त यह होगी कि आप मेरी इस गुफ़्तुगू को अपनी किसी किताब में शामिल नहीं करेंगे। अब जो पूछना हो पूछें।

सवाल – लखनऊ में शियों और सुन्नियों के दरमियान जुलूस हाय अज़ा और मदहे सहाबा का जो क़ज़ीया चल रहा है इस के बारे में आपका क्या ख़्याल है ? और इस के हल की क्या सूरत मुम्किन है ?

जवाब – लखनऊ का यह झगड़ा पुराना होने के साथ साथ फ़रीक़ैन के दरमियान कुछ ग़लत पालीसियों और नाक़िस क़यादत की वजह से उलझ कर रह गया है और मेरे लिए इस सिलसिले में लब कुशायी इस लिये मुनासिब नहीं है कि मेरा नज़रिया वाज़ेह है जिसमें जुलूसे मदहे सहाबा और जुलूसे हाय अज़ा दोनों ही बिदत हैं। अब रहा इसे हल करने का सवाल तो इस सिलसिले में जो लोग हैं उन के हक़ में मेरी दुआ है कि अल्लाह ताला उन्हें नेक तौफ़ीक़ात के साथ अपने मक़सद में कामयाब करे क्योंकि लड़ाई झगड़ा और क़त्लो ग़ारतगरी किसी मज़हब किसी फ़िरक़े और किसी मसलक में जाएज़ नहीं है।

सवाल – क्या जनाब सैय्यद शहाबुद्दीन साहब ने इस क़ज़ीये के बारे में आप को कोई ख़त लिखा है ? जैसा कि अख़बार सहाफ़त का बयान है।

जवाब – जिस अख़बार का हवाला आप दे रहे हैं वह मेरी नज़र से नहीं गुज़रा और न ही शहाबुद्दीन साहब का कोई ख़त मुझे मौसूल हुआ है।

नोट – सहाफ़त अख़बार इत्तेफ़ात से मैं अपने हमराह लेता गया था। इसे पेश करते हुए मैंने मौलाना मौसूफ़ से कहा कि बिस्मिल्लाह इसे पढ़ लीजिये। अख़बार पढ़ने के बाद मौलाना ने हैरत व इस्तेजाब ज़ाहिर करते हुए फ़रमाया भई मुझे तो अभी तक कोई ख़त नहीं मिला , मुम्किन हो नदवा लखनऊ के पते से आया हो। कल मैं जब नदवा जाऊंगा तो मालूम होगा।

सवाल – अगर जनाब शहाबुद्दीन साहब का ख़त आप को नदवे में मौसूल हो गया तो इसका क्या जवाब आप देगें ?

जवाब – ख़त और हालात की नवय्यत को देखते हुए जवाब के बारे में कोई राय क़ायम की जा सकती है किसी अख़बारी बयान पर आंख बन्द कर के यक़ीन कर लेना मेरे ख़्याल में दानिशमन्दी नहीं है।

सवाल – इस शिया सुन्नी क़ज़ीये को हल करने के लिये यू 0 पी 0 सरकार ने जो दोरूकनी कमेटी तशकील दी है इस के रू ब रू मौलाना सैय्यद कल्बे सादिक़ साहब क़िब्ला ने अपना जो फ़ारमूला पेश किया है उसे क्या आप की तायीद हासिल है ?

जवाब – अभी तक मैंने किसी फ़ारमूले की हिमायत नहीं की और न ही मुझे इस बारे में इल्म है क्योंकि मैं लखनऊ से बाहर था।

सवाल – जनाब शहाबुद्दीन साहब ने फ़रमाया है कि मदहे सहाबा सिर्फ़ लखनऊ के कुछ लोगों की इजाद है , इस के मुतअल्लिक़ आप का क्या ख़्याल है ?

जवाब – यह झगड़ा दर असल मेरी पैदाइश से पहले का है और उसके बारे में जो तारीख़ है उस से पढ़ा लिखा इन्सान वाक़िफ़ है।

सवाल – क्या आप बता सकते हैं कि अहाता शौकत अली , रकाबगंज , लखनऊ में तहफ़्फ़ुज़े नामूसे सहाबा के नाम से जो हालिया कान्फ़्रेंस हुई थी उसका बुनयादी मक़सद क्या था ?

जवाब – उसका मक़सद सहाबा ए कराम की तालीमात से मुसलमानों को रूशिनास करना और मुत्तहद करना था।

सवाल – अख़बारों की वज़ाहत के मुताबिक़ उस कान्फ़्रेंस में शियों के साथ साथ बाज़ शिया उलमा को भी काफ़िर क़रार दिया गया और आले रसूल (अ.स.) की शान में तौहीन आमेज़ कलेमात इस्तेमाल किये गये ऐसा क्यों हैं ?

जवाब – आले रसूल (अ.स.) की फ़ज़ीलत , अज़मत और बुज़ुर्गी से कौन इन्कार कर सकता है अगर कुछ उलमा ने ऐसा किया है तो वह मेरे नज़दीक ग़लत हैं। अब रहा शियों को या शियों के किसी रहनुमा को काफ़िर क़रार देने का सवाल तो यह बात मेरे इल्म में नहीं है और न ही नाफ़हमों के ख़्यालात पर कोई पाबन्दी लगायी जा सकती है।

सवाल – मौलाना ! इस आख़िरी सवाल के ज़ैल में बस इतना और बता दीजिये कि आप की नज़र में जुलूसे मदहे सहाबा की शरई और मज़हबी हैसियत क्या है ?

जवाब – भाई इस का मुख़्तसर सा जवाब यह है कि मदहे सहाबा का जुलूस हमारे मज़हब का जुज़ नहीं है।

इन्टरव्यू नुमा इस गुफ़्तुगू के बाद मैंने मौलाना साहिब का शुक्रिया अदा किया और रूख़सत होते वक़्त उन पर वाज़ेह कर दिया कि आप ख़्वाह तायीद करें या तरदीद लेकिन इस गुफ़्तुगू को मैं अपनी आने वाली किताब फ़ितना ए वहाबियत में ज़रूर शामिल करूंगा क्योंकि उस में 100 साल से चले आ रहे क़ज़ीया ए मदहे सहाबा और अज़ादारी की तारीख़ी तफ़सील भी है और हक़ीक़त निगारी मेरा नसबुलऐन है।

सुन्नी उलामा का मुश्तरका बयान

लखनऊ में जुलूस हाय अज़ा पर आयद शुदा पाबन्दी और शियों के ख़िलाफ़ वहाबियों की मुनाफ़ेक़ाना रविश को क़ाबिले मज़म्मत क़रार देते हुए हिन्दुस्तान के नामवर सुन्नी उलमा ने जो बयान जारी किया है वह अपनी जगह एक फ़तवे की हैसियत रखता है और इस से यह पता भी चलता है कि वहाबियों की शर अंगेज़ियों और फ़ितना परदाज़ों से न सिर्फ़ शिया बल्कि इस मुल्क के तमाम रासेख़ुलअक़ीदा सुन्नी मुसलमान भी दिली करब व इज़तेराब और रूहानी कश्मकश में मुबतेला हैं।

बयान की इबारत मुन्तरजा ज़ैल है –

लखनऊ के मोहिब्बाने अहलेबैत और अज़ादारे इमाम हुसैन (अ.स.) हक़ पर हैं और अज़ादारी के जुलूस निकालना इन का मज़हबी फ़रीज़ा है इन के ख़िलाफ़ एक छोटी सी टोली जो यज़ीदी और ख़ारजी मुसलमानों पर मुश्तमिल है , सफ़आरा है।

हम हिन्दुस्तान के सात करोड़ अहले सुन्नत मुसलमान इन यज़ीदी ख़वारिज के ग़लत अक़ाएद नज़रयात के ख़िलाफ़ ख़ुली हुई नफ़रत मलामत और बेज़ारी का इज़हार करतें हैं। इन यज़ीदी व ख़ारजी मुसलमानों का तमाम हिन्दुस्तान के सुन्नी मुसलमानों से कोई राब्ता व रिश्ता नहीं है क्योंकि यह मुसलमान कहने के क़ाबिल नहीं रहे। यह लोग सिर्फ़ यज़ीदी हैं जिस का सुबूत इन यज़ीदियों की तरफ़दारी में सिविल जज मोहन लाल गंज , लखनऊ की अदालत में एक मुक़दमा क़ायम कर के दिया है।

