तौज़ीहुल मसाइल
लेखक: आयतुल्लाहिल उज़्मा आक़ाए हाज सैय्यद अली हुसैनी सीस्तानी दामा ज़िल्लाहुल वारिफ़तौज़ीहुल मसाइल
तौज़ीहुल मसाइल
मुताबिक़े फ़तावाए
ज़ईमुल हौज़ातुल इल्मीयह आयतुल्लाहिल उज़्मा
आक़ाए हाज सैय्यद अली हुसैनी सीस्तानी दामा
ज़िल्लाहुल वारिफ़
(अनुवादकः- सैय्यद मौ0 हामिद रिज़वी करारवी)
अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क
मुकद्देमा
यह किताब शीओं के मर्जेए आला हज़रत आयतुल्लाहिल उज़्मा आक़ाए सैय्यद अली हुसैनी सीस्तानी मद्देज़िल्लहुल आली के फ़तवों पर मुश्तमिल है ताकि आपके मुक़ल्लिदीन रोज़मर्रा पेश आने वाले मसाइल का शरई हुक्म मालूम कर सकें।
मुज्तहिद की तक़लीद
हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ0) इर्शाद फ़रमाते हैः-
"लोगो को चाहिये कि फ़ुक़हा (यानी अहकामे शरीयत को तफ़सील व तहक़ीक़ (विस्तार एवं शोध) के साथ जानने वाले मुज्ताहिदीन) में से जो शख़्स (व्यक्ति) अपने को गुनाहों से बचाता हो और अपने दीन की हिफ़ाज़त (धर्म की रक्षा) करता हो (यानी दीन पर सख़्ती से क़ायम हो) अपनी नफ़्सानी ख़्वाहिशात का ग़ुलाम न हो और ख़ुद अहकामी इलाही की इताअत करता हो, उसकी तक़लीद करे।" इसके बाद इमाम (अ0) ने फ़रमाया "ये औसाफ़ चन्द शीअः फ़ुक़हा में हैं, सब में नहीं ।" (एहतिजाजे तबरी जिल्द 2 सफ़्हा 263) ।
वलीय अस्र हज़रत इमाम महदी अज्जलल्लाहो तआला फ़राजुम शरीफ़ फ़रमाते हैः-
"ग़ैबते कुबरा (दीर्घकालीन परीक्षा) के ज़माने में पेश आने वाले हालात के सिलसिले में हमारी हदीसों (कथनों) को बयान करने वाले रावियों की तरफ़ रूजुउ करो क्योंकि वह हमारी तरफ़ से तुम पर उसी तरह हुज्जत हैं जिस तरह हम अल्लाह की तरफ़ से हुज्जत हैं ।" (कमालुद्दीन व तमामुन्नेम शैख़ सदूक़ रह0)
आइम्मा किराम (अ0) के मुन्दरिजा बाला फ़रमूदात (आज्ञाओं) के पेशे नज़र उन तमाम लोंगो पर जो दरजाए इज्तिहाद पर फ़ाइज़ नहीं हैं अपने ज़माने के जामेउश्शराइत मुज्तहिद (वह मुज्तहिद जिसमें सभी शर्तें पाईं जाती हों) की तक़लीद करना वाजिब (अनिवार्य) है क्योंकि इसके बग़ैर उनकी इबादात और ऐसे तमाम आमाल जिन में तक़लीद ज़रूरी है बातिल हो जाते हैं।
इस्लामे अज़ीज़ (सम्मानित इस्लाम) की शरीअते गुर्रह के फ़ुरूईमसाइल का तफ़्सीली मआख़िज़ (क़ुरआन, हदीस, इजमाअ, अक़्ल) से शरई हुक्म इस्तिबाद करने का नाम इज्तिहाद है और मुज्ताहिद के बताए हुए फ़तवों को बग़ैर दलील के जानना और उन पर अमल करना तक़लीद है। जो शख़्स रूत्बाए इज्तिहादी हासिल कर चुका हो उसके लिये तक़लीद करना जाएज़ नहीं, अलबत्ता जो ख़ुद मुज्तहिद न हो उस पर तक़लीद करना वाजिब है।
अगरचे इज्तिहाद और तक़लीद के अलावा एक तीसरी सूरत भी मुम्किन है यानी यह कि एहतियात पर अमल किया जाए लेकिन यह हर के बस की बात नहीं है। एहतियात पर वही शख़्स अमल कर सकता है जो मुख़्तलिफ़ मसाइल में तमाम मुजतहिदीन के इख़्तिलाफ़ी फ़तवों से पूरी तरह बाख़बर हो और ऐसा तरीक़ा ए अमल इख़्तियार कर सके जिसमें जामेईयत पाई जाती हो। ज़ाहिर है कि यह काम भी तक़रीबन इज्तिहाद ही की तरह दुश्वार और मुश्किल है। पस हमारे लिये दो ही सूरतें बाक़ी रह जाती हैं यानी या मुज्ताहिद बनें या फिर मुज्ताहिद की तक़लीद करें । (इदारः)
अक़वाले ज़र्री
(स्वर्णिम कथन)
"क्या तुमने पूरी तरह समझ लिया है कि इस्लाम क्या है? यह एक ऐसा दीन (धर्म) है जिसकी बुनियाद हक़ व सदाक़त (यथार्थ एवं सत्य) पर रखी गई है। यह इल्म (ज्ञान) का ऐसा सरचश्मा बृहत श्रोत) है जिसमें अक़्ल व दानिश (बुध्दि एवं विवेक) की मुतअद्दिद नदियां (अनेकों धाराऐं) फूटती हैं। यह एक ऐसा चिराग़ (दीप) है जिससे कई चिराग़ (अनेकों दीप) रौशन (ज्वलित) होंगे। यह एक बलन्द रहनुमा मिनार है जो अल्लाह की राह (मार्ग) को रौशन करता है। यह उसूलों और एतिक़ादात (सिध्दान्तों एवं श्रध्दाओं) का एक ऐसा मजमूआ (संकलन) है जो सदाक़त और हक़ीक़त (सत्य एवं यथार्थ) के हर मुतलाशी (खोज करने वाले) को इत्मीनान बख़्शता (सन्तुष्टि प्रदान) करता है।
ऐ लोगों ! जान लो कि अल्लाह तआला ने अपनी बरतरीन ख़ुशनूदी की जानिब एक शानदार रास्ता और अपनी बन्दगी और इबादत का बलन्द तरीन मेयार क़रार दिया है। उसने इसे अअला अहकाम, बलन्द उसूलों, मुहकम दलाइल, नाक़ाबिले तरदीद तफ़व्वुक़ और मुसल्लिमः दानिश से नवाज़ा है।
अब यह तुम्हारा काम है कि अल्लाह तआला ने उसे जो शान एवं अज़मत (वैभव एवं प्रतिभा) बख़्शी (प्रदान की) है उसे क़ायम रखो। उस पर ख़ुलूसे दिल से (सहृदयतः) असल करो। उसके मोतक़िदात से इन्साफ़ करो। उसके अहकाम और फ़रामीन की सहीह तौर पर तअमील (परिपालन) करो और अपनी ज़िन्दगीयों में उसे मुनासिब मक़ाम (उचित स्थान) दो।"
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
अल हम्दुलिल्लाहे रब्बिल आलमीन, वस्सलातो वस्सलामो अला अशरफ़िल अंबियाए वल मुरसलीन मोहम्मदिंव्व व आलेहित- तैयिबीनत्ताहिरीन, वल्लअनतुद्दाइमतो अला अअदाइहिम अजमईन मिनल आन इला क़ियामें यौमिद्दीन!
अहकामे तक़लीद
मस्अला नं0 1. हर मुसलमान के लिये उसूले दीन को अज़ रूए बसीरत (विवेक के आधार पर) जानना ज़रूरी है क्योंकि उसूले दीन में किसी तौर पर तक़लीद नहीं की जा सकती। यानी (अर्थात) यह नहीं हो सकता कि कोई शख़्स उसूले दीन में किसी की बात सिर्फ़ इस वजह से माने कि वह उन उसूलों को जनता है। लेकिन अगर कोई शख़्स इस्लाम के बुनियादी अक़ाइद पर यक़ीन रखता हो और उसका इज़हार करता हो अगरचे यह इज़हार अज़ रूए बसीरत (विवेक के आधार पर) न हो तब भी वह मुसलमान और मोमिन है। लिहाज़ा उस मुसलमान पर ईमान और इस्लाम के तमाम अहकाम जारी होंगे। लेकिन "मुसल्लिमाते दीन" को छोड़ कर बाक़ी दीनी अहकामात में ज़रूरी है कि इन्सान या तो ख़ुद मुज्ताहिद की तक़लीद करे या अज़राहे अहतियात अपना फ़रीज़ा यूं अदा करे कि उसे यक़ीन हो जाए कि उसने अपनी शरई ज़िम्मेदारी पूरी कर दी है। मसलन अगर चन्द मुज्तहिद किसी अमल को हराम क़रार दें और चन्द दूसरें कहें की हराम नहीं है तो उस अमल से बाज़ रहे, और अगर बाज़ मुज्ताहिद किसी अमल को वाजिब और बाज़ मुस्तहब गरदानें तो उसे बजा लाए। लिहाज़ा जो अश्ख़ास न तो मुज्तहिद हों और न ही एहतियात पर अमल पैरा हो सकें उनके लिये वाजिब है कि मुज्ताहिद की तक़लीद करें।
मस्अला नं0 2. दीनी अहकामात में तक़लीद का मतलब यह है कि किसी मुज्तहिद के फ़त्वे पर अमल किया जाए और ज़रूरी है कि जिस मुज्ताहिद की तक़लीद की जाए वह मर्द, बालिग़, आक़िल, शीअः इसना अशरी, हलाल ज़ादा, ज़िन्दा और आदिल हो। आदिल वह शख़्स है जो तमाम वाजिब कामों को बजा लाए और तमाम हराम कामों को तर्क (त्याग) करे। आदिल होने की निशानी यह है कि वह बज़ाहिर (प्रत्यक्ष में) एक अच्छा शख़्स हो और उसके अहले मोहल्ला हमसायों या हम नशीनों से उसके बारे में दर्याफ़्त किया जाए तो वह उसकी इच्छाई की तस्दीक़ करें। अगर यह बात इज्मालन (संक्षेप में) मालूम हो कि दरपेश मसाइल में मुज्तहिदीन के फ़त्वे एक दूसरे से मुख़्तलिफ़ हैं तो ज़रूरी है कि उस मुज़्तहिद की तक़लीद की जाए, "अअलम" हो याअनी अपने ज़माने के दूसरे मुज्तहिदों के मुक़ाबले में अहकामे इलाही को समझने की बेहतर सलाहीयत (योग्यता) रखता हो।
3. मुज्तहिद और अअलम की पहचान तीन तरीक़ों से हो सकती है (अव्वल) एक शख़्स पर जो ख़ुद साहबे इल्म हो ज़ाती तौर पर (व्यक्तिगत रूप से) यक़ीन हो और वह मुज्तहिद और अअलम को पहचान्ने की सलाहियत रखता हो। (दोयम) दो अशख़ास जो आलिम और आदिल हों नीज़ मुज्तहिद या अअलम को पहचानने का मलका (दक्षता) रखतें हो, किसी के मुज्तहिद या अअलम होने की तस्दीक़ करें। बशर्ते की दो और आलिम और आदिल उनकी तरदीद न करें और बज़ाहिर किसी का मुज्तहिद या अअलम होना एक क़ाबिले एतेमाद शख़्स के क़ौल से भी साबित हो जाता है। (सोयम) कुछ अहले इल्म (अहले ख़ुबरः) जो मुज्तहिद और अअलम को पहचानने की सलाहीयतर रखते हों, किसी के मुज्तहिद या अअलम होने की तस्दीक़ करें और उनकी तस्दीक़ से इन्सान मुत्मइन हो जाए।
4. अगर दरपेश मसाइल में दो या उससे ज़्यादा मुज्तहिदीन के इख़तिलाफ़ी फ़त्वे इज्माली तौर पर मअमूल हों और बाज़ के मुक़ाबिले में बाज़ दूसरों का अअलम होना भी मालूम हों और लेकिन अगर अअलम की पहचान आसान न हो तो अहवत यह है कि आदमी तमाम मसाइल में उनके फ़त्वों में जितना हो सके एहतियात करें (यह मस्अला तफ़सीली है और उसके बयान का यह मक़ाम नहीं है) और ऐसी सूरत में जबकि एहतियात मुम्किन न हो तो ज़रूरी है कि उसका अमल उस मुज्तहिद के फ़त्वे के मुताबिक़ हो, जिसके अअलम होने का एहतिमाल दूसरे के मुक़ाबिले में ज़्यादा हो। अगर दोनों के अअलम होने का एहतिमाल यकसां हो तो उसे इख़्तियार है (कि जिसके फ़त्वे पर चाहे अमल करे।)
5. किसी मुज्तहिद का फ़त्वा हासिल करने के चार तरीक़े हैं (अव्वल) ख़ुद मुज्तहिद से (उसका फ़त्वा) सुनना। (दोयम) ऐसे दो आदिल अशख़ास से सुनना जो मुज्तहिद का फ़त्वा बयान करें। (सोयम) (मुजतहिद) का फ़त्वा किसी ऐसे शख़्स से सुनना जिसके क़ौल पर इत्मिनान हो। (चहारूम) मुज्ताहिद की किताब (मसलन तौज़ीहुल मसाइल) में पढ़ना, बशर्ते कि उस किताब की सेहहत के बारे में इत्मीनान हो।
6. जब तक इन्सान को यह यक़ीन न हो जाए कि मुज्तहिद का फ़त्वा बदल चुका है वह किताब में लिखे हुए फ़त्वे पर अमल कर सकता है और अगर फ़त्वे के बदल जाने का एहतिमाल हो तो छान बीन करना ज़रूरी नहीं।
7. अगर मुज्तहिदे अअलम कोई फ़त्वा दे तो उसका मुक़ल्लिद उस मस्अले के बारे में किसी दूसरे मुज्तहिद के फ़त्वे पर अमल नहीं कर सकता । ताहम अगर वह (यानी मुज्तहिदे अअलम) फ़त्वा न दे बल्कि यह कहे कि एहतियात इसमें है कि यूं अमल किया जाए मसअलन एहतियात इसमें है कि नमाज़ की पहली और दूसरी रक्आत में सूराए अलहम्द के बाद एक और पूरी सूरत पढ़े तो मुक़ल्लिद को चाहिये कि या तो उस एहतियात पर जिसे एहतियाते वाजिब कहते हैं, अमल करे या किसी ऐसे दूसरे मुज्तहिद के फ़त्वे पर अमल करे जिसकी तक़लीद जाएज़ हो (मसलन फ़लअअलम) पस अगर वह (यानी दूसरा मुज्तहिद) फ़क़त सूराए अलहम्द को काफ़ी समझता हो तो दूसरी सूरत तर्क की जा सकती है। जब मुज्तहिदे अअलम किसी मस्अले के बारे में कहे कि महल्ले तअम्मुल या महल्ले इश्क़ाल है तो उसका भी यही हुक्म है।
8. अगर मुज्तहिदे अअलम किसी मस्अले के बारे में फ़त्वा देने के बाद या उससे पहले एहतियात लगाए मसलन यह कहे कि नजीस बर्तन कुर पानी में एक मर्तबा धोने से पाक हो जाता है अगरचे एहतियात इस में है कि तीन मर्तबा धोए तो मुक़ल्लिद ऐसी एहतियात को तर्क कर सकता है इस क़िस्म की एहतियात को एहतियाते मुस्तहब कहते हैं।
9. अगर वह मुज्तहिद जिसकी एक शख़्स तक़लीद करता है फ़ौत हो जाए तो जो हुक्म उसकी ज़िन्दगी में था वही हुक्म उसकी वफ़ात के बाद भी है। बिनाबरीं अगर मरहूम मुज्तहिद ज़िन्दा मुज्तहिदीन के मुक़ाबिले में अअलम था तो वह शख़्स जिसे दरपेश मसाइल में दोनों मुज्तहिदीन के माबैन इख़तिलाफ़ का अगरचे इजमाली तौप पर इल्म हो उसे मरहूम मुज्तहिद की तक़लीद पर बाक़ी रहना ज़रूरी है। और अगर ज़िन्दा मुज्तहिद अअलम हो तो फिर ज़िन्दा मुज्तहिद की तरफ़ रूजुउ करना ज़रूरी है। इस मस्अले में तक़लीद से मुअय्यन मुज्तहिद के फ़त्वे की पैरवी करने (क़स्देरूजूउ) को सिर्फ़ अपने लिये लाज़िम क़रार देना है न कि उसके हुक्म के मुताबिक़ अमल करना।
10. अगर को शख़्स किसी मस्अले में एक मुज्तहिद के फ़त्वे पर अमल करे फिर उस मुज्तहिद के फ़ौत हो जाने के बाद वह उसी मसअले में ज़िन्दा मुज्तहिद के फ़त्वे पर अमल कर ले तो उसे इस अम्र की इजाज़त नहीं कि दोबारा मरहूम मुज्तहिद के फ़त्वे पर अमल करे।
11. जो मसाइल इन्सान को अक्सर पेश आते रहते हैं उनको याद कर लेना वाजिब है।
12. अगर किसी शख़्स को कोई ऐसा मस्अला पेश आए जिसका हुक्म उसे मालूम न हो तो लाज़िम है कि एहतियात करे या उन शरायत के मुताबिक़ तक़लीद करे जिनका ज़िक्र ऊपर आ चुका है। लेकिन अगर इस मस्अले में उसे अअलम के फ़त्वे का इल्म न हो और अअलम और ग़ैर अअलम की आरा के मुख़्तलिफ़ होने का मुज्मिलन इल्म हो तो ग़ैर अअलम की तक़लीद जाइज़ है।
13. अगर कोई शख़्स मुज्तहिद का फ़त्वा किसी दूसरे शख़्स को बताए लेकिन मुज्तहिद ने अपना साबिक़ा फ़त्वा बदल दिया हो तो उसके लिये दूसरे शख़्स को फ़त्वे की तब्दीली की इत्तिला देना ज़रूरी नहीं। लेकिन अखर फ़त्वा बताने के बाद यह महसूस हो कि (शायद फ़त्वा बताने में) ग़लती हो गई है और अगर अन्देशा हो कि इस इत्तिला की वजह से वह शख़्स अपने शरई वज़ीफ़े के ख़िलाफ़ अमल करेगा तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर जहाँ तक हो सके उस ग़लती का इज़ालः करें।
14. अगर कोई मुक़ल्लफ़ एक मुद्दत तक किसी की तक़लीद के बग़ैर अअमाल बजा लाता रहे लेकिन बाद में किसी मुज्तहिद की तक़लीद कर ले तो इस सूरत में अगर मुज्तहिद उसके गुज़श्ता अअमाल के बारे में हुक्म लगाए कि वह सहीह है तो वह सहीह मुतसव्वर होंगे वरना बातिल शुमार होंगे।
अह्कामे तहारत
मुत्लक़ और मुज़ाफ़ पानी
15. पानी या मुत्लक़ होता है या मुज़ाफ़ । "मुज़ाफ़" वह पानी है जो किसी चीज़ से हासिल किया जाए मसलन तरबूज़ का पानी (नारियल का पानी), गुलाब का अर्क़ (वग़ैरह) । उस पानी को भी मुज़ाफ़ कहते हैं जो किसी दूसरी चीज़ से आलूदा हो मसलन गदला पानी जो इस हद तक मैला हो कि फिर उसे पानी न कहा जा सके। इनके अलावा जो पानी हो, उसे "आबे मुत्लक़" कहते हैं और उसकी पांच क़िस्में होती हैः
(अव्वल) कुर पानी, (दोयम) क़लील पानी, (सोयम) जारी पानी, (चहारूम) बारिश का पानी, (पंजुम) कुयें का पानी।
1. कुर पानीः-
16. मशहूर क़ौल की बिना पर कुर इतना पानी है जो एक ऐसे बर्तन को भर दे जिसकी लम्बाई, चौड़ाई और गहराई हर एक साढ़े तीन बालिश्त हो और इस बिना पर उसका मज्मूआ ज़र्ब (गुणा) 42.87 (=42587) बालिश्त होना ज़रूरी है लेकिन ज़ाहिर यह है कि अगर छत्तीस बालिश्त भी हो तो काफ़ी है। ताहम कुर पानी का वज़न के लिहाज़ से तअय्युन करना इश्क़ाल से ख़ाली नहीं है।
17. अगर कोई चीज़ ऐने नजीस हो मसलन पेशाब या ख़ून या वह चीज़ जो नजिस हो गई हो जैसे कि नजिस लिबास ऐसे पानी में गिर जाए जिसकी मिक़्दार एक कुर के बराबर हो और उसके नतीजे में नजासत की बू, रंग या ज़ाइक़ा पानी में सरायत कर जाए तो पानी नजिस हो जायेगा। लेकिन अगर ऐसी कोई तब्दीली वाक़े न हो तो नजिस नहीं होगा।
18. अगर ऐसे पानी की बू, रंग या ज़ाइक़ा जिसकी मिक़्दार एक कुर के बराबर हो नजासत के अलावा किसी और चीज़ में तब्दील हो जाए तो वह पानी नजिस नहीं होगा।
19. अगर कोई ऐने नजासत मसलन ख़ून ऐसे पानी में जा गिरे जिसकी मिक़्दार एक कुर से ज़्यादा हो और उसकी बू, रंग या ज़ाइक़ा तब्दील कर दे तो उस सूरत में अगर पानी के उस हिस्से की मिक़दार जिसमें कोई तब्दीली वाक़े नहीं हुई एक कुर से कम हो तो सारी पानी नजिस हो जायेगा लेकिन अगर उसकी मिक़्दार एक कुर या उससे ज़्यादा हो तो सिर्फ़ वह हिस्सा नजिस मुतसव्वर होगा जिसकी बू, रंग या ज़ाइक़ा तब्दील हुआ है।
20. अगर फ़व्वारे का पानी (यानी वह पानी जो जोश मार कर फ़व्वारे की शक्ल में उछले) ऐसे दूसरे पानी से मुत्तसिल हो (मिले) जिसकी मिक़दार (मात्रा) एक कुर के बराबर हो तो फ़व्वारे का पानी नजीस पानी को पाक कर देता है। लेकिन अगर नजिस पानी पर फ़व्वारे के पानी का एक क़तरा (बूंद) गिरे तो उसे पाक नहीं करता, अलबत्ता अगर फ़व्वारे के सामने कोई चीज़ रख दी जाए जिसके नतीजे में उसका पानी क़तरा क़तरा होने से पहले नजिस पानी से मुत्तसिल हो जाए तो नजिस पानी को पाक कर देता है और बहतर यह है कि फ़व्वारे का पानी नजिस पानी से मख़लूत हो जाए।
21. अगर किसी नजिस चीज़ को ऐसे नल के नीचें धोयें जो ऐसे (पाक) पानी से मिला हुआ हो जिसकी मिक़दार (मात्रा) एक कुर के बराबर हो और उस चीज़ की धोवन उस पानी से मुत्तासिल हो जाए जिसकी मिक़दार कुर के बराबर हो तो वह धोवन पाक होगी बशर्ते की उसमें नजासत की बू, रंग या ज़ाइक़ा पैदा न हो और न ही उसमें ऐने नजासत की आमेज़िश (मिलावट) हो।
22. अगर कुर पानी का कुछ हिस्सा जमकर बर्फ़ बन जाए और कुछ हिस्सा पानी की शक्ल में बाक़ी बचे जिसकी मिक़दार एक कुर से कम हो तो जो भी कोई नजासत उस पानी को छुएगी वह नजीस हो जाएगा और बर्फ़ पिघलने पर जो पानी बनेगा वह भी नजिस होगा।
23. अगर पानी की मिक़दार (मात्रा) एक कुर के बराबर हो और बाद में शक हो कि आया अब भी कुर के बराबर है या नहीं तो उसकी हैसियत अब भी एक कुर पानी ही की होगी यानी वह नजासत को भी पाक करेगा और नजासत के इत्तिसाल से नजिस भी नहीं होगा। इसके बर अक्स (विपरीत) जो पानी एक कुर से कम था अगर उसके मुतअल्लिक़ शक हो कि अब उसकी मिक़दार एक कुर के बराबर हो गई है या नहीं तो उसे एक कुर से कम ही समझा जाऐगा।
24. पानी का एक कुर के बराबर होना दो तरीक़ों से साबित हो सकता है (अव्वल) इन्सान को ख़ुद उसके बारे में यक़ीन या इत्मिनान हो, (दोयम) दो आदिल मर्द इस बारे में ख़बर दें।
2. क़लील पानीः-
25. ऐसे पानी को "क़लील पानी" कहते हैं जो ज़मीन से न उबले और जिसकी मिक़दार एक कुर से कम हो। और
26. जब क़लील पानी किसी नजिस चीज़ पर गिरे या कोई नजिस चीज़ उस पर गिरे तो पानी नजिस हो जाएगा। अलबत्ता अगर पानी नजिस चीज़ पर ज़ोर से गिरे तो उसका जितना हिस्सा नजिस चीज़ से मिलेगा नजिस हो जाएगा लेकिन बाक़ी पाक होगा।
27. जो क़लील पानी किसी चीज़ पर ऐने नजासत दूर करने के लिये डाला जाए वह नजासत से जूदा हो जाने के बाद नजिस हो जाता है। और इसी तरह वह क़लील पानी जो ऐने नजासत के अलग हो जाने के बाद नजिस चीज़ को पाक करने के लिये उस पर डाला जाए उससे जुदा हो जाने के बाद बिनाबर सहतियाते लाज़िम मुतलक़न नजिस है।
28. जिस क़लील पानी से पेशाब या पख़ाने के मख़ारिज धोए जाएं वह अगर किसी चीज़ को लग जायें तो पांच शराइत के साथ उसे नजिस नहीं करेगाः-
(अव्वल) पानी में नजासत की बू, रंग या ज़ाइक़ा न पैदा हुआ हो। (दोयम) बाहर से कोई नजासत उससे न आ मिली हो। (सोयम) कोई और नजासत (मसलन ख़ून) पेशाब या पख़ाने के साथ न ख़ारिज हुई हो। (चहारूम) पख़ाने के ज़र्रे पानी में दिखाई न दें। (पंजुम) पेशाब या पख़ाने के मख़ारिज पर मअमूल से ज़्यादा नजासत न लगी हो।
3. जारी पानीः-
जारी पानी वह है जो ज़मीन से उबले और बहता हो मसलन चश्मे का पानी या कारेज़ का पानी।
29. जारी पानी अगरचे कुर से कम ही क्यों न हो नजासत के आ मिलने से तब तक नजिस नहीं होता जब तक नजासत की वजह से उसकी बू, रंग या ज़ाइक़ा बदल न जाए।
30. अगर नजासत जारी पानी से आ मिले तो उसकी उतनी मिक़दार, जिसकी बू, रंग या ज़ाइक़ा नजासत की वजह से बदल जाए, नजिस है। अलबत्ता उस पानी का वह हिस्सा जो चश्में से मुत्तसिल हो पाक है, ख़्वाह उसकी मिक़दार कुर से कम ही क्यों न हो। नदी की दूसरी तरफ़ का पानी अगर एक कुर जितना हो या उस पानी के ज़रिये जिसमें (बू, रंग या ज़ाइक़ा की) कोई तब्दीली वाक़े नहीं हुई चश्मे की तरफ़ के पानी से मिला हुआ हो तो पाक है वरना नजिस है।
31. अगर किसी चश्मे का पानी जारी न हो लेकिन सूरते हाल यह हो कि जब उसमें से पानी निकाल लें तो दोबारा उसका पानी उबल पड़ता हो तो वह पानी जारी पानी का हुक्म नहीं रखता यानी अगर नजासत उससे आ मिले तो नजिस हो जाता है।
32. नदी या नहर के किनारे का पानी जो साकिन (ठहरा) हो और जारी पानी से मुत्तसिल (मिला) हो, जारी पानी का हुक्म नहीं रखता।
33. अगर एक ऐसा चश्मा हो जो मिसाल के तौर पर सर्दियों में उबल पड़ता हो लेकिन गर्मियों में उसका जोश ख़त्म हो जाता हो उसी वक़्त जारी पानी के हुक्म में आयेगा जब उसका पानी उबल पड़ता हो।
34. अगर किसी (तुर्की या ईरानी तर्ज़ के) हम्माम के छोटे हौज़ का पानी एक कुर से कम हो लेकिन वह ऐसे "वसीलाए आब" (जल साधन) से मुत्तसिल (मिला) हो जिसका पानी हौज़ के पानी से मिलकर एक कुर बन जाता हो तो जब तक नजासत के मिल जाने से उसकी बू और ज़ाइक़ा तब्दील न हो जाए वह नजिस नहीं होता।
35. हम्माम और बिल्डिंग के नल्कों का पानी जो टोंटियों और शावरों के ज़रीये बहता है अगर उस हौज़ के पानी से मिलकर जो उन नल्कों से मुत्तसिल हों एक कुर के बराबर हो जाए तो नल्कों का पानी भी कुर पानी के हुक्म में शामिल होगा।
36. जो पानी ज़मीन पर बह रहा हो लेकिन ज़मीन से उबल न रहा हो अगर वह एक कुर से कम हो और उसमें नजासत मिल जाए तो वह नजिस हो जाए गा लेकिन अगर वह पानी तेज़ी से बह रहा हो और मिसाल के तौर पर अगर नजासत उसके निचले हिस्से को लगे तो उसका ऊपर वाला हिस्सा नजिस नहीं होगा।
4. बारिश का पानीः-
37. जो चीज़ नजिस हो और ऐने नजासत उसमें न हो उस पर जहां जहां एक बार बारिश हो जाए पाक हो जाती है। लेकिन अगर बदन और लिबास पेशाब से नजिस हों जाएं तो बिनाबरे एहतियात उन पर दो बार बारिश होना ज़रूरी है मगर क़ालीन और लिबास वग़ैरह का निचोड़ना ज़रूरी नहीं है। लेकिन हल्की सी बूंदा बांदी काफ़ी नहीं बल्कि इतनी बारिश लाज़िमी है कि लोग कहें कि बारिश हो रही है।
38. अगर बारिश का पानी ऐने नजिस पर बरसे और फिर दूसरीं जगह छींटे पड़ें लेकिन ऐने नजासत उसमें शामिल न हों और नजासत की बू, रंग या ज़ाइक़ा भी उसमें पैदा न हो तो वह पानी पाक है। पस अगर बारिश का पानी ख़ून पर बरसने से छींटे पड़ें और उनमें ख़ून के ज़र्रात शामिल हों या ख़ून की बू, रंग या ज़ाइक़ा पैदा हो गया हो तो वह पानी नजिस होगा।
39. अगर मकान की अन्दरूनी या पूरी छत पर ऐने नजासत मौजूद हो तो बारिश के दौरान जो पानी नजासत को छू कर अन्दरूनी छत से टपके या परनाले से गिरे वह पाक है। लेकिन जब बारिश थम जाए और यह बात इल्म में आए कि अब जो पानी गिर रहा है वह किसी नजासत को छू कर आ रहा है, तो वह पानी नजिस होगा।
40. जिस नजिस ज़मीन पर बारिश बरस जाए वह पाक हो जाती है और अगर बारिश का पानी ज़मीन पर बहने लगे और अन्दरूनी छत के उस मक़ाम पर जा पहुँचें जो नजिस है तो वह जगह भी पाक हो जायेगी बशर्ते की हनूज़ (अब तक) बारिश हो रही हो।
41. नजिस मिट्टी के तमाम अज्ज़ा (अंशों) तक पानी पहुंच जाए तो मिट्टी पाक हो जायेगी।
42. अगर बारिश का पानी एक जगह जमाअ हो जाए ख़्वाह (चाहे) एक कुर से कम ही क्यों न हो बारिश बरसने के वक़्त वह (जमअशुदा पानी) कुर का हुक्म रखता है और कोई नजिस चीज़ उसमें धोई जाए और पानी नजासत की बू, रंग या ज़ाइक़ा क़बूल न करे तो वह नजिस चीज़ पाक हो जायेगी।
43. अगर नजिस ज़मीन पर बिछे हुए पाक क़ालीन (या दरी) पर बारिश बरसे और उसका पानी बरसने के वक़्त क़ालीन से नजिस ज़मीन पर पहुंच जाए तो क़ालीन भी नजिस नहीं होगा और ज़मीन भी पाक हो जायेगी।
5. कुयें का पानीः-
44. एक ऐसे कुयें का पानी जो ज़मीन से उबलता हो अगरचे मिक़दार में एक कुर से कम हो नजासत पड़ने से उस वक़्त तक नजिस नहीं होगा जब तक उस नजासत से उसकी बू, रंग या ज़ाइक़ा बदल न जाए लेकिन मुस्तहब यह है कि बाज़ नजासतों के गिरने पर कुयें से इतनी मिक़्दार में पानी निकाल दें जो मुफ़स्सल किताबों में दर्ज है।
45. अगर कोई नजासत कुयें में गिर जाए और उसके पानी के बू, रंग या ज़ाइक़े को तब्दील कर दे तो जब कुयें के पानी में पैदाशुदा यह तब्दीली ख़त्म हो जायेगी पानी पाक हो जायेगा और बहतर यह है कि वह पानी कुयें से उबले वाले पानी में मख़लूत हो जाए।
46. अगर बारिश का पानी एक गढ़े में जमअ हो जाए और उसकी मिक़्दार एक कुयें से कम हो तो बारिश थमने के बाद नजासत की आमेज़िश से वह पानी नजिस हो जायेगा।
पानी के अह्कामः-
47. मुज़ाफ़ पानी (जिसके मअनी मस्अला न0 15 में बयान हो चुके हैं) किसी नजिस चीज़ को पाक नहीं करता, ऐसे पानी से वुज़ू और ग़ुस्ल करना भी बातिल है।
48. मुज़ाफ़ पानी की मिक़्दार (मात्रा) अगरचे एक कुर के बराबर हो अगर उसमें नजासत का एक ज़र्रा भी पड़ जाए तो नजिस हो जाता है। अलबत्ता अगर ऐसा पानी किसी चीज़ पर ज़ोर से गिरे तो उसका जितना हिस्सा नजिस चीज़ से मुत्तासिल होगा नजिस हो जायेगा और जो मुत्तासिल नहीं होगा वह पाक होगा मसलन अगर अर्क़े गुलाब को गुलाब दान से नजिस हाथ पर छिड़का जाए तो उसका जितना हिस्सा हाथ को लगेगा नजिस होगा और जो नहीं लगेगा वह पाक होगा।
49. अगर वह मुज़ाफ़ पानी जो नजिस हो एक कुर के बराबर पानी या जारी पानी में यूं मिल जाए कि फिर उसे मुज़ाफ़ पानी न कहा जा सके तो वह पाक हो जायेगा।
50. अगर एक पानी मुतलक़ था और बाद में उसके बारे में यह मालूम न हो कि मुज़ाफ़ हो जाने की हद तक पहुंचा है या नहीं तो वह मुतलक़ पानी मुतसव्वर होगा यानी नजिस चीज़ को पाक करेगा और उससे वुज़ू और ग़ुस्ल करना भी सही होगा और अगर पानी मुज़ाफ़ मुतासव्वर होगा यानी किसी नजिस चीज़ को पाक नहीं करेगा और उससे वुज़ू और ग़ुस्ल करना भी बातिल होगा।
51. ऐसा पानी जिसके बारे में यह मालूम न हो कि मुतलक़ है या मुज़ाफ़ नजासत को पाक नहीं करता और उससे वुज़ू और ग़ुस्ल करना भी बातिल है जूंही कोई नजासत ऐसे पानी से आ मिलती है तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर वह नजिस हो जाता है ख़्वाह (चाहे) उसकी मिक़दार (मात्रा) एक कुर ही क्यों न हो।
52. ऐसा पानी जिसमें ख़ून या पेशाब जैसी ऐने नजासत आ पड़े और उसकी बू, रंग या ज़ाइक़े को तब्दील कर दे नजिस हो जाता है ख़्वाह वह कुर के बराबर या जारी पानी ही क्यों न हो ताहम उस पानी की बू, रंग या ज़ाइक़ा किसी ऐसी नजासत से तब्दील हो जाएं जो उससे बाहर है मसलन क़रीब पड़े हुए मुर्दार की वजह से उसकी बू बदल जाये तो अहतियाते लाज़िम की बिना पर वह नजिस हो जायेगा।
53. वह पानी जिसमें ऐने नजासत मसलन ख़ून या पेशाब गिर जाए और उसकी बू, रंग या ज़ाइक़ा तब्दील कर दे अगर कुर के बराबर या जारी पानी से मुत्तासिल हो जाए या बारिश का पानी उस पर बरस जाए या हवा की वजह से बारिश का पानी उस पर गिरे या बारिश का पानी उस दौरान जबकि बारिश हो रही हो परनाले से उस पर गिरे और जारी हो जाए तो इन तमाम सूरतों में उसमें वाक़े शुदा तब्दीली ज़ाइल हो जाने पर ऐसा पानी पाक हो जाता है। लेकि क़ौले अक़वा की बिना पर ज़रूरी है कि बारिश का पानी या कुर पानी या जारी पानी उसमें मख़लूत हो जाए।
54. अगर किसी नजिस चीज़ को ब मिक़दार कुर पानी या जारी पानी से पाक किया जाए तो वह पानी जो बाहर निकलने के बाद उससे टपके पाक होगा।
55. जो पानी पहले पाक हो और यह इल्म न हो कि बाद में नजिस हुआ या नहीं, वह पाक है और जो पानी पहले नजिस हो और मालूम न हो कि बाद में पाक हुआ या नहीं, वह नजिस है।
56. कुत्ते, सुवर और ग़ैर किताबी काफ़िर का झूटा बल्कि एहतियाते मुस्तहब के तौर पर किताबी काफ़िर का झूटा भी नजिस है और उसका खाना पीना हराम है मगर हराम गोश्त जानवर का झूटा पाक है और बिल्ली के अलावा इस क़िस्म के बाक़ी तमाम जानवरों के झूटे का खाना और पीना मकरूह है।
बैतुल ख़ला के अहकामः-
57. इन्सान पर वाजिब है कि पेशाब और पख़ाना करते वक़्त और दूसरे मवाक़े पर अपनी शर्मगाहों को उन लोगों से जो बालिग़ हो ख़्वाह (चाहे) वह मां और बहन की तरह उसके महरम ही क्यों न हों और इसी तरह दीवानों और उन बच्चों से जो अच्छे बूरे की तमीज़ रखते हों छिपाकर रखे। लेकिन बीवी और शौहर के लिये अपनी शर्मगाहों को एक दूसरे से छिपाना लाज़िम नहीं।
58. अपनी शर्मगाहों को किसी मख़सूस चीज़ से छिपाना लाज़िम नहीं मसलन हाथ से भी छिपा लें तो काफ़ी है।
59. पेशाब या पख़ाना करते वक़्त एहतियाते लाज़िम की बिना पर बदन का अगला हिस्सा यानी पेट और सीना क़िबले की तरफ़ न हो और न ही पुश्त क़िबले की तरफ़ हो।
60. अगर पेशाब या पख़ाना करते वक़्त किसी शख़्स के बदन का अगला हिस्सा रू ब क़िबला या पुश्त ब क़िबला हो और वह अपनी शर्मगाह को क़िबले की तरफ़ से मोड़ ले तो यह काफ़ी नहीं है और अगर उसके बदन का अगला हिस्सा रू ब क़िबला या पुश्त ब क़िबला न हो तो एहतियात यह है कि शर्मगाह को रू ब क़िबला या पुश्त ब क़िबला न मोड़े।
61. एहतियाते मुस्तहब यह है कि इस्तेब्रा के मौक़े पर, जिसके अहकाम बाद में बयान किये जायेंगे, नीज़ अगली और पिछली शर्मगाहों को पाक करते वक़्त बदन का अगला हिस्सा रू ब क़िबला और पुश्त ब क़िबला न हो।
62. अगर कोई शख़्स इस लिये की नामहरम उसे न देखे, रू ब क़िबला या पुश्त ब क़िबला बैठने पर मजबूर हो, तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर ज़रूरी है कि पुश्त ब क़िबला बैठ जाए, अगर पुश्त ब क़िबला बैठना मुम्किन न हो तो रू ब क़िबला बैठ जाए। अगर किसी और वजह से रू ब क़िबला या पुश्त ब क़िबला बैठने पर मजबूर हो तो भी यही हुक्म है।
63. एहतियाते मुस्तहब यह है कि बच्चे को रफ़े हाजत के लिये रू ब क़िबला या पुश्त ब क़िबला न बैठाए। हां अगर बच्चा ख़ुद ही इस तरह बैठ जाए तो रोकना वाजिब नहीं है।
64. चार जगहों पर रफ़्ए हाजत हराम हैः-
(1). बन्द गली में जबकि वहाँ रहने वालों ने इसकी इजाज़त न दे रखी हो।
(2). उस क़त्अए ज़मीन में जो किसी की निजी मिल्कियत हो जब उसने रफ़्ए हाजत की इजाज़त न दे रखी हो।
(3). उन जगहों में जो मख़्सूस लोगों के लिये वक़्फ़ हों मसलन बाज़ मदरसे।
(4). मोमिनीन की क़ब्रों के पास जबकि इस फ़ेल से उनकी बे हुरमती हो। यही सूरत हर उस जगह की है जहाँ रफ़्ए हाजत दीन या मज़हब के मुक़द्दसात की तौहीन का मूजिब हो।
65. तीन सूरतों में मक़अद (पख़ाना ख़ारिज होने का मक़ाम) फ़क़त पानी से पाक होता हैः-
(1). पाख़ाने के साथ कोई और नजासत (मसलन ख़ून) बाहर आई हो।
(2). कोई बैरूनी (बाहरी) नजासत मक़्अद पर लग गई हो।
(3). मक़्अद का अतराफ़ मअमूल से ज़्यादा आलूदा हो गया हो।
इन तीन सूरतों के अलावा मक़्अद को या तो पानी से धोया जा सकता है या उस तरीक़े मुताबिक़ जो बाद में बयान किया जायेगा कपड़े या पत्थर वग़ैरा से भी पाक किया जा सकता है अगरचे पानी से धोना बहतर है।
66. पेशाब का मख़रज पानी के अलावा किसी चीज़ से पाक नहीं होता। अगर पानी कुर के बराबर हो या जारी हो तो पेशाब करने के बाद एक मर्तबा धोना काफ़ी है। लेकिन अगर क़लील पानी से धोया जाए तो एहतियाते मुस्तहब की बिना पर दो मर्तबा धोना चाहिये और बहतर यह है कि तीन मर्तबा धोएं।
67. अगर मक़्अद को पानी से धोया जाए तो ज़रूरी है कि पख़ाने का कोई ज़र्रा बाक़ी न रहे अलबत्ता रंग या बू बाक़ी रह जाए तो कोई हर्ज नहीं और अगर पहली बार ही वो मक़ाम यूं धुल जाए कि पख़ाने का कोई ज़र्रा बाक़ी न रहे तो दोबारा धोना लाज़िम नहीं।
68. पत्थर, ढेला, कपड़ा या इन्हीं जैसी दूसरी चीज़ें अगर ख़ुश्क और पाक हों तो उनसे मक़्अद को पाक किया जा सकता है और अगर उन्में मामूली नमी भी हो जो मक़्अद तक न पहुंचे तो कोई हर्ज नहीं।
69. अगर मक़्अद को पत्थर या ढेले या कपड़े से एक मर्तबा साफ़ कर दिया जाए तो काफ़ी है लेकिन बहतर यह है कि तीन मर्तबा साफ़ किया जाए और (जिस चीज़ से साफ़ किया जाए उसके) तीन टुकड़े भी हों और अगर तीन टुकड़ों से साफ़ न हो तो उतने मज़ीद टुकड़ों का इज़ाफ़ा करना चाहिये कि मक़्अद बिल्कुल साफ़ हो जाए। अलबत्ता अगर इतने छोटे ज़र्रे बाक़ी रह जाएं जो नज़र न आये तो कोई हर्ज नहीं है।
70. मक़्अद को ऐसी चीज़ों से पाक करना हराम है जिनका एहतिराम लाज़िम हो (मसलन कापी या अख़बार का ऐसा कागज़ जिस पर अल्लाह तआला और पैग़म्बरों के नाम लिखें हों) और मक़अद के हड्डी या गोबर से पाक होने में इश्काल है।
71. अगर एक शख़्स को शक हो कि मक्अद पाक किया है या नहीं तो उस पर लाज़िम है कि उसे पाक करे अगरचे पेशाब या पख़ाना करने के बाद वह हमेशा मुतअल्लिक़ः मक़ाम को फ़ौरन पाक करता हो।
72. अगर किसी शख़्स को नमाज़ के बाद शक गुज़रे कि नमाज़ से पहले पेशाब या पख़ाने का मख़रज पाक किया था या नहीं तो उसने जो नमाज़ अदा की है वह सहीह है लेकिन आइन्दा नमाज़ों के लिये उसे (मुतअल्लिक़ः मक़ामात को) पाक करना ज़रूरी है।
इसतिबरा
73. इसतिबरा एक मुस्तहब अमल है जो मर्द पेशाब करने के बाद इस ग़रज़ से अंजाम देते है ताकि इत्मीनान हो जाए कि अब पेशाब नाली में बाक़ी नहीं रहा। इसकी कई तर्कीबे हैं जिनमें से बहतरीन यह है कि पेशाब से फ़ारिग़ हो जाने के बाद अगर मक़्अद नजिस हो गया हो तो पहले उसे पाक करे और फिर तीन दफ़्आ बायें हाथ की दरमियानी उंगली के साथ मक़्अद से लेकर उज़्वे तनासुल की जड़ तक सौंते और उसके बाद अगूंठे को उज़्वे तनासुल के ऊपर और अगूंठे के साथ वाली उंगली को उसके नीचे रखें और तीन दफ़्आ सुपारी तक सौंते और फिर तीन दफ़्आ सुपारी को मलें।
74. वह रूतूबत जो कभी कभी औरत से मुलाअबत या हंसी मज़ाक़ करने के बाद मर्द के आलए तनासुल से ख़ारिज होती है उसे "मज़ी" कहते हैं और वह पाक है । अलावा अज़ीं वह रूतूबत जो कभी कभी मनी के बाद ख़ारिज होती है जिसे "वदी" कहा जाता है पाक है बशर्ते की उसमें पेशाब की आमेज़िश न हो। मज़ीद यह कि जब किसी शख़्स ने पेशाब के बाद इसतिबरा किया हो और उसके बाद रूतूबत ख़ारिज हो जिसके बाद शक हो कि वह पेशाब है या मज़कूरा वाला तीन रूतूबतों में से कोई एक है तो वह भी पाक है।
75. अगर किसी शख़्स को शक हो कि इसतिबरा किया है या नहीं और उसके पेशाब के मख़रज से रूतूबत ख़ारिज हो जिसके बारे में वह न जानता हो कि पाक है या नहीं तो वह नजिस है। नीज़ यह कि अगर वह वुज़ू कर चुका हो वह भी बातिल होगा। लेकिन अगर उसे इस बारे में शक हो कि जो इसतिबरा उसने किया था वह सही था या नहीं और इस दौरान रूतूबत ख़ारिज हो और वह न जानता हो कि वह रूतूबत पाक है या नहीं तो वह पाक होगी और उसका वुज़ू भी बातिल न होगा।
76. अगर किसी शख़्स ने इसतिबरा न किया हो और पेशाब करने के बाद काफ़ी वक़्त गुज़र जाने की वजह से उसे इत्मीनान हो की पेशाब नाली में नहीं रहा था और इस दौरान रूतूबत ख़ारिज हो और उसे शक हो की पाक है या नहीं तो वह रूतूबत पाक होगी और उससे वुज़ू भी बातिल न होगा।
77. अगर कोई शख़्स पेशाब के बाद इसतिबरा करके वुज़ू कर ले और उसके बाद रूतूबत ख़ारिज हो जिसके बारे में उसका ख़्याल हो कि पेशाब है या मनी तो उस पर वाजिब है कि एहतियातन ग़ुस्ल करे और वुज़ू भी करे अलबत्ता अगर उसने पहले वुज़ू न किया हो तो वुज़ू कर लेना काफ़ी है।
78. औरत के लिये पेशाब के बाद इसतिबरा नहीं है। पस अगर कोई रूतूबत ख़ारिज हो और शक हो कि यह पेशाब है या नहीं तो रूतूबत पाक होगी और उसके वुज़ू और ग़ुस्ल को भी बातिल नहीं करेगी।
रफ़्ए हाजत के मुस्तहब्बात और मकरूहात
79. हर शख़्स के लिये मुस्तहब है कि जब भी रफ़्ए हाजत के लिये जाए तो ऐसी जगह बैठे जहां उसे कोई न देखे। और बैतुल ख़ला (पाखाने) में दाख़िल होते वक़्त पहले बायां पांव अन्दर रखे और निकालते वक़्त पहले दायां पावं बाहर रखे। और यह मुस्तहब है कि रफ़्ए हाजत के वक़्त (टोपी, दुपट्टे वग़ैरा से) सर ढांप कर रखे और बदन का बोझ बायें पांव पर डाले।
80. रफ़्ए हाजत के वक़्त सूरज और चाद की तरफ़ मुहं करके बैठना मकरूह है लेकिन अगर अपनी शर्मगाह को किसी तरह ढांप लें तो मकरूह नहीं है। अलावा अज़ीं रफ़्ए हाजत के लिये हवा के रूख़ के बिल मुक़ाबिल नीज़ गली कूचों, रास्तों, मकान के दरवाज़ों के सामने और मेवादार दरख़्तों के नीचे बैठना भी मकरूह है और इस हालत में कोई चीज़ खाना या ज़्यादा वक़्त लगाना या दांयें हाथ से ताहरत करना भी मकरूह है और यही सूरत बातें करने की भी हैं लेकिन अगर मजबूरी हो या ज़िकरे ख़ुदा करे तो कोई हर्ज नहीं।
81. खड़े होकर पेशाब करना और सख़्त ज़मीन पर या जानवरों के बिलों में या पानी में बिल ख़ुसूस साकिन पानी में पेशाब करना मकरूह है।
82. पेशाब और पाख़ाना रोकना मकरूह है और अगर बदन के लिये मुकम्मल तौर पर मुज़िर हो तो हराम है।
83. नमाज़ से पहले, सोने से पहले, मुबाशिरत (संभोग) करने से पहले और इंज़ाले मनी के बाद पेशाब करना मुस्तहब है।
नजासात
84. दस चीज़े नजिस हैः-
(1) पेशाब,(2). पाख़ाना, (3). मनी, (4). मुर्दार, (5). ख़ून, (6-7). कुत्ता और सुव्वर, (8). काफ़िर, (9). शराब, (10). नजासतख़ोर हैवान का पसीना ।
1, 2 पेशाब और पाख़ानाः-
85. इन्सान का और हर उस हैवान का जिसका गोश्त हराम है और जिसका ख़ून जहिन्दा है यानी अगर उसकी रग काटी जाए तो ख़ून उछल कर निकलता है, पेशाब और पाख़ाना नजिस है। लेकिन उन हैवानों का पाख़ाना पाक है जिनका गोश्त हराम है मगर उनका ख़ून उछल कर नहीं निकलता। मसलन वह मछली जिसका गोश्त हराम है और इस तरह गोश्त न रखने वाले छोटे हैवानों मसलन मक्खी मच्छर (खटमल पिस्सू) का फ़ुज़ला या आलाइश भी पाक है लेकिन हराम गोश्त हैवान की जो उछलने वाला ख़ून न रखता हो एहतियाते लाज़िम की बिना पर उसके पेशाब से भी परहेज़ करना ज़रूरी है।
86. जिन परिन्दों का गोश्त हराम है उनका पेशाब और फ़ज़्ला पाक है लेकिन उससे परहेज़ बेहतर है।
87. नजासत ख़ौर हैवान का पेशाब और पख़ाना नजिस है। और इसी तरह उस भेड़ के बच्चे का पेशाब और पाख़ाना जिसने सुव्वरनी का दूध पिया हो नजिस है जिसकी तफ़्सील बाद में आयेगी। इसी तरह उस हैवान का पेशाब और पाख़ाना भी नजिस है जिससे किसी इन्सान ने बदफ़ेली की हो।
3. मनी (वीर्य)
88. इन्सान की और हर उस जानवर की मनी नजिस है जिस का ख़ून (ज़िब्ह होते वक़्त उसकी शहरग से) उछल कर निकले। अगरचे एहतियाते लाज़िम की बिना पर वह हैवान हलाल गोश्त ही क्यों न हो।
4. मुर्दार
89. इन्सान की और उछलने वाला ख़ून रखने वाले हर हैवान की लाश नजिस है ख़्वाह वह (कुदरती तौर पर) ख़ुद मरा हो या शरई तरीक़े के अलावा किसी और तरीक़े से ज़िब्ह किया गया हो ।
मछली चूंकि उछलने वाला ख़ून नहीं रखती इस लिये पानी में मर जाए तो भी पाक है।
90. लाश के वह अज्ज़ा जिन में जान नहीं होती पाक हैं मसलन पश्म, बाल, हड्डियां और दांत।
91. जब किसी इन्सान या जहिन्दा ख़ून वाले हैवान के बदन से उसकी ज़िन्दगी के दौरान में गोश्त या कोई दूसरा ऐसा हिस्सा जिसमें जान हो जुदा कर लिया जाए तो वह नजिस है।
92. अगर होठों या बदन की किसी और जगह से बारीक सी तह (पपड़ी0 उखेड़ ली जाए तो वह पाक है।
93. मुर्दा मुर्ग़ी के पेट से जो अण्डा निकले वो पाक है लेकिन उसका छिलका धो लेना ज़रूरी है।
94. अगर भेड़ या बकरी का बच्चा (मेमना) घास खाने के क़ाबिल होने से पहले मर जाए तो वह पनीरमा या जो उसके शीरदान में होता है पाक है लेकिन शीरदान बाहर से धो लेना ज़रूरी है।
95. बहने वाली तरल दवाइयां, इत्र, रौग़न (तेल, घी), जूतों की पालिश और साबुन जिन्हें बाहर से दरआमद (आयात) किया जाता है अगर उनकी नजासत के बारे में यक़ीन न हों तो पाक हैं ।
96. गोश्त, चर्बी और चमड़ा जिसके बारे में एहतिमाल हो कि किसी ऐसे जानवर का है जिसे शरई तरीक़े से ज़िब्हा किया गया है पाक है। लेकिन अगर यह चीज़ें किसी काफ़िर से लीं गईं हों या किसी ऐसे मुसलमान से ली गईं हों जिसने काफ़िर से लीं हों और यह तहक़ीक न की हो कि आया यह किसी ऐसे जानवर की है जिसे शरई तरीक़े से ज़िब्हा किया गया है या नहीं तो ऐसे गोश्त और चर्बी का ख़ाना हराम है अलबत्ता ऐसे चमड़े पर नमाज़ जाईज़ है। लेकिन अगर यह चीज़ों मुसलमानों के बाज़ार से या किसी मुसलमान से ख़रीदीं जाएं और यह न मालूम हो कि इससे पहले यह किसी काफ़िर से ख़रीदीं गईं थीं या एहतिमाल इस बात का हो कि तहक़ीक़ कर ली गई है तो ख़्वाह काफ़िर ही से ख़रीदी जाए इस चमढ़े पर नमाज़ पढ़ना और उस गोश्त और चर्बी का खाना जाइज़ है।
5. ख़ून
97. इन्सान और ख़ूने जहिन्दा रखने वाले हर हैवान का ख़ून नजिस है। पस ऐसे जानवरों मसलन मछली, मच्छर का ख़ून जो उछल कर नहीं निकलता पाक है।
98. जिन जानवरों का गोश्त हलाल है अगर उन्हें शरई तरीक़े से ज़िब्हा किया जाए और ज़रूरी मिक़्दार में उसका ख़ून ख़ारिज हो जाए तो जो ख़ून बदन में बाक़ी रह जाए वह पाक है लेकिन अगर (निकलने वाला) ख़ून जानवर के मांस ख़ींचने से या उसका सर बलन्द जगह पर होने की वजह से बदन में पलट जाए तो वह नजिस होगा।
99. मुर्ग़ी के जिस अण्डे में ख़ून का ज़र्रा हो उससे एहतियाते मुस्तहब की बिना पर परहेज़ करना चाहिये। लेकिन अगर ख़ून ज़र्दी में हो तो जब तक उसका नाज़ूक पर्दा फ़ट न जाए सफ़ैदा बग़ैर इशकाल के पाक है।
100. वह ख़ून जो बाज़ औक़ात चुवाई करते हुए नज़र आता है नजिस है और दूध को भी नजिस कर देता है।
101. अगर दांतो की रेख़ो से निकलने वाला ख़ून लुआबे दहन से मख़लूत हो जाने पर ख़त्म हो जाए तो उस लुआब से परहेज़ लाज़िम नहीं है।
102. जो ख़ून चोट लगने की वजह से नाख़ुन या खाल के नीचे जम जाए अगर उसकी शक्ल ऐसी होकि लोग उसे ख़ून न कहें तो वह पाक और अगर ख़ून कहें और वह ज़ाहिर हो जाए तो वह नजिस होगा। ऐसी सूरत में जबकि नाख़ुन या खाल में सुराख़ हो जाए अगर ख़ून का निकलना और वुज़ू या ग़ुस्ल के लिये उस मक़ाम का पाक करना बहुत ज़्यादा तकलीफ़ का बाइस हो तो तयम्मुम कर लेना चाहिये।
103. अगर किसी शख़्स को यह पता न चले कि खाल के नीचे ख़ून जम गया है या चोट लगने की वजह से गोश्त ने ऐसी शक्ल इख़्तियार कर ली है तो वह पाक है।
104. अगर खाना पकाते हुए ख़ून का एक ज़र्रा भी उसमें गिर जाए तो सारे का सारा खाना और बर्तन एहतियाते लाज़िम की बिना पर नजिस हो जाएगा। उबाल हरारत और आग उन्हें पाक नहीं कर सकते।
105. रेम यानी वह ज़र्द मवाद जो ज़ख़्म की हालत बेहतर होने पर उसके चारों तरफ़ पैदा हो जाता है उसके मुतअल्लिक़ अगर यह न मालूम हो कि उसमें ख़ून मिला हुआ है तो वह पाक होगा।
6, 7- कुत्ता और सुवर
106. कुत्ता और सुवर जो ज़मीन पर रहते हैं हत्ता कि उनके बाल, हड्डियां, पंजे, नाख़ून और रूतूबतें भी नजिस हैं अलबत्ता समुन्दरी कुत्ता और सुवर पाक हैं।
8. काफ़िर
107. काफ़िर यानी वह शख़्स जो बारी तआला के वुजूद या उसकी वह्दानियत का मुन्किर हो नजिस है। और इसी तरह ग़ुलात (यानी वह लोग जो आइम्मा (अ0) में से किसी को ख़ुदा कहें या यह कहें कि ख़ुदा इमाम में समा गया है) और ख़ारिजी व नासिबी (वह लोग जो आइम्मा (अ0) से बैर और बुग़्ज़ का इज़हार करें) भी नजिस हैं।
इसी तरह वह शख़्स जो किसी भी नुबुव्वत या ज़ुरूरतें दीन (यानी वह चीज़ें जिन्हें मुसलमान दीन का जुज़ समझते हैं मसलन नमाज़ और रोज़े) में से किसी एक का यह जानते हुए कि यह ज़रूरियाते दीन हैं, मुन्किर हो। नीज़ अहले किताब (यहूदी, ईसाई और मजूसी) भी जो ख़ातेमुल अंबिया हज़रत मोहम्मद इब्ने अब्दुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की रिसालत का इक़रार नहीं करते मशहूर रिवायत की बिना पर नजिस हैं अगरचे उनकी तहारत का हुक्म बईद नहीं लेकिन उनसे भी परहेज़ बेहतर है।
108. काफ़िर का तमाम बदन हत्ता कि उसके बाल, नाख़ुन और रूतूबतें भी नजिस हैं।
109. अगर किसी नाबालिग़ बच्चे के मां बाप या दादी दादा काफ़िर हों तो वह बच्चा भी नजिस है। अलबत्ता अगर वह सूझ बूझ रखता हो, इस्लाम का इज़्हार करता हो और अगर उनमें से (यानी सां बाप, या दादा दादी में से) एक भी मुसलमान हो तो उस तफ़्सील के मुताबिक़ जो मस्अला नं0 217 में आयेगी बच्चा पाक है।
110. अगर किसी शख़्स के मुतअल्लिक़ यह इल्म न हो कि मुसलमान है या नहीं और अगर कोई अलामत उसके मुसलमान होने की न हो तो वह पाक समझा जायेगा लेकिन उस पर इस्लाम के दूसरे अहकाम का इत्लाक़ नहीं होगा मसलन न ही वह मुसलमान औरत से शादी कर सकता है और न ही उसे मुसलमानों के कब्रिस्तान में दफ़्न किया जा सकता है।
111. जो शख़्स (ख़ानवादाए रिसालत के) बारह इमामों में से किसी एक को भी दुश्मनी की बिना पर गाली दे वह नजिस है।
9. शराब
112. शराब नजिस है। और एहतियाते मुस्तहब कि बिना पर हर वह चीज़ भी जो इन्सान को मस्त कर दे और माए हो नजिस है। और अगर माए न हो जैसे भंग और चरस तो वह पाक है ख़्वाह उसमें ऐसी चीज़े डाल दें जो माए हों।
113. सन्अती अलकुहल, जो दरवाज़े, खिड़की, मेज़ या कुर्सी वग़ैरा रंगने के लिये इस्तेमाल होती है उसकी तमाम क़िस्मे पाक हैं।
114. अगर अगूंर और अगूंर का रस ख़ुद ब ख़ुद या पकाने पर खमीर हो जाए तो पाक है लेकिन उसका खाना पीना हराम है।
115. खजूर, मुनक़्क़ा, किशमिश और उनका शीरा ख़्वाह ख़मीर हो जायें तो भी पाक हैं और उनका खाना हलाल है।
116. "फ़ुक़्क़ाअ" जो कि जौ से तैय्यार होती है और उसे आबे जौ कहते हैं हराम है लेकिन उसका नजिस होना इश्काल से ख़ाली नहीं है। और ग़ैर फ़ुक़्क़ाअ यानी तिब्बी क़वायद के मुताबिक़ हासिल कर्दा, "आबे जौ" जिसे, "माउश्शईर" कहते हैं, पाक है।
10. नजासत खाने वाले हैवान का पसीना
117. नजासत खाने वाले ऊंट का पसीना, और हर उस हैवान का पसीना जिसे इंसानी नजासत खाने की आदत हो, नजिस है।
118. जो शख़्स फ़ेले हराम से जुनुब हुआ हो उसका पसीना पाक है लेकिन एहतियाते मुस्तहब की बिना पर उसके (पसीने के) साथ नमाज़ न पढ़ी जाए और हालते हैज़ में बीवी से जिमाअ करना, जबकि इस हालत का इल्म हो, हराम से जुनुब होने का हुक्म रखता है।
119. अगर कोई शख़्स उन औक़ात में बीवी से जिमाअ करे जिनमें जिमाअ हराम है (मसलन रमज़ानुल मुबारक में दिन के वक़्त) तो उसका पसीना हराम से जुनुब होने वाले पसीने का हुक्म नही रखता।
120. अगर हराम से जुनुब होने वाला ग़ुस्ल के बजाए तयम्मुम करे और तयम्मुम के बाद उसे पसीना आ जाए तो उस पसीने का वही हुक्म है जो तयम्मुम से पहले वाले पसीने का था।
121. अगर कोई शख़्स हराम से जुनुब हो जाए और फिर उस औरत से जिमाअ करे जो उसके लिये हलाल है तो उसके लिये एहतियाते मुस्तहब यह है कि उस पसीने के साथ नमाज़ न पढ़े और अगर पहले उस औरत से जिमाअ करे जो हलाल हो और बाद में हराम का मुर्तकिब हो तो उसका पसीना हराम से जुनुब होने वाले पसीने का हुक्म नहीं रखता।
नजासत साबित होने के तरीक़े
122. हर चीज़ की नजासत तीन तरीक़ों से साबित होती हैः-
(अव्वल) ख़ुद इन्सान को यक़ीन या इत्मीनान हो कि फ़लां चीज़ नजिस है। अगर किसी चीज़ के मुतअल्लिक़ महज़ गुमान हो कि नजिस है तो उससे परहेज़ करना लाज़िम नहीं। लिहाज़ा क़हवा ख़ानों और होटलों में जहां लापरवाह लोग और ऐसे लोग खाते पीते हैं जो नजासत और तहारत का लिहाज़ नहीं करते खाना खाने की सूरत यह है कि जब तक इन्सान को इत्मीनान न हो कि जो खाना उसके लिये लाया गया है वह नजिस नहीं है, उसके खाने में कोई हरज नहीं।
(दोव्वुम) किसी के पास कोई चीज़ हो और वह उस चीज़ के बारे में कहे कि नजिस है और वह शख़्स ग़लत बयानी न करता हो मसलन किसी शख़्स की बीवी या नौकर या मुलाज़िम कहे कि बर्तन या कोई दूसरी चीज़ जो उसके पास है नजिस है तो वह नजिस शुमार होगी।
(सोव्वुम) अगर दो आदिम आदमी कहें कि एक चीज़ नजिस है तो वह नजिस शुमार होगी बशर्ते की वह उसके नजिस होने की वजह बयान करें।
123. अगर कोई शख़्स मसअले से अदम वाक़िफ़ीयत की बिना पर यह न जान सके कि वह चीज़ नजिस है या पाक, मसलन उसे यह इल्म न हो कि चूंहे की मेंगनी पाक है या नहीं तो उसे चाहिये कि मसअला पूछ ले। लेकिन अगर मसअला जानता हो और किसी चीज़ के बारे में उसे शक हो कि पाक है या नहीं मसलन उसे शक हो कि वह चीज़ ख़ून है या नहीं या यह न जानता हो कि मच्छर का ख़ून है या इन्सान का तो वह चीज़ पाक शुमार होगी और उसके बारे में छान बीन करना या पूछना लाज़िम नहीं।
124. अगर किसी नजिस चीज़ के बारे में शक हो कि (बाद में) पाक हुई है या नहीं तो वह नजिस है। अगर किसी पाक चीज़ के बारे में शक हो कि (बाद में) नजिस हो गई है या नहीं तो वह पाक है। अगर कोई शख़्स उन चीज़ें के नजिस या पाक होने के मुतअल्लिक़ पता चला भी सकता हो तो भी तहक़ीक़ ज़रूरी नहीं है।
125. अगर कोई शख़्स जानता हो कि जो दो बर्तन या दो कपड़े वह इस्तेमाल करता है उन में से एक नजिस हो गया है लेकिन उसे यह इल्म न हो कि उनमें से कौन सा नजिस हुआ है तो दोनों से इज्तिनाब करना ज़रूरी है और मिसाल के तौर पर अगर यह जानता हो कि ख़ुद उसका कपड़ा नजिस हुआ है या वह कपड़े जो उसके ज़ेरे इस्तेमाल नहीं है और किसी दूसरे शख़्स की मिल्कीयत है तो ज़रूरी नहीं कि अपने कपड़े से इज्तिनाब करे।
पाक चीज़ नजिस कैसे होती हैः-
126. अगर कोई पाक चीज़ किसी नजिस चीज़ से लग जाए और दोनों या उनमें से एक इस क़दर तर हो कि एक कि तरी दूसरे तक पहुँच जाए तो पाक चीज़ भी नजिस हो जाएगी और अगर वह उसी तरी के साथ किसी तीसरी चीज़ के साथ लग जाए तो उसे भी नजिस कर देती है और मशहूर क़ौल है कि जो चीज़ नजिस हो गई हो वह दूसरी चीज़ को भी नजिस कर देती है लेकिन यके बाद दीगरे कई चीज़ों पर नजासत का हुक्म लगाना मुश्किल है बल्कि तहारत का हुक्म लगाना क़ुव्वत से ख़ाली नहीं है। मसलन अगर दायां हाथ पेशाब से नजिस हो जाए और फिर यह तर हाथ बायें हाथ को छू जाए तो बायां हाथ नजिस हो जाएगा। अब अगर बायां हाथ ख़ुश्क होने के बाद मसलन तर लिबास से छू जाए तो वह लिबास भी नजिस हो जाएगा लेकिन अगर वह तर लिबास किसी दूसरी तर चीज़ को लग जाए तो वह चीज़ नजिस नहीं होगी और अगर तरी इतनी कम हो कि दूसरी चीज़ को न लगे तो पाक चीज़ नजिस नहीं होगी ख़्वाह वह ऐने नजिस को ही क्यों न लगी हों।
127. अगर कोई पाक चीज़ नजिस चीज़ को लग जाए और उन दोनों या किसी एक के तर होने के मुतअल्लिक़ किसी को शक हो तो पाक चीज़ नजिस नहीं होती।
128. ऐसी दो चीज़ें जिनके बारे में इन्सान को इल्म न हो कि उनमें से कौन सी पाक है और कौन सी नजिस अगर एक पाक और तर चीज़ उनमें से किसी एक चीज़ को छू जाए तो उससे परहेज़ करना ज़रूरी नहीं है लेकिन बाज़ सूरतों में मसलन दोनों चीज़ें पहले नजिस थीं या यह कि कोई पाक चीज़ तरी की हालत में उनमें से किसी एक को छू जाए (तो उससे इज्तिनाब ज़रूरी है) ।
129. अगर ज़मीन, कपड़ा या ऐसी दूसरी चीज़ें तर हों तो उनके जिस हिस्से को नजासत लगेगी वह नजिस हो जाएगा। और बाक़ी हिस्सा पाक रहेगा। यही हुक्म खीरे और ख़रबूज़े वग़ैरा के बारे में है।
130. जब शीरे, तेल (घी) या ऐसी ही किसी और चीज़ की सूरत ऐसी हो कि अगर उसकी कुछ मिक़्दार (मात्रा) निकाल ली जाए तो उसकी जगह खाली न रहे तो जूं ही वह ज़र्रा भर भी नजिस होगा सारे का सारा नजिस हो जाएगा लेकिन अगर उसकी सूरत ऐसी हो कि निकालने के मक़ाम पर जगह ख़ाली रहे अगरचे बाद में पुरी हो जाए तो सिर्फ़ वही हिस्सा नजिस होगा जिसे नजासत लगी है। लिहाज़ा अगर चूहें की मेंगनी उसमें गिर जाए तो जहां वह मेंगनी गिरी है वह जगह नजिस और बाक़ि पाक होगी।
131. अगर मक्ख़ी या ऐसा ही कोई जानदार एक ऐसी तर चीज़ पर बैठे जो नजिस हो और बाद अज़ां एक तर पाक चीज़ पर जा बैठे और यह इल्म हो जाए कि इस जानदार के साथ नजासत थी तो पाक चीज़ नजिस हो जाए गी और अगर इल्म न हो तो पाक रहेगी।
132. अगर बदन के किसी हिस्से पर पसीना हो और वह हिस्सा नजिस हो जाए और फिर पसीना बह कर बदन के दूसरे हिस्सों तक चला जाए तो जहां जहां पसीना बहेगा बदन के वह हिस्से नजिस हो जाए गे, लेकिन अगर पसीना आगे न बढ़े तो बाक़ी बदन पाक रहेगा।
133. जो बलग़म नाक या गले से ख़ारिज हो अगर उसमें ख़ून हो तो बलग़म में जहां ख़ून होगा नजिस और बाक़ी हिस्सा पाक होगा लिहाज़ा अगर यह बलग़म मुहं या नाक के बाहर लग जाए तो बदन के जिस मुक़ाम के बारे में यक़ीन हो कि नजिस बलग़म इस पर लगा है और जिस जगह के बारे में शक हो कि वहां बलग़म का नजासत वाला हिस्सा पहुँचा है या नहीं तो वह पाक होगा।
134. अगर एक ऐसा लोटा सिजके पेंदें में सुराख़ हो नजिस ज़मीन पर रख दिया जाए और उससे पानी बहना बंद हो जाए तो जो पानी उसके नीचे जमा होगा, वह उसके अन्दर वाले पानी से मिलकर यकज हो जाए तो लोटे का पानी नजिस हो जाएगा लेकिन अगर लोटे का पानी तेज़ी के साथ बहता रहे तो नजिस नहीं होगा।
135. अगर कोई चीज़ बदन में दाख़िल होकर नजासत से जा मिले लेकिन बदन से बाहर आने पर नजासत से आलूदा न हो तो वह चीज़ पाक है। चुनांचे अगर एनिमा का सामान या उसका पानी मक़्अद में दाखिल किया जाए या सुईं, चाक़ू या कोई और ऐसी चीज़ बदन में चुभ जाए और बाहर निकलने पर नजासत आलूदा न हो तो नजिस नहीं है। अगर थूक और नाक का पानी जिस्म के अन्दर ख़ून से जा मिलें लेकिन बाहर निकलने पर ख़ून आलूदा न हो तो उसका भी यही हुक्म है।
अहकामे नजासात
136. क़ुरआने मजीद की तहरीर और वरक़ को नजिस करना जबकि यह फ़ेल बेहुर्मती में शुमार होता हो बिला शुब्हा हराम है और अगर नजिस हो जाए तो फ़ौरन पानी से धोना ज़रूरी है बल्कि अगर बेहुर्मती का पहलू न भी निकले तब भी एहतियाते वाजिब की बिना पर कलामे पाक को नजिस करना हराम और पानी से धोना वाजिब है।
137. अगर कुरआने मजीद की जिल्द नजिस हो जाए और उससे क़ुरआने मजीद की बेहुर्मती होती हो तो जिल्द को पानी से धो देना ज़रूरी है।
138. क़ुरआने मजीद को किसी ऐने नजासत मसलन ख़ून या मुर्दार पर रखना ख़्वाह वह ऐने नजासत ख़ुश्क ही क्यों न हो अगर क़ुरआने मजीद की बेहुर्मती का बायस हो तो हराम है।
139. क़ुरआने मजीद को नजिस रौशनाई से लिखना ख़्वाह एक हर्फ़ ही क्यों न हो उसे नजिस करने का हुक्म रखता है। अगर लिखा जा चुका हो तो उसे पानी से धो कर या छील कर किसी और तरीक़े से मिटा देना ज़रूरी है।
140. अगर काफ़िर को क़ुरआने मजीद देना बेहुर्मती का मूजिब हो तो हराम है और उससे क़ुरआने मजीद ले लेनना वाजिब है।
141. अगर क़ुरआने मजीद का एक वरक़ या कोई ऐसी चीज़ जिसका एहतिराम ज़रूरी हो मसलन ऐसा कागज़ जिस पर अल्लाह तआला का या नबीये करीम सलल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम या किसी इमाम (अ0) का नाम लिखा हो बैतुलख़ला में गिर जाए तो उसका बाहर निकालना और उसे धोना वाजिब है ख़्वाह उस पर कुछ रक़म ही क्यों न ख़र्च करनी पड़े। और अगर उसका बाहर निकालना मुमकिन न हो तो ज़रूरी है कि उस वक़्त तक उस बैतुलख़ुला को इस्तेमाल न किया जाए जब तक यह यक़ीन ना हो जाए कि वह गलकर ख़त्म हो गया है। इसी तरह अगर ख़ाके शिफ़ा बैतुलख़ला में गिर जाए और उसका निकालना मुमकिन न हो तो जब तक यह यक़ीन न हो जाए कि वह बिल्कुल ख़त्म हो चुकी है, उस बैतुलख़ला को इस्तेमान नहीं करना चाहिये।
142. नजिस चीज़ का खाना पीना या किसी दूसरे को खिलाना पिलाना हराम है लेकिन बच्चे या दीवाने को खिलाना पिलाना बज़ाहिर जाइज़ है और अगर बच्चा या दीवाना नजिस ग़िज़ा खाए या पिये या नजिस हाथ से ग़िज़ा को नजिस करके खाए तो उसे रोकना ज़रूरी नहीं।
143. जो नजिस चीज़ धोईं जा सकती हों उसे बेचने या उधार देने में कोई हर्ज नहीं लेकिन उसके नजिस होने के बारे में जब यह दो शर्तें मौजूद हों तो ख़रीद ने और उधार लेने वाले को बताना ज़रूरी हैः-
(पहली शर्त) जब अन्देशा हो कि दूसरा फ़रीक़ किसी वाजिब हुक्म की मुख़ालिफ़त का मुर्तकिब होगा यानी उस (नजिस चीज़) को खाने या पीने में इस्तेमाल करेगा। अगर ऐसा न हो तो बताना ज़रूरी नहीं है मसलन लिबास के नजिस होने के बारे में बताना ज़रूरी नहीं जिसे पहन कर वह दूसरा फ़रीक़ नमाज़ पढ़े क्योंकि लिबास का पाक होना शर्ते वाक़ई नहीं है.
(दूसरी शर्त) जब बेचने या उधार देने वाले को यह तवक़्क़ो हो कि दूसरा फ़रीक़ उसकी बात पर अमल करेगा और अगर वह जानता हो कि दूसरा फ़रीक़ उसकी बात पर अमल नहीं करेगा तो उसे बताना ज़रूरी नहीं है।
144. अगर एक शख़्स किसी दूसरे को नजिस चीज़ खाते या नजिस लिबास से नमाज़ पढ़ते हुए देखे तो उसे इस बारे में कुछ कहना ज़रूरी नहीं।
145. अगर घर का कोई हिस्सा या क़ालीन (या दरी) नजिस हो और वह देखे कि उसके घर आने वाले का बदन, लिबास या कोई और चीज़ तरी के साथ नजिस जगह से जा लगी है और साहबे ख़ाना उसका बाइस हुआ तो दो शर्तों के साथ जो मसअला नं0 143 में बयान हुई हैं उन लोगों को इस बारे में आगाह कर देना ज़रूरी है।
146. अगर मेज़बान को खाने खाने के दौरान पता चले कि ग़िज़ा नजिस है तो दोंनो शर्तों के मुताबिक़ जो (मसअला नं0 143 में) बयान हुईं हैं ज़रूरी है कि मेहमानों को उसके मुतअल्लिक़ आगाह कर दे। लेकिन अगर मेहमानों में से किसी को इस बात का इल्म हो जाए तो उसके लिये दूसरों को बताना ज़रूरी नहीं। अलबत्ता अगर वह उन लोगों के साथ यूं घुल मिल कर रहता हो कि उनके नजिस होने की वजह से वह खुद भी नजासत में मुब्तिला होकर वाजिब अहकाम की मुख़ालिफ़त का मुर्तकिब होगा त उनको बताना ज़रूरी है।
147. अगर कोई उधार ली हुइ चीज़ नजिस हो जाए तो उसके मालिक को दो शर्तों के साथ जो मस्अला 143 में बयान हुई हैं आगाह करे।
148. अगर बच्चा कहे कि कोई चीज़ नजिस है या कहे कि उसने किसी चीज़ को धो लिया है तो उसकी बात पर एतिबार नहीं करना चाहिये लेकिन अगर बच्चे की उम्र मुकल्लफ़ होने के क़रीब हो और वह कहे कि उसने एक चीज़ पानी से धोई है जबकि वह चीज़ उसके इस्तेमाल में हो या बच्चे का क़ौल एतिमाद के क़ाबिल हो तो उसकी बात क़ुबूल कर लेनी चाहिये और यही हुक्म है जबकि बच्चा कहे कि वह चीज़ नजि है।
मुतह्हिरात
149. बारह चीज़े ऐसी हैं जो नजासत को पाक करती हैं और उन्हें मुतह्हिरात कहा जाता हैः-
1- पानी, 2- ज़मीन, 3-सूरज, 4-इसतिहाला, 5-इंक़िलाब, 6- इन्तिक़ाल, 7- इसलाम, 8-तबईयत, 9-ऐने नजासत का ज़ाइल हो जाना, 10- नजासत खाने वाले हैवान का इसतिबरा 11-मुसलमान का ग़ायब हो जाना, 12-ज़िब्हे किये गये जानवर के बदन से ख़ून का निकल जाना।
1-पानी
140. पानी चार शर्तों के साथ नजिस चीज़ को पाक करता हैः-
1. पानी मुत्लक़ हो। मुज़ाफ़ पानी मसलन अरक़े गुलाब या अरक़े बेदे मुश्क से नजिस चीज़ पाक नहीं होती।
2. पानी पाक हो।
3. नजिस चीज़ को धोने के दौरान पानी मुज़ाफ़ न बन जाए। जब किसी चीज़ को पाक करने के लिये पानी से धोया जाए और उसके बाद मज़ीद धोना ज़रूरी न हो तो वह भी लाज़ीम है कि उस पानी में नजासत की बू, रंग या ज़ाइक़ा मौजूद न हो लेकिन अगर धोने की सूरत उससे मुख़्तलिफ़ हो (यानी वह आख़िरी धोना न हो) और पानी की बू, रंग या ज़इक़ा बदल जाए तो उसमें कोई हरज नहीं। मसलन अगर कोई चीज़ कुर पानी या क़लील पानी से धोई जाए और उसे दो मर्तबा धोना ज़रूरी हो तो ख़्वाह पानी की बू, रंग या ज़ाइक़ा पहली दफ़्आ धोने के वक़्त बदल जाए लेकिन दूसरी दफ़्आ इस्तेमाल किये जाने वाले पानी में ऐसी कोई तब्दीली रूनुमा न हो तो वह चीज़ पाक हो जाऐगी।
4. नजिस चीज़ को पानी से धोने के बाद उसमें ऐने नजासत के ज़र्रात बाक़ी न रहें। नजिस चीज़ को क़लील पानी यानी एक कुर से कम पानी से पाक करने की कुछ और शराइत भी हैं जिनका ज़िक्र किया जा रहा हैः-
151. नजिस बर्तन के अन्दरूनी हिस्से को क़लील पानी से तीन दफ़्आ धोना ज़रूरी है। कुर या जारी पानी का भी एहतियाते वाजिब की बिना पर यही हुक्म है लेकिन जिस बर्तन में कुत्ते ने पानी या कोई माए चीज़ पी हो उसे पहले पाक मिट्टी से मांझना चाहिये फिर उस बर्तन से मिट्टी को दूर करना चाहिये, उसके बाद क़लील या कुर या जारी पानी से दो दफ़्आ धोना चाहिये। इसी तरह अगर कुत्ते ने किसी बर्तन को चाटा हो और कोई चीज़ उसमें बाक़ी रह जाए तो उसे धोने से पहले मिट्टी से मांझ लेना ज़रूरी है अलबत्ता अगर कुत्ते का लुआब किसी बर्तन में गिर जाए तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर उसे मिट्टी से मांझने के बाद तीन दफ़्आ पानी से धोना ज़रूरी है।
152. जिस बर्तन में कुत्ते ने मुहं डाला है अगर उसका मुहं तंग हो तो उसमें मिट्टी डाल कर ख़ूब हिलायें ताकि मिट्टी बर्तन के तमाम एतराफ़ में पहुँच जाए। उसके बाद उसे उसी तरतीब के मुताबिक़ धोयें जिसका ज़िक्र साबिक़ः मस्अले में हो चुका है।
153. अगर किसी बर्तन को सुव्वर चाटे या उसमें से कोई बहने वाली चीज़ पी ले या उस बर्तन में जंगली चूहां मर गया हो तो उसे क़लील या कुर या जारी पानी से सात मर्तबा धोना ज़रूरी है लेकिन मिट्टी से मांझना ज़रूरी नहीं।
154. जो बर्तन शराब से नजिस हो गया हो उसे तीन मर्तबा धोना ज़रूरी है इस बारे में क़लील या कुर या जारी पानी की कोई तख़्सीस नहीं ।
155. अगर ऐसे बर्तन को जो नजिस मिट्टी से तैयार हुआ हो या जिसमें नजिस पानी सरायत कर गया हो कुर या जारी पानी में डाल दिया जाए तो जहां जहां वह पानी पहुँचे गा बर्तन पाक हो जायेगा और अगर उस बर्तन के अन्दरूनी अज्ज़ा को भी पाक करना मक़सूद हो तो उसे कुर या जारी पानी में उतनी देर तक पड़े रहने देना चाहिये कि पानी तमाम बर्तन में सरायत कर जाए। और अगर उस बर्तन में कोई ऐसी नमी हो जो पानी के अन्दरूनी हिस्सों तक पहुँच नें में माने हो तो पहले उसे ख़ुश्क कर लेना ज़रूरी है और फिर बर्तन को कुर या जारी पानी में डाल देना चाहिये।
156. नजिस बर्तन को क़लील पानी से दो तरीक़े से धोया जा सकता हैः-
(पहला तरीक़ा) बर्तन को तीन दफ़्आ भरा जाए और हर दफ़्आ ख़ाली कर दिया जाए।
(दूसरा तरीक़ा) बर्तन में तीन दफ़्आ मुनासिब मिक़दार में पानी डालें और हर दफ़्आ पानी को यूं घुमायें कि वह तमाम नजिस मक़ामात तक पहुंच जाए और फिर उसे गिरा दें।
157. अगर एक बड़ा बर्तन मसलन देग़ या मटका नजिस हो जाएं तो तीन दफ़्आ पानी से भरने और हर दफ़्आ ख़ाली करने के बाद पाक हो जाता है। इसी तरह अगर उसमें तीन दफ़्आ ऊपर से इस तरह पानी उंडेलें कि उसकी तमाम अतराफ़ तक पहुँच जाए और हर दफ़्आ उसकी तह में जो पानी जमआ हो जाए उसको निकाल दें तो बर्तन पाक हो जाएगा। और एहतियाते मुस्तहब यह है कि दूसरी और तीसरी बार जिस बर्तन के ज़रिये पानी बाहर निकाला जाए उसे भी धो लिया जाए।
158. अगर नजिस तांबे वग़ैरा को पिघला कर पानी से धो लिया जाए तो उसका ज़ाहिरी हिस्सा पाक हो जाएगा।
159. अगर तन्नूर (तंदूर) पेशाब से नजिस हो जाए और उसमें ऊपर से एक मर्तबा यूं पानी डाला जाए कि उसकी तमाम अतराफ़ तक पहुंच जाए तो तन्नूर पाक हो जाएगा और एहतियाते मुस्तहब यह है कि यह अमल दो दफ़्आ किया जाए और अगर तन्नूर पेशाब के अलावा किसी और चीज़ से नजिस हुआ हो तो नजासत दूर करने के बाद मज़कूरा तरीक़े के मुताबिक़ उसमें एक दफ्आ पानी डालना काफ़ी है और बेहतर यह है कि तन्नूर की तह में एक गढ़ा खोद लिया जाए जिसमें पानी जम्आ हो सके फिर उस पानी को निकाल लिया जाए और गढ़े को पाक मिट्टी से पुर कर दिया जाए।
160. अगर किसी नजिस चीज़ को कुर या जारी पानी में एक दफ़्आ यूं डुबो दिया जाए कि पानी उसके तमाम नजिस मक़ामत तक पहुंच जाए तो वह चीज़ पाक हो जायेगी और क़ालीन या दरी या लिबास वग़ैरा को पाक करने के लिये उसे निचोड़ना और इसी तरह से मलना या पांव से रगड़ना ज़रूरी नहीं है और अगर बदन या लिबास पेशाब से नजिस हो गया हो तो उसे कुर पानी में दो दफ़्आ धोना भी लाज़िम है।
161. अगर किसी ऐसी चीज़ को जो पेशाब से नजिस हो गई हो क़लील पानी से धोना मक़सूद हो तो उस पर एक दफ़्आ यूं पानी बहा दें कि पेशाब उस चीज़ में बाक़ी न रहे तो वह चीज़ पाक हो जायेगी। अलबत्ता लिबास और बदन पर दो दफ़्आ पानी बहाना ज़रूरी है ताकि पाक हो जाए। लेकिन जहां तक लिबास, क़ालीन, दरी और उससे मिलती जुलती चीज़ों का तअल्लुक़ है उन्हें हर दफ़्आ पानी में डाल ने के बाद निचोड़ना चाहिये ताकि ग़ुसाला उन में से निकल जाए (ग़ुसाला या धोवन उस पानी को कहते हैं जो किसी धोई जाने वाली चीज़ से धुलने के दौरान या धुल जाने के बाद खुद ब खुद निचोड़ने से निकलता है।)
162. जो चीज़ ऐसे शीरख़्वार लड़के या लड़की के पेशाब से जिसने दूध के अलावा कोई ग़िज़ा खाना शुरू न की हो और एहतियात की बिना पर दो साल का न हो, नजिस हो जाए तो उस पर एक दफ़्आ इस तरह पानी डाला जाए कि तमाम नजिस मक़ामात पर पहुंच जाए तो वह चीज़ पाक हो जायेगी लेकिन एहतियाते मुस्तहब यह है कि मज़ीद एक बार उस पर पानी डाला जाए लिबास, क़ालीन और दरी वग़ैरा को निचोड़ना ज़रूरी नहीं।
163. अगर कोई चीज़ पेशाब के अलावा किसी नजासत से नजिस हो जाए तो वह नजासत दूर करने के बाद एक दफ़्आ क़लील पानी उस पर डाला जाए। जब वह पानी बह जाए तो वह चीज़ पाक हो जाती है अलबत्ता लिबास और उससे मिलती जुलती चीज़ों को निचोड़ लेना चाहिये ताकि उनका धोवन निकल जाए।
164. अगर किसी नजिस चटाई को जो धागों से बुनी हुई हो कुर या जारी पानी में डुबो दिया जाए तो ऐने नजासत दूर होने के बाद वो पाक हो जायेगी लेकिन अगर उसे क़लील पानी से धोया जाए तो जिस तरह भी मुम्किन हो उसका निचोड़ना भी ज़रूरी है (ख़्वाह उसमे पांव ही क्यों न चलाने पड़ें) ताकि उसका धोवन अलग हो जाए।
165. अगर गंदुम (गेहूं, चावल, साबुन वग़ैरा का ऊपर वाला हिस्सा नजिस हो जाए तो वह कुर या जारी पानी में डुबोने से पाक हो जायेगा लेकिन अगर उनका अन्दरूनी हिस्सा नजिस हो जाए तो कुर या जारी पानी उन चीज़ों के अन्दर तक पहुंच जाए और पानी मुतलक़ ही रहे तो यह चीज़े पाक हो जायेगीं लेकिन ज़ाहिर यह है कि साबुन और उससे मिलती जुलती चीज़ों के अन्दर आबे मुतलक़ बिल्कुल नहीं पहुंचता।
166. अगर किसी शख़्स को इस बारे में शक हो कि नजिस पानी साबुन के अन्दरूनी हिस्से तक सरायत कर गया है या नहीं तो वह हिस्सा पाक होगा।
167. अगर चावल या गोश्त या ऐसी ही किसी चीज़ का ज़ाहिरी हिस्सा नजिस हो जाए तो किसी पाक प्याले या उसके मिस्ल किसी चीज़ में रख कर एक दफ़्आ उस पर पानी डालने और फिर फेंक देने के बाद वह चीज़ पाक हो जाती है और अगर किसी नजिस बर्तन में रखें तो यह काम तीन दफ़्आ अनजाम देना ज़रूरी है और इस सूरत में वह बर्तन भी पाक हो जायेगा लेकिन अगर लिबास या किसी ऐसी चीज़ को बर्तन में डाल कर पाक करना मक़सूद हो जिसका निचोड़ना लाज़िम है तो जितनी बार उस पर पानी डाला जाए उसे निचोड़ना ज़रूरी है और बर्तन को उलट देना चाहिये ताकि जो धोवन उसमें जमा हो गया हो वह बह जाए।
168. अगर किसी नजिस लिबास को जो तेल या उस जैसी चीज़ से रंगा गया हो कुर या जारी पानी में डुबोया जाए और कपड़े के रंग की वजह से पानी मुज़ाफ़ होने से क़ब्ल तमाम जगह पहुंच जाए तो वह लिबास पाक हो जायेगा और अगर उसे क़लील पानी से धोया जाए और निचोड़ने पर उसमें से मुज़ाफ़ पानी न निकले तो वह लिबास पाक हो जाता है।
169. अगर कपड़े को कुर या जारी पानी में धोया जाए और मिसाल के तौर पर बाद में काई वग़ैरा कपड़े में नज़र आए और यह अहतिमाल न हो कि यह कपड़े के अन्दर पानी के पहुंचने में माने (बाधक) हुई है तो वह कपड़ा पाक है।
170. अगर लिबास या उससे मिलती जुलती चीज़ के धोने के बाद मिट्टी का ज़र्रा या साबुन उसमें नज़र आए और एहतिमाल हो कि यह कपड़े के अन्दर पानी के पहुंचने में माने हुआ है तो वह पाक है लेकिन अगर नजिस पानी मिट्टी या साबुन में सरायत कर गया हो तो मिट्टी और साबुन का ऊपर वाला हिस्सा पाक और उसका अन्दरूनी हिस्स नजिस होगा।
171. जब तक ऐने नजासत किसी नजिस चीज़ से अलग न हो वह पाक नहीं होगी लेकिन अगर बू या नजासत का रंग उसमें बाक़ी रह जाए तो कोई हरज नहीं। लिहाज़ा अगर ख़ून लिबास पर से हटा दिया जाए और लिबास धो लिया जाए और ख़ून का रंग लिबास पर बाक़ी भी रह जाए तो लिबास पाक होगा लेकिन अगर बू या रंग की वजह से यह यक़ीन या एहतिमाल पैदा हो कि नजासत के ज़र्रात इसमें बाक़ी रह गये हैं तो वह नजिस होगी।
172. अगर कुर या जारी पानी में बदन की नजासत दूर कर ली जाए तो बदन पाक हो जाता है लेकिन अगर बदन पेशाब से नजिस हुआ हो तो उस सूरत में एक दफ़्आ से पाक नहीं होगा लेकिन पानी से निकल आने के बाद दोबारा उसमें दाख़िल होना ज़रूरी नहीं बल्कि अगर पानी के अंदर ही बदन पर हाथ फेर लें कि पानी दो दफ़्आ बदन तक पहुंच जाए तो काफ़ी है।
173. अगर नजिस ग़िज़ा दांतों की रेखों में रह जाए और पानी मुहं में भर कर यूं घुमाया जाए कि तमाम नजिस ग़िज़ा तक पहुंच जाए तो वह ग़िज़ा पाक हो जाती है।
174. अगर सर या चेहरे के बालों को क़लील पानी से धोया जाए और वह बाल घने न हों तो उनसे धोवन जुदा करने के लिये उन्हें निचोड़ना ज़रूरी नहीं क्योंकि मअमूली पानी ख़ुद ब ख़ुद जुदा हो जाता है।
175. अगर बदन या लिबास का कोई हिस्सा क़लील पानी से धोया जाए तो नजिस मक़ाम के पाक होने से उस मक़ाम से मुत्तसिल वह जगहें भी पाक हो जायेंगी जिन तक धोते वक़्त उमूमन पानी पहुंच जाता है। मतलब यह है कि नजिस मक़ाम तक अतराफ़ को अलायहदा धोना ज़रूरी नहीं बल्कि वह नजिस मक़ाम को धोने के साथ ही पाक हो जाते हैं। और एक पाक चीज़ एक नजिस चीज़ के बराबर रख दें और दोनों पर पानी डालें तो उसका भी यही हुक्म है। लिहाज़ा अगर एक नजिस उंगली को पाक करने के लिये सब उंगलियों पर पानी डालें और नजिस पानी या पाक पानी सब उंगलियों तक पहुंच जाए तो नजिस उंगली के पाक होने पर तमाम उंगलिया पाक हो जायेंगी।
176. जो गोश्त या चर्बी नजिस हो जाए दूसरी चीज़ों की तरह पानी से धोई जा सकती है। यही सूरत उस बदन या लिबास की है जिस पर थोड़ी बहुत चिकनाई हो जो पानी को बदन या लिबास तक पहुंचने से न रोके।
177. अगर बर्तन या बदन नजिस हो जाए और बाद में इतन चिकना हो जाए कि पानी उस तक न पहुंच सके और बर्तन या बदन को पाक करना मक़्सूद हो तो पहले चिकनाई दूर करनी चाहिये ताकि पानी उन तक (यानी बर्तन या बदन तक) पहुंच सके।
178. जो नल कुर पानी से मुत्तसिल हो वह कुर पानी हुक्म रखता है।
179. अगर किसी चीज़ को धोया जाए और यक़ीन हो जाए कि पाक हो गई है लेकिन बाद में शक गुज़रे कि ऐने नजासत उससे दूर हुई है या नहीं तो ज़रूरी है कि उसे दोबारा पानी से धो लिया जाए और यक़ीन कर लिया जाए कि ऐने नजासत दूर हो गई है।
180. वह ज़मीन जिसमें पानी जज़्ब हो जाता हो ममलन ऐसी ज़मीन जिसकी सत्ह रेत या बजरी पर मुशतमिल हो अगर नजिस हो जाए तो क़लील पानी से पाक हो जाती है।
181. अगर वह ज़मीन जिसका फ़र्स पत्थर या ईटों का हो या दूसरी सख़्त ज़मीन जिसमें पानी जज़्ब न होता हो नजिस हो जाए तो क़लील पानी से पाक हो सकती है लेकिन ज़रूरी है कि उस पर इतना पानी गिराया जाए कि बहने लगे। जो पानी इस पर डाला जाए अगर वह किसी गढ़े से बाहर न निकल सके और किसी जगह जमआ हो जाए तो उस जगह को पाक करने का तरीक़ा यह है कि जमाअशुदा पानी को कपड़े या बर्तन से बाहर निकाल दिया जाए।
182. अगर मअदिनी नमक का डला या उस जैसी कोई और चीज़ ऊपर से नजिस हो जाए तो क़लील पानी से पाक हो सकती है।
183. अगर पिघली हुई नजिस शकर से कंद बना लें और उसे कुर या जारी पानी में डाल दें तो वह पाक नहीं होगी।
2. ज़मीन
184. ज़मीन पांव के तलवे और जूते के निचले हिस्से को चार शर्तों से पाक करती हैः-
(अव्वल) यह कि ज़मीन पाक हो।
(दोव्वुम) एहतियात की बिना पर ख़ुश्क हो।
(सोव्वुम) एहतियाते लाज़िम की बिना पर नजासत ज़मीन पर चलने से लगी हो।
(चाहरूम) ऐने नजासत मसलन ख़ून और पेशाब या मुतनज्जिस चीज़ मसलन मुतनज्जिम मिट्टी पांव के तलवे या जूते के निचले हिस्से में लगी हो वह रास्ता चलने या पांव ज़मीन पर रगड़ने से दूर हो जाए लेकिन अगर ऐने नजासत ज़मीन पर चलने या ज़मीन पर रगड़ने से पहले ही दूर हो गई हो तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर पाक नहीं होगी। अलबत्ता यह ज़रूरी है कि ज़मीन मिट्टी या पत्थर या ईंटों के फ़र्श या उनसे मिलती जुलती चीज़ पर मुश्तमिल हो। क़ालीन या दरी वग़ैरा या चटाई या घास पर चलने से पांव का नजिस तलवा या जूते का नजिस हिस्सा पाक नहीं होता।
185. पांव का तलवा या जूते के निचला हिस्सा नजिस हो तो डामर या लकड़ी के बने फ़र्श पर चलने से पाक होना महल्ले इश्क़ाल है।
186. पांव के तलवे या जूते के निचले हिस्से को पाक करने के लिये बेहतर है कि पन्द्रह हाथ या उससे ज़्यादा फ़ासला ज़मीन पर चलें ख़्वाह पन्द्रह हाथ से कम चलने या पांव ज़मीन पर रगड़ने से नजासत दूर हो गई हो।
187. पाक होने के लिये पांव या जूते के नजिस तलवे का तर होना ज़रूरी नहीं बल्कि ख़ुश्क भी हो तो ज़मीन पर चलने से पाक हो जाता है।
188. जब पांव या जूते का नजिस तलवा ज़मीन पर चलने से पाक हो जाए तो उसकी अहतराफ़ के वह हिस्से भी जिन्हें उमूमन कीचड़ वग़ैरा लग जाती है पाक हो जाते हैं।
189. अगर किसी ऐसे शख़्स की हाथ की हथेली या घुटना नजिस हो जाए जो हाथों और घुटनों के बल चलता हो तो उसके रास्ता चलने में उसकी हथेली या घुटने का पाक हो जाना महल्ले इश्क़ाल है। यही सूरत लाठी और मसनूई टांग के निचले हिस्से, चौपाए के नाल, मोटर गाड़ियों और गाड़ियों के पहियों की है।
190. अगर ज़मीन पर चलने के बाद नजासत की बू या रंग या बारीक ज़र्रे जो नज़र न आयें, पांव या जूते के तलवे से लगे रह जाए तो कोई हरज नहीं। अगरचे एहतियाते मुस्तहब यह है कि ज़मीन पर इस क़दर चला जाए कि वह भी ज़ाएल हो जाएं।
191. जूते का अन्दरूनी हिस्सा ज़मीन पर चलने से पाक नहीं होता और ज़मीन पर चलने से मोज़े के निचले हिस्से का पाक होना भी महल्ले इश्क़ाल है लेकिन अगर मोज़े का निचला हिस्सा चमड़े से मिलती जुलती चीज़ का बना हो (तो वह ज़मीन पर चलने से पाक हो जायेगा।)
3. सूरज
192. सूरज- ज़मीन इमारत और दीवार को पांच शर्तों के साथ पाक करता हैः-
अव्वल- नजिस चीज़ इस तरह तर हो कि अगर दूसरी चीज़ उससे लगे तो तर हो जाए लिहाज़ा अगर वह चीज़ ख़ुश्क हो तो उसे किसी तरह तर कर लेना चाहिये ताकि धूप से ख़ुश्क हो।
दोव्वुम- अगर किसी चीज़ में ऐने नजासत हो तो धूप से ख़ुश्क करने से पहले उस चीज़ से नजासत को दूर कर लिया जाए।
सोव्वुम- कोई चीज़ धूप में रूकावट न डाले। पस अगर धूप पर्दे, बादल या ऐसी ही किसी चीज़ के पीछे से उस चीज़ पर पड़े और उसे ख़ुश्क कर दे तो वह चीज़ पाक नहीं होगी। अलबत्ता अगर बादल इतना पतला हो कि धूप को न रोके तो कोई हरज नहीं।
चहारूम- फ़क़त सूरज नजिस चीज़ को ख़ुश्क करे। लिहाज़ा मिसाल के तौर पर अगर नजिस चीज़ हवा और धूप से ख़ुश्क हो तो पाक नहीं होती। हां अगर हवा इतनी हल्कि हो कि यह न कहा जा सके कि नजिस चीज़ को ख़ुश्क करने में उसने भी कोई मदद की है तो फिर कोई हरज नहीं।
पंजुम- बुनियाद और इमारत के जिस हिस्से में नजासत सरायत कर गई है धूप से एक ही मर्तबा ख़ुश्क हो जाए। पस अगर एक दफ़्आ धूप नजिस ज़मीन और इमारत पर पड़े और उसका सामना वाला हिस्सा ख़ुश्क करे और दूसरी दफ़्आ निचले हिस्से को ख़ुश्क करे तो उसका सामने वाला हिस्सा पाक होगा और निचला हिस्सा नजिस रहेगा।
193. सूरज नजिस चटाई को पाक कर देता है लेकिन अगर चटाई धागे से बुनी हुई हो तो धागे के पाक होने में इश्काल है। इसी तरह दरख़्त घास और दरवाज़े, खिड़कियां, सूरज से पाक होने में इश्काल है।
194. अगर धूप नजिस ज़मीन पर पड़े और इस में शक पैदा हो कि धूप पड़ने के वक़्त ज़मीन तर थी कि नहीं या तरी धूप के ज़रिये ख़ुश्क हुई है या नहीं तो वह ज़मीन नजिस होगी। और अगर शक पैदा हो कि धूप पड़ने से पहले ऐने नजासत ज़मीन पर से हटा दी गई थी या नहीं या यह कि कोई चीज़ धूप को माने थी या नहीं तो फिर भी वही सूरत होगी। (यानी ज़मीन नजिस रहेगी ।)
195. अगर धूप नजिस दीवार की एक तरफ़ पड़े और उसके ज़रिये दीवार की वह जानिब भी ख़ुश्क हो जाए कि जिस पर धूप नहीं पड़ी तो बईद (दूर) नहीं की दीवार दोनों तरफ़ से पाक हो जाए।
4. इसतिहाला
196. अगर किसी चीज़ की जिंस यूं बदल जाए कि एक पाक चीज़ की शक्ल इख़्तियार कर ले तो वह पाक हो जाती है। मिसाल के तौर पर नजिस लकड़ी जल कर राख हो जाए या कुत्ता नमक की खान में गिरकर नमक बन जाए। लेकिन अगर उसकी जिंस न बदले मसलन नजिस गेहूं को पीस कर आटा बना लिया जाए या (नजिस आटे की) रोटी पका ली जाए तो वह पाक नहीं होगी।
197. मिट्टी का लोटा और दूसरी ऐसी चीज़ें जो नजिस मिट्टी से बनाईं जायें नजिस हैं लेकिन वह कोयला जो नजिस लकड़ी से तैयार किया जाए अगर उसमें लकड़ी की कोई ख़ासीयत बाक़ी न रहे तो वह कोयला पाक है।
198. ऐसी नजिस चीज़े जिसके मुतअल्लिक़ इल्म न हो कि आया इसका इसतिहाला हुआ है या नहीं (यानी जिंस बदली है या नहीं) नजिस है।
5. इंक़िलाब
199. अगर शराब खुद ब खुद या कोई चीज़ मिलाने से मसलन सिर्का और नमक मिलाने से सिर्का बन जाए तो पाक हो जाती है।
200. वह शराब जो नजिस अंगूर या उस जैसी किसी दूसरी चीज़ से तैय्यार की गई हो या कोई नजिस चीज़ शराब में गिर जाए तो सिर्का बन जाने से पाक नहीं होती।
201. नजिस अंगूर, नजिस किशमिश और नजिस ख़जूर से जो सिर्का तैयार किया जाए वह नजिस है।
202. अगर अगूंर या खजूर के डंठल भी उनके साथ हों और उनसे सिर्का तैयार किया जाए तो कोई हरज नहीं बल्कि उसी बर्तन में खीरे और बैंगन वग़ैरा डालने में भी कोई ख़राबी नहीं ख़्वाह अंगूर या ख़जूर के सिर्का बनने से पहले ही डालें जाएं बशर्ते कि सिर्का बनने से पहले उनमें नशा न पैदा हुआ हो।
203. अगर अंगूर के रस में आंच पर रखने से या ख़ुद ब ख़ुद जोश आ जाये तो वह हराम हो जाता है और अगर वह इतना उबल जाए कि उसका दो तिहाई हिस्सा ख़त्म हो जाए और एक तिहाई बाक़ी रह जाए तो हलाल हो जाता है और मस्अला (नं0 114) में बताया जा चुका है कि अगूंर का रस जोश देने से नजिस नहीं होता (मगर खाना पीनी हराम है) ।
204. अगर अंगूर के रस का दो तिहाई बग़ैर जोश में आए कम हो जाए और जो बाक़ी बचे उसमें जोश आ जाए तो अगर लोग उसे अंगूर का रस कहें, शीरा न कहें तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर वो हराम है।
205. अगर अंगूर के रस के मुतअल्लिक़ यह मालूम न हो कि जोश में आया है या नहीं तो वह हलाल है लेकिन अगर जोश में आ जाए और यह यक़ीन न हो कि उसका दो तिहाई कम हुआ है या नहीं तो वह हलाल नहीं होता।
206. अगर कच्चे अंगूर के खोशे मे कुछ पक्के अंगूर भी हों और जो रस उस खोशे से लिया जाए उसे लोग अंगूर का रस न कहें और उसमें जोश आ जाए तो उसका पीना हलाल है।
207. अगर अंगूर का एक दाना किसी ऐसी चीज़ में गिर जाए जो आग पर जोश खा रही हो और वह भी जोश खाने लगे लेकिन वह उस चीज़ में हल न हो तो फ़क़त उस दाने का खाना हराम है।
208. अगर चन्द देग़ो में शीरा पकाया जाये तो जो चमचा जोश में आई हुई देग़ में डाला जा चुका हो उसका ऐसी देग़ में भी डालना जायज़ है जिसमें जोश न आया हो।
209. जिस चीज़ के बारे में यह मालूम न हो कि वह कच्चे अंगूरों का रस है या पक्के अंगूरों का, अगर उसमें जोश आ जाए तो हलाल है।
6- इंतिक़ाल
210. अगर इंसान का ख़ून या उछलने वाला ख़ून रखने वाले हैवान का ख़ून कोई ऐसा हैवान जिसमें उर्फ़न ख़ून नहीं होता इस तरह चूस ले कि वह ख़ून उस हैवान के बदन का जुज़्व हो जाए। मसलन मच्छर, इंसान या हैवान के बदन से इस तरह ख़ून चूसे तो वह ख़ून पाक हो जाता है और उसे इन्तिक़ाल कहते हैं। लेकिन इलाज की ग़रज़ से इन्सान का जो ख़ून जोंक चूसती है वह जोंक के बदन का जुज़्व नहीं बनता बल्कि इंसानी ख़ून ही रहता है इसलिये वह नजिस है।
211. अगर कोई शख़्स अपने बदन पर बैठे हुए मच्छर को मार दे और वह ख़ून जो मच्छर ने चूसा हो उसके बदन से निकले तो ज़ाहिर यह है कि वह ख़ून पाक है क्योंकि वह ख़ून इस क़ाबिल था कि मच्छर की ग़िज़ा बन जाए, अगर मच्छर के ख़ून चूसने और मारे जाने के दरमियान वक़्फ़ा बहुत कम हो, लेकिन एहतियाते मुस्तहब यह है कि उस ख़ून से इस हालत में परहेज़ करें।
7- इसलाम
212. अगर कोई काफ़िर "शहादतैन" पढ़ ले यानी किसी भी ज़बान (भाषा) में अल्लाह की वहदानीयत और ख़ातमुलअंबिया हज़रत मोहम्मद सलल्लाहो अलेहै व आलेही वसल्लम की नुबुव्वत की गवाही दे दे तो मुसलमान हो जाता है। और अगरचे वह मुसलमान होने से पहले नजिस के हुक्म में था लेकिन मुसलमान हो जाने के बाद उसका बदन, थूक, नाक का पानी और पसीना पाक हो जाता है। लेकिन मुसलमान होने के वक़्त अगर उसके बदन पर कोई ऐने नजासत हो तो उसे दूर करना और उस मक़ाम को पानी से धोना ज़रूरी है बल्कि अगर मुसलमान होने से पहले ही ऐने नजासत दूर हो चुकी हो तब भी एहतियाते वाजिब यह है कि उस मक़ाम को पानी से धों डाले।
213. एक काफ़िर के मुसलमान होने से पहले अगर उसका गिला लिबास उसके बदन से छू गया हो तो उसके मुसलमान होने के वक़्त वह लिबास उसके बदन पर हो या न हो एहतियाते वाजबि की बिना पर उससे इज्तिनाब करना ज़रूरी है।
214. अगर काफ़िर "शहादतैन" पढ़ ले और यह न मालूम हो कि वह दिल से मुसलमान हुआ है या नहीं तो वह पाक है। और अगर यह इल्म हो कि वह दिल से मुसलमान नहीं हुआ लेकिन ऐसी कोई बात उससे ज़ाहिर न हुई हो जो तौहीद और रिसालत की शहादत के मनाफ़ी हो तो सूरत वही है (यानी वह पाक है) ।
8- तबईय्यत
215. तबईय्यत का मतलब है कोई नजिस चीज़ किसी दूसरी चीज़ के पाक होने की वजह से पाक हो जाए।
216. अगर शराब सिर्का हो जाए तो उसका बर्तन भी उस जगह तक पाक हो जाता है जहां तक शराब जोश खाकर पहुंची हो और अगर कोई कपड़ा या कोई दूसरी चीज़ उमूमन उस (शराब के बर्तन) पर रखी जाती है और उस से नजिस हो गई हो तो वह भी पाक हो जाती है लेकिन अगर बर्तन की बैरूनी सत्ह उस शराब से आलूद हो जाए तो एहतियाते वाजिब यह है कि शराब के सिर्का हो जाने के बाद उस सत्ह से परहेज़ किया जाए।
217. काफ़िर का बच्चा बज़रीयाए तबईय्यत दो सूरतों में पाक हो जाता हैः-
1. जो काफ़िर मर्द मुसलमान हो जाए उसका बच्चा तहारत में उसके ताबे है और इसी तरह बच्चे की मां या दादी या दादा मुसलमान हो जाएं तब भी यही हुक्म है। लेकिन इस सूरत में बच्चे की तहारत का हुक्म इससे मशरूत है कि बच्चा उस नवमुस्लिम के साथ और उसके ज़ेरे कफ़ालत हो नीज़ बच्चे का कोई काफ़िर रिश्तेदार उस बच्चे के हमराह न हो।
2. एक काफ़िर बच्चे को किसी मुसलमान ने क़ैद कर लिया हो और उस बच्चे के बाप या बुज़ुर्ग (दादा या नाना वग़ैरह) में से कोई एक भी उसके हमराह न हों। इन दोनों सूरतों में बच्चे की तबईय्यत की बिना पर पाक होने की शर्त यह है कि वह जब बाशऊर हो जाए तो कुफ़्र इख़्तियार न करे।
218. वह तख़्ता या सिल जिस पर मैयित को ग़ुस्ल दिया जाए और वह कपड़ा जिससे मैयित की शर्मगाह ढांपी जाए नीज़ ग़स्साल के हाथ ग़ुस्ल मुकम्मल होने के बाद पाक हो जाते हैं।
219. अगर कोई शख़्स किसी चीज़ को पानी से धोए तो उस चीज़ के पाक होने पर उस शख़्स का वह हाथ भी पाक हो जाता है जिस से वह उस चीज़ को धोता है।
220. अगर लिबास या उस ज़ैसी किसी चीज़ को क़लील पानी से धोया जाए और इतना निचौड़ दिया जाए जितना आम तौर पर निचोड़ा जाता हो ताकि जिस पानी से धोया गया है उसका धोवन निकल जाए तो जो पानी उसमें रह जाए वो पाक है।
221. जब नजिस बर्तन को क़लील पानी से धोया जाए तो जो पानी बर्तन को पाक करने के लिये उस पर डाला जाए उसके बह जाने के बाद जो मअमूली पानी उसमें बाक़ी रह जाए वह पाक है।
9- ऐने नजासत का दूर होना
222. अगर किसी हैवान का बदन ऐने नजासत मसलन ख़ून या नजिसशुदा चीज़ मसलन नजिस पानी से आलूदा हो जाए तो जब वह नजासत दूर हो जाए हैवान का बदन पाक हो जाता है और यही सूरत इन्सानी बदन के अन्दरूनी हिस्सों मिसाल के तौर पर मुहं या नाक और कान के अन्दर वाले हिस्सों की है कि वह बाहर से नजासत लगने से नजिस हो जायेंगे और जब नजासत दूर हो जाए तो पाक हो जायेंगे लेकिन नजासते दाख़िली मसलन दांतों के रेख़ों से ख़ून निकलने से बदन का अन्दरूनी हिस्सा नजिस नहीं होता, और यही हुक्म है कि जब किसी ख़ारिजी चीज़ को बदन के अन्दरूनी हिस्से में नजासते दाख़िली लग जाए तो वह चीज़ नहीं होती। इस बिना पर अगर मसनूई दांत मुंह के अन्दर दूसरे दांतों के रेख़ों से निकले हुए ख़ून से आलूदा हो जायें तो उन दांतों को धोना लाज़िम नहीं है लेकिन अगर उन मसनूई दांतों को नजिस ग़िज़ा लग जाए तो उनको धोना लाज़िम है।
223. अगर दांतों की रेख़ों में ग़िज़ा लगी रह जाए और फिर मुंह के अन्दर ख़ून निकल आए तो वह ग़िज़ा ख़ून मिलने से नजिस नहीं होगी।
224. होंठों और आँख की पलकों के वह हिस्से जो बन्द करते वक़्त एक दूसरे से मिल जाते हैं वह अन्दरूनी हिस्से का हुक्म रखते हैं। अगर इस अन्दरूनी हिस्से में ख़ारिज से कोई नजासत लग जाए तो इस अन्दरूनी हिस्से को धोना ज़रूरी नहीं है। लेकिन वह मक़ामात जिनके बारे में इन्सान को यह इल्म न हो कि आया उन्हें अन्दरूनी हिस्सा समझा जाए या बेरूनी, अगर ख़ारिज से नजासत उन मक़ामात पर लग जाए तो उन्हें धोना चाहिये।
225. अगर नजिस मिट्टी कपड़े या ख़ुश्क क़ालीन, दरी या ऐसी ही किसी और चीज़ को लग जाए और कपड़े वग़ैरा को यूं झाड़ा जाए कि नजिस मिट्टी उससे अलग हो जाए तो उसके बाद तर चीज़ कपड़े वग़ैरा को छू जाए तो वह नजिस नहीं होगी।
10- नजासत खाने वाले हैवान का इसतिबरा
226. जिस हैवान को इन्सानी नजासत खाने की आदत पड़ गई हो उसका पेशाब और पख़ाना नजिस है और अगर उसे पाक करना मक़्सूद हो तो उसका इसतिबरा करना ज़रूरी है यानी एक अर्से तक उसे नजासत न खाने दें और पाक ग़िज़ा दें हत्ता कि इतनी मुद्दत गुज़र जाए कि फिर उसे नजासत खाने वाला न कहा जा सके। और एहतियाते मुस्तहब की बिना पर नजासत खाने वाले ऊंट को सालीस दिन तक, भेड़ को दस दिन तक, मुर्ग़ाबी को सात या पांच दिन तक और पालतू मुर्ग़ी को तीन दिन तक नजासत खाने से बाज़ रखा जाए। अगर यह मुक़र्ररः मुद्दत गुज़रने से पहले ही उन्हें नजासत खाने वाला हैवान न कहा जा सके (तब भी उस मुद्दत तक उन्हें नजासत खाने से बाज़ रखना चाहिये) ।
11- मुसलमान का ग़ायब हो जाना
अगर बालिग़ और पाकी नापाकी समझने वाले मुसलमान का बदन या लिबास या दूसरी अश्या मसलन बर्तन और दरी वग़ैरह जो उसके इस्तेमाल में हों नजिस हो जायें और फिर वह वहां से चला जाए तो अगर कोई इन्सान यह समझे कि उसने यह चीज़ें धोईं थीं तो वह पाक होंगी लेकिन एहतियाते मुस्तहब है कि उनको पाक न समझे मगर दर्जे ज़ैल चन्द शरायत के साथः
अव्वल – जिस चीज़ ने उस मुसलमान के लिबास को नजिस किया है उसे वह नजिस समझता हो। लिहाज़ा अगर मिसाल के तौर पर उसका लिबास तर हो और काफ़िर के बदन से छू गया हो और वह उसे नजिस न समझता हो तो उसके चले जाने के बाद उसके लिबास को पाक नहीं समझना चाहिये।
दोव्वुम – उसे इल्म हो कि उसका बदन या लिबास नजिस चीज़ से लग गया है।
सोव्वुम – कोई शख़्स उसे उस चीज़ को ऐसे काम में इस्तेमाल करते हुए देखे जिसमें उसका पाक होना ज़रूरी हो, मसलन उसे उस लिबास के साथ नमाज़ पढ़ते हुए देखे।
चहारूम – इस बात का एहतिमाल हो कि वह मुसलमान जो काम इस चीज़ के साथ कर रहा है इसके बारे में उसे इल्म है कि उस चीज़ का पाक होना ज़रूरी है। लिहाज़ा मिसाल के तौर पर अगर वह मुसलमान यह नहीं जानता कि नमाज़ पढ़ने वाले का लिबास पाक होना चाहिये और नजिस लिबास के साथ ही नमाज़ पढ़ रहा है तो ज़रूरी है कि इन्सान उस लिबास को पाक न समझे।
पंजुम - वह मुसलमान नजिस और पाक चीज़ में फ़र्क करता हो- पस अगर वह मुसलमान नजिस और पाक चीज़ में लापरवाई करता हो तो ज़रूरी है कि इन्सान उस चीज़ को पाक न समझे।
228. अगर किसी शख़्स को यक़ीनन या इत्मीनान हो कि जो चीज़ पहले नजिस थी अब पाक हो गई है या दो आदिल अश्ख़ास उसके पाक होनें की ख़बर दें और उनकी शहादत उस चीज़ की पाकी का जवाज़ बनें तो वह चीज़ पाक है। इसी तरह वह शख़्स जिसके पास कोई नजिस चीज़ हो कहे कि वह चीज़ पाक हो गई है और वह ग़लत बयान न हो या किसी मुसलमान ने एक नजिस चीज़ को धोया हो गोया यह मआलूम न हो कि उसने उसे ठीक तरह से धोया है या नहीं तो वह चीज़ भी पाक है।
229. अगर किसी ने एक शख़्स का लिबास धोने की ज़िम्मेदारी ली हो और कहे कि मैंने उसे धो दिया है और उस शख़्स को उसके यह कहने से तसल्ली हो जाए तो वह लिबास पाक है।
230. अगर किसी शख़्स की यह हालत हो जाए कि उसे किसी नजिस चीज़ के धोए जाने का यक़ीन ही न आए अगर वह उस चीज़ को जिस तरह लोग आमतौर पर धोते हैं धो ले तो काफ़ी है।
12 –मअमूल के मुताबिक़ (ज़बीहा के) ख़ून का बह जाना
231. जैसा कि मस्अला 98 में बताया गया है कि किसी जानवर को शरई तरीक़े से ज़िब्हा करने के बाद उसके बदन से मअमूल के मुताबिक़ (ज़रूरी मिक़दार में) ख़ून निकल जाए तो जो ख़ून उसके बदन के अन्दर बाक़ी रह जाए वह पाक है।
232. मज़कूरा बाला हुक्म जिसका बयान मस्अला 231 में हुआ है एहतियात की बिना पर उस जानवर से मख़्सूस है जिसका गोश्त हलाल हो। जिस जानवर का गोश्त हराम हो उस पर यह हुक्म जारि नहीं हो सकता बल्कि एहतियाते मुस्तहब की बिना पर उसका इत्लाक़ हलाल गोश्त वाले जानवर के उन अअज़ा पर भी नहीं हो सकता जो हराम है।
बर्तनों के अहकाम
233. जो बर्तन, कुत्ते, सुव्वर या मुर्दार के चमड़े से बनाया जाए उसमें किसी चीज़ का खाना, पीना जाबकि तरी उसकी नजासत का मूजीब बनी हो, हराम है। और उस बर्तन को वुज़ू और ग़ुस्ल और ऐसे दूसरे कामों में इस्तेमाल नहीं करना चाहिये जिन्हें पाक चीज़ से अन्जाम देना ज़रूरी हो और एहतियाते मुस्तहब यह है कि कुत्ते, सुव्वर और मुर्दार के चमड़े को ख़्वाह वह बर्तन की शक्ल में न भी हो इस्तेमाल न किया जाए।
234. सोने और चांदी के बर्तनों में खाना पीना बल्कि एहतियाते वाजिब की बिना पर उनको किसी तरह भी इस्तेमाल करना हराम है लेकिन उनसे कमरा वग़ैरा सजाने या उन्हें अपने पास रखने में कोई हरज नहीं गो उनका तर्क कर देना अहवत है। और सजावट या क़ब्ज़े में रखने के लिये सोने और चांदी के बर्तन बनाने और उनकी ख़रीद व फ़रोख़्त करने का भी यही हुक्म है।
235. इस्तिकान (शीशे का छोटा सा गिलास जिसमें कहवा पीते हैं) का होल्डल जो सोने या चांदी से बना हुआ हो अगर उसे बर्तन कहा जाए तो वह सोने और चांदी के बर्तन का हुक्म रखता है और अगर उसे बर्तन न कहा जाए तो उसके इस्तेमाल में कोई हर्ज नहीं।
236. ऐसे बर्तनों के इस्तेमाल में कोई हरज नहीं जिन पर सोने या चांदी का पानी चढ़ाया गया हो।
237. अगर जस्त को सोने या चांदी में मख़लूत (मिश्रित) करके बर्तन बनाये जायें और जस्त इतनी ज़्यादा मिक़दार में हो कि उस बर्तन को सोने या चांदी का बर्तन न कहा जाए तो उसके इस्तेमाल में कोई हर्ज नहीं।
238. अगर ग़िज़ा सोने या चांदी के बर्तन में रखी हो और कोई शख़्स उसे दूसरे बर्तन में उंडेल ले तो अगर दूसरा बर्तन आमतौर पर पहले बर्तन में खाने का ज़रीआ शुमार न हो तो ऐसा करने में कोई हर्ज नहीं है।
239. हुक्के के चिल्लम का सुराख़ वाला ढकना (सरपोश), तलवार या छुरी, चाकू का म्यान और क़ुरआन रखने का डिब्बा अगर सोने या चांदी से बने हों तो कोई हरज नहीं ताहम एहतियाते मुस्तहब यह है कि सोने या चांदी की बनी हुई इत्रदानी, सुर्मादानी और अफ़ीम दानी इस्तेमाल न की जाये।
240. मजबूरी की हालत में सोने चांदी के बर्तनों में इतना खाने पीने में कोई हरज नहीं जिससे भूक मिट जाए लेकिन इससे ज़्यादा खाना पीना जायज़ नहीं।
241. ऐसा बर्तन इस्तेमाल करने में कोई हरज नहीं जिसके बारे में मालूम न हो कि यह सोने या चांदी का है या किसी और चीज़ से बना हुआ है।
इबादात
वुज़ू
242. वुज़ू में वाजिब है कि चेहरा और दोंनो हाथ धोये जायें और सर के अगले हिस्से और दोंनो पांव के सामने वाले हिस्से का मसाह किया जाए।
243. चेहरे को लम्बाई में पेशानी के ऊपर उस जगह से लेकर जहां सर के बाल उगते हैं ठोड़ी के आख़िरी किनारे तक धोना ज़रूरी है और चौढ़ाई में बीच की उंगली और अंगूठे के फ़ैलाव में जितनी जगह आ जाये उसे धोना ज़रूरी है। अगर इस मिक़दार का ज़रा सा हिस्सा भी छूट जाए तो वुज़ू बातिल है। और अगर इन्सान को यह यक़ीन न हो कि ज़रूरी हिस्सा पूरा धुल गया है तो यक़ीन करने के लिये थोड़ा थोड़ा इधर उधर से धोना भी ज़रूरी है।
244. अगर किसी शख़्स के हाथ या चेहरा आम लोगों की बनिस्बत बड़े या छोटे हों तो उसे देखना चाहिये की आम लोग कहां तक अपना चेहरा धोते हैं फिर वह भी उतना ही धो डाले। अलावा अज़ी अगर उसकी पेशानी पर बाल उगे हुएं हों या सर के अगले हिस्से पर बाल न हों तो उसे चाहिये की आम अन्दाज़े के मुताबिक़ पेशानी धो डाले।
245. अगर इस बात का एहतिमाल हो कि भवों, आंख के गोशों और होठों पर मैल या कोई दूसरी चीज़ जो पानी के उन तक पहुंचने में माने है और उसका यह एहतिमाल लोगों की नज़रों में दरूस्त हो तो उसे वुज़ू से पहले तहक़ीक़ कर लेनी चाहिये। और अगर कोई ऐसी चीज़ हो तो उसे दूर करना चाहिये।
246. अगर चेहरे की जिल्द बालों के नीचे से नज़र आती हो तो पानी जिल्द तक पहुंचाना ज़रूरी है और अगर नज़र न आती हो तो बालों का धोना काफ़ी है और उनके नीचे तक पानी पहुंचाना ज़रूरी नहीं।
247. अगर किसी शख़्स को शक हो कि आया उसके चेहरे की जिल्द बालों के नीचे से नज़र आती है या नहीं तो एहतियाते वाजिब की बिना पर ज़रूरी है कि बालों को धोए और पानी जिल्द तक भी पहुंचाए।
248. नाक के अन्दरूनी हिस्से और होंठों और आंखों के उन हिस्सों का जो बन्द करने पर नज़र नहीं आते धोना वाजिब नहीं है। लेकिन अगर किसी इन्सान को यह यक़ीन न हो कि जिन जगहों का धोना ज़रूरी है उनमें कोई जगह बाक़ी नहीं रही तो वाजिब है कि उन अअज़ा का कुछ इज़ाफ़ी हिस्सा भी धो ले ताकि उसे यक़ीन हो जाए। और जिस शख़्स को इस (मज़कूरा) बात का इल्म न हो अगर उसने जो वुज़ू किया है उसमें ज़रूरी हिस्से धोने या न धोने के बारे में जानता हो तो उस वुज़ू से उसने जो नमाज़ पढ़ी है वह सहीह है और बाद की नमाज़ों के लिये वुज़ू करना ज़रूरी नहीं है।
249. एहतियाते लाज़िम की बिना की बिना पर ज़रूरी है कि हाथों और उसी तरह चेहरे को ऊपर से नीचे की तरफ़ धोया जाए। अगर नीचे से ऊपर की तरफ़ धोए जायें तो वुज़ू बातिल होगा।
250. अगर हथेली पानी से तर करके चेहरे और हाथों पर फेरी जाए और हाथ में इतनी तरी हो कि उसे फेरने से पूरे चेहरे और हाथों पर पानी पहुंच जाए तो काफ़ी है। उन पर पानी का बहना ज़रूरी नहीं।
251. चेहरा धोने के बाद पहले दायां हाथ और फिर बायां हाथ कोहनी से उंगूलियों के सिरों तक धोना चाहिये।
252. अगर इंसान को यक़ीन न हो कि कोहनी को पूरी तरह धो लिया है तो यक़ीन करने के लिये कोहनी से ऊपर का कुछ हिस्सा भी धोना ज़रूरी है।
253. जिस शख़्स ने चेहरा धोने से पहले अपने हाथों को कलाई के जोड़ तक धोया हो उसे चाहिये कि वुज़ू करते वक़्त उंगलियों के सिरों तक धोए। अगर वह सिर्फ़ कलाई के जोड़ तक धोयेगा तो उसका वुज़ू बातिल होगा।
254. वुज़ू में चेहरे और हाथों का एक दफ़्आ धोना वाजिब, दूसरी दफ़्आ धोना मुस्तहब और तीसरी दफ़्आ या इससे ज़्यादा बार धोना हराम है। एक दफ़्आ धोना उस वक़्त मुकम्मल होगा जब वुज़ू की नियत से इतना पानी चेहरे या हाथ पर डाले कि वह पानी पूरे चेहरे या हाथ पर पहुंच जाए और एहतियातन कोई जगह बाक़ी न रहे लिहाज़ा अगर पहली दफ़्आ धोने की नियत से दस बार भी चेहरे पर पानी डाले तो इसमें कोई हरज नहीं है। यानी मसलन जब तक वुज़ू करने या चेहरा धोने की नियत न करे पहली बार शुमार नहीं होगा लिहाज़ा अगर चाहे तो चन्द बार चेहरे को धो ले और आख़िरी बार चेहरा धोते वक़्त वुज़ू की नियत कर सकता है। लेकिन दूसरी दफ़्आ धोने में नियत का मोतबर होना इश्क़ाल से ख़ाली नहीं है और एहतियाते लाज़िम यह है कि अगरचे वुज़ू की नियत से न भी हो तो एक दफ़्आ धोने के बाद एक बार से ज़्यादा चेहरे या हाथों को न धोएं।
255. दोनों हाथ धोने के बाद सर के अगले हिस्से का मसह वुज़ू के पानी की उस तरी से करना चाहिये जो हाधों को लगी रह गई हो और एहतियाते मुस्तहब यह है कि मसह दायें हाथ से किया जाए जो ऊपर से नीचे की तरफ़ हो।
256. सर के चार हिस्सों में से पेशानी से मिला हुआ एक हिस्सा वह मक़ाम है जहां मसाह करना चाहिये। इस हिस्से में जहां भी और जिस अन्दाज़ में भी मसा करें काफ़ी है। अगर चे एहतियाते मुस्तहब यह है कि तूल में एक उंगली की लम्बाई के और अर्ज़ में तीन मिली हुई उंगलीयो के लगभग मसह किया जाए।
257. यह ज़रूरी नहीं कि सर का मसह जिल्द पर किया जाए बल्कि सर के अगले हिस्से के बालों पर करना भी दुरूस्त है लेकिन अगर किसी के सर के बाल इतने लम्बे हों कि मसलन अगर कंघा करे तो चहरे पर आ गिरें या सर के किसी दूसरे हिस्से तक जा पहुंचें तो ज़रूरी है कि वह बालों की जड़ों या मांग निकाल कर सर की जिल्द पर मसह करे। और अगर वह चेहरे पर आ गिरने वाले या सर के दूसरे हिस्सों तक पहुंचने वाले बालों को आगे की तरफ़ जमअ करके उन पर मसह करेगा या सर के दूसरे हिस्सों के बालों पर जो आगे को बढ़ आए हो मसह करेगा तो ऐसा मसह बातिल है।
258. सर के मसह के बाद वुज़ू के पानी की उस तरी से जो हाथों में बाक़ी हो पांव की किसी एक उंगली से लेकर पांव के जोड़ तक मसह करना ज़रूरी है। और एहतियाते मुस्तहब यह है कि दांये पैर का दायें हाथ से और बायें पैर का बायें हाथ से मसह किया जाए।
259. पांव पर मसह का अरज़ जितना भी हो काफ़ी है लेकिन बेहतर है कि तीन जुड़ी हुई उंगूलीयों की चौड़ाई के बराबर हो और उससे भी बेहतर यह है कि पांव के पूरे ऊपरी हिस्से का मसह पूरी हथेली से किया जाए।
260. एहतियात यह है कि पांव का मसह करते वक़्त हाथ उंगलियों के सिरो पर रखे और फिर पांव के उभार की जानिब खींचे या हाथ पांव के जोड़ पर रख कर उंगलियों के सिरों की तरफ़ खीचें। यह दुरूस्त नहीं की पूरा हाथ पांव पर रखे और थोड़ा सा खींचे।
261. सर और पांव का मसह करते वक़्त हाथ उन पर खींचना ज़रूरी है। और अगर हाथ को साकिन रखे और सर या पांव को उस पर चलाए तो बातिल है लेकिन हाथ खींचने के वक़्त सर और पांव मामूली हरकत करें तो हरज नहीं।
262. जिस जगह का मसह करना हो वह ख़ुश्क होनी चाहिये। अगर वह इस क़दर तर हो कि हथेली की तरी उस पर असर न करे तो मसह बातिल है। लेकिन अगर उस पर नमी हो या तरी इतनी कम हो कि वह हथेली की तरी से ख़त्म हो जाए तो फिर कोई हर्ज नहीं।
263. अगर मसह करने के लिये हथेली पर तरी बाक़ी न रही हो तो उसे दूसरे पानी से तर नहीं किया जा सकता बल्कि ऐसी सूरत में अपनी दाढ़ी की तरी लेकर उससे मसह करना चाहिये। और दाढ़ी के अलावा और किसी जगह से तरी लेकर मसह करना महल्ले इश्काल है।
264. अगर हथेली की तरी सिर्फ़ सर के मसह के लिये काफ़ी हो तो एहतियाते वाजिब यह है कि सर का मसह उस तरी से किया जाए और पांव के मसह के लिये अपनी दाढ़ी से तरी हासिल करे।
265. मोज़े और जूते पर मसह करना बातिल है। हां अगर सख़्त सर्दी की वजह से या चोर या दरिन्दे वग़ैरह के ख़ौफ़ से जूते या मोज़े न उतारे जा सकें तो एहतियात वाजिब यह है कि मोज़े और जूते पर मसह करें और तयम्मुम भी करें। और तक़ैया की सूरत में मोज़े और जूते पर मसह करना काफ़ी है।
266. अगर पांव का ऊपर वाला हिस्सा नजिस हो और मसह करने के लिये उसे धोया भी न जा सकता हो तो तयम्मुम करना ज़रूरी है।
इरतिमासी वुज़ू
267. इरतिमासी वुज़ू यह है कि इन्सान चेहरे और हाथों को वुज़ू की नियत से पानी में डुबो दे। बज़ाहिर इरतिमासी तरीक़े से धुले हुए हाथ की तरी से मसह करने में कोई हरज नहीं है। लेकिन ऐसा करना ख़िलाफ़े एहतियात है।
268. इरतिमासी वुज़ू में भी चेहरा और हाथ ऊपर से नीचे की तरफ़ धोने चाहियें। लिहाज़ा जब कोई शख़्स वुज़ू की नियत से चेहरा और हाथ पानी में डुबोए तो ज़रूरी है कि चेहरा पेशानी की तरफ़ से और हाथ कोहनियों की तरफ़ से डुबोए।
269. अगर कोई शख़्स बाज़ अअज़ा का वुज़ू इरतिमासी तरीक़े से और बाज़ का ग़ैर इरतिमासी (यानी तरतीबी) तरीक़े से करे कोई हरज नहीं।
दुआयें जिनका वुज़ू करते वक़्त पढ़ना ज़रूरी है
270. जो शख़्स वुज़ू करने लगे उसके लिये मुस्तहब है कि जब उसकी नज़र पानी पर पड़े तो यह दुआ पढ़ेः-
बिस्मिल्लाहे व बिल्लाहे वलहम्दो लिल्लाहे जअलल माअ तहूरौं व लम् यज्अल्हो नजसा।
जब वुज़ू से पहले अपने हाथ धोए तो यह दुआ पढ़ेः-
अल्लाहुम्मज अल्नी मिनत्ताव्वबीना वज्अलनी मिनल मुततह्ह- रीना ।
कुल्ली करते वक़्त यह दुआ पढ़ेः-
अल्लाहुम्मा लक्केनी हुज्जती यौमा अल्क़ाका व अत्लिक़ लिसानी बे ज़िकरेका ।
नाक में पानी डालते वक़्त यह दुआ पढ़ेः-
अल्लाहुम्मा ला तुहरिम अलैय्या रीहल जन्नते वज् अल्नी मिम्मैंयशुम्मो रीहहा व रौहहा व तीबहा ।
चेहरा धोते वक़्त यह दुआ पढ़ेः-
अल्लाहुम्मा बैय्यिज़ वज्ही यौमा तसव्वदुल वुजूहो वला तुसव्विद वज्ही यौमा तब्यज्जुल वुजूहो ।
दायां हाथ धोते वक़्त यह दुआ पढ़ेः-
अल्लाहुम्मा अअतिनी किताबी बे यमीनी वल ख़ुल्दा फ़िल जिनाने यसारी व हासिब्नी हिसाबैं य्यसीरा ।
बायां हाथ धोते वक़्त यह दुआ पढ़ेः-
अल्लाहुम्मा ला तोअतिनी किताबी बेशिमाली वला मिंव्वराए ज़हरी व ला तज्अल्हा मग़लूलतुन इला उनुक़ी व अऊज़ोबिका मिंम्मुक़त्ते आतिन नीराने ।
सर का मसह करते वक़्त यह दुआ पढ़ेः-
अल्ला हुम्मा सब्बितनी अलस्सिराते यौमा तज़िल्लो फ़ीहिल अक़दामो वज्अल सअयी फ़ी मा युरज़ीक़ा अन्नी या ज़ल जलाले वल इकराम ।
वुज़ू सहीह होने की शरायत
वुज़ू के सहीह होने के चन्द शरायत हैः-
(पहली शर्त) वुज़ू का पानी पाक हो। एक क़ौल की बिना पर वुज़ू का पानी चीज़ों मसलन हलाल गोश्त के पेशाब, पाक मुर्दार और ज़ख़्स की रीम से आलूदा न हो जिनसे इन्सान को घिन आती हो अगर चे शरई लिहाज़ से (ऐसा पानी) पाक है और यह क़ौल एहतियात की बिना पर है।
(दूसरी शर्त) पानी मुतलक़ हो ।
271. नजिस या मुज़ाफ़ पानी से वुज़ू करना बातिल है ख़्वाह वुज़ू करने वाला शख़्स उसके नजिस या मुज़ाफ़ होने के बारे में इल्म न रखता हो या भूल गया हो कि वह नजिस या मुज़ाफ़ पानी है। लिहाज़ा अगर वह ऐसे पानी से वुज़ू करके नमाज़ पढ़ चुका हो तो सहीह वुज़ू करके दोबारा नमाज़ पढ़ना ज़रूरी है।
272. अगर एक शख़्स के पास मिट्टी मिले हुए मुज़ाफ़ पानी के अलावा और कोई पानी वुज़ू के लिये न हो और नमाज़ का वक़्त तंग हो तो ज़रूरी है कि तयम्मुम कर ले। लेकिन अगर वक़्त तंग न हो तो ज़रूरी है कि पानी के साफ़ होने का इन्तेज़ार करे या किसी तरीक़े से उस पानी को साफ़ करे और वुज़ू करे।
(तीसरी शर्त) वुज़ू का पानी मुबाह हो ।
273. ऐसे पानी से वुज़ू करना जो ग़स्ब किया गया हो या उसके बारे में यह इल्म न हो कि इसका मालिक इसके इस्तेमाल पर राज़ी है या नहीं हराम और बातिल है। अलावा अगर चेहरे और हाथों से वुज़ू का पानी ग़स्ब की हुई जगह पर गिरता हो या वह जगह जिसमें वुज़ू कर रहा है ग़स्बी है और वुज़ू करने के लिये कोई और जगह भी न हो तो मुतअल्लिक़ा शख़्स का फ़रीज़ा तयम्मुम है। और अगर किसी दूसरी जगह वुज़ू कर सकता हो तो ज़रूरी है कि दूसरी जगह वुज़ू करे। लेकिन अगर दोंनो सूरतों में गुनाह का इरतिक़ाब करते हुए उसी जगह वुज़ू कर ले तो उसका वुज़ू सहीह है।
274. किसी मद्रसे के ऐसे हौज़ से वुज़ू करने में कोई हरज नहीं जिसके बारे में यह इल्म न हो कि आया वह तमाम लोंगो के लिये वक़्फ़ किया गया है या सिर्फ़ मद्रसे के तलबा के लिये वक़्फ़ है और सूरत यह हो कि लोग उमूमन उससे वुज़ू करते हों और कोई मनअ न करता हो।
275. अगर कोई शख़्स एक मस्जिद में नमाज़ पढ़ना चाहता हो और यह भी न जानता हो कि आया इस मस्जिद का हौज़ तमाम लोगों के लिये वक़्फ़ है या सिर्फ़ उन लोगों के लिये जो इस मस्जिद में नमाज़ पढ़ते हैं तो उसके लिये उस हौज़ से वुज़ू करना दुरूस्त नहीं लेकिन उमूमन वह लोग भी उस हौज़ से वुज़ू करते हों जो उस मस्जिद में नमाज़ न पढ़ना चाहते हों और कोई मनअ न करता हो तो वह शख़्स भी उस हौज़ से वुज़ू कर सकता है।
276. सराय, मुसाफ़िर ख़ानों और ऐसे ही दूसरे मक़ामात के हौज़ से उन लोगों का जो उसमें मुक़ीम न हो, वुज़ू करना उसी सूरत में दुरूस्त है जब उमूमन ऐसे लोग भी जो वहां मुक़ीम न हो उस हौज़ से वुज़ू करते हों और कोई मनअ न करता हो।
277. बड़ी नहरों से वुज़ू करने में कोई हरज नहीं अगरचे इन्सान न जानता हो कि उनका मालिक राज़ी है या नहीं। लेकिन उन नहरों का मालिक वुज़ू करने से मनअ करे या मालूम हो कि वह उनसे वुज़ू करने पर राज़ी नहीं या उनका मालिक नाबालिग़ या पागल हो तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि उन नहरों के पानी से वुज़ू न करें।
278. अगर कोई शख़्स यह भूल जाए कि पानी ग़स्बी है और उससे वुज़ू कर ले तो उसका वुज़ू सहीह है। लेकिन अगर किसी शख़्स ने ख़ुद पानी ग़स्ब किया हो और बाद में भूल जाए कि यह पानी ग़स्बी है और उससे वुज़ू करले तो उसका वुज़ू सहीह होने में इश्क़ाल है।
(चौथी शर्त) वुज़ू का बर्तन मुबाह हो ।
(पांचवी शर्त) वुज़ू का बर्तन एहतियाते वाजिब की बिना पर सोने या चांदी का बना हुआ न हो । इन दो शर्तों की तफ़्सील बाद वाले मस्अले में आ रही है ।
279. अगर वुज़ू का पानी ग़स्बी या सोने चांदी के बर्तन में हो और उस शख़्स के पास उसके अलावा और कोई पानी न हो तो अगर वह उस पानी को शरई तरीक़े से दूसरे बर्तन में उंड़ेल सकता हो तो उसके लिये ज़रूरी है कि उसे किसी दूसरे बर्तन में उंडेल ले और फिर उससे वुज़ू करे और अगर ऐसा करना आसान न हो तो तयम्मुम करना ज़रूरी है। और अगर उसके पास उसके अलावा दूसरा पानी मौजूद हो तो ज़रूरी है कि उससे वुज़ू करे। और अगर वह इन दोनों सूरतों में वह सहीह तरीक़े से अमल न करते हुए, उस पानी से जो ग़स्बी है या सोने चांदी के बर्तन में है वुज़ू करले तो उसका वुज़ू सहीह है।
280. अगर किसी हौज़ में मिसाल के तौर पर ग़स्ब की हुई एक ईंट या एक पत्थर लगा हो और उर्फ़े आम में उस हौज़ में से पानी निकालना उस ईंट या पत्थर पर तसर्रूफ़ न समझा जाए तो पानी का निकालना हराम है लेकिन उससे वुज़ू करना सहीह है।
181. अगर आइम्मा ए ताहिरीन (अ0) या उनकी औलाद के मक़्बिरे के सहन में जो पहले कब्रिस्तान था कोई हौज़ या नहर खोदी जाए और यह इल्म न हो कि सहन की ज़मीन कब्रिस्तान के लिये वक़्फ़ हो चुकी है तो उस हौज़ या नहर के पानी से वुज़ू करने में कोई हरज नहीं।
(छठी शर्त) वुज़ू के अअज़ा धोते वक़्त और मसह करते वक़्त पाक हों।
282. अगर वुज़ू मुकम्मल होने से पहले वह मुक़ाम नजिस हो जाए जिसे धोया जा चुका है या जिसका मसह किया जा चुका है तो वुज़ू सहीह है।
283. अगर अअज़ाए वुज़ू के सिवा बदन का कोई हिस्सा नजिस हो तो वुज़ू सहीह है लेकिन अगर पख़ाने या पेशाब के मुक़ाम को पाक न किया गया हो तो फिर एहतियाते मुस्तहब यह है कि पहले उन्हें पाक करें और फिर वुज़ू करे।
284. अगर वुज़ू के अअज़ा में से कोई उज़्व नजिस हो और वुज़ू करने के बाद मुतअल्लिक़ा शख़्स को शक गुज़रे कि आया वुज़ू करने से पहले उस उज़्व को धोया था या नहीं तो वुज़ू सहीह है लेकिन उस नजिस मक़ाम को धोना ज़रूरी है।
285. अगर किसी के चेहरे पर या हाथों पर कोई ऐसी ख़राश या ज़ख़्म हो जिससे ख़ून न रूकता हो और पानी उसके लिये मुज़िर न हो तो ज़रूरी है कि उस उज़्व के सहीह सालिम अअज़ा को तरतीबवार धोने के बाद ज़ख़्म या ख़राश वाले हिस्से को कुर बराबर पानी या जारी पानी में डुबो दे और उसे इस क़द्र दबाए की ख़ून बन्द हो जाए और पानी के अन्दर ही अपनी उंगली ज़ख़्म या ख़राश पर रख कर ऊपर से नीचे की तरफ़ खींचे ताकि उस (ख़राश या ज़ख़्म) पर पानी जारी हो जाए, इस तरह उसका वुज़ू सहीह हो जायेगा।
(सातवीं शर्त) वुज़ू करने और नमाज़ पढ़ने के लिये वक़्त काफ़ी हो ।
286. अगर वक़्त इतना तंग हो कि मुतअल्लिक़ा शख़्स वुज़ू करे तो सारी की सारी नमाज़ या उसका कुछ हिस्सा वक़्त के बाद पढ़ना पड़े तो ज़रूरी है कि तयम्मुम कर ले लेकिन अगर तयम्मुम और वुज़ू के लिये तक़रीबन यक़्सा वक़्त दरकार हो तो फिर वुज़ू करे ।
287. जिस शख़्स के लिये नमाज़ का वक़्त तंग होने के बाइस तयम्मुम करना ज़रूरी हो अगर वह क़स्दे क़ुर्बत की नियत से या किसी मुस्तहब काम मसलन क़ुरआने मजीद पढ़ने के लिये वुज़ू करे तो उसका वुज़ू सहीह है। और अगर उसी नमाज़ को पढ़ने के लिये वुज़ू करे तो भी यही हुक्म है लेकिन उसे क़स्दे क़ुर्बत हासिल नहीं होगा।
(आठवीं शर्त) वुज़ू क़स्दे क़ुर्बत यानी अल्लाह तआला की रिज़ा के लिये किया जाए। अगर अपने आपको ठंडक पहुंचाने या किसी और नियत से किया जाए तो वुज़ू बातिल है।
288. वुज़ू की नियत ज़बान से या दिल से करना ज़रूरी नहीं बल्कि अगर एक शख़्स वुज़ू के तमाम अफ़्आल अल्लाह तआला के हुक्म पर अमल करने की नीयत से बजा लाए तो काफ़ी है।
(नवीं शर्त) वुज़ू इस तरतीब से किया जाए जिसका ज़िक्र ऊपर हो चुका है यानी पहले चेहरा उसके बाद दायां और फिर बायां हाथ धोया जाए उसके बाद सर का और पांव का मसह किया जाए और एहतियाते मुस्तहब यह है कि दोनों पांव का एक साथ मसह न किया जाए बल्कि बांये पांव का मसह दांये पांव के बाद किया जाए।
(दसवीं शर्त) वुज़ू के अफ़्आल सर अंजाम देने में फ़ासिला न हो।
289. अगर वुज़ू के अफ़्आल के दरमियान इतना फ़ासला हो जाए कि उर्फ़े आम में मुतावातिर धोना न कहलाए तो वुज़ू बातिल है लेकिन अगर किसी शख़्स को कोई उज्र पेश आ जाए मसलन यह कि भूल जाए या पानी ख़त्म हो जाए तो उस सूरत में बिला फ़ासिला धोने की शर्त मोअतबर नहीं है। बल्कि वुज़ू करने वाला शख़्स जिस वक़्त चाहे किसी उज़्व को धो ले या उसका मसह कर ले तो इस आशना में अगर उन मक़ामात की तरी ख़ुश्क हो जाए जिन्हें वह पहले धो चुका हो या जिनका मसह कर चुका हो तो वुज़ू बातिल होगा, लेकिन अगर जिस उज़्व को धोना है या मसह करना है सिर्फ़ उससे पहले धोए हुए या मसह किये हुए उज़्व की तरी ख़ुश्क हो गई हो मसलन जब बायां हाथ धोते वक़्त दांयें हाथ की तरी ख़ुश्क हो चुकी हो लेकिन चेहरा तर हो तो वुज़ू सहीह है।
290. अगर कोई शख़्स वुज़ू के अफ़्आल बिला फ़ासिला अन्जाम दे लेकिन गर्म हवा या बदन की तप या किसी और ऐसी ही वजह से पहली जगहों की तरी (यानी उन जगहों की तरी जिन्हे वह पहले धो चुका हो या जिनका मसह कर चुका हो) ख़ुश्क हो जाए तो उसका वुज़ू सहीह है।
291. वुज़ू के दौरान चलने फिरने में कोई हर्ज नहीं लिहाज़ा अगर कोई शख़्स चेहरा और हाथ धोने के बाद चन्द क़दम चले और फिर सर और पांवो का मसह करे तो उसका वुज़ू सही है।
(ग्यारहवीं शर्त) इन्सान ख़ुद अपना चेहरा और हाथ धोए और फिर सर और पावों का मसह करे अगर कोई दूसरा उसे वुज़ू कराए या उसके चेहरे या हाथों पर पानी डाल दे या सर और पांव का मसह करने में उसकी मदद करे तो उसका वुज़ू बातिल है।
292. अगर कोई शख़्स ख़ुद वुज़ू न कर सकता हो तो किसी दूसरे शख़्स से मदद ले अगरचे धोने और मसह करने में हत्तल इम्कान दोनों की शिर्कत ज़रूरी है। और अगर वह शख़्स उजरत मांगे तो अगर उसकी अदायगी कर सकता हो तो और ऐसा करना उसके लिये माली तौर पर नुक़सान देह न हो तो उजरत अदा करना ज़ूरूरी है। नीज़ ज़रूरी है कि वुज़ू की नियत ख़ुद करे और अपने हाथ से मसह करे और अगर ख़ुद दूसरे के साथ शिर्कत न कर सकता हो तो ज़रूरी है कि किसी दूसरे शख़्स से मदद ले जो उसे वुज़ू कर वाए या इस सूरत में एहतियाते वाजिब यह है कि दोनों वुज़ू की नियत करें। और अगर यह मुम्किन न हो तो ज़रूरी है कि उसका नायब उसका हाथ पकड़ कर उसकी मसह की जगहों पर फेरे और अगर यह मुम्किन न हो तो ज़रूरी है कि नायब उसके हाथ से तरी हासिल करे और उस तरी से उसके सर और पांव का मसह करे।
293. वुज़ू के जो भी अफ़्आल इन्सान बज़ाते ख़ुद अन्जाम दे सकता हो ज़रूरी है कि उन्हें अंजाम देने के लिये दूसरों की मदद न ले।
(बारहवीं शर्त) वुज़ू करने वाले के लिये पानी के इस्तेमाल में कोई रूकावट न हो ।
294. जिस शख़्स को ख़ौफ़ हो कि वुज़ू करने से बीमार हो जायेगा या उस पानी से वुज़ू करेगा तो प्यासा रह जायेगा उसका फ़रीज़ा वुज़ू नहीं है और अगर उसे इल्म न हो कि पानी उसके लिये मुज़िर है और वह वुज़ू कर ले और उसे वुज़ू करने से नुक़सान पहुंचे तो उसका वुज़ू बातिल है।
295. अगर चेहरे या हाथों को इतने कम पानी से धोना, जिससे वुज़ू सहीह हो जाता हो ज़रर रसां न हो, और उससे ज़्यादातर ज़रर रसां हो तो ज़रूरी है कि कम मिक़दार में ही वुज़ू करे।
(तेरहवीं शर्त) वुज़ू के अअज़ा तक पानी पहुंचने में कोई रूकावट न हो।
296. अगर किसी शख़्स को मालूम हो कि वुज़ू के अअज़ा पर कोई चीज़ लगी हुई है, लेकिन इस बारे में उसे शक हो कि आया वह चीज़ पानी के उन अअज़ा तक पहुंचने में माने है या नहीं तो ज़रूरी है कि या तो उस चीज़ को हटा दे या पानी उसके नीचे तक पहुंचाए।
297. अगर नाख़ून के नीचे मैल हो तो वुज़ू दुरूस्त है लेकिन अगर नाख़ून काटा जाए और उस मैल की वजह से पानी खाल तक न पहुंचे तो वुज़ू के लिये उस मैल का दूर करना ज़रूरी है। अलावा अज़ी अगर नाख़ून मामूल से ज़्यादा बढ़ जाए तो जितना हिस्सा मामूल से ज़्यादा बढ़ा हुआ हो उसके नीचे से मैल निकालना ज़रूरी है।
298. अगर किसी के चेहरे, हाथों, सर के अगले हिस्से या पांव के ऊपर वाले हिस्से पर जल जाने या किसी और वजह से वरम हो जाए तो उसे धो लेना और उस पर मसह कर लेना काफ़ी है और अगर उसमें सूराख़ हो जाए तो पानी जिल्द के नीचे पहुंचाना ज़रूरी नहीं बल्कि अगर जिल्द का एक हिस्सा उखड़ जाए तब भी यह ज़रूरी नहीं की जो हिस्सा नहीं उखड़ा उसके नीचे तक पानी पहुंचाया जाए लेकिन जब उखड़ी हुई जिल्द कभी बदन से चिपक जाती हो और कभी ऊपर उठ जाती हो तो ज़रूरी है कि या तो उसे काट दें या उसके नीचे पानी पहुंचाए।
299. अगर किसी शख़्स को शक हो कि उसके वुज़ू के अअज़ा से कोई चीज़ चिपकी हुई है या नहीं और उसका यह एहतिमाल लोगों की नज़रों में भी दुरूस्त हो मसलन गारे से कोई काम करने के बाद शक हो कि गारा उसके हाथ से लगा रह गया है या नहीं तो ज़रूरी है कि तहक़ीक़ कर ले या हाथ को इतना मलें कि इत्मीनान हो जाए कि अगर उस पर गारा लगा रह गया था तो वह दूर हो गया है या पानी उसके नीचे पहुंच गया है।
300. जिस जगह को धोना या जिस जगह का मसह करना हो अगर उस पर मैल हो लेकिन वह मैल पानी के जिल्द तक पहुंचने में रूकावट न डाले तो कोई हरज नहीं। इसी तरह अगर पलस्तर वग़ैरह का काम करने के बाद सफ़ेदी हाथ पर लगी रह जाए जो पानी को जिल्द तक पहुंचने से न रोके तो उसमें भी कोई हरज नहीं। लेकिन अगर शक हो कि उन चीज़ों की मौजूदगी पानी के जिल्द तक पहुंचने में माने है या नहीं तो उन्हें दूर करना ज़रूरी है।
301. अगर कोई शख़्स वुज़ू करने से पहले जानता हो कि वुज़ू के अअज़ा पर ऐसी चीज़ मौजूद है जो उन तक पानी पहुंचने में माने है और वुज़ू के बाद शक करे कि वुज़ू करते वक़्त पानी उन अअज़ा तक पहुंचा है या नहीं तो उसका वुज़ू सहीह है।
302. अगर वुज़ू के बाज़ अअज़ा में ऐसी रूकावट हो जिसके नीचे पानी कभी तो ख़ुद ब ख़ुद चला जाता हो और कभी न पहुंचता हो और इन्सान वुज़ू के बाद शक करे कि पानी उसके नीचे पहुंचा है या नहीं जबकि वह जानता हो कि वुज़ू के वक़्त वह उस रुकावट के नीचे पानी पुहंचने की जानिब मुतवज्जह न था तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि दोबारा वुज़ू करे।
303. अगर कोई शख़्स वुज़ू करने के बाद वुज़ू के अअज़ा पर कोई ऐसी चीज़ देखे जो पानी के बदन तक पहुंचने में माने हो और उसे यह मालूम न हो कि वुज़ू के वक़्त यह चीज़ मौजूद थी या बाद में पैदा हुई तो उसका वुज़ू सहीह है लेकिन अगर वह जानता हो कि वुज़ू करते वक़्त वह रूकावट की जानिब मुतवज्जह न था तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि दोबारा वुज़ू करे।
304. अगर किसी शख़्स को वुज़ू के बाद शक हो कि जो चीज़ पानी के पहुंचने में माने है वुज़ू के अअज़ा पर थी या नहीं तो उसका वुज़ू सहीह है।
वुज़ू के अहकाम
305. अगर कोई शख़्स वुज़ू के अफ़्आल और शरायत पानी के पाक होने या ग़स्बी न होने के बारे में बहुत ज़्यादा शक करे तो उसे चाहिये कि अपने शक की परवाह न करे।
306. अगर किसी शख़्स को शक हो कि उसका वुज़ू बातिल हुआ है या नहीं तो उसे समझना चाहिये की उसका वुज़ू बाक़ी है लेकिन अगर उसने पेशाब करने के बाद इसतिबरा किये बग़ैर वुज़ू कर लिया हो और वुज़ू के बाद उसके मखरजे पेशाब से ऐसी रूतूबत ख़ारिज हुई हो जिसके बारे में वह यह न जानता हो कि पेशाब है या कोई और चीज़ तो उसका वुज़ू बातिल है।
307. अगर किसी शख़्स को शक हो कि उसने वुज़ू किया है या नहीं तो ज़रूरी है कि वुज़ू करे।
308. जिस शख़्स को मालूम हो कि उसने वुज़ू किया है और उससे हदस भी वाक़े हो गया है मसलन उसने पेशाब किया है लेकिन उसे यह मालूम न हो कि कौन सी बात पहले वाक़े हुई है अगर यह सूरत नमाज़ से पेश आए तो उसे चाहिये कि वुज़ू करे और नमाज़ के दौरान पेश आए तो नमाज़ तोड़ कर वुज़ू करना ज़रूरी है और अगर नमाज़ के बाद पेश आए तो जो नमाज़ वह पढ़ चुका है वह सहीह है अलबत्ता दूसरी नमाज़ों के लिये नया वुज़ू करना ज़रूरी है।
309. अगर किसी शख़्स को वुज़ू के बाद या वुज़ू के दौरान यक़ीन हो जाए कि उसने बाज़ जगह नहीं धोई या उनका मसह नहीं किया और जिन अअज़ा को पहले धोया हो या मसह किया हो उनकी तरी ज़्यादा वक़्त गुज़र जाने की वजह से ख़ुश्क हो चुकी हो तो उसे चाहिये कि दोबारा वुज़ू करे लेकिन अगर वह तरी ख़ुश्क न हुई हो या हवा की गर्मी या किसी और ऐसी वजह से ख़ुश्क हो चुकी हो तो ज़रूरी है कि जिन जगहों के बारे में भूल गया हो उन्हें और उनके बाद आने वाली जगहों को धोए या उनका मसह करे और अगर वुज़ू के दौरान किसी उज़्व के धोने या मसह करने के बारे में शक करे तो उसी हुक्म पर अमल करना ज़रूरी है।
310. अगर किसी शख़्स को नमाज़ पढ़ने के बाद शक हो कि उसने वुज़ू किया था या नहीं तो उसकी नमाज़ सहीह है लेकिन आइन्दा नमाज़ों के लिये वुज़ू करना ज़रूरी है।
311. अगर किसी शख़्स को नमाज़ के दौरान शक हो कि आया उसने वुज़ू किया था या नहीं तो उसकी नमाज़ बातिल है। और ज़रूरी है कि वह वुज़ू करे और नमाज़ दोबारा पढ़े।
312. अगर कोई शख़्स नमाज़ के बाद यह समझे कि उसका वुज़ू बातिल हो गया था लेकिन शक हो कि उसका वुज़ू नमाज़ से पहले बातिल हुआ था या बाद में तो जो नमाज़ पढ़ चुका है वह सहीह है।
313. अगर कोई शख़्स ऐसे मरज़ में मुब्तला हो कि उसे पेशाब के क़तरे गिरते रहते हों या पख़ाना रोकना का क़ादिर न हो तो अगर उसे यक़ीन हो कि नमाज़ के अव्वल वक़्त से लेकर आख़िर वक़्त तक उसे इतना वक़्फ़ा मिल जायेगा कि वुज़ू करके नमाज़ पढ़ सके तो ज़रूरी है कि उस वक़्फ़े के दौरान नमाज़ पढ़ ले और अगर उसे सिर्फ़ इतनी मोहलत मिले जो नमाज़ के वाजिबात अदा करने के लिये काफ़ी हो तो उस दौरान सिर्फ़ नमाज़ के वाजिबात बजा लाना और मुस्तहब अफ़्आल मसलन अज़ान, इक़ामत और क़ुनूत को तर्क कर देना ज़रूरी है।
314. अगर किसी शख़्स को (बीमारी की वजह से) वुज़ू करके नमाज़ का कुछ हिस्सा पढ़ने की मोहलत मिलती हो और नमाज़ के दौरान एक दफ़्आ या चन्द दफ़्आ उसका पेशाब या पाख़ाना ख़ारिज हो जाता हो तो एहतियाते लाज़िम यह है कि उस मोहलत के दौरान वुज़ू करके नमाज़ पढ़े लेकिन नमाज़ के दौरान लाज़िम नहीं है कि पेशाब या पाख़ाना ख़ारिज होने की वजह से दोबारा वुज़ू करे अगरचे एहतियाते मुस्तहब यह है कि पानी का बर्तन अपने साथ रखे और जब भी पेशाब या पाख़ाना खारिज हो वुज़ू करे और बाक़ी मान्दा नमाज़ पढ़े और यह एहतियात इस सूरत में है कि जब पेशाब या पाख़ाना खारिज़ होने का वक़्फ़ा तवील न हो या दोबारा वुज़ू करने की वजह से अरकाने नमाज़ के दरमियान फ़ासिला ज़्यादा न हो। बसूरते दीगर एहतियात का कोई फ़ायदा नहीं।
315. अगर किसी शख़्स को पेशाब या पाख़ाना बार बार यूं आता हो कि उसे वुज़ू करके नमाज़ का कुछ हिस्सा पढ़ने की भी मोहलत न मिलती हो तो उसकी हर नमाज़ के लिये बिला हश्काल एक वुज़ू काफ़ी है- बल्कि अज़्हर यह है कि एक वुज़ू चन्द नमाज़ों के लिये भी काफ़ी है। मासिवा इसके कि किसी दूसरे हदस में मुब्तिला हो जाए। और बेहतर यह है कि हर नमाज़ के लिये एक बार वुज़ू करे लेकिन क़ज़ा सजदे, क़ज़ा तशहहुद और नमाज़े एहतियात के लिये दूसरा वुज़ू ज़रूरी नहीं है।
316. अगर किसी शख़्स को पेशाब या पाख़ाना बार बार आता हो तो उसके लिये ज़रूरी नहीं कि वुज़ू के बाद फ़ौरन नमाज़ पढ़े अगरचे बेहतर है कि नमाज़ पढ़ने में जल्दी करे।
317. अगर किसी शख़्स को पेशाब या पाख़ाना बार बार आता हो तो वुज़ू करने के बाद अगर वह नमाज़ की हालत में न हो तब भी उसके लिये क़ुरआने मजीद के अलफ़ाज़ को छुना जायज़ है।
318. अगर किसी शख़्स को क़तरा क़तरा पेशाब आता रहता हो तो उसे चाहिये कि नमाज़ के लिये एक ऐसी थेली इस्तेमाल करे जिसमें रूई या कोई और चीज़ रखी हो जो पेशाब को दूसरी जगहों तक पहुंचने से रोके और एहतियाते वाजिब यह है कि नमाज़ से पहले नजिस शुदा ज़कर (लिंग) को धोए। अलावा अज़ीं जो शख़्स पाख़ाना रोकने पर क़ादिर न हो उसे चाहिये की जहां तक मुम्किन हो नमाज़ पढ़ने तक पख़ाने को दूसरी जगहों तक फ़ैलने से रोके और एहतियाते वाजिब यह है कि अगर बाइसे ज़हमत न हो तो हर नमाज़ के लिये मक़्अद को धोए।
319. जो शख़्स पेशाब या पाख़ाने को रोकने पर क़ुदरत न रखता हो तो जंहा तक मुम्किन हो नमाज़ में पेशाब या पाखाने को रोके चाहे इस पर कुछ ख़र्च करना पड़े बल्कि उसका मरज़ अगर आसानी से दूर हो सकता हो तो अपना इलाज कराए।
320. जो शख़्स अपना पेशाब या पाखाना रोकने पर क़ादिर न हो उसके सेह्हतयाब होने के बाद ज़रूरी नहीं कि जो नमाज़े उसने मरज़ की हालत में अपने वज़ीफ़े के मुताबिक़ पढ़ी हों उनकी क़ज़ा करे लेकिन अगर उसका मरज़ नमाज़ पढ़ते हुए दूर हो जाए तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर ज़रूरी है कि जो नमाज़ उस वक़्त पढ़ी हो उसे दोबारा पढ़े।
321. अगर किसी शख़्स को यह आरिज़ा लाहिक़ हो कि रियाह रोकने पर क़ादिर न हो तो ज़रूरी है कि उन लोगों के वज़ीफ़े के मुताबिक़ अमल करे जो पेशाब और पाखाना रोकने पर क़ुदरत न रखते हों।
वह चीज़ें जिनके लिये वुज़ू करना चाहिये
322. छः चीज़ों के लिये वुज़ू करना वाजिब हैः
अव्वलः- वाजिब नमाज़ों के लिये सिवाय नमाज़े मैयित के, और मुस्तहब नमाज़ों में वुज़ू शर्ते सेह्हत है।
दोमः- उस सज्दे और तशह्हुद के लिये जो एक शख़्स भूल गया हो जबकि उनके और नमाज़ के दरमियान कोई हदस उससे सर्ज़द हुआ हो मसलन उसने पेशाब किया हो, लेकिन सज्दा ए सहव के लिये वुज़ू करना वाजिब नहीं।
सोमः- ख़ानाए काबा के वाजिब तवाफ़ के लिये जो कि हज और उमरह के जुज़ हों।
चहारूमः- वुज़ू करने की मन्नत मानी हो या अहद किया हो या क़सम खाई हो।
पंजुमः- जब किसी ने मन्नत मानी हो कि मसलन क़ुरआने मजीद का बोसा लेगा।
शशुमः- नजिस शदः क़ुरआने मजीद को धोने के लिये या बैतुल ख़ला वग़ैरा से निकालने के लिये जब कि मुतअल्लिक़ः शख़्स मजबूर हो कर उस मक़सद के लिये अपना हाथ या बदन का कोई और हिस्सा क़ुरआने मजीद के अलफ़ाज़ से मस करे। लेकिन वुज़ू में सर्फ़ होने वाला वक़्त अगर क़ुरआने मजीद को धोने या उसे बैतुलख़ला से निकालने में इतनी ताख़ीर का बाइस हो जिस से कलामुल्लाह की बेहुर्रमती होती हो तो ज़रूरी है कि वह वुज़ू किये बग़ैर क़ुरआने मजीद को बैतुलखला वग़ैरह से बाहर निकाल ले या अगर नजिस हो गया हो तो उसे धो डाले।
323. जो शख़्स बवुज़ू न हो उसके लिये क़ुरआने मजीद के अल्फ़ाज़ को छूना यानी अपने बदन का कोई हिस्सा क़ुरआने मजीद के अल्फ़ाज़ से लगाना हराम है, लेकिन अगर क़ुरआने मजीद का फ़ारसी ज़बान या किसी और ज़बान में तर्जुमा किया गया हो तो उसे छूने में कोई इश्काल नहीं।
324. बच्चे और दीवाने को क़ुरआने मजीद के अल्फ़ाज़ को छूने से रोकना वाजिब नहीं लेकिन अगर उनके ऐसा करने से क़ुरआने मजीद की तौहीन होती हो तो उन्हें रोकना ज़रूरी है।
325. जो शख़्स बावुज़ू न हो उसके लिये अल्लाह तआला के नामों और उन सिफ़तों को छूना जो सिर्फ़ उसके लिये मख़्सूस हैं ख़्वाह किसी ज़बान में लिखी हों एहतियाते वाजिब की बिना पर हराम हैं और बेहतर यह है कि आंहज़रत सलल्लाहो अलेहै वआलेही व सल्लम और आइम्मा ए ताहिरीन (अ0) और हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (अ0) के असमाए मुबारक को भी न छुए।
326. अगर कोई शख़्स नमाज़ के वक़्त से पहले बतहारत होने के इरादे से वुज़ू या ग़ुस्ल करे तो सहीह है और नमाज़ के वक़्त भी अगर नमाज़ के लिये तैयार होने की नियत से वुज़ू करे तो कोई हरज नहीं।
327. अगर किसी शख़्स को यक़ीन हो कि (नमाज़ का) वक़्त दाख़िल हो चुका है और वाजिब वुज़ू की नियत करे लेकिन वुज़ू करने के बाद उसे पता चले कि अभी वक़्त दाख़िल नहीं हुआ था तो उसका वुज़ू सहीह है।
328. मैयित की नमाज़ के लिये, क़ब्रिस्तान जाने के लिये, मस्जिद या आइम्मा (अ0) के हरम में जाने के लिये, क़ुरआने मजीद साथ रखने, उसे पढ़ने, लिखने, और उसका हाशिया छूने के लिये और सोने के लिये वुज़ू करना मुस्तहब है। और अगर किसी शख़्स का वुज़ू हो तो हर नमाज़ के लिये दोबारा वुज़ू करना मुस्तहब है। और मज़कूरा बाला कामों में से किसी एक के लिये वुज़ू करे तो हर वह काम कर सकता है जो बावुज़ू करना ज़रूरी है मसलन उस वुज़ू के साथ नमाज़ पढ़ सकता हो।
मुब्तिलाते वुज़ू
329. सात चीज़ें वुज़ू को बातिल कर देती हैः-
1. पेशाब, 2. पाखाना, 3, मेदे और आंतों की हवा जो मक़्अद से खारिज होती है, 4. नींद जिसकी वजह से न आंखें देख सकें न कान सुन सकें। लेकिन अगर आंखें न देख रही हों लेकिन कान सुन रहें हो तो वुज़ू बातिल नहीं होता, 5. ऐसी हालत जिनमें अक़्ल ज़ाया हो जाती हो मसलन दीवानगी मस्ती या बेहोशी, 6. औरतों का इस्तिहाज़ा जिसका ज़िक्र बाद में आयेगा, 7. जनाबत बल्कि एहतियाते मुस्तहब की बिना पर हर वह काम जिसके लिये ग़ुस्ल करना ज़रूरी है।
जबीरा के अहकाम
वह चीज़ जिसके ज़ख़्म या टूटी हुई हड्डी बांधी जाती है और वह दवा जो ज़ख़्म या ऐसी ही किसी चीज़ पर लगाई जाती है जबीरा कहलाती है।
330. अगर वुज़ू के अअज़ा में से किसी पर ज़ख़्म या फ़ोड़ा हो या हड्डी टूटी हुई और उसका मुंह खुला हो और पानी उसके लिये मुज़िर न हो तो उसी तरह वुज़ू करना ज़रूरी है जैसे आमतौर पर किया जाता है।
331. अगर किसी शख़्स के चेहरे और हाथों पर ज़ख़्म या फ़ोड़ा हो या उसके (चेहरे या हाथों) की हड्डी टूटी हुई हो और उसका मुंह खुला हो और उस पर पानी डालना नुक़सान देह हो तो उसे ज़ख़्म के आस पास का हिस्सा इस तरह ऊपर से नीचे को धोना चाहिये जैसा वुज़ू के बारे में बताया गया है और बेहतर यह है कि अगर उस पर हाथ खींचना नुकसान देह न हो तो तर हाथ उस पर खींचे और उसके बाद पाक कपड़ा उस पर डाल दें और गीला हाथ उस पर भी ख़ींचे। अलबत्ता अगर हड्डी टूटी हुई हो तो तयम्मुम करना लाज़िम है।
332. अगर ज़ख़्म या फ़ोडा या टूटी हुई हड्डी किसी शख़्स के सर के अगले हिस्से या पांव पर हो और उसका मुंह खुला हो और वह उस पर मसह न कर सकता हो क्योंकि ज़ख़्म मसह की पूरी जगह पर फ़ैला हुआ हो या मसह की जगह का जो हिस्सा सहीह व सालिम हो उस पर मसह करना भी उसकी क़ुदरत से बाहर हो तो इस सूरत में ज़रूरी है कि तयम्मुम करे और एहतियाते मुस्तहब की बिना पर वुज़ू भी करे और पाक कपड़ा ज़ख़्म वग़ैरह पर रखे और वुज़ू के पानी की तरी से जो हाथों पर लगी हो कपड़े पर मसह करे।
333. अगर फोड़े या ज़ख़्म या टूटी हुई हड्डी का मुंह किसी चीज़ से बन्द हो और उसका खोलना वग़ैरह तक्लीफ़ के मुम्किन हो और पानी भी उसके लिये मुज़िर न हो तो उसे खोल कर वुज़ू करना ज़रूरी है ख़्वाह ज़ख़्म वग़ैर चेहरे और हाथों पर हो या सर के अगले हिस्से और पांव के ऊपर वाले हिस्से पर हो।
334. अगर किसी शख़्स का ज़ख़्म या फोड़ा या टूटी हुई हड्डी जो किसी चीज़ से बंधी हुई हो उसके चेहरे या हाथों पर हो और उसको खोलना और उस पर पानी डालना मुज़िर हो तो ज़रूरी है कि आस पास के जितने हिस्से को धोना मुम्किन हो उसे धोए और ज़वीरा पर वुज़ू करे।
335. अगर ज़ख़्म का मुंह न खुल सकता हो और खुद ज़ख्म और जो चीज़ उस पर लगाई गई हो पाक हो और ज़ख़्म तक पानी पुहंचना मुम्किन हो और मुज़िर हो भी न हो तो ज़रूरी है की पानी को ज़ख़्म के ऊपर से नीचे की तरफ़ पहुंचाए। और अगर ज़ख़्म या उसके ऊपर लगाई गई चीज़ नजिस हो और उसका धोना और ज़ख़्म के मुंह तक पानी पहुंचाना मुम्किन हो तो ज़रूरी है कि उसे धोए और वुज़ू करते वक़्त पानी ज़ख़्म तक पहुंचाए। और अगर पानी ज़ख़्म के लिये मुज़िर न हो लेकिन या ज़ख़्म नजिस हो और उसे धोया न जा सकता हो तो ज़रूरी है कि तयम्मुम करे।
336. अगर ज़बीरा अअज़ाए वुज़ू के किसी हिस्से पर फैला हुआ हो तो बज़ाहिर वुज़ू ज़बीरा ही काफ़ी है लेकिन अगर जबीरा तमाम अअज़ाए वुज़ू पर फ़ैला हुआ हो तो एहतियात की बिना पर तयम्मुम करना ज़रूरी है और वुज़ू जबीरा भी करें।
337. यह ज़रूरी नहीं कि जबीरा उन चीज़ों में से हों जिनके साथ नमाज़ पढ़ना दुरूस्त है बल्कि अगर वह रेशम या उन हैवानात के अज्ज़ा से बनी हो जिनका गोश्त खाना जायज़ नहीं तो भी मसह करना जायज़ है।
338. जिस शख़्स की हथेली और उंगलियों पर जबीरा हो और वुज़ू करते वक़्त उसने तर हाथ उस पर ख़ींचा हो तो सर और पांव का मसह उसी तरी से करे।
339. अगर किसी शख़्स के पांव के ऊपर वाले पूरे हिस्से पर जबीरा हो लेकिन कुछ हिस्सा उंगलियों की तरफ़ से औऱ कुछ हिस्सा पांव के ऊपर वाले हिस्से की तरफ़ खुला हो तो जो जगह खुली है वहां पांव के ऊपर वाले हिस्से पर और जिन जगहों पर जबीरा है वहां जबीरा पर मसह करना ज़रूरी है।
340. अगर चेहरे या हाथों पर कई जबीरे हों तो उनका दरमियाना हिस्सा धोना ज़रूरी है और अगर सर या पांव के ऊपर वाले हिस्से पर जबीरें हों तो उनके दरमियानी हिस्से का मसह करना ज़रूरी है और जहां जबीरें हों वहां जबीरे के बारे में अहकाम पर अमल करना ज़रूरी है।
341. अगर जबीरा ज़ख़्म के आस पास के हिस्सों को मामूल से ज़्यादा घेरे हुए हो और उसका हटाना बग़ैर तकलीफ़ के मुम्किन न हो तो ज़रूरी है कि मुतअल्लिक़ा शख़्स तयम्मुम करे बजुज़ इसके कि जबीरा तयम्मुम की जगहों पर हो क्योंकि उस सूरत में ज़रूरी है कि वुज़ू और तयम्मुम दोनों दोनों करे और दोनों सूरतों में अगर जबीरा का हटाना बग़ैर तक्लिफ़ के मुम्किन हो तो ज़रूरी है कि उसे हटा दे। पस अगर ज़ख़्म चेहरे या हाथों पर तो उसके आस पास की जगहों को धोए औऱ अगर सर या पांव के ऊपर वाले हिस्से पर हो तो आस पास की जगह का मसह करे और ज़ख़्म की जगह के लिये जबीरे के एहकाम पर अमल करे।
342. अगर वुज़ू के अअज़ा पर ज़ख़्म न हो या उनकी हड्डी टूटी हुई न हो लेकिन किसी दूसरी वजह से पानी उनके लिये मुज़िर हो तो तयम्मुम करना ज़रूरी है।
343. अगर वुज़ू के अअज़ा की किसी रग से ख़ून निकल आया हो और उसे धोना मुम्किन न हो तो तयम्मुम करना लाज़िम है। लेकिन अगर पानी उसके लिये मुज़िर हो तो जबीरा के अहकाम पर अमल करना ज़रूरी है।
344. अगर वुज़ू या ग़ुस्ल की जगह पर कोई ऐसी चीज़ चिपक गई हो जिसक उतराना मुम्किन न हो या उसे उतारने की तक्लीफ़ नाक़ाबिले बर्दाश्त हो तो मुतअल्लिक़ा शख़्सा का फ़रीज़ा तयम्मुम है। लेकिन अगर चिपकी हुई चीज़ तयम्मुम के मक़ामात पर हो तो उस सूरत में ज़रूरी है कि वुज़ू और तयम्मुम दोनों करे और अगर चिपकी हुई चीज़ दवा हो तो जबीरा के हुक्म में आती है।
345. ग़ुस्ले मसे मय्यत के अलावा तमाम क़िस्म के ग़ुस्लों में ग़ुसले जबीरा वुज़ू ए जबीरा की तरह है लेकिन एहतियाते लाज़िम की बिना पर मुकल्लफ़ शख़्स के लिये ज़रूरी है कि ग़ुस्ले तरतीबी करे (इरतिमासी न करे) और अज़्हर यह है कि अगर बदन पर ज़ख़्म या फोड़ा हो तो मुकल्लफ़ को ग़ुस्ल या तयम्मुम का इख़्तियार है। अगर वह ग़ुस्ल को इख़्तियार करता है और ज़ख़्म या फोड़े पर जबीरा न हो तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि ज़ख़्म या फोड़े पर पाक कपड़ा रखे और उस कपड़े के ऊपर मसह करे। और अगर बदन का कोई हिस्सा टूटा हुआ हो तो ज़रूरी है कि ग़ुस्ल करे और एहतियातन जबीरा के ऊपर भी मसह करे और अगर जबीरा के ऊपर मसह करना मुम्किन न हो या जो जगह टूटी हुई हो वह खुली हुई हो तो तयम्मुम करना ज़रूरी है।
346. जिस शख़्स का वज़ीफ़ा तयम्मुम हो अगर उसकी तयम्मुम की बाज़ जगहों पर ज़ख़्म या फोड़ा हो या हड्डी टूटी हुई हो तो ज़रूरी है कि वह वुज़ू ए जबीरा के अहकाम के मुताबिक़ तयम्मुमे जबीरा करे।
347. जिस शख़्स को वुज़ू ए जबीरा या ग़ुस्ले जबीरा करके नमाज़ पढ़ना ज़रूरी हो अगर उसे इल्म हो कि नमाज़ के आख़िर वक़्त तक उसका उसका उज़्र दूर नहीं होगा तो वह अव्वल वक़्त में नमाज़ पढ़ सकता है लेकिन अगर उसे उम्मीद हो कि आख़िर वक़्त तक उसका उज़्र दूर हो जाएगा तो उसके लिये बेहतर यह है कि इन्तेज़ार करे और अगर उसका उज़्र दूर न हो तो आख़िर वक़्त में वुज़ू जबीरा या ग़ुस्ले जबीरा के साथ नमाज़ अदा करे। लेकिन अगर अव्वल वक़्त में नमाज़ पढ़ ले और आख़िर वक़्त तक उसका उज़्र दूर हो जाए तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि वुज़ू या ग़ुस्ल करे और दोबारा नमाज़ पढ़े।
348. अगर कोई शख़्स आंख की बीमारी की वजह से पलकें मूंद कर रखता हो तो ज़रूरी है कि वह तयम्मुम करे।
349. अगर किसी शख़्स को यह इल्म न हो कि आया उसका वज़ीफ़ा तयम्मुम है या वुज़ू ए जबीरा तो एहतियाते वाजिब की बिना पर तयम्मुम और वुज़ू ए जबीरा दोनों बजा लाने चाहिये।
350. जो नमाज़े किसी इन्सान ने वुज़ू ए जबीरा से पढ़ी हों वह सहीह हैं और वह उसी वुज़ू के साथ आइन्दा के नमाज़े भी पढ़ सकता है।
वाजिब ग़ुस्ल
वाजिब ग़ुस्ल सात हैः-
1.ग़ुस्ले जनाबत,2. ग़ुस्ले हैज़, 3. ग़ुस्ले निफ़ास, 4. गुस्ले इस्तिहाज़ा, 5. ग़ुस्ले मसे मेयित, 6. ग़ुस्ले मेयित और 7. वह ग़ुस्ल जो मन्नत या क़सम वग़ैरह की वजह से वाजिब हो जाए।
जनाबत के अहकाम
351. दो चीज़ों से इन्सान जुनुब हो जाता है अव्वल जिमाअ से और दोम मनी के ख़ारिज होने से ख़्वाह वह नींद की हालत में निकले या जागते में, कम हो या ज़्यादा, शहवत के साथ निकले या बग़ैर शहवत के और उसका निकलना मुतअल्लिक़ा शख़्स के इख़्तियार में हो या न हो।
352. अगर किसी शख़्स के बदन से कोई रूतूबत ख़ारिज हो और वह यह न जानता हो कि मनी (वीर्य) है या पेशाब या कोई और चीज़ और अगर वह रूतूबत शहवत के साथ उछल कर निकली हो और उसके निकलने के बाद बदन सुस्त हो गया हो तो वह रूतूबत मनी (वीर्य) का हुक्म रखती है। लेकिन अगर इन तीन अलामात में से सारी की सारी या कुछ मौजूद न हों तो वह रूतूबत मनी के हुक्म में नहीं आयेगी । लेकिन अगर मुतअल्लिक़ा शख़्स बीमार हो तो फिर ज़रूरी नहीं की वह रूतूबत उछल कर निकली हो और उसके निकलने के वक़्त बदन सुस्त हो जाए बल्कि अगर सिर्फ़ शहवत के साथ निकले तो वह रूतूबत मनी के हुक्म में होगी।
353. अगर किसी ऐसे शख़्स के मख़रजे पेशाब से जो बीमार न हो कोई ऐसा पानी ख़ारिज हो जिसमें उन तीन अलामतों में से जिनका ज़िक्र ऊपर वाले मसअले मे किया गया है एक अलामत मौजूद हो और उसे यह इल्म न हो कि बाक़ी अलामत भी उसमें मौजूद है या नहीं तो अगर उस पानी के ख़ारिज हो ने से पहले उसने वुज़ू किया हो तो ज़ूरूरी है कि उसी वुज़ू को काफ़ी समझे और अगर वुज़ू नहीं किया था तो सिर्फ़ वुज़ू करना काफ़ी है और उस पर ग़ुस्ल करना लाज़िम नहीं।
354. मनी ख़ारिज होने के बाद इन्सान के लिये पेशाब करना मुस्तहब है और अगर पेशाब न करे और ग़ुस्ल के बाद उसके मखरजे पेशाब से रूतूबत ख़ारिज हो जिसके बारे में वह न जानता हो कि मनी है या कोई और रूतूबत तो वह रूतबत मनी का हुक्म रखती है।
355. अगर कोई शख़्स जिमाअ करे और उज़्वे तनासुल सुपारी की मिक़्दार तक या उससे ज़्यादा औरत की फ़र्ज़ में दाख़िल हो जाए तो ख़्वाह यह दुखूल फ़र्ज़ में हो या दुबुर में और ख़्वाह वह बालिग़ हो या न बालिग़ और ख़्वाह मनी ख़ारिज हो या न हो दोनो जुनुब हो जाते हैं।
356. अगर किसी को शक हो कि उज़्वे तनासुल सुपारी की मिक़्दार तक दाख़िल हुआ है या नहीं तो उस पर ग़ुस्ल वाजिब नहीं है।
357. नऊज़ो बिल्लाह अगर कोई शख़्स किसी हैवान के साथ वती करे और उसकी मनी ख़ारिज हो तो सिर्फ़ ग़ुस्ल करना काफ़ी है और अगर मनी ख़ारिज न हो और उसने वती करने से पहले वुज़ू किया हो तो तब भी सिर्फ़ ग़ुस्ल काफ़ी है और अगर वुज़ू न कर रखा हो तो एहतियाते वाजिब यह है कि ग़ुस्ल करे और वुज़ू भी करे और मर्द या लड़के से वती करने की सूरत में भी यही हुक्म है।
358. अगर मनी अपनी जगह से हरकत करे लेकिन खारिज न हो या इन्सान को शक हो कि मनी खारिज हुई है या नही तो उस पर ग़ुस्ल वाजिब नहीं है।
359. जो शख़्स ग़ुस्ल न कर सके लेकिन तयम्मुम कर सकता हो वह नमाज़ का वक़्त दाख़िल होने के बाद भी अपनी बीवी से जिमआ कर सकता है।
360. अगर कोई शख़्स अपने लिबास में मनी देखे और जानता हो कि उसकी अपनी मनी है और उसने उस मनी के लिये ग़ुस्ल न किया हो तो ज़ूरूरी है कि ग़ुस्ल करे और जिन नमाज़ों के बारे में उसे यक़ीन हो कि वह उसने मनी ख़ारिज होने के बाद पढ़ी थी, उनकी क़ज़ा करे लेकिन उन नमाज़ों की क़ज़ा ज़रूरी नहीं जिनके बारे में एहतिमाल हो कि वह उसने मनी ख़ारिज होने से पहले पढ़ी थीं।
वह चीज़ें जो मुज्निब पर हराम हैं
361. पांच चीज़े जुनुब शख़्स पर हराम हैः-
1. अपने बदन का कोई हिस्सा क़ुरआने मजीद के अल्फ़ाज़ या अल्लाह तआले के नाम से ख़्वाह वह किसी भी ज़बान में हो मस करना और बेहतर यह है कि पैग़म्बरों, इमामों और हज़रते ज़हरा (अ0) के नामों से भी अपना बदन मस न करें।
2. मस्जिदुल हराम और मस्जिदे नबवी में जाना ख़्वाह एक दरवाज़े से दाख़िल होकर दूसरे दरवाज़े से निकल जाए।
3. मस्जिदुल हराम और मस्जिदे नबवी के अलावा दूसरी मस्जिदों में ठहरना और एहतियाते वाजिब की बिना पर इमामों के हरम में ठहरने की भी यही हुक्म है। लेकिन अगर इन मस्जिदों में से किसी मस्जिद को उबूर करे मसलन एक दरवाज़े से दाख़िल होकर दूसरे से बाहर निकल जाए तो कोई हरज नहीं।
4. एहतियाते लाज़िम की बिना पर किसी मस्जिद में कोई चीज़ रखने या कोई चीज़ उठाने के लिये दाखिल होना।
5. उन आयात में किसी आयत का पढ़ना जिनके पढ़ने से सज्दा वाजिब हो जाता है। और वह आयतें चार सूरतों में हैः-
1. क़ुरआने मजीद की 32वी सूरत – अलिफ़ लाम्मीम तंज़ील।
2,41वी सूरत – हाम्मीम सज्दः
3. 53वी सूरत – वन्नज्म।
4. 96वीं सूरत – अलक़।
वह चीज़ें जो मुज्निब के लिये मकरूह हैं
362. नौ चीज़ें जुनुब के लिये मकरूह हैः-
1 और 2. खाना पानी। लेकिन अगर हाथ मुंह धो ले और कुल्ली कर ले तो मकरूह नहीं है और अगर सिर्फ़ हाथ धो ले तो भी कराहत कम हो जायेगी।
3. क़ुरआने मजीद की सात से ज़्यादा ऐसी आयात पढ़ना जिनमें सज्दा वाजिब न हो।
4. अपने बदन का कोई हिस्सा क़ुरआने मजीद की जिल्द, हाशिया या अल्फ़ाज़ की दरमियानी जगह से छूना।
5. क़ुरआने मजीद अपने साथ रखना।
6. सोना। अलबत्ता अगर वुज़ू कर ले या पानी न होने की वजह से ग़ुस्ल के बदले तयम्मुम कर ले तो फिर सोना मकरूह नहीं है।
7. मेंहदी या उससे मिलती जुलती चीज़ से ख़िज़ाब करना।
8. बदन पर तेल मलना।
9. एहतिलाम यानी सोते में मनी खारिज होने के बाद जिमाअ करना।
ग़ुस्ले जनाबत
363. ग़ुस्ले जनाबत वाजिब नमाज़ पढ़ने के लिये और ऐसी दूसरी इबादत के लिये वाजिब हो जाता है लेकिन नमाज़े मैयित, सज्दा ए सहव, सज्दा ए शुक्र और क़ुरआने मजीद के वाजिब सज्दों के लिये ग़ुस्ले जनाबत ज़रूरी नहीं है।
364. यह ज़रूरी नहीं कि ग़ुस्ल के वक़्त नीयत करे कि वाजिब ग़ुस्ल कर रहा है, बल्कि फ़क़त क़ुर्बतन इलल्लाह यानी अल्लाह तआला की रिज़ा के इरादे से ग़ुस्ल करे तो काफ़ी है।
365. अगर किसी शख़्स को यक़ीन हो कि नमाज़ का वक़्त हो गया है और ग़ुस्ले जनाबत की नियत कर ले लेकिन बाद में पता चले कि उसने वक़्त से पहले ग़ुस्ल कर लिया है तो उसका वुज़ू सहीह है।
366. ग़ुस्ले जनाबत दो तरीक़ों से अन्जाम दिया जा सकता हैः-
तरतीबी व इरतिमासी
तरतीबी ग़ुस्ल
367. तरतीबी ग़ुस्ल में एहतियाते लाज़िम की बिना पर ग़ुस्ल की नियत से पहले पूरा सर और गर्दन और बाद में बदन धोना ज़रूरी है और बेहतर यह है कि बदन को पहले दाई तरफ़ से धोए बाद में बाई तरफ़ से धोए। और तीनो अअज़ा में से हर एक को ग़ुस्ल की नियत से पानी के नीचे हरकत देने से तरतीबी ग़ुस्ल का सहीह होना इशक़ाल से ख़ाली नहीं है और एहतियात इस पर इक़्तिफ़ा न करने में है। और अगर वह शख़्स जान बूझ कर या भूल कर या मस्अला न जानने की वजह से बदन को सर से पहले धोए तो उसका ग़ुस्ल बातिल है।
368. अगर कोई शख़्स बदन को सर से पहले धोए तो उसके लिये ग़ुस्ल का एआदा करना ज़रूरी नहीं बल्कि अगर बदन को दोबारा धो ले तो उसका ग़ुस्ल सहीह हो जायेगा।
369. अगर किसी शख़्स को इस बात का यक़ीन न हो कि उसने सर, गर्दन व जिस्म का दायां व बायां हिस्सा मुकम्मल तौर पर धो लिया है तो इस बात का यक़ीन करने के लिये जिस हिस्से को धोए उसके साथ दूसरे हिस्से की कुछ मिक़्दार भी दोना ज़रूरी है।
370. अगर किसी शख़्स को ग़ुस्ल के बाद पता चला की बदन का कुछ हिस्सा धुलने से रह गया है लेकिन यह इल्म न हो कि वह कौन सा हिस्सा है तो सर को दोबारा धोना ज़रूरी नहीं और बदन का सिर्फ़ वह हिस्सा धोना ज़रूरी है जिसके न धोए जाने के बारे में एहतिमाल पैदा हुआ हो।
371. अगर किसी को ग़ुस्ल के बाद पता चले कि उसने बदन का कुछ हिस्सा नहीं धोया तो अगर वह बाई तरफ़ हो तो सिर्फ़ उसी मिक़्दार का धो लेना काफ़ी है और अगर दाई तरफ़ हो तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि उतनी मिक़्दार धोने के बाद बाई तरफ़ को दोबारा धोए और अगर सर और गर्दन धुलने से रह गई हो तो ज़रूरी है कि उतनी मिक़्दार धोने के बाद दोबारा बदन को धोए।
372. अगर किसी शख़्स को दाई या बाई तरफ़ का कुछ हिस्सा धोए जाने के बारे में शक गुज़रे तो उसके लिये ज़रूरी है कि उतनी मिक़्दार धोए और अगर उसे सर या गर्दन का कुछ हिस्सा धोए जाने के बारे में शक हो तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर सर और गर्दन धोने के बाद दायें और बायें हिस्से को दोबारा धोना ज़रूरी है।
इरतिमासी ग़ुस्ल
इरतिमासी ग़ुस्ल दो तरीक़ो से अन्जाम दिया जा सकता हैः- दफ़्ई और तद्रीज़ी।
373. ग़ुस्ले इरतिमासी दफ़्ई में ज़रूरी है कि एक लम्हे में पूरे बदन के साथ पानी में डुबकी लगाए लेकिन ग़ुस्ल करने से पहले एक शख़्स के सारे बदन का पानी से बाहर होना मोतबर नहीं है। बल्कि अगर बदन का कुछ हिस्सा पानी से बाहर हो और ग़ुस्ल की नीयत से पानी में ग़ोता लगाए तो काफ़ी है।
374. ग़ुस्ले इरतिमासी तद्रीजी में ज़रूरी है कि ग़ुस्ल की नीयत से एक दफ़्आ बदन को धोने का ख़्याल रखते हुए आहिस्ता आहिस्ता पानी में ग़ोता लगाए। इस ग़ुस्ल में ज़रूरी है कि बदन का पूरा हिस्सा ग़ुस्ल करने से पहले पानी से बाहर हो।
375. अगर किसी शख़्स को ग़ुस्ले तरतीबी के बाद पता चले कि उसके बदन के कुछ हिस्से तक पानी नहीं पहुंचा है तो ख़्वाह वह उस मख़्सूस हिस्से के मुतअल्लिक़ जानता हो या न जानता हो ज़रूरी है कि दोबारा ग़ुस्ल करे।
376. अगर किसी शख़्स के पास ग़ुस्ले तरतीबी के लिये वक़्त न हो लेकिन इरतीमासी ग़ुस्ल के लिये वक़्त हो तो ज़रूरी है कि इरतिमासी ग़ुस्ल करे।
377. जिस शख़्स ने हज या उमरे के लिये एहराम बांधा हो वह इरतिमासी ग़ुस्ल नहीं कर सकता लेकिन अगर उसने भूल कर इरतीमासी ग़ुस्ल कर लिया हो तो उसका ग़ुस्ल सहीह है।
ग़ुस्ल के अहकाम
378. ग़ुस्ले इरतिमासी या ग़ुस्ले तरतीबी में सारे ग़ुस्ल से पहले सारे जिस्म का पाक होना ज़रूरी नहीं है बल्कि अगर पानी में ग़ोता लगाने या ग़ुस्ल के इरादे से पानी बदन पर डालने से बदन पाक हो जाए तो ग़ुस्ल सहीह होगा।
379. अगर कोई शख़्स हराम से जुनुब हुआ हो और गर्म पानी से ग़ुस्ल कर ले तो अगरचे उसे पसीना भी आए तब भी उसका ग़ुस्ल सहीह है और एहतियाते मुस्तहब यह है कि ठण्डे पानी से ग़ुस्ल करे।
380. ग़ुस्ल में अगर बाल बराबर भी बदन अनधुला रह जाए तो ग़ुस्ल बातिल है लेकिन कान और नाक के अन्दरूनी हिस्सों का और हर उस चीज़ का धोना जो बातिन शुमार होती है वाजिब नहीं है ।
381. अगर किसी शख़्स को बदन के किसी हिस्से के बारे में शक हो कि उसका शुमार बदन के ज़ाहिर में है या बातिन में तो ज़रूरी है कि उसे धोए।
382. अगर कान की बाली का सूराख़ या उस जैसा कोई और सूराख़ इस क़दर खुला हो कि उसका अन्दरूनी हिस्सा बदन का ज़ाहिर शुमार किया जाए तो उसे धोना ज़रूरी है वर्ना उसका धोना ज़रूरी नहीं है।
383. जो चीज़ बदन तक पानी पहुंचाने में माने हो ज़रूरी है कि इन्सान उसे हटा दे और अगर इससे पेशतर कि उसे यक़ीन हो जाए कि वह चीज़ हट गई है ग़ुस्ल करे तो उसका ग़ुस्ल बातिल है।
384. अगर ग़ुस्ल के वक़्त किसी शख़्स को शक गुज़रे कि कोई ऐसी चीज़ उसके बदन पर है या नहीं जो बदन तक पानी पहुंचने में माने हो तो ज़रूरी है कि छानबीन करे हत्ता कि मुत्मइन हो जाए कि कोई ऐसी रूकावट नही है।
385. ग़ुस्ल में उन छोटे छोटे बालों को जो बदन का जुज़्व का शुमार होता है धोना ज़रूरी है और लम्बे बालों को धोना वाजिब नहीं है बल्कि अगर पानी को जिल्द तक इस तरह पहुंचाए कि लम्बे बाल तर न हो तो ग़ुस्ल सहीह है लेकिन अगर उन्हें धोए बग़ैर जिल्द तक पानी पहुंचाना मुम्किन न हो तो उन्हें भी धोना ज़रूरी है ताकि पानी बदन तक पहुंच जाए।
386. वह तमाम शराइत जो वुज़ू के सहीह होने के लिये बताई जा चुकी है मसलन पानी का पाक होना और ग़स्बी न होना वही शराइत ग़ुस्ल के सहीह होने के लिये भी हैं। लेकिन ग़ुस्ल में यह ज़रूरी नहीं कि इन्सान बदन को ऊपर से नीचे की जानिब धोए। अलावा अज़ीं ग़ुस्ले तरतीबी में यह ज़रूरी नहीं कि सर और गर्दन धोने के फ़ौरन बाद बदन को धोए लिहाज़ा अगर सर और गर्दन धोने के बाद तवक़्क़फ़ करे और कुछ वक़्त गुज़रने के बाद बदन को धोए तो कोई हरज नहीं बल्कि ज़रूरी नहीं कि सर और गर्दन या तमाम बदन को एक साथ धोए पस अगर मिसाल के तौर पर सर धोया हो और कुछ देर बाद गर्दन धोए तो जायज़ है लेकिन जो शख़्स पेशाब या पाख़ाना के निकलने को न रोक सकता हो ताहम उसे पेशाब या पाखाना अन्दाज़न इतने वक़्त तक न आता हो कि ग़ुस्ल कर के नमाज़ पढ़ ले तो ज़रूरी है कि फ़ौरन ग़ुस्ल करे और ग़ुस्ल के बाद फ़ौरन नमाज़ पढ़ ले।
387. अगर कोई शख़्स यह जाने बग़ैर कि हम्माम वाला राज़ी है या नहीं उसकी उजरत उधार रखने का इरादा रखता हो तो ख़्वाह हम्माम वाले को बाद में इस बात पर राज़ी भी कर ले उसका ग़ुस्ल बातिल है।
388. अगर हम्माम वाला उधार पर ग़ुस्ल कराने के लिये राज़ी हो लेकिन ग़ुस्ल करने वाला उसकी उजरत न देने या हराम माल से देने का इरादा रखता हो तो उसका ग़ुस्ल बातिल है।
389. अगर कोई शख़्स हम्माम वाले को ऐसी रक़्म बतौरे उजरत दे जिसका ख़ुम्स अदा न किया गया हो तो अगरचे वह हराम का मुर्तकिब होगा लेकिन बज़ाहिर उसका ग़ुस्ल सहीह होगा और मुस्तहिक़्क़ीन को ख़ुम्स अदा करना उसके ज़िम्मे रहेगा.
