अबु अब्दुल्लाह हज़रत इमामे जाफ़रे सादिक़ (अ स)
(चौदह सितारे)
लेखकः नजमुल हसन कर्रारवी
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इसी इजमाल की हैं शरह , गोया जाफ़रे सादिक़
लक़ब जिसका किताब अल्लाह में ख़त्मे नबूवत है
बनाये सब से पहले , फ़िक़हा के आईन मौला ने
इन्हीं के दम से क़ायम आज इस्लामी शरीअत है
साबिर थरयानी ‘‘ कराची ’’
सादिक़ आले मोहम्मद , वह इमामे सादस
ज़ेबे सर जिसके इमामत का है मौरूसी ताज
है यह मौलूदे जिगर बन्द , मोहम्मद बाक़र
ख़ाना ए हस्ती , जिदअत को करेगा ताराज
हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) के छठे जानशीन और सिलसिलाए अस्मत की आठवीं कड़ी हैं। आपके वालिदे माजिद हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़र (अ.स.) थे और वालिदा माजिदा जनाबे उम्मे फ़रवा बिन्ते क़ासिम बिन मोहम्मद बिन अबी बक्र थीं। आप अपने आबाओ अजदाद की तरह इमाम मन्सूस , मासूम , आलिमें ज़माना और अफ़ज़ले काएनात थे।
अल्लामा हजर लिखते हैं कि हज़रत इमामे जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) अफ़ज़ल व अकमल थे। इसी बिना पर आपने अपने बा पके ख़लीफ़ा और वसी क़रार पाये।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 120 ) अल्लामा इब्ने ख़ल्क़ान तहरीर फ़रमाते हैं कि आप सादात अहलेबैत से थे व फ़ज़लह ‘‘ अश्हरान यज़कर ’’ इनकी अफ़ज़लियत व करम मोहताज बयान नहीं।(दफ़ायात अल अयान जिल्द 1 पृष्ठ 105 )
इमाम फ़ख़रूद्दीन राज़ी की तफ़सीर कबीर जिल्द 5 पृष्ठ 429 व जिल्द 6 पृष्ठ 783 प्रकाशित मिस्र बहवाला ए आयाए ततहीर और आरिफ़ समदानी अली हमदानी की मुवदतुल क़ुर्बा पृष्ठ 34 प्रकाशित बम्बई 1310 ई 0 और शाह अब्दुल अज़ीज़ की अश्रया ताअन 13 पृष्ठ 439 प्रकाशित लखनऊ 1309 की इबारत से मुस्तफ़ाद होता है कि आप भी अपने आबाओ अजदाद की तरह मासूम और महफ़ूज़ थी। वरासतु लबीव पृष्ठ 200 में है कि आपने इब्तिदा ए उम्र से आखि़र तक कोई गुनाह नहीं किया और इसी को महफ़ूज़ कहे हैं। इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ख़ुद इरशाद फ़रमाते हैं कि (नहन क़ौम मासूमन) हम हैं वही ख़ुदा के तरजुमान , हम हैं इल्मे ख़ुदा के ख़ज़ीनादार और हम ही लोग मासूम हैं। ख़ुदा ने हमारी इताअत का हुक्म दिया है और हमारी मासीयत से दुनिया वालों को रोका है।(आलाम अल वरा पृष्ठ 169 )
अल्लामा इब्ने तल्हा शाफ़ई लिखते हैं कि आप अहले बैत और रिसालत की अज़ीम तरीन फ़र्द थे और आप मुख़्तलिफ़ क़िस्म के उलूम से भर पूर थे। आप ही से क़ुरआन मजीद के मानी के चश्मे फूटते रहे हैं। आपके बहरे इल्म से उलूम के मोती रोले जाते हैं। आप ही से इल्मी अजाएब व कमालात का ज़हूर व इन्केशाफ़ हुआ।(मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 173 )
अल्लामा इब्ने हजर मक्की लिखते हैं कि उलमा ने आपसे इस दर्जा नक़ले उलूम किया जिसकी कोई हद नहीं। आपका आवाज़े इल्म तमाम अवसाद दयार में फैला हुआ था।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 120 )
मुल्ला जामी तहरीर फ़रमाते हैं कि आपके उलूम का अहाता व फ़हमो इदराक से बुलन्द है।(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 180 )
अल्लामा मिस्र शेख़ मोहम्मद ख़ज़री बक लिखते हैं कि इनसे इमाम मालिक बिन अन्स , इमाम अबू हनीफ़ा और अकसर उलेमा ए मदीना ने रवायत की है मगर इमाम बुख़ारी , सहाए सित्ता में सब से ज़्यादा मुताबर्रिक समझी जाती है। वाज़े हो कि दीगर सहाह में आले मोहम्मद (स. अ.) से भी रवायत ली गई हैं। ज़रूरत थी कि इन सहाह का बुख़ारी से बुलन्द दर्जा दिया जाता मगर ऐसा नहीं हुआ।
बरीं अक़ल व दानिश बेबायद गिरीस्त
आपकी विलादत ब सआदत आप बतारीख़ 17 रबीउल अव्वल 83 हिजरी मुताबिक़ 702 ई 0 यौमे दो शम्बा मदीना ए मुनव्वरा में पैदा हुए।(इरशाद मुफ़ीद फ़ारसी पृष्ठ 413, आलाम अल वरा पृष्ठ 159, जामे अब्बासी पृष्ठ 60 वगै़राह) आपकी विलादत की तारीख़ को ख़ुदा वन्दे आलम ने बड़ी इज़्ज़त दे रखी है। अहादीस में है कि इस तारीख़ को रोज़ा रखना एक साल के रोज़े के बराबर है। विलादत के बाद एक दिन हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़र (अ.स.) ने फ़रमाया कि मेरा यह फ़रज़न्द इन चन्द मख़सूस अफ़राद में से है जिसनी वजह से ख़ुदा ने बन्दों पर एहसान फ़रमाया और यही मेरे बाद मेरा जानशीन होगा।(जन्नात अल ख़ुलूद पृष्ठ 27 )
अल्लामा मजलिसी लिखते हैं कि जब आप बतने मादर में थे तब कलाम फ़रमाते थे। विलादत के बाद आपने कलमाए शहादतैन ज़बान पर जारी फ़रमाया आप भी नाफ़ बुरीदा और ख़तना शुदा पैदा हुए हैं।(जिला अल उयून पृष्ठ 265 ) आप तमाम नबूवतों के ख़ुलासा थे।
इस्मे गिरामी ,कुन्नियत , अलक़ाब
आपका इस्में गेरामी जाफ़र , आपकी कुन्नियत अबू अब्दुल्लाह , अबू इस्माईल और आपके अलक़ाब सादिक़ , फ़ाज़िल , ताहिर वग़ैरा हैं। अल्लामा मजलिसी रक़म तराज़ हैं कि आं हज़रत ने अपनी ज़ाहिरी ज़िन्दगी में हज़रत जाफ़र बिन मोहम्मद को लक़ब सादिक़ से मौसूम व मुलक़्क़ब फ़रमाया था और इसकी वजह बज़ाहिर यह थी कि अहले आसमान के नज़दीक़ आपका लक़ब पहले ही से ‘‘ सादिक़ ’’ था।(जिला अल उयून पृष्ठ 264 )
अल्लामा इब्ने ख़ल्क़ान का कहना है कि सिदक़ मक़ाल की वजह से आपके नामे नामी का जुज़ो ‘‘ सादिक़ ’’ क़रार पाया है।(वफ़यात उल अयान जिल्द 1 पृष्ठ 105 )
‘‘ जाफ़र ’’ के मुताअल्लिक़ उलेमा का बयान है कि जन्नत में जाफ़र नामी एक शीरी नहर है इसी की मुनासिबत से आपका यह लक़ब रखा गया है चूंकि आपका फ़ैज़े आम नहरे जारी की तरह था इसी लिये लक़ब से मुलक़्क़ब हुए।(अरजहुल मतालिब पृष्ठ 361 बहवाला तज़किरातुल उल ख़्वास उल उम्मता)
इमामे अहले सुन्नत अल्लामा वहीदुज़्ज़मा हैदराबादी तहरीर फ़रमाते हैं कि जाफ़र छोटी नहर या बड़ी वासेए (कुशादा) इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) मशहूर नाम हैं। बारह इमामों में से और बड़े सुक़्क़ा और फ़क़ीह और हाफ़िज़ थे। इमाम मालिक और इमामे अबू हनीफ़ा के शेख़ (हदीस) हैं और इमाम बुख़ारी को मालूम नहीं क्या शुबहा हो गया कि वह अपनी सही में इनसे रवायत नहीं करते और यहया बिन सईद क़तान ने बड़ी बेअदबी की है जो कहते हैं , ‘‘ फ़ी मनहू शैइनव मजालिद अहबा इला मिन्हा ’’ मेरे दिल में इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की तरफ़ से ख़लिश है। मैं इनसे बेहतर मजालिद को समझता हूँ हालांकि मजालिद को इमाम साहब के सामने क्या रूतबा है। ऐसी ही बातों की वजह से अहले सुन्नत बदनाम होते हैं कि उनको आइम्मा अहले बैत (अ.स.) से मोहब्बत और ऐतिक़ाद नहीं। अल्लाह ताअला इमाम बुख़ारी पर रहम न करे कि मरवान और इमरान बिन ख़्तान और कई ख़्वारिज से तो उन्होंने रवाएत की और जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) से जो इब्ने रसूल अल्लाह (स अ व व ) हैं इनकी रवाएत में शुब्हा करते हैं।(अनवारूल अलख़्ता पारा पृष्ठ 47 प्रकाशित हैदराबाद दकन)
अल्लामा इब्ने हजर मक्की अल्लामा शिब्लंजी रक़म तराज़ हैं कि अयाने आइम्मा में से एक जमाअत मिस्ल यहया बिन सईद इब्ने हजर , इमाम मालिक , इमाम शैफ़ान सूरी , सुफ़यान बिन ऐनिया , अबू हनीफ़ा , अय्यूब सजसतानी ने आपसे हदीस अख़्ज़ की , अबू हातिम का कौल है कि इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ऐसे सुक़्क़ा हैं (लायस अल अन्हा मसलह) कि आप ऐसे शख़्सों की निस्बत कुछ तहक़ीक़ और इस्तेफ़सार व तफ़हुस की ज़रूरत ही नहीं। आप रियासत की तलब से बे नियाज़ थे और हमेशा इबादत गुज़ारी में बसर करते रहे। उमर इब्ने मक़दाम का कहना है कि जब मैं इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) को देखता हूँ तो मुझे माअन ख़्याल होता है कि यह जौहरे रिसालत (स अ व व ) की असल बुनियाद हैं।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 120 नूरूल अबसार 131 हुलयतुल अबरार , तारीख़ आईम्मा पृष्ठ 433 )
बादशाहाने वक़्त
आपकी विलादत 83 हिजरी में हुई है इस वक़्त अब्दुल मलिक बिन मरवान बादशाहे वक़्त था फिर वलीद सुलेमान उमर बिन अब्दुल यज़ीद बिन अब्दुल मलिक , यज़ीद अल नाक़िस , इब्राहीम इब्ने वलीद और मरवान अल हेमार , अल्ल तरतीब ख़लीफ़ा मुक़र्रर हुए। मरवान अल हेमार के बाद सलतनते बनी उमय्या का चिराग़ गुल हो गया और बनी अब्बास का पहला बादशाह अबुल अब्बास , सफ़ाह और दूसरा मन्सूर दवानक़ी हुआ है। मुलाहेज़ा हो ,(आलाम अल वरा , तारीख़ इब्ने अलवरी व तारीख़े आइम्मा पृष्ठ 336 ) इसी मन्सूर ने अपनी हुकूमत के दो साल गुज़रने के बाद इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) को ज़हर से शहीद कर दिया। (अनवारूल हुसैनिया जिल्द पृष्ठ 50)
अब्दुल मलिक बिन मरवान के अहद में आपका एक मनाज़िरा
हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) ने बे शुमार इल्मी मनाज़िरे फ़रमाए हैं आपने दहिरयों , क़दरियों काफ़िर और यहूदी व नसारा को हमेशा शिकस्ते फ़ाश दी है। किसी एक मनाज़िरे में भी आप पर कोई ग़लबा हासिल न कर सका। अहदे अब्दुल मलिक इब्ने मरवान का ज़िक्र है कि एक क़दरिया मज़हब का मनाज़िर इसके दरबार में आ कर उलमा से मनाज़िरे का ख़्वाहिश मन्द हुआ। बादशाह ने हसबे आदत अपने उलमा को तलब किया और उनसे कहा कि इस क़दरिये मनाज़िर से मनाज़िरा करो। उलमा ने उस से काफ़ी ज़ोर आज़माई की मगर वह मैदाने मनाज़िरे का खिलाड़ी इन से न हार सका और तमाम उलमा आजिज़ आ गए। इस्लाम की शिकस्त होते हुए देख कर अब्दुल मलिक इब्ने मरवान ने फ़ौरन एक ख़त इमाम मोहम्मद बाक़र (अ.स.) की खि़दमत में मदीना रवाना कर दिया और उसमें ताकीद की कि आप ज़रूर तशरीफ़ लायें। हज़रत मोहम्मद बाक़र (अ.स.) की खि़दमत में जब इसका ख़त पहुँचा तो आपने अपने फ़रज़न्द हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) से फ़रमाया कि बेटा मैं ज़ईफ़ हो चुका हूँ तुम मनाज़िरे के लिये शाम चले जाओ। हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) अपने पदरे बुर्ज़ुगवार के हस्ब उल हुक्म मदीना से रवाना हो कर शाम पहुँच गए। अब्दुल मलिक इब्ने मरवान ने जब इमाम मोहम्मद बाक़र (अ.स.) के बजाए इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) को देखा तो कहने लगा कि आप अभी कमसिन हैं और वह बड़ा पुराना मनाज़िर है , हो सकता है कि आप भी और उलमा की तरह शिकस्त खांए इस लिये मुनासिब नहीं कि मजालिसे मनाज़िरा फिर मुन्अक़िद की जाए। हज़रत ने फ़रमाया , बादशाह नू घबरा नहीं , अगर ख़ुदा ने चाहा तो मैं सिर्फ़ चन्द मिनट में मनाज़िरा ख़त्म कर दूंगा। आपके इरशाद की ताईद दरबारियों ने भी की और मौक़ा ए मनाज़िरे पर फ़रीक़ैन आ गए। चूंकि क़दरियों का एतेक़ाद है कि बन्दा ही सब कुछ है। ख़ुदा को बन्दों के मामले में कोई दख़ल नहीं है , और न ख़ुदा कुछ कर सकता है। यानी ख़ुदा के हुक्म और क़ज़ा व क़द्र व इरादों को बन्दों के किसी अमर में दख़ल नहीं। लेहाज़ा हज़रत ने इसकी पहल करने की ख़्वाहिश पर फ़रमाया कि मैं तुम से सिर्फ़ एक बात कहना चाहता हूँ और वह यह है कि तुम ‘‘ सूरा ए हम्द पढ़ो ’’ उसने पढ़ना शुरू किया। ज बवह ‘‘ इय्या का नाब्दो व इय्याका तस्तेईन ’’ पर पहुँचा , जिसका तरजुमा यह है कि ‘‘ मैं सिर्फ़ तेरी इबादत करता हूँ और बस तुझी से मद्द चाहता हूँ ’’ तो आपने फ़रमाया , ठहर जाओ और मुझे इसका जवाब दो कि जब ख़ुदा को तुम्हारे एतेक़ाद के मुताबिक़ तुम्हारे किसी मामले में दख़्ल देने का हक़ नही तो फिर तुम उससे मद्द क्यों मांगते हो। यह सुन कर वह ख़ामोश हो गया और कोई जवाब न दे सका। बिल आखि़र मजलिसे मनाज़ेरा बरख़्वास्त हो गई और बादशाह बेहद ख़ुश हुआ।(तफ़सीरे बुरहान जिल्द 1 पृष्ठ 33 )
अबु शाकिर देसानी का जवाब अबु शाकिर देसानी जो ला मज़हब था। हज़रत से कहने लगा कि क्या आप ख़ुदा का ताअर्रूफ़ करा सकते हैं और उसकी तरफ़ मेरी रहबरी फ़रमा सकते हैं। आपने एक ताऊस का अन्डा हाथ में ले कर फ़रमाया देखो इसकी बाहरी बनावट पर ग़ौर करो , और अन्दर की बहती हुई ज़र्दी और सफ़ैदी को बहुत ग़ौर से देखो और उस पर तवज्जो दो कि इसमें रंग बिरंग के तायर (पक्षी) क्यों कर पैदा हो जाते हैं। क्या तुम्हारी अक़्ले सलीम इसको तसलीम नहीं करती कि इस अंडे को अछूते अन्दाज़ में बनाने वाला और उससे पैदा करने वाला कोई है। यह सुन कर वह ख़ामोश हो गया और दहरियत से बाज़ आया। इसी देसानी का ज़िक्र है कि उसने एक दफ़ा आपके साहबी हश्शाम बिन हकम के ज़रिये से सवाल किया कि क्या यह मुम्किन है कि ख़ुदा सारी दुनिया को एक अंडे में समो दे और अंडा बढे न दुनिया घटे ? आपने फ़रमाया बेशक वह हर चीज़ पर क़ादिर है। उसने कहा कोई मिसाल ? फ़रमाया मिसाल के लिये आंख की छोटी पुतली काफ़ी है। इसमें सारी दुनियां समा जाती है न पुतली बढ़ती है न दुनिया घटती है।(उसूले काफ़ी पृष्ठ 433 जामए उल अख़बार)
इमामे जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) और हकीम इब्ने अयाश कल्बी
हश्शाम बिन अब्दुल मलिक बिन मरवान के अहदे हयात का एक वाक़ेया है कि हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) की खि़दमत में एक शख़्स ने हाज़िर हो कर अर्ज़ किया कि हकीम बिन अयाश कल्बी आप लोगों की हजो किया करता है। हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने फ़रमाया कि अगर तुझ को उसका कुछ कलाम याद हो तो बयान कर। उसने दो शेर सुनाये , जिसका हासिल यह है कि हमने ज़ैद को शाख़े दरख़्ते ख़ुरमा पर सूली दे दी , हालां कि हम ने नहीं देखा कोई मेहदी दार पर चढ़ाया गया हो और तुम ने अपनी बे वकूफ़ी से अली (अ.स.) को उस्मान के साथ क़यास कर लिया हालां कि अली (अ.स.) उस्मान से बेहतर और पाकीज़ा थे। यह सुन कर इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने दुआ की बारे इलाहा अगर यह हकीम कल्बी झूठा है तो इस पर अपनी मख़्लूक़ में से किसी दरिन्दे को मुसल्लत फ़रमा। चुनान्चे उनकी दुआ क़ुबूल हुई और हकिम कल्बी को राह में शेर ने हलाक कर दिया।(असाबा इब्ने हजर , असक़लानी जिल्द 2 पृष्ठ 80 )
मुल्ला जामी तहरीर फ़रमाते हैं कि जब हकीम कल्बी के हलाक होने की ख़बर इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) को पहुँची तो उन्होंने सजदे में जा कर कहा कि उस ख़ुदा ए बरतर का शुकरिया है कि जिसने हम से जो वायदा फ़रमाया उसे पूरा किया।(शवाहेदुन नबूवत सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 121 व नूरूल अबसार पृष्ठ 147 )
113, हिजरी में इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) का हज अल्लामा इब्ने हजर मक्की लिखते हैं कि आपने 113 हिजरी में हज किया और वहां ख़ुदा से दुआ की , ख़ुदा ने बिला फ़स्ल अंगूर और दो बेहतरीन रिदायें भिजवाईं। आपने अंगूर ख़ुद भी खाया और लोगों को भी खिलाया और रिदायें एक साएल को दे दीं।
इस वाक़िये की मुख़्तसर अल्फ़ाज़ में तफ़सील यह है कि बअस बिन सअद उसी सन् में हज के लिये गये। वह नमाज़े अस्र पढ़ कर एक दिन कोहे अबू क़बीस पर गए , वहां पहुँच कर देखा कि एक निहायत मुक़द्दस शख़्स मशग़ूले नमाज़ है। फिर नमाज़ के बाद वह सज्दे में गया और या रब या रब कह कर ख़ामोश हो गया। फिर या हय्यो या हय्यो कहा और चुप हो गया। फिर या अर रहमान निर्रहीम कह कर चुप हो गया। फिर बोला ख़ुदा मुझे अंगूर चाहिये और मेरी रिदा बोसिदा हो गई है , दो रिदाए चाहिये हैं। रावी ए हदीस बाअस कहता है कि यह अल्फ़ाज़ अभी तमाम न होने पाए थे कि एक ताज़ा अंगूरों से भरी हुई ज़म्बील(बहुत बड़ा टोकरा) आ मौजूद हुई और उस पर दो बेहतरीन चादरें रखी हुई थीं। उस आबिद ने जब अंगूर खाना चाहा तो मैंने अर्ज़ कि हुज़ूर मैं आमीन कह रहा था मुझे भी खिलाईये। उन्होंने हुक्म दिया , मैंने खाना शुरू किया। ख़ुदा की क़सम ऐसे अंगूर सारी उम्र ख़्वाब में भी नज़र न आये थे। फिर आपने एक चादर मुझे दी। मैंने कहा मुझे ज़रूरत नहीं है। उसके बाद आपने एक चादर पहन ली और एक ओढ़ ली , फिर पहाड़ से उतर कर मक़ामे सई की तरफ़ गये। मैं उनके साथ था। रास्ते में एक सायल ने कहा , मौला ! मुझे चादर दे दीजिये , ख़ुदा आपको जन्नत के लिबास से आरास्ता करेगा। आपने फ़ौरन दोनों चादरें उसके हवाले कर दीं। मैंने उस सायल से पूछा यह कौन हैं ? उसने कहा इमाम ज़माना हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ स )। यह सुन कर मैं उनके पीछे दौड़ा कि उन से मिल कर कुछ इस्तेफ़ादा करूं लेकिन फिर वह मुझे न मिल सके।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 121 व कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 66, मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 277 )
वलीद बिन यज़ीद और सादिक़े आले मोहम्मद (अ स . )
हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक (अ.स.) के वालिदे माजिद हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) को सन् 114 में शहीद करने के बाद हश्शाम बिन अब्दुल मलिक बिन मरवान 125 हिजरी में वासिले जहन्नम हुआ। उसके मरने के बाद वलीद बिन यज़ीद बिन अब्दुल मलिक बिन मरवान ख़लीफ़ा ए बनाया गया। यह ख़लीफ़ा ऊबाश , इख़्लाक़ी औसाफ़ से कोसों दूर , बे शर्म , मुन्हियात का मुरतकिब निहायत फ़ासिक़ो फ़ाजिर और अय्याश था। मय नोशी और लवाता में ख़ास शोहरत रखता था। निहायत जब्बार और कीना वर , जिस हांडी में खाता उसी मे सूराख़ करता। यह अपने बाप की कनीज़ों को भी इस्तेमाल किया करता था। एक दिन उसकी जमीला लड़की एक ख़ादेमा के पास बैठी थी उसने उसे पकड़ लिया और उसकी बुकारत (इज़्ज़त लूटना) ज़ायल कर दी। ख़ादेमा ने कहा कि यह तो मजूस का काम है। उसने जवाब दिया कि मलामत का ख़्याल करने वाले मग़मूम मर जाते हैं।
एक दिन हज के ज़माने में यह ख़ाना ए काबा की छत पर मय नोशी के लिये भी गया था। तारीख़ का यह मशहूर वाक़ेया है कि एक दिन उसने क़ुरआने मजीद से फ़ाल खोली , उसमें आयत ‘‘ ख़ाबा कल जब्बार अनीद ’’ निकला यह देख कर उसने ग़ुस्से में क़ुरआने मजीद को फेंक दिया , फिर उसे टांग कर तीरों से टुकड़े टुकड़े कर डाला और कहा ऐ क़ुरआन ! जब ख़ुदा के पास जाना तो कह देना ‘‘ मज़क़नी अल वलीद ’’ मुझे वलीद ने पारा पारा किया है।
एक दिन वलीद अपनी कनीज़ के साथ बैठा शराब पी रहा था। इतने में अज़ान की अवाज़ कान में आई। यह फ़ौरन मुबाशेरत (सम्भोग) में मशग़ूल हो गया। जब लोगों ने नमाज़ पढ़ाने के लिये कहा तो उस कनीज़ को अपना लिबास पहना कर शराब के नशे और जनाबत की हालत में नमाज़ पढ़ाने के लिये मस्जिद में भेज दिया और उसने नमाज़ पढ़ा दी।(तारीख़े ख़मीस , हबीब उस सैर , हज्जुल करामा , सिद्दीक़ हसन) यह ज़ाहिर है कि जो दीनो ईमान , नमाज़ व मस्जिद व क़ुरआने मजीद का एहतेराम न करता हो वह आले मोहम्मद (स अ व व ) का क्या एहतेराम कर सकता है। यही वजह है कि उसने अपने मुख़्तसर अहद में उनके साथ कोई रियायत नहीं की। तारीख़ में है कि हज़रत ज़ैद शहीद (र. अ.) के बेटे जनाबे यहीया को इसी के अहद में बुरी तरह शहीद किया गया और उनका सर वलीद के दरबार में लाया गया और जिस्म ख़ुरासान में सूली पर लटकाया गया।(तारीख़े इस्लाम जिल्द 1 पृष्ठ 48 )
हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) और जनाबे अबू हनीफ़ा नोमान बिन साबित कूफ़ी
