सहीफा ए कामिला

बुक करेकशन

दुआ व ज़ियारात

सहीफा ए कामिला

अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क


मुक़द्देमा

सहीफा ए कामिला इमाम सज्जाद अ.स. के ज़रीऐ पढ़ी गई दुआओ का मजमुआ हैं की जिसमे इमाम अ.स. ने खुद दुआ पढ़कर आम लोगो को दुआ पढ़ने के तरीक़ा सिखाया है।

इस किताब को सहीफा ए सज्जादीया, इंजीले आले मौहम्मद और ज़ुबुरे आले मौहम्मद भी कहा जाता है।

(आप इस किताब को अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क पर पढ़ रहे है।)


पहली दुआ

बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम

जब आप दुआ मांगते तो उसकी इब्तिदा ख़ुदाए बुज़ुर्ग व बरतर की हम्द व सताइश से फ़रमाते , चुनांचे इस सिलसिले में फ़रमाया -

सब तारीफ़ उस अल्लाह के लिये है जो ऐसा अव्वल है जिसके पहले कोई अव्वल न था और ऐसा आखि़र है जिसके बाद कोई आखि़र न होगा। वह ख़ुदा जिसके देखने से देखने वालों की आंखें आजिज़ और जिसकी तौसीफ़ व सना से वसफ़ बयान करने वालों की अक़्लें क़ासिर हैं। उसने कायनात को अपनी क़ुदरत से पैदा किया , और अपने मन्शाए अज़ीम से जैसा चाहा उन्हें ईजाद किया। फिर उन्हें अपने इरादे के रास्ते पर चलाया और अपनी मोहब्बत की राह पर उभारा। जिन हुदूद की तरफ़ उन्हें आगे बढ़ाया है उनसे पीछे रहना और जिनसे पीछे रखा है उनसे आगे बढ़ना उनके क़ब्ज़ा व इख़्तेयार से बाहर है। उसी ने हर (ज़ी) रूह के लिये अपने (पैदा कर्दा) रिज़्क़ से मुअय्यन व मालूम रोज़ी मुक़र्रर कर दी है जिसे ज़्यादा दिया है उसे कोई घटाने वाला घटा नहीं सकता और जिसे कम दिया है उसे कोई बढ़ाने वाला बढ़ा नहीं सकता। फ़िर यह के उसी ने उसकी ज़िन्दगी का एक वक़्त मुक़र्रर कर दिया और एक मुअय्यना मुद्दत उसके लिये ठहरा दी। जिस मुद्दत की तरफ़ वह अपनी ज़िन्दगी के दिनों से बढ़ता और अपने ज़मानाए ज़ीस्त के सालों से उसके नज़दीक होता है यहाँ तक के जब ज़िन्दगी की इन्तेहा को पहुँच जाता है और अपनी उम्र का हिसाब पूरा कर लेता है तो अल्लाह उसे अपने सवाब बे पायाँ तक जिसकी तरफ़ उसे बुलाया था या ख़ौफ़नाक अज़ाब की जानिब जिसे बयान कर दिया था क़ब्ज़े रूह के बाद पहुंचा देता है ताके अपने अद्ल की बुनियाद पर बुरों को उनकी बद आमालियों की सज़ा और नेकोकारों को अच्छा बदला दे। उसके नाम पाकीज़ा और उसकी नेमतों का सिलसिला लगातार है। वह जो करता है उसकी पूछगछ उससे नहीं हो सकती और लोगों से बहरहाल बाज़पुर्श होगी।

तमाम तारीफ़ उस अल्लाह के लिये हैं के अगर वह अपने बन्दों को हम्द व शुक्र की मारेफ़त से महरूम रखता उन पैहम अतीयों (अता) पर जो उसने दिये हैं और उन पै दर पै नेमतों पर जो उसने फरावानी से बख़्शी हैं तो वह उसकी नेमतों में तसर्रूफ़ तो करते मगर उसकी हम्द न करते और उसके रिज़्क़ में फ़ारिग़लबाली से बसर तो करते मगर उसका शुक्र न बजा लाते और ऐसे होते तो इन्सानियत की हदों से निकल कर चौपायों की हद में आ जाते , और उस तौसीफ़ के मिस्दाक़ होते जो उसने अपनी मोहकम किताब में की है के वह तो बस चौपायों के मानिन्द हैं बल्कि उनसे भी ज़्यादा राहे रास्त से भटके हुए। ’’

तमाम तारीफ़ अल्लाह के लिये हैं के उसने अपनी ज़ात को हमें पहचनवाया और हम्द व शुक्र का तरीक़ा समझाया और अपनी परवरदिगारी पर इल्म व इत्तेलाअ के दरवाज़े हमारे लिये खोल दिये और तौहीद में तन्ज़िया व इख़लास की तरफ़ रहनुमाई की और अपने मुआमले में शिर्क व कजरवी से हमें बचाया। ऐसी हम्द जिसके ज़रिये हम उसकी मख़लूक़ात में से हम्दगुज़ारों में ज़िन्दगी बसर करें और उसकी ख़ुशनूदी व बख़्शिश की तरफ़ बढ़ने वालों से सबक़त ले जाएं। ऐसी हम्द जिसकी बदौलत हमारे लिये बरज़क़ की तारीकियां छट जाएं और जो हमारे लिये क़यामत की राहों को आसान कर दे और हश्र के मजमए आम में हमारी क़द्र व मन्ज़िलत को बलन्द कर दे जिस दिन हर एक को उसके किये काम का सिला मिलेगा और उन पर किसी तरह का ज़ुल्म न होगा। जिस दिन दोस्त किसी दोस्त के कुछ काम न आएगा और न उनकी मदद की जाएगी। ऐसी हम्द हो एक लिखी हुई किताब में है जिसकी मुक़र्रब फ़रिश्ते निगेहदाश्त करते हैं हमारी तरफ़ से बेहिश्त बरीं के बलन्द तरीन दरजात तक बलन्द हो , ऐसी हम्द जिससे हमारी आँखों में ठण्डक आए जबके तमाम आँखें हैरत व दहशत से फटी की फटी रह जाएंगी और हमारे चेहरे रौशन व दरख़्शाँ हों जबके तमाम चेहरे सियाह होंगे। ऐसी हम्द जिसके ज़रिये हम अल्लाह तआला की भड़काई हुई अज़ीयतदेह आग से आज़ादी पाकर उसके जवारे रहमत में आ जाएं। ऐसी हम्द जिसके ज़रिये हम इसके मुक़र्रब फ़रिश्तों के साथ शाना ब शाना बैठते हुए टकराएं और उस मन्ज़िले जावेद व मक़ामे इज़्ज़त व रिफ़अत में जिसे तग़य्युर व ज़वाल नहीं उसके फ़र्सतावा पैग़म्बरों के साथ यकजा हों।

तमाम तारीफ़ उस अल्लाह के लिये है जिसने खि़लक़त व आफ़रीन्श की तमाम ख़ूबियाँ हमारे लिये मुन्तख़ब कीं और पाक व पाकीज़ा रिज़्क़ का सिलसिला हमारे लिये जारी किया और हमें ग़लबा व तसल्लत देकर तमाम मख़लूक़ात पर बरतरी अता की। चुनांचे तमाम कायनात उसकी क़ुदरत से हमारे ज़ेरे फ़रमान और उसकी क़ूवते सरबलन्दी की बदौलत हमारी इताअत पर आमादा है। तमाम तारीफ़ उस अल्लाह तआला के लिये हैं जिसने अपने सिवा तलब व हाजत का हर दरवाज़ा हमारे लिये बन्द कर दिया तो हम (उस हाजत व एहतियाज के होते हुए) कैसे उसकी हम्द से ओहदा बरआ हो सकते हैं और कब उसका शुक्र अदा कर सकते हैं। नहीं! किसी वक़्त भी उसका शुक्र अदा नहीं हो सकता। तमाम तारीफ़ उस अल्लाह के लिये है जिसने हमारे (जिस्मों में) फैलने वाले आसाब और सिमटने वाले अज़लात तरतीब दिये और ज़िन्दगी की आसाइशों से बहरामन्द किया और कार व कसब के आज़ा हमारे अन्दर वदीअत फ़रमाए और पाक व पाकीज़ा रोज़ी से हमारी परवरिश की और अपने फ़ज़्ल व करम के ज़रिये हमें बेनियाज़ कर दिया और अपने लुत्फ़ व एहसान से हमें (नेमतों का) सरमाया बख़्शा। फिर उसने अपने अवाम्र की पैरवी का हुक्म दिया ताके फ़रमाबरदारी में हमको आज़माए और नवाही के इरतेकाब से मना किया ताके हमारे शुक्र को जांचे मगर हमने उसके हुक्म की राह से इन्हेराफ़ किया और नवाही के मरकब पर सवार हो लिये। फिर भी उसने अज़ाब में जल्दी नहीं की , और सज़ा देने में ताजील से काम नहीं लिया बल्कि अपने करम व रहमत से हमारे साथ नरमी का बरताव किया और हिल्म व राफ़्त से हमारे बाज़ आ जाने का मुन्तज़िर रहा।

तमाम तारीफ़ उस अल्लाह के लिये है जिसने हमें तौबा की राह बताई के जिसे हमने सिर्फ़ उसके फ़ज़्ल व करम की बदौलत हासिल किया है। तो अगर हम उसकी बख़्शिशों में से इस तौबा के सिवा और कोई नेमत शुमार में न लाएं तो यही तौबा हमारे हक़ में इसका उमदा इनआम , बड़ा एहसान और अज़ीम फ़ज़्ल है इसलिये के हमसे पहले लोगों के लिये तौबा के बारे में उसका यह रवय्या न था। उसने तो जिस चीज़ के बरदाश्त करने की हकमें ताक़त नहीं है वह हमसे हटा ली और हमारी ताक़त से बढ़कर हम पर ज़िम्मादारी आएद नहीं की और सिर्फ़ सहल व आसान चीज़ों की हमें तकलीफ़ दी है और हम में से किसी एक के लिये हील व हुज्जत की गुन्जाइश नहीं रहने दी। लेहाज़ा वही तबाह होने वाला है। जो उसकी मन्शा के खि़लाफ़ अपनी तबाही का सामान करे और वही ख़ुशनसीब है जो उसकी तरफ़ तवज्जो व रग़बत करे।

अल्लाह के लिये हम्द व सताइश है ह रवह हम्द जो उसके मुक़र्रब फ़रिश्ते बुज़ुर्गतरीन मख़लूक़ात और पसन्दीदा हम्द करने वाले बजा लाते हैं। ऐसी सताइश जो दूसरी सताइशों से बढ़ी चढ़ी हुई हो जिस तरह हमारा परवरदिगार तमाम मख़लूक़ात से बढ़ा हुआ है। फिर उसी के लिये हम्द व सना है उसकी हर हर नेमत के बदले में हो उसने हमें और तमाम गुज़िश्ता व बाक़ीमान्दा बन्दों को बख़्शी है उन तमाम चीज़ों के शुमार के बराबर जिन पर उसका इल्म हावी है और हर नेमत के मुक़ाबले में दो गुनी चौगुनी जो क़यामत के दिन तक दाएमी व अबदी हों। ऐसी हम्द जिसका कोई आखि़री कुफ़्फार और जिसकी गिनती का कोई शुमार न हो। जिसकी हद व निहायत दस्तरस से बाहर और जिसकी मुद्दत ग़ैर मुख़्तमिम हो। ऐसी हम्द जो उसकी इताअत व बख़्शिष का वसीला , उसकी रज़ामन्दी का सबब , उसकी मग़फ़ेरत का ज़रिया , जन्नत का रास्ता , उसके अज़ाब से पनाह , उसके ग़ज़ब से अमान , उसकी इताअत में मुअय्यन , उसकी मासियत से मानेअ और उसके हुक़ूक़ व वाजेबात की अदायगी में मददगार हो। ऐसी हम्द जिसके ज़रिये उसके ख़ुशनसीब दोस्तों में शामिल होकर ख़ुश नसीब क़रार पाएं और शहीदों के ज़मरह में शुमार हों जो उसके दुश्मनों की तलवारों से शहीद हुए , बेशक वही मालिक मुख़्तार और क़ाबिले सताइश है।

खुलासा :

----यह कलेमात दुआ का इफ़तेताहिया हैं जो सताइशे इलाही पर मुश्तमिल हैं। हम्द व सताइश अल्लाह तआला के करम व फ़ैज़ान और बख़्शिश व एहसान के एतराफ़ का एक मुज़ाहिरा है और दुआ से क़ब्ल इसके जूद व करम की फ़रावानियों और एहसान फ़रमाइयों से जो तास्सुर दिल व दिमाग़ पर तारी होता है उसका तक़ाज़ा यही है के ज़बान से उसकी हम्द व सताइश के नग़्मे उबल पड़ें जिसने एक तरफ़ ‘‘वस्अलुल्लाहा मिन फ़ज़्लेही ’’ (अल्लाह से उसके फ़ज़्ल का सवाल करो) कह कर तलब व सवाल का दरवाज़ा खोल दिया और दूसरी तरफ़ ‘‘उदऊनी अस्तजिब लकुम ’’ (मुझसे दुआ करो मैं क़ुबूल करूंगा) फ़रमाकर इस्तेजाबते दुआ का ज़िम्मा लिया।

इस तम्हीद में ख़ुदावन्दे आलम की वहदत व यकताई , जलाल व अज़मत , अद्ल व रऊफ़त और दूसरे सिफ़ात पर रोशनी डाली गई है। चुनान्चे सरनामाए दुआ में ख़ल्लाक़े आलम की तीन अहम सिफ़तों की तरफ़ इशारा किया है जिनमें तन्ज़िया व तक़दीस के तमाम जौहर सिमट कर जमा हो गए हैं। पहली सिफ़त यह के वह अव्वल भी है और आखि़र भी , लेकिन ऐसा अव्वल व आखि़र के न उससे पहले कोई था और न उसके बाद कोई होगा। उसे अव्वल व आखि़र कहने के साथ दूसरों से अव्वलीयत व आख़ेरीयत के सल्ब करने के मानी यह हैं के उसकी अव्वलीयत व आख़ेरीयत इज़ाफ़ी नहीं बल्कि हक़ीक़ी है। यानी वह अज़ली व अबदी है जिसका न कोई नुक़ताए आग़ाज़ है और न नुक़ताए इख़्तेताम। न उसकी इब्तिदा का तसव्वुर हो सकता है और न उसकी इन्तेहा का। न यह कहा जा सकता है के वह कब से है , और न यह कहा जा सकता है के वह कब तक है। और जो ‘‘कब से ’’ और ‘‘कब तक ’’ के हुदूद से बालातर हो उसके लिये एक लम्हा भी ऐसा फ़र्ज़ नहीं किया जा सकता जिसमें वह नीस्ती से हमकिनार रहा हो और जिसके लिये अदम व नीस्ती को तजवीज़ किया जा सके वह है ‘‘वाजेबुल वुजूद ’’ जो मुबदाव अव्वल होने के लेहाज़ से अव्वल और ग़ायते आखि़र होने के लिहाज़ से आखि़र होगा।

दूसरी सिफ़त यह है के वह आंखों से दिखाई नहीं दे सकता , क्योंकर किसी चीज़ के दिखाई देने के लिये ज़रूरी है के वह किसी तरफ़ में वाक़े हो , और जब अल्लाह किसी तरफ़ में वाक़ेअ होगा तो दूसरी तरफ़ें उससे ख़ाली मानना पड़ेंगी। और ऐसा अक़ीदा क्योंकर दुरूस्त तस्लीम किया जा सकता है जिसके नतीजे में बाज़ जेहात को उससे ख़ाली मानना पड़े और दूसरे यह के अगर वह किसी तरफ़ में वाक़ेअ होगा तो उस तरफ़ का मोहताज होगा और चूंके वह ख़ालिक़े एतराफ़ है इसलिये किसी तरफ़ का मोहताज नहीं हो सकता और न उसका ख़ालिक़ न रहेगा और तीसरे यह के जेहत में वही चीज़ वाक़ेअ हो सकती है जिस पर हरकत व सुकून तारी हो सकता है और हरकत व सुकून चूंके मुमकिन की सिफ़ात हैं इसलिये अल्लाह के लिये इन्हें तजवीज़ नहीं किया जा सकता और ज बवह हरकत व सुकून से बरी और अर्ज़ व जौहरे जिस्मानी की सतह से बरतर है तो उसके दिखाई देने का सवाल ही पैदा नहीं होता। मगर उसके बावजूद एक जमाअत उसकी रवियत की क़ायल है। यह जमाअत तीन मुख़्तलिफ़ क़िस्म के अक़ाएद के लोगों पर मुश्तमिल है। इनमें से कुछ का अक़ीदा यह है के उसकी रवियत सिर्फ़ आखि़रत में पैदा होगी। दुनिया में रहते हुए उसे देखा नहीं जा सकता और कुछ अफ़राद का नज़रिया यह है के वह आख़ेरत की तरह दुनिया में भी नज़र आ सकता है अगरचे ऐसा कभी नहीं हुआ , और कुछ लोगों का ख़याल यह है के जिस तरह आखि़रत में उसकी रवियत होगी उसी तरह दुनियां में भी देखा जा चुका है। पहले गिरोह की दलील यह है के रवियत का क़ुरान व हदीस में सराहतन ज़िक्र है जिसके बाद इन्कार का कोई महल बाक़ी नहीं रहता चुनान्चे इरशादे बारी तआला है - ‘‘वजूह नाज़ेरत ’’ (उस दिन बहुत से चेहरे तरो ताज़ा व शादाब और अपने परवरदिगार की तरफ़ निगरान होंगे) इससे साफ़ ज़ाहिर है के वह क़यामत में नज़र आएगा और दुनिया में इसलिये नज़र नहीं आ सकता के यहाँ हमारे इदराकात व क़वा कमज़ोर हैं जो तजल्ली-ए-इलाही की ताब नहीं रखते , और आख़ेरत में हमारे हिस व शऊर की क़ूवतें तेज़ हो जाएंगी जैसा के इरशादे इलाही है ‘‘फकशफ़ना अन्क अज़ाअक फ़ बसरक अलयौम हदीद ’’ (हमने तुम्हारे सामने से परदे हटा दिये अब तुम्हारी आंखें तेज़ हो गईं) लेहाज़ा वहाँ पर रवीयत से कोई अम्र मानेअ नहीं हो सकता।

दूसरे गिरोह की दलील यह है के अगर दुनिया में इसकी रवीयत मुमकिन न होती तो हज़रत मूसा (अ 0) ‘‘रब्बे ............एलैक ’’ (ऐ परवरदिगार! मुझे अपनी झलक दिखा ताके मैं तुझे देखूँ) कह कर अनहोनी और नामुमकिन बात की ख़्वाहिश न करते , और अल्लाह तआला ने भी उसे इस्तेक़रारे जबल पर मौक़ूफ़ करके इमकाने रवीयत की तरफ़ इशारा कर दिया। इस तरह अगर रवीयत मुमकिन न होती , तो उसे पहाड़ के ठहराव पर के जो एक अम्रे मुमकिन है मौक़ूफ़ न करता। चुनांचे इरशादे इलाही है ‘‘वलाकिन उनज़ुर एलल जबले फान इसतक़र मकानह फ़सौफ तरानी। (इस पहाड़ की तरफ़ देखो , अगर यह अपनी जगह पर ठहरा रहे तो फिर मुझे भी देख लोगे) और अगर इस सिलसिले में ‘‘लन तरानी ’’ (तुम मुझे क़तअन नहीं देख सकते) फ़रमाया तो उससे सिर्फ़ दुनिया में वक़ू रवीयत की नफ़ी मुराद है न इमकान रवीयत की और न उससे रवीयत आख़ेरत की नफ़ी मक़सूद है। क्योंके जब यह कहा जाए के ऐसा कभी नहीं होगा , तो अरफ़ में उसके मानी यही होते हैं के दुनिया में ऐसा कभी नहीं होगा , यह मक़सद नहीं होता है के आख़ेरत में भी ऐसा नहीं होगा। चुनांचे क़ुराने मजीद में यहूद के मुताल्लिक़ इरशाद है के लईंयतमन्नौहो (वह मौत की कभी तमन्ना नहीं करेंगे) तो यह तमन्ना की नफ़ी दुनिया के लिये है के वह दुनिया में रहते हुए मौत के ख़्वाहिशमन्द कभी नहीं होंगे और आख़ेरत में तो वह अज़ाबे जहन्नम से छुटकारा हासिल करने के लिये बहरहाल मौत की तमन्ना व आरज़ू करेंगे। तो जिस तरह यहाँ पर नफ़ी का ताल्लुक़ सिर्फ़ दुनिया से है उसी तरह वहां भी नफ़ी का ताल्लुक़ सिर्फ़ दुनिया से है न आख़ेरत से।

तीसरे गिरोह की दलील है के जब बयाने साबिक़ से दुनिया में इसकी रवीयत का इमकान साबित हो गया तो उसके वक़ोअ के लिये हुस्ने बसरी और अहमद बिन जम्बल वग़ैरह का यह क़ौल काफ़ी है के पैग़म्बर सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम ने लैलतल इसरा में उसे देखा।

जब इन दलाएल का जाएज़ा लिया जाता है तो वह इन्तेहाई कमज़ोर और असबाते मुद्दआ से क़ासिर नज़र आते हैं। चुनान्चे पहले गिरोह का यह दावा के क़ुरान व हदीस में रवीयत के शवाहिद बकसरत हैं एक ग़लत और बेबुनियाद दावा है और क़ुरान व हदीस से क़तअन इसका असबात नहीं होता बल्कि क़ुरआन के वाज़ेह तसरीहात उसके खि़लाफ़ हैं और क़ुरानी तसरीहात के खि़लाफ़ अगर कोई हदीस होगी भी तो वह मौज़ूअ व मतरूह क़रार पाएगी। चुनान्चे क़ुराने मजीद में नफ़ी रवीयत के सिलसिले में इरशादे इलाही है के ला क़ुदरकह............ वहोवल लतीफ़ल ख़बीर। (आंखें उसे देख नहीं सकतीं और वह आँखों को देख रहा है , और वह हर छोटी से छोटी चीज़ से आगाह और बाख़बर है) और जिस आयत को असाबते रवीयत के सिलसिले में पेश किया गया है , इसमें लफ़्ज़ नाज़ेरत से रवीयत पर इस्तेदलाल सही नहीं है क्योंके अहले लुग़त ने नज़र के मानी इन्तेज़ार , ग़ौर-व फ़िक्र , मोहलत , शफ़क़त और इबरत अन्दोज़ी के भी किये हैं और जब एक लफ़्ज़ में और मानी का भी एहतेमाल हो तो उसे दलील बनाकर पेश नहीं किया जा सकता।

चुनांचे कुछ मुफ़स्सेरीन ने इस मक़ाम पर नज़र के मानी इन्तेज़ार के लिये हैं और इस मानी के लेहाज़ से आयत का मतलब यह है के वह इस दिन अल्लाह की नेमतों के मुन्तज़िर होंगे और इस मानी की शाहिद यह आयत है - फ़नाज़ेरत .....मुरसेलून (वह मुन्तज़िर थी के क़ासिद क्या जवाब लेकर पलटते हैं और कुछ मुफ़स्सेरीन ने नज़र के मानी देखने के लिये हैं और इस सूरत में लफ़्ज़ सवाब को यहाँ महज़ूफ़ माना है और आयत के मानी यह हैं के वह अपने परवरदिगार के सवाब की जानिब निगराँ होंगे। जिस तरह इरशादे इलाही -वजाअअ रब्बेक , (तुम्हारा परवरदिगार आया) में लफ़्ज़ अम्र महज़ूफ़ माना गया है और मानी यह किये गए हैं के तुम्हारे परवरदिगार का हुक्म आया , और फ़िर यह कहां ज़रूरी है के जहाँ नज़र सादिक़ आये वहां रवीयत भी सादिक़ आये। चुनांचे अरब क ामक़ौला है के नज़रत एललहलाल फ़लम अराहो , (मैंने चांद की तरफ़ नज़र की मगर देख न सका) यहाँ नज़र साबित है मगर रवीयत साबित नहीं है। अब रहा यह के वह दुनिया में इस लिये नज़र नहीं आ सकता के यहाँ इन्सानी इदराकात व क़वा ज़ईफ़ हैं और आख़ेरत में यह और इदराकात क़वी हो जायेंगे। तो यह दुनिया व आख़ेरत की तफ़रीक़ इस बिना पर तो सही हो सकती है अगर उसकी ज़ात दिखाई दिये जाने के क़ाबिल हो और हमारी निगाहें अपने अजज़ों क़ुसूर की बिना पर क़ासिर हैं। लेकिन हब उसकी ज़ात का तक़ाज़ा ही यह है के जाने के वह दिखाई न दे तो महल व मुक़ाम के बदलने से नाक़ाबिले रवीयत ज़ात क़ाबिले रवीयत नहीं क़रार पा सकती। और इस सिलसिले में जो आयत पेश की गयी है उसमें तो यह नहीं है के इदराकात व हवास के तेज़ हो जाने से ख़ुदा को भी देखा जा सकेगा बल्कि आयत के मानी तो यह हैं के उस दिन परदे हटा दिये जाएंगे और आँखें तेज़ हो जाएंगी जिसका वाज़ेह मतलब यह है के वहां पर तमाम शुबहात हट जाएंगे और आँखों पर पड़े हुए ग़फ़लत के परदे उठ जाएंगे , यह मानी नही ंके वह अल्लाह को भी देखने लगेंगे , और अगर ऐसा ही है तो यह ग़फ़लत के परदे तो काफ़िरों की आँखों से उठेंगे लेहाज़ा उन्हीं को नज़र आना चाहिये।

दूसरे गिरोह की दलील का जवाब यह है के हज़रत मूसा अ 0 ने रवीयते बारी की ख़्वाहिश इस लिये नहीं की थी के वह उसकी रवीयत को मुमकिन समझते थे और उन्हें उसके नाक़ाबिले रवीयत होने का इल्म न था। यक़ीनन वह जानते थे के वह इदराके हवास व मुशाहिदए बशरी से बदन्दतर है। तो इस सवाल की नौबत इसलिये आई के बनी इसराइल ने कहा के या मूसा लन नौमन लका..........जहरतन (ऐ मूसा अ 0! हम उस वक़्त तक ईमान नहीं लाएंगे जब तक ख़ुदा को ज़ाहिर ब ज़ाहिर न देख लेंगे) तो मूसा अलैहिस्सलाम ने चाहा के उन पर उनकी बे राहरवी साबित कर दें और यह वाज़ेह कर दे ंके वह कोई दिखाई देने वाली चीज़ नहीं है। इसलिये अल्लाह के सामने उनका सवाल पेश किया ताके वह अपने सवाल का नतीजा देख लें और इस ग़लत ख़्याल से बाज़ आयें। चुनांचे ख़ुदा वन्द आलम का इरशाद है के फ़क़द साअलू जहरतन (यह लोग तो मूसा अ 0 से इससे भी बड़ा सवाल कर चुके हैं और वह यह के मूसा से कहने लगे के हमें ख़ुदा को ज़ाहिर ब ज़ाहिर दिखा दीजिये) जब मूसा अ 0 ने उनके कहने पर सवाल किया तो इस मौक़े पर क़ुदरत का यह इरशाद के ‘‘तुम पहाड़ की तरफ़ देखो अगर यह अपनी जगह पर बरक़रार रहे तो मुझे देख लोगे ’’ इमकाने रवीयत का पता नहीं देता। इसलिये के मौक़ूफ़ अलिया सिर्फ़ पहाड़ का ठहराव नहीं था क्योंके वह तो उस वक़्त भी ठहरा हुआ था जब रवीयत को उस पर मोअल्लक़ किया जा रहा था बल्के तजल्ली के वक़्त उसका ठहराव मक़सूद था , और जब तक इस मौक़े के लिये उसके ठहराव का इमकान साबित न हो इस ठहराव को इमकाने रवीयत की दलील नहीं क़रार दिया जा सकता। हालांके इस सअत पर तो यह हुआ के ‘‘जअलहू दक्कन साअक़न ’’ (तजल्ली ने इस पहाड़ को चकनाचूर कर दिया और मूसा बेहोश होकर गिर पड़े) और बनी इसराइल पर उनके बे महल सवाल की वजह से बिजली गिरी। जैसा के इरशादे इलाही है - फ़ा ख़ज़त............ बे ज़ुल्मेहिम (उनकी शर पसन्दी की वजह से बिजली ने उन्हें जकड़ लिया) अगर ख़ुदा वन्दे आलम की रवीयत मुमकिन होती तो एक मुमकिन अलवक़ो चीज़ से ईमान को वाबस्ता करना ऐसा जुर्म न था के उन्हें साएक़ा के अज़ाब में जकड़ लिया जाए और उनकी ख़्वाहिश को ज़ुल्म से ताबीर किया जाए। आखि़र हज़रत इबराहीम अ 0 ने भी तो अपने इतमीनान को मुर्दों को ज़िन्दा करने से वाबस्ता किया था। चुनान्चे उन्होंने कहा के ‘‘रब्बे अरनी कैफ़ा हय्यिल मौता ‘‘ (ऐ मेरे परवरदिगार मुझे दिखा के तू क्योंकर मुर्दों को ज़िन्दा करता है) इसके जवाब में क़ुदरत ने फ़रमाया -अवलम तौमन (क्या तुम ईमान नहीं लाए) हज़रत इबराहीम अ 0 ने अर्ज़ किया -बला वलाकिन लैतमन क क़ल्बी (हाँ ईमान तो लाया! लेकिन चाहता हूँ के दिल मुतमइन हो जाए) अगर हज़रत इबराहीम अ 0 अपने इतमीनान को मुर्दों के ज़िन्दा होने से वाबस्ता कर सकते हैं तो उन लोगों ने अगर अपने ईमान को रवीयते बारी पर मोअल्लक़ किया तो जुर्म ही कौन सा क्या जिस चीज़ पर इन्हें लरज़ा बरअन्दाम कर देने वाली सज़ा दी जाए। और अगर यह कहा जाये के सज़ा इस बिना पर न थी के इन्होेंने रवीयते बारी का मुतालेबा किया था , उनकी साबेक़ा ज़िद , हठधर्मी और कट हुज्जती के पेशे नज़र थी , मगर यह देखते हुए के वह मुतालेबए क़ूवह करें जो किया जा सकता है और मुमकिनअलवक़ो है और इस ज़रिये से अपने ईमान की तकमील चाहें मगर उनकी किसी साबेक़ा ज़िद और सरकशी को सामने रखते हुए उन्हें ऐसी सज़ा दी जाए जो उन्हें नीस्त व नाबूद कर दे , अक़्ल में आने वाली बात नहीं है। और अगर यह कहा जाये के रवीयत के सिलसिले में इनकी ज़िद पर इन्हें सज़ा दी गई थी तो इसमें ज़िद की क्या बात थी अगर उन्होंने मूसा अ 0 के क़ौल को मुशाहिदे के मुताबिक़ करके देखना चाहा , और अगर रवीयत मुर्दों को ज़िन्दा करने की तरह मुमकिन थी तो इसमें मुज़ाएक़ा ही किया था के उनकी ख़्वाहिश को पूरा कर दिया जाता और जिस तरह हज़रत इबराहीम अ 0 के हाथों पर मुर्दों को ज़िन्दा करके उनकी ख़लिश को हटा दिया था , इसी तरह यहाँ भी रवीयत से इनके ईमान की सूरत पैदा कर दी होती , और अगर मसलहत इसकी मुक़तज़ी न थी तो हज़रत मूसा अ 0 के ज़रिये उन्हें समझा दिया जाता के दुनिया में न सही आख़ेरत में उसे देख लेना। मगर उनका मुतालेबा पूरा करने के बजाये उन्हें मोरिदे एताब ठहराया जाता है और उनकी ख़्वाहिश को ज़ुल्म व हदशिकनी से ताबीर किया जाता है और आखि़र उन्हें ख़र्मने हस्ती को जलाने वाली बिजलियों में जकड़ लिया जाता है , यह सिर्फ़ इस लिये के इन्होंने एक ऐसी ख़्वाहिश का इज़हार किया जिससे ख़ुदा के दामने तन्ज़िया पर धब्बा आता था। और यह एक ऐसी अनहोनी चीज़ का मुतालेबा था जिस पर उन्हें सज़ा देना ज़रूरी समझा गया ताके दूसरों को इबरत हासिल हो , और बनी इसराईल के अन्जाम को देख कर रवीयते बारी का तसव्वुर न करें , चुनान्चे अल्लाह सुब्हानहू ने अपनी रवीयत को पहाड़ पर मोअल्लक़ करने से पहले वाज़ेह अलफ़ाज़ में फ़रमाया के - लन तरानी ( ऐ मूसा अ 0! तुम मुझे हरगिज़ नहीं देख सकते) न दुनिया में और न आख़ेरत में , क्योंके लफ्ज़ लन नफ़ी ताबीद के लिये आता है और इस नफ़ी ताबीद को दवामे अरफ़ी पर महमूल करना ग़लत है। यह दवामे उर्फ़ी वहां पर तो सही हो सकता है जहां मुतकल्लिम व मख़ातब दोनों फ़ानी और मारिज़े ज़वाल में हों और जहां मुतकल्लिम अबदी सरमदी और दाएमी हो वहां नफ़ी के हुदूद भी वहाँ तक फैले हुए होंगे , जहाँ तक इस ज़ाते सरमदी का दामने बक़ा फैला हुआ है और चूंके वह हमेशा हमेशा रहने वाला है इसलिये इसकी तरफ़ से जो नफ़ी ताबीर वारिद होगी वह दुनिया की मुद्दते बक़ा में महदूद नहीं की जा सकती और जिस आयत की नफ़ी को दवामे अरफ़ी के मानी में पेश किया गया है उससे इस्तेशहाद इस बिना पर सही नही ंके वह उन लोगों के मुताल्लिक़ है जो फ़ानी व महदूद हैं। लेहाज़ा इस मुक़ाम की नफ़ी का इस मुक़ाम की नफ़ी पर क़यास नहीं किया जा सकता और अगर यह आयत -लँय्यतमन्नौहो (वह मौत की हरगिज़ तमन्ना नहीं करेंगे) मैं भी ताबीरे हक़ीक़ी के मानी मुराद लिये जाएं तो लिये जा सकते हैं , क्योंके आख़ेरत में वह मौत की तमन्ना करेंगे तो वह दर हक़ीक़त मौत की तमन्ना न होगी बल्कि अस्ल तमन्ना अज़ाब से निजात हासिल करने की होगी जिसे तलबे मौत के परदे में तलब करेंगे और यह मौत की तलब न होगी बल्कि राहत व आसाइश और अज़ाब से छुटकारे की तलब होगी और जबके अज़ाब के बजाये उन्हें राहत व सुकून नसीब हो तो वह यक़ीनन ज़िन्दगी के ख़्वाहाँ होंगे और फिर जब असली मानी ताबीर हक़ीक़ी के हैं तो इससे ताबीर अरफ़ी मुराद लेने के लिये किसी क़रीने की ज़रूरत है और यहाँ कोई क़रीना व दलील मौजूद नहीं है के हक़ीक़ी मानी से उदूल करना सही हो सके।

तीसरे गिरोह की दलील का जवाब यह है के अगर कुछ सहाबा व ताबेईन का क़ौल यह है के पैग़म्बर स 0 इकराम ने लैलतल इसरा में अपने रब को देखा तो सहाबा व ताबेईन की एक जमाअत इसकी भी तो क़ायल है के ऐसा नहीं हुआ। चुनांचे हज़रत आइशा और सहाबा की एक बड़ी जमाअत का यही मसलक है , लेहाज़ा चन्द अफ़राद की ज़ाती राय को कैसे सनद समझा जा सकता है जबके इसके मुक़ाबले में वैसे ही अफ़राद इसके खि़लाफ़ नज़रिया रखते हैं , चुनांचे जनाबे आइशा का क़ौल है-

जो शख़्स तुमसे यह बयान करे के मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम ने अपने रब को देखा तो उसने झूठ कहा और अल्लाह का इरशाद तो यह है के उसे निगाहें देख नहीं सकतीं अलबत्ता वह निगाहों को देख रहा है और हर छोटी से छोटी चीज़ से आगाह व ख़बरदार है। (सही बुख़ारी जि 0-4 सफ़ा 168)

तीसरी सिफ़त यह है के उक़ूले इन्सानी उसके औसाफ़ की नक़ाब कुशाई से क़ासिर हैं क्योंके ज़बान उन्हीं मानी व मफ़ाहिम की तर्जुमानी कर सकती है जो अक़्ल व फ़हम में समा सकते हैं और जिनके समझने से अक़्लें आजिज़ हों वह अल्फ़ाज़ की सूरत में ज़बान से अदा भी नहीं हो सकते और ख़ुदा के औसाफ़ का इदराक इसलिये नामुमकिन है के इसकी ज़ात का इदराक नामुमकिन है और जब तक इसकी ज़ात का इदराक न हो उसके नफ़्सुल अम्री औसाफ़ को भी नहीं समझा जा सकता और ज़ात का इदराक इसलिये नहीं हो सकता के इन्सानी इदराकात महदूद होने की वजह से ग़ैर महदूद ज़ात का अहाता नहीं कर सकते। लेहाज़ा इस सिलसिले में जितना भी ग़ौर व ख़ौज़ किया जाए उसकी ज़ात और उसके नफ़्सुल अम्री औसाफ़ अक़्ल व फ़हम के इदराक से बालातर रहेंगे।


दूसरी दुआ

तम्हीद व सताइश के बाद रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम पर दुरूदो सलाम के सिलसिले में आपकी दुआ।

तमाम तारीफ़ उस अल्लाह तआला के लिये हैं जिसने अपने पैग़म्बर (स 0) मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम की बअसत से हम पर वह एहसान फ़रमाया जो न गुज़िश्ता उम्मतों पर किया और न पहले लोगों पर अपनी इस क़ुदरत की कार फ़रमाई है जो किसी शै से आजिज़ व दरमान्दा नहीं होती अगरचे वह कितनी ही बड़ी हो। और कोई चीज़ उसके क़ब्ज़े से निकलने नहीं पाती अगरचे वह कितनी ही लतीफ़ व नाज़ुक हो , उसने अपने मख़लूक़ात में हमें आखि़री उम्मत क़रार दिया , और इन्कार करने वालों पर गवाह बनाया , और अपने लुत्फ़ व करम से कम तादाद वालों के मुक़ाबले में हमें कसरत दी। ऐ अल्लाह! तू रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर जो तेरी वही के अमानतदार तमाम मख़लूक़ात में तेरे बरगुज़ीदा , तेरे बन्दों में पसन्दीदा रहमत के पेशवा , ख़ैर व सआदत के पेशरौ और बरकत का सरचश्मा थे जिस तरह उन्होंने तेरी शरीयत की ख़ातिर अपने को मज़बूती से जमाया और तेरी राह में अपने जिस्म को हर तरह के आज़ार का निशाना बनाया और तेरी तरफ़ दावत देने के सिलसिले में अपने अज़ीज़ों से दुश्मनी का मुज़ाहिरा किया , और तेरी रज़ामन्दी के लिये अपने क़ौम क़बीले से जंग की और तेरे दीन को ज़िन्दा करने के लिये सब रिश्ते नाते क़ता कर लिये , नज़दीक के रिश्तेदारों को इन्कार की वजह से दूर कर दिया और दूर वालों को इक़रार की वजह से क़रीब किया , और तेरी वजह से दूर वालों से दोस्ती और नज़दीक वालों से दुश्मनी रखी और तेरा पैग़ाम पहुंचाने के लिये तकलीफ़ें उठाईं और दीन की तरफ़ दावत देने के सिलसिले में ज़हमतें बरदाश्त कीं और अपने नफ़्स को उन लोगों के पन्द व नसीहत करने में मसरूफ़ रखा जिन्होंने तेरी दावत को क़ुबूल किया , और अपने महल सुकूनत व मक़ामे रिहाइश और जाए विलादत व वतन मालूफ़ से परदेस की सरज़मीन और दूर दराज़ मक़ाम की तरफ़ महज़ इस मक़सद से हिजरत की के तेरे दीन को मज़बूत करें और तुझसे कुफ्र इख़्तिेयार करने वालों पर ग़लबा पाएं , यहाँ तक के तेरे दुश्मनों के बारे में जो उन्होंने चाहा था वह मुकम्मल हो गया और तेरे दोस्तों (को जंग व जेहाद पर आमादा करने) की तदबीरें कामिल हो गईं तो वह तेरी नुसरत से फतेह व कामरानी चाहते हुए और अपनी कमज़ोरी के बावजूद तेरी मदद की पुश्तपनाही पर दुश्मनों के मुक़ाबले के लिये उठ खड़े हुए और उनके घरों के हुदूद में उनसे लड़े और उनकी क़यामगाहों के वुसत में उन पर टूट पड़े। यहाँ तक के तेरा दीन ग़ालिब और तेरा कलमा बलन्द होकर रहा। अगरचे मुशरिक उसे नापसन्द करते रहे। ऐ अल्लाह! उन्होंने तेरी ख़ातिर जो कोशिशें कीं हैं उनके एवज़ उन्हें जन्नत में ऐसा बलन्द दरजा अता कर के कोई मरतबे में उनके बराबर न हो सके और न मन्ज़िलत में उनका हमपाया क़रार पा सके , और न कोई मुक़र्रब बारगाह फ़रिश्ते और न कोई फर्सतादा पैग़म्बर तेरे नज़दीक उनका हमसर हो सके और उनके अहलेबैत (अ 0) अतहार और मोमेनीन की जमाअत के बारे में जिस क़ाबिले क़ुबूल शिफ़ाअत का तूने उनसे वादा फ़रमाया है उस वादे से बढ़कर उन्हें अता फ़रमा , ऐ वादे के नाफ़िज़ करने वाले क़ौल के पूरा करने और बुराइयों को कई गुना ज़ायद अच्छाइयों से बदल देने वाले बेशक तू फ़ज़्ले अज़ीम का मालिक है।

खुलासा :

यह दुआ का दूसरा इफ़्तेताहिया है जो पहले इफ़्तेताहिया के लिये एक तकमिला की हैसियत रखता है। इसलिये वादो अतफ़ के ज़रिये इसका सिलसिला पहले इफ़्तेताहिया से जोड़ दिया गया है। पहला इफ़्तेताहिया हम्द व सनाए इलाही पर मुश्तमिल था और यह रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम पर दुरूदो सलाम के सिलसिले में है। हम्द व सताइश और दुरूदो सलाम एक दूसरे से मुरत्तब और एक क़ुदरती तरतीब के ज़ेरे असर एक दूसरे से वाबस्ता हैं। चुनान्चे जब ख़ुदावन्दे आलम के सि एहसान व इनआम पर नज़र जाती है के इसने नौए इन्सानी की हिदायत के लिये पैग़म्बरों और दीन के रहनुमाओं का सिलसिला जारी किया ताकि वही व तन्ज़ील के ज़रिये हिदायत की तालीम होती रहे तो बेसाख़्ता ज़बान इसकी तम्हीद व सताइश के इस्तेहक़ाक़ का एतराफ़ करने पर मजबूर हो जाती है। के जिसने माद्दी तरबियत के सरो सामान के साथ रूहानी तरबियत के सामान की भी तकमील की , तो जब ख़ुदा के इनआमात उसकी हम्द व सताइश के मोहरक होते हैं तो जो इरफ़ाने इलाही का ज़रिया हों और इन्सानी सलाहियतों को इस क़ाबिल बनाएं के इनमें हिदायत के अनासिर नशो नुमा पा सकें। तहमीदे इलाही के बाद एहसान शिनासी का तक़ाज़ा यह होगा के इन हस्तियों से भी दुरूद व सलाम के ज़रिये इज़हारे अक़ीदत व अरादत किया जाए और इन ज़र्राते मुक़द्देसा में सबसे अकमल व अफ़ज़ल हस्ती रसूले अकरम (स 0) की थी जिन्होंने तहज़ीबे नफ़्स व तरक़्क़ी रूहानी की राहें बताईं और सिदाक़त व रूहानियत की तालीम से मुर्दा इन्सानियत को निशाते सानिया अता किया। लेहाज़ा हम्द के बाद दुरूद व सलाम को नज़र अन्दाज़ नहीं किया जा सकता। चुनांचे दुआ के साथ जिस तरह हम्द को मुनज़्ज़म किया गया है उसी तरह दुरूदो सलवात को भी इस्तेजाबते दुआ का ज़रिया क़रार दिया गया है। चुनांचे अमीरूल मोमेनीन अलैहिस्सलाम का इरशाद हैः-

जब अल्लाह तआला से कोई हाजत तलब करो तो पहले रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम पर दुरूद भेजो फिर अपनी हाजत मांगो। क्योंके ख़ुदा इससे बलन्दतर है के इससे दो हाजतें तलब की जाएं और एक पूरी कर दे और एक रोक ले।

इमाम अलैहिस्सलाम ने दुरूद व सलाम के सिलसिले में आँहज़रत (स 0) की शख़्सियत पर इस तरह जंचे तुले अल्फ़ाज़ में रोशनी डाली है के उनकी ज़िन्दगी के तमाम गोशों की मुकम्मल तस्वीर निगाहों के सामने आ जाती है। चुनान्चे इन कलेमात से आप (स 0) की हस्ती के हस्बे ज़ैल औसाफ़ व कमालात वाज़ेह होते हैं। आप (स 0) वहीए इलाही के हामिल , पाकीज़ा नसब और बरगुज़ीदा ख़लाएक़ थे। ख़ुदावन्दे आलम ने आप (स 0) को तमाम अम्बिया के आखि़र में भेजा जिसके बाद सिलसिलए नबूवत ख़त्म कर दिया। लेहाज़ा आप (स 0) आखि़री पैग़म्बर (स 0) और आप (स 0) की उम्मत आखि़री उम्मत है और उनके अहलेबैत (अ 0) लोगों के आमाल के निगराँ और उनके गवाह हैं। आप (स 0) रहमत व राफ़बत का मुजस्समा और ख़ैर व बरकत का सरचश्मा थे , उनकी दोस्ती व दुश्मनी का मेयार सिर्फ़ ईमान व अमले सालेह है और इस सिलसिले में अपने और बेगाने में कोई इम्तियाज़ व तफ़रिक़ा रवा नहीं रखा। उन्होंने तबलीग़े एहकाम और आलाए कलेमतुल्लाह के लिये जान की बाज़ी लगा दी। दीन की ख़ातिर दुख सहे , मुसीबतें झेलीं घर बार छोड़ा और हिजरत इख़्तेयार की और अपनी सलाहियते नज़्म व नस्क़ से से मुसलमानों की शीज़ाज़ा बन्दी की और उनकी फ़लाह व निजाह का सामान किया और हर तरह के ख़तरात का मुक़ाबले करते हुए दुश्मनों से सफ़आरा हुए और किसी मौक़े पर अपनी क़ूवत व ताक़त पर भरोसा नही किया बल्कि हमेशा ख़ुदा की नुसरत व ताईद के ख़्वाहाँ और उसकी मदद के तालिब रहे और आखि़र हुस्ने नीयत व हुस्ने अमल की बदौलत अन्जामकार की कामयाबी उन्हें नसीब हुई और क़ुबूलियते शिफ़ाअत के दरजए रफ़िया पर फ़ाएज़ हुए।

तीसरी दुआ

हामेलाने अर्श और दूसरे मुक़र्रब फ़रिश्तों पर दुरूदो सलवात के सिलसिले में आप (अ 0) की दुआः-

ऐ अल्लाह! तेरे अर्श के उठाने वाले फ़रिश्ते जो तेरी तस्बीह से उकताते नहीं हैं और तेरी पाकीज़गी के बयान से थकते नहीं और न तेरी इबादत से ख़स्ता व मलूल होते हैं और न तेरे तामीले अम्र में सई व कोशिश के बजाए कोताही बरतते हैं और न तुझसे लौ लगाने से ग़ाफ़िल होते हैं और इसराफ़ील (अ 0) साहेबे सूर जो नज़र उठाए हुए तेरी इजाज़त और निफ़ाज़े हुक्म के मुन्तज़िर हैं ताके सूर फूंक कर क़ब्रों में पड़े हुए मुर्दों को होशियार करें और मीकाईल (अ 0) जो तेरे यहाँ मरतबे वाले और तेरी इताअत की वजह से बलन्द मन्ज़िलत हैं और जिबरील (अ 0) जो तेरी वही के अमानतदार और अहले आसमान जिनके मुतीअ व फ़रमाँबरदार हैं और तेरी बारगाह में मक़ामे बलन्द और तक़र्रूबे ख़ास रखते हैं और वह रूह जो फ़रिश्तगाने हिजाब पर मोक्किल है और वह रूह जिसकी खि़लक़त तेरे आलमे अम्र से है इन सब पर अपनी रहमत नाज़िल फ़रमा और इसी तरह उन फ़रिश्तों पर जो उनसे कम दरजा और आसमानों में साकिन और तेरे पैग़ामों के अमीन हैं और उन फ़रिश्तों पर जिनमें किसी सई व कोशिष से बद्दिली और किसी मशक़्क़त से ख़स्तगी व दरमान्दगी पैदा नहीं होती और न तेरी तस्बीह से नफ़सानी ख़्वाहिशें उन्हें रोकती हैं और न उनमें ग़फ़लत की रू से ऐसी भूल चूक पैदा होती है जो उन्हें तेरी ताज़ीम से बाज़ रखे। वह आँखें झुकाए हुए हैं के (तेरे नूरे अज़मत की तरफ़ निगाह उठाने का भी इरादा नहीं करते और ठोड़ियों के बल गिरे हुए हैं और तेरे यहाँ के दरजात की तरफ़ उनका इश्तियाक़ बेहद व बेनिहायत है और तेरी नेमतों की याद में खोए हुए हैं और तेरी अज़मत व जलाले किबरियाई के सामने सराफ़गन्दा हैं , और उन फ़रिश्तों पर जो जहन्नुम को गुनहगारों पर शोलावर देखते हैं तो कहते हैं :

पाक है तेरी ज़ात! हमने तेरी इबादत जैसा हक़ था वैसी नहीं की। (ऐ अल्लाह!) तू उन पर और फ़रिश्तगाने रहमत पर और उन पर जिन्हें तेरी बारगाह में तक़र्रूब हासिल है और तेरे पैग़म्बरों (अ 0) की तरफ़ छिपी हुई ख़बरें ले जाने वाले और तेरी वही के अमानतदार हैं और उन क़िस्म-क़िस्म के फ़रिश्तों पर जिन्हें तूने अपने लिये मख़सूस कर लिया है और जिन्हें तस्बीह व तक़दीस के ज़रिये खाने पीने से बेनियाज़ कर दिया है और जिन्हें आसमानी तबक़ात के अन्दरूनी हिस्सों में बसाया है और उन फ़रिश्तों पर जो आसमानों के किनारों में तौक़ुफ़ करेंगे जबके तेरा हुक्म वादे के पूरा करने के सिलसिले में सादिर होगा। और बारिश के ख़ज़ीनेदारों और बादलों के हंकाने वालों पर और उस पर जिसके झिड़कने से राद की कड़क सुनाई देती है और जब इस डांट डपट पर गरजने वाले बादल रवाँ होते हैं तो बिजली के कून्दे तड़पने लगते हैं और उन फ़रिश्तों पर जो बर्फ़ और ओलों के साथ-साथ उतरते हैं और हवा के ज़ख़ीरों की देखभाल करते हैं और उन फ़रिश्तों पर जो पहाड़ों पर मोवक्किल हैं ताके वह अपनी जगह से हटने न पाएं और उन फ़रिश्तों पर जिन्हें तूने पानी के वज़न और मूसलाधार और तलातुम अफ़ज़ा बारिशों की मिक़दार पर मुतलेअ किया है और उन फ़रिश्तों पर जो नागवार इब्तिलाओं और ख़ुश आइन्द आसाइशों को लेकर अहले ज़मीन की जानिब तेरे फ़र्सतादा हैं और उन पर जो आमाल का अहाता करने वाले गरामी मन्ज़िलत और नेकोकार हैं और उन पर जो निगेहबानी करने वाले करामन कातेबीन हैं और मलके अमलूत और उसके आवान व अन्सार और मुनकिर नकीर और अहले क़ुबूर की आज़माइश करने वाले रूमान पर और बैतुलउमूर का तवाफ़ करने वालों पर और मालिक और जहन्नम के दरबानों पर और रिज़वान और जन्नत के दूसरे पासबानों पर और उन फ़रिश्तों पर जो ख़ुदा के हुक्म की नाफ़रमानी नहीं करते और जो हुक्म उन्हें दिया जाता है उसे बजा लाते हैं और उन फ़रिश्तों पर जो (आख़ेरत में) सलाम अलैकुम के बाद कहेंगे के दुनिया में तुमने सब्र किया (यह उसी का बदला है) देखो तो आख़ेरत का घर कैसा अच्छा है और दोज़ख़ के उन पासबानों पर के जब उनसे कहा जाएगा के उसे गिरफ़्तार करके तौक़ व ज़न्जीर पहना दो फिर उसे जहन्नुम में झोंक दो तो वह उसकी तरफ़ तेज़ी से बढ़ेंगे और उसे ज़रा मोहलत न देंगे।

और हर उस फ़रिश्ते पर जिसका नाम हमने नहीं लिया और न हमें मालूम है के उसका तेरे हाँ क्या मरतबा है और यह के तूने किस काम पर उसे मुअय्यन किया है और हवा , ज़मीन और पानी में रहने वाले फ़रिश्तों पर और उन पर जो मख़लूक़ात पर मुअय्यन हैं उन सब पर रहमत नाज़िल कर उस दिन के जब हर शख़्स इस तरह आएगा के उसके साथ एक हंकाने वाला होगा और एक गवाही देने वाला और उन सब पर ऐसी रहमत नाज़िल फ़रमा जो उनके लिये इज़्ज़त बालाए इज़्ज़त और तहारत बालाए तहारत का बाएस हो। ऐ अल्लाह! जब तू अपने फ़रिश्तों और रसूलों पर रहमत नाज़िल करे और हमारे सलवात व सलाम को उन तक पहुंचाए तो हम पर भी अपनी रहमत नाज़िल करना इसलिये के तूने हमें उनके ज़िक्रे ख़ैर की तौफ़ीक़ बख़्शी। बेशक तू बख़्शने वाला और करीम है।

खुलासा :

इस दुआ में इमाम अलैहिस्सलाम ने फ़रिश्तों और मला , आला के रहने वालों पर दुरूदो सलवात के सिलसिले में उनके औसाफ़ व इक़साम और मेज़ारज और तबक़ात का ज़िक्र फ़रमाया है और यह हक़ीक़त है के मलाएका के बारे में वही कुछ कह सकता है जिसकी निगाहें आलमे मलकूत की मन्ज़िलों से आशना हों। चुनान्चे इस सिलसिले में सबसे पहले जिसने तफ़सील से रोशनी डाली वह हज़रत अली इब्ने अबी तालिब अलैहिस्सलात वस्सलाम हैं और इसके लिये आपके ख़ुतबात शाहिद हैं जिनमें मलाएका के सूर व इशकाले सिफ़ात व ख़ुसूसियात और अल्लाह से उनकी वालेहाना मोहब्बत व शीफ़्तगी और उनकी इबादत व दारफ़्तगी की मुकम्मल तस्वीरकशी की है। जिसकी नज़ीर न अगलों के कलाम में मिलती है न पिछलों के इस्लाम से क़ब्ल अगरचे कुछ अफ़राद ऐसे मौजूद थे जो हक़ाएक़ व मआरिफ़ से वाबस्तगी रखते थे। जैसे अब्दुल्लाह बिन सलाम , उमय्या इब्ने अबुलसलत , दरक़ा इब्ने नोफ़ल , क़लस बिन्दे साअद , अकशम इब्ने सैफ़ी वग़ैरा। मगर इस सिलसिले में वह ज़बान व क़लम को हरकत न दे सके और अगर कुछ कहते भी तो वह तर्ज़े बयान और कलाम पर इक़्तेदार उन्हें कहां नसीब था जो परवरदाए आग़ोशे नबूवत अमीरूल मोमेनीन (अ 0) को हासिल था। और दूसरे अदबा व शोअराए अरब थे तो उनका मौज़ूए कलाम अमूमन घोड़ा , बैल , गाय , ऊँट वग़ैरा होता था या हर्ब व पैकार के ख़ूनी हंगामों और ख़ुदसेताई व तफ़ाख़ुर के तज़किरों पर मुश्तमिल होता था या उसमें बादोबारां के मनाज़िरे इश्क़ व मोहब्बत के वारदात और खण्डरों और वीरानों के निशानात का ज़िक्र था और माद्दियात से बलन्दतर चीज़ों तक उनके ज़ेहनों की रसाई ही न थी के उनके मुताल्लिक़ वह कुछ कह सकते अगरचे वह फ़रिश्तों के वजूद के क़ायल थे मगर उन्हें ख़ुदा की चहेती और लाडली बेटियां तसव्वुर किया करते थे , चुनांचे क़ुराने मजीद में उनके ग़लत अक़ीदे का तज़किरा इस तरह हैः- फ़स तफ़तहुम..........शाहेदून ((ऐ रसूल (स 0)! इनसे पूछो के क्या तुम्हारे परवरदिगार की बेटियां हैं और उनके बेटे हैं , क्या हमने फ़रिश्तों को तबक़ुन्नास से पैदा किया तो वह देख रहे थे।)

अमीरूल मोमेनीन अलैहिस्सलाम के बाद हज़रत अली बिन अलहुसैन अलैहिस्सलाम ने मलाएका के असनाफ़ , उनके दरजात व मरातेब के तफ़ावत और उनके फ़राएज़ व मुज़ाहेरए उबूदियत पर तफ़सील से रोशनी डाली है।

मज़ाहेबे आलम में फ़रिश्तों के मुताल्लिक़ मुख़्तलिफ़ नज़रिये पाए जाते हैं। कुछ तो उन्हें नूर का मज़हर क़रार देते हैं और कुछ साद सितारों को मलाएका रहमत और नहस सितारों को मलाएकाए अज़ाब तसव्वुर करते हैं और कुछ का ख़याल है के वह अक़ूले मजरूह व नुफ़ूसे फ़लकिया हैं और कुछ का मजऊमा यह है के वह तबाए व क़वा हैं या देफ़ा व जज़्ब की क़ूवतें हैं। और फिर जो उन्हें किसी मुस्तक़िल हैसियत से मानते हैं उनमें भी इख़्तेलाफ़ात हैं के आया वह रूहानी महज़ हैं या जिस्मानी महज़ या जिस्म व रूह से मुरक्कब हैं , और अगर जिस्मानी हैं तो जिस्मे लतीफ़ रखते हैं या जिस्मे ग़ैर लतीफ़ , और लतीफ़ हैं तो अज़ क़बीले नूर हैं या अज़ क़बीले हवा , या इनमें से बाज़ अज़ क़बीले नूर हैं और बाज़ अज़ क़बीले हवा। बहरहाल इनकी हक़ीक़त कुछ भी हो हमें यह अक़ीदा रखना लाज़िम है के वह अल्लाह की एक ज़ी अक़्ल मख़लूक़ हैं जो गुनाहों से बरी और अम्बिया व रसूल की जानिब इलाही एहकाम के पहचानने पर मामूर हैं , चुनांचे इन पर ईमान लाने के सिलसिले में क़ुदरत का इरशाद है-- आमनुर्रसूल.......... व मलाएकते (हमारे) पैग़म्बर (स 0) जो कुछ उन पर उनके परवरदिगार की तरफ़ से नाज़िल किया गया है उस पर ईमान लाए और मोमेनीन भी सब के सब ख़ुदा पर और उसके फ़रिश्तों पर ईमान लाए।

हज़रत (अ 0) ने इस दुआ में दस फ़रिश्तों को नाम के साथ याद किया है जो यह हैं- जिबरील (अ 0), मीकाईल (अ 0), इसराफ़ील (अ 0), मलकुल मौत (इज़राईल) (अ 0), रूह (अलक़ुद्स)(अ 0), मुन्किर (अ 0), नकीर (अ 0), रूमान (अ 0), रिज़वान (अ 0), मालिक (अ 0)। इनमें पहले चार फ़रिश्ते जिनके नाम का आखि़री जुज़ ईल है जिसके मानी इबरानी या सुरयानी ज़बान में ‘‘अल्लाह ’’ के होते हैं , सब मलाएका से अफ़ज़ल व बरतर हैं , और मीकाईल (अ 0), के मुताल्लिक़ यह भी कहा गया है के यह कील से मुश्तक़ हैं जिसके मानी नापने के होते हैं और यह चूंके पानी की पैमाइश पर मुअय्यन हैं इसलिये इन्हें मीकाईल कहा जाता है। इस सूरत में उनके नाम का आखि़री जुज़ ईल मबनी ‘‘अल्लाह ’ नहीं होगा। और रूह के मुताल्लिक़ मुख़्तलिफ़ रिवायात हैं बाज़ रिवायात से यह मालूम होता है के यह एक फ़रिश्ते का नाम है जो तमाम फ़रिश्तों से ज़्यादा क़द्र व मन्ज़िलत का मालिक है और बाज़ रिवायात से यह ज़ाहिर होता है के जिबरील (अ 0) ही का दूसरा नाम रूह है और बाज़ रिवायात में यह है के रूह एक नौअ है जिसका कशीरूत्तादाद मलाएका पर इतलाक़ होता है और मुनकिर नकीर और रूमान क़ब्र के सवाल व जवाब से ताल्लुक़ रखते हैं। चुनान्चे रूमान , मुनकिर नकीर से पहले क़ब्र में आता है और हर आदमी को जांचता है और फिर मुनकिर व नकीर को उसकी अच्छाई या बुराई से आगाह करता है और रिज़वान जन्नत के पासबानों का व रईस और मालिके जहन्नम के दरबानों का सरख़ील है जिनकी तादाद अनीस है। चुनांचे क़ुदरत का इरशाद है- ‘‘व अलैहा तसअता अश्र ’’ जहन्नुम पर अनीस फ़रिश्ते मुक़र्रर हैं। उनके अलावा जब ज़ैल असनाफ़े मलाएका का तज़किरा फ़रमाया है-

1. हामेलाने अर्श - यह वह फ़रिश्ते हैं जो अर्शे इलाही को उठाए हुए हैं चुनांचे उनके मुताल्लिक़ इरशादे इलाही है - ‘‘अल्लज़ीना बेहम्बे रब्बेहिम ’’ (जो फ़रिश्ते अर्श को उठाए हुए हैं और जो उसके गिर्दागिर्द हैं , अपने परवरदिगार की तारीफ़ के साथ तस्बीह करते हैं। ’’

(आप इस किताब को अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क पर पढ़ रहे है।)

2. मलाएकाए हजबः इससे मुराद वह फ़रिश्ते हैं जो इस आलमे अनवार व तजल्लियात से ताल्लुक़ रखते हैं जिसके गिर्द सरादक़ जलाल व हिजाबे अज़मत के पहले हैं और इन्सानी इल्म व इदराक से बालातर हैं।

3. मलाएकाए समावात- इससे मुराद वह फ़रिश्ते हैं जो तबक़ाते आसमानी में पाए जाते हैं , चुनान्चे क़ुदरत का इरशाद है - ‘‘व अना.......... शदीद...... ’’ (हमने आसमानों को टटोला तो उसे क़वी निगहबानों से भरा हुआ पाया।)

4. मलाएकाए रूहानेयीन- इससे मुराद वह फ़रिश्ते हैं जो आसमाने हफ़्तुम में हज़ीरतुल क़ुद्स के अन्दर मुक़ीम हैं और शबे क़द्र में ज़मीन पर उतरते हैं , चुनान्चे इरशादे इलाही है- ‘‘तनज़्ज़लुल मलाएकतो............. कुल्ले अम्र ’’ (इस रात फ़रिश्ते और रूह (अल क़ुद्स) हर बात का हुक्म लेकर अपने परवरदिगार की इजाज़त से उतरते हैं)

5. मलाएकाए मुक़र्रेबीन- यह वह फ़रिश्ते हैं जिन्हें बारगाहे इलाही में ख़ास तक़र्रूब हासिल है और उन्हें कर्रोबय्यन से भी याद किया जाता है जो कर्ब मबनी क़र्ब से माख़ोज है। इनके मुताल्लिक़ इरशादे क़ुदरत है - ‘‘लन यसतनकफ़................. मलाएकतल मुक़र्रबून ’’ (मसीह अ 0 को इसमें आर नहीं के वह अल्लाह का बन्दा हो और न उसके मुक़र्रब फ़रिश्तों को)

6. मलाएकाए रस्ल - यह वह फ़रिश्ते हैं जो पैग़ाम्बरी का काम अन्जाम देने पर मामूर हैं- चुनान्चे क़ुदरत का इरशाद है - ‘‘अल्हम्दो लिल्लाह.................. मलाएकतेरसला ’’ (सब तारीफ़ उस अल्लाह के लिये जो आसमान व ज़मीन का बनाने वाला और फ़रिश्तों को अपना क़ासिद बनाकर भेजने वाला है ’’