391. अगर कोई शख़्स शक करे कि उसने ग़ुस्ल किया है या नहीं तो ज़रूरी है कि ग़ुस्ल करे लेकिन अगर ग़ुस्ल के बाद शक करे कि ग़ुस्ल सहीह किया है या नहीं तो दोबारा ग़ुस्ल करना ज़रूरी नहीं।
392. अगर ग़ुस्ल के दौरान किसी शख़्स से हदसे असग़र सर्जद हो जाए मसलन पेशाब कर दे तो उस ग़ुस्ल को तर्क करके नए सिरे से ग़ुस्ल करना ज़रूरी नहीं है बल्कि वह अपने उस ग़ुस्ल को मुकम्मल कर सकता है इस सूरत में एहतियाते लाज़िम की बिना पर वुज़ू करना भी ज़रूरी है। लेकिन अगर वह शख़्स ग़ुस्ले तरतीबी से ग़ुस्ले इरतिमासी की तरफ़ या ग़ुस्ले इरतिमासी से ग़ुस्ले तरतीबी या इरतिमासी तफ़्ई की तरफ़ पलट जाए तो वुज़ू करना ज़रूरी नहीं है।
393. अगर वक़्त कम की वजह से मुकल्लफ़ शख़्स का वज़ीफ़ा तयम्मुम हो लेकिन इस ख़्याल से कि ग़ुस्ल और नमाज़ के लिये उसके पास वक़्त है ग़ुस्ल करे तो अगर उसने ग़ुस्ल क़स्दे क़ुर्बत से किया है तो उसका ग़ुस्ल सहीह है अगर चे उसने नमाज़ पढ़ने के लिये ग़ुस्ल किया हो।
394. जो शख़्स जुनुब हो अगर वह शक करे कि उसने ग़ुस्ल किया है या नहीं तो जो नमाज़े वह पढ़ चुका है वह सहीह है लेकिन बाद की नमाज़ों के लिये ग़ुस्ल करना ज़रूरी है। और अगर नमाज़ के बाद उससे हदसे असग़र सादिर हुआ हो तो लाज़िम है कि वुज़ू भी करे और अगर वक़्त हो तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर जो नमाज़ पढ़ चुका है उसे दोबारा पढ़े।
395. जिस शख़्स पर कई ग़ुस्ल वाजिब हों वह उन सबकी नियत कर के एक ग़ुस्ल कर सकता है और ज़ाहिर यह है कि अगर उनमें से किसी एक मख़्सूस ग़ुस्ल का क़स्द करे तो वह बाक़ी ग़ुस्लों के लिये भी काफ़ी है।
396. अगर बदन के किसी हिस्से पर क़ुरआने मजीद की आयत या अल्लाह तआला का नाम लिखा हुआ हो तो वुज़ू या ग़ुस्ले तरतीबी करते वक़्त उसे चाहिये की पानी अपने बदन पर इस तरह पहुंचाए कि उसका हाथ उन तहरीरों को न लगो।
397. जिस शख़्स ने ग़ुस्ले जनाबत किया हो ज़रूरी नहीं कि नमाज़ के लिये वुज़ू भी करे बल्कि दूसरे वाजिब ग़ुस्लों के बाद सिवाए ग़ुस्ले इस्तिहाज़ा ए मुतवस्सिता और मुस्तहब ग़ुस्लों के जिनका ज़िक्र मसअला 651 में आयेगा बग़ैर वुज़ू नमाज़ पढ़ सकता है अगरचे एहतियाते मुस्तहब यह है कि वुज़ू भी करे।
इस्तिहाज़ा
औरतों को जो ख़ून आते रहते हैं उनमें से एक ख़ूने इस्तिहाज़ा है और औरत को ख़ूने इस्तिहाज़ा आने के वक़्त मुस्तहाजा कहते हैं।
398. ख़ूने इस्तिहाज़ा ज़्यादातर ज़र्द रंग का और ठंडा होता है और फ़िशार और जलन के बग़ैर के होता है और गाढ़ा भी नहीं होता लेकिन मुम्किन है कि कभी स्याह या सुर्ख़ और गर्म और गाढ़ा हो और फ़िशार और सोज़िश के साथ ख़ारिज हो।
399. इस्तिहाज़ा तीन क़िस्म का होता हैः- क़लील, मुतवस्सित और कसीरः ।
क़लीलः- यह है कि ख़ून सिर्फ़ उसे रूई के ऊपर वाले हिस्से को आलूदा करे जो औरत अपनी शर्मगाह में रखे और उस रूई के अन्दर तक सरायत न करे।
इस्तिहाज़ा ए मुतवस्सितः- यह है कि ख़ून रुई के अन्दर तक चला जाए अगरचे उसके एक कोने तक ही हो और रूई से उस कपड़े तक न पहुंचे जो औरत उमूमन ख़ून रोकने के लिये बांधती हैं।
इस्तिहाज़ा ए कसीरः- यह है कि ख़ून रूई से तजावुज़ करके कपड़े तक पहुंच जाए।
इस्तिहाजा के अहकाम
400. इस्तिहाज़ा ए क़लीलः में हर नमाज़ के लिये अलायहदा वुज़ू करना ज़रूरी है और एहतियाते मुस्तहब कि बिना पर रूई को धो ले या उसे तब्दील कर दे और अगर शर्मगाह के ज़ाहिरी हिस्से पर ख़ून लगा हो तो उसे भी धोना ज़रूरी है।
401. इस्तिहाज़ा ए मुतवस्सितः में एहतियाते लाज़िम की बिना पर ज़रूरी है कि औरत अपनी नमाज़ों के लिये रोज़ाना एक ग़ुस्ल करे और यह भी ज़रूरी है कि इस्तिहाज़ा ए क़लीलः के वह अफ़्आल सर अंजाम दें जो साबिक़ा मस्अले में बयान हो चुके हैं चुनांचे अगर सुब्ह की नमाज़ के दौरान औरत को इस्तिहाज़ा आ जाए तो सुब्ह की नमाज़ के लिये ग़ुस्ल करना ज़रूरी है। अगर जान बूझ कर या भूल कर सुब्ह की नमाज़ के लिये ग़ुस्ल न करे तो ज़ौहर और अस्र की नमाज़ के लिये ग़ुस्ल करना ज़रूरी है और अगर नमाज़े ज़ौहर और अस्र के लिये ग़ुस्ल न करे तो मग़रिब और इशा से पहले ग़ुस्ल करना ज़रूरी है ख़्वाह ख़ून आ रहा हो या बन्द हो चुका हो।
402. इस्तिहाज़ा ए कसीरः में एहतियाते वाजिब की बिना पर ज़रूरी है कि औरत हर नमाज़ के लिये रूई और कपड़े का टुकड़ा तब्दील करे या उसे धोए। और एक ग़ुस्ल फ़ज्र की नमाज़ के लिये और एक ग़ुस्ल ज़ौहर और अस्र की और एक ग़ुस्ल मग़रिब व इशा की नमाज़ के लिये करना ज़रूरी है और ज़ौहर और अस्र की नमाज़ों के दरमियान फ़ासला न रखे। और अगर फ़ासिला रखे तो अस्र की नमाज़ के लिये दोबारा ग़ुस्ल करना ज़रूरी है। इसी तरह अगर मग़रिब व इशा की नमाज़ के दरमियान फ़ासिला रखे तो इशा की नमाज़ के लिये दोबारा ग़ुस्ल करना ज़रूरी है। यह मज़्कूरा अहकाम उस औरत में हैं कि अगर खून बार बार रूई से पट्टी पर पहुंच जाए। अगर रूई से पट्टी तक पहुंचने में इतना फ़ासिला हो कि औरत उस फ़ासिले के अन्दर एक नमाज़ या एक से ज़्यादा नमाज़ पढ़ सकती हो तो एहतियाते लाज़िम यह है कि जब ख़ून रूई से पट्टी तक पहुंच जाए तो रूई और पट्टी को तब्दील कर ले या धो ले और ग़ुस्ल कर ले। इसी बिना पर अगर औरत ग़ुस्ल करे और मसलन ज़ौहर की नमाज़ पढ़े लेकिन अस्र की नमाज़ से पहले या नमाज़ के दौरान दोबारा ख़ून रूई से पट्टी पर पहुंच जाए तो अस्र की नमाज़ के लिये भी ग़ुस्ल करना ज़रूरी है। लेकिन अगर फ़ासिला इतना हो कि औरत उस दौरान दो या दो से ज़्यादा नमाज़ें पढ़ सकती हो तो ज़ाहिर यह है कि उन नमाज़ों के लिये दोबारा ग़ुस्ल करना ज़रूरी नहीं है इन तमाम सूरतों में अज़्हर यह है कि इस्तिहाज़ा ए कसीरः में ग़ुस्ल करना वुज़ू के लिये भी काफ़ी है।
403. अगर ख़ूने इस्तिहाज़ः नमाज़ के वक़्त से पहले भी आए औरत ने उस ख़ून के लिये वुज़ू या ग़ुस्ल न किया हो तो नमाज़ के वक़्त वुज़ू या ग़ुस्ल करना ज़रूरी है अगरचे वह उस वक़्त मुस्तहाज़ः न हो।
404. मुस्तहाज़ा ए मुतवस्सितः जिसके लिये वुज़ू और ग़ुस्ल करना ज़रूरी है एहतियाते लाज़िम की बिना पर उसे चाहिये कि पहले ग़ुस्ल करे और बाद में वुज़ू करे लेकिन मुस्तहाज़ा ए कसीरः मे अगर वुज़ू करना चाहे तो ज़रूरी है कि वुज़ू ग़ुस्ल से पहले करे।
405. अगर औरत का इस्तिहाज़ा ए क़लीलः सुब्ह की नमाज़ के बाद मुतवस्सितः हो जाए तो ज़रूरी है कि ज़ौहर और अस्र की नमाज़ के लिये ग़ुस्ल करे। और अगर ज़ौहर और अस्र की नमाज़ के बाद मुतवस्सितः हो तो मग़रिब और इशा की नमाज़ के लिये ग़ुस्ल करना ज़रूरी है।
406. अगर औरत का इस्तिहाज़ा ए क़लीलः या मुतवस्सितः सुब्ह की नमाज़ के बाद कसीरः हो जाए और वह औरत उसी हालत पर बाक़ी रहे तो मस्अला न0. 402 में जो अहकाम गुज़र चुके हैं नमाज़े ज़ौहर व अस्र और मग़रिब व इशा पढ़ने के लिये उन पर अमल करना ज़रूरी है।
407. मुस्तहाज़ा ए कसीरः की जिस सूरत में ज़रूरी है कि नमाज़ और ग़ुस्ल के दरमियान फ़ासिला न हो जैसा कि मस्अला न0. 402 में गुज़र चुका है अगर नमाज़ का वक़्त दाख़िल होने से पहले ग़ुस्ल करने की वजह से नमाज़ और ग़ुस्ल में फ़ासिला हो जाए तो उस ग़ुस्ल के साथ नमाज़ सहीह नहीं है और यह मुस्तहाज़ः नमाज़ के लिये दोबारा ग़ुस्ल करे। और यही हुक्म मुस्तहाज़ा ए मुतवस्सितः के लिये भी है।
408. ज़रूरी है कि मुस्तहाज़ा ए क़लीलः व मुतवस्सितः रोज़ाना की नमाज़ों के अलावा जिनके बारे में हुक्म ऊपर बयान हो चुका है हर नमाज़ के लिये ख़्वाह वह वाजिब हो या मुस्तहब, वुज़ू करे। लेकिन अगर वह चाहे कि रोज़ाना की वह नमाज़े जो वह पढ़ चुकी हो एहतियातन दोबारा पढ़े या जो नमाज़ें उसने तन्हा पढ़ीं हैं दोबारा बाजमाअत पढ़े तो ज़रूरी है कि वह तमाम अफ़्आल बजा लाए जिनका ज़िक्र इसतिहाज़ः के सिलसिले में किया गया है अलबत्ता अगर वह नमाज़े एहतियात. भूले हुए सज्दे और भूले हुए तशह्हुद की बजा आवरी नमाज़ के फ़ौरन बाद करे और इसी तरह सज्दा ए सहव किसी भी सूरत में करे तो उसके लिये इसतिहाज़ः के अफ़्आल का अन्जाम देना ज़रूरी नहीं है।
409. अगर किसी मुस्तहाज़ः औरत का ख़ून रूक जाए तो उसके बाद जो पहली नमाज़ पढ़े सिर्फ़ उसके लिये इसतिहाज़ः के अफ़्आल अन्जाम देना ज़रूरी है। लेकिन बाद की नमाज़ों के लिये ऐसा करना ज़रूरी नहीं।
410. अगर किसी औरत को यह मालूम न हो कि उसका इस्तिहाज़ा कौन सा है तो जब नमाज़ पढ़ना चाहे बतौ एहतियात ज़रूरी है कि तह्क़ीक़ करने के लिये थोड़ी सी रूई शर्मगाह में रखे और कुछ देर इन्तिज़ार करे और फिर रूई निकाल ले और जब उसे पता चल जाए कि उसका इस्तिहाज़ः तीन अक़्साम में से कौन सी क़िस्म का है तो उस क़िस्म की इस्तिहाज़ः के लिये जिन अफ़्आल का हुक्म दिया गया है उन्हें अन्जाम दे। लेकिन अगर वह जानती हो कि जिस वक़्त तक वह नमाज़ पढ़ना चाहती है उसका इस्तिहाज़ः तब्दील नहीं होगा तो नमाज़ का वक़्त दाख़िल होने से पहले भी वह अपने बारे में तहक़ीक़ कर सकती है।
411. अगर मुस्तहाज़ः अपने बारे में तहक़ीक़ करने से पहले नमाज़ में मश्ग़ूल हो जाए तो अगर वह क़ुर्बत का क़स्द रखती हो और उसने अपने वज़ीफ़े के मुताबिक़ अमल किया हो मसलन उसका इस्तिहाज़ः क़लीलः हो और उसने इस्तिहाज़ः क़लीलः के मुताबिक़ अमल किया हो तो उसकी नमाज़ सहीह है लेकिन अगर वह क़ुर्बत का क़स्द न रखती हो या उसका अमल उसके वज़ीफ़े के मुताबिक़ न हो मतलब उसका इस्तिहाज़ः मुतवस्सितः हो और उसने अमल इस्तिहाज़ः क़लीलः के मुताबिक़ किया हो तो उसकी नमाज़ बातिल है।
412. अगर मुस्तहाज़ः अपने बारे में तहक़ीक़ न कर सके तो ज़रूरी है कि जो उसका यक़ीनी वज़ीफ़ा हो उसके मुताबिक़ अमल करे मसलन अगर वह यह न जानती हो कि उसका इस्तिहाज़ः क़लीलः है या मुतवस्सितः तो ज़रूरी है कि इस्तिहाज़ः क़लीलः के अफ़्आल अन्जाम दे और अगर वह यह न जानती हो की उसका इस्तिहाज़ः मुतवस्सितः है या क़सीरः तो ज़रूरी है कि इस्तिहाज़ा ए मुतवस्सितः के अफ़्आल अन्जाम दे। लेकिन अगर वह जानती हो कि इससे पेशतर उसे उन तीन अक़्साम में से कौन सी क़िस्म का इस्तिहाज़ः था तो ज़रूरी है कि उसी क़िस्म के मुताबिक़ अपना वज़ीफ़ा अन्जाम दे।
413. अगर इस्तिहाज़ः का ख़ून अपने इब्तिदाई मर्हले पर जिस्म के अन्दर ही हो और बाहर न निकले तो औरत ने जो वुज़ू या ग़ुस्ल किया हुआ हो उसे बातिल नहीं करता लेकिन अगर बाहर आ जाए तो ख़्वाह कितना ही कम क्यों न हो वुज़ू और ग़ुस्ल को बातिल कर देता है।
414. मुस्तहाज़ः अगर नमाज़ के बाद अपने बारे में तहक़ीक़ करे और ख़ून न देखे तो अगरचे उसे इल्म हो कि दोबारा ख़ून आयेगा जो वुज़ू वह किये हुए है उसी से नमाज़ पढ़ सकती है।
415. मुस्तहाज़ः औरत अगर यह जानती हो कि जिस वक़्त वह वुज़ू या ग़ुस्ल में मशग़ूल हुई है ख़ून उसके बदन से बाहर नहीं आया और न ही शर्मगाह के अन्दर है तो जब तक उसे पाक रहने का यक़ीन हो नमाज़ पढ़ने में ताख़ीर कर सकती है।
416. अगर मुस्तहाज़ः को यक़ीन हो कि नमाज़ का वक़्त गुज़रने से पहले पूरी तरह पाक हो जायेगी या अन्दाज़न जितना वक़्त नमाज़ पढ़ने में लगता है उसमें ख़ून आना बन्द हो जायेगा तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर ज़रूरी है कि इन्तिज़ार करे और उस वक़्त नमाज़ पढ़े जब पाक हो।
417. अगर वुज़ू और ग़ुस्ल के बाद में ख़ून आना बज़ाहिर बन्द हो जाए और मुस्तहाज़ः को मालूम हो कि अगर नमाज़ पढ़ने में ताख़ीर करे तो जितनी देर में वुज़ू ग़ुस्ल और नमाज़ बजा लायेगी बिल्कुल पाक हो जायेगी तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर ज़रूरी है कि मुवख़्खर कर दे और जब बिल्कुल पाक हो जाए दोबारा वुज़ू और ग़ुस्ल कर के नमाज़ पढ़े और अगर ख़ून के बज़ाहिर बन्द होने के वक़्त नमाज़ का वक़्त तंग हो तो वुज़ू और ग़ुस्ल दोबारा करना ज़रूरी नहीं बल्कि जो वुज़ू और ग़ुस्ल उसने किये हुए हैं उन्हीं के साथ नमाज़ पढ़ सकती है।
418. मुस्तहाज़ा ए क़सीरः जब ख़ून से बिल्कुल पाक हो जाए अगर उसे मालूम हो कि जिस वक़्त से उसने ग़ुज़िशता नमाज़ के लिये ग़ुस्ल किया था उस वक़्त तक ख़ून नहीं आया तो दोबारा ग़ुस्ल करना ज़रूरी नहीं है बसूरते दीगर ग़ुस्ल करना ज़रूरी है। अगरचे इस हुक्म का बतौरे कुल्ली होना एहतियात की बिना पर है और मुस्तहाज़ा ए मुतवस्सितः में ज़रूरी नहीं है कि ख़ून से बिल्कुल पाक हो जाए फिर ग़ुस्ल करे।
419. मुस्तहाज़ा ए क़लीलः को वुज़ू के बाद और मुस्तहाज़ा ए मुतवस्सित को ग़ुस्ल और वुज़ू के बाद और मुस्तहाज़ा ए क़सीरः को ग़ुस्ल के बाद (उन दो सूरतों के अलावा जो मस्अला 403 और 415 में आई हैं) फ़ौरन नमाज़ में मशग़ूल होना ज़रूरी है। लेकिन नमाज़ से पहले अज़ान और इक़ामत कहने में कोई हर्ज नहीं और वह नमाज़ में मुस्तहब काम समलन क़ुनूत वग़ैरह पढ़ सकती है।
420. अगर मुस्तहाज़ः जिसका वज़ीफ़ा यह हो कि वुज़ू या ग़ुस्ल और नमाज़ के दरमियान फ़ासिला न रखे अघर उसने अपने वज़ीफ़े के मुताबिक़ अमल न किया हो तो ज़रूरी है कि वुज़ू या ग़ुस्ल करने के बाद फ़ौरन नमाज़ में मशग़ूल हो जाए।
421. अगर औरत का ख़ूने इस्तिहाज़ः जारी रहे और बन्द होने में न आए और ख़ून का रोकना उसके लिये मुज़िर न हो तो ज़रूरी है कि ग़ुस्ल के फ़ौरन बाद ख़ून को बाहर आने से रोके और अगर ऐसा करने में कोताही बर्ते और ख़ून निकल आए तो जो नमाज़ पढ़ ली हो उसे दोबारा पढ़े बल्कि एहतियाते मुस्तहब यह है कि दोबारा ग़ुस्ल करे।
422. अगर ग़ुस्ल करते वक़्त ख़ून न रूके तो ग़ुस्ल सहीह है लेकिन अगर ग़ुस्ल के दौरान इस्तिहाज़ा ए मुतावस्सितः इस्तिहाज़ा ए क़सीरः हो जाए तो अज़ सरे नव ग़ुस्ल करना ज़रूरी है।
423. एहतियाते मुस्तहब यह है कि मुस्तहाज़ः रोज़े से हो तो सारा दिन जहां तक मुम्किन हो ख़ून को निकल ने से रोके।
424. मशहूर क़ौल की बिना पर मुस्तहाज़ा ए क़सीरः का रोज़ा उस सूरत में सहीह होगा कि जिस रात के बाद के दिन वह रोज़ा रखना चाहती हो उस रात की मग़रिब और इशा की नमाज़ का ग़ुस्ल करे। अलावा अज़ीं दिन के वक़्त वह ग़ुस्ल अन्जाम दे जो दिन की नमाज़ों के लिये वाजिब है। लेकिन कुछ बईद नहीं कि उसके रोज़े की सेहत का इनहिसार ग़ुस्ल पर न हो। इसी तरह बिनाबर अक़्वा मुस्तहाज़ा ए सुतवस्सितः में यह ग़ुस्ल शर्ते नहीं है।
425. अगर औरत अस्र की नमाज़ के बाद मुस्तहाज़ः हो जाए और ग़ुरूबे आफ़ताब तक ग़ुस्ल न करे तो उसका रोज़ा बिला इशकाल सहीह है।
426. अगर किसी औरत का इस्तिहाज़ा ए क़लीलः नमाज़ से पहले मुतवस्सितः या कसीरः हो जाए तो ज़रूरी है कि मुतवस्सितः या क़सीरः के अफ़्आल जिनका ऊपर ज़िक्र हो चुका है अंजाम दे और अगर इस्तिहाज़ा ए मुतवस्सितः कसीरः हो जाए तो चाहिये कि इस्तिहाज़ा ए कसीरः के लिये ग़ुस्ल कर चुकी हो तो उसका यह ग़ुस्ल बेफ़ायदा होगा और उसे इस्तिहाज़ा ए कसीरः के लिये दोबारा ग़ुस्ल करना ज़रूरी है।
427. अगर नमाज़ के बाद किसी औरत का इस्तिहाज़ा ए मुतवस्सितः कसीरः में बदल जाए तो ज़रूरी है कि नमाज़ तोड़ दे और इस्तिहाज़ा ए क़सीर के लिये ग़ुस्ल करे और उसके दूसरे अफ़्आल अन्जाम दे और फिर उसी नमाज़ को पढ़े और एहतियाते मुस्तहब की बिना पर ग़ुस्ल से पहले वुज़ू करे और अगर उसके पास ग़ुस्ल के लिये वक़्त न हो तो ग़ुस्ल के लिये तयम्मुम करना ज़रूरी है। और अगर तयम्मुम के लिये भी वक़्त न हो तो एहतियात की बिना पर नमाज़ न तोड़े और उसी हालत में ख़त्म करे। लेकिन ज़रूरी है कि वक़्त गुज़रने के बाद उसी नमाज़ की क़ज़ा करे। और इसी तरह अगर नमाज़ के दौरान उसका इस्तिहाज़ा ए क़लीलः इस्तिहाज़ा ए मुतवस्सितः या क़सीरः हो जाए तो ज़रूरी है कि नमाज़ को तोड़ दे और इस्तहाज़ा ए मुतवस्सितः कसीरः हो जाए तो ज़रूरी है कि नमाज़ को तोड़ दे और इस्तिहाज़ा ए मुतवस्सितः या कसीरः के अफ़्आल को अन्जाम दे।
428. अगर नमाज़ के दौरान ख़ून बन्द हो जाए और मुस्तहाज़ः को मालूम न हो कि बातिन में भी ख़ून बन्द हुआ है या नहीं तो अगर नमाज़ के बाद उसे पता चले कि ख़ून पूरे तौर पर बन्द हो गया था और उसके बाद इतना वसी वक़्त हो कि पाक होकर दोबारा नमाज़ पढ़ सके तो अगर ख़ून बन्द हो ने से मायूस न हुई हो तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर अपने वज़ीफ़ के मुताबिक़ वुज़ू या ग़ुस्ल करे और नमाज़ दोबारा पढ़े।
429. अगर किसी औरत का इस्तिहाज़ा ए कसीरः मुतवस्सितः हो जाए तो ज़रूरी है कि पहली नमाज़ के लिये क़सीरः का अमल और बाद की नमाज़ों के लिये मुतवस्सितः का अमल बजा लाए मसलन अगर ज़ौहर की नमाज़ से पहले इस्तिहाज़ा ए क़सीरः मुतवस्सितः हो जाए तो ज़रूरी है कि ज़ौहर की नमाज़ के लिये ग़ुस्ल करे और अस्र व मग़रिब व इशा के लिये सिर्फ़ वुज़ू करे लेकिन अगर नमाज़े ज़ौहर के लिये ग़ुस्ल न करे और उसके पास सिर्फ़ नमाज़े अस्र के लिये वक़्त बाकी हो तो ज़रूरी है कि नमाज़े अस्र के लिये ग़ुस्ल करे और अगर नमाज़े अस्र के लिये भी ग़ुस्ल न करे तो ज़रूरी है कि नमाज़े मग़रिब के लिये ग़ुस्ल करे और अगर उसके लिये भी ग़ुस्ल न करे और उसके पास सिर्फ़ नमाज़े इशा के लिये वक़्त हो तो नमाज़े इशा के लिये ग़ुस्ल करना ज़रूरी है।
430. अगर हर नमाज़ से पहले मुस्तिहाज़ा ए क़सीर का ख़ून बन्द हो जाए और दोबारा आ जाए तो हर नमाज़ के लिये ग़ुस्ल करना ज़रूरी है।
431. अगर इस्तिहाज़ा ए कसीरः क़लीलः हो जाए तो ज़रूरी है कि वह औरत पहली नमाज़ के लिये कसीरः वाले और बाद की नमाज़ों के लिये क़लीलः वाले अफ़्आल बजा लाए और इस्तिहाज़ा ए मुतवस्सितः क़लीलः हो जाए तो पहली नमाज़ के लिये मुतवस्सितः वाले और बाद की नमाज़ों के लिये क़लील वाले अफ़्आल बजा लाना ज़रूरी है।
432. मुस्तहाज़ः के लिये जो अफ़्आल वाजिब है अगर वह उनमें से किसी एक को भी तर्क कर दे तो उसकी नमाज़ बातिल है।
433. मुस्तहाज़ा ए क़लीलः या मुतवस्सितः अगर नमाज़ के अलावा वह काम अन्जाम देना चाहती हो जिनके लिये वुज़ू का होना शर्त है मसलन अपने बदन का कोई हिस्सा क़ुरआने मजीद के अल्फ़ाज़ से मस करना चाहती हो तो नमाज़ अदा करने के बाद वुज़ू करना ज़रूरी है और वह वुज़ू जो नमाज़ के लिये किया था काफ़ी नहीं है।
434. जिस मुस्तहाज़ः ने अपने वाजिब ग़ुस्ल कर लिये हों उसका मस्जिद में जाना और वहां ठहरना और वह आयात पढ़ना जिनके पढ़ने से सज्दा वाजिब हो जाता है और उसके शौहर का उसके साथ मुजामिअत करना हलाल है। ख़्वाह उसने वह अफ़्आल जो नमाज़ के लिये अन्जाम देती थी (मसलन रूई और कपड़े के टुकड़े का तब्दील करना) अंजाम न दिये हों और बईद नहीं कि यह अफ़्आल बग़ैर ग़ुस्ल भी जायज़ हों अगरचे एहतियात उनके तर्क करने में है।
435. जो औरत इस्तिहाज़ा ए कसीरः या मुतवस्सितः में हो अगर वह चाहे कि नमाज़ के वक़्त से पहले उस आयत को पढ़े जिसके पढ़ने से सज्दा वाजिब हो जाता है या मस्जिद में तो एहतियाते मुस्तहब की बिना पर ज़रूरी है कि ग़ुस्ल करे और उसका शौहर उससे मुजामिअत करना चाहे तो तब भी यही हुक्म है।
436. मुस्तहाज़ः पर नमाज़े आयात का पढ़ना वाजिब है और नमाज़े आयात अदा करने के लिये यौमीयः नमाज़ों के लिये बयान किये गए तमाम अफ़्आल अंजाम देना ज़रूरी है।
437. जब भी यौमीयः नमाज़ के वक़्त में नमाज़े आयात मुस्तहाज़ः पर वाजिब हो जाए और वह चाहे कि उन दोनों नमाज़ों को यके बाद दीगरे अदा करे तब भी एहतियाते लाज़िम की बिना पर वह उन दोनों को एक वुज़ू और ग़ुस्ल से नहीं पढ़ सकती।
438. अगर मुस्तहाज़ः क़ज़ा नमाज़ पढ़ना चाहे तो ज़रूरी है कि नमाज़ के लिये वह अफ़्आल अन्जाम दे जो अदा नमाज़ के लिये उस पर वाजिब हैं और एहतियात की बिना पर क़ज़ा नमाज़ के लिये उन अफ़्आल पर इक्तिफ़ा नहीं कर सकती जो कि उसने अदा नमाज़ के लिये अंजाम दियें हों।
439. अगर कोई औरत जानती हो कि जो ख़ून उसे आ रहा है वह ज़ख़्म का ख़ून नहीं है लेकिन उस ख़ून के इस्तिहाज़ः हैज़ या निफ़ास होने के बारे में शक और शरअन वह ख़ून हैज़ व निफ़ास का हुक्म भी न रखता हो तो ज़रूरी है कि इस्तिहाज़ः वाले अहकाम के मुताबिक़ अमल करे। बल्कि अगर उसे शक हो कि यह ख़ून इस्तिहाज़ः है या कोई दूसरा और वह दूसरे ख़ून की अलामत भी न रखता हो तो एहतियाते वाजिब की बिना पर इस्तिहाज़ः के अफ़्आल अन्जाम देना ज़रूरी है।
हैज़ (माहवारी)
हैज़ वह ख़ून है जो उमूमन हर महीने चन्द दिनों के लिये औरतों के रहिम (गर्भाशय) से ख़ारिज होता है और औरत को जब हैज़ (माहवारी) का ख़ून आए तो उसे हाइज़ कहते हैं।
440. हैज़ का ख़ून उमूमन गाढ़ा और गर्म होता है और उसका रंग स्याह या सुर्ख होता है। वह उछलकर और थोड़ी जलन के साथ ख़ारिज होता है।
441. वह ख़ून जो औरतों को साठ बरस पूरे करने के बाद आता है हैज़ का हुक्म नहीं रखता। एहतियाते मुस्तहब यह है कि वह औरतें जो ग़ैर क़ुरेशी है वह पाच से साठ साल की उम्र के दौरान ख़ून इस तरह देखें कि अगर वह पचास साल से पहले ख़ून देखतीं तो वह ख़ून यक़ीक़न हैज़ का हुक्म रखता तो वह मुस्तहाज़ः वाले अहकाम बजा लायें और उन कामों को तर्क करें जिन्हें हाइज़ तर्क करती है।
442. अगर किसी लड़की को नौ साल की उम्र तक पहुंचने से पहले ख़ून आए तो वह हैज़ नहीं है।
443. हामिलः और बच्चे को दूध पिलाने वाली औरत को भी हैज़ आना मुम्किन है और हामिलः और ग़ैर हामिलः का हुक्म एक ही है। बस (फ़र्क़ यह है कि) हामिलः औरत अपनी आदत के अय्याम शूरू होने के बीस रोज़ बाद भी अगर हैज़ की अलामतों (माहवारी के लक्षणों) के साथ ख़ून देखे तो उसके लिये एहतियात की बिना पर ज़रूरी है कि वह उन कामों को तर्क कर दे जिन्हें हाइज़ तर्क करती है और मुस्तहाज़ः के अफ़्आल भी बजा लाए।
444. अगर किसी ऐसी लड़की को ख़ून आए जिसे अपनी उम्र के नौ साल पूरे होने का इल्म न हो और उस ख़ून में हैज़ की अलामत न हों तो वह हैज़ नहीं है और अगर उस ख़ून में हैज़ की अलामत हों तो उस पर हैज़ का हुक्म लगाना महल्ले इश्क़ाल है मगर यह कि इत्मीनान हो जाए कि यह हैज है उस सूरत में यह मआलूम हो जायेगा कि उसकी उम्र पूरे नौ साल हो गई है।
445. जिस औरत को शक हो कि उसकी उम्र साठ साल हो गई है या नहीं अगर वह ख़ून देखे और यह न जानती हो कि यह हैज़ या नहीं तो उसे समझना चाहिये कि उसकी उम्र साठ साल नहीं है।
446. हैज़ की मुद्दत तीन दिन से कम और दस दिन से ज़्यादा नहीं होती और अगर ख़ून आने की मुद्दत तीन दिन से भी कम हो तो वह हैज़ नहीं होगा।
447. हैज़ के लिये ज़रूरी है कि पहले तीन दिन लगातार आए लिहाज़ा अगर मिसाल के तौर पर किसी औरत को दो दिन ख़ून आए फिर एक दिन न आए और फिर एक दिन आ जाए तो वह हैज़ नहीं है।
448. हैज़ की इब्तिदा में ख़ून का बाहर आना ज़रूरी है लेकिन यह ज़रूरी नहीं कि पूरे तीन दिन ख़ून निकलता रहे बल्कि अगर शर्मगाह में ख़ून मौजूद हो तो काफ़ी है और अगर तीन दिनों में थोड़े से वक़्त के लिये भी कोई औरत पाक हो जाए जैसा कि तमाम या बाज़ औरतों के दरमियान मुतआरफ़ है तब भी वह हैज़ है।
449. एक औरत के लिये यह ज़रूरी है कि उसका ख़ून पहली रात और चौथी रात को बाहर निकले लेकिन यह ज़रूरी है कि दूसरी और तीसरी रात को मुन्क़तअ न हो पस अगर पहले दिन सुब्ह सवेरे से तीसरे दिन ग़ुरूबे आफ़ताब तक मुतवातिर ख़ून आता रहे और किसी वक़्त बन्द न हो तो वह हैज़ है। और अगर पहले दिन दोपहल से ख़ून आना शूरू हो और चौथे दिन उसी वक़्त बन्द हो तो उसकी सूरत भी यही हुक्म है (यानी वह भी हैज़ है) ।
450. अगर किसी औरत को तीन दिन मुतवातिर ख़ून आता रहे फिर वह पाक हो जाए चुनांचे अगर फिर वह दोबारा ख़ून देखे तो जिन दिनों में वह ख़ून देखे और जिन दिनों में वह पाक हो उन तमाम दिनों को मिला कर अगर दस दिन से ज़्यादा न हों तो जिन दिनों में वह ख़ून देखे वह हैज़ के दिन हैं लेकिन एहतियाते लाज़िम की बिना पर पाकी के दिनों में वह उन तमाम उमूर को जो पाक औरत पर वाजिब और हाइज़ के लिये हराम है अंजाम दे।
451. अगर किसी औरत को तीन दिन से ज़्यादा और दस दिन से कम ख़ून आए और उसे यह इल्म न हो कि या ख़ून फोड़े या ज़ख़्म का है या हैज़ का तो उसे चाहिये की उस ख़ून को हैज़ न समझे।
452. अगर किसी औरत को ऐसा ख़ून आए कि जिसके बारे में उसे इल्म न हो कि ज़ख़्म का ख़ून है या हैज़ का तो ज़रूरी है कि अपनी इबादत बजा लाती रहे। लेकिन अगर उसकी साबिकः हालत हैज़ की रही हो तो उस सूरत में उसे हैज़ क़रार दे।
453. अगर किसी औरत को ख़ून आए और उसे शक हो कि यह ख़ून हैज़ है या इस्तिहाज़ः तो ज़रूरी है कि हैज़ की अलामत मौजूद होने की सूरत में उसे हैज़ क़रार दे।
454. अगर किसी औरत को ख़ून आए और उसे यह मआलूम न हो कि हैज़ या बकारत का ख़ून है तो ज़रूरी है कि अपने बारे में तहक़ीक़ करे यानी कुछ रूई शर्मगाह में रखे और थोड़ी देर इन्तिज़ार करे फिर रूई बाहर निकाले। पस अगर ख़ून रूई के अत्राफ़ में लगा हो तो बकारत है और सारी की सारी रूई ख़ून में तर हो जाए तो हैज़ है।
455. अगर किसी औरत को तीन दिन से कम मुद्दत तक ख़ून आए और फिर बन्द हो जाए और तीन दिन के बाद ख़ून आए तो दूसरा ख़ून हैज़ है और पहला ख़ून ख़्वाह वह उसकी आदत के दिनों ही में आया हो हैज़ नहीं है।
हाइज़ के अहकाम
456. चन्द चीज़ें हाइज़ पर हराम हैः-
1. नमाज़ या उस जैसी दीगर इबादतें जिन्हें वुज़ू या ग़ुस्ल या तयम्मुम के साथ अदा करना ज़रूरी है लेकिन उन इबादतों के अदा करने में कोई हरज नहीं जिनके लिये वुज़ू, ग़ुस्ल या तयम्मुम करना ज़रूरी नहीं जैसै नमाज़े मैयित।
2. वह तमाम चीज़ें जो मुज्निब पर हराम हैं और जिनका ज़िक्र जनाबत के अहकाम में आ चुका है।
3. औरत की फ़र्ज़ में जिमाअ (संभोग) करना जो मर्द और औरत दोनों के लिये हराम है ख़्वाह दुख़ूल सिर्फ़ सुपारी की हद तक ही हो और मनी भी ख़ारिज न हो बल्कि एहतियाते वाजिब यह है कि सुपारी से कम मिक़दार में भी दुख़ूल न किया जाए नीज़ एहतियात की बिना पर औरत की दुबुर में मुजामिअत न करे ख़्वाह वह हाइज़ हो या न हो।
457. उन दिनों में भी जिमाअ करना हराम है जिनमें औरत का हैज़ यक़ीनी न हो लेकिन शरअन उसके लिये ज़रूरी है कि अपने आप को हाइज़ क़रार दे। पस जिस औरत को दस दिन से ज़्यादा ख़ून आया हो उसके लिये ज़रूरी है कि उस हुक्म के मुताबिक़ जिसका ज़िक्र बाद में किया जायेगा अपने आपको उतने दिन के लिये हाइज़ क़रार दे जितने दिन ती उसके कुंबे की औरतों की आदत हो तो उसका शौहर उन दिनों में उस से मुजामिअत नहीं कर सकता।
558. अगर मर्द अपनी बीवी से हैज़ की हालत में मुजामिअत करे तो उसके लिये ज़रूरी है कि इस्तिग़फ़ार करे और एहतियाते मुस्तहब यह है कि कफ़्फ़ारा भी अदा करे, उसका कफ़्फ़ारा मस्अला 460 में बयान होगा।
459. हाइज़ से मुजामिअत के अलावा दूसरी लुत्फ़ अन्दोज़ियों मसलन बोसो कनार की मुमानिअत नहीं है।
460. हैज़ की हालत में मुजामिअत का कफ़्फ़ारा हैज़ के पहले हिस्से में अट्ठारा चनों के बराबर, दूसरे हिस्से में नौ चनों के बराबर और तीसरे हिस्से में साढ़े चार चनों के बराबर सिक्कादार सोना है। मसलन अगर किसी औरत को छः दिन हैज़ का ख़ून आए और उसका शौहर पहली या दूसरी रात या दिन में उससे जिमाअ करे तो अट्ठारा चनों के बराबर सोना दे अगर तीसरी या चौथी रात या दिन में जिमाअ करे तो नौ चनों के बराबर सोना दे और अगर पांचवी या छठी रात में जिमाअ करे तो साढ़े चार चनों के बराबर सोना दे।
461. अगर सिक्कादार सोना मुम्किन न हो तो मुतअल्लिक़ा शख़्स उसकी क़ीमत दे और अगर सोने की उस वक़्त की क़ीमत से जबकि उसने जिमाअ किया था उस वक़्त की क़ीमत जबकि वह ग़रीब मोहताज को देना चाहता हो मुख़्तलिफ़ हो गई हो तो उस वक़्त की क़ीमत के मुताबिक़ लगाए जब वह ग़रीब मोहताज को देना चाहता हो।
462. अगर किसी शख़्स ने हैज़ के पहले हिस्से में भी दूसरे हिस्से में भी और तीसरे हिस्से में भी अपनी बीवी से जिमाअ किया हो तो वह तीनों कफ़्फ़ारे दे जो सब मिलकर साढ़े एक्तीस (6.506 ग्राम) हो जाते हैं।
463. अगर कोई शख़्स हाइज़ से कई बार जिमाअ करे तो बेहतर यह है कि हर जिमाअ के लिये कफ़्फ़ारा दे।
464. अगर मर्द को जिमाअ के दौरान मालूम हो जाए कि औरत को हैज़ आने लगा है तो ज़रूरी है कि फ़ौरन उस से जुदा हो जाए और अगर जुदा न हो तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि कफ़्फ़ारा दे।
465. अगर कोई शख़्स हाइज़ से ज़िना (बलात्कार) करे या यह गुमान करते हुए ना महरम हाइज़ से जिमाअ करे कि वह उसकी अपनी बीवी है तब भी एहतियाते मुस्तहब यह है कि कफ़्फ़ारा दे।
466. अगर कोई शख़्स ला इल्मी की बिना पर भूल कर औरत से हालते हैज़ में मुजामिअत करे तो उस पर कफ़्फ़ारा नहीं।
467. अगर एक मर्द यह ख़्याल करते हुए कि औरत हाइज़ है उससे मुजामिअत करे लेकिन बाद में मआलूम हो कि हाइज़ नहीं थी तो उस पर कफ़्फ़ारा नहीं।
468. जैसा कि तलाक़ के अहकाम में बताया जायेगा औरत को हैज़ की हालत में तलाक़ देना बातिल है।
469. अगर औरत कहे कि मैं हाइज़ हूँ या यह कहे कि मैं हैज़ से पाक हूँ और वह ग़लत बयानी न करती हो तो उसकी बात कुबूल की जाए लेकिन अगर ग़लत बयान हो तो उसकी बात क़ुबूल करने में इश्क़ाल है।
470. अगर कोई औरत नमाज़ के दौरान हाइज़ हो जाए तो उसकी नमाज़ बातिल है।
471. अगर औरत नमाज़ के दौरान शक करे कि हाइज़ हुई है या नहीं तो उसकी नमाज़ सही है। लेकिन अगर नमाज़ के बाद पता चले की नमाज़ के दौरान हाइज़ हो गई थी तो जो नमाज़ उसने पढ़ी है वह बातिल है।
472. औरत के हैज़ से पाक हो जाने के बाद उस पर वाजिब है कि नमाज़ और दूसरी इबादत के लिये जो वुज़ू, गुस्ल या तयम्मुम करके बजा लाना चाहिये ग़ुस्ल करे और उसका तरीक़ा ग़ुस्ले जनाबत की तरह है और बेहतर यह है कि ग़ुस्ल से पहले वुज़ू भी करे।
473. औरत के हैज़ से पाक हो जाने के बाद अगरचे उसने ग़ुस्ल न किया हो उसे तलाक़ देना सहीह है और उसका शौहर उससे जिमअ भी कर सकता है लेकिन एहतियाते लाज़िम यह है कि जिमाअ शर्मगाह धोने के बाद किया जाए और एहतियाते मुस्तहब यह है कि उसके ग़ुस्ल करने से पहले मर्द उससे जिमाअ न करे। अलबत्ता जब तक वह औरत ग़ुस्ल न करे वह दूसरे काम जो हैज़ के वक़्त पर हराम थे मसलन मस्जिद में ठहरना या क़ुरआने मजीद के अल्फ़ाज़ को छूना उस पर हलाल नहीं होते।
474. अगर पानी (औरत के) वुज़ू और ग़ुस्ल के लिये काफ़ी न हो और तक़रीबन इतना हो कि उससे ग़ुस्ल कर सके तो ज़रूरी है कि ग़ुस्ल करे और बेहतर यह है कि वुज़ू के बदले तयम्मुम करे और अगर पानी सिर्फ़ वुज़ू के लिये काफ़ी हो और इतना न हो कि उससे ग़ुस्ल किया जा सके तो बेहतर यह है कि वुज़ू करे और ग़ुस्ल के बदले तयम्मुम करना ज़रूरी है और अगर दोनों में से किसी के लिये भी पानी न हो तो ग़ुस्ल के बदले तयम्मुम करना ज़रूरी है और बेहतर यह है कि वुज़ू के बदले भी तयम्मुम करे ।
475. जो नमाज़े औरत ने हैज़ की हालत में न पढ़ी हों उनकी क़ज़ा नहीं लेकिन रमज़ान के वह रोज़े जो हैज़ की हालत में न रखे हों ज़रूरी है कि उनकी क़ज़ा करे और इसी तरह एहतियाते लाज़िम की बिना पर जो रोज़े मन्नत की वजह से मुअय्यन दिनों में वाजिब हुए हों और उसने हैज़ की हालत में वह रोज़े न रखे हों तो ज़रूरी है कि उनकी क़ज़ा करे।
476. जब नमाज़ का वक़्त हो जाए और औरत यह जान ले (यानी उसे यक़ीन हो) की अगर वह नमाज़ पढ़ने में देर करेगी तो हाइज़ हो जायेगी तो ज़रूरी है कि फ़ौरन नमाज़ पढ़े और अगर उसे फ़क़त एहतिमाल हो कि नमाज़ में ताख़ीर करने से वह हाइज़ हो जायेगी तो भी एहतियाते लाज़िम की बिना पर यही हुक्म है।
477. अगर औरत नमाज़ पढ़ने में ताख़ीर करे और अव्वले वक़्त में से इतना वक़्त ग़ुज़र जाए जितना की हदस से पानी के ज़रीए, और एहतियाते लाज़िम की बिना पर तयम्मुम के ज़रीये, तहारत हासिल करके नमाज़ पढ़ने में लगता और उसे हैज़ आ जाए तो उस नमाज़ की क़ज़ा उस औरत पर वाजिब है। लेकिन जल्दी पढ़ने और ठहर ठहर के पढ़ने और दूसरी बातों के बारे में ज़रूरी है कि अपनी आदत का लिहाज़ करे मसलन एक औरत जो सफ़र में नहीं है अव्वले वक़्त में नमाज़े ज़ौहर न पढ़े तो उसकी क़ज़ा उस सूरत में वाजिब होगी जबकि हदस से तहारत हासिल करने के बाद चार रक्अत नमाज़ पढ़ने के बराबर वक़्त अव्वले ज़ौहर से ग़ुज़र जाए और वह हाइज़ हो जाए और उस औरत के लिये जो सफ़र में हो तहारत हासिल करने के बाद दो रक्अत पढ़ने के बराबर वक़्त गुज़र जाना भी काफ़ी है।
478. अगर एक औरत नमाज़ के आख़री वक़्त में ख़ून से पाक हो जाए और उसके पास अन्दाज़न इतना वक़्त हो कि ग़ुस्ल कर के एक या एक से ज़्यादा रक्अत पढ़ सके तो ज़रूरी है कि नमाज़ पढ़े और अगर न पढ़े तो ज़रूरी है कि उसकी क़ज़ा बजा लाए।
479. अगर एक हाइज़ के पास (हैज़ से पाक होने के बाद) ग़ुस्ल के लिये वक़्त न हो लेकिन तयम्मुम कर के नमाज़ वक़्त के अन्दर पढ़ सकती हो तो एहतियाते वाजिब यह है कि वह नमाज़ तयम्मुम के साथ पढ़े और अगर न पढ़े तो क़ज़ा करे। लेकिन अगर वक़्ती तंगी से क़त्ए नज़र किसी और वजह से उसका फ़रीज़ा ही तयम्मुम करना हो मसलन पानी उसके लिये मुज़िर हो तो ज़रूरी है कि तयम्मुम करके वह नमाज़ पढ़े और अगर न पढ़े तो ज़रूरी है कि उसकी कज़ा करे।
480. अगर किसी औरत को हैज़ से पाक हो जाने के बाद शक हो कि नमाज़ के लिये वक़्त बाक़ी है या नहीं तो उसे चाहिये की नमाज़ पढ़ ले।
481. अगर कोई औरत इस ख़्याल से नमाज़ न पढ़े कि हदस से पाक होने के बाद एक रक्अत नमाज़ पढ़ने के लिये भी उसके पास वक़्त नहीं है लेकिन बाद में उसे पता चले कि वक़्त था तो उस नमाज़ की क़ज़ा बजा लाना ज़रूरी है।
482. हाइज़ के लिये मुस्तहब है कि नमाज़ के वक़्त अपने आप को ख़ून से पाक करे और रूई या कपड़े का टुकड़ा बदले और वुज़ू करे और अगर वुज़ू न कर सके तो तयम्मुम करे और नमाज़ की जगह पर रू बक़िबला बैठ कर ज़िक्र, दुआ और सलवात में मशग़ूल हो जाए।
483. हाइज़ के लिये क़ुरआने मजीद का पढ़ना और उसे अपने साथ रखना और अपने बदन का कोई हिस्सा उसके अल्फ़ाज़ के दरमियानी हिस्से से छूना नीज़ मेंहदी य उस जैसी किसी और चीज़ से ख़िज़ाब करना मकरूह है।
हाइज़ की क़िस्में
484. हाइज़ की छः क़िस्में हैः-
1. वक़्त और अदद की आदत रखने वाली औरतः- यह वह औरत है जिसे यके बाद दीगरे दो महीनों में एक मुअय्यन वक़्त पर हैज़ आए और उसके हैज़ के दिनों की तादाद भी दोनों महीनों में एक जैसी हो मसलन यके बाद दीगरे दो महीनों में उसे महीने की पहली तारीख़ से सातवीं तारीख़ तक ख़ून आता हो।
2. वक़्त की आदत रखने वाली औरतः- यह वह औरत है जिसे यके बाद दीगरे दो महीनों में मुअय्यन वक़्त पर हैज़ आए लेकिन उसके हैज़ के दिनों की तादाद दोनों महीनों में एक जैसी न हो। मसलन यके बाद दीगरे उसे महीने की पहली तारीख़ में ख़ून आना शरूउ हो लेकिन वह पहले महीने में सातवें दीन और दूसरे महीने में आठवें दीन ख़ून से पाक हो।
3. अदद की आदत रखने वाली औरतः- यह वह औरत है जिसके हैज़ के दिनों की तादाद यके बाद दीगरे दो महीनों में एक जैसी हो लेकिन हर महीने ख़ून आने का वक़्त यक़सां न हो । मसलन पहले महीने में उसे पांचवीं से दसवीं तारीख़ तक और दूसरे महीने में बारहवीं से सत्तरहवीं तारीख़ तक ख़ून आता हो।
4. मुज़्तरिबः- यह वह औरत है जिसे चन्द महीने पहले ख़ून आया हो लेकिन उसकी आदत मुअय्यन न हुई हो या उसकी साबिक़ा आदत बिगड़ गई हो और नई आदत न बनी हो।
5. मुब्तदीअहः- यह वह औरत है जिसे पहली दफ़्आ ख़ून आया हो।
6. नासियहः- यह वह औरत है जो अपनी आदत भूल चुकी हो। इनमें से हर क़िस्म की औरत के लिये अलायहदा अलायहदा अहकाम हैं जिनका ज़िक्र आइन्दा मसाइल में किया जायेगा।
1. वक़्त और अदद की आदत रखने वाली औरत
485. जो औरतें वक़्त और अदद की आदत रखती है उनकी दो क़िस्में हैः-
(अव्वल) वह औरत जिसे यके बाद दीगरे दो महीनों से एक मुअय्यन वक़्त पर ख़ून आए और वह और वह एक मुअय्यन वक़्त पर ही पाक भी हो जाए मसलन यके बाद दीगरे दो महीनों में उसे महीने की पहली तारीख़ को ख़ून आए और वह सातवें रोज़ पाक हो जाए तो उस औरत की हैज़ की आदत महीने की पहली तारीख़ से सातवीं तारीख़ तक है।
(दोयम) वह औरत जिसे यके बाद दीगरे दो महीनों में मुअय्यन वक़्त पर ख़ून आए और जब तीन या ज़्यादा दिन तक ख़ून आ चुके तो वह एक या ज़्यादा दिनों के लिये पाक हो जाए और फिर उसे दोबारा ख़ून आ जाए और उन तमाम दिनों की तादाद जिनमें उसे ख़ून आया है बशुमूल उन दरमियानी दिनों के जिनमें वह पाक रही है दस से ज़्यादा न हो और दोनों महीनों में तमाम दिन जिनमें उसे ख़ून आया और बीच के वह दिन जिनमें पाक रही हो एक जितने हों तो उसकी आदत उन तमाम दिनों के मुताबिक़ क़रार पायेगी जिनमें उसे ख़ून आया लेकिन उन दिनों को शामिल नहीं कर सकती जिनके दरमियान पाक रही हो। पस लाज़िम है कि जिन दिनों में उसे ख़ून आया हो और जिन दिनों में वह पाक रही हो दोनों महीनों में उनकी तादाद एक जितनी हो मसलन अगर पहले महीने में और इसी तरह दूसरे महीने में उसे पहली तारीख़ से तीसरी तारीख़ तक ख़ून आए और फिर तीन दिन पाक रहे और फिर तीन दिन दोबारा ख़ून आए तो उस औरत की आदत छः दिन की हो जायेगी और अगर उसे दूसरे महीने में आने वाले ख़ून के दिनों की तादाद उससे कम या ज़्यादा हो तो यह औरत वक़्त की आदत रखती है, अदद नहीं।
486. जो औरत वक़्त की आदत रखती हो ख़्वाह अदद की आदत रखती हो या न रखती हो अगर उसे आदत के वक़्त या उससे एक दो दिन या उससे भी ज़्यादा दिन पहले ख़ून जाए जबकि यह कहा जाए कि उसकी आदत वक़्त से क़ब्ल हो गई है अगर उस ख़ून में हैज़ की अलामात न भी हों तब भी ज़रूरी है कि उन अहकाम पर अमल करे जो हाइज़ के लिये बयान किये गये हैं। और अगर बाद में उसे पता चले कि वह हैज़ का ख़ून नहीं था मसलन वह तीन दिन से पहले पाक हो जाए तो ज़रूरी है कि जो इबादत उसने अंजाम न दी हों उनकी क़ज़ा करे।
487. जो औरत वक़्त और अदद की आदत रखती हो अगर उसे आदत के तमाम दिनों में और आदत से चन्द दिन पहले और आदत के चन्द बाद ख़ून आए और वह कुल मिलाकर दस दिन से ज़्यादा न हो तो वह सारे का सारा हैज़ है, और अगर यह मुद्दत दस दिन से बढ़ जाए तो जो ख़ून उसे आदत के दिनों में आता है वह हैज़ है, और जो आदत से पहले या बाद में आया है वह इस्तिहाज़ा है, और जो इबादत वह आदत से पहले और बाद के दिनों में बजा नहीं लाई उसकी क़ज़ा करना ज़रूरी है। और अगर आदत के तमाम दिनों में और साथ ही आदत से कुछ दिन पहले उसे ख़ून आए और उन सब दिनों को मिलाकर उनकी तादाद दस से ज़्यादा न हो तो सारा हैज़ है, और अगर दिनों की तादाद दस से ज़्यादा हो जाए तो सिर्फ़ आदत के दिनों में आना वाला ख़ून हैज़ है, अगर चे उसमें हैज़ की अलामत न हों और उससे पहले आने वाला ख़ून हैज़ की अलामत के साथ हो। और जो ख़ून उससे पहले आए वह इस्तिहाज़ा है और अगर उन दिनों में इबादत न कि हो तो ज़रूरी है कि उसकी क़ज़ा करे। और अगर आदत के तमाम दिनों में और साथ ही आदत के चन्द दिन बाद ख़ून आए और कुल दिनों की तादाद मिलाकर दस से ज़्यादा न हो तो सारे का सारा हैज़ है और अगर यह तादाद दस से बढ़ जाए तो सिर्फ़ आदत के दिनों में आने वाला ख़ून हैज़ है और बाक़ी इस्तिहाज़ा है।
488. जो औरत वक़्त और अदद की आदत रखती हो अगर उसे आदत के कुछ दिनों में या आदत से पहले ख़ून आए और उन तमाम दिनों को मिलाकर उनकी तादाद दस से ज़्यादा न हो तो वह सारे का सारा हैज़ है। और अगर उन दिनों की तादाद दस से बढ़ जाए तो जिन दिनों में उसे हस्बे आदत ख़ून आया है और पहले के चन्द दिन शामिल कर के आदत के दिनों की तादाद पूरी होने तक हैज़ और शुरू के दिनों को इस्तिहाज़ा क़रार दे। और अगर आदत के कुछ दिनों के साथ साथ आदत के बाद के कुछ दिनों में ख़ून आए और उन सब दिनों को मिलाकर उनकी तादाद दस से ज़्यादा न हो तो सारे का सारा हैज़ है और अगर दस से बढ़ जाए तो उसे चाहिये कि जिन दिनों में आदत के मुताबिक़ ख़ून आया है उसमें बाद के चन्द दिन मिलाकर जिन दिनों की मजमूई तादाद उसकी आदत के दिनों के बराबर हो जाए उन्हें हैज़ और बाक़ी को इस्तिहाज़ा क़रार दे।
489. जो औरत आदत रखती हो अगर उसका ख़ून तीन या ज़्यादा दिन तक आने के बाद रूक जाए और फिर दोबारा ख़ून आए और उन दोनों ख़ून का दरमियानी फ़ासिला दस दिन से कम हो और उन सब दिनों की तादाद जिनमें ख़ून आया है बशुमूल उन दरमियानी दिनों के जिनमें पाक रही हो दस से ज़्यादा हो, मसलन पांच दिन ख़ून आया हो फिर पांच दिन रूक गया हो फिर पांच दिन दोबारा आया हो तो उसकी चन्द सूरतें हैः-
1. वह तमाम ख़ून या उसकी कुछ मिक़्दार जो पहली बार देखें आदत के दिनों में हों और दूसरा ख़ून जो पाक होने के बाद आया है आदत के दिनों में न हो। इस सूरत में ज़रूरी है कि पहले तमाम ख़ून को हैज़ और दूसरे ख़ून को इस्तिहाज़ा क़रार दे।
2. पहला ख़ून आदत के दिनों में न आए और दूसरा तमाम ख़ून या उसकी कुछ मिक़्दार आदत के दिनों में आए तो ज़रूरी है कि दूसरे तमाम ख़ून को हैज़ और पहले को इस्तिहाज़ा क़रार दे।
3. दूसरे और पहले ख़ून की कुछ मिक़्दार आदत के दिनों में आए और अय्यामें आदत में आना वाला पहला ख़ून तीन दिन से कम न हो, उस सूरत में वह मुद्दत ब मए दरमियान में पाक रहने की मुद्दत, और आदत के दिनों में आने वाले दूसरे ख़ून की मुद्दत, दस दिन से ज़्यादा न हो तो ख़ून हैज़ है, और एहतियाते वाजिब यह है कि वह पाकी की मुद्दत में पाक औरत के काम भी अंजाम दे और वह काम जो हाइज़ पर हराम है तर्क करे। और दूसरे ख़ून की वह मिक़्दार जो आदत के दिनों के बाद आए इस्तिहाज़ा है। और ख़ूने अव्वल की वह मिक़्दार जो अय्यामे आदत से पहले आई हो और उर्फ़न कहा जाए कि उसकी आदत वक़्त से क़ब्ल हो गई है तो वह ख़ून, हैज़ का हुक्म रखता है। लेकिन अगर उस ख़ून पर हैज़ का हुक्म लगाने से दूसरे ख़ून की भी कुछ मिक़्दार जो आदत के दिनों में थी, या सारे का सारा ख़ून, हैज़ के दस दिन से ज़्यादा हो जाए तो उस सूरत में वह ख़ून ख़ूने इस्तिहाज़ा का हुक्म रखता है मसलन अगर की आदत महीने की तीसरी से दसवीं तारीख़ तक हो और उसे किसी महीने की पहली से छठी तारीख़ तक ख़ून आए और फिर दो दिन के लिये बन्द हो जाए और फिर पन्द्रहवीं तारीख़ तक आए तो तीसरी से दसवीं तारीख़ तक हैज़ है और ग्यारहवीं से पन्द्रहवीं तक आने वाला ख़ून इस्तिहाज़ा है।
4. पहले और दूसरे ख़ून की कुछ मिक़्दार आदत के दिनों में आए लेकिन अय्यामें आदत में आने वाला पहला ख़ून तीन दिन से कम हो इस सूरत में बईद नहीं है कि जितनी मुद्दत उस औरत को अय्यामें आदत में ख़ून आया है उसे आदत से पहले आने वाले ख़ून की कुछ मुद्दत के साथ मिलाकर तीन दिन पूरे करे और उन्हें अय्यामे हैज़ क़रार दे। पस अगर ऐसा हो कि वह दूसरे ख़ून की उस मुद्दत को जो आदत के दिनों में आया है उसे हैज़ क़रार दे। मतलब यह है कि वह मुद्दत और पहले ख़ून की वह मुद्दत जिसे हैज़ क़रार दिया है और उनके दरमियान पाकी की मुद्दत सब मिलाकर दस दिन से तजावुज़ न करें तो यह सब अय्यामे हैज़ है, वर्ना दूसरा ख़ून इस्तिहाज़ा है और बाज़ सूरतों में ज़रूरी है कि पहले पूरे ख़ून को हैज़ क़रार दे, न कि उस ख़ास मिक़्दार को जिसे पहले ख़ून की कमी पूरा करने के लिये वह लाज़िमी तौर पर हैज़ क़रार देती, और इसमें दो शर्तें हैः-
(अव्वल) उसे अपनी आदत से कुछ दिन पहले ख़ून आया हो कि उसके बारे में यह कहा जाए कि उसकी आदत तब्दील होकर वक़्त से पहले हो गई है।
(दोम) वह उसे हैज़ क़रार दे तो यह लाज़िम न आए कि उसके दूसरे ख़ून की कुछ मिक़्दार जो कि आदत के दिनों में आया हो हैज़ के दस दिन से ज़्यादा हो जाए मसलन अगर औरत की आदत महीने की चौथी तारीख़ से दस तारीख़ तक थी और उसे महीने के पहले दिन से चौथे दिन के आख़िरी वक़्त तक ख़ून आए और दो दिन के लिये पाक हो और फिर दोबारा उसे पन्द्रह तारीख़ तक ख़ून आए तो इस सूरत में, पहला पूरे का पूरा हैज़ है और इसी तरह दूसरा वह ख़ून भी जो दसवें दिन के आख़िरी वक़्त तक आए हैज़ का ख़ून है।
490. जो औरत वक़्त और अदद की आदत रखती हो अगर उसे आदत के वक़्त ख़ून न आए बल्कि उसके अलावा किसी और वक़्त हैज़ के दिनों के बराबर दिनों में हैज़ की अलामत के साथ ख़ून आए तो ज़रूरी है कि उसी ख़ून को हैज़ क़रार दे ख़्वाह वह आदत के वक़्त से पहले आए या बाद में आए।
491. जो औरत वक़्त और अदद की आदत रखती हो अगर उसे आदत के वक़्त तीन या तीन से ज़्यादा दिन तक ख़ून आए लेकिन उसके दिनों की तादाद उसकी आदत के दिनों से कम या ज़्यादा हो और पाक होने के बाद उसे दोबारा इतने दिनों के लिये ख़ून आए जितनी उसकी आदत हो तो उसकी चन्द सूरतें हैः-
1. दोनों ख़ून के दिनों और उनके दरमियान पाक रहने के दिनों को मिलाकर दस दिन से ज़्यादा न हो तो उस सूरत में दोनों ख़ून हैज़ शुमार होंगे।
2. दोनों ख़ून के दरमियान पाक रहने की मुद्दत दस दिन या दस दिन से ज़्यादा हो तो उस सूरत में दोनों ख़ून में से हर एक को एक मुस्तक़िल हैज़ क़रार दिया जायेगा।
3. उन दोनों ख़ून के दरमियान पाक रहने की मुद्दत दस दिन से कम हो लेकिन उन दोनों ख़ून को और दरमियान में पाक रहने की सारी मुद्दत को मिलाकर दस दिन से ज़्यादा हो तो उस सूरत में ज़रूरी है कि पहले आने वाले ख़ून को हैज़ और दूसरे को इस्तिहाज़ा क़रार दे।
492. जो औरत वक़्त और अदद की आदत रखती हो अगर उसे दस दिन से ज़्यादा दिन तक ख़ून आए तो जो ख़ून उसे आदत के दिनों में आए ख़्वाह वह हैज़ की अलामत न भी रखता हो तब भी हैज़ है और जो ख़ून आदत के दिनों के बाद आए ख़्वाह वह हैज़ की अलामत भी रखता हो इस्तिहाज़ा है। मसलन एक ऐसी औरत जिसकी हैज़ की तारीख़ महीने की पहली तारीख़ से सातवीं तारीख़ तक हो उसे पहली से बारहवीं तक ख़ून आए तो पहले सात दिन हैज़ बक़ीया पांच दिन इस्तिहाज़ा के होंगे।
2. वक़्त की आदत रखने वाली औरत
493. जो औरतें वक़्ती आदत रखती हैं और उनकी आदत की पहली तारीख़ मुअय्यन हो उनकी दो क़िस्में हैः-
1. वह औरत जिसे यके बाद दीगरे दो महीने में मुअय्यन वक़्त पर ख़ून आए और चन्द दिनों बाद बन्द हो जाए लेकिन दोनों महीनों में ख़ून आने के दिनों की तादाद मुख़्तलिफ़ हो, मसलन उसे यके बाद दीगरे महीनों की पहली तारीख़ को ख़ून आए लेकिन पहले महीने में सातवें दिन और दूसरे महीने में आठवें दिन बन्द हो । ऐसी औरत को चाहिये की महीने की पहली तारीख़ को अपनी आदत क़रार दे ।
2. वह औरत जिसे यके बाद दीगरे दो महीनों में मुअय्यन वक़्त पर तीन या ज़्यादा दिन ख़ून आए और फिर बन्द हो जाए और फिर दोबारा ख़ून आए और उन तमाम दिनों की तादाद जिनमें ख़ून आया है मए उन दरमियानी दिनों के जिनमें ख़ून बन्द रहा है दस से ज़्यादा न हो लेकिन दूसरे महीनें में दिनों की तादाद पहले महीने से कम या ज़्यादा हो मसलन पहले महीने में आठ दिन और दूसरे महीने में नौं दिन बनते हों तो उस औरत को भी चाहिये की महीने की पहली तारीख़ को अपनी हैज़ की तारीख़ का पहला दिन क़रार दे।
494. वह औरत जो वक़्त की आदत रखती हो अगर उसको आदत के दिनों में या आदत से दो या तीन दिन पहले ख़ून आए तो ज़रूरी है कि वह औरत उन अहकाम पर अमल करे जो हाइज़ के लिये बयान किये गए हैं और उस सूरत की तफ़्सील मस्अला 486 में गुज़र चुकी है। लेकिन उन दो सूरतों के अलावा मसलन यह कि आदत से इस क़द्र पहले ख़ून आए कि यह न कहा जा सके कि आदत वक़्त से क़ब्ल हो गई है बल्कि यह कहा जाए कि आदत की मुद्दत के अलावा (यानी दूसरे वक़्त में) ख़ून आया है या यह कहा जाए कि आदत के बाद ख़ून आया है चुनांचे वह ख़ून हैज़ की अलामत के साथ आए तो ज़रूरी है कि उन अहकाम पर अमल करे जो हाइज़ के लिये बयान किये गए हैं। और अगर ख़ून में हैज़ की अलामत न हों लेकिन वह औरत यह जान ले कि ख़ून तीन दिन तक जारी रहेगा तब भी यही हुक्म है। और अगर यह न जानती हो कि ख़ून तीन दिन तक जारी रहेगा या नहीं तो एहतियाते वाजिब यह है कि वह काम जो मुस्तहाज़ा पर वाजिब है अंजाम दे और वह काम जो हाइज़ पर हराम है तर्क करे।
495. जो औरत वक़्त की आदत रखती है अगर उसे आदत के दिनों में ख़ून आए और उस ख़ून की मुद्दत दस दिन से ज़्यादा हो और हैज़ की निशानियों के ज़रिये उसकी मुद्दत मुअय्यन कर सकती हो तो अहवत यह है कि अपने रिश्तेदारों में से बाज़ औरतों की आदत के मुताबिक़ हैज़ क़रार दे चाहे वह रिश्ते मां की तरफ़ से हो या बाप की तरफ़ से ज़िन्दा हो या मुर्दा लेकिन उसकी दो शर्तें हैः-
1. उसे अपने हैज़ की मिक़्दार और उस रिश्तेदार औरत की आदत की मिक़्दार में फ़र्क़ का इल्म न हो मसलन यह कि वह ख़ुद नौजवान हो और ताक़त के लिहाज़ से क़वी और दूसरी औरत उम्र के लिहाज़ से यास के नज़्दीक़ हो तो ऐसी सूरत में मअमूलन आदत की मिक़्दार कम होती है इसी तरह वह ख़ुद उम्र के लिहाज़ से यास के नज़दीक़ हो और रिश्तेदार औरत नौजवान हो।
2. उसे उस औरत की आदत की मिक़्दार में और उसकी दूसरी रिश्तेदार औरतों की आदत की मिक़्दार में कि जिनमें पहली शर्त मौजूद है इख़्तिलाफ़ का इल्म न हो लेकिन अगर इख़्तिलाफ़ इतना कम हो कि उसे इख़तिलाफ़ शुमार न किया जाता हो तो कोई हर्ज नहीं है और उस औरत के लिये भी यही हुक्म है जो वक़्त की आदत रखती है और आदत के दिनों में कोई ख़ून न आए लेकिन आदत के वक़्त के अलावा कोई ख़ून आए जो दस दिन से ज़्यादा हो और हैज़ की मिक़्दार को निशानियों के ज़रीए मुअय्यन न कर सके।
496. वक़्त की आदत रखने वाली औरत अपनी आदत के अलावा वक़्त में आने वाले ख़ून को हैज़ क़रार नहीं दे सकती, लिहाज़ा अगर उसे आदत का इब्तिदाई वक़्त मालूम हो मसलन हर महीने की पहली को ख़ून आता हो और कभी पांचवे और कभी छठी को ख़ून से पाक होती हो चुनांचे उसे किसी एक महीने में बारह दिन ख़ून आए और वह हैज़ की निशानियों के ज़रीये उसकी मुद्दत मुअय्यन न कर सके तो चाहिये की महीने की पहली को हैज़ की पहली तारीख़ क़रार दे और उसकी तादाद के बारे में जो कुछ पहले मस्अले में बयान किया गया है उस पर अमल करे। और अगर उसकी आदत की दरमियानी या आख़िरी तारीख़ मालूम हो चुनांचे अगर उसे दस दिन से ज़्यादा ख़ून आए तो ज़रूरी है कि उसका हिसाब इस तरह करे कि आखिरी या दरमियानी तारीख़ में से एक उसकी आदत के दिनों के मुताबिक़ हो।
497. जो औरत वक़्ती आदत रखती हो और उसे दस दिन से ज़्यादा ख़ून आए और ख़ून को मस्अला 495 में बताए गए तरीक़े से मुअय्यन न कर सके मसलन उस ख़ून में हैज़ की अलामत न हों या पहले बताई गईं दो शर्तों में से एक शर्त न हो तो उसे इख़्तियार है कि तीन दिन से दस दिन तक जितने दिन हैज़ की मिक़्दार के मुनासिब समझे हैज़ क़रार दे। छः या आठ दिनों को अपने हैज़ की मिक़्दार के मुनासिब समझने की सूरत में बेहतर यह है कि सात दिनों को हैज़ क़रार दे। लेकिन ज़रूरी है कि जिन दिनों को वह हैज़ क़रार दे वह दिन उसकी आदत के वक़्त के मुताबिक़ हों जैसा कि पहले मस्अले में बयान किया जा चुका है।
3. अदद की आदत रखने वाली औरत
498. जो औरत अदद की आदत रखती हैं उनकी दो क़िस्में हैः-
1. वह औरत जिसके हैज़ के दिनों की तादाद यके बाद दीगरे दो महीनों में यकसां हो लेकिन उसके ख़ून आने का वक़्त एक जैसा न हो उस सूरत में जितने दिन उसे ख़ून आए वही उसकी आदत होगी। मसलन अगर पहले महीने में उसे पहली तारीख़ से पांचवी तारीख़ तक और दूसरे महीने में ग्यारहवीं तारीख़ तक ख़ून आए तो उसकी आदत पांच दिन होगी।
2. वह औरत जिसे यके बाद दीगरे दो महीनों में से हर एक में तीन या तीन से ज़्यादा दिनों तक ख़ून आए और एक या उससे ज़्यादा दिनों के लिये बन्द हो जाए और फिर दोबारा ख़ून आए और ख़ून आने का वक़्त पहले महीने में और दूसरे महीने में मुख़्तलिफ़ हो उस सूरत में अगर उन तमाम दिनों की तादाद जिनमें ख़ून आया है ब मए उन दरमियानी दिनों के जिनमें ख़ून बन्द रहा है दस से ज़्यादा न हो और दोनों महीनों में से हर एक में उनकी तादाद भी यकसां हो तो वह तमाम दिन जिनमें ख़ून आया है उसके हैज़ की आदत के दिन शुमार किये जायेगें और उन दरमियानी दिनों में जिनमें ख़ून नहीं आया एहतियात की बिना पर ज़रूरी है कि जो काम पाक औरत पर वाजिब हैं अंजाम दे और जो काम हाइज़ पर हराम हैं उन्हें तर्क करे, मसलन अगर पहले महीने में उसे पहली तारीख़ से तीसरी तारीख़ तक ख़ून आए और फिर दो दिन तक के लिये बन्द हो जाए और फिर दोबारा तीन दिन ख़ून आए और दूसरे महीने में ग्यारहवीं तारीख़ से तेरहवीं तारीख़ तक ख़ून आए और दो दिन के लिये बन्द हो जाए और फिर दोबारा तीन दिन ख़ून आए तो उस औरत की आदत छः दिन की होगी। और अगर पहले महीने में उसे आठ दिन ख़ून आए और दूसरे महीने में चार दिन ख़ून आए और फिर बन्द हो जाए और फिर दोबारा ख़ून आए और ख़ून के दिनों और दरमियान में ख़ून के बन्द हो जाने वाले दिनों की मजमूई तादाद आठ दिन हो तो ज़ाहिरन यह औरत अदद की आदत नहीं रखती, बल्कि मुज़्तरिबः शुमार होगी जिसका हुक्म बाद में बयान किया जायेगा।
499. जो औरत अदद की आदत रखती हो अगर उसे अपनी आदत की तादाद से कम या ज़्यादा दिन ख़ून आए और उन दिनों की तादाद दस से ज़्यादा न हो तो उन तमाम दिनों को हैज़ क़रार दे। और अगर उसकी आदत से ज़्यादा ख़ून आए और दस दिन से ज़्यादा तजावुज़ कर जाए तो अगर तमाम का तमाम ख़ून एक जैसा हो तो ख़ून आने की इब्तिदा से लेकर उसकी आदत के दिनों तक हैज़ और बाक़ी दिनों को इस्तिहाज़ा क़रार दे। और अगर आने वाला तमाम ख़ून एक जैसा न हो बल्कि कुछ दिन हैज़ की अलामत के साथ और कुछ दिन इस्तिहाज़ा की अलामत के साथ हो, पस अगर हैज़ की अलामत के साथ आने वाले ख़ून के दिनों की तादाद उसकी आदत के दिनों के बराबर हो तो ज़रूरी है कि उन दिनों को हैज़ और बाक़ी दिनों को इस्तिहाज़ा क़रार दे, और अगर उन दिनों की तादाद जिनमें ख़ून हैज़ की अलामत के साथ आया हो आदत की दिनों से ज़्यादा हो तो सिर्फ़ आदत के दिन हैज़ और बाक़ी दिन इस्तिहाज़ा है, और अगर हैज़ की अलामत के साथ आने वाले ख़ून के दिनों की तादाद आदत के दिनों से कम हो तो ज़रूरी है कि उन दिनों के साथ और दिनों को मिलाकर आदत की मुद्दत पूरी करे और उनको हैज़ और बाक़ी दिनों को इस्तिहाज़ा क़रार दे।
4. मुज़्तरिबः
500. मुज़्तरिबः यानी वह औरत जिसे चन्द महीने ख़ून आए लेकिन वक़्त और अदद दोनों के लिहाज़ से उसकी आदत मुअय्यन न हुई हो अगर उसे दस दिन से ज़्यादा ख़ून आए और सारा ख़ून एक जैसा हो मसलन तमाम ख़ून हैज़ की निशानियों के साथ या इस्तिहाज़ा की निशानियों के साथ आया हो तो उसका हुक्म आदत रखने वाली औरत का हुक्म है कि जिसे अपनी आदत के अलावा वक़्त में ख़ून आए, और अलामत के ज़रिये हैज़ को इस्तिहाज़ा से तमीज़ न दे सकती हो तो एहतियात की बिना पर उसे चाहिये कि अपनी रिश्तेदार औरतों में से बाज़ औरतों की आदत के मुताबिक़ हैज़ क़रार दे और अगर यह मुम्किन न हो तो तीन और दस दिन में से किसी एक अदद को उस तफ़्सील के मुताबिक़ जो मस्अला 495 और 497 में बयान की गई है, अपने हैज़ की आदत क़रार दे।
501. अगर मुज़्तरिबः को दस दिन से ज़्यादा ख़ून आए जिसमें से चन्द दिनों के ख़ून में हैज़ की अलामात और चन्द दूसरे दिनों में इस्तिहाज़ा की अलामात हो तो अगर वह ख़ून जिसमें हैज़ की अलामात हों तीन दिन से कम या दस दिन से ज़्यादा मुद्दत तक न आया हो तो उस तमाम ख़ून को हैज़ और बाक़ी को इस्तिहाज़ा क़रार दें। और अगर तीन दिन से कम और दस दिन से ज़्यादा हो तो हैज़ के दिनों की तादाद मालूम करने के लिये ज़रूरी है कि जो हुक्म साबिक़ः मस्अले में गुज़र चुका है उसके मुताबिक़ अमल करे और अगर उस साबिक़ः ख़ून को हैज़ क़रार देने के बाद दस दिन गुज़रने से पहले दोबारा हैज़ की अलामात के साथ ख़ून आए तो बईद नहीं कि उसको इस्तिहाज़ा क़रार देना ज़रूरी हो।
5. मुब्तदिअः
502. मुब्तदिअः यानी उस औरत को जिसे पहली बार ख़ून आया हो दस दिन से ज़्यादा ख़ून आए और वह तमाम ख़ून जो मुब्तदिअः को आया है एक जैसा हो तो उसे चाहिये कि अपने कुंबे वालियों की आदत की मिक़दार को हैज़ और बाक़ी को उन दो शर्तों के साथ इस्तिहाज़ा क़रार दे जो मस्अला 495 में बयान हुई हैं। और अगर यह मुम्किन न हो तो ज़रूरी है कि मस्अला 497 में दी गई तफ़्सील के मुताबिक़ तीन और दस दिन में से किसी एक अदद को अपने हैज़ के दिन क़रार दे।
503. अगर मुब्तदिअः को दस से ज़्यादा दिन तक ख़ून आए जबकि चन्द दिन आने वाले ख़ून में हैज़ की अलामात और चन्द दिन आने वाले ख़ून में इस्तिहाज़ा की अलामात हों तो जिस ख़ून में हैज़ की अलामात हों वह तीन दिन से कम और दस दिन से ज़्यादा न हों वह सारा हैज़ है। लेकिन ख़ून में हैज़ की अलामात थीं उसके बाद दस दिन गुज़रने से पहले दोबारा ख़ून आए और उसमें भी हैज़ की अलामात हों मसलन पांच दिन स्याह ख़ून और नौ दिन ज़र्द और फिर दोबारा पांच दिन स्याह ख़ून आए तो उसे चाहिये कि पहले आने वाले ख़ून को हैज़ और बाद में आने वाले दोनों ख़ून को इस्तिहाज़ा क़रार दे जैसा कि मुज़्तरिबः के मुतअल्लिक़ बताया गया है।
504. अगर मुब्तदिअः को दस से ज़्यादा दिनों तक ख़ून आए जो चन्द दिन हैज़ की अलामात के साथ और चन्द दिन इस्तिहाज़ा की अलामात के साथ हो लेकिन जिस ख़ून में हैज़ की अलामात हों वह तीन दिन से कम मुद्दत तक आया हो तो चाहिये की उसे हैज़ क़रार दे और दिनों की मिक़्दार से मुतअल्लिक़ मस्अला 501 में बताए गए तरीक़े पर अमल करे।
6. नासियः
505. नासियः यानी वह औरत जो अपनी आदत की मिक़्दार भूल चुकी हो, उसकी चन्द क़िस्में हैः
उनमें से एक यह है कि अदद की आदत रखने वाली औरत अपनी आदत की मिक़्दार भूल चुकी हो अगर उस औरत को ख़ून आए जिसकी मुद्दत तीन दिन से कम और दस दिन से ज़्यादा न हो तो ज़रूरी है कि वह उन तमाम दिनों को हैज़ क़रार दे और अगर दस दिन से ज़्यादा हो तो उसके लिये मुज़्तरिबः का हुक्म है जो मस्अला 500 और 501 में बयान किया गया है सिर्फ़ एक फ़र्क़ के साथ और वह फ़र्क़ यह है कि जिन अय्याम को वह हैज़ क़रार दे रही है वह उस तादाद से कम न हों जिस तादाद के मुतअल्लिक़ वह जानती है कि उसके हैज़ के दिनों की तादाद उससे कम नहीं होती (मसलन यह है कि वह जानती है कि पांच दिन से कम उसे ख़ून नहीं आता तो पांच दिन को हैज़ क़रार देगी) इसी तरह उन अय्याम से भी ज़्यादा दिनों को हैज़ क़रार नहीं दे सकती जिनके बारे में उसे इल्म है कि उसकी आदत की मिक़्दार उन दिनों से ज़्यादा नहीं होती (मसलन वह जानती है कि पांच दिनों से ज़्यादा उसे ख़ून नहीं आता तो पांच दिन से ज़्यादा हैज़ क़रार नहीं दे सकती) । और इस जैसा हुक्म नाक़िस अदद रखने वाली औरत पर भी लाज़िम है यानी वह औरत जिसे आदत के दिनों की मिक़्दार तीन दिन से ज़्यादा और दस दिन से कम होने में शक हो। मसलन जिसे हर महीने में छः या सात दिन ख़ून आता हो वह हैज़ की अलामत के ज़रिए या अपनी बाज़ कुंबे वालियों की आदत के मुताबिक़ या किसी एक अदद को इख़्तियार कर के दस दिन से ज़्यादा ख़ून आने की सूरत में दोनों अददों (छः या सात) से कम या ज़्यादा दिनों को हैज़ क़रार नहीं दे सकती।
हैज़ के मुतफ़र्रिक़ मसाइल
506. मुब्तदिअः, मुज़्तरिबः, नासियः और अदद की आदत रखने वाली औरतों को अगर ख़ून आए जिसमें हैज़ की अलामात हों या यक़ीन हो कि यह ख़ून तीन दिन तक आयेगा तो उन्हें चाहिये कि इबादात तर्क कर दें और अगर बाद में उन्हें पता चले कि यह हैज़ नहीं था तो उन्हें चाहिये कि जो इबादात बजा न लाईं हो उनकी क़ज़ा करें।
507. जो औरत हैज़ की आदत रखती हो ख़्वाह यह आदत हैज़ के वक़्त के एतिबार से हो या हैज़ के अदद के एतिबार से या वक़्त और अदद दोनों के एतिबार से हो। अगर उसे यके बाद दीगरे दो महीनों में अपनी आदत के बर ख़िलाफ़ ख़ून आए जिसका वक़्त या दिनों की तादाद या वक़्त और दिन दोनों की तादाद यकसां हो तो उसकी आदत जिस तरह इन दो महीनों में उसे ख़ून आया है उसमें तब्दील हो जाती है। मसलन अगर पहले उसे महीने की पहली तारीख़ से सातवीं तारीख़ तक ख़ून आता था और फिर बन्द हो जाता था मगर दो महीनों में उसे दसवीं तारीख़ से सत्तरहवीं तारीख़ तक ख़ून आया हो और फिर बन्द हुआ हो तो उसकी आदत दसवीं तारीख़ से सत्तरहवीं तारीख़ तक हो जायेगी।
508. एक महीने से मुराद ख़ून के शूरू होने से तीस दिन तक है। महीने की पहली तारीख़ से महीने की आखिर तक नहीं है।
509. अगर किसी औरत को उमूमन महीने में एक मर्तबा ख़ून आता हो लेकिन किसी एक महीने में दो मर्तबा आ जाए और उस ख़ून में हैज़ की अलामात हों तो अगर उन दरमियानी दिनों की तादाद जिनमें उसे ख़ून नहीं आया दस दिन से कम न हो तो उसे चाहिये की दोनों ख़ून को हैज़ क़रार दे।
510. अगर किसी औरत को तीन या उससे ज़्यादा दिनों तक ऐसा ख़ून आए जिसमें हैज़ की अलामात हों और उसके बाद दस या उससे ज़्यादा दिनों तक ऐसा ख़ून आए जिसमें इस्तिहाज़ा की अलामात हों और उसके बाद दोबारा तीन दिनों तक हैज़ की अलामतों के साथ ख़ून आए तो उसे चाहिये की पहले और आख़िरी ख़ून को जिसमें हैज़ की अलामात हों हैज़ क़रार दे।
511. अगर किसी औरत का ख़ून दस दिन से पहले रूक जाए और उसे यक़ीन हो कि उसके बातिन में ख़ूने हैज़ नहीं है तो उसे चाहिये की अपनी इबादात के लिये ग़ुस्ल करे अगरचे गुमान रखती हो कि दस दिन पूरे होने से पहले दोबारा ख़ून आ जायेगा। लेकिन अगर उसे यक़ीन हो कि दस दिन पूरे होने से पहले उसे दोबारा ख़ून आ जायेगा तो जैसे बयान हो चुका उसे चाहिये की एहतियातन ग़ुस्ल करे और अपनी इबादात बजा लाए और जो चीज़े हाइज़ पर हराम हैं उसे तर्क करे।
512. अगर किसी औरत का ख़ून दस दिन गुज़रने से पहले बन्द हो जाए और इस बात का एहतिमाल हो कि उसके बातिन में ख़ूने हैज़ है तो उसे चाहिये की अपनी शर्मगाह में रूई रख कर कुछ देर इन्तिज़ार करे। लेकिन उस मुद्दत से कुछ ज़्यादा इन्तिज़ार करे जो आम तौर पर औरतें हैज़ से पाक होने की मुद्दत के दरमियान करती हैं उसके बाद निकाले, पस अगर ख़ून ख़त्म हो गया हो तो ग़ुस्ल करे और इबादात बजा लाए और अगर ख़ून बन्द न हुआ हो या थोड़ा सा ज़र्द पानी लगा हो पस अगर वह हैज़ की मुअय्यन आदत न रखती हो या उसकी आदत दस दिन की हो या अभी उसकी आदत के दस दिन तमाम न हुए हों तो उसे चाहिये कि इन्तिज़ार करे, और अगर दस दिन से पहले ख़ून ख़त्म हो जाए तो ग़ुस्ल करे और अगर दसवें दिन के ख़ातमें पर ख़ून आना बन्द हो या खून दस दिन के बाद भी आता रहे तो दसवें दिन ग़ुस्ल करे और अगर उसकी आदत दस दिनों से कम हो और वह जानती हो कि दस दिन ख़त्म होने से पहले या दसवें दिन के ख़ात्में पर ख़ून बन्द हो जायेगा तो ग़ुस्ल करना ज़रूरी नहीं है और अगर एहतिमाल हो कि उसे दस दिन तक ख़ून आयेगा तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि एक दिन के लिये इबादत तर्क करे और और दसवें दिन तक भी इबादत को तर्क कर सकती है और यह हुक्म सिर्फ़ उस औरत के लिये मख़्सूस है जिसे आदत से पहले लगातार ख़ून नहीं आता था वर्ना आदत के गुज़रने के बाद इबादत तर्क करना जायज़ नहीं है।
513. अगर कोई औरत चन्द दिनों को हैज़ क़रार दे और इबादत न करे लेकिन बाद में उसे पता चले कि हैज़ नहीं था तो उसे चाहिये की जो नमाज़ें और रोज़ें वह उन दिनों में बजा नहीं लाईं उनकी क़ज़ा करा और अगर चन्द दिन इस ख़्याल से इबादात बजा लाती रही हो कि हैज़ नहीं है और बाद में उसे पता चले कि हैज़ था तो अगर उन दिनों में उसने रोज़े भी रखे हों तो उसकी क़ज़ा करना ज़रूरी है।
निफ़ास
514. बच्चे का पहला जुज़्व मां के पेट से बाहर आने के वक़्त से जो ख़ून औरत को आए अगर वह दस दिन से पहले या दसवें दिन के ख़ात्मे पर बन्द हो जाए तो वह ख़ूने निफ़ास है और निफ़ास की हालत में औरत को नफ़्सा कहते हैं।
515. जो ख़ून औरत को बच्चे का पहला जुज़्व बाहर आने से पहले आए वह निफ़ास नहीं है।
516. यह ज़रूरी नहीं है कि बच्चे की ख़िल्क़त मुकम्मल हो बल्कि अगर उसकी ख़िल्क़द नामुकम्मल हो तब भी अगर उसे बच्चा जनना कहा जा सकता हो तो वह ख़ून जो औरत को दस दिन तक आए ख़ूने निफ़ास है।
517. यह हो सकता है कि ख़ूने निफ़ास एक लेह्ज़ा से ज़्यादा न आए लेकिन वह दस दिन से ज़्यादा नहीं आता।
518. अगर किसी औरत को शक हो कि इस्क़ात हुआ है या नहीं या जो इस्क़ात हुआ है वह बच्चा था या नहीं तो उसके लिये तहक़ीक़ करना ज़रूरी नहीं और जो ख़ून उसे आए वह शरअन निफ़ास नहीं है।
519. मस्जिद में ठहरना और दूसरे अफ़्आल जो हाइज़ पर हराम हैं एहतियात की बिना पर नफ़्सा पर भी हराम हैं और जो कुछ हाइज़ पर वाजिब है वह नफ़्सा पर भी वाजिब है।
520. जो औरत निफ़ास की हालत में हो उसे तलाक़ देना और उससे जिमाअ करना हराम है लेकिन अगर उसका शौहर उससे जिमाअ करे तो उस पर बिला इश्क़ाल कफ़्फ़ारा नहीं।
521. जब औरत निफ़ास के ख़ून से पाक हो जाए तो उसे चाहिये कि ग़ुस्ल करे और अपनी इबादात बजा लाए और अगर बाद में एक या एक बार से ज़्यादा ख़ून आए तो ख़ून आने वाले दिनों को पाक रहने वाले दिनों से मिलाकर अगर दस दिन से कम हो तो सारा ख़ूने निफ़ास है। और ज़रूरी है कि दरमियान में पाक रहने के दिनों में एहतियात की बिना पर जो काम पाक औरत पर वाजिब है अंजाम दे, और जो काम नफ़्सा पर हराम है उन्हें तर्क करे और अगर उन दिनों में कोई रोज़ा रखा हो तो ज़रूरी है कि उनकी क़ज़ा करे। और अगर बाद में आने वाला ख़ून दस दिन से तजावुज़ कर जाए और वह औरत अदद की आदत न रखती हो तो ख़ून की वह मिक़्दार जो दस दिन के अन्दर आई है उसे निफ़ास और दस दिन के बाद आने वाले ख़ून को इस्तिहाज़ा क़रार दे। और अगर वह औरत अदद की आदत रखती हो तो ज़रूरी है कि एहतियातन आदत के बाद आने वाले तमाम ख़ून की मुद्दत में जो काम मुस्तहाज़ा के लिये हैं अंजाम दे और जो काम नफ़्सा पर हराम है उन्हें तर्क करे।
522. अगर औरत ख़ूने निफ़ास से पाक हो जाए और एहतिमाल हो कि उसके बातिन में ख़ूने निफ़ास है तो उसे चाहिये की कुछ रूई अपनी शर्मगाह में दाख़िल करे और कुछ देर बाद इन्तिज़ार करे फिर अगर वह पाक हो तो इबादात के लिये ग़ुस्ल करे।
523. अगर औरत को निफ़ास का ख़ून दस दिन से ज़्यादा आए और वह हैज़ में आदत रखती हो तो आदत के बारबर दिनों की मुद्दत निफ़ास और बाक़ी इस्तिहाज़ा है। और अगर आदत न रखती हो तो दस दिन तक निफ़ास और बाक़ी इस्तिहाज़ा है। और एहतियाते मुस्तहब यह है कि जो औरत आदत रखती हो वह आदत के बाद के दिन से और जो औरत आदत न रखती हो वो दसवें दिन के बाद से बच्चे की पैदाइश के अट्ठारवें दिन तक इस्तिहाज़ा के अफ़्आल बजा लाए और वह काम जो नफ़्सा पर हराम हैं उन्हें तर्क करे।
524. अगर किसी औरत को जिसकी हैज़ की आदत दस दिन से कम हो अपनी आदत से ज़्यादा दिन ख़ून आए तो उसे चाहिये की अपनी आदत के दिनों की तादाद को निफ़ास क़रार दे और उसके बाद उसे इख़्तियार है कि दस दिन तक नमाज़ तर्क करे या मुस्तहाज़ा के अहकाम पर अमल करे। लेकिन एक दिन की नमाज़ तर्क करना बेहतर है। और अगर ख़ून दस दिन के बाद भी आता रहे तो उसे चाहिये कि आदत के दिनों के बाद दसवें दिन तक भी इस्तिहाज़ा क़रार दे और जो इबादात वह उन दिनों में बजा नहीं लाई उनकी क़ज़ा करे। मसलन जिस औरत की आदत छः दिनों की हो अगर उसे छः दिन से ज़्यादा ख़ून आए तो उसे चाहिये की छः दिनों को निफ़ास क़रार दे और सातवें, आठवें, नवें और दसवें दिन उसे इख़्तियार है कि या तो इबादात तर्क करे या इस्तिहाज़ा के अफ़्आल बजा लाए और अगर उसे दस दिन से ज़्यादा ख़ून आया हो तो उसकी आदत के बाद के दिन से वह इस्तिहाज़ा होगा।
525. जो औरत हैज़ में आदत रखती हो अगर उसे बच्चा जनने के बाद एक महीने तक या एक महीने से ज़्यादा मुद्दत तक लगातार ख़ून आता रहे तो उसकी आदत के दिनों की तादाद के बराबर ख़ूने निफ़ास है और जो ख़ून निफ़ास के बाद दस दिन तक आए ख़्वाह वह उसकी माहाना आदत के दिनों में आया हो इस्तिहाज़ा है। मसलन ऐसी औरत जिसके हैज़ की आदत हर महीने की बीस तारीख़ से सत्ताइस तारीख़ तक हो अगर वह महीने की दस तारीख़ को बच्चा जने और एक महीना या उससे ज़्यादा मुद्दत तक उसे मुतवातिर ख़ून आए तो सत्तरहवीं तारीख़ तक निफ़ास और सत्तरहवी तारीख़ से दस दिन तक का ख़ून हत्ताकि वह ख़ून भी जो बीस तारीख़ से सत्ताइस तक उसकी आदत के दिनों में आया है इस्तिहाज़ा होगा और दस दिन गुज़रने के बाद जो ख़ून उसे आए अगर वह आदत के दिनों में हो तो हैज़ है ख़्वाह उसमें हैज़ की अलामत हो या न हों। और अगर वह ख़ून उसकी आदत के दिनों में न आया हो तो उसके लिये ज़रूरी है कि अपनी आदत के दिनों का इन्तिज़ार करे अगरचे उसके इन्तिज़ार की मुद्दत एक महीना या एक महीने से ज़्यादा हो जाए और ख़्वाह उस मुद्दत में जो ख़ून आए उसमें हैज़ की अलामात हों। और अगर वह वक़्त की आदत वाली औरत न हो और उसके लिये मुम्किन हो तो ज़रूरी है कि वह अपने हैज़ की अलामत के ज़रिए मुअय्यन करे और अगर मुम्किन न हो जैसा कि निफ़ास के बाद दस दिन जो ख़ून आए वह सारा एक जैसा हो और एक महीने या चन्द महीने उन्हीं अलामात के साथ आता रहे तो ज़रूरी है कि हर महीने में अपने कुंबे की बाज़ औरतों के हैज़ की जो सूरत हो वही अपने लिये क़रार दे और अगर यह मुम्किन न हो तो जो अदद अपने लिये मुनासिब समझती है इख़्तियार करे और इन तमाम उमूर की तफ़्सील हैज़ की बहस में ग़ुज़र चुकी है।
526. जो औरत हैज़ में अदद के लिहाज़ से आदत न रखती हो अगर उसे बच्चा जनने के बाद एक महीने तक या एक महीने से ज़्यादा मुद्दत तक ख़ून आए तो उसके पहले दस दिनों के लिये वही हुक्म है जिसका ज़िक्र मस्अला 523 में हो चुका है और दूसरी दहाई में जो ख़ून आए वह इस्तिहाज़ा है और जो ख़ून उसके बाद आए मुम्किन है वह हैज़ हो और मुम्किन है इस्तिहाज़ा हो और हैज़ क़रार देने के लिये ज़रूरी है कि उस हुक्म के मुताबिक़ अमल करे जिसका ज़िक्र साबिक़ा मस्अले में गुज़र चुका है।
ग़ुस्ले मसे मैयित
527. अगर कोई शख़्स किसी ऐसे मुर्दा इंसान के बदन को छुए जो ठंडा हो चुका हो और जिसे ग़ुस्ल न दिया गया हो यानी अपने बदन का कोई हिस्सा उससे लगाए तो उसे चाहिये कि ग़ुस्ले मसे मैयित करे। ख़्वाह उसने नीन्द की हालत में उसका बदन छुआ हो या बेदारी के आलम में, और ख़्वाह इरादी तौर पर छुआ हो या ग़ैर इरादी तौर पर हत्ता की अगर उसका नाख़ून या हड्डी मुर्दे के नाख़ून या हड्ड़ी से छू जाए तब भी उसे चाहिये कि ग़ुस्ल करे लेकिन अगर मुर्दा हैवान को छुए तो उस पर ग़ुस्ल वाजिब नहीं है।
528. जिस मुर्दे का तमाम बदन ठंडा न हुआ हो उसे छूने से ग़ुस्ल वाजिब नहीं होता ख़्वाह उसने बदन का जो हिस्सा छुआ हो वह ठंडा हो चुका हो।
529. अगर कोई शख़्स अपने बाद मुर्दे के बदन से लगाए या अपना बदन मुर्दे के बालों से लगाए तो उस पर ग़ुस्ल वाजिब नहीं है।
530. मुर्दा बच्चे को छूने पर हत्ता कि ऐसे सिक्त शुदा बच्चे को छूने पर जिसके बदन में रूह दाखिल हो चुकी हो ग़ुस्ले मसे मैयित वाजिब है। इस बिना पर अगर मुर्दा बच्चा पैदा हुआ हो और उसका बदन ठंडा हो चुका हो और वह मां के ज़ाहिरी हिस्से को छू जाए तो मां को चाहिये कि ग़ुस्ले मसे मैयित करे बल्कि अगर ज़ाहिरी हिस्से को मस न करे तब भी मां को चाहिये की एहतियाते वाजिब की बिना पर ग़ुस्ले मसे मैयित करे।
531. जो बच्चा मां के मर जाने और उसका बदन ठंडा हो जाने के बाद पैदा हो अगर वह मां के बदन के ज़ाहिरी हिस्से को मस करे तो उस पर वाजिब है कि जब बालिग़ हो तो ग़ुस्ले मसे मैयित करे बल्कि अगर मां के बदन के ज़ाहिरी हिस्से को मस न करे तब भी एहतियात की बिना पर ज़रूरी है कि वह बच्चा बालिग़ होने के बाद ग़ुस्ले मसे मैयित करे।
532. अगर कोई शख़्स एक ऐसी मैयित को मस करे जिसे तीन ग़ुस्ल मुकम्मल तौर पर दिये जा चुके हों तो उस पर ग़ुस्ल वाजिब नहीं होता। लेकिन अगर वह तीसरा ग़ुस्ल मुकम्मल होने से पहले उसके बदन के किसी हिस्से को मस करे तो ख़्वाह उस हिस्से को तीसरा ग़ुस्ल दिया जा चुका हो उस शख़्स के लिये ग़ुस्ले मसे मैयित करना ज़रूरी है।
533. अगर कोई दीवाना या नाबालिग़ बच्चा मैयित को मस करे तो दीवाने को आक़िल होने और बच्चे को बालिग़ होने के बाद ग़ुस्ले मसे मैयित करना ज़रूरी है।
534. अगर किसी ज़िन्दा शख़्स के बदन से या किसी ऐसे मुर्दे के बदन से जिसे ग़ुस्ल न दिया गया हो एक हिस्सा जुदा हो जाए और इससे पहले कि जुदा होने वाले हिस्से को ग़ुस्ल दिया जाए कोई शख़्स उसे मस कर ले तो क़ौले अक़्वा की बिना पर अगरचे उस हिस्से में हड्डी हो, ग़ुस्ले मसे मैयित करना ज़रूरी नहीं।
535. एक ऐसी हड्डी के मस करने से जिसे ग़ुस्ल न दिया गया हो ख़्वाह वह मुर्दे के बदन से जुदा हुई हो या ज़िन्दा शख़्स के बदन से ग़ुस्ल वाजिब नहीं है। और दांत ख़्वाह मुर्दे के बदन से जुदा हुए हों या ज़िन्दा शख़्स के बदन से, उनके लिये भी यही हुक्म है।
536. ग़ुस्ले मसे मैयित का तरीक़ा वही है जो ग़ुस्ले जनाबत का है लेकिन जिस शख़्स ने मैयित को मस किया हो अगर वह नमाज़ पढ़ना चाहे तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि वुज़ू भी करे।
537. अगर कोई शख़्स कई मैयितों को मस करे या एक मैयित को कई बार मस करे तो एक ग़ुस्ल काफ़ी है।
538. जिस शख़्स ने मैयित को मस करने के बाद ग़ुस्ल न किया हो उसके लिये मस्जिद में ठहरना और बीवी से जिमाअ करना और उन आयात का पढ़ना जिनमें सज्दा वाजिब है मम्नूउ नहीं है लेकिन नमाज़ और उस जैसी इबादत के लिये ग़ुस्ल करना ज़रूरी है।
मुह्तज़र के अहकाम
539. जो मुसलमान मुह्तज़र हो यानी जांकनी की हालत में हो ख़्वाह मर्द हो या औरत, बड़ा हो या छोटा, उसे एहतियात की बिना पर बसूरते इमकान पुश्क के बल यूं लिटाना चाहिये कि उसके पांव के तल्वे क़िब्ला रूख़ हों।
540. औला यह है कि जब तक मैयित का ग़ुस्ल मुकम्मल न हो उसे भी रूबक़िब्ला लिटायें। लेकिन जब उसका ग़ुस्ल मुकम्मल हो जाए तो बेहतर यह है कि उसे उस हालत में लिटायें जिस तरह उसे नमाज़े जनाज़ा पढ़ाते वक़्त लिटाते हैं।
541. जो शख़्स जांकनी की हालत में हो उसे एहतियात की बिना पर रूबक़िब्ला लिटाना हर मुसलमान पर वाजिब है लिहाज़ा वह शख़्स जो जांकनी की हालत में है राज़ी हो और फिर क़ासिर भी हो (यानी बालिग़ और आक़िल हो) तो इस काम के लिये उसके वली से इजाज़त लेना ज़रूरी नहीं है। इसके अलावा किसी दूसरी सूरत में उसके वली से इजाज़त लेना एहतियात की बिना पर ज़रूरी है।
542. मुस्तहब है कि जो शख़्स जांकनी की हालत में हो उसके सामने शहादतैन, बारह इमामों के नाम और दूसरे दीनी अक़ाइद इस तरह दुहरायें जायें कि वह समझ ले। और उसकी मौत के वक़्त तक इन चीज़ों की तकरार करना भी मुस्तहब है।
543. मुस्तहब है कि जो शख़्स जांकनी की हालत में हो उसे मुन्दरिजः ज़ैल दुआ इस तरह सुनाई जाए कि वह समझ लेः-
अल्लाहुम्मग़् फ़िरलियल कसीरा मिंम्मआसीका
वक़्बल मिन्निन यसीरा मिन तआतिका या मैय्यंक् बलुल
यसीरा व यअफ़ु अनिल कसीरा इक़्बल
मिन्निल यसीरा वअफ़ु अन्निल कसीरा इन्नका
अन्तल अफ़ुव्वुल ग़फ़ूरो अल्लाहुम्मर्हमूनी
फ़ इन्नका रहीमुन।
544. किसी की जान सख़्ती से निकल रही हो तो अगर उसे तक्लीफ़ न हो तो उसे उस जगह ले जाना जहां वह नमाज़ पढ़ा करता था मुस्तहब है।
545. जो शख़्स जांकनी के आलम में हो उसकी आसानी के लिये (यानी इस मक़्सद से कि उसकी जान आसानी से निकल जाए) उसके सिरहाने सूरा ए यासीन, सूरा ए सफ़्फ़ात, सूरा ए अहज़ाब, आयतुल कुर्सी और सूरा ए एराफ़ की 54 वीं आयत और सूरा ए बक़रा की आख़री तीन आयत का पढ़ना मुस्तहब है बल्कि क़ुरआने मजीद जितना भी पढ़ा जा सके पढ़ा जाए.
546. जो शख़्स जांकनी के आलम में हो उसे तन्हा छोड़ना और कोई भारी चीज़ उसके पेट पर रखना और जुनुब और हाइज़ का उसके क़रीब होना इसी तरह उसके पास ज़्यादा बातें करना, रोना और सिर्फ़ औरतों को छोड़ना मकरूह है।
मरने के बाद के अहकाम
547. मुस्तहब है कि मरने के बाद मैयित के आंखे और होट बन्द कर दिये जाएं और उसकी ठोड़ी को बांध दिया जाए नीज़ उसके हाथ और पांव सीधे कर दिये जाएं और उसके ऊपर कपड़ा डाल दिया जाए। और अगर मौत रात को वाक़े हो तो जहां मौत वाक़े हुई हो वहां चिराग़ जलाये (रौशनी कर दे) और जनाज़े में शिरकत के लिये मोमिनीन को इत्तिलाअ दे और मैयित को दफ़्न करने में जल्दी करे। लेकिन अगर उस शख़्स के मरने का यक़ीन न हो तो इन्तिज़ार करे ताकि सूरते हाल वाज़ेह हो जाए। अलावा अज़ीं अगर मैयित हामिला हो और बच्चा उसके पेट में ज़िन्दा हो तो ज़रूरी है कि दफ़्न करने में इतना तवक़्क़ुफ़ करें कि उसका पहलू चाक कर के बच्चा बाहर निकाल लें और फिर उस पहलू को सी दें।
ग़ुस्ल, कफ़न, नमाज़ और दफ़्न का वुजूब
548. किसी मुसलमान का ग़ुस्ल, हुनूत, कफ़न, नमाज़े मैयित और दफ़्न ख़्वाह वह इसना अशरी शीअः न भी हो उसके वली पर वाजिब है। ज़रूरी है कि वली खुद इन कामों को अंजाम दे या किसी दूसरे को इन कामों के लिये मुअय्यन करे और अगर कोई शख़्स इन कामों को वली की इजाज़त से अंजाम दे तो वली पर से वुजूब साक़ित हो जाता है बल्कि दफ़्न और उसकी मानिन्द दूसरे उमूर को कोई शख़्स वली की इजाज़त के बग़ैर अंजाम दे तब भी वली से वुजूब साक़ित हो जाता है और इन उमूर को दोबार अंजाम देने की ज़रूरत नहीं और अगर मैयित का कोई वली न हो या वली उन कामों को अंजाम देने से मनाअ करे तब भी बाक़ी मुकल्लफ़ लोगों पर वाजिबे किफ़ाई है कि मैयित के इन कामों को अंजाम दे और अगर बाज़ मुकल्लफ़ लोगों ने अंजाम दिया तो दूसरों पर से वुज़ूब साक़ित हो जाता है। चुनांचे अगर कोई भी अंजाम न दे तो तमाम मुकल्लफ़ लोग गुनाहगार होगें और वली के मनअ करने की सूरत में उससे इजाज़त लेने की शर्त ख़त्म हो जाती है।
549. अगर कोई शख़्स तज्हीज़ो तक्फ़ीन के कामों में मशग़ूल हो जाए तो दूसरों के लिये इस बारे में कोई इक़्दाम करना वाजिब नहीं लेकिन अगर वह इन कामों को अधूरा छोड़ दें तो ज़रूरी है कि दूसरे इन्हें पायए तक्मील तक पहुंचायें।
550. अगर किसी शख़्स को इत्मीनान हो कि दूसरा मैयित को (नहलाने, कफ़्नाने और दफ़्नाने) के कामों में मशग़ूल है तो उस पर वाजिब नहीं है कि मैयित के (मुतज़क्किरा) कामों में के बारे में इक़्दाम करे लेकिन अगर उसे (मुतज़क्किरा कामों के न होने का) महज़ शक या गुमान हो तो ज़रूरी है कि इक़्दाम करे।
551. अगर किसी शख़्स को मालूम हो कि मैयित का ग़ुस्ल या कफ़न या नमाज़ या दफ़्न ग़लत तरीक़े से हुआ है तो ज़रूरी है कि इन कामों को दोबारा अंजाम दे। लेकिन अगर उसे बातिल होने का गुमान हो (यानी यक़ीन न हो) या शक हो कि दुरूस्त था या नहीं तो फिर इस बारे में कोई इक़्दाम करना ज़रूरी नहीं।
552. औरत का वली उसका शौहर है और औरत के अलावा वह अश्ख़ास कि जिनको मैयित से मीरास मिलती है उसी तरतीब से जिसका ज़िक्र मीरास के मुख़तिलफ़ तब्क़ों में आयेगा, दूसरों पर मुक़द्दम है । मैयित का बाप मैयित के बेटे पर, और मैयित का दादा उसके भाई पर, और मैयित का पदरी व मादरी भाई उसके सिर्फ़ पदरी भाई या मादरी भाई पर, और उसका पदरी भाई उसके मादरी भाई पर, और उसके चाचा उसके मामू पर मुक़द्दम होने में इश्क़ाल है। चुनांचे इस सिलसिले में एहतियात के (तमाम) तक़ाज़ों को पेशे नज़र रखना चाहिये।
553. नाबालिग़ बच्चा और दीवाना मैयित के कामों को अंजाम देने के लिये वली नहीं बन सकते और बिल्कुल इसी तरह वह शख़्स भी जो ग़ैर हाज़िर हो वह ख़ुद या किसी शख़्स को मामूर कर के मैयित से मुतअल्लिक़ उमूर को अंजाम न दे सकता हो तो वह भी वली नहीं बन सकता।
554. अगर कोई शख़्स कहे कि मैं मैयित का वली हूँ या मैयित के वली ने मुझे इजाज़त दी है कि मैयित के ग़ुस्ल, कफ़्न व दफ़्न को अंजाम दूं या कहे कि मैं मैयित के दफ़्न से मुतअल्लिक़ कामों में मैयित का वली हूं और उसके कहने में इत्मीनान हासिल हो जाए या मैयित उसके तसर्रूफ़ में हो या दो आदिल शख़्स गवाही दें तो उसका क़ौल क़बूल कर लेना चाहिये।
555. अगर मरने वाला अपने ग़ुस्ल, कफ़्न, दफ़्न और नमाज़ के लिये अपने वली के अलावा किसी और को मुक़र्र करे तो इन उमूर की विलायत उसी शख़्स के हाथ में है और यह ज़रूरी नहीं कि जिस शख़्स को मैयित ने वसीयत की हो कि वह ख़ुद इन कामों को अंजाम देने का ज़िम्मेदार बने और इस वसीयत को क़बूल करे लेकिन अगर क़बूल कर ले तो ज़रूरी है कि उस पर अमल करे।
ग़ुस्ले मैयित की कैफ़ीयत
556. मैयित को तीन ग़ुस्ल देने वाजिब हैः- पहला ऐसे पानी से जिसमें बेरी के पत्ते मिलें हुए हों, दूसरा ऐसे पानी से जिसमें काफ़ूर मिला हुआ हो और तीसरा ख़ालिस पानी से।
557. ज़रूरी है कि बेरी और काफ़ूर न इस क़द्र ज़्यादा हों कि पानी मुज़ाफ़ हो जाए और न इस क़द्र कम हो कि यह न कहा जा सके कि बेरी और काफ़ूर उस पानी में नहीं मिलाए गए हैं।
558. अगर बेरी और काफ़ूर इतनी मिक़्दार में न मिल सकें जितनी की ज़रूरी है तो एहतियाते मुस्तहब की बिना पर जितनी मिक़्दार मुयस्सर आए पानी में डाल दी जाए।
559. अगर कोई शख़्स एहराम की हालत में मर जाए तो उसे काफ़ूर के पानी से ग़ुस्ल नहीं देना चाहिये बल्कि उसके बजाए ख़ालीस पानी से ग़ुस्ल देना चाहिये लेकिन अगर वह हज्जे तमत्तो का एहराम हो और वह तवाफ़ और तवाफ़ की नमाज़ और सई को मुकम्मल कर चुका हो या हज्जे क़िरान या इफ़राद के एहराम में हो और सर मुंडा चुका हो तो इन दो सूरतों में उसको काफ़ूर के पानी से ग़ुस्ल देना ज़रूरी है।
560. अगर बेरी या काफ़ूर या उनमें से कोई एक न मिल सके या उसका इस्तेमाल जाइज़ न हो मसलन यह कि ग़स्बी हो तो एहतियात की बिना पर ज़रूरी है कि उनमें से हर उस चीज़ के बजाए जिसका मिलना मुम्किन न हो मैयित को ख़ालिस पानी से ग़ुस्ल दिया जाए और एक तयम्मुम भी कराया जाए।
561. जो शख़्स मैयित को ग़ुस्ल दे ज़रूरी है कि वह अक़्लमन्द और मुसलमान हो और क़ौले मश्हूर की बिना पर ज़रूरी है कि वह इसना अशरी हो और ग़ुस्ल के मसाइल से भी वाक़िफ़ हो और ज़ाहिर यह है कि जो बच्चा अच्छे और बुरे की तमीज़ रखता हो अगर वह ग़ुस्ल को सहीह तरीक़े से अंजाम दे सकता हो तो उसका ग़ुस्ल देना भी काफ़ी है । चुनांचे अगर इसना अशरी मुसलमान की मैयित को उसके हम मज़्हब के मुताबिक़ ग़ुस्ल दे तो मोमिने इसना अशरी से ज़िम्मेदारी साक़ित हो जाती है । लेकिन वह इस्ना अशरी शख़्स मैयित का वली हो तो उस सूरत में ज़िम्मेदारी उससे साक़ित नहीं होती।
562. जो शख़्स ग़ुस्ल दे ज़रूरी है कि वह क़ुर्बत की नीयत रखता हो यानी अल्लाह तआला की ख़ुशनूदी के लिये ग़ुस्ल दे।
563. मुसलमान के बच्चे को ख़्वाह वह वलदुज़्ज़िना ही क्यों न हो ग़ुस्ल देना वाजिब है और काफ़िर और उसकी औलाद का ग़ुस्लो कफ़न और दफ़्न शरीअत में नहीं है। और जो शख़्स बचपन से दीवाना हो और दीवानगी की हालत में बालिग़ हो जाए अगर वह इस्लाम के हुक्म हो तो ज़रूरी है कि उसे ग़ुस्ल दें।
564. अगर एक बच्चा चार महीने या उससे ज़्यादा का होकर साक़ित हो जाए तो उसे ग़ुस्ल देना ज़रूरी है बल्कि अगर चार महीने से भी कम का हो लेकिन उसका पूरा बदन बन चुका हो दो एहतियात की बिना पर उसको ग़ुस्ल देना ज़रूरी है। इन दो सूरतों के अलावा एहतियात की बिना पर उसे कपड़े में लपेट कर बग़ैर ग़ुस्ल दिये दफ़्न कर देना चाहिये।
565. मर्द औरत को ग़ुस्ल नहीं दे सकता, इसी तरह औरत मर्द को ग़ुस्ल नही दे सकती। लेकिन बीवी अपने शौहर को ग़ुस्ल दे सकती है और शौहर भी अपनी बीवी को ग़ुस्ल दे सकता है अगरचे एहतियाते मुस्तहब यह है कि बीवी अपने शौहर को और शौहर अपनी बीवी को हालते इख़्तियार में ग़ुस्ल न दे।
566. मर्द इतनी छोटी लड़की को ग़ुस्ल दे सकता है जो मुमैयज़ न हो और औरत भी इतने छोटे लड़के को ग़ुस्ल दे सकती है जो मुमैयज़ न हो।
567. अगर मर्द की मैयित को ग़ुस्ल देने के लिये मर्द न मिल सके तो वह औरतें जो उसकी क़राबतदार और महरम हों मसलन मां बहन फुफी और ख़ाला या वह औरतें जो रिज़ाअत या निकाह के सबब से उसकी महरम हो गई हों उसे ग़ुस्ल दे सकती हैं, और इसी तरह अगर औरत की मैयित को ग़ुस्ल देने के लिये कोई और औरत न हो तो जो मर्द उसके क़राबतदार और महरम हों या रिज़ाअत या निकाह के सबब से उसके महरम हो गए हों उसे ग़ुस्ल दे सकते हैं। दोनों सूरतों में लिबास के नीचे से ग़ुस्ल देना ज़रूरी नहीं है अगरचे इस तरह ग़ुस्ल देना अहवत है सिवाय शर्मगाह के (जिन्हें लिबास के नीचे ही से ग़ुस्ल देना चाहिये)।
568. अगर मैयित और ग़स्साल दोनों मर्द हों या दोनों औरत हों तो जाइज़ है कि शर्मगाह के अलावा मैयित का बाक़ी बदन बरहना हो लेकिन बेहतर यह है कि लिबास के नीचे से ग़ुस्ल दिया जाए।
569. मैयित की शर्मगाह पर नज़र डालना हराम है और जो शख़्स उसे ग़ुस्ल दे रहा हो अगर वह उस पर नज़र डाले तो गुनाहगार है लेकिन उससे ग़ुस्ल बातिल नहीं होता।
570. अगर मैयित के बदन के किसी हिस्से पर ऐने नजासत हो तो ज़रूरी है कि उस हिस्से को ग़ुस्ल देने से पहले ऐने नजासत दूर करे और औला यह है कि ग़ुस्ल शूरू करने से पहले मैयित का तमाम बदन पाक हो।
571. ग़ुस्ले मैयित ग़ुस्ले जनाबत की तरह है और एहतियाते वाजिब यह है कि जब तक मैयित को ग़ुस्ले तरतीबी मुम्किन हो ग़ुस्ले इरतिमासी न दिया जाए और ग़ुस्ले तरतीबी में भी ज़रूरी है कि दाहिनी तरफ़ को बाई तरफ़ से पहले धोया जाए और अगर मुम्किन हो तो एहतियाते मुस्तहब की बिना पर बदन के तीनों हिस्सों में से किसी हिस्से को पानी में न डुबोया जाए बल्कि पानी उसके ऊपर डाला जाए।
572. जो शख़्स हैज़ या जनाबत की हालत में मर जाए उसे ग़ुस्ले हैज़ या ग़ुस्ले जनाबत देना ज़रूरी नहीं ह बल्कि सिर्फ़ ग़ुस्ले मैयित उसके लिये काफ़ी है।
573. मैयित को ग़ुस्ल देने की उजरत लेना एहतियात की बिना पर हराम है और अगर कोई शख़्स उजरत लेने के लिये मैयित को इस तरह ग़ुस्ल दे कि यह ग़ुस्ल देना क़स्दे क़ुर्बत के मनाफ़ी हो तो ग़ुस्ल बातिल है लेकिन ग़ुस्ल के इब्तिदाई कामों की उजरत लेना हराम नहीं है।
574. मैयित के ग़ुस्ल में ग़ुस्ले जबीरा जाइज़ नहीं है और अगर पानी मुयस्सर न हो या उसके इस्तिमाल में कोई अम्र माने हो तो ज़रूरी है कि ग़ुस्ल के बदले मैयित को एक तयम्मुम कराए और एहतियाते मुस्तहब यह है कि तीन तयम्मुम कराए जायें और उन तीन तयम्मुम में से एक में माफ़िज़्ज़िम्मा की नीयत करे यानी जो शख़्स तयम्मुम करा रहा हो यह नीयत करे कि यह तयम्मुम उस शरई ज़िम्मेदारी को अंजाम देने के लिये करा रहा हूं जो मुझ पर वाजिब है।
575. जो शख़्स मैयित को तयम्मुम करा रहा हो उसे चाहिये कि अपने हाथ ज़मीन पर मारे और मैयित के चेहरे और हाथों की पुश्त पर फेरे और एहतियाते वाजिब यह है कि अगर मुम्किन हो तो मैयित को उसके अपने हाथों से भी तयम्मुम कराए।
कफ़न के अहकाम
576. मुसलमान मैयित को तीन कपड़ों का कफ़न देना ज़रूरी है जिन्हें लुंग, कुर्ता और चादर कहा जाता है।
577. एहतियात की बिना पर ज़रूरी है कि लुंग ऐसी हो जो नाफ़ से घुटनों तक बदन के अतराफ़ को ढांप ले और बेहतर यह है कि सीने से पांव तक पहुंचे और (कुर्ता या) पेराहन एहतियात की बिना पर ऐसा हो कि कंधों के सिरों से आधी पिन्डलियों तक तमाम बदन को ढांपे और बेहतर यह है कि पांव तक पहुंचे और चादर की लम्बाई इतनी होनी चाहिये कि पूरे बदन को ढांप दे और एहतियात यह है कि चादर कि लम्बाई इतनी होनी चाहिये के मैयित के पांव और सर की तरफ़ से गिरह दे सकें और उसकी चौड़ाई इतनी होनी चाहिये कि उसका एक किनारा दूसरे किनारे पर आ सके।
578. लुंग की इतनी मिक़्दार जो नाफ़ से घुटनों तक के हिस्से को ढांप ले और (कुर्ते या) पैराहन की इतनी मिक़्दार जो कंधे से निस्फ़ पिन्डली तक ढांप ले कफ़न के लिये वाजिब है और उस मिक़्दार से ज़्यादा जो कुछ साबिकः मस्अले में बताया गया है वह कफ़न की मुस्तहब मिक़्दार है।
579. वाजिब मिक़्दार की हद तक कफ़न जिसका ज़िक्र साबिक़ः मस्अले में हो चुका है मैयित के अस्ल माल से लिया जाता है और ज़ाहिर यह है कि मुस्तहब मिक़्दार की हद तक कफ़न मैयित की शान और उर्फ़े आम को पेशे नज़र रखते हुए मैयित के अस्ल माल से लिया जाए अगरचे एहतियाते मुस्तहब यह है कि वाजिब मिक़्दार से ज़ायद कफ़न उन वारिसों के हिस्से से न लिया जाए जो अभी बालिग़ न हुए हों।
580. अगर किसी शख़्स ने वसीयत की हो कि मुस्तहब कफ़न की मिक़्दार जिसका ज़िक्र दो साबिक़ः मसाइल में आ चुका है उसके तिहाई माल से ली जाए या यह वसीयत की हो कि उसका तिहाई माल खुद उस पर ख़र्च किया जाए लेकिन उसके मस्रफ़ का तअय्युन न किया हो या सिर्फ़ उसके कुछ हिस्से के मस्रफ़ का तअय्युन किया हो तो मुस्तहब कफ़न उसके तिहाई माल से लिया जा सकता है।
581. अगर मरने वाले ने यह वसीयत न की हो कि कफ़न उसके तिहाई माल से लिया जाए और मुतअल्लिक़ा अश्ख़ास चाहें कि उसके अस्ल माल से लें तो जो बयान मस्अला 579 में ग़ुज़र चुका है उससे ज़्यादा न लें। मसलन वह मुस्तहब काम जो मअमूलन अंजाम न दिये जाते हों और जो मैयित की शान के मुताबिक़ भी न हों तो उनकी अदायगी के लिये हरगिज़ अस्ल माल से न लें और बिल्कुन इसी तरह अगर कफ़न मअमूल से ज़्यादा क़ीमती हो तो इज़ाफ़ी रक़म को मैयित के अस्ल माल से नहीं लेना चाहिये लेकिन जो वरसा बालिग़ है अगर वह अपने हिस्से से लेने की इजाज़त दें तो जिस हद तक वह लोग इजाज़त दें उनके हिस्से से लिया जा सकता है।
582. औरत के कफ़न की ज़िम्मेदारी शौहर पर है ख़्वाह वह अपना माल भी रखती हो इसी तरह अगर औरत को उस तफ़्सील के मुताबिक़ जो तलाक़ के अहकाम में आयेगी तलाक़े रजई दी गई हो और इद्दत ख़त्म होने से पहले मर जाए तो शौहर के लिये ज़रूरी है कि उसे कफ़न दे और अगर शौहर बालिग़ न हो या दीवाना हो तो शौहर के वली को चाहिये कि उसके माल से औरत को कफ़न दे।
583. मैयित को कफ़न देना उसके क़राबतदारों पर वाजिब नहीं गो उसकी ज़िन्दगी में अख़राजात की कफ़ालत उन पर वाजिब रही हो।
584. एहतियात यह है कि कफ़न के तीनों कपड़ों में से हर एक कपड़ा इतना बारीक न हो कि मैयित का बदन उसके नीचे से नज़र आए लेकिन अगर इस तरह हो कि तीनों कपड़ों को मिलाकर मैयित का बदन उसके नीचे से नज़र न आए तो बिनाबर अक़्वा काफ़ी है।
585. ग़स्ब की गई चीज़ का कफ़न देना ख़्वाह कोई दूसरी चीज़ मुयस्सर न हो तब भी जाइज़ नहीं है पस अगर मैयित का कफ़न ग़स्बी हो और उसका मालिक राज़ी न हो तो वह कफ़न उसके बदन से उतार लेना चाहिये। ख़्वाह उसको दफ़्न भी किया जा चुका हो लेकिन बाज़ सूरतों में (उसके बदन से कफ़न उतारना जाइज़ नहीं) जिसकी तफ़्सील की गुंजाइश इस मक़ाम पर नहीं है।
586. मैयित को नजिस चीज़ या ख़ालिस रेशमी कपड़े का कफ़न देना (जाइज़ नहीं) और एहतियात की बिना पर सोने के पानी से काम किये हुए कपड़े का कफ़न देना (भी) जाइज़ नहीं लेकिन मजबूरी की हालत में कोई हरज नहीं है।
587. मैयित को नजिस मुर्दार की खाल का कफ़न देना इख़्तियारी हालत में जाइज़ नहीं है बल्कि पाक मुर्दार की खाल का कफ़न देना भी जाइज़ नहीं है। और एहतियात की बिना पर किसी ऐसे कपड़े का कफ़न देना जो रेशमी हो या उस जानवर की ऊन से तैयार किया गया हो जिसका गोश्त खाना हराम हो इख़्तियारी हालत में जाइज़ नहीं है। लेकिन अगर कफ़न हलाल गोश्त जानवर की खाल या बाल और ऊन का हो तो कोई हरज नहीं अगरचे एहतियाते मुस्तहब यह है कि इन दोनों चीज़ों का भी कफ़न न दिया जाए।
588. अगर मैयित का कफ़न उसकी अपनी नजासत या किसी दूसरी नजासत से नजिस हो जाए और अगर ऐसा करने से कफ़न ज़ाए न होता हो तो जितना हिस्सा नजिस हुआ है उसे धोना या काटना ज़रूरी है ख़्वाहा मैयित को क़ब्र में ही क्यों न उतारा जा चुका हो। और अगर उसका धोना या काटना मुम्किन न हो लेकिन बदल देना मुम्किन हो तो ज़रूरी है कि बदल दें।
589. अगर कोई ऐसा शख़्स मर जाए जिसने हज या उमरे का एहराम बांध रखा हो तो उस दूसरों की तरह कफ़न पहनाना ज़रूरी है और उसका सर और चेहरा ढांप देने में कोई हरज नहीं।
590. इंसान का अपनी ज़िन्दगी में कफ़न, बेरी और काफ़ूर का तैयार रखना मुस्तहब है।
हनूत के अहकाम
591. ग़ुस्ल देने के बाद वाजिब है कि मैयित को हनूत किया जाए यानी उसकी पेशानी, दोनों हथेलियों, दोनों घुटनों और दोनों पांव के अंगूठों पर काफ़ूर इस तरह मला जाए कि काफ़ूर उस पर बाक़ी रहे ख़्वाह कुछ काफ़ूर बग़ैर मले बाक़ी बचे और मुस्तहब यह है कि मैयित की नाक पर भी काफ़ूर मला जाए। काफ़ूर पिसा हुआ और ताज़ा होना चाहिये और अगर पुराना होने की वजह से उसकी ख़ुशबू ज़ाइल हो गई हो तो काफ़ी नहीं।
592. एहतियाते मुस्तहब यह है कि काफ़ूर पहले मैयित के पेशानी पर मला जाए। लेकिन दूसरे मक़ामात पर मलने में तरतीब ज़रूरी नहीं है।
593. बेहतर यह है कि मैयित को कफ़न पहनाने से पहले हनूत किया जाए। अगरचे कफ़न पहनाने के दौरान या उसके बाद भी हनूनत करें तो कोई हरज नहीं है।
594. अगर कोई ऐसा शख़्स मर जाए जिसने हज या उमरे के लिये एहराम बांध रखा हो तो उसे हनूत करना जाइज़ नहीं है मगर उन दो सूरतों में (जाइज़ है) जिनका ज़िक्र मस्अला 559 में गुज़र चुका है।
595. ऐसी औरत जिसका शौहर मर गया हो और अभी इद्दत बाक़ी हो अगरचे ख़ुशबू लगाना उसके लिये हराम है लेकिन अगर वह मर जाए तो उसे हनूत करना वाजिब है।
596. एहतियाते मुस्तहब यह है कि मैयित को मुश्क, अंबर (ऊद) और दूसरी ख़ुशबूयें न लगाई जायें और उन्हें काफ़ूर के साथ भी न मिलाया जाए।
597. मुस्तहब है कि सैयिदुश्शुहदा इमाम हुसैन (अ0) की क़ब्रे मुबारक की मिट्टी (ख़ाके शिफ़ा) की कुछ मिक़्दार काफ़ूर में मिला ली जाए लेकिन उस काफ़ूर को ऐसे मक़ामात पर नहीं लगाना चाहिये जहां लगाने से ख़ाके शिफ़ा की बे हुर्मती हो और यह भी ज़रूरी है कि जब वह काफ़ूर के साथ मिल जाए तो उसे काफ़ूर न कहा जा सके।
598. अगर काफ़ूर न मिल सके या फ़क़त ग़ुस्ल के लिये काफ़ी हो तो हनूत करना ज़रूरी नहीं और अगर ग़ुस्ल की ज़रूरत से ज़्यादा हो लेकिन तमाम सात अअज़ा के लिये काफ़ी न हो तो एहतियाते मुस्तहब की बिना पर चाहिये कि पहले पेशानी पर और अगर बच जाए तो दूसरे मक़ामात पर मला जाए।
599. मुस्तहब है कि (दरख्त की) दो तरोताज़ा टहनियां मैयित के साथ क़ब्र में रखी जायें।
नमाज़े मैयित के अहकाम
600. हर मुसलमान की मैयित पर और ऐसे बच्चे की मैयित पर जो इस्लाम के हुक्म में हो और पूरे छः साल का हो चुका हो नमाज़ पढ़ना वाजिब है।
601. एक ऐसे बच्चे की मैयित पर जो छः साल का न हुआ हो लेकिन नमाज़ को जानता हो एहतियाते लाज़िम की बिना पर नमाज़ पढ़ना चाहिये और अगर नमाज़ को न जानता हो तो रजाअ की नीयत से नमाज़ पढ़ने में कोई हरज नहीं और वह बच्चा जो मुर्दा पैदा हुआ हो उसकी मैयित पर नमाज़ पढ़ना वाजिब नहीं है।
602. मैयित की नमाज़ – उसे ग़ुस्ल देने, हनूत करने और कफ़न पहनाने के बाद पढ़नी चाहिये और अगर इन उमूर से पहले या उनके दरमियान पढ़ी जाए तो ऐसा करना ख़्वाह भूल चूक या मस्अले से ला इल्मी की बिना पर ही क्यों न हो काफ़ी नहीं है।
603. जो शख़्स मैयित की नमाज़ पढ़नी चाहे उसके लिये ज़रूरी नहीं कि उसने वुज़ू, ग़ुस्ल या तयम्मुम कर रखा हो और उसका बदन और लिबास पाक हो और अगर उसका लिबास ग़स्बी हो तब भी कोई हरज नहीं। अगरचे बेहतर यह है कि उन चीज़ों का ख़्याल रखे जो दूसरी नमाज़ों में लाज़िमी हैं।
604. जो शख़्स नमाज़े मैयित पढ़ रहा हो उसे चाहिये कि रू ब-क़िब्ला हो और यह भी वाजिब है कि मैयित को नमाज़ पढ़ने वाले के सामने पुश्त के बल यूं लिटाया जाए कि मैयित का सर नमाज़ पढ़ने वाले के दाईं तरफ़ हो और पांव बाई तरफ़ हों।
605. एहतियाते मुस्तहब की बिना पर ज़रूरी है कि जिस जगह एक शख़्स मैयित की नमाज़ पढ़े वह ग़स्बी न हो और यह भी ज़रूरी है कि नमाज़ पढ़ने की जगह मैयित के मक़ाम से ऊंची न हो लेकिन मअमूली पस्ती या बलन्दी में कोई हरज नहीं।
606. नमाज़ पढ़ने वाले को चाहिये कि मैयित से दूर न हो लेकिन जो शख़्स नमाज़े मैयित बा जमाअत पढ़ रहा हो अगर वह मैयित से दूर हो जबकि सफ़े बाहम मुत्तसिल हों तो कोई हरज नहीं।
607. नमाज़ पढ़ने वाले को चाहिये कि मैयित के सामने खड़ा हो लेकिन अगर नमाज़ बा जमाअत पढ़ी जाए और जमाअत की सफ़ मैयित के दोनों तरफ़ से गुज़र जाए तो उन दोनों की नमाज़ में जो मैयित के सामने न हों कोई इशक़ाल नहीं है।
608. एहतियात की बिना पर मैयित और नमाज़ पढ़ने वाले के दरमियान पर्दा या दीवार या कोई और ऐसी चीज़ हाइल नहीं होनी चाहिये लेकिन अगर मैयित ताबूत में या ऐसी ही किसी और चीज़ में रखी हो तो कोई हरज नहीं।
609. नमाज़ पढ़ते वक़्त ज़रूरी है कि मैयित की शर्मगाह ढकी हुई हो। और अगर उसे कफ़न पहनाना मुम्किन न हो तो ज़रूरी है कि उसकी शर्मगाह को लकड़ी या ईंट या ऐसी ही किसी और चीज़ से ढांक दें।
610. नमाज़ मैयित खड़े होकर और क़ुर्बत की नीयत से पढ़नी चाहिये और नीयत करते वक़्त मैयित को मुअय्यम कर लेना चाहिये मसलन नीयत करनी चाहिये कि इस मैयित पर क़ुर्बतन इलल्लाह नमाज़ पढ़ रहा हूं।
611. अगर कोई शख़्स खड़े होकर नमाज़े मैयित न पढ़ सकता हो तो बैठ कर पढ़ ले।
612. अगर मरने वाले ने वसीयत की हो कि कोई मखसूस शख़्स उसकी नमाज़ पढ़ाए तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि वह शख़्स मैयित के वली से इजाज़त हासिल करे।
613. मैयित पर कई दफ़ा नमाज़ पढ़ना मकरूह है लेकिन अगर मैयित किसी साहबे इल्म व तक़्वा की हो तो मकरूह नहीं है।
614. अगर मैयित को जान बूझ कर या भूल चूक की वजह से या किसी उज़्र की बिना पर बग़ैर नमाज़ पढ़े दफ़्त कर दिया जाए या दफ़्न कर देने के बाद पता चले कि जो नमाज़ उस पर पढ़ी जा चुकी है वह बातिल है तो मैयित पर नमाज़ पढ़ने के लिये उसकी क़ब्र को खोलना जाइज़ नहीं लेकिन जब तक उसका बदन पाश पाश न हो जाए और जिन शराइत का नमाज़े मैयित के सिलसिले में ज़िक्र आ चुका है उनके साथ रजाअ की से उसकी क़ब्र पर नमाज़ पढ़ने में कोई हरज नहीं है।
नमाज़े मैयित का तरीक़ा
615. मैयित की नमाज़ में पांच तक्बीरे हैं और अगर नमाज़ पढ़ने वाला शख़्स मुन्दरिजए ज़ैल तरतीब के साथ पांच तक्बीरें कहे तो काफ़ी है।
नीयत करने और पहली तक्बीर पढ़ने के बाद कहेः
अश्हदु अल्लाइलाहा इल्लल्लाहो व अश्हदु अन्ना मोहम्मदन रसूलुल्लाह –
और दूसरी तक्बीर के बाद कहेः
अल्लाहुम्मा स्वल्ले अला मोहम्मदिन व आले मोहम्मदिन
और तीसरी तक्बीर के बाद कहेः
अल्लाहुम्मग़्फ़िर लिलमोमिनीना वल मोमिनाते
और चौथी तक्बीर के बाद अगर मैयित मर्द हो तो कहे –
अल्लाहुम्मग़्फ़िर ले हाज़ल मैयित
और अगर मैयित औरत हो तो कहे –
अल्लाहुम्मग़्फ़िर ले हाज़िहिल मैयित –
और उसके बाद पांचवीं तक्बीर पढ़े ।
और बेहतर यह है कि पहली तक्बीर के बाद कहेः अश्हदु अल्लाइलाहा इल्लल्लाहो वह्दहू ला शरीका लहू व अश्हदो अन्ना मोहम्मदन व अब्दुहू व रसूलुहू अर्सलहू बिलहक़्क़े बशीरों व नज़ीरम् बैना यदैइस्सअते।
और दूसरी तक्बीर के बाद कहेः अल्लाहुम्मा स्वल्ले अला मोहम्मदिंव व आले मोहम्मदिंव व बारिक अला मोहम्मदिंव व आले मोहम्मदिंव वरहम मोहम्मदों व अला मोहम्मदिन कअफ़्ज़ले मा सल्लैता व बारक्ता व तरह्हम्ता अला इब्राहीमा व आले इब्राहीमा इन्नका हमीदुम्मजीद व स्वल्ले अला जमीइल अंबियाए वल मुर्सलीना वश्शुहदाए वस्सिद्दीक़ीना व जमीए इबादिल्लाहिस स्वालेहीना।
और तीसरी तक्बीर के बाद कहेः अल्लाहुम्मग़्फ़िर लिल मोमिनीना वल मोमिनाते वल मुस्लिमीना वल मुसलिमाते अलअहयाए मिनहुम वल अम्वाते ताबेए बैनना व बैनहुम बिल ख़ैराते इन्नका मुजीबुद दअवाते इन्नका अला कुल्ले शयइन क़दीरून।
और अगर मैयित मर्द हो तो चौथी तक्बीर के बाद कहेः
अल्लाहुम्मा इन्ना हाज़ा अब्दुका वब्नो अब्दिका वब्ना अमतिका नज़ला बिका व अन्ता ख़ैरो मज़ूलिम बिही, अल्लाहुम्मा इन्ना ला नअलमो मिन्हो इल्ला खैरा व अन्ता अअलमो बिही मिन्ना अल्लाहुम्मा इनकाना मोह्सिन्न फ़ज़िद फ़ी एह्सानेही व इनकाना मुसीअन फ़तजावज़ अन्हो वग़्फ़िर लहू अल्लाहुम्मज अल्हो अन्दका फ़ी अअला इल्लीयीना वख्लुफ़ अला अहलिही फ़िल ग़ाबिरीना वर्हम्हो बेरहतमेका या अर्हमर्राहिमीना। उसके बाद पांचवी तक्बीर पढ़ेः – लेकिन अगर मैयित औरत हो तो चौथी तक्बीर के बाद कहेः- अल्लाहुम्मा इन्ना हाज़िही अमतुका वब्नतो अब्दिका वब्नतो अमतिका नज़लत बिका व अन्ता खैरो मंज़िलम बिही अल्लाहुम्मा इन्ना ला नअलमो मिन्हा इल्ला खैरा व अन्ता अअलमो बिहा मिन्ना अल्लाहुम्मा इन कानत मोहसिनतन फ़ज़िद फ़ी एह्सानिहा व इन कानत मुसीअतन फ़तजावज़ अन्हा वग़्फ़िर लहा अल्लाहुम्मज अल्हा इन्दका फ़ी अअला इल्लीयीना वख़लुफ़ अला अहलिहा फ़िल ग़ाबिरीना वर्हमहा बेरहमतिका या अर्हमर्राहिमीना।
616. तक्बीरें और दुआयें (तसलसुल के साथ) यके बाद दीगरे इस तरह पढ़नी चाहिये कि नमाज़ अपनी शक्ल न खो दे।
617. जो शख़्स मैयित की नमाज़ बा जमाअत पढ़ रहा हो ख़्वाह वह मुक्तदी ही हो उसे चाहिये कि उसकी दुआयें और तक्बीरें भी पढ़े।
नमाज़े मैयित के मुस्तहब्बात
618. चन्द चीज़े नमाज़े मैयित के लिये मुस्तहब हैः
1. जो शख़्स नमाज़े मैयित पढ़े वह वुज़ू, ग़ुस्ल या तयम्मुम करे। और एहतियात इसमें है कि तयम्मुम उस वक़्त करे जब वुज़ू और ग़ुस्ल करना मुम्किन न हो या उसे खद्शा हो कि अगर वुज़ू या ग़ुस्ल करेगा तो नमाज़ में शरीक न हो सकेगा।
2. अगर मैयित मर्द हो तो इमाम या जो शख़्स अकेला मैयित पर नमाज़ पढ़ रहा हो मैयित के शिकम के सामने खड़ा हो और अगर मैयित औरत हो तो उसके सीने के सामने खड़ा हो।
3. नमाज़ नंगे पांव पढ़ी जाए।
4. हर तक्बीर में हाथों को बलन्द किया जाए।
5. नमाज़ी और मैयित के दरमियान इतना कम फ़ासिला हो कि अगर नमाज़ी लिबास को हरकत दो तो वह जनाज़े को छू जाए।
6. नमाज़े मैयित जमाअत के साथ पढ़ी जाए।
7. इमाम तक्बीरें और दुआयें बलन्द आवाज़ से पढ़े और मुक़्तदी आहिस्ता पढ़ें।
8. नमाज़े ब जमाअत में मुक़्तदी ख़्वाह एक ही शख़्स क्यों न हो इमाम के पीछे खड़ा हो।
9. नमाज़ पढ़ने वाला मैयित और मोमिनीन के लिये कसरत से दुआ करे।
10. बा जमाअत नमाज़ से पहले तीन बार, अस्सलात कहे ।
11. नमाज़ ऐसी जगह पढ़ी जाए जहां नमाज़े मैयित के लिये लोग ज़ियादातर जाते हों।
12. अगर हाइज़ नमाज़े मैयित जमाअत के साथ पढ़े तो अकेली खड़ी हो और नमाज़ियों की सफ़ में न खड़ी हो।
619. नमाज़े मैयित मस्जिदों में पढ़ना मकरूह है लेकिन मसजिदुल हराम में पढ़ना मकरूह नहीं है।
दफ़्न के अहकाम
620. मैयित को इस तरह ज़मीन में दफ़्न करना वाजिब है कि उसकी बू बाहर न आए और दरिन्दे भी उसका बदन बाहर न निकाल सकें और अगर इस बात का ख़ौफ़ हो कि दरिन्दे उसका बदन बाहर निकाल लेंगे तो क़ब्र को ईटों वग़ैरा से पुख़्ता कर देना चाहिये।
621. अगर मैयित को ज़मीन में दफ़्न करना मुम्किन न हो तो दफ़्न करने के बजाए उसे कमरे या ताबूत में रखा जा सकता है।
622. मैयित को क़ब्र में दायें पहलू इस तरह लिटाना चाहिये के उसके बदन का सामने का हिस्सा रू बक़िब्ला हो।
623. अगर कोई शख़्स कश्ती में मर जाए और उसकी मैयित के ख़राब होने का इम्कान न हो और उसे कश्ती में रखने में भी कोई अम्र माने न हो तो लोगों को चाहिये कि इन्तिज़ार करें ताकि ख़ुश्की तक पहुंच जायें और उसे ज़मीन में दफ़्न कर दें वर्ना चाहिये की उसे कश्ती में ही ग़ुस्ल देकर हनूत करें और कफ़न पहनायें और नमाज़े मैयित पढ़ने के बाद उसे चटाई में रख कर उसका मुंह बन्द कर दें और समुंदर में डाल दें या कोई भारी चीज़ उसके पांव में बांधकर समुंदर में डाल दें और जहां तक मुम्किन हो उसे ऐसी जगह नहीं गिराना चाहिये जहां जानवर उसे फ़ौरन लुक़्मा बना लें।
624. अगर इस बात का ख़ौफ़ हो कि दुश्मन क़ब्र खोदकर मैयित का जिस्म बाहर निकाल लेगा और उसके कान या नाक या दूसरे अअज़ा काट लेगा तो अगर मुम्किन हो तो साबिक़ः मस्अले में बयान किये गए तरीक़े के मुताबिक़ उसे समुंदर में डाल देना चाहिये।
625. अगर मैयित को क़ब्र में डालना और उसकी क़ब्र को पुख़्ता करना ज़रूरी हो तो उसके अख़राजात मैयित के अस्ल माल से ले सकते हैं।
626. अगर कोई काफ़िर औरत मर जाए और उसके पेट में मरा हुआ बच्चा हो और उस बच्चे का बाप मुसलमान हो तो उस औरत को क़ब्र में बायें पहलू क़िब्ले की तरफ़ पीठ करके लिटाना चाहिये ताकि बच्चे का मुंह क़िब्ले की तरफ़ हो और अगर पेट में मौजूद बच्चे के बदन में अभी जान न पड़ी हो तब भी एहतियाते मुस्तहब की बिना पर यही हुक्म है।
627. मुसलमान को काफ़िरों के क़ब्रिस्तान में दफ़्न करना और काफ़िर को मुसलमानों के क़ब्रिस्तान में दफ़्न करना जाइज़ नहीं है।
628. मुसलमान को ऐसी जगह जहां उसकी बे हुर्मती होती हो मसलन जहां कूड़ा कर्कट और गंदगी फेंकी जाती हो दफ़्न करना जाइज़ नहीं है।
629. मैयित को ग़स्बी ज़मीन में या ऐसी ज़मीन में जो दफ़्न के अलावा किसी दूसरे मक्सद मसलन मस्जिद के लिये वक़्फ़ हो दफ़्न करना जाइज़ नहीं है।
630. किसी मैयित की क़ब्र को खोद कर किसी दूसरे मुर्दे को उस क़ब्र में दफ़्न करना जाइज़ नहीं लेकिन अगर क़ब्र पुरानी हो गई हो और पहली मैयित का निशान बाक़ी न रह गया हो तो दफ़्न कर सकते हैं।
631. जो चीज़ मैयित से जुदा हो जाए ख़्वाह वह उसके बाल, नाख़ुन या दांत ही हों उसे उसके साथ ही दफ़्न करना देना चाहिये और अगर जुदा होने वाली चीज़ें अगरचे वह दांत, नाखुन या बाल ही क्यों न हों मैयित को दफ़्नाने के बाद मिलें तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर उन्हें किसी दूसरी जगह दफ़्न कर देना चाहिये। और जो नाख़ुन और दांत इंसान की ज़िन्दगी में ही उससे जुदा हो जायें उन्हें दफ़्न करना मुस्तहब है।
632. अगर कोई शख़्स कुयें में मर जाए और उसे बाहर निकालना मुम्किन न हो तो चाहिये कि कुयें का मुंह बन्द कर दें और उस कुयें को ही उसकी क़ब्र क़रार दें।
633. अगर कोई बच्चा मां के पेट में मर जाए और उसका मां के पेट में रहना मां की ज़िन्दगी के लिये ख़तरनाक हो तो चाहिये की उसे आसान तरीक़े से बाहर निकालें। चुनांचे अगर उसे टुकड़े टुकड़े करने पर भी मजबूर हो तो ऐसा करने में कोई हरज नहीं लेकिन चाहिये की अगर उस औरत का शौहर अहले फ़न हो तो बच्चे को उसके ज़रिये बाहर निकालें और अगर यह मुम्किन न हो तो अहले फ़न औरत के ज़रिये से निकालें और अगर यह मुम्किन हो तो ऐसे महरम मर्द के ज़रिये निकालें जो अहले फ़न हो और अगर यह भी मुम्किन न हो तो न महरम मर्द जो अहले फ़न हो बच्चे को बाहर निकाले और अगर कोई ऐसा शख़्स भी मौजूद न हो तो फ़िर जो शख़्स अहले फ़न न हो वह भी बच्चे को बाहर निकाल सकता है।
634. अगर मां मर जाए और बच्चा उसके पेट में ज़िन्दा हो अगरचे उस बच्चे के ज़िन्दा रहने की उम्मीद न हो तब भी ज़रूरी है कि हर उस जगह को चाक करें जो बच्चे की सलामती के लिये बेहतर है और बच्चे को बाहर निकालें और फिर उस जगह को टांके लगा दें।
दफ़्न के मुस्तहब्बात
635. मुस्तहब है कि मुतअल्लिक़ा अश्ख़ास क़ब्र को एक मुतवस्सित इंसान के क़द के लगभग खोदें और मैयित को नज़दीक़ तरीन क़ब्रिस्तान में दफ़्न करें मासिवा इसके कि जो क़ब्रिस्तान दूर हो वह किसी वजह से बेहतर हो मसलन वहां नेक लोग दफ़्न किये गयें हों या ज़्यादा लोग वहां फ़ातिहा पढ़ने जाते हों। यह भी मुस्तहब है कि जनाज़ा क़ब्र से चन्द ग़ज़ दूर ज़मीन पर रख दें और तीन दफ़्आ कर के थोड़ा थोड़ा क़ब्र के नज़दीक़ ले जायें और हर दफ़्आ ज़मीन पर रखें और फिर उठायें और चौथी दफ़्आ क़ब्र मे उतार दें और अगर मैयित मर्द हो तो तीसरी दफ़्आ ज़मीन पर इस तरह रखें कि उसका सर क़ब्र की निचली तरफ़ हों और चौथी दफ़्आ सर की तरफ़ से क़ब्र में उतार दें और क़ब्र में उतार ते वक़्त एक कपड़ा क़ब्र के ऊपर तान लें। यह भी मुस्तहब है कि जनाज़ा बड़े आराम के साथ ताबूत से निकालें और क़ब्र में दाख़िल करें और वह दुआयें पढ़ें जिन्हें पढ़ने के लिये कहा गया है दफ़्न करने से पहले और दफ़्न करते वक़्त पढ़ें और मैयित को क़ब्र में रखने के बाद उसके कफ़न की गिरहें खोल दें और उसका रूख़्सार ज़मीन पर रख दें और उसके सर के नीचे मिट्टी का तकिया बना दें और उसकी पीठ के पीछे कच्ची ईटें या ढेले रख दें ताकि मैयित चित न हो जाए और इससे पेशतर कि क़ब्र बन्द करें दायां हाथ मैयित के दायें कंधे पर मारें और बायां हाथ ज़ोर से मैयित के बायें कंधे पर रखें और मुंह उसके कान के क़रीब ले जायें और उसे ज़ोर से हरकत दें और तीन दफ़्आ कहें – इस्मअ इफ़हम या फ़ुलानब्ना फ़ुलानिन। और फ़ुलां इब्ने फ़ुलां की जगह मैयित और उसके बाप का नाम लें। मसलन अगर मैयित का नाम मूसा और उसके बाप का नाम इमरान हो तो तीन दफ़्आ कहेः
इस्मअ इफ़्हम (तीन बार) या मूसब्ना इमरान – उसके बाद कहें हल अन्ता अलल अहदिल लज़ी फ़ारक़्तना अलैहे मिन शहादते अंल्ला इलाहा इल्लल्लाहो वह्दहू ला शरीका लहू व अन्ना मोहम्मदन सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही अब्दुहू व रसूलुहू व सैयिदुन नबीयीना व खातमुल मुर्सलीना व अन्ना अलीयन अमीरूल मोमिनीना व सैयिदुल वसीयीना व इमामुनिफ़्तरज़ल्लाहो तातहू अलल आलमीना व अन्नल हसना वल हुसैना व अलीयिबनल हुसैना व मोहम्मदब्ना अलीयिन व जाअफ़रब्ना मोहम्मदिन व मूसाब्ना जाअफ़र व अलीयिब्ने मूसा व मोहम्मदब्ना अलीयिन व अलीयिब्ना मोहम्मदिन वल हसनब्ना अलीयिन वल क़ाइमल हुज्जतल महदीया सलवातुल्लाहे अलैहिम अइम्मतुल मोमिनीना व हुज्जतुल्लाहे अलल ख़ल्के अज्मईना व आइम्मतका आइम्मतो हुदन अबरारन या फ़ुलानब्ना फ़ुलानिन (और फ़ुलां इब्ने फ़ुलां की बजाय मैयित का और उसके बाप का नाम लें और फिर कहें) इज़ा अताकल मलकानिल मुक़र्रिबाने रसूलैने मिन इंदिल्लाहे तबारका व तआला व सअलका अंर्रब्बिका व अन्नबीयिका व अन दीनिका व अन किताबीका व अन क़िब्लतिका व अन अइम्मतिका फ़ला तख़फ़ व ला तह्ज़न व क़ुल फ़ी जवाबेहिमा अल्लाहो रब्बी व मोहम्मदुन सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही नबिय्यी वल इसलामों दीनी वल क़ुरआनो किताबी वल कअबतो क़िब्लती व अमीरूल मोमिनीना अलीयुब्नो अबी तालिबिन इमामी वल हसनुब्नो अलीयिनिल मुज्तबा इमामी वल हुसैनुब्नो अलीयिनिश शहीदो बे कर्बलाअ इमामी व अलीयुन ज़ैनुल आबिदीना इमामी व मोहम्मदोनिल बाक़िरो इमामी व मूसल काज़िमो इमामी व अलीयुर्निज़ा इमामी व मोहम्मदोनिल जवादो इमामी व अलीयुनिल हादी इमामी वल हसनुल अस्करीयो इमामी वल हुज्जतुल मुन्तज़रो इमामी हाउलाए सलावातुल्लाहे अलैहिम अज़्मईना अइम्मती व सादती व क़ादती व शुफ़आई बेहिम अतवल्ला व मिन अअदाएहिम अतर्बरओ फ़िद्दुनिया वल आख़िरते सुम्माअअलम या फ़ुलानब्ना फ़ुलांनिन (और फ़ुलां इब्ने फ़ुलां की बजाय मैयित का और उसके बाप का नाम लें और फिर कहें) अन्नल्लाहा तबारका व तआला नेअमर्रब्बो व अन्ना मोहम्मदन सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही नेअमर्रसूलो व अन्ना अलीयब्ना अबी तालिबिन व औलादहुल मअसूमीनल अइम्मतइल इसनय अशरा नेअमल अइम्मतो व अन्ना मा जाअ बेही मोहम्मदुन सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही हक़्क़ुन व अन्नल मौता हक़्क़ुन व सुवाला मुन्क़रिंव व नकीरिन फ़िल क़ब्रे हक़्क़ुन वल बअसा हक़्क़ुन वन्नुशूरा हक़्क़ुन वस्सिराता हक़्क़ुन वल मीज़ाना हक़्क़ुन व ततायुरल कुतुबे हक़्क़ुन वअन्नल जन्नता हक़्क़ुन वन्नारा हक़्क़ुन व अन्नस्साअता आतेयतुल्लारैबा फ़ीहा व अन्नल्लाहा यब्असो मन फ़िल क़ुबूरे। (फ़िर कहें) अफ़्हिम्ता या फ़ुलानों (फ़ुला के बजाय मैयित का नाम लें और उसके बाद कहें) – सब्बतकल्लाहो बिल क़ौलिस्साबिते हदाकल्लाहो इला सिरातिम्मुस्तक़ीमिन अर्रफ़ल्लाहो बैनका व बैना औलियाइका फ़ी मुस्तक़र्रिम मिंर्रह्मतेही, (उसके बाद कहें) – अल्लाहुम्मा जाफ़िल अरज़े अन जंबैहे व अस्इद बेरूहेही इलैका व लक़्क़ेही मिनका बुर्हानन अल्लाहम्मा अफ़्वका अफ़्वका।
636. मुस्तहब है कि जो शख़्स मैयित को क़ब्र में उतारे वह बा तहारत, बरहना सर और बरहना पा हो और मैयित की पांयती की तरफ़ से क़ब्र से बाहर निकले और मैयित के अज़ीज़े अक़रबा के अलावा जो लोग मौजूद हों वह हाथ की पुश्त से क़ब्र पर मिट्टी डालें और इन्ना लिल्लाहे व इन्नाइलैहे राजेऊन पढ़ें। अगर मैयित औरत हो तो उसका महरम उसे क़ब्र में उतारे और अगर महरम न हो तो उसके अज़ीज़ व अक़रबा उसे क़ब्र में उतारें।
637. मुस्तहब है कि क़ब्र मुरब्बअ या मुस्ततील बनाई जाए और ज़मीन से तक़रीबन चार उंगल बलन्द हो और उस पर कोई (कतबा या) निशानी या लगा दी जाए ताकि पहचानने में ग़लती न हो और क़ब्र पर पानी छिड़का जाए और पानी छिड़कने के बाद जो लोग मौजूद हों वह अपनी उंगलियां क़ब्र की मिट्टी में गाड़ कर सात दफ़्अ सूरा ए क़द्र पढ़े और मैयित के लिये मग़्फ़िरत तलब करें और यह दुआ पढ़ेः अल्लाहुम्मा ज़ाफ़िल अरज़े अन जंबैहे व अस्इद इलैका रूहहू मन सिवाका।
638. मुस्तहब है कि जो लोग जनाज़े की मुशायअत के लिये आए हों उनके चले जाने के बाद मैयित का वली या वह शख़्स जिसे वली इजाज़त दे मैयित को उन दुआओं की तल्क़ीन करे जो बताई गई हैं।
639. दफ़्न के बाद मुस्तहब है कि मैयित के पसमादगान को पुर्सा दिया जाए लेकिन अगर इतनी मुद्दत गुज़र चुकी हो कि पुर्सा देने में उनका दुख ताज़ा हो जाए तो पुर्सा न देना बेहतर है । यह भी मुस्तहब है कि मैयित के अहले खाना के लिये तीन दिन तक खाना भेजा जाए। उनके पास बैठकर और उनके घर में खाना मकरूह है।
640. मुस्तहब है कि इंसान अज़ीज़ अक़रबा की मौत पर ख़ुसूस बेटे की मौत पर सब्र करे और जब भी मैयित की याद आए इन्नालिल्लाहे व इन्ना इलैहेराजेऊन पढ़े और मैयित के लिये क़ुरआन ख़्वानी करे और मां बाप की क़ब्रों पर जाकर अल्लाह तआला से अपनी हाजतें तलब करे और क़ब्र को पुख़्तः कर दे ताकि जल्दी टूट फूट न जाए।
641. किसी की मौत पर भी इंसान के लिये एहतियात की बिना पर जाइज़ नहीं कि अपना चेहरा और बदन ज़ख़्मी करे और अपने बाल नोचे लेकिन सर और चेहरे का पीटना बिनाबर अक़्वा जाइज़ है।
642. बाप और भाई के अलावा किसी की मौत पर गरेबान चाक करना एहतियात की बिना पर जाइज़ नहीं है और एहतियाते मुस्तहब यह है कि बाप और भाई की मौत पर भी गरेबान चाक न किया जाए।
643. अगर औरत मैयित के सोग में अपना चेहरा ज़ख़्मी कर के ख़ून आलूद कर ले या बाल नोचे तो एहतियात की बिना पर वह एक ग़ुलाम आज़ाद करे या दस फ़क़ीरों को खाना खिलाए या उन्हें कपड़े पहनाए और अगर मर्द अपनी बीवी या फ़र्ज़न्द की मौत पर अपना गरेबान या लिबास फाड़े तो उसके लिये भी यही हुक्म है।
644. एहतियाते मुस्तहब यह है कि मैयित पर रोते वक़्त आवाज़ बलन्द न की जाए।
नमाज़े वह्शत
645. मुनासिब है कि मैयित के दफ़्न के बाद पहली रात को उसके लिये दो रक्अत नमाज़े वह्शत पढ़ी जाए और उसके पढ़ने का तरीक़ा यह है कि पहली रक्अत में सूरा ए अलहम्द के बाद एक दफ़्आ आयतुल कुर्सी और दूसरी रक्अत में सूरा ए अलहम्द के बाद दस दफ़्अ सूरा ए क़द्र पढ़ा जाए और सलामे नमाज़ के बाद कहा जाएः- अल्लाहुम्मा स्वल्ले अला मोहम्मदिंव व आले मोहम्मदिंव वब्अस सवाबहा इलाक़ब्रे फुलानिन। और लफ़्ज़े फ़ुलां की बजाए मैयित का नाम लिया जाए।
646. नमाज़े वह्शत मैयित के दफ़्न के बाद पहली रात को किसी वक़्त भी पढ़ी जा सकती है लेकिन बेह्तर यह है कि अव्वले शब में नमाज़े इशा के बाद पढ़ी जाए।
647. अगर मैयित को किसी दूर के शहर में ले जाना मक़्सूद हो या किसी और वजह से उसके दफ़्न में ताख़ीर हो जाए तो नमाज़े वह्शत को उस साबिक़ा तरीक़े के मुताबिक़ दफ़्न की पहली रात तक मुल्तवी कर देना चाहिये।
नब्शे क़ब्र
648. किसी मुसलमान का नब्शे क़ब्र यानी उस क़ब्र का खोलना ख़्वाह वह बच्चा या दीवाना ही क्यों न हो हराम है हां अगर उसका बदन मिट्टी के साथ मिलकर मिट्टी हो चुका हो तो फिर कोई हरज नहीं।
649. इमाम ज़ादों, शहीदों, आलिमों और स्वालेह लोगों की क़ब्रों को उजाड़ना ख़्वाह उन्हें फ़ौत हुए सालहा साल ग़ुज़र चुके हों और उनके बदन खाक हो गए हो, अगर उनकी बे हुर्मती होती हो तो हराम है।
वो सूरतें ऐसी हैं जिनमें क़ब्र का खोदना हराम नहीं हैः
650. चन्द सूरतें ऐसी हैं जिनमें क़ब्र का खोदना हराम नहीं हैः
1. जब मैयित को ग़स्बी ज़मीन में दफ़्न किया गया हो और ज़मीन का मालिक उसके वहां रहने पर राज़ी न हो।
2. जब कफ़न या कोई और चीज़ जो मैयित के साथ दफ़्न की गई हो ग़स्बी हो और उसका मालिक इस बात पर रज़ामन्द न हो कि वह क़ब्र में रहे और अगर खुद मैयित के माल में से कोई चीज़ जो उसके वारिसों को मिली हो उसके साथ दफ़्न हो गई हो और उसके वारिस इस बाद पर राज़ी न हों कि वह चीज़ क़ब्र में रहे तो उसकी भी यही सूरत है। अलबत्ता अगर मरने वाले ने वसीयत की हो कि दुआ या क़ुरआने मजीद या अंगूठी उसके साथ दफ़्न की जाए और उसकी वसीयत पर अमल किया गया हो तो उन चीज़ों को निकालने के लिये क़ब्र को नहीं खोला जा सकता। इसी तरह उन बाज़ सूरतों में भी जब ज़मीन या कफ़न में से कोई एक चीज़ ग़स्बी हो या कोई और ग़स्बी चीज़ मैयित के साथ दफ़्न हो गई हो तो क़ब्र को नहीं खोला जा सकता लेकिन यहा उन तमाम सूरतों की तफ़्सील बयान करने की गंजाइश नहीं है।
3. जब क़ब्र का खोलना मैयित की बे हुर्मती का मूजिब न हो और मैयित को बग़ैर ग़ुस्ल दिये या बग़ैर कफ़न पहनाए दफ़्न किया गया हो या पता चले कि मैयित का ग़ुस्ल बातिल था या उसे शरई अहकाम के मुताबिक़ कफ़न नहीं दिया गया था या क़ब्र में क़िब्ले के रूख़ पर नहीं लिटाया गया था।
4. जब कोई ऐसा हक़ साबित करने के लिये जो नब्शे क़ब्र से अहम हो मैयित का बदन देखना ज़रूरी है।
5. जब मैयित को ऐसी जगह पर दफ़्न किया गया हो जहां उसकी बे हुर्मती होती हो मसलन उसे काफ़िरों के क़ब्रिस्तान में या उस जगह दफ़्न किया गया हो जहां ग़लाज़त और कूड़ा कर्कट फेंका जाता हो।
6. जब किसी ऐसे शरई मक़्सद के लिये क़ब्र खोदी जाए जिसकी अहम्मीयत क़ब्र खोलने से ज़्यादा हो मसलन किसी ज़िन्दा बच्चे को ऐसी हामिला औरत के पेट से निकालना मत्लूब हो जिसे दफ़्न कर दिया गया हो।
7. जब यह ख़ौफ़ हो कि दरिन्दा मैयित को चीर फाड़ डालेगा या सैलाब उसे बहा ले जायेगा या दुश्मन उसे निकाल लेगा।
8. मैयित ने वसीयत की हो कि उसे दफ़्न करने से पहले मुक़द्दस मक़ामात की तरफ़ मुन्तक़िल किया जाए और ले जाते वक़्त उसकी बे हुर्मती भी न होती हो लेकिन जान बूझकर या भूले से किसी दूसरी जगह दफ़्ना दिया गया हो तो बे हुर्मती न होने की सूरत में क़ब्र खोलकर उसे मुक़द्दस मक़ामात की तरफ़ ले जा सकते हैं।
मुस्तहब ग़ुस्ल
651. इस्लाम की मुक़द्दस शरीअत में बहुत से ग़ुस्ल मुस्तहब हैं जिनमें से कुछ यह हैः
1. ग़ुस्ले जुमा- इसका वक़्त सुब्ह की अज़ान के बाद से सूरज ग़ुरूब होने तक है और बेहतर यह है कि ज़ोहर के क़रीब बजा लाया जाए (और अगर कोई शख़्स उसे ज़ोहर तक अंजाम न दे तो बेहतर है कि अदा और क़ज़ा की नियत किये बग़ैर ग़ुरूबे आफ़ताब तक बजा लाए) और अगर जुमा के दिन ग़ुस्ल न करे तो मुस्तहब है कि हफ़्ते के दिन सुब्ह से ग़ुरूबे आफ़ताब तक उसकी क़ज़ा बजा लाए। और जो शख़्स जानता हो कि उसे जुमा के दिन पानी मुयस्सर न होगा तो वह रिजाअन जुमअरात के दिन ग़ुस्ल अंजाम दे सकता है और मुस्तहब है कि इंसान ग़ुस्ले जुमा करते वक़्त यह दुआ पढ़ेः अश्हदों अंल्लाइलाहा इल्लल्लाहो वह्दहू ला शरीका लहू व अन्ना मोहम्मदन अब्दुहू व रसूलुहू अल्ला हुम्मा स्वल्ले अला मोहम्मदिंव व आले मोहम्मदिंन वज्अलनी मिनत्तव्वाबीना वज्अलनी मिनलमुततह्हरीना।
2 ता 7. माहे रमज़ान की पहली और सत्तरहवीं रात और उन्नीसवीं, इक्कीस्वीं और तेईसवीं रातों के पहले हिस्से का ग़ुस्ल और चौबीसवीं रात का ग़ुस्ल है।
8-9. ईदुल फ़ुत्र और ईदे क़ुर्बान के दिन का ग़ुस्ल – इसका वक़्त सुब्ह की अज़ान से सूरत ग़ुरूब होने तक है और बेहतर यह है कि ईद कि नमाज़ से पहले कर लिया जाए।
10-11. माहे ज़िलहिज्जः के आठवें और नवें दिन का ग़ुस्ल और बेहतर यह है कि नवें दिन का ग़ुस्ल ज़ोहर के नज़दीक किया जाए।
12. उस शख़्स का ग़ुस्ल जिसने अपने बदन का कोई हिस्सा ऐसी मैयित से मस किया हो जिसे ग़ुस्ल दिया गया हो।
13. एहराम का ग़ुस्ल।
14. हरमें मक्का में दाखिल होने का ग़ुस्ल।
15. मक्कए मुकर्मा में दाख़िल होने का ग़ुस्ल।
16. ख़ानाए काबा की ज़ियारत का ग़ुस्ल।
17. काबा में दाखिल होने का ग़ुस्ल।
18. ज़िब्हा और नहर के लिये ग़ुस्ल।
19. बाल मूंडने के लिये ग़ुस्ल।
20. हरमे मदीना में दाखिल होने का ग़ुस्ल।
21. मदीना ए मुनव्वरा में दाखिल होने का ग़ुस्ल।
22. मस्जिदे नबवी में दाख़िल होने का ग़ुस्ल।
23. नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की क़ब्रे मुतह्हर से विदाअ होने का ग़ुस्ल।
24. दुश्मन के साथ मुबाहला करने का ग़ुस्ल।
25. नव ज़ाईदा बच्चे का ग़ुस्ल।
26. इस्तिख़ारा करने का ग़ुस्ल।
27. तलबे बारां का ग़ुस्ल।
652. फ़ुक़हा ने मुस्तहब ग़ुस्लों के बाब में बहुत से ग़ुस्लों का ज़िक्र फ़रमाया है जिनमें से चन्द यह हैः-
1. माहे रमज़ान की तमाम ताक रातों का ग़ुस्ल और उसकी आखिरी दहाई की रातों का ग़ुस्ल और उसकी तीसवीं रात के आख़िरी हिस्से में दूसरा ग़ुस्ल।
2. माहे ज़िलाहिज्जा के चौबीसवें दिन का ग़ुस्ल।
3. ईदे नव रोज़ के दिन और पन्द्रहवीं शाबान और सत्तरहवी रबीउल अव्वल और ज़िल क़ादा के पच्चीसवें दिन का ग़ुस्ल।
4. उस औरत का ग़ुस्ल जिसने अपने शौहर के अलावा किसी और के लिये ख़ुश्बू इस्तेमाल की हो।
5. उस शख़्स का ग़ुस्ल जो मस्ती हालत में सो गया हो।
6. उस शख़्स का ग़ुस्ल जो किसी सूली चढ़े हुए इंसान को देखने गया हो और उसे देखा भी हो लेकिन अगर इत्तिफ़ाक़न मजबूरी की हालत में नज़र गई हो या मिसाल के तौर पर अगर शहादत देने गया हो तो ग़ुस्ल मुस्तहब नहीं है।
7. दूर या नज़दीक से मअसूमीन (अ0) की ज़ियारत के लिये ग़ुस्ल। लेकिन अहवत यह है कि यह तमाम ग़ुस्ल रजाअ की नियत से बजा लाए जायें।
653. उन मुस्तहब ग़ुस्लों के साथ जिनका ज़िक्र मसअला 651 में किया गया है इंसान ऐसे काम मसलन नमाज़ अंजाम दे सकता है जिनके लिये वुज़ू लाज़िम है (यानी वुज़ू करना ज़रूरी नहीं है) लेकिन जो ग़ुस्ल बतौरे रजाअ किये जायें वह वुज़ू के लिये किफ़ायत नहीं करते (यानी साथ साथ वुज़ू करना भी ज़रूरी है) ।
654. अगर कई मुस्तहब ग़ुस्ल किसी शख़्स के ज़िम्मे हों और वह सबकी नीयत कर के एक ग़ुस्ल कर ले तो काफ़ी है।
तयम्मुम
सात सूरतों में वुज़ू और ग़ुस्ल के बजाय तयम्मुम करना चाहियेः-
तयम्मुम की पहली सूरत
वुज़ू या ग़ुस्ल के लिये ज़रूरी मिक़्दार में पानी करना मुहैया करना मुम्किन न हो।
655. अगर इंसान आबादी हो तो ज़रूरी है कि वुज़ू और ग़ुस्ल के लिये पानी मुहैया करने के लिये इतनी जुस्तजी करे कि बिल आख़िर उसके मिलने से न उम्मीद हो जाए और अगर बियाबान में हो तो ज़रूरी है कि रास्तों में या अपने ठहरने की जगहों में या उसके आस पास वाली जगहों में पानी तलाश करे और एहतियाते लाज़िम यह है कि वहां की ज़मीन न हमवार हो या दरख़्तों की कसरत की वजह से राह चलना दुश्वार हो तो चारो अतराफ़ में से हर तरफ़ पुराने ज़माने में कमान के चिल्ले पर चढ़ा कर फेंके जाने वाले तीर की पर्वाज़ के फ़ासिले के बराबर पानी की तलाश में जाए। वर्ना हर तरफ़ अन्दाज़न दो बार फेंके जाने वाले तीर के फ़ासिले के बराबर जुस्तजू करे।
656. अगर चार अत्राफ़ में से बाज़ हमवार और बाज़ ना हमवार हों तो जो तरफ़ हमवार हों उसमें दो तीरों की पर्वाज़ 1 (मजलिसीये अव्वल क़ुद्ससिर्रहू ने मन ला यह्ज़ुरूहुल फ़क़ीह की शर्ह में तीर के पर्वाज़ की मिक़्दार दो सौ क़दम मुअय्यन फ़रमाई है।) के बराबर और जो तरफ़ ना हमवार हो उसमें एक तीर की पर्वाज़ के बराबर पानी तलाश करे।
657. जिस तरफ़ पानी के न होने का यक़ीन हो उस तरफ़ तलाश करना ज़रूरी नहीं।
658. अगर किसी शख़्स की नमाज़ का वक़्त तंग न हो और पानी हासिल करने के लिये उसके पास वक़्त हो और उसे यक़ीन या इत्मीनान हो कि जिस फ़ासिले तक उसके लिये पानी तलाश करना ज़रूरी है उस से दूर पानी मौजूद है तो उसे चाहिये कि पानी हासिल करने के लिये वहां जाए लेकिन अगर वहां जाना मशक़्क़त का बाइस हो या पानी बहुत ज़्यादा दूर हो कि लोग यह कहें कि उसके पास पानी नहीं है तो वहां जाना लाज़िम नहीं और अगर पानी मौजूद होने का गुमान हो तो फिर भी वहां जाना ज़रूरी नहीं है।
659. यह ज़रूरी नहीं कि इंसान खुद पानी की तलाश में जाए बल्कि वह किसी और ऐसे शख़्स को भेज सकता है जिसके कहने पर उसे इत्मीनान हो और इस सूरत में अगर एक शख़्स कई अश्ख़ास की तरफ़ से जाए तो काफ़ी है।
660. अगर इस बात का एहतिमाल हो कि किसी शख़्स के लिये अपने सफ़र के सामान में या पड़ाव डालने की जगह पर या काफ़िले में पानी मौजूद है तो ज़रूरी है कि इस क़दर जुस्तजू करे कि उसे पानी के न होने का इत्मीनान हो जाए या उसके हुसूल से ना उम्मीद हो जाए।
661. अगर एक शख़्स नमाज़ के वक़्त से पहले पानी तलाश करे और हासिल न कर पाए और नमाज़ के वक़्त तक उसी जगह रहे तो अगर पानी मिलने का एहतिमाल हो तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि दोबारा पानी की तलाश में जाए।
662. अगर नमाज़ का वक़्त दाख़िल होने के बाद तलाश करे और पानी हासिल न कर पाए और बाद वाली नमाज़ के वक़्त तक उसी जगह रहे तो अगर पानी मिलने का एहतिमाल हो तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि दोबारा पानी की तलाश में जाए।
663. अगर किसी शख़्स की नमाज़ का वक़्त तंग हो या उसे चोर, डाकू और दरिन्दे का खौफ़ हो या पानी तलाश इतनी कठिन हो कि वह सऊबत को बर्दाश्त न कर सके तो तलाश ज़रूरी नहीं।
664. अगर कोई शख़्स पानी की तलाश न करे हत्ता की नमाज़ का वक़्त तंग हो जाए और पानी तलाश करने की सूरत में पानी मिल सकता था तो वह गुनाह का मुर्तकिब हुआ लेकिन तयम्मुम के साथ उसकी नमाज़ सहीह है।
665. अगर कोई शख़्स इस यक़ीन की बिना पर पानी की तलाश में न जाए कि उसे पानी नहीं मिल सकता और तयम्मुम कर के नमाज़ पढ़ ले और बाद में उसे पता चले कि अगर तलाश करता तो पानी मिल सकता था तो एहतियाते लाज़िम की बिना वुज़ू कर के नमाज़ को दोबारा पढ़े।
666. अगर किसी शख़्स को तलाश करने पर पानी न मिले और मिलने से मायूस होकर तयम्मुम के साथ नमाज़ पढ़ ले और नमाज़ के बाद उसे पता चले कि जहां उसने तलाश किया था वहां पानी मौजूद था तो उसकी नमाज़ सहीह है।
667. जिस शख़्स को यक़ीन हो कि नमाज़ का वक़्त तंग है अगर वह पानी तलाश किये बग़ैर तयम्मुम कर के नमाज़ पढ़ ले और नमाज़ के बाद और वक़्त गुज़रने से पहले उसे पता चले कि पानी तलाश करने के लिये उसके पास वक़्त था तो एहतियाते वाजिब यह है कि दोबारा नमाज़ पढ़े।
668. अगर नमाज़ का वक़्त दाखिल होने के बाद किसी शख़्स का वुज़ू बाक़ी हो और उसे मालूम हो कि अगर उसने अपना वुज़ू बातिल कर दिया तो दोबारा वुज़ू करने के लिये पानी नहीं मिलेगा या वुज़ू नहीं कर पायेगा तो इस सूरत में अगर वह अपना वुज़ू बरक़रार रख सकता हो तो एहतियाते वाजिब की बिना उसे चाहिये कि उसे बातिल न करे लेकिन अगर ऐसा शख़्स यह जानते हुए भी कि ग़ुस्ल न कर पायेगा अपनी बीवी से जिमाअ कर सकता है।
669. अगर कोई शख़्स नमाज़ से पहले बा वुज़ू हो और उसे मालूम हो कि अगर उसने अपना वुज़ू बातिल कर दिया तो दोबारा वुज़ू करने के लिये पानी मुहैया करना उसके लिये मुम्किन न होगा तो इस सूरत में अगर वह अपना वुज़ू बरक़रार रख सकता हो तो एहतियाते वाजिब यह है कि उसे बातिल न करे।
670. जब किसी के पास फ़क़त ग़ुस्ल या वुज़ू के लिये पानी हो और वह जानता हो कि उसे गिरा देने की सूरत में मज़ीद पानी नहीं मिल सकेगा तो अगर नमाज़ का वक़्त दाखिल हो गया हो तो उस पानी का गिराना हराम है और एहतियाते वाजिब यह है कि नमाज़ के वक़्त से पहले भी न गिराए।
671. अगर कोई शख़्स यह जानते हुए कि उसे पानी न मिल सकेगा, नमाज़ का वक़्त दाखिल होने के बाद अपना वुज़ू बातिल कर दे या जो पानी उसके पास हो उसे गिरा दे तो अगर चे उसने (हुक्मे मस्अला के) बह अक्स काम किया है, तयम्मुम के साथ उसकी नमाज़ सहीह होगी लेकिन एहतियाते मुस्तहब यह है कि उस नमाज़ की क़ज़ा भी करे।
तयम्मुम की दूसरी सूरत
672. अगर कोई शख़्स बुढ़ापे या कमज़ोरी की वजह से चोर, डाकू और जानवर वग़ैरा के ख़ौफ़ से या कुयें से पानी निकालने के वसाइल मुयस्सर न होने की वजह से पानी हासिल न कर सके तो उसे चाहिये की तयम्मुम करे। और अगर पानी मुहैया करने या इस्तेमाल करने में उसे इतनी तक्लीफ़ उठानी पड़े जो नाक़ाबिले बर्दाश्त हो तो उस सूरत में भी यही हुक्म है। लेकिन आखिरी सूरत में अगर तयम्मुम न करे और वुज़ू करे तो उसका वुज़ू सहीह होगा।
673. अगर कुयें से पानी निकालने के लिये डोल और रस्सी वग़ैरा ज़रूरी हो और मुतअल्लिक़ा शख़्स मजबूर हो कि उन्हें खरीदे या किराए पर हासिल करे तो ख़्वाह उनकी क़िमत आम भाव से कई गुना ही ज़्यादा क्यों न हो उसे चाहिये की उन्हें हासिल करे। और अगर पानी अपनी असली क़ीमत से मंहगा बेचा जा रहा हो तो उसके लिये भी यही हुक्म है। लेकिन अगर इन चीज़ों के हुसूल पर इतना खर्च आता हो कि उसकी जेब इजाज़त न देती हो तो फिर इन चीज़ों का मुहैया करना वाजिब नहीं है।
674. अगर कोई शख़्स मजबूर हो कि पानी मुहैया करने के लिये क़र्ज़ ले तो क़र्ज़ लेना ज़रूरी है लेकिन जिस शख़्स को इल्म हो या गुमान हो कि वह अपने क़र्ज़े की अदायगी नहीं कर सकता उसके लिये क़र्ज़ लेना वाजिब नहीं है।
675. अगर कुआं खोदने में कोई मशक़्क़त न हो तो मुतअल्लिक़ा शख़्स को चाहिये कि पानी मुहैया करने के लिये कुआं खोदे।
676. अगर कोई शख़्स बग़ैर एहसान रखे कुछ पानी दे तो उसे क़ुबूल कर लेना चाहियें।
तयम्मुम की तीसरी सूरत
677. अगर किसी शख़्स को पानी इस्तेमाल करने से अपनी जान पर बन जाने या बदन में कोई ऐब या मरज़ पैदा होने या मौजूदा मरज़ के तूलानी या शदीद हो जाने या इलाज मुआलिजा में दुशवारी पैदा होने का ख़ौफ़ हो तो उसे चाहिये कि तयम्मुम करे। लेकिन अगर पानी के ज़रर को किसी तरीक़े से दूर कर सकता हो मसलन यह कि पानी को गर्म करने से ज़रर दूर हो सकता हो तो पानी गर्म कर के वुज़ू करे और ग़ुस्ल करना ज़रूरी हो तो ग़ुस्ल करे।
678. ज़रूरी नहीं कि किसी शख़्स को यक़ीन हो कि पानी उसके लिये मुज़िर है बल्कि अगर ज़रर का एहतिमाल हो और यह एहतिमाल आम लोगों की नज़रों में मअक़ूल हो और इस एहतिमाल से उसे ख़ौफ़ लाहिक़ हो जाए तो तयम्मुम करना ज़रूरी है।
679. अगर कोई शख़्स दर्दे चश्म में मुब्तला हो और पानी उसके लिये मुज़िर हो तो ज़रूरी है कि तयम्मुम करे।
680. अगर कोई शख़्स ज़रर के यक़ीन या ख़ौफ़ की वजह से तयम्मुम करे और उसे नमाज़ से पहले इस बात का पता चल जाए कि पानी उसके लिये नुक्सान देह नहीं तो उसका तयम्मुम बातिल है। और अगर इस बात का पता नमाज़ के बाद चले तो वुज़ू या ग़ुस्ल कर के दोबारा नमाज़ पढ़ना ज़रूरी है।
681. अगर किसी शख़्स को यक़ीन हो कि पानी उसके लिये मुज़िर नहीं है और ग़ुस्ल या वुज़ू कर ले बाद में उसे पता चले कि पानी उसके लिये मुज़िर था तो उसका वुज़ू और ग़ुस्ल दोनों बातिल हैं।
तयम्मुम की चौथी सूरत
682. अगर किसी शख़्स को यह ख़ौफ़ हो कि पानी से ग़ुस्ल या वुज़ू कर लेने के बाद वह प्यास की वजह से बेताब हो जायेगा तो ज़रूरी है कि तयम्मुम करे और इस वजह से तयम्मुम के जाइज़ हो जाने की तीन सूरतें हैः-
1. अगर पानी वुज़ू या ग़ुस्ल करने में सर्फ़ कर दे तो वह ख़ुद फ़ौरी तौर पर या बाद में ऐसी प्यास में मुब्तला हो जो उसकी हलाकत या अलालत (बीमारी) का मूजिब होगी या जिसका बर्दाश्त करना उसके लिये सख़्त तक्लीफ़ का बाइस होगा।
2. उसे ख़ौफ़ हो कि जिन लोगों की हिफ़ाज़त करना उस पर वाजिब है वह कहीं प्यास से हलाक या बीमार न हो जायें।
3. अपने अलावा किसी दूसरे की ख़ातिर ख़्वाह वह इंसान हो या हैवान, डरता हो और उसकी हलाकत या बीमारी या बेताबी उसे गरां गुज़रती हो ख़्वाह मोहतरम नुफ़ूस में से हो या ग़ैर मोहतरम नुफ़ूस में से हो इन तीन सूरतों के अलावा किसी सूरत में पानी होते हुए तयम्मुम करना जाइज़ नहीं है।
683. अगर किसी शख़्स के पास उस पाक पानी के अलावा जो वुज़ू या ग़ुस्ल के लिये हो इतना नजिस पानी भी हो जितना उसे पीने के लिये दरकार है तो ज़रूरी है कि पाक पानी पीने के लिये रख ले और तयम्मुम कर के नमाज़ पढ़े लेकिन अगर पानी उसके साथियों के पीने के लिये दरकार हो तो वह पाक पानी से ग़ुस्ल या वुज़ू कर सकता है ख़्वाह उसके साथी प्यास बुझाने के लिये नजिस पानी पीने पर ही क्यों न मजबूर हों बल्कि अगर वह लोग उस पानी के नजिस होने के बारे में न जानते हों या यह कि किसी नजासत से परहेज़ न करते हों तो लाज़िम है कि पाक पानी को वुज़ू या ग़ुस्ल के लिये सर्फ़ करे और इसी तरह पानी अपने किसी जानवर या नाबालिग़ बच्चे को पिलाना चाहे तब भी ज़रूरी है कि उन्हें वह नजिस पानी पिलाए और पाक पानी से वुज़ू या ग़ुस्ल करे।
तयुम्मुम की पांचवीं सूरत
684. अगर किसी शख़्स का बदन या लिबास नजिस हो और उसके पास इतनी मिक़्दार में पानी हो कि उससे वुज़ू या ग़ुस्ल कर ले तो बदन या लिबास धोने के लिये पानी न बचता हो तो ज़रूरी है कि बदन या लिबास धोए और तयम्मुम कर के नमाज़ पढ़े लेकिन अगर उसके पास ऐसी कोई चीज़ न हो जिस पर तयम्मुम करे तो ज़रूरी है कि पानी वुज़ू या ग़ुस्ल के लिये इस्तेमाल करे और नजिस बदन या लिबास के साथ नमाज़ पढ़े।
तयम्मुम की छठी सूरत
685. अगर किसी शख़्स के पास सिवाए ऐसे पानी या बर्तन के जिसका इस्तेमाल करना हराम हो कोई और पानी या बर्तन न हो मसलन जो पानी या बर्तन उसके पास हो वह ग़स्बी हो और उसके अलावा उसके पास कोई पानी या बर्तन न हो तो उसे चाहिये कि वुज़ू और ग़ुस्ल के बजाए तयम्मुम करे।
तयम्मुम की सातवीं सूरत
686. जब वक़्त इतना तंग हो कि अगर एक शख़्स वुज़ू या ग़ुस्ल करे तो सारी नमाज़ या उसका कुछ हिस्सा वक़्त के बाद पढ़ा जा सके तो ज़रूरी है कि तयम्मुम करे।
687. अगर कोई शख़्स जान बूझकर नमाज़ पढ़ने में इतनी ताख़ीर करे कि वुज़ू या ग़ुस्ल का वक़्त बाक़ी न रहे तो वह गुनाह का मुर्तकिब होगा लेकिन तयम्मुम के साथ उसकी नमाज़ सहीह है। अगर चे एहतियाते मुस्तहब यह है कि उस नमाज़ की क़ज़ा भी करे।
688. अगर किसी शख़्स को शक हो कि वह वुज़ू या ग़ुस्ल करे तो नमाज़ का वक़्त बाक़ी रहेगा या नहीं तो ज़रूरी है कि तयम्मुम करे।
689. अगर किसी शख़्स ने वक़्त की तंगी की वजह से तयम्मुम किया हो और नमाज़ के बाद वुज़ू कर सकने के बावजूद न किया हो हत्ता की जो पानी उसके पास था वह ज़ाए हो जाए तो इस सूरत में उसका फ़रीज़ा तयम्मुम हो तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि बाद की नमाज़ों के लिये दोबारा तयम्मुम करे। ख़्वाह वह तयम्मुम जो उसने किया था न टूटा हो।
690. अगर किसी शख़्स के पास पानी हो लेकिन वक़्त की तंगी के बाइस तयम्मुम कर के नमाज़ पढ़ने लगे और नमाज़ के दौरान जो पानी उसके पास था वह ज़ाए हो जाए और अगर उसका फ़रीज़ा तयम्मुम हो तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि बाद की नमाज़ों के लिये दोबारा तयम्मुम करे।
691. अगर किसी शख़्स के पास इतना वक़्त हो कि वुज़ू या ग़ुस्ल कर सके और नमाज़ को उसके मुस्तहब अफ़आल मसलन इक़ामत और क़ुनूत के बग़ैर पढ़ ले तो ज़रूरी है कि ग़ुस्ल या वुज़ू कर ले और उसके मुस्तहब अफ़आल के बग़ैर नमाज़ पढ़े बल्कि अगर सूरा पढ़ने जितना वक़्त भी न बचता हो तो ज़रूरी है कि ग़ुस्ल या वुज़ू करे और बग़ैर सूरा के नमाज़ पढ़े।
वह चीज़ें जिन पर तयम्मुम करना सहीह है
692. मिट्टी, रेत, ढेले और रोढ़ी या पत्थर पर तयम्मुम करना सहीह है लेकिन एहतियाते मुस्तहब यह है कि अगर मिट्टी मुयस्सर हो तो किसी दूसरी चीज़ पर तयम्मुम न किया जाए। और अगर मिट्टी न हो तो रेत या ढेले पर और अगर रेत और ढेला भी न हो तो फिर रोढ़ी या पत्थर पर तयम्मुम किया जाए।
693. जिप्सम और चूने के पत्थर पर तयम्मुम करना सहीह है नीज़ उस गर्दोंग़ुब्बार पर जो क़ालीन, कपड़े और उन जैसी दूसरी चीज़ों पर जमाअ हो जाता है, अगर उर्फ़े आम में उसे नर्म मिट्टी शुमार किया जाता हो तो उस पर तयम्मुम सहीह है। अगरचे एहतियाते मुस्तहब यह है कि इख़्तियार की हालत में उस पर तयम्मुम न करे। इसी तरह एहतियाते मुस्तहब की बिना पर इख़्तियार की हालत में पक्के जिप्सम और चूने पर और पक्की हुई ईट और दूसरे मअदिनी पत्थर मसलन अक़ीक़ वग़ैरा पर तयम्मुम न करे।
694. अगर किसी शख़्स को मिट्टी, रेत, ढेले या पत्थर न मिल सकें तो ज़रूरी है कि तर मिट्टी पर तयम्मुम करे और अगर तर मिट्टी न मिले तो ज़रूरी है कि क़ालीन, दरी या लिबास और उन जैसा दूसरी चीज़ों के अन्दर या ऊपर मौजूद उस मुख़्तसर से गर्दोग़ुब्बार से जो उर्फ़े आम में मिट्टी शुमार न होता हो तयम्मुम करे और अगर इनमें से कोई चीज़ भी दस्तयाब न हो तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि तयम्मुम के बग़ैर नमाज़ पढ़े लेकिन वाजिब है कि बाद में उसकी क़ज़ा पढ़े।
695. अगर कोई शख़्स क़ालीन, दरी और उन जैसी चीज़ों को झाड़कर मिट्टी मुहैया कर सकता हो तो उसका गर्द आलूद चीज़ों पर तयम्मुम करना बातिल है और इसी तरह अगर तर मिट्टी को ख़ुश्क कर के उससे सूखी मिट्टी हासिल कर सकता हो तो तर मिट्टी पर तयम्मुम करना बातिल है।
696. जिस शख़्स के पास पानी न हो लेकिन बर्फ़ हो और उसे पिघला सकता हो तो उसे पिघला कर पानी बनाना और उससे वुज़ू या ग़ुस्ल करना ज़रूरी है और अगर ऐसा करना मुम्किन न हो और उसके पास कोई ऐसी चीज़ भी न हो जिस पर तयम्मुम करना सहीह हो तो उसके लिये ज़रूरी है कि दूसरे वक़्त में नमाज़ को क़ज़ा करे और बेहतर यह है कि बर्फ़ से वुज़ू या ग़ुस्ल के अअज़ा को तर करे और अगर ऐसा करना भी मुम्किन न हो तो बर्फ़ पर तयम्मुम कर ले और वक़्त पर भी नमाज़ पढ़े।
697. अगर मिट्टी और रेत के साथ सूखी घास की तरह कोई चीज़ (मसलन बीज, कलियां) मिली हुई हों जिस पर तयम्मुम करना बातिल हो तो मुतअल्लिक़ा शख़्स उस पर तयम्मुम नहीं कर सकता। लेकिन अगर वह चीज़ इतनी कम हो कि उसे मिट्टी या रेत में न होने के बराबर समझा जा सके तो उस मिट्टी और रेत पर तयम्मुम सहीह है।
698. अगर एस शख़्स के पास कोई ऐसी चीज़ न हो जिस पर तयम्मुम किया जा सके और उसका ख़रीदना या किसी और तरह हासिल करना मुम्किन हो तो ज़रूरी है कि उस तरह मुहैया कर ले।
699. मिट्टी की दीवार पर तयम्मुम करना सहीह है और एहतियाते मुस्तहब यह है कि ख़ुश्क ज़मीन या ख़ुश्क मिट्टी के होते हुए तर ज़मीन या तर मिट्टी पर तयम्मुम न किया जाए।
700. जिस चीज़ पर इंसान तयम्मुम करे उसका पाक होना ज़रूरी है और अगर उसके पास कोई ऐसी पाक चीज़ न हो जिस पर तयम्मुम करना सहीह हो तो उस पर नमाज़ वाजिब नहीं लेकिन ज़रूरी है कि उसकी क़ज़ा बजा लाए और बेहतर यह है कि वक़्त में भी नमाज़ पढ़े।
701. अगर किसी शख़्स को यक़ीन हो कि एक चीज़ पर तयम्मुम करना सहीह है और उस पर तयम्मुम कर ले बाद अंजा उसे पता चले कि उस चीज़ पर तयम्मुम करना बातिल था तो ज़रूरी है कि जो नमाज़ें उस तयम्मुम के साथ पढ़ी हैं उन्हें दोबारा पढ़े।
702. जिस चीज़ पर कोई शख़्स तयम्मुम करे ज़रूरी है कि वह ग़स्बी न हो पस अगर वह ग़स्बी मिट्टी पर तयम्मुम करे तो उसका तयम्मुम बातिल है।
703. ग़स्ब की हुई फ़ज़ा में तयम्मुम करना बातिल नहीं है लिहाज़ा अगर कोई शख़्स अपनी ज़मीन पर अपने हाथ मिट्टी पर मारे और फिर बिला इजज़ात दूसरे की ज़मीन में दाखिल हो जाए और हाथों को पेशानी पर फेरे तो उसका तयम्मुम सहीह होगा अगर चे वह गुनाह का मुर्तक़िब हुआ है।
704. अगर कोई शख़्स भूले से या ग़फ़्लत से ग़स्बी चीज़ पर तयम्मुम कर ले तो तयम्मुम सहीह है लेकिन अगर वह खुद कोई चीज़ ग़स्ब करे और फिर भूल जाए कि ग़स्ब की है तो उस चीज़ पर तयम्मुम के सहीह होने में इश्क़ाल है।
705. अगर कोई शख़्स ग़स्बी जगह में मह्बूस हो और उस जगह का पानी और मिट्टी दोनों ग़स्बी हों तो ज़रूरी है कि तयम्मुम कर के नमाज़ पढ़े।
706. जिस चीज़ पर तयम्मुम किया जाए एहतियाते लाज़िम की बिना पर ज़रूरी है कि उस पर गर्दों ग़ुबार मौजूद हो जो कि हाथों पर लग जाए और उस पर हाथ मारने के बाद ज़रूरी है कि इतने ज़ोर से हाथों को न झाड़े कि सारी गर्द झड़ जाए।
707. गढ़े वाली ज़मीन, रास्ते की मिट्टी और ऐसी शोर ज़मीन जिस पर नमक की तह न जमी हो तयम्मुम करना मकरूह है और अगर उस पर नमक की तह जम गई हो तो तयम्मुम बातिल है।
वुज़ू या ग़ुस्ल के बदले तयम्मुम करने का तरीक़ा
708. वुज़ू या ग़ुस्ल के बदले किये जाने वाले तयम्मुम में चार चीज़ें वाजिब हैः-
1. नीयत
2. दोनों हथेलियों को एक साथ ऐसी चीज़ पर मारने या रखना जिस पर तयम्मुम करना सहीह हो। और एहतियाते लाज़िम की बिना पर दोनों हाथ एक साथ ज़मीन पर मारने या रखने चाहियें।
3. पूरी पेशानी पर दोनों हथेलीयों को फेरना और इसी तरह एहतियाते लाज़िम की बिना पर उस मक़ाम से जहां सर के बाल उगते हैं भवों और नाक के ऊपर तक पेशानी के दोनों तरफ़ दोनों हथेलीयों को फेरना। और एहतियाते मुस्तहब यह है कि हाथ भवों तक भी फेरे जाए।
4. बाई हथेली को दायें हाथ की तमाम पुश्त पर और उसके बाद दाईं हाथेली को बायें हाथ की तमाम पुश्त पर फेरना।
709. एहतियाते मुस्तहब यह है कि तयम्मुम ख़्वाह वुज़ू के बदले हो या ग़ुस्ल के बदले उसे तरतीब से किया जाए यानी यह है कि एक दफआ हाथ ज़मीन पर मारे जायें और पेशानी और हाथों की पुश्त पर फेरे जायें और फिर एक दफ़आ ज़मीन पर मारे जायें और हाथों की पुश्त का मसह किया जाए।
तयम्मुम के अहकाम
710. अगर एक शख़्स पेशानी या हाथों की पुश्त के ज़रां से हिस्से का भी मसह न करे तो उसका तयम्मुम बातिल है। क़त्ए नज़र इससे कि उसने अमदन मसह न किया हो या मस्अला न जानता हो या मस्अला भूल गया हो लेकिन बाल की खाल निकालने की ज़रूरत भी नहीं अगर यह कहा जा सके कि तमाम पेशानी और हाथों का मसह हो गया है तो इतना ही काफ़ी है।
711. अगर किसी शख़्स को यक़ीन न हो कि हाथ की तमाम पुश्त पर मसह कर लिया है तो यक़ीन हासिल करने के लिये ज़रूरी है कि कलाई से कुछ ऊपर वाले हिस्से का भी मसह करे लेकिन उंगलियों के दरमियान मसह करना ज़रूरी नहीं।
712. तयम्मुम करने वाले को पेशानी और हाथों की पुश्त की मसह एहतियात की बिना पर ऊपर से नीचे की जानिब करना ज़रूरी है और यह अफ़्आल एक दूसरे से मुत्तसिल होने चाहिये और अगर इन अफ़्आल के दरमियान इतना फ़ासला दे कि लोग यह न कहें की तयम्मुम कर रहा है तो तयम्मुम बातिल है।
713. नीयत करते वक़्त लाज़िम नहीं कि इस बात का तअय्युन करे कि उसका तयम्मुम ग़ुस्ल के बदले है या वुज़ू के बदले लेकिन जहां दो तयम्मुम अंजाम देना ज़रूरी हों तो लाज़िम है कि उन में से हर एक को मुअय्यन करे और अगर उस पर एक तयम्मुम वाजिब हो और नीयत करे कि मैं इस वक़्त अपना वज़ीफ़ा अंजाम दे रहा हूँ तो अगरचे वह मुअय्यन करने में ग़लती करे (कि वह तयम्मुम ग़ुस्ल के बदले है या वुज़ू के बदले) उसका तयम्मुम सहीह है।
714. एहतियाते मुस्तहब की बिना पर तयम्मुम में पेशानी, हाथों की हथेलीयां और हाथों की पुश्त जहां तक कि मुम्किन हो ज़रूरी है कि पाक हों।
715. इंसान को चाहिये कि हाथ पर मसह करते वक़्त अग़ूठी उतार दे और अगर पेशानी या हाथों की पुश्त या हथेलियों पर कोई रूकावट हो मसलन उन पर कोई चीज़ चीपकी हुई हो तो ज़रूरी है कि उसे हटा दे।
716. अगर किसी शख़्स की पेशानी या हाथों की पुश्त पर ज़ख़्म हो और उस पर कपड़ा या पट्टी वग़ैरा बंधी हो जिसको खोला न जा सकता हो तो ज़रूरी है कि उस के ऊपर हाथ फेरे। और अगर हथेली ज़ख़्मी हो और उस पर कपड़ा या पट्टी बंधी हो जिसे खोला न जा सकता हो तो ज़रूरी है कि कपड़े या पट्टी वग़ैरा समेत उस चीज़ पर हाथ मारे जिस पर तयम्मुम करना सहीह हो और फिर पेशानी और हाथों की पुश्त पर फेरे।
717. अगर किसी शख़्स की पेशानी और हाथों की पुश्त पर बाल हों तो कोई हरज नहीं लेकिन अगर सर के बाल पेशानी पर आ गिरे हों तो ज़रूरी है कि उन्हें पीछें हटा दें।
718. अगर एहतिमाल हो कि पेशानी और हथेलियों या हाथों की पुश्त पर कोई रूकावट है और यह एहतिमाल लोगों की नज़रों में मअक़ूल हों तो ज़रूरी है कि छान बीन करे ताकि उसे यक़ीन या इत्मीनान हो जाए कि रूकावट मौजूद नहीं है।
719. अगर किसी शख़्स का वज़ीफ़ा तयम्मुम हो और वह खुद तयम्मुम न कर सकता हो तो ज़रूरी है कि किसी दूसरे शख़्स से मदद ले ताकि वह मददगार मुतअल्लिक़ा शख़्स के हाथों को उस चीज़ पर मारे जिस पर तयम्मुम करना सहही हो और फिर मुतअल्लिक़ा शख़्स के हाथों को उसकी पेशानी और दोनों हाथों की पुश्त पर रख दे ताकि इम्कान की सूरत में वह खुद अपनी दोनों हथेलियों को पेशानी और दोनों हाथों की पुश्त पर फेरे और अगर यह मुम्किन न हो तो नायब के लिये ज़रूरी है कि मुतअल्लिक़ा शख़्स को खुद उसके हाथों से तयम्मुम कराए और अगर ऐसा करना मुम्किन न हो तो नायब के लिये ज़रूरी है कि अपने हाथों को उस चीज़ पर मारे जिस पर तयम्मुम करना सहीह हो और फिर मुतअल्लिक़ा शख़्स की पेशानी और हाथों की पुश्त पर फेरे। इन दोनों सूरतों में एहतियाते लाज़िम की बिना पर दोनों शख़्स तयम्मुम की नियत करें लेकिन पहली सूरत में खुद मुकल्लफ़ की नीयत काफ़ी है।
720. अगर कोई शख़्स तयम्मुम के दौरान शक करे कि वह उसका कोई हिस्सा भूल गया है या नहीं और उस हिस्से का मौक़ा ग़ुज़र गया हो तो वह अपने शक का लिहाज़ न करे और अगर मौक़ा न गुज़रा हो तो ज़रूरी है कि उस हिस्से का तयम्मुम करे।
721. अगर किसी शख़्स को बायें हाथ का मसह करने के बाद शक हो कि आया उसने तयम्मुम दुरूस्त किया है या नहीं तो उसका तयम्मुम सहीह है और अगर उसका शक बायें हाथ के मसह के बारे में हो तो उसके लिये ज़रूरी है कि उसका मसह करे सिवाय इसके कि लोग यह कहें कि तयम्मुम से फ़ारिग़ हो चुका है मसलन उस शख़्स ने कोई ऐसा काम किया हो जिसके लिये तहारत शर्त है या तसलसुल ख़त्म हो गया हो।
722. जिस शख़्स का वज़ीफ़ा तयम्मुम हो अगर वह नमाज़ के पूरे वक़्त में उज़्र ख़त्म होने से मायूस हो जाए तो तयम्मुम कर सकता है और अगर उसने किसी दूसरी वाजिब या मुस्तहब काम के लिये तयम्मुम किया हो और नमाज़ के वक़्त तक उसका उज़्र बाक़ी हो (जिसकी वजह से उसका वज़ीफ़ा तयम्मुम है) तो उसी तयम्मुम के साथ नमाज़ पढ़ सकता है।
723. जिस शख़्स का वज़ीफ़ा तयम्मुम हो अगर उसे इल्म हो कि आख़िर वक़्त तक उसका उज़्र बाक़ी रहेगा या वह उज़्र के ख़त्म होने से मायूस हो तो वक़्त के वसी होते हुए वह तयम्मुम के साथ नमाज़ पढ़ सकता है। लेकिन अगर वह जानता हो कि आख़िर वक़्त तक उसका उज़्र दूर हो जायेगा तो ज़रूरी है कि इन्तिज़ार करे और वुज़ू या ग़ुस्ल कर के नमाज़ पढ़े। बल्कि अगर वह आख़िर वक़्त तक उज़्र के ख़त्म होने से मायूस न हो तो मायूम होने से पहले तयम्मुम करके नमाज़ नहीं पढ़ सकता।
724. अगर कोई शख़्स वुज़ू या ग़ुस्ल न कर सकता हो और उसे यक़ीन हो कि उसका उज़्र दूर होने वाला नहीं है या दूर होने से मायूस हो तो वह अपनी क़ज़ा नमाज़े तयम्मुम के साथ पढ़ सकता है लेकिन अगर बाद में उज़्र ख़त्म हो जाए तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि वह नमाज़े वुज़ू या ग़ुस्ल कर के दोबारा पढ़े और अगर उसे उज़्र दूर होने से मायूसी न हो तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर क़ज़ा नमाज़ों के लिये तयम्मुम नहीं कर सकता।
725. जो शख़्स वुज़ू या ग़ुस्ल न कर सकता हो उसके लिये जाइज़ है कि मुस्तहब नमाज़ें दिन रात के उन नवाफ़िल की तरह जिनका वक़्त मुअय्यन है तयम्मुम कर के पढ़े, लेकिन अगर मायूस न हो कि आख़िर वक़्त तक उसका उज़्र दूर हो जायेगा तो एहतियाते लाज़िम यह है कि वह नमाज़ें उनके अव्वले वक़्त में न पढ़े।
726. जिस शख़्स ने एहतियातन ग़ुस्ले जबीरा और तयम्मुम किया हो अगर वह ग़ुस्ल और तयम्मुम के बाद नमाज़ पढ़े और नमाज़ के बाद उससे हदसे असग़र सादिर हो मसलन अगर वह पेशाब करे तो बाद की नमाज़ों के लिये ज़रूरी है कि वुज़ू करे और अगर हदस नमाज़ से पहले सादिर हो तो ज़रूरी है कि उस नमाज़ के लिये भी वुज़ू करे।
727. अगर कोई शख़्स पानी न मिलने की वजह से या किसी और उज़्र की बिना पर तयम्मुम करे तो उज़्र के ख़त्म हो जाने के बाद उसका तयम्मुम बातिल हो जाता है।
728. जो चीज़ें वुज़ू को बातिल करती हैं वह वुज़ू के बदले किये हुए तयम्मुम को भी बातिल करती हैं। और जो चीज़ें ग़ुस्ल को बातिल करती है वह ग़ुस्ल के बदले किये हुए तयम्मुम को भी बातिल करती हैं।
729. अगर कोई शख़्स ग़ुस्ल न कर सकता हो और चन्द ग़ुस्ल उस पर वाजिब हों तो उसके लिये ज़रूरी है कि उन ग़ुस्लों के बदले एक तयम्मुम करे और एहतियाते मुस्तहब यह है कि उन ग़ुस्लों में से हर एक के बदले एक तयम्मुम करे।
730. जो शख़्स ग़ुस्ल न कर सकता हो वह कोई ऐसा काम अंजाम देना चाहे जिसके लिये ग़ुस्ल वाजिब हो तो ज़रूरी है कि ग़ुस्ल के बदले तयम्मुम करे और जो शख़्स वुज़ू न कर सकता हो अगर वह कोई ऐसा काम अंजाम देना चाहे जिसके लिये वुज़ू वाजिब हो तो ज़रूरी है कि वुज़ू के बदले तयम्मुम करे।
731. अगर कोई ग़ुस्ले जनाबत के बदले तयम्मुम करे तो नमाज़ के लिये वुज़ू करना ज़रूरी नहीं है लेकिन अगर दूसरे ग़ुस्लों के बदले तयम्मुम करे तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि वुज़ू भी करे और अगर वह वुज़ू न कर सके तो वुज़ू के बदले एक और तयम्मुम करे।
732. अगर कोई शख़्स जनाबत के बदले तयम्मुम करे लेकिन बाद में उसे किसी ऐसी सूरत से दो चार होना पड़े जो वुज़ू को बातिल कर देती हो और बाद की नमाज़ों के लिये ग़ुस्ल भी न कर सकता हो तो ज़रूरी है कि वुज़ू करे और एहतियाते मुस्तहब यह है कि तयम्मुम भी करे। और अगर वुज़ू न कर सकता हो तो ज़रूरी है कि उसके बदले तयम्मुम करे और एहतियाते मुस्तहब यह है कि उस तयम्मुम को माफ़ी ज़िम्मा की नीयत से बजा लाए (यानी जो कुछ मेरे ज़िम्मे है उसे अंजाम दे रहां हूँ।
733. किसी शख़्स को कोई काम अंजाम देने मसलन नमाज़ पढ़ने के लिये वुज़ू या ग़ुस्ल के बदले तयम्मुम करना ज़रूरी हो तो अगर वह पहले तयम्मुम में वुज़ू के बदले तयम्मुम या ग़ुस्ल के बदले तयम्मुम की नीयत करे और दूसरा तयम्मुम अपने वज़ीफ़े को अंजाम देने की नीयत से करे तो यह काफ़ी है।
734. जिस शख़्स का फ़रीज़ा तयम्मुम हो अगर वह किसी काम के लिये तयम्मुम करे तो जब तक उसका तयम्मुम और उज़्र बाक़ी है वह उन कामों को कर सकता है जो वुज़ू या ग़ुस्ल कर के करने चाहियें लेकिन अगर उसका उज़्र वक़्त की तंगी हो या उसने पानी होते हुए नमाज़े मैयित या सोने के लिये तयम्मुम किया हो तो वह फ़क़त उन कामों को अंजाम दे सकता है जिनके लिये उसने तयम्मुम किया हो।
735. चन्द सूरतों में बेहतर यह है कि जो नमाज़े इंसान ने तयम्मुम के साथ पढ़ी हों उनकी क़ज़ा करेः-
1. पानी के इस्तेमाल से डरता हो और उसने जान बूझकर अपने आप को जुनुब कर लिया हो और तयम्मुम कर के नमाज़ पढ़ी हो।
2. यह जानते हुए या गुमान करते हुए कि उसे पानी न मिल सकेगा अमदन अपने आप को जुनुब कर लिया हो और तयम्मुम कर के नमाज़ पढ़ी हो।
3. आख़िर वक़्त तक पानी की तलाश में न जाए और तयम्मुम कर के नमाज़ पढ़े और बाद में उसे पते चले कि तलाश करता तो उसे पानी मिल जाता।
4. जान बूझकर नमाज़ पढ़ने में ताख़ीर की हो और आखिरे वक़्त में तयम्मुम कर के नमाज़ पढ़ी हो।
5. यह जानते हुए या गुमान करते हुए कि पानी नहीं मिलेगा जो पानी उसके पास था उसे गिरा दिया हो और तयम्मुम कर के नमाज़ पढ़ी हो।
अह्कामे नमाज़