फ़रज़न्दे रसूल (स अ व व ) हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) जो आलीमे इल्मे लदुन्नी थे। आपके फ़ैज़े सोहबत से अरबाबे अक़ल ने उलूम हासिल किये। आपकी ही एक कनीज़ ‘‘ हुसैनिया ’’ का ज़िक्र ज़बान ज़द ख़्वासो आम है कि उसने बादशाहे वक़्त के दरबार में चालीस उलेमा ए इस्लाम को चुप कर के दम बा खुद कर दिया था। आप ही के फ़ैज़े सोहबत से जनाबे नोमान बिन साबित ने इल्मी मदारिज हासिल किये थे और आपके लिये मनक़बते अज़ीम है।(हदाएक़ उल हनफ़िया पृष्ठ 18 प्रकाशित लखनऊ 1906 ई 0 )
जनाबे नोमान बिन साबित 80 हिजरी में बा मक़ाम कूफ़ा पैदा हुए। आपकी कुन्नियत अबू हनीफ़ा थी। आप अजमी नस्ल के थे। आपको हारून रशीद अब्बासी के अहद में काफ़ी उरूज हासिल हुआ।(तारीख़े सग़ीर बुख़ारी सन् 174 व सीरतुन नोमान , शिब्ली पृष्ठ 17 )
आपको हश्शाम बिन अब्दुल मलिक बिन मरवान के ज़माने में ‘‘ इमामे आज़म ’’ का खि़ताब मिला। जब कि उन्होंने 123 हिजरी में जनाबे ज़ैद शहीद की बैयत की और हुकूमत की मुख़ालेफ़त कर के मोआफ़ेक़त की थी।
किताब मुस्तफ़ा शरह मौता में है कि अकाबिरे मोहद्देसीन मिस्ल अहमद बुख़ारी , इमाम मुस्लिम , तिरमिज़ी , निसाई , अबू दाऊद , इब्ने माजा ने आपकी रवायत पर भरोसा नहीं किया। आपकी वफ़ात 150 हिजरी में हुई है।(तारीख़े सग़ीर पृष्ठ 174 )
इसी तारीख़े सग़ीर में बा रवायत नईम बिन हमाद , मरवी है कि मैं सुफ़ियान सौरी की खि़दमत में हाज़िर था कि नागाह अबू हनीफ़ा साहब की वफ़ात की ख़बर सुनी गई तो सुफ़ियान ने ख़ुदा का शुक्र अदा किया और कहा कि वह शख़्स इस्लाम को तोड़ कर चकना चूर करता था। ‘‘ मा वल्द फ़िल इस्लाम अश्शाम मिन्हा ’’ इस्लाम में इस्से ज़्यादा शूम कोई पैदा नहीं हुआ।
इमाम अबू हनीफ़ा की शार्गिदी का मसला
यह तारीख़ी मुसल्लेमात से है कि जनाबे अबू हनीफ़ा हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़र (अ.स.) और इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के शार्गिद थे लेकिन अल्लामा तक़ीउद्दीन इब्ने तैमिया ने हम असर होने की वजह से इसमें कुन्केराना शुब्हा ज़ाहिर किया है। इनके शुब्हे को शम्सुल उलेमा अल्लामा शिब्ली नोमानी ने रद करने हुए तहरीर फ़रमाया है , ‘‘ अबू हनीफ़ा एक मुद्दत तक इस्तेफ़ादे की ग़र्ज़ से इमाम मोहम्मद बाक़र (अ.स.) की खि़दमत में हाज़िर रहे और फ़िक़ा व हदीस के मुताअल्लिक़ बहुत बड़ा ज़ख़ीरा हज़रत मम्दूह का फ़ैज़े सोहबत था। इमाम साहब ने उनके फ़रज़न्दे रशीद हज़रत जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की फ़ैज़े सोहबत से भी कुछ फ़ायदा उठाया , जिसका ज़िक्र उमूमन तारीख़ों में पाया जाता है। ’’ इब्ने तैमिया ने इससे इन्कार किया है और उसकी वजह यह ख़्याल है कि इमाम अबू हनीफ़ा इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के माअसर और हम असर थे। इस लिये उनकी शार्गिदी क्यों कर इख़्तेयार करते लेकिन इब्ने तैमिया की गुस्ताख़ी और ख़ीरा चश्मी है। इमाम अबू हनीफ़ा लाख मुजतहिद और फ़क़ीह हों लेकिन फ़ज़लो कमाल में उनको हज़रत जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) से क्या निसबत। हदीस व फ़िक़ा बल्कि तमाम मज़हबी उलूमे अहले बैत (अ.स.) के घर से निकले हैं। ‘‘ वा साहेबुल बैत अदरा बेमा फ़ीहा ’’ घर वाले ही घर की तमाम चीज़ों से वाक़िफ़ होते हैं।(सीरतुन नोमान पृष्ठ 45 तबआ आगरा)
जनाबे अबू हनीफ़ा का इम्तेहान तारीख़ में है कि हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की खि़दमत में अकसर हज़रत अबू हनीफ़ा नोमान बिन साबित हाज़िर हुआ करते थे और यह होता रहता था कि आप उनका इम्तेहान ले कर उन्हें फ़ायदा पहुँचा दिया करते थे। एक दफ़ा का ज़िक्र है कि जनाबे अबू हनीफ़ा हज़रत की खि़दमत मे हाज़िर हुए , तो आपने पूछा कि ऐ अबू हनीफ़ा मैंने सुना है कि तुम मसाएले दीनिया मे ‘‘ क़यास ’’ से काम लिया करते हो। अर्ज़ कि जी हां है तो ऐसा ही। आपने फ़रमाया कि ऐसा न किया करो क्यों कि ‘‘ अव्वल मन क़यास इब्लीस ’’ दीन में क़यास करना इब्लीस का काम है और उसी ने क़यास की पहल की है।
एक दफ़ा आपने पूछा कि ऐ अबू हनीफ़ा यह बताओ कि ख़ुदा वन्दे आलम ने आखों में नमकीनी , कानों में तल्ख़ी , नाक के नथनों में रूतूबत और लबों पर शीरीनी क्यों पैदा की ? उन्होंने बहुत ग़ौरो ख़ौज़ के बाद कहा , या हज़रत इसका इल्म मुझे नहीं है। आपने फ़रमाया , अच्छा मुझ से सुनो , आंखें चरबी का ढेला हैं , अगर उनमें शूरियत और नमकीनी न होती तो पिघल जातीं , कानों में तल्ख़ी इस लिये है कि कीड़े मकोड़े न घुस जायें। नाक में रूतूबत इस लिये है कि सांस की आमदो रफ़्त में सहूलियत हो और ख़ुशबू और बदबू महसूस हो , लबों में शीरीनी इस लिये है कि खाने पीने मे लज़्ज़त आये।
फिर आपने पूछा कि वह कौन सा कलमा है जिसका पहला हिस्सा कुफ़्र और दूसरा ईमान है ? उन्होंने अर्ज़ की मुझे इल्म नहीं। आपने फ़रमाया कि वह वही कलमा है जो तुम रात में पढ़ा करते हो , सुनो ! ला इलाहा कुफ्ऱ और इल्लल्लाह ईमान है।
फिर आपने पूछा कि औरत कमज़ोर है या मर्द , नीज़ यह कि हालते हमल में औरत को ख़ूने हैज़ क्यों नहीं आता ? उन्होंने कहा कि यह तो मालूम है कि औरत कमज़ोर है लेकिन यह नहीं मालूम कि इसे आलमे हमल में हैज़ क्यों नहीं आता। आपने फ़रमाया कि अच्छा अगर औरत कमज़ोर है तो क्या वजह है कि मीरास में उसको एक हिस्सा और मर्द को दो हिस्सा दिया जाता है। उन्होंने जवाब दिया मुझे मालूम नहीं। आपने फ़रमाया कि औरत का नफ़क़ा मर्द पर है और हुसूले आज़ूक़ा उसी के ज़िम्मे है इस लिये उसे दोहरा दिया गया और औरत को आलमे हमल में ख़ूने हैज़ इस लिये नहीं आता कि वह बच्चे के पेट में दाखि़ल हो कर ग़िज़ा बन जाता है।
इब्ने ख़ल्क़ान लिखते हैं कि एक दिन हज़रत की खि़दमत में जनाबे अबू हनीफ़ा साहब तशरीफ़ लाये तो आपने पूछा , ऐ अबू हनीफ़ा तुम इस मुजरिम के बारे में क्या फ़तवा देते हो , जिस ने हज के लिये एहराम बांधने के बाद हिरन के वह दांत तोड़ डाले हों जिनको रूबाई कहते हैं। ‘‘ फ़क़ाला या बिन रसूल मा आलमा मा फ़ीहा ’’ अर्ज़ की फ़रज़न्दे रसूल (अ.स.) मुझे इसका हुक्म मालूम नहीं ‘‘ फ़क़ाला अनता तदाहिर वला तालम ’’ आपने फ़रमाया कि इसी इल्मीयत पर फ़ख़्र करते और लोगों को धोका देतो हो , तुम्हें यह तक मालूम नहीं कि हिरन के रूबाईया होते ही नहीं।(अल मसाएद पृष्ठ 202 )
फिर आपने पूछा कि यह बताओ कि अक़्ल मन्द कौन है ? उन्होंने अर्ज़ कि जो अच्छे बुरे की पहचान करे और दोस्त दुश्मन में तमीज़ कर सके। आपने फ़रमाया कि यह सिफ़त और तमीज़ तो जानवरों में भी होती है। वह भी प्यार करते और मारते हैं। यानी अच्छे बुरे को जानते हैं। उन्होंने कहा फिर आप ही फ़रमायें। आपने इरशाद किया कि अक़्ल मन्द वह है जो दो नेकियों और दो बुराईयों में यह इम्तियाज़ कर सके कि कौन सी नेकी तरजीह देने के क़ाबिल और दो बुराईयों में कौन सी बुराई कम और कौन ज़्यादा है।(हयातुल हैवान , दमीरी जिल्द 2 पृष्ठ 85, 86 तारीख़ इब्ने ख़ल्क़ान जिल्द 1 पृष्ठ 105 मनाक़िब इब्ने शहरे आशोब पृष्ठ 41 नूरूल अबसार पृष्ठ 131 )
इमामे जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के बाज़ नसीहते व इरशादात
अल्लामा शिब्ली तहरीर फ़रमाते हैः
1. सईद वह है जो तन्हाई में अपने को लोगों से बे नियाज़ और ख़ुदा की तरफ़ झुका हुआ पाये।
2. जो शख़्स किसी बरादरे मोमिन का दिल ख़ुश करता है ख़ुदा वन्दे आलम उसके लिये एक फ़रिश्ता पैदा करता है जो उसकी तरफ़ से इबादत करता है और क़ब्र में मूनिसे तन्हाई , क़यामत में साबित क़दमी का बाएस , मन्ज़िले शफ़ाअत में और जन्नत में पहुँचाने में रहबर होगा।
3. नेकी का तकमेला यानी कमाल यह है कि इसमें जल्दी करो और उसे कम समझो और छुपा के करो।
4. अमले ख़ैर नेक नीयती से करने को सआदत कहते हैं।
5. तवाज़ो में ताख़ीर नफ़्स का धोखा है।
6. चार चीज़ें ऐसी हैं जिनकी क़िल्लत को कसरत समझना चाहिए। ( 1) आग , ( 2) दुश्मनी , ( 3) फ़क़ीरी , ( 4) मर्ज़।
7. किसी के साथ बीस दिन रहना अज़ीज़दारी के मुतारादिफ़ है।
8. शैतान के ग़ल्बे से बचने के लिये लोगों पर एहसान करो।
9. जब अपने किसी भाई के वहां जाओ तो सदरे मजलिस में बैठने के अलावा इसकी हर नेक ख़्वाहिश को मान लो।
10. लड़की रहमत नेकी और लड़का नेअमत है। ख़ुदा हर नेकी पर सवाब देता है और नेअमत पर सवाल करेगा।
11. जो तुम्हें इज़्ज़त की निगाह से देखे तो तुम भी उसकी इज़्ज़त करो , जो ज़लील समझे उससे ख़ुद्दारी बरतो। 12. बख़शिश से रोकना ख़ुदा से बदज़नी है।
1 3. दुनियां में लोग बाप दादा के ज़रिये से मुतअर्रिफ़ होते हैं और आख़ेरत में आमाल के ज़रिये से पहचाने जायेंगे।
14. इन्सान के बाल बच्चे उसके असीर और क़ैदी हैं नेअमत की वुसअत पर उन्हें वुसअत देनी चाहिये वरना ज़वाले नेअमत का अन्देशा है।
15. जिन चीज़ों से इज़्ज़त बढ़ती है इनमें तीन यह हैं , ( 1) ज़ालिम से बदला न लो। ( 2) उस पर करम गुस्तरी जो मुख़ालिफ़ हो। ( 3) जो इसका हमर्दद न हो उसके साथ हमदर्दी करे।
16. मोमिन वह है जो जादए हक़ से न हटे और ख़ुशी में बातिल की पैरवी न करे।
17. जो ख़ुदा की दी हुई नेअमत पर क़िनाअत करेगा , मुस्तग़नी रहेगा।
18. जो दूसरों की दौलत मंदी पर लल्चाई हुई नज़र डालेगा , वह हमेशा फ़क़ीर रहेगा।
19. जो राज़ी ब रज़ा ख़ुदा नहीं वह ख़ुदा पर इत्तेहाम तक़दीर लगा रहा है।
20. जो अपनी लग़ज़िश को नज़र अन्दाज़ करेगा वह दूसरों की लग़ज़िश को भी नज़र में न लायेगा।
21. जो किसी को बे पर्दा करने की सई करेगा ख़ुद बरहना हो जायेगा।
22. जो किसी पर ना हक़ तलवार खींचेगा तो नतीजे में ख़ुद मक़तूल होगा।
23. जो किसी के लिये कुआं खोदेगा ख़ुद उसमें गिरेगा। ‘‘ चाह कुन रा चाह दरपेश ’’।
24. जो शख़्स बे वकूफ़ों से राह रस्म रखेगा ज़लील होगा।
25. हक़ गोई करनी चाहिये ख़्वाह वह अपने लिये मुफ़ीद हो या मुज़िर।
26. चुग़ल ख़ोरी से बचो क्यों कि यह लोगों के दिलों में दुश्मनी और अदावत का बीज बोती है।
27. अच्छों से मिलो , बुरों के क़रीब न जाओ क्यों कि वह ऐसे पत्थर हैं जिनमें जोंक नहीं लगती , यानी उनसे फ़ायदा नहीं हो सकता।(नूरूल अबसार पृष्ठ 134 )
28. जब कोई नेअमत मिले तो बहुत ज़्यादा शुक्र करो ताकि इज़ाफ़ा हो।
29. जब रोज़ी तंग हो तो अस्तग़फ़ार ज़्यादा करो कि अब्वाबे रिज़्क़ खुल जाएं।
30. जब हुकूमत या ग़ैर हुकूमत की तरफ़ से कोई रंज पहुँचे तो ‘‘ ला हौल वला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहिल अलीअल अज़ीम ’’ ज़्यादा कहो कि रंज दूर हो , ग़म काफ़ूर हो और ख़ुशी का वफ़ूर हो।(मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 274 से पृष्ठ 275 )
आपके बाज़ करामात
हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) के करामात और ख्वारिक़ आदात और इल्मी मालूमाती वाक़ेआत से किताबें भरी पड़ी हैं। अल्लामा अरबली लिखते हैं कि अबू बसीर एक दिन हमाम ख़ाने के लिये अपने घर से बरामद हुए। रास्ते में चन्द ऐसे हज़रात मिले जो इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की ज़्यारत के लिये जा रहे थे। अबू बसीर साहबी सोच कर साथ हो गए कि अगर मैं हमाम से वापसी में जाऊंगा तो सआदते ज़ियारत में पीछे रह जाऊंगा। जब वहां पहुँचे तो इमाम (अ.स.) ने इशारतन फ़रमाया कि नबी और इमाम के घर में हालते जनाबत में दाखि़ल नहीं होना चाहिए। अबू बसीर ने माज़रत की और हमाम चले गए। (कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 97)
यूनुस बिन ज़िबयान कहते हैं कि हम लोग एक दिन हज़रत की खि़दमत में हाज़िर हुए तो आपने दौराने गुफ़्तुगू में फ़रमाया कि ज़मीन के ख़ज़ाने हमारे इख़्तेयार मे हैं। यह कह कर आपने पैर से ज़मीन पर एक ख़त खींचा और एक बालिश्त का डब्बा उठा कर हमें दिखलाया। इसमें बेहतरीन सोने की ईटें थीं। मैंने अर्ज़ की मौला , आपके क़ब्ज़े में सब कुछ है मगर आपके मानने वाले तकलीफ़ उठा रहे हैं। आपने फ़रमाया उनके लिये जन्नत है।(तज़किरतुल मासूमीन पृष्ठ 183 )
आपका अख़्लाक़ और आदात व औसाफ़
अल्लामा इब्ने शहर आशोब तहरीर फ़रमाते हैं कि एक दिन इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) ने अपने एक ग़ुलाम को किसी काम से बाज़ार भेजा। जब उसकी वापसी में बहुत देर हुई तो आप उसको तलाश करने के लिये निकल पड़े , देखा एक जगह लेटा हुआ सो रहा है। आप उसे जगाने के बजाए उसके सरहाने बैठ गए और पंखा झलने लगे। जब वह बेदार हुआ तो आपने फ़रमाया यह तरीक़ा अच्छा नहीं है। रात सोने के लिये और दिन काम काज के लिये है। आइन्दा ऐसा न करना।(मनाक़िब इब्ने शहर आशोब जिल्द 5 पृष्ठ 52 )
अल्लामा मआसिर मौलाना अली नक़ी मुजतहिदुल असर रक़म तराज़ हैं , आप इसी सिलसिला ए असमत की एक कड़ी थे जिसे ख़ुदा वन्दे आलम ने नवए इन्सानी के लिए नमूना ए कामिल बना कर पैदा किया। उनके इख़्लाक़ व अवसाफ़ , ज़िन्दगी के हर शोबे में मेआरी हैसीयत रखते थे। ख़ास ख़ास अवसाफ़ जिनके मुताअल्लिक़ मुवर्रेख़ीन ने मख़्सूस तौर पर वाक़ेयात नक़ल किये हैं। मेहमां नवाज़ी , ख़ैरो ख़ैरात , मख़फ़ी तरीक़े पर ग़ुरबा की ख़बर गीरी , अज़ीज़ों के साथ हुस्ने सुलूक , अफ़ो जराएम , सब्र व तहम्मुल वग़ैरा हैं।
एक मरतबा एक हाजी मदीने में वारिद हुआ और मस्जिदे रसूल (स अ व व ) में सो गया आंख खुली तो उसे शुबा हुआ कि उसकी एक हज़ार की थैली मौजूद नहीं। उसने इधर उधर देखा किसी को न पाया। एक गोशा ए मस्जिद में इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) नमाज़ पढ़ रहे थे। वह आपको बिल्कुल न पहचानता था। आपके पास आ कर कहने लगा कि मेरी थैली तुम ने ले ली है। हज़रत ने पूछा उसमें क्या था ? उसने कहा एक हज़ार दीनार। हज़रत ने फ़रमाया मेरे साथ मेरे मकान तक आओ , वह आपके साथ हो गया। बैत उस शरफ़ में तशरीफ़ ला कर एक हज़ार दीनार इसके हवाले कर दिये। वह मस्जिद में वापस चला गया और अपना असबाब उठाने लगा , तो ख़ुद उसके दीनारो की थैली असबाब में नज़र आई , यह देख कर बहुत शर्मिन्दा हुआ और दौड़ता हुआ फिर इमाम (अ.स.) की खि़दमत में आया , उज़्र ख़्वाही करते हुए हज़ार दीनार वापस करना चाहा। हज़रत ने फ़रमाया , हम जो कुछ दे देते हैं वह फिर वापस नहीं लेते।
मौजूदा ज़माने में यह हालात सभी की आंखों से देखे हुए हैं कि जब यह अन्देशा मालूम होता है कि अनाज मुश्किल से मिलेगा तो जिसको जितना मुम्किन हो वह अनाज ख़रीद कर रख लेता है मगर इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के किरदार का एक वाक़ेया यह है कि एक मरतबा आप से आपके एक वकील माक़िब ने कहा कि हमें इस गरानी और क़हत की तकलीफ़ का कोई अन्देशा नहीं है। हमारे पास ग़ल्ले का इतना ज़ख़ीरा है जो बहुत अर्से तक के लिये काफ़ी होगा। हज़रत ने फ़रमाया यह तमाम ग़ल्ला फ़रोख़्त कर डालो इसके बाद जो हाल सब का होगा वह हमारा भी होगा , और जब ग़ल्ला फ़रोख़्त कर दिया गया तो फ़रमाया अब ख़ालिस गेहूँ की रोटी न पका करे , बल्कि आधे गेहूँ और आधे जौ की रोटी पकाई जाए। जहां तक मुम्किन हो हमें ग़रीबों का साथ देना चाहिये।
आपका क़ायदा था कि आप मालदारों से ज़्यादा ग़रीबों की इज़्ज़त करते थे। मज़दूरों की बड़ी क़दर फ़रमाते थे। ख़ुद भी तिजारत फ़रमाते थे और अकसर अपने बाग़ों में ब नफ़्से नफ़ीस मेहनत भी करते थे।
एक मरतबा आप बेलचा हाथ में लिये बाग़ में काम कर रहे थे और पसीने से तमाम जिस्म तर हो गया था। किसी ने कहा ये बेलचा मुझे इनायत फ़रमाइये कि मैं यह खि़दमत अन्जाम दूं। हज़रत (अ.स.) ने फ़रमाया , तलबे माश में धूप और गर्मी की तकलीफ़ सहना ऐब की बात नहीं। ग़ुलामों और कनीज़ों पर वही मेहरबानी रहती थी जो इस घराने की इम्तेआज़ी सिफ़त थी। इसका एक हैरत अंगेज़ नमूना यह है कि जिसे सफ़यान सूरी ने बयान किया है कि मैं एक मरतबा इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की खि़दमत में हाज़िर हुआ देखा कि चेहरा ए मुबारक का रंग मुताग़य्यर है। मैंने सबब दरयाफ़्त किया तो फ़रमाया मैंने मना किया था कि कोई मकान के कोठे पर न चढ़े इस वक़्त जो मैं घर आया तो क्या देखा कि एक कनीज़ जो एक बच्चे की परवरिश पर मुतअय्यन थी उसे गोद में लिये ज़िने से ऊपर जा रही थी। मुझे देखा तो ऐसा ख़ौफ़ तारी हुआ कि बद हवासी में बच्चा उसके हाथ से छूट गया और इस सदमे से जान बाहक़ तसलीम हो गया। मुझे बच्चे के मरने का इतना सदमा नहीं जितना इसका रंज है कि इस कनीज़ पर इतना रोब हेरास क्यों तारी हुआ। फिर हज़रत ने इस कनीज़ को पुकार कर फ़रमाया , डर नहीं , मैंने तुमको राहे ख़ुदा में आज़ाद कर दिया। इसके बाद हज़रत बच्चे की तजहीज़ की तरफ़ मोतवज्जा हुए। (सादिके आले मोहम्मद (अ.स.) पृष्ठ 12, मुनाक़िब इब्ने शहरे आशोब जिल्द 5 पृष्ठ 54)
किताब मजानी अल अदब जिल्द 1 पृष्ठ 67 में है कि हज़रत के यहां कुछ महमान आए थे। हज़रत ने खाने के मौक़े पर अपनी कनीज़ को खाना लाने का हुक्म दिया। वह सालन का बड़ा प्याला ले कर जब दस्तरख़्वान के क़रीब पहुँची तो इत्तेफ़ाक़न प्याला उसके हाथ से छूट कर गिर गया। इसके गिरने से इमाम (अ.स.) और दीगर महमानों के कपड़े ख़राब हो गए। कनीज़ कांपने लगी और आपने ग़ुस्से के बजाए उसे राहे ख़ुदा में यह कह कर आज़ाद कर दिया कि तू जो मेरे ख़ौफ़ से कांपती है शायद यही आज़ाद करना कफ़्फ़ारा हो जाए। फिर उसी किताब के सफ़े 69 में है कि एक ग़ुलाम आपका हाथ धुला रहा था कि दफ़तन लोटा छूट कर तश्त में गिरा और पानी उड़ कर हज़रत के मुंह पर पड़ा। ग़ुलाम घबरा उठा हज़रत ने फ़रमाया डर नहीं जा मैंने तुझे राहे ख़ुदा में आज़ाद कर दिया।
किताब तोहफ़तुल अलज़राएर अल्लामा मजलिसी में है कि आपकी आदात में इमाम हुसैन (अ.स.) की ज़्यारत के लिये जाना दाखि़ल था। आप अहदे सफ़ाह और ज़मानाए मन्सूर में भी ज़ियारत के लिये तशरीफ़ ले गए थे। करबला की आबादी से तक़रीबन चार सौ क़दम शुमाल की जानिब , नहरे अलक़मा के किनारे बाग़ों में शरीए सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) इसी ज़माने से बना हुआ है।(तसवीरे अज़ा 10 पृष्ठ 60 प्रकाशित देहली 1919 ई 0 )
इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की इल्मी बुलन्दी
यह ज़ाहिर है कि इल्म ही इन्सान का वह जौहरे फ़ानी है जिसके बग़ैर हक़ीक़ी इम्तेआज़ हासिल नहीं होता। हज़रत आदम (अ.स.) ने इल्म के ज़रिये मलाएका पर फ़ज़ीलत हासिल की और आपके इस तरज़े अमल के ना ग़ुज़ीर तौर पर यह वाज़े हो गया कि मनसूस मिन अल्लाह को आलिमे जैय्यद होना लाज़मी है। हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) चूंकि सही तौर पर मनसूस थे लेहाज़ा आपका आलमे ज़माना होना लाज़मी था और यही वजह है कि आप इल्म के उन मदारिज पर फ़ाएज़ थे जिनके अर्श ए बुलन्द के पाए को परिन्दा पर नहीं मार सकता था।
सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) की तसानीफ़
आपकी तसानीफ़ का शुमार नहीं किया जा सकता। तवारीख़ से मालूम होता है कि आप ने बेशुमार किताबें व रिसाले और मक़ालात से दुनियां वालों को फ़ैज़याब फ़रमाया है। आप चूंकि उलूम में ग़ैर महदूद थे। इस लिये आपकी किताबें हर इल्म में मिलती हैं। आपने इल्में दीन , इल्मे कीमिया , इल्मे रजज़ , इल्मे फ़ाल , इल्मे फ़लसफ़ा , इल्मे तबीइयात , इल्मे हैय्यत , इल्मे मन्तिक़ , इल्मे तिब , इल्मे समीयात , इल्मे तशरीह अल अजसाम व अफ़आल अल आज़ा , इल्म अल हयात वमा बाद अल तबयात वग़ैरा वग़ैरा पर ख़ामा फ़रसाई की है और लेक्चर दिये हैं। हम इस मक़ाम पर सिर्फ़ दो किताबों को ज़िक्र करना चाहते हैं। 1. किताबे जफ़रो जामोआ , 2. किताब अहले लिजिया।
