बोहलोल दाना
लेखिकाः सैय्यदा आबिदा नरजिस
अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क
यह बादशाहो का सा मेजाज़ रखने वाले लोग गोया बादशाहो जैसे एहतेराम के मुस्तहक़ हैं।
इन गुदड़ी पोश बादशाहों के ग़ुलाम भी अपनी गुदड़ीयों में जमशेद और ख़क़ान का सा वेक़ार छिपाये फ़िरते हैं।
उन्होने आज दुनिया भर की नेमतो को नज़र अन्दाज़ कर दिया है और कल यह जन्नत को आँख उठा कर भी नहीं देखेंगें
इन बर्हना –पा फकीरो को हिक़ारत की निगाह से न देखो। कि अक़्ल के नज़दीक यह उन आँखो से ज़्यादा मोहतरम हैं जिन में ख़ौफे इलाही से आँसू चमकते हैं।
हाँ। अगर आदम (अ.स.) ने जन्नत को गेंहू के दो दानो के एवज़ बेच दिया था।
तो सच जानो के यह दीवाने जन्नत को एक जौं के एवज़ भी नहीं ख़रीदेंगें।
( आप इस किताब को अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क पर पढ़ रहे है।)
नज्रे-कारेईन
बोहलोल तारिख़ का एक ऐसा यगान-ए। रोज़गार किरदार है। जिसे आले मौ 0 (अ.स.) के मोजिज़े से ताबीर किया जाये तो ग़लत नहीम होगा।
इस नाम के कई और लोग भी गुज़रे हैं। लेकिन बोहलोल से मुराद उमूमन वही शख़्स लिया जाता है। जिसने दीवानगी का मफ़हूम बदल दिया और दानिशे बुर्हानी के माना समझाये। तारिख़ के सफहात में यह वाहिद दीवाना है। जो दाना-ए-राज़ है और यह तन्हा पागल कहलवाने वाला है। जो दानिशमन्दो को हिकमत व-दानिश सिखाता है।
उसने एक ऐसी अनोखी राह चुनी थी। जो आज तक किसी के क़दमों से पामाल नहीं हुई।
बोहलोल की (बे) पर पेश ( ') और 0 पर जज़म ( ^) है। यह नाम हँसमुख ; सच्चे और हाज़िर जवाब लोगो के लिये इस्तेमाल होता है। बोहलोल की इन ही ख़ूबियों ने उसका असली नाम फरमोश कर दिया था। वह हर जगह बोहलोल ही कहलाता था। जिस तरह वह अपने दौर में एक मक़बूल शख़्सियत था। उस तरह हर दौर में एक पंसदीदा किरदार रहा। उसकी हिकायत दिलचस्पी और शौक़ से कही और सुनी जाती है।
उसका अस्ल नाम वहब बिन अमरौ और जाये विलादत कूफा बयान की गई है।
वह बग़दाद के सरवतमन्दो में से था। बाज़ रवायत में उसे हारून रशीद का क़रीबी रिश्तेदार औऱ बरादरे मादरी लिखा गया है। वह इमामे जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के शार्गिदो में से था। उसने उनके फरज़न्द इमाम मूसा काज़िम (अ.स.) का ज़माना भी देखा है।
क़ाज़ी नूरूल्लाह शूस्त्री के बक़ौल वह हारून रशीद के अहद के दानिशमन्दों में से गुज़रा है। जो किसी मसलहत के तहत दीवाना बन गया था।
(मजालिसुल मोमेनीन)
उसकी दीवानगी
उसकी दीवानगी के बारे में रवायत मशहूर है। यह भी मारूफ है के उसने इमाम मूसा काज़िम (अ.स.) की हिदायत पर दीवानगी का लिबादा ओढ़ लिया था।
इस तरह उसने अपनी जान भी बचा ली और उस दौर के शाही दरबार के लिये एक ऐसा नक़्क़ाद बन गया। जो हँसी ही हँसी में उन्हे आईना दिखाता रहता था।
इमाम मूसा काज़िम (अ.स.) से हारून रशीद अब्बासी का मुरवासमत कोई ढ़की छुपी बात नहीं है। तारिख़ ने इमाम आली मक़ाम की चौदह साल की क़ैदे सख़्त और ज़हर से शाहादत का ज़िम्मेदार हारून को ही ठहराया है।
एक रवायत के मुताबिक। हारून ने दीगर मुत्तक़ी और नामूर लोगो के साथ बोहलोल से भी इमाम मासूम (अ.स.) के क़त्ल का फ़त्वा तलब किया था। बोहलोल इन्कार के नताएज से ख़ूब वाक़िफ था। इस लिये उसने इमाम मूसा काज़िम (अ.स.) से रहनुमाई की दरख़ास्त की और उनकी हिदायत पर दीवाना बन कर अपनी जान बचा ली
उसके बारे में दूसरी रवायत ये है। के बोहलोल का जुर्म आले मौहम्मद (स 0अ 0) से अक़ीदत और एरादत मन्दी था। जब बोहलोल को पता चला के उसे अनक़रीब गिरफ़्तार करके क़त्ल कर दिया जायेगा। तो उसने अपने दो साथियों के हमराह इमाम मूसा काज़िम (अ.स.) से क़ैदखाने में राब्ता किया।
हालाते ज़माना के पेशेनज़र इमामे मूसा काज़िम (अ.स.) ने उसके सवाल का जवाब सिर्ऱ एक हर्फ (ज) कि सूरत में दिया जिससे बोहलोल पर जुनून के माना मुन्कशिफ़ हुए वक़्त और हालात के तक़ाज़े को समझते हुए उसने एक ऐसी पुर-अज़-हिकमत दीवानगी इख़तेयार कर ली। जिसे उस दौर की चलती फ़िरती अपोजिशन ( Opposition) कहा जाये तो बेजा न होगा।
बोहलोल जुर्अत व बेबाकी , हक़गोई और मज़लूमों की हिमायत का अलमबर्दार था। वह उस दौर में बादशाह पर खुले बन्दो तनक़ीद करता था।
जब कोई बादशाह के ख़िलाफ़ ज़बान खोलने का तसव्वुर भी नहीं करता सकता था। उसकी दानिशमन्दी और ज़ेहानत ने कभी इसका मौक़ा नहीं दिया के उसके किसी लफ़्ज़ की गिरफ़्त की जा सकती।
बोहलोल की हालाते ज़िन्दगी तो दस्तियाब नहीं हैं। लेकिन उसकी हिक़ायत के मुताले से उसके जो खद्दो ख़ाल उभरते हैं। वह एक ग़ैरे मामूली ज़ेहीन , दानिशमन्द और तब्बाअ शख़्स की निशानदेही करते हैं। वह हक़ीकीं मानो में एक ख़ुदा रसीदा आलिम और नाबग़-ए-रोज़गार था। वह बेहतरीन हिस्से मेज़ाह रखता था। उस दौर के हालात और मुआशेरत पर उसकी निगाह गहरी थी।
वह एक हैरत अंगेंज़ शुगुफ़्ता बर्जस्तगी के साथ अपनी दीवानगी का भरम भी रखता था। उसने दीवानगी और फर्ज़ानगी को कुछ ऐसे मोजेज़ाना अन्दाज़ में हम आहंग किया था के वह न सिर्फ उसकी जान की ज़मानत थी बल्कि मज़लूमों की हिमायत का एक मोअस्सर ज़रिया और हुकूमते वक़्त पर एक खुली तन्क़ीद भी थी।
उसकी शग़ुफ्तगी , ज़िन्दादिली और बज़्लासनजी ने उसे हर दौर का हर दिल अज़ीज़ किरदार बना दिया है। तारिख़ के सफ़हात में वह एक ऐसा मोहरूयेरूल ओक़ूल किरदार है। जो दीवाना भी है और लोग उसके फज़्ल व कमाल के क़ायल भी हैं। वह पागल भी कहलाता है और मुश्किल मसलो में उसकी राय को अहमियत भी दी जाती है इस सब के बावजूद कोई यह साबित नहीं कर पाता के वह दीवाना नहीं है। यही उसका कमाल है के वह दर हक़ीक़त आले मोहम्मद (स 0 अ 0) का दीवाना है।
इस किताब की तालीफ में किरमान महमूद हिम्मद की जमा करदा हिक़ायत से मदद ली गयी है और हम इसका एअतेराफ शुक्रिया के साथ करते हैं।
(सैय्यदा आबेदा नरजिस)
शहरो के शहर बग़दाद की पुर रौनक़ शहराहो पर ज़िन्दगी अपनी मख़सूस गहमागहमी मे रवां दवां थी। लोग अपनी रोज़ मर्रह के मामूलात में मसरूफ थे। बाज़ारो में खरीद फरोख्त हो रही थी और गलीकूचों में लड़के बाले खेल कूद मे मगन थे। अचानक एक शोर उठा। चाहार जानिब एक हलचल सी मच गयी। लोगो ने वहब को देख कर उँगलियाँ दाँतों मे दाब लीं और हैरत व इस्तेजाब से नौ-रंग्गिये दौरां का करिश्मा देखने लगे।
बग़दाद का मशहूर सखतमन्द वहब बिन अमरौ जो अब्बासी खलीफा हारून रशीद के क़रीबी रिश्तेदारो में था , अपने घर से इस हाल में निकला था उस के बाल परेशान थे। दाढ़ी बेतरबीब और लिबास परागन्धा था। हाथ में पकड़े हुए असा को उसने घोड़ा बना रखा था। जिसे बच्चो की तरह खटखटाता बेमाना अल्फाज़ कहता । न जाने किस सिम्त चला जाता था।
जिसने भी आगे बढ़कर उसे रोकना चाहा वहब ने उसे धुत्कार दिया। दूर हो जाओ हटो। मुझे रास्ता दो। नहीं तो मेरा घोड़ा लाते मार देगा।
लोग उसकी यह हालत देख कर दम-ब-खुद रह गये। बच्चो के हाथ एक नया तमाशा आ गया वह पहले तो दूर-दूर से उसकी तरफ देखते रहे। फ़िर आहिस्ता आहिस्ता नज़दीक आये। किसी ने उसकी अबा खीचीं-किसी ने उसकी रिदा गसीट ली। कोई उसके साथ-साथ दौड़ने लगा। और कोई उसके असा पर सवार होने की ज़िद करने लगा। जिसे वह घोड़े की तरह चला रहा था।
लेकिन वहब ने बच्चो को न डाँटा न डराया न धमकाया। बल्कि वह खुद भी उनमे से एक मालूम होने लगा और के साथ बचकाना हरकतें करता , आबादीयों से दूर वीराने की तरफ़ भाग गया।
सारे शहर में सन्नाटा छा गया। हैरत व इबरत ने लोगो को शुश्दर कर दिया। कुछ लम्हे गुज़रे और उनके हवास पलटे। वह इबरत की उस गुंग कर देने वाली कैफियत से निकले तो हर तरफ उसी के तज़किरे होने लगे। जहाँ चन्द लोग इकठठे होते , वहब बिन अमरौ की ज़हनी हालत ही ज़ेरे बहस आती। लोग गलियों और चौराहो में खड़े इसी वाक़िये पर तबसिरा करते नज़र आते।
कोई कहता ''खुदा की शान है- ''
यह वहब बिन अमरौ शहर के दानिशमन्दो में शुमार होता था। मगर आज इसकी हालत देखकर इबरत होती है।
कोई दूसरा कहता। लगता है। इसकी कोई बात बारगाहे ख़ुदावन्दी में नापसन्द ठहरी है। शायद इसी लिये उसने वहब से अक़्ल व दानिश छीन ली है।
''बुरे वक़्त से पनाह माँगनी चाहिये। ऐसो की हालत से इबरत हासिल करनी चाहिये ''। कोई खौफे ख़ुदा से काँप कर बोला।
''खाह-म-खाह क़यास आराइयों से इज्तेनाब बर्तो। न मालूम उसकी इस हालत में कौन-सी हिकमत पोशीदा है ''
एक मर्दे बुज़ुर्ग ने गहरी साँस लेकर कहा और एक जानिब चल दिया। उसका लहजा माना खेज़ था और उसके लफ्ज़ो में असरार बोल रहे थे
उसके बराबर में खड़ा एक शख़्स बड़े ग़ैर महसूस अन्दाज़ मे मजमे से अलहैदा हुआ और उसके पीछे-पीछे चल पड़ा। कुछ दूर दोनो इसी तरह चलते रहे। फिर पहले शख़्स ने अपने क़दमो की चाप से किसी और की मौजूदगी का अन्दाज़ा लगाया और ग़ैरेइरादी तौर पर पीछे मुड़कर देखा। दूसरे शख़्स ने अपने क़दमो को तेज़ किया और उसके बराबर आ गया।
उसना खन्कार कर गला साफ किया और मोहतात लहजे में बोला ऐ मर्दे बुज़ुर्ग आपकी बातों में असरार को बोलते सुना है। ऐसा लगता है जैसे वहब की दीवानगी में जो हिकमत पोशीदा है आप उससे वाकिफ हैं। आप मुझे खुदा रसीदा मालूम होते हैं। मैं आप जैसे लोगो की गुफ्तुगु में अपने लिए हिदायत व रहनुमाई तलाश करता हूँ।
क्या ऐसा मुमकिन है के आप मुझे वहब की हालत की कुछ ख़बर दें दें
उस मर्दे बुज़ुर्ग ने तेज़ निगाह उसपर डाली। और बेनियाज़ी से कहा।
ऐ बन्दे-ए। ख़ुदा तू किसी अज़ीम ग़लत फहमी का शिकार मालूम होता है जा और अपनी राह ले मुझे भला वहब से क्या सरोकार
उस शख़्स ने बुज़ुर्ग का दामन पकड़ लिया। ब-ख़ुदा मैं किसी ग़लत फहमी का शिकार नहीं हूँ। मैने आलिमो और बुर्गज़ीदा लोगो की सोहबत में वक़्त गुज़ारा है। आप जैसे लोग तो हिकमत व दानिश के सरचश्मे हैं।
अगर आप इसलिये मुझसे कलाम नही करना चाहते के हालाते ज़माना दिगर-गू है और ख़लीफा हारून के जासूसो और आम लोगो में तमीज़ करना मुश्किल हो गया है। तो मैं ख़ुदा की क़सम खा कर आपको यक़ीन दिलाता हूँ कि आप जो कुछ भी फरमाये वह मेरे पास अमानत की तरह महफूज़ रहेगा। अगर मैं उसे ख़यानत करू तो अल्लाह मुझे वही सज़ा दें जो ख़ाइन की है
उस मर्दे बुज़ुर्ग ने इसकी तरफ घूर कर देखा और बेज़ारी से कहने लगा। ऐ शख़्स। तू किस क़द्र बातूनी और गुफतूगु का शायक है। मैंने तुझसे कह जो दिया कि मैं इसस बारे मे कुछ नहीं जानता वह इतना कह कर आगे बढ़ गया।
मगर उस शख़्स ने पीछा नहीं छोड़ा और उसके साथ-साथ चलता हुआ बोला। मैं ख़ुदा की क़सम खाकर कहता हूँ के मेरा हारून रशीद और उसके हवारियों से कोई ताल्लुक़ नहीं मैं जानता हूँ के आप उन अश्ख़ास में से एक हैं जिन्होने इमाम मूसा बिन जाफर (अ.स) (मेरे माँ-बाप उन पर फिदा हों-) से क़ैदख़ाने में राबिता किया था और वहब भी उस वक़्त आपके साथ था
वह मर्दे बुज़ुर्ग ठिठक कर रूक गया और ख़श्मगीन लहजे में बोला। ''अगर तू इतना कुछ जानता है तो फिर मेरे पीछे क्यो पड़ा है। तुझे मेरे बयान की क्या हाजत है
मैं अहलेबैत (अ.स) का दोस्तदार हूँ। मैँ उस कठिन वक़्त की सख़्तियों से वाक़िफ हूँ जो आले मौहम्मद (अ.स) के भीहि-ख़ाहो को दरपेश हैं। ज़िनदान के दरबानो की उन पर सख़्तियाँ देखकर दिल खुन के आँसू रोता हैं। मगर अफसोस के हम बेकस हैं और शायद बुज़दिल भी यक़ीनन ख़ुदा के यहाँ हम इसके लिए जवाब देह होगें। उनसे राबिते का कोई ज़रिया भी नहीं है। मुझे मालूम हुआ था कि आपने किसी तरह उनसे राबिता किया है। तो मैंने सोचा आपसे हिदायत और बसीरत हासील करूँ ''
वह मर्दे बुज़ुर्ग गो-म-गो की-सी कैफियत में कुछ सोचता रहा फिर इधर उधर देख कर बोला
अगर तुम सच कह रहे हो। तो इसे साबित करो। ब-सर-व-चश्म। आप मेरे हमराह तशरीफ ले चलिये। मेरी ज़ोजा मदीने की है और आले मोहम्मद(अ.स) की आज़ादकरदा कनीज़ है। हमारी दौलत मोवददते अहलेबैत (अ.स) है। आप जैसी चाहे मुझसे क़सम लें लें। जैसा चाहे इतमिनान कर लें। उसने पूरी सच्चाई से कहा। मर्दे बुज़ुर्ग ने उसकी आँखो में देखा जो उसके लफ़्ज़ो की ताईद कर रही थीं। और कुछ सोच कर उसके साथ रवाना हो गया। उसके घर पहुँच कर जब उसने अच्छी तरह से इत्मीनान कर लिया के इसकी गुफ्तुगू ग़ैरे महफ़ूज़ नही होगी। तो बोला। सुन ऐ बन्दा-ए-खुदा। तू हालाते ज़माना को जानता है और तुझसे यह भी पोशीदा नहीं के हमदर्दीयाँ अब्बासियों को इस लिये हासिल हुई थीं के उन्होने आले मौहम्मद (अ.स) की हिमायत और एआनत का नारा लगाया था। उनका हक़ उन तक पहुँचाने का वायदा किया था। मगर अफसोस के उन्होने न सिर्फ आले मौहम्मद (अ.स) का हक़ नही पहचाना। बल्कि लोगो की उनके साथ अक़ीदत और मोहब्बत देखकर उन्हे अपनी सल्तनत के लिये ख़तरा तसव्वुर करने लगें।
उनके दिन-रात इसी कोशीश में सर्फ होते हैं के किस तरह इमाम मूसा बिन जाफर (अ.स) से लोगो की तवज्जोह हटा सकें। इस लिये ये हर उस शक़्स की जान के दुश्मन हो जाते हैं जो आले मौहम्मद से अक़ीदत रखता हैं। हमें यह ख़बरे बराबर मिल रही थीं के हम मोहब्बते आले मौहम्मद के जुर्म में अनक़रीब हारून के ज़ेरे इताब आने वाले हैं।
इस लिये हम ने बाहम मशविरा किया लेकिन कुछ समझ नही आया
बिल आख़िर यही फैसला किया के इमाम मूसा बिन जाफर (अ.स) से रहनुमाई हासिल की जाये उनको क़ैद खाने के अहवाल से तो तुम वाक़िफ हो के उन के दरबान चुन चुनकर शक़िय्युल क़ल्ब और दश्मनाने अहलेबैत रखे जाते हैं। उन से मिलने पर सख़्त पाबंदी है। लेकिन किसी न किसी तरह हमने अपना मसला उनकी ख़िदमत में पहुँचा ही दिया।
अगले रोज़ सुबह सादिक़ के वक़्त ज़िन्दान से एक ठेकरी गिरी। हम पहले इस ताक में थे। हमने बड़ी राज़दारी से ठेकरी उठा ली। मैं क़ुर्बान जाऊ अपने इमाम (अ.स) पर उसका चहरा गुलगार हो गया और वह रूक कर आँसू पोछनें लगा। दसरे शख़्स की आँखों से भी आँसू गिरने लगे।
उस मर्दे बुज़ुर्ग ने सर्द-आह भरी। इमाम पर क़ैदख़ाने में इस क़द्र सख़्ती है के उन्होने मिट्टी की इस ठेकरी पर हुरूफ़े तहैज्जी में से सिर्फ एक हर्फ लिखा खा।
वह क्या उस शख़्स ने बेताब होकर सवाल किया।
उस ठेकरी पर हर्फे (जीम) लिखा हुआ था। फ़रज़न्दे रसूल (अ.स) के अता करदा इस एक लफ़्ज़ ने हमपर हिकतम के दरवाज़े ख़ोल दिये।
हमे अपनी मुश्कील का हल अज़-ख़ुद मिल गया जो हमारे हालात के साथ मेल ख़ाता है।
हमारा तीसरा साथी , जिसका नाम ज़ाहिर करना ज़रूरी नही ,। उसने (जीम) से जिलावतनी मुराद लिया। वह आज रात यह शहर छोड़ देगा। मेरे विजदान में (जीम) से जबल का इन्केशाफ़ हुआ है। मैं पहाड़ो पर अपने आबाई मकान में पनाह लूँगा। और हमारे दोस्त वहब बिन अमरौ हैं। और तुम देख़ोगे के आले मोहम्मद (अ.स) के इस दीवाने की दीवानगी फर्ज़ानो को शर्मा देगी।
वहब बिन अमरौ बच्चो के हुजूम में बच्चा बना हुआ दीवानो की सी हरकतें करता बिल आख़िर एक वीराने में आ उतरा। वह बच्चो के साथ दौड़-दौड़ कर हाँप गया था और कुछ थकावट भी महसूस कर रहा था। वह अपने असा के फर्ज़ी घोड़े पर से उतरा और बच्चो से बोला।
मेरा घोड़ा थक गया है। इसे भूक भी लगी है अब यह आराम करना चाहता है उसने असा को घोड़े की तकह चुमकार कर खन्डर की शिकस्ता दीवार के साथ खड़ा कर दिया। बच्चे खिलखिला कर हँस पड़े
ऐ वहब। क्या तुम्हारा घोड़ा घास खाता है हाँ-हाँ। यह तुम्हारी अक़्ल के साथ रोज़ घास चरने जाता है वहब ने शोख़ी से जवाब दिया। अच्छा। और यह पानी भी पीता है। एक और शरीर बच्चे ने सवाल किया।
हाँ। यह पानी भी पीता है। मगर तुम्हारे ख़लीफा के पैमाने में वहब हँसा।
बच्चे भी उसकी हँसी में शरीक हो गये और मचल मचल कर बोले। ऐ वहब हमें भी अपने घोड़े की सवारी कराओ वहब ने उन्हे परे ढकेला ख़बरदार कोई क़रीब न आये। मेरे घोड़े का मेज़ाज शाहाना है किसी को लात मार दी तो मुझे न कहना।
बच्चे हँसने और तालियाँ बजाने लगे। वहब ने हीवार से टेक लगा ली और गहरी साँस लेकर बोला। अच्छा दोस्तो। अब मुझे कमर सीधी करने दो और तुम अपने-अपने घर जाओ
बच्चे कुछ देर उसके साथ छेड़ख़ानी करते रहे। जब वहब ने उन की तरफ कोई तवज्जोह नही दी तो वह एक-एक कर अपने-अपने घरो को लौट गये। वहब ने उसी खण्डर में डेरा जमा लिया। उसके घर वाले परेशान हुए उसके अज़ीज़ रिश्तेदार इकटठे हुए और लोगो से पूछते , मालूम करते उसी खण्डर तक आ पहुँचे जहाँ वहब ने बसेरा किया था। देखा की वह नंगी ज़मीन पर अपने बाज़ू का तकिया बनाये चैन की नींद सो रहा है-उसकी यह हालत देख कर उसके अज़ीज़ो की आँखों में आँसू आ गये। कुछ इज़्हारे अफसोस करने लगे। एक ने झुक कर उसका शाना हिलाया वहब-वहब। उठो। जुनून की इस नींद से जागो। आँखें खोलो।
वहब होशियार हुआ और उसने नींद से भरी आँखें खोलकर अपने चारो तरफ जमा शनासा चेहरो को देखा जिन पर दुख और तफ़क्कुर की लकीरें थी। वह हमदर्दी से उसकी तरफ देख़ रहे थे।
क्या बात है। वहब ने उठकर बैठते हुए कहा।
वहब उठो। घर चलो। एक अज़ीज़ ने क़रीब बैठकर उसकी अबा से गर्द झाड़ते हुए कहा।
यह भी तो घर है वहब ने ख़ण्डर की टूटी दीवारो की तरफ इशारा किया। भला इसमें क्या कमी है। न हमसाये का झगड़ा। न मालिक मकान का ख़ौफ़। न दरबान की मुसीबत। न चोर का डर।
कैसी बाते कर रहे हो वहब। कोई उनसीयत से बोला।
मैं तुम्हारी ज़बान ही तो बोल रहा हूँ। वहब ने जवाब दिया।
तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है। कोई बोला। मेरी तबियत बिल्कुल ठीक है। मैं बहुत मज़े में हूँ।
वहब ने कमाले बे नियाज़ी से जवाब दिया
नही। तुम बिमार हो। तुम्हे इलाज की ज़रूरत है। किसी अज़ीज़ ने उसे समझाने की कोशीश की।
बीमार तो सब ही हैं। इलाज की किस को ज़रूरत नहीं वहब हँसा और राज़दारी से बोला। तुम ख़ुद ही कहो। क्या ख़लीफा क्या वज़ीर , क्या कोतवाल क्या दरोग़ा। इनमें से कौन है। जिसे इलाज की ज़रूरत नहीं।
हमारी बात समझने की कोशीश करो। यह जगह तुम्हारे शायाने शान नहीं। उसके रिश्तेदार परेशान हो गये।
भला यह मेरे शायाने शान क्यों नहीं। यह ख़लीफा के महल से तो बेहतर है कि रोज़े हश्र मुझसे इसके बारे में कोई बाज़ पुर्स तो नहीं होगी।
उसके रिश्तेदार ज़िच हो गये। उन्होने बहुत कोशिश की कि उसे घर ले जायें और उसके जुनून का कुछ इलाज हो जाये। लेकिन वह क़तअन रज़ामन्द नही हुआ।
अब वह फ़र्शे ख़ाक , शिकस्ता दीवारें और ख़ुला आसमान ही उसका घर था। वह आराम व अशाएस से बे-नियाज़ हो गया था नेमतहाय दुनिया से उसने मुह मोड़ लिया था। वह रूखे सूखे टुकडो पर गुज़र बसर करता था और नगीं ज़मीन पर अपने बाज़ू के तकिये पर चैन की नींद सोता था।
वह बच्चो का सबसे ज़्यादा दोस्त था। उनकी मासूमियत और मनचलापन उसे भाते थे। वह पहरो उनके साथ बचकाना हरकते करने में मसरूफ रहता और खेल कूद मे उन्हे काम की बाते बताता।
कोई राहगीर उसे मुख़ातब कर लेता था कोई जानने वाला उससे पूछताः।
वहब तुमने यह क्या हालत बना ली है तो वह बढ़ी शेगुफ्तगी से कोई ऐसी पहलदार बात कह देता जो मुख़ातब को महजूज़ करती लेकिन बे माना नही होती थी ग़ौर करने पर उसमे कोई हिकमत पोशीदा नज़र आती थी।
इस आलमे दीवानगी में पूरा शहर उसकी दस्तरस में था। वह अपने मन की मौज में जहाँ चाहता पहुँच जाता और जिसको चाहता अपने शुगूफ्ता लफ्ज़ो में आईना दिखा देता। आवाम मुश्किल में होते तो हँसी-हँसी में उनका मसला हल कर देता और अगर ख़ास हुदूद मे तजाव्वुज़ करते तो बातो-बातो में उन्हे लगाम दे देता उसकी बज़्लासन्जी में छीपी हुई ज़ेहानत और दानिशमन्दि आहिस्ता-आहिस्ता लोगो को क़ायल करने लगी।
एक बदकिरदार
एक बदकिरदार शख़्स ने उसका मज़ाक उड़ाने की शरारत से कहा।
ऐ वहब क्या तुने कभी शैतान को देखा है। मेरा बहुत जी चाहता है कि मैं शैतान को देखूँ।
तेरी यह ख़्वाहिश तो बड़ी आसानी से पूरी हो सकती है। वहब ने सन्जीदगी से जवाब दिया।
वह किस तरह उस शख़्स ने पूछा।
तेरे घर में आईना तो होगा। अगर नहीं तो साफ पानी में देख लेना। तुझे शैतान की ज़ियारत हो जायेगी। उस शख़्स को भागते ही बन पड़ी।
लड़की की विलादत
उन ही दिनो अमीरे कूफा इस्हाक़ बिन मोहम्मद सबाह , के यहाँ लड़की की विलादत हुई। पता चला के वह लड़की की पैदाइश पर बहुत रंजीदा है। किसी से नहीं मिलता। न ही मुबारक बाद वुसूल करता है। वहब को जो ख़बर हुई तो वह अपनी गुदड़ी शाने पे डाले उसके यहाँ पहुँचा और बोला
ऐ इस्हाक़ मैंने सुना है के तू लड़की की पैदाइश पर बहुत अफ़सुर्दा है। खाता है। न पीता है।
क्या करूँ। दिल ही नहीं चाहता।
वह ठन्डी साँस भर कर बोला। मुझे बेटे की बड़ी आरज़ू थी। मगर अफसोस के अल्लाह ताला ने मुझे लड़की दे दी।
कमाल है वहब ने बे-साख़्ता काहा तू इस पर राज़ी नहीं के अल्लाह ने तुझे सही व सालिम बेटी दी है अगर वह तुझे मुझ जैसा पागल बेटा दे देता तो फिर
इस्हाक़ को उसकी बे-साख़्तगी पर हँसी आ गई। लेकिन वह इसकी तह में छिपी हुई हिकमत को जान गया और ख़ुदा का शुक्र बजा लाया। अपना सोग तोड़ा और लोगो को इजाज़त दि के वह उसके पास तबरीक पेश करने के लिये आयें।
जूते
वह अपनी दीवानगी के बावजूद नमाज़ के वक़्त मस्जिद में पहुँच जाता था। एक रोज़ अभी उसने जूते नहीँ उतारे थे के उसने एक शख़्स को देखा के वह इस ताक में है के उसके जूते चुराये। वहब बहुत देर इस इन्तेज़ार में रहा के वह शख़्स इधर उधर हो। तो वह अपने जूते उतार कर नमाज़ मे शामिल हो। मगर वह नहीं टला और नमाज़ के लिये सफे दुरूस्त हो गयीं।
वहब ने आव देखा न ताव। दौड़कर आगे बढ़ा और जूतों समैत ही नमाज़ के लिये खड़ा हो गया। उस शख़्स ने मायूस होकर उसे टोका। औ दीवाने यह क्या कर रहे हो जूतों समैत नमाज़ नहीं होती
नमाज़ नही होती तो न हो। मगर जूते तो होते हैं वहब ने जवाब देकर नियत बाँध ली।
वह गलियों और बाज़ारो में अपने मासुम साथियों के साथ चोहले करता फ़िरता। कहीं कोई ग़ैरे मामूली बात देखता – तो वहीं रूक जाता अपनी बज़्लासन्ज़ी से लोगो को हँसने और मुस्कुराने पर मजबूर कर देता।
शहर का दरोग़ा