चूंकि लखनऊ के यह नाम नेहाद सुन्नी मुसलमान और इन के एक़ाएद व अमल इस्लाम के दुश्मन हैं और लखनऊ के शिया हक़ पर हैं और अज़ादारी शियों का मज़हबी फ़रीज़ा है लिहाज़ा उत्तर प्रदेश सरकार को यह चाहिए कि वह अज़ादारी पर लगी पाबन्दी को फ़ौरन हटा लें और अलम व ताबूतों के जुलूस को उठवाने का माक़ूल बन्दोबस्त करे।

इस बयान पर जिन उलमा ए अहले सुन्नत के दस्तख़त हैं उन में मौलाना पीर सैय्यद सफ़दर निज़ामी सज्जादा नशीन ख़्वाजा निज़ामुद्दीन औलिया , मौलाना हेमायतुन्नज़र , मुफ़्ती आज़म राम पुर , मौलाना क़मरूद्दीन चिश्ती , बग़दादी कछोछा शरीफ़ , मुफ़्ती आज़म बरेली , मौलाना सैय्यद शाह मोईनुद्दीन जामा मस्जिद बम्बई , मौलाना जमालुद्दीन इमामे जुमा जामा मस्जिद कलकत्ता , मौलाना मुफ़्ती बुरहानुद्दीन इलाहाबाद , मौलाना फ़हीमुद्दीन कानपुरी और मौलाना फ़िरदौस जलाल सज्जादा नशीन बहराइची के नाम ख़ुसूसी तौर पर क़ाबिले ज़िक्र हैं।

यह बयान हुकूमत के रिकार्ड में भी मौजूद होना चाहिए नेज़ इस बयान को जमात अहले सुन्नत नम्बर 9 सिराज जुद्दौला लेन , कलकत्ता ने पम्फलेट की शकल में छपवाकर हिन्दुस्तान के मुख़तलिफ़ मुक़ामात पर तक़सीम भी कराये हैं।

(आप ये किताब अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क पर पढ़ रहे है।)

इक्कीसवीं रमज़ान का आरज़ी व उबूरी समझौता

मुसलमानों के अकसरियती फ़िर्क़े से वोटों की ख़ातिर गुज़िश्ता हुकूमत की जांबरादराना व नाक़िस पालिसी और साबिक़ ज़िला इन्तिज़ामियां के ना अहल व नाकारा अफ़सरान की साज़िश हिमकत ए अमली ने दो सौ पचास साला अज़ादारी के क़दीम और कस्टमरी जुलूसों पर अरसा बीस साल से जो ग़ैर क़ानूनी और ग़ैर आयनी पाबन्दी आयद कर रखी है उस के ख़िलाफ़ शिया आवाम और क़ायदीन की तरफ़ से चलायी जाने वाली मुसलसल तहरीकों , मुज़ाहिरों , गिरफ़्तारियों और आख़िर में तीन नौजवानों बब्बू , भोपाली और इशरत अल्ताफ़ की आलमनांक ख़ुदसोज़ियों और क़ुरबानियों नेज़ नासबी सुन्नियों के कुछ मफ़ाद परस्त और ख़ुदसाख़्ता लीडरों की तरफ़ से जुलूसे मदहे सहाबा निकालने की ग़ैर उसूली ज़िद के नतीजे में मौजूदा हुकूमत की तरफ़ से नौ तशकील दो रूकनी तहक़ीक़ाती व मुसालेहती कमेटी के दानिशमंद ज़िम्मेदारों ने हज़रत अली (अ.स.) के यौमे शहादत के मौक़े पर इक्कीसवीं रमज़ान 1428 हिजरी , 21 जनवरी 1998 के लिये जो आरजी व अबूरी समझौता फ़रीक़ैन के दरमियान आयद 26 जनवरी और वस्ती मुद्दत के पार्लिमानी इलेक्शन के दौरान किसी फ़िर्क़े की तरफ़ से किसी तरह की गड़बड़ी को नज़र में रखते हुए 17/18 जनवरी 1998 को कराया है। इसकी असल इबारत इस किताब में शामिल कर रहे हैं –

और ये

तबसेरा –

इस आरज़ी और अगूबरी समझौते में सब से बड़ी ख़ामी यह है कि उसमें फ़रीक़ैन की तरफ़ से निकाले जाने वाले जुलूसों की अलामत व नौइय्यत का कोई ताय्युन का तज़केरा नहीं है और न ही पूरी इबारत में इशारतन व क़िनायतन कोई ऐसी निशानदेही की गयी है जिस से यह वाज़ेह हो कि शिया और सुन्नी दोनों फ़िरक़ों के अफ़राद को किस क़िस्म के जुलूस निकालने का हक़ व इख़्तियार हुकूमत और ज़िला इन्तिज़ामियां की तरफ़ से दिया गया है जब कि दुनिया का हर जुलूस ख़्वाह वह मज़हबी हो या सियासी अपनी अलामत व नौइय्यत की बिना पर ही अपनी शिनाख़्त का मज़हर होता है और जुलूस कहलाने का मुस्तहक़ क़रार पाता है। इस के बरअक्स अगर कोई जुलूस अपनी अलामत और नोइय्यत से महरूम है तो साहेबे फ़हम हज़रात उसे इजतेमायी रोड मार्च या दुम कटी रैली का नाम दे सकते हैं मगर जुलूस नहीं कह सकते ख़्वाह इस की इजतेमाई हैसियत कितनी ही मुस्तहकम क्यों न हो।

और ब ग़रज़े मुहाल अपनी ख़ुशफ़हमी की बिना पर थोड़ी देर के लिये हम यह मान लें कि यह आरज़ी समझौता बीस बरसों से रूके हुए अज़ादारी के क़दीम व रवायती जुलूस की बहाली और सौ साल से चले आ रहे क़ज़िय्याए मदहे सहाबा के किसी मुसबत हल का पेश ख़ेमा है तो फिर इसके साथ ही हमें यह भी तसलीम करना पड़ेगा की जुलूस हाय अज़ा की बहाली के नाम पर जुलूसे मदहे सहाबा को क़ुबूल कर के मौजूदा शिया क़यादत ने साबिक़ शिया क़यादत की इन तमाम मुस्तहब कोशिशों पर पानी फेर दिया है। जो इस मकरूह फ़ेल को रोकने के लिये सरकार नसीरूल मिल्लत , सरकार नजमुल मिल्लत , मौलाना सैय्यद कल्बे हुसैन साहब क़िब्ला उर्फ़ कब्बन साहब , मौलाना सआदत हुसैन ख़ां साहब क़िब्ला , मौलाना मिर्ज़ा मोहम्मद आलिम साहब क़िब्ला , मौलाना सैय्यद क़ायम मेंहदी साहब क़िब्ला , मौलाना सैय्यद अली शब्बर साहब क़िब्ला , मुजाहिदे अकबर सैय्यद क़ैसर हुसैन साहब रिज़वी ऐडवोकेट और मुजाहिदे मिल्लत सैय्यद अशरफ़ हुसैन साहब एडवोकेट वग़ैरा ने 1969 में तबर्रा एजीटेशन के दौरान की थीं और उन्हीं कोशिशों के नतीजे में हिन्दुस्तान के बाईस हज़ार शियों ने रज़ा काराना तौर पर ख़ुद को सरकारी जेलों के हवाले कर दिया था।