किताब जफ़र व जामेअ
किताब जफ़रो जामोआ के मुताअल्लिक़ उलेमा के बयानात मुख़्तलिफ़ हैं। मौलवी वहीदुज़्ज़मा हैदराबादी अपनी किताब अनवारूल लुग़ता के पारा 5 पृष्ठ 15 पर लिखते हैं कि आं हज़रत (स अ व व ) ने अमीरूल मोमेनीन अली इब्ने अबी तालिब (अ.स.) को दो किताबें लिखवा दीं थीं।
‘‘ एक जफ़र दूसरी जामेए ’’ एक किताब तो बकरी की खाल पर थी , दूसरी भेड़ की खाल पर और उसमे क़यामत तक जितनी बातें होने वाली थीं वह सब मुजमिलन लिखवा दी थीं। सय्यद शरीफ़ ने शरह मवाफ़िक़ में नक़ल किया है कि जफ़र और जामए दो किताबें हैं जो हज़रत अली (अ.स.) के पास थीं। इनमें अज़ रूए क़वाएद , इल्मे हुरूफ़ व तकसीर बड़े बड़े हवादिस का बयान था जो क़यामत तक होने वाले थे और आपकी औलाद मे जो इमाम गुज़रे वह इन्हीं किताबों को देख कर अकसर उमूर की ख़बर देते थे।
किताब बहरे मुहीत में है कि इल्मे जफ़र और इल्मे तकसीर एक ही हैं , यानी सायल के सवाल के हुरूफ़ में तसर्रूफ़ और तग़य्युर कर के सवाल का जवाब निकालना।
अल्लामा शिब्लंजी अपनी किताब नूरूल अबसार के पृष्ठ 133 पर बा हवाला हयातुल हैवान दमीरी लिखते हैं कि इब्ने क़तीबा ने किताबे अदब अल कातिब में लिखा है कि किताब अल जफ़र हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की लिखी हुई है। इसमें वह तमाम चीज़ें हैं जो क़यामत तक दुनियां में रूनूमा होंगी।
अल्लामा इब्ने तल्हा शाफ़ेई अपनी किताब मतालेबुस सूऊल के पृष्ठ 214 में किताब अल जफ़र का ज़िक्र करते हुए लिखते हैं कि ‘‘ होआमन कलामेह ’’ यह किताब आप ही की तसनीफ़ है। यही इबारत बिल्कुल इसी तरह शवाहेदुन नबूवत मुल्ला जामी के पृष्ठ 187 प्रकाशित लखनऊ 1905 में भी मौजूद है। तारीख़ से मालूम होता है कि आप जफ़र व जामेए के अलावा जफ़रे अहमर व जफ़रे अबयज़ और मुसहफ़े फ़ात्मा के भी मालिक थे और आप को ख़ुदा ने इल्मे ग़ाबिर व मज़बूर नुक़त व नक़र से बहरावर फ़रमाया था। अल्लामा जामी शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 187 में और अल्लामा अरबली कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 97 में फ़रमातें हैं कि हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) फ़रमाया करते थे , हमें आईन्दा और गुज़िश्ता का इल्म और इल्हाम की सलाहियत और मलायका की बातें सुन्ने की ताक़त दी गई है। मेरे ख़्याल में यही आलिमे इल्मे लदुन्नी होने की दलील है जो जानशीने पैग़म्बर (स अ व व ) होने के सुबूत में पेश किया जा सकता है।
साहेबे मजमाउल बैहरैन इसकी ताईद करते हुए लिखते हैं कि जफ़र व जामया में क़यामत तक होने वाले सारे वाक़ेयात मुन्दरिज हैं। यहां तक कि इस में ख़राश लग जाने की भी सज़ा का ज़िक्र है और एक ताज़याना बल्कि आधा ताज़याना (कोड़ा) का भी हुक्म मौजूद है।
किताबे अलहिलीचिया
अल्लामा मजलिसी ने किताब बेहारूल अनवार की जिल्द 2 में हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की किताब अलहिलीचिया को मुकम्मल तौर पर नक़ल फ़रमाया है। इस किताब के तसनीफ़ करने की ज़रूरत यूं महसूस हुई कि एक हिन्दुस्तानी फ़लसफ़ी हज़रत की खि़दमत मे हाज़िर हुआ और उसने आलीयात और मा बादत तबीआत पर हज़रत से तबादला ए ख़्यालात करना चाहा। हज़रत ने उससे निहायत मुकम्मल गुफ़्तुगू की और इल्मे कलाम से उसूल पर दहरियत और मादीयत को फ़ना कर छोड़ा , उसे आखि़र में कहना पड़ा कि आपने अपने दावे को इस तरह साबित फ़रमा दिया है कि अरबाबे अक़ल को माने बग़ैर चारा नहीं। तवारीख़ से मालूम होता है कि हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने हिन्दी फ़लसफ़ी से जो गुफ़्तुगू की थी उसे किताब की शक्ल में जमा कर के बाबे अहले बैत के मशहूर मुताकल्लिम जनाब मुफ़ज़ल बिन उमर अल जाफ़ी के पास भेज दिया था और यह लिखा था कि ,
‘‘ ऐ मुफ़ज़ल मैंने तुम्हारे लिये एक किताब लिखी है जिसमें मुन्करीने ख़ुदा की रद की है और उसके लिखने की वजह यह हुई कि मेरे पास हिन्दुस्तान से एक तबीब (फ़लसफ़ी) आया था और उसने मुझसे मुबाहेसा किया था। मैंने जो जवाब उसे दिया था , उसी को क़लम बन्द कर के तुम्हारे पास भेज रहा हूँ। ’’
हज़रत सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) के फ़लक़ वक़ार शार्गिद
हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के शार्गिदों का शुमार मुश्किल है। बहुत मुम्किन है कि आईन्दा सिलसिला ए तहरीर में आपके बाज़ शार्गिदों का ज़िक्र आता जाय। आम मुवर्रेख़ीन ने बाज़ नामों को ख़ुसूसी तौर पर पेश कर के आपकी शार्गिदी की सिल्क में पिरो कर उन्हें मोअज़्ज़ज़ बताया है। मतालेबुस सूऊल , सवाएक़े मोहर्रेक़ा , नूरूल अबसार वग़ैरा में इमाम अबू हनीफ़ा , यहीया बिन सईद अन्सारी , इब्ने जरीह , इमाम मालिक इब्ने अनस , इमाम सुफ़ियान सूरी , सुफ़ियान बिन अयनिया , अय्यूब सजिस्तानी वग़ैरा का आपके शार्गिदों में ख़ास तौर पर ज़िक्र है। तारीख़ इब्ने ख़लक़ान जिल्द 1 पृष्ठ 130 और ख़ैरूद्दीन ज़र कली की अल्ल आलाम पृष्ठ 183 प्रकाशित मिस्र मोहम्मद फ़रीद वजदी की इदारा मायफ़ल क़ुरआन की जिल्द 3 पृष्ठ 109 प्रकाशित मिस्र में है ‘‘ वा काना तलमीना अबू मूसा जाबिर बिन हय्यान अल सूफ़ी अल तरसूसी ’’ आपके शार्गिदों में जाबिर बिन हय्यान सूफ़ी तरसूसी भी हैं। आपके बाज़ शार्गिदों की जलालत क़द्र और उनकी तसानीफ़ और इल्मी खि़दमात पर रौशनी डालनी तो बे इन्तेहा दुशवार है। इस लिये इस मक़ाम पर सिर्फ़ जाबिर बिन हय्यान तरसूसी जो कि इन्तेहाई बा कमाल होने के बवजूद शार्गिदे इमाम की हैसियत से अवाम की नज़रों से पोशीदा हैं , का ज़िक्र किया जाता है।
इमामुल कीमिया जनाबे जाबिर इब्ने हय्यान तरसूसी
आपका पूरा नाम अबू मूसा जाबिर बिन हय्यान बिन अब्दुल समद अल सूफ़ी अल तरसूसी अल कूफ़ी है। आप 742 ई 0 में पैदा हुए और 803 ई 0 में इन्तेक़ाल फ़रमा गए। बाज़ मोहक़्क़ेक़ीन ने आपकी वफ़ात 813 ई 0 बताई है लेकिन इब्ने नदीम ने 777 ई 0 लिखा है।
इन्साईकिलो पीडिया आफ़ इस्लामिक हिस्ट्र में है कि उस्तादे आज़म जाबिर बिन हय्यान बिन अब्दुल्लाह , अब्दुल समद कूफ़ै में पैदा हुए। वह तूसी उल नस्ल थे और आज़ाद नामी क़बीले से ताअल्लुक़ रखते थे , ख़्यालात में सूफ़ी थे और यमन के रहने वाले थे। अवाएल उम्र में इल्मे तबीआत की तालीम अच्छी तरह हासिल कर ली और इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) इब्ने इमाम मोहम्मद बाक़र (अ.स.) की फ़ैज़े सोहबत से इमाम उल फ़न हो गए।
तारीख़ के देखने से मालूम होता है कि जाबिर बिन हय्यान ने इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की अज़मत का एतराफ़ करते हुए कहा है कि सारी कायनात में कोई ऐसा नहीं जो इमाम की तरह सारे उलूम पर बोल सके।
तारीख़े आइम्मा में हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की तसनीफ़ात का ज़िक्र करते हुए लिखा है कि हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने एक किताब कीमीया , जफ़र रमल पर लिखी थी। हज़रत के शार्गिद व मशहूर मारूफ़ कीमिया गर जाबिर बिन हय्यान जो यूरोप में जबर के नाम से मशहूर हैं , जिनको जाबिर सूफ़ी का लक़ब दिया गया था और जुनूनन मिस्री की तरह वह भी इल्मे बातिन से ज़ौक़ रखते थे। इन जाबिर बिन हय्यान ने हज़ारों वरक़ की एक किताब तालीफ़ की थी जिसमें हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के पांच सौ रिसालों को जमा किया था। अल्लामा इब्ने ख़लकान किताब दफ़ियात इला अयान जिल्द 1 पृष्ठ 130 प्रकाशित मिस्र में हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) का ज़िक्र करते हुए लिखते हैं।
हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के मक़ालात इल्मे कीमिया और इल्मे जफ़र व फ़ाल में मौजूद हैं और आपके शार्गिद थे जाबिर बिन हय्यान सूफ़ी तरसूसी जिन्होंने हज़ार वरक़ की एक किताब तालीफ़ की थी जिसमें इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के पांच सौ रिसालों को जमा किया था। अल्लामा ख़ैरूद्दीन ज़रकली ने भी अल आलाम जिल्द 1 पृष्ठ 182 प्रकाशित मिस्र में यही कुछ लिखा है। इसके बाद तहरीर किया है कि उनकी बेशुमार तसानीफ़ हैं जिनका ज़िक्र इब्ने नदीम ने अपनी फ़ेहरिस्त में किया है। अल्लामा मोहम्मद फ़रीद वजदी ने दायरा ए मआरेफ़ुल क़ुरआन अल राबे अशर की जिल्द 3 पृष्ठ 109 प्रकाशित मिस्र में भी लिखा है कि जाबिर बिन हय्यान ने इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के पांच सौ रसायल को जमा कर के एक किताब हज़ार सफ़हे की तालीफ़ की थी। अल्लामा इब्ने ख़ल्दून ने भी मुक़दमा ए इब्ने ख़ल्दून मतबूआ मिस्र पृष्ठ 385 में इल्मे कीमिया का ज़िक्र करते हुए जाबिर बिन हय्यान का ज़िक्र किया है और फ़ाज़िल हंसवी ने अपनी ज़ख़ीम तसनीफ़ किताब और किताब ख़ाना ग़ैर मतबूआ में बा हवाला ए मुक़द्दमा इब्ने ख़ल्दून पृष्ठ 579 प्रकाशित मिस्र लिखा है कि जाबिर बिन हय्यान इल्मे कीमिया के ईजाद करने वालों का इमाम है बल्कि इस इल्म के माहेरीन ने इसको जाबिर से इस हद तक मख़सूस कर दिया है कि इस इल्म का नाम ‘‘ इल्मे जाबिर ’’ रख दिया है।(अल जव्वाद शुमारा 11 जिल्द 1 पृष्ठ 9 )
मुवर्रिख़ इब्नुल क़त्फ़ी लिखते हैं कि जाबिर बिन हय्यान को इल्मे तबीआत और कीमिया में तक़द्दुम हासिल है। इन उलूम में उसने शोहरा ए आफ़ाक़ किताबें तालीफ़ की हैं। इनके अलावा उलूमे फ़लसफ़ा वग़ैरा में शरफ़े कमाल पर फ़ाएज़ थे और यह तमाम कमालात से भर पूर होना इल्मे बातिन की पैरवी का नतीजा था। मुलाहेज़ा हो ,(तबक़ातुल उमम , पृष्ठ 95 व अख़बारूल हुक्मा पृष्ठ 111 प्रकाशित मिस्र)
पयामे इस्लाम जिल्द 7 पृष्ठ 15 में है कि वही ख़ुश क़िस्मत मुसलमान है जिसे हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की शार्गिदी का शरफ़ हासिल था। इसके मुताअल्लिक़ जनवरी 25 ई 0 में साईंस प्रोग्ररेस नवीशता ए जे 0 होलम यार्ड एम 0 ए 0 एफ़ 0 आई 0 सी 0 आफ़ीसरे आला शोबा ए र्साइंस कफ़टेन कालेज ब्ररिस्टल ने लिखा है कि इल्मे कीमिया के मुतअल्लिक़ ज़माना ए वस्ता की अकसर तसानीफ़ मिलती हैं। जिसमें ‘‘ गेबर ’’ का ज़िक्र आता है और आम तौर पर गेबर या जेबर दर अस्ल ‘‘ जाबिर ’’ हैं। चुनान्चे जहां कहीं भी लातीनी कुतुब में गेबर का ज़िक्र आता है वहां मुराद अरबी माहिरे कीमिया जाबिर बिन हय्यान ही है। जिसे जे के बजाय गे आसानी से समझ में आ जाता है , लातानी में (जे) से मिलती जुल्ती आवाज़ और बाज़ इलाक़ों मसलन मिस्र वग़ैरा में (जे) को अब भी बतौर (जी) यानी गाफ़ इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा ख़लीफ़ा हारून के ज़माने में साईंस कमेस्ट्री वग़ैरा का चरचा बहुत हो चुका है और इस इल्म के जानने वाले दुनिया के गोशे गोशे से खिंच कर दरबारे खि़लाफ़त से मुन्सलिक हो रहे थे। जाबिर इब्ने हय्यान का ज़माना भी कमो बेश इसी दौर में था। पिछले 20, 25, साल में इंगलिस्तान और जर्मनी में जाबिर के मुतअल्लिक़ बहुत सी तहक़ीक़ात हुई हैं। लातीनी ज़बाना में इल्मे कीमिया के मुताअल्लिक़ चंद कुतुब सैकड़ों साल से इस मुफ़क्किर के नाम से मन्सूब हैं। जिसमें मख़सूस 1. समा , 2. बरफ़ेकशन , 3. डी इन्वेस्टीगेशन परफ़ेक्शन , 4. डी इन्वेस्टीगेशन वर टेलेक्स , 5. टीटा बहन , लेकिन इन किताबों के मुताअल्लिक़ अब तक उक तूलानी बहस है और इस वक़्त तक मुफ़क़्के़रीने योरोप इन्हें अपने यहां की पैदावार बताते हैं। इस लिये उन्हें इसकी ज़रूरत महसूस होती है। जाबिर को हर्फ़ (जी) (गाफ़) गेबर से पुकारें और बजाय अरबी नस्ल के उसे यूरोपियन साबित करें। हांलाकि समा के कई प्रकाशित शुदा ऐडीशनों में गेबर को अरब ही कहा गया है। रसल के अंगे्रज़ी तरजुमे में उसे एक मशहूर अरबी शाहज़ादा और मन्तक़ी कहा गया है।
1541 ई 0 में की नूरन बर्ग कि एडिशन में वह सिर्फ़ अरब है। इसी तरह और बहुत से क़ल्मी नुसख़े ऐसे मिल जाते हैं जिनमें कहीं उसे ईरानियों के बादशाह से याद किया गया है किसी जगह उसे शाह बन्द कहा गया है। इन इख़्तेलाफ़ात से समझ में आता है कि जाबिर बर्रे आज़म एशिया से न था बल्कि इस्लामी अरब का एक चमकता सितारा था।
इन्साईकिलो पीडिया आफ़ इस्लामिक कैमिस्ट्री के मुताबिक़ जाफ़र बर मक्की के ज़रिये से जाबिर बिन हय्यान का ख़लीफ़ा हारून रशीद के दरबार में आना जाना शुरू हो गया चुनान्चे उन्होंने ख़लीफ़ा के नाम से इल्मे कीमिया में एक किताब लिखी जिसका नाम ‘‘ शुगूफ़ा ’’ रखा। इस किताब में उसने इल्मे कीमिया के जली व ख़फ़ी पहलूओं के मुताअल्लिक़ निहायत मुख़्तसर तरीक़े , निहायत सुथरा तरीक़े अमल और अजीबो ग़रीब तजरबात बयान किये। जाबिर की वजह से ही कुस्तुनतुनया से दूसरी दफ़ा यूनानी कुतुब बड़ी तादात में लाई गई।
मन्तिक़ में अल्लामा ए दहर मशहूर हो गया और 90 साल से कुछ ज़्यादा उम्र में उसने तीन हज़ार किताबें लिखीं और इन किताबों में से वह बाज़ पर नाज़ करता था। अपनी किसी तसनीफ़ के बारे में उसने लिखा है कि रूए ज़मीन पर हमारी इस किताब के मिस्ल एक किताब भी नहीं है न आज तक ऐसी किताब लिखी गई है और न क़यामत तक लिखी जायेगी।(सरफ़राज़ 2 दिसम्बर 1952 ई 0 )
फ़ाज़िल हंसवी अपनी किताब ‘‘ किताब व किताब ख़ाना ’’ में लिखते हैं कि जाबिर के इन्तेक़ाल के दो बरस बाद इज़्ज़ उद दौला इब्ने मुइज़्ज़ उद दौला के अहद में कूफ़े के शारेह बाबुश शाम के क़रीब जाबिर की तजरूबे गाह का इन्केशाफ़ हो चुका है। जिसको खोदने के बाद बाज़ क़दीमी मख़तूतात ब्रिटिश मियूज़ियम में अब तक मौजूद हैं। जिनमें से किताब उल ख़वास क़ाबिले ज़िक्र है। इसी तरह फ़ुस्ते वस्ता में बाज़ किताबों का तरजुमा लातीनी में किया गया। इन किताबों के अलावा इन अनुवादों के सिबअईन भी हैं जो नाक़िसों ना तमाम है।
‘‘ इसी तरह अल बहस अनल कमाल ’’ का तरजुमा भी लातीनी में किया जा चुका है। यह किताब लातीनी ज़बान में कीमिया पर यूरोप की ज़बान में सब से पहली किताब है। इसी तरह और दूसरी किताबें भी अनुवादित हुई हैं। जाबिर ने कीमिया के अलावा तबीयात , हैय्यत इल्मे रोया , मन्तिक़ , तिब और दूसरे उलूम पर भी किताबें लिखीं। इसकी एक किताब समीयत पर भी है जो कुत्बे ख़ाना ए तैमूरिया क़ाहेरा मिस्र में मौजूद है। इनमें चन्द ऐसे मक़ालात को जो बहुत मुफ़ीद थे बाद करह हुरूफ़ ने रिसाला ए मक़ततफ़ जिल्द 58. 59 में शाया किये हैं। मुलाहेज़ा हो ,(मोअज्जमुल मतबूआत अल अरबिया अल मोअर्रेबा जिल्द 3 हरफ़ जीम पृष्ठ 665 )
जबिर ब हैसियत एक तबीबी के काम करता था लेकिन इसकी तिब्बी तसानीफ़ हम तक न पहुंच सकीं। हालां कि इस मक़ाले का लिखने वाला यानी डाक्टर माक्स मी यरहाफ़ ने जाबिर की किताब को जो समूूम पर है हाल ही में मालूम कर लिया।
जाबिर की एक किताब जिसको मय मतन अरबी और तरजुमा फ़्रानसीसी पोल कराओ मुशर्तरक ने 1935 ई 0 में शाया किया है ऐसी भी है जिसमें उसने तारीख़ इन्तेशार आराद अक़ाएद व अफ़कार हिन्दी यूनानी और इन तग़य्यूरात का ज़िक्र किया है जो मुसलमानों ने किए हैं। इस किताब का नाम ‘‘ एख़राज माफ़िल क़ूव्वत इल्ल फ़ेल ’’ है।(अल जवाद जिल्द 10 पृष्ठ 9 प्रकाशित बनारस)
प्रोफ़ेसर रसकार की रद मेरे बयान से यह यक़ीनन वाज़ेह हो गया कि मुवर्रेख़ीन इस पर मुत्तफ़िक़ है कि जाबिर बिन हय्यान इस्लाम का मोअजि़्ज़ कीमिया गर हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) का शार्गिद था। लेकिन मिस्टर प्रोफ़ेसर रसकार ने इल्मे कीमिया के बारे में जो रिसाला शाया किया है उसमें जाबिर इब्ने हय्यान के उन दावों को ग़लत और जाली बताया है जो इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की शार्गिदी की तरफ़ मन्सूब है। इसकी दलील यह है कि इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) को इल्मे कीमिया और साईंस से क्या वास्ता और इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की हैसियत का इमाम पारे , गन्धक , खटाई और फुकनी के इस्तेमाल में मसरूफ़ हो यह कैसे हो सकता है। मैं मौसूफ़ के जवाब में कहता हूँ कि मौसूफ़ ने कोई माक़ूल वजह इन्कार की बयान नहीं फ़रमाई। तारीख़ों को सुबूत पेश करना सुबूत के लिये काफ़ी है और उनके इन्कार से अदम शर्मिंन्दगी की दलील नहीं क़ायम की जा सकती। यह कब ज़ुरूरी है कि जाबिर बिन हय्यान जैसे ज़की व ज़ेहीन शार्गिद को बच्चों की तरह बैठ कर अमल कर के दिखाया हो। ज़ैहीन तालिबुल इल्मों को ज़बानी तालीम दी जाती है और अगर इसी तरह तालीम दी हो जिस तरह एतेराज़ करने वालों का ख़्याल है , तब भी कोई हर्ज नहीं है।
इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) जैसा उस्ताद उलूम को फ़ैलाने के लिये पारा और गन्धक , खटाई और फुकनी में कुछ देर मसरूफ़ रह सकता है और यह कोई एतेराज़ की बात नहीं हो सकती , मुम्किन है कि हज़रत ने जुमला उलूम के उसूल तालीम फ़रमा दिये हों और जाबिर ने उन्हें वसअत दे दी हो। मिसाल के लिये मुलाहेज़ा हो , किताब मनाक़िब में है कि हज़रत अली फ़रमाते हैं , अल मनी रसूल अल्लाह (स अ व व ) अलीफ़ बाब , आं हज़रत (स अ व व ) ने मुझे उलूम के एक हज़ार बाब तालीम फ़रमाये और मैंने हर बाब से हज़ार हज़ार बाब खुद पैदा किये। किताब मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 58 में है कि हज़रत अली (अ.स.) ने इल्मे नहो के उसूल अबु असवद दवेली को तालीम फ़रमाये फिर उसने तमाम तफ़सीलात मुकम्मल किये , हो सकता है कि इसी उसूल पर जाबिर को तालीम दी गई हो।
जाबिर बिन हय्यान की वफ़ात इन्साईकिलो पीडिया आफ़ इस्लामिक कैमिस्ट्री से मालूम होता है कि जाबिर बिन हय्यान की उम्र 90 साल से कुछ ज़्यादा थी। मिस्टर जाफ़र बारहवी ने उनकी विलादत और वफ़ात के बारे में सरफ़राज़ 17 नवम्बर 1952 ई 0 में जो कुछ तहरीर किया है उसी को नक़ल करते हुए मिस्टर क़मर रज़ा ने पयामे इस्लाम जिल्द 7 पृष्ठ 15, 16, 26 जुलाई 1953 ई 0 में लिखा है कि जाबिर बिन हय्यान 722 ई 0 में पैदा हुए और उन्होंने 803 ई 0 में इन्तेक़ाल किया और बाज़ का कहना है कि 813 ई 0 तक ज़िन्दा रहे। इसके बाद लिखते हैं कि इब्ने नदीम ने उनकी वफ़ात 777 ई 0 में बताई है और मेरे नज़दीक यही ठीक है। मेरी समझ में नहीं आता कि मौसूफ़ ने इब्ने नदीम के फ़ैसले को क्यों कर तसलीम कर लिया , इस लिये कि अगर विलादत का सन् सही है तो फिर इब्ने नदीम का बयान मानने लायक़ नहीं क्यों कि अगर वह 722 ई 0 में पैदा हुए थे और 777 ई 0 में वफ़ात पा गये तो गोया उनकी उम्र सिर्फ़ 55 साल की हुई जो इतने साहेबे कमाल के लिये क़रीने क़यास नहीं है। मेरे नज़दीक़ इन्साईकिलो पीडिया वाले की तहक़ीक़ सही है वह 90 साल से कुछ ज़्यादा उनकी उम्र बताता है जो हिसाब के एतेबार से सही है क्यों कि विलादत 722 ई 0 और वफ़ा 813 ई 0 में तसलीम करने के बाद उनकी उम्र 91 साल होती है और यह उम्र ऐसे बा कमाल के लिये होनी मुनासिब है।
सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) के इल्मी फ़ुयूज़ व बरकात
हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) जिन्हें रासेख़ीन फिल इल्म में होने का शरफ़ हासिल है और जो इल्मे अव्वलीन व आख़ेरीन से आगाह और दुनिया की तमाम ज़बानों से वाक़िफ़ हैं। जैसा कि मुवर्रेख़ीन ने लिखा है , मैं उनके तमाम इल्मी फ़यूज़ व बरकात पर थोड़े अवराक़ में क्या रौशनी डाल सकता हूँ। मैंने आपके हालात की छान बीन भी की है और यक़ीन रखता हूँ कि अगर मुझे फ़ुरसत मिले तो तक़रीबन 6 महीने में आपके उलूम और फ़ज़ाएलो कमालात का काफ़ी ज़ख़ीरा जमा किया जा सकता है। आपके मुताअल्लिक़ इमाम मालिक बिन अनस लिखते हैं ‘‘ मेरी आंखों ने इल्मो फ़ज़ल , वरा व तक़वे में इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) से बेहतर देखा ही नहीं जैसा कि ऊपर गुज़रा वह बहुत बड़े लोगों में से थे और बहुत बड़े ज़ाहिद थे। ख़ुदा से बेपनाह डरते थे। बे इन्तेहा हदीसें बयान करते थे , बड़ी पाक मजलिस वाले और कसीरूल फ़वाएद थे। आपसे मिल कर बे इन्तेहा फ़ायदा उठाया जाता था। ’’(मनाक़िब शहरे आशोब जिल्द 5 पृष्ठ 52 प्रकाशित बम्बई)
इल्मी फ़यूज़ रसानी का मौक़ा यूं तो हमारे तमाम आइम्मा ए अहलेबैत (अ.स.) इल्मी फ़यूज़ व बरकात से भरपूर थे और इल्मे अव्वलीन व आख़ेरीन के मालिक , लेकिन दुनिया वालों ने उनसे फ़ायदा उठाने के बजाय उन्हें क़ैदो बन्द में रख कर उलूमो फ़ुनून के ख़ज़ाने पर हतकड़ियों और बेड़ियों के नाग बिठा दिये थे। इस लिये इन हज़रात के इल्मी कमालात कमा हक़्क़ा मंज़रे आम पर न आ सके। वरना आज दुनिया किसी इल्म में ख़ानदाने रिसालत के अलावा किसी की मोहताज न होती। फ़ाज़िल मआसिर मौलाना सिब्तुल हसन साहब हंसवी लिखते हैं कि इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) अल मतूफ़ी 148 हिजरी का अहद मआरफ़ परवरी के लिहाज़ से एक ज़र्री अहद था। वह रूकावटें जो आप से पहले आइम्मा अहलेबैत (अ.स.) के लिये पेश आया करती थीं उनमें किसी हद तक कमी थीं। उमवी हुकूमत की तबाही और अब्बासी सलतनत का इस्तेहकाम आपके लिये सुकून व अमन का सबब बना। इस लिये हज़रत को मज़हबे अहलेबैत (अ.स.) की इशाअत और उलूमव फ़ुनून की तरवीज (फ़ैलाने) का बेहतरीन मौक़ा मिला। लोगों को भी इन आलिमाने रब्बानी की तरफ़ रूजु करने में अब कोई ख़ास ज़हमत न थी जिसकी वजह से आपकी खि़दमत में अलावा हिजाज़ के दूर दराज़ मक़ामात मिस्ले ईराक़ , शाम , ख़ुरासान , काबुल , सिन्ध और बलादे रोम , फ़िरहंग के तुल्बा शाएक़ीने इल्म हाज़िर हो कर मुस्तफ़ीद होते थे। हज़रत के हलक़ा ए दर्स में चार हज़ार असहाब थे। अल्लामा शेख़ मुफ़ीद (अ.र.) किताबे इरशाद में फ़रमाते हैं।
तरजुमा लोगों ने आपके उलूम को नक़ल किया जिन्हें तेज़ सवार मनाज़िल बईदा की तरफ़ ले गये और आपकी शोहरत तमाम शहरों में फ़ैल गई और उलेमा ने अहले बैत (अ.स.) में किसी से भी इतने उलूम व फ़ुनून को नहीं नक़्ल किया है जो आप से रवायत करते हैं और जिनकी तादाद 4000 (चार हज़ार) है। ग़ैर अरब तालेबान इल्म से एक रूमी नसब बुज़ुर्ग ज़रार बिन ऐन मतूफ़ी 150 हिजरी में क़ाबिले ज़िक्र है। जिनके दादा सुनसुन बिला दरदम के एक मुक़द्दस राहिब (छवदा) थे। ज़रारा अपनी खि़दमाते इल्मिया के एतेबार से इस्लामी दुनियां में काफ़ी शोहरत रखते थे और साहेबे तसानीफ़ थे। किताब अल इस्तेताअत वल जबरान की मशहूर तसनीफ़ है।(ख़ुलासतुल अक़वाल अल्लामा जल्ली पृष्ठ 38, मिन्हाजुल मक़ाल पृष्ठ 142 व मोअल्लेफ़ा शिया फ़ी सदरूल इस्लाम पृष्ठ 51 )
कुतुबे उसूले अरबा मिया
हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के चार सौ ऐसे मुसन्नेफ़ीन थे जिन्होंने अलावा दीगर उलूम व फ़ुनून के कलामे मासूम को ज़ब्त कर के चार सौ कुतुब उसूल तैयार कीं। असल से मुराद मजमूए अहादीसे अहलेबैत (अ.स.) की वह किताबें हैं जिनमें जामे ने ख़ुद बराहे रास्त मासूम से रवायत कर के अहादीस को ज़ब्ते तहरीर किया है या ऐसे रावी से सुना है जो ख़ुद मासूम से रवायत करता है। इस क़िस्म की किताब में जामे की दूसरी किताब या रवायत से अन फ़लां अन फ़लां के साथ नक़ल करता जिसकी सनद में और सवाएत की ज़रूरत हो। इस लिये कुनुबे उसूल में ख़ता व ग़लत सहो व निसयान का एहतेमाल ब निसबत और दूसरी किताबों के बहुत कम है। कुतुबे उसूल के ज़माना ए तालीफ़ का इन्हेसार अहदे अमीरल मोमेनीन अली इब्ने अबी तालिब (अ.स.) से ले कर इमाम हसन असकरी (अ.स.) के ज़माने तक है जिसमें असहाबे मासूमीन ने बिल मुशाफ़ा मासूम से रवायत कर के अहादीस को जमा किया है या किसी ऐसे सुक़्क़े रावी से हदीसे मासूम को अख़ज़ किया है जो बराहे रास्त मासूम से रवायत करता है। शेख़ अबुल क़ासिम जाफ़र बिन सईद अल मारूफ़ बिल मोहक़क़्िक अल हली अपनी किताब अल मोतबर में फ़रमाते हैं कि इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के जवाबात मसाएल को चार सौ मुसन्नेफ़ीन असहाबे इमाम ने तहरीर कर के चार सौ तसानीफ़ मुकम्मल की है।
सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) के असहाब की तादाद और उनकी तसानीफ़
आगे चल कर फ़ाज़िल माअसर अल जव्वाद में बा हवाला ए किताब व कुतुब ख़ाना लिखते हैं कुतुब रेजाल में असहाबे आइम्मा के हालात व तराजिम मज़कूर हैं। उनकी मजमूई तादाद चार हज़ार पांच सौ असहाब है। जिनमें से सिर्फ़ चार हज़ार असहाब हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के हंै। सब का तज़किरा अबुल अब्बास अहमद बिन मोहम्मद बिन सईद बिन अक़्दा 249 से 333 ने अपनी किताब रेजाल में किया है और शेख़ अल ताएफ़ा अबू जाफ़र अल तूसी ने भी इन सब का ज़िक्र अपनी किताब रिजाल में किया है। मासूमीन (अ.स.) के तमाम असहाब में से मुसन्नेफ़ीन की जुमला तादाद एक हज़ार तीन सौ से ज़्यादा नहीं है। ज़िन्होंने सैकड़ो की तादाद में कुतुबे उसूल और हज़रों की तादाद में दूसरी किताबें तालीफ़ और तसनीफ़ की हैं जिनमें से बाज़ मुसन्नेफ़ीन असहाबे आइम्मा तो ऐसे थे जिन्होंने तन्हा सैकड़ों किताबें लिखीं। फ़ज़ल बिन शाज़ान ने एक सो अस्सी किताबें तालीफ़ कीं। इब्ने दवल ने सौ किताबें लिखीं। इसी तरह बरक़ी ने भी तक़रीबन सौ किताबें लिखीं। इब्ने अबी अमीर ने 90 नब्बे किताबें लिखीं और अक्सर असहाबे आइम्मा ऐसे थे जिन्होंने तीस या चालीस से ज़्यादा किताबें तालीफ़ कीं। ग़रज़ की एक हज़ार तीन सौ मुसन्नेफ़ीन असहाबे आइम्मा ने तक़रीबन पांच हज़ार तसानीफ़ कीं। मजमउल बैहरैन में लफ़्ज़े जबर के मातहत है कि सिर्फ़ जाबिर अल जाफ़ेई इमाम सादिक़ (अ.स.) के सत्तर हज़ार अहादीस के हाफ़िज़ थे।(अमीरल मोमेनीन , किताब मक़तल अल हुसैन ज़्यादा मशहूर है।)
तारीख़े इस्लाम जिल्द 5 पृष्ठ 3 में है कि ‘‘ अब्बना बिन शग़लब बिन रबाह(अबू सईद) कूफ़ी सिर्फ़ इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) की तीस हज़ार अहादीस के हाफ़िज़ थे। ’’ उनकी तसानीफ़ में तफ़सीर ग़रीबुल क़ुरआन , किताब अल मुफ़रद , किताब अल फ़ज़ाएल , किताब अल सिफ़्फ़ीन क़ाबिले ज़िक्र हैं। यह क़ारी फ़क़ीह लग़वी मोहद्दीस थे। इन्हें हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) और हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़र (अ.स.) हज़रत इमाम जा़फ़रे सादिक़ (अ.स.) के सहाबी होने का शरफ़ हासिल था। 141 हिजरी में इन्तेक़ाल किया।
हज़रत सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) और इल्मे जफ़र
हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) को चूंकि नशरे उलूम का मौक़ा मिल गया था लेहाज़ा आपने इल्मी इफ़ादात के दरिया बहा दिये। आपको जहां दीगर उलूम में कमाल था और आपने मुख़्तलिफ़ उलूम के नशर में कोशिश की है। इल्मे जफ़र में भी आप यकताए ज़माना थे और इस इल्म में भी आपकी तसानीफ़ हैं।
इल्मे जफ़र किसे कहते हैं इसके मुताअल्लिक़ ‘‘ अलाब लौलैस मालूफ़ अल यसवा ’’ किताब अल मन्जद के पृष्ठ 91 प्रकाशित बैरूत में लिखते हैं कि इल्मे जफ़र को इल्मे हुरूफ़ भी कहते हैं। यह ऐसा इल्म है कि इसके ज़रिये से हवादिसे आलम को मालूम कर लिया जाता है। मौलवी वहीदुज़्ज़मां अपनी किताब अनवारूल लुग़त पृष्ठ 15 ब हवाला ए बहरे मुहीत लिखते हैं कि इल्मे जफ़र जो इल्मे तकसीर का दूसरा नाम है इससे मुराद यह है कि सायल के सवाल के हुरूफ़ में तग़य्युर व तबद्दुल कर के हालात मालूम किये जायें। मजमउल बैहरैन में लफ़्ज़े जफ़र के मातहत लिखा है कि इल्म अल हुरूफ़ के उसूल पर हवादिसे आलम के मालूम करने का नाम इल्मे जफ़र है। तारीख़े आइम्मा बा हवाला ए तारीख़े इब्ने ख़लक़ान जिल्द 1 पृष्ठ 85 में है कि इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने एक किताब कीमिया और जफ़र और रमल पर लिखी थी।
1 अल्लामा सय्यद अब्दुल हुसैन शरफ़उद्दीन अपनी किताब ‘‘ मोअल्लेफ़ा अल शिया फ़ी सदरूल इस्लाम ’’ प्रकाशित बग़दाद के पृष्ठ 36 में लिखतें हैं कि जनाबे जाबिर जाफ़ेई का असली नाम और सिलसिला ए नसब यह था। जाबिर बिन यज़ीद बिन हरस बिन अब्दुल ग़ौस बिन क़आब बिन अल हरस बिन माविया बिन वाएल अल जाएफ़ी अल कूफ़ी था। उनकी तसानीफ़ में किताब अल तफ़सीर , किताब अल नवादर , किताब अल फ़ज़ाएल , किताब अल जमल , किताब अल सिफ़्फ़ीन , किताब अल नहरवान , किताब मक़तल अमीरल मोमेनीन , किताब मक़तल अल हुसैन , ज़्यादा मशहूर हैं।
हज़रत सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) और इल्मे तिब
अल्लामा इब्ने बाबूया अल नफ़मी किताब ख़साएल जिल्द 2 बाब 19 पृष्ठ 97 से 99 प्रकाशित ईरान में तहरीर फ़रमाते हैं कि हिन्दुस्तान का एक मशहूर तबीब ‘‘ मन्सूर दवांक़ी ’’ के दरबार में तलब किया गया। बादशाह ने हज़रत से उसकी मुलाक़ात कराई। इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) ने इल्मे तशरीह अल अजसाम और अफ़आल उला आज़ा के मुताअल्लिक़ उससे उन्नीस सवालात किये। वह अगरचे अपने फ़न में पूरा कमाल रखता था लेकिन जवाब न दे सका। बिल आखि़र कलमा पढ़ कर मुसलमान हो गया। अल्लामा इब्ने शहरे आशोब लिखते हैं कि इस तबीब से हज़रत ने 20 सवालात किये थे और अन्दाज़े से पुर अज़ मालूमात तक़रीर फ़रमाई कि वह बोल उठा ‘‘ मिन एना लका हाज़ा अल इल्म ’’ ऐ हज़रत यह बे पनाह इल्म आपने कहां से हासिल फ़रमाया ? आप ने कहा कि मैंने अपने बाप दादा से , उन्होंने हज़रत मोहम्मद (स अ व व ) से उन्होंने जिब्राईल , उन्होंने ख़ुदा वन्दे आलम से इसे हासिल किया है। जिसने अजसाम व अरवाह को पैदा किया है। ‘‘ फ़क़ाला अल हिन्दी सदक़त ’’ उसने कहा बेशक आपने सच फ़रमाया। इसके बाद फिर उसने कलमा पढ़ कर इस्लाम क़ुबूल कर लिया और कहा , ‘‘ इन्नका आलम अहले ज़माना ’’ मैं गवाही देता हूँ कि आप अहदे हाज़िर के सब से बड़े आलिम हैं।(मनाक़िब इब्ने शहरे आशोब जिल्द 1 पृष्ठ 45 प्रकाशित बम्बई)
हज़रत सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) का इल्मुल क़ुरआन
मुख़्तसर यह है कि आपके इल्मी फ़यूज़ व बरकात पर मुफ़स्सल रौशनी डालनी तो दुश्वार है जैसा कि मैंने पहले अर्ज़ किया है। अलबत्ता सिर्फ़ यह अर्ज़ कर देना चाहता हूँ कि इल्मुल क़ुरआन के बारे में दम ए साकेबा पृष्ठ 478 पर आपका क़ौल मौजूद है। वह फ़रमाते हैं कि , ख़ुदा की क़सम मैं क़ुरआने मजीद को अव्वल से आखि़र तक इसी तरह पर जानता हूँ गोया मेरे हाथ में ज़मीन व आसमान की ख़बरें हैं और वह ख़बरे भी हैं जो हो चुकी हैं और हो रही हैं और होने वाली हैं , और क्यों न हो जब कि क़ुरआने मजीद में हैं कि इस पर हर चीज़ अयां है। एक मक़ाम पर आपने फ़रमाया है कि हम अम्बिया और रसूलों के उलूम के वारिस हैं।(दमए साकेबा पृष्ठ 488 )
इल्मे नुजूम
इल्मे नुजूम के बारे में अगर आपके कमालात देखना हों तो कुतुबे तवाल का मुतालेआ करना चाहिये। आपने निहायत जलील उलेमा ए इल्म अल नुजूम से मुबाहेसा और मुनाज़ेरा कर के अंगुश्त बदन्दां कर दिया है। बेहारूल अनवार मनाक़िबे शहरे आशोब व दमए साकेबा वग़ैरा में आपके मनाज़िरे मौजूद हैं उलेमा का फ़ैसला है कि इल्मे नुजुम हक़ है लेकिन उसका सही इल्म आइम्मा ए अहले बैत के अलावा किसी को नसीब नहीं। यह दूसरी बात है कि हल्क़ा बगोशान मोअद्दते नूरे हिदायत से कसबे ज़िया कर लें।
इल्मे मन्तिक़ुत तैर
सादिके़ आले मोहम्मद (अ.स.) दीगर आइम्मा की तरह मन्तिक़ अल तैर से भी बा क़ायेदा वाक़िफ़ थे। जो परिन्दा या कोई जानवर आपस में बात चीत करता था उसे आप समझ लिया करते थे और ब वक़्ते ज़रूरत उसकी ज़बान में तकल्लुम फ़रमाया करते थे। मिसाल के लिये मुलाहेज़ा हों किताब तफ़सीरे लुबाब अल तावील जिल्द 5 पृष्ठ 113 व मआलम अल तन्ज़ील पृष्ठ 113, अजायबुल क़सस पृष्ठ 105, नूरूल अनवार पृष्ठ 311 प्रकाशित ईरान में है कि सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) ने क़बरह नामी परिन्दा जिसको चकोर या चनडोल कहते हैं कि बोलते हुए असहाब से फ़रमाया कि तुम जानते हो यह क्या कहता है ? असहाब ने सराहत की ख़्वाहिश की तो फ़रमाया यह कहता है ‘‘ अल्लाहुम्मा लाअन मबग़ज़ी मोहम्मद व आले मोहम्मद ’’ ख़ुदाया मोहम्मद (स अ व व ) व आले मोहम्मद (अ.स.) से बुग़्ज़ करने वालों पर लानत कर। फ़ाख़्ता की आवाज़ पर आपने कहा कि इसे घर में न रहने दो यह कहती है कि ‘‘ फ़क़्द तुम फ़क़्द तुम ’’ ख़ुदा तुम्हें नेस्तो नाबूद करे , वग़ैरा वग़ैरा।
हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) और इल्मुल अजसाम
मनाक़िबे शहरे आशोब और बेहारूल अनवार जिल्द 14 में है कि एक ईसाई ने हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) से इल्मे तिब के बारे में सवालात करते हुए जिस्मे इन्सानी की तफ़सील पूछी। आपने इरशाद फ़रमाया कि ख़ुदा वन्दे आलम ने इन्सान के जिस्म में वसल , 248 हड्डियां और तीन सौ साठ रगें ख़ल्क़ फ़रमाई हैं। रगें तमाम जिस्म को सेराब करती हैं। हड्डियां जिस्म को , गोश्त हड्डियों को और आसाब गोश्त को रोके रखते हैं।
सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) ने जन्नत में घर बनवा दिया
यह एक मुसल्लेमा हक़ीक़त है कि बेहिश्त पर अहले बैते रसूल (स अ व व ) का पूरा पूरा हक़ व इक़्तेदार है। मुल्ला जामी लिखते हैं कि एक शख़्स ने हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) रवाना ए हज होते हुए कुछ दिरहम दिये और अर्ज़ की कि मैं हज को जाता हूँ मेहरबानी फ़रमा कर मेरी वापसी तक एक मकान मेरी रहाईश का बनवा दीजिए गा या ख़रीद फ़रमा दीजिए गा। जब वह लौट कर आया तो आपने फ़रमाया कि मैंने तेरे लिये जन्नत में एक घर ख़रीद लिया है। जिसके हुदूदे अरबा यह हैं। हुदूदे अरबा बताने के बाद आपने एक नविश्ता दिया और वह घर चल गया। वहां पहुँच कर बीमार हुआ और मरने लगा की कि नविश्ता मेरे कफ़न में रखा जाय। चुनान्चे लोगों ने रख दिया। जब दूसरा दिन हुआ तो क़ब्र पर वही परचा मिला। ‘‘ व बर पुश्त दे नविश्ता ’’ कि ‘‘ जाफ़र बिन मोहम्मद वफ़ा नमूद बा नचे वायदा करदा बूद। ’’ इस परचे की पुश्त पर लिखा हुआ था कि सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) ने जो वायदा किया था , दुरूस्त निकला और मुझे मकान मिल गया।(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 192 )
दस्ते सादिक़ (अ.स.) में एजाज़े इब्राहीमी
पैग़म्बरे इस्लाम (स अ व व ) की मशहूर हदीस है कि मेरे अहले बैत मेरे अलावा तमाम अम्बिया से बेहतर हैं। इसका मतलब यह हुआ कि जो मोजिज़ात अम्बिया कराम दिखाया करते थे वह आपके अहते बैत भी दिखा सकते थे। यह दूसरी बात है कि उन्हें तहद्दी के तौर पर असबाते नबूवत के लिये दुनिया वालों को दिखाना ज़रूरी था , लेकिन अहले बैत (अ.स.) को ऐसे मोजिज़ात दिखलाना ज़रूरी न हो , लेकिन अगर किसी वक़्त कोई इस क़िस्म का मोजेज़ा तलब करे तो वह शाने इस्लाम दिखलाने के लिये मोजेज़ा दिखला दिया करते थे।
मुल्ला जामी लिखते हैं कि एक शख़्स ने सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) से पूछा कि हज़रत इब्राहीम (अ.स.) ने चार जानवरों को ज़िन्दा किया था तो वह परिन्दे हम जिन्स थे या मुख़्तलिफ़ अजनास के थे। हज़रत ने ताअज्जुबाना सवाल को सुन कर फ़रमाया , देखो हज़रत इब्राहीम (अ.स.) ने इस तरह ज़िन्दा किया था। यह फ़रमा कर आपने आवाज़ दी ताऊस यहां आ। ग़राब यहां आ। बाज़ यहां आ। कबूतर यहां आ। यह तमाम परिन्दे हज़रत के पास आ गये। आपने हुक्म दिया इन्हें ज़ब्हा कर के इनके गोश्त को ख़ूब पीस डालो। उसके बाद आपने सर हाथ में ले कर एक एक को आवाज़ दी। आवाज़ के साथ गोश्त उड़ा और अपने अपने सर से जा लगा और पहरन्दा फिर मुकम्मल हो गया। यह देख कर सायल हैरान रह गया।(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 191 प्रकाशित लखनऊ 1905 ई 0 )
ख़तो किताबत और दरख़्वास्त के बारे में आपकी हिदायत
बिस्मिल्लाह के लिखने का तरीक़ा
हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी चीज़ों के बारे में हिदायत फ़रमाई है। उसूले काफ़ी पृष्ठ 690 प्रकाशित ईरान में है कि जब कुछ भी लिखो तो ‘‘ बिस्मिल्लाह अर रहमान अर रहीम ’’ से शुरू करो और देखो बिस्मिल्लाह को दन्दाने वाले ‘‘ सीन ’’ से लिखना , यानी बे बाद सीन इर तरह लिखना।(सीन)
दरख़्वास्त लिखने का तरीक़ा
आप फ़रमाते हैं कि दाहेनी तरफ़ दवात रख कर दरख़्वास्त लिखो। इमाम शिब्लंजी नूरूल अबसार प्रकाशित मिस्र के पृष्ठ 133 और अल्लामा मजलिसी हुलयतुल मुत्तक़ीन में लिखते हैं कि सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) ने फ़रमाया है कि जब कोई दरख़्वास्त दो , और चाहो कि वह ज़रूर मन्ज़ूर हो जाय तो उसके सर नामे पर
बिस्मिल्लाह हिर्ररहमार्निरहीम
‘‘ वआदअल्लाह अल साबेरीन अल मख़रज मिम्मा यकराहून वल रिज़्क़ मिन हैस ला यसतबून जाअलना अल्लाह व इय्या कुम मिनल लज़ीना ला ख़ौफ़ुन अलैहिम वला हुम यह ज़नून ’’ अल्लामा अरबली किताब कशफ़ुल ग़म्मा के पृष्ठ 97 पर इसी तरीक़ा ए तहरीर को लिखते के बाद लिखते हैं कि बर सरे रूक़ा ब क़लम बे मदाद ब नवीस यानी यह इबारत बिला रौशनाई के बर सर दरख़्वास्त लिखनी चाहिये।(तहज़ीबुल इस्लाम , तरजुमा हिल्यतुल मुत्तक़ीन पृष्ठ 185 प्रकाशित कराची)
ख़त और जवाबे ख़त
उसूले काफ़ी पृष्ठ 690 में है कि ‘‘ क़ाला अल सादिक़ (अ.स.) रद्दे जवाब अल किताब वाजेबून को जोबे रद्देस सलाम ’’ हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) फ़रमाते हैं कि ख़त का जवाब देना इसी तरह वाजिब है जिस तरह सलाम का जवाब देना वाजिब है।
हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की अन्जाम बीनी और दूर अन्देशी मुवर्रेख़ीन लिखते हैं कि जब बनी अब्बास इस बात पर आमादा हो गये कि बनी उमय्या को ख़त्म कर दें तो उन्होंने यह ख़्याल किया कि आले रसूल (स अ व व ) की दावत का हवाला दिये बग़ैर काम चलना मुश्किल है लेहाज़ा वह इमदाद व इन्तेक़ामे आले मोहम्मद (अ.स.) की तरफ़ दावत देने लगे और यही तरीक़ा करते हुए उठ खड़े हुए जिससे आम तौर पर आले मोहम्मद (अ.स.) यानी बनी फ़ात्मा (अ.स.) की मदद समझी जाती थी। इसी वजस से शियाने बनी फ़ात्मा को भी उनसे हमदर्दी पैदा हो गयी थी और वह उनके मद्दगार हो गए थे और इसी सिलसिले में अबू सलमा जाफ़र बिन सुलैमान कूफ़ी आले मोहम्मद की तरफ़ से वज़ीर तजवीज़ किये गये थे। यानी वह गुमाश्ते के तौर पर तबलीग़ करते थे। उन्हें इमामे वक़्त की तरफ़ से कोई इजाज़त हासिल न थी। यह बनी उमय्या के मुक़ाबले में बड़ी कामयाबी से काम कर रहे थे। जब हालात ज़्यादा साज़गार नज़र आये तो उन्होंने इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) और अबू मोहम्मद अब्दुल्लाह इब्ने हसन को अलग अलग एक एक ख़त लिखा कि आप यहां आ जायें ताकि आपकी बैअत की जाय।
क़ासिद अपने अपने खु़तूत ले कर मंज़िल तक पहुँचे , मदीने में जिस वक़्त क़ासिद पहुँचा वह रात का वक़्त था। क़ासिद ने अर्ज़ कि मौला मैं अबू सलमा का ख़त लाया हूँ। हुज़ूर उसे मुलाहेज़ा फ़रमा कर जवाब इनायत फ़रमायें।