एक रोज़ वह अपने शरीर साथीयों के साथ भागा जा रहा था के उसने सरे बाज़ार एक मजमा लगा हुआ देखा। उसने अपनी छड़ी खटखटाई। लोगो के कंधे दबाये। किसी की बग़ल में झांका। किसी का पैर हटाया और हुजूम के दरमियान् सर जा निकाला।
लोगो ने उसे धक्के दिये। बुरा-भला कहा। लेकिन उसने परवाह नहीं की देखा के शहर का दरोग़ा एक अजीब दावा कर रहा है।
ऐ लोगो मेरी बात ग़ैर से सुनो। मैं एक ऐसा होशियार आदमी हूँ के मुझे कोई धोका नहीं दे सकता।
बेशक बेशक। दरोग़ा जी आप बिल्कुल दुरूस्त फ़रमाते हैं।
मर्हबा-मर्हबा। क्या कहने। दरोग़ा का दावा बिल्कुल हक़ है
किसी क्या मजाल के दराग़ा साहब को कोई धोका दे सके। मजमे में से उसके ख़ुशाम्दी तरह-तरह की बोलियाँ बोलने लगे। हर तरफ से दाद-व-तहसीन के नारे बुलन्द हो रहे थे
वहब ने अपनी छड़ी ज़मीन पर ज़ोर से मार कर उन्हे अपनी तरफ मुतावज्जेह किया और बोला। दरोग़ा जी मुझे भी कुछ कहने की इजाज़त है।
अच्छा। तुम भी बोलोगे। बोलो क्या कहते हो उसने निख़्वत से कहा
वहब ने सन्जीदगी से कहा। दरोग़ा जी ग़ुस्ताख़ी माफ़ यह दीवाना आपके इस दावे को चुटकियों में बातिल कर सकता है। मगर यह कोई ऐसा मुफीद काम नहीं , जिस पर वक़्त ज़ाया किया जाये।
इसकी सूरत देखो ज़रा। और इसका दावा देखो। किसी ने मज़ाक से कहा।
ओ दीवाने। दरोग़ा साहब की अक़्ल के सामने भला तेरी क्या हक़ीकत है किसी और ने आवाज़ कसी।
दरोग़ा ने मुछो को ताव दिया। हाँ-हाँ तुम जैसा पागल तो मुझे ज़रूर धोका दे सकता है।
मैं पागल हुँ या कुछ। अगर मुझे इस वक़्त एक ज़रूरी काम ना होता तो मैं आपको इसी वक़्त ऐसा झाँसा देता के आप और आपके यह चमचे हमेशा याद रखते
बड़ी ऊँची हवाओं में हो मियाँ दीवाने। मुझे कुछ जल्दी नहीं है। मैं यहीं बैठा हूँ। तुम अपना काम करके वापिस आओ और अपने दावे को साबित करो। दरोग़ा ने डाँट कर कहा ।
वहब ने अपनी छड़ी सँभाली और उजलत में यह कहता हुआ मुड़ा। दरोग़ा साहब अब अपने वायदे से फिर मत जाइयेगा। यहीं मेरा इन्तेज़ार कीजियेगा बस गया और आया। वह जिस तरह मज्मे मे आया था उसी तरह बाहर निकल गया।
दरोग़ा फिर अपनी शेख़ी बघारने में मसरूफ हो गया। उसके खुशाम्दी बढ़ चढ़कर दाद देने लगे। काफी देर हो गई और वह दीवाना पलट कर नहीं आया। लोगो ने भी महसूस किया के वक़्त गुज़रता जा रहा है और वहब का दूर-दूर तक पता नहीं। मगर उन्होने दरोग़ा को तसल्ली देने की कोशिश की। दरोग़ा जी वह है भी तो दीवाना। राह में कहीं बच्चो के साथ कहीं खेल में लग गया होगा।
कुछ और वक़्त गुज़रा। लेकिन वहब वापिस नही आया। मजमे में चेमि-गोइयाँ होने लगीं। आँखों में इशारे होने लगे। कुछ होठो पर मुस्कुराहठ भी नमुदार हुई। बाज़ लोग उक्ता कर घरो को जाने लगे।
दरोग़ा को भी अन्दाज़ा हो गया के पागल वहब उसे पागल बना के चला गया और अब वह वापिस नहीं आयेगा-वह बेचेन होकर बड़बड़ाया।
यह पहली बार है कि मुझे किसी ने धोका दिया है। और वह भी एक दीवाने ने मजमे में से किसी ने बे-साख्ता कहा तो कहकहों से फिज़ा गूँज उठी
जल्दी ही वहब की इस बज़्लासन्जी , शोर , ज़ेहानत और शग़ुफ्ता दानिश मन्दी का सारे शहर , में शोहरा हो गया। उसकी दीवानगी में छिपी हुई फर्ज़ानगी और उसके पागलपन में पोशीदा होश रूबा हक़ायक़ ने अवाम को उसके क़रीब कर दिया वह न किसी को सताता था , न परेशान करता था और न नुकसान पहुँचाता था , अलबत्ता अपने जुनून में अपनी दानिशमन्दी को छुपाये हर वक़्त लोगो की मदद करने को तैयार रहता था।
जल्द ही वह बग़दाद का एक ऐसा पसंदीदा किरदार बन गया के लोग उसके गिर्वीदा बन गये और मोहब्बत से लोग उसे बोहलोल कहने लगे। जिसके माना हैं हँसमुख , ख़ूबसूरत और नेकियों का मजमुआ।
बोहलोल का लफ्ज़ उमूमन चुटकुले बाज़ और हाज़िर जवाब और सच्चे लोगो के लिए इस्तेमाल किया जाता है। रफ़्ता-रफ़्ता यह नाम यूँ ज़बान ज़दे आम हो गया के उस्का अस्ल नाम फरामोश हो गया। अब कोई भी उसे वहब नहीं कहता था। वह सब के लिए बोहलोल था और सबका बोहलोल था। उसकी दानाई और हिकमत ने उसे एक पागल और दीवाने से बढ़कर आक़िल व दाना मशहूर कर दिया था।
हारून रशीद तक यह ख़बरें मुतावातिर पहुँच रही थीं के उसका रिश्तेदार वहब बिन अमरौ दीवाना हो गया है।
उसने दुनिया की शान व शौकत से मुहँ मोड़ कर ख़ाक नशीनी इख़्तेयार कर ली है। वह अपनी गुदड़ी में मस्त वीराने में बैठा रूखी-सूखी पर गुज़ारा कर रहा है। मगर हारून को यक़ीन नहीं आया। उसने सही सुरते हाल जानने के लिये अपने मुक़र्रबों को बुलाया।
कुछ वहब बिन अमरौ का हाल कहो। हमने सुना है वह दीवाना हो गया है।
आली जाह। अब तो उसे वहब कोई भी नहीं कहता। अब तो बच्चा-बच्चा उसे बोहलोल कहता है एक अमीर ने इत्तेलअ दी।
अच्छा। हारून ने दिलचस्पी से पूछा यह नया ख़िताब उसे किसने दिया
ज़िल्ले-इलाही। वह हसँमुख तो पहले ही था। दिवानगी ने उसे कुछ और भी ख़ुश तबअ बना दिया है। अब तो वह बाज़ औक़ात मसखरो की सी हरकते करने लगता है। लोगो को हँसाता और ख़ुश करता है। इस लिये सब उसे बोहलोल कहने लगे है अमीर ने वज़ाहत की।
हारून ने ग़ौर करते हुए कहा उसे किसी तबीब को दिखाया है ताकि उसका कुछ इलाज हो जायें।
आली जाह। उसके घर वालो ने बहुत कोशीश की है लेकिन वह किसी तरह रज़ामन्द नहीं होता। वज़ीर ने जवाब दिया खाता पीता कहाँ से है और दिन भर क्या करता फ़िरता है। हारून ने इस्तफसार किया।
उसके अज़ीज़ उसे खाना पहुँचाते तो हैं। लेकिन वह सिर्फ रूखी-सूखी पर ही गुज़ारा करता है बाज़ औक़ात ख़ुद मज़दूरी भी कर लेता है। उसने एक खण्डर में डेरा जमा रखा है। दिन भर लड़के बालो के साथ दौड़ता फिरता है। कभी कभी खूब मस्ख़रापन करता है। जिससे महज़ एक पागल नज़र आता है। मगर बाज़ औक़ात ऐसी पते की बात कह जाता है कि सुनने वाले दंग रह जाते है। वज़ीर ने तफ्सील से जवाब दिया।
हुज़ूर अगर इजाज़त दें तो मैं तफसील से अर्ज़ करूँ के उसने कल क्या किया है एक दरबारी ने मोअद्दब लहजे में पूछा।
इजाज़त है हारून ने इजाज़त दी।
नानबाई
कल बग़दाद के बड़े बाजार में एक फकीर नानबाई की दुकान के सामने से गुज़र रहा था। उसने तरह-तरह के खाने चुल्हो पर चढ़ा रखे थे। ज़िससे भाँप निकल रही थी। उन खानो की ख़ुश्बू उन खानो की लज़्जत का पता दे रही थी और इर्द-गिर्द गुज़रने वालो को अपनी तरफ मुतावज्जेह कर रही थी
बेचारे फकीर का दिल भी ललचाया। लेकिन ग़रीब की गिरह में माल कहाँ था। जो इन खानो की लज़्ज़त खरीद सकता। मगर वहाँ से हटने को भी उसका दिल नहीं चाहता था। खानो की खुश्बू उसकी भूक बड़ा रही थी। बिल आख़िर उसने अपने थैले में से सूखी रोटी निकाली और खाने की देग़ की भाँप से नर्म करके उसे खाने लगा , जिसमें खाने की ख़ुश्बू बसी हुई थी।
नानबाई चुपचाप यह तमाशा देखता रहा। जब फकीर की रोटी ख़त्म हो गई और वह चलने लगा। तो नानबाई ने उसका रास्ता रोक लिया। क्यों ओ मुस्टण्डे। कहाँ भागा जाता है। ला मेरे पैसे निकाल।
कौन से पैसे फकीर ने हक दक हो कर पूछा। अच्छा कौन से पैसे।
उसने अल्फाज़ चबाकर उगले। अभी जो तूने मेरे खाने की भाँप के साथ रोटी खाई है। वह क्या तेरे बाप की थी। उसकी क़ीमत कौन चुकायेगा
अजीब इन्सान हो , तुम। वह भाँप तो उड़कर हवा में मिल रही थी। अगर मैंने उसके साथ रोटी खाकर ख़ुद को बहलाने की कोशीश की है तो उसमें तेरा क्या चला गया है जिसकी मैं क़ीमत अदा करूँ। फकीर ने परेशान होकर कहा।
बस।बस। अब इधर-उधर की बाते मत कर। मैं तेरी जान हर्गिज़ न छोडूँगा। मैं अपना माल वसूल कर रहूँगा। नानबाई ने उसका गरेबान पकड़ लिया। फकीर बेचारा परेशान हो गया के इस हट्टे-कट्टे नानबाई से किस तरह जान छुड़ाये। उनकी तकरार बढ़ती जा रही थी कि बोहलोल उधर से गुज़रा और उनके क़रीब रूककर उनकी बाते सुनने लगा। फकीर ने अपना हमदर्द समझकर यह बात उसे सुनाई। तो वह बोहलोल नानबाई से बोला। भाई यह बात बताओ के क्या इस ग़रीब आदमी ने तुम्हारा खाना खाया है।
नहीं। खाना तो नहीं खाया। मगर मेरे खाने की भाँप से फायदा तो उठाया है। मैंने उसी की क़ीमत माँगी है। लेकिन इसकी समझ में यह बात ही नहीं आती। नानबाई ने बताया।
बिल्कुल दुरूस्त कह रहे हो बरादर। बिल्कुल दुरूस्त। बोहलोल ने सर हिलाया और अपनी जेब से मुटठी भर सिक्के निकाले। वह एक-एक करके उन सिक्को को ज़मीन पर गिराता जाता और कहता जाता। नानबाई।नानबाई। यह ले पैसों की आवाज़ पकड़ ले। यह ले अपने खाने की भाँप की क़ीमत इन सिक्को की खनक से वुसूल कर ले। ले-ले। यह सिक्को की आवाज़ तेरे खाने की ख़ुश्बू की क़ीमत है। इसे अपने गुल्लक में डाल ले इर्द-गिर्द खड़े हुए लोग हँस-हँस कर दोहरे हो गये।
नानबाई अपनी ख़िफ़्फ़त मिटाने को बोला। यह पैसे देने का कौन-सा तरीक़ा है। बोहलोल ने जवाब दिया। अगर तू अपने खाने की भाँप और ख़ुश्बू बेचेगा। तो उसकी क़ीमत तुझे सिक्कों की आवाज़ की सूरत में ही अदा की जायेगी।
बहुत ख़ूब हारून खुश होकर हंसा। वल्लाह यह किसी दीवाने का फ़ैसला तो मालूम नहीं होता। इसमें तो ग़ैरे मामूली दानिश छिपी हुई है। लगता है उसकी दीवानगी ने उसकी दानिश को कोई नुकसान नही पहुँचाया।
आली-जाह। बजा फरमाते हैं। बोहलोल हरकते तो पागलों किसी करता है मगर उसकी बातों में उसकी दानिश बोलती है। अगर इजाज़त हो तो मैं भी एक वाक़ेआ हुज़ूर की समाअत की नज़्र करूँ। एक दूसरे दरबारी ने कहा। इजाज़त है। हारून ने इजाज़त दी।
सोने का सिक्का
अभी चन्द दिन पहले की बात है के उसने न जाने कहाँ से एक सोने का सिक्का पाया था। वह उसके साथ बच्चों की तरह खेल रहा था। कभी वह उसको उंगली पर नचाता था। कभी रेत से साफ करता और कभी पहिये की तरह घुमाता।
एक नौ सरबाज़ उसका यह खेल देख रहा था। उसने उसे पागल समझ कर कहा। तुम्हे इस एक सिक्के से खेलने में मज़ा तो नहीं आ रहा होगा। तुम यही सिक्का मुझे दे दो। मैं इसके बदले में तुम्हे दस सिक्के दूँगा। उसने जेब से सिक्के निकाल कर बोहलोल को दिखाये।
ठीक है। मैं यह सिक्का तुम्हे अभी दे देता हूँ मगर एक शर्त पर। बोहलोल ने कहा।
वह क्या। नौ सरबाज़ ने पूछाः पहले तू गधे की तरह ढ़ीचूँ ढ़ीचूँ की आवाज़ निकाल। बोहलोल ने शर्त रखी।
उस धोखेबाज़ ने सोचा इस दीवाने के सामने गधे की आवाज़ निकालने में क्या हर्ज है। इस लिये वह शुरू हो गया और गधे की तरह रेंकने लगा।
बोहलोल हसाँ। अजब गधे हो भाई। तुमने मेरे सोने के सिक्के को फौरन पहचान लिया और मैं गधा भी नहीं। तो भला मैं तुम्हारे ताँबे के सिक्के को क्यों न पहचानता। वह नौ सर बाज़ इस क़द्र शर्मिन्दा हुआ के उसे भागते ही बनी।
हारून को भी हँसी आ गई और बोला। शोखी तो ख़ैर उसकी तबियत मे शुरू से ही बहुत हैं। हमें उसके बारे में कुछ और भी बताओ ताकि हम जान सकें के उसकी दीवानगी किस मंज़िल पर है
ज़िल्ले सुब्हानी। इजाज़त हो तो मैं बयान करूँ। एक दरबारी ने अदब से कहा। बयान करो। हारून ने इजाज़त दी हुज़ूर। अभी कुछ ज़्यादा दिन नहीं हुए कि उसने एक अजीब फैसला किया और वह भी इस तरह के क़ाज़ी को उसके सामने सरे तसलीम ख़म करना पड़ा। दरबारी ने कहना शुरू किया।
हुआ इस तरह के बोहलोल ने राह चलते दो बच्चो को रोते और फ़रियाद करते देखा वह उनके सामने रूक गया और उनके सर पर हाथ फेर कर बोला। बच्चो तुम क्यो परेशान हो
बड़ा लड़का बोला। हम फ़लाँ शख़्स के बेटे हैं। हमारा बाप हज को गया था। उसने चलने से पहले एक हज़ार अशर्फि क़ाज़ी के पास ब-तौर अमानत रखवाई थी और कहा था के ज़िन्दगी मौत का कोई भरोसा नहीं। अगर मैं सफरे हज से वापिस न आया तो तुम मेरे बच्चो को उसमें से जो तुम्हारा दिल चाहे दे देना और अगर ख़ुदा मुझे वापिस ले आया तो मैं अपनी अमानत तुमसे वापिस ले लूँगा। मगर अफसोस के क़ज़ा हो गया। हम यतीम और बेआसरा हो गये हमने अपने बाप की अमानत क़ाज़ी से माँगी तो वह कहने लगा कि तुम्हारे बाप ने मेरे साथ जो क़ौल किया था। उसके मुताबिक़ जो मेरा दिल चाहेगा। वह तुम्हे दूँगा।
( आप इस किताब को अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क पर पढ़ रहे है।)
इस लिए यह सौ अशर्फिया ले जाना चाहो तो ले लो। उसने उन लोगो की गवाही भी पेश कर दी। जिन के सामने यह क़ौल हुआ था। हम लोग बहुत परेशान हैं। यतीम हैं हमारा कोई आसरा नहीं।
बोहलोल ने उनके सर पर हाथ रखा और बोला। बेटा परेशान न हो। अपने आँसू पोछ लो औऱ मेरे साथ चलो मैं खुद क़ाज़ी से बात करता हूँ।
वह लड़के उसके साथ चल पड़े। बोहलोल उन्हे लेकर क़ाज़ी के पास आया और बोला। ऐ क़ाज़ी। तू इन यतीम बच्चो का हक़ उन्हे क्यो नहीं देता।
अच्छा। तो यह चालाक लड़के अब तुम्हे अपना हिमायती बना कर लाये हैं। हालाँकि इन के बाप ने कई लोगो के सामने मुझे ये इख़्तेयार दिया था के मैं जो कुछ चाहूँ उन्हे दे दूँ। अब मैं सौ अशर्फियाँ उन्हे देता हूँ। तो यह लेने से इन्कार करते हैं और मुझे वैसे ही शहर भर में बदनाम करते फिरते हैं। क़ाज़ी ने ठाट से जवाब दिया।
बोहलोल ने बड़े इत्मीनान से कहा।
क़ाज़ी जी। आपने बिल्कुल दुरूस्त फरमाया है। यह क़ौल ज़रूर हुआ है। लेकिन इस क़ौल से तो यह साबित होता है के आप जो चाहते हैं वह नौ सौ अशर्फियाँ हैं और यही इन बच्चो के मरहूम बाप ने कहा था के जो आपका दिल चाहे वह आप उसके बच्चो को दे दें। तो क़िबला क़ाज़ी साहब।
चूँकि आप नौ सौ अशर्फियाँ चाहते है। इस लिये यही उसके बच्चो को दे दें।
क़ाज़ी तो अंगुश्त-ब-दन्दां बोहलोल का मुँह तकता रह गया।
हाज़िरीन ने बोहलोल की ताईद की और उसे उन यतीम बच्चो का हक़ देते ही बनी।
अच्छा। तो उसने शहर के क़ाज़ी को आजिज़ कर दिया और कहलाता दीवाना है। हारून रशीद ने ज़ोर देकर कहा।
आली जहा। वह पागलो की सी हरकते भी करता है कभी अपने असा को घोड़ा बनाकर उस पर सवारी करता है तो कभी बच्चो के साथ मिलकर मिट्टी से खेलता है। रेत के घरावदें बनाता है। हाँ नमाज़ के वक़्त मस्जिद में पहुँच जाता है अभी पिछले जुमे को उसने एक ऐसा शिग़ोफा छोड़ा के हँस-हँस कर नमाज़ीयों के पेट में बल पड़ गये। वज़ीर ने बताया।
बयान करो वह क्या बात है। हारून ने कहा।
जूते
गुज़श्ता जुमे को वह नमाज़ पढ़ने मस्जिद में आया। तो ग़लिबन चोरी के डर से उसने अपने जूते एक कपड़े में बाँध कर अपनी अबा में छिपा लिये। यहाँ के मक़ामी लोग तो बोहलोल को जानते हैं एक ऐसा शख्स जो उसे पहचानता नहीं था। उसने उसे बग़ल में कोई चीज़ दाबे हुए देखकर कहा।
मालूम होता है के आपके पास कोई क़ीमती किताब है जिसे आपने इतनी हिफाज़त से रखा हुआ है।
बोहलोल ने बड़ी सन्जीदगी से जवाब दिया। आप ने दुरूस्त अन्दाज़ा लगाया। बहुत क़ीमती किताब है।
उस शख़्स ने पूछाः क्या आप बताना पसन्द फरमायेगें के यह कौन-सी किताब है।
जी हाँ। क्यों नहीं। यह फलसफे की किताब है। बोहलोल ने बताया।
फलसफे की किताब। सुब्हानअल्लाह आपने किस कुतुब फ़रोश से ख़रीदी है।
जनाब यह मैंने मोची से ख़रीदी है। बोहलोल ने मज़े में जवाब दिया। जो लोग उसकी हरकतो से वाक़िफ थे। उन्हे हँसी ज़ब्त करना मोहाल हो गई।
हारून भी मुस्कुराया। तो मौसूफ की दीवानगी। फर्ज़ानो को शर्माती है। हमें उसकी इस रविश पर शक है।
कहीं यह लोगो की आँखो में धूल तो नहीं झोंक रहा है।
आपने बजा फरमाया आला हज़रत अल्लाह ताला ने आपको बेहतरीन अक़्ल व दानिश से नवाज़ा है। ख़याल आपके ही ज़हने रसा में आ सकता है। किसी ख़ुशाम्दी ने फौरन हाँ में हाँ मिलायी।
तुम सब नमक हराम हो। लगता है के वह कोई साज़िश कर रहा है और तुम लोगो को कोई ख़बर ही नहीं। उसके बारे में फ़ौरन पता चलाओ के उसकी दीवानगी के पसे परदा कौन से मक़ासिद पौशीदा हैं और उसे कल दरबार में तलब करो।
वरना तुम सब की गरदन मार दी जायेगी।
हारून ने जलाले शाही से हुक्म जारी किया और दरबार बर्ख़ास्त हो गया।
ख़लीफा का एक कारिन्दा फ़ौरन ही बोहलोल की तलाश में रवाना कर दिया गया बोहलोल उसे कहीं भी नहीं मिला। न वह उस वीरान खण्डर में था। जो उसका बसेरा था। न ही कब्रिस्तान में जहाँ वह अक्सर व बेश्तर किसी सोच में डूबा बैठा रहता था। किसी ने बताया के वह मस्जिद की तरफ़ जाते हुए देखा गया है।
अबुहनिफा
कारिन्दा भी मस्जिद की तरफ चल पड़ा। अभी वह रास्ते ही में था के उसने देखा के बोहलोल अपने जूते हाथ में पकड़े। छड़ी बग़ल में दबाये। गिरता पड़ता मस्जिद से बाहर निकला और जिस तरफ़ उसका मुँह उठा। सरपट भागता चला गया।
उसके पीछे एक शोर बलन्द हुआ। लेना-पकड़ना देखो जाने न पाये। पकड़ो। इस दीवाने को पकड़ो। इस ग़ुस्ताख की खबर लो। कुछ नौजवान तालिबे इल्म मस्जिद से निकले और वावेला करते बोहलोल का पीछा करने लगे।
बोहलोल अपनी ही अबा में उलझता और छड़ी सँभालता। जूतो को बग़ल में दबाता। मुड़-मुड़ कर देखता। उनकी पहुँच से दूर निकलने की कोशीश कर रहा था। लेकिन बिल-आख़िर उन नौजवानो की सुबुक रफ़्तारी ने उसको जा लिया। वह उसकी ठुकाई करने लगे।
औ ग़ुस्ताख। तेरी यह जुर्अत के तूने हमारे उस्ताद को मिट्टी का ढेला मारा हम तुझे ज़िन्दा नहीं छोड़ेगें। हम तेरी जान ले लेंगे। गँवार दीवाने।
हाँ-हाँ। मैंने उसको मारा है। मैं कब इन्कार करता हूँ। लेकिन उसे लगा कहाँ हैं। अगर उसे लगा भी है। तो उसे कोई तकलीफ नहीं हुई। तुम बेकार शोर मचा रहे हो। हटो पीछे। छोड़ो मुझे। बोहलोल दुहाई देने लगा।
हारून का कारिन्दा दौड़कर क़रीब पहुँचा और बीच बचाओ कराते हुए बोला
भाईयों। तुम लोग क्यों इस पागल के पीछे पड़े हो। कुछ इन्साफ से काम लो तुम लोग इतने सारे हो और यह अकेला। आख़िर हुआ क्या है। यह पूछें के क्या नहीं हुआ। इस दीवाने ने हमारे उस्तादे मोहतारम इमाम अबुहनीफ़ा को मिट्टी का ढेला खींच मारा। जो उनकी पेशानी पर लगा। हम इसको हर्गिज़ नहीं छोड़ेगें। वह फिर बोहलोल के गिर्द हो गये।
हारून के कारिन्दे ने उन्हे रोक दिया। मगर हुआ क्या था। क्या उनके साथ बोहलोल का कोई झगड़ा हुआ था।
एक तालिबे इल्म बोला: क्या बात कर रहें हैं आप। हमारे उस्तादे मोहतरम की शान इस से बालातर है के वह इस जैसे के साथ झगड़ा करें। वह तो हमें मामूल के मुताबिक़ दर्स दे रहे थे। के यह कमबख़्त न जाने कहाँ से नमूदार हो गया और उनकी पेशानी पर ढेला ख़ींच मारा। आप दरमियान् से हट जायें। यह पागल है या दीवाना। आज तो हम इसको ऐसा सबक़ सिखा कर छोड़ेगें के सारा पागलपन भूल जायेगा। एक लड़के ने अपनी बात खत्म करके फिर बोहलोल की तरफ देखकर दाँत किचकिचाये।
क्यों बोहलोल। क्या यह लड़के ठीक कह रहे हैं कारिन्दे ने बोहलोल से पूछा।
हाँ। मैंने उसको मारा है। मगर उसे लगा तो नही। न ही उसे कोई तकलीफ हुई। पूछ लो उससे मेरे पीछे क्यों पड़े हो। बोहलोल ने बड़ी बेनियाज़ी से जवाब दिया।
देखी। आपने इसकी ढिटाई उस्तादे मोहतरम पेशानी पकड़े बैठे हैं और यह कहता है के उन्हे ढेला लगा ही नहीं। मैं अभी इसका दिमाग़ दुरूस्त करता हूँ। वह तालिबे इल्म फिर बोहलोल पर झपटा।
हारून के कारिन्दे ने उसका बाज़ू पकड़ लिया बात सुनो लड़के। सब जानते हैं के यह दीवाना है फिर ख़लीफा का रिश्तेदार भी है। तुम इसे मार कर क़ानून को हाथ में न लो। इसे क़ाज़ी के पास ले जाओ। वही सही फैसला करगा।
बात लड़के की समझ में आ गयी। वह बोहलोल को पकड़ कर क़ाज़ी के पास ले गये और उसे तमाम माजरा कह सुनाया। तो बोहलोल बोला। ज़रा अपने उस्तादे मोहतरम को भी तो बुला लाओ। मुद्दई के बग़ैर तुम दावा किस तरह पेश कर सकते हो
बोहलोल दुरूस्त कहता है। तुम अपने उस्ताद को बुला लाओ। क्योंकि मुद्दई तो वही हैं फिर हम देख भी लेंगे के ज़र्ब कितनी शदीद् है
क़ाज़ी ने हुक्म दिया।
तालिबे इल्म गये और अबु हनीफा को बुला लाये। बोहलोल ने क़ाज़ी से कहा। क़ाज़ी जी। क़ाज़ी जी क्या मैं इन लड़को के उस्तादे मोहतरम से बात कर सकता हूँ।
हाँ शौक़ से। क़ाज़ी ने इजाज़त दी। बोहलोल ने उन्हे मुख़ातब किया। मेरे अज़ीज़म मैंने तुझ पर कौन सा ज़ुल्म किया है।
अजीब मसख़रे हो तुम। अभी तुमने सबके सामने मेरी पेशानी पर मिट्टी का ढेला मारा। अबु हनीफ़ा ने ग़ुस्से से कहा।
तो भाई। उससे तुझे क्या फ़र्क़ पड़ता है। तू भी मिट्टी से बना है और वह ढेला भी मिट्टी का था। अभी तू ख़ुद ही तो अपने शार्गिदों को समझा रहा था के इमाम जाफरे सादिक़ (अ.स.) जो यह फरमाते हैं के इब्लीस को जहन्नम का अज़ाब दिया जायेगा , वह दुरूस्त नहीं है। वह आग से बना है। और उसको आग भला क्या तकलीफ पहुँचायेगी।
तू भी ख़ाकी और मिट्टी के ढेले से बना है फ़िर भला मिट्टी के ढेले ने तुझे क्या तकलीफ पहुँचाई।
फ़ुज़ूल बाते मत करो। तुमने वह ढेला इतनी ज़ोर से मारा है के मेरी पेशानी और सर में दर्द हो रहा है।
अबु हनीफा ने नागवारी से कहा। आप भी ग़लत बयानी न करें आला हज़रत अगर आपकी पेशानी में दर्द है। तो वह हमें नज़र क्यों नहीं आता। बोहलोल ने हाथो-हाथ जवाब दिया।
ओ हो। किस अहमक़ से पाला पड़ा है। अक़्लमन्द आदमी। क्या कभी दर्द भी किसी को नज़र आया है। अबू हनीफ़ा ने नापसन्दीदगी से जवाब दिया।
क़िब्ला उस्ताद साहब। अभी तो आप अपने शार्गिदों से फरमां रहे थे। कि इमाम जाफरे सादिक़ (अ.स.) जो फरमाते हैं कि ख़ुदा को देखना मुमकिन नहीं। मैं इस बात को नहीं मानता। भला जो चीज़ मौजूद है। उसे नज़र आना चाहिये। इसलिये ख़ुदा को देखना मुमकिन है। तो अगर आपके सरे मुबारक में दर्द हो रहा है। तो उसे हमें भी दिखाइये। बोहलोल ने शग़ुफ्तगी से कहा।
अबु हनीफा ज़ीच हो गये और क़ाज़ी से बोले क़ाजी साहब। यह दीवाना तो यूँ हीं इधर-उधर की हाँक रहा है। इसने सबके सामने मुझे पत्थर मारा है। आप गवाहिइयाँ लेकर इसे सज़ा दें और कार्यवाही ख़त्म करें।
या हज़रत। अगर मुझ नाचीज़ ने आपको मिट्टी का ढेला मार भी दिया है तो इसमें मुझ दीवाने की क्या तक़सीर। अभी आप ही तो अपने शार्गिदों से फरमां रहे थे कि आपको इमाम जाफरे सादिक़ (अ.स.) के इस क़ौल से भी इख़्तेलाफ़ है कि वह फरमाते हैं के अच्छा या बुरा काम करने वाला खुद उसका ज़िम्मेदार है और उसके लिये जवाब देह है। जबकि आप फरमाते हैं के हर फ़ेल अल्लाह की तरफ से होता है। और बन्दा उसका ज़िम्मेदार नहीं।
