अबु जाफ़र हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अस )
(चौदह सितारे)
लेखकः नजमुल हसन कर्रारवी
नोटः ये किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क के ज़रीऐ अपने पाठको के लिऐ टाइप कराई गई है और इस किताब मे टाइप वग़ैरा की ग़लतीयो को ठीक किया गया है।
Alhassanain.org/hindi
दिये जवाब तक़ी (अ.स.) ने ,वह बर सरे दरबार।
कि दंग थे उलमा , तिफ़ल की बसीरत से।।
दिखाए इल्म के जौहर वह इब्ने अक्सम को।
कि वाफ़क़ीह भी , वाक़िफ़ हुये इमामत से।।
साबिर थनयानी ‘‘ कराची ’’
तरके दुनियां में नहीं , मशक़े रियाज़त में नहीं
कसरते इल्म में तौफ़ीक़ , बसीरत में नही
दिल की एक कैफ़ीयते , ख़ास है तक़वा बानो
तरज़ पोशिश में नहीं शक्लो , शबाहत में नहीं
हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) के नवे जानशीन और हमारे नवे इमाम और सिलसिला ए अस्मत की ग्यारवीं कड़ी थे। आपके वालिदे माजिद वली अहदे सलतनते अब्बासीया ग़रीबुल ग़ुरबा शहीदे जफ़ा इमाम रज़ा (अ.स.) थे और आपकी वालदा माजदा जनाबे ख़ैज़रान उर्फ़ सकीना थीं। उलमा का बयान है कि आप उम्मुल मोमेनीन जनबा मारया क़िबतिया यानी वालदा जनाबे इब्राहीम बिन रसूले करीम (स अ व व ) की नस्ल से थीं।(शवाहिद अल नबूवत पृष्ठ 204, रौज़तुल पृष्ठ जिल्द 3 पृष्ठ 16 )
इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) अपने आबाओ अजदाद की तरह , इमाम मन्सूस , मासूम , इमामे ज़माना और अफ़ज़ले काएनात थे। आप जुमला सिफ़ाते हुस्ना में यगाना रोज़गार और मुम्ताज़ थे। अल्लामा बिन तल्हा शाफ़ेई लिखते हैं , ‘‘ वइन कान सग़ीर अलसन फ़हू कबीर अल क़दर , रफ़ीह अलज़कर ’’ इमाम (अ.स.) अगरचे तमाम मासूमीन में सब से कम सिन और छोटे थे लेकिन आपकी क़दरो मन्ज़ेलत आपके आबाओ अजदाद की तरह निहायत ही अज़ीम थी और आपका बुलन्द तज़किरा बर सरे नोक ज़बान था।(मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 195 )
अल्लामा हुसैन वाएज़ काशफ़ी लिखते हैं कि ‘‘ मुक़ामे वै बिसयार बुलन्द अस्त ’’ आपकी मन्ज़िलत और आपकी हस्ती नेहायत ही बुलन्द थी।(रौज़तुल शोहदा पृष्ठ 438 )
अल्लामा ख़विन्द शाह लिखते हैं ‘‘ दर कमाल फ़ज़ल व इल्म और हिकमत इमाम जवाद बा मरतबाबूदह कि ’’ हेच कसरा अज़ आज़मे सादात आन मरतबा ना बूदा ’’ इल्म व फ़ज़ल , अदब व हिकमत में इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) को वह कमाल हासिल था जो किसी को भी नसीब ना था।(रौज़तुल पृष्ठ जिल्द 3 पृष्ठ 16 )
अल्लामा शिबलन्जी लिखते हैं कि इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) कम सिनी के बावजूद फ़ज़ाएल से भर पूर थे ‘‘ व मुनक़बये कसीरा ’’ और आपके मनाक़िब व मदायह बेशुमार हैं।(नूरूल अबसार पृष्ठ 145 )
अल्लामा तबरसी लिखते हैं कि ‘‘ कान क़द बलग़ फ़ी कमाल अल अक़ल वल फ़ज़ल वा आलेम व अल हकम वा अलदाब व रिफ़अते माज़लतेही तम यसा व फ़ीहा अहद मन ज़ी अलसिन मन अलसादात वग़ैर हिम ’’ आप कमाले अक़ल और फ़ज़ल और इल्म व हिक्म व आदाब व बुलन्दी मनज़िलत में इन मदारिज पर फ़ाएज़ थे जिन पर आपके सिन और उमर के सादात और ग़ैर सादात में से कोई भी फ़ायज़ न था।(अलाम अल वरा पृष्ठ 202 ) अल्लामा शेख़ मुफ़ीद (र. अ.) आपकी बुलन्दी ए मन्ज़ेलत का ज़िक्र करते हुए तहरीर फ़रमाते हैं। ‘‘ मशाययख़ अहले ज़बान बा उमसावी दरफ़ज़ल न बुलन्द ’’ िकइस अहद में दुनियां के बड़े बड़े लोग फ़ज़ाएल व कमालात में आपकी बराबरी नहीं कर सकते थे।(इरशाद मुफ़ीद पृष्ठ 474 )
इमाम (अ.स.) की विलादत बा सआदत
उलमा का बयान है कि इमाम अल मुत्तक़ीन हज़रज इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) बा तारीख़ 10 रजबुल मुरज्जब 195 हिजरी में बा मुताबिक़ 811 ई 0 यौमे जुमा बामुक़ाम मदीना मुनव्वरा में मोतावल्लिद हुय ऐ।(रौज़ातुल अल पृष्ठ जिल्द 2 पृष्ठ 16 व शवाहेदुन नबूअत पृष्ठ 204 व अनवारे नोमानी पृष्ठ 127 )
अल्लामा यगाना जनाबे शेख़ मुफ़ीद (र. अ.) फ़रमाते हैं , चूंकि हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) के कोई औलाद आपकी विलादत से क़ब्ल न थी इस लिये लोग ताना ज़नी करते हुए कहते थे कि शियों के इमाम मुन क़ता उल नस्ल हैं। यह सुन कर हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) ने इरशाद फ़रमाया कि औलाद का होना ख़ुदा की इनाएत से मुताअल्लिक़ है उसे मुझे साहेबे औलाद किया है और अंक़रीब मेरे यहां मस्नदे इमामत का वारिस पैदा होगा। चुनांचे आपकी विलादत बा साअदत हुई।(इरशाद मुफ़ीद पृष्ठ 473 )
अल्लामा तबरीसी लिखते हैं कि हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) ने इरशाद फ़रमाया था कि मेरे यहां जो बच्चा अंक़रीब पैदा होगा वह अज़ीम बरकतों का हामिल होगा।(अलामुल वरा पृष्ठ 200 ) वाक़ए विलादत के मुताअल्लिक़ लिखा है कि इमाम रज़ा (अ.स.) की बहन हकीमा ख़ातून फ़रमाती हैं कि एक दिन मेरे भाई ने मुझे बुला कर कहा कि आज तुम मेरे घर में क़याम करो क्यों कि ख़ैज़रान के बतन से आज रात को ख़ुदा मुझे एक फ़रज़न्द अता फ़रमायेगा। मैंने ख़ुशी के साथ इस हुक्म की तामील की। जब रात आई तो हमसाया और चन्द औरतें भी बुलाई गईं , निस्फ़ शब से ज़्यादा गुज़रने पर यका यक वाज़ेह हमल के आसार नमूदार हुए। यह हाल देख कर मैं ख़ैज़रान को हुजरे में ले गई और मैंने चिराग़ रौशन कर दिया। थोड़ी देर में इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) पैदा हुए। मैंने देखा कि वह मख़तून और नाफ़ बुरीदा हैं। विलादत के बाद मैंने नहलाने के लिये तश्त में बैठाया। इस वक़्त जो चिराग़ रौशन था गुल हो गया मगर फिर भी उस हुजरे में रौशनी ब दस्तूर रही और इतनी रौशनी रही कि मैंने बच्चे को आसानी से नहला दिया। थोड़ी देर में मेरे भाई इमाम रज़ा (अ.स.) भी वहां तशरीफ़ ले आए। मैंने निहायत उजलत के साथ साहब ज़ादे को कपड़े में लपेट कर हज़रत की आग़ोश में दे दिया। आपने सर और आंखों पर बोसा दे कर फिर मुझे वापस कर दिया। दो दिन तक इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की आंखें बन्द रहीं हैं तीसरे दिन जब आंखें खुली तो आपने सब से पहले आसमान की तरफ़ नज़र की , फिर दाहिने बाऐ देख कर कलमा ए शहादतैन ज़बान पर जारी किया। मैं यह देख कर सख़्त मुतअजिब हुई और मैंने सारा वाक़ेया अपने भाई से बयान किया। आपने फ़रमाया , ताअज्जुब न करो , यह मेरा फ़रज़न्द हुज्जते ख़ुदा और वसीए रसूल (स अ व व ) हादी है। इस से जो अजाएबात ज़हूर पज़ीर हों , उनमें ताअज्जुब क्या। मोहम्मद बिन अली नाक़ील हैं , हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के दोनों कंधों के दरमियान इसी तरह मोहरे इमामत थी जिस तरह दीगर आइम्मा (अ.स.) के दोनों कंधो के दरमियान मोहरें हुआ करती थीं।(मुनाक़िब)
नाम कुन्नियत और अलक़ाब
आपका इसमे गिरामी लौहे महफ़ूज़ के मुताबिक़ उनके वालिदे माजिद हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) ने मोहम्मद रखा। आपकी कुन्नियत अबु जाफ़र और आपके अलक़ाब जवाद , कानेह , मुर्तुज़ा थे और मशहूर तरीन लक़ब तक़ी था।(रौज़तुल अल पृष्ठ जिल्द 3 पृष्ठ 96, शवाहेदुन नबूअत पृष्ठ 202 आलामु वुरा पृष्ठ 199 )
बादशाहाने वक़्त
हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की विलादत 195 हिजरी में हुई। इस वक़्त बादशाहे वक़्त , अमीन इब्ने हारून रशीद अब्बासी था।(दफ़ियात अल अयान) 198 हिजरी में मामून रशीद अब्बासी बादशाहे वक़्त हुआ।(तारीख़े ख़मीस व अबुल फ़िदा) 218 हिजरी में मोतसिम अब्बासी ख़लीफ़ाए वक़्त क़रार पाया।(अबुल फ़िदा) इसी मोतसिम ने सन् 220 हिजरी में आपको ज़हर से शहीद करा दिया।(वसीलतुन नजात)
इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की नशो नुमा और तरबीअत
यह एक हसरत नाक वाक़िया है कि इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) को निहायत कमसिनी ही के ज़माने में मसाएब और परेशानियों का मुक़ाबला करने के लिये तैय्यार हो जाना पड़ा। उन्हें बहुत ही कम इतमेनान और सुकून के लमहात में बाप की मोहब्बत और शफ़क़तो तरबीअत के साए में ज़िन्दगी गुज़ारने का मौक़ा मिल सका। आपको सिर्फ़ पांचवा बरस था जब हज़रते इमाम रज़ा (अ.स.) मदीने से ख़ुरासान की तरफ़ सफ़र करने पर मजबूर हुए। इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) उस वक़्त से जो अपने बाप से जुदा हुए तो फिर ज़िन्दगी में मुलाक़ात का मौक़ा न मिला। इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) से जुदा होने के तीसरे साल इमाम रज़ा (अ.स.) की शहादत हो गई। दुनियां समझती होगी कि इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के लिये इल्मी और अमली बलन्दियों तक पहुँचने का कोई ज़रिया नहीं रहा इस लिये अब इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की इल्मी मस्नद शायद ख़ाली नज़र आए मगर ख़लक़े ख़ुदा की हैरत की इन्तेहा न रही जब इस कम सिन बच्चे को थोड़े दिन बाद मामून के पहलू में बैठ कर बड़े बड़े उलमा से फ़िक़ा व हदीस व तफ़सीर और कलाम पर मनाज़रे करते और उन सबको क़ाएल हो जाते देखा। उनकी हैरत उस वक़्त तक दूर होना मुमकिन न थी जब तक वह मद्दी असबाब के आगे एक मख़सूस ख़ुदा वन्दी मर्दसा तालीम व तरबीअत के क़ाएल न होते जिसके बग़ैर यह मोअम्मा न हल हुआ और न कभी हल हो सकता है। (सवाने इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) पृष्ठ 4) मक़सद यह है कि इमाम को इल्मे लदुन्नी होता है यह अम्बिया की तरह पढ़े लिखे और तमाम सलाहियतों से भर पूर पैदा होते हैं। उन्होंने सरवरे काएनात की तरह कभी किसी के सामने ज़ानूए तल्लमुज़ नहीं तह किया और न कर सकते थे। यह इसके भी मोहताज नहीं होते थे कि आबाओ अजदाद उन्हें तालीम दें। यह और बात है कि इज़दियाद व इल्म शरफ़ के लिये ऐसा कर दिया जाय या उलूमे मख़सूसा की तालीम दे दी जाए।
वालिदे माजिद के साया ए आत्फ़ियत से महरूमी