7. मलाएकए मुदब्बेरात - यह वह फ़रिश्ते हैं जो अनासिरे बसीत व एहसामे मुरक्कबा जैसे पानी , हवा , बर्क़ , बादो बाराँ , रअद और जमादात व नबातात व हैवान पर मुक़र्रर हैं। चुनान्चे क़ुरआन मजीद में है ‘‘ फलमुदब्बेराते अमरन ’’ (उन फ़रिश्तों की क़सम जो उमूरे आलम के इन्तेज़ाम में लगे हुए हैं) फिर इरशाद है- ‘‘वज़्ज़ाजेराते ज़जरन ’’ (झिड़क कर डाँटने वालों की क़सम)। इब्ने अब्बास का क़ौल है के इससे वह फ़रिश्ते मुराद हैं जो बादलों पर मुक़र्रर हैं।

8. मलाएकाए हिफ़्ज़ा - यह वह फ़रिश्ते हैं जो अफ़रादे इन्सानी की हिफ़ाज़त पर मामूर हैं , चुनान्चे क़ुदरत का इरशाद है - ‘‘लह ...............अम्रिल्लाह ’’ (इसके लिये इसके आगे और पीछे हिफ़ाज़त करने वाले फ़रिश्ते मुक़र्रर हैं जो ख़ुदा के हुक्म से उसकी हिफ़ाज़त व निगरानी करते हैं)

9. मलाएकए कातेबीन- वह फ़रिश्ते जो बन्दों के आमाल ज़ब्ते तहरीर में लाते हैं। चुनान्चे क़ुदरत का इरशाद है (जब वह कोई काम करता है तो दो लिखने वाले जो उसके दाएं , बाएं हैं लिख लेते हैं और वह कोई बात नहीं कहता मगर एक निगराँ उसके पास तैयार रहता है)

10. मलाएकए मौत- वह फ़रिश्ते जो मौत का पैग़ाम लाते और रूह को क़ब्ज़ करते हैं , चुनान्चे इरशादे इलाही है -( उन फ़रिश्तों की क़सम जो ढूब कर इन्तेहाई शिद्दत से काफ़िरों की की रूह खींच लेते हैं , और उनकी क़सम जो बड़ी आसानी से मोमिनों की रूह क़ब्ज़ करते हैं ’’ )

11. मलाएकाए ताएफ़ीन - वह फ़रिश्ते जो अर्श और अर्श के नीचे बैतुल मामूर का तवाफ़ करते रहते हैं चुनान्चे क़ुदरत का इरशाद है ‘‘वतरी..... अर्श ’’ (तुम अर्श के गिर्दागिर्द फ़रिश्तों को घेरा डाले हुए देखोगे)

12. मलाएकाए हश्र- वह फ़रिश्ते जो मैदाने हश्र में इन्सानों को लाएंगे और उनके आमाल व अफ़आल की गवाही देंगे , चुनांचे क़ुदरत का इरशाद है - ‘‘वजाअत शहीद ’’ (और हर शख़्स हमारे पास आएगा और इसके साथ एक फ़रिश्ता हंकाने वाला और एक आमाल की शहादत देने वाला होगा)

13. मलाएकाए जहन्नुम -वह फ़रिश्ते जो दोज़ख़ की पासबानी पर मुक़र्रर हैं चुनांचे क़ुदरत का इरशाद है - ‘‘ अलैहा.................शद्ाद ’’ (जहन्नुम पर वह फ़रिश्ते मुक़र्रर हैं जो तन्द ख़ू और तेज़ मिज़ाज हैं)

14. मलाएकाए बहिश्त- वह फ़रिश्ते जो जन्नत के दरवाज़ों पर मुक़र्रर हैं , चुनांचे क़ुदरत का इरशाद है - ‘‘हत्ता................................ ख़ालेदीन ’’ (यहाँ तक के ज बवह जन्नत के पास पहुंचेंगे और उसके दरवाज़े खोल दिये जाएंगे और उसके निगेहबान उनसे कहेंगे सलाम अलैकुम तुम ख़ैर व ख़ूबी से रहे लेहाज़ा बहिश्त में हमेशा के लिये दाखि़ल हो जाओ)

यह वह असनाफ़े मलाएका हैं जिनका इस दुआ में तज़किरा है और इनके अलावा और कितने एक़साम व असनाफ़ हैं तो उनका अहाता अल्लाह के सिवा कौन कर सकता है - (तुम्हारे परवरदिगार के लश्करों को उसके अलावा कोई नहीं जानता)

चौथी दुआ

अम्बिया व ताबेईन और उन पर ईमान वालों के हक़ में हज़रत की दुआ

बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम ऐ अल्लाह! तू अहले ज़मीन से रसूलों की पैरवी करने वालों और उन मोमेनीन को अपनी मग़फ़ेरत और ख़ुशनूदी के साथ याद फ़रमा जो ग़ैब की रू से उन पर ईमान लाए। उस वक़्त के जब दुश्मन उनके झुठलाने के दरपै थे और उस वक़्त के जब वह ईमान की हक़ीक़तों की रोशनी में उनके (ज़ुहूर के) मुश्ताक़ थे। हर उस दौर और हर उस ज़माने में जिसमें तूने कोई रसूल भेजा और वक़्त के लोगों के लिये कोई रहनुमा मुक़र्रर किया। हज़रत आदम (अ 0) के वक़्त से लेकर हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम के अहद तक जो हिदायत के पेशवा और साहेबाने तक़वा के सरबराह थे (उन सब पर सलाम हो) बारे इलाहा! ख़ुसूसियत से असहाबे मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम में से वह अफ़राद जिन्होंने पूरी तरह पैग़म्बर (स 0) का साथ दिया और उनकी नुसरत में पूरी शुजाअत का मुज़ाहेरा किया और उनकी मदद पर कमरबस्ता रहे और उन पर ईमान लाने में जल्दी और उनकी दावत की तरफ़ सबक़त की , और जब पैग़म्बर (स 0) ने अपनी रिसालत की दलीलें उनके गोशगुज़ार की ंतो उन्होंने लब्बैक कहा और उनका बोलबाला करने के लिये बीवी बच्चों को छोड़ दिया और अम्रे नबूवत के इस्तेहकाम के लिये बाप और बेटों तक से जंगें कीं और नबी-ए-अकरम (स 0) के वजूद की बरकत से काम याबी हासिल की , इस हालत में के उनकी मोहब्बत दिल के हर रग व रेशे में लिये हुए थे और उनकी मोहब्बत व दोस्ती में ऐसी नफ़ा बख़्श तिजारत के मुतवक़्क़ो थे जिसमें कभी नुक़सान न हो। और जब उनके दीन के बन्धन से वाबस्ता हुए तो उनके क़ौम क़बीले ने उन्हें छोड़ दिया। और जब उनके सायए क़र्ब में सन्ज़िल की तो अपने बेगाने हो गए। तो ऐ मेरे माबूद! उन्होंने तेरी ख़ातिर और तेरी राह में जो सब को छोड़ दिया तो (जज़ा के मौक़े पर) उन्हें फ़रामोश न कीजो और उनकी इस फ़िदाकारी और ख़ल्क़े ख़ुदा को तेरे दीन पर जमा करने और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम के साथ दाई हक़ बन कर खड़ा होने के सिले में उन्हें अपनी ख़ुशनूदी से सरफ़राज़ व शाद काम फ़रमा और उन्हें इस अम्र पर भी जज़ा दे के उन्होंने तेरी ख़ातिर अपने क़ौम क़बीले के शहरों से हिजरत की और वुसअते मआश से तंगीए मआश में जा पड़े और यूं ही उन मज़लूमों की ख़ुशनूदी का सामान करके जिनकी तादाद को तूने अपने दीन को ग़लबा देने के लिये बढ़ाया बारे इलाहा! जिन्होंने असहाबे रसूल (स 0) की अहसन तरीक़ से पैरवी की उन्हें बेहतरीन जज़ाए ख़ैर दे जो हमेशा यह दुआ करते रहे के ‘‘ऐ हमारे परवरदिगार! तू हमें और हमारे उन भाइयों को बख़्श दे जो ईमान लाने में हमसे सबक़त ले गये ’’ और जिनका सतहे नज़र असहाब का तरीक़ रहा और उन्हीं का तौर तरीक़ा इख़्तेयार किया औन उन्हीं की रविश पर गामज़न हुए। उनकी बसीरत में कभी शुबह का गुज़र नहीं हुआ के उन्हें (राहे हक़ से) मुन्हरिफ़ करता और उनके नक़शे क़दम पर गाम फ़रमाई और उनके रौशन तर्ज़े अमल की इक़्तेदार में उन्हीं की शक व तरद्दुद ने परेशान नहीं किया वह असहाबे नबी (स 0) के मआवुन व दोस्तगीर और दीन में उनके पैरोकार और सीरत व इख़लाक़ में उनसे दर्स आमोज़ रहे और हमेशा उनके हमनवा रहे और उनके पहँुचाए हुए एहकाम में उन पर कोई इल्ज़ाम न वुसरा। बारे इलाहा! उन ताबेईन और उनकी अज़वाज और आल व औलाद और उनमें से जो तेरे फ़रमाँबरदार व मुतीअ हैं उनपर आज से लेकर रोज़े क़यामत तक दूरूद व रहमत भेज। ऐसी रहमत जिसके ज़रिये तू उन्हें मासियत से बचाए। जन्नत के गुलज़ारों में फ़राख़ी व वुसअत दे। शैतान के मक्र से महफ़ूज़ा रखे और जिस कारे ख़ैर में तुझसे मदद चाहें उनकी मदद करे और शब व रोज़ के हवादिस से सिवाए किसी नवीदे ख़ैर के इनकी निगेहदाश्त करे और इस बात पर उन्हें आमादा करे के वह तुझसे हुस्ने उम्मीद का अक़ीदा वाबस्ता रखें और तेरे हाँ की नेमतों की ख़्वाहिश करें और बन्दों के हाथों में फ़राख़ी नेमत को देखकर तुझ पर (बे इन्साफ़ी का) इल्ज़ाम न धरें ताके उनका रूख़ अपने उम्मीद व बीम की तरफ़ फेर दे और दुनिया की वुसअत व फ़राख़ी से बे तअल्लुक़ कर दे और अमले आख़ेरत और मौत के बाद की मन्ज़िल का साज़ व बर्ग मुहय्या करना उनकी निगाहों में ख़ुश आईन्द बना दे और रूहों के जिस्मों से जुदा होने के दिन हर कर्ब व अन्दोह जो उन पर वारिद हो आसान कर दे और फ़ित्ना व आज़माईश से पैदा होने वाले ख़तरात और जहन्नुम की शिद्दत और इसमें हमेशा पड़े रहने से निजात दे और उन्हें जा-ए अमन की तरफ़ जो परहेज़गारों की आसाइशगाह है , मुन्तक़िल कर दे।

हज़रत ने इस दुआ में सहाबा व ताबेईन बिलएहसान और साबेक़ीन बिल ईमान के लिये कलेमात तरहम इरशाद फ़रमाए हैं और हस्बे इरशादे इलाही के अहले ईमान गुज़रे हुए अहद के मोमेनीन के लिये दुआ करते हुए कहते हैं के ‘‘रब्बेनग़ फ़िरलना .............बिल ईमान ’’ । ऐ हमारे परवरदिगार! तू हमें और हमारे उन भाईयों को बख़्श दे जो ईमान लाने में हमसे सबक़त ले गये ’’ उनके लिये दुआए अफ़ो व मग़फ़ेरत फ़रमाते हैं। इमाम अलैहिस्सलाम के तर्ज़े अमल और इस आयाए क़ुरानी से हमें यह दर्स हासिल होता है के जो मोमेनीन रहमते इलाही के जवार में पहुंच चुके हैं उनके लिये हमारी ज़बान से कलेमाते तरह्हम निकलें और उनकी सबक़ते ईमानी के पेशे नज़र उनके लिये दुआए मग़फ़ेरत करें और यह हक़ीक़त भी वाज़ेह हो जाती है के ईमान में सबक़त हासिल करना भी फ़ज़ीलत का एक बड़ा दरजा है। तो इस लिहाज़ से सबक़त ले जाने वालों में सबसे ज़्यादा फ़ज़ीलत का हामिल वह होगा जो उन सबसे साबिक़ हो और यह मुसल्लेमए अम्र है के सबसे पहले ईमान में सबक़त करने वाले अमीरूल मोमेनीन अली (अ 0) इब्ने अबी तालिब अलैहिस्सलाम थे। चुनांचे इब्ने अब्दुल बरीकी ने तहरीर किया है--

’’ रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम के बाद जो सबसे पहले अल्लाह तआला पर ईमान लाया वह अली इब्ने अबी तालिब अलैहिस्सलाम थे ’’

ख़ुदावन्दे आलम ने अपने इरशाद - ‘‘ऐ हमारे परवरदिगार! तू हमें और हमारे उन भाईयों को जो ईमान में हमसे साबिक़ थे बख़्श दे , की रू से हर मुसलमान पर अपने कलाम में यह फ़रीज़ा आयद कर दिया है के वह अली (अ 0) इब्ने अबी तालिब अलैहिस्सलाम के लिये दुआए मग़फ़ेरत व रहमत करता रहे। लेहाज़ा हर वह शख़्स जो अली (अ 0) इब्ने अबी तालिब अलैहिस्सलाम के बाद ईमान लाए वह आप (अ 0) के हक़ में दुआए मग़फ़ेरत करे। (शरह इब्ने अबी अल हदीद जि 0 3, स 0 256)

बहरहाल जिन सहाबा और साबेक़ीन बिल ईमान का इस दुआ में तज़किरा है वह असहाब थे जिन्होंने मरहले पर फ़िदाकारी के जौहर दिखाए , बातिल की ताग़ूती क़ूवतों के सामने सीना सिपर रहे। रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम के असवए हुस्ना के सांचे में अपनी ज़िन्दगियों को ढाल के दूसरों के लिये मिनारे हिदायत क़ायम कर गए और जादहो हक़ की निशानदेही और इस्लाम की सही तालीमात की तरफ़ रहनुमाई करते रहे , दीन की ख़ातिर हर क़ुर्बानी पर आमादा नज़र आये। क़ौम क़बीले को छोड़ा। बीवी बच्चों से मुंह मोड़ा , घर से बेघर हुए , जंग की शाद फ़िशानियों में तलवारों के वार सहे और सब्रो इस्तेक़लाल के साथ दुश्मन के मुक़ाबले में जम कर लड़े , जिससे इस्लाम इनका दहीने मन्नत और अहले इस्लाम इनके ज़ेरे एहसान हैं क्या सलमान , अबूज़र , मिक़दाद , अम्मार इब्ने यासिर , ख़बाब इब्ने अरत , बिलाल इब्ने रबाह , क़ैस इब्ने सअद , जारिया इब्ने क़दामा , हज्र इब्ने अदमी , हज़ीफ़ा इब्ने अलयमान , हुन्ज़ला इब्ने नामान , ख़ज़ीमा इब्ने साबित , अहनफ़ इब्ने क़ैस , अम्रो इब्ने अलहमक़ , उस्मान बिन हनीफ़ ऐसे जलील अलक़द्र सहाबा को अहले इस्लाम फ़रामोश कर सकते हैं जिनकी जान फ़रोशाना खि़दमात के तज़किरों से तारीख़ का दामन छलक रहा है।

यह ज़ाहिर है के यह दुआ अहदे नबवी (स 0) के तमाम मुसलमानों को शामिल नहीं है क्योंके इनमें ऐसे भी थे जो बन्से क़ुरानी फ़ासिक़ थे जैसे वलीद इब्ने अक़बा। ऐसे भी थे जिन्हें पैग़म्बर (स 0) ने फ़ित्ना परवरी व शरअंगेज़ी की वजह से शहर बदर कर दिया गया था जैसे हकम इब्ने आस और उसका बेटा मरवान। ऐसे भी थे जिन्होंने महज़ हुसूले इक़्तेदार व तलब व जाह के लिये अहलेबैत (अ 0) रसूल (स 0) से जंगें कीं। जैसे माविया , अम्रो इब्ने आस , बसर इब्ने अबी इरतात , जीब इब्ने मुसलमह , अम्रो इब्ने सअद वग़ैरह। ऐसे भी थे जो पैग़म्बर (स 0) को मस्जिद में तन्हा छोड़कर अलग हो जाते थे। चुनांचे इरशादे बारे हैः-

‘‘वएज़ा क़ाएमन

(यह वह हैं के जब कोई तिजारत या बेहूदगी की बात देखते हैं तो उसकी तरफ़ टूट पड़ते हैं और तुमको खड़ा हुआ छोड़ जाते हैं) और ऐसे भी थे जिनके दिमाग़ों में जाहेलीयत की बू बसी हुई थी और पैग़म्बर (स 0) अकरम की रेहलत के बाद अपनी साबेक़ा सीरत की तरफ़ पलट गए , चुनांचे मुहम्मद इब्ने इस्माईल बुख़ारी यह हदीस तहरीर करते हैं-

‘‘ फ़रमाया के क़यामत के दिन मेरे असहाब की एक जमाअत मेरे पास आएगी। जिसे हौज़े कौसर से हटा दिया जाएगा। मैं इस मौक़े पर कहूंगा के ऐ मेरे परवरदिगार। यह तो मेरे हैं इरशाद होगा के तुम्हें ख़बर नहीं है के इन्होंने तुम्हारे बाद दीन में क्या क्या बिदअतें कीं। यह तो उलटे पाँव अपने साबेक़ा मज़हब की तरफ़ पलट गए थे। ’ (सही बुख़ारी बाबुल हौज़)

इन हालात में उन सबके मुताल्लिक़ हुस्ने अक़ीदत रखना और उन सबको एक सा आदिल क़रार दे लेना एक तक़लीदी अक़बेदत का नतीजा तो हो सकता है मगर वाक़ेआत व हक़ाएक़ की रौशनी में परखने के बाद इस अक़ीदे पर बरक़रार रहना बहुत मुश्किल है। आखि़र एक होशमन्द इन्सान यह सोचने पर मजबूर होगा के पैग़म्बर (स 0) के रेहलत फ़रमाते ही यह एकदम इन्क़ेलाब कैसे रूनुमा हो गया के उनकी ज़िन्दगी में तो उनके मरातिब व दरजात , में इम्तियाज़ हो और अब सबके सब एक सतह पर आकर आदिल क़रार पा जाएं और उन्हें हर तरह के नक़्द व जिरह से बालातर समझते हुए अपनी अक़ीदत का मरकज़ बना लिया जाए। आखि़र क्यों ? बेशक बैअत रिज़वान के मौक़े पर अल्लाह तआला ने उनके मुताल्लिक़ अपनी ख़ुशनूदी का इज़हार किया चुनांचे इरशादे इलाही है- ‘‘लक़द शजरता ’’ (जिस वक़्त ईमान लाने वाले तुमसे दरख़्त के नीचे बैअत कर रहे थे तो ख़ुदा उनकी इस बात से ज़रूर ख़ुश हुआ) - तो इस एक बात से ख़ुशनूद होने के मानी यह नहीं होंगे के बस अब उनका हर अमल और हर एक़दाम रज़ामन्दी ही का तर्जुमान होगा और अब वह जो चाहें करें यह ख़ुशनूदी उनके शरीके हाल ही रहेगी , और फिर यह के ख़ुदा वन्दे आलम ने इस आयत में अपनी रज़ामन्दी को सिर्फ़ बैअत से वाबस्ता नहीं किया बल्कि बैअत और ईमान दोनों के मजमूए से वाबस्ता किया है। लेहाज़ा यह रज़ामन्दी सिर्फ़ उनसे मुताल्लिक़ होगी जो दिल से ईमान लाए हों। और अगर कोई मुनाफ़िक़त के साथ इज़हारे इस्लाम करके बैअत करे तो उससे रज़ामन्दी का ताअल्लुक़ साबित नहीं होगा। और फिर जहां यह रज़ामन्दी साबित हो वहाँ यह कहाँ ज़रूरी है के वह बाक़ी व बरक़रार रहेगी। क्योंके यह ख़ुशनूदी तो इस मुआहेदे पर मबनी थी के वह दुश्मन के मुक़ाबले में पैग़म्बर (स 0) अकरम का साथ नहीं छोड़ेंगे और जेहाद के मौक़े पर जम कर हरीफ़ का मुक़ाबला करेंगे। तो अगर वह इस मुआहेदे के तक़ाज़ों को नज़रअन्दाज़ करके मैदान से मुंह मोड़ लें और बैअत के मातहत किये हुए क़ौल व क़रार को पूरा न करें तो यह ख़ुशनूदी कहां बाक़ी रह सकती है। और वाक़ेआत यह बताते हैं के इनमें से ऐसे अफ़राद भी थे जिन्होंने इस मुआहेदे को दरख़ोरे अक़ना नहीं समझा और हिमायते पैग़म्बर (स 0) के फ़रीज़े को नज़रअन्दाज़ कर दिया। चुनांचे जंगे हनीन इसकी शाहिद है के जो इस्लाम की आखि़री जंग थी। अगरचे इसके बाद ग़ज़वए ताएफ़ व ग़ज़वए तबूक पेश आया। मगर इन गज़वों में जंग की नौबत नहीं आई। इस आखि़री मारेके में मुसलमानों की तादाद चार हज़ार से ज़्यादा थी जो दुश्मन की फ़ौज से कहीं ज़्यादा थी मगर इतनी बड़ी फ़ौज में से सिर्फ़ सात आदमी निकले जो मैदान में जमे रहे और बाक़ी दुश्मनों के मुक़ाबले में छोड़कर चले गये। चुनांचे क़ुरान मजीद है- ‘‘वज़ाक़त मुदब्बेरीन ’’ (ज़मीन अपनी वुसअत के बावजूद तुम पर तंग हो गई फिर तुम पीठ फिराकर चल दिये यह कोई और न थे बल्कि वही लोग थे जो बैअते रिज़वान में शरीक थे) चुनांचे पैग़म्बर (स 0) ने इस मुआहेदे का ज़िक्र करते हुए अब्बास (र 0) से फ़रमाया - ‘‘उन दरख़्त के नीचे बैअत करने वाले मुहाजिरों को पुकारो और उन पनाह देने वाले और मदद करने वाले अन्सार को ललकारो ’’

क्या इस मौक़े पर यह तसव्वुर किया जा सकता है के अल्लाह की ख़ुशनूदी उनके शामिले हाल रही होगी , हरगिज़ नहीं , क्योंके वह ख़ुशनूदी तो सिर्फ़ मुआहेदे से वाबस्ता थी और जब इस मुआहेदे की पाबन्दी न की जा सकी तो ख़ुशनूदी के क्या मानी , और बैअते रिज़वान में शामिल होने वाले भी यह समझते थे के अल्लाह की ख़ुशनूदी बशर्ते इस्तवारी ही बाक़ी रह सकती थी , चुनांचे मोहम्मद इब्ने इस्माईल बुख़ारी तहरीर करते हैं -हिलाल इब्ने मुसय्यब अपने बाप से रिवायत करते हैं के उन्होंने कहा के मैंने बरा इब्ने आज़िब से मुलाक़ात की और उनसे कहा के ख़ुशानसीब तुम्हारे के तुम नबी (स 0) की सोहबत में रहे और दरख़्त के नीचे उनके हाथ पर बैअत की। फ़रमाया के ऐ बरादर ज़ादे। तुमने नहीं जानते के हमने उनके बाद क्या-क्या बिदअतें पैदा कीं ’’ (सही बुख़ारी जि 0 3- सफ़ा 30) लेहाज़ा महज़ सहाबियत कोई दलीले अदालत है और न बैअते रिज़वान से उनकी अदालत पर दलील लाई जा सकती है।

पांचवी दुआ

अपने लिये और अपने दोस्तों के लिये हज़रत की दुआः-

बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम — ऐ वह जिसकी बुज़ुर्गी व अज़मत के अजाएब ख़त्म होने वाले नहीं। तू मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमें अपनी अज़मत के परदों में छुपाकर कज अन्देशियों से बचा ले। ऐ वह जिसकी शाही व फ़रमाँरवाई की मुद्दत ख़त्म होने वाली नहीं तू रहमत नाज़िल कर मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और हमारी गर्दनों को अपने ग़ज़ब व अज़ाब (के बन्धनों) से आज़ाद रख। ऐ वह जिसकी रहमत के ख़ज़ाने ख़त्म होने वाले नहीं। रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और अपनी रहमत में हमारा भी हिस्सा क़रार दे। ऐ वह जिसके मुशाहिदे से आँखें क़ासिर हैं , रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और अपनी बारगाह से हमको क़रीब कर ले। ऐ वह जिसकी अज़मत के सामने तमाम अज़मतें पस्त व हक़ीर हैं , रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और हमें अपने हाँ इज़्ज़त अता कर। ऐ वह जिसके सामने राज़हाए सरबस्ता ज़ाहिर हैं रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और हमें अपने सामने रूसवा न कर। बारे इलाहा! हमें अपनी बख़्शिश व अता की बदौलत बख़्शिश करने वालों की बख़्शिश से बेनियाज़ कर दे और अपनी पोस्तगी के ज़रिये क़तअ ताअल्लुक़ करने वालों की बेताअल्लुक़ी व दूरी की तलाफ़ी कर दे ताके तेरी बख़्शिष व अता के होते हुए दूसरे से सवाल न करें और तेरे फ़ज़्ल व एहसान के होते हुए किसी से हरासाँ न हों। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमारे नफ़े की तदबीर कर और हमारे नुक़सान की तदबीर न कर और हमसे मक्र करने वाले दुश्मनों को अपने मक्र का निशाना बना और हमें उसकी ज़द पर न रख। और हमें दुश्मनों पर ग़लबा दे , दुश्मनों को हम पर ग़लबा न दे। बारे इलाहा! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमें अपने नाराज़गी से महफ़ूज़ रख और अपने फ़ज़्ल व करम से हमारी निगेहदाश्त फ़रमा और अपनी जानिब हमें हिदायत कर और अपनी रहमत से दूर न कर के जिसे तू अपनी नाराज़गी से बचाएगा वही बचेगा। और जिसे तू हिदायत करेगा वही (हक़ाएक़ पर) मुत्तेलअ होगा और जिसे तू (अपनी रहमत से) क़रीब करेगा वही फ़ायदे में रहेगा। ऐ माबूद! तू मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमें ज़माने के हवादिस की सख़्ती और शैतान के हथकण्डों की फ़ित्ना अंगेज़ी और सुलतान के क़हर व ग़लबे की तल्ख़ कलामी से अपनी पनाह में रख। बारे इलाहा! बेनियाज़ होने वाले तेरे ही कमाले क़ूवत व इक़्तेदार के सहारे बे नियाज़ होते हैं। रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और हमें बेनियाज़ कर दे और अता करने वाले तेरी ही अता व बख़्शिश के हिस्सए दाफ़र में से अता करते हैं। रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और हमें भी (अपने ख़ज़ानए रहमत से) अता फ़रमा। और हिदायत पाने वाले तेरी ही ज़ात की दर की दरख़्शिन्दगियों से हिदायत पाते हैं। रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और हमें हिदायत फ़रमा। बारे इलाहा! जिसकी तूने मदद की उसे मदद न करने वालों का मदद से महरूम रखना कुछ नुक़सान नहीं पहुंचा सकता और जिसे तू अता करे उसके हाँ रोकने वालों के रोकने से कुछ कमी नहीं हो जाती। और जिसकी तू ख़ुसूसी हिदायत करे उसे गुमराह करने वालों का गुमराह करना बे राह नहीं कर सकता। रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और अपने ग़लबे व क़ूवत के ज़रिये बन्दों (के शर) से हमें बचाए रख और अपनी अता व बख़्शिश के ज़रिये दूसरों से बेनियाज़ कर दे और अपनी रहनुमाई से हमें राहे हक़ पर चला। ऐ माबूद! तू मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमारे दिलों की सलामती अपनी अज़मत की याद में क़रार दे और हमारी जिस्मानी फ़राग़त (के लम्हों) को अपनी नेमत के शुक्रिया में सर्फ़ कर दे और हमारी ज़बानों की गोयाई को अपने एहसान की तौसीफ़ के लिये वक़्फ़ कर दे ऐ अल्लाह! तू रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और हमें उन लोगों में से क़रार दे जो तेरी तरफ़ दावत देने वाले और तेरी तरफ़ का रास्ता बताने वाले हैं और अपने ख़ासुल ख़ास मुक़र्रेबीन में से क़रार दे ऐ सब रहम करने वालों से ज़्यादा रहम करने वाले।

यह दुआ जिसकी इब्तिदा अज़मते इलाही के तज़किरे से है बन्दों को अल्लाह की अज़मत व रिफ़अत के आगे झुकने और सिर्फ़ उसी से सवाल करने की तालीम देती है। अगर इन्सान हर दरवाज़े से अपनी हाजतें वाबस्ता करेगा तो यह चीज़ इज़्ज़ते नफ़्स व ख़ुददारी के मनाफ़ी होने के अलावा ज़ेहनी इन्तेशार का बाएस बन कर उसे हमेशा परेशानियों और उलझनों में मुब्तिला रखेगी और जो शख़्स क़दम-क़दम पर दूसरों का सहारा सहारा ढूंढता है और हर वक़्त यह आस लगाए बैठा है के यह मक़सद फ़लाँ से पूरा होगा और यह काम फ़लाँ शख़्स के ज़रिये अन्जाम पाएगा तो कभी किसी की चौखट पर झुकेगा और कभी किसी के आस्ताने पर सरे नियाज़ ख़म करेगा , कभी किसी से तवक़्क़ो रखेगा और कभी किसी से उम्मीद बांधेगा। कहीं मायूसी का सामना होगा कहीं ज़िल्लत का और नतीजे में ज़ेहन मुनतशिर और ख़यालात परागन्दा हो जाएंगे। न सूकूने क़ल्ब नसीब होगा न ज़ेहनी यकसूई हासिल होगी और उसकी तमाम उम्मीदों , आरज़ूओं और हाजतों का एक ही महवर हो तो वह अपने को इन्तेशारे ज़ेहनी से बचा ले जा सकता है। उसे यूँ समझना चाहिये के अगर कोई शख़्स छोटी-छोटी रक़मों का बहुत से आदमियों का मक़रूज़ हो और सुबह से शाम तक उसे मुख़्तलिफ़ क़र्ज़ ख़्वाहों से निमटना पड़ता हो तो वह यह चाहेगा के मुताअद्दद आदमियों का मक़रूज़ होने के बजाए एक ही आदमी का मक़रूज़ हो। अगरचे उससे क़़र्ज़े की मिक़दार में कमी वाक़े नहीं होगी मगर मुताअद्दद क़र्ज़ ख़्वाहों के तक़ाज़ों से तो बच जाएगा। अब तक़ाज़ा होगा तो एक का और ज़ेरबारी होगी तो एक की। और अगर यह मालूम हो के वह क़र्ज़ ख़्वाह या वह तक़ाज़ा करने वाला नहीं है और न होने की सूरत में दरगुज़र करने वाला भी है तो उससे ज़ेहनी बार और हलका हो जाएगा। इसी तरह अगर कोई अपनी हाजतों और तलबगारियों का एक ही मरकज़ क़रार दे ले और सिर्फ़ उसी से अपने तवक़्क़ोआत वाबस्ता कर ले और तमाम मुतफ़र्रिक़ व पाशाँ और नाक़ाबिले इत्मीनान मरकज़ों से रूख़ मोड़ ले तो उसके नतीजे में ज़ेहनी आसूदगी हासिल कर सकता है और दिल व दिमाग़ को परेशान ख़याली से बचा ले जा सकता है। गोया के वह मुताअद्दद क़र्ज़ख़्वाहों के चंगुल से छूटकर अब सिर्फ़ एक का ज़ेरेबार और हलक़ा बगोश है।-

‘‘इक दर पे बैठ गर है तवक्कल करीम पर ,, अल्लाह के फ़क़ीर को फेरा न चाहिये ’’

इस दुआ में हर जुमले के बाद दुरूद की तकरार इस्तेजाबते दुआ के लिये है क्योंके दुआ में मोहम्मद (स 0) व आले मोहम्मद (अ 0) पर दुरूद भेजना इस्तेजाबते दुआ का ज़िम्मेदार और इसकी मक़बूलियत का ज़ामिन है और वह दुआ जिसका तकमिला दुरूद न हो वह बाबे क़ुबूलियत तक नहीं पहुंचती। चुनांचे इमाम जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम का इरशाद हैः- ‘‘दुआ उस वक़्त तक रूकी रहती है जब तक मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर दुरूद न भेजा जाए ’’ ।

छठी दुआ —-

दुआए सुबह व शाम

सब तारीफ़ उस अल्लाह के लिये हैं जिसने अपनी क़ूवत व तवानाई से शब व रोज़ को ख़ल्क़ फ़रमाया और अपनी क़ुदरत की कारफ़रमाई से उन दोनों में इम्तियाज़ क़ायम है और उनमें से हर एक को मुअय्यना हुदूद व मुक़र्ररा औक़ात का पाबन्द बनाया। और उनके कम व बेश होने का जो अन्दाज़ा मुक़र्रर किया उसके मुताबिक़ रात की जगह पर दिन और दिन की जगह पर रात को लाता है ताके इस ज़रिये से बन्दों की रोज़ी और उनकी परवरिश का सरो सामान करे। चुनान्चे उसने उनके लिये रात बनाई ताके वह उसमें थका देने वाले कामों और ख़स्ता कर देने वाली कलफ़तों के बाद आराम करें , और उसे परदा उसे क़रार दिया ताके सुकून की चादर तानकर आराम से सोएँ और यह उनके लिये राहत व निशात और तबई क़ूवतों के बहाल होने और लज़्ज़त व कैफ़ अन्दोज़ी का ज़रिया हो और दिन को उनके लिये रौशन व रख़्शाँ पैदा किया ताके इसमें कार-व-कस्ब में सरगर्मे अमल होकर) इसके फ़ज़्ल की जुस्तजू करें और रोज़ी का वसीला ढूंढें और दुनियावी मुनाफ़े और उख़रवी फ़वाएद के वसाएल तलाश करने के लिये उसकी ज़मीन में चलें फ़रीं। इनत माम कारफ़रमाइयों से वह उनके हालात सँवारता और उनके आमाल की जांच करता और यह देखता है के वह लोग इताअत की घड़ियों , फ़राएज़ की मंज़िलों और तामीले एहकाम के मौक़ों पर कैसे साबित होते हैं ताके बुरों को उनकी बदआमालियों की सज़ा और नेकोकारों को अच्छा बदला दे। ऐ अल्लाह! तेरे ही लिये तमाम तारीफ़ व तौसीफ़ है के तूने हमारे लिये (रात का दामन चाक करके) सुबह का उजाला किया और इसी तरह दिन की रोशनी से हमें फ़ायदा पहुंचाया और तलबे रिज़्क़ के मवाक़े हमें दिखाए और इसमें आफ़ात व बल्लियात से हमें बचाया। हम और हमारे अलावा सब चीज़ें तेरी हैं । आसमान भी और ज़मीन भी और वह सब चीज़ें जिन्हें तूने इनमें फैलाया है , वह साकिन हूँ या मुतहर्रिक मुक़ीम हूँ या राहे नूर व फ़िज़ा में बलन्द हूँ या ज़मीन की तहों में पोशीदा , हम तेरे क़ब्ज़ए क़ुदरत में हैं और तेरा इक़्तेदार और तेरी बादशाहत हम पर हावी है और तेरी मशीयत का मुहीत हमें घेरे हुए है , तेरे हुक्म से हम तसर्रूफ़ करते और तेरी तदबीर व कारसाज़ी के तहत हम एक हालत से दूसरी हालत की तरफ़ पलटते हैं। जो अम्र तूने हमारे लिये नाफ़िज़ किया और जो ख़ैर और भलाई तूने बख़्शी उसके अलावा हमारे इख़्तेयार में कुछ नहीं है और यह दिन नया और ताज़ा वारिद है जो हम पर ऐसा गवाह है जो हमहवक़्त हाज़िर है। अगर हमने अच्छे काम किये तो वह तौसीफ़ व सना करते हुए हमें रूख़सत करेगा और अगर बुरे काम किये तो बुराई करता हुआ हमसे अलाहीदा होगा। ऐ अल्लाह! तू मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमें उस दिन की अच्छी रिफ़ाक़त नसीब करना और किसी ख़ता के इरतेका करने या सग़ीरा व कबीरा गुनाह में मुब्तिला होने की वजह से उसके चीँ ब जबीं होकर रूख़सत होने से हमें बचाए रखना और उस दिन में हमारी नेकियों का हिस्सा ज़्यादा कर और बुराइयों से हमारा दामन ख़ाली रख। और हमारे लिये उसके आग़ाज़ व अन्जाम को हम्द व सपास , सवाब व ज़ख़ीरए आख़ेरत और बख़्शिश व एहसान से भर दे। ऐ अल्लाह! करामन कातेबीन पर (हमारे गुनाह क़लमबन्द करने की) ज़हमत कम कर दे और हमारा नामाए आमाल नेकियों से भर दे और बद आमालियों की वजह से हमें उनके सामने रूसवा न कर। बारे इलाहा! तू उस दिन के लम्हों में से हर लम्हा व साअत में अपने ख़ास बन्दों का ख़त व नसीब और अपने शुक्र का एक हिस्सा और फ़रिश्तों में से एक सच्चा गवाह हमारे लिये क़रार दे। ऐ अल्लाह! तू मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और आगे पीछे , दाहिने और बांये और तमाम एतराफ़ व जवानिब से हमारी हिफ़ाज़त कर ऐसी हिफ़ाज़त जो हमारे लिये गुनाह व मासियत से सद्दे राह हो। तेरी इताअत की तरफ़ रहनुमाई करे और तेरी मोहब्बत में सर्फ़ हो। ऐ अल्लाह! तू मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमें आज के दिन आज की रात और ज़िन्दगी के तमाम दिनों में तौफ़ीक़ अता फ़रमा के हम नेकियों पर अमल करें , बुराइयों को छोड़ें , नेमतों पर शुक्र और सुन्नतों पर अमल करें , बिदअतों से अलग-थलग रहें और नेक कामों का हुक्म दें। और बुरे कामों से रोकें , इस्लाम की हिमायत व तरफ़दारी करें , बातिल को कुचलें और उसे ज़लील करें , हक़ की नुसरत करें और उसे सरबलन्द करें , गुमराहों की रहनुमाई , कमज़ोरों की एआनत और दर्दमन्दों की चाराजोई करें। बारे इलाहा! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और आज के दिन को उन तमाम दिनों से जो हमने गुज़ारे ज़्यादा मुबारक दिन और उन तमाम साथियों से जिनका हमने साथ दिया इसको बेहतरीन रफ़ीक़ और उन तमाम वक़्तों से जिनके ज़ेरे साया हमने ज़िन्दगी बसर की इसको बेहतरीन वक़्त क़रार दे और हमें उन तमाम मख़लूक़ात में से ज़्यादा राज़ी व ख़ुशनूद रख जिन पर शब व रोज़ के चक्कर चलते रहे हैं और इन सबसे ज़्यादा अपनी अता की हुई नेमतों का शुक्रगुज़ार और उन सबसे ज़़्यादा अपने जारी किये हुए एहकाम का पाबन्द और उन सबसे ज़्यादा उन चीज़ों से किनाराकशी करने वाला क़रार दे जिनसे तूने ख़ौफ़ दिलाकर मना किया है। ऐ ख़ुदा! मैं तुझे गवाह करता हूँ और तू गवाही के लिये काफ़ी है और तेरे आसमान और तेरी ज़मीन को और उनमें जिन जिन फ़रिश्तों और जिस जिस मख़लूक़ को तूने बसाया है , आज के दिन और उस घड़ी और उस रात में और उस मुक़ाम पर गवाह करता हूँ के मैं इस बात का मोतरफ़ हूँ के सिर्फ़ तू ही वह माबूद है जिसके अलावा कोई माबूद नहीं। इन्साफ़ का क़ायम करने वाला , हुक्म में अद्ल मलहोज़ रखने वाला , बन्दों पर मेहरबान , इक़्तेदार का मालिक और कायनात पर रहम करने वाला है और इस बात की भी शहादत देता हूँ के मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम तेरे ख़ास बन्दे , रसूल और बरगुज़ीदाए कायनात हैं। उन पर तूने रिसालत की ज़िम्मेदारियां आयद की तो उन्होंने उसे पहुंचाया और अपनी उम्मत को पन्द व नसीहत करने का हुक्म दिया तो उन्होंने नसीहत फ़रमाई। हमारी तरफ़ से उन्हें वह बेहतरीन तोहफ़ा अता कर जो तेरे हर उस इनआम से बढ़ा हुआ हो जो अपने बन्दों में से तूने किसी एक को दिया हो और हमारी तरफ़ से उन्हें वह जज़ा दे जो हर उस जज़ा से बेहतर व बरतर हो जो अम्बिया (अ 0) में से किसी एक को तूने उसकी उम्मत की तरफ़ से अता फ़रमाई हो। बेशक तू बड़ी नेमतों का बख़्शने वाला और बड़े गुनाहों से दरगुज़र करने वाला और हर रहीम से ज़्यादा रहम करने वाला है लेहाज़ा तू मोहम्मद (स 0) और उनकी पाक व पाकीज़ा और शरीफ़ व नजीब औलाद (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा।

इस दुआ का सरनामा ‘‘दुआए सुबह व शाम ’’ है जिसमें इख़्तेलाफ़े शब व रोज़ की करिश्मासाज़ी , औक़ात की तब्दीली व तनव्वअ की हिकमत और क़ुदरत के इरादे व मशीयत की कार फ़रमाई का ज़िक्र फ़रमाया है और हुस्ने अमल , शुक्रे नेमत , इत्तेबाए सुन्नत , तर्के बिदअत , अम्रे बिलमारूफ़ व नही अनिल मुनकिर , इस्लाम की तरफ़दारी व हिफ़ाज़त , बातिल की तज़लील व सरकोबी , हक़ की नुसरत रिआयत , इरशाद व हिदायत में सरगर्मी और कमज़ोर व नातवाँ की ख़बरगीरी के लिये तौफ़ीक़े इलाही के शामिले हाल होने की दुआ फ़रमाई है ताके दुआ के तास्सुरात अमली इस्तेहकाम का पेशख़ेमा साबित हों और ज़िन्दगी के लम्हात मक़सदे हयात की तकमील में सर्फ़ हों।

यह औक़ात का तबद्दुल , तुलूअ व ग़ुरूब का तसलसुल और सुबह के बाद शाम और शाम के बाद सपीदह सहर की नमूद और कार फ़रमाइए फ़ितरत की वह हसीन कारफ़रमाई है जो निगाहों के लिये हिज़ व कैफ़ और क़ल्ब व रूह के लिये सर्द रू निशात का सामान होने के अलावा बेशुमार मसालेह व फ़वाएद की भी हामिल है। चुनांचे शब व रोज़ की तअय्यिन महीनों और सालों का इन्ज़बात और कारोबार मईशत और आराम व इस्तराहत के औक़ात की हदबन्दी उसी से वाबस्ता है और फिर इसमें ज़िन्दगी की तस्कीन व राहत का भी सामान है क्योंके वक़्त अगर हमेशा एक हालत पर रहता और लैल व नहार के सियाह व सफ़ेद वरक़ निगाहों के सामने उलटे न जाते तो तबीअतें बेकैफ़ , दिल सेर और ज़िन्दगी के लिये दिलबस्तगी के तमाम ज़राए ख़त्म हो जाते और हुस्ने यकरंग आंखों में खटकने लगता और नग़मा बे ज़ेर व बमोबाल गोश हो जाता क्योंके इन्सान की तनव्वोअ पसन्द तबीयत यकसानी व यकरंगी की हालत से जल्द उकता जाती है इसलिये क़ुदरत ने इन्सानी तबीयत के ख़्वास के मुताबिक़ शब व रोज़ की तफ़रीक़ क़ायम कर दी ताके शाम के बाद सुबह और सुबह के बाद शाम का इन्तेज़ार ज़िन्दगी की ख़स्तगियों और इसकी मुसलसल उलझनों और परेशानियों से सहारा देता रहे चुनांचे क़ुदरत ने इख़्तेलाफ़े शब व रोज़ की मसलेहत की तरफ़ मुतवज्जोह करते हुए इरशाद फ़रमाया है। -

‘‘ अन जअल............. तशकोरून ’’ (अगर ख़ुदा तुम्हारे लिये क़यामत के दिन तक दि नही रखता तो अल्लाह के अलावा और कौन है जो तुम्हारे लिये रात लाता के तुम इसमें आराम करो। क्या तुम इतना भी नहीं देखते और उसने अपनी रहमत से तुम्हारे लिये रात और दिन क़रार दिये हैं ताके रात को आराम करो और दिन को इसका रिज़्क़ तलाश करो ताके इसके नतीजे में तुम शुक्र अदा करो।)

इसी नज़्मे औक़ात का नतीजा है के जब सुबह नमूदार होती है और सूरज की ताबनाक किरनें फ़िज़ा में फैल कर कारगाहे हस्ती के गोशा गोशा को जगमगा देती हैं तो ख़ामोश व पुरसुकून फ़िज़ा में गहमा गहमी शुरू हो जाती है। परिन्दे आशियानों से हैवान भटों और खोओं से , कीड़े-मकोड़े बिलों और सूराख़ों से और इन्सान झोपड़ों और मकानों से निकल खड़े होते हैं। हरकत व अमल की दुनिया आबाद हो जाती है और हर सिन्फ़ अपने कार-व-कस्ब में मारूफ़ और अपने मशाग़ेल में सरगर्मे अमल नज़र आने लगती है। परिन्दे फ़िज़ा में , हैवान ज़मीन के ऊपर से और कीड़े मकोड़े ज़मीन के अन्दर से अपनी रोज़ी ढूंढने लगते हैं। और च्यूंटियां भी अपनी मुख़्तसर जसामत के बावजूद सई पैहम व जेहद मुसलसल का वह मुज़ाहेरा करती हैं के इन्सानी अक़्लें दंग रह जाती हैं धूप हो या साया , न मेहनत से जी चुराती हैं न मशक़्क़त से मुंह मोड़ती हैं और हर वक़्त दौड़ धूप करती और तलब व तलाश में मसरूफ़ नज़र आती हैं। ग़रज़ कायनात की हर छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी मख़लूक़ मेहनत व काविश को अपना दस्तूरे हयात बनाए हुए पेट पालने के लिये भाग दौड़ करती है और कमज़ोर से कमज़ोर हैवान भी यह गवारा नहीं करता के जब तक उसके हाथ पांव में सकत है , बेकार पड़ा रहे और अपने हम जिन्सों से भीक मांगे और इनके आगे हाथ फैलाए। यह हैवानी सीरत इन्सानी ग़ैरत के लिये एक ताज़ियाना है और इन्सान के लिये एक दाइयाए फ़िक्र है के जब हैवान इसकी सतह से कहीं पस्ततर होने के बावजूद सवाल में आर महसूस करता है तो वह अपने हम जिन्सों के आगे किस तरह हाथ फैलाना गवारा कर लेता है। इन्सानी बलन्दी का तक़ाज़ा तो यह है के अपने क़ूवते बाज़ू से कमाए और सवाल की ज़िल्लत और एहतियाज की निकबत से इज़्ज़ते नफ़्स पर हर्फ़ न आने दे।

वह अफ़राद जो तने आसानी की वजह से बेकार पड़े रहते हैं वह आराम व सुकून की हक़ीक़ी लज़्ज़त से यकसर महरूम रहते हैं। सच्ची राहत और असली सुकून तो मेहनत व मशक़्क़त के बाद ही हासिल होता है। साये की क़द्र व क़ीमत को वही जान सकता है जो सूरज की तमाज़त और धूप की तपिश में मसरूफ़े कार हो और ठण्डी हवा के झोंकों से वही कैफ़अन्दोज़ हो सकता है जो गर्मी व हिद्दत की शोलाबारियों में पसीने से शराबोर हो और रात के पुरसुकून लम्हात उसी के लिये सुकून व राहत का पैग़ाम साबित हो सकते हैं जिसका दिन मेहनत व जफ़ाकशी का हामिल हो। चुनांचे एक टोकरी ढोने वाला मज़दूर और चिलचिलाती धूप में हल चलाने वाला किसान जब दिन के कामों से फ़ारिग़ होता है तो फ़ितरत पूरी फ़राख़ हौसलगी से उसके लिये सरो सामाने राहत मुहय्या कर देती है। सूरज का चिराग़ गुल हो जाता है , चान्द की हल्की और ठण्डी शुआओं का शामियाना तन जाता है सितारों की क़न्दीलें टिमटिमाने लगती हैं , शफ़क़ के रंगीन परदे आवेज़ां हो जाते हैं। हरी भरी घास का मख़मली फ़र्श बिछ जाता है , शाख़ें झूमकर मुर्दहे जन्बाती करती हैं और पत्ते हवा के झोंकों से टकराकर फ़िज़ा के दामन को ख़्वाब और नग़मों से भर देते हैं और फ़र्शे ज़मीन के ऊपर और शामियानाए फ़लक के नीचे सोने वाला रात की स्याह चादर ओढ़ कर आराम से सो जाता है क्या उसके मुक़ाबले में वह काहिल व आराम तलब जिसके हाँ नर्म व गुदाज़ गद्दे , आरामदेह मसहरियां , हवाएं , लहरें पैदा करने वाले बिजली के पंखे और आंखों को ख़ैरगी से बचाने वाले हल्के सब्ज़ रंग के क़मक़मे और दूसरे मसनूई व ख़ुदसाख़्ता सामाने आसाइश मुहय्या हों ज़्यादा पुरसुकून व पुरकैफ़ रात बसर कर सकता है ? बहरहाल कारख़ानाए नीस्त व बूद की बू क़लमोनियां और फ़ितरत की तनव्वाएअ रअनाइयां इन्सान के हयात की तस्कीन और ज़िन्दगी की दिलबस्तगी व आसाइश का मुकम्मल सरो सामान लिये हुए हैं। लेकिन यह आलम के दिल आवेज़ नुक़ूश और राहत व आसाइश के सामान किस लिये हैं ? क्या इसलिये हैं के इन्सान चन्द दिन खाए पिये , घूमे फिरे और फिर क़ब्र में जा सोए। अगर ऐसा हो तो ज़िन्दगी का कोई मक़सद ही नहीं रहता। हालांके दुनियाए कायनात की हर चीज़ का एक मक़सद और एक मुद्दआ है तो फिर ज़िन्दगी और ज़िन्दगी के सदो सामान बग़ैर मक़सद के क्योंकर हो सकते हैं , इसका भी कोई मक़सद होना चाहिये और वह मक़सद सिर्फ़ आख़ेरत की ज़िन्दगी है। जिसकी सआदतों और कामरानियों को हासिल करने के लिये दुनिया को एक ज़रिया और इम्तेहान गाह क़रार दिया गया है। चुनांचे इरशादे इलाही है- ‘‘वलाकिन ख़ैरात ’’ (लेकिन जो उसने तुम्हें दिया है उसमें तुम्हें आज़माना चाहता है लेहाज़ा नेकियों की तरफ़ बढ़ने में एक दूसरे से सबक़त ले जाने की कोशिष करो)

यह आज़माइश इसी सूरत में आज़माइश रह सकती है जब इन नेकियों पर अमलपैरा होने और इनमें सबक़त ले जाने में इन्सानी इख़्तेयार का अमल दख़ल हो और अगर वह ईमान व अमले सालेह पर मजबूर हो तो आज़माइश के मानी ही क्या ऐसी सूरत में तो हर एक को ईमान लाना पड़ता और आमाल बजा लाने पड़ते क्योंके क़ुदरत अपनी बात के मनवाने में मजबूर व क़ासिर नहीं है चुनांचे इरशादे इलाही है- ‘‘व लौ शाअ........... जमीअन ’’ (और अगर तुम्हारा परवरदिगार चाहता तो ज़मीन में बसने वाले सब के सब उस पर ईमान ले आते।)

बेशक कायनात का हर ज़र्रा उसकी मशीयत के ताबेअ है। इस तरह के कोई उसके महीते इक़्तेदार से बाहर नहीं है। वह ज़मीन हो या उस पर चलने फिरने वाली मख़लूक़ , पहाड़ हों या उनके दामन में मादनियात , दरया हों या उनमें रहने वाली मछलियां समन्दर हों या उनमें अम्बर , मूंगे और मोतियों के ख़ज़ाने , फ़िज़़ा हो या उसमें परवाज़ करने वाले परिन्दे , बादलों के लक्के हों या उनमें उमड़ते हुए पानी के ज़ख़ीरे , चान्द सूरज हों या उनकी जौहरी शुआएं , सितारे हों या उनकी मख़सूस तासीरें , फ़रिश्ते हों या उनकी सरगर्मियाँ सब ही तो उसकी मशीयत के अन्दर जकड़ी बन्धी हुई हैं। अगर इन्सान भी एतक़ाद व आमाल मे इसी तरह बेबस होता और मशीयत हर एक को एक मख़सूस तरीक़ेकार का पाबन्द बना देती तो जज़ा व सज़ा बेकार हो जाती। हालांके क़ानूने मकाफात की रू से जज़ा व सज़ा से दोचार होना ज़रूरी है जैसा के इरशादे इलाही है- ‘‘लहा मा कसबत........मकतसबत ’’ (अगर उसने अच्छा काम किया तो अपने फ़ायदे के लिये और बुरा काम किया तो उसका वबाल उसके सर पड़ेगा)

तो जब अपने ही आमाल सामने आते हैं तो वही औक़ात व लम्हात ज़िन्दगी का सरमाया हैं जिनमें आमाल ख़ैर के ज़रिये आख़ेरत का सरमाया महम पहुंचा लिया गया हो और वही शब व रोज़ मुबारक व मसऊद हैं जिनमें अख़रवी हलाकत व तबाही से बचने का सामान कर लिया गया हो। यह दिन और यह रातें हमारे अच्छे और बुरे आमाल की निगरान हैं। अगर उनके सामने हमारी नेकियां आती हैं तो उनकी पेशानी की गिरहें खुल जाती हैं और उनके चेहरे पर मुस्कुराहट फैल जाती है और वह हमसे ख़ुश ख़ुश रूख़सत होते हैं और अगर बुराइयों को देखते हैं तो उनकी जबीन पर शिकनें पड़ जाती हैं और बुराई करते हुए रूख़सत होते हैं। चुनांचे हज़रत अली इब्ने अबी तालिब अलैहिस्सलाम का इरशाद है-

‘‘ इन्सान की ज़िन्दगी का जो दिन गुज़रता है वह (ज़बाने हाल से) खि़ताब करते हुए उससे कहता है के मैं तेरे लिये नया दिन और तेरे आमाल का गवाह हूँ। लेहाज़ा ज़बान और आज़ा से नेक अमल करो , मैं उसकी क़यामत के दिन गवाही दूँगा। ’’

लेहाज़ा सुबह की पुरसुकून फ़िज़ा और सितारों की ठण्डी छाँव में आने वाले दिन का इस्तेक़बाल इस दुआ से किया जाए ताके कम अज़ कम इस दिन तो उसके तास्सुरात हमारी ज़िन्दगी पर छाए रहें और फ़िक्र व अमल की पाकीज़गी हमारे तसव्वुरात पर मोहीता रहे और यही इस दुआ का मरकज़ी नुक़्ताए निगाह है।

सातवीं दुआ —

जब कोई मुहिम दरपेश होती या कोई मुसीबत नाज़िल होती या किसी क़िस्म की बेचैनी होती तो हज़रत यह दुआ पढ़ते थे-

ऐ वह जिसके ज़रिये मुसीबतों के बन्धन खुल जाते हैं , ऐ वह जिसके बाएस सख़्तियों की बाढ़ कुन्द हो जाती है। ऐ वह जिससे (तंगी व दुश्वारी से) वुसअत व फ़राख़ी की आसाइश की तरफ़ निकाल ले जाने की इल्तिजा की जाती है। तू वह है के तेरी क़ुदरत के आगे दुश्वारियां आसान हो गईं , तेरे लुत्फ़ से सिलसिलए असबाब बरक़रार रहा और तेरी क़ुदरत से क़ज़ा का निफ़ाज़ हुआ और तमाम चीज़ें तेरे इरादे के रूख़ पर गामज़न हैं। वह बिन कहे तेरी मशीयत की पाबन्द और बिन रोके ख़ुद ही तेरे इरादे से रूकी हुई हैं। मुश्किलात में तुझे ही पुकारा जाता है और बल्लियात में तू ही जा-ए-पनाह है , इनमें से कोई मुसीबत टल नहीं सकती मगर जिसे तू टाल दे और कोई मुश्किल हल नहीं हो सकती मगर जिसे तू हल कर दे। परवरदिगार मुझ पर एक ऐसी मुसीबत नाज़िल हुई है जिसकी संगीनी ने मुझे गरांबार कर दिया है और एक ऐसी आफ़त आ पड़ी है जिससे मेरी क़ूवते बरदाश्त आजिज़ हो चुकी है। तूने अपनी क़ुदरत से इस मुसीबत को मुझ पर वारिद किया है और अपने इक़्तेदार से मेरी तरफ़ मुतवज्जेह किया है। तू जिसे वारिद करे , उसे कोई हटाने वाला , और जिसे तू मुतवज्जेह करे उसे कोई पलटाने वाला और जिसे तू बन्द करे उसे कोई खोलने वाला और जिसे तू खोले उसे कोई बन्द करने वाला और जिसे तू दुश्वार बनाए उसे कोई आसान करने वाला और जिसे तू नज़रअन्दाज़ करे उसे कोई मदद देने वाला नहीं है। रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और अपनी करम फ़रमाई से ऐ मेरे पालने वाले मेरे लिये आसाइश का दरवाज़ा खोल दे और अपनी क़ूवत व तवानाई से ग़म व अन्दोह का ज़ोर तोड़ दे और मेरे इस शिकवे के पेशे नज़र अपनी निगाहे करम का रूख़ मेरी तरफ़ मोड़ दे और मेरी हाजत को पूरा करके शीरीनी एहसान से मुझे लज़्ज़त अन्दोज़ कर। और अपनी तरफ़ से रहमत और ख़ुशगवार आसूदगी मरहमत फ़रमा और मेरे लिये अपने लुत्फ़े ख़ास से जल्द छुटकारे की राह पैदा कर और इस ग़म व अन्दोह की वजह से अपने फ़राएज़ की पाबन्दी और मुस्तहेबात की बजाआवरी से ग़फ़लत में न डाल दे। क्योंके मैं इस मुसीबत के हाथों तंग आ चुका हूँ और इस हादसे के टूट पड़ने से दिल रन्ज व अन्दोह से भर गया है जिस मुसीबत में मुब्तिला हों उसके दूर करने और जिस बला में फंसा हुआ हूं उससे निकालने पर तू ही क़ादिर है लेहाज़ा अपनी क़ुदरत को मेरे हक़ में कार-फ़रमा-कर। अगरचे तेरी तरफ़ से मैं इसका सज़ावार न क़रार पा सकूँ। ऐ अर्शे अज़ीम के मालिक।

खुलासा :

जब ज़हरे ग़म रग व पै में उतरता और कर्ब व अन्दोह के शरारों से दिल व दिमाग़ फुंकता है तो दर्दो-अलम की टीस सुकून व क़रार छीन लेती हैं और मिम्बर व शकीब का दामन हाथ से छूट जाता है न तसल्ली व तस्कीन का कोई सामान नज़र आता है न सब्र व ज़ब्त की कोई सूरत। ऐसी हालत में यास व नाउम्मीदी कभी जुनून व दीवानगी में मुब्तिला और कभी मौत का सहारा ढूंढने पर मजबूर कर देती है। अगर इन्सान इस मौक़े पर बलन्द नज़री से काम ले तो उसे एक ऐसा सहारा मिल सकता है जो हवादिस व आलाम के भंवर और रंज व अन्दोह के सैलाब से निकाल ले जा सकता है। और वह सहारा अल्लाह है जो इज़्तेराब की तसल्ली और दर्द व कर्ब का चारा कर सकता है। चुनांचे अमीरूल मोमेनीन अलैहिस्सलाम का इरशाद है - ‘‘जब बेचैनी हद से बढ़ जाए तो फिर अल्लाह ही तस्कीन का मरकज़ है। और अगर अल्लाह की हस्ती पर ईमान न भी हो जब भी फ़ितरते ख़्वाबीदा करवट लेकर लेकर इसका रास्ता दिखा देती है और मुसीबत व बेचारगी किसी अनदेखी हस्ती के आगे झुकने और उसका सहारा लेने के लिये पुकारती है। ’’ चुनांचे एक शख़्स ने इमाम जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम से वजूदे बारी के सिलसिले में गुफ़्तगू की तो आपने उससे दरयाफ़्त फ़रमाया के तुम्हें किश्ती पर सवार होने का कभी इत्तेफ़ाक़ हुआ है। उसने कहा हाँ , फ़रमाया कभी ऐसा इत्तेफ़ाक़ भी पेश आया है के किश्ती भंवर में घिर गई हो और समन्दर की तिलमिलाती लहरों ने तुम्हें अपनी लपेट में ले लिया ? उसने कहा के जी हाँ , ऐसा भी हुआ है , फ़रमाया के उस वक़्त तुम्हारे दिल में कोई ख़याल पैदा हुआ था , कहा के हाँ , जब हर तरफ़ से मायूसी ही मायूसी नज़र आने लगी तो मेरा दिल कहता था के एक ऐसी बालादस्त क़ूवत भी मौजूद है जो चाहे तो इस भंवर से मुझे निकाल ले जा सकती है। फ़रमाया बस वही तो ख़ुदा था जो इन्तेहाई मायूसकुन हालातों में भी मायूस नहीं होने देता। और जब कोई सहारा न रहे तो वह सहारा साबित होता है। चुनांचे जब इन्सान अल्लाह तआला पर मुकम्मल यक़ीन व एतेमाद पैदा करके उस पर अपने उमूर को छोड़ देता है तो वह अपनी ज़ेहनी क़ूवतों को मुन्तशिर होने से बचा ले जाता है और जब हमह तन उसकी याद में खो जाता है तो उलझनें और परेशानियां उसका साथ छोड़ देती हैं। क्योंकि ज़ेहन का सुकून और क़ल्ब की तमानियत उसके ज़िक्र का लाज़मी नतीजा है। जैसा के इरशादे इलाही है: - ‘‘अला बेज़िक्रिल्लाह.......... क़ोलूब ’’ (दिल तो अल्लाह के ज़िक्र से मुतमइन हो जाता है।) वह लोग जो इत्मीनान को बज़ाहिर ग़म-ग़लत करने वाली कैफ़ अंगेज़ व मसर्रत अफ़ज़ा चीज़ों में तलाश करने की कोशिश करते हैं वह कभी सुकून व इत्मीनान हासिल करने में कामयाब नहीं हो सकते। क्योंके न इशरत कदों में इत्मीनान नज़र आता है , न ताज व दनहीम के सायों में। न नग़मा व सुरूर की महफ़िलों में सुकून व क़रार बटता है न नावूद नोश की मजलिसों में। बेशक हर मौक़ै पर ज़िक्र व इबादत के लिये दिल आमादा और तबीयत हाज़िर नहीं होती ख़ुसूसन जब के इन्सान किसी मुसीबत की वजह से ज़ेहनी कशमकश में मुब्तिला हो। इसलिये के मुसीबत ब-हर सूरत मुसीबत और इससे मुतास्सिर होना तिबई व फ़ितरी है। तो ऐसे मौक़े पर नवाफ़िल से दस्तकश हुवा जा सकता है मगर बहुत से लोग ऐसे भी मिलेंगे जो परेशानकुन हालात में फ़राएज़ तक से ग़ाफ़िल हो जाते हैं तो उन्हें इमाम अलैहिस्सलाम की इस दुआ पर नज़र करना चाहिये के वह बारगाहे इलाही में यह दुआ करते हुए नज़र आते हैं के ख़्वाह कितने जानकाह हवादिस व आलाम से साबक़ा पड़ेगा मगर तेरे फ़राएज़ व नवाफ़िल से ग़फ़लत न होने पाए क्योंके फ़राएज़ ब-हर सूरत फ़राएज़ हैं और नवाफ़िल उबूदियत का तक़ाज़ा हैं और ऐसा न हो के मसाएब व आलाम के तास्सुराते उबूदियत के इज़हार पर ग़ालिब आ जाएं।

आठवीं दुआ

मुसीबतों से बचाव और बुरे एख़लाक़ व आमाल से हिफ़ाज़त के सिलसिले में हज़रत (अ 0) की दुआ

(आप इस किताब को अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क पर पढ़ रहे है।)