इस लिये ढेला मैंने आपको नहीं मारा। यह काम तो ख़ुदा ने मुझसे करवाया है। अब भला मैं किस तरह इस काम के लिये सज़ा का मुस्तेहक़ ठहरा। जो मैंने नहीं किया। ख़ुदा-रा क़ाज़ी साहब आप ही इन्साफ कीजिए।
अबु हनीफा ला जवाब से हो गये। क़ाज़ी जो दोनों की दिलचस्प बहस से महज़ूज़ हो रहा था। बोलाः बोहलोल ने अपना मुक़द्दमा जीत लिया है।
बोहलोल ने इत्मीनान से गहरी साँस ली। पाँव में जूते पहने और छड़ी सँभाल कर अदालत से बाहर निकल आया। वह अपनी धुन में बड़बड़ा रहा था। आले मोहम्मद (अ.स.) की तक़ज़ीब करने वालो को मुहँ की खानी पड़ती है उलूमे-अहलेबैत (अ.स.) को झुटलाने वालो के मुक़द्दर में जीत नहीं।
हारून का कारिन्दा उसके पीछे-पीछे चला उसने दो एक बार उसे मुतावज्जे करने की कोशिश की। लेकिन वह अपनी धुन में मस्त चलता चला गया और उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया। हारून का कारिन्दा कुछ फासला रखकर उसका पीछा करता रहा।
बोहलोल कभी अपने आप से बातें करने लगता। कहीं खड़ा होकर अपनी छड़ी से ज़मीन कुरेदता। कहीं राह चलते बच्चो के सर पर हाथ फेर कर कोई मेज़ाहिया फ़िक़रा कस देता कहीं दीवार से टेक लगाकर अपने ख़्यालो में डूब जाता।
इसी तरह चलते-चलते आधा दिन बीत गया। सूरज सर पर आ गया। बोहलोल अपने खण्डर में दाखिल हुआ और टूटी हुई दीवार के साथ कमर लगाकर सुसताने लगा। उसने आँखे बन्द कर लीं और फर्शे ख़ाक पर टाँगे पसार लीं।
कारिन्दा जो बहुत देर से उसके ताक़्क़ुब में था। उसने सोचा कि दिन बीत चला है। खाने का वक़्त है। लेकिन बोहलोल ने खाना नहीं खाया। बेहतर यही है के वह उसके लिये खाना ले आये ताकि उससे बात करने का बहाना हो जाये। उसे खुद भी भूक लगी थी। वह बाज़ार गया। एक होटल में बैठकर खुद खाना खाया और कुछ उम्दा खाना खरीद कर एक खुश् नुमा खान में रखा और बोहलोल के खण्डर में वापिस आ गया।
बोहलोल अपने आप में मगन न जाने ख़यालात की कौन सी गुंत्थियाँ सुलझा रहा था।
खलीफा का खाना
हारून का कारिन्दा आगे बढ़ा और बोहलोल को मुतावज्जेह करने के लिये इत्तेलाई अन्दाज़ में खन्कारा। बोहलोल ने आँखे खोलकर उसकी तरफ देखा। उसने सलाम किया। बोहलोल ने जवाब दिया तो वह बोला। जनाब बोहलोल साहब खलीफा हारून ने आपके लिये यह खाना भेजा है। उसने खाने का ख़ान उसके आगे ही रख दिया।
बोहलोल हँसा। वाह-वाह। इस्लामी ममलेकत के बादशाह मुझ जैसे कम हैसियत दीवानों का भी ख़याल रखते हैं।
ख़लीफ़ा हारून की रेआया परवरी तो ज़र्बुल-मसल है।
कारिन्दे ने फौरन कहा।
बोहलोल ने अपने दायें बायें देखा और उस कुत्ते को चुमकारा जो खण्डर में एक जानिब बैठा हुआ था। कुत्ता दुम हिलाता क़रीब आ गया। बोहलोल ने खाने का ख़ुश् नुमा ख़ान उठाया और कुत्ते सामने रख दिया। कुत्ता बे-सबरी से मुँह मारने लगा।
ख़ुदा की पनाह। बोहलोल यह क्या करते हो। ख़लीफ़ा का खाना तुमने कुत्ते के सामने रख दिया। मुलाज़िम ने दुहाई दी।
हशिश्त। चुप-चाप। ख़ामोश रहो। मुँह बन्द रखो अगर इस कुत्ते ने सुन लिया के यह खाना का ख़लीफ़ा का है। तो यह भी नहीं खायेगा।
मुलाज़िम अपनी हँसी नही रोक सका और बोला बोहलोल तुम भी अजीब मसखरे हो। मैं तुम्हरे लिये ख़लीफ़ा का यह पैग़ाम भी लाया हूँ के कल उन्होने तुम्हे दरबार में तलब किया है। बहतर है के कल तुम ख़ुद ही हाज़िरे दरबार हो जाना।
बोहलोल ने कोई जवाब नहीं दिया और वह काररिन्दा वापिस चला गया।
बादशाह की मसनद
अगले रोज़ बोहलोल का रूख़ हारून के महल की जानिब था। उसने पेवन्द लगे कपड़े पहन रखे थे। दोश पर गुदड़ी थी और हाथ में असा। दरबान का मालूम था कि वह हारून का रिश्तेदार हैं और उसे हारून ने तलब किया है। इसलिये उसने इसे अन्दर जाने की इजाज़त दे दी।
वह अपनी फटी हुई जूतियाँ चटखाता। बड़ी बे-तक्ल्लुफी से अन्दर दाखिल हुआ। दीवाने ख़ास में पहुँचा। वज़ीरों की कुर्सीयाँ भी ख़ाली पड़ी हैं। शायद अभी दरबार आरास्ता नही हुआ था। वह क़ीमती क़ालीन को रौंदता। बादशाह की मसनद पर जा पहुँचा। और मज़े से उस पर ब्राजमान हो गया।
अभी उसे बैठे हुए चन्द लम्हे भी नहीं हुए थे के दरबार के पहरेदार दौड़ते हुए आये। उन्हे इत्तेलाअ थी के हारून इसी तरफ आ रहा है। यह देख कर वह दंग रह गये के बादशाह की ज़रीं मसनद पर बोहलोल फटे हाल बैठा है। उन्हे अपनी आँखों पर यक़ीन नहीं आया। वे बदहवासी में आगे बढ़े। एक ने बोहलोल का दामन पकड़ कर ख़ींचा। दूसरे ने कोड़ा बोहलोल की पुश्त पर रसीद किया।
ओ दीवाने। तेरी यह जुर्अत के तू बादशाह की मसनद पर बैठे। उतर नीचे।
हाय। बोहलोल ने तड़र कर नारा मारा। हाय-हाय। उफ़। यह दुहाई देने लगा।
मुँह बन्द करो। शोर मत मचाओ उतरो बादशाह की मसनद पर से उतरो। पहरेदार ने उसकी पुश्त पर मुसलसल कोड़े बर्साते हुए दुरूश्तों से कहा।
दूसरे ने ज़ोर लगाया और बोहलोल को मसनद पर खींच कर फर्श पर गिरा दिया। बोहलोल सर हीटने लगा। हाय अफसोस सद अफसोस। आह-आह उफ़।
उफ़ वह बलन्द आवाज़ में मुसलसल रोता जा रहा था।
पहरेदारो की जान पर बनी थी। लेकिन वह किसी तरह ख़ामोश होने का नाम ही नहीं लेता था। उसी वक़्त हारून की आमद की इत्तेलाअ नक़ीबो ने दी और चन्द लम्हो बाद वह दीवाने ख़ास में दाखिल हुआ। उसने बोहलोल को इस तरह रोते चिल्लाते और फर्याद करते देखा तो हैरान रह गया। उसने आगे बढ़कर बोहलोल को फर्श पर से उठाना चाहा लेकिन वह नहीं उठा और उसी तरह रोते हुए। अफ़सोस। अफ़सोस और हाय। हाय पुकारता रहा।
यह सब क्या हो रहा है। हारून ने डाँट कर पूछा। आली जहा। यह दीवाना हुज़ूर की मसनद पर जा बैठा था और उतरने का नाम नहीं लेता था। इस लियें हमें थोड़ी सी सख़्ती करनी पड़ी।
पहरे दारो ने डरते। डरते बताया। हाय। यह थोड़ी सी सख़्ती थी। अरे ज़ालिमों। तुमने तो मेरी कमर उधेड़कर रख दी है। हाय अफ़सोस। उफ़-उफ़ बोहलोल ने फरयाद करते हुए उन्हे टोका।
हारून ने निगाहे इताब उन पर डाली। तुम लोग देखते नहीं के यह दीवाना है
पहरेदार आयें बायें शायें करने लगे। हारून ने बोहलोल की दिलजूई करते हुए उसे फ़र्श से उठाया और तसल्ली दी लेकिन वह मुसलसल रोता जा रहा था।
हारून ने बड़ी तशवीश से पूछा। बोहलोल इस तरह क्यों रो रहे हो। क्या तुम्हें बहुत तकलीफ़ पहुँची है।
हाँ। मुझे बहुत तकलीफ़ पहुँची है। लेकिन मैं अपने हाल पर नहीं तुम्हारे हाल पर रो रहा हूँ। हाय अफसोस। हाय अफसोस। बोहलोल ने तास्सुफ से कहा।
मेरे हाल पर। हारून को ताज्जुब हुआ क्या गुज़रती होगी। मैं तो तुम्हारी मसनद पर चन्द लम्हे ही बैठा हूँ। तो इतनी मार खाई के सारी पुश्त छलनी हो गई और तू न जाने कब से इस मसनद पर बैठ रहा है। उफ़ तुझे अपने अन्जाम की कोई फ़िक्र नहीं।
हारून लम्हे भर को काँप गया। लेकिन उसने यूँही ज़ाहिर किया। जैसे उसकी बात नहीं समझा और बोहलोल से बोला। तुम मेरे हाल पर अफ़सोस करते हो और मैं तुम्हारे हाल पर। तुम अच्छे भले तो थे। फिर तुम्हें न जाने क्या हुआ है। जो यूँ दीवाने बने फुरते हो
बोहलोल मुस्कुराया। तुम जानते हो के ख़ुदा की सबसे बड़ी नेमत अक़्ल है।
ख़्वाजा अब्दुल्लाह अन्सारी अपनी मुनाजात में फ़रमाते हैं के ऐ ख़ुदा। जिसको तुने अक़्ल दी। उसे क्या कुछ नहीं दिया और जिसे अक़्ल नहीं दी। उसे क्या दिया
तुमने वह हदीस तो सुनी होगी जब ख़ुदा इरादा करता है के बन्दे से अपनी नेमतें वापिस ले लें तो सबसे पहले बन्दे से जो चीज़ वापिस लेता है वह अक़्ल है। अक़्ल रिज़्क़ में शुमार होती है। अफ़सोस के ख़ुदा ने मुझसे यह नेमत वापिस ले ली है
लेकिन इससे शाही ख़ानदान की किस क़द्र ज़िल्लत हो रही है। तुम्हे इसका भी कुछ अन्दाज़ा है। सब जानते है के तुम मेरे रिश्तेदार हो और तुम हो के इस हुलिये में जगह-जगह फिरते हो। कुछ नहीं तो मेरे मनसब और मर्तबे का ही ख़याल करो। हारून ने सरज़निश के अन्दाज़ में कहा।
बोहलोल और हारून
बोहलोल ने सर उठाया और बोला। हारून तू अगर किसी जंगल बयाबान में रास्ता भटक जाये। तेरा प्यास से दम निकल रहा हो। और तुझे कहीं पानी न मिले। तो तू एक घूँट पानी के एवज़ क्या कुछ देने पर तैयार हो जायेगा।
अजीब दीवाने हो तुम। भला इस वक़्त इसका क्या ज़िक्र। हारून ने ना-गवारी से कहा।
बोहलोल हँसा। मेरी बात का जवाब तो दो ज़ाहिर है। उस वक्त मेरे पास जो भी मालो दौलत होगा वह सब दे दूँगा। हारून ने बेपरवाई से जवाब दिया।
अगर पानी का मालिक इस क़ीमत पर राज़ी न हो। फिर बोहलोल ने पूछा।
तो मैं उसे अपनी आधी सलतनत दे दूँगा। हारून ने फ़ेराख़दिली से कहा।
अच्छा। बोहलोल ने बड़े इत्मीनान से कहा। अगर यह एक घूँट पानी पीकर तेरी जान बच जाये। लेकिन तुझे पेशाब रूक जाने की बीमारी लाहक़ हो जाये। और किसी तरह दूर न हो।
तेरी जान पर बन जाये और तुझे पता चले के कोई शख़्स से तेरी इस बीमारी का इलाज कर सकता है। तो तू उसे क्या देगा।
मैं उस शख़्स को अपनी बाक़ी आधी सलतनत भी दे दूँगा। जान है तो जहान है।
हारून बोला।
तो फिर इसी बादशाही पर ग़ुरूर करते हो। जिसकी क़ीमत पानी के दो घूँट से ज़्यादा नहीं। बोहलोल ने बर्जस्ता कहा।
हारून ख़फ़ीफ़ सा हो गया। बोहलोल तुम दीवाने हो गये हो। मगर तुम्हारी आदते नहीं बदलीं। तुम्हे अपने खानदान का कोई पास नहीं। पैग़म्बरे ख़ुदा (स 0) के चचा अब्बास के बेटे अब्दुल्लाह बिन अब्बास कितने मर्तबे के हामिल हैं लेकिन तुम अली इब्ने अबी तालिब (अ.स.) को तरजीह देते हो।
मुझे अपनी जान का ख़ौफ न हो। तो मैं यही कहूँगा के तुम ठीक कहतो हो। बोहलोल ने जवाब दिया।
हारून चौंका और उसके ख़यालात जानने के लिये बोला। तुम्हे हर तरह से अमान है लेकिन तुम्हे दलील से अपनी बात को हक़ साबित करना पड़ेगा।
बोहलोल सीधा होकर बैठा और वाज़ेह लफ़्ज़ो में बोला। मेरे ख़याल में पैग़म्बरे ख़ुदा (स 0) के बाद अली (अ.स.) तमाम मुसलमानो से अफ़ज़ल हैं। क्योकिं वह सच्चे मोमिन थे। उनकी तमाम आदात पसंदीदा थी और इताअते ख़ुदा और रसूल (स.अ. ) में उनसे ज़र्रा बराबर भी कोताही नहीं हुई। उन्होने तमाम ख़ुदाई अहकामात पर इस तरह हर्फ़ ब हर्फ़ अमल किया कि उसके मुक़ाबले में न सिर्फ़ अपनी जान बल्कि औलाद की जान को भी कुछ नही समझते थे। वह बहुत बहादुर और निडर थे। तमाम जंगो में सबसे आगे रहते थे। उन्होने कभी दुश्मन को पीठ नहीं दिखाई।
इस बारे में उन से सवाल भी किया गया था के आप जंग में अपनी जान का ख़याल क्यों नहीं रखते। अगर कोई पीछे से हमला करके आप की जान ले ले। तो फिर।
उन्होने जवाब दिया। मेरी लड़ाई ख़ुदा के दीन की ख़ातिर है। उसमें मुझे किसी लालच , फायदे और ज़ाती ग़रज़ का ख़याल नहीं। मेरी जान खुदा के हाथ में है। मैं अगर मर जाऊँगा तो ख़ुदा की राह में मरूँगा और इससे बढ़कर और क्या सआदत होगी।
जब वह मुसलमानो के ख़लीफ़ा थे तो अपना तमाम वक़्त मुसलमानों के कामों और ख़ुदा की इबादत में सर्फ करते थे।
बैतुल माल से एक दीनार भी बेकार नहीं उठाते थे। यहाँ तक के उनके भाई अक़ील ने जो अयालदार थे। उनसे दर्ख़ास्त की के बैयतुल माल से जो उनका हक़ उन्हे मिलता है। उससे कुछ ज़्यादा उन्हे दिया करें।
अमीरूल। मोमेनीन ने उनकी दर्ख़ास्त रद कर दी।
आप तमाम हुक्काम से यह भी फ़रमाते थे के लोगो पर ज़ुल्म न किया जाये। उनके मामलात के फ़ैसले अदल व इन्साफ़ से किये जायें। जो हाकिम ज़रा सा भी ज़ुल्म व सितम करता था। उससे बाज़-पुर्स में सख़्ती करते थे और उसे फ़ौरन मनसब से हटा देते थे। चाहे वह उनका क़रीबी अज़ीज़ ही क्यों न हो। उसे माफ़ नहीं करते थे।
जैसा के अब्दुल्लाह बिन अब्बास ने जिस वक़्त वह बसरे के हाकिम थे। बैतुल माल की कुछ रक़म ज़ाती कामों में ख़र्च करली थी। आपने उनसे वह रक़म वापिस माँगी और उनके इस फ़ेल पर उन्हे सख़्त तम्बीह की और एक आख़िरी तारीख़ मुक़र्रर कर दी ताकि उससे पहले पहले इब्ने अब्बास वह रक़म वापिस कर दें।
लेकिन इब्ने अब्बास उस मुक़र्ररह तारीख़ तक रक़म नहीं लौटा सके। अली (अ.स.) ने उन्हे कूफ़े में हाज़िर होने का हुक्म दिया। इब्ने अब्बास जानते थे के अली (अ.स.) ऐसे ख़लीफ़ा नहीं है जो दर गुज़र कर देगें और चश्म पोशी से काम लेगें। इस लिये भाग कर वह मक्के चले गये और ख़ुदा के घर में जा बैठे ताकि अली (अ.स.) के मुहासिबों से बच जाये।
हारून शरमिंदा सा हो गया। लेकिन ढटाई से बोला। अगर अली (अ.स.) इतने ही अज़ीम और अवाम दोस्त थे। तो फ़िर क़त्ल क्यों हुए।
हक़ की राह पर चलने वालो को अक्सर शहीद किया गया है। हज़ारों पैग़म्बर और ख़ुदा के नेक बन्दे इसी तरह ख़ुदा की राह में क़त्ल हुए है। बोहलोल ने बर्जस्ता जवाब दिया।
हारून कोई उज़्र न तलाश कर सका तो बोला। अच्छा बोहलोल अब अली (अ.स.) की शहादत का हाल भी सुना दो।
बोहलोल ने सर्द आह भरी और बोला। इमाम ज़ैनुल आबेदीन से रवायत है कि जिस रात अब्दुर्रहमान इब्ने मुल्जिम क़त्ले अली (अ.स.) के इरादे से मस्जिद में आया। उस वक़्त एक शख़्स और भी उसके साथ था-कुछ देर वे दोनो बाते करते रहे फिर सहने मस्जिद में सो गये।
( आप इस किताब को अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क पर पढ़ रहे है।)
जब अली (अ.स.) मस्जिद में दाख़िल हुए तो आपने सोतो को जगाया ताकि नमाज़ पढ़े ये दोनो मलऊन भी बेदार हो गये। अली (अ.स.) नमाज़ के लिये ख़ड़े हो गये। आपने सजदे में सर रख़ा तो इब्ने मुल्जिम ने तलवार आपके सर पर मारी। यह ज़र्ब उसी जगह लगी जहाँ अमरौ बिन अब्देवुद ने गज़व-ए-खंदक में वार किया था। उस बदबख़्त के वार से आपके सर से अबरू तक गहरा ज़ख़्म पड़ गया।
उसकी तलवार ज़हर में बुझी हुई थी इसलिये आप जांबर न हो सके और तीसरे दिन शहादत पायी। आख़री वक़्त अपने बेटों से मुख़ातब होकर फ़र्माया। ख़ुदा के चाहने वालो के लिये इस फ़ानी दुनिया से अम्बिया और औसिया का साथ बेहतर है। अगर मैं इस ज़ख़्म से मर जाऊँ तो मेरे क़ातिल को भी एक ही ज़र्ब लगाना क्योंकि उसने मुझपर सिर्फ़ एक वार किया है और-हाँ-उसका बदन टुकड़े टुकड़े न करना।
यह फ़रमा कर आप कुछ देर के लिये बेहोश हो गये। जब होश में आये तो अपनी वसियत जारी रखी। फ़रमाने लगे मैंने इस वक़्त रसूले ख़ुदा (स 0) को देखा के मुझसे फ़रमा रहें है के कल तुम हमारे पास होगे।
उस वक़्त आसमान का रंग बदल गया। ज़मीन हिलने लगी – मोमिनों की आह-व-बुका से फ़िज़ायें गूँजने लगीं।
अवामुन्नास के नाला व शियु से कान पड़ी आवाज़ सुनाई नहीं देती थी। इस बारे में एक शायर ने क्या ख़ूब कहा है।
आज की रात मुशरिको ने ज़ुल्म का झण्डा बुलन्द कर दिया है। शहादते अली (अ.स.) से दीन के अरकान पर सख़्त वार हुआ है। इस एक वार से जो मोमिनों के बाप को लगा है। ईमान का पूरा का पूरा घर उजड़ गया।
आसमान के मकीनों ने इस ग़म में अपने ताजे सआदत उतार फेके हैं।
दुनिया वालो को बहता पानी कड़वा लगने लगा है। आबे हयात में ज़हर घोल दिया गया है।
ज़ालिमों रसूलुल्लाह के दामाद को शहीद करके उनके दिल में ग़म के तीर पेवस्त कर दियें हैं।
उन्होने अली (ए) मुर्तुज़ा का सर ही दो पारा नहीं किया बल्कि ख़ुदा के हाथ (हज़रत का लक़ब) को भी काट डाला है।
जब से अली (अ.स.) की पेशानी पर दुश्मन की तलवार लगी है चाँद और सूरज की पेशानियाँ भी दाग़दार हो गयीं हैं। यूँ मालूम होता है जैसे शक़्क़ुल-क़मर का मोजिज़ा दोबारा दुनिया पर ज़ाहिर हो गया है।
अली (अ.स.) की पेशानी चाँद की तरह दो टुकड़े हो गयी है। ज़ैनब व उम्मे कुलसूम (अ.स.) के नाला व फ़र्याद की आवाज़े बलन्द हुँई।
हसन (अ.स.) और हुसैन (अ.स.) ने अपने अमामे शिद्दते ग़म से ज़मीन पर उतार फ़ेंके।
बोहलोल का हर्फ़ दर्द-व-अलम में डूबा हुआ था। हारून भी उसकी तासीर में खो सा गया।
और बहुत देर तक उसके होठों से एक हर्फ़ भी नहीं निकला और उसका सर झुका रहा
बोहलोल ने अपनी गुदड़ी सँभाली और अपने आँसू पोछता हुआ उठ खड़ा हुआ।
अच्छा हारून। अब मुझे इजाज़त दे।
हारून चौंका। ठहरो। तुम हमारे महल में आये हो। यह मुनासिब नहीं के यहाँ से ख़ाली हाथ जाओ।
उसने मुलाज़िमो को हुक्म दिया के बोहलोल के लिये अशर्फ़ियाँ और दीनार लाये जायें।
नहीं हारून। मुझे इन अशर्फ़ियों की हाजत नहीं। तुमने यह माल जिन लोगो से लिया है। उन्हें दे दो। अगर तुमने क़ौम का माल नहीं लौटाया। तो एक दिन ऐसा ज़रूर आयेगा। जब ख़लीफ़ा से इसका तक़ाज़ा किया जायेगा। उस रोज़ ख़लीफ़ा ख़ाली हाथ होगा और उसके पास शर्मिन्दगी और पछतावे के सिवा कुछ नहीं होगा। बोहलोल इतना कहकर चल दिया। हारून लरज़ गया और वहीं पशेमान सा बैठा रह गया।
जन्नत मे घर
हारून की चहीती मल्का , ज़ुबैदा अपने शानदार महल की ख़िड़की में से बाहर का नज़ारा कर रहीं थी। के उसने नहर के किनारे बोहलोल को बैठे हुए देखा। वह बच्चो की तरह रेत से खेल रहा था। कभी वह उसकी छोटी-छोटी ढेरियाँ बनाता। कभी उन्हे क्यारियों की शक्ल देता। कभी उन घरौदों में खिड़कियाँ और दरवाज़े बनाता। ज़ुबैदा कुछ देर उसका यह खेल दिलचस्पी से देखती रही फिर अपनी चन्द कनीज़ो के साथ बाहर आयी और बोहलोल के पास आ खड़ी हुई और उसे मुतावज्जेह किया। बोहलोल यह क्या कर रहे हो
बोहलोल ने सर उठाकर देखा। यह मैं जन्नत के महल बना रहा हूँ।
इतना कहकर वह फिर अपने काम में मसरूफ़ हो गया।
अच्छा। ज़ुबैदा ने मसनूई हैरत से कहा। फिर कुछ सोच कर बोली। बोहलोल। तुम बेहिश्त के ये महल बेचते हो
हाँ बेचता हूँ। बोहलोल ने जवाब दिया। कितने दीनार में। ज़ुबैदा ने मेज़ाहन पूछा।
सिर्फ़ सौ दीनार में। बोहलोल ने बताया ज़ुबैदा ने सोचा के इस तरह मज़ाक ही मज़ाक में बोहलोल की मदद भी हो जायेगी। उसने कनीज़ों को हुक्म दिया के बोहलोल को सौ दीनार अदा कर दिये जायें और बोहलोल से बोली। बोहलोल मैं भी एक बेहिश्त ख़रीदना चाहती हूँ।
कौन सी। बोहलोल ने इस्तफ्सार किया ज़ुबैदा ने यूँ ही रेत की एक क्यारी की जानिब इशारा कर दिया। तुमने क़ीमत अदा कर दी है। ठहरो। मैं इसका क़बाला तुम्हारे नाम लिख देता हूँ।
ज़ुबैदा हँसी। मैं इस वक़्त जल्दी में हूँ बोहलोल तुम इसका क़बाला लिखकर महल में ले आना।
वह इतना कहकर आगे बढ़ गई। बोहलोल भी अपनी मिट्टी की ढेरियाँ हटा कर उठ खड़ा हुआ और वह सब दीनार अपनी झोली में डालकर ज़रूरत मन्दो और नादारों की तलाश में निकल गया
ज़ुबैदा सब कुछ भूल कर अपने मामूलात में मसरूफ़ हो गई। रात को अपने बिस्तर पर गई। आँख लगी। तो उसने देखा के वह एक ऐसे ख़ुशनुमा बाग़ में है। जिसको तसव्वुर भी करना मोहाल है के वह रू-ए-ज़मीन पर उसकी कोई मिसाल हो सकती है। वह हैरान नज़रो से उसे देखती रह गयी , उसने आहिस्ता। आहिस्ता क़दम उठाये और हर लहज़ा हैरत में डूबती चली गई।
उसके चारों तरफ़ अज़ीमुश्शान महल्लात थे। जिन के दर व दीवार में जड़े सतरंग जवाहरात निगाहों को ख़िरा कर रहे थे। चमन में बहती हुई नहरों का पानी मोतियों जैसा शफ़्फ़ाफ़ था। गुलिस्तान की बहार क़ाबिले दीद थी। कलियाँ चटक रहीं थी। फूल खिल रहे थे। फ़िज़ायें मोअत्तर थीं और हवाओं में ताज़गी और ख़ुश-गवारी थी। रूशें फूलों से भरी थीं और उनकी महक निराली थी।
इतनी ख़ूबसुरती। इतना हुस्न और दिलकशी यक्जा देखकर ज़ुबैदा हैरान हो रही थी के कुछ ग़ुलाम और कनीज़ें सफ़े बाँधे क़रीब आये। ज़रनिगार कुर्सी बैठने के लिये पेश की और मोअद्देबाना लहजे में बोले तशरिफ़ रखिये
ज़ुबैदा तसवीरे हैरत बनी उस ज़र्री कुर्सी पर बैठ गई। एक कनीज़ आगे बढ़ी और उसने एक दस्तावेज़ चाँदी की तश्तरी में रख़ कर ज़ुबैदा को पेश की। ज़ुबैदा ने कुछ मुताज़बज़िब सी होकर दस्तावेज़ उठाई और डरते-डरते उस पर निगाह डाली उसमें सोने के हर्फ़ो से लिखा था:। यह क़बाला है उस बेहिश्त का जो बोहलोल ने ज़ुबैदा के हाथ फरोख़्त की है।
इसके साथ ही उसकी आँख खुल गयी वह बहुत देर तक ख़ाब के सहर(जादू) में खोई रही। उसकी आँखों में वह तमाम फ़िरदौसी मनाज़िर रक़्स करने लगे। उसने सोचा। ग़ौर किया और उसे यक़ीन हो गया के उसने जो कुछ देखा है। वह ख़ाब की सूरत में एक बशारत है। बोहलोल का वायदा सच था। क़्योंकि उसने बेहिश्त का क़बाला लिख कर देने का वायदा किया था और जैसे नज़ारे उसने ख़ाब में देखे थे। वे रू-ए-ज़मीन पर कहीं नहीं थे।
उसका रोवाँ-रोवाँ मसर्रत व शादमानी से नाच उठा उसने बे ख़ुदी में हारून को जगाया और फ़ूले हुए साँसों के दरमियान बोली। ज़िल्ले इलाही। आज मैंने सौ दीनार में बोहलोल से एक बेहिश्त ख़रीदी थी। मेरा ख़याल था के वह एक मज़ाक़ है। दीवाने की बड़ है। मगर वह अभी-अभी मुझे ख़ाब में दीखला दी गई है। उसका क़बाला मेरे नाम है। मैंने अभी उसे अपनी आँखों से देखा है।
तुम्हारा दिमाग़ तो दुरूस्त है। अहमक़। के तुम्हें भी उस दीवाने ने पागल बना दिया है। हारून ने अपनी नींद ख़राब होने की ख़फ़्गी से कहा।
नहीं। मैं सच कह रही हूँ। मैंने ख़ाब में जो कुछ देखा है। उसका दीदार किसी इन्सानी आँख ने नहीं किया होगा। वह वह बेहिश्त मेरे नाम है। ख़ुदा की क़सम मैंने उसकी दस्तावेज़ देखी है ज़ुबैदा ने जोश से बताया।
ओ हो यह वक़्त ऐसे उल्टे सीधे खाब सुनाने का है। ख़ामोश हो जाओ और मेरी नींद ख़राब मत करो। हारून ने ग़ुस्से से कहा और करवट बदल ली।
लेकिन ज़ुबैदा की आँखों से नींद ग़ायब थी। वह तमाम रात उसने इसी तसव्वुर में गुज़ार दी। सुबह क़समें खाकर अपना ख़ाब सुनाया और उसे यक़ीन दिलाया के उसका ख़ाब सच्चा है और बोहलोल से ख़रीदी हुई जन्नत हक़ीक्त है।
हारून ने बोहलोल को बुला भेजा। वह अपनी गुदड़ी में लिपटा शहनशाहो की सी शान से आया और मानाख़ेज़ लहजे में हारून से बोला।
तुझ जैसे बादशाह को मुझ फक़ीर की ज़रूरत क्यों आ पड़ी हैं।
सुना है। तूने बेहिश्त बेचने का कारोबार शुरू कर दिया है। हारून ने मज़ाक़ ऊड़ाया।
महा-बदौलत तो यह कारोबार कब से कर रहे हैं। बोहलोल ने बेनियाज़ी से जवाब दिया।
सुना है तूने मल्का को भी कोई बेहिश्त बेची है। हारून ने सवाल किया।
हाँ । बोहलोल ने इस्बात में सर हिलाया। कितने में, हारून ने पूछा।
सौ दीनार में वह बोला।
बहुत ख़ूब। मैं भी तुझे सौ दीनार से कुछ ज़्यादा ही दे दूँगा। एक बेहिश्त मेरे हाथ भी फ़रोख़्त कर दे। हारून ने कहा।
बोहलोल ने क़हक़हा लगाया। हारून तेरी मल्का ने तो अनदेखे यह सौदा किया था तूने तो उससे सब कुछ सुन लिया है। अब उसकी क़ीमत अदा करना तेरे बस में नहीं