यूं तो उमूमी तौर पर किसी के बाप के मरने से साया ए आतिफ़त से महरूमी हुआ करती है लेकिन हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) अपने वालिदे माजिद के साया ए आतिफ़त से उनकी ज़िन्दगी ही में महरूम हो गए थे। अभी आप की उम्र छः साल की भी न हो पाई थी कि आप अपने पदरे बुज़ुर्गवार की शफ़क़तों अतूफ़त से महरूम कर दिये गए और मामून रशीद अब्बासी ने आपके वालिदे माजिद हज़रते इमाम रज़ा (अ.स.) को अपनी सियासी ग़रज़ के तहत मदीने से ख़ुरासान तलब कर लिया और साथ ही यह शर्त भी लगा दी कि आप के बाल बच्चे मदीने ही में रहेंगे। जिसका नतीजा यह हुआ कि आप सबको हमेशा के लिये ख़ैर बाद कह कर ख़ुरासान तशरीफ़ ले गए और वहीं आलमें गु़रबत में सब से जुदा मामून रशीद के हाथों ही शहीद हो कर दुनियां से रूख़सत हो गए।
आपके मदीने से तशरीफ़ ले जाने का असर ख़ानदान पर यह चढ़ा कि सब के दिल का सुकून जाता रहा और सब के सब अपने को ज़िन्दा दर गोर समझते रहे। बिल आखि़र यह नौबत पहुँची कि आपकी हमशीरा जनाबे फ़ात्मा जो बाद में मासूमा ए क़ुम के नाम से मुलक़्क़ब हुईं इन्तेहाई बेचैनी की हालत में घर से निकल कर ख़ुरासान की तरफ़ रवाना हो गईं। उनके दिल में जज़बात यह थे कि किसी तरह अपने भाई अली रज़ा (अ.स.) से मिलें लेकिन एक रवायत की बिना पर आप मदीने से रवाना हो कर जब मुक़ामे वसावा में पहुँची तो अलील हो गईं। आपने पूछा यहां से क़ुम कितनी दूर है ? लोगों ने कहा कि यहां से कु़म की मसाफ़त दस 10 फ़रसख़ हैं। आपने ख़्वाहिश ज़ाहिर की किसी सूरत से वहां पहुँचा दी जायें। चुनान्चे आप आले साद के रईस मूसा बिन ख़ज़रज की कोशिश से वहां पहुँची और उसी के मकान में 17 दिन बीमार रह कर अपने भाई को रोती पीटती दुनियां से रूख़सत हो गईं और मक़ामे बाबूलान क़ुम में दफ़्न हुई। यह वाक़िया 201 हिजरी का है।(अनवारूल हुसैनिया जिल्द 4 पृष्ठ 53 ) और एक रिवायत की बिना पर आप उस वक़्त ख़ुरासान पहुँची जब भाई शहीद हो चुका था और लोग दफ़्न के लिये काले काले अलमों के साये में लिये जा रहे थे। आप क़ुम आ कर वफ़ात पा गईं। हज़रते इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की जुदाई क्या कम थी कि उस पर मुस्तज़ाद अपनी फुफी के साए से भी महरूम हो गए। हमारे इमाम के लिये कम सिनी में यह दोनों सदमे इन्तेहाई तकलीफ़ देह और रन्ज रसा थे लेकिन मशीयते ऐज़दी में चारा नहीं। आखि़र आपको तमाम मराहिल का मुक़ाबेला करना पड़ा और आप सब्रो ज़ब्त के साथ हर मुसीबत को झेलते रहे।
मामून रशीद अब्बासी और हज़रते इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) का पहला सफ़रे ईराक़
अब्बासी ख़लीफ़ा मामून रशीद अब्बासी हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की शहादत से फ़राग़त के बाद या इस लिये की उस पर इमाम रज़ा (अ.स.) के क़त्ल का इल्ज़ाम साबित न हो सके या इस लिये कि वह इमाम रज़ा (अ.स.) की वली अहदी के मौक़े पर अपनी लड़की उम्मे हबीबा की शादी का ऐलान भी कर चुका था कि वली अहद के फ़रज़न्द इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के साथ करेगा। उसे निभाने के लिये या इस लिये की अभी उस की सियासी ज़रूरत उसे मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की तरफ़ तवज्जो की दावत दे रही थी। बहरहाल जो बात भी हो। उसने यह फ़ैसला कर लिया कि इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) को मदीने से बग़दाद बुलाया जाए। जो इमाम रज़ा (अ.स.) की शहादत के बाद पाऐ तख़्त बनाया जा चुका था चुनान्चे दावत नामा इरसाल किया और उन्हें इसी तरह मजबूर कर के बुलाया जिस तरह इमाम रज़ा (अ.स.) को बुलवाया था। ‘‘ हुक्मे हाकिम मर्गे मफ़ाजात ’’ बिल आखि़र इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) को बग़दाद आना पड़ा।
बाज़ और मछली का वाक़िया
इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) जिनकी उम्र उस वक़्त तक़रीबन 9 साल की थी। एक दिन बग़दाद के किसी गु़जरगाह में खड़े हुए थे और चन्द लड़के वहां खेल रहे थे कि नागाह ख़लीफ़ा मामून की सवारी दिखाई दी , सब लड़के डर कर भाग गए मगर इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) अपनी जगह पर खड़े रहे। जब मामून की सवारी वहां पहुँची तो उसने इमाम हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) से मुख़ातिब हो कर कहा कि साहब ज़ादे सब लड़के भाग गए तो तुम क्यों नहीं भागे। उन्होंने बेसाख़्ता बिला ताअम्मुल जबाव दिया मेरे खड़े रहने से रास्ता तंग न था , जो हट जाने से वसी हो जाता और न कोई जुर्म किया था कि डरता नीज़ मेरा हुसने ज़न है कि तुम बेगुनाह को ज़र्र नहीं पहुँचाते। मामून को हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) का अन्दाज़े बयान बहुत पसन्द आया। इसके बाद मामून वहां से आगे बढ़ा। उसके साथ शिकारी बाज़ भी थे जब आबादी से बाहर निकल गया तो उसने एक बाज़ को एक चकोर पर छोड़ा। बाज़ नज़रों से ओझल हो गया और जब वापस आया तो उसकी चोच में एक छोटी सी ज़िन्दा मछली थी जिसको देख कर मामून बहुत मुताअज्जिब हुआ। थोड़ी देर में जब वह इसी तरह लौटा तो उसने हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) को दूसरे लड़कों के साथ वहीं देखा जहां वह पहले थे। लड़के मामून की सवारी देख कर फिर भागे लेकिन हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) बदस्तूर साबिक़ वहीं खड़े रहे। जब मामून उनके क़रीब आया , तो मुठ्ठी बन्द कर के कहने लगा , साहब ज़ादे बताओ मेरे हाथ में क्या है ? उन्होंने फ़रमाया अल्लाह ताअला ने अपने दरिया ए क़ुदरत में छोटी मछलियां पैदा की हैं और सलातीन अपने बाज़ से उन मछलियों का शिकार कर के अहले बैते रिसालत के इल्म का इम्तेहान लेते हैं। यह सुन कर मामून बोला , बे शक तुम अली बिन मूसा रज़ा (अ.स.) के फ़रज़न्द हो। फिर उनको अपने साथ ले गया।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 123, मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 290, शवाहेदुन नबूअत पृष्ठ 204 नुरूल अबसार पृष्ठ 145, अरजहुल मतालिब पृष्ठ 459 )
यह वाक़िया हमारी भी बाज़ किताबों में है , इस वाक़िये के सिलसिले में जिन किताबों का हवाला दिया है उनमें ‘‘ इन्नल्लहा ख़लक़ फ़ी बहरे कु़दरताहू समाकन सग़ारत ’’ मुन्दरिज है। अलबत्ता बाज़ कुतुब में ‘‘ बैन अल समाआ व अल हवाअन ’’ लिखा है। अव्वल उज़ ज़िक्र के मुताअल्लिक़ तवील का सवाल ही पैदा नहीं होता क्यों कि हर दरिया ख़ुदा की क़ुदरत से जारी है और मज़कूरा वाक़िये में इमकान क़वी है कि बाज़ ऐसी ज़मीन पर जो दरिया हैं उनमें से किसी एक से शिकार कर के लाया होगा। अलबत्ता अखि़र उज़ ज़िक्र के मुतअल्लिक़ कहा जा सकता है।
1. जहां तक मुझे इल्म है गहरे से गहरे दरिया की इन्तेहा किसी सतह अरर्ज़ी पर है।
2. बक़ौल अल्लामा मजलिसी दरिया ऐसे हैं जिनसे अब्र छोटी मछलियों को उड़ा कर ऊपर ले जाते हैं।
3. 1932 ई 0 के अख़बार में यह शाया हो चुका है कि अमरीका की नहर पनामा में जो सन्डबोल बन्दरगाह के क़रीब है मछलियो की बारिश हुई है।
4. आसमान और हवा के दरमियान बहरे मुतलातिम से मुराद फ़िज़ा की वह कैफ़ियत हों जो दरिया की तरह पैदा होते हैं।
5. कहा जाता है कि इल्म हैवान में यह साबित है कि मछली दरिया से एक सौ पचास गज़ तक बाज़ हालात में बुलन्द हो जाती हैं। बहर हाल इन्हीं गहराईयों की रौशनी में फ़रज़न्दे रसूल (स अ व व ) ने मामून से फ़रमाया कि बादशाहे बहरे क़ुदरत ख़ुदावन्दी से शिकार कर के लाया है और आले मोहम्मद (स अ व व ) का इम्तेहान लेता है।
हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) से उलमाए इस्लाम का मनाज़ेरा और अब्बासी हासिदों की शिकस्ते फ़ाश
उलमाए इस्लाम का बयान है कि बनी अब्बास को मामून की तरफ़ इमाम रज़ा (अ.स.) को वली अहद बनाया जाना ही ना क़ाबिले बर्दाश्त था। इमाम रजा़ (अ.स.) की वफ़ात से एक हद तक उन्हें इतमीनान हासिल हुआ था और उन्होंने मामून से अपने हस्ब दिलख़्वाह तसलीम कर लिया गया। इसके अलावा इमाम रज़ा (अ.स.) की वली अहदी के ज़माने में अब्बासीयों का मख़सूस शुमार यानी काला लिबास तर्क हो कर जो सब्ज़ लिबास का रवाज हो रहा था उसे मन्सूख़ करके फिर स्याह लिबास की पाबन्दी आएद कर दी गई ताकि बनी अब्बास के रवायाते क़दीम मख़सूस रहे। यह सब बातें अब्बासीयों के यक़ीन दिला रहीं थी कि वह मामून पर पूरा क़ाबू पा चुके हैं , मगर अब मामून का यह इरादा कि वह इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) को अपना दामाद बनाऐ। उन लोगों के लिये तशवीश का बाएस बना और इस हद तक बना कि वह अपने दिली रूझान को दिल में न रख सके और एक वफ़द की शक्ल में मामून के पास आ कर अपने जज़बात का इज़हार कर दिया। उन्होंने साफ़ साफ़ कहा कि इमाम रज़ा (अ.स.) के साथ जो आपने तरीख़ा इख़्तेयार किया , वही हम को ना पसन्द था। मगर वह ख़ैर कम अज़ कम औसाफ़ व कमालात के लेहाज़ से ना क़ाबिले इज़्ज़त भी समझे जा सकते थे , मगर यह उन के बेटे मोहम्मद तो अभी बिल्कुल कम सिन हैं। एक बच्चे को बड़े बड़े उलमा , मुवज़्ज़ेज़ीन पर तरजीह देना और इस क़दर इसकी इज़्ज़त करना हर गिज़ ख़लीफ़ा के लिए ज़ेबा नहीं है फिर उम्मे हबीबा का निकाह जो इमाम रज़ा के साथ किया गया था , उससे हम को क्या फ़ायदा पहुँचा जो उम्मे अफ़ज़ल का निकाह मोहम्मद बिन अली के साथ किया जा रहा है।
मामून ने तमाम तक़रीर का यह जवाब दिया कि मोहम्मद कमसिन ज़रूर हैं मगर मैंने ख़ूब अन्दाज़ा कर लिया है , औसाफ़ और कमालात में वह अपने बाप के पूरे जानशीन हैं और आलमे इस्लाम के बडे़ बड़े उलमा जिनका तुम हवाला दे रहे हो वह इल्म में उनका मुक़ाबला नहीं कर सकते। अगर तुम चाहो तो इम्तेहान ले कर देख लो फिर तुम्हे भी फ़ैसले से मुत्तफ़िक़ होना पडे़गा।