यह सच है कि मदहे सहाबा के ख़िलाफ़ शियों की तरफ़ से शुरू किया गया तबर्रा एजीटेशन चन्द माह जारी रह कर मौलाना अबुलकलाम आज़ाद और कुछ दीगर ख़ुश अक़ीदा सुन्नी उलमा की मुख़्लेसाना मदाख़ेलत के नतीजे में ख़त्म कर दिया गया था और मुजाहेदीने तबर्रा जेलों से अपने घरों को वापस आ गये थे लेकिन इसके बाद भी इन साबेक़ा उलमा ए कराम की अमली व असूली जद्दोजेहद जुलूसे मदहे सहाबा के ख़िलाफ़ उन की आख़री सांस तक जारी रही। अगर यह अक़ारिब उलमा चाहते तो उसी दौर में किसी ऐसे ही बाहमी समझौते की बिना पर जुलूसे मदहे सहाबा को क़ुबूल कर लेते और इस क़ज़िए को हमेशा के लिए दफ़्न कर देते। इसके बाद न सन् 1969 सन् 1974 सन् 1997 के फ़सादात होते और न शिया मारे जाते और न ही इमामबाड़ो और मस्जिदों में आग लगाई जाती लेकिन उन उलमा की ग़ैरत व हमियत ने जुलूसे मदहे सहाबा को कतई गवारा नहीं किया आख़िर क्यों , यह मौजूदा शिया क़यादत के लिए एक लमहा ए फ़िकरिया और एक इन्तेहाई संजीदा व ग़ौर तलब मसला ह । हम मौजूदा शिया क़ायदीन की मुख़लेसाना कोशिशों पर तन्क़ीद या किसी क़िस्म का शक नहीं करते लेकिन ये ज़रूर कहेंगे कि समझौता करते वक़्त इन्हें इस नाज़ुक तरीन मसले को भी नज़र में रखना चाहिए था। इस समझौते का दूसरा अफ़सोसनांक पहलू यह है कि शिया क़ायदीन को इशतेराफ़ व ताव्वुन से अरबाबे हुकूमत व ज़िला इन्तिज़ामियां ने इक्कसवीं रमज़ान को ही सुन्नियों के लिये मदहे सहाबा की वह गुंजाइश भी पैदा कर दी जिस के लिये वह सौ साल से बेचैनी के आलम में हाथ पैर मार रहे थे। हालांकि यह तारीख़ एक अज़ीम तरीन ग़म से वाबस्ता है जबकि जुलूसे मदहे सहाबा का इस ग़म की तारीख़ से कोई रबत नहीं है इसका इरतबात चौदह सौ साल से सिर्फ़ और सिर्फ़ शियों के अव्वलीन इमाम व पेशवा और पैग़म्बर इस्लाम के हक़ीक़ी जानशीन और दामाद हज़रत अली इब्ने अबूतालिब (अ.स.) की शहादत से है जिसे शिया फ़िर्क़ा यौमे ग़म से ताबीर करता है और गिरया और मातम के ज़रिये अपने आंसुओं का नज़राना बारगाहे अलवी में पेश करता है।

इस ग़म की तारीख़ में सुन्नियों की तरफ़ से मदहे सहाबा का जुलूस निकालना दुशमनाने अली व मुख़ालेफ़ीने अहलेबैत (अ.स.) की तारीफ़ व तौसीफ़ में बेसुरे गीत गाना इज़्हारे मसर्रत करना सड़कों पर उछलना कूदना क़दम क़दम पर फ़ूलों का बरसाया जाना और एक दूसरे से गले मिल कर मुबारकबाद का देना यह तमाम बातें शियों की दिल आज़ारी के मतराकिफ़ नहीं तो फ़िर क्या है। क्या मौजूदा शिया क़यादत इस उबूरी समझौते पर अपने दस्तख़तों के ज़रिये मोहर तस्दीक़ सबत करते वक़्त इन तमाम बातों से बे नियाज़ व बेगाना थीं ? या अरबाब इक़्तेदार के दबावों में थी।

अगर कोई यह तावील करे कि हज़रत अली (अ.स.) सुन्नियों के भी चौथे ख़लीफ़ा हैं इस लिये उनके यौमे शहादत पर सुन्नी फ़िरक़े को भी जुलूस की इजाज़त दी गयी है तो उस से मैं सवाल करना चाहूंगा कि तो फिर जुलूसे मदहे सहाबा की यह धींगा मुश्ती क्यों सुन्नी हज़रात भी अपने चौथे ख़लीफ़ा की शहादत का ग़म मनाते सियाह लिबास पहनते या बाज़ुओं पर काली पट्टियां बाधं कर ख़ामोश जुलूस निकालते और मस्जिदों में क़ुरआन ख़्वानी का एहतेमाम करते मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ बल्कि सिर्फ़ और सिर्फ़ मदहे सहाबा की हंगामा आराई और फ़ितना अंगेज़ी थी। क्या शिया फ़िरक़े के लिए दिल आज़ारी का सबब नहीं था ?

इस समझौते में तीसरी ख़ामी यह है कि जब दोनों फ़िरक़ों के जुलूसों का प्रोग्राम दोनों फ़िरक़ों के नुमाइन्दों की रज़ामन्दी से तय हो चुका था और यह भी फ़ैसला हो चुका था कि किसी फ़िरक़े की तरफ़ से न ऐसी कोई बात कही जायेगी और न की जायेगी जिस से दूसरे फ़िरक़े को तकलीफ़ पहुंचे तो ऐसी सूरत में हुकूमत की तरफ़ से तश्क़ील शुदा दो रूकनी कमेटी का यह फ़र्ज़ था कि वह दोनों फ़िरक़ों के जुलूसों के दरमियान सरकारी तौर पर मजिस्ट्रेट सतह के ऐनी मुशाहेदीन मुक़र्रर करती जो यह देखते कि कौन फ़िर्क़ा किस फ़िर्क़े की दिल आज़ारी कर रहा है ताकि इन्हीं मुशाहेदीन की रिपोर्ट की रौशनी में आइन्दा फ़ैसला किया जाता।

बहर हाल यह आरज़ी समझौता मजमुयी तौर पर एक ऐसा सरकारी खिलौना है जिस के ज़रिये शियों को बहलाया गया है और सुन्नियों के दैरीन मक़सद को पूरा किया गया है ताकि इक्कीस्वीं रमज़ान को शिया फ़िरक़े की ओर से कोई एहतेजाज न हो सके और छब्बीस जनवरी (यौमे जम्हूरिया) , ईद के त्योहार और फ़रवरी में होने वाली वस्ती मुद्दत के पार्लिमानी इलेक्शन पर इसका कोई असर न पड़ सके क्योंकि शिया फ़िरक़े की तरफ़ से 21 रमज़ान को हर हालत में अज़ादारी का जुलूस निकालने का ऐलान पहले ही हो चुका था और ज़िला इन्तिज़ामियां इस ऐलान से बा ख़बर थी।

ऐनी मुशाहेदा

इस समझौते के ज़ैल में सुन्नियों के तर्ज़े अमल और उन के जुलूसों का आंखों देख़ा हाल मैं अपनी किताब में शामिल करना चहाता हूं लेहाज़ा इक्कीसवीं रमज़ान को मुक़र्रेरा वक़्त से कुछ पहले पूरी हिम्मत और मुकम्मल अजम व इरादे के साथ मैं भोलानाथ कुआं से मुत्तसल हकीम अब्दुलवली पार्क पहुंचा जहां से सुन्नियों का जुलूस उठने वाला था क़ुरआन मजीद की तिलावत के बाद ठीक दस बज कर पचपन मिनट पर झण्डे और बैनर के साथ सुन्नी यूथ फेडरेशन का पहला जत्था पार्क से निकला और इस के साथ ही अन्जुमन तहफ़्फ़ुज़े सहाबा और दीगर अन्जुमने अपने अपने झण्डो को सम्भाले हुए सड़क पर आना शुरू हो गयीं और नारे तकबीर के साथ साथ यह सदा भी फ़िज़ा में बुलन्द होने लगी।

सहाबा का परचम उठाए चला चल।

क़दम आगे आगे बढ़ाये चला चल।

साढ़े ग्यारह बजे तक इस जुलूस में शरीक होने वाली सारी अन्जुमने अपने साज़ो सामान के साथ रोड पर आ चुकी थीं झण्डो की तादाद तक़रीबन 35 -40 के दरमियान थी जिन के खुले हुए फरैरे पर अबूबकर , उमर , उस्मान , मरवान , अबू सुफ़ियान , माविया , तलहा और ज़ुबैर के नामों के अलावा और भी कुछ बनी उमैय्या बनी अब्बास के ज़ालिम व जाबिर खोलफ़ा के नाम लिखे हुए थे और एक बैनर पर यह तहरीर था कि सहाबा सितारों की मांनिन्द हैं अगर उनकी पैरवी करोगे तो निजात पाओगे।

अंजुमने जो कलाम सुना रही थीं उन में मिनजुमला दीगर दिल आज़ार और क़ाबिले एतेराज़ अशआर के दो शेर ख़ुसूसी तौर पर क़ाबिले तवज्जो हैं –