ऐ अल्लाह! मैं तुझसे पनाह मांगता हुं हिर्स की तुग़यानी , ग़ज़ब की शिद्दत , हसद की चीरादस्ती , बेसब्री , क़नाअत की कमी , कज एख़लाक़ी , ख़्वाहिशे नफ़्स की फ़रावानी , असबीयत के ग़लबे , हवा व हवस की पैरवी , हिदायत की खि़लाफ़वर्ज़ी , ख़्वाबे ग़फ़लत (की मदहोशी) और तकल्लुफ़ पसन्दी से नीज़ बातिल को हक़ पर तरजीह देने , गुनाहों पर इसरार करने , मासियत को हक़ीर और इताअत को अज़ीम समझने , दौलतमन्दों के से तफ़ाख़ुर , मोहताजों की तहक़ीर और अपने ज़ेर दस्तों की बुरी निगेहदाश्त और जो हमसे भलाई करे उसकी नाशुक्री से और इससे के हम किसी ज़ालिम की मदद करें और मुसीबतज़दा को नज़रअन्दाज़ करें या उस चीज़ का क़स्द करें जिसका हमें हक़ नहीं या दीन में बे जाने बूझे दख़ल दें और हम तुझसे पनाह मांगते हैं इस बात से के किसी को फ़रेब देने का क़स्द करें या अपने आमाल पर नाज़ाँ हों और अपनी उम्मीदों का दामन फैलाएं और हम तुझसे पनाह मांगते हैं , बदबातनी और छोटे गुनाहों को हक़ीर तसव्वुर करने और इस बात से के शैतान हम पर ग़लबा हासिल कर ले जाए या ज़माना हमको मुसीबत में डाले या फ़रमानरवा अपने मज़ालिम का निशाना बनाए और हम तुझसे पनाह मांगते हैं फ़िज़ूलख़र्ची में पड़ने और हस्बे ज़रूरत रिज़्क़ के न मिलने से और हम तुझसे पनाह मांगते हैं दुश्मनों की सेमातत , हमचश्मों की एहतियाज , सख़्ती में ज़िन्दगी बसर करने और तोशए आख़ेरत के बग़ैर मर जाने से और तुझसे पनाह मांगते हैं बड़े तास्सुफ़ , बड़ी मुसीबत , बदतरीन बदबख़्ती , बुरे अन्जाम , सवाब से महरूमी और अज़ाब के वारिद होने से।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा , और अपनी हरमत के सदक़े में मुझे और तमाम मोमेनीन व मोमेनात को उन सब बुराइयों से पनाह दे। ऐ तमाम रहम करने वालों में सबसे ज़्यादा रहम करने वाले।

नवी दुआ

तलबे मग़फ़ेरत के इश्तियाक़ में हज़रत (अ 0) की दुआ

ऐ अल्लाह! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और हमारी ताज्जो उस तौबा की तरफ़ मबज़ूल कर दे जो तुझे पसन्द है और गुनाह के इसरार से हमें दूर रख जो तुझे नापसन्द है। बारे इलाहा! जब हमारा मौक़ूफ़ कुछ ऐसा हो के (हमारी किसी कोताही के बाएस) दीन का ज़याल होता हो या दुनिया का तू नुक़सान (दुनिया में) क़रार दे के जो जल्द फ़ना पज़ीद है आर अफ़ो व दरगुज़र को (दीन के मामले में) क़रार दे जो बाक़ी व बरक़रार रहने वाला है और जब हम ऐसे दो कामों का इरादा करें के इनमें से एक तेरी ख़ुशनूदी का और दूसरा तेरी नाराज़ी का बाएस हो तो हमें उस काम की तरफ़ माएल करना जो तुझे ख़ुश करने वाला हो और उस काम से हमें बे दस्त-व-पा कर देना जो तुझे नाराज़ करने वाला हो। और इस मरहले पर हमें इख़्तेयार देकर आज़ाद न छोड़ दे , क्योंकर नफ़्स तो बातिल ही को एख़्तेयार करने वाला है , मगर जहाँ तेरी तौफ़ीक़ शामिले हाल हो और बुराई का हुक्म देने वाला है मगर जहाँ तेरा रहम कारफ़रमा हो।

बारे इलाहा! तूने हमें कमज़ोर और सुस्त बुनियाद पैदा किया है और पानी के एक हक़ीर क़तरे (नुत्फे) से ख़ल्क़ फ़रमाया है , अगर हमें कुछ वक़्त व तसर्रूफ़ हासिल है तो तेरी क़ूवत की बदौलत , और इख़्तेयार है तो तो तेरी मदद के सहारे से , लेहाज़ा अपनी तौफ़ीक़ से हमारी दस्तगीरी फ़रमा और अपनी रहनुमाई से इस्तेहकाम व क़ूवत बख़्श और हमारे वीदाए दिल को उन बातों से जो तेरी मोहब्बत के खि़लाफ़ हैं नाबीना कर दे और हमारे आज़ा के किसी हिस्से में मासियत के सरायत करने की गुन्जाइश पैदा न कर। बारे इलाहा! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और हमारे दिल के ख़यालों , आज़ा की जुम्बिशों , आँख के इशारों और ज़बान के कलमों को उन चीज़ों में सर्फ़ करने की तौफ़ीक़ दे जो तेरे सवाब का बाएस होँ यहाँ तक के हमसे कोई ऐसी नेकी छूटने न पाये जिससे हम तेरे अज्र व सवाब के मुस्तहक़ क़रार पाएँ और न हम में कोई बुराई रह जाए जिससे तेरे अज़ाब के सज़ावार ठहरें।

दसवीं दुआ

अल्लाह तआला से पनाह तलब करने के सिलसिले में हज़रत (अ 0) की दुआ

बारे इलाहा! अगर तू चाहे के हमें माफ़ कर दे तो यह तेरे फ़ज़्ल के सबब से है और अगर तू चाहे के हमें सज़ा दे तो यह तेरे अद्ल की रू से है। तू अपने शेवए एहसान के पेशे नज़र हमें पूरी माफ़ी दे और हमारे गुनाहों से दरगुज़र करके अपने अज़ाब से बचा ले। इसलिये के हमें तेरे अद्ल की ताब नहीं है और तेरे अफ़ो के बग़ैर हम में से किसी एक की भी निजात नहीं हो सकती।

ऐ बे नियाज़ों के बे नियाज़! हाँ तो फिर हम सब तेरे बन्दे हैं जो तेरे हुज़ूर खड़े हैं। और मैं सब मोहताजों से बढ़ कर तेरा मोहताज हूँ। लेहाज़ा अपने भरे ख़ज़ाने से हमारे दामने फ़क्ऱ व एहतियाज को भर दे , और अपने दरवाज़े से रद्द करके हमारी उम्मीदों को क़तअ न कर , वरना जो तुझसे ख़ुशहाली का तालिब था वह तेरे हाँ से हरमाँनसीब होगा और जो तेरे फ़ज़्ल से बख़्शिश व अता का ख़्वास्तगार था वह तेरे दर से महरूम रहेगा।

तो अब हम तुझे छोड़कर किसके पास जाएँ और तेरा दर छोड़कर किधर का रूख़ करें। तू इससे मुनज़्ज़ा है (के हमें ठुकरा दे जबके) हम ही वह आजिज़ व बेबस हैं जिनकी दुआएं क़ुबूल करना तूने अपने ऊपर लाज़िम कर लिया है और वह दर्दमन्द हैं जिनके दुख दूर करने का तूने वादा किया है , और तमाम चीज़ों में तेरे मक़तज़ाए मशीयत के मनासिब और तमाम उमूर में तेरी बुज़ुर्गी व अज़मत के शायान यह है के तुझसे रहम की दरख़्वास्त करे तू उस पर रहम फ़रमाए और जो तुझसे फ़रयादरसी चाहे तू उसकी फ़रयाद रसी करे। तू अब अपनी बारगाह में हमारी तज़र्रूअ वज़ारी पर रहम फ़रमा। और जबके हमने अपने को तेरे आगे (ख़ाके मुज़ल्लत पर) डाल दिया है तो हमें (फ़िक्र व ग़म से) निजात दे। बारे इलाहा! जब हमने तेरी मासीयत में शैतान की पैरवी की तो उसने (हमारी इस कमज़ोरी पर) इज़हारे मसर्रत किया। तू मोहम्मद (स 0) और उनकी आले (अ 0) अतहर पर दुरूद भेज। और जब हमने तेरी ख़ातिर उसे छोड़ दिया और उससे रूगर्दानी करके तुझसे लौ लगा चुके हैं तो कोई ऐसी उफ़ताद न पड़े के वह हम पर शमातत करे। ’’

ग्यारहवीं दुआ

अन्जाम बख़ैर होने की दुआ

ऐ वह ज़ात! जिसकी याद , याद करने वालों के लिये सरमाया-ए-इज़्ज़त , ऐ वह जिसका शुक्र , शुक्रगुज़ारों के लिये वजहे कामरानी , ऐ वह जिसकी फ़रमाबरदारी फ़रमाबरदारों के लिये ज़रियाए नजात है। रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और हमारे दिलों को अपनी याद में और हमारी ज़बानों को अपने शुक्रिया में और हमारे आज़ा को अपनी फ़रमानबरदारी में मसरूफ़ रखकर हर याद , हर शुक्रिया और फ़रमाबरदारी से बेनियाज़ कर दे।

और अगर तूने हमारी मसरूफ़ियतों में कोई फ़राग़त का लम्हा रखा है तो उसे सलामती से हमकिनार कर , इस तरह के नतीजे में कोई गुनाह दामनगीर न हो और ख़स्तगी रूनुमा हो ताके बुराइयों को लिखने वाले फ़रिश्ते इस तरह पलटें के नामाए आमाल हमारी बुराईयों के ज़िक्र से ख़ाली हों और नेकियों को लिखने वाले फ़रिश्ते हमारी नेकियों को लिख कर मसरूर व शादाँ वापस होँ और जब हमारी ज़िन्दगी के दिन बीत जाएं और सिलसिलए हयात क़ता हो जाएं और तेरी बारगाह में हाज़िर होने का बुलावा आए , जिसे बहरहाल आना और जिस पर बहरसूरत लब्बैक कहना है। तू मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमारे कातिबाने आमाल हमारे जिन आमाल का शुमार करें उनमें आखि़री अमल मक़बूले तौबा को क़रार दे के इसके बाद हमारे इन गुनाहों और हमारी इन मासियतों पर जिन के हम मुरतकिब हुए हैं सरज़न्श न करे और जब अपने बन्दों के हालात जांचे तो उस पर्दे को जो तूने हमारे गुनाहों पर डाला है सब के रू-ब-रू चाक न करे , बेशक जो तुझे बुलाए तू उस पर मेहरबानी करता है और जो तुझे पुकारे तू उसकी सुनता है।

बारहवीं दुआ

एतराफ़े गुनाह और तलबे तौबा के सिलसिले में हज़रत (अ 0) की दुआ

ऐ अल्लाह! मुझे तीन बातें तेरी बारगाह में सवाल करने से रोकती हैं और एक बात इस पर आमादा करती है। जो बातें रोकती हैं उनमें से

एक यह है के जिस अम्र का तूने हुक्म दिया मैंने उसकी तामील में सुस्ती की

दूसरे यह के जिस चीज़ से तूने मना किया उसकी तरफ़ तेज़ी से बढ़ा।

तीसरे जो नेमतें तूने मुझे अता कीं उनका शुक्रिया अदा करने में कोताही की

और जो बात मुझे सवाल करने की जराअत दिलाती है वह तेरा तफ़ज़्जुल व एहसान है जो तेरी तरफ़ रूजूअ होने वालों और हुस्ने ज़न के साथ आने वालों के हमेशा शरीके हाल रहा है। क्योंके तेरे तमाम एहसानात सिर्फ़ तेरे तफ़ज़्ज़ल की बिना पर हैं और तेरी हर नेमत बग़ैर किसी साबेक़ा इस्तेहक़ाक़ के है। अच्छा फिर ऐ मेरे माबूद! मैं तेरे दरवाज़ा-ए-इज़्ज़ो जलाल पर एक अब्दे मुतीअ व ज़लील की तरह खड़ा हूँ और शर्मिन्दगी के साथ एक फ़क़ीर व मोहताज की हैसियत से सवाल करता हूँ इस अम्र का इक़रार करते हुए के तेरे एहसानात के वक़्त तर्के मासियत के अलावा और कोई इताअत (अज़ क़बीले हम्द व शुक्र) न कर सका , और मैं किसी हालत में तेरे इनआम व एहसान से ख़ाली नहीं रहा। तो क्या ऐ मेरे माबूद! यह बदआमालियों का इक़रार तेरी बारगाह में मेरे लिये सूदमन्द हो सकता है और वह बुराइयां जो मुझसे सरज़द हुई हैं उनका एतराफ़ तेरे अज़ाब से निजात का बाएस क़रार पा सकता है। या यह के तूने इस मक़ाम पर मुझ पर ग़ज़ब करने का फ़ैसला कर लिया है और दुआ के वक़्त अपनी नाराज़गी को मेरे लिये बरक़रार रखा है। तू पाक व मुनज़्ज़ह है। मैं तेरी रहमत से मायूस नहीं हूँ इसलिये के तूने अपनी बारगाह की तरफ़ मेरे लिये तौबा का दरवाज़ा खोल दिया है , बल्कि मैं उस बन्दए ज़लील की सी बात कह रहा हूँ जिसने अपने नफ़्स पर ज़ुल्म किया और अपने परवरदिगार की हुरमत का लेहाज़ न रखा। जिसके गुनाह अज़ीम रोज़ अफ़ज़ोर हैं। जिसकी ज़िन्दगी के दिन गुज़र गए और गुज़रे जा रहे हैं। यहाँ तक के जब उसने देखा के मुद्दते अमल तमाम हो गई और उम्र अपनी आख़ेरी हद को पहुँच गई और यह यक़ीन हो गया के अब तेरे हाँ हाज़िर हूए बग़ैर कोई चारा और तुझ से निकल भागने की सूरत नहीं है। तो वह हमहतन तेरी तरफ़ रूजु हुआ और सिदक़े नीयत से तेरी बारगाह में तौबा की। अब वह बिलकुल पाक व साफ़ दिल के साथ तेरे हुज़ूर खड़ा हुआ। फिर कपकपाती आवाज़ से और दबे लहजे में तुझे पुकारा इस हालत में तुझे पुकारा इस हालत में के ख़ुशू व तज़ल्लुल के साथ तेरे सामने झुक गया और सर को न्योढ़ा कर तेरे आगे ख़मीदा हो गया। ख़ौफ़ से इसके दोनों पावों थर्रा रहे हैं और सीले अश्क उसके रूख़सारों पर रवाँ है और तुझे इस तरह पुकार रहा है:- ऐ सब रहम करने वालों से ज़्यादा रहम करने वाले , ऐ उन सबसे बढ़कर रहम करने वाले जिनसे तलबगाराने रहम व करम बार बार रहम की इल्तिजाएं करते हैं , ऐ उन सबसे ज़्यादा मेहरबानी करने वाले जिनके गिर्द माफ़ी चाहने वाले घेरा डाले रहते हैं। ऐ वह जिसका अफ़ो व वरगुज़ाँ के इन्तेक़ाम से फ़ज़ोंतर है। ऐ वह जिसकी ख़ुशनूदी उसकी नाराज़गी से ज़्यादा है।

ऐ वह जो बेहतरीन अफ़ो व दरगुज़र के बाएस मख़लूक़ात के नज़दीक हम्द व सताइश का मुस्तहक़ है। ऐ वह जिसने अपने बन्दों को क़ुबूले तौबा का ख़ौगीर किया है , और तौबा के ज़रिये उनके बिगड़े हुए कामों की दुरूस्ती चाही है। ऐ वह जो उनके ज़रा से अमल पर ख़ुश हो जाता है और थोड़े से काम का बदला ज़्यादा देता है। ऐ वह जिसने उनकी दुआओं को क़ुबूल करने का ज़िम्मा लिया है। ऐ वह जिसने अज़रूए तफ़ज़्ज़ुल व एहसान बेहतरीन जज़ा का वादा किया है जिन लोगों ने तेरी मासियत की और तूने उन्हें बख़्श दिया मैं उनसे ज़्यादा गुनहगार नहीं हूं जिन्होंने तुझसे माज़ेरत की और तूने उनकी माज़ेरत को क़ुबूल कर लिया उनसे ज़्यादा क़ाबिले सरज़न्श नहीं हूँ और जिन्होंने तेरी बारगाह में तौबा की और तूने (तौबा को क़ुबूल फ़रमाकर) उन पर एहसान किया उनसे ज़्यादा ज़ालिम नहीं हूँ। लेहाज़ा मैं अपने इस मौक़ूफ़ को देखते हुए तेरी बारगाह में तौबा करता हूँ उस शख़्स की सी तौबा जो अपने पिछले गुनाहों पर नादिम और ख़ताओं के हुजूम से ख़ौफ़ज़दा और जिन बुराइयों का मुरतकिब होता रहा है उन पर वाक़ेई शर्मसार हूँ और जानता हूं के बड़े से बड़े गुनाह को माफ़ कर देना तेरे नज़दीक कोई बड़ी बात नहीं है और बड़ी से बड़ी ख़ता से दरगुज़र करना तेरे लिये कोई मुश्किल नहीं है और सख़्त से सख़्त जुर्म से चश्मपोशी करना तुझे ज़रा गराँ नहीं है। यक़ीनन तमाम बन्दों में से वह बन्दा तुझे ज़्यादा महबूब है जो तेरे मुक़ाबले में सरकशी न करे गुनाहों पर मसर न हो और तौबा व अस्तग़फ़ार की पाबन्दी करे। और मैं तेरे हुज़ूर ग़ुरूर व सरकशी से दस्तबरदार होता हूँ और गुनाहों पर इसरार से तेरे दामन में पनाह मांगता हूँ और जहाँ-जहाँ कोताही की है उसके लिये अफ़ो व बख़्शिश का तलबगार हूँ। और जिन कामों के अन्जाम देने से आजिज़ हूँ उनमें तुझ से मदद का ख़्वास्तगार हूँ। ऐ अल्लाह! तू रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और तेरे जो जो हुक़ूक़ मेरे ज़िम्मे आएद होते हैं उन्हें बख़्श दे और जिस पादाश का मैं सज़ावार हूँ उससे मोआफ़ी दे और मुझे उस अज़ाब से पनाह दे जिससे गुनहगार हरासाँ हैं। इसलिये के तू माफ़ कर देने पर क़ादिर है और तू उस सिफ़ते अफ़ो व दरगुज़र में मारूफ़ है। और तेरे सिवा हाजत के पेश करने की कोई जगह नहीं है और न तेरे अलावा कोई मेरे गुनाहों का बख़्शने वाला है। हाशा व कला कोई और बख़्शने वाला नहीं है। और मुझे अपने बारे में डर है तो बस तेरा। इसलिये के तू ही इसका सज़ावार है के तुझ से डरा जाए। और तू ही इसका अहल है के बख़्शिश व आमरज़िश से काम ले , तू मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मेरी हाजत बर ला और मेरी मुराद पूरी कर। मेरे गुनाह बख़्श दे और मेरे दिल को ख़ौफ़ से मुतमइन कर दे। इसलिये के तू हर चीज़ पर क़ुदरत रखता है और यह काम तेरे लिये सहल व आसान है। मेरी दुआ क़ुबूल फ़रमा ऐ तमाम जहान के परवरदिगार।

तेरहवीं दुआ

ख़ुदावन्द आलम से तलबे हाजात के सिलसिले में हज़रत की दुआ

ऐ माबूद! ऐ वह जो तलबे हाजात की मन्ज़िले मुन्तहा है ऐ वह जिसके यहां मुरादों तक रसाई होती है। ऐ वह जो अपनी नेमतें क़ीमतों के एवज़ फ़रोख़्त नहीं करता और न अपने अतियें को एहसान जताकर मुकद्दर करता है , ऐ वह जिसके ज़रिये बेनियाज़ी हासिल होती है और जिससे बेनियाज़ नहीं रहा जा सकता। ऐ वह जिसकी ख़्वाहिश व रग़बत की जाती है और जिससे मुंह मोड़ा नहीं जा सकता। ऐ वह जिसके ख़ज़ाने तलब व सवाल से ख़त्म नहीं होते और जिसकी हिकमत व मसलेहत को वसाएल व असबाब के ज़रिये तबदील नहीं किया जा सकता। ऐ वह जिससे हाजतमन्दों का रिश्ताए एहतियाज क़ता नहीं होता और जिसे पुकारने वालों की सदा ख़स्ता व मलोल नहीं करती। तूने ख़ल्क़ से बेनियाज़ होने की सिफ़त का मुज़ाहेरा किया है और तू यक़ीनन इनसे बेनियाज़ है और तूने उनकी तरफ़ फ़क्र व एहतियाज की निस्बत दी है और वह बेशक तेरे मोहताज हैं लेहाज़ा जिसने अपने इफ़लास के रफ़ा करने के लिये तेरा इरादा किया और अपनी एहतियाज के दूर करने के लिये तेरा क़स्द किया उसने अपनी हाजत को उसके महल व मुक़ाम से तलब किया और अपने मक़सद तक पहुंचने का सही रास्ता इख़्तेयार किया। और जो अपनी हाजत को लेकर मख़लूक़ात में से किसी एक की तरफ़ मुतवज्जोह हुआ या तेरे अलावा दूसरे को अपनी हाजत बरआरी का ज़रिया क़रार दिया वह हरमाँनसीबी से दो चार और तेरे एहसान से महरूमी का सज़ावार हुआ। बारे इलाहा। मेरी तुझसे एक हाजत है जिसे पूरा करने से मेरी ताक़त जवाब दे चुकी है और मेरी तदबीर व चाराजोई भी नाकाम होकर रह गई है और मेरे नफ़्स ने मुझे यह बात ख़ुशनुमा सूरत में दिखाई के मैं अपनी हाजत को उसके सामने पेश करूँ जो ख़ुद अपनी हाजतें तेरे सामने पेश करता है और अपने मक़ासिद में तुझसे बेनियाज़ नहीं है। यह सरासर ख़ताकारों की ख़ताओं में से एक ख़ता और गुनाहों की लग़्ज़िशों में से एक लग़्ज़िश थी लेकिन तेरे याद दिलाने से मैं अपनी ग़फ़लत से होशियार हुआ और तेरी तौफ़ीक़ ने सहारा दिया तो ठोकर खाने से संभल गया और तेरी राहनुमाई की बदौलत ग़लत एक़दाम से बाज़ आया और वापस पलट आया और मैंने कहा वाह सुबहान अल्लाह। किस तरह एक मोहताज दूसरे मोहताज से सवाल कर सकता है , और कहां एक रादार दूसरे नादार से रूजू कर सकता है (जब यह हक़ीक़त वाज़ेह हो गई) तो मैंने ऐ मेरे माबूद। पूरी रग़बत के साथ तेरा इरादा किया और तुझ पर भरोसा करते हुए अपनी उम्मीदें तेरे पास लाया हूँ और मैंने इस अम्र को बख़ूबी जान लिया है के मेरी कसीर हाजतें तेरी वुसअते रहमत के सामने हैच हैं , तेरे दामने करम की वुसअत किसी के सवाल करने से तंग नहीं होती और तेरा दस्ते करम अता व बख़्शिश में हर हाथ से बलन्द है। ऐ अल्लाह। मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और अपने करम से मेरे साथ तफ़ज़्ज़ल व एहसान की रविश इख़्तेयार और अपने अद्ल से काम लेते हुए मेरे इस्तेहक़ाक़ की रू से फ़ैसला न कर क्योंके मैं पहला वह हाजतमन्द नहीं हूँ जो तेरी तरफ़ मुतवज्जोह हुआ और तूने उसे अता किया हो हालांके वह दर किये जाने का मुस्तहेक़ हो और पहला वह साएल नहीं हूं जिसने तुझसे मांगा हो और तूने उस पर अपना फ़ज़्ल किया हो हालांके वह महरूम किये जाने के क़ाबिल हो। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मेरी दुआ का क़ुबूल करने वाला , मेरी पुकार पर इत्तेफ़ात फ़रमाने वाला , मेरी अज्ज़वज़ारी पर रहम करने वाला और मेरी आवाज़ का सुनने वाला साबित हो और मेरी उम्मीद जो तुझसे वाबस्ता है उसे न तोड़ और मेरा वसीला अपने से क़ता न कर। और मुझे इस मक़सद और दूसरे मक़ासिद में अपने सिवा दूसरे की तरफ़ मुतवज्जोह न होने दे। और इस मक़ाम से अलग होने से पहले मेरी मुश्किल कुशाई और मुआमलात में हुस्ने तक़दीर की कारफ़रमाई से मेरे मक़सद के बर लाने , मेरी हाजत के रवा करने और मेरे सवाल के पूरा करने का ख़ुद ज़िम्मा ले। और मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा। ऐसी रहमत जो दाएमी और रोज़ाफ़्ज़ो हो , जिस का ज़माना ग़ैर मोहतमिम और जिसकी मुद्दत बेपायां हो। और उसे मेरे लिये मुअय्यन और मक़सद बरआरी का ज़रिया क़रार दे। बेशक तू वसीअ रहमत और जूद व करम की सिफ़त का मालिक है। ऐ मेरे परवरदिगार! मेरी कुछ हाजतें यह हैं (इस मक़ाम पर अपनी हाजतें बयान करो , फिर सजदा करो और सजदे की हालत में यह कहो) तेरे फ़ज़्ल व करम ने मेरी दिले जमई और तेरे एहसान ने रहनुमाई की , इस वजह से मैं तुझसे तेरे ही वसीले से मोहम्मद (स 0) व आले मोहम्मद अलैहिस्सलातो वस्सलाम के ज़रिये सवाल करता हूं के मुझे (अपने दर से) नाकाम व नामुराद न फेर।


चौदहवीं दुआ

जब आप पर कोई ज़्यादती होती या ज़ालिमों से कोई नागवार बात देखते तो यह दुआ पढ़ते थे

ऐ वह जिससे फ़रियाद करने वालों की फ़रयादें पोशीदा नहीं हैं। ऐ वह जो उनकी सरगुज़िश्तों के सिलसिले में गवाहों की गवाही का मोहताज नहीं है , ऐ वह जिसकी नुसरत मज़लूमों के हम रकाब और जिसकी मदद ज़ालिमों से कोसों दूर है। ऐ मेरे माबूद! तेरे इल्म में हैं वह ईज़ाएं जो मुझे फ़लाँ इब्ने फ़लाँ से उसके तेरी नेमतों पर इतराने और तेरी गिरफ़्त से ग़ाफ़िल होने के बाएस पहुँची हैं। जिन्हें तूने उस पर हराम किया था और मेरी हतके इज़्ज़त का मुरतकिब हुआ , जिससे तूने उसे रोका था। ऐ अल्लाह रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और अपनी क़ूवत व तवानाई से मुझ पर ज़ुल्म करने वाले और मुझसे दुश्मनी करने वाले को ज़ुल्म व सितम से रोक दे और अपने इक़्तेदार के ज़रिये उसके हरबे कुन्द कर दे और उसे अपने ही कामांे में उलझाए रख और जिससे आमादा दुश्मनी है उसके मुक़ाबले में उसे बेदस्त व पा कर दे। ऐ माबूद! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और उसे मुझ पर ज़ुल्म करने की खुली छूट न दे और उसके मुक़ाबले में अच्छे असलूब से मेरी मदद फ़रमा और उसके बुरे कामों जैसे कामों से मुझे महफ़ूज़ रख और उसकी हालत ऐसी हालत न होने दे। ऐ अल्लाह मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और उसके मुक़ाबले में ऐसी बरवक़्त मदद फ़रमा जो मेरे ग़ुस्से को ठण्डा कर दे और मेरे ग़ैज़ व ग़ज़ब का बदला चुकाए। ऐ अल्लाह रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और उसके ज़ुल्म व सितम के एवज़ अपनी मुआफ़ी और उसकी बदसुलूकी के बदले में अपनी रहमत नाज़िल फ़रमा क्योंके हर नागवार चीज़ तेरी नाराज़गी के मुक़ाबले में हैच है और तेरी नाराज़गी न हो तो हर (छोटी बड़ी) मुसीबत आसान है। बारे इलाहा! जिस तरह ज़ुल्म सहना तूने मेरी नज़रों में नापसन्द किया है , यूँ ही ज़ुल्म करने से भी मुझे बचाए रख। ऐ अल्लाह! मैं तेरे सिवा किसी से शिकवा नहीं करता और तेरे अलावा किसी हाकिम से मदद नहीं चाहता। हाशा के मैं ऐसा चाहूँ तो रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और मेरी दुआ को क़ुबूलियत से और मेरे शिकवे को सूरते हाल की तबदीली से जल्दी हमकिनार कर और मेरा इस तरह इम्तेहान न करना के तेरे अद्ल व इन्साफ़ से मायूस हो जाऊँ और मेरे दुश्मन को इस तरह न आज़माना के वह तेरी सज़ा से बेख़ौफ़ होकर मुझ पर बराबर ज़ुल्म करता रहे और मेरे हक़ पर छाया रहे और उसे जल्द अज़ जल्द उस अज़ाब से रू शिनास कर जिससे तूने सितमगारों को डराया धमकाया है और मुझे क़ुबूलियते दुआ का वह असर दिखा जिसका तूने बेबसों से वादा किया है। ऐ अल्लाह मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे तौफ़ीक़ दे के जो सूद-ओ-ज़ियां तूने मेरे लिये मुक़द्दर कर दिया है उसे (बतय्यब ख़ातिर) क़ुबूल करूं और जो कुछ तूने दिया है और जो कुछ लिया है उस पर मुझे राज़ी व ख़ुशनूद रख और मुझे सीधे रास्ते पर लगा और ऐसे काम में मसरूफ़ रख जो आफ़त व ज़ियाँ से बरी हों। ऐ अल्लाह! अगर तेरे नज़दीक मेरे लिये यही बेहतर हो के मेरी दादरसी को ताख़ीर में डाल दे और मुझ पर ज़ुल्म ढाने वाले से इन्तेक़ाम लेने को फ़ैसले के दिन और दावेदारों के महले इजतेमाअ के लिये उठा रखे तो फिर मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल कर और अपनी जानिब से नीयत की सच्चाई और सब्र की पाएदारी से मेरी मदद फ़रमा और बुरी ख़्वाहिश और हरीसों की बेसब्री से बचाए रख और जो सवाब तूने मेरे लिये ज़ख़ीरा किया है और जो सज़ा व उक़ूबत मेरे दुश्मन के लिये मुहय्या की है उसका नक़्शा मेरे दिल में जमा दे और उसे अपने फ़ैसले क़ज़ा व क़द्र पर राज़ी रहने का ज़रिया और अपनी पसन्दीदा चीज़ों पर इत्मीनान व वसूक़ का सबब क़रार दे। मेरी दुआ को क़ुबूल फ़रमा ऐ तमाम जहान के पालने वाले। बेशक तू फ़ज़्ले अज़ीम का मालिक है और तेरी क़ुदरत से कोई चीज़ बाहर नहीं है।

पन्द्रहवीं दुआ

जब किसी बीमारी या कर्ब व अज़ीयत में मुब्तिला होते तो यह दुआ पढ़ते

ऐ माबूद! तेरे ही लिये हम्द व सपास है इस सेहत व सलामतीए बदन पर जिसमें हमेषा ज़िन्दगी बसर करता रहा और तेरे ही लिये हम्द व सपास है उस मर्ज़ पर जो अब मेरे जिस्म में तेरे हुक्म से रूनुमा हुआ है। ऐ माबूद! मुझे नही मालूम के इन दोनों हालतों में से कौन सी हालत पर तू षुक्रिया का ज़्यादा मुस्तहेक़ है और इन दोनों वक़्तों में से कौन सा वक़्त तेरी हम्द व सताइश के ज़्यादा लाएक़ है। आया सेहत के लम्हे जिनमें तूने अपनी पाकीज़ा रोज़ी को मेरे लिये ख़ुषगवार बनाया और अपनी रज़ा व ख़ुषनूदी और फ़ज़्ल व एहसान के तलब की उमंग मेरे दिल में पैदा की और उसके साथ अपनी इताअत की तौफ़ीक़ देकर उससे ओहदाबरा होने की क़ूवत बख़्षी या यह बीमारी का ज़माना जिसके ज़रिये मेरे गुनाहों को दूर किया और नेमतों के तोहफ़े अता फ़रमाए ताके उन गुनाहों का बोझ हल्का कर दे जो मेरी पीठ को गराँबार बनाए हुए हैं और उन बुराइयों से पाक कर दे जिनमें डूबा हुआ हूँ और तौबा करने पर मुतनब्बे कर दे और गुज़िष्ता नेमत (तन्दरूस्ती) की याददेहानी से (कुफ्राने नेमत के) गुनाह को महो कर दे और इस बीमारी के असना में कातिबाने आमाल मेरे लिये वह पाकीज़ा आमाल भी लिखते रहे जिनका न दिल में तसव्वुर हुआ था न ज़बान पर आए थे और न किसी अज़ो ने उसकी तकलीफ़ गवारा की थी। यह सिर्फ़ तेरा तफ़ज़्ज़ुल व एहसान था जो मुझ पर हुअ। ऐ अल्लाह! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और जो कुछ तूने मेरे लिये पसन्द किया है वही मेरी नज़रों में पसन्दीदा क़रार दे और जो मुसीबत मुझ पर डाल दी है उसे सहल व आसान कर दे और मुझे गुज़िष्ता गुनाहों की आलाइष से पाक और साबेक़ा बुराइयों को नीस्त व नाबूद कर दे और तन्दरूस्ती की लज़्ज़त से कामरान अैर सेहत की ख़ुषगवारी से बहराअन्दोज़ कर और मुझे इस बीमारी से छुड़ाकर अपने अफ़ो की जानिब ले और इस हालते उफ़तादगी से बख़्षिष व दरगुज़र की तरफ़ फेर दे और इस बेचैनी से निजात देकर अपनी राहत तक और इस षिद्दत व सख़्ती को दूर करके कषाइष व वुसअत की मन्ज़िल तक पहुंचा दे इसलिये के तू बे इस्तेहक़ाक़ एहसान करने वाला और गरांबहा नेमतें बख़्षने वला है और तू ही बख़्षिष व करम का मालिक और अज़मत व बुज़ुर्गी का सरमायादार है।

सोलहवीं दुआ

जब गुनाहों से मुआफ़ी चाहते या अपने ऐबों से दरगुज़र की इल्तेजा करते तो यह दुआ पढ़ते

ऐ ख़ुदा! ऐ वह जिसे गुनहगार उसकी रहमत के वसीले से फ़रयादरसी के लिये पुकारते हैं। ऐ वह जिसके तफ़ज़्ज़ुल व एहसान की याद का सहारा बेकस व लाचार ढूंढते हैं। ऐ वह जिसके ख़ौफ़ से आसी व ख़ताकार नाला व फ़रयाद करते हैं। ऐ हर वतन आवारा व दिल गिरफ्ता के सरमाया ‘अनस ’ हर ग़मज़दा दिल षिकस्ता के ग़मगुसार , हर बेकस व तन्हा के फ़रयदरस और हर रान्दा व मोहताज के दस्तगीर , तू वह है जो अपने इल्म व रहमत से हर चीज़ पर छाया हुआ है और तू वह है जिसने अपनी नेमतों में हर मख़लूक़ का हिस्सा रखा है। तू वह है जिसका अफ़ो व दरगुज़र उसके इन्तेक़ाम पर ग़ालिब है , तू वह है जिसकी रहमत उसके ग़ज़ब से आगे चलती है , तू वह है जिसकी अताएं फ़ैज़ व अता के रोक लेने से ज़्यादा हैं। तू वह है जिसके दामने वुसअत में तमाम कायनाते हस्ती की समाई है , तू वह है के जिस किसी को अता करता है उससे एवज़ की तवक़्क़ो नहीं रखता और तू वह है के जो तेरी नाफ़रमानी करता है उसे हद से बढ़ कर सज़ा नहीं देता। ख़ुदाया! मैं तेरा वह बन्दा हूँ जिसे तूने दुआ का हुक्म दिया तो वह लब्बैक लब्बैक पुकर उठा। हाँ तो वह मैं हूं ऐ मेरे माबूद! जाो तेरे आगे ख़ाके मज़ल्लत पर पड़ा है , मैं वह हूँ जिसकी पुष्त गुनाहों से बोझिल हो गई है , मैं वह हूँ जिसकी उम्र गुनाहों में बीत चुकी है , मैं वह हूँ जिसने अपनी नादानी व जेहालत से तेरी नाफ़रमानी की , हालांके तू मेरी जानिब से नाफ़रमानी का सज़ावार न था। ऐ मेरे माबूद! जो तुझसे दुआ मांगे आया तू उस पर रहम फ़रमाएगा ताके मैं लगातार दुआ मांगूं या जो तेरे आगे रोए उसे बख़्ष देगा ताके मैं रोने पर जल्द आमादा हो जाऊँ। या जो तेरे सामने अज्ज़ व नियाज़ से अपना चेहर ख़ाक पर मले उससे दरगुज़र करेगा , या जो तुझ पर भरोसा करते हुए अपनी तही दस्ती का षिकवा करे उसे बेनियज़ करेगा। बारेइलाहा! जिसका देने वाला तेरे सिवा कोई नहीं है उसे नाउम्मीद न कर और जिसका तेरे अलावा और कोई ज़रियाए बेनियाज़ी नहीं है उसे महरूम न कर। ख़ुदावन्दा! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और मुझसे रूगरदानी इख़्तेयार न कर जबके मैं तेरी तरफ़ ख़्वाहिष लेकर आया हूं और मुझे सख़्ती से धुतकार न दे जबके मैं तेरे सामने खड़ा हूं। तू वह है जिसने अपनी तौसीफ़ रहम व करम से की है लेहाज़ा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझ पर रहम फ़रमा और तूने अपन नाम दरगुज़र करने वाला रखा है लेहाज़ा मुझसे दरगुज़र फ़रमा। बारे इलाहा! तू मेरे अष्कों की रवाने को जो तेरे ख़ौफ़ के बाएस है , मेरे दिल की धड़कन को जो तेरे डर की वजह से है और मेरे आज़ा की थरथरी को जो तेरी हैबत के सबब से है देख रहा है। यह सब अपनी बदआमालियों को देखते हुए तुझसे षर्म व हया महसूस करने का नतीजा है यही वजह है के तज़रूअ व ज़ारी के वक़्त मेरी आवाज़ रूक जाती है और मुनाजात के मौक़े पर ज़बान काम नहीं देती। ऐ ख़ुदा तेरे ही लिये हम्द व सपास है के तूने मेरे कितने ही ऐबों पर पर्दा डाला और मुझे रूसवा नहीं होने दिया और कितने ही मेरे गुनाहों को छुपाया और मुझे बदनाम नहीं किया और कितनी ही बुराइयों का मैं मुरतकिब हुआ मगर तूने परदा फ़ाष न किया और न मेरे गले में तंग व आर की ज़िल्लत का तौक़ डाला और न मेरे ऐबों की जुस्तजू में रहने वाले हमसायों और उन नेमतों पर जो मुझे अता की हैं हसद करने वालों पर उन बुराइयों को ज़ाहिर किया। फिर भी तेरी मेहरबानियां मुझे उन बुराइयों के इरतेकाब से जिनका तू मेरे बारे में इल्म रखता है रोक न सकीं। तो ऐ मेरे माबूद! मुझसे बढ़कर कौन अपनी सलाह व बहबूद से बेख़बर अपने हिज़्ज़ व नसीब से ग़ाफ़िल और इस्लाहे नफ़्स से दूर होगा जबके मैं उस रोज़ी को जिसे तूने मेरे लिये क़रार दिया है उन गुनाहों में सर्फ़ करता हूं जिनसे तूने मना किया है और मुझसे ज़्यादा कौन बातिल की गहराई तक उतरने वाला और बुराइयों पर एक़दाम की जराअत करने वाला होगा जबके मैं ऐसे दोराहे पर खड़ा हूं के जहां एक तरफ़ तू दावत दे अैर दूसरी तरफ़ शैतान आवाज़ दे , तो मै। उसकी कारस्तानियों से वाक़िफ़ होते हुए और उसकी षरअंगेज़ियों को ज़ेहन में महफ़ूज़ रखते हुए उसकी आवाज़ पर लब्बैक कहता हूँ। हालांके मुझे उस वक़्त भी यक़ीन होता है के तेरी दावत का मआल जन्नत और उसकी आवाज़ पर लब्बैक कहने का अन्जाम दोज़ख़ है। अल्लाहो अकबर! कितनी यह अजीब बात है जिसकी गवाही मैं ख़ुद अपने खि़लाफ़ दे रहा हूँ और अपने छुपे हुए कामों को एक-एक करके गिन रहा हूं और इससे ज़्यादा अजीब तेरा मुझे मोहलत देना और अज़ाब में ताख़ीर करना है। यह इसलिये नही ंके मैं तेरी नज़रों में बावेक़ार हूँ , बल्कि यह मेरे मामले में तेरी बुर्दबारी और मुझ पर लुत्फ़ो एहसान है ताके मैं ततुझे नाराज़ करने वाली नाफ़रमानियों से बाज़ आ जाऊँ और ज़लील व रूसवा करने वाले गुनाहों से दस्तकष हो जाऊं और इसलिये है के मुझसे दरगुज़र करना सज़ा देने से तुझे ज़्यादा पसन्द है , बल्कि मैं तो ऐ मेरे माबूद! बहुत गुनहगार बहुत बदसिफ़ात व बदआमाल और ग़लतकारियों में बेबाक और तेरी इताअत के वक़्त सुस्तगाम और तेरी तहदीद व सरज़न्ष से ग़ाफ़िल और उसकी तरफ़ बहुत कम निगरान हूँ तो किस तरह मैं अपने उयूब तेरे सामने षुमार कर सकता हूं या अपने गुनाहों का ज़िक्र व बयान से एहाता कर सकता हूं और जो इस तरह मैं अपने नफ़्स को मलामत व सरज़न्ष कर रहा हूँ तो तेरी इस षफ़क़्क़त व मरहमत के लालच में जिससे गुनहगारों के हालात इस्लाह पज़ीद होते हैं और तेरी उस रहमत की तवक़्क़ोमें जिसके ज़रिये ख़ताकारों की गरदनें (अज़ाब से) रिहा होती हैं। बारे इलाहा! यह मेरी गरदन है जिसे गुनाहों ने जकड़ रखा है , तू रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और अपने अफ़ो व दरगुज़र से इसे आज़ाद कर दे। और यह मेरी पुष्त है जिसे गुनाहों ने बोझिल कर दिया है तू रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और अपने लुत्फ़ो इनआम के ज़रिये इसे हलका कर दे। बारे इलाहा! अगर मैं तेरे सामने इतना रोऊं के मेरी आंखों की पलकें झड़ जाएं और इतना चीख़ चीख़ कर गिरया करूं के आवाज़ बन्द हो जाए और तेरे सामने इतनी देर खड़ा रहूं के दोनों पैरों पर वरम आ जाए और इतने रूकू करूं के रीढ़ की हड्डियां अपनी जगह से उखड़ जाएं और इस क़द्र सजदे करूं के आंखें अन्दर को धंस जाएं और उम्र भर ख़ाक फांकता रहूं और ज़िन्दगी भर गन्दला पानी पीता रहूँ और इस आसना में तेरा ज़िक्र इतना करूं के ज़बान थक कर जवाब दे जाए फिर षर्म व हया की वजह से आसमान की तरफ़ निगाह न उठाऊं तो इसके बावजूद मैं अपने गुनाहों में से एक गुनाह के बख़्षे जाने का भी सज़ावार न होंगा और अगर तू मुझे बख़्ष दे जबके मैं तेरी मग़फ़ेरत के लाएक़ क़रार पाऊं और मुझे माफ़ कर दे जबके मैं तेरी माफ़ी के क़ाबिल समझा जाऊं तो यह मेरा इसतेहक़ाक़ की बिना पर लाज़िम नहीं होगा और न मैं इस्तेहक़ाक़ की बिना पर इसका अहल हूँ क्योंके जब मैंने पहले पहल तेरी मासियत की तो मेरी सज़ा जहन्नम तय थी , लेहाज़ तू मुझ पर अज़ाब करे तो मेरे हक़ में ज़ालिम नहीं होगा। ऐ मेरे माबूद! जबके तूने मेरी पर्दापोषी की और मुझे रूसवा नहीं किया और अपने लुत्फ़ व करम से नर्मी बरती और अज़ाब में जल्दी नहीं की और अपने फ़ज़्ल से मेरे बारे में हिल्म से काम लिया और अपनी नेमतों में तबदीली नहीं की और न अपने एहसान को मुकद्दर किया है तू मेरी इस तवील तज़रूअ व ज़ारी और सख़्त एहतियाज और मौक़ूफ़ की बदहाली पर रहम फ़रमा। ऐ अल्लाह मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे गुनाहों से महफ़ूज़ और इताअत में सरगर्मे अमल रख और मुझे हुस्ने रूजू की तौफ़ीक़ दे और तौबा के ज़रिये पाक कर दे और अपनी हुस्ने निगहदास्त से नुसरत फ़रमा और तन्दरूस्ती से मेरी हालत साज़गार कर और मग़फ़ेरत की षीरीनी से काम व दहन को लज़्ज़त बख़्ष और मुझे अपने अफ़ोका रेहाषदा और अपनी रहमत का आज़ादकर्दा क़रार दे और अपने अज़ाब से रेहाई का परवाना लिख दे और आख़ेरत से पहले दुनिया ही में निजात की ऐसी ख़ुषख़बरी सुना दे जिसे वाज़ेह तौर से समझ लूँ और उसकी ऐसी अलामत दिखा दे जिसे किसी षाहेबा इबहाम के बग़ैर पहचान लूँ और यह चीज़ तेरे हमहगीर इक़तेदार के सामने मुष्किल और तेरी क़ुदरत के मुक़ाबले में दुष्वार नहीं है , बेषक तेरी क़ुदरत हर चीज़ पर महीत है।

सत्रहवीं दुआ

जब षैतान का ज़िक्र आता तो उससे और उसके मक्रो अदावत से बचने के लिये यह दुआ पढ़ते

ऐ अल्लाह! हम षैतान मरदूद के वसवसों , मक्रों और हीलों से और उसकी झूटी तिफ़्ल तसल्लियों पर एतमाद करने और उसके हथकण्डों से तेरे ज़रिये पनाह मांगते हैं और इस बात से के उसके दिल में यह तमअ व ख़्वाहिष पैदा हो के वह हमें तेरी इताअत से बहकाए और तेरी मासियत के ज़रिये हमारी रूसवाई का सामान करे या यह के जिस चीज़ को वह रंग व रौग़न से आरास्ता करे वह हमारी नज़रों में खुब जाए या जिस चीज़ को वह बदनुमा ज़ाहिर करे वह हमें षाक़ गुज़रे। ऐ अल्लाह! तू अपनी इबादत के ज़रिये उसे हमसे दूर कर दे और तेरी मोहब्बत में मेहनत व जाँफ़िषानी करने के बाएस उसे ठुकरा दे और हमारे और उसके दरमियान एक ऐसा परदा जिसे वह चाक न कर सके , और एक ऐसी ठोस दीवार जिसे वह तोड़ न सके हाएल कर दे। ऐ अल्लाह रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और उसे हमारे बजाए अपने किसी दुष्मन के बहकाने में मसरूफ़ रख और हमें अपने हुस्ने निगेहदाष्त के ज़रिये उससे महफ़ूज़ कर दे। उसके मक्रो फ़रेब से बचा ले और हमसे रूगर्दां कर दे और हमारे रास्ते से उसके नक़्षे क़दम मिटा दे। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमें वैसी ही (महफ़ूज़) हिदायत से बहरामन्द फ़रमा जैसी उसकी गुमराही (मुस्तहकम) है और हमें उसकी गुमराही के मुक़ाबले में तक़वा व परहेज़गारी का ज़ादे राह दे और उसकी हलाकत आफ़रीन राह के खि़लाफ़ रष्द और तक़वा के रास्ते पर ले चल। ऐ अल्लाह! हमारे दिलों में उसे अमल व दख़ल का मौक़ा न दे और हमारे पास की चीज़ों में उसके लिये मन्ज़िल मुहय्या न कर। ऐ अल्लाह वह जिस बेहूदा बात को ख़ुषनुमा बनाके हमें दिखाए वह हमें पहचनवा दे और जब पहचनवा दे तो उससे हमारी हिफ़ाज़त भी फ़रमा। और हमें उसको फ़रेब देने के तौर तरीक़ों में बसीरत और उसके मुक़ाबले में सरो सामान की तैयारी की तालीम दे और इस ख़्वाबे ग़फ़लत से जो उसकी तरफ़ झुकाव का बाएस हो , होषियार कर दे और अपनी तौफ़ीक़ से उसके मुक़ाबले में कामिले नुसरत अता फ़रमा। बारे इलाहा! उसके आमाल से नापसन्दीदगी का जज़्बा हमारे दिलों में भर दे और उसके हीलों को तोड़ने की तौफ़ीक़ करामत फ़रमा। ऐ अल्लाह! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और षैतान (लानतुल्लाह) के तसर्रूत को हमसे हटा दे और इसकी उम्मीदें हमसे क़ता कर दे और हमें गुमराह करने की हिरस व आज़ से उसे दूर कर दे। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमारे बाप दादाओं , हमारी माओं , हमारी औलादों , हमारे क़बीले वालों , अज़ीज़ों , रिष्तेदारों और हमसाये में रहने वाले मोमिन मर्दों और मोमिना औरतों को उसके षर से एक मोहकम जगह हिफ़ाज़त करने वाले क़िला और रोक थाम करने वाली पनाह में रख और उससे बचा ले जाने वाली ज़र हैं उन्हें पहना और उसके मुक़ाबले में तेज़ धार वाले हथियार उन्हें अता कर , बारे इलाहा! इस दुआ में उन लोगों को भी षामिल कर जो तेरी रूबूबियत की गवाही दें और दुई के तसव्वुर के बग़ैर तुझे यकता समझें और हक़ीक़ते उबूदियत की रोषनी में तेरी ख़ातिर उसे दुष्मन रखें और इलाही उलूम के सीखने में उसके बरखि़लाफ़ तुझसे मदद चाहें। ऐ अल्लाह! जो गिरह वह लगाए उसे खोल दे , जो जोड़े उसे तोड़ दे। और जो तदबीर करे उसे नाकाम बना दे , और जब कोई इरादा करे उसे रोक दे और जिसे फ़राहम करे उसे दरहम बरहम कर दे। ख़ुदाया! उसके लष्कर को षिकस्त दे , उसके मक्रो फ़रेब को मलियामेट कर दे , उसकी पनाहगाह को ढा दे और उसकी नाक रगड़ दे।

ऐ अल्लाह। हमें उसके दुष्मनों में षामिल कर और उसके दोस्तों में षुमार होने से अलैहदा कर दे ताके वह हमें बहकाए तो उसकी इताअत न करें और जब हमें पुकारे तो उसकी आवाज़ पर लब्बैक न कहें और जो हमारा हुक्म माने हम उसे इससे दुष्मनी रखने का हुक्म दें और जो हमारे रोकने से बाज़ आए उसे इसकी पैरवी से मना करें। ऐ अल्लाह! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) पर जो तमाम नबियों के ख़ातम और सब रसूलों के सरताज हैं और उनके अहलेबैत पर जो तय्यब व ताहिर हैं और हमारे अज़ीज़ों , भाइयों और तमाम मोमिन मर्दों और मोमिना औरतों को उस चीज़ से पनाह में रख जिससे हमने पनाह मांगी है और जिस चीज़ से ख़ौफ़ खाते हुए हमने तुझसे अमान चाही है उससे अमान दे और जो दरख़्वास्त की है उसे मन्ज़ूर फ़रमा और जिसके तलब करने में ग़फ़लत हो गई है उसे मरहमत फ़रमा और जिसे भूल गए हैं उसे हमारे लिये महफ़ूज़ रख और इस वसीले से हमें नेकोकारों के दरजों और अहले ईमान के मरतबों तक पहुंचा दे। हमारी दुआ क़ुबूल फ़रमा , ऐ तमाम जहान के परवरदिगार।

अठारहवीं दुआ

जब कोई मुसीबत बरतरफ़ होती या कोई हाजत पूरी होती तो यह दुआ पढ़ते

ऐ अल्लाह! तेरे ही लिये हम्दो सताइश है तेरे बेहतरीन फै़सले पर और इस बात पर के तूने बलाओं का रूख़ मुझसे मोड़ दिया। तू मेरा हिस्सा अपनी रहमत में से सिर्फ़ उस दुनियवी तन्दरूस्ती में मुनहसिर न कर दे के मैं अपनी इस पसन्दीदा चीज़ की वजह से (आख़ेरत की) सआदतों से महरूम रहूँ और दूसरा मेरी नापसन्दीदा चीज़ की वजह से ख़ूशबख़्ती व सआदत हासिल कर ले जाए और अगर यह तन्दरूस्ती के जिसमें दिन गुज़ारा है या रात बसर की है किसी लाज़वाल मुसीबत का पेशख़ेमा और किसी दाएमी वबाल की तम्हीद बन जाए तो जिस (रहमत व अन्दोह) को तूने मोअख़्ख़र किया है उसे मुक़द्दम कर दे और जिस (सेहत व आफ़ियत को मुक़द्दम किया उसे मोअख़्ख़र कर दे क्योंके जिस चीज़ का नतीजा फ़ना हो वह ज़्यादा नहीं और जिसका अन्जाम बक़ा हो वह कम नहीं। ऐ अल्लाह! तू मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा।

उन्नीसवीं दुआ

क़हतसाली के मौक़े पर तलबे बाराँ की दुआ

बारे इलाहा! अब्रे बारां से हमें सेराब फ़रमा और इन अब्रों के ज़रिये हम पर दामने रहमत फैला जो मूसलाधारा बारिषों के साथ ज़मीन के सब्ज़ाए ख़ुषरंग की रूदीदगी का सरो सामान लिये हुए एतराफ़े आलम में रवाना किये जाते हैं और फलों के पुख़्ता होने से अपने बन्दों पर एहसान फ़रमा और षगूफ़ों के खिलने से अपने षहरों को ज़िन्दगी बख़्ष और अपन मोअजि़्ज़ज़ व बावेक़ार फ़रिष्तों और सफ़ीरों को ऐसी नफ़ा रसां बारिष पर आमादा कर जिसकी फ़रावान दाएम और रवानी हमहगीर हो। और बड़ी बून्दों वाली तेज़ी से आने वाली और जल्द बरसने वाली हो जिससे तू मुर्दा चीज़ों में ज़िन्दगी दौड़ा दे गुज़री हुई बहारें पलटा दे और जो चीज़ें आने वाली हैं उन्हें नमूदार कर दे और सामाने माषियत में वुसअत पैदा कर दे ऐसा अब्र छाए जो तह ब तह ख़ुषआईन्द ख़ुषगवार ज़मीन पर मोहीत और घन गर्ज वाला हो और उसकी बारिष लगातार न बरसे (के खेतों और मकानों को नुक़सान पहुंचे) और न उसकी बिजली धोका देने वाली हो (के चमके , गरजे और बरसे नहीं)। बारे इलाहा! हमें उस बारिष से सेराब कर जो ख़ुष्कसाली को दूर करने वाली (ज़मीन से) सब्ज़ा उगाने वाली (दष्त व सहरा को) सरसब्ज़ करने वाली बड़े फैलाव और बढ़ाव और अनथाह गहराव वाली हो जिससे तू मुरझाई हुई घास की रौनक़ पलटा दे और सूखे पड़े सब्ज़े में जान पैदा कर दे। ख़ुदाया! हमें ऐसी बारिष से सेराब कर जिससे तू टीलों पर से पानी के धारे बहा दे , कुंए छलका दे , नहरें जारी कर दे , दरख़्तों को तरो ताज़ा व षादाब कर दे , षहरों में नरख़ों की अरज़ानी कर दे , चौपायों और इन्सानों में नई रूह फूंक दे , पाकीज़ा रोज़ी का सरो सामान हमारे लिये मुकम्मल कर दे। खेतों को सरसब्ज़ व षादाब कर दे और चौपायों के थनों को दूध से भर दे और उसके ज़रिये हमारी क़ूवत व ताक़त में मज़ीद क़ूवत का इज़ाफ़ा कर दे। बारे इलाहा! इस अब्र की साया अफ़गनी को हमारे लिये झुलसा देने वाला लू का झोंका उसकी ख़नकी को नहूसत का सरचष्मा और उसके बरसने को अज़ाब का पेषख़ेमा और उसके पानी को (हमारे काम व दहन के लिये) षूर न क़रार देना। बारे इलाहा! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और हमें आसमान व ज़मीन की बरकतों से बहरामन्द कर इसलिये के तू हर चीज़ पर क़ुदरत रखता है।

(आप इस किताब को अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क पर पढ़ रहे है।)

बीसवीं दुआ

पसन्दीदा एख़लाक़ व शाइस्ता किरदार के सिलसिले में हज़रत अ 0 की दुआ

बारे इलाहा! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मेरे ईमान को कामिल तरीन ईमान की हद तक पहुंचा दे और मेरे यक़ीन को बेहतरीन यक़ीन क़रार दे और मेरी नीयत को पसन्दीदातरीन नीयत और मेरे आमाल को बेहतरीन आमाल के पाया तक बलन्द कर दे। ख़ुदावन्द! अपने लुत्फ़ से मेरी नीयत को ख़ालिस व बेरिया और अपनी रहमत से मेरे यक़ीन को इस्तवार और अपनी क़ुदरत से मेरी ख़राबियों की इस्लाह कर दे।

बारे इलाहा। मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे उन मसरूफ़ीन से जो इबादत में मानेअ हैं बेनियाज़ कर दे और उन्हीं चीज़़ों पर अमल पैरा होने की तौफ़ीक़ दे जिनके बारे में मुझसे कल के दिन सवाल करेगा और मेरे अय्यामे ज़िन्दगी को ग़रज़े खि़लक़त की अन्जामदेही के लिये मख़सूस कर दे और मुझे (दूसरों से) बेनियाज़ कर दे और मेरे रिज़्क़ में कषाइष व वुसअत फ़रमा। एहतियाज व दस्तंगरी में मुब्तिला न कर। इज़्ज़त व तौक़ीर दे , किब्र व ग़ुरूर से दो चार न होने दे। मेरे नफ़्स को बन्दगी व इबादत के लिये राम कर और ख़ुदपसन्दी से मेरी इबादत को फ़ासिद न होने दे और मेरे हाथों से लोगों को फ़ैज़ पहुंचा दे और उसे एहसान जताने से राएगाना न होने दे। मुझे बलन्दपाया एख़लाक़ मरहमत फ़रमा और ग़ुरूर और तफ़ाख़ुर से महफ़ूज़ रख।

बारे इलाहा! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और लोगों में मेरा दरजा जितना बलन्द करे उतना ही मुझे ख़ुद अपनी नज़रों में पस्त कर दे और जितनी ज़ाहेरी इज़्ज़त मुझे दे उतना ही मेरे नफ़्स में बातिनी बेवक़अती का एहसास पैदा कर दे।

बारे इलाहा! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे ऐसी नेक हिदायत से बहरामन्द फ़रमा के जिसे दूसरी चीज़ से तबदील न करू और ऐसे सही रास्ते पर लगा जिससे कभी मुंह न मोड़ूं , और ऐसी पुख़्ता नीयत दे जिसमें ज़रा षुबह न करूं और जब तक मेरी ज़िन्दगी तेरी इताअत व फ़रमाबरदारी के काम आये मुझे ज़िन्दा रख और जब वह षैतान की चरागाह बन जाए तो इससे पहले के तेरी नाराज़गी से साबक़ा पड़े या तेरा ग़ज़ब मुझ पर यक़ीनी हो जाए , मुझे अपनी तरफ़ उठा ले , ऐ माबूद! कोई ऐसी ख़सलत जो मेरे लिये मोईब समझी जाती हो उसकी इस्लाह किये बग़़ैर न छोड़ और कोई ऐसी बुरी आदत जिस पर मेरी सरज़न्ष की जा सके उसे दुरूस्त किये बग़ैर न रहने दे और जो पाकीज़ा ख़सलत अभी मुझमें नातमाम हो उसे तकमील तक पहुंचा दे।

ऐ अल्लाह! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और मेरी निसबत कीनातोज़ दुष्मनों की दुष्मनी को उलफ़त से , सरकषों के हसद को मोहब्बत से , नेकियों से बेएतमादी को एतमाद से , क़रीबों की अदावत को दोस्ती से , अज़ीज़ों की क़तअ ताल्लुक़ी को सिलए रहमी से , क़राबतदारों की बेएतनाई को नुसरत व तआवुन से , ख़ुषामदियों की ज़ाहेरी मोहब्बत को सच्ची मोहब्बत से और साथियों के एहानत आमेज़ बरताव को हुस्ने मआषेरत से और ज़ालिमों के ख़ौफ़ की तल्ख़ी को अमन की षीरीनी से बदल दे।

ख़ुदावन्दा! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और जो मुझ पर ज़ुल्म करे उस पर मुझे ग़लबा दे , जो मुझसे झगड़ा करे उसके मुक़ाबले में ज़बान (हुज्जत षिकन) दे , जो मुझ से दुष्मनी करे उस पर मुझे फ़तेह व कामरानी बख़्ष। जो मुझसे मक्र करे उसके मक्र का तोड़ अता कर , जो मुझे दबाए उस पर क़ाबू दे। जो मेरी बदगोई करे उसे झुटलाने की ताक़त दे और जो डराए धमकाए , उससे मुझे महफ़ूज़ रख। जो मेरी इस्लह करे उसकी इताअत और जो राहे रास्त दिखाए उसकी पैरवी की तौफ़ीक़ अता फ़रमा।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे उस अम्र की तौफ़ीक़ दे के जो मुझसे ग़ष व फ़रेब करे मैं उसकी ख़ैरख़्वाही करूं , जो मुझे छोड़ दे उससे हुस्ने सुलूक से पेष आऊं , जो मुझे महरूम करे उसे अता व बख़्षिष के साथ एवज़ दूँ और जो क़तए रहमी करे उसे सिलए रहमी के साथ बदला दूँ और जो पसे पुश्त मेरी बुराई करे मैं उसके बरखि़लाफ़ उसका ज़िक्रे ख़ैर करूं और हुस्ने सुलूक पर षुक्रिया बजा लाऊं और बदी से चष्मपोषी करूं।

बारे इलाहा! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और अद्ल के नश्र , ग़ुस्से के ज़ब्त और फ़ितने के फ़रो करने , मुतफ़र्रिक़ व परागान्दा लोगों को मिलाने , आपस में सुलह व सफ़ाई कराने , नेकी के ज़ाहिर करने , ऐब पर पर्दा डालने , नर्म जोई व फ़रवतनी और हुस्ने सीरत के इख़्तेयार करने , रख रखाव रखने हुस्ने एख़लाक़ से पेष आने , फ़ज़ीलत की तरफ़ पेषक़दमी करने , तफ़ज़्ज़ल व एहसान को तरजीह देने , ख़ोरदागीरी से किनारा करने और मुस्तहक़ के साथ हुस्ने सुलूक के तर्क करने और हक़ बात के कहने में अगरचे वह गराँ गुज़रे , और अपनी गुफ़्तार व किरदार की भलाई को कम समझने में अगरचे वह ज़्यादा हो और अपनी क़ौल और अमल की बुराई को ज़्यादा समझने में अगरचे वह कम हो। मुझे नेकोकारों के ज़ेवर और परहेज़गारों की सज व धज से आरास्ता कर और उन तमाम चीज़ों को दाएमी इताअत और जमाअत से वाबस्तगी और अहले बिदअत और ईजाद करदा राइयों पर अमल करने वालों से अलाहेदगी के ज़रिये पायाए तकमील तक पहुंचा दे। बारे इलाहा! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और जब मैं बूढ़ा हो तो अपनी वसीअ रोज़ी मेरे लिये क़रार दे और जब आजिज़ व दरमान्दा हो जाऊं तो अपनी क़वी ताक़त से मुझे सहारा दे और मुझे इस बात में मुब्तिला न कर के तेरी इबादत में सुस्ती व कोताही करूं तेरी राह की तषख़ीस में भटक जाऊं , तेरी मोहब्बत के तक़ाज़ों की खि़लाफ़वर्ज़ी करूं और जो तुझसे मुतफ़र्रिक़ व परागान्दा हों उनसे मेलजोल रखूं और जो तेरी जानिब बढ़ने वाले हैं उनसे अलाहीदा रहूं।