बोहलोल की इस करामत ने हारून को फ़िक्रमन्द कर दिया। वह नहीं चाहता था के कोई ऐसी बात लोगों को अपनी तरफ़ मुतावज्जेह करे और वह उसके मोअतक़िद बन जायें। क्योंकि उसे यह भी बदगुमानी थी कि इमाम मूसा बिन जाफ़र (अ.स.) जिन्हें उसने क़ैद कर रखा था वह उनसे ख़ुफ़िया राब्ता रख़ता है और उसके ख़िलाफ़ प्रोपेगण्डा करता है। उसने उन जासूस को बुलवाया। जो बोहलोल के बारे में तमाम ख़बरें पहुँचाते थे और उनसे बोला तुम लोगो ने बोहलोल के बारे में क्या पता लगाया है –
जान की अमान पाऊँ तो कुछ अर्ज़ करूँ – एक शख़्स ने जुर्अत की। अमान है हारून ने कहा।
आली-जाह। उसे दीवाना नहीं दाना कहना चाहिये। ऐसा मालूम होता है। जैसे उसने ख़ुद पर दीवानगी का एक ख़ोल सा चढ़ा रखा है वह दानिशमन्दी में अच्छे भले होशमन्दों को मात दे देता है। मैंने उसकी बहुत निगरानी की है। मगर कोई ऐसी बात नहीं देखी जिसपर गिरफ़्त की जा सके एक वज़ीर ने जवाब दिया।
हमें ख़बर मिली है के उसने अवाम को आशिक बना रखा है। लोग अपनी मुश्किले लेकर उसके पास जाते हैं हारून ने ना-गवारी से कहा। आपने बजा फ़रमाया। ज़िल्ले सुबहानी। यह हक़ीकत है के वह लोगों के काम आता है और बड़े अजीब अन्दाज़ में उनकी मुश्किलें हल करता है। अगर इजाज़त हो तो मैं बग़दाद के सौदागर का क़िस्सा बयान करूँ। जिसकी मुश्किल बोहलोल ने हल की है। दूसरे मुशीर ने गुफ़्तुगु में हिस्सा लिया। इजाज़त है – हारून ने इजाज़त दी।
बग़दाद का सौदागर
इस बात को ज़्यादा अर्सा नहीं हुआ। बग़दाद का एक शरीफ़ सौदगर अजीब मुश्किल में गिरफ़्तार हो गया था। वह बहुत कम मुनाफ़े पर माल बेचता है।
इसलिए शहर में हर दिल अज़ीज है उसका एक कारोबारी रक़ीब जो यहूदी है उससे हसद करता था और मौक़े की ताक में था के सौदागर को कोई नुकसान पहुँचा सके। वह शहर में सूद पर रूपया भी चलाता है
कुछ मुद्दत गुज़री उस शरीफ़ सौदागर को रूपये की ज़रूरत पड़ी। उसने यहूदी से क़र्ज़ माँगा। वह रूपये देने पर तैयार तो हो गया। लेकिन उसने एक निराली शर्त रखी के अगर सौदागर वक़्ते मुक़र्ररह पर उसका क़र्ज़ अदा न कर सका। तो वह उसके बदले जिस्म के जिस हिस्से से चाहेगा। एक सेर गोश्त काट लेगा। सौदागर मजबूर था। उसकी इज़्ज़त पर बनी थी। उसने मजबूरन शर्त मान ली और पक्की दस्तावेज़ लिखकर यहूदी के हवाले कर दी
इत्तेफ़ाक ऐसा हुआ के वह सौदागर वक़्ते मुक़र्ररह पर क़र्ज़ अदा नहीं कर सका। तो यहूदी ने फ़ौरन मुक़द्दमा दायर कर दिया क्योंकि उसके पास सौदागर के हाथ की लिखी हुई दस्तावेज़ मौजूद थी।
इसलिये क़ाज़ी को फ़ैसला यहूदी के हक़ में ही देना था। मगर वह आजकल पर टालता रहा।
क्योंकि उसे मालूम था के यहूदी सौदागर का सख़्त तरीन दुश्मन है। वह उसका ऐसा अज़ों काटना चाहता है जो उसकी मौत का बायस बन जाये।
यहूदी हर रोज़ क़ाज़ी से हुक्म जारी करने का तक़ाजा करने लगा। क़ाज़ी के पास भी सौदागर के बचाओ की कोई तदबीर नहीं थी। लोग भी उसके हाल पर कुढ़ते थे। किसी ने बोहलोल से भी यह क़िस्सा जा कहा। उसने आव देखा न ताव अपनी गुदड़ी उठा कर कंधे पर डाली और क़ाज़ी की अदालत में जा पहुँचा। और क़ाज़ी से बोला।
क़ाज़ी-जी। क्या आप मुझे इजाज़त देते हैं के मैं इन्सानियत के नाते इस सौदागर की वकालत करूँ
क़ाज़ी ने उसे इजाज़त दे दी। तो वह अपना असा खटखटाता आगे बढा और बड़े इत्मीनान से सौदागर और यहूदी के दरमियान जा बैठा। और सौदागर से बोला। भाई सौदागर क्या तूने इसको दस्तावेज़ लिखकर दी है कि अगर तू क़र्ज़ अदा न कर सके तो उसे इख़्तेयार है के यह तेरे जिस्म का एक सेर गोश्त जिस जगह से चाहे उतार ले।
मुझे इससे इन्कार नहीं है। वह ठण्डी साँस भर कर बोला।
फिर बोहलोल यहूदी की तरफ़ मुतावज्जेह हुआ। क्यों भाई क्या यही दस्तावेज़ लिखी गई है के तुम उसके जिस्म के एक सेर गोश्त जहाँ से चाहोगे काट लोगे।
बिल्कुल यही इक़रार हुआ था। मेरे पास दस्तावेज़ मौजूद है यहूदी ने बड़े फ़ख्र से बताया।
तो फिर ठीक है भाई। तुम्हें पूरा हक़ हासिल है के तुम सौदागर के जिस्म से एक सेर गोश्त काट लो जहाँ से जी चाहे काटो। लेकिन इतना ख़याल रखना के शर्त सिर्फ़ गोश्त की है और वह भी पूरा एक सेर-न कम न ज़्यादा। और ख़ून का एक क़तरा न निकले। अगर तुमने एक सेर से ज़्यादा या कम काटा या सौदागर का ख़ून ज़ाया हुआ तो तुम्हे इक़दामे क़त्ल की सज़ा मिलेगी। बोहलोल ने बहुत मज़े में कहा।
यहूदी का मुँह खुला का खुला रह गया। लोग अश-अश कर उठे और क़ाज़ी ने हुक्म दिया के यहूदी को सिर्फ़ रक़म अदा कर दी जाये।
बहुत ख़ूब। हारून ने तौसीफ़ी अन्दाज़ में कहा बहुत दूर की कौड़ी लाया बोहलोल।
आली-जहा। उसका दीवाना दिमाग़ अक्सर दूर की कौड़ी लाता है। अगर मुझे इजाज़त हो तो मैं बताऊँ के उसने एक बेवकूफ़ ग़ुलाम को क्या ख़ूब सबक़ सिखाया। कोई दूसरा मुक़र्रब बोला। बयान करो। हारून ने इजाज़त दी।
बेवकूफ़ ग़ुलाम
चन्द रोज़ हुए यह ख़ाकसार कश्ती में बसरे गया। उसमें और लोगो के साथ बोहलोल भी सवार था। अचानक एक सौदागर का ग़ुलाम रोने और चिल्लाने लगा। ख़ुदा के लिये मुझे कश्ती से उतारो। नहीं तो मैं मर जाऊगाँ। ख़ुदा के लिये इस कश्ती को वापिस ले चलो। समन्दर की लहरे इसे उल्टा देंगीं हम सब डूब जायेंगें। तुम्हें ख़ुदा-व। रसूल का वास्ता कश्ती रोको।
उसे एक लम्हा भी क़रार नहीं आ रहा था। और उसकी चीख़ व पुकार से कश्ती में बैठे लोग बहुत परेशान हो रहे थे। कुछ मुसाफ़िरों ने उसे तसल्ली देने की कोशिश की। हर तरह से उसे समझाया बुझाया। लेकिन उसे किसी पल चैन नहीं था।
बोहलोल ने ग़ुलाम के मालिक से कहा। जनाब अगर आप इजाज़त दें तो मैं आपके ग़ुलाम का ख़ौफ़ दूर कर दूँ। बेचारा बहुत परेशान है।
नेकी और पूछ-पूछ। भला इससे बहतर और क्या बात होगी।
इसकी चीख़ पुकार हमारे दीमाग़ पर भी हथौड़े की तरह बरस रही है। अल्लाह तुम्हें जज़ा-ए-ख़ैर दे। इसे पूर-सुकून कर दो। सौदगर ने जल्दी से कहा।
बाक़ी लोगो ने भी उसकी हाँ में हाँ मिलायी। बोहलोल ने क़रीब बैठे हुए लोगों से कहा। भाईयों। तुम्हे ज़हमत तो होगी। ज़रा इस बेचारे ग़ुलाम को उठाकर समन्दर में तीन-चार डुबकियाँ तो दिलवा दो।
लोग हँस पड़े। कुछ ने हैरान होकर उसकी तरफ देखा। ग़ुलाम और ज़्यादा चीख़ पुकार करने लगा बोहलोल बोला। भाईयों। जब इसके मालिक ने इजाज़त दे दी है तो तुम्हे क्या ताम्मुल है। शाबाश उठो। इसको समन्दर में दो-चार ग़ोते दिनवा दो। चलो बिस्मिल्लाह करो।
सौदगर ने उसकी ताईद की। तो ग़ुलाम के क़रीब बैठे हुए लोगों ने उसे पकड़ लिया ग़ुलाम ने वा-वयला मचा कर आसमान सर पर उठा लिया। बहुत हाथ पैर मारे मगर उसकी एक न चली। कुछ आदमियों ने उसे मज़बूती से पकड़ लिया और समुंद्र में ग़ोते देने लगे। वह बचाओ। बचाओ का शोर मचाने लगा।
चन्द लम्हो बाद बोहलोल ने कहा। यार इस बेचारे पर तरस खाओ और अब बस करो। इसका इलाज हो गया।
मुसाफ़िरों ने उसे वापिस खींच लिया। उसने हाँपते-काँपते अपने नाक और मुँह से पानी निकाला। बाल पोछे और एक किनारे पर बिल्कुल चुपचाप बैठ गया। बाक़ी मुसाफ़िरों ने हैरत से उसकी ख़ामोशी को देखा और बोहलोल से सवाल किया के उसने यह नुस्ख़ा क्योंकर ईजाद किया जो इस क़द्र कारगर साबित हुआ।
बोहलोल ने हँस कर जवाब दिया। इस बेचारे को कश्ती के आराम की क़द्र व क़ीमत का अन्दाज़ा ही नहीं था। समुंद्र में ग़ोते खाकर उसे यह नुक्ता समझ में आ गया है के कश्ती समुंद्र के मुक़ाबले में कितनी महफ़ूज़ है।
हारून मुस्कुराया। इस मसख़रे का भी कोई ऐसा ही इलाज करना पड़ेगा। जो दीवाना बन कर दूसरो को दीवाना बनाता फ़िरता है।
ज़िल्ले-इलाही ने बजा फ़रमाया। हमारा अन्दाज़ा भी यही है के वह दीवाना नहीं है। बल्कि दूसरो को बेवकूफ़ बनाने के लिये ऐसी हरकतें करता है। कुछ रोज़ पहले तो हमें इसका सबूत भी मिल गया के वह दीवाना। पागल और दानिशमन्द में तमीज़ करने की सलाहियत रखता है। एक शख़्स ने कहा।
वह किस तरह। बयान करो। हारून ने मुताजस्सिस लहजे में कहा।
व्यापारी
जब बोहलोल को पागलपन का दौरा पड़ा था तो एक ताजिर ने ग़ालेबन फ़ाल लेने की ग़र्ज़ से बोहलोल से पूछा। हज़रत शेख़ बोहलोल साहब मेहरबानी फ़रमाकर मुझे मशाविरा दें कि मैं कौन सा माल ख़रीदूँ जो नफ़ा बख़्श हो।
बोहलोल ने बड़े इत्मीनान से कह दिया। भाई तुम लोहा और रूई ख़रीद लो। अल्लाहताला बरकत देगा।
दीवानों और दुवेंशों की बातो में अक्सर लोग फ़ाल लेते ही है , उसने भी बोहलोल की बात पर अमल किया। इत्तेफाक़न उसे बहुत ज़्यादा मुनाफ़ा हुआ।
दो ढाई माह बाद , उसने फिर माल ख़रीदने का इरादा किया तो सोचा के फिर बोहलोल की बातों से फ़ाल ली जाये। वह उसके पास आया। यह अपनी उन दीवानी हरकतों में लगा हुआ था। ताजिर ने उसे बुलाया। तो वह असा पर सवार होकर ठख़-ठख़ करता आया। उसने उसकी हालत देखकर कहीं कह दिया।
ओ , पागल बोहलोल। ज़रा यह तो बता इस बार तिजारत के लिये कौन सा माल ख़रीदूँ।
बोहलोल फ़ौरन बोला। जा भाई प्याज़ और तर्बूज़ ख़रीद ले।
उस अहमक़ ने बग़ैर सोचे समझे अपना तमाम सर्माया प्याज़ तर्बूज़ ख़रीदने में लगा दिया।
फ़सल के दिनों में तो वैसे ही उनकी माँग नहीं थी। कुछ दिन ज़ख़ीरा किये। तो वह सड़ गये और उसे ख़सारा उठाना पड़ा। वह ग़ुस्सा में भरा हुआ बोहलोल के पास आया और बोला। औ बोहलोल। तूने मुझे यह कैसा मशविरा दिया था। मेरा सारा सर्माया डूब गया। हालांकि पिछली बार तेरे मशविरे से मुझे बहुत मुनाफ़ा हुआ था।
बोहलोल बोला। हज़रत पहले रोज़ जब आपने मुझसे मशविरा माँगा था। तो जनाब शेख़ बोहलोल कहकर मुझे आवाज़ दी थी। गोया आपने मुझे दानिशमन्द समझकर मेरे वेक़ार का ख़याल रखा। मैंने भी दानिशमन्दी से मशविरा दिया।
लेकिन दूसरी बार आपको याद है के आपने क्या गौहर अफ़शानी फ़रमायी थी।
नहीं। ताजिर को याद नहीं था।
आपने फ़रमाया था। ओ पागल बोहलोल , चूँकि आपने मुझे पागल समझकर मुख़ातब किया था। इसलिये मैंने आपको पागलपन में ही मशविरा दिया था।
बहुत ख़ूब। हारून महजूज़ हुआ। यह तो होशमन्द दीवाना है। इसका कोई बन्दोबस्त करना पड़ेगा।
आपका फ़रमान बजा। लेकिन हुज़ूर उसकी इस दीवानगी ने उसे आवाम के बहुत क़रीब कर दिया है। यह मुफ़्त में उनकी मुश्किलें हल करता है। उस पर ज़रा एहतियात के साथ हाथ डालना होगा। हर ग़रीब के साथ उठकर चल पड़ता है। वज़ीर ने इज़्हारे ख़याल किया।
हूँ। तो फिर तुम ही बताओ के उस पर कौन सी फ़र्दे-जुर्म आयद् कि जाए के आवाम में कोई रद्दे अमल न हो। हारून ने पूछा।
जान की आमान पाऊँ तो एक तजवीज़ पेश करूँ। एक मुशीर ने मोहतात् लहजे में कहा।
अमान है। हारून ने शाहाना निख़्वत से गोया अहसान किया हो कहा।
उसपर इल्ज़ाम लगाया जा सकता है के वह अंबिया-ए-सलफ़ की तौहीन करता है। इसलिये इस्लाम से ख़ारिज है और वाजिबुल क़त्ल है। उसने बताया।
कोई सुबूत। हारून ने रोबे शाही से कहा। इसका सुबूत भी मौजूद है और गवाह भी। मुशीर बोला।
बयान करो। हारून ने तहक्कुमाना शान से कहा।
लूत नबी
कुछ लोगों ने बोहलोल से हज़रत लूत (अ.स.) के बारे में पूछा के वह किस क़ौम के पैग़म्बर थे तो वह कहने लगा। के उनके नाम से ज़ाहिर है के वह ऊबाशों और अय्याशों के पैग़म्बर थे। लोग उसके पीछे पड़ गये के पैग़म्बरे ख़ुदा की शान में ग़ुस्ताख़ी करता है। तो उसने यह कहकर अपनी जान बचाई के मैंने पैग़म्बरे ख़ुदा की शान में तो ग़ुस्ताख़ी नहीं की।
मैंने तो उनकी क़ौम की बात की है। इसकी ताईद क़ुर्आने पाक में मौजूद है।
हारून ज़ेरे लब मुस्कुराया। और बोला। नहीं। नहीं उस पर यह इल्ज़ाम साबित नहीं किया जा सकता यह दीवाना बड़ा हाज़िर जवाब है और दूसरों को ला जवाब करने का हुनर ख़ूब जानता है।
आली-जहा। ऐसा वेसा हाज़िर जवाब। उसने तो आपके वज़ीरे ममलेकत का ऐसा नातेक़ा बन्द किया था के मौसूफ़ बग़ले झाँकने लगे थे।
हालांकि वह ख़ुद को बहुत हाज़िर दिमाग़ समझते हैं।
एक मुशीर ने वज़ीर ममलेकत का तज़किरा किया जो उस वक़्त महफ़िल में मौजूद नहीं था।
वह क़िस्सा क्या है , बयान किया जाये। हारून ने इजाज़त दी।
आली-जहा।
वज़ीर
हुआ यूँ कि एक रोज़ बोहलोल यहाँ आया तो इत्तेफ़कन वज़ीरे ममलेकत से मुलाक़ात हो गई। उन्होने मेज़ाहन बोहलोल से कहा। बोहलोल। मुबारक हो। अभी-अभी हुक्म आया है के ख़लीफ़ा ने तुझे कुत्तो , मुर्ग़ो और सुअरों का अमीर और हाकिम बना दिया है।
बोहलोल ने एक लम्हा तवक्क़ुफ़ नहीं किया और बड़े रोब से बोला। ख़बरदार। अब हमारे हुक्म से सरताबी की जुर्अत न करना इस हुक्म से तू भी मेरी रय्यत हो गया है। उसने यह बात इतनी बेसाख़्तगी से कही के वहाँ मौजूद कोई भी अपनी हँसी पर क़ाबू नहीं पा सका और वज़ीरे ममलेकत को वहाँ से टलते ही बनी।
हारून हँसने लगा। तो उसके ख़ुश-गवार मेज़ाज से पाकर मुशीर के किसी हासिद ने मौक़ा ग़नीमत जानकर कहा। आली-जहा , मुशीर साहब ने वज़ीरे ममलेकत का वाक़ेआ तो बयान कर दिया। लेकिन ज़रा उनसे भी तो पूछये के पिछले हफ़्ते हज़रत बोहलोल ने उनके साथ क्या किया है ।
हारून ने उसकी जानिब देखा। बोलो क्या हुआ था ।
वह ख़फ़ीफ़-सा हो गया और उस शख़्स पर क़हर आलूद निगाह डाल कर बोला। ज़िल्ले इलाही हासिदों का काम दूसरों को नीचा दिखाना है।
तुमने वज़ीरे ममलेकत के साथ जो कुछ किया है उसका निशाना तुम्हारी अपनी ज़ात भी बन गयी है फ़ौरन वह क़िस्सा बयान करो। हारून ने सरज़निश की।
सरताबी की मजाल किसमें थी वह ख़ज़िल सा होकर अपना क़िस्सा आप ही कहने लगा। आली-जहा।
कबूतर की बीट
उस रोज़ मैंने खाने साथ पनीर भी खाया था। शायद उसका कोई रेज़ा मेरी दाढ़ी में भी अटका रह गया। लेकिन मुझे इसकी ख़बर नहीं थी।
बदकिस्मती कि बोहलोल उस तरफ़ आ निकला और मुझसे पूछने लगा। मुशीर साहब। आज आपने नाश्ते में क्या तनाव्वुल फ़रमाया है।
मैंने हँसी-हँसी में कह दिया। मैंने कबूतर खाया है।
तो वह कहने लगा। तब ही उसकी बीट आपकी रीशे मुबारक में अटकी हुई नज़र आ रही है।
हारून बे साख़्ता हँस पड़ा। वल्लाह कैसा मसख़रा है यह बोहलोल , कल उसे दरबार में तलब करो। हम ख़ुद उससे बात करेंगें ।
हारून के दरबार मे हाज़री
अगले रोज़ बोहलोल दरबार में हाज़िर था। हारून अपने ज़र-निगार तख़्त पर शाही लिबास पहने बड़ी तमकेनत से बैठा हुआ था। बोहलोल अपनी बोसीदा पापोश और पेवंद लगी गुदड़ी के साथ उसके उसके हुज़ूर में पेश किया गया। हारून ने एक क़हर आलूद निगाह उसपर डाली और ख़श्मगीन लहजे में बोला। बोहलोल। तू बहुत होशियार बनता है। लेकिन हमें पता चला के तू हुकूमत के बाग़ी मूसा बिन जाफ़र (अ.स.) के दोस्तदारों में से है। उन्हीं के हुक्म पर तू दीवाना बना हुआ है। ताकि अवाम को उनकी तरफ़ मुतावज्जेह करके हमारी हुकूमत का तख़्ता उलट दे। तू समझता है के पागल होने की वजह से तेरी कोई पूछ-ताछ नहीं होगी। लेकिन याद रख़ हुकूमत तेरी तरफ़ से ग़ाफ़िल नहीं है। तेरी सब सर-गर्मियों की ख़बर हमें बराबर मिलती है।
बोहलोल ने मज़हक़ा-ख़ेज़ सूरत बनाई ज़ाहिर है के तुम्हारे नमक हलाल शिकारी कुत्ते सही इत्तेलाअ ही लेकर आये होगें। तो अब ख़लीफ़ा मुझसे कैसा सुलूक करेंगें।
भरे दरबार में मज़ाक़ उड़ाने पर हारून और तेश में आया। तुम्हे ऐसा सबक़ सिखाया यायेगा के तुम दूसरो के लिए नमूना-ए-इबरत बन जाओगे।
उसने ग़ुस्से से कहा और अपने ग़ुलाम को पुकारा। मसरूर ले जाओ इस ग़ुस्ताख़ को। इसके कपड़े उतार लो और इस पर गधे का पालान डाल दो। इसके मुँह में लगाम दो। इसे महल और हरम-सरा में फिराओ और उसके बाद मेरे सामने इसका सिरे पुर ग़ुरूर उड़ा दो।
दरबार में सन्नाटा छा गया। दरबारी हैबते शाही से काँप गये। लेकिन बोहलोल शाने बेनियाज़ी से ख़ड़ा मुस्कुराता रहा। मसरूर आगे बढ़ा और उसने बोहलोल की गुदड़ी घसीट कर परे उछाली। उसका बोसीदा लिबास नोचकर उस-पे-गधे का पालान कस दिया। उसके मुँह में लगाम दी और उसे ख़ींचता हुआ महल और हरम-सरा की तरफ़ ले गया।
शाही दरबारों और महल सराओं में इन्सानियत की तज़लील रोज़ का मामूल है। इसलिये बोहलोल की इस हैबते कज़ाई पर किसी को ताज्जुब नहीं हुआ। महल और हरम-सरा के मकीन , इन्सानियत की इस तौहीन को तमाशे की तरह देखते रहे। किसी ने सोचा के बोहलोल तो दीवाना है। इसलिये सज़ा का मुस्तौजब नहीं लेकिन जान के ख़ौफ़ ने ज़बान को बन्द कर रखा था। कोई कुछ न कह सका।
मसरूर उसकी लगाम खींचता हुआ उसे दरबार में वापिस ले आया। और हारून के सामने अदब से झुक कर बोला। आली-जहा आपके हुक्म की तामिल हुई। क्या इसकी गर्दन उड़ा दी जाये।
हारून ने अभी जवाब नहीं दिया था कि नागाह उसका वज़ीर जाफ़र बर-मक्की दरबार में दाख़िल हुआ। उसने हैरत से बोहलोल की यह हालत देखी और बोला।
बोहलोल ख़ैरियत तो है। ऐसा क्या कुसूर हो गया तुझसे जो यह हालत बनी है।
बोहलोल हँसा। जनाबे आली। यह तो कुछ भी नहीं अभी तो मेरी गर्दन भी मारी जायेगी।
मगर किस जुर्म में। जाफ़र बर-मक्की ने पूछा
मैने एक सच्ची बात कह दी थी। जिसके इनाम में ख़लीफ़ा ने मुझे ख़ुल-अते फाख़ेरा अता की है और जामे मर्ग मेरा इन्तेज़ार कर रहा है।
हारून को बे साख़्ता हँसी आ गयी। ख़लीफ़ा को हँसते देखकर दरबारी और जाफ़र बर-मक्की जो अपनी हँसी ज़ब्त कर रहे थे। वह भी हँस पड़े। हारून का ग़ुस्सा काफ़ूर हो गया और उसने शाही हुक्म जारी किया। जैसा बोहलोल ने कहा है उसे वैसा ही ख़ुल्अते फ़ाखरा अता किया जाये।
ख़लीफ़ा के इस करम का शुक्रिया। मुझे अपनी पेवंद लगी गुदड़ी ही ग़नीमत है। बोहलोल ने अपनी गुदड़ी शाने-पे डाली।
बोहलोल को दरहम व दीनार अता किये जायें – शाही फ़रमान जारी हुआ।
नहीं। मुझे अहले जहन्नम की पेशानियों और पुश्तो पर लगने वाली मोंहरों की ज़रूरत नहीं। बोहलोल चलने पर तैयार हो गया।
हारून ने उसे रोका। बोहलोल तुम अगर इस इनाम व इकराम को अपने इस्तेमाल में नहीं लाना चाहते तो ग़रीबो और मोहताजो में बाँट देना। उनका भला हो जायेगा।
बोहलोल रूक गया और उसने रक़म की थैलियाँ ग़ुलाम से ले लीं। चन्द क़दम चला और रूक गया। कुछ सोचने लगा। फिर आगे बढ़ा और रूक गया। फिर कुछ सोचा और वापिस पलट आया।
उसने रक़म की थैलियाँ हारून के सामने ढेर कर दीं। और बोला हारून। मैंने बहुत सोचा है के इन अशर्फ़ियों की सबसे ज़्यादा ज़रूरत किसको है लेकिन मुझे तुझसे ज़्यादा मुस्तहक़ कोई और नज़र नहीं आया। तुझसे ज़्यादा नादार और ज़रूरतमन्द शायद और कोई नहीं। क्योंकि में रोज़ देखता हूँ के तेरे कारिन्दे हर जगह लोगो को कोड़े मार मारकर उनसे टैक्स वुसूल करते हैं। ताकि तेरे ख़ज़ाने पुर हों। सारे शहर में सबसे बड़ा ज़रूरतमन्द तो तू ख़ुद है। इस लिये यह रक़म तू ही रख ले।
ख़लीफ़ा दम-ब-ख़ुद रह गया। अहले दरबार सन्नाटे में आ गये। बोहलोल के अन्जाम को सोचकर उनके रोंगटे ख़ड़े हो गये। लेकिन बोहलोल इत्मीनान से चल ख़ड़ा हुआ।
रोको। इस दीवाने को रोको।
अचानक ख़लीफ़ा हारून की आवाज़ गूँजी।
अहले दरबार इस तसव्वुर से ही काँप गये के अब बोहलोल का इताबे शाही से बचना मुहाल है।
दो ग़ुलाम तेज़ी से आगे बढ़े और बोहलोल को घसीट कर हारून के सामने ले आये।
हारून की आँखे नम थी और पशेमानी ने उसकी आवाज़ को पस्त कर दिया था। वह गहरी साँस लेकर बोला। बोहलोल। तेरी दीवानगी हम जैसे होशमन्दों के लिये एक नेमत है।
तेरी इस बात ने मेरे दिल को नर्म कर दिया है मेरा जी चाहता है के तुझसे कुछ पंद व नसीहत की फ़रमाइश करूँ।
ग़ुलामों ने फ़ौरन ही बोहलोल को छोड़ दिया। वह अपनी मख़सूस शाने बेनियाज़ी से गोया हुआ। हारून। पिछले ख़लीफ़ाओं के महलों और उनकी क़ब्रों को देखकर इबरत हासिल कर। तू ख़ूब जानता है कि यह लोग अर्स-ए-दराज़ तक उन महलों में ऐश व इशरत की ज़िन्दगी ग़ुज़ारते रहे। और अब क़ब्रों में पड़े पछताते और अफ़सोस करते हैं के काश। उन्होने अपनी आख़ेरत के लिये कुछ नेक आमाल अपने साथ ले लिये होते। मगर अब उन्हे इस पछतावे से कुछ हासिल नहीं हो सकता। हम सब भी जल्द-या-ब-देर इसी अन्जाम को पहुँचने वाले हैं। जब यह शाही रोब व दबदबा और व शौकत कोई काम नहीं देगी। हारून पर कपकपी सी तारी हो गई। मुतास्सिफ़ लहजे में बोला। बोहलोल कुछ ऐसे आमाल बता जिनके बजा लाने से अल्लाह मुझसे राज़ी हो जाये।
उसकी मख़लूक़ को ख़ुश कर। वह तुझसे राज़ी हो जायेगा। बोहलोल ने जवाब दिया।
अब इसकी तदबीर भी बता दो के ख़ल्के ख़ुदा को किस तरह ख़ुश रखा जा सकता है। हारून ने पूछा
अदल व इन्साफ़ में सबको बराबर का दरजा दो जो अपने लिये मुनासिब नहीं समझते। दूसरो को भी उसका मुस्तहक़ न समझ। मज़लूम की फ़रियाद तवज्जोह से सुनो और इन्साफ़ से फ़ैसला करो। बोहलोल ने बुर्दबारी से कहा
आफ़रीन सद आफ़रीन बोहलोल-मरहबा। तुमने कैसी हक़ बात कही है। मरहबा हारून ने तौसीफ़ी लहजे में कहा। उसकी हाँ में हाँ मिलाने वाले दरबारियों ने भी नारा-हाय-तहसीन बलन्द किये
हारून ने हुक्मे शाही जारी किया। हुक्म दिया जाता है के शाही ख़ज़ाने से बोहलोल के तमाम क़र्ज़ अदा कर दिये जायें।
हारून क़र्ज़ से भी कभी क़र्ज़ अदा हुआ है।
बोहलोल ने उसे मुख़ातब करके कहा। शाही ख़ज़ाने में जो कुछ है वह अवाम का माल है और ख़लीफ़ा पर क़र्ज़ है। तुम्हारे लिये यही मुनासिब है के अवाम का क़र्ज़ उन्हे लौटा दो। मुझे तुम्हारा यह एहसान नही चाहिये।
तो फिर बोहलोल कोई तो ख़्वाहिश करो। मैं दिल से चाहता हूँ के तुम्हारी कोई आरज़ू पूरी करूँ। हारून ने ज़ोर देकर कहा।
तो फिर मेरी ख़्वाहिश और आरज़ू यही है के मेरी नसीहतों पर अमल करो। लेकिन अफ़सोस के दुनिया की शान शौकत और इक़्तेदार का नशा बहुत जल्द मेरी इन नसीहतों को फ़रामोश कर देगा।
यह कहता हुआ वह दरबार से बाहर निकल गया। हारून और अहलेदरबार झुके हुए सरों के साथ ख़ामोश बैठे रह गये ।
बोहलोल के घर चोरी
बोहलोल अपने वीरान खण्डर में वापिस आया। तो देखा उसमें क़दमों के निशान हैं। यूँ मालूम होता था। जैसे कोई यहाँ आया है। उसने फ़ौरन एक ख़ास जगह पर देखा। ताज़ा खुदी हुई मिट्टी जिसको हमवार किया गया था। बता रही थी के उसके अन्दाज़ा सही था। उसने अपनी छड़ी से मिट्टी को हटाया उसकी जमाशुदा रक़म ग़ायब थी।