1.जिन्हें हम समझते हैं बेहतर से बेहतर ,

वह सारे सहाबा थे हैदर से बेहतर।

2.जहां होती रहती है मदहे सहाबा ,

वह घर है ज़माने के हर घर से बेहतर।

क्या यह दोनों शेर शिया फ़िरक़े के लिए दिल आज़ारी व तकलीफ़ का सबब नहीं हैं और क्या इन शेरों के ज़रिये सुन्नियों की तरफ़ से सरही तौर पर मुहायदे की ख़िलाफ़ वरज़ी नहीं की गई। आख़िर शिया फ़िरक़ा इस क़िस्म की इशतेआल अंगेज़ियों को मुस्तक़बिल में कब तक बर्दाश्त करेगा। आइंदा सरकारी सतह पर होने वाली मीटिंगों में मौजूदा शिया क़यादत को इस दिल आज़ार अक़दाम और समझौते की ख़िलाफ़वरज़ी को नज़र में रखते हुए आवाज़ ए एहतेजाज बुलन्द करना चाहिए।

सुन्नियों और वहाबियों दोनों समलक के लोगों पर मुशतमिल इस जुलूस में शोरका की तादाद चार और पांच हज़ार के दरमियान थी और पढ़े लिखे लोग बहुत कम थे जिस से यह अन्दाज़ा भी लगाया जा सकता है कि लखनऊ शहर में अस्सी फ़ीसदी वहाबियत फैल चुकी है जिस का नसबुल ऐन ही जुलूसे मदहे सहाबा की आड़ में अज़ादारी के जुलूसों को रोकना और फ़ितना व फ़साद पैदा करना है। चुनान्चे इस जुलूसे मदहे सहाबा में वहाबी फ़िरक़े के जो लोग शरीक थे उन में कुछ लोगों के चेहरों पर सफ़फ़ाक़ना शरारत आमेज़ और फ़ातेहाना मुस्कुराहत थी कुछ के चेहरों पर पुलिस व इंतिज़ामियां के अफ़सरों व हुक्काम और पी 0 ए 0 सी 0 का ख़ौफ़ तारी था और कुछ के चेहरे हर क़िस्म के जज़्बात व एहसासात से आरी थे।

अर्ज़ कि ग़ुरूर व अनानियत के साज़ पर अपनी फ़तह व कामयाबी के तराने अलापता हुआ और अपनी मन मानी करता हुआ यह जुलूस जब अकबरी गेट की ढाल पर पहुंचा तो पुल ग़ुलाम हुसैन पर वाक़ेया ए चारयारी मस्जिद की तरफ़ मुड़ने के बजाय कुछ शर पसन्दों ने आगे बढ़ने की कोशिश की शायद इनका इरादा शहमीना या टीले वाली मस्जिद की तरफ़ पेश क़दमी का रहा हो बहर हाल मौक़े पर मौजूद पुलिस व इंतिज़ामियां के होशमंद अफ़सरों ने मौक़े की नज़ाकत को फ़ौरन भाप लिया और थोड़ी सी कशमकश के बाद इन्हें पुल ग़ुलाम हुसैन की तरफ़ मोड़ने पर मजबूर कर दिया इसके बाद मैं वहां से करबलाये तालकटोरा की तरफ़ रवाना हो गया क्योंकि मेरा मक़सद पूरा हो चुका था मेरे नज़दीक़ सुन्नियों की तरफ़ से समझैते की ख़िलाफ़वरज़ी बिलकुल इसी तरह अमल में लाई गयी जिस तरह इमाम हसन (अ.स.) से मुहायदे के बाद मआविया की तरफ़ से अमल में लायी गयी थी।


जुलूसे मदहे सहाबा में तबर्रा

22 जनवरी सन् 1997 का हिन्दी स्वतंत्र भारत शुमारा नम्बर 159 सफ़ा नम्बर चार पर लिखता है।

आज दोपहर लगभग डेढ़ बजे तक सुन्नियों का जुलूस चारयारी मस्जिद के पास पहुंचा तो पुलिस ने इसे वहीं रोक दिया और आगे जाने वाले रास्ते को सील कर दिया क्योंकि सुन्नियों के जुलूस को यहीं पर ख़त्म होना था। इसके बाद सुन्नियों ने अपने झण्डों को लपेटना शुरू ही किया ही था कि जुलूस में मौजूद तीन लोगों ने तबर्रा पढ़ना शुरू कर दिया जिससे भीड़ भड़क उठी और उन लोगों ने उन नौ जवानों की पिटाई शुरू कर दी पिलाई कर रहे सुन्नियों की गिरफ़्त से भागे मज़कूरा तीनों नौजवान चारयारी मस्जिद में जा छिपे जिस से मुशतअल भीड़ भी इन लोगों के पीछे मस्जिद में जाने लगी। इस अफ़रा तफ़री के माहौल में एक शख़्स ने मस्जिद के पास ही खड़े अपर ज़िला अधिकारी (नगर) , को हादसे की इत्तेला दी हादसे की इत्तेला मिलते ही अपर ज़िला अधिकारी नगर ऐ 0 के 0 चतुर्वेदी और अपर पुलिस अधीक्षक (पश्चिम) सतेन्द्र वीर सिंह तीन पुलिस वालों के साथ मस्जिद में घुस गये इन के पीछे और पुलिस वालों ने जाना चाहा पर इन्हें वहां मौजूद लोगों ने मस्जिद में जाने से रोक दिया। कुछ लम्हों के बाद जब अपर ज़िला अधिकारी (नगर) व पुलिस अधीक्षक (पश्चिम) मस्जिद के बाहर आये तो उन्होंने बताया कि भीड़ के ज़रिये पीटे गये शख़्स तीन नहीं सिर्फ़ एक ही है और वह भी शिया नहीं सुन्नी है जो अब भी ऊपर ही बैठा हुआ है जब कि जुलूस में मौजूद लोगों का कहना है कि जुलूस में शामिल तीन लोगों ने तबर्रा पढ़ा था और वही पीटे गये। भीड़ में मौजूद लोगों ने ज़िला इंतिज़ामिया पर इल्ज़ाम आयद किया कि उसने तीनों नौ जवानों को मस्जिद के पिछले रास्ते से भगा दिया।

इस एकतेबास से साफ़ तौर पर वाज़ेह है कि सुन्नियों में एक फ़िरक़ा ऐसा भी है जो न सिर्फ़ जुलूसे मदहे सहाबा का मुख़ालिफ़ है बल्कि शिया सुन्नी झगड़े का शाक़िसाना खड़ा कर के शहर में फ़ितना व फ़साद की आग भड़काना चाहता है नेज़ गुज़िशता वाक़ेआत का सरसरी तौर पर जायज़ा लेने से यह बात खुल कर सामने आती है कि अकसर व बेशतर बारह वफ़ात के मौक़े पर मदहे सहाबा के बलमुक़ाबिल तबर्रा का होना शियों का फेल नहीं था बल्कि इसी फ़िरक़े के लोगों का कारनामा था और मुरीदे इलज़ाम शियों को क़रार दिया जाता था जैसा कि इसी अलामती जुलूस के दौरान हुआ।

अख़बारी इक़्तेबासात

1.इन टोकन जुलूसों के ज़ैल में हिन्दी अख़बार राष्ट्रीय सहाबा का बयान है कि –

ज़िला इंतिज़ामियां के साथ हुए एक समझौते के मुताबिक़ शियों को इक्कीसवीं रमज़ान ( 21 जनवरी) कार्यवाही जुलूस आज सुबह पुत्तन साहिबा की करबला से निकाला गया। जुलूस बुलाकी अड्डा से होता हुआ ताल कटोरा पहुंचा जहां मातमी अंजुमनों ने नौहा ख़्वानी कर के हज़रत अली (अ.स.) को ख़ेराजे अक़ीदत पेश किया जुलूस का सिलसिला सुहब 11 बजे से शाम 4 बेज तक जारी रहा। रवायती जुलूस निकाले जाने से पहले पुत्तन साहिबा की करबला में एक बड़ी मजलिस का एहतेमाम किया गया जिसे धर्म गुरू मौलाना कल्बे जव्वाद साहब ने ख़िताब किया मौलाना ने शियों के इमाम हज़रत अली (अ.स.) की शहादत पर रौशनी डालते हुए बताया कि हज़रत अली (अ.स.) की निगाह में नमाज़ की क्या अहमियत थी। मौलाना ने कहा जिस तरह हज़रत अली (अ.स.) ने नमाज़ के लिए अपनी जान की परवाह नहीं की इसी तरह सभी मुसलमानों को नमाज़ की अहमियत समझनी चाहिए।

मजलिम के बाद तमाम अंजुमनों के दस्तों की या हुसैन , या अली की सदायें गूंजने लगीं मातमी अंजुमनों का यह सिलसिला पुत्तन साहिबा की करबला से लेकर तक़रीबन एक किलो मीटर की दूरी तक फ़ैलता चला गया।