यह सिर्फ़ मुन्सेफ़ाना जवाब ही नहीं , बल्कि एक तरह का चैलेन्ज था जिस पर मजबूरन उन लोगों को मनाज़िरा की दावत मंज़ूर करनी पड़ी हालांकि ख़ुद मामून तमाम सलातीन बनी अब्बास में यह ख़ुसूसीयत रखता है कि मोर्वेख़ीन इसके लिये यह अल्फ़ाज़ लिख देते हैं। ‘‘ काना यादा मन कबारल फ़ुक़ाहा ’’ यानी इनका शुमार बड़े बड़े फ़क़ीहों में है। इस लिये इसका फ़ैसला ख़ुद कुछ कम वक़त न रखता था , मगर इन लोगों ने इस पर इक़्तेफ़ा नहीं की बल्कि बग़दाद के सब से बड़े आालिम यहया बिने अक्सम को इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) से बहस के लिये मुन्तख़ब किया। मामून ने एक अज़ीमुश्शान जलसा इस मनाज़िरे के लिये मुनअक़िद किया और आम ऐलान करा दिया। हर शख़्स इस अजीब और बज़ाहिर ग़ैर मुतावाज़िन मुक़ाबले के देखने का मुश्ताक़ हो गया। जिस में एक तरफ़ एक नौ बरस का बच्चा था और दूसरी तरफ़ एक आमूदाकार आरै शोरा ए अफ़ाक़ क़ाज़िउल कुज़्ज़ाज़त। इस का नतीजा था कि हर तरफ़ से ख़लाएक़ का हुजूम हो गया।
मुवर्रेख़ीन का बयान है कि अरकाने दौलत और मोअज़्ज़ेज़ीन के अलावा इस जलसे में नव सौ कुर्सियां फ़क़त उलमा व फ़ुज़ला के लिये मख़सूस थीं और इसमें कोई ताज्जुब भी नहीं इस लिये कि यह ज़माना अब्बासी सलतनत के शबाब और बिल ख़ुसूस इल्मी तरक़्क़ी के ऐतबार से ज़री दौर था और बग़दाद दारूल सलतनत था जहां तमाम अतराफ़े मुख़्तलिफ़ उलूम और फ़ुनून के माहेरीन खिंच कर जमा हो गए थे। इस ऐतबार से यह तादात किसी मुबालग़े पर मुबनी नहीं होती।
मामून ने हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के लिये अपने पहलू में मसनद बिछवाई थी और हज़रत के सामने यहया बिने अक़सम के लिये बैठने की जगह थी। हर तरफ़ कामिल सन्नाटा था मजमा हमातन चश्म व गोश बना हुआ गुफ़्तुगू शुरू होने के वक़्त का मुन्तज़िर ही था िकइस ख़ामोशी को यहिया के इस सवाल ने तोड़ दिया जो उसने मामून की तरफ़ मुख़ातिब हो कर किया था आप इजाज़त देते हैं मैं आपसे कुछ दरयाफ़्त करूँ।
हज़रत ने फ़रमाया ऐ याहिया ऐ याहिया तुम जो पूछना चाहते हो पूछ सकते हो। यहिया ने कहा यह फ़रमाईये कि हालते एहराम में अगर कोई शख़्स शिकार करे तो इसका क्या हुक्म है ? इस सवाल से अन्दाज़ा होता है कि यहिया हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की इल्मी पाबन्दी से बिल्कुल वाक़िफ़ न था। वह अपने ग़ुरूरे इल्म और जिहालत से यह समझता था कि यह कमसिन साहब ज़ादे तो हैं ही रोज़मर्रा के रोज़े नमाज़ के मसाएल से वाक़िफ़ हों तो हों। मगर हज वग़ैरा के अहकाम और हालते अहराम में जिन चीज़ों की मुमानियत है उनके कफ़्फ़ारों से भला कहां वाक़िफ़ होंगे।
इमाम (अ.स.) ने इसके जवाब में इस तरह सवाल के गोशों की अलग अलग तहलील फ़रमाई जिससे बग़ैर कोई जवाब अस्ल मसले का दिए हुए आपके इल्म की गहराईयों का यहिया और तमाम अहले महफ़िल को अन्दाज़ा हो गया। यहिया ख़ुद भी अपने को सुबुक पाने लगा और तमाम मजमे को भी इसका सुबुक होना महसूस होने लगा। आपने जवाब में फ़रमाया: यहिया तुमहारा सवाल बिल्कुल मुबहम है और मोहमल है। सवाल के ज़ैल में यह देखने की ज़रूरत है कि शिकार हिल में था कि हरम में। शिकार करने वाला मसले से वाक़िफ़ था या ना वाक़िफ़ था। इसने अमदन जानवर को मार डाला या धोखे से क़त्ल हो गया। या वह शख़्स आज़ाद था या ग़ुलाम , कमसिन था या बालिग़ , पहली मरतबा ऐसा किया था या इसके पहले भी ऐसा कर चुका था। शिकार परिन्द का था या कोई और , छोटा था या बड़ा। वह अपने फ़ेल पर इसरार रखता है या पशेमान है। रात को या पोशीदा तरीक़े पर उसने यह शिकार किया या दिन दहाड़े और एलानियाँ। एहराम उमरे का था या हज का। जब तक यह तमाम तफ़सीलात न बताए जाएं इस मसले का कोई मोअय्यन हुक्म नहीं बताया जा सकता।
यहिया कितना ही नाक़िस क्यों न होता। बहरहाल फ़िक़ही मसाएल पर कुछ उसकी नज़र थी। इन कसीउत्ताए दाद शिक़ों के पैदा ही करने से ख़ूब समझ गया कि उनका मुक़ाबेला मेरे लिए आसान नहीं है उसके चेहरे पर ऐसी शिकस्तगी के आसार पैदा हुए जिनका तमाम देखने वालों ने अन्दाज़ा कर लिया उसकी ज़बान ख़ामोश थी और वह कुछ जवाब न देता था।
मामून उसकी कैफ़ियत का सही अन्दाज़ा कर के उससे कुछ कहना बेकार समझा और हज़रत से अर्ज़ किया कि फिर आप तमाम शिकों के एहकाम बयान फ़रमा दीजिए ताकि हम सब को इस्तेफ़ादे का मौक़ा मिल सके। इमाम (अ.स.) ने तफ़सील के साथ तमाम सूरतो से जुदागाना जो एहकाम थे फ़रमा दिये। आपने फ़रमाया कि ‘‘ अगर एहराम बांधने के बाद ‘‘ हिल ’’ में शिकार करे और वह शिकार परिन्दा हो और बड़ा भी हो तो उस पर कफ़्फ़ारा एक बकरी है और अगर ऐसा शिकार हरम में किया है तो दो बकरियां हैं और अगर किसी छोटे परिन्दे को हिल में शिकार किया है तो दुम्बे का एक बच्चा जो अपनी मां का दूध छोड़ चुका हो। कफ़्फ़ारा देगा , और अगर हरम में शिकार किया हो तो उस परिन्दे की क़ीमत और एक दुम्बा कफ़्फ़ारा देगा और अगर वह शिकार चौपाया हो तो उसकी कई क़िस्में हैं। अगर वह वहशी गधा है तो एक गाय और अगर शुतुरमुर्ग़ है तो एक ऊंट और अगर हिरन है तो एक बकरी कफ़्फ़ारा देगा। यह कफ़्फ़ारा तो जब है कि हिल में शिकार किया हो लेकिन अगर हरम में किया हो तो यही कफ़्फ़ारे दुगने देने होंगे और उन जानवरों को जिन्हें कफ़्फ़ारे में देगा , अगर एहराम उमरे का था तो ख़ाना ए काबा तक पहुँचायेगा और मक्के में क़ुर्बानी करेगा और अहराम हज का था तो मिना में क़ुर्बानी करेगा और इन कफ़्फ़ारों में आलिम व जाहिल दोनों बराबर हैं और इरादे से शिकार करने में कफ़्फ़ारा देने के अलावा गुनाहगार भी होगा। हां भूले से शिकार करने में गुनाह नहीं होगा। और आज़ाद अपना कफ़्फ़ारा ख़ुद देगा और ग़ुलाम का कफ़्फ़ारा उसका मालिक देगा और छोटे बच्चे पर कोई कफ़्फारा नहीं है और बालिग़ पर कफ़्फ़ारा देना वाजिब है और जो शख़्स अपने इस फ़ेल पर नादिम हो आख़ेरत के अज़ाब से बच जायेगा लेकिन अगर इस फ़ेल पर इसरार करेगा तो आख़ेरत में भी इस पर अज़ाब होगा। ’’
यह तफ़सीलात सुन कर यहिया हक्का बक्का रह गया और सारे मजमे से अहसन्त अहसन्त की आवाज़ बुलन्द होने लगी। मामून को भी क़द थी कि वह यहिया की रूसवाई को इन्तेहाई दर्जे तक पहुँचा दे। उसने इमाम से अर्ज़ की कि अगर मुनासिब मालूम हो तो आप यहिया से सवाल फ़रमाएं। हज़रत ने एख़लाकन यहिया से दरियाफ़्त फ़रमाया कि क्या मैं भी तुम से कुछ पूछ सकता हूँ। यहिया अपने मुताअल्लिक़ किसी धोखे में मुब्तिला न था। उसने कहा ‘‘ कि हुज़ूर दरियाफ़्त फ़रमायें ! अगर मुझे मालूम होगा तो अर्ज़ करूगां वरना खुद भी हुज़ूर से मालूम कर लूगां ’’ हज़रत ने सवाल किया।
उस शख़्स के बारे में क्या कहते हो जिसने सुबह को एक औरत की तरफ़ नज़र की वह उस पर हराम थी। दिन चढ़े हलाल हो गई , ग़ुरूबे आफ़ताब पर फिर हराम हो गई। असर के वक़्त फिर हलाल हो गई , आधी रात को हराम हो गई सुबह के वक़्त हलाल हो गई। बताओ एक ही दिन में इतनी दफ़ा वह औरत उस शख़्स पर किस तरह हराम व हलाल होती रही। इमाम (अ.स.) की ज़बाने मोजिज़बयान से इस सवाल को सुन कर क़ाज़िउल क़ुज़्ज़ात यहिया बिन अक़सम मबहूत हो गए और जवाब न दे सके , बिल आखि़र इन्तेहाई आजज़ी के साथ कहा फ़रज़न्दे रसूल आप ही इसकी वज़ाहत फ़रमा दें और मसले को हल कर दें।
इमाम (अ.स.) ने फ़रमाया , सुनो ! वह औरत किसी की लौंड़ी थी। उसकी तरफ़ सुबह के वक़्त एक अजनबी शख़्स ने नज़र की तो वह उसके लिये हराम थी , दिन चढ़े उसने वह लौड़ी ख़रीद ली वह हलाल हो गई। जौहर के वक़्त उसको आज़ाद कर दिया वह हराम हो गई , असर के वक़्त उसने निकाह कर लिया फिर हलाल हो गई , मग़रिब के वक़्त उससे ज़हार किया तो फिर हराम हो गई , इशा के वक़्त ज़हार का कफ़्फ़ारा दे दिया , तो फिर हलाल हो गई , आधी रात को उस शख़्स ने उसको तलाक़े रजई दी , जिससे फिर हराम हो गई और सुबह के वक़्त उस तलाक़ से रूजू कर लिया ‘’ हलाल हो गई ’’
मसले का हल सुन कर सिर्फ़ यहिया ही नहीं बल्कि सारा मजमा हैरान रह गया और सब में मर्सरत की लहर दौड़ गई। मामून को अपनी बात के ऊँचा रहने की ख़ुशी थी , उसने मजमे की तरफ़ मुख़ातिब हो कर कहा मैं न कहता था कि यह वह घराना है जो क़ुदरत की तरफ़ से मालिक क़रार दिया गया है। यहां के बच्चों का भी कोई मुक़ाबला नहीं कर सकता। मजमे में जोशो ख़रोश था सब ने यही एक ज़बान हो कर कहा कि बेशक जो आपकी राय है वह बिल्कुल ठीक है और यक़ीनन अबू जाफ़र मोहम्मद बिने अली (अ.स.) का कोई मिस्ल नहीं है। (सवाऐक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 122 रवाहिल मुस्तफ़ा 191 नूरूल अबसार पृष्ठ 142 शरा इरशाद 478 से 479, तारीख़े आइम्मा 485, सवानह मोहम्मद तक़ी (अ.स.) पृष्ठ 6)
इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के साथ उम्मे फ़ज़ल का अक़्द और ख़़ुत्बा ए निकाह
इस अज़ीमुश्शान मनाज़रा में इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की शान दार कामयाबी ने मामून को आपका और गिरवीदा बना दिया , और उसकी मंज़िले एतराफ़ में इन्तेहाई बुलन्दी पैदा हो गई , इसके हर क़िस्म के हुस्ने ज़न में यक़ीन की रूह दौड़ गई।
उलमा लिखते हैं कि ‘‘ मामून ने इसके बाद फ़ौरन ही अपनी दिली मुराद को अमली जामा पहनाने का तहय्या कर लिया और ज़रा भी ताख़ीर मुनासिब न समझते हुए इसी जलसे में इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) ने ख़ुतबा और निकाह पढ़ा और यह तक़रीब पूरी कामयाबी के साथ अन्जाम पज़ीर हुई , मामून ने ख़ुशी में बड़ी फ़य्याज़ी से काम लिया , लाखों रूपए ख़ैरो ख़ैरात में तक़सीम किए गए और तमाम रेआया को इनामात व अतीया के साथ माला माल किया गया। ’’(सफ़र नामा हज व ज़्यारत पृष्ठ 434 प्रकाशित पेशावर 1972 ई 0 )
अल्लामा शेख़ मुफ़ीद और अल्लामा शिब्लंजी लिखते हैं कि हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) ने जो ख़ुत्बा ए निकाह पढ़ा वह यह था। ‘‘ अलहम्दो लिल्लाह अक़रार अब्नाहताह व आलाल्लाहा अख़्लासन लौहदा नैहतेही अलख़. ’’ और जो महर किया वह महरे फ़ातमी मुब्लिग़ पाँच सौ ( 500) दिरहम था।(इरशाद मुफ़ीद पृष्ठ 477 नूरूल अबसार पृष्ठ 146 ) मालूम होना चाहिये इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) ने जो ख़ुत्बा ए निकाह अपनी ज़बाने मुबारक पर जारी किया था वह वही है जो इस वक़्त भी निकाह के मौक़े पर पढ़ा जाता है। मेरी नज़र में इस ख़ुत्बे के होते हुए दूसरे ख़ुत्बे को पढ़ना मुनासिब नहीं है।