यह सुन कर हज़रत ने चिराग़ तलब किया और ख़त ले कर उसी वक़्त पढ़े बग़ैर नज़रे आतिश कर दिया और क़ासिद से फ़रमाया कि अबू सलमा से कहना कि तुम्हारे ख़त का यही जवाब था।
अभी वह क़ासिद मदीने पहुँचा भी न था कि 3 रबीउल अव्वल 132 हिजरी को जुमे के दिन हुकूमत का फ़ैसला हो गया और सफ़ाह अब्बासी ख़लीफ़ा बनाया जा चुका था।(मरवजुल ज़हब मसूदी बर हाशिया , कामिल जिल्द 8 पृष्ठ 30, तारीख़ुल ख़ुल्फ़ा पृष्ठ 272 हयातुल हैवान जिल्द 1 पृष्ठ 74, तारीख़े आइम्मा पृष्ठ 433 )
ख़लीफ़ा मन्सूर दवानेक़ी और हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ स . )
मुवर्रिख़ अबुल फ़िदा लिखता है कि अबुल अब्बास सफ़ाह बिन अब्दुल्लाह अब्बासी ने चार साल छः माह( 4 साल 6 महीने) हुकूमत कर के ज़िल्हिज्जा 136 हिजरी मुताबिक़ 754 ई 0 में इन्तेक़ाल किया और वक़्ते वफ़ात अपने भाई मन्सूर को अपना वली अहद क़रार दिया। जिस वक़्त सफ़ाह ने इन्तेक़ाल किया मन्सूर हज को गया हुआ था। 137 हिजरी में उसने वापस आ कर एनाने हुकूमत संभाल ली।
जस्टिस अमीर अली लिखते हैं कि मन्सूर बनी अब्बासी का वह बादशाह है जिसकी आक़ेबत अन्देशी और दूर बीनी से इस ख़ानदान को इतना क़याम और इस क़द्र इक़तेदार हासिल हुआ कि दुनियावी सलतनत जाने के बाद भी अरसे तक ख़ानदानी वक़ार बाक़ी रहा।
मुवर्रेख़ ज़ाकिर हुसैन लिखते हैं कि मन्सूर मुदब्बिर , मुन्तज़िम , मगर दग़ा बाज़ , बे रहम , शक्की , वसवासी और सफ़्फ़ाक था। जिस पर उसे ज़रा भी शुब्हा होता था कि ज़ात या ख़ानदान के लिये मुज़िर साबित होगा , उसे हरगिज़ ज़िन्दा न छोड़ता था। हज़रत अली (अ.स.) की औलाद के साथ जो ज़ुल्म उसने किये हैं उन्हीं ने अब्बासी तारीख़ के सफ़ों को सब से ज़्यादा सियाह किया है। उसी ने अलवियों और अब्बासियों में अदावत की बीज बोया। बड़ा कंजूस था। एक एक दांग पर जान देता था। इसी लिये उसे दवानेक़ी कहते हैं। हज़रत इमाम हसन (अ.स.) और हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) की औलाद अगरचे जुम्ला दुनियावी उमूर से किनारा कश थी लेकिन उनका रूहानी इक़तेदार मन्सूर के लिये निहायत ही तकलीफ़ देह था और ख़्वाम ख़्वाह उनकी तरफ़ से उसे खटका लगा रहता था। यह सादात से पूरी दुश्मनी करता था। उसने बनी हुसैन (अ.स.) की जायदातें ज़ब्त कीं और बहुत से सादात क़त्ल किये , बहुतों को ज़िन्दा दीवारों में चुनवा दिया। इमाम मालिक को इसी लिये ताज़याने लगवाये की उन्होंने एक मौक़े पर सादात की हिमायत की थी। इमाम अबू हनीफ़ा को इसी लिये क़ैद किया कि उन्होंने इब्तेदा में जै़द शहीद की बैअत कर ली थी। फिर 150 ई 0 में उन्हें ज़हर दिलवा दिया। ग़रज़ कि उसके ज़माने में बेशुमार सादात क़त्ल हुए और बहुत से क़ैद ख़ाने में सड़ गए और ज़िन्दान के ज़हरीले बुख़ारात की वजह से मर गए। हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) के साथ भी उसका रवय्या इसी अन्दाज़ का था हालांकि आपने और आपसे पहले आपके वालिदे माजिद हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़र (अ.स.) ने इसे ब इल्मे इमामत हाकिम होने की ख़ुश ख़बरी दी थी और उस वक़्त उसने उनकी मदह सराई की थी।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 121 )
मुल्ला जामी और इमाम शिब्लंजी लिखते हैं कि मंसूर अब्बासी का एक मुक़र्रब बारगाह नाक़िल है कि मैंने एक दिन मन्सूर को मुताफक्किर देख कर सबबे तफ़क्कुर दरयाफ़्त किया , मन्सूर ने कहा कि मैंने अलवियों की जमाअते कसीर को फ़ना कर दिया लेकिन उनके पेशवा को अब तक बाक़ी रखा है। मैंने पूछा वह कौन हैं ? मन्सूर ने कहा ‘‘ जाफ़र बिन मोहम्मद (अ.स.) ’’ मैंने अर्ज़ कि जाफ़र इब्ने मोहम्मद (अ.स.) तो ऐसे शख़्स हैं जो हमेशा इबादत और यादे ख़ुदा में मशग़ूल रहते हैं दुनियां से कुछ ताअल्लुक़ नहीं रखते। मन्सूर ने कहा जानता हूँ कि तू दिल से इनकी इमामत का ख़्याल रखता है , मगर मैंने क़सम खाई है कि रात होने से पहले ही इनकी तरफ़ से मुतमईन हो जाऊंगा। यह कह कर जल्लाद को हुक्म दिया कि जब जाफ़र बिन मोहम्मद को लोग हाज़िर करें और मैं अपने सर पर हाथ रखूं तो तू फ़ौरन उनको क़त्ल कर देना। थोड़ी देर के बाद हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) तशरीफ़ लाये , वह उस वक़्त कुछ पढ़ रहे थे। जब मन्सूर की नज़र उन पर पड़ी तो कांपने लगा और इस्तेक़बाल कर के उनको अपनी मसनद पर बिठा लिया उसके बाद पूछा कि या बिन रसूल अल्लाह(अ स ) आपके तकलीफ़ करने की क्या वजह हुई ? उन्होंने फ़रमाया तलब किये जाने पर आया हूँ। मन्सूर ने कहा कि अगर कोई हाजत हो तो बयान कीजिये। हज़रत (अ.स.) ने फ़रमाया , यही हाजत है कि आइन्दा मेरी तलबी न हो , जब मैं चाहूं आऊँ , यह कह कर वहां से चले गए।(शवहिद अल नबूवत पृष्ठ 188 वसीला ए नजात नूरूल अबसार 146 मजानी अदब जिल्द 2 पृष्ठ 182, इरशाद मुफ़ीद पृष्ठ 415 )
मन्सूर अब्बासी की सादात कशी
जब बनी उमय्या की सलतनत का ज़माना ख़त्म हुआ , तो बनी अब्बास की हुकूमत का दौर चला। यह लोग बनी उमय्या से भी ज़्यादा सादात के दुश्मन साबित हुए। इनके ज़माने में तो सादात पर वह तबाही आई कि इसके बयान से बदन पर रौंगटे ख़ड़े होते हैं। इस सिलसिला ए अब्बासिया का दूसरा बादशाह मन्सूर अब्बासी हुआ है। ख़ुदा की पनाह इसके मज़ालिम का क्या ठिकाना है। हज़ारों सय्यदों को इस ज़ालिम ने क़त्ल कराया। इनके खू़न के गारों से दीवारें तामीर कराईं यही नहीं बल्कि बहुत से बेगुनाहों को दीवारों में ज़िन्दा चिनवा दिया। बीखों और बुनियादों में दबवा दिया।। क़ैद ख़ाने में सड़ा सड़ा कर मार दिया। इसके ज़माने में शिया या सय्यदों का शुब्हा हो जाना क़त्ल के लिये काफ़ी था। सब से ज़्यादा तबाही इस ज़ालिम के दौरे सलतनत में हुसैनी सादात पर आई। ख़्याल करो कि नाज़ुक दौर में हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने किस ऐहतियात से अपनी ज़िन्दगी बसर की होगी। ज़ुल्म के बर्दाश्त करने की भी कोई हद होती है। सालहा सालसे ग़रीब सादात एक अजीब बे कसी की हालत में बसर कर रहे थे , आखि़र उनके सीनों भी दिल था और एक बहादुर ख़ानदान का ख़ून रगों में दौड़ा हुआ था। रफ़ता रफ़ता उनको भी जोश आ गया। इमाम हसन (अ.स.) की औलाद में उनके पोते जनाबे अब्दुल्लाह महज़ एक बड़े नेक दिल और जोशीले सय्यद थे। उन्होंने चाहा कि सादात को अब्बासियों के मज़ालिम से किस तरह छुड़ायें। इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) ने उनको इस इरादे से रोकना चाहा मगर उनका जोश कर नहीं हुआ और लोगों को मन्सूर के खि़लाफ़ उभारने लगे। उनके दो बेटे थे। एक का नाम मोहम्मद नफ़से ज़किया और दूसरे का इब्राहीम था। इन दोनों ने इस कोशिश में पूरा हिस्सा लिया। मन्सूर को जब उनके इरादों का हाल मालूम हुआ तो उसने सादाते हुसैनी की गिरफ़्तारी के लिये एक फ़ौज भेजी जिनमें सत्तर पछत्तर आदमी , कमसिन बच्चे , नौजवान और बूढ़े सब शामिल थे , गिरफ़्तार कर लिये गये। लिखा है कि जब यह सित्म रसीदा काफ़िला मदीने से चला तो उनकी बे कसी व मजबूरी , बे गुनाही व बे कसूरी का ख़्याल कर के हर एक अपने मक़ाम पर रोता और बेचैन नज़र आता था। आह वह साहेबाने फ़ज़लो कमाल जो सूरतो सीरत में बे मिस्ल बे नज़ीर थे जिनका एक एक जवान हिम्मत व दिलेरी में तमाम अरब में मशहूर था। गले में तौक़ पहने और हाथों में दोहरी जंजीरें डालें शर्मों हिजाब से गरदने नीचे किये लाग़र ऊंटों की पीठों पर बैठे हुए मदीना ए रसूल (स अ व व ) से निकल रहे थे।
तारीख़े कामिल में है कि जब इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) को कुन्बे की गिरफ़्तारी का हाल मालूम हुआ तो बेचैन हो गये। मस्जिदे रसूल के दरवाज़े पर खड़े थे कि मज़लूम सादात का काफ़ेला इधर से गुज़रा। इमाम (अ.स.) ने जब यह हाल देखा कि किसी के पैर में ज़न्जीर है किसी के गले में तौक़ , किसी की मुश्कें कसी हैं किसी के पैर ऊंट के पेट से बंधे हुए हैं तो आप ज़ार ज़ार रोने लगे और फ़रमाया ख़ुदा की क़सम आज के बाद से हुरमते हरमे ख़ुदा और रसूल महफ़ूज़ न रहेगी। ख़ुदा की क़सम क़ौमे अन्सार से जो मुआहेदा हज़रत रसूले ख़ुदा (स अ व व ) ने लिया था यानी उनकी औलाद और उनकी हिफ़ाज़त को वह भूल गये। ख़ुदा वन्दा तू अन्सार से सख़्त मुआख़ेज़ा करना। हज़रत की परेशानी का उस वक़्त यह आलम था कि रिदाये मुबारक दोशे अक़दस से गिर गई थी। इस वाक़िये का आप पर इतना गहरा असर पड़ा कि आप उसी रोज़ से बीमार पड़ गये और तक़रीबन बीस रोज़ तक तप (बुख़ार) की वह शदीद तकलीफ़ उठाई कि जान के लाले पड़ गये। हज़रत ने चाहा कि अपने चचा हज़रते अब्दुल्लाह महज़ तक जायें और तसल्ली व दिलासा दें मगर एक संगदिल ने वहां तक न जाने दिया।
मोहम्मद नफ़से ज़किया व इब्राहीम
हज़रत अब्दुल्लाह महज़ उस ज़माने में रूपोश हो गये थे और सहराई अरबों का भेस बदल कर रहने लगे थे। चुनान्चे उसी भेस में वह छुप कर एक मंज़िल पर जनाबे अब्दुल्लाह महज़ से मिले। उन्होंने बेटों से कहा कि इस ज़िल्लत की ज़िन्दगी से इज़्ज़त की मौत बेहतर है। मन्सूर उस ज़माने में कूफ़े में था। क़ैदी उसके सामने पेश हुये। चन्द रोज़ बाद ही यह लोग मरने लगे। क़यामत यह आई कि उनके मुरदों को भी क़ैद ख़ाने से बाहर न निकाला गया। वहीं मरते और सड़ते रहे। इससे वहां की हवा और ज़्यादा गन्दी हो गई और एक ऐसी वबा फैली कि हर रोज़ दो चार मरने लगे। हक़ीक़त यह है कि सादात कशी में बनी अब्बास के मज़ालिम बनी उमय्या से भी कहीं ज़्यादा बढ़ गये थे। बनी उमय्या ने अगर ऐसा किया तो गै़र हो कर क़दीमी दुश्मन बन कर यह तो अपने कहलाते थे माले दुनियां की तमा और हुकूमत की हिर्स ने उनकी आखों पर ऐसा परदा डाला कि नेक व बद की तमीज़ बाक़ी न रही और दुनियां के पीछे आख़ेरत को बिल्कुल भूल गये। बहर हाल ग़रीब सादात ने इस क़ैद ख़ाने में बड़ी इबरत नाक हालत में ज़िन्दगी बसर की लेकिन इस हालत में भी ख़ुदा की याद से ग़ाफ़िल न रहे। शबो रोज़ तिलावते कलामे पाक से काम रहता था। क़ैद ख़ाने की तारीकी में दिन के अवक़ात का चूंकि पता न चलता था , इस लिये अपनी तिलावत को पांच हिस्सों में तक़सीम कर दिया था और उन्हीं से अवक़ाते नमाज़ का पता लगाते थे। उनको इस क़ैद ख़ाने में कई कई वक़्त फ़ाके से गुज़र जाते थे और कोई पुरसाने हाल न था बल्कि खाने का क्या ज़िक्र पानी भी ज़रूरत भर न मिलता था।
अब इधर का हाल सुनों , मोहम्मद नफ़्से ज़किया ने बहुत जल्द एक फ़ौज फ़राहम कर के मन्सूर पर चढ़ाई की और मदीने पर क़ब्ज़ा कर लिया मगर चन्द ही रोज़ बाद मन्सूर की फ़ौजों ने फिर आ घेरा। मोहम्मद उनके मुक़ाबले की ताब न ला सके आखि़र शहीद हो गये। उनका सर काट कर के मन्सूर के पास भेज दिया गया। इस ज़ालिम ने इस सर को एक क़ैद ख़ाने में रख कर क़ैद ख़ाने में उनके बूढ़े बाप अब्दुल्लाह महज़ के पास भेज दिया। जनाबे अब्दुल्लाह उस वक़्त नमाज़ पढ़ रहे थे कि सर मुसल्ले के पास रखा गया। नमाज़ से फ़ारिग़ हो कर जब देखा तो जवान बेटे का सर रखा हुआ है। बे साख़्ता एक आह सीने से निकली , सर को छाती से लगा लिया और कहने लगे बेटा , शाबाश तुम बे शक उन्हीं वायदा वफ़ा करने वालों में से हो जिनकी तारीफ़ ख़ुदा ने क़ुरआन में की है। बेटा तुम ऐसे जवान थे कि तुम्हारी तलवार ने तुमको ज़िल्लत से बचा लिया और तुम्हारी परहेज़गारी ने तुम को गुनाहों से महफ़ूज़ रखा। फिर सर लाने वाले से कहा कि मन्सूर से कह देना कि हम तो मक़तूल हो ही चुके , अब तुम्हारी बारी है। अब हमारा और तुम्हारा इंसाफ़ ख़ुदा के यहां होगा। यह कह के एक ठंडी सांस भरी और दम निकल गया।
अब दूसरे भाई यानी इब्राहीम का हाल सुनो , यह भी मुद्दतों इधर उधर घूमते फिरे आखि़र उन्होंने भी एक फ़ौज जमा कर के मिस्र की हुकूमत हासिल कर ली। जिस ज़माने में नफ़्से ज़किया मन्सूर से लड़ रहे थे। उन्होंने भाई की मद्द को आना चाहा , मगर मन्सूर ने रास्ते बन्द कर रखे थे , मुम्किन न हुआ। मोहम्मद पर फ़तेह पाने के बाद मन्सूर ने इब्राहीम का भी ख़ात्मा कर दिया। सूरत यह हुई कि इब्राहीम अपने लशकर को साथ लिये कूफ़े की तरफ़ रवाना हुए। मक़ाम ‘‘ अल अहमरा ’’ में ख़ेमा ज़न थे कि मन्सूर का लशकर भी वहां पहुँच गया। दोनों लशकरों में सख़्त मुक़ाबला हुआ। सैकड़ों आदमी मारे गये। इब्राहीम की फ़तेह के आसार नुमायां हो चुके थे कि यका यक मामेला दिगर गूँ हो गया और इब्राहीम की फ़ौज ने भागते हुए दुश्मन का पीछा किया मगर नेक दिल इब्राहीम को उनकी तबाह हालत पर रहम आ गया , अपने सिपाहियों को ताअक़्कु़ब से रोक दिया। मन्सूर के सरदार ‘‘ ऐनी ’’ ने इस मौक़े से फ़ायदा उठाया और अपनी तितर बितर क़ुव्वत को जमा कर के फिर एक दम हमला कर दिया। इब्राहीम की फ़ौज को इस बलाए नागहानी की क्या ख़बर थी। वह अपनी फ़तेह देख कर अपनी कमरे खोल चुके थे कि शिकस्त खाई दुश्मन की फ़ौज फिर लौट पड़ी। अब इब्राहीम को मुक़ाबला करना दुश्वार हो गया। फ़ौज तितर बितर हो गई। मजबूरन तलवार ले कर ख़ुद मुक़ाबले को निकल पड़े। देर तक हाशमी शुजाअत के जौहर दिखाते रहे। आखि़र कहां तक लड़ते। दुश्मन ने चारों तरफ़ से घेर कर हलाक कर दिया। यह वाक़ेया 25 ज़िक़ादा 145 हिजरी का है। इब्राहीम वह शख़्स थे कि पूरे पांच बरस रूपोश रहे थे और मन्सूर बावजूद इतनी क़ुदरतो ताक़त के किसी तरह उनको गिरफ़्तार न कर सका था।
इब्राहीम और नफ़से ज़किया के क़त्ल होने के बाद भी मन्सूर के मज़ालिम सादात पर कम न हुए। जहां जिसको पाया बिना क़त्ल किये न छोड़ा। उस ज़माने में सादात की वह तबाही हुई कि बयान में नहीं आ सकती। अल्लामा मजलिसी लिखते हैं कि मन्सूर के ज़माने में बे शुमार औलादे अली (अ.स.) शहीद किये गये और बहुतों को दीवार में चिन्वा दिया गया। मन्सूर उस ज़माने में बग़दाद में महल बनवा रहा था। इसमें जहां औरो को ज़िन्दा चिनवा दिया था एक हसीन नौजवान को भी चुनवाया , वह चूंकि बहुत ही हसीनों ख़ूब सूरत था। उसके चेहरे पर मेमार की नज़र पड़ी तो बे साख़्ता उसका दिल रोने लगा। हुक्म से मजबूर था। दीवार में चुनते चुनते उसे मौक़ा मिल गया। बोला कि ऐ फ़रज़न्दे रसूल (अ.स.) आप घबरायें नहीं , मैं सांस के लिये सूराख़ छोड़ देता हूँ और रात को आ कर निकाल लूंगा। चुनांचे वह रात की तारीकी में दीवार के क़रीब आया और ईंटें हटा कर उस ना जवान बाग़े रिसालत को दीवार से निकाल दिया और कहा कि आप सिर्फ़ इतना कीजिये कि इस तरह ज़िन्दा बच कर किसी तरफ़ चले जाइये कि आपका पता निशान न मिल सके और ऐ फ़रज़न्दे रसूल (अ.स.) आप अपने नाना मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) से मेरी बख़्शिश की सिफ़ारिश फ़रमाईयेगा।
उन्होंने शुक्रिया अदा किया और कहा ऐ शेख़ अगर तुम से हो सके तो मेरी ज़ुल्फ़ों को तराश लो और किसी रात को मेरी दुखिया मां के पास फ़लां महल्ले में जा कर उन्हें मेरी ज़ुल्फ़ें दे कर कह दें कि मैं ज़िन्दा हूँ और अन्क़रीब मिलंूगा। इस मेमार का बयान है कि मैं उनकी ख़्वाहिश के मुताबिक़ उनके मकान पर पहुँचा तो उनकी माँ बैठी रो रही थीं। मैंने उन्हें सुबूते हयात के लिये ज़ुल्फ़ें दे कर नवेदे ज़िन्दगी सुनाई और वापस चला आया।(जिलाउल उयून पृष्ठ 269 प्रकाशित ईरान व सवानेह उमरी चहारदा मासूमीन हिस्सा 2 पृष्ठ 7 )
तवारीख़ में है कि जनाबे नफ़्से ज़किया के शहीद होने के बाद से जहां मज़ालिम का पूरा ज़ोर पैदा हो गया था वहां इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) भी महफ़ूज़ नहीं रह सके। इमाम शब्लन्जी लिखते हैं कि उनको क़त्ल कराने के बाद मन्सूर ने इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) को तलब किया और उनकी सख़्त तहदीद की और क़त्ल की खुले अल्फ़ाज़ मे धमकी दी।(नूरूल अबसार पृष्ठ 133 )
मन्सूर का हज और इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) पर बोहतान तराज़ी हालात की रौशनी में हर बा फ़हम इसका अन्दाज़ा कर सकता है कि हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की ज़िन्दगी किस दौर से गुज़र रही थी और मन्सूर किस ताक में था और किस तरह बहाना तलाश कर रहा था।
तारीख़े हबीबुस सियर में है कि 144 हिजरी में मन्सूर अब्बासी हज के लिये गया। मन्सूर ने हज से फ़राग़त की तो एक शख़्स ने उससे कहा कि इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) तुम्हारे खि़लाफ़ लोगों को भड़काते और उकसाते हैं। उसने इमाम (अ.स.) को बुला कर उनसे कहा कि मुझे ऐसा मालूम हुआ है कि आप मेरी हुकूमत के खि़लाफ़ प्रोपेगन्डा करते और लोगों को उकसाते और भड़काते हैं। आपने इरशाद फ़रमाया , ऐ बादशाह ! यह बिल्कुल ग़लत है और तूझे मेरे कहने पर यक़ीन न आये तो तू उस शख़्स को मेरे सामने तलब कर। मन्सूर ने उसे बुलाया। आपने फ़रमाया कि तूने मुझ पर क्यों बोहतान बांधा हैं ? उसने कहा कि मैंने सच कहा है। इमाम (अ.स.) ने फ़रमाया कि क्या तू क़सम खा कर कह सकता है ? उसने कहा हां , फिर उसने ख़ुदा की क़सम खाई। आपने कहा इस तरह नहीं जिस तरह मैं कहूँ उस तरह क़सम खा। चुनान्चे आपने फ़रमाया कि अपनी ज़बान से यह कह कर क़सम खा ‘‘ बरत मिन हौल अल्लाह ’’ मैं ख़ुदा की क़ुव्वत व ताक़त से दूर हट कर अपने भरोसे पर क़सम खाता हूँ। उसने पहले तो हल्का सा इन्कार किया फिर वह क़सम खा गया। उसका नतीजा यह हुआ कि उसी जगह गिर कर हलाक हो गया।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 120 प्रकाशित मिस्र)
इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) का दरबारे मन्सूर में एक तबीबे हिन्द से तबादला ए ख़यालात
अल्लामा रशीद उद्दीन अबू अब्दुल्लाह मोहम्मद बिन अली इब्ने शहरे आशोब माज़न्द्रानी अल मतूफ़ी 588 हिजरी ने दरबारे मन्सूर का एक अहम वाक़ेया नक़ल फ़रमाया है जिसमें मुफ़स्सल तौर पर यह वाज़े किया गया है कि एक तबीब जिसको अपनी क़ाबलियत पर बड़ा भरोसा और ग़ुरूर था वह इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के सामने किस तरह सिपर अन्दाख़्ता हो कर आपके कमालात का मोतरिफ़ हो गया। हम मौसूफ़ की अरबी इबारत का तरजुमा अपने फ़ाज़िल मआसर के अल्फ़ाज़ में पेश करते हैं।
एक बार हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) मन्सूर दवानक़ी के दरबार में तशरीफ़ फ़रमा थे। वहां एक तबीबे हिन्दी तिब की बाते बयान कर रहा था और हज़रत ख़ामोश बैठे सुन रहे थे। जब वह कह चुका तो हज़रत से मुख़ातिब हो कर कहने लगा। अगर कुछ पूछना चाहें तो शोक़ से पूछें। आपने फ़रमाया , मैं क्या पूछूँ , मुझे तुझ से ज़्यादा मालूम है। तबीब अगर यह बात है तो मैं भी कुछ सुनूं। इमाम (अ.स.) जब किसी मर्ज़ का ग़लबा हो तो उसका इलाज ज़िद से करना चाहिये यानी हार , गर्म का इलाज बारद सर्द से , तर का ख़ुश्क से , ख़ुश्क का तर से और हर हालत में अपने ख़ुदा पर भरोसा रखे। याद रख मेदा तमाम बिमारियों का घर है और परहेज़ सौ दवाओं की एक दवा है। जिस चीज़ का इंसान आदी हो जाता है उसके मिजाज़ के मुवाफ़िक़ और उसकी सेहत का सबब बन जाती है। तबीब बे शक आपने जो बयान फ़रमाया है असली तिब यही है। इमाम (अ.स.) यह न समझना चाहिये कि मैंने जो बयान किया है यह तिब की किताबें पढ़ कर हासिल किया है बल्कि यह उलूम मुझको ख़ुदा की तरफ़ से मिले हैं। अब बता तू ज़्यादा इल्म रखता है या मैं ? तबीब मैं। इमाम (अ.स.) अच्छा मैं चन्द सवाल करता हूँ उनका जवाब दे।
1. आंसुओं और रूतूबतों की जगह सर में क्यों है ?