ख़ुदावन्द! मुझे ऐसा क़रार दे के ज़रूरत के वक़्त तेरे ज़रिये हमला करूं , हाजत के वक़्त तुझसे सवाल करूं और फ़क्ऱ व एहतियाज के मौक़े पर तेरे सामने गिड़गिड़ाऊं और इस तरह मुझे न आज़माना के इज़तेरार में तेरे ग़ैर से मदद मांगूं और फ़क्ऱ व नादारी के वक़्त तेरे ग़ैर के आगे आजिज़ाना दरख़्वास्त करूं और ख़ौफ़ के मौक़े पर तेरे सिवा किसी दूसरे के सामने गिड़गिड़ाऊं के तेरी तरफ़ से महरूमी , नाकामी और बे एतनाई का मुस्तहक़ क़रार पाऊं। ऐ तमाम रहम करने वालों में सबसे ज़्यादा रहम करने वाले।

ख़ुदाया! जो हिरस , बदगुमानी और हसद के जज़्बात षैतान मेरे दिल में पैदा करे उन्हें अपनी अज़मत की याद अपनी क़ुदरत में तफ़क्कुर और दुष्मन के मुक़ाबले में तदबीर व चारासाज़ी के तसव्वुरात से बदल दे और फ़हष कलामी या बेहूदा गोई , या दुषनाम तराज़ी या झूटी गवाही या ग़ाएब मोमिन की ग़ीबत या मौजूद से बदज़बानी और उस क़बील की जो बातें मेरी ज़बान पर लाना चाहे उन्हें अपनी हम्द सराई मदह में कोषिष व इन्हेमाक , तमजीद व बुज़ुर्गी के बयान , षुक्रे नेमत व एतराफ़े एहसान और अपनी नेमतों के षुमार से तबदील कर दे।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझ पर ज़ुल्म न होने पाए जबके तू उसके दफ़ा करने पर क़ादिर है , और किसी पर ज़ुल्म न करूं जबके तू मुझे ज़ुल्म से रोक देने की ताक़त रखता है और गुमराह न हो जाऊं जब के मेरी राहनुमाई तेरे लिये आसान है और मोहताज न हूँ जबके मेरी फ़ारिग़ुल बाली तेरी तरफ़ से है। और सरकष न हो जाऊँ जबके मेरी ख़ुषहाली तेरी जानिब से है।

बारे इलाहा! मैं तेरी मग़फ़ेरत की जानिब आया हूं और तेरी मुआफ़ी का तलबगार और तेरी बख़्षिष का मुष्ताक़ हूं। मैं सिर्फ़ तेरे फ़ज़्ल पर भरोसा रखता हूं और मेरे पास कोई चीज़ ऐसी नहीं है जो मेरे लिये मग़फ़ेरत का बाएस बन सके और न मेरे अमल में कुछ है के तेरे अफ़ो का सज़वार क़रार पाऊं और अब इसके बाद के मैं ख़ुद ही अपने खि़लाफ़ फ़ैसला कर चुका हूं तेरे फ़ज़्ल के सिवा मेरा सरमायाए उम्मीद क्या हो सकता है। लेहाज़ा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल कर और मुझ पर तफ़ज़्ज़ुल फ़रमा , ख़ुदाया मुझे हिदायत के साथ गोया कर , मेरे दिल में तक़वा व परहेज़गारी का अलक़ा फ़रमा , पाकीज़ा अमल की तौफ़ीक़ दे , पसन्दीदा काम में मषग़ूल रख। ख़ुदाया मुझे बेहतरीन रास्ते पर चला और ऐसा कर के तेरे दीन व आईन पर मरूं और उसी पर ज़िन्दा रहूं।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे (गुफ़तार व किरदार में) मयानारवी से बहरामन्द फ़रमा और दुरूस्तकारों और हिदायत के रहनुमाओं और नेक बन्दों में से क़रार दे और आख़ेरत की कामयाबी और जहन्नम से सलामती अता कर ख़ुदाया मेरे नफ़्स का एक हिस्सा अपनी (इबतेलाओ आज़माइष के) लिये मख़सूस कर दे ताके उसे (अज़ाब से) रेहाई दिला सके और एक हिस्सा के जिससे उसकी (दुनयवी) इस्लाह व दुरूस्ती वाबस्ता है , मेरे लिये रहने दे क्योंके मेरा नफ़्स तो हलाक होने वाला है मगर यह के तू उसे बचा ले जाए।

ऐ अल्लाह! अगर मैं ग़मगीन हूं तो मेरा साज़ व सामाने (तसकीन) तू है , और अगर (हर जगह से) महरूम रहूं तो मेरी उम्मीदगाह तू है , और अगर मुझ पर ग़मों का हुजूम हो तो तुझ ही से दादफ़रयाद है। जो चीज़ जा चुकी , उसका एवज़ और जो षै तबाह हो गई उसकी दुरूस्ती और जो तू नापसन्द करे उसकी तबदीली तेरे हाथ में है। लेहाज़ा बला के नाज़िल होने से पहले आफ़ियत , मांगने से पहले ख़ुषहाली और गुमराही से पहले हिदायत से मुझ पर एहसान फ़रमा और लोगों की सख़्त व दुरषत बातों के रंज से महफ़ूज़ रख और क़यामत के दिन अम्न व इतमीनान अता फ़रमा और हुस्ने हिदायत व इरषाद की तौफ़ीक़ मरहमत फ़रमा।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और अपने लुत्फ़ से (बुराइयों को) मुझसे दूर कर दे और अपनी नेमत से मेरी परवरिष और अपने करम से मेरी इस्लाह फ़रमा और अपने फ़ज़्ल व एहसान से (जिस्मानी व नफ़्सानी अमराज़ से) मेरा मदावा कर। मुझे अपनी रहमत के साये में जगह दे , और अपनी रज़ामन्दी में ढांप ले और जब उमूर मुष्तबा हो जाएं तो जो उनमें ज़्यादा क़रीने सवाब हो और जब आमाल में इष्तेबाह वाक़ेअ हो जाए तो जो उनमें पाकीज़ातर हो और जब जब मज़ाहिब में इख़्तेलाफ़ पड़ जाए तो जो उनमें पसन्दीदातर हो उस पर अमल पैरा होने की तौफ़ीक़ अता फ़रमा।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे बेनियाज़ी का ताज पहना और मुतअल्लुक़ा कामों और अहसन तरीक़ से अन्जाम देने पर मामूर फ़रमा और ऐसी हिदायत से सरफ़राज़ फ़रमा जो दवाम व साबित लिये हुए हो और ग़ना व ख़ुषहाली से मुझे बेराह न होने दे और आसूदगी व आसाइष अता फ़रमा , और ज़िन्दगी को सख़्त दुष्वार न बना दे। मेरी दुआ को रद्द न कर क्योंके मैं किसी को तेरा मद्दे मुक़ाबिल नहीं क़रार देता और न तेरे साथ किसी को तेरा हमसर समझते हुए पुकारता हूँ।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे फ़ुज़ूलख़र्ची से बाज़ रख और मेरी रोज़ी को तबाह होने से बचा और मेरे माल में बरकत देकर इसमें इज़ाफ़ा कर और मुझे इसमें से उमूरे ख़ैर में ख़र्च करने की वजह से राहे हक़ व सवाब तक पहुंचा।

बारे इलाहा! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे कस्बे माषियत के रंज व ग़म से बेनियाज़ कर दे और बेहिसाब रोज़ी अता फ़रमा ताके तलाषे मआष में उलझ कर तेरी इबादत से रूगर्दान न हो जाऊं और (ग़लत व नामषरूअ) कार व कस्ब का ख़मयाज़ा न भुगतूं।

ऐ अल्लाह! मैं जो कुछ तलब करता हूं उसे अपनी क़ुदरत से मुहय्या कर दे और जिस चीज़ से ख़ाएफ़ हूं उससे अपनी इज़्ज़त व जलाल के ज़रिये पनाह दे।

ख़ुदाया! मेरी आबरू को ग़ना व तवंगरी के साथ महफ़ूज़ रख और फ़क्ऱ व तंगदस्ती से मेरी मन्ज़ेलत को नज़रों से न गिरा के तुझसे रिज़्क़ पाने वालों से रिज़्क़ मांगने लगूं और तेरे पस्त बन्दों की निगाहे लुत्फ़ व करम को अपनी तरफ़ मोड़ने की तमन्ना करूं और जो मुझे दे उसकी मदह व सना और जो न दे उसकी बुराई करने में मुब्तिला हो जाऊं। और तू ही अता करने और रोक लेने का इख़्तेयार रखता है न के वह।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे ऐसी सेहत दे जो इबादत में काम आए और ऐसी फ़ुरसत जो दुनिया से बेताअल्लुक़ी में सर्फ़ हो और ऐसा इल्म जो अमल के साथ हो और ऐसी परहेज़गारी जो हद्दे एतदाल में हो (के वसवास में मुब्तिला न हो जाऊं)

ऐ अल्लाह! मेरी मुद्दते हयात को अपने अफ़ो व दरगुज़र के साथ ख़त्म कर और मेरी आरज़ू को रहमत की उम्मीद में कामयाब फ़रमा और अपनी ख़ुषनूदी तक पहुंचने के लिये राह आसान कर और हर हालत में मेरे अमल को बेहतर क़रार दे।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे ग़फ़लत के लम्हात में अपने ज़िक्र के लिये होषियार कर और मोहलत के दिनों में अपनी इताअत में मसरूफ़ रख और अपनी मोहब्बत की सहल व आसान राह मेरे लिये खोल दे और उसके ज़रिये मेरे लिये दुनिया व आख़ेरत की भलाई को कामिल कर दे।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी औलाद पर बेहतरीन रहमत नाज़िल फ़रमा। ऐसी रहमत जो उससे पहले तूने मख़लूक़ात में से किसी एक पर नाज़िल की हो और उसके बाद किसी पर नाज़िल नाज़िल करने वाला हो और हमें दुनिया में भी नेकी अता कर और आख़ेरत में भी और अपनी रहमत से हमें दोज़ख़ के अज़ाब से महफ़ूज़ रख।

इक्कीसवीं दुआ

जब किसी बात से ग़मगीन या गुनाहों की वजह से परेषान होते तो यह दुआ पढ़ते

ऐ अल्लाह! ऐ यक व तन्हा और कमज़ोर व नातवान की किफ़ायत करने वाले और ख़तरनाक मरहलों से बचा ले जाने वाले! गुनाहों ने मुझे बे यार व मददगार छोड़ दिया है। अब कोई साथी नहीं है और तेरे ग़ज़ब के बरदाष्त करने से आजिज़ हूँ अब कोई सहारा देने वाला नहीं है। तेरी तरफ़ बाज़गष्त का ख़तरा दरपेष है। अब इस दहषत से कोई तस्कीन देने वाला नहीं है। और जबके तूने मुझे ख़ौफ़ज़दा किया है तो कौन है जो मुझे तुझसे मुतमईन करे और जबके तूने मुझे तन्हा छोड़ दिया है तो कौन है जो मेरी दस्तगीरी करे , और जबके तूने मुझे नातवां कर दिया है तो कौन है जो मुझे क़ूवत दे। ऐ मेरे माबूद! परवरदा को कोई पनाह नहीं दे सकता सिवाए उसके परवरदिगार के और षिकस्त ख़ोरदा को कोई अमान नहीं दे सकता सिवाए उस पर ग़लबा पाने वाले के। और तलबकरदा की कोई मदद नहीं कर सकता सिवाए उसके तालिब के। यह तमाम वसाएल ऐ मेरे माबूद तेरे ही हाथ में हैं और तेरी ही तरफ़ राहे फ़रार व गुरेज़ है। लेहाज़ा तू मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मेरे गुरेज़ को अपने दामन में पनाह दे और मेरी हाजत बर ला। ऐ अल्लाह! अगर तूने अपना पाकीज़ा रूख़ मुझसे मोड़ लिया और अपने एहसाने अज़ीम से दरीग़ किया या अपने रिज़्क़ को बन्द कर दिया , या अपने रिष्तए रहमत को मुझसे क़ता कर लिया तो मैं अपनी आरज़ूओं तक पहुंचने का वसीला तेरे सिवा कोई पा नहीं सकता और तेरे हाँ की चीज़ों पर तेरी मदद के सिवा दस्तेरस हासिल नहीं कर सकता। क्योंके मैं तेरा बन्दा और तेरे क़ब्ज़ए क़ुदरत में हूँ और तेरे ही हाथ में मेरी बागडोर है। तेरे हुक्म के आगे मेरा हुक्म नहीं चल सकता , मेरे मेरे बारे में तेरा फ़रमान जारी और मेरे हक़ में तेरा फ़ैसला अद्ल व इन्साफ पर मबनी है। तेरे क़लम व सलतनत से निकल जाने का मुझे यारा नहीं और तेरे अहाताए क़ुदरत से क़दम बाहर रखने की ताक़त नहीं और न तेरी मोहब्बत को हासिल कर सकता हूं। न तेरी रज़ामन्दी तक पहुंच सकता हूं और न तेरे हां की नेमतें पा सकता हूँ मगर तेरी इताअत और तेरी रहमते ज़ाववाल के वसीले से। ऐ अल्लाह! मैं हर हाल में तेरा ज़लील बन्दा हूं , तेरी मदद के बग़ैर मैं अपने सूद व ज़ेयाँ का मालिक नहीं। मैं इस अज्ज़ व बेबज़ाअती की अपने बारे में गवाही देता हूँ और अपनी कमज़ोरी व बेचारगी का एतराफ़ करता हूँ। लेहाज़ा जो वादा तूने मुझसे किया है उसे पूरा कर और जो दिया है उसे तकमील तक पहुंचा दे इसलिये के मैं तेरा वह बन्दा हूं जो बेनवा , आजिज़ , कमज़ोर , बे सरोसामान , हक़ीर , ज़लील , नादार , ख़ौफ़ज़दा और पनाह का ख़्वास्तगार है।

ऐ अल्लाह! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और मुझे उन अतियों में जो तूने बख़्षे हैं फ़रामोष कार और उन नेमतों में जो तूने अता की हैं एहसान नाषिनास न बना दे और मुझे दुआ की क़ुबूलियत से ना उम्मीद न कर अगरचे उसमें ताख़ीर हो जाए। आसाइष में हूं या तकलीफ़ में तंगी में हूं या फ़ारिग़ुलबाली में तन्दरूस्ती की हालत में हूँ या बीमारी की। बदहाली में हूँ या ख़ुषहाली में , तवंगरी में हूं या उसरत में। फ़क्ऱ में हूं या दौलतमन्दी में।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे हर हालत में मदह व सताइष व सपास में मसरूफ़ रख यहां तक के दुनिया में से जो कुछ तू दे उस पर ख़ुष न होने लगूँ और जो रोक ले उस पर रन्जीदा न हों। और परहेज़गारी को मेरे दिल का षुआर बना और मेरे जिस्म से वही काम ले जिसे तू क़ुबूल फ़रमा और अपनी इताअत में इन्हेमाक के ज़रिये तमाम दुनियवी इलाएक़ से फ़ारिग़ कर दे ताके उस चीज़ को जो तेरी नाराज़ी का सबब है दोस्त न रखूं और जो चीज़ तेरी ख़ुषनूदी का बाएस है उसे नापसन्द न करूं।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और ज़िन्दगी भर मेरे दिल को अपनी मोहब्बत के लिये फ़ारिग़ कर दे। अपनी याद में उसे मषग़ूल रख। अपने ख़ौफ़ व हेरास के ज़रिये (गुनाहों की) तलाफ़ी का मौक़ा दे , अपपनी तरफ़ रूजू होने से उसको क़ूवत व तवानाई बख़्ष। अपनी इताअत की तरफ़ से माएल और अपने पसन्दीदातरीन रास्ते पर चला और अपनी नेमतों की तलब पर उसे तैयार कर आौर परहेज़गारी को मेरा तोषह , अपनी रहमत की जानिब मेरा सफ़र अपनी ख़ुषनूदी में मेरा गुज़र और अपनी जन्नत में मेरी मन्ज़िल क़रार दे और मुझे ऐसी क़ूवत अता फ़रमा जिससे तेरी रज़ामन्दियों का बोझ उठाऊं और मेरे गुरेज़ को अपनी जानिब और मेरी ख़्वाहिष को अपने हाँ की नेमतों की तरफ़ क़रार दे और बुरे लोगों से मेरे दिल को मतोहिष और अपने और अपने दोस्तों और फ़रमाबरदारों से मानूस कर दे और किसी बदकार और काफ़िर का मुझ पर एहसान न हो। न इसकी निगाहे करम मुझ पर हो और न उसकी मुझे कोई एहतियाज हो बल्कि मेरे दिली सुकून , क़ल्बी लगाव और मेरी बे नियाज़ी व कारगुज़ारी को अपने और अपने बरगुज़ीदा बन्दों से वाबस्ता कर।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0)पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे उनका हमनषीन व मददगार क़रार दे और अपने षौक़ व वारफ़्तगी और उन आमाल के ज़रिये जिन्हें तू पसन्द करता और जिनसे ख़ुष होता है। मुझ पर एहसान फ़रमा इसलिये के तू हर चीज़ पर क़ादिर है और यह काम तेरे लिये आसान है।


बाईसवीं दुआ

शदाएद (शिद्दत) व मुशकीलात के मौक़े पर यह दुआ पढ़ते थे

ऐ मेरे माबूद! तूने (इस्लाह व तहज़ीबे नफ़्स के बारे में) जो तकलीफ़ मुझ पर आयद की है उस पर तू मुझसे ज़्यादा क़ुदरत रखता है और तेरी क़ूवत व तवनाई उस अम्र पर और ख़ुद मुझ पर मेरी क़ूवत व ताक़त से फ़ज़ोंतर है लेहाज़ा मुझे उन आमाल की तौफ़ीक़ दे जो तेरी ख़ुषनूदी का बाएस हों। और सेहत व सलामती की हालत में अपनी रज़ामन्दी के तक़ाज़े मुझसे पूरे कर ले।

बारे इलाहा! मुझमें मषक़्क़त के मुक़ाबले में हिम्मत , मुसीबत के मुक़ाबले में सब्र और फ़क्ऱ व एहतियाज के मुक़ाबले में क़ूवत नहीं है। लेहाज़ा मेरी रोज़ी को रोक न ले अैर मुझे अपनी मख़लूक़ के हवाले न कर। बल्कि बिला वास्तामेरी हाजत बर ला और ख़ुद ही मेरा कारसाज़ बन और मुझ पर नज़रे षफ़क़्क़त फ़रमा और तमाम कामों के सिलसिले में मुझ पर नज़रे करम रख। इसलिये के अगर तूने मुझे मेरे हाल पर छोड़ दिया तो मैं अपने उमूर की अन्जामदेही से आजिज़ रहूंगा। और जिन कामों में मेरी बहबूदी है उन्हें अन्जाम न दे सकूंगा। और अगर तूने मुझे लोगों के हवाले कर दिया तो वह त्येवरियों पर बल डालकर मुझे देखेंगे। और अगर अज़ीज़ों की तरफ़ धकेल दिय तो वह मुझे नाउम्मीद रखेंगे। और अगर कुछ देंगे तो क़लील व नाख़ुषगवार , और उसके मुक़ाबले में एहसान ज़्यादा रखेंगे। और बुराई भी हद से बढ़ कर करेंगे। लेहाज़ा ऐ मेरे माबूद। तू अपने फ़ज़्ल व करम के ज़रिये मुझे बेनियाज़ कर और अपनी बुज़ुर्गी व अज़मत के वसीले से मेरी एहतियाज को बरतरफ़ फ़रमा और अपनी तवंगरी व वुसअत से मेरा हाथ कुषादा कर दे और अपने हाँ की नेमतों के ज़रिये मुझे (दूसरों से) बेनियाज़ बना दे।

ऐ अल्लाह! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर मुझे हसद से निजात दे और गुनाहों के इरतेकाब से रोक दे और हराम कामों से बचने की तौफ़ीक़ दे और गुनाहों पर जुरअत पैदा न होने दे और मेरी ख़्वाहिष व रग़बत अपने से वाबस्ता रख और मेरी रज़ामन्दी उन्हीं चीज़ों में क़रार दे जो तेरी तरफ़ से मुझ पर वारिद हों , और रिज़्क़ व बख़्षिष व इनआम में मेरे लिये अफ़ज़ाइष फ़रमा और मुझे हर हाल में अपने हिफ़्ज़ व निगेहदाष्त , हिजाब व निगरानी और पनाह व अमान में रख ,

ऐ अल्लाह! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और मुझे हर क़िस्म की इताअत के बजा लाने की तौफ़ीक़ अता फ़रमा जो तूने अपने लिये या मख़लूक़ात में से किसी के लिये मुझ पर लाज़िम व वाजिब की हो। अगरचे उसे अन्जाम देने की सकत मेरे जिस्म में न हो , और मेरी क़ूवत उसके मुक़ाबले में कमज़ोर साबित हो और मेरी मुक़दरत से बाहर हो और मेरा माल व असास उसकी गुन्जाइष न रखता हो। वह मुझे याद हो या भूल गया हूँ। वह तो ऐ मेरे परवरदिगार! उन चीज़ों में से है जिन्हें तूने मेरे ज़िम्मे षुमार किया है और मैं अपनी सहल अंगारी की वजह से उसे बजा न लाया। लेहाज़ा अपनी वसीअ बख़्षिष और कसीर रहमत के पेषे नज़र इस (कमी) को पूरा कर दे। इसलिये के तू तवंगर व करीम है। ताके ऐ मेरे परवरदिगार! जिस दिन मैं तेरी मुलाक़ात करूं उसमें से कोई ऐसी बात मेरे ज़िम्मे बाक़ी न रहे के तू उसके मुक़ाबले में यह चाहे के मेरी नेकियों में कमी या मेरी बदियों में इज़ाफ़ा कर दे।

ऐ अल्लाह! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और आख़ेरत के पेषे नज़र सिर्फ़ अपने लिये अमल की रग़बत अता कर यहां तक के मैं अपने दिल में उसकी सेहत का एहसास कर लूं और दुनिया में ज़ोहद व बे रग़बती का जज़्बा मुझ पर ग़ालिब आ जाए और नेक काम षौक़ से करूं और ख़ौफ़ व हेरास की वजह से बुरे कामों से महफ़ूज़ रहूं। और मुझे ऐसा नूर (इल्म व दानिष) अता कर जिसके परतो में लोगों के दरमियान (बेखटके) चलूं फिरूं और उसके ज़रिये तारीकियों में हिदायत पाऊं और षुकूक व षुबहात के धुन्धलकों में रोषनी हासिल करूं।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और अन्दोह अज़ाब का ख़ौफ़ और सवाबे आख़ेरत का षौक़ मेरे अन्दर पैदा कर दे ताके जिस चीज़ का तुझसे तालिब हूँ उसकी लज़्ज़त और जिससे पनाह मांगता हूं उसकी तल्ख़ी महसूस कर सकूँ। बारे इलाहा! जिन चीज़ों से मेरे दीनी और दुनियवी उमूर की बहबूदी वाबस्ता है तू उन्हें ख़ूब जानता है। लेहाज़ा मेरी हाजतों की तरफ़ ख़ास तवज्जो फ़रमा।

ऐ अल्लाह! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और ख़ुषहाली व तंगदस्ती और सेहत व बीमारी में जो नेमतें तूने बख़्षी हैं उन पर अदाए षुक्र में कोताही के वक़्त मुझे एतराफ़े हक़ की तौफ़ीक़ अता कर ताके मैं ख़ौफ़ व अमन , रिज़ा व ग़ज़ब और नफ़ा व नुक़सान के मौक़े पर तेरे हुक़ूक़ व वज़ाएफ़ के अन्जाम देने में मसर्रत क़ल्बी व इत्मीनाने नफ़्स महसूस करूं।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मेरे सीने को हसद से पाक कर दे ताके मैं मख़लूक़ात में से किसी एक पर इस चीज़ की वजह से जो तूने अपने फ़ज़्ल व करम से अता की है , हसद न करूं यहां तक के मैं तेरी नेमतें में से कोई नेमत , वह दीन से मुताल्लिक़ हो या दुनिया से , आफ़ियत से मुताल्लिक़ हो या तक़वा से , वुसअते रिज़्क़ से मुताल्लिक़ हे या आसाइष से। मख़लूक़ात में से किसी एक के पास न देखूं मगर यह के तेरे वसीले से। और तुझसे , और तुझसे ऐ ख़ुदाए यगाना व लाषरीक इससे बेहतर की अपने लिये आरज़ू करूं।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और दुनिया व आख़ेरत के उमूर में ख़्वाह ख़ुषनूदी की हालत हो या ग़ज़ब की , मुझे ख़ताओं से तहफ़्फ़ुज़ और लग़्िज़षों से इजतेनाब की तौफ़ीक़ अता फ़रमा यहां तक के ग़ज़ब व रिज़ा की जो हालत पेष आए मेरी हालत यकसां रहे और तेरी इताअत पर अमल पैरा रहूं। और दोस्त व दुष्मनी के बारे में तेरी रेज़ा और इताअत को दूसरी चीज़ों पर मुक़द्दम करूं यहां तक के दुष्मन को मेरे ज़ुल्म व जोर का कोई अन्देषा न रहे और मेरे दोस्त को भी जन्बादरी और दोस्ती की रू में बह जाने से मायूसी हो जाए और मुझे उन लोगों में क़रार दे जो राहत व आसाइष के ज़माने में पूरे इख़लास के साथ उन मुख़लेसीन की तरह दुआ मांगते हैं जो इज़तेरार व बेचारगी के आलम में -

तेईसवीं दुआ

जब तलबे आफ़ियत करते और उस पर शुक्र अदा करते तो यह दुआ पढ़ते।

ऐ अल्लाह! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और मुझे अपनी आफ़ियत का लिबास पहना , अपनी आफ़ियत की रिदा ओढ़ा , अपनी आफ़ियत के ज़रिये महफ़ूज़ा रख , अपनी आफ़ियत के ज़रिये इज़्ज़त व वेक़ार दे , अपनी आफ़ियत के ज़रिये बेनियाज़ कर दे। अपनी आफ़ियत की भीक मेरी झोली में डाल दे , अपनी आफ़ियत मुझे मरहमत फ़रमा। अपनी आफ़ियत को मेरा ओढ़ना बिछोना क़रार दे। अपनी आफ़ियत की मेरे लिये इस्लाह व दुरूस्ती फ़रमा और दुनिया व आख़ेरत में मेरे और अपनी आफ़ियत के दरम्यान जुदाई न डाल।

ऐ मेरे माबूद! रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और मुझे ऐसी आफ़ियत दे जो बेनियाज़ करने वाली , शिफ़ा बख़्शने वाली (इमराज़ के दस्तरस से) बाला और रोज़े अफ़ज़ों हो। ऐसी आफ़ियत जो मेरे जिस्म में दुनिया व आख़ेरत की आफ़ियत को जनम दे। और सेहत , अमन , जिस्म व ईमान की सलामती , क़ल्बी बसीरत , निफ़ाज़े उमूर की सलाहियत , हम व ख़ौफ़ का जज़्बा और जिस इताअत का हुक्म दिया है उसके बजा लाने की क़ूवत और जिन गुनाहों से मना किया है उनसे इजतेनाब की तौफ़ीक़ बख़्श कर मुझ पर एहसान फ़रमा।

बारे इलाहा! मुझ पर यह एहसान भी फ़रमा के जब तक तू मुझे ज़िन्दा रखे हमेषा इस साल भी और हर साल हज व उमरा और क़ब्रे रसूल सल्लल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम और क़ुबूरे आले रसूल (स 0) समामुल्लाहे अलैहिम की ज़ियारत करता रहूँ और उन इबादतों को मक़बूल व पसन्दीदा क़ाबिले इलतेफ़ात और अपने हाँ ज़ख़ीरा क़रार दे , और हम्द व शुक्र व ज़िक्र और सनाए जीमल के नग़मों से मेरी ज़बान को गोया रख और दीनी हिदायतों के लिये मेरे दिल की गिरहें खोल दे और मुझे और मेरी औलाद को षैतान मरदूद और ज़हरीले जानवरों , हलाक करने वाले हैवानों और दूसरे जानवरों के गज़न्द और चश्मेब द से पनाह दे और हर सरकश शैतान , हर ज़ालिम हुकमरान , हर जमा जत्थे वाले मग़रूर , हर कमज़ोर और ताक़तवर , हर आला व अदना , हर छोटे बड़े और हर नज़दीक और दूर वाले और जिन्न व इन्स में से तेरे पैग़म्बर और उनके अहलेबैत से बरसरे पैकार होने वाले और हर हैवान के शर से जिन पर तुझे तसल्लत हासिल है , महफ़ूज़ रख। इसलिये के तू हक़ व अद्ल की राह पर है।

ऐ अल्लाह मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और जो मुझसे बुराई करना चाहे उसे मुझसे रूगर्दा कर दे , उसका मक्र मुझसे दूर , उसका असर मुझसे दफ़ा कर दे और उसके मक्र व फ़रेब (के तीर) उसी के सीने की तरफ़ पलटा दे और उसके सामने एक दीवार खड़ी कर दे यहाँ तक के उसकी आंखों को मुझे देखने से नाबीना और उसके कानों को मेरा ज़िक्र सुनने से बहरा कर दे और उसके दिल पर क़फ़्ल चढ़ा दे ताके मेरा उसे ख़याल न आए। और मेरे बारे में कुछ कहने सुनने से उसकी ज़बान को गंग कर दे , उसका सर कुचल दे , उसकी इज़्ज़त पामाल कर दे , उसकी तमकनत को तोड़ दे। उसकी गर्दन में ज़िल्लत का तौक़ डाल दे उसका तकब्बुर ख़त्म कर दे और मुझे उसकी ज़रर रसानी , शर पसन्दी , तानाज़नी , ग़ीबत , ऐबजोई , हसद , दुश्मनी और उसके फन्दों , हथकण्डों ,प्यादों और सवारों से अपने हिफ़्ज़ व अमान में रख। यक़ीनन तू ग़लबा व इक़तेदार का मालिक है।


चौबीसवीं दुआ

अपने वालेदैन (अलैहिस्सलाम) के हक़ में हज़रत (अ 0) की दुआ

ऐ अल्लाह! अपने अब्दे ख़ास और रसूल मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम और उनके पाक व पाकीज़ा अहलेबैत (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और उन्हें बेहतरीन रहमत व बरकत और दुरूद व सलाम के साथ ख़ुसूसी इम्तियाज़ बख़्श , और ऐ माबूद! मेरे मँा बाप को भी अपने नज़दीक इज़्ज़त व करामत और अपनी रहमत से मख़सूस फ़रमा। ऐ सब रहम करने वालों से ज़्यादा रहम करने वाले।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा। उनके जो हुक़ूक़ मुझ पर वाजिब हैं उनका इल्म बज़रिये इलहाम अता कर और उन तमाम वाजेबात का इल्म बे कम व कास्त मेरे लिये मुहयया फ़रमा दे। फिर जो मुझे बज़रिये इलहाम बताए उस पर कारबन्द रख और इस सिलसिले में जो बसीरत इल्मी अता करे उस पर अमल पैरा होने की तौफ़ीक़ दे ताके उन बातों में से जो तूने मुझे तालीम की हैं कोई बात अमल में आए बग़ैर न रह जाए और उस खि़दमतगुज़ारी से जो तूने मुझे बतलाई है , मेरे हाथ पैर थकन महसूस न करें।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा क्योंके तूने उनकी तरफ़ इन्तेसाब से हमें शरफ़ बख़्शा है। मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा क्योंके तूने उनकी वजह से हमारा हक़ मख़लूक़ात पर क़ायम किया है।

ऐ अल्लाह! मुझे ऐसा बना दे के मैं इन दोनों से इस तरह डरूं जिस तरह किसी जाबिर बादषाह से डरा जाता है और इस तरह उनके हाल पर शफ़ीक़ व मेहरबान रहूँ जिस तरह शफ़ीक़ मां (अपनी औलाद पर) शफ़क़्क़त करती है और उनकी फ़रमाबरदारी और उनसे हुस्ने सुलूक के साथ पेश आने को मेरी आंखों के लिये इससे ज़्यादा कैफ़ अफ़ज़ा क़रार दे जितना चश्मे ख़्वाब आलूद में नीन्द का ख़ुमार और मेरे क़ल्ब व रूह के लिये इससे बढ़ कर मसर्रत अंगेज़ क़रार दे जितना प्यासे के लिये जरअए आब। ताके मैं अपनी ख़्वाहिश पर उनकी ख़्वाहिश को तरजीह दूँ और अपनी ख़ुशी पर उनकी ख़ुशी को मुक़द्दम रखूँ और उनके थोड़े एहसान को भी जो मुझ पर करें , ज़्यादा समझूं। और मैं जो नेकी उनके साथ करूं वह ज़्यादा भी हो तो उसे कम तसव्वुर करूं।

ऐ अल्लाह! मेरी आवाज़ को उनके सामने आहिस्ता मेरे कलाम को उनके लिये ख़ुशगवार , मेरी तबीयत को नरम और मेरे दिल को मेहरबान बना दे और मुझे उनके साथ नर्मी व शफ़क़्क़त से पेश आने वाला क़रार दे। ऐ अल्लाह! उन्हें मेरी परवरिश की जज़ाए ख़ैर दे और मेरे हुस्ने निगेहदाश्त पर अज्र व सवाब अता कर और कमसिनी में मेरी ख़बरगीरी का उन्हें सिला दे। ऐ अल्लाह! उन्हें मेरी तरफ़ से कोई तकलीफ़ पहुंची हो या मेरी जानिब से कोई नागवार सूरत पेश आई हो या उनकी हक़तलफ़ी हुई हो तो उसे उनके गुनाहों का कफ़्फ़ारा , दरजात की बलन्दी और नेकियों में इज़ाफ़े का सबब क़रार दे।

ऐ बुराइयों को कई गुना नेकियों से बदल देने वाले , बारे इलाहा! अगर उन्होंने मेरे साथ गुफ़्तगू में सख़्ती या किसी काम में ज़्यादती या मेरे किसी हक़ में फ़रोगुज़ाश्त या अपने फ़र्ज़े मन्सबी में कोताही की हो तो मैं उनको बख़्शता हूं और उसे नेकी व एहसान का वसीला क़रार देता हूं , और पालने वाले! तुझसे ख़्वाहिश करता हूँ के इसका मोआख़ेज़ा उनसे न करना। इसमें अपनी निस्बत उनसे कोई बदगुमानी नहीं रखता और न तरबीयत के सिलसिले में उन्हें सहल अंगार समझता हूँ और न उनकी देखभाल को नापसन्द करता हूँ इसलिये के उनके हुक़ूक़ मुझपर लाज़िम व वाजिब , उनके एहसानात देरीना और उनके इनआमात अज़ीम हैं। वह इससे बालातर हैं के मैं उनको बराबर का बदला या वैसा ही एवज़ दे सकूँ। अगर ऐसा कर सकूं तो ऐ मेरे माबूद! वह उनका हमहवक़्त मेरी तरबीयत में मशग़ूल रहना , मेरी ख़बरगीरी में रन्ज व ताब उठाना और ख़ुद असरत व तंगी में रहकर मेरी आसूदगी का सामान करना कहाँ जाएगा भला कहां हो सकता है के वह अपने हुक़ूक़ का सिला मुझसे पा सकें और न मैं ख़ुद ही उनके हुक़ूक़ से सुबुकदोश हो सकता हूँ और न उनकी खि़दमत का फ़रीज़ा अन्जाम दे सकता हूँ। रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और मेरी मदद फ़रमा ऐ बेहतर उनसे जिनसे मदद मांगी जाती है और मुझे तौफ़ीक़ दे ऐ ज़्यादा रहनुमाई करने वाले उन सबसे जिनकी तरफ़ (हिदायत के लिये) तवज्जो की जाती है। और मुझे उस दिन जबके हर शख़्स को उसके आमाल का बदला दिया जाएगा और किसी पर ज़्यादती न होगी उन लोगों में से क़रार न देना जो माँ-बाप के आक़ व नाफ़रमाबरदार हों।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) व औलाद (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मेरे माँ-बाप को उससे बढ़कर इम्तियाज़ दे जो मोमिन बन्दों के माँ-बाप को तूने बख़्शा है। ऐ सब रहम करने वालों से ज़्यादा रहम करने वाले। ऐ अल्लाह! उनकी याद को नमाज़ों के बाद रात की साअतों और दिन के तमाम लम्हों में किसी वक़्त फ़रामोश न होने दे।

ऐ अल्लाह। मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे उनके हक़ में दुआ करने की वजह से और उन्हें मेरे साथ नेकी करने की वजह से लाज़मी तौर पर बख़्श दे और मेरी सिफ़ारिश की वजह से उनसे क़तई तौर पर राज़ी व ख़ुशनूद हो और उन्हें इज़्ज़त व आबरू के साथ सलामती की मन्ज़िलों तक पहुंचा दे।

ऐ अल्लाह! अगर तूने उन्हें मुझसे पहले बख़्श दिया तो उन्हें मेरा शफ़ीअ बना। और अगर मुझे पहले बख़्श दिया तो मुझे उनका शफ़ीअ क़रार दे ताके हमस ब तेरे लुत्फ़ व करम की बदौलत तेरे बुज़ुर्गी के घर और बख़्शिश व रहमत की मन्ज़िल में एक साथ जमा हो सकें। यक़ीनन तू बड़े फ़ज़्ल वाला क़दीम एहसान वाला और सब रहम करने वालों से ज़्यादा रहम करने वाला है।

(आप इस किताब को अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क पर पढ़ रहे है।)

पच्चीसवीं दुआ

औलाद के हक़ में हज़रत (अ 0) की दुआ

ऐ मेरे माबूद! मेरी औलाद की बक़ा और उनकी इस्लाह और उनसे मेहरामन्दी के सामान मुहय्या करके मुझे ममनूने एहसान फ़रमा और मेरे सहारे के लिये उनकी उम्रों में बरकत और उनकी ज़िन्दगियों में तूल दे और उनमें से छोटों की परवरिश फ़रमा और कमज़ोरों को तवानाई दे और उनकी जिस्मानी , ईमानी और एख़लाक़ी हालत को दुरूस्त फ़रमा और उनके जिस्म व जान और उनके दूसरे मुआमलात में जिनमें मुझे एहतेमाम करना पड़े उन्हें आफ़ियत से हमकिनार रख , और मेरे लिये और मेरे ज़रिये उनके लिये रिज़्क़े फ़रावाँ जारी कर और उन्हें नेकोकार उन्हें नेकोकार , परहेज़गार , रौशन दिल , हक़ शिनास और अपना फ़रमाबरदार और अपने दोस्तों का दोस्त व ख़ैरख़्वाह और अपने तमाम दुश्मनों का दुश्मन व बदख़्वाह क़रार दे- आमीन।

ऐ अल्लाह! उनके ज़रिये मेरे बाज़ुओं को क़वी और मेरी परेशांहाली की इस्लाह और उनकी वजह से मेरी जमीअत में इज़ाफ़ा और मेरी मजलिस की रौनक़ दोबाला फ़रमा और उनकी बदौलत मेरा नाम ज़िन्दा रख और मेरी अदम मौजूदगी में उन्हें मेरा क़ायम मुक़ाम क़रार दे और उनके वसीले से मेरी हाजतों में मेरी मदद फ़रमा और उन्हें मेरे लिये दोस्त , मेहरबान , हमहतन , मुतवज्जेह , साबित क़दम और फ़रमाबरदार क़रार दे। वह नाफ़रमान , सरकश , मुख़ालेफ़त व ख़ताकार न हों और उनकी तरबीयत व तादीब और उनसे अच्छे बरताव में मेरी मदद फ़रमा और उनके अलावा भी मुझे अपने ख़ज़ानए रहमत से नरीनए औलाद अता कर और उन्हें मेरे लिये सरापा ख़ैर व बरकत क़रार दे और उन्हें उन चीज़ों में जिनका मैं तलबगार हूँ। मेरा मददगार बना और मुझे और मेरी ज़ुर्रियत को शैतान मरदूद से पनाह दे। इसलिये के तूने हमें पैदा किया और अम्र व नहीं की और जो हुक्म दिया उसके सवाब की तरफ़ राग़िब किया और जिससे मना किया उसके अज़ाब से डराया और हमारा एक दुश्मन बनाया जो हमसे मक्र करता है और जितना हमारी चीज़ों पर उसे तसल्लत देता है उतना हमें उसकी किसी चीज़ पर तसल्लत नहीं दिया। इस तरह के उसे हमारे सीनों में ठहरा दिया और हमारे रग व पै में दौड़ा दिया। हम ग़ाफ़िल हो जाएं मग रवह ग़ाफ़िल नहीं होता , हम भूल जाएं मगर वह नहीं भूलता , वह हमें तेरे अज़ाब से मुतमईन करता और तेरे अलावा दूसरों से डराता है। अगर हम किसी बुराई का इरादा करते हैं तो वह हमारी हिम्मत बन्धाता है और अगर किसी अमले ख़ैर का इरादा करते हैं तो हमें उससे बाज़ रखता है और गुनाहों की दावत देता और हमारे सामने शुबहे खड़े कर देता है अगर वादा करता है तो झूटा और उम्मीद दिलाता है तो खि़लाफ़वर्ज़ी करता है अगर तू उसके मक्र को न हटाए तो वह हमें गुमराह करके छोड़ेगा और उसके फ़ित्नों से न बचाए तो वह हमें डगमगा देगा।

ख़ुदाया! उस लईन के तसल्लुत को अपनी क़ूवत व तवानाई के ज़रिये हमसे दफ़ा कर दे और कसरते दुआ के वसीले से उसे हमारी राह ही से हटा दे ताके हम उसकी मक्कारियों से महफ़ूज़ हो जाएं।

ऐ अल्लाह! मेरी हर दरख़्वास्त को क़ुबूल फ़रमा और मेरी हाजतें बर ला जबके तूने इस्तेजाबते दुआ का ज़िम्मा लिया है तू मेरी दुआ को रद न कर और जबके तूने मुझे दुआ का हुक्म दिया है तो मेरी दुआ को अपनी बारगाह से रोक न दे। और जिन चीज़ों से मेरा दीनी व दुनियवी मफ़ाद वाबस्ता है उनकी तकमील से मुझ पर एहसान फ़रमा। जो याद हों और जो भूल गया हूँ ज़ाहिर की हों या पोशीदा रहने दी हों , एलानिया तलब की हों या दरपरदा इनत माम सूरतों में इस वजह से के तुझसे सवाल किया है (नीयत व अमल की) इस्लाह करने वालों और इस बिना पर के तुझसे तलब किया है कामयाब होने वालों और इस सबब से के तुझ पर भरोसा किया है ग़ैर मुस्तर्द होने वालों में से क़रार दे और (उन लोगों में शुमार कर) जो तेरे दामन में पनाह लेने के ख़ूगर , तुझसे ब्योपार में फ़ायदा उठाने वाले और तेरे दामने इज़्ज़त में पनाह गुज़ीं हैं। जिन्हें तेरे हमहगीर फ़ज़ल और जूद व करम से रिज़्क़े हलाल में फ़रावानी हासिल हुई है और तेरी वजह से ज़िल्लत से इज़्ज़त तक पहुंचे हैं और तेरे अद्ल व इन्साफ़ के दामन में ज़ुल्म से पनाह ली है और रहमत के ज़रिये बला व मुसीबत से महफ़ूज़ हैं और तेरी बेनियाज़ी की वजह से फ़क़ीर से ग़नी हो चुके हैं और तेरे तक़वा की वजह से गुनाहों , लग़्िज़शों और ख़ताओं से मासूम हैं और तेरी इताअत की वजह से ख़ैर व रश्द व सवाब की तौफ़ीक़ उन्हें हासिल है और तेरी क़ुदरत से उनके और गुनाहों के दरम्यान पर्दा हाएल है और जो तमाम गुनाहों से दस्त बरदार और तेरे जवारे रहमत में मुक़ीम हैं। बारे इलाहा! अपनी तौफ़ीक़ व रहमत से यह तमाम चीज़ें हमें अता फ़रमा और दोज़ख़ के आज़ार से पनाह दे और जिन चीज़ों का मैंने अपने लिये और अपनी औलाद के लिये सवाल किया है ऐसी ही चीज़ें तमाम मुसलेमीन व मुसलेमात और मोमेनीन और मोमेनात को दुनिया व आख़ेरत में मरहमत फ़रमा। इसलिये के तू नज़दीक और दुआ का क़ुबूल करने वाला है , सुनने वाला और जानने वाला है , माफ़ करने वाला और बख़्शने वाला और शफ़ीक़ व मेहरबान है। और हमें दुनिया में नेकी (तौफ़ीक़े इबादत) और आख़ेरत में नेकी (बेहिश्ते जावेद) अता कर , और दोज़ख़ के अज़ाब से बचाए रख।

छब्बीसवीं दुआ

जब हमसायों और दोस्तों को याद करते तो उनके लिये यह दुआ फ़रमाते

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मेरी इस सिलसिले में बेहतर नुसरत फ़रमा के मैं अपने हमसायों और उन दोस्तों के हुक़ूक़ का लेहाज़ रखूं जो हमारे हक़ के पहचानने वाले और हमारे दुष्मनों के मुख़ालिफ़ हैं और उन्हें अपने तरीक़ों के क़ाएम करने और उमदा इख़लाक़ व आदाब से आरास्ता होने की तौफ़ीक़ दे इस तरह के वह कमज़ोरों के साथ नरम रवैया रखें और उनके फ़क्ऱ का मदावा करें , मरीज़ों की बीमार पुर्सी , तालिबाने हिदायत की हिदायत , मषविरा करने वालों की ख़ैर ख़्वाही और ताज़ा वारिद से मुलाक़ात करें। राज़ों को छिपाएं , ऐबों पर पर्दा डालें , मज़लूम की नुसरत और घरेलू ज़रूरियात के ज़रिये हुस्ने मवासात करें और बख़्शिश व इनआम से फ़ायदा पहुंचाएं और सवाल से पहले उनके ज़ुरूरियात मुहैया करें।

ऐ अल्लाह! मुझे ऐसा बना के मैं उनमें से बुरे के साथ भलाई से पेष आऊं और ज़ालिम से चष्मपोषी करके दरगुज़र करूं और इन सबके बारे में हुस्ने ज़न से काम लूँ और नेकी व एहसान के साथ सबकी ख़बरगीरी करूं और परहेज़गारी व इफ़्फत की बिना पर उन (के उयूब) से आंखें बन्द रखूं। तवाज़ोह व फ़रवतनी की रू से उनसे नरम रवय्या इख़्तेयार करूं और षफ़क़्क़त की बिना पर मुसीबतज़दा की दिलजोई करूं। उनकी ग़ैबत में भी उनकी मोहब्बत को दिल में लिये रहूं और ख़ुलूस की बिना पर उनके पास सदा नेमतों का रहना पसन्द करूं और जो चीज़ें अपने ख़ास क़रीबियों के लिये ज़रूरी समझूं उनके लिये भी ज़रूरी समझूं , और जो मुराहात अपने मख़सूसीन से करूं वोही मुराहात उनसे भी करूं।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे भी उनसे वैसे ही सुलूक का रवादार क़रार दे और जो चीज़ें उनके पास हैं उनमें मेरा हिस्सा वाफ़िर क़रार दे। और उन्हें मेरे हक़ की बसीरत और मेरे फ़ज़्ल व बरतरी की मारेफ़त में अफ़ज़ाइष व तरक़्क़ी दे ताके वह मेरी वजह से सआदतमन्द और मैं उनकी वजह से मसाब व माजूर क़रार पाऊं। आमीन ऐ तमाम जहान के परवरदिगार।

सत्ताईसवीं दुआ

सरहदों की निगेहबानी करने वालों के लिये हज़रत (अ 0) की दुआ

बारे इलाहा! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और अपने ग़लबे व इक़तेदार से मुसलमानों की सरहदों को महफ़ूज़ रख , और अपनी क़ूवत व तवानाई से उनकी हिफ़ाज़त करने वालों को तक़वीयत दे और अपने ख़ज़ाने बेपायां से उन्हें मालामाल कर दे।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और उनकी तादाद बढ़ा दे। उनके हथियारों को तेज़ कर दे , उनके हुदूद व इतराफ़ और मरकज़ी मक़ामात की हिफ़ाज़त व निगेहदाश्त कर। उनकी जमइयत में उन्स व यकजहती पैदा कर , उनके उमूर की दुरूस्ती फ़रमा , रसद रसानी के ज़राए मुसलसल क़ायम रख। उनकी मुश्किलात के हल करने का ख़ुद ज़िम्मा फ़रमा। उनके बाज़ू क़वी कर। सब्र के ज़रिये उनकी एआनत फ़रमा। और दुष्मन से छिपी तदबीरों में उन्हें बारीक निगाही अता कर।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और जिस षै को वह नहीं पहचानते वह उन्हें पहचनवा दे और जिस बात का इल्म नीं रखते वह उन्हें बता दे। और जिस चीज़ की बसीरत उन्हें नहीं है वह उन्हें सुझा दे।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और दुष्मन से मद्दे मुक़ाबिल होते वक़्त ग़द्दार व फ़रेबकार दुनिया की याद उनके ज़ेहनों से मिटा दे। और गुमराह करने वाले माल के अन्देषे उनके दिलों से निकाल दे और जन्नत को उनकी निगाहों के सामने कर दे। और जो दाएमी क़यामगा हमें इज़्ज़त व षरफ़ की मन्ज़िलें और (पानी , दूध) शराब और साफ़ व शफ़्फाफ़ शहद की) बहती हुई नहरें और तरह तरह के फलों (के बार) से झुके हुए अशजार वहां फ़राहेम किये है। उन्हें दिखा दे ताके उनमें से कोई पीठ फिराने का इरादा और अपने हरीफ़ के सामने से भागने का ख़याल न करे।

ऐ अल्लाह! इस ज़रिये से उनके दुश्मनों के हरबे कुन्द और उन्हें बे दस्त व पा कर दे और उनमें और उनके हथियारों में तफ़रिक़ा डाल दे , (यानी हथियार छोड़कर भाग जाएं) और उनके रगे दिल की तनाबें तोड़ दे और उनमें और उनके आज़ोक़ा में दूरी पैदा कर दे और उनकी राहों में उन्हें भटकने के लिये छोड़ दे और उनके मक़सद से उन्हें बे राह कर दे। उनकी कमक का सिलसिला मकक का सिलसिला क़ता कर दे उनकी गिनती कम कर दे , उनके दिलों में दहशत भर दे , उनकी दराज़ दस्तियों को कोताह कर दे , उनकी ज़बानों में गिरह लगा दे के बोल न सकें , और उन्हें सज़ा देकर उनके साथ साथ उन लोगों को भी तितर बितर कर दे जो उनके पसे पुश्त , हैं और पसे पुश्त वालों को ऐसी शिकस्त दे के जो उनके पुश्त पर हैं उन्हें इबरत हासिल हो और उनकी हज़ीमत व रूसवाई से उनके पीछे वालों के हौसले तोड़ दे।

ऐ अल्लाह! उनकी औरतों के शिकम बांझ , उनके मर्दों के सल्ब ख़ुश्क और उनके घोड़ों , ऊंटों , गायों , बकरियों की नस्ल क़ता कर दे और उनके आसमान को बरसने की और ज़मीन को रवीदगी की इजाज़त न दे। बारे इलाहा। इस ज़रिये से अहले इस्लाम की तदबीरों को मज़बूत , उनके शहरों को महफ़ूज़ और उनकी दौलत व सरवत को ज़्यादा कर दे और उन्हें इबादत व ख़लवत गज़ीनी के लिये जंग व जेदाल और लड़ाई झगड़े से फ़ारिग़ कर दे ताके रूए ज़मीन पर तेरे अलावा किसी की परस्तिश न हो और तेरे सिवा किसी के आगे ख़ाक पर पेशानी न रखी जाए।

ऐ अल्लाह! तू मुसलमानों को उनके हर हर इलाक़े में बरसरे पैकार होने वाले मशरिकों पर ग़लबा दे और सफ़ दर सफ़ फ़रिश्तों के ज़रिये इनकी इमदाद फ़रमा। ताके इस खि़त्तए ज़मीन में उन्हें क़त्ल व असीर करते हुए उसके आखि़री हुदूद तक पस्पा कर दें या के वह इक़रार करें के तू वह ख़ुदा है जिसके अलावा कोई माबूद नहीं और यकता व लाशरीक है। ख़ुदाया! मुख़्तलिफ़ एतराफ़ व जवानिब के दुश्मनाने दीन को भी इस क़त्ल व ग़ारत की लपेट में ले ले। वह हिन्दी हों या रूमी , तुर्की हों या खि़ज़्री , हबशी हों या नूबी , रंगी हों या सक़लबी व दलीमी , नीज़ उन मुषरिक जमाअतों को जिनके नाम और सिफ़ात हमें मालूम नहीं और तू अपने इल्म से उन पर मोहीत और अपनी क़ुदरत से उन पर मुतलअ है।

ऐ अल्लाह! मुषरिकों को मुषरिकों से उलझा कर मुसलमानों के हुदूदे ममलेकत पर दस्त दराज़ी से बाज़ रख और उनमें कमी वाक़ेअ करके मुसलमानों में कमी करने से रोक दे और उनमें फूट डलवा कर अहले इस्लाम के मुक़ाबले में सफ़आराई से बिठा दे। ऐ अल्लाह! उनके दिलों को तस्कीन व बेख़ौफ़ी से , उनके जिस्मों को क़ूवत व तवानाई से ख़ाली कर दे। उनकी फ़िक्रों को तदबीर व चाराजोई से ग़ाफ़िल और मरदान कारज़ार के मुक़ाबले में उनके दस्त व बाज़ू को कमज़ोर कर दे और दिलेराने इस्लाम से टक्कर लेने में उन्हें बुज़दिल बना दे और अपने अज़ाबों में से एक अज़ाब के साथ उन पर फ़रिष्तों की सिपाह भेज। जैसा के तूने बद्र के दिन किया था। उसी तरह तू उनकी जड़े बुनियादें काट दे , उनकी षान व षौकत मिटा दे और उनकी जमीअत को परागन्दा कर दे। ऐ अल्लाह! उनके पानी में वबा और उनके खानों में इमराज़ (के जरासीम) की आमेज़िष कर दे , उनके षहरों को ज़मीन में धंसा दे , उन्हें हमेषा पत्थरों का निषाना बना और क़हतसाली उन पर मुसल्लत कर दे। उनकी रोज़ी ऐसी सरज़मीन में क़रार दे जो बन्जर और उनसे कोसों दूर हो। ज़मीन के महफ़ूज़ क़िले उनके लिये बन्द कर दे। और उन्हें हमेषा की भूक और तकलीफ़देह बीमारियों में मुब्तिला रख। बारे इलाहा! तेरे दीन व मिल्लत वालों में से जो ग़ाज़ी उनसे आमादाए जंग हो या तेरे तरीक़े की पैरवी करने वालों में से जो मुजाहिद क़स्दे जेहाद करे इस ग़रज़ से के तेरा दीन बलन्द , तेरा गिरोह क़वी और तेरा हिस्सा व नसीब कामिलतर हो तो उसके लिये आसानियां पैदा कर। तकमीलकार के सामान फ़राहेम कर , उसकी कामयाबी का ज़िम्मा ले , उसके लिये बेहतरीन हमराही इन्तेख़ाब फ़रमा। क़वी व मज़बूत सवारी का बन्दोबस्त कर , ज़रूरियात पूरा करने के लिये वुसअत व फ़राख़ी दे। दिलजमई व निषाते ख़ातिर से बहरामन्द फ़रमा। इसके इष्तेयाक़े (वतन) का वलवला ठण्डा कर दे तन्हाई के ग़म का उसे एहसास न होने दे , ज़न व फ़रज़न्द की याद उसे भुला दे। क़स्दे ख़ैर की तरफ़ रहनुमाई फ़रमा उसकी आफ़ियत का ज़िम्मा ले। सलामती को उसका साथी क़रार दे। बुज़दिली को उसके पास न फटकने दे। उसके दिल में जराएत पैदा कर , ज़ोर व क़ूवत उसे अता फ़रमा। अपनी मददगारी से उसे तवानाई बख़्श , राह व रविश (जेहाद) की तालीम दे और हुक्म में सही तरीक़ेकार की हिदायत फ़रमा। रिया व नमूद को उससे दूर रख। हवस , शोहरत का कोई शाएबा उसमें न रहने दे , उसके ज़िक्र व फ़िक्र और सफ़र व क़याम को अपनी राह में और अपने लिये क़रार दे और जब वह तेरे दुष्मनों और अपने दुश्मनों से मद्दे मुक़ाबिल हो तो उसकी नज़रों में उनकी तादाद थोड़ी करके दिखा। उसके दिल में उनके मक़ाम व मन्ज़िलत को पस्त कर दे। ऐ उसे उन पर ग़लबा दे और उनको उस पर ग़ालिब न होने दे। अगर तूने उस मर्दे मुजाहिद के ख़ातमे बिल ख़ैर और शहादत का फ़ैसला कर दिया है तो यह षहादत उस वक़्त वाक़ेअ हो जब वह तेरे दुश्मनों को क़त्ल करके कैफ़र किरदार तक पहुंचा दे। या असीरी उन्हें बे हाल कर दे और मुसलमानों के एतराफ़े ममलेकत में अमन बरक़रार हो जाए और दुश्मन पीठ फिराकर चल दे। बारे इलाहा! वह मुसलमान जो किसी मुजाहिद या निगेहबान सरहद के घर का निगरान हो या उसके अहल व अयाल की ख़बरगीरी करे या थोड़ी बहुत माली एआनत करे या आलाते जंग से मदद दे। या जेहाद पर उभारे या उसके मक़सद के सिलसिले में दुआए ख़ैर करे या उसके पसे पुश्त उसकी इज़्ज़त व नामूस का ख़याल रखे तो उसे भी उसके अज्र के बराबर बे कम व कास्त अज्र और उसके अमल का हाथों हाथ बदला दे जिससे वह अपने पेश किये हुए अमल का नफ़ा और अपने बजा लाए हुए काम की मसर्रत दुनिया में फ़ौरी तौर से हासिल कर ले यहां तक के ज़िन्दगी की साअतें उसे तेरे फ़ज़्ल व एहसान की उस नेमत तक जो तूने उसके लिये जारी की है और इस इज़्ज़त व करामत तक जो तूने उसके लिये मुहय्या की है पहुंचा दें। परवरदिगार! जिस मुसलमान को इस्लाम की फ़िक्रे परेशान और मुसलमानों के खि़लाफ़ मुशरिकों की जत्थाबन्दी ग़मगीन करे इस हद तक के वह जंग की नीयत और जेहाद का इरादा करे मगर कमज़ोरी उसे बिठा दे या बेसरो सामानी उसे क़दम न उठाने दे या कोई हादसा इस मक़सद से या ख़ैर में डाल दे या कोई मानेअ उसके इरादे में हाएल हो जाए तो उसका नाम इबादत गुज़ारों में लिख और उसे मुजाहिदों का सवाब अता कर और उसे शहीदों और नेकोकारों के ज़मरह में शुमार फ़रमा। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) पर जो तेरे अब्दे ख़ास और रसूल हैं और उनकी औलाद (अ 0) पर ऐसी रहमत नाज़िल फ़रमा जो शरफ़ व रूतबे में तमाम रहमतों से बलन्दतर और तमाम दूरूदों से बालातर हो। ऐसी रहमत जिसकी मुद्दत एख़तेतामपज़ीद न हो , जिसकी गिनती का सिलसिला कहीं क़ता न हो। ऐसी कामिल व अकमल रहमत जो तेरे दोस्तों में से किसी एक पर नाज़िल हुई हो इसलिये के तू अता व बख़्शिश करने वाला , हर हाल में क़ाबिले सताइश पहली दफ़ा पैदा करने वाला , और दोबारा ज़िन्दा करने वाला और जो चाहे वह करने वाला है।

अट्ठाइसवीं दुआ

अल्लाह तआला से तलब व फ़रियाद के सिलसिले में हज़रत (अ 0) की दुआ

ऐ अल्लाह! मैं पूरे ख़ुलूस के साथ दूसरों से मुंह मोड़कर तुझसे लौ लगाए हूं और हमह तन तेरी तरफ़ मुतवज्जोह हूं , और उस षख़्स से जो ख़ुद तेरी अता व बख़्षिष का मोहताज है , मुंह फेल लिया है। और उस षख़्स से जो तेरे फ़ज़्ल व एहसान से बेनियाज़ नहीं है , सवाल का रूख़ मोड़ लिया है। और इस नतीजे पर पहुंचा हूं के मोहताज का मोहताज से मांगना सरासर समझ बूझ की कुबकी और अक़्ल की गुमराही है , क्योंके ऐ मेरे अल्लाह! मैंने बहुत से ऐसे लोगों को देखा है जो तुझे छोड़कर दूसरों के ज़रिये इज़्ज़त के तलबगार हुए। तो वह ज़लील व रूसवा हुए। और दूसरों से नेमत व दौलत के ख़्वाहिषमन्द हुए तो फ़क़ीर व नादार ही रहे और बलन्दी का क़स्द किया तो पस्ती पर जा गिरे। लेहाज़ा उन जैसों को देखने से एक दूरअन्देष की दूरअन्देषी बिलकुल बर महल है के इबरत के नतीजे में उसे तौफ़ीक़ हासिल हुई और उसके (सही) इन्तेख़ाब ने उसे सीधा रास्ता दिखाया। जब हक़ीक़त यही है। तो फिर ऐ मेरे मालिक! तू ही मेरे सवाल का मरजअ है न वह जिससे सवाल किया जाता है , और तू ही मेरा हाजत रवा है न वह जिनसे हाजत तलब की जाती है और तमाम लोगों से पहले जिन्हें पुकारा जाता है तू मेरी दुआ के लिये मख़सूस है और मेरी उम्मीद में तेरा कोई षरीक नहीं है और मेरी दुआ में तेरा कोई हमपाया नहीं है। और मेरी आवाज़ तेरे साथ किसी और को षरीक नहीं करती।

ऐ अल्लाह! अदद की यकताई , क़ुदरते कामेला की कारफ़रमाई और कमाले क़ूवत व तवानाई और मक़ामे रिफ़अत व बलन्दी तेरे लिये है और तेरे अलावा जो है वह अपनी ज़िन्दगी में तेरे रहम व करम का मोहताज , अपने उमूर में दरमान्दा और अपने मक़ाम पर बेबस व लाचार है , जिसके हालात गूनागूँ हैं और एक हालत से दूसरी हालत की तरफ़ पलटता रहता है। तू मानिन्द व हमसर से बलन्दतर और मिस्ल व नज़ीर से बालातर है , तू पाक है , तेरे अलावा कोई माबूद नहीं है।

उनतीसवी दुआ

रिज़क़ के तंगी में पढ़ी जाने वाली दुआ

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है

ऐ अल्लाह! तूने रिज़्क़ के बारे में बेयक़ीनी से और ज़िन्दगी के बारे में तूले अमल से हमारी आज़माइश की है। यहाँ तक के हम उनसे रिज़्क़ तलब करने लगे जो तुझसे रिज़्क़ पाने वाले हैं और उम्र रसीदा लोगों की उम्रे देखकर हम भी दराज़िए उम्र की आरज़ूएं करने लगे। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमें ऐसा पुख़्ता यक़ीन अता कर जिसके ज़रिये तो हमें तलब व जुस्तजू की ज़हमत से बचा ले और ख़ालिस इत्मीनानी कैफ़ियत हमारे दिलों में पैदा कर दे जो हमें रंज व सख़्ती से छुड़ा ले और वही के ज़रिये जो वाज़ेह और साफ़ वादा तूने फ़रमाया है और अपनी किताब में उसके साथ साथ क़सम भी खाई है। उसे इस रोज़ी के एहतेमाम से जिसका तू ज़ामिन है। सुबुकदोशी का सबब क़रार दे और जिस रोज़ी का ज़िम्मा तूने लिया है उसकी मशग़ूलियतों से अलाहेदगी का वसीला बना दे। चुनांचे तूने फ़रमाया है और तेरा क़ौल हक़ और बहुत सच्चा है और तूने क़सम खाई है और तेरी क़सम सच्ची और पूरी होने वाली है के ‘‘तुम्हारी रोज़ी और वह जिसका तुमसे वादा किया जाता है आसमान में है ’’ फिर तेरा इरशाद हैः- "ज़मीन व आसमान के मालिक की क़सम यह अम्र यक़ीनी व क़तई है जैसे यह के तुम बोल रहे हो। ’’