नमाज़ दीनी अअमाल में से बेहतरीन अमल है। अगर यह दरगाहे इलाही में क़बूल हो गई तो दूसरी इबादात भी क़बूल हो जायेंगी और अगर यह क़बूल न हुई तो दूसरे अअमाल भी क़बूल न होगें। जिस तरह इंसान अगर दिन रात में पांच दफ़्आ नहर में नहाए धोए तो उसके बदन पर मैल कुचैल नहीं रहती उसी तरह पांच वक़्ता नमाज़ भी इंसान को गुनाहों से पाक कर देती है और बेहतर है कि इंसान नमाज़े अव्वले वक़्त पढ़े। जो शख़्स नमाज़ को मअमूली और ग़ैर अहम समझे वह उस शख़्स की मानिन्द है जो नमाज़ न पढ़ता हो। रसूले अकरम स्वल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने फ़रमाया है कि, जो शख़्स नमाज़ को अहम्मीयत न दे और उसे मअमूली चीज़ समझे वह अज़ाबे आख़िरत का मुस्तहक़ है। एक दिन रसूले अकरम स्वल्लाल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम मस्जिद में तशरीफ़ फ़रमा थे कि एक शख़्स मस्जिद में दाखिल हुआ और नमाज़ पढ़ने में मश्ग़ूल हो गया लेकिन रूकू और सुजूद मुकम्मल तौर पर बजा न लाया, इस पर हुज़ूर स्वल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने फ़रमाया कि अगर यह शख़्स इस हालत में मर जाए जबकि इसके नमाज़ पढ़ने का यह तरीक़ा है तो यह हमारे दीन पर नहीं मरेगा। इस इंसान को ख़्याल रखना चाहिये कि नमाज़ जल्दी जल्दी न पढ़े और नमाज़ की हालत में ख़ुदा की याद में रहे और ख़ुज़ूउ व खुशूउ और संजीदगी से नमाज़ पढ़े और यह ख़्याल रखे कि किस हस्ती से कलाम कर रहा है और अपने आपको ख़ुदा वन्दे आलम की अज़मत और बुज़ुर्गी के मुक़ाबिले में हक़ीर और नाचीज़ समझे। अगर इंसान नमाज़ के दौरान पूरी तरह इन बातों की तरफ़ मुतवज्जह रहे तो वह अपने आप से बेख़बर हो जाता है जैसा कि नमाज़ की हालत में अमीरूल मोमिनीन इमाम अली (अ0) के पांव से तीर खींच लिया गया और आप (अ0) को ख़बर तक न हुई। अलावा अज़ीं नमाज़ पढ़ने वाले को चाहिये कि तौबा व इसतिग़्फ़ार करे और न सिर्फ़ उन गुनाहों को जो नमाज़ क़बूल होने में माने होते हैं मसलन हसद, तकब्बुर, ग़ीबत, हराम खाना, शराब पीना और ख़ुम्स व ज़कात का अदा न करना – तर्क करे बल्कि तमाम गुनाह तर्क कर दे और इसी तरह बेहतर है कि जो काम नमाज़ का सवाब घटाते हैं वह न करे मसलन औघंने की हालत में या पेशाब रोक कर नमाज़ के लिये न खड़ा हो और नमाज़ के मौक़े पर आस्मान की जानिब न देखे और वह काम करे जो नमाज़ का सवाब बढ़ाते हैं मसलन अक़ीक़ की अंगूठी और पाकीज़ा लिबास पहने, कंघी और मिसवाक करे नीज़ ख़ुश्बू लगाए।
वाजिब नमाज़ें
छः नमाज़े वाजिब हैः-
1.रोज़ाना की नमाज़ें,
2.नमाज़े आयात,
3.नमाज़े मैयित,
4.खानए कअबा के वाजिब तवाफ़ की नमाज़,
5.बाप की क़ज़ा नमाज़ें जो बड़े बेटे पर वाजिब हैं,
6.जो नमाज़े इजारा, मन्नत, क़सम और अह्द से वाजिब हो जाती हैं और नमाज़े जुमा रोज़ाना नमाज़ों में से है।
रोज़ाना की वाजिब नमाज़ें
रोज़ाना की वाजिब नमाज़ें पांच हैः-
ज़ोहर और अस्र (हर एक चार रक्अत) मग़रिब (तीन रक्अत) इशा (चार रक्अत) और फ़ज्र (दो रक्अत) ।
736. इंसान सफ़र में हो तो ज़रूरी है कि चार रक्अती नमाज़ें उन शराइत के साथ जो बाद में बयान होंगी दो रक्अत पढ़े।
ज़ोहर और अस्र की नमाज़ का वक़्त
737. अगर लकड़ी या किसी ऐसी ही सीधी चीज़ को जिस शाखिस कहते हैं हमवार ज़मीन में गाड़ा जाए तो सुब्ह के वक़्त जब सूरत तुलूहउ होता है उसका साया मग़रिब की तरफ़ पड़ता है और जूं जूं सूरज ऊंचा होता जाता है उसका साया घटता जाता है और हमारे शहरे में ज़ोहरे शरई के वक़्त कमी के आख़िरी दरजे पर पहुंच जाता है और ज़ोहर गुज़रने के बाद उसका साया मशरिक़ की तरफ़ हो जाता है और जूं जूं सूरज मग़रिब की तरफ़ ढलता है साया बढ़ता जाता है । इस बिना पर जब साया कमी के आख़िरी दरजे तक पहुंचे और दोबारा बढ़ने लगे तो पता चलता है कि ज़ोहरे शरई का वक़्त हो गया है। लेकिन बाज़ शहरों मसलन मक्कए मुकर्रमा में जहां बाज़ औक़ात ज़ोहर के वक़्त साया बिल्कुल ख़त्म हो जाता है जब साया दोबारा ज़ाहिर होता है तो मालूम हो जाता है कि ज़ोहर का वक़्त हो गया है।
738. ज़ोहर और अस्र की नमाज़ का वक़्त ज़वाले आफ़्ताब से गुरूबे आफ़्ताब तक है लेकिन अगर को शख़्स जान बूझकर अस्र की नमाज़ को ज़ोहर की नमाज़ पहले पढ़े तो उसकी अस्र की नमाज़ बातिल है सिवाए इसके कि आख़िरी वक़्त तक एक नमाज़ से ज़्यादा पढ़ने का वक़्त बाक़ी न हो क्योंकि ऐसी सूरत में अगर उसने ज़ोहर की नमाज़ नहीं पढ़ी तो उसकी ज़ोहर की नमाज़ क़ज़ा होगी और उसे चाहिये कि अस्र की नमाज़ पढ़े और अगर कोई शख़्स उस वक़्त से पहले ग़लत फ़हमी की बिना पर अस्र की पूरी नमाज़ ज़ोहर की नमाज़ से पहले पढ़ ले तो उसकी नमाज़ सहीह है और एहतियाते मुस्तहब यह है कि उस नमाज़ को नमाज़े ज़ोहर क़रार दे और माफ़िज़्ज़िम्मा की नीयत से चार रक्अत और पढ़े।
739. अगर कोई शख़्स ज़ोहर की नमाज़ पढ़ने से पहले ग़लती से अस्र की नमाज़ पढ़ने लग जाए और नमाज़ के दौरान उसे पते चले कि उससे ग़लती हुई है तो उसे चाहिये कि नीयत नमाज़े ज़ोहर की जानिब फेर दे। यानी नीयत करे कि जो कुछ मैं पढ़ चुका हूँ और पढ़ रहा हूँ और पढ़ूंगा वह तमाम की तमाम नमाज़े ज़ोहर है और जब नमाज़ ख़त्म करे तो उसके बाद अस्र की नमाज़ पढ़े।
नमाज़े जुमा के अहकामः-
740. जुमा की नमाज़ सुब्ह की नमाज़ की तरह दो रक्अत की है। इसमें और सुब्ह की नमाज़ में फ़र्क़ यह है कि इस नमाज़ से पहले दो ख़ुत्बे भी हैं। जुमा की नमाज़ वाजिबे तख़्ईरी है। इससे मुराद यह है कि जुमा के दिन मुकल्लफ़ को इख़्तियार है कि अगर नमाज़े जुमा के शराइत मौजूद हों तो जुमा की नमाज़ पढ़े या ज़ोहर की नमाज़ पढ़े। लिहाज़ा अगर इंसान जुमा की नमाज़ पढ़े तो वह ज़ोहर की नमाज़ की किफ़ायत करती है (यानी फिर ज़ोहर की नमाज़ पढ़ना ज़रूरी नहीं) ।
जुमा की नमाज़ वाजिब होने की चन्द शर्तें हैं-
(अव्वल) वक़्त का दाखिल होना जो कि ज़वाले आफ़्ताब है और उसका वक़्ते अव्वल ज़वाले उर्फ़ी है। पस जब भी उसे ताख़ीर हो जाए, उसका वक़्त ख़त्म हो जाता है और फिर ज़ोहर की नमाज़ अदा करनी चाहिये।
(दोम) नमाज़ पढ़ने वालों की तादाद जो कि बमअ इमाम पांच अफ़्राद है और जब तक पांच मुसलमान इकट्ठे न हों जुमा की नमाज़ वाजिब नहीं होती।
(सोम) इमाम का जामेए शराइते इमामत होना – मसलन अदालत वग़ैरा जो कि इमामे जमाअत में मोअतबर हैं और नमाज़े जमाअत की बह्स में बताया जायेगा। अगर यह शर्त पूरी न हो तो जुमा की नमाज़ वाजिब नहीं होती।
जुमा की नमाज़ के सहीह होने की चन्द शर्तें हैं –
(अव्वल) बा जमाअत पढ़ा जाना। पस यह नमाज़ फ़ुरादा अदा करना सहीह नहीं और जब मुक़्तदी नमाज़ की दूसरी रक्अत के रूकू से पहले इमाम के साथ शामिल हो जाए तो उसकी नमाज़ सहीह है और वह उस नमाज़ पर एक रक्अत का इज़ाफ़ा करेगा और अगर वह रूकू में इमाम को पा ले (यानी नमाज़ में शामिल हो जाए) तो उसकी नमाज़ का सहीह होना मुश्किल है और एहतियाते तर्क नहीं होती (यानी उसे ज़ोहर की नमाज़ पढ़नी चाहिये)।
(दोम) नमाज़ से पहले दो ख़ुत्बे पढ़ना। पहले ख़ुत्बे में ख़तीब अल्लाह तअला की हम्द व सना बयान करे नीज़ नमाज़ियों को तक़्वा और परहेज़गारी की तल्क़ीन करे। फिर क़ुरआने मजीद का एक छोटा सूरा पढ़ कर (मिम्बर पर लम्हा दो लम्हा) बैठ जाए और फिर खड़ा हो और दोबारा अल्लाह तअला की हम्द व सना बजा लाए। फिर हज़रत रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम और आइम्मा ए ताहिरीन (अ0) पर दुरूद भेजे और एहतियाते मुस्तहब यह है कि मोमिनीन और मोमिनात के लिये इस्तिग़्फ़ार (बख़्शिश की दुआ) करे। ज़रूरी है कि ख़ुत्बे नमाज़ से पहले पढ़े जायें। पस अगर नमाज़ दो ख़ुत्बों से पहले शूरू कर ली जाए तो सहीह नहीं होगी और ज़वाले आफ़्ताब से पहले ख़ुत्बे पढ़ने में इश्काल है और ज़रूरी है कि जो शख़्स ख़ुत्बे पढ़े वह ख़ुत्बे पढ़ने के वक़्त खड़ा हो। लिहाज़ा अगर वह बैठ कर ख़ुत्बे पढ़ेगा तो सहीह नहीं होगा और दो ख़ुत्बों के दरमियान बैठकर फ़ासिला देना लाज़िम और वाजिब है। और ज़रूरी है कि मुख़्तसर लम्हों के लिये बैठे। और यह भी ज़रूरी है कि इमामे जमाअत और ख़तीब यानी जो शख़्स ख़ुत्बे पढ़े – एक ही शख़्स हो, और अक़्वा यह है कि ख़ुत्बे में तहारत शर्त नहीं है अगरचे इश्तिरात (यानी शर्त होना) अहवत है। और एहतियात की बिना पर अल्लाह तअला की हम्द व सना इसी तरह पैग़म्बरे अकरम (स0) और अइम्मतुल मुसलिमीन पर अरबी ज़बान मे दुरूद भेजना मोअत्बर है और उससे ज़्यादा में अरबी मोअत्बर नहीं है। बल्कि अगर हाज़िरीन की अक्सरीयत अरबी न जानती हो तो एहतियाते लाज़िम यह है कि तक़्वा के बारे में वअज़ व नसीहत करते वक़्त जो ज़बान हाज़िरीन जानते हैं उसी तक़्वा की नसीहत करे।
(सोम) यह कि जुमा की दो नमाज़ों के दरमियान एक फ़र्सख़ से कम फ़ासिला न हो। पस जब जुमा की दूसरी नमाज़ एक फ़र्सख से कम फ़ासिले पर क़ाइम हो और दो नमाज़े वयक वक़्त पढ़ी जायें तो दोनों बातिल होंगी और अगर एक नमाज़ को दूसरी नमाज़ पर सबक़त हासिल हो ख़्वाह वह तक्बीरतुल एहराम की हद तक ही क्यों न हो तो वह (नमाज़ जिसे सबक़त हासिल हो) सहीह होगी और दूसरी बातिल होगी, लेकिन अगर नमाज़ के बाद पता चले कि एक फ़र्सख़ से कम फ़ासिले पर जुमा की एक और नमाज़ इससे पहले या इसके साथ साथ क़ाइम हुई थी तो ज़ोहर की नमाज़ वाजिब नहीं होगी और इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि इस बात का इल्म वक़्त में हो या वक़्त के बाद हो। और जुमा की नमाज़ का क़ाइम करना मज़्कूरा फ़ासिले के अन्दर जुमा की दूसरी नमाज़ का क़ाइम करने में उस वक़्त माने होता है जब वह नमाज़ खुद सहीह और जामेउश्शराइत हो वर्ना उसके माने होने में इश्कल है। और ज़्यादा एहतिमाल उसके माने न होने का है।
741. जब जुमा की एक ऐसी नमाज़ क़ाइम हो जो शराइत को पूरी करती हो और नमाज़ क़ाइम करने वाला इमामे वक़्त या उसका नायब हो तो उस सूरत में नमाज़े जुमा में हाज़िर होना वाजिब है। और उस सूरत के अलावा हाज़िर होना वाजिब नहीं है। पहली सूरत में हाज़िरी के वुजूब के लिये चन्द चीज़ें मोअतबर हैः-
(अव्वल) मुकल्लफ़ मर्द हो – और जुमा की नमाज़ में हाज़िर होना औरतों के लिये वाजिब नहीं है।
(दोम) आज़ाद होना – लिहाज़ा ग़ुलामों के लिये जुमा की नमाज़ में हाज़िर होना वाजिब नहीं है।
(सोम) मुक़ीम होना – लिहाज़ा मुसाफ़िर के लिये जुमा की नमाज़ में शामिल होना वाजिब नहीं है। उस मुसाफ़िर में जिसका फ़रीज़ा क़स्र हो और जिस मुसाफ़िर नें इमामत की क़स्द किया हो और उसका फ़रीज़ा पूरी नमाज़ पढ़ना हो कोई फ़र्क़ नहीं है।
(चहारुम) बीमार और अंधा न होना – लिहाज़ा बिमार और अंधे शख़्स पर जुमा की नमाज़ वाजिब नहीं है।
(पंजुम) बूढ़ा न होना – लिहाज़ा बूढ़ों पर यह नमाज़ वाजिब नहीं है।
(शशुम) यह कि ख़ुद इंसान के और उस जगह के दरमियान जहां जुमुअ की नमाज़ क़ाइम हो दो फ़र्सख़ से ज़्यादा फ़ासिला न हो और जो शख़्स दो फ़र्सख़ के सिरे पर हो उसके लिये हाज़िर होना वाजिब है और इसी तरह वह शख़्स जिसके लिये जुमा की नमाज़ में बारिश या सख़्त सर्दी की वजह से हाज़िर होना मुश्किल या दुश्वार हो तो हाज़िर होना वाजिब नहीं है।
742. चन्दअहकामजिनकातअल्लुक़जुमाकीनमाज़सेहैयहहैः-
(अव्वल) जिस शख़्स पर जुमा की नमाज़ साक़ित हो गई हो और उसका उस नमाज़ में हाज़िर होना वाजिब न हो उसके लिये जाइज़ है कि ज़ोहर की नमाज़ अव्वले वक़्त में अदा करने की जल्दी करे।
(दोम) इमाम को ख़ुत्बे के दौरान बातें करना मकरूह है लेकिन अगर बातों की वजह से ख़ुत्बा सुनने में रूकावट हो तो एहतियात की बिना पर बातें करना जाइज़ नहीं है। और जो तादाद नमाज़े जुमा के वाजिब होने के लिये मोअतबर है उसमें और उससे ज़्यादा के दरमियान कोई फ़र्क़ नहीं है।
(सोम) एहतियात की बिना पर दोनों ख़ुत्बों का तवज्जोह से सुनना वाजिब है लेकिन जो लोग ख़ुत्बों के मअना न समझते हों उनके लिये तवज्जोह से सुना वाजिब नहीं है।
(चहारुम) जुमा के दिन की दूसरी अज़ान बिद्अत है और यह वही अज़ान है जिसे आम तौर पर तीसरी अज़ान कहा जाता है।
(पंजुम) ज़ाहिर यह है कि जब इमामे जुमा ख़ुत्बा पढ़ रहा हो तो हाज़िर होना वाजिब नहीं है।
(शशुम) जब जुमा की नमाज़ के लिये अज़ान दी जा रही हो तो खरीद व फ़रोख़्त उस सूरत में जबकि वह नमाज़ में माने हो हराम है और अगर ऐसा न हो तो फिर हराम नहीं है और अज़्हर यह है कि ख़रीद व फ़रोख़्त हराम होने की सूरत में भी मुआमला बातिल नहीं होता।
(हफ़्तुम) अगर किसी शख़्स पर जुमा की नमाज़ में हाज़िर होना वाजिब हो और वह उस नमाज़ को तर्क करे और ज़ोहर की नमाज़ बजा लाए तो अज़्हर यह है कि उसकी नमाज़ सहीह होगी।
मग़्रिब और इशा की नमाज़ का वक़्त
743. एहतियाते वाजिब यह है कि जब तक मश़्रिक़ की जानिब की वह सुर्ख़ी जो सूरज ग़ुरूब होने के बाद ज़ाहिर होती है इंसान के सर पर से न ग़ुज़र जाए वह मग़्रिब की नमाज़ न पढ़े।
744. मग़्रिब और इशा की नमाज़ का वक़्त मुख़्तार शख़्स के लिये आधी रात तक रहता है लेकिन जिन लोंगो को कोई उज़्र हो मसलन भूल जाने की वजह से या नीन्द या हैज़ या उन जैसे दूसरे उमूर की वजह से आधी रात से पहले नमाज़ पढ़ सकते हों तो उनके लिये मग़्रिब और इशा की नमाज़ का वक़्त फ़ज्र तुलूउ होने तक बाक़ी रहता है। लेकिन इन दोनों नमाज़ों के दरमियान मुतवज्जह होने की सूरत में तरतीब मोअतबर है यानी इशा की नमाज़ को जान बूझकर मग़्रिब की नमाज़ से पहले पढ़े तो बातिल है। लेकिन अगर इशा की नमाज़ अदा करने की मिक़्दार से ज़्यादा वक़्त बाक़ी न रहा हो तो उस सूरत में लाज़िम है कि इशा की नमाज़ को मग़्रिब की नमाज़ से पहले पढ़े।
745. अगर कोई शख़्स ग़लत फ़हमी की बिना पर इशा की नमाज़ मग़्रिब की नमाज़ से पहले पढ़ ले और नमाज़ के बाद इस अम्र की जानिब मुतवज्जह हो तो उसकी नमाज़ सहीह है और ज़रूरी है कि मग़्रिब की नमाज़ उसके बाद पढ़े।
746. अगर कोई शख़्स मग़्रिब की नमाज़ पढ़ने से पहले भूलकर इशा की नमाज़ पढ़ने में मश्ग़ूल हो जाए और नमाज़ के दौरान उसे पता चले कि उसने ग़लती की है और अभी वह चौथी रक्अत के रूकू तक न पहुंचा हो तो ज़रूरी है कि मग़्रिब की तरफ़ नीयत फेर ले और नमाज़ को तमाम करे और बाद में इशा की नमाज़ पढ़े और अगर चौथी रक्अत के रूकू में जा चुका हो तो उसे इशा की नमाज़ क़रार दे और ख़त्म करे और बाद में मग़्रिब की नमाज़ बजा लाए।
747. इशा की नमाज़ का वक़्त मुख़्तार शख़्स के लिये आधी रात है और रात का हिसाब सूरज ग़ुरूब होने की इब्तिदा से तुलूए फ़ज्र तक है।
748. अगर कोई शख़्स इख़्तियारी हालत में मग़्रिब और इशा की नमाज़ आधी रात तक न पढ़े तो एहतियाते वाजिब की बिना पर ज़रूरी है कि अज़ाने सुब्ह से पहले क़ज़ा और अदा की नीयत किये बग़ैर इन नमाज़ों को पढ़े।
सुब्ह की नमाज़ का वक़्त
749. सुब्ह की अज़ान के क़रीब मश्रिक़ की तरफ़ से एक सफ़ैदी ऊपर उठती है जिसे फ़ज्रे अव्वल कहा जाता है। जब यह सफ़ैदी फैल जाए तो वह फ़ज्रे दोम और सुब्ह की नमाज़ का अव्वले वक़्त है और सुब्ह की नमाज़ का आख़िरी वक़्त सूरज निकलने तक है।
औक़ाते नमाज़ के अहकाम
750. इंसान नमाज़ में उस वक़्त मश्ग़ूल हो सकता है जब उसे यक़ीन हो जाए कि वक़्त दाख़िल हो गया है या दो आदिल मर्द वक़्त दाख़िल होने की ख़बर दें बल्कि किसी वक़्त शनास शख़्स की जो क़ाबिले इत्मीनान हो अज़ान या वक़्त दाख़िल होने के बारे में गवाही पर भी इक़्तिफ़ा किया जा सकता है।
751. अगर कोई शख़्स किसी ज़ाती उज़्र मसलन बीनाई न होने या क़ैद ख़ाने में होने की वजह से नमाज़ का अव्वल वक़्त दाखिल होने का यक़ीन न कर सके तो ज़रूरी है कि नमाज़ पढ़ने में ताख़ीर करे हत्ता की उसे यक़ीन या इत्मीनान हो जाए कि वक़्त दाखिल हो गया है। इसी तरह अगर वक़्त दाखिल होने का यक़ीन होने में ऐसी चीज़ माने हो जो मसलन बादल, ग़ुबार या इन जैसी दूसरी चीज़ों (मसलन धुंध) की तरह उमूमन पेश आती हो तो एहितयाते लाज़िम की बिना पर उसके लिये भी यही हुक्म है।
752. अगर मज़्कूरा बाला तरीक़े से किसी शख़्स को इत्मीनान हो जाए कि नमाज़ का वक़्त हो गया है और वह नमाज़ में मश्ग़ूल हो जाए लेकिन नमाज़ के बाद उसे पता चले कि अभी वक़्त दाख़िल नहीं हुआ तो उसकी नमाज़ बातिल है और अगर नमाज़ के बाद पता चले कि उसने सारी नमाज़ वक़्त से पहले पढ़ी तो उसके लिये भी यही हुक्म है लेकिन अगर नमाज़ के दौरान उसे पता चले कि वक़्त दाखिल हो गया है या नमाज़ के बाद पता चले कि नमाज़ पढ़ते हुए वक़्त दाखिल हो गया था तो उसकी नमाज़ सहीह है।
753. अगर कोई शख़्स इस अम्र की जानिब मुतवज्जह न हो कि वक़्त के दाखिल होने का यक़ीन कर के नमाज़ में मश्ग़ूल होना चाहिये लेकिन नमाज़ के बाद उसे मालूम हो कि उसने सारी नमाज़ वक़्त में पढ़ी है तो उसकी नमाज़ सहीह है और अगर उसे पता चल जाए कि उसने वक़्त से पहले नमाज़ पढ़ी है या उसे पता चले न चले कि वक़्त में पढ़ी है या वक़्त से पहले पढ़ी है तो उसकी नमाज़ बातिल है। बल्कि अगर नमाज़ के बाद उसे पता चले कि नमाज़ के दौरान वक़्त दाखिल हो गया था तब भी उसे चाहिये की नमाज़ को दोबारा पढ़े।
754. अगर किसी शख़्स को यक़ीन हो कि वक़्त दाखिल हो गया है और नमाज़ पढ़ने लगे लेकिन नमाज़ के दौरान शक करे कि वक़्त दाखिल हुआ है या नहीं तो उसकी नमाज़ बातिल है लेकिन अगर नमाज़ के दौरान उसे यक़ीन हो कि वक़्त दाखिल हो गया है और शक करे की जितनी नमाज़ पढ़ी है वह वक़्त पर पढ़ी है या नहीं तो उसकी नमाज़ सहीह है।
755. अगर नमाज़ का वक़्त इतना तंग हो कि नमाज़ के बाद मुस्तहब अफ़्आल अदा करने से नमाज़ की कुछ मिक़्दार वक़्त के बाद पढ़नी पड़ती हो तो ज़रूरी है कि वह मुस्तहब उमूर को छोड़ दे मसलन अगर क़ुनूत पढ़ने की वजह से नमाज़ का कुछ हिस्सा वक़्त के बाद पढ़ना पड़ता हो तो उसे चाहिये की क़ुनूत न पढ़े।
756. जिस शख़्स के पास नमाज़ की फ़क़त एक रक्आत अदा करने का वक़्त हो उसे चाहिये कि नमाज़ अदा की नीयत से पढ़े अलबत्ता उसे जान बूझकर नमाज़ में इतनी ताखीर नहीं करनी चाहिये।
757. जो शख़्स सफ़र में न हो अगर उसके पास ग़ुरूबे आफ़ताब तक पांच रक्अत नमाज़ पढ़ने के अन्दाज़े के मुताबिक़ वक़्त हो तो उसे चाहिये कि ज़ोहर और अस्र की दोनों नमाज़े पढ़े लेकिन अगर उसके पास उससे कम वक़्त हो तो उसे चाहिये कि सिर्फ़ अस्र की नमाज़ पढ़े और बाद में ज़ोहर की नमाज़ की क़ज़ा करे और इसी तरह अगर आधी रात तक उसके पास पांच रक्अत पढ़ने के अन्दाज़े के मुताबिक़ वक़्त हो तो उसे चाहिये की मग़्रीब और इशा की नमाज़ पढ़े और अगर वक़्त इससे कम हो तो उसे चाहिये कि सिर्फ़ इशा की नमाज़ पढ़े और बाद में अदा और क़ज़ा की नीयत किये बग़ैर नमाज़े मग़्रिब पढ़े।
758. जो शख़्स सफ़र में हो अगर ग़ुरूबे आफ़ताब तक उसके पास तीन रक्अत नमाज़ पढ़ने के अन्दाज़े के मुताबिक़ वक़्त हो तो उसे चाहिये कि ज़ोहर और अस्र की नमाज़ पढ़े और अगर इस से कम वक़्त हो तो उसे चाहिये कि सिर्फ़ अस्र की नमाज़ पढ़े और ज़ोहर की क़ज़ा करे और अगर आधी रात तक उसके पास चाह रक्अत नमाज़ पढ़ने के मुताबिक़ वक़्त हो तो उसे चाहिये कि मग़रिब और इशा की नमाज़ पढ़े और अगर नमाज़ के तीन रक्अत के बराबर वक़्त हो तो उसे चाहिये कि पहले इशा की नमाज़ पढ़े और बाद में मग़रिब की नमाज़ बजा लाए ताकि नमाज़ मग़रिब की एक रक्आत वक़्त में अंजाम दी जाए, और अगर नमाज़ की तीन रक्अत से कम वक़्त बाक़ी हो तो ज़रूरी है कि पहले इशा की नमाज़ पढ़े और बाद में मग़रिब की नमाज़ अदा और क़ज़ा की नीयत किये बग़ैर पढ़े और अगर इशा की नमाज़ पढ़ने के बाद मालूम हो जाए कि आधी रात होने में एक रक्आत या उससे ज़्यादा रक्अते पढने के लिये वक़्त बाक़ी है तो उसे चाहिये की मग़रिब की नमाज़ फ़ौरन अदा की नीयत से बजा लाए।
759. इंसान के लिये मुस्तहब है कि नमाज़ अव्वले वक़्त में पढ़े और इसके मुताबिक़ बहुत ज़्यादा ताक़ीद की गई है और जितना अव्वले वक़्त के क़रीब हो बेहतर है मासिव इसके कि उसमें ताख़ीर किसी वजह बेहतर हो मसलन इसलिये इन्तिज़ार करे कि नमाज़ जमाअत के साथ पढ़े।
760. जब इंसान के पास कोई ऐसा उज़्र हो कि अगर अव्वले वक़्त में नमाज़ पढ़ना चाहे तो तयम्मुम कर के नमाज़ पढ़ने पर मजबूर हो और उसे इल्म हो कि उसका उज़्र आख़िरे वक़्त तक बाक़ी रहेगा या आख़िरे वक़्त तक उज़्र के दूर होने से मायूस हो तो वह अव्वले वक़्त में तयम्मुम कर के नमाज़ पढ़ सकता है लेकिन अगर मायूस न हो तो ज़रूरी है कि उज़्र दूर होने तक इन्तिज़ार करे और अगर उसका उज़्र दूर न हो तो आख़िरे वक़्त में नमाज़ पढ़े और यह ज़रूरी नहीं कि इस क़दर इन्तिज़ार करे कि नमाज़ के सिर्फ़ वाजिब अफ़्आल अन्जाम दे सके बल्कि उसके पास मुस्तहबाते नमाज़ मसलन अज़ान, इक़ामत और क़ुनूत के लिये भी वक़्त हो तो तयम्मुम के अलावा दूसरी मजबूरियों की सूरत में अगरचे उज़्र दूर होने से मायूस न हुआ हो उसके लिये जाइज़ है कि अव्वले वक़्त में नमाज़ पढ़े। लेकिन अगर वक़्त के दौरान उसका उज़्र दूर हो जाए तो ज़रूरी है कि दोबारा नमाज़ पढ़े।
761. अगर एक शख़्स नमाज़ के मसाइल और शक्कीयात और सहवीयात का इल्म न रखता हो और उसे इस बात का एहतिमाल हो कि उसे नमाज़ के दौरान इन मसाइल में से कोई न कोई मसअला पेश आयेगा और उसके याद न करने की वजह से किसी लाज़िमी हुक्म की मुख़ालिफ़त होती हो तो ज़रूरी है कि उन्हें सीखने के लिये नमाज़ को मुवख़्खर कर दे लेकिन अगर उसे उम्मीद हो कि सहीह तरीक़े से नमाज़ अंजाम दे सकता है और अव्वले वक़्त में नमाज़ पढ़ने में मश्ग़ूल हो जाए पस अगर नमाज़ में कोई ऐसा मस्अला न पेश आए जिसका हुक्म न जानता हो तो उसकी नमाज़ सहीह है। और अगर कोई ऐसा मस्अला पेश आ जाए जिसका हुक्म न जानता हो तो उसके लिये जाइज़ है कि जिन दो बातों का एहतिमाल हो उनमें से एक पर अमल करे और नमाज़ ख़त्म करे ताहम ज़रूरी है कि नमाज़ के बाद मस्अला पूछे और अगर उसकी नमाज़ बातिल साबित हो तो दोबारा पढ़े और अगर सहीह हो तो दोबारा पढ़ना लाज़िमी नहीं है।
762. अगर नमाज़ का वक़्त वसी हो और क़र्ज़ ख़्वाह भी अपने क़र्ज़ का मुतालबा करे तो अगर मुम्किन हो तो ज़रूरी है कि पहले क़र्ज़ा अदा करे और बाद में नमाज़ पढ़े। और अगर कोई दूसरा वाजिब काम पेश आ जाए जिसे फ़ौरन बजा लाना ज़रूरी हो तो उसके लिये भी यही हुक्म है। मसलन अगर देखे कि मस्जिद नजिस हो गई है तो ज़रूरी है कि पहले मस्जिद को पाक करे और बाद में नमाज़ पढ़े और अगर मज़कूरा बाला दोनों सूरतों में पहले नमाज़ पढ़े तो गुनाह का मुर्तकिब होगा लेकिन उसकी नमाज़ सहीह होगी।
वह नमाज़ें जो तरतीब से पढ़नी ज़रूरी हैं
763. ज़रूरी है कि इंसान नमाज़े अस्र नमाज़े ज़ोहर के बाद और नमाज़े इशा नमाज़े मग़रिब के बाद पढ़े और अगर जानबूझ कर नमाज़े अस्र नमाज़े ज़ोहर से पहले पढ़े और नमाज़े इशा नमाज़े मग़रिब से पहले पढ़े तो उसकी नमाज़ बातिल है।
764. अगर कोई शख़्स नमाज़े ज़ोहर की नीयत से नमाज़ पढ़नी शुरू करे तो नमाज़ के दौरान उसे याद आए कि नमाज़े ज़ोहर पढ़ चुका है तो वह नीयत को नमाज़े अस्र की जानिब नहीं मोड़ सकता बल्कि ज़रूरी है कि नमाज़ तोड़ कर नमाज़े अस्र पढ़े और मग़रिब और इशा में भी यही सूरत है।
765. अगर नमाज़े अस्र के दौरान किसी शख़्स को यक़ीन हो कि उसने नमाज़े ज़ोहर नहीं पढ़ी है और वह नीयत को नमाज़े ज़ोहर की तरफ़ मोड़ दे तो जूं ही उसे याद आए कि वह नमाज़े ज़ोहर पढ़ चुका है तो नीयत को नमाज़े अस्र की तरफ़ मोड़ दे और नमाज़ मुकम्मल करे। लेकिन अगर उसने नमाज़ के बाज़ अज्ज़ा को ज़ोहर की नीयत से अंजाम न दिया हो या ज़ोहर की नीयत से अंजाम दिया हो तो उस सूरत में उन अज्ज़ा को अस्र की नीयत से दोबारा अंजाम दे। लेकिन अगर वह जुज़ एक रक्अत का रूकू हो या दो सज्दे हों तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर नमाज़ बातिल है।
766. अगर किसी शख़्स को नमाज़े अस्र के दौरान शक हो कि उसने नमाज़े ज़ोहर पढ़ी है या नहीं तो ज़रूरी है कि अस्र की नीयत से नमाज़ तमाम करे और बाद में ज़ोहर की नमाज़ पढ़े। लेकिन अगर वक़्त इतना कम हो कि नमाज़ पढ़ने के बाद सूरज डूब जाता हो और एक रक्अत नमाज़ के लिये भी वक़्त बाक़ी न बचता हो तो लाज़िम नहीं है कि नमाज़े ज़ोहर की क़ज़ा पढ़े।
767. अगर किसी को नमाज़े इशा के बाद शक हो जाए कि उसने मग़रिब पढ़ी है या नहीं तो ज़रूरी है कि इशा की नीयत से नमाज़ ख़त्म करे और बाद में मग़रिब की नमाज़ पढ़े। लेकिन अगर वक़्त इतना कम हो कि नमाज़ ख़त्म होने के बाद आधी रात हो जाती हो और एक रक्अत नमाज़ का वक़्त भी न बचता हो तो नमाज़े मग़रिब की क़ज़ा उस पर लाज़िम नहीं है।
768. अगर कोई शख़्स नमाज़े इशा की चौथी रक्अत के रूकू में पहुंचने के बाद शक करे कि उसने नमाज़े मग़रिब पढ़ी है या नहीं तो ज़रूरी है कि नमाज़ मुकम्मल करे। और अगर बाद में मग़रिब की नमाज़ के लिये वक़्त बाक़ी हो तो मग़रिब की नमाज़ भी पढ़ी।
769. अगर कोई शख़्स जो उसने पढ़ ली हो एहतियातन दोबारा पढ़े और नमाज़ के दौरान उसे याद आए कि उस नमाज़ से पहले वाली नमाज़ नहीं पढ़ी तो वह नीयत को उस नमाज़ की तरफ़ नहीं मोड़ सकता मसलन जब वह नमाज़े अस्र एहतियातन पढ़ रहा हो अगर उसे याद आए कि उसने नमाज़े ज़ोहर नहीं पढ़ी तो वह नीयत को नमाज़े ज़ोहर की तरफ़ नहीं मोड़ सकता।
770. नमाज़े क़ज़ा की नीयत नमाज़े अदा की तरफ़ और नमाज़े मुस्तहब की नीयत नमाज़े वाजिब की तरफ़ मोड़ना जाइज़ नहीं है।
771. अगर अदा नमाज़ का वक़्त वसी हो तो इंसान नमाज़ के दौरान यह याद आने पर कि उसके ज़िम्मे कोई क़ज़ा नमाज़ है, नीयत को नमाज़े क़ज़ा की तरफ़ मोड़ सकता है बशर्ते कि नमाज़े क़ज़ा की तरफ़ नीयत मोड़ना मुम्किन हो। मसलन अगर वह नमाज़े ज़ोहर में मश्ग़ूल हो तो नीयत को क़ज़ाए सुबह की तरफ़ उसे सूरत में मोड़ सकता है कि तीसरी रक्अत के रूकू में न दाखिल हुआ हो।
मुस्तहब नमाज़ें
772. मुस्तहब नमाज़े बहुत सी हैं जिन्हें नफ़ल कहते हैं और मुस्तहब नमाज़ों से रोज़ाआना के नफ़्लों की बहुत ज़्यादा ताकीद की गई है। यह नमाज़े रोज़े जुमा के अलावा चौंतीस रक्अत हैं। जिनमें से आठ रक्अत ज़ोहर की, आठ रक्अत अस्र की, चार रक्अत मग़रिब की, दो रक्अत इशा की, ग्यारा रक्अत नमाज़े शब (यानी तहज्जुद) की और दो रक्अत सुब्ह की होती हैं। और चूंकि एहतियाते वाजिब की बिना पर इशा की दो रक्अत नफ़ल बैठकर पढ़नी ज़रूरी है इस लिये वह एक रक्अत शुमार होती है। लेकिन जुमा के दिन ज़ोहर और अस्र की सोला रक्अत नफ़ल पर चार रक्अत का इज़ाफ़ा हो जाता है। और बेहतर है कि यह पूरी की पूरी बीस रक्अतें ज़वाल से पहले पढ़ी जायें।
773. नमाज़े शब की ग्यारा रक्अतों से आठ रक्अतें नाफ़िलाए शब की नीयत से और दो रक्अत नमाज़े शफ़अ की नीयत से और एक रक्अत नमाज़े वत्र की नीयत से पढ़नी ज़रूरी हैं और नाफ़िलए शब का मुकम्मल तरीक़ा दुआ की किताबों में मज़्कूर है।
774. नफ़ल नमाज़ें बैठकर भी पढ़ी जा सकती हैं लेकिन बाज़ फ़ुक़हा कहते हैं कि इस सूरत में बेहतर है कि बैठ कर पढ़ी जाने वाली नफ़ल नमाज़ की दो रक्अतों को एक रक्अत शुमार किया जाए मसलन जो शख़्स ज़ोहर की नफ़लें जिसकी आठ रक्अतें है बैठकर पढ़ना चाहे तो उसके लिये बेहतर है कि सोला रक्अतें पढ़े और अगर चाहे कि नमाज़े वित्र बैठकर पढ़े तो एक एक रक्अत की दो नमाज़ें पढ़े। ताहम इस काम का बेहतर होना मालूम नहीं है लेकिन रजा की नीयत से अंजाम दे तो कोई इश्काल नहीं है।
775. ज़ोहर और अस्र की नफ़्ली नमाज़ें सफ़र में नहीं पढ़नी चाहियें और अगर इशा की नफ़्लें रजा की नीयत से पढ़ी जाए तो कोई हरज नहीं है।
रोज़ाना की नफ़्लों का वक़्त
776. ज़ोहर की नफ़्लें नमाज़ें ज़ोहर से पहले पढ़ी जाती हैं। और जहां तक मुम्किन हो उसे ज़ोहर की नमाज़ से पहले पढ़ा जाए। और उसका वक़्त अव्वले ज़ोहर से लेकर ज़ोहर की नमाज़ अदा करने तक बाक़ी रहता है। लेकिन अगर कोई शख़्स ज़ोहर की नफ़्लों को उस वक़्त तक मुवख्खर कर दे कि शाखिस के साए की वह मिक़्दार जो ज़ोहर के बाद पैदा हो सात में से दो हिस्सों के बराबर हो जाए मसलन शाखिस की लम्बाई सात बालिश्त और साए की मिक़्दार दो बालिश्त हो तो इस सूरत में बेहतर यह है कि इंसान ज़ोहर की नमाज़ पढ़े।
777. अस्र की नफ़्लें अस्र की नमाज़ से पहले पढ़ी जाती हैं। और जब तक मुम्किन हो उसे अस्र की नमाज़ से पहले पढ़ा जाए। और उसका वक़्त अस्र की नमाज़ अदा करने तक बाक़ी रहता है। लेकिन अगर कोई शख़्स अस्र की नफ़्लें उस वक़्त तक मुवख्ख़र कर दे कि शाखिस के साए की वह मिक़्दार जो ज़ोहर के बाद पैदा हो सात में से चार हिस्सों तक पहुंच जाए तो उस सूरत में बेहतर है कि इंसान अस्र की नमाज़ पढ़े और अगर ज़ोहर या अस्र की नफ़्लें उस के मुक़र्ररा वक़्त के बाद पढ़ना चाहे तो ज़ोहर की नफ़्लें नमाज़े ज़ोहर के बाद और अस्र की नफ़्लें नमाज़े अस्र के बाद पढ़ सकता है। लेकिन एहतियात की बिना पर अदा और क़ज़ा की नीयत न करे।
778. मग़रिब की नफ़्लों का वक़्त नमाज़े मग़रिब ख़त्म होने के बाद होता है और जहां तक मुम्किन हो उसे मग़रिब की नमाज़ के फौरन बाद बजा लाए लेकिन अगर कोई शख़्स उस सुर्ख़ी के ख़त्म होने तक जो सूरज के ग़ुरुब होने के बाद आसमानन में दिखाई देती है मग़्ऱिब की नफ़्लों में ताखीर करे तो उस वक़्त बेहतर यह है कि इशा की नमाज़ पढ़े।
779. इशा की नफ़्लों का वक़्त नमाज़े इशा ख़त्म होने के बाद से आधी रात तक है और बेहतर है कि नमाज़े इशा ख़त्म होने के फ़ौरन बाद पढ़ी जाए।
780. सुब्ह की नफ़्लें सुब्ह की नमाज़े से पहले पढ़ी जाती हैं और उसका वक़्त नमाज़े शब का वक़्त ख़त्म होने के बाद से शुरू होता है और सुब्ह की नमाज़ अदा होने तक बाक़ी रहता है और जहां तक मुम्किन हो सुब्ह की नफ़्लें सुब्ह की नमाज़ से पहले पढ़नी चाहिये लेकिन अगर कोई शख़्स सुब्ह की नफ़्लें मश्रिक़ की सुर्ख़ी ज़ाहिर होने के बाद न पढ़े तो उस सूरत में यह है कि सुब्ह की नमाज़ पढ़े।
781. नमाज़े शब का अव्वले वक़्त मश्हूर क़ौल की बिना पर आधी रात है और सुब्ह की अज़ान तक उसका वक़्त बाक़ी रहता है। और बेहतर यह है कि सुब्ह की अज़ान के क़रीब पढ़ी जाए
782. मुसाफ़िर और वह शख़्स जिसके लिये नमाज़े शब का आधी रात के बाद अदा करना मुश्किल हो उसे अव्वले शब में भी अदा कर सकता है।
नमाज़े ग़ुफ़ैला
783. मश्हूर मुस्तहब नमाज़ों में से एक नमाज़े ग़ुफ़ैला है जो मग़्ऱिब और इशा की नमाज़ के दरमियान पढ़ी जाती है। इसकी पहली रक्अत में अलहम्द के बाद किसी दूसरी सूरत के बजाए यह आयत पढ़नी ज़रूरी हैः- व ज़न्नूने इज़् ज़हबा मुग़ाज़िबन फ़ज़न्ना अंल्लन तक़्दिरा अलैहे फ़नादा फ़िज़्ज़ुलुमाते अंल्ला इलाहा अल्ला अन्ता सुब्हानाका इन्नी कुन्तो मिनज़ ज़ालिमीना फ़स्तजब्ना लहू व नज्जैनाहो मिनल ग़म्मे व कज़ालिका नुंजिल मोमिनीन। और दूसरी रक्अत में अलहम्द के बाद बजाए किसी और सूरत के यह आयत पढ़ेः- व इन्दहू मफ़ातिहुल ग़ैबे ला यअलमुहा इल्ला हुवा व यअलमो मा फ़िल बर्रे वल बहरे व मा तस्क़ुतो मिंव वरक़तिन इल्ला यअलमुहा व ला हब्बतिन फ़ी ज़ुलुमातिल अर्ज़े व ला रत्बिंव व ला याबिसिन इल्ला फ़ी किताबिम मुम्बीन। और इसके क़ुनूत में यह पढ़ेः- अल्लाहुम्मा इन्नी अस्अलुका बे मफ़ातिहिल ग़ैबिल्लती ला यअतमुहा इल्ला अन्ता अन तुस्वल्लिया अला मोहम्मदिंव व आले मोहम्मदिंव व अन तफ़्अलबी कज़ा व कज़ा। और क़ज़ा व कज़ा के बजाए अपनी हाजतें बयान करे और उसके बाद कहेः- अल्लाहुम्मा अन्ता वलीयो नेमती वल क़ादिरो अला तलेबती तअलमु हाजती फ़असअलुका बे हक़्क़े मोहम्मदिंव व आले मोहम्मदिन अलैहे व अलैहिममुस्सलामु लम्मा क़ज़ैतहा ली। क़िब्ले के अहकाम
784. रव़ानए कअबः जो मक्कए मुर्कार्रमा में है वह हमारा क़िब्ला है लिहाज़ा (हर मुसलमान के लिये) ज़रूरी है कि उसके सामने खड़े होकर नमाज़ पढ़े। लेकिन जो शख़्स उससे दूर हो अगर वह इस तरह खड़ा हो कि लोग कहें कि क़िब्ले की तरफ़ मुंह करके नमाज़ पढ़ रहा है तो काफ़ी है। और दूसरे काम जो क़िब्ले की तरफ़ मुंह कर के अंजाम देने ज़रूरी हैं मसलन हैवानात को ज़िब्हा करना उनका भी यही हुक्म है।
785. जो शख़्स खड़ा होकर वाजिब नमाज़ पढ़ रहा हो ज़रूरी है कि उसका सीना और पेट क़िब्ले की तरफ़ हो। बल्कि उसका चेहरा क़िब्ले से बहुत ज़्यादा फिरा हुआ नहीं होना चाहिये और एहतियाते मुस्तहब यह है कि उसके पांव की उंगलिया भी क़िब्ले की तरफ़ हों।
786. जिस शख़्स को बैठकर नमाज़ पढ़नी हो ज़रूरी है कि उसका सीना और पेट नमाज़ के वक़्त क़िब्ले की तरफ़ हो, बल्कि उसका चेहरा भी क़िब्ले से बहुत ज़्यादा फिरा हुआ न हो।
787. जो शख़्स बैठकर नमाज़ न पढ़ सके ज़रूरी है कि दायें पहलू के बल यूं लेटे कि उसके बदन का अगला हिस्सा क़िब्ले की तरफ़ हो और अगर यह मुम्किन न हो तो ज़रूरी है कि बायें पहलू के बल यूं लेटे कि उसके बदन का अगला हिस्सा क़िब्ला की तरफ़ हो। और जब तक दायें पहलू के बल लेट कर नमाज़ पढ़ना मुम्किन हो एहतियाते लाज़िम की बिना पर बायें पहलू के बल लेट कर नमाज़ न पढ़ें। और अगर यह दोनों सूरतें मुम्किन न हों तो ज़रूरी है कि पुश्त के बल यूं लेटे कि उसके पांव के तल्वे क़िब्ले की तरफ़ हों।
788. नमाज़े एहतियात, भूला हुआ सज्दा और भूला हुआ तशहहुद क़िब्ले की तरफ़ मुंह कर के अदा करना ज़रूरी है और एहतियाते मुस्तहब की बिना पर सज्दाए सहव भी क़िब्ले की तरफ़ मुंह कर के अदा करे।
789. मुस्तहब नमाज़ रास्ता चलते हुए और सवारी की हालत में पढ़ी जा सकती है और अगर इंसान इन दोनों हालतों में मुस्तहब नमाज़ पढ़े तो ज़रूरी नहीं कि उसका मुंह क़िब्ले की तरफ़ हो।
790. जो शख़्स नमाज़ पढ़ना चाहे ज़रूरी है कि क़िब्ले की सम्त का तअय्युन करने के लिये कोशिश करे ताकि क़िब्ले की सम्त के बारे में यक़ीन या ऐसी कैफ़ियत जो यक़ीन के हुक्म में हो, मसलन दो आदिल आदमियों की गवाही हासिल कर ले और अगर ऐसा न कर सके तो ज़रूरी है कि मुसलमानों की मस्जिद के मेहराब से या उनकी क़ब्रों से या दूसरे तरीक़ों से जो गुमान पैदा हो उसके मुताबिक़ अमल करे हत्ता की अगर किसी ऐसे फ़ासिक़ या काफ़िर के कहने पर जो साइंसी क़वायद के ज़रीए क़िब्ले का रूख पहचानता हो क़िब्ले के बारे में गुमान पैदा करे तो वह भी काफ़ी है।
791. जो शख़्स क़िब्ले की सम्त के बारे में गुमान करे अगर वह उस से क़वी तर गुमान पैदा कर सकता हो तो अपने गुमान पर अमल नहीं कर सकता। मसलन अगर मेहमान साहबे ख़ाना के कहने पर क़िब्ले की सम्त के बारे में गुमान पैदा कर ले लेकिन किसी दूसरे तरीक़े से ज़्यादा क़वी गुमान पैदा कर सकता हो तो उसे साहबे ख़ाना के कहने पर अमल नहीं करना चाहिये।
792. अगर किसी के पास क़िब्ले का रूख़ मुतअय्यन करने का कोई ज़रीआ न हो (मसलन कुतुब नुमा) या कोशिश के बावजूद उसका गुमान किसी एक तरफ़ न जाता हो तो उसका किसी भी तरफ़ मुंह करके नमाज़ पढ़ना काफ़ी है और एहतियाते मुस्तहब यह है कि अगर नमाज़ का वक़्त वसी हो तो चार नमाज़ें चारों तरफ़ मुंह कर के पढ़े (यानी वही एक नमाज़ चार मर्तबा एक एक सम्त की जानिब मुंह करके पढ़े)।
793. अगर किसी शख़्स को यक़ीन या गुमान हो कि क़िब्ला दो में से एक तरफ़ है तो ज़रूरी है कि दोनों तरफ़ मुंह करके नमाज़ पढ़े।
794. जो शख़्स कई तरफ़ मुंह करके नमाज़ पढ़ना चाहता हो अगर वह ऐसी दो नमाज़े पढ़ना चाहे जो ज़ोहर और अस्र की तरह यके बाद दीगरे पढ़नी ज़रूरी हैं तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि पहली नमाज़ मुख़्तलिफ़ सम्तों की तरफ़ मुंह करके पढ़े और बाद में दूसरी नमाज़ शुरू करे।
795. जिस शख़्स को क़िब्ले की सम्त का यक़ीन न हो अगर वह नमाज़ के अलावा कोई ऐसा काम करना चाहे जो क़िब्ले की तरफ़ मुंह करके करना ज़रूरी है मसलन अगर वह कोई हैवान ज़िब्हा करना चाहता हो तो उसे चाहिये की गुमान पर अमल करे और अगर गुमान पैदा करना मुम्किन न हो तो जिस तरफ़ मुंह करके वह काम अंजाम दे वह दुरूस्त है।
नमाज़ में बदन का ढांपना
796. ज़रूरी है कि मर्द ख़्वाह उसे कोई भी न देख रहा हो नमाज़ की हालत में अपनी शर्मगाहों को ढांपे और बेहतर यह है कि नाफ़ से घुटनो तक बदन भी ढांपे।
797. ज़रूरी है कि औरत नमाज़ के वक़्त अपना तमाम बदन हत्ता कि सर और बाल भी ढांपे और एहतियाते मुस्तहब यह है कि पांव के तल्वे भी ढांपे। अलबत्ता चेहरे का जितना हिस्सा वुज़ू में धोया जाता है और कलाइयों तक और टखनों तक पांव का ज़ाहिरी हिस्सा ढांपना ज़रूरी नहीं है। लेकिन यह यक़ीन करने के लिये कि उसने बदन की वाजिब मिक़्दार ढांप ली है ज़रूरी है कि चेहरे के अतराफ़ का कुछ हिस्सा और कलाइयों से नीचे कुछ हिस्सा भी ढांपे।
798. जब इंसान भूले हुए सज्दे या भूले हुए तशहहुद की क़ज़ा बजा ला रहा हो तो ज़रूरी है कि अपने आप को इस तरह ढांपे जिस तरह नमाज़ के वक़्त ढांपा जाता है और एहतियाते मुस्तहब यह है कि सज्दा ए सहव अदा करने के वक़्त भी अपने आप को ढांपे।
799. अगर इंसान झान बूझकर या मसअला न जानने की वजह से ग़लती करते हुए नमाज़ में अपनी शर्मगाह न ढांपे तो उसकी नमाज़ बातिल है।
800. अगर किसी शख़्स को नमाज़ के दौरान पता चले कि उसकी शर्मगाह नंगी है तो ज़रूरी है कि अपनी शर्मगाह छिपाए और उस पर लाज़िम नहीं है कि नमाज़ दोबारा पढ़े। लेकिन एहतियात यह है कि जब उसे पता चले कि उसकी शर्मगाह नंगी है तो उसके बाद नमाज़ का कोई जुज़ अंजाम न दे। लेकिन अगर उसे नमाज़ के बाद पता चले कि नमाज़ के बाद उसकी शर्मगाह नंगी थी तो उसकी नमाज़ सहीह है।
801. अगर किसी शख़्स का लिबास खड़े होने की हालत में उसकी शर्मगाह को ढांप ले लेकिन मुम्किन हो दूसरी हालत में मसलन रुकुउ और सुजूद की हालत में न ढांपे तो अगर शर्मगाह के नंगा होने के वक़्त उसे किसी ज़रीए से ढांप ले तो उसकी नमाज़ सहीह है। लेकिन एहतियाते मुस्तहब यह है कि उस लिबास के साथ नमाज़ न पढ़े।
802. इंसान नमाज़ में अपने आप को घास फूस के दरख़्तों में (बड़े) पत्तों से ढांप सकता है। लेकिन एहतियाते मुस्तहब यह है कि उन चीज़ों से उस वक़्त ढांपे जब उसके पास कोई और चीज़ न हो।
803. इंसान के पास मजबूरी की हालत में शर्मगाह छिपाने के लिये कोई चीज़ न हो तो अपनी शर्मगाह की खाल नुमायाँ न होने के लिये गारा या उस जैसी किसी दूसरी चीज़ को लीप पोत कर उसे छिपाए।
804. अगर किसी शख़्स के पास कोई ऐसी चीज़ न हो जिससे वह नमाज़ में अपने आप को ढांपे और अभी वह ऐसी चीज़ मिलने से मायूस भी न हुआ हो तो बेहतर यह है कि नमाज़ पढ़ने में ताख़ीर करे और अगर कोई चीज़ न मिले तो आख़िरे वक़्त में अपने वज़ीफ़े के मुताबिक़ नमाज़ पढ़े लेकिन अगर अव्वले वक़्त में नमाज़ पढ़े और उसका उज़्र आख़िरे वक़्त तक बाक़ी न रहे तो एहतियाते वाजिब यह है कि नमाज़ को दोबारा पढ़े।
805. अगर किसी शख़्स के पास जो नमाज़ पढ़ना चाहता हो आपने आप को ढांपने के लिये दरख़्त के पत्ते, घास, गारा या दलदल न हो और आखिरे वक़्त तक किसी ऐसी चीज़ के मिलने से मायूस हो जिससे वह अपने आपको छिपा सके अगर उसे इस बात का इत्मीनान हो कि कोई शख़्स उसे नहीं देखेगा तो वह खड़ा होकर उसी तरह नमाज़ पढ़े जिस तरह इख़्तियारी हालत में रुकुउ और सुजूद के साथ नमाज़ पढ़ते हैं। लेकिन अगर उसे इस बात का एहतिमाल हो कि कोई शख़्स उसे देख लेगा तो ज़रूरी है कि इस तरह नमाज़ पढ़े कि उसकी शर्मगाह नज़र न आए मसलन बैठकर नमाज़ पढ़े या रुकुउ और सुजूद जो इख़्तियारी हालत में अंजाम देते हैं तर्क करे और रुकुउ और सुजूद को इशारे से बजा लाए और एहतियाते लाज़िम यह है कि नंगा शख़्स नमाज़ की हालत में अपनी शर्मगाह को अपने बाज़ अअज़ा के ज़रीए मसलन बैठा हो तो दोनों रानों से और खड़ा हो तो दोनों हाथों से छिपा ले।
नमाज़ी के लिबास की शर्तें
806. नमाज़ पढ़ने वाले के लिबास की छः शर्तें हैः-
(1). पाक हो।
(2). मुबाह हो।
(3). मुर्दार के अज्ज़ा से न बना हो।
(4). हराम गोश्त हैवान के अज्ज़ा से न बना हो।
(5 और 6) अगर नमाज़ पढ़ने वाला मर्द हो तो उसका लिबास खालिस रेशम और ज़रदोज़ी का बना हुआ न हो। इन शर्तों की तफ़्सील आइन्दा मसाइल में बताई दायेगी।
पहली शर्तः-
807. नमाज़ पढ़ने वाले का लिबास पाक होना ज़रूरी है। अगर कोई शख़्स हालते इख़्तियार में नजिस बदन या नजिस लिबास के साथ नमाज़ पढ़े तो उस की नमाज़ बातिल है।
808. अगर कोई शख़्स अपनी कोताही की वजह से यह न जानता हो कि नजिस बदन और लिबास के साथ नमाज़ बातिल है और नजिस बदन या लिबास के साथ लिबास पढ़े तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर उसकी नमाज़ बातिल है।
809. अगर कोई शख़्स मस्अला न जानने की वजह से कोताही की बिना पर किसी नजिस चीज़ के बारे में यह न जानता हो कि नजिस है मसलन यह न जानता हो कि काफ़िर का पसीना नजिस है और उस (पसीने) के साथ नमाज़ पढ़े तो उसकी नमाज़ एहतियाते लाज़िम की बिना पर बातिल है।
810. अगर किसी शख़्स को यह यक़ीन हो कि उस का बदन या लिबास नजिस नहीं है और उसके नजिस होने के बारे में उसे नमाज़ के बाद पता चले तो उसकी नमाज़ सहीह है।
811. अगर कोई शख़्स यह भूल जाए कि उसका बदन या लिबास नजिस है और उसे नमाज़ के दौरान या उसके बाद याद आए चुनांचे अगर उसने लापरवाही और अहमीयत न देने की वजह से भुला दिया हो तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर ज़रूरी है कि वह नमाज़ को दोबारा पढ़े और अगर वह वक़्त गुज़र गया हो तो उसकी क़ज़ा करे। और इस सूरत के अलावा ज़रूरी नहीं है कि वह नमाज़ को दोबारा पढ़े। लेकिन अगर नमाज़ के दौरान उसे याद आए तो ज़रूरी है कि उस हुक्म पर अमल करे जो बाद वाले मसअले में बयान किया जायेगा।
812. जो शख़्स वसी वक़्त में नमाज़ में मशग़ूल हो अगर नमाज़ के दौरान उसे पता चले कि उस का बदन या लिबास नजिस है और उसे यह एहतिमाल हो कि नमाज़ शूरू करने के बाद नजिस हुआ है तो उस सूरत में बदन या लिबास पाक करने या लिबास तब्दील करने या लिबास उतार देने से नमाज़ न टूटे तो नमाज़ के दौरान बदन या लिबास पाक करे या लिबास तब्दील करे या अगर किसी और चीज़ ने उसकी शर्मगाह को ढांप रखा हो तो लिबास उतार दे लेकिन जब यह सूरत हो कि अगर बदन या लिबास पाक करे या अगर लिबास बदले या उतारे तो नमाज़ टूटती हो या अगर लिबास उतारे तो नंगा हो जाता हो तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर ज़रूरी है कि दोबारा पाक लिबास के साथ नमाज़ पढ़े।
813. जो शख़्स तंग वक़्त में नमाज़ में मशग़ूल हो अगर नमाज़ के दौरान उसे पता चले कि उसका लिबास नजिस है और उसे यह एहतिमाल हो कि नमाज़ शुरू करने के बाद नजिस हुआ है तो अगर यह सूरत हो कि लिबास पाक करने या बदलने या उतारने से नमाज़ टूटती हो और वह लिबास उतार सकता हो तो ज़रूरी है कि लिबास को पाक करे या बदले या अगर किसी और चीज़ ने उसकी शर्मगाह को ढांप रखा हो तो लिबास उतार दे और नमाज़ ख़त्म करे लेकिन अगर किसी और चीज़ ने उसकी शर्मगाह को ढांप रखा हो और वह लिबास पाक न कर सकता हो और उसे बदल भी न सकता हो तो ज़रूरी है कि उसी नजिस लिबास के साथ नमाज़ को ख़त्म करे।।
814. कोई शख़्स जो तंग वक़्त में मशग़ूल हो और नमाज़ के दौरान पता चले कि उसका बदल नजिस है और उसे यह एहतिमाल हो कि नमाज़ शुरू करने के बाद नजिस हुआ हो तो अगर सूरत यह हो कि बदन पाक करने से नमाज़ न टूटती हो तो बदन को पाक करे और अगर नमाज़ टूटती हो तो ज़रूरी है कि उसी हालत में नमाज़ ख़त्म करे और उसकी नमाज़ सहीह है।
815. ऐसा शख़्स जो अपने बदन या लिबास के पाक होने के बारे में शक करे और जुस्तजू के बाद कोई चीज़ न पाकर और नमाज़ पढ़े और नमाज़ के बाद उसे पता चले कि उसका बदन या लिबास नजिस था तो उसकी नमाज़ सहीह है और अगर उसने जुस्तजू न की हो तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर ज़रूरी है कि नमाज़ को दोबारा पढ़े और अगर वक़्त गुज़र गया हो तो उसकी क़ज़ा करे।
816. अगर कोई शख़्स अपना लिबास धोए और उसे यक़ीन हो जाए कि लिबास पाक हो गया है, उसके साथ नमाज़ पढ़े और नमाज़ के बाद उसे पता चले कि पाक नहीं हुआ था तो उसकी नमाज़ सहीह है।
817. अगर कोई शख़्स अपने बदन या लिबास में खून देखे और उसे यक़ीन हो कि यह नजिस खून में से नहीं है मसलन उसे यक़ीन हो कि मच्छर का खून है लेकिन नमाज़ पढ़ने के बाद उसे पता चले कि यह उस खून में से है जिसके साथ नमाज़ नहीं पढ़ी जा सकती तो उसकी नमाज़ सहीह है।
818. अगर किसी शख़्स को यक़ीन हो कि उसके बदन या लिबास में जो खून है वह ऐसा नजिस खून है जिसके साथ नमाज़ सहीह है मसलन उसे यक़ीन हो कि ज़ख़्म और फ़ोड़े का खून है लेकिन नमाज़ के बाद उसे पता चले कि यह ऐसा खून है जिसके साथ नमाज़ बातिल है तो उसकी नमाज़ सहीह है।
819. अगर कोई शख़्स यह भूल जाए कि एक चीज़ नजिस है या गीला बदन या गीला लिबास उस चीज़ से छू जाए और उसी भूल के आलम में वह नमाज़ पढ़ ले और नमाज़ के बाद उसे याद आए तो उसकी नमाज़ सहीह है लेकिन अगर उसका गीला बदन उस चीज़ को छू जाए जिसका नजिस होना वह भूल गया है और अपने आप को पाक किये बग़ैर वह ग़ुस्ल करे और नमाज़ पढ़े तो उसका ग़ुस्ल और नमाज़ बातिल है मासिवा इसके कि ग़ुस्ल करने से बदन भी पाक हो जाए। और अगर वुज़ू के गीले अअज़ा का कोई हिस्सा उस चीज़ से छू जाए जिसके नजिस होने के बारे में वह भूल गया है और इससे पहले कि वह उस हिस्से को पाक करे वह वुज़ू करे और नमाज़ पढ़े तो उसका वुज़ू और नमाज़ दोनों बातिल हैं मासिवा इसके कि वुज़ू करने से वुज़ू के अअज़ा भी पाक हो जायें।
820. जिस शख़्स के पास सिर्फ़ एक लिबास हो अगर उसका बदन और लिबास नजिस हो जाए और उसके पास उनमें से एक को पाक करने के लिये पानी हो तो एहतियाते लाज़िम यह है कि बदन को पाक करे और नजिस लिबास के साथ नमाज़ पढ़े। और लिबास को पाक कर के नजिस बदन के साथ नमाज़ पढ़ना जाइज़ नहीं है। लेकिन अगर लिबास की नजासत बदन की नजासत से बहुत ज़्यादा हो या लिबास की नजासत बदन की नजासत के लिहाज़ से ज़्यादा शदीद हो तो उसे इख़्तियार है कि लिबास और बदन में से जिसे चाहे पाक करे।
821. जिस शख़्स के पास नजिस लिबास के अलावा कोई लिबास न हो ज़रूरी है कि नजिस लिबास के साथ नमाज़ पढ़े और उसकी नमाज़ सहीह है।
822. जिस शख़्स के पास दो लिबास हों अगर वह यह जानता हो कि इनमें से एक नजिस है लेकिन यह न जानता हो कि कौन सा नजिस है और उसके पास वक़्त हो तो ज़रूरी है कि दोनों के साथ नमाज़ पढ़े (यानी एक दफ़्आ एक लिबास पहन कर और एक दफ़्आ दूसरा लिबास पहन कर दो दफ़्आ वही नमाज़ पढ़े) मसलन अगर वह ज़ोहर और अस्र की नमाज़ पढ़ना चाहे तो ज़रूरी है कि हर एक लिबास से एक नमाज़ ज़ोहर की और एक नमाज़ अस्र की पढ़े लेकिन अगर वक़्त तंग हो तो जिस लिबास के साथ नमाज़ पढ़ ले काफ़ी है।
दूसरी शर्त
823. नमाज़ पढ़ने वाले का लिबास मुबाह होना ज़रूरी है। पस अगर एक शख़्स जो जानता हो कि ग़स्बी लिबास पहनना हराम है या कोताही की वजह से मसअला का हुक्म न जानता हो और जान बूझकर उस लिबास के साथ नमाज़ पढ़े तो एहतियात की बिना पर उसकी नमाज़ बातिल है। लेकिन अगर लिबास में वह चीज़ें जिनसे अगरचे शर्मगाह को ढांपा जा सकता हो लेकिन नमाज़ पढ़ने वाले ने उन्हें हालते नमाज़ में न पहन रखा हो मसलन बड़ा रूमाल या लंगोटी जो जेब में रखी हो और इसी तरह वह चीज़ें जिन्हें नमाज़ी ने पहन रखा हो अगरचे उसके पास एक मुबाह सत्रपोश भी हो ऐसी तमाम सूरतों में इन (इज़ाफ़ी) चीज़ों के ग़स्बी होने से नमाज़ में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता अगरचे एहतियात उनके तर्क कर देने में है।
824. जो शख़्स यह जानता हो कि ग़स्बी लिबास पहनना हराम है लेकिन उस लिबास के साथ नमाज़ पढ़ने का हुक्म न जानता हो अगर वह जान बूझकर ग़स्बी लिबास के साथ नमाज़ पढ़े तो ज़ैसा कि साबिक़ा मसअले में तफ़्सील से बताया गया है एहतियात की बिना पर उसकी नमाज़ बातिल है।
825. अगर कोई शख़्स न जानता हो या भूल जाए कि उसका लिबास ग़स्बी है और उस लिबास के साथ नमाज़ पढ़े तो उसकी नमाज़ सहीह है। लेकिन अगर वह शख़्स ख़ुद उस लिबास को ग़स्ब करे और फिर भूल जाए कि उसने ग़स्ब किया है और उसी लिबास में नमाज़ पढ़े तो एहतियात की बिना पर उसकी नमाज़ बातिल है।
826. अगर किसी शख़्स को इल्म न हो या भूल जाए कि उसका लिबास ग़स्बी है लेकिन नमाज़ के दौरान उसे पता चल जाए और उसकी शर्मगाह किसी दूसरी चीज़ से ढकी हुई हो और वह फ़ौरन या नमाज़ का तसलसुल तोड़े बग़ैर ग़स्बी लिबास उतार सकता हो तो ज़रूरी है कि फ़ौरन उस लिबास को उतार दे और अगर उसकी शर्मगाह किसी दूसरी चीज़ से ढकी हुई न हो या वह ग़स्बी लिबास को फ़ौरन न उतार सकता हो या अगर लिबास का उतारना नमाज़ के तसलसुल को तोड़ देता हो और सूरत यह हो कि उसके पास एक रक्अत पढ़ने जितना वक़्त भी हो तो ज़रूरी है कि नमाज़ को तोड़ दे और उस लिबास के साथ नमाज़ पढ़े जो ग़स्बी न हो और अगर इतना वक़्त न हो तो ज़रूरी है कि नमाज़ की हालत में लिबास उतार दे और बरहना लोगों की नमाज़ के मुताबिक़ नमाज़ ख़त्म करे।
827. अगर कोई शख़्स अपनी जान की हिफ़ाज़त के लिये ग़स्बी लिबास के साथ नमाज़ पढ़े या मिसाल के तौर पर ग़स्बी लिबास के साथ इस लिये नमाज़ पढ़े ताकि चोरी न हो जाए तो उसकी नमाज़ सहीह है।
828. अगर कोई शख़्स उस रक़म से लिबास खरीदे जिसका ख़ुम्स उसने अदा न किया हो तो उस लिबास के साथ नमाज़ पढ़ने के लिये वही हुक्म है जो ग़स्बी लिबास के साथ नमाज़ पढ़ने का है।
तीसरी शर्त
829. ज़रूरी है कि नमाज़ पढ़ने वाले का लिबास और हर वह चीज़ जो शर्मगाह छिपाने के लिये नाकाफ़ी है एहतियाते लाज़िम की बिना पर जिहिन्दा खून वाले मुर्दा हैवान के अअज़ा से न बनी हो बल्कि अगर लिबास उस मुर्दा हैवान मसलन मछली और सांप से तैयार किया जाए जिसका खून जिहिन्दा नहीं होता तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि उसके साथ नमाज़ न पढ़ी जाए।
830. अगर नजिस मुर्दार की ऐसी चीज़ मसलन गोश्त और खाल जिसमें रूह होती है नमाज़ पढ़ने वाले के हमराह हो तो कुछ बईद नहीं है कि उसकी नमाज़ सहीह हो।
831. अगर हलाल गोश्त मुर्दार की कोई ऐसी चीज़ जिसमें रुह न होती हो मसलन बाल और ऊन नमाज़ पढ़ने वाले के हमराह हो या उस लिबास के साथ नमाज़ पढ़े जो इन चीज़ों से तैयार किया गया हो तो उसकी नमाज़ सहीह है।
चौथी शर्त
832. ज़रूरी है कि नमाज़ पढ़ने वाले का लिबास – उन चीज़ों के अलावा जो सिर्फ़ शर्मगाह छिपाने के लिये नाकाफ़ी है मसलन जुर्राब – जानवरों के अअज़ा से तैयार किया हुआ न हो बल्कि एहतियाते लाज़िम की बिना पर हर उस जानवर के अअज़ा से बना हुआ न हो जिसका गोश्त खाना हराम है। इसी तरह ज़रूरी है कि नमाज़ पढ़ने वाले का लिबास और बदन हराम गोश्त जानवर के पेशाब, पाखाने, पसीने, दूध और बाल से आलूदा न हो लेकिन अगर हराम गोश्त जानवर का एक बाल उसके लिबास पर लगा हो तो कोई हरज नहीं है। इसी तरह नमाज़ गुज़ार के हमराह इन में से कोई चीज़ अगर डिबिया (या बोतल वग़ैरा) में बन्द रखी हो तब भी कोई हरज नहीं है।
833. हराम गोश्त जानवर मसलन बिल्ली के मुंह या नाक का पानी या कोई दूसरी रुतूबत नमाज़ पढ़ने वाले के बदन या लिबास पर लगी हो और अगर वह तर हो तो नमाज़ बातिल है। लेकिन अगर ख़ुश्क हो और उसका ऐन जुज़्व ज़ाइल हो गया हो तो नमाज़ सहीह है।
834. अगर किसी का बाल या पसीना या लुआब नमाज़ पढ़ने वाले के बदन या लिबास पर लगा हो तो कोई हरज नहीं। इसी तरह मर्वारीद, मोम और शहद उसके हमराह हो तब भी नमाज़ पढ़ना जाइज़ है।
835. अगर किसी को शक हो कि लिबास हलाल गोश्त जानवर से तैयार किया गया है या हराम गोश्त जानवर से तो ख़्वाह वह मक़ामी तौर पर तैयार किया गया हो या दर आमद किया गया हो उसके साथ नमाज़ पढ़ना जाइज़ है।
836. यह मालूम नहीं है कि सीपी हराम गोश्त हैवान के अअज़ा में से है लिहाज़ा सीप (के बटन वग़ैरा) के साथ नमाज़ पढ़ना जाइज़ है।
837. समूर का लिबास (Mink Fur) और इसी तरह गिलहरी की पोस्तीन पहन कर नमाज़ पढ़ने में कोई हरज नहीं है लेकिन एहतियाते मुस्तहब यह है कि गिलहरी की पोस्तीन के साथ नमाज़ न पढ़ी जाए।
838. अगर कोई शख़्स ऐसे लिबास के साथ नमाज़ पढ़े जिसके मुतअल्लिक़ वह न जानता हो या भूल गया हो कि हराम गोश्त जानवर से तैयार हुआ है तो एहतियाते मुस्तहब की बिना पर उस नमाज़ को दोबारा पढ़े।
पांचवीं शर्त
839. ज़रदोज़ी का लिबास पहनना मर्दों के लिये हराम है और उसके साथ नमाज़ पढ़ना बातिल है लेकिन औरतों के लिये नमाज़ में या नमाज़ के अलावा उसके पहनने में कोई हरज नहीं है।
840. सोना पहनना मसलन सोने की ज़ंजीर गले में पहनना, सोने की अंगूठी हाथ में पहनना, सोने की घड़ी कलाई में बांधना और सोने की ऐनक लगाना मर्दों के लिये हराम है और इन चीज़ों के साथ नमाज़ पढ़ना बातिल है। लेकिन औरतों के लिये नमाज़ में और नमाज़ के अलावा इन चीज़ों के इस्तेमाल में कोई हरज नहीं ।
841. अगर कोई शख़्स न जानता हो या भूल गया हो कि उसकी अंगूठी या लिबास सोने का है या शक रखता हो और उसके साथ नमाज़ पढ़े तो उसकी नमाज़ सहीह है।
छटी शर्त
842. नमाज़ पढ़ने वाले मर्द का लिबास ह्त्ता कि एहतियाते मुस्तहब की बिना पर टोपी और इज़ारबन्द भी खालिस रेशम का नहीं होना चाहिए और नमाज़ के अलावा भी ख़ालिस रेशम पहनना मर्दों के लिये हराम है।
843. अगर लिबास का तमाम अस्तर या उसका कुछ हिस्सा खालिस रेशम का हो तो मर्द के लिये उसका पहनना हराम और उसके साथ नमाज़ पढ़ना बातिल है।
844. जब किसी लिबास के बारे में यह इल्म न हो कि खालिस रेशम का है या किसी और चीज़ का बना हुआ है तो उसका पहनना जाइज़ है और उसके साथ नमाज़ पढ़ने में कोई हरज नहीं है।
845. रेशमी रुमाल या उसी जैसी कोई चीज़ मर्द की जेब में हो तो कोई हरज नहीं है और वह नमाज़ को बातिल नहीं करती।
846. औरत के लिये नमाज़ में या उसके अलावा रेशमी लिबास पहनने में कोई हरज नहीं है।
847. मजबूरी की हालत में ग़स्बी और खालिस रेशमी और ज़रदोज़ी का लिबास पहनने में कोई हरज नहीं । इसके अलावा जो शख़्स यह लिबास पहनने पर मजबूर हो और उसके पास कोई और लिबास न हो तो वह इन लिबासों के साथ नमाज़ पढ़ सकता है।
848. अगर किसी शख़्स के पास ग़स्बी लिबास के अलावा कोई लिबास न हो और वह यह लिबास पहनने पर मजबूर न हो तो उसे चाहिये कि उन एहकाम के मुताबिक़ नमाज़ पढ़े जो बरहना लोगों के लिये बताए गये हैं।
849. अगर किसी के पास दरिन्दे के अज्ज़ा से बने हुए लिबास के अलावा और कोई लिबास न हो और वह यह लिबास पहनने पर मजबूर हो तो उस लिबास के साथ नमाज़ पढ़ सकता है और अगर लिबास पहनने पर मजबूर न हो तो उसे चाहिये कि उन अहकाम के मुताबिक़ नमाज़ पढ़े जो बरहना लोगों के लिए बताए गए हैं। और अगर उसके पास ग़ैर शिकारी हराम जानवरों के अज्ज़ा से तैयार शुदा लिबास के सिवा दूसरा लिबास न हो और वह उस लिबास को पहनने पर मजबूर न हो तो एहतियाते लाज़िम यह है कि दो दफ़्आ नमाज़ पढ़े। एक बार उसी लिबास के साथ और एक बार उस तरीक़े के मुताबिक़ जिस का ज़िक्र बरहना लोगों की नमाज़ में बयान हो चुका है।
850. अगर किसी मर्द के पास खालिस रेशमी या ज़रबफ़्ती लिबास के सिवा कोई लिबास न हो और वह लिबास पहनने पर मजबूर न हो तो ज़रूरी है कि उन अहकाम के मुताबिक़ नमाज़ पढ़े जो बरहना लोगों के लिये बताए गये हैं।
851. अगर किसी के पास ऐसी कोई चीज़ न हो जिससे वह अपनी शर्मगाहों को नमाज़ में ढांप सके तो वाजिब है कि ऐसी चीज़ किराए पर ले या ख़रीदे लेकिन अगर उस पर उसकी हैसियत से ज़्यादा ख़र्च उठता हो या सूरत यह हो कि इस काम के लिये ख़र्च बर्दाश्त करे तो उसकी हालत तबाह हो जाए तो उन अहकाम के मुताबिक़ नमाज़ पढ़े जो बरहना लोगों के लिये बताए गए हैं।
852. जिस शख़्स के पास लिबास न हो अगर कोई दूसरा शख़्स उसे लिबास बख़्श दे या उधार दे दे तो अगर लिबास का क़बूल करना उस पर गरां न गुरज़ता हो तो ज़रूरी है कि उसे क़बूल कर ले बल्कि अगर उधार लेना या बख़शिश के तौर पर तलब करना उसके लिये तक्लीफ़ का बाइस न हो तो ज़रूरी है कि जिस के पास लिबास हो उससे उधार मांग ले या बख़शिश के तौर पर तलब करे।
853. अगर कोई शख़्स ऐसा लिबास पहनना चाहे जिसका कपड़ा, रंग या सिलाई रिवाज के मुताबिक़ न हो तो अगर उसका पहनना उसकी शान के खिलाफ़ और तौहीन का बाइस हो तो उसका पहनना हराम है। लेकिन अगर वह उस लिबास के साथ नमाज़ पढ़े और उसके पास शर्मगाह छिपाने के लिये फ़क़त वही लिबास हो तो उसकी नमाज़ सहीह है।
854. अगर मर्द ज़नाना लिबास पहने और औरत मर्दाना लिबास पहने और उसे अपनी ज़ीनत क़रार दे तो एहतियात की बिना पर उसका पहनना हराम है। लेकिन उस लिबास के साथ नमाज़ पढ़ना हर सूरत में सहीह है।
855. जिस शख़्स को लेटकर नमाज़ पढ़नी चाहिये अगर उसका लिहाफ़ दरिन्दे के अज्ज़ा से बल्कि एहतियात की बिना पर हराम गोश्त जानवर के अज्ज़ा से बना हो या नजिस या रेशमी हो और उसे पहनावा कहा जा सके तो उससे भी नमाज़ जाइज़ नहीं है। लेकिन अगर उसे महज़ अपने ऊपर डाल लिया जाए तो कोई हरज नहीं और उससे नमाज़ बातिल नहीं होती अलबत्ता गदीले के इस्तेमाल में किसी हालत में भी कोई क़बाहत नहीं सिवा इसके कि उसका कुछ हिस्सा इंसान अपने ऊपर लपेट ले और उसे उर्फ़े आम में पहनना कहा जाए तो इस सूरत में उस का भी वही हुक्म है जो लिहाफ़ का है।
जिन सूरतों में नमाज़ी का बदन और लिबास पाक होना ज़रूरी नहीं
856. तीन सूरतों में जिनकी तफ़्सील नीचे बयान की जा रही है अगर नमाज़ पढ़ने वाले का बदन या लिबास नजिस भी हो तो उसकी नमाज़ सहीह हैः-
(1). उसके बदन के ज़ख़्म, जराहत या फोड़े की वजह से उसके लिबास या बदन पर खून लग जाए।
(2). उसके बदन या लिबास पर दिरहम – जिसकी मिक़्दार तक़्रीबन अंगूठे के ऊपर वाली गिरह के बराबर है – की मिक़्दार से कम खून लग जाए।
(3). वह नजिस बदन या लिबास के साथ नमाज़ पढ़ने पर मजबूर हो।
इनके अलावा एक और सूरत में अगर नमाज़ पढ़ने वाले का लिबास नजिस भी हो तो उसकी नमाज़ सहीह है और वह सूरत यह है कि उसका छोटा लिबास मसलन मोज़ा और टोपी नजिस हो।
इन चारों सूरतों के मुफ़स्सल अहकाम आइन्दा मस्अलों में बयान किये जायेंगे।
857. अगर नमाज़ पढ़ने वाले के बदन या लिबास पर ज़ख़्म या जराहत या फ़ोड़े का खून हो तो वह उस खून के साथ उस वक़्त तक नमाज़ पढ़ सकता है जब तक ज़ख़्म या जराहत या फ़ोड़े ठीक न हो जाए और उसके बदन या लिबास पर ऐसी पीप हो जो खून के साथ निकली हो या ऐसी दवाई हो जो ज़ख़्म पर लगाई गई हो और नजिस हो गई हो और नजिस हो गई हो तो उसके भी यही हुक्म है।
858. अगर नमाज़ पढ़ने वाले के बदन या लिबास पर ऐसी खराश या ज़ख़्म का खून लगा हो जो जल्दी ठीक हो जाता हो और जिसका धोना आसान हो तो उसकी नमाज़ बातिल है।
859. अगर बदन या लिबास की ऐसी जगह जो ज़ख़्म से फ़ासिले पर हो ज़ख़्म की रुतूबत से नजिस हो जाए तो उसके साथ नमाज़ पढ़ना जाइज़ नहीं है लेकिन अगर लिबास या बदन की वह जगह जो उमूमन ज़ख़्म की रुतूबत से आलूदा हो जाती है उस ज़ख़्म की रुतूबत से नजिस हो जाए तो उसके साथ नमाज़ पढ़ने में कोई हरज नहीं है।
860. अगर किसी शख़्स के बदन या लिबास को उस बवासीर से जिस के मस्से बाहर न हों या उस ज़ख़्म से जो मुंह और नाक वग़ैरा के अन्दर हों खून लग जाए तो ज़ाहिर यह है कि वह उसके साथ नमाज़ पढ़ सकता है अलबत्ता उस बवासीर के खून के साथ नमाज़ पढ़ना बिला इश्काल जाइज़ है जिसके मस्से मक़्अद के बाहर हों।
861. अगर कोई ऐसा शख़्स जिसके बदन पर ज़ख़्म हों अपने बदन या लिबास पर ऐसा खून देखे जो दिरहम से ज़्यादा हो और यह न जानता हो कि यह खून ज़ख़्म का है या कोई और खून है तो एहतियाते वाजिब यह है कि उस खून के साथ नमाज़ न पढ़े।
862. अगर किसी शख़्स के बदन पर चन्द ज़ख़्म हों और वह एक दूसरे के इस क़द्र नज़्दीक हों कि एक ज़ख़्म शुमार होते हों तो जब तक वह ज़ख़्म ठीक न हो जायें उनके खून के साथ नमाज़ पढ़ने में कोई हरज नहीं है लेकिन अगर वह एक दूसरे से इतने दूर हों कि उनमें से हर ज़ख़्म एक अलायहदा ज़ख़्म शुमार हो तो जो ज़ख़्म ठीक हो जाए ज़रूरी है कि नमाज़ के लिये बदन और लिबास को धो कर उस खून से पाक करे।
863. अगर नमाज़ पढ़ने वाले के बदन या लिबास पर सुई की नोक के बराबर भी हैज़ का खून लगा हो तो उसकी नमाज़ बातिल है। और एहतियात की बिना पर नजिस हैवानात मसलन सुव्वर, मुर्दार और हराम गोश्त जानवर नीज़ निफ़ास और इस्तिहाज़ा की भी यही सूरत है। लेकिन दूसरा खून मसलन इंसान या हलाल गोश्त हैवान के खून की छींट बदन के कई हिस्सों पर लगी हो लेकिन मज्मूई मिक़्दार एक दिरहम से कम हो तो उसके साथ नमाज़ पढ़ने में कोई हरज नहीं है।
864. जो खून बग़ैर अस्तर के कपड़े पर गिरे और दूसरी तरफ़ पहुंच जाए वह एक खून शुमार होता है लेकिन अगर कपड़े के दूसरी तरफ़ अलग से खून आलूदा हो जाए तो ज़रूरी है कि उनमें से हर एक को अलायहदा खून शुमार किया जाए पस अगर वह खून जो कपड़े के सामने के रुख और पिछली तरफ़ है मज्मूई तौर पर एक दिरहम से कम हो तो उसके साथ नमाज़ सहीह है और अगर उससे ज़्यादा हो तो उसके साथ नमाज़ बातिल है।
865. अगर अस्तर वाले कपड़े पर गिरे और उसके अस्तर तक पहुंच जाए या अस्तर पर गिरे और कपड़े तक पहुंच जाए तो ज़रूरी है कि हर खून को अलग अलग शुमार किया जाए। लेकिन अगर कपड़े का खून और अस्तर का खून इस तरह मिल जाए कि लोगों के नज़्दीक़ एक खून शुमार हो तो अगर कपड़े का खून और अस्तर का खून मिलाकर एक दिरहम से कम हो तो उसके साथ नमाज़ सहीह है और अगर ज़्यादा हो तो नमाज़ बातिल है।
866. अगर बदन या लिबास पर एक दिरहम से कम खून हो और कोई रुतूबत उस खून से मिल जाए और उसके अत्राफ़ को आलूदा कर दे तो उसके साथ नमाज़ बातिल है ख़्वाह खून और रुतूबत उससे मिली है एक दिरहम के बराबर न हो लेकिन अगर रुतूबत सिर्फ़ खून से मिले और उसके एतराफ़ को आलूदा न करे तो ज़ाहिर यह है कि उसके साथ नमाज़ पढ़ने में कोई हरज नहीं है।
867. अगर बदन या लिबास पर खून न हो लेकिन रुतूबत लगने की वजह से खून से नजिस हो जायें तो अगरचे जो मिक़्दार नजिस हुई है वह एक दिरहम से कम हो तो उसके साथ भी नमाज़ नहीं पढ़ी जा सकती।
868. बदन या लिबास पर जो खून हो अगर वह एक दिरहम से कम हो और कोई दूसरी नजासत उससे आ लगे मसलन पेशाब का एक क़तरा उस पर गिर जाए और वह बदन या लिबास से लग जाए तो उसके साथ नमाज़ पढ़ना जाइज़ नहीं बल्कि अगर बदन और लिबास तक न भी पहुंचे तब भी एहतियाते लाज़िम की बिना पर उसमें नमाज़ पढ़ना सहीह नहीं है।
869. अगर नमाज़ पढ़ने वाले का छोटा लिबास मसलन टोपी और मोज़ा, जिससे शर्मगाह को न ढांपा जा सकता हो, नजिस हो जाए और वह एहतियाते लाज़िम की बिना पर नजिस मुर्दार या नजिसुल ऐन हैवान मसलन कुत्ते (के अअज़ा) से न बना हो तो उसके साथ नमाज़ सहीह है और इसी तरह अगर नजिस अंगूठी के साथ नमाज़ पढ़ी जाए तो कोई हरज नहीं।
870. नजिस चीज़ मसलन नजिस रूमाल, चाबी और चाक़ू का नमाज़ पढने वाले के पास होना जाइज़ है और बईद नहीं है कि मुत्लक़ नजिस लिबास (जो पहना हुआ न हो) उसके पास हो तब भी नमाज़ को कोई ज़रर न पहुंचाए (यानी उसके पास होते हुए नमाज़ सहीह हो।
871. अगर कोई जानतो हो कि जो खून उसके लिबास या बदन पर है वह एक दिरहम से कम है लेकिन इस अम्र का एहतिमाल हो कि यह उस खून में से है जो मुआफ़ नहीं है तो उसके लिये जाइज़ है कि उस खून के साथ नमाज़ पढ़े और उसका धोना ज़रूरी नहीं है।
872. अगर वह खून जो एक शख़्स के लिबास या बदन पर हो एक दिरहम से कम हो और उसे यह इल्म न हो कि यह उस खून में से है जो मुआफ़ नहीं है नमाज़ पढ़ ले और फिर उसे पता चले कि यह उस खून में से था जो मुआफ़ नहीं है तो उसके लिये दोबारा नमाज़ पढ़ना ज़रूरी नहीं है और उस वक़्त भी यही हुक्म है जब वह यह समझता हो कि खून एक दिरहम से कम है और नमाज़ पढ़ ले और बाद में पता चले कि उसकी मिक़्दार एक दिरहम या उससे ज़्यादा थी, उस सूरत में भी दोबारा नमाज़ पढ़ने की ज़रूरी नहीं है।
वह चीज़ें जो नमाज़ी के लिबास में मुस्तहब हैं
873. चन्द चीज़ें नमाज़ी के लिबास में मुस्तहब हैं कि जिनमें से तह्तुलहनक के साथ अमामा, अबा, सफ़ैद लिबास, साफ़ सुथरा लिबास, ख़ुशबू लगाना और अक़ीक़ की अंगूठी पहनना।
वह चीज़ें जो नमाज़ी के लिबास में मकरूह हैं
874. चन्द चीज़ें नमाज़ी के लिबास में मकरूह हैं जिनमें से सियाह, मैला और तंग लिबास और शराबी का लिबास पहनना या उस शख़्स का लिबास पहनना जो नजासत से परहेज़ न करता हो और ऐसा लिबास पहनना जिस पर चेहरे की तस्वीर बनी हो। इसके अलावा लिबास के बटन खुले होना और ऐसी अंगूठी पहनना जिस पर चेहरे की तस्वीर बनी हो मकरूह है।
नमाज़ पढ़ने की जगह
नमाज़ पढ़ने वाले की जगह की सात शर्तें हैः-
पहली शर्त यह है कि वह मुबाह हो।
875. जो शख़्स ग़स्बी जगह पर अगरचे वह क़ालीन, तख्त और इसी तरह की दूसरी चीज़ें हों, नमाज़ पढ़ रहा हो तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर उसकी नमाज़ बातिल है लेकिन ग़स्बी छत के नीचे और ग़स्बी ख़ैमे में नमाज़ पढ़ने में कोई हरज नहीं है।
876. ऐसी जगह नमाज़ पढ़ना जिसकी मन्फ़अत किसी और की मिल्कियत हो तो मन्फ़अत के मालिक की इजाज़त के बग़ैर वहां नमाज़ पढ़ना ग़स्बी जगह पर नमाज़ पढ़ने के हुक्म में है मसलन किराये के मकान में मालिक मकान या उस शख़्स की इजाज़त के बग़ैर कि जिसने वह मकान किराये पर लिया है नमाज़ पढ़े तो एहतियात की बिना पर उसकी नमाज़ बातिल है और अगर मरने वाले ने वसीयत की हो कि उसके माल का तीसरा हिस्सा फ़ुलां काम पर ख़र्च किया जाए तो जब तक कि तीसरे हिस्से को जुदा न किया जाए उसकी जायदाद में नमाज़ नहीं पढ़ी जा सकती।
877. अगर कोई शख़्स मस्जिद में बैठा हो और दूसरा शख़्स उसे बाहर निकाल कर उसकी जगह पर क़ब्ज़ा करे और उस जगह नमाज़ पढ़े तो उसकी नमाज़ सहीह है अगरचे उसने गुनाह किया है।
878. अगर कोई शख़्स किसी ऐसी जगह नमाज़ पढ़े जिसके ग़स्बी होने का उसे इल्म न हो और नमाज़ के बाद उसे पता चले या ऐसी जगह नमाज़ पढ़े जिसके ग़स्बी होने को वह भूल गया हो और नमाज़ के बाद उसे याद आये तो उसकी नमाज़ सहीह है। लेकिन कोई ऐसा शख़्स जिसने खुद वह जगह ग़स्ब की हो और वह भूल जाए और वहां नमाज़ पढ़े तो उसकी नमाज़ एहतियात की बिना पर बातिल है।
879. अगर कोई शख़्स जानता हो कि यह ग़स्बी जगह है और इसमें तसर्रूफ़ हराम है लेकिन उसे यह इल्म न हो कि ग़स्बी जगह पर नमाज़ पढ़ने में इश्काल है और वह वहां नमाज़ पढ़े तो एहतियात की बिना पर उसकी नमाज़ बातिल है।
880. अगर कोई शख़्स वाजिब नमाज़ सवारी की हालत में पढ़ने पर मजबूर हो और सवारी का जानवर या उसकी ज़ीन या नअल ग़स्बी हो तो उसकी नमाज़ बातिल है और अगर वह शख़्स उस जानवर पर सवारी की हालत में मुस्तहब नमाज़ पढ़ना चाहे तो उसकी भी यही हुक्म है।
881. अगर कोई शख़्स किसी जायदाद में दूसरे का शरीक हो और उसका हिस्सा जुदा न हो तो अपने शिर्कतदार की इजाज़त के बग़ैर वह उस जायदाद पर तसर्रूफ़ नहीं कर सकता और उस पर नमाज़ नहीं पढ़ सकता।
882. अगर कोई शख़्स एक ऐसी रक़म से जायदाद खरीदे जिसका ख़ुम्स उसने अदा न किया हो तो उस जायदाद पर उसका तसर्रूफ़ हराम है और उसमें उसकी नमाज़ जाइज़ नहीं है।
883. अगर किसी जगह का मालिक ज़बान से नमाज़ पढ़ने की इजाज़त दे दे और इंसान को इल्म हो कि वह दिल से राज़ी नहीं है तो उस जगह पर नमाज़ पढ़ना जाइज़ नहीं है और अगर इजाज़त न दे लेकिन इंसान को यक़ीन हो कि वह दिल से राज़ी है तो नमाज़ पढ़ना जाइज़ है।
884. जिस मुतवफ़्फ़ी ने ज़कात और उसे जैसे दूसरे वाजिबात अदा न किये हों उसकी जायदाद में तसर्रूफ़ करना, अगर वाजिबात की अदायगी में माने न हो, मसलन उसके घर में वरसा की इजाज़त से नमाज़ पढ़ी जाए तो इश्काल नहीं है। इसी तरह अगर कोई शख़्स वह रक़म जो मुतवफ़्फ़ी के ज़िम्मे हो अदा कर दे या ज़मानत दे कि अदा कर देगा तो उसकी जायदाद में तसर्रूफ़ करने में भी कोई इश्काल नहीं है।
885. अगर मुतवफ़्फ़ी लोगो का मक़रूज़ हो तो उसकी जायदाद में तसर्रूफ़ करना उस मुर्दे की जायदाद में तसर्रूफ़ के हुक्म में है जिसने ज़कात और उसकी मानिन्द दूसरे माली वाजिबात अदा न किये हों।
886. अगर मुतवफ़्फ़ी के ज़िम्मे क़र्ज़ न हो लेकिन उसके बाज़ वरसा कमसिन या मज्नून या ग़ैर हाज़िर हों तो उनके वली की इजाज़त के बग़ैर उसकी जायदाद में तसर्रूफ़ हराम है और उसमें नमाज़ जाइज़ नहीं है।
887. किसी की जायदाद में नमाज़ पढ़ना उस सूरत में जाइज़ है जबकि उसका मालिक सरीहन इजाज़त दे या कोई ऐसी बात कहे जिसमें मालूम हो कि उसने नमाज़ पढ़ने की इजाज़त दे दी है। मसलन अगर इससे समझा जा सकता है उसने नमाज़ पढ़ने की इजाज़त भी दे दी है या मालिक के राज़ी होने पर दूसरी वुजूहात की बिना पर इत्मीनान रखता हो।
888. वसी व अरीज़ ज़मीन में नमाज़ पढ़ना जाइज़ है अगरचे उसके मालिक कमसिन या मज्नून हो या वहां नमाज़ पढ़ने पर राज़ी न हो। इसी तरह वह ज़मीने कि जिनके दरवाज़े और दिवार न हों उनमें उनके मालिक की इजाज़त के बग़ैर नमाज़ पढ़ सकते हैं। लेकिन अगर मालिक कमसिन या मज्नून हो या उसके राज़ी न हो ने का गुमान हो तो एहतियाते लाज़िम यह है कि वहां नमाज़ न पढ़ी जाए।
दूसरी शर्त
889. ज़रूरी है कि नमाज़ी की जगह वाजिब नमाज़ों में ऐसी न हो कि तेज़ हरकत नमाज़ी के खड़े होने या रूकूउ और सुजूद करने में माने हो बल्कि एहतियाते लाज़िम की बिना पर ज़रूरी है कि उसके बदन को साकिन रखने में भी माने न हो और अगर वक़्त की तंगी या किसी और वजह से ऐसी जगह मसलन बस, ट्रक, कश्ती या रेलगाड़ी में नमाज़ पढ़े तो जिस क़द्र मुम्किन हो बदन के ठहराव और क़िब्ले की सिम्त का ख़्याल रखे और अगर ट्रांस्पोर्ट से किसी दूसरी तरफ़ मुड़ जाए तो अपना मुंह क़िब्ले की तरफ़ मोड़ दे।
890. जब गाड़ी, कश्ती या रेलगाड़ी वग़ैरा खड़ी हुई हों तो उनमें नमाज़ पढ़ने में कोई हरज नहीं और इसी तरह जब चल रहीं हो तो इस हद तक न हिलजुल रही हों कि नमाज़ी के बदन के ठहराव में हाइल हों।
891. गंदुम, जौ और उन जैसी दूसरी अज्नास के ढेर पर जो हिले जुले बग़ैर नहीं रह सकते नमाज़ बातिल है। (बोरियें के ढेर मुराद नहीं हैं।)
(तीसरी शर्त)
ज़रूरी है कि इंसान ऐसी जगह नमाज़ पढ़े जहां नमाज़ पूरी पढ़ लेने का एहतिमाल हो। ऐसी जगह नमाज़ पढ़ना सहीह नहीं है जिसके मुताल्लिक़ उसे यक़ीन हो कि मसलन हवा और बारिश या भीड़ भाड़ की वजह से वहां पूरी नमाज़ न पढ़ सकेगा गो इत्तेफ़ाक़ से पूरी पढ़ ले।
892. अगर कोई शख़्स ऐसी जगह नमाज़ न पढ़े जहां ठहरना हराम हो मसलन किसी ऐसी मख्दूश छत के नीचे जो अंक़रीब गिरने वाली हो तो वह गुनाहा का मुर्तकिब होगा लेकिन उसकी नमाज़ सहीह है।
893. किसी ऐसी चीज़ पर नमाज़ पढ़ना सहीह नहीं है जिस पर खड़ा होना या बैठना हराम हो मसलन क़ालीन के ऐसे हिस्से पर जहां अल्लाह तआला का नाम लिखा हो। चूंकि यह (इस्मे खुदा) क़स्दे क़ुर्बत में माने है इस लिये (नमाज़ पढ़ना) सहीह नहीं है।
(चौथी शर्त)
जिस जगह इंसान नमाज़ पढ़े उसकी छत इतनी नीची न हो कि सीधा खड़ा न हो सके और न ही वह जगह इतनी मुख़्तसर हो कि रूकू और सज्दे की गुंजाइश न हो।
894. अगर कोई शख़्स ऐसी जगह नमाज़ पढ़ने पर मजबूर हो जहां बिल्कुल सीधा खड़ा होना मुम्किन न हो तो उसके लिये ज़रूरी है कि बैठकर नमाज़ पढ़े और अगर रूकू और सुजूद अदा करने का इम्कान न हो तो उसके लिये सर से इशारा करे।
895. ज़रूरी है कि पैग़म्बरे अकरम स्वल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम और अइम्मए अहले बैत (अ0) की क़ब्र के आगे अगर उनकी बे हुर्मती होती हो तो नमाज़ न पढ़े। इसके अलावा किसी और सूरत में इश्काल नहीं।
(पांचवी शर्त)
अगर नमाज़ पढ़ने वाले की जगह नजिस हो तो इतनी मर्तूब न हो कि उसकी रुतूबत नमाज़ पढ़ने वाले के बदन या लिबास तक पहुंचे लेकिन अगर सज्दे में पेशानी रखने की जगह नजिस हो तो ख़्वाह वह ख़ुश्क भी हो नमाज़ बातिल है और एहतियाते मुस्तहब यह है कि नमाज़ पढ़ने की जगह हरगिज़ नजिस न हो।
(छटी शर्त)
एहतियाते लाज़िम की बिना पर ज़रूरी है कि औरत मर्द से पीछे खड़ी हो और कम अज़ कम उसके सज्दा करने की जगह सज्दे की हालत में मर्द के दो ज़ानू के बराबर फ़ासिले पर हो।
896. अगर कोई औरत मर्द के बराबर या आगे खड़ी हो और दोनों बयक वक़्त नमाज़ पढ़ने लगें तो ज़रूरी है कि दोबारा नमाज़ पढ़ें। और यही हुक्म है अगर एक दूसरे से पहले नमाज़ के लिये खड़ा हो।
897. अगर मर्द और औरत एक दूसरे के बराबर खड़े हों या औरत आगे खड़ी हो और दोनों नमाज़ पढ़ रहे हों लेकिन दोनों के दरमियान दीवार या पर्दा या कोई और ऐसी चीज़ हाइल हो कि एक दूसरे को न देख सकें या उनके दरमियान दस हाथ से ज़्यादा फ़ासिला हो तो दोनों की नमाज़ सहीह है।
(सातवीं शर्त)
नमाज़ पढ़ने वाले की पेशानी रखने की जगह, दो ज़ानू और पांव की उंगलियां रखने की जगह से चार मिली हुई उंगलियों की मिक़्दार से ज़्यादा ऊंची या नीची न हो। इस मस्अले की तफ़्सील सज्दे के अहकाम में आयेगी।
898. ना महरम मर्द और औरत का एक ऐसी जगह होना जहां गुनाह में मुब्तला होने का एहतिमाल हो हराम है। एहतियाते मुस्तहब यह है कि ऐसी जगह नमाज़ भी न पढ़ें।
899. जिस जगह सितार बजाया जाता हो और उस जैसी चीज़े इस्तेमाल की जाती हों वहां नमाज़ पढ़ना बातिल नहीं है गो उनका सुनना और इस्तेमाल करना गुनाह है।
900. एहतियाते वाजिब यह है कि इख़्तियार की हालत में खाना ए कअबा के अन्दर और उसकी छत के ऊपर वाजिब नमाज़ न पढ़ी जाए। लेकिन मज्बूरी की हालत में कोई इश्काल नहीं है।
901. ख़ाना ए कअबा के अन्दर और उसकी छत के ऊपर नफ़्ली नमाज़ें पढ़ने में कोई हरज नहीं है बल्कि मुस्तहब है कि ख़ाना ए कअबा के अन्दर हर रुक्न के मुक़ाबिल दो रक्अत नमाज़ पढ़ी जाए।
वह मक़ामात जहां नमाज़ पढ़ना मुस्तहब है
902. इस्लाम की मुक़द्दस शरीअत में बहुत ताकीद की गई है कि नमाज़ मस्जिद में पढ़ी जाए। दुनिया भर की सारी मस्जिदों में सबसे बेहतर मस्जिदुल हराम और उसके बाद मस्जिदे नबवी (स0) है और उसके बाद मस्जिदे कूफ़ा और उसके बाद मस्जिदे बैतुल मुक़द्दस का दरजा है। उसके बाद शहर की जामे मस्जिद और उसके बाद मोहल्ले की मस्जिद और उसके बाद बाज़ार की मस्जिद का नम्बर आता है।
903. औरत के लिये बेहतर है कि नमाज़ ऐसी जगह पढ़े जो ना महरम से महफ़ूज़ होने के लिहाज़ से दूसरी जगहों से बेहतर हो ख़्वाह वह जगह मकान या मस्जिद या कोई और जगह हो।
904. आइम्मा ए अहले बैत (अ0) के हरमों में नमाज़ पढ़ना मुस्तहब है बल्कि मस्जिद में नमाज़ पढ़ने से बेहतर है और रिवायत है कि हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अ0) के हरमे पाक में नमाज़ पढ़ना दो लाख नमाज़ों के बराबर है।
905. मस्जिद में ज़्यादा जाना और उस मस्जिद में जाना जो आबाद न हो (यानी जहां लोग बहुत कम नमाज़ पढ़ने आते हों) मुस्तहब है और अगर कोई शख़्स मस्जिद के पड़ोस में रहता हो और कोई उज़्र भी न रखता हो तो उसके लिये मस्जिद के अलावा किसी और जगह नमाज़ पढ़ना मकरूह है।
906. जो शख़्स मस्जिद में न आता हो, मुस्तहब है कि इंसान उसके साथ मिलकर खाना न खाए, अपने कामों में उससे मश्विरा न करे, उसके पड़ोस में न रहे और न उससे औरत का रिश्ता ले और न उसे रिश्ता दे। (यानी उसका सोशल बाइकाट करे) ।
वह मक़ामात जहां नमाज़ पढ़ना मकरूह है
907. चन्द मक़ामात पर नमाज़ पढ़ना मकरूह है जिनमें से कुछ यह हैं-
1. हम्माम,
2. शोर ज़मीन,
3. किसी इंसान के मुक़ाबिल,
4. उस दरवाज़े के मुक़ाबिल जो खुला हो।
5. सड़क, गली और कूचे में बशर्ते कि ग़ुज़रने वालों के लिये बाइसे ज़हमत न हो और अगर उन्हें ज़हमत हो तो उनके रास्ते में रुकावट डालना हराम है।
6. आग और चिराग़ के मुक़ाबिल।
7. बावरची खाने में हर उस जगह जहां आग की भट्टी हो।
8. कुयें के और ऐसे गढ़े के मुक़ाबिल जिसमें पेशाब किया जाता हो।
9. जानदार के फ़ोटो या मुजस्समे के सामने मगर यह कि उसे ढांप दिया जाए।
10. ऐसे कमरे में जिसमें जुनुब शख़्स मौजूद हो।
11. जिस जगह फ़ोटो हो ख़्वाह वह नमाज़ पढ़ने वाले के सामने न हो।
12. क़ब्र के मुक़ाबिल।
13. क़ब्र के ऊपर।
14. दो क़ब्रों के दरमियान।
15. क़ब्रिस्तान में।
908. अगर कोई शख़्स लोगों की रहगुज़र पर नमाज़ पढ़ रहा हो या कोई और शख़्स उसके सामने खड़ा हो तो नमाज़ी के लिये मुस्तहब है कि अपने सामने कोई चीज़ रख ले और अगर वह चीज़ लकड़ी या रस्सी हो तो भी काफ़ी है।
मस्जिद के अहकाम
909. मस्जिद की ज़मीन अन्दरूनी और बेरूनी छत और अन्दरूनी दीवार को नजिस करना हराम है और जिस शख़्स को पता चले कि इनमें से कोई एक मक़ाम नजिस हो गया है तो ज़रूरी है कि उसकी नजासत को फ़ौरन दूर करे और एहतियाते मुस्तहब यह है कि मस्जिद की दीवार के बेरूनी हिस्से को भी नजिस न किया जाए और अगर वह नजिस हो जाए तो नजासत का हटाना लाज़िम नहीं लेकिन अगर दीवार का बेरूनी हिस्सा नजिस करना मस्जिद की बे हुरमती का सबब हो तो क़त्अन हराम है और इस क़दर नजासत का ज़ाइल करना कि जिससे बे हुर्मती ख़त्म हो जाए ज़रूरी है।
910. अगर कोई शख़्स मस्जिद को पाक करने पर क़ादिर न हो या उसे मदद की ज़रूरत हो जो दस्तयाब न हो तो मस्जिद का पाक करना उस पर वाजिब नहीं लेकिन यह समझता हो कि अगर दूसरे को इत्तिलाअ देगा तो यह काम हो जायेगा तो ज़रूरी है कि उसे इत्तिलाअ दे।
911. अगर मस्जिद की कोई जगह नजिस हो गई हो जिसे खोदे या तोड़े बग़ैर पाक करना मुम्किन न हो तो ज़रूरी है कि उस जगह को खोदें या तोड़ें जबकि जुज़्वी तौर पर खोदना या तोड़ना पड़े या बे हुर्मती का ख़त्म होना मुकम्मल तौर पर खोदने या तोड़ने पर मौक़ूफ़ हो वर्ना तोड़ने में इश्काल है। जो जगह खोदी गई हो उसे पुर करना और जो जगह तोड़ी गई हो उसे तअमीर करना वाजिब नहीं है लेकिन मस्जिद की कोई चीज़ मसलन ईंट अगर नजिस हो गई हो तो मुम्किन सूरत में उसे पानी से पाक करके ज़रूरी है कि उसकी असली जगह पर लगा दिया जाए।
912. अगर कोई शख़्स मस्जिद को ग़स्ब करे और उसकी जगह घर या ऐसी ही कोई चीज़ तअमीर करे या मस्जिद इस क़दर टूट फ़ूट जाए कि उसे मस्जिद न कहा जाए तब भी एहतियाते मुस्तहब की बिना पर उसे नजिस न करे लेकिन उसे पाक करना वाजिब नहीं।
913. अइम्मा ए अहले बैत (अ0) में से किसी इमाम का हरम नजिस करना हराम है। अगर उनके हरमों में से कोई हरम नजिस हो जाए और उसका नजिस रहना उसकी बे हुर्मती का सबब हो तो उसका पाक करना वाजिब है बल्कि एहतियाते मुस्तहब यह है कि ख़्वाह बे हुर्मती न होती हो तब भी पाक किया जाए।
914. अगर मस्जिद की चटाई नजिस हो जाए तो ज़रूरी है कि उसे धोकर पाक करें और अगर चटाई का नजिस होना मस्जिद की बे हुर्मती शुमार होता हो और वह धोने से ख़राब होती हो और नजिस हिस्से का काट देना बेहतर हो तो ज़रूरी है कि उसे काट दिया जाए।
915. अगर किसी ऐन नजासत या नजिस चीज़ को मस्जिद में ले जाने से मस्जिद की बे हुर्मती हो तो उसका मस्जिदों में ले जाना हराम है बल्कि एहितयाते मुस्तहब यह है कि अगर बे हुर्मती न होती हो तब भी ऐने नजासत को मस्जिद में न ले जाया जाए।
916. अगर मस्जिद में मजलिसे अज़ा के लिये क़िनात तानी जाए और फ़र्श बिछाया जाए और सियाह पर्दे लटकाए जायें और चाय का सामान उसके अन्दर ले जाया जाए तो अगर यह चीज़ें मस्जिद के तक़द्दुस को पामाल न करती हों और नमाज़ पढ़ने में भी माने न होतीं हों तो कोई हरज नहीं।
917. एहतियाते वाजिब यह है कि मस्जिद की सोने से ज़ीनत न करें और एहतियाते मुस्तहब यह है कि मस्जिद को इंसान और हैवान की तरह जानवरों की तस्वीरों से भी न सजाया जाए।
918. अगर मस्जिद टूट फूट भी जाए तब भी न तो उसे बेचा जा सकता है और नहीं मिल्कियत और सड़क में शामिल किया जा सकता है।
919. मस्जिद के दरवाज़ों, खिड़कियों और दूसरी चीज़ों को बेचना हराम है और अगर मस्जिद टूट फूट जाए तब भी ज़रूरी है कि इन चीज़ों को उसी मस्जिद की मरम्मत के लिये इस्तेमाल किया जाए और अगर उस मस्जिद के काम की न रही हों तो ज़रूरी है कि किसी दूसरी मस्जिद के काम में लाया जाए और अगर दूसरी मस्जिदों के काम की भी न रहीं हो तो उन्हें बेचा जा सकता है और जो रक़म हासिल हो वह बसूरते इम्कान उसी मस्जिद की मरम्मत पर वर्ना दूसरी मस्जिद की मरम्मत पर खर्च की जाए।
920. मस्जिद का तअमीर करना और ऐसी मस्जिद की मरम्मत करना जो मख्दूश हो मुस्तहब है, और अगर मस्जिद इस क़दर मख्दूश हो कि उसकी मरम्मत मुम्किन न हो तो उसे गिरा कर दोबारा तअमीर किया जा सकता है बल्कि अगर मस्जिद टूटी फूटी न हो तब भी उसे लोगों की ज़रूरत की खातिर गिरा कर वसी किया जा सकता है।
921. मस्जिद को साफ़ सुथरा रखना और उसमें चिराग़ जलाना मुस्तहब है और अगर कोई मस्जिद में जाना चाहे तो मुस्तहब है कि खुशबू लगाए और पाकीज़ा क़ीमती लिबास पहने और अपने जूतों के तलवों के बारे में तहक़ीक करे कि कहीं नजासत तो नहीं लगी हुई। नीज़ यह है कि मस्जिद में दाखिल होते वक़्त पहले दायां पांव और बाहर निकलते वक़्त पहले बायां पांव रखे और इसी तरह मुस्तहब है कि सब लोगों से पहले मस्जिदों में आए और सब से बाद में निकले।
922. जब कोई शख़्स मस्जिद में दाखिल हो तो मुस्तहब है कि दो रक्अत नमाज़े तहीयत व एहतिरामे मस्जिद की नीयत से पढ़े और अगर वाजिब नमाज़ या कोई और मुस्तहब नमाज़ पढ़े तब भी काफ़ी है।
923. अगर इंसान मजबूर न हो तो मस्जिद में सोना, दुनियावी कामों के बारे में गुफ़्तुगू करना और कोई काम काज करना और अश्आर पढ़ना जिनमें नसीहत और काम की बात न हो मकरूह है। नीज़ मस्जिद में थूकना, नाक की आलाइश फेंकना और बलग़म थूकना भी मकरूह है बल्कि बाज़ सूरतों में हराम है। और इसके अलावा गुमशुदा (शख़्स या चीज़) को तलाश करते हुए आवाज़ को बलन्द करना भी मकरूह है। लेकिन अज़ान के लिये आवाज़ को बलन्द करने की मुमानिअत नहीं है।
924. दीवाने को मस्जिद में दाखिल होने देना मकरूह है और इसी तरह उस बच्चे को भी दाखिल होने देना मकरूह है जो नमाज़ी के लिये बाइसे ज़हमत हो या एहतिमाल हो कि वह मस्जिद को नजिस कर देगा। इन दो सूरतों के अलावा बच्चे को मस्जिद में आने देने में कोई हरज नहीं। उस शख़्स का भी मस्जिद में जाना मकरूह है जिसने प्याज़, लहसुन या इनसे मुशाबेह कोई चीज़ खाई हो कि जिसकी बू लोगों को नागवार गुज़रती हो।
अज़ान और इक़ामत
925. हर मर्द और औरत के लिये मुस्तहब है कि रोज़ाना की वाजिब नमाज़ों से पहले अज़ान और इक़ामत कहे और ऐसा करना दूसरी वाजिब या मुस्तहब नमाज़ों के लिये मशरूउ नहीं लेकिन ईदे फ़ित्र और ईदे क़ुर्बान से पहले जबकि नमाज़ बा जमाअत पढ़े तो मुस्तहब है कि तीन मर्तबा, अस सलात कहें।
926. मुस्तहब है कि बच्चे की पैदाइश के पहले दिन या नाफ़ उखड़ने से पहले उसके दायें कान में अज़ान और बायें कान में इक़ामत कही जाए।
927. अज़ान अट्ठारा जुम्लों पर मुशतमिल हैः-
अल्लाहो अक्बरो अल्लाहो अक्बरो अल्लाहो अक्बरो अल्लाहो अक्बरो,
अश्हदो अंल्ला इलाहा इल्लल्लाहो अश्हदो अंल्ला इलाहा इल्लल्लाहो,
अश्हदो अन्ना मोहम्मदर्रसूलुल्लाह अश्हदो अन्ना मोहम्मदर्रसूलुल्लाह,
हैया अलस्सलाते हैया अलस्सलाते,
हैया अलल फ़लाहे हैया अलल फ़लाहे,
हैया अला ख़ैरिल अमले हैया अला ख़ैरिल अमले,
अल्लाहो अक्बरो अल्लाहो अक्बरो,
लाइलाहा इल्लल्लाहो लाइलाहा इल्लल्लाहो।
और इक़ामत के सत्रा जुम्ले हैं यानी अज़ान की इब्तिदा से दो मर्तबा अल्लाहो अक्बरो और आख़िर में एक मर्तबा ला इलाहा इल्लल्लाहो कम हो जाता है और हैया अला ख़ैरिल अमले कहने के बाद दो दफ्आ क़द क़ामतिस्सलातो का इज़ाफ़ा कर देना ज़रूरी है।
928. अश्हदो अन्ना अलीयन वलीयुल्लाहे अज़ान और इक़ामत का जुज़्व नहीं है लेकिन अगर अश्हदो अन्ना मोहम्मदर्रसूलुल्लाहे के बाद क़ुर्बत की नीयत से कहा जाए तो अच्छा है।
अज़ान और इक़ामत का तर्जमा
अल्लाहो अक्बरो यानी खुदाए लआला इससे बुज़ुर्ग तर है कि उसकी तअरीफ़ की जाए। अश्हदो अंल्ला इलाहा इल्लल्लाह यानी मैं गवाही देता हूं कि यकता और बेमिस्ल अल्लाह के अलावा कोई और परस्तिश के क़ाबिल नहीं है।
अश्हदो अन्ना मोहम्मदर्रसूलुल्लाह यानी मैं गवाही देता हूं कि मोहम्मद इब्ने अब्दुल्लाह स्वल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम अल्लाह के पैग़म्बर और उसी की तरफ़ से भेजे हुए हैं।
अश्हदो अन्ना अलीयन अमीरल मोमिनीना वलीयुल्लाह यानी गवाही देता हूं कि हज़रत अली (अ0) मोमिनीन के अमीर और तमाम मख्लूक़ पर अल्लाह के वली हैं।
हैया अलस्सलाते यानी नमाज़ की तरफ़ जल्दी करो।
हैया अलल फ़लाहे यानी रूस्तगारी के लिये जल्दी करो।
हैया अला ख़ैरिल अमले यानी बेहतरीन काम (नमाज़) के लिये जल्दी करो।
कद़् क़ामतिस्सलाते य्अनी बित्तहक़ीक़ नमाज़ क़ाइम हो गई।
ला इलाहा इल्लल्लाहो यानी यकता और बे मिस्ल अल्लाह के अलावा कोई परस्तिश के क़ाबिल नहीं।
929. ज़रूरी है कि अज़ान और इक़ामत के जुम्लों के दरमियान ज़्यादा फ़ासिला न हो और अगर उनके दरमियान मअमूल से ज़्यादा फ़ासिला रखा जाए तो ज़रूरी है कि अज़ान और इक़ामत दोबारा शूरू से कही जायें।
930. अगर अज़ान या इक़ामत में आवाज़ को गले में इस तरह फेरे कि ग़िना हो जाए यानी अज़ान और इक़ामत इस तरह कहे जैसे लहवो लइब और खेलकूद की महफ़िलों में अवाज़ निकालने का दस्तूर है तो वह हराम है और अगर ग़िना न हो तो मकरूह है।
931. तमाम सूरतों में जब कि नमाज़ी दो नमाज़ों को तले ऊपर अदा करे अगर उसने पहली नमाज़ के लिये अज़ान कही तो बाद वाली नमाज़ के लिये अज़ान साक़ित है। ख़्वाह दो नमाज़ों का जमअ करना बेहतर हो या न हो मसलन अरफ़ा के दिन जो नवी ज़िलहिज्जा का दिन है ज़ोहर और अस्र की नमाज़ों का जमअ करना और ईदे क़ुर्बान की रात में मग़्रिब और इशा की नमाज़ों का जमअ करना उस शख़्स के लिये जो मश्अरूल हराम में हो। इन सूरतों में अज़ान का साक़ित होना इससे मशरूत है कि दो नमाज़ों के दरमियान बिल्कुल फ़ासिला न हो या बहुत कम फ़ासिला हो लेकिन नफ़ल और तअक़ीबात पढ़ने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता और एहतियाते वाजिब यह है कि इन सूरतों में अज़ान मशरूइयत की नीयत से कही जाए बल्कि आख़िरी दो सूरतों में अज़ान कहना मुनासिब नहीं है अगरचे मशरूइयत की नियत से न हो।
932. अगर नमाज़े जमाअत के लिये अज़ान और इक़ामत कही जा चुकी हो तो जो शख़्स उस जमाअत के साथ नमाज़ पढ़ रहा हो उसके लिये ज़रूरी नहीं कि अपनी नमाज़ के लिये अज़ान और इक़ामत कहे।
933. अगर कोई शख़्स नमाज़ के लिये मस्जिद में जाए और देखे कि नमाज़े जमाअत ख़त्म हो चुकी है तो जब तक सफ़ें टूट न जायें और लोग मुन्तशिर न हो जायें वह नमाज़ के लिये अज़ान और इक़ामत न कहे। यानी उन दोनों का कहना मुस्तहबे ताकीदी नहीं बल्कि अगर अज़ान देना चाहता हो तो बेहतर यह है कि बहुत आहिस्ता कहे और अगर दूसरी नमाज़े जमाअत क़ाइम करना चाहता हो तो हरगिज़ अज़ान व इक़ामत न कहे।
934. ऐसी जगह जहां नमाज़े जमाअत अभी अभी ख़त्म हुई हो और सफ़ें न टूटी हों अगर कोई शख़्स वहां तन्हा या दूसरी जमाअत के साथ जो क़ाइम हो रही हो नमाज़ पढ़ना चाहे तो छः शर्तों के साथ अज़ान और इक़ामत उस पर से साक़ित हो जाती हैः-
1. नमाज़े जमाअत मस्जिद में हो – और अगर मस्जिद में न हो तो अज़ान और इक़ामत का साक़ित होना मालूम नहीं।
2. उस नमाज़ के लिये अज़ान और इक़ामत कही जा चुकी हो।
3. नमाज़े जमाअत बातिल न हो।
4. उस शख़्स की नमाज़ और नमाज़े जमाअत एक ही जगह पर हो। लिहाज़ा अगर नमाज़े जमाअत मस्जिद के अन्दर पढ़ी जाए और वह शख़्स मस्जिद की छत पर नमाज़ पढ़ना चाहे तो मुस्तहब है कि अज़ान और इक़ामत कहे।
5. नमाज़े जमाअत अदा हो। लेकिन इस बात की शर्त नहीं कि खुद उसकी नमाज़ भी अदा हो।
6. उस शख़्स की नमाज़ और नमाज़े जमाअत का वक़्त मुश्तरक हो मसलन दोनों नमाज़े ज़ोहर या दोनों नमाज़े अस्र पढ़ें या नमाज़े ज़ोहर जमाअत से पढ़ी जा रही है और वह शख़्स नमाज़े अस्र पढ़े और जमाअत की नमाज़, अस्र की नमाज़ हो और अगर जमाअत की नमाज़े अस्र हो और आख़िरी वक़्त में वह चाहे कि मग़्रिब की नमाज़ अदा पढ़े तो अज़ान और इक़ामत उस पर से साक़ित नहीं होगी।
935. जो शर्तें साबिक़ा मस्अले में बयान की गई हैं अगर कोई शख़्स उनमें से तीसरी शर्त के बारे में शक करे यानी उसे शक हो कि जमाअत की नमाज़ सहीह थी या नहीं तो उस पर से अज़ान और इक़ामत साक़ित नहीं है। लेकिन अगर दूसरी पांच शराइत में से किसी एक के बारे में शक करे तो बेहतर है कि रजाए मतलूवियत की नीयत से अज़ान और इक़ामत कहे।
936. अगर कोई शख़्स किसी दूसरे की अज़ान जो एलान या जमाअत की नमाज़ के लिये कही जाए, सुने तो मुस्तहब है कि उसका जो हिस्सा सुने खुद भी उसे आहिस्ता आहिस्ता दोहराए।
937. अगर किसी शख़्स ने किसी दूसरे की अज़ान और इक़ामत सुनी हो ख़्वाह उसने उन जुमलों को दोहराया हो या न दोहराया हो तो अगर अज़ान और इक़ामत और उस नमाज़ के दरमियान जो वह पढ़ना चाहता हो ज़्यादा फ़ासिला न हुआ हो तो वह अपनी नमाज़ के लिये अज़ान और इक़ामत कह सकता है।
938. अगर कोई मर्द औरत की अज़ान को लज़्ज़त के क़स्द से सुने तो उसकी अज़ान साक़ित नहीं होगी बल्कि अगर मर्द का इरादा लज़्ज़त हासिल करने का न हो तब भी उसकी अज़ान साक़ित होने में इश्काल है।
939. ज़रूरी है कि नमाज़े ज़माअत की अज़ान और इक़ामत मर्द कहे लेकिन औरतों की नमाज़े जमाअत में अगर औरत अज़ान और इक़ामत कह दे तो काफ़ी है।
940. ज़रूरी है कि इक़ामत अज़ान के बाद कही जाए अलावा अज़ीं इक़ामत में मोअतबर है कि खड़े होकर और हदस से पाक होकर वुज़ू या ग़ुस्ल या तयम्मुम कर के कही जाए।
941. अगर कोई शख़्स अज़ान और इक़ामत के जुमले बग़ैर तरतीब के कहे मसलन हैया अललफ़लाह का जुमला हैया अलस्सलाह से पहले कहे तो ज़रूरी है कि जहां से तरतीब बिगड़ी हो वहां से दोबारा कहे।
942. ज़रूरी है कि अज़ान और इक़ामत के दरमियान फ़ासिला न हो और अगर उनके दरमियान इतना फ़ासिला हो जाए कि जो अज़ान कही जा चुकी है उसे उस इक़ामत की अज़ान न शुमार किया जा सके तो मुस्तहब है कि दोबारा अज़ान कही जाए। अलावा अज़ीं अगर अज़ान और इक़ामत के और नमाज़ के दरमियान इतना फ़ासिला हो जाए कि अज़ान और इक़ामत उस नमाज़ की अज़ान और इक़ामत शुमार न हो तो मुस्तहब है कि उस नमाज़ के लिये दोबारा अज़ान और इक़ामत कही जाए।
943. ज़रूरी है कि अज़ान और इक़ामत सहीह अरबी में कही जायें। लिहाज़ा अगर कोई शख़्स उन्हें ग़लत अरबी में कहे या एक हर्फ़ की जगह कोई दूसरा हर्फ़ कहे या मसलन उनका तर्जमा उर्दू ज़बान में कहे तो सहीह नहीं है।
944. ज़रूरी है कि अज़ान और इक़ामत, नमाज़ का वक़्त दाखिल होने के बाद कही जाएं और अगर कोई शख़्स अमदन या भूल कर वक़्त से पहले कहे तो बातिल है मगर ऐसी सूरत में जबकि वसते नमाज़ में वक़्त दाख़िल हो तो उस नमाज़ पर सहीह हुक्म लगेगा कि जिसका मस्अला 752 में ज़िक्र हो चुका है।
945. अगर कोई शख़्स इक़ामत कहने से पहले शक करे कि अज़ान कही है या नहीं तो ज़रूरी है कि अज़ान कहे और अगर इक़ामत कहने में मशग़ूल हो जाए और शक करे कि अज़ान कही है या नहीं तो अज़ान कहना ज़रूरी नहीं।
946. अगर अज़ान और इक़ामत कहने के दौरान कोई जुमला कहने से पहले एक शख़्स शक करे कि उसने इससे पहले वाला जुमला कहा है या नहीं तो ज़रूरी है कि जिस जुमले की अदायगी के बारे में उसे शक हुआ हो उसे अदा करे लेकिन अगर उसे अज़ान या इक़ामत का कोई जुमला अदा करते हुए शक हो कि उसने उससे पहने वाला जुमला कहा है या नहीं तो उस जुमले को कहना ज़रूरी नहीं।
947. मुस्तहब है कि अज़ान कहते वक़्त इंसान क़िब्ले की तरफ़ मुंह कर के खड़ा हो और वुज़ू या ग़ुस्ल की हालत में हो और हाथों को कानो पर रखे और आवाज़ को बलन्द करे और ख़ींचे और अज़ान के जुमलों के दरमियान क़दरे फ़ासिला दे और जुमलों के दरमियान बातें न करे।
948. मुस्तहब है कि इक़ामत कहते वक़्त इंसान का बदन साक़िन हो और अज़ान के मुक़ाबिले में इक़ामत आहिस्ता कहे और उसके जुमलों को एक दूसरे से मिला न दे। लेकिन इक़ामत के दरमियान उतना फ़ासिला न दे जितना अज़ान के जुमलों के दरमियान देता है।
949. मुस्तहब है कि अज़ान और इक़ामत के दरमियान एक क़दम आगे बढ़े या थोड़ी देर के लिये बैठ जाए या सज्दा करे या अल्लाह का ज़िक्र करे या दुआ पढ़े या थोड़ी देर के लिये साकित हो जाए या कोई बात करे या दो रक्अत नमाज़ पढ़े लेकिन नमाज़े फ़ज्र की अज़ान और इक़ामत के दरमियान कलाम करना और नमाज़े मग़्रिब की अज़ान और इक़ामत के दरमियान नमाज़ पढ़ना (यानी दो रक्अत नमाज़ पढ़ना) मुस्तहब नहीं है।
950. मुस्तहब है कि जिस शख़्स को अज़ान देने पर मुक़र्रर किया जाए वह आदिल और वक़्त शनास हो, नीज़ यह कि बलन्द आहंग हो और ऊंची जगह पर अज़ान दे।
नमाज़ के वाजिबात
1.नीयत, 2.क़ियाम, 3.तक्बीरतुल एहराम, 4.रूकू, 5.सुजूद, 6.क़िरअत, 7.ज़िक्र, 8.तशहहुद, 9.सलाम, 10.तरतीब, 11.मुवालात यानी अज्ज़ा ए नमाज़ का पयदर पय बजा लाना।
951. नमाज़ के वाजिबात में से बाज़ उसके रुक्न हैं यानी अगर इंसान उन्हें बजा न लाए तो ऐसा करना अमदन हो या ग़लती से हो नमाज़ बातिल हो जाती है और बाज़ वाजिबात रुक्न नहीं हैं यानी अगर वह ग़लती से छूट जायें तो नमाज़ बातिल नहीं होती।
नमाज़ के अर्कान पांच हैः-
1. नीयत
2. तक्बीरतुल एहराम (यानी नमाज़ शुरू करते वक़्त अल्लाहो अक्बर कहना)।
3. रूकू से मुत्तसिल क़ियाम यानी रूकू में जाने से पहले खड़ा होना।
4. रूकू।
5. हर रक्अत में दो सज्दे। और जहां तक ज़्यादती का तअल्लुक़ है अगर ज़्यादती अमदन हो तो बग़ैर किसी शर्त के नमाज़ बातिल है। और अगर ग़लती से हुई हो तो रूकू में या एक ही रक्अत के दो सज्दों में ज़्यादती से एहतियाते लाज़िम की बिना पर नमाज़ बातिल है वर्ना बातिल नहीं।
नीयत
952. ज़रूरी है कि इंसान नमाज़ क़ुर्बत की नीयत से यानी ख़ुदावन्दे करीम की ख़ुशनूदी हासिल करने के लिये पढ़े और यह ज़रूरी नहीं कि नीयत को अपने दिल से गुज़ारे या मसलन ज़बान से कहे कि चार रक्अत नमाज़े ज़ोहर पढ़ता हूं क़ुर्बतन इलल्लाह।
953. अगर कोई शख़्स ज़ोहर की नमाज़ में या अस्र की नमाज़ में नीयत करे कि चार रक्अत नमाज़ पढ़ता हूं लेकिन इस अम्र का तअय्युन न करे कि नमाज़े ज़ोहर है या अस्र की तो उसकी नमाज़ बातिल है। नीज़ मिसाल के तौर पर किसी शख़्स पर नमाज़े ज़ोहर की क़ज़ा वाजिब हो और वह उस क़ज़ा नमाज़ या नमाज़े ज़ोहर को ज़ोहर के वक़्त में पढ़ना चाहे तो ज़रूरी है कि जो नमाज़ वह पढ़े नीयत में उसका तअय्युन करे।
954. ज़रूरी है कि इंसान शूरू से आख़िर तक अपनी नीयत पर क़ाइम रहे अगर वह नमाज़ में इस तरह ग़ाफ़िल हो जाए कि अगर कोई पूछे कि वह क्या कर रहा है तो उसकी समझ में न आए कि क्या जवाब दे तो तो उसकी नमाज़ बातिल है।
955. ज़रूरी है कि इंसान फ़क़त ख़ुदावन्दे आलम की ख़ुशनूदी हासिल करने के लिये नमाज़ पढ़े पस जो शख़्स रिया करे यानी लोगों को दिखाने के लिये नमाज़ पढ़े तो उसकी नमाज़ बातिल है ख़्वाह यह नमाज़ पढ़ना फ़क़त लोगों को या ख़ुदा और लोगों दोनों को दिखाने के लिये हो।
956. अगर कोई शख़्स नमाज़ का कुछ हिस्सा भी अल्लाह तआला जल्ला शानहू के अलावा किसी और के लिये बजा लाए ख़्वाह वह हिस्सा वाजिब हो मसलन सूरा ए अलहम्द, या मुस्तहब हो, मसलन क़ुनूत और अगर ग़ैरे ख़ुदा का यह क़स्द पूरी नमाज़ पर मुहीत हो या उस बड़े हिस्से के तदारुक से बुतलान लाज़िम आता हो तो उसकी नमाज़ बातिल है। और अगर नमाज़ तो ख़ुदा के लिये पढ़े लेकिन लोगों को दिखाने के लिये किसी ख़ास जगह मसलन मस्जिद में पढ़े या किसी ख़ास वक़्त मसलन अव्वले वक़्त में पढ़े या किसी ख़ास क़ायदे से मसलन बा जमाअत पढ़े तो उसकी नमाज़ भी बातिल है।
तक्बीरतुल एहराम
957. हर नमाज़ के शूरू में अल्लाहो अक्बर कहना वाजिब और रुक्न है और ज़रूरी है कि इंसान अल्लाह के हुरूफ़ और अक्बर के हुरूफ़ और दो कलिमे पय दर पय कहे और यह भी ज़रूरी है कि यह दो कलिमे सहीह अरबी में कहे जायें और अगर कोई शख़्स ग़लत अरबी में कहे या मसलन उनका उर्दू तर्जमा करके कहे तो सहीह नहीं है।
958. एहतियाते मुस्तहब यह है कि इंसान नमाज़ की तक्बीरतुल एहराम को उस चीज़ से मसलन इक़ामत या दुआ से जो वह तक्बीर से पहले पढ़ रहा हो न मिलाए।
959. अगर कोई शख़्स चाहे कि अल्लाहो अक्बर को उस जुमले के साथ जो बाद में पढ़ता हो मसलन बिस्मिल्लाहिर्रमार्निरहीम से मिलाए तो बेहतर यह है कि अक्बर की आख़िरी हर्फ़ रा पर पेश दे लेकिन एहतियाते मुस्तहब यह है कि वाजिब नमाज़ में उसे न मिलाए।
960. तक्बीरतुल एहराम कहते वक़्त ज़रूरी है कि इंसान का बदन साकिन हो और अगर कोई शख़्स जान बूझकर इस हालत में तक्बीरतुल एहराम कहे कि उसका बदन हरकत में हो तो (उसकी तक्बीर) बातिल है।
961. ज़रूरी है कि तक्बीर, अलहम्द, सूरा, जिक्र और दुआ कम से कम इतनी आवाज़ में पढ़े कि खुद सुन सके और अगर ऊंचा सुनने या बहरा होने की वजह से या शोरोग़ुल की वजह से न सुन सके तो इस तरह कहना ज़रूरी है कि अगर कोई माने न हो तो सुन ले।
962. जो शख़्स किसी बीमारी की बिना पर गंगू हो जाए या उसकी ज़बान में कोई नक़्स हो जिसकी वजह से अल्लाहो अक्बर न कह सकता हो तो ज़रूरी है कि जिस तरह भी मुम्किन हो उस तरह कहे और अगर बिल्कुन ही न कह सकता हो तो ज़रूरी है कि दिल में कहे और उसके लिये उंगली से इस तरह इशारा करे कि जो तक्बीर से मुनासिबत रखता हो। और अगर हो सके तो ज़बान और होंट को भी हरकत दे और अगर कोई पैदाइशी गूंगा हो तो उसके लिये ज़रूरी है कि वह अपनी ज़बान और होंट को इस तरह हरकत दे कि जो किसी शख़्स के तक्बीर कहने से मुशाबेह हो और उसके लिये अपनी उंगली से भी इशारा करे।
963. इंसान के लिये मुस्तहब है कि तक्बीरतुल एहराम के बाद कहेः या मोहसिनो क़द अताकल मुसीओ व क़द असरतुल मोहसिनो अंय्यतजावज़ अनिल मुसीए अन्तल मोहलिनो व अनल मुसीओ बेहक्क़े मोहम्मदिंव व आले मोहम्मदिन स्वल्ले अला मोहम्मदिंव व आले मोहम्मदिंव व तजावज़ अन क़बीहे मा तअलमो मिन्नी। (यानी) ए अपने बन्दों पर एहसान करने वाले खुदा ! यह गुनाहगार बन्दा तेरी बारगाह में आया है और तूने हुक्म दिया है कि नेक लोग गुनाहगारों से दरगुज़ा करें – तू एहसान करने वाला है और मैं गुनाहगार हूं मोहम्मद (स्वल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम) और आले मोहम्मद (अ0) पर अपनी रहमतें नाज़िल फ़रमा और मोहम्मद (स्वल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम) और आले मोहम्मद (अ0) के तुफ़ैल मेरी बुराइयों से जिन्हें तू जानता है, दर गुज़र फ़रमा।
964. (इंसान के लिये) मुस्तहब है कि नमाज़ की पहली तक्बीर और नमाज़ की दरमियानी तक्बीरें कहते वक़्त हाथों को कानों के बराबर तक ले जाए।
965. अगर कोई शख़्स शक करे कि तक्बीरतुल एहराम कही है या नहीं और क़िरअत में मशग़ूल हो जाए तो अपने शक की परवाह न करे और अगर कुछ भी न पढ़ा हो तो ज़रूरी है कि तक्बीर कहे।
966. अगर कोई शख़्स तक्बीरतुल एहराम कहने के बाद शक करे कि सहीह तरीक़े से तक्बीर कही है या नहीं तो ख़्वाह उसने आगे कुछ पढ़ा हो या न पढ़ा हो अपने शक की परवाह न करे।
क़ियाम यानी खड़ा होना
967. तक्बीरतुल एहराम कहने के मौक़े पर क़ियाम और रूकू से पहले वाला क़ियाम – क़ियाम मुत्तसिल ब रूकू – रुक्न है। लेकिन अलहम्द और सूरा पढ़ने के मौक़े पर क़ियाम और रूकू के बाद क़ियाम रुक्न नहीं है और अगर कोई शख़्स उसे भूल चूक की वजह से तर्क कर दे तो उसकी नमाज़ सहीह है।
968. तक्बीरतुल एहराम कहने से पहले और उसके बाद थोड़ी देर तक खड़ा होना वाजिब है ताकि यक़ीन हो जाए कि तक्बीर क़ियाम की हालत में कही गई है।
969. अगर कोई शख़्स रूकू करना भूल जाए और अलहम्द और सूरा के बाद बैठ जाए और फिर उसे याद आए कि रूकू नहीं किया तो ज़रूरी है कि खड़ा हो जाए और रूकू में जाए। लेकिन अगर सीधा खड़ा हुए बग़ैर झुके होने की हालत में रूकू करे तो चूंकि वह क़ियाम मुत्तसिल ब रूकू बजा नहीं लाया इस लिये उसका यह रूकू किफ़ायत नहीं करता।
970. जिस वक़्त एक शख़्स तक्बीरतुल एहराम या क़िरअत के लिये खड़ा हो ज़रूरी है कि बदन को हरकत न दे और किसी तरफ़ न झुके और एहतियाते लाज़िम की बिना पर इखतियार की हालत में किसी जगह टेक न लगाए लेकिन अगर ऐसा करना ब अम्रे मजबूरी हो तो कोई इश्काल नहीं।
971. अगर क़ियाम की हालत में कोई शख़्स भूले से बदन को हरकत दे या किसी तरफ़ झुक जाए या किसी जगह टेक लगा ले तो कोई इश्काल नहीं है।
972. एहतियाते वाजिब यह है कि क़ियाम के वक़्त इंसान के दोनों पांव ज़मीन पर हों। लेकिन यह ज़रूरी नहीं कि बदन का बोझ दोनों पांव पर हो चुनांचे अगर एक पांव पर भी हो तो कोई इश्काल नहीं।
973. जो शख़्स ठीक तौर पर खड़ा हो सकता हो अगर वह अपने पांव एक दूसरे से इतना जुदा रखे कि उस पर खड़ा होना सादिक़ न आता हो तो उसकी नमाज़ बातिल है। और इसी तरह अगर मअमूल के ख़िलाफ़ पैरों को खड़ा होने की हालत में बहुत खुला रखे तो एहतियात की बिना पर यही हुक्म है। 974. जब इंसान नमाज़ में कोई वाजिब ज़िक्र पढ़ने में मश्ग़ूल हो तो ज़रूरी है कि उसका बदन साकिन हो और मुस्तहब ज़िक्र में मश्ग़ूल हो तब भी एहतियाते लाज़िम की बिना पर यही हुक्म है और जिस वक़्त हर क़द्र आगे या पीछे होना चाहे या बदन को दांये या बांये जानिब थोड़ी सी हरकत देना चाहे तो ज़रूरी है कि उस वक़्त कुछ न पढ़ें।
975. अगर मुतहर्रिक बदन की हालत में कोई शख़्स मुस्तहब ज़िक्र पढ़े मसलन रूकू से सज्दे में जाने के वक़्त तक्बीर कहे और उस ज़िक्र के क़स्द से कहे जिसका नमाज़ में हुक्म दिया गया है तो वह ज़िक्र सहीह नहीं लेकिन उसकी नमाज़ सहीह है। और ज़रूरी है कि इंसान बे हौलिल्लाहे व क़ुव्वतेही अक़ूमो व अक़्उद उस वक़्त कहे जब खड़ा हो रहा हो।
976. हाथों और उंगलियों को अलहम्द पढ़ते वक़्त हरकत देने में कोई हरज नहीं अगरचे एहतियाते मुस्तहब यह है कि उन्हें भी हरकत न दी जाए।
977. अगर कोई शख़्स अलहम्द और सूरा पढ़ते वक़्त या तस्बीहात पढ़ते वक़्त बे इख़तियार इतनी हरकत करे कि बदन साकिन होने की हालत से खारिज हो जाए तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि बदन के दोबारा साकिन होने पर जो कुछ उसने हरकत की हालत में पढ़ा था, दोबारा पढ़े।
978. नमाज़ के दौरान अगर कोई शख़्स खड़े होने के क़ाबिल न हो तो ज़रूरी है कि बैठ जाए और अगर बैठ भी न सकता हो तो ज़रूरी है कि लेट जाए लेकिन जब तक उसके बदन को सुकून हासिल न हो ज़रूरी है कि कोई वाजिब ज़िक्र न पढ़े।
979. जब तक इंसान खड़े होकर नमाज़ पढ़ सकता हो ज़रूरी है कि न बैठे मसलन अगर खड़ा होने की हालत में किसी का बदन हरकत करता हो या वह किसी चीज़ पर टेक लगाने पर या बदन को थोड़ा सा टेढ़ा करने पर मजबूर हो तो ज़रूरी है कि जैसे भी हो सके खड़ा होकर नमाज़ पढ़े लेकिन अगर वह किसी तरह भी खड़ा न हो सकता हो तो ज़रूरी है कि सीधा बैठ जाए और बैठ कर नमाज़ पढ़े।
980. जब तक इंसान बैठ सके ज़रूरी है कि वह लेट कर नमाज़ न पढ़े और अगर वह सीधा होकर न बैठ सके तो ज़रूरी है कि जैसे भी मुम्किन हो बैठे और अगर बिल्कुल न बैठ सके तो जैसा कि क़िब्ले के अहकाम में कहा गया है ज़रूरी है कि दायें पहलू लेटे और दायें पहलू पर न लेट सकता हो तो बायें पहलू पर लेटे। और एहतियाते लाज़िम की बिना पर ज़रूरी है कि जब तक दायें पहलू पर लेट सकता हो बायें पहलू पर न लेटे और अगर दोनों तरफ़ लेटना मुम्किन न हो तो पुश्त के बल इस तरह लेटे कि उसके तल्वे क़िब्ले की तरफ़ हों।
981. जो शख़्स बैठ कर नमाज़ पढ़ रहा हो अगर वह अलहम्द और सूरा पढ़ने के बाद खड़ा हो सके और रूकू खड़ा होकर बजा ला सके तो ज़रूरी है कि खड़ा हो जाए और क़ियाम की हालत से रूकू में जाए और अगर ऐसा न कर सके तो ज़रूरी है कि रूकू भी बैठ कर बजा लाए।
982. जो शख़्स लेट कर नमाज़ पढ़ रहा हो गर वह नमाज़ के दौरान इस क़ाबिल हो जाए कि बैठ सके तो ज़रूरी है कि नमाज़ की जितनी मिक़्दार मुम्किन हो बैठ कर पढ़े और अगर खड़ा हो सके तो ज़रूरी है कि जितनी मिक़्दार मुम्किन हो खड़ा होकर पढ़े लेकिन जब तक उसके बदन को सुकून हासिल न हो जाए ज़रूरी है कि कोई वाजिब ज़िक्र न पढ़े।
983. जो शख़्स बैठ कर नमाज़ पढ़ रहा हो अगर नमाज़ के दौरान इस क़ाबिल हो जाए कि खड़ा हो सके तो ज़रूरी है कि नमाज़ की जितनी मिक़्दार मुम्किन हो खड़ा होकर पढ़े लेकिन जब तक उसके बदन को सुकून न हासिल हो जाए ज़रूरी है कि कोई वाजिब ज़िक्र न पढ़े।
984. अगर किसी ऐसे शख़्स को, जो खड़ा हो सकता हो, यह ख़ौफ़ हो कि खड़े होने से बीमार हो जायेगा या उसे कोई तक्लीफ़ होगी तो वह बैठ कर नमाज़ पढ़ सकता है और अगर बैठने से भी तक्लीफ़ का डर हो तो लेट कर नमाज़ पढ़ सकता है।
985. अगर किसी शख़्स को इस बात की उम्मीद हो कि आख़िरे वक़्त में खड़ा होकर नमाज़ पढ़ सकेगा और वह अव्वले वक़्त में नमाज़ पढ़ ले और और आख़िरे वक़्त में खड़ा होने पर क़ादिर हो जाए तो ज़रूरी है कि दोबारा नमाज़ पढ़े लेकिन अगर खड़ा होकर नमाज़ पढ़ने से मायूस हो और अव्वले वक़्त में नमाज़ पढ़ ले बाद अज़्आँ वह खड़े होने के क़ाबिल हो जाए तो ज़रूरी नहीं कि दोबारा नमाज़ पढ़े।
986. (इंसान के लिये) मुस्तहब है कि क़ियाम की हालत में जिस्म सीधा रखे और कंधों को नीचे की तरफ़ ढीला छोड़ा दे नीज़ हाथों को रानों पर रखे और उंगलियों को बाहम मिलाकर रखे और निगाह सज्दे की जगह पर मर्क़ूज़ रखे और बदन का बोझ दोनों पांव पर यकसां डाले और ख़ुशूउ और ख़ुज़ूउ के साथ खड़ा हो और पांव आगे पीछे न रखे और अगर मर्द हो तो पांव के दरमियान तीन फैली हुई उंगलियों से लेकर एक बालिश्त तक का फ़ासिला रखे और अगर औरत हो तो दोनों पांव मिलाकर रखे।
क़िराअत
987. ज़रूरी है कि इंसान रोज़ाना की वाजिब नमाज़ों की पहली और दूसरी रक्अत में पहले अलहम्द और उसके बाद एहतियात की बिना पर एक पूरे सूरे की तिलावत करे और वज़्ज़ुहा और अलम नशरा की सूरतें और इसी तरह सूरा ए फ़ील और क़ुरैश एहतियात की बिना पर नमाज़ में एक सूरत सुमार होती हैं।
988. अगर नमाज़ का वक़्त तंग हो या इंसान किसी मजबूरी की वजह से सूरा न पढ़ सकता हो मसलन उसे ख़ौफ़ हो कि अगर सूरा पढ़ेगा तो चोर या दरिन्दा या कोई और चीज़ उसे नुक्सान पहुंचायेगी या उसे ज़रूरी काम हो तो अगर वह चाहे तो सूरा न पढ़े बल्कि वक़्त तंग होने की सूरत में और ख़ौफ़ की बाज़ हालतों में ज़रूरी है कि वह सूरा न पढ़े।
989. अगर कोई शख़्स जान बूझकर अलहम्द से पहले सूरा पढ़े तो उसकी नमाज़ बातिल होगी लेकिन अगर ग़ल्ती से अलहम्द से पहले सूरा पढ़े और पढ़ने के दौरान याद आए तो ज़रूरी है कि सूरा को छोड़ा दे और अलहम्द पढ़ने के बाद सूरा शूरू से पढ़े।
990. अगर कोई शख़्स अलहम्द और सूरा या उनमें से किसी एक का पढ़ना भूल जाए और रूकू में जाने के बाद उसे याद आए तो उसकी नमाज़ सहीह है।
991. अगर रूकू के लिये झुकने से पहल किसी शख़्स को याद आए कि उसने अलहम्द और सूरा नहीं पढ़ा तो ज़रूरी है कि पढ़े और अगर यह याद आए कि सूरा नहीं पढ़ा तो ज़रूरी है कि फ़क़त सूरा पढ़े लेकिन अगर उसे याद आए कि फ़क़त अलहम्द नहीं पढ़ी तो ज़रूरी है कि पहले अलहम्द और उसके बाद दोबारा सूरा पढ़े और अगर झुक भी जाए लेकिन रूकू की हद तक पहुंचने से पहले याद आए कि अलहम्द और सूरा या फ़क़त सूरा या फ़क़त अलहम्द नहीं पढ़ी तो ज़रूरी है कि खड़ा हो जाए और इसी हुक्म के मुताबिक़ अमल करे।
992. अगर कोई शख़्स जान भूझकर फ़र्ज़ नमाज़ में उन चार सूरों में से कोई एक सूरा पढ़े जिनमें आयाए सज्दा हो और जिनका ज़िक्र मस्अला 361 में किया गया है तो वाजिब है कि आयए सज्दा पढ़ने के बाद सज्दा करे लेकिन अगर सज्दा बजा लाए तो एहतियात की बिना पर उसकी नमाज़ बातिल है और ज़रूरी है कि उसे दोबारा पढ़े और अगर सज्दा न करे तो अपनी नमाज़ जारी रख सकता है अगरचे सज्दा न कर के उसने गुनाह किया है।
993. अगर कोई शख़्स भूलकर ऐसा सूरा पढ़ना शूरू कर दे जिसमें सज्दा वाजिब हो लेकिन आयए सज्दा पर पहुंचने से पहले उसे ख़्याल आ जाए तो ज़रूरी है कि उस सूरे को छोड़ दे और कोई दूसरा सूरा पढ़े और आयए सज्दा पढ़ने के बाद ख़्याल आए तो ज़रूरी है कि जिस तरह साबिक़ मस्अले में कहा गया है अमल करे।
994. अगर कोई शख़्स नमाज़ के दौरान किसी दूसरे को आयाए सज्दा पढ़ते हुए सुने तो उसकी नमाज़ सहीह है लेकिन एहतियात की बिना पर सज्दे का इशारा करे और नमाज़ ख़त्म करने के बाद उसका सज्दा बजा लाए।
995. मुस्तहब नमाज़ों में सूरा पढ़ना ज़रूरी नहीं है ख़्वाह वह नमाज़ मन्नत मानने की वजह से ही क्यों न वाजिब हो गई हो। लेकिन अगर कोई शख़्स बाज़ ऐसी मुस्तहब नमाज़ें उनके अहकाम के साथ पढ़ना चाहे मसलन नमाज़े वहशत कि जिनमें मख़्सूस सूरतें पढ़नी होती हैं तो ज़रूरी है कि वही सूरतें पढ़े।
996. जुमुआ की नमाज़ में और जुमुआ के दिन ज़ोहर की नमाज़ में पहली रक्अत में अलहम्द के बाद सूरा जुमुआ और दूसरी रक्अत में अलहम्द के बाद सूरा ए मुनाफ़िक़ून पढ़ना मुस्तहब है। और अगर कोई शख़्स इनमें से कोई एक सूरा पढ़ना शूरू कर दे तो एहतियाते वाजिब की बिना पर उसे छोड़ कर कोई दूसरा सूरा नहीं पढ़ सकता।
997. अगर कोई शख़्स अलहम्द के बाद सूरा ए एख़्लास या सूरा ए काफ़िरून पढ़ने लगे तो वह उसे छोड़कर दूसरा सूरा नहीं पढ़ सकता अलबत्ता अगर नमाज़े जुमुआ या जुमुआ के दिन नमाज़े ज़ोहर में भूल कर सूरा ए जुमुआ और सूरा ए मुनाफ़िक़ून की बजाए उन दो सूरतों में से कोई सूरा पढ़े तो उन्हें छोड़ सकता है और सूरा ए जुमुआ और सूरा ए मुनाफ़िक़ून पढ़ सकता है और एहतियाते मुस्तहब यह है कि अगर निस्फ़ तक पढ़ चुका हो तो फिर इन सूरों को न छोड़े।
998. अगर कोई शख़्स जुमुआ की नमाज़ में या जुमुआ के दिन ज़ोहर की नमाज़ में जान बूझ कर सूरा ए एख़्लास या सूरा ए काफ़िरून पढ़े तो ख़्वाह वह निस्फ़ तक न पहुंचा हो एहतियाते वाजिब की बिना पर उन्हें छोड़ कर सूरा ए जुमुआ और सूरा ए मुनाफ़िक़ून नहीं पढ़ सकता।
999. अगर कोई शख़्स नमाज़ में सूरा ए एख़्लास या सूरा ए काफ़िरून के अलावा कोई दूसरा सूरा पढ़े तो जब तक निस्फ़ तक न पहुंचा हो उसे छोड़ सकता है और दूसरा सूरा पढ़ सकता है और निस्फ़ तक पहुंचने के बाद बग़ैर किसी वजह के उस सूरे को छोड़ कर दूसरा सूरा पढ़ना एहतियात की बिना पर जाइज़ नहीं।
1000. अगर कोई शख़्स किसी सूरे का कोई हिस्सा भूल जाए या ब अम्रे मजबूरी मसलन वक़्त की तंगी या किसी और वजह से उसे मुकम्मल न कर सके तो वह उस सूरे को छोड़ कर कोई दूसरा सूरा पढ़ सकता है ख़्वाह निस्फ़ तक ही पहुंच चुका हो या वह सूरा ए एख़्लास या सूरा ए काफ़िरून ही हो।
1001. मर्द पर एहतियात की बिना पर वाजिब है कि सुब्ह और मग़्रिब व इशा की नमाज़ों में अलहम्द और सूरा बलन्द आवाज़ से पढ़े और मर्द और औरत दोनों पर एहतियात की बिना पर वाजिब है कि नमाज़े ज़ोहर व अस्र में अलहम्द और सूरा आहिस्ता पढ़ें।
1002. एहतियात की बिना पर ज़रूरी है कि मर्द सुब्ह और मग्रिब व इशा की नमाज़ में ख़्याल रखे कि अलहम्द और सूरा के तमाम कलिमात हत्ता कि उनके आख़िरी हर्फ़ तक बलन्द आवाज़ से पढ़े।
1003. सुब्ह की नमाज़ और मग़्रिब व इशा की नमाज़ में औरत अलहम्द और सूरा बलन्द आवाज़ से या आहिस्ता जैसा चाहे पढ़ सकती है। लेकिन अगर ना महरम उसकी आवाज़ सुन रहा हो और उसका सुनना हराम हो तो अहतियात की बिना पर आहिस्ता पढ़े।
1004. अगर कोई शख़्स जिस नमाज़ को बलन्द आवाज़ से पढ़ना ज़रूरी है उसे अमदन आहिस्ता पढ़े या जो नमाज़ आहिस्ता पढ़नी ज़रूरी है उसे अमदन बलन्द आवाज़ से पढ़े तो एहतियात की बिना पर उसकी नमाज़ बातिल है। लेकिन अगर भूल जाने की वजह से या मसअला न जानने की वजह से ऐसा करे तो (उसकी नमाज़) सहीह है। नीज़ अलहम्द और सूरा पढ़ने के दौरान भी अगर वह मुतवज्जह हो जाए कि उससे ग़लती हुई है तो ज़रूरी नहीं कि नमाज़ को जो हिस्सा पढ़ चुका हो उससे दोबारा पढ़े।
1005. अगर कोई शख़्स अलहम्द और सूरा पढ़ने के दौरान अपनी आवाज़ मअमूल से ज़्यादा बलन्द करे मसलन उन सूरतों को ऐसे पढ़े ज़ैसे कि फ़र्याद कर रहा हो तो उसकी नमाज़ बातिल है।
1006. इंसान के लिये ज़रूरी है कि नमाज़ की क़िरअत को सीख ले ताकि ग़लत न पढ़े और जो शख़्स किसी तरह भी पूरे सूरा ए अलहम्द को न सीख सकता हो जिस क़दर भी सीख सकता हो सीखे और पढ़े लेकिन अगर वह मिक़्दार बहुत कम हो तो एहतियाते वाजिब की बिना पर क़ुरआन के दूसरे सूरों में से जिस क़दर सीख सकता हो उसके साथ मिलाकर पढ़े और अगर न कर सकता हो तो तस्बीह को उसके साथ मिलाकर पढ़े और अगर पूरे सूरे को न सीख सकता हो तो ज़रूरी नहीं कि उसके बदले कुछ पढ़े। और हर हाल में एहतियाते मुस्तहब यह है कि नमाज़ को जमाअत के साथ बजा ला लाए।
1007. अगर किसी को अलहम्द अच्छी तरह याद न हो और वह सीख सकता हो और नमाज़ का वक़्त वसी हो तो ज़रूरी है कि सीख ले और अगर वक़्त तंग हो और वह इस तरह पढ़े जैसा कि गुज़िश्ता मस्अलों में कहा गया है तो उसकी नमाज़ सहीह है लेकिन अगर मुम्किन हो तो अज़ाब से बचने के लिये जमाअत के साथ नमाज़ पढ़े।
1008. वाजिबाते नमाज़ सीखाने की उजरत लेना एहतियात की बिना पर हराम है लेकिन मुस्तहब्बाते नमाज़ सीखाने की उजरत लेना जाइज़ है।
1009. अगर कोई शख़्स अलहम्द और सूरा का कोई कलिमा न जानता हो या जान बूझकर उसे न पढ़े या एक हर्फ़ के बजाए दूसरे हर्फ़ कहे मसलन ज़ाद के बजाए ज़ो कहे या जहां ज़ैर और ज़बर के बग़ैर पढ़ना ज़रूरी हो वहा ज़ैर और ज़बर लगाए या तश्दीद हज़फ़ कर दे तो उसकी नमाज बातिल है।
1010. अगर इंसान ने कोई कलिमा जिस तरह याद किया हो उसे सहीह समझता हो और नमाज़ में उसी तरह पढ़े और बाद में उसे पता चले कि उसने ग़लत पढ़ा है तो उसके लिये नमाज़ का दोबारा पढ़ना ज़रूरी नहीं।
1011. अगर कोई शख़्स किसी लफ़्ज़ के ज़बर ज़ेर से वाक़िफ़ न हो या यह न जानता हो कि वह लफ़्ज़ (छोटी) हे से अदा करना चाहिये या हाए हुत्ती से तो ज़रूरी है कि सीख ले और लफ़्ज़ को दो (या दो से ज़ाइद) तरीक़ो से अदा करे। और अगर उसे लफ़्ज़ ग़लत पढ़ना क़ुरआन या ज़िक्रे ख़ुदा शुमार न हो तो उसकी नमाज़ बातिल है। और अगर दोनों तरीक़ों से पढ़ना सहीह हो मसलन एहदिनस सिरातल मुस्तक़ीमा को दो दफ़्आ (सीन) से और एक दफ़्आ (साद) से पढ़े तो इन दोनों तरीक़ों से पढ़ने में कोई मुज़ाइक़ा नहीं।
1012. उलमा ए तज़्वीद का कहना है कि अगर किसी लफ़्ज़ में वाव हो और उसे लफ़्ज़ से पहले वाले हर्फ़ पर पेश हो और उस लफ़्ज़ में वाव के बाद हर्फ़ हम्ज़ा हो मसलन सूइन हो पढ़ने वाले को चाहिये कि उस वाव को मद के साथ खींच कर पढ़े। इसी तरह अगर किसी लफ़्ज़ में अलिफ़ हो और उस लफ़्ज़ में अलीफ़ से पहले वाले हर्फ़ पर ज़बर हो और उस लफ़्ज़ में अलीफ़ के बाद वाला हर्फ़ हमज़ा है मसलन जाअ तो ज़रूरी है कि उस लफ़्ज़ के अलिफ़ को खींच कर पढ़ें। और अगर किसी लफ़्ज़ में ये हो और उस लफ़्ज़ में ये से पहले वाले हर्फ़ पर ज़ेर हो और उस लफ़्ज़ में ये से बाद वाला हर्फ़ हमज़ा हो मसलन जीअ तो ज़रूरी है कि ये को मद के साथ पढ़ें और अगर इन हुरूफ़ वा अलिफ़ और या के बाद हमज़ा के बजाए कोई साकिन हर्फ़ हो यानी उस पर ज़बर, ज़ेर या पेश में से कोई हरकत न हो तब भी इन तीनों हुरूफ़ को मद के साथ पढ़ना ज़रूरी है। लेकिन ज़ाहिरन ऐसे मुआमले में क़िरअत का सहीह होना मद पर मौक़ूफ़ नहीं। लिहाज़ा जो तरीक़ा बताया गया है अगर कोई उस पर अमल न करे तब भी उसकी नमाज़ सहीह है लेकिन वलज़्ज़ल्लीन जैसे अल्फ़ाज़ में तश्दीद और अलिफ़ का पूरे तौर पर अदा होना मद पर थोड़ा सा तवक़्क़ुफ़ करने से है लिहाज़ा ज़रूरी है कि अलिफ़ को थोड़ा सा ख़ींचकर पढ़े। 1013. एहतियाते मुस्तहब यह है कि इंसान नमाज़ में वक़्फ़ ब हरकत और वस्ल ब सुकून न करे और वक़्फ़ ब हरकत के मअनी यह हैं कि किसी लफ़्ज़ के आख़िर में ज़ेर, ज़बर, पेश पढ़े और उस लफ़्ज़ और उसके बाद के लफ़्ज़ के दरमियान फ़ासिला दे मसलन कहे अर्रहमानिर्रहीमे और अर्रहीमे के मीम को ज़ेर दे और उसके बाद क़दरे फ़ासिला दे और कहे, मालिके यौमिद्दीने और वस्ल बसुकून के मअना यह है कि किसी लफ़्ज़ के ज़ेर, जबर या पेश न पढ़े और उस लफ़्ज़ को बाद के लफ़्ज़ से जोड़ दे। मसलन यह कहे अर्रहमानिर्रहीम और अर्रहीम की मीम को ज़ेर न दे और फ़ौरन मालिके यौमिद्दीन कहे।
1014. नमाज़ की तीसरी और चौथी रक्अत में फ़क़त एक दफ़्आ अलहम्द या एक दफ़्आ तस्बीहाते अर्बआ पढ़ी जा सकती है यानी नमाज़ पढ़ने वाला एक दफ़्आ कहे सुब्हानल्लाहे वलहम्दो लिल्लाहे वला इलाहा इल्लल्लाहो वल्लाहो अकबर और बेहतर यह है कि तीन दफ़्आ कहे। और एक रक्अत में अलहम्द और दूसरी रक्अत में तस्बीहात भी पढ़ सकता है। और बेहतर यह है कि दोनों रक्अतो में तस्बीहात पढ़े।
1015. अगर वक़्त तंग हो तो तस्बीहाते अर्बआ एक दफ़्आ पढ़ना चाहिये और अगर इस क़दर वक़्त भी न हो तो बईद नहीं कि एक दफ़्आ सुब्हानल्लाह कहना लाज़िम हो।
1016. एहतियात की बिना पर मर्द और औरत दोनों पर वाजिब है कि नमाज़ की तीसरी और चौथी रक्अत में अलहम्द या तस्बीहाते अर्बआ आहिस्ता पढ़ें।
1017. अगर कोई शख़्स तीसरी और चौथी रक्अत में अलहम्द पढ़े तो वाजिब नहीं कि उसकी बिस्मिल्लाह भी आहिस्ता पढ़े लेकिन मुक्तदी के लिये एहतियाते वाजिब यह है कि बिस्मिल्लाह भी आहिस्ता भी।
1018. जो शख़्स तस्बीहात याद न कर सकता हो या उन्हें ठीक ठीक पढ़ न सकता हो ज़रूरी है कि वह तीसरी और चौथी रक्अत में अलहम्द पढ़े।
1019. अगर कोई शख़्स नमाज़ की पहली दो रक्अतों में यह ख़्याल करते हुए कि यह आख़िरी दो रक्अतें हैं तस्बीहात पढ़े लेकिन रूकू से पहले उसे सहीह सूरत का पता चल जाए तो ज़रूरी है कि अलहम्द और सूरा पढ़े और अगर उसे रूकू के बाद पता चले तो उसकी नमाज़ सहीह है।
1020. अगर कोई शख़्स नमाज़ की आख़िरी दो रक्अतों में यह ख़्याल करते हुए कि यह पहली दो रक्अतें हैं अलहम्द पढ़े या नमाज़ की पहली दो रक्अतों में यह ख़्याल करते हुए कि यह आख़िरी दो रक्अतें हैं अलहम्द पढ़े तो सहीह सूरत का ख़्वाह रूकू से पहले पता चले या बाद में उसकी नमाज़ सहीह है।
1021. अगर कोई शख़्स तीसरी या चौथी रक्अत में अलहम्द पढ़ना चाहता हो लेकिन तस्बीहात उसकी ज़बान पर आ जायें या तस्बीहात पढ़ना चाहता हो लेकिन अलहम्द उसकी ज़बान पर आ जाए और अगर उसके पढ़ने का बिल्कुल इरादा न था तो ज़रूरी है कि उसे छोड़ कर दोबारा अलहम्द या तस्बीहात पढ़े लेकिन अगर बतौरे कुल्ली बिला इरादा न हो जैसे कि उसकी आदत वही कुछ पढ़ने की हो जो उसकी ज़बान पर आया है तो वह उसी को तमाम कर सकता है और उसकी नमाज़ सहीह है।
1022. जीस शख़्स की आदत तीसरी और चौथी रक्अत में तस्बीहात पढ़ने की हो अगर वह अपनी आदत से ग़फ़्लत बरते और अपने वज़ीफ़े की अदायगी की नीयत से अलहम्द पढ़ने लगे तो वही काफ़ी है और उसके लिये अलहम्द या तस्बीहात दोबारा पढ़ना ज़रूरी नहीं।
1023. तीसरी और चौथी रक्अत में तस्बीहात के बाद इस्तिग़्फ़ार करना मुस्तहब है मसलन अस्तग़्फ़िरुल्लाहा रब्बी व अतूबो इलैहे या कहे अल्लाहुम्मग़्फ़िर ली और अगर नमाज़ पढ़ने वाला रूकू के लिये झुकने से पहले इसतिग़्फ़ार पढ़ रहा हो या उससे फ़ारिग़ हो चुका हो और उसे शक हो जाए कि उसने अलहम्द या तस्बीहात पढ़ी है या नहीं तो ज़रूरी है कि अलहम्द या तस्बीहात पढ़े।
1024. अगर तीसरी या चौथी रक्अत में या रूकू में जाते हुए शक करे कि अलहम्द या तस्बीहात पढ़ी है या नहीं तो अपने शक की परवाह न करे।
1025. अगर नमाज़ पढ़ने वाला शक करे कि आया उसने कोई आयत या जुमला दुरुस्त पढ़ा है या नहीं मसलन शक करे कि क़ुल हुवल्लाहो अहद दुरुस्त पढ़ा है या नहीं तो वह अपने शक की परवाह न करे लेकिन अगर एहतियातन वही आयत या जुमला दोबारा सहीह तरीक़े से पढ़ दे तो कोई हरज नहीं और अगर कई बार भी शक करे तो कई बार पढ़ सकता है। हां अगर वस्वसे की हद तक पहुंच जाए और अगर फिर भी दोबारा पढ़े तो एहतियाते मुस्तहब की बिना पर नमाज़ दोबारा पढ़े।
1026. मुस्तहब है कि पहली रक्अत में अलहम्द पढ़ने से पहले अऊज़ोबिल्लाहे मिनश शैतानिर्रजीम कहे और ज़ोहर अस्र की पहली और दूसरी रक्अतों में बिस्मिल्लाह बलन्द आवाज़ से कहे और अलहम्द और सूरा को मुमैयज़ करके पढ़े और हर आयत के आख़िर पर वक़्फ़ करे यानी उसे बाद वाली आयत के साथ न मिलाए और अलहम्द और सूरा पढ़ते वक़्त आयात के मअनों की तरफ़ तवज्जह रखे। और अगर जमाअत से नमाज़ पढ़ रहा हो तो इमामे जमाअत के सूरा ए अलहम्द ख़त्म करने के बाद और अगर फ़रूदा नमाज़ पढ़ रहा हो तो सूरा ए अलहम्द पढ़ने के बाद कहे अलहम्दोलिल्लाहे रब्बिल आलमीन और सूरा ए क़ुल हुवल्लाहो अहद पढ़ने के बाद एक या दो तीन दफ़्आ कज़ालिकल्लाहो रब्बी या तीन दफ़्आ कज़ालिकल्लाहो रब्बना कहे और सूरा पढ़ने के बाद और थोड़ी देर रुके और उसके बाद रूकू से पहले की तक्बीर कहे या क़ुनूत पढ़े।
1027. मुस्तहब है कि तमाम नमाज़ों की पहली रक्अत में सूरा ए क़द्र और दूसरी रक्अत में सूरा ए एख़्लास पढ़े।
1028. पंचगाना नमाज़ों में से किसी एक नमाज़ में भी इंसान का सूरा ए एख़्लास का न पढ़ना मकरूह है।
1029. एक ही सांस में सूरा ए क़ुल हुवल्लाहो अहद का पढ़ना मकरूह है।
1030. जो सूरा इंसान पहली रक्अत में पढ़े उसका दूसरी रक्अत में पढ़ना मकरूह है। लेकिन अगर सूरा ए एख़्लास दोनों रक्अतों में पढ़े तो मकरूह नहीं है।
रुकू
1031. ज़रूरी है कि हर रक्अत में क़िरअत के बाद इस क़दर झुके कि अपनी उंगलियों के सिरे घुटने पर रख सके और इस अमल को रूकू कहते हैं।
1032. अगर रूकू जितना झुक जाए लेकिन अपनी उंगलियों के सिरे घुटनों पर न रखे तो कोई हरज नहीं।
1033. अगर कोई शख़्स रूकू आम तरीक़े के मुताबिक़ न बजा लाए मसलन बायें या दायें जानिब झुक जाए तो ख़्वाह उसके हाथ घुटनों तक पहुंच भी जायें उसका रूकू सहीह नहीं है।
1034. ज़रूरी है कि झुकना रूकू की नीयत से हो लिहाज़ा अगर किसी और काम के लिये मसलन किसी और जानवर को मारने के लिये झुके तो उसे रूकू नहीं कहा जा सकता बल्कि ज़रूरी है कि खड़ा हो जाए और दोबारा रूकू के लिये झुके और इस अमल की वजह से रुक्न में इज़ाफ़ा नहीं होता और नमाज़ बातिल नहीं होती।
1035. जिस शख़्स के हाथ या घुटने दूसरे लोगों के हाथों या घुटनों से मुख़्तलिफ़ हों मसलन उसके हाथ इतने लम्बे हों कि अगर मअमूली सा भी झुके तो घुटनों तक पहुंच जायें या उसके घुटने दूसरे लोगों के घुटनों के मुक़ाबिले में नीचे हों और उसे हाथ घुटनों तक पहुंचाने के लिये बहुत ज़्यादा झुकना पड़ता हो तो ज़रूरी है कि इतना झुके कि जितना उमूमन लोग झुकते हैं।
1036. जो शख़्स बैठकर रूकू कर रहा हो उसे इस क़दर झुकना ज़रूरी है कि उसका चेहरा उसके घुटनों के बिल मुक़ाबिल जा पहुंचे और बेहतर है कि इतना झुके कि उसका चेहरा सज्दे की जगह के क़रीब जा पहुंचे।
1037. बेहतर यह है कि इख़्तियार की हालत में रूकू में तीन दफ़्आ सुब्हानल्लाह या एक दफ़्आ सुब्हाना रब्बियल अज़ीमे व बेहम्देही कहे और ज़ाहिर यह है कि जो ज़िक्र भी इतना मिक़्दार में कहा जाए काफ़ी है। लेकिन वक़्त की तंगी और मजबूरी की हालत में एक दफ़्आ सुब्हानल्लाह कहना ही काफ़ी है।
1038. ज़िक्रे रूकू मुसलसल और सहीह अरबी में पढ़ना चाहिये और मुस्तहब है कि उसे तीन या पांच या सात दफ़्आ बल्कि इससे भी ज़्यादा पढ़ा जाए।
1039. रूकू की हालत में ज़रूरी है कि नमाज़ पढ़ने वाले का बदन साकिन हो नीज़ ज़रूरी है कि वह अपने इख़्तियार से बदन को इस तरह हरकत न दे कि उस पर साकिन होना सादिक़ न आए हत्ता कि एहतियात की बिना पर अगर वह वाजिब ज़िक्र में मश्ग़ूल न हो तब भी यही हुक्म है।
1040. अगर नमाज़ पढ़ने वाला उस वक़्त जबकि रूकू का वाजिब ज़िक्र अदा कर रहा हो बे इख़्तियार इतनी हरकत करे कि बदन के सुकून की हालत में होने से खारिज हो जाए तो बेहतर यह है कि बदन के सुकून हासिल करने के बाद दोबारा ज़िक्र को बजा लाए लेकिन अगर इतनी कम मुद्दत के लिये हरकत करे कि बदन के सुकून होने की हालत से खारिज न हो या उंगलियों को हरकत दे तो कोई हरज नहीं।
1041. अगर नमाज़ पढ़ने वाला इससे पेशतर कि रूकू जितना झुके और उसका बदन सुकून हासिल करे जान बूझकर ज़िक्रे रूकू पढ़ना शूरू कर दे तो उसकी नमाज़ बातिल है।
1042. अगर एक शख़्स वाजिब ज़िक्र कर के ख़त्म होने से पहले जान बूझकर सर रूकू से उठा ले तो उसकी नमाज़ बातिल है और अगर सहवन सर उठा ले और इससे पेशतर की रूकू की हालत से खारिज हो जाए उसे याद आए कि उसने ज़िक्रे रूकू ख़त्म नहीं किया तो ज़रूरी है कि रुकू जाए और ज़िक्र पढ़े। और अगर उसे रूकू की हालत में खारिज होने के बाद याद आए तो उसकी नमाज़ सहीह है।
1043. अगर एक शख़्स ज़िक्र की मिक़्दार के मुताबिक़ रूकू की हालत में न रह सकता हो तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि उसका बक़िय्या हिस्सा रूकू से उठते हुए पढ़े।
1044. अगर कोई शख़्स मरज़ वग़ैरा की वजह से रूकू में अपना बदन साकिन न रख सके तो उसकी नमाज़ सहीह है लेकिन ज़रूरी है कि रूकू की हालत से खारिज होने से पहले वाजिब ज़िक्र उस तरीक़े से अदा करे जैसे ऊपर बयान किया गया है।
1045. जब कोई शख़्स रूकू के लिये न झुक सकता हो तो ज़रूरी है कि किसी चीज़ का सहारा लेकर रूकू बजा लाए और अगर सहारे के ज़रिये भी मअमूल के मुताबिक़ रूकू न कर सके तो ज़रूरी है कि इस क़दर झुके कि उर्फ़न उसे रूकू कहा जा सके और अगर इस क़दर न झुक सके तो ज़रूरी है कि रूकू के लिये सर से इशारा करे।
1046. जिस शख़्स को रूकू के लिये सर से इशारा करना ज़रूरी हो अगर वह इशारा करने पर क़ादिर न हो तो ज़रूरी है कि रूकू की नीयत के साथ आंखों को बन्द करे और ज़िक्रे रूकू पढ़े और रूकू से उठने की नीयत से आंखों को खोल दे और अगर इस क़ाबिल न हो तो एहतियात की बिना पर दिल में रूकू की नियत करे और अपने हाथ से रूकू के लिये इशारा करे और ज़िक्रे रूकू पढ़े।
1047. जो शख़्स खड़े होकर रूकू न कर सके लेकिन जब बैठा हुआ हो तो रूकू के लिये झुक सकता हो तो ज़रूरी है कि खड़े होकर नमाज़ पढ़े और रूकू के लिये सर से इशारा करे। और एहतियाते मुस्तहब यह है कि एक दफ़्आ फिर नमाज़ पढ़े और उसके रूकू के वक़्त बैठ जाए और रूकू के लिये झुक जाए।
1048. अगर कोई शख़्स रूकू की हद तक पहुंचने के बाद सर को उठा ले और दोबारा रूकू करने की हद तक झुके तो उसकी नमाज़ बातिल है।
1049. ज़रूरी है कि ज़िक्रे रूकू ख़त्म होने के बाद सीधा खड़ा हो जाए और जब उसका बदन सुकून हासिल कर ले उसके बाद सज्दे में जाए और अगर जान बूझकर खड़ा होने से पहले या बदन के सुकून हासिल करने से पहले सज्दे में चला जाए तो उसकी नमाज़ बातिल है।
1050. अगर कोई शख़्स रूकू अदा करना भूल जाए और इससे पेशतर की सज्दे की हालत में पहुंचे उसे याद आ जाए तो ज़रूरी है कि खड़ा हो जाए और फिर रूकू में जाए। और झुके हुए होने की हालत में अगर रूकू की जानिब लौट जाए तो काफ़ी नहीं।
1051. अगर किसी शख़्स को पेशानी ज़मीन पर रखने के बाद याद आए कि उसने रूकू नहीं किया तो उसके लिये ज़रूरी है कि लौट जाए और खड़ा होने के बाद रूकू बजा लाए। और अगर उसे दूसरे सज्दे में याद आए तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर उसकी नमाज़ बातिल है।
1052. मुस्तहब है कि इंसान रूकू में जाने से पहले सीधा खड़ा होकर तक्बीर कहे और रूकू में घुटनों को पीछे की तरफ़ धकेले। पीठ को हमवार रखे। गर्दन को खींच कर पीठ के बराबर रखे। दोनों पांव के दरमियान देखे। ज़िक्र से पहले या बाद में दुरुद पढ़े और जब रूकू के बाद उठे और सीधा खड़ा हो तो बदन के सुकून की हालत में होते हुए समेअल्लाहो लेमन हमेदा कहे।
1053. औरतों के लिये मुस्तहब है कि रूकू में हाथों को घुटनों से ऊपर रखें और घुटनों को पीछे की तरफ़ न धकेलें।
सुजूद
1054. नमाज़ पढ़ने वाले के लिये ज़रूरी है कि वाजिब और मुस्तहब नमाज़ों की हर रक्अत में रूकू के बाद दो सज्दे करे। सज्दा यह है कि ख़ास शक्ल में पेशानी को ख़ुज़ूउ की नीयत से ज़मीन पर रखे और नमाज़ के सज्दे की हालत में वाजिब है कि दोनों हथेलियां, दोनों घुटने और दोनों पांव के अंगूठे ज़मीन पर रखे जायें।
1055. दो सज्दे मिलकर एक रुक्न हैं और अगर कोई शख़्स वाजिब नमाज़ में अमदन या भूले से एक रक्अत में दोनों सज्दे तर्क कर दे तो उसकी नमाज़ बातिल है।
1056. अगर कोई शख़्स जान बूझकर एक सज्दा कम या ज़्यादा कर दे तो उसका हुक्म बाद में बयान किया जाऐगा।
1057. जो शख़्स पेशानी ज़मीन पर रख सकता हो अगर जान बूझकर या सहवन पेशानी ज़मीन पर न रखे तो ख़्वाह बदन के दूसरे हिस्से ज़मीन से लग भी गए हों तो उसने सज्दा नहीं किया लेकिन अगर वह पेशानी ज़मीन पर रख दे और सहवन बदन के दूसरे हिस्से ज़मीन पर न रखे या सहवन ज़िक्र न पढ़े तो उसका सज्दा सहीह है।
1058. बेहतर यह है कि इख़्तियार की हालत में सज्दे में तीन दफ़्आ सुब्हानल्लाह या एक दफ़्आ सुब्हाना रब्बियल अअला व बेहम्देही पढ़े और ज़रूरी है कि यह जुमले मुसलसल और सहीह अरबी में कहे जायें और ज़ाहिर यह है कि ज़िक्र का पढ़ना काफ़ी है लेकिन एहतियाते लाज़िम की बिना पर ज़रूरी है कि उतनी ही मिक़्दार में हो और मुस्तहब है कि, सुब्हाना रब्बियल अअला व बेहम्देही तीन या पांच या सात दफ़्आ या इससे भी ज़्यादा मर्तबा पढ़े।
1059. सज्दे की हालत में ज़रूरी है कि नमाज़ी का बदन साकिन हो और हालते इख़्तियार में उसे अपने बदन को इस तरह हरकत नहीं देना चाहिये कि सुकून की हालत से निकल जाए और जब वाजिब ज़िक्र में मश्ग़ूल न हो तो एहतियात की बिना पर यही हुक्म है।
1060. इससे पेशतर की पेशानी ज़मीन से लगे और बदन सुकून हासिल कर ले कोई शख़्स जान बूझकर ज़िक्रे सज्दा पढ़े या ज़िक्र ख़त्म होने से पहले जान बूझकर सर सज्दे से उठा ले तो उसकी नमाज़ बातिल है।
1061. अगर इससे पेशतर कि पेशानी ज़मीन पर लगे कोई शख़्स सहवन ज़िक्रे सज्दा पढ़े और इससे पेशतर की सर सज्दे से उठाए उसे पता चल जाए कि उसने ग़लती की है तो ज़रूरी है कि साकिन हो जाए और दोबारा ज़िक्र पढ़े।
1062. अगर किसी शख़्स को सर सज्दे से उठा लेने के बाद पता चले कि उसने ज़िक्रे सज्दा ख़त्म होने से पहले सर उठा लिया है तो उसकी नमाज़ सहीह है।
1063. जिस वक़्त कोई शख़्स ज़िक्रे सज्दा पढ़ रहा हो अगर वह जान बूझकर सात अअज़ाए सज्दा में से किसी एक को ज़मीन पर से उठाए तो उसकी नमाज़ बातिल हो जायेगी लेकिन जिस वक़्त ज़िक्र पढ़ने में मश्ग़ूल न हो अगर पेशानी के अलावा कोई उज़्वो ज़मीन पर से उठा ले और दोबारा रख दे तो कोई हरज नहीं है। लेकिन अगर ऐसा करना उसके बदन के साकिन होने के मनाफ़ी हो तो उस सूरत में एहतियात की बिना पर उसकी नमाज़ बातिल है।
1064. अगर ज़िक्रे सज्दा ख़त्म होने से पहले कोई शख़्स सहवन पेशानी ज़मीन पर से उठा ले तो उसे दोबारा ज़मीन पर नहीं रख सकता और ज़रूरी है कि उसे एक सज्दा शुमार करे लेकिन अगर दूसरे अअज़ा सहवन ज़मीन पर से उठा ले तो ज़रूरी है कि उन्हें दोबारा ज़मीन पर रखे और ज़िक्र पढ़े।
1065. पहले सज्दे का ज़िक्र ख़त्म होने के बाद जरूरी है कि बैठ जाए हत्ता कि उसका बदन सुकून हासिल कर ले और फिर दोबारा सज्दे में जाए।
1066. नमाज़ पढ़ने वाले की पेशानी रखने की जगह घुटनों और पांव की उंगलियों के सिरों की जगह से चार मिली हुई उंगलियों से ज़्यादा बलन्द या पस्त नहीं होनी चाहिये। बल्कि एहतियाते वाजिब यह है कि उसकी पेशानी की जगह उसके खड़े होने की जगह से चार मिली हुई उंगलियों से ज़्यादा नीची या ऊंची भी न हो।
1067. अगर किसी ऐसी ढलवान जगह में अगरचे उसका झुकाव सहीह तौर पर मालूम न हो नमाज़ पढ़ने वाले की पेशानी की जगह उसके घुटनों और पांव की उंगलियों के सिरों की जगह से चार मिली हुई उंगलियों से ज़्यादा बलन्द या पस्त हो तो उसकी नमाज़ में इश्काल है।
1068. अगर नमाज़ पढ़ने वाला अपनी पेशानी को ग़लती से एक ऐसी चीज़ पर रख दे जो घुटनों और पांव की उंगलियों के सिरों की जगह से चार मिली हुई उंगलियों से ज़्यादा बलन्द हों और उनकी बलन्दी इस क़दर हो कि यह न कह सकें कि सज्दे की हालत में है तो ज़रूरी है कि सर को उठाए और ऐसी चीज़ पर जिसकी बलन्दी चार मिली हुई उंगलियों से ज़्यादा न हो रखे और अगर उसकी बलन्दी इस क़दर हो कि कह सकें कि सज्दे की हालत में है तो फिर वाजिब ज़िक्र पढ़ने के बाद मुतवज्जह हो तो सर सज्दे से उठाकर नमाज़ को तमाम कर सकता है। और अगर वाजिब ज़िक्र पढ़ने से पहले मुतवज्जह हो तो ज़रूरी है कि पेशानी को हटा कर उस चीज़ पर रखे कि जिसकी बलन्दी चार मिली उंगलियों के बराबर या उससे कम हो और वाजिब ज़िक्र पढ़े और अगर पेशानी को हटाना मुम्किन न हो तो वाजिब ज़िक्र को उसी हालत में पढ़े और नमाज़ को तमाम करे और ज़रूरी नहीं कि नमाज़ को दोबारा पढ़े।
1069. ज़रूरी है कि नमाज़ पढ़ने वाले की पेशानी और उस चीज़ के दरमियान जिस पर सज्दा करना सहीह है कोई दूसरी चीज़ न हो पस अगर सज्दागाह इतनी मैली हो कि पेशानी सज्दागाह को न छुए तो उसका सज्दा बातिल है। लेकिन अगर सज्दागाह का रंग तब्दील हो गया हो तो कोई हरज नहीं।
1070. ज़रूरी है कि सज्दे में दोनों हथेलियां ज़मीन पर रखे लेकिन मजबूरी की हालत में हाथों की पुश्त भी ज़मीन पर रखे तो कोई हरज नहीं और अगर हाथों की पुश्त भी ज़मीन पर रखना मुम्किन न हो तो एहतियात की बिना पर ज़रूरी है कि हाथों की कलाइयां ज़मीन पर रखे और अगर उन्हें भी न रख सके तो फिर कुहनी तक जो हिस्सा भी मुम्किन हो ज़मीन पर रखे और अगर यह भी मुम्किन न हो तो फिर बाज़ू का रखना भी काफ़ी है।
1071. (नमाज़ पढ़ने वाले के लिये) ज़रूरी है कि सज्दे में पांव के दोनों अंगूठे ज़मीन पर रखे लेकिन ज़रूरी नहीं कि दोनों अंगूठों के सिरे ज़मीन पर रखे बल्कि उन्का ज़ाहिरी और बातिनी हिस्सा भी रखे तो काफ़ी है। और अगर पांव की दूसरी उंगलियां या पांव का ऊपर वाला हिस्सा ज़मीन पर रखे या नाखुन लम्बे होने की बिना पर अंगूठों के सिरे ज़मीन पर न लगें तो नमाज़ बातिल है और जिस शख़्स ने कोताही और मस्अला न जानने की वजह से अपनी नमाज़ें इस तरह पढ़ी हों ज़रूरी है कि उन्हें दोबारा पढ़े।
1072. जिस शख़्स के पांव के अंगूठों के सिरों से कुछ हिस्सा कटा हुआ हो ज़रूरी है कि जितना बाक़ी हो वह ज़मीन पर रखे और अगर अंगूठों का कुछ हिस्सा भी न बचा हो और अगर बचा भी हो तो बहुत छोटा हो तो एहतियात की बिना पर ज़रूरी है कि बाक़ी उंगलियों को ज़मीन पर रखे और अगर उसकी कोई भी उंगलि न हो तो पांव का जितना हिस्सा भी बाक़ी बचा हो उसे ज़मीन पर रखे।
1073. अगर कोई शख़्स मअमूल के ख़िलाफ़ सज्दा करे मसलन सीने और पेट को ज़मीन पर टिकाए या पांव को कुछ फैलाए चुनांचे अगर कहा जाए कि उसने सज्दा किया है तो उसकी नमाज़ सहीह है। लेकिन अगर कहा जाए कि उसने पांव फैलाए हैं और उस पर सज्दा करना सादिक़ न आता हो तो उसकी नमाज़ बातिल है।
1074. सज्दागाह या दूसरी चीज़ जीस पर नमाज़ पढ़ने वाला सज्दा करे ज़रूरी है कि पाक हो लेकिन अगर मिसाल के तौर पर सज्दागाह को नजिस फ़र्श पर रख दे या सज्दागाह की एक तरफ़ नजिस हो और वह पेशानी पाक तरफ़ रखे तो कोई हरज नहीं है।
1075. अगर नमाज़ पढ़ने वाले की पेशानी पर फोड़ा या ज़ख़्म या इस तरह की कोई चीज़ हो जिसकी बिना पर वह पेशानी ज़मीन पर न रख सकता हो मसलन अगर वह फोड़ा पूरी पेशानी को न घेरे हुए हो ज़रूरी है कि पेशानी के सेहतमन्द हिस्से से सज्दा करे और अगर पेशानी की सेहतमन्द जगह पर सज्दा करना इस बात पर मौक़ूफ़ हो कि ज़मीन को खोदे और फोड़े को गढ़े में और सेहतमन्द जगह की उतनी मिक़्दार ज़मीन पर रखे कि सज्दे के लिये काफ़ी हो तो ज़रूरी है कि उस काम को अंजाम दे।
1076. अगर फोड़ा या ज़ख़्म तमाम पेशानी पर फैला हुआ हो तो नमाज़ पढ़ने वाले के लिये ज़रूरी है कि अपने चेहरे के कुछ हिस्से से सज्दा करे और एहतियाते लाज़िम यह है कि अगर ठोड़ी से सज्दा कर सकता हो तो ठोड़ी से सज्दा करे और अगर न कर सकता हो तो पेशानी के दोनों अत्राफ़ में से एक तरफ़ से सज्दा करे और अगर चेहरे से सज्दा करना किसी तरह भी मुम्किन न हो तो ज़रूरी है कि सज्दे के लिये इशारा करे।
1077. जो शख़्स बैठ सकता हो लेकिन पेशानी ज़मीन पर न रख सकता हो ज़रूरी है कि जिस क़दर भी झुक सकता हो झुके और सज्दागाह या किसी दूसरी चीज़ को जिस पर सज्दा सहीह हो किसी बलन्द चीज़ पर रखे और अपनी पेशानी उस पर इस तरह रखे कि लोग कहें कि इसने सज्दा किया है। लेकिन ज़रूरी है कि हथेलियों और घुटनों और पांव के अंगूठों को को मअमूल के मुताबिक़ ज़मीन पर रखे।
1078. अगर कोई ऐसी बलन्द चीज़ न हो जिस पर नमाज़ पढ़ने वाला सज्दागाह या कोई दूसरी चीज़ जिस पर सज्दा करना सहीह हो रख सके और कोई शख़्स भी न हो जो मसलन सज्दागाह को उठाए और पकड़े ताकि वह शख़्स उस पर सज्दा करे तो एहतियात यह है कि सज्दागाह या दूसरी चीज़ को जिस पर सज्गा कर रहा हो हाथ से उठाए और उस पर सज्दा करे।
1079. अगर कोई शख़्स बिल्कुल ही सज्दा न कर सकता हो तो ज़रूरी है कि सज्दे के लिये सर से इशारा करे और अगर ऐसा न कर सके तो ज़रूरी है कि आंखों से इशारा करे और अगर आंखों से भी इशारा न कर सकता हो तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर ज़रूरी है कि हाथ वग़ैरा से सज्दे के लिये इशारा करे और दिल में भी सज्दे की नीयत करे और वाजिब ज़िक्र अदा करे।
1080. अगर किसी शख़्स की पेशानी बे इख़्तियार सज्दे की जगह से उठ जाए तो ज़रूरी है कि हत्तलइम्कान उसे दोबारा सज्दे की जगह पर न जाने दे क़त्ए नज़र इसके कि उसने सज्दे का ज़िक्र पढ़ा हो या न पढ़ा हो यह एक सज्दा शुमार होगा। और अगर सर को न रोक सके और वह बे इख़्तियार दोबारा सज्दे की जगह पहुंच जाए तो वही एक सज्दा शुमार होगा। लेकिन अगर वाजिब ज़िक्र न अदा किया हो तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि उसे क़ुर्बते मुत्लक़ा की नीयत से अदा करे।
1081. जहां इंसान के लिये तक़ैया करना ज़रूरी है वहां वह क़ालीन या इस तरह की चीज़ पर सज्दा करे और यह ज़रूरी नहीं कि नमाज़ के लिये किसी दूसरी जगह जाए या नमाज़ को मुवख्खर करे ताकि उसी जगह पर उस सबब के ख़त्म होने के बाद नमाज़ अदा करे। लेकिन अगर चटाई या किसी दूसरी चीज़ पर सज्दा करना सहीह हो अगर वह इस तरह सज्दा करे कि तक़ैये की मुख़ालिफ़त न होती हो तो ज़रूरी है कि फिर वह क़ालीन या उससे मिलती जुलती चीज़ पर सज्दा न करे।
1082. अगर कोई शख़्स (परिन्दों के) परों से भरे गद्दे या इसी क़िस्म की किसी दूसरी चीज़ पर सज्दा करे जिस पर जिस्म सुकून की हालत में न रहे तो उसकी नमाज़ बातिल है।
1083. अगर इंसान कीचड़ वाली ज़मीन पर नमाज़ पढ़ने पर मजबूर हो और बदन और लिबास का आलूदा हो जाना उसके लिये मशक्क़त का मूजिब हो तो ज़रूरी है कि सज्दा और तशह्हुद मअमूल के मुताबिक़ बजा लाए और अगर ऐसा करना मशक्क़त का मूजिब हो तो क़ियाम की हालत में सज्दे के लिये सर से इशारा करे और तशह्हुद खड़े होकर पढ़े तो उसकी नमाज़ सहीह होगी।
1084. पहली रक्अत में और मसलन नमाज़े ज़ोहर, नमाज़े अस्र और नमाज़े इशा की तीसरी रक्अत में जिसमें तशह्हुद नहीं है एहतियाते वाजिब यह है कि इंसान दूसरे सज्दे के बाद थोड़ी देर के लिये सुकून से बैठे और फिर खड़ा हो।
वह चीज़ें जिन पर सज्दा करना सहीह है।
1085. सज्दा ज़मीन पर और उन चीज़ों पर करना ज़रूरी है जो खाई और पहनी न जाती हों और ज़मीन से उगती हों मसलन लकड़ी और दरख़्तों के पत्तों पर सज्दा करे। खाने और पहनने की चीज़ों मसलन गेहूं, जौ और कपास पर और उन चीज़ों पर जो ज़मीन के अअज़ा शुमार नहीं होती मसलन सोने, चाँदी और इसी तरह की दूसरी चीज़ों पर सज्दा करना सहीह नहीं है लेकिन तारकोल और गंदाबीरोज़ा को मजबूरी की हालत में दूसरी चीज़ों के मुक़ाबिले में, कि जिन पर सज्दा करना सहीह नहीं, सज्दे के लिये अव्वलीयत दे।
1086. अंगूर के पत्तों पर सज्दा करना जबकि वह कच्चे हों और उन्हें मअमूलन खाया जाता हो जाइज़ नहीं। इस सूरत के अलावा उन पर सज्दा करने में ज़ाहिरन कोई हरज नहीं।
1087. जो चीज़ें जमीन से उगती हैं और हैवानात की ख़ोराक हैं मसलन घास और भूसा उन पर सज्दा करना सहीह है।
1088. जिन फूलों को खाया नहीं जाता उन पर सज्दा सहीह है बल्कि उन खानों की दवांओं पर भी सज्दा सहीह है जो ज़मीन से उगती हैं और उन्हें कूट कर या जोश देकर उनका पानी पीते हैं मसलन गुले बनफ़शा और गुले गावज़बान पर भी सज्दा सहीह है।
1089. ऐसी घास जो बाज़ शहरों में खाई जाती हो और बाज़ शहरों में खाई तो न जाती हो लेकिन वहां उसे अश्या ए खुर्दनी में शुमार किया जाता हो उस पर सज्दा सहीह नहीं और कच्चे फलों पर सज्दा करना सहीह नहीं है।
1090. चूने के पत्थर और जिप्सम पर सज्दा करना सहीह है और एहतियाते मुस्तहब यह है कि इख़्तियार की हालत में पुख़्ता जिप्सम और चूने और ईंट और मिट्टी के पक्के हुए बर्तनों और उनसे मिलती जुलती चीज़ों पर सज्दा न किया जाए।
1091. अगर कागज़ को ऐसी चीज़ से बनाया जाए कि जिस पर सज्दा करना सहीह है, मसलन लकड़ी और भूसे से, तो उस पर सज्दा किया जा सकता है और इसी तरह अगर रुई या कतान से बनाया गया हो तो भी उस पर सज्दा करना सहीह है लेकिन रेशम या अबरेशम और इसी तरह किसी चीज़ से बनाया गया हो तो उस पर सज्दा करना सहीह नहीं है।
1092. सज्दे के लिये खाके शिफ़ा सब चीज़ों से बेहतर है उसके बाद मिट्टी, मिट्टी के बाद पत्थर और पत्थर के बाद घास।
1093. अगर किसी के पास ऐसी चीज़ न हो जिस पर सज्दा करना सहीह है या अगर हो तो सर्दी या ज़्यादा गर्मी वग़ैरा की वजह से उस पर सज्दा न कर सकता हो तो ऐसी सूरत में तारकोल और गन्दाबीरोज़ा को सज्दे के लिये दूसरी चीज़ों पर अव्वलीयत हासिल है लेकिन अगर उन पर सज्दा करना मुम्किन न हो तो ज़रूरी है कि अपने लिबास या अपने हाथों की पुश्त या किसी दूसरी चीज़ पर कि हालते इख़्तियार में उस पर सज्दा जाइज़ नहीं सज्दा करे लेकिन एहतियाते मुस्तहब यह है कि जब तक अपने कपड़ों पर सज्दा मुम्किन हो किसी दूसरी चीज़ पर सज्दा न करे।
1094. कीचड़ पर और ऐसी नर्म मिट्टी पर जिस पर पेशानी सुकून से न टिक सके सज्दा करना बातिल है।
1095. अगर पहले सज्दे में सज्दागाह पेशानी से चिपक जाए तो दूसरे सज्दे के लिये उसे छुड़ा लेना चाहिये।
1096. जिस चीज़ पर सज्दा करना हो अगर नमाज़ पढ़ने के दौरान वह गुम हो जाए और नमाज़ पढ़ने वाले के पास कोई ऐसी चीज़ न हो जिस पर सज्दा करना सहीह हो तो तरतीब मस्अला 1093 में बताई गई है उस पर अमल करे ख़्वाह वक़्त तंग हो या वसी, नमाज़ को तोड़कर उसका इआदा करे।
1097. जब किसी शख़्स को सज्दे की हालत में पता चले कि उसने अपनी पेशानी किसी ऐसी चीज़ पर रखी है जिस पर सज्दा करना बातिल है चुनांचे वाजिब ज़िक्र अदा करने से पहले मुतवज्जह हो तो ज़रूरी है कि अपनी पेशानी को उस चीज़ पर जिस पर सज्दा करना सहीह है, लाए और वाजिब ज़िक्र पढ़े लेकिन अगर पेशानी लाना मुम्किन न हो तो उसी हालत में वाजिब ज़िक्र अदा कर सकता है और उसकी नमाज़ हर दो सूरत में सहीह है।
1098. अगर किसी शख़्स को सज्दे के बाद पता चले कि उसने अपनी पेशानी किसी ऐसी चीज़ पर रखी है जिस पर सज्दा करना बातिल है तो कोई हरज नहीं।
1099. अल्लाह तआला के अलावा किसी दूसरे को सज्दा करना हराम है। अवाम में से बाज़ लोग जो आइम्मा (अ0) के मज़ाराते मुक़द्दसा के सामने पेशानी ज़मीन पर रखते हैं अगर वह अल्लाह तआला का शुक्र अदा करने की नीयत से ऐसा करें तो कोई हरज नहीं। वर्ना ऐसा करना हराम है।
सज्दे के मुस्तहब्बात और मकरूहात
1100. चन्द चीज़ें सज्दे में मुस्तहब हैः-
1. जो शख़्स खड़ा होकर नमाज़ पढ़ रहा हो वह रूकू से सर उठाने के बाद मुकम्मल तौर पर खड़े होकर और बैठ कर नमाज़ पढ़ने वाला रूकू के बाद पूरी तरह बैठ कर सज्दे में जाने के लिये तक्बीर कहे।
2. सज्दे में जाते वक़्त मर्द पहले अपनी हथेलियों और औरत अपने घुटनों को ज़मीन पर रखे।
3. नमाज़ी नाक को सज्दागाह या किसी ऐसी चीज़ पर रखे जिस पर सज्दा करना दुरूस्त हो।
4. नमाज़ी सज्दे की हालत में हाथ की उंगलियों को मिलाकर कानों के पास इस तरह रखे कि उनके सिरे रू बक़िब्ला हों।
5. सज्दे में दुआ करे, अल्लाह तआला से हाजत तलब करे, और यह दुआ पढ़ेः
या ख़ैरलस्ऊलीना व या ख़ैरल मोअतीना अज़ुक़्नी वर्ज़ुक़ अयाली मिन फ़ज़्लिका फ़न्नाका ज़ुलफ़ज़्लिल अज़ीम।
यानी ऐ उन सब में से बेहतरीन जिनसे की मांगा जाता है और ऐ उन सब से बरतर जो अता करते हैं। मुझे और मेरे अहलोअयाल को अपने फ़ज़्लो करम से रिज़्क़ अता फ़रमा क्योंकि तू ही फ़ज़्ले अज़ीम का मालिक है।
6. सज्दे के बाद बांई रान पर बैठ जाए और दायें पांव का ऊपर वाला हिस्सा (यानी पुश्त) बायें पांव के तलवे पर रखे।
7. हर सज्दे के बाद जब बैठ जाए और बदन को सुकून हासिल हो जाए तो तक्बीर कहे।
8. पहले सज्दे के बाद जब बदन को सुकून हासिल हो जाए तो अस्तग़्फ़िरुल्लाहा रब्बी व अतूबो इलैह् कहे।
9. सज्दा ज़्यादा देर तक अंजाम दे और बैठने के वक़्त हाथों को रानों पर रखे।ट
10. दूसरे सज्दे में जाने के लिये बदन के सुकून की हालत में अल्लाहो अकबर कहे।
11. सज्दे में दुरूद पढ़े।
12. सज्दे से क़ियाम के लिये उठते वक़्त पहले घुटनों को और उनके बाद हाथों को ज़मीन से उठाए।
13. मर्द कोहनियों और पेट को ज़मीन से न मिलायें नीज़ बाज़ुओं को पहलू से जुदा रखें और औरतें कोहनियां और पेट ज़मीन पर बदन के अअज़ा को एक दूसरे से मिला लें। इनके अलावा दूसरे मुस्तहब्बात भी हैं जिनका ज़िक्र मुफ़स्सल किताबों में मौजूद हैं।
1101. सज्दे में क़ुरआने मजीद पढ़ना मकरूह है। और सज्दे की जगह को गर्दो ग़ुबार झाड़ने के लिये फूंक मारना भी मकरूह है बल्कि अगर फूंक मारने की वजह से दो हर्फ़ भी मुंह से अमदन निकल जायें तो एहतियात की बिना पर नमाज़ बातिल है और इनके अलावा और मकरूहात की ज़िक्र भी और मुफ़स्सल किताबों में आया है।
क़ुरआने मजीद के वाजिब सज्दे
1102. क़ुरआने मजीद की चार सूरतों यानी वन्नज्म, इक़रा, अलिफ़ लाम्मीम तंज़ील और हाम्मीम सज्दा में से हर एक में एक आया ए सज्दा है जिसे अगर इंसान पढ़े या सुने तो आयत ख़त्म होने के बाद फ़ौरन सज्दा करना ज़रूरी है और अगर सज्दा करना भूल जाए तो जब भी उसे याद आए सज्दा करे और ज़ाहिर यह है कि आया ए सज्दा ग़ैर इख़्तियारी हालत में सुने तो सज्दा वाजिब नहीं है अगरचे बेहतर यह है कि सज्दा किया जाए।
1103. अगर इंसान सज्दे की आयत सुनने के वक़्त खुद भी वह आयत पढ़े तो ज़रूरी है कि दो सज्दे करे।
1104. अगर नमाज़ के अलावा सज्दे की हालत में कोई शख़्स आया ए सज्दा पढ़े या सुने तो ज़रूरी है कि सर उठाए और दोबारा सज्दा करे।
1105. अगर इंसान सोए हुए शख़्स या दीवाने या बच्चे से जो क़ुरआन को क़ुरआन समझकर न पढ़ रहा हो सज्दे की आयत सुने या उस पर कान धरे तो सज्दा वाजिब है। लेकिन अगर ग्रामोफ़ोन या टेपरिकार्डर से (रिकार्ड शुदा आया ए सज्दा) सुने तो सज्दा वाजिब नहीं। और सज्दे की आयत रेडियो पर टेप रिकार्ड के ज़रिए नश्र की जाए तब भी यही हुक्म है। लेकिन अगर कोई शख़्स रेडियो स्टेशन से (बराहे रास्त नशरीयात में) सज्दे की आयत पढ़े और इंसान उसे रेडियो पर सुने तो सज्दा वाजिब है।
1106. क़ुरआन का वाजिब सज्दा करने के लिये एहतियाते वाजिब की बिना पर ज़रूरी है कि इंसान की जगह ग़स्बी न हो और एहतियाते मुस्तहब की बिना पर उसकी पेशानी रखने की जगह उसके घुटने और पांव की उंगलियों के सिरों की चार मिली हुई उंगलियों से ज़्यादा ऊंची या नीची न हो लेकिन यह ज़रूरी नहीं कि उसने वुज़ू या ग़ुस्ल किया हुआ हो या क़िब्ला रूख़ हो या अपनी शर्मगाह को छिपाए या उसका बदन और पेशानी रखने की जगह पाक हो। इसके अलावा जो शराइत नमाज़ पढ़ने वाले के लिये ज़रूरी है वह शराइत क़ुरआने मजीद का वाजिब सज्दा अदा करने वाले के लिबास के लिये नहीं है।
1107. एहतियाते वाजिब यह है कि क़ुरआने मजीद के वाजिब सज्दे में इंसान अपनी पेशानी सज्दागाह या किसी ऐसी चीज़ पर रखे जिस पर सज्दा करना सहीह हो और एहतियाते मुस्तहब की बिना पर बदन के दूसरे अअज़ा ज़मीन पर इस तरह रखे जिस तरह नमाज़ के सिलसिले में बताया गया है।
1108. जब इंसान क़ुरआने मजीद का वाजिब सज्दा करने के इरादे से पेशानी ज़मीन पर रखे दे तो ख़्वाह कोई ज़िक्र भी पढ़े तब भी काफ़ी है और ज़िक्र का पढ़ना मुस्तहब है। और बेहतर है कि यह पढ़ेः-
ला इलाहा इल्लल्लाहो हक़्क़न हक़्क़ा, ला इलाहा इल्लल्लाहो ईमानौं व तस्दीक़ा, ला इलाहा इल्लल्लाहो उबूदीयतौं व रिक़्क़ा, सजद्तोलका या रब्बे तअब्बुदौं व रिक़्क़ा, मुस्तंकिफ़ौ व ला मुस्तक्बिरा, बल अना अब्दुन ज़लीलुन ज़ईफ़ुन ख़ाइफ़ुन मुस्तजीरुन।
तशह्हुद
1109. सब वाजिब और मुस्तहब नमाज़ों की दूसरी रक्अत में और नमाज़े मग़्रिब की तीसरी रक्अत में और ज़ोहर, अस्र और इशा की चौथी रक्अत में इंसान के लिये ज़रूरी है कि दूसरे सज्दे के बाद बैठ जाए और बदन के सुकून की हालत में तशह्हुद पढ़े यानी कहेः
अश्हदो अंल्ला इलाहा इल्लल्लाहो वह्दहू ला शरीका लहू व अश्हदो अन्ना मोहम्मदन अब्दुहू व रसूलुहू अल्लाहुम्मा स्वल्ले अला मोहम्मदिंव व आले मोहम्मद और अगर कहे अश्हदो अंल्ला इलाहा इल्लल्लाहो व अश्हदो अन्ना मोहम्मदन स्वल्लाहो अलैहे व आलेही अब्दुहू व रसुलुहू तो बिनाबर अक़्वा काफ़ी है। और नमाज़े वित्र में भी तशह्हुद पढ़ना ज़रूरी है।
1110. ज़रूरी है कि तशह्हुद के जुमले सहीह अरबी में और मअमूल के मुताबिक़ मुसलसल कहे जायें।
1111. अगर कोई शख्स तशह्हुद पढ़ना भूल जाए और खड़ा हो जाए, और रूकू से पहले उसे याद आए कि उसने तशह्हुद नहीं पढ़ा तो ज़रूरी है कि बैठ जाए और तशह्हुद पढ़े और फिर दोबारा खड़ा हो और उस रक्अत में जो कुछ पढ़ना ज़रूरी है पढ़े और नमाज़ को ख़त्म करे। और एहतियाते मुस्तहब की बिना पर नमाज़ के बाद बेजा क़ियाम के लिये दो सज्दा ए सहव बजा लाए और अगर उसे रूकू में या उसके बाद याद आए तो ज़रूरी है कि नमाज़ तमाम करे और नमाज़ के सलाम के बाद एहतियाते मुस्तहब की बिना पर तशह्हुद की क़ज़ा करे। और ज़रूरी है कि भूले हुए तशह्हुद के लिये दो सज्दा ए सहव बजा लाए।
1112. मुस्तहब है कि तशह्हुद की हालत में इंसान बायें रान पर बैठे और दायें पांव की पुश्त को बायें पांव के तल्वे पर रखे और तशह्हुद से पहले कहे, अलहम्दो लिल्लाह और यह भी मुस्तहब है कि हाथ रानों पर रखे और उंगलियां एक दूसरे के साथ मिलाए और अपने दामन पर निगाह डाले और तशह्हुद में सलावात के बाद कहे, व तक़ब्बल शफ़ाअतहू वर्फ़अ दरजतहू ।
1113. मुस्तहब हो कि औरतें तशहहुद पढ़ते वक़्त अपनी राने मिलाकर रखें।
नमाज़ का सलाम
1114. नमाज़ की आख़िरी रक्अत के तशह्हुद के बाद जब नमाज़ी बैठा हो और उसका बदन सुकून की हालत में तो मुस्तहब है कि वह कहेः
अस्सलामो अलैका अय्युहन्नबीयो व रहमतुल्लाहे व बरकातुहू और उसके बाद ज़रूरी है कि कहे, अस्सलामो अलैकुम और एहतियाते मुस्तहब यह है कि अस्सलामो अलैकुम के जुमले के साथ व रहमतुल्लाहे व बरकातुहू के जुमले का इज़ाफ़ा करे या यह कहे अस्सलामो अलैना व अला इबादिल्लाहिस्स्वालेहीन लेकिन अगर इस सलाम को पढ़े तो एहतियाते वाजिब यह है कि उसके बाद अस्सलामो अलैकुम भी कहे।
1115. अगर कोई शख़्स नमाज़ का सलाम कहना भूल जाए और उसे ऐसे वक़्त याद आए जब अभी नमाज़ की शक्ल ख़त्म न हुई हो और उसने कोई ऐसा काम भी न किया हो जिसे अमदन और सहवन करने से नमाज़ बातिल हो जाती हो, मसलन क़िब्ले की तरफ़ पीठ करना, तो ज़रूरी है कि सलाम कहे और उसकी नमाज़ सहीह है।
1116. अगर कोई शख़्स नमाज़ का सलाम कहना भूल जाए और उसे ऐसे वक़्त याद आए जब नमाज़ की शक्ल ख़त्म हो गई हो तो उसने कोई ऐसा काम किया हो जिसे अमदन या सहवन करने से नमाज़ बातिल हो जाती है, मसलन क़िब्ले की तरफ़ पीठ करना तो उसकी नमाज़ सहीह है।
तरतीब
1117. अगर कोई शख़्स जान बूझकर नमाज़ की तरतीब उलट दे मसलन अलहम्द से पहले सूरा पढ़ ले या रूकू से पहले सज्दे बजा लाए तो उसकी नमाज़ बातिल हो जाती है।
1118. अगर कोई शख़्स नमाज़ का कोई रुक्न भूल जाए और उसके बाद का रुक्न बजा लाए मसलन रूकू करने से पहले दो सज्दे करे तो उसकी नमाज़ एहतियात की बिना पर बातिल है।
1119. अगर कोई शख़्स नमाज़ का कोई रुक्न भूल जाए और ऐसी चीज़ बजा लाए जो उसके बाद हो और रुक्न न हो मसलन इस से पहले की दो सज्दे करे तशह्हुद पढ़ले तो ज़रूरी है कि रुक्न बजा लाए और जो कुछ भी भूलकर उससे पहले पढ़ा हो उसे दोबारा पढ़े।
1120. अगर कोई शख़्स कोई ऐसी चीज़ भूल जाए जो रुक्न न हो और उसके बाद का रुकन बजा लाए मसलन अलहम्द भूल जाए और रूकू में चला जाए तो उसकी नमाज़ सहीह है।
1121. अगर कोई शख़्स कोई ऐसी चीज़ भूल जाए जो रुक्न न हो और उस चीज़ को बजा लाए जो उसके बाद हो और वह भी रुक्न न हो मसलन अलहम्द भूल जाए और सूरा पढ़ ले तो ज़रूरी है कि जो चीज़ भूल गया हो वह बजा लाए और उसके बाद वह चीज़ जो भूल कर पहले पढ़ ली हो दोबारा पढ़े।
1122. अगर कोई शख़्स पहला सज्दा इस ख़्याल से बजा लाए कि दूसरा सज्दा है या दूसरा सज्दा इस ख़्याल से बजा लाए कि पहला सज्दा है तो उसकी नमाज़ सहीह है और उसका पहला सज्दा, पहला सज्दा और दूसरा सज्दा, दूसरा सज्दा शुमार होगा।