बोहलोल कुछ रक़म किसी हंगामी ज़रूरत के लिये मिट्टी में छिपाकर रखता था। ग़ालेबन किसी ने उसे रक़म छुपाते हुए ताड़ लिया था। उसने अपनी गुदड़ी उठीई और चल पड़ा और नज़दीक ही वाक़ेअ मोची की दुकान पर पहुँचा और बड़ी ख़ुश-तबई से उसे सलाम किया।
आओ। आओ बोहलोल। कैसे आना हुआ। मोची ने ख़ुशी से पूछा।
मैंने सोचा के तुमसे मिल आऊँ। फिर तुमसे एक काम भी है। बोहलोल ने कहा।
कैसा काम है। मोची ने पूछा। तुम एक अच्छे इन्सान हो मुझ जैसे दीवाने का साथ भी ख़ुश-अख़लाक़ी से पेश आते हो। मैं तुमसे एक मशविरा लेना चाहता हूँ। बोहलोल ने कहा।
यह तुम्हारी मेहरबानी है के तुम ऐसा समझते हो। मोची ने ख़ुश होकर कहा।
बोहलोल ज़रा क़रीब हुआ और बोला। तुम तो जानते हो के मैं वीरानों खण्डरों और ख़ाली मकानों में ही रहता हूँ। मैं जहाँ भी रहा। वहाँ थोड़ी बहुत रक़म अपने बुरे वक़्त के लिये बचा कर ज़मीन में दफ़्न कर दी। तुम ज़रा हिसाब लगाकर मुझे बता दो के ये रक़म कुल कितनी होती है।
हाँ-हाँ क्यों नहीं। तुम बताओ मैं हिसाब कर देता हूँ। मोची ने फ़ेराख़दिली से कहा।
ख़ुदा तुम्हारा भला करे। शहर के मशरिक़ी गोशे में जो खण्डर है। वहाँ मैंने शायद सौ सिक्के दबा रखे हैं। कब्रिस्तान में तक़रीबन ढ़ाई सौ सिक्के होगें और एक मकान के सहन में तो पूरे पाँच सौ हैं। हाँ याद आया नहर के किनारे भी पचास सिक्के दफ़्न हैं। तो यह सब मिलाकर कुल कितने हुए। बोहलोल पूछा।
अगर यह सिक्के सोने के है तो इनकी मालियत दो हज़ार के लगभग ज़रूर है। मोची ने हिसाब लगाकर बताया।
बोहलोल कुछ देर सोचता रहा फिर सर उठाकर बोला। यार मैं-चाहता हूँ कि इन सब जगहों मे तमाम सिक्के निकाल लाऊँ और इस वीराने में छुपा दूँ। यहाँ आमद-व-रफ़्त कम है मेरा ख़याल है यह जगह ज़्यादा महफ़ूज़ है।
यह तो बहुत अच्छा ख़्याल है। तमाम रक़म एक जगह रखें ताकि जब ज़रूरत पड़े तो निकालने में आसानी हो। मोची ने दिल ही दिल में ख़ुश होते हुए मशविरा दिया।
बोहलोल अपनी छड़ी के सहारे उठा। अच्छा तो भाई मैं चलता हूँ। आज ही यह काम कर लूँ तो अच्छा है। सारे सिक्के निकाल कर ले आऊँ और यहां गाड़ दूँ। मेरे लिये दुआ करना।
हाँ-जाओ अल्लाह तुम्हारा निगेहबान हो। मोची ने उसे अलविदा कहा।
वह चला गया। तो मोची ने सोचा के उसने बोहलोल के जो सिक्के ज़मीन खोदकर चुराये थे।
उन्हे वापिस रख आये ताकि जब बोहलोल अपने बाक़ी सिक्के लेकर आयो तो उसे शक न हो। और वह अपनी बाक़ी दौलत भी यहाँ गाड़ दे। उसके बाद वह मौक़ा देखकर सारी रक़म निकाल लेगा।
वह जल्दी से गया और उसी जगह बोहलोल की रक़म दबाकर वापिस आ गया।
बोहलोल कहीं शाम को वापिस आया। उसने मिट्टी हटाकर अपनी सारी रक़म निकाल ली और वह वीराना छोड़ कर चला गया। मोची बेचारा उसका इन्तेज़ार ही करता रह गया।
वह अपनी रक़म निकाल कर उस वीराने से निकला और कोई दूसरा ठीकाना तलाश करने लगा।
इत्तेफ़ाकन उसे एक शिकस्ता मकान नज़र आया जो ख़ाली पड़ा था। तमाम शहर जानता था के वह वीरानों से मानूस है। और ऐसी ही जगहों पर रहता है। इसलिये उमूमन कोई उसे परेशान नहीं करता था। उसकी बे-सर-व सामानी ही उसका असासा था उसने उस शिकस्ता मकान का एक गोशा साफ़ किया और वहाँ डेरा जमा लिया।
मकान का सजदा
अभी उसे वहाँ बसेरा किये ज़्यादा देर नहीं हुई थी के टूटे दरवाज़े से एक शख़्स अन्दर दाख़िल हुआ उसने सलाम किया और बोला। वाह-वाह। बहुत ख़ूब। यह देखकर मुझे बहुत खुशी हुई है के बोहलोल जैसा नामवर शख़्स मेरा नया किरायेदार है।
बोहलोल सीधा हो बैठा। मुझे भी इस आलीशान मकान के मालिक से मिलकर बे-हद ख़ुशी हुई है।
मुझे उम्मीद है कि आप इस माह का किराया अदा कर देंगें। मालिक मकान ने कहा।
बोहलोल ने मकान की लरज़ती हुई छत और शिकस्ता दीवारों की जानिब इशारा किया। जनाब ने अपने इस शानदार महल की हालत का मुलाहिज़ा फ़रमाया है कि ज़रा सी हवा चले तो इसकी छत और दीवारे बोलने लगती है।
बेशक-बेशक आप दुरूस्त फ़रमाते हैं। आप जैसा बुज़ुर्ग यह भी जानता होगा कि तमाम मौजूदाते-आलम ख़ुदा की हम्द व सना करते हैं। यह जो आवाज़ आप सुनते हैं यह इस मकान की तसबीह करने की सदा है। वह बोला।
बोहलोल ने अपना असा सँभाला और फ़ौरन ही उठ ख़ड़ा हुआ और बोला। हज़रत आप जैसे दानिशमन्द इन्सान को यह तो मालूम होगा कि मौजूदात हम्द व सना और तसबीह व तहलील के बाद सजदा भी करते है और मैं आपके इस मकान के सजदा करने से पहले ही यहाँ से रूख़सत हो जाना चाहता हूँ। उसने गुदड़ी सँभाली और मकान से बाहर निकल आया।
मुसाफिर आलिम
हारून ने अपनी सी कोशीश की कि किसी तरह बोहलोल पर गिरफ़्त की जा सके लेकिन उसकी हाज़िर दिमाग़ी , उसकी पुर-हिकमत गुफ़्तुगु और आवाम के साथ उसकी क़ुर्बत ने उसे इसका मौक़ा नहीं दिया। वह अपने जासूसो को उसके पीछे लगाये रखता ताकि उसकी सरगर्मियों से बा-ख़बर रहे। किसी वक़्त सख़्ती से उसकी बाज़ पुर्स करता। लेकिन अक्सर मुश्किल मौक़ो पर बोहलोल ही काम आता।
एक बार एक सय्याह बग़दाद में आया। उसने घाट-घाट का पानी पिया था। वह मुल्कों-मुल्कों घूमा था जब वह हारून के दरबार में हाज़िर हुआ तो उसने ख़लीफ़ा के वज़ीरों और दानिशवरों से कुछ सवालात किये लेकिन कोई भी उसका जवाब न दे सका।
हारून अपने मुक़र्रबीन की नालाएक़ी पर बहुत शर्मिन्दा हुआ। सय्याह रूख़्सत हुआ तो वह अपने वज़ीरो और मुशीरों पर बरस पड़ा। तुम सब लोग मेरे लिये बायसे नंग-व-आर हो। आज इस सय्याह ने तुम्हे कैसा आजिज़ किया। यूँ मालूम होता था जैसे तुम इसके मुक़ाबले में तिफ़्ले मकतब हो।
दरबारियों के सर शर्म से झुक गये। उनके पास अपनी सफ़ाई में कहने के लिये कुछ भी नहीं था इताबेशाही और जोश में आया। कल इस सय्याह को दरबार में तलब किया जायेगा अगर तुम लोग उसके सवालों का जवाब न दे सकें तो तुम्हारी सब जायदाद और माल व दौलत उसके हवाले कर दिया जायेगा।
हारून ने दरबार बर्ख़ास्त कर दिया। दरबारियों में खलबली मच गयी उनकी परेशानी का कोई ठीकाना नहीं था। वे सब एक जगह जमा होकर सोचने लगे के बागशाह के इताब से क्योंकर बचा जा सकता है। आख़िर एक शख़्स को अचानक याद आया और ख़ुशी से बोला।
दोस्तों। इस मुश्किल को हल करने के लिये हमारे पास बोहलोल जो मौजूद है। मुझे यक़ीन है के वह सय्याह को ला-जवाब कर देगा।
और उसके सब सवालों के जवाबात ठीक-ठीक देगा।
बाक़ी सब लोगों की भी जान में जान आयी और वे सब मिलकर बोहलोल के पास पहुँचे। उसे तमाम माजरा सुनाया। तो उसने उन्हे तसल्ली दी के वह अगले दिन दरबार में पहुँचकर सय्याह के सवालों के जवाबात ज़रूर देगा।
अगले रोज़ दरबार आरास्ता हुआ। वज़ीर , मीर , मुशीर सोने की कुर्सियों पर बैठे। हारून अपने ज़र-निगार तख़्त पर मुतामक्किन हुआ।
सय्याह को भी एक कुर्सी पेश की गई। हारून ने अहलेदरबार पर निगाह डाली और बोला तुममे से कौन इस मोअज़्ज़िज़ सय्याह के सवालों का जवाब देगा।
अहलेदरबार ने आँखों ही आँखों में एक दूसरे की तरफ़ देखा के बोहलोल का नाम किस तरह ले। कहीं उसका नाम हारून को ना-गवार न गुज़रे कि उसी वक़्त बोहलोल की आवाज़ गूँजी।
यह दीवाना हाज़िर है। अहले दरबार को ज़हमत करने की ज़रूरत नहीं। वह अपनी लाठी पटख़्ता। दुदड़ी शाने पे डाले दाख़िले दरबार हुआ और सय्याह के क़हीब जा बैठा।
हारून कुछ हिचकिचाया। लेकिन पहलू में बैठे वज़ीर ने उसके कान में कुछ कह दिया। जिससे उसके चेहरे पर इत्मीनान की झलक नज़र आयी। सय्याह ने बोहलोल की हैबते कज़ाई की तरफ़ देखा और क़द्रे ताज्जुब से बोला। क्या मैं आपसे सवालात करूँ।
ब-सर-व-चश्म। बोहलोल ने मुस्तैदी से जवाब दिया। वह सय्याह उठा और अपनी छड़ी से ज़मीन पर एक दायरा ख़ींच दिया।
बोहलोल ने फ़ौरन उठ कर अपने असे से उस दायरे के दरमियान में एक लकीर खींच कर उसे दो हिस्सों में बाँट दिया।
सय्याह के चेहरे पर मुस्कुराहट आयी और उसने एक और दायरा खींच दिया। बोहलोल ने इस मर्तबा दायरे को चार हिस्सों में बाँटा और एक हिस्से पर छड़ी रखकर खटखटाई। सय्याह ने क़द्रे हैरत से उसकी जानिब देखा और ज़मीन पर अपना हाथ उल्टी तरफ रखकर उंगलियाँ आसमान की तरफ़ उठा दी। बोहलोल ने उठकर अपना हाथ ज़मीन पर इस तरह रखा के उसके हाथ की पुश्त ऊपर थी।
सय्याह अपनी नशिस्त पर आ बैठा और तौसीफ़ी लहजे में बोलाः मरहबा। आफ़रीन
आली-जहा मैं आपको मुबारकबाद देता हूँ के आपके यहाँ ऐसा दानिशमन्द-आलिम मौजूद है जिसपर फ़ख़्र किया जा सकता है ऐसे शख़्स की क़द्र की जानी चाहिये।
क्या बोहलोल ने तुम्हारे सब सवालों का जवाबात ठीक-ठीक दिये है।
हारून ने पूछा।
यक़ीनन। उसने किसी बहुत अज़ीम दर्सगाह से तालीम हासिल की है जो उसके पास इतना इल्म है के यह मेरे इशारे फ़ौरन समझ गया है। सय्याह बोला।
बोहलोल मुस्कुराया। उस अज़ीम दर्सगाह का नाम मत पूछना क्योंकि उसे सभी जानते हैं।
बोहलोल का इशारा सब समझ रहे थे।
लेकिन सय्याह कुछ नहीं समझा और चाहता था कि कोई सवाल करें कि हारून ने फ़ौरन पूछ लिया।
अगर तुम इन इशारों को खोलकर बयान करो तो अहलेदरबार भी महज़ूज़ हो सकेंगें और सीख भी लेंगें।
सय्याह बोला। आपने देखा के मैंने ज़मीन पर दायरा खींचा था। मेरा मक़सद ज़मीन का कुरा दिखाना था। आपका आलिम फ़ौरन समझ गया और उसने दायरे के दो बराबर हिस्से करके मुझ पर ज़ाहिर कर दिया कि वह ज़मीन के गोल होने पर यक़ीन रखता है और उसके असरार व राज़ो से भी वाक़िफ़ है। उसने इस लकीर से खत्ते-इस्तेवा को दिखाया जिससे ज़मीन शुमाली और जुनूबी कुरे में बँट गई।
फिर उसने देखा के मैंने एक और दायरा खींचा। आपके आलिम ने उसके चार हिस्से बनाये। और उसने चार हिस्से कर के मुझे समझा दिया के ज़मीन में तीन हिस्से पानी और एक हिस्सा ख़ुश्की है। और जब मैंने हाथ की ऊँगलियों से ज़मीन पर नबातात की तरफ़ इशारा किया तो उसने बारिश और सूरज की निशानदेही की जो नबातात की बालीदगी और नशो नुमा का ज़रीया हैं। मैं एक बार फ़िर कहता हूँ के आपको ऐसे दानिशमन्द पर फख़्र करना चाहिये।
मशहूर फ़क़ीह
हारून को अन्दाज़ा हो गया था के बोहलोल एक बे-ज़रर और मुफ़ीद इन्सान है। उसकी शेग़ुफ़्ता-बातों की हिकमत तफ़न्नुने तबअ का ज़रिया भी बनती थी। वह बग़दाद शहर का एक पंसदीदा और हरदिल अज़ीज़ किरदार था। जब भी हारून उसके साथ सख़्ती करना चाहता। उसकी शोख़ी में छुपी हुई दानिशमन्दी उसे साफ़ बचा ले जाती। बोहलोल की तमाम ज़िन्दगी इसी आँख-मिचोली में गुज़री। हारून कोशीश करता रहा के उसे किसी तरह फाँस ले या उसका क़िस्सा तमाम कर दे।
मगर जिसे अल्लाह रखे उसे कौन चखे। बोहलोल अपनी दीवानगी का लिबादा औढ़े उसके और उसके वज़ीरो के सामने खड़ा उन्हें आईना दिखाता रहा। वह अपने पागलपन की आढ़ में न सिर्फ़ अपनी जान बचाता रहा। बल्कि उन्हें इल्म-व-हिकमत की तालीम भी देता रहा और अपने जुनून का सहारा लेकर अवाम की मुशकिलें हल करता रहा।
एक मर्तबा ख़ुरासान का एक मशहूर फ़क़ीह बग़दाद आया। हारून को भी उससे मुलाक़ात का इश्तियाक़ हुआ। उसने उसे दरबार में बुलाया। गर्म-जोशी से उसका ख़ैर मक़दम किया और बड़ी क़द्र व-मंज़िलत के साथ अपने पास बैठाया।
फ़क़ीह इस इज़्ज़त अफ़ज़ाई पर फ़ूले नहीं समा रहा था और हारून पर अपने इल्म की धाक बैठाने की कोशीश कर रहा था के अचानक बोहलोल कहीं से फिरता-फिराता दरबार में आ निकला।
उसने सलाम किया। हारून ने उसे बैठने के लिये कहा। फ़क़ीह ने उसका मामूली लिबास बोसीदा गुदड़ी और धूल में अटी हुई जूतीयाँ देखी और क़द्रे हैरत से बोला। आप बहुत मेहरबान और फेराख़दिल है के मामूली लोगो को भी अपने दरबार में जगह देते हैं।
बोहलोल अपनी जगह से उठा और अपना असा खटखटाता उसके क़रीब पहुँचा और बोला।
क़िबला। ग़ुस्ताख़ी माफ़ आप अपने नाक़िस इल्म पर क्यों इतना मग़रूर हैं। आप मेरी ज़ाहिरी हालत का ख़्याल न कीजिये और मेरे साथ इल्मी मुबाहिसा करने के लिये तैयार हो जाइये ताकि आपको पता चल जाये के आप तो कुछ भी नहीं जानते।
फ़क़ीह ने एक निगाहे ग़लत अन्दाज़ उस पर डाली। मैंने सुना है के तू पागल है और मैं पागलों से मुबाहिसा नहीं किया करता।
मैंने कब कहा के मैं पागल नहीं हूँ। मैं तो अपने पागलपन का ख़ुद इक़रार करता हूँ
मगर आप हैं के आपको अपनी कम इल्मी का कुछ पता ही नहीं। बोहलोल ने मज़े से कहा।
हारून ने क़हर-आलूद निगाहों से बोहलोल की तरफ़ देखा।
बोहलोल ख़ामोश रहो। तुम्हे मालूम नहीं के यह ख़ुरासान के नामूर फ़क़ीह हैं।
इस लिये तो चाहता हूँ के यह मुझसे इल्मी मुबाहिसा कर लें बोहलोल ने इत्मीनान से कहा।
हारून भी इल्मी मुबाहिसों और मुनाज़िरों का शायक़ था। वह उस फ़क़ीह से बोला। क्या मुज़ाएक़ा है। तुम्हें बोहलोल की दावत क़ुबूल कर लेनी क़ुबून कर लेनी चाहिये।
तो फिर मेरी एक शर्त होगी। फ़क़ीह बोला। इजाज़त है। तुम जैसी चाहे शरायत तज कर लो हारून ने इजाज़त दी।
फ़क़ीह बोला। मेरी शर्त यह है कि मैं बोहलोल से एक मोअम्मा पूछूँगा। अगर इसने दुरूस्त जवाब दे दिया तो इसे एक हज़ार अशर्फ़ियाँ दूँगा और अगर यह नाकाम रहा तो मुझे एक हज़ार अशर्फ़िया देने का पाबंद होगा।
बोहलोल मुस्कुराया। हम फ़क़ीरो के पास माले दुनियाँ कहाँ हाँ मैं ख़ुद को आपके सुपुर्द कर सकता हूँ के आप मुझसे एक ग़ुलाम की तरह काम लें और एक हज़ार अशर्फ़ियाँ पूरी कर लें और अगर मैं एक हज़ार अशर्फ़ी जीत गया। तो वह तो नादारों और मोहताजों का हिस्सा है ही। के अमीरूल मोमेनीन अली-ए-मुर्तज़ा (अ.स.) फ़रमाते हैं के जहाँ भी दौलत ज़रूरत से ज़्यादा है। वहाँ यक़ीनन किसी हक़दार का हक़ ज़ाया हो रहा है
मुझे मन्ज़ूर है। और क्या तुम तैयार हो के मेरा मोअम्मा हल करो। फ़क़ीह ने कहा।
ब-सर-व-चश्म। बोहलोल ने जवाब दिया।
आली-जहा। आपकी भी इजाज़त है। फ़क़ीह ने हारून से पूछा।
इजाज़त है हारून ने शाहाना तमकेनत से कहा।
फ़क़ीह ने अपना मोअम्मा पेश किया। एक घर में एक औरत अपने शरई शौहर के साथ बैठी है। उसी घर में एक शख़्स नमाज़ पढ़ रहा है और दूसरा रोज़े से है। अचानक दरवाज़े पर दस्तक होती है और एक ऐसा शख़्स अन्दर दाख़िल हुआ जिसके आ जाने से शौहर और बीवी एक दूसरे पर हराम हो गये। नमाज़ पढ़ने वाले की नमाज़ बातिल हो गयी। और रोज़ेदार का रोज़ा भी बातिल हो गया। क्या तुम बता सकते हो के बाहर से आने वाला शख़्स कौन है।
दरबार में सन्नाटा सा छा गया। लोग एक दूसरे का मुँह तकने लगे। बोहलोल ने बर्जस्ता कहा। । घर में दाख़िल होने वाला शख़्स उस औरत का पहला शौहर है। जो सफ़र पर गया हुआ था। जिसके बारे में यह ख़बर मिली थी के दौराने सफ़र इन्तेक़ाल कर गया है। उस औरत ने हाकिमे शरअ की इजाज़त से उसी मर्द से अक़्द कर लिया था जो उसके बराबर बैठा हुआ था। उन्होने दो अश्ख़ास को उजरत दी थी के वह मरहूम शौहर की क़ज़ा नमाज़े अदा करें और रोज़े रखें। इसी अस्ना में पहला शौहर सफ़र से वापिस आ गया। क्योंकि उसकी मौत की ख़बर ग़लत थी। चुनाँचें उसके आते ही दूसरा शौहर उस औरत पर हराम हो गया। उन दोनो अश्ख़ास के नमाज़ और रोज़े बातिल हो गये। जो शौहर को मुर्दा समझकर पढ़ी और पढ़ी और रखे जा रहे थे।
मरहबा। मरहबा। बहुत ख़ूब बोहलोल बाज़ औक़ात तुम्हारी दीवानगी फ़र्ज़ानो को भी मात दे देती है। हारून ने सताएश (तारीफ़) की।
बाक़ी वज़ीर और अमीर भी दादे तहसीन देने लगे। शोर कुछ कम हुआ। तो बोहलोल कहने लगा।
( आप इस किताब को अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क पर पढ़ रहे है।)
क्या आली-जहा की इजाज़त है के मैं भी हज़रत फ़क़ीह से सवाल करूँ
इजाज़त है हारून ने कहा।
क्या आप तैयार है बोहलोल ने पूछा।
ज़रूर पूछो। फ़क़ीह ने निख़्वत से कहा। फ़र्ज़ करें के हमारे पास एक मटका शीरा और एक मटका सिरका मौजूद है। हम उससे सेकन-जबीन तैयार करने के लिये एक प्याला सिरका और एक प्याला शीरा मट्को से निकालते हैं और दोनों को किसी बर्तन में मिला देते है। उस वक़्त पता चलता है के उसमें तो एक चूहा मरा पड़ा है। क्या आप बता सकते हैं के वह मरा हुआ चूहा सिरके के मट्के में था या शीरे के मट्के में।
हारून महज़ूज़ हुआ। अहलेदरबार भी मुस्कुराये सब की निगाहें फ़क़ीह पर लगी हुई थीं के वह इस मोअम्मे को किस तरह हल करता है। वह गहरी सोच में मुस्तग़रक हो गया और बहुत देर तक एक लफ़्ज़ भी न बोल सका।
हारून इतना इन्तेज़ार न कर सका और बोला। बोहलोल ने तुम्हारा मोअम्मा हल करने में एक लम्हा भी नहीं लगाया। तुम्हे भी उसके सवाल का जवाब इसी तरह देना चाहिये।
फ़क़ीह नादिम सा हो गया। उसकी निगाहें झुक गयी। उसे अपनी कम इल्मी का एअतेराफ़ करना पड़ा।
आली-जाह। मैं यह मोअम्मा नहीं कर सकता। उसकी पेशानी पसीने से भरी थी।
हारून ने बोहलोल की तरफ़ देखा। बोहलोल बेहतर यही है के तुम ख़ुद इस मोअम्मे को हल कर दो।
बोहलोल मुस्कुराया। क्या हज़रत फ़क़ीह अब भी अपनी ना-समझी के क़ायल हुए है या नहीं।
फ़क़ीह बोला। बोहलोल तुमने मुझे एहसास दिला दिया है के इल्म की कोई हद नहीं। किसी की ज़ाहिरी-हालत को देखकर उसे कमतर ख़याल नहीं करना चाहिये।
तो सुनिये जनाब के हमें चाहिये के उस चूहे को सेकन-जबीन से निकाल कर अच्छी तरह धो लें।
फिर उसका पेट चाक करें। अगर उसके पेट में सिरका हुआ। तो समझे के वह सिरके के मटके में था। अगर शीरा हुआ। तो फिर उसने शीरे में ड़ुबकी लगाकर जान दी है। लिहाज़ा जो कुछ भी उसके पेट में हो उस शय के मटके को ज़ाया कर देना चाहिये।
अहलेदरबार इश ,इश कर उठे। हीरून बहुत महज़ूज़ हुआ। उसने बोहलोल को आफ़रीन कही।
फ़क़ीह ने सर झुकाया और एक हज़ार अशर्फ़ियाँ उसके सामने ढ़ेर कर दीं। बोहलोल ने तमाम अशर्फ़ियाँ समेट कर अपनी झोली में ड़ाल लीं। और महल से निकलते ही उसे ज़रूरतमन्दों में बाँट ने लगा जब वह अपने बसेरे पर पहुँचा तो उसकी झोली ख़ाली थी।
हारून के सवाल
कुछ दिन गुज़रे थे कि हारून ने बोहलोल को तलब किया। वह उसके महल में पहुँचा। तो देखा के वह शराब के नशे में मख़्मूर दजला के किनारे अपने शानदार महल के झरोके में बैठा शोर मचाती लहरों का तमाशा देखने में महो है। बोहलोल। उस रोज़ तो तूने बेचारे फ़क़ीह का नातेक़ा बन्द कर दिया था। इत्तेफ़ाक़न तेरा दाव लग गया था और वह अहमक़ भी निरा गाउदी निकला मगर आज मैं तूझे आजीज़ करके रहूगा और इस झरोके में से तुझे दजला में फिकवा दूँगा और अगर तू इसी तरह दजला की मौजों में ग़ोते खायेगा जिस तरह तेरे मोअम्मे में चूहा शीरे और सिरके के मटके में डुबकियाँ लगाता रहा।
अगर मैंने मोअम्मा बूझ लिया तो बोहलोल ने कहा।
तो फिर एक हज़ार अशर्फ़ियाँ इनाम में मिलेंगी। उसने बड़ी शान से कहा।
जनाबे-आली। मुझे अशर्फ़ियों की कतअन कोइ ज़रूरत नहीं। हाँ मेरी एक और शर्त है अगर वह मन्ज़ूर हो। तो कोई बात भी है बोहलोल बोला। बयान करो हारून ने हुक्म दिया।
अगर मैंने मोअम्मे का सही जवाब दिया। तो उसके बदले में सौ क़ैदियों को रिहा करना होगा। मगर वह जिनके नाम मैं बताऊँगा। बोहलोल ने अपनी शर्त पेश की।
हारून हँसा। यह बात तो बाद की है। मगर मुझे मन्ज़ूर है। पहले तुम मोअम्मा तो बूझ लो। देखो। तुम्हे ग़ोते दिलाने के लिये दजला की मौजें कितनी बेक़रार है।
मौजों की बेक़रारी की ज़बान तो वही समझ सकते हैं। जो दरियाओं का रूख़ मोड़ देने की ताक़त रखते हैं। आप अपना मोअम्मा पूछें। बोहलोल ने कड़े लहजे में कहा।
हारून गोया हुआ। अगर किसी शख़्स के पास एक बकरी , एक भेड़िया और घास का गठ्ढ़ा है और वह चाहता है के दरिया पार करे। तो उसे क्या तरीक़ा इख़्तेयार करना चाहिए के न बकरी घास को खाये और न भेड़िया बकरी को।
बोहलोल ने एक लम्हा भी नहीं सोचा और बर्जास्ता कहा। उस शख़्स को चाहिये के भेड़िये और घास को किनारे पर छोड़े और बकरी को दरीया के पार ले जाये। फिर वह वापिस आकर घास को ले जाये और घास को तो उस किनारे पर छोड़ दे। लोकिन बकरी को वापिस ले जाये। अब बकरी को तो उस किनारे पर छोड़ दे। लेकिन भेड़िये को पार ले जाये। वापिस आकर वह बकरी को ले जा सकता है। इस तरह न बकरी घास खायेगी। न भेड़िया बकरी को खा सकेगा।
हारून हैरान हुआ। बहुत ख़ूब। बोहलोल आज तो सितारे तुम्हारे हक़ में थे।
सितारे नाहक़ कुछ भी नहीं करते क्योंकि वह तो हक़ को पहचानते हैं। अब आली-जहा भी मेरे हक़ को पहचानें और अपना वायदा पूरा करें। बोहलोल ने जुर्अत से कहा।
दुरूस्त-मुझे अपना वादा याद है तुम मंशी को उन क़ैदियों के नाम लिखवा दो। वह दरोग़-ए-ज़िन्दान को दे देगा , ताकि उन क़ैदियों को रिहा कर दे। हारून ने फ़ेराख़दिली से कहा।
बोहलोल ने उन अश्ख़ास के नाम लिखवा दिये और चला आया। हारून का नशा उतरा। तो उसके मुक़र्रब ने उसे वह फ़ेहरिस्त दिखाई। जो बोहलोल ने लिखवाई थी और बोला।
हुज़ूर ने बोहलोल के साथ कुछ ज़्यादा ही फ़य्याज़ी का बर्ताव किया है अगर आप इस फ़ेहरिस्त को एक मर्तबा मुलाहिज़ा फ़रमा लें तो बहुत मुनासिब होगा।
हारून ने फ़ेहरिस्त देखी। तो होश में आ गया। ओ बोहलोल तू कैसा ग़ज़ब का शरीर और फ़सादी है। ये सब तो उन लोगों के नाम हैं। जिन्हें बग़ावत के जुर्म में क़ैद किया गया है। ये लोग मूसा बिन जाफ़र (अ.स.) के दोस्तदार है। और ख़िलाफ़त हाश्मियों का हक़ समझतें हैं।
आली जहा मैं भी इस फ़ेहरिस्त को देख कर खटक गया था। इसलिये मैंने यही मुनासिब समझा के हुज़ूर इस पर एक निगाह डाल लें। ये सब के सब तो बाग़ी है। मुक़र्रब ने कहा।
मगर हम वादा कर चुके हैं। ऐसा न हो के वह दीवाना हमें बदनाम करे। हारून ने फ़िक्र मन्दी से कहा।
इसमें परेशान होने की ज़रूरत नहीं हुज़ूर दस आदमियों की रिहाई का हुक्म सादिर फ़रमायें। जिनका जुर्म कम संगीन है। सिफ़र हम साथ ख़ुद बढ़ा लेंगें। मुक़र्रब ने होशियारी से कहा।
हारून मुस्कुराया। इस दीवाने के साथ यही होना चाहिये ।
एक रोज़ बोहलोल अपने फ़क़्र की शान में मस्त क़दम उठाता। हारून के महल में पहुँचा और बेबाकी से आगे बढ़ता। हारून के बराबर जा बैठा। हारून के निख़्वत और ग़ुरूर को उसकी यह अदा पसन्द नहीं आयी उसने सोचा कि किसी तरह उसको ज़िच करे। इसलिये उससे मुख़ातब होकर बोला।
क्यों बोहलोल। मेरे मोअम्मे का जवाब दोगे।