तीसवीं दुआ

अदाए क़र्ज़ के सिलसिले में अल्लाह तआला से तलबे एआनत की दुआ

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे ऐसे क़र्ज़ से निजात दे जिससे तू मेरी आबरू पर हर्फ़ आने दे और मेरा ज़ेहन परेशान और फ़िक्र परागन्दा रहे और उसकी फ़िक्र व तदबीर में हमहवक़्त मशग़ूल रहूं। ऐ मेरे परवरदिगार! मैं तुझसे पनाह मांगता हूं क़र्ज़ के फ़िक्र व अन्देशे से और उसके झमेलों से और उसके बाएस बेख़्वाबी से तू मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे इससे पनाह दे। परवरदिगार! मैं तुझसे ज़िन्दगी में उसकी ज़िल्लत और मरने के बाद उसके वबाल से पनाह मांगता हूँ। तू मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे माल व दौलत की फ़रावानी और पैहम रिज़्क़ रसानी के ज़रिये इससे छुटकारा दे।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे फ़ुज़ूल ख़र्ची और मसारेफ़ की ज़ियादती से रोक दे और अता व मेयानारवी के साथ नुक़्तए एतदाल पर क़ायम रख और मेरे लिये हलाल तरीक़ों से रोज़ी का सामान कर और मेरे माल का मसरफ़ उमूरे ख़ैर में क़रार दे और उस माल को मुझसे दूर ही रख जो मेरे अन्दर ग़ुरूर व तमकनत पैदा करे या ज़ुल्म की राह पर डाल दे या उसका नतीजा तुग़यान व सरकषी हो। ऐ अल्लाह दरवेषों की हम नषीनी मेरी नज़रों में पसन्दीदा बना दे और इतमीनान अफ़ज़ा सब्र के साथ उनकी रिफ़ाक़त इख़्तियार करने में मेरी मदद फ़रमा। दुनियाए फानी के माल में से जो तूने मुझसे रोक लिया है उसे अपने बाक़ी रहने वाले ख़ज़ानों में मेरे लिये ज़ख़ीरा कर दे और इससके साज़ व बर्ग में से जो तूने दिया है और उसके सर्द सामान में से जो बहम पहुंचाया है उसे अपने जवार (रहमत) तक पहुंचने का ज़ादे राह , हुसूले तक़रीब का वसीला और जन्नत तक रसाई का ज़रिया क़रार दे इसलिये के तू फ़ज़्ले अज़ीम का मालिक और सख़ी व करीम है।

इकत्तीसवीं दुआ

दुआए तौबा

ऐ माबूद! ऐ वह जिसकी तौसीफ़ से वस्फ़ करने वालों के तौसीफ़ी अल्फ़ाज़ क़ासिर हैं। ऐ वह जो उम्मीदवारों की उम्मीदों का मरकज़ है। ऐ वह जिसके हाँ नेकोकारों का अज्र ज़ाया नहीं होता। ऐ वह जो इबादतगुज़ारों के ख़ौफ़ की मन्ज़िले मुन्तहा है। ऐ वह जो परहेज़गारों के बीम व हेरास की हद्दे आखि़र है यह उस षख़्स का मौक़ुफ़ है जो गुनाहों के हाथों में खेलता है और ख़ताओं की बागों ने जिसे खींच लिया है और जिस पर ग़ालिब आ गया है। इसलिये तेरे हुक्म से लापरवही करते हुए उसने (अदाए फ़र्ज़) में कोताही की और फ़रेबख़ोर्दगी की वजह से तेरे मुनहेयात का मुरतकब होता है। गोया वह अपने को तेरे क़ब्ज़ए क़ुदरत में समझता ही नहीं है और तेरे फ़ज़्ल व एहसान को जो तूने उस पर किये हैं मानता ही नहीं है मगर जब उसकी चष्मे बसीरत वा हुई और उस कोरी व बे बसरी के बादल उसके सामने से छटे तो उसने अपने नफ़्स पर किये हुए ज़ुल्में का जाएज़ा लिया अैर जिन जिन मवारिद पर अपने परवरदिगार की मुख़ालफ़तें की थी उन पर नज़र दौड़ाई तो अपने बड़े गुनाहों को (वाक़ेअन) बड़ा और अपनी अज़ीम मुख़ालफ़तों को (हक़ीक़तन) अज़ीम पाया तो वह इस हालत में के तुझसे उम्मीदवार भी है और षर्मसार भी , तेरी जानिब मुतवज्जो हुआ और तुझ पर एतमाद करते हुए तेरी तरफ़ राग़िब हुआ और यक़ीन व इतमीनान के साथ अपनी ख़्वहिश व आरज़ू को लेकर तेरा क़स्द किया और (दिल में) तेरा ख़ौफ़ लिये हुए ख़ुलूस के साथ तेरी बारगाह का इरादा किया इस हालत में के तेरे अलावा उसे किसी से ग़रज़ न थी और तेरे सिवा उसे किसी का ख़ौफ़ न था। चुनांचे वह आजिज़ाना सूरत में तेरे सामने आ खड़ा हुअ और फ़रवतनी से अपनी आंखें ज़मीन में गााड़ लीं और तज़ल्लुल व इन्केसा र से तेरी अज़मत के आगे सर झुका लिया अैर अज्ज़ व नियाज़मन्दी से अपने राज़ हाए दरदने परदा जिन्हें तू उससे बेहतर जनता है तेरे आगे खोल दिये और आजिज़ी से अपने वह गुनाह जिनका तू उससे ज़्यादा हिसाब रखताहै एक एक करके शुमार किये और इन बड़े गुनाहों से जो तेरे इल्म में उसके लिये मोहलक और बदआमालियोंसे जो तेरे फ़ैसले के मुताबिक़ उसके लिये रूसवाकुन हैं , दाद व फ़रयाद करता है। वह गुनाह के जिनकी लज़्ज़त जाती रही है और उनका वबाल हमेषा के लिये बाक़ी रह गया है।

ऐ मेरे माबूद! अगर तू उस पर अज़ाब करे तो वह तेरे अद्ल का मुनकिर नहीं होगा। और अगर उससे दरगुज़र करे और तरस खाए तो वह तेरे अफ़ो को कोई अजीब और बड़ी बात नहीं समझेगा। इसलिये के तू वह परवरदिगारे करीम है जिसके नज़दीक बड़े से बड़े गुनाह को भी बख़्ष देना कोई बड़ी बात नहीं है। अच्छा तो ऐ मेरे माबूद! मैं तेरी बारगाह में हाज़िर हूं तेरे हुक्मे दुआ की इताअत करते हुए और तेरे वादे का ईफ़ा चाहते हुए जो क़ुबूलियते दुआ के मुताल्लिक़ तूने अपने उस इरषाद में किया है- ‘‘मुझसे दुआ मांगो तो मैं तुम्हारी दुआ क़ुबूल करूंगा। ’’ ख़ुदावन्दा! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और अपनी मग़फ़ेरत मेरे षामिले हाल कर , जिस तरह मैं (अपने गुनाहों का) इक़रार करते हुए तेरी तरफ़ मुतवज्जेह हुआ हूं और उन मक़ामात से जहां गुनाहों से मग़लूब होना पड़ता है मुझे (सहारा देकर) ऊपर उठा ले जिस तरह मैंने अपने नफ़्स को तेरे आगे (ख़ाके मज़िल्लत) पर डाल दिया है और अपने दामने रहमत से मेरी परदापोशी फ़रमा जिस तरह मुझसे इन्तेक़ाम लेने में सब्र व हिल्म से काम लिया है।

ऐ अल्लाह! अपनी इताअत में मेरी नीयत को इसतेवार और अपनी इबादत में मेरी बसीरत को क़वी कर और मुझे उन आमाल के बजा लाने की तौफ़ीक़ दे जिनके ज़रिये तू मेरे गुनाहों के मैल को धो डाले और जब मुझे दुनिया से उठाए तो अपने दीन और अपनी नबी मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम के आईन पर उठा। ऐ माबूद! मैं इस मक़ाम पर अपने छोटे बड़े गुनाहों , पोषीदा व आषकारा मासियतों और गुज़िष्ता व मौजूदा लग़्िज़षों से तौबा करता हूँ उस षख़्स की सी तौबा जो दिल में मासियत क ख़याल भी न लाए और गुनाह की तरफ़ पलटने का तसव्वुर भी न करे। ख़ुदावन्दा! तने अपनी मोहकम किताब में फ़रमाया है के तू बन्दों की तौबा क़ुबूल करता है और गुनाहों को माफ़ करता है और तौबा करने वालों को दोस्त रखता है। लेहाज़ा तू मेरी तौबा क़ुबूल फ़रमा जैसा के तूने वादा किया है , और मेरे गुनाहों को माफ़ कर दे जैसा के तूने ज़िम्मा लिया है। और हस्बे क़रारदाद अपनी मोहब्बत को मेरे लिये ज़रूरी क़रार दे और मैं तुझसे ऐ मेरे परवरदिगार यह इक़रार करता हूँ के तेरी नापसन्दीदा बातों की तरफ़ रूख़ नहीं करूंगा और यह क़ौल व क़रार करता हूँ के क़ाबिले मज़म्मत चीज़ों की तरफ़ रूजू न करूंगा और यह अहद करता हूँ के तेरी तमाम नाफ़रमानियों को यकसर छोड़ दूंगा।

बारे इलाहा! तू मेरे अमल व किरदार से ख़ूब आगाह है , अब जो भी तू जानता है उसे बख़्श दे और अपनी क़ुदरते कामेला से पसन्दीदा चीज़ों की तरफ़ मुझे मोड़ दे। ऐ अल्लाह! मेरे ज़िम्मे कितने ऐसे हुक़ूक़ हैं जो मुझे याद हैं , और कितने ऐसे मज़लिमे हैं जिन पर निसयान का पर्दा पड़ा हुआ है। लेकिन वह सब के सब तेरी आांखोंके सामने हैं। ऐसी आंखें जो ख़्वाब आालूदा नहीं होतीं और तेरे इल्म में हैं ऐसा इल्म जिसमें फ़रोगज़ाष्त नहीं होती। लेहाज़ा जिन लोगों का मुझ पर कोई हक़ है उसका उन्हें एवज़ देकर इसका बोझ मुझसे बरतरफ़ और इसका बार हल्का कर दे , और मुझे फिर वैसे गुनाहों के इरतेकाब से महफ़ूज़ रख। ऐ अल्लाह! मैं तौबा पर क़ायम नहीं रह सकता मगर तेरी ही निगरानी से , और गुनाहों से बाज़ नहीं आ सकता मगर तेरी ही क़ूवत व तवानाई से , लेहाज़ा मुझे बेनियाज़ करने वाली क़ूवत से तक़वीयत दे और (गुनाहों से) रोकने वाली निगरानी का ज़िम्मा ले।

ऐ अल्लाह! वह बन्दा जो तुझसे तौबा करे और तेरे इल्मे ग़ैब में वह तौबा शिकनी करने वालों और गुनाह व मासियत की तरफ़ दोबारा पलटने वाला हो तो मैं तुझसे पनाह माँगता हूं के उस जैसा हूं। मेरी तौबा को ऐसी तौबा क़रार दे के उसके बाद फ़िर तौबा की एहतियाज न रहे जिससे गुज़िष्ता गुनाह महो हो जाएं अैर ज़िन्दगी के बाक़ी दिनों में (गुनाहों से) सलामती का सामान हो। ऐ अल्लाह! मैं अपनी जेहालतों से उज़्रख़्वाह और अपनी बदआमालियों से बख़्षिष का तलबगार हूँ। लेहाज़ा अपने लुत्फ़ व एहसान से मुझे पनाहगाह रहमत में जगह दे और अपने तफ़ज़्ज़ुल से अपनी आफ़ियत के परदे में छुपा ले। ऐ अल्लाह! मैं दिल में गुज़रने वाले ख़यालात और आंख के इषारों और ज़बान की गुफ़्तगुओं , ग़रज़ हर उस चीज़ से जो तेरे इरादे व रेज़ा के खि़लाफ़ हो और तेरी मोहब्बत के हुदूद से बाहर हे , तेरी बारगाह में तौबा करता हूं। ऐसी तौबा जिससे मेरा हर हर अज़ो अपनी जगह पर तेरी अक़ूबतों से बचा रहे और उन तकलीफ़ देह अज़ाबों से जिनसे सरकष लोग ख़ाएफ़ रहते हैं महफ़ूज़ रहे। ऐ माबूद! यह तेरे सामने मेरा आलमे तन्हाई , तेरे ख़ौफ़ से मेरे दिल की धड़कन , तेरी हैबत से मेरे आज़ा की थरथरी , इन हालतों पर रहम फ़रमा। परवरदिगारा मुझे गुनाहों ने तेरी बारगाह में रूसवाई की मन्ज़िल पर ला खड़ा किया है। अब अगर चुप रहूं तो मेरी तरफ़ से कोई बोलने वाला नहीं है और कोई वसीला लाऊं तो शिफ़ाअत का सज़ावार नहीं हूं। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमाा और अपने करम व बख़्षिष को मेरी ख़ताओं का शफ़ीअ क़रार दे और अने फ़ज़्ल से मेरे गुनाहों को बख़्ष दे और जिस सज़ा काा मैं सज़ावार हूं वह सज़ा न दे और अपना दामने करम मुझ पर फैला दे और अपने परदए अफ़ो व रहमत में मुझे ढांप ले और मुझसे इस ज़ी इक़्तेदार षख़्स का सा बरताव कर जिसके आगे कोई बन्दाए ज़लील गिड़गिड़ाए तो वह उस पर तरस खाए या इस दौलत मन्द का सा जिससे कोई बन्दाए मोहताज लिपटे तो वह उसे सहारा देकर उठा ले।

बारे इलाहा! मुझे तेरे (अज़ाब) से कोई पनाह देने वाला नहीं है। अब तेरी क़ूवत व तवानाई ही पनाह दे तो दे। और तेरे यहाँ कोई मेरी सिफ़ारिश करने वाला नहीं अब तेरा फ़ज़्ल ही सिफ़ारिश करे तो करे। और मेरे गुनाहों ने मुझे हरासां कर दिया है। अब तेरा अफ़ो व दरगुज़र ही मुझे मुतमईन करे तो करे। यह जो कुछ मैं कह रहा हूँ इसलिये नही ंके मैं अपनी बद आमालियों से नावाक़िफ़ और अपनी गुज़िश्ता बदकिरदारियों को फ़रामोश कर चुका हूं बल्कि इसलिये के तेरा आसमान और जो उसमें रहते सहते हैं और तेरी ज़मीन और जो उस पर आबाद हैं। मेरी निदामत को जिसका मैंने तेरे सामने इज़हार किया है , और मेरी तौबा को जिसके ज़रिये तुझसे पनाह मांगी है सुन लें। ताके तेरी रहमत की कारफ़रमाई की वजह से किसी को मेरे हाले ज़ार पर रहम आ जाए या मेरी परेशाँहाली पर उसका दिल पसीजे तो मेरे हक़ में दुआ करे जिसकी तेरे हाँ मेरी दुआ से ज़्यादा सुनवाई हो। या केई ऐसी सिफ़ारिश हासिल कर लूं जो तेरे हाँ मेरी दरख़्वास्त से ज़्यादा मोअस्सर हो और इस तरह तेरे ग़ज़ब से निजात की दस्तावेज़ और तेरी ख़ुशनूदी का परवाना हासिल कर सकूं।

ऐ अल्लाह! अगर तेरी बारगाह में निदामत व पशेमानी ही तौबा है तो मैं पशेमान हूं। और अगर तर्के मासियत ही तौबा व अनाबत है तो मैं तौबा करने वालों में अव्वल दर्जा पर हूँ। और अगर तलबे मग़फ़ेरत गुनाहों को ज़ाएल करने का सबब है तो मग़फ़ेरत करने वालों में से एक मैं भी हूं। ख़ुदाया जबके तूने तौबा का हुक्म दिया है और क़ुबूल करने का ज़िम्मा लिया है और दुआ पर आमादा किया है और क़ुबूलियत का वादा फ़रमाया है तो रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और मेरी तौबा को क़ुबूल फ़रमा और मुझे अपनी रहमत से नाउम्मीदी के साथ न पलटा क्योंके तू गुनहगारों की तौबा क़ुबूल करने वाला और रूजू होने वाले ख़ताकारों पर रहम करने वाला है।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा जिस तरह तूने उनके वसीले से हमारी हिदायत फ़रमाई है। तू मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल कर , जिस तरह उनके ज़रिये हमें (गुमराही के भंवर से) निकाला है। तू मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल कर , ऐसी रहमत जो क़यामत के रोज़ और तुझसे एहतियाज के दिन हमारी सिफ़ारिश करे इसलिये के तू हर चीज़ पर क़ुदरत रखता है और यह अम्र तेरे लिये सहल व आसान है।

बत्तीसवीं दुआ

एतराफ़े गुनाह के सिलसिले में हज़रत (अ 0) की दुआ जिसे नमाज़े शब के बाद पढ़ते

ऐ अल्लाह! ऐ दाएमी व अबदी बादशाही वाले और लश्कर व ऐवना के बग़ैर मज़बूत फ़रमानरवाई वाले और ऐसी इज़्ज़त व रिफ़अत वाले जो सदियों , सालों , ज़मानों और दिनों के बीतने , गुज़रने के बावजूद पाइन्दा व बरक़रार है। तेरी बादशाही ऐसी ग़ालिब है जिसकी इब्तिदा की कोई हद है और न इन्तेहा का कोई आखि़री किनारा है। और तेरी जहानदारी का पाया इतना बलन्द है के तमाम चीज़ें उसकी बलन्दी को छूने से क़ासिर हैं और तारीफ़ करने वालों की इन्तेहाई तारीफ़ तेरी उस बलन्दी के पस्ततरीन दरजे तक भी नहीं पहुंच सकती। जिसे तूने अपने लिये मखा़सूस किया है। सिफ़तों के कारवाँ तेरे बारे में सरगर्दां हैं। और तौसीफ़ी अलफ़ाज़ तेरे लाएक़े हाल मदह तक पहुंचने से आजिज़ हैं और नाज़ुक तससव्वुरात तेरे मक़ामे किबरियाई में शशदर व हैरान हैं। तू वह ख़ुदाए अज़ली है जो अज़ल ही से ऐसा है और हमेशा बग़ैर ज़वाल के ऐसा ही रहेगा। मैं तेरा वह बन्दा हूं जिसका अमल कमज़ोर और सरमायाए उम्मीद ज़्यादा है , मेरे हाथ से ताल्लुक़ व वाबस्तगी के रिष्ते जाते रहे हैं , मगर वह रिष्ता जिसे तेरी रहमत ने जोड़ दिया है और उम्मीदों के वसीले भी एक-एक करके टूट गए हैं। मगर तेरे अफ़ो व दरगुज़र का वसीला जिस पर सहारा किये हुए हूं , तेरी इताअत जिसे किसी षुमार में ला सकूं , न होने के बराबर है और वह मासियत जिसमें गिरफ्तार हूं बहुत ज़्यादा है। तुझे अपने किसी बन्दे को माफ़ कर देना अगरचे वह कितना ही बुरा क्यों न हो , दुश्वार नहीं है। तो फिर मुझे भी माफ़ कर दे। ऐ अल्लाह! तेरा इल्म तमाम पोशीदा आमाल पर मोहीत है और तेरे इल्म व इत्तेलाअ के आगे हर मख़फ़ी चीज़ ज़ाहिर व आशकारा है और बारीक से बारीक चीज़ें भी तेरी नज़र से पोशीदा नहीं हैं और न राज़हाए दरवने पर्दा तुझसे मख़फ़ी हैं तेरा वह दुश्मन जिसने मेरे बे राहरौ होने के सिलसिले में तुझसे मोहलत मांगी और तूने उसे मोहलत दी , और मुझे गुमराह करने के लिये रोज़े क़यामत तक फ़ुरसत तलब की और तूने उसे फ़ुरसत दी , मुझ पर ग़ालिब आ गया है। और जबके मैं हलाक करने वाले सग़ीरा गुनाहों और तबाह करने वाले कबीरा गुनाहों से तेरे दामन में पनाह लेने के लिये बढ़ रहा था उसने मुझे आ गिराया। और जब मैं गुनाह का मुरतकिब हुआ और अपनी बदआमाली की वजह से तेरी नाराज़ी का मुस्तहक़ बना तो उसने अपने हीला व फ़रेब की बाग मुझसे मोड़ ली। और अपने कलमए कुफ्र के साथ मेरे सामने आ गया और मुझसे बेज़ारी का इज़हार किया और मेरी जानिब से पीठ फिराकर चल दिया और मुझे खुले मैदान में तेरे ग़ज़ब के सामने अकेला छोड़ दिया। और तेरे इन्तेक़ाम की मन्ज़िल में मुझे खींच तान कर ले आया। इस हालत में के न कोई सिफ़ारिश करने वाला था जो तुझसे मेरी सिफ़ारिश करे और न कोई पनाह देने वाला था जो मुझे तेरे अज़ाब से ढारस दे और न कोई चार दीवारी थी जो मुझे तेरी निगाहों से छिपा सके और न कोई पनाहगाह थी जहां तेरे ख़ौफ़ से पनाह ले सकूं। अब यह मन्ज़िल मेरे पनाह मांगने और यह मक़ाम मेरे गुनाहों का एतराफ़ करने का , लेहाज़ा ऐसा न हो के तेरे दामने फ़ज़्ल (की वुसअतें) मेरे लिये तंग हो जाएं और अफ़ो व दरगुज़र मुझ तक पहुंचने ही न पाए और न तौबागुज़ार बन्दों में सब से ज़्यादा नाकाम साबित हूं और न तेरे पास उम्मीदें लेकर आने वालों में सबसे ज़्यादा नाउम्मीद रहूं (बारे इलाहा!) मुझे बख़्श दे इसलिये के तू बख्शने वालों में सबसे बेहतर है।

ऐ अल्लाह! तूने मुझे (इताअत का) हुक्म दिया मगर मैं उसे बजा न लाया और (बुरे आमाल से) मुझे रोका मगर उनका मुरतकिब होता रहा। और बुरे ख़यालात ने जब गुनाह को ख़ुषनुमा करके दिखाया तो (तेरे एहकाम में) कोताही की। मैं न रोज़ा रखने की वजह से दिन को गवाह बना सकता हूं। और न नमाज़े शब की वजह से रात को अपनी सिपर बना सकता हूं और न किसी सुन्नत को मैंने ज़िन्दा किया है के उससे तहसीन व सना की तवक़्क़ो करूं सिवाए तेरे वाजेबात के के जो उन्हें ज़ाया करे वह बहरहाल हलाक व तबाह होगा और नवाफ़िल के फ़ज़्ल व शरफ़ की वजह से भी तुझसे तवस्सुल नहीं कर सकता दरसूरतीके तेरे वाजिबात के बहुत से शराएत से ग़फ़लत करता रहा और तेरे एहकाम के हुदूद से तजावुज़ करता हुआ महारम शरीयत का दामन चाक करता रहा , और कबीरा गुनाहों का मुरतकब होता रहा जिनकी रूसवाइयों से सिर्फ़ तेरा दामने अफ़ो व रहमत परदापोश रहा। यह (मेरा मौक़फ़) उस शख़्स का मौक़फ़ है जो तुझसे षर्म व हया करते हुए अपने नफ्स को बुराइयों से रोकता हो , और उसपर नाराज़ हो और तुझसे राज़ी हो , और तेरे सामने ख़ौफ़ज़दा दिल , ख़मीदा गर्दन और गुनाहों से बोझल पीठ के साथ उम्मीद व बीम की हालत में इसतादा हो और तू उन सबसे ज़्यादा सज़ावार है जिनसे उसने आस लगाई और उन सबसे ज़्यादा हक़दार है जिनसे वह हरासां व ख़ाएफ़ हुआ।

ऐ मेरे परवरदिगार! जब यही हालत मेरी है तो मुझे भी वह चीज़ मरहमत फ़रमा , जिसका मैं उम्मीदवार हूं। और उस चीज़ से मुतमईन कर जिससे ख़ाएफ़ हूं और अपनी रहमत के इनआम से मुझ पर एहसान फ़रमा। इसलिये के तू उन तमाम लोगों से जिनसे सवाल किया जाता है ज़्यादा सख़ी व करीम है।

ऐ अल्लाह जबके तूने मुझे अपने दामने अफ़ो में छिपा लिया है और हमसरों के सामने इस दारे फ़ना में फ़ज़्ल व करम का जामा पहनाया है। तो दारे बक़ा की रूसवाईयों से भी पनाह दे। इस मक़ाम पर के जहां मुक़र्रब फ़रिश्ते , मोअजि़्ज़ज़ व बावेक़ार पैग़म्बर , षहीद व सालेह अफ़राद सब हाज़िर होंगे , कुछ तो हमसाये होंगे जिनसे मैं अपनी बुराइयों को छिपाता रहा हूं , और कुछ ख़वीश व अक़ारिब होंगे जिनसे मैं अपने पोशीदा कामों में शर्म व हया करता रहा हूं। ऐ मेरे परवरदिगार! मैंने अपनी परदापोशी में उन पर भरोसा नहीं किया और मग़फ़ेरत के बारे में परवरदिगारा तुझ पर एतमाद किया है और तू उन तमाम लोगों से जिन पर एतमाद किया जाता है। ज़्यादा सज़ावार एतमाद है और उन सबसे ज़्यादा अता करने वाला है जिनकी तरफ़ रूजू हो जाता है और उन सबसे ज़्यादा मेहरबान है जिनसे रहम की इल्तेजा की जाती है। लेहाज़ा मुझ पर रहम फ़रमा।

ऐ अल्लाह तूने मुझे बाहम पोशीदा हड्डियों और तंग राहों वाली सल्ब से तंग नाए रह्म में के जिसे तूने पर्दों में छिपा रखा है एक ज़लील पानी (नुत्फ़े) की सूरत में उतारा जहां तू मुझे एक हालत से दूसरी हालत की तरफ़ मुन्तक़िल करता रहा यहां तक के तूने मुझे इस हद तक पहुंचा दिया। जहां मेरी सूरत की तकमील हो गयी। फिर मुझमें आज़ाए व जवारेह व दीअत किये। जैसा के तूने अपनी किताब में ज़िक्र किया है। के (मैं) पहले नुत्फ़ा था। फ़िर मुन्जमिद ख़ून हुआ फिर गोश्त का एक लोथड़ा , फिर हड्डियों का एक ढांचा फिर उन हड्डियों पर गोश्त की तहें चढ़ा दीं। फिर जैसा तूने चाहा एक दूसरी तरह की मख़लूक़ बना दिया और जब मैं तेरी रोज़ी का मोहताज हुआ और लुत्फ़ व एहसान की दस्तगीरी से बेनियाज़ न रह सका , तो तूने उस बचे हुए खाने पानी में से जिसे तूने उस कनीज़ के लिये जारी किया था जिसके शिकम में तूने मुझे ठहरा दिया और जिसके रह्म में मुझे वदीअत किया था। मेरी रोज़ी का सरो सामान कर दिया। ऐ मेरे परवरदिगार उन हालात में अगर तू ख़ुद मेरी तदबीर पर मुझे छोड़ देता या मेरी ही क़ूवत के हवाले कर देता तो तदबीर मुझसे किनाराकश और क़ूवतम ुझसे देर रहती , मगर तूने अपने फ़ज़्ल व एहसान से एक शफ़ीक़ व मेहरबान की तरह मेरी परवरिश का एहतेमाम किया जिसका तेरे फ़ज़्ले बेपायां की बदौलत इस वक़्त तक सिलसिला जारी है के न तेरे हुस्ने सुलूक से कभी महरूम रहा और न तेरे एहसानात में कभी ताख़ीर हुई। लेकिन इसके बावजूद यक़ीन व एतमाद क़वी न हुआ के मैं सिर्फ़ उसी काम के लिये वक़्फ़ हो जाता जो तेरे नज़दीक मेरे लिये ज़्यादा सूदमन्द है (इस बेयक़ीनी का सबब यह है के) बदगुमानी और कमज़ोरी यक़ीन के सिलसिले में मेरी बाग शैतान के हाथ में है। इसलिये मैं उसकी बद हमसायगी और अपने नफ़्स की फ़रमाबरदारी का शिकवा करता हूँ और उसके तसल्लुत से तेरे दामन में तहफ़्फ़ुज़ व निगेहदाश्त का तालिब हूँ और तुझसे आजिज़ी के साथ इल्तिजा करता हूँ के इसके मक्र व फ़रेब का रूख़ मुझसे मोड़ दे और तुझसे सवाल करता हूँ के मेरी रोज़ी की आसान सबील पैदा कर दे। तेरे ही लिये हम्द व सताइश है के तूने अज़ख़ुद बलन्दपाया नेमतें अता कीं और एहसान व इनआम पर (दिल में) शुक्र का अलक़ा किया। तू मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मेरे लिये रोज़ी को सहल व आसान कर दे और जो अन्दाज़ा मेरे लिये मुक़र्रर किया है , उस पर क़नाअत की तौफ़ीक़ दे और जो हिस्सा मेरे लिये मुअय्यन किया है उस पर मुझे राज़ी कर दे और जो जिस्म काम में आ चुका और जो उम्र गुज़र चुकी है उसे अपनी इताअत की राह में महसूब फ़रमा , बिलाशुबह तू असबाबे रिज़्क़ मुहय्या करने वालों में सबसे बेहतरीन है , बारे इलाहा मैं उस आग से पनाह मांगता हूं जिसके ज़रिये तूने अपने नाफ़रमानों की सख़्त गिरफ़्त की है और जिससे तूने उन लोगों को जिन्होंने तेरी रज़ा व ख़ुशनूदी से रूख़ मोड़ लिया , डराया और धमकाया है और उस आतिशे जहन्नम से पनाह मांगता हूं जिसमें रोशनी के बजाए अन्धेरा जिसका ख़फ़ीफ़ लपका भी इन्तेहाई तकलीफ़देह और जो कोसों दूर होने के बावजूद (गर्मी व तपिश के लिहाज़ से) क़रीब है और उस आग से पनाह मांगता हूं जो आपस में एक दूसरे को खा लेती है और एक दूसरे पर हमलावर होती है और उस आग से पनाह मांगता हूं जो हड्डियों को ख़ाकसर कर देगी और दोज़खि़यों को खौलता हुआ पानी पिलाएगी। और उस आग से के जो उसके आगे गिड़गिड़ाएगा , उस पर तरस नहीं खाएगी और जो उससे रहम की इल्तेजा करेगा , उस पर रहम नहीं करेगी और जो उसके सामने फ़रवतनी करेगा और ख़ुदको उसके हवाले कर देगा उस पर किसी तरह की तख़फ़ीफ़ का उसे इख़्तेयार नहीं होगा। वह दर्दनाक अज़ाब और शदीद एक़ाब की शोला सामानियों के साथ अपने रहने वालों का सामान करेगी। (बारे इलाहा!) मैं तुझसे पनाह मांगता हूं जहन्नम के बिच्छुओं से जिनके मुंह खुले होंगे और उन सांपों से जो दांतों को पीस पीस कर फुंकार रहे होंगे और उसके खौलते हुए पानी से जो अन्तड़ियों और दिलों को टुकड़े-टुकड़े कर देगा और (सीनों को चीरकर) दिलों को निकाल लेगा।

ख़ुदाया! मैं तुझसे तौफ़ीक़ मांगता हूं उन बातों की जो उस आग से दूर करें , और उसे पीछे हटा दें , ख़ुदावन्दा! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे अपनी रहमते फ़रावां के ज़रिये उस आग से पनाह दे और हुस्ने दरगुज़र से काम लेते हुए मेरी लग़्िज़शों को माफ़ कर दे और मुझे महरूम व नाकाम न कर। ऐ पनाह देने वालों में सबसे बेहतर पनाह देने वाले। ख़ुदाया तू सख़्ती व मुसीबत से बचाता और अच्छी नेमतें अता करता और जो चाहे वह करता है और तू हर चीज़ पर क़ुदरत रखता है।

ऐ अल्लाह! जब भी नेकोकारों का ज़िक्र आए तो मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और जब तक शब व रोज़ के आने जाने का सिलसिला क़ायम रहे। तू मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा। ऐसी रहमत जिसका ज़ख़ीरा ख़त्म न हो और जिसकी गिनती शुमार न हो सके। ऐसी रहमत जो फ़िज़ाए आलम को पुर कर दे और ज़मीन व आसमान को भर दे। ख़ुदा उन पर रहमत नाज़िल करे इस हद तक के वह ख़ुशनूद हो जाए और ख़ुशनूदी के बाद भी उन पर और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल करता रहे। ऐसी रहमत जिसकी न कोई हद हो और न कोई इन्तेहा , ऐ तमाम रहम करने वालों में सबसे ज़्यादा रहम करने वाले।

तैंतीसवीं दुआ

दुआए इस्तेख़ारह

बारे इलाहा! मैं तेरे इल्म के ज़रिये तुझसे ख़ैर व बहबूद चाहता हूँ। तू मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मेरे लिये अच्छाई का फ़ैसला सादर फ़रमा , और हमारे दिल में अपने फ़ैसले (की हिकमत व मसलेहत) का अलक़ा कर और उसे एक ज़रिया क़रार दे के हम तेरे फ़ैसले पर राज़ी रहें और तेरे हुक्म के आगे सरे तस्लीम ख़म करें , इस तरह हमसे शक की ख़लिश दूर कर दे और मुख़लेसीन का यक़ीन हमारे अन्दर पैदा करके हमें तक़वीयत दे और हमें ख़ुद हमारे हवाले न कर दे के जो तूने फ़ैसला किया है उसकी मग़फ़ेरत से आजिज़ रहें और तेरी क़ुदरत व मन्ज़िलत को सुबुक समझें और जिस चीज़ से तेरी रज़ा वाबस्ता है उसे नापसन्द करें और जो चीज़ अन्जाम की ख़ूबी से दूर और आफ़ियत की ज़द से क़रीब हो उसकी तरफ़ माएल हो जाएं। तेरे जिस फ़ैसले को हम नापसन्द करें वह हमारी नज़रों में पसन्दीदा बना दे और जिसे हम दुश्वार समझें उसे हमारे लिये सहल व आसान कर दे और जिस मशीयत व इरादे को हमसे मुताल्लुक़ किया है उसकी इताअत हमारे दिल में अलक़ा कर। यहां तक के जिस चीज़ में तूने ताजील की है उसमें ताख़ीर और जिसमें ताख़ीर की है उसमें ताजील न चाहें और जिसे तूने पसन्द किया है उसे नापसन्द और जिसे नागवार समझा है उसे इख़्तेयार न करें। और हमारे कामों का उस चीज़ पर ख़ातेमा कर जो अन्जाम के लेहाज़ से पसन्दीदा और मआल के एतबार से बेहतर हो। इसलिये के तू नफ़ीस व पाकीज़ा चीज़ें अता करता और बड़ी नेमतें बख़्शता है और जो चाहता है वही करता है और तू हर चीज़ पर क़ुदरत रखता है।

चौंतीसवीं दुआ

जब ख़ुद मुब्तिला होते या किसी को गुनाहों की रूसवाई में मुब्तिला देखते तो यह दुआ पढ़ते

ऐ माबूद! तेरे ही लिये तमाम तारीफ़ है इस बात पर के तूने (गुनाहों के) जानने के बाद पर्दापोशी की और (हालात पर) इत्तेलाअ के बाद आफ़ियत व सलामती बख़्शी। यूं तो हम में से हर एक ही उयूब व नक़ाएस के दरपै हुआ मगर तूने उसे मुशतहिर न किया , और अफ़आले बद का का मुरतकिब हुआ मगर तूने उसको रूसवा न होने दिया और पर्दाए ख़फ़ा में बुराईयों से आलूदा रहा मगर तूने उसकी निशानदेही न की , कितने ही तेरे मनहियात थे जिनके हम मुरतकिब हुए और कितने ही तेरे एहकाम थे जिन पर तूने कारबन्द रहने का हुक्म दिया था। मगर हमने उनसे तजावुज़ किया और कितनी ही बुराइयां थीं जो हमसे सरज़द हुईं। और कितनी ही ख़ताएं थीं जिनका हमने इरतेकाब किया दरआँहालियाके दूसरे देखने वालों के बजाये तू उन पर आगाह था और दूसरे (गुनाहों की तशहीर पर) क़ुदरत रखने वालों से तू ज़्यादा उनके अफ़शा पर क़ादिर था , मगर उसके बावजूद हमारे बारे में तेरी हिफ़ाज़त व निगेहदाश्त उनकी आंखों के सामने पर्दा और उनके कानों के बिलमुक़ाबिल दीवार बन गई तो फिर उस पर्दादारी व ऐबपोशी को हमारे लिये एक नसीहत करने वाला और बदजोई व इरतेकाबे गुनाह से रोकने वाला और (गुनाहों को) मिटाने वाली राहे तौबा और तरीक़ पसन्दीदा पर गामज़नी का वसीला क़रार दे और इस राह पैमाई के लम्हे (हमसे) फ़रेब कर , और हमारे लिये ऐसे असबाब मुहय्या न कर जो तुझसे हमें ग़ाफ़िल कर दें। इसलिये के हम तेरी तरफ़ रूजू होने वाले और गुनाहों से तौबा करने वाले हैं। बारे इलाहा! मोहम्मद (स 0) पर जो मख़लूक़ात में तेरे बरगुज़ीदा और उनकी पाकीज़ा इतरत (अ 0) पर जो कायनात में तेरी मुन्तख़बकर्दा है रहमत नाज़िल फ़रमा और हमें अपने फ़रमान के मुताबिक़ उनकी बात पर कान धरने वाला और उनके एहकाम की तामील करने वाला क़रार दे।

(आप इस किताब को अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क पर पढ़ रहे है।)

पैंतीसवीं दुआ

जब अहले दुनिया को देखते तो राज़ी ब रिज़ा रहने के लिये यह दुआ पढ़ते

अल्लाह तआला के हुक्म पर रज़ा व ख़ुशनूदी की बिना पर अल्लाह तआला के लिये हम्द व सताइश है , मैं गवाही देता हूं के उसने अपने बन्दों की रोज़ियां आईने अद्ल के मुताबिक़ तक़सीम की हैं और तमाम मख़लूक़ात से फ़ज़्ल व एहसान का रवय्या इख़्तेयार किया है।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे उन चीज़ों से जो दूसरों की दी हैं आशफ़्ता व परेशान न होने दे के मैं तेरी मख़लूक़ पर हसद करूं और तेरे फ़ैसले को हक़ीर समझूं और जिन चीज़ों से मुझे महरूम रखा है उन्हें देसरों के लिये फ़ित्ना व आज़माइश न बना दे (के वह अज़ रूए ग़ुरूर मुझे ब नज़रे हिक़ारत से देखें) ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे अपने फ़ैसलाए क़ज़ा व क़द्र पर शादमाँ रख और अपने मुक़द्देरात की पज़ीराई के लिये मेरे सीने में वुसअत पैदा कर दे और मेरे अन्दर वह रूहे एतमाद फूंक दे के मैं यह इक़रार करूं के तेरा फ़ैसला क़ज़ा व क़द्र , ख़ैर व बहबूदी के साथ नाफ़िज़ हुआ है और इन नेमतों पर अदाए शुक्र की बनिस्बत जो मुझे अता की हैं उन चीज़ों पर मेरे शुक्रिया को कामिल व फ़ज़ोंतर क़रार दे , जो मुझसे रोक ली हैं और मुझे उससे महफ़ूज़ रख के मैं किसी नादार को ज़िल्लत व हिक़ारत की नज़र से देखूं या किसी साहेबे सरवत के बारे में मैं (उसकी सरवत की बिना पर) फ़ज़ीलत व बरतरी का गुमान करूँ। इसलिये के साहबे शरफ़ व फ़ज़ीलत वह है जिसे तेरी इताअत ने शरफ़ बख़्शा हो और साहेबे इज़्ज़त वह है जिसे तेरी इबादत ने इज़्ज़त व सरबलन्दी दी हो।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमें ऐसी सरवत व दौलत से बहराअन्दोज़ कर जो ख़त्म होने वाली नहीं और ऐसी इज़्ज़त व बुज़ुर्गी से हमारी ताईद फ़रमा जो ज़ाएल होने वाली नहीं और हमें मुल्के जावेदाँ की तरफ़ रवाँ दवाँ कर , बेशक तू यकता व यगाना और ऐसा बेनियाज़ है के न तेरी कोई औलाद है और न तू किसी की औलाद है और न तेरा कोई मिस्ल व हमसर है।

छत्तीसवीं दुआ

जब बादल और बिजली को देखते और रअद की आवाज़ सुनते तो यह दुआ पढ़ते

बारे इलाहा! यह (अब्र व बर्क़) तेरी निशानियों में से दो निशानियाँ और तेरी खि़दमतगुज़ारों में से दो खि़दमतगुज़ार हैं जो नफ़ारसाँ रहमत या ज़रर रसाँ उक़ूबत के साथ तेरे हुक्म की बजाआवरी के लिये रवाँ दवाँ हैं। तो अब इनके ज़रिये ऐसी बारिश न बरसा जो ज़रर व ज़ेयाँ का बाएस हो और न उनकी वजह से हमें बला व मुसीबत का लिबास पहना। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और इन बादलों की मनफ़अत व बरकत हम पर नाज़िल कर और उनके ज़रर व आज़ार का रूख़ हमसे मोड़ दे और उनसे हमें कोई गज़न्द न पहुंचाना और न हमारे सामाने माशियत पर तबाही वारिद करना।

बारे इलाहा! अगर इन घटाओं को तूने बतौरे अज़ाब भेजा है और बसूरते ग़ज़ब रवाना किया है तो फिर हम तेरे ग़ज़ब से तेरे ही दामन में पनाह के ख़्वास्तगार हैं और अफ़ो व दरगुज़र के लिये तेरे सामने गिड़गिड़ाकर सवाल करते हैं। तू मुशरिकों की जानिब अपने ग़ज़ब का रूख़ मोड़ दे और काफ़िरों पर आसियाए अज़ाब को गर्दिश दे।

ऐ अल्लाह! हमारे शहरों की ख़ुश्कसाली को सेराबी के ज़रिये दूर कर दे और हमारे दिल के वसवसों को रिज़्क़ के वसीले से बरतरफ़ कर दे और अपनी बारगाह से हमारा रूख़ मोड़कर हमें दूसरों की तरफ़ मुतवज्जोह न फ़रमा और हम सबसे अपने एहसानात का सरचश्मा क़ता न कर। क्योंके बेनियाज़ वही है जिसे तू बेनियाज़ करे और सालिम व महफ़ूज़ वही है जिसकी तू निगेहदाश्त करे। इसलिये के तेरे अलावा किसी के पास (मुसीबतों का) दफ़िया और किसी के हाँ तेरी सुतूत व हैबत से बचाव का सामान नहीं है। तू जिसकी निस्बत जो चाहता है हुक्म फ़रमाता है और जिसके बारे में जो फ़ैसला करता है वह सादर कर देता है। तेरे ही लिये तमाम तारीफ़ें हैं के तूने हमें मुसीबतों से महफ़ूज़ रखा और तेरे ही लिये शुक्र है के तूने हमें नेमतें अता कीं। ऐसी हम्द जो तमाम हम्दगुज़ारों की हम्द को पीछे छोड़ दे। ऐसी हम्द जो ख़ुदा के आसमान व ज़मीन की फ़िज़ाओं को छलका दे। इसलिये के तू बड़ी से बड़ी नेमतों का अता करने वाला और बड़े से बड़े इनामात का बख़्शने वाला है मुख़्तसर सी हम्द को भी क़ुबूल करने वाला और थोड़े से शुक्रिये की भी क़दर करने वाला है और एहसान करने वाला और बहुत नेकी करने वाला और साहबे करम व बख़्शिश है। तेरे अलावा कोई माबूद नहीं है और तेरी ही तरफ़ (हमारी) बाज़गश्त है।

सैंतीसवीं दुआ

जब अदाए शुक्र में कोताही का एतराफ़ करते तो यह दुआ पढ़ते

बारे इलाहा! कोई शख़्स तेरे शुक्र की किसी मन्ज़िल तक नहीं पहुंचा मगर यह के तेरे इतने एहसानात मुजतमअ हो जाते हैं के वह इस पर मज़ीद शुक्रिया लाज़िम व वाजिब कर देते हैं और कोई शख़्स तेरी इताअत के किसी दरजे पर चाहे वह कितनी ही सरगर्मी दिखाए , नहीं पहुंच सकता और तेरे इस इस्तेहक़ाक़ के मुक़ाबले में जो बरबिनाए फ़ज़्ल व एहसान है , क़ासिर ही रहता है , जब यह सूरत है तो तेरे सबसे ज़्यादा शुक्रगुज़ार बन्दे भी अदाए शुक्र से आजिज़ और सबसे ज़्यादा इबादतगुज़ार भी दरमान्दा साबित होंगे। कोई इस्तेहक़ाक़ ही नहीं रखता के तू उसके इस्तेहक़ाक़ की बिना पर , बख़्श दे या उसके हक़ की वजह से उससे ख़ुश हो , जिसे तूने बख़्श दिया तो यह तेरा इनआम है , और जिससे तू राज़ी हो गया तो यह तेरा फ़ज़्ल है। जिस अमले क़लील को तू क़ुबूल फ़रमाता है उसकी जज़ा फ़रावां देता है और मुख़्तसर इबादत पर भी सवाब मरहमत फ़रमाता है यहां तक के गोया बन्दों का वह शुक्र बजा लाना जिसके मुक़ाबले में तूने अज्र व सवाब को ज़रूरी क़रार दिया और जिसके एवज़ उनको अज्र अज़ीम अता किया एक ऐसी बात थी के इस शुक्र से दस्ता बरदार होना उनके इख़्तियार में था तो इस लेहाज़ से तूने अज्र दिया (के उन्होंने बइख़्तेयार ख़ुद शुक्र अदा किया) या यह के अदाए शुक्र के असबाब तेरे क़बज़ए क़ुदरत में न थे (और उन्होंने ख़ुद असबाबे शुक्र मुहय्या किये) जिस पर तूने उन्हें जज़ा मरहमत फ़रमाई (ऐसा तो नहीं है) बल्के ऐ मेरे माबूद! तू उनके जुमला उमूर का मालिक था , क़ब्ल इसके के वह तेरी इबादत पर क़ादिर व तवाना हों और तूने उनके लिये अज्र व सवाब को मुहय्या कर दिया था क़ब्ल इसके के वह तेरी इताअत में दाखि़ल हों और यह इसलिये के तेरा तरीक़ाए इनआम व इकराम तेरी आदते तफ़ज़्ज़ुल व एहसान और तेरी रौशन अफ़ो व दरगुज़र है। चुनांचे तमाम कायनात उसकी मारेफ़त है के तू जिस पर अज़ाब करे उस पर कोई ज़ुल्म नहीं करता और गवाह है इस बात की के जिसको तू मुआफ़ कर दे उस पर तफ़ज़्ज़ुल व एहसान करता है। और हर षख़्स इक़रार करेगा , अपने नफ्स की कोताही का उस (इताअत) के बजा लाने में जिसका तू मुस्तहेक़ है। अगर शैतान उन्हें तेरी इबादत से न बहकाता तो फिर कोई शख़्स तेरी नाफ़रमानी न करता और अगर बातिल को हक़ के लिबास में उनके सामने पेश न करता तो तेरे रास्ते से कोई गुमराह न होता। पाक है तेरी ज़ात , तेरा लुत्फ़ व करम , फ़रमाबरदार हो या गुनहगार हर एक के मामले में किस क़द्र आशकारा है। यूं के इताअत गुज़ार को उस अमले ख़ैर पर जिस के असबाब तूने ख़ुद फ़राहम किये हैं जज़ा देता है और गुनहगार को फ़ौरी सज़ा देने का इख़्तेयार रखते हुए फिर मोहलत देता है। तूने फ़रमाबरदार व नाफ़रमान दोनों को वह चीज़ेंदी हैं जिनका उन्हें इस्तेहक़ाक़ न था। और इनमें से हर एक पर तूने वह फ़ज़्ल व एहसान किया है जिसके मुक़ाबले में उनका अमल बहुत कम था। और अगर तू इताअत गुज़ार को सिर्फ़ उन आमाल पर जिनका सरो सामान तूने मुहय्या किया है जज़ा देता तो क़रीब था के वह सवाब को अपने हाथ से खो देता और तेरी नेमतें उससे ज़ायल हो जातीं लेकिन तूने अपने जूद व करम से फ़ानी व कोताह मुद्दत के आमाल के एवज़ तूलानी व जावेदानी मुद्दत का अज्र्र व सवाब बख़्शा और क़लील व ज़वाल पज़ीद आमाल के मुक़ाबले में दाएमी व सरी जज़ा मरहमत फ़रमाई , फिर यह के तेरे ख़्वाने नेमत से जो रिज़्क़ खाकर उसने तेरी इताअत पर क़ूवत हासिल की उसका कोई एवज़ तूने नहीं चाहा और जिन आज़ा व जवारेह से काम लेकर तेरी मग़फ़ेरत तक राह पैदा की उसका सख़्ती से कोई मुहासेबा नहीं किया। और अगर तू ऐसा करता तो इसकी तमाम मेहनतों का हासिल और सब कोशिशों का नतीजा तेरी नेमतों और एहसानों में से एक अदना व मामूली क़िस्म की नेमत के मुक़ाबले में ख़त्म हो जाता और बक़िया नेमतों के लिये तेरी बारगाह में गिरवी होकर रह जाता (यानी उसके पास कुछ न होता के अपने को छुड़ाता) तो ऐसी सूरत में वह कहां तेरे किसी सवाब का मुस्तहेक़ हो सकता था ? नहीं! वह कब मुस्तहक़ हो सकता था।

ऐ मेरे माबूद! यह तो तेरी इताअत करने वाले का हाल और तेरी इबादत करने वाले की सरगुज़श्त है और वह जिसने तेरे एहकाम की खि़लाफ़वर्ज़ी की और तेरे मुनहेयात का मुरतकिब हुआ उसे भी सज़ा देने में तूने जल्दी नहीं की ताके वह मासियत व नाफ़रमानी की हालत को छोड़कर तेरी इताअत की तरफ़ रूजु हो सके। सच तो यह है के जब पहले पहल उसने तेरी नाफ़रमानी का क़स्द किया था जब ही वह हर उस सज़ा का जिसे तूने तमाम ख़ल्क़ के लिये मुहय्या किया है मुस्तहेक़ हो चुका था तो हर वह अज़ाब जिसे तूने उससे रोक लिया सज़ा व उक़ूबत का हर वह जुमला जो उससे ताख़ीर में डाल दिया , यह तेरा अपने हक़ से चश्मपोशी करना और इस्तेहक़ाक़ से कम पर राज़ी होना है।

ऐ मेरे माबूद! ऐसी हालत में तुझसे बढ़कर कौन करीम हो सकता है और उससे बढ़कर के जो तेरी मर्ज़ी के खि़लाफ़ तबाह व बरबाद हो कौन बदबख़्त हो सकता है ? नहीं! कौन है जो उससे ज़्यादा बदबख़्त हो। तू मुबारक है के तेरी तौसीफ़ लुत्फ़ व एहसान ही के साथ हो सकती है। और तू बुलन्दतर है इससे के तुझसे अद्ल व इन्साफ़ के खि़लाफ़ का अन्देशा हो जो शख़्स तेरी नाफ़रमानी करे तुझसे यह अन्देशा हो ही नहीं सकता के तू उस पर ज़ुल्म व जौर करेगा और न उस शख़्स के बारे में जो तेरी रिज़ा व ख़ुशनूदी को मलहूज़ रखे तुझसे हक़तलफ़ी का ख़ौफ़ हो सकता है , तू मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मेरी आरज़ूओं को बर ला और मेरे लिये हिदायत और रहनुमाई में इतना इज़ाफ़ा फ़रमा के मैं अपने कामों में तौफ़ीक़ से हमकिनार हूँ इसलिये के तू नेमतों का बख़्शने वाला और लुत्फ़ व करम करने वाला है।

अढ़तीसवीं दुआ

बन्दों की हक़तलफ़ी और उनके हुक़ूक़ में कोताही से माज़ेरत तलबी और दोज़ख़ से गुलू ख़लासी के लिये यह दुआ पढ़ते

बारे इलाहा! मैं उस मज़लूम की निस्बत जिस पर मेरे सामने ज़ुल्म किया गया हो और मैंने उसकी मदद न की हो और मेरे साथ कोई नेकी की गई हो और मैंने उसका शुक्रिया अदा न किया हो और उस बदसुलूकी करने वाले की बाबत जिसने मुझसे माज़ेरत की हो और मैंने उसके उज़्र को न माना हो , और फ़ाक़ाकश के बारे में जिसने मुझसे मांगा हो और मैंने उसे तरजीह न दी हो और उस हक़दार मोमिन के हक़ के मुताल्लिक़ जो मेरे ज़िम्मे हो और मैंने अदा न किया हो और उस मर्दे मोमिन के बारे में जिसका कोई ऐब मुझ पर ज़ाहिर हुआ हो और मैंने उस पर पर्दा न डाला हो। और हर उस गुनाह से जिससे मुझे वास्ता पड़ा हो और मैंने उससे किनाराकशी न की हो , तुझसे उज़्रख़्वाह हूं।

बारे इलाहा! मैं उन तमाम बातों से और उन जैसी दूसरी बातों से शर्मसारी व निदामत के साथ ऐसी माज़ेरत करता हूं जो मेरे लिये उन जैसी पेश आईन्द चीज़ों के लिये पन्द व नसीहत करने वाली हो। तू मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और लग़्िज़शों से जिनसे मैं दो-चार हुआ हूं मेरी पशेमानी को और पेश आने वाली बुराईयों से दस्तबरदार होने के इरादे को ऐसी तौबा क़रार दे जो मेरे लिये तेरी मोहब्बत का बाएस हो। ऐ तौबा करने वालों को दोस्त रखने वाले।

उन्तालीसवीं दुआ

तलबे अफ़ो व रहमत के लिये यह दुआ पढ़ते

बारे इलाहा! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हर अम्रे हराम से मेरी ख़्वाहिश (का ज़ोर) तोड़ दे और हर गुनाह से मेरी हिरस का रूख़ मोड़ दे और हर मोमिन और मोमिना , मुस्लिम और मुस्लिमा की ईज़ारसानी से मुझे बाज़ रख।

ऐ मेरे माबूद! जो बन्दा भी मेरे बारे में ऐसे अम्र का मुरतकिब हो जिसे तूने उस पर हराम किया था और मेरी इज़्ज़त पर हमलावर हुआ हो जिससे तूने उसे मना किया था। मेरा मज़लेमा लेकर दुनिया से उठ गया हो या हालते हयात में उसके ज़िम्मे बाक़ी हो तो उसने मुझ पर जो ज़ुल्म किया है उसे बख़्श दे और मेरा जो हक़ लेकर चला गया है , उसे माफ़ कर दे और मेरी निस्बत जिस अम्र का मुरतकिब हुआ है उस पर उसे सरज़न्श न कर और मुझे अर्ज़दह करने के बाएस उसे रूसवा न फ़रमा और जिस अफ़ो व दरगुज़र की मैंने उनके लिये कश की है और जिस करम व बख़्शिश को मैंने उनके लिये रवा रखा है उसे सदक़ा करने वालों के सदक़े से पाकीज़ातर और तक़र्रूब चाहने वालों के अतियों से बलन्दतर क़रार दे और इस अफ़ो व दरगुज़र के एवज़ तू मुझसे दरगुज़र कर और उनके लिये दुआ करने के सिले में मुझे अपनी रहमत से सरफ़राज़ फ़रमा ताके हम में से हर एक तेरे फ़ज़्ल व करम की बदौलत ख़ुश नसीब हो सके और तेरे लुत्फ़ व एहसान की वजह से नजात पा जाए।

ऐ अल्लाह! तेरे बन्दों में से जिस किसी को मुझसे कोई ज़रर पहुंचा हो या मेरी जानिब से कोई अज़ीयत पहुंची हो या मुझसे या मेरी वजह से उस पर ज़ुल्म हुआ हो इस तरह के मैंने उसके किसी हक़ को ज़ाया किया हो या उसके किसी मज़ालिमे की दादख़्वाही न की हो। तू मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और अपनी ग़िना व तवंगरी के ज़रिये उसे मुझसे राज़ी कर दे और अपने पास से उसका हक़ बे कम व कास्त अदा कर दे। फिर यह के उस चीज़ से जिसका तेरे हुक्म के तहत सज़ावार हूं , बचा ले और जो तेरे अद्ल का तक़ाज़ा है उससे निजात दे , इसलिये के मुझे तेरे अज़ाब के बरदाश्त करने की ताब नहीं और तेरी नाराज़गी के झेल ले जाने की हिम्मत नहीं। लेहाज़ा अगर तू मुझे हक़ व इन्साफ़ की रू से बदला देगा तो मुझे हलाक कर देगा। और अगर दामने रहमत में नहीं ढांपेगा तो मुझे तबाह कर देगा।

ऐ अल्लाह! ऐ मेरे माबूद! मैं तुझसे उस चीज़ का तालिब हूं जिसके अता करने से तेरे हाँ कुछ कमी नहीं होती और वह बार तुझ पर रखना चाहता हूँ जो तुझे गरांबार नहीं बनाता और तुझसे इस जान की भीक मांगता हूं जिसे तूने इसलिये पैदा नहीं किया के उसके ज़रिये ज़रर व ज़ेयां से तहफ़्फ़ुज़ करे या मुनफ़अत की राह निकाले बल्कि इसलिये पैदा किया ताके इस अम्र का सुबूत बहम पहुंचाए और इस बात पर दलील लाए के तू इस जैसी और इस तरह की मख़लूक़ पैदा करने पर क़ादिर व तवाना है और तुझसे इस अम्र का ख़्वास्तगार हूं के मुझे उन गुनाहों से सुबकबार कर दे जिनका बार मुझे हलकान किये हुए है और तुझसे मदद मांगता हूं उस चीज़ की निस्बत जिसकी गरांबारी ने मुझे आजिज़ कर दिया है। तू मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मेरे नफ़्स को बावजूद यह के उसने ख़ुद अपने ऊपर ज़ुल्म किया है , बख़्श दे और अपनी रहमत को मेरे गुनाहों का बारे गराँ उठाने पर मामूर कर इसलिये के कितनी ही मरतबा तेरी रहमत गुनहगारों के हमकिनार और तेरा अफ़ो व करम ज़ालिमों के शामिले हाल रहा है। तू मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे उन लोगों के लिये नमूना बना जिन्हें तूने अपने अफ़ो के ज़रिये ख़ताकारों के गिरने के मक़ामात से ऊपर उठा लिया। और जिन्हें तूने अपनी तौफ़ीक़ से गुनहगारों के मोहलकों से बचा लिया तो वह तेरे अफ़ो व बख़्शिश के वसीले से तेरी नाराज़गी के बन्धनों से छूट गए और तेरे एहसान की बदौलत अद्ल की लग़्िज़शों से आज़ाद हो गए।

ऐ मेरे अल्लाह! अगर तू मुझे माफ़ कर दे तो तेरा यह सुलूक उसके साथ होगा जो सज़ावारे उक़ूबत होने से इन्कारी नहीं है और न मुस्तहेक़े सज़ा होने से अपने को बरी समझता है। यह तेरा बरताव उसके साथ होगा ऐ मेरे माबूद। जिसका ख़ौफ़ उम्मीदे अफ़ो से बढ़ा हुआ है और जिसकी निजात से नाउम्मीदी , रेहाई की तवक़्क़ो से क़वीतर है। यह इसलिये नही ंके उसकी ना उम्मीदी रहमत से मायूसी हो या यह के उसकी उम्मीद फ़रेबख़ोरदगी का नतीजा हो बल्कि इसलिये के उसकी बुराइयां नेकियों के मुक़ाबले में कम और गुनाहों के तमाम मवारिद में उज़्र ख़्वाही के वजूह कमज़ोर हैं। लेकिन ऐ मेरे माबूद! तू इसका सज़ावार है के रास्तबाज़ लोग भी तेरी रहमत पर मग़रूर होकर फ़रेब न खाएं और गुनहगार भी तुझसे नाउम्मीद न हों। इसलिये के तू वह रब्बे अज़ीम है के किसी पर फ़ज़्ल व एहसान से दरीख़ नहीं करता और किसी से अपना हक़ पूरा पूरा वसूल करने के दरपै नहीं होता। तेरा ज़िक्र तमाम नाम आवरों (के ज़िक्र) से बलन्दतर है और तेरे असमाअ इससे के दूसरे हसब व नसब वाले उनसे मौसूम हों मुनज़्जह हैं। तेरी नेमतें तमाम कायनात में फैली हुई हैं। लेहाज़ा इस सिलसिले में तेरे ही लिये हम्द व सताइश है। ऐ तमाम जहान के परवरदिगार।

चालीसवीं दुआ

जब किसी की ख़बरे मर्ग सुनते या मौत को याद करते तो यह दुआ पढ़ते

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमें तूल तवील उम्मीदों से बचाए रख और पुरख़ुलूस आमाल के बजा लाने से दामने उम्मीद को कोताह कर दे ताके हम एक घड़ी के बाद दूसरी घड़ी के तमाम करने , एक दिन के बाद दूसरे दिन के गुज़ारने , एक सांस के बाद दूसरी सांस के आने और एक क़दम के बाद दूसरे क़दम के उठने की आस न रखें। हमें फ़रेब आरज़ू और फ़ित्नाए उम्मीद से महफ़ूज़ व मामून रख। और मौत को हमारा नसबलऐन क़रार दे और किसी दिन भी हमें उसकी याद से ख़ाली न रहने दे और नेक आमाल में से हमें ऐसे अमले ख़ैर की तौफ़ीक़ दे जिसके होते हुए हम तेरी जानिब बाज़गश्त में देरी महसूस करें और जल्द से जल्द तेरी बारगाह में हाज़िर होने के आरज़ू मन्द हों। इस हद तक के मौत हमारे उन्स की मन्ज़िल हो जाए जिससे हम जी लगाएं और उलफ़त की जगह बन जाए जिसके हम मुश्ताक़ हों और ऐसी अज़ीज़ हो जिसके क़रीब को हम पसन्द करें। जब तू उसे हम पर वारिद करे और हम पर ला उतारे तो उसकी मुलाक़ात के ज़रिये हमें सआदतमन्द बनाना और जब वह आए तो हमें उससे मानूस करना और उसकी मेहरबानी से हमें बदबख़्त न क़रार देना और न उसकी मुलाक़ात से हमको रूसवा करना और उसे अपनी मग़फ़ेरत के दरवाज़ों में से एक दरवाज़े और रहमत की कुन्जियों में से एक कलीद क़रार देना और हमें इस हालत में मौत आए के हम हिदायतयाफ़्ता हों गुमराह न हों। फ़रमाबरदार हों और (मौत से) नफ़रत करने वाले न हों , तौबागुज़ार हों ख़ताकार और गुनाह पर इसरार करने वाले न हों। ऐ नेकोकारों के अज्र व सवाब का ज़िम्मा लेने वाले और बदकिरदारों के अमल व किरदार की इस्लाह करने वाले।

इकतालीसवीं दुआ

पर्दापोशी और हिफ़्ज़ व निगेहदाश्त के लिये यह दुआ पढ़ते

बारे इलाहा रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और मेरे लिये एज़ाज़ व इकराम की मसनद बिछा दे , मुझे रहमत के सरचश्मों पर उतार दे , वुसते बेहिश्त में जगह दे और अपने हाँ से नाकाम पलटाकर रन्जीदा न कर और अपनी रहमत से नाउम्मीद करके हरमाँ नसीब न बना दे। मेरे गुनाहों का क़सास न ले और मेरे कामों का सख़्ती से मुहासेबा न कर। मेरे छुपे हुए राज़ों को ज़ाहिर न फ़रमा और मेरे मख़फ़ी हालात पर से पर्दा न उठा और मेरे आमाल को अद्ल व इन्साफ़ के तराज़ू पर न तौल और अशराफ़ की नज़रों के सामने मेरी बातेनी हालत को आशकार न कर। जिसका ज़ाहिर होना मेरे लिये बाएसे नंग व आर हो वह उनसे छिपाए रख और तेरे हुज़ूर जो चीज़ ज़िल्लत व रूसवाई का बाएस हो वह उनसे पोशीदा रहने दे। अपनी रज़ामन्दी के ज़रिेये मेरे दर्जे को बलन्द और अपनी बख़्शिश के वसीले से मेरी बन्दगी व करामत की तकमील फ़रमा और उन लोगों के गिरोह में मुझे दाखि़ल कर जो दाएँ हाथ से नामाए आमाल लेने वाले हैं और उन लोगों की राह पर ले चल जो (दुनिया व आख़ेरत में) अम्न व आफ़ियत से हमकिनार हैं और मुझे कामयाब लोगों के ज़मरह में क़रार दे और नेकोकारों की महफ़िलों को मेरी वजह से आबाद व पुर रौनक़ बना। मेरी दुआ को क़ुबूल फ़रमा ऐ तमाम जहानों के परवरदिगार।