मुवालात
1123. ज़रूरी है कि इंसान नमाज़ मुवालात के साथ पढ़े यानी नमाज़ के अफ़्आल मसलन रूकू, सुजूद और तशह्हुद तवातुर और तसलसुल के साथ बजा लाए। और जो चीज़ें भी नमाज़ में पढ़े मअमूल के मुताबिक़ पै दर पै पढ़े और अगर उनके दरमियान इतना फ़ासिला डाले कि लोग यह न कहें कि नमाज़ पढ़ रहा है तो उसकी नमाज़ बातिल है।
1124. अगर कोई शख़्स नमाज़ में सहवन हुरुफ़ या जुम्लों के दरमियान फ़ासिला दे और फ़ासिला इतना न हो कि नमाज़ की सूरत बरक़रार न रहे तो अगर वह अभी बाद वाले रुक्न में मश्ग़ूल न हुआ तो ज़रूरी है कि वह हुरूफ़ या जुमले मअमूल के मुताबिक़ पढ़े और अगर बाद की कोई चीज़ पढ़ी जा चुकी हो तो ज़रूरी है कि उसे दुहराए और अगर बाद के रुक्न में मशग़ूल हो गया हो तो उसकी नमाज़ सहीह है।
1125. रूकू और सुजूद को तूल देना और बड़ी सूरतें पढ़ना मुवालात को नहीं तोड़ता।
क़ुनूत
1126. तमाम वाजिब और मुस्तहब नमाज़ों में दूसरी रक्अत से पहले क़ुनूत पढ़ना मुस्तहब है लेकिन नमाज़े शफ़अ में ज़रूरी है कि उसे रजाअन पढ़ें और नमाज़े वित्र में भी बावजूदे के एक रक्अत की होती है रूकू से पहले क़ुनूत पढ़ना मुस्तहब है। और नमाज़े जुमुआ की हर रक्अत में एक क़ुनूत, नमाज़े आयात में पांच क़ुनूत, नमाज़े ईदे फ़ित्र व क़ुर्बान की पहली रक्अत में पांच क़ुनूत और दूसरी रक्अत में चार क़ुनूत हैं।
1127. मुस्तहब है कि क़ुनूत पढ़ते वक़्त हाथ चेहरे के सामने और हथेलियां एक दूसरे के साथ मिला कर आस्मान की तरफ़ रखे और अंगूठों के अलावा बाक़ी उंगलियों को आपस में मिलाए और निगाह हथेलियों पर रखे।
1128. क़ुनूत में इंसान जो ज़िक्र भी पढ़े ख़्वाह एक दफ़्आ, सुब्हानल्लाह ही कहे काफ़ी है। और बेहतर यह है कि यह दुआ पढ़ेः-
ला इलाहा इल्लल्लाहुल हलीमुल करीम, लाइलाहा इल्लल्लाहुल अलीयुल अज़ीम सुब्हानल्लाहे रब्बिस्समावातिस सबा ए रब्बिल अरज़ीनस्सबाए व माफ़ीहिन्ना व माबैनाहुन्ना व रब्बिल अर्शिल अज़ीम, वलहम्दो लिल्लाहे रब्बिल आलमीन।
1129. मुस्तहब है कि इंसान क़ुनूत बलन्द आवाज़ से पढ़े लेकिन अगर एक शख़्स जमाअत के साथ नमाज़ पढ़ रहा हो और इमाम उसकी आवाज़ सुन सकता हो तो उसका बलन्द आवाज़ से क़ुनूत पढ़ना मुस्तहब नहीं है।
1130. अगर कोई शख़्स अमदन क़ुनूत न पढ़े तो उसकी क़ज़ा नहीं और अगर भूल जाए और इस से पहले कि रूकू की हद तक झुके उसे याद आ जाए तो मुस्तहब है कि खड़ा हो जाए और क़ुनूत पढ़े। और अगर रूकू में याद आ जाए तो मुस्तहब है कि रूकू के बाद क़ज़ा करे और अगर सज्दे मे याद आ जाए तो मुस्तहब है कि सलाम के बाद उसकी क़ज़ा करे।
नमाज़ का तर्जुमा
1.सूरा ए अलहम्द का तर्जुमाः-
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम, बिस्मिल्लाहे यानी मैं इब्तिदा करता हूं ख़ुदा के नाम से , उस ज़ात के नाम से जिसमें तमाम कमालात यक्जा हैं और जो हर क़िस्म के नक्स से मुनज्जा है। अर्रहमाने उसकी रहमत वसी और बेइन्तिहा है। अर्रहीमे उसकी रहमत ज़ाती और अज़ली व अबदी है। अलहम्दोलिल्लाहे रब्बिल आलमीना यानी सना उस ख़ुदा वन्द की ज़ात से मख़सूस है जो तमाम मौजूदात का पालने वाला है। अर्रहमानिर्रहीम इसके मअनी बताए जा चुके हैं। मालिके यौमिद्दीने यानी वह तवाना ज़ात कि जज़ा के दिन की हुक्मरानी उसके हाथ में है। ईय्याका नअबुदु व ईय्याका नस्तईन यानी हम फ़क़त तेरी ही इबादत करते हैं और फ़क़त तुझी से मदद तलब करते हैं। एहदिनस सिरातल मुस्तक़ीमा यानी हमे राहे रास्त की जानिब हिदायत फ़रमा जो कि दीने इस्लाम है। सिरातल्लज़ीना अन्अम्ता अलैहिम यानी उन लोगों के रास्ते की जानिब जिन्हें तूने अपनी नेमतें अता की हैं जो अंबिया और अंबिया के जानशीन हैं। ग़ैरिल मग़्ज़ूबे अलैहिम वलज़्ज़ाल्लीना यानी न उन लोगों के रास्ते की जानिब जिन पर तेरा ग़ज़ब हुआ और न उनके रास्ते की जानिब जो गुमराह हैं।
2.सूरा ए एख़्लास का तर्जुमाः-
बिस्मिल्ला हिर्रहमा निर्रहीम, इसके मअना बताए जा चुके हैं। क़ुल हुवल्लाहो अहदुन यानी मोहम्मद स्वल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम आप कह दें ख़ुदावन्दा वही है जो यकता ख़ुदा है। अल्लाहुस्समदो यानी वह ख़ुदा जो तमाम मौजूदात से बेनियाज़ है। लम यलिद व लम यूलद यानी न उसकी कोई औलाद है और न वह किसी की औलाद है। वलम यकुंल्लहू कुफ़ूवन अहदुन और मख़्लूकात में से कोई भी उसके मिस्ल नहीं है।
3.रूकू, सुजूद और उनके बाद के मुस्तहब अज़्कार का तर्जुमाः-
सुब्हाना रब्बियल अज़ीमें व बेहम्देही यानी मेरा परवरदिगार हर ऐब हर नक़्स से पाक और मुनज़्ज़ा है, मैं उसकी सताइश में मश्ग़ूल हूं। सुब्हाना रब्बियल अअला व बेहम्देही यानी मेरा परवरदिगार जो सबसे बालातर है और हर ऐब और हर नक़्स से पाक और मुनज़्ज़ा है, मैं उसकी सताइश में मश्ग़ूल हूं। समेअल्लाहो लेमन हमेदहू यानी जो कोई ख़ुदा की सताइश करता है ख़ुदा उसे सुनता है और क़ुबूल करता है। अस्तग़्फ़िरुल्लाहा रब्बी व अतूबो इलैह यानी मैं मग़्फ़िरत तलब करता हूं उस ख़ुदावन्द से जो मेरा पालने वाला है और उसकी तरफ़ रुजूउ करता हूं। बेहौल्लिलाहे व क़ुव्वतेही अक़ूमो व अक़्उद यानी मैं ख़ुदा तआला की मदद से उठता और बैठता हूं।
4.क़ुनूत का तर्जुमाः-
ला इलाहा इल्लल्लाहुल हलीमुल करीम यानी कोई ख़ुदा परस्तिश के लाइक़ नहीं सिवाय उस यकता और बेमिस्ल ख़ुदा के जो साहबे हिल्म व करम है। ला इलाहा इल्लल्लाहुल अलीयुल अज़ीम यानी कोई ख़ुदा परस्तिश के लाइक़ नहीं सिवाय उस यकता और बेमिस्ल ख़ुदा के जो बलन्द मर्तबा और बुज़ुर्ग है। सुब्हानल्लाहे रब्बिस्समावातिस सबए व रब्बिल अरज़ीनस्सबए यानी पाक और मुनज़्ज़ा है वह ख़ुदा जो सात आसमानों और सात ज़मीनों का परवरदिगार है। वमा फ़ीहिन्ना व माबैनाहुन्ना व रब्बिल अर्शिल अज़ीम यानी वह हर उस चीज़ का परवरदिगार है जो आसमानों और ज़मीनों में और उनके दरमियान है और अर्शे अअज़म का परवरदिगार है। वल्हम्दो लिल्लाहे रब्बिल आलमीन और हम्द व सना उस ख़ुदा के लिये मख़्सूस है जो तमाम मौजूदात का पालने वाला है।
5.तस्बीहाते अर्बआ का तर्जुमाः-
सुब्हानल्लाहे वल हम्दो लिल्लाहे व ला इलाहा इल्लल्लाहो वल्लाहो अक्बरो यानी ख़ुदा तआला पाक और मुनज़्ज़ा है और सना उसी के लिये मख़्सूस है और उस बेमिस्ल ख़ुदा के अलावा कोई ख़ुदा परस्तिश के लाइक़ नहीं और वह इससे बालातर है कि उसकी (कमा हक़्क़हू) तौसीफ़ की जाए। 6.तशह्हुद और सलाम का तर्जुमाः-
अलहम्दो लिल्लाहे, अश्हदो अंल्ला इलाहा इल्लल्लाहो वह्दहू ला शरीका लहू यानी सताइश परवरदिगार के लिये मख़्सूस है और मैं गवाही देता हूं कि सिवाय उस ख़ुदा के जो यकता है और जिसका कोई शरीक नहीं कोई और ख़ुदा परस्तिश के लाइक़ नहीं है। व अश्हदो अन्ना मोहम्मदन अब्दोहू व रसूलुहू और मै गवाही देता हूं कि मोहम्मद स्वल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम ख़ुदा के बन्दे और उसके रसूल हैं। अल्लाहुम्मा स्वल्ले अला मोहम्मदिंव व आले मोहम्मद यानी ऐ ख़ुदा रहमत भेज मोहम्मद और आले मोहम्मद पर। व तक़ब्बल शफ़ाअतहू वर्फ़अ दरजतहू यानी रसूलुल्लाह की शफ़ाअत क़बूल कर और आँहज़रत का दरजा अपने नज़दीक बलन्द कर। अस्सलामो अलैका अय्युहन्नबीयो व रहमतुल्लाहे व बरकातुहू यानी ऐ अल्लाह के रसूल (स0) आप पर हमारा सलाम हो और आप पर अल्लाह की रहमतें और बरकतें हों। अस्सलामो अलैना व अला इबादिल्लाहिस्स्वालेहीना यानी हम नमाज़ पढ़ने वालों पर और तमाम स्वालेह बन्दों पर अल्लाह की तरफ़ से सलामती हो। अस्सलामो अलैकुम व रहमतुल्लाहे व बरकातुहू यानी तुम मोमिनीन पर ख़ुदा की तरफ़ से सलामती और रहमत व बरकत हो।
ताक़ीबाते नमाज़
1131. मुस्तहब है कि नमाज़ पढ़ने के बाद इंसान कुछ देर के लिये तअक़ीबात यानी ज़िक्र, दुआ और क़ुरआने मजीद पढ़ने में मश्ग़ूल रहे। और बेहतर यह है कि इससे पहले वह अपनी जगह से हरकत करे कि उसका वुज़ू या तयम्मुम बातिल हो जाए रु बक़िब्ला होकर तअक़ीबात पढ़े और यह ज़रूरी नहीं कि तअक़ीबात अरबी में हो लेकिन बेहतर है कि इंसान वह दुआयें पढ़े जो दुआओं की किताबों में बताई गई हैं और तस्बीहे फ़ातिमा (स0) उन ताक़िबात में से है जिनकी बहुत ज़्यादा ताकीद की गई है। यह तस्बीह इस तरतीब से पढ़नी चाहियेः-
34 बार अल्लाहो अक्बर। उसके बाद 33 दफ़्आ अलहम्दो लिल्लाह और उसके बाद 33 दफ़्आ सुब्हानल्लाह। और सुब्हानल्लाह अलहम्दोलिल्लाह से पहले भी पढ़ा जा सकता है लेकिन बेहतर है कि अलहम्दो लिल्लाह के बाद पढ़े।
1132. इंसान के लिये मुस्तहब है कि नमाज़ के बाद सज्दा ए शुक्र बजा लाए और इतना काफ़ी है कि शुक्र की नीयत से पेशानी ज़मीन पर रखे लेकिन बेहतर है कि सौ दफ़्आ या तीन दफ़्आ या एक दफ़्आ शुकरन लिल्लाह या अफ़्वन कहे और यह भी मुस्तहब है कि जब इंसान को कोई नेमत मिले या कोई मुसीबत टल जाए तो सज्दा ए शुक्र बजा लाए।
पैग़म्बरे अकरम (स0)पर सलवात (दुरुद)
1133. जब भी इंसान हज़रत रसूले अकरम स्वल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का इस्मे मुबारक मोसलन मोहम्मद (स0) या अहमद (स0) या आँहज़रत का लक़ब और कुनीयत मसलन मुस्तफ़ा (स0) और अबुल क़ासिल (स0) ज़बान से अदा करे या सुने तो ख़्वाह वह नमाज़ में ही क्यों न हो मुस्तहब है कि सलवात भेजे।
1134. हज़रत रसूले अकरम स्वल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का इस्मे मुबारक लिखते वक़्त मुस्तहब है कि इंसान सलवात (स0) भी लिखे और बेहतर है कि जब आंहज़रत को याद करे तो सलवात भेजे।
मुब्तिलाते नमाज़
1135. बारह चीज़ें नमाज़ को बातिल करती हैं और उन्हें मुब्तिलात कहा जाता हैः-
1. नमाज़ के दौरान नमाज़ की शर्तों में से कोई शर्त मफ़्क़ूद हो जाए मसलन नमाज़ पढ़ते हुए मुतअल्लिक़ा शख़्स को पता चले कि जिस कपड़े से उसने सत्रपोशी की हुई है वह ग़स्बी है।
2. नमाज़ के दौरान अमदन या सहवन या मजबूरी की वजह से इंसान किसी ऐसी चीज़ से दो चार हो जो वुज़ू या ग़ुस्ल को बातिल कर दे। मसलन उसका पेशान खता हो जाए अगरचे एहतियात की बिना पर इस तरह नमाज़ के आखिरी सज्दे के बाद सहवन या मजबूरी की बिना पर हो ताहम जो शख़्स पेशाब या पाखाना न रोक सकता हो अगर नमाज़ के दौरान उसका पेशाब या पाखाना निकल जाए और वह उस तरीक़े पर अमल करे जो अहकामे वुज़ू के ज़ैल में बताया गया है तो उसकी नमाज़ बातिल नहीं होगी और इसी तरह अगर नमाज़ के दौरान मुस्तहाज़ा को ख़ून आ जाए तो अगर वह इस्तिहाज़ा से मुतअल्लिक़ अहकाम के मुताबिक़ अमल करे तो उसकी नमाज़ सहीह है।
1136. जिस शख़्स को बे इख़्तियार नीन्द आ जाए अगर उसे यह पता न चले कि वह नमाज़ के दौरान सो गया था या उसके बाद सोया तो ज़रूरी नहीं की नमाज़ दोबारा पढ़े बशर्ते की यह जानता हो कि जो कुछ नमाज़ में पढ़ा है वह इस क़दर था कि उसे उर्फ़े आम में नमाज़ कहें।
1137. अगर किसी शख़्स को इल्म हो कि वह अपनी मर्ज़ी से सोया था लेकिन शक करे कि नमाज़ के बाद सोया था या नमाज़ के दौरान यह भूल गया कि नमाज़ पढ़ रहा है और सो गया तो उस शर्त के साथ जो साबिक़ा मस्अले में बयान की गई है उसकी नमाज़ सहीह है।
1138. अगर कोई शख़्स नींद से सज्दे की हालत में बेदार हो जाए और शक करे कि आया नमाज़ के आख़िरी सज्दे में है या सज्दा ए शुक्र में है तो अगर उसे इल्म हो कि बे इख़्तियार सो गया था तो ज़रूरी है कि नमाज़ दोबारा पढ़े और जानता हो कि अपनी मर्ज़ी से सोया था और इस बात का एहतिमाल हो कि गफ़्लत की वजह से नमाज़ के सज्दे में सो गया था तो उसकी नमाज़ सहीह है।
3. यह चीज़ मुब्तिलाते नमाज़ में से है कि इंसान अपने हाथों को आजिज़ी और अदब की नीयत से बांधे लेकिन इस काम की वजह से नमाज़ का बातिल होना एहतियात की बिना पर है और अगर मशरुइयत की नीयत से अंजाम दे तो उस काम के हराम होने में कोई इश्काल नहीं है।
139. अगर कोई शख़्स भूले से या मजबूरी से या तक़ीय्या की वजह से या किसी और काम मसलन हाथ खुजाने और ऐसे ही किसी काम के लिये हाथ पर हाथ रख ले तो कोई हरज नहीं है।
4. मुब्तिलाते नमाज़ में से एक यह है कि अलहम्द पढ़ने के बाद आमीन कहे। आमीन कहने से नमाज़ का इस तरह बातिल होना ग़ैरे मामूम में एहतियात की बिना पर है। अगरचे आमीन कहने को जाइज़ समझते हुए आमीन कहे तो उसके हराम होने में कोई इश्काल नहीं है। बहर हाल अगर आमीन को ग़लती या तक़ीय्या की वजह से कहे तो उसकी नमाज़ में कोई इश्काल नहीं है।
5. मुब्तिलाते नमाज़ में से है कि बग़ैर किसी उज्र के क़िब्ले से रुख़ फेरे लेकिन अगर किसी उज्र मसलन भूल कर या बेइख़्तियारी की बिना पर मसलन तेज़ हवा के थपेड़े उसे क़िब्ले से फेर दें चुनांचे अगर दायें या बायें सम्त तक न पहुंचे तो उसकी नमाज़ सहीह है। लेकिन ज़रूरी है कि जैसे ही उज्र दूर हो फ़ौरन ही अपना क़िब्ला दुरूस्त करे। और अगर दायें या बायें तरफ़ मुड़ जाए ख़्वाह क़िब्ले की तरफ़ पुश्त हो या न हो अगर उसका उज़्र भूलने की वजह से हो और जिस वक़्त मुतवज्जह हो और नमाज़ को तोड़ दे तो उसे दोबारा क़िब्ला रुख होकर पढ़ सकता हो तो ज़रूरी है कि नमाज़ को दोबारा पढ़े। अगरचे उस नमाज़ की एक रक्अत वक़्त में पढ़े वर्ना उसी नमाज़ पर इक्तिफ़ा करे और उस पर क़ज़ा लाज़िम नहीं और यही हुक्म है अगर क़िब्ले से उसका फिरना बे इख़्तियारी की हालत में हो चुनांचे क़िब्ले से फिरे बग़ैर अगर नमाज़ को दोबारा वक़्त में पढ़ सकता हो। अगरचे वक़्त में एक रक्अत ही पढ़ी जा सकती हो तो ज़रूरी है कि नमाज़ को नए सिरे से पढ़े वर्ना ज़रूरी है कि उसी नमाज़ को तमाम करे इआदा और क़ज़ा उस पर लाज़िम नहीं है।
1140. अगर फ़क़त अपने चेहरे को क़िब्ले से घुमाए लेकिन उसका बदन क़िब्ले की तरफ़ हो चुनांचे इस हद तक गर्दन को मोड़े कि अपने सर के पीछे कुछ देख सके तो उसके लिये भी वही हुक्म है जो क़िब्ले से फिर जाने वाले के लिये है जिसका ज़िक्र पहले किया जा चुका है। और अगर अपनी गर्दन को थोड़ा सा मोड़े कि उर्फ़न कहा जाए कि उसके बदन का अगला हिस्सा क़िब्ले की तरफ़ है तो उसकी नमाज़ बातिल नहीं होगी अगरचे यह काम मकरूह है।
6. मुब्तिलाते नमाज़ में से एक यह है कि अमदन बात करे अगरचे ऐसा कलिमा हो कि जिसमें एक हर्फ़ से ज़्यादा न हो अगर वह हर्फ़ बा मअनी हो मसलन (काफ़) कि जिसके अरबी ज़बान में मअना हिफ़ाज़ात करो के हैं या कोई और मअना समझ में आते हों मसलन (बे) उस शख़्स के जवाब में कि जो हुरूफ़े तहज्जी के हर्फ़े दोम के बारे में सवाल करे और अगर उस लफ़्ज़ से कोई मअना भी समझ में न आते हों और दो या दो से ज़्यादा हर्फ़ों से मुरक्कब हो तब भी एहतियात की बिना पर (वह लफ़्ज़) नमाज़ को बातिल कर देता है।
1141. अगर कोई शख़्स सहवन ऐसा कलिमा कहे जिसके हुरूफ़ एक या उससे ज़्यादा हों तो ख़्वाह वह कलिमा मअनी भी रखता हो उस शख़्स की नमाज़ बातिल नहीं होती लेकिन एहतियात की बिना पर उसके लिये ज़रूरी है कि ज़ैसा कि बाद में ज़िक्र आयेगा नमाज़ के बाद वह सज्दा ए सहव बजा लाए।
1142. नमाज़ की हालत में खांसने या डकार लेने में कोई हरज नहीं और एहतियाते लाज़िम की बिना पर नमाज़ में इख़्तियारन आह न भरे और न ही गिर्या करे। और आंख और आह और इन्ही जैसे अल्फ़ाज़ का अमदन कहना नमाज़ को बातिल कर देता है
1143. अगर कोई शख़्स कोई कलिमा ज़िक्र के क़स्द से कहे मसलन ज़िक्र के क़स्द से अल्लाहो अक्बर कहे और उसे कहते वक़्त आवाज़ को बलन्द करे ताकि दूसरे शख़्स को किसी चीज़ की तरफ़ मुतवज्जह करे तो इसमें कोई हरज नहीं। और इसी तरह अगर कोई कलिमा ज़िक्र के क़स्द से कहे अगरचे जानता हो कि इस काम की वजह से कोई किसी मतलब की तरफ़ मुतवज्जह हो जायेगा तो कोई हरज नहीं लेकिन अगर बिलकुल ज़िक्र का क़स्द न करे या ज़िक्र का क़स्द भी हो और किसी बात की तरफ़ मुतवज्जह भी करना चाहता हो तो इसमें इश्काल है।
1144. नमाज़ में क़ुरआन पढ़ने (चार आयतों का हुक्म कि जिनमें वाजिब सज्दा है क़िरअत के अहकाम मस्अला न0 992 में बयान हो चुका है) और दुआ करने में कोई हरज नहीं लेकिन एहतियाते मुस्तहब यह है कि अरबी के अलावा किसी और ज़बान में दुआ न करे।
1145. अगर कोई बग़ैर क़स्द जुज़ईयत अमदन या एहतियातन अलहम्द और सूरे के किसी हिस्से या अज़्कारे नमाज़ की तकरार करे तो कोई हरज नहीं।
1146. इंसान को चाहिये कि नमाज़ की हालत में किसी को सलाम न करे और अगर कोई दूसरा शख़्स उसे सलाम करे तो ज़रूरी है कि जवाब दे लेकिन जवाब सलाम की मानिन्द होना चाहिये यानी ज़रूरी है कि अस्ल सलाम पर इज़ाफ़ा न हो मसलन जवाब में ये नहीं कहना चाहिये सलामुन अलैकुम व रहमतुल्लाहे व बरकातुहू बल्कि एहतियाते लाज़िम की बिना पर ज़रूरी है कि जवाब में अलैकुम या अलैक के लफ़्ज़ को सलाम के लफ़्ज़ पर मुक़द्दम न रखे। अगर वह शख़्स कि जिसने सलाम किया है उसने इस तरह न किया हो बल्कि एहतियाते मुस्तहब यह है कि जवाब मुकम्मल तौर पर दे जिस तरह कि उसने सलाम किया हो मसलन अगर कहा हो सलामुन अलैकुम तो जवाब में कहे सलामुन अलैकुम और अगर कहा हो अस्सलामो अलैकुम तो कहें अस्सलामो अलैकुम और अगर कहा हो सलामुन अलैक तो कहे सलामुन अलैक लेकिन अलैकुमुस्सलाम के जवाब में जो लफ़्ज़ चाहे कह सकता है।
1147. इंसान को चाहिये कि ख़्वाह वह नमाज़ की हालत में हो या न हो सलाम का जवाब फ़ौरन दे और अगर जान भूझ कर या भूले से सलाम का जवाब देने में इतना तवक़्क़ुफ़ करे कि अगर जवाब दे तो वह उस सलाम का जवाब शुमार न हो तो अगर वह नमाज़ की हालत में हो तो ज़रूरी है कि जवाब न दे और अगर नमाज़ की हालत में न हो तो जवाब देना वाजिब नहीं है।
1148. इंसान को सलाम का जवाब इस तरह देना ज़रूरी है कि सलाम करने वाला सुन ले लेकिन अगर सलाम करने वाला बहरा हो या सलाम कह कर जल्दी से गुज़र जाए चुनांचे मुम्किन हो तो सलाम का जवाब इशारे से या उसी तरह किसी तरीक़े से उसे समझा सके तो जवाब देना ज़रूरी है। इस सूरत के अलावा जवाब देना नमाज़ के अलावा किसी और जगह पर ज़रूरी नहीं और नमाज़ में जाइज़ नहीं है।
1149. वाजिब है कि नमाज़ी सलाम के जवाब को सलाम की नीयत से कहे। और दुआ का क़स्द करने में भी कोई हरज नहीं यानी ख़ुदावन्दे आलम से उस शख़्स के लिये सलामती चाहे जिसने सलाम किया हो।
1150. अगर औरत या ना महरम मर्द या वह बच्चा जो अच्छे बुरे में तमीज़ कर सकता हो नमाज़ पढ़ने वाले को सलाम करे तो ज़रूरी है कि नमाज़ पढ़ने वाला उसके सलाम का जवाब दे और अगर औरत सलामुन अलैका कहकर सलाम करे तो जवाब में कह सकता है सलामुन अलैके यानी काफ़ को ज़ेर दे।
1151. अगर नमाज़ पढ़ने वाला सलाम का जवाब न दे तो वह गुनाहगार है लेकिन उसकी नमाज़ सहीह है।
1152. अगर कोई शख़्स नमाज़ पढ़ने वाले को इस तरह ग़लत सलाम करे कि वह सलाम ही शुमार न हो तो उसके सलाम का जवाब देना जाइज़ नहीं है।
1153. किसी ऐसे शख़्स को सलाम का जवाब देना जो मिज़ाह और तमस्ख़ुर के तौर पर सलाम करे और ऐसे ग़ैर मुस्लिम मर्द और औरत के सलाम का जवाब देना जो ज़िम्मी न हो वाजिब नही नहीं है और अगर ज़िम्मी हो तो एहतियाते वाजिब की बिना पर उनके जवाब में कलिमा ए अलैका कह देना काफ़ी है।
1154. अगर कोई शख़्स किसी गुरोह को सलाम करे तो उन सब पर सलाम का जवाब देना वाजिब है लेकिन अगर उनमें से एक शख़्स जवाब दे दे तो काफ़ी है।
1155. अगर कोई शख़्स किसी गुरोह को सलाम करे और जवाब एक ऐसा शख़्स दे जिसका सलाम करने वाले को सलाम करने का इरादा न हो तो (उस शख़्स के जवाब देने के बावजूद) सलाम का जवाब उस गुरोह पर वाजिब है।
1156. अगर कोई शख़्स किसी गुरोह को सलाम करे और उस गुरोह में से जो शख़्स नमाज़ में मश्ग़ूल हो वह शक करे कि सलाम करने वाले का इरादा उसे भी सलाम करने का था या नहीं तो ज़रूरी है कि जवाब न दे और अगर नमाज़ पढ़ने वाले को यक़ीन हो कि उस शख़्स का इरादा उसे भी सलाम करने का था लेकिन कोई शख़्स सलाम का जवाब दे दे तो उस सूरत में भी यह हुक्म है। लेकिन अगर नमाज़ पढ़ने वाले को मालूम हो कि सलाम करने वाले का इरादा उसे भी सलाम करने का था और कोई दूसरा जवाब दे तो ज़रूरी है कि सलाम का जवाब दे।
1157. सलाम करना मुस्तहब है और इस अम्र की बुहत ताकीद की गई है कि सवार पैदल को और खड़ा हुआ शख़्स बैठे हुए को और छोटा बड़े को सलाम करे।
1158. अगर दो शख़्स आपस में एक दूसरे को सलाम करें तो एहतियाते वाजिब की बिना पर ज़रूरी है कि उनमें से हर एक दूसरे को उसके सलाम का जवाब दे।
1159. अगर इंसान नमाज़ पढ़ रहा हो तो मुस्तहब है कि सलाम का जवाब उस सलाम से बेहतर अल्फ़ाज़ में दे मसलन अगर कोई शख़्स सलामुन अलैकुम कहे तो जवाब में कहे सलामुन अलैकुम व रहमतुल्लाहे।
7. नमाज़ के मुब्तिलात में से एक आवाज़ के साथ और जान बूझकर हंसना है। अगरचे बेइख़्तियार हंसे। और जिन बातों की वजह से हंसे वह इख़्तियारी हो बल्कि एहतियात की बिना पर जिन बातों की वजह से हंसी आई हो अगरचे वह इख़्तियारी न भी हों तब भी वह नमाज़ के बातिल होने का मुजिब होगी लेकिन अगर जान बूझकर बग़ैर आवाज़ या सहवन आवाज़ के साथ हंसे तो ज़ाहिर यह है कि उसकी नमाज़ में कोई इश्काल नहीं।
1160. अगर हंसी की आवाज़ रोकने के लिये किसी शख़्स की हालत बदल जाए मसलन उसका रंग सुर्ख़ हो जाए तो एहतियाते वाजिब यह है कि वह नमाज़ दोबारा पढ़े।
8. एहतियाते वाजिब की बिना पर यह नमाज़ के मुब्तिलात में से है कि इंसान दुनियावी काम के लिये जान बूझकर आवाज़ से या बग़ैर आवाज़ के रोए लेकिन अगर ख़ौफ़े ख़ुदा से या आखिरत के लिये रोए तो ख़्वाह आहिस्ता रोए या बलन्द आवाज़ से रोए कोई हरज नहीं बल्कि यह बेहतरीन अअमाल में से हैं।
9. नमाज़ बातिल करने वाली चीज़ों में से है कि कोई ऐसा काम करे जिससे नमाज़ की शक्ल बाक़ी न रहे मसलन उछलना कूदना और इसी तरह का कोई अमल अंजाम देना। ऐसा करना अमदन हो या भूल चूक की वजह से हो लेकिन जिस काम से नमाज़ की शक्ल तब्दील न होती हो मसलन हाथ से इशारा करना इसमें कोई हरज नहीं है।
1161. अगर कोई शख़्स नमाज़ के दौरान इस क़दर साकित हो जाए कि लोग यह न कहें कि नमाज़ पढ़ रहा है तो उसकी नमाज़ बातिल हो जाती है।
1162. अगर कोई शख़्स नमाज़ के दौरान कोई काम करे या कुछ देर साकित रहे और शक करे कि उसकी नमाज़ टूट गई है या नहीं तो ज़रूरी है कि नमाज़ को दोबारा पढ़े और बेहतर यह है कि नमाज़ पूरी करे और फिर दोबारा पढ़े।
10. मुब्तिलाते नमाज़ में से एक खाना और पीना है। पस अगर कोई शख़्स नमाज़ के दौरान इस तरह खाए या पिये कि लोग यह न कहे कि नमाज़ पढ़ रहा है तो ख़्वाह उसका यह फ़ेल अमदन हो या भूल चूक कि वजह से हो उसकी नमाज़ बातिल हो जाती है। अलबत्ता जो शख़्स रोज़ा रखना चाहता हो अगर वह सुब्हा की अज़ान से पहले मुस्तहब नमाज़ पढ़ रहा हो और प्यासा हो और उसे डर हो कि अगर नमाज़ पूरी करेगा तो सुब्ह हो जायेगी तो अगर पानी उसके सामने दो तीन क़दम के फ़ासिले पर हो तो वह नमाज़ के दौरान पानी पी सकता है। लेकिन ज़रूरी है कि कोई ऐसा काम, मसलन क़िब्ले से मुंह फेरना न करे जो नमाज़ को बातिल करता है।
1163. अगर किसी का जान बूझकर खाना या पीना नमाज़ की शक्ल को ख़त्म न भी करे तब भी एहतियाते वाजिब की बिना पर ज़रूरी है कि नमाज़ को दोबारा पढ़े ख़्वाह नमाज़ का तसलसुल ख़त्म हो यानी यह न कहा जाए कि नमाज़ को मुसलसल पढ़ रहा है या नमाज़ का तसलसुल ख़त्म न हो।
1164. अगर कोई शख़्स नमाज़ के दौरान कोई ऐसी ग़िज़ा निगल ले जो उसके मुंह या दांतों के रेख़ों में रह गई हो तो उसकी नमाज़ बातिल नहीं होती। इसी तरह अगर ज़रा भी क़न्द या शकर या उन्हीं जैसी कोई चीज़ मुंह में रह गई हो और नमाज़ की हालत में आहिस्ता आहिस्ता घुलकर पेट में चली जाए तो कोई हरज नहीं।
11. मुब्तिलाते नमाज़ में से दो रक्अती या तीन रक्अती नमाज़ की रक्अतों में या चार रक्अती नमाज़ों की पहली रक्अतों शक करना है। नमाज़ पढ़ने वाला शक की हालत पर बाक़ी रहे।
12. मुब्तिलाते नमाज़ में से यह भी है कि कोई शख़्स नमाज़ का रुक्न जान बूझकर या भूलकर कम कर दे या एक ऐसी चीज़ को जो रुक्न नहीं है जान बूझकर घटाए या जान बूझकर कोई चीज़ नमाज़ में बढ़ाए। इसी तरह अगर किसी रुक्न मसलन रूकू या दो सज्दों को एक रक्अत में ग़लती से बढ़ा दे तो एहतियाते वाजिब की बिना पर उसकी नमाज़ बातिल हो जायेगी, अलबत्ता भूले से तक्बीरतुल एहराम की ज़ियादती नमाज़ को बातिल नहीं करती।
1165. अगर कोई शख़्स नमाज़ के बाद शक करे कि दौराने नमाज़ उसने कोई ऐसा काम किया है या नहीं जो नमाज़ को बातिल करता हो तो उसकी नमाज़ सहीह है।
वह चीज़ें जो नमाज़ में मकरूह हैं
1166. इसी शख़्स का नमाज़ में अपना चेहरा दाईं या बाई जानिब इतना कम मोड़ना कि लोग यह न कहं सकें कि उसने अपना मुंह क़िब्ले से मोड़ लिया है मकरूह है वरना जैसा कि बयान हो चुका है उसकी नमाज़ बातिल है। और यह भी मकरूह है कि कोई शख़्स नमाज़ में अपनी आंखें बन्द करे या दायीं और बायीं तरफ़ घुमाए और अपनी ड़ाढ़ी और हाथों से खेले और उंगलिया एक दूसरे में दाखिल करे और थूके और क़ुरआने मजीद या किसी और किताब या अंगूठी की तहरीर को देखे। और यह भी मकरूह है कि अलहम्द, सूरा और ज़िक्र पढ़ते वक़्त किसी की बात सुनने के लिये ख़ामोश हो जाए बल्कि हर वह काम जो कि ख़ुज़ूउ व ख़ुशूउ को कल्अदम (ख़त्म) कर दे, मकरूह है।
1167. जब इंसान को नींद आ रही हो और उस वक़्त भी जब उसने पेशाब या पखाना रोक रखा हो नमाज़ पढ़ना मकरूह है और इसी तरह नमाज़ की हालत में ऐसा मोज़ा पहनना भी मकरूह है जो पांव को जकड़ ले और इनके अलावा दूसरे मकरूहात भी भी मुफ़स्सल किताबों में बयान किये गये हैं।
वह सूरतें जिनमें वाजिब नमाज़ें तोड़ी जा सकती हैं
1168. इख़्तियारी हालत में वाजिब नमाज़ को तोड़ना एहतियाते वाजिब की बिना पर हराम है लेकिन माल की हिफ़ाज़त और माली या जिस्मानी ज़रर से बचने के लिये नमाज़ तोड़ने में कोई हरज नहीं बल्कि ज़ाहिरन वह तमाम अहम दीनी और दुनियावी काम जो नमाज़ी को पेश आयें उनके लिये नमाज़ तोड़ने में कोई हरज नहीं।
1169. अगर इंसान अपनी जान की हिफ़ाज़त या किसी ऐसे शख़्स की जान की हिफ़ाज़त जिसकी जान की हिफ़ाज़त वाजिब हो या ऐसे माल की हिफ़ाज़त जिसकी निगहदाश्त वाजिब हो और वह नमाज़ तोड़े बग़ैर मुम्किन न हो तो इंसान को चाहिये कि नमाज़ तोड़ दे।
1170. अगर कोई शख़्स वसी वक़्त में नमाज़ पढ़ने लगे और क़र्ज़ ख़्वाह उससे अपने क़र्ज़े का मुतालबा करे और वह उसका क़र्ज़ा नमाज़ के दौरान अदा कर सकता हो तो ज़रूरी है कि उसी हालत में अदा कर दे और अगर बग़ैर नमाज़ तोड़े उसका क़र्ज़ चुकाना मुम्किन न हो तो ज़रूरी है कि नमाज़ तोड़ दे और उसका क़र्ज़ा अदा करे और बाद में नमाज़ पढ़े।
1171. अगर किसी शख़्स को नमाज़ के दौरान पता चले कि मस्जिद नजिस है और वक़्त तंग हो तो ज़रूरी है कि नमाज़ तमाम करे और अगर वक़्त वसी हो और मस्जिद को पाक करने से नमाज़ न टूटती हो तो ज़रूरी है कि नमाज़ के दौरान उसे पाक करे और बाद में बाक़ी नमाज़ पढ़े और अगर नमाज़ टूट जाती हो और नमाज़ के बाद मस्जिद को पाक करना मुम्किन न हो तो उसके लिये ज़रूरी है कि नमाज़ तोड़ दे और मस्जिद को पाक करे और बाद में नमाज़ पढ़े।
1172. जिस शख़्स के लिये नमाज़ को तोड़ना ज़रूरी हो अगर वह नमाज़ ख़त्म करे (पूरी करे) तो वह गुनाहगार होगा लेकिन उसकी नमाज़ सहीह है अगरचे एहतियाते मुस्तहब यह है कि दोबारा नमाज़ पढ़े।
1173. अगर किसी शख़्स को क़िरअत या रूकू की हद तक झुकने से पहले याद आ जाए कि वह अज़ान और इक़ामत या फ़क़त इक़ामत कहना भूल गया है और नमाज़ का वक़्त वसी हो तो मुस्तहब है कि उन्हें कहने के लिये नमाज़ तोड़ दे बल्कि अगर नमाज़ ख़त्म होने से पहले उसे याद आए कि उन्हें भूल गया था तब भी मुस्तहब है कि उन्हें कहने के लिये नमाज़ तोड़ दे।
शक्कीयाते नमाज़
नमाज़ के शक्कीयात की 22 क़िस्में हैं। उनमें से सात इस क़िस्म के शक हैं जो नमाज़ को बातिल करते हैं और छः इस क़िस्म के हैं जिनकी परवाह नहीं करनी चाहिये और बाक़ी नौ इस क़िस्म के शक हैं जो सहीह हैं।
वह शक जो नमाज़ को बातिल करते हैं
1174. जो शक नमाज़ को बातिल करते हैं वह यह हैः-
1. दो रक्अती वाजिब नमाज़ मसलन नमाज़े सुब्ह और नमाज़े मुसाफ़िर की रक्अतों की तादाद के बारे में शक अलबत्ता नमाज़े मुस्तहब और नमाज़े एहतियात की रक्अतों की तादाद के बारे में शक नमाज़ को बातिल नहीं करता।
2. तीन रक्अती नमाज़ की तादाद के बारे में शक।
3. चार रक्अती नमाज़ में कोई शक करे कि उसने एक रक्अत पढ़ी है या ज़्यादा पढ़ी है।
4. चार रक्अती नमाज़ में दूसरे सज्दे में दाख़िल होने से पहले नमाज़ी शक करे कि उसने दो रक्अतें पढ़ी हैं या ज़्यादा पढ़ी हैं।
5. दो और छः रक्अतों में या दो और पांच रक्अतों में शक करे।
6. तीन और छः रक्अतों में या तीन और छः से ज़्यादा रक्अतों में शक करे।
7. चार और छः रक्अतों के दरमियान शक या चार और छः से ज़्यादा रक्अतों के दरमियान शक जिसकी तफ़्सील आगे आयेगी।
1175. अगर इंसान को नमाज़ बातिल करने वाले शुकूक में से कोई शक पेश आए तो बेहतर यह है कि जैसे ही उसे शक हो नमाज़ न तोड़े बल्कि इस क़दर ग़ौरो फ़िक्र करे कि नमाज़ की शक्ल बरक़रार न रहे या यक़ीन या गुमान हासिल होने से ना उम्मीद हो जाए।
वह शक जिनकी परवाह नहीं करनी चाहिये
1176. वह शुकूक जिनकी परवाह नहीं करनी चाहिये मुन्दरिजा ज़ैल हैः-
1. उस फ़ेल में शक जिसके बजा लाने का मौक़ा ग़ुज़र गया हो। मसलन इंसान रूकू में शक करे कि उसने अलहम्द पढ़ी हैं या नहीं।
2. सलामे नमाज़ के बाद शक।
3. नमाज़ का वक़्त गुज़र जाने के बाद शक।
4. कसीरुश्शक का शक – यानी उस शख़्स का शक जो बहुत ज़्यादा शक करता हो।
5. रक्अतों की तादाद के बारे में इमाम का शक जब कि मामूम उनकी तादाद जानतो हो। और इसी तरह मामूम का शक जब कि इमाम नमाज़ की रक्अतों की तादाद जानता हो।
6. मुस्तहब नमाज़ों और नमाज़े एहतियात के बारे में शक।
1. जिस फ़ेल का मौक़ा गुज़र गया हो उसमें शक करना
1177. अगर नमाज़ी नमाज़ के दौरान शक करे कि उसने नमाज़ का एक वाजिब फ़ेल अंजाम दिया है या नहीं मसलन उसे शक हो कि अलहम्द पढ़ी या नहीं जबकि उस साबिक़ काम को अमदन तर्क कर के जिस काम में मशग़ूल हो उस काम में शरअन मशग़ूल नहीं होना चाहिये या मसलन सूरा पढ़ते वक़्त शक करे कि अलहम्द पढ़ी है या नहीं तो ज़रूरी है कि अपने शक की परवाह न करे। इस सूरत के अलावा ज़रूरी है कि जिस चीज़ की अंजाम देही के बारे में शक हो बजा लाए।
1178. अगर नमाज़ी कोई आयत पढ़ते हुए शक करे कि इससे पहले की आयत पढ़ी है या नहीं या जिस वक़्त आयत का आख़िरी हिस्सा पढ़ रहा हो शक करे कि इसका पहला हिस्सा पढ़ा है या नहीं तो ज़रूरी है कि अपने शक की परवाह न करे।
1179. अगर नमाज़ रूकू या सुजूद के बाद शक करे कि उनके वाजिब अफ़्आल मसलन ज़िक्र और बदन का सुकून की हालत में होना – उसने अंजाम दिये हैं या नहीं तो ज़रूरी है कि अपने शक की परवाह न करे।
1180. अगर नमाज़ी सज्दे में जाते वक़्त शक करे कि रूकू बजा लाया है या नहीं या शक करे कि रूकू के बाद खड़ा हुआ था या नहीं तो ज़रूरी है कि अपने शक की परवाह न करे।
1181. अगर नमाज़ी खड़ा होते वक़्त शक करे कि सज्दा या तशह्हुद बजा लाया है या नहीं तो ज़रूरी है कि अपने शक की परवाह न करे।
1182. जो शख़्स बैठ कर या लेट कर नमाज़ पढ़ रहा हो अगर अलहम्द या तस्बीहात पढ़ने के वक़्त शक करे कि सज्दा या तशह्हुद बाजा लाया है या नहीं तो ज़रूरी है कि अपने शक की परवाह न करे और अगर अलहम्द या तस्बीहात में मशग़ूल होने से पहले शक करे कि सज्दा या तशह्हुद बाजा लाया है या नहीं तो ज़रूरी है कि बजा लाए।
1183. अगर नमाज़ी शक करे कि नमाज़ का कोई रुक्न बजा लाया है या नहीं और उसके बाद आने वाले फ़ेल में मशग़ूल न हुआ हो तो ज़रूरी है कि उसे बजा लाए मसलन अगर तशह्हुद पढ़ने से पहले शक करे कि दो सज्दे बजा लाया है या नहीं तो ज़रूरी है कि बजा लाए और अगर बाद में उसे याद आए कि वह उस रुक्न को बजा लाया था तो एक रूक्न बढ़ जाने की वजह से एहतियाते लाज़िम की बिना पर उसकी नमाज़ बातिल है।
1184. अगर नमाज़ी शक करे कि एक ऐसा अमल जो नमाज़ का रुक्न नहीं है बजा लाया है या नहीं और उसके बाद आने वाले फ़ेल में मशग़ूल न हुआ हो तो ज़रूरी है कि उसे बजा लाए मसलन अगर सूरा पढ़ने से पहले शक करे कि अलहम्द पढ़ी है या नहीं तो ज़रूरी है कि अलहम्द पढ़े और अगर उसे अंजाम देने के बाद उसे याद आए कि उसे पहले ही बजा ला चुका था तो चूंकि रुक्न ज़्यादा नहीं हुआ इस लिये उसकी नमाज़ सहीह है।
1185. अगर नमाज़ी शक करे कि एक रुक्न बजा लाया है या नहीं मसलन जब तशह्हुद पढ़ रहा हो शक करे कि दो सज्दे बजा लाया है या नहीं और अपने शक की परवाह न करे और बाद में उसे याद आए कि उस रुक्न को बजा नहीं लाया तो अगर वह बाद वाले रुक्न में मशग़ूल न हुआ हो तो ज़रूरी है कि उस रुक्न को बजा लाए और अगर बाद वाले रुक्न में मशग़ूल हो गया हो तो उसकी नमाज़ एहतियाते लाज़िम की बिना पर बातिल है। मसलन अगर बाद वाली रक्अत के रूकू से पहले उसे याद आए कि दो सज्दे नहीं बजा लाया तो ज़रूरी है कि बजा लाए और अगर रूकू में या उसके बाद उसे याद आए (कि दो सज्दे नहीं बजा लाया) तो उसकी नमाज़ी जैसा कि बजा लाया गया, बातिल है।
1186. अगर नमाज़ी शक करे कि वह एक ग़ैर रुक्नी अमल बजा लाया है या नहीं और उसके बाद वाले अमल में मशग़ूल हो चुका हो तो ज़रूरी है कि अपने शक की परवाह न करे। मसलन जिस वक़्त सूरा पढ़ रहा हो शक करे कि अलहम्द पढ़ी है या नहीं तो ज़रूरी है कि अपने शक की परवाह न करे अलबत्ता अगर उसे कुछ देर में याद आ जाए कि इस अमल को बजा नहीं लाया और अभी बाद वाले रुक्न में मशग़ूल न हुआ हो तो ज़रूरी है कि उस अमल को बजा लाए और अगर बाद वाले रुक्न में मशग़ूल हो गया हो तो उसकी नमाज़ सहीह है। इस बिना पर मसलन अगर क़ुनूत में उसे याद आ जाए कि उसने अलहम्द नहीं पढ़ी थी तो ज़रूरी है कि पढ़े और अगर यह बात उसे रूकू में याद आए तो उसकी नमाज़ सहीह है।
1187. अगर नमाज़ी शक करे कि उसने नमाज़ का सलाम पढ़ा है या नहीं और तअक़ीबात या दूसरी नमाज़ में मशग़ूल हो जाए या कोई ऐसा काम करे जो नमाज़ को बरक़रार नहीं रखता और वह हालते नमाज़ से ख़ारिज हो गया हो तो ज़रूरी है कि अपने शक की परवाह न करे और अगर इन सूरतों से पहले शक करे तो ज़रूरी है कि सलाम पढ़े अगर शक करे कि सलाम पढ़ा है या नहीं तो जहां भी हो अपने शक की परवाह न करे।
2. सलाम के बाद शक करना
1188. अगर नमाज़ी सलामे नमाज़ के बाद शक करे कि उसने नमाज़ सहीह तौर पर पढ़ी है या नहीं मसलन शक करे कि रूकू अदा किया है या नहीं या चार रक्अती नमाज़ के सलाम के बाद शक करे कि चार रक्अती नमाज़ पढ़ी है या पांच तो वह अपने शक की परवाह न करे लेकिन अगर उसे दोनों तरफ़ नमाज़ के बातिल होने का शक हो मसलन चार रक्अती नमाज़ के सलाम के बाद शक करे कि तीन रक्अती पढ़ी है या पांच रक्अत तो उसकी नमाज़ बातिल है।
3. वक़्त के बाद शक करना
1189. अगर कोई शख़्स नमाज़ का वक़्त गुज़रने के बाद शक करे कि उसने नमाज़ पढ़ी है या नहीं या गुमान करे कि नहीं पढ़ी तो उस नमाज़ का पढ़ना लाज़िम नहीं लेकिन अगर वक़्त गुज़रने से पहले शक करे कि नमाज़ पढ़ी है या नहीं तो ख़्वाह गुमान करे कि पढ़ी है फिर भी ज़रूरी है कि वह नमाज़ पढ़े।
1190. अगर कोई शख़्स वक़्त गुज़रने के बाद शक करे कि उसने नमाज़ दुरूस्त पढ़ी है या नहीं तो अपने शक की परवाह न करे।
1191. अगर नमाज़े ज़ोहर और अस्र का वक़्त गुज़र जाने के बाद नमाज़ी जान ले कि चार रक्अत नमाज़ पढ़ी है लेकिन यह मालूम न हो कि ज़ोहर की नीयत से पढ़ी है या अस्र की नीयत से तो ज़रूरी है कि चार रकअत नमाज़े क़ज़ा उस नमाज़ की नीयत से पढ़े जो उस पर वाजिब है।
1192. अगर मग़्रिब और इशा की नमाज़ का वक़्त गुज़रने के बाद नमाज़ी को पता चले कि उसने एक नमाज़ पढ़ी है लेकिन यह इल्म न हो कि तीन रक्अती नमाज़ पढ़ी है या चार रक्अती तो ज़रूरी है कि मग़्रिब और इशा दोनों नमाज़ो की क़ज़ा करे।
4. कसीरुश्शक का शक करना
1193. ससीरुश्शक वह शख़्स है जो बहुत ज़्यादा शक करे इस मअनी में कि वह लोग जो उसकी मानिन्द हैं उनकी निस्बत वह हवासे फ़रेब अस्बाब के होने या न होने के बारे में ज़्यादा शक करे। पस जहां हवास को फ़रेब देने वाला सबब न हो और हर तीन नमाज़ों में एक दफ़्अ शक करे तो ऐसा शख़्स अपने शक की परवाह न करे।
1194. अगर कसीरुश्शक नमाज़ के अज्ज़ा में से किसी जुज़्व के अंजाम देने के बारे में शक करे तो उसे यूं समझना चाहिये कि उस जुज़्व को अंजाम दे दिया है। मसलन अगर शक करे कि रूकू किया है या नहीं तो उसे समझना चाहिये कि रूकू कर लिया है और अगर किसी ऐसी चीज़ के बारे में शक करे जो मुब्तिले नमाज़ है मसलन शक करे कि सुब्ह की नमाज़ दो रक्अत पढ़ी है या तीन रक्अत तो यहीं समझे नमाज़ ठीक पढ़ी है।
1195. जिस शख़्स को नमाज़ के किसी जुज़्व के बारे में ज़्यादा शक होता हो, इस तरह कि वह किसी मख़्सूस जुज़्व के बारे में कुछ ज़्यादा (ही) शक करता रहता हो, अगर वह नमाज़ के किसी जुज़्व के बारे में शक करे तो ज़रूरी है कि शक के अहकाम पर अमल करे। मसलन किसी को ज़्यादा शक इस बात में होता हो कि सज्दा किया है या नहीं, अगर उसे रूकू करने के बाद शक हो तो ज़रूरी है कि शक के हुक्म पर अमल करे यानी अगर भी सज्दे में न गया हो तो रूकू करे और सज्दे में चला गया हो तो शक की परवाह न करे।
1196. जो शख़्स किसी मख़्सूस नमाज़ मसलन ज़ोहर की नमाज़ में ज़्यादा शक करता हो अगर वह किसी दूसरी नमाज़ मसलन अस्र की नमाज़ में शक करे तो ज़रूरी है कि शक के अहकाम पर अमल करे।
1197. जो शख़्स किसी मख़्सूस जगह पर नमाज़ पढ़ते वक़्त ज़्यादा शक करता हो अगर वह किसी दूसरी जगह नमाज़ पढ़े और उसे शक पैदा हो तो ज़रूरी है कि शक के अहकाम पर अमल करे।
1198. अगर किसी शख़्स को इस बारे में शक हो कि कसीरुश्शक हो गया है या नहीं तो ज़रूरी है कि शक के अहकाम पर अमल करे और कसीरुश्शक शख़्स को जब तक यक़ीन न हो जाए कि वह लोगों की आम हालत पर लौट आया है। अपने शक की परवाह न करे।
1199. अगर कसीरुश्शक शख़्स शक करे कि एक रुक्न बजा लाया है या नहीं और वह इस शक की परवाह भी न करे और फिर उसे याद आए कि वह रुक्न बजा नहीं लाया और उसके बाद के रुक्न में मशग़ूल न हुआ हो तो ज़रूरी है कि उस रुक्न को बजा लाए और अगर बाद के रुक्न में मशग़ूल हो गया हो तो उसकी नमाज़ एहतियात की बिना पर बातिल है मसलन अगर शक करे कि रूकू किया है या नहीं और इस शक की परवाह न करे और दूसरे सज्दे से पहले उसे याद आए कि रूकू नहीं किया था तो ज़रूरी है कि रूकू करे और अगर दूसरे सज्दे के दौरान उसे याद आए तो उसकी नमाज़ एहतियात की बिना पर बातिल है।
1200. जो शख़्स ज़्यादा शक करता हो अगर वह शक करे कि कोई ऐसा अमल जो रुक्न न हो अंजाम दिया है या नहीं और इस शक की परवाह न करे और बाद में उसे याद आए कि वह अमल अंजाम नहीं दिया तो अगर अंजाम देने के मक़ाम से अभी न गुज़रा हो तो ज़रूरी है कि उसे अंजाम दे और अगर उसके मक़ाम से गुज़र गया हो तो उसकी नमाज़ सहीह है। मसलन अगर शक करे कि अलहम्द पढ़ी है या नहीं और अलहम्द पढ़े और रूकू में याद आए तो उसकी नमाज़ सहीह है।
5. इमाम और मुक्तदी का शक
1201. अगर इमामे जमाअत नमाज़ की रक्अतों की तादाद में शक करे। मसलन शक करे कि तीन रक्अतें पढ़ी है या चार रक्अतें और मुक्तदी को यक़ीन या गुमान हो कि चार रक्अतें पढ़ी हैं और वह यह बात इमामे जमाअत के इल्म में ले आए कि चार रक्अतें पढ़ी हैं तो इमाम को चाहिये कि नमाज़ को तमाम करे और नमाज़े एहतियात का पढ़ना ज़रूरी नहीं और अगर इमाम को यक़ीन या गुमान हो कि कितनी रक्अतें पढ़ी हैं और मुक्तदी नमाज़ की रक्अतों के बारे में शक करे तो उसे चाहिये कि अपने शक की परवाह न करे।
6. मुस्तहब नमाज़ में शक
1202. अगर कोई शख़्स मुस्तहब नमाज़ की रक्अतों में शक करे और शक अदद की ज़्यादती की तरफ़ हो जो नमाज़ को बातिल करती है तो उसे चाहिये कि यह समझ ले कि कम रक्अतें पढ़ी हैं मसलन अगर सुब्ह की नफ़्लों में शक करे कि दो रक्अतें पढ़ी हैं या तीन तो यह समझे कि दो पढ़ीं हैं। और अगर तादाद की ज़्यादती वाला शक नमाज़ को बातिल न करे मसलन अगर नमाज़ी शक करे कि दो रक्अतें पढ़ीं तो शक की जिस तरफ़ पर भी अमल करे उसकी नमाज़ सहीह है।
1203. रुक्न का कम होना नफ़ल नमाज़ को बातिल कर देता है लेकिन रुक्न का ज़्यादा होना उसे बातिल नहीं करता। पस अगर नमाज़ी नफ़ल के अफ़्आल में से कोई फ़ेल भूल जाए और यह बात उसे उस वक़्त याद आए जब वह उसके बाद वाले रुक्न में मशग़ूल हो चुका हो तो ज़रूरी है कि उस फ़ेल को अंजाम दे और दोबारा उस रुक्न को अंजाम दे मसलन अगर रूकू के दौरान उसे याद आए कि सूरतुल हम्द नहीं पढ़ी तो ज़रूरी है कि वापस लौटे और अलहम्द पढ़े और दोबारा रूकू में जाए।
1204. अगर कोई शख़्स नफ़ल के अफ़्आल में से किसी फ़ेल के मुतअल्लिक़ शक करे ख़्वाह वह फ़ेल रुक्नी हो या ग़ैर रुक्नी और इसका मौक़ा न गुज़रा हो तो ज़रूरी है कि उसे अंजाम दे और अगर मौक़ा गुज़र गया हो तो अपने शक की परवाह न करे।
1205. अगर किसी शख़्स को दो रक्अत मुस्तहब नमाज़ में तीन या ज़्यादा रक्अतों के पढ़ लेने का गुमान हो तो चाहिये कि उस गुमान की परवाह न करे और उसकी नमाज़ सहीह है लेकिन अगर उसका गुमान दो रक्अतों का या उससे कम का हो तो एहतियाते वाजिब की बिना पर उसी गुमान पर अमल करे मसलन अगर उसे गुमान हो कि एक रक्अत पढ़ी है तो ज़रूरी है कि एहतियात के तौर पर एक रक्अत और पढ़े।
1206. अगर कोई शख़्स नफ़ल नमाज़ में कोई ऐसा काम करे जिसके लिये वाजिब नमाज़ में सज्दा ए सहव वाजिब हो जाता हो या एक सज्दा भूल जाए तो उसके लिये ज़रूरी है नहीं कि नमाज़ के बाद सज्दा ए सहव या सज्दे की क़ज़ा बजा लाए।
1207. अगर कोई शख़्स शक करे कि मुस्तहब नमाज़ पढ़ी है या नहीं और उसका नमाज़े जाफ़रे तय्यार की तरह कोई मुक़र्रर वक़्त न हो तो उसे समझ लेना चाहिये कि नहीं पढ़ी। और अगर उस मुस्तहब नमाज़ का गौमीया नवाफ़िल की तरह वक़्त मुक़र्रर हो और उस वक़्त के गुज़रने से पहले मुतअल्लिक़ा शख़्स शक करे कि उसे अंजाम दिया है या नहीं तो उसके लिये भी यही हुक्म है। लेकिन अगर वक़्त गुज़रने के बाद शक करे कि वह नमाज़ पढ़ी है या नहीं तो अपने शक की परवाह न करे।
सहीह शुकूक
1208. अगर किसी को नौ सूरतों में चार रक्अती नमाज़ की रक्अतों की तादाद के बारे में शक हो तो उसे चाहिये की फ़ौरन ग़ौरो फ़िक्र करे और अगर यक़ीन या गुमान शक की किसी एक तरफ़ हो जाए तो उसी को इख़्तियार करे और नमाज़ को तमाम करे वर्ना उन अहकाम के मुताबिक़ अमल करे जो ज़ैल में बताए जा रहे हैं।
वह नौ सूरतें यह हैः-
1.दूसरे सज्दे के दौरान दो रक्अतें पढ़ीं हैं या तीन। इस सूरत में उसे यूं समझ लेना चाहिये कि तीन रक्अतें पढ़ी हैं और एक और रक्अत पढ़े फिर नमाज़ को तमाम करे और एहतियाते वाजिब की बिना पर नमाज़ के बाद एक रक्अत नमाज़े एहतियात खड़े होकर बजा लाए।
2.दूसरे सज्दे के दौरान अगर शक करे कि दो रक्अतें पढ़ी हैं या चार तो यह समझ ले कि चार पढ़ी हैं और नमाज़ को तमाम करे और बाद में दो रक्अते नमाज़े एहतियात खड़े होकर बजा लाए।
3.अगर किसी को दूसरे सज्दे के दौरान शक हो जाए कि दो रक्अते पढ़ीं हैं या तीन या चार तो उसे यह समझ लेना चाहिये कि चार पढी हैं और वह नमाज़ ख़त्म होने के बाद दो रक्अत नमाज़े एहतियात खड़े होकर और बाद में दो रक्अत बैठकर बजा लाए।
4. अगर किसी शख़्स को दूसरे सज्दे के दौरान शक हो कि उसने चार रक्अतें पढ़ी हैं या पांच तो वह यह समझे कि चार पढ़ी हैं और इस बुनियाद पर नमाज़ पूरी करे और नमाज़ के बाद दो सज्दा ए सहव बजा लाए। और बईद नहीं कि यही हुक्म हर उस सूरत में हो जहां चार रक्अत और उससे कम और उससे ज़्यादा रक्अतों में दूसरे सज्दे के दौरान शक हो तो चार रक्अतें क़रार दे कर दोनों शक के अअमाल अंजाम दे। यानी इस एहतिमाल की बिना पर कि चार रक्अत से ज़्यादा पढ़ी हैं बाद में दो सज्दा ए सहव भी करे। और तमाम सूरतों में अगर पहले सज्दे के बाद और दूसरे सज्दे में दाखिल होने से पहले साबिक़ा चार शक में से एक उसे पेश आए तो उसकी नमाज़ बातिल है।
5. नमाज़ के दौरान जिस वक़्त भी किसी को तीन रक्अत और चार रक्अत के दरमियान शक हो ज़रूरी है कि यह समझ ले कि चार रक्अतें पढी हैं और नमाज़ को तमाम करे और बाद में एक रक्अत नमाज़े एहतियात खड़े होकर या दो रक्अत बैठ कर पढ़े।
6. अगर क़ियाम के दौरान किसी को चार रक्अतों और पांच रक्अतों के बारे में शक हो जाए तो ज़रूरी है कि बैठ जाए और तशह्हुद और नमाज़ का सलाम पढ़े और एक रक्अत नमाज़े एहतियात खड़े होकर या दो रक्अत बैठ कर पढ़े।
7. अगर क़ियाम के दौरान किसी को तीन और पांच रक्अतों के बारे में शक हो जाए तो ज़रूरी है कि बैठ जाए और तशह्हुद और नमाज़ का सलाम पढ़े और दो रक्अत नमाज़े एहतियात खड़े होकर पढ़े।
8. अगर क़ियाम के दौरान किसी को तीन, चार और पांच रक्अतों के बारे में शक हो जाए तो ज़रूरी है कि बैठ जाए और तशह्हुद पढ़े और सलामे नमाज़ के बाद दो रक्अते नमाज़े एहतियात खड़े होकर और बाद में दो रक्अत बैठ कर पढ़े।
9. अगर क़ियाम के दौरान किसी को पांच और छः रक्अतों के बारे में शक हो जाए तो ज़रूरी है कि बैठ जाए और तशह्हुद और नमाज़ का सलाम पढ़े और दो सज्दा ए सहव बजा लाए और एहतियाते मुस्तहब की बिना पर इन चार सरतों में बेजा क़ियाम के लिये दो सज्दा ए सहव भी बजा लाए।
1209. अगर किसी को सहीह शुकूक में से कोई शक हो जाए और नमाज़ का वक़्त इतना तंग हो कि नमाज़ अज़ सरे नव न पढ़ सके तो नमाज़ नहीं तोड़नी चाहिये और ज़रूरी है कि जो मसअला बयान किया गया है उसके मुताबिक़ अमल करे। बल्कि अगर नमाज़ का वक़्त वसी हो तब भी एहतियाते मुस्तहब यह है कि नमाज़ न तोड़े और जो मसअला पहले बयान किया गया है उस पर अमल करे।
1210. अगर नमाज़ के दौरान इंसान को उन शुकूक में से कोई शक लाहिक़ हो जाए जिनके लिये नमाज़े एहतियात वाजिब है और वह नमाज़ को तमाम करे तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि नमाज़े एहतियात पढ़े और नमाज़े एहतियात पढ़े बग़ैर अज़ सरे नव नमाज़ न पढ़े और अगर वह कोई ऐसा फ़ेल अंजाम देने से पहले जो नमाज़ को बातिल करता हो अज़ सरे नव नमाज़ पढ़े तो एहतियात की बिना पर उसकी दूसरी नमाज़ भी बातिल है लेकिन अगर कोई ऐसा फ़ेल अंजाम देने के बाद जो नमाज़ को बातिल करता हो नमाज़ में मशग़ूल हो जाए तो उसकी दूसरी नमाज़ सहीह है।
1211. जब नमाज़ को बातिल करने वाले शुकूक में से कोई शक इंसान को लाहिक़ हो जाए और वह जानता हो कि बाद की हालत में मुन्तक़िल हो जाने पर उसके लिये यक़ीन या गुमान पैदा हो जायेगा तो उस सूरत में जबकि उसका बातिल शक शूरू की दो रक्अत में हो उसके लिये शक की हालत में नमाज़ जारी रखना जाइज़ नहीं है। मसलन अगर क़ियाम की हालत में उसे शक हो कि एक रक्अत पढ़ी है या ज़्यादा पढ़ी है और वह जानता हो कि अगर रूकू में जाए तो किसी एक तरफ़ यक़ीन या गुमान पैदा करेगा तो इस हालत में उसके लिये रूकू करना जाइज़ नहीं है और बाक़ि बातिल शुकूक में बज़ाहिर अपनी नमाज़ जारी रख सकता है ताकि उसे यक़ीन या गुमान हासिल हो जाए। 1212. अगर किसी शख़्स को गुमान पहले एक तरफ़ ज़्यादा हो और बाद में उसकी नज़र में दोनों अतराफ़ बराबर हो जायें तो ज़रूरी है कि शक के अहकाम पर अमल करे और अगर पहले ही दोनों अतराफ़ उसकी नज़र में बराबर हों और अहकाम के मुताबिक़ जो कुछ उसका वज़ीफ़ा है उस पर अमल की बुनियाद रखे और बाद में उसका गुमान दूसरी तरफ़ चला जाए तो ज़रूरी है कि उसी तरफ़ को इख़्तियार करे और नमाज़ को तमाम करे।
1213. जो शख़्स यह न जानता हो कि उसका गुमान एक तरफ़ ज़्यादा है या दोनों अतराफ़ उसकी नज़र में बराबर हैं तो ज़रूरी है कि शक के अहकाम पर अमल करे।
1214. अगर किसी शख़्स को नमाज़ के बाद मालूम हो कि नमाज़ के दौरान वह शक की हालत में था मसलन उसे शक था कि उसने दो रक्अतें पढ़ी हैं या तीन रक्अतें पढ़ी हैं और उसके अपने अफ़्आल की बुनियाद तीन रक्अतों पर रखी हो लेकिन उसे यह इल्म न हो कि उसके गुमान में यह था कि उसने तीन रक्अतें पढीं हैं या दोनों अतराफ़ उसकी नज़र में बराबर थीं तो नमाज़े एहतियात पढ़ना ज़रूरी है।
1215. अगर क़ियाम के बाद शक करे कि दो सज्दे किये थे या नहीं और उसी वक़्त उसे उन शुकूक में से कोई शक हो जाए जो दो सज्दे तमाम होने के बाद लाहिक़ होता है तो सहीह होता है मसलन वह शक करे कि मैंने दो रक्अतें पढ़ी हैं या तीन और वह उस शक के मुताबिक़ अमल करे तो उसकी नमाज़ सहीह है लेकिन अगर उसे तशह्हुद पढ़ते वक़्त उन शुकूक में से कोई शक लाहिक़ हो जाए तो बिल फ़र्ज़ उसे यह इल्म हो कि दो सज्दे अदा किये हैं तो ज़रूरी है कि यह समझे कि यह ऐसी दो रक्अत में से है जिसमें तशह्हुद नहीं होता तो उसकी नमाज़ बातिल है। उस मिसाल की तरह जो गुज़र चुकी है वर्ना उसकी नमाज़ सहीह है जैसे कोई शक करे कि दो रक्अत पढ़ी हैं या चार रक्अत।
1216. अगर कोई शख़्स तशह्हुद में मशग़ूल होने से पहले या उन रक्अतों में जिनमें तशह्हुद नहीं है क़ियाम से पहले शक करे कि एक या दो सज्दे बजा लाया है या नहीं और उसी वक़्त उसे उन शुकूक में से कोई शक लाहिक़ हो जाए जो दो सज्दे तमाम होने के बाद सहीह हो तो उसकी नमाज़ बातिल है।
1217. अगर कोई शख़्स क़ियाम की हालत में तीन और चार रक्अतों के बारे में या तीन और चार और पांच रक्अतों के बारे में शक करे और उसे यह भी याद आ जाए कि उसने उससे पहली रक्अत का एक सज्दा या दोनों सज्दे अदा नहीं किये तो उसकी नमाज़ बातिल है।
1218. अगर किसी का शक ज़ाइल हो जाए और कोई दूसरा शक उसे लाहिक़ हो जाए मसलन पहले शक करे कि दो रक्अतें पढ़ी हैं या तीन रक्अतें और बाद में शक करे कि तीन रक्अतें पढ़ी हैं या चार रक्अतें तो ज़रूरी है कि दूसरे शक के मुताबिक़ अहकाम पर अमल करे।
1219. जो शख़्स नमाज़ के बाद शक करे कि नमाज़ की हालत में मिसाल के तौर पर उसने दो और चार रक्अतों के बारे में शक किया था या तीन और चार रक्अतों के बारे में शक किया था तो वह हर दो शक के हुक्म पर अमल कर सकता है। और नमाज़ को भी तोड़ सकता है। और जो काम नमाज़ को बातिल कर सकता है उसे करने के बाद दोबारा नमाज़ पढ़े।
1220. अगर किसी शख़्स को नमाज़ के बाद पता चले कि नमाज़ की हालत में उसे ऐसा शक लाहिक़ हो गया था लेकिन यह न जानता हो कि वह शक नमाज़ को बातिल करने वाले शुकूक में से था या सहीह शुकूक में से था और अगर सहीह शुकूक में से था तो उसका तअल्लुक़ सहीह शुकूक की कौन सी क़िस्म से था तो उसके लिये जाइज़ है कि नमाज़ को क़लअदम क़रार दे और दोबारा पढ़े।
1221. जो शख़्स बैठ कर नमाज़ पढ़ रहा हो अगर उसे ऐसा शक लाहिक़ हो जाए जिसके लिये उसे एक रक्अत नमाज़े एहतियात खड़े होकर या दो रक्अत बैठ कर पढ़नी चाहिये तो ज़रूरी है कि एक रक्अत बैठ कर पढ़े और अगर वह ऐसा शक करे जिसके लिये उसे दो रक्अत नमाज़े एहतियात खड़े होकर पढ़नी चाहिये तो ज़रूरी है कि दो रक्अत बैठ कर पढ़े।
1222. जो शख़्स खड़ा होकर नमाज़ पढ़ता हो अगर वह नमाज़े एतियात पढ़ने के वक़्त खड़ा होने से आजिज़ हो तो ज़रूरी है कि नमाज़े एहतियात उस शख़्स की तरह पढ़े जो बैठ कर नमाज़ पढ़ता है और जिसका हुक्म साबिक़ा मसअले में बयान हो चुका है।
1223. जो शख़्स बैठ कर नमाज़ पढ़ता हो अगर नमाज़े एहतियात पढ़ने के वक़्त खड़ा हो सके तो ज़रूरी है कि उस शख़्स के वज़ीफ़े के मुताबिक़ अमल करे जो खड़ा होकर नमाज़ पढ़ता है।
नमाज़े एहतियात पढ़ने का तरीक़ा
1224. जिस शख़्स पर नमाज़े एहतियात वाजिब हो ज़रूरी है कि नमाज़ के सलाम के फ़ौरन बाद नमाज़े एहतियात की नीयत करे और तक्बीर कहे फिर अलहम्द पढ़े और रूकू में जाए और दो सज्दे बजा लाए। पस अगर उस पर एक रक्अत नमाज़े एहतियात वाजिब हो तो दो सज्दों के बाद तशह्हुद और सलाम पढ़े। और अगर उस पर दो रक्अत नमाज़े एहतियात वाजिब हो तो दो सज्दों के बाद पहली रक्अत की तरह एक और रक्अत बजा लाए और तशह्हुद के बाद सलाम पढ़े।
1225. नमाज़े एहतियात में सूरा और क़ुनूत नहीं है और एहतियाते लाज़िम की बिना पर ज़रूरी है कि यह नमाज़ आहिस्ता पढ़े और नीयत ज़बान पर न लाए और एहतियाते मुस्तहब यह है कि उसकी बिस्मिल्लाह भी आहिस्ता पढ़े।
1226. अगर किसी शख़्स को नमाज़े एहतियात पढ़ने से पहले मालूम हो जाए कि जो नमाज़ उसने पढ़ी थी वह सहीह थी तो उसके लिये नमाज़े एहतियात पढ़ना ज़रूरी नहीं और अगर नमाज़े एहतियात के दौरान भी यह इल्म हो जाए तो उस नमाज़ को तमाम करना ज़रूरी नहीं।
1227. अगर नमाज़े एहतियात पढ़ने से पहले किसी शख़्स को मालूम हो जाए कि उसने नमाज़ की रक्अत में कम पढ़ी थी और नमाज़ पढ़ने के बाद उसने कोई ऐसा काम न किया हो जो नमाज़ को बातिल करता हो तो ज़रूरी है कि उसने नमाज़ को जो हिस्सा न पढ़ा हो उसे पढ़े और बे महल सलाम के लिये एहतियाते लाज़िम की बिना पर दो सज्दा ए सहव अदा करे और अगर उससे कोई ऐसा फ़ेल सर्ज़द हुआ है जो नमाज़ को बातिल करता हो मसलन क़िब्ले की जानिब पीठ की हो तो ज़रूरी है कि नमाज़ को दोबारा पढ़े।
1228. अगर किसी शख़्स को नमाज़े एहतियात के बाद पता चले कि उसकी नमाज़ में कमी नमाज़े एहतियात के बराबर थी मसलन तीन रक्अतों और चार रक्अतों के दरमियान शक की सूरत में एक रक्अत नमाज़े एहतियात पढ़े और बाद में मालूम हो कि उसने नमाज़ की तीन रक्अतें पढ़ी थीं तो उसकी नमाज़ सहीह है।
1229. अगर किसी शख़्स को नमाज़े एहतियात पढ़ने के बाद पता चले कि नमाज़ में जो कमी हुई थी वह नमाज़े एहतियात से कम थी मसलन दो रक्अतों और चार रक्अतों के माबैन शक की सूरत में दो रक्अत नमाज़े एहतियात पढ़े और बाद में मालूम हो कि उसने नमाज़ की तीन रक्अतें पढ़ी थीं तो ज़रूरी है कि नमाज़ दोबारा पढ़े।
1230. अगर किसी शख़्स को नमाज़े एहतियात पढ़ने के बाद पता चले कि नमाज़ में जो कमी हुई थी वह नमाज़े एहतियात से ज़्यादा थी मसलन तीन रक्अतों और चार रक्अतों के माबैन शक की सूरत में एक रक्अत नमाज़े एहतियात पढ़े और बाद में मालूम हो कि नमाज़ की दो रक्अतें पढ़ी थीं और नमाज़े एहतियात के बाद कोई ऐसा काम किया हो जो नमाज़ को बातिल करता हो मसलन क़िब्ले की जानिब पीठ की हो तो ज़रूरी है कि नमाज़ दोबारा पढ़े और अगर कोई ऐसा काम न किया हो जो नमाज़ को बातिल करता हो तो उस सूरत में भी एहतियाते लाज़िम यह है कि नमाज़ दोबारा पढ़े और बाक़ि मांदा एक रक्अत ज़म करने पर इक़्तिफ़ा न करे।
1231. अगर कोई शख़्स तीन और चार रक्अतों में शक करे और जिस वक़्त वह एक रक्अत नमाज़ खड़े होकर पढ़ रहा हो उसे याद आए कि उसने नमाज़ की दो रक्अतें पढ़ी थीं तो उसके लिये बैठ कर दो रक्अत नमाज़े एहतियात पढ़ना ज़रूरी नहीं।
1232. अगर कोई शख़्स तीन और चार रक्अतों में शक करे और जिस वक़्त वह एक रकअत नमाज़े एहतियात खड़े होकर पढ़ रहा हो उसे याद आए की उसने नमाज़ की तीन रक्अतें पढ़ी थीं तो ज़रूरी है कि नमाज़े एहतियात को छोड़ दे चुनांचे रूकू में दाख़िल होने से पहले उसे याद आया हो तो एक रक्अत मिलाकर पढ़े और उसकी नमाज़ सहीह है और एहतियाते लाज़िम की बिना पर ज़ाइद सलाम के लिये दो सज्दा ए सहव बजा लाए और अगर रूकू में दाख़िल होने के बाद याद आए तो ज़रूरी है कि नमाज़ दोबारा पढ़े और एहतियात की बिना पर बाक़ी मांदा रक्अत ज़म करने पर इक़तिफ़ नहीं कर सकता।
1233. अगर कोई शख़्स दो और तीन और चार रक्अतों में शक करे और जिस वक़्त वह दो रक्अत नमाज़े एहतियात खड़े होकर पढ़ रहा हो उसे याद आए कि उसने नमाज़ की तीन रक्अतें पढ़ी थीं तो यहां भी बिल्कुल वही हुक्म जारी हो जिसका ज़िक्र साबिक़ा मस्अले में किया गया है।
1234. अगर किसी को नमाज़े एहतियात के दौरान पता चले कि उसकी नमाज़ में कमी नमाज़े एहतियात से ज़्यादा या कम थी तो यहां भी बिल्कुल वही हुक्म जारी होगा जिसका ज़िक्र मस्अला 1232 में किया गया है। 1235. अगर कोई शख़्स शक करे कि जो नमाज़े एहतियात उस पर वाजिब थी वह उसे बजा लाया है या नहीं तो नमाज़ का वक़्त गुज़र जाने की सूरत में अपने शक की परवाह न करे और अगर वक़्त बाक़ी हो तो उस सूरत में जबकि शक और नमाज़ के दरमियान ज़्यादा वक़्फ़ा भी न गुज़रा हो और उसने कोई ऐसा काम भी न किया हो मसलन क़िब्ले से मुंह मोड़ना जो नमाज़ को बातिल करता हो तो ज़रूरी है कि नमाज़े एहतियात पढ़े और अगर कोई ऐसा काम किया हो जो नमाज़ को बातिल करता हो या नमाज़ और उसके शक के दरमियान ज़्यादा वक़्फ़ा हो गया हो तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर नमाज़ दोबारा पढ़ना ज़रूरी है।
1236. अगर एक शख़्स नमाज़े एहतियात में एक रक्अत की बजाए दो रक्अत पढ़ ले तो नमाज़े एहतियात बातिल हो जाती है और ज़रूरी है कि दोबारा अस्ल नमाज़ पढ़े। और अगर वह नमाज़ में कोई रुक्न बढ़ा दे तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर उसका भी यही हुक्म है।
1237. अगर किसी शख़्स को नमाज़े एहतियात पढ़ते हुए उस नमाज़ के अफ़्आल में से किसी एक के मुताल्लिक़ शक हो जाए तो अगर उसका मौक़ा न गुज़रा हो तो उसे अंजाम देना ज़रूरी है और अगर उसका मौक़ा गुज़र गया हो तो ज़रूरी है कि अपने शक की परवाह न करे मसलन अगर शक करे कि अलहम्द पढ़ी है या नहीं और अभी रूकू में न गया हो तो ज़रूरी है कि अपने शक की परवाह न करे।
1238. अगर कोई शख़्स नमाज़े एहतियात की रक्अतों के बारे में शक करे और ज़्यादा रक्अतों की तरफ़ शक करना नमाज़ को बातिल करता हो तो ज़रूरी है कि शक की बुनियाद कम पर रखे और ज़्यादा रक्अतों की तरफ़ शक करना नमाज़ को बातिल न करता हो तो ज़रूरी है कि उसकी बुनियाद ज़्यादा पर रखे मसलन जब वह दो रक्अत नमाज़े एहतियात पढ़ रहा हो अगर शक करे कि दो रक्अतें पढ़ी हैं या तीन तो चूंकि ज़्यादा की तरफ़ शक करना नमाज़ को बातिल करता है इस लिये उसे चाहिये की समझ ले कि उसने दो रक्अतें और अगर शक करे कि उसने एक रक्अत पढ़ी है या दो रक्अतें पढ़ी हैं तो चूंकि ज़्यादती की तरफ़ शक करना नमाज़ को बातिल नहीं करता इस लिये उसे समझना चाहिये के दो रक्अते पढ़ी हैं।
1239. अगर नमाज़े एहतियात में कोई ऐसी चीज़ जो रुक्न न हो सहवन कम या ज़्यादा हो जाए तो उसके लिये सज्दा ए सहव नहीं है।
1240. अगर कोई शख़्स नमाज़े एहतियात के सलाम के बाद शक करे कि वह उस नमाज़ के अज्ज़ा और शराइत में से कोई एक जुज़्व या शर्त अंजाम दे चुका है या नहीं तो वह अपने शक की परवाह न करे।
1241. अगर कोई शख़्स नमाज़े एहतियात में तशह्हुद पढ़ना या एक सज्दा करना भूल जाए और उस तशह्हुद या सज्दे का अपनी जगह पर तदारुक भी मुम्किन न हो तो एहतियाते वाजिब यह है कि सलामे नमाज़ के बाद सज्दे की क़ज़ा करे।
1242. अगर किसी शख़्स पर नमाज़े एहतियात और एक सज्दे की क़ज़ा या दो सज्दा ए सहव वाजिब हों तो ज़रूरी है कि पहले नमाज़े एहतियात बजा लाए।
1243. नमाज़ की रक्अतों के बारे में गुमान का हुक्म यक़ीन के हुक्म की तरह है मसलन अगर कोई शख़्स यह न जानता हो कि एक रक्अत पढ़ी है या दो रक्अतें पढ़ी हैं और गुमान करे कि दो रक्अतें पढ़ी हैं तो वह समझे कि दो रक्अतें पढ़ी हैं। और अगर चार रक्अती नमाज़ में गुमान करे कि चार रक्अती पढ़ी हैं तो उसे नमाज़े एहतियात पढ़ने की ज़रूरत नहीं लेकिन अफ़्आल के बारे में गुमान करना शक का हुक्म रखता है पस अगर वह गुमान करे के रूकू किया है और अभी सज्दे में न दाख़िल हुआ हो तो ज़रूरी है कि रूकू को अंजाम दे, और अगर वह गुमान करे कि अलहम्द नहीं पढ़ी है और सूरे में दाख़िल हो चुका हो तो गुमान की परवाह न करे और उसकी नमाज़ सहीह है।
1244. रोज़ाना की वाजिब नमाज़ों और दूसरी वाजिब नमाज़ों के बारे में शक और सहव और गुमान के हुक्म में कोई फ़र्क़ नहीं है। मसलन किसी को अगर नमाज़े आयात के दौरान शक हो कि एक रक्अत पढ़ी है या दो रक्अतें तो चूंकि उसका शक दो रक्अती नमाज़ में है लिहाज़ा उसकी नमाज़ बातिल है। और अगर वह गुमान करे कि यह दूसरी रक्अत है या पहली रक्अत तो अपने गुमान के मुतामिक़ नमाज़ को तमाम करे।
सज्दा ए सहव
1245. ज़रूरी है कि इंसान सलामे नमाज़ के बाद पांच चीज़ों के लिये उस तरीक़े के मुताबिक़ जिसका आइन्दा ज़िक्र होगा दो सज्दा ए सहव बजा लाएः-
1. नमाज़ की हालत में सहवन कलाम करना।
2. जहां सलामे नमाज़ न कहना चाहिये वहां सलाम कहना। मसलन भूल कर पहली रक्अत में सलाम पढ़ना।
3. तशह्हुद भूल जाना।
4. चार रक्अती नमाज़ में दूसरे सज्दे के दौरान शक करना कि चार रक्अतें पढ़ी हैं या पांच, या शक करना कि चार रक्अतें पढ़ी हैं या छः बिलकुल उसी तरह जैसे कि सहीह शुकूक के नम्बर 4 में गुज़र चुका है।
5. नमाज़ के बाद इज्मालन यह जानना कि नमाज़ में ग़लती से कोई चीज़ कम या ज़्यादा हो गई है।
इन पांच सूरतों में अगर नमाज़ के सहीह होने का हुक्म हो तो एहतियात की बिना पर पहली, दूसरी और पांचवी सूरत में और अक़्वा की बिना पर तीसरी और चौथी सूरत में सज्दा ए सहव अदा करना ज़रूरी है। और एहतियाते मुस्तहब यह है कि अगर एक सज्दा भूल जाए या जहां खड़ा होना ज़रूरी हो मसलन अलहम्द और सूरा पढ़ते वक़्त वहां ग़लती से बैठ जाए या जहां बैठना ज़रूरी हो मसलन तशह्हुद पढ़ते वक़्त वहां ग़लती से खड़ा हो जाए तो दो सज्दा ए सहव अदा करे बल्कि हर उस चीज़ के लिये जो ग़लती से नमाज़ में कम या ज़्यादा हो जाए दो सज्दा ए सहव करे। उन चन्द सूरतों के अहकाम आइन्दा मसाइल में बयान होंगे।
1246. अगर इंसान ग़लती से या इस ख़्याल से कि वह नमाज़ पढ़ चुका है कलाम करे तो एहतियात की बिना पर ज़रूरी है कि दो सज्दा ए सहव करे।
1247. उस आवाज़ के लिये जो खांसने से पैदा होती है सज्दा ए सहव वाजिब नहीं लेकिन अगर कोई ग़लती से नालओ बुका करे या (सर्द) आह भरे या (लफ़्ज़े) आह कहे तो ज़रूरी है कि एहतियात की बिना पर सज्दा ए सहव करे।
1248. अगर कोई शख़्स एक ऐसी चीज़ को जो उसने ग़लत पढ़ी हो दोबारा सहीह तौर पर पढ़े तो उसके दोबारा पढ़ने पर सज्दा ए सहव वाजिब नहीं है।
1249. अगर कोई शख़्स नमाज़ में ग़लती से कुछ देर बाते करता रहे और उमूमन उसे एक दफ़्आ बात करना समझा जाता हो तो उसके लिये नमाज़ के सलाम के बाद दो सज्दा ए सहव काफ़ी है।
1250. अगर कोई शख़्स ग़लती से तस्बीहाते अर्बआ न पढ़े तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि नमाज़ के बाद दो सज्दा ए सहव बजा लाए।
1251. जहां नमाज़ का सलाम नहीं कहना चाहिये अगर कोई शख़्स ग़लती से अस्सलामो अलैना व अला इबादिल्लाहिस्स्वालेहीन कह दे या अस्सलामो अलैकुम कहे तो अगरचे उसने व रहमतुल्लाहे व बरकातुहू न कहा हो तो तब भी एहतियाते लाज़िम की बिना पर ज़रूरी है कि दो सज्दा ए सहव करे। लेकिन अगर ग़लती से अस्सलामो अलैका अय्युहन्नबीयो व रहमतुल्लाहे व बरकातुहू कहे तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि दो सज्दा ए सहव बजा लाए।
1252. जहां सलाम नहीं पढ़ना चाहिये अगर कोई शख़्स ग़लती से वहां तीनों सलाम पढ़ ले तो उसके लिये दो सज्दा ए सहव काफ़ी हैं।
1253. अगर कोई शख़्स एक सज्दा या तशह्हुद भूल जाए और बाद की रक्अत के रूकू से पहले उसे याद आए तो ज़रूरी है कि पलटे और (सज्दा या तशह्हुद) बजा लाए और नमाज़ के बाद एहतियाते मुस्तहब की बिना पर बेजा क़ियाम के लिये दो सज्दा ए सहव करे।
1254. अगर किसी शख़्स को रूकू में या उसके बाद याद आए कि वह उससे पहली रक्अत में एक सज्दा या तशह्हुद भूल गया है तो ज़रूरी है कि सलामे नमाज़ के बाद सज्दे की क़ज़ा करे और तशह्हुद के लिये दो सज्दा ए सहव करे।
1255. अगर कोई शख़्स नमाज़ के सलाम के बाद जान बूझ कर सज्दा ए सहव न करे तो उसने गुनाह किया है और एहतियाते वाजिब की बिना पर ज़रूरी है कि जिस क़द्र जल्दी हो सके उसे अदा करे और अगर भूल कर उसने सज्दा ए सहव नहीं किया तो जिस वक़्त भी उसे याद आए ज़रूरी है कि फ़ौरन सज्दा करे और उसके लिये नमाज़ का दोबारा पढ़ना ज़रूरी नहीं।
1256. अगर कोई शख़्स शक करे कि मसलन उस पर दो सज्दा ए सहव वाजिब हुए हैं या नहीं तो उनका बजा लाना उसके लिये ज़रूरी नहीं।
1257. अगर कोई शख़्स शक करे कि मसलन उस पर दो सज्दा ए सहव वाजिब हुए हैं या चार तो उसका दो सज्दे अदा करना काफ़ी है।
1258. अगर किसी शख़्स को इल्म हो कि दो सज्दा ए सहव में से एक सज्दा ए सहव नहीं बजा लाया और तदारुक भी मुम्किन न हो तो ज़रूरी है कि दो सज्दा ए सहव बजा लाए और अगर उसे इल्म हो कि उसने सहवन तीन सज्दे किये हैं तो एहतियाते वाजिब यह है कि दोबारा दो सज्दा ए सहव बजा लाए।
सज्दा ए सहव का तरीक़ा
1259. सज्दा ए सहव की तरीक़ा यह है कि सलामे नमाज़ के बाद इंसान फ़ौरन सज्दा ए सहव की नीयत करे एहतियाते लाज़िम की बिना पर पेशानी किसी ऐसी चीज़ पर रख दे जिस पर सज्दा करना सहीह हो और एहतियात मुस्तहब यह है कि सज्दा ए सहव में ज़िक्र पढ़े और बेहतर है कि कहेः बिस्मिल्लाहे व बिल्लाहे अस्सलामो अलैका अय्युहन्नबीयो व रहमतुल्लाहे व बरकातुहू इसके बाद उसे चाहिये कि बैठ जाए और दोबारा सज्दे में जाए और मज़कूरा ज़िक्र पढ़े और बैठ जाए और तशह्हुद के बाद कहे अस्सलामो अलैकुम और औला यह है कि व रहमतुल्लाहे व बरकातुहू का इज़ाफ़ा करे।
भूले हुए सज्दे और तशह्हुद की क़ज़ा
1260. अगर इंसान सज्दा और तशह्हुद भूल जाए और नमाज़ के बाद उनकी क़ज़ा बजा लाए तो ज़रूरी है कि वह नमाज़ की तमाम शराइत मसलन बदन और लिबास का पाक होना और रू बक़िब्ला होना और दीगर शराइत पूरी करता हो।
1261. अगर इंसान कई दफ़्आ सज्दा करना भूल जाए मसलन एक सज्दा पहली रक्अत में और एक सज्दा दूसरी रक्अत में भूल जाए तो ज़रूरी है कि नमाज़ के बाद उन दोनों सज्दों की क़ज़ा बजा लाए और बेहतर यह है कि भूली हुई हर चीज़ के लिये एहतियातन दो सज्दा ए सहव करे।
1262. अगर इंसान एक सज्दा और एक तशह्हुद भूल जाए तो एहतियातन हर एक के लिये दो सज्दा ए सहव बजा लाए।
1263. अगर इंसान दो रक्अतों में से दो सज्दे भूल जाए तो उसके लिये ज़रूरी नहीं कि क़ज़ा करते वक़्त तरतीब से बजा लाए।
1264. अगर इंसान नमाज़ के सलाम और सज्दे की क़ज़ा के दरमियान कोई ऐसा काम करे जिसके अमदन या सहवन करने से नमाज़ बातिल हो जाती है मसलन पीठ क़िब्ले की तरफ़ करे तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि सज्दे की क़ज़ा के बाद दोबारा नमाज़ पढ़े।
1265. अगर किसी शख़्स को नमाज़ के सलाम के बाद याद आए कि आख़िरी रक्अत का एक सज्दा या तशह्हुद भूल गया है तो ज़रूरी है कि लौट जाए और नमाज़ को तमाम करे और एहतियाते वाजिब की बिना पर ज़रूरी है कि पहले सज्दे की क़ज़ा करे और बाद में सज्दा ए सहव करे।
1266. अगर एक शख़्स नमाज़ के सलाम और सज्दे की क़ज़ा के दरमियान कोई ऐसा काम करे जिसके लिये सज्दा ए सहव वाजिब हो जाता हो मसलन भूले से कलाम करे तो एहतियाते वाजिब की बिना पर ज़रूरी है कि पहले सज्दे की क़ज़ा करे और बाद में दो सज्दा ए सहव करे।
1267. अगर किसी शख़्स को यह इल्म न हो कि नमाज़ में सज्दा भूला है या तशह्हुद तो ज़रूरी है कि सज्दे की क़ज़ा करे और दो सज्दा ए सहव अदा करे। और एहतियाते मुस्तहब यह है कि तशह्हुद की भी क़ज़ा करे।
1268. अगर किसी शख़्स को शक हो कि सज्दा या तशह्हुद भूला है या नहीं तो उसके लिये उनकी क़ज़ा करना या सज्दा ए सहव अदा करना वाजिब नहीं है।
1269. अगर किसी शख़्स को इल्म हो कि सज्दा भूल गया है और शक करे कि बाद की रक्अत के रूकू से पहले उसे याद आया था और उसे बजा लाया था या नहीं तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि उसकी क़ज़ा करे।
1270. जिस शख़्स पर सज्दे की क़ज़ा ज़रूरी हो, अगर किसी दूसरे काम की वजह से उस पर सज्दा ए सहव वाजिब हो जाए तो ज़रूरी है कि एहतियात की बिना पर नमाज़ अदा करने के बाद अव्वलन सज्दे की क़ज़ा करे और उसके बाद सज्दा ए सहव करे।
1271. अगर किसी शख़्स को शक हो कि नमाज़ पढ़ने के बाद भूले हुए सज्दे की क़ज़ा बजा लाया है या नहीं और नमाज़ का वक़्त न गुज़रा हो तो उसे चाहिये की सज्दे की क़ज़ा करे लेकिन अगर नमाज़ का वक़्त भी गुज़र गया हो तो एहतियाते वाजिब की बिना पर उसकी क़ज़ा करना ज़रूरी है।
नमाज़ के अज्ज़ा और शराइत को कम या ज़्यादा करना
1272. जब नमाज़ के वाजिबात में से कोई चीज़ जान बूझकर कम या ज़्यादा की जाए तो ख़्वाह वह एक हर्फ़ ही क्यों न हो नमाज़ बातिल है।
1273. अगर कोई शख़्स मस्अला न जानने की वजह से नमाज़ के अरकान में से कोई एक कम कर दे तो नमाज़ बातिल है। और वह शख़्स जो (किसी दूर उफ़्तादा मक़ाम पर रहने की वजह से) मसाइल तक रसाई करने से क़ासिर हो या वह शख़्स जिसने किसी हुज्जत (मोअतबर शख़्स या किताब वग़ैरा) पर एतिमाद किया हो अगर वाजिबे ग़ैर रुक्नी को कम करे या किसी रुक्न को ज़्यादा करे तो नमाज़ बातिल नहीं होती। चुनांचे अगर मस्अला न जानने की वजह से अगरचे कोताही की वजह से हो सुब्हा और मग़्रीब और इशा की नमाज़ों में अलहम्द और सूरा आहिस्ता पढ़े या ज़ोहर और अस्र की नमाज़ों में अलहम्द और सूरा आवाज़ से पढ़े या सफ़र करे ज़ोहर, अस्र और इशा की नमाज़ों की चार रक्अतें पढ़े तो उसकी नमाज़ सहीह है।
1274. अगर नमाज़ के दौरान किसी शख़्स का ध्यान इस तरफ़ जाए कि उसका वुज़ू या ग़ुस्ल बातिल था या वुज़ू या ग़ुस्ल किये बग़ैर नमाज़ पढ़ने लगा है तो ज़रूरी है कि नमाज़ तोड़ दे और दोबारा वुज़ू या ग़ुस्ल के साथ पढ़े और अगर इस तरफ़ उसका ध्यान नमाज़ के बाद जाए तो ज़रूरी है कि वुज़ू या ग़ुस्ल के साथ दोबारा नमाज़ पढ़े और अगर नमाज़ का वक़्त गुज़र गया हो तो उसकी क़ज़ा करे।
1275. अगर किसी शख़्स को रूकू में पहुंचने के बाद याद आए कि पहले वाली रक्अत के दो सज्दे भूल गया है तो उसकी नमाज़ एहतियात की बिना पर बातिल है और अगर यह बात उसे रूकू में पहुंचने से पहले याद आए तो ज़रूरी है कि वापस मुड़े और दो सज्दे बजा लाए और फिर खड़ा हो जाए और अलहम्द और सूरा या तस्बीहात पढ़े और नमाज़ को तमाम करे और नमाज़ के बाद एहतियाते मुस्तहब की बिना पर बे महल क़ियाम के लिये दो सज्दा ए सहव बजा लाए।
1276. अगर किसी शख़्स को अस्सलामो अलैना और अस्सलामो अलैकुम कहने से पहले याद आए कि वह आख़िरी रक्अत के दो सज्दे बजा नहीं लाया तो ज़रूरी है कि दो सज्दे बजा लाए और दोबारा सज्दे और तशह्हुद और सलाम पढ़े.
1277. अगर किसी शख़्स को नमाज़ के सलाम से पहले याद आए कि उसने नमाज़ के आख़िरी हिस्से की एक या एक से ज़्यादा रक्अतें नहीं पढी तो ज़रूरी है कि जितना हिस्सा भूल गया हो उसे बजा लाए।
1278. अगर किसी शख़्स को नमाज़ के सलाम के बाद याद आए कि उसने नमाज़ के आख़िरी हिस्से की एक या एक से ज़्यादा रक्अतें नहीं पढ़ीं और उससे ऐसा काम भी सरज़द हो चुका हो कि अगर वह नमाज़ में अमदन या सहव किया जाए तो नमाज़ को बातिल कर देता हो मसलन उसने क़िब्ले की तरफ़ पीठ की हो तो उसकी नमाज़ बातिल है और अगर उसने कोई ऐसा काम न किया हो जिसका अमदन या सहवन करना नमाज़ को बातिल करता हो तो ज़रूरी है कि जितना हिस्सा पढ़ना भूल गया हो उसे फ़ौरन बजा लाए और ज़ाइद सलाम के लिये एहतियाते लाज़िम की बिना पर दो सज्दा ए सहव करे।
1279. जब कोई शख़्स नमाज़ के सलाम के बाद एक काम अंजाम दे जो अगर नमाज़ के दौरान अमदन या सहवन किया जाए तो नमाज़ को बातिल कर देता हो मसलन पीठ क़िब्ले की तरफ़ करे और बाद में उसे याद आए कि वह दो आख़िरी सज्दे बजा नहीं लाया तो उसकी नमाज़ बातिल है और अगर नमाज़ को बातिल करने वाला कोई काम करने से पहले उसे यह बात याद आए तो ज़रूरी है कि जो दो सज्दे अदा करना भूल गया है उन्हें बजा लाए और दोबारा तशह्हुद और सलाम पढ़े और जो सलाम पहले पढ़ा हो उसके लिये एहतियाते वाजिब की बिना पर दो सज्दा ए सहव करे।
1280. अगर किसी शख़्स को पता चले कि उसने नमाज़ वक़्त से पहले पढ़ ली है तो ज़रूरी है कि दोबारा पढ़े और अगर वक़्त गुज़र गया हो तो क़ज़ा करे। और अगर यह पता चले कि क़िब्ले की तरफ़ पीठ कर के पढ़ी है और अभी वक़्त न गुज़रा हो तो ज़रूरी है कि दोबारा पढ़े और अगर वक़्त गुज़र चुका हो और तरद्दुद का शिकार हो तो क़ज़ा ज़रूरी है वर्ना क़ज़ा ज़रूरी नहीं। और अगर पता चले कि क़िब्ले की शुमाली या जुनूबी सम्त के दरमियान नमाज़ अदा की है और वक़्त गुज़रने के बाद पता चले तो क़ज़ा ज़रूरी नहीं लेकिन अगर वक़्त गुज़रने से पहले मुतवज्जह हो और क़िब्ले की सम्त तब्दील करने से मअज़ूर न हो मसलन क़िब्ले की सम्त तलाश करने में कोताही की हो तो एहतियात की बिना पर दोबारा नमाज़ पढ़ना ज़रूरी है।
मुसाफ़िर की नमाज़
ज़रूरी है कि मुसाफ़िर ज़ोहर, अस्र और इशा की नमाज़ आठ शर्ते होते हुए क़स्र बजा लाए यानी दो रक्अत पढ़े।
(पहली शर्त)
उसका सफ़र आठ फ़र्सख शरई से कम न हो और फ़र्सखे शरई साढ़े पांच किलोमीटर से क़द्रे कम होता है (मीलों के हिसाब से आठ फ़र्सखे शरई तक़रीबन 28 मील बनते हैं) ।
1281. जिस शख़्स के जाने और वापस आने की मजमूई मसाफ़त मिला कर आठ फ़र्सख़ हो और ख़्वाह उसके जाने की या वापसी की मसाफ़त चार फ़र्सख़ से कम हो या न हो ज़रूरी है कि नमाज़ क़स्र कर के पढ़े। इस बिना पर अगर जाने की मसाफ़त तीन फ़र्सख़ और वापसी की पांच फ़र्सख़ या उसके बर अक्स हो तो ज़रूरी है कि नमाज़ क़स्र कर के पढ़े। इस बिना पर अगर जाने की मसाफ़त तीन फ़र्सख़ और वापसी की पांच फ़र्सख़ या उसके बर अक्स हो तो ज़रूरी है कि नमाज़ क़स्र यानी दो रक्अती पढ़े।
1282. अगर सफ़र पर जाने और वापस आने की मसाफ़त आठ फ़र्सख़ हो तो अगरचे जिस दिन वह गया हो उसी दिन या उसी रात को वापिस पलट कर न आए ज़रूरी है कि नमाज़ क़स्र पढ़े लेकिन इस सूरत में बेहतर है कि एहतियातन पूरी नमाज़ भी पढ़े।
1283. अगर एक मुख़्तसर सफ़र आठ फ़र्सख़ से कम हो या इंसान को इल्म न हो कि उसका सफ़र आठ फ़र्सख़ है या नहीं तो उसे नमाज़ क़स्र कर के नहीं पढ़नी चाहिये और अगर शक करे कि उसका सफ़र आठ फ़र्सख़ है या नहीं तो उसके लिये तह्क़ीक़ करना ज़रूरी नहीं और ज़रूरी है कि पूरी नमाज़ पढ़े।
1284. अगर एक आदिल या क़ाबिले एतिमाद शख़्स किसी को बताए कि उसका सफ़र आठ फ़र्सख़ है और वह उसकी बात से मुत्मईन हो तो ज़रूरी है कि नमाज़ क़स्र कर के पढ़े।
1285. ऐसा शख़्स जिसे यक़ीन हो कि उसका सफ़र आठ फ़र्सख़ है अगर नमाज़ क़स्र करके पढ़े और बाद में उसे पता चले कि आठ फ़र्सख़ न था तो ज़रूरी है कि पूरी नमाज़ पढ़े और अगर वक़्त गुज़र गया हो तो उसकी क़ज़ा बजा लाए।
1286. जिस शख़्स को यक़ीन हो कि जिस जगह वह जाना चाहता है वहां सफ़र आठ फ़र्सख़ नहीं या शक हो कि आठ फ़र्सख़ है या नहीं और रास्ते में उसे मालूम हो जाए कि उसका सफ़र आठ फ़र्सख़ था तो गो थोड़ा सा सफ़र बाक़ी हो ज़रूरी है कि नमाज़ क़स्र कर के पढ़े और अगर पूरी नमाज़ पढ़ चुका हो तो ज़रूरी है कि दोबारा क़स्र पढ़े। लेकिन अगर वक़्त गुज़र गया हो तो क़ज़ा ज़रूरी नहीं है।
1287. अगर दो जगहों का दरमियानी फ़ासिला चार फ़र्सख़ से कम हो और कोई शख़्स कई दफ़्आ उनके दरमियान जाए और आए तो ख़्वाह उन तमाम मसाफ़तों का फ़ासिला मिलाकर आठ फ़र्सख़ भी हो जाए उसे नमाज़ पूरी पढ़नी ज़रूरी है।
1288. अगर किसी जगह जाने के दो रास्ते हों और उनमें से एक रास्ता आठ फ़र्सख़ से कम और दूसरा आठ फ़र्सख़ या उससे ज़्यादा हो तो अगर इंसान वहां उस रास्ते से जाए जो आठ फ़र्सख़ है तो ज़रूरी है कि नमाज़ क़स्र कर के पढ़े। और अगर उस रास्ते से जाए जो आठ फ़र्सख़ नहीं है तो ज़रूरी है कि पूरी नमाज़ पढ़े।
1289. आठ फ़र्सख़ की इब्तिदा उस जगह से हिसाब करना ज़रूरी है कि जहां से गुज़र जाने के बाद आदमी मुसाफ़िर शुमार होता है और ग़ालिबन वह जगह शहर की इन्तिहा होती है लेकिन बाज़ बहुत बड़े शहरों में मुम्किन है वह शहर का आख़िरी मोहल्ला हो।
(दूसरी शर्त)
मुसाफ़िर अपने सफ़र की इब्तिदा से ही आठ फ़र्सख़ तय करने का इरादा रखता हो यानी यह जानता हो कि आठ फ़र्सख़ तक का फ़ासिला तय करेगा लिहाज़ा अगर वह उस जगह तक का सफ़र करे जो आठ फ़र्सख़ से कम हो और वहां पहुंचने के बाद किसी ऐसी जगह जाने का इरादा करे जिसका फ़ासिला तय कर्दा फ़ासिले से मिलाकर आठ फ़र्सख़ हो जाता हो तो चूंकि वह शूरू से आठ फ़र्सख़ तय करने का इरादा नहीं रखता था इसलिये ज़रूरी है कि पूरी नमाज़ पढ़े लेकिन अगर वहां से आठ फ़र्सख़ आगे जाने का इरादा करे या मसलन चार फ़र्सख़ जाना चाहता हो और फिर चार फ़र्सख़ तय कर के अपने वतन या ऐसी जगह वापस जाना चाहता हो जहां उसका इरादा दस दिन ठहरने का हो तो ज़रूरी है कि नमाज़ क़स्र कर के पढ़े।
1290. जिस शख़्स को यह इल्म न हो कि उसका सफ़र कितने फ़र्सख़ का है मसलन किसी गुमशुदा (शख़्स या चीज़) को ढूंढने के लिये सफ़र कर रहा हो और न जानता हो कि उस पा लेने के लिये उसे कहां तक जाना पड़ेगा तो ज़रूरी है कि पूरी नमाज़ पढ़े। लेकिन अगर वापसी पर उसके वतन या उस जगह तक का फ़ासिला जहां वह दस दिन क़ियाम करना चाहता हो आठ फ़र्सख़ या उससे ज़्यादा बनता हो तो ज़रूरी है कि नमाज़ क़स्र कर के पढ़े मज़ीद बरआं अगर वह सफ़र पर जाने के दौरान इरादा करे कि वह मसलन चार फ़र्सख़ की मसाफ़त जाते हुए और चार फ़र्सख़ की मसाफ़त वहां आते हुए तय करेगा तो ज़रूरी है कि नमाज़ क़स्र करके पढ़े।
1291. मुसाफ़िर को नमाज़ क़स्र कर के उसे सूरत में पढ़नी ज़रूरी है जब उसका आठ फ़र्सख़ तय करने का पुख़्ता इरादा हो लिहाज़ा अगर कोई शख़्स शहर से बाहर जा रहा हो और मिसाल के तौर पर उसका इरादा यह हो कि अगर कोई साथी मिल गया तो आठ फ़र्सख़ के सफ़र पर चला जाऊंगा और उसे इत्मीनान हो कि साथी मिल जायेगा तो उसे नमाज़ क़स्र कर के पढ़नी ज़रूरी है और अगर उसे इस बारे में इत्मीनान हो तो ज़रूरी है कि पूरी नमाज़ पढ़े।
1292. जो शख़्स आठ फ़र्सख़ सफ़र तय करने का इरादा रखता हो वह अगरचे हर रोज़ थोड़ा फ़ासिला तय करे और जब हद्दे तरख्खुस जिसके मअनी मस्अला 1327 में आयेंगे – तक पहुंच जाए तो ज़रूरी है कि नमाज़ क़स्र कर के पढ़े लेकिन अगर हर रोज़ बहुत कम फ़ासिला तय करे तो एहतियाते लाज़िम यह है कि अपनी नमाज़ पूरी भी पढ़े और क़स्र भी करे।
1293. जो शख़्स सफ़र में किसी दूसरे के इख़्तियार में हो मसलन नौकर जो अपने आक़ा के साथ सफ़र कर रहा हो अगर उसे इल्म हो कि उसका सफ़र आठ फ़र्सख़ का है तो ज़रूरी है कि नमाज़ क़स्र कर के पढ़े और अगर उसे इल्म न हो तो पूरी नमाज़ पढ़े और इस बारे में पूछना ज़रूरी नहीं।
1294. जो शख़्स सफ़र में किसी दूसरे के इख़्तियार में हो अगर वह जानता हो या गुमान रखता हो कि चार फ़र्सख़ तक पहुंचने से पहले उससे जुदा हो जायेगा और सफ़र नहीं करेगा तो ज़रूरी है कि पूरी नमाज़ पढ़े।
1295. जो शख़्स सफ़र में किसी दूसरे के इख़्तियार में हो अगर उसे इत्मीनान न हो कि चार फ़र्सख़ तक पहुंचने से पहले उससे जुदा नहीं होगा और सफ़र जारी रखेगा तो ज़रूरी है कि पूरी नमाज़ पढ़े लेकिन अगर उसे इत्मीनान हो अगरचे एहतिमाल बहुत कम हो कि उसके सफ़र में कोई रुकावट पैदा होगी तो ज़रूरी है कि नमाज़ क़स्र कर के पढ़े।
(तीसरी शर्त)
रास्ते में मुसाफ़िर अपने इरादे से फिर न जाए। पस अगर वह चार फ़र्सख़ तक पहुंचने से पहले अपना इरादा बदल दे या उसका इरादा मुतज़ल्ज़ल हो जाए तो ज़रूरी है कि पूरी नमाज़ पढ़े।
1296. अगर कोई शख़्स कुछ फ़ासिला तय करने के बाद जो कि वापसी के सफ़र को मिलाकर आठ फ़र्सख़ हो सफ़र तर्क कर दे और पुख़्ता इरादा कर ले कि उसी जगह रहेगा या दस दिन गुज़रने के बाद वापस जायेगा या वापस जाने और ठहरने के बारे में कोई फ़ैसला न कर पाए तो ज़रूरी है कि पूरी नमाज़ पढ़े।
1297. अगर कोई शख़्स कुछ फ़ासिला तय करने के बाद जो कि वापसी के सफ़र को मिलाकर आठ फ़र्सख़ हो सफ़र तर्क कर दे और वापस जाने का पुख़्ता इरादा कर ले तो ज़रूरी है कि नमाज़ क़स्र कर के पढ़े अगरचे वह उस जगह दस दिन से कम मुद्दत के लिये ही रहना चाहता हो।
1298. अगर कोई शख़्स किसी ऐसी जगह जाने के लिये जो आठ फ़र्सख़ दूर हो सफ़र शुरू करे और कुछ रास्ता तय करने के बाद किसी और जगह जाना चाहे और जिस जगह से उसने सफ़र शूरू किया है वहां से उस जगह तक जहां वह अब जाना चाहता है आठ फ़र्सख़ बनते हों तो ज़रूरी है कि नमाज़ क़स्र कर के पढ़े।
1299. अगर कोई शख़्स आठ फ़र्सख़ तक फ़ासिला तय करने से पहले मुतरद्दिद हो जाए कि बाक़ी रास्ता तय करे या नहीं और दौराने तरद्दुद सफ़र न करे और बाद में बाक़ी रास्ता तय करने का पुख़्ता इरादा कर ले तो ज़रूरी है कि सफ़र के ख़ातिमे तक नमाज़ क़स्र पढ़े।
1300. अगर कोई शख़्स आठ फ़र्सख़ का फ़ासिला तय करने से पहले तरद्दुद का शिकार हो जाए कि बाक़ी रास्ता तय करे या नहीं और हालते तरद्दुद में कुछ फ़ासिला तय कर ले और बाद में पुख़्ता इरादा कर ले कि आठ फ़र्सख़ मज़ीद सफ़र करेगा या ऐसी जगह जाए कि जहां तक जाना और आना आठ फ़र्सख़ हो ख़्वाह उसी दिन या उसी रात वहां से वापस आए या न आए और वहां दस दिन से कम ठहरने का इरादा हो तो ज़रूरी है कि सफ़र के ख़ातिमे तक नमाज़ क़स्र पढ़े।
1301. अगर कोई शख़्स आठ फ़र्सख़ का फ़ासिला तय करने से पहले मुतरद्दिद हो जाए कि बाक़ी रास्ता तय करे या नहीं और हालते तरद्दुद में कुछ फ़ासिला तय कर ले और बाद में पुख़्ता इरादा कर ले कि बाक़ी रास्ता भी तय करेगा चुनांचे उसका बाक़ी सफ़र आठ फ़र्सख़ से कम हो तो पूरी नमाज पढ़ना ज़रूरी है। लेकिन उस सूरत में जबकि तरद्दुद से पहले की तय कर्दा मसाफ़त और तरद्दुद के बाद की तय कर्दा मसाफ़त मिलाकर आठ फ़र्सख़ हो तो अज़्हर यह है कि नमाज़ क़स्र पढ़े।
(चौथी शर्त)
मुसाफ़िर आठ फ़र्सख़ तक पहुंचने से पहले अपने वतन से गुज़रने और वहां तवक़्क़ुफ़ करने या किसी जगह दस दिन या उससे ज़्यादा दिन रहने का इरादा न रखता हो। पस जो शख़्स यह चाहता हो कि आठ फ़र्सख़ पहुंचने से पहले अपने वतन से गुज़रे और वहां तवक़्क़ुफ़ करे या दस दिन किसी जगह पर रहे तो ज़रूरी है कि नमाज़ पूरी पढ़े।
1302. जिस शख़्स को यह इल्म न हो कि आठ फ़र्सख़ तक पहुंचने से पहले अपने वतन से गुज़रेगा या तवक़्क़ुफ़ करेगा या नहीं या किसी जगह दस दिन ठहरने का क़स्द करेगा या नहीं तो ज़रूरी है कि पूरी नमाज़ पढ़े।
1303. वह शख़्स जो आठ फ़र्सख़ तक पहुंचने से पहले अपने वतन से गुज़रना चाहता हो ताकि वहां तवक़्क़ुफ़ करे या किसी जगह दस दिन रहना चाहता हो और वह शख़्स भी जो वतन से गुज़रने या किसी जगह दस दिन रहने के बारे में मुतरद्दिद हो अगर वह दस दिन कहीं रहने या वतन से गुज़रने का इरादा तर्क भी कर दे तब भी ज़रूरी है कि पूरी नमाज़ पढ़े लेकिन अगर बाक़ी मांदा और वापसी का रास्ता मिलाकर आठ फ़र्सख़ हो तो ज़रूरी है कि नमाज़ क़स्र करके पढ़े।
(पांचवीं शर्त)
मुसाफ़िर हराम काम के लिये सफ़र न करे और अगर हराम काम मसलन चोरी करने के लिये सफ़र करे तो ज़रूरी है कि नमाज़ पूरी पढ़े। और अगर ख़ुद सफ़र ही हराम हो जिसकी जानिब पेशक़दमी शरअन हराम हो या औरत शौहर की इजाज़त के बग़ैर ऐसे सफ़र पर जाए जो उस पर वाजिब न हो तो उसके लिये भी यही हुक्म है। लेकिन अगर सफ़रे हज के सफ़र की तरह वाजिब हो तो नमाज़ क़स्र कर के पढ़नी ज़रूरी है।
1304. जो सफ़र वाजिब न हो अगर मां बाप की औलाद से मौहब्बत की वजह से उनके लिये अज़ीयत का बाइस हो तो हराम है और ज़रूरी है कि इंसान इस सफ़र में पूरी नमाज़ पढ़े और (रमज़ान का महीना हो तो) रोज़ा भी रखे।
1305. जिस शख़्स का सफ़र हराम न हो और वह किसी हराम काम के लिये भी सफ़र न कर रहा हो वह अगरचे सफ़र में गुनाह भी करे मसलन ग़ीबत करे या शराब पिये तब भी ज़रूरी है कि नमाज़ क़स्र करके पढ़े।
1306. अगर कोई शख़्स किसी वाजिब काम को तर्क करने के लिये सफ़र करे तो ख़्वाह सफ़र में उसकी कोई दूसरी ग़रज़ हो या न हो उसे पूरी नमाज़ पढ़नी चाहिये। पस जो शख़्स मक़रूज़ हो और अपना क़र्ज़ चुका सकता हो और क़र्ज़ ख़्वाह मुतालबा भी करे तो अगर वह सफ़र करते हुए अपना क़र्ज़ अदा न कर सके और क़र्ज़ चुकाने से फ़रार हासिल करने के लिये सफ़र करे तो ज़रूरी है कि पूरी नमाज़ पढ़े। लेकिन अगर उसका सफ़र किसी और काम के लिये हो तो अगरचे वह सफ़र में तर्के वाजिब का मुर्तकिब भी हो तो ज़रूरी है कि नमाज़ क़स्र कर के पढ़े।
1307. अगर किसी शख़्स का, सफ़र में सवारी का जानवर का, या सवारी की कोई और चीज़ जिस पर वह सवार हो ग़स्बी हो या अपने मालिक से फ़रार होने के लिये सफ़र कर रहा हो या वह ग़स्बी ज़मीन पर सफ़र कर रहा हो तो ज़रूरी है कि पूरी नमाज़ पढ़े।
1308. जो शख़्स किसी ज़ालिम के साथ सफ़र कर रहा हो अगर वह मजबूर न हो और उसका सफ़र करना ज़ालिम के ज़ुल्म करने मे मदद का मूजिब हो तो उसे पूरी नमाज़ पढ़नी ज़रूरी है और अगर मजबूर हो या मिसाल के तौर पर किसी मज़लूम को छुड़ाने के लिये उस ज़ालिम के साथ सफ़र करे तो उसकी नमाज़ क़स्र होगी।
1309. अगर कोई शख़्स सैर व तफ़रीह (यानी पिकनिक) की ग़रज़ से सफ़र करे तो उसका सफ़र हराम नहीं है और ज़रूरी है कि नमाज़ क़स्र कर के पढ़े।
1310. अगर कोई शख़्स मौज मेले और सैर व तफ़रीह कि लिये शिकार को जाए तो उसकी नमाज़ जाते वक़्त पूरी है और वापसी पर अगर मसाफ़त की हद पूरी हो तो क़स्र है उस सूरत में कि उसकी हदे मसाफ़त पूरी हो और शिकार पर जाने की मानिन्द न हो लिहाज़ा अगर हुसूले मआश के लिये शिकार को जाए तो उसकी नमाज़ क़स्र है। और अगर कमाई और अफ़्ज़ाइशे दौलत के लिये जाए तो उसकी लिये भी यही हुक्म है अगरचे उस सूरत में एहतियात यह है कि नमाज़ क़स्र करके भी पढ़े और पूरी भी पढ़े।
1311. अगर कोई शख़्स गुनाह का काम करने के लिये सफ़र करे और सफ़र से वापसी के वक़्त फ़क़त उसकी वापसी का सफ़र आठ फ़र्सख़ हो तो ज़रूरी है कि नमाज़ क़स्र करके पढ़े और एहतियाते मुस्तहब यह है कि अगर उसने तौबा न कि हो तो नमाज़ क़स्र कर के भी पढ़े और पूरी भी पढ़े।
1312. जिस शख़्स का सफ़र गुनाह का सफ़र हो अगर वह सफ़र के दौरान गुनाह का इरादा तर्क कर दे ख़्वाह बाक़ी मांदा मसाफ़त या किसी जगह जाना और वापस आना आठ फ़र्सख़ हो या न हो तो ज़रूरी है कि नमाज़ क़स्र करके पढ़े।
1313. जिस शख़्स ने गुनाह करने की ग़रज़ से गुनाह न किया हो अगर वह रास्ते में तय करे कि बक़ीया रास्ता गुनाह के लिये तय करेगा तो उसे चाहिये की नमाज़ पूरी पढ़े अलबत्ता उसने जो नमाज़े क़स्र कर के पढ़ी हो वह सहीह हैं।
(छठी शर्त)
उन लोगों में से न हो जिनके क़ियाम की कोई (मुस्तक़िल) जगह नहीं होती और उनके घर उनके साथ होते हैं। यानी उन सहरा नशीनों (खानाबदोशों) की मानिन्द जो बियाबानों में घूमते रहते हैं और जहां कहीं अपने लिये और अपने मवेशियों के लिये दाना पानी देखते हैं वहीं डेरा डाल देते हैं और फिर कुछ दिनों के बाद दूसरी जगह चले जाते हैं। पस ज़रूरी है कि ऐसे लोग सफ़र में पूरी नमाज़ पढ़ें।
1314. अगर कोई सहरा नशीन मसलन जाए क़ियाम और अपने हैवानात के लिये चरागाह तलाश करने के लिये सफ़र करे और माल व असबाब उसके हमराह हो तो वह पूरी नमाज़ पढ़े वर्ना अगर उसका सफ़र आठ फ़र्सख़ हो तो नमाज़ क़स्र कर के पढ़े।
1315. अगर कोई सहरा नशीन हज, ज़ियारत, तिजारत या इनसे मिलते जुलते किसी मक़्सद से सफ़र करे तो ज़रूरी है कि नमाज़ क़स्र कर के पढ़े।
(सातवीं शर्त)
उस शख़्स का पेशा सफ़र न हो। पस जिस शख़्स का पेशा सफ़र हो यानी या तो उसका काम ही फ़क़त सफ़र करना हो इस हद तक कि लोग उसे कसीरुस्सफ़र कहें या उसने जो पेशा अपने लिये इख़्तियार किया हो उसका इनहिसार सफ़र करने पर हो मसलन सारबान, ड्राइवर, गल्लाबान और मल्लाह। इस क़िस्म के अफ़राद अगरचे अपने ज़ाती मक़्सद मसलन घर का सामान ले जाने या अपने घर वालों को मुन्तक़िल करने के लिये सफ़र करें तो ज़रूरी है कि नमाज़ पूरी पढ़ें और जिस शख़्स का पेशा सफ़र हो इस मस्अले में उस शख़्स के लिये भी यही हुक्म है जो किसी दूसरी जगह पर काम करता हो (या उसकी पोस्टिंग दूसरी जगह पर हो) और वह हर रोज़ या दो दिन में एक मर्तबा वहां तक का सफ़र करता हो और लौट आता हो। मसलन वह शख़्स जिसकी रहाइश एक जगह हो और काम मसलन तिजारत, मुअल्लिमी वग़ैरा दूसरी जगह हो।
1316. जिस शख़्स के पेशे का तअल्लुक़ सफ़र से हो अगर वह किसी दूसरे मक़्सद मसलन हज या ज़ियारत के लिये सफ़र करे तो ज़रूरी है कि नमाज़ क़स्र कर के पढ़े लेकिन अगर उर्फ़े आम में कसीरुस्सफ़र कहलाता हो तो क़स्र न करे। लेकिन अगर मिसाल के तौर पर ड्राइवर अपनी गाड़ी ज़ियारत के लिये किराए पर चलाए और ज़िम्नन ख़ुद भी ज़्यारत करे तो हर हाल में ज़रूरी है कि पूरी नमाज़ पढ़े।
1317. वह बार बरदार जो हाजियों को मक्का पहुंचाने के लिये सफ़र करता हो अगर उसका पेशा सफ़र करना हो तो जरूरी है कि पूरी नमाज़ पढ़े और अगर उसका पेशा सफ़र करना न हो और सिर्फ़ हज के दिनों में बार बरदारी के लिये सफ़र करता हो तो उसके लिये एहतियाते वाजिब यह है कि नमाज़ पूरी भी पढ़े और क़स्र करके भी पढ़े। लेकिन अगर सफ़र की मुद्दत कम हो मसलन दो - तीन हफ़्ते तो बईद नहीं है कि उसके लिये नमाज़ क़स्र करके पढ़ने का हुक्म हो।
1318. जिस शख़्स का पेशा बार बरदारी हो और वह दूर दराज़ मक़ामात से हाजियों को मक्का ले जाता हो अगर वह साल का काफ़ी हिस्सा सफ़र में रहता हो तो उसे पूरी नमाज़ पढ़नी ज़रूरी है।
1319. जिस शख़्स का पेशा साल के कुछ हिस्सें में सफ़र करना हो मसलन एक ड्राइवर जो सिर्फ़ गर्मियों या सर्दियों के दिनों में अपनी गाड़ी किराए पर चलाता हो ज़रूरी है कि उस सफ़र में नमाज़ पूरी पढ़े और एहतियाते मुस्तहब यह है कि क़स्र करके भी पढ़े और पूरी भी पढ़े।
1320. ड्राइवर और फेरी वाला जो शहर के आसपास दो तीन फ़र्सख़ में आता जाता हो अगर वह इत्तिफ़ाक़न आठ फर्सख़ के सफ़र पर चला जाए तो ज़रूरी है कि नमाज़ क़स्र कर के पढ़े।
1321. जिसका पेशा मुसाफ़िरत है अगर दस दिन या उससे ज़्यादा अर्सा अपने वतन में रह जाए तो ख़्वाह वह इब्तिदा से दस दिन रहने का इरादा रखता हो या बग़ैर इरादे के इतने दिन रहे तो ज़रूरी है कि दस दिन के बाद जब पहले सफ़र पर जाए तो नमाज़ पूरी पढ़े और अगर अपने वतन के अलावा किसी दूसरी जगह रहने का क़स्द करके या बग़ैर क़स्द के दस दिन वहां मुक़ीम रहे तो उसके लिये भी यही हुक्म है।
1322. चारवादार (वह सौदागर जो चौपाये पर सौदा लाद कर बेचता है) जिसका पेशा सफ़र करना हो अगर वह अपने वतन या वतन के अलावा किसी और जगह क़स्द कर के या बग़ैर क़स्द के दस दिन रहे तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि दस दिन के बाद जब वह पहला सफ़र करे तो नमाज़े मुकम्मल और क़स्र दोनों पढ़े।
1323. चारवादार और सारबान की तरह जिनका पेशा सफ़र करना है अगर मअमूल से ज़्यादा सफ़र उनकी मशक़्क़त और थकावट का सबब हो तो ज़रूरी है कि नमाज़ क़स्र करे।
1324. सैलानी की जो शहर ब शहर सियाहत करता हो और जिसने अपने लिये कोई वतन मुअय्यन न किया हो वह पूरी नमाज़ पढ़े।
1325. जिस शख़्स का पेशा सफ़र करना न हो अगर मसलन किसी शहर या गांव में उसका कोई सामान हो और वह उसे लेने के लिये सफ़र पर सफ़र करे तो ज़रूरी है कि नमाज़ क़स्र कर के पढ़े। मगर यह कि उसका सफ़र इस क़दर ज़्यादा हो कि उसे उर्फ़न कसीरुस्सफ़र कहा जाए।
1326. जो शख़्स तर्के वतन कर के दूसरा वतन अपनाना चाहता हो अगर उसका पेशा सफ़र न हो तो सफ़र की हालत में उसे नमाज़ क़स्र कर के पढ़नी ज़रूरी है।
(आठवीं शर्त)
मुसाफ़िर हद्दे तरख़्खुस तक पहुंच जाए लेकिन वतन के अलावा हद्दे तरख़्ख़ुस मोअतबर नहीं है और जूं ही कोई शख़्स अपनी इक़ामतगाह से निकले उसकी नमाज़ क़स्र है।
1327. हद्दे तरख़्ख़ुस वह जगह है जहां से अहले शहर मुसाफ़िर को न देख सकें और उसकी अलामत यह है कि वह अहले शहर को न देख सके।
1328. जो मुसाफ़िर अपने वतन वापस आ रहा हो जब तक वह अपने वतन वापस न पहुंचे क़स्र नमाज़ पढ़ना ज़रूरी है और ऐसे ही जो मुसाफ़िर वतन के अलावा किसी और जगह दस दिन ठहरना चाहते हों वह जब तक उस जगह न पहुंचे उसकी नमाज़ क़स्र है।
1329. अगर शहर इतनी बलन्दी पर वाक़े हो कि वहां के बाशिन्दे दूर से दिखाई दें या इस क़दर नशेब में वाक़े हो कि अगर इंसान थोड़ा सा दूर भी जाए तो वहां के बाशिन्दों को न देख सके तो उसके शहर के रहने वालों में से जो शख़्स सफ़र में हो जब वह इतना दूर चला जाए कि अगर वह शहर हमवार ज़मीन पर होता तो वहां के बाशिन्दे उस जगह से देखे न जा सकते तो ज़रूरी है कि नमाज़ क़स्र कर के पढ़े और इसी तरह अगर रास्ते की बलन्दी या पस्ती मअमूल से ज़्यादा हो तो ज़रूरी है कि मअमूल का लिहाज़ रखे।
1330. अगर कोई शख़्स ऐसी जगह से सफ़र करे जहां कोई रहता न हो तो जब वह ऐसी जगह पहुंचे कि अगर कोई उस मक़ाम (यानी सफ़र शूरू करने के मक़ाम) पर रहता हो तो वहां से नज़र न आता तो ज़रूरी है कि नमाज़ क़स्र कर के पढ़े।
1331. कोई शख़्स कश्ती या रेल में बैठे और हद्दे तरख़्ख़ुस तक पहुंचने से पहले पूरी नमाज़ की नीयत से नमाज़ पढ़ने लगे तो अगर तीसरी रक्अत के रूकू से पहले हद्दे तरख़्ख़ुस तक पहुंच जाए तो क़स्र नमाज़ पढ़ना ज़रूरी है।
1332. जो सूरत पीछले मसअले में गुज़र चुकी है उसके मुताबिक़ अगर तीसरी रक्अत के रूकू के बाद हद्दे तरख़्खुस तक पहुंचे चो उस नमाज़ को तोड़ सकता है और ज़रूरी है कि उसे क़स्र कर के पढ़े।
1333. अगर किसी शख़्स को यक़ीन हो जाए कि वह हद्दे तरख़्ख़ुस तक पहुंच चुका है और नमाज़ क़स्र कर के पढ़े और उसके बाद मालूम हो कि नमाज़ के वक़्त हद्दे तरख़्ख़ुस तक नहीं पहुंचा था तो नमाज़ दोबारा पढ़ना ज़रूरी है। चुनांचे जब तक हद्दे तरख़्ख़ुस तक न पहुंचा हो तो नमाज़ पूरी पढ़ना ज़रूरी है। और उस सूरत में जबकि हद्दे तरख़्ख़ुस से गुज़र चुका हो नमाज़ क़स्र कर के पढ़े। और अगर वक़्त निकल चुका हो तो नमाज़ को उसके फ़ौत होते वक़्त जो हुक्म था उसके मुताबिक़ अदा करे।
1334. अगर मुसाफ़िर की क़ुव्वते बासिरा ग़ैर मअमूली हो तो उसे उस मक़ाम पर पहुंच कर नमाज़ क़स्र कर के पढ़नी ज़रूरी है जहां से मुतवस्सित क़ुव्वत की आंख अहले शहर को न देख सके।
1335. अगर मुसाफ़िर को सफ़र के दौरान किसी मक़ाम पर शक हो कि हद्दे तरख़्ख़ुस तक पहुंचा है या नहीं तो ज़रूरी है कि पूरी नमाज़ पढ़े।
1336. जो मुसाफ़िर सफ़र के दौरान अपने वतन से गुज़र रहा हो अगर वहां तवक़्क़ुफ़ करे तो ज़रूरी है कि वहां क़स्र और पूरी नमाज़ दोनों पढ़े।
1337. जो मुसाफ़िर अपनी मुसाफ़िरत के दौरान अपने वतन पहुंच जाए और वहां कुछ देर ठहरे तो ज़रूरी है कि जब तक वहां रहे पूरी नमाज़ पढ़े लेकिन अगर वह चाहे कि वहां से आठ फ़र्सख़ के फ़ासिले पर चला जाए या मसलन चार फ़र्सख़ जाए और फ़िर चार फ़र्सख़ तय कर के लौटे तो जिस वक़्त वह हद्दे तरख़्ख़ुस पर पहुंचे ज़रूरी है कि नमाज़ क़स्र कर के पढ़े।
1338. जिस जगह को इंसान ने अपनी मुस्तक़िल सुकूनत और बूदोबाश के लिये मुन्तख़ब किया हो वह उसका वतन है ख़्वाह वह वहां पैदा हुआ हो और वह उसका आबाई वतन हो या उसने ख़ुद उस जगह को ज़िन्दगी बसर करने के लिये इख़्तियार किया हो।
1339. अगर कोई शख़्स इरादा रखता हो कि थोड़ी सी मुद्दत एक ऐसी जगह रहे जो उसका वतन नहीं है और बाद में किसी और जगह चला जाए तो वह उसका वतन तसव्वुर नहीं होता।
1340. अगर किसी जगह को ज़िन्दगी गुज़ारने के लिये इख़्तियार करे अगरचे वह हमेशा रहने का क़स्द न रखता हो ताहम ऐसा हो कि उर्फ़े आम में उसे वहां मुसाफ़िर न कहे और अगरचे वक़्ती तौर पर दस दिन या दस दिन से ज़्यादा दूसरी जगह रहे इसके बावजूद पहली जगह ही को उसकी ज़िन्दगी ग़ुजारने की जगह कहेंगे और वही जगह उसके वतन का हुक्म रखती है।
1341. जो शख़्स दो मक़ामात पर ज़िन्दगी गुज़ारता हो मसलन छः महीने एक शहर में और छः महीने दूसरे शहर में रहता हो तो दोनों मक़ामात उसका वतन हैं। नीज़ अगर उसने दो मक़ामात से ज़्यादा मक़ामात को ज़िन्दगी बसर करने के लिये इख़्तियार कर रखा हो तो वह सब उसका वतन शुमार होते हैं।
1342. बाज़ फ़ुक़्हा ने कहा है कि जो शख़्स किसी एक जगह सुकूनती मकान का मालिक हो अगर वह मुसलसल छः महीने वहां रहे तो जिस वक़्त तक मकान उसकी मिल्कियत में है यह जगह उसके वतन का हुक्म रकती है। पस जब भी वह सफ़र के दौरान वहां पहुंचे ज़रूरी है कि पूरी नमाज़ पढ़े अगरचे यह हुक्म साबित नहीं है।
1343. अगर एक शख़्स किसी ऐसे मक़ाम पर पहुंचे जो किसी ज़माने में उसका वतन रहा हो और बाद में उसने उसे तर्क कर दिया हो तो ख़्वाह उसने कोई नया वतन अपने लिये मुन्तख़ब न भी किया हो ज़रूरी है कि वहां पूरी नमाज़ पढ़े।
1344. अगर किसी मुसाफ़िर का किसी जगह पर मुसलसल दस दिन रहने का इरादा हो या वह जानता हो कि ब अमरे मजबूरी दस दिन तक एक जगह रहना पड़ेगा तो वहां उसे पूरी नमाज़ पढ़नी ज़रूरी है।
1345. अगर कोई मुसाफ़िर किसी जगह दस दिन रहना चाहता हो तो ज़रूरी नहीं कि उसका इरादा पहली रात या ग्यारहवीं रात वहां रहने का हो जूंही वह इरादा करे कि पहले दिन के तुलूए आफ़ताब से दसवें दिन के ग़ुरूबे आफ़ताब तक वहां रहेगा, ज़रूरी है कि पूरी नमाज़ पढ़े और मिसाल के तौर पर उसका इरादा पहले दिन ज़ोहर से ग्यारहवें दिन की ज़ोहर तक वहां रहने का हो तो उसके लिये भी यही हुक्म है।
1346. जो मुसाफ़िर किसी जगह दस दिन रहना चाहता हो उसे उस सूरत में पूरी नमाज़ पढ़नी ज़रूरी है जब वह सारे के सारे दिन एक जगह रहना चाहता हो। पस अगर वह मिसाल के तौर पर चाहे के दस दिन नजफ़ और कूफ़ा या तेहरान और शमेरान (या कराची और घारू) में रहे तो ज़रूरी है कि नमाज़ क़स्र कर के पढ़े।
1347. जो मुसाफ़िर किसी जगह दस दिन रहना चाहता हो अगर वह शूरू से ही क़स्द रखता हो कि उन दस दिनों के दरमियान उस जगह के आसपास ऐसे मक़ामात पर जायेगा जो हद्दे तरख़्ख़ुस तक या उससे ज़्यादा दूर हों तो अगर उसके जाने और आने की मुद्दत उर्फ़ में दस दिन क़ियाम के मनाफ़ी न हो तो पूरी नमाज़ पढ़े और अगर मनाफ़ी हो तो नमाज़ क़स्र कर के पढ़े। मसलन अगर इब्तिदा ही से इरादा हो कि एक दिन या एक रात के लिये वहां से निकलेगा तो यह ठहरने के क़स्द के मनाफ़ी है और ज़रूरी है कि नमाज़ क़स्र कर के पढ़े। लेकिन अगर उसका क़स्द यह हो कि मसलन आधे दिन बाद निकलेगा और फिर लौटेगा अगरचे उसकी वापसी रात होने के बाद हो तो ज़रूरी है कि नमाज़ पूरी पढ़े। मगर उस सूरत में कि उसके बार बार निकलने की वजह से उर्फ़न यह कहा जाए कि दो या उससे ज़्यादा जगह क़ियाम पज़ीन है (तो नमाज़ क़स्र पढ़े)।
1348. अगर किसी मुसाफ़िर का किसी जगह दस दिन रहने का मुसम्मम इरादा न हो मसलन उसका इरादा यह हो कि अगर उसका साथी आ गया या रहने को अच्छा मकान मिल गया तो दस दिन वहां रहेगा तो ज़रूरी है कि नमाज़ क़स्र कर के पढ़े।
1349. जब कोई शख़्स किसी जगह दस दिन रहने का मुसम्मम इरादा रखता हो अगर उसे इस बात का एहतिमाल हो कि उसके वहां रहने में कोई रुकावट पैदा होगी और उसका यह एहतिमाल उक़ला के नज़दीक मअक़ूल हो तो ज़रूरी है कि नमाज़ क़स्र कर के पढ़े।
1350. अगर मुसाफ़िर को इल्म हो कि महीना ख़त्म होने में मसलन दस या दस दिन से ज़्यादा दिन बाक़ी है और किसी जगह महीने के आख़िर तक रहने का इरादा करे तो ज़रूरी है कि नमाज़ पूरी पढ़े लेकिन अगर उसे इल्म न हो कि महीना ख़त्म होने में कितने दिन बाक़ी हैं और महीने के आख़िर तक वहां रहने का इरादा करे तो ज़रूरी है कि नमाज़ क़स्र कर के पढ़े अगरचे जिस वक़्त उसने इरादा किया था उस वक़्त से महीने के आख़िरी दिन तक दस या उस से ज़्यादा दिन बनते हों।
1351. अगर मुसाफ़िर किसी जगह दस दिन रहने का इरादा करे और एक चार रक्अती नमाज़ पढ़ने से पहले वहां रहने का इरादा तर्क कर दे या मुज़बज़ब हो कि वहां रहे या कहीं और चला जाए तो ज़रूरी है कि नमाज़ क़स्र कर के पढ़े लेकिन अगर चार रक्अती नमाज़ पढ़ने के बाद वहां रहने का इरादा तर्क कर दे या मुज़बज़ब हो जाए तो ज़रूरी है कि जिस वक़्त तक वहां रहे नमाज़ पूरी पढ़े।
1352. अगर कोई मुसाफ़िर जिसने एक जगह दस दिन रहने का इरादा किया हो रोज़ा रख ले और ज़ोहर के बाद वहां रहने का इरादा तर्क कर दे जबकि उसने एक चार रक्अती नमाज़ पढ़ ली हो तो जब तक वहां रहे उसके रोज़े दुरुस्त हैं और ज़रूरी है कि अपनी नमाज़ें पूरी पढ़े और अगर उसने चार रक्अती नमाज़ न पढ़ी हो तो एहतियातन उस दिन का रोज़ा पूरा करना नीज़ उसकी क़ज़ा रखना ज़रूरी है। और ज़रूरी है कि अपनी नमाज़ें क़स्र कर के पढ़े और बाद के दिनों में वह रोज़ा भी नहीं रख सकता।
1353. अगर कोई मुसाफ़िर जिसने एक जगह दस दिन रहने का इरादा किया हो वहां रहने का इरादा तर्क कर दे और शक करे कि वहां रहने का इरादा तर्क करने से पहले एक चार रक्अती नमाज़ पढ़ी थी या नहीं तो ज़रूरी है कि अपनी नमाज़ें क़स्र कर के पढ़े।
1354. अगर कोई मुसाफ़िर नमाज़ को क़स्र करके पढ़ने की नीयत से नमाज़ में मश्ग़ूल हो जाए और नमाज़ के दौरान मुसम्मम इरादा कर ले कि दस या उससे ज़्यादा दिन वहां रहेगा तो ज़रूरी है कि नमाज़ को चार रक्अती पढ़ कर ख़त्म करे।
1355. अगर कोई मुसाफ़िर जिसने एक जगह दस दिन रहने का इरादा किया हो पहली चार रक्अती नमाज़ के दौरान अपने इरादे से बाज़ आ जाए और अभी तीसरी रक्अत में मशग़ूल न हुआ हो तो ज़रूरी है कि दो रक्अती पढ़ कर ख़त्म करे और अपनी बाक़ी नमाज़ें, क़स्र करके पढ़े और इसी तरह अगर तीसरी रक्अत में मशग़ूल हो गया हो और रूकू में न गया हो तो ज़रूरी है कि बैठ जाए और नमाज़ को बसूरते क़स्र ख़त्म करे और अगर रूकू में चला गया हो तो अपनी नमाज़ तोड़ सकता है और ज़रूरी है कि उस नमाज़ को दोबारा क़स्र कर के पढ़े और जब तक वहां रहे नमाज़ क़स्र कर के पढ़े।
1356. जिस मुसाफ़िर ने दस दिन किसी जगह रहने का इरादा किया हो अगर वहां दस दिन से ज़्यादा रहे तो जब तक वहां से सफ़र न करे ज़रूरी है कि नमाज़ पूरी पढ़े और यह ज़रूरी नहीं कि दोबारा दस दिन रहने का इरादा करे।
1357. जिस मुसाफ़िर ने किसी जगह दस दिन रहने का इरादा किया हो ज़रूरी है कि वाजिब रोज़े रखे और मुस्तहब रोज़ा भी रख सकता है और ज़ोहर, अस्र और इशा की नफ़्लें भी पढ़ सकता है। 1358. अगर एक मुसाफ़िर जिसने किसी जगह दस दिन रहने का इरादा किया हो एक चार रक्अती नमाज़ पढ़ने के बाद या वहां दस दिन रहने के बाद अगरचे उसने एक भी पूरी नमाज़ न पढ़ी हो यह चाहे कि एक ऐसी जगह जाए जो चार फ़र्सख़ से कम फ़ासिले पर हो और फिर लौट आए और अपनी पहली जगह पर दस दिन या उससे कम मुद्दत के लिये जाए तो ज़रूरी है कि जाने के वक़्त से वापसी तक और वापसी के बाद अपनी नमाज़े पूरी पढ़े। लेकिन अगर उसका अपनी इक़ामत के मक़ाम पर वापस आना फ़क़त इस वजह से हो कि वह उसके सफ़र के रास्ते में वाक़े हो और उसका सफ़र शरई मसाफ़त (यानी आठ फ़र्सख़) का हो तो उसके लिये ज़रूरी है कि जाने और आने के दौरान और ठहरने की जगह में नमाज़ क़स्र करके पढ़े। 1359. अगर कोई मुसाफ़िर जिसने किसी जगह दस दिन रहने का इरादा किया हो एक चार रक्अती नमाज़ पढ़ने के बाद चाहे कि किसी और जगह चला जाए जिसका फ़ासिला आठ फ़र्सख़ से कम हो और दस दिन वहां रहे तो ज़रूरी है कि रवानगी के वक़्त और उस जगह जहां पर वह दस दिन रहने का इरादा रखता हो अपनी नमाज़ें पूरी पढ़े लेकिन अगर वह जगह जहां पर वह जाना चाहता हो आठ फ़र्सख़ या उससे ज़्यादा दूर हो तो ज़रूरी है कि रवानगी के वक़्त अपनी नमाज़े क़स्र कर के पढ़े और अगर वहां दस दिन न रहना चाहता हो तो ज़रूरी है कि जितने दिन वहां रहे उन दिनों की नमाज़े भी क़स्र कर के पढ़े।
1360. अगर कोई मुसाफ़िर जिसने किसी जगह दस दिन रहने का इरादा किया हो एक चार रक्अती नमाज़ पढ़ने के बाद किसी ऐसी जगह जाना चाहे जिसका फ़ासिला चार फ़र्सख़ से कम हो और मुज़ब्ज़ब् हो कि अपनी पहली जगह पर वापस आए या नहीं या उस जगह वापस आने से बिल्कुल ग़ाफ़िल हो या यह चाहे कि वापस हो जाए लेकिन मुज़ब्ज़ब् हो कि दस दिन उस जगह ठहरे या नहीं या वहां दस दिन रहने या वहां से सफ़र करने से ग़ाफ़िल हो जाए तो ज़रूरी है कि जाने के वक़्त से वापसी तक और वापसी के बाद अपनी नमाज़ें पूरी पढ़े।
1361. अगर कोई मुसाफ़िर इस ख़्याल से कि उसके साथी किसी जगह दस दिन रहना चाहते हैं उस जगह दस दिन रहने का इरादा करे और एक चार रक्अती नमाज़ पढ़ने के बाद उसे पता चले कि उसके साथियों ने ऐसा कोई इरादा नहीं किया था तो अगरचे वह ख़ुद भी वहां रहने का ख़्याल तर्क कर दे ज़रूरी है कि जब तक वहां रहे नमाज़ पूरी पढ़े।
1362. अगर कोई मुसाफ़िर इत्तिफ़ाक़न किसी जगह तीस दिन रह जाए मसलन तीस के तीस दिनों में वहां से चले जाने या वहां रहने के बारे में मुज़बज़ब रहा हो तो तीस दिन गुज़रने के बाद अगरचे वह थोड़ी मुद्दत ही वहां रहे ज़रूरी है कि नमाज़ पूरी पढ़े।
1363. जो मुसाफ़िर नौ दिन या उससे कम मुद्दत के लिये एक जगह रहना चाहता हो अगर वह उस जगह नौ दिन या उससे कम मुद्दत गुज़ारने के बाद नौ दिन या उससे कम मुद्दत के लिये दोबारा वहां रहने का इरादा करे और इसी तरह तीस दिन गुज़र जायें तो ज़रूरी है कि एक्तीसवें दिन पूरी नमाज़ पढ़े।
1364. तीस दिन गुज़रने के बाद मुसाफ़िर को उस सूरत में नमाज़ पूरी पढ़नी ज़रूरी है जब वह तीस दिन एक ही जगह रहा हो पस अगर उसने उस मुद्दत का कुछ हिस्सा एक जगह और कुछ हिस्सा दूसरी जगह गुज़ारा हो तीस दिन के बाद भी उसे नमाज़ क़स्र कर के पढ़नी ज़रूरी है।
मुतफ़र्रिक़ मसाइल
1365. मुसाफ़िर मस्जिदुल हराम, मस्जिदे नबवी और मस्जिदे कूफ़ा में बल्कि मक्का ए मुकर्रिमा, मदीना ए मुनव्वरा और कूफ़े के पूरे शहरों में अपनी नमाज़ पूरी पढ़ सकता है नीज़ हज़रते सैयिदुश्शुहदा (अ0) के हरम में भी क़ब्रे मुतह्हर से पच्चीस गज़ के फ़ासिले तक मुसाफ़िर अपनी पूरी नमाज़ पढ़ सकता है।
1366. अगर कोई ऐसा शख़्स जिसे मालूम हो कि वह मुसाफ़िर है और उसे नमाज़ क़स्र कर के पढ़नी ज़रूरी है। उन चार जगहों के अलावा जिनका ज़िक्र साबिक़ा मस्अले में किया गया है किसी और जगह जान बूझकर पूरी नमाज़ पढ़े तो उसकी नमाज़ बातिल है और अगर भूल जाए कि मुसाफ़िर को नमाज़ क़स्र कर के पढ़नी चाहिये और पूरी नमाज़ पढ़ ले तो उसके लिये भी यही हुक्म है लेकिन भूल जाने की सूरत में अगर उसे नमाज़ के वक़्त के बाद यह बात याद आए तो उस नमाज़ का क़ज़ा करना ज़रूरी नहीं।
1367. जो शख़्स जानता हो कि वह मुसाफ़िर है और उसे नमाज़ क़स्र कर के पढ़नी ज़रूरी है अगर वह पूरी नमाज़ पढ़े और अभी नमाज का वक्त बाकी हो तो उसे नमाज दुबारा पढ़नी होगी औप अगर नमाज का वक्त खत्म हो चुका है तो अहतियात की बिना पर उसे उस नमाज की कज़ा करनी पढ़ेगी।
1368. जो मुसाफ़िर यह न जानता हो कि उसे नमाज़ क़स्र कर के पढ़नी ज़रूरी है अगर वह पूरी नमाज़ पढ़े तो उसकी नमाज़ सहीह है।
1369. जो मुसाफ़िर जानता हो कि उसे नमाज़ क़स्र कर के पढ़नी चाहिये अगर वह क़स्र नमाज़ के वअज़ ख़ुसूसीयात से नावाक़िफ़ हो मसलन यह न जानता हो कि आठ फ़र्सख़ के सफ़र में नमाज़ क़स्र कर के पढ़नी ज़रूरी है तो अगर वह पूरी नमाज़ पढ़ ले और नमाज़ के वक़्त में इस मस्अले का पता चल जाए तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर ज़रूरी है कि दोबारा नमाज़ पढ़े और अगर दोबारा न पढ़े तो उसकी क़ज़ा करे लेकिन अगर नमाज़ का वक़्त गुज़रने के बाद उसे (हुक्मे मस्अला) मालूम हो तो उस नमाज़ की क़ज़ा नहीं है।
1370. अगर एक मुसाफ़िर जानता हो कि उसे नमाज़ क़स्र कर के पढ़नी चाहिये और वह इस गुमान में पूरी नमाज़ पढ़ ले कि उसका सफ़र आठ फ़र्सख़ से कम है तो जब उसे पता चले कि उसका सफ़र आठ फ़र्सख़ का था तो ज़रूरी है कि जो नमाज़ पूरी पढ़ी हो उसे दोबारा क़स्र कर के पढ़े और अगर उसे इस बात का पता नमाज़ का वक़्त गुज़र जाने के बाद चले तो क़ज़ा ज़रूरी नहीं।
1371. अगर कोई शख़्स भूल जाए कि वह मुसाफ़िर है और पूरी नमाज़ पढ़ ले और उसे नमाज़ के वक़्त के अन्दर ही याद आ जाए तो उसे चाहिये कि क़स्र कर के पढ़े और अगर नमाज़ के वक़्त के बाद याद आए तो उस नमाज़ की क़ज़ा उस पर वाजिब नहीं।
1372. जिस शख़्स को पूरी नमाज़ पढ़नी ज़रूरी है अगर वह उसे क़स्र कर के पढ़े तो उसकी नमाज़ हर सूरत में बातिल है अगरचे एहतियात की बिना पर ऐसा मुसाफ़िर हो जो किसी जगह दस दिन रहने का इरादा रखता हो और मस्अले का हुक्म न जानने की वजह से नमाज़ क़स्र कर के पढ़ी हो।
1373. अगर एक शख़्स चार रक्अती नमाज़ पढ़ रहा हो और नमाज़ के दौरान उसे याद आए कि वह तो मुसाफ़िर है या इस अम्र की तरफ़ मुतवज्जह हो कि उसका सफ़र आठ फ़र्सख़ है और वह अभी तीसरी रक्अत के रूकू में न गया हो तो ज़रूरी है कि नमाज़ को दो रक्अतों पर ही तमाम कर दे और अगर तीसरी रक्अत के रूकू में जा चुका हो तो एहतियात की बिना पर उसकी नमाज़ बातिल है और अगर उसके पास एक रक्अत पढ़ने के लिये भी वक़्त बाक़ी हो तो ज़रूरी है कि नमाज़ को नए सिरे से क़स्र कर के पढ़े।
1374. अगर किसी मुसाफ़िर को नमाज़े मुसाफ़िर की बाज़ ख़ुसूसीयात का इल्म न हो मसलन वह यह जानता हो कि अगर चार फ़र्सख़ तक जाए और वापसी में चार फ़र्सख़ का फ़ासिला तय करे तो उसे नमाज़ क़स्र कर के पढ़नी ज़रूरी है और चार रक्अत वाली नमाज़ की नीयत से नमाज़ में मशग़ूल हो जाए और तीसरी रक्अत के रूकू से पहले मस्अला उसकी समझ में आ जाए तो ज़रूरी है कि नमाज़ को दो रक्अतों पर ही तमाम कर दे और अगर वह रूकू में इस अम्र की जानिब मुतवज्जह हो तो एहतियात की बिना पर उसकी नमाज़ बातिल है और उस सूरत में अगर उसके पास एक रक्अत पढ़ने के लिये भी वक़्त बाक़ी हो तो ज़रूरी है कि नमाज़ को नए सिरे से क़स्र कर के पढ़े।
1375. जिस मुसाफ़िर को पूरी नमाज़ पढ़नी ज़रूरी हो अगर वह मस्अला न जानने की वजह से दो रक्अती नमाज़ की नीयत से पढ़ने लगे और नमाज़ के दौरान मस्अला उसकी समझ में आ जाए तो ज़रूरी है कि चार रक्अतें पढ़ कर नमाज़ को तमाम करे और एहतियाते मुस्तहब यह है कि नमाज़ ख़त्म होने के बाद दोबारा उस नमाज़ को चार रक्अती पढ़े।
1376. जिस मुसाफ़िर ने अभी नमाज़ न पढ़ी हो अगर वह नमाज़ का वक़्त ख़त्म होने से पहले अपने वतन पहुंच जाए या ऐसी जगह पहुंचे जहां दस दिन रहना चाहता हो तो ज़रूरी है कि पूरी नमाज़ पढ़े और जो शख़्स मुसाफ़िर न हो अगर उसने नमाज़ के अव्वले वक़्त में नमाज़ न पढ़ी हो और सफ़र इख़्तियार करे तो ज़रूरी है कि सफ़र में नमाज़ क़स्र करके पढ़े।
1377. जिस मुसाफ़िर को नमाज़ क़स्र कर के पढ़ना ज़रूरी हो अगर उसकी ज़ोहर या अस्र या इशा की नमाज़ क़ज़ा हो जाए तो अगरचे वह उसकी क़ज़ा उस वक़्त बजा लाए जब वह सफ़र में न हो ज़रूरी है कि उसकी दो रक्अती क़ज़ा करे। और अगर इन तीन नमाज़ों में से किसी ऐसे शख़्स की कोई नमाज़ क़ज़ा हो जाए जो मुसाफ़िर न हो तो ज़रूरी है कि चार रक्अती क़ज़ा बजा लाए अगरचे यह क़ज़ा उस वक़्त बजा लाए जब वह सफ़र में हो।
1378. मुस्तहब है कि मुसाफ़िर हर क़स्र नमाज़ के बाद तीस मर्तबा सुब्हानल्लाहे वलहम्दो लिल्लाहे व ला इलाहा इल्लल्लाहो वल्लाहो अकबर कहे और ज़ोहर, अस्र और इशा की तअक़ीबात के मुतअल्लिक़ बहुत ज़्यादा ताकीद की गई है बल्कि बेहतर है कि मुसाफ़िर इन तीन नमाज़ों की तअक़ीब में यही ज़िक्र साठ मर्तबा पढ़े।
क़ज़ा नमाज़
1379. जिस शख़्स ने अपनी यौमिया नमाज़ें उनके वक़्त में न पढ़ी हों तो ज़रूरी है कि उनकी क़ज़ा बजा लाए अगरचे वह नमाज़ के तमाम वक़्त के दौरान सोया रहा हो या उसने मदहोशी की वजह से नमाज़ न पढ़ी हो और यही हुक्म है उस नमाज़ का जो मन्नत मानने की वजह से मोअय्यन वक़्त में उस पर वाजिब हो चुकी हो। लेकिन नमाज़े ईदे फ़ित्र और नमाज़े ईदे क़ुर्बान की क़ज़ा नहीं है। ऐसे ही जो नमाज़ किसी औरत ने हैज़ या निफ़ास की हालत में न पढ़ी हों उनकी क़ज़ा वाजिब नहीं ख़्वाह वह यौमिया नमाज़ें हो या कोई और हों।
1380. अगर किसी शख़्स को नमाज़ के वक़्त के बाद पता चले कि जो नमाज़ उसने पढ़ी थी वह बातिल थी तो ज़रूरी है कि उस नमाज़ की क़ज़ा करे।
1381. जिस शख़्स पर किसी नमाज़ की क़ज़ा हो जाए ज़रूरी है कि उसकी क़ज़ा पढ़ने में कोताही न करे अलबत्ता उसका फ़ौरन पढ़ना वाजिब नहीं है।
1382. जिस शख़्स पर किसी नमाज़ की क़ज़ा (वाजिब) हो वह मुस्तहब नमाज़ पढ़ सकता है।
1383. अगर किसी शख़्स को एहतिमाल हो कि क़ज़ा नमाज़ उसके ज़िम्मे है या जो नमाज़ें पढ़ चुका है वह सहीह नहीं थीं तो मुस्तहब है कि एहतियातन उन नमाज़ों की क़ज़ा करे।
1384. यौमिया नमाज़ों की क़ज़ा में तरतीब लाज़िम नहीं है सिवाय उन नमाज़ों के जिनकी अदा में तरतीब है मसलन एक दिन की ज़ोहर व अस्र या मग़रिब व इशा। अगरचे दूसरी नमाज़ों में भी तरतीब का लिहाज़ रखना बेहतर है।
1385. अगर कोई शख़्स चाहे कि यौमिया नमाज़ों के अलावा चन्द नमाज़ों मसलन नमाज़े आयात की क़ज़ा करे या मिसाल के तौर पर चाहे कि किसी एक यौमिया नमाज़ की और चन्द ग़ैर यौमिया नमाज़ों की क़ज़ा कर तो उनका तरतीब के साथ क़ज़ा करना ज़रूरी नहीं है।
1386. अगर कोई शख़्स उन नमाज़ों की तरतीब भूल जाए जो उसने नहीं पढ़ीं तो बेहतर है कि उन्हें इस तरह पढ़े कि उसे यक़ीन हो जाए कि उसने वह उसी तरह तरतीब से पढ़ी हैं जिस तरतीब से वह क़ज़ा हुई थीं। मसलन अगर ज़ोहर की एक नमाज़ और मग़रिब की एक नमाज़ की क़ज़ा उस पर वाजिब हो और उसे यह मालूम न हो कि कौन सी पहले क़ज़ा हुई थी तो पहले एक नमाज़े मग़रिब और उसके बाद एक नमाज़ ज़ोहर और दोबारा नमाज़े मग़रिब पढ़े या पहले एक नमाज़े ज़ोहर और उसके बाद एक नमाज़े मग़रिब और फ़िर दोबारा एक नमाज़े ज़ोहर पढ़े ताकि उसे यक़ीन हो जाए कि जो नमाज़ भी पहले क़ज़ा हुई थी वह पहले ही पढ़ी गई है।
1387. अगर किसी शख़्स से एक दिन की नमाज़े ज़ोहर और किसी और दिन की नमाज़े अस्र या दो नमाज़े ज़ोहर या दो नमाज़े अस्र क़ज़ा हुई हों और उसे मालूम न हो कि कौन सी पहले क़ज़ा हुई है तो अगर दो नमाज़ें चार रक्अती इस नीयत से पढ़े कि उनमें से पहली नमाज़ पहले दिन की क़ज़ा है और दूसरी दूसरे दिन की क़ज़ा है तो तरतीब हासिल होने के लिये काफ़ी है।
1388. अगर किसी शख़्स की एक नमाज़े ज़ोहर और एक नमाज़े इशा या एक नमाज़े अस्र और एक नमाज़े इशा क़ज़ा हो जाए और उसे यह न मालूम हो कि कौन सी पहले क़ज़ा हुई है तो बेहतर है कि उन्हें इस तरह पढ़े कि उसे यक़ीन हो जाए कि उसने उसे तरतीब से पढ़ा है मसलन अगर उससे एक नमाज़े ज़ोहर और एक नमाज़े इशा क़ज़ा हुई हो और उसे यह इल्म न हो कि पहले कौन सी क़ज़ा हुई थी तो वह पहले एक नमाज़े ज़ोहर और उसके बाद एक नमाज़े इशा और फिर दोबारा एक नमाज़े ज़ोहर या पहले एक नमाज़े इशा उसके बाद एक नमाज़े ज़ोहर पढ़े या पहले एक नमाज़े इशा उसके बाद एक नमाज़े ज़ोहर और फिर दोबारा एक नमाज़े इशा पढ़े।
1389. अगर किसी शख़्स को मालूम हो कि उस ने एक चार रक्अती नमाज़ नहीं पढ़ी लेकिन यह इल्म न हो कि वह ज़ोहर की नमाज़ थी या इशा की तो अगर वह एक चार रक्अती नमाज़ की क़ज़ा की नीयत से पढ़े जो उसने नहीं पढ़ी तो काफ़ी है और उसे इख़्तियार है कि वह नमाज़ बलन्द आवाज़ से पढ़े या आहिस्ता पढ़े।
1390. अगर किसी शख़्स की मुसलसल पांच नमाज़ें क़ज़ा हो जायें और उसे यह मालूम न हो कि उनमें से पहली कौन सी थी तो अगर वह नौ नमाज़ें तरतीब से पढ़े मसलन नमाज़े सुब्हा से शूरू करे और ज़ोहर व अस्र और मग़रिब व इशा पढ़ने के बाद दोबारा नमाज़े सुब्हा और ज़ोहर व अस्र और मग़रिब पढ़े तो उसे तरतीब के बारे में यक़ीन हासिल हो जायेगा।
1391. जिस शख़्स को मालूम हो कि उसकी यौमिया नमाज़ों में से कोई न कोई एक न एक दिन की क़ज़ा हुई है लेकिन उनकी तरतीब न जानता हो तो बेहतर यह है कि पांच दिन रात की नमाज़ें पढ़े और अगर छः दिनों में से उसकी छः नमाज़ें क़ज़ा हुई हों तो छः दिन रात की नमाज़ें पढ़े और इसी तरह हर उस नमाज़ के लिये जिससे उसकी क़ज़ा नमाज़ों में इज़ाफ़ा हो। एक मज़ीद दिन रात की नमाज़े पढ़े ताकि उसे यक़ीन हो जाए कि उसने नमाज़ें तरतीब से पढ़ी हैं जिस तरतीब से क़ज़ा हुई थीं मसलन अगर सात दिन की सात नमाज़ें न पढ़ी हों तो सात दिन रात की नमाजों की क़ज़ा करे।
1392. मिसाल के तौर पर अगर किसी की चन्द सुब्ह की नमाज़ें या चन्द ज़ोहर की नमाज़ें क़ज़ा हो गई हों और उनकी तादाद न जानता हो या भूल गया हो मसलन यह न जानता हो कि वह तीन थीं, चार थीं या पांच तो अगर वह छोटे अदद के हिसाब से पढ़ ले तो काफ़ी है, लेकिन बेहतर यह है कि उतनी नमाज़ें पढ़े कि उसे यक़ीन हो जाए कि सारी क़ज़ा नमाज़ें पढ़ ली हैं मसलन अगर वह भूल गया हो कि उसकी कितनी नमाज़ें क़ज़ा हुई थीं और उसे यक़ीन हो कि दस से ज़्यादा थीं तो एहतियातन सुब्ह की दस नमाज़ें पढ़े।
1393. जिस शख़्स गुज़श्ता दिनों की फ़क़त नमाज़ क़ज़ा हुई हो उसके लिये बेहतर है कि अगर उस दिन की नमाज़ की फ़ज़ीलत का वक़्त ख़त्म न हुआ हो तो पहले क़ज़ा पढ़े और उसके बाद उस दिन की नमाज़ में मश्ग़ूल हो। और अगर उसकी गुज़श्ता दिनों की कोई नमाज़ क़ज़ा न हुई हो लेकिन उसी दिन की एक या एक से ज़्यादा नमाज़ें क़ज़ा हुई हों तो अगर उस दिन की नमाज़ की फ़ज़ीलत का वक़्त ख़त्म न हुआ हो तो बेहतर यह है कि उस दिन की क़ज़ा नमाज़ें अदा नमाज़ से पहले पढ़े।
1394. अगर किसी शख़्स को नमाज़ पढ़ते हुए याद आए कि किसी दिन की एक या ज़्यादा नमाज़ें उस से क़ज़ा हो गई हैं या गुज़श्ता दिनों की सिर्फ़ एक नमाज़ उसके ज़िममे है तो अगर वक़्त वसी हो और नीयत को क़ज़ा नमाज़ की तरफ़ फेरना मुम्किन हो और उस दिन की नमाज़ की फ़ज़ीलत का वक़्त ख़त्म न हुआ हो तो बेहतर यह है कि क़ज़ा नमाज़ की नीयत करे। मसलन अगर ज़ोहर की नमाज़ में तीसरी रक्अत के रूकू से पहले उसे याद आए कि उस दिन की सुब्ह की नमाज़ क़ज़ा हुई है और अगर ज़ोहर की नमाज़ का वक़्त भी तंग न हो तो नीयत को सुब्ह की नमाज़ की तरफ़ फेर दे और नमाज़ को दो रक्अती तमाम करे और उसके बाद नमाज़े ज़ोहर पढ़े। हाँ अगर वक़्त तंग हो या नीयत को क़ज़ा नमाज़ की तरफ़ न फेर सकता हो मसलन नमाज़े ज़ोहर की तीसरी रक्अत के रूकू में उसे याद आए कि उसने सुब्हा की नमाज़ नहीं पढ़ी तो चूंकि अगर वह सुब्ह की नमाज़ की नीयत करना चाहे तो एक रूकू जो कि रुक्न है ज़्यादा हो जाता है इस लिये नीयत को सुब्ह की क़ज़ा तरफ़ न फेरे।
1395. अगर गुज़श्ता दिनों की क़ज़ा नमाज़ें एक शख़्स के ज़िम्मे हों और दिन की (जब नमाज़ पढ़ रहा है) एक या एक से ज़्यादा नमाज़ें भी उससे क़ज़ा हो गई हों और उन सब नमाज़ों को पढ़ने के लिये उसके पास वक़्त न हो या वह उन सब को उसी दिन न पढ़ना चाहता हो तो मुस्तहब है कि उस दिन की क़ज़ा नमाज़ों को अदा नमाज़ से पहले पढ़े और बेहतर यह है कि साबिक़ा नमाज़ पढ़ने के बाद उन क़ज़ा नमाज़ों को जो उस दिन अदा नमाज़ से पहले पढ़ी हों दोबारा पढ़े।
1396. जब तक इंसान ज़िन्दा है ख़्वाह वह अपनी क़ज़ा नमाज़ें पढ़ने से क़ासिर ही क्यों न हो कोई दूसरा शख़्स उसकी क़ज़ा नमाज़ें नहीं पढ़ सकता ।
1397. क़ज़ा नमाज़ बा जमाअत भी पढ़ी जा सकती है ख़्वाह इमामे जमाअत की नमाज़ अदा हो या क़ज़ा हो और यह ज़रूरी नहीं कि दोनों एक ही नमाज़ पढ़ें मसलन अगर कोई शख़्स सुब्ह की क़ज़ा नमाज़ को इमाम की नमाज़े ज़ोहर या नमाज़े अस्र के साथ पढ़े तो कोई हरज नहीं है।
1398. मुस्तहब है कि समझदार बच्चे को (यानी उस बच्चे को जो बुरे भले की समझ रखता हो) नमाज़ पढ़ने और दूसरी इबादत बजा लाने की आदत डाली जाए बल्कि मुस्तहब है कि उसे क़ज़ा नमाज़े पढ़ने पर भी आमद किया जाए।
बाप की क़ज़ा नमाज़ें जो बड़े बेटे पर वाजिब हैं
1399. बाप ने अपनी कुछ नमाज़ें न पढ़ी हों और उनकी क़ज़ा पढ़ने पर क़ादिर हो तो अगर उसने अम्रे ख़ुदावन्दी की ना फ़रमानी करते हुए उनको तर्क न किया हो तो एहतियात की बिना पर उसके बड़े बेटे पर वाजिब है कि बाप के मरने के बाद उसकी क़ज़ा नमाज़ें पढ़े या किसी को उजरत देकर पढ़वाए और माँ की क़ज़ा नमाज़ें उस पर वाजिब नहीं अगरचे बेहतर है (कि माँ की क़ज़ा नमाज़ें भी पढ़े)।
1400. अगर बड़े बेटे को शक हो कि कोई क़ज़ा नमाज़ उसके बाप के ज़िम्मे थी या नहीं तो उस पर कुछ भी वाजिब नहीं।
1401. अगर बड़े बेटे को मालूम हो कि उसके बाप के ज़िम्मे क़ज़ा नमाज़ें थीं और शक हो कि उसने वह पढ़ी थी या नहीं तो एहतियाते वाजिब की बिना पर ज़रूरी है कि उनकी क़ज़ा बजा लाए।
1402. अगर यह मालूम न हो कि बड़ा बेटा कौन सा है तो बाप की क़ज़ा किसी बेटे पर भी वाजिब नहीं है लेकिन एहतियाते मुस्तहब यह है कि बेटे बाप की क़ज़ा नमाज़ आपस में तक़्सीम कर लें या उन्हें बजा लाने के लिये क़ुर्आ अन्दाज़ी कर लें।
1403. अगर मरने वाले ने वसीयत की हो कि उसकी क़ज़ा नमाज़ों के लिये किसी को अजीर बनाया जाए (यानी किसी से उजरत पर नमाज़ें पढ़वाई जायें) तो अगर अजीर उसकी नमाज़ें सहीह तौर पर पढ़ दे तो उसके बाद बड़े बेटे पर कुछ वाजिब नहीं है।
1404. अगर बड़ा बेटा अपनी माँ की क़ज़ा नमाज़ें पढ़ना चाहे तो ज़रूरी है कि बलन्द आवाज़ से या आहिस्ता नमाज़ पढ़ने के बारे में अपने वज़ीफ़े के मुताबिक़ अमल करे तो ज़रूरी है कि अपनी माँ की सुब्ह मग़रिब और इशा की क़ज़ा नमाज़ें बलन्द आवाज़ से पढ़े।
1405. जिस शख़्स के ज़िम्मे किसी नमाज़ की क़ज़ा हो अगर वह बाप और माँ की नमाज़ें भी क़ज़ा करना चाहे तो उनमें से जो भी पहले बजा लाए सहीह है।
1406. अगर बाप के मरने के वक़्त बड़ा बेटा नाबालिग़ या दिवाना हो तो उस पर वाजिब नहीं कि जब बालिग़ या आक़िल हो जाए तो बाप की क़ज़ा नमाज़ें पढ़े।
1407. अगर बड़ा बेटा बाप की क़ज़ा नमाज़ें पढ़ने से पहले मर जाए तो दूसरे बेटे पर कुछ भी वाजिब नहीं।
नमाज़े जमाअत
1408. वाजिब नमाज़ें ख़ुसूसन यौमिया नमाज़ें जमाअत के साथ पढ़ना मुस्तहब है और मस्जिद के पड़ोस में रहने वाले को और उस शख़्स को जो मस्जिद की अज़ान सुनता हो नमाज़े सुब्ह और मग़रिब व इशा जमाअत के साथ पढ़ने की बिलख़ुसूस बहुत ज़्यादा ताकीद की गई है।
1409. मोअतबर रिवायत के मुताबिक़ बा जमाअत नमाज़ फ़ुरादा नमाज़ से पच्चीस गुना अफ़्ज़ल है।
1410. बे एतिनाई बरतते हुए नमाज़े जमाअत में न शरीक होना जाइज़ नहीं है और इंसान के लिये यह मुनासिब नहीं है कि बग़ैर उज़्र के नमाज़े जमाअत को तर्क करे।
1411. मुस्तहब है कि इंसान सब्र करे ताकि नमाज़ जमाअत के साथ पढ़े और वह बा जमाअत नमाज़ जो मुख़्तसर पढ़ी जाए उस फ़ुरादा नमाज़ से बेहतर है जो अव्वले वक़्त में फ़ुरादा यानी तन्हा पढ़ी जाए और वह नमाज़े बा जमाअत जो फ़ज़ीलत के वक़्त में न पढ़ी जाए और फ़ुरादा नमाज़ जो फ़ज़ीलत के वक़्त में पढ़ी जाए उन दोनों नमाज़ों में कौन सी बेहतर है मालूम नहीं।
1412. जब जमाअत के साथ नमाज़ पढ़ी जाने लगे तो मुस्तहब है कि जिस शख़्स ने तन्हा नमाज़ पढ़ी हो वह दोबारा जमाअत के साथ पढ़े और अगर उसे बाद में पता चले कि उसकी पहली नमाज़ बातिल थी तो दूसरी नमाज़ काफ़ी है।
1413. अगर इमामे जमाअत या मुक्तदी जमाअत के साथ नमाज़ पढने के बाद उसी नमाज़ को दोबारा जमाअत के साथ पढ़ना चाहे तो अगरचे उसका मुस्तहब होना साबित नहीं लेकिन रजाअन दोबारा पढ़ने की मुमानअत नहीं है।
1414. जिस शख़्स को नमाज़ में इस क़द्र वसवसा होता हो कि उस नमाज़ के बातिल होने का मूजिब बन जाता हो और सिर्फ़ जमाअत के साथ नमाज़ पढ़ने से उसे वसवसे से नजात मिलती हो तो ज़रूरी है कि वह नमाज़ जमाअत के साथ पढ़े।
1415. अगर बाप या माँ अपनी औलाद को हुक्म दें कि नमाज़ जमाअत के साथ पढ़े तो एहतियाते मुस्तहब है कि नमाज़ जमाअत के साथ पढ़े अलबत्ता जब भी वालिदैन की तरफ़ से अम्र व नही महब्बत की वजह से हो और उसकी मुख़ालिफ़त से उन्हें अज़ीयत होती हो तो औलाद के लिये उनकी मुख़ालिफ़त करना अगरचे सरकशी की हद तक न हो तब भी हराम है।
1416. मुस्तहब नमाज़ किसी भी जगह एहतियात की बिना पर जमाअत के साथ नहीं पढ़ी जा सकती लेकिन नमाज़े इस्तिसक़ा जो तलबे बारां के लिये पढ़ी जाती है जमाअत के साथ पढ़ सकते हैं और इसी तरह वह नमाज़ जो पहले वाजिब रही हो और फिर किसी वजह से मुस्तहब हो गई हों मसलन नमाज़े ईदे फ़ित्र और नमाज़े ईदे क़ुर्बान जो इमाम मेहदी (अ0) के ज़माने तक वाजिब थी और उनकी ग़ैबत की वजह से मुस्तहब हो गई है।
1417. जिस वक़्त इमामे जमाअत यौमिया नमाज़ों में से कोई नमाज़ पढ़ रहा हो तो उसकी इक़तिदा कोई सी भी यौमिया नमाज़ में की जा सकती है।
1418. अगर इमामे जमाअत यौमिया नमाज़ में से क़ज़ा शुदा अपनी नमाज़ पढ़ रहा हो या किसी दूसरे शख़्स कि ऐसी नमाज़ की क़ज़ा पढ़ रहा हो जिसका क़ज़ा होना यक़ीनी हो तो उसकी इक़तिदा की जा सकती है लेकिन अगर वह अपनी या किसी दूसरे की नमाज़ एहतियातन पढ़ रहा हो तो उसकी इक़तिदा जाइज़ नहीं मगर यह कि मुक्तदी भी एहतियातन पढ़ रहा हो और इमाम की एहतियात का सबब मुक्तदी की एहतियात का भी सबब हो लेकिन ज़रूरी नहीं कि मुक्तदी की एहतियात का कोई दूसरा सबब न हो।
1419. अगर इंसान को यह इल्म न हो कि जो नमाज़ इमाम पढ़ रहा है वह वाजिब पंजगाना नमाज़ों में से है या मुस्तहब नमाज़ है तो उस नमाज़ में उस इमाम की इकतिदा नहीं की जा सकती ।
1420. जमाअत के सहीह होने के लिये यह शर्त है कि इमाम और मुक्तदी के दरमियान और इसी तरह एक मुक्तदी और दूसरे ऐसे मुक्तदी के दरमियान जो उस मुक्तदी और इमाम के दरमियान वासिता हो कोई चीज़ हाइल न हो और हाइल चीज़ से मुराद वह चीज़ है जो उन्हें एक दूसरे से जुदा करे ख़्वाह देखने में माने हो जैसे पर्दा या दीवार वग़ैरा या देखने में हाइल न हो जैसे शीशा पस अगर नमाज़ की तमाम या बाज़ हालतों में इमाम और मुक्तदी के दरमियान या मुक्तदी और दूसरे ऐसे मुक्तदी के दरमियान जो इस्तिसाल का ज़रीआ हो कोई ऐसी चीज़ हाइल हो जाए तो जमाअत बातिल होगी और जैसा कि बाद में ज़िक्र होगा औरत इस हुक्म से मुस्तसना है।
1421. अगर पहली सफ़ के लम्बा होने की वजह से उसके दोनों तरफ़ खड़े होने वाले लोग इमामे जमाअत को न देख सकें तब भी वह इक्तिदा कर सकते हैं और इसी तरह अगर दूसरी सफ़ों में से किसी सफ़ की लम्बाई की वजह से उस के दोनों तरफ़ खड़े होने वाले लोग अपने से आगे वाली सफ़ को न देख सकें तब भी वह इक्तिदा कर सकते हैं।
1422. अगर जमाअत की सफ़े मस्जिद के दरवाज़े तक पहुंच जायें तो जो शख़्स दरवाज़े के सामने सफ़ के पीछे खड़ा हो उसकी नमाज़ सहीह है नीज़ जो अश्ख़ास उस शख़्स के पीछे खड़े होकर इमामे जमाअत की इक़तिदा कर रहे हों उनकी नमाज़ भी सहीह है बल्कि उन लोगों की नमाज़ भी सहीह है जो दोनों तरफ़ खड़े नमाज़ पढ़ रहे हों और किसी दूसरे मुक्तदी के तवस्सुत से जमाअत से मुत्तसिल हों।
1423. जो शख़्स सुतून के पीछे खड़ा हो अगर वह दाई या बाई तरफ़ से किसी दूसरे मुक्तदी के तवस्सुत से इमामे जमाअत से इत्तिसाल न रखता हो तो वह इक्तिदा नहीं कर सकता।
1424. इमामे जमाअत के खड़े होने की जगह ज़रूरी है कि मुक्तदी की जगह से ज़्यादा ऊँची न हो लेकिन अगर मअमूली ऊँची हो तो कोई हरज नहीं नीज़ अगर ढलवान ज़मीन हो और इमाम उस तरफ़ खड़ा हो जो ज़्यादा बलन्द हो तो अगर ढलवान ज़्यादा न हो और इस तरह हो कि उमूमन उस ज़मीन को मुसत्तह कहा जाए तो कोई हरज नहीं।
1425. (नमाज़े जमाअत में) अगर मुक्तदी की जगह इमाम की जगह से ऊँची हो तो कोई हरज नहीं लेकिन अगर इस क़द्र ऊँची हो कि यह न कहा जा सके कि वह एक जगह जमअ हुए हैं तो जमाअत सहीह नहीं है।
1426. अगर उन लोगों के दरमियान जो एक सफ़ में खड़े हों एक समझदार बच्चा यानी ऐसा बच्चा जो अच्छे बुरे की समझ रखता हो खड़ा हो जाए और लोग न जानते हों कि उसकी नमाज़ बातिल है तो इक़्तिदा कर सकते हैं।
1427. इमाम की तक्बीर के बाद अगर अगली सफ़ के लोग नमाज़ के लिये तैयार हों और तक्बीर कहने ही वाले हों तो जो शख़्स पीछली सफ़ में खड़ा हो वह तक्बीर कह सकता है लेकिन एहतियाते मुस्तहब यह है कि वह इन्तिज़ार करे ताकि अगली सफ़ वाले तक्बीर कह लें।
1428. अगर कोई शख़्स जानता हो कि अगली सफ़ों में से एक सफ़ की नमाज़ बातिल है तो वह पीछली सफ़ों में इक्तिदा नहीं कर सकता लेकिन अगर उसे यह इल्म न हो कि उस सफ़ की लोगों की नमाज़ सहीह है या नहीं तो इक्तिदा कर सकता है।
1429. जब कोई शख़्स जानता हो कि इमाम की नमाज़ बातिल है मसलन उसे इल्म हो कि इमाम वुज़ू से नहीं है तो ख़्वाह इमाम इस अम्र की जानिब मुतवज्जह न भी हो वह शख़्स उसकी इक़तिदा नहीं कर सकता।
1430. अगर मुक्तदी को नमाज़ के बाद पता चले कि इमाम आदिल न था या काफ़िर था या किसी वजह से मसलन वुज़ू न होने की वजह से उसकी नमाज़ बातिल थी तो उसकी नमाज़ सहीह है।
1431. अगर कोई शख़्स नमाज़ के दौरान शक करे कि उसने इक़्तिदा की है या नहीं चुनांचे अलामतों की वजह से उसे इत्मीनान हो जाए कि इक़्तिदा की है मसलन ऐसी हालत में हो कि जो मुक्तदी का वज़ीफ़ा है मसलन इमाम को अलहम्द और सूरा पढ़ते हुए सुन रहा हो तो ज़रूरी है कि नमाज़े जमाअत के साथ ही ख़त्म करे बसूरते दीगर ज़रूरी है कि नमाज़ फ़ुरादा की नीयत से ख़त्म करे।
1432. अगर नमाज़ के दौरान मुक्तदी बग़ैर किसी उज़्र के फ़ुरादा की नीयत करे तो उसकी जमाअत के सहीह होने में इश्काल है। लेकिन उसकी नमाज़ सहीह है मगर यह कि उस ने फ़ुरादा की नमाज़ में उसका जो वज़ीफ़ा है, उस पर अमल न किया हो या ऐसा काम जो फ़ुरादा नमाज़ को बातिल करता है अंजाम दिया हो अगरचे सहवन हो मसलन रूकू ज़्यादा किया हो बल्कि बाज़ सूरतों में अगर फ़ुरादा नमाज़ में उसका जो वज़ीफ़ा है उस पर अमल न किया हो तो भी उसकी नमाज़ सहीह है। मसलन अगर नमाज़ की इब्तिदा से फ़ुरादा की नीयत न हो और क़िरअत भी न की हो लेकिन रूकू में उसे ऐसा क़स्द करना पड़े तो ऐसी सूरत में फ़ुरादा की नीयत से तमाम ख़त्म कर सकता है और उसे दोबारा पढ़ना ज़रूरी नहीं है।
1433. अगर मुक्तदी इमाम के अलहम्द और सूरा पढ़ने के बाद किसी उज़्र की वजह से फ़ुरादा की नीयत करे तो अलहम्द और सूरा पढ़ना ज़रूरी नहीं है। लेकिन अगर (इमाम के) अलहम्द और सूरा ख़त्म करने से पहले फ़ुरादा की नीयत करे तो एहतियात की बिना पर ज़रूरी है कि (अलहम्द और सूरे की) जितनी मिक़्दार इमाम ने पढ़ी हो वह भी पढ़े।
1434. अगर कोई शख़्स नमाज़े जमाअत के दौरान फ़ुरादा की नीयत करे तो फिर वह दोबारा जमाअत की नीयत नहीं कर सकता लेकिन अगर मुज़ब्ज़ब हो कि फ़ुरादा की नीयत करे या न करे और बाद में नमाज़ को जमाअत के साथ तमाम करने का मुसम्मम इरादा करे तो उसकी जमाअत सहीह है।
1435. अगर कोई शख़्स शक करे कि नमाज़ के दौरान उसने फ़ुरादा की नीयत की है या नहीं तो ज़रूरी है कि यह समझ ले कि उसने फ़ुरादा की नीयत नहीं की है।
1436. अगर कोई शख़्स उस वक़्त इक़्तिदा करे जब इमाम रूकू में हो और इमाम के रूकू में शरीक हो जाए अगरचे इमाम ने रूकू का ज़िक्र पढ़ लिया हो उस शख़्स की नमाज़ सहीह है और वह एक रक्अत नमाज़ शुमार होगी लेकिन अगर वह शख़्स बक़द्रे रूकू के झुके ताहम इमाम को रूकू में न पा सके तो वह महज़ अपनी नमाज़ फ़ुरादा की नीयत से ख़त्म कर सकता है।
1437. अगर कोई शख़्स उस वक़्त इक़्तिदा करे जब इमाम रूकू में हो और बक़द्रे रूकू के झुके और शक करे कि इमाम के रूकू में शरीक हुआ है या नहीं तो अगर उसका मौक़ा निकल गया हो मसलन रूकू के बाद शक करे तो ज़ाहिर यह है कि उसकी जमाअत सहीह है। इसके अलावा दूसरी सूरत में नमाज़ फ़ुरादा की नीयत से पूरी कर सकता है।
1438. अगर कोई शख़्स उस वक़्त इक़्तिदा करे जब इमाम रूकू में हो और इससे पहले की वह बक़द्रे रूकू झुके इमाम रूकू से सर उठा ले तो उसे इख़्तियार है कि फ़ुरादा की नीयत कर के नमाज़ पूरी करे या क़ुर्बते मुत्लक़ा की नीयत से इमाम के साथ सज्दे में जाए और सज्दे के बाद क़ियाम की हालत में तक्बीरतुल एहराम और किसी ज़िक्र का क़स्द किये बग़ैर दोबारा तक्बीर कहे और नमाज़ जमाअत के साथ पढ़े।
1439. अगर कोई शख़्स नमाज़ की इब्तिदा में अलहम्द और सूरा के दौरान इक़्तिदा करे और इत्तिफ़ाक़न इससे पहले कि वह रूकू में जाए इमाम अपना सर रूकू से उठा ले तो उस शख़्स की नमाज़ सहीह है।
1440. अगर कोई शख़्स नमाज़ के लिये ऐसे वक़्त पहुँचे जब इमाम नमाज़ का आख़िरी तशह्हुद पढ़ रहा हो और वह शख़्स चाहता हो कि नमाज़े जमाअत का सवाब हासिल करे तो ज़रूरी है कि नीयत बांधने और तक्बीरतुल एहराम कहने के बाद बैठ जाए और महज़ क़ुर्बत की नीयत से तशह्हुद इमाम के साथ पढ़े लेकिन सलाम न कहे और इन्तिज़ार करे ताकि इमाम नमाज़ का सलाम पढ़ ले उसके बाद वह शख़्स खड़ा हो जाए और दोबारा नीयत किये बग़ैर और तक्बीर कहे बग़ैर अलहम्द और सूरा पढ़े और उसे अपनी नमाज़ की पहली रक्अत शुमार करे।
1441. मुक्तदी को इमाम से आगे नहीं खड़ा होना चाहिये बल्कि एहतियाते वाजिब यह है कि अगर मुक्तदी ज़्यादा हों तो इमाम के बराबर न खड़े हों। लेकिन अगर मुक्तदी एक आदमी हो तो इमाम के बराबर में खड़े होने में कोई हर्ज नहीं।
1442. अगर इमाम और मुक्तदी औरत हो तो अगर उस औरत और इमाम के दरमियान या औरत और दूसरे मर्द मुक्तदी के दरमियान जो औरत और इमाम के दरमियान इत्तिसाल का ज़रीआ हो पर्दा वग़ैरा लगा हो तो कोई हर्ज नहीं।
1443. अगर नमाज़ शूरू होने के बाद इमाम और मुक्तदी के दरमियान या मुक्तदी और उस शख़्स के दरमियान जिसके तवस्सुत से मुक्तदी इमाम से मुत्तसिल हो पर्दा या कोई दूसरी चीज़ हाइल हो जाए तो नमाज़ बातिल हो जाती है और लाज़िम है कि मुक्तदी फ़ुरादा नमाज़ के वज़ीफ़े पर अमल करे।
1444. एहतियाते वाजिब है कि मुक्तदी के सज्दे की जगह और इमाम के खड़े होने की जगह के बीच एक डग से ज़्यादा फ़ासिला न हो और अगर इंसान एक ऐसे मक्तदी के तवस्सुत से जो उसके आगे खड़ा हो इमाम से मुत्तसिल हो तब भी यही हुक्म है और एहतियाते मुस्तहब यह है कि मुक्तदी के खड़े होने की जगह और उससे आगे वाले शख़्स के खड़े होने की जगह के दरमियान इससे ज़्यादा फ़ासिला न हो जो इंसान की हालते सज्दा में होती है।
1445. अगर मुक्तदी किसी ऐसे शख़्स के तवस्सुत से इमाम से मुत्तसिल हो, जिसने उसकी दाई तरफ़ या बाई तरफ़ इक़्तिदा की हो और सामने से इमाम से मुत्तसिल न हो तो एहतियाते वाजिब की बिना पर ज़रूरी है कि उस शख़्स से जिसने उसकी दाई तरफ़ या बाईं तरफ़ इक़्तिदा की हो एक डग से ज़्यादा फ़ासिले पर न हो।
1446. अगर नमाज़ के दौरान मुक्तदी और इमाम या मुक्तदी और उस शख़्स के दरमियान जिसके तवस्सुत से मुक्तदी इमाम से मुत्तसिल हो एक डग से ज़्यादा फ़ासिला हो जाए तो वह तन्हा हो जाता है और अपनी नमाज़ फ़ुरादा की नीयत से जारी रख सकता है।
1447. जो लोग अगली सफ़ में हों अगर उन सब की नमाज़ ख़त्म हो जाए और वह फ़ौरन दूसरी नमाज़ के लिये इमाम की इक़्तिदा न करें तो पीछली सफ़ वालों की नमाज़े जमाअत बातिल हो जाती हैं बल्कि अगर फ़ौरन ही इक़्तिदा कर लें फिर भी पिछली सफ़ की जमाअत सहीह होने में इश्काल है।
1448. अगर कोई शख़्स दूसरी रक्अत में इक़्तिदा करे तो उसके लिये अलहम्द और सूरा पढ़ना ज़रूरी नहीं अलबत्ता क़ुनूत और तशह्हुद इमाम के साथ पढ़े और एहतियात यह है कि तशह्हुद पढ़ते वक़्त हाथों की उँगिलयाँ और पांव के तलवों का अगला हिस्सा ज़मीन पर रखे और घुटने उठा ले और तशह्हुद के बाद ज़रूरी है कि इमाम के साथ खड़ा हो जाए और अलहम्द को तमाम करे और अपने रूकू में इमाम से मिल जाए और अगर पूरी अलहम्द पढ़ने के लिये वक़्त न हो तो अलहम्द को छोड़ सकता है और इमाम के साथ रूकू में जाए। लेकिन इस सूरत में एहतियाते मुस्तहब यह है कि नमाज़ को फ़ुरादा की नीयत से पढ़े।
1449. अगर कोई शख़्स उस वक़्त इक़्तिदा करे जब इमाम चार रक्अती नमाज़ की दूसरी रक्अत पढ़ रहा हो तो ज़रूरी है कि अपनी नमाज़ की दूसरी रक्अत में जो इमाम की तीसरी रक्अत होगी दो सज्दों के बाद बैठ जाए और वाजिब मिक़्दार में तशह्हुद पढ़े और फिर उठ खड़ा हो और अगर तीन दफ़्आ तस्बीहात पढ़ने का वक़्त न रखता हो तो ज़रूरी है कि एक दफ़्आ पढ़े और रूकू में अपने आप को इमाम के साथ शरीक करे।
1450. अगर इमाम तीसरी या चौथी रक्अत में हो और मुक्तदी जानता हो कि अगर इक़तिदा करेगा और अलहम्द पढ़ेगा तो इमाम के साथ रूकू में शामिल न हो सकेगा तो एहतियाते वाजिब की बिना पर ज़रूरी है कि इमाम के रूकू में जाने तक इन्तिज़ा करे और उसके बाद इक़्तिदा करे।
1451. अगर कोई शख़्स इमाम के तीसरी या चौथी रक्अत में क़ियाम की हालत में होने के वक़्त इक़्तिदा करे तो ज़रूरी है कि अलहम्द और सूरा पढ़े और अगर सूरा पढ़ने के लिये वक़्त न हो तो ज़रूरी है कि अलहम्द तमाम करे और रूकू में इमाम के साथ शरीक हो जाए और अगर पूरी अलहम्द पढ़ने के लिये वक़्त न हो तो अलहम्द को छोड़कर इमाम के साथ रूकू में जाए लेकिन इस सूरत में एहतियाते मुस्तहब यह है कि फ़ुरादा की नीयत से नमाज़ पूरी करे।
1452. अगर एक शख़्स जानता हो कि अगर वह सूरा और क़ुनूत पढ़े तो रूकू में इमाम के साथ शरीक नहीं हो सकता और वह अमदन सूरा या क़ुनूत पढ़े और रूकू में इमाम के साथ शरीक न हो तो उसकी जमाअत बातिल हो जाती है और ज़रूरी है कि वह फ़ुरादा तौर पर नमाज़ पढ़े।
1453. जिस शख़्स को इत्मीनान हो कि अगर सूरा शूरू करे या उसे तमाम करे तो बशर्ते कि सूरा ज़्यादा लम्बा न हो वह रूकू में इमाम के साथ शरीक हो जायेगा तो उसके लिये बेहतर यह है कि सूरा शूरू करे लेकिन अगर सूरा इतना ज़्यादा तवील हो कि उसे इमाम का मुक्तदी न कहा जा सके तो ज़रूरी है कि उसे शूरू न करे और अगर शूरू कर चुका हो तो उसे पूरा न करे।
1454. जो शख़्स यक़ीन रखता हो कि सूरा पढ़कर इमाम के साथ रूकू में शरीक हो जायेगा और इमाम की इक़्तिदा ख़त्म नहीं होगी लिहाज़ा अगर वह सूरा पढ़ कर इमाम के साथ रूकू में शरीक न हो सके तो उसकी जमाअत सहीह है।
1455. अगर इमाम क़ियाम की हालत में हो और मुक्तदी को इल्म न हो कि वह कौन सी रक्अत में है तो वह इक़्तिदा कर सकता है लेकिन ज़रूरी है कि अलहम्द और सूरा क़ुर्बत की नीयत से पढ़े अगरचे बाद में उसे पता चल जाए कि इमाम की पहली या दूसरी रक्अत थी।
1456. अगर कोई शख़्स इस ख़्याल से कि इमाम पहली या दूसरी रक्अत में है अलहम्द और सूरा न पढ़े और रूकू के बाद उसे पता चल जाए कि इमाम तीसरी या चौथी रक्अत में था तो मुक्तदी की नमाज़ सहीह है लेकिन अगर उसे रूकू से पहले इस बात का पता चल जाए तो ज़रूरी है कि अलहम्द और सूरा पढ़े और अगर वक़्त तंग हो तो मसअला 1451 के मुताबिक़ अमल करे।
1457. अगर कोई शख़्स मुस्तहब नमाज़ पढ़ रहा हो और जमाअत क़ाइम हो जाए और उसे यह इत्मीनान न हो कि अगर मुस्तहब नमाज़ को तमाम करेगा तो जमाअत के साथ शरीक हो सकेगा तो मुस्तहब यह है कि जो नमाज़ पढ़ रहा हो उसे छोड़ दे और नमाज़े जमाअत में शामिल हो जाए बल्कि अगर उसे यह इत्मीनान न हो कि पहली रक्अत में शरीक हो सकेगा तब भी मुस्तहब है कि उसी हुक्म के मुताबिक़ अमल करे।
1459. अगर कोई शख़्स तीन रक्अती या चार रक्अती नमाज़ पढ़ रहा हो और जमाअत क़ाइम हो जाए और अभी तीसरी रक्अत के रूकू में न गया हो और उसे यह इत्मीनान न हो कि अगर नमाज़ को पूरा करेगा तो जमाअत में शरीक हो सकेगा तो मुस्तहब है कि मुस्तहब नमाज़ की नीयत के साथ उस नमाज़ को दो रक्अत पर ख़त्म कर दे और जमाअत के साथ शरीक हो जाए।
1460. अगर इमाम की नमाज़ ख़त्म हो जाए और मुक्तदी तशह्हुद या पहला सलाम पढ़ने में मशग़ूल हो तो उसके लिये फ़ुरादा यानी तन्हा नमाज़ की नीयत करना लाज़िमी नहीं।
1461. जो शख़्स इमाम से एक रक्अत पीछे हो उसके लिये बेहतर यह है कि जब इमाम आख़िरी रक्अत का तशह्हुद पढ़ रहा हो तो हाथों कि उँगलियाँ और पाँव के तलवों का अगला हिस्सा ज़मीन पर रखे और घुटनों को बलन्द करे और इमाम के सलाम करने का इन्तिज़ार करे और फिर खड़ा हो जाए और अगर उसी वक़्त फ़ुरादा का क़स्द करना चाहे तो कोई हरज नहीं। इमामे जमाअत के शराइत
1462. इमामे जमाअत के लिये ज़रूरी है कि बालिग़, आक़िल, शीआ, इसना अशरी, आदिल और हलालज़ादा हो और नमाज़ सहीह पढ़ सकता हो नीज़ अगर मुक्तदी मर्द हो तो उसका इमाम भी मर्द होना ज़रूरी है और दस साला बच्चे की इक़्तिदा सहीह होना अगरचे वजह से ख़ाली नहीं, लेकिन इश्काल से भी ख़ाली नहीं है।
1463. जो शख़्स पहले एक इमाम को आदिल समझता था अगर शक करे कि वह अब भी अपनी अदालत पर क़ाइम है या नहीं तब भी उसकी इक़्तिदा कर सकता है।
1464. जो शख़्स खड़ा होकर नमाज़ पढ़ता हो वह किसी ऐसे शख़्स की इक़्तिदा नहीं कर सकता जो बैठ कर या लेट कर नमाज़ पढ़ता हो और जो शख़्स बैठ कर नमाज़ पढ़ता हो वो किसी ऐसे शख़्स की इक़्तिदा नहीं कर सकता जो लेट कर नमाज़ पढ़ता हो।
1465. जो शख़्स बैठ कर नमाज़ पढ़ता हो वह उस शख़्स की इक़्तिदा कर सकता है जो बैठ कर नमाज़ पढ़ता हो लेकिन जो शख़्स लेट कर नमाज़ पढ़ता हो उसका किसी ऐसे शख़्स की इक़्तिदा करना जो लेट कर या बैठ कर नमाज़ पढ़ता हो महल्ले इश्काल है।
1466. अगर इमामे जमाअत किसी उज़्र की वजह से नजिस लिबास या तयम्मुम या जबीरेह के वुज़ू से नमाज़ पढ़े तो उसकी इक़्तिदा की जा सकती है।
1467. अगर इमाम किसी ऐसी बीमारी में मुब्तला हो जिसकी वजह से वह पेशाब और पाखाना न रोक सकता हो तो उसकी इक़्तिदा की जा सकती है नीज़ जो औरत मुस्तहज़ा न हो वह मुस्तहाज़ा औरत की इक़्तिदा कर सकती है।
1468. बेहतर यह है कि जो शख़्स जुज़ाम या बर्स का मरीज़ हो वह इमामे जमाअत न बने और एहतियाते वाजिब यह है कि उस (सज़ा याफ़्ता) शख़्स की जिस पर शरई हद जारी हो चुकी हो इक़्तिदा न की जाए।
नमाज़े जमाअत के अहकाम
1469. नमाज़ की नीयत करते वक़्त ज़रूरी है कि मुक्तदी इमाम को मुअय्यन करे लेकिन इमाम का नाम जानना ज़रूरी नहीं और अगर नीयत करे कि मैं मौजूदा इमामे जमाअत की इक़्तिदा करता हूँ तो उसकी नमाज़ सहीह है।
1470. ज़रूरी है कि मुक्तदी अलहम्द और सूरा के अलावा नमाज़ की सब चीज़ें ख़ुद पढ़े लेकिन अगर उसकी पहली और दूसरी रक्अत इमाम की तीसरी और चौथी रक्अत हो तो ज़रूरी है कि अलहम्द और सूरा भी पढ़े। 1471. अगर मुक्तदी नमाज़े सुब्ह व मग़रिब व इशा की पहली और दूसरी रक्अत में इमाम की अलहम्द और सूरा पढ़ने की आवाज़ सुन रहा हो तो ख़्वाह वह कलिमात को ठीक तरह न समझ सके उसे अलहम्द और सूरा नहीं पढ़ना चाहिये और अगर इमाम की आवाज़ न सुन पाए तो मुस्तहब है कि अलहम्द और सूरा पढ़े लेकिन ज़रूरी है कि आहिस्ता पढ़े और अगर सहवन बलन्द आवाज़ में पढ़े तो कोई हरज नहीं।
1472. अगर मुक्तदी इमाम की अलहम्द और सूरे की क़िरअत के बाज़ कलिमात सुन ले तो जिस क़द्र न सुन सके वह पढ़ सकता है।
1473. अगर मुक्तदी सहवन अलहम्द और सूरा पढ़े या यह ख़्याल करते हुए कि जो आवाज़ सुन रहा है वह इमाम की नहीं है अलहम्द और सूरा पढ़े और बाद में उसे पता चले कि इमाम की आवाज़ थी तो उसकी नमाज़ सहीह है।
1474. अगर मुक्तदी शक करे कि इमाम की आवाज़ सुन रहा है या नहीं या कोई आवाज़ सुने और यह न जानता हो कि इमाम की आवाज़ है या किसी और की तो वह अलहम्द और सूरा पढ़ सकता है।
1475. मुक्तदी को नमाज़े ज़ोहर व अस्र की पहली और दूसरी रक्अत में एहतियात की बिना पर अलहम्द और सूरा नहीं पढ़ना चाहिये और मुस्तहब है कि उनके बजाए कोई ज़िक्र पढ़े।
1476. मुक्तदी को तक्बीरतुल एहराम इमाम से पहले नहीं कहनी चाहिये बल्कि एहतियाते वाजिब यह है कि जब तक इमाम तक्बीर न कह चुके मुक्तदी तक्बीर न कहे।
1477. अगर मुक्तदी सहवन इमाम से पहले सलाम कह दे तो उसकी नमाज़ सहीह है और ज़रूरी नहीं कि वह दोबारा इमाम के साथ सलाम कहे बल्कि ज़ाहिर यह है कि अगर जान बूझ कर भी इमाम से पहले सलाम कह दे तो कोई हरज नहीं है।
1478. अगर मुक्तदी तक्बीरतुल एहराम के अलावा नमाज़ की दूसरी चीज़ें इमाम से पहले पढ़ ले तो कोई हर्ज नहीं लेकिन अगर उन्हें सुन ले या यह जान ले कि इमाम उन्हें किस वक़्त पढ़ता है तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि इमाम से पहले न पढ़े।
1479. ज़रूरी है कि मुक्तदी जो कुछ नमाज़ में पढ़ा जाता है उसके अलावा नमाज़ के दूसरे अफ़्आल मसलन रूकू और सुजूद इमाम के साथ या उससे थोड़ी देर बाद बजा लाए और अगर वह उन अफ़्आल को अमदन इमाम से पहले या उससे काफ़ी देर बाद अंजाम दे तो उस की जमाअत बातिल होगी। लेकिन अगर फ़ुरादा शख़्स के वज़ीफ़े पर अमल करे तो उसकी नमाज़ सहीह है।
1480. अगर मुक्तदी भूल कर इमाम से पहले रूकू से सर उठा ले और इमाम रूकू में ही हो तो एहतियात की बिना पर ज़रूरी है कि दोबारा रूकू में चला जाए और इमाम के साथ ही सर उठाए। इस सूरत में रूकू की ज़्यादती जो कि रुक्न है नमाज़ को बातिल नहीं करती लेकिन अगर वह दोबारा रूकू में जाए और इससे पेशतर कि वह इमाम के साथ रूकू में शरीक हो इमाम सर उठा ले तो एहतियात की बिना पर उसकी नमाज़ बातिल है।
1481. अगर मुक्तदी सहवन सर सज्दे से उठा ले और देखे कि इमाम अभी भी सज्दे में है तो एहतियात की बिना पर ज़रूरी है कि दोबारा सज्दे में चला जाए और अगर दोनों सज्दों में यही इत्तेफ़ाक हो जाए तो दो सज्दों के ज़्यादा हो जाने की वजह से जो कि रुक्न है नमाज़ बातिल नहीं होती।
1482. जो शख़्स सहवन इमाम से पहले सज्दे से सर उठा ले अगर उसे दोबारा सज्दे में जाने पर मालूम हो कि इमाम पहले ही सज्दे से सर उठा चुका है तो उसकी नमाज़ सहीह है लेकिन अगर दोनों ही सज्दों में ऐसा इत्तिफ़ाक़ हो जाए तो एहतियात की बिना पर उसकी नमाज़ बातिल है।
1483. अगर मुक्तदी ग़लती से सर रूकू या सज्दे से उठा ले और सहवन या इस ख़्याल से कि दोबारा रूकू या सज्दे में लौट जाने से इमाम के साथ न शरीक हो सकेगा रूकू या सज्दे में न जाए तो उसकी जमाअत और नमाज़ सहीह है।
1484. अगर मुक्तदी सज्दे से सर उठा ले और देखे कि इमाम सज्दे में है और इस ख़्याल से कि यह इमाम का पहला सज्दा है और इस नीयत से कि इमाम के साथ सज्दा करे, सज्दे में चला जाए और बाद में उसे मालूम हो कि यह इमाम का दूसरा सज्दा था तो यह मुक्तदी का दूसरा सज्दा शुमार होगा और इस ख़्याल से सज्दे में जाए कि यह इमाम का दूसरा सज्दा है और बाद में मालूम हो कि यह इमाम का पहला सज्दा था तो ज़रूरी है कि इस नीयत से सज्दा तमाम करे कि इमाम के साथ सज्दा कर रहा हूँ और फिर दोबारा इमाम के साथ सज्दे में जाए और दोनों सूरतों में बेहतर यह है कि नमाज़ को जमाअत के साथ तमाम करे और फिर दोबारा भी पढ़े।
1485. अगर कोई मुक्तदी सहवन इमाम से पहले रूकू में चला जाए और सूरत यह हो कि अगर दोबारा क़ियाम की हालत में आ जाए तो इमाम की क़िरअत का कुछ हिस्सा सुन सके तो अगर वह सर उठा ले और दोबारा इमाम के साथ रूकू में जाए तो उसकी नमाज़ सहीह है और अगर वह जान बूझ कर दोबारा क़ियाम की हालत में न आए तो उसकी नमाज़ बातिल है।
1486. अगर मुक्तदी सहवन इमाम से पहले सज्दे में चला जाए और सूरत यह हो कि अगर दोबारा क़ियाम की हालत में आए तो इमाम की क़िरअत का कोई हिस्सा न सुन सके तो अगर वह इस नीयत से कि इमाम के साथ नमाज़ पढ़े, अपना सर उठा ले और इमाम के साथ रूकू में जाए तो उसकी जमाअत और नमाज़ सहीह है और अगर वह अमदन दोबारा क़ियाम की हालत में न आए तो उसकी नमाज़ सहीह है लेकिन फ़ुरादा शुमार होगी।
1487. अगर मुक्तदी ग़लती से इमाम से पहले सज्दे में चला जाए तो अगर वह इस क़स्द से कि इमाम के साथ नमाज़ पढ़े अपना सर उठा ले और इमाम के साथ सज्दे में जाए तो उसकी नमाज़ सहीह है और अगर अमदन सज्दे से सर न उठाए तो उसकी नमाज़ सहीह है लेकिन वह फ़ुरादा शुमार होगी।
1488. अगर इमाम ग़लती से एक ऐसी रक्अत में क़ुनूत पढ़ दे, जिसमें क़ुनूत न हो या एक ऐसी रक्अत में जिसमें तशह्हुद न हो ग़लती से तशह्हुद पढ़ने लगे तो मुक्तदी को क़ुनूत और तशह्हुद नहीं पढ़ना चाहिये लेकिन इमाम से पहले न रूकू में जा सकता है और न इमाम के खड़े होने से पहले खड़ा हो सकता है बल्कि ज़रूरी है कि इमाम के तशह्हुद और क़ुनूत ख़त्म करने तक इन्तिज़ार करे और बाक़ी मांदा नमाज़ उसके साथ पढ़े।
जमाअत में इमाम और मुक्तदी के फ़राइज़
1489. अगर मुक्तदी सिर्फ़ एक मर्द हो तो मुस्तहब है कि इमाम के दाई तरफ़ खड़ा हो और अगर एक औरत हो तब भी मुस्तहब है कि इमाम के दाई तरफ़ खड़ी हो लेकिन ज़रूरी है कि उसके सज्दा करने की जगह इमाम से उसके सज्दे की हालत में दो ज़ानू के फ़ासिले पर हो और अगर एक मर्द और एक औरत या एक मर्द और चन्द औरतें हो तो मुस्तहब है कि मर्द इमाम के दाई जानिब और औरत या औरतें इमाम के पीछे खड़ी हों और अगर चन्द मर्द और एक या चन्द औरतें हों तो मर्दों का इमाम के पीछे और औरतों का मर्दों के पीछे खड़ा होना मुस्तहब है।
1490. अगर इमाम और मुक्तदी दोनों औरतें हों तो एहतियाते वाजिब यह है कि सब एक दूसरी के बराबर बराबर खड़ी हों और इमाम मुक्तदीयों से आगे न खड़ी हो।
1491. मुस्तहब है कि इमाम सफ़ के दरमियान में आगे खड़ा हो और साहबाने इल्म व फ़ज़्ल और तक़्वा व वरअ पहली सफ़ में खड़े हों।
1492. मुस्तहब है कि जमाअत की सफ़ें मुनज़्ज़म हों और जो अश्ख़ास एक सफ़ में खड़े हों उनके दरमियान फ़ासिला न हो और उनके कंधे एक दूसरे के कंधों से मिले हुए हों।
1493. मुस्तहब है कि क़दक़ामतिस्सलात कहने के बाद मुक्तदी खड़े हो जायें।
1494. मुस्तहब है कि इमामे जमाअत उस मुक्तदी की हालत का लिहाज़ करे जो दूसरों से कमज़ोर हो और क़ुनूत और रूकू और सुजूद को तूल न दे बजुज़ उस सूरत के कि उसे इल्म हो कि तमाम वह अशख़ास जिन्होंने उस की इक़्दिता की है तूल देने की जानिब माइल हैं।
1495. मुस्तहब है कि इमामे जमाअत अलहम्द और सूरा नीज़ बलन्द आवाज़ से पढ़े जाने वाले अज़्कार पढ़ते हुए अपनी आवाज़ को इतना बलन्द करे कि दूसरे सुन सकें लेकिन ज़रूरी है कि आवाज़ मुनासिब हद से ज़्यादा बलन्द न करे।
1496. अगर इमाम को हालते रूकू में मालूम हो जाए कि कोई शख़्स अभी अभी आया है और इक़्तिदा करना चाहता है तो मुस्तहब है कि रुकउ को मअमूल से दुगना तूल दे और फिर खड़ा हो जाए ख़्वाह उसे मालूम हो जाए कि कोई दूसरा शख़्स भी इक़्तिदा के लिये आया है।
नमाज़े जमाअत के मकरूहात
1497. अगर जमाअत की सफ़ों में जगह हो तो इंसान के लिये तन्हा खड़ा होना मकरूह है।
1498. मुक्तदी का नमाज़ के अज़कार को इस तरह पढ़ना कि इमाम सुन ले मकरूह है।
1499. जो मुसाफ़िर ज़ोहर, अस्र और इशा की नमाज़ें क़स्र कर के पढ़ता हो उस के लिये इन नमाज़ों में किसी ऐसे शख़्स की इक़्तिदा करना मकरूह है जो मुसाफ़िर न हो और जो शख़्स मुसाफ़िर न हो उसके लिये मकरूह है कि इन नमाज़ों में मुसाफ़िर की इक़्तिदा करे।
नमाज़े आयात
1500. नमाज़े आयात जिसके पढ़ने का तरीक़ा बाद में बयान होगा तीन चीज़ों की वजह से वाजिब होती हैः-
1. सूरज ग्रहन,
2. चांद ग्रहन, अगरचे उसको कुछ हिस्से को ही ग्रहन लगे और ख़्वाह इंसान पर उसकी वजह से ख़ौफ़ भी तारी न हुआ हो।
3. ज़लज़ला, एहतियाते वाजिब की बिना पर, अगरचे उससे कोई भी ख़ौफ़ज़दा न हुआ हो।
अलबत्ता बादलों की गरज, बिजली की कड़क, सुर्ख़ व सियाह आंधी और इन्हीं जैसी दूसरी आसमानी निशानियाँ जिनसे अकसर लोग ख़ौफ़ज़दा हो जायें और इसी तरह ज़मीन के हादिसात मसलन (दरिया और) समुन्दर के पानी का सूख जाना और पहाड़ों का गिरना जिनसे अकसर लोग ख़ौफ़ज़दा हो जाते हैं इन सूरतों में भी एहतियाते मुस्तहब की बिना पर नमाज़े आयात तर्क नहीं करना चाहिये।
1501. जिन चीज़ों के लिये नमाज़े आयात पढ़ना वाजिब है अगर वह एक से ज़्यादा वुक़ू पज़ीर हो जायें तो ज़रूरी है कि इंसान उनमें से हर एक के लिये एक नमाज़े आयात पढ़े मसलन अगर सूरज को भी ग्रहन लग जाए और ज़लज़ला भी आ जाए तो दोनों के लिये दो अलग अलग नमाज़ें पढ़नी ज़रूरी हैं।
1502. अगर किसी शख़्स पर कई नमाज़े आयात वाजिब हों ख़्वाह वह सब उस पर एक ही चीज़ की वजह से वाजिब हुई हों मसलन सूरज को तीन दफ़्आ ग्रहन लगा हो और उसने उसकी नमाज़ें न पढ़ी हों या मुख़्तलिफ़ चीज़ों की वजह से मसलन सूरज ग्रहन और चांद ग्रहन और ज़लज़ले की वजह से उस पर वाजिब हुई हों तो उनकी क़ज़ा करते वक़्त ज़रूरी नहीं कि वह सब इस बात का तअय्युन करे कि कौन सी क़ज़ा कौन सी चीज़ के लिये कर रहा है।
1503. जिन चीज़ों के लिये नमाज़े आयात पढ़ना वाजिब है वह जिस शहर में वुक़ू पज़ीर हो फ़क़त उसी शहर के लोगों के लिये ज़रूरी है कि नमाज़े आयात पढ़े और दूसरे मक़ामात के लोगों के लिये उसका पढ़ना वाजिब नहीं है.