जुलूस में अलम व ताबूत भी निकाले गये लोगों ने इन की ज़ियारत की बाद में करबलाये तालकटोरा पहुंच कर अलम व ताबूत को ठंडा कर दिया गया। ताल कटोरा पहुंचने पर भी लोगों ने अलग अलग मजलिस व नौहा ख़्वानी की पूरा ताल कटोरा सहन मातमी अंजुमनों व जुलूस में शामिल लोगों से खचाखच भरा हुआ था।

इधर तहफ़्फ़ुज़े नामूसे सहाबा और आल इण्डिया सुन्नी यूथ फेडरेशन के बैनर तले बड़ी तादाद में सुन्नी मुसलमानों ने आज भोला नाथ कुंआ से पुल ग़ुलाम हुसैन तक तारीख़ी व मज़हबी जुलूस निकाला। जुलूस अगरचे बग़ैर नाम ही के निकाले गये लेकिन सैकड़ौं झण्डों और बैनर के साथ लोगों ने अपने मदहे सहाबा के जुलूसों की याद ताज़ा की।

जुलूस के दौरान अफ़रा तफ़री मच गयी जब जुलूस में शामिल कुछ लोगों ने अब्दुल अज़ीज़ रोड़ अकबरी गेट से पुल ग़ुलाम हुसैन की तरफ़ मुड़ने के बजाय विक्टोरिया स्ट्रीट की तरफ़ बढ़ने की कोशिश की वहां मौक़े पर मौजूद अफ़सरान व सुन्नी लीडरान ने मुदाख़ेलत कर के हालात को बिगड़ने से बचा लिया।

सुन्नियों की तरफ़ से 21 रमज़ान को निकाला गया यह पहला जुलूस था। जुलूस निकलने पर हर चेहरे पर खुशी झलक रही थी और जुलूस में शामिल होने के लिए शहर की तमाम अंजुमनें आज सुबह ही से भोला नाथ कुंआ की तरफ़ पहुंचना शुरू हो गयी थीं। 11 बजते ही मुक़र्रर वक़्त पर सुन्नी मुसलमानों ने जुलूस निकालना शुरू किया। दो घण्टे तक चले इस जुलूस के प्रोग्राम की सदारत तहफ़्फ़ुज़े नामूसे सहाबा और सुन्नी यूथ फेडरेशन की तरफ़ से शेख़ सग़ीर हुसैन , हाजी ग़ुलाम हुसैन , हसन अहमद सिद्दीक़ी , रईस अंसारी , मुशर्रफ़ हुसैन , मौलाना अब्दुल रहमान फ़ारूक़ी , मौलाना अब्दुल बारी , और फ़ज़्ले आलम एडवोकेट ने की इस मौक़े पर अंजुमन माविया , अन्जुमन 786, अंजुमन मदहे सहाबा , अंजुमन कयामे सलाल , अंजुमन क़दीमी , अंजुमन निजामुल मुसलेमीन , अंजुमन आज़ाद 313, अंजुमन आज़ाद 62, अंजुमन तलहा , अंजुमन ख़ुद्दामे उस्मानी , और अंजुमन उसमानियां ने दुरूद व सलाम पेश की उस दौरान अंजुमनी दस्तों ने कुछ यादगार अशआर पढ़ कर सहाबा का नाम बलंद किया।

सहाबा का परचम उठाये चला चल।

क़दम आगे आगे बढ़ाऐ चला चल।।

मेरे सहाबा सितारों की मानिंद हैं।

इन की पैरवी करोगे तो निजात पाओगे।।

हमें ऐ जज़्बाए इस्लाम तुझ से काम लेना है।

अबू बकर व उमर उस्मान अली का नाम लेना है।।

जुलूस पुल ग़ुलाम हुसैन की चारयारी मस्जिद में दोपहर की नमाज़ और दुआयी प्रोग्राम के बाद ख़त्म हुआ।

(आप ये किताब अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क पर पढ़ रहे है।)

2. उर्दू रोज़नामा इन दिनों का बयान है।

आज लखनऊ के शहरियों ने हज़रत अली करम अल्लाह वजहू की शहादत की याद में शिया मसलक के मानने वालों को लाखों की तादाद में पुत्तन साहिबा की करबला से ताल कटोरा तक मातम करते हुए देखा। इस मातम में बड़ी तादाद में पुरजोश नौ जवानों ने छुरियों और ज़ंजीरों का मातम कर के मौला अली (अ.स.) के प्यारों के साथ नज़राना ए अक़ीदत पेश किया। हमारे नुमाइंदे के मुताबिक़ विक्टोरियां स्ट्रीट से ताल कटोरा तक स्याह लिबास में इंसानों का ठांठे मारता हुआ समन्दर , या पुलिस की ख़ाकी वरदियों का मंज़र नज़र आ रहा था। ताल कटोरा पहुंचने पर अंदाज़ा हुआ कि इतना बड़ा मजमा करबला में समा नहीं सकता इस लिए किसी मजलिम का इंतज़ाम नहीं किया गया। इस लिए कि मजमें को कोई ताक़त या शख़्सियत कंट्रोल नहीं कर सकती थी। जुलूस की क़यादत मौलाना कल्बे जव्वाद साहब , मौलाना हमीदुल हसन साहब , मौलाना अली नासिर सईद अबाक़ाती आग़ा रूही साहब और मौलाना ज़हीर अहमद इफ़्तेख़ारी ने की और लाख़ो के मजमे ने कहीं भी वक़ार और सुकून को हाथ से जाने नहीं दिया। हर चन्द कि यह जुलूस हैदर गंज क़दीम से भी ग़ुज़रा जहां सुन्नियों की ख़ासी आबादी है लेकिन वह तमाम अहले मोहल्ला इत्मीनान के साथ जुलूस को गुज़रता हुआ और मातम का नज़ारा देखते रहे। शिया सोगवारों ने वापसी के लिए विक्टोरिया स्ट्रीट को ही इस्तेमाल नहीं किया बल्कि राजाजी पुरम की तरफ़ से कश्मीरी मोहल्ला काज़मैन और सआदतगंज की सड़कों से भी मजमा वापस हुआ। हमारे नुमाइन्दे कि इत्तेला के मुताबिक़ पुत्तन साहिबा की करबला से ताल कटोरा तक शिया हज़रात का जो हुजूम मातम करता हुआ गुज़रा उसके साथ दो ताबूत और पांच अलम थे। जुलूस में शामिल लोगों ने या अली मौला और हैदर मौला के ही नारे लगाये और बड़े नज़्म व ज़ब्त के साथ यह जुलूस करबला ए ताल कटोरा पर बख़ैर व ख़ूबी तमाम हुआ।

हिफ़ाज़ती बन्दोबस्त का यह आलम था कि छतों पर पुलिस लगी हुई थी और जुलूस के आगे आगे दरजनो घोड़े सवार पुलिस और काफ़ी तादाद में पी 0 ए 0 सी 0 और इन्तिज़ामियां और पुलिस के अफ़सरान भी थे और यही हाल जुलूस के पीछे था। जुलूस जैसे जैसे आगे बढ़ता जा रहा था लोग अपनी अपनी छतो पर खड़े हो कर इस तारीख़ी मंज़र को देख रहे थे।

सुन्नियों का जुलूस भोला नाथ कुंआ पर वाक़ेया हकीम अब्दुलवली पार्क से शुरू हो कर मस्जिद चारयारी पुल ग़ुलाम हुसैन पर तमाम हुआ। इसमें भी हज़ारों की तादाद में सुन्नियों ने शिरकत की। इस जुलूस में मुख़तलिफ़ अंजुमनों के चालीस झण्डे शामिल थे। जिन पर चारों ख़ुल्फ़ा ए राशदीन के नाम लिखे हुए थे। जुलूस में शामिल मिख़तलिफ़ अंजुमने मदहे सहाबा पढ़ रही थीं जब यह जुलूस अकबरी गेट की चढ़ायी से मस्जिद चारयारी की तरफ़ मुड़ने वाला था कि तभी कुछ पुरजोश नौजवानों ने एक मीनारा मस्जिद की तरफ़ बढ़ना शुरू किया मगर कुछ बदनज़मी न हो सकी। जुलूस शुरू होने से पहले क़ारी वसीम साहब ने तिलावत की , जुलूस में सब से आगे सुन्नी यूथ फ़ेडरेशन औत तहफ़्फ़ुज़े नामूसे सहाबा के बैनर थे। जुलूस की क़यादत मिस्टर शमीम सग़ीर , मिस्टर हसन अहमद सिद्दीक़ी , हाजी ग़ुलाम हसनैन , मिस्टर अब्दुल्ला , मिस्टर क़मर याब जिलानी और सुन्नी यूथ फेडरेशन की तरफ़ से मिस्टर मुशर्रफ़ हुसैन , मिस्टर सलाउद्दीन अबूबकर , मिस्टर ग़ुफ़रान नसीम , मिस्टर शाह नवाज़ , मिस्टर मोहम्मद उमर और मिस्टर ख़ालिद हलीम ने क़यादत की इस के अलावा मौलाना अब्दुल अलीम के तीनों बेटे भी शामिल थे। जुलूस जिधर जिधर से गुज़रा उस पर फूलों की बारिश हुई और जगह जगह इस्तेक़बाल किया गया।

