खुतबाते इमाम अली (उपदेश)
समूहन इमाम अली (अ)
लेखक सैय्यद रज़ी र.ह
पुस्तक की भाषा هندی
मुद्रण वर्ष 1404

खुतबातेइमामअली(उपदेश)

(नहजुल बलाग़ा से)


मुक़द्देमा

बिस्मिल्लाहिर रहमानिर्रहीम

नहजुल बलाग़ा अमीरूल मोमेनीन अली इब्ने अबी तालिब अ.स. के कलाम का वह मशहूर तरीन संयोजन है जिसे सैयद रजी ने चौथी शताब्दी के अंत में संकलित किया तथा इस किताब को तीन हिस्सो मे तक़सीम किया गया है :

1. खुतबाते इमाम अली (उपदेश)

2. इमाम अली के मकतूब (पत्र)

3. इमाम अली के अक़वाल (कथन)

किताब के बड़ी होने के कारण हम यहा सिर्फ इमाम अली के उपदेश जमा कर रहे है।


खुतबाते इमाम अली (उपदेश )

बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम (अमीरूल मोमेनीन (अ.स.) के मुन्तख़ब ख़ुतबात का सिलसिला-ए-कलाम)

1.आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

( जिसमें आसमान व ज़मीन की खि़ल्क़त की इब्तेदा और खि़ल्क़त-ए-आदम (अ.स.) के तज़किरे के साथ हज्जे बैतुल्लाह की अज़्मत का भी ज़िक्र किया गया है) यह ख़ुत्बा हम्द-व-सनाए परवरदिगार , खि़ल्क़ते आलम , तख़लीक़े मलाएका , इन्तेख़ाबे अम्बिया , बअसत सरकारे दो आलम (स.) , अज़मते क़ुरान और मुख़्तलिफ़ एहकामे शरइया पर मुष्तमिल है।

सारी तारीफ़ें उस अल्लाह के लिये हैं जिसकी मिदहत तक बोलने वालों के तकल्लुम की रसाई नहीं है और इसकी नेमतों को गिनने वाले शुमार नहीं कर सकते हैं। इसके हक़ को कोशिश करने वाले भी अदा नहीं कर सकते हैं। न हिम्मतों की बुलन्दियां इसका इदराक कर सकती हैं और न ज़ेहानतों की गहराइयां इसकी तह तक जा सकती हैं। इसकी सिफ़त ज़ात के लिये न कोई मुअय्यन हद है न तौसीफ़ी कलेमात। न मुक़र्ररा वक़्त है और न आखि़री मुद्दत। इसने तमाम मख़लूक़ात को सिर्फ़ अपनी क़ुदरते कामेला से पैदा किया है और फिर अपनी रहमत ही से हवाएं चलाई हैं और ज़मीन की हरकत को पहाड़ों की मीख़ों से संभाल रखा है। दीन की इब्तेदा इसकी मारेफ़त से है और मारेफ़त का कमाल इसकी तसदीक़ से है , तसदीक़ का कमाल तौहीद का इक़रार है और तौहीद का कमाल इख़लास अक़ीदा है और इख़लास का कमाल ज़ाएद बर ज़ात सिफात की नफ़ी है के सिफ़त का मफ़हूम ख़ुद ही गवाह है के वह मौसूफ़ से अलग कोई शै है और मौसूफ़ का मफ़हूम ही यह है के वह सिफ़त से जुदागाना कोई ज़ात है। इस के लिए अलग से सिफ़ात का असबात एक शरीक का असबात है और इसका लाज़मी नतीजा ज़ात का ताअदुद है और ताअदुद का मक़सद इसके लिए अजज़ाअ का अक़ीदा है और अजज़ाअ का अक़ीदा सिर्फ़ जिहालत है मारेफ़त नहीं है और जो बेमारेफ़त हो गया उसने इशारा करना शुरू कर दिया और जिसने इसकी तरफ़ इशारा किया उसने इसे एक सिम्त में महदूद कर दिया और जिसने महदूद कर दिया उसने इसे गिनती का एक शुमार कर लिया (जो सरासर खि़लाफ़े तौहीद ज़ात है)।

जिसने यह सवाल खड़ा किया के वह किस चीज़ में है उसने इसे किसी के ज़हन में क़रार दे दिया और जिसने यह कहा के वह किसके ऊपर क़ाएम है उसने नीचे का इलाक़ा ख़ाली करा लिया। इसकी हस्ती हादिस नहीं है और इसका वजूद अदम की तारीकियों से नहीं निकला है। वह हर शै के साथ है लेकिन मिल कर नहीं , और हर शै से अलग है लेकिन जुदाई की बुनियाद पर नहीं। वह फाएल है लेकिन हरकात व आलात के ज़रिये नहीं और वह उस वक़्त भी बसीर था जब देखी जाने वाली मख़लूक़ का पता नहीं था। वह अपनी ज़ात में बिलकुल अकेला है और इसका कोई ऐसा साथी नहीं है जिसको पाकर उन्स महसूस करे और खोकर परेशान हो जाने का एहसास करे।

ख़ुतबे का पहला हिस्सा ज़ाते वाजिब की अज़मतों से मुताल्लिक है जिसमें इसकी बुलन्दियों और गहराईयों के तज़किरे के साथ इसकी पायां नेमतों की तरफ़ भी इशारा किया गया है और यह वाज़ेअ किया गया है के इसकी ज़ाते मुक़द्दस ला महदूद है और इसकी इब्तेदा व इन्तेहा का तसव्वुर भी मुहाल है। अलबत्ता इसके अहानात की फ़ेहरिस्त में सरे फेहरिस्त तीन चीज़ें हैं-

1. उसने अपनी क़ुदरते कामेला से मख़लूक़ात को पैदा किया है।

2. उसने अपनी रहमते शामला से साँस लेने के लिए हवाएं चलाई हैं।

3. इन्सान के क़रार व इस्तेक़रार के लिए ज़मीन की थरथराहट को पहाड़ों की मेख़ों के ज़रिये रोक दिया है वरना इनसान का एक लम्हा भी खड़ा रहना मुहाल हो जाता और इसके हर लम्हे गिर पड़ने और उलट जाने का इमकान बरक़रार रहता।

दूसरे हिस्से में दीन व मज़हब का ज़िक्र किया गया है के जिस तरह कायनात का आग़ाज़ ज़ाते वाजिब से है उसी तरह दीन का आग़ाज़ भी इसकी मारेफ़त से होता है और मारेफ़त में हस्बे ज़ैल काम का लेहाज़ रखना ज़रूरी है। दिल व जान से इसकी तस्दीक़ की जाए। फ़िक्रो नज़र से इसकी वहदानियत का इक़रार किया जाए और ख़ालिक़ व मख़लूक़ के इम्तेयाज़ इसके सिफ़ात को ऐन ज़ात तसव्वुर किया जाए वरना हर ग़लत अक़ीदा इन्सान को इस जेहालत से दो चार कर देगा और हर महमल सवाल के नतीजे में मारेफ़त से ‘ शुरूहोने वाला सिलसिला जेहालत पर तमाम होगा और यह बदबख़्ती की आख़री मन्ज़िल है। इसकी अज़्मत के साथ इस नुक्ते का भी ख़्याल रखना ज़रूरी है के वह जुमला आमाल की निगरानी कर रहा है और अपनी यकताई में किसी के वहम व गुमान का मोहताज नहीं है। इसने मख़लूक़ात को अज़ ग़ैब ईजाद किया और इनकी तख़लीक़ की इब्तेदा की बग़ैर किसी फ़िक्र की जूलानी के और बग़ैर किसी तजुरबे से फ़ायदा उठाए हुए या हरकत की ईजाद किये हुए या नफ़्स के उफ़्कार की उलझन में पड़े हुए। तमाम अशयाअ को इनके औक़ात के हवाले कर दिया और फ़िर इनके इख़्तेलाफ़ात में तनासब पैदा कर दिया। सब की तबीयतें मुक़र्रर कर दीं और फ़िर इन्हें शक्लें अता कर दीं। इसे यह तमाम बातें ईजाद के पहले से मालूम थीं और वह उनके हुदूद और उनकी इन्तेहा को ख़ूब जानता था। उसे हर शै के ज़ाती एतराफ़ आ भी इल्म था और इसके साथ शामिल हो जाने वाली चीज़ो का भी इल्म था।

इसके बाद उसने फ़िज़ा की वुस्अतें , इसके एतराफ व एकनाफ़ और हवाओं के तबक़ात ईजाद किये और उनके दरम्यान वह पानी बहा दिया जिसकी लहरों में तलातुम था और जिसकी मौजें तह ब तह थीं और उसे एक तेज़ व तन्द हवा के कान्धे पर लाद दिया और फिर हवा को उलटने पलटने और रोक कर रखने का हुक्त दे दिया और इसकी हदों को पानी की हदों से यूँ मिला दिया के नीचे हवा की वुसअतें थीं और ऊपर पानी का तलातुम।

इसके बाद एक और हवा ईजाद की जिसकी हरकत में कोई तौलीदी सलाहियत नहीं थी और इसे मरकज़ पर रोक कर इसके झोंकों को तेज़ कर दिया और इसके मैदान को वसीअतर बना दिया और फ़िर उसे हुक्म दिया के इस बहरज़खार को मथ डाले और मौजूद को उलट पलट कर दे। चुनांचे इसने सारे पानी को एक मष्कीज़ह की तरह मथ डाला और उसे फ़िज़ाए बसीत में इस तरह लेकर चली के अव्वल को आखि़र पर उलट दिया और साकिन को मुतहर्रिक पर पलट दिया और इसके नतीजे में पानी की एक सतह बलन्द हो गई और इसके ऊपर एक झाग की तह बन गई। फिर इस झाग को फैली हुई हवा और खुली हुई फ़िज़ा में बलन्द कर दिया और इससे सात आसमान पैदा कर दिये जिसकी निचली सतह एक ठहरी हुई मौज की तरह थी और ऊपर का हिस्सा एक महफ़ूज़ सिक़त और बलन्द इमारत के मानिन्द था। न इसका कोई सतून था जो सहारा दे सके और न कोई बन्धन था जो मुनज़्ज़म कर सके।

फ़िर उन आसमानों को सितारों की ज़ीनत से मुजय्यन किया और उनमें ताबन्दह नजूम की रौशनी फैला दी और उनके दरमियान एक ज़ौफ़गन चिराग़ और एक रौशन माहताब रवां कर दिया जिसकी हरकत एक घूमने वाले फ़लक और एक मुतहर्रक छत और जुम्बिश करने वाली तख़्ती में थी।

तख़्लीक़े कायनात के बारे में अब तक जो नज़रियात सामने आए हैं इनका ताल्लुक़ दो मौज़ूआत से हैः

एक मौज़ू यह है के इस कायनात का मादा क्या है ? तमाम अनासर अरबह हैं या सिर्फ़ पानी से यह कायनात ख़ल्क़ हुई है या कुछ दूसरे अनासर अरबह भी कार फ़रमा थे या किसी गैस से यह कायनात पैदा हुई है या किसी भाप और कोहरे ने इसे जनम दिया है , दूसरा मौज़ू यह है के इसकी तख़लीक़ वफ़अतन हुई है या यह क़दर रेज आलमे वजूद में आई है और इसकी उम्र दस बिलयन साल है 60हज़ार बिलयन साल है ?

चुनान्चे हर शख़्स ने अपने अन्दाज़े के मुताबिक़ एक राय क़ाएम की है और उसी राय की बिना पर इसे मोहक़क़िक का दरजा दिया गया है। हालांके हक़ीक़ते अम्र यह है के इस क़िस्म के मौज़ूआत में तहक़ीक़ का कोई इमकान नहीं है और न कोई हतमी राय क़ायम की जा सकती है। सिर्र्फ़ अन्दाज़े हैं जिन पर सारा कारोबार चल रहा है और ऐसे माहौल में हर शख़्स को एक नई राय क़ायम करने का हक़ है और किसी को यह चैलेन्ज करने का हक़ नहीं है के यह राय आलात और वसाएल से पहले की है लेहाज़ा इसकी कोई क़ीमत नहीं है।

अमीरूल मोमेनीन (अ.स.) ने अस्ल कायनात पानी को क़रार दिया है और इसी की तरफ़ क़ुरआन मजीद ने भी इशारा किया है और आपकी राय दीगर आराय के मुक़ाबले में इसलिये भी अहमियत रखती है के इसकी बुनियाद तहक़ीक़ , इन्केशाफ़ , तजुरबा और अन्दाज़ा पर नहीं है बल्कि यह इस मालिक का दिया हुआ बेपनाह इल्म है जिसने इस कायनात को बनाया है और खुली बात है के मालिक से ज़्यादा मख़लूक़ात से बाख़बर और कौन हो सकता है।

अमीरूल मोमेनीन (अ 0) ने अपने बयान में तीन नुकात की तरफ़ तवज्जोह दिलाई है ( 1) असल कायनात पानी है और पानी को क़ाबिले इस्तेमाल हवा ने बनाया है। ( 2) इस फ़िज़ाए बेसत के तीन रूख़ हैं , बलन्दी जिसको अजवाए कहा जाता है और एतराफ़ जिसे इरजार से ताबीर किया जाता है और तबक़ात जिन्हें सकाइक का नाम दिया जाता है , आम तौर से ओलमाए फलक को अकब के हर मजमूए को सिक्कह का नाम देते हैं जिसमें एक अरब से ज़्यादा सितारे पाए जाते हैं जिस तरह के हमारे अपने निज़ाम शम्सी का हाल है के इसमें एक अरब से ज़्यादह सितारों का इन्केशाफ़ किया जा चुका है। ( 3) आसमानी मख़लूक़ात में एक मरकज़ी शै है जिसे इसकी हरकत की बिना पर चिराग़ कहा जाता है और एक इसके गिर्द हरकत करने वाली ज़मीन है और एक ज़मीन के गिर्द हरकत करने वाला सितारा है जिसे क़मर कहा जाता है और ओलमाए फ़लक इस ताबेअ दर ताबेअ को क़मर कहते हैं कोकब नहीं कहते हैं।

फिर इसने बलन्द तरीन आसमानों के दरमियान शिगाफ़ पैदा किये और इन्हें तरह तरह के फ़रिश्तो से भर दिया जिनमें से बाज़ सजदे में हैं तो रूकूअ की नौबत नहीं आती है और बाज़ रूकूअ में हैं तो सर नहीं उठाते हैं और बाज़ सफ़ बान्धे हुए हैं तो अपनी जगह से हरकत नहीं करते हैं बाज़ मशग़ूले तस्बीह हैं तो खस्ताहाल नहीं होते हैं। सब के स बवह हैं के न इनकी आँखों पर नीन्द का ग़लबा होता है और न अक़्लों पर सहो व निस्यान का , न बदन में सुस्ती पैदा होती है और न दिमाग़ में निस्यान की ग़फ़लत।

इनमें से बाज़ को वही का अमीन और रसूलों की तरफ़ क़ुदरत की ज़बान बनाया गया है जो इसके फ़ैसलों और एहकाम को बराबर लाते रहते हैं और कुछ इस के बन्दों के मुहाफ़िज़ और जन्नत के दरवाज़ों के दरबान हैं और बाज़ वह भी हैं जिनके क़दम ज़मीन के आखि़री तबक़े में साबित हैं और गर्दनें बलन्दतरीन आसमानों से भी बाहर निकली हुई हैं। इनके एतराफ़ बदन इक़तारे आलम से वसीअतर हैं और इनके कान्धे पर पायहाए अर्ष के उठाने के क़ाबिल हैं। इनकी निगाहें अर्षे इलाही के सामने झुकी हुई हैं और वह इसके नीचे परों को समेटे हुए हैं। उनके और दीगर मख़लूक़ात के दरमियान इज़्ज़त के हिजाब और क़ुदरत के पर्दे हाएल हैं। वह अपने परवरदिगार के बारे में शक्ल व सूरत का तसव्वुर भी नहीं करते हैं और न इसके हक़ में मख़लूक़ात के सिफ़ात को जारी करते हैं। वह न इसे मकान में महदूद करते हैं और न इसकी तरफ़ इशबाह व नज़ाएर से इशारह करते हैं।

तख़लीक़े जनाबे आदम (अ) की कैफ़ियत

इसके बाद परवरदिगार ने ज़मीन के सख़्त व नरम और शूर व शीरीं हिस्सों से ख़ाक को जमा किया और इसे पानी से इस क़दर भिगोया के बिल्कुल ख़ालिस हो गयी और फ़िर तरी में इस क़दर गूंधा के लसदार बन गई और इसे एक ऐसी सूरत बनाई जिसमें मोड़ भी थे और जोड़ भी। आज़ा भी थे और जोड़बन्द भी , फिर इस क़दर सुखाया के मज़बूत हो गई और इस क़द्र सख़्त किया के खनखनाने लगी और यह सूरते हाल एक वक़्ते मुअय्यन और मुद्दत-ए-ख़ास तक बरक़रार रही जिसके बाद इसमें मालिक ने अपनी रूहे कमाल फूंक दी और इसे ऐसा इन्सान बना दिया जिसमें ज़ेहन की जूलानियां भी थीं और फ़िक्र के तसर्रूफात भी काम करने वाले आज़ा व जवारेह भी थे और हरकत करने वाले अददात व आलात भी , हक़ व बातिल में फ़र्क़ करने वाली मारेफ़त भी थी और मुख़्तलिफ़ ज़ाएक़ों , ख़ुशबुओं , रंग व रोग़न में तमीज़ करने की सलाहियत भी। इसे मुख़्तलिफ़ क़िस्म की मिट्टी से बनाया गया जिसमें मवाफ़िक़ अजज़ा भी पाए जाते थे और मुतज़ात अनासिर भी और गरमी , सरदी , तरी ख़ुश्की जैसे कैफ़ियात भी।

फ़िर परवरदिगार ने मलाएका से मतालेबा किया के इसकी अमानत को वापस करें और इसकी ममहूदह वसीयत पर अमल करें यानी इस मख़लूक़ के सामने सर झुका दें और इसकी करामत का इक़रार कर लें। चुनांचे इसने साफ़ साफ़ एलान कर दिया के आदम को सजदा करो और सबने सजदा भी कर लिया सिवाए इबलीस के , के उसे ताअस्सुब ने घेर लिया और बदबख़्ती ग़ालिब आ गई और इसने आग की खि़ल्क़त को वजह-ए-इज़्ज़त और ख़ाक की खि़ल्क़त को वजह-ए-ज़िल्लत क़रार दे दिया। मगर परवरदिगार ने उसे ग़ज़बे इलाही के मुकम्मल इस्तहक़ाक़ , आज़माइश की तकमील और अपने वादे को पूरा करने के लिये यह कहकर मोहलत दे दी के तुजे रोज़ वक़्ते मआलूम तक के लिये मोहलत दी जा रही है।

ऐ इन्सान की कमज़ोरी के सिलसिले में इतना ही काफ़ी है के अपनी असल के बारे में इतना भी मालूम नहीं है जितना दूसरी मख़लूक़ात के बारे में इल्म है। वह न अपने मादा की असल से बाख़बर है और न अपनी रूह की हक़ीक़त से। मालिक ने इसे मुतज़ाद अनासिर से ऐसा जामेअ बना दिया है के जिस्मे सग़ीर में आलमे अकबर समा गया है और बक़ौल शख्से इसमें जमादात अजया कोन व फ़साद , नबातात जैसा नमू , हैवान जैसी हरकत और मलाएका जैसी इताअत व हयात सब पाई जाती है और औसाफ़ के ऐतबार से भी इसमें कुत्ते जैसी ख़ुशामद , मकड़ी जैसे ताने बाने , क़न्ज़र जैसे अस्लहे , परिन्दों जैसा तहफ़्फ़ुज़ , हशरातुल अर्ज़ जैसा तहफ़्फ़ुज़ , हिरन जैसी उछल कूद , चूहे जैसी चोरी , मोर जैसा ग़ुरूर , ऊंट जैसा कीना ख़च्चर जैसी शरारत , बुलबुल जैसा तरन्नुम , बिच्छू जैसा डंक , सब कुछ पाया जाता है।

इसके बाद परवरदिगार ने आदम (अ) को एक ऐसा घर में साकिन कर दिया जहां ज़िन्दगी ख़ुश गवार और मामून व महफ़ूज़ थी और फिर इन्हें इबलीस और इसकी अदावत से भी बाख़बर कर दिया। लेकिन दुशमन ने इनके जन्नत के क़याम और नेक बन्दों की रिफ़ाक़त से जल कर इन्हें धोका दे दिया और इन्होंने भी अपने यक़ीने मोहकम को शक और अज़्मे मुस्तहकम को कमज़ोरी के हाथों फ़रोख़्त कर दिया और इस तरह मसर्रत के बदले ख़ौफ़ को ले लिया और इबलीस के कहने में आकर निदामत का सामान फ़राहम कर लिया। फिर परवरदिगार ने इनके लिये तौबा का सामान फ़राहम कर दिया और अपने कलेमाते रहमत की तलक़ीन कर दी और इनसे जन्नत में वापसी का वादा करके इन्हें आज़माइश की दुनिया में उतार दिया जहां नस्लों का सिलसिला क़ायम होने वाला था।

अम्बिया-ए-कराम का इन्तेख़ाब

इसके बाद उसने इनकी औलाद में से इन अम्बियाओं का इन्तेख़ाब किया जिनसे वही की हिफ़ाज़त और पैग़ाम की तबलीग़ की अमानत का अहद लिया इसलिये के आखि़री मख़लूक़ात ने अहदे इलाही को तबदील कर दिया था। इसके हक़ से नावाक़िफ़ हो गये थे। इसके साथ दूसरे ख़ुदा बना लिये थे और शैतान ने इन्हें मारेफ़त की राह से हटाकर इबादत से यकसर जुदा कर दिया था।

परवरदिगार ने इनके दरमियान रसूल भेजे , अम्बिया का तसलसुल क़ाएम किया ताके वह उनसे फ़ितरत की अमानत को वापस लें और इन्हें भूली हुई नेमतों परवरदिगार को याद दिलाएं। तबलीग़ के ज़रिये इन पर तमाम हुज्जत करें और इनकी अक़्ल के दफ़ीफ़ों को बाहर लाएं और उन्हें क़ुदरते इलाही की निशानियां दिखलाईं। यह सदों पर बलन्दतरीन छत , यह ज़ेरे क़दम गहवारा , यह ज़िन्दगी के असबाब , यह फ़ना करने वाली अजल , यह बूढ़ा बना देने वाले इमराज़ और यह पै दर पै पेश आने वाले हादसात।

इसने कभी अपनी मख़लूक़ात को नबीए मुरसल या किताब मुनज़्ज़ल या हुज्जतल अज़्म या तरीक़ वाज़ेअ से महरूम नहीं रखा है। ऐसे रसूल भेजे हैं जिन्हें न अदद की क़िल्लत काम से रोक सकती थी और न झुटलाने वालों की कसरत , इनमें जो पहले था उसे बाद वाले का हाल मालूम था और जो बाद में आया उसे पहले वाले ने पहुंचवा दिया था और यूं ही सदियां गुज़रती रहीं औश्र ज़माने बीतते रहे। आबा व अजदाद जाते रहे और औलाद व अहफ़ाद आते रहे।

बैसत रसूले अकरम (स 0)

यहां तक के मालिक ने अपने वादे को पूरा करने और अपने नबूवत को मुकम्मल करने के लिये हज़रत मोहम्मद (स 0) को भेज दिया जिनके बारे में अम्बिया से अहद लिया जा चुका था और जिनकी अलामतें मशहूर और विलादत मसऊद व मुबारक थी। इस वक़्त अहले ज़मीन मुतफ़र्रिक़ मज़ाहिब , मुन्तशिर ख़्वाहिशात और मुख़्तलिफ़ रास्तों पर गामज़न थे। कोई ख़ुदा को मख़लूक़ात की शबीह बता रहा था। कोई इसके नामों को बिगाड़ रहा था , और कोई दूसरे ख़ुदा का इशारा दे रहा था। मालिक ने आपके ज़रिये सबको गुमराही से हिदायत दी और जेहालत से बाहर निकाल लिया।

इसके बाद उसने आपकी मुलाक़ात को पसन्द किया और इनआमात से नवाज़ने के लिये इस दारे दुनिया से बलन्द कर लिया। आपको मसाएब से निजात दिला दी और निहायत एहतेराम से अपनी बारगाह में तलब कर लिया और उम्मत में वैसा ही इन्तेज़ाम कर दिया जैसा के दीगर अम्बिया ने किया था के उन्होंने भी क़ौम को लावारिस नहीं छोड़ा था जिसके लिये कोई वाज़ेए रास्ता और मुस्तहकम निशान न हो।

क़ुरआन और एहकामे शरीया

उन्होंने तुम्हारे दरमियान तुम्हारे परवरदिगार की किताब को छोड़ा है जिसके हलाल व हराम फराएज़ व फ़ज़ाएल , नासिख़ व मन्सूख़ , रूख़सत व अज़ीमत , ख़ास व आम , इबरत व इमसाल , मुतलक़ व मुक़ीद , मोहकम व मुतशाबेह सबको वाज़ेह कर दिया था , मोजमल की तफ़सीर कर दी थी , गुत्थियों को सुलझा दिया था। इसमें बाज़ आयात हैं जिनके इल्म का अहद लिया गया है और बाज़ से नावाक़फ़ीयत को मुआफ़ कर दिया गया है। बाज़ एहकाम के फ़र्ज़ का किताब में ज़िक्र किया गया है और सुन्नत से इनके मनसूख़ होने का इल्म हासिल हुआ है। या सुन्नत में इनके वजूब का ज़िक्र हुआ है जबके किताब में तर्क करने की आज़ादी का ज़िक्र था , बाज़ एहकाम एक वक़्त में वाजिब हुए हैं और मुस्तक़बिल में ख़त्म कर दिये गए हैं। इसके मोहर्रमात में बाज़ पर जहन्नुम की सज़ा सुनाई गई है और बाज़ गुनाहे सग़ीरा हैं जिनकी बख़्शिशकी उम्मीद दिलाई गई है। बाज़ एहकाम हैं जिनका मुख़्तसर भी क़ाबिले क़ुबूल है और ज़्यादा की भी गुन्जाइश पाई जाती है।

ज़िक्रे बैतुल्लाह

परवरदिगार ने तुम लोगों पर हज्जे बैतुलहराम को वाजिब क़रार दिया है जिसे लोगों के लिये क़िबला बनाया है और जहां लोग प्यासे जानवरों की तरह बे ताबाना वारिद होते हैं और वैसा उन्स रखते हैं जैसे कबूतर अपने आशियाने से रखता है। हज्जे बैतुल्लाह को मालिक ने अपनी अज़मत के सामने झुकने की अलामत और अपनी इज़्ज़त के ईक़ान की निशानी क़रार दिया है। इसने मख़लूक़ात में से इन बन्दों का इन्तेख़ाब किया है जो इसकी आवाज़ सुन कर लब्बैक कहते हैं और उसके कलेमात की तसदीक़ करते हैं। उन्होंने अम्बिया के मवाफ़िक़ में वक़ूफ़ किया है और तवाफ़ अर्श करने वाले फ़रिश्तो का अन्ताज़ अख़्तियार किया है। यह लोग अपनी इबादत के मुआमले में बराबर फ़ायदे हासिल कर रहे हैं और मग़फ़ेरत की वादागाह की तरफ़ तेज़ी से सबक़त कर रहे हैं।

परवरदिगार ने काबे को इस्लाम की निशानी और बेपनाह अफ़राद की पनाहगाह क़रार दिया है। इसके हज को फ़र्ज़ किया है और इसके हक़ को वाजिब क़रार दिया है। तुम्हारे ऊपर उस घर की हाज़िरी को लिख दिया है और साफ़ ऐलान कर दिया है के “ अल्लाह के लिये लोगों की ज़िम्मादारी है के इसके घर का हज करें जिसके पास भी इस राह को तय करने की इस्तेताअत पाई जाती हो। ”

2-सिफ़्फ़ीन से वापसी पर आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

जिसमें बाअसते पैग़म्बर के वक़्त लोगों के हालात आले रसूल (स 0) के औसाफ़ और दूसरे अफ़राद के कैफ़ियात का ज़िक्र किया गया है।

मैं परवरदिगार की हम्द करता हूँ इसकी नेमतों की तकमील के लिये और इसकी इज़्ज़त के सामने सरे तस्लीम ख़म करते हुए हैं इसकी नाफ़रमानी से तहफ़्फ़ुज़ चाहता हूँ और इससे मदद मांगता हूँ के मैं इसी की किफ़ायत व किफ़ालत का मोहताज हूँ। वह जिसे हिदायत दे दे वह गुमराह नहीं हो सकता है और जिसका वह दुशमन हो जाए उसे कहीं पनाह नहीं मिल सकती है।

जिसके लिये वह काफ़ी हो जाए वह किसी का मोहताज नहीं है। इस हम्द का पल्ला हर बावज़न शै से गरांतर है और यह सरमाया हर ख़ज़ाने से ज़्यादा क़ीमती है। मैं गवाही देता हूँ के अल्लाह एक है , उसका कोई शरीक नहीं है और यह वह गवाही है , जिसके इख़लास का इम्तेहान हो चुका है और जिसका निचोड़ अक़ीदे का जुज़ बन चुका है। मैं इस गवाही से ताहयात वाबस्ता रहूँगा और इसी को रोज़े क़यामत के हौलनाक मराहेल के लिये ज़ख़ीरा बनाऊंगा। यही ईमान की मुस्तहकम बुनियाद है और यही नेकियों का आग़ाज़ है और इसी में रहमान की मरज़ी और शैतान की तबाही का राज़ मुज़म्मर है।

और मैं गवाही देता हूँ के मोहम्मद (स 0) अल्लाह के बन्दे और इसके रसूल हैं। उन्हें परवरदिगार ने मशहूर दीन , मासूर निशानी , रोशन किताब , ज़िया-ए-पाश नूर , चमकदार रौशनी और वाज़ेह अम्र के साथ भेजा है ताके शुबहात ज़ाएल हो जाएं और दलाएल के ज़रिये हुज्जत तमाम की जा सके , आयात के ज़रिये होशियार बनाया जा सके और मिसालों के ज़रिये डराया जा सके।

यह बअसत उस वक़्त हुई है जब लोग ऐसे फ़ितनों में मुब्तिला थे जिनसे रीसमाने दीन टूट चुकी थी। यक़ीन के सुतून हिल गए थे। उसूल में शदीद इख़्तेलाफ़ था और काम में सख़्त इन्तेशार। मुश्किलात से निकलने के रास्ते तंग व तारीक हो गये थे। हिदायत गुमनाम थी और गुमराही बरसरे आम , रहमान की मआसियत हो रही थी और शैतान की नुसरत , ईमान यकसीर नज़रअन्दाज़ हो गया था , इसके सुतून गिर गए थे औश्र आसार नाक़ाबिले शिनाख़्त हो गए थे , रास्ते मिट गए थे और शहराहें बेनिशान हो गई थीं। लोग शैतान की इताअत में इसी के रास्ते पर चल रहे थे और इसी के चश्मों पर वारित हो रहे थे। उन्हीं की वजह से शैतान के परचम लहरा रहे थे और इसके अलम सरबलन्द थे। यह लोग ऐसे फ़ितनों में मुब्तिला थे जिन्होंने इन्हें पैरों तले रोन्द दिया था और समों से कुचल दिया था और ख़ुद अपने पन्जों के बल खड़े हो गए थे। यह लोग फ़ितनों में हैरान व सरगरदां और जाहिल व फ़रेब खा़ेरदा थे। परवरदिगार ने उन्हें इस घर (मक्का) में भेजा जो बेहतरीन मकान था , लेकिन बदतरीन हमसाए जिनकी नींद बेदारी थी और जिनका सुरमा आंसू , वह सरज़मीन जहाँ आलिम को लगाम लगी हुई थी और जाहिल मोहतरम था।

आले रसूले अकरम (स 0)

यह लोग राज़े इलाही की मन्ज़िल और अम्रे दीन का मिलजा व मावा हैं। यही इल्मे ख़ुदा के मरकज़ और हुक्मे ख़ुदा की पनाहगाह हैं। किताबों ने यहीं पनाह ली है और दीन के यही कोहे गराँ हैं। उन्हीं के ज़रिये परवरदिगार ने दीन की पुश्त की कजी सीधी की है और उन्हीं के ज़रिये इसके जोड़ बन्द के राशे का इलाज किया है।

एक दूसरी क़ौम

उन लोगों ने फ़िजोर का बीज बोया है और इसे ग़ुरूर के पानी से सींचा है और नतीजे में हलाकत को काटा है। याद रखो के आले मोहम्मद (स 0) पर इस उम्मत में किसी का क़यास नहीं किया जा सकता है और न इन लोगों को उनके बराबर क़रार दिया जा सकता है जिन पर हमेशा इनकी नेमतों का सिलसिला जारी रहा है। आले मोहम्मद (स 0) दीन की असास और यक़ीन का सतून हैं। उनसे आगे बढ़ जाने वाला पलट कर उन्हीं की तरफ़ आता है और पीछे रह जाने वाला भी उन्हीं से आकर मिलता है। उनके पस हक़्क़े विलायत के ख़ुसूसियात हैं और इन्हीं के दरमियान पैग़म्बर (स 0) की वसीयत और उनकी विरासत है।

अब जबके हक़ अपने अहल के पास वापस आ गया है और अपनी मन्ज़िल की तरफ़ मुन्तक़िल हो गया है।

3-आपके एक ख़ुतबे का हिस्सा

(जिसे शक़शक़िया के नाम से याद किया जाता है)

आगाह हो जाओ के ख़ुदा की क़सम फ़ुलां शख़्स (इब्ने अबी क़हाफ़ा) ने क़मीस खि़लाफ़त को खींच तान कर पहन लिया है हालांकि इसे मालूम है के खि़लाफ़त की चक्की के लिये मेरी हैसियत मरकज़ी कील की है। इल्म का सैलाब मेरी ज़ात से गुज़र कर नीचे जाता है और मेरी बलन्दी तक किसी का ताएर-ए-फ़िक्र भी परवाज़ नहीं कर सकता है। फिर भी परवाज़ नहीं कर सकता है। फिर भी मैंने खि़लाफ़त के आगे परदा डाल दिया और इससे पहलू तही कर ली और यह सोचना ‘ शुरूकर दिया के कटे हुए हाथों से हमला कर दूँ या इसी भयानक अन्धेरे पर सब्र कर लूँ जिसमें सिन रसीदा बिलकुल ज़ईफ़ हो जाए और बच्चा बूढ़ा हो जाए और मोमिन मेहनत करते करते ख़ुदा की बारगाह तक पहुंच जाए।

तो मैंने देखा के इन हालात में सब्र ही क़रीन-ए-अक़्ल है तो मैंने इस आलम में सब्र कर लिया के आँखों में मसाएब की खटक थी और गले में रन्ज व ग़म के फन्दे थे। मैं अपनी मीरास को लुटते देख रहा था। यहां तक के पहले ख़लीफ़ा ने अपना रास्ता लिया और खि़लाफ़त को अपने बाद फ़ुलाँ के हवाले कर दिया , बक़ौल आशया-

“ कहां वह दिन जो गुज़रता था मेरा ऊँटों पर , कहाँ यह दिन के मैं हय्यान के जवार में हूँ। ” हैरत अंगेज़ बात तो यह है के वह अपनी ज़िन्दगी में इस्तीफ़ा दे रहा था और मरने के बाद के लिये दूसरे के लिए तय कर गया। बेशक दोनों ने मिलकर शिद्दत से इसके थनों को दोहा है और अब एक ऐसी दरष्त और सख़्त मन्ज़िल में रख दिया है जिसके ज़ख़्म कारी हैं और जिसको छूने से भी दरष्ती का एहसास होता है। लग़्िज़षों की कसरत है और माज़रतों की बोहतात।

(( ख़ुत्बा शक़शक़िया के बारे में बाज़ मुतास्सिब और नाइन्साफ़ मुसन्नेफ़ीन ने यह फ़ितना उठाने की कोशिश की है के यह ख़ुत्बा अमीरूल मोमेनीन अ 0का नहीं है और इसे सय्यद रज़ी रह 0ने हज़रत अली अ 0के नाम से वाज़ेअ कर दिया है। हालांके यह बात रिवायत और विरायत दोनों के खि़लाफ़ है। रिवायत के ऐतेबार से इसके नाक़िल हज़रात में वह अफ़राद भी हैं जो सय्यद रज़ी रह 0की विलादत से पहले दुनिया से जा चुके हैं , और विरायत के एतबार से यह अन्दाज़े तन्क़ीद व तज़लम साहबे मुसीबत के अलावा दूसरा शख़्स इख़्तेयार ही नहीं कर सकता है और हर शख़्स को अपने ऊपर वारिद होने वाले मसाएब के खि़लाफ़ आवाज़ उठाने का हक़ हासिल है फिर जबके सारे वाक़ेआत तारीख़ के मुसालमात में भी हैं तो इन्कार की क्या वजह हो सकती है। ख़लीफ़ए अव्वल का ज़बरदस्ती लिबासे खि़लाफ़त पहन लेना इस एतराफ़ के साथ के मैं तुम लोगों से बेहतर नहीं हूँ। मेरे साथ एक शैतान लगा रहता है। मुझे माफ कर दो। हज़रत अली अ 0का यह मरतबा के वह इल्मी सैलाब का सरचश्मा और इन्सानी फ़िक्र से बालातर शख़्सियत हैं , आपका खि़लाफ़त से किनाराकश होकर सब्र व तहम्मुल की पॉलीसी पर अमल करना। अबूबक्र का इस्तीफ़ा के एलान के बाद भी उमर को नामज़द कर देना और दोनों का मुकम्मल तौर पर खि़लाफ़त से इस्तेफ़ादह करना और हज़रत उमर का दरष्त मिज़ाज होना वह तारीख़ी हक़ाएक़ हैं जिनसे इन्कार करने वाला नहीं पैदा हुआ है तो फिर किस बुनियाद पर ख़ुतबे को जाली या ज़ई क़रार दिया जा रहा है और क्यों हक़ाएक़ की परदापोशी की नाकाम कोशिश की जा रही है। ))