2. सर पर बाल क्यों हैं ?
3. पेशानी बालों से खाली क्यों है ?
4. पेशानी पर ख़त और शिकन क्यों हैं ?
5. दोनों पल्कें आंखों के ऊपर क्यों हैं ?
6. नाक दोनों आंखों के दरमियान क्यों है ?
7. आंखें बादामी शक्ल की क्यों हैं ?
8. नाक का सूराख़ नीचे की तरफ़ क्यो है ?
9. मूंह पर दो होंठ क्यों बनाये गये हैं ?
10. सामने के दांत तेज़ और दाढ़ें चौड़ी क्यों है और उन दोनों के बीच में लम्बे दांत क्यों हैं ?
11. दोनों हथेलियां बालों से ख़ाली क्यों हैं ?
12. मर्दो के दाढ़ी क्यों होती है ?
13. नाख़ून और बालों में जान क्यों नहीं ?
14. दिल सनोबरी शक्ल का क्यों है ?
15. फ़ेफड़े के दो टुकड़े क्यों हैं और वह अपनी जगह हरकत क्यों करता हैं ?
16. जिगर की शक्ल मोहद्दब क्यों है ?
17. गुर्दे की शक्ल लोबिये के दाने की तरह क्यों होती है ?
18. घुटने आगे को झुकते हैं पीछे को क्यों नहीं झुकते ?
19. दोनों पावों के तलवे बीच से ख़ाली क्यों होते हैं ?
तबीब मैं इन बातों का जवाब नहीं दे सकता। इमाम (अ.स.) ख़ुदा के फ़ज़्ल से मैं इन सब सवालों का जवाब जानता हूँ। तबीब ने कहा कि बराऐ करम बयान फ़रमाइये।
इमाम (अ.स.) ने फरमायाः
1. सर अगर आंसुओं और रूतूबतों का मरकज़ न होता तो ख़ुश्की की वजह से टुकड़े टुकड़े हो जाता।
2. बाल इस लिये सर पर हैं कि उनकी जड़ों से तेल वग़ैरा दिमाग़ तक पहुँचता रहे और बहुत से दिमाग़ी अबख़रे निकलते रहें , दिमाग़ गर्मी और सर्दी से महफ़ूज़ रहे।
3. पेशानी बालों से इस लिये ख़ाली है कि इस जगह से आंखों में नूर पहुँचता है।
4. पेशानी में लकीरें इस लिये हैं कि सर से जो पसीना गिरे वह आंखों में न जा पाये। जब शिकनों में पसीना जमा हो तो इंसान उसे पोंछ कर फे़क दे जिस तरह ज़मीन पर पानी जारी होता है तो गढ़ों में जमा हो जाता है।
5. पलकें इस लिये आंखों पर क़रार दी गई हैं कि आफ़ताब की रौशनी इतनी उन पर पड़े जितनी ज़रूरत है और ब वक़्ते ज़रूरत बन्द हो कर आंखों की हिफ़ाज़त कर सके और सोने में मद्द दे सकें। तुम ने देखा होगा की जब इंसान ज़्यादा रौशनी में बलन्दी की तरफ़ किसी चीज़ को देखना चाहता है तो हाथ आंखों के ऊपर रख कर साया कर लेता है।
6. नाक को दोनों आंखों के बीच में इस लिये क़रार दिया गया है कि मजमा ए नूर से रौशनी तक़सीम हो कर बराबर दोनों आंखों को पहुँचे।
7. आंखों को बदामी शक्ल का इस लिये बनाया गया है कि बा वक़्ते ज़रूरत सलाई के ज़रिये से दवा , सुरमा वग़ैरा इसमें आसानी से पहुँच जायें। अगर आंख चकोर या गोल होती तो सलाई का उसमें फिरना मुश्किल होता। दवा उसमें ब ख़ूबी न पहुँच सकती और बीमारी दफ़ा न होती।।
8. नाक का सूराख़ नीचे को इस लिये बनाया कि दिमाग़ी रूतूबतें आसानी से निकल सकें अगर ऊपर को होता तो यह बात न होती और दिमाग़ तक किसी भी चीज़ की बू जल्दी से न पहुँच सकती।
9. होंठ इस लिये मुंह पर लगाये गये कि जो रूतूबतें दिमाग़ से मुंह मे आयें वह रूकी रहें और खाना भी इंसान के इख़्तियार में रहे , जब चाहे फेकें और थूक दे।
10. दाढ़ी मर्दों को इस लिये दी कि मर्द और औरत में तमीज़ हो जाय।
11. अगले दांत इस लिये तेज़ हैं कि किसी चीज़ का काटना सहल हो और दाढ़ों को चौड़ा इस लिये बनाया कि ग़िज़ा पीसना और चबाना आसान हो। इन दोनों के दरमियान लम्बे दांत इस लिये बनाये कि दोनों के इस्तेहकाम के बाएस हों जिस तरह मकान की मज़बूती के बाएस सुतून (खम्बे) होते हैं।
12. हथेलियों पर बाल इस लिये नहीं कि किसी चीज़ को छूने से इसकी नरमी , सख़्ती , गर्मी और सर्दी वग़ैरा आसानी से मालूम हो जाय। बालों की सूरत में यह बात हासिल न होती।
13. बाल और नाख़ूनों में जान इस लिये नहीं कि इन चीज़ों का बढ़ना बुरा मालूम होता है और नुक़्सान देह है , अगर इन में जान होती तो काटने में तकलीफ़ होती।
14. दिल सनोबरी शक्ल यानी सर पतला और दुम चौड़ी (निचला हिस्सा) इस लिये है कि आसानी से फे़फ़ड़े में दाखि़ल हो सके और उसकी हवा से ठंडक पाता रहे ताकि उसके बुख़ारात दिमाग़ की तरफ़ चढ़ कर बीमारियां पैदा न करें।
15. फे़फ़ड़े के दो टुकड़े इस लिये हुए कि दिल उनके दरमियान रहे और वह उसको हवा दें।
16. जिगर मोहद्दब इस लिये हुआ कि अच्छी तरह मेदे के ऊपर जगह पकड़े और अपनी गरानी व गर्मी से ग़िज़ा को हज़म करे।
17. गुर्दा लोबिये के दाने की शक्ल का इस लिये हुआ कि मनी यानी नुत्फ़ा इंसानी पुश्त की जानिब से इसमें आता है और उसके फ़ैलने और सुकड़ने की वजह से आहिस्ता आहिस्ता निकलना है जो सबबे लज़्ज़त है।
18. घुटने पीछे की तरफ़ इस लिये नहीं झुकते कि चलने में आसानी हो अगर ऐसा न होता तो आदमी चलते वक़्त गिर गिर पड़ता , आगे चलना आसान न होता।
19. दोनों पैरों के तलवों के बीच में जगह ख़ाली इस लिये है कि दोनों किनारों पर बोझ पड़ने से आसानी से पैर उठ सकें अगर ऐसा न होता और पूरे बदन का बोझ पेरों पर पड़ता तो सारे बदन का बोझ उठाना दुश्वार हो जाता।
यह जवाबात सुन कर हिन्दोस्तानी तबीब (हकीम , वैद्य) हैरान रह गया और कहने लगा कि आपने यह इल्म किससे सीखा है ? फ़रमाया अपने दादा से उन्होंने रसूले ख़ुदा (स अ व व ) से हासिल किया और उन्होंने ख़ुदा से सीखा है। उसने कहा , ‘‘ इन्ना अशहदो अन ला इलाहा इलल्लाह व अन मोहम्मदन रसूल अल्लाह व अब्दहू ’’ मैं गवाही देता हूँ कि ख़ुदा एक है और मोहम्मद (स अ व व ) उसके रसूल और अब्दे ख़ास हैं। ‘‘ व इन्नका आलमो अहले ज़माना ’’ और आप अपने ज़माने में सब से बडे आलिम हैं।(मनाक़िब इब्ने शहरे आशोब जिल्द 5 पृष्ठ 46 प्रकाशित बम्बई व सवानेह चहारदा मासूमीन हिस्सा 2 पृष्ठ 25 )
इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) को बाल बच्चों समेत जला देने का मन्सूबा
तबीबे हिन्दी से गुफ़्तुगू के बाद इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) का आम शोहरा हो गया और लोगों के क़ुलूब पहले से ज़्यादा आपकी तरफ़ माएल हो गये। दोस्त और दुश्मन आपके इल्मी कमालात का ज़िक्र करने लगे। यह देख कर मन्सूर के दिल में आग लग गई और वह अपनी शरारत के तक़ाज़ों से मजबूर हो कर यह मन्सूबा बनाने लगा कि अब जल्द से जल्द इन्हें हलाक कर देना चाहिये। चुनान्चे उसने ज़ाहिरी क़द्रों मन्ज़ेलत के साथ आपको मदीना रवाना कर के हाकिमे मदीना हुसैन बिन ज़ैद को हुक्म दिया ‘‘ अन अहरक़ जाफ़र बिन मोहम्मद फ़ी दाराह ’’ इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) को बाल बच्चों समैत घर के अन्दर जला दिया जाए। यह हुक्म पा कर वालिये मदीना चन्द ग़ुन्डों के ज़रिये से रात के वक़्त जब कि सब महवे ख़्वाब थे , आपके मकान में आग लगवा दी और घर जलने लगा। आपके असहाब अगरचे उसे बुझाने की पूरी कोशिश कर रहे थे लेकिन आग बुझने को न आती थी। बिल आखि़र आप उन्हीं शोलों में कहते हुए कि ‘‘ अना इब्ने ईराक़ अल शरआ , अना इब्ने इब्राहीम अल ख़लील ’’ ऐ आग मैं वह हूँ जिसके आबाव अजदाद ज़मीनों आसमान की बुनियादों के सबब हैं और मैं ख़लीले ख़ुदा इब्राहीम नबी का फ़रज़न्द हूँ। निकल पड़े और अपनी अबा के दामन से आग बुझा दी।(तज़किरतुल मासूमीन पृष्ठ 181 ब हवाला उसूले काफ़ी आक़ा ए क़ुलैनी अर रहमा)
147हिजरी में मन्सूर का हज और इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के क़त्ल का अज़म बिल जज़म
अल्लामा शिब्लंजी और अल्लामा मोहम्मद बिन तल्हा शाफ़ेई रक़म तराज़ हैं कि 147 हिजरी में मन्सूर हज को गया। उसे चूंकि इमाम (अ.स.) के दुश्मनों की तरफ़ से बराबर यह ख़बर दी जा चुकि थी कि इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) तेरी मुख़ालेफ़त करते रहते हैं और तेरी हुकूमत का तख़्ता पलटने की कोशिश में हैं। लेहाज़ा उसने हज से फ़राग़त के बाद मदीने का क़स्द किया और वहां पहुँच कर अपने ख़ास हमदर्द ‘‘ रबी ’’ से कहा कि जाफ़र बिन मोहम्मद को बुलवा दो। रबी ने वायदे के ब वजूद टाल मटोल की। उसने फिर दूसरे दिन सख़्ती के साथ कहा कि उन्हें बुलवा। मैं कहता हूँ कि ख़ुदा मुझे क़त्ल करे अगर मैं उन्हें क़त्ल न कर सकूँ। रबी ने इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की खि़दमत में हाज़िर हो कर अर्ज़ कि मौला ! आपको मन्सूर बुला रहा है और उसके तेवर बहुत ख़राब हैं। मुझे यक़ीन है कि वह इस मुलाक़ात से आपको क़त्ल कर देगा। हज़रत ने फ़रमाया , ‘‘ ला हौला वला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहिल अली उल अज़ीम ’’ यह इस दफ़ा न मुम्किन है। ग़रज़ कि रबी हज़रत को ले कर हाज़िरे दरबार हुआ। मन्सूर की नज़र जैसे ही आप पर पड़ी तो आग बबूला हो कर बोला , ‘‘ या अदू अल्लाह ’’ ऐ दुश्मने ख़ुदा तुमको अहले ईराक़ इमाम मानते हैं और तुम्हें ज़कात अम्वाल वग़ैरा देते हैं और मेरी तरफ़ उनका कोई ध्यान नहीं। याद रखो , मैं आज तुम्हें क़त्ल कर के छोड़ूगा और इसके लिये मैंने क़सम खा ली है। यह रंग देख कर इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने इरशाद फ़रमाया। ऐ अमीर , जनाबे सुलेमान (अ.स.) को अज़ीम सलतनत दी गई तो उन्होंने शुक्र किया। जनाबे अय्यूब को बला में मुब्तिला किया गया तो उन्होंने सब्र किया। जनाबे यूसुफ़ पर ज़ुल्म किया गया तो उन्होंने ज़ालिमों को माफ़ कर दिया। ऐ बादशाह ये सब अम्बिया थे और उन्हीं की तरफ़ तेरा नसब भी पहुँचता है तुझे तो उनकी पैरवी लाज़िम है यह सुन कर उसका ग़ुस्सा ठंडा हो गया।(नूरूल अबसार पृष्ठ 132, मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 276 )
हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की दरबारे मन्सूर में सातवीं बार तलबी
147 हिजरी में हज से फ़राग़त के बाद जब मन्सूर अपने दारूल खि़लाफ़ा में पहुँचा तो मुशीरों ने मौक़े से इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) का ज़िक्र छेड़ा। मन्सूर जो इसी दौरान में उनसे मिल कर आया था उसने फ़ौरन हुक्म दे दिया कि इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की तलबी की जाय और उन्हें बुला कर मेरे सामने दरबार में पेश किया जाय। दावत नामा चला गया और इमाम (अ.स.) मदीने से चल कर दरबार में उस वक़्त पहुँचे जब उसे एक मक्खी सता रही थी और वह उसे बार बार हकंा रहा था। वह मुंह पर बैठी थी और मन्सूर उसे दफ़ा करता था लेकिन वह बाज़ न आती थी। मन्सूर इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की तरफ़ मुतावज्जे हो कर बोला , कि ज़रा यह बताइये कि ख़ुदा ने मक्खी को क्यों पैदा किया है ? हज़रत ने फ़रमाया ! ‘‘ लैज़ल बेही अल जब्बारता ’’ कि ख़ुदा ने मक्खी इस लिये पैदा की है कि उसके ज़रिये से जाबिरों को ज़लील करे व सर कशों का सर झुकाये।(नूरूल अबसार , पृष्ठ 144, मनाक़िब इब्ने शहरे आशोब जिल्द 3 पृष्ठ 40 )
इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) और दरबार के शेर
एक दिन का ज़िक्र है कि मन्सूर ने बाबुल से सत्तर जादूगरों को बुला कर दरबार में बैठाये हुए था और उनसे कह दिया था कि मैं अन्क़रीब अपने एक दुश्मन को बुलाने वाला हूँ वह जब यहां पर आये तो तुम उसके साथ कोई ऐसा करतब करना जिससे वह ज़लील हो जाय। वहां पहुँच कर अपने देखा कि सत्तर मसनवी शेर दरबार में बैठे हुए हैं। आपको ग़ुस्सा आ गया और आपने उन शेरों की तरफ़ मुतव्वजे हो कर कहा कि अपने बनाने वालों को निगल लो। वह नक़ली शेर की तस्वीरें मुजस्सम हुईं और उन्होंने सब जादूगरों को निगल लिया। यह देख कर मन्सूर कांपने लगा , फिर थोड़ी देर के बाद बोला , ऐ इब्ने रसूल अल्लाह (अ.स.) इन शेरों को हुक्म दीजिये कि इन जादूगरों को उगल दें। आपने फ़रमाया यह नहीं हो सकता। अगर असाए मूसा ने सांपों को उगल दिया होता तो यक़ीन है कि यह भी उगल देते।(दमए साकेबा जिल्द 2 पृष्ठ 513 बा हवाला ए शरह शाफ़िया अबी फ़ारस)
इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) को दरबार में क़त्ल किये जाने का बन्दो बस्त
अल्लामा दहर शती ब हवाला ए किताब मशारिको अनवार अल्लामा तबरीसी रक़म तराज़ हैं कि मन्सूर अब्बासी जब आपकी रूहानियत से आजिज़ आ गया और किसी मरतबा क़त्ल करने में कामयाबी न हासिल कर सका तो उसने सवालिये अफ़राद तलाश किये जो कुछ जानते और पहचानते ही न थे , बिल्कुल अल्लढ़ और कुन्दा ए ना तराश थे। उसने मालो दौलत दे कर इस अम्र पर राज़ी किया कि जब इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) की तरफ़ इशारा किया जाय तो वह उन्हें क़त्ल कर दें। प्रोग्राम मुरत्तब होने के बाद रात के वक़्त हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) को बुलाया गया। आप तशरीफ़ लाए , हुक्म था कि बिल्कुल तन्हा तशरीफ़ लायें। आप अकेले आये। जब आप दरबार में दाखि़ल हुए और उन लोगों की नज़रे आप पर पड़ीं जो तलवारें सूते हुए खड़े थे तो वह सब के सब तलवारें फें़क कर आपके क़दमों पर गिर पड़े। यह हाल देख कर मन्सूर ने कहा , इब्ने रसूल अल्लाह आप रात के वक़्त क्यों तशरीफ़ लाये हैं ? आपने फ़रमाया कि तूने मुझे गिरफ़्तार करा के मंगवाया है , अब कहता है क्यों आए हैं। उसने कहा माअज़ अल्लाह कहीं यह भी हो सकता है। आप तशरीफ़ तशरीफ़ ले जायें और क़याम गाह में आराम फ़रमायें। आप वापस चले गये। वहां से मदीना तशरीफ़ ले गये। इमाम (अ.स.) के चले जाने के बाद उन लोगों से पूछा गया कि तुमने खि़लाफ़ वरज़ी क्यों की और उन्हें क़त्ल क्यों नहीं किया ? उन्होंने जवाब दिया कि यह तो वह इमामे ज़माना हैं जो हमारी शबो रोज़ ख़बर गिरी करता है और हमेशा हमारी अपने बच्चों की तरह परवरिश करते हैं। यह सुन कर मन्सूर डर गया और उसे ख़्याल हुआ कि कहीं यह लोग मुझ से इसका बदला न लेने लगें इसी लिये उन्हें रात ही में रवाना कर दिया। ‘‘ सम क़त्ल बिल इसमा ’’ फिर आपको ज़हर से शहीद करा दिया।(दम ए साकेबा पृष्ठ 481 जिल्द 2 प्रकाशित नजफ़) अल्लामा अरबली का कहना है कि आपको क़ैद ख़ाने में ज़हर दिया गया।(कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 100 ) रवायात से मालूम होता है कि आपको कई मरतबा ज़हर दिया गया।(जन्नातुल ख़ुलूद पृष्ठ 28 ) बिल आखि़र आप इस आख़ेरी ज़हर से शहीद हो गये , जो अंगूर के ज़रिये से दिया गया था।(जिलाउल उयून पृष्ठ 268 )
हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की शहादत
उलेमा ए फ़रीक़ैन का इत्तेफ़ाक़ है कि ब तारीख़ 15 शव्वाल 148 हिजरी 65 साल की उम्र में आपने इस दारे फ़ानी से ब तरफ़े मुल्के जावेदानी रेहलत फ़रमाई।(इरशादे मुफ़ीद पृष्ठ 413 आलामु वुरा पृष्ठ 159 नूरूल अबसार पृष्ठ 132 मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 277 ) यौमे वफ़ात दोशम्बा था और मक़ामे दफ़्न जन्नतुल बक़ी है।
अल्लामा इब्ने हजर अल्लामा सिब्ते इब्ने जौज़ी अल्लामा शिब्लन्जी अल्लामा इब्ने तल्हा शाफ़ेई तहरीर फ़रमाते हैं कि ‘‘ माता मस्मूमन अय्यामल मन्सूर ’’ मन्सूर के ज़माने में आप ज़हर से शहीद हुए।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 121, ग़ाएतुल इख़्तेसार पृष्ठ 62 सहा अल अख़बार पृष्ठ 44, तज़किरा ए ख़वासुल उम्मता , नूरूल अबसार पृष्ठ 133, अरजहुल मतालिब पृष्ठ 450 )
उलेमा ए अहले तशीय का इत्तेफ़ाक़ है कि आपको मन्सूर दवानक़ी ने ज़हर से शहीद कराया था और नमाज़ हज़रत इमाम मूसी ए काज़िम (अ.स.) ने पढ़ाई थी। अल्लामा क़ुलैनी और अल्लामा मजलिसी का इरशाद है कि आपको निहायत क़ीमती कफ़न दिया गया और आपके मक़ामे वफ़ात पर हर शब चराग़ जलाया जाता रहा।(किताब काफ़ी व जिलाउल उयून मजलिसी पृष्ठ 269 )
आपकी औलाद
आपकी मुख़्तलिफ़ बीबीयों से दस औलादें थीं जिनमें से सात लड़के और तीन लड़कियां थीं। लड़कों के नाम यह हैं। 1. जनाबे इस्माईल , 2. हज़रत मूसी ए काज़िम (अ स ) , 3. अब्दुल्लाह , 4. इस्हाक़ , 5. मोहम्मद , 6. अब्बास , 7. अली , और लड़कियों के नाम यह हैं। 1. उम्मे फ़रवा , 2. असमा , 3. फ़ात्मा।(इरशाद व जन्नातुल ख़ुलूद) अल्लामा शिब्लंजी ने सात औलाद तहरीर किया है। जिन्में सिर्फ़ एक लड़की का हवाला दिया है जिसका नाम उम्मे फ़रवा था।(नूरूल अबसार पृष्ठ 133 )
आपकी ही औलाद से ख़ुल्फ़ा ए फ़ात्मिया गुज़रे हैं जिनकी सलतनत 267 हिजरी से 567 हिजरी तक 270 साल क़ायम रही। उनकी तादाद 14 थी।
फ़ात्मी ख़ुल्फ़ा
मुवर्रिख़ एहसान उल्लाह अब्बासी अपनी तारीख़े इस्लाम के पृष्ठ 422 में लिखते हैं कि तीसरी सदी हिजरी के आख़ीर में एक बड़ी ज़बर दस्त सलतनत अलवियों की मग़रिब में क़ायम हुई। बनू उमय्या और अब्बासियों के बाद हुदूदे आराजी के हिसाब से नीज़ इस एतेबार से कि अर्से तक बादशाहत क़ायम रही। अलवी सलतनत तीसरे दर्जे में शुमार होती है। बग़दाद से पछिचम अन्दलस तक अलवियों की बादशाहत थी। कुछ दिनों तक शाम , मक्का और मदीने में भी अलवियों का ज़ोर था। साल भर तक ख़ुत्बा ए बग़दाद में मुसतसिर अलवी का नाम लिया गया। अन्दलस ऐसी मुसतक़िल और ज़बर दस्त इस्लामी सलतनत अर्से तक अलवियों का एक सूबा रही।
सलातीने अलविया बा एतेबार ख़ुल्फ़ा ए अब्बासिया ज़्यादा पाबन्दे अहकामे शरिया थे। लहो लाब से उनको परहेज़ था। इस लिये ईसाई मुवर्रिख़ों ने ताअस्सुब की बिना पर अलवियां को मुताअस्सिब लिखा है। 250 सौ बरस से कुछ ज़्यादा अर्से तक यह ख़ान दान क़ायम रहा। चौदहवें बादशाह आज़द पर 567 हिजरी में इसका ख़ात्मा हुआ।