1504. जब सूरज या चांद को ग्रहन लगने लगे तो नमाज़े आयात का वक़्त शूरू हो जाता है और उस वक़्त तक रहता है जब तक वह अपनी साबिक़ा हालत पर लौट न आयें। अगरचे बेहतर यह है कि इतनी ताख़ीर न करे के ग्रहन ख़त्म होने लगे। लेकिन नमाज़े आयात की तकमील सूरज या चांद ग्रहन ख़त्म होने के बाद भी कर सकते हैं।
1505. अगर कोई शख़्स नमाज़े आयात पढ़ने में इतनी ताख़ीर कर दे या चांद या सूरज ग्रहन से निकलना शूरू हो जाए तो अदा की नीयत में कोई हरज नहीं है लेकिन उसके मुकम्मल तौर पर ग्रहन से निकल जाने के बाद नमाज़ पढ़े तो फिर ज़रूरी है कि क़ज़ा की नीयत करे।
1506. अगर चांद या सूरज को ग्रहन लगने की मुद्दत एक रक्अत नमाज़ के बराबर या उससे भी कम हो तो जो नमाज़ वह पढ़ रहा है अदा है और यही हुक्म है अगर उनके ग्रहन की मुद्दत उससे ज़्यादा हो लेकिन इंसान नमाज़ न पढ़े यहाँ तक कि ग्रहन ख़त्म होने में एक रक्अत पढ़ने के बराबर या उससे कम वक़्त बाक़ी हो।
1507. जब कभी ज़लज़ला, बादलों की गरज, बिजली की कड़क, और उसी जैसी चीज़ें वुक़ू पज़ीर हों तो अगर उनका वक़्त वसी हो तो नमाज़े आयात को फ़ौरन पढ़ना ज़रूरी नहीं है बसूरते दीगर ज़रूरी है कि फ़ौरन नमाज़े आयात पढ़े यानी इतनी जल्दी पढ़े कि लोगों की नज़रों में ताखीर करना शुमार न हो अगर ताख़ीर करे तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि बाद में अदा और क़ज़ा की नीयत किये बग़ैर पढ़े।
1508. अगर किसी शख़्स को चाँद या सूरज को ग्रहन लगने का पता न चले और उनके ग्रहन से बाहर आने के बाद पता चले कि पूरे सूरज या पूरे चांद को ग्रहन लगा था तो ज़रूरी है कि नमाज़े आयात की क़ज़ा करे लेकिन अगर उसे यह पता चले कि कुछ हिस्से को ग्रहन लगा था तो नमाज़े आयात की क़ज़ा उस पर वाजिब नहीं है।
1509. अगर कुछ लोग यह कहें कि चाँद को या यह कहें कि सूरज को ग्रहन लगा है और इंसान को ज़ाती तौर पर उनके कहने से यक़ीन या इत्मीनान हासिल न हो इसलिये वह नमाज़े आयात न पढ़े और बाद में पता चले कि उन्होंने ठीक कहा था तो उस सूरत में जबकि पूरे चाँद को या पूरे सूरज को ग्रहन लगा हो नमाज़े आयात पढ़े लेकिन अगर कुछ हिस्से को ग्रहन लगा हो तो नमाज़े आयात का पढ़ना उस पर वाजिब नहीं है। और यही हुक्म उस सूरत में है जबकि दो आदमी जिनके आदिल होने के बारे में इल्म न हो यह कहें कि चाँद को या सूरज को ग्रहन लगा है और बाद में मालूम हो कि वह आदिल थे।
1510. अगर इंसान को माहिरीने फ़लकीयात के कहने पर जो इल्मी क़ायदे की रू से सूरज को और चाँद को ग्रहन लगने का वक़्त जानते हों इत्मीनान हो जाए कि सूरज को या चाँद को गहन लगा है तो ज़रूरी है कि नमाज़े आयात पढ़े और इसी तरह अगर वह कहें कि सूरज या चाँद को फ़लां वक़्त ग्रहन लगेगा और इतनी देर तक रहेगा और इंसान को उनके कहने से इत्मीनान हासिल हो जाए तो उनके कहने पर अमल करना ज़रूरी है।
1511. अगर किसी शख़्स को इल्म हो जाए कि जो नमाज़े आयात उसने पढ़ी है वह बातिल थी तो ज़रूरी है कि दोबारा पढ़े और अगर वक़्त गुज़र गया हो तो उसकी क़ज़ा बजा लाए।
1512. अगर यौमिया नमाज़ के वक़्त नमाज़े आयात भी इंसान पर वाजिब हो जाए और उसके पास दोनों के लिये वक़्त हो तो जो भी पहले पढ़ ले कोई हरज नहीं है और अगर दोनों में से किसी एक का वक़्त तंग हो तो पहले वह नमाज़ पढ़े जिसका वक़्त हो और अगर दोनों का वक़्त तंग हो तो ज़रूरी है कि यौमिया नमाज़ पढ़े।
1513. अगर किसी शख़्स को यौमिया नमाज़ पढ़ते हुए इल्म हो जाए कि नमाज़े आयात का वक़्त तंग है और यौमिया नमाज़ का वक़्त भी तंग हो तो ज़रूरी है कि पहले यौमिया नमाज़ को तमाम करे और बाद में नमाज़े आयात पढ़े और अगर यौमिया नमाज़ का वक़्त तंग न हो तो उसे तोड़ दे और पहले नमाज़े आयात और उसके बाद यौमिया नमाज़ बजा लाए।
1514. अगर किसी शख़्स को नमाज़े आयात पढ़ते हुए इल्म हो जाए कि यौमिया नमाज़ का वक़्त तंग है तो ज़रूरी है कि नमाज़े आयात को छोड़ दे और यौमिया नमाज़ को पढ़ने में मशग़ूल हो जाए और यौमिया नमाज़ को तमाम करने के बाद इससे पहले की कोई ऐसा काम करे जो नमाज़ को बातिल करता हो तो बाक़ी मांदा नमाज़े आयात वहीं से पढ़े जहां से छोड़ी थी।
1515. जब औरत हैज़ या निफ़ास की हालत में हो और सूरज या चांद को ग्रहन लग जाए या ज़लज़ला आ जाए तो उस पर नमाज़े आयात वाजिब नहीं है और न ही उसकी क़ज़ा है।
नमाज़े आयात पढ़ने का तरीक़ा
1516. नमाज़े आयात की दो रक्अतें हैं और हर रक्अत में पांच रूकू हैं। इस के पढ़ने का तरीक़ा यह है कि नीयत करने के बाद इंसान तक्बीर कहे और एक दफ़्आ अलहम्द और एक पूरा सूरा पढ़े और रूकू में जाए और फिर रूकूउ से सर उठाए और फिर दोबारा एक दफ़्आ अलहम्द और एक सूरा पढ़े और फिर रूकू में जाए। इस अमल को पांच दफ़्आ अंजाम दे और पांचवें रूकू से क़ियाम की हालत में वापस आने के बाद दो सज्दे बजा लाए और फिर उठ खड़ा हो और पहली रक्अत की तरह दूसरी रक्अत बजा लाए और तशह्हुद और सलाम पढ़ कर नमाज़ तमाम करे।
1517. नमाज़े आयात में यह भी मुम्कीन है कि इंसान नीयत करने और तक्बीर और अलहम्द पढ़ने के बाद एक सूरे की आयतों के पांच हिस्से करे और एक आयत या उससे कुछ ज़्यादा पढ़े बल्कि एक आयत से कम भी पढ़ सकता है लेकिन एहतियात की बिन पर ज़रूरी है कि मुकम्मल जुमला हो और उसके बाद रूकू में जाए और फिर खड़ा हो जाए और अलहम्द पढ़े बग़ैर उसी सूरे का दूसरा हिस्सा पढ़े और रूकू में जाए इसी तरह इस अमल को दोहराता रहे हत्ता की पांचवें रूकू से पहले सूरे को ख़त्म कर दे। मसलन सूरा ए फ़लक़ में पहले बिस्मिल्लाहिर्रहमनिर्रहीम क़ुल अऊज़ो बे रब्बिल फ़लक़े पढ़े और रूकू में जाए उसके बाद खड़ा हो और पढ़े, मिन शर्रे मा ख़लक़ा फिर रूकू में जाए और फिर खड़ा हो और पढ़े मिन शर्रे ग़ासेक़िन इज़ा वक़बा और दोबारा रूकू में जाए। उसके बाद खड़ा हो और पढ़े, व मिन शर्रिन नफ़्फ़ासाते फ़िल उक़दे और रूकू में चला जाए और फिर खड़ा हो जाए और पढ़े, व मिन शर्रे हासिदिन इज़ा हसद और सके बाद पांचवें रूकू में जाए और (रूकू से) खड़ा होने के बाद दो सज्दे करे और दूसरी रक्अत भी पहली रक्अत की तरह बजा लाए और उसके बाद दूसरे सज्दे के बाद तशह्हुद और सलाम पढ़े। और यह भी जाइज़ है कि सूरे को पांच से कम हिस्सों में तक़सीम करे लेकिन जिस वक़्त भी सूरा ख़त्म करे लाज़िमी है कि बाद वाले रूकू से पहले अलहम्द पढ़े।
1518. अगर कोई शख़्स नमाज़े आयात की एक रक्अत में पांच दफ़्आ अलहम्द और सूरा पढ़े और दूसरी रक्अत में एक दफ़्आ अलहम्द पढ़े और सूरे को पांच हिस्सों में तक़सीम कर दे तो कोई हरज नहीं है।
1519. जो चीज़ें यौमिया नमाज़ में वाजिब और मुस्तहब हैं वह नमाज़े आयात में भी वाजिब और मुस्तहब हैं अलबत्ता अगर नमाज़े आयात जमाअत के साथ हो रही हो तो अज़ान और इक़ामत की बजाय तीन दफ़्आ बतौरे रजा, अस्सलाम कहा जाए लेकिन अगर यह नमाज़ जमाअत के साथ न पढ़ी जा रही हो तो कुछ कहने की ज़रूरत नहीं।
1520. नमाज़े आयात पढ़ने वाले के लिये मुस्तहब है कि रूकू से पहले और उसके बाद तक्बीर कहे और पांचवें और दसवें रूकू के बाद तक्बीर से पहले, समेअल्लाहो लेमन हमेदा भी कहे।
1521. दूसरे, चौथे, छठें, आठवें और दसवें रूकू से पहले क़ुनूत पढ़ना मुस्तहब है और अगर क़ुनूत सिर्फ़ दसवें रूकू से पहले पढ़ लिया जाए तब भी काफ़ी है।
1522. अगर कोई शख़्स नमाज़े आयात में शक करे कि कितनी रक्अतें पढ़ी हैं और किसी नतीजे पर न पहुंच सके तो उसकी नमाज़ बातिल है।
1523. अगर (कोई शख़्स जो नमाज़े आयात पढ़ रहा हो) शक करे कि वह पहली रक्अत के आख़िरी रूकू में है या दूसरी रक्अत के पहले रूकू में और किसी नतीजे पर न पहुँच सके तो उसकी नमाज़ बातिल है लेकिन अगर मिसाल के तौर पर शक करे कि चार रूकू बजा लाया है या पांच और उस का यह शक सज्दे में जाने से पहले हो तो जिस रूकू के बारे में उसे शक हो कि बजा लाया है या नहीं उसे अदा करना ज़रूरी है लेकिन अगर सज्दे के लिये झुक गया हो तो ज़रूरी है कि अपने शक की परवाह न करे।
1524. नमाज़े आयात का हर रूकू रुक्न है और अगर उन में अमदन या कमी या बेशी हो जाए तो नमाज़ बातिल है। और यही हुक्म है अगर सहवन कमी हो या एहतियात की बिना पर ज़्यादा हो।
ईदे फ़ित्र और ईदे क़ुर्बान की नमाज़
1525. इमामे अस्र (अ0) के ज़माना ए हुज़ूर में ईदे फ़ित्र व ईदे क़ुर्बान की नमाज़ें वाजिब हैं और उनका जमाअत के साथ पढ़ना ज़रूरी है लेकिन हमारे ज़माने में जब इमामे अस्र (अ0) ग़ैबते कुबरा में हैं यह नमाज़ें मुस्तहब हैं और बा जमाअत व फ़ुरादा दोनों तरह पढ़ी जा सकती हैं।
1526. नमाज़े ईदे फ़ित्र व क़ुर्बान का वक़्त ईद के दिन तुलूए आफ़ताब से ज़ोहर तक है।
1527. ईदे क़ुर्बान की नमाज़ सूरज चढ़ आने के बाद पढ़ना मुस्तहब है और ईदे फ़ित्र में मुस्तहब है कि सूरज चढ़ आने के बाद इफ़्तार किया जाए फ़ितरा दिया जाए और बाद में दोगाना ए ईद अदा किया जाए।
1528. ईदे फ़ित्र व क़ुर्बान की नमाज़ दो रक्अत है जिसकी पहली रक्अत में अलहम्द और सूरा पढ़ने के बाद बेहतर यह है कि पाँच तक्बीर के बाद एक और तक्बीर के दरमियान एक क़ुनूत पढ़े और पाँचवीं तक्बीर के बाद एक और तक्बीर कहे और रूकू में चला जाए और फिर दो सज्दे बजा लाए और उठ खड़ा हो और दूसरी रक्अत में चार तक्बीरें कहे और हर दो तक्बीर के दरमियान क़ुनूत पढ़े और चौथी तक्बीर के बाद एक और तक्बीर कहकर रूकू में चला जाए और रूकू के बाद दो सज्दे करे और तशह्हुद पढ़े और सलाम कहकर नमाज़ को तमाम कर दे।
1529. ईदे फ़ित्र व क़ुर्बान की नमाज़ के क़ुनूत में जो दुआ और ज़िक्र भी पढ़ा जाए काफ़ी है लेकिन बेहतर है कि यह दुआ पढ़ी जाएः-
अल्लाहुम्मा अहलल किबरियाए वल अज़मते व अहलल जूदे वल जबरूते व अहलल अफ़्वे वर्रहमते व अहलत्तक़वा वल मग़्फ़िरते अस्अलुका बेहक़्क़े हाज़ल यौमिल्लज़ी जअल्तहू लिल मुसलेमीना ईदौं वले मोहम्मदिन सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही ज़ुखरौं व शरफ़ौं व करामतौं व मज़ीदा अन तुसल्लिया अला मोहम्मदिंव्व आले मोहम्मदिन व अन तुदखिलनी फ़ी कुल्ले खैरिन अद्ख़ल्ता फ़ीहे मोहम्मदौं व अला मोहम्मद व अन तुख़रिजनी मिन कुल्ले सूइन अख़रजता मिन्हो मोहम्मदौं व आला मोहम्मद सलवातुका अलैहे व अलैहिम अज्मईन अल्लाहुम्मा इन्नी अस्अलुका ख़ैरा मा सअलका बेही इबादुकस्सालेहून व अऊज़ो बेका मिम्मस तआज़ा मिन्हो इबादुसल मुख़्लेसून
1530. इमामे अस्र (अ0) के ज़माना ए ग़ैबत में अगर नमाज़े ईदे फ़ित्र व ईदे क़ुर्बान जमाअत से पढ़ी जाए तो एहतियाते लाज़िम यह है कि इसके बाद दो ख़ुतूबे पढ़े जायें और बेहतर यह है कि ईदे फ़ित्र के ख़ुतूबे में फ़ित्रे के अहकाम बयान हों और ईदे क़ुर्बान के ख़ुतूबे में क़ुर्बानी के अहकाम बयान किये जायें।
1531. ईद की नमाज़ के लिये कोई सूरा मख़्सूस नहीं है लेकिन बेहतर यह है कि पहली रक्अत में (अलहम्द के बाद) सूरा ए ग़ाशिया (88 वां सूरा) पढ़ा जाए या पहली रक्अत में सूरा ए अअला (87 वां सूरा) और दूसरी रक्अत में सूरा ए शम्स पढ़ा जाए।
1532. नमाज़े ईद खुले मैदान में पढ़ना मुस्तहब है लेकिन मक्का ए मुकर्रिमा में मुस्तहब है कि मस्जिदुल हराम में पढ़ी जाए।
1533. मुस्तहब है कि नमाज़े ईद के लिये पैदल और पा बरहना और बावक़ार तौर पर जायें और नमाज़ से पहले ग़ुस्ल करें और सफ़ैद अम्मामा सर पर बांधें।
1534. मुस्तहब है कि नमाज़े ईद में ज़मीन पर सज्दा किया जाए और तक्बीरें कहते वक़्त हाथों को बलन्द किया जाए और जो शख़्स नमाज़े ईद पढ़ रहा हो ख़्वाह वह इमामे जमाअत हो या फ़ुरादा नमाज़ पढ़ रहा हो नमाज़ बलन्द आवाज़ से पढ़े।
1535. मुस्तहब है कि ईदे फ़ित्र की रात को मग़्रिब व इशा की नमाज़ के बाद और ईदे फ़ित्र के के दिन नमाज़े सुब्ह के बाद और नमाज़े ईदे फ़ित्र के बाद यह तक्बीरें कही जायेः-
अल्लाहो अक्बर, अल्लाहो अक्बर, ला इलाहा इल्लल्लाहो वल्लाहो अक्बर, अल्लाहो अक्बर व लिल्लाहिल हम्द, अल्लाहो अक्बरो अलामा हदाना।
1536. ईदे क़ुर्बान में दस नमाज़ों के बाद जिनमें से पहली नमाज़ें ईद के दिन की नमाज़े ज़ौहर है और और आख़िरी बारहवीं तारीख़ की नमाज़े सुब्ह है इन तक्बीरात का पढ़ना मुस्तहब है जिनका ज़िक्र साबिक़ा मस्अले में हो चुका है और उसके बाद, अल्लाहो अक्बरो अला मा रज़क़्ना मिमबहीमतिल अन्आमे वलहम्दो लिल्लाहे अला मा अब्ललाना। पढ़ना भी मुस्तहब है लेकिन अगर ईदे क़ुर्बान के मौक़े पर इंसान मिना में हो तो मुस्तहब है कि यह तक्बीरें पन्द्रह नमाज़ों के बाद पढ़े जिन में से पहली नमाज़ ईद के दिन नमाज़े ज़ोहर और आख़री तेरहवीं ज़िलहिज्जा की नमाज़े सुब्ह है।
1537. एहतियाते मुस्तहब यह है कि औरतें नमाज़े ईद पढ़ने के लिये न जायें लेकिन यह एहतियात उम्र रसीदा औरतों के लिये नहीं है।
1538. नमाज़े ईद में भी दूसरी नमाज़ों की तरह मुक्तदी को चाहिये कि अलहम्द और सूरा के अलावा नमाज़ के अज़्कार ख़ुद पढ़े।
1539. अगर मुक्तदी उस वक़्त पहुंचे जब इमाम नमाज़ की कुछ तक्बीरे कह चुका हो तो इमाम के रूकू में जाने के बाद ज़रूरी है कि जितनी तक्बीरें और क़ुनूत उसने इमाम के साथ नहीं पढ़ी उन्हें पढ़े और अगर हर क़ुनूत में एक दफ़्आ सुब्हानल्लाह या एक दफ़्आ अलहम्दो लिल्लाह कह दे तो काफ़ी है।
1540. अगर कोई शख़्स नमाज़े ईद में उस वक़्त पहुंचे जब इमाम रूकू में हो तो वह नीयत कर के और नमाज़ की पहली तक्बीर कह कर रूकू में जा सकता है।
1541. अगर कोई शख़्स नमाज़े ईद में एक सज्दा भूल जाए तो ज़रूरी है कि नमाज़ के बाद उसे बजा लाए। और इसी तरह कोई ऐसा फ़ेल नमाज़े ईद में सर्ज़द हो जिसके लिये यौमिया नमाज़ में सज्दा ए सहव लाज़िम है तो नमाज़े ईद पढ़ने वाले के लिये ज़रूरी है कि दो सज्दा ए सहव बजा लाए।
नमाज़ के लिये अजीर बनाना
1542. इंसान के मरने के बाद उन नमाज़ों और दूसरी इबादतों के लिये जो वह ज़िन्दगी में न बजा लाया हो किसी दूसरे शख़्स को अजीर बनाया जा सकता है यानी वह नमाज़ें उसे उजरत दे कर पढ़वाई जा सकती हैं और अगर कोई शख़्स बग़ैर उजरत लिये उन नमाज़ों और दूसरी इबादतों को बजा लाए तब भी सहीह है। 1543. इंसान बाज़ मुस्तहब कामों मसलन हज व उमरे और रौज़ा ए रसूल (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम) या क़ुबूरे अइम्मा (अ0) की ज़ियारत के लिये ज़िन्दा अश्ख़ास की तरफ़ से अजीर बन सकता है और यह भी कर सकता है कि मुस्तहब काम अंजाम दे कर उस का सवाब मुर्दा या ज़िन्दा अश्ख़ास को हदिया कर दे।
1544. जो शख़्स मैयित की क़ज़ा नमाज़ के लिये अजीर बने उसके लिये ज़रूरी है कि या तो मुज्तहिद हो या नमाज़ तक़लीद के मुताबिक़ सहीह तरीक़े पर अदा करे या एहतियात पर अमल करे बशर्ते कि मवारिदे एहतियात को पूरी तरह जानता हो।
1545. ज़रूरी है कि अजीर नीयत करते वक़्त मैयित को मुअय्यन करे और ज़रूरी नहीं कि मैयित का नाम जानता हो बल्कि अगर नीयत करे कि मैं यह नमाज़ उस शख़्स के लिये पढ़ रहा हूँ जिस के लिये मैं अजीर हुआ हूँ तो काफ़ी है।
1546. ज़रूरी है कि अजीर जो अमल बजा लाए उसके लिये नीयत करे कि जो कुछ मैयित के ज़िम्मे है वह बजा ला रहा हूँ और अगर अजीर कोई अमल अंजाम दे और उसका सवाब मैयित को हदिया कर दे तो यह काफ़ी नहीं है।
1547. अजीर ऐसे शख़्स को मुक़र्रर करना ज़रूरीह है जिसके बारे में इत्मीनान हो कि वह अमल को बजा लायेगा।
1548. जिस शख़्स को मैयित की नमाज़ों के लिये अज़ीर बनाया जाए अगर उसके बारे में पता चले कि वह अमल को बजा नहीं लाया या बातिल तौर पर बजा लाया है तो दोबारा (किसी दूसरे शख़्स को) अजीर मुक़र्रर करना ज़रूरी है।
1549. जब कोई शख़्स शक करे कि अजीर ने अमल अंजाम दिया है या नहीं अगरचे वह कहे कि मैंने अंजाम दे दिया है लेकिन उसकी बात पर इत्मीनान न हो तो ज़रूरी है कि दोबारा अजीर मुक़र्रर करे। और अगर शक करे कि उस ने सहीह तौर पर अंजाम दिया है या नहीं तो उसे सहीह समझ सकता है।
1550. जो शख़्स कोई उज़्र रखता हो मसलन तयम्मुम करके या बैठ कर नमाज़ पढ़ता हो उसे एहतियात की बिना पर मैयित की नमाज़ों के लिये अजीर बिल्कुल मुक़र्रर न किया जाए अगरचे मैयित की नमाज़ें भी इसी तरह क़ज़ा हुई हों।
1551. मर्द औरत की तरफ़ से अजीर बन सकता है और औरत मर्द की तरफ़ से अजीर बन सकती है और जहाँ तक नमाज़ बलन्द आवाज़ से पढ़ने का सवाल है ज़रूरी है कि अजीर अपने वज़ीफ़े के मुताबिक़ अमल करे।
1552. मैयित की क़ज़ा नमाज़ों में तरतीब वाजिब नहीं है सिवाय उन नमाज़ों के जिनकी अदा में तरतीब है मसलन एक दिन की नमाज़े ज़ोहर व अस्र या मग़रिब व इशा जैसा कि पहले ज़िक्र हो चुका है।
1553. अगर अजीर के साथ तय किया जाए कि अमल को एक मख़्सूस तरीक़े से अंजाम देगा तो ज़रूरी है कि उस अमल को उसी तरीक़े से अंजाम दे और अगर कुछ तय न हुआ हो तो ज़रूरी है कि वह अमल अपने वज़ीफ़े के मुताबिक़ अंजाम दे और एहतियाते मुस्तहब यह है कि अपने वज़ीफ़े और मैयित के वज़ीफ़े में से जो भी एहतियात के ज़्यादा क़रीब हो उस पर अमल करे मसलन अगर मैयित का वज़ीफ़ा तस्बीहाते अरबआ तीन दफ़्आ पढ़ना था और उसकी अपनी तक्लीफ़ एक दफ़्आ पढ़ना हो तो तीन दफ़्आ पढ़े।
1554. अगर अजीर के साथ यह तय न किया जाए कि नमाज़ के मुस्तहब्बात किस मिक़्दार में पढ़ेगा तो ज़रूरी है कि उमूमन जितने मुस्तहब्बात पढ़े जाते हैं उन्हें बजा लाए।
1555. अगर इंसान मैयित की क़ज़ा नमाज़ों के लिये कई अश्ख़ास को अजीर मुक़र्रर करे तो जो कुछ मस्अला न0 1552 में बताया गया है उसकी बिना पर ज़रूरी नहीं कि वह हर अजीर के लिये वक़्त मुअय्यन करे।
1556. अगर कोई शख़्स अजीर बने कि मिसाल के तौर पर एक साल में मैयित की नमाज़ें पढ़ देगा और साल ख़त्म होने से पहले मर जाए तो उन नमाज़ों के लिये जिन के बारे में इल्म हो कि वह बजा नहीं लाया किसी और शख़्स को अजीर मुक़र्रर किया जाए और जिन नमाज़ों के बारे में एहतिमाल हो कि वह उन्हें नहीं बजा लाया एहतियाते वाजिब की बिना पर उनके लिये भी अजीर मुक़र्रर किया जाए।
1557. जिस शख़्स को मैयित की क़ज़ा नमाज़ों के लिये अजीर मुक़र्रर किया हो और उसने उन सब नमाज़ों की उजरत भी वसूल कर ली हो अगर वह सारी नमाज़ें पढ़ने से पहले मर जाए तो अगर यह तय किया गया हो कि सारी नमाज़ें वह खुद ही पढ़ेगा तो उजरत देने वाले बाक़ी नमाज़ों की तय शुदा उजरत वापस ले सकतें हैं या इजारा को फ़स्ख़ कर सकते हैं और उसकी उजरतुल मिस्ल दे सकते हैं। और अगर यह तय न किया गया हो कि सारी नमाज़े अजीर खुद पढ़ेगा तो ज़रूरी है कि अजीर के वरसा उस के माल में से बाक़ी मांदा नमाज़ों के लिये किसी को अजीर बनायें लेकिन अगर उसने कोई माल न छोड़ा हो तो उस के वरसा पर कुछ भी वाजिब नहीं है।
1558. अगर अजीर मैयित की सब क़ज़ा नमाज़ें पढ़ने से पहले मर जाए और उसके अपने ज़िम्में भी क़ज़ा नमाज़ें हों तो मस्अला ए साबिक़ा में जो तरीक़ा बताया गया है उस पर अमल करने के बाद अगर फ़ौतशुदा अजीर के माल से कुछ बचे और इस सूरत में जबकि उसने वसीयत की हो और उसके वरसा भी इजाज़त दें तो उसकी सब नमाज़ों के लिये अजीर मुक़र्रर किया जा सकता है और अगर वरसा इजाज़त न दें तो माल का तीसरा हिस्सा उसकी नमाज़ों पर सर्फ़ किया जा सकता है।
रोज़े के अहकाम
(शरीअते इस्लाम में) रोज़ा से मुराद है ख़ुदावन्दे आलम की रिज़ा के लिये इंसान अज़ाने सुब्ह से मग़्रिब तक नौ चीज़ों से जो बाद में बयान की जायेंगी परहेज़ करे।
नीयत
1559. इंसान के लिए रोज़े की नीयत दिल से गुज़ारना या मसलन यह कहना कि, मैं कल रोज़ा रखूंगा ज़रूरी नहीं बल्कि उस का इरादा करना काफ़ी है कि वह अल्लाह तआला की रिज़ा के लिये अज़ाने सुब्ह से मग़्रिब तक कोई भी ऐसा काम नहीं करेगा जिससे रोज़ा बातिल होता हो और यह यक़ीन हासिल करने के लिये इस तमाम वक़्त में वह रोज़े से रहा है ज़रूरी है कि कुछ देर अज़ाने सुब्ह से पहले और कुछ देर मग़्रिब के बाद भी ऐसे काम करने से परहेज़ न करे जिन से रोज़ा बातिल हो जाता है।
1560. इंसान माहे रमज़ानुल मुबारक की हर रात उस से अगले दिन के रोज़े की नीयत कर सकता है और बेहतर यह है कि उस महीने की पहली रात को ही सारे महीने के रोज़ों की नीयत करे।
1561. वह शख़्स जिसका रोज़ा रखना का इरादा हो उसके लिये माहे रमज़ान में रोज़े की नीयत का आखिरी वक़्त अज़ाने सुब्ह से पहले है। यानी अज़ाने सुब्ह से पहले रोज़े की नीयत ज़रूरी है अगरचे नीन्द या ऐसी ही किसी वजह से अपने इरादे की तरफ़ मुतवज्जह न हो।
1562. जिस शख़्स न ऐसा कोई काम न किया हो जो रोज़े को बातिल करे तो वह जिस वक़्त भी दिन में मुस्तहब रोज़े की नीयत कर ले अगरचे मग़रिब होने में कम वक़्त ही रह गया हो, उस का रोज़ा सहीह है।
1563. जो शख़्स माहे रमज़ानुल मुबारक के रोज़ों और उसी तरह वाजिब रोज़ों में जिन के दिन मुअय्यन हैं रोज़े की नीयत किये बग़ैर अज़ाने सुब्ह से पहले सो जाए अगर वह ज़ोहर से पहले बेदार हो जाए और रोज़े की नीयत करे तो उसका रोज़ा सहीह है और अगर वह ज़ोहर के बाद बेदार हो तो एहतियात की बिना पर ज़रूरी है कि क़ुर्बते मुतलक़ा की नीयत न करे और उस दिन के रोज़े की क़ज़ा भी बजा लाए।
1564. अगर कोई शख़्स माहे रमज़ानुल मुबारक के रोज़ों के अलावा कोई दूसरा रोज़ा रखना चाहे तो ज़रूरी है कि उस रोज़े को मुअय्यन करे मसलन नीयत करे कि मैं क़ज़ा या कफ़्फ़ारे का रोज़ा रख रहा हूँ लेकिन माहे रमज़ानुल मुबारक में यह नीयत करना ज़रूरी नहीं कि मैं सारे रमज़ानुल मुबारक का रोज़ा रख रहा हूँ बल्कि अगर किसी को इल्म न हो या भूल जाए कि माहे रमज़ान है और किसी दूसरे रोज़े की नीयत करे तब भी वह रोज़ा माहे रमज़ान का रोज़ा शुमार होगा।
1565. अगर कोई शख़्स यह जानता हो कि रमज़ान का महीना है और जानबूझ कर माहे रमज़ान के रोज़े के अलावा किसी दूसरे रोज़े की नीयत करे तो वह रोज़ा जिसकी उसने नीयत की है वह रोज़ा शुमार नहीं होगा और इसी तरह वह माहे रमज़ान का रोज़ा भी शुमार नहीं होगा अगर वह नीयत क़स्दे क़ुर्बत के मनाफ़ी हो बल्कि अगर मनाफ़ी न हो तब भी एहतियात की बिना पर वह रोज़ा माहे रमज़ान का रोज़ा शुमार नहीं होगा।
1566. मिसाल के तौर पर अगर कोई माहे रमज़ानुल मुबारक के पहले रोज़े की नीयत करे लेकिन बाद में मालूम हो कि यह दूसरा रोज़ा या तीसरा रोज़ा था तो उसका रोज़ा सहीह है।
1567. अगर कोई शख़्स अज़ाने सुब्ह से पहले रोज़े की नीयत करने के बाद बेहोश हो जाए और फिर उसे दिन में किसी वक़्त होश आ जाए तो एहतियाते वाजिब यह है कि उस दिन का रोज़ा तमाम करे और उसकी क़ज़ा भी बजा लाए।
1568. अगर कोई शख़्स अज़ाने सुब्ह से पहले रोज़े की नीयत करे और फिर बेहोश हो जाए और फिर उसे दिन में किसी वक़्त होश आ जाए तो एहतियाते वाजिब यह है कि उस दिन का रोज़ा तमाम करे और उसकी क़ज़ा भी बजा लाए।
1569. अगर कोई शख़्स अज़ाने सुब्ह से पहले रोज़े की नीयत करे और सो जाए और मग़्रिब के बाद बेदार हो तो उसका रोज़ा सहीह है।
1570. अगर किसी शख़्स को इल्म न हो या भूल जाए कि माहे रमज़ान है और ज़ोहर से पहले इस अम्र की जानिब मुतवज्जह हो और इस दौरान कोई ऐसा काम कर चुका हो जो रोज़े को बातिल करता है तो उसका रोज़ा बातिल होगा लेकिन यह ज़रूरी है कि मग़्रिब तक कोई ऐसा काम न करे जो रोज़े को बातिल करता हो और माहे रमज़ान के बाद रोज़े की क़ज़ा भी करे। और अगर ज़ोहर के बाद मुतवज्जह हो तो कोई ऐसा काम भी न किया हो जो रोज़े को बातिल करता हो तो उसका रोज़ा सहीह है।
1571. अगर माहे रमज़ान में बच्चा अज़ाने सुब्ह से पहले बालिग़ हो जाए तो ज़रूरी है कि रोज़ा रखे और अगर अज़ाने सुब्ह के बाद बालिग़ हो तो उस दिन का रोज़ा उस पर वाजिब नहीं है लेकिन अगर मुस्तहब रोज़ा रखने का इरादा कर लिया हो तो इस सूरत में एहतियात की बिना पर उस दिन के रोज़े को पूरा करना ज़रूरी है।
1572. जो शख़्स मैयित के रोज़े रखने के लिये अजीर बना हो या उसके ज़िम्मे कफ़्फ़ारे के रोज़ें हों अगर वह मुस्तहब रोज़े रखे तो कोई हरज नहीं लेकिन अगर क़ज़ा रोज़े किसी के ज़िम्मे हों तो वह मुस्तहब रोज़े नहीं रख सकता और अगर भूल कर मुस्तहब रोज़ा रख ले तो इस सूरत में अगर ज़ोहर से पहले याद आ जाए तो उसका रोज़ा कल्अदम हो जाता है और वह अपनी नीयत वाजिब रोज़े की जानिब मोड़ सकता है। और अगर वह ज़ोहर के बाद मुतवज्जह हो तो एहतियात की बिना पर उसका रोज़ा बातिल है और अगर उसे मग़्रिब के बाद याद आए तो तो उसके रोज़े का सहीह होना इश्काल से ख़ाली नहीं।
1573. अगर माहे रमज़ान के रोज़े के अलावा कोई दूसरा मख़्सूस रोज़ा इंसान पर वाजिब हो मसलन उसने मन्नत मानी हो कि एक मुक़र्रर दिन को रोज़ा रखेगा और जान बूझ कर अज़ाने सुब्ह से पहले नीयत न करे तो उसका रोज़ा बातिल है और अगर उसे मालूम न हो कि उस दिन का रोज़ा उस पर वाजिब है या भूल जाए और ज़ोहर से पहले उसे याद आए तो अगर उसने कोई ऐसा काम न किया हो जो रोज़े को बातिल करता हो और रोज़े की नीयत कर ले तो उसका रोज़ा सहीह है और अगर ज़ोहर के बाद उसे याद आए तो माहे रमज़ान के रोज़े में जिस एहतियात का ज़िक्र किया गया है उसका ख़्याल रखे। 1574. अगर कोई शख़्स किसी ग़ैर मुअय्यन वाजिब रोज़े के लिये मसलन रोज़ा ए कफ़्फ़ारा के लिये ज़ोहर के नज़दीक तक अमदन नीयत न करे तो कोई हरज नहीं बल्कि अगर नीयत से पहले मुसम्मम इरादा रखता हो कि रोज़ा नहीं रखेगा या मुज़ब्ज़ब हो कि रोज़ा रखे या न रखे तो अगर उसने कोई ऐसा काम न किया हो जो रोज़े को बातिल करता हो और ज़ोहर से पहले रोज़े की नीयत कर ले तो उसका रोज़ा सहीह है।
1575. अगर कोई काफ़िर माहे रमज़ान में ज़ोहर से पहले मुसलमान हो जाए और अज़ाने सुब्ह से उस वक़्त तक कोई ऐसा काम न किया हो जो रोज़े को बातिल करता हो तो एहतियाते वाजिब की बिना पर ज़रूरी है कि रोज़े की नीयत करे और रोज़े को तमाम करे और अगर दिन का रोज़ा न रखे तो उसकी क़ज़ा बजा लाए।
1576. अगर कोई बीमार शख़्स माहे रमज़ान के किसी दिन में ज़ोहर से पहले तन्दुरुस्त हो जाए और उसने उस वक़्त तक कोई ऐसा काम न किया हो जो रोज़े को बातिल करता हो तो नीयत कर के उस दिन का रोज़ा रखना ज़रूरी है और अगर ज़ोहर के बाद तन्दुरुस्त हो तो उस दिन का रोज़ा उस पर वाजिब नहीं है।
1577. जिस दिन के बारे में इंसान को शक हो कि शाबान की आख़िरी तारीख़ है या रमज़ान की पहली तारीख़, उस दिन का रोज़ा रखना उस पर वाजिब नहीं है और अगर रोज़ा रखना चाहे तो रमज़ानुल मुबारक के रोज़े की नीयत नहीं कर सकता लेकिन नीयत करे कि अगर रमज़ान है तो रमज़ान का रोज़ा है और अगर रमज़ान नहीं है तो क़ज़ा रोज़ा या उसी जैसा कोई और रोज़ा है बईद नहीं की उसका रोज़ा सहीह हो लेकिन बेहतर यह है कि क़ज़ा रोज़े वग़ैरा की नीयत करे और अगर बाद में पता चले कि माहे रमज़ान था तो रमज़ान का रोज़ा शुमार होगा लेकिन अगर नीयत सीर्फ़ रोज़े की करे और बाद में मालूम हो कि रमज़ान था तब भी काफ़ी है।
1578. अगर किसी दिन के बारे में इंसान को शक हो कि शाबान की आख़िरी तारीख़ है या रमज़ानुल मुबारक की पहली तारीख़ तो वह क़ज़ा या मुस्तहब या ऐसे किसी और रोज़े की नीयत कर के रोज़ा रख ले और दिन में किसी वक़्त उसे पता चले कि माहे रमज़ान है तो ज़रूरी है कि माहे रमज़ान के रोज़े की नीयत कर ले।
1579. अगर किसी मुअय्यन वाजिब रोज़े के बारे में मसलन रमज़ानुल मुबारक के रोज़े के बारे में इंसान मुज़ब्ज़ब हो कि अपने रोज़े को बातिल करे या न करे या रोज़े को बातिल करने का क़स्द करे तो ख़्वाह उसने जो क़स्द किया हो उसे तर्क कर दे और कोई ऐसा काम भी न करे जिस में रोज़ा बातिल होता हो उसका रोज़ा एहतियात की बिना पर बातिल हो जाता है।
1580. अगर कोई शख़्स जो मुस्तहब या ऐसा वाजिब रोज़ा मसलन कफ़्फ़ारे का रोज़ा रखे हुए हो जिसका वक़्त मुअय्यन न हो किसी ऐसे काम का क़स्द करे जो रोज़े को बातिल करता हो या मुज़ब्ज़ब हो कि कोई ऐसा काम करे या न करे तो अगर वह कोई ऐसा काम न करे और वाजिब रोज़े में ज़ोहर से पहले और मुस्तहब रोज़े में ग़ुरुब से पहले रोज़े की नीयत कर ले तो उस का रोज़ा सहीह है। वह चीज़ें जो रोज़े को बातिल करती हैं
वो चीज़ें रोज़े को बातिल कर देती है।
1581. चन्द चीज़ें रोज़े को बातिल कर देती हैः-
1. खाना और पीना।
2. जिमाअ करना।
3. इस्तेम्ना- यानी इंसान अपने साथ या किसी दूसरे के साथ जिमाअ के अलावा ऐसा फ़ेल करे जिसके नतीजे में मनी ख़ारिज हो।
4. ख़ुदा ए तआला पैग़म्बरे अकरम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम) और आइम्मा ए ताहिरीन (अ0) से कोई झूठी बात मंसूब करना।
5. ग़ुबार हल्क़ तक पहुँचाना।
6. मश्हूर क़ौल की बिना पर पूरा सर पानी में डुबाना।
7. अज़ाने सुब्ह तक जनाबत या हैज़ और निफ़ास की हालत में रहना।
8. किसी सय्याल चीज़ से हुक़्ना (एनिमा) करना।
9. क़ै करना।
इन मुब्तलात के तफ़्सीली अहकाम
1.खाना और पीना
1582. अगर रोज़ादार इस अम्र की जानिब मुतवज्जह होते हुए कि रोज़े से है कोई चीज़ जानबूझ कर खाए या पिये तो उसका रोज़ा बातिल हो जाता है। क़ता ए नज़र इस से कि वह चीज़ ऐसी हो जिसे उमूमन खाया या पिया जाता हो मसलन रोटी और पानी या ऐसी हो जिसे उमूमन खाया या पिया न जता हो मसलन मिट्टी और दरख़्त का शीरा ख़्वाह कम हो या ज़्यादा हत्ता कि अगर रोज़ादार मिसवाक मुँह से निकाले और दोबारा मुँह में ले जाए और उसकी तरी निगल ले तब भी रोज़ा बातिल हो जाता है सिवाए इस सूरत के कि मिसवाक की तरी लुआबे दहन में घुलमिल कर इस तरह ख़त्म हो जाए कि उसे बेरुनी तरी न कहा जा सके।
1583. जब रोज़ादार खाना खा रहा हो अगर उसे मालूम हो जाए कि सुब्ह हो गई है तो ज़रूरी है कि जो लुक़्मा मुँह में हो उसे उगल दे और अगर जान बूझ कर वह लुक़मा निगल ले तो उसका रोज़ा बातिल है। और उस हुक्म के मुताबिक़ जिसका ज़िक्र बाद में होगा उस पर कफ़्फ़ारा भी वाजिब है।
1584. अगर रोज़ादार ग़लती से कोई चीज़ खा ले या पी ले तो उसका रोज़ा बातिल नहीं होता।
1585. जो इंजेक्शन उज़्व़ को बेहिस कर देते हैं या किसी और मक़सद के लिये इस्तेमाल होते हैं अगर रोज़ादार उन्हें इस्तेमाल करे तो कोई हरज नहीं लेकिन बेहतर यह है कि उन इंजेक्शनों से परहेज़ किया जाए जो दवा और ग़िज़ा के बजाय इस्तेमाल होते हैं।
1586. अगर रोज़ादार दांतों की रेखों में फँसी हुई कोई चीज़ अमदन निगल ले तो उसका रोज़ा बातिल हो जाता है।
1587. जो शख़्स रोज़ा रखना चाहता हो उसके लिये अज़ाने सुब्ह से पहले दांतों में खिलाल करना ज़रूरी नहीं है। लेकिन अगर उसे इल्म हो कि जो ग़िज़ा दांतों के रेखों में रह गई है वह दिन के वक़्त पेट में चली जायेगी तो खिलाल करना ज़रूरी है।
1588. मुंह का पानी नीगलने से रोज़ा बातिल नहीं होता ख़्वाह तुर्शी वग़ैरा के तसव्वुर से ही मुंह में पानी भर आया हो।
1589. सर और सीने का बलग़म जब तक मुंह के अंदर वाले हिस्से तक न पहुंचे उसे निगलने में कोई हरज नहीं लेकिन अगर मुंह में आ जाए तो एहतियाते वाजिब है कि उसे थूक दे।
1590. अगर रोज़ादार को इतनी प्यास लगे कि उसे प्यास से मर जाने का ख़ौफ़ हो जाए या उसे नुक़्सान का अन्देशा हो या इतनी सख्ती उठाना पड़े जो उस के लिये नाक़ाबिले बर्दाश्त हो तो इतना पानी पी सकता है कि उन उमूर का खौफ़ खत्म हो जाए लेकिन उसका रोज़ा बातिल हो जायेगा और अगर माहे रमज़ान हो तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर ज़रूरी है कि उससे ज़्यादा पानी न पिये और दिन के बाक़ी हिस्से में वह काम करने से परहेज़ करे जिससे रोज़ा बातिल हो जाता है।
1591. बच्चे या परिन्दे को खिलाने के लिये ग़िज़ा का चबाना या ग़िज़ा का चखना और इसी तरह के काम करना जिस में ग़िज़ा उमूमन हल्क़ तक नहीं पहुंचती ख़्वाह वह इत्तिफ़ाक़न हल्क़ तक पहुंच जाए तो रोज़े को बातिल नहीं करती, लेकिन अगर इंसान शूरू से जानता हो कि यह ग़िज़ा हल्क़ तक पहुंच जायेगी तो उसका रोज़ा बातिल हो जाता है और ज़रूरी है कि उसकी क़ज़ा बजा लाए और कफ़्फ़ारा भी उस पर वाजिब है।
1592. इंसान (मअमूली) नक़ाहत की वजह से रोज़ा नहीं छोड़ सकता, लेकिन अगर नक़ाहत इस हद तक हो कि उमूमन बर्दाश्त न हो सके तो फिर रोज़ा छोड़ने में कोई हरज नहीं है।
2.जिमाअ (सम्भोग)
1593. जिमाअ रोज़े को बातिल कर देता है ख़्वाह उज़्वे तनासुल सुपारी तक ही दाखिल हो और मनी भी खारिज न हो।
1594. अगर आला ए तनासुल सुपारी से कम दाखिल हो और मनी भी खारिज न हो तो रोज़ा बातिल नहीं होता लेकिन जिस शख़्स की सुपारी कटी हुई हो अगर वह सुपारी की मिक़्दार से कमतर मिक़्दार दाखिल करे तो अगर यह कहा जाए कि उसने हमबिस्तरी की है तो उसका रोज़ा बातिल हो जायेगा।
1595. अगर कोई शख़्स अमदन जिमाअ का इरादा करे और फिर शक करे कि सुपारी के बराबर दुखूल हुआ था या नहीं तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर उसका रोज़ा बातिल है और ज़रूरी है कि उस रोज़े की क़ज़ा बजा लाए लेकिन कफ़्फ़ारा वाजिब नहीं है।
1596. अगर कोई शख़्स भूल जाए कि रोज़े से है और जिमाअ करे या उसे जिमाअ पर इस तरह मजबूर किया जाए कि उसका इख़्तियार बाक़ी न रहे तो उसका रोज़ा बातिल नहीं होगा अलबत्ता अगर जिमाअ की हालत में उसे याद आ जाए कि रोज़े से है या मजबूरी ख़त्म हो जाए तो ज़रूरी है कि फ़ौरन तर्क करे और अगर ऐसा न करे तो उसका रोज़ा बातिल है।
3.इस्तेम्ना (हस्तमैथुन)
1597. अगर रोज़ादार इस्तेम्ना करे (इस्तेमना के मअनी मस्अला 1581 में बताए जा चुके हैं) तो उसका रोज़ा बातिल हो जाता है।
1598. अगर बे इख़्तियारी की हालत में किसी की मनी खारिज हो जाए तो उसका रोज़ा बातिल नहीं है।
1599. अगरचे रोज़ादार को इल्म हो कि अगर दिन में सोयेगा तो उसे एहतिलाम हो जायेगा यानी सोते में उसकी मनी ख़ारिज हो जायेगी तब भी उसके लिये सोना जाइज़ है ख़्वाह न सोने की वजह से उसे कोई तक्लीफ़ न भी हो और उसे एहतिलाम हो जाए तो उसका रोज़ा बातिल नहीं होता।
1600. अगर रोज़ादार मनी खारिज होते वक़्त नीन्द से बेदार हो जाए तो उस पर यह वाजिब नहीं कि मनी को निकलने से रोके।
1601. जिस रोज़ादार को एहतिलाम हो गया हो तो वह पेशाब कर सकता है ख़्वाह उसे यह इल्म हो कि पेशाब करने से बाक़ी मांदा मनी नाली से बाहर आ जायेगी।
1602. जब रोज़ादार को एहतिलाम हो जाए उसे मालूम हो कि मनी नाली में रह गई है और वह ग़ुस्ल से पहले पेशाब नहीं करेगा तो ग़ुस्ल के बाद मनी उस के जिस्म से खारिज नहीं होगी तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि ग़ुस्ल से पहले पेशाब करे।
1603. जो शख़्स मनी निकालने के इरादे से छेड़छाड़ और दिललगी करे तो ख़्वाह मनी न भी निकले तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर ज़रूरी है कि रोज़े को तमाम करे और उसकी क़ज़ा भी बजा लाए।
1604. अगर रोज़ादार मनी निकालने के इरादे के बग़ैर मिसाल के तौर पर अपनी बीवी से छेड़छाड़ और हँसी मज़ाक करे और उसे इत्मीनान हो कि मनी खारिज नहीं होगी तो अगरचे इत्तिफ़ाक़न मनी खारिज हो जाए उसका रोज़ा सहीह है। अलबत्ता अगर उसे इत्मीनान न हो तो उस सूरत में जब मनी ख़ारिज होगी तो उसका रोज़ा बातिल हो जायेगा।
4. ख़ुदा और रसूल (स0) पर बोह्तान बाँधना
1605. अगर रोज़ादार ज़बान से या लिख कर या इशारे से या किसी और तरीक़े से अल्लाह तआला या रसूले अकरम स्वल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम या आपके (बर हक़) जा नशीनों में से किसी से जानबूझ कर कोई झूठी बात मंसूब करे तो अगरचे वह फ़ौरन कह दे कि मैंने झूठ कहा है या तौबा कर ले तब भी एहतियाते लाज़िम की बिना पर उसका रोज़ा बातिल है और एहतियाते मुस्तहब की बिना पर हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलवातुल्लाहे अलैहा और तमाम अंबिया ए मुर्सलीन (अ0 स0) और उन के जा नशीनों से भी कोई झूठी बात मंसूब करने का यही हुक्म है।
1606. अगर (रोज़ादार) कोई ऐसी रिवायत नक़्ल करना चाहे जिसके क़तई होने की दलील न हो और उसके बारे में उसे यह इल्म न हो कि सच है या झूठ तो एहतियाते वाजिब की बिना पर ज़रूरी है कि जिस शख़्स से वह रिवायत हो या जिस किताब में लिखी देखी हो उसका हवाला दे।
1607. अगर किसी रिवायत के बारे में एतिक़ाद रखता हो कि वह वाक़ई क़ौले ख़ुदा या क़ौले पैग़म्बर स्वल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम है और उसे अल्लाह तआला या पैग़म्बरे अकरम स्वल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम से मंसूब करे और बाद में मालूम हो कि यह निस्बत सही नहीं थी तो उसका रोज़ा बातिल नहीं होगा।
1608. अगर रोज़ादार किसी चीज़ के बारे में यह जानते हुए कि झूठ है उसे अल्लाह तआला और रसूले अकरम स्वल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम से मंसूब करे और बाद में उसे पता चले कि जो कुछ उसने कहा था वह दुरुस्त था तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर ज़रूरी है कि रोज़े को तमाम करे और उसकी क़ज़ा भी बजा लाए।
1609. अगर रोज़ादार किसी ऐसे झूठ को जो खुद रोज़ादार ने नहीं बल्कि किसी दूसरे ने गढ़ा हो जानबूझ कर अल्लाह तआला या रसूले अकरम स्वल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम या आपके (बरहक़) जानशीनों से मंसूब कर दे तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर उसका रोज़ा बातिल हो जायेगा लेकिन अगर जिसने झूठ गढ़ा हो उसका क़ौल नक़्ल करे तो कोई हरज नहीं।
1610. अगर रोज़ादार से सवाल किया जाए कि क्या रसूले मोहतशम स्वल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने ऐसा फ़रमाया है और वह अमदन जहाँ जवाब नहीं देना चाहिये वहाँ इस्बात में दे और जहाँ इस्बात में देना चाहिये वहाँ अमदन नहीं में दे तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर उसका रोज़ा बातिल हो जाता है।
1611. अगर कोई शख़्स अल्लाह तआला या रसूले अकरम स्वल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का क़ौले दुरुस्त नक़्ल करे और बाद में कहे कि मैंने झूठ कहा है या रात को झूठी बात उनसे मंसूब करे और दूसरे दिन जबकि रोज़ा रखा हुआ हो कहे कि जो कुछ मैंने गुज़श्ता रात कहा था वह दुरुस्त है तो उसका रोज़ा बातिल हो जाता है लेकिन अगर वह रिवायत के (सहीह या ग़लत होने के) बारे में बताए (तो उसका रोज़ा बातिल नहीं होता)।
5. ग़ुबार को हल्क़ तक पहुंचाना
1612. एहतियाते वाजिब की बिना पर कसीफ़ ग़ुबार का हल्क़ तक पहुंचाना रोज़े को बातिल कर देता है ख़्वाह ग़ुबार किसी ऐसी चीज़ का हो जिसका खाना हलाल हो मसलन आटा या किसी ऐसी चीज़ का हो जिसका खाना हराम हो मसलन मिट्टी।
1613. अक़्वा यह है कि ग़ैरे कसीफ़ ग़ुबार हल्क़ तक पहुंचने से रोज़ा बातिल हो जाता है।
1614. अगर हवा की वजह से ग़ुबार पैदा हो और इंसान मुतवज्जह होने और एहतियात कर सकने के बावजूद एहतियात न करे और ग़ुबार उसके हल्क़ तक पहुंच जाए तो एहतियाते वाजिब की बिना पर उसका रोज़ा बातिल हो जाता है।
1615. एहतियाते वाजिब यह है कि रोज़ादार सिग्रेट और तम्बाकू वग़ैरा का धुवां भी हल्क़ तक न पहुंचाए।
1616. अगर इंसान एहतियात न करे और ग़ुबार या धुवां वग़ैरा हल्क़ में चला जाए तो अगर उसे यक़ीन या इत्मीनान था कि यह चीज़ें हल्क़ में न पहुंचेंगी तो उसका रोज़ा सहीह है लेकिन उसे गुमान था कि यह हल्क़ तक नहीं पहुंचेंगी तो बेहतर यह है कि रोज़ा की क़ज़ा बजा लाए।
1617. अगर कोई शख़्स यह भूल जाए कि रोज़े से है एहतियात न करे या बे इख़्तियार ग़ुबार वग़ैरा उसके हल्क़ तक पहुंच जाए तो उसका रोज़ा बातिल नहीं होता।
6. सर को पानी में डुबोना
1618. अगर रोज़ादार जानबूझ कर सारा सर पानी में डुबो दे ख़्वाह उस का बाक़ी बदन पानी से बाहर रहे मश्हूर क़ौल की बिना पर उसका रोज़ा बातिल हो जाता है लेकिन बईद नहीं कि ऐसा करना रोज़े को बातिल न करे। अगरचे ऐसा करने में शदीद कराहत है और मुम्किन हो तो उससे एहतियात करना बेहतर है।
1619. अगर रोज़ादार अपने निस्फ़ सर को एक दफ़्आ और बाक़ी निस्फ़ सर को दूसरी दफ़्आ पानी में डुबोए तो उसका रोज़ा सहीह होने में कोई इश्क़ाल नहीं है।
1620. अगर सारा सर पानी में डूब जाए तो ख़्वाह कुछ बाल पानी से बाहर भी रह जायें तो उसका हुक्म भी मस्अला 1618 की तरह है।
1621. पानी के अलावा दूसरी सैयाल चीज़ों मसलन दूध में सर डुबोने से रोज़े को कोई ज़रर नहीं पहुंचता और मुज़ाफ़ पानी में भी सर डुबोने का भी यही हुक्म है।
1622. अगर रोज़ादार बेइख़्तियार पानी में गिर जाए और उसका पूरा सर पानी में डूब जाए या भूल जाए कि रोज़े से है और सर पानी में डुबो ले तो उसके रोज़े में कोई इश्काल नहीं है।
1623. अगर कोई रोज़ादार यह ख़्याल करते हुए अपने आप को पानी में गिरा दे कि उसका सर पानी में नहीं डूबेगा लेकिन उसका पूरा सर पानी में डूब जाए तो उसके रोज़े में बिल्कुल इश्काल नहीं है।
1624. अगर कोई शख़्स भूल जाए कि रोज़े से है और सर पानी में डुबो दे तो अगर पानी में डुबे हुए उसे याद आए कि रोज़े से है तो बेहतर यह है कि रोज़ादार फ़ौरन अपना सर पानी से बाहर निकाले और अगर न निकाले तो उसका रोज़ा बातिल नहीं होगा।
1625. अगर कोई शख़्स रोज़ादार के सर को ज़बरदस्ती पानी में डुबो दे तो उसके रोज़े में कोई इश्काल नहीं है लेकिन जबकि अभी वह पानी में है दूसरा शख़्स अपना हाथ हटा ले तो बेहतर यह है कि फ़ौरन अपना सर पानी से बाहर निकाल ले।
1626. अगर रोज़ादार ग़ुस्ल की नीयत से सर पानी में डुबो दे तो उसका रोज़ा और ग़ुस्ल दोनों सहीह हैं।
1627. अगर कोई रोज़ादार किसी को डूबने से बचाने की ख़ातिर सर को पानी में डुबो दे ख़्वाह उस शख़्स को बचाना वाजिब ही क्यों न हो तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि रोज़े की क़ज़ा बजा लाए।
7. अज़ाने सुब्ह तक जनाबत, हैज़ और निफ़ास की हालत में रहना
1628. अगर जुनुब शख़्स माहे रमज़ानुल मुबारक में जानबूझ कर अज़ाने सुब्ह तक ग़ुस्ल न करे तो उसका रोज़ा बातिल है और जिस शख़्स का वजीफ़ा तयम्मुम हो और वह जानबूझ कर तयम्मुम न करे तो उसका रोज़ा भी बातिल है और माहे रमज़ान की क़ज़ा का हुक्म भी यही है।
1629. अगर जुनुब शख़्स माहे रमज़ान के रोज़ों और उनकी क़ज़ा के अलावा उन वाजिब रोजों में जिनका वक़्त माहे रमजान की रोज़ों की तरह मुअय्यन है जानबूझ कर अज़ाने सुब्ह तक ग़ुस्ल न करे तो अज़हर यह है कि उसका रोज़ा सहीह है।
1630. अगर कोई शख़्स माहे रमज़ानुल मुबारक की किसी रात में जुनुब हो जाए तो अगर वह अमदन ग़ुस्ल न करे हत्ता कि वक़्त तंग हो जाए तो ज़रूरी है कि तयम्मुम करे और रोज़ा रखे और एहतियाते मुस्तहब यह है कि उसकी क़ज़ा भी बजा लाए।
1631. अगर जुनुब शख़्स माहे रमज़ान में गुस्ल करना भूल जाए और एक दिन के बाद उसे याद आए तो ज़रूरी है कि उस दिन का रोज़ा क़ज़ा करे और अगर चन्द दिनों के बाद याद आए तो उतने दिनों के रोजों की क़ज़ा करे जितने दिनों के बारे में उसे यक़ीन हो कि वह जुनुब या मसलन अगर उसे यह इल्म न हो कि तीन दिन जुनुब रहा था या चार दिन तो ज़रूरी है कि तीन दिनों के रोजों की क़ज़ा करे।
1632. अगर एक ऐसा शख़्स अपने आप को जुनुब कर ले जिसके पास माहे रमज़ान की रात में ग़ुस्ल और तयम्मुम में से किसी के लिये भी वक़्त न हो तो उसका रोज़ा बातिल है और उस पर क़ज़ा और कफ़्फ़ार दोनों वाजिब हैं।
1633. अगर रोज़ादार यह जानने के लिये जुस्तजू करे कि उसके पास वक़्त है कि नहीं और गुमान करे कि उसके पास ग़ुस्ल के लिये वक़्त है और अपने आप को जुनुब कर ले और बाद में उसे पता चले कि वक़्त तंग था और तयम्मुम कर के रोज़ा रखे तो एहतियाते मुस्तहब की बिना पर ज़रूरी है कि उस दिन के रोज़े की क़ज़ा करे।
1634. जो शख़्स माहे रमज़ान की किसी रात को जुनुब हो और जानता हो कि अगर सोयेगा तो सुब्ह तक बेदार न होगा, उसे बग़ैर ग़ुस्ल किये नहीं सोना चाहिये और अगर वह ग़ुस्ल करने से पहले अपनी मरज़ी से सो जाए और सुब्ह तक बेदार न हो तो उसका रोज़ा बातिल है और क़ज़ा और कफ़्फ़ारा दोनों उस पर वाजिब हैं।
1635. जब जुनुब माहे रमज़ान की रात में सो कर जाग उठे तो एहतियते वाजिब यह है कि अगर वह बेदार होने के बारे में मुत्मइन हो तो ग़ुस्ल से पहले न सोए अगरचे इस बात का एहतिमाल हो कि अगर दोबारा सो गया तो सुब्ह की अज़ान से पहले बेदार हो जायेगा।
1636. अगर कोई शख़्स माहे रमज़ान की किसी रात में जुनुब हो और यक़ीन रखता हो कि अगर सो गया तो सुब्ह की अज़ान से पहले बेदार हो जायेगा और उसका मुसम्मम इरादा हो कि बेदार होने के बाद ग़ुस्ल करेगा और इस इरादे के साथ सो जाए और अज़ान तक सोता रहे तो उसका रोज़ा सहीह है। और अगर कोई शख़्स सुब्ह की अज़ान से पहले बेदार होने के बारे में मुत्मइन हो तो उस के लिए भी यही हुक्म है।
1637. अगर कोई शख़्स माहे रमज़ान की किसी रात में जुनुब हो और उसे इल्म हो या एहतिमाल हो कि अगर सो गया तो सुब्ह की अज़ान से पहले बेदार हो जायेगा और वह इस बात से ग़ाफ़िल हो कि बेदार होने के बाद उस पर ग़ुस्ल करना ज़रूरी है तो उस सूरत में जबकि वह सो जाए और सुब्ह की अज़ान तक सोया रहे एहतियात की बिना पर उस पर क़ज़ा वाजिब हो जाती है। 1638. अगर कोई शख़्स माहे रमज़ान की किसी रात में जुनुब हो और उसे यक़ीन हो या एहतिमाल इस बात का हो कि अगर वह सो गया तो सुब्ह की अज़ान से पहले बेदार हो जायेगा और वह बेदार होने के बाद ग़ुस्ल न करना चाहता हो तो उस सूरत में जब कि वह सो जाए और बेदार न हो उसका रोज़ा बातिल है और क़ज़ा और कफ़्फ़ारा उस के लिये लाज़िम हैं। और इसी तरह अगर बेदार होने के बाद उसे तरद्दुद हो कि ग़ुस्ल करे या न करे तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर यही हुक्म है। 1639. अगर जुनुब शख़्स माहे रमज़ान की किसी रात में सो कर जाग उठे और उसे यक़ीन हो या इस बात का एहतिमाल हो कि अगर दोबारा सो गया तो सुब्ह की अज़ान से पहले बेदार हो जायेगा और वह मुसम्मम इरादा भी रखता हो कि बेदार होने के बाद ग़ुस्ल करेगा और दोबारा सो जाए और अज़ान तक बेदार न हो तो ज़रूरी है कि बतौरे सज़ा उस दिन का रोज़ा क़ज़ा करे। और अगर दूसरी नीन्द से बेदार हो जाये और तीसरी दफ़्आ सो जाए और सुब्ह की अज़ान तक बेदार न हो तो ज़रूरी है कि उस दिन के रोज़े की क़ज़ा करे और एहतियाते मुस्तहब की बिना पर कफ़्फ़ारा भी दे।
1640. जब इंसान को नीन्द में एहतिलाम हो जाए तो पहली, दूसरी और तीसरी नीन्द से मुराद वह नीन्द है कि इंसान (एहतिलाम से) जागने के बाद सोए लेकिन वह नीन्द जिसमें एहतिलाम हुआ पहली नीन्द शुमार नहीं होती।
1641. अगर किसी रोज़ादार को दिन में एहतिलाम हो जाए तो उस पर फ़ौरन ग़ुस्ल करना वाजिब नहीं।
1642. अगर कोई शख़्स माहे रमज़ान में सुब्ह की अज़ान के बाद जागे और यह देखे कि उसे एहतिलाम हो गया है तो अगरचे उसे मालूम हो कि यह एहतिलाम अज़ान से पहले हुआ है उसका रोज़ा सहीह है।
1643. जो शख़्स रमज़ानुल मुबारक का क़ज़ा रोज़ा रखना चाहता हो और वह सुब्ह की अज़ान तक जुनुब रहे तो अगर उसका इस हालत में रहना अमदन हो तो उस दिन का रोज़ा नहीं रख सकता और अमदन न हो तो रोज़ा रख सकता है अगरचे एहतियात यह है कि रोज़ा न रखे।
1644. जो शख़्स रमज़ानुल मुबारक के क़ज़ा रोज़े रखना चाहता हो अगर वह सुब्ह की अज़ान के बाद बेदार हो और देखे कि उसे एहतिलाम हो गया है और जानता हो कि यह एहतिलाम उसे सुब्ह की अज़ान से पहले हुआ है तो अक़्वा की बिना पर उस दिन माहे रमज़ान के रोज़े की क़ज़ा की नीयत से रोज़ा रख सकता है।
1645. अगर माहे रमज़ान के क़ज़ा रोज़ों के अलावा ऐसे वाजिब रोज़ों में कि जिनका वक़्त मुअय्यन नहीं है मसलन कफ़्फ़ारे के रोज़े में कोई शख़्स अमदन अज़ाने सुब्ह तक जुनुब रहे तो अज़हर यह है कि उसका रोज़ा सहीह है लेकिन बेहतर है कि उस दिन के अलावा किसी दूसरे दिन रोज़ा रखे।
1646. अगर रमज़ान के रोजों में औरत सुब्ह की अज़ान से पहले हैज़ या निफ़ास से पाक हो जाए और अमदन ग़ुस्ल न करे या वक़्त तंग होने की सूरत में – अगरचे उसके इख़्तियार में हो और रमज़ान का रोज़ा हो – तयम्मुम न करे तो उसका रोज़ा बातिल है और एहतियात की बिना पर माहे रमज़ान के क़ज़ा रोज़े का भी यही हुक्म है (यानी उसका रोज़ा बातिल है) और इन दो के अलावा दीगर सूरतों में बातिल नहीं अगरचे अहवत यह है कि ग़ुस्ल करे। माहे रमज़ान में जिस औरत की शरई ज़िम्मेदारी हैज़ या निफ़ास के ग़ुस्ल के बदले तयम्मुम हो और इसी तरह एहतियात की बिना पर रमज़ान की क़ज़ा में अगर जानबूझ कर अज़ाने सुब्ह से पहले तयम्मुम न करे तो उसका रोज़ा बातिल है।
1647. अगर कोई औरत माहे रमज़ान में सुब्ह की अज़ान से पहले हैज़ या निफ़ास से पाक हो जाए और ग़ुस्ल के लिये वक़्त न हो तो ज़रूरी है कि तयम्मुम करे और सुब्ह की अज़ान तक बेदार रहना ज़रूरी नहीं है। जिस जुनुब शख़्स का वज़ीफ़ा तयम्मुम हो उसके लिये भी यही हुक्म है।
1648. अगर कोई औरत माहे रमज़ानुल मुबारक में सुब्ह की अज़ान के नज़्दीक हैज़ या निफ़ास से पाक हो जाए और ग़ुस्ल या तयम्मुम किसी के लिये वक़्त बाक़ी न हो तो उसका रोज़ा सहीह है।
1649. अगर कोई औरत सुब्ह की अज़ान के बाद हैज़ या निफ़ास के ख़ून से पाक हो जाए या दिन में उसे हैज़ या निफ़ास का खून आ जाए तो अगरचे यह खून मग़्रिब के करीब ही क्यों न आए उसका रोज़ा बातिल है।
1650. अगर औरत हैज़ का निफ़ास का ग़ुस्ल करना भूल जाए और उसे एक दिन या कई दिन के बाद याद आए तो जो रोज़े उसने रखे हों सहीह हैं।
1651. अगर औरत माहे रमज़ानुल मुबारक में सुब्ह की अज़ान से पहले हैज़ या निफ़ास से पाक हो जाए और ग़ुस्ल करने में कोताही करे और सुब्ह की अज़ान तक ग़ुस्ल न करे और वक़्त तंग होने की सूरत में तयम्मुम भी न करे तो उसका रोज़ा बातिल है लेकिन अगर कोताही न करे मसलन मुंतज़िर हो कि ज़नाना हम्माम मुयस्सर आ जाए ख़्वाह उस मुद्दत में तीन दफ़्आ सोए और सुब्ह की अज़ान तक ग़ुस्ल न करे और तयम्मुम करने में भी कोताही न करे तो उसका रोज़ा सहीह है।
1652. जो औरत इस्तिहाज़ा ए कसीरा की हालत में हो अगर वह अपने ग़ुस्लों को उस तफ़्सील के साथ न बजा लाए जिसका ज़िक्र मस्अला 402 में किया गया है तो उसका रोज़ा सहीह है। ऐसे ही इस्तिहाज़ा ए मुतवस्सिता में अगरचे औरत ग़ुस्ल न भी करे, उसका रोज़ा सहीह है।
1653. जिस शख़्स ने मैयित को मस किया हो यानी अपने बदन का कोई हिस्सा मैयित के बदन से छुआ हो वह गुस्ले मसे मैयित के बग़ैर रोज़ा रख सकता है अगर रोज़े की हालत में भी मैयित को मस करे तो उसका रोज़ा बातिल नहीं होता।
8. हुक़्ना लेना
1654. सैयाल चीज़ से हुक़्ना (एनिमा) अगरचे ब अमरे मजबूरी और इलाज की ग़रज़ से लिया जाए रोज़े को बातिल कर देता है।
9. उल्टी करना
1655. अगर रोज़ादार जानबूझ कर क़ै (उल्टी) करे तो अगरचे वह बीमारी वग़ैरा की वजह से ऐसा करने पर मजबूर हो उसका रोज़ा बातिल हो जाता है लेकिन अगर सहवन या बे इख़्तियार हो कर क़ै करे तो कोई हरज नहीं।
1656. अगर कोई शख़्स रात को ऐसी चीज़ खा ले जिसके बारे में मालूम हो कि उस के खाने की वजह से दिन में बे इख़्तियार क़ै आयेगी तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि उस दिन का रोज़ा क़ज़ा करे।
1657. अगर रोज़ादार क़ै रोक सकता हो और ऐसा करना उसके लिये मुज़िर और तक्लीफ़ का बाइस न हो तो बेह्तर यह है कि क़ै को रोके। 1658. अगर रोज़ादार के हल्क़ में मक्खी चली जाए या चुनांचे वह इस हद तक अन्दर चली गई हो कि उसके नीचे ले जाने को निगलना न कहा जाए तो ज़रूरी नहीं कि उसे बाहर निकाला जाए और उसका रोज़ा सहीह है लेकिन अगर मक्खी काफ़ी हद तक अन्दर न गई हो तो ज़रूरी है कि बाहर निकाले अगरचे उसको क़ै कर के ही निकालने पड़े मगर यह कि क़ै करने में रोज़ादार को ज़रर और तक्लीफ़ न हो और अगर वह क़ै न करे और उसे निगल ले तो उसका रोज़ा बातिल हो जायेगा।
1659. अगर रोज़ादार सहवन कोई चीज़ निगल ले और उसके पेट में पहुंचने से पहले उसे याद आ जाए कि रोज़े से है तो उस चीज़ का निकालना लाज़िमी नहीं और उसका रोज़ा सहीह है।
1660. अगर किसी रोज़ादार को यक़ीन हो कि डकार लेने की वजह से कोई चीज़ उसके हल्क़ से बाहर आ जायेगी तो एहतियात की बिना पर उसे जानबूझ कर डकार नहीं लेनी चाहिए लेकिन उसे यक़ीन न हो तो कोई हरज नहीं।
1661. अगर रोज़ादार डकार ले और कोई चीज़ उसके हल्क़ या मुंह में आ जाए तो ज़रूरी है कि उसे उगल दे और अगर वह चीज़ बेइख़्तियार पेट में चली जाए तो उसका रोज़ा सहीह है।
उन चीज़ों के अहकाम जो रोज़े को बातिल करती हैं।
1662. अगर इंसान जानबूझ कर और इख़्तियार के साथ कोई ऐसा काम करे जो रोज़े को बातिल करता हो तो उसका रोज़ा बातिल हो जाता है और अगर कोई ऐसा काम जानबूझ कर न करे तो फिर इश्काल नहीं लेकिन अगर जुनुब सो जाए और उस तफ़्सील के मुताबिक़ जो मस्अला 1639 में बयान की गई है सुब्ह की अज़ान तक ग़ुस्ल न करे तो उसका रोज़ा बातिल है। चुनांचे अगर इंसान न जानता हो कि जो बातें बताई गई हैं उनमें से बाज़ रोज़े को बातिल करती हैं यानी जाहिल क़ासिर हो और इंकार भी न करता हो (बअलफ़ाज़े दीगर मुक़स्सिर न हो) या यह कि शरई हुज्जत पर एतिमाद रखता हो और खाने पीने और जिमाअ के अलावा उन अफ़्आल में से किसी फ़ेल को अंजाम दे तो उसका रोज़ा बातिल नहीं होगा।
1663. अगर रोज़ादार सहवन कोई ऐसा काम करे जो रोज़े को बातिल करता हो और इस गुमान से कि उसका रोज़ा बातिल हो गया है दोबारा अमदन कोई ऐसा ही काम करे तो उस का रोज़ा बातिल हो जाता है।
1664. अगर कोई चीज़ ज़बरदस्ती रोज़ादार के हल्क़ में उंडेल दी जाए तो उसका रोज़ा बातिल नहीं होता लेकिन अगर उसे मज्बूर किया जाए मसलन उसे कहा जाए कि अगर तुम ग़िज़ा नहीं खाओगे तो हम तुम्हे माली या जानी नुक़्सान पहुँचायेंगे और वह नुक़्सान से बचने के लिये अपने आप कुछ खा ले तो उसका रोज़ा बातिल हो जायेगा
1665. रोज़ादार को ऐसी जगह नहीं जाना चाहिये जिसके बारे में वह जानता हो कि लोग कोई चीज़ उसके हल्क़ में डाल देंगे या उसे रोज़ा तोड़ने पर मज्बूर करेंगे और अगर ऐसी जगह जाए या ब अम्रे मज्बूरी वह खुद कोई ऐसा काम करे जो रोज़े को बातिल करता हो तो उसका रोज़ा बातिल हो जाता है और अगर कोई चीज़ उसके हल्क़ में उंडेल दें तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर यही हुक्म है।
वह चीज़ें जो रोज़ादार के लिये मकरूह हैं
1666. रोज़ादार के लिये कुछ चीज़ें मकरूह हैं और उनमें से बाज़ यह हैः-
1. आँख में दवा डालना और सुर्मा लगाना जब कि उसका मज़ा या बू हल्क़ में पहुँचे।
2. हर ऐसा काम करना जो कमज़ोरी का बाइस हो मसलन फ़स्द खुलवाना और हम्माम जाना।
3. (नाक से) नास ख़ीचना बशर्ते की यह इल्म न हो कि हल्क़ तक पहुंचेगी और अगर यह इल्म हो कि हल्क़ तक पहुंचेगी तो उसका इस्तेमाल जाइज़ नहीं है।
4. ख़ुश्बूदार घास (और जड़ी बूटियाँ) सूंघना।
5. औरत का पानी में बैठना।
6. शय्याफ़ इस्तेमाल करना यानी किसी ख़ुश्क चीज़ से एनिमा लेना।
7. जो लिबास पहन रखा हो उसे तर करना।
8. दांत निकलवाना और हर वह काम करना जिसकी वजह से मुंह से खून निकले।
9. तर लकड़ी से मिसवाक करना।
10. बिला वजह पानी या कोई और सैयाल चीज़ मुंह में डालना।
और यह भी मकरूह है मनी निकालने के क़स्द के बग़ैर इंसान अपनी बीवी का बोसा ले या शहवत अंगेज़ काम करे और अगर ऐसा करना मनी निकालने के क़स्द से हो और मनी न निकले तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर रोज़ा बातिल हो जाता है।
ऐसे मवाक़े जिनमें रोज़ा की क़ज़ा और कफ़्फ़ारा वाजिब हो जाते हैं।
1667. अगर कोई शख़्स माहे रमज़ान के रोज़े को खाने, पीने या हम बिस्तरी या इस्तिमना या जनाबत पर बाक़ी रहने की वजह से बातिल करे जबकि जब्र और नाचारी की बिना पर नहीं बल्कि अमदन और इख़्तियारन ऐसा किया हो तो उस पर क़ज़ा के अलावा कफ़्फ़ारा भी वाजिब होगा और जो कोई मुतज़क्किरा उमूर के अलावा किसी और तरीक़े से रोज़ा बातिल करे तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि वह क़ज़ा के अलावा कफ़्फ़ारा भी दे।
1668. जिन उमूर का ज़िक्र किया गया है अगर उन में से किसी फ़ेल को अंजाम दे जबकि उसे पुख्ता यक़ीन हो कि उस अमल से उस का रोज़ा बातिल नहीं होगा तो उस पर कफ़्फ़ारा वाजिब नहीं है।
रोज़े का कफ़्फ़ारा
1669. माहे रमज़ान का रोज़ा तोड़ने के कफ़्फ़ारे के तौर पर ज़रूरी है कि इंसान एक ग़ुलाम आज़ाद करे या उन अहकाम के मुताबिक़ जो आइन्दा मस्अले में बयान किये जायेंगे दो महीने रोज़े रखे या साठ फ़क़ीरों को पेट भर कर खाना खिलाए या हर फ़क़ीर को एक मुद तक़्रीबन 3/4 किलो तआम यानी गंदुम या जौ या रोटी वग़ैरा दे और अगर यह अफ़्आल अंजाम देना उसके लिये मुम्किन न हो तो ब क़द्रे इम्कान सदक़ा देना ज़रूरी है और अगर यह मुम्किन न हो तो तौबा व इस्तिग़फ़ार करे और एहतियाते वाजिब यह है कि जिस वक़्त (कफ़्फ़ारा देने के) क़ाबिल हो जाए कफ़्फ़ारा दे।
1670. जो शख़्स माहे रमज़ान के रोज़े के कफ़्फ़ारे के तौर पर दो माह रोज़े रखना चाहे तो ज़रूरी है कि एक पूरा महीना और उससे अगले महीने के एक दिन तक मुसलसल रोज़े रखे और अगर बाक़ी मांदा रोज़े मुसलसल न भी रखे तो कोई इश्काल नहीं।
1671. जो शख़्स माहे रमज़ान के रोज़े के कफ़्फ़ारे के तौर पर दो माह रोज़े रखना चाहे ज़रूरी है कि वह रोज़े ऐसे वक़्त न रखे जिसके बारे में वह जानता हो कि एक महीने और एक दिन के दरमियान ईदे क़ुर्बान की तरह कोई ऐसा दिन आ जायेगा जिसका रोज़ा रखना हराम है।
1672. जिस शख़्स को मुसलसल रोज़े रखना ज़रूरी है अगर वह उन के बीच में बग़ैर उज़्र के एक दिन रोज़ा न रखे तो ज़रूरी है कि दोबारा अज़ सरे नव रोज़े रखे।
1673. अगर उन दिनों के दरमियान जिन में मुसलसल रोज़े रखने ज़रूरी है रोज़ादार को कोई ग़ैर इख़्तियारी उज़्र पेश आ जाए मसलन हैज़ या निफ़ास या ऐसा सफ़र जिसे इख़्तियार करने पर वह मजबूर हो तो उज़्र के दूर होने के बाद रोज़ों का अज़् सरे नव रखना उसके लिये वाजिब नहीं बल्कि उज़्र दूर होने के बाद बाक़ी मांदा रोज़े रखे।
1674. अगर कोई शख़्स हराम चीज़ से अपना रोज़ा बातिल कर दे ख़्वाह वह चीज़ बज़ाते खुद हराम हो जैसे शराब और ज़िना या किसी वजह से हराम हो जाए जैसे कि हलाल ग़िज़ा जिस का खाना इंसान के लिये बिल उमूम मुज़िर हो या वह अपनी बीबी से हालते हैज़ में मुजामिअत करे तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि मज्मूअन कफ़्फ़ारा दे। यानी उसे चाहिये कि एक ग़ुलाम आज़ाद करे और दो महीने रोज़े रखे और साठ फ़क़ीरों को पेट भर कर खाना खिलाए या उनमें से हर फ़क़ीर को एक मुद गंदुम या जौ या रोटी वग़ैरा दे और अगर यह तीनों चीज़ें उसके लिये मुम्किन न हो तो उनमें से जो कफ़्फ़ारा मुम्किन हो, दे।
1675. अगर रोज़ादार जानबूझ कर अल्लाह तआला या नबीये अकरम स्वल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम से कोई झूटी बात मंसूब करे तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि मज्मूअन कफ़्फ़ारा वाजिब है लेकिन एहतियाते मुस्तहब यह है कि हर दफ़्आ के लिये एक कफ़्फ़ारा दे।
1676. अगर रोज़ादार माहे रमज़ान के एक दिन में कई दफ़्आ जिमाअ या इस्तिम्ना करे तो उस पर कफ़्फ़ारा वाजिब है लेकिन एहतियाते मुस्तहब यह है कि हर दफ़्आ के लिये एक एक कफ़्फ़ारा दे।
1677. अगर रोज़ादार माहे रमज़ान के एक दिन में जिमाअ और इसतिम्ना के अलावा कई दफ़्आ कोई दूसरा ऐसा काम करे जो रोज़े को बातिल करता हो तो उन सब के लिये बिला इश्काल सिर्फ़ एक कफ़्फ़ारा काफ़ी है।
1678. अगर रोज़ादार जिमाअ के अलावा कोई दूसरा ऐसा काम करे जो रोज़े को बातिल करता हो और फिर अपनी ज़ौजा से मुजामिअत भी करे तो दोनों के लिये एक कफ़्फ़ारा काफ़ी है।
1679. अगर रोज़ादार कोई ऐसा काम करे जो हलाल हो और रोज़े को बातिल करता हो मसलन पानी पी ले और उसके बाद कोई दूसरा ऐसा काम करे जो हराम हो और रोज़े को बातिल करता हो मसलन हराम ग़िज़ा खा ले तो एक कफ़्फ़ारा काफ़ी है।
1680. अगर रोज़ादार डकार ले और कोई चीज़ उसके मुंह में आ जाए तो अगर वह उसे जानबूझ कर निगल ले तो उसका रोज़ा बातिल है और ज़रूरी है कि उसकी क़ज़ा करे और कफ़्फ़ारा भी उस पर वाजिब हो जाता है और अगर उस चीज़ का खाना हराम हो मसलन डकार लेते वक़्त खून या ऐसी ख़ोराक जो ग़िज़ा की तअरीफ़ में न आती हो उसके मुंह में आ जाए और वह उसे जानबूझ कर निगल ले तो ज़रूरी है कि उस रोज़े की क़ज़ा बजा लाए और एहतियाते मुस्तहब की बिना पर मज्मूअन कफ़्फ़ारा भी दे।
1681. अगर कोई शख़्स मन्नत माने कि एक ख़ास दिन रोज़ा रखेगा तो अगर वह उस दिन जानबूझ कर अपने रोज़े को बातिल कर दे तो ज़रूरी है कि कफ़्फ़ारा दे और उसका कफ़्फ़ारा उसी तरह है जैसे कि मन्नत तोड़ने पर है।
1682. अगर रोज़ादार एक ऐसे शख़्स के कहने पर जो कहे कि मग़्रिब का वक़्त हो गया है और जिसके कहने पर एतिमाद न हो रोज़ा इफ़्तार कर ले और बाद में उसे पता चले कि मग़्रिब का वक़्त नहीं हुआ या शक करे कि मग़्रिब का वक़्त हुआ है या नहीं तो उस पर क़ज़ा और कफ़्फ़ारा दोनों वाजिब हो जाते हैं।
1683. जो शख़्स जानबूझ कर अपना रोज़ा बातिल कर ले और अगर वह ज़ोहर के बाद सफ़र करे या कफ़्फ़ारे से बचने के लिये ज़ोहर से पहले सफ़र करे तो उस पर से कफ़्फ़ारा साक़ित नहीं होता बल्कि अगर ज़ोहर से पहले इत्तिफ़ाक़न उसे सफ़र करना पड़े तब भी कफ़्फ़ारा उस पर वाजिब है।
1684. अगर कोई शख़्स जानबूझ कर अपना रोज़ा तोड़ दे और उसके बाद कोई उज़्र पैदा हो जाए मसलन हैज़ या निफ़ास या बीमारी में मुब्तला हो जाए तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि कफ़्फ़ारा दे।
1685. अगर किसी शख़्स को यक़ीन हो कि आज माहे रमज़ानुल मुबारक की पहली तारीख़ है और वह जानबूझ कर रोज़ा तोड़ दे लेकिन बाद में उसे पता चले कि शाबान की आख़िरी तारीख़ है तो उस पर कफ़्फ़ारा वाजिब नहीं है।
1686. अगर किसी शख़्स को शक हो कि आज रमज़ान की आख़िरी तारीख़ है या शव्वाल की पहली तारीख़ है और वह जानबूझ कर रोज़ा तोड़ दे और बाद में पता चले कि पहली शव्वाल है तो उस पर कफ़्फ़ारा वाजिब नहीं है।
1687. अगर एक रोज़ादार माहे रमज़ान में अपनी रोज़ादार बीवी से जिमाअ करे तो अगर उसने बीवी को मजबूर किया हो तो अपने रोज़े का कफ़्फ़ारा और एहतियात की बिना पर ज़रूरी है कि अपनी बीवी के रोज़े का भी कफ़्फ़ारा दे और अगर बीवी जिमाअ पर राज़ी हो तो हर एक पर एक एक कफ़्फ़ारा वाजिब हो जाता है।
1688. अगर कोई औरत अपने रोज़ादार शौहर को जिमाअ करने पर मजबूर करे तो उस पर शौहर के रोज़े का कफ़्फ़ारा अदा करना वाजिब नहीं है।
1689. अगर रोज़ादार माहे रमज़ानुल मुबारक में अपनी बीवी को जिमाअ पर मजबूर करे और जिमाअ के दौरान औरत भी जिमाअ पर राज़ी हो जाए तो एहतियाते वाजिब की बिना पर ज़रूरी है कि मर्द दो कफ़्फ़ारे दे और औरत एक कफ़्फ़ारा दे।
1690. अगर रोज़ादार माहे रमज़ानुल मुबारक में अपनी रोज़ादार बीवी से जो सो रही हो जिमाअ करे तो उस पर एक कफ़्फ़ारा वाजिब हो जाता है औरत का रोज़ा सहीह है और उस पर कफ़्फ़ारा भी वाजिब नहीं है।
1691. अगर शौहर अपनी बीवी को या बीवी अपने शौहर को जिमाअ के अलावा कोई ऐसा काम करने पर मजबूर करे जिससे रोज़ा बातिल हो जाता हो तो उन दोनों में से किसी पर भी कफ़्फ़ारा वाजिब नहीं है।
1692. जो आदमी सफ़र या बीमारी की वजह से रोज़ा न रखे वह अपनी रोज़ादार बीवी को जिमाअ पर मजबूर नहीं कर सकता लेकिन अगर मजबूर करे तब भी मर्द पर कफ़्फ़ारा वाजिब नहीं।
1693. ज़रूरी है कि इंसान कफ़्फ़ारा देने में कोताही न करे लेकिन फ़ौरी तौर पर देना भी ज़रूरी नहीं।
1694. अगर किसी शख़्स पर कफ़्फ़ारा वाजिब हो और वह कई साल तक न दे तो कफ़्फ़ारे में कोई इज़ाफ़ा नहीं होता।
1695. जिस शख़्स को बतौर कफ़्फ़ारा एक दिन साठ फ़क़ीरों को खाना खिलाना ज़रूरी हो अगर साठ फ़क़ीर मौजूद हों तो वह एक फ़क़ीर को एक मुद से ज़्यादा खाना नहीं दे सकता या एक फ़क़ीर को एक से ज़ाइद मर्तबा पेट भर खिलाए और उसे अपने कफ़्फ़ारे में ज़्यादा अफ़राद को खाना खिलाना शुमार करे अलबत्ता वह फ़क़ीर के अहलो अयाल में से हर एक को एक मुद दे सकता है ख़्वाह वह छोटे ही क्यों न हों।
1696. जो शख़्स माहे रमज़ानुल मुबारक के रोज़े की क़ज़ा करे अगर वह ज़ोहर के बाद जानबूझ कर कोई ऐसा काम करे जो रोज़े को बातिल करता हो तो ज़रूरी है कि दस फ़क़ीरों को फ़र्दन फ़र्दन एक मुद खाना दे और अगर न दे सकता हो तो तीन रोज़े रखे।
वह सूरतें जिन में फ़क़त रोज़े की क़ज़ा वाजिब है
1697. जो सूरतें बयान हो चुकी हैं उनके अलावा इन चन्द सूरतों में इंसान पर सिर्फ़ रोज़े की क़ज़ा वाजिब है और कफ़्फ़ारा वाजिब नहीं है।
1. एक शख़्स माहे रमज़ान की रात में जुनुब हो जाए और जैसा कि मस्अला 1639 में तफ़्सील से बताया गया है सुब्ह की अज़ान तक दूसरी नीन्द से बेदार न हो।
2. रोज़े को बातिल करने वाला काम तो न किया हो लेकिन रोज़े की नीयत न करे या रिया करे (यानी लोगों पर ज़ाहिर करे कि रोज़े से हूँ) या रोज़ा न रखने का इरादा करे इसी तरह अगर ऐसे काम का इरादा करे जो रोज़ो को बातिल करता हो तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर उस दिन के रोज़े की क़ज़ा रखना ज़रूरी है।
3. माहे रमज़ानुल मुबारक में ग़ुस्ले जनाबत करना भूल जाए और जनाबत की हालत में एक या कई दिन रोज़े रखता रहे।
4. माहे रमज़ानुल मुबारक में यह तहक़ीक़ किये बग़ैर कि सुब्ह हुई या नहीं कोई ऐसा काम करे जो रोज़े को बातिल करता हो और बाद में पता चले कि सुब्ह हो चुकि थी तो इस सूरत में एहतियात की बिना पर ज़रूरी है कि क़ुर्बते मुतलक़ा की नीयत से उस दिन उन चीज़ों से इज्तिनाब करे जो रोज़े को बातिल करती हैं और उस दिन के रोज़े की क़ज़ा भी करे।
5. कोई कहे कि सुब्ह नहीं हुई और इंसान उसके कहने की बिना पर कोई ऐसा काम करे जो रोज़े को बातिल करता हो और बाद में पता चले कि सुब्ह हो गई थी।
6. कोई कहे कि सुब्ह हो गई है और इंसान उसके कहने पर यक़ीन न करे या समझे कि मज़ाक़ कर रहा है और ख़ुद तहक़ीक न करे और कोई ऐसा काम करे जो रोज़े को बातिल करता हो और बाद में मालूम हो कि सुब्ह हो गई थी।
7. नाबीना या उस जैसा कोई शख़्स किसी के कहने पर जिसका क़ौल उसके लिये शरअन हुज्जत हो, रोज़ा इफ़्तार कर ले कि मग़्रिब हो गई है और बाद में मालूम हो कि मग़्रिब का वक़्त नहीं हुआ था।
8. इंसान को यक़ीन या इत्मीनान हो कि मग़्रिब हो गई है और वह रोज़ा इफ़्तार कर ले और बाद में पता चले कि मग़्रिब नहीं हुई थी लेकिन अगर मत्लअ अब्र आलूद हो और इंसान उस गुमान के तहत इफ़्तार कर ले कि मग़्रिब हो गई है और बाद में मालूम हो कि मग़्रिब नहीं हुई थी तो एहतियात की बिना पर उसे सूरत में क़ज़ा वाजिब है।
9. इंसान प्यास की वजह से कुल्ली करे यानी पानी मुंह में घुमाये और बे इख़्तियार पानी पेट में चला जाए। अगर नमाज़े वाजिब के वुज़ू के अलावा किसी वुज़ू में कुल्ली की जाए तो एहतियाते मुस्तहब की बिना पर उसके लिये भी यही हुक्म है लेकिन अगर इंसान भूल जाए कि रोज़े से है और पानी गले से उतर जाए या प्यास के अलावा किसी दूसरी सूरत में कि जहां कुल्ली करना मुस्तहब है – जैसे वुज़ू करते वक़्त – कुल्ली करे और पानी बे इख़्तियार पेट में चला जाए तो उसकी क़ज़ा नहीं है।
10. कोई शख़्स मजबूरी, इज़तिरार या तक़ैया की हालत में रोज़ा इफ़्तार करे तो उस पर रोज़ा की क़ज़ा रखना लाज़िम है लेकिन कफ़्फ़ारा वाजिब नहीं।
1698. अगर रोज़ादार पानी के अलावा कोई चीज़ मुंह में डाले और वह बे इख़्तियार पेट में चली जाए या नाक में पानी डाले और वह बे इख़्तियार (हल्क़ के) नीचे उतर जाए तो उस पर क़ज़ा वाजिब नहीं है।
1699. रोज़ादार के लिये ज़्यादा कुल्लियाँ करना मकरूह है और अगर कुल्ली के बाद लुआबे दहन निगलना चाहे तो बेहतर है कि पहले तीन दफ़्आ लुआबे दहन को थूक दे।
1700. अगर किसी शख़्स को मालूम हो या उसे एहतिमाल हो कि कुल्ली करने से बे इख़्तियार पानी उसके हल्क़ में चला जायेगा तो ज़रूरी है कि कुल्ली न करे, और अगर जानता हो कि भूल जाने की वजह से पानी उसके हल्क़ में चला जायेगा तब भी एहतियाते लाज़िम की बिना पर यही हुक्म है।
1701. अगर किसी शख़्स को माहे रमज़ानुल मुबारक में तहक़ीक़ करने के बाद मालूम न हो कि सुब्ह हो गई है और वह कोई ऐसा काम करे जो रोज़े को बातिल करता हो और बाद में मालूम हो कि सुब्ह हो गई थी तो उसके लिये रोज़े की क़ज़ा करना ज़रूरी नहीं।
1702. अगर किसी शख़्स को शक हो कि मग़्रिब हो गई है या नहीं तो वह रोज़ा इफ़्तार नहीं कर सकता लेकिन अगर उसे शक हो कि सुब्ह हो गई है या नहीं तो वह तहक़ीक करने से पहले ऐसा काम कर सकता है जो रोज़े को बातिल करता हो।
क़ज़ा रोज़े के अहकाम
1703. अगर कोई दीवाना अच्छा हो जाए तो उसके लिए आलमे दीवांगी के रोज़ों की क़ज़ा वाजिब नहीं।
1704. अगर कोई काफ़िर मुसलमान हो जाए तो उस पर ज़माना ए कुफ़्र के रोज़ों की क़ज़ा वाजिब नहीं है लेकिन अगर एक मुसलमान काफ़िर हो जाए और फिर दोबारा मुसलमान हो जाए तो ज़रूरी है कि अय्यामे कुफ़्र के रोज़े की क़ज़ा बजा लाये।
1705. जो रोज़े इंसान की बेहवासी की वजह से छूट जायें ज़रूरी है कि उनकी क़ज़ा बजा लाए ख़्वाह जिस चीज़ की वजह से वह बेहवास हुआ हो वह इलाज की ग़रज़ से ही खाई हो।
1706. अगर कोई शख़्स किसी उज़्र की वजह से चन्द दिन रोज़े न रखे और बाद में शक करे कि उसका उज़्र किस वक़्त ज़ाइल हुआ था तो उसके लिये वाजिब नहीं कि जितनी मुद्दत रोज़े न रखने का ज़्यादा एहतिमाल हो उसके मुताबिक़ क़ज़ा बजा लाए मसलन अगर कोई शख़्स रमज़ानुल मुबारक से पहले सफ़र करे और उसे मालूम न हो कि माहे मुबारक की पांचवीं तारीख़ को सफ़र से वापस आया था या छटी को, या मसलन उसने माहे मुबारक के आख़िर में सफ़र शुरू किया हो और माहे मुबारक ख़त्म होने के बाद वापस आया हो। और उसे पता न हो कि पच्चीसवीं रमज़ान को सफ़र किया था या छब्बीसवीं को तो दोनों सूरतों में वह कमतर दिनों याअनी पांच रोज़ों की क़ज़ कर सकता है अगरचे एहतियाते मुस्तहब यह है कि ज़्यादा दिनों यानी छः दिनों की क़ज़ा करे।
1707. अगर किसी शख़्स पर कई साल के माहे रमज़ानुल मुबारक के रोज़ों की क़ज़ा वाजिब हो तो जिस साल के रोज़ों की क़ज़ा पहले करना चाहे कर सकता है लेकिन अगर आख़िरी रमज़ानुल मुबारक के रोज़ों की क़ज़ा का वक़्त तंग हो मसलन आख़िरी रमज़ानुल मुबारक के पांच रोज़ों की क़ज़ा उसके ज़िम्मे हो और आइन्दा रमज़ानुल मुबारक के शूरू होने में भी पांच ही दिन बाक़ी हों तो बेहतर यह है कि पहले आख़िरी रमज़ानुल मुबारक के रोज़ों की क़ज़ा बजा लाए।
1708. अगर किसी शख़्स पर कई साल के माहे रमज़ान के रोज़ों की क़ज़ा वाजिब हो और वह रोज़े की नीयत करते वक़्त मुअय्यन न करे कि कौन से रमज़ानुल मुबारक के रोज़े की क़ज़ा कर रहा है तो उसका शुमार आख़िरी माहे रमज़ान की क़ज़ा में नहीं होगा।
1709. जिस शख़्स ने रमज़ानुल मुबारक का क़ज़ा रोज़ा रखा हो वह उस रोज़े को ज़ोहर से पहले तोड़ सकता है लेकिन अगर क़ज़ा का वक़्त तंग हो तो बेहतर है कि रोज़ा न तोड़े।
1710. अगर किसी ने मैयित का क़ज़ा रोज़ा रखा हो तो बेहतर है कि ज़ोहर के बाद रोज़ा न तोड़े।
1711. अगर कोई बीमारी या हैज़ या निफ़ास की वजह से रमज़ानुल मुबारक के रोज़े न रखे और उस मुद्दत के गुज़रने से पहले कि जिसमें वह उन रोज़ों की जो उसने नहीं रखे थे क़ज़ा कर सकता हो मर जाए तो उन रोज़ों की क़ज़ा नहीं है।
1712. अगर कोई शख़्स बीमारी का वजह से रमज़ानुल मुबारक के रोज़े न रखे और उसकी बीमारी आइन्दा रमज़ान तक तूल खींच जाए तो जो रोज़े उसने न रखे हों उनकी क़ज़ा उस पर वाजिब नहीं है और ज़रूरी है कि हर दिन के लिए एक मुद तआम यानी गंदुम या जौ या रोटी वग़ैरा फ़क़ीर को दे लेकिन अगर किसी उज़्र मसलन सफ़र की वजह से रोज़े न रखे और उसक उज़्र आइन्दा रमज़ानुल मुबारक तक बाक़ी रहे तो ज़रूरी है कि जो रोज़े न रखे हों उनकी क़ज़ा करे एहतियाते वाजिब है कि हर एक दिन के लिये एक मुद तआम भी फ़क़ीर को दे। 1713. अगर कोई शख़्स बीमारी का वजह से रमज़ानुल मुबारक के रोज़े न रखे और रमज़ानुल मुबारक के बाद उसकी बीमारी दूर हो जाए लेकिन कोई दूसरा उज़्र लाहिक़ हो जाए जिसकी वजह से वह आइन्दा रमज़ानुल मुबारक तक क़ज़ा रोज़े न रख सके तो ज़रूरी है कि जो रोज़े न रखे हों उनकी क़ज़ा बजा लाए नीज़ अगर रमज़ानुल मुबारक में बीमारी के अलावा कोई और उज़्र रखता हो और रमज़ानुल मुबारक तक बीमारी की वजह से रोज़े न रख सके तो जो रोज़े न रखे हों ज़रूरी है कि उनकी क़ज़ा बजा लाए और एहतियाते वाजिब की बिना पर हर दिन के लिये एक मुद तआम भी फ़क़ीर को दे।
1714. अगर कोई शख़्स किसी उज़्र की वजह से रमज़ानुल मुबारक में रोज़े न रखे और रमज़ानुल मुबारक के बाद उसका उज़्र दूर हो जाए और वह आइन्दा रमज़ानुल मुबारक तक अमदन रोज़े की क़ज़ा न बजा लाए तो ज़रूरी है कि रोज़ों की क़ज़ा करे और हर दिन के लिये एक मुद तआम भी फ़क़ीर को दे।
1715. अगर कोई शख़्स क़ज़ा रोज़े रखने में कोताही करे हत्ता कि वक़्त तंग हो जाए और वक़्त की तंगी में उसे कोई उज़्र पेश आ जाए तो ज़रूरी है कि रोज़ों की क़ज़ा करे और एहतियात की बिना पर हर एक दिन के लिए एक मुद तआम (गिज़ा) फ़क़ीर को दे। और अगर उज़्र दूर होने के बाद मुसम्मम इरादा रखता हो कि रोज़ों की क़ज़ा बजा लायेगा लेकिन क़ज़ा बजा लाने से पहले तंग वक़्त में उसे कोई उज़्र पेश आ जाए तो उस सूरत में भी यही हुक्म है।
1716. अगर इंसान का मरज़ चन्द साल तूल खींच जाए तो ज़रूरी है कि तन्दुरुस्त होने के बाद आख़िरी रमज़ानुल मुबारक के छुटे हुए रोज़ों की क़ज़ा बजा लाए और उससे पिछले सालों के माह हाए मुबारक के हर दिन के लिए एक मुद तआम फ़क़ीर को दे।
1717. जिस शख़्स के लिए हर रोज़े के एवज़ एक मुद तआम फ़क़ीर को देना ज़रूरी हो वह चन्द दिनों का कफ़्फ़ारा एक ही फ़क़ीर को दे सकता है।
1718. अगर कोई शख़्स रमज़ानुल मुबारक के रोज़ों की क़ज़ा करने में कई साल की तारव़ीर कर दे तो ज़रूरी है कि क़ज़ा करे और पहले साल में तारव़ीर करने की बिना पर हर रोज़े के लिए एक मुद तआम फ़क़ीर को दे लेकिन बाक़ी कई साल की तारव़ीर के लिए उस पर कुछ भी वाजिब नहीं है।
1719. अगर कोई शख़्स रमज़ानुल मुबारक के रोज़े जानबूझ कर न रखे तो ज़रूरी है कि उन की क़ज़ा बजा लाए और हर दिन के लिए दो महीने रोज़े रखे या साठ फ़क़ीरों को खाना दे या एक ग़ुलाम आज़ाद करे और अगर आइन्दा रमज़ानुल मुबारक तक उन रोज़ों की क़ज़ा न करे तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर हर दिन के लिए एक मुद तआम कफ़्फ़ारा भी दे।
1720. अगर कोई शख़्स जान बूझ कर रमज़ानुल मुबारक का रोज़ा न रखे और दिन में कई दफ़्आ जिमाअ या इसतिम्ना करे तो अक़्वा की बिना पर कफ़्फ़ारा मुक़र्रर नहीं होगा (एक कफ़्फ़ारा काफ़ी है) ऐसे ही अगर कई दफ़्आ कोई और ऐसा काम करे जो रोज़े को बातिल करता हो मसलन कई दफ़्आ खाना खाए तब भी एक कफ़्फ़ारा काफ़ी है।
1721. बाप के मरने के बाद बड़े बेटे के लिए एहतियाते लाज़िम की बिना पर ज़रूरी है कि बाप के रोज़ों की क़ज़ा उसी तरह बजा लाए जैसे कि नमाज़ के सिलसिले में मस्अला 1399 में तफ़्सील से बताया गया है।
1722. अगर किसी के बाप ने माहे रमज़ानुल मुबारक के रोज़ों के अलावा कोई दूसरे वाजिब रोज़े मसलन सुन्नती रोज़े न रखे हों तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि बड़ा बेटा उन रोज़ों की क़ज़ा बजा लाए लेकिन अगर बाप किसी के रोज़ों के लिए अजीर बना हो और उस ने वह रोज़े न रखे हों तो उन रोज़ों की क़ज़ा बड़े बेटे पर वाजिब नहीं है।
मुसाफ़िर के रोज़ों के अहकाम
1723. जिस मुसाफ़िर के लिए सफ़र में चार रक्अती नमाज़ के बजाय दो रक्अत पढ़ना ज़रूरी हो उसे रोज़ा नहीं रखना चाहिये लेकिन वह मुसाफ़िर जो पूरी नमाज़ पढ़ता हो मसलन वह शख़्स जिसका पेशा ही सफ़र हो या जिसका सफ़र किसी नजाइज़ काम के लिए हो ज़रूरी है कि सफ़र में रोज़ा रखे।
1724. माहे रमज़ानुल मुबारक में सफ़र करने में कोई हरज नहीं लेकिन रोज़े से बचने के लिए सफ़र करना मकरूह है और इसी तरह माहे रमज़ानुल मुबारक की चौबीसवीं तारीख़ से पहले सफ़र करना (भी मकरूह है) बजुज़ उस सफ़र के जो हज, उमरा या किसी ज़रूरी काम के लिए हो।
1725. अगर माहे रमज़ानुल मुबारक के रोज़ों के अलावा किसी खास दिन का रोज़ा इंसान पर वाजिब हो या एतिकाफ़ के दिनों में से तीसरा दिन हो तो उस दिन सफ़र नहीं कर सकता और अगर सफ़र में हो और उसके लिए ठहरना मुम्किन हो तो ज़रूरी है कि दस दिन एक जगह क़ियाम करने की नीयत करे और उस दिन रोज़ा रखे लेकिन अगर उस दिन का रोज़ा मन्नत की वजह से वाजिब हुआ हो तो ज़ाहिर यह है कि उस दिन सफ़र करना जाइज़ है और क़ियाम की नीयत करना वाजिब नहीं। अगरचे बेहतर यह है कि जब तक सफ़र करने के लिए मजबूर न हो सफ़र न करे और अगर सफ़र में हो तो क़ियाम करने की नीयत करे।
1726. अगर कोई शख़्स मुस्तहब रोज़े की मन्नत माने लेकिन उसके लिए दिन मुअय्यन न करे तो वह शख़्स सफ़र में ऐसा मन्नती रोज़ा नहीं रख सकता लेकिन अगर मन्नत माने कि सफ़र के दौरान एक मख़्सूस दिन रोज़ा रखेगा तो ज़रूरी है कि वह रोज़ा सफ़र में रखे नीज़ अगर मन्नत माने कि सफ़र में हो या न हो एक मख़्सूस दिन का रोज़ा रखेगा तो ज़रूरी है कि अगरचे सफ़र में हो तब भी उस दिन का रोज़ा रखे।
1727. मुसाफ़िर तलबे हाजत के लिए तीन दिन मदीना ए तैयिबा में मुस्तहब रोज़ा रख सकता है। और अहवत यह है कि वह तीन दिन बुध, जुमअरात और जुमुआ हों।
1728. कोई शख़्स जिसे यह इल्म न हो कि मुसाफ़िर का रोज़ा रखना बातिल है, अगर सफ़र में रोज़ा रख ले और दिन ही दिन में उसे हुक्मे मस्अला मालूम हो जाए तो उसका रोज़ा बातिल है लेकिन अगर मग़्रिब तक हुक्म मालूम न हो तो उसका रोज़ा सहीह है।
1729. अगर कोई शख़्स यह भूल जाए कि वह मुसाफ़िर है या यह भूल जाए कि मुसाफ़िर का रोज़ा बातिल होता है और सफ़र के दौरान रोज़ा रख ले तो उसका रोज़ा बातिल है।
1730. अगर रोज़ादार ज़ोहर के बाद सफ़र करे तो ज़रूरी है कि एहतियात की बिना पर अपने रोज़े को तमाम करे और अगर ज़ोहर से पहले सफ़र करे और रात से ही सफ़र का इरादा रखता हो तो उस दिन का रोज़ा नहीं रख सकता लेकिन हर सूरत में हद्दे तरख़्ख़ुस तक पहुंचने से पहले ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिये जो रोज़े को बातिल करता हो वर्ना उस पर कफ़्फ़ारा वाजिब होगा।
1731. अगर मुसाफ़िर रमज़ानुल मुबारक में ख़्वाह वह फ़ज्र से पहले सफ़र में हो या रोज़े से हो और सफ़र करे और ज़ोहर से पहले अपने वतन पहुंच जाए या ऐसी जगह पहुंच जाए जहाँ वह दस दिन क़ियाम करना चाहता हो और उसने कोई ऐसा काम न किया हो जो रोज़े को बातिल करता हो तो ज़रूरी है कि उस दिन का रोज़ा रखे और अगर कोई ऐसा काम किया हो जो रोज़े को बातिल करता हो तो उस दिन का रोज़ा उस पर वाजिब नहीं है।
1732. अगर मुसाफ़िर ज़ोहर के बाद अपने वतन पहुँचे या ऐसी जगह पहुँचे जहाँ दस दिन क़ियाम करना चाहता हो तो वह उस दिन का रोज़ा नहीं रख सकता।
1733. मुसाफ़िर और वह शख़्स जो किसी उज़्र की वजह से रोज़ा न रख सकता हो उसके लिए माहे रमज़ानुल मुबारक में दिन के वक़्त जिमाअ करना और पेट भर कर खाना और पीना मकरूह है।
वह लोग जिन पर रोज़ा रखना वाजिब नहीं
1734. जो शख़्स बुढ़ापे की वजह से रोज़ा न रख सकता हो या रोज़ा रखना उसके लिए शदीद तक्लीफ़ का बाइस हो उस पर रोज़ा वाजिब नहीं है लेकिन रोज़ा न रखने की सूरत में ज़रूरी है कि हर रोज़े के एवज़ एक मुद तआम यानी गंदुम या जौ या रोटी या उन से मिलती जुलती कोई चीज़ फ़क़ीर को दे।
1735. जो शख़्स बुढ़ापे की वजह से माहे रमज़ानुल मुबारक के रोज़े न रखे अगर वह रमज़ानुल मुबारक के बाद रोज़े रखने के क़ाबिल हो जाये तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि जो रोज़े न रखें हो उनकी क़ज़ा बजा लाए।
1736. अगर किसी शख़्स को कोई ऐसी बीमारी हो जिसकी वजह से उसे बहुत ज़्यादा प्यास लगती हो और वह प्यास बर्दाश्त न कर सकता हो या प्यास की वजह से उसे तक्लीफ़ होती हो तो उस पर रोज़ा वाजिब नहीं है लेकिन रोज़ा न रखने की सूरत में ज़रूरी है कि हर रोज़े के एवज़ एक मुद तआम फ़क़ीर को दे और एहतियाते मुस्तहब यह है कि जितनी मिक़्दार अशद ज़रूरी हो उस से ज़्यादा पानी न पिये और बाद में जब रोज़ा रखने के क़ाबिल हो जाए तो जो रोज़े न रखे हों एहतियाते मुस्तहब की बिना पर उन की क़ज़ा बजा लाए।
1737. जिस औरत का वज़्ए हम्ल का वक़्त क़रीब हो, उसका रोज़ा रखना ख़ुद उसके लिए या उसके होने वाले बच्चे के लिए मुज़िर हो उस पर रोज़ा वाजिब नहीं है और ज़रूरी है कि वह हर दिन के एवज़ एक मुद तआम फ़क़ीर को दे और ज़रूरी है कि दोनों सूरतों में जो रोज़े न रखे हों उनकी क़ज़ा बजा लाए।
1738. जो औरत बच्चे को दूध पिलाती हो और उसका दूध कम हो ख़्वाह वह बच्चे की माँ हो या दाया और ख़्वाह बच्चे को मुफ़्त दूध पिला रही हो अगर उसका रोज़ा रखना खुद उसके या दूध पीने वाले बच्चे के लिए मुज़िर हो तो उस औरत पर रोज़ा रखना वाजिब नहीं है और ज़रूरी है कि हर एक दिन के एवज़ एक मुद तआम फ़क़ीर को दे और दोनों सूरतों में जो रोज़े न रखे हों उन की क़ज़ा करना ज़रूरी है। लेकिन एहतियाते वाजिब की बिना पर यह हुक्म सिर्फ़ उस सूरत में है जबकि बच्चे को दूध पिलाने का इनहिसार उसी पर हो। लेकिन अगर बच्चे को दूध पिलाने का कोई और तरीक़ा हो मसलन कुछ औरतें मिल कर बच्चे को दूध पिलायें तो ऐसी सूरत में इस हुक्म के साबित होने में इश्काल है।
महीने की पहली तारीख़ साबित होने का तरीक़ा
1739. महीने की पहली तारीख़ (मुन्दरिजा ज़ैल) चार चीज़ों से साबित होती है।
1. इंसान खुद चांद देखे।
2. एक ऐसा गुरोह जिसके कहने पर यक़ीन या इत्मीनान हो जाए यह कहे कि हमने चाँद देखा है और इस तरह हर वह चीज़ जिसकी बतौलत यक़ीन या इत्मीनान हो जाए।
3. दो आदिल मर्द यह कहें कि हमने रात को चांद देखा है लेकिन अगर वह चांद के अलग अलग औसाफ़ बयान करें तो पहली तारीख़ साबित नहीं होगी। और यही हुक्म है अगर उनकी गवाही से इख़तिलाफ़ हो। या उस के हुक्म में इख़तिलाफ़ हो। मसलन शहर के बहुत से लोग चांद देखने की कोशीश करें लेकिन दो आदिल आदमियों के अलावा कोई दूसरा चांद देखने का दअवा न करे या कुछ लोग चांद देखने की कोशीश करें और उन लोगों में से दो आदिल चांद देखने का दअवा करें और दूसरों को चांद नज़र न आए हालांकि उन लोगों में से दो और आदिल आदमि ऐसे हों जो चांद की जगह पहचानचे, निगाह की तेज़ी और दीगर ख़ुसूसीयात में उन पहले दो आदमियों की मानिन्द हों (और वह चांद देखने का दअवा न करें) तो ऐसी सूरत में दो आदिल आदमियों की गवाही से महीने की पहली तारीख़ साबित नहीं होगी।
4. शाबान की पहली तारीख़ से तीस दिन गुज़र जायें जिन के गुज़रने पर माहे रमज़ानुल मुबारक की पहली तारीख साबित हो जाती है और रमज़ानुल मुबारक से तीस दिन गुज़र जायें जिनके गुज़रने पर शव्वाल की पहली तारीख़ साबित हो जाती है।
1740. हाकिमे शरअ के हुक्म से महीने की पहली तारीख़ साबित नहीं होती और एहतियात की रिआयत करना औला है।
1741. मुनज्जिमों की पेशीनगोई से महीने की पहली तारीख़ साबित नहीं होती लेकिन अगर इंसान को उनके कहने से यक़ीन या इत्मीनान हो जाए तो ज़रूरी है कि उस पर अमल करे।
1742. चांद का आसमान पर बलन्द होना या उसका देर से ग़ुरूब होना इस बात की दलील नहीं कि साबिक़ा रात चांद रात थी और इसी तरह अगर चांद के गिर्द हल्क़ा हो तो यह इस बात की दलील नहीं है कि पहली का चांद गुज़श्ता रात निकला था।
1743. अगर किसी शख़्स पर माहे रमज़ानुल मुबारक की पहली तारीख़ साबित न हो और वह रोज़ा न रखे लेकिन बाद में साबित हो जाए कि गुज़श्ता रात ही चांद रात थी तो ज़रूरी है कि उस दिन के रोज़े की क़ज़ा करे।
1744. अगर किसी शहर में महीने की पहली तारीख़ साबित हो जाए तो दूसरे शहरों में भी कि जिनका उफ़ुक़ उस शहर में मुत्तहिद हो महीने की पहली तारीख़ होती है। यहाँ पर उफ़ुक़ के मुत्तहिद होने से मुराद यह है कि अगर पहले शहर में चांद दिखाई दे तो दूसरे शहर में भी अगर बादल की तरह कोई रुकावट न हो तो चांद दिखाई देता है।
1745. महीने की पहली तारीख़ टेलीग्राम (और फ़ैक्स या टेलेक्स) से साबित नहीं होती सिवाय इस सूरत के कि इंसान को इल्म हो कि यह पैग़ाम दो आदिल मर्दों की शहादत की रू से या किसी दूसरे ऐसे तरीक़े से आया है जो शर्अन मोअतबर है।
1746. जिस दिन के मुतअल्लिक़ इंसान को इल्म न हो कि रमज़ानुल मुबारक का आख़िरी दिन है या शव्वाल का पहला दिन उस दिन ज़रूरी है कि रोज़ा रखे लेकिन अगर दिन ही दिन उसे पता चल जाए कि आज यकुम शव्वाल (रोज़े ईद) है तो ज़रूरी है कि रोज़ा इफ़्तार कर ले।
1747. अगर कोई शख़्स क़ैद में हो और माहे रमज़ान के बारे में यक़ीन न कर सके तो ज़रूरी है कि गुमान पर अमल करे लेकिन अगर क़वी गुमान पर अमल कर सकता हो तो ज़ईफ़ गुमान पर अमल नही कर सकता और अगर गुमान पर अमल मुम्किन न हो तो ज़रूरी है कि जिस महीने के बारे में एहतिमाल हो कि रमज़ान है उस महीने में रोज़े रखे लेकिन ज़रूरी है कि वह उस महीने को याद रखे। चुनांचे बाद में उसे मालूम हो कि वह माहे रमज़ान या उसके बाद का ज़माना था तो उसके ज़िम्मे कुछ नहीं है। लेकिन अगर मालूम हो कि माहे रमज़ान से पहले का ज़माना था तो ज़रूरी है कि रमज़ान के रोज़ों की क़ज़ा करे।
हराम और मकरूह रोज़े
1748. ईदे फ़ित्र और ईदे क़ुर्बान के दिन रोज़ा रखना हराम है। नीज़ जिस दिन के बारे में इंसान को यह इल्म न हो कि शाबान की आख़िरी तारीख़ है या रमज़ानुल मुबारक की पहली तो अगर वह उस दिन पहली रमज़ानुल मुबारक की नीयत से रोज़ा रखे तो हराम है।
1749. अगर औरत के मुस्तहब (नफ़्ली) रोज़े रखने से शौहर की हक़ तलफ़ी होती हो तो औरत का रोज़ा रखना हराम है और एहतियाते वाजिब यह है कि ख़्वाह शौहर की हक़ तलफ़ी न भी होती हो उसकी इजाज़त के बग़ैर मुस्तहब (नफ़्ली) रोज़ा न रखे।
1750. अगर औलाद का मुस्तहब रोज़ाः- माँ बाप की औलात से शफ़क़त की वजह से - - माँ के लिए अज़ीयत का मूजिब हो तो औलाद के लिए मुस्तहब रोज़े रखना हराम है।
1751. अगर बेटा बाप की इजाज़त के बग़ैर मुस्तहब रोज़ा रख ले और दिन के दौरान बाप उसे (रोज़ा रखने से) मना करे तो अगर बेटे का बाप की बात न मानना फ़ितरी शफ़क़त की वजह से अज़ीत का मूजिब हो तो बेटे को चाहिए कि रोज़ा तोड़ दे।
1752. अगर कोई शख़्स जानता हो कि रोज़ा रखना उसके लिए ऐसा मुज़िर नहीं है कि जिसकी परवाह की जाए तो अगरचे तबीब कहे कि मुज़िर है उसके लिए ज़रूरी है कि रोज़ा रखे और अगर कोई शख़्स यक़ीन या गुमान रखता हो कि रोज़ा उसके लिए मुज़िर है तो अगरचे तबीब कहे कि मुज़िर नहीं है ज़रूरी है कि वह रोज़ा न रखे और अगर वह रोज़ा रखे जबकि रोज़ा रखना वाक़ई मुज़िर हो या क़स्दे क़ुर्बत से न हो तो उसका रोज़ा सहीह नहीं है।
1753. अगर किसी शख़्स को एहतिमाल हो कि रोज़ा रखना उसके लिए ऐसा मुज़िर है कि जिसकी परवाह की जाए और इस एहतिमाल की बिना पर (उस के दिल में) ख़ौफ़ पैदा हो जाए तो अगर उस का एहतिमाल लोगों की नज़र में सहीह हो तो उसे रोज़ा नहीं रखना चाहिये। और अगर वह रोज़ा रख ले तो साबिक़ा मस्अले की तरह उस सूरत में भी उस का रोज़ा सहीह नहीं है।
1754. जिस शख़्स को एतिमाद हो कि रोज़ा रखना उसके लिए मुज़िर नहीं अगर वह रोज़ा रख ले और मग़्रिब के बाद उसे पता चले कि रोज़ा रखना उसके लिये ऐसा मुज़िर था कि जिसकी परवाह की जाती तो एहतियाते वाजिब की बिना पर उस रोज़े की क़ज़ा करना ज़रूरी है।
1755. मुन्दरिजा बाला रोज़ों के अलावा और भी रोज़े हराम हैं जो मुफ़स्सल किताबों में मज़्कूर हैं।
1756. आशूर के दिन रोज़ा रखना मकरूह है और उस दिन का रोज़ा भी मकरूह है जिसके बारे में शक हो कि अरफ़ा का दिन है या ईदे क़ुर्बान का।
मुस्तहब रोज़े
1757. बजुज़ हराम और मकरूह रोज़ों के जिनका ज़िक्र किया गया है साल के तमाम दिनों में रोज़े मुस्तहब हैं और बाज़ दिनों के रोज़े रखने की बहुत ताकीद की गई है जिनमें से चन्द यह हैं
1. हर महीने की पहली और आख़िरी जुम्अरात और पहला बुध जो महीने की दसवीं तारीख़ के बाद आए। और अगर कोई शख़्स यह रोज़े न रखे तो मुस्तहब है कि उनकी क़ज़ा करे और अगर रोज़ा बिल्कुल न रख सकता हो तो मुस्तहब है कि हर दिन के बदले एक मुद तआम या 12/6 नख़ुद सिक्कादार चांदी फ़क़ीर को दे।
2. हर महीने की तेरहवीं, चौदहवीं और पन्द्रहवीं तारीख़।
3. रजब और शाबान के पूरे महीने के रोज़े। या उन दो महीनों में जितने रोज़े रख सके ख़्वाह वह एक ही दिन क्यों न हो।
4. ईदे नवरोज़ का दिन।
5. शव्वाल की चौथी से नवीं तारीख़ तक।
6. ज़ी क़अदा की पहली तारीख़ से नवीं तारीख़ (यौमे अरफ़ा) तक।
7. ज़िलहिज्जा की पहली तारीख़ से नवीं तारीख़ (यौमे अरफ़ा) तक लेकन अगर इंसान रोज़े की वजह से पैदा होने वाली कमज़ोरी की बिना पर यौमे अरफ़ा की दुआयें न पढ़ सके तो उस दिन रोज़ा रखना मकरूह है।
8. ईदे सईदे ग़दीर का दिन (18 ज़िल हिज्जा)
9. रोज़े मुबाहिला (24 ज़िलहिज्जा)
10. मोहर्रमुल हराम की पहली, तीसरी और सातवीं तारीख।
11. रसूले अकरम स्वल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम की विलादत का दिन (17 रबीउल अव्वल)
12. जमादिल अव्वल की पन्द्रह तारीख़।
नीज़ा (ईदे बेअसत) यानी रसूले अकरम स्वल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम के एलाने रिसालत के दिन (27 रजब) भी रोज़ा रखना मुस्तहब है। और जो शख़्स मुस्तहब रोज़ा रखे उसके लिए वाजिब नहीं है कि उसे इख़तिताम तक पहुँचाए बल्कि अगर उसका मोमिन भाई उसे खाने की दअवत दे तो मुस्तहब है कि उसकी दावत क़बूल कर ले और दिन में ही रोज़ा खोल ले ख़्वाह ज़ोहर के बाद ही क्यों न हो।
वह सूरतें जिनमें मुब्तलाते रोज़ा से पर्हेज़ मुस्तहब है
1758. (मुन्दरिजा ज़ैल) पांच अश्ख़ास के लिए मुस्तहब है कि अगरचे रोज़े से न हों माहे रमज़ानुल मुबारक में उन अफ़्आल से पर्हेज़ करें जो रोज़े को बातिल करते हैं।
1. वह मुसाफ़िर जिसने सफ़र में कोई ऐसा काम किया हो जो रोज़े को बातिल करता हो और वह ज़ोहर से पहले अपने वतन या ऐसी जगह पहुंच जाए जहाँ वह दस दिन रहना चाहता हो।
2. वह मुसाफ़िर जो ज़ोहर के बाद अपने वतन या ऐसी जगह पहुंच जाए जहां वह दस दिन रहना चाहता हो। और इसी तरह अगर ज़ोहर से पहले उन जगहों पर पहुंच जाए जबकि वह सफ़र में रोज़ा तोड़ चुका हो तब भी यही हुक्म है।
3. वह मरीज़ जो ज़ोहर के बाद तन्दरुस्त हो जाए और यही हुक्म है अगर ज़ोहर से पहले तन्दरुस्त हो जाए अगरचे उसने कोई ऐसा काम (भी) किया हो जो रोज़े को बातिल करता हो और इसी तरह अगर ऐसा काम न किया हो तो उसका हुक्म मस्अला 1576 में गुज़र चुका है।
4. वह औरत जो दिन में हैज़ या निफ़ास के ख़ून से पाक हो जाए।
1759. रोज़ादार के लिए मुस्तहब है कि रोज़ा इफ़्तार करने से पहले मग़्रिब और इशा की नमाज़ पढ़े लेकिन अगर कोई दूसरा शख़्स उस का इन्तिज़ार कर रहा हो या उसे इतनी भूक लगी हो कि हुज़ूरे क़ल्ब के साथ नमाज़ न पढ़ सकता हो तो बेहतर है कि रोज़ा इफ़्तार करे लेकिन जहाँ तक मुम्किन हो नमाज़ फ़ज़ीलत के वक़्त में ही अदा करे।
ख़ुम्स के अहकाम
1760. ख़ुम्स सात चीज़ों पर वाजिब हैः-
1. कारोबार (या रोज़गार) का मुनाफ़ा।
2. मअदिनी कानें।
3. गड़ा हुआ ख़ज़ाना।
4. हलाल माल जो हराम माल में मख़लूत हो जाए।
5. ग़ोताख़ोरी से हासिल होने वाले समुन्द्री मोती और मूंगे।
6. जंग में मिलने वाला माले ग़नीमत।
7. मश्हूर क़ौल की बिना पर वह ज़मीन जो ज़िम्मी काफ़िर किसी मुसलमान से ख़रीदे।
ज़ैल में इनके अहकाम तफ़्सील से बयान किये जायेंगे।
1.कारोबार का मुनाफ़ा
1761. जब इंसान तिजारत, सन्अत व हिर्फ़त या दूसरे काम धंदों से रुपया पैसा कमाए, मिसाल के तौर पर अगर कोई अजीर बन कर किसी मुतवफ़्फ़ी की नमाज़ें पढ़े और रोज़ा रखे और इस तरह कुछ रुपया कमाए लिहाज़ा अगर वह कमाई ख़ुद उसके और उसके अहलो अयाल के साल भर के अख़राजात से ज़्यादा हो तो ज़रूरी है कि ज़ायद कमाई का ख़ुम्स यानी पांचवां हिस्सा उस तरीक़े के मुताबिक दे जिसकी तफ़्सील बाद में बयान होगी।
1762. अगर किसी को कमाई किये बग़ैर कोई आमदनी हो जाए मसलन कोई शख़्स उसे बतौरे तोहफ़ा कोई चीज़ दे और वह उसके साल भर के अख़राजात से ज़्यादा हो तो ज़रूरी है कि उस का ख़ुम्स दे। 1763. औरत को जो महर मिलता है और शौहर, बीवी को तलाक़े ख़ुलअ देने के एवज़ जो माल हासिल करता है उन पर ख़ुम्स नहीं है, और इसी तरह जो मीरास इंसान को मिले उस का भी मीरास के मोअतबर क़वाइद की रू से यही हुक्म है। और अगर उस मुसलमान को जो शीअह है किसी और ज़रीए से मसलन पदरी रिश्तेदार की तरफ़ से मीरास मिले तो उस माल को फ़वायद में शुमार किया जायेगा और ज़रूरी है कि उसका ख़ुम्स दे। इसी तरह अगर उसे बाप और बेटे के अलावा किसी और तरफ़ से मीरास मिले कि जिस का ख़ुद उसे गुमान तक न हो तो एहतियाते वाजिब यह है कि वह मीरास अगर उसके साल भर के अख़राजात से ज़्यादा हो तो उसका ख़ुम्स दे।
1764. अगर किसी शख़्स को कोई मीरास मिले और उसे मालूम हो कि जिस शख़्स से उसे यह मीरास मिली है उसने उस का ख़ुम्स नहीं दिया था तो ज़रूरी है कि वारिस उस का ख़ुम्स दे। इसी तरह अगर खुद उस माल पर ख़ुम्स वाजिब न हो और वारिस को इल्म हो कि जिस शख़्स से उसे वह माल विरसे में मिला है उस शख़्स के ज़िम्मे ख़ुम्स वाजिबुल अदा था तो ज़रूरी है कि उस के माल में ख़ुम्स अदा करे। लेकिन दोनों सूरतों में जिस शख़्स से माल विरसे में मिला हो अगर वह ख़ुम्स देने का मोअतक़िद न हो या यह कि वह ख़ुम्स देता ही न हो तो ज़रूरी नहीं कि वारिस वह ख़ुम्स अदा करे जो उस शख़्स पर वाजिब था।
1765. अगर किसी शख़्स ने किफ़ायत शिआरी के सबब साल भर के अख़राजात के बाद कुछ रक़म पस अन्दाज़ की हो तो ज़रूरी है कि उस बचत का ख़ुम्स दे।
1766. जिस शख़्स के तमाम अख़राजात कोई दूसरा शख़्स बर्दाश्त करता हो तो ज़रूरी है कि जितना माल उसके हाथ आए उस का ख़ुम्स दे।
1767. अगर कोई शख़्स अपनी जायदाद कुछ ख़ास अफ़राद मसलन अपनी औलाद के लिए वक़्फ़ कर दे और वह लोग उस जायदाद में खेती बाड़ी और शजरकारी करें और उस से मुनाफ़ा कमायें और वह कमाई उनके साल भर के अख़राजात से ज़्यादा हो तो ज़रूरी है कि उस कमाई का ख़ुम्स दें। नीज़ यह कि अगर वह किसी और तरीक़े से उस जायदाद से नफ़्अ हासिल करें मसलन उसे किराये या ठीके पर दे दें तो ज़रूरी है कि नफ़्अ की जो मिक़्दार उनके साल भर के अख़राजात में ज़्यादा हो उस का ख़ुम्स दें।
1768. जो माल किसी फ़क़ीर नें वाजिब या मुस्तहब सदक़े के तौर पर हासिल किया हो वह उस के साल भर के अख़राजात से ज़्यादा हो या जो माल उसे दिया गया है उस से उसने नफ़्अ कमाया हो मसलन उसने एक ऐसे दरख़्त से जो उसे दिया गया हो मेवा हासिल किया हो और वह उसके साल भर के अख़राजात से ज़्यादा हो तो ज़रूरी है कि उसका ख़ुम्स दे। लेकिन जो माल उसे बतौर ख़ुम्स या ज़कात दिया गया हो और वह उसके साल भर के अख़राजात से ज़्यादा हो तो ज़रूरी नहीं कि उस का ख़ुम्स दे।
1769. अगर कोई शख़्स ऐसी रक़म से कोई चीज़ ख़रीदे जिसका ख़ुम्स न दिया गया हो यानी बेचने वाले से कहे कि, मैं यह चीज़ उस रक़म से ख़रीद रहा हूं, अगर बेचने वाला शीआ इस्ना अशरी हो तो ज़ाहिर यह है कि कुल माल के मुतअल्लिक़ मुआमला दुरुस्त है और ख़ुम्स का तअल्लुक़ उस चीज़ से हो जाता है जो उसने उस रक़म से ख़रीदी है और (इस मुआमले में) हाकिमे शर्अ की इजाज़त और दस्तखत की ज़रूरत नहीं है।
1770. अगर कोई शख़्स कोई चीज़ ख़रीदे और मुआमला तय करने के बाद उसकी क़ीमत उस रक़म से अदा करे जिसका ख़ुम्स न दिया गया हो तो जो मुआमला उसने किया है वह सहीह है और जो रक़म उसने फ़रोशिन्दा को दी है उस के ख़ुम्स के लिए वह ख़ुम्स के मुस्तहक़्क़ीन का मक़रुज़ है।
1771. अगर कोई शीआ इस्ना अशरी मुसलमान कोई ऐसा माल ख़रीदे जिसका ख़ुम्स न दिया गया हो तो उसका ख़ुम्स बेचने वाले की ज़िम्मेदारी है और खरीदार के लिए कुछ नहीं।
1772. अगर कोई शख़्स किसी शीआ इस्ना अशरी मुसलमान को कोई ऐसी चीज़ बतौर अतीया दे जिसका ख़ुम्स न दिया गया हो तो उसके ख़ुम्स की अदायगी की ज़िम्मेदारी अतीया देने वाले पर है और (जिस शख़्स को अतीया दिया गया हो) उसके ज़िम्मे कुछ नहीं।
1773. अगर इंसान को किसी काफ़िर से या ऐसे शख़्स से जो ख़ुम्स देने पर एतिक़ाद न रखता हो कोई मिले तो उस माल का ख़ुम्स देना वाजिब नहीं है।
1774. ताजिर, दुकानदार, कारीगर और इस क़िस्म के दूसरे लोगों के लिए ज़रूरी है कि उस वक़्त से जब उन्होंने कारोबार शुरू किया हो, एक साल गुज़र जाए तो जो कुछ उनके साल भर के अख़राजात से ज़्यादा हो उसका ख़ुम्स दें। और जो शख़्स किसी काम धन्दे से कमाई न करता हो अगर उसे इत्तिफ़ाक़न कोई नफ़्अ हासिल हो जाए तो जब उसे यह नफ़्अ मिले उस वक़्त से एक साल गुज़रने के बाद जितनी मिक़्दार उसके साल भर के अख़राजात से ज़्यादा हो ज़रूरी है कि उसका ख़ुम्स दे।
1775. साल के दौरान जिस वक़्त भी किसी शख़्स को मुनाफ़ा मिले वह उस का ख़ुम्स दे सकता है और उसके लिए यह भी जाइज़ है कि साल के ख़त्म होने तक उसकी अदायगी को मुवख़्ख़र कर दे और अगर वह ख़ुम्स अदा करने के लिए शम्सी साल (रोमन कैलेण्डर) इख़्तियार केर तो कोई हरज नहीं।
1776. अगर कोई ताजिर या दुकानदार ख़ुम्स देने के लिए साल की मुद्दत मुअय्यन करे और उसे मुनाफ़ा हासिल हो लेकिन वह साल के दौरान मर जाए तो ज़रूरी है कि उसकी मौत के अख़राजात उस मुनाफ़ा में मिन्हा कर के बाक़ी मांदा का ख़ुम्स दिया जाए।
1777. अगर किसी शख़्स के बग़रज़े तिजारत खरीदे हुए माल की क़ीमत बढ़ जाए और वह उसे न बेचे और साल के दौरान उसकी क़ीमत गिर जाए तो जितनी मिक़्दार तक क़ीमत बढ़ी हो उस का ख़ुम्स वाजिब नहीं है।
1778. अगर किसी शख़्स के बग़रज़े तिजारत ख़रीदे हुए माल की क़ीमत बढ़ जाए और वह इस उम्मीद पर कि अभी इस की क़ीमत और बढ़ेगी उस माल को साल के ख़ातिमे के बाद तक फ़रोख़्त न करे और फिर उसकी क़ीमत गिर जाए तो जिस मिक़्दार तक क़ीमत बढ़ी हो उस का ख़ुम्स देना वाजिब है। 1779. किसी शख़्स ने माले तिजारत के अलावा कोई माल ख़रीद कर या उसी की तरह किसी तरीक़े से हासिल किया हो जिसका ख़ुम्स वह अदा कर चुका हो तो अगर उस की क़ीमत बढ़ जाए और वह उसे बेच दे तो ज़रूरी है कि जिस क़दर उस चीज़ की क़ीमत बढ़ी है उस का ख़ुम्स दे। इसी तरह मसलन अगर कोई दरख़्त ख़रीदे और उसमें फल लगें या (भेड़ ख़रीदे और वह) भेड़ मोटी हो जाए तो अगर उन चीज़ों की निगाह दाश्त से उसका मक़सद नफ़्अ कमाना था तो ज़रूरी है कि उनकी क़ीमत में जो इज़ाफ़ा हुआ हो उस का खुम्स दे बल्कि अगर उसका मक़्सद नफ़्अ कमाना न भी रहा हो तब भी ज़रूरी है कि उन का ख़ुम्स दे।
1780. अगर कोई शख़्स इस ख़्याल से बाग़ (में पौदे) लगाए कि क़ीमत बढ़ जाने पर उन्हें बेच देगा तो ज़रूरी है कि फ़लों की और दरख़्तों की नशवोनुमा और बाग़ की बढ़ी हुई क़ीमत का ख़ुम्स दे लेकिन अगर उसका इरादा यह रहा हो कि उन दरख़्तों के फल बेच कर उनसे नफ़्अ कमाएगा तो फ़क़त फलों का ख़ुम्स देना ज़रूरी है।
1781. अगर कोई शख़्स बेदमुश्क और चुनार वग़ैरा के दरख़्त लगाए तो ज़रूरी है कि हर साल उनके बढ़ने का ख़ुम्स दे और इसी तरह अगर मसलन उन दरख़्तों की उन शाख़ों से नफ़्अ कमाए जो उमूमन हर साल काटी जाती हैं और तन्हा उन शाख़ों की कीमत या दूसरे फ़ाइदों को मिला कर उसकी आमदनी उसके साल भर के अख़राजात से बढ़ जाए तो ज़रूरी है कि हर साल के ख़ातिमे पर उस ज़ाइद रक़म का ख़ुम्स दे।
1782. अगर किसी शख़्स की आमदनी की मुतअद्दिद ज़राए हों मसलन जायदाद का किराया आता हो और ख़रीदो फ़रोख़्त भी करता हो और उन तमाम ज़राए तिजारत की आमदनी और अख़राजात और तमाम रक़म का हिसाब किताब यकजा हो तो ज़रूरी है कि साल के ख़ातिमे पर जो कुछ उसके अख़राजात से ज़ाइद हो उसका ख़ुम्स अदा करे। और अगर एक ज़रीए से नफ़्अ कमाए और दूसरे ज़रीए से नुक़्सान उठाए तो वह एक ज़रीए के नुक़्सान का दूसरे ज़रीए के नुक़्सान से तदारुक कर सकता है। लेकिन अगर उसके दो मुख़्तिलिफ़ पेशे हों मसलन तिजारत और ज़िराअत करता हो तो उस सूरत में एहतियाते वाजिब की बिना पर वह एक पेशे के नुक़्सान का तदारुक दूसरे पेशे के नफ़्अ से नहीं कर सकता।
1783. इंसान जो अख़राजात फ़ाइदा हासिल करने के लिए मसलन दलाली और बार बरदारी के सिलसिले में ख़र्च करे तो उन्हें मुनाफ़ा में से मिन्हा कर सकता है और उतनी मिक़्दार का खुम्स अदा करना लाज़िम नहीं।
1784. कारोबार के मुनाफ़े से कोई शख़्स साल भर में जो कुछ खोराक, लिबास, घर के साज़ो सामान, मकान की खरीदारी, बेटे की शादी, बेटी के जहेज़ और ज़ियारत वग़ैरा पर खर्च करे उस पर ख़ुम्स नहीं है बशर्ते की ऐसे अख़राजात उसकी हैसियत से ज़्यादा न हों और उसने फ़ुज़ूल ख़र्ची भी न की हो।
1785. जो माल इंसान मन्नत और कफ़्फ़ारे पर ख़र्च करे वह सालाना अख़राजात का हिस्सा है। इसी तरह वह माल भी उसके सालाना अख़राजात का हिस्सा है जो वह किसी को तोहफ़े या इन्आम के तौर पर दे बशर्ते कि उसकी हैसियत से ज़्यादा न हो।
1786. अगर इंसान अपनी लड़की की शादी के वक़्त तमाम जहेज़ इकट्ठा तैयार न कर सकता हो तो वह उसे कई सालों में थोड़ा थोड़ा कर के जमअ कर सकता है चुनांचे अगर जहेज़ तैयार न करना उसकी शान के ख़िलाफ़ हो और वह साल के दौरान उसी साल के मुनाफ़े से कुछ जहेज़ ख़रीदे जो उसकी हैसियत से बढ़ कर न हो तो उस पर ख़ुम्स देना लाज़िम नहीं है और अगर वह जहेज़ उसकी हैसियत से बढ़ कर हो या एक साल के मुनाफ़े से दूसरे साल तैयार किया गया हो तो उसका ख़ुम्स देना ज़रूरी है।
1787. जो माल किसी शख़्स ने ज़ियारते बैतुल्लाह (हज) और दूसरी ज़ियारत के सफ़र पर ख़र्च किया हो उस साल के अख़राजात में शुमार होता है जिस साल में ख़र्च किया जाए तो जो कुछ वह दूसरे साल में ख़र्च करे उसका ख़ुम्स देना ज़रूरी है।
1788. जो शख़्स किसी पेशे या तिजारत वग़ैरा से मुनाफ़ा हासिल करे अगर उसके पास कोई और माल भी हो जिस पर ख़ुम्स वाजिब न हो तो वह अपने साल भर के अख़राजात का हिस्सा फ़क़त अपने मुनाफ़े को मद्दे नज़र रखते हुए कर सकता है।
1789. जो सामान किसी शख़्स ने साल भर इस्तेमाल करने के लिए अपने मुनाफ़े से ख़रीदा हो अगर साल के आख़िर में उस से कुछ बच जाए तो ज़रूरी है कि उसका ख़ुम्स दे और अगर ख़ुम्स उस की क़ीमत की सूरत में देना चाहे और जब वह सामान ख़रीदा था उसके मुक़ाबिले में उसकी क़ीमत बढ़ गई हो तो ज़रूरी है कि साल के ख़ातिमे पर जो क़ीमत हो उसका हिसाब लगाए।
1790. कोई शख़्स ख़ुम्स देने से पहले अपने मुनाफ़े में से घरेलू इस्तेमाल के लिए सामान ख़रीदे अगर उसकी ज़रूरत मुनाफ़ा हासिल होने वाले साल के बाद ख़त्म हो जाए तो ज़रूरी नहीं की उसका ख़ुम्स दे और अगर दौराने साल उसकी ज़रूरत ख़त्म हो जाए तो भी यही हुक्म है। लेकिन अगर वह सामान उन चीज़ों में से हो जो उमूमन आइन्दा सालों में इस्तेमाल के लिए रखी जाती हो जैसे सर्दी और गर्मी के कपड़े तो उन पर ख़ुम्स नहीं होता। इस सूरत के अलावा जिस वक़्त भी उस सामान की ज़रूरत ख़त्म हो जाए एहतियाते वाजिब यह है कि उसका ख़ुम्स दे और यही सूरत ज़नाना ज़ेवरात की है जबकि औरत का उन्हें बतौरे ज़ीनत इस्तेमाल करने का ज़माना गुज़र जाए।
1791. अगर किसी शख़्स को साल के शूरू में मुनाफ़ा न हो और वह अपने सरमाए से ख़र्च उठाए और साल के ख़त्म होने से पहले उसे मुनाफ़ा हो जाए तो उसने जो कुछ सरमाए में से ख़र्च किया है उसे मुनाफ़ा से मिन्हा कर सकता है।
1792. अगर किसी शख़्स को किसी साल में मुनाफ़ा न हो तो वह उस साल के अख़राजात को आइन्दा साल के मुनाफ़े से मिन्हा नहीं कर सकता।
1793. अगर सरमाए का कुछ हिस्सा तिजारत वग़ैरा में डूब जाए तो जिस क़दर सरमाया डूबा हो इंसान उतनी मिक़्दार उस साल के मुनाफ़े से मिन्हा कर सकता है।
1794. अगर किसी शख़्स के माल में से सरमाए के अलावा कोई और चीज़ ज़ाए हो जाए तो उस चीज़ को मुनाफ़े में से मुहैया नहीं कर सकता लेकिन अगर उसे उसी साल में उस चीज़ की ज़रूरत पड़ जाए तो वह उस साल के दौरान अपने मुनाफ़े से मुहैया कर सकता है।
1795. अगर किसी शख़्स को सारा साल कोई मुनाफ़ा न हो और वह अपने अख़राजात क़र्ज़ लेकर पूरे करे तो वह आइन्दा सालों के मुनाफ़े से क़र्ज़ की रक़म मिन्हा नहीं कर सकता लेकिन अगर साल के शूरू में अपने अख़राजात पूरे करने के लिए क़र्ज़ ले और साल ख़त्म होने से पहले मुनाफ़ा कमाए तो अपने क़र्ज़े की रक़म उस मुनाफ़े में मिन्हा कर सकता है। और इसी तरह पहली सूरत में वह उस क़र्ज़ को उस साल के मुनाफ़े से अदा कर सकता है और मुनाफ़ा की उस मिक़्दार से ख़ुम्स का कोई तअल्लुक़ नहीं।
1796. अगर कोई शख़्स माल बढ़ाने की ग़रज़ से या ऐसी इमलाक ख़रीदने के लिए जिसकी उसे ज़रूरत न हो क़र्ज़ ले तो वह उस साल के मुनाफ़ा से उस क़र्ज़ को अदा नहीं कर सकता। हां जो माल बतौरे क़र्ज़ लिया हो या जो चीज़ उस क़र्ज़ से ख़रीदी हो अगर वह तलफ़ हो जाए तो उस सूरत में वह अपना क़र्ज़ उस साल के मुनाफ़ा से अदा कर सकता है।
1797. इंसान हर उस चीज़ का जिस पर ख़ुम्स वाजिब हो चुका हो उसी चीज़ की शक्ल में ख़ुम्स दे सकता है और अगर चाहे तो जितना ख़ुम्स उस पर वाजिब हो उसकी क़ीमत के बराबर रक़म भी दे सकता है लेकिन अगर किसी दूसरी जिंस की सूरत में जिस पर ख़ुम्स वाजिब न हो देना चाहे तो महल्ले इश्काल है बजुज़ इस के कि ऐसा करना हाकिमे शर्अ की इजाज़त से हो।
1798. जिस शख़्स के माल पर ख़ुम्स वाजिबुल अदा हो और साल गुज़र गया हो लेकिन उसने ख़ुम्स न दिया हो और ख़ुम्स देने का इरादा भी न रखता हो वह उस माल में तसर्रुफ़ नहीं कर सकता बल्कि एहतियाते वाजिब की बिना पर अगर ख़ुम्स देने का इरादा रखता हो तब भी वह तसर्रुफ़ नहीं कर सकता।
1799. जिस शख़्स को ख़ुम्स अदा करना हो वह यह नहीं कर सकता कि उस ख़ुम्स को अपने ज़िम्मे ले यानी अपने आप को ख़ुम्स के मुस्तहक़्क़ीन का मक़रूज़ तसव्वुर करे और सारा माल इस्तेमाल करता रहे और अगर इस्तेमाल करे और वह माल तलफ़ हो जाए तो ज़रूरी है कि उसका ख़ुम्स दे।
1800. जिस शख़्स को ख़ुम्स अदा करना हो अगर वह हाकिमे शर्अ से मुफ़ाहिमत कर के ख़ुम्स को अपने ज़िम्मे ले ले तो सारा माल इस्तेमाल कर सकता है और मुफ़ाहिमत के बाद उस साल से जो मुनाफ़ा उसे हासिल हो वह उसका अपना माल है।
1801. जो शख़्स कारोबार में किसी दूसरे के साथ शरीक हो अगर वह अपने मुनाफ़े पर ख़ुम्स दे दे और उसका हिस्सेदार ख़ुम्स न दे और आइन्दा साल वह हिस्सेदार उस माल को जिसका ख़ुम्स उस ने नहीं दिया साझे में सरमाए के तौर पर पेश करे तो वह शख़्स (जिसने ख़ुम्स अदा कर दिया हो) अगर शिआ इस्ना अशरी मुसलमान हो तो उस माल को इस्तेमाल में ला सकता है।
1802. अगर नाबालिग़ बच्चे के पास कोई सरमाया हो और उस से मुनाफ़ा हासिल हो तो अक़्वा की बिना पर उसका ख़ुम्स देना होगा और उसके वली पर वाजिब है कि उसका ख़ुम्स दे और अगर वली ख़ुम्स न दे तो बालिग़ होने के बाद वाजिब है कि वह ख़ुद ख़ुम्स अदा दे।
1803. जिस शख़्स को किसी दूसरे शख़्स से कोई माल मिले और उसे शक हो कि (माल देने वाले) दूसरे शख़्स ने उसका ख़ुम्स दिया है या नहीं तो वह (माल हासिल करने वाला शख़्स) उस माल में तसर्रुफ़ कर सकता है। बल्कि अगर यक़ीन भी हो कि उस दूसरे शख़्स ने ख़ुम्स नहीं दिया तब भी अगर वह शीआ इस्ना अशरी मुसलमान हो तो उस माल में तसर्रुफ़ कर सकता है।
1804. अगर कोई शख़्स कारोबार के मुनाफ़ा से साल के दौरान ऐसी जायदाद ख़रीदे जो उसकी साल भर की ज़रूरीयात और अख़राजात में शुमार हो तो उस पर वाजिब है कि साल के ख़ातिमें पर उसका ख़ुम्स दे और अगर ख़ुम्स न दे और उस जायदाद की क़ीमत बढ़ जाए तो लाज़िम है कि उसकी मौजूदा क़ीमत पर ख़ुम्स दे और जायदाद के अलावा क़ालीन वग़ैरा के लिए भी यही हुक्म है।
1805. जिस शख़्स ने शुरू से (यअनी जब से उस पर ख़ुम्स की अदायगी वाजिब हुई हो) ख़ुम्स न दिया हो मिसाल के तौर पर अगर वह कोई जायदाद ख़रीदे और उसकी क़ीमत बढ़ जाए और अगर उसने यह जायदाद इस इरादे से न ख़रीदी हो कि उसकी क़ीमत बढ़ जायेगी तो बेच देगा। मसलन खेती बाड़ी के लिए ज़मीन ख़रीदी हो और उसकी क़ीमत उस रक़म से अदा की हो जिस पर ख़ुम्स न दिया हो तो ज़रूरी है कि क़ीमते ख़रीद पर ख़ुम्स दे और अगर मसलन बेचने वाले को वह रक़म दी है जिस पर ख़ुम्स न दिया हो और उसे कहा हो कि मैं यह जायदाद उस रक़म से ख़रीदता हूं तो ज़रूरी है कि उस जायदाद की मौजूदा क़ीमत पर ख़ुम्स दे।
1806. जिस शख़्स ने शुरू से (यअनी जब से उस पर ख़ुम्स की अदायगी वाजिब हुई ) ख़ुम्स न दिया हो अगर उसने कारोबार के मुनाफ़ा से कोई ऐसी चीज़ ख़रीदी हो जिसकी उसको ज़रूरत न हो और उसे मुनाफ़ा कमाए एक साल गुज़र गया हो तो ज़रूरी है कि उसका ख़ुम्स दे और अगर उसने घर का साज़ो सामान और ज़रूरत की चीज़ें अपनी हैसियत के मुताबिक़ ख़रीदी हों और जानता हो कि उसने यह चीज़ें उस साल के दौरान उस मुनाफ़े से ख़रीदी हैं जिस साल में उसे मुनाफ़ा हुआ है तो उन पर ख़ुम्स देना लाज़िमी नहीं लेकिन अगर उसे यह मअलूम हो तो एहतियाते वाजिब की बिना पर ज़रूरी है कि हाकिमे शर्अ से मुफ़ाहिमत करे।
2. मअदिनी कानें
1807. सोने, चाँदी, सीसे, तांबे, लोहे (जैसी धातों की कानें, नीज़ पिट्रौलियम, कोयले, फ़ीरोज़े, अक़ीक़, फ़िटकिरी या नमक की कानें और (इसी तरह की) दूसरी कानें अन्फ़ाल के ज़ुमरे में आती हैं यअनी यह इमामे अस्र (अ0) की मिल्कियत है। लेकिन अगर कोई शख़्स उनमें से कोई चीज़ निकाले जब कि शर्अन कोई हरज न हो तो वह उसे अपनी मिल्कियत क़रार दे सकता है और अगर वह चीज़ निसाब के मुताबिक़ हो तो ज़रूरी है कि उसका ख़ुम्स दे।
1808. कान से निकली हुई चीज़ का निसाब 15 मिस्क़ाल मुरव्वजा सिक्केदार सोना है। यअनी अगर कान से निकली हुई किसी चीज़ की क़ीमत 15 मिस्क़ाल सिक्कादार सोने तक पहुंच जाए तो ज़रूरी है कि उस पर जो अख़्राजात आये हों उन्हें मिन्हा कर के जो बाक़ी बचे उसका ख़ुम्स दे।
1809. जिस शख़्स ने कान से मुनाफ़ा कमाया हो और जो चीज़ कान से निकाली हो अगर उसकी क़ीमत 15 मिस्क़ाल सिक्कादार सोने तक न पहुँचे तो उस पर ख़ुम्स तब वाजिब होगा जब सिर्फ़ यह मुनाफ़ा या उस के दूसरे मुनाफ़े ही उस मुनाफ़े को मिलाकर उसके साल भर के अख़राजात से ज़्यादा हो जायें।
1810. जिप्सम, चूना, चिक्नी मिट्टी और सुर्ख़ मिट्टी पर एहतियाते लाज़िम की बिना पर मअदिनी चीज़ों के हुक्म का इत्लाक़ होता है लिहाज़ा अगर यह चीज़ें हद्दे निसाब तक पहुंच जायें तो साल भर के अख़राजात निकालने से पहले उन का खुम्स देना ज़रूरी है।
1811. जो शख़्स कान से कोई चीज़ निकाले तो ज़रूरी है कि उसका ख़ुम्स दे ख़्वाह वह कान ज़मीन के ऊपर हो या ज़ेरे ज़मीन और ख़्वाह ऐसी ज़मीन हो जो किसी की मिल्कियत हो या ऐसी ज़मीन में हो जिसका कोई मालिक न हो।
1812. अगर किसी शख़्स को यह मअलूम हो कि जो चीज़ उस ने कान से निकाली है उसकी क़ीमत 15 मिस्क़ाल सिक्कादार सोने के बराबर है या नहीं तो एहतियाते लाज़िम यह है कि अगर मुम्किन हो तो वज़न कर के या किसी और तरीक़े से उस की क़ीमत मअलूम करे।
1813. अगर कई अफ़्राद मिल कर कान से कोई चीज़ निकालें और उसकी क़ीमत 15 मिस्क़ाल सिक्कादार सोने तक पहुंच जाए लेकिन उन में से हर एक का हिस्सा उस मिक़्दार से कम हो तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि ख़ुम्स दे।
1814. अगर कोई शख़्स उस मअदिनी चीज़ को जो ज़ेरे ज़मीन दूसरे की मिल्कियत में हो उसकी इजाज़त के बग़ैर उसकी ज़मीन खौद कर निकाले तो मश्हूर क़ौल यह है कि जो चीज़ दूसरे की ज़मीन से निकाली जाए वह उसी मालिक की है लेकिन यह बात इश्काल से ख़ाली नहीं और बेहतर यह है कि बाहम मुआमला तय करे और अगर आपस में समझोता न हो सके तो हाकिमें शर्अ की तरफ़ रुजूउ करे ताकि वह उस तनाज़ों का फ़ैसला करे।
3. गड़ा हुआ दफ़ीना
1815. दफ़ीना वह माल है जो ज़मीन या दरख़्त या पहाड़ या दीवार में गड़ा हुआ हो और कोई उसे वहां से निकाले और उसकी सूरत यह हो कि उसे दफ़ीना कहा जा सके।
1816. अगर इंसान को किसी ऐसी ज़मीन से दफ़ीना मिले जो किसी की मिल्कियत न हो तो वह उसे अपने क़ब्ज़े में ले सकता है यअनी अपनी मिल्कियत में ले सकता है लेकिन उसका ख़ुम्स देना ज़रूरी है।
1817. दफ़ीने का निसाब 105 मिस्क़ाल सिक्कादार चांदी और 15 मिस्क़ाल सिक्कादार सोना है। यअनी जो चीज़ दफ़ीने से मिले अगर उसकी क़ीमत उन दोनों में से किसी एक के भी बराबर हो तो उसका ख़ुम्स देना वाजिब है।
1818. अगर किसी शख़्स को ऐसी ज़मीन से दफ़ीना मिले जो उसने किसी से ख़रीदी हो और उसे मअलूम हो कि यह उन लोगों का माल नहीं है जो इससे पहले इस ज़मीन के मालिक थे और वह यह न जानता हो कि मालिक मुसलमान है या ज़िम्मी है और वह खुद या उसके वारिस ज़िन्दा हैं तो वह उस दफ़ीने को अपने क़ब्ज़े में ले सकता है लेकिन उसका ख़ुम्स देना ज़रूरी है। और अगर उसे एहतिमाल हो कि यह साबिक़ा मालिक का माल है जब कि ज़मीन और इसी तरह दफ़ीना या वह जगह ज़िम्नन ज़मीन में शामिल होने की बिना पर उसका हक़ हो तो ज़रूरी है कि उसे इत्तिलाअ दे और अगर यह मअलूम हो कि उस का माल नहीं तो उस शख़्स को इत्तिलाअ दे जो उस से पहले भी उस ज़मीन का मालिक था और उस पर उन सा हक़ था और इसी तरतीब से उन तमाम लोगों को इत्तिलाअ दे जो ख़ुद उससे पहले उस ज़मीन के मालिक रहे हों और उस पर उन का हक़ हो और अगर पता चले कि वह उनमें से किसी का भी माल नहीं है तो फिर वह उसे अपने क़ब्ज़े में ले सकता है लेकिन उस का ख़ुम्स देना ज़रूरी है।
1819. अगर किसी शख़्स को ऐसे कई बर्तनों से माल मिले जो एक जगह दफ़्न हों और उस माल की मज्मूई क़ीमत 105 मिस्क़ाल चांदी या 15 मिस्क़ाल सोने के बराबर हो तो ज़रूरी है कि उस माल का ख़ुम्स दे लेकिन अगर मुख़्तलिफ़ मक़ामात से दफ़ीने मिलें तो उन में से जिस दफ़ीने की क़ीमत मज़कूरा मिक़्दार तक पहुंच जाए उस पर ख़ुम्स वाजिब है और जिस दफ़ीने की क़ीमत उस मिक़्दार तक न पहुंचे उस पर ख़ुम्स वाजिब नहीं है।
1820. जब दो अश्ख़ास को ऐसा दफ़ीना मिले जिसकी क़ीमत 105 मिस्क़ाल चांदी या 15 मिस्क़ाल सोने तक पहुंचती हो लेकिन उनमें से हर एक का हिस्सा उतना न बनता हो तो उस पर ख़ुम्स अदा करना ज़रूरी नहीं है।
1821. अगर कोई शख़्स जानवर ख़रीदे और उसके पेट से कोई माल मिले तो अगर उसे एहतिमाल हो कि यह माल बेचने वाले या पहले मालिक का है और वह जानवर पर और जो कुछ उसके पेट से बरआमद हुआ है उस पर हक़ रखता है तो ज़रूरी है कि इत्तिलाअ दे और अगर मअलूम हो कि वह माल उनमें से किसी एक का भी नहीं है तो एहतियाते लाज़िम यह है कि उस का ख़ुम्स दे अगरचे वह माल दफ़ीने के निसाब के बराबर न हो और यह हुक्म मछली और उसकी मानिन्द दूसरे ऐसे जानवरों के लिए भी है जिनकी कोई शख़्स किसी मख़्सूस जगह में अफ़ज़ाइश व पर्वरिश करे और उनकी ग़िज़ा का इन्तिज़ाम करे। और अगर समुन्दर या दरिया से उसे पकड़े तो किसी को उसकी इत्तिलाअ देना लाज़िमी नहीं।
4. वह हलाल माल जो हराम माल में मख़्लूत हो जाए
1822. अगर हलाल माल हराम माल के साथ इस तरह मिल जाए कि इंसान उन्हें एक दूसरे से अलग न कर सके और हराम माल के मालिक और उस माल की मिक़्दार का भी इल्म न हो और यह भी इल्म न हो कि हराम माल की मिक़्दार ख़ुम्स से कम है या ज़्यादा तो तमाम माल का ख़ुम्स क़ुर्बते मुत्लक़ा की नीयत से ऐसे शख़्स को दे जो ख़ुम्स का और माले मज्हूलुल मालिक का मुस्तहक़ है और ख़ुम्स देने के बाद बाक़ी माल उस शख़्स पर हलाल है।
1823. अगर हलाल माल हराम माल से मिल जाए और इंसान हराम की मिक़्दार - - ख़्वाह वह खुम्स से कम हो या ज़्यादा - - जानता हो लेकिन उसके मालिक को न जानता हो तो ज़रूरी है कि उतनी मिक़्दार उस माल के मालिक की तरफ़ से सदक़ा कर दे और एहतियाते वाजिब यह है कि हाकिमे शर्अ से भी इजाज़त ले।
1824. अगर हलाल माल हराम माल से मिल जाए और इंसान को हराम की मिक़्दार का इल्म न हो लेकिन उस माल के मालिक को पहचानता हो और दोनों एक दूसरे को राज़ी न कर सकें तो ज़रूरी है कि जितनी मिक़्दार के बारे में यक़ीन हो कि दूसरे का माल है वह उसे दे दे। बल्कि अगर वह माल उसकी अपनी ग़लती से मख़्लूत हुए हों तो एहतियात की बिना पर जिस माल के बारे में उसे एहतिमाल हो कि यह दूसरे का है उसे इस माल से ज़्यादा देना ज़रूरी है।
1825. अगर कोई शख़्स हराम से मख़्लूत हलाल माल का ख़ुम्स दे दे और बाद में उसे पता चले कि हराम की मिक़्दार ख़ुम्स से ज़्यादा थी तो ज़रूरी है कि जितनी मिक़्दार के बारे में इल्म हो कि ख़ुम्स से ज़्यादा थी उसे उसके मालिक की तरफ़ से सदक़ा कर दे।
1826. अगर कोई शख़्स हराम से मख़्लूत हलाल माल का ख़ुम्स दे या ऐसा माल जिस के मालिक को न पहचानता हो मालिक के मालिक की तरफ़ से सदक़ा कर दे और बाद में उस का मालिक मिल जाए तो अगर वह राज़ी न हो तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर उसके माल के बराबर उसे देना ज़रूरी है।
1827. अगर हलाल माल हराम माल से मिल जाए और हराम की मिक़्दार माअलूम हो और इंसान जानता हो कि उसका मालिक चन्द लोगों में से ही कोई है लेकिन यह न जानता हो कि वह कौन है तो उन सब को इत्तिलाअ दे चुनांचे उन में से कोई एक कहे कि यह मेरा माल है और दूसरे कहें कि हमारा माल नहीं या उस माल के बारे में लाइल्मी का इज़हार करें तो उसी पहले शख़्स को वह माल दे दे और अगर दो या दो से ज़्यादा आदमी कहें कि यह हमारा माल है और सुल्ह या इस तरह किसी तरीक़े से वह मुआमला हल न हो तो ज़रूरी है कि तनाज़ो के हल के लिए हाकिमे शर्अ से रुजूउ करें और अगर वह सब लाइल्मी का इज़्हार करें और बाहम सुल्ह भी न करें तो ज़ाहिर यह है कि उस माल के मालिक का तअय्युन क़ुरआ के ज़रीए होगा और एहतियात यह है कि हाकिमे शर्अ या उस का वकील क़ुरआ अन्दाज़ी की निगरानी करे।
5. ग़व्वासी से हासिल किये हुए मोती
1828. अगर ग़व्वसी के ज़रीए यअनी समुन्दर में ग़ोता लगा कर या दूसरे मोती निकालें जायें तो ख़्वाह ऐसी चीज़ों में से हो जो उगती है या मअदिनीयात में से हों अगर उसकी क़ीमत 18 चने सोने के बराबर हो जाए तो ज़रूरी है कि उसका ख़ुम्स दिया जाए ख़्वाह उन्हें एक दफ़्आ में समुन्दर से निकाला गया हो या एक से ज़्यादा दफ़्आ में बशर्ते की पहली दफ़्आ और दूसरी दफ़्आ ग़ोता लगाने में ज़्यादा फ़ासिला न हो मसलन यह कि दो मौसमों में ग़व्वासी की हो। बसूरते दीगर हर एक दफ़्आ में 18 चने सोने की क़ीमत के बराबर न हो तो उसका ख़ुम्स देना वाजिब नहीं है। और इसी तरह ग़व्वासी में शरीक तमाम ग़ोता ख़ोरों में से हर एक का हिस्सा 18 चने सोने की क़ीमत के बराबर न हो तो उन पर ख़ुम्स देना वाजिब नहीं है।
1829. अगर समुन्दर में ग़ोता लगाए बग़ैर दूसरे ज़राए से मोती निकाले जायें तो एहतियात की बिना पर उन पर ख़ुम्स वाजिब है लेकिन अगर कोई शख़्स समुन्दर के पानी की सत्ह या समुन्दर के किनारे से मोती हासिल करे तो उन का ख़ुम्स उसे उस सूरत में देना ज़रूरी है जब जो मोती उसे दस्तयाब हुए हों वह तन्हा या उसके कारोबार के दूसरे मुनाफ़े से मिलाकर उसके साल भर के अख़राजात से ज़्यादा हो।
1830. मछलियों और उन दूसरे (आबी) जानवरों का ख़ुम्स जिन्हे इंसान समुन्दर में ग़ोता लगाए बग़ैर हासिल करता है उस सूरत में वाजिब होता है जब उन चीज़ों से हासिल कर्दा मुनाफ़ा तन्हा या कारोबार के दूसरे मुनाफ़े से मिलाकर उसके साल भर के अख़राजात से ज़्यादा हो।
1831. अगर इंसान कोई चीज़ निकालने का इरादा किये बग़ैर समुन्दर में ग़ोता लगाए और इत्तिफ़ाक़ से कोई मोती उसके हाथ लग जाए और वह उसे अपनी मिल्कियत में लेने का इरादा करे तो उस का ख़ुम्स देना ज़रूरी है बल्कि एहतियाते वाजिब यह है कि हर हाल में उसका ख़ुम्स दे।
1832. अगर इंसान समुन्दर में ग़ोता लगाए और कोई जानवर निकाल लाए और उसके पेट में से उसे कोई मोती मिले तो अगर वह जानवर सीपी की मानिन्द हो जिसके पेट में उमूमन मोती होते हैं और वह निसाब तक पहुंच जाए तो ज़रूरी है कि उसका ख़ुम्स दे और अगर वह कोई ऐसा जानवर हो जिसने इत्तिफ़ाक़न मोती निगल लिया हो तो एहतियाते लाज़िम यह है कि अगरचे वह हद्दे निसाब तक न पहुंचे तब भी उसका ख़ुम्स दे।
1833. अगर कोई शख़्स बड़े दरियाओं मसलन दज्ला और फ़ुरात में ग़ोता लगाए और मोती निकाल लाए तो अगर उस दरिया में मोती पैदा होते हों तो ज़रूरी है कि (जो मोती निकाले) उनका ख़ुम्स दे।
1834. अगर कोई शख़्स पानी में ग़ोता लगाए और कुछ अंबर निकाल लाए और उसकी क़ीमत 18 चने सोने या उससे ज़्यादा हो तो ज़रूरी है कि उस का ख़ुम्स दे बल्कि अगर पानी की सत्ह या समुन्दर के किनारे से भी हासिल करे तो उसका भी यही हुक्म है।
1835. जिस शख़्स का पेशा ग़ोता ख़ोरी हो या कान कनी हो अगर वह उन का ख़ुम्स अदा कर दे और फिर उसके साल भर के अख़राजात से कुछ बच जाए तो उसके लिए यह लाज़िम नहीं कि दोबारा ख़ुम्स अदा करे।
1836. अगर बच्चा कोई मअदिनी चीज़ निकाले या उसे कोई दफ़ीना मिल जाए या समुन्दर में ग़ोता लगाकर मोती निकाल लाए तो बच्चे का वली उसका ख़ुम्स दे और अगर वली ख़ुम्स अदा न करे तो ज़रूरी है कि बच्चा बालिग़ होने के बाद ख़ुम्स अदा करे और इसी तरह अगर उस के पास हराम माल में हलाल माल मिला हुआ हो तो ज़रूरी है कि उसका वली उस माल को पाक करे।
6. माले ग़नीमत
1837. अगर मुसलमान इमाम (अ0) के हुक्म से कुफ़्फ़ार से जंग करे और जो चीज़ जंग में उनके हाथ लगे उन्हें ग़नीमत कहा जाता है और उस माल की हिफ़ाज़त या उसकी नक़्लो हम्ल वग़ैरा के मसारिफ़ मिन्हा कर ने के बाद और जो रक़म इमाम (अ0) अपनी मसलेहत के मुताबिक़ ख़र्च करें और जो माल ख़ास इमाम (अ0) का हक़ है उसे अलायहदा करने के बाद बाक़ीमांदा पर ख़ुम्स अदा किया जाए। माले ग़नीमत पर ख़ुम्स साबित होने में अन्फ़ाल से हो वह तमाम मुसलमानों की मुशतर्का मिल्कियत है अगरचे जंग इमाम (अ0) की इजाज़त से न हो।
1838. अगर मुसलमान काफ़िरों से इमाम (अ0) की इजाज़त के बग़ैर जंग करे और उन से माले ग़नीमत हासिल हो तो जो ग़नीमत हासिल हो वह इमाम (अ0) की मिल्कियत है और जंग करने वालों का उसमें कोई हक़ नहीं।
1839. जो कुछ काफ़िरों के हाथ में है अगर उसका मालिक मोहतरमुल माल यअनी मुसलमान या काफ़िरे ज़िम्मी हो तो उस पर ग़नीमत के अहकाम जारी नहीं होंगे।
1840. काफ़िरे हर्बी का माल चुराना और उस जैसा कोई काम करना अगर ख़ियानत और नक़्ज़े अम्न में शुमार हो तो हराम है और इस तरह जो चीज़ें उन से हासिल की जायें एहतियात की बिना पर ज़रूरी है कि उन्हें लौटा दी जाए।
1841. मश्हूर यह है कि नासिबी का माल मोमिन अपने लिए ले सकता है अलबत्ता उस का ख़ुम्स दे लेकिन यह हुक्म इश्काल से ख़ाली नहीं है।
7. वह ज़मीन जो ज़िम्मी काफ़िर किसी मुसलमान से ख़रीदे
1842. अगर काफ़िरे ज़िम्मी किसी मुसलमान से ज़मीन ख़रीदे तो मश्हूर क़ौल की बिना पर उस का खुम्स उसी ज़मीन से या अपने किसी दूसरे माल से दे लेकिन ख़ुम्स के आम क़वायद के मुताबिक़ उस सूरत में ख़ुम्स के वाजिब होने में इश्काल है।
ख़ुम्स का मसरफ़
1843. ज़रूरी है कि ख़ुम्स दो हिस्सों में तक़्सीम किया जाए। उसका एक हिस्सा सादात का हक़ है और ज़रूरी है कि किसी फ़क़ीर सैयद या यतीम सैय्यद या ऐसे सैय्यद को दिया जाए जो सफ़र में नाचार हो गया हो। और दूसरा हिस्सा इमाम (अ0) का है जो ज़रूरी है कि मौजूदा ज़माने में जामिइश शराइत मुज्तहिद को दिया जाए या ऐसे कामों पर जिस की वह मुज्तहिद इजाज़त दे ख़र्च किया जाए और एहतियाते लाज़िम यह है कि वह मर्जअ अअलम उमूमी मसलेहतों से आगाह हो।
1844. जिस यतीम सैय्यद को ख़ुम्स दिया जाए ज़रूरी है कि वह फ़क़ीर भी हो लेकिन जो सैय्यद सफ़र में नाचार हो जाए वह ख़्वाह अपने वतन में फ़क़ीर न भी हो उसे ख़ुम्स दिया जा सकता है।
1845. जो सैय्यद सफ़र में नाचार हो गया हो अगर उसका सफ़र गुनाह का सफ़र हो तो एहतियाते वाजिब की बिना पर ज़रूरी है कि उसे ख़ुम्स न दिया जाए।
1846. जो सैय्यद आदिल न हो उसे ख़ुस्म दिया जा सकता है लेकिन जो सैय्यद इसना अशरी न हो ज़रूरी है कि उसे ख़ुम्स न दिया जाए।
1847. जो सैय्यद गुनाह का काम करता हो अगर उसे ख़ुम्स देने से गुनाह करने में उसकी मदद होती हो तो उसे ख़ुम्स न दिया जाए और अहव्त यह है कि उस सैय्यद को भी ख़ुम्स न दिया जाए जो शराब पीता हो या नमाज़ न पढ़ता हो या अलानिया गुनाह करता हो गो ख़ुम्स देने से उसे गुनाह करने में मदद न मिलती हो।
1848. जो शख़्स कहे कि मैं सैय्यद हूं उसे उस वक़्त तक ख़ुम्स न दिया जाए जब तक दो आदिल अश्ख़ास उसके सैय्यद होने की तसदीक़ न कर दें या लोगों में उसका सैय्यद होने इतना मशहूर हो कि इंसान को यक़ीन और इत्मीनान हो जाए कि वह सैय्यद है।
1849. कोई शख़्स अपने शहर में सैय्यद मशहूर हो और उसके सैय्यद न होने के बारे में जो बातें की जाती हों इंसान को उन पर यक़ीन या इत्मीनान न हो तो उसे ख़ुम्स दिया जा सकता है।
1850. अगर किसी की बीवी सैयिदानी हो तो एहतियाते वाजिब की बिना पर ज़रूरी है कि शौहर उसे इस मक़्सद के लिए ख़ुस्म न दे कि वह उसे अपने ज़ाती इस्तेमाल में ले आए लेकिन अगर दूसरे लोगों की कफ़ालत उस औरत पर वाजिब हो और वह उन अख़राजात की अदायगी से क़ासिर हो तो इंसान के लिए जाइज़ है कि अपनी बीवी को ख़ुस्म दे ताकि ज़ेरे कफ़ालत लोगों पर ख़र्च करे। और उस औरत को इस ग़रज़ से ख़ुस्म देने के बारे में भी यही हुक्म है जबकि वह (यह रक़म) अपने ग़ैर वाजिब अख़राजात पर सर्फ़ करे (यअनी इस मक़्सद के लिए उसे ख़ुस्म नहीं देना चाहिये)।
1851. अगर इंसान पर किसी सैय्यद के या ऐसी सैयिदानी के अख़राजात वाजिब हों जो उसकी बीवी न हो तो एहतियाते वाजिब की बिना पर वह उस सैय्यद या सैयिदानी के खोराक और पोशाक को अखराजात और बाक़ी वाजिब अखराजात अपने ख़ुम्स से अदा नहीं कर सकता। हां अगर वह उस सैय्यद या सैयिदानी को ख़ुम्स की कुछ रक़म इस मक़सद से दे कि वह वाजिब अखराजात के अलावा उसे दूसरी ज़रूरीयात पर खर्च करे तो कोई हरज नहीं।
1852. अगर किसी फ़क़ीर सैय्यद के अखराजात किसी दूसरे शख़्स पर वाजिब हों और वह शख़्स उस सैय्यद के अखराजात बर्दाश्त न कर सकता हो या इसतिताअत रखता हो लेकिन न देता हो तो उस सैय्यद को ख़ुम्स दिया जा सकता है।
1853. एहतियाते वाजिब यह है कि किसी एक फ़क़ीर सैय्यद को उसके एक साल के अख़राजात से ज़्यादा ख़ुम्स न दिया जाए।
1854. अगर किसी शख़्स के शहर में कोई मुस्तहक़ सैय्यद न हो और उसे यक़ीन या इत्मीनान हो कि कोई ऐसा सैय्यद बाद में भी नहीं मिलेगा या जब तक कोई मुस्तहक़ सैय्यद मिले ख़ुम्स की हिफ़ाज़त करना मुम्किन न हो तो ज़रूरी है कि ख़ुम्स दूसरे शहर में ले जाए और मुस्तहक़ को पहुंचा दे और ख़ुम्स दूसरे शहर ले जाने के अख़राजात ख़ुम्स में से ले सकता है। और अगर ख़ुम्स तलफ़ हो जाए तो अगर उस शख़्स ने उस की निगहदाश्त में कोताही बरती हो तो ज़रूरी है कि उस का एवज़ दे और अगर कोताही न बरती हो तो उस पर कुछ भी वाजिब नहीं है।
1855. जब किसी शख़्स के अपने शहर में ख़ुम्स का मुस्तहक़ शख़्स मौजूद न हो तो अगरचे उसे यक़ीन या इत्मीनान हो कि बाद में मिल जायेगा और ख़ुम्स के मुस्तहक़ शख़्स के मिलने तक ख़ुम्स की निगहदाश्त भी मुम्किन हो तब भी वह ख़ुम्स दूसरे शहर ले जा सकता है और अगर वह ख़ुम्स की निगहदाश्त में कोताही न बरते और वह तलफ़ हो जाए तो उसके लिए कोई चीज़ देना ज़रूरी नहीं लेकिन वह ख़ुम्स के दूसरी जगह ले जाने के अख़राजात ख़ुम्स में से नहीं ले सकता।
1856. अगर किसी शख़्स के अपने शहर में ख़ुम्स का मुस्तहक़ मिल जाए तब भी वह ख़ुम्स दूसरे शहर ले जाकर मुस्तहक़ को पहुंचा सकता है अलबत्ता ख़ुम्स का एक शहर से दूसरे शहर ले जाना इस क़द्र ताख़ीर का मूजिब न हो कि ख़ुम्स पहुंचाने में सुस्ती शुमार हो लेकिन ज़रूरी है कि उसे ले जाने के अख़राजात ख़ुद अदा करे और इस सूरत में अगर ख़ुम्स ज़ाए हो जाए तो अगरचे उस ने उसकी निगहदाश्त में कोताही न बरती हो वह उसका ज़िम्मेदार है।
1857. अगर कोई शख़्स हाकिमे शर्अ के हुक्म से ख़ुम्स दूसरे शहर ले जाए और वह तलफ़ हो जाए तो उसके लिए दोबारा ख़ुम्स देना लाज़िम नहीं और इसी तरह अगर वह ख़ुम्स हाकिमे शर्अ के वकील को दे दे जो ख़ुम्स की वसूली पर मामूर हो और वह वकील ख़ुम्स को एक शहर से दूसरे शहर ले जाए तो उसके लिए भी यही हुक्म है।
1858. यह जाइज़ नहीं कि किसी चीज़ की क़ीमत उस की अस्ल क़ीमत से ज़्यादा लगा कर उसे बतौरे ख़ुम्स दिया जाए और जैसा कि मस्अला 1797 में बताया गया है कि किसी दूसरी जिन्स की शक्ल में ख़ुम्स अदा करना मासिवा सोने और चाँदी के सिक्कों और उन्हीं जैसी दूसरी चीज़ों के हर सूरत में महल्ले इश्काल है।
1859. जिस शख़्स को मुस्तहक़ शख़्स से कुछ लेना हो और चाहता हो कि अपना क़र्ज़ा ख़ुम्स की रक़म से मिन्हा कर ले तो एहतियाते वाजिब की बिना पर ज़रूरी है कि या तो हाकिमे शर्अ से इजाज़त ले या ख़ुम्स उस शख़्स को दे दे और बाद में मुस्तहक़ शख़्स उसे वह माल क़र्ज़े की अदायगी के तौर पर लौटा दे और वह यह भी कर सकता है कि ख़ुम्स के मुस्तहक़ शख़्स की इजाज़त से उसका वकील बन कर ख़ुद उसकी तरफ़ से ख़ुम्स ले ले और उससे अपना क़र्ज़ा चुका ले।
1860. मालिक, ख़ुम्स के मुस्तहक़ शख़्स से यह शर्त नहीं कर सकता कि वह ख़ुम्स लेने के बाद उसे वापस लौटा दे। लेकिन अगर मुस्तहक़ शख़्स ख़ुम्स लेने के बाद उसे वापस देने पर राज़ी हो जाए तो इस में कोई हरज नहीं है। मसलन जिस शख़्स के ज़िम्मे ख़ुम्स की ज़्यादा रक़म वाजिबुल अदा हो और वह फ़क़ीर हो गया हो और चाहता हो कि ख़ुम्स के मुस्तहक़ लोगों का मक़रूज़ न रहे तो अगर ख़ुम्स का मुस्तहक़ शख़्स राज़ी हो जाए कि उससे ख़ुम्स ले कर फिर उसको बख़्श दे तो इस में कोई हरज नहीं है।
ज़कात के अहकाम
1861. ज़कात चन्द चीज़ों पर वाजिब हैः
1. गेहूँ, 2. जौ, 3. खजूर, 4. किशमिश, 5. सोना, 6. चांदी, 7. ऊंट, 8. गाय, 9. भेड़, बकरी, 10. एहतियाते लाज़िम की बिना पर माले तिजारत।
अगर कोई शख़्स इन दस चीज़ों में से किसी एक का मालिक हो तो उन शराइत के तहत जिन का ज़िक्र बाद में किया जायेगा ज़रूरी है कि जो मिक़दार मुक़र्रर की गई है उसे उन मसारिफ़ में से किसी एक मद में ख़र्च करे जिन का हुक्म दिया गया है।
1862. सुल्त जो गेहूँ की तरह एक नर्म अनाज है और जिसे बे छिल्के का जौ भी कहते हैं और अलस पर जो गेहूँ की एक क़िस्म है और सनआ (यमन) के लोगों की ग़िज़ा है एहतियाते वाजिब की बिना पर जकात देना ज़रूरी है।
ज़कात वाजिब होने की शराइत
1863. ज़कात मज़कूरा दस चीज़ों पर इस सूरत में वाजिब होती है जब माल उस निसाब की मिक़्दार तक पहुंच जाए जिसका ज़िक्र बाद में किया जायेगा और वह माल इंसान की अपनी मिल्कियत हो और उसका मालिक आज़ाद हो।
1864. अगर इंसान ग्यारा महीने गाय, भेड़ बकरी, ऊंट, सोने या चांदी का मालिक रहे तो अगरचे बारहवें महीने की पहली तारीख़ को ज़कात उस पर वाजिब हो जायेगी लेकिन ज़रूरी है कि अगले साल की इब्तिदा का हिसाब बारहवें महीने के ख़ातिमे के बाद से करे।
1865. सोने, चांदी और माले तिजारत पर ज़कात के वाजिब होने की शर्त यह है कि उन चीज़ों का मालिक बालिग़ और आक़िल हो। लेकिन गेहूं, जौ, खजूर, किशमिश और इसी तरह ऊंट, गाय और भेड़ बकरियों में मालिक का बालिग़ और आक़िल होना शर्त नहीं है।
1866. गेहूं और जौ पर ज़कात उस वक़्त वाजिब होती है जब उन्हें गेहूं और जौ कहा जाए। किशमिश पर जकात उस वक़्त वाजिब होती है जब वह अभी अंगूर की ही सूरत में हो। और खजूर पर ज़कात उस वक़्त वाजिब होती है जब (वह पक जायें और) अरब उसे तमर कहें। लेकिन गेहूं और जौ में ज़कात का निसाब देखने और ज़कात देने का वक़्त वह होता है, जब यह ग़ल्ला खलियान में पहुंचे और उस (की बालियों) से भूसा और दाना अलग किया जाए। जबकि खजूर और किशमिश में यह वक़्त वह होता है जब उन्हें उतार लेते हैं। उस वक़्त को ख़ुश्क होने का वक़्त भी कहते हैं।
1867. गेहूं, जौ, किशमिश और खजूर में ज़कात साबित होने के लिए जैसा कि साबिक़ा मस्अले में बताया गया है अक़्वा की बिना पर मोअतबर नहीं है कि उन का मालिक उनमें तसर्रुफ़ कर सके। पस अगर मालिक ग़ायब हो और माल भी उस के या उसके वकील के हाथ में न हो मसलन किसी ने उन चीज़ों को ग़स्ब कर लिया हो तब भी ज़कात उन चीज़ों में साबित है।
1868. सोने, चांदी और माले तिजारत में ज़कात साबित होने के लिए, जैसा कि बयान हो चुका, ज़रूरी है कि मालिक आक़िल हो अगर मालिक पूरा साल या साल का कुछ हिस्सा दीवाना रहे तो उस पर ज़कात वाजिब नहीं है।
1869. अगर गाय, भेड़, ऊंट, सोने और चांदी, का मालिक साल का कुछ हिस्सा मस्त (बेहवास) या बेहोश रहे तो ज़कात उस पर से साकित नहीं होती और इसी तरह गेहूं, जौ, खजूर और किशमिश का मालिक ज़कात वाजिब होने के मौक़े पर मस्त या बेहोश हो जाए तो भी यही हुक्म है।
1870. गेहूं, जौ, खजूर और किशमिश के अलावा दूसरी चीज़ों में ज़कात साबित होने के लिए यह शर्त है कि मालिक उस माल में तसर्रुफ़ करने की क़ुदरत रखता हो पस अगर किसी ने उस माल को ग़स्ब कर लिया हो और मालिक उस माल में तसर्रुफ़ न कर सकता हो तो उसमें ज़कात नहीं है।
1871. अगर किसी ने सोना और चांदी या कोई और चीज़ जिस पर ज़कात देना वाजिब हो किसी से क़र्ज़ ली हो और वह चीज़ एक साल तक उस के पास रहे तो ज़रूरी है कि उसकी ज़कात दे और जिसने क़र्ज़ दिया हो उस पर कुछ वाजिब नहीं है।
गेहूं, जौ, खजूर और किशमिश की ज़कात
1872. गेहूं, जौ, खजूर और किशमिश पर ज़कात उस वक़्त वाजिब होती है जब वह निसाब की हद तक पहुंच जायें और उन का निसाब तीन सौ साअ है जो एक गुरोहे (उलमा) के बक़ौल तक़्रीबन 847 किलो होता है।
1873. जिस अंगूर, खजूर, जौ और गेंहू पर ज़कात वाजिब हो चुकी हो अगर कोई शख़्स खुद या उसके अहलो अयाल उसे खा लें या मसलन वह यह अज्नास किसी फ़कीर को ज़कात की नीयत के बग़ैर दे दे तो ज़रूरी है कि जितनी मिक़्दार इस्तेमाल की हो उस पर ज़कात दे।
1874. अगर गेहूं, जौ, खजूर और अंगूर पर ज़कात वाजिब होने के बाद उन चीज़ों का मालिक मर जाए तो जितनी ज़कात बनती हो वह उसके माल से देनी ज़रूरी है लेकिन अगर वह शख़्स ज़कात वाजिब होने से पहले मर जाए तो वह वारिस जिसका हिस्सा निसाब तक पहुंच जाए – ज़रूरी है कि अपने हिस्से की ज़कात ख़ुद अदा करे।
1875. जो शख़्स हाकिमे शर्अ की तरफ़ से ज़कात जमा करने पर मामूर हो वह गेहूं और जौ के खलियान में भूसा (और दाना) अलग करने के वक़्त और खजूर और अंगूर के ख़ुश्क होने के वक़्त ज़कात का मुतालबा कर सकता है और अगर मालिक न दे और जिस चीज़ पर ज़कात वाजिब हो गई हो वह तलाफ़ हो जाए तो ज़रूरी है कि उसका एवज़ दे।
1876. अगर किसी शख़्स के खजूर के दरख़्तों, अंगूर की बेलों या गेहूं और जौ के खेतों (की पैदावार) का मालिक बनने के बाद उन चीजों पर ज़कात वाजिब हो जाए तो ज़रूरी है कि उन पर ज़कात दे।
1877. अगर गेहूं, जौ और अंगूर पर ज़कात वाजिब होने के बाद कोई शख़्स खेतों और दरख़्तों को बेच दे तो बेचने वाले पर उन अज्नास की ज़कात वाजिब है और जब वह ज़कात अदा कर दे तो ख़रीदने वाले पर कुछ वाजिब नहीं है।
1878. अगर कोई शख़्स गेहूं, जौ, खजूर या अंगूर खरीदे और उसे इल्म हो कि बेचने वाले ने उनकी ज़कात दे दी है या शक करे कि उस ने ज़कात दी है या नहीं तो उस पर कुछ वाजिब नहीं है और अगर उसे मअमूल हो कि बेचने वाले ने उन पर ज़कात नहीं दी तो ज़रूरी है कि वह खुद उस पर ज़कात दे दे लेकिन अगर बेचने वाले ने दग्ल किया हो तो वह ज़कात देने के बाद उससे रुजूउ कर सकता है और ज़कात की मिक़्दार का उस से मुतालबा कर सकता है।
1879. अगर गेहूं, जौ, खजूर और अंगूर का वजन तर होने के वक़्त निसाब की हद तक पहुंच जाए और ख़ुश्क होने के वक़्त उस हद से कम हो जाए तो उस पर ज़कात वाजिब नहीं है।
1880. अगर कोई शख़्स गेहूं, जौ और खजूर को ख़ुश्क होने के वक़्त से पहले ख़र्च करे तो अगर वह ख़ुश्क हो कर निसाब पर पूरी उतरें तो ज़रूरी है कि उनकी ज़कात दे।
1881. खजूर की तीन क़िस्में हैं –
1. वह जिसे ख़ुश्क किया जाता है (यअनी छुआरे) उसकी ज़कात का हुक्म बयान हो चुका है।
2. रुतब – वह जो रुतब (पकी हुई रसदार) होने की हालत में खाई जाती है।
3. वह जो कच्ची ही खाई जाती है।
दूसरी क़िस्म की मिक़्दार अगर ख़ुश्क होने तक निसाब की हद तक पहुंच जाए तो एहतियाते मुस्तहब है कि उसकी ज़कात दी जाए। जहां तक तीसरी क़िस्म का तअल्लुक़ है ज़ाहिर यह है कि उस पर ज़कात वाजिब नहीं है।
1882. जिस गेहूं, जौ, खजूर और किशमिश की ज़कात किसी शख़्स ने दे दी हो अगर वह चन्द साल उसके पास पड़ी भी रहे तो उन पर दोबारा ज़कात वाजिब नहीं होगी।
1883. अगर गेहूं, जौ, खजूर और अंगूर (की काश्त) बारानी या नहरी ज़मीन पर की जाए या मिस्त्री ज़िराअत की तरह उन्हें ज़मीन की नमी से फ़ाइदा पहुंचे तो उन पर ज़कात दसवां हिस्सा है और अगर उनकी सिंचाई (झील या कुयें वग़ैरा) के पानी से बज़रीअए डोल की जाए तो उन पर ज़कात बीसवां हिस्सा है।
1884. अगर गेहूं, जौ, खजूर और अंगूर (की काश्त) बारिश के पानी से भी सेराब हो औऱ उसे डोल वग़ैरा के पानी से भी फ़ाइदा पहुंचे तो अगर यह सिचांई ऐसी हो कि आम तौर पर कहा जा सके कि उनकी सिचाई डोल वग़ैरा से की गई है तो उस पर ज़कात बीसवां हिस्सा है। और अगर यह कहा जाए कि यह नहर और बारिश के पानी से सेराब हुए हैं तो उन पर ज़कात का दसवां हिस्सा है और अगर सिंचाई की सूरत यह हो कि आम तौर पर कहा जाए कि दोनों ज़राए से सेराब हुए हैं तो उस पर ज़कात साढ़े सात फ़ीसद है।
1885. अगर कोई शक करे कि आम तौर पर कौन सी बात सहीह समझी जायेगी और उसे इल्म न हो कि सिंचाई की सूरत ऐसी है कि लोग आम तौर पर कहें कि दोनों ज़राए से सिंचाई हुई या यह कहें कि मसलन बारिश के पानी से हुई है तो अगर वह साढ़े सात फ़ीसदी ज़कात दे तो काफ़ी है।
1886. अगर कोई शक करे और उसे इल्म न हो कि उमूमन लोग कहते हैं कि दोनों ज़रा ए से सिंचाई हुई है या यह कहते हैं कि डोल वग़ैरा से हुई है तो उस सूरत में बीसवां हिस्सा देना काफ़ी है और अगर इस बात का एहतिमाल भी हो कि उमूमन लोग कहें कि बारिश के पानी से सेराब हुई है तब भी यही हुक्म है।
1887. अगर गेहूं, जौ, खजूर और अंगूर बारिश और नहर के पानी से सेराब हों और उन्हें डोल वग़ैरा के पानी की हाजत न हो लेकिन उनकी सिंचाई डोल के पानी से भी हुई हो और डोल के पानी से आमदनी में इज़ाफ़े में कोई मदद न मिली हो तो उन पर ज़कात दसवां हिस्सा है और अगर डोल वग़ैरा के पानी से सिंचाई हुई हो और नहर और बारिश के पानी की हाजत न हो लेकिन नहर और बारिश के पानी से भी सेराब हों और उससे आमदनी में इज़ाफ़े में कोई मदद न मिली हो तो उन पर ज़कात बीसवां हिस्सा है।
1888. अगर किसी खेत की सिंचाई डोल वग़ैरा से की जाए और उससे मुलाहिक़ा (मिली हुई) ज़मीन में खेती बाड़ी की जाए और वह मुलाहिक़ा ज़मीन उस ज़मीन से फ़ाइदा उठाए और उसे सिंचाई की ज़रूरत न रहे तो जिस ज़मीन की सिंचाई डोल वग़ैरा से की गई है उस की ज़कात बीसवां हिस्सा और उस से मुलाहिक़ा खेत की ज़कात एहतियात की बिना पर दसवां हिस्सा है।
1889. जो अख़राजात किसी शख़्स ने गेहूं, जौ, खजूर और अंगूर पर किये हों उन्हें वह फ़स्ल की आमदनी से मिन्हा कर के निसाब का हिसाब नहीं लगा सकता लिहाज़ा अगर उनमें से किसी एक का वज़न अख़राजात का हिसाब लगाने से पहले निसाब की मिक़्दार तक पहुंच जाए तो ज़रूरी है कि उस पर ज़कात दे।
1890. जिस शख़्स ने ज़िराअत में बीज इस्तेमाल किया हो ख़्वाह वह उस के पास मौजूद हो या उस ने खरीदा हो, वह निसाब का हिसाब उस बीज को फ़स्ल की आमदनी से मिन्हा कर के नहीं रख सकता बल्कि ज़रूरी है कि निसाब का हिसाब पूरी फ़स्ल को मद्देनज़र रखते हुए लगाए।
1891. जो कुछ हुकूमत असली माल से (जिस पर ज़कात वाजिब हो) बतौर मह्सूल ले ले उस पर ज़कात वाजिब नहीं है। मसलन अगर खेत की पैदावार 2000 किलो हो और हुकूमत उसमें से 100 किलो बतौर लगान के ले ले तो ज़कात फ़क़त 1900 किलो पर वाजिब है।
1892. एहतियाते वाजिब की बिना पर इंसान यह नहीं कर सकता कि जो अखराजात उसने ज़कात वाजिब होने से पहले किये हों उन्हें वह पैदावार से मिन्हा करे और सिर्फ़ बाक़ी मांदा पर ज़कात दे।
1893. ज़कात वाजिब होने के बाद जो अख़राजात किये जायें और जो कुछ ज़कात की मिक़्दार की निस्बत ख़र्च किया जाए वह पैदावार से मिन्हा नहीं किया जा सकता अगरचे एहतियात की बिना पर हाकिमे शर्अ या उसके वकील से उसको खर्च करने की इजाज़त भी ले ली हो।
1894. किसी शख़्स के लिए यह वाजिब नहीं कि वह इन्तिज़ार करे ताकि जौ और गेहूं खलियान तक पहुंच जायें और अंगूर और खजूर के ख़ुश्क होने का वक़्त हो जाए फिर ज़कात दे बल्कि जूं ही ज़कात वाजिब हो जाइज़ है कि ज़कात की मिक़्दार का अन्दाज़ा लगाकर वह क़ीमत बतौर ज़कात दे।
1895. ज़कात वाजिब होने के बाद मुतअल्लिक़ा शख़्स यह कर सकता है कि खड़ी फ़स्ल काटने या खजूर और अंगूर को चुनने से पहले ज़कात मुस्तहक़ शख़्स या हाकिमे शर्अ या उसके वकील को मुशतर्का तौर पर पेश कर दे और उसके बाद वह अख़राजात में शरीक होंगे।
1896. जब कोई शख़्स फ़स्ल या खजूर और अंगूर की ज़कात ऐन माल की शक्ल में हाकिमे शर्अ या मुस्तहक़ शख़्स या उन के वकील को दे दे तो उसके लिए ज़रूरी नहीं कि बिला मुआवज़ा मुशतर्का तौर पर उन चीज़ों की हिफ़ाज़त करे बल्कि वह फ़स्ल की कटाई या खजूर और अंगूर के ख़ुश्क होने तक माले ज़कात अपनी ज़मीन में रहने के बदले उज्रत का मुतालबा कर सकता है।
1897. अगर इंसान कई शहरो में गेहूं, जौ, खजूर या अंगूर का मालिक हो और उन शहरों में फ़स्ल पकने का वक़्त एक दूसरे से मुख़्तलिफ़ हो और उन पर सब शहरों से फ़स्ल और मेवे एक ही वक़्त में दस्तयाब न होते हों और यह सब एक साल की पैदावार शुमार होतें हों तो अगर उनमें से जो चीज़ पहले पक जाए वह निसाब के मुताबिक़ हो तो ज़रूरी है कि उस पर उसके पकने के वक़्त ज़कात दे और बाक़ी मांदा अज्नास पर उस वक़्त ज़कात दे जब वह दस्तयाब हों और अगर पहले पकने वाली चीज़ निसाब के बराबर न हो तो इन्तिज़ार करे ताकि बाक़ी अज्नास पक जायें। फिर अगर सब मिला कर निसाब के बराबर हो जायें तो उन पर ज़कात वाजिब है और अगर निसाब के बराबर न हों तो उन पर ज़कात वाजिब नहीं है।
1898. अगर खजूर और अंगूर के दरख़्त साल में दो दफ़्आ फल दें और दोनों मर्तबा की पैदावार जम्अ करने पर निसाब के बराबर हो जाए तो एहतियात की बिना पर उस पैदावार पर ज़कात वाजिब है।
1899. अगर किसी शख़्स के पास ग़ैर ख़ुश्कशुदा खजूरें हों या अंगूर हों जो ख़ुश्क होने की सूरत में निसाब के मुताबिक हों तो अगर उनके ताज़ा होने की हालत में वह ज़कात की नीयत से उतनी मिक़्दार ज़कात के मसरफ़ में ले आए जितनी उनके ख़ुश्क होने पर ज़कात की उस मिक़्दार के बराबर हो जो उस पर वाजिब है तो उसमें कोई हरज नहीं है।
1900. अगर किसी शख़्स पर ख़ुश्क खजूर या किशमिश की ज़कात वाजिब हो तो वह उन की ज़कात ताज़ा खजूर या अंगूर की शक्ल में नहीं दे सकता बल्कि अगर वह ख़ुश्क खजूर या किशमिश की ज़कात की क़ीमत लगाए और अंगूर या ताज़ा खजूरें या किशमिश या कोई और ख़ुश्क खजूरें इस क़ीमत के तौर पर दे तो उसमें भी इश्काल है नीज़ अगर किसी पर ताज़ा खजूर या अंगूर की ज़कात वाजिब हो तो वह ख़ुश्क खजूर या किशमिश देकर वह ज़कात अदा नहीं कर सकता बल्कि अगर वह क़ीमत लगाकर कोई खजूर या अंगूर दे तो अगरचे वह ताज़ा ही हो उसमें इश्काल है।
1901. अगर कोई ऐसा शख़्स मर जाए जो मकरूज़ हो और उसके पास ऐसा माल भी हो जिस पर ज़कात वाजिब हो चुकी हो तो ज़रूरी है कि जिस माल पर ज़कात वाजिब हो चुकी हो पहले उसमें से तमाम ज़कात दी जाए और उसके बाद उस का क़र्ज़ा अदा किया जाए।
1902. अगर कोई ऐसा शख़्स मर जाए जो मकरूज़ हो और उसके पास गेहूं, जौ, खजूर या अंगूर भी हो और इससे पहले कि उन अज्नास पर ज़कात वाजिब हो उसके वर्सा उस का क़र्ज़ा किसी दूसरे माल से अदा कर दें तो जिस वारिस का हिस्सा निसाब की मिक़्दार तक पहुंचता हो ज़रूरी है कि ज़कात दे और अगर इससे पहले कि ज़कात उन अज्नास पर वाजिब हो मुतावफ़्फ़ी का क़र्ज़ा अदा न करें और अगर उसका माल फ़क़त उस क़र्ज़े से ज़्यादा हो जबकि मुतवफ़्फ़ी पर उतना क़र्ज़ हो कि अगर उसे अदा करने चाहे तो अदा कर सकें ज़रूरी है कि गेहूं, जौ, खजूर और अंगूर में से कुछ मिक़्दार भी क़र्ज़ख़्वाह को दें। लिहाज़ा जो कुछ क़र्ज़ख़्वाह को दें उस पर ज़कात नहीं है और बाक़ी मांदा माल पर वारिसों में से जिस का भी हिस्सा ज़कात के निसाब के बराबर हो उसकी ज़कात देना ज़रूरी है।