ज़रूर दूँगा। बशर्ते के आप अपने क़ौल पर पूरे उतरें और पहले की तरह वायदा ख़िलाफ़ी न करें। बोहलोल ने वाज़ेह किया।
और तुम भी सुन रखो के अगर तुमने मेरे मोअम्मे को फ़ौरन हल कर लिया तो तुम्हारा इनाम एक हज़ार अशर्फ़ी होगा। और अगर तुम जवाब न दे सके तो तुम्हारी दाढ़ी की ख़ैर नहीं उसे मुंडवाने और गधे की सवारी के लिये तैयार हो जाओ।
मुझे अशर्फ़ियाँ क्या करना है। मेरी शर्त तो कुछ और है। बोहलोल ने बोला।
शर्त बयान की जाये। हारून ने कहा।
मेरी शर्त यह है के अगर मैंने मोअम्मे को हल कर लिया। तो आली-जहा मक्खियों को हुक्म दे दें के वे मुझे न सताया करें। मक्खियाँ मुझे बहुत तंग करती है। बोहलोल ने बड़ी सनंजीदगी से दरख़ास्त की अहलेदरबार के होंठों पर मुस्कुराहट आयी। लेकिन वह हारून के ख़ौफ़ से ज़ब्त कर गये।
हारून बग़लें झाँकनें लगा और उसे कहना पड़ा। किसी-किसी वक़्त तो तुम्हारी अक़्ल बिल्कुल ही ख़ब्त हो जाती है। मक्खियाँ तो मेरी मुतीअ नहीं हैं। जो उनपर हुक्म चलाऊँ।
अफ़सोस के हमारा बादशाह मक्खियों के मुक़ाबले में भी आजीज़ है। तो उसके इक्तेदार का क्या फ़ायदा बोहलोल ने मेज़ाहिया लहजे में कहा।
दरबारियों की आँखों से हैरत और हँसी झाँकने लगी। वे नज़रो ही नज़रो में बोहलोल की इस जुर्अत की दाद देने लगे। हारून भी शर्मिन्दा-सा हो गया और उसके जवाब में कुछ भी नहीं कह सका। तो बोहलोल ने उसकी ख़िफ़्फ़त मिटाने को कहा। अच्छा। अब मैं कोई शर्त नहीं रखता और तुम्हारे मोअम्मे का जवाब देता हूँ। हारून पूछा। वह कौन-सा दरख़्त है। जिसकी उम्र एक साल है। उसमें बारह शाख़ें हैं। हर शाख़ पर तीस-तीस पत्ते लगे हुए है और उन पत्तों का एक रूख़ रौशन है और दूसरा तारीक
बोहलोल ने हस्बे-आदत फ़ौरन जवाब दिया। यह दरख़्त महीना दिन और रात का है। इसलिये के साल में बारह महीने होते हैं। हर महीने में तीस दिन होते हैं जो आधे दिन हैं और आधे रात हैं ।
हारून को बे साख़्ता दाद देनी पड़ी। अहलेदरबार भी उसकी तारीफ़ करने लगे ।
बोहलोल सरे राह खड़ा था। देखा कि हारून की सवारी आ रही है। उसने मुँह के गिर्द दोनो हाथ रखे और ज़ोर से पुकारा। हारून। हारून। हारून हारून।।। इस आवाज़ पर चौंका। उसे ग़ुस्सा भी आया उसने अपने ख़ुद्दाम से पूछा। यह कौन ग़ुस्ताख़ है। जो मुझे इस तरह पुकार रहा है।
हुज़ूर। यह दीवाना बोहलोल है। मालूम होता है के आज इसका दिमाग़ बिल्कुल ही काम नहीं कर रहा है किसी ग़ुलाम ने बोहलोल को बादशाह के इताब से बचाने की कोशिश की।
हारून ने सवारी ठहराने को कहा और बोला। बुलाओ उसको। बोहलोल क़रीब आया तो ग़ुस्से से बोला-तू जानता है के मैं कौन हूँ।
बिल्कुल जानता हूँ। बोहलोल ने सर हिलाया। आप ऐसे इन्सान है कि अगर मशरिक़ में किसी कमज़ोर पर ज़ुल्म हुआ। तो बाज़ पुर्स आप से होगी।
हारून लरज़ गया। उसकी आँखों के गोशे नम हो गये। उसका ग़ुस्सा फ़रो हो गया और वह नर्मी से बोला। बोहलोल तूने ऐसी बात कही है जो मेरे दिल पर जाकर लगी है। तेरी कोई हाजत हो तो बयान करो।
मेरी हाजत यह है के आप मेरे गुनाह माफ़ करके मुझे जन्नत में दाखिल कर दें। बोहलोल ने कमाले सन्जीदगी से कहा।
गिर्द व पेश खड़े लोग मुस्कुराने लगे। हारून ने ऐतेराफ़ किया। बोहलोल। तुमने ऐसी बात कही है जो मेरे बस में नहीं। हाँ मैं तुम्हारे क़र्ज़े चुका सकता हूँ।
नहीं। आप यह भी नहीं कर सकते। बोहलोल ने ज़ोर देकर कहा।
क्यों। हारून ने तुर्शी से सवाल किया एक क़र्ज़ा दूसरे क़र्ज़े से अदा नहीं हो सकता आप तो ख़ुद आवाम के क़र्ज़दार है। आप उनका क़र्ज़ वापिस करें। यह मुनासिब नहीं के उनका माल मुझे दे डालें।
बोहलोल के अन्दाज़ में सच था।
हारून मुज़तरिब हुआ और बात बदलने को बोला। तो फिर ठीक है। मैं हुक्म देता हूँ के तुम्हें कुछ जायदाद दे दी जाय ताकि तुम्हारी गुज़र बसर सुहूलत से हो
बोहलोल हँसा। सब का राज़िक़ ख़ुदा है। हम सब बन्दे उसी से वज़ीफ़ा पाते हैं। ऐसा तो मुमकिन नहीं के वह बादशाह को तो फ़ेराख़ी से रिज़्क़ अता करे और इस दीवाने को भूल जाये।
हारून ला जवाब सा हो गया।
अमीन-मामून
हारून बोहलोल से बोला। मैं अमीन व मामून के मकतब जा रहा हूँ। ज़रा उनके उस्ताद से उनकी तालीम की बाबत मालूम करूँगा। आओ तुम भी मेरे साथ चलो।
बोहलोल राज़ी हो गया और सवारी मकतब पहुँची। उस्ताद दौड़ा हुआ आया और हारून को सलाम किया। खुशनसीबी है कि ख़लीफ़ा इस नाचीज़ के मकतब में तशरीफ़ लाये हैं।
हम अमीन और मामून की तालीम के बारे में मालूम करने आये हैं के दोनो कैसे तालिबे इल्म हैं। हारून ने कहा।
जान की अमान पाऊँ तो कुछ अर्ज़ करूँ। उस्ताद बोला।
हाँ तुम्हें अमान है। हमें दोनो की तालीमी कैफ़ियत सही-सही बताओ। हारून बोला।
आली-जहा। आपका बेटा अमीन। औरतों की सरदार , मल्का ज़ुबैदा जैसी क़ाबिल और ज़हीन ख़ातून का बेटा है। लेकिन कुन्द ज़ेहन है।
मगर इस के बर-अक्स आपका बेटा मामून बहुत ज़ेहीन दानिशमन्द और बा-वेक़ार है।
यह तुमने अजीब बात कही है। मैं इसे तसलीम नहीं कर सकता।
हारून ने हैरत से कहा।
मैं इसका सुबूत मोहय्या कर सकता हूँ। उस्ताद ने जवाब दिया।
यक़ीनन। तुम्हे शहज़ादो के बारे में इतनी बड़ी बात बिला सुबूत नहीं कहनी चाहिये।
हारून ने ना-गवारी से कहा।
मैंने यह बात तजुर्बे के बाद कही है। उस्ताद बोला।
इस वक़्त अमीन और मामून थोड़ी तफ़रीह लेने बाहर गये है। मैं यह काग़ज़ मामून के (बैठने की जगह) फ़र्श के नीचे रखता हूँ और अमीन के बैठने की जगह यह ईंट रख रहा हूँ।
जब वे आ जायें। तो आप मुलाहेज़ा फ़रमाइये के मेरी राय किस हद तक दुरूस्त है।
थोड़ी ही देर में अमीन और मामून वापिस आ गये। हारून को देखकर दोनों हैरान हुए और उसे आदाब किया। हारून ने उन्हें बैठने-की इजाज़त दी , हारून दोनों का ब-ग़ौर मुशाहेदा कर रहा था।
मामून बैठते ही कुछ मुज़तरिब सा हुआ उसने कुछ परेशान होकर छत की तरफ़ देखा।
फिर दायें बायें देखा-और कई बार पहलू बदला। और बेचैन-सा नज़र आने लगा। उस्ताद ने शफ़्फ्क़त से पूछा।
क्यों मामून। ख़ैरियत तो है। मैं तुम्हे कुछ परेशान सा देख रहा हूँ।
उस्तादे मोहतरम। मैं अपने बैठने की जगह पर कुछ तबदीली सी महसूस कर रहा हूँ। मामून ने कुछ सोचते हुए जवाब दिया।
कैसी तबदीली। उस्ताद ने पूछा।
ऐसा महसूस होता है उस्तादे मोहतरम। जौसे मेरे बैठने की जगह एक काग़ज़ भर ऊँची हो गई है। या छत कागज़ भर निची हो गई है। मामून बोला।
अमीन। क्या तुम्हें भी ऐसा ही महसूस होता है। जैसे तुम्हारा भाई कहे हैं। उस्ताद ने अमीन को मुख़ातब किया।
नही। ऐसी तो कोई बात नहीं। अमीन ने जवाब दिया।
उस्ताद ने माना-ख़ेज़ निगाहों से हारून की तरफ़ देखा और बोला। आली-जाह पसन्द फ़रमायें। तो दूसरे कमरे में तशरीफ़ रखे
हारून ने इजाज़त दी और उस्ताद के साथ दूसरे कमरे में चला आया। बोहलोल थी उनके हमराह था। उस्ताद ने मुतमईन लहजें में कहा।
अलहम्दोलिल्लाह। के मैंने आपके सामने अपनी राय का सुबूत भी पेश कर दिया।
हैरत है। हैरत है। अमीन की मां अरब की ज़ेहीन औरतों में से है। कोई उसका हमसर नहीं। लेकिन उसका बेटा। हारून ने जैसे अपने आप से कहा। समझ में नहीं आता के इसका क्या सबब है।
बोहलोल आगे बढ़ा। इसका सबब मुझे मालूम है। अगर आली जाह को नागवार न हो। तो बयान करूँ।
बयान करो। मैं सख़्त तरीन उल्झन में हूँ। हारून ने कहा।
बोहलोल बोला। औलाद की दानिशमन्दी और ज़ेहानत के असबाब दो हैं। अव्वल यह के औरत और मर्द के दरमियान रग़बत और फ़ितरी ख़्वाहिश हो। तो उनकी औलाद ज़ेहीन , होशियार और अक़्लमन्द होती है। दोम यह के मर्द और औरत मुख़्तलिफ़ ख़ून और नस्ल से ताल्लुक़ रखते हों। तो उनकी औलाद में अक़्ल व दानिश की फ़रावनगी होगी।
कोई दलील दो। हारून ने ग़ौर करते हुए कहा।
इसकी मिसाल दरख़्तों और जानवरो में नज़र आती है। मसलन अगर फल के दरख़्त में दूसरे फलदार दरख़्त का पेवंद लगाया जाये। तो निहायत लज़ीज़ और उमदा फल पैदा होते हैं। इसी तरह गधे और घोड़े के मिलाप से ख़च्चर पैदा होता हैं जिसकी होशियारी , ताक़त और फुर्ती का जवाब नहीं। अब आली-जाह समझ सकते हैं के। अमीन में जो ज़ेहानत की कमी महसूस होती है
इसका सबब् उसकी वालिदा और आपकी रिश्तेदारी है। जबकि मामून की माँ मुख़्तलिफ़ नस्ल और क़बीले से ताल्लुक़ रखती है। ख़ून के लिहाज़ से आपमें और उसमें जो फ़र्ख़ है वही सबब् मामून की ज़ेहानत और दानिशमन्दी का भी है।
हारून उसकी बात पर ग़ौर करता रहा उस्ताद भी क़ायल नज़र आता था। लेकिन मुँह से कुछ नहीं कह रहा था। कि मबादा ख़लीफ़ा उसे ग़ुस्ताख़ी तसव्वुर करें। हारून ने बोहलोल की तरफ़ देखा और हस्बे आदत उसके कमाल को कमतर करने के लिये बोला। हो न तुम दीवाने। पागल बेचारा ऐसी बातों के अलावा कर भी क्या सकता है।
नूजुमी
एक रोज़ बोहलोल दरबार में आया। तो देखा इल्मे नुजूम पर गुफ़्तुगु हो रही है और एक शख़्स इल्मे नुजूम का माहिर होने का दावा कर रहा है। बोहलोल सलाम करके ख़ामोशी से उसके पास जा बैठा और उसकी बातें सुनने लगा। जब वह अपने बारे में सब कुछ कह चुका। तो बोहलोल ने कहा।
हज़रत। माशाल्लाह आपकी महारत के क्या कहने। लेकिन क्या आप बता सकते हैं के आपके पास कौन बैठा हुआ है।
नुजूमी बोहलोल से वाक़िफ़ नहीं था। इसलिये उसने ला इल्मी का इज़हार किया। नहीं मैं नहीं जानता।
बोहलोल मुस्कुराया। अगर अपने बराबर में बैठने वाले को नहीं जानते। तो फिर आसमान के सितारों के बारे में सब कुछ जानने का दावा किस तरह कर सकते हैं।
वह शख़्स ला जवाब सा हो गया और थोड़ी देर बाद उठकर चला गया।
हिन्दुस्तान
दरबार अभी मुनक़्क़िद था के हाजिब ने सदा दी के कोई सय्याह हाज़िरे ख़िदमत होना चाहता है। हारून ने इजाज़त दी।
वह आया और हारून को ताज़ीम दी।
हारून ने उससे मुख़्तलिफ़ मुल्को के बारे में सवालात किये जहाँ-जहाँ वह जा चुका था। वह गुफ़्तुगु के फ़न में माहिर था। उसने मुख़्तलिफ़ मुल्को की पैदावार जवाहरात और मसनूआत के बारे में तफ़सीली तौर पर बताया और हिन्दुस्तान का तज़किरा करते हुए बोला।
आली-जाह। हिन्दुस्तान एक अजीब जादूनगरी है। वहाँ इल्म और हिकमत का बड़ा शोहरा है। शायद मेरी बात पर आपको यक़ीन न आये के हिन्दुस्तान में एक ऐसी माजून बनायी जाती है। जिसके बा-क़ायदा इस्तेमाल से इन्सान में जवानी की क़ुव्वत अज़सरे नौ बहाल होती है। अगर साठ साल का बूढ़ा वह माजून इस्तेमाल करे। तो ख़ुद को बीस बरस का जवान पायेगा।
कमाल है। उस इलाक़े में तिब के ऐसे मोअजिज़े भी मिलते हैं। हारून ने ताज्जुब से कहा।
हुज़ूर अगर पसन्द फ़रमायें। तो मैं हिन्दुस्तान से वह माजून तैयार करवा कर ला सकता हूँ। सय्याह मोअद्दब लेहजे में बोला।
हारून के दिल में पहले ही इश्तेयाक़ पैदा हो चुका था। उसने सय्याह से पूछा।
वह माजून तैयार करने पर कितना ख़र्च उठेगा।
ज़िल्ले सुबहानी। इसमें बहुत सी क़ीमती जड़ी बूटीयाँ और जवाहरात के कुश्ते शामिल किये जाते हैं। इसकी तैयारी पर इख़राजात कुछ ज़्यादा ही उठते हैं। सय्याह ने बताया।
तुम्हारा क्या ख़्याल है के हम वे इख़राजात अदा नहीं कर सकेंगें हारून ने दुरूश्ती से कहा।
नाऊज़ो-बिल्लाह। आली-जाह यह हक़ीर तो यह ख़्याल भी दिल में नहीं ला सकता। मैंने तो इसलिये कहा है के कहीं अहलेदरबार में से कोई इसे झूठ या ग़लत न समझे। उसने घबराकर जवाब दिया।
अहलेदरबार में ऐसी हरकत करने की जुर्अत नहीं है अल्लाह ताला ने हर हाल में जान बचाने का हुक्म दिया है।
बोहलोल ने चुपके से कहा।
बताओ इस पर कितना ख़र्च उठेगा हारून ने इस्तेफ़सार किया।
आली जाह। इसके लिये पचास हज़ार दीनार दरकार होंगे। सय्याह ने बताया।
रक़म दे दी जाये। हारून ने खज़ांची को हुक्म दिया।
खज़ांची ने उसको रक़म दे दी और वह रवाना हो गया।
इस वाक़ेये को एक अर्सा हो गया। मगर वह लौट कर नहीं आया। हारून को भी अन्दाज़ा हो गया था के वह कोई धोकेबाज़ था। जो उसे फ़रेब देकर रक़म हथिया ले गया। एक रोज़ दरबार में फिर उस शख़्स का तज़किरा हुआ। हारून ने मुताअस्सिफ़ लहजे में कहा।
उस शख़्स ने कैसे हमारी आँखों में धूल झोंकी है। अगर वह कहीं हाथ लग जाये। तो उससे कई गुना ज़्यादा रक़म वुसूल की जायेगी और उस कमबख़्त का सर काट कर बग़दाद के दरवाज़े पर आवेज़ा किया जायेगा ताकि दूसरे लोग इबरत हासिल करें।
बोहलोल भी दरबार में मौजूद था। वह बेसाख़्ता हँस रहा दिया। हारून ने ख़श्मगीन नज़रों से बोहलोल की तरफ़ देखा। बोहलोल इस बेमौक़ा हँसी का सबब क्या है। क्या तुम इस ग़ुस्ताख़ी की वजह बयान कर सकते हो।
बोहलोल की हँसी न रूकी। हुज़ूर मुझे एक क़िस्सा याद आ गया है।
कौन सा क़िस्सा। हारून ने इस्तेफ़्सार किया।
बोहलोल ने हँसी रोककर कहा। इस धोके बाज़ सय्याह का क़िस्सा बिल्कुल ऐसा ही है। जैसा मुर्ग़ बुढ़िया और लोमड़ी का क़िस्सा है।
बयान करो हारून ने तहक्कुम से कहा। बोहलोल बोला। क़िस्सा कुछ यूँ है के एक जगंली बिल्ली ने एक बुढ़िया का पालतू मुर्ग़ झपट लिया। बुढ़िया उसके पीछे दुहाई देती दौड़ी। अरे-अरे। पकड़ो। इस चोट्टी बिल्ली को पकड़ो। ज़ालिम मेरा दो मन का मुर्ग़ लकर भागी जाती है और कोई मेरी मद्द करो। इस बिल्ली को पकड़ो। हाय मेरा नाज़ो का पाला। मुर्ग़। अरे यह पूरे दो मन का है।
इत्तेफ़ाक़न एक लोमड़ी क़रीब से गुज़र रही थी। वह बिल्ली से बोली। बहिन तुम क्यों परेशान होती हो। ज़रा मुर्ग़े को मुझे दो। मैं अभी तोलकर बता देती हूँ के यह दो मन का है या नहीं।
बिल्ली ने मुर्ग़ लोमड़ी को दे दिया। उसने मुर्ग़ दबोचा और यह कहकर ग़ायब हो गई के बहिन बिल्ली। बुढ़िया से कह देना के उसका मुर्ग़ तीन मन का है।
हारून अपनी हँसी नहीं रोक सका। अहलेदरबार भी मुस्कुराने लगे। हारून बोला
बोहलोल तुम्हारे इस क़िस्से ने हमारी अफ़्सुरद्गी को ज़ायल कर दिया है।
शिकारी
ख़लीफ़ा हारून रशीद अपनी मल्का ज़ुबैदा के हमराह शतरंज खेल रहा था। बोहलोल भी क़रीब बैठा था उसी वक़्त चोबदार ने सदा दी। एक शिकारी बारयाबी की इजाज़त चाहता है।
इजाज़त है। हारून ने इजाज़त दी।
शिकारी अन्दर आया और ज़मीन चूम कर बोला।
मैं ख़लीफ़ा के लिए एक बहुत उम्दा मछली लेकर आया हूँ।
हारून ने ज़ुबैदा से कहा। यह इनाम की आस में मेरे पास यह हदिया लाया है। इसे इनाम में चार हज़ार दरहम दे दिये जायें तो क्या मुनासिब रहेगा।
ज़ुबैदा बोली नहीं आली-जाह। शिकारी का यह मनसब नहीं के उसे इतना ज़्यादा इनाम दे दिया जाये। आप फौजियों और मोअज़्ज़ज़ शहरियों को भी इनाम व इकराम अता करते हैं। अगर आप उन्हे इससे कम देंगें तो वे शिकवा करेंगें के हम शिकारी के बराबर भी नहीं हैं। अगर ज़्यादा देने की रस्म पड़ गई। तो ख़ज़ाना ख़ाली हो जायेगा।
यह बात हारून के दिल को लगी और वह बोला मगर इसको कुछ तो देना है।
तो आप इस तरह करें के शिकारी से पूछे के यह मछली नर है या मादा अगर वह कहे मादा है। तो कहें हमें यह पसन्द नहीं। और अगर वह कहे के नर है। तो भी आप कह दें के यह हमें नहीं चाहिये इस तरह वह मछली वापिस ले जायेगा और इनाम भी नहीं देना पड़ागा। ज़ुबैदा ने तजवीज़ पेश की।
बोहलोल ने आहिस्तगी से कहा। शिकारी इतनी दूर से बड़ी आस लेकर आया है। यह मुनासिब नहीं के मल्का की बातों में आकर आप उसे नामुराद लौटा दें और वह रंजीदा हो।
हारून ने बोहलोल की बात पर तवज्जोह नहीं दी और चौबदार से बोला।
शिकारी को हमारी खिदमत में पेश करो।
शिकारी क़रीब आया तो हारून ने सवाल किया।
ऐ शिकारी क्या तू बता सकता है के यह मछली नर है या मादा।
शिकारी ताज़ीमन झुका और बोला। आली जाह न यह नर है न मादा। यह मछली तो मोख़न्नस है।
हारून बेसाख़्ता हँसा और बोला। तुम्हारी हाज़ीर जवाबी हमें पसन्द आयी। तुम्हे चार हज़ार दरहम इनाम में दिये जायेंगें।
हुज़ूर का इक़बाल बुलन्द हो। शिकारी दरहम लेकर दुआएं देता हुआ रूख़्सत हुआ।
( आप इस किताब को अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क पर पढ़ रहे है।)
जब वह महल की सीढ़ियाँ उतर रहा था। तो एक दरहम ज़मीन पर गिर पड़ा। शिकारी रूक गया और उसने दरहम उठाकर जेब में रख लिया।
हारून और ज़ुबैदा भी उसे देख रहे थे। ज़ुबैदा जो इतनी रक़म जाने पर अफ़्सुरदा थी।
हारून से बोली। आली जाह। आपने मुलाहीज़ा फ़रमाया के यह शिकारी किस क़द्र लालची और कमीना है।
इसने एक दरहम भी नहीं छोड़ा। क्या हर्ज था अगर उसे महल का कोई और मुलाज़िम ही उठा लेता।
हारून को भी मल्का की बात लायक़े तवज्जोह महसूस हुई। उसने पुकार कर कहा।
शिकारी को बुलाया जाये।
क़रीब बैठे हुए बोहलोल ने दबी ज़बान में कहा। आलीजाह। मल्का कहने पर शिकारी को न रोकिये।
हारून ने तवज्जोह नहीं दी। तब तक चोबदार शिकारी को बुला लाया और हारून की ख़िदमत में पेश किया।
हारून बोला। ऐ शिकारी हमें तेरी यह हरकत बहुत ना-गवार गुज़री है। के तेरे पास चार हज़ार दरहम मौजूद हैं। अगर इनमें से एक गिर गया था। तो तूने यह भी गवारा नहीं किया के उसे छोड़ दे। शायद वह किसी ग़रीब को मिल जाये और वह उससे अपना काम निकाल ले।
शिकारी ताज़ीमन झुका और बोला। जान की अमान पाऊँ तो कुछ अर्ज़ करूँ।
अमान है। हारून ने अमान दी।
शिकारी मोअद्दब लेहजे में बोला। हुज़ूर यह नाचीज़ पस्त फ़ितरत नहीं है। बल्कि नमक की क़द्र करना जानता है। मैंने इस लिये वह दरहम उठा लिया था के उसके एक तरफ़ आयाते क़ुर्आनी कन्दा है और दूसरी जानिब आपका इस्में गिरामी। मैं नहीं चाहता था के यह ज़मीन पर पड़ा रहे और किसी के पाँव तले आ जाये। और बे अदबी हो।
ख़लीफ़ा को उसकी हाज़िर जवाबी ने महज़ूज़ किया। उसने ख़ुश होकर हुक्म दिया।
शिकारी को चार हज़ार दरहम और दिये जायें।
शिकारी रूख़्सत हो गया तो बोहलोल ने कहा। आलीजाह क्या मैंने आपको नहीं रोका था के शिकारी को वापिस न बुलाये।
हारून हँसा। बोहलोल आज तो मैंने तुझसे भी ज़्यादा दीवानगी का मुज़ाहेरा किया है। तुमने मुझे दोनो बार रोका। लेकिन मैंने तवज्जोह नहीं दी। और मल्का की बात पर कान धरने का यह नुकसान हुआ के चार हज़ार के बजाये आठ हज़ार दरहम ख़ज़ाने से गये ।
हकीम
कहते है कि एक बार हारून ने यूनान से किसी हकीम को बुलवाया जब वह बग़दाद पहुँचा। तो हर तरफ़ उसका शोहरा हो गया। हारून ने उसे दरबार में बड़ी इज़्ज़त दी। जिसकी वजह से उसके ओमरा और मोअज़्ज़ेज़ीन शहर हकीम से ख़ास तौर से मिलने गये। बोहलोल को भी ख़बर हुई। वह भी अपनी दीवानगी का लिबास पहने दरबार में पहुँचा। देखा के हकीम दरबार में बड़ी शान से बैठा है। वज़ीर , अमीर उसकी तारिफ़ो के पुल बाँध रहें हैं।
बोहलोल कुछ देर चुपका बैठा रहा। फिर हकीम से बोला। आप क्या काम करते हैं।
हकीम उसकी हैबते कज़ाई देखकर उसे पागल समझा और उसकी हँसी उड़ाने को बोला। जनाब। मैं हकीम हूँ और मेरा काम मुर्दो को ज़िन्दा करना है।
दरबार में दबी-दबी हँसी की आवाज़ सुनाई देने लगी। बोहलोल ने मुस्कुरा कर उसकी तरफ़ देखा और बड़े मज़े से बोला। जनाब हकीम साहब क़िब्ला बरा-ए-करम आप ज़िन्दों के हाल पर रहम करें। उनकी जान बख़्शी कर दें। बाक़ी रहे मुर्दे। तो उनका ज़िन्दा करना आपका हदिया है।
दबी-दबी हँसी क़हक़हों में बदल गई। हारून भी उनमें शामील था। हकीम इतना ख़जिल हुआ के वापिस यूनान चला गया ।
हारून ने महफ़िल में नौशी सजा रखी थी वज़ीर अमीर बैठे थे मुसलमानों का ख़लीफ़ा कनीज़ो के हाथों से जाम में (शराब के जाम) लेकर ख़म के ख़म लुँढा रहा था के बोहलोल भी वहाँ पहुँचा। उसने ख़लीफ़ा की हरकतों को ख़ामोश निगाहों से देखा तो हारून को उसकी नसीहतें याद आयीं। नशे के तरंग में उसने सोचा के इससे पहले के बोहलोल कोई ऐसी बात कह दे। जो उसका सर झुका दे। वह पहल करे। उसने बोहलोल को देखा और बोला।
बोहलोल। मेरे एक सवाल का जवाब दोगे। मैं तैयार हूँ। बोहलोल ने जवाब दिया।
बोहलोल। यह बताओ के अगर कोई शख़्स अंगूर खा रहा हो तो क्या हराम है। हारून ने सवाल किया।
नहीं। बिल्कुल नहीं। बोहलोल ने कहा।
अगर वह अगूंर खाकर पानी पी ले। तो हारून बोला। कोई हर्ज नहीं। बोहलोल ने बताया।
अब यही शख़्स अगूंर खाने और पानी पीने के बाद धूप में बैठ जायें तो फिर
कोई मुज़ाएक़ा नहीं। जितनी देर चाहे बैठे। बोहलोल ने जवाब दिया।
तो फिर बोहलोल। तुम ख़ुद ही बताओं के यही अगूंर और पानी। कुछ अरसा धूप में रख दिये जायें तो हराम क्यों हो जाते हैं। हारून ने बड़े फ़ख़्र से अपना फ़लसफ़ा बयान किया।
अगर इजाज़त हो तो मैं भी ख़लीफ़ा से चन्द सवाल कर लूँ। उम्मीद है इन्हीं सवालात में ख़लीफ़ा को अपने सवाल का जवाब मिल जायेगा। बोहलोल ने इत्मीनान से कहा।
इजाज़त है। हारून झुमता हुआ बोला।
बोहलोल बोला। क्या आलीजाह बतायेंगें के अगर किसी आदमी के सर पर थोड़ी सी मिट्टी डाल दी जाये तो क्या उसे कोई नुकसान पहुँचेगा।
नहीं। ख़लीफ़ा ने फ़ौरन जवाब दिया।
इसके बाद उसके सर पर थोड़ा सा पानी डाल दें। तो क्या उस शख़्स को कोई तकलीफ़ होगी
नहीं। बिल्कुल नहीं। हारून बोला।
लेकिन बोहलोल ने उसे मुतावज्जेह किया अगर इस मिट्टी और पानी को मिलाकर ईंट बना ली जाये और वह उस शख़्स के सर पर मारी जाये। तो क्या कोई नुकसान होगा।
तुम भी अजीब बातें करते हो बोहलोल। ख़लीफ़ा हँसा। उसका तो सर फट जायेगा।
तो फिर आलीजाह ग़ौर फ़रमायें तो उन्हें मालूम होगा के जिस तरह मिट्टी और पानी मिलकर इन्सान का सर फोड़ सकते हैं। उसी तरह अगूंर और पानी मिलकर भी ऐसी चीज़ बना देतें है जो हराम और नापाक है। जिसके पीने से इन्सान की अक़्ल मारी जाती है। उसे बुरे भले की तमिज़ नहीं रहती। इसलिये इस्लाम ने उसके पीने वाले पर सज़ा वाजिब की है।
हारून का नशा हिरन हो गया। वह मुज़तरिब होकर उठा और पशेमानी से बोला।
शराब की यह महफ़िल बर्ख़ास्त की जाती है।
( आप इस किताब को अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क पर पढ़ रहे है।)
एक रोज़ हारून हमाम गया। तो बोहलोल भी हमराह था। हारून को मज़ाक़ सूझा। तो बोहलोल से बोला। बोहलोल। अगर मैं ग़ुलाम होता। तो मेरी क्या क़ीमत लगती।
बोहलोल ने बहुत मज़े से कहा। आलीजाह। सिर्फ पचास दीनार।