अमन व अमान क़ायम रखने के लिए इन अलामती जुलूसों में 19 मजिस्ट्रेट 140 अफ़सरों की ड्यूटी लगायी गयी थी। 38 कम्पनी पी 0 ए 0 सी 0 व सरीउल हरकत फ़ोर्स लगायी गयी थी। जुलूस के तमाम इलाक़ों को चौदह सेक्टरों में बांटा गया था और इन तमाम जगहों पर मजिस्ट्रेटों और बाहर से आये तमाम अफ़सरों की ड्यूटी लगायी गयी थी।

3. रोज़नामा सहाफ़त लिखता है –

शहादत अमीरूल मोमेनीन के मौक़े पर आज शहर में 20 साल से ज़्यादा अरसे के बाद अलामती जुलूस निकाले गये ज़िला इंतिज़ामियां और दोनों फ़िरक़ों के रहनुमाओं के माबैन मुहायदे के बाद यह जुलूस निकलने की इजाज़त दी गयी और इस दौरान कोई नाख़ुशगवार वाक़ेया रूनुमा नहीं हुआ। दोनों फ़िर्क़ें के रहनुमाओं ने पुरअमन तौर पर इन जुलूसों के निकल जाने पर अवाम और ज़िला इंतिज़ामियां का शुक्रिया अदा किया है और उम्मीद ज़ाहिर की है कि इस से मसले के मुसतक़िल हल निकल आने की राह हमवार हो गयी है।

करबला ए पुत्तन साहब जहां से इस आरज़ी मुहायदे के तहत शिया मुसलमानों का जुलूस निकलना था मोमेनीन सुबह हसन मिर्ज़ा का ताबूत उठने के बाद से ही जमा होने लगे थे जुलूस से क़ब्ल मजलिस को ख़िताब करते हुए मौलाना कल्बे जव्वाद साहब ने शहादते अमीरूल मोमेनीन (अ.स.) का ज़िक्र किया और अवाम को हिदायत दी कि आप लोग जुलूस में सिर्फ़ मातम करें और कोई ऐसी हरकत न करें जिस से दूसरे फ़िर्क़े को कोई तकलीफ़ पहुंचे और हम पर कोई इल्ज़ाम लग सके। बादे ख़त्मे मजलिस ठीक ग्यारह बजे दिन में शिया उलमा मौलाना हमीदुल हसन , मौलाना कल्बे जव्वाद , और मौलाना आग़ा रूही की क़यादत में जुलूस निकाला गया जो बुलाकी अड्डा होता हुआ ताल कटोरा पहुंचा जुलूस में हज़ारों की तादाद में लोग शरीक थे जिस में ख़ासी तादाद में नौजवान और ख़्वातीन भी मातम करते हुए आख़िर तक शामिल रहीं। जुलूस में नौजवान पूरे नज़्म व ज़ब्त के साथ मातम करते हुए चल रहे थे जोश व वलवले के बावजूद इस मौक़े पर नौजवानों ने जिस डिसिप्लिन का मुज़ाहेरा किया वह क़ाबिले दीद था। सिर्फ़ या अली मौला हैदर मौला के नारों और सीना ज़नी के अलावा कोई आवाज़ सुनाई नहीं दे रही थी। ज़िला इंतिज़ामियां की तरफ़ से भी इस मौक़े पर सख़्त हिफ़ाज़ती इंतिज़ाम किये गये थे जो बराबर निगरानी कर रहे थे।

डेढ़ बजे दिन में यह जुलूस ताल कटोरा पहुंचा जहां जुलूस में शामिल अंजुमन हाय मातमी ने नौहा ख़्वानी का सिलसिला शुरू कर दिया और मोमेनीन की जानिब से मजलिस का एहतेमाम किया गया करबला में हर तरफ़ गिरया व बुका का सिलसिला भी नमाज़ मग़रिब तक जारी रहा जो बाद नमाज़ इफ़तार पर ख़त्म हुआ।

दूसरी जानिब अंजुमने तहफ़्फ़ुज़े नामूसे सहाबा और सुन्नी यूथ फेडरेशन की क़यादत में सुन्नियों का जुलूस भोला नाथ कुआं से निकल कर अकबरी गेट होता हुआ पुल ग़ुलाम हुसैन की चारयारी मस्जिद तक गया जुलूस में शोरका अपने हाथों में झण्डे और बैनर लिये हुए थे और नौजवान जोशो ख़रोश के साथ नारे तकबीर बुलन्द कर रहे थे और अन्जुमन हाय मदहे सहाबा अपना कलाम सुना रहीं थी।

4. रोज़नामा कुबेर टाईम्स का बयान है कि –

शिया फ़िरक़े की तरफ़ से इक्कीसवीं रमज़ान को अज़ादारी का जुलूस निकालने के एलान के बाद ज़िला इंतिज़ामियां ने दोनों फ़िरक़ों की मीटिंग तलब कर के बग़ैर किसी नाम के अलामती जुलूस निकालने के लिए राज़ी कर लिया। 17/18 जनवरी को हुए इस तारीख़ी समझौते के लिए कई रज़ामंदी के बाद दोनों फ़िरक़ों के उलमा ने अपने अपने फ़िर्क़ों का जलसा तलब कर के मुहायदा और रज़ामंदी के नुक़ात से उन्हें आगाह किया और जुलूस के ख़दो ख़ाल को आख़िरी शक्ल दी।

पुरअमन तरीक़े से आज निकाले गये अलामती जुलूसों को लेकर पुराना लखनऊ पिछले तीन दिनों से कुछ ज़्यादा गरमाया हुआ था। हर पर किसी न किसी तरह की अफ़वाह फैल रही थी लेकिन जुलूसों के दौरान लड़ायी झगड़े और तशद्दुद का कोई हादसा नहीं हुआ। दोनों फ़िर्क़ों के दरमियान हुए समझौते में साफ़ तरीक़े से लिखा गया था कि दोनों फ़िरक़ों की तरफ़ से ऐसी कोई बात नहीं कही जायेगी न की जायेगी जिस से दूसरे फ़िरक़े को तकलीफ़ व एतेराज़ हो।

सुन्नियों का जुलूस झंवाई टोला के भोला नाथ कुएं से निकाला गया। हसन अहमद मुशर्रफ़ हुसैन , शेख़ सग़ीर हुसैन , हाजी गुलाम हुसैन , क़मरयाब जिलानी , फ़ज़ले आलम एडवोकेट और सलाउद्दीन अबूबकर की क़यादत में जुलूस निकालने से क़ब्ल क़ुरआन ख़्वानी की गयी। जुलूस में बहत्तर झण्डे और बैनर थे। सब से आगे सुन्नी यूथ फेडरेशन और तहफ़्फ़ुज़े नामूसे सहाबा का बैनर था जुलूस में शामिल सभी अन्जुमन मदहे सहाबा पढ़ रही थीं और अंजुमन माविया अकबरी गेट के बैनर पर चारो सहाबा के नाम थे।

अख़बारी ख़ुलासा

मुंदरजा बाला चारों अख़बारों के एकतेबासात की रोशनी में मुंदरजा ज़ैल बातें उभर कर सामने आती हैं –