बयालीसवीं दुआ

दुआए ख़त्मुल क़ुरान

बारे इलाहा! तूने अपनी किताब के ख़त्म करने पर मेरी मदद फ़रमाई। वह किताब जिसे तूने नूर बनाकर उतारा और तमाम किताबे समाविया पर उसे गवाह बनाया और हर उस कलाम पर जिसे तूने बयान फ़रमाया उसे फ़ौक़ीयत बख़्शी और (हक़ व बातिल में) हद्दे फ़ासिल क़रार दिया जिसके ज़रिये हलाल व हराम अलग-अलग कर दिया। वह क़ुरान जिसके ज़रिये शरीयत के एहकाम वाज़ेह किये वह किताब जिसे तूने अपने बन्दों के लिये शरह व तफ़सील से बयान किया और वह वही (आसमानी) जिसे अपने पैग़म्बर सल्लल्लाहो अलैहे वालेहीवसल्लम पर नाज़िल फ़रमाया जिसे वह नूर बनाया जिसकी पैरवी से हम गुमराही व जेहालत की तारीकियों हिदायत हासिल करते हैं और उस शख़्स के लिये शिफ़ा क़रार दिया जो उस पर एतबार रखते हुए उसे समझना चाहते हैं और ख़ामोशी के साथ उसे सुने और वह अद्ल व इन्साफ़ का तराज़ू बनाया जिसका कांटा हक़ से इधर-उधर नहीं होता और वह नूरे हिदायत क़रार दिया जिसकी दलील व बुरहान की रोषनी (तौहीद व नबूवत की) गवाही देने वालों के लिये बुझती नहीं और वह निजात का निशान बनाया के जो उसके सीधे तरीक़े पर चलने का इरादा करे वह गुमराह नहीं होता और जो उसकी दीसमान के बन्धन से वाबस्ता हो वह (ख़ौफ़ व फ़क्र व अज़ाब की) हलाकतों की दस्तरसी से बाहर हो जाता है। बारे इलाहा! जबके तूने उसकी तिलावत के सिलसिले में हमें मदद पहुंचाई और उसके हुस्ने अदायगी के लिये हमारी ज़बान की गिरहें खोल दीं तो फिर हमें उन लोगों में से क़रार दे जो उसकी पूरी तरह हिफ़ाज़त व निगेहदाश्त करते हों और उसकी मोहकम आयतों के एतराफ़ व तस्लीम की पुख़्तगी के साथ तेरी इताअत करते हों और मुतशाबेह आयतों और रोशन व वाज़ेह दलीलों के इक़रार के साये में पनाह लेते हों।

ऐ अल्लाह! तूने उसे अपने पैग़म्बर मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैह वआलेही वसल्लम पर इजमाल के तौर पर उतारा और उसके अजाएब व इसरार का पूरा-पूरा आलम उन्हें अलक़ा किया और उसके इल्मे तफ़सीली का हमें वारिस क़रार दिया , और जो इसका इल्म नहीं रखते उन पर हमें फ़ज़ीलत दी। और उसके मुक़तज़ीयात पर अमल करने की क़ूवत बख़्शी ताके जो उसके हक़ाएक़ के मुतहम्मिल नहीं हो सकते उन पर हमारी फ़ौक़ीयत व बरतरी साबित कर दे।

ऐ अल्लाह! जिस तरह तूने हमारे दिलों को क़ुरान का हामिल बनाया और अपनी रहमत से उसके फ़ज़्ल व शरफ़ से आगाह किया यूँ ही मोहम्मद (स 0) पर जो क़ुरान के ख़ुत्बा ख़्वाँ , और उनकी आल (अ 0) पर जो क़ुरान के ख़ज़ीनेदार हैं रहमत नाज़िल फ़रमा और हमें उन लोगों में से क़रार दे जो यह इक़रार करते हैं के यह तेरी जानिब से है ताके इसकी तस्दीक़ में हमें शक व शुबह लाहक़ न हो और उसके सीधे रास्ते से रूगर्दानी का ख़याल भी न आने पाए।

ऐ अल्लाह। मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमें उन लोगों में से क़रार दे जो उसकी रीसमान से वाबस्ता उमूर में उसकी मोहकम पनाहगाह का सहारा लेते और उसके परों के ज़ेरे साया मन्ज़िल करते , इसकी सुबह दरख़्शां की रोशनी से हिदायत पाते और उसके नूर की दरख़्शन्दगी पैरवी करते और उसके चिराग़ से चिराग़ जलाते हैं और उसके अलावा किसी से हिदायत के तालिब नहीं होते।

बारे इलाहा! जिस तरह तूने इस क़ुरान के ज़रिये मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैह वआलेही वसल्लम को अपनी रहनुमाई का निशान बनाया है और उनकी आल (अ 0) के ज़रिये अपनी रज़ा व ख़ुशनूदी की राहें आशकार की हैं यूंही मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमारे लिये क़ुरान को इज़्ज़त व बुज़ुर्गी की बलन्दपाया मन्ज़िलों तक पहुंचने का वसीला और सलामती के मक़ाम तक बलन्द होने का ज़ीना और मैदाने हश्र में निजात को जज़ा में पाने का सबब और महल्ले क़याम (जन्नत) की नेमतों तक पहुंचने का ज़रिया क़रार दे।

ऐ अल्लाह। मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और क़ुरान के ज़रिये गुनाहों का भारी बोझ हमारे सर से उतार दे और नेकोकारों के अच्छे ख़साएल व आदात हमें मरहमत फ़रमा और उन लोगों के नक़्शे क़दम पर चला जो तेरे लिये रात के लम्हों और सुबह व शाम (की साअतों) में उसे अपना दस्तूरूल अमल बनाते हैं ताके उसकी ततहीर के वसीले से तू हमें हर आलूदगी से पाक कर दे और इन लोगों के नक़्शे क़दम पर चलाए , जिन्होंने उसके नूर से रोशनी हासिल की है। और उम्मीदों ने उन्हें अमल से ग़ाफ़िल नहीं होने दिया के उन्हें अपने क़रीब की नैरंगियों से तबाह कर दें।

ऐ अल्लाह। मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और क़ुरान को रात की तारीकियों में हमारा मोनिस और शैतान के मफ़सनदों और दिल में गुज़रने वाले वसवसों से निगेहबानी करने और हमारे क़दमों को नाफ़रमानियों की तरफ़ बढ़ने से रोक देने वाला और हमारी ज़बानों को बातिल पैमाइयों से बग़ैर किसी मर्ज़ के गंग कर देने वाला और हमारे आज़ा को इरतेकाब गुनाह से बाज़ रखने वाला और हमारी ग़फ़लत व मदहोशी ने जिस दफ़्तरे इबरत व पन्द अन्दोज़ी को तह कर रखा है , उसे फैलाने वाला क़रार दे ताके उसके अजाएब व रमूज़ की हक़ीक़तों और उसकी मुतनब्बेह करने वाली मिसालों को के जिन्हें उठाने से पहाड़ अपने इस्तेहकाम के बावजूद आजिज़ आ चुके हैं हमारे दिलों में उतार दे।

ऐ अल्लाह। मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और क़ुरान के ज़रिये हमारे ज़ाहिर को हमेशा सलाह व रशद से आरास्ता रख और हमारे ज़मीर की फ़ितरी सलामती से ग़लत तसव्वुरात की दख़ल दरान्दाज़ी को रोक दे और हमारे दिलों की कसाफ़तों और गुनाहों की आलूदगियों को धो दे और उसके ज़रिये हमारे परागन्दा उमूर की शीराज़ा बन्दी कर और मैदाने हश्र में हमारी झुलसती हुई दोपहरों की तपिश व तशनगी बुझा दे और सख़्त ख़ौफ़ व हेरास के दिन जब क़ब्रों से उठें तो हमें अम्न व आफ़ियत के जामे पहना दे।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और क़ुरान के ज़रिये फ़क्ऱो एहतियाज की वजह से हमारी ख़स्तगी व बदहाली का तदारूक फ़रमा और ज़िन्दगी की कशाइश और फ़राख़ रोज़ी की आसूदगी का रूख़ हमारे जानिब फेर दे और बुरी आदात और पस्त इख़लाक़ से हमें दूर कर दे और कुफ्ऱ के गढ़े (में गिरने) और निफ़ाक़ अंगेज़ चीज़ों से बचा ले ताके वह हमें क़यामत में तेरी ख़ुशनूदी व जन्नत की तरफ़ बढ़ाने वाला और दुनिया में तेरी नाराज़गी और हुदूद शिकनी से रोकने वाला हो और इस अम्र पर गवाह हो के जो चीज़ तेरे नज़दीक हलाल थी उसे हलाल जाना और जो हराम थी उसे हराम समझा।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और क़ुरान के वसीले से मौत के हंगामे नज़अ की अज़ीयतों , कराहने की सख़्तियों और जाँकनी की लगातार हिचकियों को हम पर आसान फ़रमा जबके जान गले तक पहुंच जाए और कहा जाए के कोई झाड़ फूंक करने वाला है (जो कुछ तदारूक करे) और मलकुल मौत ग़ैब के पर्दे चीर कर क़ब्ज़े रूह के लिये सामने आए और मौत की कमान में फ़िराक़ की दहशत के तीर जोड़कर अपने निशाने की ज़द पर रख ले और मौत के ज़हरीले जाम में ज़हरे हलाहल घोल दे और आख़ेरत की तरफ़ हमारा चल-चलाव और कूच क़रीब हो और हमारे आमाल हमारी गर्दन का तौक़ बन जाएं और क़ब्रें रोज़े हष्र की साअत तक आरामगाह क़रार पाएं।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और कहन्गी व बोसीदगी के घर में उतरने और मिट्टी की तहों में मुद्दत तक पड़े रहने को हमारे लिये मुबारक करना और दुनिया से मुंह मोड़ने के बाद क़ब्रों को हमारा अच्छा घर बनाना और अपनी रहमत से हमारे लिये गौर की तंगी को कुशादा कर देना और हश्र के आम इज्तेमाअ के सामने हमारे मोहलक गुनाहों की वजह से हमें रूसवा न करना और आमाल के पेश होने के मक़ाम पर हमारी ज़िल्लत व ख़्वारी की वज़ा पर रहम फ़रमाना और जिस दिन जहन्नम के पुल पर से गुज़रना होगा , तो उसके लड़खड़ाने के वक़्त हमारे डगमगाते हुए क़दमों को जमा देना और क़यामत के दिन हमें उसके ज़रिये हर अन्दोह और रोज़े हश्र की सख़्त हौलनाकियों से निजात देना और जब के हसरत व निदामत के दिन ज़ालिमों के चेहरे सियाह होंगे हमारे चेहरों को नूरानी करना और मोमेनीन के दिलों में हमारी मोहब्बत पैदा कर दे और ज़िन्दगी को हमारे लिये दुश्वारगुज़ार न बना।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) जो तेरे ख़ास बन्दे और रसूल (स 0) हैं उन पर रहमत नाज़िल फ़रमा जिस तरह उन्होंने तेरा पैग़ाम पहुंचाया , तेरी शरीयत को वाज़ेह तौर से पेश किया और तेरे बन्दों को पन्द व नसीहत की। ऐ अल्लाह! हमारे नबी सल्लल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम को क़यामत के दिन तमाम नबियों से मन्ज़िलत के लेहाज़ से मुक़र्रबतर शिफ़ाअत के लेहाज़ से बरतर , क़द्र व मन्ज़िलत के लेहाज़ से बुज़ुर्गतर और जाह व मरतबत के एतबार से मुमताज़तर क़रार दे।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और उनके ऐवान (अज़्ज़ व शरफ़) को बलन्द , उनकी दलील व बुरहान को अज़ीम और उनके मीज़ान (अमल के पल्ले) को भारी कर दे। उनकी शिफ़ाअत को क़ुबूल फ़रमा और उनकी मन्ज़िलत को अपने से क़रीब कर , उनके चेहरे को रौशन , उनके नूर को कामिल और उनके दरजे को बलन्द फ़रमा। और हमें उन्हीं के आईन पर ज़िन्दा रख और उन्हीं के दीन पर मौत दे और उन्हीं की षाहेराह पर गामज़न कर और उन्हीं के रास्ते पर चला और हमें उनके फ़रमाबरदारों में से क़रार दे और उनकी जमाअत में महशूर कर और उनके हौज़ पर उतार और उनके साग़र से सेराब फ़रमा।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर ऐसी रहमत नाज़िल फ़रमा जिसके ज़रिये उन्हें बेहतरीन नेकी , फ़ज़्ल और इज़्ज़त तक पहुंचा दे जिसके वह उम्मीदवार हैं। इसलिये के तू वसीअ रहमत और अज़ीम फ़ज़्ल व एहसान का मालिक है। ऐ अल्लाह! उन्होंने जो तेरे पैग़ामात की तबलीग़ की , तेरी आयतों को पहुचाया , तेरे बन्दों को पन्द व नसीहत की और तेरी राह में जेहाद किया। इन सबकी उन्हें जज़ा दे जो हर उस जज़ा से बेहतर हो जो तूने मुक़र्रब फ़रिश्तों और बरगुज़ीदा मुरसल नबीयों को अता की हो। उन पर और उनकी पाक व पाकीज़ा आल (अ 0) पर सलाम हो और अल्लाह तआला की रहमतें और बरकतें उनके शामिले हाल हों।

तेंतालीसवीं दुआ

दुआए रोयते हेलाल (चाँद देखना)

ऐ फ़रमाबरदार , सरगर्मे अमल और तेज़ रौ मख़लूक़ और मुक़रर्रा मन्ज़िलों में यके बाद दीगरे वारिद होने और फ़लक नज़्म व तदबीरें तसरूफ़ करने वाले मैं उस ज़ात पर ईमान लाया जिसने तेरे ज़रिये तारीकियों को रौषन और ढकी छिपी चीज़ों को आशकार किया और तुझे अपनी शाही व फ़रमानरवाई की निशानियों में से एक निशानी और अपने ग़लबे व इक़्तेदार की अलामतों में से एक अलामत क़रार दिया और तुझे बढ़ने , घटने , निकलने , छिपने और चमकने गहनाने से तसख़ीर किया। इन तमाम हालात में तू उसके ज़ेरे फ़रमान और उसके इरादे की जानिब रवां दवां है। तेरे बारे में उसकी तदबीर व कारसाज़ी कितनी अजीब और तेरी निस्बत उसकी सनाई कितनी लतीफ़ है , तुझे पेश आईन्द हालात के लिये नये महीने की कलीद क़रार दिया। तो अब मैं अल्लाह तआला से जो मेरा परवरदिगार , मेरा ख़ालिक़ और तेरा ख़ालिक़ मेरा नक़्श आरा और तेरा नक़्श आरा और मेरा सूरतगर और तेरा सूरत गर है सवाल करता हूं के वह रहमत नाज़िल करे मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और तुझे ऐसी बरकत वाला चान्द क़रार दे , जिसे दिनों की गर्दिशें ज़ाएल न कर सकें और ऐसी पाकीज़गी वाला जिसे गुनाह की कशाफ़तें आलूदा न कर सकें। ऐसा चान्द जो आफ़तों से बरी और बुराइयों से महफ़ूज़ हो। सरासर यमन व सआदत का चान्द जिस में ज़रा नहूसत न हो और सरापा ख़ैर व बरकत का चान्द जिसे तंगी व उसरत से कोई लगाव न हो और ऐसी आसानी व कशाइश का जिस में दुश्वारी की आमेज़िश न हो और ऐसी भलाई का जिसमें बुराई का शाएबा न हो। ग़रज़ सर ता पा अम्न , ईमान , नेमत , हुस्ने अमल , सलामती और इताअत व फ़रमा बरदारी का चान्द हो , ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और जिन जिन पर यह अपना परतो डालें उनसे बढ़कर हमें ख़ुशनूद और जो जो उसे देखे उन सबसे ज़्यादा दुरूस्तकार और जो जो जो इस महीने में तेरी इबादत करे उन सबसे ज़्यादा ख़ुशनसीब क़रार दे। और हमें इसमें तौबा की तौफ़ीक़ दे और गुनाहों से दूर और मासियत के इरतेकाब से महफ़ूज़ रखे और हमारे दिल में अपनी नेमतों पर अदाए शुक्र का वलवला पैदा कर और हमें अम्न व आफ़ियत की सिपर में ढांप ले और इस तरह हम पर अपनी नेमत को तमाम करके तेरी फ़राएज़े इताअत को पूरे तौर से अन्जाम दें। बेशक तू नेमतों का बख़्शने वाला और क़ाबिले सताइश है। रहमते फ़रावां नाज़िल करे अल्लाह मोहम्मद (स 0) और उनकी पाक व पाकीज़ा आल (अ 0)पर।


चौवालीसवीं दुआ

दुआए इस्तेक़बाले माहे रमज़ान

तमाम तारीफ़ उस अल्लाह के लिये है जिसने अपनी हम्द व सेपास की तरफ़ हमारी रहनुमाई की और हमें हम्दगुज़ारों में से क़रार दिया ताके हम उसके एहसानात पर शुक्र करने वालों में महसूब हों और हमें इस शुक्र के बदले में नेकोकारों का अज्र दे। उस अल्लाह तआला के लिये हम्द व सताइश है जिसने हमें अपना दीन अता किया और अपनी मिल्लत में से क़रार देकर इम्तियाज़ बख़्शा और अपने लुत्फ़ व एहसान की राहों पर चलाया। ताके हम उसके फ़ज़्ल व करम से उन रास्तों पर चल कर उसकी ख़ुशनूदी तक पहुंचें। ऐसी हम्द जिसे वह क़ुबूल फ़रमाए और जिसकी वजह से हम से वह राज़ी हो जाएं। तमाम तारीफ़ें उस अल्लाह के लिये है जिसने अपने लुत्फ़ व एहसान के रास्तों में से एक रास्ता अपने महीने को क़रार दिया। यानी रमज़ान का महीना , सेयाम का महीना , इस्लाम का महीना , पाकीज़गी का महीना , तसफ़ीह और ततहीर का महीना , इबादत व क़याम का महीना , वह महीना जिसमें क़ुरान नाज़िल हुआ। जो लोगों के लिये रहनुमा है। हिदायत और हक़ व बातिल के इम्तियाज़ की रौशन सदाक़तें रखता है। चुनांचे तमाम महीनों पर इसकी फ़ज़ीलत व बरतरी को आशकारा किया। इन फ़रावां इज़्ज़तों और नुमायां फ़ज़ीलतों की वजह से जो इसके लिये क़रार दीं। और इसकी अज़मत के इज़हार के लिये जो चीज़ें दूसरे महीनों में जाएज़ की थें इसमें हराम कर दी और इसके एहतेराम के पेशे नज़र खाने-पीने की चीज़ों से मना कर दिया और एक वाज़ेअ ज़माना इसके लिये मुअय्यन कर दिया। ख़ुदाए बुज़ुर्ग व बरतर यह इजाज़त नहीं देता के इसे उसके मुअय्यना वक़्त से आगे बढ़ाया जाए और न क़ुबूल करता है के इससे मोहर कर दिया जाए। फिर यह के इसकी रातों में से एक रात को हज़ार महीनों की रातों नी फज़ीलत दी और इसका नाम शबे क़द्र रखा। इस रात में फ़रिश्ते और रूह अलक़ुद्स हर उस अम्र के साथ जो उसका क़तई फ़ैसला होता है। इसके बन्दों में से जिसपर वह चाहता है नाज़िल होते हैं। वोह रात सरासर सलामती की रात है जिसकी बरकते तुलूए फ़ज्र तक दाएम व बरक़रार है। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमें हिदायत फ़रमा के हम इस महीने के फ़ज़्ल व शरफ़ को पहचानें , इसकी इज़्ज़त व हुरमत को बलन्द जानें और इसमें इन चीज़ों से जिनसे तूने मना किया है इज्तेनाब करें और इसके रोज़े रखने में हमारे आज़ा को नाफ़रमानियों से रोकने और कामों में मसरूफ रखने से जो तेरी ख़ुशनूदी का बाएस हों हमारी एआनत फ़रमा , ताके हम न बेहूदा बातों की तरफ़ कान लगाएं न फ़िज़ूल ख़र्ची की तरफ़ बे महाबा निगाहें उठाएं , न हराम की तरफ़ हाथ बढ़ाएं न अम्रे ममनूअ की तरफ़ पेश क़दमी करें न तेरी हलाल की हुई चीज़ों के अलावा किसी चीज़ को हमारे शिकम क़ुबूल करें और न तेरी बयान की हुई बातों के सिवा हमारी ज़बानें गोया हों। सिर्फ़ उन चीज़ों के बजा लाने का बार उठाएं जो तेरे सवाब से क़रीब करें और सिर्फ़ उन कामों को अन्जाम दें जो तेरे अज़ाब से बचा ले जाएं फिर उन तमाम आमाल को रियाकारों की रियाकारी और शोहरत पसन्दों की शोहरत पसन्दी से पाक कर दे इस तरह के तेरे अलावा किसी को इनमें शरीक न करें और तेरे सिवा किसी से कोई मतलब न रखें। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमें इसमें नमाज़हाए पन्जगाना के औक़ात से इन हुदूद के साथ जो तूने मुअय्यन किये हैं और उन वाजेबात के साथ जो तूने क़रार दिये हैं और उन लम्हात के साथ जो तूने मुक़र्रर किये हैं आगाह फ़रमा और हमें उन नमाज़ों में उन लोगों के मरतबे पर फ़ाएज़ कर जो इन नमाज़ों के दरजाते आलिया हासिल करने वाले , इनके वाजेबात की निगेहदाश्त करने वाले और उन्हें इनके औक़ात में इसी तरीक़े पर जो तेरे अब्दे ख़ास और रसूल सल्लल्लाहो अलैह वालेही वसल्लम ने रूकूअ व सुजूद और उनके तमाम फ़ज़ीलत व बरतरी के पहलुओं में जारी किया था , कामिल और पूरी पाकीज़गी और नुमायां व मुकम्मल ख़ुशू व फ़रवतनी के साथ अदा करने वाले हैं। और हमें इस महीने में तौफ़ीक़ दे के नेकी व एहसान के ज़रिये अज़ीज़ों के साथ सिलाए रहमी और इनआम व बख़्शिश से हमसायों की ख़बरगीरी करें और अपने अमवाल को मज़लूमों से पाक व साफ़ करें और ज़कात देकर उन्हें पाकीज़ा तय्यब बना लें और यह के जो हमसे अलाहेदगी इख़्तियार करे उसकी तरफ़ दस्ते मसालेहत बढ़ाएं , जो हम पर ज़ुल्म करे उस से इन्साफ़ बरतें जो हमसे दुश्मनी करे उससे सुलह व सफ़ाई करें सिवाए उसके जिससे तेरे लिये और तेरी ख़ातिर दुश्मनी की गयी हो। क्योंके वह ऐसा दुश्मन है जिसे हम दोस्त नहीं रख सकते और ऐसे गिरोह का (फ़र्द) है जिससे हम साफ़ नहीं हो सकते। और हमें इस महीने में ऐसे पाक व पाकीज़ा आमाल के वसीले से तक़र्रूब हासिल करने की तौफ़ीक़ दे जिनके ज़रिये तू हमें गुनाहों से पाक कर दे और अज़ सरे नौ बुराइयों के इरतेकाब से बचा ले जाए। यहां तक के फ़रिश्ते तेरे तेरी बारगाह में जो आमाल नामे पेश करें वह हमारी हर क़िस्म की इताअतों और हर नौअ की इबादत के मुक़ाबले में सुबुक हों। ऐ अल्लाह मैं तुझसे इस महीने के हक़ व हुरमत और नीज़ उन लोगों का वास्ता देकर सवाल करता हूं जिन्होंने इस महीने में शुरू से लेकर इसके ख़त्म होने तक तेरी इबादत की हो वह मुक़र्रब बारगाह फ़रिश्ता हो या नबी मुरसल या कोई मर्द सालेह व बरगुज़ीदा के तू मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमाए और जिस इज़्ज़त व करामत का तूने अपने दोस्तों से वादा किया है उसका हमें अहल बना और जो इन्तेहाई इताअत करने वालों के लिये तूने अज्र मुक़र्रर किया है वह हमारे लिये मुक़र्रर फ़रमा और हमें अपनी रहमत से उन लोगों में शामिल कर जिन्होंने बलन्दतरीन मर्तबे का इस्तेहक़ाक़ पैदा किया। ऐ अल्लाह। मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमें इस चीज़ से बचाए रख के हम तौहीद में कज अन्देशी तेरी तमजीद व बुज़ुर्गी में कोताही , तेरे दीन में शक , तेरे रास्ते से बे राहरवी और तेरी हुरमत से लापरवाही करें और तेरे दुश्मन शैतान मरदूद से फ़रेबख़ोर्दगी का शिकार हों। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और जब के इस महीने की रातों में हर रात में तेरे कुछ ऐसे बन्दे होते हैं जिन्हें तेरा अफ़ो व करम आज़ाद करता है या तेरी बख़्शिश व दरगुज़र उन्हें बख़्श देती है। तू हमें भी उन्हीं बन्दों में दाखि़ल कर और इस महीने के बेहतरीन एहल व असहाब में क़रार दे। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और इस चान्द के घटने के साथ हमारे गुनाहों को भी महो कर दे और जब इसके दिन ख़त्म होने पर आएं तो हमारे गुनाहों का वबाल हमसे दूर कर दे ताके यह महीना इस तरह तमाम हो के तू हमें ख़ताओं से पाक और गुनाहों से बरी कर चुका हो। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और इस महीने में अगर हम हक़ से मुंह मोड़े तो हमें सीधा रास्ते पर लगा दे और कजरवी इख़्तियार करें तो हमारी इस्लाह व दुरूस्तगी फ़रमा और अगर तेरा दुश्मन शैतान हमारे गिर्द एहाता करे तो उसके पन्जे से छुड़ा ले। बारे इलाहा! इस महीने का दामन हमारी इबादतों से जो तेरे लिये बजा लाई गई हों , भर दे और इसके लम्हात को हमारी इताअतों से सजा दे और इसके दिनों में रोज़े रखने और इसकी रातों में नमाज़ें पढ़ने , तेरे हुज़ूर गिड़गिड़ाने तेरे सामने अज्ज़ व इलहाह करने और तेरे रू बरू ज़िल्लत व ख़्वारी का मुज़ाहेरा करने , इन सबमें हमारी मदद फ़रमा। ताके इसके दिन हमारे खि़लाफ़ ग़फ़लत की और इसकी रातें कोताही व तक़स्बर की गवाही न दें। ऐ अल्लाह! तमाम महीनों और दिनों में जब तक तू हमें ज़िन्दा रखे , ऐसा ही क़रार दे। और हमें उन बन्दों में शामिल फ़रमा जो फ़िरदौसे बरीं की ज़िन्दगी के हमेशा हमेशा के लिये वारिस होंगे। और व हके जो कुछ वह ख़ुदा की राह में दे सकते हैं , देते हैं। फिर भी उनके दिलों को यह खटका लगा रहता है के उन्हें अपने परवरदिगार की तरफ़ पलट कर जाना है। और उन लोगों में से जो नेकियों में जल्दी करते हैं और वोही तो वह लोग हैं जो भलाइयों में आगे निकल जाने वाले हैं। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर हर वक़्त और हर घड़ी और हर हाल में इस क़द्र रहमत नाज़िल फ़रमा जितनी तूने किसी पर नाज़िल की हो और उन सब रहमतों से दोगुनी चौगनी के जिसे तेरे अलावा कोई शुमार न कर सके। बेशक तू जो चाहता है वही करने वाला है।

(आप इस किताब को अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क पर पढ़ रहे है।)

पैंतालीसवीं दुआ

दुआए विदाए माहे रमज़ान

ऐ अल्लाह! ऐ वह जो (अपने एहसानात) का बदला नहीं चाहता। ऐ वह जो अता व बख़्शिश पर पशेमान नहीं होता। ऐ वह जो अपने बन्दों को (उनके अमल के मुक़ाबले में) नपा तुला अज्र नहीं देता। तेरी नेमतें बग़ैर किसी साबेक़ा इस्तेहक़ाक़ के हैं और तेरा अफ़ो व दरगुज़र तफ़ज़्ज़ुल व एहसान है। तेरा सज़ा देना ऐने अद्ल और तेरा फ़ैसला ख़ैर व बहबूदी का हामिल है। तू अगर देता है तो अपनी अता को मन्नत गुज़ारी से आलूदा नहीं करता और अगर मना कर देता है तो यह ज़ुल्म व ज़्यादती की बिना पर नहीं होता। जो तेरा षुक्र अदा करता है तू उसके षुक्र की जज़ा देता है। हालांके तू ही ने उसके दिल में शुक्रगुज़ारी का अलक़ा किया है और जो तेरी हम्द करता है उसे बदला देता है। हालांके तू ही ने उसे हम्द की तालीम दी है और ऐसे शख़्स की पर्दापोशी करता है के अगर चाहता तो उसे रूसवा कर देता , और ऐसे शख़्स को देता है के अगर चाहता तो उसे न देता। हालांके वह दोनों तेरी बारगाहे अदालत में रूसवा व महरूम किये जाने ही के क़ाबिल थे मगर तूने अपने अफ़आल की बुनियाद व तफ़ज़्ज़ुल व एहसान पर रखी है और अपने इक़्तेदार को अफ़ो व दरगुज़र की राह पर लगाया है। और जिस किसी ने तेरी नाफ़रमानी की तूने उससे बुर्दबारी का रवैया इख़्तेयार किया। और जिस किसी ने अपने नफ़्स पर ज़ुल्म का इरादा किया तूने उसे मोहलत दी , तू उनके रूजूअ होने तक अपने हिल्म की बिना पर मोहलत देता है और तौबा करने तक उन्हें सज़ा देने में जल्दी नहीं करता ताके तेरी मन्शा के खि़लाफ़ तबाह होने वाला तबाह न हो और तेरी नेमत की वजह से बदबख़्त होने वाला बदबख़्त न हो मगर उस वक़्त के जब उस पर पूरी उज़्रदारी और एतमामे हुज्जत हो जाए। ऐ करीम! यह (एतमामे हुज्जत) तेरे अफ़ो व दरगुज़र का करम और ऐ बुर्दबार तेरी शफ़क़्क़त व मेहरबानी का फ़ैज़ है तू ही है वह जिसने अपने बन्दों के लिये अफ़ो व बख़्शिश का दरवाज़ा खोला है और उसका नाम तौबा रखा है और तूने इस दरवाज़े की निशानदेही के लिये अपनी वही को रहबर क़रार दिया है ताके वह उस दरवाज़े से भटक न जाएं। चुनांचे ऐ मुबारक नाम वाले तूने फ़रमाया है के ख़ुदा की बारगाह में सच्चे दिल से तौबा करो। उम्मीद है के तुम्हारा परवरदिगार तुम्हारे गुनाहों को महो कर दे और तुम्हें उस बेहिश्त में दाखि़ल करे जिसके (मोहल्लात व बाग़ात के) नीचे नहरें बहती हैं। उस दिन जब ख़ुदा अपने रसूल स 0 और उन लोगों को जो उस पर ईमान लाए हैं रूसवा नहीं करेगा बल्कि उनका नूर उनके आगे आगे और उनकी दाई जानिब चलता होगा और वह लोग यह कहते होंगे के ऐ हमारे परवरदिगार! हमारे लिये हमारे नूर को कामिल फ़रमा और हमें बख़्श दें इसलिये के तू हर चीज़ पर क़ादिर है। तो अब जो इस घर में दाखि़ल होने से ग़फ़लत करे जबके दरवाज़ा खोला और रहबर मुक़र्रर किया जा चुका है तो इसका उज्ऱ व बहाना क्या हो सकता है ? तू वह है जिसने अपने बन्दों के लिये लेन देन में ऊंचे नरख़ों का ज़िम्मा ले लिया है और यह चाहा है के वह जो सौदा तुझसे करें उसमें उन्हें नफ़ा हो और तेरी तरफ़ बढ़ने और ज़्यादा हासिल करने में कामयाब हों। चुनांचे तूने के जो मुबारक नाम वाला और बलन्द मक़ाम वाला है। फ़रमाया है- ‘‘जो मेरे पास नेकी लेकर आएगा उसे उसका दस गुना अज्र मिलेगा और जो बुराई का मुरतकिब होगा तो उसको बुराई का बदला बस उतना ही मिलेगा जितनी बुराई है। ’’ और तेरा इरशाद है के ‘‘जो लोग अल्लाह तआला की राह में अपना माल ख़र्च करते हैं उनकी मिसाल उस बीज की सी है जिससे सात बालियां निकलें और हर बाली में सौ सौ दाने हों और ख़ुदा जिसके लिये चाहता है दुगना कर देता है ’’ और तेरा इरशाद है के - कौन है जो अल्लाह तआला को क़र्ज़े हसना दे ताके ख़ुदा उसके माल को कई गुना ज़्यादा करके अदा करे ’’ और ऐसी ही अफ़ज़ाइश इसनात के वादे पर मुश्तमिल दूसरी आयतें के जो तूने क़ुरान मजीद में नाज़िल की हैं और तू ही वह है जिसने वही व ग़ैब के कलाम और ऐसी तरग़ीब के ज़रिये के जो उनके फ़ायदे पर मुश्तमिल है ऐसे उमूर की तरफ़ उनकी रहनुमाई की के अगर उनसे पोशीदा रखता तो न उनकी आंखें देख सकतीं न उनके कान सुन सकते और न उनके तसव्वुरात वहां तक पहुंच सकते। चुनांचे तेरा इरशाद है के तुम मुझे याद रखो मैं भी तुम्हारी तरफ़ से ग़ाफ़िल नहीं होंगा और मेरा शुक्र अदा करते रहो और नाशुक्री न करो। और तेरा इरशाद है के ‘‘अगर नाशुक्री की तो याद रखो के मेरा अज़ाब सख़्त अज़ाब है ’’ और तेरा इरशाद है के ‘‘मुझसे दुआ मांगो तो मैं क़ुबूल करूंगा , वह लोग जो ग़ुरूर की बिना पर मेरी इबादत से मुंह मोड़ लेते हैं वह अनक़रीब ज़लील होकर जहन्नुम में दाखि़ल होंगे। ’’ चुनांचे तूने दुआ का नाम इबादत रखा और उसके तर्क को ग़ुरूर से ताबीर किया और उसके तर्क पर जहन्नुम में ज़लील होकर दाखि़ल होने से डराया। इसलिये उन्होंने तेरी नेमतों की वजह से तुझे याद किया। तेरे फ़ज़्ल व करम की बिना पर तेरा शुक्रिया अदा किया और तेरे हुक्म से तुझे पुकारा और (नेमतों में) तलबे अफ़ज़ाइश के लिये तेरी राह में सदक़ा दिया और तेरी यह रहनुमाई ही उनके लिये तेरे ग़ज़ब से बचाव और तेरी ख़ुशनूदी तक रसाई की सूरत थी। और जिन बातों की तूने अपनी जानिब से अपने बन्दों की राहनुमाई की है अगर कोई मख़लूक़ अपनी तरफ़ से दूसरे मख़लूक़ की ऐसी ही चीज़ों की तरफ़ राहनुमाई करता तो वह क़ाबिले वहसील होता। तो फिर तेरे ही लिये हम्द व सताइश है। जब तक तेरी हम्द के लिये राह पैदा होती रहे और जब तक हम्द के वह अल्फ़ाज़ जिनसे तेरी तहमीद की जा सके और हम्द के वह मानी जो तेरी हम्द की तरफ़ पलट सकें बाक़ी रहें। ऐ वह जो अपने फ़ज़्ल व एहसान से बन्दों की हम्द का सज़ावार हुआ है और उन्हें अपनी नेमत व बख़्शिश से ढांप लिया है। हम पर तेरी नेमतें कितनी आशकारा हैं और तेरा इनआम कितना फ़रावां है और किस क़द्र हम तेरे इनआम व एहसान से मख़सूस हैं। तूने उस दीन की जिसे मुन्तखि़ब फ़रमाया और उस तरीक़े की जिसे पसन्द फ़रमाया और उस रास्ते की जिसे आसान कर दिया हमें हिदायत की और अपने हां क़रीब हासिल करने और इज़्ज़त व बुज़ुर्गी तक पहुंचने के लिये बसीरत दी। बारे इलाहा! तूने इन मुन्तख़ब फ़राएज़ और मख़सूस वाजेबात में से माहे रमज़ान को क़रार दिया है। जिसे तूने तमाम महीनों में इम्तियाज़ बख़्श और तमाम वक़्तों और ज़बानों में उसे मुन्तख़ब फ़रमाया है। और इसमें क़ुरान और नूर को नाज़िल फ़रमाकर और ईमान को फ़रोग़ व तरक़्क़ी बख़्श कर उसे साल के तमाम औक़ात पर फ़ज़ीलत दी और इसमें रोज़े वाजिब किये और नमाज़ों की तरग़ीब दी और उसमें शबे क़द्र को बुज़ुर्गी बख़्शी जो ख़ुद हज़ार महीनों से बेहतर है। फिर इस महीने की वजह से तूने हमें तमाम उम्मतों पर तरजीह दी , और दूसरी उम्मतों के बजाए हमें इसकी फ़ज़ीलत के बाएस मुन्तख़ब किया। चुनान्चे हमने तेरे हुक्म से इसके दिनों में रोज़े रखे और तेरी मदद से इसकी रातें इबादत में बसर कीं। इस हालत में के हम इस रोज़ा नमाज़ के ज़रिये तेरी उस रहमत के ख़्वास्तगार थे जिसका दामन तूने हमारे लिये फैलाया है और उसे तेरे अज्र व सवाब का वसीला क़रार दिया और तू हर उस चीज़ के अता करने पर क़ादिर है जिसकी तुझसे ख़्वाहिश की जाए और हर उस चीज़ का बख़्शने वाला है जिसका तेरे फ़ज़्ल से सवाल किया जाए तू हर उस शख़्स से क़रीब है जो तुझसे क़ुर्ब हासिल करना चाहे। इस महीने ने हमारे दरम्यान क़ाबिले सताइश दिन गुज़ारे और अच्छी तरह हक़्क़े रफ़ाक़त अदा किया और दुनिया जहान के बेहतरीन फ़ायदों से हमें मालामाल किया फिर जब उसका ज़माना ख़त्म हो गया मुद्दत बीत गई और गिनती तमाम हो गई तो वह हमसे जुदा हो गया। अब हम उसे रूख़सत करते हैं उस शख़्स के रूख़सत करने की तरह जिसकी जुदाई हम पर शाक़ हो और जिसका जाना हमारे लिये ग़मअफ़ज़ा और वहशतअंगेज़ हुआ और जिसके अहद व पैमान की निगेहदाश्त इज़्ज़त व हुरमत का पास और उसके वाजिबुल अदा हक़ से सुबुकदोशी अज़ बस ज़रूरी हो। इसलिये हम कहते हैं ऐ अल्लाह के बुज़ुर्गतरीन महीने , तुझ पर सलाम। ऐ दोस्ताने ख़ुदा की ईद तुझ पर सलाम। ऐ औक़ात में बेहतरीन रफ़ीक़ और दिनों और साअतों में बेहतरीन महीने तुझ पर सलाम। ऐ वह महीने जिसमें उम्मीद बर आती हैं और आमाल की फ़रावानी होती है , तुझ पर सलाम , ऐ वह हम नशीन के जो मौजूद हो तो उसकी बड़ी क़द्र व मन्ज़िलत होती है और न होने पर बड़ा दुख होता है और ऐ वह सरश्माए उम्मीद दरजा जिसकी जुदाई अलम अंगेज़ है , तुझ पर सलाम। ऐ वह हमदम जो उन्स व दिलबस्तगी का सामान लिये हुए आया तो शादमानी का सबब हुआ और वापस गया तो वहशत बढ़ाकर ग़मगीन बना गया। तुझ पर सलाम। ऐ वह हमसाये जिसकी हमसायगी में दिल नर्म और गुनाह कम हो गए , तुझ पर सलाम। ऐ वह मददगार जिसने शैतान के मुक़ाबले में मदद व एआनत की , ऐ वह साथी जिसने हुस्ने अमल की राहें हमवार कीं तुझ पर सलाम। (ऐ माहे रमज़ान) तुझमें अल्लाह तआला के आज़ाद किये हुए बन्दे किस क़द्र ज़्यादा हैं और जिन्होंने तेरी हुरमत व इज़्ज़त का पास व लेहाज़ रखा वह कितने ख़ुश नसीब हैं , तुझ पर सलाम , तू किस क़द्र गुनाहों को महो करने वाला और क़िस्म क़िस्म के ऐबों को छिपाने वाला है। तुझ पर सलाम। तू गुनहगारों के लिये कितना तवील और मोमिनों के दिलों में कितना पुर हैबत है। तुझ पर सलाम। ऐ वह महीने जिससे दूसरे अय्याम हमसरी का दावा नहीं कर सकते , तुझ पर सलाम। ऐ वह महीने जो हर अम्र से सलामती का बाएस है तुझ पर सलाम। ऐ वह जिसकी हम नशीनी बारे ख़ातिर और मआशेरत नागवार नहीं , तुझ पर सलाम जबके तू बरकतों के साथ हमारे पास आया और गुनाहों की आलूदगियों को धो दिया , तुझ पर सलाम। ऐ वह जिसे दिल तंगी की वजह से रूख़सत नहीं किया गया और न ख़स्तगी की वजह से उसके रोज़े छोड़े गये तुझ पर सलाम। ऐ व हके जिसके आने की पहले से ख़्वाहिश थी और जिसके ख़त्म होने से क़ब्ल ही दिल रंजीदा हैं तुझ पर सलाम। तेरी वजह से कितनी बुराईयां हमसे दूर हो गईं और कितनी भलाइयों के सरचश्मे हमारे लिये जारी हो गये। तुझ पर सलाम (ऐ माहे रमज़ान) तुझ पर और उस शबे क़द्र पर जो हज़ार महीनों से बेहतर है। सलाम हो , अभी कल हम कितने तुझ पर वारफ़ता थे और आने वाले कल में हमारे शौक़ की कितनी फ़रावानी होगी। तुझ पर सलाम। (ऐ माहे मुबारक तुझ पर) और तेरी उन फ़ज़ीलतों पर जिनसे हम महरूम हो गए और तेरी गुज़िश्ता बरकतों पर जो हमारे हाथ से जाती रहीं। सलाम हो ऐ अल्लाह हम उस महीने से मख़सूस हैं जिसकी वजह से तूने हमें शरफ़ बख़्शा और अपने लुत्फ़ व एहसान से इसकी हक़शिनासी की तौफ़ीक़ दी जबके बदनसीब लोग इसके वक़्त की (क़द्र व क़ीमत) से बेख़बर थे और अपनी बदबख़्ती की वजह से इसके फ़ज़्ल से महरूम रह गए। और तू ही वली व साहेबे इख़्तेयार है। के हमें इसकी हक़शिनासी के लिये मुन्तख़ब किया और इसके एहकाम की हिदायत फ़रमाई। बेशक तेरी तौफ़ीक़ से हमने इस माह में रोज़े रखे , इबादत के लिये क़याम किया मगर कमी व कोताही के साथ और मुश्ते अज़ ख़रवार से ज़्यादा न बजा ला सके। ऐ अल्लाह! हम अपनी बदआमाली का इक़रार और सहलअंगारी का एतराफ़ करते हुए तेरी हम्द करते हैं और अब तेरे लिये कुछ है तो वह हमारे दिलों की वाक़ेई शर्मसारी और हमारी ज़बानों की सच्ची माज़ेरत है , लेहाज़ा इस कमी व कोताही के बावजूद जो हमसे हमसे हुई है हमें ऐसा अज्र अता कर के हम उसके ज़रिये दिलख़्वाह फ़ज़ीलत व सआदत को पा सकें और तरह तरह के अज्र व सवाब के ज़ख़ीरे जिसके हम आरज़ूमन्द थे उसके एवज़ हासिल कर सकें। और हम ने तेरे हक़ में जो कमी व कोताही की है उसमें हमारे उज्ऱ को क़ुबूल फ़रमा और हमारी उम्रे आईन्दा का रिश्ता आने वाले माहे रमज़ान से जोड़ दे। और जब उस तक पहुंचा दे तो जो इबादत तेरे शायाने शान हो उसके बजा लाने पर हमारी एआनत फ़रमाना और इस इताअत पर जिसका वह महीना सज़ावार है अमल पैरा होने तौफ़ीक़ देना और हमारे लिये ऐसे नेक आमाल का सिलसिला जारी रखना के जो ज़मानाए ज़ीस्त के महीनों में एक के बाद दूसरे माह माहे रमज़ान में तेरे हक़ अदायगी का बाएस हों।

ऐ अल्लाह! हमने इस महीने में जो सग़ीरा या कबीरा मासीयत की हो , या किसी गुनाह से आलूदा और किसी ख़ता के मुरतकिब हुए हों जान बूझकर या भूले चौके , ख़ुद अपने नफ़्स पर ज़ुल्म किया हो या दूसरे का दामने हुरमत चाक किया हो। तू मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमें अपने पर्दे में ढांप ले , और अपने अफ़ो व दरगुज़र से काम लेते हुए मुआफ़ कर दे। और ऐसा न हो के इस गुनाह की वजह से तन्ज़ करने वालों की आंखें हमें घूरें और तानाज़नी करने वालों की ज़बानें हम पर खुलें। और अपनी शफ़क़्क़ते बेपायां और मरहमत रोज़अफ़ज़ों से हमें इन आमाल पर कारबन्द कर के जो उन चीज़ों को बरतरफ़ करें और उन बातों की तलाफ़ी करें जिन्हें तु इस माह में हमारे लिये नापसन्द करता है।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और इस महीने के रूख़सत होने से जो क़लक़ हमें हुआ है उसका चारा कर और ईद और रोज़ा छोड़ने के दिल हमारे लिये मुबारक क़रार दे और उसे हमारे गुज़रे हुए दिनों में बेहतरीन दिन क़रार दे जो अफ़ो व दरगुज़र को समेटने वाला और गुनाहों को महो करने वाला हो और तू हमारे ज़ाहिर व पोशीदा गुनाहों को बख़्श दे। बारे इलाहा! इस महीने के अलग होने के साथ तू हमें गुनाहों से अलग कर दे और इसके निकलने के साथ तू हमें बुराइयों से निकाल ले। और इस महीने की बदौलत उसको आबाद करने वालों में हमें सबसे बढ़कर ख़ुश बख़्त बानसीब और बहरामन्द क़रार दे। ऐ अल्लाह! जिस किसी ने जैसा चाहिये इस महीने का पास व लेहाज़ किया हो और कमा हक़्क़हू इसका एहतेराम मलहूज़ रखा हो और इसके एहकाम पर पूरी तरह अमलपैरा रहा हो। और गुनाहों से जिस तरह बचना चाहिये उस तरह बचा हो या ब नीयते तक़रूब ऐसा अमले ख़ैर बजा लाया हो जिसने तेरी ख़ुशनूदी उसके लिये ज़रूरी क़रार दी हो और तेरी रहमत को उसकी तरफ़ मुतवज्जेह कर दिया हो तो जो उसे बख़्शे वैसा ही हमें भी अपनी दौलते बेपायां में से बख़्श और अपने फ़ज़्ल व करम से इससे भी कई गुना ज़ाएद अता कर। इस लिये के तेरे फ़ज़्ल के सोते ख़ुश्क नहीं होते और तेरे ख़ज़ाने कम होने में नहीं आते बल्कि बढ़ते ही जाते हैं। और न तेरे एहसानात की कानें फ़ना होती है और तेरी बख़्शिश व अता तो हर लेहाज़ से ख़ुशगवारबख़्शिश व अता है।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और जो लोग रोज़े क़यामत तक इस माह के रोज़े रखें या तेरी इबादत करें उनके अज्र व सवाब के मानिन्द हमारे लिये अज्र व सवाब सब्त फ़रमा। ऐ अल्लाह! हम उस रोज़े फ़ित्र में जिसे तूने अहले ईमान के लिये ईद व मसर्रत का रोज़ और अहले इस्लाम के लिये इज्तेमाअ व तआवुन का दिन क़रार दिया है हर उस गुनाह से जिसके हम मुरतकिब हुए हों और हर उस बुराई से जिसे पहले कर चुके हों और हर बुरी नीयत से जिसे दिल में लिये हुए हों उस शख़्स की तरह तौबा करते हैं जो गुनाहों की तरफ़ दोबारा पलटने का इरादा न रखता हो और न तौबा के बाद ख़ता का मुरतकिब होता हो। ऐसी सच्ची तौबा जो हर शक व शुबह से पाक हो। तो अब हमारी तौबा को क़ुबूल फ़रमा हमसे राज़ी व ख़ुशनूद हो जा और हमें इस पर साबित क़दम रख। ऐ अल्लाह! गुनाहों की सज़ा का ख़ौफ़ और जिस सवाब का तूने वादा किया है उसका शौक़ हमें नसीब फ़रमा ताके जिस सवाब के तुझसे ख़्वाहिशमन्द हैं उसकी लज़्ज़त और जिस अज़ाब से पनाह मांग रहे हैं उसकी तकलीफ़ व अज़ीयत पूरी तरह जान सकें। और हमें अपने नज़दीक उन तौबा गुज़ारों में से क़रार दे जिनके लिये तूने अपनी मोहब्बत को लाज़िम कर दिया है और जिनसे फ़रमाबरदारी व इताअत की तरफ़ रूजू होने को तूने क़ुबूल फ़रमाया है। ऐ अद्ल करने वालों में सबसे ज़्यादा अद्ल करने वाले।

ऐ अल्लाह! हमारे मां बाप और हमारे तमाम अहले मज़हब व मिल्लत ख़्वाह वह गुज़र चुके हों या क़यामत के दिन तक आईन्दा आने वाले हों सबसे दरगुज़र फ़रमा। ऐ अल्लाह! हमारे नबी मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर ऐसी रहमत नाज़िल फ़रमा जैसी रहमत तूने अपने मुक़र्रब फ़रिश्तों पर की है। और उन पर उनकी आल पर ऐसी रहमत नाज़िल फ़रमा जैसी तूने अपने फ़रस्तादा नबीयों पर नाज़िल फ़रमाई है। और उन पर और उनकी आल(अ 0) पर ऐसी रहमत नाज़िल फ़रमा जैसी तूने अपने नेकोकार बन्दों पर नाज़िल की है। (बल्कि) इससे बेहतर व बरतर। ऐ तमाम जहान के परवरदिगार ऐसी रहमत जिसकी बरकत हम तक पहुंचे , जिसकी मनफ़अत हमें हासिल हो और जिसकी वजह से हमारी दुआएं क़ुबूल हों। इसलिये के तू उन लोगों से जिनकी तरफ़ रूजू हुआ जाता है , ज़्यादा करीम और उन लोगों से जिन पर भरोसा किया जाता है , ज़्यादा बेनियाज़ करने वाला है और उन लोगों से जिनके फ़ज़्ल की बिना पर सवाल किया जाता है , ज़्यादा अता करने वाला है और तू हर चीज़ पर क़ादिर व तवाना है।

छेयालीसवीं दुआ

जब नमाज़े ईदुल फ़ित्र से फ़ारिग़ होकर पलटते तो यह दुआ पढ़ते और जुमे के दिन भी यह दुआ पढ़ते

ऐ वह जो ऐसे शख़्स पर रहम करता है जिस पर बन्दे रहम नहीं करते। ऐ वह जो ऐसे (गुनहगार) को क़ुबूल करता है जिसे कोई क़ितअए ज़मीन (उसके गुनाहों के बाएस) क़ुबूल नहीं करता। ऐ वह जो अपने हाजतमन्द को हक़ीर नहीं समझता। ऐ वह जो गिड़गिड़ाने वालों को नाकाम नहीं फेरता। ऐ वह जो नाज़िश बेजा करने वालों को ठुकराता नहीं। ऐ वह जो छोटे से छोटे तोहफ़े को भी पसन्दीदगी की नज़रों से देखता है और जो मामूली से मामूली अमल उसके लिये बजा लाया गया हो उसकी जज़ा देता है। ऐ वह जो इससे क़रीब हो वह उससे क़रीब होता है। ऐ वह के जो इससे रूगर्दानी करे उसे अपनी तरफ़ बुलाता है। और वह जो नेमत को बदलता नहीं और न सज़ा देने में जल्दी करता है। ऐ वह जो नेकी के नेहाल को बारआवर करता है ताके उसे बढ़ा दे और गुनाहों से दरगुज़र करता है ताके उन्हें नापैद कर दे। उम्मीदें तेरी सरहदे करम को छूने से पहले कामरान होकर पलट आएं और तलब व आरज़ू के मसाग़ेर तेरे फ़ैज़ाने जूद से छलक उठे और सिफ़तें तेरे कमाले ज़ात की मन्ज़िल तक पहुंचने से दरमान्दा होकर मुन्तशिर हो गईं इसलिये के बलन्दतरीन रफ़अत जो हर कंगरह बलन्द से बालातर है , और बुज़ुर्गतरीन अज़मत जो हर अज़मत से बलन्दतर है , तेरे लिये मख़सूस है। हर बुज़ुर्ग तेरी बुज़ुर्गी के सामने छोटा और हर ज़ीशरफ़ तेरे शरफ़ के मुक़ाबले में हक़ीर है। जिन्होंने तेरे ग़ैर का रूख़ किया वह नाकाम हुए। जिन्होंने तेरे सिवा दूसरों से तलब किया वह नुक़सान में रहे , जिन्होंने तेरे सिवा दूसरों के हाँ मन्ज़िल की वह तबाह हुए। जो तेरे फ़ज़्ल के बजाए दूसरों से रिज़्क़ व नेमत के तलबगार हुए वह क़हत व मुसीबत से दो-चार हुए तेरा दरवाज़ा तलबगारों के लिये वा है और तेरा जूद व करम साएलों के लिये आम है। तेरी फ़रयादरसी दादख़्वाहों से नज़दीक है। उम्मीदवार तुझसे महरूम नहीं रहते और तलबगार तेरी अता व बख़्शिश से मायूस नहीं होते , और मग़फ़ेरत चाहने वाले पर तेरे अज़ाब की बदबख़्ती नहीं आती। तेरा ख़्वाने नेमत उनके लिये भी बिछा हुआ है जो तेरी नाफ़रमानी करते हैं। और तेरी बुर्दबारी उनके भी आड़े आती है जो तुझसे दुश्मनी रखते हैं। बुरों से नेकी करना तेरी रोश और सरकशों पर मेहरबानी करना तेरा तरीक़ा है। यहां तक के नर्मी व हिल्म ने उन्हें (हक़ की तरफ़) रूजू होने से ग़ाफ़िल कर दिया और तेरी दी हुई मोहलत ने उन्हें इज्तेनाब मआसी से रोक दिया। हालांके तूने उनसे नर्मी इसलिये की थी के वह तेरे फ़रमान की तरफ़ पलट आएं और मोहलत इसलिये दी थी के तुझे अपने तसल्लुत व इक़्तेदार के दवाम पर एतमाद था (के जब चाहे उन्हें अपनी गिरफ़्त में ले सकता है) अब जो ख़ुश नसीब था उसका ख़ात्मा भी ख़ुश नसीबी पर किया और जो बदनसीब था , उसे नाकाम रखा। (वह ख़ुशनसीब हूँ या बदनसीब) सबके सब तेरे हुक्म की तरफ़ पलटने वाले हैं और उनका माल तेरे अम्र से वाबस्ता है। उनकी तवील मुद्दते मोहलत से तेरी दलील हुज्जत में कमज़ोरी रूनुमा नहीं होती (जैसे उस शख़्स की दलील कमज़ोर हो जाती है जो अपने हक़ के हासिल करने में ताख़ीर करे) और फ़ौरी गिरफ़्त को नज़रअन्दाज़ करने से तेरी हुज्जत व बुरहान बातिल नहीं क़रार पाई (के यह कहा जाए के अगर उसके पास उनके खि़लाफ़ दलील व बुरहान होती तो वह मोहलत क्यों देता) तेरी हुज्जत बरक़रार है जो बातिल नहीं हो सकती , और तेरी दलील मोहकम है जो ज़ाएल नहीं हो सकती। लेहाज़ा दाएमी हसरत व अन्दोह उसी शख़्स के लिये है जो तुझसे रूगर्दां हुआ और रूसवाकुन नामुरादी उसके लिये है जो तेरे हां से महरूम रहा और बदतरीन बदबख़्ती उसी के लिये है जिसने तेरी (चश्मपोशी से) फ़रेब खाया। ऐसा शख़्स किस क़द्र तेरे अज़ाब में उलटे-पलटे खाता और कितना तवील ज़माना तेरे एक़ाब में गर्दिश करता रहेगा और उसकी रेहाई का मरहला कितनी दूर और बा-आसानी निजात हासिल करने से कितना मायूस होगा। यह तेरा फ़ैसला अज़रूए अद्ल है जिसमें ज़रा भी ज़ुल्म नहीं करता। और तेरा यह हुक्म मबनी बर इन्साफ़ है जिसमें इस पर ज़्यादती नहीं करता। इसलिये के तूने पै दरपै दलीलें क़ायम और क़ाबिले क़ुबूल हुज्जतें आश्कारा कर दी हैं और पहले से डराने वाली चीज़ों के ज़रिये आगाह कर दिया है और लुत्फ़ व मेहरबानी से (आख़ेरत की) तरग़ीब दिलाई है और तरह-तरह की मिसालें बयान की हैं। मोहलत की मुद्दत बढ़ा दी है और (अज़ाब में) ताख़ीर से काम लिया है। हालांके तू फ़ौरी गिरफ़्त पर इख़्तियार रखता था और नर्मी व मुदारात से काम लिया है। बावजूद यके तू ताजील करने पर क़ादिर था , यह नर्मरवी , आजिज़ी की बिना पर और मोहलत देही कमज़ोरी की वजह से न थी और न अज़ाब में तौक़फ़ करना ग़फ़लत व बेख़बरी के बाएस और न ताख़ीर करना नर्मी व मुलातेफ़त की बिना पर था। बल्कि यह इसलिये था के तेरी हुज्जत हर तरह से पूरी हो। तेरा करम कामिलतर , तेरा एहसान फ़रावां और तेरी नेमत तमामतर हो। यह तमाम चीज़ें थीं और रहेंगी दरआँ हालिया के तू हमेशा से है और हमेशा रहेगा। तेरी हुज्जत इससे बालातर है के इसके तमाम गोशों को पूरी तरह बयान किया जा सके और तेरी इज़्ज़त व बुज़ुर्गी इससे बलन्दतर है के इसकी कुन्ह व हक़ीक़त की हदें क़ायम की जाएं और तेरी नेमतें इससे फ़ज़ोंतर है के इन सबका शुमार हो सके और तेरे एहसानात इससे कहीं ज़्यादातर हैं के उनमें अदना एहसान पर भी तेरा शुक्रिया अदा किया जा सके। (मैं तेरी हम्द व सिपास से आजिज़ और दरमान्दा हूँ , गोया) ख़ामोशी ने तेरी पै दर पै हम्द व सिपास से मुझे नातवां कर दिया है और क़ौक़फ़ ने तेरी तमजीद व सताइश से मुझे गंग कर दिया है और इस सिलसिले में मेरी तवानाई की हद यह है के अपनी दरमान्दगी का एतराफ़ करूं यह बे रग़बती की वजह से नहीं है। ऐ मेरे माबूद! बल्कि अज्ज़ व नातवानी की बिना पर है। अच्छा तो मैं अब तेरी बारगाह में हाज़िर होने का क़स्द करता हूं और तुझसे हुस्ने एआनत का ख़्वास्तगार हूं। तू मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मेरी राज़ व नियाज़ की बातों को सुन और मेरी दुआ को शरफ़े क़ुबूलियत बख़्श और मेरे दिन को नाकामी के साथ ख़त्म न कर और मेरे सवाल में मुझे ठुकरा न दे , और अपनी बारगाह से पलटने और फिर पलटकर आने को इज़्ज़त व एहतेराम से हमकिनार फ़रमा। इसलिये के तुझे तेरे इरादे में कोई दुश्वारी हाएल नहीं होती और जो चीज़ तुझ से तलब की जाए उसके देने से आजिज़ नहीं होता , और तू हर चीज़ पर क़ादिर है और क़ूवत व ताक़त नहीं सिवा अल्लाह के सहारे के जो बलन्द मरतबा व अज़ीम है।