ख़लीफ़ा को इसकी उम्मीद नहीं थी। उसका नाज़ुक शाही मेज़ाज बिगड़ा। हो न तुम दीवाने। इन्सान की क़द्र व क़ीमत का तुम्हें अन्दाज़ा ही नहीं। अहमक़ जानते हो के यह तहमद् जो मैंने पहन रखी है। पचास दीनार तो सिर्फ़ इसकी क़ीमत है।
मैंने भी तो सिर्फ़ तहमद् की ही क़ीमत लगाई है सरकार वरना ख़लीफ़ा की कोई क़ीमत नहीं है। बोहलोल ने हँस कर कहा।
शिकार
ख़लीफ़ा बड़े तुज़ुक व एहतेशाम से शिकार पर पवाना हुआ। अमीर वज़ीर हमराह थे। ग़ुलाम तीकमान उठाये साथ-साथ चल रहे थे।
बोहलोल भी मौजूद था। अचानक एक हिरन नज़र आया। ख़लीफ़ा ने फ़ौरन कमान उठाई और हिरन का निशाना लेकर तीर छोड़ा। लेकिन निशाना ख़ता कर गया। हिरन चौकड़ियाँ भरता निगाहों से ओझल हो गया।
बहुत ख़ूब। बहुत ख़ूब। सुब्हानल्लाह। बोहलोल ने बे साख़्ता दाद् दी।
ख़लीफ़ा को ना-गवार गुज़रा। ग़ुस्से से बोला। बोहलोल। तू मेरा मज़ाक़ उड़ा रहा है।
नहीं आलीजाह। यह नाचीज़ तो ऐसी जसारत करने का तसव्वुर भी नहीं कर सकता। बोहलोल ने आजिज़ी से कहा।
तो फिर यह दाद् किसको दे रहे थे। हारून ने सख्ती से पूछा।
जहाँपनाह। मैंने हिरन को दाद् दी है के वह आप के तीर से कितनी ख़ूबसूरती से बचा है।
पुले सिरात
बोहलोल अक्सर क़ब्रिस्तान में बैठा रहता था। एक रोज़ हारून का इसी तरफ़ से गुज़र हुआ। बोहलोल पर निगाह पड़ी। तो सवारी ठहाराई और बोला। बोहलोल यहाँ क्या कर रहे हो।
मैं ऐसे लोगों की मुलाक़ात को आया हूँ। जो न लोगो की ग़ीबत करते हैं। न मुझसे कोई उम्मीद या तवक़्क़ो रखते है और न किसी को कोई तकलीफ़ देते हैं। बोहलोल ने वज़ाहत की।
हारून ने गहरी साँस ली। बोहलोल क्या तुम मुझे पुले सिरात से गुज़रने और उस दुनिया में सवाल व जवाब की कुछ ख़बर दे सकते हो।
यक़ीनन। लेकिन इसके लिये थोड़ा एहतेमाम करना होगा। क्या आलीजाह उसका इन्तेज़ाम कर देंगें। बोहलोल ने कहा
हाँ-हाँ-तुम बताओ। मैं अभी हुक्म देता हूँ। हारून ने जवाब दिया।
फिर आलीजाह। अपने मुलाज़िम को हुक्म दें के यहाँ आग जलायें। उसपर एक बड़ा तवा रखें उस तवे को गर्म होकर सुर्ख़ हो जाने दें।
बोहलोल ने बताया।
बोहलोल की फ़रमाईश पूरी की जायें। हारून ने फ़रमाने शाही जारी किया।
मुलाज़िमों ने फ़ौरन आग जलायी तवा लाया गया और गर्म होने के लिये आग पर रख दिया गया। लोगो की नज़रे उसी जानिब थीं और हैरत में सोच रहे थे के इससे बोहलोल का क्या मक़सद है। यहाँ तक कि तवा ख़ूब गर्म हो गया।
बोहलोल ने कहा। आलीजाह। पहले मैं इस तवे पर नंगे पाँव खड़ा हूँगा और अपना तआर्रूफ़ तआरिफ़ कराऊँगा यानि मेरा नाम क्या है। मेरा लिबास क्या है और मेरी ख़ूराक क्या है इसके बाद इसी तरह आप भी तवे पर खड़े होकर अपना तआर्रूफ़ कराये।
हारून को तम्मुल तो हुआ। लेकिन उसने मन्ज़ूर कर लिया और बोहलोल से बोला। चलो। तुम पहल करो।
बोहलोल तेज़ी से तवे पर खड़ा हो गया और जल्दी से बोला। बोहलोल खिर्क़ा , जौ की रोटी और सिरका यह तीन लफ़्ज़ कहकर वह झट तवे से नीचे उतर आया। इन चन्द लम्हों में उसके पैर जलने से महफ़ूज़ रहे।
अब हारून की बारी आयी। वह तवे पर चढ़ा और शाही अल्क़ाब के साथ अभी अपना नाम भी नहीं बता पाया था के उसके पैर जलने लगे। वह गिरता पड़ता तवे से नीचे उतर आया और बोला।
बोहलोल। तुमने मुझे किस अज़ाब में डाल दिया था।
बोहलोल मुस्कुराया। आपने ही तो फ़रमाईश की थी के आपको क़यामत के सवाल व जवाब के बारे में बताया जाये। तो आपने देखा के गर्म तवे पर क़दम रखना कितना मुश्किल है इसी तरह जो लोग ख़ुदा परस्त है। दुनिया के जा-व-हशम से दूर हैं। लालच और तमअ नहीं रखते। तो पुले सिरात पर से आराम से गुज़र जायेंगे। और जो दुनियावी शान व शौकत में डूबे हुए हैं उन्हे इसी तरह अज़ाब से गुज़रना होगा। जिस तरह अभी आपको महसूस हुआ।
फज़ल बिन रबी
बयान किया जाता है के एक रोज़ हारून का वज़ीर फज़ल बिन रबी एक रास्ते से गुज़र रहा था। उसने देखा के बोहलोल एक तरफ़ बैठा है। कुछ सोच रहा है। फ़ज़ल ने उसका नाम लेकर उसे पुकारा। बोहलोल। क्या सोच रहे हो।
बोहलोल ने चौंक कर सर उठाया देखा के फज़ल बिन रबी खड़ा है। बोला। तेरे अन्जाम के बारे में सोच रहा हूँ।
फ़ज़ल चौंक गया। क्यों। ख़ैरियत तो है बोहलोल।
सारे वज़ीर एक जैसे ही होते हैं। इसलिये उनका अन्जाम भी मिलता झुलता ही होता है। मुझे अन्देशा है के कहीं तेरा भी अन्जाम जाफ़र बर-मक्की का सा न हो।
फ़ज़ल काँप गया और बोला। बोहलोल मैंने जाफ़र बर-मक्की के बारे में सुना तो है। लेकिन दूसरे लोगो की ज़बानी। न जाने इसमें कितना झूठ है और कितना सच। मैं चाहता हूँ कि तू मुझे उसके बारे में बता के आख़िर हारून ने उसके क़त्ल का हुक्म क्यों दिया था।
बोहलोल ने कहा। तो फिर बैठ जा और कान धर कर सुन। फ़ज़ल बैठ गया और बोहलोल ने कहना शुरू किया। तुम जानते हो-ना के मन्सूर के बेटे महदी के ज़माने में ख़ालिद बर-मक्की का बेटा यहिया बर-मक्की हारून रशीद का कातिब मुक़र्रर हुआ था।
फ़ज़ल ने हुंकार भरी। हाँ। मैंने यह भी सुना है कि हारून यहिया और उसके बेटे ज़फ़र की लियाक़त देखकर उन्हें बहुत पसन्द करने लगा था।
बादशाह की पसन्द व ना-पसन्द हमेशा ज़वाल का बायस बनती है। हारून का ज़ाफ़र बर-मक्की के साथ इतनी मोहब्बत हो गयी के उसने अपनी हमशीरा अब्बासा का निकाह ज़ाफ़र बरमक्की से कर दिया। लेकिन उसे यह भी ताकीद कर दी कि वह अब्बासा को अपनी बीवी न बनाये और ख़लीफा की बहन समझकर उसपर दस्तदराज़ी न करे। जाफ़र बर-मक्की ने क़ौल तो दे दिया। लेकिन उस पर पूरा न उतर सका। इसकी इत्तेलाअ हारून को भी हो गई और उसकी मोहब्बत दुश्मनी में बदल गई।
उसने अपने ग़ुलाम मसरूर से कहा। आज तुम्हारे सुपुर्द एक अहम् काम है। जिसकी तकमील हर सूरत में होनी चाहिये।
मसरूर ने सरे तसलीम ख़म किया तो हारून बोला। आज रात जाफ़र बर-मक्की का सर काट कर हमारी ख़िदमत में पेश करो।
मसरूर हक-बक रह गया। उसकी ज़बान गुँग हो गई और उसका सर झुक गया। उसके चेहरे पर तशवीश के आसार देखकर हारून ने कड़े लहजे में कहा। मसरूर तू परेशान क्यों हो गया है। किस सोच में पड़ गया है।
मसरूर ने डरते-डरते कहा। हुज़ूर। यह अम्रे अज़ीम है सोचता हूँ कि काश आपने इस काम के लिये मुझे मुनतख़ब न किया होता।
तो गोया तू अपनी मौत को आवाज़ देना चाहता है और ऐसी मौत जिसपर परिन्दे भी आँसू बहायें। हारून ने ग़ज़्बनाक लहजे में कहा।
तो मसरूर के पास इसके सिवा चार-ए-कार नहीं था कि उसके हुक्म की तामील करे। वह सर झुकाये हुए जाफ़र बर-मक्की के यहाँ पहुँचा और उसे तमाम माजरा कह सुनाया।
जाफ़र बर-मक्की बेहद परेशान हुआ। उसके पैरो तले ज़मीन निकल गई। लेकिन उसने उम्मीद का सहारा लिया और मसरूर से बोला। मसरूर। क्या ख़बर कि ख़लीफ़ा ने यह हुक्म शराब के नशे में दिया हो और जब वह होश में आये तो उसे पछतावा हो इसलिये मेरी मान और ख़लीफ़ा के पास जा। और उसे इत्तेलाअ दे दे कि तूने मुझे क़त्ल कर दिया है। अगर वह अफ़सोस का इज़्हार न करे तो तुझे इख़्तेयार है। शौक से आकर मेरा सर काट ले।
मसरूर ख़लीफ़ा की तबीयत से वाक़िफ़ था वह उसके हुक्म की सरताबी करके ख़ुद मुसीबत में गिरफ़्तार नहीं होना चाहता था। वह जाफ़र से बोला। आप मेरे साथ हारून के महल तक चलें। हो सकता है आपकी मोहब्बत ख़लीफ़ा को अपना फ़ैसला बदलने पर मजबूर कर दें।
जाफ़र को मजबूरन उसकी बात माननी पड़ी। उसके दिल में उम्मीद की थोड़ी-सी जो रमक़ बाक़ी थी। वह उसके सहारे मसरूर के साथ चल पड़ा। मसरूर ने जाफ़र को पर्दे के पीछे ख़ड़ा किया और ख़ुद लरज़्ता काँपता ख़लीफा की ख़िदमत में हाज़िर हुआ।
उसे देखते ही हारून ने कहा। मसरूर क्या तुमने मेरे हुक्म की तामील की है।
मसरूर घबरा गया और जल्दी से बोला आलीजाह। जाफ़र बर-मक्की मेरे साथ आया है वह पर्दे के पीछे खड़ा है।
मसरूर याद रख कि अगर तूने मेरे हुक्म की तामील में ज़र्रा बराबर भी सुस्ती की तो जाफ़र से पहले तेरा सर उड़ता हुआ नज़र आयेगा।
मसरूर को अपनी जान प्यारी थी। उसने लपक कर पर्दा उठाया और तलवार का ऐसा हाथ मारा के वजी व हसीन नौजवान का सर तन से जुदा हो गया फिर उसने उस जवाने रअना का सर हाथ में लिया। जो शराफ़त और दानिशमन्दी की तसवीर था। जिसकी फ़य्याज़ी और सख़ावत सबसे बढ़ी हुई थी। उसे अपने सर पर रखा और हारून के सामने पेश कर दिया। बे रहम ख़लीफ़ा को इस पर भी तसल्ली नहीं हुई और उसने हुक्म दिया के बर-मक्कियों के पूरे खानदान का नाम व निशान मिटा दिया जाये। उनका माल व असबाब क़ुर्क़ कर लिया जाये।
जाफ़र की लाश बग़दाद के क़िले पर लटका दी गई और चन्द दिन बाद उसे जला दिया गया।
ऐ फ़ज़ल वज़ारत का यही अन्जाम होता है। इसलिये मोहतात् रहो और अवाम् की भलाई को हमेशा पेशे नज़र रखो।
फ़ज़ल काँप गया और परेशान से बोला। बोहलोल मुझे सलामती की दुआ दो।
ख़ुदा का घर
फज़ल बिन रबी ने बग़दाद में एक मस्जिद की बुनियाद डाली। वह अपने ख़र्च पर उसे बनवाता रहा। जब तामीर मुकम्मल हो गई। तो मस्जिद के दरवाज़े पर कत्बा लगाने की बारी आयी। फ़ज़ल भी इस मौक़े पर आया। उससे पूछा गया के इस कत्बे पर कौन सी इबारत लिखाई जाये।
ज़ाहिर है इस पर तो मेरा ही नाम लिखा जायेगा। फ़ज़ल ने बड़े फ़ख़्र से कहा।
बोहलोल क़रीब ही खड़ा था। वहीं से पुकार कर बोला। हज़रत फज़ल बिन रबी। क्या आप इस दीवाने को यह बताने की ज़हमत गवारा फ़रमायेंगें के आपने यह मस्जिद किस के लिये बनवाई है।
यह ख़ुदा का घर है। इसे मैंने अल्लाह की ख़ातिर बनाया है। फ़ज़ल ने जवाब दिया।
बोहलोल मुस्कुराया आपका फ़रमान बजा है। के यह आपने अल्लाह के लिये बनवाई है तो फिर इस पर अपना नाम क्यों लिखवा रहें है।
फ़ज़ल ने ग़ुस्से से उसकी तरफ़ देखा। क्यों। मैं अपना नाम इस कत्बे पर क़यों न लिखवाऊँ।
आख़िर लोगों को भी तो मालूम होना चाहिये के इस मस्जिद को बनवाने वाला कौन है।
तो फ़िर मेरा नाम लिखवा दो। लिखवा दो के इस मस्जिद का बानी बोहलोल है। बोहलोल ने हँसकर कहा।
अजीब दीवाने हो तुम। भला तुम्हारा नाम लिखवाने की क्या तुक है। उसने ना-गवारी से कहा।
चलो न सही। मेरा नाम न लिखवाओ अपना ही नाम लिखवा लो ताकि तुम्हारी शौहरत और नेकनामी हो। लेकिन फिर सवाब का ख़्याल अपने दिल में न लाना। बोहलोल यह कहता हुआ आगे बढ़ गया।
फ़ज़ल का सर झुक गया। वह निदामत से बोला। बुलाओ बोहलोल को। और जो कुछ वह कहता है कत्बे पर वही लिख दो।
लोग बोहलोल के पीछे दौड़े और उस से पूछने लगे के कत्बे पर क्या लिखा जाये तो वह बोला। क़ुर्आन पाक की आयत से बेहतर कुछ नहीं। जो इस कत्बे पर कंदा की जाये।
फ़ज़ल ने भी उसकी ताईद की और मस्जिद के कत्बे पर आयते क़ुर्आनी लिखवाई गई।
ऊँट की खुजली
एक ऐराबी के ऊँट को खुजली लाहक़ हो गई। लोगो ने मशविरा दिया के इस पर अरण्डी के तेल की मालिश करें। एअराब ऊँट पर सवार हुआ और शहर की जानिब रवाना हो गया ताकि अरण्डी का तेल ख़रीद लाये।
राह में बोहलोल को देखा। तो उसने अपना ऊँट ठहरा लिया। नीचे उतरा और उसे सलाम करके बोला। मै अजीब मुसीबत में गिरफ़्तार हो गया हूँ। मेरे ऊंट को ख़ारिश हो गई है। लोगो ने तो अरण्डी के तेल की मालिश करने का मशविरा दिया है मैं अरण्डी का तेल लेने ही जा रहा था। तुम्हें देखा। तो मुझे ख़्याल आया के तुम्हारी दुआ में तो बड़ा असर है। अगर तुम मेरे ऊँट पर दमकर दो। तो इसे शिफ़ा हो जायेगी।
बोहलोल मुस्कुराया। सिर्फ़ मेरी दुआ में तो इतनी तासीर नहीं है कि इतना बड़ा ऊँट उससे शिफ़ायाब हो जाये। हाँ अगर तुम अरण्डी का तेल ले आओ। तो मैं उस पर दुआ दम कर दूँगा। तुम वह तेल इस्तेमाल करना। तो उम्मीद है कि काम बन जायेगा।
बात उस शख़्स के समझ में आ गई। वह शहर से तेल ख़रीद लाया। बोहलोल ने उस पर दुआ दम कर दी। कुछ रोज़ की मालिश से उसका ऊँट तन्दरूस्त हो गया।
गधे की बात पर भरोसा
बोहलोल का एक दोस्त गेहूँ पिसवा कर वापिस आ रहा था के उसका गधा लगंड़ाने लगा। उसने गधे को दो तीन छड़ियाँ लगाकर आगे ढकेलना चाहा। लेकिन वह टस से मस न हुआ और बिल-आख़िर ज़मीन पर गिर पड़ा। क़रीब ही वह ख़स्ता हाल मकान था। जहाँ बोहलोल उन दिनों मुक़ीम था। उस शख़्स ने दरवाज़ा खटखटाया और आवाज़ दी।
बोहलोल भाई। बोहलोल भाई।
ज़रा मुझे अपना गधा तो दे दो। मेरा गधा तो आधे रास्ते में जवाब दे गया और मुझे यह आटा घर पहुँचाना है।
बोहलोल उसकी आवाज़ पहचानता था वह उसकी आदत से भी वाक़िफ़ था के वह जानवर की सही निगेहदाश्त नहीं करता था और उनसे बेरहमी का सुलूक करता था।
इसलिये वह उसे अपना गधा देना नहीं चाहता था। वह बाहर निकला और उस शख़्स से बोला। यार। बड़ा अफ़सोस है के मेरा गधा। कोई माँग कर ले गया है। इसलिये इस वक़्त तो तुम्हारे काम नहीं आ सकता।
अभी बोहलोल के अल्फ़ाज़ उसके मुँह में ही थे के घर के अन्दर से गधे की ढीचूँ-ढीचूँ की आवाज़ सुनाई देने लगी।
वह शख़्स होशियार हुआ और शिकवे के अन्दाज़ में बोला। अच्छा बोहलोल भाई तुम भी अच्छे दोस्त हो। तुम्हारा गधा तो घर में मौजूद है और तुम कहते हो के उसे कोई माँग कर ले गया है।
और तुम भी अच्छे दोस्त हो। बोहलोल ने उसी के लहजे में कहा। मेरा तुम्हारी पचास साल का साथ है और तुम मेरी बात पर यक़ीन नहीं कर रहे। और गधे की बात मानने पर तैयार हो ।
हम्माम
बोहलोल हमाम करने गया। तो वह अपनी गुदड़ी लपेटे हुए था। उसकी पापोश भी बोसीदा थी और लिबास भी उमदा नहीं था। हमाम के हम्मामियों ने उसकी तरफ़ बिल्कुल भी तवज्जोह नहीं दी। काफ़ि देर बाद उसकी बारी आयी। तो भी उन्होने बोहलोल की कोई ख़ास परवाह नहीं की। और उसके हस्बेमंशा नहाने का कीसा उसके बदन पर नहीं रगड़ा। बोहलोल फ़ारिग़ हो चुका। तो बाहर आया। उसने अपनी जेब में हाथ डाला और दस दीनार निकाल कर हमाम के मालिक की हथेली पर रख दिये।
हमाम का मालिक उजरत से बहुत ज़्यादा रक़म देखकर क़द्रे नादिम हुआ के उसने बोहलोल के साथ लापरवाही बर्ती। बोहलोल कुछ कहे बग़ैर हमाम से बाहर निकल आया।
अगले हफ़्ते फिर वह हमाम करने आया। तो उसे देखते ही हमामी दौड़े हुए आये और उसे हाथों-हाथ अन्दर ले गये और बड़े अदब से उसे ग़ुस्ल करने में मद्द दी।
बोहलोल फ़ारिग़ होकर बाहर आया तो उसने जेब में हाथ डाला और एक दीनार मालिक की हथेली पर रख दिया। वह ग़ुस्से से लाल भभुका हो गया। उसने दीनार दूर फेंक दिया और दुरूश्ती से बोला।
हज़रत आप होश में तो हैं। हमाम करने की यह उजरत।
क़िब्ला। इस मर्तबा हमाम करने की उजरत तो मैं पिछले हफ़्ते ही आपकी ख़िदमत में अदा कर चुका हूँ। यह तो पिछले हफ़्ते की उजरत है। जो मैंने अब अदा की है। ताकि आपको अहसास हो के ग्राहकों के साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये।
अजनबी की अमानत
बग़दाद के आवारा लड़के पागल-पागल का शोर मचाते एक शख़्स के पीछे दौड़े जा रहे थे। वह परेशान हाल शख़्स बार-बार मुड़कर उन्हें मना करने की कोशिश करता। लेकिन वह किसी तौर पर नहीं मानते थे। कोई उसे पत्थर मारता था। कोई उसके कपड़े खींचता था।
कोई पागल-पागल कह कर उसे छेड़ता था। वह उन्हें मना करकर के थक गया। तो उसने हाथ जोड़ दिये और उन नन्हें शैतानों से बोला। ख़ुदा के लिये मेरा पीछा छोड़ दो। मैं पागल नहीं हूँ। मैं पागल नहीं हूँ। उसकी आवाज़ रूंध गयी थी और उसकी आँखों में आँसू आ गये थे।
लड़के खिलखिलाकर हँस पड़े। उनमें से एक शरीर बोला। सारे ही पागल इसी तरह कहते हैं।
दूसरे ने लुक़्मा दिया। तुम तो शक्ल से ही पागल नज़र आते हो और फिर भी कहते हो के मैं पागल नहीं।
पागलों के सर पर सींग तो नहीं होते। कोई और बोला और सब उसे छेड़ने और तंग करने लगे।
ठहर जाओ। शैतान के चेलों। मैं अभी तुम्हें सीधा करता हूँ। एक कड़कदार आवाज़ सुनाई दी तो लड़को ने मुड़कर देखा।
बोहलोल अपना असा लहराता चला आ रहा था। तुम लोगों को शर्म नहीं आती एक शरीफ़ आदमी को तंग करते हो। वह ग़ुस्से से बोला। तुम्हें ज़रा ख़ौफ़े ख़ुदा नहीं है। बेचारे अजनबी को परेशान करके रख दिया। चलो भागो। यहाँ से वरना।
उसने दाँत पीसकर लाठी उठाई। तो लड़के सर पर पैर रख कर भागे।
उस शख़्स की जान में जान आयी। उसने अपना लिबास दुरूस्त किया और हाँपता हुआ बोला। आपकी बहुत मेहरबानी। अगर आप न आते तो ये शरीर लड़के सचमुच मुझे पागल ही कर देते। उसकी आँखें भीग गयी।
बोहलोल ने उसकी जानिब देखा। वह शक्ल व सूरत और लिबास से अजनबी मालूम होता था। उसके चेहरे पर परेशानी और हरास था। बोहलोल ने हमद्रदी से पूछा।
भाई। तुम अजनबी मालूम होते हो। हमारे इस शहर ने तुम पर जो ज़ुल्म किया है कुछ तो मैंने अपनी आँखों से देख लिया है। और कुछ तुम सुना दो के जिसने तुम्हारी आँखों में आँसू भर दिये हैं।
उस शख़्स ने एक आह भरी। आप दुरूस्त फ़रमाते हैं। इस शहर ने तो मुझे पागल बनाने में कसर नहीं छोड़ी है। मैं चन्द रोज़ पहले ही यहाँ वारिद हुआ हूँ। मेरे पास कुछ जवाहरात और सोने के सिक्के थे। वही मेरी पूँजी थी और वही ज़ादे सफ़र मैंने इस ख़ौफ़ से कि कहीं अजनबी शहर में लुट न जाऊँ। वह जवाहरात एक अत्तार के पास ज़मानत रखवा दिये थे। मगर अफ़सोस आज जब मैंने अपनी अमानत का मुताल्बा किया तो वह मुकर गया। उसने मुझे बुरा भला कहा और शरीर लड़को को यह कहकर मेरे पीछे लगा दिया के मैं पागल हूँ। उसके आँसू बह निकले।
बोहलोल ने उसे तसल्ली दी। भाई। मुझे बहुत अफ़सोस है के इस शहर में तुम्हारे साथ ऐसा सुलूक हुआ है। लेकिन तुम फ़िक्र न करो। तुम्हारी अमानत तुम्हें ज़रूर मिलेगी।
मुझे यक़ीन तो नहीं आता। वह अत्तार हद दर्जा चालाक और मक्कार है लेकिन उम्मीद पर दुनिया क़ायम है। मायूसी कुफ़्र है। इसलिये मैं भी अपनी टूटी आस फिर जोड़ लेता हूँ। अगर आप मेरी जमा पूँजी मुझे दिलवा दें। तो मैं उम्र भर आपको दुआएं दूँगा। अजनबी ने कहा।
भाई तुमने सच कहा के मायूसी कुफ़्र है। तुम फ़िक्र न करो। तुम्हारी अमानत तुम्हें ज़रूर मिलेगी। बोहलोल ने बड़े यक़ीन से कहा।
ख़ुदा आपका भला करे। अजनबी बोला।
अच्छा अब तुम इस तरह करो के मुझे उस अत्तार का पता बता दो कल उसी वक़्त तुम फिर उस अत्तार की दुकान पर आना और उससे अपनी अमानत का मुताल्बा करना। बोहलोल ने उसे हिदायत दी।
नहीं जनाब। अब मैं उस मक्कार की दुकान पर नहीं जाऊँगा पहले ही उसने मेरे साथ क्या कुछ नहीं किया। अजनबी ने घबराकर कहा।
पूरी बात तो सुन लो यार। तुम्हें इस क़द्र घबराने की ज़रूरत नहीं है। मैं उसकी दुकान पर पहले से ही मौजूद हूँगा। यह मेरा ज़िम्मा के वह तुम्हें कुछ नहीं कहेगा। बोहलोल ने ज़ोर देकर कहा।
अगले रोज़ बोहलोल उस अत्तार की दुकान पर पहुँचा उसके हाथ में एक थैली थी। वह उसे सलाम करके बाला। जनाब मैं कुछ अर्से के लिये ख़ुरासान जा रहा हूँ। दूर का सफ़र है। ख़ुदा मालूम वापिस आऊँ या न आऊँ राह में चोर डाकुओं का भी ख़तरा है। यह मेरी जमा पूँजी है। कुछ जवाहरात और तीस हज़ार अशर्फ़ियाँ हैं। आप इन्हें मेरी अमानत समझकर रख लें। अगर मैं तीन माह बाद वापिस आ गया तो अपनी अमानत ले लूँगा। अगर मुझे वापिस आना नसीब न हुआ। तो आप इस रक़म से कोई मस्जिद बनवा दें। बोहलोल ने निहायत संजीदगी से कहा।
अत्तार ने थैली हाथ में ली। उसका बोझ महसूस करके वह दिल ही दिल में ख़ुश हुआ और बोला। जनाब। आपका कहा सर आँखों पर आप बद्-शुगूनी की बातें न करें। इन्शाल्लाह आप ज़रूर वापिस आयेंगे और अपनी अमानत इसी तरह महफ़ूज़ पायेंगे।
मैं आपका बहुत शुक्रगुज़ार हूँ। आपने मेरी परेशानी दूर कर दी है।
बोहलोल ने थैली उसके हवाले कर दी। उसी वक़्त वह अजनबी भी दुकान पर पहुँच गया और बड़ी लजाजत से बोला। जनाब। मैंने जो अमानत आपके पास रखवाई थी।
बरा-ए-करम उसे एनायत फ़रमा दीजिये।
अत्तार सोचने लगा के उसे क्या जवाब दे। अगर वह इन्कार करता है तो बोहलोल मश्कूक हो सकता है। क्या ख़बर वह अपनी अमानत वापिस ले जाये और किसी दूसरे के पास रखवा दे। बोहलोल की थैली उसकी थैली से काफ़ी वज़नी है। बोहलोल ख़लीफ़ा का रिश्तेदार भी है। उसको अक्सर व बेश्तर ख़लीफ़ा से नज़राने मिलते रहते है। यक़ीनन इसके जवाहरात ज़्यादा क़ीमती होंगे। यह सोचकर उसने अपने मुलाज़िम से कहा के वह अजनबी की थैली लाकर उसे दे दें।
उस शख़्स ने थैली ली और दुआएं देता हुआ चला गया। बोहलोल भी अत्तार को ख़ुदा हाफ़िज़ कहकर रूखसत हुआ। अत्तार ने बेक़रारी से वह थैली खोली ताकि उसकी मालियत का अन्दाज़ा कर सके। यह देखकर उसकी आँखें खुली की खुली रह गयीं के थैली में लौहे और काँच का टुकड़े भरे हुए थे ।
पढ़ा लिखा गधा
बोहलोल बाज़ार से गुज़र रहा था के एक शख़्स ने दामन पकड़ लिया। बोहलोल ने उसकी तरफ़ देखा। क्या बात है भाई। मुझे क्यों रोका है।
वह परेशानी से बोला। जनाब शेख़ बोहलोल ख़ुदा के लिये मेरी मदद किजिये। वरना मैं बे मौत मारा जाऊँगा।
क्यों ख़ैरियत तो है। बोहलोल ने पूछा। बस ख़ैरियत ही तो नहीं है। मेरी इस ज़बान ने मुझे आज मरवा दिया है। मैंने अपनी मौत का सामान ख़ुद अपने हाथों किया है। वह तास्सुफ़ से कहने लगा।
बताओ तो सही के क्या हुआ है। बोहलोल ने इस्तेफ़्सार किया।
क्या बताऊँ जनाब। अपनी हिमाक़त का हाल अपनी ज़बान से किस तरह कहुँ। दर अस्ल हुआ यूँ के हाकिमे कूफ़ा की ख़िदमत में किसी ने बेहद ख़ूबसूरत गधा पेश किया। सब लोग उसकी तारीफ़ करने लगे। कोई कहता था के यह बहुत आलानस्ल का गधा है। कोई कहता था के इसे ख़ूब सधाया गया है। कोई कहता था के यह बहुत चाक़ और चौबंद और तैयार है। मेरे मुँह से कहीं निकल गया के यह गधा तो इतना दानिशमन्द है के इसे पढ़ाया जा सकता है।
बस मेरा इतना कहना था के हाकिमे कूफ़ा ने मेरी बात पकड़ ली। मेरे मुख़ालिफ़ो ने इसे और हवा दी। यहाँ तक के हाकिमे कूफ़ा ने मुझे हुक्म दे दिया। के मैं गधे को पढाऊँ और अपना क़ौल सच कर के दिखाऊँ अगर मैं इसमें कामयाब हो गया। तो मुझे इनाम व इकरारम दिया जायेगा। और अगर मैं कामयाब न हुआ। तो मेरी गर्दन मार दी जायेगी। मैं सख़्त मुसीबत में हूँ।
भाई बोहलोल। मेरी जान पर बनी है। ख़ुदा के लिये कोई सूरत पैदा करो के मै बच जाऊँ।
बोहलोल बोला। भाई ग़म न कर। मैं तूझे एक तरकीब बता दूँगा आगे जो अल्लाह को मन्ज़ूर।