1. शियों ने इक्कीसवी रमज़ान (शहादत अमीरूल मोमेनीन (अ.स.) ) के मौक़े पर अज़ादारी के रूके हुए जुलूसों के निकालने का एलान कर दिया था इस लिए ज़िला इंतिज़ामियां ने दोनों फ़िरक़ों के लीडरों की मीटिंग तलब कर के बग़ैर किसी नाम के अलामती जुलूस निकालने पर राज़ी कर लिया जैसा कि कुबेर टाइम्स का बयान है। यह रज़ामंदी फ़रीक़ैन के दरमियान किन वजहों या किन मजबूरियों की बिना पर अमल में लायीं गयी । यह ज़िला इंतिज़ामिया और हुकूमत की तरफ़ से तशक़ील शुदा दो रूकनी कमेटी जानती है। दोनों फ़िरक़ों में लीडर जानते हैं या ख़ुदा जानता है।

2. शिया फ़िरक़े की तरफ़ से निकाले गये अलामती जुलूस में नज़्म व ज़ब्त पूरी तरह बरक़रार रहा कोई ऐसी बात न कही गयी न की गयी जिस से दूसरे फ़िरक़े को कोई तकलीफ़ पहुंचे या उसकी दिल आज़ारी होती।

3. शिया फ़िर्क़ें ने अपने चार पांच लाख मजमें वाले अज़ीम तरीन जुलूस में सिर्फ़ दो ताबूतों और रोज़ानामा इन दिनों की सराहत के मुताबिक़ पांच अलमों की अलामत के तौर पर इस्तेमाल किया जब कि सुन्नी फ़िरक़े ने अपने चार पांच हज़ार के मजमें में मुतादिद अख़बारों की सराहत के मुताबिक़ चालीस झण्डों से लेकर बहत्तर झण्डों तक निज़ इसके अलावा बैनरों की अलामत क़रार दे कर अपना जुलूस निकाला और मदहे सहाबा पढ़ा हालांकि समझौते में किसी फ़िरक़े के लिए अलामत का कोई तज़किरा नहीं है।

4. सुन्नी फ़िरक़े के लोगों ने अपने हुदूद मोअय्यना से आगे बढ़ने और जुलूस के अख़तताम पर तबर्रा पढ़ कर शहर में फ़ितना व फ़साद बरपा करने और शियों पर इलज़ाम आयद करने की कोशिश की जब कि शिया अपने हुदूदे मोअय्यन में पुर अमन व पुर सुकून रहे।

5. सुन्नियों के जुलूसों में शियों के दरमियान इशतआल पैदा करने के लिए दिल आज़ार और अज़ीयत रसां अशार पढ़े गये जब कि शियों के जुलूस में या अली मौला हैदर मौला और मातम की सदाओं के अलावा कोई दूसरी आवाज़ नहीं सुनाई दी।

6. सुन्नियों के झण्डों और बैनरों पर ख़ुलफ़ा ए सलासा के अलावा दीगर ऐसी शख़्सियतों के नाम भी थे जो हज़रत अली (अ.स.) के बदतरीन दुशमन थे जब कि शियों के अलमों पर कोई नाम नहीं था।

7. सुन्नियों के जुलूसों में मुख़तलिफ़ अंदाज़ से ख़ुशियों के मुज़ाहिरे हो रहे थे जब कि शिया फ़िरक़ा सिर्फ़ हज़रत अली (अ.स.) का ग़म मनाने और नौहा मातम में मसरूफ़ था अर्ज़ की लखनऊ की तारीख़ इस आरज़ी व ग़बूरी समझौते से क़ब्ल ऐसी कोई मिसाल पेश करने से क़ासिर नज़र आती है।

मौजूदा सूरते हाल

लखनऊ का शिया सुन्नी कज़िया जितना पेंचीदा पहले था उस से ज़्यादा पेंचीदा इस अरज़ी व गबूरी समझौते के निफ़ाज़ और सुन्नी फ़िरक़े के जुलूस के दौरान इन के तर्ज़े अमल के बाद हो गया है क्योंकि यह झगड़ा दर हक़ीक़त शियों और ख़ुश अक़ीदा व अमन पंसद सुन्नियों के दरमियान नहीं है बल्कि शियों और इस्लाम दुश्मन उन नासबियों और ख़ारजियों के दरमियान है जिनका नसबुलऐन ही जुलूसे मदहे सहाबा की आड़ में उन इस्लामी रवायात व मामूलात और मरासिम को यज़ीदियत मावियत , अबू सुफ़यानियत और ख़ारजियत से टकरा कर ख़त्म करना है जो हुक्में खुदा और सुन्नते रसूल स 0 के मुताबिक़ उम्मते मुसलेमा में चौदह सौ बरस से राएज हैं।

ख़ुश अक़ीदा सुन्नी मुसलमान इस झगड़े में शियों के साथ हैं इस लिए कि इस्लामी मालूमात व मरासिम के मामले में दोनों के नज़रियात एक दूसरे मे हम अंहग हैं और दोनों ही रसूल स 0 व आले रसूल (अ.स.) से मुहब्बत व अक़ीदत रखते हैं नेज़ नवासे रसूल की अज़ादारी को अपना मज़हबी फ़रीज़ा समझते हैं।

(आप ये किताब अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क पर पढ़ रहे है।)

इस के बरअक्स नासबी और ख़ारजी मुसलमानों का फ़िरक़ा मोहम्मद व आले मोहम्मद (अ.स.) पर दुरूद सलाम और बुज़ुर्गीने दीन की क़बरों के अहतेराम व ज़ियारत को बिदअत और शिर्क से ताबीर करता है नेज़ अपने अलावा चौदह सौ बरस की सारी उम्मत मुसलेमां को काफ़िर क़रार देता है जिस की वज़ाहत हम इस किताब में कर चुके हैं। यह फ़िरक़ा चूंकि अबू सुफ़यान , माविया और माविया के फ़ासिख़ व फ़ाजिर और बदकिरदार बेटे यज़ीद को अपना रहनुमा और पेशवा तसलीम करता है। इस लिए फ़रज़न्दे रसूल हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) की अज़ादारी का सख़्त तरीन मुख़ालिफ़ है ताकि मुख़ालिफ़त की आड़ में इन नाम नेहाद सहाबा के जराइम और मज़ालिम पर परदा डाला जा सके जो 61 में इमाम हुसैन (अ.स.) और इन के बहत्तर साथियों की शहादत का सबब बने –

सहाबा की क़बरों को खोदने वाले इस फ़िरक़े के शर पसन्द अफ़राद तक़रीबन सौ साल से मदहे सहाबा के नाम पर लखनऊ में फ़ितना फ़साद की आग भड़काने शियों और सुन्नियों के दरमियान बदगुमानी , नफ़रत और अदावत की दीवार खड़ी करने , इत्तेहाद को पारा पारा करने शहर के सुकून और ख़ुशगवार माहौल को परागंदा करने और सादा लोह मुसलमान को गुमराह कर के उन्हें ज़िल्लत व तबाही के ग़ार में ढ़केलने का काम अंजाम देते रहे और जब भी इन्हें मौक़ा मिला इन्होंने शहर में ख़ूनी फ़साद बरपा कर दिया।

उत्तर प्रदेश सरकार ने इस मसले का पाएदार हल तलाश करने के लिए जो दो रूकनी कमेटी तशकील दी है इसका यह फ़र्ज़ था कि कोई बाहमी समझौता कराने से पहले वह जुलूसे मदहे सहाबा और जुलूस हाय अज़ा दोनों की तारीख़ और शिया सुन्नी फ़िर्क़े की रौशनी में देखती कि किस का मुतालबा जाएज़ और दुरूस्त है ताकि हक़ व बातिल का फ़र्क़ नुमायां हो जाता मगर ऐसा नहीं किया गया बल्कि सियासी और साज़िशी मसलहत परवरी के तहत दोनों फ़िर्क़ों के मुतालबात को मंज़ूर कर के और इक्कीसवीं रमज़ान को आरज़ी तौर पर मदहे सहाबा का जुलूस निकलवा कर बाहमी फ़ितना व फ़साद का एक नया रास्ता खोल दिया गया है।

ऐसी सूरत में मौजूदा शिया क़यादत को भी चाहिए कि वह आइंदा इस क़िस्म के हरबों से मुहतात रहे और मुस्तक़बिल में कोई ऐसा फ़ैसला न करें जिस से कि तबर्रा की तलवारें फिर चमकने लगें और यह मसला फिर इसी मंज़िल पर पहुंच जाये जहां से इसकी इब्तेदा हुई थी।