अल्लामा शिबलन्जी का बयान है कि हर क़िस्म की ख़ुश्बू की बास में अक़दे निकाह हुआ , और हाज़ेरीन की हलवे से तवाज़ो की गई।(नूरूल अबसार पृष्ठ 146, सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 123 शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 204, रौज़तुल पृष्ठ जिल्द 3 पृष्ठ 17, इरशाद पृष्ठ 477, कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 116 )
अल्लामा शेख़ मुफ़ीद तहरीर फ़रमाते हैं कि शादी के बाद शबे उरूस की सुबह को जहां और लोग हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की खि़दमत में मुबारक बाद अदा करने के लिए आए , एक शख़्स मोहम्मद बिन अली हाशमी भी पहुँचे। उनका बयान है कि मुझे दफ़तन सख़्त प्यास महसूस हुई , मैं अभी पासे अदब में पानी मांगने न पाया था कि आपने हुक्म दिया और आबे खुनक आ गया , थोड़ी देर बाद फिर ऐसा ही वाक़ेया दर पेश हुआ। मैं हज़रत के इस इल्मे ज़माएर से बहुत मुताअस्सिर हुआ , और मुझे यक़ीन हो गया कि इमामिया आपके जुमला उलूम में माहिर होने का जो अक़ीदा रखते हैं बिल्कुल दुरूस्त है।(इरशाद पृष्ठ 481 )
उम्मुल फ़ज़ल की रूख़सती , इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) कर मदीने को वापसी और हज़रत के इख़्लाक़ो औसाफ़ आदातो ख़साएल
इस शादी का पस मंज़र जो भी हो लेकिन मामून ने निहायत अछूते अन्दाज़ से अपनी लख़्ते जिगर उम्मुल फ़ज़ल को इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के हबलए निकाह में दे दिया। तक़रीबन एक साल तक इमाम (अ.स.) बग़दाद में मुक़ीम रहे , मामून ने दौराने क़याम बग़दाद में आपकी इज़्ज़तो तौक़ीर में कोई कमी नहीं की। ‘‘ इला अन तवज्जो बेज़ैवजता उम्मुल फ़ज़ल इलल्ल मदीनता अलमुशरफ़ता ’’ यहां तक आप अपनी ज़ौजा उम्मुल फ़ज़ल समेत मदीना ए मुशर्रे़फ़ा तशरीफ़ ले आए।(नूरूल अबसार पृष्ठ 146 ) मामून ने बहुत ही इन्तेज़ाम और एहतिमाम के साथ उम्मुल फ़ज़ल को हज़रत के साथ रूख़सत कर दिया। अल्लामा शेख़ मुफ़ीद , अल्लामा तबरसी , अल्लामा शिब्लन्जी , अल्लामा जामी अलैहिम अलरहमता तहरीर फ़रमाते हैं कि इमाम (अ.स.) अपनी एहलिया को लिए हुए मदीना तशरीफ़ लिये जा रहे थे , आप के हमराह बहुत से हज़रात भी थे। चलते चलते शाम के वक़्त आप वारिदे कुफ़ा हुए। वहां पहुँच कर आपने जनाबे मसीब के मकान पर क़याम फ़रमाया और नमाज़े मग़रिब पढ़ने के लिये एक निहायत क़दीम मस्जिद में तशरीफ़ ले गए। आपने वज़ू के लिये पानी तलब फ़रमाया , पानी आने पर आप एक ऐसे दरख़्त के थाले में वज़ू करने लगे जो बिल्कुल ख़ुश्क था और मुद्दतों से सर सब्ज़ी और शादाबी से महरूम था। इमाम (अ.स.) ने उस जगह वज़ू किया , फिर आप नमाज़े मग़रिब पढ़ कर वहां से वापस तशरीफ़ लाए और अपने प्रोग्राम के मुताबिक़ वहां से रवाना हो गए।
इमाम (अ.स.) तो तशरीफ़ ले गए लेकिन एक अज़ीम निशानी छोड़ गए और वह यह थी कि जिस ख़ुश्क दरख़्त के थाले में आपने वज़ू फ़रमाया था वह सर सब्ज़ शादाब हो गया , और रात ही भर में तैय्यार फलों से लद गया। लोगों ने उसे देख कर बे इंतेहा ताज्जुब किया।(इरशाद मुफ़ीद पृष्ठ 479, आलामु वुरा पृष्ठ 205, नूरूल अबसार पृष्ठ 147, शवाहेदुन नबूअत पृष्ठ 205 ) कूफ़े से रवाना हो कर तय मराहेल व क़ता मनाज़िल करते हुए आप मदीने मुनव्वरा पहुँचे। वहां पहुँच कर आप अपने फ़राएज़े मन्सबी की अदाएगी में मुनहमिक़ व मशग़ूल हो गए। पन्दो नसाए , तबलीग़ व हिदायत के अलावा आपने इख़्लाक़ का अमली दर्स देना शुरू कर दिया। ख़ानदानी तुर्रए इम्तेयाज़ के बामोजिब हर एक से झुक कर मिलना , ज़रूरत मन्दों की हाजत रवाई करना मसावात और सादगी को हर हाल में पेश नज़र रखना। ग़ुर्बा की पोशीदा तौर पर ख़बर लेना। दोस्त के अलावा दुश्मनों तक से अच्छा सुलूक करते रहना। मेहमानों की ख़ातिर दारी में इन्हेमाक और इल्मी व मज़हबी प्यासों के लिये फ़ैज़ के चश्मे जारी रखना , आपकी सीरते ज़िन्दगी का नुमाया पहलू था। अहले दुनियां जो आपकी बुलन्दीये नफ़्स का ज़्यादा अन्दाज़ा न रखते थे उन्हें यह तस्वर ज़रूर होता था कि एक कमसिन बच्चे का अज़ीमुश्शान मुसलमान सलतनत के शहनशाह का दामाद हो जाना , यक़ीनन इसके चाल ढाल , तौर तरीक़े को बदल देगा और उसकी ज़िन्दगी दूसरे सांचे में ढल जायेगी। हक़ीक़त में यह एक बहुत बड़ा मक़सद हो सकता है जो मामून की कोता निगाह के सामने भी था। बनी उमय्या या बनी अब्बास के बादशाहों को आले रसूल (स अ व व ) की ज़ात से इतला इख़्तेलाफ़ न था , जिनका उनकी सिफ़ात से था। वह हमेशा इसके दरपए रहते थे कि बुलन्दी इख़्लाक़ और मेराजे इन्सानियत का वह मरकज़ जो मदीना ए मुनव्वरा में क़ायम है और जो सलतनत के माद्दी इक़तिदार के मुक़ाबले में एक मिसाली रूहानियत का मरकज़ बना हुआ है , यह किसी तरह टूट जाए। इसी के लिये घबरा घबरा कर वह मुख़्तलीफ़ तदबीरें करते रहे। इमाम हुसैन (अ.स.) से बैअत तलब करना , इसी की एक शक्ल थी और फिर इमाम रज़ा (अ.स.) को वली अहद बनाना इसी का दूसरा तरीक़ा था। फ़क़त ज़ाहेरी शक्ल सूरत में एक का अन्दाज़ा मआन्दाना और दूसरा तरीक़ा इरादत मन्दी के रूप् में था। मगर असल हक़ीक़त दोनों सूरतों की एक थी , जिस तरह इमाम हुसैन (अ.स.) ने बैअत न की , तो वह शहीद कर डाले गए , इसी तरह इमाम रज़ा (अ.स.) वली अहद होने के बवजूद हुकूमत के मादीम क़ासिद के साथ साथ न चले तो आपको ज़हर के ज़रिए से हमेशा के लिये ख़ामोश कर दिया गया , अब मामून के नुक़ता ए नज़र से यह मौक़ा इन्तेहाई क़ीमती था कि इमाम रज़ा (अ.स.) का जा नशीन एक आठ नौ बरस का बच्चा है जो तीन चार बरस पहले ही बाप से छुड़ा लिया जा चुका था। हुकूमते वक़्त की सियसी सूझ बूझ कह रही थी कि इस बच्चे को अपने तरीक़े पर लाना निहायती आसान है और इसके बाद वह मरकज़ जो हुकूमते वक़्त के खि़लाफ़ साकिन और ख़ामोश मगर इन्तेहाई ख़तरनाक क़ाएम है हमेशा के लिये ख़त्म हो जायेगा।
मामून रशीद अब्बासी , इमाम रज़ा (अ.स.) के वली अहद की मोहिम में अपनी नाकामी को मायूसी का सबब नहीं तसव्वुर करता था , इस लिये कि इमाम रज़ा (अ.स.) की ज़िन्दगी एक उसूल पर क़ाएम रह चुकी थी , इमसें तबदीली नहीं हुई तो यह ज़रूरी नहीं कि इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) जो आठ नौ बरस के सिन से क़सरे हुकूमत में नशोनुमा पा कर बढे वह भी बिल्कुल अपने बुज़ुर्गों के उसूले ज़िन्दगी पर बरक़रार हैं।
सिवाए उन लोगों के जो इन मख़सूस अफ़राद के ख़ुदा दाद कमालात को जानते थे इस वक़्त का हर शख़्स यक़ीनन मामून ही का हम ख़्याल होगा , मगर दुनियां को हैरत हो गई , जब यह देखा कि नौ बरस का बच्चा जैसे शहंशाहे इस्लाम का दामाद बना दिया गया। इस उमर में अपने ख़ानदानी रख रखाओ और उसूल का इन्तेहाई पा बन्द है कि वह शादी के बाद महले शाही में क़याम से इन्कार कर देता है , और इस वक़्त भी जब बग़दाद में क़याम रहता है तो एक अलाहदा मकान किराए पर ले कर इसमें क़याम फ़रमाते हैं। इसी से भी इमाम (अ.स.) की मुस्तहकम क़ूव्वते इरादी का अन्दाज़ा किया जा सकता है। उमूमन माली एतबार से लड़के वाले जो कुछ भी बड़ा दर्जा रखते होते हैं तो वह यह पसन्द करते हैं कि जहां वह रहे वहीं दामाद भी रहे। इस घर में न सही कम अज़ कम इसी शहर में इसका क़याम रहे , मगर इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) ने शादी के एक साल बाद ही मामून को हिजाज़ वापस जाने की इजाज़त पर मजबूर कर दिया। यक़ीनन यह अमर एक चाहने वाले बाप और मामून ऐसे ब इक़तिदार के लिये इन्तेहाई ना गवार था। मगर उसे लड़की की जुदाई गवारा करना पड़ी और इमाम मय उम्मुल फ़ज़ल के मदीना तशरीफ़ ले गए।
मदीना तशरीफ़ लाने के बाद डयोढ़ी का वही आलम रहा जो इसके पहले था , न पहरे दार न कोई ख़ास रोक टोक , न तुज़ुक व एहतिशाम , न औक़ाते मुलाक़ात , न मुलाक़ातियों के साथ बरताओ में कोई तफ़रीक़ ज़्यादा तर नश्शित मस्जिदे नबवी में रहती थी जहाँ मुसलमान हज़रत के वाज़ व नसीहत से फ़ाएदा उठाते थे। रावीयाने हदीस , इख़बार व अहादीस दरियाफ़्त करते थे। तालिबे इल्म मसाएल पूछते थे , साफ़ ज़ाहिर था कि जाफ़र सादिक़ (अ.स.) ही का जां नशीन और इमाम रज़ा (अ.स.) का फ़रज़न्द है जो इसी मसनदे इल्म पर बैठा हुआ हिदायत का काम अन्जाम दे रहा है।
उमूरे ख़ाना दारी और अज़वाजी ज़िन्दगी में
आपके बुज़ुर्गों ने अपनी बीबीयों को जिन हुदूद में रखा हुआ था उन्हीं हुदूद में आपने उम्मुल फ़ज़ल को भी रखा आपने इसके मुतालिक़ परवाह ना की कि आप की बीवी एक शहनशाहे वक़्त की बेटी है। चुनान्चे उम्मुल फ़ज़ल के होते हुए आपने हज़रत अम्मार यासिर की नस्ल से एक मोहतरम ख़ातून के साथ अक़्द भी फ़रमाया और क़ुदरत को नस्ले इमामत इसी ख़ातून से बाक़ी रखना मन्ज़ूर थी। यही इमाम नक़ी (अ.स.) की माँ हुईं। उम्मुल फ़ज़ल ने इसकी शिकायत अपने बाप के पास लिख कर भेजी , मामून के दिल के लिये भी यह कुछ कम तकलीफ़ देह अमर न था , मगर अब उसे अपने किए को निभाना था इस लिये उम्मुल फ़ज़ल को जवाब में लिखा कि मैंने तुम्हारा अक़्द अबू जाफ़र के साथ इस लिये नहीं किया कि उन पर किसी हलाले ख़ुदा को हराम करूं। ख़बरदार ! मुझसे अब इस क़िस्म की शिकायत न करना। यह जवाब दे कर हक़ीक़त में उसने अपनी खि़फ़्फ़त मिटाई है। हमारे सामने इस की नज़ीरें मौजूद हैं कि अगर मज़हबे हैसीयत से कोई बाएहतेराम ख़ातून हुई हैं तो इस की ज़िन्दगी में किसी दूसरी बीवी से निकाह नहीं किया गया , जैसे पैग़म्बरे इस्लाम (स अ व व ) के लिये जनाबे ख़दीजा (अ.स.) और हज़रत अली ए मुर्तुज़ा (अ.स.) के लिये जनाबे फ़ात्मा ज़हरा (अ.स.) मगर शंहशाहे दुनियां की बेटी को यह इम्तेआज़े दुनियां सिर्फ़ इस लिये कि वह एक बादशाह की बेटी हैं। इस्लाम की उस रूह के खि़लाफ़ था जिसके आले मोहम्मद (अ.स.) मुहाफ़िज़ थे। इस लिये इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) ने इसके खि़लाफ़ तर्ज़े अमल इख़्तेआर करना अपना फ़रीज़ा समझा। (सवानेह मोहम्मद तक़ी (अ.स.) जिल्द 2 पृष्ठ 11)
इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) और तैयुल अर्ज़
इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) अगर चे मदीना में क़याम फ़रमाते थे लेकिन फ़राएज़ की वुस्अत ने आपको मदीना ही के लिये महदूद नहीं रखा था। आप मदीना में रह कर अतराफ़े आलम के अक़ीदत मन्दों की ख़बर गीरी फ़रमाते थे यह ज़रूरी नहीं कि जिसके साथ करम गुस्तरी की जाए। वह आपके कवाएफ़ व हालात से भी आगाह हो। अक़ीदे का ताअल्लुक़ दिल की गहराई से है कि ज़मीनों आसमान ही नहीं सारी काएनात उनके ताबे होती है। उन्हें इसकी ज़रूरत नहीं पड़ती कि वह किसी सफ़र में तय मराहिल के लिये ज़मीन अपने क़दमों से नापा करें , उनके लिये यही बस है कि जब और जहां चाहें चश्में ज़दन में पहुँच जाएं और यह अक़लन मोहाल भी नहीं है। ऐसे ख़ासाने ख़ुदा के लिये इस क़िस्म के वाक़ियात क़ुरान मजीद में भी मिलते हैं। आसिफ़ बिन ख़्यावसी जनाबे सुलेमान (अ.स.) के लिए उलमा ने इस क़िस्म के वाक़िये का हवाला दिया है। उनमें से एक वाक़िया है कि आप मदीना मुनव्वरा से रवाना हो कर शाम पहुँचे , एक शख़्स को उस मुक़ाम पर इबादत में मसरूफ़ व मशग़ूल पाया जिस जगह इमाम हुसैन (अ.स.) का सरे मुबारक लटकाया गया था , आपने इससे कहा मेरे हमराह चलो वह रवाना हुआ अभी चन्द क़दम भी न चला था कि कूफ़े की मस्जिद में जा पहुँचा , वहीं नमाज़ अदा करने के बाद जो रवानगी हुई तो सिर्फ़ चन्द मिन्टों में मदीना मुनव्वरा जा पहुँचे और ज़्यारत व नमाज़ से फ़राग़त की गई , फिर वहां से चल कर चन्द लम्हों में मक्का ए मोअज़्ज़मा रसीदगी हो गई , तवाफ़ व दीगर इबादत से फ़राग़त के बाद आपने चश्मे ज़दन में उसे शाम की मस्जिद में पहुँचा दिया और ख़ुद नज़रों से ओझल हो कर मदीना ए मुनव्वरा जा पहुँचे , फिर जब दूसरा साल आया तो आप बदस्तूरे शाम की मस्जिद में तशरीफ़ ले गए और उस आबिद से कहा मेरे हम राह चलो चुनान्चे वह चल पड़ा , आपने चन्द लम्हों में उसे साले गुज़िश्ताा की तरह तमाम मुक़द्दस मक़ामात की ज़्यारत करा दी। पहले ही साल के वाक़िये से वह शख़्स बेइन्तेहा मुत्तअस्सिर था ही कि दूसरे साल भी ऐसा ही वाक़िया हो गया। अबकी मरतबा उसने मस्जिदे शाम वापस पहुँचते ही उनका दामन थाम लिया और क़सम दे कर पूछा कि फ़रमाईये आप इस करामात के मालिक कौन हैं ? आपने इरशाद फ़रमाया कि मैं मोहम्मद बिन अली इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) हूँ। इसने बड़ी अक़ीदत और ताज़ीम व तकरीम के मरासिम अदा किए। आपके वापस तशरीफ़ ले जाने के बाद यह ख़बर बिजली की तरह फैल गई। जब वालिये शाम मोहम्मद अब्दुल मलिक को इसकी इत्तेला मिली और यह भी पता चला कि लोग इस वाक़िये से इन्तेहाई मुताअस्सिर हो गए हैं तो आपने उस आबिद पर मुदयी नबूअत होने का इल्ज़ाम लगा कर उसे क़ैद करा दिया और फिर शाम से मुन्तक़िल कर के ईराक़ भिजवा दिया। उसने वाली को क़ैद ख़ाने से एक ख़त भेजा जिसमें लिखा की मैं बे ख़ता हूँ मुझे रिहा किया जाए , तो उसने ख़त की पुश्त पर लिखा कि जो शख़्स तूझे शाम से कूफ़े और कूफ़े से मदीने और वहां से मक्का और फिर वहां से शाम पहुँचा सकता है। अपनी रिहाई में उसी की तरफ़ रूजू कर। इस जवाब के दूसरे दिन यह शख़्स मुकम्मल सख़्ती के बवजूद सख़्त तरीन पहरे के होते हुए क़ैद ख़ाने से ग़ाएब हो गया। अली बिन ख़ालिद रावी का बयान है कि जब मैं क़ैद ख़ाने के फाटक पर पहुँचा तो देखा की तमाम ज़िम्मे दारान हैरान व परेशान हैं और कुछ पता नहीं चलता कि आबिदे शामी ज़मीन में समा गया या आसमान पर उठा लिया गया। अल्लामा मुफ़ीद (अ. र.) लिखते हैं कि इस वाक़िये से अली बिन ख़ालिद जो दूसरे मज़हब का पैरो था , इमामिया मसलक़ का मोतक़िद हो गया।(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 205, नूरूल अबसार पृष्ठ 146, आलामु वुरा पृष्ठ 731, इरशाद मुफ़ीद पृष्ठ 481 )
हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के बाज़ करामात
साहबे तफ़सीर हुसैनी अल्लामा हुसैन वाएज़ काशफ़ी का बयान है कि हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के करामात बेशुमार हैं।(रौज़तुल शोहदा पृष्ठ 438 ) में बाज़ तज़केरा मुख़्तलिफ़ कुतुब से करता हूँ।
अल्लाम अब्दुरर्रहमान जामी तहरीर फ़रमाते हैं कि 1. मामून रशीद के इन्तेक़ाल के बाद हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) ने इरशाद फ़रमाया कि अब तीस माह बाद मेरा भी इन्तेक़ाल होगा , चुनान्चे ऐसा ही हुआ।
2. एक शख़्स ने आपकी खि़दमत में हाज़िर हो कर अर्ज़ किया कि एक मुसम्मता (उम्मुल हसन) ने आपसे दरख़्वास्त की है कि अपना कोई जामये कुहना (पुराने कपड़े) दीजिए ताकि मैं उसे कफ़न में रखूं। आपने फ़रमाया कि अब जामेय कुहना की ज़रूरत नहीं है। रावी का बयान है कि मैं वह जवाब ले कर जब वापस हुआ तो मालूम हुआ कि 13 14 दिन हो गए हैं वह इन्तेक़ाल कर चुकी है।
3. एक शख़्स उमय्या बिन अली कहता है कि मैं और हमाद बिन ईसा एक सफ़र में जाते हुए हज़रत की खि़दमत में हाज़िर हुए ताकि एक से रूख़सत हो लें , आपने इरशाद फ़रमाया कि , तुम आज अपना सफ़र मुलतवी करो , चुनान्चे हस्बे अल हुक्म ठहर गया , लेकिन मेरे साथी हमाद बिन ईसा ने कहा कि मैंने सारा सामाने सफ़र घर से निकाल रखा है अब अच्छा नहीं मालूम होता है कि सफ़र मुलतवी करूँ , यह कह कर वह रवाना हो गया और चलते चलते रात को एक वादी में जा पहुँचा और वहीं क़याम किया , रात के किसी हिस्से में एक अज़ीमुश्शान सेलाब आ गया और वह तमाम लोगों के साथ हमाद को भी बहा ले गया।(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 202 )
4. अल्लामा अरबली तहरीर फ़रमाते हैं कि मिम्बर बिन ख़लाद का बयान है कि एक दिन मदीना मुनव्वरा में जब कि आप बहुत कमसिन थे मुझसे फ़रमाया कि चलो मेरे हमराह , चुनान्चे मैं साथ हो गया , हज़रत ने मदीने से बाहर एक वादी में जा कर मुझ से फ़रमाया कि तुम ठहरो मैं अभी आता हूँ , चुनान्चे आप नज़रों से ग़ायब हो गए और थोड़ी देर बाद वापस हुए , वापसी पर आप बेइन्तेहा मलूल और रंजीदा थे , मैंने पूछा फ़रज़न्दे रसूल (स अ व व ) आपके चेहरा ए मुबारक से आसारे हुज़न व मलाल हुवैदा हैं। इरशाद फ़रमाया ! कि इसी वक़्त बग़दाद से वापस आ रहा हूँ वहां मेरे वालिदे माजिद हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) ज़हर से शहीद कर दिये गए हैं , मैं उन पर नमाज़ वग़ैरा अदा करने गया था।
5. क़ासिम बिन अब्दुर्रमान का बयान है कि बग़दाद में मैंने देखा किसी शख़्स के पास बराबर लोग आते जाते हैं और मैंने दरियाफ़्त किया कि जिसके पास आने जाने का ताता बंधा हुआ है यह कौन है ? लोगों ने कहा कि अबू जाफर बिन अली (अ.स.) हैं , अभी यह बातें हो ही रहीं थी कि आप नाक़े पर सवार उस तरफ़ से गुज़रे , क़ासिम कहता है कि उन्हें देख कर मैंने दिल में कहा कि लोग बड़े बेवकूफ़ हैं जो आपकी इमामत के क़ाएल हैं और आपकी इज़्ज़त व तौक़ीर करते हैं , यह तो बच्चे हैं और मेरे दिल मे इनकी कोई वक़त महसूस नहीं होती। मैं अपने दिल मे यही सोच रहा था कि आप ने क़रीब आ कर फ़रमाया कि , ऐ क़ासिम बिन अब्दुर्रहमान ! जो शख़्स हमारी इताअत से गुरेज़ाँ हैं वह जहन्नम में जायेगा। आपके इस फ़रमाने पर मैंने ख़्याल किया कि यह जादूगर हैं कि इन्होंने मेरे दिल के इरादे को मालूम कर लिया है। जैसे ही यह ख़्याल मेरे दिल में आया , आपने फ़रमाया कि तुम्हारा ख़्याल बिल्कुल ग़लत है तुम अपने अक़ीदे की इस्लाह करो। यह सुन कर मैंने आपकी इमामत का इक़रार किया और मुझे मानना पड़ा कि आप हुज्जतुल्लाह हैं।
6. क़ासिम इब्नुल हसन का बयान है कि मैं एक सफ़र में था , मक्का और मदीना के दरमियान एक मफ़लूक़ुल हाल ने मुझसे सवाल किया , मैंने उसे रोटी का एक टुकड़ा दे दिया। अभी थोड़ी देर गुज़री थी कि एक ज़बर दस्त आंधी आई और वह मेरी पगड़ी उड़ा ले गई। मैंने बड़ी तलाश की लेकिन वह दस्तयाब न हुई। जब मैं मदीने पहुँचा और हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) से मिलने गया तो आपने फ़रमाया , ऐ क़ासिम ! तुम्हारी पगड़ी हवा उड़ा ले गई। मैंने अर्ज़ कि जी हुज़ूर। आपने अपने ग़ुलाम को हुक्म दिया कि इनकी पगड़ी ले आओ। ग़ुलाम ने पगड़ी हाज़िर की। मैंने बड़े ताज्जुब से दरियाफ़्त किया कि मौला ! यह पगड़ी यहां कैसे पहुँची ? आपने फ़रमाया तुमने जो राहे ख़ुदा में रोटी का टुकड़ा दिया था , उसे ख़ुदा ने क़ुबूल फ़रमा लिया है। ऐ क़ासिम ! ख़ुदा वन्दे आलम यह नहीं चाहता कि जो उसकी राह में सदक़ा दे वह उसे नुक़सान पहुँचने दे।
7. उम्मुल फ़ज़ल ने हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की शिकायत अपने वालिद मामून रशीद अब्बासी को लिख कर भेजी , कि अबू जाफ़र मेरे होते हुए दूसरी शादी भी कर रहे हैं। उसने जवाब दिया कि मैंने तेरी शादी इस लिये नहीं की कि हलाले ख़ुदा को हराम कर दूँ। उन्हें क़ानूने ख़ुदा वन्दी इजाज़त देता है वह दूसरी शादी करें इसमें तेरा क्या दख़ल है। आइन्दा से इस क़िस्म की कोई शिकायत न करना और सुन तेरा फ़रीज़ा है कि तू अपने शौहर अबू जाफ़र को जिस तरह हो राज़ी रख। इस तमाम ख़तो किताबत की इत्तेला हज़रत को हो गई।(कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 120 )
अल्लामा शेख़ हुसैन बिन अब्दुल वहाब तहरीर फ़रमाते हैं कि एक दिन उम्मुल फ़ज़ल ने हज़रत (अ.स.) की एक बीवी को जो अम्मार यासीर की नस्ल से थीं , देखा तो मामून रशीद को कुछ इस अन्दाज़ से कहा कि वह हज़रत के क़त्ल पर आमादा हो गया मगर क़त्ल न कर सका।(अयुनूल मोजिज़ात पृष्ठ 154 प्रकाशित मुलतान)
हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के हिदायात व इरशादात