इसको बरदाश्त करने वाला ऐसा ही है जैसे सरकश ऊंटनी का सवार के महार खींच ले तो नाक ज़ख़्मी हो जाए और ढील दे दे तो हलाकतों में कूद पड़े। तो ख़ुदा की क़सम लोग एक कजरवी , सरकशी , तलवन मिज़ाजी और बेराहरवी में मुब्तिला हो गए हैं और मैंने भी सख़्त हालात में तवील मुद्दत तक सब्र किया यहाँ तक के वह भी अपने रास्ते चला गया लेकिन खि़लाफ़त को एक जमाअत में क़रार दे गया जिनमें एक मुझे भी शुमार कर गया जबके मेरा इस शूरा से क्या ताअल्लुक़ था। मुझमें पहले दिन कौन सा ऐब व रैब देखा था के आज मुझे ऐसे लोगों के साथ मिलाया जा रहा है। लेकिन इसके बावजूद मैंने इन्हीं की फ़िज़ा में परवाज़ की और यह नज़दीक फ़िज़ा में उड़े तो वहाँ भी साथ रहा और ऊचे उड़े तो वहां भी साथ रहा मगर फिर भी एक शख़्स अपने कीने की बिना पर मुझ से मुनहरिफ़ हो गया और दूसरा दामादी की तरफ़ झुक गया और कुछ और भी नाक़ाबिले ज़िक्र असबाब व अशख़ास थे जिसके नतीजे में तीसरा शख़्स सरगीन और चारा के दरमियान पेट फुलाए हुए उठ खड़ा हुआ और इसके साथ इसके अहले ख़ानदान भी खड़े हो गए जो माले ख़ुदा को इस तरह हज़म कर रहे थे जिस तरह ऊंट बहार की घास को चर लेता है , यहां तक के इसकी बटी हुई रस्सी के बल खुल गए और उसके आमाल ने उसका ख़ात्मा कर दिया और शिकमपुरी ने मुंह के बल गिरा दिया।

इस वक़्त मुझे जिस चीज़ ने दहशत ज़दा कर दिया वह यह थी के लोग बिज्जू की गरदन के बाल की तरह मेरे गिर्द जमा हो गए और चारों तरफ से मेरे ऊपर टूट पड़े यहां तक के हसन (अ) व हुसैन (अ) कुचल गए और मेरी रिदा के किनारे फट गए। यह सब मेरे गिर्द बकरियों के गलह की तरह घेरा डाले हुए थे लेकिन जब मैंने ज़िम्मेदारी सम्भाली और उठ खड़ा हुआ तो एक गिरोह ने बैअत तोड़ दी और दूसरा दीन से बाहर निकल गया और तीसरे ने फिस्क़ इख़्तेयार कर लिया जैसे के इन लोगों ने यह इरशाद-ए-इलाही सुना ही नहीं है के “ यह दारे आख़ेरत हम सिर्फ़ उन लोगों के लिये क़रार देते हैं जो दुनिया में बलन्दी और फ़साद नहीं चाहते हैं और आक़ेबत सिर्फ़ अहले तक़वा के लिये है। ” हाँ हाँ ख़ुदा की क़सम उन लोगों ने यह इरशाद सुना भी है और समझे भी हैं। लेकिन दुनिया उनकी निगाहों में आरास्ता हो गई और इसकी चमक दमक ने उन्हें लुभा लिया।

(( इसमें कोई शक नहीं है के उसमान के तसरफ़ात ने तमाम आलमे इस्लाम को नाराज़ कर दिया था। हज़रत आयशा उन्हें लोअसल यहूदी क़रार देकर लोगों को क़त्ल पर आमादा कर रही थीं। तलहा इन्हें वाजिबुल क़त्ल क़रार दे रहा था। ज़ुबैर दरपरदा क़ातिलों की हिमायत कर रहा था लेकिन इन सबका मक़सद उम्मते इस्लामिया को ना अहल से निजात दिलाना नहीं था बल्कि आइन्दा खि़लाफ़त की ज़मीन को हमवार करना था और हज़रत अली इस हक़ीक़त से मुकम्मल तौर पर बाख़बर थे। इसीलिये जब इन्क़ेलाबी गिरोह ने खि़लाफ़त की पेशकश की त आपने इन्कार कर दिया के क़त्ल का सारा इल्ज़ाम अपनी गरदन पर आ जाएगा और इस वक़्त तक क़ुबूल नहीं किया जब तक तमाम इन्सार व महाजेरीन ने इस अम्र का इक़रार नहीं कर लिया के आपके अलावा उम्मत का मुश्किलकुशा कोई नहीं है और इसके बाद भी मिम्बरे रसूल (स) पर बैठकर बैअत ली ताके जानशीनी का सही मफ़हूम वाज़े हो जाए। यह और बात है के इस वक़्त भी साद बिन अबी क़ास और अब्दुल्लाह बिन उमर जैसे अफ़राद ने बैअत नहीं की और हज़रत आएशा को भी जैसे ही इस “ हादसे ” की इत्तेलाअ मिली उन्होंने उस्मान की मज़लूमियत का एलान ‘ शुरूकर दिया और तलहा व ज़ुबैर की महरूमी का इन्तेक़ाम लेने का इरादा कर लिया। आपके हज़रत अली (अ) से इख़्तेलाफ़ की एक बुनियाद यह भी थी के हुज़ूर (स) ने औलादे अली (अ) को अपनी औलाद क़रार दे दिया था और क़ुराने मजीद ने उन्हें अब्नाअना का लक़ब दे दिया था और हज़रत आएशा मुस्तक़िल तौर पर महरूमे औलाद थीं लेहाज़ा उनमें यह जज़्ब-ए-हसद पैदा होना ही चाहिए था।))

आगाह हो जाओ वह ख़ुदा गवाह है जिसने दाने को शिगाफ़्ता किया है और ज़ीरूह को पैदा किया है के अगर हाज़िरीन की मौजूदगी और अन्सार के वजूद से हुज्जत तमाम न हो गई होती और अल्लाह का अहले इल्म से यह अहद न होता के ख़बरदार ज़ालिम की शिकमपुरी और मज़लूम की गरन्गी पर चैन से न बैठना तो मैं आज भी इस खि़लाफ़त की रस्सी को इसी की गरदन पर डाल कर हका देता और इसके आखि़र को अव्वल ही के कासे से सेराब करता और तुम देख लेते के तुम्हारी दुनिया मेरी नज़र में बकरी की छींक से भी ज़ादा बेक़ीमत है।

कहा जाता है के इस मौक़े पर एक इराक़ी बाशिन्दा उठ खड़ा हुआ और उसने आपको एक ख़त दिया जिसके बारे में ख़याल है के इसमें कुछ फ़ौरी जवाब तलबे मसाएल थे। चुनान्चे आपने इस ख़त को पढ़ना ‘ शुरूकर दिया और जब फ़ारिग़ हुए तो इब्ने अब्बास ने अर्ज़ की के हुज़ूर बयान जारी रहे। फ़रमाया के अफ़सोस इब्ने अब्बास यह तो एक शक़शक़ा था जो उभरकर दब गया। (शक़शक़ा ऊंट के मुंह में वह गोश्त का लोथड़ा है जो ग़ुस्से और हैजान के वक़्त बाहर निकल आता है।)

इब्ने अब्बास कहते हैं के बख़ुदा क़सम मुझे किसी कलाम के नातमाम रह जाने का इस क़द्र अफ़सोस नहीं हुआ जितना अफ़सोस इस अम्र पर हुआ के अमीरूल मोमेनीन (अ) अपनी बात पूरी न फ़रमा सके और आपका कलाम नातमाम रह गया।

सैयद शरीफ़ (र) फ़रमाते हैं के अमीरूल मोमेनीन (अ) के इरशाद “ इन शनक़लहा....... ” का मफ़हूम यह है के अगर नाक़े पर मेहार खींचने में सख़्ती की जाएगी और वह सरकशी पर आमादा हो जाएगा तो उसकी नाक ज़ख़्मी हो जाएगी और अगर ढीला छोड़ दिया जाए तो इख़्तेयार से बाहर निकल जाएगा। अरब “ अशनक़लनाक़ा ” इसी मौक़े पर इस्तेमाल करते हैं जब इसके सर को मेहार के ज़रिये खींचा जाता है और वह सर उठा लेता है। इस कैफ़ियत को “ शन्क़हा ” से भी ताबीर करते हैं जैसा के इब्ने अलसकीत ने “ इस्लाहलमन्तक़ ” में बयान किया है। लेकिन अमीरूल मोमेनीन (अ) ने इसमें एक ‘ लाम ‘ का इज़ाफ़ा कर दिया है “ अशनक़लहा ” के बाद के जुमले “ असलस लहा ” से हम आहंग हो जाए और फ़साहत का निज़ाम दरहम बरहम न होने पाए।

4-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

( जो फ़सीह तरीन कलेमात में शुमार होता है और जिसमें लोगों को नसीहत की गई है और इन्हें गुमराही से हिदायत के रास्ते पर लाया गया है।)

( तल्हा व ज़ुबैर की बग़ावत और क़त्ले उस्मान के पस मन्ज़र में फ़रमाया) तुम लोगों ने हमारी ही वजह से तारीकियों में हिदायत का रास्ता पाया है और बलन्दी के कोहान पर क़दम जमाए हैं और हमारी ही वजह से अन्धेरी रातों से उजाले की तरफ़ बाहर आए हो।

वह कान बहरे हो जाएं जो पुकारने वाले की आवाज़ न सुन सकें और वह लोग भला धीमी आवाज़ को क्या सुन सकेंगे जिनके कान बलन्द तरीन आवाज़ों के सामने भी बहरे ही रहे हों। मुतमईन दिल वही होता है जो यादे इलाही और ख़ौफ़े ख़ुदा में मुसलसल धड़कता रहता है। मैं रोज़े अव्वल से तुम्हारी ग़द्दारी के अन्जाम का इन्तेज़ाम कर रहा हूँ और तुम्हें फ़रेब ख़ोरदा लोगों के अन्दाज़ से पहचान रहा हूँ। मुझे तुमसे दीनदारी की चादर ने पोशीदा कर दिया है लेकिन सिद्क़ नीयत ने मेरे लिये तुम्हारे हालात को आईना कर दिया है। मैंने तुम्हारे लिये गुमराही की मन्ज़िलों में हक़ के रास्तों पर क़याम किया है जहां तुम एक दूसरे से मिलते थे लेकिन कोई राहनुमा न था और कुँआ खोदते थे लेकिन पानी नसीब न होता था। आज मैं तुम्हारे लिये अपनी इस ज़बाने ख़ामोश को गोया बना रहा हूँ जिसमें बड़ी क़ूवते बयान है। याद रखो के उस शख़्स की राय गुम हो गयी है जिसने मुझ से रू गरदानी की है। मैंने रोज़े अव्वल से आज तक हक़ के बारे में कभी शक नहीं किया है। (मेरा सकूत मिस्ले मूसा (अ) है) मूसा को अपने नफ़्स के बारे में ख़ौफ़ नहीं था , उन्हें दरबारे फ़िरऔन में सिर्फ़ यह ख़ौफ़ था के कहीं जाहिल जादूगर और गुमराह हुक्काम अवाम की अक़्लों पर ग़ालिब न आ जाएं। आज हम सब हक़ व बातिल के रास्ते पर आमने-सामने हैं और याद रखो जिसे पानी पर ऐतमाद होता है वह प्यासा नहीं रहता है।


5-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

( जो आपने वफ़ाते पैग़म्बर (स 0) के मौक़े पर इरशाद फ़रमाया था जब अब्बास और अबू सुफ़ियान ने आपसे बैअत लेने का मुतालबा किया था)

ऐ लोगो! फ़ितनों की मौजों को निजात की कश्तियों से चीर कर निकल जाओ और मनाफ़ेरत के रास्तों से अलग रहो। बाहेमी फ़ख़्र्र व मुबाहात के ताज उतार दो के कामयाबी इसी का हिस्सा है जो उठे तो बालो पर के साथ उठे वरना कुरसी को दूसरों के हवाले करके अपने को आज़ाद कर ले। यह पानी बड़ा गन्दा है और इसका लुक़मे में उच्छू लग जाने का ख़तरा है और याद रखो के नावक़्त (बेवक़्त) फल चुनने वाला ऐसा ही है जैसे नामुनासिब ज़मीन में ज़राअत करने वाला।

( मेरी मुश्किल यह है के) मैं बोलता हूँ तो कहते हैं के इक़्तेदार की लालच रखते हैं और ख़ामोश हो जाता हूँ तो कहते हैं के मौत से डर गए हैं।

(( अमीरूल मोमेनीन (अ 0) ने हालात की वह बेहतरीन तस्वीरकशी की है जिसकी तरफ़ अबू सुफ़ियान जैसे अफ़राद मुतवज्जोह नहीं थे या साज़िशों का परदा डालना चाहते थे आपने वाज़ेअ लफ़्ज़ों में फ़रमा दिया के मुझे इस मुतालब-ए- बैअत और वादाए नुसरत का अन्जाम मालूम है और मैं इस वक़्त क़याम को नावक़्त क़याम तसव्वुर करता हूँ जिसका कोई मुसब्बत नतीजा निकलने वाला नहीं है लेहाज़ा बेहतर यह है के इन्सान पहले बालो पर तलाश कर ले उसके बाद उड़ने का इरादा करे वरना ख़ामोश होकर बैठ जाए के इसी में आफ़ियत है और यही तक़ाज़ाए अक़्ल व मन्तक़ है। मैं उस तान व तन्ज़ से भी बाख़बर हूँ जो मेरे एक़दामात के बारे में इस्तेमाल हो रहे हैं लेकिन मैं कोई जज़्बाती इन्सान नहीं हूँ के इन जुमलों से घबरा जाऊँ , मैं मशीयते इलाही का पाबन्द हूँ और उसके खि़लाफ़ एक क़दम आगे नहीं बढ़ा सकता हूँ।))

अफ़सोस अब यह बात जब मैं तमाम मराहेल देख चुका हूँ , ख़ुदा की क़सम अबूतालिब का फ़रज़न्द मौत से उससे ज़्यादा मानूस है जितना बच्चा सरचश्मा-ए-हयात से मानूस होता है। अलबत्ता मेरे सीने की तहों में एक ऐसा पोशीदा इल्म है जो मुझे मजबूर किये हुए है वरना उसे ज़ाहिर कर दूँ तो तुम उसी तरह लरज़ने लगोगे जिस तरह गहने कुँए में रस्सी थरथराती और लरज़ती है।

6-हज़रत का इरशादे गिरामी

(जब आपको मशविरा दिया गया के तल्हा व ज़ुबैर का पीछा न करें और उनसे जंग का बन्दोबस्त न करें)

ख़ुदा की क़सम मैं उस बिज्जू के मानिन्द नहीं हो सकता जिसका शिकारी मुसलसल खटखटाता रहता है और वह आँख बन्द किये पड़ा रहता है यहां तक के घात लगाने वाला उसे पकड़ लेता है। मैं हक़ की तरफ़ आने वालों के ज़रिये इन्हेराफ़ करने वालों पर और इताअत करने वालों के सहारे मआसीयतकार तश्कीक करने वालों पर मुसलसल ज़र्ब लगाता रहूँगा यहाँ तक के मेरा आखि़री दिन आ जाए। ख़ुदा गवाह है के मैं हमेशा अपने हक़ से महरूम रखा गया हूँ और दूसरों को मुझ पर मुक़द्दम किया गया है जब से सरकारे दो आलम (स 0) का इन्तेक़ाल हुआ है और आज तक यह सिलसिला जारी है।

7-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें शैतान के पैरोकारों की मज़म्मत की गई है)

उन लोगों ने शैतान को अपने काम का मालिक व मुख़्तार बना लिया है औश्र उसने उन्हें अपना आलाएकार क़रार दे लिया है और उन्हीं के सीनों में अण्डे बच्चे दिये हैं और वह उन्हीं की आग़ोश में पले बढ़े हैं। अब शैतान उन्हीं की आंखों से देखता है और उन्हीं की ज़बान से बोलता है उन्हें लग़्ज़िश की राह पर लगा दिया है और इनके लिए ग़लत बातों को आरास्ता कर दिया है जैसे के इसने उन्हें अपने कारोबार शरीक बना लिया हो और अपने हरफ़े बातिल को उन्हीं की ज़बान से ज़ाहिर करता हो।

(( बिज्जू को अरबी में अमआमिर के नाम से याद किया जाता है इसके शिकार का तरीक़ा यह है के शिकारी इसके गिर्द घेरा डाल कर ज़मीन को थपथपाता है और वह अन्दर सूराख़ में घुस कर बैठ जाता है। फिर शिकारी एलान करता है के अमआमिर नहीं है और वह अपने को सोया हुआ ज़ाहिर करने के लिए पैर फैला देता है और शिकारी पैर में रस्सी बांध कर खींच लेता है। यह इन्तेहाई अहमक़ाना अमल होता है जिस की बिना पर बिज्जू को हिमाक़त की मिसाल बनाकर पेश किया जाता है। आप (अ 0) का इरशादे गिरामी है के जेहाद से ग़ाफ़िल होकर ख़ाना नशीन हो जाना और शाम के लश्करों को मदीने का रास्ता बता देना एक बिज्जू का अमल हो सकता है लेकिन अक़्ले कुल और बाबे मदीनतुल इल्म का किरदार नहीं हो सकता है।

शैतानों की तख़लीक़ में अन्डे बच्चे होते हैं या नहीं यह मसला अपनी जगह पर क़ाबिले तहक़ीक़ है लेकिन हज़रत की मुराद है के शयातीन अपने मआनवी बच्चों को इन्सानी मुआशरे से अलग किसी माहौल में नहीं रखते हैं बल्कि उनकी परवरिश इसी माहौल में करते हैं और फिर इन्हीं के ज़रिये अपने मक़ासिद की तकमील करते हैं। ज़माने के हालात का जाएज़ा लिया जाए तो अन्दाज़ा होगा के शयातीने ज़माना अपनी औलाद को मुसलमानों की आग़ोश में पालते हैं और मुसलमानों की औलाद को अपनी गोद में पालते हैं ताके मुस्तक़बिल में उन्हें मुकम्मल तौर पर इस्तेमाल किया जा सके और इस्लाम को इस्लाम के ज़रिये फ़ना किया जा सके जिसका सिलसिला कल के शाम से शुरू हुआ था और आज के आलमे इस्लाम तक जारी व सारी है।))

8-आपका इरशादे गिरामी ज़ुबैर के बारे में

(जब ऐसे हालात पैदा हो गए और उसे दोबारा बैअत के दायरे में दाखि़ल करने की ज़रूरत पड़ी)

ज़ुबैर का ख़याल यह है के उसने सिर्फ हाथ से मेरी बैअत की है और दिल से बैअत नहीं की है। तो बैअत का तो बहरहाल इक़रार कर लिया है अब सिर्फ दिल के खोट का इदआ करता है तो उसे इसका वाज़ेअ सुबुत फराहम करना पड़ेगा वरना इसी बैअत में दोबारा दाखि़ल होना पड़ेगा जिससे निकल गया है।

9-आपके कलाम का एक हिस्सा

(जिसमें अपने और बाज़ मुख़ालेफ़ीन के औसाफ़ का तज़किरा फ़रमाया है और शायद इससे मुराद अहले जमल हैं)

यह लोग बहुत गरजे और बहुत चमके लेकिन आखि़र में नाकाम ही रहे जबके हम उस वक़्त तक गरजते नहीं हैं जब तक दुश्मन पर टूट न पड़ें और उस वक़्त तक लफ़्ज़ों की रवानी नहीं दिखलाते जब तक के बरस न पड़ें।

10-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसका मक़सद शैतान है या शैतान सिफ़त कोई गिरोह)

आगाह हो जाओ के शैतान ने अपने गिरोह को जमा कर लिया है और अपने प्यादे व सवार समेट लिये हैं। लेकिन फिर भी मेरे साथ मेरी बसीरत है। न मैंने किसी को धोका दिया है और न वाके़अन धोका खाया है और ख़ुदा की क़सम मैं इनके लिये ऐसे हौज़ को छलकाऊंगा जिसका पानी निकालने वाला भी मैं ही हूंगा के यह न निकल सकेंगे और न पलट कर आ सकेंगे।

11-आपका इरशादे गिरामी

(अपने फ़रज़न्द मोहम्मद बिन अलहनफ़िया से -मैदाने जमल में अलमे लशकर देते हुए)

ख़बरदार पहाड़ अपनी जगह से हट जाएं , तुम न हटना , अपने दांतों को भींच लेना अपना कासए सर अल्लाह के हवाले कर देना। ज़मीन में क़दम गाड़ देना। निगाह आखि़रे क़ौम पर रखना। आंखों को बन्द रखना और यह याद रखना के मदद अल्लाह ही की तरफ़ से आने वाली है।

(( हैरत की बात है के जो इन्सान ऐसे फ़नूने जंग की तालीम देता हो उसे मौत से ख़ौफ़ज़दा होने का इल्ज़ाम दे दिया जाए। अमीरूल मोमेनीन (अ) की मुकम्मल तारीख़े हयात गवाह है के आपसे बड़ा शुजाअ व बहादुर कायनात में नहीं पैदा हुआ है। आप मौत को सरचश्मए हयात तसव्वुर करते थे जिसकी तरफ़ बच्चा फ़ितरी तौर पर हुमकता है और उसे अपनी ज़िन्दगी का राज़ तसव्वुर करता है। आपने सिफ़फीन के मैदान में वह तेग़ के जौहर दिखलाए हैं जिसने एक मरतबा फिर बदर ओहद व ख़न्दक़ व ख़ैबर की याद ताज़ा कर दी थी और यह साबित कर दिया था के यह बाज़ू 25साल के सुकूत के बाद भी शल नहीं हुए हैं और यह फ़न्ने हरब किसी मश्क़ो महारत का नतीजा नहीं है। मोहम्मद हनफ़िया से खि़ताब करके यह फ़रमाना के पहाड़ हट जाएं तुम न हटना- इस अम्र की दलील है के आपकी इस्तेक़ामत उससे कहीं ज़्यादा पाएदार और इस्तेवार है। दांतों को भींच लेने में इशारा है के इस तरह रगों के तनाव पर तलवार का वार असर नहीं करता है। कासए सर को आरियत दे देने का मतलब यह है के मालिक ज़िन्दा रखना चाहेगा तो दोबारा यह सर वापस लिया जा सकता है वरना बन्दे ने तो इसकी बारगाह में पेश कर दिया है। आंखों को बन्द रखने और आखि़रे क़ौम पर निगाह रखने का मतलब यह है के सामने के लशकर को मत देखना , बस यह देखना के कहां तक जाना है और किस तरह सफ़ों को पामाल कर देना है। आखि़री फ़िक़रा जंग और जेहाद के फ़र्क़ को नुमाया करता है के जंगजू अपनी ताक़त पर भरोसा करता है और मुजाहिद नुसरते इलाही के एतमाद पर मैदान में क़दम जमाता है और जिसकी ख़ुदा मदद कर दे वह कभी मग़लूब नहीं हो सकता है।))

12-आपका इरशादे गिरामी

जब परवरदिगार ने आपको अस्हाबे जमल पर कामयाबी अता फ़रमाई और आपके बाज़ असहाब ने कहा के काश हमारा अफ़लाल भाई भी हमारे साथ होता तो वह देखता के परवरदिगार ने किस तरह आपको दुश्मन पर फ़तह इनायत फ़रमाई है तो आपने फ़रमाया क्या तेरे भाई की मोहब्बत भी हमारे साथ है ? उसने अर्ज़ की बेशक। फ़रमाया तो वह हमारे साथ था और हमारे इस लशकर में वह तमाम लोग हमारे साथ थे जो अभी मर्दों के सुल्ब और औरतों के रह्म में हैं और अनक़रीब ज़माना उन्हें मन्ज़रे आम पर ले आएगा और उनके ज़रिये ईमान को तक़वीयत हासिल होगी। ((यह दीने इस्लाम का एक मख़सूस इम्तियाज़ है के यहां अज़ाब बद अमली के बग़ैर नाज़िल नहीं होता है और सवाब का इस्तेहक़ाक़ अमल के बग़ैर भी हासिल हो जाता है और अमले ख़ैर का दारोमदार सिर्फ़ नीयत पर रखा गया है बल्कि बाज़ औक़ात तो नीयत मोमिन को उसके अमल से भी बेहतर क़रार दिया गया है के अमल में रियाकारी के इमकानात पाए जाते हैं और नीयत में किसी तरह की रियाकारी नहीं होती है और शायद यही वजह है के परवरदिगार ने रोज़े को सिर्फ़ अपने लिए क़रार दिया है और उसके अज्र व सवाब की मख़सूस ज़िम्मेदारी अपने ऊपर रखी है के रोज़े में नीयत के अलावा कुछ नहीं होता है और नीयत में एख़लास के अलावा कुछ नहीं होता है और एख़लास नीयत का फ़ैसला करने वाला परवरदिगार के अलावा कोई नहीं है।))


13-आपका इरशादे गिरामी

(जिसमें जंगे जमल के बाद अहले बसरा की मज़म्मत फ़रमाई है)

अफ़सोस तुम लोग एक औरत के सिपाही और एक जानवर के पीछे चलने वाले थे जिसने बिलबिलाना शुरू किया तो तुम लब्बैक - 2- कहने लगे और वह ज़ख़्मी हो गया तो तुम भाग खड़े हुए। ((अहले बसरा का बरताव अमीरूल मोमेनीन (अ) के साथ तारीख़ का हर तालिबे इल्म जानता है और जंगे जमल इसका बेहतरीन सबूत है लेकिन अमीरूल मोमेनीन (अ) के बरताव के बारे में तह हुसैन का बयान है के आपने एक करीम इन्सान का बरताव किया और बैतुलमाल का माल दोस्त और दुश्मन दोनों के मुस्तहक़ीन में तक़सीम कर दिया और ज़ख़ीमों पर हमला नहीं किया और हद यह है के क़ैदियों को कनीज़ नहीं बनाया बल्कि निहायत एहतेराम के साथ मदीना वापस कर दिया। - अलीयुन वबनोवा तह हुसैन-))

तुम्हारे इख़लाक़ेयात पस्त तुम्हारा अहद नाक़ाबिले एतबार तुम्हारा दीन निफ़ाक़ और तुम्हारा पानी शूर है। तुम्हारे दरम्यान क़यामक रने वाला गोया गुनाहों के हाथों रेहन है और तुमसे निकल जाने वाला गोया रहमते परवरदिगार को हासिल कर लेने वाला है। मैं तुम्हारी इस मस्जिद को उस आलम में देख रहा हूँ जैसे किश्ती का सीना। जब ख़ुदा तुम्हारी ज़मीन पर ऊपर और नीचे हर तरफ़ से अज़ाब भेजेगा और सारे अहले शहर ग़र्क़ हो जाएंगे।

दूसरी रिवायत में है ख़ुदा की क़सम तुम्हारा शहर ग़र्क़ होने वाला है- 3- यहां तक के गोया मैं इसकी मस्जिद को एक किश्ती के सीने की तरह या एक बैठे हुए शुतुरमुर्ग़ की शक्ल में देख रहा हूँ।

तीसरी रिवायत में है जैसे परिन्दा का सीना समन्दर की गहराईयों में।

एक रिवायत में आपका यह इरशाद वारिद हुआ है- तुम्हारा शहर ख़ाक के एतबार से सबसे ज़्यादा बदबूदार है के पानी से सबसे ज़्यादा क़रीब है और आसमान से सबसे ज़्यादा दूर है। इसमें शर के दस हिस्सों में से नौ हिस्से पाए जाते हैंं। इसमें मुक़ीम गुनाहों के हाथों में गिरफ्तार है।

और उससे निकल जाने वाला अज़वे इलाही में दाखि़ल हो गया। गोया मैं तुम्हारी इस बस्ती को देख रहा हूँ के पानी ने इसे इस तरह ढांप लिया है के मस्जिद के कनगरों के अलावा कुछ नज़र नहीं आ रहा है और वह कनगरे भी जिस तरह पानी की गहराई में परिन्दे का सीना।

14-आपका इरशादे गिरामी

(ऐसे ही एक मौक़े पर)

तुम्हारी ज़मीन पानी से क़रीबतर और आसमान से दूर है। तुम्हारी अक़्लें हल्की और तुम्हारी दानाई अहमक़ाना है। ((इससे ज़्यादा हिमाक़त क्या हो सकती है के कल जिस ज़बान से क़त्ले उस्मान का फ़तवा सुना था आज उसी से इन्तेक़ामे ख़ूने उस्मान की फ़रियाद सुन रहे हैं और फ़िर भी एतबार कर रहे हैं। इसके बाद एक ऊंट की हिफ़ाज़त पर हज़ारों जानें क़ुरबान कर रहे हैं और सरकारे दोआलम (स) के इस इरशादे गिरामी का एहसास तक नहीं है के मेरी अज़वाज में से किसी एक की सवारी को देख कर हदाब के कुत्ते भौकेंगे और वह आएशा ही हो सकती हैं।)) तुम हर तीरन्दाज़ का निशाना , हर भूके का लुक़्मा और हर शिकारी का शिकार हो। ((तारीख़ का मसलमा है के अमीरूल मोमेनीन (अ) जब बैतुलमाल में दाखि़ल होते थे तो सूई तागा और रोटी के टुकड़े तक तक़सीम कर दिया करते थे और उसके बाद झाड़ू देकर दो रकअत नमाज़ अदा करते थे ताके यह ज़मीन रोज़े क़यामत अली(अ) के अद्ल व इन्साफ़ की गवाही दे और इस बुनियाद पर आपने उस्मान की अताकरदा जागीरों को वापसी का हुक्म दिया और सदक़े के ऊंट उस्मान के घर से वापस मंगवाए के उस्मान किसी क़ीमत पर ज़कात के मुस्तहक़ नहीं थे। अगरचे बाज़ हवाख़्वाहान बनी उमय्या ने यह सवाल उठा दिया है के यह इन्तेहाई बेरहमाना बरताव था जहाँ यतीमों पर रहम नहीं किया गया और उनके क़ब्ज़े से माल ले लिया गया। लेकिन उसका जवाब बिल्कुल वाज़े है के ज़ुल्म और शक़ावत का मुज़ाहिरा उसने किया है जिसने ग़ुरबा व मसाकीन का हक़ अपने घर में जमा कर लिया है और माले मुस्लेमीन पर क़ब्ज़ा कर लिया है। फिर यह कोइ नया हादसा भी नहीं है। कल पहली खि़लाफ़त में यतीमाए रसूले अकरम (स) पर कब रहम किया गया था जो वाक़ेअन फ़िदक की हक़दार थीं और उसके बाबा ने उसे यह जागीर हुक्मे ख़ुदा से अता कर दी थी। औलादे उस्मान तो हक़दार भी नहीं हैं और क्या औलादे उस्मान का मरतबा औलादे रसूल (स) से बलन्दतर है या हर दौर के लिये एक नयी शरीअत मुरत्तब की जाती है और इसका महवर सरकारी मसालेह और जमाअती फ़वाएद ही होते हैं।))


15-आपके कलाम का एक हिस्सा

(इस मौज़ू से मुताल्लिक़ के आपने उस्मान की जागीरों को मुसलमानों को वापस दे दिया)

ख़ुदा की क़सम अगर मैं किसी माल को इस हालत में पाता के उसे औरत का मेहर बना दिया गया है या कनीज़ों की क़ीमत के तौर पर दे दिया गया है तो भी उसे वापस कर देता इसलिये के इन्साफ़ में बड़ी वुसअत पाई जाती है और जिसके लिये इन्साफ़ में तंगी हो उसके लिये ज़ुल्म में तो और भी तंगी होगी।

16-आपके कलाम का एक हिस्सा

( उस वक़्त जब आपकी मदीना में बैअत की गई और आपने लोगों को बैअत के मुस्तक़बिल से आगाह करते हुए उनकी क़िस्में बयान फ़रमाईं)

मैं अपने क़ौल का ख़ुद ज़िम्मेदार और उसकी सेहत का ज़ामिन हूँ और जिस श़ख़्स पर गुज़िश्ता अक़वाम की सज़ाओं ने इबरतों को वाज़ेअ कर दिया हो उसे तक़वा शुबहात में दाखि़ल होने से यक़ीनन रोक देगा। आगाह हो जाओ आज तुम्हारे लिये वह आज़माइशी दौर पलट आया है जो उस वक़्त था जब परवरदिगार ने अपनु रसूल (स) को भेजा था। क़सम है उस परवरदिगार की जिसने आप (अ) को हक़ के साथ मबऊस किया था के तुम सख़्ती के साथ तहो बाला किये जाओगे। तुम्हें बाक़ाएदा छाना जाएगा और देग की तरह चमचे से उलट-पलट किया जाएगा यहाँ तक के असफ़ल आला हो जाए और आला असफ़ल बन जाए और जो पीछे रह गए हैं वह आगे बढ़ जाएं और जो आगे बढ़ गए हैं वह पीछे आ जाएं। ख़ुदा गवाह है के मैंने न किसी कलमे को छिपाया है और न कोई ग़लत बयानी की है और मुझे उस मन्ज़िल और उस दिन की पहले ही ख़बर दे दी गई थी।

याद रखो के ख़ताएं वह सरकश सवारियां हैं जिन पर अहले ख़ता को सवार कर दिया जाए और उनकी लगाम को ढीला छोड़ दिया जाए और वह सवार को ले कर जहन्नुम में फान्द पड़ें और तक़वा उन रअम की हुई सवारियों के मानिन्द है जिन पर लोग सवार किये जाएं और उनकी लगाम इनके हाथों में दे दी जाए तो वह अपने सवारों को जन्नत तक पहुँचा दें।

दुनिया में हक़ व बातिल दोनों हैं और दोनों के अहल भी हैं। अब अगर बातिल ज़्यादा हो गया है तो यह हमेशा से होता चला आया है और अगर हक़ कम हो गया है तो यह भी होता रहा है और उसके खि़लाफ़ भी हो सकता है। अगरचे ऐसा कम ही होता है के कोई शै पीछे हट जाने के बाद दोबारा मन्ज़रे आम पर आजाए। ((मालिके कायनात ने इन्सान को बेपनाह सलाहियतों का मालिक बनाया है और इसकी फ़ितरत में ख़ैर व शर का सारा इरफ़ान वदलीत कर दिया है लेकिन इन्सान की बदक़िस्मती यह है के वह उन सलाहियतों से फ़ाएदा नहीं उठाता है और हमेशा अपने को बेचारा ही समझता है जो जेहालत की बदतरीन मन्ज़िल है के इन्सान को अपनी ही क़द्र व क़ीमत का अन्दाज़ा न हो सके। किसी शाएर ने क्या ख़ूब कहा हैः अपनी ही ज़ात का इन्सान को इरफ़ाँ न हुआ ; ख़ाक फिर ख़ाक थी औक़ात से आगे न बढ़ी ))

सय्यद रज़ी- इस मुख़्तसर से कलाम में इस क़दर ख़ूबियां पाई जाती हैं जहां तक किसी की दाद व तारीफ़ नहीं पहुँच सकती है और इसमें हैरत व इस्तेजाब का हिस्सा पसन्दीरगी की मिक़दार से कहीं ज़्यादा है। इसमें फ़साहत के वह पहलू भी हैं जिनको कोई ज़बान बयान नहीं कर सकती है और उनकी गहराईयों का कोई इन्सान इदराक नहीं कर सकता है और इस हक़ीक़त को वही इन्सान समझ सकता है जिसने फन्ने बलाग़त का हक़ अदा किया हो और उसके रगो रेशे से बाख़बर हो। और उन हक़ाएक़ को अहले इल्म के अलावा कोई नहीं समझ सकता है।

इसी ख़ुतबे का एक हिस्सा जिसमें लोगों को तीन हिस्सों पर तक़सीम किया गया है-

वह शख़्स किसी तरफ़ देखने की फ़ुरसत नहीं रखता जिसकी निगाह में जन्नत व जहन्नम का नक़्शा हो। तेज़ रफ़तारी से काम करने वाला निजात पा लेता है और सुस्त रफ़तारी से काम करके जन्नत की तलबगारी करने वाला भी उम्मीदवार रहता है लेकिन कोताही करने वाला जहन्नम में गिर पड़ता है। दाहिने बाएं गुमराहियों की मंज़िलें हैं और सीधा रास्ता सिर्फ़ दरमियानी रास्ता है इसी रास्ते पर रह जाने वाली किताबे ख़ुदा और नबूवत के आसार हैं और इसी से शरीअत का नेफ़ाज़ होता है और इसी की तरफ़ आक़ेबत की बाज़गश्त है। ग़लत अद्आ करने वाला हलाक हुआ और इफ़तरा करने वाला नाकाम व नामुराद हुआ। जिसने हक़ के मुक़ाबले में सर निकाला वह हलाक हो गया और इन्सान की जेहालत के लिये इतना ही काफ़ी है के इसे अपनी ज़ात का भी इरफ़ान न हो। जो बुनियाद तक़वा पर क़ाएम होती है उसमें हलाकत नहीं होती है और इसके होते हुए किसी क़ौम की खेती प्यास से बरबाद नहीं होती है। अब तुम अपने घरों में छिप कर बैठ जाओ और अपने बाहेमी काम की इस्लाह करो। तौबा तुम्हारे सामने है - 3-। तारीफ़ करने वाले का फर्ज़ है के अपने रब की तारीफ़ करे और मलामत करने वाले को चाहिए के अपने नफ़स की मलामत करे।