सैंतालीसवीं दुआ

दुआए रोज़े अरफ़ा

सब तारीफ़ उस अल्लाह तआला के लिये हैं जो तमाम जहानों का परवरदिगार है। बारे इलाहा! तेरे ही लिये तमाम तारीफ़ें हैं ऐ आसमान व ज़मीन के पैदा करने वाले , ऐ बुज़ुर्गी व एज़ाज़ वाले! ऐ पालने वालों के पालने वाले। ऐ हर परस्तार के माबूद! ऐ हर मख़लूक़ के ख़ालिक़ और हर चीज़ के मालिक व वारिस। उसके मिस्ल कोई चीज़ नहीं है और न कोई चीज़ इसके इल्म से पोषीदा है। वह हर चीज़ पर हावी और हर षै पर निगरां है। तू ही वह अल्लाह है के तेरे अलावा कोई माबूद नहीं जो एक अकेला और यकता व यगाना है। और तू ही वह अल्लाह है के तेरे अलावा कोई माबूद नहीं जो बख़्षने वाला और इन्तेहाई बख़्षने वाला अज़मत वाला और इन्तेहाई अज़मत वाला और बड़ा और इन्तेहाई बड़ा है। और तू ही वह अल्लाह है के तेरे सिवा कोई माबूद नहीं जो बलन्द व बरतर और बड़ी क़ूवत व तदबीर वाला है और तू ही वह अल्लाह है के तेरे सिवा कोई माबूद नहीं जो फ़ैज़े रसां , मेहरबान और इल्म व हिकमत वाला है और तू ही वह माबूद है के तेरे अलावा कोई माबूद नहीं , जो करीम और सबसे बढ़कर करीम और दाएम व जावेद है। और तू ही वह माबूद है के तेरे सिवा कोई माबूद नहीं। जो हर षै से पहले और हर षुमार में आने वाली षै के बाद है। और तू ही वह माबूद है के तेरे सिवा कोई माबूद नहीं। जो हर षै से पहले और हर षुमार में आने वाली षै के बाद है। और तू ही वह माबूद है के तेरे अलावा कोई माबूद नहीं जो (कायनात के दस्तेरस) से बाला होने के बावजूद नज़दीक और नज़दीक होने के बावजूद (फ़हम और इदराक से) बलन्द है। और तू ही वह माबूद है के तेरे सिवा कोई माबूद नहीं जो जमाल व बुज़ुर्गी और अज़मत व सताइष वाला है और तू ही वह अल्लाह (ज 0) है के तेरे अलावा कोई माबूद नहीं। जिसन बग़ैर मवाद के तमाम चीज़ों को पैदा किया और बगैर किसी नमूना व मिसाल के सूरतों की नक़्ष आराई की और बग़ैर किसी की पैरवी के मौजूदात को ख़लअते वजूद बख़्षा। तू ही वह है जिसने हर चीज़ का एक अन्दाज़ा ठहराया है और हर चीज़ को उसके वज़ाएफ़ की अन्जाम देही पर आमादा किया है और कायनाते आलम में से हर चीज़ की तद्बीर व कारसाज़ी की है। तो वह है के आफ़रीन्ष आलम में किसी षरीके कार ने तेरा हाथ नहीं बटाया और न किसी मआवुन ने तेरे काम में तुझे मदद दी है और न कोई तेरा देखने वाला और न कोई तेरा मिस्ल व नज़ीर था और तूने जो इरादा किया वह हतमी व लाज़मी और जो फ़ैसला किया वह अद्ल के तक़ाज़ों के ऐन मुताबिक़ और जो हुक्म दिया वह इन्साफ़ पर मबनी था। तू वह है जिसे कोई जगह घेरे हुए नहीं है और न तेरे इक़्तेदार का कोई इक़्तेदार मुक़ाबेला कर सकता है। और न तू दलील व बुरहान और किसी चीज़ को वाज़ेअ तौर पर पेश करने से आजिज़ है। तू वह है जिसने एक एक चीज़ को षुमार कर रखा है और हर चीज़ की एक मुद्दत मुक़र्रर कर दी है और हर शै का एक अन्दाज़ा ठहरा दिया है। तू वह है के तेरी कन्ह ज़ात को समझने से वाहमे क़ासिर और तेरी कैफ़ियत को जानने से अक़्लें आजिज़ हैं। और तेरी कोई जगह नहीं है के आंखें उसका खोज लगा सकें। तू वह है के तेरी कोई हद व नेहायत नहीं है के तू महदूद क़रार पाए और न तेरा तसव्वुर किया जा सकता है के तू तसव्वुर की हुई सूरत के साथ ज़ेहन में मौजूद हो सके और न तेरे कोई औलाद है के तेरे मुताल्लिक़ किसी की औलाद होने का एहतेमाल हो। तू वह है के तेरा कोई मद्दे मुक़ाबिल नहीं है के तुझसे टकराए और न तेरा कोई हमसर है के तुझ पर ग़ालिब आए और न तेरा कोई मिस्ल व नज़ीर है के तुझसे बराबरी करे। तू वह है जिसने ख़ल्के कायनात की इब्तिदा की आलम को ईजाद किया और उसकी बुनियाद क़ायम की। और बग़ैर किसी मादा व अस्ल के उसे वजूद में लाया और जो बनाया उसे अपने हुस्ने सनअत का नमूना बनाया। तू हर ऐब से मुनज़्ज़ह है। तेरी शान किस क़द्र बुज़ुर्ग और तमाम जगहों में तेरा पाया कितना बलन्द और तेरी हक़ व बातिल में इम्तियाज़ करने वाली किताब किस क़द्र हक़ को आशकारा करने वाली है। तू मुनज़्ज़ह है ऐ साहेबे लुत्फ़ व एहसान तू किस क़द्र लुत्फ़ फ़रमाने वाला है। ऐ मेहरबान तू किस क़द्र मेहरबानी करने वाला है। ऐ हिकमत वाले तू कितना जानने वाला है। पाक है तेरी ज़ात ऐ साहबे इक़्तेदार! तू किस क़द्र क़वी व तवाना है। ऐ करीम! तेरा दामने करम कितना वसीअ है। ऐ बलन्द मरतबा तेरा मरतबा कितना बलन्द है तू हुस्न व ख़ूबी , शरफ़ व बुज़ुर्गी , अज़मत व किबरियाई और हम्द व सताइश का मालिक है। पाक है तेरी ज़ात तूने भलाइयों के लिये अपना हाथ बढ़ाया है तुझ ही से हिदायत का इरफ़ान हासिल हुआ है। लेहाज़ा जो तुझे दीन या दुनिया के लिये तलब करे तुझे पा लेगा। तू मुनज़ज़ह व पाक है। जो भी तेरे इल्म में है वह तेरे सामने सरनिगूं और जो कुछ अर्श के नीचे है वह तेरी अज़मत के आगे सर ब ख़म और जुमला मख़लूक़ात तेरी इताअत का जुवा अपनी गर्दन में डाले हुए है। पाक है तेरी ज़ात के न हवास से तुझे जाना जा सकता है न तुझे टटोला और छुआ जा सकता है। न तुझ पर किसी का हीला चल सकता है न तुझे दूर किया जा सकता है। न तुझसे निज़ाअ हो सकती है न मुक़ाबला , न तुझसे झगड़ा किया जा सकता है और न तुझे धोका और फ़रेब दिया जा सकता है। पाक है तेरी ज़ात , तेरा रास्ता सीधा और हमवार , तेरा फ़रमान सरासर हक़ व सवाब और तू ज़िन्दा व बेनियाज़ है। पाक है तू , तेरी गुफ़तार हिकमत आमेज़ , तेरा फै़सला क़तई और तेरा इरादा हतमी है। पाक है तू , न तो कोई तेरी मषीयत को रद्द कर सकता है और न कोई तेरी बातों को बदल सकता है। पाक है तू ऐ दरख़शिन्दा निशानियों वाले। ऐ आसमानों के ख़ल्क़ फ़रमाने वाले और ज़ी रूह चीज़ों के पैदा करने वाले तेरे ही लिये तमाम तारीफ़ें हैं। ऐसी तारीफ़ें जिनकी हमेशगी तेरी हमेशगी से वाबस्ता है और तेरे ही लिये सताइष है। ऐसी सताइष जो तेरी नेमतों के साथ हमेषा बाक़ी रहे और तेरे ही लिये हम्द व सना है। ऐसी जो तेरे करम व एहसान के बराबर हो और तेरे ही लिये हम्द है ऐसी जो तेरी रज़ामन्दी से बढ़ जाए। और तेरे ही लिये हम्द व सिपास है ऐसी जो हर हम्दगुज़ारी की हम्द पर मुश्तमिल हो और जिसके मुक़ाबले में हर शुक्रगुज़ार का शुक्र पीछे रह जाए। ऐसी हम्द जो तेरे अलावा किसी के लिये सज़ावार न हो और न तेरे सिवा किसी के तक़र्रूब का वसीला बने। ऐसी हम्द जो पहली हम्द के दवाम का सबब क़रार पाए और उसके ज़रिये आखि़री हम्द के दवाम की इल्तिजा की जाए ऐसी हम्द जो ज़माने की गर्दिशों के साथ बढ़ती जाए और पै दरपै इज़ाफ़ों से ज़्यादा होती रहे। ऐसी हम्द के निगेहबानी करने वाले फ़रिश्ते उसके शुमार से आजिज़ आ जाएं। ऐसी हम्द जो कातिबाने आमाल ने तेरी किताब में लिख दिया है इससे बढ़ जाए। ऐसी हम्द जो तेरे अर्शे बुज़ुर्ग को हमवज़न और तेरी बलन्द पाया कुर्सी के बराबर हो। ऐसी हम्द जिसका अज्र व सवाब तेरी तरफ़ से कामिल और जिस की जज़ा तमाम जज़ाओं को शामिल हो। ऐसी हम्द जिसका ज़ाहिर बातिन से हमनवा और बातिन सिद्क़े नीयत से हमआहंग हो। ऐसी हम्द के किसी मख़लूक़ ने वैसी तेरी हम्द न की हो और तेरे सिवा कोई उसकी फ़ज़ीलत व बरतरी से आषना न हो। ऐसी हम्द के जो उसंे बकसरत बजा लाने के लिये कोशां हो उसे (तेरी तरफ़ से) मदद हासिल हो और जो उसे अन्जाम तक पहुंचाने के लिये सई बलीग़ करे। उसे तौफ़ीक़ व ताईद नसीब हो। ऐसी हम्द जो तमाम इक़सामे हम्द की जामेअ हो जिन्हें तू मौजूद कर चुका है और उन इक़साम को भी शामिल हो जिन्हें तू बाद में मौजूद करेगा। सरगर्मे अमल , उनके ज़मानाए इक़्तेदार के मुन्तज़िर और उनके लिये चश्मे बराह हैं। ऐसी रहमत जो बाबरकत , पाकीज़ा और बढ़ने वाली और हर सुबह व शाम नाज़िल होने वाली हो और उन पर और उनके अरवाहे (तय्यबा) पर सलामती नाज़िल फ़रमा और उनके कामों को सलाह व तक़वा की बुनियादों पर क़ायम कर और उनके हालात की इस्लाह फ़रमा और उनकी तौबा क़ुबूल फ़रमा बेशक तू तौबा क़ुबूल करने वाला , रहम करने वाला और सबसे बेहतर बख़्शने वाला है। और हमें अपनी रहमत के वसीले से उनके साथ दारूस्सलाम (जन्नत) में जगह दे , ऐ सब रहीमों से ज़्यादा रहीम , परवरदिगारा! यह रोज़े अरफ़ा वह दिन है जिसे तूने शरफ़ , इज़्ज़त और अज़मत बख़्शी है जिसमें अपनी रहमतें फैला दीं और अपने अफ़ो व दरगुज़र से एहसान फ़रमाया। अपने अतियों को फ़रावां किया और उसके वसीले से अपने बन्दों पर तफ़ज़्ज़ुल फ़रमाया है। ऐ अल्लाह! मैं तेरा वह बन्दा हूं जिसपर तूने उसकी खि़लक़त से पहले और खि़लक़त के बाद इनाम व एहसान फ़रमाया है। इस तरह के उसे उन लोगों में से क़रार दिया जिन्हें तूने अपने दीन की हिदायत की , अपने अदाए हक़ की तौफ़ीक़ बख़्शी जिनकी अपनी रीसमां के ज़रिये हिफ़ाज़त की जिन्हें अपनी जमाअत में दाखि़ल किया और अपने दोस्तों की दोस्ती और दुश्मनों की दुश्मनी की हिदायत फ़रमाई है। बाई हमह तूने उसे हुक्म दिया तो उसने हुक्म न माना , और मना किया तो वह बाज़ न आया और अपनी मासियत से रोका तो वह तेरे हुक्म के खि़लाफ़ अम्रे ममनूअ का मुरतकब हुआ। यह तुझसे अनाद और तेरे मुक़ाबले में तकब्बुर की रू से न था बल्कि ख़्वाहिशे नफ़्स ने उसे ऐसे कामों की दावत दी जिनसे तूने रोका और डराया था। और तेरे दुश्मन और उसके दुश्मन (शैतान मलऊन) ने उन कामों में उसकी मदद की। चुनांचे उसने तेरी धमकी से आगाह होने के बावजूद तेरे अफ़ो की उम्मीद करते हुए और तेरे दरगुज़र पर भरोसा रखते हुए गुनाह की तरफ़ इक़दाम किया। हालांके उन एहसानात की वजह से जो तूने उस पर किये थे। तमाम बन्दों में वह उसका सज़ावार था के ऐसा न करता। अच्छा फिर मैं तेरे सामने खड़ा हूं बिल्कुल ख़्वार व ज़लील , सरापा अज्ज़ व नियाज़ और लरज़ां व तरसां। इन इज़ीम गुनाहों का जिनका बोझ अपने सर उठाया है और उन बड़ी ख़ताओं का जिनका इरतेकाब किया है एतराफ़ करता हुआ तेरे दामने अफ़ो में पनाह चाहता हुआ और तेरी रहमत का सहारा ढूंढता हुआ और यह यक़ीन रखता हुआ के कोई पनाह देने वाला (तेरे अज़ाब से) मुझे पनाह नहीं दे सकता और कोई बचाने वाला (तेरे ग़ज़ब से) मुझे बचा नहीं सकता। लेहाज़ा (इस एतराफ़े गुनाह व इज़हारे निदामत के बाद) तू मेरी पर्दापोशी फ़रमा जिस तरह गुनाहगारों की पर्दापोशी फ़रमाता है और मुझे माफ़ी अता कर जिस तरह उन लोगों को माफ़ी अता करता है। जिन्होंने अपने आप को तेरे हवाले कर दिया हो और मुझ पर इस बख़्शिश व आमज़िश के साथ एहसान फ़रमा के जिस बख़्शिश व आमज़िश से तू अपने उम्मीदवार पर एहसान करता है तो तुझे बड़ी नही मालूम होती। और मेरे लिये आज के दिन ऐसा हिज़ व नसीब क़रार दे के जिसके ज़रिये तेरी रज़ामन्दी का कुछ हिस्सा पा सकूं और तेरे इबादतगुज़ार बन्दे जो (अज्र व सवाब के) तहाएफ़ ले कर पलटे हैं मुझे उनसे ख़ाली हाथ न फेर। अगरचे वह नेक आमाल जो उन्होंने आगे भेजे हैं मैंने आगे नहीं भेजे लेकिन मैंने तेरी वहदत व यकताई का अक़ीदा और यह के तेरा कोई हरीफ़ शरीक और मिस्ल व नज़ीर नहीं है पेश किया है और इन्हीं दरवाज़ों से जिन दरवाज़ों से तूने आने का हुक्म दिया है आया हूं और ऐसी चीज़ के ज़रिये जिसके बग़ैर कोई तुझसे तक़र्रूब हासिल नहीं कर सकता तक़र्रूब चाहा है। फिर तेरी तरफ़ रूजू व बाज़गश्त , तेरी बारगाह में तज़ल्लुल व आजिज़ी और तुझसे नेकगुमान और तेरी रहमत पर एतमाद को तलब तक़र्रूब के हमराह रखा है और उसके साथ ऐसी उम्मीद का ज़मीमा भी लगा दिया है जिसके होते हुए तुझसे उम्मीद रखने वाला महरूम नहीं रहता और तुझसे उसी तरह सवाल किया है जिस तरह कोई बेक़द्र ज़लील षिकस्ता हाल तही दस्त ख़ौफ़ ज़दा और तलबगारे पनाह सवाल करता है और इस हालत के बावजूद मेरा यह सवाल ख़ौफ़ , अज्ज़ व नियाज़मन्दी , पनाहतलबी और अमानख़्वाही की रू से है न मुतकब्बिरों के तकब्बुर के साथ बरतरी जतलाते , न इताअतगुज़ारों के (अपनी इबादत पर) फ़ख्ऱ व एतमाद की बिना पर इतराते और न सिफ़ारिश करने करने वालों की सिफ़ारिश पर सर बलन्दी दिखाते हुए। और मैं इस एतराफ़ के साथ तमाम कमतरों से कमतर , ख़्वार व ज़लील लोगों से ज़लीलतर और एक च्यूंटी के मानिन्द बल्कि उससे भी पस्ततर हूं। ऐ वह जो गुनाहगारों पर अज़ाब करने में जल्दी नहीं करता और न सरकशों को (अपनी नेमतों से) रोकता है।

(आप इस किताब को अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क पर पढ़ रहे है।)

ऐ वह जो लग़्िज़श करने वालों से दरगुज़र फ़रमाकर एहसान करता है और गुनहगारों को मोहलत देकर तफ़ज़्ज़ुल फ़रमाता है। मैं वह हूं जो गुनहगार गुनाह का मोतरफ़ , ख़ताकार और लग्ज़िश करने वाला हूं मैं वह हूं जिसने तेरे मुक़ाबले में जराअत से काम लेते हुए पेश क़दमी की। मैं वह हूं जिसने दीदा दानिस्ता गुनाह किये मैं वह हूं जिसने (अपने गुनाहों को) तेरे बन्दों से छुपाया और तेरे सामने खुल्लम खुल्ला मुख़ालफ़त की। मैं वह हूं जो तेरे बन्दों से डरता रहा और तुझसे बेख़ौफ़ रहा। मैं वह हूं जो तेरी हैबत से हरासां और तेरे अज़ाब से ख़ौफ़ज़दा न हुआ। मैं ख़ुद ही अपने हक़ में मुजरिम और बला व मुसीबत के हाथों में गिरवीं हूं मैं ही शर्म व हया से आरी और तवील रंज व तकलीफ़ में मुब्तिला हूं। मैं तुझे उसके हक़ का वास्ता देता हूं जिसे तूने मख़लूक़ात में से मुन्तख़ब किया। उसके हक़ का वास्ता देता हूं जिसे तूने अपने लिये पसन्द फ़रमाया , उसके हक़ का वास्ता देता हूं जिसे तूने कायनात में से बरगुज़ीदा किया और जिसे अपने एहकाम (की तबलीग़) के लिये चुन लिया। उसके हक़ का वास्ता देता हूं जिसकी इताअत को अपनी इताअत से मिला दिया और जिसकी नाफ़रमानी को अपनी नाफ़रमानी के मानिन्द क़रार दिया। उसके हक़ का वास्ता देता हूं जिसकी मोहब्बत को अपनी मोहब्बत से मक़रून और जिसकी दुश्मनी को अपनी दुश्मनी से वाबस्ता किया है। मुझे आज के दिन इस दामने रहमत में ढांप ले जिससे ऐसे शख़्स को ढांपता है जो गुनाहों से दस्तबरदार होकर तुझसे नाला व फ़रियाद करे और ताएब होकर तेरे दामने मग़फ़ेरत में पनाह चाहे और जिस तरह अपने इताअत गुज़ारों और और क़ुर्ब व मन्ज़िलत वालों की सरपरस्ती फ़रमाता है इसी तरह मेरी सरपरस्ती फ़रमा और जिस तरह उन लोगों पर जिन्होंने तेरे अहद को पूरा किया तेरी ख़ातिर अपने को ताब व मशक़्क़त में डाला और तेरी रज़ामन्दियों के लिये सख़्तियों को झेला। ख़ुद तनो तन्हा एहसान करता है उसी तरह मुझ पर भी तनो तन्हा एहसान फ़रमा और तेरे हक़ में कोताही करने तेरे हुदूद से मुतजावज़ होने और तेरे एहकाम के पसे पुश्त डालने पर मेरा मोवाख़ेज़ह न कर और मुझे उस शख़्स के मोहलत देने की तरह मोहलत देकर रफ़ता रफ़ता अपने अज़ाब का मुस्तहक़ न बना जिसने अपनी भलाई को मुझसे रोक लिया और समझता यह है के बस वही नेमत का देने वाला है यहां तक के तुझे भी उन नेमतों के देने में षरीक न समझा हो। मुझे ग़फ़लत शआरों की नीन्द , बेराहरवों के ख़्वाब और हरमां नसीबों की ग़फ़लत से होशियार कर दे और मेरे दिल को इस राहे अमल पर लगा जिस पर तूने इताअत गुज़ारों को लगाया है और इस इबादत की तरफ़ माएल फ़रमा जो इबादत गुज़ारों से तूने चाही है। और उन चीज़ों की हिदायत कर जिनके वसीले से सहल अंगारों को रिहाई बख़्शी है। और जो बातें तेरी बारगाह से दूर कर दीं और मेरे और तेरे हां के हज़ व नसीब के दरम्यान हाएल और तेरे हां के मक़सद व मुराद से मानेअ हो जाएं उनसे महफ़ूज़ रख और नेकियों की राह पैमाई और उनकी तरफ़ सबक़त जिस तरह तूने हुक्म दिया है और उनकी बढ़ चढ़ कर ख़्वाहिश जैसा के तूने चाहा है मेरे लिये सहल व आसान कर और अपने अज़ाब व वईद को सुबुक समझने वालों के साथ के जिन्हें तू तबाह करेगा , मुझे तबाह न करना और जिन्हें दुश्मनी पर आमादा होने की वजह से हलाक करेगा , उनके साथ मुझे हलाक न करना और अपनी सीधी राहों से इन्हेराफ़ करने वालों के ज़मरह में के जिन्हें तू बरबाद करेगा मुझे बरबाद न करना और फ़ित्ना व फ़साद के भंवर से मुझे निजात दे और बला के मुंह से छुड़ा ले और ज़मानाए मोहलत (की बदआमालियों) पर गिरफ़्त से पनाह दे और उस दुश्मन के दरम्यान जो मुझे बहकाए , और उस ख़्वाहिशे नफ़्स के दरम्यान जो मुझे तबाह व बरबाद करे , और उस नक़्स व ऐब के दरम्यान जो मुझे घेर ले , हाएल हो जा। और जैसे उस शख़्स से के जिस पर ग़ज़बनाक होने के बाद तू राज़ी न हो रूख़ फेर लेता है इसी तरह मुझ से रूख़ न फ़ेर और जो उम्मीदें तेरे दामन से वाबस्ता किये हुए हों उनमें मुझे बे आस न कर के तेरी रहमत से यास व नाउम्मीदी मुझ पर ग़ालिब आ जाए और मुझे इतनी नेमतें भी न बख़्श के जिनके उठाने की मैं ताक़त नहीं रखता के तू फ़रावानी , मोहब्बत से मुझ पर वह बार लाद दे जो मुझे गरां बार कर दें और मुझे इस तरह अपने हाथ से न छोड़ दे जिस तरह उसे छोड़ देता है जिसमें कोई भलाई न हो और न मुझे उससे कोई मतलब हो और न उसके लिये तौबा व बाज़गश्त हो। और मुझे इस तरह न फेंक दे जिस तरह उसे फेंक देता है जो तेरी नज़र तवज्जो से गिर चुका हो। और तेरी तरफ़ से ज़िल्लत व रूसवाई उस पर छाई हुई हो बल्कि गिरने वालों के गिरने से और कजरूओं ख़ौफ़ व हेरास से और फ़रेबख़ोर्दा लोगों के लग्ज़िश खाने से और हलाक होने वालों के वरतए हलाकत में गिरने से मेरा हाथ थाम ले और अपने बन्दों और कनीज़ों के मुख़तलिफ़ तबक़ों को जिन चीज़ों में मुब्तिला किया है उन से मुझे आफ़ियत व सलामती बख़्श। और जिन्हें तूने मूरिदे इनायत क़रार दिया , जिन्हें नेमतें अता कीं , जिनसे राज़ी व ख़ुशनूद हुआ। जिन्हें क़ाबिले सताइश ज़िन्दगी बख़्शी। और सआदत व कामरानी के साथ मौत दी उनके मरातब व दरजात पर मुझे फ़ाएज़ कर और वह चीज़ें जो नेकियों को महो और बरकतों को ज़ाएल कर दें उनसे किनाराकशी उस तरह मेरे लिये लाज़िम कर दे जिस तरह गर्दन में पड़ा हुआ तौक़। और बुरे गुनाहों और रूसवा करने वाली मासियतों से अलाहेदगी व नफ़रत को मेरे दिल के लिये इस तरह ज़रूरी क़रार दे जिस तरह बदन से चिमटा हुआ लिबास और मुझे दुनिया में मसरूफ़ करके के जिसे तेरी मदद के बग़ैर हासिल नही कर सकता उन आमाल से के जिनके अलावा तुझे कोई और चीज़ मुझसे ख़ुश नहीं कर सकती , रोक न दे और इस पस्त दुनिया की मोहब्बत के जो तेरे हां की सआदते अबदी की तरफ़ मुतवज्जो होने से मानेअ और तेरी तरफ़ वसीला तलब करने से सद्दे राह और तेरा तक़र्रूब हासिल करने से ग़ाफ़िल करने वाली है मेरे दिल से निकाल दे। आौर मुझे वह मुल्के इस्मत अता फ़रमा जो मुझे तेरे ख़ौफ़ से क़रीब , इरतेकाबे मोहर्रमात से अलग और कबीरा गुनाहों के बन्धनों से रिहा कर दे। और मुझे गुनाहों की आलूदगी से पाकीज़गी अता फ़रमा और मासियत की कसाफ़तों को मुझसे दूर कर दे और अपनी आफ़ियत का जामा मुझे पहना दे और अपनी सलामती की चादर उढ़ा दे और अपनी वसीअ नेमतों से मुझे ढांप ले और मेरे लिये अपने अताया व इनआमात का सिलसिला पैहम जारी रख और अपनी तौफ़ीक़ व राहे हक़ की राहनुमाई से मुझे तक़वीयत दे और पाकीज़ा नीयत , पसन्दीदा गुफ़तार और शाइस्ता किरदार के सिलसिले में मेरी मदद फ़रमा। और अपनी क़ूवत व ताक़त के बजाए मुझे मेरी क़ूवत व ताक़त के हवाले न कर और जिस दिन मुझे अपनी मुलाक़ात के लिये उठाए मुझे ज़लील व ख़्वार और अपने दोस्तों के सामने रूसवा न करना , और अपनी याद मेरे दिल से फ़रामोश न होने दे और अपना शुक्र व सिपास मुझसे ज़ाएल न कर , बल्कि जब तेरी नेमतों से बेख़बर , सहो व ग़फ़लत के आलम में हूं , मेरे लिये अदाए शुक्र लाज़िम क़रार दे। और मेरे दिल में यह बात डाल दे के जो नेमतें तूने बख़्शी हैं उन पर हम्द व तौसीफ़ और जो एहसानात मुझ पर किये हैं उनका एतराफ़ करूं और अपनी तरफ़ मेरी तवज्जो को तमाम तवज्जो करने वालों से बालातर और मेरी हम्द सराई को तमाम हम्द करने वालों से बलन्दतर क़रार दे और जब मुझे तेरी एहतियाज हो तो मुझे अपनी नुसरत से महरूम न करना और जिन आमाल को तेरी बारगाह में पेश किया है उन को मेरे लिये वजहे हलाकत न क़रार देना। और जिस अमल व किरदार के पेशे नज़र तूने अपने नाफ़रमानों को ध्ुात्कारा है यूं मुझे अपनी बारगाह से धुत्कार न देना। इसलिये के मैं तेरा मुतीअ व फ़रमाबरदार हूं और यह जानता हूं के हुज्जत व बुरहान तेरे ही लिये है और तू फ़ज़्ल व बख़्शिश का ज़्यादा सज़ावार और लुत्फ़ व एहसान के साथ फ़ायदा रसां और इस लाएक़ है के तुझसे डरा जाए और इसका अहल है के मग़फ़ेरत से काम ले और इसका ज़्यादा सज़ावार है के सज़ा देने के बजाय माफ़ कर दे और तशहीर करने के बजाए पर्दापोशी तेरी रोश से क़रीबतर है तो फिर मुझे ऐसी पाकीज़ा ज़िन्दगी दे जो मेरे हस्बे दिल ख़्वाह उमूर पर मुश्तमिल और मेरी और मेरी दिलपसन्द चीज़ों पर मुन्तही हो। उस तरह के जिस काम को तू नापसन्द करे उसे बजा न लाउं और जिससे मना करे उसका इरतेकाब न करूं। और मुझे उस शख़्स की सी मौत दे जिसका नूर उसके आगे और उसके दाहेनी तरफ़ चलता हो और मुझे अपनी बारगाह में आजिज़ व निगोंसार और लोगों के नज़दीक बावेक़ार बना दे और जब तुझसे तख़लिया में राज़ व नियाज़ करूं , तू मुझे पस्त और सराफ़गन्दा और अपने बन्दों में बलन्द मरतबा क़रार दे और जो मुझसे बेनियाज़ हो उससे मुझे बेनियाज़ कर दे और मेरे फ़क्ऱ व एहतियाज को अपनी तरफ़ बढ़ा दे और दुश्मनों के ख़ज़ाए (वीरलब) बलाओं के दुरूद और ज़िल्लत व सख़्ती से पनाह दे और मेरे उन गुनाहों के बारे में के जिन पर तू मुतलाअ है उस शख़्स के मानिन्द मेरी परदापोशी फ़रमा के अगर उसका हिल्म मानेअ न होता तो वह सख़्त गिरफ़्त पर क़ादिर होता और अगर उसकी रविश में नर्मी न होती तो वह गुनाहो पर मुवाख़ेज़ा करता। और जब किसी जमाअत को तू मुसीत में गिरफ़्तार या बला व नकहत से दो-चार करना चाहे तो दरसूरती के मैं तुझसे पनाह तलब हूं इस मुसीबत से निजात दे और जबके तूने मुझे दुनिया में रूसवाई के मौक़फ़ में खड़ा नहीं किया तो इसी तरह आख़ेरत में भी रूसवाई के मक़ाम पर खड़ा न करना और मेरे लिये दुनयवी नेमतों को अख़रवी नेमतों से और क़दीम फ़ायदों को जदीद फ़ाययदों से मिला दे और मुझे इतनी मोहलत न दे के उसके नतीजे में मेरा दिल सख़्त हो जाए और ऐसी मुसीबत में मुब्तिला न कर जिससे मेरी इज़्ज़त व आबरू जाती रहे और ऐसी ज़िल्लत से दोचार न कर जिससे मेरी क़द्र व मन्ज़िलत कम हो जाए और ऐसी ऐब में गिरफ़्तार न कर जिससे मेरा मरतबा व मक़ाम जाना न जा सके। और मुझे इतना ख़ौफ़ज़दा न कर के मैं मायूस हो जाउं और ऐसा ख़ौफ़ न दिला के हरासां हो जाऊं।

मेरे ख़ौफ़ को अपनी वईद व सरज़न्श में और मेरी अन्देशे को तेरे उज़्र तमाम करने और डराने में मुनहसिर कर दे और मेरे ख़ौफ़ व हेरास को आयाते (क़ुरानी) की तिलावत के वक़्त क़रार दे और मुझे अपनी इबादत के लिये बेदार रखने , ख़लवत व तन्हाई में दुआ व मुनाजात के लिये जागने सबसे अलग रहकर तुझसे लौ लगाने , तेरे सामने अपनी हाजतें पेश करने , दोज़ख़ से गुलू ख़लासी के लिये बार बार इल्तिजा करने और तेरे उस अज़ाब से जिसमें अहले दोज़ख़ गिरफ़्तार हैं पनाह मांगने के वसीले से मेरी रातों को आबाद कर और मुझे सरकशी में सरगरदां छोड़ न दे और न ग़फ़लत में एक ख़ास वक़्त तक ग़ाफ़िल व बेख़बर पड़ा रहने दे और मुझे नसीहत हासिल करने वालों के लिये नसीहत इबरत हासिल करने वालों के लिये इबरत और देखने वालों के लिये फ़ित्ना व गुमराही का सबब न क़रार दे और मुझे उन लोगों में जिनसे तू (उनके मक्र की पादाश में) मक्र करेगा शुमार न कर और (इनआम व बख़्शिश के लिये) मेरे एवज़ दूसरे को इनतेख़ाब न कर। मेरे नाम में तग़य्युर और जिस्म में तब्दीली न फ़रमा और मुझे मख़लूक़ात के लिये मज़हका और अपनी बारगाह में लाएक़े इस्तेहज़ा न क़रार दे। मुझे सिर्फ़ उन चीज़ों का पाबन्द बना जिनसे तेरी रज़ामन्दी वाबस्ता है और सिर्फ़ उस ज़हमत से दो चार कर जो (तेरे दुश्मनों से) इन्तेक़ाम लेने के सिलसिले में हो और अपने अफ़ो व दरगुज़र की लज़्ज़त और रहमत , राहत व आसाइश गुल व रैहान और जन्नते नईम की शीरीनी से आशना कर और अपनी वुसअत व तवंगरी की बदौलत ऐसी फ़राग़त से रूशिनास कर जिसमें तेरे पसन्दीदा कामों को बजा ला सकूं , और ऐसी सई व कोशिश की तौफ़ीक़ दे जो तेरी बारगाह में तक़र्रूब का बाएस हो और अपने तोहफ़ों में से मुझे नित नया तोहफ़ा दे और मेरी अख़रवी तिजारत को नफ़ाबख़्श और मेरी बाज़गश्त को बेज़रर क़रार दे और मुझे अपने मक़ाम व मौक़फ़ से डरा और अपनी मुलाक़ात का मुश्ताक़ बना और ऐसी सच्ची तौबा की तौफ़ीक़ अता फ़रमा के जिसके साथ मेरे छोटे और बड़े गुनाहों को बाक़ी न रखे और खुली और ढकी मासियतों को महो कर दे और अहले ईमान की तरफ़ से मेरे दिल से कीना व बुग़्ज़ को निकाल दे और इन्केसार व फ़रवतनी करने वालों पर मेरे दिल को मेहरबान बना दे और मेरे लिये तू ऐसा हो जा जैसा नेकोकारों के लिये है और परहेज़गारों के ज़ेवर से मुझे आरास्ता कर दे और आईन्दा आने वालों में मेरा ज़िक्रे ख़ैर और बाद में आने वाली नस्लों में मेरा ज़िक्र रोज़े अफ़ज़ों बरक़रार रख और साबिकूनल अव्वलून के महल व मक़ाम में मुझे पहुंचा दे और फ़राख़ी नेमत को मुझ पर तमाम कर और उसकी मनफ़अतों का सिलसिला पैहम जारी रख। अपनी नेमतों से मेरे हाथों को भर दे। और अपनी गरां क़द्र बखि़शशों को मेरी तरफ़ बढ़ा दे और जन्नत में जिसे तूने अपने बरगुज़ीदा बन्दों के लिये सजाया है मुझे अपने पाकीज़ा दोस्तों का हमसाया क़रार दे और उन जगहों में जिन्हें अपने दोस्तदारों के लिये मुहय्या किया है , मुझे उम्दा व नफ़ीस अतियों के ख़लअत ओढ़ा दे और मेरे लिये वह आरामगाह के जहां मैं इत्मीनान से बेखटके रहूं और वह मन्ज़िल के जहां मैं ठहरूं और वह मन्ज़िल के जहां मैं ठहरूं और अपनी आंखों को ठण्डा करूं , अपने नज़दीक क़रार दे। और मुझे मेरे अज़ीम गुनाहों के लेहाज़ से सज़ा न देना और जिस दिन दिलों के भेद जांचे जाएंगे , मुझे हलाक न करना हर शक व शुबह को मुझसे दूर कर दे और मेरे लिये हर सिम्त से हक़ पहुंचने की राह पैदा कर दे और अपनी अता व बख़्शिश के हिस्से मेरे लिये ज़्यादा कर दे और अपने फ़ज़्ल से नेकी व एहसान से हिज़ फ़रावां अता कर। और अपने हां की चीज़ों पर मेरा दिल मुतमईन और अपने कामों के लिये मेरी फ़िक्र को यक सू कर दे और मुझसे वही काम ले जो अपने मख़सूस बन्दों से लेता है। और जब अक़्लें ग़फ़लत में पड़ जाएं उस वक़्त मेरे दिल में इताअत का वलवला समो दे और मेेरे लिये तवंगरी , पाक दामनी , आसाइश , सलामती , तन्दरूस्ती , फ़िराख़ी , इत्मीनान और आफ़ियत को जमा कर दे और मेरी नेकियों को गुनाहों की आमेज़िश की वजह से और मेरी तन्हाइयों को उन मफ़सदों के बाएस जो अज़ राहे इम्तेहान पेश आते हैं , तबाह न कर , और अहले आलम में से किसी एक के आगे हाथ फैलाने से मेरी इज़्ज़त व आबरू को बचाए रख और उन चीज़ों की तलब व ख़्वाहिश से जो बद किरदारों के पास हैं मुझे रोक दे और मुझे ज़ालिमों का पुश्त पनाह न बना और न (एहकामे) किताब के महो करने पर उनका नासिर व मददगार क़रार दे और मेरी उस तरह निगेहदाश्त कर के मुझे ख़बर भी न होने पाए ऐसी निगेहदाश्त के जिसके ज़रिये तू मुझे (हलाकत व तबाही) से बचा ले जाए और मेरे लिये तौबा व रहमत , लुत्फ़ व राफ़त और कुशादा रोज़ी के दरवाज़े खोल दे। इसलिये के मैं तेरी जानिब रग़बत व ख़्वाहिश करने वालों में से हूं , और मेरे लिये अपनी नेमतों को पायाए तकमील तक पहुंचा दे इसलिये के इन्आम व बख़्शिश करने वालों में सबसे बेहतर है और मेरी बक़िया उम्र को हज व उमरा और अपनी रज़ाजोई के लिये क़रार दे ऐ तमाम जहानों के पालने वाले! रहमत करे अल्लाह तआला मोहम्मद (स 0) और उनकी पाक व पाकीज़ा आल (अ 0) पर और उन पर और उनकी औलाद पर हमेशा हमेशा दुरूद व सलाम हो।

अढ़तालीसवीं दुआ

ईदुल अज़हा और रोज़े जुमा की दुआ

बारे इलाहा! यह मुबारक व मसऊद दिन है जिसमें मुसलमान मामूरा ज़मीन के हर गोशे में मुज्तमअ हैं। उनमें साएल भी हैं और तलबगार भी। मुलतजी भी हैं और ख़ौफ़ज़दा भी वह सब ही तेरी बारगाह में हाज़िर हैं और तू ही उनकी हाजतों पर निगाह रखने वाला है। लेहाज़ा तेरे जूद व करम को देखते हुए और इस ख़याल से के मेरी हाजत बरआरी तेरे लिये आसान है तुझसे सवाल करता हूं के तू रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर। ऐ अल्लाह! ऐ हम सबके परवरदिगार! जबके तेरे ही लिये बादशाही और तेरे ही लिये हम्द व सताइश है और कोई माबूद नहीं तेरे अलावा , जो बुर्दबार , करीम , मेहरबानी करने वाला , नेमत बख़्शने वाला , बुज़ुर्गी व अज़मत वाला और ज़मीन व आसमान का पैदा करने वाला। तो मैं तुझसे सवाल करता हूं के जब भी तू अपने ईमान वाले बन्दों में नेकी या आफ़ियत या ख़ैर व बरकत या अपनी इताअत पर अमल पैरा होने की तौफ़ीक़ तक़सीम फ़रमाए या ऐसी भलाई जिससे तू उन पर एहसान करे और उन्हें अपनी तरफ़ रहनुमाई फ़रमाए या अपने हां उनका दरजा बलन्द करे या दुनिया व आख़ेरत की भलाई में से कोई भलाई उन्हें अता करे तो इसमें मेरा हिस्सा व नसीब फ़रावां कर। ऐ अल्लाह! तेरे ही लिये जहांदारी और तेरे ही लिये हम्द व सताइश है और कोई माबूद नहीं तेरे सिवा। लेहाज़ा मैं तुझसे सवाल करता हूं के तू रहमत नाज़िल फ़रमा अपने अब्द , रसूल (स 0), हबीब , मुन्तख़ब और बरगुज़ीदा ख़लाएक़ मोहम्मद (स 0) पर और उनके अहलेबैत (अ 0) पर जो नेकोकार , पाक व पाकीज़ा और बेहतरीन ख़ल्क़ हैं। ऐसी रहमत जिसके शुमार पर तेरे अलावा कोई क़ादिर न हो और आज के दिन तेरे ईमान लाने वाले बन्दों में से जो भी तुझसे कोई नेक दुआ मांगे तो हमें उसमें शरीक कर दे ऐ तमाम जहानों के परवरदिगार , और हमें और उन सबको बख़्श दे इसलिये के तू हर चीज़ पर क़ादिर है।

ऐ अल्लाह! मैं अपनी हाजतें तेरी तरफ़ लाया हूं और अपने फ़क्ऱ व फ़ाक़ा व एहतियाज का बारे गरां तेरे दर पर ला उतारा है और मैं अपने अमल से कहीं ज़्यादा तेरी आमरज़िश व रहमत पर मुतमईन हूं और बेशक तेरी मग़फ़ेरत व रहमत का दामन मेरे गुनाहों से कहीं ज़्यादा वसीअ है। लेहाज़ा तू मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मेरी हर हाजत तू ही बर ला। अपनी उस क़ुदरत की बदौलत जो तुझे उस पर हासिल है और यह तेरे लिये सहल व आसान है और इस लिये के मैं तेरा मोहताज और तू मुझसे बे नियाज़ है। और इसलिये के मैं किसी भलाई को हासिल नहीं कर सकता मगर तेरी जानिब से और तेरे सिवा कोई मुझ से दुख दर्द दूर नहीं कर सका। और मैं दुनिया व आख़ेरत के कामों में तेरे अलावा किसी से उम्मीद नहीं रखता।

ऐ अल्लाह! जो कोई सिला व अता की उम्मीद और बख़्शिश व इनआम की ख़्वाहिश लेकर किसी मख़लूक़ के पास जाने के लिये कमरबस्ता व आमादा और तैयार व मुस्तअद हो तो ऐ मेरे मौला व आक़ा! आज के दिन मेरी आमादगी व तैयारी और सरो सामान की फ़राहेमी व मुस्तअदी तेरे अफ़ो व अता की उम्मीद और बख़्शिश व इनआम की तलब के लिये है। लेहाज़ा ऐ मेरे माबूद! तू मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और आज के दिन मेरी उम्मीदों में मुझे नाकाम न कर। ऐ वह जो मांगने वाले के हाथों तंग नहीं होता और न बख़्शिश व अता से जिसके हां कमी होती है। मैं अपने किसी अमले ख़ैर पर जिसे आगे भेजा हो और सिवाए मोहम्मद (स 0) और उनके अहलेबैत सलवातुल्लाह अलैह व अलैहिम की शिफ़ाअत के किसी मख़लूक़ की सिफ़ारिश पर जिसकी उम्मीद रखी हो इत्मीनान करते हुए तेरी बारगाह में हाज़िर नहीं हुआ। मैं तो अपने गुनह और अपने हक़ में बुराई का इक़रार करते हुए तेरे पास हाज़िर हुआ हूं। दरआंहालियाके मैं तेरे इस अफ़वे अज़ीम का उम्मीदवार हूं जिसके ज़रिये तूने ख़ताकारों को बख़्श दिया। फिर यह के उनका बड़े बड़े गुनाहों पर अरसे तक जमे रहना तुझे उन पर मग़फ़ैरत व रहमत की अहसान फ़रमाई से मानेअ न हुआ। ऐ वह जिसकी रहमत वसीअ और अफ़ो व बख़्शिश अज़ीम है , ऐ बुज़ुर्ग! ऐ अज़ीम!! ऐ बख़शन्दा! ऐ करीम!! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और अपनी रहमत से मुझ पर एहसान और अपने फ़ज़्ल व करम के ज़रिये मुझ पर मेहरबानी फ़रमा और मेरे हक़ में दामने मग़फ़ेरत को वसीअ कर। बारे इलाहा! यह मक़ाम (ख़ुत्बा व इमामते नमाज़े जुमा) तेरे जानशीनों और बरगुज़ीदा बन्दों के लिये था और तेरे अमानतदारों का महल था दरआंहालियाके तूने इस बलन्द मन्सब के साथ उन्हें मख़सूस किया था। (ग़स्ब करने वालों ने) उसे छीन लिया। और तू ही रोज़े अज़ल से उस चीज़ का मुक़द्दर करने वाला है। न तेरा अम्रो फ़रमान मग़लूब हो सकता है और न तेरी क़तई तदबीर (क़ज़ा व क़द्र) से जिस तरह तूने चाहा हो और जिस वक़्त चाहा हो तजावुज़ मुमकिन है। इस मसलेहत की वजह से जिसे तू ही बेहतर जानता है। बहरहाल तेरी तक़दीर और तेरे इरादे व मशीयत की निस्बत तुझ पर इल्ज़ाम आयद नहीं हो सकता। यहां तक के (इस ग़स्ब के नतीजे में) तेरे बरगुज़ीदा और जानशीन मग़लूब व मक़हूर हो गए , और उनका हक़ उनके हाथ से जाता रहा। वह देख रहे हैं के तेरे एहकाम बदल दिये गए। तेरी किताब पसे पुश्त डाल दी गयी। तेरे फ़राएज़ व वाजेबात तेरे वाज़ेह मक़ासिद से हटा दिये गये और तेरे नबी (स 0) के तौर व तरीक़े मतरूक हो गए। बारे इलाहा! तू इन बरगुज़ीदा बन्दों के अगले और पिछले दुश्मनों पर और उन पर जो उन दुश्मनों के अमल व किरदार पर राज़ी व ख़ुशनूद हों और जो उनके ताबेअ और पैरोकार हों लानत फ़रमा।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर ऐसी रहमत नाज़िल फ़रमा ‘‘बेशक तू क़ाबिले हम्द व सना बुज़ुर्गी वाला है। ’’ जैसी रहमतें बरकतें और सलाम तूने अपने मुन्तख़ब व बरगुज़ीदा इबराहीम (अ 0) और आले इबराहीम पर नाज़िल किये हैं और उन के लिये कशाइश राहत , नुसरत , ग़लबा और ताईद में ताजील फ़रमा। बारे इलाहा! मुझे तौहीद का अक़ीदा रखने वालों , तुझ पर ईमान लाने वालों और तेरे रसूल (स 0) और आईम्मा (अ 0) की तस्दीक़ करने वालों में से क़रार दे जिनकी इताअत को तूने वाजिब किया है। इन लोगों में से जिनके वसीले और जिनके हाथों से (तौहीद , ईमान और तस्दीक़) यह सब चीज़ें जारी करें। मेरी दुआ को क़ुबूल फ़रमा ऐ तमाम जहानों के परवरदिगार! बारे इलाहा! तेरे हिल्म के सिवा कोई चीज़ तेरे ग़ज़ब को टाल नहीं सकती और तेरे अफ़ो व दरगुज़र के सिवा कोई चीज़ तेरी नाराज़गी को पलटा नहीं सकती और तेरी रहमत के सिवा कोई चीज़ तेरे अज़ाब से पनाह नहीं दे सकती और तेरी बारगाह में गिड़गिड़ाहट के अलावा कोई चीज़ तुझसे रिहाई नहीं दे सकती है। लेहाज़ा तू मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और अपनी इस क़ुदरत से जिससे तू मुर्दों को ज़िन्दा और बन्जर ज़मीनों को शादाब करता है। मुझे अपनी जानिब से ग़मो अन्दोह से छुटकारा दे। बारे इलाहा! जब तक तू मेरी दुआ क़ुबूल न फ़रमाए और उसकी क़ुबूलियत से आगाह न कर दे मुझे ग़म व अन्दोह से हलाक न करना , और ज़िन्दगी के आख़री लम्हों तक मुझे सेहत व आफ़ियत की लज़्ज़त से शाद काम रखना। और दुश्मनों को (मेरी हालत पर) ख़ुश होने और मेरी गर्दन पर सवार और मुझ पर मुसल्लत होने का मौक़ा न देना। बारे इलाहा! अगर तू मुझे बलन्द करे तो कौन पस्त कर सकता है और तू पस्त करे तो कौन बलन्द कर सकता है और तू इज़्ज़त बख़्शे तो कौन ज़लील कर सकता है , और तू ज़लील करे तो कौन इज़्ज़त दे सकता है। और तू मुझ पर अज़ाब करे तो कौन मुझ पर तरस खा सकता है और अगर तू हलाक करे तो कौन तेरे बन्दे के बारे में तुझ पर मोतरज़ हो सकता है या इसके मुताल्लिक़ तुझसे कुछ पूछ सकता है। और मुझे ख़ूब इल्म है के तेरे फ़ैसले में न ज़ुल्म का शाएबा होता है और न सज़ा देने में जल्दी होती है। जल्दी तो वह करता है जिसे मौक़े के हाथ से निकल जाने का अन्देशा हो और ज़ुल्म की उसे हाजत होती है जो कमज़ोर व नातवां हो , और तू ऐ मेरे माबूद! इन चीज़ों से बहुत बलन्द व बरतर है। ऐ अल्लाह! तू मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे बलाओं का निशाना और अपनी उक़ूबतों का हदफ़ न क़रार दे , मुझे मोहलत दे और मेरे रंज व ग़म को दूर कर , मेरी लग़्िज़शों को माफ़ कर दे और मुझे एक मुसीबत के बाद दूसरी मुसीबत में मुब्तिला न कर , क्योंके तू मेरी नातवानी , बेचारगी और अपने हुज़ूर मेरी गिड़गिड़ाहट को देख रहा है। बारे इलाहा! मैं आज के दिन तेरे ग़ज़ब से तेरे ही दामन में पनाह मांगता हूं। तू मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे पनाह दे और मैं आज के दिन तेरी नाराज़गी से अमान चाहता हूं। तू मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे अमान दे और तेरे अज़ाब से अमन तलबगार हूं। तू रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और मुझे (अज़ाब से) मुतमईन कर दे। और तुझसे हिदायत का ख़्वास्तगार हूं , तू रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और मुझे हिदायत फ़रमा। और तुझसे मदद चाहता हूं। तू रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और मेरी मदद फ़रमा। और तुझसे रहम की दरख़्वास्त करता हूं , तू रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और मुझ पर रहम कर। और तुझसे बेनियाज़ी का सवाल करता हूं , तू रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और मुझे बेनियाज़ कर दे और तुझसे रोज़ी का सवाल करता हूं , तू रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और मुझे रोज़ी दे , और तुझसे कमंग का तालिब हूं तू रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और मेरी कमंग फ़रमा। और गुज़िश्ता गुनाहों की आमर्ज़िश का ख़्वास्तगार हूं तू रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और मुझे बख़्श दे , और तुझसे (गुनाहों के बारे में) बचाव का ख़्वाहा हूं , तू रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और मुझे (गुनाहों से) बचाए रख। इसलिये के अगर तेरी मशीयत शामिले हाल रही तो किसी ऐसी काम का जिसे तू मुझसे नापसन्द करता हो , मुरतकिब न हूंगा , ऐ मेरे परवरदिगार , ऐ मेरे परवरदिगार! ऐ मेहरबान , ऐ नेमतों के बख़्शने वाले ऐ जलालत व बुज़ुर्गी के मालिक तू रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर और जो कुछ मैंने मांगा और जो कुछ तलब किया है और जिन चीज़ों के हुसूल के लिये तेरी बारगाह का रूख़ किया है। उनसे अपना इरादा , हुक्म और फैसला मुताल्लिक़ कर और उन्हें जारी कर दे। और जो भी फ़ैसले करे उसमें मेरे लिये भलाई क़रार दे और मुझे उसमें बरकत अता कर और इसके ज़रिये मुझ पर एहसान फ़रमा और जो अता फ़रमाए उसके वसीले से मुझे ख़ुशबख़्त बना दे और मेरे लिये अपने फ़ज़्ल व कशाइश को जो तेरे पास है , ज़्यादा कर दे इसलिये के तू तवंगर व करीम है। और इसका सिलसिला आख़ेरत की ख़ैर व नेकी और वहां की नेमते फ़रावां से मिला दे। ऐ तमाम रहम करने वालों से ज़्यादा रहम करने वाले।

उनचासवीं दुआ

दुश्मनों के मक्रो फ़रेब के दफ़ीया और उनकी शिद्दत व सख़्ती को दूर करने के लिये हज़रत की दुआ

ऐ मेरे माबूद! तूने मेरी रहनुमाई की मगर मैं ग़ाफ़िल रहा , तूने पन्द व नसीहत की मगर मैं सख़्तदिली के बाएस मुतास्सिर न हुआ। तूने मुझे उमदा नेमतें बख़्शीं , मगर मैंने नाफ़रमानी की। फिर यह के जिन गुनाहों से तूने मेरा रूख़ मोड़ा जबके तूने मुझे इसकी मारेफ़त अता की तो मैं ने (गुनाहों की बुराई को) पहचानकर तौबा व अस्तग़फ़ार की जिस पर तूने मुझे माफ़ कर दिया और फिर गुनाहों का मुरतकिब हुआ तो तूने पर्दापोशी से काम लिया ऐ मेरे माबूद! तेरे ही लिये हम्द व सना है। मैं हलाकत की वादियों में फान्दा और तबाही व बरबादी की घाटियों में उतरा। इन हलाकतख़ेज़ घाटियों में तेरी क़हर मानी सख़्तगीरियों और उनमें वर आने से तेरी उक़ूबतों का सामना किया तेरी बारगाह में मेरा ववसीला तेरी वहदत वव यकताई का इक़रार है। और मेरा ज़रिया सिर्फ़ यह है के मैंने किसी चीज़ को तेरा शरीक नहीं जाना और तेरे साथ किसी को माबूद नहीं ठहराया। और मैं अपनी जान को लिये तेरी रहमत व मग़फ़ेरत की जानिब गुरीज़ां हूं। और एक गुनहगार तेरी ही तरफ़ भागकर आता है और एक इल्तेजा करने वाला जो अपने ख़त व नसीब को ज़ाया कर चुका हो तेरे ही दामन में पनाह लेता है कितने ही ऐसे दुश्मन थे जिन्होंने शमशीरे अदावत को मुझ पर बेनियाम किया और मेरे लिये अपनी छुरी की धार को बारीक और अपनी तन्दी व सख़्ती की बाड़ को तेज़ किया और पानी में मेरे लिये मोहलक ज़हरों की आमेज़िश की और कमानों में तीरों को जोड़ कर मुझे निशाने की ज़द पर रख लिया और उनकी तआक़ुब करने वाली निगाहें मुझसे ज़रा ग़ाफ़िल न हुईं और दिल में मेरी ईन्दारसानी के मन्सूबे बान्धने और तल्ख़ जरओं की तल्ख़ी से मुझे पैहम तल्ख़ काम बनाते रहे। तो ऐ मेरे माबूद! इन रन्ज व आलाम की बरदाश्त से मेरी कमज़ोरी और मुझसे आमादा पैकार होने वालों के मुक़ाबले में इन्तेक़ाम से मेरी आजिज़ी और कसीरूततादाद दुश्मनों और ईन्दारसानी के लिये घात लगाने वालों के मुक़ाबले में मेरी तन्हाई तेरी नज़र में थी जिसकी तरफ़ से मैं ग़ाफ़िल और बेफ़िक्र था के तूने मेरी मदद में पहल और अपनी क़ूवत और ताक़त से मेरी कमर मज़बूत की। फिर यह के इसकी तेज़ी को तोड़ दिया और उसके कसीर साथियों (को मुन्तशिर करने) के बाद उसे यको तन्हा कर दिया और मुझे उस पर ग़लबा व सरबलन्दी अता की और जो तीर उसने अपनी कमान में जोड़े थे वह उसी की तरफ़ पलटा दिये। चुनांचे इस हालत में तूने उसे पलटा दिया के न तो वह अपना ग़ुस्सा ठण्डा कर सका और न उसके दिल की पेश फ़रो हो सकी , उसने अपनी बोटियां काटीं और पीठ फिराकर चला गयाा और उसके लश्करवालों ने भी इसे दुनिया दी और कितने ही ऐसे सितमगर थे जिन्होंने अपने मक्रो फ़रेब से मुझ पर ज़ुल्म व तादी की और अपने शिकार के जाल मेरे लिये बिछाए और अपनी निगाहे जुस्तजू का मुझ पर पहरा लगा दिया और इस तरह घात लगाकर बैठ गए जिस तरह दरन्दह अपने शिकार के इन्तेज़ार में मौक़े की ताक में घात लगाकर बैठता है। दरआंहालिया के वह मेरे सामने ख़ुशामदाना तौर पर ख़न्दह पेशानी से पेश आते और (दर पर्दा) इन्तेहाई कीनातोज़ नज़रों से मुझे देखते तो जब ऐ ख़ुदाए बुज़ुर्ग व बरतर उनकी बद बातेनी व बदसरिश्ती को देखा तो उन्हें सर के बल उन्हीं के गढ़े में उलट दिया और उन्हें उन्हीं के ग़ार के गहराव में फेंक दिया , और जिस हाल में मुझे गिरफ्तार देखना चाहते थे ख़ुद ही ग़ुरूर व सरबलन्दी का मुज़ाहेरा करने के बाद ज़लील होकर उसके फन्दों में जा पड़े अैर सच तो यह है के अगर तेरी रहमत शरीके हाल न होती तो क्या बईद था के जो बला व मुसीबत उन पर टूट पड़ी है वह मुझ पर टूट पड़ती और कितने ही ऐसे हासिद थे जिन्हें मेरी वजह से ग़म व ग़ुस्से के उच्छू और ग़ैज़ व ग़ज़ब के गुलूगीर फन्दे लगे और अपनी तेज़ ज़बानी से मुझे अज़ीयत देते रहे और अपने उयूब के साथ मुझे मोतहिम करके तैश दिलाते रहे और मेरी आबरू को अपने तीरों का निशाना बनाया और जिन बुरी आदतों में वह ख़ुद हमेशा मुब्तिला रहे वह मेरे सर मण्ढ दें और अपनी फ़रेबकारियों से मुझे मुश्तअल करते और अपनी दग़ाबाज़ियों के साथ मेरी तरफ़ पर तोलते रहे तो मैंने ऐ मेरे अल्लाह तुझसे फ़रयादरसी चाहते हुए और तेरी जल्द हाजत रवाई पर भरोसा करते हुए तुझे पुकारा दरआंहालिया के यह जानता था के जो तेरे सायाए हिमायत में पनाह लेगा वह शिकस्त ख़ोरदा न होगा और जो तेरे इन्तेक़ाम की पनाहगाहे मोहकम में पनाहगुज़ीं होगा , वह हरासां नहीं होगा , चुनांचे तूने अपनी क़ुदरत से उनकी शिद्दत व शर अंगेज़ी से मुझे महफ़ूज़ कर दिया और कितने ही मुसीबतों के अब्र (जो मेरे अफ़क़े ज़िन्दगी पर छाए हुए) थे तूने छांट दिये और कितने ही नेमतों के बादल बरसा दिये और कितनी ही रहमत की नहरें बहा दीं और कितने ही सेहत व आफ़ियत के जामे पहन दिये , और कितनी ही आलाम व हवादिस की आंखें (जो मेरी तरफ़ निगरान थीं) तूने बेनूर कर दीं और कितने ही ग़मों के तारीक पर्दे (मेरे दिल पर से) उठा दिये और कितने ही अच्छे गुमानें को तूने सच कर दिया और कितने ही तही वसीयतों का तूने चारा किया और कितनी ही ठोकरों को तूने संभाला और कितनी ही नादारियों को तूने (सरवत से) बदल दिया। (बारे इलाहा! ) यह सब तेरी तरफ़ से इनआम व एहसान है और मैं इन तमाम वाक़ेयात के बावजूद तेरी मासीयतों में हमहतन मुनहमिक रहा। (लेकिन) मेरी बदआमालियों ने तुझे अपने एहसानात की तकमील से रोका नहीं और न तेरा फ़ज़्ल व एहसान मुझे उन कामों से जो तेरी नाराज़गी का बाएस हैं बाज़ रख सका और जो कुछ तू करे उसकी बाबत तुझसे पूछगछ नहीं हो सकती। तेरी ज़ात की क़सम! जब भी तुझसे मांगा गया तूने अता किया और जब न मांगा गया तो तूने अज़ख़ुद दिया। और जब तेरे फ़ज़्ल व करम के लिये झोली फैलाई गई तो तूने बुख़ल से काम नहीं लिया। ऐ मेरे मौला व आक़ा! तूने कभी एहसान व बख़्शिश और तफ़ज़्ज़ुल व इनआम से दरीग़ नहीं किया और मैं तेरे मोहर्रमात में फान्दता तेरे हुदूद व एहकाम से मुतजाविज़ होता और तेरी तहदीद व सरज़न्श से हमेशा ग़फ़लत करता रहा। ऐ मेरे माबूद! तेरे ही लिये हम्द व सताइश है जो ऐसा साहबे इक़्तेदार है जो मग़लूब नहीं हो सकता। और ऐसा बुर्दबार है जो जल्दी नहीं करता। यह उस शख़्स का मौक़फ़ है जिसने तेरी नेमतों की फ़रावानी का एतराफ़ किया है और उन नेमतों के मुक़ाबले में कोताही की है और अपने खि़लाफ़ अपनी ज़ियांकारी की गवाही दी है। ऐ मेरे माबूद! मैं मोहम्मद (सल्लल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम) की मन्ज़िलत बलन्द पाया और अली (अलैहिस्सलाम) के मरतबए रौशन व दरख़्शां के वास्ते से तुझसे तक़र्रूब का ख़्वास्तगार हूं और उन दोनों के वसीली से तेरी तरफ़ मुतवज्जो हूं। ताके मुझे उन चीज़ों की बुराई से पनाह दे जिनसे पनाह तलब की जाती है। इसलिये के यह तेरी तवंगरी व वुसअत के मुक़ाबले में दुश्वार और तेरी क़ुदरत के आगे कोई मुश्किल काम नहीं है और तू हर चीज़ पर क़ादिर है। लेहाज़ा तू अपनी रहमत और दाएमी तौफ़ीक़ से मुझे बहरामन्द फ़रमा के जिसे ज़ीना क़रार देकर तेरी रज़ामन्दी की सतह पर बलन्द हो सकूं और उसके ज़रिये तेरे अज़ाब से महफ़ूज़ रहूं। ऐ तमाम रहम करने वालों में सबसे बढ़कर रहम करने वाले।

पचासवीं दुआ

ख़ौफ़े ख़ुदा के सिलसिले में हज़रत की दुआ

बारे इलाहा! तूने मुझे इस तरह पैदा किया के मेरा आज़ा बिल्कुल सही व सालिम थे , और जब कमसिन था , तो मेरी परवरिश का सामान किया और बे रन्ज व काविश रिज़्क़ दिया। बारे इलाहा! तूने जिस किताब को नाज़िल किया और जिसके ज़रिये अपने बन्दों को नवेद व बशारत दी , उसमें तेरे इस इरशाद को देखा है के ‘‘ऐ मेरे बन्दों! जिन्होंने अपनी जानों पर ज़्यादती की है , तुम अल्लाह तआला की रहमत से ना उम्मीद न होना। यक़ीनन अल्लाह तुम्हारे तमाम गुनाह मुआफ़ कर देगा ’’ इससे पेशतर मुझसे ऐसे गुनाह सरज़द हो चुके हैं जिनसे तू वाक़िफ़ है और जिन्हें तू मुझसे ज़्यादा जानता है। वाए बदबख़्ती व रूसवाई उन गुनाहों के हाथों जिन्हें तेरी किताब क़लमबन्द किये हुए है अगर तेरे हमहगीर अफ़ो व दरगुज़र के वह मवाक़ेअ न होते जिनका मैं उम्मीदवार हूं तो मैं अपने हाथों अपनी हलाकत का सामान कर चुका था। अगर कोई एक भी अपने परवरदिगार से निकल भागने पर क़ादिर होता तो मैं तुझसे भागने का ज़्यादा सज़ावार था। और तू वह है जिससे ज़मीन व आसमान के अन्दर कोई राज़ मख़फ़ी नहीं है मगर यह के तू (क़यामत के दिन) उसे ला हाज़िर करेगा। तू जज़ा देने और हिसाब करने के लिये बहुत काफ़ी है। ऐ अल्लाह! मैं अगर भागना चाहूं तो तू मुझे ढूंढ लेगा , अगर राहे गुरेज़ इख़्तियार करूं , तो तू मुझे पा लेगा। ले देख मैं आजिज़ , ज़लील और शिकस्ता हाल तेरे सामने खड़ा हूं , अगर तू अज़ाब करे तो मैं उसका सज़ावार हूं। ऐ मेरे परवरदिगार! यह तेरी जानिब से ऐन अद्ल है और अगर तू मुआफ़ कर दे तो तेरा अफ़ो व दरगुज़र हमेशा मेरे शामिले हाल रहा है। और तूने सेहत व सलामती के लिबास मुझे पहनाए हैं। बारे इलाहा! मैं तेरे उन पोशीदा नामों के वसीले से और तेरी उस बुज़ुर्गी के वास्ते से जो (जलाल व अज़मत के) पर्दों में मख़फ़ी है तुझसे यह सवाल करता हूं के इस बेताब नफ़्स और बेक़रार हड्डियों के ढांचे पर तरस खा (इसलिये के) जो तेरे सूरज की तपिश को बरदाश्त नहीं कर सकता वह तेरे जहन्नुम की तेज़ी को कैसे बरदाश्त करेगा और जो तेरे बादल की गरज से कांप उठता है तो वह तेरे ग़ज़ब की आवाज़ को कैसे सुन सकता है। लेहाज़ा मेरे हाले ज़ार पर रहम फ़रमा इसलिये के ऐ मेरे माबूद! मैं एक हक़ीर फ़र्द हूं जिसका मरतबा पस्ततर है और मुझ पर अज़ाब करना तेरी सल्तनत में ज़र्रा भर इज़ाफ़ा नहीं कर सकता और अगर मुझे अज़ाब करना तेरी सल्तनत को बढ़ा देता तो मैं तुझसे अज़ाब पर सब्र व शिकेबाई का सवाल करता और यह चाहता के वह इज़ाफ़ा तुझे हासिल हो। लेकिन ऐ मेरे माबूद! तेरी सल्तनत इससे ज़्यादा अज़ीम और इससे ज़्यादा दवाम पज़ीद है के फ़रमांबरदारों की इताअत इसमें कुछ इज़ाफ़ा कर सके या गुनहगारों की मासियत इसमें से कुछ घटा सके। तो फिर ऐ तमाम रहम करने वालों से ज़्यादा रहम करने वाले मुझ पर रहम फ़रमा और ऐ जलाल व बुज़ुर्गी वाले मुझसे दरगुज़र कर और मेरी तौबा क़ुबूल फ़रमा। बेशक तू तौबा क़ुबूल करने वाला और रहम करने वाला है।