1903. जिस शख़्स के पास अच्छी और घटिया दोनों क़िस्म के गेहूं, जौ, खजूर और अंगूर हों जिन पर ज़कात वाजिब हो गई हो उसके लिए एहतियाते वाजिब यह है कि अच्छे और घटिया दोनों अक़्साम में से अलग अलग ज़कात निकाले।
सोने का निसाब
1904. सोने के निसाब दो हैं –
उसका पहला निसाब बीस मिस्क़ाले शरई है जबकि हर मिस्क़ाले शरई 18 नखुद का होता है। पस जिस वक़्त सोने की मिक़्दार बीस मिस्क़ाले शरई तक, जो आजकल के पन्द्रह मिस्क़ाल के बराबर होते हैं, पहुंच जाए और वह दूसरी शराइत भी पूरी होती हों जो बयान की जा चुकी हैं तो ज़रूरी है कि इंसान उस का चालीसवां हिस्सा जो 1 (9) नखुद के बराबर होता है ज़कात के तौर पर दे और अगर सोना उस मिक़्दार तक न पहुंचे तो उस पर ज़कात वाजिब नहीं है। और उसका दूसरा निसाब चार मिस्क़ाले शरई है जो आजकल के तीन मिस्क़ाल के बराबर होता है यअनी अगर पन्द्रह मिस्क़ाल पर तीन मिस्क़ाल का इज़ाफ़ा हो जाए तो ज़रूरी है कि सिर्फ़ 15 मिस्क़ाल पर ज़कात दे इस सूरत में इज़ाफ़े यअनी अगर तीन मिस्क़ाल इज़ाफ़ा हो तो ज़रूरी है कि तमाम तक मिक़्दार पर ज़कात दे और अगर इज़ाफ़ा तीन मिस्क़ाल से कम हो तो जो मिक़्दार बढ़ी हो उस पर कोई ज़कात नहीं है।
चांदी का निसाब
1905. चांदी के निसाब दो हैं -
इस का पहला निसाब 105. मुरव्वजा मिस्क़ाल है लिहाज़ा जब चांदी की मिक़्दार 105 मिस्क़ाल तक पहुंच आए और दूसरी शराइत भी पूरी करती हो जो बयान की जा चुकी हैं तो ज़रूरी है कि इंसान उसका ढ़ाई फ़ीसदी जो दो मिस्क़ाल और 15 नखुद बनता है बतौर ज़कात दे और अगर वह उस मिक़्दार तक न पहुंचे तो उस पर ज़कात वाजिब नहीं है और उसका दूसरा निसाब 21 मिस्क़ाल है यअनी अगर 105 मिस्क़ाल 21 मिस्क़ाल का इज़ाफ़ा हो जाए तो ज़रूरी है कि 105 मिस्क़ाल पर ज़कात दे और जो इज़ाफ़ा हुआ है उस पर ज़कात नहीं है और जितना भी इज़ाफ़ा होता जाए यही हुक्म है यअनी अगर 21 मिस्क़ाल का इज़ाफ़ा हो तो वह मिक़्दार जिसका इज़ाफ़ा हुआ है और जो 21 मिस्क़ाल से कम है और उस पर ज़कात नहीं है। इस बिना पर इंसान के पास जितना सोना या चांदी हो अगर वह उसका चालीसवां हिस्सा बतौर ज़कात दे तो वह ऐसी ज़कात अदा करेगा जो उस पर वाजिब थी और अगर वह किसी वक़्त मिक़्दार से कुछ ज़्यादा दे मसलन अगर किसी के पास 110 मिस्क़ाल चांदी हो और वह उसका चालीसवां हिस्सा दे तो 105 मिस्क़ाल की ज़कात तो वह होगी जो उस पर वाजिब थी और 5 मिस्क़ाल पर वह ऐसी ज़कात देगा जो उस पर वाजिब न थी।
1906. जिस शख़्स के पास निसाब के मुताबिक़ सोना या चांदी हो अगरचे वह उस पर ज़कात दे दे लेकिन जब तक उसके पास सोना या चांदी पहले निसाब से कम न हो जाए ज़रूरी है कि हर साल उन पर ज़कात दे।
1907. सोने और चांदी पर ज़कात उस सूरत में वाजिब होती है जब वह ज़रूरी है कि ढले हुए सिक्कों की सूरत में हों और उनके ज़रीए लेन देन का रिवाज हो और अगर उनकी मुहर मिट भी चुकी हो तब भी ज़रूरी है कि उन पर ज़कात दी जाए।
1908. वह सिक्कादार सोना या चांदी जिन्हें औरतें बतौर ज़ेवर पहनती हों जब तक वह राइज हों यअनी सोने और चांदी के सिक्कों के तौर पर उनके ज़रीए लेन देन होता हो एहतियात की बिना पर उनकी ज़कात देना वाजिब है लेकिन अगर उनके ज़रीए लेन देन का रिवाज बाक़ी न हो तो उन पर ज़कात वाजिब नहीं है।
1909. जिस शख़्स के पास सोना और चांदी दोनों हों अगर उनमें से कोई भी पहले निसाब के बराबर न हो मसलन उसके पास 104 मिस्काल चांदी और 15 मिस्क़ाल सोना हो तो उस पर ज़कात वाजिब नहीं है।
1910. जैसा कि पहले बताया गया है कि सोने और चांदी पर ज़कात उस सूरत में वाजिब होती है जब वह ग्यारा महीने निसाब की मिक़्दार के मुताबिक़ किसी शख़्स की मिल्कियत में रहे और अगर ग्यारा महीनों में किसी वक़्त सोना और चांदी निसाब से कम हो जायें तो उस शख़्स पर ज़कात वाजिब नहीं है।
1911. अगर किसी शख़्स के पास सोना और चांदी हो और वह ग्यारा महीने के दौरान उन्हें किसी दूसरी चीज़ से बदल ले या उन्हें पिघला ले तो उस पर ज़कात वाजिब नहीं है लेकिन अगर वह ज़कात से बचने के लिए उनको सोने या चांदी से बदल ले यअनी सोने को सोने और चांदी को चांदी या सोने से बदल ले तो एहतियाते वाजिब है कि ज़कात दे।
1912. अगर कोई शख़्स बारहवें महीने में सोना या चांदी पिघ्लाए तो ज़रूरी है कि उन पर ज़कात दे और अगर पिघलाने की वजह से उन का वज़न या क़ीमत कम हो जाए तो ज़रूरी है कि उन चीज़ों को पिघलाने से पहले जो ज़कात उस पर वाजिब थी वह दे।
1913. अगर किसी शख़्स के पास जो सोना और चांदी हो उसमें से कुछ बढ़िया और कुछ घटिया क़िस्म का हो तो वह बढ़िया की ज़कात बढ़िया में से और घटिया की ज़कात घटिया में से दे सकता है। लेकिन एहतियात की बिना पर वह घटिया हिस्से में से तमाम ज़कात नहीं दे सकता बल्कि बेहतर यह है कि सारी ज़कात बढ़िया सोने और चांदी में से दे।
1914. सोने और चांदी के सिक्के जिनमें मअमूल से ज़्यादा दूसरी धातु की आमोज़िश हो अगर उन्हें चांदी और सोने के सिक्के कहा जाता हो तो उस सूरत में जब वह निसाब की हद तक पहुंच जायें उन पर ज़कात वाजिब है गो उनका खालिस हिस्सा निसाब की हद तक न पहुंचे लेकिन अगर उन्हें सोने और चांदी के सिक्के न कहा जाता हो ख़्वाह उन का खालिस हिस्सा निसाब की हद तक पहुंच भी जाए उन पर ज़कात का वाजिब होना महल्ले इश्काल है।
1915. जिस शख़्स के पास सोने और चांदी के सिक्के हों अगर उनमें दूसरी धातु की आमोज़िश मअमूल के मुताबिक हो तो अगर वह शख़्स उनकी ज़कात सोने और चांदी के ऐसे सिक्कों में दे जिनमें दूसरी धात की आमोज़िश मअमूल से ज़्यादा हो या ऐसे सिक्कों में दे जो सोने और चांदी के बने हुए न हों लेकिन यह सिक्के इतनी मिक़्दार में हों कि उनकी क़ीमत उस ज़कात की क़ीमत के बराबर हो जो उस पर वाजिब हो गई है तो उसमें कोई हरज नहीं है।
ऊंट, गाय और भेड़ बकरी की ज़कात
1916. ऊंट, गाय और भेड़, बकरी की ज़कात के लिए उन शराइत के अलावा जिनका ज़िक्र आ चुका है एक शर्त और भी है वह यह है कि हैवान सारा साल सिर्फ़ (खुदरौ) जंगली घास चरता हो लिहाज़ा अगर सारा साल या उस का कुछ हिस्सा काटी हुई घास खाए या ऐसी चारागाह में चरे जो खुद उस शख़्स की (यअनी हैवान के मालिक की) या किसी दूसरे शख्स की मिल्कियत हो तो उस हैवान पर ज़कात नहीं है लेकिन अगर वह हैवान साल भर में एक या दो दिन मालिक की मम्लूका घास (या चारा) खाए तो उसकी ज़कात वाजिब है। लेकिन ऊंट, गाय और भेड़ की ज़कात वाजिब होने में एहतियात की बिना पर यह शर्त नहीं है कि सारा साल हैवान बेकार रहे बल्कि अगर आबयारी या हल चलाने या उन जैसे उमूर में उन हैवानों से इस्तिफ़ादा किया जाए तो एहतियात की बिना पर ज़रूरी है कि उनकी ज़कात दे।
1917. अगर कोई शख़्स अपने ऊंट, गाय और भेड़ के लिए एक ऐसी चारागाह खरीदे जिसमें किसी ने काश्त न की हो या उसे किराए (या ठीके) पर हासिल करे तो उस सूरत में ज़कात का वाजिब होना मुश्किल है अगरचे ज़कात का देना अह्वात है लेकिन अगर वहां जानवर चराने का महसूल अदा करे तो ज़रूरी है कि ज़कात दे।
ऊंट के निसाब
1918. ऊंट के निसाब बारह हैं -
1. पांच ऊंट – और उनकी ज़कात एक भेड़ है और जब तक ऊंटों की तादाद इस हद तक न पहुंचे, ज़कात (वाजिब) नहीं है।
2. दस ऊंट – और उनकी ज़कात दो भेड़ें है।
3. पन्द्रह ऊंट – और उनकी ज़कात तीन भेड़ें हैं।
4. बीस ऊंट – और उनकी ज़कात चार भेड़ें हैं।
5. पच्चीस ऊंट -- और उनकी ज़कात पांच भेड़ें हैं।
6. छब्बीस ऊंट -- और उनकी ज़कात एक ऐसा ऊंट है जो दूसरे साल में दाख़िल हो चुका हो।
7. छत्तीस ऊंट -- और उनकी ज़कात एक ऐसा ऊंट है जो तीसरे साल में दाखिल हो चुका हो।
8. छियालीस ऊंट -- और उनकी ज़कात एक ऐसा ऊंट है जो चौथे साल में दाखिल हो चुका हो।
9. एक्सठ ऊंट -- और उनकी ज़कात एक ऐसा ऊंट है जो पांचवें साल में दाखिल हो चुका हो।
10. छिहत्तर ऊंट -- और उनकी ज़कात दो ऐसे ऊंट हैं जो तीसरे साल में दाखिल हो चुके हों।
11. एक्यानवे ऊंट -- और उनकी ज़कात दो ऐसे ऊंट हैं जो चौथे साल में दाखिल हों।
12. एक सौ एक्कीस ऊंट और इससे ऊपर जितने होते जायेंगे ज़रूरी है कि ज़कात देने वाला या तो उन का चालीस से चालीस तक हिसाब करे और हर चालीस ऊंटों के लिए एक ऐसा ऊंट दे जो तीसरे साल में दाखिल हो चुका हो या पचास से पचास तक हिसाब करे और हर पचास ऊंटों के लिए एक ऊंट दे जो चौथे साल में दाखिल हो चुका हो या चालीस और पचास दोनों में हिसाब करे लेकिन हर सूरत में इस तरह हिसाब करना ज़रूरी है कि कुछ बाक़ी न बचे या अगर बचे भी तो नौ से ज़्यादा न हो मसलन उसके पास 140 ऊंट हों तो ज़रूरी है कि एक सौ के लिए दो ऐसे ऊंट दे जो चौथे साल में दाखिल हो चुकें हों और चालीस के लिए एक ऐसा ऊंट दे जो तीसरे साल में दाखिल हो चुका हो और जो ऊंट ज़कात में दिया जाए उसका मादा होना ज़रूरी है।
1919. दो निसाबों के दरमियान ज़कात वाजिब नहीं है लिहाज़ा अगर एक शख़्स जो ऊंट रखता हो उनकी तादाद पहले निसाब जो पांच है, बढ़ जाए तो जब तक वह दूसरे निसाब तक जो दस है न पहुंचे ज़रूरी है कि फ़क़त पांच पर ज़कात दे और बाक़ी निसाबों की सूरत भी ऐसी ही है।
गाय का निसाब –
1920. गाय के दो निसाब हैं –
इस का पहला निसाब तीस है। जब किसी शख़्स की गायों की तादाद तीस तक पहुंच जाए और वह शराइत भी पूरी होती हों जिनका ज़िक्र किया जा चुका है तो ज़रूरी है कि गाय का ऐसा बच्चा जो दूसरे साल में दाखिल हो चुका हो ज़कात के तौर पर दे और एहतियाते वाजिब यह है कि वह बछड़ा हो। और उसका दूसार निसाब चालीस है और उसकी ज़कात एक बछिया है जो तीसरे साल में दाखिल हो चुकी हो और तीस और चालीस के दरमियान ज़कात वाजिब नहीं है। मसलन जिस शख़्स के पास उन्तालीस गायें हों ज़रूरी है कि सिर्फ़ तीस की ज़कात दे और अगर उसके पास चालीस से ज़्यादा गायें हों तो जब तक उनकी तादाद साठ तक न पहुंच जाए ज़रूरी है कि सिर्फ़ चालीस पर ज़कात दे। और जब उनकी तादाद साठ तक पहुंच जाए तो चूंकि यह तादाद पहले निसाब से दुगनी है इसलिए ज़रूरी है कि दो ऐसे बछड़े बतौर ज़कात दे जो दूसरे साल में दाखिल हो चुके हों और इसी तरह जूं जूं गायों की तादाद बढ़ती जाए ज़रूरी है कि या तो तीस से तीस तक हिसाब करे या चालीस से चालीस तक या तीस और चालीस दोनों का हिसाब करे और उन पर उस तरीक़े के मुताबिक़ ज़कात दे जो बताया गया है। लेकिन ज़रूरी है कि इस तरह हिसाब करे कि कुछ बाक़ी न बचे और अगर कुछ बचे तो नौ से ज़्यादा न हो मसलन अगर उसके पास सत्तर गायें हों तो ज़रूरी है कि तीस और चालीस के मुताबिक़ हिसाब करे और तीस के लिए तीस की और चालीस के लिए चालीस की ज़कात दे क्योंकि अगर वह तीस के लिहाज़ से हिसाब करेगा तो दस गायें बग़ैर ज़कात दिये रह जायेंगी।
भेड़ का निसाब
1921. भेड़ के पांच निसाब हैं –
पहला निसाब चालीस है – और उसकी ज़कात एक भेड़ है और जब तक भेड़ों की तादाद चालीस तक न पहुंचे उन पर ज़कात नहीं है।
दूसरा निसाब 121 है – और उसकी ज़कात दो भेड़ें हैं।
तीसरा निसाब 201 है – और उसकी ज़कात तीन भेड़ें हैं।
चौथा निसाब 301 है – और उसकी ज़कात चार भेड़ें हैं।
पांचवा निसाब 400 और उससे ऊपर ह और उनका हिसाब सौ से सौ तक करना ज़रूरी है और हर सौ भेड़ों पर एक भेड़ दी जाए और यह ज़रूरी नहीं कि ज़कात उन्हीं भेड़ों में से दी जाए बल्कि अगर कोई और भेड़ें दी जायें या भड़ों की क़ीमत के बराबर नक़दी दे दी जाए तो काफ़ी है।
1922. दो निसाबों के दरमियान ज़कात वाजिब नहीं है लिहाज़ा अगर किसी की भेड़ों की तादाद पहले निसाब से जो कि चालीस है ज़्यादा हो लेकिन दूसरे निसाब तक जो 121 है न पहुंची हो तो उसे चाहिए कि सिर्फ़ चालीस पर ज़कात दे और जो तादाद उससे ज़्यादा हो उस पर ज़कात नहीं है और उसके बाद के निसाबों के लिए भी यही हुक्म है।
1923. ऊंट, गायें और भेड़ें जब निसाब की हद तक पहुंच जायें तो ख़्वाह वह सब नर हों या मादा या कुछ नर हों और कुछ मादा उन पर ज़कात वाजिब है।
1924. ज़कात के ज़िम्न में गाय और भैंस एक जिन्स शुमार होती है और अरबी और ग़ैर अरबी ऊंट एक जिन्स हैं। इसी तरह भेड़, बकरे और दुंबे में कोई फ़र्क़ नहीं है।
1925. अगर कोई शख़्स ज़कात के तौर पर भेड़ दे तो एहतियाते वाजिब की बिना पर ज़रूरी है कि वह कम अज़ कम दूसरे साल में दाखिल हो चुकि हो और अगर बकरी दे तो एहतियातन ज़रूरी है कि वह तीसरे साल में दाखिल हो चुकि हो।
1926. जो भेड़ कोई शख़्स ज़कात के तौर पर दे अगर उसकी क़ीमत उसकी भेड़ों से मअमूली सी कम भी हो तो कोई हरज नहीं लेकिन बेहतर है कि ऐसी भेड़ दे जिसकी क़ीमत उसकी हर भेड़ से ज़्यादा हो। नीज़ गाय और ऊंट के बारे में भी यही हुक्म है।
1927. अगर कई अफ़राद बाहम हिस्सेदार हों तो जिस जिस का हिस्सा पहले निसाब तक पहुंच जाए ज़रूरी है कि ज़कात दे और जिसका हिस्सा पहले निसाब से कम हो उस पर ज़कात वाजिब नहीं।
1928. अगर एक शख़्स की गायें या ऊंट या भेड़े मुख़्तलिफ़ जगहों पर हों और वह सब मिलाकर निसाब के बराबर हों तो ज़रूरी है कि उन की ज़कात दे।
1929. अगर किसी शख़्स की गायें, भेड़ें, या ऊंट बीमार और ऐबदार हों तब भी ज़रूरी है कि उन की ज़कात दे।
1930. अगर किसी शख़्स की सारी गायें, भेड़ें या ऊंट बीमार या ऐबदार या बूढ़े हों तो वह खुद उन्हीं में से ज़कात दे सकता है लेकिन अगर वह सब तन्दरुस्त, बे ऐब और जवान हों तो वह उनकी ज़कात में बीमार या ऐबदार या बूढ़े जानवर नहीं दे सकता बल्कि अगर उन में से बअज़ तन्दरुस्त और बअज़ बीमार कुछ ऐबदार और कुछ बे ऐब और कुछ बूढ़े और कुछ जवान हों तो एहतियाते वाजिब यह है कि उनकी ज़कात में तन्दरुस्त बे ऐब और जवान जानवर दे।
1931. अगर कोई शख़्स ग्यारा महीने ख़त्म होने से पहले अपनी गायें, भेड़ें और ऊंट किसी दूसरी चीज़ से बदल ले या जो निसाब बनता हो उसे उसी जिन्स के उतने ही निसाब से बदल ले मसलन चालीस भेड़ें देकर चालीस और भेड़ें ले ले तो अगर ऐसा करना ज़कात से बचने की नीयत से न हो तो उस पर ज़कात वाजिब नहीं है। लेकिन अगर ज़कात से बचने की नीयत से हो तो उस सूरत में जबकि दोनों चीज़ें एक ही नौईयत का फ़ाइदा रखती हों मसलन दोनों भेड़ें दूध देती हों तो एहतियाते लाज़िम यह है कि उसकी ज़कात दे।
1932. जिस शख़्स को गाय, भेड़ और ऊंट की ज़कात देनी ज़रूरी हो अगर वह उनकी ज़कात अपने किसी दूसरे माल से दे तो जब तक उन जानवरों की तादाद निसाब से कम न हो ज़रूरी है कि हर साल ज़कात दे और अगर वह ज़कात उन्हीं जानवरों में से दे और वह पहले निसाब से कम हो जायें तो ज़कात उस पर वाजिब नहीं है मसलन जो शख़्स चालीस भेड़ें रखता हो अगर वह उनकी ज़कात अपने दूसरे माल से दे दे तो जब तक उसकी भेड़ें चालीस से कम न हों ज़रूरी है कि हर साल एक भेड़ दे और अगर वह खुद उन भेड़ों में से ज़कात दे तो जब तक उनकी तादाद चालीस तक न पहुंच जाए उस पर ज़कात वाजिब नहीं है।
माले तिजारत की ज़कात
जिस माल का इंसान मुआवज़ा दे कर मालिक हुआ हो और उस ने वह माले तिजारत और फ़ाइदा हासिल करने के लिए मह्फ़ूज़ रखा हो तो एहतियात की बिना ज़रूरी है कि (मुन्दरिजा ज़ैल) चन्द शराइत के साथ उसकी ज़कात दे जो चालीसवां हिस्सा है।
1. मालिक बालिग़ और आक़िल हो।
2. माल निसाब की मिक़्दार तक पहुंच गया हो और वह निसाब सोने और चांदी के निसाब के बराबर है।
3. जिस वक़्त से उस माल से फ़ाइदा उठाने की नीयत की हो, उस पर एक साल गुज़र जाए।
4. फ़ाइदा उठाने की नीयत पूरे साल बाक़ी रहे। पस अगर साल के दौरान उस की नीयत बदल जाए मसलन उसको अख़राजात की मद में सर्फ़ करने की नीयत करे तो ज़रूरी नहीं कि उस पर ज़कात दे।
5. मालिक उस माल में पूरा साल तसर्रुफ़ कर सकता हो।
6. तमाम साल उसके सरमाये की मिक़्दार या उससे ज़्यादा पर खरीदार मौजूद हो। पस अगर साल के कुछ हिस्से में सरमाये के कमतर माल का खरीदार हो तो उस पर ज़कात देना वाजिब नहीं है।
ज़कात का मसरफ़
1933. ज़कात का माल आठ मसरफ़ में ख़र्च हो सकता हैः-
1. फ़क़ीरः- वह (ग़रीब मोहताज) शख़्स जिसके पास अपने और अपने अहलो अयाल के लिए साल भर के अख़राजात न हों – फ़क़ीर है। लेकिन जिस शख़्स के पास कोई हुनर या जायदाद या सरमाया हो जिससे वह अपने साल भर के अखराजात पूरे कर सकता हो वह फ़क़ीर नहीं है।
2. मिस्कीनः- वह शख़्स जो फ़क़ीर से ज़्यादा तंगदस्त हो, मिस्कीन है।
3. वह शख़्स जो इमामे अस्र (अ0) या नायबे इमाम की जानिब से इस काम पर मामूर हो कि ज़कात जम्अ करे, उसकी निगहदाश्त करे, हिसाब की जांच पड़ताल करे और जम्अ किया हुआ माल इमाम (अ0) या नायबे इमाम या फ़ुक़रा (व मसाकीन) को पहुंचाए।
4. वह कुफ़्फ़ार जिन्हें ज़कात दी जाए तो वह दीने इस्लाम की जानिब माइल हों या जंग में या जंग के अलावा मुसलमानों की मदद करें इसी तरह वह मुसलमान जिनका ईमान उन चीज़ों पर जो पैग़म्बरे इस्लाम स्वल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम लाए हैं कमज़ोर हो लेकिन अगर उन को ज़कात दी जाए तो उनके ईमान की तक़वीयत का सबब बन जाए या जो मुसलमान (शहनशाहे विलायत) इमाम अली (अ0) की विलायत पर ईमान नहीं रखते लेकिन अगर उनको ज़कात दी जाए तो वह अमीरुल मोमिनीन (अ0) की विलायते (कुबरा) की तरफ़ माइल हों और उस पर ईमान ले आयें।
5. ग़ुलामों को खरीद कर उन्हें आज़ाद करना – जिस की तफ़्सील उसके बाद में बयान हुई है।
6. वह मक़रुज़ जो अपना क़र्ज़ अदा न कर सकता हो।
7. फ़ी सबीलिल्लाह – यअनी वह काम जिनका फ़ाइदा तमाम मुसलमानों को पहुंचता हो मसलन मस्जिद बनाना, ऐसा मदरज़ा तअमीर करना जहां दीनी तअलीम दी जाती हो, शहर की सफ़ाई करना नीज़ सड़कों को पुख़्ता बनाना और उन्हें चौड़ा करना और उन ही जैसे दूसरे काम करना।
8. इब्नुस्सबील – यअनी वह मुसाफ़िर जो सफ़र में नाचार हो गया हो।
यह वह मंदे हैं जहाँ ज़कात ख़र्च होती है लेकिन अक़्वा की बिना पर मालिक ज़कात को इमाम या नायबे इमाम की इजाज़त के बग़ैर मद न0 3 और मद न0 4 में ख़र्च नहीं कर सकता और इसी तरह एहतियाते लाज़िम की बिना पर मद न0 7 का हुक्म भी यही है और मज़्कूरा मदों के अहकाम आइन्दा मसाइल में बयान किये जायेंगे।
1934. एहतियाते वाजिब यह है कि फ़क़ीर और मिस्कीन अपने और अपने अहलो अयाल के साल भर के अखराजात से ज़्यादा ज़कात न ले और अगर उस के पास कुछ रक़म या जिन्स हो तो फ़क़त उतनी ही ज़कात ले जितनी रक़म या जिन्स उस के साल भर के अखराजात के लिए कम पड़ती हो।
1935. जिस शख़्स के पास अपने पूरे साल का ख़र्च हो अगर वह उस का कुछ हिस्सा इस्तेमाल कर ले और बाद में शक करे कि जो कुछ बाक़ी बचा है वह उस के साल भर के अखराजात के लिए काफ़ी है या नहीं तो वह ज़कात नहीं ले सकता।
1936. जिस हुनरमन्द या साहबे जायदाद या ताजिर की आमदनी उसके साल भर के अखराजात से कम हो वह अपने अख़राजात की कमी पूरी करने के लिए ज़कात ले सकता है और लाज़िम नहीं है कि वह अपने काम के औज़ार या जायदाद या सरमाया अपने अख़राजात के मसरफ़ में ले आए।
1937. जिस फ़क़ीर के पास अपने और अपने अहलो अयाल के लिए साल भर का ख़र्च न हो लेकिन एक घर का मालिक हो जिस में वह रहता हो या सवारी की चीज़ रखता हो और उन के बग़ैर गुज़र बसर न कर सकता हो ख़्वाह यह सूरत अपनी इज़्ज़त रखने के लिए ही हो वह ज़कात ले सकता है और घर के सामान, बर्तनों और गर्मी व सर्दी के कपड़ों और जिन चीज़ों की उसे ज़रूरत हो उनके लिए भी यही हुक्म है और जो फ़क़ीर यह चीज़ें न रखता हो अगर उसे उनकी ज़रूरत हो तो ज़कात में से खरीद सकता है।
1938. जिस फ़क़ीर के लिए हुनर सीखना मुश्किल न हो एहतियाते वाजिब की बिना पर ज़कात पर ज़िन्दगी बसर न करे लेकिन जब तक हुनर सीखने में मश्ग़ूल हो ज़कात ले सकता है।
1939. जो शख़्स पहले फ़क़ीर रहा हो और वह कहता हो कि मैं फ़क़ीर हूं तो अगरचे उसके कहने पर इंसान को इत्मीनान न हो फिर भी उसे ज़कात दे सकता है। लेकिन जिस शख़्स के बारे में मअलूम न हो कि वह पहले फ़क़ीर रहा है या नहीं तो एहतियात की बिना पर जब तक उसके फ़क़ीर होने का इत्मीनान न कर ले उसको ज़कात नहीं दे सकता।
1940. जो शख़्स कहे कि मैं फ़क़ीर हूं और पहले फ़क़ीर न रहा हो अगर उसके कहने पर इत्मीनान न होता हो तो एहतियाते वाजिब है कि उसको ज़कात न दी जाए।
1941. जिस शख़्स पर ज़कात वाजिब हो अगर कोई फ़क़ीर उसका मक़रुज़ (क़र्ज़दार) हो तो वह ज़कात देते हुए अपना क़र्ज़ उसमें से वसूल कर सकता है।
1942. अगर फ़क़ीर मर जाए और उसका माल इतना न हो कि जितना उसको क़र्ज़ा देना हो तो क़र्ज़ख़्वाह क़र्ज़े को ज़कात में शुमार कर सकता है बल्कि अगर मुतवफ़्फ़ी का माल उस पर वाजिबुल अदा क़र्ज़े के बराबर हो और उसके वर्सा उसका क़र्ज़ा अदा न करें या किसी और वजह से क़र्ज़ख़्वाह अपना क़र्ज़ा वापस न ले सकता हो तब भी वह अपना क़र्ज़ा ज़कात में शुमार कर सकता है।
1943. यह ज़रूरी नहीं कि कोई शख़्स जो चीज़ फ़क़ीर को बतौरे ज़कात दे उस के बारे में उसे बताए कि यह ज़कात है बल्कि अगर फ़क़ीर ज़कात लेने में ख़िफ़्फ़त मह्सूस करता हो तो मुस्तहब है कि उसे माल तो ज़कात की नीयत से दिया जाए लेकिन उसका ज़कात होना उस पर ज़ाहिर न किया जाए।
1944. अगर कोई शख़्स यह ख़याल करते हुए किसी को ज़कात दे कि वह फ़क़ीर है और बाद में उसे पता चले कि वह फ़क़ीर न था या मस्अले में नावाक़िफ़ होने की बिना पर किसी ऐसे शख़्स को ज़कात दे दे जिस के मुतअल्लिक़ उसे इल्म हो कि वह फ़क़ीर नहीं है तो यह काफ़ी नहीं है लिहाज़ा उसने जो चीज़ उस शख़्स को बतौरे ज़कात दी थी अगर वह बाक़ी हो तो ज़रूरी है कि उस शख़्स से वापिस लेकर मुस्तहक़ को दे सकता है और अगर लेने वाले को यह इल्म न था कि वह माले ज़कात है तो उससे कुछ नहीं ले सकता और इंसान को अपने माल से ज़कात का एवज़ मुस्तहक़ को देना ज़रूरी है।
1945. जो शख़्स मक़रूज़ हो और क़र्ज़ा अदा न कर सकता हो अगर उसके पास अपना साल भर का ख़र्च भी हो तब भी अपना क़र्ज़ा अदा करने के लिए ज़कात ले सकता है लेकिन ज़रूरी है कि उसने जो माल बतौरे क़र्ज़ लिया हो उसे किसी गुनाह के काम में ख़र्च न किया हो।
1946. अगर इंसान एक ऐसे शख़्स को ज़कात दे जो मक़रूज़ हो और अपना क़र्ज़ा अदा न कर सकता हो और बाद में उसे पता चले कि उस शख़्स ने जो क़र्ज़ा लिया था गुनाह के काम पर ख़र्च किया था तो अगर मक़रूज़ फ़क़ीर हो तो इंसान ने जो कुछ उसे दिया हो उसे सहमे फ़ुक़रा में शुमार कर सकता है।
1947. जो शख़्स मक़रूज़ हो और अपना क़र्ज़ा अदा न कर सकता हो अगरचे वह फ़क़ीर न हो तब भी क़र्ज़ख़्वाह क़र्ज़े को जो उसे मक़रूज़ से वसूल करना है ज़कात में शुमार कर सकता है।
1948. जिस मुसाफ़िर का ज़ादे राह ख़त्म हो जाए या उसकी सवारी क़ाबिले इस्तेमाल न रहे अगर उसका सफ़र गुनाह की ग़रज़ से न हो और वह क़र्ज़ लेकर या अपनी कोई चीज़ बेच कर मंज़िले मक़्सूद तक न पहुंच सकता हो तो अगरचे वह अपने वतन में फ़क़ीर न भी हो तो ज़कात लेकर या अपनी कोई चीज़ बेच कर सफ़र के अखराजात हासिल कर सकता हो तो वह फ़क़त उतनी मिक़्दार में ज़कात ले सकता है जिसके ज़रीए वह अपनी मंज़िल तक पहुंच जाए।
1949. जो मुसाफ़िर सफ़र में नाचार हो जाए और ज़कात ले अगर उसके वतन पहुंच जाने के बाद ज़कात में से कुछ बच जाए उसे ज़कात देने वाले को वापस न पहुंचा सकता हो तो ज़रूरी है कि वह ज़ाइद माल हाकिमे शर्अ को पहुंचा दे और उसे बता दे कि वह माले ज़कात है।
मुस्तहक़्क़ीने ज़कात के शराइत
1950. (माल का) मालिक जिस शख़्स को अपनी ज़कात देना चाहता हो ज़रूरी है कि वह शीआ इस्ना अशरी हो। अगर इंसान किसी को शीआ समझते हुए ज़कात दे दे और बाद में पते चले कि वह शीआ न था तो ज़रूरी है कि दोबारा ज़कात दे।
1951. अगर कोई शीआ बच्चा या दीवाना फ़क़ीर हो तो इंसान उस के सर परस्त को इस नीयत से ज़कात दे सकता है कि वह जो कुछ दे रहा है वह बच्चे या दीवाने की मिल्कीयत होगी।
1952. अगर इंसान बच्चे या दीवाने तक न पहुंच सके तो वह खुद या किसी अमानत दार शख़्स के ज़रीए ज़कात का माल उन पर ख़र्च कर सकता है और जब ज़कात उन लोगों पर ख़र्च की जा रही हो तो ज़रूरी है कि ज़कात देने वाला ज़कात की नीयत करे।
1953. जो फ़क़ीर भीक मांगता हो उसे ज़कात दी जा सकती है लेकिन जो शख़्स माले ज़कात गुनाह के काम पर ख़र्च करता हो ज़रूरी है कि उसे ज़कात न दी जाए बल्कि एहतियात यह है कि वह शख़्स जिसे ज़कात देना गुनाह की तरफ़ माइल करने का सबब हो अगरचे वह उसे गुनाह के काम में न भी ख़र्च करे उसे ज़कात न दी जाए।
1954. जो शख़्स शराब पीता हो या नमाज़ न पढ़ता हो और इसी तरह जो शख़्स खुल्लम खुल्ला गुनाहे कबीरा का मुर्तकिब होता हो एहतियाते वाजिब यह है कि उसे ज़कात न दी जाए।
1955. जो शख़्स मक़रूज़ हो और अपना क़र्ज़ा अदा न कर सकता हो उसका क़र्ज़ा ज़कात से दिया जा सकता है ख़्वाह उस शख़्स के अखराजात ज़कात देने वाले ही पर क्यों न हों।
1956. इंसान उन लोगों के अख़राजात जिनकी कफ़ालत उस पर वाजिब हो मसलन औलाद के अखराजात – ज़कात से अदा नहीं कर सकता लेकिन अगर वह खुद औलाद का ख़र्चा न दे तो दूसरे लोग उन्हें ज़कात दे सकते हैं।
1957. अगर इंसान अपने बेटे को ज़कात इस लिए दे ताकि वह उसे अपनी बीवी और नौकर और नौकरानी पर ख़र्च करे तो उसमें कोई हरज नहीं है।
1958. बाप अपने बेटे को सहमे फ़ी सबीलिल्लाह में से इल्मी और दीनी किताबें जिनकी बेटे को ज़रूरत हो खरीद कर नहीं दे सकता। लेकिन अगर रिफ़ाहे आम्मा के लिए उन किताबों की ज़रूरत हो तो एहतियात की बिना पर हाकिमे शर्अ से इजाज़त ले ले।
1959. जो बाप बेटे की शादी की इस्तिताअत न रखता हो वह बेटे की शादी के लिए ज़कात में से ख़र्च कर सकता है और बेटा भी बाप के लिए ऐसा ही कर सकता है।
1960. किसी ऐसी औरत को ज़कात नहीं दी जा सकती जिस का शौहर उसे ख़र्च देता हो और ऐसी औरत जिसे उस का शौहर ख़र्च न देता हो लेकिन जो हाकिमे शर्अ से रुजूउ कर के शौहर को ख़र्च देने पर मजबूर कर सकती हो उसे ज़कात न दी जाए।
1961. जिस औरत ने मुत्अ किया हो अगर वह फ़क़ीर हो तो उस का शौहर और दूसरे लोग उसे ज़कात दे सकते हैं। हाँ अगर अक़्द के मौक़े पर शौहर ने यह शर्त क़बूल की हो कि उसका ख़र्च देगा या किसी और वजह से उसका ख़र्च देना शौहर पर वाजिब हो और वह उस औरत के अखराजात देता हो तो उस औरत को ज़कात नहीं दी जा सकती।
1962. औरत अपने फ़क़ीर शौहर को ज़कात दे सकती है ख़्वाह शौहर वह ज़कात उस औरत पर ही क्यों न ख़र्च करे।
1963. सैयय्द ग़ैर सैय्यद से ज़कात नहीं ले सकता लेकिन अगर ख़ुम्स और दूसरे ज़राए आमदनी उसके अखराजात के लिए काफ़ी न हों और अगर ग़ैरे सैय्यद से ज़कात लेने पर मजबूर हो तो उस से ज़कात ले सकता है।
1964. जिस शख़्स के बारे में मअलूम न हो कि सैय्यद है या ग़ैर सैय्यद उसे ज़कात दी जा सकती है।
ज़कात की नीयत
1965. ज़रूरी है कि इंसान ब क़स्दे क़ुर्बत यानी अल्लाह तबारका तआला की ख़ुशनूदी की नीयत से ज़कात दे और अपनी नीयत में मुअय्यन करे कि जो कुछ दे रहा है वह माल की ज़कात है या ज़काते फ़ितरा है बल्कि मिसाल के तौर पर अगर गेहूं और जौ की की ज़कात उस पर वाजिब हो और वह कुछ रक़म ज़कात के तौर पर देना चाहे तो उस के लिए यह ज़रूरी है कि वह मुअय्यन करे कि गेहूं की ज़कात दे रहा है या जौ की।
1966. अगर किसी शख़्स पर मुतअद्दिद चीज़ों की ज़कात वाजिब हो और वह ज़कात में कोई चीज़ दे लेकिन किसी भी चीज़ की नीयत न करे तो जो चीज़ उसने ज़कात में दी है अगर उसकी जिन्स वही हो जो उन चीज़ों में से किसी एक की है तो वह उसी जिन्स की शुमार होगी। फ़र्ज़ करें कि किसी शख़्स पर चालीस भेड़ों और 15 मिस्क़ाल सोने की ज़कात वाजिब है, अगर वह मसलन एक भेड़ ज़कात में दे और उन चीज़ों में से (कि जिन पर ज़कात वाजिब है) किसी की भी नीयत न करे तो वह भेड़ों की ज़कात शुमार होगी लेकिन अगर वह चांदी के सिक्के या करेंसी नोट दे या जो उन (चीज़ों) के हम जिन्स नहीं है तो बअज़ (उलमा) के बक़ौल वह (सिक्के या नोट) उन तमाम (चीज़ों) पर हिसाब से बांट दिये जायें लेकिन यह बात इश्काल से खाली नहीं है बल्कि एहतिमाल यह है कि वह उन चीज़ों में से किसी की भी (ज़कात) शुमार न होंगे और (नीयत न करने तक) मालिके माल की मिल्कियत रहेंगे।
1967. अगर कोई शख़्स अपने माल की ज़कात (मुस्तहक़ तक) पहुंचाने के लिए किसी को वकील बनाये तो जब वह माले ज़कात वकील के हवाले करे तो एहतियाते वाजिब की बिना पर ज़रूरी है कि नीयत करे कि जो कुछ उसका वकील बाद में फ़क़ीर को देगा वह ज़कात है और अहवत यह है कि ज़कात फ़क़ीर तक पहुंचने के वक़्त तक वह उस नीयत पर क़ाइम रहे।
1968. अगर कोई शख़्स माले ज़कात क़स्दे क़ुर्बत के बग़ैर ज़कात की नीयत से हाकिमे शर्अ या फ़क़ीर को दे दे तो अक़्वा की बिना पर वह माले ज़कात में शुमार होगा अगरचे उसने क़स्दे क़ुर्बत के बग़ैर अदा कर के गुनाह किया है।
ज़कात के मुतफ़र्रिक़ मसाइल
1969. एहतियात की बिना पर ज़रूरी है कि इंसान गेहूं और जौ को भूसे से अलग करने के मौक़े पर और खजूर और अंगूर के ख़ुश्क होने के वक़्त ज़कात फ़क़ीर को दे दे या अपने माल से अलायहदा कर दे। और ज़रूरी है कि सोने, चांदी, गाय, भेड़ और ऊंट की ज़कात ग्यारा महीने ख़त्म होने के बाद फ़क़ीर को दे या अपने माल से अलायहदा कर दे लेकिन अगर वह शख़्स किसी फ़क़ीर का मुन्तज़िर हो या किसी ऐसे फ़क़ीर को ज़कात देना चाहता हो जो किसी लिहाज़ से (दूसरे पर) बरतरी रखता हो तो वह यह कर सकता है कि ज़कात अलायहदा न करे।
1970. ज़कात अलायहदा करने के बाद एक शख़्स के लिए लाज़िम नहीं कि उसे फ़ौरन मुस्तहक़ शख़्स को दे लेकिन अगर किसी ऐसे शख़्स तक उसकी रसाई हो, जिसे ज़कात दी जा सकती हो तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि ज़कात देने में ताख़ीर न करे।
1971. जो शख़्स ज़कात मुस्तहक़ शख़्स को पहुंचा सकता हो अगर वह उसे ज़कात न पहुंचाए और उसके कोताही बरतने की वजह से माले ज़कात तलफ़ हो जाए तो ज़रूरी है कि उसका एवज़ दे।
1972. जो शख़्स ज़कात मुस्तहक़ तक पहुंचा सकता हो अगर वह उसे ज़कात न पहुंचाए और माले ज़कात हिफ़ाज़त करने के बावजूद तलफ़ हो जाए और ज़कात अदा करने में ताख़ीर की कोई सहीह वजह न हो तो ज़रूरी है कि उसका एवज़ दे। लेकिन अगर ताख़ीर करने की कोई सहीह वजह थी मसलन एक ख़ास फ़क़ीर उसकी नज़र में था या थोड़ा थोड़ा कर के फ़ुक़रा को देना चाहता था तो उसका ज़ामिन होना मअलूम नहीं है।
1973. अगर कोई शख़्स ज़कात (ऐन उसी) माल से अदा करे तो वह बाक़ी मांदा माल में तसर्रुफ़ कर सकता है और अगर वह ज़कात अपने किसी दूसरे माल से अदा कर दे तो उस पूरे माल में तसर्रुफ़ कर सकता है।
1974. इंसान ने जो माले ज़कात अलायहदा किया हो उसे अपने लिये उठा कर उसकी जगह कोई दूसरी चीज़ नहीं रख सकता।
1975. अगर उस माले ज़कात से जो किसी शख़्स से जो किसी शख़्स ने अलायहदा कर दिया हो कोई मनफ़अत हासिल हो मसलन जो भेड़ बतौरे ज़कात अलायहदा की हो वह बच्चा जने तो वह मन्फ़अत फ़क़ीर का माल है।
1976. जब कोई शख़्स माले ज़कात अलायहदा कर रहा हो अगर उस वक़्त कोई मुस्तहक़ मौजूद हो तो बेहतर है कि ज़कात उसे दे दे बूजुज़ उस सूरत के कि कोई ऐसा शख़्स उसकी नज़र में हो जिसे ज़कात देना किसी वजह से बेहतर हो।
1977. अगर कोई शख़्स हाकिमे शर्अ की इजाज़त के बग़ैर उस माल से कारोबार करे जो उसने ज़कात के लिए अलायहदा कर दिया हो और उसमें खिसारा हो जाए तो उसे ज़कात में कोई कमी नहीं करनी चाहिए लेकिन अगर मुनाफ़ा हो तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर ज़रूरी है कि मुस्तहक़ को दे दे।
1978. अगर कोई शख़्स इससे पहले की ज़कात उस पर वाजिब हो कोई चीज़ बतौरे ज़कात फ़क़ीर को दे दे तो वह ज़कात में शुमार नहीं होगी और अगर उस पर ज़कात वाजिब होने के बाद वह चीज़ जो उसने फ़क़ीर को दी थी तलफ़ न हुई हो और फ़क़ीर अभी तक फ़क़ीरी में मुब्तला हो तो ज़कात देने वाला उस चीज़ को जो उसने फ़क़ीर को दी थी ज़कात में शुमार कर सकता है।
1979. अगर फ़क़ीर यह जानते हुए कि ज़कात एक शख़्स पर वाजिब नहीं हुई उससे कोई चीज़ बतौर ज़कात ले ले और वह चीज़ फ़क़ीर की तहवील में तलफ़ हो जाए तो फ़क़ीर उस का ज़िम्मेदार है और जब ज़कात उस शख़्स पर वाजिब हो जाए और फ़क़ीर उस वक़्त तक तंगदस्त हो तो जो चीज़ उस शख़्स ने फ़क़ीर को दी थी उस का एवज़ ज़कात में शुमार कर सकता है।
1980. अगर कोई फ़क़ीर यह न जानते हुए कि ज़कात एक शख़्स पर वाजिब नहीं हुई है उससे कोई चीज़ बतौरे ज़कात ले ले और वह फ़क़ीर की तहवील में तलफ़ हो जाए तो फ़क़ीर ज़िम्मेदार नहीं है और देने वाला शख़्स उस चीज़ का एवज़ ज़कात में शुमार नहीं कर सकता।
1981. मुस्तहब है कि गाय, भेड़ और ऊंट की ज़कात आबरूमंद (सफ़ैदपोश ग़रीब ग़ुरबा) को दी जाए और ज़कात देने में अपने रिश्तेदारों को दूसरों पर, अहले इल्म को बेइल्म लोगों पर, और जो लोग हाथ न फ़ैलाते हों उन को मंगतों पर तरजीह दी जाए। हां अगर फ़क़ीर को किसी और वजह से ज़कात देना बेहतर हो तो फिर मुस्तहब है कि ज़कात उस को दी जाए।
1982. बेहतर है कि ज़कात अलानिया दी जाए और मुस्तहब सदक़ा पोशीदा तौर पर दिया जाए।
1983. जो शख़्स ज़कात देना चाहता हो अगर उसके शहर में कोई मुस्तहक़ न हो और वह ज़कात उसके लिए मुअय्यन मद में भी सर्फ़ न कर सकता हो तो अगर उसे उम्मीद न हो कि बाद में कोई मुस्तहक़ शख़्स अपने शहर में मिल जायेगा तो ज़रूरी है कि ज़कात दूसरे शहर में ले जाए और ज़कात की मुअय्यन मद में सर्फ़ करे। और उस शहर में ले जाने के अख़राजात हाकिमे शर्अ की इजाज़त से माले ज़कात में से ले सकता है। और अगर माले ज़कात तलफ़ हो जाए तो वह ज़िम्मेदार नहीं है।
1984. अगर ज़कात देने वाले को अपने शहर में कोई मुस्तहक़ मिल जाए तब भी वह माले ज़कात दूसरे शहर ले जा सकता है लेकिन ज़रूरी है कि उस शहर में ले जाने के अख़राजात ख़ुद बर्दाश्त करे और अगर माले ज़कात तलफ़ हो जाए तो वह ख़ुद ज़िम्मेदार है बजुज़ उस सूरत के कि माले ज़कात दूसरे शहर में हाकिमे शर्अ के हुक्म से ले गया हो।
1985. जो शख़्स गेहूं, जौ, किशमिश और खजूर बतौरे ज़कात दे रहा हो इन अज्नास के नाप तोल की उजरत उसकी अपनी ज़िम्मेदारी है।
1986. जिस शख़्स को ज़कात में 2 मिस्क़ाल और 15 नखुद या इस से ज़्यादा चांदी देनी हो वह एहतियाते मुस्तहब की बिना पर 2 मिस्क़ाल और 15 नखुद से कम चांदी किसी फ़क़ीर को न दे नीज़ अगर चांदी के अलावा कोई दूसरी चीज़ मसलन गेहूं और जौ दोनों हों और उनकी क़ीमत 2 मिस्क़ाल और 15 नखुद चांदी तक पहुंच जाए तो एहतियाते मुस्तहब की बिना पर वह एक फ़क़ीर को उस से कम न दे।
1987. इंसान के लिए मकरूह है कि मुस्तहक़ से दर्ख़्वास्त करे कि जो ज़कात उसने उस से ली है उसी के हाथ फ़रोख़्त कर दे लेकिन अगर मुस्तहक़ ने जो चीज़ बतौरे ज़कात ली है उसे बेचना चाहे तो जब उसकी क़ीमत तय हो जाए तो जिस शख़्स ने मुस्तहक़ को ज़कात दी हो उस चीज़ को खरीदने के लिए उसका हक़ दूसरों पर फ़ायक़ है।
1988. अगर किसी शख़्स को शक हो कि जो ज़कात उस पर वाजिब हुई थी वह उसने दी है या नहीं और जिस माल में ज़कात वाजिब हुई थी वह भी मौजूद हो तो ज़रूरी है कि ज़कात दे ख़्वाह उसका शक गुज़श्ता साल की ज़कात के मुतअल्लिक़ ही क्यों न हो। और (जिस माल में ज़कात वाजिब हुई थी) अगर वह ज़ाए हो चुका हो तो अगरचे उसी साल के मुतअल्लिक़ ही शक क्यों न हो उस पर ज़कात नहीं है।
1989. फ़क़ीर यह नहीं कर सकता कि ज़कात लेने से पहले उस की मिक़्दार से कम मिक़्दार पर समझौता कर ले या किसी चीज़ को उसकी क़ीमत से ज़्यादा क़ीमत पर बतौरे ज़कात क़बूल करे। और इसी तरह मालिक भी यह नहीं कर सकता कि मुस्तहक़ को इस शर्त पर ज़कात दे कि वह मुस्तहक़ उसे वापस कर देगा लेकिन अगर मुस्तहक़ ज़कात लेने के बाद राज़ी हो जाए और उस ज़कात को उसे वापस कर दे तो कोई हरज नहीं मसलन किसी शख़्स पर बहुत ज़्यादा ज़कात वाजिब हो और फ़क़ीर हो जाने की वजह से वह ज़कात अदा न कर सकता हो और उसने तौबा कर ली हो तो अगर फ़क़ीर राज़ी हो जाए कि उससे ज़कात ले कर फिर उसे बख़्श दे तो कोई हरज नहीं।
1990. इंसान क़ुरआने मजीद, दीनी किताबें या दुआ की किताबें सहमे फ़ी सबीलिल्लाह से खरीद कर वक़्फ़ नहीं कर सकता लेकिन अगर रिफ़ाहे आम्मा के लिए उन चीज़ों की ज़रूरत हो तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर हाकिमे शर्अ से इजाज़त ले ले।
1991. इंसान माले ज़कात से जायदाद खरीद कर अपनी औलाद या उन लोगों को वक़्फ़ नहीं कर सकता जिनका खर्च उस पर वाजिब हो ताकि वह उस जायदाद की मनफ़अत अपने मसरफ़ में ले आयें।
1992. हज और ज़ियारत वग़ैरा पर जाने के लिए इंसान फ़ी सबीलिल्लाह के हिस्से से ज़कात ले सकता है अगरचे वह फ़क़ीर न हो या अपने साल भर के अख़राजात के लिए ज़कात ले चुका हो लेकिन यह उस सूरत में है जबकि उसका हज और ज़ियारत वग़ैरा के लिए जाना लोगों के मफ़ाद में हो और एहतियात की बिना पर ऐसे लोगों में ज़कात ख़र्च करने के लिए हाकिमे शर्अ से इजाज़त ले ले।
1993. अगर एक मालिक अपने माल की ज़कात देने के लिए किसी फ़क़ीर को वकील बनाए और फ़क़ीर को यह एहतिमाल हो कि मालिक का इरादा यह था कि वह खुद (यअनी फ़क़ीर) उस माल से कुछ न ले तो उस सूरत में वह कोई चीज़ उसमें से अपने लिए नहीं ले सकता और अगर फ़क़ीर को यह यक़ीन हो कि मालिक का इरादा यह नहीं था तो वह अपने लिए भी ले सकता है।
1994. अगर कोई फ़क़ीर ऊंट, गायें, भेड़ें, सोना और चांदी बतौरे ज़कात हासिल करे और उनमें वह सब शराइत मौजूद हों जो ज़कात वाजिब होने के लिए बयान की गई हैं ज़रूरी है कि फ़क़ीर उन पर ज़कात दे।
1995. अगर दो अश्ख़ास एक ऐसे माल में हिस्सादार हों जिसकी ज़कात वाजिब हो चुकि हो और उनमें से एक अपने हिस्से की ज़कात दे दे और बाद में वह माल तक़सीम कर ले (और जो शख़्स ज़कात दे चुका हो) अगरचे उसे इल्म हो कि उसके साथी ने अपने हिस्से की ज़कात नहीं दी और न ही बाद में देगा तो उस का अपने हिस्से में तसर्रुफ़ करना इश्काल नहीं रखता।
1996. अगर ख़ुम्स और ज़कात किसी शख़्स के ज़िम्मे वाजिब हो और कफ़्फ़ारा और मन्नत वग़ैरा भी उस पर वाजिब हो और वह मक़रूज़ भी हो और उन सब की अदायगी न कर सकता हो तो अगर वह माल जिस पर ख़ुम्स या ज़कात वाजिब हो चुकी हो तलफ़ न हो गया हो तो ज़रूरी है कि ख़ुम्स और ज़कात दे और अगर वह माल तलफ़ हो गया हो तो कफ़्फ़ारे और नज़्र से पहले ज़कात, ख़ुम्स और क़र्ज़ अदा करे।
1997. जिस शख़्स के ज़िम्मे ख़ुम्स या ज़कात हो और हज भी उस पर वाजिब हो और वह मक़रूज़ भी हो अगर वह मर जाए और उसका माल उन तमाम चीज़ों के लिए काफ़ी न हो और अगर वह माल जिस पर ख़ुम्स या ज़कात वाजिब हो चुकी हो तलफ़ न हो गया हो तो ज़रूरी है कि ख़ुम्स या ज़कात अदा की जाए और उसका बाक़ी मांदा माल जिस पर ख़ुम्स या ज़कात वाजिब हो चुकी हो तलफ़ हो गया हो तो ज़रूरी है कि उसका माल क़र्ज़ की अदायगी पर ख़र्च किया जाए और अगर ज़्यादा बचा हो तो उसे ख़ुम्स और ज़कात पर तक़सीम कर दिया जाए।
1998. जो शख़्स इल्म हासिल करने में मश्ग़ूल हो वह जिस वक़्त इल्म हासिल न करे उस वक़्त अपनी रोज़ी कमाने के लिए काम कर सकता है। अगर उसका इल्म हासिल करना वाजिबे ऐनी हो तो फ़ुक़रा के हिस्से से उसको ज़कात दे सकते हैं और अगर उस इल्म का हासिल करना अवामी बह्बूद के लिए हो तो फ़ी सबीलिल्लाह की मद से एहतियात की बिना पर हाकिमे शर्अ की इजाज़त से उसको ज़कात देना जाइज़ है और इन दो सूरतों के अलावा उसको ज़कात देना जाइज़ नहीं है।
ज़काते फ़ित्रा
1999. ईदुल फ़ित्र की रात ग़ुरूबे आफ़्ताब के वक़्त जो शख़्स बालिग़ और आक़िल हो और न फ़क़ीर हो और न दूसरे का ग़ुलाम हो ज़रूरी है कि अपने लिए और उन लोगों के लिए जो उसके हां खाना खाते हों फ़ी कस एक साअ जिसके बारे में कहा जाता है कि तक़रीबन तीन किलो होता उन ग़िज़ाओं में जो उसके शहर (या इलाक़े) में इस्तेमाल होती हों मसलन गेहूं या जौ या खजूर या किशमिश या चावल या जुवार मुस्तहक़ शख़्स को दे और अगर इनकी बजाय उनकी क़ीमत नक़दी की शक्ल में दे तब भी काफ़ी है और एहतियाते लाज़िम यह है कि जो ग़िज़ा उसके शहर में आम तौर पर इस्तेमाल न होती हो चाहे वह गेहूं, जौ, खजूर या किशमिश हो, न दे।
2000. जिस शख़्स के पास अपने और अपने अहलोअयाल के लिए साल भर का खर्च न हो और उस का कोई रोज़गार भी न हो जिसके ज़रीए वह अपने अहलोअयाल का साल भर का खर्च पूरा कर सके वह फ़क़ीर है और उस पर फ़ित्रा देना वाजिब नहीं है।
2001. जो लोग ईदुलफ़ित्र की रात ग़ुरूब के वक़्त किसी शख़्स के हां खाने वाले समझे जायें ज़रूरी है कि वह शख़्स उनका फ़ित्रा दे, क़त्ए नज़र इससे कि वह छोटे हों या बड़े, मुसलमान हों या काफ़िर, उनका ख़र्चा उस पर वाजिब हो या न हो और उसके शहर में हों या किसी दूसरे शहर में।
2002. अगर कोई शख़्स एक ऐसे शख़्स को जो उसके हां खाना खाने वाला गरदाना जाए, उसे दूसरे शहर में नुमाइन्दा मुक़र्रर करे कि उसके (यअनी साहबे ख़ाना के) माल से अपना फ़ित्रा दे दे और उसे इत्मीनान हो कि वह शख़्स फ़ित्रा दे देगा तो खुद साहबे ख़ाना के लिए उसका फ़ित्रा देना ज़रूरी नहीं है।
2003. जो मेहमान ईदुल फ़ित्र की रात ग़ुरूब से पहले साहबे ख़ाना की रज़ामन्दी से उसके घर आए और उसके हां खाना खाने वालों में अगरचे वक़्ती तौर पर शुमार हो उसका फ़ित्रा साहबे ख़ाना पर वाजिब है।
2004. जो मेहमान ईदुलफ़ित्र की रात ग़ुरूब से पहले साहबे ख़ाना की रज़ामन्दी के बग़ैर उसके घर आए और कुछ मुद्दत साहबे ख़ाना के हां रहे उस का फ़ित्रा एहतियात की बिना पर वाजिब है और इसी तरह अगर इंसान को किसी का ख़र्चा देने पर मजबूर किया न गया हो तो उसके फ़ित्रे के लिए भी यही हुक्म है।
2005. जो मेहमान ईदुल फ़ित्र की रात ग़ुरूब के बाद वारिद हो अगर वह साहबे ख़ाना के हां खाना खाने वाला शुमार हो तो उस का फ़ित्रा साहबे ख़ाना पर एहतियात की बिना पर वाजिब है और अगर खाना खाने वाला शुमार न हो तो वाजिब नहीं है। ख़्वाह साहबे ख़ाना ने ग़ुरूब से पहले उसे दअवत दी हो और वह इफ़्तार भी साहबे ख़ाना के घर पर ही करे।
2006. अगर कोई शख़्स ईदुल फ़ित्र की रात ग़ुरूब के वक़्त दीवाना हो और उसकी दीवांगी ईदुल फ़ित्र के दिन ज़ोहर के वक़्त तक बाक़ी रहे तो उस पर फ़ित्रा वाजिब नहीं है वर्ना एहतियाते वाजिब की बिना पर लाज़िम है कि फ़ित्रा दे।
2007. ग़ुरूबे आफ़ताब से पहले अगर कोई बच्चा बालिग़ हो जाए या कोई दीवाना आक़िल हो जाए या कोई फ़क़ीर ग़नी हो जाए तो अगर वह फ़ितरा वाजिब होने की शराइत पूरी करता हो तो ज़रूरी है कि फ़ितरा दे।
2008. जिस शख़्स पर ईदुल फ़ित्र की रात ग़ुरूब के वक़्त फ़ित्रा वाजिब न हो अगर ईद के दिन ज़ोहर के वक़्त से पहले तक फ़ित्रा होने की शराइत उसमें मौजूद हो जायें तो एहतियाते वाजिब1 यह है कि फ़ित्रा दे।
2009. अगर कोई काफ़िर ईदुल फ़ित्र की रात ग़ुरूबे आफ़ताब के बाद मुसलमान हो जाए तो उस पर फ़ित्रा वाजिब है लेकिन अगर एक ऐसा मुसलमान जो शीआ न हो वह ईद का चांद देखने के बाद शीआ हो जाए तो ज़रूरी है कि फ़ित्रा दे।
2010. जिस शख़्स के पास सिर्फ़ अन्दाज़न एक साथ गेहूं ऐसी ही कोई जिन्स हो उसके लिए मुस्तहब है कि फ़ित्रा दे और अगर उसके अहलो अयाल भी हों और वह उनका भी फ़ित्रा देना चाहता हो तो वह ऐसा कर सकता है कि फ़ित्रे की नीयत से एक साथ गेहूं वग़ैरा अपने अहलो अयाल में से किसी एक को दे दे और वह इसी नीयत से दूसरे को दे दे और वह इसी तरह देते रहें हत्ताकि वह जिन्स खानदान के आख़िरी फ़र्द तक पहुंच जाए और बेहतर है कि जो चीज़ आख़िरी फ़र्द को मिले वह किसी ऐसे शख़्स को दे जो ख़ुद उन लोगों में से न हो जिन्होंने फ़ित्रा एक दूसरे को दिया है और अगर उन लोगों में से कोई नाबालिग़ हो तो उसका सरपरस्त उसकी बजाय फ़ितरा ले सकता है और एहतियात यहै है कि जो चीज़ नाबालिग़ के लिए ली जाए वह किसी दूसरे को न दी जाए।
2011. अगर ईदुल फ़ित्र की रात ग़ुरूब के बाद किसी के हां बच्चा पैदा हो तो उसका फ़ित्रा देना वाजिब नहीं है लेकिन एहतियाते मुस्तहब यह है कि जो अश्ख़ास ग़ुरूब के बाद से ईद के दिन ज़ौहर से पहले तक साहबे ख़ाना के हां खाना खाने वालों में समझे जायें वह उन सबका फ़ित्रा दे।
2012. अगर कोई शख़्स किसी के हां खाना खाता हो और ग़ुरूब से पहले किसी दूसरे के हां खाना खाने वाला हो जाए तो उसका फ़ित्रा उसी शख़्स पर वाजिब है जिसके हां वह खाना खाने वाला बन जाए मसलन अगर औरत ग़ुरूब से पहले शौहर के घर चली जाए तो ज़रूरी है कि शौहर उसका फ़ित्रा दे।
2013. जिस शख़्स का फ़ित्रा किसी दूसरे शख़्स पर वाजिब हो उस पर अपना फ़ित्रा खुद देना वाजिब नहीं है।
2014. जिस शख़्स का फ़ित्रा किसी दूसरे शख़्स पर वाजिब हो अगर वह न दे तो एहतियात की बिना पर फ़ित्रा खुद उस शख़्स पर देना वाजिब हो जाता है जो शराइत मस्अला 1999 में बयान हुई है। अगर वह मौजूद हों तो अपना फ़ित्रा खुद अदा करे।
2015. जिस शख़्स का फ़ित्रा किसी दूसरे शख़्स पर वाजिब हो अगर वह खुद अपना फ़ित्रा दे दे तो जिस शख़्स पर उसका फ़ित्रा वाजिब हो उस पर से उसकी अदायगी का वुजूब साक़ित नहीं होता।
2016. जिस औरत का शौहर उसका ख़र्च न देता हो अगर वह किसी दूसरे के हां खाना खाती हो तो उसका फ़ित्रा उस शख़्स पर वाजिब है जिसके हां वह खाना खाती है और अगर वह किसी के हां खाना न खाती हो और फ़क़ीर भी न हो तो ज़रूरी है कि अपना फ़ित्रा खुद दे।
2017. ग़ैरे सैय्यद, सैय्यद को फ़ित्रा नहीं दे सकता हालांकि अगर सैय्यद उसके हां खाना खाता हो तब भी उसका फ़ित्रा वह किसी दूसरे सैय्यद को नहीं दे सकता।
2018. जो बच्चा मां या दाया का दूध पीता हो उसका फ़ित्रा उस शख़्स पर वाजिब है जो मां या दाया के अखराजात बर्दाश्त करता हो लेकिन अगर मां या दाया का खर्च खुद बच्चे के माल से पूरा हो तो बच्चे का फ़ित्रा किसी पर वाजिब नहीं है।
2019. इंसान अगरचे अपने अहलो अयाल का खर्च हराम माल से देता हो, ज़रूरी है कि उनका फ़ित्रा हलाल माल से दे।
2020. अगर इंसान किसी शख़्स को उजरत पर रखे जैसे मिस्त्री, बढ़ई या खिदमतगार और उसका खर्च इस तरह दे कि वह उसका खाना खाने वालों में शुमार हो तो ज़रूरी है कि उसका फ़ित्रा भी दे लेकिन अगर उसे सिर्फ़ काम की मज़दूरी दे तो उस (अजीर) का फ़ित्रा अदा करना उस पर वाजिब नहीं है।
2021. अगर कोई शख़्स ईदुल फ़ित्र की रात ग़ुरूब से पहले फ़ौत हो जाए तो उसका और उसके अहलो अयाल का फ़ित्रा उसके माल से देना वाजिब नहीं है। लेकिन अगर ग़ुरूब के बाद फ़ौत हो तो मश्हूर क़ौल की बिना पर ज़रूरी है कि उसका और उसके अहलो अयाल का फ़ित्रा उसके माल से दिया जाए लेकिन यह हुक्म इश्काल से खाली नहीं है और इस मसअले में एहतियात के पहलू को तर्क नहीं करना चाहिए।
ज़काते फ़ित्रा का मसरफ़
2022. फ़ित्रा एहतियाते वाजिब की बिना पर उन शीआ इसना अशरी फ़ुक़रा को देना ज़रूरी है, जो उन शराइत पर पूरे उतरते हों जिनका ज़िक्र ज़कात के मुस्तहक़्क़ीन में हो चुका है और अगर शहर में शीआ इसना अशरी फ़ुक़रा न मिलें तो दूसरे मुसलमान फ़ुक़रा को फ़ित्रा दे सकता है लेकिन ज़रूरी है कि किसी भी सूरत में नासिबी को न दिया जाए।
2023. अगर कोई शीआ बच्चा फ़क़ीर हो तो इंसान यह कर सकता है कि फ़ित्रा उस पर खर्च करे या उसके सरपरस्त को देकर उसे बच्चे की मिल्कियत क़रार दे।
2024. जिस फ़क़ीर को फ़ित्रा दिया जाए ज़रूरी नहीं कि वह आदिल हो लेकिन एहतियाते वाजिब यह है कि शराबी और बेनमाज़ी को और उस शख़्स को जो खुल्लम खुल्ला गुनाह करता हो फ़ित्रा न दिया जाए।
2025. जो शख़्स फ़ित्रा नाजाइज़ कामों में खर्च करता हो ज़रूरी है कि उसे फ़ित्रा न दिया जाए।
2026. एहतियाते मुस्तहब यह है कि एक फ़क़ीर को एक साअ से कम फ़ित्रा न दिया जाए। अलबत्ता अगर एक साअ से ज़्यादा दिया जाए तो कोई इश्काल नहीं है।
2027. जब किसी जिन्स की क़ीमत उसी जिन्स की मअमूली क़िस्म से दुगनी हो, मसलन किसी गेहूं की क़ीमत मअमूली क़िस्म के गेहूं की क़ीमत से दुगनी हो तो अगर कोई शख़्स उस (बढ़िया जिन्स) का आधा साअ बतौरे फ़ित्रा दे तो यह काफ़ी नहीं है बल्कि अगर वह आधा साअ फ़ित्रा की क़ीमत की नीयत से भी दे तो भी काफ़ी नहीं है।
2028. इंसान आधा साअ एक जिन्स का मसलन गेहूं का और आधा साअ किसी दूसरी जिन्स मसलन जौ का बतौरे फ़ित्रा नहीं दे सकता बल्कि अगर यह आधा आधा साअ फ़ित्रे की क़ीमत की नीयत से भी दे तो काफ़ी नहीं है।
2029. इंसान के लिए मुस्तहब है कि ज़कात देने में अपने फ़क़ीर रिश्तेदारों और हमसायों को दूसरे लोगों पर तरजीह दे और बेहतर यह है कि अहले इल्मों फ़ज़्ल और दींदार लोगों को दूसरे लोगों पर तरजीह दें।
2030. अगर इंसान यह ख़्याल करते हुए कि एक शख़्स फ़क़ीर है उसे फ़ित्रा दे और बाद में मअलूम हो कि वह फ़क़ीर न था तो अगर उसने जो माल फ़क़ीर को दिया था वह ख़त्म न हो गया हो तो ज़रूरी है कि वापस ले ले और मुस्तहक़ को दे दे और अगर वापस न ले सकता हो तो ज़रूरी है कि खुद अपने माल से फ़ित्रे का एवज़ दे और अगर वह माल ख़त्म हो गया हो लेकिन लेने वाले को इल्म हो कि जो कुछ उसने लिया है वह फ़ित्रा है तो ज़रूरी है कि उसका एवज़ दे और अगर उसे यह इल्म न हो तो एवज़ देना उस पर वाजिब नहीं है और ज़रूरी है कि इंसान फ़ित्रे का एवज़ दे।
2031. अगर कोई शख़्स कहे कि मैं फ़क़ीर हूं तो उसे फ़ित्रा नहीं दिया जा सकता बजुज़ उस सूरत के कि इंसान को उसके कहने से इत्मीनान हो जाए या इंसान को इल्म हो कि वह पहले फ़क़ीर था।
ज़काते फ़ित्रा के मुतफ़र्रिक मसाइल
2032. ज़रूरी है कि इंसान फ़ित्रा क़ुर्बत के क़स्द से यअनी अल्लाह तबारका तआला की ख़ुशनूदी के लिए दे और उसे देते वक़्त फ़ित्रे की नीयत करे।
2033. अगर कोई शख़्स माहे रमज़ानुल मुबारक से पहले फ़ित्रा दे दे तो यह सहीह नहीं है और बेहतर यह है कि माहे रमज़ानुल मुबारक में भी फ़ित्रा न दे अलबत्ता अगर माहे रमज़ानुल मुबारक से पहले किसी फ़क़ीर को क़र्ज़ा दे और जब फ़ित्रा उस पर वाजिब हो जाए, क़र्ज़े को फ़ित्रे में शुमार कर ले तो कोई हरज नहीं है।
2034. गेहूं या कोई दूसरी चीज़ जो फ़ित्रे के तौर पर दी जाए ज़रूरी है कि उसमें कोई और जिन्स या मिट्टी न मिली हुई हो। और अगर उसमें कोई ऐसी चीज़ मिली हुई हो और खालिस माल एक साअ तक पहुंच जाए और मिली हुई चीज़ जुदा किये बग़ैर इस्तेमाल के क़ाबिल हो या जुदा करने में हद से ज़्यादा ज़हमत न हो या जो चीज़ मिली हुई हो वह इतनी कम हो कि क़ाबिले तवज्जुह न हो तो कोई हरज नहीं है।
2035. अगर कोई शख़्स ऐबदार चीज़ फ़ित्रे के तौर पर दे तो एहतियाते वाजिब की बिना पर काफ़ी नहीं है।
2036. जिस शख़्स को कई अश्ख़ास का फ़ित्रा देना हो उसके लिए ज़रूरी नहीं कि सारा फ़ित्रा एक ही जिन्स से दे मसलन अगर बअज़ अफ़राद का फ़ित्रा गेहूं से और बअज़ दूसरों का जौ से दे तो काफ़ी है।
2037. ईद की नमाज़ पढ़ने वाले शख़्स को एहतियाते वाजिब की बिना पर ईद की नमाज़ से पहले फ़ित्रा देना ज़रूरी है लेकिन अगर कोई शख़्स नमाज़े ईद न पढ़े तो फ़ित्रे की अदायगी में ज़ौहर के वक़्त तक ताख़ीर कर सकता है।
2038. अगर कोई शख़्स फ़ित्रे की नीयत से अपने माल की कुछ मिक़्दार अलायहदा कर दे और ईद के दिन ज़ौहर के वक़्त तक मुस्तहक़ को न दे तो जब भी वह माल मुस्तहक़ को दे फ़ित्रे की नीयत करे।
2039. अगर कोई शख़्स फ़ित्रे वाजिब होने के वक़्त फ़ित्रा न दे और अलग भी न करे तो उसके बाद अदा और क़ज़ा की नीयत किये बग़ैर फ़ित्रा दे।
2040. अगर कोई शख़्स फ़ित्रा अलग कर दे तो वह उसे अपने मसरफ़ में ला कर दूसरा माल उसकी जगह बतौर फ़ित्रा नहीं रख सकता।
2041. अगर किसी शख़्स के पास ऐसा माल हो जिसकी क़ीमत फ़ित्रा से ज़्यादा हो तो अगर वह शख़्स फ़ित्रा न दे और नीयत करे कि उस माल की कुछ मिक़्दार फ़ित्रे के लिए होगी तो ऐसा करने में इश्काल है।
2042. किसी शख़्स ने जो माल फ़ित्रे के लिए अलग किया हो अगर वह तलफ़ हो जाए तो अगर वह शख़्स फ़क़ीर तक पहुंच सकता था और उसने फ़ित्रा देने में ताख़ीर की हो या उसकी हिफ़ाज़त करने में कोताही की हो तो ज़रूरी है कि उसका एवज़ दे और अगर फ़क़ीर तक नहीं पहुंच सकता था और उसकी हिफ़ाज़त में कोताही न की हो तो फिर ज़िम्मेदार नहीं है।
2043. अगर फ़ित्रा देने वाले के अपने इलाक़े में मुस्तहक़ मिल जाए तो एहतियाते वाजिब यह है कि फ़ित्रा दूसरी जगह न ले जाए और अगर दूसरी जगह ले जाए और वह तलफ़ हो जाए तो ज़रूरी है कि उसका एवज़ दे।
हज के अहकाम
2044. बैतुल्लाह की ज़ियारत करने और उन अअमाल को बजा लाने का नाम हज है जिनके वहां बजा लाने का हुक्म दिया गया है और उसकी अदायगी हर उस शख़्स के लिए जो मुन्दारिजा ज़ैल शराइत पूरी करता हो तमाम उम्र में एक दफ़्आ वाजिब हैः-
अव्वल – इंसान बालिग़ हो।
दोम – आक़िल और आज़ाद हो।
सोम – हज पर जाने की वजह से कोई ऐसा नाजाइज़ काम करने पर मजबूर न हो जिसका तर्क करना हज करने से ज़्यादा अहम हो या कोई ऐसा वाजिब तर्क न होता हो जो हज से ज़्यादा अहम हो।
चाहरूम – इस्तिताअत रखता हो और साहबे इस्तिताअत होना चन्द चीज़ों पर मुन्हसिर हैः-
1. इंसान रास्ते का ख़र्च और इसी तरह अगर ज़रूरत हो तो सवारी रखता हो या इतना माल रखता हो जिससे उन चीज़ों को मुहैया कर सके।
2. इतनी सेहत और ताक़त हो कि ज़्यादा मशक़्क़त के बग़ैर मक्का ए मुकर्रिमा जा कर हज कर सकता हो।
3. मक्का ए मुकर्रिमा जाने के लिए रास्ते में कोई रुकावट न हो और अगर रास्ता बन्द हो या इंसान को डर हो कि रास्ते में उसकी जान या आबरू चली जायेगी या उसका माल छीन लिया जायेगा तो उस पर हज वाजिब नहीं है लेकिन अगर वह दूसरे रास्ते से जा सकता हो तो अगरचे वह रास्ता ज़्यादा तवील हो ज़रूरी है कि उस रास्ते से जाए बजुज़ इसके कि वह रास्ता इस क़दर दूर और ग़ैर मअरूफ़ हो कि लोग कहें कि हज का रास्ता बन्द है।
4. उसके पास इतना वक़्त हो कि मक्का ए मुकर्रमा पहुंच कर हज के अअमाल बजा ला सके।
5. जिन लोगों के अखराजात उस पर वाजिब हों मसलन बीवी, बच्चे और जिन लोगों के अखराजात बर्दाश्त करना लोग उसके लिए ज़रूरी समझते हों उनके अखराजात उसके पास मौजूद हों।
6. हज से वापसी के बाद वह मआश के लिए कोई हुनर या खेती या जायदाद रखता हो या फिर कोई दूसरा ज़रीआ ए आमदनी रखता हो यअनी इस तरह न हो कि हज के अखराजात की वजह से वापसी पर मजबूर हो जाए और तंगी तुर्शी में ज़िन्दगी गुज़ारे।
2045. जिस शख़्स की ज़रूरत अपने ज़ाती मकान के बग़ैर पूरी न हो सके उस पर हज उस वक़्त वाजिब है जब उसके पास मकान के लिए भी रक़म हो।
2046. जो औरत मक्का ए मुकर्रमा जा सकती हो अगर वापसी के बाद उसके पास उसका अपना कोई माल न हो और मिसाल के तौर पर उसका शौहर भी फ़क़ीर हो और उसे ख़र्च न देता हो और वह औरत उसरत में ज़िन्दगी गुज़ारने पर मजबूर हो जाए तो उस पर हज वाजिब नहीं।
2047. अगर किसी शख़्स के पास हज के लिए ज़ादे राह और सवारी न हो और दूसरा उसे कहे कि तुम हज पर जाओ मैं तुम्हारा सफ़र खर्च दूंगा और तुम्हारे सफ़रे हज के दौरान तुम्हारे अहलो अयाल को भी खर्च देता रहूंगा तो अगर उसे इत्मीनान हो जाए कि वह शख़्स उसे ख़र्च देगा तो उस पर हज वाजिब हो जाता है।
2048. अगर किसी शख़्स को मक्का ए मुकर्रमा जाने और वापस आने का खर्च दे दिया जाए कि वह हज कर ले तो अगरचे वह मक़रूज़ भी हो और वापसी पर ग़ुज़र बसर करने के लिए माल भी न रखता हो उस पर हज वाजिब हो जाता है लेकिन अगर इस तरह हो कि हज के सफ़र का ज़माना उसके कारोबार और काम का ज़माना हो कि अगर हज पर चला जाए तो अपना क़र्ज़ मुक़र्रर वक़्त पर अदा न कर सकता हो या अपनी गुज़र बसर के अखराजात साल के बाक़ी दिनों में मुहैया न कर सकता हो तो उस पर हज वाजिब नहीं है।
2049. अगर किसी को मक्का ए मुकर्रमा तक जाने और जाने के अखराजात नीज़ जितनी मुद्दत वहां जाने और आने में लगे उस मुद्दत के लिए उसके अहलो अयाल के अखराजात दे दिये जायें और उससे कहा जाए कि हज पर जाओ लेकिन यह सब मसारिफ़ उसकी मिल्कियत में न दिये जायें तो उस सूरत में जबकि उसे इत्मीनान हो कि दिए हुए अख़राजात का उससे फिर मुतालबा नहीं किया जायेगा उस पर हज वाजिब हो जाता है।
2050. अगर किसी शख़्स को इतना माल दे दिया जाए जो हज के लिए काफ़ी हो और यह शर्त लगाई जाए कि जिस शख़्स ने माल दिया है माल लेने वाला मक्का ए मुकर्रमा के रास्ते में उसकी खिदमत करेगा तो जिसे माल दिया जाये उस पर हज वाजिब नहीं होता।
2051. अगर किसी शख़्स को इतना माल दिया जाए कि उस पर हज वाजिब हो जाए और वह हज करे तो अगरचे बाद में वह खुद भी (कहीं से) माल हासिल कर ले दूसरा हज उस पर वाजिब नहीं है।
2052. अगर कोई शख़्स बग़रज़े तिजारत मिसाल के तौर पर जद्दा जाए और इतना माल कमाए कि अगर वहां से मक्का जाना चाहे तो इस्तिताअत रखने की वजह से ज़रूरी है कि हज करे और अगर वह हज कर ले तो ख्वाह वह बाद में इतनी दौलत कमा ले कि खुद अपने वतन से भी मक्का ए मुकर्रमा जा सकता हो तब भी उस पर दूसरा हज वाजिब नहीं है।
2053. अगर कोई इस शर्त पर अजीर बने कि वह खुद एक दूसरे शख़्स की तरफ़ से हज करेगा तो अगर वह खुद हज को न जा सके और चाहे कि किसी दूसरे को अपनी जगह भेज दे तो ज़रूरी है कि जिसने उसे अजीर बनाया है उसे इजाज़त ले।
2054. अगर कोई साहबे इस्तिताअत हो कर हज को न जाए और फिर फ़क़ीर हो जाए तो ज़रूरी है कि ख़्वाह उसे ज़हमत ही क्यों न उठानी पड़े बाद में हज करे और अगर वह किसी भी तरह हज को न जा सकता हो और कोई उसे हज करने के लिए अजीर बनाए तो ज़रूरी है कि मक्का ए मुकर्रमा में रहे और फिर अपना हज बजा लाए लेकिन अगर अजीर बने और उजरत नक़्द ले ले और जिस शख़्स ने उसे अजीर बनाया हो वह इस बात पर राज़ी हो कि उस की तरफ़ से हज दूसरे साल बजा लाया जाए जबकि वह इत्मीनान न रखता हो तो ज़रूरी है कि अजीर पहले साल खुद अपना हज करे और उस शख़्स का हज जिसने उसको अजीर बनाया था दूसरे साल के लिए उठा रखे।
2055. जिस साल कोई शख़्स साहबे इस्तिताअत हुआ हो अगर उसी साल मक्का ए मुकर्रमा चला जाए और मुक़र्ररा वक़्त पर अरफ़ात और मश्अरूल हराम में न पहुंच सके और बाद में सालों में साहबे इस्तिताअत न हो तो उस पर हज वाजिब नहीं है सिवाय इसके कि चंद साल पहले से साहबे इस्तिताअत रहा हो और हज पर न गया हो तो उस सूरत में ख़्वाह ज़हमत ही क्यों न उठानी पड़े उसे हज करना ज़रूरी है।
2056. अगर कोई शख़्स साहबे इस्तिताअत होते हुए हज न करे और बाद में बुढ़ापे, बीमारी या कमज़ोरी की वजह से हज न कर सके और इस बात से ना उम्मीद हो जाए कि बाद में खुद हज कर सकेगा तो ज़रूरी है कि किसी दूसरे को अपनी तरफ़ से हज के लिए भेज दे बल्कि अगर ना उम्मीद न भी हुआ हो तो एहतियाते वाजिब यह है कि एक अजीर मुक़र्रर करे और अगर बाद में इस क़ाबिल हो जाए तो खुद भी हज करे और अगर उसके पास किसी साल पहली दफ़्आ इतना माल हो जाए जो हज के लिए काफ़ी हो और बुढ़ापे या बीमारी या कमज़ोरी की वजह से हज न कर सके और ताक़त (व सेहत) हासिल करने से ना उम्मीद हो तब भी यही हुक्म है और इन तमाम सूरतों में एहतियाते मुस्तहब यह है कि जिसकी तरफ़ से हज के लिए जा रहा हो अगर वह मर्द हो तो ऐसे शख़्स को नायाब बनाए जिसका हज पर जाने का पहला मौक़ा हो (यअनी इससे पहले हज करने न गया हो)
2057. जो शख़्स हज करने के लिए किसी दूसरे की तरफ़ से अजीर हो ज़रूरी है कि उसकी तरफ़ से तवाफ़ुन्निसा भी करे और अगर न करे तो अजीर पर उसकी बीवी हराम हो जायेगी।
2058. अगर कोई शख़्स तवाफ़ुन्निसा सहीह तौर पर न बजा लाए या उसको बजा लाना भूल जाए और चन्द रोज़ बाद उसे याद आए और रास्ते से वापस होकर बजा लाए तो सहीह है लेकिन अगर वापस होना उसके लिए बाइसे मशक़्क़त हो तो तवाफ़ुन्निसा की बजा आवरी के लिए किसी को नायब बना सकता है।
मुआमलात
ख़रीद व फ़रोख़्त के अहकाम
2059. एक ब्योपारी के लिए मुनासिब है कि ख़रीद व फ़रोख़्त के सिलसिले में जिन मसाइल का (उमूमन) सामना करना पड़ता है उनके अहकाम सीख ले बल्कि अगर मसाइल न सीखने की वजह से किसी वाजिब हुक्म की मुखालिफ़त करने का अन्देशा हो तो मसाइल सीखना लाज़िम व लाबुद है। हज़रत इमाम जअफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलातो वस्सलाम से रिवायत है कि जो शख़्स ख़रीद व फ़रोख़्त करना चाहता हो उसके लिए ज़रूरी है कि उनके अहकाम सीखे और अगर उन अहकाम को सीखने से पहले खरीद व फ़रोख़्त करेगा तो बातिल या मुशतबह मुआमला करने की वजह से हलाकत में पड़ेगा।
2060. अगर कोई मस्अले से नावाक़िफ़ीयत की बिना पर यह न जानता हो कि उसने जो मुआमला किया है वह सहीह है या बातिल तो जो माल उसने हासिल किया हो उसे इस्तेमाल नहीं कर सकता मगर यह कि उसे इल्म हो जाए कि दूसरा फ़रीक़ उस माल को इस्तेमाल करने पर राज़ी है तो उस सूरत में वह इस्तेमाल कर सकता है अगरचे मुआमला बातिल हो।
2061. जिस शख़्स के पास माल न हो और कुछ अख़राजात उस पर वाजिब हों, मसलन बीवी बच्चों का खर्च तो ज़रूरीह कि कारोबार करे। और मुस्तहब कामों के लिए मसलन अहलो अयाल की ख़ुशहाली और फ़क़ीरों की मदद करने के लिए कारोबार करना मुस्तहब है।
ख़रीद व फ़रोख़्त के मुस्तहब्बात
ख़रीद व फ़रोख़्त में चन्द चीज़ें मुस्तहब शुमार की गई हैं –
1.- फ़क़्र और उस जैसी कैफ़ीयत के सिवा जिन्स की क़ीमत में ख़रीदारों के दरमियान फ़र्क़ न करे।
2.- अगर वह नुक़्सान में न हो तो चीज़ें ज़्यादा मंहगी न बेचे।
3.- जो चीज़ बेच रहा हो वह कुछ ज़्यादा दे और जो चीज़ खरीद रहा हो वह कम ले।
4.- अगर कोई शख़्स सौदा करने के बाद पशीमान होकर उस चीज़ को वापस करना चाहे तो वापस ले ले।
मकरूह मुआमलात
2062. ख़ास खास मुआमलात जिन्हें मकरूह शुमार किया गया है यह हैं –
1. जायदाद का बेचना बजुज़ इसके कि उससे दूसरी जायदाद खरीदी जाए।
2. गोश्त फ़रोशी का पेशा इख़तियार करना।
3. कफ़न फ़रोशी का पेशा इखतियार करना।
4. ऐसे (ओछे) लोगों से मुआमला करना जिनकी सहीह तरबियत न हुई हो।
5. सुब्ह की अज़ान से सूरज निकलने के वक़्त तक मुआमला करना।
6. गेहूं, जौ और उन जैसी दूसरी अजनास की खरीद व फ़रोख़्त को अपना पेशा क़रार देना।
7. अगर मुसलमान कोई जिन्स खरीद रहा हो तो उसके सौदे में दख्लअन्दाज़ी करके खरीदार बनने का इज़्हार करना।
हराम मुआमलात
2063. बहुत से मुआमलात हराम हैं जिनमें से कुछ यह हैं –
1. नश्शा आवर मशरूबात, ग़ैर शिकारी कुत्ते और सुव्वर की खरीद फ़रोख़्त हराम है और एहतियात की बिना पर नजिस मुर्दार के मुतअल्लिक़ भी यही हुक्म है। इनके अलावा दूसरी नजासत की खरीद व फ़रोख़्त उस सूरत में जाइज़ है जबकि ऐने नजिस से हलाल फ़ाइदा हासिल करना मक़्सूद हो मसलन गोबर और पाखाने से खाद बनायें अगरचे एहतियात इसमें है कि उनकी खरीद व फ़रोख़्त से भी परहेज़ किया जाए।
2. जिन्सी माल की ख़रीद व फ़रोख़्त।
3. उन चीज़ों की खरीद व फ़रोख़्त भी एहतियात की बिना पर हराम है जिन्हें बिल उमूम माले तिजारत न समझा जाता हो मसलन दरिन्दों की खरीद व फ़रोख़्त उस सूरत में जबकि उनसे मुनासिब हद तक हलाल फ़ाइदा न हो।
4. उन चीज़ों की ख़रीद व फ़रोख़्त जिन्हें आम तौर पर फ़क़त हराम काम में इस्तेमाल करते हों मसलन जुए का सामान।
5. जिस लेन देने में रिबा (सूद) हो।
6. वह लेन देने जिसमें मिलावट हो यअनी ऐसी चीज़ का बेचना जिसमें दूसरी चीज़ इस तरह मिलाई गई हो कि मिलावट का पता न चल सके और बेचने वाला भी खरीदार को न बताए मसलन ऐसा घी बेचना जिसमें चर्बी मिलाई गई हो। हज़रत रसूले अकरम स्वल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम का इर्शाद है, जो शख़्स मिलावट कर के कोई चीज़ किसी मुसलमान के हाथ बेचता है या मुसलमानों को नुक़्सान पहुंचाता है या उनके साथ मक्र व फ़रेब से काम लेता है वह मेरी उम्मत में से नहीं है और जो मुसलमान अपने मुसलमान भाई को मिलावट वाली चीज़ बेचता है तो अल्लाह तआला उसकी रोज़ी से बरकत उठा लेता है और उसकी रोज़ी के रास्तों को तंग कर देता है और उसे उसके हाल पर छोड़ देता है।
2064. जो पाक चीज़ नजिस हो गई हो और उसे पानी से धोकर पाक करना मुम्किन हो तो उसे फ़रोख़्त करने में कोई हरज नहीं है और अगर धोना मुम्किन न हो तब भी यही हुक्म है लेकिन अगर उसका हलाल फ़ाइदा उर्फ़े आम में उसके पाक होने पर मुन्हसिर न हो मसलन बअज़ अक़्साम के तेल बल्कि अगर उसका हलाल फ़ाइदा पाक होने पर मौक़ूफ़ हो और उसका मुनासिब हद तक हलाल फ़ाइदा हो तब भी उसका बेचना जाइज़ है।
2065. अगर कोई शख़्स नजिस चीज़ बेचना चाहे तो ज़रूरी है कि वह उसकी नजासत के बारे में खरीदार को बता दे और अगर उसे न बताए तो वह एक हुक्मे वाजिब की मुख़ालिफ़त का मुर्तकिब होगा मसलन नजिस पानी को वुज़ू या ग़ुस्ल में इस्तेमाल करेगा और उसके साथ अपनी वाजिब नमाज़ पढ़ेगा या उस नजिस चीज़ को खाने या पीने में इस्तेमाल करेगा अलबत्ता अगर यह जानता हो कि उसे बताने से कोई फ़ाइदा नहीं क्योंकि वह लापर्वा शख़्स है और नजिस पाक का ख़्याल नहीं रखता तो उसे बताना ज़रूरी नहीं।
2066. अगरचे खाने वाली और न खाने वाली नजिस दवाओं की खरीद व फ़रोख़्त जाइज़ है लेकिन उनकी नजासत के मुतअल्लिक़ खरीदार को उस सूरत में बता देना ज़रूरी है जिसका ज़िक्र साबिक़ा मस्अले में किया गया है।
2067. जो तेल ग़ैर इस्लामी मुमालिक से दरआमद किये जाते हैं अगर उन के नजिस होने के बारे में इल्म न हो तो उनकी खरीर व फ़रोख़्त में कोई हरज नहीं और जो चर्बी किसी हैवान के मर जाने के बाद हासिल की जाती है अगर उसे काफ़िर से लें या ग़ैर इसलामी मुमालिक से मंगायें तो उस सूरत में जबकि उस के बारे में एहतिमाल हो कि ऐसे हैवान की है जिस शरई तरीक़े से ज़िब्हा किया गया है तो वह पाक है और उसकी ख़रीद व फ़रोख़्त जाइज़ है लेकिन उसका खाना हराम है और बेचने वाले के लिए ज़रूरी है कि वह इस कैफ़ियत से ख़रीदार को आगाह करे क्योंकि खरीदार को आगाह न करने की सूरत में वह किसी वाजिब हुक्म की मुख़ालिफ़त का मुर्तकिब होगा जैसे कि मस्अला 2065 में ग़ुज़र चुका है।
2068. अगर लोमड़ी या उस जैसे जानवर को शरई तरीक़े से ज़िब्हा न किया जाए या वह खुद मर जायें तो उनकी खाल की ख़रीद व फ़रोख़्त एहतियात की बिना पर जाइज़ नहीं है।
2069. जो चमड़ा ग़ैर इसलामी मुमालिक से दर आमद किया जाए या काफ़िर से लिया जाए अगर उसके बारे में एहतिमाल हो कि एक ऐसे जानवर का है जिसे शरई तरीक़े से ज़िब्हा किया गया है तो उसकी ख़रीद व फ़रोख़्त जाइज़ है और इसी तरह उसमें नमाज़ भी अक़्वा की बिना पर सहीह होगी।
2070. जो तेल और चर्बी हैवान के मरने के बाद हासिल की जाए या वह चमड़ा जो मुसलमान से लिया जाए और इंसान को इल्म हो कि उस मुसलमान ने यह चीज़ काफ़िर से ली है लेकिन यह तहक़ीक़ नहीं की कि यह ऐसे हैवान की है जिसे शरई तरीक़े से ज़िब्हा किया गया है या नहीं अगरचे उस पर तहारत का हुक्म लगता है और उसकी ख़रीद और फ़रोख़्त जाइज़ है लेकिन उस तेल या चर्बी का खाना जाइज़ नहीं है।
2071. नशा आवर मशरूबात का लेन देन हराम और बातिल है।
2072. ग़स्बी माल का बेचना बातिल है और बेचने वाले ने जो रक़म खरीदार से ली हो उसे वापस करना ज़रूरी है।
2073. अगर खरीदार संजीदगी से सौदा करने का इरादा रखता हो लेकिन उसकी नीयत यह हो कि जो चीज़ खरीद रहा है उसकी क़ीमत नहीं देगा तो उसका यह सोचना सौदे के सहीह होने में माने नहीं और ज़रूरी है कि ख़रीदार उस सौदे की क़ीमत बेचने वाले को दे।
2074. अगर ख़रीदार चाहे कि जो माल उसने उधार ख़रीदा है उसकी क़ीमत बाद में हराम माल से देगा तब भी मुआमला सहीह है अलबत्ता ज़रूरी है कि जितनी क़ीमत उसके ज़िम्मे हो हलाल माल से दे ताकि उसका उधार चुकता हो जाए।
2075. मूसीक़ी (संगीत) के आलात मसलन सितार और तंबूरा की खरीद व फ़रोख़्त जाइज़ नहीं है और एहतियात की बिना पर छोटे छोटे साज़ जो बच्चों के खिलोने होते हैं उनके लिए भी यही हुक्म है। लेकिन (हलाल और हराम में इस्तेमाल होने वाले) मुशर्तका आलात मसलन रेडियो और टेपरिकार्ड की ख़रीद व फ़रोख़्त में कोई हरज नहीं बशर्ते कि उन्हें हराम कामों में इस्तेमाल करने का इरादा न हो।
2076. अगर कोई चीज़ कि जिससे जाइज़ फ़ाइदा उठाया जा सकता हो इस नीयत से बेची जाए कि उसे हराम मसरफ़ में लाया जाए मसलन अंगूर इस नीयत से बेचा जाए कि उससे शराब तैयार की जाए तो उसका सौदा हराम बल्कि एहतियात की बिना पर बातिल है। लेकिन अगर कोई शख़्स अंगूर इस मक़्सद से न बेचे और फ़क़त यह जानता हो कि खरीदार अंगूर से शराब तैयार करेगा तो ज़ाहिर यह है कि सौदे में कोई हरज नहीं।
2077. जानदार का मुजस्समा बनाना एहतियात की बिना पर मुत्लक़न हराम है (मुत्लक़न से मुराद यह है कि मुजस्समा कामिल बनाया जाए या नाक़िस) लेकिन उन की खरीद व फ़रोख़्त मम्नून नहीं है अगरचे अहवत यह है कि उसे भी तर्क किया जाए लेकिन जानदार की नक्काशी अक़्वा की बिना पर जाइज़ है।
2078. किसी ऐसी चीज़ का खरीदना हराम है जो जुए या चोरी या बातिल सौदे से हासिल की गई हो और अगर कोई ऐसी चीज़ खरीद ले तो ज़रूरी है कि उसके असली मालिक को लौटा दे।
2079. अगर कोई शख़्स ऐसा घी बेचे जिसमें चर्बी की मिलावट हो और उसे मुअय्यन कर दे मसलन कहे कि मैं, यह एक मन घी बेच रहा हूं तो उस सूरत में जब उसमें चर्बी की मिक़्दार इतनी ज़्यादा हो कि उसे घी न कहा जाए तो मुआमला बातिल है और अगर चर्बी की मिक़्दार इतनी कम हो कि उसे चर्बी मिला हुआ कहा जाए तो मुआमला सहीह है लेकिन खरीदने वाले को माल ऐबदार होने की बिना पर हक़ हासिल है कि वह मुआमला खत्म कर सकता है और अपना पैसा वापस ले सकता है और अगर चर्बी घी से जुदा है तो चर्बी की जितनी मिक़्दार की मिलावट है उसका मुआमला बातिल है और चर्बी की जो क़ीमत बेचने वाले ने ली है वह खरीदार की है और चर्बी बेचने वाले का माल है और गाहक उसमें जो खालिस घी है उसका मुआमला भी खत्म कर सकता है लेकिन अगर मुअय्यन न करे बल्कि सिर्फ़ एक मन घी बता कर बेचे लेकिन देते वक़्त चर्बी मिला हुआ घी दे तो गाहक वह घी वापस कर के खालिस घी का मुतालबा कर सकता है।
2080. जिस जिन्स को नाप तोल कर बेचा जाता है अगर कोई बेचने वाला उसी जिन्स के बदले में बढ़ा कर बेचे मसलन एक मन गेहूं की क़ीमत डेढ़ मन गेहूं वसूल करे तो यह सूद और हराम है बल्कि अगर दो जिन्सों में से एक बे ऐब और दूसरी ऐबदार हो या एक जिन्स बढ़िया और दूसरी घटिया हो या उनकी क़ीमतों में फ़र्क़ हो तो अगर बेचने वाला जो मिक़्दार दे रहा हो उस से ज़्यादा ले तब भी सूद है और हराम है लिहाज़ा अगर वह साबित तांबा देकर उससे ज़्यादा मिक़्दार में टूटा हुआ तांबा ले या साबित क़िस्म का पीतल देकर उससे ज़्यादा मिक़्दार टूटा हुआ पीतल ले या गढ़ा हुआ सोना देकर उससे ज़्यादा मिक़्दार में बग़ैर गढ़ा हुआ सोना ले तो यह भी सूद और हराम है।
2081. बेचने वाला जो चीज़ ज़ाइद ले अगर वह जिन्स से मुख़्तलिफ़ हो जो वह बेच रहा है मसलन एक मन गेहूं को एक मन गेहूं और कुछ नक़्द रक़म के एवज़ बेचे तब भी यह सूद और हराम है बल्कि अगर वह कोई चीज़ ज़ाइद न ले लेकिन यह शर्त लगाए कि खरीदार उसके लिए कोई काम करे तो यह भी सूद और हराम है।
2082. जो शख़्स कोई चीज़ कम मिक़्दार में दे रहा हो तो अगर वह उसके साथ कोई और चीज़ शामिल कर दे मसलन एक मन गेहूं और एक रूमाल को डेढ़ मन गेहूं के एवज़ में बेचे तो इसमें कोई हरज नहीं उस सूरत में जबकि उसकी नीयत यह हो कि वह रूमाल उस ज़्यादा गेहूं के मुक़ाबिले में है और मुआमला भी नक़्द हो और इसी तरह अगर दोनों तरफ़ से कोई चीज़ बढ़ा दी जाए मसलन एक शख़्स एक मन गेहूं और एक रूमाल को डेढ़ मन गेहूं और एक रूमाल के एवज़ बेचे तो उस के लिए भी यही हुक्म है लिहाज़ा अगर उनकी नीयत यह हो कि एक का रूमाल और आधा मन गेहूं दूसरे के रूमाल के मुक़ाबिले में है तो इसमें कोई इश्काल नहीं है।
2083. अगर कोई शख़्स कोई ऐसी चीज़ बेचे जो मीटर और गज़ के हिसाब से बेची जाती है मसलन कपड़ा या ऐसी चीज़ बेचे जो गिन कर बेची जाती है मसलन अखरोट और अण्डे और ज़्यादा ले मसलन दस अण्डे दे और ग्यारा ले तो इसमें कोई हरज नहीं। लेकिन अगर ऐसा हो कि मुआमले में दोनों चीज़ें एक ही जिन्स से हों और मुद्दत मुअय्यन हो तो इस सूरत में मुआमले के सहीह होने में इश्काल है। मसलन दस अखरोट नक़्द दे और बारह अखरोट एक महीने के बाद ले। और करंसी नोटों का फ़रोख़्त करना भी इसी जुमरे में आता है मसलन तूमान को नोटों की किसी दूसरी जिन्स के बदले में मसलन दीनार या डॉलर के बदले में नक़्द या मुअय्यन मुद्दत के लिए बेचे तो इसमें कोई हरज नहीं लेकिन अगर अपनी ही जिन्स के बदले बेचना चाहे और बहुत ज़्यादा ले तो मुआमला मुअय्यन मुद्दत के लिए नहीं होना चाहिए मसलन सौ तूमान नक़्द दे और एक सौ दस तूमान छः महीने के बाद ले तो इस मुआमले के सहीह होने में इश्काल है।
2084. अगर किसी जिन्स को अकसर शहरों में नाप तोल कर बेचा जाता हो और बअज़ शहरों में उसका लेन देन गिन कर होता हो तो अक़्वा की बिना पर उस जिन्स को उस शहर की निस्बत जहां गिन कर लेन देन होता है दूसरे शहर में ज़्यादा क़िमत पर बेचना जाइज़ है और इसी तरह उस सूरत में जब शहर मुख़्तलिफ़ हों और ऐसा ग़लबा दरमियान में न हो (यअनी यह न कहा जा सके कि अकसर शहरों में यह जिन्स नाप तोल कर बिकती है या गिन कर बिकती है) तो हर शहर में वहां के रिवाज के मुताबिक़ हुक्म लगाया जायेगा।
2085. उन चीज़ों में जो तोल कर या नाप कर बेची जाती हैं अगर बेची जाने वाली चीज़ और उसके बदले में दी जाने वाली चीज़ एक जिन्स से न हों और लेन देन भी नक़्द हो तो ज़्यादा लेने में कोई हरज नहीं है लेकिन अगर लेन देन मुअय्यन मुद्दत के लिए हो तो उसमें इशकाल है। लिहाज़ा अगर कोई शख़्स एक मन चावल को दो मन गेहूं के बदले में एक महीने की मुद्दत तक बेचे तो उस लेन देन का सहीह होना इश्काल से ख़ाली नहीं।
2086. अगर एक शख़्स पक्के मेवों का सौदा कच्चे मेवों से करे तो ज़्यादा नहीं ले सकता और मश्हूर (उलमा) ने कहा है कि एक शख़्स जो चीज़ बेच रहा हो और उसके बदले में जो कुछ ले रहा हो अगर वह दोनों एक ही चीज़ से बनी हों तो ज़रूरी है कि मुआमले में इज़ाफ़ा न ले मसलन अगर वह एक गाय का दही बेचे और उसके बदले में डेढ़ मन गाय का पनीर हासिल करे तो यह सूद है और हराम है लेकिन इस हुक्म के कुल्ली होने में इश्काल है।
2087. सूद के एतिबार से गेहूं और जौ एक शुमार होते हैं लिहाज़ा मिसाल के तौर पर अगर कोई शख़्स एक मन गेहूं दे और उसके बदले में एक मन पांच सेर जौ ले तो यह सूद है और हराम है। और मिसाल के तौर पर अगर दस मन जौ इस शर्त पे खरीदे कि गेहूं की फ़सल उठाने के वक़्त दस मन गेहूं बदले में देगा तो चूंकि जौ उसने नक़्द लिये हैं और गेहूं कुछ मुद्दत के बाद दे रहा है लिहाज़ा यह उसी तरह है जैसे इज़ाफ़ा लिया हो इस लिए हराम है।
2088. बाप, बेटा और मियां बीवी एक दूसरे से सूद ले सकते हैं और इसी तरह मुसलमान एक ऐसे काफ़िर से जो इस्लाम की पनाह में न हो सूद ले सकता है लेकिन एक ऐसे काफ़िर से जो इस्लाम की पनाह में है सूद का लेन देन हराम है अलबत्ता मुआमला तय कर लेने के बाद अगर सूद देना उसकी शरीअत में जाइज़ हो तो उससे सूद ले सकता है।
बेचने वाले और ख़रीदार की शराइत
2089. बेचने वाले और खरीदार के लिए छः चीज़ें शर्त हैं –
1. – बालिग़ हों।
2. – आक़िल हों।
3. – सफ़ीह न हों यअनी अपना माल अहमक़ाना कामों में ख़र्च न करते हों।
4. – ख़रीद व फ़रोख़्त का इरादा रखते हों। पस अगर कोई मज़ाक में कहे कि मैंने अपना माल बेचा तो मुआमला बातिल होगा।
5. – किसी ने उन्हें ख़रीद फ़रोख़्त पर मजबूर न किया हो।
6. – जो जिन्स और उसके बदले में जो चीज़ एक दूसरे को दे रहे हों उसके मालिक हों। और उनके बारे में अहकाम आइन्दा मसाइल में बयान किये जायेंगे।
2090. किसी ना बालिग़ बच्चे के साथ सौदा करना जो आज़ादाना तौर पर सौदा कर रहा हो बातिल है लेकिन उन कम क़ीमत चीज़ों में जिनकी खरीद व फ़रोख्त का रिवाज है अगर ना बालिग़ मगर समझदार बच्चे के साथ लेन देन हो जाए (तो सहीह है)। और अगर सौदा उसके सरपरस्त के साथ हो और ना बालिग़ मगर समझदार बच्चा लेन देन का सीग़ा जारी करे तो सौदा हर सूरत में सहीह है बल्कि अगर जिन्स या रक़म किसी दूसरे आदमी का माल हो और बच्चा ब हैसियत वकील उस माल के मालिक की तरफ़ से वह माल बेचे या उस रक़म से कोई चीज़ खरीदे तो ज़ाहिर यह है कि सौदा सहीह है अगरचे वह समझदार बच्चा आज़ादाना तौर पर उस माल या रक़म में (हक़्के) तर्सरुफ़ रखता हो और इसी तरह अगर बच्चा इस काम में वसीला हो कि रक़म बेचने वाले को दे और जिस खरीदार तक पहुंचाए या जिस खरीदार को दे और रक़म बेचने वाले को पहुंचाए तो अगरचे बच्चा समझदार न हो, सौदा सहीह है क्योंकि दरअस्ल दो बालिग़ अफ़राद ने आपस में सौदा किया है।
2091. अगर कोई शख़्स इस सूरत में कि एक बालिग़ बच्चे से सौदा करना सहीह न हो उससे कोई चीज़ खरीदे या उसके हाथ कोई चीज़ बेचे तो ज़रूरी है कि जो जिन्स या रक़म उस बच्चे से ले अगर वह खुद बच्चे का माल हो तो उसके सरपरस्त को और अगर किसी और का माल हो तो उस के मालिक को दे दे या उसके मालिक की रिज़ामन्दी हासिल करे और अगर सौदा करने वाला शख़्स उस जिन्स या रक़म के मालिक को न जानता हो और उस का पता लगाने का कोई ज़रिआ भी न हो तो उस शख़्स के लिए ज़रूरी है कि जो चीज़ उसने बच्चे से ली हो वह उस चीज़ के मालिक की तरफ़ से ब उनवाने मज़ालिम (ज़ुल्मन और ना हक़ ली हुई चीज़) किसी फ़क़ीर को दे दे और एहतियाते लाज़िम यह है कि इस काम में हाकिमे शर्अ से इजाज़त ले।
2092. अगर कोई शख़्स एक समझदार बच्चे से इस सूरत में सौदा करे जबकि उसके साथ सौदा करना सहीह न हो और उस ने जो जिन्स या रक़म बच्चे को दी हो वह तलफ़ हो जाए तो ज़ाहिर यह है कि वह शख़्स बच्चे से उसके बालिग़ होने के बाद या उसके सरपरस्त से मुतालबा कर सकता है और अगर बच्चा समझदार न हो तो फिर वह शख़्स मुतालबे का हक़ नहीं रखता।
2093. अगर खरीदार या बेचने वाले को सौदा करने पर मजबूर किया जाए और सौदा हो जाने के बाद वह राज़ी हो जाए और मिसाल के तौर पर कहे कि मैं राज़ी हूं तो सौदा सहीह है लेकिन एहतियाते मुस्तहब यह है कि मुआमले का सीग़ा दोबारा पढ़ा जाए।
2094. अगर इंसान किसी का माल उसकी इजाज़त के बग़ैर बेच दे और माल का मालिक उस के बेचने पर राज़ी न हो और इजाज़त न दे तो सौदा बातिल है।
2095. बच्चे का बाप और दादा नीज़ बाप का वसी और दादा का वसी बच्चे का माल फ़रोख़्त कर सकते हैं और अगर सूरते हाल का तक़ाज़ा हो तो मुजतहिदे आदिल भी दीवाने शख़्स या यतीम का माल या ऐसे शख़्स का माल जो ग़ायब हो फ़रोख़्त कर सकता है।
2096. अगर कोई शख़्स किसी का माल ग़स्ब कर के बेच डाले और माल के बिक जाने के बाद उसका मालिक सौदे की इजाज़त दे दे तो सौदा सहीह है और जो चीज़ ग़स्ब करने वाले ने खरीदार को दी हो और उस चीज़ जो मुनाफ़ा सौदे के वक़्त से हासिल हो वह खरीदार की मिल्कियत है और जो चीज़ खरीदार ने दी हो और उस चीज़ से जो मुनाफ़ा सौदे के वक़्त से हासिल हो वह उस शख़्स की मिल्कियत है जिसका माल ग़स्ब किया गया हो।
2097. अगर कोई शख़्स किसी का माल ग़स्ब कर के बेच दे और उसका इरादा यह हो कि उस माल की क़ीमत खुद उसकी मिल्कियत होगी और अगर माल का मालिक सौदे की इजाज़त दे दे तो सौदा सहीह है लेकिन माल की क़ीमत मालिक की मिल्कियत होगी न कि ग़ासिब की।
जिन्स और उसके एवज़ की शराइत
2098. जो चीज़ बेची जाए और जो चीज़ उसके बदले में ली जाए उसकी पांच शर्तें हैं –
1. – नाप, तोल या गिनती वग़ैरा की शक्ल में उसकी मिक़्दार मअलूम हो।
2. – बेचने वाला उन चीज़ों को तहवील में देने का अहल हो। अगर अहल न हो तो सौदा सहीह नहीं है लेकिन अगर वह उसको किसी दूसरी चीज़ के साथ मिला कर बेचे जिसे वह तहवील में दे सकता हो तो इस सूरत में लेन देन सहीह है अलबत्ता ज़ाहिर यह है कि अगर खरीदार उस चीज़ को जो खरीदी हो अपने क़ब्ज़े में ले सकता हो अगरचे बेचने वाला उसे उसकी तहवील में देने का अहल न हो तो भी लेन देन सहीह है मसलन जो घोड़ा भाग गया हो अगर उसे बेचे और खरीदने वाला उस घोड़े को ढूंढ सकता हो तो उस सौदे में कोई हरज नहीं और वह सहीह होगा और उस सूरत में किसी बात के इज़ाफ़े की ज़रूरत नहीं है।
3. – वह ख़ुसूसीयात जो जिन्स और एवज़ में मौजूद हों और जिनकी वजह से सौदे में लोगों की दिलचस्पी में फ़र्क़ पड़ता हो मुअय्यन कर दी जायें।
4. – किसी दूसरे का हक़ उस माल से इस तरह वाबस्ता न हो कि माल की मिल्कियत से खारिज होने से दूसरे का हक़ ज़ाए हो जाए।
5. – बेचने वाला खुद उस जिन्स को बेचे न कि उसकी मनफ़अत को। पस मिसाल के तौर पर अगर मकान की एक साल की मनफ़अत बेची जाए तो सहीह नहीं है लेकिन अगर खरीदार नक़्द की बजाए अपनी मिल्कियत का मुनाफ़ा दे मसलन किसी से क़ालीन या दरी वग़ैरा खरीदे और उसके एवज़ अपने मकान का एक साल का मुनाफ़ा उसे दे दे तो इसमें कोई हरज नहीं। इन सब के अहकाम आइन्दा मसाइल में बयान किये जायेंगे।
2099. जिस जिन्स का सौदा किसी शहर में तोल कर या नाप कर किया जाता हो उस शहर में ज़रूरी है कि उस जिन्स को तोल कर या नाप कर ही खरीदे लेकिन जिस शहर में उस जिन्स का सौदा उसे देख कर किया जाता हो उस शहर में वह उसे देख कर खरीद सकता है।
2100. जिस चीज़ की खरीद व फ़रोख़्त तोल कर की जाती हो उसका सौदा नाप कर भी किया जा सकता है। मिसाल के तौर पर अगर एक शख़्स दस मन गेहूं बेचना चाहे तो वह एक ऐसा पैमाना जिसमें एक मन गेहूं समाता हो दस मर्तबा भर कर ले सकता है।
2101. अगर मुआमला चौथी शर्त के अलावा जो शराइत बयान की गई हैं उन में से कोई एक शर्त न होने की बिना पर बातिल हो लेकिन बेचने वाला और खरीदार एक दूसरे के माल पर तर्सरुफ़ करने पर राज़ी हों तो उनके तर्सरुफ़ करने में कोई हरज नहीं।
2102. जो चीज़ वक़्फ़ की जा चुकी हो उस का सौदा बातिल है लेकिन अगर वह चीज़ इतनी खराब हो जाए कि जिस फ़ाइदे के लिए वक़्फ़ की गई है वह हासिल न किया जा सके या वह चीज़ खराब होने वाली हो मसलन मस्जिद की चटाई इस तरह फ़ट जाए कि उस पर नमाज़ न पढ़ी जा सके तो जो शख़्स मुतवल्ली है या जिस मुतवल्ली जैसे इख़्तियारात हासिल हों वह उसे बेच दे तो कोई हरज नहीं और एहतियात की बिना पर जहां तक मुम्किन हो उसकी क़ीमत उसी मस्जिद के किसी ऐसे काम पर खर्च की जाए जो वक़्फ़ करने वाले के मक़्सद से क़रीबतर है।
2103. जब उन लोगों के माबैन जिनके लिए माल वक़्फ़ किया गया हो ऐसा इख़्तिलाफ़ पैदा हो जाए कि अन्देशा हो कि अगर वक़्फ़ शुदा माल फ़रोख़्त न किया गया तो माल या किसी की जान तलफ़ हो जायेगी तो बअज़ (फ़ुक़हा) ने कहा है कि वह ऐसा कर सकते हैं कि माल बेच कर रक़म ऐसे काम पर खर्च करें जो वक़्फ़ करने वाले के मक़्सद से क़रीब हो लेकिन यह हुक्म महल्ले इश्काल है। हां अगर वक़्फ़ करने वाला यह शर्त लगाए कि वक़्फ़ के बेच देने में कोई मसलहत हो तो बेच दिया जाए तो इस सूरत में उसे बेचने में कोई हरज नहीं है।
2104. जो जायदाद किसी दूसरे को किराये पर दी गई हो उसकी ख़रीद व फ़रोख़्त में कोई हरज नहीं है लेकिन जितनी मुद्दत पर उसे किराये पर दी गई हो उतनी मुद्दत की आमदनी साहबे जायदाद का माल है और अगर ख़रीदार को यह इल्म न हो कि वह जायदाद किराये पर दी जा चुकी है या इस गुमान के तहत कि किराये की मुद्दत थोड़ी है उस जायदाद को खरीद ले तो जब उसे हक़ीक़ते हाल का इल्म हो वह सौदा फ़स्ख़ कर सकता है।
ख़रीद व फ़रोख़्त का सीग़ा
2105. ज़रूरी नहीं कि ख़रीद व फ़रोख़्त का सीग़ा अरबी ज़बान में जारी किया जाए मसलन अगर बेचने वाला फ़ारसी (या उर्दू) में कहे कि मैंने यह माल इतनी रक़म पर बेचा और खरीदार कहे कि मैंने क़बूल किया तो सौदा सहीह है लेकिन यह ज़रूरी है कि खरीदार और बेचने वाला (मुआमले का) दिली इरादा रखते हों यअनी दो जुमले कहने से उनकी मुराद खरीद व फ़रोख़्त हो।
2106. अगर सौदा करते वक़्त सीग़ा न पढ़ा जाए लेकिन बेचने वाला उस माल के मुक़ाबिले में जो वह खरीदार से ले अपना माल उसकी मिल्कियत में दे दे तो सौदा सहीह है और दोनों अश्ख़ास मुतअल्लिक़ा चीज़ों के मालिक हो जाते हैं।
फ़लों की ख़रीद व फ़रोख़्त
2107. जिन फ़लों के फूल गिर चुके हों और उनमें दाने पड़ चुके हों अगर उनके आफ़त (मसलन बीमारीयों और कीड़ों के हमलों) से महफ़ूज़ होने या न होने के बारे में इस तरह इल्म हो कि उस दरख़्त की पैदावार का अन्दाज़ा लगा सकें तो उसके तोड़ने से पहले उसका बेचना सहीह है बल्कि अगर मअलूम न भी हो कि आफ़त से महफ़ूज़ है या नहीं तब भी अगर दो साल या उससे ज़्यादा अर्से की पैदावार या फलों की सिर्फ़ उतनी मिक़्दार जो उस वक़्त की हो बेची जाए बशर्ते कि उस की किसी हद तक मालियत हो तो मुआमला सहीह है।
इसी तरह अगर ज़मीन की पैदावार या किसी दूसरी चीज़ को उसके साथ बेचा जाए तो मुआमला सहीह है लेकिन इस सूरत में एहतियाते लाज़िम यह है कि दूसरी चीज़ (जो जिम्नन बेच रहा हो वह) ऐसी हो कि अगर बीज समरआवर न हों सकें तो खरीदार के सरमाए को डूबने से बचाए।
2108. जिस दरख़्त पर फल लगा हो, दाने बनने और फूल गिरने से पहले उसका बेचना जायज़ है लेकिन ज़रूरी है कि उसके साथ कोई और चीज़ भी बेचे जैसा कि इससे पहले वाले मस्अले में बयान किया गया है या एक साल से ज़्यादा मुद्दत का फल बेचे।
2109. दरख्त पर लगी हुई वह खजूरें जो ज़र्द या सुर्ख हो चुकी हों उनको बेचने में कोई हरज नहीं लेकिन उनके एवज़ में ख्वाह उसी दरख़्त की खजूरें हों या किसी और दरख़्त की खजूरें न दी जायें अलबत्ता अगर एक शख़्स का खजूर का दरख़्त किसी दूसरे शख़्स के घर में हो तो अगर उस दरख़्त की खजूरों को तखमीना लगा लिया जाए और दरख्त का मालिक उन्हें घर के मालिक को बेच दे और खजूरों को उसका एवज़ाना क़रार दिया जाए तो कोई हरज नहीं।
2110. खीरे, बैगन, सब्ज़ियां और उन जैसी (दूसरी) चीज़ें जो साल में कई दफ़्आ उतरती हों अगर वह उग आई हों और यह तय कर लिया जाए कि खरीदार उन्हें साल में कितनी दफ़्आ तोड़ेगा तो उन्हें बेचने में कोई हरज नहीं है लेकिन अगर उगी न हों तो उन्हें बेचने में इश्काल है।
2111. अगर दाना आने के बाद गंदुम के खोशे को गंदुम से जो खुद उससे हासिल होती है या किसी दूसरे खोशे के एवज़ बेच दिया जाए तो सौदा सहीह नहीं है।
नक़्द और उधार के अहकाम
2112. अगर किसी जिन्स को नक़्द बेचा जाए तो सौदा तय पा जाने के बाद खरीदार और बेचने वाला एक दूसरे से जिन्स और रक़म का मुतालबा कर सकते हैं और उसे अपने क़ब्ज़े में ले सकते हैं। मंक़ूल चीज़ों मसलन क़ालीन और लिबास को क़ब्ज़े में देने और ग़ैर मंक़ूला चीज़ों मसलन घर और ज़मीन को क़ब्ज़े में देने से मुराद यह है कि उन चीज़ों से दस्त बरदार हो जाए और उन्हें फ़रीक़ सानी की तहवील में इस तरह दे दे कि जब वाह चाहे उसमें तसर्रुफ़ कर सके और (वाज़ेह रहे) मुख़्तलिफ़ चीज़ों में तसर्रुफ़ मुख़्तलिफ़ तरीक़े से होती है।
2113. उधार के मुआमले में ज़रूरी है कि मुद्दत ठीक ठीक मअलूम हो। लिहाज़ा अगर चीज़ इस वअदे पर बेचे कि वह उसकी क़ीमत फ़स्ल उठने पर लेगा तो चूंकि उस की मुद्दत ठीक ठीक मुअय्यन नहीं हुई इस लिए सौदा बातिल है।
2114. अगर कोई शख़्स अपना माल उधार बेचे तो जो मुद्दत तय हुई हो उसकी मीआद पूरी होने से पहले वह खरीदार से उसके एवज़ का मुतालबा नहीं कर सकता लेकिन अगर खरीदार मर जाए और उसका अपना कोई माल हो तो बेचने वाला तय शुदा मीआद पूरी होने से पहले ही जो रक़म लेनी हो उसका मुतालबा मरने वाले के वरसा से कर सकता है।
2115. अगर कोई शख़्स एक चीज़ उधार बेचे तो तय शुदा मुद्दत गुज़रने के बाद वह खरीदार से उसके एवज़ का मुतालबा कर सकता है लेकिन अगर खरीदार अदायगी न कर सकता हो तो ज़रूरी है कि बेचने वाला उसे मोहलत दे या सौदा खत्म कर दे और अगर वह चीज़ जो बेची है मौजूद हो तो वापस ले ले।
2116. अगर कोई शख़्स एक ऐसे फ़र्द को जिस किसी चीज़ की क़ीमत मअलूम न हो उसकी कुछ मिक़्दार उधार दे और उसकी क़ीमत उसे न बताए तो सौदा बातिल है। लेकिन अगर ऐसे शख़्स को जिसे जिन्स की नक़्द क़ीमत मअलूम हो उधार पर मंहगे दामों पर बेचे मसलन कहे कि जो जिन्स मैं तुम्हें उधार दे रहा हूं उसकी क़ीमत से जिस पर मैं नक़्द बेचता हूं एक पैसा फ़ी रुपया ज़्यादा लूंगा और खरीदार उस शर्त को क़बूल कर ले तो ऐसे सौदे में कोई हरज नहीं है।
2117. अगर एक शख़्स ने कोई जिन्स उधार फ़रोख़्त की हो और उसकी क़ीमत की अदायगी के लिए मुद्दत मुक़र्रर की गई हो तो अगर मिसाल के तौर पर आधी मुद्दत गुज़रने के बाद (फ़रोख़्त करने वाला) वाजिबुल अगा रक़म में कटौती कर दे और बाक़ीमांदा रक़म नक़्द ले ले तो इसमें कोई हरज नहीं है।
मुआमला ए सलफ़ की शराइत
2118. मुआमला ए सलफ़ (पेशगी सौदा) से मुराद यह है कि कोई शख़्स नक़्द रक़म लेकर पूरा माल जो वह मुक़र्ररा मुद्दत के बाद तहवील में देगा, बेच दे लिहाज़ा अगर खरीदार कहे कि मैं यह रक़म दे रहा हूं ताकि मसलन छः महीने बाद फ़लां चीज़ ले लूं और बेचने वाला कहे कि मैंने क़बूल किया या बेचने वाला रक़म ले ले और कहे कि मैंने फ़लां चीज़ बेची और उसका क़ब्ज़ा छः महीने बाद दूंगा तो सौदा सहीह है।
2119. अगर कोई शख़्स सोने या चांदी के सिक्के बतौरे सलफ़ बेचे और उसके एवज़ चांदी या सोने के सिक्के ले तो सौदा बातिल है। लेकिन अगर कोई ऐसी चीज़ या सिक्के जो सोने या चांदी के न हों बेचे और उनके एवज़ कोई दूसरी चीज़ या सोने या चांदी के सिक्के ले तो सौदा उस तफ़्सील के मुताबिक़ सहीह है जो आइन्दा मस्अले की सातवीं शर्त में बताई जायेगी और एहतियाते मुस्तहब यह है कि जो माल बेचे उसके एवज़ रक़म ले, कोई दूसरा माल न ले।
2120. मुआमला ए सलफ़ में सात शर्तें हैं –
1. उन ख़ुसूसीयात को जिनकी वजह से किसी चीज़ की क़ीमत में फ़र्क़ पड़ता हो मुअय्यन कर दिया जाए लेकिन ज़्यादा तफ़्सीलात में जाने की ज़रूरत नहीं बल्कि इसी क़दर काफ़ी है कि लोग कहें के उसकी ख़ुसूसीयात मअलूम हो गई हैं।
2. इससे पहले कि खरीदार और बेचने वाला एक दूसरे से जुदा हो जायें खरीदार पूरी क़ीमत बेचने वाले को दे या अगर बेचने वाला खरीदार का उतनी ही रक़म का मक़रूज़ हो और खरीदार को उससे जो कुछ लेना हो उसे माल की क़ीमत में हिसाब कर ले और बेचने वाला उसे क़बूल करे और अगर खरीदार उस माल की क़ीमत की कुछ मिक्दार बेचने वाले को दे दे तो अगरचे उस मिक़्दार की निस्बत से सौदा सहीह है लेकिन बेचने वाला सौदा फ़स्ख़ कर सकता है।
3. मुद्दत को ठीक ठीक मुअय्यन किया जाए मसलन बेचने वाला कहे कि फ़स्ल का क़ब्ज़ा कटाई पर दूंगा तो चूंकि इससे मुद्दत का ठीक ठीक तअय्युन नहीं होता इस लिए सौदा बातिल है।
4. जिन्स का क़ब्ज़ा देने के लिए ऐसा वक़्त मुअय्यन किया जाए जिसमें बेचने वाला जिन्स का क़ब्ज़ा दे सके ख़्वाह वह जिन्स कामयाब हो या न हो।
5. जिन्स का क़ब्ज़ा देने की जगह का तअय्युन एहतियात की बिना पर मुकम्मल तौर पर किया जाए। लेकिन अगर तरफ़ैन की बातों से जगह का पता चल जाए तो उसका नाम लेना ज़रूरी नहीं है।
6. उस जिन्स का तोल या नाप मुअय्यन किया जाए और जिस चीज़ का सौदा उमूमन देख कर किया जाता है अगर उसे बतौरे सलफ़ बेचा जाए तो इसमें कोई हरज नहीं है। लेकिन मिसाल के तौर पर अखरोट और अण्डों की बअज़ क़िस्मों में तअदाद का फ़र्क़ ज़रूरी है कि इतना हो कि लोग उसे अहमियत न दें।
7. जिस चीज़ को बतौरे सलफ़ बेचा जाए अगर वह ऐसी हों जिन्हें तोलकर या नाप कर बेचा जाता है तो उसका एवज़ उसी जिन्स से न हो बल्कि एहतियाते लाज़िम की बिना पर दूसरी जिन्स में से भी ऐसी चीज़ न हो जिसे तोलकर या नाप कर बेचा जाता है और अगर वह चीज़ जिसे बेचा जा रहा है उन चीज़ों में से हो जिन्हें गिनकर बेचा जाता हो तो एहतियात की बिना पर जाइज़ नहीं है कि उसका एवज़ खुद उसी की जिन्स से ज़्यादा मिक़्दार में मुक़र्रर करे।
मुआमला ए सलफ़ के अहकाम
2121. जो जिन्स किसी ने बतौरे सलफ़ खरीदी हो उसे वह मुद्दत ख़त्म होने से पहले बेचने वाले के सिवा किसी और के हाथ नहीं बेच सकता और मुद्दत ख़त्म होने के बाद अगरचे खरीदार ने उसका क़ब्ज़ा न भी लिया हो उसे बेचने में कोई हरज नहीं। अलबत्ता फलों के अलावा जिन ग़ल्लों मसलन गेहूं और जौ वग़ैरा को तोल कर या नाप कर फ़रोख़्त किया जाता है उन्हें अपने क़ब्ज़े में लेने से पहले उनका बेचना जायज़ नहीं है मासिवा इसके कि ग्राहक ने जिस क़ीमत पर खरीदी हों उसी क़ीमत पर या उससे कम क़ीमत पर बेचे।
2122. सलफ़ के लेन देन में अगर बेचने वाला मुद्दत ख़त्म होने पर उस चीज़ का क़ब्ज़ा दे जिसका सौदा हुआ है तो खरीदार के लिए ज़रूरी है कि उसे क़बूल करे अगरचे जिस चीज़ का सौदा हुआ है उससे बेहतर चीज़ दे रहा हो जबकि उस चीज़ को उसी जिन्स में शुमार किया जाए।
2123. अगर बेचने वाला जो जिन्स दे वह उस जिन्स से घटिया हो जिसका सौदा हुआ है तो खरीदार उसे क़बूल करने से इंकार कर सकता है।
2124. अगर बेचने वाला उस जिन्स की बजाय जिस का सौदा हुआ है कोई दूसरी जिन्स दे और खरीदार उसे लेने पर राज़ी हो जाए तो कोई इश्काल नहीं है।
2125. जो चीज़ बतौरे सलफ़ बेची गई हो अगर वह खरीदार के हवाले करने के लिए तय शुदा वक़्त पर दस्तयाब न हो सके तो खरीदार को इख़्तियार है कि इन्तिज़ार करे ताकि बेचने वाला उसे मुहैया कर दे या सौदा फ़स्ख़ कर दे और जो चीज़ बेचने वाले को दी हो उसे वापस ले ले और एहतियात की बिना पर वह चीज़ बेचने वाले को ज़्यादा क़ीमत पर नहीं बेच सकता।
2126. अगर एक शख़्स कोई चीज़ बेचे और मुआहदा करे कि कुछ मुद्दत बाद वह चीज़ खरीदार के हवाले कर देगा और उसकी क़ीमत भी कुछ मुद्दत बाद लेगा तो ऐसा सौदा बातिल है।
सोने चांदी को सोने चांदी के एवज़ बेचना
2127. अगर सोने को सोने से या चांदी को चांदी से बेचा जाए तो वह सिक्कादार हो या न हो अगर उनमें से एक का वज़न दूसरे से ज़्यादा हो तो ऐसा सौदा हराम और बातिल है।
2128. अगर सोने को चांदी से या चांदी को सोने से नक़्द बेचा जाए तो सौदा सहीह है और ज़रूरी नहीं कि दोनों का वज़न बराबर हो। लेकिन अगर मुआमले में मुद्दत मुअय्यन हो तो बातिल है।
2129. अगर सोने या चांदी को सोने या चांदी के एवज़ बेचा जाए तो ज़रूरी है कि बेचने वाला और खरीदार एक दूसरे से जुदा होने से पहले जिन्स और उसका एवज़ एक दूसरे के हवाले कर दें और अगर जिस चीज़ के बारे में मुआमला तय हुआ है उसकी कुछ मिक़्दार भी एक दूसरे के हवाले न की जाए तो मुआमला बातिल है।
2130. अगर बेचने वाले या खरीदार में से कोई एक तय शुदा माल पूरा पूरा दूसरे के हवाले कर दे लेकिन दूसरा (माल की सिर्फ़) कुछ मिक़्दार हवाले करे और फिर वह एक दूसरे जुदा हो जायें तो अगरचे इतनी मिक़्दार के मुताअल्लिक़ मुआमला सहीह है लेकिन जिसको पूरा माल न मिला हो वह सौदा फ़स्ख़ कर सकता है।
2131. अगर चांदी की कान की मिट्टी को ख़ालिस चांदी से और सोने की कान की सोने की मिट्टी को खालिस सोने से बेचा जाए तो सौदा बातिल है। मगर यह कि जब जानते हों कि मसलन चांदी की मिट्टी की मिक़्दार खालिस चांदी की मिक़्दार के बराबर है। लेकिन जैसा कि पहले कहा जा चुका है चांदी की मिट्टी को सोने के एवज़ और सोने की मिट्टी को चांदी के एवज़ बेचने में कोई इश्काल नहीं है।
मुआमला फ़स्ख़ किये जाने की सूरतें
2132. मुआमला फ़स्ख़ करने के हक़ को ख़ियार कहते हैं और खरीदार और बेचने वाला ग्यारा सूरतों में मुआमला फ़स्ख़ कर सकते हैं –
1. जिस मजलिस में मुआमला हुआ है वह बरख़ास्त न हुई हो अगरचे सौदा हो चुका हो उसे खियारे मजलिस कहते हैं।
2. ख़रीद व फ़रोख़्त के मुआमले में खरीदार या बेचने वाला नीज़ दूसरे मुआमलात में तरफ़ैन में से कोई एक मग़्बून हो जाए इसे ख़ियारे ग़बन कहते हैं (मग़्बून से मुराद वह शख़्स है जिस के साथ फ़्राड किया गया हो) ख़ियार की इस क़िस्म का मंशा उर्फ़े आम में शर्ते इरतिकाज़ी होता है यअनी हर मुआमले में फ़रीक़ैन के ज़िह्न में यह शर्त मौजूद होती है कि जो माल हासिल कर रहा है उसकी क़ीमत माल से बहुत ज़्यादा कम नहीं जो वह अदा कर रहा है और अगर उसकी क़ीमत कम हो तो वह मुआमले को ख़त्म करने का हक़ रखता है। लेकिन उर्फ़े ख़ास की चन्द सूरतों में इरतिकाज़ी शर्त दूसरी तरह हो मसलन यह शर्त हो कि अगर जो माल लिया हो वह बहिलाज़े क़ीमत उस माल से कम हो जो उसने दिया है तो दोंनो (माल) के दरमियान जो कमी बेशी होगी उस का मुतालबा कर सकता है और अगर मुम्किन न हो सके तो मुआमले को ख़त्म कर दे और ज़रूरी है कि इस क़िस्म की सूरतों में उर्फ़े ख़ास का ख़्याल रखा जाए।
3. सौदा करते वक़्त यह तय किया जाए कि मुक़र्ररा मुद्दत तक फ़रीक़ैन को या किसी एक फ़रीक़ को सौदा फ़स्ख़ करने का इख़्तियार होगा उसे ख़ियारे शर्त कहते हैं।
4. फ़रीक़ैन में से एक फ़रीक़ अपने माल को उसकी अस्लियत से बेहतर बना कर पेश करे जिसकी वजह से दूसरा फ़रीक़ उस में दिलचस्पी ले या उसकी दिलचस्पी उसमें बढ़ जाए उसे ख़ियार तद्लीस कहते हैं।
5. फ़रीक़ैन में से एक फ़रीक़ दूसरे के साथ शर्त करे कि वह फ़लां काम अन्जाम देगा और इस शर्त पर अमल न हो या शर्त की जाए कि एक फ़रीक़ दूसरे फ़रीक़ को एक मख़्सूस क़िस्म का मुअय्यन माल देगा और जो माल दिया जाए उसमें वह ख़ुसूसीयत न हों, उस सूरत में वह शर्त लगाने वाला फ़रीक़ मुआमले को फ़स्ख़ कर सकता है। उसे ख़ियारे तख़ल्लुफ़े शर्त कहते हैं।
6. दी जाने वाली जिन्स या उसके एवज़ में कोई ऐब हो उसे ख़ियारे ऐब कहते हैं।
7. यह पता चले कि फ़रीक़ैन ने जिस जिन्स का सौदा किया है उसकी कुछ मिक़्दार किसी और शख़्स का माल है। इस सूरत में अगर उस मिक़्दार का मालिक सौदे पर राज़ी न हो तो ख़रीदने वाला सौदा फ़स्ख़ कर सकता है या अगर उतनी मिक़्दार की अदायगी कर चुका हो तो उसे वापस ले सकता है। उसे ख़ियारे शिर्कत कहते हैं।
8. जिस मुअय्यन जिन्स को दूसरे फ़रीक़ ने न देखा हो अगर उस जिन्स का मालिक उसे उसकी ख़ुसूसीयात बताए और बाद में मअलूम हो कि जो ख़ुसूसीयात उसने बताई थीं वह उसमें नहीं हैं या दूसरे फ़रीक़ ने पहले उस जिन्स को देखा था और उसका ख़्याल था कि वह ख़ुसूसीयात अब उसमें बाक़ी नहीं है तो इस सूरत में दूसरा फ़रीक़ मुआमला फ़स्ख़ कर सकता है। इसे ख़ियारे रूयत कहते हैं।
9. ख़रीदार ने जो जिन्स खरीदी हो अगर उसकी क़ीमत तीन दिन तक न दे और वह बेचने वाले ने भी वह जिन्स खरीदार के हवाले न की हो तो बेचने वाला सौदे को ख़त्म कर सकता है लेकिन ऐसा उस सूरत में हो सकता है जब बेचने वाले ने ख़रीदार को क़ीमत अदा करने की मोहलत दी हो लेकिन मुद्दत मुअय्यन न की हो। और अगर उसको मोहलत बिल्कुल न दी हो तो बेचने वाला क़ीमत की अदायगी में मअमूली सी ताख़ीर से भी सौदा ख़त्म कर सकता है और अगर उसे तीन दिन से ज़्यादा मोहलत दी हो तो मुद्दत पूरी होने से पहले सौदा ख़त्म नहीं कर सकता। इससे यह मअलूम हो जाता है कि जो जिन्स बेची है अगर वह बअज़ ऐसे फलों की तरह हो जो एक दिन बाक़ी रहने से ज़ाए हो जाते हैं चुनाचे ख़रीदार रात तक उसकी क़ीमत न दे और यह शर्त भी न करे कि क़ीमत देने में ताख़ीर करेगा तो बेचने वाला सौदा ख़त्म कर सकता है। इसे ख़ियार ताख़ीर कहते हैं।
10. जिस शख़्स ने कोई जानवर ख़रीदा हो वह तीन दिन तक सौदा फ़स्ख़ कर सकता है और जो चीज़ उसने बेची हो अगर उसके एवज़ में ख़रीदार ने जानवर दिया हो तो जानवर बेचने वाला भी तीन दिन तक सौदा फ़स्ख़ कर सकता है। इसे ख़ियारे हैवान कहते हैं।
11. बेचने वाले ने जो चीज़ बेची हो अगर उसका क़ब्ज़ा न दे सके मसलन जो घोड़ा उसने बेचा हो वह भाग गया हो तो उस सूरत में ख़रीदार सौदा फ़स्ख़ कर सकता है। इसे ख़ियारे तअज़्ज़ुरे तसलीम कहते हैं।
(ख़ियारत की) इन तमाम अक़्साम के (तफ़्सीली) अहकाम आइन्दा मसाइल में बयान किये जायेंगे।
2133. अगर ख़रीदार को जिन्स की क़ीमत का इल्म न हो या वह सौदा करते वक़्त ग़फ़लत बरते और उस चीज़ को आम क़ीमत से महंगा ख़रीदे और यह क़ीमते ख़रीद बड़ी हद तक महंगी हो तो वह सौदा ख़त्म कर सकता है बशर्ते की सौदा ख़त्म करते वक़्त जिस क़दर फ़र्क़ हो वह भी मौजूद हो और अगर फ़र्क़ मौजूद न हो तो उसके बारे में मअलूम नहीं कि वह सौदा ख़त्म कर सकता है। नीज़ अगर बेचने वाले को जिन्स की क़ीमत का इल्म न हो या सौदा करते वक़्त ग़फ़लत बरते और उस जिन्स को उसकी क़ीमत से सस्ता बेचे और बड़ी हद तक सस्ता बेचे तो साबिक़ा शर्त के मुताबिक़ सौदा ख़त्म कर सकता है।
2134. मशरूत ख़रीद व फ़रोख़्त में जबकि मिसाल के तौर पर एक लाख रूपये का मकान पचास हज़ार रूपये में बेच दिया जाए और तय किया जाए कि अगर बेचने वाला मुक़र्ररा मुद्दत तक रक़म वापस तक दे तो सौदा फ़स्ख़ कर सकता है तो अगर ख़रीदार और बेचने वाला ख़रीद व फ़रोख़्त की नीयत रखते हों तो सौदा सहीह है।
2135. मशरूत ख़रीद व फ़ोरख़्त में अगर बेचने वाले को इत्मीनान हो कि ख़रीदार मुक़र्ररा वक़्त में रक़म अदा न कर सकने की सूरत में माल उसे वापस कर देगा तो सौदा सहीह है लेकिन अगर वह मुद्दत ख़त्म होने तक रक़म अदा न कर सके तो वह ख़रीदार से माल की वापसी का मुतालबा करने का हक़ नहीं रखता और अगर खरीदार मर जाए तो उसके वरसा से माल की वापसी का मुतालबा नहीं कर सकता।
2136. अगर कोई शख़्स उम्दा चाय में घटिया चाय की मिलावट कर के उम्दा चाय के तौर पर बेचे तो ख़रीदार सौदा फ़स्ख़ कर सकता है।
2137. अगर ख़रीदार को पता चले कि जो मुअय्यन माल उसने ख़रीदा है वह ऐबदार है मसलन एक जानवर खरीदे और (खरीदने के बाद) उसे पता चले कि उसकी एक आंख नहीं है लिहाज़ा अगर यह ऐब माल में सौदे से पहले था और उसे इल्म नहीं था तो वह सौदा फ़स्ख़ कर सकता है और माल बेचने वाले को वापस कर सकता है और अगर वापस करना मुम्किन न हो मसलन उस माल में कोई तब्दीली हो गई हो या ऐसा तसर्रूफ़ कर लिया गया हो जो वापसी में रूकावट बन रहा हो तो उस सूरत में वह बे ऐब और ऐबदार माल की क़ीमत के फ़र्क़ का हिसाब करके बेचने वाले से (फ़र्क़) की रक़म वापस ले ले मसलन अगर उसने कोई माल चार रूपये में ख़रीदा हो और उसे उसके ऐबदार होने का इल्म हो जाए तो अगर ऐसा ही बे ऐब माल (बाज़ार में) आठ रूपये का और ऐबदार छः रूपये का हो तो चूंकि बे ऐब और ऐबदार की क़ीमत का फ़र्क़ एक चौथाई है इसलिये उसने जितनी रक़म दी है उसका चौथाई यअनी एक रूपया बेचने वाले से वापस ले सकता है।
2138. अगर बेचने वाले को पता चले कि उसने जिस मुअय्यन ऐवज़ के बदले अपना माल बेचा है उसमें ऐब है तो अगर वह ऐब उस एवज़ में सौदे से पहले मौजूद था और उसे इल्म न हुआ हो तो वह सौदा फ़स्ख़ कर सकता है और वह एवज़ उसके मालिक को वापस कर सकता है लेकिन अगर तब्दीली या तसर्रूफ़ की वजह से वापस न कर सके तो बे ऐब और ऐबदार की क़ीमत का फ़र्क़ उस क़ाइदे के मुताबिक़ ले सकता है जिसका ज़िक्र साबिक़ा मसअले में किया गया है।
2139. अगर सौदा करने के बाद और क़ब्ज़ा देने से पहले माल कोई ऐब पैदा हो जाए तो ख़रीदार सौदा फ़स्ख़ कर सकता है। नीज़ जो चीज़ माल के एवज़ दी जाए अगर उसमें सौदा करने के बाद और क़ब्ज़ा देने से पहले कोई ऐब पैदा हो जाए तो बेचने वाला सौदा फ़स्ख़ कर सकता है और अगर फ़रीक़ैन क़ीमत का फ़र्क़ लेना चाहें तो सौदा तय न होने की सूरत में चीज़ को लौटाना जायज़ है।
2140. अगर किसी शख़्स को माल के ऐब का इल्म सौदा करने के बाद हो तो अगर वह (सौदा ख़त्म करना) चाहे तो ज़रूरी है कि फ़ौरन सौदे को ख़त्म कर दे और – इख़तिलाफ़ की सूरतों को पेशे नज़र रखते हुए अगर मअलूम से ज़्यादा ताख़ीर तो वह सौदे को ख़त्म नहीं कर सकता।
2141. जब किसी शख़्स को कोई जिन्स ख़रीदने के बाद उसके ऐब का पता चले तो ख़्वाह बेचने वाला उस पर तैयार न भी हो खरीदार सौदा फ़स्ख़ कर सकता है और दूसरे ख़ियारत के लिए भी यही हुक्म है।
2142. चार सूरतों में ख़रीदार माल में ऐब होने की बिना पर सौदा फ़स्ख़ नहीं कर सकता है और न ही क़ीमत का फ़र्क़ ले सकता है।
1. ख़रीदते वक़्त माल के ऐब से वाक़िफ़ हो।
2. माल के ऐब को क़बूल करे।
3. सौदा करते वक़्त कहे, अगर माल में ऐब हुआ तब भी वापस नहीं करूगां और क़ीमत का फ़र्क़ भी नहीं लूगां।
4. सौदे के वक़्त बेचने वाला कहे – मैं इस माल को जो ऐब भी इसमें है उसके साथ बेचता हूं। लेकिन अगर वह ऐब का तअय्युन कर दे और कहे – मैं इस माल को फ़लां ऐब के साथ बेच रहा हूं। और बाद में मअलूम हो कि माल में कोई दूसरा ऐब भी है तो जो ऐब बेचने वाले ने मुअय्यन न किया हो उसकी बिना पर ख़रीदार वह माल वापस कर सकता है और अगर वापस न कर सके तो क़ीमत का फ़र्क़ ले सकता है।
2143. अगर ख़रीदार को मअलूम हो कि माल में एक ऐब है और उसे वसूल करने के बाद उसमें कोई और ऐब निकल आए तो वह सौदा फ़स्ख़ नहीं कर सकता लेकिन बे ऐब और ऐबदार माल का फ़र्क़ ले सकता है लेकिन अगर वह ऐबदार हैवान (जानवर) ख़रीदे और ख़ियार की मुद्दत जो कि तीन दिन है गुज़रने से पहले उस हैवान में किसी और ऐब का पता चल जाए तो गो ख़रीदार ने उसे अपनी तहवील में ले लिया हो फिर भी वह उसे वापस कर सकता है। नीज़ अगर फ़क़त ख़रीदार को कुछ मुद्दत तक सौदा फ़स्ख़ करने का हक़ हासिल हो और उस मुद्दत के दौरान माल में कोई दूसरा ऐब निकल जाए तो अगरचे ख़रीदार ने वह माल अपनी तहवील में ले लिया हो वह सौदा फ़स्ख़ कर सकता है।
2144. अगर किसी शख़्स के पास ऐसा माल हो जिसे उसने ख़ुद अपनी आंख से न देखा हो और किसी दूसरे शख़्स ने माल की ख़ुसूसीयात उसे बताई हों और वही ख़ुसूसीयात ख़रीदार को बताए और वह माल उस के हाथ बेच दे और बाद में उसे (यअनी मालिक को) पता चले कि वह माल उससे बेहतर ख़ुसूसीयात का हामिल है तो वह सौदा फ़स्ख़ कर सकता है।
मुतफ़र्रिक़ मसाइल
2145. अगर बेचने वाला ख़रीदार को किसी जिन्स की क़ीमते ख़रीद बताए तो ज़रूरी है कि वह तमाम चीज़ें भी उसे बताए जिनकी वजह से माल की क़ीमत घटती बढ़ती है अगरचे उसी क़ीमत पर (जिस पर ख़रीदा है) या उससे भी कम क़ीमत पर बेचे। मसलन उसे बताना ज़रूरी है कि माल नक़्द ख़रीदा है या उधार लिहाज़ा अगर माल की कुछ ख़ुसूसीयात न बताए और ख़रीदार को बाद में मअलूम हो तो वह सौदा फ़स्ख़ कर सकता है।
2146. अगर इंसान कोई जिन्स किसी को दे और उसकी क़ीमत मुअय्यन कर दे और कहे – यह जिन्स इस क़ीमत पर बेचो और इससे ज़्यादा जितनी क़ीमत वसूल करोगे वह तुम्हारी मेहनत की उजरत होगी, तो उस सूरत में वह शख़्स उस क़ीमत से ज़्यादा जितनी क़ीमत भी वसूल करे वह जिन्स के मालिक का माल होगा और बेचने वाला मालिक से फ़क़त मेहनताना ले सकता है लेकिन अगर मुआहदा बतौरे जुआला हो और माल का मालिक कहे कि अगर तूने यह जिन्स इस क़ीमत से ज़्यादा पर बेची तो फ़ाज़िल आमदनी तेरा माल है तो इसमें कोई हरज नहीं।
2147. अगर क़स्साब नर जानवर का गोश्त कह कर मादा का गोश्त बेचे तो वह गुनाहगार होगा लिहाज़ा अगर वह उस गोश्त को मुअय्यन कर दे और कहे कि मैं यह नर जानवर का गोश्त बेच रहा हूं तो ख़रीदार सौदा फ़स्ख़ कर सकता है। और अगर कस्साब उस गोश्त को मुअय्यन न करे और ख़ीरदार को जो गोश्त मिला हो (यअनी मादा का गोश्त) वह उस पर राज़ी न हो तो ज़रूरी है कि क़स्साब उसे नर जानवर का गोश्त दे।
2148. अगर ख़रीदार बज़्ज़ाज़ से कहे कि मुझे ऐसा कपड़ा चाहिये जिसका रंग कच्चा न हो और बज़्ज़ाज़ एक ऐसा कपड़ा उसके हाथ फ़रोख़्त करे जिसका रंग कच्चा हो तो ख़रीदार सौदा फ़स्ख़ कर सकता है।
2149. लेन देन में क़सम खाना अगर सच्ची हो तो मकरूह है और अगर झूठी हो तो हराम है।
शिराकत के अहकाम
2150. दो आदमी अगर बाहम तय करें कि अपने मुश्तरक माल से ब्योपार कर के जो कुछ नफ़्अ कमायेंगे उसे आपस में तक़्सीम कर लेगें और वह अरबी या किसी और ज़बान में शिराकत का सिग़ा पढ़ें या कोई ऐसा काम करें जिससे ज़ाहिर होता हो कि वह एक दूसरे के शरीक बनना चाहते हैं तो उनकी शिराकत सहीह है।
2151. अगर चन्द अश्ख़ास उस मज़दूरी में जो वह अपनी मेहनत से हासिल करते हों एक दूसरे के साथ शिराकत करें मसलन चन्द हज्जाम आपस में तय करें कि जो उजरत हासिल होगी उसे आपस में तक़्सीम कर लेगें तो उनकी शिराकत सहीह नहीं है। लेकिन अगर बाहम तय कर लें कि मसलन हर एक की आधी मज़दूरी मुअय्यन मुद्दत तक के लिए दूसरे की आधी मज़दूरी के बदले में होगी तो मुआमला सहीह है और उन में से हर एक दूसरे की मज़दूरी में शरीक होगा।
2152. अगर दो अश्ख़ास आपस में इस तरह शिराकत करें कि उन में से हर एक अपनी ज़िम्मेदारी पर जिन्स खरीदे और उसकी क़ीमत की अदायगी का खुद भी ज़िम्मेदार हो लेकिन जो जिन्स उन्होंने खरीदी हो उसके नफ़्अ में एक दूसरे के साथ शरीक हों तो ऐसी शिराकत सहीह नहीं। अलबत्ता अगर उनमें से हर एक दूसरे को अपना वकील बनायें कि जो कुछ वह उधार ले रहा है उसमें उसे शरीक कर के यअनी जिसको अपने और अपने हिस्सादार के लिए खरीदे जिसकी बिना पर दोनों मक़रूज़ हो जायें तो दोनो में से हर एक जिन्स में शरीक हो जायेगा।
2153. जो अशख़ास शिराकत के ज़रीए एक दूसरे के शरीकेकार बन जायें उनके लिए ज़रूरी है कि बालिग़ और आक़िल हों नीज़ यह कि इरादे और इख़तियार के साथ शिराकत करें और यह भी ज़रूरी है कि वह अपने माल में तसर्रूफ़ कर सकते हों लिहाज़ा चूंकि सफ़ीह – जो अपना माल अहमक़ाना और फ़ुज़ूल कामों पर खर्च करता है अपने माल में तसर्रूफ़ का हक़ नहीं रखता अगर वह किसी के साथ शिराकत करे तो सहीह नहीं है।
2154. अगर शिराकत के मुआहदे में यह शर्त लगाई जाए कि जो शख़्स काम करेगा या जो दूसरे शरीक से ज़्यादा काम करेगा या जिस के काम की दूसरे के काम के मुक़ाबिले में ज़्यादा अहम्मीयत है उसे मुनाफ़ा में ज़्यादा हिस्सा मिलेगा तो ज़रूरी है कि जैसा तय किया गया हो मुअल्लिक़ा शख़्स को उस के मुताबिक़ दें। और इसी तरह अगर शर्त लगाई जाए कि जो शख़्स काम नहीं करेगा या ज़्यादा काम नहीं करेगा या जिसके काम की दूसरे के काम के मुक़ाबिले में ज़्यादा अहम्मीयत नहीं है उसे मुनाफ़ा का ज़्यादा हिस्सा मिलेगा तब भी शर्त सहीह है। और जैसा तय किया गया हो मुतअल्लिक़ा शख़्स को उस के मुताबिक़ दें।
2155. अगर शुरका तय करे कि सारा मुनाफ़ा किसी एक शख़्स का होगा या सारा नुक़्सान किसी एक को बर्दाश्त करना होगा तो शिराकत सहीह होने में इश्काल है।
2156. अगर शुरका यह तय न करें कि किसी एक शरीक को ज़्यादा मुनाफ़ा मिलेगा तो अगर उन में से हर का सरमाया एक जितना हो तो नफ़्अ नुक़्सान भी उन के माबैन बराबर तक़्सीम होगा और उन का सरमाया बराबर बराबर न हो तो ज़रूरी है कि नफ़्अ नुक़्सान सरमाये की निस्बत से तक़्सीम करें। मसलन अगर दे अफ़राद शिराकत करें और एक का सरमाया दूसरे के सरमाये से दुगना हो तो नफ़्अ नुक़्सान में भी उस का हिस्सा दूसरे से दुगना होगा ख़्वाह दोनों एक जितना काम करें या एक थोड़ा काम करे या बिल्कुल काम न करे।
2157. अगर शिरकत के मुआहदे में यह तय किया जाए कि दोनों शरीक मिल कर ख़रीद व फ़रोख़्त करेंगे या हर एक इनफ़िरादी तौर पर लेन देन करने का मजाज़ होगा या उन में से फ़क़त एक शख़्स लेन देन करेगा या तीसरा शख़्स उजरत पर लेन देन करेगा तो ज़रुरी है कि उस मुआहदे पर अमल करें।
2158. अगर शुरका यह मुअय्यन न करें कि उन में से कौन सरमाये के साथ ख़रीद व फ़रोख़्त करेगा तो उन में से कोई भी दूसरे की इजाज़त के बग़ैर उस सरमाये से लेन देन नहीं कर सकता।
2159. जो शरीक शिराकत के सरमाये पर इख़तियार रखता हो उसके लिए ज़रूरी है कि शिराकत के मुआहदे पर अमल करे मसलन अगर उससे तय किया गया हो कि उधार ख़रीदेगा या नक़्द बेचेगा या किसी खास जगह से खरीदेगा तो जो मुआहदा तय पाया है उसके मुताबिक़ अमल करना ज़रूरी है और अगर उसके साथ कुछ तय न हुआ हो तो ज़रूरी है कि मअमूल के मुताबिक़ लेन देन करे ताकि शिराकत को नुक़्सान न हो। नीज़ अगर आम रविश के अलर्रग़्म हो तो सफ़र में शिराकत का माल अपने हमराह न ले जाए।
2160. जो शरीक शिराकत के सरमाए से सौदे करता हो अगर जो कुछ उसके साथ तय किया गया हो उसके बर ख़िलाफ़ खरीद व फ़रोख़्त करे या अगर कुछ तय न किया गया हो और मअमूल के खिलाफ़ सौदा करे तो उन दोनों सूरतों में अगरचे अक़्वा क़ौल की बिना पर मुआमला सहीह है लेकिन अगर मुआमला नुक़्सान देह हो या शिराकत के माल में से कुछ माल ज़ाए हो जाए तो जिस शरीक ने मुआहदे या आम रविश के अलर्रग़्म अमल लिया हो वह ज़िम्मेदार है।
2161. जो शरीक शिराकत के सरमाए से कारोबार करता हो अगर वह फ़ुज़ूल ख़र्ची न करे और सरमाए की निगाहदाश्त में भी कोताही न करे और फिर इत्तिफ़ाक़न उस सरमाए की कुछ मिक़्दार या सारे का सारा सरमाया तलफ़ हो जाए तो वह ज़िम्मेदार नहीं है।
2162. जो शरीक शिराकत के सरमाये से कारोबार करता हो अगर वह कहे कि सरमाया तलफ़ हो गया है तो अगर दूसरे शुरका के नज़्दीक़ मोतबर शख़्स हो तो ज़रूरी है कि उसका कहना मान ले। और अगर दूसरे शुरका के नज़्दीक वह मोतबर शख़्स न हो तो शुरका हाकिमे शर्अ के पास उसके खिलाफ़ दावा कर सकते हैं ताकि हाकिमे शर्अ क़ज़ावत के उसूलों के मुताबिक़ तनाज़ों का फ़ैसला करे।
2163. अगर तमाम शरीक उस इजाज़त से जो उन्होंने एक दूसरे को माल में तसर्रूफ़ के लिए दे रखी हो फिर जायें तो उन में से कोई भी शिराकत के माल में तसर्रूफ़ नहीं कर सकता और अगर उन में से एक अपनी दी हुई इजाज़त से फिर जाए तो दूसरे शुरका को तसर्रूफ़ का कोई हक़ नहीं लेकिन जो शख़्स अपनी दी हुई इजाज़त से फिर गया हो वह शिराकत के माल में तसर्रूफ़ कर सकता है।
2164. जब शुरका में से कोई एक तक़ाज़ा करे कि शिराकत का सरमाया तक़्सीम कर दिया जाए तो अगरचे शिराकत की मुअय्यना मुद्दत में अभी कुछ वक़्त बाक़ी हो दूसरों को उसका कहना मान लेना ज़रूरी है मगर यह कि उन्होंने पहले ही (मुआहदा करते वक़्त) सरमाए की तक़्सीम को रद कर दिया हो (यअनी क़बूल न किया हो) या माल की तक़्सीम शुरका के लिए क़ाबिले ज़िक्र नुक़्सान का मूजिब हो (तो उसकी बात क़बूल नहीं करनी चाहिए)।
2165. अगर शुरका में से कोई मर जाए या दीवाना या बेहवास हो जाए तो दूसरे शुरका शिराकत के माल में तसर्रूफ़ नहीं कर सकते और अगर उनमें से कोई सफ़ीह हो जाए यअनी अपना माल अहमक़ाना और फ़ुज़ूल कामों में ख़र्च करे तो दोनों शरीक होंगे।
2166. अगर शरीक अपने लिए कोई चीज़ उधार खरीदे तो उस नफ़्अ नुक़्सान का वह खुद ज़िम्मेदार है लेकिन अगर शिराकत के लिए खरीदे और शिराकत के मुआहदे में उधार मुआमला करना भी शामिल हो तो फिर नफ़्अ नुक़्सान में दोनों शरीक होंगे।
2167. अगर शिराकत के सरमाए से कोई मुआमला किया जाए और बाद में मअलूम हो कि शिराकत बातिल थी तो अगर सूरत यह हो कि मुआमला करने की इजाज़त में शिराकत के सहीह होने की क़ैद न थी यअनी अगर शुरका जानते होते कि शिराकत दुरुस्त नहीं है तब भी वह एक दूसरे के माल में तसर्रूफ़ पर राज़ी होते तो मुआमला सहीह है और जो कुछ इस मुआमले से हासिल हो वह उन सबका माल है और अगर सूरत यह न हो तो जो लोग दूसरों के तसर्रूफ़ पर राज़ी न हों अगर वह यह कह दें कि हम इस मुआमले पर राज़ी हैं तो मुआमला सहीह है वर्ना बातिल है। दोनों सूरतों में उनमें से जिसने भी शिराकत के लिए काम किया हो अगर उसने बिला मुआवज़ा काम करने के इरादे से न किया हो तो वह अपनी मेहनत का मुआवज़ा मअमूल के मुताबिक़ दूसरे शुरका से उनके मफ़ाद का ख़याल रखते हुए ले सकता है। लेकिन अगर काम करने का मुआवज़ा उस फ़ाइदे की मिक़्दार से ज़्यादा हो जो वह शिराकत सहीह होने की सूरत में लेता तो बस उसी क़द्र फ़ाइदा ले सकता है।
सुल्ह के अहकाम
2168. सुल्ह से मुराद है कि इंसान किसी दूसरे शख़्स के साथ इस बात पर इत्तिफ़ाक़ करे कि अपने माल से या अपने माल के मुनाफ़ा से कुछ मिक़्दार दूसरे को दे दे या अपना क़र्ज़ या हक़ छोड़ दे ताकि दूसरा भी उसके एवज़ अपने माल या मुनाफ़ा की कुछ मिक़्दार उसे दे दे या क़र्ज़ या हक़ से दस्तबरदार हो जाए। बल्कि अगर कोई शख़्स एवज़ लिए बग़ैर किसी से इत्तिफ़ाक़ करे और अपना माल या माल के मुनाफ़ा की कुछ मिक़्दार उसको दे दे या अपना क़र्ज़ या हक़ छोड़ दे तब भी सुल्ह सहीह है।
2169. जो शख़्स अपना माल बतौरे सुल्ह दूसरे को दे उसके लिए ज़रूरी है कि वह बालिग़ और आक़िल हो और सुल्ह का क़स्द रखता हो नीज़ यह कि किसी ने उसे सुल्ह पर मजबूर न किया हो और ज़रूरी है कि सफ़ीह या दीवालिया होने की बिना पर उसे अपने माल में तसर्रूफ़ करने से न रोका गया हो।
2170. सुल्ह का सीग़ा अरबी में पढ़ना ज़रूरी नहीं बल्कि जिन अलफ़ाज़ से इस बात का इज़हार हो कि फ़रीक़ैन ने आपस में सुल्ह की है (वह सुल्ह) सहीह है।
2171. अगर कोई शख़्स अपनी भेड़ें चरवाहे को दे ताकि वह मसलन एक साल उनकी निगहदाश्त करे और उनके दूध से खुद इस्तिफ़ादा करे और घी की कुछ मिक़्दार मालिक को दे तो चरवाहे की मेहनत और उस घी के मुक़ाबिले में वह शख़्स भेड़ों के दूध पर सुल्ह कर ले तो मुआमला सहीह है बल्कि अगर भेड़े चरवाहे को एक साल के लिए इस शर्त के साथ इजारे पर दे कि वह उनके दूध से इसतिफ़ादा करे और उसके एवज़ उसे कुछ घी दे मगर यह क़ैद न लगाए कि बिलख़ुसूस उन्हीं भेड़ों के दूध का घी हो तो इजारा सहीह है।
2172. अगर कोई क़र्ज़ख़्वाह उस क़र्ज़ के बदले जो उसे मक़रूज़ से वसूल करना है या अपने हक़ के बदले उस शख़्स से सुल्ह करना चाहे तो यह सुल्ह उस सूरत में सहीह है जब दूसरा उसे क़बूल कर ले लेकिन अगर कोई शख़्स अपने क़र्ज़ या हक़ से दस्तबरदार होना चाहे तो दूसरे का क़बूल करना ज़रूरी नहीं।
2173. अगर मक़रूज़ अपने क़र्ज़ की मिक़्दार जानता हो जबकि क़र्ज़ख़्वाह को इल्म न हो और क़र्ज़ख़्वाह को जो कुछ लेना हो उससे कम पर सुल्ह कर ले मसलन उसको पचास रूपये लेने हों और दस रूपये पर सुल्ह कर ले तो बाक़ीमांदा रक़म मक़रूज़ के लिए हलाल नहीं है। सिवाय उस सूरत के कि वह जितने क़र्ज़ का देनदार है उसके मुतलअल्लिक़ खुद क़र्ज़ख़्वाह को क़र्ज़े की मिक़्दार का इल्म होता तब भी वह उसी मिक़्दार (यअनी दस रूपये) पर सुल्ह कर लेता।
2174. अगर दो आदमियों के पास कोई माल मौजूद हो या एक दूसरे के ज़िम्मे कोई माल बाक़ी हो और उन्हें यह इल्म हो कि उन दोनों अमवाल में से एक माल दूसरे माल से ज़्यादा है तो चूंकि उन दोनों अमवाल को एक दूसरे के एवज़ फ़रोख़्त करना सूद होने की बिना पर हराम है इस लिए उन दोनों में एक दूसरे के एवज़ सुल्ह करना भी हराम है बल्कि अगर उन दोनों अमवाल में से एक दूसरे से ज़्यादा होने का इल्म न भी हो लेकिन ज़्यादा होने का एहतिमाल हो तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर उन दोनों में एक दूसरे के एवज़ सुल्ह नहीं की जा सकती।
2175. अगर दो अश्ख़ास को एक शख़्स से या दो अश्ख़ास को दो अश्ख़ास से क़र्ज़ा वसूल करना हो और वह अपनी अपनी तलब पर एक दूसरे से सुल्ह करना चाहते हों चुनांचे अगर सुल्ह करना सूद का बाइस न हो जैसा कि साबिक़ा मस्अले में कहा गया है तो कोई हरज नहीं है मसलन अगर दोनों के दस मन गेहूं वसूल करना हो और एक का गेहूं अअला और दूसरे का दरमियाने दरजे का हो और दोनों की मुद्दत पूरी हो चुकी है तो उन दोनों का आपस में मुसालहत करना सहीह है।
2176. अगर एक शख़्स को किसी से अपना क़र्ज़ा कुछ मुद्दत के बाद वापस लेना हो और वह मक़रूज़ के साथ मुक़र्ररा मुद्दत से पहले मुअय्यन मिक़्दार से कम पर सुल्ह कर ले और उसका मक़्सद यह हो कि अपने क़र्ज़े का कुछ हिस्सा मुआफ़ कर दे और बाक़ीमांदा नक़्द ले ले तो इसमें कोई हरज नहीं और यह हुक्म उस सूरत में है कि क़र्ज़ा सोने या चांदी की शक्ल में या किसी ऐसी जिन्स की शक्ल में हो जो नाप कर या तोल कर बेची जाती है और अगर जिन्स इस क़िस्म की न हो तो क़र्ज़ख़्वाह के लिए जाइज़ है कि अपने क़र्ज़े की मक़रूज़ से या किसी और शख़्स से कमतर मिक़्दार पर सुल्ह कर ले या बेच दे जैसा कि मस्अला 2297 में बयान होगा।
2177. अगर दो अश्ख़ास किसी चीज़ पर आपस में सुल्ह कर लें तो एक दूसरे की रज़ामन्दी से उस सुल्ह को तोड़ सकते हैं नीज़ अगर सौदे के सिलसिले में दोनों को या किसी एक को सौदा फ़स्ख़ करने का हक़ दिया गया हो तो जिसके पास हक़ है वह सुल्ह को फ़स्ख़ कर सकता है।
2178. जब तक ख़रीदार और बेचने वाला एक दूसरे से जुदा न हो गाए हों वह सौदे को फ़स्ख़ कर सकते हैं। नीज़ अगर खरीदार एक जानवर ख़रीदे तो वह तीन दिन तक सौदा फ़स्ख़ करने का हक़ रखता है। इसी तरह अगर एक ख़रीदार खरीदी हुई जिन्स की क़ीमत तीन दिन तक अदा न करे और जिन्स को अपनी तहवील में न ले तो जैसा कि मस्अला 2132 में बयान हो चुका है बेचने वाला सौदे को फ़स्ख़ कर सकता है। लेकिन जो शख़्स किसी माल पर सुल्ह करे वह उन तीनों सूरतों में सुल्ह फ़स्ख़ करने का हक़ नहीं रखता। लेकिन अगर सुल्ह का दूसरा फ़रीक़ इस शर्ते पर अमल न करे तो उस सूरत में सुल्ह फ़स्ख़ की जा सकती है और इसी तरह बाक़ी सूरतों में भी जिनका ज़िक्र खरीद व फ़रोख़्त के अहकाम में आया है सुल्ह फ़स्ख़ की जा सकती है मगर मुसालहत के दोनों फ़रीक़ों में से एक को नुक़्सान हो तो उस सूरत में मअलूम नहीं कि सौदा फ़स्ख़ किया जा सकता है (या नहीं)।
2179. जो चीज़ बज़रीआ ए सुल्ह मिले अगर वह ऐबदार हो तो सुल्ह फ़स्ख़ की जा सकती है लेकिन अगर मुतअल्लिक़ा शख़्स बे ऐब और ऐबदार के माबेन क़ीमत का फ़र्क़ लेना चाहे तो इसमें इश्काल है।
2180. अगर कोई शख़्स अपने माल के ज़रीए दूसरे से सुल्ह करे और उसके साथ शर्त ठहराए और कहे, जिस चीज़ पर मैनें तुम से सुल्ह की है मेरे मरने के बाद मसलन तुम उसे वक़्फ़ कर दोगे, और दूसरा शख्स भी उस को क़बूल कर ले तो ज़रूरी है कि उस शर्त पर अमल करे।
किराये के अहकाम
2181. कोई चीज़ किराये पर देने वाले और किराये पर लेने वाले के लिए ज़रूरी है कि बालिग़ और आक़िल हों और किराया लोने या किराया देने का काम अपने इख़तियार से करे। और यह भी ज़रूरी है कि अपने माल में तसर्रूफ़ का हक़ रखते हों। लिहाज़ा चूंकि सफ़ीह अपने माल में तसर्रूफ़ करने का हक़ नहीं रखता इस लिए वह कोई चीज़ किराये पर ले सकता है और न दे सकता है। इसी तरह जो शख़्स दिवालिया हो चुका हो वह उन चीज़ों को किराये पर नहीं दे सकता जिनमें वह तसर्रूफ़ का हक़ न रखता हो और न वह उन में से कोई चीज़ किराये पर ले सकता है लेकिन अपनी ख़िदमात को किराये पर पेश कर सकता है।
2182. इंसान दूसरे की तरफ़ से वकील बन कर उसका माल किराये पर दे सकता है या कोई माल उसके लिए किराये पर ले सकता है।
2183. अगर बच्चे का सरपरस्त या उसके माल का मुन्तज़िम बच्चे का माल किराये पर दे या बच्चे को किसी का अजीर मुक़र्रर कर दे तो कोई हरज नहीं और अगर बच्चे के बालिग़ होने के बाद की कुछ मुद्दत को भी इजारे की मुद्दत का हिस्सा क़रार दिया जाए तो बच्चा बालिग़ होने के बाद बाक़ीमांदा इजारा फ़स्ख़ कर सकता है अगरचे सूरत यह हो कि अगर बच्चे के बालिग़ होने की कुछ मुद्दत को इजारा की मुद्दत का हिस्सा न बनाया जाता तो यह बच्चे के लिए मसलहत के अलर्रग़्म होता। हां अगर वह मसलहत कि जिसके बारे में यह इल्म हो कि शारेए मुक़द्दस इस मसलहत को तर्क करने पर राज़ी नहीं है उस सूरत में अगर हाकिमे शर्अ की इजाज़त से इजारा वाक़े हो जाए तो बच्चा बालिग़ होने के बाद इजारा फ़स्ख़ कर सकता है।
2184. जिस नाबालिग़ बच्चे का सरपरस्त न हो उसे मुज्तहिद की इजाज़त के बग़ैर मज़दूरी पर नहीं लगाया जा सकता और जिस शख़्स की रसाई मुज्तहिद तक न हो वह एक मोमिन शख़्स की इजाज़त लेकर जो आदिल हो बच्चे को मज़्दूरी पर लगा सकता है।
2185. इजारा देने वाले और इजारा लेने वाले के लिए ज़रूरी नहीं कि सीग़ा अरबी में पढ़ें बल्कि अगर किसी चीज़ का मालिक दूसरे से कहे कि मैंने अपना माल तुम्हें इजारे पर दिया और दूसरा कहे कि मैंने क़बूल किया तो इजारा सहीह है बल्कि अगर वह मुंह से कुछ भी न कहे और मालिक अपना माल इजारे के क़स्द से मुस्ताजिर को दे और वह भी इजारे के क़स्द से ले तो इजारा सहीह होगा।
2186. अगर कोई शख़्स चाहे कि इजारे का सीग़ा पढ़े बग़ैर कोई काम करने के लिए अजीर बन जाए तो जूं ही वह काम करने में मश्ग़ूल होगा इजारा सहीह हो जायेगा।
2187. जो शख़्स बोल न सकता हो अगर वह इशारे से समझा दे कि उसने कोई चीज़ इजारे पर दी है या इजारे पर ली है तो इजारा सहीह है।
2188. अगर कोई शख़्स मकान या दुकान या कश्ती या कमरा इजारे पर ले और उसका मालिक यह शर्त लगाए कि सिर्फ़ वह इस से इस्तिफ़ादा कर सकता है तो मुस्ताजिर उसे किसी दूसरे को इस्तेमाल के लिए इजारे पर नहीं दे सकता बजुज़ इसके कि वह नया इजारा इस तरह हो कि उसके फ़वाइद भी ख़ुद मुस्ताजिर से मख़्सूस हों। मसलन एक औरत एक मकान या कमरा किराया पर ले और बाद में शादी कर ले और कमरा या मकान अपनी रहाइश के लिए किराये पर दे दे (यअनी शौहर को किराये पर दे क्योंकि बीवी की रहाइश का इन्तिज़ाम भी शौहर की ज़िम्मेदारी है) और अगर मालिक ऐसी कोई शर्त न लगाए तो मुस्ताजिर उसे दूसरो को किराये पर दे सकता है। अलबत्ता माल को मुस्ताजिरे दोम के सिपुर्द करने के लिए एहतियात की बिना पर ज़रूरी है कि मालिक से इजाज़त ले ले लेकिन अगर वह यह चाहे कि जितने किराये पर लिया है उससे ज़्यादा किराये पर दे अगरचे (किराया रक़म न हो) दूसरी जिन्स से हो तो ज़रूरी है कि उसने मरम्मत और सफ़ेदी वग़ैरा कराई हो या उसकी हिफ़ाज़त के लिए कुछ नुक़्सान बर्दाश्त किया हो तो उसे ज़्यादा किराये पर दे सकता है।
2189. अगर अजीर मुस्ताजिर से यह शर्त तय करे कि वह फ़क़त उसी का काम करेगा तो बजुज़ उस सूरत के जिसका ज़िक्र साबिक़ा मस्अले में किया गया है उस अजीर को किसी दूसरे शख़्स को बतौरे इजारा नहीं दिया जा सकता और अगर अजीर कोई ऐसी शर्त न लगाए तो उसे दूसरे को इजारे पर दे सकता है लेकिन जो चीज़ इजारे पर दे रहा है ज़रूरी है कि उसकी क़ीमत उस इजारे से ज़्यादा हो जो अजीर के लिए क़रार दिया है। और इसी तरह अगर कोई शख़्स ख़ुद किसी का अजीर बन जाए और किसी दूसरे शख़्स को वह काम करने के लिए कम उजरत पर रख ले तो उसके लिए भी यही हुक्म है (यानी वह उसे कम उजरत पर नहीं रख सकता) लेकिन अगर उसने काम की कुछ मिक़्दार खुद अंजाम दी हो तो फिर दूसरे को कम उजरत पर भी रख सकता है।
2190. अगर कोई शख़्स मकान, दुकान, कमरे और कश्ती के अलावा कोई और चीज़ मसलन ज़मीन किराये पर ले और ज़मीन का मालिक उससे यह शर्त न करे कि सिर्फ़ वही उससे इस्तिफ़ादा कर सकता है तो अगर जितने किराये पर उसने वह चीज़ ली है उससे ज़्यादा किराये पर दे तो इजारा सहीह होने में इश्काल है।
2191. अगर कोई शख़्स मकान पर दुकान मसलन एक साल के लिए सौ रुपया किराये पर ले और उसका आधा हिस्सा खुद इस्तेमाल करे तो दूसरा हिस्सा सौ रुपया किराये पर चढ़ा सकता है लेकिन अगर वह चाहे कि मकान या दुकान का आधा हिस्सा उससे ज़्यादा किराये पर चढ़ा दे जिस पर उसने खुद वह मकान या दुकान किराये पर ली है मसलन 120 रूपया किराये पर दे दे तो ज़रूरी है कि उसने उसमें मरम्मत वग़ैरा का काम कराया हो।
किराये पर दिये जाने वाले माल की शराइत
2192. जो माल इजारे पर दिया जाए उस के चन्द शराइत हैः-
1. – वह माल मुअय्यन हो। लिहाज़ा अगर कोई शख़्स कहे कि मैंने अपने मकानात में से एक मकान तुम्हें किराये पर दिया तो यह दुरूस्त नहीं है।
2. – मुस्ताजिर यअनी किराये पर लेने वाला उस माल को देख ले या इजारे पर देने वाला शख़्स अपने माल की ख़ुसूसीयात इस तरह बयान करे कि उसके बारे में मुकम्मल मअलूमात हासिल हो जायें।
3. – इजारे पर दिये जाने वाले माल को दूसरे फ़रीक़ को सिपुर्द करना मुम्किन हो लिहाज़ा उस घोड़े को इजारे पर देना जो भाग गया हो अगर मुस्ताजिर उसको न पकड़ सके तो इजारा बातिल है और अगर पकड़ सके तो इजारा सहीह है।
4. – उस माल से इस्तिफ़ादा करना, उसके ख़त्म होने या कलअदम हो जाने पर मौक़ूफ़ न हो लिहाज़ा रोटी, फलों और दूसरी खुर्दनी अश्या को खाने के लिए किराये पर देना सहीह है।
5. – माल से वह फ़ाइदा उठाना मुम्किन हो जिसके लिए उसे किराये पर दिया जाए। लिहाज़ा ऐसी ज़मीन का ज़िराअत के लिए किराये पर देना जिसके लिए बारिश का पानी काफ़ी न हो और वह दरिया के पानी से भी सेराब न होती हो सहीह नहीं है।
6. जो चीज़ किराये पर दी जा रही हो वह किराये पर देने वाले का अपना माल हो और अगर किसी दूसरा का माल किराये पर दिया जाए तो मुआमला उस सूरत में सहीह है जबकि उस माल का मालिक रज़ामन्द हो।
2193. जिस दरख़्त में अभी फल न लगा हो उसका इस मक़्सद से किराये पर देना कि उसके फल से इस्तिफ़ादा किया जायेगा दुरुस्त है और इसी तरह एक जानवर को उसके दूध के लिए किराये पर देने का भी यही हुक्म है।
2194. औरत इस मक़्सद के लिए अजीर बन सकती है कि उसके दूध से इस्तिफ़ादा किया जाए (यअनी किसी दूसरे के बच्चे को उजरत पर दूध पिला सकती है) और ज़रूरी नहीं कि वह उस मक़्सद के लिए शौहर से इजाज़त ले। लेकिन अगर उसके दूध पिलाने में शौहर की हक़ तलफ़ी होती हो तो फिर उसकी इजाज़त के बग़ैर औरत अजीर नहीं बन सकती।
किराये पर दिये जाने वाले माल से इसतिफ़ादा की शराइत
2195. जिस इसतिफ़ादे के लिए माल किराये पर दिया जाता है उसकी चार शर्तें हैः-
1. इसतिफ़ादा करना हलाल हो। लिहाज़ा दुकान को शराब बेचने या शराब ज़खीरा (स्टोर) करने के लिए किराये पर देना और हैवान (जानवर) को शराब की नक़्लों हम्ल के लिए किराये पर देना बातिल है।
2. वह अमल शरीअत में बिला मुआवज़ा अंजाम देना वाजिब न हो। और एहतियात की बिना पर इसी क़िस्म के कामों में से है हलाल और हराम सिखाना और मुर्दों की तजहीज़ व तक्फ़ीन करना। लिहाज़ा इन कामों की उजरत लेना जायज़ नहीं है और एहतियात की बिना पर मोतबर है कि इस इसतिफ़ादे के लिए रक़म देना लोगों की नज़रों में फ़ुज़ूल न हो।
3. जो चीज़ किराये पर दी जाए अगर वह कसीरूल फ़वाइद (और कसीरुल मक़ासिद) हो तो जो फ़ाइदा उठाने की मुस्ताजिर को इजाज़त हो उसे मुअय्यन किया जाए। मसलन एक ऐसा जानवर किराये पर दिया जाए जिस पर सवारी भी की जा सकती हो और माल भी लादा जा सकता हो तो उसे किराये पर देते वक़्त यह मुअय्यन करना ज़रूरी है कि मुस्ताजिर उसे फ़क़त सवारी के मक़्सद के लिए या फ़क़त बारबरदारी के मक़्सद के लिए इस्तेमाल कर सकता है या उससे हर तरह इस्तिफ़ादा कर सकता है।
4. इस्तिफ़ादा करने की मुद्दत का तअय्युन कर लिया जाए और यह इस्तिफ़ादा मुद्दत मुअय्यन कर के हासिल किया जा सकता है मसलन मकान या दुकान किराये पर देकर या काम का तअय्युन कर के हासिल किया जा सकता है मसलन दर्ज़ी के साथ तय कर लिया जाए कि वह एक मुअय्यन लिबास मख़्सूस डिज़ाइन में सियेगा।
2196. अगर इजारे की शुरुआत का तअय्युन न किया जाए तो उसके शुरूउ होने का वक़्त इजारे का सीग़ा पढ़ने के बाद से होगा।
2197. मिसाल के तौर पर अगर मकान एक साल के लिए किराये पर दिया जाए और मुआहदे की इब्तिदा का वक़्त सीग़ा पढ़ने से एक महीना बाद से मुक़र्रर किया जाए तो इजारा सहीह है अगरचे जब सीग़ा पढ़ा जा रहा हो वह मकान किसी दूसरे के पास किराये पर हो।
2198. अगर इजारे की मुद्दत का तअय्युन न किया जाए बल्कि किरायेदार से कहा जाए कि जब तक तुम इस मकान में रहोगे दस रूपये माहबार किराया दोगे तो इजारा सहीह नहीं है।
2199. अगर मालिक मकान, किरायेदार से कहे कि मैंने तुझे यह मकान दस रुपये माहवार किराये पर दिया और उसके बाद भी तुम जितनी मुद्दत उसमें रहोगे उसका किराया दस रुपये महीना होगा तो उस सूरत में इजारे की मुद्दत की इब्तिदा का तअय्युन कर लिया जाए या उसकी इबतिदा का इल्म हो जाए तो पहले महीने का इजारा सहीह है।
2200. जिस मकान में मुसाफ़िर और ज़ायर क़ियाम करते हों और यह इल्म न हो कि वह कितनी मुद्दत तक वहां रहेंगे अगर वह मालिक मकान से तय कर लें कि मसलन एक रात का एक रुपया देंगे और मालिक मकान इस पर राज़ी हो जाए तो उस मकान से इस्तिफ़ादा करने में कोई हरज नहीं लेकिन चूंकि इजारे की मुद्दत तय नहीं की गई लिहाज़ा पहली रात के अलावा इजारा सहीह नहीं है और मालिक मकान रात के बाद जब भी चाहे उन्हें निकाल सकता है।
किराये के मुतफ़र्रिक़ मसाइल
2201. जो माल मुस्ताजिर इजारे के तौर पर दे रहा हो ज़रूरी है कि वह माल मअलूम हो। लिहाज़ा अगर ऐसी चीज़ें हों जिन का लेन देन तोल कर किया जाता हो मसलन गेहूं तो उनका वज़न मालूम होना ज़रूरी है, और अगर ऐसी चीज़ें हों जिनका लेन देन गिन कर किया जाता है मसलन राइजुल वक़्त सिक्के तो ज़रूरी है कि उनकी तअदाद मुअय्यन हो, और अगर वह चीज़ें घोड़े और भेड़ की तरह हों तो ज़रूरी है कि किराया लेने वाला उन्हें देख ले या मुस्ताजिर उनकी ख़ुसूसीयात बता दे।
2202. अगर ज़मीन ज़िराअत (खेती) के लिए किराये पर दी जाए और उसकी उजरत उसी ज़मीन की पैदावार क़रार दी जाए जो उस वक़्त मौजूद न हो या कुल्ली तौर पर कोई चीज़ उसके ज़िम्मे क़रार दे इस शर्त पर कि वह उसी ज़मीन की पैदावार से अदा की जायेगी तो इजारा सहीह नहीं है और अगर उजरत (यअनी उस ज़मीन की पैदावार) इजारा करते वक़्त मौजूद हो तो फिर कोई हरज नहीं है।
2203. जिस शख़्स ने कोई चीज़ किराये पर दी हो वह उस चीज़ को किरायादार की तहवील में देने से पहले किराया मांगने का हक़ नहीं रखता नीज़ अगर कोई शख़्स किसी काम के लिए अजीर बना हो तो जब तक वह काम अंजाम न दे दे उजरत का मुतालबा करने का हक़ नहीं रखता मगर बाअज़ सूरतों में, मसलन हक़ की अदायगी के लिए अजीर जिसे उमूमन अमल अंजाम देने से पहले उजरत दे दी जाती है (उजरत का मुतालबा करने का हक़ रखता है।
2204. अगर कोई शख़्स किराये पर दी गई चीज़ किरायादार की तहवील में दे दे तो अगरचे किरायादार उस चीज़ पर क़ब्ज़ा न करे या क़ब्ज़ा हासिल कर ले लेकिन इजारा ख़त्म होने तक उससे फ़ाइदा न उठाए फिर भी ज़रूरी है कि फिर भी मालिक को उजरत अदा करे।
2205. अगर एक शख़्स कोई काम एक मुअय्यन दिन में अंजाम देने के लिए अजीर बन जाए और उस दिन वह काम करने के लिए तैयार हो जाए तो जिस शख़्स ने उसे अजीर बनाया है ख़्वाह वह उस दिन उससे काम न ले – ज़रूरी है कि उसकी उजरत उसे दे दे। मसलन अगर किसी दर्ज़ी को एक मुअय्यन दिन लिबास सीने के लिए अजीर बनाए और दर्ज़ी उस दिन काम करने पर तैयार हो तो अगचे मालिक उसे सीने के लिए कपड़ा न दे तब भी ज़रूरी है कि उसकी मज़दूरी दे दे। क़ता ए नज़र इससे कि दर्ज़ी बेकार रहा हो या उसने अपना या किसी दूसरे का काम किया हो।
2206. अगर इजारे की मुद्दत ख़त्म हो जाने के बाद मअलूम हो कि इजारा बातिल था तो मुस्ताजिर के लिए ज़रूरी है कि आम तौर पर उस चीज़ का जो किराया होता है माल के मालिक को दे दे मसलन अगर वह एक मकान सौ रुपये किराये पर एक साल के लिए ले ले और बाद में उसे पता चले कि इजारा बातिल था तो तो अगर उस मकान का किराया आम तौर पर पचास रुपये हो तो ज़रूरी है कि पचास रुपये दे और अगर उसका किराया आम तौर पर दो सौ रुपये हो तो अगर मकान किराये पर देने वाला मालिक मकान हो या उसका वकीले मुत्लक़ हो और आम तौर पर घर के किराये की जो शर्ह हो उसे जानता हो तो ज़रूरी नहीं कि मुस्ताजिर सौ रुपये से ज़्यादा दे और अगर उसके बर अक्स सूरत हो तो ज़रूरी है कि मुस्ताजिर दो सौ रुपये दे नीज़ अगर इजारे की कुछ मुद्दत गुज़रने के बाद मअलूम हो कि इजारा बातिल था तो जो मुद्दत गुज़र चुकी हो उस पर भी यही हुक्म जारी होगा।
2207. जिस चीज़ को इजारे पर लिया गया हो अगर वह तलफ़ हो जाए और मुस्ताजिर ने उसकी निगहदाश्त में कोताही न बरती हो और उसे ग़लत तौर पर इस्तेमाल न किया हो तो (फिर वह उस चीज़ के तलफ़ होने का) ज़िम्मेदार नहीं है। इस तरह मिसाल के तौर पर अगर दर्ज़ी को दिया गया कपड़ा तलफ़ हो जाए तो अगर दर्ज़ी ने बे एहतियात न की हो और कपड़े की निगहदाश्त में भी कोताही न बरती हो तो ज़रूरी है कि वह उसका एवज़ उससे तलब न करे।
2208. जो चीज़ किसी कारीगर ने ली हो अगर वह उसे ज़ाए कर दे तो (वह उसका) ज़िम्मेदार है।
2209. अगर क़स्साब किसी जानवर का सर काट डाले और उसे हराम कर दे तो ख़्वाह उसने मज़दूरी ली हो या बिला मुआवज़ा ज़िब्हा किया हो ज़रूरी है कि जानवर की क़ीमत उसके मालिक को अदा करे।
2210. अगर कोई शख़्स एक जानवर किराये पर ले और मुअय्यन करे कि कितना बोझ उस पर लादेगा तो अगर वह उस पर मुअय्यन मिक़्दार से ज़्यादा बोझ लादे और इस वजह से जानवर मर जाए या ऐबदार हो जाए तो मुस्ताजिर ज़िम्मेदार है। नीज़ अगर उसने बोझ की मिक़्दार मुअय्यन न की हो और मअलूम से ज़्यादा बोझ जानवर पर लादे और जानवर मर जाए या ऐबदार हो जाए तब भी मुस्ताजिर ज़िम्मेदार है और दोनों सूरतों में मुस्ताजिर के लिए यह भी ज़रूरी है कि मअलूम से ज़्यादा उजरत अदा करे।
2211. अगर कोई शख़्स हैवान को ऐसा (नाज़ुक) सामान लादने के लिए किराये पर दे जो टूटने वाला हो और जानवर फिसल जाए या भाग खड़ा हो और सामान को तोड़ फोड़ दे तो जानवर का मालिक ज़िम्मेदार नहीं है। हां अगर मालिक जानवर को मअलूम से ज़्यादा मारे या ऐसी हरकत करे जिसकी वजह से जानवर गिर जाए और लदा हुआ सामान तोड़ दे तो मालिक ज़िम्मेदार है।
2212. अगर कोई शख़्स बच्चे का ख़तना करे और वह अपने काम में कोताही या ग़लती करे मसलन उसने मअलूम से ज़्यादा (चमड़ा) काटा हो और वह बच्चा मर जाए या उसमें कोई नुक़्स पैदा हो जाए तो वह ज़िम्मेदार है और अगर उसने कोताही या गलती न की हो और बच्चा खतना करने से ही मर जाए या उसमें कोई ऐब पैदा हो जाए चुनांचे इस बात की तश्खीस के लिए कि बच्चे के लिए नुक़्सान देह है या नहीं उसकी तरफ़ रुजूउ न किया गया हो नीज़ वह यह भी न जानता हो कि बच्चे को नुक़्सान होगा तो उस सूरत में वह ज़िम्मेदार नहीं है।
2213. अगर मुआलिज अपने हाथ से किसी मरीज़ को दवा दे या उसके लिए दवा तैयार करने को कहे और दवा खाने की वजह से मरीज़ को नुक़्सान पहुंचे या वह मर जाए तो मुआलिज ज़िम्मेदार है अगरचे उसने इलाज करने में कोताही न की हो।
2214. जब मुआलिज किसी मरीज़ से कह दे कि अगर तुम्हें कोई ज़रर पहुंचा तो मैं ज़िम्मेदार नहीं हूं और पूरी एहतियात से काम ले लेकिन इसके बावजूद मरीज़ को ज़रर पहुंचे या वह मर जाए तो मुआलिज ज़िम्मेदार नहीं है।
2215. किराये पर लेने वाला और जिस शख़्स ने कोई चीज़ किराये पर दी हो, वह एक दूसरे की रज़ामन्दी से मुआमला फ़स्ख़ कर सकते हैं और अगर इजारे में यह शर्त आइद करे कि वह दोनों या उनमें से कोई एक मुआमले को फ़स्ख़ करने का हक़ रखता है तो वह मुआहदे के मुताबिक़ इजारा फ़स्ख़ कर सकते हैं।
2216. अगर माल इजारे पर देने वाले मुस्ताजिर को पता चले कि वह घाटे में रहा है तो अगर इजारा करने के वक़्त वह इस अम्र की जानिब मुतवज्जह न था कि वह घाटे में है तो वह उस तफ़्सील के मुताबिक़ जो मस्अला 2132 में गुज़र चुकी है इजारा फ़स्ख़ कर सकता है लेकिन अगर इजारे के सीग़े में यह शर्त आइद की जाए कि अगर उनमें से कोई घाटे में भी होगा तो उसे इजारा फ़स्ख़ करने का हक़ नहीं होगा तो फिर वह इजारा फ़स्ख़ नहीं कर सकते।
2217. अगर एक शख़्स कोई चीज़ इजारे पर दे और इससे पहले कि उसका क़ब्ज़ा मुस्ताजिर को दे कोई और शख़्स उस चीज़ को ग़स्ब कर ले तो मुस्ताजिर इजारा फ़स्ख़ कर सकता है और जो चीज़ उसने इजारे पर देने वाले को दी हो उसे वापस ले सकता है। या (यह भी कर सकता है कि) इजारा फ़स्ख़ न करे और जितनी मुद्दत वह चीज़ ग़ासिब के पास रही हो उसकी आमतौर पर जितनी उजरत बने वह ग़ासिब से ले ले। लिहाज़ा अगर मुस्ताजिर एक हैवान का एक महीने का इजारा दस रुपये के एवज़ करे और कोई शख़्स उस हैवान को दस दिन के लिए ग़स्ब कर ले और आम तौर पर उसका दस दिन का इजारा पन्द्रह रुपये हो तो मुस्ताजिर पन्द्रह रुपये ग़ासिब से ले सकता है।
2218. अगर कोई दूसरा शख़्स मुस्ताजिर को इजारा कर्दा चीज़ अपनी तहवील में न लेने दे या तहवील में लेने के बाद उस पर नाजाइज़ क़ब्ज़ा कर ले या उससे इस्तिफ़ादा करने में हाइल हो तो मुस्ताजिर इजारा फ़स्ख़ नहीं कर सकता और सिर्फ़ यह हक़ रखता है कि उस चीज़ का आम तौर पर जितना किराया बनता हो वह ग़ासिब से ले ले।
2219. अगर इजारे की मुद्दत ख़त्म होने से पहले मालिक अपना माल मुस्ताजिर के हाथ बेच डाले तो इजारा फ़स्ख़ नहीं होता और मुस्ताजिर को चाहिये कि उस चीज़ का किराया मालिक को दे और अगर (मालिक मुस्ताजिर के अलावा) उस (माल) को किसी और शख़्स के हाथ बेच दे तब भी यही हुक्म है।
2220. अगर इजारे की मुद्दत शुरुउ होने से पहले जो चीज़ इजारे पर ली है वह उस इस्तिफ़ादे के क़ाबिल न रहे जिसका तअय्युन किया गया था तो इजारा बातिल हो जाता है और मुस्ताजिर इजारे की रक़म मालिक से वापस ले सकता है और अगर सूरत यह हो कि उस माल से थोड़ा सा इस्तिफ़ादा किया जा सकता हो तो मुस्ताजिर इजारा फ़स्ख़ कर सकता है।
2221. अगर एक शख्स कोई चीज़ इजारे पर ले और वह कुछ मुद्दत गुज़रने के बाद जो इस्तिफ़ादा मुस्ताजिर के लिए तय किया गया हो उसके क़ाबिल न रहे तो बाक़ी मांदा मुद्दत के लिए इजारा बातिल हो जाता है और मुस्ताजिर गुज़री हुई मुद्दत का इजारा उजरतुल मिस्ल यअनी जितने दिन वह चीज़ इस्तेमाल की हो उतने दिनों की आम उजरत देकर इजारा फ़स्ख़ कर सकता है।
2222. अगर कोई शख़्स ऐसा मकान किराये पर दे जिसके मसलन दो कमरे हों और उनमें से एक कमरा टूट फूट जाए लेकिन इजारे पर देने वाला उस कमरे को (मरम्मत कर के) इस तरह बना दे जिसमें साबिक़ा कमरे के मुक़ाबिले में काफ़ी फ़र्क़ हो तो उसके लिए वही हुक्म है जो उससे पहले वाले वाले मस्अले में बताया गया है और अगर इस तरह न हो बल्कि इजारे पर देने वाला उसे फ़ौरन बना दे और उससे इस्तिफ़ादा करने में भी क़त्अन फ़र्क़ वाक़े न हो तो इजारा बातिल नहीं होता। और किरायेदार भी इजारे को फ़स्ख़ नहीं कर सकता लेकिन अगर कमरे की मरम्मत में क़दरे तारव़ीर हो जाए और किरायेदार उससे इस्तिफ़ादा न कर पाए तो उससे तारव़ीर की मुद्दत तक का इजारा बातिल हो जाता है। और किरायेदार चाहे तो सारी मुद्दत का इजारा भी फ़स्ख़ कर सकता है अलबत्ता जितनी मुद्दत उसने कमरे से इस्तिफ़ादा किया है उसकी उजरतुल मिस्ल दे।
2223. अगर माल किराये पर देने वाला या मुस्ताजिर मर जाए तो इजारा बातिल नहीं होता लेकिन अगर मकान का फ़ाइदा सिर्फ़ उसकी ज़िन्दगी में ही उसका हो मसलन किसी दूसरे शख़्स ने वसीयत की हो कि जब तक वह (इजारे पर देने वाला) ज़िन्दा है मकान की आमदनी उसका माल होगा तो अगर वह मकान किराये पर दे दे और इजारे की मुद्दत ख़त्म होने से पहले मर जाए तो उसके मरने के वक़्त से इजारा बातिल है और अगर मौजूदा मालिक उस इजारे की तस्दीक़ कर दे तो इजारा सहीह है और इजारे पर देने वाले की मौत के बाद इजारे की जो मुद्दत बाक़ी होगी उसकी उजरत उस शख़्स को मिलेगी जो मौजूदा मालिक हो।
2224. अगर कोई शख़्स किसी मेमार को इस मक़्सद से वकील बनाए कि वह उसके लिए कारीगर मुहैया केर तो अगर मेमार ने जो कुछ उस शख़्स से लिया है कारीगरों को उससे कम दे तो ज़ाइद माल उस पर हराम है और उसके लिए ज़रूरी है कि वह रक़म उस शख़्स को वापस कर दे लेकिन अगर मेमार अजीर बन जाए कि इमारत को मुकम्मल कर देगा और वह अपने लिए यह इख़्तियार हासिल कर ले के खुद बनायेगा या दूसरे से बनवायेगा तो उस सूरत में कि कुछ काम खुद करे और बाक़ी मांदा दूसरों से उस उजरत पर करवाए जिस पर वह खुद अजीर बना है तो ज़ाइद रक़म उस के लिए हलाल होगी।
2225. अगर रंगरेज़ वअदा करे कि मसलन कपड़ा नील से रंगेगा तो अगर वह नील के बजाय उसे किसी और चीज़ से रंग दे तो उसे उजरत लेने का कोई हक़ नहीं।
जिआला के अहकाम
2226. जिआल से मुराद यह है कि इंसान वअदा करे कि अगर एक काम उसके लिए अंजाम दिया जायेगा तो वह उसके बदले कुछ माल बतौरे इनआम देगा। मसलन यह कहे कि जो उसकी गुमशुदा चीज़ बर आमद करेगा वह उसे दस रुपये (इनआम) देगा तो जो शख़्स इस काम का वअदा करे उसे जाइल और जो शख़्स वह काम अंजाम दे उसे आमिल कहते हैं और इजारे व जिआले में बअज़ लिहाज़ा से फ़र्क़ है। उन में से एक यह है कि इजारे में सीग़ा पढ़ने के बाद अजीर के लिए ज़रूरी है कि काम अंजाम दे और जिसने उसे अजीर बनाया हो वह उजरत के लिए उसका मक़रूज़ हो जाता है लेकिन जिआला में अगरचे आमिल एक मुअय्यन शख़्स हो ताहम हो सकता है कि वह काम में मश्ग़ूल न हो। पस जब तक वह काम अंजाम न दे, जाइल उस का मक़रूज़ नहीं होता।