17-आपका इरशादे गिरामी

( उन ना-अहलों के बारे में जो सलाहियत के बग़ैर फै़सले का काम शुरू कर देते हैं और इसी ज़ैल में दो बदतरीन इक़साम मख़लूक़ात का ज़िक्र भी है)

क़िस्मे अव्वल- याद रखो के परवरदिगार की निगाह में बदतरीन ख़लाएक़ दो तरह के अफ़राद हैं (( जाहिल इन्सानों की हमेशा यह ख़्वाहिश होती है के परवरदिगार उन्हें उनके हाल पर छोड़ दे और वह जो चाहें करें किसी तरह की कोई पाबन्दी न हो हालांकि दरहक़ीक़त यह बदतरीन अज़ाबे इलाही है। इन्सान की फ़लाहो बहबूद इसी में है के मालिक उसे अपने रहम व करम के साये में रखे वरना अगर उससे तौफ़ीक़ात को सल्ब करके उसके हाल पर छोड़ दिया तो वह लम्हों में फ़िरऔन , क़ारून , नमरूद , हज्जाज और मुतवक्किल बन सकता है। अगरचे उसे एहसास यही रहेगा के उसने कायनात का इक़तेदार हासिल कर लिया है और परवरदिगार उसके हाल पर बहुत ज़्यादा मेहरबान है।))

वह शख़्स जिसे परवरदिगार ने इसी के रहम व करम पर छोड़ दिया है और वह दरमियानी रास्ते से हट गया है। सिर्फ़ बिदअत का विल्दावा है और गुमराही की दावत पर फ़रेफ़ता है। यह दूसरे अफ़राद के लिये एक मुस्तक़िल फ़ितना है और साबिक़ अफ़राद की हिदायत से बहका हुआ है। अपने पैरोकारों को गुमराह करने वाला है ज़िन्दगी में भी और मरने के बाद भी। यह दूसरों की ग़ल्तियों का भी बोझ उठाने वाला है और उनकी ख़ताओं में भी गिरफ़तार है।

क़िस्मे दोम- वह शख़्स जिसने जेहालतों को समेट लिया है और उन्हीं के सहारे जाहिलों के दरम्यान दौड़ लगा रहा है ((क़ाज़ियों की यह क़िस्म हर दौर में रही है और हर इलाक़े में पाई जाती है। बाज़ लोग गांव या शहर में इसी बात को अपना इम्तेयाज़ तसव्वुर करते हैं के उन्हें फ़ैसला करने का हक़ हासिल है अगरचे उनमें किसी क़िस्म की सलाहियत नहीं है। यही वह क़िस्म है जिसने दीने ख़ुदा को तबाह और ख़ल्क़े ख़ुदा को गुमराह किया है और यही क़िस्म शरीह से शुरू होकर उन अफ़राद तक पहुंच गई है जो दूसरों के मसाएल को बाआसानी तय कर देते हैं और अपने मसले में किसी तरह के फ़ैसले से राज़ी नहीं होते हैं और न किसी की राय को सुनने के लिये तैयार होते हैं)) फ़ित्नों की तारीकियों में दौड़ रहा है और अम्न व सुलह के फ़वाएद से यकसर ग़ाफ़िल है। इन्साननुमा लोगों ने इसका नाम आलिम रख दिया है हालाँके इसका इल्म से कोई ताल्लुक़ नहीं है। सुबह सवेरे इन बातों की तलाश में निकल पड़ता है जिनका क़लील इनके कसीर से बेहतर है। यहां तक के जब गन्दे पानी से सेराब हो जाता है और महमिल और बेफ़ाएदा बातों को जमा कर लेता है तो लोगों के दरमियान क़ाज़ी बन कर बैठ जाता है और इस अम्र की ज़िम्मेदारी ले लेता है के जो काम दूसरे लोगों पर मुश्तबह हैं वह उन्हें साफ़ कर देगा। इसके बाद जब कोई मुबहम मसला आ जाता है तो इसके लिए बे सूद और फ़रसूदा दलाएल को इकट्ठा करता है और उन्हीं से फ़ैसला कर देता है। यह शबाहत में इसी तरह गिरफ़तार है जिस तरह मकड़ी अपने जाले में फंस जाती है। इसे यह भी नहीं मालूम है के सही फ़ैसला किया है या ग़लत। अगर सही किया है तो भी डरता है के शायद ग़लत हो और अगर ग़लत किया है तो भी यह उम्मीद रखता है के शायद सही हो। ऐसा जाहिल है जो जिहालतों में भटक रहा हो और ऐसा अन्धा है जो अन्धेरों की सवारी पर सवार हो। न इल्म में कोई हतमी बात समझा है और न किसी हक़ीक़त को परखा है। रिवायात को यूं उड़ा देता है जिस तरह तेज़ हवा तिनकों को उड़ा देती है। ख़ुदा गवाह है के यह इन फ़ैसलों के सादिर करने के क़ाबिल नहीं है जो उसपर वारिद होते हैं और इस काम का अहल नहीं है जो उसके हवाले किया गया है। जिस चीज़ को नाक़ाबिले तवज्जो समझता है उसमें इल्म का एहतेसाल भी नहीं देता है और अपनी पहुंच के मावराए किसी और राय का तसव्वुर भी नहीं करता है। अगर कोई मसला वाज़े नहीं होता है तो उसे छिपा देता है के उसे अपनी जिहालत का इल्म है।

नाहक़ बहाए हुए ख़ून इसके फै़सलों के ज़ुल्म से फ़रयादी हैं और ग़लत तक़सीम की हुई मीरास चिल्ला रही है। मैं ख़ुदा की बारगाह में फ़रयाद करता हूं ऐसे गिरोह जो ज़िन्दा रहते हैं तो जेहालत के साथ और मर जाते हैं तो ज़लालत के साथ। इनके नज़दीक कोई मताअ किताबे ख़ुदा से ज़्यादा बेक़ीमत नहीं है अगर इसकी वाक़ई तिलावत की जाए और कोई मताअ इस किताब से ज़्यादा क़ीमती और फ़ाएदामन्द नहीं है अगर उसके मफ़ाहिम में तहरीफ़ कर दी जाए। इनके लिए मारूफ़ से ज़्यादा मुन्किर कुछ नहीं है और मुन्किर से ज़्यादा मारूफ़ कुछ नहीं है। ((याद रहे के अमीरूल मोमेनीन (अ) ने मसले के तमाम एहतेमालात का सद बाब कर दिया है और अब किसी राय परस्त इन्सान के लिए फ़रार करने का कोई रास्ता नहीं है और उसे नमसब में राय और क़यास इस्तेमाल करने के लिये एक न एक महमिल बुनयाद को इख़्तेयार करना पड़ेगा। इसके बग़ैर राय और क़यास का कोई जवाज़ नहीं है।))


18-आपका इरशादे गिरामी

( उलमा के दरमियान इख़तेलाफ़े फ़तवा के बारे में और इसी में अहल राय की मज़म्मत और क़ुरआन की मरजईयत का ज़िक्र किया गया है)

मज़म्मत अहल राय- उन लोगों का आलम यह है के एक शख़्स के पस किसी मसले का फ़ैसला आता है तो वह अपनी राय से फ़ैसला कर देता है और फ़िर यही क़ज़िया बअय्यना दूसरे के पास जाता है तो वह उसके खि़लाफ़ फ़ैसला कर देता है। इसके बाद तमाम क़ज़ात इस हाकिम के पास जमा होते हैं जिसने इन्हें क़ाज़ी बनाया है तो वह सबकी राय से ताईद कर देता है जबके सबका ख़ुदा एक , नबी एक और किताब एक है तो क्या ख़ुदा ही ने इन्हें इख़्तेलाफ़ का हुक्म दिया है और यह इसी की इताअत कर रहे हैं या उसने उन्हें इख़्तेलाफ़ से मना किया है मगर फ़िर भी इसकी मुख़ालेफ़त कर रहे हैं ? या ख़ुदा ने दीने नाक़िस नाज़िल किया है और उनसे इसकी तकमील के लिये मदद मांगी है या यह सब ख़ुद इसकी ख़ुदाई ही में शरीक हैं और इन्हें यह हक़ हासिल है के यह बात कहें और ख़ुदा का फ़र्ज़ है के वह क़ुबूल करे या ख़ुदा ने दीने कामिल नाज़िल किया था और रसूले अकरम (स) ने इसकी तबलीग़ और अदायगी में कोताही कर दी है , जबके इसका एलान है के हमने किताब में किसी तरह की कोताही नहीं की है और इसमें हर शै का बयान मौजूद है - 2-। और यह भी बता दिया है के इसका एक हिस्सा दूसरे की तस्दीक़ करता है और इसमें किसी तरह का इख़्तेलाफ़ नहीं है। यह क़ुरआन ग़ैर ख़ुदा की तरफ़ से होता तो इसमें बेपनाह इख़्तेलाफ़ात होता। यह क़ुरआन वह है जिसका ज़ाहिर ख़ूबसूरत और बातिन अमीक़ और गहराए। इसके अजाएब फ़ना होने वाले नहीं हैं और तारीकियों का ख़ात्मा इसके अलावा और किसी कलाम से नहीं हो सकता है।

19-आपका इरशादे गिरामी

( जिसे उस वक़्त फ़रमाया जब मिम्बरे कूफ़े पर ख़ुत्बा दे रहे थे और अशअस बिन क़ैस ने टोक दिया के यह बयान आप ख़ुद अपने खि़लाफ़ दे रहे हैं। आपने पहले निगाहों को नीचा करके सुकूत फ़रमाया और फिर पुरजलाल अन्दाज़ से फ़रमाया)

तुझे क्या ख़बर के कौन सी बात मेरे मवाफ़िक़ है और कौन सी मेरे खि़लाफ़ है। तुझ पर ख़ुदा और तमाम लाअनत करने वालों की लानत , तू सुख़न बाफ़ और ताने बाने दुरूस्त करने वाले का फ़रज़न्द है। तू मुनाफ़िक़ है और तेरा बाप खुला हुआ काफ़िर था। ख़ुदा की क़सम तू एक मरतबा कुफ्ऱ का क़ैदी बना और दूसरी मरतबा इस्लाम का। लेकिन न तेरा माल काम आया न हसब। और जो शख़्स भी अपनी क़ौम की तरफ़ तलवार को रास्ता बताएगा और मौत को खींच कर लाएगा वह इस बात का हक़दार है के क़रीब वाले उससे नफ़रत करें और दूर वाले इस पर भरोसा न करें।

सय्यद रज़ी - - इमाम (अ) का मक़सद यह है के अशअत बिन क़ैस एक मरतबा दौरे कुफ्ऱ में क़ैदी बना था और दूसरी मरतबा इस्लाम लाने के बाद। तलवार की रहनुमाई का मक़सद यह है के जब यमामा में ख़ालिद बिन वलीद ने चढ़ाई की तो उसने अपनी क़ौम से ग़द्दारी की और सबको ख़ालिद की तलवार के हवाले कर दिया जिसके बाद इसका लक़ब “ उरफ़ुल नार ” हो गया जो उस दौर में हर ग़द्दार का लक़ब हुआ करता था।

20-आपका इरशादे गिरामी

( जिसमें ग़फ़लत से बेदार किया गया है और ख़ुदा की तरफ़ दौड़कर आने की दावत दी गई है।)

यक़ीनन जिन हालात को तुमसे पहले मरने वालों ने देख लिया है अगर तुम भी देख लेते तो परेशान व मुज़तरिब हो जाते और बात सुनने और इताअत करने के लिये तैयार हो जाते लेकिन मुश्किल यह है के अभी वह चीज़ तुम्हारे लिये पस हिजाब हैं और अनक़रीब यह परदा उठने वाला है। बेशक तुम्हें सब कुछ दिखाया जा चुका है अगर तुम निगाह बीना रखते हो और सब कुछ सुनाया जा चुका है अगर तुम गोश शनवार रखते हो और तुम्हें हिदायत दी जा चुकी है अगर तुम हिदायत हासिल करना चाहो और मैं बिल्कुल बरहक़ कह रहा हूँ के अनक़रीब तुम्हारे सामने खुल कर आ चुकी हैं और तुम्हें इस क़दर डराया जा चुका है जो बक़द्र काफ़ी है और ज़ाहिर है के आसमानी फ़रिश्तों के बाद इलाही पैग़ाम को इन्सान ही पहुंचाने वाला है।

21-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

( जो एक कलमा है लेकिन तमाम मोअज़त व हिकमत को अपने अन्दर समेटे हुए है)

बेशक मन्ज़िले मक़सूद तुम्हारे सामने है और साअते मौत तुम्हारे तआक़ब में है और तुम्हें अपने साथ लेकर चल रही है। अपना बोझ हल्का कर लो - 1- ताके पहले वालों से मुलहक़ हो जाओ के अभी तुम्हारे साबेक़ीन से तुम्हारा इन्तेज़ार कराया जा रहा है।

सय्यद रज़ी- - इस कलाम का कलामे ख़ुदा व कलामे रसूल (स) के बाद किसी कलाम के साथ रख दिया जाए तो इसका पल्ला भारी ही रहेगा और यह सबसे आगे निकल जाएगा। “ तख़फ़फ़वा तलहक़वा ” से ज्यादा मुख़्तसर और बलीग़ कलाम तो कभी देखा और सुना ही नहीं गया है। इस कलमे में किस क़द्र गहराई पाई जाती है और इस हिकमत का चश्मा किस क़द्र शफ़फाफ़ है। हमने किताबे ख़साएस में इसकी क़द्र व क़ीमत और अज़मत व शराफ़त पर मुकम्मल तब्सिरा किया है।

(( इसमें कोई शक नहीं है के गुनाह इन्सानी ज़िन्दगी के लिए एक बोझ की हैसियत रखता है और यही बोझ है जो इन्सान को आगे नहीं बढ़ने देता है और वह इसी दुनियादारी में मुब्तिला रह जाता है वरना इन्सान का बोझ हल्का हो जाए तो तेज़ क़दम बढ़ाकर उन साबेक़ीन से मुलहक़ हो सकता है जो नेकियों की तरफ़ सबक़त करते हुए बलन्दतरीन मन्ज़िलों तक पहुंच गये हैं। अमीरूल मोमेनीन (अ) की दी हुई यह मिसाल वह है जिसका तजुरबा हर इन्सान की ज़िन्दगी में बराबर सामने आता रहता है के क़ाफ़िले में जिसका बोझ ज़्यादा होता है वह पीछे रह जाता है और जिसका बोझ हल्का होता है वह आगे बढ़ जाता है। सिर्फ़ मुश्किल यह है के इन्सान को गुनाहों के बोझ होने का एहसास नहीं है। शायर ने क्या ख़ुब कहा है- चलने न दिया बारे गुनह न पैदल ताबूत में कान्धों पे सवार आया हूँ। ))

22-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जब आपको ख़बर दी गई के कुछ लोगों ने आपकी बैअत तोड़ दी है)

आगाह हो जाओ के शैतान ने अपने गिरोह को भड़काना शुरू कर दिया है और फ़ौज को जमा कर लिया है ताके ज़ुल्म अपनी मन्ज़िल पर पलट आए और बातिल अपने मरकज़ की तरफ़ वापस आ जाए। ख़ुदा की क़सम उन लोगों ने मुझ पर कोई सच्चा इल्ज़ाम लगाया है और न मेरे और अपने दरम्यान कोई इन्साफ़ किया है। यह मुझसे उस हक़ का मुतालबा कर रहे हैं जो ख़ुद इन्होंने नज़रअन्दाज़ किया है और उस ख़ून का तक़ाज़ा कर रहे हैं जो ख़ुद इन्होंने बहाया है। फ़िर अगर मैं इनके साथ शरीक था तो इनका भी तो एक हिस्सा था और वह तन्हा मुजरिम थे तो ज़िम्मेदारी भी उन्हीं पर है। बेशक इनकी अज़ीमतरीन दलील भी इन्हीं के खि़लाफ़ है। यह उस माँ से दूध पीना चाहते हैं जिसका दूध ख़त्म हो चुका है और उस बिदअत को ज़िन्दा करना चाहते हैं जो मर चुकी है। हाए किस क़दर नामुराद यह जंग का दाई है। कौन पुकार रहा है और किस मक़सद के लिये इसकी बात सुनी जा रही है ? मैं इस बात से ख़ुश हू के परवरदिगार की हुज्जत इनपर तमाम हो चुकी है और वह इनके हालात से बाख़बर है।

अब अगर इन लोगों ने हक़ का इन्कार किया है तो मैं इन्हें तलवार की बाढ़ अता करूंगा के वही बातिल की बीमारी से शिफ़ा देने वाली और हक़ की वाक़ई मददगार है। हैरतअंगेज़ बात है के यह लोग मुझे नेज़ाबाज़ी के मैदान में निकलने और तलवार की जंग सहने की दावत दे रहे हैं- रोने वालियां इनके ग़म में रोएं। मुझे तो कभी भी जंग से ख़ौफ़ज़दा नहीं किया जा सका है और न मैं शमशीरज़नी से मरऊब हुआ हूँ। मैं तो अपने परवरदिगार की तरफ़ से मन्ज़िले यक़ीन पर हँ और मुझे दीन के बारे में किसी तरह कोई शक नहीं है।

(( तारीख़ का मसला है के उस्मान ने अपने दौरे हुकूमत में अपने पेशरौ तमाम हुक्काम के खि़लाफ़ अक़रबा परस्ती और बैतुलमाल की बे-बुनियाद तक़सीम का बाज़ार गर्म कर दिया था और यही बात उनके क़त्ल का बुनियादी सबब बन गयी। ज़ाहिर है के उनके क़त्ल के बाद यह बिदअत भी मुरदा हो चुकी थी लेकिन तलहा ने अमीरूलमोमेनीन (अ) से बसरा की गवरनरी और ज़ुबैर ने कूफ़े की गवरनरी का मतालबा करके फिर इस बिदअत को ज़िन्दा करना चाहा जो एक इमामे मासूम (अ) किसी क़ीमत पर बरदाश्त नहीं कर सकता है चाहे उसकी कितनी ही बड़ी क़ीमत क्यों न अदा करना पड़े।

इब्ने अबील हदीद के नज़दीक दाई से मुराद तलहा , ज़ुबैर और आईशा हैं जिन्होंने आप (अ) के खि़लाफ़ जंग की आग भड़काई थी लेकिन अन्जाम कार सबको नाकाम और नामुराद होना पड़ा और कोई नतीजा हाथ न आया जिसकी तरफ़ आपने तहक़ीर आमेज़ लहजे में इशारा किया है और साफ़ वाज़ेअ कर दिया है के मैं जंग से डरने वाला नहीं हूँ , तलवार मेरा तकिया है और यक़ीन मेरा सहारा। इसके बाद मुझे किस चीज़ से ख़ौफ़ज़दा किया जा सकता है।))

23-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें फ़ोक़रा को ज़ोहद और सरमायेदारों को शफ़क़त की हिदायत दी गई है)

अम्मा बाद!- इन्सान के मक़सूम में कम या ज़्यादा जो कुछ भी होता है उसका अम्र आसमान से ज़मीन की तरफ़ बारिश के क़तरात की तरह नाज़िल होता है। लेहाज़ा अगर कोई शख़्स अपने भाई के पास अहल व माल या नफ़्स की फ़रावानी देखे तो इसके लिये फ़ितना न बने।

के मर्दे मुस्लिम के किरदार में अगर ऐसी पस्ती नहीं है जिसके ज़ाहिर हो जाने के बाद जब भी उसका ज़िक्र किया जाए उसकी निगाह शर्म से झुक जाए और पस्त लोगों के हौसले उससे बलन्द हो जाएं तो इसकी मिसाल उस कामयाब जवारी की है जो जुए के तीरों का पाँसा फेंक कर पहले ही मरहले में कामयाबी का इन्तज़ार करता है जिससे फ़ायदा हासिल हो और गुज़िश्ता फसाद की तलाफ़ी हो जाए।

यही हाल उस मर्दे मुसलमान का है जिसका दामन ख़यानत से पाक हो के वह हमेशा परवरदिगार से दो में से एक नेकी का उम्मीदवार रहता है या दाई अजल आजाए तो जो कुछ इसकी बारगाह में है वह इस दुनिया से कहीं ज़्यादा बेहतर है या रिज़क़े ख़ुदा हासिल हो जाए तो वह साहबे अहल व माल भी होगा और इसका दीन और वक़ार भी बरक़रार रहेगा। याद रखो माल और औलाद दुनिया की खेती हैं और अमले स्वालेह आख़ेरत की खेती है और कभी भी परवररिगार बाज़ अक़वाम के लिये दोनों को जमा कर देता है। लेहाज़ा ख़ुदा से इस तरह डरो जिस तरह उसने डरने का हुक्म दिया है और इसका ख़ौफ़ इस तरह पैदा करो के कुछ मारेफ़त न करना पड़े , अमल करो तो दिखाने सुनाने से अलग रखो के जो शख़्स भी ग़ैरे ख़ुदा के वास्ते अमल करता है ख़ुदा उसी शख़्स के हवाले कर देता है। मैं परवरदिगार से शहीदों की मन्ज़िल , नेक बन्दों की सोहबत और अम्बियाए कराम की रिफ़ाक़त की दुआ करता हूं।

ऐ लोगो! याद रखो के कोई शख़्स किसी क़द्र भी साहबे माल क्यों न हो जाए , अपने क़बीले और उन लोगों के हाथ और ज़बान के ज़रिये दफ़ाअ करने से बेनियाज़ नहीं हो सकता है। यह लोग इन्सान के बेहतरीन मुहाफ़िज़ होते हैं। इसकी परागन्दगी के दूर करने वाले और मुसीबत के नज़ूल के वक़्त इसके हाल पर मेहरबान होते हैं। परवरदिगार बन्दे के लिए जो ज़िक्रे ख़ैर लोगों के दरमियान क़रार देता है वह उस माल से कहीं ज़्यादा बेहतर होता है जिसके वारिस दूसरे अफ़राद हो जाते हैं।

(( अगरचे इस्लाम ने बज़ाहिर फ़क़ीर को ग़नी के माल में या रिश्तेदार को रिश्तेदार के माल में शरीक नहीं बनाया है लेकिन उसका यह फ़ैसला के तमाम अमलाके दुनिया का मालिके हक़ीक़ी परवरदिगार है और इसके एतबार से तमाम बन्दे एक जैसे हैं। सब उसके बन्दे हैं और सबके रिज़्क़ की ज़िम्मादारी इसी की ज़ाते अक़दस पर है। इस अम्र की अलामत है के उसने हर ग़नी के माल में एक हिस्सा फ़क़ीरों और मोहताजों का ज़रूर क़रार दिया है और इसे जबरन वापस नहीं लिया है बल्के ख़ुद ग़नी को इनफ़ाक़ का हुक्म दिया है ताके माल इसके इख़्तेयार से फ़क़ीर तक जाए। इस तरह वह आखि़रत में अज्र व सवाब का हक़दार हो जाएगा और दुनिया में फ़ोक़रा के दिल में इसकी जगह बन जायेगी जो साहेबाने ईमान का शरफ़ है के परवरदिगार लोगों के दिलों में इनकी मोहब्बत क़रार दे देता है। फिर इस इनफ़ाक में किसी तरह का नुक़सान भी नहीं है। माल यूँ ही बाक़ी रह गया तो भी दूसरों ही के काम आएगा तो क्यों न ऐसा हो के उसी के काम आ जाए जिसके ज़ोरे बाज़ू ने जमा किया है और फिर वह जमाअत भी हाथ आ जाए जो किसी वक़्त भी काम आ सकती है। जिगर जिगर होता है और दिगर दिगर होता है।))

आगाह हो जाओ के तुमसे कोई शख़्स भी अपने अक़रबा को मोहताज देखकर इस माल से हाजत बरआरी करने से गुरेज़ न करे जो बाक़ी रह जाए तो बढ़ नहीं जाएगा और ख़र्च कर दिया जाए कम नहीं हो जाएगा। इसलिये जो शख़्स भी अपने अशीरा और क़बीला से अपना हाथ रोक लेता है तो इस क़बीले से एक हाथ रूक जाता है और ख़ुद इसके लिये बेशुमार हाथ रूक जाते हैं। और जिसके मिज़ाज में नरमी होती है वह क़ौम की मोहब्बत को हमेशा के लिये हासिल कर लेता है।

सय्यद रज़ी- इस मक़ाम पर ग़फ़ीरा कसरत के मानी में है जिस तरह जमा कसीर को जमा कशीर कहा जाता है। बाज़ रवायत में ग़फ़ीरा के बजाए इफ़वह है जो मुन्तख़ब और पसन्दीदा शै के मानी है , इस्तेमाल होता है। “ अफ़वतिल तआम ” पसन्दीदा खाने को कहा जाता है और इमाम अलैहिस्सलाम ने इस मक़ाम पर बेहतरीन नुक्ते की तरफ़ इशारा फ़रमाया है के अगर किसी ने अपना हाथ अशीरा से खींच लिया तो गोया के एक हाथ कम हो गया। लेकिन जब इसे इनकी नुसरत और इमदाद की ज़रूरत होगी और वह हाथ खींच लेंेगे और उसकी आवाज़ पर लब्बैक नहीं कहेंगे तो बहुत से बढ़ने वाले हाथों और उठने वाले क़दमों से महरूम हो जाएगा।

24-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें इताअते ख़ुदा की दावत दी गई है)

मेरी जान की क़सम। मैं हक़ की मुख़ालफ़त करने वालों और गुमराही में बैठने वालों से जेहाद करने में न कोई नरमी कर सकता हूँ और न सुस्ती। अल्लाह के बन्दों! अल्लाह से डरो और उसके ग़ज़ब से फ़रार करके उसकी रहमत में पनाह लो। उस रास्ते पर चलो जो उसने बना दिया है और उन एहकाम पर अमल करो जिन्हें तुम से मरबूत कर दिया गया है। इसके बाद अली (अ) तुम्हारी कामयाबी का आखि़रत में बहरहाल ज़िम्मेदार है चाहे दुनिया में हासिल न हो सके।((अमीरूल मोमेनीन (अ) की खि़लाफ़त का जाएज़ा लिया जाए तो मसाएब व मुश्किलात में सरकारे दो आलम (स) के दौरे रिसालत से कुछ कम नहीं है। आपने तेरा साल मक्के में मुसीबते बरदाश्त कीं और दस साल मदीने में जंगों का मुक़ाबला करते रहे और यही हाल मौलाए कायनात (अ) का रहा। ज़िलहिज्जा 35हि 0में खि़लाफ़त मिली और माहे मुबारक 40हि 0में शहीद हो गए। कुल दौरे हुकूमत 4साल 9माह 2दिन रहा और इसमें भी तीन बड़े-बड़े मारके हुए और छोटी-छोटी झड़पें मुसलसल होती रहीं। जहां इलाक़ों पर क़ब्ज़ा किया जा रहा था और चाहने वालों को अज़ीयत दी जा रही थी। माविया ने अम्र व आस के मश्विरे से बुसर बिन अबी अरताह को तलाश कर लिया था और इस जल्लाद को मुतलक़ुल अनान बनाकर छोड़ दिया था। ज़ाहिर है के “ पागल कुत्ते ” को आज़ाद छोड़ दिया जाए तो शहरवालों का क्या हाल होगा और इलाक़े के अम्नो अमान में क्या बाक़ी रह जाएगा।))

25-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

जब आपको मुसलसल ख़बर दी गई के मआविया के साथियों ने शहरों पर क़ब्ज़ा कर लिया है और आपके दो आमिले यमन अब्दुल्लाह बिन अब्बास और सईद बिन नमरान , बुसर बिन अबी अरताह के मज़ालिम से परेशान होकर आपकी खि़दमत में आ गए। तो आपने असहाब की कोताही जेहाद से बददिल होकर मिम्बर पर खड़े होकर यह ख़ुत्बा इरशाद फ़रमाया। अब यही कूफ़ा है जिसका बस्त व कशाद मेरे हाथ में है। ऐ कूफ़ा अगर तू ऐसा ही रहा और यूँ ही तेरी आन्धियाँ चलती रहीं तो ख़ुदा तेरा बुरा करेगा। (इसके बाद शाएर के “ शेर की तमसील बयान फ़रमाई) ऐ अमरो! तेरे अच्छे बाप की क़सम , मुझे तो उस बरतन की तह में लगी हुई चिकनाई ही मिली है। इसके बाद फ़रमाया , मुझे ख़बर दी गई है के बुसर यमन तक आ गया है और ख़ुदा की क़सम मेरा ख़याल यह है के अनक़रीब यह लोग तुमसे इक़तेदार को छीन लेंगे। इसलिये यह अपने बातिल पर मुत्तहिद हैं और तुम अपने हक़ पर मुत्तहिद नहीं हो। यह अपने पेशवा की बातिल में इताअत करते हैं और तुम अपने इमाम की हक़ में भी नाफ़रमानी करते हो। यह अपने मालिक की अमानत उसके हवाले कर देते हैं और तुम ख़यानत करते हो। यह अपने शहरों में अमन व अमान रखते हैं और तुम अपने शहर में भी फ़साद करते हो।

(( ज़रा जाए ख़त की क़ाबलीयत मुलाहेज़ा फ़रमाएं- फ़रमाते हैं के कूफ़े वाले इस लिये नहीं इताअत करते थे के इनकी निगाह तनक़ीदी और बसीरत आमेज़ थी और शाम ववाले अहमक़ और जाहिल थे इसलिये इताअत कर लेते थे। इन क़ाबेलीयत मआब से कौन दरयाफ़्त करे के कूफ़ावालों ने मौलाए कायनात (अ) के किस ऐ़ब की बिना पर इताअत छोड़ दी थी और किस तनक़ीदी नज़र से आप की ज़िन्दगी को देख लिया था। हक़ीक़ते अम्र यह है के कूफ़े व शाम दोनों ज़मीर फ़रोश थे। शाम वालों को ख़रीदार मिल गया था और कूफ़े में हज़रत अली (अ) ने यह तरीक़ाएकार इख़्तेयार कर लिया था के मुँह मांगी क़ीमत नहीं अता की थी लेहाज़ा बग़ावत का होना नागुज़ीर था और यह कोई हैरतअंगेज़ अम्र नहीं है।))

मैं तो तुम में से किसी को लकड़ी के प्याले का भी अमीन बनाऊं तो यह ख़ौफ़ रहेगा के वह कुन्डा लेकर भाग जाएगा। - 1- ख़ुदाया मैं इनसे तंग आ गया हूँ और यह मुझसे तंग आ गए हैं। मैं इनसे उकता गया हूँ और यह मुझसे उकता गये हैं। लेहाज़ा मुझे इनसे बेहतर क़ौम इनायत कर दे और इन्हें मुझसे “ बदतर ” हाकिम दे दे और इनके दिलों को यूँ पिघला दे जिस तरह पानी में नमक भिगोया जाता है। ख़ुदा की क़सम मैं यह पसन्द करता हूँ के इन सब के बदले मुझे बनी फ़रास बिन ग़नम के हरफ़ एक हजार शाही मिल जाएं , जिनके बारे में इनके शाएर ने कहा थाः- “ इस वक़्त में अगर तू इन्हें आवाज़ देगा तो ऐसे शहसवार सामने आएंगे जिनकी तेज़ रफ़्तारी गर्मियों के बादलों से ज़्यादा सरीहतर होगी ”

सय्यद रज़ी - अरमिया रमी की जमा है जिसके मानी बादल हैं और हमीम गर्मी के ज़माने के मानी में हैं , शायर ने गर्मी के बादलों का ज़िक्र इसलिये किया है कि इनकी रफ़तार तेज़ औश्र सुबकतर होती है इसलिये के इनमें पानी नहीं होता है। बादल की रफ़तार उस वक़्त सुस्त हो जाती है जब उसमें पानी भर जाता है और यह आम तौर से सरदी के ज़माने में होता है। शायर ने अपनी क़ौम को आवाज़ पर लब्बैक कहने और मज़लूम की फ़रयाद रसी में सुबक रफ़तारी का ज़िक्र किया है जिसकी दलील “ लौ दऔतो ” है।

26-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

( जिसमें बासत से पहले अरब की हालत का ज़िक्र किया गया है और फिर अपनी बैअत से पहले के हालात का तज़किरा किया गया है)

यक़ीनन अल्लाह ने हज़रत मोहम्मद (स) को आलमीन के अज़ाबे इलाही से डराने वाला और तन्ज़ील का अमानतदार बनाकर उस वक़्त भेजा है जब तुम गिरोहे अरब बदतरीन दीन के मालिक और बदतरीन इलाक़े के रहने वाले थे। न हमवार पत्थरों और ज़हरीले सांपों के दरमियान बूदोबाश रखते थे। गन्दा पानी पीते थे और ग़लीज़ ग़िज़ा इस्तेमाल करते थे। आपस में एक दूसरे का ख़ून बहाते थे और क़राबतदारों से बेतआल्लुक़ी रखते थे। बुत तुम्हारे दरम्यान नसब थे और गुनाह तुम्हें घेरे हुए थे।

(बैयत के हंगाम)

मैंने देखा के सिवाए मेरे घरवालों के कोई मेरा मददगार नहीं है तो मैंने उन्हें मौत के मुंह में दे देने से गुरेज़ किया और इस हाल में चश्मपोशी की के आंखों में ख़स्द ख़ाशाक था। मैंने ग़म व ग़ुस्से के घूंट पिये और गुलू गिरफ्तगी और हन्ज़ाल से ज़्यादा तल्क़ हालात पर सब्र किया।

याद रखो! अमर व आस ने माविया की बैयत उस वक़्त तक नहीं की जब तक के बैयत की क़ीमत नहीं तय कर ली। ख़ुदा ने चाहा तो बैयत करने वाले का सौदा कामयाब न होगा और बैयत लेने वाले को भी सिर्फ़ रूसवाई ही नसीब होगी। लेहाज़ा जंग का सामान संभाल लो और इसके असबाब मुहैया कर लो के इसके शोले भड़क उट्ठे हैं और लपटें बलन्द हो चुकी हैं और देखो सब्र को अपना शआर बना लो के यह नुसरत व कामरानी का बेहतरीन ज़रिया है।

(( किसी क़ौम के लिये डूब मरने की बात है के उसका मासूम रहनुमा उससे इस क़द्र आजिज़ आ जाए के उसके हक़ में दरपरदा बद्दुआ करने के लिये तैयार हो जाए और उसे दुशमन के हाथ फ़रोख़्त कर देने पर आमादा हो जाए।

अहले कूफ़ा की बदबख़्ती की आखि़री मन्ज़िल थी के वह अपने मासूम रहनुमा को भी तहफ़्फ़ुज़ फ़राहम न कर सके और इनके दरम्यान इनका रहनुमा ऐन हालते सजदा में शहीद कर दिया गया। कूफ़े का क़यास मदीने के हालात पर नहीं किया जा सकता है। मदीने ने अपने हाकिम का साथ नहीं दिया इस लिये के वह ख़ुद इसके हरकात से आजिज़ थे और मुसलसल एहतेजाज कर चुके थे लेकिन कूफ़े में ऐसा कुछ नहीं था या वाजे़अ लफ़्ज़ों में यूँ कहा जा सकता है के मदीने के हुक्काम के क़ातिल अपने अमल पर मुतमईन थे और उन्हें किसी तरह की शर्मिन्दगी का एहसास नहीं था लेकिन कूफ़े में जब अमीरूल मोमेनीन (अ) ने अपने क़ातिल से दरयाफ़त किया के क्या मैं तेरा कोई बुरा इमाम था ? तो उसने बरजस्ता यही जवाब दिया के आप किसी जहन्नुम में जाने वाले को रोक नहीं सकते हैं। गोया मदीने से कूफ़े तक के हालात से यह बात बिल्कुल वाज़ेअ हो जाती है के मदीने के मक़तूल अपने ज़ुल्म के हाथों क़त्ल हुए थे और कूफ़े का शहीद अपने अद्लो इन्साफ़ की बुनियाद पर शहीद हुआ है और ऐसे ही शहीद को यह कहने का हक़ है के “ फ़ुज़्तो बे रब्बिल काबा ” ( परवरदिगारे काबा की क़सम मैं कामयाब हो गया)))

27-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

( जो उस वक़्त इरशाद फ़रमाया जब आपको ख़बर मिली के माविया के लशकर ने अनबार पर हमला कर दिया है। इस ख़ुतबे में जेहाद की फ़ज़ीलत का ज़िक्र करके लोगों को जंग पर आमादा किया गया है और अपनी जंगी महारत का तज़किरा करके नाफ़रमानी की ज़िम्मेदारी लशकरवालों पर डाली गई है)