यह एक मुसल्लेमा हक़ीक़त है कि बहुत से बुज़ुर्ग मरतबा उलेमा ने आपसे उलूमे अहले बैत की तालीम हासिल की। आपके ऐसे मुख़्तसिर हाकिमाना मक़ूलों का भी एक ज़ख़ीरा है। जैसे आपके जद्दे बुज़ुर्गवार हज़रत अमीरल मोमेनीन इमाम अली बिन अबी तालिब (अ.स.) के कसरत से पाए जाते हैं। जनाबे अमीर (अ.स.) के बाद इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के मक़ूलों को एक ख़ास दर्जा हासिल है। बाज़ उलमा ने आपके मक़ूलों की तादाद कई हज़ार बताई है। अल्लामा शिबलन्जी ब हवाला ए फ़सूलुलप मोहिमा तहरीर फ़रमाते हैं कि इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) का इरशाद है कि 1. ख़ुदा वन्दे आलम जिसे जो नेमत देता है ब इरादा दवाम देता है लेकिन उस से वह उस वक़्त ज़ाएल हो जाती है जब वह लोगों यानी मुस्तहक़ीन का देना बन्द कर देता है।
2. हर नेमते ख़ुदा वन्दी में मख़लूक़ का हिस्सा है। जब ख़ुदा किसी को अज़ीम नेमतें देता है तो लोगों की हाजतें भी कसीर हो जाती हैं। इस मौके़ पर अगर साहेबे नेअमत (मालदार) ओहदे बरआ हो सका तो ख़ैर ने नेअमत का ज़वाल लाज़मी है।
3. जो किसी को बड़ा समझता है उस से डरता है।
4. जिसकी ख़्वाहिशात ज़्यादा होंगी उसका जिस्म मोटा होगा।
5. सहीफ़ा ए हयाते मुस्लिम का सर नामा हुस्ने ख़ल्क़ है।
6. जो ख़ुदा के भरोसे पर लोगों से बेनियाज़ हो जायेगा लोग उसके मोहताज होंगे।
7. जो ख़ुदा से डरेगा लोग उसे दोस्त रखेगें।
8. इन्सान की तमाम ख़ुबीयों का मरकज़ ज़बान है।
9. इन्सान के कमालात का दारो मदार अक़ल के कमाल पर है।
10. इन्सान के लिये फ़ख़्र की ज़ीनत इफ़्फ़त है। ख़ुदाई इम्तेहान की ज़ीनत शुक्र है। हसब की ज़ीनत तवाज़ो और फ़रोतनी है। कलाम की ज़ीनत फ़साहत है। रवायत की ज़ीनत हाफ़ेज़ा है। इल्म की ज़ीनत इन्केसार है। वरा और तक़वा की ज़ीनत हुस्ने अदब है। क़नात की ज़ीनत ख़न्दा पेशानी है। वरा व परेहज़गारी की ज़ीनत तमाम मामेलात से कनारा कशी है।
11. ज़ालिम और ज़ालिम के मद्दगार और ज़ालिम के फे़ल को सराहने वाले एक ही ज़ुमरे में हैं यानी सब का दर्जा बराबर है।
12. जो ज़िन्दा रहना चाहता है उसे चाहिये कि बर्दाश्त करने के लिये अपने दिल को सब्र अज़मा बना ले।
13. ख़ुदा की रज़ा हासिल करने के लिये तीन चीज़ें होनी चाहियें , अव्वल अस्तग़फ़ार , दोम , नरमी और फ़रोतनी , सौम , कसरते सदक़ा।
14. जो जल्द बाज़ी से परहेज़ करेगा , लोगों से मशविरा लेगा , अल्लाह पर भरोसा रखेगा वह कभी शर्मिन्दा नहीं होगा।
15. अगर जाहिल ज़बान बन्द रखे तो इख़्तेलाफ़ात न हों।
16. तीन बातों से दिल मोह लिये जाते हैं , क. माशरे में इंसाफ़ , ख. मुसीबत में हमदर्दी , ग. परेशान ख़ातरी में तसल्ली।
17. जो किसी बुरी बात को अच्छी निगाह से देखेगा वह उसमें शरीक समझा जायेगा।
18. कुफ़राने नेअमत करने वाला ख़ुदा की नाराज़गी को दावत देता है।
19. जो तुम्हारे किसी अतिए पर शुक्रिया अदा करे गोया उसने तुम्हें उससे ज़्यादा दे दिया।
20. जो अपने भाई को पोशीदा तौर पर नसीहत करे वह उसका मोहसिन है और जो एलानिया नसीहत करे गोया उसके साथ बुराई की।
21. अक़लमन्दी और हिमाक़त जवानी के क़रीब तक एक दूसरे पर ग़लबा करते रहते हैं और जब अठ्ठारा साल पूरे हो जाते हैं तो इस्तक़लाल पैदा हो जाता है और राह मोअय्यन हो जाती है।
22. जब किसी बन्दे पर नेअमत का नुज़ूल हो वह इस नेअमत से मुताअस्सिर हो कर यह समझे कि यह ख़ुदा की इनायत और मेहरबानी है तो ख़ुदा वन्दे आलम शुक्र करने से पहले उसका नाम शाकिरों में लिख लेता है और जब कोई गुनाह करने के बाद यह महसूस करे कि मैं ख़ुदा के हाथ में हूँ वह जब और जिस तरह चाहे अज़ाब कर सकता है तो ख़ुदा वन्दे आलम उसे अस्तग़फ़ार से क़ब्ल बख़्श देता है।
23. शरीफ़ वह है जो आलिम है और अक़्लमन्द वह है जो मुत्तक़ी है।
24. जल्द बाज़ी कर के किसी अम्र को शोहरत न दो जब तक तकमील न हो जाए। 25. अपनी ख़्वाहिशात को इतना न बढ़ाओ कि दिल तंग हो जाओ।
26. अपने ज़ईफ़ों पर रहम करो और उन पर रहम के ज़रिए से अपने लिये रहम की ख़ुदा से दरख़्वास्त करो।
27. आम मौत से बूरी मौत वह है जो गुनाह के ज़रिए से हो , और आम ज़िन्दगी से ख़ैरो बरकत के साथ वाली ज़िन्दगी बेहतर है।
28. जो ख़ुदा के लिये अपने किसी भाई को फ़ाएदा पहुँचाए वह ऐसा है जैसे उसने अपने लिये जन्नत में घर बना लिया।
29. जो ख़ुदा पर एतमाद रखे और उस पर तवक़्कु़ल और भरोसा करे खु़दा उसे हर बुराई से बचाता है और उसकी हर क़िस्म के दुश्मन से हिफ़ाज़त करता है।
30. दीन इज़्ज़त है , इल्म ख़ज़ाना है और ख़ामोशी नूर है।
31. ज़ोहद कि इन्तेहा वरा और तक़वा है।
32. दीन को तबाह कर देने वाली चीज़ बिदअत है।
33. इन्सान को बादबाद करने वाली चीज़ लालच है।
34. हाकिम की सलाहियत पर रेआया की ख़ुशहाली का दारो मदार है।
35. दुआ के ज़रिए हर बला टल सकती है।
36. जो सब्रो ज़ब्त के साथ मैदान में आ जाए वह कामयाब होगा।
37. जो दुनियां में तक़वा का बीज बोएगा आख़ेरत में दिली मुरादों का फल पाएगा।
(नूरूल अबसार पृष्ठ 148 प्रकाशित मिस्र)
हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की एक रवायत
मुवर्रिख़े दमिश्क़ अल्लामा शम्सुद्दीन इब्ने तालून लिखते हैं कि हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) ने अपने आबाओ अजदाद से रवायत करते हुए इरशाद फ़रमाया है कि हज़रत अली (अ.स.) ने बयान फ़रमाया है कि जब आं हज़रत (स अ व व ) ने मुझे यमन की तरफ़ भेजा था तो चन्द ख़ास वसीअतें की थीं जिनमें एक यह थी ‘‘ या अली माख़ाबा मन इस्तेख़ारो लानदम मन इस्तेशार ’’ जो शख़्स अपने कामों में इस्तेख़ारा कर लिया करेगा वह ख़ाएब यासिर न होगा और जो अपने मुख़लिस दोस्तों से मशविरा किया करेगा वह नादिमो शर्मिन्दा न होगा मन इस्तेफ़ादा काफ़िल्लाह फ़क़त इस्तेफ़ाद बैतन फिल जन्नत जो अपने भाई को फ़ी सबीलिल्लाह फ़ाएदा पहुँचाएगा वह जन्नत में अपना घर बनवा लेगा।(अल मता अल असना अशर पृष्ठ 103 प्रकाशित बैरूत)
मामून की वफ़ात , मोतसिम की खि़लाफ़त और हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की गिरफ़्तारी
शादी के बाद हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) मदीने में क़दरे पुर सुकून ज़िन्दगी बसर कर रहे थे यानी आपको वह ख़दशा न था जो हुकूमते वक़्त की तरफ़ से आपके आबाओ अजदाद को हर वक़्त लगा रहता था और जिसके नतीजे में शहादत का दर्जा नसीब होता रहता था। आपको जो तकलीफ़ थी वह उम्मुल फ़ज़ल के शिकायती ख़ुतूत की थी जिनके ज़रिए से वह मामून की अनाने तवज्जा आपकी मुख़ालेफ़त की तरफ़ मोड़ना चाहती थीं। मामून चुंकि होशियार और अपने किए के निभाने का आदी था इस लिये उसने कोई परवाह नहीं की लेकिन इसके बाद वाले ख़लीफ़ा ने इसको पूरी अहमियत दे कर आपका काम तमाम कर दिया।
अल्लामा अली नक़ी लिखते हैं कि 218 हिजरी में मामून ने दुनियां को ख़ैर बाद कहा। अब मामून का भाई और उम्मुल फ़ज़ल का चचा मोतसिम जो इमाम रज़ा (अ.स.) के बाद वली अहद बनाया जा चुका था तख़्ते सलतनत पर बैठा और मोतसिम बिल्लाह अब्बासी के नाम से मशहूर हुआ , इसके बैठते ही इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के मुताअल्लिक़ उम्मुल फ़ज़ल के इसी तरह के शिकायती ख़ुतूत की रफ़्तार बढ़ गई , जिस तरह के उसने अपने बाप मामून को भेजे थे। मामून ने जो तमाम बनी अब्बासीयों की मुख़ालेफ़तों के बवजूद भी अपनी लड़की का निकाह इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के साथ कर दिया था इस लिये अपनी बात की पच और किए की लाज रखने की ख़ातिर उसने उन शिकायतों पर कोई तवज्जोह नही दी बल्कि मायूस कर देने वाले जवाब से बेटी की ज़बान बन्द कर दी मगर मोतसिम जो इमाम रज़ा (अ.स.) की वली अहदी का दाग़ अपने सीने पर लिये हुए था और इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) को दामाद बनाए जाने से तमाम बनी अब्बास के नुमाइन्दे की हैसियत से पहले ही इख़्तेलाफ़ करने वालों में पेश पेश रह चुका था। अब उम्मुल फ़ज़ल के शिकायती ख़ुतूत को अहमियत दे कर अपने इस इख़्तेलाफ़ को जो इस निकाह से था हक़ बा जानिब करना चाहता था। फिर सब से ज़्यादा इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की इल्मी मरजीयत आपके इख़लाक़ी असर का शोहरा जो हिजाज़ से बढ़ कर ईराक़ तक पहुँचा हुआ था , वह बिना मुख़ासेमत जो मोतसिम के बुज़ुर्गों को इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के बुज़ुर्गों से रह चुकि थी वह फिर इस सियासत की नामी और मन्सूबा की शिकस्त का महसूस हो जाना जो इस अक़्द का मुहर्रिक हुआ था जिसकी तशरीह पहले हो चुकि है। यह तमाम बातें थीं कि मोतसिम मुख़ालेफ़त के लिये अमादा हो गया। उसने अपनी सलतनत के दूसरे ही साल इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) को मदीने से बग़दाद की तरफ़ जबरन बुलवा भेजा। हाकिमे मदीना अब्दुल मलिक को इस बारे में ताक़िदी ख़त लिखा मजबूरन इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) अपने फ़रज़न्द हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) और उनकी वालेदा को मदीने में छोड़ कर बग़दाद की तरफ़ रवाना हो गए। मुल्ला मोहम्मद मुबीन फिरंगी महली कहते हैं कि जब मामून के बाद मोतसिम ख़लीफ़ा हुआ और उसने इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के फ़ज़ाएल का आवाज़ सुना तो बराए बुग़ुज़ व अनाद मदीना ए मुनव्वरा से ब मुक़ाम बग़दाद आपको तलब कर लिया। इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) जब मदीने से चलने लगे तो उन्होंने अपने फ़रज़न्द इमाम अली नक़ी (अ.स.) को अपना वसी और ख़लीफ़ा क़रार दे कर कुतुबे उलूमे इलाही और असारे जनाबे रिसालत पनाही उन्हें सुपुर्द फ़रमाया , उसके बाद मदीने से रवाना हो कर नवीं मोहर्रम ( 9 मोहर्रम) 220 हिजरी को बग़दाद पहुँचे और मोतसिम ने उसी साल उनको शहीद कर दिया।(वसीलाए नजात पृष्ठ 260 )
इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की नज़र बन्दी क़ैद और शहादत
मदीना ए रसूल (स अ व व ) से फ़रज़न्दे रसूल को तलब करने की ग़रज़ चुंकि नेक नीयती पर मुबनी न थी इस लिये अज़ीम शरफ़ के ब वजूद बाप हुकूमते वक़्त की किसी रियायत के क़ाबिल नहीं मतसव्वुर हुए। मोतसिम ने बग़दाद बुलवा कर आपको क़ैद कर दिया।