2227. जाइल के लिए ज़रूरी है कि बालिग़ और आक़िल हो और इनआम का वअदा अपने इरादे और इख़्तियार से करे और शरअन अपने माल में तसर्रूफ़ कर सकता हो। इस बिना पर सफ़ीह का जिआला सहीह नहीं है और बिल्कुल उसी तरह दीवालिया शख़्स का जिआला उन अमवाल में सहीह नहीं है जिनमें तसर्रूफ़ का हक़ न रखता हो।
2228. जाइल जो काम लोगों से कराना चाहता हो, ज़रूरी है कि वह हराम या बे फ़ाइदा न हो और न ही उन वाजिबात में से हो जिनका बिला मुआवज़ा बजा लाना शरअन लाज़िम हो। लिहाज़ा अगर कोई कहे कि जो शख़्स शराब पियेगा या रात के वक़्त किसी आक़िलाना मक़्सद के बग़ैर एक तारीक जगह पर जायेगा या वाजिब नमाज़ पढ़ेगा मैं उसे दस रुपये दूंगा तो जिआला सहीह नहीं है।
2229. जिस माल के बारे में मुआहदा किया जा रहा हो ज़रूरी नहीं है कि उसे उसकी पूरी ख़ुसूसीयात का ज़िक्र करके मुअय्यन किया जाए बल्कि अगर सूरते हाल यह हो कि काम करने वाले को मअलूम हो कि इस काम को अंजाम देने के लिए इक़्दाम करना हिमाक़त शुमार न होगा तो काफ़ी है। मसलन अगर जाइल यह कहे कि अगर तुमने इस माक को दस रुपये से ज़्यादा क़ीमत पर बेचा तो इज़ाफ़ी रक़म तुम्हारी होगी तो जिआला सहीह है और इसी तरह अगर जाइल यह कहे कि जो कोई मेरा घोड़ा ढ़ूढ कर लायेगा मैं उसे घोड़े में निस्फ़ शिराकत या दस मन गेहूं दूंगा तो भी जिआला सहीह है।
2230. अगर काम की उजरत मुकम्मल तौर पर मुब्हम हो मसलन जाइल यह कहे कि जो मेरा बच्चा तलाश कर देगा मैं उसे रक़म दूंगा लेकिन रक़म की मिक़्दार का तअय्युन न करे तो अगर कोई शख़्स उस काम को अंजाम दे तो ज़रूरी है कि जाइल उसे उतनी उजरत दे जितनी आम लोगों की नज़रों में उस अमल की उजरत क़रार पा सके।
2231. अगर आमिल ने जाइल के क़ौल व क़रार से पहले ही वह काम कर दिया हो या क़ौल व क़रार के बाद इस नीयत से यह काम अंजाम दे कि उसके बदले रक़म नहीं लेगा तो फिर वह उजरत का हक़दार नहीं।
2232. इससे पहले कि आमिल काम शुरुउ करे जाइल जिआला को मंसूख कर सकता है।
2233. जब आमिल ने काम शुरुउ कर दिया हो अगर उसके बाद जाइल जिआला मंसूख करना चाहे तो इसमें इश्काल है।
2234. आमिल काम को अधूरा छोड़ सकता है लेकिन अगर काम अधूरा छोड़ने पर जाइल को या जिस शख़्स के लिए यह काम अंजाम दिया जा रहा है कोई नुक़्सान पहुंचता हो तो ज़रूरी है कि काम को मुकम्मल करे। मसलन अगर कोई शख़्स कहे कि जो कोई मेरी आंख का इलाज कर दे मैं उसे इस क़दर मुआवज़ा दूंगा और डाक्टर उसकी आंख का आपरेशन कर दे और सूरत यह हो कि अगर वह इलाज मुकम्मल न करे तो आंख में ऐब पैदा हो जाए तो ज़रूरी है कि अपना अमल तक्मील तक पहुंचाए और अगर अधूरा छोड़ दे तो जाइल से उजरत लेने का उसे कोई हक़ नहीं।
2235. अगर आमिल काम अधूरा छोड़ दे और वह काम ऐसा हो जैसे घोड़ा तलाश करना कि जिसके मुकम्मल किये बग़ैर उजरत का कोई फ़ाइदा न हो तो आमिल जाइल से किसी चीज़ का मुतालबा नहीं कर सकता। और अगर जाइल उजरत को काम मुकम्मल करने से मशरूत कर दे तब भी यही हुक्म है। मसलन वह कहे कि जो मेरा लिबास सियेगा मैं उसे दस रुपये दूंगा लेकिन अगर उसकी मुराद यह हो कि जितना काम किया जायेगा उतनी उजरत देगा तो फिर जाइल को चाहिये कि जितना काम हुआ हो उतनी उजरत आमिल को दे दे अगरचे एहतियात यह है कि दोनों मुसालहत के तौर पर एक दूसरे को राज़ी कर लें।
मुज़ारआ के अहकाम
2236. मुज़ारआ की चन्द क़िस्में हैं। उन में से एक यह है कि (ज़मीन का) मालिक काश्तकार (मुज़ारे) से मुआहदा कर के अपनी ज़मीन उसके इख़्तियार में दे ताकि वह उसमें काश्तकारी करे और पैदावार का कुछ हिस्सा मालिक को दे।
2237. मुज़ारआ की चन्द शराइत हैं—
1. ज़मीन का मालिक काश्तकार से कहे कि मैंने ज़मीन तुम्हे खेती बाड़ी के लिए दी है और काश्तकार भी कहे कि मैंने क़बूल की है या बग़ैर इसके कि ज़बानी कुछ कहें मालिक काश्तकार को खेती बाड़ी के इरादे से ज़मीन दे दे और काश्तकार क़बूल कर ले।
2. ज़मीन का मालिक और काश्तकार दोनों बालिग़ और आक़िल हों और बंटाई का मुआहदा अपने इरादे और इख़तियार से करें और सफ़ीह न हों। और इसी तरह ज़रूरी है कि मालिक दीवालिया न हो। लेकिन अगर काश्तकार दीवालिया हो और उसका मुज़ारआ करना उन अमवाल में तसर्रूफ़ न कह लाए जिनमें उसे तसर्रूफ़ करना मनअ था तो ऐसी सूरत में कोई इश्काल नहीं।
3. मालिक और काश्तकार में से हर एक ज़मीन की पैदावार में से कुछ हिस्सा निस्फ़ या एक तिहाई वग़ैरा ले ले। लिहाज़ा अगर कोई भी अपने लिए कोई हिस्सा मुक़र्रर न करे या मसलन मालिक कहे कि इस ज़मीन में खेती बाड़ी करो और जो तुम्हारा जी चाहे मुझे दे देना तो यह दुरुस्त नहीं है और इसी तरह अगर पैदावार की एक मुअय्यन मिक़्दार दस मन काश्तकार या मालिक के लिए मुक़र्रर कर दी जाए तो यह भी सहीह नहीं है।
4. एहतियात की बिना पर हर एक का हिस्सा ज़मीन की पूरी पैदावार में मुश्तरक हो। अगरचे अज़हर यह है कि यह शर्त मोतबर नहीं है। इसी बिना पर अगर मालिक कहे कि इस ज़मीन में खेती बाड़ी करो और ज़मीन की पैदावार का पहला आधा हिस्सा जितना भी हो तुम्हारा होगा और दूसरा आधा हिस्सा मेरा तो मुज़ारआ सहीह है।
5. जितनी मुद्दत के लिए ज़मीन काश्तकार के क़ब्ज़े में रहनी चाहिए उसे मुअय्यन कर दे और ज़रूरी है कि वह मुद्दत इतनी हो कि उस मुद्दत में पैदावार हासिल होना मुम्किन हो और अगर मुद्दत की इब्तिदा एक मखसूस दिन से और मुद्दत का इख़तिताम पैदावार मिलने को मुक़र्रर कर दे तो काफ़ी है।
6. ज़मीन क़ाबिले काश्त हो। और अगर उसमें अभी काश्त करना मुम्किन न हो लेकिन ऐसा काम किया जा सकता हो जिस से काश्त मुम्किन हो जाए तो मुज़ारआ सहीह है।
7. काश्तकार जो चीज़ काश्त करना चाहे, ज़रूरी है कि उसको मुअय्यन कर दिया जाए। मसलन मुअय्यन करे कि चावल है या गेहूं और अगर चावल है तो कौन सी क़िस्म का चावल है। लेकिन अगर किसी मख़सूस क़िस्म की काश्त पेशे नज़र न हो तो उसका मुअय्यन करना ज़रूरी नहीं है इसी तरह अगर कोई मख़सूस चीज़ पेशे नज़र हो और उसका इल्म हो तो लाज़िम नहीं है कि उसकी वज़ाहत भी करे।
8. मालिक ज़मीन को मुअय्यन कर दे। यह शर्त उस सूरत में है जबकि मालिक के पास ज़मीन के चन्द क़तआत हों और उन क़त्आत के लवाज़िमे काश्तकारी में फ़र्क़ हो। लेकिन अगर उन में कोई फ़र्क़ न हो तो ज़मीन को मुअय्यन करना लाज़िम नहीं है। लिहाज़ा अगर मालिक काश्तकार से कहे कि ज़मीन के इन क़त्आत में से किसी एक में खेती बाड़ी करो और उस क़त् ए को मुअय्यन न करे तो मुज़ारआ सहीह है।
9. जो ख़र्च उनमें से हर एक को करना ज़रूरी हो उसे मुअय्यन कर दें लेकिन जो खर्च हर एक को करना ज़रूरी हो अगर उसका इल्म हो तो फिर उसकी वज़ाहत करना लाज़िम नहीं।
2238. अगर मालिक काश्तकार से तय करे कि पैदावार की कुछ मिक़्दार एक की होगी और जो बाक़ी बचेगा उसे वह आपस में तक़्सीम कर लेंगे तो मुज़ारआ बातिल है अगरचे उन्हें इल्म हो कि इस मिक़्दार को अलाहदा करने के बाद कुछ न कुछ बाक़ी बच जायेगा। हां अगर आपस में यह तय कर लें कि बीज की जो मिक़्दार काश्त की गई है या टैक्स की जो मिक़्दार हुकूमत लेती है वह पैदावार से निकाली जायेगी और जो बाक़ी बचेगा उसे दोनों के दरमियान तक़्सीम किया जायेगा तो मुज़ारआ सहीह है।
2239. अगर मुज़ारआ के लिए कोई मुद्दत मुअय्यन की हो कि जिसमें उमूमन पैदावार दस्तयाब हो जाती है लेकिन अगर इत्तिफ़ाक़न मुअय्यन मुद्दत ख़त्म हो जाए और पैदावार दस्तयाब न हुई हो तो अगर मुद्दत मुअय्यन करते वक़्त यह बात भी शामिल थी यअनी दोनों इस बात पर राज़ी थे कि मुद्दत ख़त्म होने के बाद अगरचे पैदावार दस्तयाब न हो मुज़ारआ ख़त्म हो जायेगा तो उस सूरत में अगर मालिक इस बात पर राज़ी हो कि उजरत या बग़ैर उजरत फ़स्ल उसकी ज़मीन में खड़ी रहे और काश्तकार भी राज़ी हो तो कोई हरज नहीं और अगर मालिक राज़ी न हो तो काश्तकार को मजबूर कर सकता है कि फ़स्ल ज़मीन में से काट ले और अगर फ़स्ल काट लेने से काश्तकार को कोई नुक़्सान पहुंचे तो लाज़िम नहीं कि मालिक उसे उसका एवज़ दे लेकिन अगरचे काश्तकार मालिक को कोई चीज़ देने पर राज़ी हो तब भी वह मालिक को मजबूर नहीं कर सकता कि वह फ़स्ल अपनी ज़मीन पर रहने दे।
2240. अगर कोई ऐसी सूरत पेश आ जाए कि ज़मीन में खेती बाड़ी करना मुम्किन न हो मसलन ज़मीन का पानी बन्द हो जाए तो मुज़ारआ खत्म हो जाता है और अगर काश्तकार बिला वजह खेती बाड़ी न करे तो अगर जम़ीन उसके तसर्रूफ़ में रही हो और मालिक का उसमें कोई तसर्रूफ़ न रहा हो तो ज़रूरी है कि आम शर्ह के हिसाब से उस मुद्दत का किराया मालिक को दे।
2241. ज़मीन का मालिक और काश्तकार एक दूसरे की रज़ामन्दी के बग़ैर मुज़ारआ (का मुआहदा मंसूख नहीं कर सकते। लेकिन अगर मुज़ारआ के मुआहदे के सिलसिले में उन्होंने शर्त की हो कि उनमें से दोनों को या किसी एक को मुआमला फ़स्ख़ करने का हक़ हासिल होगा तो जो मुआहदा उन्होंने कर रखा हो उसके मुताबिक़ मुआमला फ़स्ख़ कर सकते हैं। इसी तरह अगर उन दोनों में से एक फ़रीक़ तय शुदा शराइत के ख़िलाफ़ अमल करे तो दूसरा फ़रीक़ मुआमला फ़स्ख़ कर सकता है।
2242. अगर मुज़ारआ के मुआहदे के बाद मालिक या काश्तकार मर जाए तो मुज़ारआ मंसूख नहीं हो जाता बल्कि उनके वारिस उनकी जगह ले लेते हैं। लेकिन अगर काश्तकार मर जाए और उन्होंने मुज़ारआ में यह शर्त रखी थी कि काश्तकार खुद काश्त करेगा तो मुज़रआ मंसूख हो जाता है। लेकिन अगर जो काम उसके ज़िम्मे थे वह मुकम्मल हो गाए हों तो उस सूरत में मुज़ारआ मंसूख नहीं होता और उसका हिस्सा उसके वरसा को देना ज़रूरी है। और जो दूसरे हुक़ूक़ काश्तकार को हासिल हों वह भी उसके वरसा को मीरास में मिल जाते हैं और वरसा मालिक को इस बात पर मजबूर कर सकते हैं कि मुज़ारआ खत्म होने तक फ़स्ल उसकी ज़मीन में खड़ी रहे।
2243. अगर काश्त के बाद पता चले कि मुज़ारआ बातिल था तो अगर जो बीज डाला गया हो वह मालिक का माल हो तो जो फ़स्ल हाथ आयेगी वह भी उसी का माल होगी और ज़रूरी है कि काश्तकार की उजरत और जो कुछ उसने ख़र्च किया हो और काश्तकार के ममलूका जिन बैलों और दूसरे जानवरों ने ज़मीन पर काम किया हो और उनका किराया काश्तकार को दे। और अगर बीज काश्तकार का माल हो तो फ़स्ल भी उसी का माल है और ज़रूरी है कि ज़मीन का किराया और जो कुछ मालिक ने ख़र्च किया हो और उन बैलों और दूसरे जानवरों का किराया जो मालिक का माल हो और जिन्होंने उस ज़िराअत पर काम किया हो मालिक को दे। और दोनों सूरतों में आम तौर पर जो हक़ बनता हो अगर उसकी मिक़्दार तयशुदा मिक़्दार से ज़्यादा हो और दूसरे फ़रीक़ को उसका इल्म हो तो ज़्यादा मिक़्दार देना वाजिब नहीं।
2244. अगर बीज काश्तकार का माल हो और काश्त के बाद फ़रीक़ैन को पता चले कि मुज़ारआ बातिल था तो अगर मालिक और काश्तकार रज़ामन्द हों कि उज़रत पर या बिला उजरत फ़स्ल ज़मीन पर खड़ी रहे तो कोई इश्काल नहीं है और अगर मालिक राज़ी न हो तो (उलमा के) एक गुरोह ने कहा है कि फ़स्ल पकने से पहले ही वह काश्तकार को मजबूर कर सकता है कि उसे काट ले और अगरचे काश्तकार इस बात पर तैयार हो कि वह मालिक को कोई चीज़ दे दे तब भी वह उसे फ़स्ल अपनी ज़मीन में रहने देने पर मजबूर नहीं कर सकता लेकिन यह क़ौल इश्काल से खाली नहीं है और किसी भी सूरत में मालिक काश्तकार को मजबूर नहीं कर सकता कि वह किराया दे कर फ़स्ल उसकी ज़मीन में खड़ी रहने दे हत्ता कि उससे ज़मीन का किराया तलब न करे (तब भी फ़स्ल खड़ी रहने पर मजबूर नहीं कर सकता)।
2245. अगर खेत की पैदावार जमा करने और मुज़ारआ की मीआद ख़त्म होने के बाद खेत की जड़ें ज़मीन में रह जायें और दूसरे साल सर सब्ज़ हो जायें और पैदावार दें तो अगर मालिक ने काश्तकार के साथ ज़िराअत की जड़ों में इश्तिराक का मुआहदा न किया हो तो दूसरे साल की पैदावार बीज के मालिक का माल है।
मुसाक़ात और मुग़ारसा के अहकाम
2246. अगर इंसान किसी के साथ इस क़िस्म का मुआहदा करे मसलन फलदार दरख़्तों को जिनका फल खुद उसका माल हो या उस फल पर उसका इख़्तियार हो एक मुक़र्ररा मुद्दत के लिए किसी दूसरे शख़्स के सिपुर्द कर दे ताकि वह उनकी निगाहदाश्त करे और उन्हें पानी दे और जितनी मिक़्दार वह आपस में तय करें उसके मुताबिक़ वह उन दरख़्तों का फल ले लें तो ऐसा मुआमला मुसाक़ात (आबयारी) कहलाता है।
2247. जो दरख़्त फल नहीं देते अगर उनकी कोई दूसरी पैदावार हो मसलन पत्ते और फूल हों कि जो कुछ न कुछ मालियत रखते हों मसलन मेंहदी (और पान) के दरख्त कि उसके पत्ते काम आते हैं, उनके लिए मुसाक़ात का मुआमला सहीह है।
2248. मुसाक़ात के मुआमले में सीग़ा पढ़ना लाज़िम नहीं बल्कि अगर दरख़्त का मालिक मुसाक़ात की नीयत से उसे किसी के सिपुर्द कर दे और जिस शख़्स को काम करना हो वह भी उसी नीयत से काम में मश्ग़ूल हो जाए तो मुआमला सहीह है।
2249. दरख़्तों का मालिक और जो शख़्स दरख़्तों की निगाहदाश्त की ज़िम्मेदारी ले ज़रूरी है कि दोनों बालिग़ और आक़िल हों और किसी ने उन्हें मुआमला करने पर मजबूर न किया हो नीज़ यह भी ज़रूरी है कि सफ़ीह न हों। इसी तरह ज़रूरी है कि मालिक दीवालिया न हो। लेकिन अगर बाग़बान दीवालिया हो और मुसाक़ात का मुआमला करने की सूरत में उन अम्वाल में तसर्रूफ़ करना लाज़िम न आए जिनमें तसर्रूफ़ करने से उसे रोका गया हो तो कोई इश्काल नहीं है।
2250. मुसाक़ात की मुद्दत मुअय्यन होनी चाहिए। और इतनी मुद्दत होना ज़रूरी है कि जिसमें पैदावार का दस्तयाब होना मुम्किन हो। और अगर फ़रीक़ैन उस मुद्दत की इब्तिदा मुअय्यन कर दें और उसका इख़्तिताम उस वक़्त को क़रार दें जब उसकी पैदावार दस्तयाब हो तो मुआमला सहीह है।
2251. ज़रूरी है कि हर फ़रीक़ का हिस्सा पैदावार का आधा या तिहाई या उसी की मानिन्द हो और अगर यह मुआहदा करें कि मसलन सौ मन मेवा मालिक का और बाक़ी काम करने वाले का होगा तो मुआमला बातिल है।
2252. लाज़िम नहीं है कि मुसाक़ात का मुआमला पैदावार ज़ाहिर होने से पहले तय कर लें। बल्कि अगर पैदावार ज़ाहिर होने के बाद मुआमला करें और कुछ काम बाक़ी रह जाए जो कि पैदावार में इज़ाफ़े के लिए या उसकी बेहतरी या उसे नुक़्सान से बचाने के लिए ज़रूरी हो तो मुआमला सहीह है। लेकिन अगर इस तरह के कोई काम बाक़ी न रहे हों कि जो आबयारी की तरह दरख़्त की परवरिश के लिए ज़रूरी हैं या मेवा तोड़ने या उसकी हिफ़ाज़त जैसे कामों में से बाक़ी रह जाते हैं तो फिर मुसाक़ात के मुआमले का सहीह होना महल्ले इश्काल है।
2253. खरबूज़े और खीरे वग़ैरा की बेलों के बारे में मुसाक़ात का मुआमला बिनाबरे अज़्हर सहीह है।
2254. जो दरख़्त बारिश के पानी या ज़मीन की नमी से इस्तिफ़ादा करता हो और जिसे आबपाशी की ज़रूरत न हो अगर उसे मसलन दूसरे ऐसे कामों की ज़रूरत हो जो मस्अला 2252 में बयान हो चुके हैं तो उन कामों के बारे में मुसाक़ात का मुआमला करना सहीह है।
2255. दो अफ़राद जिन्होंने मुसाक़ात की हो बाहमी रज़ामन्दी से मुआमला फ़स्ख़ कर सकते हैं और अगर मुसाक़ात के मुआहदे के सिलसिले में यह शर्त तय करें कि उन दोनों को या उनमें से किसी एक को मुआमला फ़स्ख़ करने का हक़ होगा तो उनके तय कर्दा मुआहदे के मुताबिक़ मुआमला फ़स्ख़ करने में कोई इश्काल नहीं और अगर मुसाक़ात के मुआमले में कोई शर्त तय करें और उस शर्त पर अमल न हो तो जिस शख़्स के फ़ाइदे के लिए वह शर्त तय की गई हो वह मुआमला फ़स्ख़ कर सकता है।
2256. अगर मालिक मर जाए तो मुसाक़ात का मुआमला फ़स्ख़ नहीं होता बल्कि उसके वारिस उसकी जगह पाते हैं।
2257. दरख़्तों की पर्वरिश जिस शख़्स के सिपुर्द की गई हो अगर वह मर जाए और मुआहदे में यह क़ैद और शर्त आइद न की गई हो कि वह खुद दरख़्तों की पर्वरिश करेगा तो उसके परसा उसकी जगह ले लेते हैं और अगर वरसा न खुद दरख़्तों की पर्वरिश का काम अंजाम दें और न ही उस मक़्सद के लिए किसी को अजीर मुक़र्रर करें तो हाकिमे शर्अ मुर्दे के माल से किसी को अजीर मुक़र्रर कर देगा और जो आमदनी होगी उसे मुर्दे के वरसा और दरख़्तों के मालिक के माबैन तक़्सीम कर देगा और अगर फ़रीक़ैन ने मुआमले में यह क़ैद लगाई हो कि वह शख़्स खुद दरख़्तों की पर्वरिश करेगा तो उसके मरने के बाद मुआमला फ़स्ख़ हो जायेगा।
2258. अगर यह शर्त तय की जाए कि तमाम पैदावार मालिक का मालिक होगी तो मुसाक़ात बातिल है लेकिन ऐसी सूरत में पैदावार मालिक का माल होगा और जिस शख़्स ने काम किया हो वह उजरत का मुतालबा नहीं कर सकता लेकिन अगर मुसाक़ात किसी और वजह से बातिल हो तो ज़रूरी है कि मालिक आबयारी और दूसरे काम करने की उजरत दरख़्तों की निगहदाश्त करने वाले को मअमूल के मुताबिक़ दे लेकिन अगर मअमूल के मुताबिक़ उजरत तय शुदा उजरत से ज़्यादा हो और वह उससे मुत्तेलअ हो तो तय शुदा उजरत से ज़्यादा देना लाज़िम नहीं।
2259. मुग़ारसा यह है कि कोई शख़्स ज़मीन दूसरे को सिपूर्द कर दे ताकि वह दरख़्त लगाए और जो कुछ हासिल हो वह दोनों का माल हो तो बिना बरे अज़्हर यह मुआमला सहीह है अगरचे एहतियात यह है कि ऐसे मुआमले को तर्क करे। लेकिन उस मुआमले के नतीजे पर पहुंचने के लिए कोई और मुआमला अंजाम दे तो बग़ैर इश्काल के वह मुआमला सहीह है, मसलन फ़रीक़ैन किसी तरह बाहम सुल्ह और इत्तिफ़ाक़ कर लें या नए दरख़्त लगाने में शरीक हो जायें फिर बाग़बान अपनी ख़िदमात मालिके ज़मीन को बीज बोने, दरख़्तों की निगहदाश्त और आबयारी करने के लिए एक मुअय्यन मुद्दत तक ज़मीन की पैदावार के निस्फ़ फ़ाइदे के एवज़ किराये पर पेश करे।
वह अश्ख़ास जो अपने माल में तसर्रूफ़ नहीं कर सकते
2260. जो बच्चा बालिग़ न हुआ हो वह अपनी ज़िम्मेदारी और अपने माल में शरअन तसर्रूफ़ नहीं कर सकता अगरचे अच्छे और बुरे को समझने में हद्दे कमाल और रूश्त तक पहुंच गया हो और सरपरस्त की इजाज़त इस बारे में कोई फ़ाइदा नहीं रखती। लेकिन चन्द चीज़ों में बच्चे का तसर्रूफ़ करना सहीह है उन में से कम क़ीमत वाली चीज़ों की ख़रीद व फ़रोख़्त करना है जैसे कि मसअला 2090 में गुज़र चुका है। इसी तहर बच्चे का अपने ख़ूनी रिश्तेदारों और क़रीबी रिश्तेदारों के लिए वसीयत करना, जिसका बयान मस्अला 2706 में आयेगा। लड़की में बालिग़ होने की अलामत यह हैं कि वह नौ क़मरी साल पूरे कर ले और लड़के के बालिग़ होने की अलामत तीन चीज़ों में से एक होती है।
1. नाफ़ के नीचे और शर्मगाह से ऊपर सख़्त बालों का उगना।
2. मनी का खारिज होना।
3. बिनाबर मश्हूर उम्र के पन्द्रह क़मरी साल पूरे करना।
2261. चेहरे पर और होंठों के ऊपर सख़्त बालों का उगना बईद नहीं कि बुलूग़त की अलामत हों, लेकिन सीने पर और बग़ल के नीचे बालों का उगना और आवाज़ का भारी हो जाना और ऐसी ही दूसरी अलामत बुलूग़त की निशानियां नहीं है मगर उनकी वजह से इंसान बालिग़ होने का यक़ीन करे।
2262. दीवाना अपने माल में तसर्रूफ़ नहीं कर सकता। इसी तरह दीवालिया यअनी वह शख़्स जिसे उसके क़र्ज़ख़्वाहों के मुतालबे पर हाकिमे शर्अ ने अपने माल में तसर्रूफ़ करने से मनअ कर दिया हो क़र्ज़ख़्वाहों की इजाज़त के बग़ैर उस माल में तसर्रूफ़ नहीं कर सकता और इसी तरह सफ़ीह यअनी वह शख़्स जो अपना माल अहमक़ाना और फ़ुज़ूल कामों में खर्च करता हो, सरपरस्त की इजाज़त के बग़ैर अपने माल में तसर्रूफ़ नहीं कर सकता।
2263. जो शख़्स कभी आक़िल और कभी दीवाना हो जाए उसका दीवांगी की हालत में अपने माल में तसर्रूफ़ करना सहीह नहीं है।
2264. इंसान को इख़्तियार है कि मरज़ुल मौत के आलम में अपने आप पर या अपने अहलोअयान और मेहमानों पर और उन कामों पर जो फ़ुज़ूल खर्ची में शुमार न हों जितना चाहे सर्फ़ करे। और अगर अपने माल को उसकी (अस्ल) क़ीमत पर फ़रोख़्त करे या किराए पर दे तो कोई इश्काल नहीं है। लेकिन अगर मसलन अपना माल किसी को बख़्श दे या राइज क़ीमत से सस्ता फ़रोख़्त करे तो जितनी मिक़्दार उसने बख़्श दी है या जितनी सस्ती फ़रोख़्त की है अगर वह उसके माल की तिहाई के बराबर या उससे कम हो तो उसका तसर्रूफ़ करना सहीह है। और अगर एक तिहाई से ज़्यादा हो तो वरसा की इजाज़त देने की सूरत में उसका तसर्रूफ़ करना सहीह है। और अगर वरसा इजाज़त न दें तो तिहाई से ज़्यादा में उसका तसर्रूफ़ बातिल है।
वकालत के अहकाम
वकालत से मुराद यह है कि वह काम जिसे इंसान खुद करने का हक़ रखता हो, जैसे कोई मुआमला करना, उसे दूसरे के सिपुर्द कर दे ताकि वह उसकी तरफ़ से वह काम अंजाम दे मसलन किसी को अपना वकील बनाए ताकि वह उसका मकान बेच दे या किसी औरत से उसका अक़्द कर दे। लिहाज़ा सफ़ीह चूंकि अपने माल में तसर्रूफ़ करने का हक़ नहीं रखता इस लिए वह मकान बेचने के लिए किसी को वकील नहीं बना सकता।
2265. वकालत में सीग़ा पढ़ना लाज़िम नहीं बल्कि अगर इंसान दूसरे शख़्स को समझा दे कि उसने उसे वकील मुक़र्रर किया है और वह भी समझा दे कि उसने वकील बनना क़बूल कर लिया है मसलन एक शख़्स अपना माल दूसरे को दे ताकि वह उसे उसकी तरफ़ से बेच दे और दूसरा शख़्स वह माल ले ले तो वकालत सहीह है।
2266. अगर इंसान एक ऐसे शख़्स को वकील मुक़र्रर करे जिसकी रहाइश दूसरे शहर में हो और उसको वकालतनामा भेज दे और वह वकालतनामा क़बूल कर ले तो अगरचे वकालत नामा उसे कुछ अर्से बाद ही मिले फिर भी वकालत सहीह है।
2267. मुवक्किल यअनी वह शख़्स जो दूसरे को वकील बनाए और वह शख़्स जो वकील बने ज़रूरी है कि दोनों आक़िल हों और (वकील बनाने और वकील बनने का) इक़्दाम क़स्द और इख़्तियार से करें और मुवक्किल के मुआमले में बुलूग़ भी मोतबर है। मगर उन कामों में जिनको मुमैयज़ बच्चे का अंजाम देना सहीह है (उनमें बुलूग़ शर्त नहीं है)।
2268. जो काम इंसान अंजाम न दे सकता हो या शरअन अंजाम देना ज़रूरी न हो उसे अंजाम देने के लिए वह दूसरे का वकील नहीं बन सकता। मसलन जो शख़्स हज का अहराम बांध चुका हो चूंकि उसे निकाह का सीग़ा नहीं पढ़ना चाहिए इस लिए वह सीग़ा ए निकाह पढ़ने के लिए दूसरे का वकील नहीं बन सकता।
2269. अगर कोई शख़्स अपने तमाम काम का तअय्युन न करे तो वकालत सहीह नहीं है। हां अगर वकील को चन्द कामों में से एक काम जिसका वह खुद इंतिखाब करे अंजाम देने के लिए वकील बनाए मसलन उसको वकील बनाए कि या उसका घर फ़रोख़्त करे या किराये पर दे तो वकालत सहीह है।
2270. अगर (मुवक्किल) वकील को मअज़ूल कर दे यअनी जो काम उसके ज़िम्मे लगाया हो उससे बरतरफ़ कर दे तो वकील अपनी मअज़ूली की ख़बर मिल जाने के बाद उस काम को (मुवक्किल की जानिब से) अंजाम नहीं दे सकता लेकिन मअज़ूली की ख़बर मिलने से पहले उसने वह काम कर दिया हो तो सहीह है।
2271. मुवक्किल ख़्वाह मौजूद न हो वकील खुद को वकालत से कनारा कश कर सकता है।
2272. जो काम वकील के सिपुर्द किया गया हो, उस काम के लिए वह किसी दूसरे शख़्स को वकील मुक़र्रर नहीं कर सकता लेकिन अगर मुवक्किल ने उसे इजाज़त न दी हो कि किसी को वकील मुक़र्रर करे तो जिस तरह उसने हुक्म दिया है उसी तरह वह अमल कर सकता है लिहाज़ा अगर उसने कहा हो कि मेरे लिए एक वकील मुक़र्रर करो तो ज़रूरी है कि उसकी तरफ़ से वकील मुक़र्रर करे लेकिन अज़ खुद किसी को वकील मुक़र्रर नहीं कर सकता।
2273. अगर वकील मुवक्किल की इजाज़त से किसी को उसकी तरफ़ से वकील मुक़र्रर करे तो पहला वकील दूसरे वकील को मअज़ूल नहीं कर सकता और अगर पहला वकील मर जाए या मुवक्किल उसे मअज़ूल कर दे तब भी दूसरे वकील की वकालत बातिल नहीं होती।
2274. अगर वकील मुवक्किल की इजाज़त से किसी को खुद अपनी तरफ़ से वकील मुक़र्रर करे तो मुवक्किल और पहला वकील उस वकील को मअज़ूल कर सकते हैं और अगर पहला वकील मर जाए या मअज़ूल हो जाए तो दूसरी वकालत बातिल हो जाती है।
2275. अगर (मुवक्किल) किसी काम के लिए चन्द अश्ख़ास को वकील मुक़र्रर करे और उन से कहे कि उनमें से हर एक ज़ाती तौर पर उस काम को करे तो उन में से हर एक उस काम को अंजाम दे सकता है और अगर उनमें से एक मर जाए तो दूसरों की वकालत बातिल नहीं होती, लेकिन अगर यह कहा हो कि सब मिल कर अंजाम दें तो उनमें से कोई तन्हा उस काम को अंजाम नहीं दे सकता और अगर उनमें से एक मर जाए तो बाक़ी अश्ख़ास की वकालत बातिल हो जाती है।
2276. अगर वकील या मुवक्किल मर जाए तो वकालत बातिल हो जाती है। नीज़ जिस चीज़ में तसर्रूफ़ के लिए किसी शख़्स को वकील मुक़र्रर किया जाए अगर वह चीज़ तलफ़ हो जाए मसलन जिस भेड़ को बेचने के लिए किसी को वकील मुक़र्रर किया गया हो अगर वह भेड़ मर जाए तो वकालत बातिल हो जायेगी। लेकिन अगर कभी कभी दीवांगी और बेहवासी का दौरा पड़ता हो तो वकालत का बातिल होना दीवांगी और बेहवासी की मुद्दत में हत्ताकि दीवांगी और बेहवासी खत्म होने के बाद भी मुत्लक़न महल्ले इश्काल है।
2277. अगर इंसान किसी को अपने काम के लिए वकील मुक़र्रर करे और उसे कोई चीज़ देना तय करे तो काम की तक्मील के बाद ज़रूरी है कि जिस चीज़ का देना तय किया हो वह उसे दे दे।
2278. जो माल वकील के इख़्तियार में हो अगर वह उसकी निगहदाश्त में कोताही बरते या जिस तसर्रूफ़ की उसे इजाज़त दी गई हो उसके अलावा कोई तसर्रूफ़ उसमें न करे और इत्तिफ़ाक़न वह माल तलफ़ हो जाए तो उसके लिए उसका एवज़ देना ज़रूरी नहीं।
2279. जो माल वकील के इख़्तियार में हो अगर वह उसकी निगहदाश्त में कोताही बरते या जिस तसर्रूफ़ की उसे इजाज़त दी गई हो उससे तजावुज़ करे और वह माल तलफ़ हो जाए तो वह (वकील) ज़िम्मेदार है। लिहाज़ा जिस लिबास के लिए उसे कहा जाए कि उसे बेच दो अगर वह उसे पहन ले और वह लिबास तलफ़ हो जाए तो ज़रूरी है कि उसका एवज़ दे।
2280. अगर वकील को माल में जिस तसर्रूफ़ की इजाज़त दी गई हो उसके अलावा कोई तसर्रूफ़ करे मसलन उसे जिस लिबास के बेचने के लिए कहा जाए वह उसे पहन ले और बाद में वह तसर्रूफ़ करे जिसकी उसे इजाज़त दी गई हो तो तसर्रूफ़ सहीह है।
क़र्ज़ के अहकाम
मोमिनीन को ख़ुसूसन ज़रूरत मन्द मोमिनीन को क़र्ज़ देना उन मुस्तहब कामों में से है जिनके मुतअल्लिक़ अहादीस में काफ़ी ताकीद की गई है। रसूले अकरम स्वल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम से रिवायत है, जो शख़्स अपने मुसलमान भाई को क़र्ज़ दे उसके माल में बरकत होती है और मलाइका उस पर (खुदा की) रहमत बरसाते हैं और अगर वह मक़रूज़ से नर्मी बरते तो बग़ैर हिसाब के और तेज़ी से पुले सिरात पर से गुज़र जायेगा और किसी शख़्स से उसका मुसलमान भाई क़र्ज़ मांगे और वह न दे तो बिहिश्त उस पर हराम हो जाती है।
2281. क़र्ज़ में सीग़ा पढ़ना लाज़िम नहीं बल्कि अगर एक शख़्स दूसरे को कोई चीज़ क़र्ज़ की नीयत से दे और दूसरा भी उसी नीयत से ले तो क़र्ज़ सहीह है।
2282. जब भी मक़रूज़ अपना क़र्ज़ा अदा करे तो क़र्ज़ ख़्वाह को चाहिए कि उसे क़बूल कर ले। लेकिन अगर क़र्ज़ अदा करने के लिए क़र्ज़ ख़्वाह के कहने से या दोनों के कहने से एक मुद्दत मुक़र्रर की हो तो उस सूरत में क़र्ज़ख़्वाह उस मुद्दत के ख़त्म होने से पहले अपना क़र्ज़ वापस लेने से इंकार कर सकता है।
2283. अगर क़र्ज़ के सीग़े में क़र्ज़ की वापसी की मुद्दत मुअय्यन कर दी जाए और मुद्दत का तअय्युन मक़रूज़ की दर्ख़्वास्त पर हो या जानिबैन की दर्ख़्वास्त पर क़र्ज़ख़्वाह उस मुअय्यन मुद्दत के ख़त्म होने से पहले क़र्ज़ की अदायगी का मुतालबा नहीं कर सकता। लेकिन अगर मुद्दत का तअय्युन क़र्ज़ख़्वाह की दर्ख़्वास्त पर हुआ हो या क़र्ज़े की वापसी के लिए कोई मुद्दत मुअय्यन न की गई हो तो क़र्ज़ख़्वाह जब भी चाहे अपने क़र्ज़ क अदायगी का मुतालबा कर सकता है।
2284. अगर क़र्ज़ख़्वाह अपने क़र्ज़ की अदायगी का मुतालबा करे और मक़रूज़ क़र्ज़ अदा कर सकता हो तो उसे चाहिए कि फ़ौरन अदा करे और अगर अदायगी में ताख़ीर करे तो गुनाहगार है।
2285. अगर मक़रूज़ के पास एक घर कि जिसमें वह रहता हो और घर के अस्बाब और उन लवाज़िमात कि जिनकी उसे ज़रूरत हो और उनके बग़ैर उसे परीशानी हो और कोई चीज़ न हो तो क़र्ज़ख़्वाह उससे क़र्ज़ की अदायगी का मुतालबा नहीं कर सकता। बल्कि उसे चाहिए कि सब्र करे हत्ताकि मक़रूज़ क़र्ज़ अदा करने के क़ाबिल हो जाए।
2286. जो शख़्स मक़रूज़ हो और अपना क़र्ज़ा अदा न कर सकता हो तो अगर वह कोई ऐसा काम काज कर सकता हो जो उसकी शायाने शान हो तो एहतियाते वाजिब यह है कि काम काज करे और अपना क़र्ज़ अदा करे। बिलख़ुसूस ऐसे शख़्स के लिए जिसके लिए काम करना आसान हो या उसका पेशा ही काम काज करना हो बल्कि उस सूरत में काम का वाजिब होना क़ुव्वत से खाली नहीं।
2287. जिस शख़्स को अपना क़र्ज़ख़्वाह न मिल सके और मुस्तक़बिल मे उसके या उसके वारिस के मिलने की उम्मीद भी न हो तो ज़रूरी है कि वह क़र्ज़े का माल क़र्ज़ख़्वाह की तरफ़ से फ़क़ीर को दे दे और एहतियात की बिना पर ऐसा करने की इजाज़त हाकिमे शर्अ से ले ले और अगर उसका क़र्ज़ख़्वाह सैयिद न हो तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि क़र्ज़े का माल सैयिद फ़क़ीर को न दे। लेकिन अगर मक़रूज़ को क़र्ज़ख़्वाह या उसके वारिस के मिलने की उम्मीद हो तो ज़रूरी है कि इंकार करे और उसको तलाश करे और अगर वह न मिले तो वसीयत करे कि अगर वह मर जाए और क़र्ज़ख़्वाह या उसका वारिस मिल जाए तो उसका क़र्ज़ उसके माल से अदा किया जाए।
2288. अगर किसी मैयित का माल उसके कफ़न या दफ़्न के वाजिब अखराजात और क़र्ज़ से ज़्यादा न हो तो उसका माल उन्हीं उमूर पर ख़र्च करना ज़रूरी है और उसके वारिस को कुछ नहीं मिलेगा।
2289. अगर कोई शख़्स सोने या चांदी के सिक्के वग़ैरा क़र्ज़ ले और बाद में उन की क़ीमत कम हो जाए तो अगर वह वही मिक़्दार जो उसने ली थी वापस करे तो काफ़ी है और अगर उनकी क़ीमत बढ़ जाए तो लाज़िम है कि उतनी ही मिक़्दार वापस कर जो ली थी लेकिन दोनों सूरतों में अगर मक़रूज़ और क़र्ज़ख़्वाह किसी और बात पर रज़ामन्द हो जायें तो इसमें कोई इश्काल नहीं।
2290. किसी शख़्स ने जो माल क़र्ज़ लिया हो अगर वह तलफ़ न हुआ हो और माल का मालिक उसका मुतालबा करे तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि मक़रूज़ वही माल मालिक को दे दे।
2291. अगर क़र्ज़ देने वाला शर्त आइद करे कि वह जितनी मिक़्दार में माल दे रहा है उससे ज़्यादा वापस लेगा मसलन एक मन गेहूं दे और शर्त आइद करे कि एक मन पांच किलों वापस लूंगा या दस अण्डे दे और कहे कि ग्यारा अण्डे वापस लूंगा तो यह सूद और हराम है बल्कि अगर तय करे कि मक़रूज़ उसके लिए कोई काम करेगा या जो चीज़ ली हो वह किसी दूसरी जिन्स की मिक़्दार के साथ वापस करेगा मसलन तय करे कि (मक़रूज़ ने) जो एक रूपया लिया है वापस करते वक़्त उसके साथ माचिस की एक डिबिया भी दे तो यह सूद होगा और हराम है। नीज़ अगर मक़रूज़ के साथ शर्त करे कि जो चीज़ वह क़र्ज़ ले रहा है उसे एक मख़सूस तरीक़े से वापस करेगा मसलन अनगढ़े सोने की कुछ मिक़्दार उसे दे और शर्त करे कि गढ़ा हुआ वापस करेगा तब भी यह सूद और हराम होगा अलबत्ता अगर क़र्ज़ख़्वाह कोई शर्त न लगाए बल्कि मक़रूज़ खुद क़र्ज़े की मिक़्दार से कुछ ज़्यादा वापस दे तो कोई इश्काल नहीं बल्कि (ऐसा करना) मुस्तहब है।
2292. सूद देना सूद लेने की तरह हराम है लेकिन जो शख़्स सूद पर क़र्ज़ ले ज़ाहिर यह है कि वह उसका मालिक हो जाता है अगरचे औला यह है कि उसमें तसर्रूफ़ न करे और अगर सूरत यह हो कि तरफ़ैन ने सूद का मुआहदा न भी किया होता और रक़म का मालिक इस बात पर राज़ी होता कि क़र्ज़ लेने वाला उस रक़म में तसर्रूफ़ कर ले तो मक़रूज़ बग़ैर किसी इश्काल के उस रक़म में तसर्रूफ़ कर सकता है।
2293. अगर कोई शख़्स गेहूं या उसी जैसी कोई चीज़ सूदी क़र्ज़े के तौर पर ले और उसके ज़रीए काश्त करे तो ज़ाहिर यह है कि वह पैदावार का मालिक हो जाता है अगरचे औला यह है कि उससे जो पैदावार हासिल हो उसमें तसर्रूफ़ न करे।
2294. अगर एक शख़्स कोई लिबास खरीदे और बाद में उसकी क़ीमत कपड़े के मालिक को सूदी रक़म से या ऐसी हलाल रक़म से जो सूदी क़र्ज़े पर ली गई रक़म के साथ मख्लूत हो गई हो अदा करे तो उस लिबास के पहनने या उसके साथ नमाज़ पढ़ने में कोई इश्काल नहीं लेकिन अगर बेचने वाले से कहे कि मैं यह लिबास उस रक़म से खरीद रहा हूं तो उस लिबास को पहनना हराम है और उस लिबास के साथ नमाज़ पढ़ने का हुक्म नमाज़ गुज़ार के लिबास के अहकाम में गुज़र चुका है।
2295. अगर कोई शख़्स किसी ताजिर को कुछ रक़म दे और दूसरे शहरों में उस ताजिर से कम रक़म ले तो इसमें कोई इश्काल नहीं और उसे सर्फ़ेबराअत कहते हैं।
2296. अगर कोई शख़्स किसी को कुछ रक़म इस शर्त पर दे कि चन्द दिन बाद दूसरे शहर में उससे ज़्यादा लेगा मसलन 999 रुपये दे और दस दिन बाद दूसरे शहर में उसके बदले एक हज़रा रुपये ले तो अगर यह रक़म (यअनी 990 और हज़ार रुपये) मिसाल के तौर पर सोने या चांदी की बनी हों तो यह सूद और हराम है लेकिन जो शख़्स ज़्यादा ले रहा हो अगर वह इज़ाफ़े के मुक़ाबिले में कोई जिन्स दे या कोई काम कर दे तो फिर इश्काल नहीं ताहम वह आम राइज नोट जिन्हें गिनकर शुमार किया जाता हो अगर उन्हें ज़्यादा लिया जाए तो कोई इश्काल नहीं मासिवा उस सूरत के कि क़र्ज़ दिया हो और ज़्यादा की अदायगी की शर्त लगाई हो तो उस सूरत में हराम है या उधार पर बेचे और जिन्स और उसका एवज़ एक ही जिन्स से हों तो उस सूरत में मुआमले का सहीह होना इश्काल से खाली नहीं है।
2297. अगर किसी शख़्स को किसी से कुछ क़र्ज़ लेना हो और वह चीज़ सोना या चांदी या नापी या तोली जाने वाली जिन्स न हो तो वह शख़्स उस चीज़ को मक़रूज़ या किसी और के पास कम क़ीमत पर बेच कर उसकी क़ीमत नक़्द वसूल कर सकता है। इसी बिना पर मौजूदा दौर में जो चेक और हुंडियां क़र्ज़ख़्वाह मक़रूज़ से लेता है उन्हें वह बैंक के पास या किसी दूसरे शख़्स के पास उससे कम क़ीमत पर जिसे आम तौर पर भाव गिरना कहते हैं बेच सकता है और बाक़ी रक़म नक़्द ले सकता है क्योंकि राइजुलवक़्त नोटों का लेन देन नाप तोल से नहीं होता।
हवाला देने के अहकाम
2298. अगर कोई शख़्स अपने क़र्ज़ख़्वाह को हवाला दे कि वह अपना क़र्ज़ एक और शख़्स से ले ले और क़र्ज़ख़्वाह इस बात को क़बूल कर ले तो जब हवाला उन शराइत के साथ जिनका ज़िक्र बाद में आयेगा मुकम्मल हो जाए तो जिस शख़्स के नाम हवाला दिया गया है वह मक़रूज़ हो जायेगा और उसके बाद क़र्ज़ख़्वाह पहले मक़रूज़ से अपने क़र्ज़ का मुतालबा नहीं कर सकता।
2299. मक़रूज़ और क़र्ज़ख्वाह और जिस शख़्स का हवाला दिया जा सकता हो ज़रूरी है कि सब बालिग़ और आक़िल हों और किसी ने उन्हें मजबूर न किया हो नीज़ ज़रूरी है कि सफ़ीह न हों यअनी अपना माल अहमक़ाना और फ़ुज़ूल कामों में खर्च न करते हों और यह भी मोतबर है कि मक़रूज़ और क़र्ज़ख़्वाह दीवालिया न हों। हां अगर हवाला ऐसे शख़्स के नाम हो जो पहले से हवाला देने वाले का मक़रूज़ न हो तो अगरचे हवाला देने वाला दीवालिया भी हो कोई इश्काल नहीं है।
2300. ऐसे शख़्स के नाम हवाला देना जो मक़रूज़ न हो उस सूरत में सहीह नहीं है जब वह हवाला क़बूल न केर। नीज़ अगर कोई शख़्स चाहे कि जो शख़्स एक जिन्स के लिए उसका मक़रूज़ है उसके नाम दूसरी जिन्स का हवाला लिखे। मसलन जो शख़्स जौ का मक़रूज़ हो उसके नाम गेहूं हवाला लिखे तो जब तक वह शख़्स क़बूल न करे हवाला सहीह नहीं है। बल्कि हवाला देने की तमाम सूरतों में ज़रूरी है कि जिस शख़्स के नाम हवाला किया जा रहा है वह हवाला क़बूल करे और अगर क़बूल न करे तो बिनाबरे अज़्हर (हवाला) सहीह नहीं है।
2301. इंसान जब हवाला दे तो ज़रूरी है कि वह उस वक़्त मक़रूज़ हो लिहाज़ा अगर वह किसी से क़र्ज़ लेना चाहता हो तो जब तक उससे क़र्ज़ न ले ले उसे किसी नाम का हवाला नहीं दे सकता ताकि जो क़र्ज़ उसे बाद में देना हो वह पहले ही उस शख़्स से वसूल कर ले।
2302. हवाला की जिन्स और मिक़्दार फ़िल वाक़े मुअय्यन होना ज़रूरी है पस अगर हवाला देने वाला किसी शख़्स का दस मन गेहूं और दस रुपये का मक़रूज़ हो और क़र्ज़ख़्वाह को हवाला दे कि उन दोनों क़र्ज़ों में से कोई एक फ़लां शख़्स से ले और उस क़र्ज़ को मुअय्यन न करे तो हवाला दुरुस्त नहीं है।
2303. अगर क़र्ज़ वाक़ई मुअय्यन हो लेकिन हवाला देने के वक़्त मक़रूज़ और क़र्ज़ख़्वाह को उसकी मिक़्दार या जिन्स का इल्म न हो तो हवाला सहीह है मसलन अगर किसी शख़्स ने दूसरे का क़र्ज़ा रजिस्टर में लिखा हो और रजिस्टर देखने से पहले हवाला दे दे और बाद में रजिस्टर देखे और क़र्ज़ख़्वाह को क़र्ज़े की मिक़्दार बता दे तो हवाला सहीह होगा।
2304. क़र्ज़ख्वाह को इख़्तियार है कि हवाला क़बूल न करे अगरचे जिसके नाम का हवाला दिया जाए वह दौलतमन्द हो और हवाले के अदा करने में कोताही भी न करे।
2305. जो शख़्स हवाला देने वाले का मक़रूज़ न हो अगर हवाला क़बूल करे तो अज़्हर यह है कि हवाला अदा करने से पहले हवाला देने वाले से हवाले की मिक़्दार का मुतालबा कर सकता है। मगर यह कि जो क़र्ज़ जिसके नाम हवाला दिया गया है उसकी मुद्दत मुअय्यन हो और अभी वह मुद्दत ख़त्म न हुई हो तो उस सूरत में वह मुद्दत ख़त्म होने से पहले हवाले देने से हवाले की मिक़्दार का मुतालबा नहीं कर सकता अगरचे उसने अदायगी कर दी हो और उसी तरह अगर क़र्ज़ख़्वाह अपने क़र्ज़ से थोड़ी मिक़्दार पर सुल्ह करे तो वह हवाला देने वाले से फ़क़त उतनी (थोड़ी) मिक़्दार का ही मुतालबा कर सकता है।
2306. हवाला की शराइत पूरी होने के बाद हवाला देने वाला और जिसके नाम हवाला दिया जाए हवाला मंसूख नहीं कर सकते और वह शख़्स जिसके नाम का हवाला दिया गया है हवाला के वक़्त फ़क़ीर न हो तो अगरचे वह बाद में फ़क़ीर हो जाए तो ख़र्ज़ख़्वाह भी हवाले को मंसूख नहीं कर सकता। यही हुक्म उस वक़्त है जब (वह शख़्स जिसके नाम का हवाला दिया गया हो) हवाला देने के वक़्त वह शख़्स मालदार न हुआ हो क़र्ज़ख़्वाह हवाला मंसूख कर के अपना क़र्ज़ हवाला देने वाले से ले सकता है। लेकिन अगर वह मालदार हो गया हो तो मअलूम नहीं कि मुआमले को फ़िस्ख़ कर सकता है (या नहीं)।
2307. अगर मक़रूज़ और क़र्ज़ख़्वाह और जिसके नाम का हवाला दिया गया हो या उनमें से किसी एक ने अपने हक़ में हवाला मंसूख करने का मुआहदा किया हो तो जो मुआहदा उन्होंने किया हो उसके मुताबिक़ वह हवाला मंसूख कर सकते हैं।
2308. अगर हवाला देने वाला खुद क़र्ज़ख़्वाह का क़र्ज़ा अदा कर दे यह काम उस शख़्स की ख़्वाहिश पर हुआ हो जिसके नाम का हवाला दिया गया हो जबकि वह हवाला देने वाले का मक़रूज़ भी हो तो वह जो कुछ दिया हो उससे ले सकता है और अगर उसकी ख़्वाहिश के बग़ैर अदा किया हो या वह हवाला दिहिन्दा का मक़रूज़ न हो तो फिर उसने जो कुछ दिया है उसका मुतालबा उस से नहीं कर सकता।
रहन के अहकाम
2309. रेहन यह है कि इंसान क़र्ज़ के बदले अपना माल या जिस माल के लिए ज़ामिन बना हो वह माल किसी के पास गिरवी रखवाए कि अगर रेहन रखवाने वाला क़र्ज़ा न लौटा सके या रेहन न छुड़ा सके तो रेहन लेने वाला शख़्स उसका एवज़ उसके माल से ले सके।
2310. रेहन में सीग़ा पढ़ना लाज़िम नहीं है बल्कि इतना काफ़ी है कि गिरवी देने वाल अपना माल गिरवी रखने की नीयत से गिरवी लेने वाले को दे दे और वह उसी नीयत से ले ले तो रेहन सहीह है।
2311. ज़रूरी है कि गिरवी रखवाने वाला और गिरवी रखने वाला बालिग़ और आक़िल हों और किसी ने उन्हें इस मुआमले के लिए मजबूर न किया हो और यह भी ज़रूरी है कि माल गिरवी रखवाने वाला दीवालिया और सफ़ीह न हो – दीवालिया और सफ़ीह के मअनी मस्अला 2262 में बताए जा चुके हैं – और अगर दीवालिया हो लेकिन जो माल वह गिरवी रखवा रहा है उसका अपना माल न हो या उन अमवाल में से न हो जिसके तसर्रूफ़ करने से मनअ किया गया हो तो कोई इश्काल नहीं है।
2312. इंसान वह माल गिरवी रख सकता है जिसमें वह शरअन तसर्रूफ़ कर सकता हो और अगर किसी दूसरे का माल उसकी इजाज़त से गिरवी रख दे तो भी सहीह है।
2313. जिस चीज़ को गिरवी रखा जा रहा हो ज़रूरी है कि उसकी खरीद व फ़रोख़्त सहीह हो। लिहाज़ा अगर शराब या उस जैसी चीज़ गिरवी रखी जाए तो दुरुस्त नहीं है।
2314. जिस चीज़ को गिरवी रखा जा रहा है उससे जो फ़ाइदा होगा वह उस चीज़ के मालिक की मिल्कियत होगा ख़्वाह वह गिरवी रखवाने वाला हो या कोई दूसरा शख़्स हो।
2315. गिरवी रखवाने वाले ने जो माल बतौर गिरवी लिया हो उस माल को उसके मालिक की इजाज़त के बग़ैर ख़्वाह गिरवी रखवाने वाला हो या कोई दूसरा शख़्स किसी दूसरे की मिल्कियत में नहीं दे सकता। मसलन वह किसी दूसरे को वह माल न बख़्श सकता है न बेच सकता है। लेकिन अगर वह उस माल को किसी को बख़्श दे या फ़रोख़्त कर दे और मालिक बाद में इजाज़त दे तो कोई इश्काल नहीं है।
2316. अगर गिरवी रखने वाला उस माल को जो उसने बतौर गिरवी लिया हो उसके मालिक की इजाज़त से बेच दे तो माल की तरह उसकी क़ीमत गिरवी नहीं होगी। और यही हुक्म है अगर मालिक की इजाज़त के बग़ैर बेच दे और मालिक बाद में इजाज़त दे (यअनी उस माल की क़ीमत वसूल की जाए वह उस माल की तरह गिरवी नहीं होगी) लेकिन अगर गिरवी रखवाने वाला उस चीज़ को गिरवी रखने वाले की इजाज़त से बेच दे ताकि उसकी क़ीमत को गिरवी क़रार दे तो ज़रूरी है कि मालिक की इजाज़त से बेच दे और उसकी मुख़ालिफ़त करने की सूरत में मुआमला बातिल है। मगर यह कि गिरवी रखने वाले ने उसकी इजाज़त ही हो (तो फिर मुआमला सहीह है)।
2317. जिस वक़्त मक़रूज़ को क़र्ज़ अदा कर देना चाहिए मगर क़र्ज़ख़्वाह उस वक़्त मुतालबा करे और मक़रूज़ अदायगी न करे तो उस सूरत में जबकि क़र्ज़ख़्वाह माल को फ़रोख़्त कर के अपना क़र्ज़ा उसके माल से वसूल करने का इख़्तियार रखता हो वह गिरवी किये हुए माल को फ़रोख्त कर के अपना क़र्ज़ा वसूल कर सकता है। और अगर इख़्तियार न रखता हो तो ज़रूरी है कि हाकिमे शर्अ से उस माल को बेच कर उसकी क़ीमत से अपना क़र्ज़ा वसूल करने की इजाज़त ले और दोनों सूरतों में अगर क़र्ज़े से ज़्यादा क़ीमत वसूल हो तो ज़रूरी है कि ज़्यादा माल मक़रूज़ को दे दे।
2318. अगर मक़रूज़ के पास उस मकान के अलावा जिसमें वह रहता हो और उस सामान के अलावा जिसकी उसे ज़रूरत हो और कोई चीज़ न हो तो क़र्ज़ख़्वाह उससे अपने क़र्ज़े का मुतालबा नहीं कर सकता लेकिन मक़रूज़ ने जो माल बतौर गिरवी दिया हो अगरचे वह मकान और सामान ही क्यों न हो क़र्ज़ख़्वाह उसे बेच कर अपना क़र्ज़ वसूल कर सकता है।
ज़ामिन होने के अहकाम
2319. अगर कोई शख़्स किसी दूसरे का क़र्ज़ा अदा करने के लिए ज़ामिन बनना चाहे तो उसका ज़ामिन बनना उस वक़्त सहीह होगा जब वह किसी लफ़्ज़ से अगरचे वह अरबी ज़बान में न हो या किसी अमल से क़र्ज़ख़्वाह को समझा दे कि मैं तुम्हारे क़र्ज़ की अदायगी के लिए ज़ामिन बान गया हूं और क़र्ज़ख़्वाह भी अपनी रज़ामन्दी का इज़हार कर दे और (इस सिलसिले में) मक़रूज़ का रज़ामन्द होना शर्त नहीं।
2320. ज़ामिन और क़र्ज़ख़्वाह दोनों के लिए जरूरी है कि बालिग़ और आक़िल हों और किसी ने उन्हें इस मुआमले पर मजबूर न किया हो नीज़ ज़रूरी है कि वह सफ़ीह भी न हों और इसी तरह ज़रूरी है कि ख़र्ज़ख़्वाह दीवालिया न हो लेकिन यह शराइत मक़रूज़ के लिए नहीं है मसलन अगर कोई शख़्स बच्चे या दीवाने या सफ़ीह का क़र्ज़ अदा करने के लिए ज़ामिन बने तो ज़मानत सहीह है।
2321. जब कोई शख़्स ज़ामिन बनने के लिए कोई शर्त रखे मसलन यह कहे कि अगर मक़रूज़ तुम्हारा क़र्ज़ अदा न करे तो मैं तुम्हारा क़र्ज़ अदा कर दूगां, तो उसके ज़ामिन होने में इश्काल है।
2322. इंसान जिस शख़्स के क़र्ज़ की ज़मानत दे रहा है ज़रूरी है कि वह मक़रूज़ हो लिहाज़ा अगर कोई शख़्स किसी दूसरे शख़्स से क़र्ज़ लेना चाहता हो तो जब तक वह क़र्ज़ न ले ले उस वक़्त तक कोई शख़्स उसका ज़ामिन नहीं बन सकता।
2323. इंसान उसी सूरत में ज़ामिन बन सकता है जब क़र्ज़, क़र्ज़ख़्वाह और मक़रूज़ (यह तीनों) फ़िल वाक़े मुअय्यन हों लिहाज़ा अगर दो अश्ख़ास किसी एक शख्स के क़र्ज़ख्वाह हों और इंसान कहे कि मैं तुम में से एक का क़र्ज़ अदा कर दूंगा तो चूंकि उसने इस बात को मुअय्यन नहीं किया कि वह उनमें से किस का क़र्ज़ अदा करेगा इस लिए उसका ज़ामिन बातिल है। नीज़ अगर किसी को दो अश्ख़ास से क़र्ज़ वसूल करना हो और कोई शख़्स कहे कि मैं ज़ामिन हूं कि उन दो में से एक का क़र्ज़ तुम्हें अदा कर दूंगा तो चूंकि उसने इस बात को मुअय्यन नहीं किया कि दोनों में से किसका क़र्ज़ अदा करेगा इस लिए उसका ज़ामिन बनना बातिल है। और इसी तरह अगर किसी ने एक दूसरे शख़्स से मिसाल के तौर पर दस मन गेहूं और दस रुपये लेने हों और कोई शख़्स कहे कि मैं तुम्हारे दोनों क़र्ज़ों में से एक की अदायगी का ज़ामिन हूं और उस चीज़ को मुअय्यन न करे कि वह गेहूं के लिए ज़ामिन है या रुपयों के लिए तो यह ज़मानत सहीह नहीं है।
2324. अगर क़र्ज़ख़्वाह अपना क़र्ज़ ज़ामिन को बख़्श दे तो ज़ामिन मक़रूज़ से कोई चीज़ नहीं ले सकता और अगर वह क़र्ज़े की कुछ मिक्दार उसे बख़्श दे तो वह (मक़रूज़ से) उस मिक़्दार का मुतालबा नहीं कर सकता।
2325. अगर कोई शख़्स किसी का क़र्ज़ा अदा करने के लिए ज़ामिन बन जाए तो फिर वह ज़ामिन होने से मुकर नहीं सकता।
2326. एहतियात की बिना पर ज़ामिन और क़र्ज़ख़्वाह यह शर्त नहीं कर सकते कि जिस वक़्त चाहें ज़ामिन की ज़मानत मंसूख कर दें।
2327. अगर इंसान ज़ामिन बनने के वक़्त क़र्ज़ख़्वाह का क़र्ज़ा अदा करने के क़ाबिल हों तो ख़्वाह वह (ज़ामिन) बाद में दीवालिया हो जाए क़र्ज़ख्वाह उसकी ज़मानत मंसूख करके पहले मक़रूज़ से क़र्ज़ की अदायगी का मुतालबा नहीं कर सकता। और इसी तरह अगर ज़मानत देते वक़्त ज़ामिन क़र्ज़ अदा करने पर क़ादिर न हो लेकिन क़र्ज़ख़्वाह यह बात मानते हुए उसके ज़ामिन बनने पर राज़ी हो जाए तब भी यही हुक्म है।
2328. अगर इंसान ज़ामिन बनने के वक़्त क़र्ज़ख़्वाह का क़र्ज़ा अदा करने पर क़ादिर न हो और क़र्ज़ख्वाह सूरते हाल से लाइल्म होने की बिना पर उसकी ज़मानत मंसूख करना चाहे तो इस में इश्काल है ख़ुसूसन उस सूरत में जबकि क़र्ज़ख़्वाह के इस अम्र की जानिब मुतवज्जह होने से पहले ज़ामिन क़र्ज़े की अदायगी पर क़ादिर न हो जाए।
2329. अगर कोई शख़्स मक़रूज़ की इजाज़त के बग़ैर उसका क़र्ज़ा अदा करने के लिए ज़ामिन बन जाए तो वह क़र्ज़ा अदा करने पर मक़रूज़ से कुछ नहीं ले सकता।
2330. अगर कोई शख़्स मक़रूज़ की इजाज़त से उसके क़र्ज़े की अदायगी का ज़ामिन बन जाए तो जिस मिक़्दार के लिए ज़ामिन बना हो – अगरचे से अदा करने से पहले – मक़रूज़ से उसका मुतालबा कर सकता है लेकिन जिस जिन्स के लिए वह मक़रूज़ था उसकी बजाय कोई और जिन्स क़र्ज़ख्वाह को दे तो जो चीज़ दी हो उसका मुतालबा मक़रूज़ नहीं कर सकता मसलन अगर मक़रूज़ को दस मन गेहूं देनी हो और ज़ामिन दस मन चावल दे दे तो ज़ामिन मक़रूज़ से दस मन चावल का मुतालबा नहीं कर सकता लेकिन अगर मक़रूज़ खुद चावल देने पर रज़ामन्द हो जाए तो फिर कोई इश्काल नहीं।
कफ़ालत के अहकाम
2331. कफ़ालत से मुराद यह है कि कोई शख़्स ज़िम्मा ले कि जिस वक़्त क़र्ज़ख़्वाह चाहेगा वह मक़रूज़ को उसके सिपुर्द कर देगा। और जो शख़्स इस क़िस्म की ज़िम्मेदारी क़बूल करे उसे कफ़ील कहते हैं।
2332. कफ़ालत उस वक़्त सहीह है जब कफ़ील कोई से भी अल्फ़ाज़ में ख़्वाह वह अरबी के न भी हों, या किसी अमल से क़र्ज़ख़्वाह को यह बात समझा दे कि मैं ज़िम्मा लेता हूं कि जिस वक़्त तुम चाहोगे मैं मक़रूज़ को तुम्हारे हवाले कर दूंगा और क़र्ज़ख़्वाह भी इस बात को क़बूल कर ले और एहतियात की बिना पर कफ़ालत के सहीह होने के लिए मक़रूज़ की रज़ामन्दी भी मोतबर है। बल्कि एहतियात यह है कि कफ़ालत के मुआमले में उसी तरह मक़रूज़ को भी एक फ़रीक़ होना चाहिए यअनी मक़रूज़ और क़र्ज़ख़्वाह दोनों कफ़ालत को क़बूल करें।
2333. कफ़ील के लिए ज़रूरी है कि बालिग़ और आक़िल हो और उसे कफ़ील बनने पर मजबूर न किया गया हो और वह इस बात पर क़ादिर हो कि जिसका कफ़ील बने उसे हाज़िर कर सके और इसी तरह उस सूरत में जब मक़रूज़ को हाज़िर करने के लिए कफ़ील को अपना माल ख़र्च करना पड़े तो ज़रूरी है कि वह सफ़ीह और दीवालिया न हो।
2334. इन पांच चीज़ों में से कोई एक कफ़ालत को कलअदम (ख़त्म) कर देती हैः-
1. कफ़ील मक़रूज़ को क़र्ज़ख़्वाह के हवाले कर दे या वह खुद अपने आपको क़र्ज़ख़्वाह के हवाले कर दे।
2. क़र्ज़ख़्वाह का क़र्ज़ा अदा कर दिया जाए
3. क़र्ज़ख्वाह अपने क़र्ज़े से दस्तबरदार हो जाए या उसे किसी दूसरे के हवाले कर दे।
4. मक़रूज़ या कफ़ील में से एक मर जाए।
5. क़र्ज़ख़्वाह कफ़ील को कफ़ालत से बरी उज़्ज़िम्मा क़रार दे दे।
2335. अगर कोई शख़्स मक़रूज़ को क़र्ज़ख्वाह से ज़बरदस्ती आज़ाद करा दे और क़र्ज़ख़्वाह की पहुंच मक़रूज़ तक न हो सके तो जिस शख़्स ने मक़रूज़ को आज़ाद कराया हो ज़रूरी है कि वह मक़रूज़ को क़र्ज़ख़्वाह के हवाले कर दे या उसका क़र्ज़ अदा करे।
अमानत के अहकाम
2336. अगर एक शख़्स कोई माल किसी को दे और कहे यह तुम्हारे पास अमानत रहेगा और वह भी क़बूल करे या कोई लफ़्ज़ कहे बग़ैर माल का मालिक उस शख़्स को समझा दे कि वह उसे माल रखवाली के लिए दे रहा है और वह भी रखवाली के मक़्सद से ले ले तो ज़रूरी है कि अमानतदारी के उन अहकाम के मुताबिक़ अमल करे जो बाद में बयान होंगे।
2337. ज़रूरी है कि अमानतदार और वह शख़्स जो माल बतौरे अमानत दे दोनों बालिग़ और आक़िल हों और किसी ने उन्हें मजबूर न किया हो लिहाज़ा अगर कोई शख़्स किसी माल को दीवाने या बच्चे के पास अमानत के तौर पर रखे या दीवाना या बच्चा कोई माल किसी के पास अमानत के तौर पर रखे तो सहीह नहीं है। हां समझदार बच्चा किसी दूसरे के माल को उसकी इजाज़त से किसी के पास अमानत रखे तो जाइज़ है। इसी तरह ज़रूरी है कि अमानत रखवाने वाला सफ़ीह और दीवालिया न हो लेकिन अगर दीवालिया हो ताहम जो माल उसने अमानत के तौर पर रखवाया हो वह उस माल में से न हो जिसमें उसे तसर्रूफ़ करने से मनअ किया गया है तो उस सूरत में कोई इश्काल नहीं है नीज़ उस सूरत में जबकि माल की हिफ़ाज़त करने के लिए अमानतदार को अपना माल खर्च करना पड़े तो ज़रूरी है कि वह सफ़ीह और दीवालिया न हो।
2338. अगर कोई शख़्स बच्चे से कोई चीज़ उसके मालिक की इजाज़त के बग़ैर बतौर अमानत क़बूल कर ले तो ज़रूरी है कि वह चीज़ उसके मालिक को दे दे और अगर वह चीज़ ख़्वाह बच्चे का माल हो तो लाज़िम है कि वह चीज़ बच्चे के सरपरस्त तक पहुंचा दे, और अगर वह माल उन लोगों के पास पहुंचाने से पहले तलफ़ हो जाए तो ज़रूरी है कि उसका एवज़ दे मगर इस डर से कि ख़ुदानख़्वास्ता तलफ़ हो जाए उस माल को उसके मालिक तक पहुंचाने की नीयत से लिया हो तो उस सूरत में अगर उसने माल की हिफ़ाज़त करने और उसे मालिक तक पहुंचाने में कोताही न की हो तो वह ज़ामिन नहीं है और अगर अमानत के तौर पर माल देने वाला दीवाना हो तब भी यही हुक्म है।
2339. जो शख़्स अमानत की हिफ़ाज़त न कर सकता हो अगर अमानत रखवाने वाला उसकी इस हालत से बाख़बर न हो तो ज़रूरी है कि वह शख़्स अमानत क़बूल न करे।
2340. अगर इंसान साहबे माल को समझाए कि वह उस माल की हिफ़ाज़त के लिए तौयार नहीं और उस माल को अमानत के तौर पर क़बूल न करे और साहबे माल फिर भी माल छोड़ कर चला जाए और वह माल तलफ़ हो जाए तो जिस शख़्स ने अमानत क़बूल न की हो वह ज़िम्मेदार नहीं है लेकिन एहतियाते मुस्तहब यह है कि अगर मुम्किन हो तो उस माल की हिफ़ाज़त करे।
2341. जो शख़्स किसी के पास कोई चीज़ बतौर अमानत रखवाए वह अमानत को जिस वक़्त चाहे मंसूख कर सकता है और इसी तरह अमीन भी जब चाहे उसे मंसूख कर सकता है।
2342. अगर कोई शख़्स अमानत की निगहदाश्त तर्क कर दे और अमानतदारी मंसूख कर दे तो ज़रूरी है कि जिस क़दर जल्द हो सके माल उसके मालिक या मालिक के वकील या सरपरस्त को पहुंचा दे या उन्हें इत्तिलाअ दे कि वह माल की (मज़ीद) निगहदाश्त के लिए तैयार नहीं है और अगर वह बग़ैर उज़्र के माल उन तक न पहुंचाए या इत्तिलाअ न दे और माल तलफ़ हो जाए तो ज़रूरी है कि उसका एवज़ दे।
2343. जो शख़्स अमानत क़बूल करे अगर उसके पास उसे रखने के लिए मुनासिब जगह न हो तो ज़रूरी है कि उसके लिए मुनासिब जगह हासिल करे और अमानत की इस तरह निगहदाश्त करे कि लोग यह न कहें कि उसने निगहदाश्त में कोताही की है और अगर वह इस काम में कोताही करे और अमानत तलफ़ हो जाए तो ज़रूरी है कि उसका एवज़ दे।
2344. जो शख़्स अमानत क़बूल करे अगर वह उसकी निगहदाश्त में कोताही न करे और न ही तअद्दी करे और इत्तिफ़ाक़न वह माल तलफ़ हो जाए तो वह शख़्स ज़िम्मेदार नहीं है लेकिन अगर वह उस माल की हिफ़ाज़त में कोताही केर और माल को ऐसी जगह रखे जहां वह ऐसा ग़ैर महफ़ूज़ हो कि अगर कोई ज़ालिम ख़बर पाए तो ले जाए या वह इस माल में तअद्दी करे यअनी मालिक की इजाज़त के बग़ैर उस माल में तसर्रूफ़ करे मसलन लिबास को इस्तेमाल करे या जानवर पर सवारी करे और वह तलफ़ हो जाए तो ज़रूरी है कि उसका एवज़ उसके मालिक को दे।
2345. अगर माल का मालिक अपने माल की निगहदाश्त के लिए कोई जगह मुअय्यन कर दे और जिस शख़्स ने अमानत क़बूल की हो उससे कहे कि, तुम्हें चाहिये कि यहीं माल का ख़्याल रखो और अगर उसके ज़ाए हो जाने का एहतिमाल हो तब भी तुम उसको कहीं और ले जाना, तो अमानत क़बूल करने वाला उसे किसी और जगह नहीं ले जा सकता और अगर वह माल को किसी दूसरी जगह ले जाए और वह तलफ़ हो जाए तो अमीन ज़िम्मेदार है।
2346. अगर माल का मालिक अपने माल की निगहदाश्त के लिए कोई जगह मुअय्यन करे लेकिन ज़ाहिरन वह यह कह रहा हो कि उसकी नज़र में वह जगह कोई ख़ुसूसीयत नहीं रखती बल्कि वह जगह माल के लिए महफ़ूज़ जगहों में से एक है तो वह शख़्स जिसने अमानत क़बूल की है उस माल को किसी ऐसी जगह जो ज़्यादा महफ़ूज़ हो या पहली जगह जितनी महफ़ूज़ हो ले जा सकता है और अगर माल वहां तलफ़ हो जाए तो वह ज़िम्मेदार नहीं है।
2347. अगर माल का मालिक हमेशा के लिए दीवाना या बेहवास हो जाए तो अमानत का मुआमला ख़त्म हो जायेगा और जिस शख़्स ने उससे अमानत क़बूल की हो उसे चाहिये कि फ़ौरन अमानत उसके सरपरस्त को पहुंचा दे या उसके सरपरस्त को ख़बर करे और अगर वह शरई उज़्र के बग़ैर माल दीवाने के सरपरस्त को न पहुंचाए और उसे ख़बर करने में भी कोताही बरते और माल तलफ़ हो जाए तो उसे चाहिए कि उसका एवज़ दे। लेकिन अगर माल के मालिक पर कभी कभार दीवांगी या बेहवासी का दौरा पड़ता हो तो इस सूरत में अमानत का मुआमला बातिल होने में इश्काल है।
2348. अगर माल का मालिक मर जाए तो अमानत का मुआमला बातिल हो जाता है लिहाज़ा अगर उस माल में किसी दूसरे का हक़ न हो तो वह माल उसके वारिस को मिलता है और ज़रूरी है कि अमानतदार उस माल को उसके वारिस तक पहुंचाए या उसे इत्तिलाअ दे। और अगर वह शरई उज़्र के बग़ैर माल को उसके वारिस के हवाले न करे और ख़बर देने में भी कोताही बरते और माल ज़ाए हो तो वह ज़िम्मेदार है लेकिन अगर वह माल इस लिए वारिस को न दे और उसे ख़बर देने में भी कोताही करे कि जानना चाहता हो कि वह शख़्स जो कहता है कि मैयित का वारिस हूं वाक़िअय ठीक कहता है या नहीं या यह जानना चाहता हो कि कोई और शख़्स मैयित का वारिस है या नहीं और अगर (इस तह्क़ीक़ के बीच) माल तलफ़ हो जाए तो वह ज़िम्मेदार नहीं है।
2349. अगर माल का मालिक मर जाए और माल की मिल्कियत का हक़ उसके वरसा को मिल जाए तो जिस शख़्स ने अमानत क़बूल की हो ज़रूरी है कि माल तमाम वरसा को दे या उस शख़्स को दे जिसे माल देने पर सब वरसा रज़ामन्द हों। लिहाज़ा अगर वह दूसरे वरसा की इजाज़त के बग़ैर तमाम माल फ़क़त एक वारिस को दे दे तो वह दूसरों के हिस्सों का ज़िम्मेदार है।
2350 जिस शख़्स ने अमानत क़बूल की हो अगर वह मर जाए या हमेशा के लिए दीवाना या बेहवास हो जाए तो अमानत का मुआमला बातिल हो जायेगा और उसके सरपरस्त या वारिस को चाहिये कि जिस क़दर जल्द हो सके माल के मालिक को इत्तिलाअ दे या अमानत उस तक पहुंचाए। लेकिन अगर कभी कभार (या थोड़ी मुद्दत के लिए) दीवाना या बेहवास होता हो तो उस सूरत में अमानत का मुआमला बातिल होने में इश्काल है।
2351. अगर अमानतदार अपने आप में मौत की निशानियां देखे तो अगर मुम्किन हो तो एहतियात की बिना पर ज़रूरी है कि अमानत को उसके मालिक सरपरस्त या वकील तक पहुंचा दे या उसको इत्तिलाअ दे और अगर यह मुम्किन न हो तो ज़रूरी है कि ऐसा बन्दोबस्त करे कि उसे इत्मीनान हो जाए कि उसके मरने के बाद माल उसके मालिक को मिल जायेगा मसलन वसीयत करे और उस वसीयत पर गवाह मुक़र्रर करे और माल के मालिक का नाम और माल की जिन्स और ख़ुसूसीयात और महल्ले वक़ूउ वसी और गवाहों को बता दे।
2352. अगर अमानत दार अपने आप में मौत की निशानियां देखे और जो तरीक़ा इससे पहले मस्अले में बताया गया है उसके मुताबिक़ अमल न करे तो वह उस अमानत का ज़ामिन होगा लिहाज़ा अगर अमानत ज़ाए हो जाए तो ज़रूरी है कि उसका एवज़ दे। लेकिन अगर वह जाँबर हो जाए या कुछ मुद्दत गुज़रने के बाद पशीमान हो जाए और कुछ (साबिक़ा मस्अले में) बताया गया है उस पर अमल करे तो अज़्हर यह है कि वह ज़िम्मेदार नहीं है।
आरिया के अहकाम
2353. आरिया से मुराद यह है कि इंसान अपना माल दूसरे को दे ताकि वह उस माल से इस्तिफ़ादा करे और उसके एवज़ कोई चीज़ उससे न ले।
2354. आरिया में सीग़ा पढ़ना लाज़िम नहीं और अगर मिसाल के तौर पर कोई शख़्स किसी को लिबास आरिया के क़स्द से दे और वह भी उसी क़स्द से ले तो आरिया सहीह है।
2355. ग़स्बी चीज़ या उस चीज़ को बतौरे आरिया देना जो कि आरिया देने वाले का माल हो लेकिन उसकी आमदनी उसने किसी दसरे शख़्स के सिपुर्द कर दी हो मसलन उसे किराये पर दे रखा हो, उस सूरत में सहीह है जब ग़स्बी चीज़ का मालिक या वह शख़्स जिसने आरिया दी जाने वाली चीज़ को बतौर इजारा ले रखा हो और उसके बतौरे आरिया देने पर राज़ी हो।
2356. जिस चीज़ की मनफ़अत किसी शख़्स के सिपुर्द हो मसलन उस चीज़ को किराए पर ले रखा हो तो उसे बतौर आरिया दे सकता है लेकिन एहतियात की बिना पर मालिक की इजाज़त के बग़ैर उस शख़्स के हवाले नहीं कर सकता जिसने उसे बतौरे आरिया लिया है।
2357. अगर दीवाना, बच्चा, दीवालिया और सफ़ीह अपना माल आरियतन दें तो सहीह नहीं है। लेकिन अगर (उनमें से किसी का) सरपरस्त आरिया देने की मसलहत समझता हो और जिस शख़्स का वह सरपरस्त है उसका माल आरियतन दे दे तो इसमें कोई इश्काल नहीं। इसी तरह जिस शख़्स ने माल आरियतन लिया हो उस तक माल पहुंचाने के लिए बच्चा वसीला बने तो कोई इश्काल नहीं है।
2358. आरियतन ली हुई चीज़ की निगहदाश्त में कोताही न करे और उससे मअमूल से ज़्यादा इस्तिफ़ादा भी न करे और इत्तिफ़ाक़न वह चीज़ तलफ़ हो जाए तो वह शख़्स ज़िम्मेदार नहीं है लेकिन अगर तरफ़ैन आपस में यह शर्त करें कि अगर वह चीज़ तलफ़ हो जाए तो आरियतन लेने वाला ज़िम्मेदार होगा या जो चीज़ आरियतन ली हो वह सोना या चांदी हो तो उसका एवज़ देना ज़रूरी है।
2359. अगर कोई शख़्स सोना या चांदी आरियतन ले और यह तय किया हो कि अगर तलफ़ हो गया हो तो ज़िम्मेदार नहीं होगा फिर तलफ़ हो जाए तो वह शख़्स ज़िम्मेदार नहीं है।
2360. अगर आरिया पर देने वाला मर जाए तो आरिया पर लेने वाले के लिए ज़रूरी है कि जो तरीक़ा अमानत के मालिक के फ़ौत हो जाने की सूरत में मस्अला 2348 में बताया गया है उसी के मुताबिक़ अमल करे।
2361. अगर आरिया देने वाले की कैफ़ीयत यह हो कि वह शरअन अपने माल में तसर्रूफ़ न कर सकता हो मसलन दीवाना या बेहवास हो जाए तो आरिया लेने वाले के लिए ज़रूरी है कि उसी तरीक़े के मुताबिक़ अमल करे जो मस्अला 2347 में अमानत के बारे में उस जैसी सूरत में बयान किया गया है।
2362. जिस शख़्स ने कोई चीज आरियतन दी हो वह जब भी चाहे उसे मंसूख कर सकता है और जिसने कोई चीज़ आरियतन ली हो वह भी जब चाहे उसे मंसूख कर सकता है।
2363. किसी ऐसी चीज़ का आरियतन देना जिससे हलाल इस्तिफ़ादा न हो सकता हो मसलन लहव व लइब और क़ुमारबाज़ी के आलात और खाने पीने में इस्तेमाल करने के लिए सोने और चांदी के बर्तन आरियतन देना – बल्कि एहतियाते लाज़िम की बिना पर हर क़िस्म के इस्तेमाल के लिए आरियतन देना – बातिल है और तज़्ईन व आराइश के लिए आरियतन देना जाइज़ है अगरचे एहतियात न देने में है।
2364. भेड़ (बकरियों) को उनके दूध और उन से इस्तिफ़ादा करने के लिए नीज़ नर हैवान को मादा हैवानात के साथ मिलाप के लिए आरियतन देना सहीह है।
2365. अगर किसी चीज़ को आरियतन लेने वाला उसे उसके मालिक या मालिक के वकील या सरपरस्त को दे दे और उसके बाद वह चीज़ तलफ़ हो जाए तो उस चीज़ को आरियतन लेने वाला ज़िम्मेदार नहीं है लेकिन अगर वह माल के मालिक या वकील या सरपरस्त की इजाज़त के बग़ैर माल को ख़्वाह ऐसी जगह ले जाए जहां माल का मालिक उसे उमूमन ले जाता हो मसलन घोड़े को अस्तबल में बांध दे जो उसके मालिक ने उसके लिए तैयार किया हो और बाद में घोड़ा तलफ़ हो जाए या कोई उसे तलफ़ कर दे तो आरियतन लेने वाला ज़िम्मेदार है।
2366. अगर एक शख़्स कोई नजिस चीज आरियतन दे तो उस सूरत में उसे चाहिये कि मस्अला 2065 में गुज़र चुका है – उस चीज़ के नजीस होने के बारे में आरियतन लेने वाले शख़्स को बता दे।
2367. जो चीज़ किसी शख़्स ने आरियतन ली हो उसे उसके मालिक की इजाज़त के बग़ैर किसी दूसरे को किराये पर या आरियतन नहीं दे सकता।
2368. जो चीज़ किसी शख़्स ने आरियतन न ली हो अगर वह उसे मालिक की इजाज़त से किसी और शख़्स को आरियतन दे दे तो अगर जिस शख़्स ने पहले वह चीज़ आरियतन ली हो मर जाए या दीवाना हो जाए तो दूसरा आरिया बातिल नहीं होता।
2369. अगर कोई शख़्स जानता हो कि जो माल उसने आरियतन लिया है वह ग़स्बी है तो ज़रूरी है कि वह माल उसके मालिक को पहुंचा दे और वह उसे आरियतन देने वाले को नहीं दे सकता।
2370. अगर कोई शख़्स ऐसा माल आरियतन ले जिसके मुतअल्लिक़ जानता हो कि वह ग़स्बी है और वह उससे फ़ाइदा उठाए और उसके हाथ से वह माल तलफ़ हो जाए तो मालिक उस माल का एवज़ और जो फ़ाइदा आरियतन लेने वाले ने उठाया है उसका एवज़ उससे या जिसने माल ग़स्ब किया हो उससे तलब कर सकता है और अगर मालिक आरियतन लेने वाले से एवज़ ले ले तो आरियतन लेने वाला जो कुछ मालिक को दे उसका मुतालबा आरियतन देने वाले से नहीं कर सकता।
2371. अगर किसी शख़्स को यह मअलूम न हो कि उसने जो माल आरियतन लिया है वह ग़स्बी है और उसके पास होते हुए वह माल तलफ़ हो जाए तो अगर माल का मालिक उसका एवज़ उससे ले ले तो वह भी जो कुछ माल के मालिक को दिया हो उसका मुतालबा आरियतन देने वाले से कर सकता है। लेकिन अगर उसने जो चीज़ आरियतन ली हो वह सोना या चांदी हो या बतौरे आरिया देने वाले ने उससे शर्त की हो कि अगर वह चीज़ तलफ़ हो जाए तो वह उसका एवज़ देगा तो फिर उसने माल का जो एवज़ माल के मालिक को दिया हो उसका मुतालबा आरियतन देने वाले से नहीं कर सकता।
निकाह के अहकाम
अक़्दे इज़्दिवाज के ज़रीए औरत, मर्द पर और मर्द, औरत पर हलाल हो जाते हैं और अक़्द की दो क़िस्में हैं पहली दाइमी और दूसरी ग़ैर दाइमी। मुक़र्ररा वक़्त के लिए अक़्द अक़्दे दाइमी उसे कहते हैं जिसमें इज़्दिवाज की मुद्दत मुअय्यन न हो और वह हमेशा के लिए हो और जिस औरत से इस क़िस्म का अक़्द किया जाए उसे दाइमा कहते हैं। और ग़ैर दाइमी अक़्द वह है जिसमें इज़्दिवाज की मुद्दत मुअय्यन हो मसलन औरत के साथ एक घंटे या एक दिन या एक महीने या एक साल या उससे ज़्यादा मुद्दत के लिए अक़्द किया जाए लेकिन उस अक़्द की मुद्दत औरत और मर्द की तमाम उम्र से ज़्यादा नहीं होनी चाहिए क्योंकि उस सूरत में अक़्द बातिल हो जायेगा। जब औरत से इस क़िस्म का अक़्द किया जाए तो उसे अक़्दे मुतअ या सीग़ा कहते हैं।
2372. इज़दिवाज ख़्वाह दाइमी हो या ग़ैर दाइमी उसमें सीग़ा (निकाह के बोल) पढ़ना ज़रूरी है। औरत और मर्द का महज़ होना और इसी तरह (निकाहनामा) लिखना काफ़ी नहीं है। निकाह का सीग़ा या तो औरत और मर्द खुद पढ़ते हैं या किसी को वकील मुक़र्रर कर लेते हैं ताकि वह उनकी तरफ़ से पढ़ दे।
2373. वकील का मर्द होना लाज़िम नहीं बल्कि औरत भी निकाह का सीग़ा पढ़ने के लिए किसी दूसरे की जानिब से वकील हो सकती है।
2374. औरत और मर्द को जब तक इत्मीनान न हो जाए कि उनके वकील ने सीग़ा पढ़ दिया है उस वक़्त तक वह एक दूसरे को महरमाना नज़रों से नहीं देख सकते और इस बात का गुमान कि वकील ने सीग़ा पढ़ दिया है काफ़ी नहीं है। बल्कि अगर वकील कह दे कि मैंने सीग़ा पढ़ दिया है लेकिन उसकी बात पर इत्मीनान न हो तो उसकी बात पर भरोसा करना महल्ले इश्काल है।
2375. अगर कोई औरत किसी को वकील मुक़र्रर करे और कहे कि तुम मेरा निकाह दस दिन के लिए फ़लां शख़्स के साथ पढ़ दो और दस दिन की इब्तिदा को मुअय्यन न करे तो वह (निकाहख़्वान) वकील जिन दस दिनों के लिए चाहे उसे उस मर्द के निकाह में दे सकता है लेकिन अगर वकील को मअलूम हो कि औरत का मक़्सद किसी खास दिन या घंटे का है तो फिर उसे चाहिये कि औरत के क़स्द के मुताबिक़ सीग़ा पढ़े।
2376. अक़्दे दाइमी या अक़्दे ग़ैर दाइमी का सीग़ा पढ़ने के लिए एक शख़्स दो अश्ख़ास की तरफ़ से वकील बन सकता है और इंसान यह भी कर सकता है कि औरत की तरफ़ से वकील बन जाए और उससे खुद दाइमी या ग़ैर दाइमी निकाह कर ले लेकिन एहतियाते मुस्तहब यह है कि निकाह दो अश्ख़ास पढ़ें।
निकाह पढ़ने का तरीक़ा
2377. अगर औरत और मर्द ख़ुद अपने दाइमी निकाह का सीग़ा पढ़ें तो महर मुअय्यन करने के बाद पहले औरत कहे, ज़व्वज्तुका नफ़्सी अलस् सिदाक़िल मअलूम, यअनी मैंने उस महर पर जो मुअय्यन हो चुका है अपने आपको तुम्हारी बीबी बनाया और उसके लम्हे भर बाद मर्द कहे, क़बिल्तुत् तज़्वीजा यअनी मैंने इज़्दिवाज को क़बूल किया, तो निकाह सहीह है। और अगर वह किसी दूसरे को वकील मुक़र्रर करें कि उनकी तरफ़ से सीग़ा ए निकाह पढ़ दे तो अगर मिसाल के तौर पर मर्द का नाम अहमद और औरत का नाम फ़ातिमा हो और औरत का वकील कहे, ज़व्वज्तो मुवक्किलका अहमदा मुवक्किलती फ़ातिमता अलस् सिदाक़िल मअलूम, और उसके लम्हा भर बाद मर्द का वकील कहे, क़बिल्तुत तज़्वीजा ले मुवक्किली अहमदा अलस सिदाक़िल मअलूम तो निकाह सहीह होगा और एहतियाते मुस्तहब यह है कि मर्द जो लफ़्ज़ कहे वह औरत के कहे जाने वाले लफ़्ज़ के मुताबिक़ हो मसलन अगर औरत, ज़व्वज्तो कहे तो मर्द भी क़विल्तुत तज़्वीजा कहे और क़बिल्तुन् निकाह न कहे।
2378. अगर खुद औरत और मर्द चाहें तो ग़ैर दाइमी निकाह का सीग़ा निकाह की मुद्दत और महर मुअय्यन करने के बाद पढ़ सकते हैं। लिहाज़ा अगर औरत कहे ज़व्वजतुकान नफ़्सी फ़िल्मुद्दतिल मअलूमते अलल महरिल मअलूम और उसके लम्हा भर बाद मर्द कहे क़बिल्तो तो निकाह सहीह है। और अगर वह किसी और शख़्स को वकील बनाये और पहले औरत का वकील मर्द के वकील से कहे, ज़व्वज्तो मुवक्कितली मुवक्किलका फ़िलमुद्दतिल मअलूमते अलल महरिल मअलूम और उसके बाद मर्द का वकील मअमूली तवक़्क़ुफ़ के बाद कहे, क़बिल्तुत तज़वीजा लेमुवक्किली हाकज़ा तो निकाह सहीह होगा।
निकाह की शराइत
2379. निकाह की चन्द शर्तें हैं जो ज़ैल में दर्ज की जाती हैं –
1. एहतियात की बिना पर निकाह का सीग़ा सहीह अरबी में पढ़ा जाए और अगर ख़ुद मर्द और औरत सीग़ा सहीह अरबी न पढ़ सकते हों तो अरबी के अलावा किसी दूसरी ज़बान में पढ़ सकते हैं और किसी शख़्स को वकील बनाना लाज़िम नहीं है। अलबत्ता उन्हें चाहिये कि वह अल्फ़ाज़ कहें जो ज़व्वज्तो और क़बिल्तो का मफ़्हूम अदा कर सकें।
2. मर्द और औरत या उनके वकील जो कि सीग़ा पढ़ रहे हों वह क़स्दे इंशा रखते हों यअनी अगर खुद मर्द और औरत सीग़ा पढ़ रहे हों तो औरत का ज़व्वज्तुका नफ़्सी कहना इस नीयत से हो कि खुद को उसकी बीवी क़रार दे और मर्द का क़बिल्तुत् तज़वीजा कहना इस नीयत से हो कि वह उसका अपनी बीवी बनना क़बूल करे और अगर मर्द और औरत के वकील सीग़ा पढ़ रहे हों तो ज़व्वज्तो व क़बिल्तो कहने से उनकी नीयत यह हो कि वह मर्द और औरत जिन्होंने उन्हें वकील बनाया है एक दूसरे के मियां बीवी बन जायें।
3. जो शख़्स सीग़ा पढ़ रहा हो ज़रूरी है कि वह आक़िल हो और एहतियात की बिना पर उसे बालिग़ भी होना चाहिये। ख़्वाह वह अपने लिये सीग़ा पढ़े या किसी दूसरे की तरफ़ से वकील बनाया गया हो।
4. अगर औरत और मर्द के वकील या उनके सरपरस्त सीग़ा पढ़ रहे हों तो वह निकाह के वक़्त औरत और मर्द को मुअय्यन कर लें मसलन उनके नाम लें या उनकी तरफ़ इशारा करें। लिहाज़ा जिस शख़्स की कई लड़कियां हों अगर वह किसी मर्द से कहे ज़व्वज्तुका एह्दा बनाती यअनी मैंने अपनी बेटियों में से एक को तुम्हारी बीवी बनाया और वह मर्द कहे, क़बिल्तो यअनी मैंने क़बूल किया तो चूंकि निकाह करते वक़्त लड़की को मुअय्यन नहीं किया गया इस लिये निकाह बातिल है।
5. औरत और मर्द इज़दिवाज पर राज़ी हों। हां अगर औरत बज़ाहिर नापसंदीदगी से इजाज़त दे और मअलूम हो कि दिल से राज़ी है तो निकाह सहीह है।
2380. अगर निकाह में एक हर्फ़ भी ग़लत पढ़ा जाए जो उसके मअनी बदल दे तो निकाह बातिल है।
2381. वह शख़्स जो निकाह का सीग़ा पढ़ रहा हो अगर ख़्वाह वह इज्माली तौर पर निकाह के मअनी जानता हो और उसके मअनी को हक़ीक़ी शक्ल देना चाहता हो तो निकाह सहीह है। और यह लाज़िम नहीं कि वह तफ़्सील के साथ सीग़े के मअनी जानता हो मसलन या जानना (ज़रूरी नहीं है) कि अरबी ज़बान के लिहाज़ से फ़ेल या फ़ायल कौन सा है।
2382. अगर किसी औरत का निकाह उसकी इजाज़त के बग़ैर किसी मर्द से कर दिया जाए और बाद में औरत और मर्द उस निकाह की इजाज़त दे दें तो निकाह सहीह है।
2383. अगर औरत और मर्द दोनों को या उनमें से किसी एक को इज़्दिवाज पर मजबूर किया जाए और निकाह पढ़े जाने के बाद वह इजाज़त दे दें तो निकाह सहीह है और बेहतर यह है कि दोबारा निकाह पढ़ा जाए।
2384. बाप और दादा अपने नाबालिग़ लड़के या लड़की (पोते या पोती) या दीवाने फ़र्ज़न्द का जो दीवांगी की हालत में बालिग़ हुआ हो निकाह कर सकते हैं और जब वह बच्चा बालिग़ हो जाए या दीवाना आक़िल हो जाए तो उन्होंने उसका जो निकाह किया हो अगर उसमें कोई ख़राबी हो तो उन्हें उस निकाह को बरक़रार रखने या ख़त्म करने का इख़्तियार है और अगर कोई ख़राबी न हो और बालिग़ लड़के और लड़की में से कोई एक अपने उस निकाह को मंसूख करे तो तलाक़ या दोबारा निकाह पढ़ने की एहतियात तर्क नहीं होती।
2385. जो लड़की सिने बुलूग़ को पहुंच चुकि हो और रशीदा हो यअनी अपना भला बुरा समझ सकती हो अगर वह शादी करना चाहे और कुंवारी हो तो – एहतियात की बिना पर – उसे चाहिये कि अपने बाप या दादा से इजाज़त ले अगरचे वह खुदमुख़्तारी से अपनी ज़िन्दगी के कामों को अंजाम देती हो अलबत्ता मां और भाई से इजाज़त लेना लाज़िम नहीं।
2386. अगर लड़की कुंवारी न हो या कुंवारी हो लेकिन बाप या दादा उस मर्द के साथ उसे शादी करने की इजाज़त न देते हों जो उर्फ़न व शरअन उसका हम पल्ला हो या बाप और दादा बेटी की शादी के मुआमले में किसी तरह शरीक होने के लिए राज़ी न हों या दीवांगी या उस जैसी किसी दूसरी वजह से इजाज़त देने की अहलियत न रखते हों तो इन तमाम सूरतों में उनसे इजाज़त लेना लाज़िम नहीं है। इसी तरह उन के मौजूद न होने या किसी दूसरी वजह से इजाज़त लेना मुम्किन न हो और लड़की का शादी करना बेहद ज़रूरी हो तो बाप और दादा से इजाज़त लेना लाज़िम नहीं है।
2387. अगर बाप या दादा अपने ना बालिग़ लड़के (या पोते) की शादी कर दें तो लड़के (या पोते) को चाहिये कि बालिग़ होने के बाद उस औरत का ख़र्च दे बल्कि बालिग़ होने से पहले भी जब उसकी उम्र इतनी हो जाए कि वह उस लड़की से लज़्ज़त उठाने की क़ाबिलीयत रखता हो और लड़की भी इस क़दर छोटी न हो कि शौहर उस से लज़्ज़त न उठा सके तो बीवी के ख़र्च का ज़िम्मेदार लड़का है और इस सूरत के अलावा भी एहतिमाल है कि बीवी खर्च की मुस्तहक़ हो। पस एहतियात यह है कि मुसालहत वग़ैरा के ज़रीए मस्अले को हल करे।
2388. अगर बाप या दादा अपने ना बालिग़ लड़के (या पोते) की शादी कर दें तो अगर लड़के के पास निकाह के वक़्त कोई माल न हो तो बाप या दादा को चाहिये कि उस औरत का महर दे और यही हुक्म है अगर लड़के (या पोते) के पास कोई माल हो लेकिन बाप या दादा ने महर अदा करने की ज़मानत दी हो। और इन दो सूरतों के अलावा अगर उसका महर महरुल मिस्ल से ज़्यादा न हो या किसी मसलहत की बिना पर उस लड़की का महर महरुल मिस्ल से ज़्यादा हो तो बाप या दादा बेटे (या पोते) के माल से महर अदा कर सकते हैं वरना बेटे (या पोते) के माल से महरुल मिस्ल से ज़्यादा महर नहीं दे सकते मगर यह कि बच्चा बालिग़ होने के बाद उनके इस काम को क़ब़ूल करे।
वह सूरतें जिनमें मर्द या औरत निकाह फ़स्ख़ कर सकते हैं
2389. अगर निकाह के बाद मर्द को पता चले कि औरत में निकाह के वक़्त मुन्दरिजा ज़ैल छः उयूब में से कोई ऐब मौजूद था तो उसकी वजह से निकाह को फ़स्ख़ कर सकता हैः-
1. दीवानगी – अगरचे कभी कभार होती हो।
2. जुज़ाम।
3. बर्स। (सफेद दाग़)
4. अंधापन।
5. अपाहिज होना। अगरचे ज़मीन पर न घसिटती हो।
6. बच्चादानी में गोश्त या हड्डी हो। ख़्वाह जिमाअ और हम्ल के लिए माने हो या न हो। और अगर मर्द को निकाह के बाद पता चले कि औरत निकाह के वक़्त इफ़्ज़ा हो चुकी थी यअनी उसका पेशाब और हैज़ का मखरज या हैज़ और पाखाने का मखरज एक हो चुका था तो इस सूरत में निकाह को फ़स्ख़ करने में इश्काल है और एहतियाते लाज़िम यह है कि अक़्द को फ़स्ख़ करना चाहे तो तलाक़ भी दे।
2390. अगर औरत को निकाह के बाद पता चले कि उसके शौहर का आला ए तनासुल नहीं है, या निकाह के बाद जिमाअ करने से पहले, या जिमाअ करने के बाद, उसका आला ए तनासुल कट जाए, या ऐसी बीमारी में मुब्तला हो जाए कि सोहबत और जिमाअ न कर सकता हो ख़्वाह वह बीमारी निकाह के बाद और जिमाअ करने से पहले, या जिमाअ करने के बाद ही क्यों न लाहिक़ हुई हो। उन तमाम सूरतों में औरत तलाक़ के बग़ैर निकाह को ख़त्म कर सकती है। और अगर औरत को निकाह के बाद पता चले कि उसका शौहर निकाह के पहले दीवाना था या निकाह के बाद – ख़्वाह जिमाअ से पहले, या जिमाअ के बाद – दीवाना हो जाए, या उसे (निकाह के बाद) पता चले कि निकाह के वक़्त उसके फ़ोते निकाले गये थे या मसल दिये गये थे, या उसे पता चले कि निकाह के वक़्त जुज़ाम या बर्स में मुब्तला था तो इन तमाम सूरतों में अगर औरत इज़्दिवाजी ज़िन्दगी बरक़रार न रखना और निकाह करने को ख़त्म करना चाहे तो एहतियाते वाजिब यह है कि उसका शौहर या उसका सरपरस्त औरत को तलाक़ दे। लेकिन उस सूरत में कि उसका शौहर जिमाअ न कर सकता हो और औरत निकाह को ख़त्म करना चाहे तो उस पर लाज़िम है कि पहले हाकिमे शर्अ उसे एक साल की मोहलत देगा लिहाज़ा अगर इस दौरान वह उस औरत या किसी दूसरी औरत से जिमाअ न कर सके तो उसके बाद औरत निकाह को ख़त्म कर सकती है।
2391. अगर औरत इस बिना पर निकाह ख़त्म कर दे कि उसका शौहर नामर्द है तो ज़रूरी है कि शौहर उसे आधा महर दे लेकिन अगर उन दूसरे नक़ाइस में जिनका ज़िक्र ऊपर किया गया है किसी एक की बिना पर मर्द या औरत निकाह ख़त्म कर दें तो अगर मर्द ने औरत के साथ जिमाअ न किया हो तो वह किसी चीज़ का ज़िम्मेदार नहीं है और अगर जिमाअ किया हो तो ज़रूरी है कि पूरा महर दे। लेकिन अगर मर्द औरत के उन उयूब की वजह से निकाह ख़त्म करे जिन का बयान मस्अला 2389 में हो चुका है और उसने औरत के साथ जिमाअ न किया हो तो ज़रूरी है कि औरत को पूरा महर दे।
2392. अगर मर्द या औरत जो कुछ वह है उससे ज़्यादा बढ़ा चढ़ा कर उनकी तअरीफ़ की जाए ताकि वह शादी करने में दिलचस्पी लें ख़्वाह यह तअरीफ़ निकाह के ज़िम्न में हो या उससे पहले – उस सूरत में कि उस तअरीफ़ की बुनियाद पर निकाह हुआ हो – लिहाज़ा अगर निकाह के बाद दूसरे फ़रीक़ को इस बात का ग़लत होना मअलूम हो जाए तो वह निकाह को ख़त्म कर सकता है और इस मस्अले के तफ़्सीली अहकाम मसाइले मुन्तख़िब जैसी दूसरी किताबों में बयान किये गए हैं।
वह औरतें जिन से निकाह करना हराम है
2393. उन औरतों के साथ जो इंसान की महरम हों इज़्दिवाज हराम है मसलन मां, बहन, बेटी, फुफी, खाला, भतीजी, भांजी, सास।
2394. अगर कोई शख़्स किसी औरत से निकाह करे चाहे उसके साथ जिमाअ न भी करे तो उस औरत की मां, नानी और दादी और जितना सिलसिला ऊपर चला जाए सब औरतें उस मर्द की महरम हो जाती हैं।
2395. अगर कोई शख़्स किसी औरत से निकाह करे और उसके साथ हमबिस्तरी करे तो फिर उस औरत की लड़की, नवासी, पोती और जितना सिलसिला नीचे चला जाए सब औरतें उस मर्द की महरम हो जाती हैं ख़्वाह वह अक़्द के वक़्त मौजूद हों या बाद में पैदा हों।
2396. अगर किसी मर्द ने एक औरत से निकाह किया हो लेकिन हमबिस्तरी न की हो तो जब तक वह औरत उसके निकाह में रहे एहतियाते वाजिब की बिना पर उस वक़्त तक उस की लड़की से शादी न करे।
2397. इंसान की फुफी और खाला और उसके बाप की फुफी और खाला और दादा की फुफी और ख़ाला, बाप की मां (दादी) और मां की फुफी और खाला और नानी और नाना की फुफी और खाला और जिस क़दर यह सिलसिला ऊपर चला जाए सब उसके महरम हैं।
2398. शौहर का बाप और दादा और जिस क़दर यह सिलसिला ऊपर चला जाए और शौहर का बेटा, पोता और नवासा जिस क़दर भी यह सिलसिला नीचे चला जाए और ख़्वाह वह निकाह के वक़्त दुनिया में मौजूद हों या बाद में पैदा हों सब उसकी बीवी के महरम हैं।
2399. अगर कोई शख़्स किसी औरत से निकाह करे तो ख़्वाह निकाह दाइमी हो या ग़ैर दाइमी जब तक वह औरत उसकी मंकूहा है वह उसकी बहन के साथ निकाह नहीं कर सकता।
2400. अगर कोई शख़्स उस तरतीब के मुताबिक़ जिसका ज़िक्र तलाक़ के मसाइल में किया जायेगा अपनी बीवी को तलाक़े रजई दे दे तो वह इद्दत के दौरान उसकी बहन से निकाह नहीं कर सकता लेकिन तलाक़े बाइन की इद्दत के दौरान उसकी बहन से निकाह कर सकता है और मुतअ की इद्दत के दौरान एहतियाते वाजिब यह है कि औरत की बहन से निकाह न करे।
2401. इंसान अपनी बीवी की इजाज़त के बग़ैर उसकी भतीजी या भांजी से शादी नहीं कर सकता लेकिन अगर वह बीवी की इजाज़त के बग़ैर उन से निकाह कर ले और बाद में बीवी इजाज़त दे दे तो फिर कोई इश्काल नहीं।
2402. अगर बीवी को पता चले कि उसके शौहर ने उसकी भतीजी या भांजी से निकाह कर लिया है और ख़ामोश रहे तो अगर वह बाद में राज़ी हो जाए तो निकाह सहीह है और अगर रज़ामन्दी दे दे तो फिर कोई इश्काल नहीं।
2403. अगर इंसान खाला या फुफी की लड़की से शादी करने से पहले (नऊज़ों बिल्लाह) ख़ाला या फुफी से ज़िना करे तो फिर वह उसकी लड़की से एहतियात की बिना पर शादी नहीं कर सकता।
2404. अगर कोई शख़्स अपनी फुफी की लड़की या ख़ाला की लड़की से शादी करे और उससे हमबिस्तरी करने के बाद उसकी मां से ज़िना करे तो यह बात उनकी जुदाई का मूजिब नहीं बनती और अगर उससे निकाह के बाद लेकिन जिमाअ करने से पहले उसकी मां से ज़िना करे तब भी यही हुक्म है अगरचे एहतियाते मुस्तहब यह है कि उस सूरत में तलाक़ देकर उससे (यअनी फुफी ज़ाद या खाला ज़ाद बहन से) जुदा हो जाए।
2405. अगर कोई शख़्स अपनी फुफी या खाला के अलावा किसी और औरत से ज़िना करे तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि उसकी बेटी के साथ शादी न करे बल्कि अगर किसी औरत से निकाह करे और उसके साथ जिमाअ करने से पहले उसकी मां के साथ ज़िना करे तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि उस औरत से जुदा हो जाए लेकिन अगर उसके साथ जिमाअ कर ले और बाद में उसकी मां से ज़िना करे तो बेशक औरत से जुदा होना लाज़िम नहीं।
2406. मुसलमान औरत काफ़िर मर्द से निकाह नहीं कर सकती। मुसलमान मर्द भी अहले किताब के अलावा काफ़िर औरतों से निकाह नहीं कर सकता। लेकिन यहूदी और ईसाई औरतों की मानिन्द अहले किताब औरतों से मुतअ करने में कोई हरज नहीं और एहतियाते लाज़िम की बिना पर उनसे दाइमी अक़्द न किया जाए और बअज़ फ़िरक़े मसलन नासिबी जो अपने आप को मुसलमान समझते हैं कुफ़्फ़ार के हुक्म में हैं और मुसलमान मर्द और औरतें उनके साथ दाइमी या ग़ैरे दाइमी निकाह नहीं कर सकते।
2407. अगर कोई शख़्स एक ऐसी औरत से ज़िना करे जो रजई तलाक़ की इद्दत गुज़ार रही हो तो एहतियात की बिना पर – वह औरत उस पर हराम हो जाती है औगर ऐसी औरत के साथ ज़िना करे जो मुतअ या तलाक़े बाइन या वफ़ात की इद्दत गुज़ार रही हो तो बाद में उसके साथ निकाह कर सकता है अगरचे एहतियाते मुस्तहब यह है कि उससे शादी न करे। और रजई तलाक़ और बाइन तलाक़ और मुतअ की इद्दत और वफ़ात की इद्दत के मअनी तलाक़ के अहकाम में बताए जायेंगे।
2408. अगर कोई शख़्स किसी ऐसी औरत से ज़िना करे जो बे शौहर हो मगर इद्दत में न हो तो एहतियात की बिना पर तौबा करने से पहले उससे शादी नहीं कर सकता। लेकिन अगर ज़ानी के अलावा कोई दूसरा शख़्स (उस औरत के) तौबा करने से पहले उसके साथ शादी करना चाहे तो कोई इश्काल नहीं है। मगर उस सूरत में कि वह औरत ज़िनाकार मशहूर हो तो एहतियात की बिना पर उस (औरत) के तौबा करने से पहले उसके साथ शादी करना जाइज़ नहीं है। इसी तरह कोई मर्द ज़िनाकार मशहूर हो तो तौबा करने से पहले उसके साथ शादी करना जाइज़ नहीं है और एहतियाते मुस्तहब यह है कि अगर कोई शख़्स ज़िनाकार औरत से जिस से खुद उसने या किसी दूसरे ने मुंह काला किया हो शादी करना चाहे तो हैज़ आने तक सब्र करे और हैज़ आने के बाद उसके साथ शादी कर ले।
2409. अगर कोई शख़्स एक ऐसी औरत से निकाह करे जो दूसरे की इद्दत में हो तो अगर मर्द और औरत दोनों या उसमें से कोई एक जानता हो कि औरत की इद्दत ख़त्म नहीं हुई और यह भी जानते हो कि इद्दत के दौरान औरत से निकाह करना हराम है तो अगरचे मर्द ने निकाह के बाद औरत से जिमाअ न भी किया हो वह हमेशा के लिए उस पर हराम हो जायेगी।
2410. अगर कोई शख़्स किसी ऐसी औरत से निकाह करे जो दूसरे की इद्दत में हो और उससे जिमाअ करे तो ख़्वाह उसे यह इल्म न हो कि वह औरत इद्दत में है या यह न जानता हो कि इद्दत के दौरान औरत से निकाह करना हराम है वह औरत हमेशा के लिए उस पर हराम हो जायेगी।
2411. अगर कोई शख़्स यह जानते हुए कि औरत शौहरदार है और (उससे शादी करना हराम है) उससे शादी करे तो ज़रूरी है कि उस औरत से जुदा हो जाए और बाद में उससे निकाह नहीं करना चाहिए। और अगर उस शख़्स को यह इल्म न हो कि औरत शौहरदार है लेकिन शादी के बाद हमबिस्तरी की हो तब भी एहतियात की बिना पर यही हुक्म है।
2412. अगर शौहरदार औरत ज़िना करे – तो एहतियात की बिना पर – वह ज़ानी पर हमेशा के लिए हराम हो जाती है लेकिन शौहर पर हराम नहीं होती और अगर तौबा व इस्तिग़फ़ार न करे और अपने अमल पर बाक़ी रहे (यअनी ज़िनाकारी तर्क न करे) तो बेहतर यह है कि उसका शौहर उसे तलाक़ दे दे लेकिन शौहर को चाहिए कि उसका महर भी दे।
2413. जिस औरत को तलाक़ मिल गई हो और जो औरत मुतअ में रही हो उसके शौहर ने मुतअ की मुद्दत बख़्श दी हो या मुतअ की मुद्दत ख़त्म हो गई हो अगर वह कुछ अर्से के बाद दूसरा शौहर करे और फिर उसे शक हो कि दूसरे शौहर से निकाह के वक़्त पहले शौहर की इद्दत ख़त्म हुई थी या नहीं तो वह अपने शक की पर्वा न करे।
2414. इग़्लाम करवाने वाले लड़के की मां, बहन और बेटी इग़्लाम करने वाले पर – जबकि (इग़्लाम करने वाला) बालिग़ हो – हराम हो जाते हैं। और इग़्लाम करवाने वाला मर्द हो या इग़्लाम करने वाला नाबालिग़ हो तब भी एहतियाते लाज़िम की बिना पर यही हुक्म है। लेकिन अगर उसे गुमान हो कि दुख़ूल हुआ था या शक करे कि दुख़ूल हुआ या नहीं तो फिर वह हराम नहीं होंगे।
2415. अगर कोई शख़्स किसी लड़के की मां या बहन से शादी करे और शादी के बाद उस लड़के से इग़्लाम करे तो एहतियात की बिना पर वह औरतें उस पर हराम हो जाती हैं।
2416. अगर कोई शख़्स एहराम की हालत में जो अअमाले हज में से एक अमल है किसी औरत से शादी करे तो उसका निकाह बातिल है और अगर औरत को मअलूम था कि एहराम की हालत में शादी करना हराम है तो एहतियाते वाजिब यह है कि बाद में उस मर्द से शादी न करे।
2417. जो औरत एहराम की हालत में हो अगर वह एक ऐसे मर्द से शादी करे जो एहराम की हालत में न हो तो उसका निकाह बातिल है और अगर औरत को मअलूम था कि एहराम की हालत में शादी करना हराम है तो एहतियाते वाजिब यह है कि बाद में उस मर्द से शादी न करे।
2418. अगर मर्द तवाफ़ुन्निसा जो हज और उमरा ए मुफ़्रादा के अअमाल में से एक अमल है बजा न लाए तो उसकी बीवी और दूसरी औरतें उस पर हलाल नहीं होतीं और अगर औरत तवाफ़ुन्निसा न करे तो उसका शौहर और दूसरे मर्द उस पर हलाल नहीं होते लेकिन अगर वह बाद में तवाफ़ुन्निसा बजा लायें तो मर्द पर औरतें और औरतों पर मर्द हलाल हो जाते हैं।
2419. अगर कोई शख़्स नाबालिग़ लड़की से निकाह करे तो उसकी लड़की की उम्र नौ साल होने से पहले उसके साथ जिमाअ करना हराम है। लेकिन अगर जिमाअ करे तो अज़हर यह है कि लड़की के बालिग़ होने के बाद उससे जिमाअ करना हराम नहीं है ख़्वाह उसे इफ़्ज़ा ही हो गया हो। इफ़ज़ा के मअनी मस्अला 2389 में बताए जा चुके हैं लेकिन अहवत यह है कि उसे तलाक़ दे दे।
2420. जिस औरत को तीन मर्तबा तलाक़ दी जाए वह शौहर पर हराम हो जाती है। हां अगर उन शराइत के साथ जिन का ज़िक्र तलाक़ के अहकाम में किया जायेगा वह औरत दूसरे मर्द से शादी करे तो दूसरे शौहर की मौत या उससे तलाक़ हो जाने के बाद और इद्दत गुज़र जाने के बाद उसका पहला शौहर दोबारा उसके साथ निकाह कर सकता है।
दाइमी अक़्द के अहकाम
2421. जिस औरत का दाइमी निकाह हो जाए उसके लिए हराम है कि शौहर की इजाज़त के बग़ैर घर से बाहर निकले ख़्वाह उसका निकलना शौहर के हक़ के मनाफ़ी न भी हो। नीज़ उसके लिए ज़रूरी है कि जब भी शौहर जिंसी लज़्ज़तें हासिल करना चाहे तो उसकी ख़्वाहिश पूरी करे और शरई उज़्र के बग़ैर शौहर को हमबिस्तरी से न रोके। और उसकी ग़िज़ा, लिबास, रहाइश और ज़िन्दगी की बाक़ी ज़रूरीयात का इन्तिज़ाम जब तक वह अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करे, शौहर पर वाजिब है। और अगर वह यह चीज़ें मुहैया न करे तो ख़्वाह उनके मुहैया करने पर क़ुदरत रखता हो या न रखता हो वह बीवी का मक़रूज़ है।
2422. अगर कोई औरत हमबिस्तरी और जिंसी लज़्ज़तों के सिलसिले में शौहर का साथ देकर उसकी ख़्वाहिश पूरी न करे तो रोटी, कपड़े और मकान का वह ज़िम्मेदार नहीं है, अगरचे वह शौहर के पास ही रहे और अगर वह कभी कभार अपनी इन ज़िम्मेदरियों को पूरा न करे तो मशहूर क़ौल के मुताबिक़ तब भी रोटी, कपड़े और मकान का शौहर पर हक़ नहीं रखती। लेकिन यह हुक्म महल्ले इश्काल है और हर सूरत में बिना इश्काल उसका महर कलअदम नहीं होता।
2423. मर्द को यह हक़ नहीं कि बीवी को घरेलू खितमत पर मजबूर करे।
2424. बीवी को सफ़र के अख़राजात, वतन में रहने के अख़राजात से ज़्यादा हों तो अगर उसने सफ़र शौहर की इजाज़त से किया हो तो शौहर की ज़िम्मेदारी है कि वह उन अख़राजात को पूरा करे। लेकिन अगर वह सफ़र गाड़ी या जहाज़ वग़ैरा के ज़रीए हो तो किराये और सफ़र के दूसरे ज़रूरी अख़राजात की वह खुद ज़िम्मेदार है लेकिन अगर उसका शौहर उसे सफ़र में साथ ले जाना चाहता हो तो उसके लिए ज़रूरी है कि बीवी के सफ़री अख़राजात बर्दाश्त करे।
2425. जिस औरत का ख़र्च उसके शौहर के ज़िम्मे हो और शौहर उसे ख़र्च न दे तो वह अपना ख़र्च शौहर की इजाज़त के बग़ैर उसके माल से ले सकती है और अगर न ले सकती हो और मजबूर हो कि अपनी मआश का खुद बन्दोबस्त करे और शिकायत करने के लिए हाकिमे शर्अ तक उसकी रसाई न हो ताकि वह उसके शौहर को अगरचे क़ैद कर के ही – खर्च देने पर मजबूर करे तो जिस वक़्त वह अपनी मआश का बन्दोबस्त करने में मशग़ूल हो उस वक़्त शौहर की इताअत उस पर वाजिब नहीं है।
2426. अगर किसी मर्द की मसलन दो बीवियाँ हों और वह उनमें से एक के साथ एक रात रहे तो उस पर वाजिब है कि चार रातों में से एक रात दूसरी के पास भी गुज़ारे और उस सूरत के अलावा औरत के पास रहना वाजिब नहीं है। हां यह लाज़िम है कि उसके पास रहना बिल्कुल ही तर्क न कर दे और औला और अहवत यह है कि हर चार रातों में से एक रात मर्द अपनी दाइमी मंकूहा बीवी के पास रहे।
2427. शौहर अपनी जवान बीवी से चार महीने से ज़्यादा मुद्दत के लिए हम बिस्तरी तर्क नहीं कर सकता मगर यह कि हमबिस्तरी उसके लिए नुक़्सान देह या बहुत ज़्यादा तक्लीफ़ का बाइस हो या उस की बीवी ख़ुद चार महीने से ज़्यादा मुद्दत के लिए हमबिस्तरी तर्क करने पर राज़ी हो या शादी करते वक़्त निकाह के ज़िम्न में चार महीने से ज़्यादा मुद्दत के लिए हमबिस्तरी तर्क करने की शर्त रखी गई हो और इस हुक्म में एहतियात की बिना पर शौहर के मौजूद होने या मुसाफ़िर होने या औरत के मंकूहा या मम्तूआ होने में कोई फ़र्क़ नहीं है।
2428. अगर दाइमी निकाह में महर मुअय्यन न किया जाए तो निकाह सहीह है और अगर औरत के साथ जिमाअ करे तो उसे चाहिए कि उसका महर उसी जैसी औरतों के महर के मुताबिक़ दे अलबत्ता अगर मुतअ में महर मुअय्यन न किया जाए तो मुतअ बातिल हो जाता है।
2429. अगर दाइमी निकाह पढ़ते वक़्त महर देने के लिए मुद्दत न मुअय्यन की जाए तो औरत महर लेने से पहले शौहर को जिमाअ करने से रोक सकती है क़तए नज़र इस से कि मर्द महर देने पर क़ादिर हो या न हो लेकिन अगर वह महर देने से पहले जिमाअ पर राज़ी हो और शौहर उस से जिमाअ करे तो बाद में वह शरई उज़्र के बग़ैर शौहर को जिमाअ करने से नहीं रोक सकती।
मुअय्यन मुद्दत का निकाह
2430. औरत के साथ मुतअ करना अगरचे लज़्ज़त हासिल करने के लिए न हो तब भी सही है।
2431. एहतियाते वाजिब यह है कि शौहर ने जिस औरत से मुतअ किया हो उसके साथ चार महीने से ज़्यादा जिमाअ तर्क न करे।
2432. जिस औरत के साथ मुतअ किया जा रहा हो अगर वह निकाह में यह शर्त आयद करे कि शौहर उससे जिमाअ न करे तो निकाह और उसकी आयद कर्दा शर्त सहीह है और शौहर फ़क़त उससे दूसरी लज़्ज़तें हासिल कर सकता है। लेकिन अगर वह बाद में जिमाअ के लिए राज़ी हो जाए तो शौहर उससे जिमाअ कर सकता है। और दाइमी अक़्द में भी यही हुक्म है।
2433. जिस औरत के साथ मुतअ किया गया हो ख़्वाह वह हामिला हो जाए तब भी ख़र्च का हक़ नहीं रखती।
2434. जिस औरत के साथ मुतअ किया गया हो वह हमबिस्तरी का हक़ नहीं रखती और शौहर से मीरास भी नहीं पाती और शौहर भी उससे मीरास नहीं पाता। लेकिन अगर – उन में से किसी फ़रीक़ ने या दोनों ने – मीरास पाने की शर्त रखी हो तो उस शर्त का सहीह होना महल्ले इश्काल है लेकिन एहतियात का खयाल रहे।
2435. जिस औरत से मुतअ किया गया हो अगरचे उसे यह मअलूम हो कि वह ख़र्च और हमबिस्तरी का हक़ नहीं रखती उसका निकाह सहीह है और इस वजह से कि वह इन उमूर से नावाक़िफ़ थी उसका शौहर पर कोई हक़ नहीं बनता।
2436. जिस औरत से मुतअ किया गया हो अगर वह शौहर की इजाज़त के बग़ैर घर से बाहर जाये और उसके बाहर जाने की वजह से शौहर की हक़ तलफ़ी हो तो उसका बाहर जाना हराम है और उस सूरत में जबकि उसके बाहर जाने से शौहर की हक़ तलफ़ी न होती हो तब भी एहतियाते मुस्तहब की बिना पर शौहर की इजाज़त के बग़ैर घर से बाहर न जाए।
2437. अगर कोई औरत किसी मर्द को वकील बनाए कि मुअय्यन मुद्दत के लिए और मुअय्यन रक़म के एवज़ उसका खुद अपने साथ सीग़ा पढ़े और वह शख़्स उसका दाइमी निकाह अपने साथ पढ़ ले या मुद्दत मुक़र्रर किये बग़ैर या रक़म का तअय्युन किये बग़ैर मुतअ का सीग़ा पढ़ दे तो जिस वक़्त औरत को इन उमूर का पता चले – अगर वह इजाज़त दे दे तो निकाह सहीह है वर्ना बातिल है।
2438. अगर महरम होने के लिए – मसलन – बाप या दादा अपनी नाबालिग़ लड़की या लड़के का निकाह मुअय्यन मुद्दत के लिए किसी से पढ़ें तो उस सूरत में अगर उस निकाह की वजह से कोई फ़साद न हो तो निकाह सहीह है लेकिन अगर नाबालिग़ लड़का शादी की उस पूरी मुद्दत में जिंसी लज़्ज़त लेने की बिल्कुल सलाहीयत न रखता हो या लड़की ऐसी हो कि वह उससे बिल्कुल लज़्ज़त न ले सकता हो तो निकाह का सहीह होना महल्ले इशकाल है।
2439. अगर बाप या दादा अपनी बच्ची का जो दूसरी जगह हो और यह मअलूम न हो कि वह ज़िन्दा भी है या नहीं महरम बन जाने की ख़ातिर किसी औरत से निकाह कर दें और ज़ौजियत की मुद्दत इतनी हो कि जिस औरत से निकाह किया गया हो उससे इसतिम्ताअ हो सके तो ज़ाहिरी तौर पर महरम बनने का मक़सद हासिल हो जायेगा और अगर बाद में मअलूम हो कि निकाह के वक़्त वह बच्ची ज़िन्दा न थी तो निकाह बातिल है और वह लोग जो निकाह की वजह से बज़ाहिर महरम बन गए थे ना महरम हैं।
2440. जिस औरत के साथ मुतअ किया गया हो अगर मर्द उसकी निकाह में मुअय्यन की हुई मुद्दत बख़्श दे तो अगर उसने उसके साथ हमबिस्तरी की हो तो मर्द को चाहिए की तमाम चीज़ें जिन का वादा किया गया था उसे दे और अगर हमबिस्तरी न की हो तो आधा महर देना वाजिब है और एहतियाते मुस्तहब यह है कि सारा महर उसे दे दे।
2441. मर्द यह कर सकता है कि जिस औरत के साथ उसने पहले मुतअ किया हो और अभी उसकी इद्दत ख़त्म न हुई हो उस से दाइमी अक़्द कर ले या दोबारा मुतअ कर ले।
अहकाम
निगाह डालने के अहकाम
2442. मर्द के लिए ना महरम औरत का ज़िस्म देखना और इसी तरह उसके बालों का देखना ख़्वाह लज़्ज़त के इरादे से हो या उसके बग़ैर – हराम में मुब्तला होने का ख़ौफ़ हो या न हो – हराम है। और उसके चहरे पर नज़र डालना और हाथों को कोहनियों तक देखना अगर लज़्ज़त के इरादे से हो या हराम में मुब्तला हो ने का ख़ौफ़ हो तो हराम है। बल्कि एहतियाते मुस्तहब यह है कि लज़्ज़त के इरादे के बग़ैर और हराम में मुब्तला होने का ख़ौफ़ न हो तब भी न देखे। इसी तरह औरत के लिए ना महरम मर्द के जिस्म पर नज़र डालना हराम है लेकिन अगर औरत मर्द के जिस्म के उन हिस्सों मसलन सर, दोनों हाथों, और दोनों पिंडलियों पर जिन्हें उर्फ़न छिपाना ज़रूरी नहीं है लज़्ज़त के इरादे के बग़ैर नज़र डाले और हराम में मुब्तला होने का ख़ौफ़ न हो तो कोई इश्काल नहीं है।
2443. वह बे पर्दा औरतें जिन्हें अगर कोई पर्दा करने के लिए कहे तो उसको अहम्मीयत न देती हों, उनके बदन की तरफ़ देखने में, अगर लज़्ज़त का क़स्द और हराम में मुब्तला होने का ख़ौफ़ न हो, तो कोई इश्काल नहीं। और इस हुक्म में काफ़िर और ग़ैर काफ़िर औरतों में कोई फ़र्क़ नहीं है। और इसी तरह उन के हाथ, चेहरे और जिस्म के दूसरे हिस्से जिन्हें वह छिपाने की आदी नहीं, कोई फ़र्क़ नहीं है।
2444. औरत को चाहिए कि वह – अलावा हाथ और चेहरे के – सर के बाल और अपना बदन ना महरम मर्द से छिपाए और एहतियाते लाज़िम यह है कि अपना बदन और सर के बाल उस लड़के से भी छिपाए जो अभी बालिग़ तो न हुआ हो लेकिन (इतना समझदार हो कि) अच्छे और बुरे को समझता हो और एहतिमाल हो कि औरत के बदन पर उसकी नज़र पड़ने से उसकी जिंसी ख़्वाहिश बेदार हो जायेगी। लेकिन औरत ना महरम मर्द के सामने चेहरा और कलाइयों तक हाथ खुले रख सकती है लेकिन उस सूरत में कि हराम में मुब्तला होने का ख़ौफ़ हो या किसी मर्द को हाथ और चेहरा दिखाना हराम में मुब्तला करने के इरादे से हो तो उन दोनों सूरतों में उनका खुला रखना जाइज़ नहीं है।
2445. बालिग़ मुसलमान की शर्मगाह देखना हराम है। अगरचे ऐसा करना शीशे के पीछे से या आईने में या साफ़ शफ़्फ़ाफ़ पानी वग़ैरा में ही क्यों न हो। और एहतियाते लाज़िम की बिना पर यही हुक्म है काफ़िर और उस बच्चे की शर्मगाह की तरफ़ देखने का जो अच्छे बुरे को समझता हो, अलबत्ता मियां बीवी एक दूसरे का पूरा बदन देख सकते हैं।
2446. जो मर्द और औरत आपस में महरम हों अगर वह लज़्ज़त की नीयत न रखते हों तो शर्मगाह के अलावा एक दूसरे का पूरा बदन देख सकते हैं।
2447. एक मर्द को दूसरे मर्द का बदन लज़्ज़त की नीयत से नहीं देखना चाहिए और एक औरत का दूसरी औरत के बदन को लज़्ज़त की नीयत से देखना हराम है।
2448. अगर कोई मर्द किसी ना महरम औरत को पहचानता हो अगर वह बेपर्दा औरतों में से न हो तो एहतियात की बिना पर उसे उसकी तस्वीर नहीं देखना चाहिए।
2449. अगर एक औरत किसी दूसरी औरत का या अपने शौहर के अलावा किसी मर्द का एनिमा करना चाहे या उसकी शर्मगाह को धो कर पाक करना चाहे तो ज़रूरी है कि अपने हाथ पर कोई चीज़ लपेट ले ताकि उसका हाथ उस (औरत या मर्द) की शर्मगाह पर न लगे। और अगर एक मर्द किसी दूसरे मर्द या अपनी बीवी के अलावा किसी दूसरी औरत का एनिमा करना चाहे या उसकी शर्मगाह को धोकर पाक करना चाहे तो उसके लिए भी यही हुक्म है।
2450. अगर औरत ना महरम मर्द से अपनी किसी ऐसी बीमारी का इलाज कराने पर मजबूर हो, जिसका इलाज वह बेहतर तौर पर कर सकता हो तो वह औरत उस ना महरम मर्द से अपना इलाज करा सकती है। चुनांचे वह मर्द इलाज के सिलसिले में उसके देखने या उसके बदन को हाथ लगाने पर मजबूर हो तो (ऐसा करने में) कोई इश्काल नहीं लेकिन अगर वह महज़ देख कर इलाज कर सकता हो तो ज़रूरी है कि उस औरत के बदन को हाथ न लगाए और अगर सिर्फ़ हाथ लगाने से इलाज कर सकता हो तो फिर ज़रूरी है कि उस औरत पर निगाह न डाले।
2451. अगर किसी शख़्स का इलाज करने के सिलसिले में उसकी शर्मगाह पर निगाह डालने पर मजबूर हो तो एहतियाते वाजिब की बिना पर उसे चाहिये कि आईना सामने रखे और उसमें देखे। लेकिन अगर शर्मगाह पर निगाह डालने के अलावा कोई चारा न हो तो (ऐसा करने में) कोई इश्काल नहीं। और अगर शर्मगाह पर निगाह डालने की मुद्दत आईने में देखने की मुद्दत से कम हो तब भी यही हुक्म है।
शादी ब्याह के मुख़्तलिफ़ मसाइल
2452. जो शख़्स शादी न करने की वजह से हराम फ़ेल में मुब्तला होता हो उस पर वाजिब है कि शादी करे।
2453. अगर शौहर निकाह में मसलन यह शर्त आयद करे कि औरत कुंवारी हो और निकाह के बाद मअलूम हो कि वह कुंवारी नहीं, तो शौहर निकाह को फ़स्ख़ कर सकता है अलबत्ता अगर फ़स्ख़ करे तो कुंवारी होने और कुंवारी न होने के माबैन मुक़र्रर कर्दा महर में जो फ़र्क़ हो वह ले सकता है।
2454. ना महरम मर्द और औरत का किसी ऐसी जगह साथ होना जहां और कोई न हो जबकि उस सूरत में बहकने का अंदेशा भी हो – हराम है। चाहे वह जगह ऐसी हो जहां कोई भी आ सकता हो। अलबत्ता अगर बहकने का अंदेशा न हो तो कोई इश्काल नहीं है।
2455. अगर कोई मर्द औरत का महर निकाह में मुअय्यन कर दे और उसका इरादा यह हो कि वह महर नहीं देगा तो (उसका निकाह नहीं टूटता बल्कि) सहीह है। लेकिन ज़रूरी है कि महर अदा करे।
2456. जो मुसलमान इस्लाम से ख़ारिज हो जाए और कुफ़्र इख़तियार करे तो उसे मुर्तद कहते हैं और मुर्तद की दो क़िस्में हैं – 1. मुर्तदे फ़ितरी, 2. मुर्तदे मिल्ली। मुर्तदे फ़ितरी वह शख़्स है जिसकी पैदाइश के वक़्त उसके मां बाप दोनों या उन में से कोई एक मुसलमान हो और वह खुद भी अच्छे बुरे को पहचानने के बाद मुसलमान हुआ हो लेकिन बाद में काफ़िर हो जाए, और मुर्तदे मिल्ली उस के बर अक्स है (यअनी वह शख़्स है जिसकी पैदाइश के वक़्त मां बाप दोनों या उनमें से एक भी मुसलमान न हो)।
2457. अगर औरत शादी के बाद मुर्तद हो जाए तो उसका निकाह टूट जाता है और अगर उसके शौहर ने उसके साथ जिमाअ न किया हो तो उसके लिए इद्दत नहीं है। और अगर जिमाअ के बाद मुर्तद हो जाए लेकिन याइसा हो चुकी हो या बहुत छोटी हो तब भी यही हुक्म है। लेकिन अगर उसकी उम्र हैज़ आने वाली औरतों के बराबर हो तो उसे चाहिये कि उस दस्तूर के मुताबिक़ जिसका ज़िक्र तलाक़ के अहकाम में किया जायेगा इद्दत गुज़ारे। और (उलमा के माबैन) मश्हूर यह है कि अगर इद्दत के दौरान मुसलमान हो जाए तो उसका निकाह (नहीं टूटता यअनी) बाक़ी रहता है और यह हुक्म वजह से ख़ाली नहीं है अगरचे बेहतर यह है कि एहतियात की रिआयत तर्क न हो। और याइसा उस औरत को कहते हैं जिसकी उम्र पचास साल हो गई हो और उम्र रसीदा होने की वजह से उसे हैज़ न आता हो और दोबारा आने की उम्मीद न हो।
2458. अगर कोई मर्द शादी के बाद मुर्तदे फ़ितरी हो जाए तो उसकी बीवी उस पर हराम हो जाती है और उस औरत के लिए ज़रूरी है कि वफ़ात की इद्दत के बराबर जिसका बयान तलाक़ के अहकाम में होगा इद्दत रखे।
2459. अगर कोई मर्द शादी के बाद मुर्तदे मिल्ली हो जाए तो उसका निकाह टूट जाता है। लिहाज़ा अगर उसने अपनी बीवी के साथ जिमाअ किया हो या वह औरत याइसा या बहुत छोटी हो तो उसके लिए इद्दत नहीं है और अगर वह मर्द जिमाअ के बाद मुर्तद हो और उसकी बीवी उन औरतों की हमसिन हो जिन्हें हैज़ आता हो तो ज़रूरी है कि वह औरत तलाक़ की इद्दत के बराबर जिसका ज़िक्र तलाक़ के अहकाम में आयेगा इद्दत रखे और मश्हूर यह है कि अगर उसकी इद्दत ख़त्म होने से पहले उसका शौहर मुसलमान हो जाए तो उसका निकाह क़ाइम रहता है। और यह हुक्म भी वजह से ख़ाली नहीं है। अलबत्ता एहतियात का ख़्याल रखना बेहतर है।
2460. अगर औरत अक़्द में मर्द पर शर्त आइद करे कि उसे (एक मुअय्यन) शहर से बाहर न ले जाए और मर्द भी इस शर्त को क़बूल कर ले तो ज़रूरी है कि उसकी रज़ामन्दी के बग़ैर उस शहर से बाहर न ले जाए।
2461. अगर किसी औरत की पहले शौहर से लड़की हो तो बाद में उसका दूसरा शौहर उस लड़की का निकाह अपने उस लड़के से कर सकता है जो उस बीवी से न हो नीज़ अगर किसी लड़की का निकाह अपने बेटे से करे तो बाद में उस लड़की की मां से खुद भी निकाह कर सकता है।
2462. अगर कोई औरत ज़िना से हामिला हो जाए तो बच्चे को गिराना उसके लिये जाइज़ नहीं है।
2463. अगर कोई मर्द किसी ऐसी औरत से ज़िना करे जो शौहरदार न हो और किसी दूसरे की इद्दत में भी न हो चुनांचे बाद में उस औरत से शादी कर ले और कोई बच्चा पैदा हो जाए तो इस सूरत में कि जब वह यह न जानते हो कि बच्चा हलाल नुतफ़े से है या हराम नुतफ़े से तो वह बच्चा हलाल ज़ादा है।
2464. अगर किसी मर्द को यह मअलूम न हो कि एक औरत इद्दत में है और वह उससे निकाह करे तो अगर औरत को भी इस बारे में इल्म न हो और उनके हां बच्चा पैदा हो तो वह हलाल ज़ादा होगा और शरअन उन दोनों का बच्चा होगा। लेकिन अगर औरत को इल्म था कि वह इद्दत मे है और इद्दत के दौरान निकाह करना हराम है तो शरअन वह बच्चा बाप का होगा और मज़कूरा दोनों सूरतों में उन दोनों का निकाह बातिल है और जैसे कि बयान हो चुका है वह दोनों एक दूसरे पर हराम हैं।
2465. अगर कोई औरत यह कहे कि मैं याइसा हूं तो उसकी यह बात क़बूल नहीं करनी चाहिये लेकिन अगर कहे कि मैं शौहरदार नहीं हूं तो उसकी बात मान लेना चाहिए लेकिन अगर वह ग़लत बयान हो तो उस सूरत में एहतियात यह है कि उसके बारे में तह्क़ीक़ की जाए।
2466. अगर कोई शख़्स किसी ऐसी औरत से शादी करे जिसने कहा हो कि मेरा शौहर नहीं है और बाद में कोई और शख़्स कहे कि वह औरत उसकी बीवी है तो जब तक यह बात साबित न हो जाए कि वह सच कह रहा है उसकी बात को क़बूल नहीं करना चाहिये।।
2467. जब तक लड़का या लड़की दो साल के न हो जायें, बाप, बच्चों को उनकी माँ से जुदा नहीं कर सकता और अहवत और औला यह है कि बच्चे को सात साल तक उसकी माँ से जुदा न करे।
2468. अगर रिश्ता मांगने वाले की दियानतदारी और अख़लाक़ से ख़ुश हो तो बेहतर यह है कि लड़की का हाथ उसके हाथ में देने से इन्कार न करे। पैग़म्बरे अकरम स्वल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम से रिवायत है कि, जब भी कोई शख़्स तुम्हारी लड़की का रिश्ता मांगने आए और तुम उस शख़्स के अख़लाक़ और दियानतदारी से ख़ुश हो तो अपनी लड़की की शादी उस से कर दो। अगर ऐसा न करोगे तो गोया ज़मीन पर एक बहुत बड़ा फ़ितना फैल जायेगा।
2469. अगर बीवी शौहर के साथ इस शर्त पर अपने महर की मुसालहत करे (यअनी महर उसे बख़्श दे) कि वह दूसरी शादी नहीं करेगा तो वाजिब है कि वह दूसरी शादी न करे। और बीवी को भी महर लेने का कोई हक़ नहीं है।
2470. जो शख़्स वलदुज़्ज़िना हो अगर वह शादी कर ले और उसके हां बच्चा पैदा हो तो वह हलाल ज़ादा है।
2471. अगर कोई शख़्स माहे रमज़ानुल मुबारक के रोज़ों में या औरत के हाइज़ होने की हालत में उससे जिमाअ करे तो गुनाहगार है लेकिन अगर इस जिमाअ के नतीजे में उनके हां कोई बच्चा पैदा हो तो वह हलालज़ादा है।
2472. जिस औरत को यक़ीन हो कि उसका शौहर सफ़र में फ़ौत हो गया है अगर वह वफ़ात की इद्दत के बाद शादी करे और बाद अज़ां उसका पहला शौहर सफ़र से (ज़िन्दा सलामत) वापस आ जाए तो ज़रूरी है कि दूसरे शौहर से जुदा हो जाए और वह पहले शौहर पर हलाल होगी। लेकिन अगर दूसरे शौहर ने उससे जिमाअ किया हो तो औरत के लिए ज़रूरी है कि इद्दत गुज़ारे और दूसरे शौहर को चाहिये कि उस जैसी औरतों के महर के मुताबिक़ उसे महर अदा करे लेकिन इद्दत (के ज़माने) का ख़र्च (दूसरे शौहर के ज़िम्मे) नहीं है।
दूध पिलाने के अहकाम
2473. अगर कोई औरत एक बच्चे को उन शराइत के साथ दूध पिलाए जो मस्अला 2483 में बयान होंगी तो वह बच्चा मुन्दरिजा ज़ैल लोगों का महरम बन जाता हैः-
1. ख़ुद वह औरत – और उसे रिज़ाई माँ कहते हैं।
2. औरत का शौहर जो दूध का मालिक है – और उसे रिज़ाई बाप कहते हैं।
3. उस औरत का बाप और माँ – और जहां तक यह सिलसिला ऊपर चला जाए अगरचे वह उस औरत के रिज़ाई मां बाप ही क्यों न हों।
4. उस औरत के वह बच्चे जो पैदा हो चुके हों या बाद में पैदा हों।
5. उस औरत की औलाद की औलाद ख़्वाह यह सिलसिला जिस क़दर नीचे चला जाए और औलाद की औलाद ख़्वाह हक़ीक़ी हो ख़्वाह उसकी औलाद ने उन बच्चों को दूध पिलाया हो।
6. उस औरत की बहनें और भाई ख़्वाह वह रिज़ाई ही क्यों न हों यअनी दूध पीने की वजह से उस औरत के बहन और भाई बन गए हों।
7. उस औरत का चचा और फुफी ख़्वाह वह रिज़ाई ही क्यों न हों।
8. उस औरत का मामूं और खाला ख़्वाह वह रिज़ाई ही क्यों न हों।
9. उस औरत के उस शौहर की औलाद जो दूध का मालिक है। और जहां तक भी यह सिलसिला नीचे चला जाए अगरचे उसकी औलाद रिज़ाई ही क्यों न हों।
10. उस औरत के उस शौहर के मां बाप जो दूध का मालिक है। और जहां तक भी यह सिलसिला ऊपर चलता जाए।
11. उस औरत के उस शौहर के भाई बहन जो दूध का मालिक है ख़्वाह वह उसके रिज़ाई बहन भाई ही क्यों न हों।
12. उस औरत का जो शौहर दूध का मालिक है उसके चचा और फुफियाँ और मामूं और ख़ालायें – और जहां तक यह सिलसिला ऊपर चला जाए और अगरचे वह रिज़ाई ही क्यों न हों। और इनके अलावा कई और वह लोग भी दूध पिलाने की वजह से महरम बन जाते हैं जिनका ज़िक्र आइन्दा मसाइल में किया जायेगा।
2474. अगर कोई औरत किसी बच्चे को उन शराइत के साथ दूध पिलाए जिन का ज़िक्र मस्अला 2483 में किया जायेगा तो उस बच्चे का बाप उन लड़कियों से शादी नहीं कर सकता जिन्हें वह औरत जन्म दे और अगर उन में से कोई एक भी लड़की अभी उसकी बीवी हो तो उसका निकाह टूट जायेगा। अलबत्ता उसका उस औरत की रिज़ाई लड़कीयों से निकाह करना जाइज़ है अगरचे एहतियाते मुस्तहब यह है कि उनके साथ भी निकाह न करे नीज़ एहतियात की बिना पर वह उस औरत के उस शौहर की बेटियों से निकाह नहीं कर सकता जो दूध का मालिक है अगरचे वह उस शौहर की रिज़ाई बेटियां हों लिहाज़ा अगर उस वक़्त उनमें से कोई औरत उसकी बीवी हो तो एहतियात की बिना पर उसका निकाह टूट जाता है।
2475. अगर कोई औरत किसी बच्चे को उन शराइत के साथ दूध पिलाए जिनका ज़िक्र मस्अला 2483 में किया जायेगा तो उस औरत का वह शौहर जो दूध का मालिक है उस बच्चे की बहनों का महरम नहीं बन जाता लेकिन एहतियाते मुस्तहब यह है कि वह उनसे शादी न करे नीज़ शौहर के रिश्तेदार भी उस बच्चे के भाई बहनों के महरम नहीं बन जाते।
2476. अगर कोई औरत एक बच्चे को दूध पिलाए तो वह उसके भाईयों की महरम नहीं बन जाती और उस औरत के रिश्तेदार भी उस बच्चे के भाई बहनों के महरम नहीं बन जाते।
2477. अगर कोई शख़्स उस औरत से जिसने किसी लड़की को पूरा दूध पिलाया हो निकाह कर ले और उससे मुजामअत (संभोग) कर ले तो फिर वह उस लड़की से निकाह नहीं कर सकता।
2478. अगर कोई शख़्स किसी लड़की से निकाह कर ले तो फिर वह उस औरत से निकाह नहीं कर सकता जिसने उस लड़की को दूध पिलाया हो।
2479. कोई शख़्स उस लड़की से निकाह नहीं कर सकता जिसे उस शख़्स की मां या दादी ने दूध पिलाया हो। नीज़ अगर किसी शख़्स के बाप की बीवी ने (यअनी उसकी सौतेली मां ने) उस शख़्स के बाप का मसलूका दूध किसी लड़की को पिलाया हो तो वह उस लड़की से निकाह नहीं कर सकता। और अगर कोई शख़्स किसी दूध पीती बच्ची से निकाह करे और उसके बाद उसकी मां या दादी या उसकी सौतेली मां उस बच्ची को दूध पिला दे तो निकाह टूट जाता है।
2480. जिस लड़की को किसी शख़्स की बहन या भाभी ने भाई के दूध से पूरा दूध पिलाया हो वह शख़्स उस लड़की से निकाह नहीं कर सकता। और जब किसी शख़्स की भांजी, भतीजी या बहन या भाई की पोती या नवासी ने उस बच्ची को दूध पिलाया हो तब भी यही हुक्म है।
2481. अगर कोई औरत अपनी लड़की के बच्चे को (यअनी अपने नवासे या नवासी को) पूरा दूध पिलाए तो वह लड़की अपने शौहर पर हराम हो जायेगी। और अगर कोई औरत उस बच्चे को दूध पिलाए जो उस लड़की के शौहर की दूसरी बीवी से पैदा हुआ हो तब भी यही हुक्म है लेकिन अगर कोई औरत अपने बेटे के बच्चे को (यअनी अपने पोते या पोती को) दूध पिलाए तो उसके बेटे की बीवी (यअनी दूध पिलाई की बहू) जो उस दूध पीते बच्चे की मां है अपने शौहर पर हराम नहीं होगी।
2482. अगर किसी लड़की की सौतेली मां उस लड़की के शौहर के बच्चे को उस लड़की के बाप की मसलूका दूध पिलाए तो उस एहतियात की बिना पर जिसका ज़िक्र मसअला 2474 में किया गया है वह लड़की अपने शौहर पर हराम हो जाती है ख़्वाह वह बच्चा उस लड़की के बत्न से या किसी दूसरी औरत के बत्न से हो।
दूध पिलाने से महरम बनने की शराइत
2483. बच्चे को जो दूध पिलाना महरम बनने का सबब बनता है उसकी आठ शर्तें हैं –
1. बच्चा ज़िन्दा औरत का दूध पिये। पस अगर वह मुर्दा औरत के पिस्तान (छाती) से दूध पिये तो उसका कोई फ़ाइदा नहीं।
2. औरत का दूध फ़ेले हराम का नतीजा न हो। पस अगर ऐसे बच्चे का दूध जो वलदुज़्ज़िना हो किसी दूसरे बच्चे को दिया जाए तो उस दूध के तवस्सुत से वह दूसरा बच्चा किसी का महरम नहीं बनेगा।
3. बच्चा पिस्तान से दूध पिये। पस अगर दूध उसके हल्क़ में उन्डेला जाए तो बेकार है।
4. दूध ख़ालिस हो और किसी दूसरी चीज़ से मिला हुआ न हो।
5. दूध एक ही शौहर का हो। पस जिस औरत को दूध उजरता हो अगर उसे तलाक़ हो जाए और वह अक़्दे सानी कर ले और दूसरे शौहर से हामिला हो जाए और बच्चा जनने तक उसके पहले शौहर का दूध उसमें बाक़ी हो मसलन अगर उस बच्चे को खुद बच्चा जनने के क़ब्ल पहले शौहर का दूध आठ दफ़्आ और वज़ए हम्ल के बाद दूसरे शौहर का दूध सात दफ़्आ पिलाए तो वह बच्चा किसी का भी महरम नहीं बनता।
6. बच्चा किसी बीमारी की वजह से दूध की क़ै न कर दे और अगर क़ै कर दे तो बच्चा महरम नहीं बनता है।
7. बच्चे को इस क़दर दूध पिलाया जाए कि उसकी हड्डियां उस दूध से मज़बूत हों और बदन का गोश्त भी उस से बने और अगर इस बात का इल्म न हो कि इस क़दर दूध पिया है या नहीं तो अगर उसने एक दिन और एक रात या पन्द्रह दफ़्आ पेट भर कर दूध पिया हो तब भी (महरम होने के लिए) काफ़ी है जैसा कि इसका तफ़्सीली ज़िक्र आने वाले मस्अले में किया जायेगा लेकिन अगर इस बात का इल्म हो कि उस की हड्डियां इस दूध से मज़बूत नहीं हुई और उस का गोश्त भी उस से नहीं बना हालांकि बच्चे ने एक दिन और एक रात या पन्द्रह दफ़्आ दूध पिया हो तो उस जैसी सूरत में एहतियात का ख़्याल करना ज़रूरी है।
8. बच्चे की उम्र के दो साल मुकम्मल न हुए हों और अगर उसकी उम्र दो साल होने के बाद उसे दूध पिलाया जाए तो वह किसी का महरम नहीं बनता बल्कि अगर मिसाल के तौर पर वह उम्र के दो साल मुकम्मल होने से पहले आठ दफ़्आ और उसके बाद सात दफ़्आ दूध पिये तब भी वह किसी का महरम नहीं बनता। लेकिन अगर दूध पिलाने वाली औरत को बच्चा जने दो साल से ज़्यादा मुद्दत गुज़र चुकी हो और उसका दूध अभी बाक़ी हो और वह किसी बच्चे को दूध पिलाए तो वह बच्चा उन लोगों का महरम बन जाता है जिन का ज़िक्र ऊपर किया गया है।
2484. दूध पीने की वजह से महरम बनने के लिए ज़रूरी है कि एक दिन रात बच्चा ग़िज़ा न खाए और न किसी दूसरी औरत का दूध पिये लेकिन अगर इतनी थोड़ी ग़िज़ा खाए कि लोग यह न कहें कि उसने बीच में ग़िज़ा खाई है तो फिर कोई इश्काल नहीं। नीज़ यह भी ज़रूरी है कि पन्द्रह मर्तबा एक ही औरत का दूध पिये। हाँ अगर दूध पिते हुए सांस ले या थोड़ा सा सब्र करे गोया कि जब उसने पहली बार पिस्तान मुंह में लिया था उस वक़्त से लेकर उसके सेर हो जाने तक एक दफ़्आ दूध पीना ही शुमार किया जाए तो इस में कोई इश्काल नहीं।
2485. अगर कोई औरत अपने शौहर का दूध किसी बच्चे को पिलाए बाद अज़ां (उसके बाद) अक़्दे सानी कर ले और दूसरे शौहर का दूध किसी और बच्चे को पिलाए तो वह दो बच्चे आपस में महरम नहीं बनते अगरचे बेहतर यह है कि वह आपस में शादी न करें।
2486. अगर कोई औरत एक शौहर का दूध कई बच्चों को पिलाए तो वह सब आपस में नीज़ उस आदमी के और उस औरत के जिस ने उन्हें दूध पिलाया है महरम बन जाते हैं।
2487. अगर किसी शख़्स की कई बीवियां हों और उन में से हर एक उन शराइत के साथ जो बयान की गई हैं एक एक बच्चे को दूध पिला दे तो वह सब बच्चे आपस में और उस आदमी के और उन तमाम औरतों के महरम बन जाते हैं।
2488. अगर किसी शख़्स की दो बीवियों का दूध उतरता हो और उनमें से एक किसी बच्चे को मिसाल के तौर पर आठ मर्तबा और दूसरी सात मर्तबा दूध पिला दे तो वह बच्चा किसी का भी महरम नहीं बनता।
2489. अगर कोई औरत एक शौहर का पूरा दूध एक लड़के और एक लड़की को पिलाए तो उस लड़की के बहन भाई उस लड़के के बहन भाईयों के महरम नहीं बन जाते।
2490. कोई शख़्स अपनी बीवी की इजाज़त के बग़ैर उन औरतों से निकाह नहीं कर सकता जो दूध पीने की वजह से उसकी बीवी की भांजियां या भतीजियां बन गई हों नीज़ अगर कोई शख़्स किसी लड़के से इग़्लाम करे तो वह उस लड़के की रिज़ाई बेटी, बहन, मां और दादी से यअनी उन औरतों से जो दूध पीने की वजह से उसकी बेटी, बहन, मां और दादी बन गई हों निकाह नहीं कर सकता। और एहतियात की बिना पर जब कि लिवातत करने वाला बालिग़ न हो या लिवातत कराने वाला बालिग़ हो तब भी यही हुक्म है।
2491. जिस औरत ने किसी शख़्स के भाई को दूध पिलाया हो वह उस शख़्स की महरम नहीं बन जाती अगरचे एहतियाते मुस्तहब यह है कि उस से शादी न करे।
2492. कोई आदमी दो बहनों से (एक ही वक़्त में) निकाह नहीं कर सकता अगरचे वह रिज़ाई बहनें ही हों यअनी दूध पीने की वजह से एक दूसरी की बहनें बन गई हों और अगर वह दो औरतों से शादी करे और बाद में उसे पता चले कि वह आपस में बहनें हैं तो उस सूरत में जब कि उसकी शादी एक ही वक़्त में हुई हो अज़हर यह है कि दोनों निकाह बातिल हैं। और अगर निकाह एक ही वक़्त में न हुआ हो तो पहला निकाह सहीह और दूसरा बातिल है।
2493. अगर कोई औरत अपने शौहर का दूध उन अश्ख़ास को पिलाए जिन का ज़िक्र ज़ैल में किया गया है तो उस औरत का शौहर उस पर हराम नहीं होता अगरचे बेहतर यह है कि एहतियात की जाए।
1. अपने भाई और बहन को।
2. अपने चचा, फुफी, मामूं और ख़ाला को।
3. अपने चचा और मामूं की औलाद को।
4. अपने भतीजे को।
5. अपने जेठ या देवर और नन्द को।
6. अपने भांजे या अपने शौहर के भांजे को।
7. अपने शौहर के चचा, फुफी, मामूं और ख़ाला को।
8. अपने शौहर की दूसरी बीवी के नवासे या नवासी को।
2494. अगर कोई औरत किसी शख़्स की फुफीज़ाद या ख़ालाज़ाद बहन को दूध पिलाए तो वह (औरत) उस शख़्स की महरम नहीं बनती लेकिन एहतियाते मुस्तहब यह है कि वह शख़्स उस औरत से शादी न करे।
2495. जिस शख़्स की दो बीवियां हों अगर उसकी एक बीवी दूसरी बीवी के चचा के बेटे को दूध पिलाए तो जिस औरत के चचा के बेटे ने दूध पिया है वह अपने शौहर पर हराम नहीं होगी।
दूध पिलाने के आदाब
2496. बच्चे को दूध पिलाने के लिए सब औरतों से बेहतर उसकी माँ है। और मां के लिए मुनासिब है कि बच्चे को दूध पिलाने की उजरत अपने शौहर से न ले और शौहर के लिए अच्छी बात यह है कि उसे उजरत दे और अगर बच्चे की मां, दाया (दूध मां) के मुक़ाबिले में ज़्यादा उजरत लेना चाहे तो शौहर बच्चे को उस से ले कर दाया के सिपुर्द कर सकता है।
2497. मुस्तहब है कि बच्चे की दाया शीआ इसना अशरी होशमन्द, पाक दामन और खुश शक्ल हो। और मकरूह है कि वह ग़बी, ग़ैर शीआ इसना अशरी, बद सूरत, बद अख़लाक़ या हरामज़ादी हो। और यह भी मकरूह है कि उस औरत को बतौर दाया मुन्तख़ब किया जाए, जिसका दूध ऐसे बच्चे से हो जो वलदुज़्ज़िना हो।
दूध पिलाने के मुख़्तलिफ़ मसाइल
2498. औरतों के लिए बेहतर है कि वह हर एक के बच्चे कि दूध न पिलाये क्योंकि हो सकता है कि वह यह याद न रख सकें कि उन्होंने किस किस को दूध पिलाया है और (मुम्किन है कि) बाद में दो महरम एक दूसरे से निकाह कर लें।
2499. अगर मुम्किन हो तो मुस्तहब है कि बच्चे को 21 महीने दूध पिलाया जाए। और दो साल से ज़्यादा दूध पिलाना मुनासिब नहीं है।
2500. अगर दूध पिलाने की वजह से शौहर का हक़ तलफ़ न होता हो तो औरत शौहर की इजाज़त के बग़ैर किसी दूसरे शख़्स के बच्चे को दूध पिला सकती है।
2501. अगर किसी औरत का शौहर एक शीर ख़्वार बच्ची से निकाह करे और वह औरत उस बच्ची को दूध पिलाए तो मशहूर क़ौल की बिना पर वह औरत अपने शौहर की सास बन जाती है और उस पर हराम हो जाती है। लेकिन यह हुक्म इशकाल से ख़ाली नहीं है और एहतियात का ख़्याल रखना चाहिए।
2502. अगर कोई शख़्स चाहे की उसकी भाभी उसकी महरम बन जाए तो बअज़ फ़ुक़हा ने फ़रमाया है कि उसे चाहिए कि किसी शीर ख़्वार बच्ची से मिसाल के तौर पर दो दिन के लिए मुतअ कर ले और उन दोनों में उन शराइत के साथ जिनका ज़िक्र मस्अला 2483 में किया गया है उसकी भाभी उस बच्ची को दूध पिलाए ताकि वह उसकी बीवी की मां बन जाए। लेकिन यह हुक्म उस सूरत में जब भाभी भाई के ममलूका दूध से उस बच्ची को पिलाए महल्ले इश्काल है।
2503. अगर कोई मर्द किसी औरत से शादी करने से पहले कहे कि रिज़ाअत की वजह से वह औरत मुझ पर हराम है मसलन कहे कि मैं ने उस औरत की मां का दूध पिया है तो अगर इस बात की तस्दीक़ मुम्किन हो तो वह उस औरत से शादी नहीं कर सकता और अगर यह बात शादी के बाद कहे और खुद औरत भी इस बात को क़बूल करे तो उनका निकाह बातिल है। लिहाज़ा अगर मर्द ने उस औरत से हमबिस्तरी न की हो या की हो लेकिन हमबिस्तरी के वक़्त और को मअलूम हो कि वह उस मर्द पर हराम है तो औरत का कोई महर नहीं और अगर औरत को हमबिस्तरी के बाद पता चले कि वह उस मर्द पर हराम थी तो ज़रूरी है कि शौहर उस जैसी औरतों के महर के मुताबिक़ उसे महर दे।
2504. अगर कोई औरत शादी से पहले कह दे कि रिज़ाअत की वजह से मैं इस मर्द पर हराम हूं और इसकी तस्दीक़ मुम्किन हो तो वह उस मर्द से शादी नहीं कर सकती और अगर वह यह बात शादी के बाद कहे तो उसका कहना ऐसा ही है जैसे कि मर्द शादी के बाद कहे कि वह औरत उस पर हराम है और इसके मुतअल्लिक़ हुक्म साबिक़ा मस्अले में बयान हो चुका है।
2505. दूध पिलाना जो महरम बनने का सबब है दो चीज़ों से साबित होता हैः-
1. एक ऐसी जमाअत का ख़बर देना जिसकी बात पर यक़ीन या इत्मीनान हो जाए।
2. दो आदिल मर्द इसकी गवाही दें लेकिन ज़रूरी है कि वह दूध पिलाने की शराइत के बारे में भी बतायें मसलन कहें कि हम ने फ़लां बच्चे को चौबीस घंटे फ़लां औरत के पिस्तान से दूध पीते देखा है और उसने उस दौरान कोई और चीज़ भी नहीं खाई और इसी तरह उन बाक़ी शराइत को भी वाशिग़ाफ़ लफ़्ज़ों में बयान करें जिनका ज़िक्र मस्अला 2483 में किया गया है। अलबत्ता एक मर्द और दो औरतों या चार औरतों की गवाही से जो सब के सब आदिल हों रिज़ाअत का साबित होना महल्ले इश्काल है।
2506. अगर इस बात में शक हो कि बच्चे ने इतनी मिक़्दार में दूध पिया है जो महरम बनने का सबब है या नहीं पिया है या गुमान हो कि उस ने इतनी मिक़्दार में दूध पिया है तो बच्चा किसी का भी महरम नहीं होता लेकिन बेहतर यह है कि एहतियात की जाए।
तलाक़ के अहकाम
2507. जो मर्द अपनी बीवी को तलाक़ दे उसके लिए ज़रूरी है कि बालिग़ और आक़िल हो लेकिन अगर दस साल का बच्चा अपनी बीवी को तलाक़ दे तो उसके बारे में एहतियात का ख़्याल रखें और इसी तरह ज़रूरी है कि मर्द अपने इख़्तियार से तलाक़ दे और अगर उसे अपनी बीवी को तलाक़ देने पर मजबूर किया जाए तो तलाक़ बातिल है और यह भी ज़रूरी है कि वह शख़्स तलाक़ की नीयत रखता हो लिहाज़ा अगर वह मसलन मज़ाक में तलाक़ का सीग़ा कहे तो तलाक़ सहीह नहीं है।
2508. ज़रूरी है कि औरत तलाक़ के वक़्त हैज़ या निफ़ास से पाक हो और उसके शौहर ने उस पाकी के दौरान उस से हमबिस्तरी न की हो और उन दो शर्तों की तफ़्सील आइन्दा मसाइल में बयान की जायेगी।
2509. औरत को हैज़ या निफ़ास की हालत में तीन सूरतों में तलाक़ देना सहीह हैः-
1. शौहर ने निकाह के बाद उस से हमबिस्तरी न की हो।
2. मअलूम हो कि वह हामिला है। और अगर यह बात मअलूम न हो और शौहर उसे हैज़ की हालत में तलाक़ दे दे और बाद में शौहर को पता चले कि वह हामिला थी तो वह तलाक़ बातिल है अगरचे एहतियाते मुस्तहब यह है कि उसे दोबारा तलाक़ दे।
3. मर्द ग़ैर हाज़िरी या ऐसी ही किसी और वजह से अपनी बीवी से जुदा हो और यह मअलूम न हो सकता हो कि औरत हैज़ या निफ़ास से पाक है या नहीं। लेकिन उस सूरत में एहतियाते लाज़िम की बिना पर ज़रूरी है कि मर्द इन्तिज़ार करे ताकि बीवी से जुदा होने के बाद कम अज़ कम एक महीना गुज़र जाए उसके बाद उसे तलाक़ दे।
2510. अगर कोई शख़्स औरत को हैज़ से पाक समझे और उसे तलाक़ दे दे और बाद में पता चले कि वह हैज़ की हालत में थी तो उसकी तलाक़ बातिल है और अगर शौहर उसे हैज़ की हालत में समझे और तलाक़ दे दे और बाद में मअलूम हो कि वह पाक थी तो तलाक़ सहीह है।
2511. जिस शख़्स को इल्म हो कि उसकी बीवी हैज़ या निफ़ास की हालत में है अगर वह बीवी से जुदा हो जाए मसलन सफ़र इख़्तियार करे और उसे तलाक़ देना चाहता हो तो उसे चाहिए कि उतनी मुद्दत सब्र करे जिस में उसे यक़ीन या इत्मीनान हो जाए कि वह औरत हैज़ या निफ़ास से पाक हो गई है और जब वह यह जान ले कि औरत पाक है उसे तलाक़ दे और अगर उसे शक हो तब भी यही हुक्म है लेकिन इस सूरत में ग़ायब शख़्स की तलाक़ के बारे में मस्अला 2509 में जो बयान हुई है उन का ख्याल रखे।
2512. जो शख़्स अपनी बीवी से जुदा हो अगर उसे तलाक़ देना चाहे तो अगर वह मअलूम कर सकता हो कि उसकी बीवी हैज़ या निफ़ास की हालत में है या नहीं तो अगरचे हैज़ की आदत या उन दूसरी निशानियों को जो शरअ में मुअय्यन हैं देखते हुए उसे तलाक़ दे और बाद में मअलूम हो कि वह हैज़ या निफ़ास की हालत में थी तो उसकी तलाक़ सहीह है।
2513. अगर कोई शख़्स अपनी बीवी से जो हैज़ या निफ़ास से पाक हो हम बिस्तरी करे और फिर उसे तलाक़ देना चाहे तो ज़रूरी है कि सब्र करे हत्ता कि उसे दोबारा हैज़ आ जाए और फिर वह पाक हो जाए लेकिन अगर ऐसी औरत को हम बिस्तरी के बाद तलाक़ दी जाए जिसकी उम्र नौ साल से कम हो या मअलूम हो कि वह हामिला है तो उसमें कोई इश्काल नहीं और अगर औरत याइसा हो तब भी यही हुक्म है।
2514. अगर कोई शख़्स ऐसी औरत से हमबिस्तरी करे जो हैज़ या निफ़ास से पाक हो और उसी पाकी की हालत में उसे तलाक़ दे दे और बाद में मअलूम हो कि वह तलाक़ देने के वक़्त हामिला थी तो वह तलाक़ बातिल है और एहतियाते मुस्तहब यह है कि शौहर उसे दोबारा तलाक़ दे।
2515. अगर कोई शख़्स ऐसी औरत से हमबिस्तरी करे जो हैज़ या निफ़ास से पाक हो फिर वह उस से जुदा हो जाए मसलन सफ़र इख़्तियार करे। लिहाज़ा अगर वह चाहे कि सफ़र के दौरान उसे तलाक़ दे और उसकी पाकी या ना पाकी के बारे में जान सकता हो तो ज़रूरी है कि इतनी मुद्दत सब्र करे कि औरत को उसकी पाकी के बाद हैज़ आए और वह दोबारा पाक हो जाए और एहतियाते वाजिब यह है कि वह मुद्दत एक महीने से कम न हो।
2516. अगर कोई मर्द ऐसी औरत को तलाक़ देना चाहता हो जिस पैदायशी तौर पर या किसी बीमारी की वजह से हैज़ न आता हो और उस उम्र की दूसरी औरतों को हैज़ आता हो तो ज़रूरी है कि जब उसने ऐसी औरत से जिमाअ किया हो उस वक़्त से तीन महीने तक उससे जिमाअ न करे और बाद में उसे तलाक़ दे दे।
2517. ज़रूरी है कि तलाक़ का सीग़ा सहीह अरबी में लफ़्ज़े तालिक़ुन के साथ पढ़ा जाए और दो आदिल मर्द उसे सुनें। अगर शौहर खुद तलाक़ का सीग़ा पढ़ना चाहे और मिसाल के तौर पर उसकी बीवी का नाम फ़ातिमा हो तो ज़रूरी है कि कहे – ज़ौजती फ़ातिमतो तालिक़ुन और अगर औरत मुअय्यन हो तो उसका नाम लेना लाज़िम नहीं है। और अगर मर्द अरबी में तलाक़ का सीग़ा न पढ़ सकता हो और वकील भी न बना सके तो वह जिस ज़बान में चाहे हर उस लफ़्ज़ के ज़रिये तलाक़ दे सकता है और जो अरबी लफ़्ज़ के हम मअना हो।
2518. जिस औरत से मुतअ किया गया हो मसलन एक साल या एक महीने के लिए उस से निकाह किया गया हो उसे तलाक़ देने का कोई सवाल नहीं। और उसका आज़ाद होना इस बात पर मुनहसिर है कि या तो मुतअ की मुद्दत ख़त्म हो जाए या मर्द उसे मुद्दत बख़्श दे और वह इस तरह से उससे कहे, मैने मुद्दत तुझे बख़्श दी । और किसी को इस पर गवाह क़रार देना और उस औरत का हैज़ से पाक होना लाज़िम नहीं।
तलाक़ की इद्दत
2519. जिस लड़की की उम्र (पूरे) नौ साल न हुई हो – और जो औरत याइसा हो चुकी हो – उस की कोई इद्दत नहीं होती। यअनी अगरचे शौहर ने उससे मुजामिअत की हो, तलाक़ के बाद वह फ़ौरन दूसरा शौहर कर सकती है।
2520. जिस लड़की की उम्र (पूरे) नौ साल हो चुकी हो और जो औरत याइसा न हो उसका शौहर उस से मुजामिअत करे तो अगर वह उसे तलाक़ दे तो ज़रूरी है कि वह (लड़की या) औरत तलाक़ के बाद इद्दत रखे और आज़ाद औरत की इद्दत यह है कि जब उसका शौहर उसे पाकी की हालत में तलाक़ दे तो उसके बाद वह इतनी मुद्दत सब्र करे कि दो दफ़्आ हैज़ से पाक हो जाए और जूं ही उसे तीसरी दफ़्आ हैज़ आए तो उसकी इद्दत ख़त्म हो जाती है और वह दूसरा निकाह कर सकती है लेकिन अगर शौहर औरत से मुजामिअत करने से पहले उसे तलाक़ दे दे तो उसके लिए कोई इद्दत नहीं यअनी वह तलाक़ के फ़ौरन बाद दूसरा निकाह कर सकती है लेकिन अगर शौहर की मनी जज़्ब या उस जैसी किसी वजह से उसकी शर्मगाह में दाख़िल हुई हो तो उस सूरत में अज़हर की बिना पर ज़रूरी है कि वह इद्दत रखे।
2521. जिस औरत को हैज़ न आता हो लेकिन उस का सिन उन औरतों जैसा हो जिन्हें हैज़ आता हो अगर उसका शौहर मुजामिअत करने के बाद उसे तलाक़ दे दे तो ज़रूरी है कि तलाक़ के बाद तीन महीने की इद्दत रखे।
2522. जिस औरत की इद्दत तीन महीने हो अगर उसे चांद की पहली तारीख़ को तलाक़ दी जाए तो ज़रूरी है कि तीन क़मरी महीने तक यअनी जब चांद देखा जाए उस वक़्त से तीन महीने तक इद्दत रखे और अगर उसे महीने के दौरान (किसी और तारीख़ को) तलाक़ दी जाए तो ज़रूरी है कि उस महीने के बाक़ी दिनों में उस के बाद आने वाले दो महीने और चौथे महीने के उतने दिन जितने दिन पहले महीने से कम हो इद्दत रखे ताकि तीन महीने मुकम्मल हो जायें मसलन अगर उसे महीने की बीसवीं तारीख़ को ग़रुब के वक़्त तलाक़ दी जाए और यह महीना उन्तीस दिन का हो तो ज़रूरी है कि नौ दिन उस महीने के और उसके बाद दो महीने और उसके बाद चौथे महीने के बीस दिन इद्दत रखे बल्कि एहतियाते वाजिब है कि चौथे महीने के एक्कीस दिन इद्दत रखे ताकि पहले महीने के जितने दिन इद्दत रखी है उन्हें मिलाकर दिनों की तअदाद तीस हो जाए।
2523. अगर हामिला औरत को तलाक़ दी जाए तो उसकी इद्दत वज़ए हम्ल या इस्क़ाते हम्ल तक है लिहाज़ा मिसाल के तौर पर अगर तलाक़ के एक घंटे बाद बच्चा पैदा हो जाए तो उस औरत की इद्दत ख़त्म हो जायेगी। लेकिन यह हुक्म उस सूरत में है जब वह बच्चा साहिबए इद्दत का शरई बेटा हो लिहाज़ा अगर औरत ज़िना से हामिला हुई हो और शौहर उसे तलाक़ दे तो उसकी इद्दत बच्चे के पैदा होने से ख़त्म नहीं होती।
2524. जिस लड़की ने उम्र के नौ साल मुकम्मल कर लिये हों और जो औरत याइसा न हो अगर वह मिसाल के तौर पर किसी शख़्स से एक महीने या एक साल के लिए मुतअ करे तो अगर उस का शौहर उस से मुजामिअत करे और उस औरत की मुद्दत तमाम हो जाए या शौहर उसे मुद्दत बख़्श दे तो ज़रूरी है कि वह इद्दत रखे। पस अगर उसे हैज़ आए तो एहतियात की बिना पर ज़रूरी है कि वह हैज़ के बराबर इद्दत रखे और निकाह न करे और अगर हैज़ न आए तो पैंतालिस दिन शौहर करने से इजतिनाब करे और हामिला होने की सूरत में अज़हर की बिना पर उसकी इद्दत बच्चे की पैदाइश या इस्क़ात होने तक है। अगरचे एहतियाते मुस्तहब यह है कि जो मुद्दते वज़ए हम्ल या पैंतालिस दिन में से ज़्यादा हो उतनी मुद्दत के लिए इद्दत रखे।
2525. तलाक़ की इद्दत उस वक़्त शुरूउ होती है जब सीग़ा का पढ़ना ख़त्म हो जाता है ख़्वाह औरत को पता चले या न चले कि उसे तलाक़ हो गई है पस अगर उसे इद्दत के (के बराबर मुद्दत) गुज़रने के बाद पता चले कि उसे तलाक़ हो गई है तो ज़रूरी नहीं कि वह दोबारा इद्दत रखे।
वफ़ात की इद्दत
2526. अगर कोई औरत बेवा हो जाए तो उस सूरत में जब कि वह आज़ाद हो अगर वह हामिला न हो तो ख़्वाह वह याइसा हो या शौहर ने उस से मुतअ किया हो या शौहर ने उससे मिजामिअत न की हो ज़रूरी है कि चार महीने और दस दिन इद्दत रखे और अगर हामिला हो तो ज़रूरी है कि वज़्ए हम्ल तक इद्दत रखे लेकिन अगर चार महीने और दस दिन गुज़रने से पहले बच्चा पैदा हो जाए तो ज़रूरी है कि शौहर की मौत के बाद चार महीने तक सब्र करे और इस इद्दत को वफ़ात की इद्दत कहते हैं।
2527. जो औरत वफ़ात की इद्दत में हो उस के लिए रंग बिरंगा लिबास पहनना, सुर्मा लगाना और इसी तरह दूसरे ऐसे काम जो ज़ीनत में शुमार होते हों हराम हैं।
2528. अगर औरत को यक़ीन हो जाए कि उस का शौहर मर चुका है और इद्दते वफ़ात तमाम होने के बाद वह दूसरा निकाह करे और फिर उसे मअलूम हो कि उसके शौहर की मौत बाद में वाक़ेअ हुई है तो ज़रूरी है कि दूसरे शौहर से अलायहदगी इख़्तियार करे और एहतियात की बिना पर उस सूरत में जबकि वह हामिला हो वज़ए हम्ल तक दूसरे शौहर के लिए वतीए शुब्हा की इद्दत रखे -- जो कि तलाक़ की इद्दत की तरह है। और उसके बाद पहले शौहर के लिए इद्दते वफ़ात रखे और अगर हामिला न हो तो पहले शौहर के लिए इद्दते वफ़ात और उसके बाद दूसरे शौहर के लिए वतीए शुब्हा की इद्दत रखे।
2529. जिस औरत का शौहर लापता हो या लापता होने के हुक्म में हो उसकी इद्दते वफ़ात शौहर की मौत की इत्तिला मिलने के वक़्त से शुरूउ होती है न कि शौहर की मौत के वक़्त से। लेकिन इस हुक्म का उस औरत के लिए होना जो नाबालिग़ हो या पागल हो इशकाल है।
2530. अगर औरत कहे कि मेरी इद्दत ख़त्म हो गई है तो उसकी बात क़ाबिले क़बूल है मगर यह कि वह ग़लत बयान मश्हूर हो तो उस सूरत में एहतियात की बिना पर उसकी बात क़ाबिले क़बूल नहीं है। मसलन वह कहे कि मुझे एक महीने में तीन दफ़्अ ख़ून आता है तो इस बात की तस्दीक़ नहीं की जायेगी। मगर यह कि उस की सहेलियां और रिश्तेदार औरतें इस बात की तस्दीक़ करें कि उसकी हैज़ की आदत ऐसी ही थी।
तलाक़े बाइन और तलाक़े रज्ई
2531. तलाक़े बाइन वह है कि जिस के बाद मर्द अपनी औरत की तरफ़ रुजूउ करने का हक़ नहीं रखता यअनी कि बग़ैर निकाह के दोबारा उसे अपनी बीवी नहीं बना सकता और इस तलाक़ की छः क़िस्में हैं –
1. उस औरत को दी गई तलाक़ जिसकी उम्र अभी नौ साल न हुई हो।
2. उस औरत को दी गई तलाक़ जो याइसा हो।
3. उस औरत को दी गई तलाक़ जिस के शौहर ने निकाह के बाद उससे जिमाअ न किया हो।
4. जिस औरत को तीन दफ़्आ तलाक़ दी गई हो उसे दी जाने वाली तीसरी तलाक़।
5. ख़ुलअ और मुबारात की तलाक़।
6. हाकिमे शर्अ का उस औरत को तलाक़ देना जिसका शौहर न उसके अख़राजात बर्दाश्त करता हो न उसे तलाक़ देता हो, जिनके अहकाम बाद में बयान किये जायेंगे।
और इन तलाक़ों के अलावा जो तलाक़ें हैं वह रजई हैं जिसका मतलब यह है कि जब तक औरत इद्दत में हो शौहर उस से रुजूउ कर सकता है।
2532. जिस शख़्स ने अपनी औरत को रजई तलाक़ दी हो उसके लिए उस औरत को उस घर से निकाल देना या जिस में वह तलाक़ देने के वक़्त मुक़ीम थी हराम है अलबत्ता बअज़ मौक़ों पर – जिन में से एक यह है कि औरत ज़िना करे तो उसे घर से निकाल देने में कोई इश्काल नहीं। नीज़ यह भी हराम है कि औरत ग़ैर ज़रूरी कामों के लिए शौहर की इजाज़त के बग़ैर उस घर से बाहर जाए।
रुजू करने के अहकाम
2533. रज्ई तलाक़ में मर्द दो तरीक़ों से औरत की तरफ़ रुजूउ कर सकता हैः-
1. ऐसी बातें करे जिस से मुतरश्शेह हो कि उसने उसे दोबारा अपनी बीवी बना लिया है।
2. कोई काम करे और उस काम से रुजूउ का क़स्द करे और ज़ाहिर यह है कि जिमाअ करने से रुजूउ साबित हो जाता है ख़्वाह उसका क़स्द रुजूउ करने का न भी हो। बल्कि बअज़ (फ़ुक़हा) का कहना है कि अगरचे रुकूउ का क़स्द न हो सिर्फ़ लिपटाने और बोसा लेने से रुजूउ साबित हो जाता है अलबत्ता यह क़ौल इश्काल से ख़ाली नहीं है।
2534. रुजूउ करने में मर्द के लिए लाज़िम नहीं कि किसी को गवाह बनाए या अपनी बीवी को (रुजूउ के मुतअल्लिक़) इत्तिलाअ दे बल्कि अगर बग़ैर इस के कि किसी को पता चले वह खुद ही रुजूउ कर ले तो उसका रुजूउ करना सहीह है। लेकिन अगर इद्दत ख़त्म हो जाने के बाद मर्द कहे कि मैंने इद्दत के दौरान ही रुजूउ कर लिया था तो लाज़िम है कि इस बात को साबित करे।
2535. जिस मर्द ने औरत को रज्ई तलाक़ दी हो अगर वह उस से कुछ माल ले ले और उस से मुसालहत कर ले कि अब तुझ से रुजूउ नहीं करूंगा तो अगरचे यह मुसालहत दुरूस्त है और मर्द पर वाजिब है कि रुजूउ न करे लेकिन इस से मर्द के रुजूउ करने का हक़ ख़त्म नहीं होता और अगर वह रुजूउ करे तो जो तलाक़ दे चुका है वह अलायहदगी का मूजिब नहीं बनती।
2536. अगर कोई शख़्स अपनी बीवी को दो दफ़्आ तलाक़ दे कर उसकी तरफ़ रुजूउ कर ले या उसे दो दफ़्आ तलाक़ दे और हर तलाक़ के बाद उस से निकाह करे या एक तलाक़ के बाद रुजूउ करे और दूसरी तलाक़ के बाद निकाह करे तो तीसरी तलाक़ के बाद वह उस मर्द पर हराम हो जायेगी लेकिन अगर औरत तीसरी तलाक़ के बाद किसी दूसरे मर्द से निकाह करे तो वह पांच शर्तों के साथ पहले मर्द पर हलाल होगी यअनी उस औरत से दोबारा निकाह कर सकेगा।
1. दूसरे शौहर का निकाह दाइमी हो। पस अगर मिसाल के तौर पर वह एक महीने या एक साल के लिए उस औरत से मुतअ कर ले तो उस मर्द से अलायहदगी के बाद पहला शौहर उस से निकाह नहीं कर सकता।
2. दूसरा शौहर जिमाअ करे और एहतियाते वाजिब यह है कि जिमाअ फ़ुर्ज़ में करे।
3. दूसरा शौहर उसे तलाक़ दे या मर जाए।
4. दूसरे शौहर की तलाक़ की इद्दत या वफ़ात की इद्दत ख़त्म हो जाए।
5. एहतियाते वाजिब की बिना पर दूसरा शौहर जिमाअ करते वक़्त बालिग़ हो।
तलाक़े ख़ुलअ
2537. उस औरत की तलाक़ को जो अपने शौहर की तरफ़ माइल न हो और उस से नफ़रत करती हो अपना महर या कोई और माल उसे बख़्श दे ताकि वह उसे तलाक़ दे दे तलाक़े ख़ुलअ कहते हैं। और तलाक़े ख़ुलअ में अज़हर की बिना पर मोतबर है कि औरत अपने शौहर से इस क़दर शदीद नफ़रत करती हो कि उसे वज़ीफ़ा ए ज़ौजीयत अदा न करने की धमकी दे।
2538. जब शौहर खुद तलाक़े ख़ुलअ का सीग़ा पढ़ना चाहे तो अगर उसकी बीवी का नाम मसलन फ़ातिमा हो तो एवज़ लेने के बाद कहे, ज़ौजती फ़ातिमतो ख़ालअतुहा अला मा बज़लत और एहतियाते मुस्तहब की बिना पर, हिया तालिक़ुन भी कहे यअनी मैंने अपनी बीवी फ़ातिमा को उस माल के एवज़ जो उसने मुझे दिया है तलाक़े ख़ुलअ दे रहा हूं और वह आज़ाद है। और अगर औरत मुअय्यन हो तो तलाक़े ख़ुलअ में और नीज़ तलाक़े मुबारत में उसका नाम लेना लाज़िम नहीं।
2539. अगर कोई औरत किसी शख़्स को वकील मुक़र्रर करे ताकि वह उस का महर उसके शौहर को बख़्श दे और शौहर भी उसी शख़्स को वकील मुक़र्रर करे ताकि वह उसकी बीवी को तलाक़ दे दे तो अगर मिसाल के तौर पर शौहर का नाम मौहम्मद औऱ बीवी का नाम फ़ातिमा हो तो वकील सीग़ा ए तलाक़ यूं पढ़े, अन मुवक्किलती फ़ातिमता बज़ल्तो महरहा ले मुवक्किली मोहम्मदिन लेयखलअहा अलैहे, और उसके बाद बिला फ़ासिला कहे, ज़ौजतो मुवक्किली ख़ालअतुहा अला मा बज़लत हिया तालिक़ुन,। और अगर औरत किसी को वकील मुक़र्रर करे कि उसके शौहर को महर के अलावा कोई और चीज़ बख़्श दे ताकि उस का शौहर उसे तलाक़ दे दे तो ज़रूरी है कि वकील लफ़्ज़े महरहा की बजाय उस चीज़ का नाम ले मसलन अगर औरत ने सौ रुपये दिये हों तो ज़रूरी है कि कहे, बज़लत मेअता रुपया।
तलाक़े मुबारत
2540. अगर मियां बीवी दोनों एक दूसरे को न चाहते हों और अगर एक दूसरे से नफ़रत करते हों और औरत मर्द को कुछ माल दे ताकि वह उसे तलाक़ दे दे तो उसे तलाक़े मुबारत कहते हैं।
2541. अगर शौहर मुबारत का सीग़ा पढ़ना चाहे तो अगर मसलन औरत का नाम फ़ातिमा हो तो ज़रूरी है कि कहे, बारातो ज़ौजती फ़ातिमता अला मा बज़लत, और एहतियाते लाज़िम की बिना पर, फ़हिया तालिक़ुन भी कहे। यअनी मैं और मेरी बीवी फ़ातिमा उस अता के मुक़ाबिल में जो उसने की है एक दूसरे से जुदा हो गए हैं पस वह आज़ाद है। और अगर वह शख़्स किसी को वकील मुक़र्रर करे तो ज़रूरी है कि वकील कहे, अनक़िबला मुवक्किली बारातो ज़ौजतहू फ़ातिमता अला मा बज़लत फ़हिया तालिक़ुन और दोनों सूरतों में कलिमा अला मा बज़लत की बजाय अगर बेमा बज़लत कहे तो कोई इश्काल नहीं है।
2542. ख़ुलअ और मुबारात की तलाक़ का सीग़ा अगर मुम्किन हो तो सहीह अरबी में पढ़ा जाना चाहिए और अगर मुम्किन न हो तो उसका हुक्म तलाक़ के हुक्म जैसा है जिसका बयान मस्अला 2517 में गुज़र चुका है। लेकिन अगर औरत मुबारात की तलाक़ के लिये शौहर को अपना माल बख़्श दे। मसलन उर्दू में कहे कि – मैंने तलाक़ लेने के लिये फ़लां माल तुम्हें बख़्श दिया, तो कोई इश्काल नहीं।
2543. अगर कोई औरत तलाक़े ख़ुलअ या तलाक़े मुबारात की इद्दत के दौरान अपनी बख़्शिश से फिर जाए तो शौहर उसकी तरफ़ रुजूउ कर सकता है और दोबारा निकाह के बग़ैर उसे अपनी बीवी बना सकता है।
2544. जो माल शौहर तलाक़े मुबारात देने के लिए ले ज़रूरी है कि वह औरत के महर से ज़्यादा न हो लेकिन तलाक़े खुलअ के सिलसिले में लिया जाने वाला माल अगर महर से ज़्यादा भी हो तो कोई इश्काल नहीं।
तलाक़ के मुख़्तलिफ़ अहकाम
2545. अगर कोई आदमी किसी ना महरम औरत से इस गुमान में जिमाअ करे कि वह उसकी बीवी है तो ख़्वाह औरत को इल्म हो कि वह उस का शौहर नहीं है या गुमान करे कि उस का शौहर है ज़रूरी है कि इद्दत रखे।
2546. अगर कोई आदमी किसी औरत से यह जानते हुए ज़िना करे कि वह उसकी बीवी नहीं है तो अगर औरत को इल्म हो कि वह आदमी उसका शौहर नहीं है उसके लिए इद्दत रखना ज़रूर नहीं। लेकिन अगर उसे शौहर होने का गुमान हो तो एहतियाते लाज़िम यह है कि वह औरत इद्दत रखे।
2547. अगर कोई शख़्स किसी औरत को वर्ग़लाए कि वह अपने शौहर से मुतअल्लिक़ इज़दिवाजी ज़िम्मेदारियां पूरी न करे ताकि इस तरह शौहर उसे तलाक़ देने पर मजबूर हो जाए और वह खुद उस औरत के साथ शादी कर सके तो तलाक़ और निकाह सहीह है लेकिन दोनों ने बहुत बड़ा गुनाह किया है।
2548. अगर औरत निकाह के सिलसिले में शौहर से शर्त करे कि अगर उसका शौहर सफ़र इख़्तियार करे या मसलन छः महीने उसे ख़र्च न दे तो तलाक़ का हक़ औरत को हासिल होगा तो यह शर्त बातिल है। लेकिन अगर शर्त करे कि अभी से शौहर की तरफ़ से वकील है कि अगर वह मुसाफ़िरत इख़्तियार करे या छः महीने तक उस के अख़राजात पूरे न करे तो वह अपने आप को तलाक़ देगी तो इसमें कोई इश्काल नहीं है।
2549. जिस औरत का शौहर लापता हो जाए अगर वह दूसरा शौहर करना चाहे तो ज़रूरी है कि मुज्तहिदे आदिल के पास जाए और उसके हुक्म के मुताबिक़ अमल करे।
2550. दीवाने के बाप दादा उसकी बीवी को तलाक़ दे सकते हैं।
2551. अगर बाप या दादा अपने नाबालिग़ लड़के (या पोते) का किसी औरत से मुतअ कर दें और मुतअ की मुद्दत में उस लड़के के मुकल्लफ़ होने की कुछ मुद्दत भी शामिल हो मसलन अपने चौदा साला लड़के का किसी औरत से दो साल के लिए मुतअ कर दे तो अगर उस में लड़के की भलाई हो तो वह (यअनी बाप या दादा) उस औरत की मुद्दत बख़्श सकते हैं लेकिन लड़के की दाइमी बीवी को तलाक़ नहीं दे सकते।
2552. अगर कोई शख़्स दो आदमियों को शरअ की मुक़र्रर कर्दा अलामत की रू से आदिल मसझे और अपनी बीवी को उनके सामने तलाक़ दे दे तो कोई और शख़्स जिसके नज़दीक उन दो आदमियों की अदालत साबित न हो उस औरत की इद्दत ख़त्म होने के बाद उस के साथ खुद निकाह कर सकता है या उसे किसी दूसरे के निकाह में दे सकता है अगरचे एहतियाते मुस्तहब यह है कि उस के साथ निकाह से इज्तिनाब करे और दूसरे का निकाह भी उस के साथ न करे।
2553. अगर कोई शख़्स अपनी बीवी के इल्म में लाए बग़ैर उसे तलाक़ दे दे तो अगर वह उसके अख़राजात उसी तरह से जिस तरह उस वक़्त देता था जब वह उसकी बीवी थी और मसलन एक साल के बाद उस से कहे कि, मैं एक साल हुआ तुझे तलाक़ दे चुका हूँ, और इस बात को शरअन साबित भी कर दे तो जो चीज़ें उसने इस मुद्दत में उस औरत को मुहैया की हों और वह उन्हें अपने इस्तेमाल में न लाई हो उससे वापस ले सकता है लेकिन जो चीज़ें उसने इस्तेमाल कर ली हों उनका मुतालबा नहीं कर सकता।
ग़स्ब के अहकाम
ग़स्ब के मअनी यह हैं कि कोई शख़्स किसी के माल पर या हक़ पर ज़ुल्म (और धौंस या धांधली) के ज़रीए क़ाबिज़ हो जाए और यह बहुत बड़े गुनाहों में से एक गुनाह है जिसका मुर्तकिब क़ियामत के दिन सख़्त अज़ाब में गिरफ़्तार होगा। जनाबे रसूले अकरम स्वल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम से रिवायत है, जो शख़्स किसी दूसरे की एक बालिश्त ज़मीन पर ग़स्ब करे क़ियामत के दिन उस ज़मीन को उसके सात तबक़ों समेत तौक़ की तरह उसकी गर्दन में डाल दिया जायेगा।
2554. अगर कोई शख़्स लोगों को मस्जिद या मदरसे या पुल या दूसरी ऐसी जगहों से जो रिफ़ाहे आम्मा के लिए बनाई गई हों इस्तिफ़ादा न करने दे तो उसने उनका हक़ ग़स्ब किया है। इसी तरह अगर कोई शख़्स मस्जिद में अपने (बैठने के) लिए जगह मुख़्तस करे और दूसरा कोई शख़्स उसे उस जगह से निकाल दे और उसे उस जगह से इस्तिफ़ादा न करने दे तो वह गुनाहगार है।
2555. अगर गिरवी रखवाने वाला और गिरवी रखने वाला यह तय करे कि जो चीज़ गिरवी रखी जा रही हो वह गिरवी रखने वाले या किसी तीसरे शख़्स के पास रखी जाए तो गिरवी रखवाने वाला उसका क़र्ज़ अदा करने से पहले उस चीज़ को वापस नहीं ले सकता और अगर वह चीज़ वापस ली हो तो ज़रूरी है कि फ़ौरन लौटा दे।
2556. जो माल किसी के पास गिरवी रखा गया हो अगर कोई और शख़्स उसे ग़स्ब कर ले तो माल का मालिक और गिरवी रखने वाला दोनों ग़ासिब से ग़स्ब की हुई चीज़ का मुतालबा कर सकते हैं और अगर वह चीज़ ग़ासिब से वापस ले लें तो वह गिरवी ही रहेगी और अगर वह चीज़ तलफ़ हो जाए और वह उस का एवज़ हासिल करें तो वह एवज़ भी अस्ली चीज़ की गिरवी रहेगा।
2557. अगर इंसान कोई चीज़ ग़स्ब करे तो ज़रूरी है कि उसके मालिक को लौटा दे और अगर वह चीज़ ज़ाए हो जाए और उसकी कोई क़ीमत हो तो ज़रूरी है कि उस का एवज़ मालिक को दे।
2558. जो चीज़ ग़स्ब की गई हो अगर उससे कोई नफ़्अ हो मसलन ग़स्ब की हुई भेड़ का बच्चा पैदा हो तो वह उसके मालिक का माल है नीज़ मिसाल के तौर पर अगर किसी ने कोई मकान ग़स्ब कर लिया हो तो ख़्वाह ग़ासिब उस मकान में न रहे ज़रूरी है कि उसका किराया मालिक को दे।
2559. अगर कोई शख़्स बच्चे या दीवाने से कोई चीज़ जो उस (बच्चे या दीवाने) का माल हो ग़स्ब करे तो ज़रूरी है कि वह चीज़ उसके सरपरस्त को दे दे और अगर वह चीज़ तलफ़ हो जाए तो ज़रूरी है कि उसका एवज़ दे।
2560. अगर दो आदमी मिलकर किसी चीज़ को ग़स्ब करें चुनांचे वह दोनों उस चीज़ पर तसल्लुत रखते हों तो उनमें से हर एक उस पूरी चीज़ का ज़ामिन है अगरचे उन में से हर एक जुदागाना तौर पर उसे ग़स्ब न कर सकता हो।
2561. अगर कोई शख़्स ग़स्ब की हुई चीज़ को किसी दूसरी चीज़ से मिला दे मसलन जो गेहूं ग़स्ब की हो उसे जौ से मिला दे तो अगर उसका जुदा करना मुम्किन हो तो ख़्वाह उस में ज़हमत ही क्यों न हो ज़रूरी है कि उन्हें एक दूसरे से अलायहदा करे और (ग़स्ब की हुई चीज़) उसके मालिक को वापस कर दे।
2562. अगर कोई शख़्स तिलाई चीज़ मसलन सोने की बालियों को ग़स्ब करे और उसके बाद उसे पिघला दे तो पिघलाने से पहले और पिघलाने के बाद की क़ीमत में जो फ़र्क़ हो ज़रूरी है कि वह मालिक को अदा करे चुनांचे अगर क़ीमत में जो फ़र्क़ पड़ा हो वह न देना चाहे और कहे कि मैं उसे पहले की तरह बना दूंगा तो मालिक मजबूर नहीं कि उस की बात क़बूल करे और मालिक भी उसे मजबूर नहीं कर सकता कि उसे पहले की तरह बना दे।