अम्मा बाद! जेहाद जन्नत के दरवाज़ों में से एक दरवाज़ा है जिसे परवरदिगार ने अपने मख़सूस औलिया के लिये खोला है। यह तक़वा का लिबास और अल्लाह की महफ़ूज़ व मुस्तहकम ज़िरह और मज़बूत सिपर है। जिसने एराज़ करते हुए नज़रअन्दाज़ कर दिया उसे अल्लाह ज़िल्लत का लिबास पिन्हा देगा और उस पर मुसीबत हावी हो जाएगी और उसे ज़िल्लत व ख़्वारी के साथ ठुकरा दिया जाएगा और उसके दिल पर ग़फ़लत का परदा डाल दिया जाएगा और जेहाद को वाज़ेअ करने की बिना पर हक़ उसके हाथ से निकल जाएगा और उसे ज़िल्लत बरदाश्त करना पड़ेगा और वह इन्साफ़ से महरूम हो जाएगा। (((माविया ने अमीरूलमोमेनीन (अ 0) की खि़लाफ़त के खि़लाफ़ बग़ावत का एलान करके पहले सिफ़्फ़ीन का मैदाने कारज़ार गरम किया। उसके बाद हर इलाक़े में फ़ितना व फ़साद की आगणन भड़काई ताके आपको एक लम्हे के लिये सुकून नसीब न हो सके और आप अपने निज़ामे अद्ल व इन्साफ़ को सुकून के साथ राएज न कर सकें। माविया के इन्हीं हरकात में से एक काम यह भी था के बनी ग़ामद के एक शख़्स सुफ़यान बिन औफ़ को छः हज़ार लशकर देकर रवाना कर दिया के इराक़ के मुख़्तलिफ़ इलाक़ों पर ग़ारत का काम शुरू कर दे। चुनान्चे इसने अनबा पर हमला कर दिया जहाँ हज़रत (अ 0) का मुख़्तसर सरहदी हिफ़ाज़ती दस्ता था और वह इस लशकर से मुक़ाबला न कर सका सिर्फ़ चन्द अफ़राद साबित क़दम रहे। बाक़ी सब भाग खड़े हुए और इसके बाद सुफ़ियान का लशकर आबादी में दाखि़ल हो गया और बेहद लूट मचाई। जिसकी ख़बर ने हज़रत (अ) को बेचैन कर दिया और आपने मिम्बर पर आकर क़ौम को ग़ैरत दिलाई लेकिन कोई लशकर तैयार न हो सका जिसके बाद आप ख़ुद रवाना हो गए और इस सूरते हाल को देख कर चन्द अफ़राद को ग़ैरत आ गई और एक लशकर सुफ़ियान के मुक़ाबले के लिये सईद बिन क़ैस की क़यादत में रवाना हो गया मगर इत्तेफ़ाक़ से उस वक़्त सुफ़ियान का लशकर वापस जा चुका था और लशकर जंग किये बग़ैर वापस आ गया और आपने नासाज़िए मिज़ाज के बावजूद ख़ुत्बा इरशाद फ़रमाया। बाज़ हज़रात का ख़याल है के यह ख़ुत्बा कूफ़े वापस आने के बाद इरशाद फ़रमाया है और बाज़ का कहना है के मक़ामे नख़ीला ही पर इरशाद फ़रमाया था बहरहाल सूरत वाक़ेअन इन्तेहाई अफ़सोसनाक और दर्दनाक थी और इस्लाम में इसकी बेशुमार मिसालें पाई जाती हैं))) आगाह हो जाओ के मैंने तुम लोगों को इस क़ौम से जेहाद करने के लिये दिन में पुकारा और रात में आवाज़ दी। ख़ुफ़िया तरीक़े से दावत दी और अलल एलान आमादा किया और बराबर समझाया के इनके हमला करने से पहले तुम मैदान में निकल आओ के ख़ुदा की क़सम जिस क़ौम से उसके घर के अन्दर जंग की जाती है उसका हिस्सा ज़िल्लत के अलावा कुछ नहीं होता है लेकिन तुमने टाल मटोल किया और सुस्ती का मुज़ाहेरा किया। यहां तक के तुम पर मुसलसल हमले शुरू हो गए और तुम्हारे इलाक़ों पर क़ब्ज़ा कर लिया गया। देखो यह बनी ग़ामिद के आदमी (सुफ़यान बिन औफ़) की फ़ौज अनबार में दाखि़ल हो गई है और उसने हेसान बिन हेसान बकरी को क़त्ल कर दिया है और तुम्हारे सिपाहियों को उनके मराकज़ से निकाल बाहर कर दिया है और मुझे तो यहाँ तक ख़बर मिली है के दुशमन का एक सिपाही मुसलमान या मुसलमानों के मुआहेदे में रहने वाली औरत के पास वारिद होता था। और उसके पैरों के कड़े , हाथ के कंगन , गले के गुलूबन्द और कान के गोशवारे उतार लिया था और वह सिवाए इन्नालिल्लाह पढ़ने और रहमो करम की दरख़्वास्त करने के कुछ नहीं कर सकती थी और वह सारा साज़ोसामान लेकर चला जाता था न कोई ज़ख़्म खाता था और न किसी तरह का ख़ून बहता था। इस सूरतेहाल के बाद अगर कोई मर्दे मुसलमान सदमे से मर भी जाए तो क़ाबिले मलामत नहीं है बल्के मेरे नज़दीक हक़ ब जानिब है। किस क़द्र हैरतअंगेज़ और ताअज्जुबख़ेज़ सूरते हाल है। ख़ुदा की क़सम यह बात दिल को मुर्दा बना देने वाली है व ग़म को समेटने वाली है के यह लोग अपने बातिल पर इकट्ठा और मुज्तहिद हैं और तुम अपने हक़ पर भी मुत्तहिद नहीं हो। तुम्हारा बुरा हो , क्या अफ़सोसनाक हाल है तुम्हारा। के तुम तीरअन्दाज़ों का मुस्तक़िल निशाना बन गए हो। तुम पर हमला किया जा रहा है और तुम हमला नहीं करते हो। तुमसे जंग की जा रही है और तुम बाहर नहीं निकलते हो। लोग ख़ुदा की नाफ़रमानी कर रहे हैं और तुम इस सूरतेहाल से ख़ुश हो। मैं तुम्हें गरमी में जेहाद के लिये निकलने की दावत देता हूँ तो कहते हो के शदीद गर्मी है , थोड़ी मोहलत दे दीजिये के गर्मी गुज़र जाए। इसके बाद सर्दी में बुलाता हूँ तो कहते हो सख़्त जाड़ा पड़ रहा है ज़रा ठहर जाइये के सर्दी ख़त्म हो जाए , हालाँके यह सब जंग से फ़रार करने के बहाने हैं वरना जो क़ौम सर्दी और गर्मी से फ़रार करती हो वह तलवारों से किस क़द्र फ़रार करेंगी। ऐ मर्दों की शक्ल व सूरत वालों और वाक़ेअन नामर्दों! तुम्हारी फ़िक्रें बच्चों जैसी और तुम्हारी अक़्लें हुजलानशीन औरतों जैसी हैं। मेरी दिली ख़्वाहिश थी के काश मैं तुम्हें न देखता और तुमसे मुताअर्रूफ़ न होता। जिसका नतीजा सिर्फ़ निदामत और रन्ज व अफ़सोस है। अल्लाह तुम्हें ग़ारत कर दे तुमने मेरे दिल को पीप से भर दिया है और मेरे सीने को रंजो ग़म से छलका दिया है। तुमने हर साँस में हम व ग़म के घूँट पिलाए हैं और अपनी नाफ़रमानी और सरकशी से मेरी राय को भी बेकार व बे असर बना दिया है यहाँ तक के अब क़ुरैश वाले यह कहने लगे हैं के फ़रज़न्दे अबूतालिब बहादुर तो हैं लेकिन इन्हें फ़नूने जंग का इल्म नहीं है। अल्लाह इनका भला करे , क्या इनमें कोई भी ऐसा है जो मुझसे ज़्यादा जंग का तजुर्बा रखता हो और मुझसे पहले से कोई मक़ाम रखता हो , मैंने जेहाद के लिये उस वक़्त क़याम किया है जब मेरी उम्र 20साल भी नहीं थी और अब तो 60से ज़्यादा हो चुकी है। लेकिन क्या किया जाए। जिसकी इताअत नहीं की जाती है उसकी राय कोई राय नहीं होती है। (((किसी क़ौम की ज़िल्लत व रूसवाई के लिये इन्तेहाई काफ़ी है के उनका सरबराह हज़रत अली (अ 0) बिन अबूतालिब जैसा इन्सान हो और वह उनसे इस क़दर बददिल हो के इनकी शक्लों को देखना भी गवारा न करता हो। ऐसी क़ौम दुनिया में ज़िन्दा रहने के क़ाबिल नहीं है और आखि़रत में भी इसका अन्जाम जहन्नम के अलावा कुछ नहीं है। इस मक़ाम पर मौलाए कायनात (अ 0) ने एक और नुक्ते की तरफ़ भी इशारा किया है के तुम्हारी नाफ़रमानी और सरकशी ने मेरी राय को भी बरबाद कर दिया है और हक़ीक़ते अम्र यह है के राहनुमा और सरबराह किसी क़द्र भी ज़की और अबक़री क्यों न हो , अगर क़ौम इसकी इताअत से इन्कार कर दे तो नाफ़हम इन्सान यही ख़याल करता है के शायद यह राय और हुक्म क़ाबिले अहले सनअत न था इसीलिये क़ौम ने इसे नज़रअन्दाज़ कर दिया है। ख़ुसूसियत के साथ अगर काम ही इज्तेमाई हो तो इज्तेमाअ का इन्हेराफ़ काम को भी मुअत्तल कर देता है और इसके नताएज बहरहाल नामुनासिब और ग़लत होते हैं जिसका तजुर्बा मौलाए कायनात (अ 0) के सामने आया के क़ौम ने आपके हुक्म के मुताबिक़ जेहाद करने से इनकार कर दिया और गर्मी व सर्दी के बहाने बनाना शुरू कर दे और इसके नतीजे में दुश्मनों ने यह कहना शुरू कर दिया के अली (अ 0) फ़नूने जंग से बाख़बर नहीं हैं हालांके अली (अ 0) से ज़्यादा इस्लाम में कोई माहिरे जंग व जेहाद नहीं था जिसने अपनी सारी ज़िन्दगी इस्लामी मुजाहेदात के मैदानों में गुज़ारी थी और मुसलसल तेग़ आज़माई का सबूत दिया था और जिसकी तरफ़ ख़ुद आपने भी इशारा फ़रमाया है और अपनी तारीख़े हयात को इसका गवाह क़रार दिया है। दुश्मनों के तानों से एक बात बहरहाल वाज़ेअ हो जाती है के दुश्मनों को आपकी ज़ाती शुजाअत का इक़रार था और फ़न्ने जंग की नावाक़फ़ीयत से मुराद क़ौम का बेक़ाबू हो जाना था और खुली हुई बात है के अली (अ 0) इस तरह क़ौम को क़ाबू में नहीं कर सकते थे जिस तरह माविया जैसे दीन व ज़मीर के ख़रीदार इस कारोबार को अन्जाम दे रहे थे और हर दीन व बेदीनी के ज़रिये क़ौम को अपने क़ाबू में रखना चाहते थे और इनका मन्षा सिफ़ यह था के लशकर वालों को ऊंट और ऊंटनी का फ़र्क़ मालूम न हो सके।)))

28-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

( जो उस ख़ुतबे की एक फ़ज़ीलत की हैसियत रखता है जिसका आग़ाज़ “ अलहम्दो लिल्लाह ग़ैरे मक़नूत मन रहमत ’ से हुआ और इसमें ग्यारह तम्बीहात हैं)

अम्माबाद! यह दुनिया पीठ फेर चुकी है और इसने अपने विदा का एलान कर दिया है और आख़ेरत सामने आ रही है और इसके आसार नुमाया हो गए हैं। याद रखो के आज मैदाने अमल है और कल मुक़ाबला होगा जहाँ सबक़त करने वाले का इनआम जन्नत होगा और बदअमली का अन्जाम जहन्नम होगा। क्या अब भी कोई ऐसा नहीं है जो मौत से पहले ख़ताओं से तौबा कर ले और सख़्ती के दिन से पहले अपने नफ़्स के लिये अमल कर ले। याद रखो के तुम आज उम्मीदों के दिनों में हो जिसके पीछे मौत लगी हुई है तो जिस शख़्स ने उम्मीद के दिनों में मौत आने से पहले अमल कर लिया उसे इसका अमल यक़ीनन फ़ाएदा पहुँचाएगा और मौत कोई नुक़सान नहीं पहुँचाएगी , लेकिन जिसने मौत से पहले उम्मीद के दिनों में अमल नहीं किया उसने अमल की मन्ज़िल में घाटा उठाया और इसकी मौत भी नुक़सानदेह हो गई। आगाह हो जाओ- तुम लोग राहत के हालात में इसी तरह अमल करो जिस तरह ख़ौफ़ के आलम में करते हो , के मैंने जन्नत जैसा कोई मतलूब नहीं देखा है जिसके तलबगार सब सो रहे हैं और जहन्नम जैसा कोई ख़तरा नहीं देखा है जिससे भागने वाले सब ख़्वाबे ग़फ़लत में पड़े हुए हैं। याद रखो के जिसे हक़ फ़ायदा न पहुँचा सके उसे बातिल ज़रूर नुक़सान पहुंचाएगा और जिसे हिदायत सीधे रास्ते पर न ला सकेगी इसे गुमराही बहरहाल खींच कर हलाकत तक पहुँचा देगी। आगाह हो जाओ के तुम्हें कोच का हुक्म मिल चुका है और तुम्हें ज़ादे सफ़र भी बताया जा चुका है और तुम्हारे लिये सबसे बड़ा ख़ौफ़नाक ख़तरा दो चीज़ों का है। ख़्वाहिशात का इत्तेबाअ और उम्मीदों का तूलानी होना। लेहाज़ा जब तक दुनिया में हुआ इस दुनिया से वह ज़ादे राह हासिल कर लो जिसके ज़रिये कल अपने नफ़्स का तहफ़्फ़ुज़ कर सको। सय्यद रज़ी- अगर कोई ऐसा कलाम हो सकता है जो इन्सान की गर्दन पकड़ कर इसे ज़ोहद की मन्ज़िल तक पहुँचा दे और उसे अमल आखि़रत पर मजबूर कर दे तो वह यही कलाम है। (((ज़माने के हालात का जाएज़ा लिया जाए तो अन्दाज़ा होगा के शायद इस दुनिया के इससे बड़ी कोई हक़ीक़त और सिदाक़त नहीं है। जिस शख़्स से पूछिये वह जन्नत का मुशताक है और जिस शख़्स को देखिये वह जहन्नुम के नाम से पनाह मांगता है। लेकिन मन्ज़िले अमल में दोनों इस तरह सो रहे हैं जैसे के यह माषूक़ अज़ ख़ुद घर आने वाला है और यह ख़तरा अज़ख़ुद टल जाने वाला है। न जन्नत के आशिक़ जन्नत के लिये कोई अमल कर रहे हैं और न जहन्नम से ख़ौफ़ज़दा इससे बचने का इन्तेज़ाम कर रहे हैं बल्कि दोनों का ख़याल यह है के मन्सब में कुछ अफ़राद ऐसे हैं जिन्होंने इस बात का ठेका ले लिया है के वह जन्नत का इन्तेज़ाम भी करेंगे और जहन्नम से बचाने का बन्दोबस्त भी करेंगे और इस सिलसिले में हमारी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है। हालाँके दुनिया के चन्द रोज़ा माषूक़ का मामला इससे बिल्कुल मुख़तलिफ़ है। यहाँ कोई दूसरे पर भरोसा नहीं करता है। दौलत के लिये सब ख़ुद दौड़ते हैं , शोहरत के लिये सब ख़ुद मरते हैं , औरत के लिये सब ख़ुद दीवाने बनते हैं , ओहदे के लिये सब ख़ुद रातों की नीन्द हराम करते हैं , ख़ुदा जाने यह अबदी माषूक़ जन्नत जैसा महबूब है जिसका मामला दूसरों के रहमो करम पर छोड़ दिया जाता है और इन्सान ग़फ़लत की नींद सो जाता है। काश यह इन्सान वाक़ेअन मुशताक और ख़ौफ़ज़दा होता तो यक़ीनन इसका यह किरदार न होता। “ फ़ाअतबरू या ऊलिल अबसार ” )) यह कलाम दुनिया की उम्मीदों को क़ता करने और वाअज़ व नसीहत क़ुबूल करने के जज़्बात को मुष्तअल करने के लिये काफ़ी होता। ख़ुसूसियत के साथ हज़रत का यह इरशाद के “ आज मैदाने अमल है और कल मुक़ाबला , इसके बाद मन्ज़िले मक़सूद जन्नत है और अन्जाम जहन्नम। ” इसमें अल्फ़ाज़ की अज़मत मानी की क़द्रो मन्ज़ेलत तहशील की सिदाक़त और तस्बीह की वाक़ेअत के साथ वह अजीबो ग़रीब राज़े निजात और लताफ़त मफ़हूम है जिसका अन्दाज़ा नहीं किया जा सकता है। फिर हज़रत (अ 0) ने जन्नत व जहन्नम के बारे में “ सबक़ा ” और “ ग़ायत ” का लफ़्ज़ इस्तेमाल किया है जिसमें सिर्फ़ लफ़्ज़ी इख़्तेलाफ़ नहीं है बल्के वाक़ेअन मानवी इफ़तेराक़ व इम्तेयाज़ पाया जाता है के न जहन्नम को सबक़ा (मन्ज़िल) कहा जा सकता है और न जन्नत को ग़ायत (अन्जाम) जहाँ तक इन्सान ख़ुद ब ख़ुद पहुंच जाएगा बल्कि जन्नत के लिये दौड़ धूप करना होगी जिसके बाद इनआम मिलने वाला है और जहन्नम बदअमली के नतीजे में ख़ुद ब ख़ुद सामने आ जाएगा। इसके लिये किसी इष्तेयाक़ और मेहनत की ज़रूरत नहीं है। इसी बुनियाद पर आपने जहन्नम को ग़ायत (अन्जाम) क़रार दिया है जिस तरह के क़ुरआन मजीद ने “ मसीर ” से ताबीर किया है , “ फान मसीर कुम एलन्नार ” । हक़ीक़तनइ स नुक्ते पर ग़ौर करने की ज़रूरत है के इसका बातिन इन्तेहाई अजीब व ग़रीब और इसकी गहराई इन्तेहाई लतीफ़ है और यह तन्हा इस कलाम की बात नहीं है। हज़रत के कलमात में आम तौर से यही बलाग़त पाई जाती है और इसके मआनी में इसी तरह की लताफ़त और गहराई नज़र आती है। बाज़ रिवायात में जन्नत के लिये सबक़त के बजाए सुबक़त का लफ़्ज़ इस्तेमाल हुआ है जिसके मानी इनआम के हैं और खुली हुई बात है के इनआम भी किसी मज़मूम अमल पर नहीं मिलता है बल्के इसका ताअल्लुक़ भी क़ाबिले तारीफ़ आमाल ही से होता है लेहाज़ा अमल बहरहाल ज़रूरी है और अमल का क़ाबिले तारीफ़ होना भी लाज़मी है।

29-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

( जब तहकीम के बाद माविया के सिपाही ज़हाक बिन क़ैस ने हज्जाज के क़ाफ़िले पर हमला करवा दिया और हज़रत को इसकी ख़बर दी गई तो आप (अ 0) ने लोगों को जेहाद पर आमादा करने के लिये यह ख़ुत्बा इरशाद फ़रमाया)

ऐ वह लोग! जिनके जिस्म एक जगह पर हों और ख़्वाहिशात अलग-अलग हों। तुम्हारा कलाम तो सख़्त तरीन पत्थर को भी नर्म कर सकता है लेकिन तुम्हारे बारे में पुरउम्मीद बना देते हैं। तुम महफ़िलों में बैठकर ऐसी-ऐसी बातें करते हो के ख़ुदा की पनाह लेकिन जब जंग का नक़्षा सामने आता है तो कहते हो “ दूर बाश दूर ” हक़ीक़ते अम्र यह है के जो तुमको पुकारेगा उसकी पुकार कभी कामयाब न होगी और जो तुम्हें बरदाश्त करेगा उसके दिल को कभी सुकून न मिलेगा। तुम्हारे पास सिर्फ बहाने हैं और ग़लत सलत हवाले और फिर मुझसे ताख़ीरे जंग की फ़रमाइश जैसे कोई नादहन्द क़र्ज़ को टालना चाहता है। याद रखो ज़लील आदमी ज़िल्लत को नहीं रोक सकता है और हक़ मेहनत के बग़ैर हासिल नहीं किया हो सकता है। तुम जब अपने घर का दिफ़ाअ न कर सकोगे तो किसके घर का दिफ़ाअ करोगे और जब मेरे साथ्ज्ञ जेहाद न करोगे तो किसके साथ जेहाद करोगे। ख़ुदा की क़सम वह फ़रेब खोरदा है जो तुम्हारे धोके में आ जाए और जो तुम्हारे सहारे कामयाबी चाहेगा इसे सिर्फ नाकामी का तीर हाथ आएगा।

((( माविया का एक मुस्तक़िल मुक़द्दर यह भी था के अमीरूल मोमेनीन (अ 0) किसी आन चैन से न बैठने पाएं कहीं ऐसा न हो के आप वाक़ई इस्लाम क़ौम के सामने पेश कर दें और अमवी उफ़कार का जनाज़ा निकल जाए। इसलिये वह मुसलसल रेशा रवानियों में लगा रहता था। आखि़र एक मरतबा ज़हाक बिन क़ैस को चार हज़ार का लशकर देकर रवाना कर दिया और उसने सारे इलाक़े में कुश्त व ख़ून शुरू कर दिया। आपने मिम्बर पर आकर क़ौम को ग़ैरत दिलाई लेकिन कोई खातिर ख़्वाह असर नहीं हुआ और लोग जंग से किनाराकशी करते रहे। यहाँ तक के हजर बिन अदी चार हज़ार सिपाहियों को लेकर निकल पड़े और मुक़ाम तदमर पर दोनों का सामना हो गया। लेकिन माविया का लशकर भाग खड़ा हुआ और सिर्फ़ 19अफ़राद माविया के काम आए जबके हजर के सिपाहियों में दो अफ़राद ने जामे शहादत नौश फ़रमाया।)))

और जिसने तुम्हारे ज़रिये तीर फेंका उसने वह तीर फेंका जिसका पैकान टूट चुका है और सूफार ख़त्म हो चुका है। ख़ुदा की क़सम मैं इन हालात में तुम्हारे क़ौल की तस्दीक़ कर सकता हूँ और न तुम्हारी नुसरत की उम्मीद रखता हूँ और न तुम्हारे ज़रिये किसी दुशमन को तहदीद कर सकता हूँ। आखि़र तुम्हें क्या हो गया है ? तुम्हारी दवा क्या है ? तुम्हारा इलाज क्या है ? आखि़र वह लोग भी तो तुम्हारे ही जैसे इन्सान हैं , यह बग़ैर इल्म की बातें कब तक और यह बग़ैर तक़वा की ग़फ़लते ताबके और बग़ैर हक़ के बलन्दी की ख़्वाहिश कहाँ तक ?


30-आपका इरशादे गिरामी

(क़त्ले उस्मान की हक़ीक़त के बारे में)

याद रखो अगर मैंने इस क़त्ल का हुक्म दिया होता तो यक़ीनन मैं क़ातिल होता और अगर मैंने मना किया होता तो यक़ीनन मैं मददगार क़रार पाता , लेकिन बहरहाल यह बात तयषुदा है के जिन बनी उमय्या ने मदद की है वह अपने को उनसे बेहतर नहीं कह सकते हैं जिन्होंने नज़रअन्दाज़ कर दिया है आर जिन लोगों ने नज़रअन्दाज़ कर दिया है वह यह नहीं कह सकते के जिसने मदद की है वह हमसे बेहतर था। अब मैं इस क़त्ल का ख़ुलासा बता देता हूँ , “ उस्मान ने खि़लाफ़त को इख़्तेयार किया तो बदतरीन तरीक़े से इख़्तेयार किया और तुम घबरा गए तो बुरी तरह से घबरा गए और अब अल्लाह दोनों के बारे में फ़ैसला करने वाला है। ”

((( यह तारीख़ का मसला है के उसमान ने सारे मुल्क पर बनी उमय्या का इक़्तेदार क़ायम कर दिया था और बैतुलमाल को बेतहाशा अपने ख़ानदान वालों के हवाले कर दिया था जिसकी फ़रयाद पूरे आलमे इस्लाम में शुरू हो गई थी और कूफ़ा और मिस्र तक के लोग फ़रयाद लेकर आ गये थे। अमीरूल मोमेनीन (अ 0) ने दरमियान में बैठकर मसालेहत करवाई और यह तय हो गया के मदीने के हालात की ज़रूरी इस्लाह की जाए और मिस्र का हाकिम मोहम्मद बिन अबीबक्र को बना दिया जाए , लेकिन मुख़ालेफ़ीन के जाने के बाद उस्मान ने हर बात का इन्कार कर दिया और दाई मिस्र के नाम मोहम्मद बिन अबीबक्र के क़त्ल का फ़रमान भेज दिया। ख़त रास्ते में पकड़ लिया गया और जब लोगों ने वापस आकर मदीने वालों को हालात से आगाह किया तो तौबा का इमकान भी ख़त्म हो गया और चारों तरफ़ से मुहासरा हो गया। अब अमीरूल मोमेनीन (अ 0) की मुदाख़ेलत के इमकानात भी ख़त्म हो गए थे और बाला आखि़र उस्मान को अपने आमाल और बनी उमय्या की अक़रबा नवाज़ी की सज़ा बरदाश्त करना पड़ी और फिर कोई मरवान या माविया काम नहीं आया।)))

31-आपका इरशादे गिरामी

जब आपने अब्दुल्लाह बिन अब्बास को ज़ुबैर के पास भेजा के इसे जंग से पहले इताअते इमाम (अ 0) की तरफ़ वापस ले आएँ।

ख़बरदार तल्हा से मुलाक़ात न करना के इससे मुलाक़ात करोगे तो उसे उस बैल जैसा पाओगे जिसके सींग मुड़े हुए हों। वह सरकश सवारी पर सवार होता है और उसे राम किया हुआ कहते है। तुम सिर्फ़ ज़ुबैर से मुलाक़ात करना इसकी तबीअत क़द्रे नर्म है - 4-। उससे कहना के तुम्हारे मामूज़ाद भाई ने फ़रमाया है के तुमने हेजाज़ में मुझे पहचाना था और ईराक़ में आकर बिल्कुल भूल गए हो। आखि़र यह नया सानेहा क्या हो गया है। सय्यद रज़ी- “ माअदा मिम्माबदा ” यह फ़िक़रा पहले पहल तारीख़े ग़ुरबत में अमीरूल मोमेनीन (अ 0) ही से सुना गया है।

32-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

( जिसमें ज़माने के ज़ुल्म का तज़किरा है और लोगों की पांच क़िस्मों को बयान किया गया है औश्र इसके बाद ज़ोहद की दावत दी गई है)

ऐ लोगो! हम एक ऐसे ज़माने में पैदा हुए हैं जो सरकश और नाषुक्रा है। यहाँ नेक किरदार बुरा समझा जाता है और ज़ालिम अपने ज़ुल्म में बढ़ता ही जा रहा है। न हम इल्म से कोई फ़ायदा उठाते हैं और न जिन चीज़ों से नावाक़िफ़ हैं उनके बारे में सवाल करते हैं और न किसी मुसीबत का उस वक़्त तक एहसास करते हैं जब तक वह नाज़िल न हो जाए। लोग इस ज़माने में चार तरह के हैं। बाज़ वह हैं जिन्हें रूए ज़मीन पर फ़साद करने से सिर्फ उनके नफ़्स की कमज़ोरी और उनके असलहे की धार की कुन्दी और उनके असबाब की कमी ने रोक रखा है। बाज़ वह हैं जो तलवार खींचते हुए अपने शर का ऐलान कर रहे हैं और अपने सवार प्यादे को जमा कर रहे हैं। अपने नफ़्स को माले दुनिया के हुसूल और लशकर की क़यादत या मिम्बर की बलन्दी पर उरूज के लिये वक़्फ़ कर दिया है और दीन को बरबाद कर दिया है और यह बदतरीन तिजारत है के तुम दुनिया को अपने नफ़्स की क़ीमत बना दो या अज्र आखि़रत का बदल क़रार दे दो। बाज़ वह हैं जो दुनिया को आखि़रत के आमाल के ज़रिये हासिल करना चाहते हैं और आखि़रत को दुनिया के ज़रिये नहीं हासिल करना चाहते हैं , उन्होंने निगाहों को पहचान लिया है। क़दम नाप-नाप कर रखते हैं। दामन को समेट लिया है और अपने नफ़्स को गोया अमानतदारी के लिये आरास्ता कर लिया है और परवरदिगार की परदेदारी को मासियत का ज़रिया बनाए हुए हैं। बाज़ वह हैं जिन्हें हुसूले इक़्तेदार से नफ़्स की कमज़ोरी और असबाब की नाबूदी ने दूर रखा है और जब हालात ने साज़गारी का सहारा नहीं दिया तो इसी का नाम क़नाअत रख लिया है। यह लोग अहले ज़ोहद का लिबास ज़ेबे तन किये हुए हैं जबके इनकी शाम ज़ाहिदाना है और न सुबह। (पांचवी क़िस्म)- इसके बाद कुछ लोग बाक़ी रह गये हैं जिनकी निगाहों को बाज़गष्त की याद ने झुका दिया है और इनके आंसुओं को ख़ौफ़े महशर ने जारी कर दिया है। इनमें बाज़ आवारा वतन और दौरे इफ़तादा हैं और बाज़ ख़ौफ़ज़दा और गोशानशीन हैं। बाज़ की ज़बानों पर मोहर लगी हुई है और बाज़ इख़लास के साथ महवे दुआ हैं और दर्द रसीदा की तरह रन्जीदा हैं। उन्हें ख़ौफ़े हुक्काम ने गुमनामी की मन्ज़िल तक पहुँचा दिया है।

((( इन्सानी मुआशरे की क्या सच्ची तस्वीर है , जब चाहिये अपने घर , अपने महल्ले , अपने शहर , अपने मुल्क पर एक निगाह डाल लीजिये। इन चारों क़िस्में बयकवक़्त नज़र आ जाएंगी। वह शरीफ़ भी मिल जाएंगे जो सिर्फ़ हालात की तंगी की बिना पर शरीफ़ बने हुए हैं वरना बस चल जाता तो बीवी बच्चों पर भी ज़ुल्म करने से बाज़ नहीं आते। व्ह तीस मार ख़ाँ भी मिल जाएंगे जिनका कुल शरफ़ फ़साद फ़िल अर्ज़ है और किसी को अपनी अहमियत व अज़मत का ज़रिया बनाए हुए हैं के हमने भरी महफ़िल में फ़लाँ को कह दिया और फ़लाँ अख़बार में फ़लाँ के खि़लाफ़ यह मज़मून लिख दिया या अदालत में यह फ़र्ज़ी मुक़दमा दायर कर दिया। वह मुक़द्दस भी मिल जाएंगे जिनका तक़द्दुस ही इनके फ़िस्क़ व फ़जूर का ज़रिया है। दुआ-तावीज़ के नाम पर नामहरमों से खि़लवत इख़्तेयार करते हैं और औलियाअल्लाह से क़रीबतर बनाने के लिये अपने से क़रीबतर बना लेते हैं। चादरें ओढ़ाकर दुआएं मंगवाते हैं और तन्हाई में बुलाकर जादू उतारते हैं। वह फाक़ामस्त भी मिल जाएंगे जिन्हें हालात की मजबूरी ने क़नाअत पर आमादा कर दिया है वरना इनकी सही हालत का अन्दाज़ा दूसरों के दस्तरख़्वानों पर बख़ूबी लगाया जा सकता है। तलाश है इन्सानियत को इस पांचवीं क़िस्म की जो सिवाए पन्जेतने पाक के और किसी के आस्ताने पर नज़र नहीं आती है। काश दुनिया को अब भी होश आ जाए।)))

और बेचारगी ने इन्हें घेर लिया है , गोया वह एक खारे समन्दर के अन्दर ज़िन्दगी गुज़ार रहे हैं जहां मुंह बन्द हैं और दिल ज़ख़्मी है। इन्होंने इस क़द्र मौग़ता किया है के थक गये हैं और वह इस क़द्र दबाए गए हैं के बाला आख़िर दब गये हैं और इस क़द्र मारे गये हैं के इनकी तादाद भी कम हो गयी है। लेहाज़ा अब दुनिया को तुम्हारी निगाहों में कीकर के छिलकों और ऊवन के रेज़ों से भी ज़्यादा पस्त होना चाहिये , और अपने पहलेवालों से इबरत हासिल करनी चाहिये। क़ब्ल इसके के बाद वाले तुम्हारे अन्जाम से इबरत हासिल करें। इस दुनिया को नज़रअन्दाज़ कर दो , यह बहुत ज़लील है यह उनके काम नहीं आई है जो तुमसे ज़्यादा इससे दिल लगाने वाले थे। सय्यद रज़ी- बाज़ जाहिलों ने इस ख़ुतबे को माविया की तरफ़ मन्सूब कर दिया है जबके बिला शक यह अमीरूल मोमेनीन का कलाम है और भला क्या राबेता है सोने और मिट्टी में और शीरीं और शूर में इस हक़ीक़त की निशानदेही फ़न्ने बलाग़त के माहिर और बा-बसीरत तनक़ीदी नज़र रखने वाले आलिम अमरू बिन बहरल जाख़त ने भी की है जब इस ख़ुतबे को “ अलबयान व अलतबययन ” में नक़्ल करने के बाद यह तबसेरा किया है के बाज़ लोगों ने इसे माविया की तरफ़ मन्सूब कर दिया है हालांके यह हज़रत अली (अ 0) के अन्दाज़े बयान से ज़्यादा मिलता जुलता है के आप ही इस तरह लोगों के एक़साम , मज़ाहेब और क़हर व ज़िल्लत और तक़या व ख़ौफ़ का तज़केरा किया करते थे वरना माविया को कब अपनी गुफ़्तू में ज़ाहिदों का अन्दाज़ या आबिदों का तरीक़ा इख़्तेयार करते देखा गया है।

33-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

( अहले बसरा से जेहाद के लिये निकलते वक़्त , जिसमें आपने रसूलों की बाअसत की हिकमत और फिर अपनी फ़ज़ीलत और ख़वारिज की रज़ीलत का ज़िक्र किया है)

अब्दुल्लाह बिन अब्बास का बयान है के मैं मक़ाम ज़ीक़ार में अमीरूल मोमेनीन (अ 0) की खि़दमत में हाज़िर हुआ जब आप अपनी नालैन की मरम्मत कर रहे थे। आपने फ़रमाया इब्ने अब्बास! इन जूतियों की क्या क़ीमत है ? मैंने अर्ज़ की कुछ नहीं! फ़रमाया के ख़ुदा की क़सम यह मुझे तुम्हारी हुकूमत से ज़्यादा अज़ीज़ हैं मगर यह के हुकूमत के ज़रिये मैं किसी हक़ को क़ायम कर सकूँ या किसी बातिल को दफ़ा कर सकूँ। इसके बाद लोगों के दरमियान आकर ख़ुत्बा इरशाद फ़रमाया- अल्लाह ने हज़रत मोहम्मद (स 0) को उस वक़्त मबऊस किया जब अरबों में कोई न आसमानी किताब पढ़ना जानता था और न नबूवत का दावेदार था। आपने लोगों को खींच कर उनके मुक़ाम तक पहुँचाया और उन्हें मन्ज़िले निजात से आशना बना दिया। यहाँ तक के इनकी कजी दुरूस्त हो गई और इनके हालात इसतवार हो गये।

((( अमीरूल मोमेनीन (अ 0) के ज़ेरे नज़र ख़ुतबे की फ़साहत व बलाग़त अपने मक़ाम पर है। आपका यह एक कलमा ही आपकी ज़िन्दगी और आपके नज़रियात का अन्दाज़ा करने के लिये काफ़ी हैं। ख़ुसूसियत के साथ इस सूरतेहाल को निगाह में रखने के बाद के आप जंगे जमल के मौक़े पर बसरा की तरफ़ जा रहे थे और हज़रत आइशा आपके खि़लाफ़ जंग की आग उस प्रोपगन्डा के साथ भड़का रही थीं के आपने हुकूमत व इक़तेदार की लालच में उसमान को क़त्ल करा दिया है और तख़्ते खि़लाफ़त पर क़ाबिज़ हो गए हैं। ज़्ारूरत थी के आप तख़्ते हुकूमत के बारे में अपने नज़रियात का एलान कर देते। लेकिन यह काम ख़ुतबे की शक्ल में होता तो इसकी अमली शक्ल का समझना हर इन्सान के बस का काम नहीं था लेहाज़ा क़ुदरत ने एक ग़ैबी ज़रिया फ़राहम कर दिया जहाँ आप अपनी जूतियों की मरम्मत कर रहे थे और इब्ने अब्बास सामने आ गए। सूरतेहाल ने पहले तो इस अम्र की वज़ाहत की के आप तख़्ते खि़लाफ़त पर “ क़ाबिज़ ” होने के बाद भी ऐसी ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे के आपके पास सही व सालिम जूतियाँ भी नहीं थीं और फिर शिकस्ता और बोसीदा जूतियों की मरम्मत भी किसी सहाबी या मुलाज़िम से नहीं कराते थे बल्कि यह काम भी ख़ुद ही अन्जाम दिया करते थे। ज़ाहिर है के ऐसे शख़्स को हुकूमत की क्या लालच हो सकती है और उसे हुकूमत से क्या सुकून व आराम मिल सकता है। इसके बाद आपने दो बुनियाद नुकात का एलान फ़रमाया- 1. मेरी निगाह में हुकूमत की क़ीमत जूतियों के बराबर भी नहीं है के जूतियां तो कम से कम मेरे क़दमों में रहती हैं और तख़्ते हुकूमत तो ज़ालिमों और बेईमानों को भी हासिल हो जाता है। 2. मेरी निगाह में हुकूमत का मसरफ़ सिर्फ़ हक़ का क़याम और बातिल का इज़ाला है वरना इसके बग़ैर हुकूमत का कोई जवाज़ नहीं है।)))

आगाह हो जाओ के ब ख़ुदा क़सम मैं इस सूरते हाल के तबदील करने वालों में शामिल था यहाँतक के हालात मुकम्मल तौर पर तब्दील हो गए और मैं न कमज़ोर हुआ और न ख़ौफ़ज़दा हुआ और आज भी मेरा यह सफ़र वैसे ही मक़ासिद के लिये है। मैं बातिल के शिकम को चाक करके इसके पहलू से वह हक़ निकाल लूंगा जिसे इसने मज़ालिम की तहों में छिपा दिया है। मेरा क़ुरैश से क्या ताल्लुक़ है , मैंने कल इनसे कुफ्र की बिना पर जेहाद किया था और आज फ़ित्ना और गुमराही की बिना पर जेहाद करूंगा। मैं इनका पुराना मद्दे मुक़ाबिल हूँ और आज भी इनके मुक़ाबले पर तैयार हूँ। ख़ुदा की क़सम क़ुरैश को हमसे कोई अदावत नहीं है मगर यह के परवरदिगार ने हमें मुन्तख़ब क़रार दिया है और हमने उनको अपनी जमाअत में दाखि़ल करना चाहा तो वह इन अश्आर के मिस्दाक़ हो गए। हमारी जाँ की क़सम यह शराबे नाबे सबाह यह चर्ब चर्ब ग़िज़ाएं हमारा सदक़ा हैं हमीं ने तुमको यह सारी बलन्दियां दी हैं वगरना तेग़ो सिनां बस हमारा हिस्सा हैं।