अल्लामा अरबली लिखते हैं कि चूंकि मोतसिम ब खि़लाफ़त बानश्त आँ हज़रत रा अज़ मदीना ए तय्यबा ब दारूल खिलाफ़ा बग़दाद आवरदा जलस फ़रमूदा(कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 112 ) एक साल तक आपने क़ैद की सख़्तियां सिर्फ़ इस जुर्म में बर्दाश्त कीं कि आप कमालाते इमामत के हामिल क्यों हैं और आपको ख़ुदा ने यह शरफ़ क्यों अता फ़रमाया है। बाज़ उलमा का कहना है कि आप पर इस क़दर सख़्तियां थीं और इतनी कड़ी निगरानी और नज़र बन्दी थी कि आप अक्सर अपनी ज़िन्दगी से बेज़ार हो जाते थे। बहरहाल वह वक़्त आ गया कि आप सिर्फ़ पच्चीस साल तीन माह 12 यौम की उम्र में क़ैद ख़ाने के अन्दर आखि़र ज़िक़ाद (ब तारीख़ 29 ज़िक़ादा सन् 220 हिजरी यौमे सह शम्बा) मोतसिम के ज़हर से शहीद हो गए।(कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 121, सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 123, रौज़तुल पृष्ठ जिल्द 3 पृष्ठ 16, आलामु वुरा पृष्ठ 205, इरशाद 480, अनवारे नोमानिया पृष्ठ 127, अनवारूल हुसैनिया पृष्ठ 54 ) आपकी शहादत के मुताअल्लिक़ मुल्ला मुबीन कहते हैं कि मोतसिम अब्बासी ने आपको ज़हर से शहीद किया।(वसीलतुन नजात पृष्ठ 297 ) अल्लामा इब्ने हजर मक्की लिखते हैं कि आपको इमाम रज़ा (अ.स.) की तरह ज़हर से शहीद किया गया।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 123 )
अल्लामा हुसैन काशफ़ी लिखते हैं कि ‘‘ गोयन्द ब ज़हर शहीद शुद ’’ कहते हैं कि ज़हर से शहीद हुए हैं।(रौज़तुल शोहदा पृष्ठ 438 ) मुल्ला जामी की किताब में है ‘‘ क़ीला मता मसमूमन ’’ कहा जाता है कि आपकी वफ़ात ज़हर से हुई।(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 204 )
अल्लामा नेमत उल्ला जज़ायरी लिखते हैं ‘‘ माता मसमूमन क़द समेउल मोतसिम ’’ आप ज़हर से शहीद हुए हैं और यक़ीनन मोतसिम ने आपको ज़हर दिया है।(अनवारे नोमानिया पृष्ठ 195 ) यही कुछ अल्लामा तबरी ने भी तहरीर फ़रमाया है।(आलामुल वरा पृष्ठ 205 ) और अल्लामा अब्दुल रज़ा ने भी यही लिखा है।(अनवारूल हुसैनिया पृष्ठ 54 )
नवाब सिद्दीक़ हसन लिखते हैं कि मोहतसिम अब्बासी ने आपको ज़हर से मार दिया।(अल फ़राहुल आमी) अल्लामा शिब्लन्जी लिखते हैं कि ‘‘अना मता मसमूमन ’’ आप ज़हर से शहीद हुए है। ‘‘ यक़ाल इन उम्मुल फ़ज़ल बिनतुल मामून सख़्तहू बे मूराबीहा ’’ कहा जाता है कि आपको आपकी बीवी उम्मुल फ़ज़ल ने अपने बाप मामून के मुताबिक़ मोतसिम की मदद से ज़हर दे कर शहीद किया।(नूरूल अबसार पृष्ठ 147, अरजहुल मतालिब पृष्ठ 460 )
मतलब यह हुआ कि मामून रशीद ने इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के वालिदे माजिद इमाम रज़ा (अ.स.) को उसकी बेटी ने इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) को बक़ौले शिब्लन्जी शहीद कर के अपने वतीरे मुस्तमारता और उसूले ख़ानदानी को फ़रोग़ बख़्शा है।
अल्लामा मौसूफ़ लिखते हैं कि ‘‘ दख़्लत इम्रातहा उम्मुल फ़ज़ल अला क़सर अल मोतसिम ’’ कि इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) को शहीद कर के उनकी बीवी उम्मुल फ़ज़ल मोतसिम के पास चली गईं। बाज़ मआसेरीन लिखते हैं कि इमाम (अ.स.) ने शहादत के वक़्त उम्मुल फ़ज़ल के बदतरीन मुस्तक़बिल का ज़िक्र फ़रमाया था जिसके नतीजे में उसके नासूर हो गया था और वह आखि़र में दीवानी हो कर मरी।
मुख्तसर यह कि शहादत के बाद हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) ने आपकी तजहीज़ व तकफ़ीन में शिरकत की और नमाज़े जनाज़ा पढ़ाई और इसके बाद आप मुक़ाबिर क़ुरैश में अपने जद्दे नामदार हज़रत इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) के पहलू में दफ़्न किए गए। चुंकि आपके दादा का लक़ब काज़िम और आपका लक़ब जवाद भी था इस लिये उस शहर को आपकी शिरकत से ‘‘ काज़मैन ’’ और वहां के इस्टेशन को आपके दादा की शिरकत की रिआयत से ‘‘ जवादीन ’’ कहा जाता है।
इस मक़बरा ए क़ुरैश में जिसे काज़मैन के नाम से याद किया जाता है 356 हिजरी मुताबिक़ 998 ई 0 में मोअज़ उद्दौला और 452 हिजरी मुताबिक़ 1044 ई 0 जलालुद दौला शाहाने आल बोयह के जनाज़े ऐतिक़ाद मन्दी से दफ़्न किए गए। काज़मैन में जो शानदार रौज़ा बना हुआ है इस पर बहुत से तामीरी दौर गुज़रे लेकिन इसकी तामीरी तकमील शाह इस्माईल सफ़वी ने 966 हिजरी मुताबिक़ 1520 ई 0 में कराई। 1255 हिजरी मुताबिक़ 1856 में मोहम्मद शाह क़ाचार ने उसे जवाहेरात से मुरस्सा किया।
आपकी अज़वाज और औलाद
उलमा ने लिखा है कि हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के चन्द बीवीयां थीं जिनमें उम्मुल फ़ज़ल बिन्ते मामून रशीद अब्बासी और समाना ख़ातून यासरी नुमायां हैसीयत रखती थीं। जनाबा समाना ख़ातून जो कि हज़रत अम्मार यसीर की नस्ल से थी के अलावा किसी से कोई औलाद नहीं हुई। आपकी औलाद के बारे में उलमा का इत्तेफ़ाक़ है कि दो नरीना और दो ग़ैर नरीना थीं जिसके असमा यह हैं 1. हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) 2. जनाबे मूसा मुबर्रेक़ा (अ.स.) 3. जनाबे फ़ात्मा 4. जनाबे अमामह।(इरशाद मुफ़ीद पृष्ठ 493, सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 123, रौज़तुल शोहदा पृष्ठ 438, नूरूल अबसार पृष्ठ 147, अनवारे नोमानिया पृष्ठ 127 कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 116, आलामुल वरा पृष्ठ 205 वगै़रह।)
सिलसिला ए सा दा ते रिज़विया
हज़रत इमाम अली रज़ा (अ.स.) के हालात में बहवाले इमाम उल मोहद्देसीन हुज्जतुल इस्लाम हज़रत अल्लामा शेख़ मुफ़ीद (अ. र.) व अल्लामा मोतमिद तबरसी लिखा जा चुका है कि हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) के नरीना फ़रज़न्द , हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) थे। इन हज़रात की तहक़ीक़ पर ऐतिमाद व एतिक़ाद करने के बाद यह यक़ीनी तौर पर कहा जा सकता है कि हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की नस्ल सिर्फ़ इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) से बढ़ी , बेटे की औलाद का दादा की तरफ़ इन्तेसाब ख़ुसूसन ऐसी हालत में जब कि बाप के अलावा दादा के कोई और औलाद न हो नेहायत मुनासिब है।
इसी लिये अल्लामा हुसैन वाएज़ काशफ़ी , अल्लामा सय्यद नूरूल्लाह शूस्तरी(शहीदे सालिस) अल्लामा मजलिसी तहरीर फ़रमाते हैं कि हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की औलाद को ‘‘ रिज़वी ’’ कहा जाता है।(रौज़तुल शोहदा पृष्ठ 438, मजालिस अल मोमेनीन व बेहारूल अनवार) अल्लामा मआसिर मौलाना सय्यद अली नक़ी मुजतहीदुल अस्र रक़म तराज़ हैं कि ‘‘ यह एक हक़ीकत है कि जितने सादात ‘‘ रिज़वी ’’ कहलाते हैं वह दरअस्ल तक़वी हैं यानी हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की औलाद हैं। अगर हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की औलाद हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के अलावा किसी और फ़रज़न्द के ज़रिए से भी होती तो इम्तेआज़ के वह अपने को ‘‘ रिज़वी ’’ कहलाती और इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की औलाद अपने को तक़वी कहती , मगर चुंकि इमाम रज़ा (अ.स.) की नस्ल इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) से चली और हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की शख़्सी शोहरत सलतनते अब्बासीया के वली अहद होने की वजह से जम्हूरे मुसल्लेमीन में बहुत हो चुकी थी , इस लिये तमाम औलाद को हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की तरफ़ मन्सूब कर के तारूफ़ किया जाने लगा और रिज़वी के नाम से मशहूर हुए। ’’
हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की नस्ल दो बेटों से बढ़ी , एक इमाम अली नक़ी (अ.स.) और दूसरे मूसा मबरक़ा अलैह रहमह(किताब रहमतुल लिलअलेमीन जिल्द 2 पृष्ठ 145 ) इमाम अली नक़ी (अ.स.) की औलाद अपने को नक़वी और मूसा मुबरक़े की औलाद मज़कूरा वजह की बिना पर अपने को रिज़वी कहलाती है।
जनाबे मूसा बिन इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के फ़रज़न्द
मुताबिक़ तहरीर सय्यद हामिद हुसैन करारवी मतूफ़ी 1271 हिजरी महूलए ‘‘ लताएफ़ुश शरफ़ ’’ तीन थे।
अल्लामा हुसैन वाएज़ काशफ़ी लिखते हैं ‘‘ अक़ब मुबरक़ा अज़ सय्यद अहमद अस्त व अक़ब अहमद अज़ मोहम्मद अरज अस्त ’’(रौज़तुल शोहदा पृष्ठ 438 ) सय्यद अहमद के तीन बेटे थे 1. सय्यद सालेह 2. सय्यद जलील 3. सय्यद मोहम्मद अरज मोहम्मद अरज के फ़रज़न्द अबू अब्दुल्लाह सय्यद अहमद ‘‘ नक़ीब अलकुम ’’ थे जिसके मानी रईसे आज़म , निगराने आला , सरबराह और क़ौम के हर दाख़ली और ख़ारजी अमर में तदबीर और साज़गारी पैदा करने वाले के हैं।(मजमउल बहरैन पृष्ठ 157 ) सादाते करारी ज़िला इलाहबाद का सिलसिला ए नसब आप ही की वसातत से इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) और इमाम अली रज़ा (अ.स.) तक पहुँचता है। सादाते करारी के मूरिसे आला सय्यद हसामुद्दीन आल्लाह मुक़ामहू , गर्वनर मथुरा ब अहदे फ़िरोज़ शाह तुग़लक थे। सय्यद रियाज़ुल हसन करारवी मुक़ीम कराची लिखते हैं कि ‘‘ आप ईरान से हिन्दुस्तान आ कर ज़ैद पुर ज़िला बारा बंकी में सुकूनत पज़ीर हुए थे। आपको पहले सूबे का गर्वनर फिर फ़ौज का कमान्डर बना दिया गया था। आप बहुत बड़े बहादुर और सख़ी थे। ’’ आपका सिलसिला नौ वास्तों से नक़ीब अलकु़म तक , फिर चार वास्तों से हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) तक पहुँचता है। आपने 717 हिजरी में जंगल काट कर ‘‘ करारी ’’ को आबाद किया जो तक़रीबन आढ़ाई सौ मवाज़ेआत पर मुश्तमिल है , जिन पर आपकी औलाद क़ाबिज़ और मुतासरिफ़ है।(किताब शजरह सादात करारी मोअल्लेफ़ा सय्यद रियाज़ हुसैन मरहूम पृष्ठ 17 -18 प्रकाशित लखनऊ 1927 ई 0 )