21 अप्रैल 1998 ई 0 के समझौते पर एक नज़र

इस आरज़ी समझौते की पहली ख़ुसूसियत यह है कि लखनऊ की ज़िला इंतिज़ामियां ने शिया व सुन्नी दोनों फ़िरक़ों क मज़हबी आज़ादी को सल्ब करते हुए उनके जुलूसों की नक़लो हरकत को अपने ही दायरा ए इख़तेयार में रखा है जो उसूली तौर पर नामुनासिब है जैसा कि मुहायदे के पैरा नम्बर 1, 2 और 5 से ज़ाहिर है।

दूसरी ख़ुसूसियत यह है कि शिया क़यादत ने अपनी मसलहत आमेज़ पालिसी के तहत यह तसलीम कर के कि सुन्नी फ़िरक़े के लोग अपने जुलूस का नाम ख़ुद तजवीज़ करेंगे , जुलूसे मदहे सहाबा का वह रास्ता हमवार कर दिया है जो सौ बरस से मसदूद था , और उन्होंने शिया आवाम के सामने तावील की गुंजाइश भी रखी है ताकि मुसतक़बिल में उन पर किसी क़िस्म की अन्गुश्त नुमाई न हो सके।

(आप ये किताब अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क पर पढ़ रहे है।)

तीसरी अहम बात यह है कि 2 मई 1998 ई 0 को मौलाना सै 0 हमीदुल हसन साहब क़िब्ला और मौलाना सै 0 कल्बे जव्वाद साहब क़िब्ला ने अपनी तहरीर के ज़रिये जनाब जावेद मुर्तुज़ा साहब एडवोकेट और जनाब एम 0 एम 0 ताहिर साहब को इस बात का मजाज़ किया था कि वह इन्तिज़ामियां के साथ गुफ़्तुगू कर के आशूर ए मोहर्रम को उठने वाले जुलूस हाय अज़ा के रास्तों का तअय्युन करें। चुनान्चें इन दोनों हज़रात ने ज़िला इन्तिज़ामियां के सामने अपना यह मवक़्क़िफ़ रखा कि शियों को इमामबाड़ा आसफ़ी से तालकटोरा तक जुलूस ले जाने की इजाज़त दी जाये। मोहतरम जावेद मुर्तुज़ा साहब का यह बयान है कि उनकी गुफ़्तुगू इमामबाड़ा आसफ़ी और गुफ़रानमात से गुज़र कर इमामबाड़ा नाज़िम साहब से करबला तालकटोरा तक जुलूस ले जाने पर ठहर गयी थी। ज़िला इन्तिज़ामियां के अफ़सरान इस पर ग़ौर कर ही रहे थे कि एक मीटिंग में कुछ बरगुज़ीदा शिया उलमा ने यह कह कर उनकी सारी कोशिशों पर पानी फेर दिया कि सरकार का हुक्म जहां से होगा वहां से हम अपना जुलूस उठा लेंगे। इसका नतीजा यह हुआ कि आशूर को भी पुत्तन साहिबा की करबला शियों के जुलूस का मरकज़ क़रार पायी। जनाब जावेद मुर्तुज़ा साहब के इस बयान की रौशनी में अगर ग़ौर किया जाये तो शिया उलमा का यह नारवा एक़दाम शिया आवाम की मज़हबी आज़ादी की पामाली के मुतारादिफ़ है उन्हें चाहिये कि हुकुमत व ज़िला इन्तिज़ामिया की बैयत तोड़ कर आइंदा अपने हुक़ूक़ की बाज़याबी के लिए मुख़लेसाना जद्दो जेहद करें वरना मज़लूमें करबला से ग़द्दारी के जुर्म में मासूमा ए कौनैन उन्हें कभी माफ़ नहीं करेंगी।

(तमाम शुद)

[[अलहम्दो लिल्लाह किताब हिन्दुस्तान में फ़ितना ए वहाबियत पूरी टाईप हो गई खुदा वंदे आलम से दुआगौ हुं कि हमारे इस अमल को कुबुल फरमाऐ और इमाम हुसैन (अ.) फाउनडेशन को तरक्की इनायत फरमाए कि जिन्होने इस किताब को अपनी साइट (अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क) के लिऐ टाइप कराया।

सैय्यद मौहम्मद उवैस नक़वी]]

(0 5/0 1/2016)


फेहरिस्त

हिन्दुस्तान में फ़ितना ए वहाबियत 1

अरज़े मोअल्लिफ़ 3

इब्तेदाईया 6

हिन्दुस्तान में फ़ितना ए वहाबियत 16

मदहे सहाबा का जन्म – 23

दूसरा दौर – 26

एलसप कमेटी और उसकी तहक़ीक़ाती रिपोर्ट – 27

इज़हारे ख़्याल 28

मन्ज़ूरी व तबसेरा 30

30 मार्च 1939 का सियासी फ़ैसला – 31

तबर्रा ऐजीटेशन – 32

5 जुलाई 1939 का कर्फ़्यू – 37

6 जुलाई 1939 का तारीख़ी दिन – 38

मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद से वज़ीर ए आला की फ़रियाद – 40

मौलाना आज़ाद का तारीख़ी बयान – 41

तबलीग़ी जमाअतों का क़याम और उनकी सरगर्मियां – 44

जुलूसे मदहे सहाबा पर इसरार क्यों ? 54

तन्क़ीद व तब्सेरा – 56

क़ज़ीया ए मदहे सहाबा का तीसरा दौर – 65

ताबूत पर हमला 23 अप्रैल 1969 – 74

ज़िला हुक्काम का जांबेदाराना रवैया 74

26 मई का फ़साद – 76

नाना जी देश मुख का दौरा – 79

बारह वफ़ात – 80

21 अगस्त का दूसरा फ़साद – 81

मौलाना सैय्यद मुज़फ़्फ़र हुसैन , ताहिर जरवली और मौलाना सैय्यद कल्बे सादिक़ की गिरफ़्तारियां – 82

सह रोज़ा एजीटेशन – 83

शिया अख़बारों की ख़िदमात – 85

सुलह की कोशिश – 87

1969 का मुहायदा – 88

मुहायदे की क़ानूनी हैसियत – 90

क्या खोया क्या पाया – 91

1977 का फ़साद – 94

जुलूस हाय अज़ा पर पाबन्दी – 95

माहे रमज़ानुल मुबारक का भयानक फ़साद – 96

फ़ैसला कुन एक़दाम – 99

इल्तवा का ऐलान – 99

शिया एक्शन कमेटी का एक़दाम और धरना – 101

यौम ए आशूरा और गिरफ़्तारियां – 101

शिया मंच की कोशिश – 104

मौलाना सैय्यद ज़ाहिद अहमद साहब क़िब्ला का एक़दाम – 106

वाक़यात ए ख़ुदसोज़ी – 107

मौलाना सैय्यद कल्बे जव्वाद साहब क़िब्ला की क़यादत – 112

कर्फ़्यू का नेफ़ाज़ – 115

दो रूकनी तहक़ीक़ाती कमेटी – 118

हुकूमत से तवक़्क़ोआत – 120

दूसरे फ़िर्क़े से तवक़्क़ोआत – 120

पहली मीटिंग – 121

दूसरी मीटिंग – 123

तीसरी मीटिंग – 124

चौथी मीटिंग – 125

पांचवी मीटिंग – 126

छठी मीटिंग – 126

सातवीं मीटिंग – 128

आठवीं मीटिंग – 128

मदहे सहाबा लखनऊ के कुछ अफ़राद की ईजाद 130

मौलाना नदवी से एक मुलाक़ात 132

सुन्नी उलामा का मुश्तरका बयान 136

इक्कीसवीं रमज़ान का आरज़ी व उबूरी समझौता 138

ऐनी मुशाहेदा 144

जुलूसे मदहे सहाबा में तबर्रा 148

अख़बारी इक़्तेबासात 149

2. उर्दू रोज़नामा इन दिनों का बयान है। 152

3. रोज़नामा सहाफ़त लिखता है – 155

4. रोज़नामा कुबेर टाईम्स का बयान है कि – 157

अख़बारी ख़ुलासा 158

मौजूदा सूरते हाल 161

21 अप्रैल 1998 ई 0 के समझौते पर एक नज़र 163

फेहरिस्त 166

हिन्दुस्तान में फ़ितना ए वहाबियत

हिन्दुस्तान में फ़ितना ए वहाबियत

बुक करेकशन

लेखक: फरोग़ काज़मी
कैटिगिरी: विभिन्न
पन्ने: 10