((( इस मक़ाम पर यह ख़याल न किया जाए के ऐसे अन्दाज़े गुफ़्तगू से अवामुन्नास में मज़ीद नख़वत पैदा हो जाती है और इनमें काम करने का जज़्बा बिल्कुल मुरदा हो जाता है और अगर वाक़ेअन इमाम अलैहिस्सलाम इसी क़द्र आजिज़ आ गए थे तो फिर बार-बार दुहराने की क्या ज़रूरत थी। उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया होता। जो अन्जाम होने वाला था हो जाता और बाला आखि़र लोग अपने कीफ़र किरदार को पहुँच जाते ? इसलिये के एक जज़्बाती मष्विरा तो हो सकता है मुन्तक़ी गुफ़्तगू नहीं हो सकती है। उकताहट और नाराज़गी एक फ़ितरी रद्दे अमल है जो अम्रे बिलमारूफ़ की मन्ज़िल में फ़रीज़ा भी बन जाता है। लेकिन इसके बाद भी एतमामे हुज्जत का फ़रीज़ा बहरहाल बाक़ी रह जाता है। फ़िर इमाम (अ 0) की निगाहें इस मुस्तक़बिल को भी देख रही थीं जहां मुसलसल हिदायत के पेशेनज़र चन्द अफ़राद ज़रूर पैदा हो जाते हैं और उस वक़्त भी पैदा हो गए थे यह और बात है के क़ज़ा व क़द्र ने साथ नहीं दिया और जेहाद मुकम्मल नहीं हो सका। इसके अलावा यह नुक्ता भी क़ाबिले तवज्जो है के अगर अमीरूल मोमेनीन (अ 0) ने सुकूत इख़्तेयार कर लिया होता तो दुशमन इसे रज़ामन्दी और बैअत की अलामत बना लेते और मुख़्लेसीन अपनी कोताही अमल का बहाना क़रार दे लेते और इस्लाम की रूह अमल और तहरीक दुनियादारी मुरदा होकर रह जाती।)))

34-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

( जिसमें ख़वारिज के क़िस्से के बाद लोगोंं को अहले शाम से जेहाद के लिये आमादा किया गया है और उनके हालात पर अफ़सोस का इज़हार करते हुए इन्हें नसीहत की गई है)

हैफ़ है तुम्हारे हाल पर , मैं तुम्हें मलामत करते करते थक गया। क्या तुम लोग वाक़ेअन आख़ेरत के एवज़ ज़िन्दगानी दुनिया पर राज़ी हो गए हो और तुमने ज़िल्लत को इज़्ज़त का बदल समझ लिया है ? के जब मैं तुम्हें दुशमन से जेहाद की दावत देता हूँ तो तुम आँखें फिराने लगते हो जैसे मौत की बेहोशी तारी हो और ग़फ़लत के नशे में मुब्तिला हो। तुम पर जैसे मेरी गुफ़्तगू के दरवाज़े बन्द हो गए हैं के तुम गुमराह होते जा रहे हो और तुम्हारे दिलों पर दीवानगी का असर हो गया है के तुम्हारी समझ ही में कुछ नहीं आ रहा है। तुम कभी मेरे लिये क़ाबिले एतमाद नहीं हो सकते हो और न ऐसा सुतून हो जिस पर भरोसा किया जासके और न इज़्ज़त के वसाएल हो जिसकी ज़रूरत महसूस की जा सके तुम तो उन ऊंटों जैसे हो जिनके चरवाहे गुम हो जाएं के जब एक तरफ़ से जमा किये जाते हैं तो दूसरी तरफ़ से भड़क जाते हैं। ख़ुदा की क़सम! तुम बदतरीन अफ़राद हो जिनके ज़रिये आतिशे जंग को भड़काया जा सके। तुम्हारे साथ मक्र किया जाता है और तुम कोई तद्बीर भी नहीं करते हो। तुम्हारे इलाक़े कम होते जा रहे हैं और तुम्हें ग़ुस्सा भी नहीं आता है। दुशमन तुम्हारी तरफ़ से ग़ाफ़िल नहीं है मगर तुम ग़फ़लत की नींद सो रहे हो। ख़ुदा की क़सम सुस्ती बरतने वाले हमेशा मग़लूब हो जाते हैं और ब-ख़ुदा मैं तुम्हारे बारे में यही ख़याल रखता हूँ के अगर जंग ने ज़ोर पकड़ लिया और मौत का बाज़ार गर्म हो गया तो तुम फ़रज़न्दे अबूतालिब से यूँही अलग हो जाओगे जिस तरह जिस्म से सर अलग हो जाता है।(((यह दयानतदारी और ईमानदारी की अज़ीमतरीन मिसाल है के कायनात का अमीर मुसलमानों का हाकिम , इस्लाम का ज़िम्मेदार क़ौम के सामने खड़े होकर इस हक़ीक़त का एलान कर रहा है के जिस तरह मेरा हक़ तुम्हारे ज़िम्मे है इसी तरह तुम्हारा हक़ मेरे ज़िम्मे भी है। इस्लाम में हाकिम हुक़ूक़ुल इबाद से बलन्दतर नहीं होता है और न उसे क़ानूने इलाही के मुक़ाबले में मुतलक़ुलअनान क़रार दिया जा सकता है। इसके बाद दूसरी एहतियात यह है के पहले अवाम के हुक़ूक़ को अदा करने का ज़िक्र किया। इसके बाद अपने हुक़ूक़ का मुतालबा किया और हुक़ूक़ के बयान में भी अवाम के हुक़ूक़ को अपने हक़ के मुक़ाबले में ज़्यादा अहमियत दी। अपना हक़ सिर्फ़ यह है के क़ौम मुख़लिस रहे और बैयत का हक़ अदा करती रहे और एहकाम की इताअत करती रहे जबके यह किसी हाकिम के इम्तेयाज़ी हुक़ूक़ नहीं हैं बल्के मज़हब के बुनियादी फ़राएज़ हैं। इख़लास व नसीहत हर शख़्स का बुनियादी फ़रीज़ा है। बैअत की पाबन्दी मुआहेदा की पाबन्दी और तक़ाज़ाए इन्सानियत है। एहकाम की इताअत एहकामे इलाहिया की इताअत है और यही ऐन तक़ाज़ाए इस्लाम है। इसके बरखि़लाफ़ अपने ऊपर जिन हुक़ूक़ का ज़िक्र किया गया है वह इस्लाम के बुनियादी फ़राएज़ में शामिल नहीं हैं बल्कि एक हाकिम की ज़िम्मेदारी के शोबे हैं के वह लोगों को तालीम देकर इनकी जेहालत का इलाज करे और उन्हें महज़ब बनाकर अमल की दावत दे और फिर बराबर नसीहत करता रहे और किसी आन भी इनके मसालेह व मनाफ़ेअ से ग़ाफ़िल न होने पाए।)))

ख़ुदा की क़सम अगर कोई शख़्स अपने दुशमन को इतना क़ाबू दे देता है के वह इसका गोश्त उतार ले और हड्डी तोड़ डाले और खाल के टुकड़े- टुकड़े कर दे तो ऐसा शख़्स आजिज़ी की आखि़री सरहद पर है और इसका वह दिल इन्तेहाई कमज़ोर है जो इसके पहलूओं के दरम्यान है। - 2- तुम चाहो तो ऐसे ही हो जाओ लेकिन मैं ख़ुदा गवाह है के इस नौबत के आने से पहले वह तलवार चलाऊंगा के खोपड़ियां टुकड़े- टुकड़े होकर उड़ती दिखाई देंगी और हाथ पैर कट कर गिरते नज़र आएंगे। इसके बाद ख़ुदा जो चाहेगा वह करेगा। ऐ लोगो एक हक़ तुम्हारे ज़िम्मे है और एक हक़ तुम्हारा मेरे ज़िम्मे है। तुम्हारा हक़ मेरे ज़िम्मे यह है के मैं तुम्हें नसीहत कर दूं और बैतुलमाल का माल तुम्हारे हवाले कर दूँ और तुम्हें तालीम दूँ ताके तुम जाहिल न रह जाओ और अदब सिखाऊं ताके बाअमल हो जाऊँ और मेरा हक़ तुम्हारे ऊपर यह है के बैयत का हक़ अदा करो और हाज़िर व ग़ाएब हर हाल में ख़ैर ख़्वाह रहो। जब पुकारूं तो लब्बैक कहो और जब हुक्म दूँ तो इताअत करो।


35-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

( जब तहकीम के बाद इसके नतीजे की इत्तेला दी गई तो आपने हम्दो सनाए इलाही के बाद इस बलाए का सबब बयान फ़रमाया)

हर हाल में ख़ुदा का शुक्र है चाहिये ज़माना कोई बड़ी मुसीबत क्यों न ले आए और हादेसात कितने ही अज़ीम क्यों न हो जाएं। और मैं गवाही देता हूँ के वह ख़ुदा एक है , इसका कोई शरीक नहीं है और इसके साथ कोई दूसरा माबूद नहीं है और हज़रत मोहम्मद (स 0) इसके बन्दे और रसूल हैं (ख़ुदा की रहमत इन पर और इनकी आल (अ 0) पर)

अम्माबाद! (याद रखो) के नासेह शफ़ीक़ और आलिमे तजुरबेकार की नाफ़रमानी हमेशा बाइसे हसरत और मोजब निदामत हुआ करती है। मैंने तुम्हें तहकीम के बारे में अपनी राय से बाख़बर कर दिया था और अपनी क़ीमती राय का निचोड़ बयान कर दिया था लेकिन ऐ काश “ क़सीर ” के हुक्म की इताअत की जाती। तुमने तो मेरी इस तरह मुख़ालफ़त की जिस तरह बदतरीन मुख़ालफ़त और अहदे शिकन नाफ़रमान किया करते हैं यहाँ तक के नसीहत करने वाला ख़ुद भी शुबहा में पड़ जाए के किसको नसीहत कर दी और चक़माक़ ने शोले भड़काना बन्द कर दिये। अब हमारा और तुम्हारा वही हाल हुआ है जो बनी हवाज़न के शायर ने कहा थाः “ मैंने तुमको अपनी बात मक़ामे मनारेजुललेवा में बता दी थी , लेकिन तुमने इसकी हक़ीक़त को दूसरे दिन की सुबह ही को पहचाना ”

36-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(अहले नहरवान को अन्जामकार से डराने के सिलसिले में)

मैं तुम्हें बाख़बर किये देता हूँ के इस नहर के मोड़ों पर और इस नशेब की हमवार ज़मीनों पर पड़े दिखाई दोगे और तुम्हारे पास परवरदिगार की तरफ़ से कोई वाज़ेअ दलील और रौशन हुज्जत न होगी। तुम्हारे घरों ने तुम्हें निकाल बाहर कर दिया और क़ज़ा व क़द्र ने तुम्हें गिरफ़्तार कर लिया। मैं तुम्हें इस तहकीम से मना कर रहा था लेकिन तुमने अहदशिकन दुश्मनों की तरह मेरी मुख़ालेफ़त की यहाँतक के मैंने अपनी राय को छोड़कर मजबूरन तुम्हारी बात को तस्लीम कर लिया मगर तुम दिमाग़ के हल्के और अक़्ल के अहमक़ निकले। ख़ुदा तुम्हारा बुरा करे। मैंने तो तुम्हें किसी मुसीबत में नहीं डाला है और तुम्हारे लिये कोई नुक़सान नहीं चाहा है।

((( सूरते हाल यह है के जंगे सिफ़फ़ीन के इख़्तेताम के क़रीब जब अम्र व आस के मश्विरे से माविया ने नैज़ों पर क़ुरान बलन्द कर दिये और क़ौम ने जंग रोकने का इरादा कर लिया तो हज़रत ने मुतनब्बेह किया के सिर्फ़ मक्कारी है। इस क़ौम का क़ुरान से कोई ताल्लुक़ नहीं है। लेकिन क़ौम ने इस हद तक इसरार किया के अगर आप क़ुरान के फ़ैसले को न मानेंगे तो हम आपको क़त्ल कर देंगे या गिरफ़्तार करके माविया के हवाले कर देंगे। ज़ाहिर है के इसके नताएज इन्तेहाई बदतर और संगीन थे लेहाज़ा आपने अपनी राय से क़ता नज़र करके इस बात को तसलीम कर लिया मगर शर्त यही रखी के फ़ैसला किताब व सुन्नत ही के ज़रिये होगा। ममला रफ़ा दफ़ा हो गया लेकिन फ़ैसले के वक़्त माविया के नुमाइन्दे अम्र व आस ने हज़रत अली (अ 0) की तरफ़ के नुमाइन्दे अबू मूसा अशअरी को धोका दे दिया और उसने हज़रत अली (अ 0) के माज़ूल करने का एलान कर दिया जिसके बाद अम्र व आस ने माविया को नामज़द कर दिया और इसकी हुकूमत मुसल्लम हो गई। हज़रत अली (अ 0) के नाम नेहाद असहाब को अपनी हिमाक़त का अन्दाज़ा हुआ और शर्मिन्दगी को मिटाने के लिये उलटा इलज़ाम लगाना शुरू कर दिया के आपने इस तहकीम को क्यों मंज़ूर किया था और ख़ुदा के अलावा किसी को हुक्म क्यों तस्लीम किया था। आप काफ़िर हो गए हैं और आपसे जंग , वाजिब है और यह कहकर मक़ाम हरोरा पर लशकर जमा करना शुरू कर दिया। उधर हज़रत शाम के मुक़ाबले की तैयारी कर रहे थे लेकिन जब इन ज़ालिमों की शरारत हद से आगे बढ़ गई तो आपने अबू अयूब अन्सारी को फ़हमाइश के लिये भेजा। इनकी तक़रीर का यह असर हुआ के बारा हज़ार में से अक्सरीयत कूफ़े चली गई , या ग़ैर जानिबदार हो गई या हज़रत के साथ आ गई और सिर्फ़ दो तीन हज़ार ख़वारिज रह गए जिनसे मुक़ाबला हुआ तो इस क़यामत का हुआ के सिर्फ़ नौ आदमी बचे। बाक़ी सब फ़िन्नार हो गए और हज़रत के लशकर से सिर्फ़ आठ अफ़राद शहीद हुए वाक़ेया 9सफ़र 538हि 0को पेश आया।)))

37-आपका इरशादे गिरामी

( जो बमन्ज़िलए ख़ुत्बा है और इसमें नहरवान के वाक़ेए के बाद आपने अपने फ़ज़ाएल और कारनामों का तज़किरा किया है।)

मैंने उस वक़्त अपनी ज़िम्मेदारियों के साथ क़याम किया जब सब नाकाम हो गए थे और उस वक़्त सर उठाया जब सब गोशों में छुपे हुए थे और उस वक़्त बोला जब सब गूंगे हो गए थे और उस वक़्त नूरे ख़ुदा के सहारे आगे बढ़ा जब सब ठहरे हुए थे। मेरी आवाज़ सबसे धीमी थी लेकिन मेरे क़दम सबसे आगे थे। मैंने अनान हुकूमत संभाली तो इसमें क़ूवते परवाज़ पैदा हो गई और मैं तनो तन्हा इस मैदान में बाज़ी ले गया। मेरा सेबात पहाड़ों जैसा था जिन्हें न तेज़ हवाएं हिला सकती थीं और न आंधियां हटा सकती थीं। न किसी के लिये मेरे किरदार में तान-ओ-तन्ज़ की गुन्जाइश थी और न कोई ऐब लगा सकता था। याद रखो के तुम्हारा ज़लील मेरी निगाह में अज़ीज़ है यहां तक के इसका हक़ दिलवा दूँ और तुम्हारा अज़ीज़ मेरी निगाह में ज़लील है यहाँ तक के इससे हक़ ले लूँ। मैं क़ज़ाए इलाही पर राज़ी हूँ और उसके हुक्म के सामने सरापा तस्लीम हूँ। क्या तुम्हारा ख़्याल है के मैं रसूले अकरम (स 0) के बारे में कोई ग़लत बयानी कर सकता हूँ जबके सबसे पहले मैंने आपकी तसदीक़ की है तो अब सबसे पहले झूठ बोलने वाला नहीं हो सकता हूँ। मैंने अपने मुआमले में ग़ौर किया तो मेरे लिये इताअते रसूल (स 0) का मरहला बैयत पर मुक़द्दम था और मेरी गरदन में हज़रत के ओहद का तौक़ पहले से पड़ा हुआ था।

38-आपका इरशादे गिरामी

( जिसमें शुबह की वजहे तसमिया बयान की गई है और लोगों के हालात का ज़िक्र किया गया है।)

यक़ीनन शुबह को शुबह इसीलिये कहा जाता है के वह हक़ से मुशाबेह होता है। इस मौक़े पर औलियाअल्लाह के लिये यक़ीन की रोशनी होती है और सिम्त हिदायत की रहनुमाई। लेकिन दुश्मनाने ख़ुदा की दावत गुमराही और रहनुमा बे बसीरती होती है। याद रखो के मौत से डरने वाला मौत से बच नहीं सकता है और बक़ा का तलबगार बक़ाए दवाम पा नहीं सकता है।

39-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

( जो माविया के सरदारे लशकर नामान बिन बशीर के ऐनलतमर पर हमले के वक़्त इरशाद फ़रमाया और लोगों को अपनी नुसरत पर आमादा किया)

मैं ऐसे अफ़राद में मुब्तिला हो गया हूँ जिन्हें हुक्म देता हूँ तो इताअत नहीं करते हैं और बुलाता हूँ तो लब्बैक नहीं कहते हैं। ख़ुदा तुम्हारा बुरा करे , अपने परवरदिगार की मदद करने में किस चीज़ का इन्तेज़ार कर रहे हो। क्या तुम्हें जमा करने वाला दीन नहीं है और क्या जोश दिलाने वाली ग़ैरत नहीं है। मैं तुम में खड़ा होकर आवाज़ देता हूँ और तुम्हें फ़रयाद के लिये बुलाता हूँ लेकिन न मेरी बात सुनते हो और न मेरी इताअत करते हो।

((( माविया की मुफ़सिदाना कारवाइयों में से एक अमल यह भी था के उसने नामान बिन बशीर की सरकरदगी में दो हज़ार का लशकर ऐनलतमर पर हमला करने के लिये भेज दिया था जबके उस वक़्त अमीरूल मोमेनीन (अ 0) की तरफ़ से मालिक बिन कअब एक हज़ार अफ़राद के साथ इलाक़े की निगरानी कर रहे थे लेकिन वह सब मौजूद न थे। मालिक ने हज़रत के पास पैग़ाम भेजा। आपने ख़ुत्बा इरशाद फ़रमाया लेकिन ख़ातिरख़्वाह असर न हुआ। सिर्फ़ अदमी बिन हातम अपने क़बीले के साथ तैयार हुए लेकिन आपने दूसरे क़बाएल को भी शामिल करना चाहा और जैसे ही मख़निफ़ बिन सलीम ने अब्दुर्रहमान बिन मख़निफ के हमराह पचास आदमी रवाना कर दिये लशकरे माविया आती हुई मकक को देख फ़रार कर गया। लेकिन क़ौम के दामन पर नाफ़रमानी का धब्बा रह गया के आम अफ़राद ने हज़रत के कलाम पर कोई तवज्जो नहीं दी।)))

यहाँ तक के हालात के बदतरीन नताएज सामने आ जाएं। सच्ची बात यह है के तुम्हारे ज़रिये न किसी ख़ूने नाहक़ का बदला लिया जा सकता है और न कोई मक़सद हासिल किया जा सकता है। मैंने तुमको तुम्हारे ही भाइयों की मदद के लिये पुकारा मगर तुम उस ऊंट की तरह बिलबिलाने लगे जिसकी नाफ़ में दर्द हो और उस कमज़ोर शतर की तरह सुस्त पड़ गए जिसकी पुश्त ज़ख़्मी हो। इसके बाद तुमसे एक मुख़्तसर सी कमज़ोर , परेशान हाल सिपाह बरामद हुई इस तरह जैसे उन्हें मौत की तरफ़ ढकेला जा रहा हो और यह बेकसी से मौत देख रहे हों। सय्यद रज़ी- हज़रत (अ 0) के कलाम में मतज़ाएब मुज़तरिब के मानी में है के अरब इस लफ़्ज़ को उस हवा के बारे में इस्तेमाल करते हैं जिसका रूख़ मुअय्यन नहीं होता है और भेडिये को भी ज़ैब इसीलिसे कहा जाता है के इसकी चाल बे-हंगम होती है।

40-आपका इरशादे गिरामी

(ख़वारिज के बारे में इनका यह मक़ौल सुन कर के “ हुक्मे अल्लाह के अलावा किसी के लिये नहीं है)

यह एक कलमए हक़ है जिससे बातिल मानी मुराद ले गए हैं- बेशक हुक्म सिर्फ़ अल्लाह के लिये है लेकिन उन लोगों का कहना है के हुकूमत और इमारत भी सिर्फ़ अल्लाह के लिये है हालांके खुली हुई बात है के निज़ामे इन्सानियत के लिये एक हाकिम का होना बहरहाल ज़रूरी है चाहे नेक किरदार हो या फ़ासिक़ के हुकूमत के ज़ेरे साया ही मोमिन को काम करने का मौक़ा मिल सकता है और काफ़िर भी मज़े उड़ा सकता है और अल्लाह हर चीज़ को उसकी आखि़री हद तक पहुंचा देता है और माले ग़नीमत व ख़ेराज वग़ैरह जमा किया जाता है और दुश्मनों से जंग की जाती है और रास्तों का तहफ़्फ़ुज़ किया जाता है और ताक़तवर से कमज़ोर का हक़ लिया जाता है ताके नेक किरदार इन्सान को राहत मिले और बदकिरदार इन्सान से राहत मिले। (एक रिवायत में है के जब आपको तहकीम की इत्तेला मिली तो फ़रमाया) “ मैं तुम्हारे बारे में हुक्मे ख़ुदा का इन्तेज़ार कर रहा हूँ। ” फिर फ़रमाया - हुकूमत नेक होती है तो मुत्तक़ी को काम करने का मौक़ा मिलता है और हाकिम फ़ासिक़ व फ़ाजिर होता है तो बदबख़्तों को मज़ा उड़ाने का मौक़ा मिलता है यहाँ तक के इसकी मुद्दत तमाम हो जाए और मौत उसे अपनी गिरफ्त में ले ले।

41-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें ग़द्दारी से रोका गया है और इसके नताएज से डराया गया है।)

ऐ लोगो! याद रखो वफ़ा हमेशा सिदाक़त के साथ रहती है और मैं उससे बेहतर मुहाफ़िज़ कोई सिपर नहीं जानता हूँ और जिसे बाज़गष्त की कैफ़ियत का अन्दाज़ा होता है वह ग़द्दारी नहीं करता है। हम एक ऐसे दौर में वाक़ेअ हुए हैं जिसकी अक्सरीयत ने ग़द्दारी और मक्कारी का नाम होशियारी रख लिया है।

((( सत्रहवीं सदी में एक फ़लसफ़ा ऐसा भी पैदा हुआ था जिसका मक़सद मिज़ाज की हिमायत था और उसका दावा यह था के हुकूमत का वजूद समाज में हामिक व महकूम का इम्तेयाज़ पैदा करता है। हुकूमत से एक तबक़े को अच्छी-अच्छी तन्ख़्वाहें मिल जाती हैं और दूसरा महरूम रह जाता है। एक तबक़े को ताक़त इस्तेमाल करने का हक़ होता है और दूसरे को यह हक़ नहीं होता है और यह सारी बातें मिज़ाजे इन्सानियत के खि़लाफ़ हैँ लेकिन हक़ीक़ते अम्र यह है के यह बयान लफ़्ज़ों में इन्तेहाई हसीन है और हक़ीक़त के एतबार से इन्तेहाई ख़तरनाक है और बयान करदा मफ़ासिद का इलाज यह है के हाकिमे आला को मासूम और आम हुक्काम को अदालत का पाबन्द तस्लीम कर लिया जाए। सारे फ़सादात का ख़ुद-ब-ख़ुद इलाज हो जाएगा।

मज़कूरा बाला फ़लसफ़े के खि़लाफ़ फ़ितरत की रौशनी भी वह थी जिसने 1920ई 0में इसका जनाज़ा निकाल दिया और फिर कोई ऐसा अहमक़ फ़लसफ़ी नहीं पैदा हुआ।))) और अहले जेहालत ने इसका नाम हुस्ने तदबीर रख लिया है। आखि़र उन्हें क्या हो गया है ? ख़ुदा इन्हें ग़ारत करे , वह इन्सान जो हालात के उलट फेर को देख चुका है वह भी हीला के रूख़ को जानता है लेकिन अम्र व नहीं इलाही इसका रास्ता रोक लेते हैं और वह इमकान रखने के बावजूद उस रास्ते को तर्क कर देता है और वह शख़्स इस मौक़े से फ़ायदा उठा लेता है जिसके लिये दीन सरे राह नहीं होता है।


42-आपका इरशादे गिरामी

(जिसमें इत्तबाअ ख़्वाहिशात और तूले अमल से डराया गया है)

ऐ लोगो! मैं तुम्हारे बारे में सबसे ज़्यादा दो चीज़ों का ख़ौफ़ रखता हूँ। इत्तेबाअ ख़्वाहिशात और दराज़िये उम्मीद , के इत्तेबाअ ख़्वाहिशात इन्सान को राहे हक़ से रोक देता है और तूले अमल आख़ेरत को भुला देता है। याद रखो दुनिया मुंह फेरकर जा रही है और इसमें से कुछ बाक़ी नहीं रह गया है मगर उतना जितना बरतन से चीज़ को उण्डेल देने के बाद तह में बाक़ी रह जाता है और आखि़रत अब सामने आ रही है। दुनिया व आख़ेरत दोनों की अपनी औलाद हैं। लेहाज़ा तुम आख़ेरत के फ़रज़न्दों में शामिल हो जाओ और ख़बरदार फ़रज़न्दाने दुनिया में शुमार न होना इसलिये के अनक़रीब हर फ़रज़न्द को इसके माल के साथ मिला दिया जाएगा। आज अमल की मंज़िल है और कोई हिसाब नहीं है और कल हिसाब ही हिसाब है और कोई अमल की गुंजाइश नहीं है।

43-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

( जब जरीर बिन अब्दुल्लाह अल बजली को माविया के पास भेजने और माविया के इन्कारे बैयत के बाद असहाब को अहले शाम से जंग पर आमादा करना चाहा)

इस वक़्त मेरी अहले शाम से जंग की तैयारी जबके जरीर वहां मौजूद हैं शाम पर तमाम दरवाज़े बन्द कर देना है और उन्हें ख़ैर के रास्ते से रोक देना है और अगर वह ख़ैर का इरादा भी करना चाहें मैंने ख़ैर के लिये एक वक़्त मुक़र्रर कर दिया है। इसके बाद वह वहाँ या किसी धोके की बिना पर रूक सकते हैं या नाफ़रमानी की बिना पर , और दोनों सूरतों में मेरी राय यही है के इन्तेज़ार किया जाए लेहाज़ा अभी पेशक़दमी न करो और मैं मना भी नहीं करता हूँ अगर अन्दर-अन्दर तैयारी करते रहो। (((इन्सान की आक़ेबत का दारोमदार हक़ाएक और वाक़ेयात पर है और वहां हर शख़्स को इसकी माँ के नाम से पुकारा जाएगा के माँ ही एक साबित हक़ीक़त है बाप की तशख़ीस में तो इख़्तेलाफ़ हो सकता है लेकिन माँ की तशख़ीस में कोई इख़्तेलाफ़ नहीं हो सकता है। इमाम अलैहिस्सलाम का मक़सद यह है के दुनिया में आख़ेरत की गोद में परवरिश पाओ ताके क़यामत के दिन इसी से मिला दिये जाओ वरना अबनाए दुनिया इस दिन वह यतीम होंगे जिनका कोई बाप न होगा और माँ को भी पीछे छोड़ कर आए होंगे। ऐसा बेसहारा बनने से बेहतर यह है के यहीं से सहारे का इन्तेज़ाम कर लो और पूरे इन्तेज़ाम के साथ आख़ेरत का सफ़र इख़्तेयार करो। यह इस अम्र की तरफ़ इशारा है के अमली एहतियात का तक़ाज़ा यह है के दुशमन को कोई बहाना फ़राहम न करो और वाक़ई एहतियात का तक़ाज़ा यह है के उसके मक्रो फ़रेब से होशियार हो और हर वक़्त मुक़ाबला करने के लिये तैयार रहो।)))

मैंने इस मसले पर मुकम्मल ग़ौरो फ़िक्र कर लिया है और इसके ज़ाहिर व बातिन को उलट पलट कर देख लिया है। अब मेरे सामने दो ही रास्ते हैं या जंग करूं या बयानाते पैग़म्बरे इस्लाम (स 0) का इन्कार कर दूँ। मुझसे पहले इस क़ौम का एक हुकमराँ था। उसने इस्लाम में बिदअतें ईजाद कीं और लोगों को बोलने का मौक़ा दिया तो लोगों ने ज़बान खोली। फिर अपनी नाराज़गी का इज़हार किया और आखि़र में समाज का ढांचा बदल दिया।

44-हज़रत का इरशादे गिरामी

( इस मौक़े पर जब मुस्क़िला बिन हबीरा शीबानी ने आपके आमिल से बनी नाजिया के असीर ख़रीद कर आज़ाद कर दिये और जब जब हज़रत ने उससे क़ीमत का मुतालबा किया तो बददयानती करते हुए शाम की तरफ़ फ़रार कर गया)

ख़ुदा बुरा करे मुस्क़िला का के उसने काम शरीफ़ों जैसा किया लेकिन फ़रार ग़ुलामों की तरह किया। अभी इसके मद्दाह ने ज़बान खोली भी नहीं थी के इसने ख़ुद ही ख़ामोश कर दिया और इसकी तारीफ़ कुछ कहने वाला कुछ कहने भी न पाया था के इसने मुंह बन्द कर दिया। अगर वह यहीं ठहरा रहता तो मैं जिस क़द्र क़ीमत मुमकिन होता उससे ले लेता और बाक़ी के लिये इसके माल की ज़्यादती का इन्तेज़ार करता।

45-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

( यह ईदुल फ़ित्र के मौक़े पर आपके तवील ख़ुतबे का एक जुज़ है जिसमें हम्दे ख़ुदा और मज़म्मते दुनिया का ज़िक्र किया गया है)

तमाम तारीफ़ उस अल्लाह के लिये है जिसकी रहमत से मायूस नहीं हुआ जाता और जिसकी नेमत से किसी का दामन ख़ाली नहीं है। न कोई शख़्स इसकी मग़फ़ेरत से मायूस हो सकता है और न किसी में इसकी इबादत से अकड़ने का इमकान है। न इसकी रहमत तमाम होती है और न इसकी नेमत का सिलसिला रूकता है। यह दुनिया एक ऐसा घर है जिसके लिये फ़ना और इसके बाशिन्दों के लिये जिला वतनी मुक़र्रर है। यह देखने में शीरीं और सरसब्ज़ है जो अपने तलबगार की तरफ़ तेज़ी से बढ़ती है और उसके दिल में समा जाती है। लेहाज़ा ख़बरदार इससे कूच की तैयारी करो और बेहतरीन ज़ादे राह लेकर चलो। इस दुनिया में ज़रूरत से ज़्यादा सवाल न करना और जितने से काम चल जाए उससे ज़्यादा का मुतालबा न करना।

((( उस वाक़िये का ख़ुलासा यह है के तहकीम के बाद ख़वारिज ने जिन शोरषों का आगणऩाज़ किया था उनमें एक बनी नाजिया के एक शख़्स ख़रीत बिन राशिद का इक़दाम था जिसको दबाने के लिये हज़रत ने ज़ियादा बिन हफ़सा को रवाना किया था और उन्होंने शोरश को दबा दिया था लेकिन ख़रीत दूसरे इलाक़ों में फ़ितने बरपा करने लगा तो हज़रत ने माक़ल बिन क़ैस रियाही को दो हज़ार का लशकर देकर रवाना कर दिया और उधर इब्ने अब्बास ने बसरा से मकक भेज दी और बाला आखि़र हज़रत (अ 0) के लशकर ने फ़ितना को दबा दिया और बहुत से अफ़राद को क़ैदी बना लिया। क़ैदियों को लेकर जा रहे थे के रास्ते में मुस्क़ला के शहर से गुज़र हुआ। इसने क़ैदियों की फ़रयाद पर उन्हें ख़रीद कर आज़ाद कर दिया और क़ीमत की सिर्फ़ एक क़िस्त अदा कर दी। इसके बाद ख़ामोश बैठ गया। हज़रत (अ 0) ने बार-बार मुतालबा किया। आखि़र में कूफ़ा आकर दो लाख दिरहम दे दिये और जान बचाने के लिये शाम भाग गया। हज़रत (अ 0) ने फ़रमाया के काम शरीफ़ों का किया था लेकिन वाक़ेयन ज़लील ही साबित हुआ। काश इसे इस्लाम के इस क़ानून की इत्तेलाअ होती के क़र्ज़ की अदायगी में जब्र नहीं किया जाता है बल्कि हालात का इन्तेज़ार किया जाता है और जब मक़रूज़ के पास इमकानात फ़राहम हो जाते हैं तब क़र्ज़ का मुतालबा किया जाता है।)))

46-आपका इरशादे गिरामी

(जब शाम की तरफ़ जाने का इरादा फ़रमाया और इस दुआ को रकाब में पांव रखते हुए विर्दे ज़बान फ़रमाया)

ख़ुदाया मैं सफ़र की मशक्क़त और वापसी के अन्दोह व ग़म और अहल-व-माल-व-औलाद की बदहाली से तेरी पनाह चाहता हूँ। तू ही सफ़र का साथी है और घर का निगराँ है के यह दोनों काम तेरे अलावा कोई दूसरा नहीं कर सकता है के जिसे घर में छोड़ दिया जाए वह सफ़र में काम नहीं आता है और जिसे सफ़र में साथ ले लिया जाए वह घर की निगरानी नहीं कर सकता है।

सय्यद रज़ी- इस दुआ का इब्तेदाई हिस्सा सरकारे दो आलम (स 0) नक़ल किया गया है और आखि़री हिस्सा मौलाए कायनात की तज़मीन का है जो सरकार (अ 0) के कलेमात की बेहतरीन तौज़ीअ और तकमील है “ ला यहमाहमा ग़ैरक ”

47-आपका इरशादे गिरामी

(कूफ़े के बारे में)

ऐ कूफ़ा! जैसे के मैं देख रहा हूँ के तुझे बाज़ार अकाज़ के चमड़े की तरह खींचा जा रहा है। तुझ पर हवादिस के हमले हो रहे हैं और तुझे ज़लज़लों का मरकब बना दिया गया है और मुझे यह मालूम है के जो ज़ालिम व जाबिर भी तेरे साथ कोई बुराई करना चाहेगा परवरदिगार उसे किसी न किसी मुसीबत में मुब्तिला कर देगा और उसे किसी क़ातिल की ज़द पर ले आएगा।

48-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जो सिफ़्फ़ीन के लिये कूफ़े से निकलते हुए मक़ामे नख़लिया पर इरशाद फ़रमाया था)

परवरदिगार की हम्द है जब भी रात आए और तारीकी छाए या सितारा चमके और डूब जाए। परवरदिगार की हम्दो सना है के उसकी नेमतें ख़त्म नहीं होती हैं और उसके एहसानात का बदला नहीं दिया जा सकता।

अम्माबाद! मैंने अपने लशकर का हरावल दस्ता रवाना कर दिया है और उन्हें हुक्म दिया है के इस नहर के किनारे ठहर कर मेरे हुक्म का इन्तेज़ार करें। मैं चाहता हूँ के इस दरियाए दजला को अबूर करके तुम्हारी एक मुख़्तसर जमाअत तक पहुँच जाऊँ जो एतराफ़े दजला में मुक़ीम हैं ताके उन्हें तुम्हारे साथ जेहाद के लिये आमादा कर सकूँ और उनके ज़रिये तुम्हारी क़ूवत में इज़ाफ़ा कर सकूँ।

सय्यद रज़ी- मलतात से मुराद दरिया का किनारा है और असल में यह लफ़्ज़ हमवार ज़मीन के मानों में इस्तेमाल होता है। नुत्फ़े से मुराद फ़ुरात का पानी है और यह अजीबो ग़रीब ताबीरात में है।

((( इस जमाअत से मुराद अहले मदायन हैं जिन्हें हज़रात (अ 0) इस जेहाद में शामिल करना चाहते थे और उनके ज़रिये लशकर की क़ूवत में इज़ाफ़ा करना चाहते थे। ख़ुतबे के आगणऩाज़ में रात और सितारों का ज़िक्र इस अम्र की तरफ़ भी इशारा हो सकता है के लशकरे इस्लाम को रात की तारीकी और सितारे के ग़ुरूब व ज़वाल से परेशान नहीं होना चाहिए। नूरे मुतलक़ और ज़ियाए मुकम्मल साथ है तो तारीकी कोई नुक़सान नहीं पहुँच मार्गँचा सकती है और सितारों का क्या भरोसा है। सितारे तो डूब भी जाते हैं लेकिन जो परवरदिगार क़ाबिले हम्दो सना है उसके लिये ज़वाल व ग़ुरूब नहीं है और वह हमेशा बन्दए मोमिन के साथ रहता है।)))