सैय्यद हसामुद्दीन के कु़म से हिन्दुस्तान तशरीफ़ लाने के मुताअल्लिक़ कहा जा सकता है कि चंगेज़ ख़ाँ ने जब ईरान फ़तेह करने के लिये लश्कर भेजा और उस लश्कर ने क़यामत ख़ेज़ तबाही मचाई थी , इसी मौक़े पर दीगर हज़रात की तरह आप भी हिन्दुस्तान तशरीफ़ लाए। (तारीख़ रौज़तुल पृष्ठ जिल्द 5 पृष्ठ 25 ता पृष्ठ 39 प्रकाशित लखनऊ में है कि चंगेज़ खाँ का लश्कर 615 हिजरी में फ़तेह ईरान के लिये निकला। इसकी हालत यह थी कि सैले हवादिस की तरह जिस तरफ़ गुज़रता था तबाहो बरबाद कर छोड़ता था , किसी ने किसी का हवाला देते हुए कहा है कि ‘‘ आमदन् दव कन्दन्द व सोख़तन्द व कुश्तन्द व बुरदन्द ’’ कि लश्कर वाले आए , उखाड़ा वछाड़ जलाया फूका , क़त्ल किया और सब लूट कर ले गए। पृष्ठ 2 चंगेज़ ख़ाँ के दस्त बुरद से ईरान का कोई शहर नुमाया क़रिया नहीं बचा। उसने क़त्लो ग़ारत का सिलसिला 621 हिजरी तक जारी रखा। यूँ तो हर जगह तबाही हुई और सब ही क़त्ल हुए लेकिन वह मुक़ामात जिनकी तबाही से हमारे दिलों को रूही सदमा पहुँचा , वह बलख़ , ख़ुरासान , सब्ज़ावार , नेशापूर और क़ुम जैसे शहर में , बलख़ में पचास हज़ार सादात थे जो क़त्ल हुए। ख़ुरासान में करीब सद हज़ार मोमिन मोवहिद शहीद साखतनद ’’ तक़रीबन एक लाख मोमिन क़त्ल हुए। पृष्ठ 36, सब्ज़ावार में सत्तर हज़ार क़त्ल किये गए। पृष्ठ 36, नेशापूर में तो मक़तूलीन की इतनी कसरत थी कि बारह दिन तक लाशों का शुमार होता रहा। हेरात में भी शदीद अन्धेर गर्दी थी , बेशुमार सादात क़त्ल किये गए। इन हंगामों में नेहायत बरबरियत का सबूत दिया गया , आग लगाई गई। अस्मतदरी की गई , पानी बन्द किया गया और बे दरेग़ क़त्ल व खूंरेज़ी से सर ज़मीने ईरान लालाज़ार बनाई गई। बाज़ मुक़ामात के तज़किरे में मज़कूर है कि ज़ालिम यह कहते थे कि राफ़्ज़ी लोग हैं इनका क़त्ल करना ‘‘ एैन सवाब व मुस्तलज़िम सवाब अस्त ’’ नेहायत सही अमल है और बे हद सवाब का मोजिब है। पृष्ठ 30, बहर हाल हालात से मुतासिर हो कर सादात ईरान से जान बचा कर निकल खड़े हुए और एतराफ़े आलम जहाँ जिसको सूझा वहां जा ठहरा पृष्ठ 39 साहबे उम्दतूल तालिब की तहरीर के मुताबिक़ हज़रत मूसा मबरक़ा की औलाद भी हिन्दुस्तान आई। बदरे मशअशा पृष्ठ 31 जहाँ तक मैं समझता हूँ सैय्यद हुसामुद्दीन का तशरीफ़ लाना भी इसी अहद से मुतअल्लिक़ है।
हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के फ़रज़न्दे अर्जुमन्द जनाब मूसा मुबरक़ा के मुख़्तसिर हालात
हज़रत मूसा मुबरक़ा (अ. र.) हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के फ़रज़न्द और हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) के बरादरे अज़ीज़ थे। आपकी कुन्नीयत अबू जाफ़र और अबू अहमद थी। आप कमाले हुस्नो जमाल की वजह से हमेशा चेहरे पर नक़ाब डाले रहते थे। इसी लिये आपके नाम के साथ ‘‘ मुबरक़ा ’’ भी मुस्तमिल होता है। आप बेहतरीन आलिमे दीन , सख़ी और बहादुर थे। आप 10 रजबुल मुरज्जब 217 हिजरी को मदीना ए मुनव्वरा में पैदा हुए फिर 38 साल की उम्र में 255 हिजरी में कूफ़े तशरीफ़ ले गए , फिर वहां से 256 हिजरी में क़ुम मुन्तक़िल हो गए। उलमा का बयान है कि यह पहले शख़्स हैं जिन्होंने सादाते रिज़विया से कु़म में मुस्तक़िल क़याम का इरादा किया।
अल्लामा शेख़ अब्बास कु़म्मी तहरीर फ़रमाते हैं कि जब आप कूफ़े से क़ुम पहुँचे तो वहा के रऊसा ने आपके मुस्तक़िल क़याम की मुख़ालेफ़त की और आपकी भर पूर कोशिशे क़याम के बावजूद आपको वहां टिकने न दिया , बिल आखि़र आप वहां से रवाना हो कर ‘‘ काशान ’’ पहुँचे , आपकी नस्ली अज़मत और तबलीग़ी सर गर्मियों की शोहरत की वजह से वहां के बाशिन्दों ने आपकी बड़ी आओ भगत की और पूरी इज़्ज़त व तौक़ीर के साथ इनको अपनी आंखों पर जगह दी , चुनान्चे इनके सरबराह अहमद बिन अब्दुल अज़ीज़ बिन दल्फ़ अजली ने दिलो जान से ख़ैर मक़दम किया और लिबासे फ़ाख़ेरा पहना कर उनके लिये शानदार घोड़े फ़राहम किये और एक हज़ार मिसक़ाल सोना , सालाना उनके लिये मुक़र्रर किया।
मुवर्रेख़ीन का बयान है कि अहले काशान आपके वहां क़याम करने से इन्तेहाई ख़ुश थे और आपके क़याम को सारे काशान की ख़ुश क़िस्मती समझते थे लेकिन इसी दौरान में जब क़ुम वालों को होश आया और उनके बाज़ मोअजि़्ज़ हज़रात जो कि बाहर थे जैसे ‘‘ अबू अल सय्यद बिन अल हुसैन बिन अली बिन आदम ’’ जब क़ुम वापस पहुँचे और उन्हें इस हादसे अख़राज का हुक्म हुआ तो वह बेहद शर्मिन्दा हुए और उन लोगों की सख़्त मज़म्मत की जिनका इनके अख़्राज में हाथ था। ‘‘ फ़ार सल्वा रऊसा अल अरब ’’ फिर इन मोअज़्ज़ेज़ीन और अरब के रऊसा ने आपको वापस लाने के लिये एक जमीअत भेज दी , इसने उज़र व माज़ेरत के बाद आपको क़ुम वापस तशरीफ़ लाने पर आमादा कर लिया। चुनान्चे आप निहायत इज़्ज़त व एहतिराम के साथ क़ुम वापस तशरीफ़ लाए , इन हज़रात ने इनके लिये एक शानदार मकान और बहुत सी ज़रूरी चीज़ें और जाएदाद में उनको वाफ़िर हिस्सा दिया और बीस हज़ार दिरहम से नक़द खि़दमत की आपके क़ुम में मुस्तक़िल क़याम के बाद आपकी बहने , ज़ीनत उम्मे मोहम्मद ,मैमूना वग़ैरा भी पहुँच गई और आपकी लड़की बरेह भी जा पहुँची। यह बीबियां मुस्तक़िल वहीं मुक़ीम रहीं बिल आखि़र सब की सब हज़रत मासूमा ए क़ुम के गिर्दा गिर्द दफ़्न हुई।
आप अपने भाई इमाम अली नक़ी (अ.स.) के पैरो थे और उन्हें बेहद मानते थे और मसाएल के जवाब देने में बावक़्ते ज़रूरत उन्हीं से मद्द लिया करते थे जैसा कि यहिया इब्ने अक़सम के सवाल के जवाब में आपका इमाम अली नक़ी (अ.स.) की तरफ़ रूजू करने से ज़ाहिर है।(सफ़ीनतुल बेहार जिल्द 1 पृष्ठ 591 ) आपके मुताअल्लिक़ जो यह कहा जाता है कि आप इमाम अली नक़ी (अ.स.) की मर्ज़ी के खि़लाफ़ एक दफ़ा मुतावक्लि से मिलने गए थे। ‘‘ ग़लत है ’’ क्यों कि इस ख़बर की रवायत याक़ूब बिन यासिर ने की है और वह मोवक्किल का आदमी था यानी ‘‘ यह हवाई उसी दुश्मन की उड़ाई हुई है ’’ इसकी कोई अस्लीयत नहीं।(बदर मशअशा अल्लामा नूरी व सफ़ीनतुल अल बहार 2 पृष्ठ 652 )
आपने शबे चार शम्बा 22 रबीउस्सानी 296 में ब उम्र 79 साल वफ़ात पाई। आपकी नमाज़े जनाज़ा अमीरे क़ुम अब्बास बिन अमरू ग़नवी ने पढ़ाई और आप इसी मुक़ाम पर दफ़्न हुए जिस जगह आपका रौज़ा बना हुआ है। एक रवायत की बिना पर यह वह जगह है जिस जगह मोहम्मद बिन अल हसन बिन अबी ख़ालिद अशरी मुलक़्क़ब ब ‘‘ शम्बूल ’’ का मकान था।(मन्थउल माल जिल्द 2 पृष्ठ 351 ) राक़िम अल हुरूफ़ ने 1966 ई 0 में आपके मज़ारे मुक़द्दस पर हाज़री दी और फ़ातेहा ख़्वानी की है।
मोअल्लिफ़ किताब (14 सितारे) का शजरहए नस्ब
मोवलिफ़ किताब और राक़िम अल हुरूफ़ का शजरह ए नस्ब यह है। सय्यद नजमुल हसन बिन सय्यद फ़ैज़ मोहम्मद बिन सय्यद तय्यब हुसैन इब्ने सय्यद अमीर हुसैन(क़ाज़ी शरीअत बअहदे मलका विक्टोरिया) बिन सय्यद शरीफ़ अली सय्यद रौशन अली बिन सय्यद फ़ैज़ महमूद बिन सय्यद शरीफ़ मोहम्मद बिन सय्यद ईसा इब्ने सय्यद मोहम्मद क़ाएम बिन रूह उल्लाह बिन सय्यद फ़ातेह उ बिन सय्यद शरीफ़ अली सय्यद रौशन अली बिन सय्यद फ़ैज़ महमूद बिन सय्यद शरीफ़ मोहम्मद बिन सय्यद ईसा इब्ने सय्यद मोहम्मद क़ाएम बिन रूह उल्लाह बिन सय्यद फ़तेह उल्लाह बिन सय्यद फ़ैज़ बिन सय्यद हाशिम बिन सय्यद याक़ूब बिन सय्यद इमामुद्दीन बिन सय्यद हैदर बिन सय्यद मोहम्मद बिन सय्यद फ़िरोज़ बिन सय्यद कुतुबुद्दीन बिन सय्यद इमामुद्दीन बिन सय्यद फ़ख़्रूद्दीन बिन सय्यद हुसामुद्दीन (मूरिसे आला सादात करारी) बिन सय्यद कमालुद्दीन (छहतीम) बिन सय्यद बदरूद्दीन बिन ताजुद्दीन (शहीद) बिन सय्यद यहिया बिन सय्यद अब्दुल अज़ीज़ बिन सय्यद इब्राहीम बिन सय्यद महमूद बिन सय्यद अब्दुल्लाह (ज़रबख़्श) बिन सय्यद याक़ूब बिन अबू अब्दुल्लाह सय्यद अहमद (नक़ीब अल क़ुम) बिन सय्यद अबू अली मोहम्मद ऊरूज बिन अबू अहमद सय्यद अबू अल मकारम बिन सय्यद मूसा मुबरक़ा बिन हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) बिन हज़रत इमाम अली रज़ा (अलैहिस्सलाम)
[[अलहम्दो लिल्लाह ये किताबः अबुल हसन हज़रत इमाम अली रज़ा (अ.स.) जो कि किताबः चौदह सितारे एक हिस्सा है , पूरी टाईप हो गई खुदा वंदे आलम से दुआगौ हुं कि हमारे इस अमल को कुबुल फरमाऐ और इमाम हुसैन फाउनडेशन को तरक्की इनायत फरमाए कि जिन्होने इस किताब को अपनी साइट (अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क) के लिऐ टाइप कराया। ]]
18-11-2016
फेहरिस्त
इमाम (अ.स.) की विलादत बा सआदत 4
नाम कुन्नियत और अलक़ाब 6
बादशाहाने वक़्त 7
इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की नशो नुमा और तरबीअत 7
वालिदे माजिद के साया ए आत्फ़ियत से महरूमी 8
मामून रशीद अब्बासी और हज़रते इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) का पहला सफ़रे ईराक़ 10
बाज़ और मछली का वाक़िया 11
हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) से उलमाए इस्लाम का मनाज़ेरा और अब्बासी हासिदों की शिकस्ते फ़ाश 14
इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के साथ उम्मे फ़ज़ल का अक़्द और ख़़ुत्बा ए निकाह 21
उम्मुल फ़ज़ल की रूख़सती , इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) कर मदीने को वापसी और हज़रत के इख़्लाक़ो औसाफ़ आदातो ख़साएल 24
उमूरे ख़ाना दारी और अज़वाजी ज़िन्दगी में 29
इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) और तैयुल अर्ज़ 31
हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के बाज़ करामात 33
हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के हिदायात व इरशादात 37
हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की एक रवायत 41
मामून की वफ़ात , मोतसिम की खि़लाफ़त और हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की गिरफ़्तारी 42
इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की नज़र बन्दी क़ैद और शहादत 45
आपकी अज़वाज और औलाद 48
सिलसिला ए सादाते रिज़विया 49
जनाबे मूसा बिन इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के फ़रज़न्द 50
हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के फ़रज़न्दे अर्जुमन्द जनाब मूसा मुबरक़ा के मुख़्तसिर हालात 53
मोअल्लिफ़ किताब (14 सितारे) का शजरहए नस्ब 56