मुक़र्ररा मुदद्त के बाद हाकिमे कूफ़ा ने उसे तलब किया। वह गधे को लेकर उसके दरबार में पहुँचा। सारा दरबार भरा हुआ था और लोग बड़े शौक़ से देख रहे थे के पढ़ा लिखा गधा क्योंकर अपने फ़न का मुज़ाहिरा करता है।
उस शख़्स ने गधे के सामने किताब रखी। गधा सफ़े उलटने लगा। आहिस्ता-आहिस्ता वह तमाम सफ़े उलट गया और जब किताब बन्द कर चुका। तो उसने ज़ोर से पुकारा ढ़ीचूँ। ढीचूँ। ढीचूँ।
( आप इस किताब को अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क पर पढ़ रहे है।)
हाज़ेरीन और हाकिम हैरान रह गये। उन्होने तस्लीम कर लिया कि गधा तमाम किताब पढ़ चुका है और अपनी ज़बान में उसका ऐलान कर रहा है। हाकिम ने उस शख़्स को भारी इनाम् न इकराम् दिया। वह ख़ुश-ख़ुश वापिस आया और बोहलोल की ख़िदमत में पहुँचा।
जनाब शेख़ बोहलोल। यह इनाम् व इकराम्। यह सब आपका हक़ है। अगर आप मुझे यह तरकीब न बताते तो मैं अपनी जान से भी जाता।
नहीं भाई। यह इनाम् व इकराम् तुम्हें ही मुबारक हो। मैंने तो सिर्फ़ तरकीब बताई थी। गधे के साथ मेहनत तो तुमने की है।
बोहलोल ने बे नियाज़ी से कहा।
क़रीब ही ख़ड़ा हुआ एक शख़्स बोला। भाई वह तरकीब क्या है। जिसने गधे को सारी किताब पढ़वा दी।
वह शख़्स हँसा और बोला। अब तो मेरी जान बच गयी है सो तरकीब को बता देने में कोई हर्ज भी नहीं। के जिसको अपने गधे को पढ़वाना हो। वह इस तरीक़े से पढ़ाये।
हाँ भाई बताओ। दूसरा शख़्स पूछने लगा।
सुनो भाई। वह किताब जो गधे को पढ़ानी हो। उसके दरमियान जौ रख दो। गधे को दिन भर भूखा रखो। और शाम को वही किताब उसके सामने रख दो। भूखा गधा किताब के सफ़े उलटता जायेगा और जौ खाता जायेगा। इस तरह आठ-दस दिन यह अमल दोहराओगे। तो गधा इसका आदी दो जायेगा के इसकी ख़ुराक किताब के सफ़ो के दरमियान है। अब जिस वक़्त भी गधे से किताब पढ़वाने का मुज़ाहिरा करवाना हो। तो उसे भूखा रखो। और किताब के दरमियान जौ भी न रखो। अब गधा यही समझेगा के सफ़ो के दरमियान जौ रखे हुए हैं। वह भूख से बेताब होकर सफ़े उलटता जायेगा।
आख़िरी सफ़े तक जब उसे जौ नहीं मिलेंगे। तो वह ढीचूँ –ढीचूँ करके एलान कर देगा के उसने सारी किताब पढ़ ली है ।
हिन्दुस्तानी सौदागर
एक कारवा सराय में भटियारे और हिन्दुस्तानी सौदागर का झगड़ा था। दोनो में ज़बर्दस्त तू। तुकार हो रही थी। बाक़ी मुसाफ़िर जो सराय में बैठे हुए थे। उन्होने आकर पूछा के क्या मामला है। भटियारे ने ग़ुस्से से कहा
देखिये जनाब। यह अजीब शख़्स है खाना खा लिया और क़ीमत अदा करते हुए इसे मौत आती है। हम यूँही मुफ़्त ख़ोरों के पेट भरने लगे। तो कल को भीक माँगते फिरेंगें।
एक मुसाफ़िर ने सौदागर की तरफ़ देखा। जनाब आप ख़ासे माक़ूल और आसूदा हाल नज़र आते हैं। आख़िर आप इस ग़रीब आदमी के पैसे क्यों नहीं अदा कर देते।
क़िब्ला मैं तो पैसे देने के लिये तैयार हूँ। बल्कि मैंने तो इसके साथ यह भलाई की के पिछले खाने के पैसे भी अदा करना चाहता हूँ। जो मैं इत्तेफ़ाक़न भूल गया था। लेकिन यह कुछ और ही हिसाब बता रहा है। यूँ लगता है। जैसे सारे मुसाफ़िरों की क़ीमत यह मुझसे ही वुसूल करना चाहता है। सौदागर ने अपना मौक़िफ़ बयान किया।
भलाई किस बात की। भटियारा तुनक कर बोला। एक तो पहले रक़म ही अदा नहीं की। उसी का मुझपर एहसान जताते हो। खाना खाया है। तो क़ीमत भी अदा करो। और ख़ाह-म-ख़ाह झगड़ा न बढ़ाओ।
तकरार बढ़ी। तो कोई क़स्बे के मुक़द्दम को भी बुला लाया। उसने दोनों से कुन वाक़ेआ बयान करने को कहा।
सौदागर बोला। जनाब। मामला यह है के पिछले साल भी मैं इस सराय में ठहरा था। मैंने खाने में एक मुर्ग़ी और चन्द अण्डे खाये थे। मगर जल्दी में होने की वजह से मैं उसकी क़ीमत अदा नहीं कर सका। मैंने इससे उस खाने का हिसाब पूछा है। तो एक हज़ार दिनार माँगता है। आप ही इन्साफ़ से बाताइये के क्या एक मुर्ग़ी और चन्द अण्डो की क़ीमत एक हज़ार दीनार होती है।
मुक्द्दम ने भटियारे से कहा। क्यों साहब आप इस सिलसिले में क्या कहते हैं।
भटियारे ने गले को साफ़ किया और बड़े ग़ुस्से से बोला। जनाबे आली। अभी तो मैंने बड़ी फ़य्याज़ी से काम लिया है। के कहीं गड़बड़ न हो और मैं किसी का देनदार न बनूँ। आप ज़रा इन्साफ़ से ग़ौर फ़रमायें के इन हज़रत ने पिछले साल बड़े शौक से एक मुर्ग़ी और छ: अण्डे डटकर खाये थे। अब अगर वह मुर्ग़ी ज़िन्दा होती और मैं छ: अण्डे उसके नीचे रख देता। तो उनमें से चूज़े निकल आते। और चूज़े बड़े होकर अण्डे देते। तो मैं उनमें से भी अण्डे निकलवाता। आप अक़्लमन्द हैं ख़द ही हिसाब लगा लें के एक साल में वह मुर्ग़ी और छ: अण्डे हज़ारों मुर्ग़ी और चूज़ों में बदल जाते यह सारा मुनाफ़ा महज़ इस वजह से मेरे हाथों से निकल गया के इन हज़रत ने वह मुर्ग़ी अण्डे खा लिये थे अब मैंने उसी हिसाब से क़ीमत सिर्फ़ एक हज़ार दीनार लगाई है। तो इन्हें अदा करते हुए तकलीफ़ होती है। और मुझसे झगड़ा करने पर तुल गये है।
मुक़द्दम भटियारे का दोस्त था। इसलिये उसने फ़ैसला भटियारे के हक़ में दे दिया और उसे हुक्म दिया के वह भटियारे को एक हज़ार दीनार अदा करे।
सौदागर बेचारा बहुत परेशान था के इतनी रक़म कहाँ से अदा करे के मुसाफ़िरों में से एक शख़्स बोला। के हज़रात। अगर कोई एक तेज़ रफ़तार सवारी मोहय्या कर दे। तो मैं अभी बग़दाद से क़ाज़ी को लेकर आता हूँ। फिर वह जो फ़ैसला कर दे। उसे मान लिया जाये।
बाक़ी मुसाफ़िरों ने उसकी हिमायत की। सौदागर बोला। भाई आप मेरा ख़च्चर ले जायें यह बहुत तेज़ रफ़्तार है। और ख़ुदा के लिये क़ाज़ी साहब को लेकर आये। यह क़स्बा तो अधेंर नगरी है। मैं इतनी रक़म इसको अदा कर दूँ। तो क्या ख़ुद भीक माँग कर अपने मुल्क वापिस जाऊँ। ख़ुदा आपका भला करे। मेरी मद्द कीजिये।
उस शख़्से ने ख़च्चर लिया और बर्क़ रफ़्तारी से बग़दाद की तरफ़ रवाना हो गया। शहर चन्द कोस के फ़ासले पर था। वह जल्दी ही वापिस आ गया और बोला। क़ाज़ी साहब ख़ुद मसरूफ़ थे। उन्होनें आधे घण्टे तक आने का वायदा किया है। आप लोग इन्तेज़ार कीजिये।
एक-एक करके मिनट गिने जाने लगे बेचैनी में उस रास्ते की तरफ़ देखने लगे। जिस तरफ़ से क़ाज़ी साहब को आना था। आधा घण्टा गुज़र गया। फिर एक घण्टा हुआ। लोगो की बेचैनी बढ़ी। सौदागर की परेशानी का ठीकाना नहीं था और भटियारा मूँछों को ताव देता। ख़ुश-ख़ुश फिर रहा था। वक़्त और गुज़रा और डेढ़ घण्टा हो गया।
अचानक बग़दाद की तरफ़ से आने वाले रास्ते पर एक टोपी नज़र आयी। फिर गुदड़ी में लिपटा एक दुखेश नमुदार हुआ।
क़ाज़ी साहब आ गये। क़ाज़ी साहब तशरीफ़ ले आये। उस मुसाफ़िर ने ख़ुशी से नारा मारा।
लोग एहतेरामन उठ गये और उन्होंने हैरत से उस दुखेश को देखा जिसका नाम बोहलोल था। वह गधे से उतरा और अपना असा टेकता दरमियान में आ बैठा। और बोला। हज़रात मैं माज़ेरत ख़ा हूँ के मुझे यहाँ पहुँचने में ताख़ीर हो गई। मुझे इस झगड़े की इत्तेलाअ मिल गई थी। मगर मैं जल्दी नहीं आ सकता था। दर अस्ल मैं मुक़्द्दमों के फ़ैसले करने के अलावा। काश्तकारी भी करता हूँ। आज जब आपका पैग़ाम मुझे मिला तो मैं गेहूँ के बीज उबाल रहा था। क्योंकि आप जानते हैं के गेहूँ के बीज उबाल लिये जायें। तो पैदावार अच्छी होती है। बस वह बीज उबालते उबालते ही मुझे इतनी देर हो गई। मैं एक बार फिर आपसे माफ़ी की ख़ास्तगार हूँ।
मुक़द्दम और हाज़ेरीन हैरान हुए। भटियारे ने ग़ुस्से से कहा। जनाब आप कैसे क़ाज़ी हैं। जो गेहूँ के बीजों को उबाल कर बोते हैं। आपको मुक़द्दमें का फ़ैसला करना है।
क्यों नहीं जनाब। मैं बिल्कुल दुरूस्त फ़ैसला करूगाँ। इन्शाल्लाह। और गेहूँ उबालने पर आपको ताअज्जुब क्यों है। आपके यहाँ तो भुनी हुई मुर्ग़ीयाँ भी अण्डों पर बैठती और चूज़े निकालती हैं। तो उबले हुए गेहूँ क्यों न हरे होंगे।
लोग चौंक गये। मुक़द्दम भी अपनी जानिबदारी पर शर्मिन्दा हुआ और बोला। सुब्हानल्लाह। हुज़ूर आपने तो बात ही बात में फ़ैसला कर दिया।
नहीं अभी फ़ैसला होना बाक़ी है। और वह यह है के भटियारें और सौदागर अपने दिल से रंजिश निकाल दें और दोनों गले मिलें और भटियारा आईंदा भुनी हुई मुर्ग़ियों की औलादों की क़ीमत मुसाफ़िरों से न वुसूल किया करें।
शेख़ जुनैद बग़दादी
शेख़ जुनैद बग़दादी। बग़दाद की गलियों में अपने मुरीदों के हमराह चले जा रहे थे। अचानक उन्होंने मुड़कर कहा। आओ सहरा की जानिब के मुझे वहाँ किसी से मिलना है।
मुरीदों को हैरत हुई। लेकिन उनमें सवाल करने की जुर्अत नहीं थी। वह ख़ामोशी से उनके अक़ब में चलते गये। देखा के ईंट के सरहाने सर रखे एक दुरवेश महवे-इस्तेराहत है। वह अपने आप में इस क़द्र मगन था के उसे शेख़ और उसके मुरीदों के क़दमों की चाप भी सुनाई नहीं दी।
शेख़ ने अदब से सलाम किया।
हज़रत बोहलोल। मेरा सलाम क़ुबूल फ़रमाइये।
बोहलोल ने निगाह उठाई। सलाम का जवाब दिया और बोला। तुम कौन हो।
हुज़ूर मैं जुनैद बग़दादी हूँ।
शेख़ ने तअर्रूफ़ कराया।
अच्छा। मैं समझा। तुम ही अबुल क़ासिम हो। बोहलोल ने सवाल किया।
जी। आप दुरूस्त समझे। शेख़ ने अदब से कहा।
सुना है। तुम लोगों को रूहानी तालीम देते हो। बोहलोल ने पूछा।
जी हाँ। एक नाचीज़ अपनी सी कोशीश करता है। शेख़ ने आजिज़ी से जवाब दिया।
लोगों को तो तुम रूहानी तालीम देते हो। क्या तुम्हें खाना खाने का तरीक़ा मालूम है। बोहलोल ने पूछा।
शेख़ चौंके और सँभल कर बोले। मैं बिस्मिल्लाह कहकर शुरू करता हूँ। अपने सामने से खाता हूँ। छोटे लुक़्में लेता हूँ।
खाने में शरीक लोगों के निवाले नहीं गिनता खाना खाते हुए अल्लाह की हम्द करता हूँ और खाना शुरू करने से पहले और ख़त्म करने से पहले हाथ धोता हूँ।
वाह भाई। क्या कहने। बोहलोल सर झिटक कर उठा और अपना दामन झाड़कर बोला। तुम तो ख़िल्क़त के मुर्शिद बने फ़िरते हो और तुमको अभी तक खाना खाना भी नहीं आता। उसने इतना कहा और आगे बढ़ गया।
शेख़ के मुरीदों को उसका इस तरह कहना बहुत ना-गवार गुज़रा। उन में से एक ग़ुस्से से बोला। पीर व मुर्शिद। यह बोहलोल तो बिल्कुल पागल है। आप इसकी बात का ख़्याल न करे।
शेख़ ने सर हिलाया। यह पागल ज़रूर है। मगर हज़ार दानिशमन्दों पर भारी है। अस्ल हक़ायक़ इसी के पास है। आओ चलो। इससे हमें बहुत कुछ सीखना है।
मुरीद बा-दिले। न-ख़ास्ता शेख़ के साथ चल पड़े। बोहलोल अपनी धुन में मस्त चलता चला गया। शेख़ ने उसे न पुकारा न रोका। यहाँ तक की वह एक वीराने में जा बैठा।
शेख़ मोहतात क़दमो से से उसके क़रीब पहुँचे और उसे फिर सलाम किया।
बोहलोल ने निगाह उठाई और पूछा। तुम कौन हो।
मैं शेख़ बग़दादी हूँ। जो खाना खाना भी नहीं जानता। उन्होंने एअतेराफ़ किया।
बोहलोल ने बेनियाज़ी से कहा। खाना खाना तो तुमको आता नहीं। क्या बात करना आता है।
जी। मेरा ख़्याल है के मैं किसी हद तक बात करना जानता हूँ। शेख़ ने झिझक कर जवाब दिया।
सुब्हानल्लाह बताओ। तुम किस तरह गुफ़्तुगू करते हो। बोहलोल ने पूछा
मैं एअतेदाल की हद तक बात करता हूँ। बे मौक़ा और बहुत ज़्यादा नहीं बोलता। सामेईन की अक़्ल और गुफ़्तुगू के मुताबिक गुफ़्तुगू करता हूँ। दुनिया वालो को अल्लाह और उसके रसूल (स 0 अ 0) की तरफ़ बुलाता हूँ मैं इतना नहीं बोलता के सुनने वाले बेज़ार हो जायें। मैं इतनी गुफ़्तुगू में ज़ाहिरी और बातिनी उलूम की बारीकियों का लिहाज़ भी रखता हूँ।
शेख़ ने कोशीश की इस मर्तबा कोई कसर न रह जाये।
अजीब शख़्स हो तुम। बोहलोल बेज़ारी से उठ ख़ड़ा हुआ।
खाना खाना तो दरकिनार। तुम को तो बात करने की भी तमीज़ नहीं है।
उसने अपना दामन झटका और आगे बढ़ गया।
मुरीदों को सख़्त ना-गवार गुज़रा। उन्होंने घूर कर दूर जाते हुए बोहलोल की तरफ़ देखा और ग़ुस्से से बोले।
ये शेख़। यह दीवाना किस क़द्र ग़ुस्ताख़ है। इसको आपके इल्म और मर्तबे का क्या अन्दाज़ा इसे अपने हाल पर छोड़िये और तशरीफ़ ले चलिये।
नहीं। शेख़ बग़दादी ने कहा। यह दीवाना दानाई का ख़ज़ाना अपने पास रखता है। और मुझे उसी की हाजत है। आओ मेरे साथ।
वे फिर बोहलोल के पीछे चल दिये। कुछ दूर तक बोहलोल अपने ख़याल में मगन चलता चला गया। फिर उसने मुड़कर देखा और बोला। शेख़ बग़दादी। तुम मेरा पीछा क्यों कर रहे हो। न तुमको खाना खाना आता है। न गुफ़्तुगू के आदाब जानते हो। शायद सोने के तौर तरीक़ा भी तुमको नहीं आता होगा।
जैसा मुझे आता है। मैं आपको बताता हूँ। शेख़ ने अदब से कहा।
बताओ। बोहलोल ने ज़मीन पर बैठते हुए कहा।
शेख़ भी बैठ गये और बोले। मै जब इशा की नमाज़ पढ़कर औराद् और वाज़ाएफ़ से फ़ारिग़ हो जाता हूँ। तो सोने के कपड़े पहने लेता हूँ। और उन आदाब को जो रसूलल्लाह और दीन के बुज़ुर्गो के तुफ़ैल हम तक पहुँचे हैं। मल्हूज़े ख़ातिर रखता हूँ।
कमाल है। बोहलोल ने कहा। इन हज़रत को तो सोना भी नहीं आता। उसने उठना चाहा। लेकिन शेख़ बग़दादी ने दामन पकड़ लिया और मिन्नत करने लगा।
जनाब शेख़ बोहलोल। ख़ुदा के लिये तशरीफ़ रखिये और मुझे वे सब तालिम कीजिये जो मैं नहीं जानता।
बोहलोल मुस्कुराया। शेख़। पहले तुम सब जानन् का दावा रखते थे। इसलिये मैंने तुम से किनारा किया। अब तुमने अपनी ना-वाक़फ़ियत का एअतेराफ़ कर लिया है। तो तुमको सिखाने में कोई हर्ज नहीं तो सुनो।
मैं हमा-तन गोश हूँ। शेख़ बग़दादी ने तवज्जोह से कहा।
तुमने खाना खाने के आदाब में जो कुछ बयान किया। वो सब फ़ुरूआत हैं। जबकि उसूल की अहमयित मुसल्लम है। तो खाना खाने के अस्ल आदाब यह है के जो कुछ खाया जाये। वह हलाल और जाएज़ हो। अगर हराम ग़िज़ा को एक हज़ार आदाब के साथ भी खाया जाये। तो वह बे फ़ायदा है और दिल की तारीकी का सबब बनता है। बोहलोल ने बयान किया।
सुब्हानल्लाह। आपने ने मेरी आँखें खोल दी है। जुनैद ने कहा।
बोहलोल ने अपनी बात जारी रखी। बात करने में सबसे पहले क़ल्ब की पाकीज़गी और नियत का दुरूस्त होना ज़रूरी है और वह गुफ़्तुगू ख़ुदा की ख़ुशनूदी के लिये होनी चाहिये। अगर किसी दुनियावी काम की ग़रज़ से होगी। तो चाहे कैसे ही अल्फ़ाज़ चुने जायें। वह मुसीबत ही मुसीबत है इसलिये ख़ामोशी ही में आफ़ियत है।
सोने के बारे में जो कुछ तुमने बयान किया है। वे भी फ़ुरूआत हैं। उसकी अस्ल यह है के सोते वक़्त दिल में किसी भी मुसलमान से बुग़्ज़ , किना और हसद न हो। दिल में दुनिया और माले दुनिया का लालच न हो। और सोते हुए ख़ुदा की याद दिल में हो।
शेख़ बग़दादी ने बे साख़्ता उठकर बोहलोल के हाथ का बोसा दिया। और उसे दुआएं देते हुए रूख़सत हुए। उनके जो मुरीद बोहलोल को दीवाना और पागल समझ रहे थे। उन्हें अपने अमल पर ख़जेलत व शर्मिन्दगी हुई उन्होंने नये सिरे से अपने क़ल्ब की रौशनी को देखना शुरू किया।
अब्दुल्लाह मुबारक
अब्दुल्लाह मुबारक के दिल में बोहलोल से मिलने का शौक़ हुआ। किसी ने बताया के वह सहरा में मिलेगा। अब्दुल्लाह सहरा की तरफ़ रवाना हुआ। एक जगह उसने बोहलोल को देखा के नंगे सर नंगे पाँव या होवा-या होवा पुकार रहा है। वह क़रीब गया और सलाम किया। बोहलोल ने सलाम का जवाब दिया।
अब्दुल्लाह मुबारक बोला। या शेख़ मुझे कुछ नसीहत कीजिए। मुझे बाताइये के ज़िन्दगी को गुनाहों से कैसे पाक करूँ। अपने सरकश नफ़्स से किस तरह बाज़ी ले जाऊँ और क्योंकर राहे निजात इख़्तेयार करूँ।
बोहलोल ने सादगी से कहा। भाई जो ख़ुद आजिज़ और परेशान है। उससे कोई दूसरा क्या उम्मीद रख सकता है। मैं तो दीवाना हूँ। तू जाकर किसी अक़्लमन्द को तलाश कर जो तेरी फ़रमाइश पूरी कर सके।
अब्दुल्लाह ने सीने पर हाथ रखा। बोहलोल इसलिय तो यह नाचीज़ आपकी ख़िदमत में हाज़िर हुआ है के सच्ची बात कहने की जुर्अत तो सिर्फ़ दीवाने रखते है।
बोहलोल ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया और ख़ामोश हो गया। अब्दुल्लाह मिन्नत और ख़ुशामद करने लगा। जब उसने बहुत मजबूर किया। तो बोहलोल बोला।
अब्दुल्लाह मेरी चार शर्ते हैं। अगर तुम क़ुबूल कर लो। तो मैं तुम्हें राहे निजात दिखा दूँगा।
ब-सर-व-चश्म। चार क्या मैं आपकी चार हज़ार शर्ते मानने को तैयार हूँ के राहे निजात तो इसमें सस्ती है। अब्दुल्लाह ने बे-सबरी से कहा।
तो फिर सुन। बोहलोल कहने लगा। मेरी पहली शर्त यह है के जब तू कोई गुनाह करे या ख़ुदा के हुक्म की ना-फ़रमानी करे। तो उसका रिज़्क़ भी मत खा।
अब्दुल्लाह घबराया। यह किस तरह मुमकिन है के कोई ख़ुदा का रिज़्क़ न खाये।
बोहलोल बोला। तो फिर अक़्लमन्द आदमी ख़ुदा की बन्दगी का दावा भी न करो। यह कहाँ का इन्साफ़ है के जिसका खाओ उसी की नमक हरामी करो।
अब्दुल्लाह ने एअतेराफ़ किया। आप सच फ़रमाते हैं। दूसरी शर्त बयान कीजिये।
दूसरी शर्त यह है के जब तू कोई गुनाह करना चाहे। तो ख़ुदा की ज़मीन से निकल जा। के यह दुनिया महज़रे ख़ुदा है। बोहलोल ने कहा।
उफ़ ख़ुदाया। यह शर्त तो बिल्कुल ही ना-क़ाबिले अमल है। ज़मीन के सिवा बन्दा कहाँ रह सकता है। अब्दुल्लाह मुबारक चिल्लाया।
बोहलोल बोला। अब्दुल्लाह इतना परेशान क्यों हो रहा है। क्या तुझमें ज़र्रा बराबर भी इन्साफ़ नहीं है। क्या तेरे ख़याल में यह सही है के बन्दा जिसके मुल्क में रहे। जिसका रिज़्क़ खाये और जिसकी बन्दगी का दावा करे। उसकी ना-फ़रमानी भी करे।
अब्हुल्लाह नादिम हुआ। बोहलोल बेशक आपने सच फ़रमाया। अब तीसरी शर्त भी बयान कीजिये।
बोहलोल बोला। भाई तीसरी शर्त यह है के जब तू कोई गुनाह करने का इरादा करे। या ख़ुदा की ना-फ़रमानी करना चाहे। तो किसी ऐसी जगह जाकर कर जहाँ ख़ुदा तुझे न देख सके न ही तेरे हाल से वाक़िफ़ हो सके। जब तुझे कोई ऐसी जगह मिल जाये जहाँ तुझे ख़ुदा न देखे तो फिर जो तेरा दिल चाहे कर।
अब्दुल्लाह बे हद परेशान हुआ।
जनाब शेख़ बोहलोल। यह शर्त भी वैसी ही कठिन और ना-क़ाबिले अमल है। ख़ुदा तो हाज़िर व नाज़िर है। वह आलिमुल ग़ैब है। वह सब कुछ जानता और देखता है। तो फिर ऐसी कौन सी जगह है जो उससे पोशीदा और ओझल है।
तो अब्दुल्लाह जब तू यह जानता है। के वह हाज़िर व नाज़िर है। तो फिर क्या किसी बन्दे को ज़ेब देता है के वह ख़ुदा की ज़मीन पर रहे। उसका रिज़्क़ खाये और उसके सामने ही उसकी ना-फ़रमानी करे और फिर भी उससे बन्दगी का दावा हो। हालांकि अल्लाहताला क़ुर्आने पाक में फ़रमाता है। यह ख़याल न करो के अल्लाह उस अमल से ग़ाफ़िल है। जो ज़ालिम करते हैं।
अब्दुल्लाह ने पशेमानी से कहा। बोहलोल मैं ला-जवाब हूँ। अब आप अपनी चौथी शर्त बयान करें।
बोहलोल कहने लगा। चौथी शर्त यह है के जिस वक़्त मलकुल-मौत अचानक तेरे पास आये। ताकि ख़ुदा के अम्र को पूरा करें और तेरी रूह क़ब्ज़ करके के ले जाएँ तो तू उस घड़ी मलकुल मौत से कहना। ऐ मलकुल मौत। ज़रा तू ठहर मैं अपने अज़ीज़ो से रूख़सत हो लूँ। और वह तूशा अपने साथ ले लूँ। जो आख़ेरत में मेंरी निजात का सबब हो। तो फिर मेरी रूह क़ब्ज़ करना।
मलकुल मौत कब किसी को मोहलत देता है शेख़ बोहलोल। यह आपने कैसी कड़ी शर्त लगा दी है। अब्दुल्लाह मुबारक ने फ़रियाद की।
तो फिर ऐ दानिशमन्द इस दीवाने की बात सुन। जब तू जानता है के मौत से किसी को मफ़र नहीं। मलकुल मौत किसी को मोहलत नहीं देता। गुनाहों के बीच में किसी वक़्त भी मलकुल मौत सामने आ खड़ा होता है। फिर एक साँस की भी मोहलत नहीं मिलती। जैसा ख़ुदावन्दे आलम ने फ़रमाया है।
जिस वक़्त मौत आयेगी। तो न घड़ी भर की देर होगी , न जल्दी। तो ऐ अब्दुल्लाह तू कब ग़फ़लत से होशियार होगा। देख ग़ुरूरू से दूर रह और आख़ेरत की फ़िक्र न कर। लम्बा सफ़र सामने है और उम्र बहुत मुख़तसर है। जो काम और अमले ख़ैर आज हो सकता है। वह आज कर लो। क्या ख़बर तू कल को न देख सके जो वक़्त हाथ में है वही ग़नीमत है। अमाले ख़ैर की सूरत में आज ही आख़ेरत का तूशा अपने हाथ ले ले। ऐसा न हो कल पछताना पड़े।
अब्दुल्लाह का सर झुकता चला गया और उसकी ज़बान गुंग हो गयी।
बोहलोल ने कहा। अब्दुल्लाह तुमने ख़ुद ही मुझसे नसीहत करने की फ़रमाइश की थी। जो तुम्हें राहे निजात दिखा दे। तुमने अब सर क्यों झुका लिया है। तुम्हारी ज़बान पर ताला क्यों पड़ गया है। तुम आज मेरे सामने ला-जवाब क्यों हो गये हो। तो कल जब रोज़े महशर तुमसे पूछ-ताछ होगी। तो क्या जवाब दोगे। यहाँ इस दुनिया में ही अपना हिसाब साफ़ करो। ताकि कल के ख़ौफ़ से पनाह में रहो।
अब्दुल्लाह ने झुका हुआ सर उठाया और सच्चाई से बोला। जनाब शेख़ बोहलोल मैंने आपकी नसीहत को दिल व जान से सुना है और उसे हिर्ज़े जान बना लूँगा। आपने मुझे अपना मुरीद बना लिया है। लोग तो आपको यूँही दीवाना कहते हैं। वरना कौन नहीं जानता के आले मोहम्मद (अ.स.) की सोहबत और मोहब्बत ने आपको यग़ान-ए-रोज़गार बना दिया है आप पागल नहीं। आले मोहम्मद (अ.स.) के दीवाने है।
बोहलोल ने अपनी गुदड़ी उठाई और यह कहता हुआ चल पड़ा।
बन्दे को लाज़िम है के जो कुछ करे ख़ुदा के हुक्म से करे और जो कुछ कहे सुने ख़ुदा के हुक्म से। क्योंकि वह बन्दगी का दावा रखता है और ख़ुद को ख़ुदा का बन्दा कहता है।
(तमाम)
[[अलहम्दो लिल्लाह किताब पूरी टाईप हो गई खुदा वंदे आलम से दुआगौ हुं कि हमारे इस अमल को कुबुल फरमाऐ और इमाम हुसैन फाउनडेशन को को तरक्की इनायत फरमाए कि जिन्होने इस किताब को अपनी साइट (अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क) के लिऐ टाइप कराया।
सैय्यद मौहम्मद उवेस नक़वी 18.4.2015]
फेहरिस्त
बोहलोल दाना 1
नज्रे-कारेईन 3
उसकी दीवानगी 3
एक बदकिरदार 3
लड़की की विलादत 3
जूते 3
शहर का दरोग़ा 3
नानबाई 3
सोने का सिक्का 3
जूते 3
अबुहनिफा 3
खलीफा का खाना 3
बादशाह की मसनद 3
बोहलोल और हारून 3
जन्नत मे घर 3
बग़दाद का सौदागर 3
बेवकूफ़ ग़ुलाम 3
व्यापारी 3
लूत नबी 3
वज़ीर 3
कबूतर की बीट 3
हारून के दरबार मे हाज़री 3
बोहलोल के घर चोरी 3
मकान का सजदा 3
मुसाफिर आलिम 3
मशहूर फ़क़ीह 3
हारून के सवाल 3
अमीन-मामून 3
नूजुमी 3
हिन्दुस्तान 3
शिकारी 3
हकीम 3
शिकार 3
पुले सिरात 3
फज़ल बिन रबी 3
ख़ुदा का घर 3
ऊँट की खुजली 3
गधे की बात पर भरोसा 3
हम्माम 3
अजनबी की अमानत 3
पढ़ा लिखा गधा 3
हिन्दुस्तानी सौदागर 3
शेख़ जुनैद बग़दादी 3
अब्दुल्लाह मुबारक 3
फेहरिस्त 3