इक्यावनवी दुआ

तज़रूअ व फ़रवतनी के सिलसिले में हज़रत (अ 0) की दुआ

ऐ मेरे माबूद! मैं तेरी हम्द व सताइश करता हूं और तू हम्द व सताइश का सज़ावार है इस बात पर के तूने मेरे साथ अच्छा सुलूक किया। मुझ पर अपनी नेमतों का कामिल और अपने अतीयों को फ़रावां किया और इस बात पर के तूने अपनी रहमत के ज़रिये मुझे ज़्यादा से ज़्यादा और अपनी नेमतों को मुझ पर तमाम किया। चुनांचे तूने मुझ पर वह एहसानात किये हैं जिनके शुक्रिया से क़ासिर हूं और अगर तेरे एहसानात मुझ पर न होते और तेरी नेमतें मुझ पर फ़रावां न होतीं तो मैं न अपना हिज्ज़ व नसीब फ़राहम कर सकता था और न नफ़्स की इस्लाह व दुरूस्ती की हद तक पहुंच सकता था लेकिन तूने मेरे हक़ में अपने एहसानात का आग़ाज़ फ़रमाया और मेरे तमाम कामों में मुझे (दूसरों से) बेनियाज़ी अता की। रंज व बला की सख़्ती भी मुझसे हटा दी और जिस हुक्मे क़ज़ा का अन्देशा था उसे मुझसे रोक दिया। ऐ मेरे माबूद! कितनी बलाख़ेज़ मुसीबतें थीं जिन्हें तूने मुझसे दूर कर दिया और कितनी ही कामिल नेमतें थीं जिनसे तूने मेरी आंखों की ख़नकी व सरवर का सामान किया और कितने ही तूने मुझ पर बढ़े एहसानात फ़रमाए हैं। तू वह है जिसने हालते इज़्तेरार में दुआ क़ुबूल की और (गुनाहों में) गिरने के मौक़े पर मेरी लग़्िज़श से दरगुज़र किया और दुश्मनों से मेरे ज़ुल्म व सितम से छने हुए हक़ को ले लिया। बारे इलाहा! मैंने जब भी तुझसे सवाल किया तुझे बख़ील और जब भी तेरी बारगाह का क़स्द किया तुझे रन्जीदा नहीं पाया। बल्कि तुझे अपनी दुआ की निस्बत सुनने वाला और अपने मक़ासिद का बर लाने वाला ही पाया। और मैंने अपने अहवाल में से हर हाल में और अपने ज़मानाए (हयात) के हर लम्हे में तेरी नेमतों को अपने लिये फ़रावां पाया। लेहाज़ा तू मेरे नज़दीक क़ाबिले तारीफ़ और तेरा एहसान लाएक़े शुक्रिया है। मेरा जिस्म (अमलन) मेरी ज़बान (क़ौलन) और मेरी अक़्ल (एतेक़ादन) तेरी हम्द व सिपास करती है। ऐसी हम्द जो हद्दे कमाल और इन्तेहाए शुक्र पर फ़ाएज़ हो। ऐसी हम्द जो मेरे लिये तेरी ख़ुशनूदी के बराबर हो। लेहाज़ा मुझे अपनी नाराज़गी से बचा। ऐ मेरे पनाहगाह जबके (मुतज़र्क़) रास्ते मुझे ख़स्ता व परेशान कर दें। ऐ मेरी लग़्िज़शों के माफ़ करने वाले अगर तू मेरी पर्दापोशी न करता तो मैं यक़ीनन रूसवा होने वालों में से होता। ऐ अपनी मदद से मुझे तक़वीयत देने वाले अगर तेरी मदद शरीके हाल न होती तो मैं मग़ावब व शिकस्त ख़ोरदा लोगों में से होता। ऐ वह जिसकी बारगाह में शाहों ने ज़िल्लत व ख़्वारी का जोवा अपनी गर्दन में डाल लिया है और वह उसके ग़लबे व इक़्तेदार से ख़ौफ़ज़दा हैं। ऐ वह जो तक़वा का सज़ावार है ऐ वह के हुस्न व ख़ूबी वाले नाम बस उसी के लिये हैं , मैं तुझसे ख़्वास्तगार हूं के मुझसे दरगुज़र फ़रमा और मुझे बख़्श दे , क्योंके मैं बेगुनाह नहीं हूं के उज़्र ख़्वाही करूं और न ताक़तवर हूं के ग़लबा पा सकूं और न गुरेज़ की कोई जगह है के भाग सकूं। मैं तुझसे अपनी लग्ज़िशों की माफ़ी चाहता हूं और उन गुनाहों से जिन्होंने मुझे हलाक कर दिया है और मुझे इस तरह घेर लिया है के मुझे तबाह कर दिया है , तौबा व माज़ेरत करता हूं मैं ऐ मेरे परवरदिगार! उन गुनाहों से तौबा करते हुए तेरी तरफ़ भाग खड़ा हूं तो अब मेरी तौबा क़ुबूल फ़रमा , तुझसे पनाह चाहता हूं। मुझे पनाह दे , तुझसे अमान मांगता हूं मुझे ख़्वार न कर तुझसे सवाल करता हूं मुझे महरूम न कर , तेरे दामन से वाबस्ता हूं मुझे मेरे हाल पर छोड़ न दे , और तुझसे दुआ मांगता हूं लेहाज़ा मुझे नाकाम न फेर। ऐ मेरे परवरदिगार! मैंने ऐसे हाल में के मैं बिल्कुल मिस्कीन आजिज़ , ख़ौफ़ज़दा , तरसां , हरासां , बेसरो सामान और लाचार हूं , तुझे पुकारा है। ऐ मेरे माबूद! मैं इस अज्र व सवाब की जानिब जिसका तूने अपने दोस्तों से वादा किया है जल्दी करने और उस अज़ाब से जिससे तूने अपने दुश्मनों को डराया है दूरी इख़्तियार करने से अपनी कमज़ोरी और नातवानी का गिला करता हूं तेज़ अफ़कार की ज़ियादती और नफ़्स की परेशान ख़याली का शिकवा करता हूं। ऐ मेरे माबूद! तू मेरी बातेनी हालत की वजह से मुझे रूसवा न करना। और मेरे गुनाहों के बाएस मुझे तबाह व बरबाद न होने देना। मैं तुझे पुकारता हूं तो तू मुझे जवाब देता है और जब तू मुझे बुलाता है तो मैं सुस्ती करता हूं और मैं जो हाजत रखता हूं तुझसे तलब करता हूं और जहां कहीं होता हूं अपने राज़े दिली तेरे सामने आश्कारा करता हूं और तेरे सिवा किसी को नहीं पुकारता और न तेरे अलावा किसी से आस रखता हूं। हाज़िर हूं! मैं हाज़िर हूं! जो तुझसे शिकवा करे तू उसका शिकवा सुनता है और जो तुझ पर भरोसा करे उसकी तरफ़ मुतवज्जो होता है। और जो तेरा दामन थाम ले उसे (ग़म व फ़िक्र) से रेहाई देता है। और जो तुझसे पनाह चाहे उससे ग़म व अन्दोह को दूर कर देता है। ऐ मेरे माबूद! मेरे नाशुक्रेपन की वजह से मुझे दुनिया व आख़ेरत की भलाई से महरूम न कर और मेरे जो गुनाह जो तेरे इल्म में हैं बख़्श दे। और अगर तू सज़ा दे तो इसलिये के मैं ही हद से तजावुज़ करने वाला सुस्त क़दम , ज़ियांकार , आसी , तक़सीर पेशा , ग़फ़लत शुआर और अपने हज़ा व नसीब में लापरवाही करने वाला हूं और अगर तू बख़्शे तो इसलिये के तू सब रहम करने वालों से ज़्यादा रहम करने वाला है।

बावनवीं दुआ

अल्लाह तआला से तलब व इलहाह के सिलसिले में हज़रत (अ 0) की दुआ

ऐ वह माबूद जिससे केई चीज़ पोशीदा नहीं है चाहे ज़मीन में हो चाहे आसमान में। और ऐ मेरे माबूद वह चीज़ें जिन्हें तूने पैदा किया है वह तुझसे क्योंकर पोशीदा रह सकती हैं। और जिन चीज़ों को तूने बनाया है उन पर किस तरह तेरा इल्म मोहीत न होगा और जिन चीज़ों की तू तदबीर व कारसाज़ी करता है वह तेरी नज़रों से किस तरह ओझल रह सकती हैं और जिसकी ज़िन्दगी तेरे रिज़्क़ से वाबस्ता हो वह तुझसे क्योंकर राहे गुरेज़ इख़्तेयार कर सकता है या जिसे तेरे मुल्क के अलावा कहीं रास्ता न मिले वह किस तरह तुझसे आज़ाद हो सकता है। पाक है तू , जो तुझे ज़्यादा जानने वाला है वोही सब मख़लूक़ात से ज़्यादा तुझसे डरने वाला है और जो तेरे सामने सरअफ़गन्दह है वही सबसे ज़्यादा तेरे फ़रमान पर कारबन्द है और तेरी नज़रों में सबसे ज़्यादा ज़लील व ख़्वार वह है जिसे तू रोज़ी देता है और वह तेरे अलावा दूसरे की परस्तिश करता है। पाक है तू , जो तेरा शरीक ठहराए और तेरे रसूलों को झुठलाए वह तेरी सल्तनतमें कमी नहीं कर सकता और जो तेरे हुक्मे क़ज़ा व क़द्र को नापसन्द करे वह तेरे फ़रमान को पलटा नहीं सकता। और जो तेरी क़ुदरत का इनकार करे वह तुझसे अपना बचाव नहीं कर सकता और जो तेरे अलावा किसी और की इबादत करे वह तुझसे बच नहीं सकता और जो तेरी मुलाक़ात को नागवार समझे वह दुनिया में ज़िन्दगी जावेद हासिल नहीं कर सकता। पाक है तू , तेरी शान कितनी अज़ीम , तेरा इक़्तेदार कितना ग़ालिब , तेरी क़ूवत कितनी मज़बूत और तेरा फ़रमान कितना नाफ़िज़ है। तू पाक व मुनज़्ज़ह है तूने तमाम ख़ल्क़ के लिये मौत का फ़ैसला किया है। क्या कोई तुझे यकता जाने और क्या कोई तेरा इन्कार करे। सब ही मौत की तल्ख़ी चखने वाले और सब ही तेरी तरफ़ पलटने वाले हैं। तू बा बरकत और बलन्द व बरतर है। कोई माबूद नहीं मगर तू , तू एक अकेला है और तेरा कोई शरीक नहीं है। मैं तुझ पर ईमान लाया हूं , तेरे रसूलों की तस्दीक़ की है। तेरी किताब को माना है , तेरे अलावा हर माबूद का इन्कार किया है और जो तेरे अलावा दूसरे की परस्तिश करे उससे बेज़ारी इख़्तेयार की है। बारे इलाहा! मैं इस आलम में सुबह व शाम करता हूं के अपने आमाल को कम तसव्वुर करता , अपने गुनाहों का एतराफ़ और अपनी ख़ताओं का इक़रार करता हूं , मैं अपने नफ़्स पर ज़ुल्म व ज़्यादती के बाएस ज़लील व ख़्वार हूं। मेरे किरदार ने मुझे हलाक और हवाए नफ़्स ने तबाह कर दिया है और ख़्वाहिशात ने (नेकी व सआदत से) बे बहरा कर दिया है। ऐ मेरे मालिक! मैं तुझसे ऐसे शख़्स की तरह सवाल करता हूं जिसका नफ़्स तूलानी उम्मीदों के बाएस ग़ाफ़िल , जिस्म सेहत व तन आसानी की वजह से बे ख़बर , दिल नेमत की फ़रावानी के सबब ख़्वाहिशों पर वारफ़ता और फ़िक्र अन्जामकार की निस्बत कम हो। मेरा सवाल उस शख़्स के मानिन्द है जिस पर आरज़ूओं ने ग़लबा पा लिया हो। जिसे ख़्वाहिशाते नफ़्स ने वरग़लाया हो , जिस पर दुनिया मुसल्लत हो चुकी हो और जिसके सर पर मौत ने साया डाल दिया हो। मेरा सवाल उस शख़्स के सवाल के मानिन्द है जो अपने गुनाहों को ज़्यादा समझता और अपनी ख़ताओं का एतराफ़ करता हो , मेरा सवाल उस शख़्स का सा सवाल है जिसका तेरे अलावा कोई परवरदिगार और तेरे सिवा कोई वली व सरपरस्त न हो और जिसका तुझसे कोई बचाने वाला और न उसके लिये तुझसे सिवा तेरी तरफ़ रूजू होने के कोई पनाहगाह हो। बारे इलाहा! मैं तेरे उस हक़ के वास्ते से जो तेरे मख़लूक़ात पर लाज़िम व वाजिब है और तेरे उस बुज़ुर्ग नाम के वास्ते से जिसके साथ तूने अपने रसूल (स 0) को तस्बीह करने का हुक्म दिया और तेरी उस ज़ाते बुज़ुर्गवार की बुज़ुर्गी व जलालत के वसीले से के जो न कहनह होती है न मुतग़य्यिर , न तबदील होती है न फ़ना। तुझसे यह सवाल करता हूं के तू मोहम्मद (अ 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे अपनी इबादत के ज़रिये हर चीज़ से बेनियाज़ कर दे। और अपने ख़ौफ़ की वजह से दुनिया से दिल बरदाश्ता बना दे और अपनी रहमत से बख़्शिश व करामत की फ़रावानी के साथ मुझे वापस कर इसलिये के मैं तेरी ही तरफ़ गुरीज़ां और तुझ ही से डरता हूं और तुझ ही से फ़रयादरसी चाहता हूं और तुझ ही से उम्मीद रखता हूं और तुझे ही पुकारता हूं और तुझ ही से पनाह चाहता हूं और तुझ ही पर भरोसा करता हूं और तुझ ही से मदद चाहता हूं और तुझ ही पर ईमान लाया हूं और तुझ ही पर तवक्कल रखता हूं और तेरे ही जूद व करम पर एतमाद करता हूं।

तिरपनवीं दुआ

अल्लाह तआला के हुज़ूर तज़ल्लुल व आजिज़ी के सिलसिले में हज़रत (अ 0) की दुआ

ऐ मेरे परवरदिगार! मेरे गुनाहों ने मुझे (उज़्र ख़्वाही से) चुप कर दिया है , मेरी गुफ़्तगू भी दम तोड़ चुकी है। तो अब मैं कोई उज़्र व हुज्जत नहीं रखता। इस तरह मैं अपने रन्ज व मुसीबत में गिरफ़्तार अपने आमाल के हाथों में गिरवी अपने गुनाहों में हैरान व परेशान , मक़सद से सरगर्दान और मन्ज़िल से दूर उफ़तादा हूँ। मैंने अपने के ज़लील गुनहगारों के मौक़ुफ़ पर ला खड़ा किया है। इन बदबख़्तों के मौक़ुफ़ पर जो तेरे मुक़ाबले में जराएत दिखाने वाले और तेरे वादे को सरसरी समझने वाले हैं , पाक है तेरी ज़ात। मैंने किस जराअत व दिलेरी के साथ तेरे मुक़ाबले में जराअत की है और किस तबाही व बरबादी के साथ अपनी हलाकत का सामान किया है। ऐ मेरे मालिक , मेरे मुंह के बल गिरने और क़दमों के ठोकर खाने पर रहम फ़रमा और अपने हिल्म से मेरी जेहालत व नादानी को और अपने एहसान से मेरी ख़ता व बदआमाली को बख़्श दे इसलिये के मैं अपने गुनाहों का मोक़िर और अपनी ख़ताओं का मोतरफ़ हूं यह मेरा हाथ और यह मेरी पेशानी के बाल (तेरे क़ब्ज़ए क़ुदरत में) हैं। मैंने अज्ज़ व सराफ़गन्दगी के साथ अपने को क़ेसास के लिये पेश कर दिया है। बारे इलाहा! मेरे बुढ़ापे , ज़िन्दगी के दिनों के बीत जाने , मौत के सर पर मण्डलाने और मेरी नातवान , आजिज़ी और बेचारगी पर रहम फ़रमा। ऐ मेरे मालिक , जब दुनिया से मेरा नाम व निशान मिट जाए और लोगों (के दिलों) से मेरी याद महो हो जाए और उन लोगों की तरह जिन्हें भुला दिया जाता है मैं भी भुला दिये जाने वालों में से हो जाऊं तो मुझ पर रहम फ़रमाना। ऐ मेरे मालिक! मेरी सूरत व हालत के बदल जाने के वक़्त जब मेरा जिस्म कोहनहू आज़ा दरहम बरहम और जोड़ व बन्द अलग अलग हो जाएं तो मुझ पर तरस खाना। हाए मेरी ग़फ़लत व बेख़बरी उससे जो अब मेरे लिये चाहा जा रहा है और ऐ मेरे मौला! हश्र व नशरत के हंगाम मुझ पर रहम करना और उस दिन मेरा क़याम अपने दोस्तों के साथ और (मौक़फ़े हिसाब से महले जज़ा की तरफ़) मेरी वापसी अपने दोस्तदारों के हमराह और मेरी मन्ज़िल अपनी हमसायगी में क़रार देना। ऐ तमाम जहानों के परवरदिगार।

चौवनवीं दुआ

ग़म व अन्दोह से निजात हासिल करने के लिये हज़रत (अ 0) की दुआ

इस रन्ज व अन्दोह के बरतरफ़ करने वाले और ग़म व अलम के दूर करने वाले , ऐ दुनिया व आख़ेरत में रहम करने वाले और दोनों जहानों में मेहरबानी फ़रमाने वाले तू मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मेरी बेचैनी को दूर और मेरे ग़म को बरतरफ़ कर दे ऐ अकेले , ऐ यकता! ऐ बेनियाज़! ऐ वह जिसकी कोई औलाद नहीं और न वह किसी की औलाद है और न उसका कोई हमसर है मेरी हिफ़ाज़त फ़रमा और मुझे (गुनाहों से) पाक रख और मेरे रन्ज व अलम को दूर कर दे (इस मुक़ाम पर आयतलकुर्सी , क़ुल आउज़ो बेरब्बिन्नास , क़ुल आउज़ो बेरब्बिल फ़लक़ और क़ुल हो वल्लाहो अहद पढ़ो और यह कहो) बारे इलाहा! मैं तुझसे सवाल करता हूं , उस शख़्स का सवाल जिसकी एहतियाज शदीद क़ूवत व तवानाई ज़ईफ़ और गुनाह फ़रावां हों , उस शख़्स का सा सवाल जिसे अपनी हाजत के मौक़े पर कोई फ़रयादरस , जिसे अपनी कमज़ोरी के आलम में कोई पुश्तपनाह और जिसे तेरे अलावा ऐ जलालत व बुज़ुर्गी वाले। कोई गुनाहों का बख़्शने वाला दस्तयाब न हो। बारे इलाहा! मैं तुझसे इस अमल (की तौफ़ीक़) का सवाल करता हूं के जो उस पर अमलपैरा हो तू उसे दोस्त रखे और ऐसे यक़ीन का के जो उसके ज़रिये तेरे फ़रमाने क़ज़ा पर पूरी तरह मुतयक़्क़न हो तो उसके बाएस तू फ़ाएदा व मनफ़अत पहुंचाए। ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे हक़ व सेदाक़त पर मौत दे और दुनिया से मेरी हाजत व ज़रूरत का सिलसिला ख़त्म कर दे और अपनी मुलाक़ात के जज़्बए इश्तियाक़ की बिना पर अपने हां की चीज़ों की तरफ़ मेरी ख़्वाहिश व रग़बत क़रार दे और मुझे अपनी ज़ात पर सही एतमाद व तवक्कल की तौफ़ीक़ अता फ़रमा। मैं तुझसे साबेक़ा नौश्ते तक़दीर की भलाई का तालिब हूं और साबेक़ा सरनौश्ते तक़दीर की बुराई से पनाह मांगता हूं। मैं तेरे इबादतगुज़ार बन्दों के ख़ौफ़ , अज्ज़ व फ़रवतनी करने वालों की इबादत , तवक्कल करने वालों के यक़ीन और ईमानदारों के एतमाद व तवक्कल का तुझसे ख़्वास्तगार हूं। बारे इलाहा! तलब व सवाल में मेरी ख़्वाहिश व रग़बत को ऐसा ही क़रार दे जैसी तलब व सवाल मैं तेरे दोस्तों की तमन्ना व ख़्वाहिश होती है। और मेरे ख़ौफ़ को भी अपनी दोस्तों के ख़ौफ़ के मानिन्द क़रार दे और मुझे अपनी रेज़ा व ख़ुशनूदी में इस तरह बरसरे अमल रख के मैं तेरे मख़लूक़ात में से किसी एक के ख़ौफ़ से तेरे दीन की किसी बात को तर्क न करूं। ऐ अल्लाह! यह मेरी हाजत है इसमें मेरी तवज्जो व रग़बत को अज़ीम कर दे। मेरे उज़्र को आश्कारा कर और उसके बारे में मुझे दलील व हुज्जत की तालीम कर और इसमें मेरे जिस्म को सेहत व सलामती बख़्श। ऐ अल्लाह! जिसे भी तेरे सिवा दूसरे पर भरोसा या उम्मीद हो तो मैं इस आलम में सुबह करता हूं के तमाम उमूर में तू ही एतमाद व उम्मीद का मरकज़ होता है। लेहाज़ा जो उमूर बलेहाज़ अन्जाम बेहतर हों वह मेरे लिये नाफ़िज़ फ़रमा और मुझे अपनी रहमत के वसीले से गुमराह करने वाले फ़ित्नों से छुटकारा दे। ऐ तमाम रहम करने वालों में सबसे ज़्यादा रहम करने वाले। और अल्लाह रहमत नाज़िल करे हमारे सययद व सरदार फ़र्सतादहे ख़ुदा मोहम्मद (स 0) मुस्तफ़ा पर और उनकी पाक व पाकीज़ा आल (अ 0) पर।

पचपनवीं दुआ

यह वह दुआएं हैं जो सहीफ़ाए कामेला के बाज़ नुस्ख़ों में दर्ज की गई हैं-

मिनजुमला उनके हज़रत (अ 0) की एक दुआ यह है जो तस्बीह व तक़दीस के सिलसिले में

ऐ मेरे माबूद! मैं तेरी तस्बीह करता हूं तू मुझ पर करम बालाए करम फ़रमा। बारे इलाहा! मैं तेरी तस्बीह करता हूं और तू बलन्द व बरतर है। ख़ुदाया! मैं तेरी तस्बीह करता हूं और इज़्ज़त तेरा ही जामअ है। बारे इलाहा! मैं तेरी तस्बीह करता हूं और अज़मत तेरी ही रिदा है। ऐ परवरदिगार! मैं तेरी तस्बीह करता हूं और किबरियाई तेरी दलील व हुज्जत है , पाक है तू ऐ अज़ीम व बरबर तू कितना अज़मत वाला है। पाक है तू ऐ वह के मलाए आला के रहने वालों में तेरी तस्बीह की गयी है जो कुछ तहे ख़ाक है तू उसे सुनता और देखता है। पाक है तेरी ज़ात तू हर राज़दाराना गुफ़्तगू पर मुतलअ है। पाक है तू ऐ वह जो हर रन्ज व शिकवा के पेश करने की जगह है। पाक है तू ऐ वह जो हर इज्तेमाअ में मौजूद है। पाक है तू ऐ वह जिससे बड़ी से बड़ी उम्मीदें बान्धी जाती हैं। पाक है तू जो कुछ पानी की गहराई में है उसे तू देखता है। पाक है तेरी ज़ात तू समन्दरों की गहराइयों में मछलियों के सांस लेने की आवाज़ सुनता है। पाक है तेरी ज़ात तू आसमानों का वज़न जानता है , पाक है तेरी ज़ात तू ज़मीनों के वज़न से बाख़बर है। पाक है तेरी ज़ात तू सूरज और चान्द के वज़न से वाक़िफ़ है। पाक है तेरी ज़ात तू तारीकी और रोशनी के वज़न से आगाह है पाक है तेरी ज़ात तू साया और हवा का वज़न जानता है। पाक है तेरी ज़ात तू हवा के (हर झोंके के) वज़न से आगाह है के वह वज़न में कितने ज़र्रों के बराबर है। पाक है तेरी ज़ात तू (तसव्वुर व ख़याल व वहम में आने से) पाक , मुनज़्ज़ह और बरी है मैं तेरी तस्बीह करता हूं। ताज्जुब है के जिसने तुझे पहचाना वह क्योंकर तुझसे ख़ौफ़ नहीं खाता। ऐ अल्लाह! मैं हम्द व सना के साथ तेरी पाकीज़गी बयान करता हूं। पाक है वह परवरदिगार जो उलू व अज़मत वाला है।

(आप इस किताब को अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क पर पढ़ रहे है।)

छप्पनवीं दुआ

बुज़ुर्गी व अज़मते इलाही के बयान में हज़रत (अ 0) की दुआ

तमाम तारीफ़ उस अल्लाह तआला के लिये हैं जो अपनी अज़मत के साथ दिलों पर रोशन व दरख़शां है और अपनी इज़्ज़त के साथ आंखों से पिनहां है। और तमाम चीज़ों पर अपने इक़्तेदार से क़ाबू रखता है। न आंखें उसके दीदार की ताब ला सकती हैं और न अक़्लें उसकी अज़मत की हद तक पहुंच सकती हैं। वह अपनी अज़मत व बुज़ुर्गी के साथ हर चीज़ पर ग़ालिब है और इज़्ज़त व एहसान व जलालत की रिदा ओढ़े हूए है हुस्न व जमाल के साथ नक़ाएस से बुरी है और फ़ख़्रव सरबलन्दी के साथ शरफ़ व बुज़ुर्गी का मालिक है और ख़ैर व बख़्शिश की फ़रावानी और (अताए) नेमात से ख़ुश होता है और नूर व रोशनी के साथ (तमाम आलम से) इम्तियाज़ रखता है। वह ऐसा ख़ालिक़ है जिससका कोई नज़ीर नहीं। वह ऐसा यकता है जिसका कोई मिस्ल नहीं। वह ऐसा यगाना है जिसका कोई मद्दे मुक़ाबिल नहीं। वह ऐसा बेनियाज़ है जिसका कोई हमसर नहीं। वह ख़ुदा जिसका कोई दूसरा नहीं। वह पैदा करने वाला है जिसका कोई शरीकेकार नहीं। वह रिज़्क़ देने वाला है जिसका कोई मददगार नहीं। वह ऐसा अव्वल है जिसे ज़वाल नहीं। वह ऐसा बाक़ी व जावेद है जिसे फ़ना नहीं। वह दाएम व क़ायम है बग़ैर किसी रन्ज व मशक़्क़त के वह अम्न व अमान का बख़्शने वाला है। बगै़र किसी हद व निहायत के वह ईजाद करने वाला है। बगै़र किसी मुद्दत की हदबन्दी के वह सानेअ व मौजूद है। बगै़र किसी एक (की एआनत) के वह परवरदिगार है । बगै़र किसी शरीक के वह पैदा करने वाला है । बगै़र किसी ज़हमत व दुश्वारी के वह काम करने वाला है। बग़ैर अज्ज़ व दरमान्दगी के उसकी कोई हद नहीं। मकान में और न उसकी कोई इन्तेहा है ज़माने में। वह हमेशा से है , हमेशा रहेगा। यूंही हमेशा हमेशा उसे कभी ज़वाल न होगा। वही ख़ुदा है जो ज़िन्दा व क़ायम व दायम , क़दीम क़ादिर और इल्म व हिकमत वाला है। बारे इलाहा! तेरा एक बन्दाए हक़ीर तेरे साहते क़ुद्स में हाज़िर है। तेरा साएल तेरे आस्ताने पर हाज़िर है। तेरा मोहताज व दस्तंगर तेरी बारगाह में हाज़िर है (इन तीनों जुमलों को तीन मरतबा दोहराए) ऐ मेरे अल्लाह (ज 0) तुझ ही से इबादतगुज़ार डरते हैं और तेरे ख़ौफ़ और उम्मीद व अफ़ो व बख़्शिश के पेशे नज़र आजिज़ी से इल्तिजा करने वाले तुझसे लौ लगाते हैं। ऐ सच्चे माबूद! इस्तेग़ासा व फ़रयाद करने वालों की पुकार पर रहम फ़रमा और ग़फ़लत में गिरफ़्तार होने वालों के गुनाहों से दरगुज़र फ़रमा और ऐ करीम अपनी बारगाह में तौबा करने वालों के साथ उस दिन के ज बवह तेरे सामने पेश हों , नेकी और एहसान में इज़ाफ़ा फ़रमा।

सत्तावनवीं दुआ

तज़ल्लुल व आजेज़ी के सिलसिले में हज़रत (अ 0) की दुआ

ऐ मेरे आक़ा ऐ मेरे मालिक! तू आक़ा है , और मैं बन्दा , और बन्दे पर आक़ा के सिवा कौन रहम खाएगा। मेरे मौला , मेरे आक़ा! तू इज़्ज़त वाला है और मैं ज़लील और ज़लील पर इज़्ज़तदार के अलावा और कौन रहम करेगा। मेरे मालिक , मेरे मालिक! तू ख़ालिक़ है और मैं मख़लूक़ और मख़लूक़ पर ख़ालिक़ के सिवा कौन तरस खाएगा। मेरे मौला! मेरे मौला! तू अता करने वाला है और मैं सवाली और साएल पर अता करने वाले के अलावा कौन मेहरबानी करेगा। मेरे आक़ा! मेरे आक़ा तू फ़रयाद रस है और मैं फ़रियादी और फ़रियादी पर फ़रयादरस के अलावा कौन रहम करेगा। मेरे मालिक! मेरे मालिक! तू बाक़ी है और मैं फ़ानी और फ़ानी पर दाएम व जावेद के अलावा कौन रहम करेगा। मेरे मौला! मेरे मौला! तू ज़िन्दा है और मैं मुर्दा और मुर्दा पर ज़िन्दा के सिवा कौन तरस खाएगा। मेरे मालिक मेरे मालिक! तू ताक़तवर है है और मैं कमज़ोर और कमज़ोर पर ताक़तवर के अलावा कौन रहम करेगा। मेरे मौला! मेरे मालिक! तू ग़नी है और मैं तही दस्त। और तही दस्त पर ग़नी के अलावा कौन रहम खाएगा। मेरे आक़ा! मेरे आक़ा! तू बड़ा है और मैं छोटा और छोटे पर बड़े के सिवा कौन नज़रे शफ़क़्क़त करेगा। मेरे मौला! मेरे मौला! तू मालिक है और मैं ग़ुलाम और ग़ुलाम पर मालिक के सिवा कौन मेहरबानी करेगा।

अट्ठावनवीं दुआ

हज़रत (अ 0) की दुआ जो ज़िक्रे आले मोहम्मद (सल्लल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम) पर मुश्तमिल है

ऐ अल्लाह! ऐ वह जिसने मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) को इज़्ज़त व बुज़ुर्गी के साथ मख़सूस किया और जिन्हें मन्सबे रिसालत अता किया और वसीला बनाकर इम्तियाज़े ख़ास बख़्शा। जिन्हें अम्बिया का वारिस क़रार दिया और जिनके ज़रिये औसिया और आइम्मा का सिलसिला ख़त्म किया। जिन्हें गुज़िश्ता व आइन्दा का इल्म सिखया और लोगों के दिलों को जिनकी तरफ़ माएल किया। बारे इलाहा! मोहम्मद (स 0) और उनकी पाक व पाकीज़ा आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमारे साथ दीन , दुनिया और आख़ेरत में वह बरताव कर जिसका तू सज़ावार है। यक़ीनन तू हर चीज़ पर क़ादिर है।

उनसठवीं दुआ

हज़रते आदम (अ 0) पर दुरूदो सलवात के सिलसिले में हज़रत (अ 0) की दुआ

बारे इलाहा! वह आदम (अ 0) जो तेरी आफ़ज़ीन्श के नक़्शे बदीअ और ख़ाक से पैदा होने वालों में तेरी रुबूबीयत के पहले मोतरफ़ और तेरे बन्दों और तेरी मख़लूक़ात पर तेरी पहली हुज्जत और तेरे अज़ाब से तेरे दामने अफ़ो में पनाह मांगने की राह दिखाने वाले और तेरी बारगाह में तौबा की राहें आश्कारा करने वाले और तेरी मारेफ़त और तेरे मख़लूक़ात के दरमियान वसीला बनने वाले हैं। व हके जिन पर ख़ुसूसी करम व एहसान और मेहरबानी करते हुए उन्हें वह तमाम बातें बतला दीं जिनके ज़रिये तू उनसे राज़ी व ख़ुशनूद हुआ व हके जो तौबा व अनाबत करने वाले हैं। जिन्होंने तेरी मासियत पर इसरार नहीं किया। जो तेरे हरम में सर मुन्डवा कर अज्ज़ व फ़रवतनी करने वालों में साबिक़ हैं। वह जो मुख़ालेफ़त के बाद इताअत के वसीले से तेरे अफ़ो व करमम के ख़्वाहिशमन्द हुए और उन तमाम अम्बिया के बाप हैं जिन्होंने तेरी राह में अज़ीयतें उठाईं। और ज़मीन पर बसने वालों में सबसे ज़्यादा तेरी इताअत व बन्दगी में सई व कोशिश करने वाले हैं। उन पर ऐ मेहरबानी करने वाले तू अपनी जानिब से और अपने फ़रिश्तों और ज़मीन व आसमान में बसने वालों की तरफ़ से रहमत नाज़िल फ़रमा। जिस तरह उन्होंने तेरी क़ाबिले एहतेराम चीज़ों की अज़मत मलहूज रखी और तेरी ख़ुशनूदी व रज़ामन्दी की तरफ़ हमारी रहनुमाई की। ऐ तमाम रहम करने वालों में सबसे ज़्यादा रहम करने वाले।

साठवीं दुआ

कर्ब व मुसीबत से तहफ़्फ़ुज़ और लग़्िज़श व ख़ता से मुआफ़ी के लिये हज़रत (अ 0) की दुआ

ऐ मेरे माबूद! मेरे दुश्मनों के मेरी हालत पर दिल में ख़ुश होने का मौक़ा न दे और मेरी वजह से मेरे किसी मुख़लिस व दोस्त को रन्जीदा ख़ातिर न कर। बारे इलाहा! अपनी नज़रे इनायात में से ऐसी नज़रे तवज्जो मेरे शामिले हाल फ़रमा जिससे तू इन मुसीबतों को मुझसे टाल दे जिनमें मुझे मुब्तिला किया है और उन एहसानात की तरफ़ मुझे पलटा दे जिनका मुझे ख़ूगर बनाया है और मेरी दुआ और हर उस शख़्स की दुआ को जो सिद्क़े नीयत से तुझे पुकारे क़ुबूल फ़रमा। क्योंके मेरी क़ूवत कमज़ोर , चाराजोई की सूरत नापैद , और हालत सख़्त से सख़्त तर हो गई है और जो कुछ तेरे मख़लूक़ात के पास है उससे मैं बिलकुल ना उम्मीद हूं। अब तो तेरी पहली नेमतों के दोबारा हासिल होने में तेरी उम्मीद के अलावा कोई सूरत बाक़ी नहीं रही। ऐ मेरे माबूद! जिन रन्ज व आलाम में गिरफ़्तार हूं उनके छुटकारा दिलाने पर तू ऐसा ही क़ादिर है जैसा उन चीज़ों पर क़ुदरत रखता है जिनमें मुझे मुब्तिला किया है। बेशक तेरे एहसानात की याद मेरा दिल बहलाती और तेरे इनआम व तफ़ज़्ज़ुल की उम्मीद मेरी हिम्मत बन्धाती है। इसलिये के जबसे तूने मुझे पैदा किया है मैं तेरी नेमतों से महरूम नहीं रहा। और तू ही मेरे माबूद! मेरी पनाहगाह , मेरा मुलजा , मेरा मुहाफ़िज़ व पुश्त पनाह , मेरे हाल पर शफ़ीक़ व मेहरबान और मेरे रिज़्क़ का ज़िम्मादार है , जो मुसीबत मुझ पर वारिद हुई है वह तेरे फ़ैसलए क़ज़ा व क़द्र में और जो मेरी मौजूदा हालत है वह तेरे इल्म में गुज़र चुकी थी। तो ऐ मेरे मालिम व सरदार! जिन चीज़ों को तेरे फ़ैसलए क़ज़ा व क़द्र ने मेरे हक़ में तै किया और लाज़िम व ज़रूरी क़रार दिया है उन चीज़ों में से मेरी इताअत और वह चीज़ जिससे मेरी बहबूदी और जिस हालत में हूं उस से रिहाई वाबस्ता है क़रार दे। क्योंके मैं इस मुसीबत के टालने में किसी से उम्मीद नहीं रखता और न इस सिलसिले में तेरे अलावा किसी पर भरोसा करता हूं तो ऐ जलालत व बुज़ुर्गी के मालिक मेरे इस हुस्ने ज़न के मुताबिक़ साबित हो जो मुझे तेरे बारे में है और मेरी कमज़ोरी व बेचारगी पर रहम फ़रमा। मेरी बेचैनी को दूर कर। मेरी दुआ क़ुबूल फ़रमाा। मेरी ख़ता व लग़्िज़श को माफ़ कर दे और मुझ पर और जो कुछ भी तुझसे दुआा मांगे अफ़ो व दरगुज़र करके एहसान फ़रमा। ऐ मेरे मालिक! तूने मुझे दुआ का हुक्म दिया और क़ुबूलियते दुआा का ज़िम्मा लिया , और तेरा वादा ऐसा सच्चा है जिसमें खि़लाफ़वर्ज़ी व तबदीली की गुन्जाइश नहीं है। तू अपने नबी (स 0) और अब्दे ख़ास मोहम्मद (स 0) और उनके अहले बैते अतहार (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा। और मेरी फ़रयाद को पहुंच क्योंके तू उनका फ़रयादरस है जिनका कोई फ़रयादरस न हो। और उनके लिये पनाह है जिनके लिये कोई पनाह न हो। मैं ही वह मुज़तर व लाचार हूं जिसकी दुआ क़ुबूल करने और उसके दुख दर्द दूर करने का तूने इलतेज़ाम किया है। लेहाज़ा मेरी दुआ को क़ुबूल फ़रमा , मेरे ग़म को दूर और मेरे रन्ज व अन्दोह को बरतरफ़ फ़रमा और मेरी हालत को पहली हालत से भी बेहतर हालत की तरफ़ पलटा दे और मुझे इस्तेहक़ाक़ के बक़द्र अज्र न दे बल्कि अपनी उस रहमत के लेहाज़ से जज़ा दे जो तमाम चीज़ों पर छाई हुई है। ऐ जलालत व बुज़ुर्गी के मालिक तू रहमत नाज़िल फ़रमा मोहम्मद (स 0) और आले मोहम्मद (स 0) पर और मेरी दुआ को सुन और उसे क़ुबूल फ़रमा। ऐ ग़ालिब! ऐ साहेबे इक़्तेदार।


इकसठवीं दुआ

ख़ौफ़ व ख़तरे के मौक़े पर हज़रत (अ 0) की दुआ

ऐ मेरे माबूद! तेरे ग़ज़ब को कोई चीज़ रोक नहीं सकती सिवा तेरे हिल्म के , और तेरे अज़ाब से कोई चीज़ छुड़ा नहीं सकती सिवा तेरे अफ़ोव करम के और तुझसे कोई चीज़ बचा नहीं सकती सिवा तेरी रहमत अैर तेरी बारगाह में तज़र्रोअ व ज़ारी के , ऐ मेरे माबूद! तू उस क़ुदरत के ज़रिये जिससे मुर्दा ज़मीनों को ज़िन्दा करेगा और बन्दों की (मुर्दा) रूहों को ज़िन्दगी देगा , मुझे कशाइश् व फ़ारिग़लबाली अताकर और तबाह व बरबाद न होने दे। (मौत से पहले) क़ुबूलियते दुआ से आगाह कर दे। ऐ मेरे परवरदिगाार और मुझे रफ़अत व सरबलन्दी दे और पस्त व नेगोनिसार न कर और मेरी इमदाद फ़रमा और मुझे रोज़ी दे , और आफ़तों से हिफ़्ज़ व अमान में रख। परवरदिगार! अगर तू मुझे बलन्द करे तो फ़िर कौन मुझे पस्त कर सकता है , और अगर तू पस्त करे तो कौन बलन्द कर सकता है। और ऐ मेरे माबूद मुझे बख़ूबी इल्म है के तेरे हुक्म में ज़ुल्म का शाएबा नहीं है और न तेरे इन्तेक़ाम में जल्दी- जल्दी तो वह करता है जिसे मौक़े के हाथ से निकल जाने का अन्देशा होता है और ज़ुल्म करने की ज़रूरत उसे पड़ती है जो कमज़ोर व नातवां होता है और तू ऐ मेरे मालिक! इससे कहीं ज़्यादा बलन्द व बरतर है। ऐ मेरे परवरदिगार! मुझे बला व मुसीबत का हदफ़ अैर अपने अज़ाब का निशाना न बना , और मुझे मोहलत दे और मेरे ग़म व अन्दोह को दूर कर। मेरी लग्ज़िश से दरगुज़र फ़रमा और मुसीबत मेरे पीछे न लगा। क्योंकेमेरी कमज़ोरी व बेचारगी तेरे सामने है। तू मुझे सब्र व सेबात की हिम्मत दे। क्योंके ऐ मेरे परवरदिगार! मैं कमज़ोर और तेरे आगे गिड़गिड़ाने वाला हूं। ऐ मेरे परवरदिगार! मैं तुझसे तेरे ही दामने रहमत में पनाह मांगता हूं लेहाज़ा मुझे पनाह दे और हर मुसीबत व इब्तेला से तेरे ही दामन में अमान का तलबगार हूं लेहाज़ा मुझे अमान दे और तुझसे परदापोशी चाहता हूं लेहाज़ा जिन चीज़ों से मैं ख़ौफ़ व हेरास महसूस करता हूं उनसे ऐ मेरे मालिक अपने दामने हिफ़्ज़ व हिमायत में छुपा ले और तू अज़ीम और हर अज़ीम से अज़ीमतर है। मैं तेरे और सिर्फ़ तेरे और महज़ तेरे ज़रिये (पर्दाए हिफ़्ज़ व अमान में) छिप हुआ हूं। ऐ अल्लाह! ऐ अल्लाह! ऐ अल्लाह! ऐ अल्लाह! ऐ अल्लाह! ऐ अल्लाह! ऐ अल्लाह! ऐ अल्लाह! तू मोहम्मद (स 0) और उनकी पाक व पाकीज़ा आल (अ 0) पर रहमत और कसीर सलामती नाज़िल फ़रमा।

हफ़ते के सात दिनों में हज़रत (अ 0) के पढ़ने की दुआएं

बारसठवीं दुआ

दुआए रोज़े यकशम्बा (रविवार)

उस अल्लाह के नाम से मदद मांगता हूं जिसके फ़ज़्ल व करम ही का उम्मीदवार हूं और जिसके अद्ल ही से अन्देशा है। उसी की बात पर मुझे भरोसा है और उसी की रस्सी से वाबस्ता हूं। ऐ अफ़ो व ख़ुशनूदी के मालिक! मैं तुझसे ज़ुल्म व जौर , ज़माने के इन्क़ेलाबात , ग़मों के पैहम हुजूम और नाज़िल होने वाली मुसीबतों से पनाह मांगता हूं और इस बात से के आख़ेरत का साज़ व सामान और ज़ादे राह मुहय्या करने से पहले ही मुद्दते हयात ख़त्म हो जाए और तुझ ही से उन चीज़ों की रहनुमाई चाहता हूं जिन में अपनी बहबूदी और दूसरों की फ़लाह व दुरूस्तगी का सामान हो और तुझ ही मुकम्मल सेहत व तंदरुस्ती की तमन्ना रखता हुं के जिसमे हमेशा सलामती भी शामिल हो। या अल्लाह मैं शैतानी वसवसो से तेरी पनाह चाहता हुं बस मेरी नमाज़े और रोज़े जैसे भी हैं इन्हे क़ुबुल फरमा । कल का दिन और उससे अगले वक़्त को मेरे आज के दिन और इस घडी से बेहतर बना दे , और मेरी क़ौम को इज़्ज़त अता फरमा , ऐ अल्लाह तू बेहतरीन निगेहबान हैं और सबसे ज़्यादा रहम करने वाला हैं। ऐ अल्लाह मैं तेरे हुज़ुर मे आज के दिन और इसमे अगले इतवार के दिनो में शिर्क व बदीनी से बरी हुं ख़ुलुस के साथ तुझसे दुआ करता हुं (ये दुआऐ ) क़ुबुल हो जाऐ और मैं सवाब की उम्मीद पर तेरी इताअत पर क़ाएम हुं बस तू बेहतरीन मख़्लूक़ और हक़ के रखने वाले मौहम्मदे मुस्तफा स.अ.व.व पर रबमत नाज़िल फरमा और अपनी इज़्जत के सदक़े मे मुझे वो इज़्ज़त दे जिसमे ज़ुल्म न हो , अपना न सोने वाली आँख से मेरी निगेहबानी फरमा , मेरा ख़ातमा यूँ हो के तुज ही से उम्मीद लगाए रखूँ मेरी ज़िंदगी को बख़शिश पर तमाम कर दे। बेशक तू बख़्शने वाला और मेहरबान हैं।

तिरसठवीं दुआ

दुआए रोज़े दोशम्बा (सोमवार)

तमाम तारीफ़ें उस अल्लाह तआला के लिये हैं के जब उसने ज़मीन व आसमान को ख़ल्क़ फ़रमाया तो किसी को गवाह नहीं बनाया , और जब जानदारों को पैदा किया तो अपना कोई मददगार नहीं ठहराया। उलूहियत में कोई उसका शरीक और वहदत (व इन्फ़ेरादियत से मख़सूस होने) में कोई उसका मआवुन नहीं है। ज़बानें उसकी इन्तिहाए सिफ़ात के बयान करने से गंग और अक़्लें उसकी मारेफ़त की तह तक पहुंचने से आजिज़ हैं। जाबिर व सरकश उसकी हैबत के सामने झुके हुए , चेहरे नक़ाबे ख़शयत ओढ़े हुए और अज़मत वाले उसकी अज़मत के आगे सर अफ़गन्दा हैं। तो बस तेरे ही लिये हम्द व सताइश है पै दर पै , लगातार , मुसलसल , पैहम। और उसके रसूल (स 0) पर अल्लाह तआला की अबदी रहमत और दाएम व जावेदानी सलाम हो। बारे इलाहा! मेरे इस दिन के इब्तिदाई हिस्से को सलाह व दुरूस्ती , दरमियानी हिस्से को फ़लाह व बहबूदी और आख़ेरी हिस्से को कामयाबी व कामरानी से हमकिनार क़रार दे। और उस दिन से जिसका पहला हिस्सा ख़ौफ़ , दरम्यिानी हिस्सा बेताबी और आखि़री हिस्सा दर्द व अलम लिये हुए , तुझसे पनाह मांगता हूं। बारे इलाहा! हर उस नज़र के लिये जो मैंने मानी हो , हर उस वादे की निस्बत जो मैंने किया हो और हर उस अहद व पैमान की बाबत जो मैंने बान्धा हो फिर किसी एक को भी तेरे लिये पूरा न किया हो। तुझसे अफ़ो व बख़्शिश का ख़्वास्तगार हूं और तेरे बन्दों के उन हुक़ूक़ व मज़ालिम की बाबत जो मुझ पर आयद होते हैं , तुझसे सवाल करता हूं के तेरे बन्दों में से जिस बन्दे का और तेरी कनीज़ों में से जिस कनीज़ का कोई हक़ मुझ पर हो , इस तरह के ख़ुद उसकी ज़ात या उसकी इज़्ज़त या उसके माल या उसके अह्लो औलाद की निस्बत में मज़लेमा का मुरतकिब हुआ हूं या ग़ीबत के ज़रिये उसकी बदगोई की हो या (अपने ज़ाती) रूझान या किसी ख़्वाहिश या रउनत या ख़ुद पसन्दी या रिया , या अस्बेयत से उस पर नाजाएज़ दबाव डाला हो , चाहे वह ग़ाएब हो या हाज़िर , ज़िन्दा हो या मर गया हो , और अब उसका हक़ अदा करना या उससे तहल्लुल मेरे दस्तरस से बाहर और मेरी ताक़त से बाला हो तो ऐ वह जो हाजतों के बर लाने पर क़ादिर है और वह हाजतें उसकी मशीयत के ज़ेरे फ़रमान और उसके इरादे की जानिब तेज़ी से बढ़ती हैं। मैं तुझसे सवाल करता हूं के तू मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमाए और ऐसे शख़्स को जिस तरह तू चाहे मुझसे राज़ी कर दे और मुझे अपने पास से रहमत अता कर। बिला शुबह मग़फ़ेरत व आमरज़िश से तेरे हां कोई कमी नहीं होती और न बख़्शिश व अता से तुझे कोई नुक़सान पहुंच सकता है। ऐ रहम करने वालों में सबसे ज़्यादा रहम करने वाले। बारे इलाहा! तू मुझे दोशम्बे के दिन अपनी जानिब से दो नेमतें मरहमत फ़रमा। एक यह के इस दिन के इब्तिदाई हिस्से में तेरी इताअत के ज़रिये सआदत हासिल हो और दूसरे यह के इसके आखि़री हिस्से में तेरी मग़फ़ेरत के बाएस नेमत से बहरामन्द हूं। ऐ व हके वही माबूद है और उसके अलावा कोई गुनाहों की बख़्श नहीं सकता।

चौसठवीं दुआ

दुआए रोज़े सहशम्बा (मंगलवार)

सब तारीफ़ अल्लाह के लिये है और वही तारीफ़ का हक़दार और वही इसका मुस्तहेक़ है। ऐसी तारीफ़ जोकसीर व फ़रावां हो और मैं अपने ज़मीर की बुराई से उसके दामन में पनाह मांगता हूं और बेशक नफ़्स बहुत ज़्यादा बुराई पर उभारने वाला है मगर यह के मेरा परवरदिगार रहम करे और मैं अल्लाह ही के ज़रिये इस शैतान के शर व फ़साद से पनाह चाहता हूं जो मेरे लिये गुनाह पर गुनाह बढ़ाता जा रहा है और मैं हर सरकश , बदकार और ज़ालिम बादशाह और चीरादस्त दुश्मन से उसके दामने हिमायत में पनाह गुज़ीन हूं।

बारे इलाहा! मुझे अपने लश्कर में क़रार दे क्योंके तेरा लश्कर ही ग़ालिब व फ़तेहमन्द है और मुझे अपने गिरोह में क़रार दे क्योंके तेरा गिरोह ही हर लेहाज़ से बेहतरी पाने वाला है और मुझे अपने दोस्तों में से क़रार दे क्योंके तेरे दोस्तों को न कोई अन्देशा होता है और न वह अफ़सर्दा व ग़मगीन होते हैं। ऐ अल्लाह! मेरे लिये मेरे दीन को आरास्ता कर दे इसलिये के वह मेरे हर मामले में हिफ़ाज़त का ज़रिया है और मेरी आख़ेरत को भी संवार दे क्योंके वह मेरी मुस्तक़िल मन्ज़िल और दिनी व फ़रोमाया लोगों से (पीछा छुड़ाकर) निकल भागने की जगह है और मेरी ज़िन्दगी को हर नेकी में इज़ाफ़े का बाएस और मेरी मौत को हर रन्ज व तकलीफ़ से राहत व सुकून का ज़रिया क़रार दे।

ऐ अल्लाह! मोहम्मद (स 0) जो नबीयों (अ 0) के ख़ातम और पैग़म्बरों के सिलसिले के फ़र्दे आखि़र हैं उन पर और उनकी पाक व पाकीज़ा आल (अ 0) और बरगुज़ीदा असहाब पर रहमत नाज़िल फरमा और मुझे इस रोज़े सेशम्बाा में तीन चीज़ें अता फ़रमा। वह यह के मेरे किसी गुनाह को बाक़ी न रहने दे मगर यह के उसे बख़्श दे , और न किसी ग़म को मगर यह के उसे बरतरफ़ कर दे और न किसी दुश्मन को मगर यह के उसे दूर कर दे। बिस्मिल्लाह के वास्ते से जो (अल्लाह तआला के) तमाम नामों में से बेहतर नाम (पर मुश्तमिल) है और अल्लाह तआला के नाम के वास्ते से जो ज़मीन व आसमान का परवरदिगार है , मैं तमाम नापसन्दीदा चीज़ों का दफ़िया चाहता हूं। जिनमें अव्वल दर्जे पर उसकी नाराज़गी है और तमाम पसन्दीदा चीज़ों को समेट लेना चाहता हूं। जिनमें सबसे मुक़द्दम उसकी रज़ामन्दी है ऐ फ़ज़्ल व एहसान के मालिक तू अपनी जानिब से मेरा ख़ातेमा बख़्शिश व मग़फ़ेरत पर फ़रमा।

पैसठवीं दुआ

दुआए रोज़े चहारशम्बा (बुधवार)

तमाम तारीफ़ उस तआला के लिये है जिसने रात को पर्दा बनाया और नीन्द को आराम व राहत का ज़रिया और दिन को हरकत व अमल के लिये क़रार दिया। तमाम तारीफ़ तेरे ही लिये है के तूने मुझे मेरी ख़्वाबगाह से ज़िन्दा और सलामत उठाया। और अगर तू चाहता तो उसे दाएमी ख़्वाबगाह बना देता। ऐसी हम्द जो हमेशा हमेशा रहे , जिसका सिलसिला क़ता न हो और न मख़लूक़ उसकी गिनती का शुमार कर सके।

बारे इलाहा! तमाम तारीफ़ तेरे ही लिये है के तूने पैदा किया , तो हर लेहाज़ से दुरूस्त पैदा किया। अन्दाज़ा मुक़र्रर किया और हुक्म नाफ़ि़ज़ किया , मौत दी और ज़िन्दा किया। बीमार डाला और शिफ़ा भी बख़्शी , आफ़ियत दी और मुब्तिला भी किया अैर तू अर्श पर मुतमकिन हुआ और मुल्क पर छा गया। मैं तुझसे दुआ मांगने में उस शख़्स का सा तर्ज़े अमल इख़्तियार करता हूं जिसका वसीला कमज़ोर , चाराए कार ख़त्म और मौत का हंगाम नज़दीक हो। दुनिया में उसकी उम्मीदों का दामन सिमट चुका हो और तेरी रहमत की जानिब उसकी एहतियाज शदीद हो और अपनी कोताहियों की वजह से उसे बड़ी हसरत और उसकी लग्ज़िशों और ख़ताओं की कसरत हो और तेरी बारगाह में सिद्क़े नीयत से उसकी तौबा हो चुकी हो तो अब ख़ातेमुल अम्बियाा मोहम्मद (स 0) और उनकी पाक व पाकीज़ा आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे मोहम्मद (स 0) सल्लल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम की शिफ़ाअत नसीब कर और मुझे उनकी हमनशीनी से महरूम न कर। इसलिये के तू तमाम रहम करने वालों से ज़्यादा रहम करने वाला है। बारे इलाहा! इस रोज़े चहारशम्बा मेंमेरी चार हाजतें पूरी कर दे। यह के इत्मीनान हो तो तेरी फ़रमाबरदारी में , सुरूर हो तो तेरी इबादत में , ख़्वाहिश हो तो तेरे सवाब की जानिब , और किनाराकशी हो तो उन चीज़ों से जो तेरे दर्दनाक अज़ाब का बाएस हैं। बेशक तू जिस चीज़ के लिये चाहे अपने लुत्फ़ को कार फ़रमा करता है।

छार्छठवीं ( 66) दुआ

दुआए रोज़े पंज शंबा (बृहस्पतिवार)

सब तारीफ़ उस अल्लाह के लिये हैं जिसने अपनी क़ुदरत से अन्धेरी रात को रूख़सत किया और अपनी रहमत से रौशन दिन निकाला और उसकी रौशनी का ज़रतार जामा मुझे पहनाया और उसकी नेमत से बहरामन्द किया। बारे इलाहा! जिस तरह तूने इस दिन के लिये मुझे बाक़ी रखा इसी तरह इस जैसे दूसरे दिनों के लिये ज़िन्दा रख और अपने पैग़म्बर मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और इस दिन में और इसके अलावा और रातों और दिनों में हराम उमूर के बजा लाने और गुनाह व मआसी के इरतेकाब करने से रन्जीदा ख़ातिर न कर और मुझे इस दिन की भलाई और जो इसके बाद है उसकी भलाई अता कर और इस दिन की बुराई और जो कुछ इस दिन में है उसकी बुराई और जो इसके बाद है उसकी बुराई मुझसे दूर कर दे। ऐ अल्लाह! मैं सलाम के अहद व पैमान के ज़रिये तुझसे तवस्सुल चाहता हूं और क़ुरान की इज़्ज़त व हुरमत के वास्ते तुझ पर भरोसा करता हूं अैर मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम के वसीले के तेरी बारगाह में शिफ़ाअत का तलबगार हूं।

तो ऐ मेरे माबूद! मेरे इस अहद व पैमान पर नज़र कर जिसके वसीले से हाजत बर आरी का उम्मीदवार हूं। ऐ रहम करने वालों में सबसे ज़्यादा रहम करने वाले। बारे इलाहा! इस रोज़े पन्जशम्बा में मेरी पांच हाजतें बर ला जिनकी समाई तेरे ही दामने करम में है और तेरी ही नेमतों की फ़रावानी उनकी मुतहम्मिल हो सकती है। ऐसी सलामती दे जिससे तेरी फ़रमानबरदारी की क़ूवत हासिल कर सकूं। ऐसी तौफ़ीक़े इबादत दे जिससे तेरे सवाबे अज़ीम का मुस्तहेक़ क़रार पाऊं। अैर सरे दस्त रिज़्क़े हलाल की फ़रावानी और ख़ौफ़ व ख़तरे के मवाक़े पर अपने अमन के ज़रिये मुतमइन कर दे और ग़मों और फ़िक्रों के हुजूम से अपनी पनाह में रख। मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और उनसे मेरे तवस्सुल को क़यामत के दिन सिफ़ारिश करने वाला , नफ़ा बख़्शने वाला क़रार दे। बेशक तू रहम करने वालों में सबसे ज़्यादा रहम करने वाला है।

सढ़सठवीं ( 67) दुआ

दुआए रोज़े जुमा (शुक्रवार)

तमाम तारीफ़ उस अल्लाह तआला के लिये है जो पैदा करने और ज़िन्दगी बख़्शने से पहले मौजूद था और तमाम चीज़ों के फ़ना होने के बाद बाक़ी रहेगा। वह ऐसा इल्म वाला है के जो उसे याद रखे उसे भूलता नहीं , जो उसका शुक्र अदा करे उसके हाँ कमी नहीं होने देता , जो उसे पुकारे उसे महरूम नहीं करता , जो उससे उम्मीद रखे उसकी उम्मीद नहीं तोड़ता।

बारे इलाहा! मैं तुझे गवाह करता हूं और तू गवाह होने के लेहाज़ से बहुत काफ़ी है , और तेरे तमाम फ़रिश्तों और तेरे आसमानों में बसने वालों और तेरे अर्श के उठाने वालों और तेरे फ़र्सतादा नबियों (अ 0) और रसूलों (अ 0) और तेरी पैदा की हुई क़िस्म-क़िस्म की मख़लूक़ात को अपनी गवाही पर गवाह करता हूं के तू ही माबूद है और तेरे अलावा कोई माबूद नहीं। तू वहदहू लाशरीक है , तेरा कोई हमसर नहीं है तेरे क़ौल में न वादाखि़लाफ़ी होती है और न कोई तबदीली। और यह के मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम तेरे ख़ास बन्दे और रसूल (स 0) हैं जिन चीज़ों की ज़िम्मेदारी तूने उन पर आएद की वह बन्दों तक पहुंचा दीं। उन्होंने ख़ुदाए बुज़ुर्ग व बरतर की राह में जेहाद करके हक़क़े जेहाद अदा किया और सही-सही सवाब की ख़ुशख़बरी दी और वाक़ेई अज़ाब से डराया। बारे इलाहा! जब तक तू मुझे ज़िन्दा रखे अपने दीन पर साबित क़दम रख और जब के तूने मुझे हिदायत कर दी तो मेरे दिल को बेराह न होने दे और मुझे अपने पास से रहमत अता कर। बेशक तू ही नेमतों का बख़्शने वाला है। मोहम्मद (स 0) और उनकी आल (अ 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमें उनके इत्तेबाअ और उनकी जमाअत में से क़रार दे और उनके गिर्दा में महशूर फ़रमा और नमाज़े जुमा के फ़रीज़े और उस दिन की दूसरों इबादतों के बजा लाने और फ़राएज़ पर अमल करने वालों पर क़यामत के दिन जो अताएं तूने तक़सीम की हैं उन्हें हासिल करने की तौफ़ीक़ मरहमत फ़रमा। बेशक तू साहेबे इक़्तेदार और हिकमत वाला है।

अढ़सठवीं ( 68) दुआ

दुआए रोज़े शम्बा शनिवार

मदद अल्लाह तआला के नाम से जो हिफ़ाज़त चाहने वालों का कलमए कलाम और पनाह ढूंढने वालों का विर्दे ज़बान है और ख़ुदावन्दे आलम से पनाह चाहता हूं। सितमगारों की सितमरानी , हासिदरों की फ़रेबकारी और ज़ालिमों के ज़ुल्मे नादवा से। मैं उसकी हम्द करता हूं (और सवाल करता हूं के वह इस हम्द को) तमाम हम्द करने वालों की हम्द पर फ़ौक़ियत दे ,

बारे इलाहा! तू एक अकेला है। जिसका कोई शरीक नहीं है और बग़ैर किसी मालिक के बनाए , तू मालिक व फ़रमानरवा है , तेरे हुक्म के आगे कोई रोक खड़ी नहीं की जा सकती और न तेरी सल्तनत व फ़रमानरवाई में तुझ से टक्कर ली जा सकती है। मैं तुझसे सवाल करता हूं के तू अपने अब्दे ख़ास और रसूल (स 0) हज़रत मोहम्मद (स 0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और अपनी नेमतों पर ऐसा शुक्र मेरे दिल में डाल दे जिससे तू अपनी ख़ुशनूदी की आखि़री हद तक मुझ पहुंचा दे और अपनी नज़रे इनायत से इताअत , इबादत की पाबन्दी और सवाब का इस्तेहक़ाक़ हासिल करने में मेरे मदद फ़रमाए और जब तक मुझे ज़िन्दा रखे , गुनाहों से बाज़ रखने में मुझ पर रहम करे , और जब तक मुझे बाक़ी रखे इन चीज़ों की तौफ़ीक़ दे जो मेरे लिये सूदमन्द हों और अपनी किताब के ज़रिये मेरा सीना खोल दे और उसकी तिलावत के वसीले से मेरे गुनाह छांट दे और जान व ईमान की सलामती अता फ़रमाए और मेरे दोस्तों को (मेरे गुनाहों के बाएस) वहशत में न डाले और जिस तरह मेरी गुज़िश्ता ज़िन्दगी में एहसानात किये हैं उसी तरह बक़िया ज़िन्दगी में मुझ पर अपने एहसानात किये हैं उसी तरह बक़िया ज़िन्दगी में मुझ पर अपने एहसानात की तकमील फ़रमाए। ऐ रहम करने वालों में सबसे ज़्यादा रहम करने वाले।


विषय सूची

सहीफा ए कामिला 1

मुक़द्देमा 2

पहली दुआ 3

खुलासा : 8

दूसरी दुआ 21

खुलासा : 23

तीसरी दुआ 26

खुलासा : 29

चौथी दुआ 37

पांचवी दुआ 46

छठी दुआ —- 51

सातवीं दुआ — 62

खुलासा : 64

आठवीं दुआ 67

नवी दुआ 68

दसवीं दुआ 70

ग्यारहवीं दुआ 71

बारहवीं दुआ 72

तेरहवीं दुआ 76

चौदहवीं दुआ 80

पन्द्रहवीं दुआ 82

सोलहवीं दुआ 84

सत्रहवीं दुआ 90

अठारहवीं दुआ 93

उन्नीसवीं दुआ 94

बीसवीं दुआ 95

इक्कीसवीं दुआ 105

बाईसवीं दुआ 109

तेईसवीं दुआ 113

चौबीसवीं दुआ 116

पच्चीसवीं दुआ 120

छब्बीसवीं दुआ 123

सत्ताईसवीं दुआ 125

अट्ठाइसवीं दुआ 131

उनतीसवी दुआ 133

तीसवीं दुआ 134

इकत्तीसवीं दुआ 135

बत्तीसवीं दुआ 142

तैंतीसवीं दुआ 150

चौंतीसवीं दुआ 151

पैंतीसवीं दुआ 152

छत्तीसवीं दुआ 154

सैंतीसवीं दुआ 156

अढ़तीसवीं दुआ 160

उन्तालीसवीं दुआ 161

चालीसवीं दुआ 164

इकतालीसवीं दुआ 166

बयालीसवीं दुआ 167

तेंतालीसवीं दुआ 174

चौवालीसवीं दुआ 176

पैंतालीसवीं दुआ 181

छेयालीसवीं दुआ 193

सैंतालीसवीं दुआ 197

अढ़तालीसवीं दुआ 215

उनचासवीं दुआ 222

पचासवीं दुआ 227

इक्यावनवी दुआ 229

बावनवीं दुआ 233

तिरपनवीं दुआ 236

चौवनवीं दुआ 237

पचपनवीं दुआ 239

छप्पनवीं दुआ 241

सत्तावनवीं दुआ 243

अट्ठावनवीं दुआ 244

उनसठवीं दुआ 244

साठवीं दुआ 246

इकसठवीं दुआ 249

हफ़ते के सात दिनों में हज़रत (अ 0) के पढ़ने की दुआएं 251

बारसठवीं दुआ 251

दुआए रोज़े यकशम्बा (रविवार) 251

तिरसठवीं दुआ 252

दुआए रोज़े दोशम्बा (सोमवार) 252

चौसठवीं दुआ 254

दुआए रोज़े सहशम्बा (मंगलवार) 254

पैसठवीं दुआ 256

दुआए रोज़े चहारशम्बा (बुधवार) 256

छार्छठवीं ( 66) दुआ 257

दुआए रोज़े पंज शंबा (बृहस्पतिवार) 257

सढ़सठवीं ( 67) दुआ 259

दुआए रोज़े जुमा (शुक्रवार) 259

अढ़सठवीं ( 68) दुआ 260

दुआए रोज़े शम्बा शनिवार 260

विषय सूची 262

सहीफा ए कामिला

सहीफा ए कामिला

बुक करेकशन

कैटिगिरी: दुआ व ज़ियारात
पन्ने: 11