49-आपका इरशादे गिरामी

(जिसमें परवरदिगार के मुख़्तलिफ़ सिफ़ात और उसके इल्म का तज़किरा किया गया है)

सारी तारीफ़ें उस ख़ुदा के लिये हैं जो मख़फ़ी कामो की गहराइयों से बाख़बर है और उसके वजूद की रहनुमाई ज़हूर की तमाम निशानियां कर रही हैं। वह देखने वालों की निगाह में आने वाला नहीं है लेकिन न किसी न देखने वाले की आँख उसका इन्कार कर सकती है और न किसी असबात करने वाले का दिल इसकी हक़ीक़त को देख सकता है। वह बुलन्दियों में इतना आगे है के कोई शै उससे बुलन्दतर नहीं है और क़ुरबत में इतना क़रीब है के कोई शय इससे क़रीबतर नहीं है। न इसकी बलन्दी उसे मख़लूक़ात से दूर बना सकती है और न इसकी क़ुरबत बराबर की जगह पर ला सकती है। इसने अक़लों को अपनी सिफ़तों की हुदूद से बाख़बर नहीं किया है और बक़द्रे वाजिब मारेफ़त से महरूम भी नहीं रखा है। वह ऐसी हस्ती है के इसके इनकार करने वाले के दिल पर इसके वजूद की निशानियां शहादत दे रही हैं। वह मख़लूक़ात से तशबीह देने वाले और इन्कार करने वाले दोनों की बातों से बलन्द व बालातर है।

50-आपका इरशादे गिरामी

(इसमें उन फ़ित्नों का तज़केरा है जो लोगों को तबाह कर देते हैं और इनके असरात का भी तज़किरा है)

फ़ित्नों की इब्तेदा इन ख़्वाहिशात से होती है जिनका इत्तेबाअ किया जाता है और इन जदीदतरीन एहकाम से होती है जो गढ़ लिये जाते हैं और सरासर किताबे ख़ुदा के खि़लाफ़ होते हैं। इसमें कुछ लोग दूसरे लागों के साथ हो जाते हैं और दीने ख़ुदा से अलग हो जाते हैं के अगर बातिल हक़ की आमेज़िश से अलग रहता तो हक़ के तलबगारों पर मख़फ़ी न हो सकता और अगर हक़ बातिल की मिलावट से अलग रहता तो दुश्मनों की ज़बानें न खुल सकती। लेकिन एक हिस्सा इसमें से लिया जाता है और एक हिस्सा उसमें से , और फिर दोनों को मिला दिया जाता है और ऐसे ही मवाक़े पर शैतान अपने साथियों पर मुसल्लत हो जाता है और सिर्फ़ वह लोग निजात हासिल कर पाते हैं जिनके लिये परवरदिगार की तरफ़ से नेकी पहले ही पहुँच जाती है।

((( इस इरशादे गिरामी का आग़ाज लफ़्ज़े इन्नमा से हुआ है जो इस बात की दलील है के दुनिया का हर फ़ितना ख़्वाहिशात की पैरवी और बिदअतों की ईजाद से शुरू होता है और यही तारीख़ी हक़ीक़त है के अगर उम्मते इस्लामिया ने रोज़े अव्वल किताबे ख़ुदा के खि़लाफ़ मीरास के एहकाम वाज़े न किये होते और अगर मन्सब व इक़्तेदार की ख़्वाहिश में “ मन कुन्तो मौला ” का इन्कार न किया होता और कुछ लोग कुछ लोगों के हमदर्द न हो गए होते और नस्ल पैग़म्बर (स 0) के साथ सिन व साल और सहाबियत व क़राबत के झगड़े न शामिल कर दिये होते तो आज इस्लाम बिल्कुल ख़ालिस और सरीह होता और उम्मत में किसी तरह का फ़ित्ना व फ़साद न होता। लेकिन अफ़सोस के यह सब कुछ हो गया और उम्मत एक दायमी फ़ित्ने में मुब्तिला हो गई जिसका सिलसिला चैदह सदियों से जारी है और ख़ुदा जाने कब तक जारी रहेगा।)))

51-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

( जब माविया के साथियों ने आपके साथियों को हटाकर सिफ़फ़ीन के क़रीब फ़ुरात पर ग़लबा हासिल कर लिया और पानी बन्द कर दिया)

देखो दुश्मनों ने तुमसे ग़िज़ाए जंग का मुतालबा कर दिया है अब या तो तुम ज़िल्लत और अपने मुक़ाम की पस्ती पर क़ायम रह जाओ या अपनी तलवारों को ख़ून से सेराब कर दो और ख़ुद पानी से सेराब हो जाओ। दर हक़ीक़त मौत ज़िल्लत की ज़िन्दगी में हैं और ज़िन्दगी इज़्ज़त की मौत में है। आगाह हो जाओ के माविया गुमराहों की एक जमाअत की क़यादत कर रहा है जिस पर तमाम हक़ाएक़ पोशीदा हैं और उन्होंने जेहालत की बिना पर अपनी गरदनों को तीरे अजल का निशाना बना दिया है।

52-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

( जिसमें दुनिया में ज़ोहद की तरग़ीब और पेश परवरदिगार इसके सवाब और मख़लूक़ात पर ख़ालिक़ की नेमतों का तज़किरा किया गया है।)

अगाह हो जाओ दुनिया जा रही है और इसने अपनी रूख़सत का एलान कर दिया है और इसकी जानी पहचानी चीज़ें भी अजनबी हो गई हैं। वह तेज़ी से मुंह फेर रही है और अपने बाशिन्दों को फ़ना की तरफ़ ले जा रही है और अपने हमाइयों को मौत की तरफ़ ढकेल रही है। इसकी शीरीं तल्ख़ हो चुकी है और इसकी सफ़ाई मकद्दर हो चुकी है। अब इसमें सिर्फ़ इतना ही पानी बाक़ी रह गया है जो तह में बचा हुआ है और वह नपा तुला घूंट रह गया है जिसे प्यासा पी भी ले तो उसकी प्यास नहीं बुझ सकती है। लेहाज़ा बन्दगाने ख़ुदा अब इस दुनिया से कूच करने का इरादा कर लो जिसके रहने वालों का मुक़द्दर ज़वाल है और ख़बरदार! तुम पर ख़्वाहिशात ग़ालिब न आने पायें और इस मुख़्तसर मुद्दत को तवील न समझ लेना।

ख़ुदा की क़सम अगर तुम इन ऊंटनियों की तरह भी फ़रयाद करो जिनका बच्चा गुम हो गया हो और उन कबूतरों की तरह नाला-ओ-फ़ुग़ाँ करो जो अपने झुण्ड से अलग हो गए होँ और उन राहिबों की तरह भी गिरया व फ़रयाद करो जो अपने घरबार को छोड़ चुके हों और माल व औलाद को छोड़ कर क़ुरबते ख़ुदा की तलाश में निकल पड़ो ताके इसकी बारगाह में दरजात बलन्द हो जाएं या वह गुनाह माफ़ हो जाएं जो इसके दफ़्तर में सब्त हो गए हैं और फ़रिश्तो ने उन्हें महफ़ूज़ कर लिया है तो भी यह सब इस सवाब से कम होगा जिसकी मैं तुम्हारे बारे में उम्मीद रखता हूँ या जिस अज़ाब का तुम्हारे बारे में ख़ौफ़ रखता हूँ।

ख़ुदा की क़सम अगर तुम्हारे दिल बिल्कुल पिघल जाएं और तुम्हारी आँखों से आंसुओं के बजाए रग़बते सवाब या ख़ौफ़े अज़ाब में ख़ून जारी हो जाए और तुम्हें दुनिया में आखि़र तक बाक़ी रहने का मौक़ा दे दिया जाए तो भी तुम्हारे आमाल इसकी अज़ीमतरीन नेमतों और हिदायते ईमान का बदला नहीं हो सकते हैँ चाहे इनकी राह में तुम कोई कसर उठाकर न रखो।

((( खुली हुई बात है के “ फ़िक्र हरकस बक़द्रे रहमत ओस्त ” दुनिया का इन्सान कितना ही बलन्द नज़र और आली हिकमत क्यों न हो जाए मौलाए कायनात (अ 0) की बलन्दीए फ़िक्र को नहीं पा सकता है और इस दरजए इल्म पर फ़ाएज़ नहीं हो सकता है जिस पर मालिके कायनात ने बाबे मदीनतुल इल्म को फ़ाएज़ किया है। आप फ़रमाना चाहते हैं के तुम लोग मेरी इताअत करो और मेरे एहकाम पर अमल करो इसका अज्र व सवाब तुम्हारे उफ़्कार की रसाई की हुदूद से बालातर है। मैं तुम्हारे लिये बेहतरीन सवाब की उम्मीद रखता हूँ और तुम्हें बदतरीन अज़ाब से बचाना चाहता हूँ लेकिन इस राह में मेरे एहकाम की इताअत करना होगी और मेरे रास्ते पर चलना होगा जो दर हक़ीक़त शहादत और क़ुरबानी का रास्ता है और इन्सान इसी रास्ते पर क़दम आगे बढ़ाने से घबराता है और हैरत अंगेज़ बात यह है के एक दुनियादार इन्सान जिसकी सारी फ़िक्र माल व दुनिया और सरवते दुनिया है वह भी किसी हलाकत के ख़तरे में मुब्तिला हो जाता है तो अपने को हलाकत से बचाने के लिये सारा माल व मताअ क़ुरबान कर देता है तो फिर आखि़र दुनियादार इन्सान में यह जज़्बा क्यों नहीं पाया जाता है ? वह जन्नतुल नईम को हासिल करने और अज़ाबे जहन्नम से बचने के लिये अपनी दुनिया को क़ुरबान क्यों नहीं करता है ? इसका तो अक़ीदा यही है के दुनिया चन्द रोज़ा और फ़ानी है और आख़ेरत अबदी और दायमी है तो फ़िर फ़ानी को बाक़ी की राह में क्यों क़ुरबान नहीं कर देता है ? “ अन हाज़ल शैअ अजाब ” )))

53-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें रोज़े ईदुल अज़हा का तज़केरा है और क़ुरबानी के सिफ़ात का ज़िक्र किया गया है)

क़ुरबानी के जानवर का कमाल यह है के इसके कान बलन्द हों और आँखें सलामत हों के अगर कान और आँख सलामत हैं तो गोया क़ुरबानी सालिम और मुकम्मल है चाहे इसकी सींग टूटी हुई हो और वह पैरों को घसीट कर अपने को क़ुरबान गाह तक ले जाए।

सय्यद रज़ी- इस मक़ाम पर मन्सक से मुराद मज़नअ और क़ुरबानगाह है।

54-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें आपने अपनी बैयत का तज़किरा किया है)

लोग मुझ पर यूँ टूट पड़े जैसे वह प्यासे ऊँट पानी पर टूट पड़ते हैं जिनके निगरानों ने उन्हें आज़ाद छोड़ दिया हो और उनके पैरों की रस्सियां खोल दी हों यहां तक के मुझे यह एहसास पैदा हो गया के यह मुझे मार ही डालेंगे या एक दूसरे को क़त्ल कर देंगे। मैंने इस अम्रे मुख़ालफ़त को यूँ उलट पलट कर देखा है के मेरी नीन्द तक उड़ गई है और अब यह महसूस किया है के या इनसे जेहाद करना होगा या पैग़म्बर (स 0) के एहकाम का इन्कार कर देना होगा। ज़ाहिर है के मेरे लिये जंग की सख्तियो का बरदाश्त करना अज़ाब की सख़्ती बरदाश्त करने से आसानतर है और दुनिया की मौत आख़ेरत की मौत और तबाही से सुबुकतर है।

((( सवाल यह पैदा होता है के जिस इस्लाम में रोज़े अव्वल से बज़ोरे शमशीर बैअत ली जा रही थी और इन्कारे बैअत करने पर घरों में आगणन लगाई जा रही थी या लोगों को ख़न्जर व शमशीर और ताज़ियाना व दुर्रा का निशाना बनाया जा रहा था। इसमें यकबारगी यह इन्क़ेलाब कैसे आ गया के लोग एक इन्सान की बैअत करने के लिये टूट पड़े और यह महसूस होने लगा के जैसे एक दूसरे को क़त्ल कर देंगे। क्या इसका राज़ यह था के लोग इस एक शख़्स के इल्म व फ़ज़्ल , ज़ोहद व तक़वा और शुजाअत व करम से मुतास्सिर हो गए थे। ऐसा होता तो यह सूरते हाल बहुत पहले पैदा हो जाती और लोग इस शख़्स पर क़ुरबान हो जाते। हालांके ऐसा नहीं हो सका जिसका मतलब यह है के क़ौम ने शख़्सियत से ज़्यादा हालात को समझ लिया था और यह अन्दाज़ा कर लिया था के वह शख़्स जो उम्मत के दरमियान वाक़ेई इन्साफ़ कर सकता है और जिसकी ज़िन्दगी एक आम इन्सान की ज़िन्दगी की तरह सादगी रखती है और इसमें किसी तरह की हर्स व लालच का गुज़र नहीं है वह इस मर्दे मोमिन और कुल्ले ईमान के अलावा कोई दूसरा नहीं है। लेहाज़ा इसकी बैयत में सबक़त करना एक इन्सानी और ईमानी फ़रीज़ा है और दरहक़ीक़त मौलाए कायनात (अ 0) ने इस पूरी सूरते हाल को एक लफ़्ज़ में वाज़ेअ कर दिया है के यह दिन दर हक़ीक़त प्यासों के सेराब होने का दिन था और लोग मुद्दतों से तष्नाकाम थे लेहाज़ा इनका टूट पड़ना हक़ बजानिब था। इस एक तशबीह से माज़ी और हाल दोनों का मुकम्मल अन्दाज़ा किया जा सकता है।)))

55-आपका इरशादे गिरामी

(जब आपके असहाब ने यह इज़हार किया के अहले सिफ़फ़ीन से जेहाद की इजाज़त में ताख़ीर से काम ले रहे हैं)

तुम्हारा सवाल के क्या यह ताख़ीर मौत की नागवारी से है तो ख़ुदा की क़सम मुझे मौत की कोई परवाह नहीं है के मैं इसके पास वारिद हो जाऊँ या वह मेरी तरफ़ निकलकर आ जाए। और तुम्हारा यह ख़याल के मुझे अहले शाम के बातिल के बारे में कोई शक है , तो ख़ुदा गवाह है के मैंने एक दिन भी जंग को नहीं टाला है मगर इस ख़याल से के शायद कोई गिरोह मुझ से मुलहक़ हो जाए और हिदायत पा जाए और मेरी रौशनी में अपनी कमज़ोर आंखों का इलाज कर ले के यह बात मेरे नज़दीक उससे कहीं ज़्यादा बेहतर है के मैं उसकी गुमराही की बिना पर उसे क़त्ल कर दूँ अगरचे इस क़त्ल का गुनाह उसी के ज़िम्मे होगा।

56-आपका इरशादे गिरामी

( जिसमें असहाबे रसूल (स 0) को याद किया गया है उस वक़्त जब सिफ़फ़ीन के मौक़े पर आपने लोगों को सुल का हुक्म दिया था)

हम रसूले अकरम (स 0) के साथ अपने ख़ानदान के बुज़ुर्ग , बच्चे , भाई बन्द और चचाओं को भी क़त्ल कर दिया करते थे और इससे हमारे ईमान और जज़्बए तसलीम में इज़ाफ़ा ही होता था और हम बराबर सीधे रास्ते पर बढ़ते ही जा रहे थे और मुसीबतों की सख्तियो पर सब्र ही करते जा रहे थे और दुशमन से जेहाद में कोशिशे ही करते जा रहे थे। हमारा सिपाही दुशमन के सिपाही से इस तरह मुक़ाबला करता था जिस तरह मर्दों का मुक़ाबला होता है के एक दूसरे की जान के दरपै हो जाएं और हर एक को यही फ़िक्र हो के दूसरे को मौत का जाम पिला दें। फिर कभी हम दुशमन को मार लेते थे और कभी दुशमन को हम पर ग़लबा हो जाता था। इसके बाद जब ख़ुदा ने हमारी सिदाक़त को आज़मा लिया तो हमारे दुशमन पर ज़िल्लत नाज़िल कर दी और हमारे ऊपर नुसरत का नुज़ूल फ़रमा दिया यहाँतक के इस्लाम सीना टेक कर अपनी जगह जम गया और अपनी मन्ज़िल पर क़ायम हो गया।

मेरी जान की क़सम अगर हमारा किरदार भी तुम्हीं जैसा होता तो न दीन का कोई सुतून क़ायम होता और न ईमान की कोई शाख़ हरी होती। ख़ुदा की क़सम तुम अपने करतूतों से दूध के बदले ख़ून दुहोगे और आखि़र में पछताओगे।

((( हज़रत मोहम्मद बिन अबीबक्र की शहादत के बाद माविया ने अब्दुल्लाह बिन आमिर हिज़्री को बसरा में दोबारा फ़साद फ़ैलाने के लिये भेज दिया। वहां हज़रत के वाली इब्ने अब्बास थे और वह मोहम्मद की ताज़ियत के लिये कूफ़े आ गये थे। ज़ियाद बिन अबीदान के नाएब थे। इन्होंने हज़रत को इत्तेलात दी , आपने बसरा के बनी तमीम मा उस्मानी रूझान देखकर कूफ़े के बनी तमीम को मुक़ाबले पर भेजना चाहा लेकिन इन लोगों ने बिरादरी से जंग करने से इन्कार कर दिया तो हज़रत ने अपने दौरे क़दीम का हवाला दिया के अगर रसूले अकरम (स 0) के साथ हम लोग भी क़बायली ताअस्सुब का शिकार हो गए होते तो आज इस्लाम का नामो निशान भी न होता , इस्लाम हक़ व सिदाक़त का मज़हब है इसमें क़ौमी और क़बायली रूझानात की कोई गुन्जाइश नहीं है।

यह एक अज़ीम हक़ीक़त का एलान है के परवरदिगार अपने बन्दों की बहरहाल मदद करता है। उसने साफ़ कह दिया के “ कान हक़्क़ा अलैना नसरूल मोमेनीन ” ( मोमेनीन की मदद हमारी ज़िम्मेदारी है) “ इन्नल्लाहा मअस्साबेरीन ” ( अल्लाह सब्र करने वालों के साथ है) लेकिन इस सिलसिले में इस हक़ीक़त को बहरहाल समझ लेना चाहिये के यह नुसरत ईमान के इज़हार के बाद और यह मायते सब्र के बाद सामने आती है। जब तक इन्सान अपने ईमान व सब्र का सूबूत नहीं दे देता है , ख़ुदाई इमदाद का नुज़ूल नहीं होता है। “ अन तनसरूल्लाह यनसुरकुम ” ( अगर तुम अल्लाह की मदद करोगे तो अल्लाह तुम्हारी मदद करेगा) नुसरते इलाही तोहफ़ा नहीं है मुजाहेदात का इनआम है , पहले मुजाहिदे नफ़्स , इसके बाद इनआम।)))

57-आपका इरशादे गिरामी

(एक क़ाबिले मज़म्मत शख़्स के बारे में)

आगाह हो जाओ के अनक़रीब तुम पर एक शख़्स मुसल्लत होगा जिसका हलक़ कुशादा और पेट बड़ा होगा। जो पा जाएगा खा जाएगा और जो न पाएगा उसकी जुस्तजू में रहेगा। तुम्हारी ज़िम्मेदारी होगी के उसे क़त्ल कर दो मगर तुम हरगिज़ क़त्ल न करोगे। ख़ैर , वह अनक़रीब तुम्हें , मुझे गालियाँ देने और मुझसे बेज़ारी करने का भी हुक्म देगा। तो अगर गालियों की बात हो तो मुझे बुरा भला कह लेना के यह मेरे लिये पाकीज़गी का सामान है और तुम्हारे लिये दुशमन से निजात का , लेकिन ख़बरदार मुझसे बराएत न करना के मैं फ़ितरते इस्लाम पर पैदा हूआ हूँ और मैंने ईमान और हिजरत दोनों में सबक़त की है।

58-आपका इरशादे गिरामी

( जिसका मुख़ातिब उन ख़वारिज को बनाया गया है जो तहकीम से किनाराकश हो गए और “ ला हुक्म इलल्लाह ” का नारा लगाने लगे)

ख़ुदा करे तुम पर सख़्त आन्धियाँ आएं और कोई तुम्हारे हाल का इस्लाह करने वाला न रह जाए। क्या मैं परवरदिगार पर ईमान लाने और रसूले अकरम (स 0) के साथ जेहाद करने के बाद अपने बारे में कुफ्ऱ का ऐलान कर दूँ। ऐसा करूंगा तो मैं गुमराह हो जाऊँगा और हिदायत याफ़ता लोगों में न रह जाउंगा। जाओ पलट जाओ अपनी बदतरीन मंज़िल की तरफ़ और वापस चले जाओ अपने निशानाते क़दम पर। मगर आगाह रहो के मेरे बाद तुम्हें हमागीर ज़िल्लत और काटने वाली तलवार का सामना करना होगा और इस तरीक़ए कार का मुक़ाबला करना होगा जिसे ज़ालिम तुम्हारे बारे में अपने सुन्नत बना लेँ यानी हर चीज़ को अपने लिये मख़सूस कर लेना।

सय्यद रज़ी- हज़रत का इरशाद “ ला बक़ी मिनकुम आबरुन ” तीन तरीक़ों से नक़्ल किया गया है- आबरुन- वह शख़्स जो दरख़्ते ख़ुरमा को कांट छाट कर उसकी इसलाह करता है। आसरुन- रिवायत करने वाला यानी तुम्हारी ख़बर देने वाला कोई न रह जाएगा और यही ज़्यादा मुनासिब मालूम होता है।

आबज़ुन- कूदने वाला या हलाक होने वाला के मज़ीद हलाकत के लिये भी कोई न रह जाएगा।

59-आपका इरशादे गिरामी

(आपने उस वक़्त इरशाद फ़रमाया जब आपने ख़वारिज से जंग का अज़्म कर लिया और नहरवान के पुल को पार कर लिया)

याद रखो! दुश्मनों की क़त्लगाह दरिया के उस तरफ़ है। ख़ुदा की क़सम न उनमें से दस बाक़ी बचेंगे और न तुम्हारे दस हलाक हो सकेंगे।

सय्यद रज़ी - नुत्फ़े से मुराद नहर का शफ़ाफ़ पानी है जो बेहतरीन कनाया है पानी के बारे में चाहे इसकी मिक़दार कितनी ही ज़्यादा क्यों न हो।

((( जब अमीरूल मोमेनीन (अ 0) को यह ख़बर दी गई के ख़वारिज ने सारे मुल्क में फ़साद फ़ैलाना शुरू कर दिया है , जनाबे अब्दुल्लाह बिन ख़बाब बिन इलारत को उनके घर की औरतों समेत क़त्ल कर दिया है और लोगों में मुसलसल दहशत फ़ैला रहे हैं तो आपने एक शख़्स को समझाने के लिये भेजा , इन ज़ालिमों ने उसे भी क़त्ल कर दिया। इसके बाद जब हज़रत अब्दुल्लाह बिन ख़बाब के क़ातिलों को हवाले करने का मुतालबा किया तो साफ़ कह दिया के हम सब क़ातिल हैं। इसके बाद हज़रत ने बनफ़्से नफ़ीस तौबा की दावत दी लेकिन उन लोगों ने उसे भी ठुकरा दिया। आखि़र एक दिन वह आ गया जब लोग एक लाश को लेकर आए और सवाल किया के सरकार अब फ़रमाएं अब क्या हुक्म है ? तो आपने नारा-ए-तकबीर बलन्द करके जेहाद का हुक्म दे दिया और परवरदिगार के दिये हुए इल्मे ग़ैब की बिना पर अन्जामकार से भी बाख़बर कर दिया जो बक़ौल इब्नुल हदीद सद-फ़ीसद सही साबित हुआ और ख़वारिज के सिर्फ़ नौ अफ़राद बचे और हज़रत (अ 0) के साथियों में सिर्र्फ़ आठ अफ़राद शहीद हुए।)))

60-आपका इरशादे गिरामी

(उस वक़्त जब ख़वारिज के क़त्ल के बाद लोगों ने कहा के अब तो क़ौम का ख़ात्मा हो चुका है)

हरगिज़ नहीं- ख़ुदा गवाह है के यह अभी मुरदों के सल्ब और औरतों के रह़म में मौजूद हैं और जब भी इनमें कोई सर निकालेगा उसे सर काट दिया जाएगा , यहाँ तक के आखि़र में सिर्फ़ लुटेरे और चोर होकर रह जाएंगे।

61-आपका इरशादे गिरामी

ख़बरदार मेरे बाद ख़ुरूज करने वालों से जंग न करना के हक़ की तलब में निकलकर बहक जाने वाला उसका जैसा नहीं होता है जो बातिल की तलाश में निकले और हासिल भी कर ले।

सय्यद रज़ी- आखि़री जुमले से मुराद माविया और इसके असहाब हैं।

62-आपका इरशाद गिरामी

(जब आपको अचानक क़त्ल से डराया गया)

याद रखो मेरे लिये ख़ुदा की तरफ़ से एक मज़बूत व मुस्तहकम सिपर है। इसके बाद जब मेरा दिन आ जाएगा तो यह सिपर मुझसे अलग हो जाएगी और मुझे मौत के हवाले कर देगी। उस वक़्त न तीर ख़ता करेगा और न ज़ख़्म मुन्दमिल हो सकेगा।

63-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें दुनिया के फ़ित्नों से डराया गया है)

आगाह हो जाओ के यह दुनिया ऐसा घर है जिससे सलामती का सामान इसी के अन्दर से किया जा सकता है और कोई ऐसी शय वसीलए निजात नहीं हो सकती है जो दुनिया ही के लिये हो। लोग इस दुनिया के ज़रिये आज़माए जाते हैं। जो लोग दुनिया का सामान दुनिया ही के लिये हासिल करते हैं वह इसे छोड़कर चले जाते हैं और फिर हिसाब भी देना होता है और जो लोग यहाँ से वहाँ के लिये हासिल करते हैं वह वहाँ जाकर पा लेते हैं और इसी में मुक़ीम हो जाते हैं। यह दुनिया दरहक़ीक़त साहेबाने अक़्ल की नज़र में एक साया जैसी है जो देखते देखते सिमट जाता है और फैलते फैलते कम हो जाता है।

((( इन्सान के क़दम मौत की तरफ़ बिला इख़्तेयार बढ़ते जा रहे हैं और उसे इस अम्र का एहसास भी नहीं होता है। नतीजा यह होता है के एक दिन मौत के मुँह में चला जाता है और दाएमी ख़सारा और अज़ाब में मुब्तिला हो जाता है लेहाज़ा तक़ाज़ाए अक़्ल व दानिश यही है के आमाल को साथ लेकर आगे बढ़ेगा ताके जब मौत का सामना हो तो आमाल का सहारा रहे और अज़ाबे अलीम से निजात हासिल करने का वसीला हाथ में रहे।)))

64-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(नेक आमाल की तरफ़ सबक़त के बारे में)

बन्दगाने ख़ुदा अल्लाह से डरो और आमाल के साथ अजल की तरफ़ सबक़त करो। इस दुनिया के फ़ानी माल के ज़रिये बाक़ी रहने वाली आख़ेरत को ख़रीद लो और यहाँ से कूच कर जाओ के तुम्हें तेज़ी से ले जाया जा रहा है और मौत के लिये आमादा हो जाओ के वह तुम्हारे सरों पर मण्डला रही है। उस क़ौम जैसे हो जाओ जिसे पुकारा गया तो फ़ौरन होशियार हो गई। और उसने जान लिया के दुनिया इसकी मन्ज़िल नहीं है तो उसे आखि़रत से बदल लिया। इसलिये के परवरदिगार ने तुम्हें बेकार नहीं पैदा किया है और न महमिल छोड़ दिया है और याद रखो के तुम्हारे और जन्नत व जहन्नम के दरमियान इतना ही वक़्फ़ा है के मौत नाज़िल हो जाए और अन्जाम सामने आ जाए और वह मुद्दते हयात जिसे हर लम्हज़ कम कर रहा हो और हर साअत इसकी इमारत को मुनहदिम कर रही हो वह क़सीरूल मुद्दत ही समझने के लाएक़ है और वह मौत जिसे दिन व रात ढकेल कर आगे ला रहे हों उसे बहुत जल्द आने वाला ही ख़याल करना चाहिये और वह शख़्स जिसके सामने कामयाबी या नाकामी और बदबख़्ती आने वाली है उसे बेहतरीन सामान मुहैया ही करना चाहिये। लेहाज़ा दुनिया में रहकर दुनिया से ज़ादे राह हासिल कर लो जिससे कल अपने नफ़्स का तहफ़्फ़ुज़ कर सको। इसका रास्ता यह है के बन्दा अपने परवरदिगार से डरे। अपने नफ़्स से इख़लास रखे , तौबा की मक़दम करे , ख़्वाहिशात पर ग़लबा हासिल करे इसलिये के इसकी अजल इससे पोशीदा है और इसकी ख़्वाहिश इसे मुसलसल धोका देने वाली है और शैतान इसके सर पर सवार है जो मासियतों को आरास्ता कर रहा है ताके इन्सान मुरतकब हो जाए और वौबा की उम्मीदें दिलाता है ताके इसमें ताख़ीर करे यहाँ तक के ख़फ़लत और बे ख़बरी के आलम में मौत इस पर हमलावर हो जाती है। हाए किस क़दर हसरत का मक़ाम है के इन्सान की अम्र ही इसके खि़लाफ़ हुज्जत बन जाए और इसका रोज़गार ही इसे बदबख़्ती तक पहुंचा दे। परवरदिगार से दुआ है के हमें और तुम्हें उन लोगों में क़रार दे जिन्हें नेमतें मग़रूर नहीं बनाती हैं और कोई मक़सद इताअते ख़ुदा में कोताही पर आमादा नहीं करता है और मौत के बाद इन पर निदामत और रंज व ग़म का नुज़ूल नहीं होता है।

65-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें इल्मे इलाही के लतीफ़तरीन मुबाहिस की तरफ़ इशारा किया गया है)

तमाम तारीफ़ें उस ख़ुदा के लिये हैं जिसके सिफ़ात में तक़दम व ताख़र नहीं होता है के वह आखि़र होने से पहले और अव्वल रहा हो और बातिन बनने से पहले ज़ाहिर रहा हो। उसके अलावा जिसे भी वाहिद कहा जाता है उसकी वहदत क़िल्लत है और जिसे भी अज़ीज़ समझा जाता है उसकी इज़्ज़त ज़िल्लत है। इसके सामने हर क़ौमी ज़ईफ़ है और हर मालिक ममलूक है , हर आलिम मुतअल्लिम है और हर क़ादिर आजिज़ है , हर सुनने वाला लतीफ़ आवाज़ों के लिये बहरा है और ऊंची आवाज़ें भी इसे बहरा बना देती हैं और दूर की आवाज़ें भी इसकी हद से बाहर निकल जाती हैं और इसी तरह इसके अलावा हर देखने वाला मख़फ़ी रंग और हर लतीफ़ जिस्म को नहीं देख सकता है। इसके अलावा हर ज़ाहिर ग़ैरे बातिन है और हर बातिन ग़ैरे ज़ाहिर है इसने मख़लूक़ात को अपनी हुकूमत के इस्तेहकाम या ज़माने के नताएज के ख़ौफ़ से नहीं पैदा किया है। न उसे किसी बराबर वाले ख़मलावर या साहबे कसरत शरीक या टकराने वाले मद्दे मुक़ाबिल के मुक़ाबले में मदद लेना थी। यह सारी मख़लूक़ उसी की पैदा की हुई है और पाली हुई है और यह सारे बन्दे उसी के सामने सरे तस्लीम ख़म किये हुए हैं। उसने चीज़ो में हुलूल नहीं किया है के उसे किसी के अन्दर समाया हुआ कहा जाए और न इतना दूर हो गया है के अलग थलग ख़्याल किया जाए। मख़लूक़ात की खि़लक़त और मसनूआत की तदबीर उसे थका नहीं सकती है और न कोई तख़लीक़ उसे आजिज़ बना सकती है और न किसी क़ज़ा व क़द्र में उसे कोई शुबह पैदा हो सकता है। उसका हर फ़ैसला मोहकम और इसका हर इल्म मुतअत्तन और इसका हर हुक्म मुस्तहकम है। नाराज़गी में भी उससे उम्मीद वाबस्ता की जाती है और नेमतों में भी इसका ख़ौफ़ लाहक़ रहता है।

((( यह उस नुक्ते की तरफ़ इशारा है के परवरदिगार के सिफ़ाते कमाल ऐन ज़ात हैं और ज़ात से अलग कोई शै नहीं हैं। वह इल्म की वजह से आलिम नहीं है बल्कि ऐने हक़ीक़ते इल्म है और क़ुदरत के ज़रिये क़ादिर नहीं है बल्के ऐने क़ुदरते कामेला है और जब यह सारे सिफ़ात ऐने ज़ात हैं तो इनमें तक़दम व ताख़र का कोई सवाल ही नहीं है वह जैसे लख़्तए अव्वल है उसी तरह लख़्तए आखि़र भी है और जिस अन्दाज़ से ज़ाहिर है उसी अन्दाज़ से बातिन भी है। इसकी ज़ाते अक़दस में किसी तरह का तख़ीर क़ाबिले तसव्वुर नहीं है। हद यह है के उसकी समाअत व बसारत भी मख़लूक़ात की समाअत व बसारत से बिलकुल अलग है। दुनिया का हर समीअ व बसीर किसी शै को देखता और सुनता है और किसी शै के देखने और सुनने से क़ासिर रहता है लेकिन परवरदिगार की ज़ाते अक़दस ऐसी नहीं है वह मख़फ़ी तरीन मनाज़िर को देख रहा है और लतीफ़तरीन आवाज़ों को सुन रहा है। वह ऐसा ज़ाहिर है जो बातिन नहीं है और ऐसा बातिन है जो किसी अक़्ल व फ़हम पर ज़ाहिर नहीं हो सकता।)))

66-आपका इरशादे गिरामी

(तालीमे जंग के बारे में)

मुसलमानों! ख़ौफ़े ख़ुदा को अपना शआर बनाओ , सुकून व वेक़ार की चादर ओढ़ लो , दाँतों को भींच लो के इससे तलवारें सरों से उचट जाती है , ज़िरह पोशी को मुकम्मल कर लो , तलवारों को न्याम से निकालने से पहले न्याम के अन्दर हरकत दे लो। दुशमन को तिरछी नज़र से देखते रहो और नैज़ों से दोनों तरफ़ वार करते रहो। उसे अपनी तलवारों की बाढ़ पर रखो और तलवारों के हमले क़दम आगे बढ़ाकर करो और यह याद रखो के तुम परवरदिगार की निगाह में और रसूले अकरम (स 0) के इब्न अम के साथ हो। दुशमन पर मुसलसल हमले करते रहो और फ़रार से शर्म करो के इसका आर नस्लों में रह जाता है और इसका अन्जाम जहन्नम होता है। अपने नफ़्स को हंसी ख़ुशी ख़ुदा के हवाले कर दो और मौत की तरफ़ नेहायत दरजए सुकून व इतमीनान से क़दम आगे बढ़ाओ। तुम्हारा निशाना एक दुशमन का अज़ीम लशकर और तनाबदारे ख़ेमा होना चाहिये के इसी के दस्त पर हमला करो के शैतान इसी के एक गोशे में बैठा हुआ है। इसका हाल यह है के इसने एक क़दम हमले के लिये आगे बढ़ा रखा है और एक भागने के लिये पीछे कर रखा है लेहाज़ा तुम मज़बूती से अपने इरादे पर जमे रहो यहाँ तक के हक़ सुबह के उजाले की तरह वाज़ेह हो जाए और मुतमईन रहो के बलन्दी तुम्हारा हिस्सा है और अल्लाह तुम्हारे साथ है और वह तुम्हारे आमाल को ज़ाया नहीं कर सकता है।

((( इन तालीमात पर संजीदगी से ग़ौर किया जाए तो अन्दाज़ा होगा के एक मर्दे मुस्लिम के जेहाद का अन्दाज़ क्या होना चाहिये और उसे दुशमन के मुक़ाबले में किस तरह जंग आज़मा होना चाहिये , इन तालीमात का मुख़्तसर ख़ुलासा यह है- 1. दिल के अन्दर ख़ौफ़े ख़ुदा हो। 2. बाहर सुकून व इत्मीनान का मुज़ाहिरा हो। 3. दाँतों को भींच लिया जाए। 4. आलाते जंग को मुकम्मल तौर पर साथ रखा जाए। 5. तलवार को न्याम के अन्दर हरकत दे ली जाए के बरवक़्त निकालने में ज़हमत न हो। 6- दुशमन पर ग़ैत आलूद निगाह की जाए , 7- नेज़ों के हमले हर तरफ़ हों। 8- तलवार दुशमन के सामने रहे। 9- तलवार दुशमन तक न पहुँचे तो क़दम बढ़ाकर हमला करे। 10- फ़रार का इरादा न करे। 11- मौत की तरफ़ सुकून के साथ क़दम बढ़ाए। 12- जान जाने आफ़रीं के हवाले कर दे। 13- हदफ़ और निशाने पर निगाह रखे। 14- यह इत्मीनान रखे के ख़ुदा हमारे आमाल को देख रहा है और पैग़म्बर (स 0) का भाई हमारी निगाह के सामने है। ज़्ाहिर है के इन आदाब में बाज़ आदाब , तक़वा , ईमान , इत्मीनान वग़ैरा दाएमी हैसियत रखते हैं और बाज़ का ताल्लुक़ नेज़ा व शमशीर के दौर से है लेकिन इसे भी हर दौर के आलाते हर्ब व ज़र्ब पर मुन्तबिक़ किया जा सकता है और उससे फ़ायदा उठाया जा सकता है।)))