2563. जिस शख़्स ने कोई चीज़ ग़स्ब की हो अगर वह उसमें ऐसी तब्दीली करे कि उस चीज़ की हालत पहले से बेहतर हो जाए मसलन जो सोना ग़स्ब किया हो उस के बुन्दे बना दे तो अगर माल का मालिक उसे कहे कि मुझे माल इसी हालत में (यअनी बुन्दे की शक्ल में) दो तो ज़रूरी है कि उसे दे दे और जो ज़हमत उसने उठाई हो (यअनी बुन्दे बनाने पर जो महनत की हो) उसकी मज़दूरी नहीं ले सकता और इसी तरह वह यह हक़ नहीं रखता कि मालिक की इजाज़त के बग़ैर उस चीज़ को उसकी पहली हालत में ले आए लेकिन अगर उसकी इजाज़त के बग़ैर उस चीज़ को पहले जैसा कर दे या और किसी शक्ल में तब्दील करे तो मअलूम नहीं है कि दोनों सूरतों में क़ीमत का जो फ़र्क़ है उस का ज़ामिन है या (नहीं)।
2564. जिस शख़्स ने कोई चीज़ ग़स्ब की हो अगर वह उसमें कोई ऐसी तब्दीली करे कि उसकी हालत पहले से बेहतर हो जाए और साहबे माल उसे उस चीज़ की पहली हालत में वापस करने को कहे तो उसके वाजिब है कि उसे पहली हालत में ले आए और अगर तब्दीली करने की वजह से उस चीज़ की क़ीमत पहली हालत से कम हो जाए तो ज़रूरी है कि उसका फ़र्क़ मालिक को दे लिहाज़ा अगर कोई शख़्स ग़स्ब किए हुए सोने का हार बना ले और उस सोने का मालिक कहे कि तुम्हारे लिए लाज़िम है कि उसे पहली शक्ल में ले आओ तो अगर पिघलाने के बाद सोने की क़ीमत उससे कम हो जाए जितनी हार बनाने से पहले थी तो ग़ासिब के लिए ज़रूरी है कि क़ीमतों मे जितना फ़र्क़ हो उसके मालिक को दे।
2565. अगर कोई शख़्स उस ज़मीन में जो उसने ग़स्ब की हो खेती बाड़ी करे या दरख़्त लगाए तो ज़िराअत, दरख़्त और फल खुद उसका माल है और ज़मीन का मालिक इस बात पर राज़ी न हो कि दरख़्त उस ज़मीन में रहे तो जिसने वह ज़मीन ग़स्ब की हो ज़रूरी है कि ख़्वाह ऐसा करना उसके लिए नुक़्सानदेह ही क्यों न हो वह फ़ौरन अपनी ज़िराअत या दरख़्तों को ज़मीन से उखेड़ ले नीज़ ज़रूरी है कि जितना मुद्दत ज़िराअत और दरख़्त उस ज़मीन में रहे हों उतनी मुद्दत का किराया ज़मीन के मालिक को दे और जो ख़राबियां ज़मीन में पैदा हुई हों उन्हें दुरूस्त करे मसलन जहां दरख़्तों को उखेड़ने से ज़मीन में गढ़े पड़ गए हों उस जगह को हमवार करे और अगर उन ख़ारबियों की वजह से ज़मीन की क़ीमत पहले से कम हो जाए तो ज़रूरी है कि क़ीमत में जो फ़र्क़ पड़े वह भी अदा करे और वह ज़मीन के मालिक को इस बात पर मजबूर नहीं कर सकता कि ज़मीन उसके हाथ बेच दे या किराये पर दे दे नीज़ ज़मीन का मालिक भी उसे मजबूर नहीं कर सकता कि दरख़्त या ज़िराअत उसके हाथ बेच दे।
2566. अगर ज़मीन का मालिक इस बात पर राज़ी हो जाए कि ज़िराअत और दरख़्त उसकी ज़मीन में रहे तो जिस शख़्स ने ज़मीन ग़स्ब की हो उसके लिए लाज़िम नहीं कि ज़िराअत और दरख़्तों को उखेड़े लेकिन ज़रूरी है कि जब ज़मीन ग़स्ब की हो उस वक़्त से लेकर मालिक के राज़ी होने तक की मुद्दत का ज़मीन का किराया दे।
2567. जो चीज़ किसी ने ग़स्ब की हो अगर वह तलफ़ हो जाए तो अगर वह चीज़ गाय और भेड़ की तरह की हो जिनकी क़ीमत उनकी ज़ाती ख़सूसीयात की बिना पर उक़ला की नज़र में फ़र्दन फ़र्दन मुख़्तलिफ़ होती है तो ज़रूरी है कि ग़ासिब उस चीज़ की क़ीमत अदा करे और अगर उस वक़्त और ज़रूरत मुख़्तलिफ़ होने की वजह से उस की बाज़ार की क़ीमत बदल गई हो तो ज़रूरी है कि वह क़ीमत दे जो तलफ़ होने के वक़्त थी और एहतियाते मुस्तहब यह है कि ग़स्ब करने के वक़्त से लेकर तलफ़ होने तक उस चीज़ की जो ज़्यादा से ज़्यादा क़ीमत रही हो वह दे।
2568. जो चीज़ किसी ने ग़स्ब की हो अगर वह तलफ़ हो जाए तो अगर वह गेहूं और जौ की मानिन्द हो जिनकी फ़र्दन फ़र्दन क़ीमत का ज़ाती ख़ुसूसीयात की बिना पर बाहम फ़र्क़ नहीं होता हो ज़रूरी है कि (ग़ासिब ने) जो चीज़ ग़स्ब की हो उसी जैसी चीज़ मालिक को दे लेकिन जो चीज़ दे ज़रूरी है कि उसकी क़िस्म अपनी ख़ुसूसीयात में उस ग़स्ब की हुई चीज़ की क़िस्म के मानिन्द हो जो कि तलफ़ हो गई है मसलन अगर बढ़िया क़िस्म का चावल ग़स्ब किया था तो घटिया क़िस्म का नहीं दे सकता।
2569. अगर एक शख़्स भेड़ जैसी कोई चीज़ ग़स्ब करे और वह तलफ़ हो जाए तो अगर उसकी बाज़ार की क़ीमत में फ़र्क़ न पड़ा हो लेकिन जितनी मुद्दत में मसलन फ़र्बेह हो गई हो और फिर तलफ़ हो जाए तो ज़रूरी है कि फ़र्बेह होने के वक़्त की क़ीमत अदा करे।
2570. जो चीज़ किसी ने ग़स्ब की हो अगर कोई और शख़्स वही चीज़ उससे ग़स्ब करे और फिर वह तलफ़ हो जाए तो माल का मालिक उन दोनों में से हर एक से उसका एवज़ ले सकता है या उन दोनों में से हर एक से उसके एवज़ की कुछ मिक़्दार का मुतालबा कर सकता है लिहाज़ा अगर माल का मालिक उस का एवज़ पहले ग़ासिब से ले ले तो पहले ग़ासिब ने जो कुछ दिया हो वह दूसरे ग़ासिब से ले सकता है। लेकिन अगर माल का मालिक उसका एवज़ दूसरे ग़ासिब से ले ले तो उसने जो कुछ दिया है उसका मुतालबा दूसरा ग़ासिब पहले ग़ासिब से नहीं कर सकता।
2571. जिस चीज़ को बेचा जाए अगर उसमें मुआमले की शर्तों में से कोई एक मौजूद न हो मसलन जिस चीज़ की ख़रीद व फ़रोख़्त वज़्न कर के करनी ज़रूरी हो अगर उस का मुआमला बग़ैर वज़्न किये किया जाए तो मुआमला बातिल है और अगर बेचने वाला और ख़रीदार मुआमले से क़ता ए नज़र इस बात पर रज़ामन्द हों कि एक दूसरे के माल में तसर्रूफ़ करें तो कोई इश्काल नहीं वर्ना जो चीज़ उन्होंने एक दूसरे से ली हो वह ग़स्बी माल की मानिन्द है और उनके लिए ज़रूरी है कि एक दूसरे की चीज़ें वापस कर दें और अगर दोनों में से जिस के भी हाथों दूसरे का माल तलफ़ हो जाए तो ख़्वाह उसे मअलूम हो या न हो कि मुआमला बातिल था ज़रूरी है कि उस का एवज़ दे।
2572. जब एक शख़्स कोई माल किसी बेचने वाले से इस मक़्सद से ले कि उसे देखे या कुछ मुद्दत अपने पास रखे ताकि अगर पसन्द आए तो खरीद ले तो अगर वह माल तलफ़ हो जाए तो मश्हूर क़ौल की बिना पर ज़रूरी है कि उसका एवज़ उसके मालिक को दे।
गुमशुदा माल पाने के अहकाम
2573. अगर किसी शख़्स को किसी दूसरे का गुमशुदा ऐसा माल मिले जो हैवानात में से न हो और जिसकी कोई ऐसी निशानी भी न हो जिसके ज़रीए उसके मालिक का पता चल सके तो ख़्वाह उसकी क़ीमत एक दिरहम 12 चने सिक्केदार चांदी से कम हो या न हो वह अपने लिये ले सकता है लेकिन एहतियाते मुस्तहब है कि वह शख़्स उस माल को उसके मालिक की तरफ़ से फ़क़ीरों को सदक़ा कर दे।
2574. अगर कोई इंसान कहीं गिरी हुई चीज़ पाए जिसकी क़ीमत एक दिरहम से कम हो तो अगर उसका मालकि मअलूम हो लेकिन इंसान को यह इल्म न हो कि वह उसके उठाने पर राज़ी है या नहीं तो वह उसकी इजाज़त के बग़ैर उस चीज़ को नहीं उठा सकता और अगर उसके मालिक का इल्म न हो तो एहतियाते वाजिब यह है कि उसके मालिक की तरफ़ से सदक़ा कर दे और जब भी उसका मालिक मिले और सदक़ा देने पर राज़ी न हो तो उसे उसका एवज़ दे दे।
2575. अगर कोई शख़्स एक ऐसी चीज़ पाए जिस पर कोई ऐसी निशानी हो जिस के ज़रीए उसके मालिक का पता चलाया जा सके तो अगरचे उसे मअलूम हो कि उसका मालिक एक ऐसा काफ़िर है जिसका माल मोहतरम है तो उस सूरत में कि उस चीज़ की क़ीमत एक दिरहम तक पहुंच जाए तो ज़रूरी है कि जिस दिन वह चीज़ मिली हो उससे एक साल तक लोगों की बैठकों (या मजलिसों) में उसका ऐलान करे।
2576. अगर इंसान खुद ऐलान न करना चाहे तो ऐसे आदमी को अपनी तरफ़ से ऐलान करने के लिए कह सकता है जिसके मुतअल्लिक़ उसे इत्मीनान हो कि वह ऐलान कर देगा।
2577. अगर मज़कूरा शख़्स एक साल तक ऐलान करे और माल का मालिक न मिले तो उस सूरत में जब कि वह माल हरमे पाक (मक्का) के अलावा किसी जगह से मिला हो वह उसे उसके मालिक के लिए अपने पास रख सकता है ताकि जब भी वह मिले उसे दे दे या माल के मालिक की तरफ़ से फ़क़ीरों को सदक़ा कर दे। और एहतियाते लाज़िम यह है कि वह खुद न ले और अगर वह माल उसे हरमे पाक में मिला हो तो एहतियाते वाजिब यह है कि उसे सदक़ा कर दे।
2578. अगर एक साल तक ऐलान कर ने के बाद भी माल का मालिक न मिले और जिसे वह माल मिला हो वह उसके मालिक के लिए उसे अपने पास रख ले (यअनी जब मालिक मिलेगा उसे दे दूंगा) और वह माल तलफ़ हो जाए तो अगर उसने माल की निगहदाश्त में कोताही न बरती हो और तअद्दी भी न की हो तो फिर वह ज़िम्मेदार नहीं है लेकिन अगर वह माल उस के मालिक की तरफ़ से सदक़ा कर चुका हो तो माल के मालिक को इख़्तियार है कि उस सदक़े पर राज़ी हो जाए या अपने माल के एवज़ का मुतालबा करे और सदक़े का सवाब सदक़ा करने वाले को मिलेगा।
2579. जिस शख़्स को कोई माल मिला हो अगर वह उस तरीक़े के मुताबिक़ जिसका ज़िक्र ऊपर किया गया है अमदन ऐलान न करे तो पहले (ऐलान न कर के अगरचे) उसने गुनाह किया है लेकिन अब उसे एहतिमाल हो कि (ऐलान करना) मुफ़ीद होगा तो फिर भी उस पर वाजिब है कि ऐलान करे।
2580. अगर दीवाने या नाबालिग़ बच्चे को कोई ऐसी चीज़ मिल जाए जिसमें अलामत मौजूद हो और उसकी क़ीमत एक दिरहम के बराबर हो तो उसका सरपरस्त ऐलान कर सकता है। बल्कि अगर वह चीज़ सरपरस्त ने बच्चे या दीवाने से ले ली हो तो उस पर वाजिब है कि ऐलान करे। और अगर एक साल तक ऐलान करे फिर भी माल का मालिक न मिले तो ज़रूरी है कि जो कुछ मस्अला 2577 में बताया गया है उसके मुताबिक़ अमल करे।
2581. अगर इंसान उस साल के दौरान जिसमें वह (मिलने वाले माल के बारे में) ऐलान कर रहा हो माल के मालिक के मिलने से ना उम्मीद हो जाए तो – एहतियात की बिना पर – ज़रूरी है कि हाकिमे शर्अ की इजाज़त से उस माल को सदक़ा कर दे।
2582. अगर उस साल के दौरान जिसमें (इंसान मिलने वाले माल के बारे में) ऐलान कर रहा हो वह माल तलफ़ हो जाए तो अगर उस शख़्स ने उस माल की निगहदाश्त में कोताही की हो या तअद्दी यअनी बेजा इस्तेमाल करे तो वह ज़ामिन है कि उसका एवज़ उसके मालिक को दे और ज़रूरी है कि ऐलान करता रहे और अगर कोताही या तअद्दी न की हो तो फिर उस पर कुछ वाजिब नहीं है।
2583. अगर कोई माल जिस पर को निशानी (या मारका) हो और उसकी क़ीमत एक दिरहम तक पहुंचती हो ऐसी जगह मिले जिसके बारे में मअलूम हो कि ऐलान के ज़रीए उसका मालिक नहीं मिलेगा तो ज़रूरी है कि (जिस शख़्स को वह माल मिला हो) वह पहले दिन ही उसे – एहतियाते लाज़िम की बिना पर हाकिमे शर्अ की इजाज़त से उसके मालिक की तरफ़ से फ़क़ीरों को सदक़ा कर दे और ज़रूरी नहीं कि वह साल ख़त्म होने तक इन्तिज़ार करे।
2584. अगर किसी शख़्स को कोई ऐसी चीज़ मिले और वह उसे अपना माल समझते हुए उठा ले और बाद में उसे पता चले कि वह उस का माल नहीं है तो जो अहकाम इससे पहले वाले मसाइल में बयान किये गए हैं उन्हीं के मुताबिक़ अमल करे।
2585. जो चीज़ मिली हो ज़रूरी है कि उसका इस तरह ऐलान किया जाए कि अगर उस का मालिक सुने तो उसे ग़ालिब गुमान हो कि वह चीज़ उसका माल है और ऐलान करने में मुख़्तलिफ़ मवाक़े के लिहाज़ से फ़र्क़ होता है मसलन बाज़ औक़ात इतना ही काफ़ी है कि, मुझे कोई चीज़ मिली है, लेकिन बाज़ दीगर सूरतों में ज़रूरी है कि उस चीज़ की जिन्स का तअय्युन करे मसलन यह कहे कि, सोने का एक टुकड़ा मुझे मिला है, और बाज़ सूरतों में उस चीज़ की बाज़ ख़ुसूसीयात का भी इज़ाफ़ा ज़रूरी है मसलन कहे, सोने की बालियां, मुझे मिली हैं, लेकिन बहरहाल ज़रूरी है कि उस चीज़ की तमाम ख़ुसूसीयात का ज़िक्र न करे त कि वह चीज़ मुअय्यन हो जाए।
2586. अगर किसी को कोई चीज़ मिल जाए और दूसरा शख़्स कहे कि यह मेरा माल है और उसकी निशानियां भी बता दे तो वह चीज़ उस दूसरे शख़्स को उस वक़्त देना ज़रूरी है जब उसे इत्मीनान हो जाए कि यह उसी का माल है। और यह ज़रूरी नहीं कि वह शख़्स ऐसी निशानियां बताए जिनकी तरफ़ उमूमन माल का मालिक भी तवज्जोह नहीं देता।
2587. किसी शख़्स को जो चीज़ मिली हो उसकी क़ीमत एक दिरहम तक पहुंचे तो अगर वह ऐलान न करे और उस चीज़ को मस्जिद या किसी दूसरी जगह जहां लोग जमा होते हों रख दे और वह चीज़ तलफ़ हो जाए या कोई दूसरा शख़्स उठा ले तो जिस शख़्स को वह चीज़ पड़ी हुई मिली हो वह ज़िम्मेदार है।
2588. अगर किसी शख़्स को कोई चीज़ मिल जाए जो एक साल तक बाक़ी न रहती हो तो ज़रूरी है कि उन तमाम ख़ुसूसीयात के साथ जब तक की वह बाक़ी रहे उस चीज़ की हिफ़ाज़त करे जो उसकी क़ीमत बाक़ी रखने में अहम्मीयत रखती हो और एहतियाते लाज़िम यह है कि उस मुद्दत के दौरान इसका ऐलान भी करता रहे और अगर उसका मालिक न मिले तो एहतियात की बिना पर – हाकिमे शर्अ या उसके वकील की इजाज़त से उसकी क़ीमत का तअय्युन करे और उसे बेच दे और उन पैसों को अपने पास रखे और उसके साथ साथ ऐलान भी जारी रखे और अगर एक साल तक उसका मालिक न मिले तो ज़रूरी है कि जो कुछ मस्अला 2577 में बताया गया है उसके मुताबिक़ अमल करे।
2589. जो चीज़ किसी को पड़ी हुई मिली हो अगर वुज़ू करते वक़्त या नमाज़ पढ़ते वक़्त वह उसके पास हो और अगर वह मालिक के मिलने की सूरत में उसे न लौटाना चाहता हो तो उसका वूज़ू और नमाज़ बातिल नहीं होगी।
2590. अगर किसी शख़्स का जूता उठा लिया जाए और उसकी जगह किसी और का जूता रख दिया जाए और अगर वह शख़्स जानता हो कि जो जूता रखा है वह उस शख़्स का माल है जो उसका जूता ले गया है और वह इस बात पर राज़ी हो कि जो जूता वह ले गया है उसके एवज़ उसका जूता रख ले तो वह अपने जूते के बजाए वह जूता रख सकता है और इसी तरह अगर वह शख़्स जानता हो कि वह शख़्स उसका जूता नाहक़ और ज़ुल्मन ले गया है तब भी यही हुक्म है लेकिन इस सूरत में ज़रूरी है कि उस जूते की क़ीमत उसके अपने जूते की क़ीमत से ज़्यादा न हो वर्ना ज़्यादा क़ीमत के मुतअल्लिक़ मज़्हूलुल मालिक का हुक्म जारी होगा और इन दो सूरतों के अलावा उस जूते पर मज़्हूलुल मालिक का हुक्म जारी होगा।
2591. अगर इंसान के पास मज्हूलुल मालिक का माल हो और उस माल पर लफ़्ज़े गुमशुदा का इत्लाक़ न होता हो तो उस सूरत में जब उसे इत्मीनान हो जाए कि उसके माल पर तसर्रूफ़ करने पर उसका मालिक राज़ी होगा तो जिस तरह भी वह उस माल में तसर्रूफ़ करना चाहे उसके लिए जाइज़ है। और अगर इत्मीनान न हो तो इंसान के लिए लाज़िम है कि उसके मालिक को तलाश करे और उसके मालिक के मिलने से मायूस होने के बाद उस माल को बतौर सदक़ा फ़क़ीर को देना ज़रूरी है। और एहतियाते लाज़िम यह है कि हाकिमे शर्अ की इजाज़त से सदक़ा दे और अगर बाद में माल का मालिक मिल जाए और सदक़ा देने पर राज़ी न हो तो एहतियात की बिना पर उसे उसका एवज़ देना ज़रूरी है।
हैवानात को शिकार और ज़ब्ह करने के अहकाम
2592. हैवान जंगली हो या पालतू – हराम गोश्त हैवानों के अलावा, जिन का बयान खाने और पीने वाली चीज़ों के अहकाम में आयेगा, उसको इस तरीक़े के मुताबिक़ ज़ब्ह किया जाए, जो बाद में बताया जायेगा, तो उसकी जान निकल जाने के बाद, उसका गोश्त हलाल और बदन पाक है। लेकिन ऊँट, मछली और टिड्डी को ज़ब्ह किये बग़ैर खाना हलाल हो जायेगा जिस तरह कि आइन्दा मसाइल में बयान किया जायेगा।
2593. वह जंगली हैवान जिन का गोश्त हलाल हो मसलन हिरन, चकोर और पहाड़ी बकरी और वह हैवान जिन का गोश्त हलाल हो और जो पहले पालतू रहे हों और बाद में जंगली बन गए हों मसलन पालतू गाय और ऊँट जो भाग गए हों और जंगली बन गए हों अगर उन्हें उस तरीक़े के मुताबिक़ शिकार किया जाए जिस का ज़िक्र बाद में होगा तो वह पाक और हलाल हैं लेकिन हलाल गोश्त वाले पालतू हैवान मसलन भेड़ और घरेलू मुर्ग़ और हलाल गोश्त वाले वह जंगली हैवान जो तरबियत की वजह से पालतू बन जायें शिकार करने से पाक और हलाल नहीं होते।
2594. हलाल गोश्त वाला जंगली हैवान शिकार करने से उस सूरत में हलाल होता है जब वह भाग सकता हो या उड़ सकता हो। लिहाज़ा हिरन का वह बच्चा जो भाग न सके और चकोर का वह बच्चा जो उड़ न सके शिकार करने से पाक और हलाल नहीं होते और अगर कोई शख़्स हिरनी को और उसके ऐसे बच्चे को जो भाग न सकता हो एक ही तीर से शिकार करे तो हिरनी हलाल और बच्चा हराम होगा।
2595. हलाल गोश्त वाला वह हैवान जो उछलने वाला ख़ून न रखता हो मसलन मछली अगर खुद ब खुद मर जाए तो पाक है लेकिन उसका गोश्त खाया नहीं जा सकता।
2596. हराम गोश्त वाला वह हैवान जो उछलने वाला ख़ून न रखता हो मसलन सांप उसका मुर्दा पाक है लेकिन ज़ब्ह करने से वह हलाल नहीं होता।
2597. कुत्ता और सुव्वर ज़ब्ह करने से और शिकार करने से पाक नहीं होते और उनका गोश्त खाना भी हराम है और वह हराम गोश्त वाला हैवान जो भेड़िये और चीते की तरह चीड़फाड़ करने वाला और गोश्त खाने वाला हो अगर उसे उस तरीक़े से ज़ब्ह किया जाए जिस का ज़िक्र बाद में किया जायेगा या तीर या उसी तरह की किसी चीज़ से शिकार किया जाए तो पाक है लेकिन उसका गोश्त हलाल नहीं होता और अगर उसका शिकार शिकारी कुत्ते के ज़रीए किया जाए तो उस का बदन पाक होने में भी इश्काल है।
2598. हाथी, रीछ और बन्दर जो कुछ ज़िक्र हो चुका है उसके मुताबिक़ हैवानों का हुक्म रखते हैं लेकिन हशरात (कीड़े मकूड़े) और वह बहुत छोटे हैवानात जो ज़ेरे ज़मीन रहते हैं जैसे चूहा और गोह (वग़ैरा) अगर उछलने वाला ख़ून रखते हों और उन्हें ज़िब्हा किया जाए या शिकार किया जाए तो उनका गोश्त और खाल पाक नहीं होंगे।
2599. अगर ज़िन्दा हैवान के पेट से मुर्दा बच्चा निकाला जाए तो उस का गोश्त खाना हराम है।
हैवानात को ज़ब्ह करने का तरीक़ा
2600. हैवान को ज़ब्ह करने का तरीक़ा यह है कि उसकी गर्दन की चार बड़ी रगों को मुकम्मल तौर पर काटा जाए, उन में सिर्फ़ चीरा लगाना या मसलन सिर्फ़ गला काटना एहतियात की बिना पर काफ़ी नहीं है और दर हक़ीक़त यह चार रगों को काटना न हुआ। मगर (शरअन ज़बीहा उस वक़्त सहीह होता है) जब उन चार रगों को गले की गिरह से नीचे से काटा जाए और वह चार में सांस की नाली और खाने की नाली और वह मोटी रगें हैं जो सास की नाली के दोनों तरफ़ होती हैं।
2601. अगर कोई शख़्स चार रगों में से बाज़ को काटे और फिर हैवान के मरने तक सब्र करे और बाक़ी रगे बाद में काटे तो उसका कोई फ़ाइदा नहीं लेकिन उस सूरत में जबकि चारों रगें हैवान की जान निकलने से पहले काट दी जायें मगर हसबे मअमूल मुसलसल न काटी जायें तो वह हैवान पाक और हलाल होगा अगरचे एहतियाते मुस्तहब यह है कि मुसलसल काटी जायें।
2602. अगर भेड़िया किसी भेड़ का गला इस तरह फाड़ दे कि गर्दन की उन चार रगों में से जिन्हें ज़ब्ह करते वक़्त काटना ज़रूरी है कुछ भी बाक़ी न रहे तो वह भेड़ हराम हो जाती है और अगर सिर्फ़ सांस की नाली बिल्कुल बाक़ी न रहे तब भी यही हुक्म है। बल्कि अगर भेड़िया गर्दन का कुछ हिस्सा फाड़ दे और चारों र गें सर से लटकी हुई या बदन से लगी हुई बाक़ी रहें तो एहतियात की बिना पर वह भेड़ हराम है लेकिन अगर बदन का कोई दूसरा हिस्सा फाड़े तो उस सूरत में जब कि भेड़ अभी ज़िन्दा हो और उस तरीक़े के मुताबिक़ ज़ब्ह की जाए जिसका ज़िक्र बाद में होगा तो वह हलाल और पाक होगी।
हैवान को ज़ब्ह करने की शराइत
2603. हैवान को ज़ब्ह करने की चन्द शर्तें हैं –
1. जो शख़्स किसी हैवान को ज़ब्ह करे ख़्वाह मर्द हो या औरत उसके लिए ज़रूरी है कि मुसलमान हो और वह मुसलमान बच्चा भी जो मसझदार हो यअनी बुरे भले की समझ रखता हो हैवान को ज़ब्ह कर सकता है लेकिन ग़ैर किताबी कुफ़्फ़ार और उन फ़िर्क़ों के लोग जो कुफ़्फ़ार के हुक्म में हैं मसलन नवासिब अगर किसी हैवान को ज़ब्ह करें तो वह हलाल नहीं होगा बल्कि किताबी काफ़िर (मसलन यहूदी और ईसाई) भी किसी हैवान को ज़ब्ह करे अगरचे बिस्मिल्लाह भी कहे तो भी एहतियात की बिना पर वह हैवान हलाल नहीं होगा।
2. हैवान को उस चीज़ से ज़ब्ह किया जाए जो लोहे (या स्टील) की बनी हुई हो लेकिन अगर लोहे की चीज़ दस्तयाब न हो तो उसे किसी ऐसी तेज़ चीज़ मसलन शीशे और पत्थर से भी ज़ब्ह किया जा सकता है जो उस की चारों रगों को काट दे अगरचे ज़ब्ह करने की (फ़ौरी) ज़रूरत पेश न आई हो।
3. ज़ब्ह करते वक़्त हैवान क़िब्ले की तरफ़ हो। हैवान का क़िब्ला रुख़ होना ख़्वाह वह बैठा हो या खड़ा हो दोनों हालतों में ऐसा हो जैसे इंसान नमाज़ में क़िब्ला रुख़ होता है। अगर हैवान दाई तरफ़ या बाई तरफ़ लेटा हो तो ज़रूरी है कि हैवान की गर्दन और उसका पेट क़िब्ला रुख़ हो और उसका पांव हाथ और मुंह का क़िब्ला रुख़ होना लाज़िम नहीं है। और जो शख़्स जानता हो कि ज़ब्ह करते वक़्त ज़रूरी है कि हैवान क़िब्ला रुख़ हो अगर वह जान बूझ कर उसका मुंह क़िब्ले की तरफ़ न करे तो हैवान हराम हो जाता है। लेकिन अगर ज़ब्ह करने वाला भूल जाए या मस्अला न जानता हो या क़िब्ले के बारे में उसे इश्तिबाह हो या यह न जानता हो कि क़िब्ला किस तरफ़ है या हैवान का मुंह क़िब्ले की तरफ़ न कर सकता हो तो फिर इश्काल नहीं और एहतियाते मुस्तहब यह है कि हैवान को ज़ब्ह करने वाला भी क़िब्ला रुख़ हो।
4. कोई शख़्स किसी हैवान को ज़ब्ह करते वक़्त या ज़ब्ह से कुछ पहले ज़ब्ह करने की नीयत से खुदा का नाम ले और सिर्फ़ बिस्मिल्लाह कह दे तो काफ़ी है बल्कि अगर सिर्फ़ अल्लाह कह दे तो बईद नहीं कि काफ़ी हो। और अगर ज़ब्ह करने की नीयत के बग़ैर ख़ुदा का नाम ले तो वह हैवान पाक नहीं होता और उसका गोश्त भी हराम है। लेकिन अगर भूल जाने की वजह से ख़ुदा का नाम न ले तो इश्काल नहीं है।
5. ज़ब्ह होने के बाद हैवान हरकत करे अगरचे मिसाल के तौर पर सिर्फ़ आँख या दुम को हरकत दे या अपना पांव ज़मीन पर मारे और यह हुक्म उस सूरत में है जब ज़ब्ह करते वक़्त हैवान का ज़िन्दा होना मशकूक हो और अगर मशकूक न हो तो यह शर्त ज़रूरी नहीं है।
6. हैवान के बदन से उतना ख़ून निकले जितना मअमूल के मुताबिक़ निकलता है। पस अगर ख़ून उसकी रगों में रुक जाए और उस से ख़ून न निकले या ख़ून निकला हो लेकिन उस हैवान की नौअ की निस्बत कम हो तो वह हैवान हलाल नहीं होगा। लेकिन अगर ख़ून कम निकलने की वजह यह हो कि उस हैवान का ज़ब्ह करने से पहले ख़ून बह चुका हो तो इश्काल नहीं है।
7. हैवान को गले की तरफ़ से ज़ब्ह किया जाए और एहतियाते मुस्तहब यह है कि गर्दन को अगली तरफ़ से काटा जाए और छुरी को गर्दन की पुश्त में घोंप कर इस तरह अगली तरफ़ न लाया जाए कि उसकी गर्दन पुश्त की तरफ़ से कट जाए।
2604. एहतियात की बिना पर जाइज़ नहीं है कि हैवान की जान निकलने से पहले उसका सर तन से जुदा किया जाए अगरचे ऐसा करने से हैवान हराम नहीं होता – लेकिन लापर्वाई या छुरी तेज़ होने की वजह से सर जुदा हो जाए तो इश्काल नहीं है और इसी तरह एहतियात की बिना पर हैवान की गर्दन चीरना और उस सफ़ेद रग को जो गर्दन के मोहरों से हैवान की दुम तक जाती है और नख़ाअ कहलाती है हैवान की जान निकलने से पहले काटना जाइज़ नहीं है।
ऊँट को नहर करने का तरीक़ा
2605. अगर ऊंट को नहर करना मक़्सूद हो ताकि जान निकलने के बाद वह पाक और हलाल हो जाए तो ज़रूरी है कि उन शराइत के साथ जो हैवान को ज़ब्ह करने के लिए बताई गई हैं छुरी या कोई और चीज़ जो लोहे (या स्टील) की बनी हुई हो और काटने वाली हो ऊँट की गर्दन और सीने के दरमियान जौफ़ में घोंप दे और बेहतर यह है कि ऊँट उस वक़्त खड़ा हो लेकिन अगर वह घुटने ज़मीन पर टेक दे या किसी पहलू लेट जाए और क़िब्ला रुख़ हो उस वक़्त छुरी उस की गर्दन की गहराई में घोंप दी जाए तो कोई इशकाल नहीं है।
2606. अगर ऊँट की गर्दन की गहराई में छुरी घोंपने के बजाय उसे ज़ब्ह किया जाए (यअनी उसकी गर्दन की चार रगें काटी जायें) या भेड़ और गाय और उन जैसे दूसरे हैवानात की गर्दन की गहराई में ऊंट की तरह छुरी घोंपी जाए तो उनका गोश्त हराम और बदन नजिस है लेकिन अगर ऊंट की चार रगें काटी जायें और अभी वह ज़िन्दा हो तो मज़कूरा तरीक़े के मुताबिक़ उसकी गर्दन की गहराई में छुरी घोंपी जाए तो उसका गोश्त हलाल और बदन पाक है। नीज़ अगर गाय या भेड़ और उन जैसे हैवानात की गर्दन की गहराई में छुरी घोंपी जाए और अभी वह ज़िन्दा हो कि उन्हें ज़ब्ह कर दिया जाए तो वह पाक और हलाल है।
2607. अगर कोई हैवान सर्कश हो जाए और उस तरीक़े के मुताबिक़ जो शर्अ ने मुक़र्रर किया है ज़ब्ह (या नहर) करना मुम्किन न हो मसलन कुयें में गिर जाए और इस बात का एहतिमाल हो कि वहीं मर जाएगा और उसका मज़कूरा तरीक़े के मुताबिक़ ज़ब्ह (या नहर) करना मुम्किन न हो तो उसके बदन पर जहां कहीं भी ज़ख़्म लगाया जाए और उस ज़ख़्म के नतीजे में उसकी जान निकल जाए वह हैवान हलाल है और उसका रू बक़िब्ला होना लाज़िम नहीं लेकिन ज़रूरी है कि दूसरी शराइत जो हैवान को ज़ब्ह करने के बारे में बताई गई है उसमें मौजूद हों।
हैवानात को ज़ब्ह करने के मुस्तहब्बात
2608. फ़ुक़हा रिज़वानुल्लाहे अलैहिम ने हैवानात को ज़ब्ह करने में कुछ चीज़ों को मुस्तहब शुमार किया हैः-
1. भेड़ को ज़ब्ह करते वक़्त उसके दोनों हाथ और एक पांव बांध दिये जायेंगे और दूसरा पांव खुला रखा जाए। और गाय को ज़ब्ह करते वक़्त उसके चारों हाथ पांव बांध दिये जायें और दुम खुली रखी जाए। और ऊँट को नहर करते वक़्त अगर वह बैठा हुआ हो तो उसके दोनों हाथ नीचे से घुटने तक या बग़ल के नीचे एक दूसरे से बांध दिये जायें और उसके पांव खुले रखे जायें और मुस्तहब है कि परिन्दे को ज़ब्ह करने के बाद छोड़ दिया जाए ताकि वह अपने पर और बाल फड़फड़ा सके।
2. हैवान को ज़ब्ह (या नहर) करने से पहले उसके सामने पानी रखा जाए।
3. (ज़ब्ह या नहर करते वक़्त) ऐसा काम किया जाए कि हैवान को कम से कम तक्लीफ़ हो मसलन छुरी ख़ूब तेज़ कर ली जाए और हैवान को जल्दी ज़ब्ह किया जाए।
हैवानात के ज़ब्ह करने के मकरूहात
2609. हैवानात को ज़ब्ह करते वक़्त बाज़ रिवायात में चन्द चीज़ें मकरूह शुमार की गयी हैं –
1. हैवान की जान निकलने से पहले उसकी खाल उतारना।
2. हैवान को ऐसी जगह ज़ब्ह करना जहां उसकी नस्ल का दूसरा हैवान उसे देख रहा हो।
3. शबे जुमअ को या जुमअ के दिन ज़ौहर से पहले हैवान का ज़ब्ह करना। लेकिन अगर ऐसा करना ज़रूरत के तहत हो तो उसमें कोई ऐब नहीं।
4. जिस चौपाए को इंसान ने पाला हो उसे खुद अपने हाथ से ज़ब्ह करना।
हथियारों से शिकार करने के अहकाम
2610. अगर हलाल गोश्त जंगली हैवान का शिकार हथियारों के ज़रीए किया जाए और वह मर जाए तो पांच शर्तों के साथ वह हैवान हलाल और उसका बदन पाक होता हैः-
1. शिकार का हथियार छुरी और तलवार की तरह काटने वाला हो या नेज़े और तीर की तरह तेज़ हो ताकि तेज़ होने की वजह से हैवान के बदन को चाक कर दे और अगर हैवान का शिकार जाल या लकड़ी या पत्थर या उन्हीं जैसी चीज़ों के ज़रीए किया जाए तो वह पाक नहीं होता और उसका खाना भी हराम है। और अगर हैवान का शिकार बन्दूक से किया जाए और उसकी गोली इतनी तेज़ हो कि हैवान के बदन में घुस जाए और उसे चाक कर दे तो वह हैवान पाक और हलाल है। और अगर गोली तेज़ न हो बल्कि दबाव के साथ हैवान के बदन में दाखिल हो और उसे मार दे या अपनी गर्मी की वजह से उसका बदन जला दे और उस जलने के असर से हैवान मर जाए तो उस हैवान के पाक और हलाल होने में इश्काल है।
2. ज़रूरी है कि शिकारी मुसलमान हो या ऐसा मुसलमान बच्चा हो जो बुरे भले को समझता हो और अगर ग़ैर किताबी काफ़िर या वह शख़्स जो काफ़िर के हुक्म में हो जैसे नासिबी किसी हैवान का शिकार करे तो वह शिकार हलाल नहीं है। बल्कि किताबी काफ़िर भी अगर शिकार करे और अल्लाह का नाम भी ले तब भी एहतियात की बिना पर वह हैवान हलाल नहीं होगा।
3. शिकारी हथियार उस हैवान को शिकार करने के लिए इस्तेमाल करे और अगर मसलन कोई शख़्स किसी जगह को निशाना बना रहा हो और इत्तिफ़ाक़न एक हैवान को मार दे तो वह हैवान पाक नहीं है और उसका खाना भी हराम है।
4. हथियार चलाते वक़्त शिकारी अल्लाह का नाम ले और बिना बरे अक़्वा अगर निशाने पर लगने से पहले अल्लाह का नाम ले तो भी काफ़ी है। लेकिन अगर जान बूझ कर अल्लाह तआला का नाम न ले तो शिकार हलाल नहीं होता अलबत्ता भूल जाए तो कोई इश्काल नहीं।
5. अगर शिकारी हैवान के पास उस वक़्त पहुंचे जब वह मर चुका हो या अगर ज़िन्दा हो तो ज़ब्ह करने के लिए वक़्त न हो या ज़ब्ह के लिए वक़्त होते हुए वह उसे ज़ब्ह न करे हत्ता कि वह मर जाए तो हैवान हराम है।
2611. अगर दो अशख़ास (मिलकर) एक हैवान का शिकार करें और उन में से एक मज़कूरा पूरी शराइत के साथ शिकार करे लेकिन दूसरे के शिकार में मज़कूरा शराइत में से कुछ कम हों मसलन उन दोनों में से एक अल्लाह तआला का नाम ले और दूसरा जान बूझ कर अल्लाह तआला का नाम न ले तो हैवान हलाल नहीं है।
2612. अगर तीर लगने के बाद मिसाल के तौर पर हैवान पानी में गिर जाए और इंसान को इल्म हो कि हैवान तीर लगने और पानी में गिरने से मरा है तो वह हैवान हलाल नहीं है बल्कि अगर इंसान को यह इल्म न हो कि वह फ़क़त तीर से मरा है तब भी वह हैवान हलाल नहीं है।
2613. अगर कोई शख़्स ग़स्बी कुत्ते या ग़स्बी हथियार से किसी हैवान का शिकार करे तो शिकार हलाल है और खुद शिकारी का माल हो जाता है लेकिन इस बात का अलावा कि उस ने गुनाह किया है ज़रूरी है कि हथियार या कुत्ते की उजरत उसके मालिक को दे।
2614. अगर शिकार करने के हथियार मसलन तलवार से हैवान के बाज़ अअज़ा मसलन हाथ और पांव उस के बदन से जुदा कर दिये जायें तो वह उज़्व हराम है लेकिन अगर मस्अला 2610 में मज़कूरा शराइत के साथ उस हैवान को ज़ब्ह किया जाए तो उसका बाक़ीमांदा बदन हलाल हो जायेगा। लेकिन अगर शिकार के हथियार से मज़कूरा शराइत के साथ हैवान के बदन के दो टुकड़े कर दिये जायें और सर और गर्दन एक हिस्से में रहें और इंसान उस वक़्त शिकार के पास पहुंचे जब उसकी जान निकल चुकी हो तो दोनों हिस्से हलाल हैं। और अगर हैवान ज़िन्दा हो लेकिन उसे ज़ब्ह करने के लिए वक़्त न हो तब भी यही हुक्म है। लेकिन अगर ज़ब्ह करने के लिए वक़्त हो और मुम्किन हो कि हैवान कुछ देर ज़िन्दा रहे तो वह हिस्सा जिसमें सर और गर्दन न हो हराम है और वह हिस्सा जिसमें सर और गर्दन हो उसे शर्अ के मुअय्यन कर्दा तरीक़े के मुताबिक़ ज़ब्ह किया जाए तो हलाल है वर्ना वह भी हराम है।
2615. अगर लकड़ी या पत्थर या किसी दूसरी चीज़ से जिससे शिकार करना सहीह नहीं है किसी हैवान के दो टुकड़े कर दिये जायें तो वह हिस्सा जिसमें सर और गर्दन न हों हराम है और अगर हैवान ज़िन्दा हो और मुम्किन हो कि कुछ देर ज़िन्दा रहे और उसे शर्अ के मुअय्यन कर्दा तरीक़े के मुताबिक़ ज़ब्ह किया जाए तो वह हिस्सा जिसमें सर और गर्दन हों हलाल है वर्ना वह हिस्सा भी हराम है।
2616. जब किसी हैवान का शिकार किया जाए या उसे ज़ब्ह किया जाए और उसके पेट से ज़िन्दा बच्चा निकले तो अगर उस बच्चे को शर्अ के मुअय्यन कर्दा तरीक़े के मुताबिक़ ज़ब्ह किया जाए तो हलाल वर्ना हराम है।
2617. अगर किसी हैवान का शिकार किया जाए या उसे ज़ब्ह किया जाए और उसके पेट से मुर्दा बच्चा निकले तो उस सूरत में कि जब बच्चा उस हैवान को ज़ब्ह करने से पहले न मरा हो और इसी तरह जब वह बच्चा हैवान के पेट से देर से निकलने की वजह से न मरा हो अगर उस बच्चे की बनावट मुकम्मल हो और ऊन या बाल उसके बदन पर उगे हुए हों तो वह बच्चा पाक और हलाल है।
शिकारी कुत्ते से शिकार करना
2618. अगर शिकारी कुत्ता किसी हलाल गोश्त वाले जंगली हैवान का शिकार करे तो उस हैवान के पाक होने और हलाल होने के लिए छः शर्तें हैं –
1. कुत्ता इस तरह सुधाया हुआ हो कि जब भी उसे शिकार पकड़ने के लिए भेजा जाए और जब उसे जाने से रोका जाए तो रुक जाए। लेकिन अगर शिकार से नज़्दीक़ होने और शिकार को देखने के बाद उसे जाने से रोका जाए और न रुके तो कोई हरज नहीं है और लाज़िम है कि उसकी आदत ऐसी हो कि जब तक मालिक न पहुंचे शिकार को न खाए बल्कि अगर उसकी आदत यह हो कि अपने मालिक से पहुंचने से पहले शिकार से कुछ खा ले तो भी हरज नहीं है और इसी तरह अगर उसे शिकार का ख़ून पीने की आदत हो तो इश्काल नहीं।
2. उसका मालिक उसे शिकार के लिए भेजे और अगर वह अपने आप ही शिकार के पीछे जाए और किसी हैवान को शिकार कर ले तो उस हैवान का खाना हराम है। बल्कि अगर कुत्ता शिकार के पीछे लग जाए और बाद में उसका मालिक हांक लगाए ताकि वह जल्दी शिकार तक पहुंचे तो अगरचे वह मालिक की आवाज़ की वजह से तेज़ भागे फिर भी एहतियाते वाजिब की बिना पर उस शिकार को खाने से इज्तिनाब करना ज़रूरी है।
3. जो शख़्स कुत्ते को शिकार के पीछे लगाए ज़रूरी है कि मुसलमान हो उस तफ़्सील के मुताबिक़ जो असलहा से शिकार करने की शराइत में बयान हो चुकी हैं।
4. कुत्ते को शिकार के पीछे भेजते वक़्त शिकारी अल्लाह तआला का नाम ले और अगर जान भूझ कर अल्लाह तआला का नाम न ले तो शिकार हराम है लेकिन अगर भूल जाए तो इश्काल नहीं।
5. शिकार को कुत्ते के काटने से जो ज़ख़्म आए वह उससे मरे। लिहाज़ा अगर कुत्ता शिकार का गला घोंट दे या शिकार दौड़ने या डर जाने की वजह से मर जाए तो हलाल नहीं है।
6. जिस शख़्स ने कुत्ते को शिकार के पीछे भेजा हो अगर वह (शिकार किये गए हैवान के पास) उस वक़्त पहुंचे जब वह मर चुका हो तो अगर ज़िन्दा हो तो उसे ज़ब्ह करने के लिए वक़्त न हो लेकिन शिकार के पास पहुंचना ग़ैर मअमूली ताख़ीर की वजह से न हो। और अगर ऐसे वक़्त पहुंचे जब उसे ज़ब्ह करने के लिये वक़्त हो लेकिन वह हैवान को ज़ब्ह न करे हत्ता कि वह मर जाए तो वह हैवान हलाल नहीं है।
2619. जिस शख़्स ने कुत्ते को शिकार के पीछे भेजा हो अगर वह शिकार के पास उस वक़्त पहुंचे जब वह उसे ज़ब्ह कर सकता हो तो ज़ब्ह करने के लवाज़िमात मसलन अगर छुरी निकालने की वजह से वक़्त गुज़र जाए और हैवान मर जाए तो हलाल है लेकिन अगर उसके पास ऐसी कोई चीज़ हो जिस से हैवान को ज़ब्ह करे और वह मर जाए तो बिनाबरे एहतियात वह हलाल नहीं होता अलबत्ता उस सूरत में अगर वह शख़्स उस हैवान को छोड़ दे ताकि कुत्ता उसे मार डाले तो वह हैवान हलाल हो जाता है।
2620. अगर कई कुत्ते शिकार के पीछे भेजे जायें और वह सब मिलकर किसी हैवान का शिकार करें तो अगर वह सब के सब उन शराइत को पूरा करते हों जो मस्अला 2618 में बयान की गई हैं तो शिकार हलाल है और अगर उन में से एक कुत्ता भी उन शराइत को पूरा न करे तो शिकार हराम है।
2621. अगर कोई शख़्स कुत्ते को किसी हैवान के शिकार के लिए भेजे और वह कुत्ता कोई दूसरा हैवान शिकार कर ले तो वह शिकार हलाल और पाक है और जिस हैवान के पीछे भेजा गया हो उसे भी और एक और हैवान को भी शिकार कर ले तो वह दोनों हलाल और पाक हैं।
2622. अगर चन्द अश्ख़ास मिलकर एक कुत्ते को शिकार के लिए भेजें और उन में से एक शख़्स जान बूझ कर खुदा का नाम न ले तो वह शिकार हराम है नीज़ जो कुत्ते शिकार के पीछे भेजे गयें हो अगर उनमें से एक कुत्ता इस तरह सुधाया हुआ न हो जैसा कि मस्अला 2618 में बताया गया है तो वह हराम है।
2623. अगर बाज़ या शिकारी कुत्ते के अलावा कोई और हैवान किसी जानवर का शिकार करे तो वह शिकार हलाल नहीं है लेकिन अगर कोई शख़्स उस शिकार के पास पहुंच जाए और वह भी ज़िन्दा हो और उस तरीक़े मुताबिक़ जो शर्अ में मुअय्यन है उसे ज़ब्ह कर ले तो फिर वह हलाल है।
मछली और टिड्डी का शिकार
2624. अगर उस मछली को, जो पैदाइश से छिल्के वाली हो, अगरचे किसी आरज़ी वजह से उसका छिल्का उतर गया हो, पानी में से ज़िन्दा पकड़ लिया जाए और वह पानी से बाहर आकर मर जाए तो वह पाक है और उसका खाना हलाल है। और अगर वह पानी में मर जाए तो पाक है लेकिन उसका खाना हराम है। मगर यह कि वह मछेरे के जाल के अन्दर पानी में मर जाए तो उस सूरत में उसका खाना हलाल है। और जिस मछली के छिल्के न हों अगरचे उसे पानी में ज़िन्दा पकड़ लिया जाए और पानी के बाहर आ कर मरे – वह हराम है।
2625. अगर मछली (उछल कर) पानी से बाहर आ गिरे या पानी की लहर उसे बाहर फेंक दे या पानी उतर जाए और मछली ख़ुश्की पर रह जाए तो अगर उसके मरने से पहले कोई शख़्स उसे हाथ से या किसी और ज़रीए से पकड़ ले तो वह मरने के बाद हलाल है।
2626. जो शख़्स मछली का शिकार करे उसके लिए लाज़िम नहीं कि मुसलमान हो या मछली को पकड़ते वक़्त खुदा का नाम ले लेकिन यह ज़रूरी है कि मुसलमान देखे या किसी और ज़रीए से उसे (यअनी मुसलमान को) यह इत्मीनान हो गया हो कि मछली को पानी से ज़िन्दा पकड़ा है या वह मछली उस के जाल में पानी के अन्दर मर गई है।
2627. जिस मरी हुई मछली के मुतअल्लिक़ मअलूम न हो कि उसे पानी से ज़िन्दा पकड़ा गया है या मुर्दा हालत में पकड़ा गया है अगर वह मुसलमान के हाथ में हो तो हलाल है। लेकिन अगर काफ़िर के हाथ में हो तो ख़्वाह वह कहे कि उसने उसे ज़िन्दा पकड़ा है है, हराम है मगर यह कि इत्मीनान हो कि उस काफ़िर ने मछली को पानी से ज़िन्दा पकड़ा है या वह मछली उसके जाल में पानी के अन्दर मर गई है (तो हलाल है)।
2628. ज़िन्दा मछली का खाना जाइज़ है लेकिन बेहतर यह है कि उसे ज़िन्दा खाने से परहेज़ किया जाए।
2629. अगर ज़िन्दा मछली को भून लिया जाए या उसे पानी के बाहर मरने से पहले ज़ब्ह कर दिया जाये तो उसका खाना जाइज़ है एहतियाते मुस्तहब यह है कि उसे खाने से परहेज़ किया जाए।
2630. अगर पानी से बाहर मछली के दो टुकड़े कर लिये जायें और उनमें से एक टुकड़ा ज़िन्दा होने की हालत में गिर जाए तो जो टुकड़ा पानी से बाहर रह जाए उसे खाना जाइज़ है और एहतियाते मुस्तहब यह है कि उसे खाने से परहेज़ किया जाए।
2631. अगर टिड्डी को हाथ से या किसी और ज़रीए से ज़िन्दा पकड़ लिया जाए तो वह मर जाने के बाद हलाल है और यह लाज़िम नहीं कि उसका पकड़ने वाला मुसलमान हो और उसे पकड़ते वक़्त अल्लाह तआला का नाम ले। लेकिन अगर मुर्दा टिड्डी काफ़िर के हाथ में हो और यह मअलूम न हो कि उसने उसे ज़िन्दा पकड़ा था या नहीं तो अगरचे वह कहे कि उस ने ज़िन्दा पकड़ा था वह हराम है।
2632. जिस टिड्डी के पर अभी तक न उगे हों और उड़ न सकती हो उसका खाना हराम है।
खाने पीने की चीज़ों के अहकाम
2633. हर वह परिन्दा जो शाहीन, उक़ाब और बाज़ की तरह चीरने, फाड़ने और पंजे वाला हो हराम है और ज़ाहिर यह है कि हर वह परिन्दा जो उड़ते वक़्त परों को मारता कम, बे हरकत ज़्यादा रखता है और पंजेदार है, हराम होता है। और हर वह परिन्दा जो उड़ते वक़्त परों को मारता ज़्यादा और बे हरकत कम रखता है, वह हलाल है। इसी फ़र्क़ की बिना पर हराम गोश्त परिन्दों को हलाल गोश्त परिन्दों में से उनकी पर्वाज़ की कैफ़ियत देख कर पहचाना जा सकता है। लेकिन अगर किसी परिन्दे की पर्वाज़ की कैफ़ीयत मअलूम न हो तो अगर वह परिन्दा मोटा, संगदाना और पांव की पुश्त पर कांटा रखता हो तो वह हलाल है और अगर इन में से एक भी अलामत न रखता हो तो वह हराम है। और एहतियाते लाज़िम यह है कि कव्वे की तमाम अक़्साम हत्ता कि ज़ाग़ (पहाड़ी कव्वे) से भी इज्तिनाब किया जाए और जिन परिन्दों का ज़िक्र हो चुका है उन के अलावा दूसरे तमाम परिन्दे मसलन मुर्ग़, कबूतर और चिड़िया यहां तक कि शुतुरमुर्ग़ और मोर भी हलाल हैं। लेकिन बाज़ परिन्दों जैसे हुदहुद और अबाबील को ज़ब्ह करना मकरूह है। और जो हैवानात उड़ते हैं मगर पर नहीं रखते मसलन चमगादड़ हराम हैं। और एहतियाते लाज़िम की बिना पर ज़ंबूर (भिड़, शहद की मक्खी, ततैया) मच्छर और उड़ने वाले दूसरे कीड़े मकूड़े का भी यही हुक्म है।
2634. अगर उस हिस्से को जिस में रूह हो ज़िन्दा हैवान से जुदा कर लिया जाए मसलन ज़िन्दा भेड़ की चकती या गोश्त की कुछ मिक़्दार काट ली जाए तो वह नजिस और हराम है।
2635. हलाल गोश्त हैवानात के कुछ अज्ज़ा हराम हैं और उनकी तअदाद चौदा हैः-
1. खून। 2. फ़ुज़्ला। 3. उज़्वे तनासुल। 4. शर्मगाह। 5. बच्चादानी। 6. ग़ुदूद। 7. कपूरे। 8. वह चीज़ जो भेजे में होती है और चने के दाने की शक्ल की होती है। 9. हराम मग़्ज़ जो रीढ़ की हड्डी के दोनों तरफ़ होता है। 10. बिनाबरे एहतियाते लाज़िम वह रगें जो रीढ़ की हड्डी के दोनों तरफ़ होती हैं। 11. पित्ता। 12. तिल्ली। 13. मसाना। 14. आँख का ढेला।
यह सब चीज़ें परिन्दों के अलावा हलाल गोश्त हैवानात में हराम हैं। और परिन्दों का ख़ून और उन का फ़ुज़्ला बिला इश्काल हराम है। लेकिन इन दो चीज़ों (ख़ून और फ़ुज़्ले) के अलावा परिन्दों में वह चीज़ें हों जो ऊपर बयान की गई तो उनका हराम होना एहतियात की बिना पर है।
2636. हराम गोश्त हैवानात का पेशाब पीना हराम है और उसी तरह हलाल गोश्त हैवान – हत्ता कि एहतियातते लाज़िम की बिना पर ऊंट के पेशाब का भी यही हुक्म है। लेकिन इलाम के लिए ऊंट, गाय और भेड़ का पेशाब पीने में इश्काल नहीं है।
2637. चिकनी मिट्टी खाना हराम है नीज़ मिट्टी और बजरी खाना एहतियाते लाज़िम की बिना पर यही हुक्म रखता है अलबत्ता (मुल्तानी मिट्टी के मुमासिल) दाग़िस्तानी और आरमीनियाई मिट्टी वग़ैरा इलाज के लिए बहालते मजबूरी खाने में इश्काल नहीं है। और हुसूले शिफ़ा की ग़रज़ से (सैयिदुश्शहदा इमाम हुसैन अलैहिस्साल के मज़ारे मुबारक की मिट्टी यअनी) खाके शिफ़ा की थोड़ी सी मिक़्दार खाना जाइज़ है। और बेहतर यह है कि ख़ाके शिफ़ा की कुछ मिक़्दार पानी में हल कर ली जाए ताकि वह (हल हो कर) ख़त्म हो जाए और बाद में उस पानी को पी लिया जाए।
2638. नाक का पानी और सीने का बलग़म जो मुंह में आ जाए उसका निगलना हराम नहीं है नीज़ उस ग़िज़ा के निगलने में जो ख़िलाल करते वक़्त दांतों की रेख़ों से निकले कोई इश्काल नहीं है।
2639. किसी ऐसी चीज़ का खाना हराम है जो मौत का सबब बने या इंसान के लिए सख़्त नुक़्सानदेह हो।
2640. घोड़े, खच्चर और गधे खाना मकरूह है और कोई शख़्स उन से बदफ़ेली करे तो वह हैवान हराम हो जाता है और जो नस्ल बदफ़ेली के बाद पैदा हो एहतियात की बिना पर वह भी हराम हो जाती है और उनका पेशाब और लीद नजिस हो जाती है ज़रूरी है कि उन्हें शहर से बाहर ले जा कर दूसरी जगह बेच दिया जाए और अगर बदफ़ेली करने वाला उस हैवान का मालिक न हो तो उस पर लाज़िम है कि उस हैवान की क़ीमत उस के मालिक को दे। और अगर कोई शख़्स हलाल गोश्त हैवान मसलन गाय या भेड़ से बदफ़ेली करे तो उनका पेशाब और गोबर नजिस हो जाता है और उन का गोश्त खाना हराम है और एहतियात की बिना पर उन का दूध पीने का और उनकी जो नस्ल बदफ़ेली के बाद पैदा हो उस का भी यही हुक्म है। और ज़रूरी है कि ऐसे हैवान को फ़ौरन ज़ब्ह कर के जला दिया जाये और जिस ने उस हैवान के साथ बदफ़ेली की हो अगर वह उस का मालिक न हो तो उसकी क़ीमत उस के मालिक को अदा करे।
2641. अगर बकरी का बच्चा सुव्वरनी का दूध इतनी मिक़्दार में पी ले कि उसका गोश्त और हड्डियां उससे क़ुव्वत हासिल करें तो खुद वह और उसकी नस्ल हराम हो जाती हैं और अगर वह उससे कम मिक़्दार में दूध पिये तो एहतियात की बिना पर लाज़िम है कि उसका इस्तिबरा किया जाए और उसके बाद वह हलाल हो जाता है और उसका इस्तिबरा यह है कि सात दिन पाक दूध पिये और अगर उसे दूध की हाजत न हो तो सात दिन घास खाए। और भेड़ का शीरख़्वार बच्चा गाय का बच्चा और दूसरे हलाल गोश्त हैवानों के बच्चे – एहतियाते लाज़िम की बिना पर – बकरी के बच्चे के हुक्म में हैं। और नजासत खाने वाले हैवान का गोश्त खाना भी हराम है और अगर उसका इस्तिबरा किया जाए तो हलाल हो जाता है और उसके इस्तिबरा की तरकीब मस्अला 226 में बयान हुई है।
2642. शराब पीना हराम है और अहादीस में उसे गुनाहे कबीरा बताया गया है। हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्साल से रिवायत है कि आप ने फ़रमाया, शराब बुराइयों की जड़ और गुनाहों का मंबअ है। जो शख़्स शराब पिये वह अपनी अक़्ल खो बैठता है और उस वक़्त ख़ुदा ए तआला को नहीं पहचानता, कोई भी गुनाह करने से नहीं चुकता। किसी शख़्स का एहतिराम नहीं करता, अपने क़रीबी रिश्तेदारों के हुक़ूक़ का पास नहीं करता, खुल्लम खुल्ला बुराई करने से नहीं शर्माता। पस ईमान और खुदा शनासी को रूह उसके बदन से निकल जाती है और नाक़िस ख़बीस रूह जो ख़ुदा की रहमत से दूर होती है उसके बदन में रह जाती है। ख़ुदा और उसके फ़रिश्ते नीज़ अंबिया व मुरसलीन और मोमिनीन उस पर लअनत भेजते हैं, चालीस दिन तक उसकी नमाज़ नहीं क़बूल होती, क़ियामत के दिन उसका चेहरा सियाह होगा और उसकी ज़बान (कुत्ते की तरह) मुंह से बाहर निकली हुई होगी, उसकी राल सीने पर टपकती होगी और वह प्यास की शिद्दत से वावैला करेगा।
2643. जिस दस्तरख़्वान पर शराब पी जा रही हो उस पर चुनी हुई कोई चीज़ खाना हराम है और इसी तरह उस दस्तरख़्वान पर बैठना जिस पर शराब पी जा रही हो, अगर उस पर बैठने से इंसान शराब पीने वालों में शुमार होता हो तो एहतियात की बिना पर, हराम है।
2644. हर मुसलमान पर वाजिब है कि उसके अड़ोस पड़ोस में जब कोई दूसरा मुसलमान भूक या प्यास से जां बलब हो तो उसे रोटी और पानी देकर मरने से बचाए।
खाना खाने के आदाब
2645. खाना खाने के आदाब में चन्द चीज़ें मुस्तहब शुमार की गयी हैं –
1. खाना खाने से पहले खाने वाला दोनों हाथ धोए।
2. खाना खा लेने के बाद अपने हाध धोए और रूमाल (तौलिये वग़ैरा) से ख़ुश्क करे।
3. मेज़बान सब से पहले खाना खाना शुरू करे और सब के बाद खाने से हाथ खींचे और खाना शुरू करने से क़ब्ल मेज़बान सबसे पहले अपने हाथ धोए उस के बाद जो शख़्स उसकी दाई तरफ़ बैठा हो वह धोए इसी तरह सिलसिलेवार हाथ धोते रहें हत्ता कि नौबत उस शख़्स तक आ जाए जो उसके बाई तरफ़ बैठा हो और खाना खा लेने के बाद जो शख़्स मेज़बान की बाई तरफ़ बैठा हो सब से पहले वह हाथ धोए और इसी तरह धोते चले जायें हत्ता कि नौबत मेज़बान तक पहुंच जाए।
4. खाना खाने से पहले बिस्मिल्लाह पढ़े लेकिन अगर एक दस्तरख़्वान पर अनवाओ अक़्साम के खाने हों तो उन में से हर खाने से पहले बिस्मिल्लाह पढ़ना मुस्तहब है।
5. खाना दायें हाथ से खाए।
6. तीन या ज़्यादा उंगलियों से खाना खाए और दो उंगलियों से न खाए।
7. अगर चन्द अश्ख़ास दस्तरख़्वान पर बैठें तो हर एक अपने सामने से खाना खाए।
8. छोटे छोटे लुक़्में बना कर खाए।
9. दस्तरख़्वान पर देर तक बैठे और खाने को तूल दे।
10. खाना खूब अच्छी तरह चबा कर खाए।
11. खाना खा लेने के बाद अल्लाह तआला का शुक्र बजा लाए।
12. उंगलियों को चाटे।
13. खाना खाने के बाद दांतों में ख़िलाल करे अलबत्ता रैहान के तिंके या खजूर के दरख़्त के पत्ते से खिलाल न करे।
14. जो ग़िज़ा दस्तरख़्वान से बाहर गिर जाए उसे जमअ करे और खा ले लेकिन अगर जंगल में खाना खाए तो मुस्तहब है कि जो कुछ गिरे उसे दरिन्दों और जानवरों के लिए छोड़ दे।
15. दिन और रात की इब्तिदा में खाना खाए और दिन के दरमियान में और रात के दरमियान में न खाए।
16. खाना खाने के बाद पीठ के बल लेटे और दायां पांव बायें पांव पर रखे।
17. खाना शुरू करते वक़्त और खा लेने के बाद नमक चखे।
18. फल खाने से पहले उन्हें पानी से धो ले।
वह बातें जो खाना खाते वक़्त मकरूह हैं
2646. खाना खाते वक़्त चन्द चीज़ें मज़्मूम शुमार की गई हैं –
1. भरे पेट पर खाना खाना।
2. गर्म खाना खाना।
3. जो चीज़ खाई या पी जा रही हो उसे फूंक मारना।
4. दस्तरख़्वान पर खाना लग जाने के बाद किसी और चीज़ का मुंतज़िर होना।
5. रोटी को छुरी से काटना।
6. बहुत ज़्यादा खाना – रिवायत में है कि ख़ुदावन्दे आलम के नज़्दीक बहुत ज़्यादा खाना सबसे बुरी चीज़ है।
7. खाना खाते वक़्त दूसरों के मुंह की तरफ़ देखना।
8. रोटी को बर्तन के नीचे रखना।
9. हड्डी से चिप्के हुए गोश्त को यूं खाना कि हड्डी पर बिल्कुल गोश्त बाक़ी न रहे।
10. उस फल का छिल्का उतारना जो छिल्के के साथ खाया जाता है।
11. फल पूरा खाने से पहले फेंक देना।
पानी पीने के आदाब
2647. पानी पीने के आदाब में चन्द चीज़ें शुमार की गई हैं –
1. पानी चूसने के तर्ज़ पर पिये।
2. पानी दिन में खड़े होकर पिये।
3. पानी पीने से पहले बिस्मिल्लाह और पीने के बाद अलहम्दुलिल्लाह कहे।
4. पानी (गटागट न पिये बल्कि) तीन सांस में पिये।
5. पानी ख़्वाहिश के मुताबिक़ पिये।
6. पानी पीने के बाद हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्साल और उनके अहले हरम को याद करे और उनके क़ातिलों पर लअनत भेजे।
वह बातें जो पानी पीते वक़्त मकरूह हैं –
2648. ज़्यादा पानी पीना, मुरग्ग़न खाने के बाद पानी पीना और रात को खड़े हो कर पानी पीना मज़्मूम शुमार किया जाता है। अलावा अज़ीं पानी बायें हाथ से पीना और इसी तरह कूज़े (वग़ैरा) की टूटी हुई जगह से और उस जगह से पीना जहां कूज़े का दस्ता हो मज़्मूम शुमार किया गया है।
मन्नत और अहद के अहकाम
2649. मन्नत यह है कि इंसान अपने आप पर वाजिब कर ले कि अल्लाह तआला की रिज़ा के लिए कोई अच्छा काम करेगा या कोई ऐसा काम जिसका न करना बेहतर हो तर्क कर देगा।
2650. मन्नत में सीग़ा पढ़ना ज़रूरी है। और यह लाज़िम नहीं कि सीग़ा अरबी में ही पढ़ा जाए लिहाज़ा अगर कोई शख़्स कहे कि, मेरा मरीज़ सेहतयाब हो गया तो अल्लाह तआला की ख़ातिर मुझ पर लाज़िम है कि मैं दस रुपये फ़क़ीर को दूं, तो उसकी मन्नत सहीह है।
2651. ज़रूरी है कि मन्नत मानने वाला बालिग़ और आक़िल हो नीज़ अपने इरादे और इख़तियार के साथ मन्नत माने। लिहाज़ा किसी ऐसे शख़्स का मन्नत मानना जिसे मजबूर किया जाए या जो जज़्बात में आकर बग़ैर इरादे के बे इख़्तियार मन्नत माने तो सहीह नहीं है।
2652. कोई सफ़ीह अगर मन्नत माने मसलन यह कि कोई चीज़ फ़क़ीर को देगा तो उसकी मन्नत सहीह नहीं है। और इसी तरह अगर कोई दीवालिया शख़्स मन्नत माने कि मसलन अपने अस्ल माल में से जिस में तसर्रुफ़ करने से उसे रोक दिया गया हो कोई चीज़ फ़क़ीर को देगा तो उसकी मन्नत सहीह नहीं है।
2653. शौहर की इजाज़त के बग़ैर औरत का उन कामों में मन्नत मानना जो शौहर के हुक़ूक़ के मनाफ़ी हो सहीह नहीं है। और इसी तरह औरत का अपने माल में शौहर की इजाज़त के बग़ैर मन्नत मानना महल्ले इश्काल है। लेकिन (अपने माल में से शौहर की इजाज़त के बग़ैर) हज करना, ज़कात और सदक़ा देना और मां बाप से हुस्ने सुलूक और रिश्तेदारों से सिला ए रहिमी करना (सहीह है)।
2654. अगर औरत शौहर की इजाज़त के बग़ैर या उसकी इजाज़त से मन्नत माने तो शौहर उसकी मन्नत ख़त्म नहीं कर सकता और न ही उसे मन्नत पर अमल करने से रोक सकता है।
2655. अगर बेटा बाप की इजाज़त के बग़ैर या उसकी इजाज़त से मन्नत माने तो ज़रूरी है कि उस पर अमल करे लेकिन अगर बाप या मां उसे इस काम से जिसकी उसने मन्नत मानी हो इस तरह मन्अ करें कि उनके मनअ करने के बाद उस पर अमल करना उसके लिए बेहतर न हो तो उसकी मन्नत कलअदम हो जायेगी।
2656. इंसान किसी ऐसे काम की मन्नत मान सकता है जिसे अंजाम देना उसके लिए मुम्किन हो लिहाज़ा जो शख़्स मसलन पैदल चलकर कर्बला न जा सकता हो अगर वह मन्नत माने कि वहां तक पैदल आयेगा तो उसकी मन्नत सहीह नहीं है।
2657. अगर कोई शख़्स मन्नत माने कि कोई हराम या मकरूह काम अंजाम देगा या कोई वाजिब या मुस्तहब काम तर्क कर देगा तो उसकी मन्नत सहीह नहीं है।
2658. अगर कोई शख़्स मन्नत माने कि किसी मुबाह काम करने को अंजाम देगा या तर्क करेगा लिहाज़ा अगर उस काम का बजा लाना और तर्क करना हर लिहाज़ से मसावी हो तो उसकी मन्नत सहीह नहीं है और अगर उस काम का अंजाम देना किसी लिहाज़ से बेहतर हो और इंसान मन्नत भी उसी लिहाज़ से माने मसलन मन्नत माने कि कोई (ख़ास) ग़िज़ा खायेगा ताकि अल्लाह की इबादत के लिए उसे तवानाई हासिल हो तो उसकी मन्नत सहीह है। और अगर उस काम का तर्क करना किसी लिहाज़ से बेहतर हो और इंसान मन्नत भी उसी लिहाज़ से माने कि उस काम को तर्क कर देगा मसलन चूंकि तंबाकू मुज़िरे (सेहत) है इस लिए मन्नत माने कि उसे इस्तेमाल नहीं करेगा तो उसकी मन्नत सहीह है। लेकिन अगर बादद में तम्बाकू का इस्तेमाल तर्क करना उसके लिए नुक़्सानदेह हो तो उसकी मन्नत कलअदम हो जायेगी।
2659. अगर कोई शख़्स मन्नत माने कि वाजिब नमाज़ ऐसी जगह पढ़ेगा जहां बजाए खुद नमाज़ पढ़ने का सवाब ज़्यादा नहीं मसलन मन्नत माने कि नमाज़ कमरे में पढ़ेगा तो अगर वहां नमाज़ पढ़ना किसी से बेहतर हो मसलन चूंकि वहां खलबत है इस लिए इंसान हुज़ूरे क़ब्ल पैदा कर सकता है अगर उसके मन्नत मानने का मक़्सद यही है तो मन्नत सहीह है।
2660. अगर एक शख़्स कोई अमल बजा लाने की मन्नत तो ज़रूरी है कि वह अमल उसी तरह बजा लाए जिस तरह मन्नत मानी हो लिहाज़ा अगर मन्नत माने कि महीने की पहली तारीख़ को सदक़ा देगा या रोज़ा रखेगा या (महीने की पहली तारीख़ को) अव्वले माह की नमाज़ पढ़ेगा तो अगर उस दिन से पहले या बाद में उस अमल को बजा लाए तो काफ़ी नहीं है। इसी तरह अगर कोई शख़्स मन्नत माने कि जब उसका मरीज़ सेहतयाब हो जायेगा तो वह सदक़ा देगा तो अगर उस मरीज़ के सेहतयाब होने से पहले सदक़ा दे दे तो काफ़ी नहीं है।
2661. अगर कोई शख़्स रोज़ा रखने की मन्नत माने लेकिन रोज़ो का वक़्त और तअदाद मुअय्यन न करे तो अगर रोज़ा रखे तो काफ़ी है। अगर नमाज़ पढ़ने की मन्नत माने और नमाज़ों की मिक़्दार और ख़ुसूसीयात मुअय्यन न करे तो अगर एक दो रक्अती नमाज़ पढ़ ले तो काफ़ी है। और अगर मन्नत माने की सदक़ा देगा और सदक़े की जिन्स और मिक़्दार मुअय्यन न करे तो अगर ऐसी चीज़ दे कि लोग कहें कि उस ने सदक़ा दिया है तो फिर उसने अपनी मन्नत के मुताबिक़ अमल कर दिया है और अगर मन्नत माने कि कोई काम अल्लाह तआला की ख़ुशनूदी के लिए बजा लायेगा तो अगर एक (दो रक्अती) नमाज़ पढ़ ले या एक रोज़ा रख ले या कोई चीज़ सदक़ा दे दे तो उसने अपनी मन्नत निभा ली है।
2662. अगर कोई शख़्स मन्न्त माने कि एक ख़ास दिन रोज़ा रखेगा तो ज़रूरी है कि उसी दिन रोज़ा रखे और अगर जानबूझ कर रोज़ा न रखे तो ज़रूरी है कि उस दिन के रोज़े की क़ज़ा के अलावा कफ़्फ़ारा भी दे और अज़हर यह है कि उसका कफ़्फ़ारा क़सम का कफ़्फ़ारा है जैसा कि बाद में बयान किया जायेगा लेकिन उस दिन वह इख़तियारन यह कर सकता है कि सफ़र करे और रोज़ा न रखे और अगर सफ़र में हो तो लाज़िम नहीं कि ठहरने की नीयत कर के रोज़ा रखे और उस सूरत में जब कि सफ़र की वजह से या किसी दूसरे उज़्र मसलन बीमारी या हैज़ की वजह से रोज़ा न रखे तो लाज़िम है कि रोज़े की क़ज़ा केर लेकिन कफ़्फ़ारा नहीं है।
2663. अगर इंसान हालते इख़्तियार में अपनी मन्नत पर अमल न करे तो कफ़्फ़ारा देना ज़रूरी है।
2664. अगर कोई शख़्स एक मुअय्यन वक़्त तक कोई अमल तर्क करने की मन्नत माने तो उस वक़्त के गुज़रने के बाद उस अमल को बजा ला सकता है और अगर उस वक़्त के गुज़रने से पहले भूल कर या ब अम्रे मजबूरी उस अमल को अंजाम दे तो उस पर कुछ वाजिब नहीं है लेकिन फिर भी लाज़िम है कि वह वक़्त आने तक उस अमल को अंजाम न दे और अगर उस वक़्त के आने से पहले बग़ैर उज़्र के उस अमल को दोबारा अंजाम दे तो ज़रूरी है कि कफ़्फ़ारा दे।
2665. जिस शख़्स ने कोई अमल तर्क करने की मन्नत मानी हो और उसके लिए कोई वक़्त मुअय्यन न किया हो अगर वह भूल कर या बअम्रे मजबूरी या ग़फ़लत की वजह से उस अमल को अंजाम दे तो उस पर कफ़्फ़ारा वाजिब नहीं है लेकिन उस के बाद जब भी बहालते इख़्तियार उस माल को बजा लाए ज़रूरी है कि कफ़्फ़ारा दे।
2666. अगर कोई शख़्स मन्नत माने कि हर हफ़्ते एक मुअय्यन दिन का मसलन जुमुए का रोज़ा रखेगा तो अगर एक जुमुए के दिन ईदे फ़ित्र या ईदे क़ुर्बान पड़ जाए या जुमा के दिन उसे कोई और उज़्र मसलन सफ़र दरपेश हो या हैज़ आ जाए तो ज़रूरी है कि उस दिन रोज़ा न रखे और उसकी क़ज़ा बजा लाए।
2667. अगर कोई शख़्स मन्नत माने कि एक मुअय्यन मिक़्दार में सदक़ा देगा तो अगर वह सदक़ा देने से पहले मर जाए तो उसके माल में से उतनी मिक़्दार में सदक़ा देना लाज़िम नहीं है और बेहतर यह है कि उसके बालिग़ वरसा मीरास में से अपने हिस्से से उतनी मिक़्दार मैयित की तरफ़ से सदक़ा दे दें।
2668. अगर कोई शख़्स मन्नत माने कि एक मुअय्यन फ़क़ीर को सदक़ा देगा तो वह किसी दूसरे फ़क़ीर को नहीं दे सकता और अगर वह मुअय्यन कर्दा फ़क़ीर मर जाए तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि सदक़ा उसके पस्मांदागान को दे।
2669. अगर कोई मन्नत माने कि आइम्मा (अ0) में से किसी एक मसलन हज़रत इमाम हुसैन (अ0) की ज़ियारत से मुशर्रफ़ होगा तो अगर किसी उज़्र की वजह से उन इमाम (अ0) की ज़ियारत न कर सके तो उस पर कुछ भी वाजिब नहीं है।
2670. जिस शख़्स ने ज़ियारत करने की मन्नत मानी हो लेकिन ग़ुस्ले ज़ियारत और उसकी नमाज़ की मन्नत न मानी हो तो उसके लिए उन्हें बजा लाना लाज़िम नहीं है।
2671. अगर कोई शख़्स किसी इमाम या इमामज़ादे के हरम के लिए माल ख़र्च करने की मन्नत माने और कोई ख़ास मसरफ़ मुअय्यन न करे तो ज़रूरी है कि उस माल को उस हरम की तामीर (व मरम्मत) रौशनियों और क़ालीन वग़ैरा पर सर्फ़ करे।
2672. अगर कोई शख़्स किसी इमाम के लिये कोई चीज़ नज़्र करे तो अगर किसी मुअय्यन मसरफ़ की नीयत की हो तो ज़रूरी है कि उस चीज़ को उसी मसरफ़ में लाए और अगर किसी मुअय्यन मसरफ़ की नीयत न की हो तो ज़रूरी है कि उसे ऐसे मसरफ़ में ले आए जो इमाम से निस्बत रखता हो मसलन उस इमाम (अ0 स0 ) के नादार ज़ाइरीन पर ख़र्च करे या उस इमाम के हरम के मसारिफ़ पर ख़र्च करे या ऐसे कामों में ख़र्च करे जो इमाम का तज़्किरा आम करने का सबब हों। और अगर कोई चीज़ किसी इमाम ज़ादे की नज़्र करे तब भी यही हुक्म है।
2673. जिस भेड़ को सदक़े के लिए या किसी इमाम के लिए नज़्र किया जाए अगर वह नज़्र के मसरफ़ में लाए जाने से पहले दूध दे या बच्चा जने तो वह (दूध या बच्चा) उस का माल है जिस ने उस भेड़ को नज़्र किया हो मगर यह कि उसकी नीयत आम हो (यअनी नज़्र करने वाले ने उस भेड़, उसके बच्चे और दूध वग़ैरा सब चीज़ों की मन्नत मानी हो तो वह सब नज़्र है) अलबत्ता भेड़ की ऊन और जिस मिक़्दार में वह फ़रबेह हो जाए नज़्र का जुज़्व है।
2674. जब कोई मन्नत माने कि अगर उसका मरीज़ तन्दुरूस्त हो जाए या उसका मुसाफ़िर वापस आ जाए तो वह फ़लां काम करेगा तो अगर पता चले कि मन्नत मानने से पहले मरीज़ तन्दुरूस्त हो गया था या मुसाफ़िर वापस आ गया था तो फिर मन्नत पर अमल करना लाज़िम नहीं।
2675. अगर बाप या मां मन्नत मानें कि अपनी बेटी की शादी सैयिदज़ादे से करेंगे तो बालिग़ होने के बाद लड़की इस बारे में खुद मुख़्तार है और वालिदैन की मन्नत की कोई अहम्मीयत नहीं।
2676. जब कोई शख़्स अल्लाह तआला से अहद करे कि जब उसकी कोई मुअय्यन शरई हाजत पूरी हो जायेगी तो फ़लां काम करेगा। पस जब उसकी हाजत पूरी हो जाए तो ज़रूरी है कि वह काम अंजाम दे। नीज़ अगर कोई हाजत न होते हुए अहद करे कि फ़ंला काम अंजाम देगा तो वह काम करना उस पर वाजिब हो जाता है।
2677. अह्द में भी मन्नत की तरह सीग़ा पढ़ना ज़रूरी है। और (उलमा के बीच) मशहूर यह है कि कोई शख़्स जिस काम के अंजाम देने का अह्द करे ज़रूरी है कि या तो वाजिब और मुस्तहब नमाज़ों की तरह इबादत हो या ऐसा काम हो जिस का अंजाम देना शरअन उस के तर्क करने से बेहतर हो लेकिन ज़ाहिर यह है कि यह बात मोतबर नहीं है। बल्कि अगर उस तरह हो जैसे मस्अला 2680 में क़सम के अहकाम में आयेगा, तब भी अह्द सहीह है और उस काम को अंजाम देना सहीह है।
2678. अगर कोई शख़्स अपने अह्द पर अमल न करे तो ज़रूरी है कि कफ़्फ़ारा दे और साठ फ़क़ीरों को पेट भर खाना खिलाए या दो महीने मुसलसल रोज़े रखे या एक ग़ुलाम आज़ाद करे।
क़सम खाने के अहकाम
2679. जब कोई शख़्स क़सम खाए कि फ़लां काम अंजाम देगा या तर्क करेगा मसलन क़सम खाए कि रोज़ा रखेगा या तम्बाक़ू इस्तेमाल नहीं करेगा तो अगर बाद में जानबूझ कर इस क़सम के ख़िलाफ़ अमल करे तो ज़रूरी है कि कफ़्फ़ारा दे यअनी एक ग़ुलाम आज़ाद करे या दस फ़क़ीरों को पेट भर खाना खिलाए या उन्हें पोशाक पहनाए और अगर इन आमाल को बजा न ला सकता हो तो ज़रूरी है कि तीन दिन रोज़ा रखे और यह भी ज़रूरी है कि रोज़े मुसलसल रखे।
2680. क़सम की चन्द शर्तें हैं –
1. जो शख़्स क़सम खाए ज़रूरी है कि वह बालिग़ और आक़िल हो नीज़ अपने इरादे और इख़्तियार से क़सम खाए। लिहाज़ा बच्चे या दीवाने या बेहवास या उस शख़्स का क़सम खाना जिसे मजबूर किया गया हो दुरूस्त नहीं है। अगर कोई शख़्स जज़्बात में आकर बिला इरादा या बेइख़्तियार क़सम खाए तो उसके लिए भी यही हुक्म है।
2. (क़सम खाने वाला) जिस काम के अंजाम देने की क़सम खाए ज़रूरी है कि वह हराम या मकरूह न हो और जिस काम के तर्क करने की क़सम खाए ज़रूरी है कि वह वाजिब या मुस्तहब न हो। और अगर कोई मुबाह काम करने की क़सम खाए तो अगर उक़ला की नज़र में उस काम को अंजाम देना उसको तर्क करने से बेहतर हो तो उसकी क़सम सहीह है। बल्कि दोनों सूरतों में अगर उसका अंजाम देना या तर्क करना उक़ला की नज़र में बेहतर न हो लेकिन खुद उस शख़्स के लिए बेहतर हो तब भी उसकी क़सम सहीह है।
3. (क़सम खाने वाला) अल्लाह तआला के नामों में से किसी ऐसे नाम की क़सम खाए जो उस ज़ात के सिवा किसी और के लिए इस्तेमाल न होता हो मसलन खुदा और अल्लाह – और अगर ऐसे नाम की क़सम खाए जो उस ज़ात के सिवा किसी और के लिये भी इस्तेमाल होता हो लेकिन अल्लाह तआला के लिये इतनी कसरत से इस्तेमाल होता हो कि जब भी कोई वह नाम ले तो ख़ुदा ए बुज़ुर्ग व बरतर की ज़ात ही ज़िहन में आती हो मसलन अगर कोई ख़ालिक और राज़िक़ की क़सम खाए तो क़सम सहीह है। बल्कि अगर किसी ऐसे नाम की क़सम खाए कि जब उस नाम को तन्हा बोला जाए तो उस से सिर्फ़ ज़ाते बारी तआला ही ज़िहन में न आती हो लेकिन उस नाम को क़सम खाने के मक़ाम में इस्तेमाल किया जाए तो ज़ाते हक़ ही ज़िहन में आती हो मसलन समीइ और बसीर (की क़सम खाए) तब भी उसकी क़सम सहीह है।
4. (क़सम खाने वाला) क़सम के अल्फ़ाज़ ज़बान पर लाए – लेकिन अगर गूंगा शख़्स इशारे से क़सम खाए तो सहीह है और इसी तरह वह शख़्स जो बात करने पर क़ादिर न हो अगर क़सम को लिखे और दिल में नीयत कर ले तो काफ़ी है बल्कि इसके अलावा सूरतों में भी (काफ़ी है – नीज़) एहतियात तर्क नहीं होगी।
5. (क़सम खाने वाले के लिये) क़सम पर अमल करना मुम्किन हो। और अगर क़सम खाने के वक़्त उसके लिए उस पर अमल करना मुम्किन हो लेकिन बाद में आजिज़ हो जाए और उसने अपने आप को जानबूझ कर आजिज़ न किया हो तो जिस वक़्त से आजिज़ होगा उस वक़्त से उसकी क़सम या अह्द पर अमल करने से इतनी मशक़्क़त उठानी पड़े जो उसकी बर्दाश्त से बाहर हो तो उस सूरत में भी यही हुक्म है।
2681. अगर बाप बेटे को या शौहर, बीवी को क़सम खाने से रोके तो उनकी क़सम सहीह नहीं है।
2682. अगर बेटा, बाप की इजाज़त के बग़ैर और बीवी, शौहर की इजाज़त के बग़ैर क़सम खाए तो बाप और शौहर उनकी क़सम फ़स्ख़ कर सकते हैं।
2683. अगर इंसान भूल कर या मजबूरी की वजह से या ग़फ़लत की बिना पर क़सम पर अमल न करे तो उस पर कफ़्फ़ारा वाजिब नहीं है। और अगर उसे मजबूर किया जाए कि क़सम पर अमल न करे तब भी यही हुक्म है। और वह भी क़सम खाए मसलन यह कहे कि वल्लाह मैं अभी नमाज़ में मशग़ूल होता हूं और वहम की वजह से मशग़ूल न हो तो अगर उस का वहम ऐसा हो कि उसकी वजह से मजबूर होकर क़सम पर अमल न करे तो उस पर कफ़्फ़ारा नहीं है।
2684. अगर कोई शख़्स क़सम खाए कि मैं जो कुछ कह रहा हूं सच कह रहा हूं तो अगर वह सच कह रहा है तो उस का क़सम खाना मकरूह है और अगर झूट बोल रहा है तो हराम है बल्कि मुक़द्दमात के फ़ैसले के वक़्त झूटी क़सम खाना गुनाहे कबीरा में से है लेकिन अगर वह अपने आप को या किसी दूसरे मुसलमान को किसी ज़ालिम के शर से नजात दिलाने के लिये झूटी क़सम खाए तो इसमें इश्काल नहीं बल्कि बाज़ औक़ात ऐसी क़सम खाना वाजिब हो जाता है ताहम अगर तौरिया करना मुम्किन हो – यअनी क़सम खाते वक़्त क़सम के अल्फ़ाज़ के ज़ाहिरी मफ़हूम को छोड़कर दूसरे मतलब की नीयत करे और जो मतलब उसने लिया है उस को ज़ाहिर न करे – तो एहतियाते लाज़िम यह है कि तौरिया करे। मसलन अगर कोई ज़ालिम किसी को अज़ीयत देना चाहे और किसी दूसरे शख़्स से पूछे कि क्या तुम ने फ़लां शख़्स को देखा है ? और उस ने उस शख़्स को एक मिनट क़ब्ल देखा हो तो वह कहे कि मैंने उसे नहीं देखा और क़स्द यह करे कि इस वक़्त से पांच मिनट पहले मैंने उसे नहीं देखा।
वक़्फ़ के अहकाम
2685. अगर एक शख़्स कोई चीज़ वक़्फ़ करे तो वह उसकी मिल्कियत से निकल जाती है और वह खुद या दूसरे लोग न ही वह चीज़ किसी को बख़्श सकते हैं और न ही उसे बेच सकते हैं लेकिन बाज़ सूरतों में जिन का ज़िक्र मस्अला 2102 और मस्अला 2103 में किया गया है उसे बेचने में इश्काल नहीं।
2686. यह लाज़िम है कि वक़्फ़ का सीग़ा अरबी में पढ़ा जाए बल्कि मिसाल के तौर पर अगर कोई शख़्स कहे कि मैंने यह किताब तालिब ए इल्मों के लिये वक़्फ़ कर दी है तो वक़्फ़ सहीह है। बल्कि अमल से भी साबित हो जाता है। मसलन अगर कोई शख़्स वक़्फ़ की नीयत से चटाई मस्जिद में डाल दे या किसी इमारत को मस्जिद की नीयत से इस तरह बनाए जैसे मस्जिद बनाई जाती है तो वक़्फ़ साबित हो जायेगा। और उमूमी औक़ाफ़ मसलन मस्जिद, मदरसा या ऐसी चीज़ें जो आम लोगों के लिये वक़्फ़ की जायें या मसलन फ़ुक़रा और सादात के लिये वक़्फ़ की जायें उन के वक़्फ़ से सहीह होने में किसी का क़बूल करना लाज़िम नहीं है बल्कि बिनाबरे अज़हर ख़ुसूसी औक़ाफ़ मसलन जो चीज़ें औलाद के लिए वक़्फ़ की जायें उन में भी क़बूल करना मोतबर नहीं है।
2687. अगर कोई शख़्स अपनी किसी चीज़ को वक़्फ़ करने के लिये मुअय्यन करने के वक़्त से उस माल को हमेशा के लिये वक़्फ़ कर दे और मिसाल के तौर पर अगर वह कहे कि यह माल मेरे मरने के बाद वक़्फ़ होगा तो चूंकि वह माल सीग़ा पढ़ने के वक़्त से उसके मरने के वक़्त तक वक़्फ़ नहीं रहा इस लिये वक़्फ़ सहीह नहीं है। नीज़ अगर कहे कि यह माल दस साल तक वक़्फ़ रहेगा और फिर वक़्फ़ नहीं होगा या यह कहे कि यह माल दस साल के लिये वक़्फ़ होगा फिर पांच साल के लिये वक़्फ़ नहीं होगा और फिर दोबारा वक़्फ़ हो जायेगा तो वह वक़्फ़ सहीह नहीं है।
2688. अगर कोई शख़्स अपनी किसी चीज़ को वक़्फ़ करने के लिये मुअय्यन करे और वक़्फ़ करने से भी पच्छताए या मर जाए तो वक़्फ़ वुक़ूउ पज़ीर नहीं होता।
2689. ख़ुसूसी वक़्फ़ उस सूरत में सहीह है जब वक़्फ़ करने वाला वक़्फ़ का माल पहली पुश्त यअनी जिन लोगों के लिये वक़्फ़ किया गया है उनके या उनके वकील या सरपरस्त के तसर्रूफ़ में दे दे। लेकिन अगर कोई शख़्स कोई चीज़ अपने नाबालिग़ बच्चों के लिए वक़्फ़ कर दे और इस नीयत से कि वक़्फ़ कर्दा चीज़ उन की मिल्कियत हो जाए उस चीज़ की निगहदारी करे तो वक़्फ़ सहीह है।
2690. ज़ाहिर यह है कि आम औक़ाफ़ मसलन मदरसों और मसाजिद वग़ैरा में क़ब्ज़ा मोतबर नहीं है बल्कि सिर्फ़ वक़्फ़ करने से उनका वक़्फ़ होना साबित हो जाता है।
2691. ज़रूरी है कि वक़्फ़ करने वाला बालिग़ और आक़िल हो नीज़ क़स्द और इख़्तियार रखता हो और शर्अन अपने माल में तसर्रूफ़ कर सकता हो लिहाज़ा अगर सफ़ीह – यअनी वह शख़्स जो अपना माल अहमक़ाना मालों में ख़र्च करता हो – कोई चीज़ वक़्फ़ करे तो चूंकि वह अपने माल में तसर्रूफ़ करने का हक़ नहीं रखता इस लिए (उसका किया हुआ वक़्फ़) सहीह नहीं।
2692. अगर कोई शख़्स किसी माल को ऐसे बच्चे के लिये वक़्फ़ करे जो मां के पेट में हो और अभी पैदा न हुआ हो तो उस वक़्फ़ का सहीह होना महल्ले इश्काल है। और लाज़िम है कि एहतियात मलहूज़ रखी जाए लेकिन अगर कोई माल ऐसे लोगों के लिये वक़्फ़ किया जाए जो अभी मौजूद हों और उनके बाद उन लोगों के लिये वक़्फ़ किया जाए जो बाद में पैदा हों तो अगरचे वक़्फ़ करते वक़्त वह मां के पेट में भी न हों वह वक़्फ़ सहीह है मसलन एक शख़्स कोई चीज़ अपनी औलाद के लिये वक़्फ़ करे कि उनके बाद उसके पोतों के लिये वक़्फ़ होगी और (औलाद के) हर गुरोह के बाद आने वाले गुरोह उस वक़्फ़ से इस्तिफ़ादा करेगा तो वक़्फ़ सहीह है।
2693. अगर कोई शख़्स किसी चीज़ को अपने आप पर वक़्फ़ करे मसलन कोई दुकान वक़्फ़ कर दे ताकि उसकी आमदनी उसके मरने के बाद उसके मक़्बिरे पर ख़र्च की जाए तो वह वक़्फ़ सहीह नहीं है। लेकिन मिसाल के तौर पर वह कोई माल फ़ुक़रा के लिए वक़्फ़ कर दे और खुद भी फ़क़ीर हो जाए तो वक़्फ़ के मुनाफ़े से इस्तिफ़ादा कर सकता है।
2694. जो चीज़ किसी शख़्स ने वक़्फ़ की हो अगर उसने उसका मुतवल्ली भी मुअय्यन किया हो तो ज़रूरी है कि हिदायात के मुताबिक़ अमल हो और अगर वाक़िफ़ ने मुतवल्ली मुअय्यन न किया हो और माल मख़्सूस अफ़राद पर मसलन अपनी औलाद के लिये वक़्फ़ किया हो तो वह उससे इस्तिफ़ादा करने में खुद मुख़्तार है और अगर बालिग़ न हों तो फिर उन का सरपरस्त मुख़्तार है और वक़्फ़ से इस्तिफ़ादा करने के लिये हाकिमें शर्अ की इजाज़त लाज़िम नहीं है लेकिन ऐसे काम जिसमें वक़्फ़ की बेहतरी या आइन्दा नस्लों की भलाई हो मसलन वक़्फ़ की तअमीर करना या वक़्फ़ को किराए पर देना कि जिस में बाद वाले तबक़े के लिए फ़ाइदा है तो उसका मुख़्तार हाकिमे शर्अ है।
2695. अगर मिसाल के तौर पर कोई शख़्स किसी माल को फ़ुक़रा या सादात के लिए वक़्फ़ करे या इस मक़्सद से वक़्फ़ करे कि उस माल का मुनाफ़ा बतौरे खैरात दिया जाए तो उस सूरत में कि उसने वक़्फ़ के लिए मुतवल्ली मुअय्यन न किया हो इस का इख़्तियार हाकिमे शर्अ को है।
2696. अगर कोई शख़्स किसी इमलाक को मख़्सूस अफ़राद मसलन अपनी औलाद के लिए वक़्फ़ करे ताकि एक पुश्त के बाद दूसरी पुश्त उस से इस्तिफ़ादा करे तो अगर वक़्फ़ का मुतवल्ली उस माल को किराए पर दे दे और उस के बाद मर जाए तो इजारा बातिल नहीं होता। लेकिन अगर उस इमलाक का मुतवल्ली न हो और जिन लोगों के लिये वह इमलाक वक़्फ़ हुई है उन में से एक पुश्त उसे किराए पर दे दे और इजारे की मुद्दत के दौरान वह पुश्त मर जाए और जो पुश्त उसके बाद हो वह उस इजारे की तस्दीक़ न करे तो इजारा बातिल हो जाता जायेगा और उस सूरत में अगर किरायादार ने पूरी मुद्दत का किराया अदा कर रखा हो तो मरने वाले की मौत के वक़्त से इजारे की मुद्दत के ख़ातिमे तक का किराया उस (मरने वाले) के माल से ले सकता है।
2697. अगर वक़्फ़ कर्दा इमलाक बर्बाद हो जाए तो उस के वक़्फ़ की हैसियत नहीं बदलती बुजुज़ उस सूरत के कि वक़्फ़ की हुई चीज़ किसी ख़ास मक़्सद के लिए वक़्फ़ हो और वह मक़्सद फ़ौत हो जाए। मसलन किसी शख़्स ने कोई बाग़ बतौरे बाग़ वक़्फ़ किया हो तो अगर वह बाग़ ख़राब हो जाए तो वक़्फ़ बातिल हो जायेगा और वक़्फ़ कर्दा माल वाक़िफ़ की मिल्कियत में दोबारा दाखिल हो जायेगा।
2698. अगर किसी इमलाक की कुछ मिक़्दार वक़्फ़ हो और कुछ मिक़्दार वक़्फ़ न हो और वह इमलाक तक़्सीम न की गई हो तो वह शख़्स जिसे तसर्रूफ़ करने का इख़्तियार है जैसे हाकिमे शर्अ वाक़िफ़ का मुतवल्ली और वह लोग जिन के लिए वक़्फ़ किया गया है बाख़बर लोगों की राय के मुताबिक़ वक़्फ़ शुदा हिस्सा जुदा कर सकते हैं।
2699. अगर वक़्फ़ का मुतवल्ली ख़ियानत करे मसलन उसका मुनाफ़ा मुअय्यन मदों में इस्तेमाल न करे तो हाकिमे शर्अ उसके साथ किसी अमीन शख़्स को लगा दे ताकि वह मुतवल्ली को ख़ियानत से रोके और अगर वह मुम्किन न हो तो हाकिमे शर्अ उसकी जगह कोई दियानतदार मुतवल्ली मुक़र्रर कर सकता है।
2700. जो क़ालीन (वग़ैरा) इमाम बारगाह के लिए वक़्फ़ किया गया हो उसे नमाज़ पढ़ने के लिए मस्जिद में नहीं ले जाया जा सकता ख़्वाह वह मस्जिद इमाम बाहगाह से मुलहिक़ ही क्यों न हो।
2701. अगर कोई इमलाक किसी मस्जिद की मरम्मत के लिए वक़्फ़ की जाए तो अगर उस मस्जिद को मरम्मत की ज़रूरत न हो और इस बात की तवक़्क़ो भी न हो कि आइन्दा या कुछ अर्से बाद उसे मरम्मत की ज़रूरत होगी नीज़ उस इमलाक की आमदनी को जमअ कर के हिफ़ाज़त करना भी मुम्किन न हो कि बाद में उस मस्जिद की मरम्मत में लगा दी जाए तो उस सूरत में एहतियाते लाज़िम यह है कि इमलाक की आमदनी को उस काम में सर्फ़ करे जो वक़्फ़ करने वाले के मक़्सूद से नज़्दीकतर हो मसलन उस मस्जिद की कोई दूसरी ज़रूरत पूरी कर दी जाए या किसी दूसरी मस्जिद की तामीर में लगा दी जाए।
2702. अगर कोई शख़्स कोई इमलाक वक़्फ़ करे ताकि उसकी आमदनी मस्जिद की मरम्मत पर ख़र्च की जाए और इमामे जमाअत को और मस्जिद के मुवज़्ज़िन को दी जाए तो उस सूरत में कि उस शख़्स ने हर एक के लिए कुछ मिक़्दार मुअय्यन की हो तो ज़रूरी है कि आमदनी उसी के मुताबिक़ ख़र्च की जाए और अगर मुअय्यन न की हो तो ज़रूरी है कि पहले मस्जिद की मरम्मत कराई जाए और फिर अगर कुछ बचे तो मुतवल्ली उसे इमामे जमाअत और मुवज़्ज़िन के दरमियान जिस तरह मुनासिब समझे तक़्सीम कर दे लेकिन बेहतर है कि यह दोनों अश्ख़ास तक़्सीम के मुतअल्लीक़ एक दूसरे से मुसालहत कर लें।
वसीयत के अहकाम
2703. वसीयत यह है कि इंसान ताकीद करे कि उसके मरने के बाद उसके लिए फ़लां फ़लां काम किये जायें या यह कहे कि उसके मरने के बाद उस के माल में से कोई चीज़ किसी शख़्स की मिल्कियत में दे दी जाए या ख़ैरात की जाए या उमूरे ख़ैरीया पर सर्फ़ की जाए या अपनी औलाद के लिए और जो लोग उसकी कफ़ालत में हों उनके लिए किसी को निगरां और सरपरस्त मुक़र्रर करे और जिस शख़्स को वसीयत की जाए उसे वसी कहते हैं।
2704. जो शख़्स बोल न सकता हो अगर वह इशारे से अपना मक़्सद समझा दे तो वह हर काम के लिए वसीयत कर सकता है बल्कि जो शख़्स बोल सकता हो अगर वह भी इशारे से वसीयत करे कि उस का मक़्सद मसझ में आ जाए तो वसीयत सहीह है।
2705. अगर ऐसी तहरीर मिल जाए जिस पर मरने वाले के दस्तखत या मोहर सब्त हो तो अगर उस तहरीर से उस का मक़्सद समझ में आ जाए और पता चल जाए कि यह चीज़ उसने वसीयत की ग़रज़ से लिखी है तो उसके मुताबिक़ अमल करना चाहिए लेकिन अगर पता चले कि मरने वाले का मक़्सद वसीयत करना नहीं था और उसने कुछ बाते लिखी थीं ताकि बाद में उनके मुताबिक़ वसीयत करे तो ऐसी तहरीर बतौरे वसीयत काफ़ी नहीं है।
2706. जो शख़्स वसीयत करे ज़रूरी है कि बालिग़ और आक़िल हो, सफ़ीह न हो और अपने इख़्तियार से वसीयत करे लिहाज़ा नाबिलग़ बच्चे का वसीयत करना सहीह नहीं है। मगर यह कि बच्चा दस साल का हो और उसने अपने रिश्तेदारों के लिए वसीयत की हो या आम ख़ैरात में ख़र्च करने की वसीयत की हो तो उन दोनों सूरतों में उस की वसीयत सहीह है और अगर अपने रिश्तेदारों के अलावा किसी दूसरे के लिए वसीयत करे या सात साला बच्चा यह वसीयत करे कि, उसके अमवाल में से थोड़ी सी चीज़ किसी शख़्स के लिए है या किसी शख़्स को दे दी जाए, तो वसीयत का नाफ़िज़ होना महल्ले इश्काल है और इन दोनों सूरतों में एहतियात का ख़्याल रखा जाए और अगर कोई शख़्स सफ़ीह हो तो उसकी वसीयत के अमवाल में नाफ़िज़ नहीं है। लेकिन अगर उसकी वसीयत अमवाल के अलावा दूसरे उमूर में हो मसलन उन मख़्सूस कामों के मुतअल्लिक़ हो जो मौत के बाद मैयित के लिए अंजाम दिये जाते हैं तो वह वसीयत नाफ़िज़ है।
2707. जिस शख़्स ने मिसाल के तौर पर अमदन अपने आप को ज़ख़्मी कर लिया हो या ज़हर खा लिया हो जिसकी वजह से उसके मरने का यक़ीन या गुमान पैदा हो जाए अगर वह वसीयत करे कि उस के माल की कुछ मिक़्दार किसी मख़्सूस मसरफ़ में लाई जाए और उसके बाद वह मर जाए तो उसकी वसीयत सहीह नहीं है।
2708. अगर कोई शख़्स वसीयत करे कि उसकी इमलाक में से कोई चीज़ किसी दूसरे का माल होगी तो उस सूरत में जबकि वह दूसरा शख़्स वसीयत को क़बूल कर ले ख़्वाह उस का क़बूल करना वसीयत करने वाले की ज़िन्दगी में ही क्यों न हो वह चीज़ मूसी की मौत के बाद उसकी मिल्कियत हो जायेगी।
2709. जब इंसान अपने आप में मौत की निशानियां देख ले तो ज़रूरी है कि लोगों की अमानतें फ़ौरन उनके मालिकों को वापस कर दे या उन्हें इत्तिला दे दे। उस तफ़्सील के मुताबिक़ जो मस्अला 2351 में बयान हो चुकी है। और अगर वह लोगों का मक़रूज़ हो और क़र्ज़े की अदायगी का वक़्त आ गया हो और क़र्ज़ ख़्वाह अपने क़र्ज़े का मुतालबा भी कर रहा हो तो ज़रूरी है कि क़र्ज़ा अदा कर दे और अगर वह खुद क़र्ज़ा अदा करने के क़ाबिल न हो या क़र्ज़े की अदायगी का वक़्त न आया हो या क़र्ज़ख़्वाह अभी मुतालबा न कर रहा हो तो ज़रूरी है कि ऐसा काम करे जिस से इत्मीनान हो जाए कि उसका क़र्ज़ उसकी मौत के बाद क़र्ज़ख़्वाह को अदा कर दिया जायेगा मसलन इस सूरत में कि उसके क़र्ज़े का किसी दूसरे को इल्म न हो वह वसीयत करे और गवाहों के सामने वसीयत करे।
2710. जो शख़्स अपने आप में मौत की निशानियां देख रहा हो अगर ज़कात, ख़ुम्स और मज़ालिस उस के ज़िम्मे हों और वह उन्हें उस वक़्त अदा न कर सकता हो लेकिन उस के पास माल हो या इस बात का एहतिमाल हो कि कोई दूसरा शख़्स यह चीज़ें अदा कर देगा तो ज़रूरी है कि वसीयत करे और अगर उस पर हज वाजिब हो तो उस का भी यही हुक्म है लेकिन अगर वह शख़्स उस वक़्त अपने शरई वाजिबात अदा कर सकता हो तो ज़रूरी है कि फ़ौरन अदा कर दे अगरचे वह अपने आप में मौत की निशानियां न देखे।
2711. जो शख़्स अपने आप में मौत की निशानियां देख रहा हो अगर उसकी नमाज़ें और रोज़े क़ज़ा हुए हैं तो ज़रूरी है कि वसीयत करे कि उसके माल से उन इबादात की अदायगी के लिये किसी को अजीर बनाया जाए बल्कि अगर उसके पास माल न हो लेकिन इस बात का एहतिमाल हो कि कोई शख़्स बिला मुआवज़ा यह इबादात बजा लायेगा तब भी उस पर वाजिब है कि वसीयत करे लेकिन अगर अपना कोई हो मसलन बड़ा लड़का हो और वह शख़्स जानता हो कि अगर उसे ख़बर दी जाए तो वह उसकी क़ज़ा नमाज़ें और रोज़े बजा लायेगा तो उसे ख़बर देना ही काफ़ी है, वसीयत करना लाज़िम नहीं।
2712. जो शख़्स अपने आप में मौत की निशानियां देख रहा हो अगर उसका माल किसी के पास या ऐसी जगह छिपा हुआ हो जिसका वरसा को इल्म न हो तो अगर ला इल्मी की वजह से वरसा का हक़ तलफ़ होता हो तो ज़रूरी है कि उन्हें इत्तिलाअ दे और यह लाज़िम नहीं कि वह अपने नाबालिग़ बच्चों के लिये निग़रां और सरपरस्त मुकर्रर करे लेकिन उस सूरत में जब कि निगरां का न होना माल के तलफ़ होने का सबब हो या खुद बच्चों के लिए नुक़्सानदेह हो तो ज़रूरी है कि उनके लिए एक अमीन निगरां मुक़र्रर करे।
2713. वसी का आक़िल होना ज़रूरी है। नीज़ जो उमूर मूसी से मुतअल्लिक़ हैं और इसी तरह एहतियात की बिना पर जो उमूर दूसरों से मुतअल्लिक़ हैं ज़रूरी है कि वसी उनके बारे में मुत्मइन हो और ज़रूरी है कि मुसलमान का वसी भी एहतियात की बिना पर मुसलमान और अगर मूसी फ़क़त नाबालिग़ बच्चे के लिए इस मक़्सद से वसीयत करे ताकि वह बचपन में सरपरस्त से इजाज़त लिए बग़ैर तसर्रूफ़ कर सके तो एहतियात की बिना पर दुरूस्त नहीं है। लेकिन अगर मूसी का मक़्सद यह हो कि बालिग़ होने के बाद या सरपरस्त की इजाज़त से तसर्रूफ़ करे तो कोई इश्काल नहीं है।
2714. अगर कोई शख़्स कई लोगों को अपना वसी मुअय्यन करे तो अगर उसने इजाज़त दी हो कि उनमें से हर एक तन्हा वसीयत पर अमल कर सकता है तो लाज़िम नहीं कि वह वसीयत अंजाम देने में एक दूसरे से इजाज़त लें और अगर वसीयत करने वाले ने ऐसी कोई इजाज़त न दी हो तो ख़्वाह उसने कहा हो या न कहा हो कि दोनों मिल कर वसीयत पर अमल करें उन्हें चाहिये कि एक दूसरे की राय के मुताबिक़ वसीयत पर अमल करें और अगर वह मिल कर वसीयत पर अमल करने पर तैयार न हों और मिल कर अमल न करने पर कोई उज़्रे शरई न हो तो हाकिमे शर्अ उन्हें ऐसा करने पर मजबूर कर सकता है और अगर वह हाकिमे शर्अ का हुक्म न मानें या मिलकर अमल न करने का दोनों के पास कोई शरई उज़्र हो तो वह उनमें से किसी एक की जगह कोई और वसी मुक़र्रर कर सकता है।
2715. अगर कोई अपनी वसीयत से मुन्हरिफ़ हो जाए मसलन पहले वह यह कहे कि उसके माल का तीसरा हिस्सा फ़लां शख़्स को दिया जाये और बाद में कहे कि उसे न दिया जाए तो वसीयत कलअदम हो जाती है। और अगर कोई शख़्स अपनी वसीयत में तब्दीली कर दे मसलन पहले एक शख़्स को अपने बच्चों का निगरां मुक़र्रर करे और बाद में उसकी जगह किसी दूसरे शख़्स को निगरां मुक़र्रर कर दे तो उसकी पहली वसीयत कलअदम हो जाती है और ज़रूरी है कि उसकी दूसरी वसीयत पर अमल किया जाए।
2716. अगर एक शख़्स कोई ऐसा काम करे जिससे पता चले कि वह अपनी वसीयत से मुंहरिफ़ हो गया है मसलन जिस मकान के बारे में वसीयत की हो कि वह किसी को दिया जाए उसे बेच दे या – पहली वसीयत को पेशे नज़र रखते हुए – किसी दूसरे शख़्स को उसे बेचने के लिए वकील मुक़र्रर कर दे तो वसीयत कलअदम हो जाती है।
2717. अगर कोई शख़्स वसीयत करे कि एक मुअय्यन चीज़ किसी शख़्स को दी जाए और बाद में वसीयत करे कि उस चीज़ का निस्फ़ हिस्सा किसी और शख़्स को दिया जाए तो ज़रूरी है कि उस चीज़ के दो हिस्से किये जायें और उन दोनों अश्ख़ास में से हर एक को एक हिस्सा दिया जाए।
2718. अगर कोई शख़्स अपने मरज़ की हालत में जिस मरज़ से वह मर रहा है अपने माल की कुछ मिक़्दार किसी शख़्स को बख़्श दे और वसीयत करे कि मरने के बाद माल की कुछ मिक़्दार किसी और शख़्स को भी दी जाए तो अगर उसके माल का तीसरा हिस्सा दोनों माल के लिए काफ़ी न हो और वरसा उस ज़्यादा मिक़्दार की इजाज़त देने पर तैयार न हों तो ज़रूरी है कि पहले जो माल उसने बख़्शा है वह तीसरे हिस्से से दे दें और उसके बाद जो माल बाक़ी बचे वह वसीयत के मुताबिक़ ख़र्च करें।
2719. अगर कोई शख़्स वसीयत करे कि उसके माल का तीसरा हिस्सा न बेचा जाए और उसकी आमदनी एक मुअय्यन काम में ख़र्च की जाए तो उसके कहने के मुताबिक़ अमल करना ज़रूरी है।
2720. अगर कोई शख़्स ऐसे मरज़ की हालत में जिस मरज़ से वह मर जाए यह कहे कि वह इतनी मिक़्दार में किसी शख़्स का मक़रूज़ है तो अगर उस पर यह तोहमत लगाई जाए कि उस ने यह बात वरसा को नुक़्सान पहुंचाने के लिये की है तो जो मिक़्दार क़र्ज़े की उस ने मुअय्यन की है वह उस के माल के तीसरे हिस्से से दी जायेगी और अगर उस पर यह तोहमत न लगाई जाए तो उसका इक़रार नाफ़िज़ है और क़र्ज़ा उसके अस्ल माल से अदा करना ज़रूरी है।
2721. जिस शख़्स के लिए इंसान वसीयत करे कि कोई चीज़ उसे दी जाए यह ज़रूरी नहीं कि वसीयत करने के वक़्त वह वुजूद रखता हो। लिहाज़ा अगर कोई इंसान वसीयत करे कि जो बच्चा फ़लां औरत के पेट से पैदा होगा उस बच्चे को फ़लां चीज़ दी जाए लेकिन अगर वह बच्चा वसीयत करने वाले की मौत के बाद पैदा हो तो लाज़िम है कि वह चीज़ उसे दी जाए लेकिन अगर वह वसीयत करने वाले की मौत के बाद वह (बच्चा) पैदा न हो और वसीयत एक से ज़्यादा मक़ासिद के लिए समझी जाए तो ज़रूरी है कि उस माल को किसी ऐसे दूसरे काम में सर्फ़ किया जाए जो वसीयत करने वाले के मक़्सद से ज़्यादा क़रीब हो वर्ना वरसा खुद उसे आपस में तक़्सीम कर सकते हैं। लेकिन अगर वसीयत करे कि मरने के बाद उसके माल में से कोई चीज़ किसी शख़्स का माल होगी तो अगर वह शख़्स वसीयत करने वाले की मौत के वक़्त मौजूद हो तो वसीयत सहीह है वर्ना बातिल है। और जिस चीज़ की उस शख़्स के लिए वसीयत की गई हो (वसीयत बातिल होने की सूरत में) वरसा उसे आपस में तक़्सीम कर सकते हैं।
2722. अगर इंसान को पता चले कि किसी ने उसे वसी बनाया है तो अगर वह वसीयत करने वाले को इत्तिला दे दे कि उसकी वसीयत पर अमल करने पर आमादा नहीं है तो लाज़िम नहीं कि वह उसके मरने के बाद उस वसीयत पर अमल करे लेकिन अगर वसीयत कुनिंदा के मरने से पहले इंसान को यह पता न चले कि उसने उसे वसी बनाया है या पता चल जाए लेकिन उसे यह इत्तिलाअ न दे कि वह (यअनी जिसे वसी मुक़र्रर किया गया है) उसकी (यअनी मूसी की) वसीयत पर अमल करने पर आमादा नहीं है तो अगर वसीयत पर अमल करने में कोई ज़हमत न हो तो ज़रूरी है कि उसकी वसीयत पर अमल दर आमद करे नीज़ अगर मूसी के मरने से पहले वसी किसी वक़्त उस अम्र की जानिब मुतवज्जह हो कि मरज़ की शिद्दत की वजह से या किसी और उज़्र की बिना पर मूसी किसी दूसरे शख़्स को वसीयत नहीं कर सकता तो एहतियात की बिना पर ज़रूरी है कि वसी वसीयत को क़बूल कर ले।
2723. जिस शख़्स ने वसीयत की हो कि अगर वह मर जाए तो वसी को यह इख़्तियार नहीं कि वह किसी दूसरे को मैयित का वसी मुअय्यन करे और खुद उन कामों से किनाराकश हो जाए लेकिन अगर उसे इल्म हो कि मरने वाले का यह मक़्सद नहीं था कि खुद वसी ही उन कामों को अंजाम देने में शरीक हो बल्कि उसका मक़्सद फ़क़त यह था कि काम कर दिये जायें तो वसी किसी दूसरे शख़्स को उन कामों की अंजामदेही के लिए अपनी तरफ़ से वकील मुक़र्रर कर सकता है।
2724. अगर कोई शख़्स दो अफ़राद को एकट्ठे वसी बनाए तो अगर उन दोनों में से एक मर जाए या दीवाना या काफ़िर हो जाए तो हाकिमे शर्अ उसकी जगह एक और शख़्स को वसी मुक़र्रर करेगा। और अगर दोनों मर जायें या काफ़िर या दीवाने हो जायें तो हाकिमे शर्अ दो दूसरे अश्खास को उनकी जगह मुअय्यन करेगा लेकिन अगर एक शख़्स वसीयत पर अमल कर सकता हो तो दो अश्ख़ास का मुअय्यन करना लाज़िम नहीं।
2725. अगर वसी तन्हा ख़्वाह वकील मुक़र्रर कर के या दूसरे को उजरत दे कर मुतवफ़्फ़ी के काम अंजाम न दे सके तो हाकिमे शर्अ उसकी मदद के लिये एक और शख़्स मुक़र्रर करेगा।
2726. अगर मुतवफ़्फ़ी के माल की कुछ मिक़्दार वसी के हाथ से तलफ़ हो जाए तो अगर वसी ने उसकी निगहदाश्त में कोताही या तअद्दी की हो मसलन अगर मुतवफ़्फ़ी ने उसे वसीयत की हो कि माल की इतनी मिक़्दार फ़लां शहर के फ़क़ीरों को दे दे और वसी माल को दूसरे शहर ले जाए और वह रास्ते में तलफ़ हो जाए तो वह ज़िम्मेदार है और अगर उसने कोताही या तअद्दी न की हो तो ज़िम्मेदार नहीं है।
2727. अगर इंसान किसी शख़्स को वसी मुक़र्रर करे और कहे कि अगर वह शख़्स (यानी वसी) मर जाए तो फिर फ़लां शख़्स वसी होगा तो जब पहला वसी मर जाए तो दूसरे वसी के लिए मुतवफ़्फ़ी के काम अंजाम देना ज़रूरी है।
2728. जो हज मुतवफ़्फ़ी पर वाजिब हो नीज़ क़र्ज़ा और माली वाजिबात मसलन ख़ुम्स ज़कात और मज़ालिम जिन का अदा करना वाजिब हो उन्हें मुतावफ़्फ़ी के अस्ल माल से अदा करना ज़रूरी है ख़्वाह मुतवफ़्फ़ी ने उनके लिए वसीयत भी की हो।
2729. अगर मुतवफ़्फ़ी का क़र्ज़े से और वाजिब हज से और उन शरई वाजिबात से जो उस पर वाजिब हों मसलन ख़ुम्स और ज़कात और मज़ालिम से ज़्यादा हो तो अगर उसने वसीयत की हो कि उसके माल का तीसरा हिस्सा या तीसरे हिस्से की कुछ मिक़्दार एक मुअय्य्न मसरफ़ में लाई जाए तो उसकी वसीयत पर अमल करना ज़रूरी है और अगर वसीयत न की हो तो जो कुछ बचे वह वरसा का माल है।
2730. जो मसरफ़ मुतवफ़्फ़ी ने मुअय्यन किया हो अगर उसके माल के तीसरे हिस्से से ज़्यादा हो तो माल के तीसरे हिस्से से ज़्यादा के बारे में उस की वसीयत उस सूरत में सहीह है सब वरसा कोई ऐसी बात या ऐसा काम करें जिससे मअलूम हो कि उन्होंने वसीयत के मुताबिक़ अमल करने की इजाज़त दे दी है और उन का सिर्फ़ राज़ी होना काफ़ी नहीं है और अगर वह मूसी की रेहलत के कुछ अर्से बाद भी इजाज़त दें तो सहीह है और अगर बाज़ वरसा इजाज़त दे दें और बाज़ वसीयत को रद्द कर दें तो जिन्होंने इजाज़त दी हो उनके हिस्सों की हद तक वसीयत सहीह और नाफ़िज़ है।
2731. जो मसरफ़ मुतवफ़्फ़ी ने मुअय्यन किया हो अगर उस पर उसके माल के तीसरे हिस्से से ज़्यादा लागत आती हो और उस के मरने से पहले वरसा उस मसरफ़ की इजाज़त दे दें (यअनी यह इजाज़त दे दें कि उनके हिस्से से वसीयत को मुकम्मल किया जा सकता है) तो उसके मरने के बाद वह अपनी दी हुई इजाज़त से मुंहरिफ़ नहीं हो सकते।
2732. अगर मरने वाला वसीयत करे कि उसके माल के तीसरे हिस्से से ख़ुम्स और ज़कात या कोई और क़र्ज़ा जो उसके ज़िम्मे हो दिया जाए और उसकी क़ज़ा नमाज़ों और रोज़ों के लिए अजीर मुक़र्रर किया जाए और कोई मुस्तहब काम मसलन फ़क़ीरों को खाना खिलाना भी अंजाम दिया जाए तो ज़रूरी है कि पहले उसका क़र्ज़ा माल के तीसरे हिस्से से दिया जाए और अगर कुछ बच जाए तो नमाज़ों और रोज़ों के लिए अजीर मुक़र्रर किया जाए और अगर फिर भी कुछ बच जाए तो जो मुस्तहब काम उसने मुअय्यन किया हो उस पर सर्फ़ किया जाए और अगर उसके माल का तीसरा हिस्सा सिर्फ़ उसके क़र्ज़े के बराबर हो और वरसा भी तिहाई माल से ज़्यादा ख़र्च करने की इजाज़त न दें तो नमाज़, रोज़ों और मुस्तहब कामों के लिए की गई वसीयत बातिल है।
2733. अगर कोई शख़्स वसीयत करे कि उसका क़र्ज़ा अदा किया जाए और उसकी नमाज़ों और रोज़ों के लिए अजीर मुक़र्रर किया जाए और कोई मुस्तहब काम भी अंजाम दिया जाए तो अगर उसने यह वसीयत न की हो कि वह चीज़ें माल के तीसरे हिस्से से दी जायें तो ज़रूरी है कि उसका क़र्ज़ा अस्ल माल से दिया जाए और फिर जो कुछ बच जाए उसका तीसरा हिस्सा नमाज़, रोज़ों (जैसी इबादात) और उन मुस्तहब कामों के मसरफ़ में लाया जाए जो उसने मुअय्यन किये हैं और उस सूरत में जबकि तीसरा हिस्सा (उन कामों के लिए) काफ़ी न हो अगर वरसा इजाज़त दें तो उसकी वसीयत पर अमल करना चाहिये और अगर वह इजाज़त न दें तो नमाज़ और रोज़ों की क़ज़ा की उजरत माल के तीसरे हिस्से से देनी चाहिए और अगर उसमें से कुछ बच जाए तो वसीयत करने वाले ने जो मुस्तहब काम मुअय्यन किया हो उस पर ख़र्च करना चाहिए।
2734. अगर कोई शख़्स कहे कि मरने वाले ने वसीयत की थी कि इतनी रक़म मुझे दी जाए तो अगर दो आदिल मर्द उसके क़ौल की तस्दीक़ कर दें या वह क़सम खाए और एक आदिल शख़्स उसके क़ौल की तस्दीक़ कर दे या एक आदिल मर्द और दो आदिल औरतें या फिर चार आदिल औरतें उसके क़ौल की गवाही दें तो जितनी मिक़्दार वह बताए उसे दे देनी ज़रूरी है और अगर एक आदिल औरत गवाही दे तो ज़रूरी है कि जिस चीज़ का वह मुतालबा कर रहा हो उसका चौथाई हिस्सा उसे दिया जाए और अगर दो आदिल औरतें गवाही दें तो उसका निस्फ़ दिया जाए और अगर तीन आदिल औरतें गवाही दें तो उसका तीन चौथाई दिया जाए नीज़ अगर दो किताबी काफ़िर मर्द अपने मज़हब में आदिल हों उसके क़ौल की तस्दीक़ करें तो उस सूरत में जबकि मरने वाला वसीयत करने पर मजबूर हो गया हो और आदिल मर्द और औरतें भी वसीयत के मौक़े पर मौजूद न रहे हों तो वह शख़्स मुतवफ़्फ़ी के माल से जिस चीज़ का मुतालबा कर रहा हो वह उसे दे देनी ज़रूरी है।
2735. अगर कोई शख़्स कहे कि मैं मुतवफ़्फ़ी का वसी हूँ ताकि उसके माल को फ़लां मसरफ़ में ले आऊं या कहे कि मुतवफ़्फ़ी ने मुझे अपने बच्चों का निगरां मुक़र्रर किया था तो उसका क़ौल उस सूरत में क़बूल करना चाहिए जबकि दो आदिल मर्द उसके क़ौल की तस्दीक़ करें।
2736. अगर मरने वाला वसीयत करे कि उसके माल की इतनी मिक़्दार फ़लां शख़्स की होगी और वह शख़्स वसीयत को क़बूल करने या रद करने से पहले मर जाए तो जब तक उसके वरसा वसीयत को रद न कर दें वह उस चीज़ को क़बूल कर सकते हैं लेकिन यह हुक्म उस सूरत में है कि वसीयत करने वाला अपनी वसीयत से मुन्हरिफ़ न हो जाए वर्ना वह (यअनी वसी या उसके वरसा) उस चीज़ पर कोई हक़ नहीं रखते।
मीरास के अहकाम
2737. जो अशख़ास मुतवफ़्फ़ी से रिश्तेदारी की बिना पर तर्का पाते हैं उनके तीन गुरोह हैं –
1. पहला गुरोह मुतवफ़्फ़ी का बाप, मां और औलाद हैं। और औलाद के न होने की सूरत में औलाद की औलाद है। जहां तक यह सिलसिला नीचे चला जाए। उन में से जो कोई मुतवफ़्फ़ी से ज़्यादा क़रीब हो वह तर्का पाता है और जब तक उस गुरोह में से एक शख़्स भी मौजूद हो दूसरा गुरोह तर्का नहीं पाता।
2. दूसरा गुरोह – दादा, दादी, नाना, नानी, बहन और भाई हैं। और भाई और बहन न होने की सूरत में उनकी औलाद हैं। उनमें से जो कोई मुतवफ़्फ़ी से ज़्यादा करीब हो वह तर्का पाता है। और जब तक उस गुरोह में से एक शख़्स भी मौजूद हो तीसरा गुरोह तर्का नहीं पाता।
3. तीसरा गुरोह – चचा, फुफी, मामू, खाला और उनकी औलाद है और जब तक मुतवफ़्फ़ी के चचाओं, फुफियों और ख़ालाओं में से एक शख़्स भी ज़िन्दा हो उनकी औलाद तर्का नहीं पाती लेकिन अगर मुतवफ़्फ़ी का पदरी चचा और मां बाप दोनों की तरफ़ से चचाज़ाद भाई मौजूद हो तो तर्का बाप और मां की तरफ़ से चचाज़ाद भाइयों को मिलेगा और पदरी चचा को नहीं मिलेगा लेकिन अगर चचा या चचाज़ाद भाई मुतअद्दिद हों या मुतवफ़्फ़ी की बीवी ज़िन्दा हो – तो यह हुक्म इश्काल से ख़ाली नहीं है।
2738. अगर खुद मुतवफ़्फ़ी का चचा, फुफी, मामूं, ख़ाला और उनकी औलाद या औलाद न हो तो उसके बाप और मां के चचा, फुफी, मामूं और खाला तर्का पाते हैं। और अगर वह न हों तो उनकी औलाद तर्का पाती हैं और अगर वह भी न हों तो मुतवफ़्फ़ी के दादा, दादी और नाना, नानी के चचा, फुफी, मामूं और खाला तर्का पाते हैं और अगर वह भी न हों तो उनकी औलाद तर्का पाती है।
2739. बीवी और शौहर जैसा कि बाद में तफ़्सील से बताया जायेगा एक दूसरे से तर्का पाते हैं।
पहले गुरोह की मीरास
2740. अगर पहले गुरोह में से सिर्फ़ एक शख़्स मुतवफ़्फ़ी का वारिस हो मसलन बाप या मां या एक लौता बेटा या एक लौती बेटी हो तो मुतवफ़्फ़ी का तमाम माल उसे मिलता है और अगर बेटे और बेटियां वारिस हों तो माल को यूं तक़्सीम किया जाता है कि हर बेटा बेटी से दुगना हिस्सा पाता है।
2741. अगर मुतवफ़्फ़ी के वारिस फ़क़त उसका बाप और उसकी मां हो तो माल के तीन हिस्से किये जाते हैं जिनमें से दो हिस्से बाप और एक हिस्सा मां को मिलता है। लेकिन अगर मुतवफ़्फ़ी के दो भाई या चार बहनें या एक भाई और दो बहनें हों जो सब के सब मुसलमान, आज़ाद और एक बाप की औलाद हों ख़्वाह उनकी मां हक़ीक़ी हो या सौतेली हो और कोई भी मां हामिला न हो तो अगरचे वह मुतवफ़्फ़ी के बाप और मां के होते हुए तर्का नहीं पाते लेकिन उनके होने की वजह से मां को माल का छठा हिस्सा मिलता है और बाक़ी माल बाप को मिलता है।
2742. जब मुतवफ़्फ़ी के वारिस फ़क़त उसका बाप, मां और एक बेटी हो लिहाज़ा अगर उसके गुज़श्ता मस्अले में बयान कर्दा शराइत रखने वाले दो पदरी भाई या चार पदरी बहनें या एक पदरी भाई और दो पदरी बहनें न हों तो माल के पांच हिस्से किये जाते हैं। बाप और मां उनमें से एक एक हिस्सा लेते हैं और बेटी तीन हिस्से लेती है। और अगर मुतवफ़्फ़ी के साबिक़ा बयान कर्दा शराइत वाले दो पदरी भाई या चार पदरी बहनें या एक पदरी भाई और दो पदरी बहनें भी हों तो एक क़ौल के मुताबिक़ माल के – साबिक़ा तरतीब के मुताबिक़ – पांच हिस्से किये जायेंगे और उन अफ़राद के वुजूद से कोई असर नहीं पड़ता लेकिन (उलमा के बीच) मशहूर यह है कि इस सूरत में माल छः हिस्सों में तक़्सीम होगा। उस में से बाप और मां को एक एक हिस्सा और बेटी को तीन हिस्से मिलते हैं और जो एक हिस्सा बाक़ी बचेगा उसके फिर चार हिस्से किये जायेंगे जिस में से एक हिस्सा बाप को और तीन हिस्से बेटी हो मिलते हैं। नतीजे के तौर पर मुतवफ़्फ़ी के माल के 24 हिस्से किये जाते हैं जिनमें से 15 हिस्से बेटी को, 5 हिस्से बाप को और 4 हिस्से मां को मिलते हैं। चूंकि यह हुक्म इश्काल से खाली नहीं इस लिए मां के हिस्से में 1/5 और 1/6 में जो फ़र्क़ है उसमें एहतियात को तर्क न किया जाए।
2743. अगर मुतवफ़्फ़ी के वारिस फ़क़त उसका बाप, मां और एक बेटा हो तो माल के छः हिस्से किये जाते हैं जिन में से बाप और मां को एक एक हिस्सा और बेटे को चार हिस्से मिलते हैं और अगर मुतवफ़्फ़ी के (सिर्फ़) चन्द बेटे हों या (सिर्फ़) चन्द बेटियां हों तो वह उन चार हिस्सों को आपस में मुसावी तौर पर तक़्सीम कर लेते हैं और अगर बेटे भी हों तो उन चार हिस्सों को इस तरह तक़्सीम किया जाता है कि हर बेटे को एक बेटी से दुगना हिस्सा मिलता है।
2744. अगर मुतवफ़्फ़ी के वारिस फ़क़त बाप या मां और एक या कई बेटे हों तो माल के छ हिस्से किये जाते हैं जिनमें से एक हिस्सा बाप या मां को और पांच हिस्से बेटे को मिलते हैं और अगर कई बेटे हों तो उन पांच हिस्सों को आपस में मुसावी तौर पर तक़्सीम कर लेते हैं।
2745. अगर बाप या मां मुतवफ़्फ़ी के बेटों और बेटियों के साथ उसके वारिस हों तो माल के छः हिस्से किये जाते हैं जिनमें से एक हिस्सा बाप या मां को मिलता है और बाक़ी हिस्सों में यूं तक़्सीम किया जाता है कि हर बेटे को बेटी से दुगना मिले।
2746. अगर मुतवफ़्फ़ी के वारिस फ़क़त बाप या मां और एक बेटी हो तो माल के चार हिस्से किये जाते हैं जिनमें से एक हिस्सा बाप या मां को और बाक़ी तीन हिस्से बेटी को मिलते हैं।
2747. अगर मुतवफ़्फ़ी के वारिस फ़क़त बाप या मां और चन्द बेटियां हों तो माल के पांच हिस्से किये जाते हैं उनमें से एक हिस्सा बाप या मां को मिलता है और चार हिस्से बेटियां आपस में मुसावी तौर पर तक़्सीम कर लेती हैं।
2748. अगर मुतवफ़्फ़ी की औलाद न हो तो उसके बेटे की औलाद – ख़्वाह वह बेटी ही क्यों न हो – मुतवफ़्फ़ी के बेटे का हिस्सा पाती है और बेटी की औलाद – ख़्वाह वह बेटा ही क्यों न हो – मुतवफ़्फ़ी की बेटी का हिस्सा पाती है। मसलन अगर मुतवफ़्फ़ी का एक नवासा (बेटी का बेटा) और एक पोती (बेटे की बेटी) हो तो माल के तीन हिस्से किये जायेंगे जिन में से एक हिस्सा नवासे को और दो हिस्से पोती को मिलेंगे।
दूसरे गुरोह की मीरास
2749. जो लोग रिश्तेदारी की बिना पर मीरास पाते हैं उन का दूसरा गुरोह मुतवफ़्फ़ी का दादा, दादी, नाना, नानी, भाई और बहने हैं और अगर उसके भाई बहनें न हों तो उनकी औलाद मीरास पाती है।
2750. अगर मुतवफ़्फ़ी का वारिस फ़क़त एक भाई या एक बहन हो तो सारा माल उस को मिलता है और अगर कई सगे भाई या कई सगी बहने हों तो माल उन में बराबर बराबर तक़्सीम हो जाता है और अगर सगे भाई भी हों और बहनें भी तो हर भाई को बहन से दुगना हिस्सा मिलता है। मसलन अगर मुतवफ़्फ़ी के दो सगे भाई और एक सगी बहन हो तो माल के पांच हिस्से किये जायेंगे जिन में से हर भाई को दो हिस्से मिलेंगे और बहन को एक हिस्सा मिलेगा।
2751. अगर मुतवफ़्फ़ी के सगे भाई बहन मौजूद हों तो पदरी भाई और बहनें जिन की मां मुतवफ़्फ़ी की सौतेली मां हो मीरास नहीं पाते और अगर उसके सगे भाई बहन न हों और फ़क़त एक पदरी भाई हो या एक पदरी बहन हो तो सारा माल उसको मिलता है। और अगर उसके कई पदरी भाई या कई पदरी बहनें हों तो माल उनके दरमियान मुसावी तौर पर तक़्सीम हो जाता है और अगर उसके पदरी भाई भी हों और पदरी बहनें भी हो तो हर भाई को बहन से दुगना हिस्सा मिलता है।
2752. अगर मुतवफ़्फ़ी का वारिस फ़क़त एक मादरी बहन या भाई हो जो बाप की तरफ़ से मुतवफ़्फ़ी की सौतेली बहन या सौतेला हो तो सारा माल उसे मिलता है और अगर चन्द मादरी भाई हों या चन्द मादरी बहनें हों या चन्दा मादरी भाई और बहनें हों तो माल उन के दरमियान मुसावी तौर पर तक़्सीम हो जाता है।
2753. अगर मुतवफ़्फ़ी के सगे भाई बहनें और पदरी भाई बहनें और एक मादरी भाई या एक मादरी बहन हो तो पदरी भाई बहनों को तर्का नहीं मिलता और माल के छः हिस्से किये जाते हैं जिनमें से एक हिस्सा मादरी भाई या मादरी बहन को मिलता है और बाक़ी हिस्से सगे भाई बहनों को मिलते हैं और हर भाई दो बहनों के बराबर हिस्सा पाता है।
2754. अगर मुतवफ़्फ़ी के सगे भाई बहनें और पदरी भाई बहनें और चन्द मादरी भाई बहनें हों तो पदरी भाई बहनों को तर्का नहीं मिलता और माल के तीन हिस्से किये जाते हैं जिन में से एक हिस्सा मादरी भाई बहनें आपस में बराबर बराबर तक़्सीम करते हैं और बाक़ी दो हिस्से सगे भाई बहनों को इस तरह दिये जाते हैं कि हर भाई का हिस्सा बहन से दुगना होता है।
2755. अगर मुतवफ़्फ़ी के वारिस सिर्फ़ पदरी भाई बहनें और एक मादरी भाई या एक मादरी बहन हों तो माल के छः हिस्से किये जाते हैं। उन में से एक हिस्सा मादरी भाई या मादरी बहन को मिलता है और बाक़ी हिस्से पदरी बहन भाइयों में इस तरह तक़्सीम किये जाते हैं कि हर भाई को बहन से दुगना हिस्सा मिलता है।
2756. अगर मुतवफ़्फ़ी के वारिस फ़क़त पदरी भाई बहनें और चन्द मादरी भाई बहनें हों तो माल के तीन हिस्से किये जाते हैं। उनमें से एक हिस्सा मादरी भाई बहनें आपस में बराबर बराबर तक़्सीम कर लेते हैं और बाक़ी दो हिस्से पदरी बहन भाइयों को इस तरह मिलते हैं कि हर भाई का हिस्सा बहन से दुगना होता है।
2757. अगर मुतवफ़्फ़ी के वारिस फ़क़त उसके भाई बहनें और बीवी हों तो बीवी अपना तर्का उस तफ़्सील के साथ लेगी जो बाद में बयान की जायेगी और भाई बहनें अपना तर्का उस तरह लेंगे जैसे कि गुज़श्ता मसाइल में बताया गया है नीज़ अगर कोई औरत मर जाए और उसके वारिस फ़क़त उसके भाई बहनें और शौहर हों तो निस्फ़ माल शौहर को मिलेगा और बहनें और भाई उस तरीक़े से तर्का पायेंगे जिसका ज़िक्र गुज़श्ता मसाइल में किया गया है लेकिन बीवी या शौहर के तर्का पाने की वजह से मादरी भाई बहनों के हिस्से में कोई कमी नहीं होगी ताहम सगे भाई बहनों या पदरी भाई बहनों के हिस्से में कमी होगी मसलन अगर किसी मुतवफ़्फ़िया क वारिस उस का शौहर और मादरी बहन भाई और सगे बहन भाई हों तो निस्फ़ माल शौहर को मिलेगा और अस्ल माल के तीन हिस्सों में से एक हिस्सा मादरी बहन भाइयों को मिलेगा और जो कुछ बचे वह सगे बहन भाइयों का माल होगा। पस अगर उस का कुल माल छः रुपये हो तो तीन रुपये शौहर को और दो रुपये मादरी बहन भाइयों को और एक रुपया सगे बहन भाइयों को मिलेगा।
2758. अगर मुतवफ़्फ़ी के भाई बहनें न हों तो उनके तर्के का हिस्सा उनकी (यअनी भाई बहनों की) औलाद को मिलेगा और मादरी भाई बहनों की औलाद का हिस्सा उन के माबैन बराबर तक़्सीम होता है और जो हिस्सा पदरी भाई बहनों की औलाद या सगे भाई बहनों की औलाद को मिलता है उसके बारे में मशहूर है कि हर लड़का दो लड़कियों के बराबर हिस्सा पाता है लेकिन कुछ बईद नहीं है कि उनके माबैन भी तर्का बराबर बराबर तक़्सीम हो और अहवत यह है कि वह मुसालहत की जानिब रुजूउ करें।
2759. अगर मुतवफ़्फ़ी का वारिस फ़क़त दादा या फ़क़त दादी या फ़क़त नाना या फ़क़त नानी हों तो मुतवफ़्फ़ी का तमाम माल उसे मिलेगा और अगर मुतवफ़्फ़ी का दादा या नाना मौजूद हो तो उसके बाप (यअनी मुतवफ़्फ़ी के परदादा या परनाना) को तर्का नहीं मिलता और अगर किसी मुतवफ़्फ़ी के वारिस फ़क़त उसके दादा और दादी हों तो माल के तीन हिस्से किये जाते हैं जिन में से दो हिस्से दादा को और एक हिस्सा दादी को मिलता है और अगर वह नाना और नानी हों तो वह माल को बराबर बराबर तक़्सीम कर लेते हैं।
2760. अगर मुतवफ़्फ़ी के वारिस एक दादा या दादी और एक नाना या नानी हों तो माल के तीन हिस्से किये जायेंगे जिन में से दो हिस्से दादा या दादी को मिलेंगे और एक हिस्सा नाना या नानी को मिलेगा।।
2761. अगर मुतवफ़्फ़ी के वारिस दादा और दादी और नाना और नानी हों तो माल के तीन हिस्से किये जाते हैं जिन में से एक हिस्सा नाना और नानी आपस में बराबर बराबर तक़्सीम कर लेते हैं और बाक़ी दो हिस्से दादा और दादी को मिलते हैं जिन में दादा का हिस्सा दो तिहाई होता है।
2762. अगर मुतवफ़्फ़ी के वारिस फ़क़त उसकी बीवी और दादा, दादी और नाना, नानी हों तो बीवी अपना हिस्सा उस तफ़्सील के मुताबिक़ लेती है जो बाद मे बयान होगी और अस्ल माल के तीन हिस्सों में से एक हिस्सा नाना और नानी को मिलता है और वह आपस में बराबर बराबर तक़्सीम कर लेते हैं और बाक़ी मांदा (यअनी बीवी और नाना, नानी के बाद जो कुछ बचे) दादा और दादी को मिलता है जिस में से दादा, दादी के मुक़ाबिले में दुगना लेता है। और अगर मुतवफ़्फ़ी के वारिस उसका शौहर और दादा या नाना और दादी या नानी हों तो शौहर को निस्फ़ माल मिलता है और दादा, नाना और दादी, नानी उन अहकाम के मुताबिक़ तर्का पाते हैं जिनका ज़िक्र गुज़श्ता मसाइल में हो चुका है।
2763. भाई, बहन, भाईयों, बहनों के साथ दादा, दादी या नाना, नानी और दादाओं, दादियों या नानाओं नानियों के इज्तिमाअ की चन्द सूरतें हैं –
1. नाना या नानी और भाई या बहन सब मां की तरफ़ से हों। उस सूरत में माल उन के दरमियान मुसावी तौर पर तक़्सीम हो जाता है अगरचे वह मुज़क्कर और मुवन्नस की हैसियत से मुख़्तलिफ़ हों।
2. दादा या दादी के साथ भाई या बहन बाप की तरफ़ से हों। उस सूरत में भी उन के माबैन माल मुसावी तौर पर तक़्सीम होता है बशर्ते कि वह सब मर्द हों और सब औरतें हों और अगर मर्द और औरतें हों तो फिर वह मर्द हर औरत के मुक़ाबिले में दुगना हिस्सा लेता है।
3. दादा या दादी के साथ भाई या बहन मां और बाप की तरफ़ से हों उस सूरत में भी वही हुक्म है वो गुज़श्ता सूरत में है और यह जानना चाहिये कि अगर मुतवफ़्फ़ी के पदरी भाई या बहन, सगे भाई या बहन के साथ जम्अ हो जायें तो तन्हा पदरी भाई या बहन मीरास नहीं पाते (बल्कि सभी पाते हैं)।
4. दादे, दादियां और नाने नानियां हों ख़्वाह वह सब के सब मर्द हों या औरतें या मुख़्तलिफ़ हों या इसी तरह सगे भाई और बहनें हों उस सूरत में जो मादरी रिश्तेदार भाई, बहन और नाने नानियां हों तर्के में उन का एक तिहाई हिस्सा है और उन के दरमियान बराबर तक़्सीम हो जाता है। ख़्वाह वह मर्द और औरत की हैसियत से एक दूसरे से मुख़्तलिफ़ हों और उन में से जो पदरी रिश्तेदार हों उनका हिस्सा दो तिहाई है जिन में से हर मर्द को हर औरत के मुक़ाबिले में दुगना मिलता है और अगर उन में कोई फ़र्क़ न हो और सब मर्द और सब औरतें हों तो फिर वह तर्का उन में बराबर बराबर तक़्सीम हो जाता है।
5. दादा, दादी या मां की तरफ़ से भाई, बहन के साथ जमअ हो जायें उस सूरत में अगर बहन या भाई बिलफ़र्ज़ एक हो तो उसे माल का छठा हिस्सा मिलता है और अगर कई हों तो तीसरा हिस्सा उन के दरमियान बराबर बराबर तक़्सीम हो जाता है और जो बाक़ी बचे वह दादा या दादी का माल है और अगर दादा या दादी दोनों हों तो दादा को दादी के मुक़ाबिले में दुगना हिस्सा मिलता है।
6. नाना या नानी बाप की तरफ़ से भाई के साथ जमा हो जायें। उस सूरत में नाना या नानी का तीसरा हिस्सा है ख़्वाह उन में से एक ही हो और दो तिहाई भाई का हिस्सा है ख़्वाह वह भी एक ही हो और अगर उस नाना या नानी के साथ बाप की तरफ़ से बहन हो और वह एक ही हो तो वह आधा हिस्सा लेती है और अगर कई बहनें हों तो दो तिहाई लेती हैं और हर सूरत में नाना या नानी का हिस्सा एक तिहाई ही है और अगर बहन एक ही हो तो सब के हिस्से देकर तर्के का छठा हिस्सा बच्च जाता है और उसके बारे में एहतियाते वाजिब मुसालहत में है।
7. दादा या दादियां हों और कुछ नाना नानियां हों और उन के साथ पदरी भाई या बहन हो ख़्वाह वह एक ही हो या कई हों उस सूरत में नाना या नानी का हिस्सा एक तिहाई है और अगर वह ज़्यादा हों तो यह उन के माबैन मुसावी तौर पर तक़्सीम हो जाता है ख़्वाह वह मर्द और औरत की हैसियत से मुख़्तलिफ़ ही हों और बाक़ी मांदा दो तिहाई दादे या दादी और पदरी भाई या बहन का है और अगर वह मर्द और औरत की हैसियत से मुख़्तलिफ़ हों तो फ़र्क़ के साथ और अगर मुख़्तलिफ़ न हों तो बराबर में तक़्सीम हो जाता है। और अगर उन दादों, नानों या दादियों, नानियों के साथ मादरी भाई या बहन हों तो नाना या नानी का हिस्सा मादरी भाई या बहन के साथ एक तिहाई है जो उन के दरमियान बराबर बराबर तक़्सीम हो जाता है अगरचे वह बहैसियत मर्द और औरत एक दूसरे से मुख़्तलिफ़ हों और दादा या दादी का हिस्सा दो तिहाई हैं जो उन के माबैन इख़्तिलाफ़ की सूरत में (यअनी बहैसियत मर्द और औरत इख़तिलाफ़ की सूरत में) फ़र्क़ के साथ वर्ना बराबर बराबर तक़्सीम हो जाता है।
8. भाई और बहनें हों जिन में से कुछ पदरी और कुछ मादरी हों और उन के साथ दादा या दादी हों उस सूरत में अगर मादरी भाई या बहन एक हो तो तर्के में उसका छठा हिस्सा है और अगर एक से ज़्यादा हों तो तीसरा हिस्सा है जो उन के माबैन बराबर बराबर तक़्सीम हो जाता है और बाक़ी तर्का पदरी भाई या बहन और दादा या दादी का है जो उन के बहैसियत मर्द और औरत मुख़्तलिफ़ न होने की सूरत में उन के माबैन बराबर बराबर तक़्सीम हो जाता है और मुख़्तलिफ़ होने की सूरत में फ़र्क़ से तक़्सीम होता है और अगर उन भाईयों या बहनों के साथ नाना या नानी हों तो नाना या नानी और मादरी भाईयों या बहनों को मिला कर सब का हिस्सा एक तिहाई होता है और उन के माबैन बराबर बराबर तक़्सीम हो जाता है और पदरी भाईयों या बहनों का हिस्सा दो तिहाई होता है और जो उन में बहैसियत मर्द और औरत इख़्तिलाफ़ की सूरत में फ़र्क़ से और इख़तिलाफ़न होने की सूरत में बराबर बराबर तक़्सीम हो जाता है।
2764. अगर मुतवफ़्फ़ी के भाई या बहनें हों तो भाईयों या बहनों की औलाद को मीरास नहीं मिलती लेकिन अगर भाई की औलाद और बहन की औलाद का मीरास पाना भाईयों और बहनों की मीरास से मुज़ाहिम न हो तो फिर इस हुक्म का इतलाक़ नहीं होता। मसलन अगर मुतवफ़्फ़ी का पदरी भाई और नाना हो तो पदरी भाई को मीरास के दो हिस्सा और नाना को एक तिहाई हिस्सा मिलेगा और उस सूरत में अगर मुतवफ़्फ़ी के मादरी भाई का बेटा भी हो तो भाई का बेटा नाना के साथ एक तिहाई में शरीक हो जाता है।
तीसरे गुरोह की मीरास
2765. मीरास पाने वालों के तीसरे गुरोह में चचा, फुफी, मामूं और ख़ाला और उन की औलाद हैं। और जैसा कि बयान हो चुका है अगर पहले और दूसरे गुरोह में से कोई वारिस मौजूद न हो तो फिर यह लोग तर्का पाते हैं।
2766. अगर मुतवफ़्फ़ी का वारिस फ़क़त एक चचा या एक फुफी हो तो ख़्वाह वह सगा हो यअनी वह और मुतवफ़्फ़ी एक मां बाप की औलाद हों या पदरी हों या मादरी हो सारा माल उसे मिलता है और अगर चन्दा चचा या चन्द फुफियां हों और वह सब सगे या सब पदरी हों तो उन के दरमियान माल बराबर तक़्सीम होगा। और अगर चचा और फुफियां दोनों हों और सब सगे हों या सब पदरी हों तो बिनाबरे अक़्वा चचा को फुफियों से दुगना हिस्सा मिलता है। मसलन अगर दो चचा और एक फुफी मुतवफ़्फ़ी के वारिस हों तो माल पांच हिस्सों में तक़्सीम किया जाता है जिस में से एक हिस्सा फुफी को मिलता है और बाक़ीमांदा चार हिस्सों को दोनों चचा आपस में बराबर बराबर तक़्सीम कर लेंगे।
2767. अगर मुतवफ़्फ़ी के वारिस फ़क़त कुछ मादरी चचा या कुछ मादरी फुफियां हों तो मुतवफ़्फ़ी का माल उन के माबैन मुसावी तौर पर तक़्सीम होगा और अगर वारिस मादरी चचा और मादरी फुफी हो तो चचा को फुफी से दो गुना तर्का मिलेगा अगरचे एहतियात यह है कि चचा को जितना ज़्यादा हिस्सा मिला है उस पर बाहम तस्फ़िया करें।
2768. अगर मुतवफ़्फ़ी के वारिस चचा और फुफियां हों और उन में से कुछ पदरी और कुछ मादरी और कुछ सगे हों और पदरी चचाओं और फुफियों को तर्का नहीं मिलता और अक़्वा यह है कि अगर मुतवफ़्फ़ी का एक मादरी चचा या एक मादरी फुफी हो तो माल के छः हिस्से किये जाते हैं जिन में से एक हिस्सा मादरी चचा या फुफी को दिया जाता है और बाक़ी हिस्से सगे चचाओं और फुफियों को मिलते हैं और बिल फ़र्ज़ अगर सगे चचा और फुफियां न हों तो वह हिस्से पदरी चचाओं और फुफियों को मिलते हैं। और अगर मुतवफ़्फ़ी के मादरी चचा और मादरी फुफियां भी हों तो माल के तीन हिस्से किये जाते हैं जिन में से दो हिस्से सगे चचाओं और फुफियों को मिलते हैं और बिल फ़र्ज़ अगर सगे चचा और फुफियां न हों तो पदरी चचा और पदरी फुफी को तर्का मिलता है और एक हिस्सा मादरी चचा और फुफी को मिलता है और मशहूर यह है कि मादरी चचा और मादरी फुफी का हिस्सा उन के माबैन बराबर बराबर तक़्सीम होगा लेकिन बईद नहीं कि चचा को फुफी से दुगना हिस्सा मिले अगरचे एहतियात इस में है कि बाहम तसफ़िया करें।
2769. अगर मुतवफ़्फ़ी का वारिस फ़क़त एक मामूं या एक ख़ाला हो तो सारा माल उसे मिलता है और अगर कई मामूं भी हों और ख़ालायें भी हों और सब सगे या पदरी या मादरी हों तो बईद नहीं कि मामूं को ख़ाला से दुगना तर्का मिले लेकिन बराबर मिलने का एहतिमाल भी है लिहाज़ा एहतियात को तर्का नहीं करना चाहिए।
2770. अगर मुतवफ़्फ़ी का वारिस फ़क़त एक या चन्द मादरी मामूं या ख़लायें और सगे मामूं और ख़लायें हों और पदरी मामूं और ख़लायें हों तो पदरी मामुओं और ख़ालाओं को तर्का न मिलना महल्ले इश्काल है। बहरहाल बईद नहीं कि मामूं को ख़ाला से दुगना हिस्सा मिले। लेकिन एहतियातन बाहम रिज़ामन्दी से मुआमला करना चाहिए।
2771. अगर मुतवफ़्फ़ी के वारिस एक या चन्द मामूं या एक या चन्द ख़ालायें या मामूं और ख़ाला और एक या चन्द चचा या एक या चन्द फुफियां या चचा और फुफी हों तो माल तीन हिस्सों में तक़्सीम किया जाता है। उन में से एक हिस्सा मामूं या ख़ाला को या दोनों को मिलता है और बाक़ी दो हिस्से चचा या फुफी को या दोनों को मिलते हैं।
2772. अगर मुतवफ़्फ़ी के वारिस एक मामूं या एक ख़ाला और चचा और फुफी हों तो अगर चचा और फुफी सगे हों या पदरी हों तो माल के तीन हिस्से किये जाता हैं उन में से एक हिस्सा मामूं या ख़ाला को मिलता है, और अक़्वा की बिना पर बाक़ी में से दो हिस्से चचा को और एक हिस्सा फुफी को मिलता है, लिहाज़ा माल के नौ हिस्से होंगे जिन में से तीन हिस्से मामूं या ख़ाला को और चार हिस्से चचा को और दो हिस्से फुफी को मिलेंगे।
2773. अगर मुतवफ़्फ़ी के वारिस एक मामूं या एक ख़ाला और एक मादरी चचा या एक मादरी फुफी और सगे या पदरी चचा और फुफियां हों तो माल को तीन हिस्सों में तक़्सीम किया जाता है जिन में से एक हिस्सा मामूं या ख़ाला को दिया जाता है। और बाक़ी दो हिस्सों को चचा और फुफी आपस में तक़्सीम करेंगे और बईद नहीं कि चचा को फुफी से दुगना हिस्सा मिले अगरचे एहतियात का ख़्याल रखना बेहतर है।
2774. अगर मुतवफ़्फ़ी के वारिस चन्द मामूं या चन्द ख़ालायें हों जो सगे या पदरी या मादरी हों और उसके चचा और फुफियां भी हों तो माल के तीन हिस्से किये जाते हैं। उन में से दो हिस्से उस दस्तूर के मुताबिक़ जो बयान हो चुका है चचाओं और फुफियों के माबैन तक़्सीम हो जाते हैं और बाक़ी एक हिस्सा मामूं और ख़ालायें, जैसा कि मस्अला 2770 में गुज़र चुका है, आपस मे तक़्सीम करेंगे।
2775. अगर मुतवफ़्फ़ी के वारिस मादरी मामूं या चन्द ख़ालायें और चन्द सगे मामूं और ख़ालायें हों या फ़क़त पदरी मामूं और ख़ालायें और चचा व फुफी हों तो माल के तीन हिस्से किये जाते हैं। उन में से दो हिस्से, उस दस्तूर के मुताबिक़ जो बयान हो चुका है चचा और फुफी आपस में तक़्सीम करेंगे और बईद नहीं कि बाक़ी मांदा तीसरे हिस्से की तक़्सीम में बाक़ी वरसा के हिस्से बराबर हों।
2776. अगर मुतवफ़्फ़ी के चचा और फुफियां और मामूं और ख़ालायें न हों तो माल की जो मिक़्दार चचाओं और फुफियों को मिलना चाहिए वह उन की औलाद को और जो मिक़्दार मामुओं और ख़ालाओं को मिलनी चाहिए वह उन की औलाद को दी जाती है।
2777. अगर मुतवफ़्फ़ी के वारिस उस के बाप के चचा, फुफियां, मामूं और ख़ालायें और उस की मां के चचा, फुफियां, मामूं और ख़ालायें हों तो माल के तीन हिस्से किये जाते हैं। उन में से एक हिस्सा मुतवफ़्फ़ी की मां के चचाओं, फ़ुफियों और ख़ालाओं को बतौर मिरास मिलेगा। और मशहूर क़ौल की बिना पर माल उन क दरमियान बराबर बराबर तक़्सीम कर दिया जायेगा लेकिन एहतियात के तौर पर मुसालहत का ख़्याल रखना चाहिए। और बाक़ी दो हिस्सों के तीन हिस्से किये जाते हैं और उन में से एक हिस्सा मुतवफ़्फ़ी के बाप के मामूं और ख़ालायें (यअनी नन्हियाली रिश्तेदार) उसकी कैफ़ियत के मुताबिक़ आपस में बराबर बराबर बांट लेते हैं और बाक़ी दो हिस्से भी उसी कैफ़ीयत के मुताबिक़ मुतवफ़्फ़ी के बाप के चचाओं और फुफियों (यअनी दधियाली रिश्तेदारों) को मिलता हैं।
बीवी और शौहर की मीरास
2778. अगर कोई औरत बे औलाद मर जाए तो उसके सारे माल का निस्फ़ हिस्सा शौहर को और बाक़ी मांदा दूसरे वरसा को मिलता है। और अगर किसी औरत की पहले शौहर से या किसी और शौहर से औलाद हो तो सारे माल का चौथाई हिस्सा शौहर को और बाक़ी मांदा दूसरे वरसा को मिलता है।
2779. अगर कोई आदमी मर जाए और उस की कोई औलाद न हो तो उसके माल का चौथाई हिस्सा उसकी बीवी को और बाक़ी दूसरे वरसा को मिलता है। और अगर उस आदमी की उस बीवी से या किसी और बीवी से औलाद हो तो माल का आठवां हिस्सा बीवी को और बाक़ी दूसरे वरसा को मिलता है। और घर की ज़मीन, बाग़, खेत और दूसरी ज़मीनों में से औरत खुद ज़मीन बतौरे मीरास हासिल करती है और न ही उस की क़ीमत में से कोई तर्का पाती है। नीज़ वह घर की फ़ज़ां में क़ायम चीज़ों मसलन इमारत और दरख़्तों से तर्का नहीं पाती लेकिन उन की क़ीमत की सूरत में तर्का पाती है, और जो दरख़्त, खेत और इमारतें बाग़ की ज़मीन, मज़रूआ ज़मीन और दूसरी ज़मीनों में हो उन का भी यही हुक्म है।
2780. जिन चीज़ों में से औरत तर्का नहीं पाती मसलन रहायशी मकान की ज़मीन अगर उन में तसर्रुफ़ करना चाहे तो ज़रूरी है कि वरसा से इजाज़त ले और वरसा जब तक औरत का हिस्सा न दे दें उन के लिए जायज़ नहीं कि उस की इजाज़त के बग़ैर उन चीज़ों में मसलन इमारतों और दरख़्तों में तसर्रुफ़ करें जिन की क़ीमत से वह तर्का पाती है।
2781. अगर इमारत और दरख़्त वग़ैरा की क़ीमत लगाना मक़्सूद हो तो जैसा कि क़ीमत लगाने वालों का मअमूल होता है कि जिस ज़मीन में वह है उस की ख़ुसूसियत को पेशे नज़र रखे बग़ैर उन का हिसाब करें कि उन की कितनी क़ीमत है, न कि उन्हें ज़मीन से उखड़े हुए फ़र्ज़ कर के उन की क़ीमत लगायें और न ही उन की क़ीमत का हिसाब इस तरह करें कि वह बग़ैर किराए के उस ज़मीन में उसी हालत में बाक़ी रहें यहां तक कि उजड़ जायें।
2782. नहरों का पानी बहने की जगह और इसी तरह की दूसरी जगह ज़मीन का हुक्म रखती है और ईंटें और दूसरी चीज़ें जो उस में लगाई गई हों वह इमारत के हुक्म में हैं।
2783. अगर मुतवफ़्फ़ी की एक से ज़्यादा बीवियां हों लेकिन औलाद कोई न हो तो माल का चौथा हिस्सा और अगर औलाद हो तो माल का आठवां हिस्सा उस तफ़्सील के मुताबिक़ जिस का बयान हो चुका है सब बीवियों में मुसावी तौर पर तक़्सीम होता है ख़्वाह शौहर ने उन सब के साथ या उन में से बाज़ के साथ हमबिस्तरी न भी की हो। लेकिन अगर उस ने एक ऐसे मरज़ की हालत में जिस मरज़ से उस की मौत वाक़े हुई है किसी औरत से निकाह किया हो और उसे से हम बिस्तरी न की हो तो वह औरत उस से तर्का नहीं पाती और वह महर का हक़ भी नहीं रखती है।
2784. अगर कोई औरत मरज़ की हालत में किसी मर्द से शादी करे और उसी मरज़ में मर जाए तो ख़्वाह मर्द ने उससे हमबिस्तरी न भी की हो तो वह उस के तर्के में हिस्सेदार है।
2785. अगर औरत को उस तरतीब से तलाक़े रजई दी जाए जिस का ज़िक्र तलाक़ के अहकाम में किया जा चुका है और वह इद्दत के दौरान मर जाए तो शौहर उस से तर्का पाता है। इसी तरह अगर शौहर उस इद्दत के दौरान फ़ौत हो जाए तो बीवी उस से तर्का पाती है लेकिन इद्दत गुज़रने के बाद या बाइन तलाक़ की इद्दत के दौरान उन में से कोई एक मर जाए तो दूसरा उस से तर्का नहीं पाता।
2786. अगर शौहर मरज़ की हालत में अपनी बीवी को तलाक़ दे दे और बारह क़मरी महीने गुज़रने से पहले मर जाए तो औरत तीन शर्तें पूरी करने पर उसकी मीरास से तर्का पाती हैः-
1. औरत ने उस मुद्दत में दूसरा शौहर न किया हो और अगर दूसरा शौहर किया हो तो उसे मीरास नहीं मिलेगी अगरचे एहतियात यह है कि सुल्ह कर लें (यअनी मुतवफ़्फ़ी के वरसा औरत से मुसालहत कर लें)।
2. तलाक़ औरत की मरज़ी और दर्ख़्वास्त पर न हुई हो वर्ना उसे मीरास नहीं मिलेगी ख़्वाह तलाक़ हासिल करने के लिए उस ने अपने शौहर को कोई चीज़ दी हो या न दी हो।
3. शौहर ने जिस मरज़ में औरत को तलाक़ दी हो उस मरज़ के दौरान उस मरज़ की वजह से या किसी और वजह से मर गया हो। लिहाज़ा अगर वह उस मरज़ से शिफ़ायाब हो जाए और किसी वजह से मर जाए तो औरत उस से मीरास नहीं पाती।
2787. जो कपड़े मर्द ने अपनी बीवी को पहनने के लिए फ़राहम किये हों अगरचे वह उन कपड़ों को पहन चुकी हो फिर भी शौहर के मरने के बाद वह शौहर के माल का हिस्सा होंगे।
मीरास के मुख़्तलिफ़ मसाइल
2788. मुतवफ़्फ़ी का क़ुरआने मजीद, अंगूठी, तलवार और जो कपड़े वह पहन चुका हो वह बड़े बेटे का माल है और अगर पहली तीन चीज़ों में से मुतवफ़्फ़ी ने कोई चीज़ एक से ज़्यादा छोड़ी हो मसलन उस ने क़ुरआने मजीद के दो नुस्ख़े या दो अंगूठियां छोड़ी हों तो एहतियाते वाजिब यह है कि उस का बड़ा बेटा उन के बारे में दूसरे वरसा को मुसालहत करे और इन चार चीज़ों के साथ रेहल, बन्दूक़, ख़ंजर और उन जैसे दूसरे हथियारों को भी मिला दें तो वजह से ख़ाली नहीं लेकिन एहतियाते वाजिब यह है कि बड़ा बेटा इन चीज़ों से मुतअल्लिक़ दूसरे वरसा से मुसालहत करे।
2789. अगर किसी मुतवफ़्फ़ी के बड़े बेटे एक से ज़्यादा हों मसलन दो बीवियों से दो बेटे बयकवक़्त पैदा हों तो जिन चीज़ों का ज़िक्र किया जा चुका है उन्हें बराबर बराबर आपस में तक़्सीम करें।
2790. अगर मुतवफ़्फ़ी मक़रूज़ हो तो अगर उसका क़र्ज़ उस के माल के बारबर या उस से ज़्यादा हो तो ज़रूरी है कि बड़ा बेटा उस माल से भी उस का क़र्ज़ अदा करे जो उस की मिल्कियत है और जिन का साबिक़ा मस्अले में ज़िक्र किया गया है या उस की क़ीमत के बारबर अपने माल से दे। और अगर मुतवफ़्फ़ी का क़र्ज़ उसके माल से कम हो और ज़िक्रशुदा चन्द चीज़ों के अलावा जो बाक़ी माल उसे मीरास में मिला हो अगर वह भी उस का क़र्ज़ अदा करने के लिए काफ़ी न हो तो ज़रूरी है कि बड़ा बेटा उन चीज़ों से या अपने माल से उस का क़र्ज़ दे और अगर बाक़ी माल क़र्ज़ अदा करने के लिए काफ़ी हो तब भी एहतियाते लाज़िम यह है कि बड़ा बेटा जैसे कि पहले बताया गया है क़र्ज़ अदा करने में शिर्कत करे। मसलन अगर मुतवफ़्फ़ी का तमाम माल साठ रुपये का हो और उन में से बीस रुपये की वह चीज़ें हों जो बड़े बेटे का माल है और उस पर तीस रुपये का क़र्ज़ हो तो बड़े बेटे को चाहिए कि उन चीज़ों में से दस रुपये मुतवफ़्फ़ी के क़र्ज़ के सिलसिले में दे।
2791. मुसलमान काफ़िर से तर्का पाता है लेकिन काफ़िर ख़्वाह वह मुसलमान मुतवफ़्फ़ी का बाप या बेटा ही क्यों न हो उस से तर्का नहीं पाता।
2792. अगर कोई शख़्स अपने रिश्तेदारों में से किसी को जानबूझ कर और नाहक़ क़त्ल कर दे तो वह उस से तर्का नहीं पाता। लेकिन अगर वह शख़्स ग़लती से मारा जाए मसलन अगर कोई शख़्स (ग़ुलेल से) हवा में पत्थर फ़ेंकने (या हवाई फ़ायरिंग करे) और वह इत्तिफ़ाक़न उस के किसी रिश्तेदार को लग जाए और वह मर जाए तो वह मरने वाले से तर्का पायेगा लेकिन उस के क़त्ल की दियत में से तर्का पाना महल्ले इश्काल है।
2793. जब किसी मुतवफ़्फ़ी के वरसा तर्का तक़्सीम करना चाहें तो वह बच्चा जो अभी मां के पेट में हो और ज़िन्दा पैदा हो तो मीरास का हक़दार होगा उस सूरत में जब कि एक से ज़्यादा बच्चों के पैदा होने का एहतिमाल न हो और इत्मीनान न हो कि वह बच्चा लड़की है तो एहतियात की बिना पर एक लड़के का हिस्सा अलायहदा कर दे और जो माल उस से ज़्यादा हो वह आपस में तक़्सीम कर लें। बल्कि अगर अगर एक से ज़्यादा बच्चे होने का क़वी एहतिमाल हो मसलन औरत के पेट में दो या तीन बच्चे होने का एहतिमाल हो उन के हिस्से अलायहदा करें। मसलन अगर एक लड़के या एक लड़की की विलादत हो तो ज़ायद तर्के को वरसा आपस में तक़्सीम कर लें।
चन्द फ़िक़्ही इस्तिलाहात
(जो इस किताब में इस्तेमाल हुई हैं)
एहतियातः- वह तरीक़ा ए अमल जिस से अमल के मुताबिक़े वाक़िआ होने का यक़ीन हासिल हो जाए।
एहतियाते लाज़िमः- एहतियाते वाजिब। देखिए लफ़्ज़ लाज़िम।
एहतियाते मुस्तहबः- फ़त्वे के अलावा एहतियात है, इस लिए इसका लिहाज़ ज़रूरी नहीं होता।
एहतियाते वाजिबः- वह हुक्म जो एहतियात के मुताबिक़ हो और फ़क़ीह ने उस के साथ फ़तवा न दिया हो। ऐसे मसाइल में मुक़ल्लिद उस मुज्तहिद की तक़लीद करता है जो अअलम के बाद इल्म में सब से बढ़ कर हो।
एहतियात तर्क नहीं करना चाहिए (एहतियात का ख़्याल रहे) – जिस मस्अले में यह इस्तिलाह आए अगर उस में मुज्तहिद का फ़तवा मज़कूर न हो तो इस का मतलब एहतियाते वाजिब होगा, और अगर मुज्तहिद का फ़तवा भी मज़कूरा हो तो इस से एहतियात की ताकीद मक़्सूद होती है।
अहवतः- एहतियात के मुताबिक़।
इश्काल हैः- इस अमल की वजह से तक्लीफ़े शरई साक़ित न होगी। इसे अंजाम न देना चाहिए। इस मस्अले में किसी दूसरे मुज्तहिद की तरफ़ रुजूउ किया जा सकता है बशर्ते उस के साथ फ़तवा न हो।
अज़हरः- ज़्यादा ज़ाहिर। मस्अले से मुतअल्लिक़ दलायल से ज़्यादा नज़दीक़ दलीलों के साथ मुन्तबिक़ होने के लिहाज़ से ज़्यादा बाज़ेह्। यह मुज्तहिद का फ़तवा है।
इफ़्ज़ाः- खुलना – पेशाब और हैज़ का मक़ाम एक हो जाना या हैज़ और पख़ाने के मक़ाम का एक हो जाना या तीनों मक़ामात का एक हो जाना।
अक़्वाः- क़वी नज़रीया।
औलाः- बेहतर, ज़्यादा मुनासिब।
ईक़ाअः- वह मुआमला जो यकतरफ़ा तौर पर वाक़े हो जाता है और उसे क़बूल करने वाले की ज़रूरत नहीं होती जैसे तलाक़ में सिर्फ़ तलाक़ देना ही काफ़ी होता है, क़बूल करने की ज़रूरत नहीं होती।
बईद हैः- फ़तवा इसके मुताबिक़ नहीं है।
जाहिले क़ासिरः- मस्अले से नावाक़िफ़ ऐसा शख़्स जो किसी दूर उफ़्तादा मक़ाम पर रहने की वजह से हुक्मे मस्अला तक रसाई हासिल करने में क़ासिर हो।
जाहिले मुक़स्सिरः- वह नावाक़िफ़ शख़्स जिस के लिए मसाइल का सीखना मुम्किन रहा हो लेकिन उसने कोताही की हो और जानबूझ कर मसाइल मअलूम न किये हों।
हाकिमे शर्अः- वह मुज्तहिद जामे उश शरायत जिस का हुक्म शरई क़वानीन की बुनियाद पर नाफ़िज़ हो।
हदसे असग़रः- हर वह चीज़ जिसकी वजह से नमाज़ के लिए वुज़ू करना पड़े। यह सात चीज़ें हैं, 1.पेशाब, 2.पाख़ाना, 3.रियाह, 4.नीन्द, 5.अक़्ल को ज़ायल करने वाली चीज़ें मसलन दीवांगी, मस्ती या बेहोशी, 6.इस्तिहाज़ा, 7.जिन चीज़ों की वजह से ग़ुस्ल वाजिब होता है।
हदसे अकबरः- वह चीज़ जिसकी वजह से नमाज़ के लिए ग़ुस्ल करना पड़े जैसे एहतिलाम, जिमाअ।
हद्दे तरख़्ख़ुसः- मसाफ़त की वह हद जहां से अज़ान की आवाज़ सुनाई न दे और आबादी की दीवारें दिखाई न दें।
हरामः- हर वह अमल, जिस का तर्क करना शरीअत की निगाहों में ज़रूरी हो।
दिरहमः- 12 6/10 चनों के बराबर सिक्कादार चांदी तक़रीबन 12.50 ग्राम।
ज़िम्मी काफ़ीरः- यहूदी, ईसाई और मजूसी जो इस्लामी ममलिकत में रहते हों और इस्लाम के इज्तिमाई क़वानीन की पाबन्दी का वादा करने की वजह से इस्लामी हुकूमत उन की जान, माल और आबरू की हिफ़ाज़त करे।
रजा ए मत्लूबीयतः- किसी अमल को मतलूबे पर्वरदिगार होने की उम्मीद में अंजाम देना।
रुजूउ करनाः- पलटना। इसका इस्तेमाल दो मक़ामात पर हुआ हैः- 1. अअलम जिस मस्अले में एहतियाते वाजिब का हुक्म दे और उस मस्अले में किसी दूसरे मुज्तहिद की तक़्लीद करना। 2. बीवी को तलाक़े रजई देने के बाद इद्दत के दौरान ऐसा कोई अमल अंजाम देना या ऐसी कोई बात कहना जिस से इस बात का पता चले कि उसे दोबारा बीवी बना लिया है।
शाख़िसः- ज़ोहर का वक़्त मअलूम करने के लिए ज़मीन में गाड़ी जाने वाली लकड़ी।
शारेः- ख़ुदावन्दे आलम, रसूले अकरम स्वल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम।
तलाक़ः- आज़ादी – शरीअत के बताए हुए तरीक़े से निकाह तोड़ना।
तलाक़े बाइनः- वह तलाक़ जिस के बाद मर्द को रुजूउ करने का हक़ नहीं होता। तफ़्सीलात तलाक़ के बाब में देखीए।
तलाक़े ख़ुलअः- उस औरत की तलाक़ जो शौहर को नापसन्द करती हो और तलाक़ लेने के लिए शौहर को अपना महर या कोई माल बख़्श दे। तफ़्सीलात तलाक़ के बाब में देखिए।
तलाक़े रज्ईः- वह तलाक़ जिस में मर्द इद्दत के दौरान औरत की तरफ़ रुजूउ कर सकता है। इस के अहकाम तलाक़ के बाब में बयान हुए हैं।
तलाक़े मुबारातः- वह तलाक़ जिस में मियां बीवी दोनों एक दूसरे से मुतनफ़्फ़िर हों और औरत तलाक़ के लिए शौहर को कुछ माल बख़्श दे।
तवाफ़े निसाः- हज और उमरा ए मुफ़रदा का आख़िरी तवाफ़ जिसे अंजाम न देने से हज या उमरा ए मुफ़रदा करने वाले पर हमबिस्तरी हराम रहती है।
ज़ाहिर यह हैः- फ़तवा यह है कि (सिवाय इस के कि इबारत में इसके ख़िलाफ़ कोई क़रीना मौजूद हो)।
ज़ौहरे शरईः- ज़ौहरे शरई का मतलब आधा दिन गुज़रना है। मसलन अगर दिन बारा घंटे का हो तो तुलूए आफ़ताब के छः घंटा गुज़रने के बाद और अगर तेरा घंटे का हो तो साढ़े छः घंटे गुज़रने के बाद और अगर ग्यारा घंटे का हो तो साढ़े पांच घंटे गुज़रने के बाद ज़ौहरे शरई का वक़्त है। और ज़ौहरे शरई का वक़्त जो कि तुलूए आफ़ताब के बाद आधा दिन गुज़रने से ग़ुरूबे आफ़ताब तक है बाज़ मवाक़े पर बारा बजे से चन्द मिनट पहले और कभी बारा बजे से चन्द मिनट बाद होता है।
अदालतः- वह मअनवी कैफ़ियत जो तक़्वा की वजह से इंसान में पैदा होती है। और जिसकी वजह से वह वाजिबात को अंजाम देता है और मुहर्रमात को तर्क करता है।
अक़्दः- मुआहदा ए निकाह।
फ़त्वाः- शरई मसाइल में मुज्तहिद का नज़रीया।
क़ुरआन के वाजिब सज्देः- क़ुरआन में पन्द्रह आयतें ऐसी हैं जिन के पढ़ने या सुनने के बाद ख़ुदावन्दे आलम की अज़मत के सामने सजदा करना चाहिये। उन में से चार मक़ामात पर सज्दा वाजिब और ग्यारा मक़ामात पर मुस्तहब (मंदूब) है। आयाते सज्दा मुन्दरिजा ज़ैल हैः-
क़ुरआन के मुस्तहब सज्देः- 1. पारा 9. सूरा ए अअराफ़ – आख़री आयत।
2. पारा 13. सूरा ए रअद – आयत 15।
3. पारा 14. सूरा ए नहल – आयत 49।
4. पारा 15. सूरा ए बनी इस्राईल – आयत 107।
5. पारा 16. सूरा ए मरयम – आयत 58।
6. पारा 17. सूरा ए हज – आयत 18।
7. पारा 17. सूरा ए हज – आयत 77।
8. पारा 19. सूरा ए फ़ुरक़ान – आयत 60।
9. पारा 19. सूरा ए नमल – आयत 25।
10. पारा 23. सूरा ए स्वाद – आयत 24।
11. पारा 30. सूरा ए इंशिक़ाक़् – आयत 21।
क़ुरआन के वाजिब सज्देः- 1. पारा 21. सूरा ए सज्दा – आयत 15।
2. पारा 24. सूरा ए अलीफ़ लाम मीम तंज़ील – आयत 37।
3. पारा 27. सूरा ए वन्नज्म – आख़री आयत।
4. पारा 30. सूरा ए अलक़ – आख़री आयत।
क़स्दे इंशाः- ख़रीद व फ़रोख़्त के मानिन्द किसी एतबारी चीज़ को उस से मर्बूत अल्फ़ाज़ के ज़रीए आलमे वुजूद में लाने का इरादा।
क़स्दे क़ुर्बत (क़ुर्बत की नीयत) – मरज़िये पर्वरदिगार से क़रीब होने का इरादा।
क़ुव्वत से ख़ाली नहीः- फ़तवा यह है। (सिवाय इसके कि इबारत में इसके बर ख़िलाफ़ कोई क़रीना मौजूद हो।
कफ़्फ़ारा ए जमअ (मजमूअन कफ़्फ़ारा) – तीनों कफ़्फ़ारे 1. साठ रोज़े रखना, 2. साठ फ़क़ीरों को पेट भर खाना खिलाना, 3. ग़ुलाम आज़ाद करना।
लाज़िमः- वाजिब, अगर मुज्तहिद किसी अम्र के वाजिब व लाज़िम होने का इस्तिफ़ादा आयात और रिवायत से इस तरह करे कि उस का शारे की तरफ़ मंसूब करना मुम्किन हो तो उसकी तअबीर लफ़्ज़े वाजिब से की जाती है और अगर उस के वाजिब व लाज़िम होने को किसी और ज़रीए मसलन अक़ली दलाइल से समझा हो इस तरह कि उस का शोर की तरफ़ मंसूब करना मुम्किन न हो तो उसकी तअबीर लफ़्ज़े लाज़िम से की जाती है। एहतियाते वाजिब और एहतियाते लाज़िम में भी इसी फ़र्क़ को पेशे नज़र रखना चाहिए। बहरहाल मुक़ल्लिद के लिए मक़ामे अमल में वाजिब और लाज़िम में कोई फ़र्क़ नहीं है।
मुबाहः- वह अमल जो शरीअत की निगाहों में न क़ाबिले सताइश हो और न क़ाबिले मज़म्मत (यह लफ़्ज़ वाजिब, हराम, मुस्तहब और मकरूह के मुक़ाबिले में है।)
नजिसः- हर वह चीज़ जो ज़ाती तौर पर पाक हो लेकिन किसी नजिस चीज़ से बिलवासिता या बराहे रास्त मिल जाने की वजह से नजिस हो गई हो।
मज्हूलुलमालिकः- वह माल जिस का मालिक मअलूम न हो।
महरमः- वह क़रीबी रिश्तेदार जिन से कभी निकाह नहीं किया जा सकता।
मोहरिमः- जो शख़्स हज या उमरे के एहराम में हो।
महल्ले इश्काल हैः- इस में इश्काल है, इस अमल का सहीह व मुकम्मल होना मुशकिल है (मुक़ल्लिद इस मसअले में दूसरे मुज्तहिद की तरफ़ रुजूउ कर सकता है बशर्ते कि उसके साथ फ़तवा न हो।)
महल्ले तअम्मुल हैः- एहतियात करना चाहिए (मुक़ल्लिद इस मस्अले में दूसरे मुज्तहिद की तरफ़ रुजूउ कर सकता है बशर्ते कि उस के साथ फ़तवा न हो।)
मुसल्लमाते दीनः- वह ज़रूरी और क़त्ई उमूर जो दीने इस्लाम का जुज़्वें लायंफ़क हैं और जिन्हे सारे मुसलमान दीन का लाज़िमी जुज़्व मानते है जैसे नमाज़, रोज़े की फ़रज़ियत और उन का वुजूब। इन उमूर को ज़रूरीयते दीन और क़तईयाते दीन भी कहते हैं क्योंकि यह वह उमूर हैं जिन का तस्लीम करना दाइरा ए इस्लाम के अन्दर रहने के लिए अज़ बस ज़रूरी है।
मुस्तहबः- पसन्दीदा – जो शारेए मुक़द्दस को पसन्द हो लेकिन उसे वाजिब न क़रार दे। हर वह हुक्म जिस को करने में सवाब हो लेकिन तर्क करने में गुनाह न हो।
मकरूहः- नापसन्दीदा – वह काम जिसका अंजाम देना हराम न हो लेकिन अंजाम न देना बेहतर हो।
निसाबः- मुअय्यना मिक़्दार या मुअय्यना हद।
वाजिबः- हर वह अमल जिस का अंजाम देना शरीअत की निगाहों में फ़र्ज़ हो।
वाजिबे तख़ईरीः- जब वुजूब दो चीज़ों में किसी एक से मुतअल्लिक़ हो तो उन में से हर एक को वाजिबे तख़ईरी कहते हैं जैसे रोज़े के कफ़्फ़ारे में तीन चीज़ों के तरमियान इख़्तियार होता है-- 1. साठ रोज़े रखना, 2. साठ फ़क़ीरों को खाना खिलाना, 3. ग़ुलाम आज़ाद करना।
वाजिबे ऐनीः- वह वाजिब जो हर शख़्स पर खुद वाजिब हो जैसे नमाज़, रोज़ा।
वाजिबे किफ़ाईः- ऐसा वाजिब जिसे अगर कुछ लोग अंजाम दे दें तो बाक़ी लोगों से साक़ित हो जाए जैसे ग़ुस्ले मैयित सब पर वाजिब है लेकिन अगर कुछ लोग उसे अंजाम दे दें तो बाक़ी लोगों से साक़ित हो जायेगा।
वक़्फ़ः- अस्ल माल को ज़ाती मिल्कियत से निकाल कर उसकी मनफ़िअत को मख़्सूस अफ़राद या उमूरे खैरीया के साथ मख़सूस कर देना।
वलीः- सरपरस्त – मसलन बाप, दादा, शौहर या हाकिमे शरअ।
शरई औज़ान और अअशारी औज़ान 5 नख़ुद (चने) – एक ग्राम।
12 6/10 नखुदः- तक़रीबन 3.50 ग्राम।
8 नखुद (या एक मिस्क़ाले शरई) – तक़रीबन 3.50 ग्राम।
1 दीनार (या एक मिस्क़ाले शरई) – तक़रीबन 3.50 ग्राम।
एक मिस्क़ाले सैरफ़ी (24 नखुद) – तक़रीबन 5 ग्राम।
एक मुदः- तक़रीबन 750 ग्राम।
एक साअः- तक़रीबन 3 किलो ग्राम।
एक कुर (पानी) – तक़रीबन 377 किलो ग्राम।
नोटः- मसअला 1365 में पच्चीस गज़ को पच्चीस ज़राअ (चौदा गज़) पढ़ा जाये।
[[अलहम्दो लिल्लाह किताब तौज़ीहुल मसाइल (आयतुल्लाह सीसतानी) पूरी टाईप हो गई खुदा वंदे आलम से दुआगौ हुं कि हमारे इस अमल को कुबुल फरमाऐ और इमाम हुसैन (अ.) फाउनडेशन को तरक्की इनायत फरमाए कि जिन्होने इस किताब को अपनी साइट (अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क) के लिऐ टाइप कराया।
सैय्यद मौहम्मद उवैस नक़वी 07:12:2015]]
फेहरीस्त
तौज़ीहुलमसाइल 1
मुकद्देमा 2
अहकामे तक़लीद6
अह्कामे तहारत 12
1. कुर पानीः- 13
2. क़लील पानीः- 15
3. जारी पानीः- 16
4. बारिश का पानीः- 18
5. कुयें का पानीः- 20
पानी के अह्कामः- 21
बैतुल ख़ला के अहकामः- 23
64. चार जगहों पर रफ़्ए हाजत हराम हैः- 25
इसतिबरा 28
रफ़्ए हाजत के मुस्तहब्बात और मकरूहात 30
नजासात 32
1, 2 पेशाब और पाख़ानाः- 32
3. मनी (वीर्य) 33
4. मुर्दार 33
5. ख़ून 35
6, 7- कुत्ता और सुवर 37
8. काफ़िर 37
9. शराब 39
10. नजासत खाने वाले हैवान का पसीना 39
नजासत साबित होने के तरीक़े 40
पाक चीज़ नजिस कैसे होती हैः- 42
अहकामे नजासात 46
मुतह्हिरात 49
1-पानी 50
2. ज़मीन 60
3. सूरज 63
4. इसतिहाला 64
5. इंक़िलाब 65
6- इंतिक़ाल 67
7- इसलाम 68
8- तबईय्यत 69
9- ऐने नजासत का दूर होना 71
10- नजासत खाने वाले हैवान का इसतिबरा 72
11- मुसलमान का ग़ायब हो जाना 73
12 –मअमूल के मुताबिक़ (ज़बीहा के) ख़ून का बह जाना 75
बर्तनों के अहकाम 76
इबादात 78
वुज़ू 78
इरतिमासी वुज़ू 84
दुआयें जिनका वुज़ू करते वक़्त पढ़ना ज़रूरी है 84
वुज़ू सहीह होने की शरायत 86
वुज़ू के अहकाम 98
वह चीज़ें जिनके लिये वुज़ू करना चाहिये 103
मुब्तिलाते वुज़ू 106
जबीरा के अहकाम 106
वाजिब ग़ुस्ल 112
जनाबत के अहकाम 112
वह चीज़ें जो मुज्निब पर हराम हैं 115
वह चीज़ें जो मुज्निब के लिये मकरूह हैं 116
ग़ुस्ले जनाबत 117
तरतीबी ग़ुस्ल 118
इरतिमासी ग़ुस्ल 119
ग़ुस्ल के अहकाम 121
इस्तिहाज़ा 125
इस्तिहाजा के अहकाम 126
हैज़ (माहवारी) 138
हाइज़ के अहकाम 142
हाइज़ की क़िस्में 149
1. वक़्त और अदद की आदत रखने वाली औरत 150
2. वक़्त की आदत रखने वाली औरत 158
3. अदद की आदत रखने वाली औरत 162
4. मुज़्तरिबः 164
5. मुब्तदिअः 165
6. नासियः 167
हैज़ के मुतफ़र्रिक़ मसाइल 169
निफ़ास 172
ग़ुस्ले मसे मैयित 177
मुह्तज़र के अहकाम 179
मरने के बाद के अहकाम 182
ग़ुस्ल, कफ़न, नमाज़ और दफ़्न का वुजूब 182
ग़ुस्ले मैयित की कैफ़ीयत 185
कफ़न के अहकाम 190
हनूत के अहकाम 194
नमाज़े मैयित के अहकाम 196
नमाज़े मैयित का तरीक़ा 199
नमाज़े मैयित के मुस्तहब्बात 202
दफ़्न के अहकाम 203
दफ़्न के मुस्तहब्बात 207
नमाज़े वह्शत 213
नब्शे क़ब्र 214
वो सूरतें ऐसी हैं जिनमें क़ब्र का खोदना हराम नहीं हैः 214
मुस्तहब ग़ुस्ल 216
तयम्मुम 219
तयम्मुम की पहली सूरत 220
तयम्मुम की दूसरी सूरत 224
तयम्मुम की तीसरी सूरत 225
तयम्मुम की चौथी सूरत 227
तयुम्मुम की पांचवीं सूरत 228
तयम्मुम की छठी सूरत 228
तयम्मुम की सातवीं सूरत 229
वह चीज़ें जिन पर तयम्मुम करना सहीह है 230
वुज़ू या ग़ुस्ल के बदले तयम्मुम करने का तरीक़ा 234
तयम्मुम के अहकाम 235
अह्कामे नमाज़ 243
वाजिब नमाज़ें 244
रोज़ाना की वाजिब नमाज़ें 245
ज़ोहर और अस्र की नमाज़ का वक़्त 245
नमाज़े जुमा के अहकामः- 247
जुमा की नमाज़ वाजिब होने की चन्द शर्तें हैं- 247
जुमा की नमाज़ के सहीह होने की चन्द शर्तें हैं – 248
742. चन्दअहकामजिनकातअल्लुक़जुमाकीनमाज़सेहैयहहैः- 251
मग़्रिब और इशा की नमाज़ का वक़्त 253
सुब्ह की नमाज़ का वक़्त 254
औक़ाते नमाज़ के अहकाम 255
वह नमाज़ें जो तरतीब से पढ़नी ज़रूरी हैं 260
मुस्तहब नमाज़ें 262
रोज़ाना की नफ़्लों का वक़्त 264
नमाज़े ग़ुफ़ैला 266
नमाज़ में बदन का ढांपना 270
नमाज़ी के लिबास की शर्तें 273
जिन सूरतों में नमाज़ी का बदन और लिबास पाक होना ज़रूरी नहीं 287
वह चीज़ें जो नमाज़ी के लिबास में मुस्तहब हैं 292
वह चीज़ें जो नमाज़ी के लिबास में मकरूह हैं 293
नमाज़ पढ़ने की जगह 294
पहली शर्त यह है कि वह मुबाह हो। 294
दूसरी शर्त 298
(तीसरी शर्त) 298
(चौथी शर्त) 299
(पांचवी शर्त) 300
(छटी शर्त) 300
(सातवीं शर्त) 301
वह मक़ामात जहां नमाज़ पढ़ना मुस्तहब है 302
वह मक़ामात जहां नमाज़ पढ़ना मकरूह है 303
मस्जिद के अहकाम 304
अज़ान और इक़ामत 309
अज़ान और इक़ामत का तर्जमा 310
नमाज़ के वाजिबात 318
नमाज़ के अर्कान पांच हैः- 318
नीयत 319
तक्बीरतुल एहराम 320
क़ियाम यानी खड़ा होना 323
क़िराअत 328
रुकू 340
सुजूद 345
वह चीज़ें जिन पर सज्दा करना सहीह है। 354
सज्दे के मुस्तहब्बात और मकरूहात 357
क़ुरआने मजीद के वाजिब सज्दे 359
तशह्हुद 361
नमाज़ का सलाम 363
तरतीब 364
मुवालात 365
नमाज़ का तर्जुमा 368
1.सूरा ए अलहम्द का तर्जुमाः- 368
2.सूरा ए एख़्लास का तर्जुमाः- 369
3.रूकू, सुजूद और उनके बाद के मुस्तहब अज़्कार का तर्जुमाः- 369
4.क़ुनूत का तर्जुमाः- 370
5.तस्बीहाते अर्बआ का तर्जुमाः- 370
ताक़ीबाते नमाज़ 371
पैग़म्बरे अकरम (स0)पर सलवात (दुरुद) 372
मुब्तिलाते नमाज़ 373
वह चीज़ें जो नमाज़ में मकरूह हैं 385
वह सूरतें जिनमें वाजिब नमाज़ें तोड़ी जा सकती हैं 386
शक्कीयाते नमाज़ 387
वह शक जो नमाज़ को बातिल करते हैं 388
वह शक जिनकी परवाह नहीं करनी चाहिये 389
1. जिस फ़ेल का मौक़ा गुज़र गया हो उसमें शक करना 390
2. सलाम के बाद शक करना 394
3. वक़्त के बाद शक करना 394
4. कसीरुश्शक का शक करना 395
5. इमाम और मुक्तदी का शक 398
6. मुस्तहब नमाज़ में शक 398
सहीह शुकूक 400
नमाज़े एहतियात पढ़ने का तरीक़ा 408
सज्दा ए सहव 414
सज्दा ए सहव का तरीक़ा 418
भूले हुए सज्दे और तशह्हुद की क़ज़ा 418
नमाज़ के अज्ज़ा और शराइत को कम या ज़्यादा करना 421
मुसाफ़िर की नमाज़ 424
(पहली शर्त) 424
(दूसरी शर्त) 427
(तीसरी शर्त) 429
(चौथी शर्त) 431
(पांचवीं शर्त) 432
(छठी शर्त) 435
(सातवीं शर्त) 436
(आठवीं शर्त) 439
मुतफ़र्रिक़ मसाइल 450
क़ज़ा नमाज़ 454
बाप की क़ज़ा नमाज़ें जो बड़े बेटे पर वाजिब हैं 460
नमाज़े जमाअत 462
नमाज़े जमाअत के अहकाम 477
जमाअत में इमाम और मुक्तदी के फ़राइज़ 482
नमाज़े जमाअत के मकरूहात 484
नमाज़े आयात 484
नमाज़े आयात पढ़ने का तरीक़ा 490
ईदे फ़ित्र और ईदे क़ुर्बान की नमाज़ 493
नमाज़ के लिये अजीर बनाना 497
रोज़े के अहकाम 502
नीयत 502
वो चीज़ें रोज़े को बातिल कर देती है। 508
1.खाना और पीना 509
2.जिमाअ (सम्भोग) 512
3.इस्तेम्ना (हस्तमैथुन) 513
4. ख़ुदा और रसूल (स0) पर बोह्तान बाँधना 515
5. ग़ुबार को हल्क़ तक पहुंचाना 517
7. अज़ाने सुब्ह तक जनाबत, हैज़ और निफ़ास की हालत में रहना 520
8. हुक़्ना लेना 527
9. उल्टी करना 527
उन चीज़ों के अहकाम जो रोज़े को बातिल करती हैं। 528
वह चीज़ें जो रोज़ादार के लिये मकरूह हैं 530
ऐसे मवाक़े जिनमें रोज़ा की क़ज़ा और कफ़्फ़ारा वाजिब हो जाते हैं। 531
रोज़े का कफ़्फ़ारा 531
वह सूरतें जिन में फ़क़त रोज़े की क़ज़ा वाजिब है 538
क़ज़ा रोज़े के अहकाम 541
मुसाफ़िर के रोज़ों के अहकाम 546
वह लोग जिन पर रोज़ा रखना वाजिब नहीं 549
महीने की पहली तारीख़ साबित होने का तरीक़ा 551
हराम और मकरूह रोज़े 554
मुस्तहब रोज़े 556
वह सूरतें जिनमें मुब्तलाते रोज़ा से पर्हेज़ मुस्तहब है 558
ख़ुम्स के अहकाम 559
1760. ख़ुम्स सात चीज़ों पर वाजिब हैः- 559
1.कारोबार का मुनाफ़ा 560
2. मअदिनी कानें 573
3. गड़ा हुआ दफ़ीना 575
4. वह हलाल माल जो हराम माल में मख़्लूत हो जाए 577
5. ग़व्वासी से हासिल किये हुए मोती 580
6. माले ग़नीमत 582
7. वह ज़मीन जो ज़िम्मी काफ़िर किसी मुसलमान से ख़रीदे 584
ख़ुम्स का मसरफ़ 584
ज़कात के अहकाम 589
ज़कात वाजिब होने की शराइत 590
गेहूं, जौ, खजूर और किशमिश की ज़कात 592
सोने का निसाब 601
चांदी का निसाब 602
ऊंट, गाय और भेड़ बकरी की ज़कात 605
ऊंट के निसाब 606
गाय का निसाब – 608
भेड़ का निसाब 609
माले तिजारत की ज़कात 613
ज़कात का मसरफ़ 614
मुस्तहक़्क़ीने ज़कात के शराइत 620
ज़कात की नीयत 623
ज़कात के मुतफ़र्रिक़ मसाइल 624
ज़काते फ़ित्रा 632
ज़काते फ़ित्रा का मसरफ़ 638
ज़काते फ़ित्रा के मुतफ़र्रिक मसाइल 640
हज के अहकाम 642
मुआमलात 648
ख़रीद व फ़रोख़्त के अहकाम 648
ख़रीद व फ़रोख़्त के मुस्तहब्बात 649
मकरूह मुआमलात 650
हराम मुआमलात 651
बेचने वाले और ख़रीदार की शराइत 660
जिन्स और उसके एवज़ की शराइत 664
ख़रीद व फ़रोख़्त का सीग़ा 667
फ़लों की ख़रीद व फ़रोख़्त 668
नक़्द और उधार के अहकाम 669
मुआमला ए सलफ़ की शराइत 671
मुआमला ए सलफ़ के अहकाम 674
सोने चांदी को सोने चांदी के एवज़ बेचना 675
मुआमला फ़स्ख़ किये जाने की सूरतें 676
मुतफ़र्रिक़ मसाइल 684
शिराकत के अहकाम 686
सुल्ह के अहकाम 693
किराये के अहकाम 697
किराये पर दिये जाने वाले माल की शराइत 701
किराये पर दिये जाने वाले माल से इसतिफ़ादा की शराइत 703
किराये के मुतफ़र्रिक़ मसाइल 705
जिआला के अहकाम 714
मुज़ारआ के अहकाम 717
मुसाक़ात और मुग़ारसा के अहकाम 723
वह अश्ख़ास जो अपने माल में तसर्रूफ़ नहीं कर सकते 728
वकालत के अहकाम 730
क़र्ज़ के अहकाम 734
हवाला देने के अहकाम 740
रहन के अहकाम 743
ज़ामिन होने के अहकाम 746
कफ़ालत के अहकाम 750
अमानत के अहकाम 752
आरिया के अहकाम 758
निकाह के अहकाम 762
निकाह पढ़ने का तरीक़ा 764
निकाह की शराइत 765
वह औरतें जिन से निकाह करना हराम है 773
दाइमी अक़्द के अहकाम 780
मुअय्यन मुद्दत का निकाह 783
निगाह डालने के अहकाम 786
शादी ब्याह के मुख़्तलिफ़ मसाइल 789
दूध पिलाने के अहकाम 795
दूध पिलाने से महरम बनने की शराइत 799
दूध पिलाने के आदाब 804
दूध पिलाने के मुख़्तलिफ़ मसाइल 805
तलाक़ के अहकाम 807
तलाक़ की इद्दत 812
वफ़ात की इद्दत 814
तलाक़े बाइन और तलाक़े रज्ई 816
रुजू करने के अहकाम 817
तलाक़े ख़ुलअ 819
तलाक़े मुबारत 821
तलाक़ के मुख़्तलिफ़ अहकाम 822
ग़स्ब के अहकाम 825
गुमशुदा माल पाने के अहकाम 832
हैवानात को शिकार और ज़ब्ह करने के अहकाम 839
हैवानात को ज़ब्ह करने का तरीक़ा 841
हैवान को ज़ब्ह करने की शराइत 842
ऊँट को नहर करने का तरीक़ा 845
हैवानात को ज़ब्ह करने के मुस्तहब्बात 846
हैवानात के ज़ब्ह करने के मकरूहात 847
हथियारों से शिकार करने के अहकाम 848
शिकारी कुत्ते से शिकार करना 851
मछली और टिड्डी का शिकार 855
खाने पीने की चीज़ों के अहकाम 857
खाना खाने के आदाब862
वह बातें जो खाना खाते वक़्त मकरूह हैं 864
पानी पीने के आदाब 865
मन्नत और अहद के अहकाम 866
क़सम खाने के अहकाम 875
वक़्फ़ के अहकाम 878
वसीयत के अहकाम 886
मीरास के अहकाम 899
पहले गुरोह की मीरास 901
दूसरे गुरोह की मीरास 904
तीसरे गुरोह की मीरास 912
बीवी और शौहर की मीरास 917
मीरास के मुख़्तलिफ़ मसाइल 920
चन्द फ़िक़्ही इस्तिलाहात 924
फेहरीस्त 935