अल्लामा अली हैदर लिखते हैं कि यही सलातीने अलविया ख़ुल्फ़ा ए फ़ात्मीन के नाम से मशहूर हैं। यह हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की नस्ल से थे। इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के बड़े साहब ज़ादे जनाबे इस्माईल अपने वालिदे माजिद की ज़िन्दगी में इन्तेक़ाल फ़रमा गये थे मगर आपकी शादी हो चुकी थी जिनसे उनके बेटे हुसैन अल तक़ी और उनके बेटे अब्दुल्लाह अल मेहदी हुए जो ख़ुल्फ़ा ए फ़ात्मीन के बुज़ुर्ग थे। इसी वजह से इस ख़ान दान को इस्माईलिया कहते हैं। अशना अशरी फ़िरक़े के लोग इन लोगों को ‘‘ शिश इमामी ’’ (छ: इमामों को मानने वाले) भी कहते हैं क्यों कि यह लोग बारह इमामों में से सिर्फ़ 6 इमामों को मानते हैं और हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के बाद हज़रत इमाम मूसी ए काज़िम (अ.स.) को हुक्मे ख़ुदा और रसूल (स अ व व ) के खि़लाफ़ इमाम नहीं मानते बल्कि जनाबे इस्माईल के बेटे मोहम्मद को इमाम मानते हैं और इस अम्र के क़ायल हैं कि इमामत जनाबे इस्माईल ही के औलाद में क़यामत तक रहेगी। हिन्दुस्तान व पाकिस्तान के ‘‘ शिया बोहरों ’’ और आग़ा ख़ानी ख़ोजों का यही मज़हब है। मुवर्रिख़ ज़ाकिर हुसैन लिखते हैं कि 21 रबी उल अव्वल 297 हिजरी मुताबिक़ 909 ई 0 को यह सलतनत क़ायम हुई। इन्तेहाई उरूज के ज़माने की सलतनत बहरे ज़ुल्मात से सहराए शाम तक और बहरे रोम से सहरा ए अफ़रीक़ा तक फैल गई थी। मशरिक़ बलादिउल जज़ाएर , तून्स , तराबलीस , बरक़ा , मिस्र , शाम , यमन जज़ीरा ए सक़ीलह और बहरे रोम के बाज़ और जज़ीरा ए इसमें शामिल थे बल्कि बग़दाद व मूसल तक एक साल तक इनके नाम का ख़ुत्बा पढ़ा गया। इन बादशाहों को उलूम व फ़नून का भी कमाल शौक़ था। ख़ुद भी बड़े आलिम व फ़ाज़िल थे। उन्होंने मिस्र में हर क़िस्म की ऐसी तरक़्क़ी , रौनक़ और रौशनी फैलाई जो उन्हीं के ज़माने में मख़सूस थी। ना इनसे पहले मिस्र को यह दिन नसीब हुआ था ना इनके बाद हुआ। अस्टैलनली लैन पोल लिखता है कि ‘‘ ख़ानदाने फ़ात्मिया की दौलत व हशमत , शान व शौकत और तिजारत , बहरे रोम की ख़ुश हाली का बाएस साबित हुई। ’’ ज़ैल में इस ख़ान दान के चौदह बादशाहों के मुख़्तसर हालात लिखते हैं।
1. जनाबे अबू मोहम्मद अबीद उल्लाह उल मेहदी बिल्लाह आप 260 हिजरी मुताबिक़ 874 ई 0 में बामुक़ाम सल्मीह या कूफ़ा पैदा हुए और आपने सलतनते फ़ात्मीन की बुनियाद क़ायम की। 303 ई 0 से 306 ई 0 तक उन्होंने बनी फ़ात्मा को ख़ारजियों के हाथ से महफ़ूज़ रखने की ग़रज़ से ‘‘ क़ीरोवान ’’ के क़रीब एक मज़बूत शहर और मुस्तहकम क़िला तामीर कराया और उसका नाम ‘‘ महदीया ’’ रख कर किरदार अल हुकूमत क़रार दिया। क़ीरूवान और तराबस को फ़तेह कर के मिस्र की तरफ़ आए। यही ख़लीफ़ा मुक़तदर अब्बासी की तरफ़ से ‘‘ मूनिस ख़ादिम ’’ मुक़ाबला को आया लेकिन कामयाबी जनाबे अबीद उल्लाह ही को होई। आपने तमाम मग़रिबे अक़सा (मराकू) को मुसख़्ख़र कर के फ़ात्मी सलतनत में शामिल कर लिया। मग़रिबे अक़सा की फ़तह के बाद आप इन्दलस फ़तेह करने की तदबीरें कर रहे थे कि अजल आ गई। आपने अपनी सलतनत अपनी हयात ही में बहरे ज़ुल्मात और जज़ाएर ख़ालदात (कज़ीर) तक और बहरे रोम से सहराए अज़ीम अफ़रीक़ा तक फ़ैलाई थी। आपकी खि़लाफ़त ज़बरदस्त और मुस्तएदाना थी।
स्यूती ने लिखा है कि आपने दाद गुस्तरी और फ़य्याज़ी के साथ सलतनत की। लोग आपकी तरफ़ झुके हुए थे। आपका अहदे जुलूस रबीउल अव्वल 297 हिजरी था। आपकी तारीख़े वफ़ात 15 रबी उल अव्वल 322 हिजरी मुद्दते सलतनत 24 साल मुद्दते उम्र 62 साल थी। आप शहरे महदीया में दफ़्न किए गए।
2. जनाबे अल क़ासिम मोहम्मद नज़ार क़ाएम बेअमरिल्लाह बिन मेंहदी आपकी तारीख़े विलादत मोहर्रम 280 हिजरी मुताबिक़ 893 ई 0 तारीख़ जुलूस 15 रबी उल अव्वल 322 हिजरी मुद्दते सलतनत 12 साल 7 माह और मुद्दते उम्र 54 साल 9 माह थी। आप बड़े जंग आज़मूदह थे। अक्सर जंगों में ख़ुद फ़ौज ले कर जाया करते थे।
मिस्टर अमीर अली ने लिखा है कि यह पहले फ़ात्मी ख़लीफ़ा हैं जिन्होंने बहरे रोम पर हुकूमत व एक़तिदार हासिल करने की ग़रज़ से जहाज़ों का एक ज़बर दस्त बेड़ा तैय्यार किया। 224 हिजरी में मग़रिब अक़सा की बग़ावत फ़रो की और ‘‘ रीफ़ ’’ के बनों इदरीस को मुतीय किया। इटली के डाकू फ़ात्मी ख़लीफ़ा के बन्दरगाहों पर लूट मार कर जाया करते थे। इसके रद्दे अमल में आपका सिपह सालार जुनूबी इटली को गीटा तक ताराज करता हुआ शहर ‘‘ जनवा ’’ तक जा पहुँचा। इसने शहर को फ़तेह कर के बहुत से बाशिन्दों को गिरफ़्तार कर लिया। जनवा मुद्दत दराज़ तक ख़ुल्फ़ा ए फ़ात्मीन के क़ब्ज़े में रहा। इनकरवा (लोम बरीडी) का एक हिस्सा भी क़ब्ज़े में आ गया। यक़ीन है कि अगर आपकी अपनी सलतनत में बग़ावत न शुरू हो जाती तो आप पूरे मुल्क ‘‘ इटली ’’ को फ़तेह कर लेते। आपके इस बेड़े ने वापसी के मौक़े पर ‘‘ सारडेना ’’ पर हमला कर के फ़िरंगियों को बहुत सी शिकस्तें दीं फिर क़रक़ीसिया का रूख़ किया जो शाम के साहिल पर वाक़े है। यहां इसने अब्बासियों के जहाज़ को जला दिया और बहुत सा माले ग़नीमत ले कर ‘‘ महदिया ’’ की तरफ़ मरजाअत की। 333 हिजरी में आपके ख़ादिम ‘‘ ज़ैदान ’’ ने इसकनदरया फ़तेह कर लिया। फिर अहले सक़लिया ने बग़ावत की और शाहे क़ुस्तुनतुनिया के बेड़े को अपनी मद्द के लिये बुला लिया। सक़लिया के फ़ात्मी गवरनर ने क़ेला ‘‘ अबू असर ’’ और क़ेला ‘‘ बलूत ’’ फ़तेह कर के जर जन्नत का मोहासेरा कर लिया और आपके बेड़े ने रूमी बेड़े को तबाह कर डाला। आपके ज़माने में अबू यज़ीद खारजी ने बग़ावत की जो मुद्दत दराज़ तक जारी रही। इसी दौरान में बआमिरल्लाह ने बीमार हो कर इन्तेक़ाल किया।
3. जनाबे अबू ताहिर इस्माईली मन्सूर बिल्लाह बिन अल क़ायम आप 302 हिजरी में बा मुक़ाम क़ीरूवान पैदा हुए और 13 शव्वाल 334 हिजरी में सलतनते संभाली और शव्वाल 341 हिजरी में वफ़ात पाई। मुद्दते सलतनत सात साल 16 यौम थी। आपकी उम्र 39 साल थी।
आप बड़े बहादुर , अक़्लमन्द , मुस्तइद , मुस्तक़िल मिजाज़ , ख़ुश ख़ुल्क़ , अदीब लबीब , शायर ,मुक़र्रि , बलीग़ और निहायत मुन्तिज़म थे। आप पहले से सोचे बग़ैर ख़ुत्बा शुरू करते थे और दरिया की रवानी की तरह बयान करते चले जाते थे। आपका ऐसी हालत में बादशाह होतना कि अबू यज़ीद की बग़ावत से तमाम मुल्क में ग़दर मचा हुआ था , साहिले बहर के चन्दक़ेला बन्द शहरों और महदिया (पाए तख़्त) के सिवा कुछ भी क़ब्ज़े में न रह गया था। इन्दलिस के उमवी ख़लीफ़ा नासिर ने मग़रिबे अक़्सा पर क़ब्ज़ा कर लिया था। सलतनत का संभालना और अपने तमाम आबाई मुल्कों पर दोबारह क़ब्ज़ा कर लेना उन्ही का काम था। आपने बादशाह होते ही अबू यज़ीद से ऐसी जंग की कि वह बद हवास हो कर भागा। रबीउल अव्वल 335 हिजरी में उन्होंने अबू यज़ीद का तअक़्कु़ब किया और उसे दबाते चले गए। जंगल बियाबान चले गए , पहाड़ , वादी और दलदलों की कुछ परवाह न की , यहां तक कि उसके पीछे ‘‘ बिलासौदान ’’ के ऐसे वीराने में पहुँचे जहां पानी की एक मश्क एक अशरफ़ी को मिलती थी। ग़रज़ कि सख़्त लड़ाई के बाद अबू यज़ीद मारा गया।
साहेबे अख़्बार अल हक़ाएक़ख् लिखते हैं कि अबू यज़ीद मुलहद था। ख़ुदा ने उसके शर से अहले मग़रिब को निजात दिया दी। वह बहुत बड़ा ज़ालिम था। इसी बादशाहे मन्सूर ने ब मुक़ाम ‘‘ फ़तेह ’’ मन्सूरिया कि तामीर की और इसके गवर्नर ‘‘ हसन ’’ ने शहर ‘‘ रेओ ’’ के वस्त में मस्जिद बनवाई।
4. जनाबे अबू तमी मोअज़लउद्दीन अल्लाह बिन मन्सूर आप 11 रमज़ानुल मुबारक 313 हिजरी में ब मुक़ाम ‘‘ महदिया ’’ पैदा हुए। शव्वाल 341 हिजरी में सलतनत संभाली। 15 रबीउल आखि़र 356 हिजरी को क़ाहेरा में वफ़ात पाई। 23 साल 6 माह हुकूमत की , 45 साल 7 माह आपकी उम्र थी।
आप निहायत ज़ैरिक और बाहोश बादशाह थे। मुख़ालिफ़ों ने भी आपको बादशाह दाना , मुस्तइद , बहादुर , सख़ी , मुनसिफ़ , आदिल , करीमउल एख़लाक़ , साइन्स व फ़लसफ़े में माहिर , उलूम व फ़नून का बड़ा मुरब्बी , साहेबे अराए अमूर मम्लेकत से आगाह , इल्मे नुजूम व हय्यत का शाएक़ व माहिर लिखा है।
उलूम व फ़ुनून की क़द्र दानी के लेहाज़ से बाज़ मोवर्रेख़ों ने उन्हें मग़रिब का ‘‘ मामून ’’ लिखा है। माअज़ के अहदे हुकूमत में शुमाली अफ़रीक़ा ने आला दर्जे की तहज़ीब और खु़श हाली हासिल की। लोग फ़ारिग़ुल बाली और ख़ुश हाली में बसर करते थे। बादशाह ने मुल्क के अन्दरूनी फ़साद और हंगामें सख़्ती से फ़रो किए। इन्तेज़ाम असली उसूल की बुनियाद पर क़ाएम किया। तमाम कामों के वास्ते क़वाएद व ज़वाबित मुरत्तिब किए। अमन क़ाएम रखने के लिये फ़ौज के साथ मलेशिया भी क़रार दिया। फ़ौज और बेड़े को अज़सरे नव तरतीब दिया और तिजारत व सनत व हिरफ़त को भी पूरा फ़रोग़ दिया।
मुवर्रिख़ इब्ने ख़ल्दून ने लिखा है कि ‘‘ चूंकि मोइज़उद्दीन अल्लाह नरम मिजाज़ और रहम दिल थे और ख़ुदा ने एक अजीब व ग़रीब शऊर व लियाक़त इनको अता की थी। वह सरदार भी जो उनके आबाओ अजदाद के ख़ून के प्यासे थे वह चाहे दिल से ना हों लेकिन बा ज़ाहिर उस पर जान देते थे। माअज़ उनके साथ अच्छा बरताव करता था। ’’(तारीख़े इस्लाम मिस्टर ज़ाकिर हुसैन पृष्ठ 116 )
मुवर्रिख़ अब्बासी लिखते हैं सलतनत ने इसके ज़माने में ऊरूज पकड़ा। मिस्र , इस्कन्दरिया , मक्का और मदीना तमाम मुक़ामात अब्बासियों के तसर्रूफ़ से निकल कर उसकी सलतनत में शामिल हुए। शाम पर भी इसका दख़ल हो गया। क़ाहेरा इसका आबाद किया हुआ शहर अब तक मिस्र का दारूल ख़ेलाफ़ा है। इस बादशाह ने मिस्र को अपना दारूल ख़ेलाफ़ा क़रार दिया और फिर बराबर सलतनते इस्माईला का यही दारूल ख़ेलाफ़ा रहा।(तारीख़े इस्लाम पृष्ठ 464 ) इन्दलस के उमवी ख़लीफ़ा ‘‘ नासिरउद्दीन अल्लाह ’’ ने एक ऐसा बड़ा तिजारती जहाज़ बनवाया कि इस वक़्त तक दुनियां कि किसी सलतनत ने इतना बड़ा जहाज़ तैय्यार नहीं किया था। इस जहाज़ ने ‘‘ माअज़ुद्दीनउल्लाह ’’ के जहाज़ को लूट लिया तो आपने एक ज़बर दस्त बेड़ा तैय्यार करा के इन्दलिस पर हमला करने की ग़र्ज़ से रवाना कर दिया। उस बेड़े ने ‘‘ मरयह ’’ की लंगर गाह में घुस कर तमाम जहाज़ों को फ़ूंक दिया। पहले जहाज़ को गिरफ़्तार कर लिया और ख़ुश्की में उतार कर क़त्ल व ग़ारत गरी का बाज़ार गरम कर दिया और बहुत कुछ माले ग़नीमत ले कर वापस पलटा। इसके बाद भी यह उमवी और फ़ात्मी बादशाह आपस में लड़ कर आपनी क़ुव्वत ज़ाया करते रहे , वरना ऐसे ज़बर दस्त थे कि अगर इनमे इत्तेहाद होता तो इस वक़्त तमाम यूरोप को फ़तेह कर लेना कोई बड़ी बात न थी। 347 हिजरी के ख़त्म होते होते हुदूदे मिस्र से साहिल बहर उक़यानूस तक फिर तमाम ममालिक पर फ़ात्मी ख़लीफ़ा का क़ब्जा़ हो गया। 352 हिजरी में रूमियों से सख़्त लड़ाई हुई। मुसलमानों ने फ़तेह पाई और बहुत से रूमी गिरफ़्तार कर लिये गए। 351 हिजरी से 352 तक जज़ीरा ए सक़लिया से रूमियों की सलतनत बिल्कुल नीस्त व नाबूद कर दी गई। 359 हिजरी में यूरोप की फ़ौजों ने जुनूबी इटली के मुसलमानों पर चढ़ाई की मगर सब कोशिश बेसूद साबित हुईं। 357 हिजरी में अहले मिस्र की दरख़्वास्त पर इनकी फ़रियाद रसी करने के लिये ‘‘ अबू अल हसन जौहर ’’ को एक लाख से ज़्यादा सवार और बारह सौ से ज़्यादा माल के सन्दूक़ दे कर मिस्र की तरफ़ रवाना कर दिया। जौहर को पूरी कामयाबी नसीब हुई। ‘‘ शहर क़ाहिरया माज़िया ’’ को आबाद करके दारूल हुकूमत बना दिया। मिस्र से अब्बासियों का सिक्का और ख़ुत्बा मौकूफ़ कर के माजलदैन उल्लाह के नाम का सिक्का व ख़ुत्बा जारी किया। ‘‘ नमाज़ में हय्या अला ख़ैरिल अमल ’’ फिर से जारी किया गया नमाज़ में ‘‘ बिस्मिल्लिाह हिर्ररहमान निर्रहीम ’’ बा आवाज़े बुलन्द पढ़ने लगा और और ख़ुत्बे के बाद ‘‘ अल्लाह हुम्मा सल्ले अला मोहम्मदे मुस्तफ़ा (स अ व व ) व अला अली मुर्तुज़ा (अ.स.) व अला फ़ातेमतुल बुतूल (अ.स.) व अला अल हसन (अ.स.) व अल हुसैन (अ.स.) सिब्ते रसूल अल लज़ी अजहब अनल्लाहा अन्हुम रिजस व तहर हुम्मा ततहीरा व सल्लेअला आइम्मतुत ताहेरीन अबनाआ अमीरल मोमेनीन अलख़ ’’ पढ़ा जाने लगा और अहले बैत (अ.स.) के फ़ज़ाएल बयान होने लगे। इसके बाद जौहर ने बादशाह के हुक्म से ‘‘ जामए अज़हर ’’ तामीर की जो इस वक़्त अहले इस्लाम की सब से बड़ी यूनीवर्सीटी है। 364 हिजरी में ‘‘ ईदे ग़दीर ’’ मिस्र में पहली बार कमाले शान व शौकत से मनाई गई।
जौहर ने मिस्र फ़तेह करने के बाद शाम फ़तेह कर लिया और अब्बासियों का ख़ुत्बा मौकूफ़ करके फ़ात्मी बादशाह का ख़ुत्बा जारी कर दिया। 363 हिजरी में मक्का और मदीना में भी माअज़ के नाम का ख़ुत्बा मुस्तक़िल तौर पर जारी हो गया।
मुवर्रिख़ हबीब उस सियर ने लिखा है कि माअज़ ने ऐसी अदालत और सख़ावत के साथ सलतनत की कि इससे ज़्यादा ख़्याल में नहीं आ सकती। पन्द्रह हज़ार ऊँट और दस हज़ार ख़च्चर ज़र से लदे हुए अफ्रीक़ा से क़ाहेरा ले कर आए। उन्होंने ख़ज़ान्ची को हुक्म दे रखा था कि वह हर रोज़ चन्द सन्दूक़ पुर ज़र दरबार में ला कर रखे। चुनान्चे वह ऐसा ही करता रहा। बादशाह का हुक्म था कि हर मोहताज एक मुठ्ठी ज़र उस में से ले ले। मक़रयज़ी ने लिखा है कि माज़ का ख़ुत्बा तमाम ममालिके मग़रिब , मिस्र , शाम , हेजाज़ और बाज़ एराक़ के ईलाक़ों में पढ़ा जाता था।
5. जनाबे अबू मन्सूर नज़ार अज़ीज़ बिल्लाह बिन माअज़ आप 14 मोहर्रमुल हराम को महदिया में पैदा हुए। 15 रबीउस्सानी 365 हिजरी में तख़्त नशीं हुए और 28 रमज़ान 386 हिजरी में इन्तेक़ाल कर गए। आपकी सलतनत की मुद्दत 21 साल 5 -6 माह और आपकी उम्र 42 साल 8- 9 माह थी।
आप जवाद , करीम , शुजा , अक़ील , हलीम , साबिर , ख़ुश इख़्लाक़ और कसीरूल अफ़ू थे। दुशमन पर रहम करते थे और उसे माल व ज़र देते थे। आप आलिम व फ़ाज़िल और ज़बर दस्त अदीब व शायर थे। आपके एक फ़रज़न्द का ईद के दिन इन्तेक़ाल हो गया तो आपने चन्द अशआर कहे। जिनमें से वाज़े किया कि आले मोहम्मद (अ.स.) हमेशा मसाएब में मुब्तिला रहे हैं। लोगों की ईदें ख़ुशी में गुज़रती हैं और हमारी ईद मातम में।(यतीमुल अल दहर सालबी) आपको इमारतों की तामीर का बड़ा शौक़ था। मिस्र में बहुत सी इमारतें आपकी यादगार हैं। आपके अहद में हमस , हमात , शैहज़र और हलब फ़तेह हो कर फ़ात्मी सलतनत में शामिल हुए। मूसल , मदाएन , कूफ़ा , अन्बार वग़ैरह में आपके नाम का ख़ुत्बा और सिक्का जारी हुआ। यमन मे भी आपके नाम का ख़ुत्बा पढ़ा गया। आपके अहद में फ़ात्मी सलतनत दरिया ए फ़ुरात के किनारे बहरे ज़ुल्मात तक फ़ैली हुई थी और अरब का तमाम मग़रबी हिस्सा मिन्तहा ए यमन तक उसमें शामिल था। इन्देलिस से बनी उमय्या ने जो बाज़ इलाक़े मग़रिब अक़सा के दबा लिये थे आपने इन सब को वापिस ले लिया और 371 हिजरी में इससे सब लोगों को बरतरफ़ कर दिया। अजदुद दौला विलाबू यही से आपने दोस्ताना मरास्लत जारी थी। आपने 386 हिजरी में वफ़ात पाई जिससे फ़ात्मी ख़ुलफ़ा की अज़मत व शौकत को बड़ा नुकसान पहुँचा। मोर्वेख़ीन ने लिखा है कि इस बादशाह के अहद में लोगों के दिन ईद और रात शबे बारात की तरह गुज़र रहे थे।
6. अबू अली मन्सूर हाकिम ब अमर अल्लाह बिन अज़ीज़ आप 23 रबीउल अव्वल 375 हिजरी को क़ाहेरा में पैदा हुए। 28 रमज़ान 386 हिजरी को तख़्त नशीन हुए। 27 शव्वाल 411 हिजरी को इन्तेक़ाल फ़रमाया। 25 साल 29 दिन तक सलतनत की और 36 साल 7 माह की उम्र पाई। आप 11 साल की उम्र में बादशाह हुए। मुवर्रिख़ अब्बासी ने लिखा है कि यह बड़ा मुतशर्रह बादशाह था। उसने औरतों के लिये पर्दे में सख़्ती की , मुस्करात की ख़रीद फ़रोख़्त बन्द की। उसके वक़्त मे इन्तेज़ामें शहर भी अच्छा था। क़ाहेरा में मस्जिदे अज़हर इसी ने बनवाई।(तारीख़े इस्लाम पृष्ठ 425 ) इब्ने जूलाक़ ने लिखा है कि ख़लीफ़ा हाकिम सख़ी , शुजा , मुनसिफ़ , आलिम और साहेबे करामत था। साहेबे हबीब उस सियर ने लिखा है कि बादशाह आदिल और ख़ुदा तरस था। उसने मदरसे बनवाए। उनके लिये जागीर वक़्फ़ की और उनमें आलिम व फ़क़ीह मुक़र्रर किए। हुक्म था कि ख़लीफ़ा के वास्ते ज़मीन बोसी न की जाए। न सलाम के वक़्त हाथ चूमा जाए। आम इजाज़त थी कि जिसका दिल चाहे बादशाह से मिल कर बराहे रास्त शिकायत पेश करे।
यह ख़लीफ़ा आला दर्जे का हैसियत दां था इसकी किताब चार जिल्दों में थी। 27 शव्वाल 411 हिजरी में एक पहाड़ पर किसी दुश्मन ने तन्हा पाकर हलाक कर दिया। मिस्टर अमीर अली ने लिखा है कि हाकिम बड़ी फ़य्याज़ी तन्देही से इल्म और साईंस की तरक़्क़ी में कोशिश करते थे। शाम और मिस्र में उन्होंने बहुत सी मस्जिदे , कालिज और रसद ख़ाने तामीर कराए।
7. जनाबे अबू अल हसन अली ज़ाहिर ला अज़ाज़ दीन अल्लाह बिन हाकिम आप 10 रमज़ान 395 हिजरी बमुक़ाम क़ाहेरा पैदा हुए। 4 ज़ीक़ाद 411 हिजरी को तख़्त नशीन हुए। 15 शाबान 427 हिजरी को फ़ौत हुए। 15 साल 10 माह सलतनत की और 22 साल की उम्र पाई।
मुवर्रिख़ अब्बासी लिखते हैं कि यह बादशाह बड़ा नेक नाम था। इसकी नेक नामी सुन कर अमाएद ख़ुरासानी हज कर के फिरे , तो मिस्र होते हुए आए और वहां से खि़लअत लाए। महमूद सुबूक़तग़ीन को इसकी ख़बर लग गई , उसने फ़ौरन ख़लीफ़ा को बग़दाद मुत्तिला किया। हुज्जाज मिस्र से आ कर अभी बग़दाद पहुँचे ही थे कि ख़लीफ़ा ने उनसे बाज़ पुर्स की और उनकी खि़लअत जला दिए। इससे मालूम होता है कि महमूद को भी फ़ात्मी ख़ुलफ़ा से ख़ौफ़ था और यहीं से यह भी मालूम होता है कि दयालमा मुलूक ग़ज़नी सलजूक़ी वग़ैरा सब ख़ुलफ़ा बग़दाद की ख़ातिर इस लिये भी करते थे कि फ़ात्मी ख़ुलफ़ा से दूबदू मुक़ाबेला करने को मसालेहत के खि़लाफ़ जानते थे। सलातीन अलवी को ज़ोरे बाज़ू के अलावा वह जो इज़्ज़ते ख़ासो आम नज़रों में हासिल थी वह इन ग़ैर क़रशी अल नस्ल सलातीन के लिये बहुत ज़्यादा परेशान कुन थी।(तारीख़े इस्लाम पृष्ठ 425 )