67-आपका इरशादे गिरामी

( जब रसूले अकरम (स 0) के बाद सक़ीफ़ा बनी सादह की ख़बरें पहुँचीं और आपने पूछा के अन्सार ने क्या एहतेजाज किया तो लोगों ने बताया के वह यह कह रहे थे के एक अमीर हमारा होगा और एक तुम्हारा- तो आपने फ़रमाया)

तुम लोगों ने उनके खि़लाफ़ यह इस्तेदलाल क्यों नहीं किया के रसूले अकरम (स 0) ने तुम्हारे नेक किरदारों के साथ हुस्ने सुलूक और ख़ताकारों से दरगुज़र करने की वसीयत फ़रमाई है ? लोगों ने कहा के इसमें क्या इस्तेदलाल है ? फ़रमाया के अगर इमामत व इमारत इनका हिस्सा होती तो इनसे वसीयत की जाती न के इनके बारे में वसीयत की जाती। इसके बाद आपने सवाल किया के क़ुरैश की दलील क्या थी ? लोगों ने कहा के वह अपने को रसूले अकरम (स 0) के शजरे में साबित कर रहे थे। फ़रमाया के अफ़सोस शजरे से इस्तेदलाल किया और समरह को ज़ाया कर दिया।

68-आपका इरशादे गिरामी

(जब आपने मोहम्मद बिन अबीबक्र को मिस्र की ज़िम्मेदारी हवाले की और उन्हें क़त्ल कर दिया गया)

मेरा इरादा था के मिस्र का हाकिम हाशिम बिन अतबा को बनाऊं अगर उन्हें बना देता तो हरगिज़ मैदान को मुख़ालेफ़ीन के लिये ख़ाली न छोड़ते और उन्हें मौक़े से फ़ायदा न उठाने देते (लेकिन हालात ने ऐसा न करने दिया)। इस बयान का मक़सद मोहम्मद बिन अबीबक्र की मज़म्मत नहीं है इसलिये के वह मुझे अज़ीज़ था और मेरा ही परवरदा था।

((( उस्ताद अहमद हसन याक़ूब ने किताब नज़रियए अदालते सहाबा में एक मुफ़स्सिल बहस की है के सक़ीफ़ा में कोई क़ानून इज्तेमाअ इन्तख़ाब ख़लीफ़ा के लिये नहीं हुआ था और न कोई इसका एजेन्डा था और न सवा लाख सहाबा की बस्ती में से दस बीस हज़ार अफ़राद जमा हुए थे बल्कि सअद बिन अबादा की बीमारी की बिना पर अन्सार अयादत के लिये जमा हुए थे और बाज़ मुहाजेरीन ने इस इज्तेमाअ को देखकर यह महसूस किया के कहीं खि़लाफ़त का फ़ैसला न हो जाए , तो बरवक़्त पहुंचकर इस क़द्र हंगामा किया के अन्सार में फूट पड़ गई और फ़िल ज़ोर हज़रत अबूबक्र की खि़लाफ़त का एलान कर दिया और सारी कारवाई लम्हों में यूं मुकम्मल हो गई के सअद बिन अबादा को पामाल कर दिया गया और हज़रत अबूबक्र “ ताजे खि़लाफ़त ” सर पर रखे हुए सक़ीफ़ा से बरामद हो गए। इस शान से के इस अज़ीम मुहिम की बिना पर जनाज़ाए रसूल में शिरकत से भी महरूम हो गए और खि़लाफ़त का पहला असर सामने आ गया। हाशिम बिन अतबा सिफ़फीन में अलमदारे लशकरे अमीरूल मोमेनीन थे। मिरक़ाल उनका लक़ब था के निहायत तेज़ रफ़तारी और चाबकदस्ती से हमला करते थे। मोहम्मद बिन अबीबक्र अस्मार बिन्त ऐस के बत्न से थे जो पहले जनाबे जाफ़रे तैयार की ज़ौजा थीं और उनसे अब्दुल्लाह बिन जाफ़र पैदा हुए थे इसके बाद इनकी शहादत के बाद अबूबक्र की ज़ौजियत में आ गईं जिनसे मोहम्मद पैदा हुए और इनकी वफ़ात के बाद मौलाए कायनात की ज़ौजियत में आईं और मोहम्मद ने आपके ज़ेर असर तरबियत पाई यह और बात है के जब अम्र व आस ने चार हज़ार के लशकर के साथ मिस्र पर हमला किया तो आपने आबाई उसूले जंग की बिना पर मैदान से फ़रार इख़्तेयार किया और बाला आखि़र क़त्ल हो गए और लाश को गधे की खाल में रख कर जला दिया गया या बरिवायते ज़िन्दा ही जला दिये गए और माविया ने इस ख़बर को सुनकर इन्तेहाई मसर्रत का इज़हार किया। (मरूजुल ज़हब)

अमीरूल मोमेनीन (अ 0) ने इस मौक़े पर हाशिम को इसीलिये याद किया था के वह मैदान से फ़रार न कर सकते थे और किसी घर के अन्दर पनाह लेने का इरादा भी नहीं कर सकते थे।)))

69-आपका इरशादे गिरामी

(अपने असहाब को सरज़निश करते हुए)

कब तक मैं तुम्हारे साथ वह नरमी का बरताव करूं जो बीमार ऊंट के साथ किया जाता है जिसका कोहान अन्दर से खोखला हो गया हो या इस बोसीदा कपड़े के साथ किया जाता है जिसे एक तरफ़ से सिया जाए तो दूसरी तरफ़ से फट जाता है। जब भी शाम का कोई दस्ता तुम्हारे किसी दस्ते के सामने आता है तो तुममें से हर शख़्स अपने घर का दरवाज़ा बन्द कर लेता है और इस तरह छिप जाता है जैसे सूराख़ में गोह या भट में बिज्जू। ख़ुदा की क़सम ज़लील वही होगा जिसके तुम जैसे मददगार होंगे और जो तुम्हारे ज़रिये तीरअन्दाज़ी करेगा गोया वह सोफ़ारे शिकस्ता और पैकाने निदाष्ता तीर से निशाना लगाएगा ख़ुदा की क़सम तुम सहने ख़ाना में बहुत दिखाई देते हो और परचमे लशकर के ज़ेरे साये बहुत कम नज़र आते हो। मैं तुम्हारी इस्लाह का तरीक़ा जानता हूं और तुम्हें सीधा कर सकता हूं लेकिन क्या करूं अपने दीन को बरबाद करके तुम्हारी इस्लाह नहीं करना चाहता हूं। ख़ुदा तुम्हारे चेहरों को ज़लील करे और तुम्हारे नसीब को बदनसीब करे। तुम हक़ को इस तरह नहीं पहुंचाते हो जिस तरह बातिल की मारेफ़त रखते हो और बातिल को इस तरह बातिल नहीं क़रार देते हो जिस तरह हक़ को ग़लत ठहराते हो।

70-आपका इरशादे गिरामी

(उस सहर के हंगाम जब आपके सरे अक़दस पर ज़रबत लगाई गई)

अभी मैं बैठा हुआ था के अचानक आंख लग गई और ऐसा महसूस हुआ के रसूले अकरम (स 0) के सामने तशरीफ़ फ़रमा हूँ। मैंने अर्ज़ की के मैंने आपकी उम्मत से बेपनाह कजरवी और दुश्मनी का मुशाहेदा किया है , फ़रमाया के बददुआ करो ? तो मैंने यह दुआ की ख़ुदाया मुझे इनसे बेहतर क़ौम दे दे और इन्हें मुझसे सख़्ततर रहनुमा दे दे।

((( यह भी रूयाए सादेक़ा की एक क़िस्म है जहां इन्सान वाक़ेयन यह देखता है और महसूस करता है जैसे ख़्वाब की बातों को बेदारी के आलम में देख रहा हो। रसूले अकरम (स 0) का ख़्वाब में आना किसी तरह की तरदीद और तश्कीक का मुतहम्मल नहीं हो सकता है लेकिन यह मसला बहरहाल क़ाबिले ग़ौर है के जिस वसी ने इतने सारे मसायब बरदाश्त कर लिये और उफ़ तक नहीं की उसने ख़्वाब में रसूले अकरम (स 0) को देखते ही फ़रयाद कर दी और जिस नबी ने सारी ज़िन्दगी मज़ालिम व मसाएब का सामना किया और बददुआ नहीं की , उसने बददुआ करने का हुक्म किस तरह दे दिया ?

हक़ीकते अम्र यह है के हालात उस मन्ज़िल पर थे जिसके बाद फ़रयाद भी बरहक़ थी और बददुआ भी लाज़िम थी। अब यह मौलाए कायनात का कमाले किरदार है के बराहे रास्त क़ौम की तबाही और बरबादी की दुआ नहीं की बल्के उन्हें ख़ुद इन्हीं के नज़रियात के हवाले कर दिया के ख़ुदाया! यह मेरी नज़र में बुरे हैं तो मुझे इनसे बेहतर असहाब दे दे और मैं इनकी नज़र में बुरा हूं तो उन्हें मुझसे बदतर हाकिम दे दे ताके इन्हें अन्दाज़ा हो के बुरा हाकिम क्या होता है ? मौलाए कायनात (अ 0) की यह दुआ फ़िलज़ोर क़ुबूल हो गई और चन्द लम्हों के बाद आपको मासूम बन्दगाने ख़ुदा का जवार हासिल हो गया और शरीर क़ौम से निजात मिल गई।)))

71-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(अहले इराक़ की मज़म्मत के बारे में)

अम्माबाद! ऐ एहले ईराक़ ! बस तुम्हारी मिसाल उस हामला औरत की है जो 9माह तक बच्चे को शिकम में रखे और जब विलादत का वक़्त आए तो साक़ित कर दे और फिर उसका शौहर भी मर जाए और ब्योगी की मुद्दत भी तवील हो जाए के क़रीब का कोई वारिस न रह जाए और दूर वाले वारिस हो जाएं।

ख़ुदा गवाह है के मैं तुम्हारे पास अपने इख़्तेदार से नहीं आया हूं बल्के हालात के जब्र से आया हूं और मुझे यह ख़बर मिली है के तुम लोग मुझ पर झूट का इल्ज़ाम लगाते हो। ख़ुदा तुम्हें ग़ारत करे। मैं किसके खि़लाफ़ ग़लत बयानी करूंगा ? ख़ुदा के खि़लाफ़ ? जबके मैं सबसे पहले उस पर ईमान लाया हूँ। या रसूले ख़ुदा के खि़लाफ़ ? जबके मैंने सबसे पहले उनकी तस्दीक़ की है। ळरगिज़ नहीं! बल्कि यह बात ऐसी थी जो तुम्हारी समझ से इसके अहल नहीं थे। ख़ुदा तुमसे समझे। मैं तुम्हें जवाहर पारे नाप नाप कर दे रहा हूँ और कोई क़ीमत नहीं मांग रहा हूँ। मगर ऐ काश तुम्हारे पास इसका ज़र्फ़ होता। और अनक़रीब तुम्हें इसकी हक़ीक़त मालूम हो जाएगी।

((( दहवल अर्ज़ के बारे में दो तरह के तसव्वुरात पाए जाते हैं। बाज़ हज़रात का ख़याल है के ज़मीन को आफ़ताब से अलग करके फ़िज़ाए बसीत में लुढ़का दिया गया और इसी का नाम दहवल अर्ज़ है और बाज़ हज़रात का कहना है के दहव के मानी फ़र्ष बिछाने के हैं। गोया के ज़मीन को हमवार बनाकर क़ाबिले सुकूनत बना दिया गया और यही दहवल अर्ज़ है। बहरहाल रिवायात में इसकी तारीख़ 25ज़ीक़ादा बताई गई है जिस तारीख़ को सरकारे दो आलम (स 0) हुज्जतुलविदा के लिये मदीने से बरामद हुए थे और तख़लीक़े अर्ज़ की तारीख़ मक़सदे तख़लीक़ से हमआहंग हो गई थी। इस तारीख़ में रोज़ा रखना बेपनाह सवाब का हामिल है और यह तारीख़ साल के उन चार दिनों में शामिल है जिसका रोज़ा अज्र बेहिसाब रखता है। 25ज़ीक़ादा , 17रबीउल अव्वल , 27रजब और 18ज़िलहिज्जा ग़ौर कीजिये तो यह निहायत दरजए हसीन इन्तेख़ाबे क़ुदरत है के पहला दिन वह है जिसमें ज़मीन का फर्श बिछाया गया , दूसरा दिन वह है जब मक़सदे तख़लीक़ कायनात को ज़मीन पर भेजा गया , तीसरा दिन वह है जब इसके मन्सब का एलान करके इसका काम शुरू कराया गया और आखि़री दिन वह है जब इसका काम मुकम्मल हो गया और साहबे मन्सब को “ अकमलतो लकुम दीनेकुम ” की सनद मिल गई।)))

72-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें लोगों को सलवात की तालीम दी गई है और सिफ़ाते ख़ुदा और रसूल (स 0) का ज़िक्र किया गया है)

ऐ ख़ुदा! ऐ फ़र्षे ज़मीन के बिछाने वाले और बलन्दतरीन आसमानों को रोकने वाले और दिलों को इनकी नेक बख़्त या बदबख़्त फ़ितरतों पर पैदा करने वाले , अपनी पाकीज़ा तरीन और मुसलसल बढ़ने वाले बरकात को अपने बन्दे और रसूल हज़रत मोहम्मद (स 0) पर क़रार दे जो सिलसिलए नबूवतों के ख़त्म करने वाले दिलो दिमाग़ के बन्द दरवाज़ों को खोलने वाले , हक़ के ज़रिये हक़ का एलान करने वाले , बातिल के जोश व ख़रोश को दफ़ा करने वाले और गुमराहियों के हमलों का सर कुचलने वाले थे। जो बार जिस तरह इनके हवाले किया गया उन्होंने उठा लिया। तेरे अम्र के साथ क़याम किया। तेरी मर्ज़ी की राह में तेज़ क़दम बढ़ाते रहे , न आगे बढ़ने से इनकार किया और न इनके इरादों में कमज़ोरी आई। तेरी वही को महफ़ूज़ किया तेरे अहद की हिफ़ाज़त की , तेरे हुक्म के निफ़ाज़ की राह में बढ़ते रहे यहां तक के रोशनी की जुस्तजू करने वालों के लिये आगणन रौशन कर दी और कुम करदा राह के लिये रास्ता वाज़ेह कर दिया। इनके ज़रिये दिलों ने फ़ितनों और गुनाहों में ग़र्क़ रहने के बाद भी हिदायत पा ली और इन्होंने रास्ता दिखाने वाले निशानात और वाज़ेह एहकाम क़ायम कर दिये। वह तेरे अमानतदार बन्दे , तेरे पोशीदा उलूम के ख़ज़ानादार , रोज़े क़यामत के लिये तेरे राहे हक़ के साथ भेजे हुए और मख़लूक़ात की तरफ़ तेरे नुमाइन्दे थे। ख़ुदाया इनके लिये अपने सायए रहमत में वसीअतरीन मन्ज़िल क़रार दे दे और इनके ख़ैर को अपने फ़ज़्ल से दुगना , चैगना कर दे। ख़ुदाया इनकी इमारत को तमाम इमारतों से बलन्दतर और इनकी मन्ज़िल को अपने पास बुज़ुर्गतर बना दे। इनके नूर की तकमील फ़रमा और असरे रिसालत के सिले में इन्हें मक़बूल शहादत और पसन्दीदा अक़वाल का इनआम इनायत कर के इनकी गुफ़्तगू हमेशा आदिलाना और इनका फ़ैसला हमेशा हक़ व बातिल के दरमियान हदे फ़ासिल रहा है। ख़ुदाया हमें इनके साथ ख़ुशगवार ज़िन्दगी , नेमात की मन्ज़िल , ख़्वाहिशात व लज़्ज़ात की तकमील के मरकज़ , आराइश व तमानत के मुक़ाम और करामत व शराफ़त के तोहफ़ों की मन्ज़िल पर जमा कर दे।

((( यह इस्लाम का मख़सूस फ़लसफ़ा है जो दुनियादारी के किसी निज़ाम में नहीं पाया जाता है। दुनियादारी का मशहूर व मारूफ़ निज़ाम व उसूल यह है के मक़सद हर ज़रिये को जाएज़ बना देता है। इन्सान को फ़क़त यह देखना चाहिये के मक़सद सही और बलन्द हो। इसके बाद इस मक़सद तक पहुंचने के लिये कोई भी रास्ता इख़्तेयार कर ले इसमें कोई हर्ज और मुज़ाएक़ा नहीं है लेकिन इसलाम का निज़ाम इससे बिल्कुल मुख़्तलिफ़ है , वह दुनिया में मक़सद और मज़हब दोनों का पैग़ाम लेकर आया है। इसने “ इन्नद्दीन ” कहकर एलान किया है के इस्लाम तरीक़ाए हयात है और “ इन्दल्लाह ” कहकर वाज़ेह किया है के इसका हदफ़ हक़ीक़ी ज़ात परवरदिगार है। लेहाज़ा वह न ग़लत मक़सद को मक़सद क़रार देने की इजाज़त दे सकता है और न ग़लत रास्ते को रास्ता क़रार देने की। इसका मन्षा यह है के इसके मानने वाले सही रास्ते पर चलें और इसी रास्ते के ज़रिये मन्ज़िल तक पहुंचें। चुनांचे मौलाए कायनात ने सरकारे दो आलम (स 0) की इसी फ़ज़ीलत की तरफ़ इशारा किया है के जब आपने जाहेलीयत के नक़्क़ारख़ाने में आवाज़े हक़ बलन्द की है लेकिन इस आवाज़ को बलन्द करने का तरीक़ा और रास्ता भी सही इख़्तेयार किया है वरना जाहेलीयत में आवाज़ बलन्द करने का एक तरीक़ा यह भी था के इस क़द्र शोर मचाओ के दूसरे की आवाज़ न सुनाई दे। इस्लाम ऐसे अहमक़ाना अन्दाज़े फ़िक्र की हिमायत नहीं कर सकता है। वह अपने फातेहीन से भी यही मुतालेबा करता है के हक़ का पैग़ाम हक़ के रास्ते से पहुंचाओ , ग़ारतगिरी और लूटमार के ज़रिये नहीं। यह इस्लाम की पैग़ाम रसानी नहीं है। ख़ुदा और रसूल (स 0) के लिये ईज़ारसानी है जिसका जुर्म इन्तेहाई संगीन है और इसकी सज़ा दुनिया व आख़ेरत दोनों की लानत है।))

73-आपका इरशादे गिरामी

(जो मरवान बिन अलहकम से बसरा में फ़रमाया)

कहा जाता है के जब मरवान बिन अलहकम जंग में गिरफ़्तार हो गया तो इमाम हसन (अ 0) व हुसैन (अ 0) ने अमीरूल मोमेनीन (अ 0) से इसकी सिफ़ारिश की और आपने उसे आज़ाद कर दिया तो दोनों हज़रात ने अर्ज़ की के या अमीरूल मोमेनीन (अ 0)! आपकी बैयत करना चाहता है तो आपने फ़रमाया-

क्या उसने क़त्ले उस्मान के बाद मेरी बैअत नहीं की थी ? मुझे इसकी बैअत की कोई ज़रूरत नहीं है , यह एक यहूदी क़िस्म का हाथ है , अगर हाथ से बैअत कर भी लेगा तो रकीक तरीक़े से इसे तोड़ डालेगा। याद रखो इसे भी हुकूमत मिलेगी मगर सिर्फ़ इतनी देर जितनी देर में कुत्ता अपनी नाक चाटता है। इसके अलावा यह चार बेटों का बाप भी है और उम्मते इस्लामिया इससे और इसकी औलाद से बदतरीन दिन देखने वाली है।

74-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जब लोगों ने उस्मान की बैअत करने का इरादा किया)

तुम्हें मालूम है के मैं तमाम लोगों में सबसे ज़्यादा खि़लाफ़त का हक़दार हूँ और ख़ुदा गवाह है के मैं उस वक्त तक हालात का साथ देता रहूंगा जब तक मुसलमानों के मसाएल ठीक रहें और ज़ुल्म सिर्फ़ मेरी ज़ात तक महदूद रहे ताके मैं इसका अज्र व सवाब हासिल कर सकूँ और इसी ज़ेब व ज़ीनते दुनिया से अपनी बेनियाज़ी का इज़हार कर सकूं जिसके लिये तुम सब मरे जा रहे हो।

75-आपका इरशादे गिरामी

(जब आपको ख़बर मिली के बनी उमय्या आप पर ख़ूने उस्मान का इल्ज़ाम लगा रहे हैं)

क्या बनी उमय्या के वाक़ई मालूमात उन्हें मुझ पर इल्ज़ाम तराशी से नहीं रोक सके और क्या जाहिलों को मेरे कारनामे इस इत्तेहाम से बाज़ नहीं रख सके ? यक़ीनन परवरदिगार ने तोहमत व अफतरा के खि़लाफ़ जो नसीहत फ़रमाई है वह मेरे बयान से कहीं ज़्यादा बलीग़ है। मैं बहरहाल इन बेदीनों पर हुज्जत तमाम करने वाला , इन अहद शिकन मुब्तिलाए तशकीक अफ़राद का दुशमन हूँ , और तमाम मुश्तबा मामलात को किताबे ख़ुदा पर पेश करना चाहिये और रोज़े क़यामत बन्दों का हिसाब उनके दिलों के मज़मरात (नीयतों) ही पर होगा।

((( आले मोहम्मद (स 0) के इस किरदार का तारीख़े कायनात में कोई जवाब नहीं है , इन्होंने हमेशा फ़ज़्लो करम से काम लिया है। हद यह है के अगर माज़ल्लाह इमाम हसन (अ 0) व इमाम हुसैन (अ 0) की सिफ़ारिश को मुस्तक़बिल के हालात से नावाक़फ़ीयत भी तसव्वुर कर लिया जाए तो इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ 0) के तर्ज़े अमल को क्या कहा जा सकता है जिन्होंने वाक़ेअन करबला के बाद भी मरवान के घरवालों को पनाह दी है और इस बेहया ने हज़रत से पनाह की दरख़्वास्त की है। दरहक़ीक़त यह भी यहूदियत की एक शाख़ है के वक़्त पड़ने पर हर एक के सामने ज़लील बन जाओ और काम निकलने के बाद परवरदिगार की नसीहतों की भी दरहक़ीक़त परवाह न करो। अल्लाह दीने इस्लाम को हर दौर की यहूदियत से महफ़ूज़ रखे।

अमीरूल मोमेनीन (अ 0) का मक़सद यह है के खि़लाफ़त मेरे लिये किसी हदफ़ और मक़सदे हयात का मरतबा नहीं रखती है। यह दरहक़ीक़त आम इन्सानियत के लिये सुकून व इत्मीनान फ़राहम करने का एक ज़रिया है। लेहाज़ा अगर यह मक़सद किसी भी ज़रिये से हासिल हो गया तो मेरे लिये सुकूत जाएज़ हो जाएगा और मैं अपने ऊपर ज़ुल्म बरदाश्त कर लूंगा। दूसरा फ़िक़रा इस बात की दलील है के बातिल खि़लाफ़त से मुकम्मल अद्ल व इन्साफ़ और सुकून व इत्मीनान की तवक़्क़ो मुहाल है लेकिन मौलाए कायनात (अ 0) का मनशा यह है के अगर ज़ुल्म का निशाना मेरी ज़ात होगी तो बरदाश्त करूंगा लेकिन अवामुन्नास होंगे और मेरे पास माद्दी ताक़त होगी तो हरगिज़ बरदाश्त न करूंगा के यह अहदे इलाही के खि़लाफ़ है।)))

76-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें अमले सालेह पर आमादा किया गया है)

ख़ुदा रहमत नाज़िल करे उस बन्दे पर जो किसी हिकमत को सुने तो महफ़ूज़ कर ले और उसे किसी हिदायत की दावत दी जाए तो उससे क़रीबतर हो जाए और किया राहनुमा से वाबस्ता हो जाए तो निजात हासिल कर ले। अपने परवरदिगार को हर वक़्त नज़र में रखे और गुनाहों से डरता रहे। ख़ालिस आमाल को आगे बढ़ाए और नेक आमाल करता रहे। क़ाबिले ज़ख़ीरा सवाब हासिल करे। क़ाबिले परहेज़ चीज़ों से इज्तेनाब करे। मक़सद को निगाहों में रखे। अज्र समेट ले। ख़्वाहिशात पर ग़ालिब आ जाए और तमन्नाओं को झुटला दे। सब्र को निजात का मरकब बना ले और तक़वा को वफ़ात का ज़ख़ीरा क़रार दे ले। रौशन रास्ते पर चले और वाज़ेअ शाहराह को इख़्तेयार कर ले। मोहलते हयात को ग़नीमत क़रार दे और मौत की तरफ़ ख़ुद सबक़त करे और अमल का ज़ादे राह लेकर आगे बढ़े।

77-आपका इरशादे गिरामी

(जब सईद बिन अलआस ने आपको आपके हक़ से महरूम कर दिया)

यह बनी उमय्या मुझे मीरासे पैग़म्बर (स 0) को भी थोड़ा थोड़ा करके दे रहे हैं हालांके अगर मैं ज़िन्दा रह गया तो इस तरह झाड़ कर फेंक दूंगा जिस तरह क़साब गोश्त के टुकड़े से मिट्टी को झाड़ देता है।

सय्यद रज़ी- बाज़ रिवायात में “ वज़ाम तरबा ” के बजाए “ तराबुल वज़मा ” है जो मानी के एतबार से मअकूस तरकीब है। “ लैफ़ू क़ूननी ” का मफ़हूम है माल का थोड़ा थोड़ा करके देना जिस तरह ऊँट का दूध निकाला जाता है। फवाक़ ऊँट का एक मरतबा का दुहा हुआ दूध है और वज़ाम वज़मा की जमा है जिसके मानी टुकड़े के हैं यानी जिगर या आँतों का वह टुकड़ा जो ज़मीन पर गिर जाए।

((( इसमें कोई शक नहीं है के रहमते इलाही का दाएरा बेहद वसीअ है और मुस्लिम व काफ़िर , दीनदार व बेदीन सबको शामिल है। यह हमेशा ग़ज़बे इलाही से आगे-आगे चलती है। लेकिन रोज़े क़यामत इस रहमत का इस्तेहक़ाक़ आसान नहीं है। वह हिसाब का दिन है और ख़ुदाए वाहिद क़हार की हुकूमत का दिन है। लेहाज़ा उस दिन रहमते ख़ुदा के इस्तेहक़ाक़ के लिये इन तमाम चीज़ों को इख़्तेयार करना होगा जिनकी तरफ़ मौलाए कायनात ने इशारा किया है और इनके बग़ैर रहमतुल लिल आलमीन का कलमा और इनकी मोहब्बत का दावा भी काम नहीं आ सकता है। दुनिया के एहकाम अलग हैं और आख़ेरत के एहकाम अलग हैं। यहां का निज़ामे रहमत अलग है और वहां का निज़ामे मकाफ़ात व मजाज़ात अलग। कितनी हसीन तशबीह है के बनी असया की हैसियत इस्लाम में न जिगर की है न मेदे की और न जिगर के टुकड़े की। यह वह गर्द हैं जो अलग हो जाने वाले कपड़े से पहले चिपक जाती है लेकिन गोश्त का इस्तेमाल करने वाला इसे भी बरदाश्त नहीं करता है और इसे झाड़ने के बाद ही ख़रीदार के हवाले करता है ताके दुकान बदनाम न होने पाए , और ताजिर नातजुर्बेकार और बदज़ौक़ न कहा जा सके।)))

78-आपकी दुआ

(जिसे बराबर तकरार फ़रमाया करते थे)

ख़ुदाया मेरी ख़ातिर उन चीज़ों को माफ़ कर दे जिन्हें तू मुझसे बेहतर जानता है और अगर फिर इन उमूर की तकरार हो तो तू भी मग़फ़ेरत की तकरार फ़रमा। ख़ुदाया उन वादों के बारे में भी मग़फ़िरत फ़रमा जिनका तुझ से वादा किया गया लेकिन इन्हें दफ़ा न किया जा सका। ख़ुदाया उन आमाल की भी मग़फ़ेरत फ़रमा जिनमें ज़बान से तेरी क़ुरबत इख़्तेयार की गई लेकिन दिल ने इसकी मुख़ालेफ़त ही की। ख़ुदाया आँखों के तन्ज़िया इशारों , दहन के नाशाइस्ता कलेमात , दिल की बेजा ख़्वाहिशात और ज़बान की हरज़ह सराइयों को भी माफ़ फ़रमा दे।

79-आपका इरशादे गिरामी

( जब जंगे ख़वारिज के लिये निकलते वक़्त बाज़ असहाब ने कहा के अमीरूल मोमेनीन (अ 0) इस सफ़र के लिये कोई दूसरा वक़्त इख़्तेयार फ़रमाएं। इस वक़्त कामयाबी के इमकानात नहीं हैं के इल्मे नुजूम के हिसाबात से यही अन्दाज़ा होता है।)

क्या तुम्हारा ख़याल यह है के तुम्हें वह साअत मालूम है जिसमें निकलने वाले से बलाएं टल जाएंगी और तुम उस साअत से डराना चाहते हो जिसमें सफ़र करने वाला नुक़सानात में घिर जाएगा ? याद रखो जो तुम्हारे इस बयान की तस्दीक़ करेगा वह क़ुरान की तकज़ीब करने वाला होगा और महबूब चीज़ो के हुसूल और नापसन्दीदा कामो के दफ़ा करने में मददे ख़ुदा से बे नियाज़ हो जाएगा। क्या तुम्हारी ख़्वाहिश यह है के तुम्हारे अफ़आल के मुताबिक़ अमल करने वाला परवरदिगार के बजाए तुम्हारी ही तारीफ़ करे इसलिये के तुमने अपने ख़याल में उसे उस साअत का पता बता दिया है जिसमें मनफ़अत हासिल की जाती है और नुक़सानात से महफ़ूज़ रहा जाता है।

ऐ लोगो! ख़बरदार नुजूम का इल्म मत हासिल करो मगर उतना ही जिससे बरोबहर में रास्ते दरयाफ़्त किये जा सकें। के यह इल्म कहानत की तरफ़ ले जाता है और मुनज्जिम भी एक तरह का काहन (ग़ैब की ख़बर देने वाला) हो जाता है जबके काहन जादूगर जैसा होता है और जादूगर काफ़िर जैसा होता है और काफ़िर का अन्जाम जहन्नम है। चलो , नामे ख़ुदा लेकर निकल पड़ो।

((( वाज़ेह रहे के इल्मे नुजूम हासिल करने से मुराद उन असरात व नताएज का मालूम करना है जो सितारों की हरकात के बारे में इस इल्म के मुद्दई हज़रात ने बयान किये हैं वरना असल सितारों के बारे में मालूमात हासिल करना कोई ऐब नहीं है। इससे इन्सान के ईमान व अक़ीदे में भी इस्तेहकाम पैदा होता है और बहुत से दूसरे मसाएल भी हल हो जाते हैं और सितारों का वह इल्म जो उनके हक़ीक़ी असरात पर मबनी है एक फ़ज़्ल व शरफ़ है और इल्मे परवरदिगार का एक शोबा है वह जिसे चाहता है इनायत कर देता है। इमाम अलैहिस्सलाम ने अव्वलन इल्मे नजूम को कहानत का एक शोबा क़रार दिया के ग़ैब की ख़बर देने वाले अपने अख़बार के मुख़्तलिफ़ माख़ज़ व मदारक बयान करते हैं। जिनमें से एक इल्मे नजूम भी है। इसके बाद ज बवह ग़ैब की ख़बर में बयान कर देते हैं तो उन्हें क़ब्रों के ज़रिये इन्सान के दिल व दिमाग़ पर मुसल्लत हो जाना चाहते हैं जो जादूगरी का एक शोबा है और जादूगरी इन्सान को यह महसूस कराना चाहती है के इस कायनात में अमल दख़ल हमारा ही है और इस जादू का चढ़ाना और उतारना हमारे ही बस का काम है , दूसरा कोई यह कारनामा अन्जाम नहीं दे सकता है और इसी का नाम कुफ्ऱ है।)))

80-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जंगे जमल से फ़राग़त के बाद औरतों की मज़म्मत के बारे में)

लोगों! याद रखो के औरतें ईमान के ऐतबार से , मीरास के हिस्से के ऐतबार से और अक़्ल के ऐतबार से नाक़िस होती हैं। ईमान के ऐतबार से नाक़िस होने का मतलब यह है के वह अय्यामे हैज़ में नमाज़ रोज़े से बैठ जाती हैं और अक़्लों के ऐतबार से नाक़िस होने का मतलब यह है के इनमें दो औरतों की गवाही एक मर्द के बराबर होती है। हिस्से की कमी यह है के उन्हें मीरास में हिस्सा मर्दों के आधे हिस्से के बराबर मिलता है। लेहाज़ा तुम बदतरीन औरतों से बचते रहो और बेहतरीन औरतों से भी होशियार रहो और ख़बरदार नेक काम भी इनकी इताअत की बिना पर अन्जाम न देना के उन्हें बुरे काम का हुक्म देने का ख़याल पैदा हो जाए।

81-आपका इरशादे गिरामी

(ज़ोहद के बारे में)

ऐ लोगो! ज़ोहद उम्मीदों के कम करने , नेमतों का शुक्रिया अदा करने और मोहर्रमात से परहेज़ करने का नाम है। अब अगर यह काम तुम्हारे लिये मुश्किल हो जाए तो कम अज़ कम इतना करना के हराम तुम्हारी क़ूवते बरदाश्त पर ग़ालिब न आने पाए और नेमतों के मौक़े पर शुक्रिया को फ़रामोश न कर दुनिया के परवरदिगार ने निहायत दरजए वाज़े और रौशन दलीलों और हुज्जत तमाम करने वाली किताबों के ज़रिये तुम्हारे हर बहाना का ख़ातमा कर दिया है।


82-आपका इरशादे गिरामी

(दुनिया के सिफ़ात के बारे में)

मैं उस दुनिया के बारे में क्या कहूँ जिसकी इब्तिदा रन्ज व ग़म और इन्तेहा फ़ना व पस्ती है। इसके हलालें हिसाब में है और हराम में अक़ाब। जो इसमें ग़नी हो जाए वह आज़माइषों में मुब्तिला हो जाए और जो फ़क़ीर हो जाए वह रन्जीदा व अफ़सरदा हो जाए। जो इसकी तरफ़ दौड़ लगाए उसके हाथ से निकल जाए और जो मुंह फेर कर बैठ रहे उसके पास हाज़िर हो जाए। जो इसको ज़रिया बनाकर आगे देखे उसे बीना बना दे और जो इसको मन्ज़ूरे नज़र बना ले उसे अन्धा बना दे।

सय्यद रज़ी- अगर कोई शख़्स हज़रत के उस इरशादे गिरामी “ मन अबसर बेहा बसरता ” में ग़ौर करे तो अजीब व ग़रीब मानी और दूर रस हक़ाएक़ का इदराक कर लेगा जिनकी बलन्दियों और गहराइयों का इदराक मुमकिन नहीं है। ख़ुसूसियत के साथ अगर दूसरे फ़िक़रे “ मन अबसर एलैहा आमतह ” को मिला लिया जाए तो “ अबसर बेहा ” और “ अबसर एलैहा ” का र्फ़क़ नुमायां हो जाएगा और अक़्ल मदहोश हो जाएगी।

((( इस ख़ुतबे में इस नुक्ते पर नज़र रखना ज़रूरी है के यह जंगे जमल के बाद इरशाद फ़रमाया गया है और इसके मफ़ाहिम में कुल्लियात की तरह सूरते हाल और तजुर्बात का भी दख़ल हो सकता है। यानी यह कोई लाज़िम नहीं है के इसका इतलाक़ हर औरत पर हो जाए। दुनिया में ऐसी ख़ातून भी हो सकती है जो निसवानी अवारिज़ से पाक हो। इसकी गवाही बस क़ुरान तन्हा क़ाबिले क़ुबूल हो और वह अपने बाप की तन्हा वारिस हो। ज़ाहिर है के इस ख़ातून में किसी तरह का नुक़्स नहीं पाया जाता है जिसे जनाबे फ़ातेमा (अ 0) और ऐसी औरत भी हो सकती है जिसमें सारे नक़ाएस पाए जाते हों और इन फ़ितरी नक़ाएस के साथ किरदारी और ईमानी नक़ाएस भी हों के यह औरत हर एतेबार से क़ाबिले लानत व मज़म्मत हो। क़वानीन का दारोमदार न क़िस्मे अव्वल पर हो सकता है और न क़िस्मे दोम पर। क़वानीन का इतलाक़ दरमियानी क़िस्म पर होता है जिसमें किसी तरह का इम्तियाज़ न पाया जाता हो और सिर्फ़ फ़ितरते निसवानी कार फ़रमाई हो और अमीरूल मोमेनीन (अ 0) ने इसी क़िस्म के बारे में इरशाद फ़रमाया है वरना अगर सिर्फ़ जंगे जमल की बिना पर ग़ैज़ व ग़ज़ब होता तो मर्दों के खि़लाफ़ भी बयान देते जिन्होंने उम्मुल मोमेनीन की इताअत की थी या उन्हें भड़काया था। फिर अमीरूल मोमेनीन (अ 0) इमाम मासूम हैं कोई जज़्बाती इन्सान नहीं हैं और इनसे पहले रसूले अकरम (स 0) भी यही बात फ़रमा चुके हैं। अलबत्ता यह कहा जा सकता है के इस एलान के लिये एक मुनासिब मौक़ा हाथ आ गया जहां अपनी बात को बख़ूबी वाज़ेअ किया जा सकता है और औरत के इत्तेबाअ के नताएज से बाख़बर किया जा सकता है।)))