आपने इस्माईल मज़हब को कमाले रौनक़ के साथ रवाज दिया। 418 हिजरी में क़ैसर से सुलह हुई और उसने अपने मुल्म में जनाब ज़ाहिर का ख़ुत्बा पढ़ने की मुसलमानों इजाज़त दे दी। कु़स्तुनतुनया में मस्जिद बनाई गई और इसमें मोअजि़्ज़न मुक़र्रर किया गया।
साहेबे हबीब उस सैर लिखते हैं कि आप अपने आबाओ अजदाद की तरह मुनसिफ़ और नेक सीरत थे , साहब रौज़तुस अल पृष्ठ का बयान है कि जनाबे ज़ाहिर की फ़रते सियासत और कमाले कयासत की वजह से तमाम फ़ितने फ़रो हो गए और दीन दुनियां के उमूर मुस्तक़ीम हो गए लेकिन आप ही के अहद से फ़ात्मी सलतनत का इनहेतात(ज़वाल) शुरू हो गया।
8. जनाबे अबू तमीम माअद मुस्तनसिर ब अम्र अल्लाह बिन ज़ाहिर आप जमादिउस्सानी 420 हिजरी में बामुक़ाम क़ाहेरा पैदा हुए। 15 शाबान 427 हिजरी में तख़्त नशीनी अमल में आई। 18 ज़िलहिज को आप की वफ़ात हुई। 60 साल 4 माह हुकूमत कर के 67 साल की उम्र में दुनियां से रेहलत की।
मुवर्रिख़ अब्बासी लिखते हैं कि क़ायम बिल्लाह अब्बासी ने वाली ए अफ़रीक़ा से साज़िश कर के उनको नुक़सान पहुँचाना चाहा लेकिन इसकी हिकमत कारगर न हुई और इसके बदले में मुसतनसर के इशारे से ‘‘ बसासीरी ’’ ने क़ाएम को बग़दाद में क़ैद कर के साल भर तक मुस्तनसर का नाम बग़दाद के ख़ुत्बे में क़ायम रखा। मुसतनसर के अहद में अब्बासियों का ख़ातमा हो जाता लेकिन तोग़रल बेग ने आ कर ‘‘ बसा सैरी ’’ को मग़लूब कर दिया और क़ायम बिल्लाह को बड़े एज़ाज़ के साथ फिर तख़्त पर बिठा दिया इसी सुलोह में अपने लिये रूकनुकदीन का खि़ताब हासिल किया।(तारीख़े इस्लाम पृष्ठ 426 ) 479 हिजरी में ‘‘ हसन बिन सबाह ’’ जो बाद में नजरिया इस्माईलीयों के पेशवा हुए , ताजिरो के लिबास में मुसतनसर के पास आए। सात साल तक मिस्र में रहे फिर मुसतनसर की तरफ़ से ख़ुरासान व बिलादे अजम दाई मुक़र्रर हुए। हसन ने पहले मख़्फ़ी तौर पर फिर एलानिया बिलादे अजम में इस्माईली दावत फ़ैलाना शुरू कर दी और क़िलों पर क़ब्ज़ा कर के हुकूमत क़ायम कर ली। रूख़्सत होते वक़्त उन्होंने मुस्तनसर से पूछा था कि आपके बाद मेरा इमाम कौन है ? मुसतनसर ने अपने साहबज़ादे नजा़र को बताया था। जनाबे मुसतनसर के तीन बेटे थे। 1. नज़ार , 2. अहमद मुस्तम्ली , 3. मोहम्मद।
9. जनाबे अबुल क़ासिम अहमद मुस्तम्ली बिल्लाह बिन मुस्तनसर आप 20 शाबान 467 हिजरी को पैदा हुए। 18 ज़िलहिज 487 हिजरी को बादशाह क़रार पाये। 17 सफ़र 495 हिजरी को 28 साल की उम्र में वफ़ात पाई मुद्दते सलतनत 7 साल 3 माह थी।
अगर चे जनाबे मुस्तन्सिर ब अमरे अल्लाह अपनी ज़िन्दगी में अपने बड़े बेटे जनाबे नज़ार को वली अहद मुक़र्रर किया था मगर वज़ीरे आज़म अफ़़ज़ल में और उनमें आपसी दुश्मनी थी इस लिये अफ़ज़ल ने नज़ार को हटा कर जनाबे अहमद को मुस्तम्ली के लक़ब से ख़लीफ़ा बना दिया। जनाबे नज़ार और अफ़ज़ल में जंग छिड़ गई। बिल आखि़र नज़ार गिरफ़्तार हो कर मुस्तमली के हवाले कर दिये गये। नज़ारी इस्माईली कहते हैं कि जनाबे नज़ार के फ़रज़न्द हादी क़ैद से निकल कर बिलादे अजम में चले गये थे और यहां जनाबे हादी से ‘‘ अल मौत ’’ के इस्माईली इमाम पैदा हुए। उस वक़्त से इस्माईलियों के दो फ़िरक़े हो गये। एक नज़ार , यह जो जनाबे नज़ार और उनकी औलाद को इमामे बरहक़ मानता है वह हसन बिन सियाह के मुक़ल्लिद और हिन्द पाक के आग़ा ख़ानी ख़ोजे हैं। दूसरी वह जो मुस्तमली और उनकी औलाद को इमामे बरहक़ मानते हैं और मस्त अलविया कहलाते हैं। वह शिया बोहरे हैं।
10. अबू अली मन्सूर अम्र बा अहकाम अल्लाह बिन मुस्तमली आप 13 मोहर्रमुल हराम 490 हिजरी मुताबिक़ 1096 ई 0 को पैदा हुए। 17 सफ़र 495 हिजरी को तख़्त नशीन हुए और 29 साल 8 माह हुकूमत कर के 34 साल की उम्र में 3 ज़ीक़ाद 524 हिजरी को वफ़ात पा गये। मुवर्रिख़ अब्बासी लिखते हैं कि इसके अहद में शिमाली ईसाई से बड़ी लड़ाई हुई और मुसलमान ग़ालिब आये। इन शिमाली ईसाईयों को अहले फ़िरंग लिखते हैं कि इस वक़्त में शाम में एक ख़ानदान नज़ारिया नाम का साहेबे हुकूमत हुआ और चंद मुल्क अलवियों के इस ख़ानदान के क़ब्ज़े में आ गया। इसकी कोई औलाद न थी इस लिये अपने चचा हाफ़िज़ को उसने वली अहद मुक़र्रर किया।(तारीख़े इस्लाम पृष्ठ 426 ) आपने जवान हो कर वज़ीरे आज़म अफ़ज़ल को क़त्ल कर दिया। आप करीम और जवाद थे , आपके ज़माने में आपकी और आपके मुताअल्लेक़ीन की कसरते जूदो अता से लोग कमाल ऐश व इत्मेनान में बसर करते थे। मिस्र में कोई शख़्स ज़माने या इफ़लास का शाकी नहीं मिलता था। आप हाफ़िज़े क़ुरआन भी थे। नज़ारिया फ़िरक़े के लोग मुस्तअलीयों और उनके इमामों से सख़्त दुश्मनी रखते थे और मुद्दत से जनाबे आमिर की ताक में थे। एक दिन 425 हिजरी में आपको हलाक कर दिया। मस्तअलीयों (बोहरों) का एतेक़ाद है कि जनाबे अम्र ने 2 साल चन्द माह के एक साहब ज़ादे अबुल क़ासिम तय्यब को छोड़ कर इन्तेक़ाल कियाा और अपने चचा ज़ाद भाई अब्दुल मजीद मम्यून बिन अबील क़ासिम मुस्तन्सिर को हाफ़िजु़द्दीन अल्लाह के लक़ब से उनका निगरां मुक़र्रर किया था कि खि़लाफ़ते ज़ाहेरिया का इन्तेज़ाम करें और जब तय्यब लायक़ हो जाय तो खि़लाफ़त उनके सिपुर्द कर दें मगर दो साल के बाद हाफ़िज़ ख़ुद ख़लीफ़ा बन गए और जनाबे तय्यब ने रूपोशी इख़्तेयार कर ली। इस अम्र की ख़बर पहले से इमाम अम्र ने अपने अकाबिर ‘‘ दाअता ’’ को दे दी थी और हुक्म दिया था कि शम्से इमामत के सतर में जाने का वक़्त आ गया है। जब हाफ़िज़ की नज़र में फ़र्क़ देखो उसी वक़्त मेरे फ़रज़न्द को ले कर रूपोशी इख़्तेयार करना और ऐसा ही हुआ। अब बोहरे हज़रात उन इमाम तय्यब की नस्ल दर नस्ल इमाम का हर ज़माने में वजूद होना वाजिब जानते हैं और यही उनका एतेक़ाद है।(तारीख़े इस्लाम मिस्टर ज़ाकिर हुसैन जिल्द 1 पृष्ठ 126 )
10. जनाबे अब्दुल मजीद मम्यून हाफ़िज़उद्दीन अल्लाह आप मोहर्रम 467 हिजरी में पैदा हुए। तीन ज़िक़ाद 524 हिजरी को तख़्त नशीन हुए और 19 साल 7 माह हुकूमत कर के 77 साल की उम्र में 5 जमादिल आखि़र 544 हिजरी को इन्तेक़ाल कर गये। आप नज़र बन्दी में बसर करते थे। आपका वज़ीर अहमद कुल उमूरे सलतनत पर हावी था यह अज़ीम अशना अशरी था और ब रवायत किरमानी हाफ़िज़ ने भी मज़हबे इसना अशअरी का इज़हार कर दिया था। वज़ीर अहमद ने बारहवें इमाम मोहम्मद मेहदी (अ.स.) के नाम का सिक्का और कुत्बा भी जारी कर दिया था। 15 मोहर्रम 526 हिजरी को वज़ीर अहमद क़त्ल कर दिया गया और 544 हिजरी में जनाबे हाफ़िज़ का इन्तेक़ाल हो गया। आपकी तमाम उम्र वज़ीरों की हुकूमत में गुज़री जो वह चाहते करा लेते। मक़रेज़ी ने लिखा है कि हाफ़िज़ मुदब्बिर , सियासत दां , कसीरूल मुदारात आरिफ़ और इल्मे नजूम में शाएक़ थे। आप पर हिल्म ग़ालिब था। आपको दर्दे कूलजं की शिकायत रहती थी। आपके तबीब ने एक तबल बन वाया था जिसकी आवाज़ से उन्हें फ़ाएदा पहुँचा था। हाफ़िज़ के बाद आपकी हस्बे वसीअत आपके बेटे ‘‘ अबू मन्सूर इस्माईल ’’ बादशाह हुए।
12. जनाबे अबू मन्सूर इस्माईल ज़फ़र बाअम्रअल्लाह बिन हाफ़िज़ आप 5 रबीउस्सानी 527 हिजरी को पैदा हुए और 5 जमादिउस्सानी 544 हिजरी को तख़्त नशीन हुए और 4 साल 7 माह हुकूमत कर के 21 साल 9 माह की उम्र में 15 मोहर्रमुल हराम 549 हिजरी को इन्तेक़ाल कर गए। आप ज़माना हुकूमत में बेबस थे। वज़ीर बादशाही करते थे। बग़ावतें , रक़ाबतें साज़िशें और फ़िरक़ा बंदियां फ़ैल गईं थी। मोहर्रम 549 हिजरी में आप क़त्ल कर दिये गए।
13. जनाबे अबू अल क़ासिम ईसा फ़ाएज़ ब नस्रअल्लाह बिन जा़फ़र आप 21 मोहर्रम 544 हिजरी में पैदा हुए। 15 मोहर्रम 549 हिजरी को तख़्त नशीन हुए और 6 साल 6 माह बराए नाम हुकूमत कर के 11 साल 6 माह की उम्र में 15 रजब 555 हिजरी को इन्तेक़ाल कर गए।
मुवर्रिख़ अब्बासी लिखते हैं कि अहले फ़िरंग से इसके वक़्त में भी लड़ाई रही। बेलादे ग़रबी पर अहले फ़िरंग का जो क़ब्ज़ा हो चुका था वह मुसतहकम हुआ और कुछ हिस्सा मुल्क उसने वापस भी ले लिया।(तारीख़े इस्लाम पृष्ठ 427 ) आप तमाम उम्र मर्ज़ सरह में मुब्तिला रहे।
सालेह बिन ज़ैरिक उनका वज़ीर था जो उस अहद में दर अस्ल बादशाही करता रहा था। वह बड़ा फ़ाज़िल सख़ी था और अहले इल्म से बड़ी मोहब्बत करता था। कातिब , अदीब और आला दर्जे का शायर था। अज़रूए फ़ज़ल व अक़ल व सियासत व ततबीर अपने ज़माने का सब से बड़ा शख़्स था। शकल में रोब दार सितवत में अज़ीम था। नीज़ बड़ा पक्का असना अशअरी था। खि़लाफ़ते जनाबे अमीर में ज़बर दस्त किताब लिखी। लोगों से मनाज़रे किए। वज़ीर होते ही शिया मज़हब का इज़हार किया। नेहायत ख़ूबी से हुकूमत की। आखि़र उम्र तक फ़िरंगियों से लड़ता रहा। तमाम मुमालिक के अहले इल्म इसके पास आते दुरे मक़सूद से दामन भर कर वापस जाते थे।
अल्लामा मक़रेज़ी(अलख़त्त जिल्द 4 पृष्ठ 81 ) में लिखा है कि सालेह बिन ज़ैरिक अरमनी क़ौम के अस्ना अशरी मज़हब का एक फ़कीर था। एक दिन ज़्यारते रौज़तुल अमीरल मोमेनीन (अ.स.) के लिये नजफ़े अशरफ़ गया। हज़रत ने उसी शब रौज़े के ख़ादिम ‘‘ सय्यद इब्ने मासूम ’’ से ख़्वाब में फ़रमाया कि तलाया बिन ज़रीक हमारे महबूबों में से हैं उससे कह दो कि वह मिस्र चला जाए। मैंने उसे मिस्र का वाली बना दिया है। सय्यद ने तलाए को बुला कर ख़्वाब बयान किया वह फ़ौरन मिस्र पहुँच कर सल्तनत का मुलाज़िम हो गया। फिर चन्द दिनों में मिस्र का बादशाह हो गया। इसका असली नाम तलाया बिन जै़रिक था। मिस्र में कारे नुमाया करने की वजह से इसका खि़ताब ‘‘ मलक सालेह ’’ हो गया।
(मोअल्लिफ़) मैं कहता हूँ कि मक़रेज़ी के इस बयान से सय्यद इस्माईल शहीद देहलवी के इस बयान की ताईद होती है जिसमें उन्होंने कहा है कि ‘‘ दुनियां के तमाम बादशाहों का तक़ररूर और तनज़्ज़ुल अली इब्ने अबी तालिब (अ.स.) करते हैं ’’ मुलाहेज़ा हो मौसूफ़ की किताब ‘‘ सिरातल मुस्तक़ीम ’’
14. अबू मोहम्मद अल्लाह आज़लुद्दीन अल्लाह बिन युसूफ़ बिन हाफ़िज़ आप 20 मोहर्रमुल हराम 546 हिजरी मुताबिक़ 1151 को पैदा हुए। 17 रजब 555 हिजरी को तख़्त नशीन हुए और 11 साल 6 माह बराए नाम हुकूमत की और 21 साल की उम्र में 10 मोहर्रमुल हराम 567 हिजरी में इन्तेक़ाल कर गए।
मुवर्रिख़ अब्बासी लिखते हैं कि इसके अहद में अहले फ़िरंग साहिल शरक़ी व ग़रबी से आते आते मिस्र तक पहुँच गए और मिस्र पर क़ाबिज़ हो गए। ग़ैर मुसलमानों का मिस्र पर क़ाबिज़ होना ‘‘ नूरूद्दीन मोहम्मद ’’ वाली शाम को बहुत गराँ गुज़रा। उसने मिसरियों की मद्द के लिये फ़ौज भेजी जो अहले फ़िरंग पर ग़ालिब आई। शामियों ने अहले फ़िरंग को निकाल बाहर कर दिया लेकिन ख़ुत्बे में आज़िद के बजाए ‘‘ मस्तज़ी बाअल्लाह ’’ अब्बासी का नाम दाखि़ल कर दिया। इसी ज़माने में ‘‘ आज़िद ’’ भी मर गया और इसके साथ ही सलातीने अलविया इस्माईल का ख़ात्मा हो गया और बनू मेहदी का नाम मिट गया।(तारीख़े इस्लाम पृष्ठ 427 )
आप 10 साल की उम्र में ख़लीफ़ा हुए। सालेह ने अपनी बेटी उनसे ब्याह दी और सालेह तमाम उमूरे सलतनत पर हावी रहा। मगर 19 रमज़ान 556 हिजरी को बेचारा क़त्ल कर दिया गया। ख़लीफ़ा ए आज़द ने उसकी वफ़ात के बाद अहले सुन्नत से एक शख़्स ‘‘ सलाहुद्दीन यूसुफ़ ’’ को वज़ीर बना लिया। उसने बेवफ़ाई की और तमाम उमूरे सलतनत पर हावी हो कर ख़लीफ़ा को बे दख़ल कर दिया और शिया क़ाज़ियों को माज़ूल कर तमाम मुल्क में शाफ़ई क़ाज़ी मुक़र्रर किए। इस वक़्त से मुल्के मिस्र में मज़हबे शिया ख़त्म होने लगा और मज़हबे मालकी और शाफ़ई ज़ोर पकड़ने लगा। मोहर्रम 567 हिजरी में सलाहुद्दीन ने ख़लीफ़ा ए आज़द ख़ुत्बा भी मिस्र से बन्द कर के मुस्तज़ी अब्बासी का ख़ुत्बा जारी कर दिया। ख़लीफ़ा आज़िदउद्दीन अल्लाह ने आशूर मोहर्रम 567 हिजरी को इन्तेक़ाल किया। आपकी वफ़ात से सलतनते फ़ात्मीन का सितारा जो मुमालिके अफ़रीक़ा व मिस्र में 270 साल से चमक रहा था बिल्कुल ग़ुरूब हो गया।
फ़ात्मी ख़ुलफ़ा के अहद में जो बरकतें मिस्र को नसीब हुई वह किसी बादशाह के अहद में नहीं हुए। उलूम फ़नून तिजारत व हिरफ़त सबको कमाले तरक़्क़ी हुई। शफ़ाख़ाने , मदरसे , मस्जिदें और रेफ़ाह आम की दूसरी बेशुमार इमारतें और औक़ाफ़ा मुद्दतों यादगार हैं। ‘‘ शिया युनीवर्सिटी ’’ जामए अज़हर इसी अहद की रहती दुनियां तक के लिये यादगार है। एक लाख तीस हज़ार किस्म की 16 लाख किताबों का कुतुब ख़ाना इसी अहद में मुरत्तब हुआ था। जामा मस्जिदें बनवाईं गईं थी। 1. जामा अज़हर , 2. जामा माज़िया , 3. जामा नूर , 4. जामा हाकिम जो अपनी शान व शौकत के लिहाज़ से बड़ी पुर अज़मत थी। उन्हीं के अहद में क़ाहेरा की ख़ास इमारत हुसैनिया (इमाम बाड़ा) थी जिसमें अय्यामे अज़ा में मजालिस मुनअक़िद की जाती थीं जिनमें बादशाह और रेआया सब शरीक होते थे।(तारीख़े इस्लाम मिस्टर ज़ाकिर हुसैन जिल्द 1 पृष्ठ 133 )
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1. यह अम्र क़ाबिले ज़िक्र है कि खि़लाफ़ते फ़ात्मीया के ख़त्म होते ही जामए अज़हर में शियों का दाख़ला ममनूआ क़रार दे दिया गया था जिसका सिलसिला अब तक बाक़ी रहा लेकिन अहदे जमाल अब्दुल नासिर में डा 0 शलतूत ने इस मुमानियत को ख़त्म करके शिया फ़िक़ह की किताबें शरहे लुमआ व तब्सेरतूल मुतालेमीन को दाखि़ले निसाब कर दिया।
अल ईज़ा इमाम शरक़ावी लिखते हैं कि ख़ुल्फ़ा ए बनी उमय्या 14 ख़ुलफ़ा ए बनी अब्बास 37 और ख़ुल्फ़ा ए बनी फ़ात्मा 15 थे और वह यह भी लिखते हैं कि फ़ात्मी ख़ुल्फ़ा में 650 हिजरी तक खि़लाफ़र रही ‘‘ काना यज़अन बक़ाए हाफ़ेहुम ऐला अन यस मूहालम हुदा फिल आखि़रूज़ ज़मान ’’ वह यह गुमान करते थे कि यह हुकूमत उन्हीं में उस वक़्त तक रहेगी जब तक ज़हुरे क़ायमे आले मोहम्मद न होगा। उनके ज़हुर के बाद उसे उनके सिपुर्द कर देगें।(तोहफ़तुल नाज़ेरीन बर हाशिया फ़तूह अल शाह वाक़दी जिल्द 1 पृष्ठ 118 प्रकाशित मिस्र 1386 हिजरी) मेरी नज़दीक इमाम शरक़ावी का ख़ुल्फ़ा ए बनी फ़ात्मा की तादाद 15 बताना दुरूस्त नहीं है। तमाम कुतुबे मुतबरा में 14 ही की तादाद है। मुलाहेज़ा हो नज़रह असना अशअरीया अल्लामा मिर्ज़ा मोहम्मद जिल्द 1 पृष्ठ 213, तारीख़े मज़हिब पृष्ठ 462 प्रकाशित कोएटा व तारीख़े इस्लाम व तरजुमा ए सलातीने इस्लाम लैनिन पोल पृष्ठ 89 प्रकाशित लाहौर)
[ {अलहम्दो लिल्लाह ये किताब अबु अब्दुल्लाह हज़रत इमामे जाफ़रे सादिक़ (अ स ) पूरी टाईप हो गई जो कि चौदह सितारे का एक हिस्सा है ।खुदा वंदे आलम से दुआगौ हुं कि हमारे इस अमल को कुबुल फरमाऐ और इमाम हुसैन (अ.) फाउनडेशन को तरक्की इनायत फरमाए कि जिन्होने इस किताब को अपनी साइट (अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क) के लिऐ हिन्दी मे टाइप कराया। }]
31-12-2016
फेहरिस्त
इस्मे गिरामी , कुन्नियत , अलक़ाब 5
बादशाहाने वक़्त 7
अब्दुल मलिक बिन मरवान के अहद में आपका एक मनाज़िरा 8
इमामे जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) और हकीम इब्ने अयाश कल्बी 11
वलीद बिन यज़ीद और सादिक़े आले मोहम्मद (अ स ) 13
हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) और जनाबे अबू हनीफ़ा नोमान बिन साबित कूफ़ी 15
इमाम अबू हनीफ़ा की शार्गिदी का मसला 16
इमामे जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के बाज़ नसीहते व इरशादात 20
आपके बाज़ करामात 23
आपका अख़्लाक़ और आदात व औसाफ़ 24
इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की इल्मी बुलन्दी 29
सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) की तसानीफ़ 29
किताब जफ़र व जामेअ 30
हज़रत सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) के फ़लक़ वक़ार शार्गिद 33
इमामुल कीमिया जनाबे जाबिर इब्ने हय्यान तरसूसी 34
सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) के इल्मी फ़ुयूज़ व बरकात 42
कुतुबे उसूले अरबा मिया 45
सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) के असहाब की तादाद और उनकी तसानीफ़ 46
हज़रत सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) और इल्मे जफ़र 47
हज़रत सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) और इल्मे तिब 49
हज़रत सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) का इल्मुल क़ुरआन 51
इल्मे नुजूम 51
इल्मे मन्तिक़ुत तैर 52
हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) और इल्मुल अजसाम 53
सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) ने जन्नत में घर बनवा दिया 53
दस्ते सादिक़ (अ.स.) में एजाज़े इब्राहीमी 54
ख़तो किताबत और दरख़्वास्त के बारे में आपकी हिदायत 55
ख़लीफ़ा मन्सूर दवानेक़ी और हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ स ) 58
मन्सूर अब्बासी की सादात कशी 61
इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) का दरबारे मन्सूर में एक तबीबे हिन्द से तबादला ए ख़यालात 69
इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) को बाल बच्चों समेत जला देने का मन्सूबा 76
147 हिजरी में मन्सूर का हज और इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के क़त्ल का अज़म बिल जज़म 77
हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की दरबारे मन्सूर में सातवीं बार तलबी 78
इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) और दरबार के शेर 79
इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) को दरबार में क़त्ल किये जाने का बन्दो बस्त 80
हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की शहादत 81
आपकी औलाद 82
फ़ात्मी ख़ुल्फ़ा 83