83-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(इस अजीब व ग़रीब ख़ुतबे को ख़ुत्बए ग़र्रा कहा जाता है)

इस ख़ुतबे में परवरदिगार के सिफ़ात , तक़वा की नसीहत , दुनिया से बेज़ारी का सबक़ , क़यामत के हालात , लोगों की बेरूख़ी पर तम्बीह और फिर यादे ख़ुदा दिलाने में अपनी फ़ज़ीलत का ज़िक्र किया गया है। सारी तारीफ़े उस अल्लाह के लिये हैं जो अपनी ताक़त की बिना पर बलन्द और अपने एहसानात की बिना पर बन्दों से क़रीबतर है। वह हर फ़ाएदा और फ़ज़ल का अता करने वाला और हर मुसीबत और रन्ज का टालने वाला है। मैं इसकी करम नवाज़ियों और नेमतों की फ़रावानियों की बिना पर इसकी तारीफ़ करता हूँ और इस पर ईमान रखता हूँ के वही अव्वल और ज़ाहिर है और उसीसे हिदायत तलब करता हूँ के वही क़रीब और हादी है। उसी से मदद चाहता हूँ के वही क़ादिर और क़ाहिर है और उसी पर भरोसा करता हूँ के वही काफ़ी और नासिर है।

और मैं गवाही देता हूँ के हज़रत मोहम्मद (स 0) उसके बन्दे और रसूल हैं। उन्हें परवरदिगार ने अपने हुक्म को नाफ़िज़ करने , अपनी हुज्जत को तमाम करने और अज़ाब की ख़बरें पेश करने के लिये भेजा है।

बन्दगाने ख़ुदा! मैं तुम्हें इस ख़ुदा से डरने की दावत देता हूँ जिसने तुम्हारी हिदायत के लिये मिसालें बयान की हैं। तुम्हारी ज़िन्दगी के लिये मुद्दत मुअय्यन की है। तुम्हें मुख़्तलिफ़ क़िस्म के लिबास पिन्हाए हैं। तुम्हारे लिये अस्बाबे माशियत को फ़रावां कर दिया है। तुम्हारे आमाल का मुकम्मल अहाता कर रखा है और तुम्हारे लिये जज़ा का इन्तेज़ाम कर दिया है। तुम्हें मुकम्मल नेमतों और वसीअतर अतीयों से नवाज़ा है और मवस्सर दलीलों के ज़रिये अज़ाबे आख़ेरत से डराया है। तुम्हारे आदाद को शुमार कर लिया है और तुम्हारे लिये इस इम्तेहानगाह और मक़ामे इद्दत में मुद्दतें मुअय्यन कर दी हैं। यहीं तुम्हारा इम्तेहान लिया जाएगा और इसी के अक़वाल व आमाल पर तुम्हारा हिसाब किया जाएगा।

((( यूँ तो अमीरूल मोमेनीन (अ 0) के किसी भी ख़ुतबे की तारीफ़ करना सूरज को चिराग़ दिखाने के मुतरादिफ़ है लेकिन हक़ीक़त अम्र यह है के यह ख़ुत्बा “ ख़ुत्बए ग़र्रा ” कहे जाने के क़ाबिल है जिसमें इस क़द्र हक़ाएक़ व मआरेफ और मानी व मफ़ाहिम को जमा कर दिया गया है के इनका शुमार करना भी ताक़ते बशर से बालातर है। आग़ाज़े ख़ुतबे में मालिके कायनात के बज़ाहिर दो तज़ाद सिफ़ात व कमालात का ज़िक्र किया गया है के वह अपनी ताक़त के एतबार से इन्तेहाई बलन्दतर है लेकिन इसके बाद भी बन्दों से दूर नहीं है इसलिये के हर आन अपने बन्दों पर ऐसा करम करता रहता है के यह करम उसे बन्दों से क़रीबतर बनाए हुए है और उसे दूर नहीं होने देता है। लफ़्ज़ “ बहोला ” में इस नुक्ते की तरफ़ भी इशारा है के इसकी बलन्दी किसी वसीले और ज़रिये की बुनियाद पर नहीं है बल्कि यह अपनी ज़ाती ताक़त और क़ुदरत का नतीजा है वरना इसके अलावा हर एक की बलन्दी इसके फ़ज़्ल व करम से वाबस्ता है और इसके बाद बग़ैर बलन्दी का कोई इमकान नहीं है। वह अगर चाहे तो बन्दे को क़ाब क़ौसैन की मन्ज़िलों तक बलन्द कर दे “ इसरा बेअब्देही ” और अगर चाहे तो “ साहबे मेराज ” के कान्धों पर बलन्द कर दे “ वअलीयुन वाज़ेअ अक़दाम- फ़ी महल्ल वज़अल्लाह यदह ” । इसके बाद पैग़म्बरे इस्लाम (स 0) की बअसत के तीन बुनियादी मक़ासिद की तरफ़ इशारा किया गया है के इस बअसत का असल मक़सद यह था के इलाही एहकाम नाफ़िज़ हो जाएं। बन्दों पर हुज्जत तमाम हो जाए और उन्हें क़यामत में पेश आने वाले हालात से क़ब्ल अज़ वक़्त बाख़बर कर दिया जाए के यह काम नुमाइन्दाए परवरदिगार के अलावा कोई दूसरा अन्जाम नहीं दे सकता है और यह ख़ुदाई नुमाइन्दगी के फ़वाएद में सबसे अज़ीमतर फ़ाएदा है जिसकी बिना पर इन्सान रिसालते इलाहिया से किसी वक़्त भी बेनियाज़ नहीं हो सकता है।)))

याद रखो इस दुनिया का सरचश्मा गन्दा और इसका घाट गिल आलूद है। इसका मन्ज़र ख़ूबसूरत दिखाई देता है। लेकिन अन्दर के हालात इन्तेहाई दरजा ख़तरनाक हैं। यह दुनिया एक मिट जाने वाला धोका एक बुझ जाने वाली रोशनी , एक ढल जाने वाला साया और एक गिर जाने वाला सहारा है। जब इससे नफ़रत करने वाला मानूस हो जाता है और इसे बुरा समझने वाला मुतमईन हो जाता है तो यह अचानक अपने पैरों को पटकने लगती है और आशिक़ को अपने जाल में गिरफ़्तार कर लेती है और फिर अपने तीरों का निशाना बना लेती है। इन्सान की गरदन में मौत का फन्दा डाल देती है और उसे खींच कर तंगी , मरक़द और वहशते मन्ज़िल की तरफ़ ले जाती है जहां वह अपना ठिकाना देख लेता है और अपने आमाल का मुआवज़ा हासिल कर लेता है और यूंही यह सिलसिला नस्लों में चलता रहता है के औलाद बुज़ुर्गों की जगह पर आ जाती है। न मौत चीरा दस्तियों से बाज़ आती है और न आने वाले अफ़राद गुनाहों से बाज़ आते हैं। पुराने लोगों ने नक़्शे क़दम पर चलते रहते हैं और तेज़ी के साथ अपनी आख़री मन्ज़िले इन्तेहा व फ़ना की तरफ़ बढ़ते रहते हैं।

यहाँ तक के जब तमाम मामलात ख़त्म हो जाएंगे और तमाम ज़माने बीत जाएंगे और क़यामत का वक़्त क़रीब आ जाएगा तो उन्हें क़ब्रों के गोशों , परिन्दों के घोसलों , दरिन्दों के के भटों और हलाकत की मन्ज़िलों से निकाला जाएगा। उसके अम्र की तरफ़ तेज़ी से क़दम बढ़ाते हुए और अपनी वादागाह की तरफ़ बढ़ते हुए , गिरोह दर गिरोह ख़ामोश सफ़ बस्ता और इस्तादा निगाहे क़ुदरत इन पर हावी और दाई इलाही की आवाज़ इनके कानों में , बदन पर बेचारगी का लिबास और ख़ुद सिपर्दगी व ज़िल्लत की कमज़ोरी ग़ालिब , तदबीरें गुम , उम्मीदें मुनक़ता , दिल मायूसकुन ख़ामोशी के साथ बैठे हुए।

((( एक-एक लफ़्ज़ पर ग़ौर किया जाए और दुनिा की हक़ीक़त से आशनाई पैदा की जाए। सूरते हाल यह है के यह एक धोका है जो रहने वाला नहीं है। एक रौशनी है जो बुझ जाने वाली है। एक साया है जो ढल जाने वाला है और एक सहारा है जो गिर जाने वाला है। इन्साफ़ से बताओ क्या ऐसी दुनिया भी दिल लगाने के क़ाबिल और एतबार करने के लाहक़ है , हक़ीक़ते अम्र यह है के दुनिया से इष्क़ व मोहब्बत सिर्फ़ जेहालत और नावाक़फ़ीयत का ख़ुत्बा है वरना इन्सान की हक़ीक़त व बेवफ़ाई से बाख़बर हो जाए तो तलाक़ दिये बग़ैर नहीं रह सकता है। क़यामत यह है के इन्सान दुनिया की बेवफ़ाई , मौत की चीरादस्ती का बराबर मुशाहेदा कर रहा है लेकिन इसके बावजूद कोई इबरत हासिल करने वाला नहीं है और हर आने वाला दौरे गुज़िश्ता दौर का अन्जाम देखने के बाद भी उसी रास्ते पर चल रहा है। यह हक़ीक़त आम इन्सानों की ज़िन्दगी में वाज़ेअ न भी हो तो ज़ालिमों और सितमगारों की ज़िन्दगी में सुबह व शाम होती रहती है के हर सितमगर अपने पहले वाले सितमगरों का अन्जाम देखने के बाद भी उसी रास्ते पर चल रहा है और हर मसलए हयात का हल ज़ुल्म व सितम के अलावा किसी और चीज़ को नहीं क़रार देता है। ख़ुदा जाने इन ज़ालिमों की आँखें कब खुलेंगी और यह अन्धा इन्सान कब बीना बनेगा।

मौलाए कायनात ही ने सच फ़रमाया था के “ सारे इन्सान सो रहे हैं जब मौत आ जाएगी तो बेदार हो जाएंगे ’ यानी जब तक आंख खुली रहेगी बन्द रहेगी और जब बन्द हो जाएगी तो खुल जाएगी। अस्तग़फ़ेरूल्लाह रब्बी वातूबो इलैह)))

और आवाज़ें दब कर ख़ामोश हो जाएंगी , पसीना मुंह में लगाम लगा देगा और ख़ौफ़ अज़ीम होगा। कान उस पुकारने वाले की आवाज़ से लरज़ उठेंगे जो आख़ेरी फ़ैसला सुनाएगा और आमाल का मुआवज़ा देने और आख़ेरत के अक़ाब या सवाब के हुसूल के लिये आवाज़ देगा। तुम वह बन्दे हो जो उसके इक़तेदार के इज़हार के लिये पैदा हुए हो और इसके ग़लबे व तसल्लत के साथ उनकी तरबीयत हुई है। नज़अ के हंगाम इनकी रूहें क़ब्ज़ कर ली जाएंगी और उन्हें क़ब्रों के अन्दर छिपा दिया जाएगा। यह ख़ाक के अन्दर मिल जाएंगे और फिर अलग अलग उठाए जाएंगे। उन्हें आमाल के मुताबिक़ बदला दिया जाएगा और हिसाब की मंज़िल में अलग-अलग कर दिया जाएगा। उन्हें दुनिया में अज़ाब से निकलने का रास्ता तलाश करने के लिये मोहलत दी जा चुकी है और उन्हें रोशन रास्ते की हिदायत की जा चुकी है। उन्हें मरज़ीए ख़ुदा के हुसूल का मौक़ा भी दिया जा चुका है और इनकी निगाहों से शक के परदे भी उठाए जा चुके हैं। उन्हें मैदाने अमल में आज़ाद भी छोड़ दिया जा चुका है ताके आख़ेरत की दौड़ की तैयारी कर लें और सोच समझ कर मन्ज़िल की तलाश कर लें और इतनी मोहलत पा लें जितनी फ़वाएद के हासिल करने और आइन्दा मन्ज़िल का सामान मुहैया करने के लिये ज़रूरी होती है। हाए यह किस क़द्र सही मिसालें और शिफ़ा बख़्श नसीहतें हैं अगर इन्हें पाकीज़ा दिल , सुनने वाले कान , मज़बूत राएं और होशियार अक़लें नसीब हो जाएं। लेहाज़ा अल्लाह से डरो उस शख़्स की तरह जिसने नसीहतों को सुना तो दिल में खुशुअ पैदा हो गया और गुनाह किया तो फ़ौरन एतराफ़ कर लिया और ख़ौफ़े ख़ुदा पैदा हो गया तो अमल शुरू कर दिया।

((( इन्सान को यह याद रखना चाहिए के न इसकी तख़लीक़ इत्तेफ़ाक़ात का नतीजा है और न इसकी ज़िन्दगी इख़्तेयारात का मजमुआ। वह एक ख़ालिक़े क़दीर की क़ुदरत के नतीजे में पैदा हुआ है और एक हकीम ख़बीर के इख़्तेयारात के ज़ेरे असर ज़िन्दगी गुज़ार रहा है। एक वक़्त आएगा जब फ़रिश्तए मौत इसकी रूह क़ब्ज़ कर लेगा और उसे ज़मीन के ऊपर से ज़मीन के अन्दर पहुंचा दिया जाएगा और फिर एक दिन तने तन्हा क़ब्र से निकाल के मन्ज़िले हिसाब में लाकर खड़ा कर दिया जाएगा और उसे उसके आमाल का मुकम्मल मुआवज़ा दे दिया जाएगा और यह काम ग़ैर आदिलाना नहीं होगा इस लिये के उसे दुनिया में अज़ाब से बचने और रज़ाए ख़ुदा हासिल करने की मोहलत दी जा चुकी है। उसे तौबा का रास्ता भी बताया जा चुका है और अमल के मैदान की भी निशानदेही की जा चुकी है और इसकी निगाहों से शक के परदे भी उठाए जा चुके हैं और उसे मैदाने अमल में दौड़ने का मौक़ा भी दिया जा चुका है। उसे इस इन्सान जैसी मोहलत भी दी जा चुकी है जो रोशनी में अपने मद्दआ को तलाश करता है के एक तरफ़ यह भी ख़तरा रहता है के तेज़ रफ़तारी में मक़सद से आगे न निकल जाए और एक तरफ़ यह भी एहसास रहता है के कहीं चिराग़ बुझ न जाए और इस तरह इसकी रोशनी इन्तेहाई मोहतात होती है।

इसमें कोई शक नहीं है के मालिके कायनात की बयान की हुई मिसालें साएब व सही और इसकी नसीहतें सेहतमन्द और शिफ़ाबख़्श हैं लेकिन मुश्किल यह है के कोई नुस्क़ाए शिफ़ा सिर्फ़ नुस्क़े की हद तक कार आमद नहीं होता है बल्कि इसका इस्तेमाल करना और इस्तेमाल के साथ परहेज़ करना भी ज़रूरी होता है और इन्सानों में इसी शर्त की कमी है। नसीहतों से फ़ाएदा उठाने के लिये चार अनासिर का होना लाज़मी है। सुनने वाले कान हों , तय्यबो ताहिर दिल हों , राय में इस्तेहकाम हो और फ़िक्र में होशियारी हो , यह चारों अनासिर नहीं हैं तो नसीहतों का कोई फ़ाएदा नहीं हो सकता है और आलमे बशरीयत की कमज़ोरी ही है के इसमें उन्हीं अनासिर में से कोई न कोई अनसर कम हो जाता है और वह मवाएज़ व नसातेह के असरात से महरूम रह जाता है।)))

आख़ेरत से डरा तो अमल की तरफ़ सबक़त की , क़यामत का यक़ीन पैदा किया तो बेहतरीन आमाल अन्जाम दिये , इबरत दिलाई गई तो इबरत हासिल कर ली , ख़ौफ़ दिलाया गया तो डर गया , रोका गया तो रूक गया , सदाए हक़ पर लब्बैक कही तो इसकी तरफ़ मुतवज्जो हो गया और मुड़कर आ गया तो तौबा कर ली , बुज़ुर्गों की इक़तेदा की तो उनके नक़्शे क़दम पर चला , मन्ज़रे हक़ दिखाया गया तो देख लिया। तलबे हक़ में तेज़ रफ़तारी से बढ़ा और बातिल से फ़रार कर निजात हासिल कर ली। अपने लिये ज़ख़ीरए आख़ेरत जमा कर लिया और अपने बातिन को पाक कर लिया। आख़ेरत के घर को आबाद किया और ज़ादे राह को जमा कर लिया उस दिन के लिये जिस दिन यहां से कूच करना है और आख़ेरत का रास्ता इख़्तेयार करना है और आमाल का मोहताज होना है और महले फ़क़्र की तरफ़ जाना है और हमेशा के घर के लिये सामान आगे आगे भेज दिया।

अल्लाह के बन्दों! अल्लाह से डरो इस जहत की ग़र्ज़ से जिसके लिये तुमको पैदा किया गया है और इसका ख़ौफ़ पैदा करो , उस तरह जिस तरह उसने तुम्हें अपने अज़मत का ख़ौफ़ दिलाया है और इस अज्र का इस्तेहक़ाक़ पैदा करो जिसको उसने तुम्हारे लिये मुहैया किया है उसके सच्चे वादे के पुरा करने और क़यामत के हौल से बचने के मुतालबे के साथ। उसने तुम्हें कान इनायत किये हैं ताके ज़रूरी बातों को सुनें और आंखें दी हैं ताके बे बसरी में रौशनी अता करें और जिस्म के वह हिस्से दिये हैं जो मुख़्तलिफ़ आज़ा को समेटने वाले हैं और इनके पेच व ख़म के लिये मुनासिब हैं , सूरतों की तरकीब और उम्रों की मुद्दत के एतबार से ऐसे बदनों के साथ जो अपनी ज़रूरतों को पूरा करने वाले हैं और ऐसे दिलों के साथ जो अपने रिज़्क़ की तलाश में रहते हैं इसकी अज़ीमतरीन नेमतों , एहसानमन्द बनाने वाली बख़्िशषों और सलामती के हसारों के दरम्यान , इसने तुम्हारे लिये वह उम्रें क़रार दी हैं जिनको तुमसे मख़ज़ी कर रखा है और तुम्हारे लिये माज़ी में गुज़र जाने वालो के आसार में इबरतें फ़राहम कर दी हैं , वह लोग जो अपने ख़त व नसीब से लुत्फ़ व अन्दोज़ हो रहे थे और हर बन्धन से आज़ाद थे लेकिन मौत ने उन्हें उम्मीदों की तकमील से पहले ही गिरफ़्तार कर लिया और अजल की हलाकत सामानियों ने उन्हें हुसूले मक़सद से अलग कर दिया। उन्होंने बदन की सलामती के वक़्त कोई तैयारी नहीं की थी और इब्तेदाई औक़ात में कोई इबरत हासिल नहीं की थी , तो क्या जवानी की तरो ताज़ा उम्रे रखने वाले बुढ़ापे में कमर झुक जाने का इन्तेज़ार कर रहे हैं और क्या सेहत की ताज़गी रखने वाले मुसीबतों और बीमारियों के हवादिस का इन्तेज़ार कर रहे हैं और क्या बक़ा की मुद्दत रखने वाले फ़ना के वक़्त के मन्ज़र हैं जब के वक़्ते ज़वाल क़रीब होगा और इन्तेक़ाल की साअत नज़दीकतर होगी।

((( एक मर्दे मोमिन की ज़िन्दगी का हसीन तरीन और पाकीज़ातरीन नक़्षा यही है लेकिन यह अलफ़ाज़ फ़साहत व बलाग़त से लुत्फ़अन्दोज़ होने के लिये नहीं हैं। ज़िन्दगी पर मुन्तबिक़ करने के लिये और ज़िन्दगी का इम्तेहान करने के लिये हैं के क्या वाक़ेअन हमारी ज़िन्दगी में यह हालात और कैफ़ियात पाए जाते हैं। अगर ऐसा है तो हमारी आक़बत बख़ैर है और हमें निजात की उम्मीद रखना चाहिये और अगर ऐसा नहीं है तो हमें इस दारे इबरत में गुज़िश्ता लोगों के हालात से इबरत हासिल करनी चाहिये और अब से इस्लाह दुनिया व आखि़रत के अमल में लग जाना चाहिये। ऐसा न हो के मौत अचानक नाज़िल हो जाए और वसीयत करने का मौक़ा भी फ़राहम न हो सके। कितना बलीग़ फ़िक़रा है मौलाए कायनात (अ 0) का के गुज़िश्ता लोग हर क़ैद व बन्द और हर पाबन्दीए हयात से आज़ाद हो गए लेकिन मौत के चंगुल से आज़ाद न हो सके और उसने बाला आखि़र उन्हें गिरफ़्तार कर लिया और उनकी वादागाह तक पहुंचा दिया।

फिर जवानी में यह ख़याल के ज़ईफ़ी में अमल या तौबा कर लेंगे यह भी एक वसवसए शैतानी है। वरना फ़ुरसते अमल और हंगामे कार जवानी ही का ज़माना है। ज़ईफ़ी में काम करने का हौसला एक वहम व सिफ़त है , इसके अलावा कुछ नहीं है। रब्बे करीम हर मोमिन को ऐसे औहाम और वसवसों से महफ़ूज़ रखे।)))

और बिस्तरे मर्ग पर कलक़ की बेचैनियां और सोज़ो तपिश का रन्जो अलम और लोआबे दहन के फन्दे होंगे और वह हंगाम होगा जब इन्सान अक़रबा , औलाद , अइज़्ज़ा , अहबाब से मदद तलब करने के लिये इधर उधर देख रहा होगा। तो क्या आज तक कभी अक़रबा ने मौत को दफ़ा कर दिया है या फ़रयाद किसी के काम आई है ? हरगिज़ नहीं , करने वाले को तो क़ब्रिस्तान में गिरफ़्तार कर दिया गया है और तंगी क़ब्र में तन्हा छोड़ दिया गया है। इस आलम में के कीड़े मकोड़े इसकी जिल्द को पारा-पारा कर रहे हैं और पामालियों ने उसके जिस्म की ताज़गी को बोसीदा कर दिया है। आन्धियों ने इसके आसार को मिटा दिया है और रोज़गार के हादसात ने इसके निशानात को महो कर दिया है। जिस्म ताज़गी के बाद हलाक हो गए हैं और हड़िडयां ताक़त के बाद बोसीदा हो गई हैं , रूहें अपने बोझ की गरानी में गिरफ़्तार हैं और अब ग़ैब की ख़बरों का यक़ीन आ गया है। अब न नेक आमाल में कोई इज़ाफ़ा हो सकता है और न बदतरीन लग़्िज़षों की माफ़ी तलब की जा सकती है। तो क्या तुम लोग उन्हीं आबा व अजदाद की औलाद नहीं हो और क्या उन्हीं के भाई बन्दे नहीं हो के फिर उन्हीं के नक़्शे क़दम पर चले जा रहे हो और उन्हीं के तरीक़े को अपनाए हुए हो और उन्हीं के रास्ते पर गामज़न हो ? हक़ीक़त यह है के दिल अपना हिस्सा हासिल करने में सख़्त हो गए हैं और राहे हिदायत से ग़ाफ़िल हो गए हैं , ग़लत मैदानों में क़दम जमाए हुए हैं , ऐसा मालूम होता है के अल्लाह का मुख़ातब इनके अलावा कोई और है और शायद सारी अक़्लमन्दी दुनिया ही के जमा कर लेने में है। याद रखो तुम्हारी गुज़रगाह सिरात और इसकी हलाकत ख़ेज़ लग़्ज़िशे हैं। तुम्हें इन लग़्ज़िशो के हौलनाक मराहेल और तर्जे तरह के ख़तरनाक मनाज़िल से गुज़रना है। अल्लाह के बन्दों! अल्लाह से डरो , उस तरह जिस तरह वह साहिबे अक़्ल डरता है जिसके दिल को फ़िक्रे आख़ेरत ने मशग़ूल कर लिया हो और उसके बदन को ख़ौफ़े ख़ुदा ने ख़स्ता हाल बना दिया हो और शब बेदारी ने इसकी बची कुची नींद को भी बेदारी में बदल दिया हो और उम्मीदों ने इसके दिल की तपिश को प्यास में गुज़ार दिया हो और ज़ोहद ने इसके ख़्वाहिशात को पैरों तले रौंद दिया हो और ज़िक्रे ख़ुदा इसकी ज़बान पर तेज़ी से दौड़ रहा हो और उसने क़यामत के अम्न व अमान के लिये यहीं ख़ौफ़ का रास्ता इख़्तेयार कर लिया हो और सीधी राह पर चलने के लिये टेढ़ी राहों से कतराकर चला हो और मतलूबा रास्ते ते पहुंचने के लिये मोतदल तरीन रास्ता इख़्तेयार किया हो।

((( ज़रूरत इस बात की है के इन्सान जब दुनिया के तमाम मशाग़ेल तमाम करके बिस्तर पर आए तो इस ख़ुतबे की तिलावत करे और इसके मज़ामीन पर ग़ौर करे , फिर अगर मुमकिन हो तो कमरे की रौशनी गुल करके दरवाज़ा बन्द करके क़ब्र का तसव्वुर पैदा करे और यह सोचे के अगर इस वक़्त किसी तरफ़ से सांप बिच्छू हमलावर हो जाएं और कमरे की आवाज़ बाहर न जा सके और दरवाज़ा खोलकर भागने का इमकान भी न हो तो इन्सान क्या करेगा और इस मुसीबत से किस तरह निजात हासिल करेगा , शायद यही तसव्वुर उसे क़ब्र के बारे में सोचने और इसके हौलनाक मनाज़िर से बचने के रास्ते निकालने पर आमादा कर सके। वरना दुनिया की रंगीनियां एक लम्हे के लिये भी आख़ेरत के बारे में सोचने का मौक़ा नहीं देती है और किसी न किसी वहम में मुब्तिला करके निजात का यक़ीन दिला देती हैं और फिर इन्सान आमाल से यकसर ग़ाफ़िल हो जाता है।)))

न ख़ुश फ़रेबों ने इसमें इज़तेराब पैदा किया हो और न मुश्तबा कामो ने इसकी आंखों पर परदा डाला हो , बशारत की मसर्रत और नेमतों की राहत हासिल कर ली हो , दुनिया की गुज़रगाह से क़ाबिले तारीफ़ अन्दाज़ से गुज़र जाए और आख़ेरत का ज़ादे राह नेक बख़्ती के साथ आगे भेज दे। वहां के ख़तरात के पेशे नज़र अमल में सबक़त की और मोहलत के औक़ात में तेज़ रफ़्तारी से क़दम बढ़ाया। तलबे आख़ेरत में रग़बत के साथ आगे बढ़ा और बुराइयों से मुसलसल फ़रार करता रहा। आज के दिन कल पर निगाह रखी और हमेशा अगली मन्ज़िलों को देखता रहा , यक़ीनन सवाब और अता के लिये जन्नत और अज़ाब व वबाल के लिये जहन्नम से बालातर क्या है और फिर ख़ुदा से बेहतर मदद करने वाला और इन्तेक़ाम लेने वाला कौन है और क़ुरान के अलावा हुज्जत और सनद क्या है।

बन्दगाने ख़ुदा! मैं तुम्हें उस ख़ुदा से डरने की वसीयत करता हूँ जिसने डराने वाली अशया के ज़रिये बहाने का ख़ात्मा कर दिया है और रास्ता दिखाकर हुज्जत तमाम कर दी है , तुम्हें उस दुशमन से होशियार कर दिया है जो ख़ामोशी से दिलों में नुज़ोज कर जाता है और चुपके से कान में फूंक देता है और इस तरह गुमराह और हलाक कर देता है और वादा करके उम्मीदों में मुब्तिला कर कर देता है , बदतरीन जराएम को ख़ूबसूरत बनाकर पेश करता है और महलक गुनाहों को आसान बना देता है। यहां तक के जब अपने साथी नफ़्स को अपनी लपेट में ले लेता है और अपने क़ैदी को बाक़ाएदा गिरफ़्तार कर लेता है तो जिसको ख़ूबसूरत बनाया था उसी को मुनकिर बना देता है और जिसे आसान बनाया था उसी को अज़ीम कहने लगता है और जिसकी तरफ़ से महफ़ूज़ बना दिया था उसे से डराने लगता है। ज़रा इस मख़लूक़ को देखो जिसे बनाने वाले ने रहम की तारीकियों और मुतअदद परदों के अन्दर यूँ बनाया के उछलता हुआ नुत्फ़ा था फ़िर मुनजमद ख़ून बना , फिर जिनीन बना , फिर रज़ाअत की मन्ज़िल में आया फिर तिफ़्ल नौख़ेज़ बना फ़िर जवान हो गया और इसके बाद मालिक ने उसे महफ़ूज़ करने वाला दिल , बोलने वाली ज़बान , देखने वाली आंख इनायत कर दी ताके इबरत के साथ समझ सके और नसीहत का असर लेते हुए बुराइयों से बाज़ रहे। लेकिन जब इसके आज़ा में एतदाल पैदा हो गया और इसका क़द व क़ामत अपनी मन्ज़िल तक पहुंच गया तो ग़ुरूर व तकब्बुर से अकड़ गया और अन्धेपन के साथ भटकने लगा और हवा व होस के डोल भर-भर कर खींचने लगा।

((( परवरदिगार का करम है के उसने क़ुराने मजीद में बार-बार क़िस्सए आदम (अ 0) व इबलीस को दोहराकर औलादे आदम (अ 0) को मुतवज्जो कर दिया है के यह तुम्हारे बाबा आदम का दुशमन था और उसी ने इन्हें जन्नत की ख़ुशगवार फ़िज़ाओं से निकाला था और फिर जब से बारगाहे इलाही से निकाला गया है मुसलसल औलादे आदम (अ 0) से इन्तेक़ाम लेने पर तुला हुआ है और एक लम्हए फ़ुरसत को नज़र अन्दाज़ नहीं करना चाहता है। इसका सबब है बड़ा हुनर यह है के गुनाहों के वक़्त गुनाहों को मामूली और मज़ीन बना देता है , इसके बाद जब इन्सान का इरतेकाब कर लेता है तो इसके ज़ेहनी कर्ब को बढ़ाने के लिये गुनाह की अहमियत व अज़मत का एहसास दिलाता है और एक लम्हे के लिये उसे चैन से नहीं बैठने देता है।

मालिके कायनात के करोड़ों एहसानात में से यह तीन एहसानात ऐसे हैं के अगर यह न होते तो इन्सान का वजूद जानवरों से बदतर होकर रह जाता और इन्सान किसी क़ीमत पर अशरफ़ मख़लूक़ात कहे जाने के क़ाबिल न होता। मालिक ने पहला करम यह किया के दुनिया के हालात से बाख़बर बनाने के लिये आंखें दे दीं , इसके बाद अपने जज़्बात व ख़यालात के इज़हार के लिये ज़बान दे दी और फिर मालूमात से किसी वक़्त भी फ़ायदा उठाने के लिये हाफ़ेज़ा दे दिया वरना यह हाफ़ेज़ा न होता तो बार-बार अशया का सामने आना नामुमकिन होता और इन्सान साहबे इल्म होने के बाद भी जाहिल ही रह जाता। - फातबरोवा या ऊलिल अबसार)))

तरब की लज़्ज़तों और ख़्वाहेशात की तमन्नाओं में दुनिया के लिये अनथक कोशिश करने लगा , न किसी मुसीबत का ख़याल रह गया और न किसी ख़ौफ़ व ख़तर का असर रह गया। फ़ितनों के दरम्यान फ़रेब ख़ोरदा मर गया और मुख़्तसर सी ज़िन्दगी को बेहूदगियों में गुज़ार गया। न किसी अज्र का इन्तेज़ाम किया और न किसी फ़रीज़े को अदा किया। इसी बाक़ीमान्दा सरकशी के आलम में मर्गबार मुसीबतें इस पर टूट पड़ीं और वह हैरत ज़दा रह गया। अब रातें जागने में गुज़र रही थीं के शदीद क़िस्म के आलाम थे और तरह-तरह के अमराज़ व असक़ाम। जबके हक़ीक़ी भाई और मेहरबान बाप और फ़रयाद करने वाली माँ और इज़तेराब से सीनाकोबी करने वाली बहन भी मौजूद थी लेकिन इन्सान सकराते मौत की मदहोशियों , शदीद क़िस्म की बदहवासियों , दर्दनाक क़िस्म की फ़रयादों और कर्ब अंगेज़ क़िस्म की नज़अ की कैफ़ियतों और थका देने वाली शिद्दतों में मुब्तिला था। इसके बाद उसे मायूसी के आलम में कफ़न में लपेट दिया गया और वह निहायत दरजए आसानी और ख़ुदसुपर्दगी के साथ खींचा जाने लगा इसके बाद उसे तख़्ते पर लिटा दिया गया इस आलम में के ख़स्ताहाल और बीमारियों से निढाल हो चुका था , औलाद और बरादरी के लोग उसे उठाकर उस घर की तरफ़ ले जा रहे थे जो इज़्ज़त का घर था और जहां मुलाक़ातों का सिलसिला बन्द था और तन्हाई की वहशत का दौरे दौरा था यहाँ तक के जब मुशायअत करने वाले वापस आ गए और गिरया व ज़ारी करने वाले पलट गए तो उसे क़ब्र में दोबारा उठाकर बैठा दिया गया। सवाल व जवाब की दहशत और इम्तेहान की लग़्ज़िशो का सामना करने के लिये और वहाँ की सबसे बड़ी मुसीबत तो खोलते हुए पानी का नूज़ूल और जहन्नम का वदूद है जहां आग भड़क रही होगी और शोले बलन्द हो रहे होंगे। न कोई राहत का वक़्फ़ा होगा और न सुकून का लम्हा न कोई ताक़त अज़ाब को रोकने वाली होगी और न कोई मौत सुकूलन बख़्श होगी। हद यह है के कोई तसल्ली बख़्श नींद भी न होगी। तरह तरह की मौतें होंगी और दमबदम का अज़ाब , बेशक हम उस मन्ज़िल पर परवरदिगार की पनाह के तलबगार हैं।

((( हाए रे इन्सान की बेकसी , अभी ग़फ़लत का सिलसिला तमाम न हुआ था और लज़्ज़त अन्दोज़ी हयात का तसलसुल क़ायम था के अचानक हज़रत मलकुल मौत नाज़िल हो गए और एक लम्हे की मोहलत दिये बग़ैर लेजाने के लिये तैयार हो गए। इन्सान सहरा बियाबान और वीराना दष्त व जबल में नहीं है घर के अन्दर है। इधर औलाद उधर अहबाब , इधर मेहरबान बाप उधर सरो सीना पीटने वाली माँ , इधर हक़ीक़ी भाई उधर क़ुरबान होने वाली बहन , लेकिन कोई कर्ब मौत के लम्हे में तख़फ़ीफ़ भी नहीं करा सकता है और न मरने वाले के किसी काम आ सकता है बल्के इससे ज़्यादा कर्बनाक यह मन्ज़र है के इसके बाद अपने ही हाथों से कफ़न में लपेटा जा रहा है और सांस लेने के लिये भी कोई रास्ता नहीं छोड़ा जा रहा है और फिर यहां तक दरजए अदब व एहतेराम से क़ब्र के अन्धेरे में डालकर चारों तरफ़ से बन्द कर दिया जाता है के कोई सूराख़ भी न रहने पाए और हवा या रोशनी का गुज़र भी न होने पाए।

किसी के मुंह से न निकला हमारे दफ़न के वक़्त - के ख़ाक इन पे न डालो ये हैं नहाए हुए और इतना ही नहीं बल्के हज़रात ख़ुद भी ख़ाक डालने ही को मोहब्बत की अलामत और दोस्ती के हक़ की अदायगी तसव्वुर कर रहे हैं: मुट्ठियों में ख़ाक लेकर दोस्त आए वक़्ते दफ़न- ज़िन्दगी भर की मोहब्बत का सिला देने लगे इन्ना लिल्लाहे व इन्ना इलैहे राजेऊन।)))

बन्दगाने ख़ुदा! कहाँ हैं वह लोग जिन्हें उम्रें दी गईं तो ख़ुब मज़े उड़ाए और बताया गया तो सब समझ गए लेकिन मोहलत दी गई तो ग़फ़लत में पड़ गए। सेहत व सलामती दी गई तो इस नेमत को भूल गए। उन्हें काफ़ी तवील मोहलत दी गई और काफ़ी अच्छी नेमतें दी गईं और उन्हें दर्दनाक अज़ाब से डराया भी गया और बेहतरीन नेमतों का वादा भी किया गया। लेकिन कोई फ़ायदा न हुआ। अब तुम लोग मोहलक गुनाहों से परहेज़ करो और ख़ुदा को नाराज़ करने वाले उयूब से दूर रहो। तुम साहेबाने समाअत व बसारत और अहले आफ़ियत व सरवत हो बताओ क्या बचाव की कोई जगह या छुटकारे की कोई गुन्जाइश है। कोई ठिकाना या पनाहगाह है। कोई जाए फ़रार या दुनिया में वापसी की कोई सूरत है ? और अगर नहीं है तो किधर बहके जा रहे हो और कहाँ तुमको ले जाया जा रहा है या किस धोके में पड़े हो ? याद रखो इस तवील व अरीज़ ज़मीन में तुम्हारी क़िस्मत सिर्फ़ बक़द्र क़ामत जगह है जहाँ रूख़सारों को ख़ाक पर रहना है। बन्दगाने ख़ुदा। अभी मौक़ा है , रस्सी ढीली है , रूह आज़ाद है , तुम हिदायत की मंज़िल और जिस्मानी राहत की जगह पर हो। मजलिसों के इज्तेमाअ में हो और बक़िया ज़िन्दगी की मोहलत सलामत है और रास्ता इख़्तेयार करने की आज़ादी है और तौबा की मोहलत है और जगह की वुसअत है , क़ब्ल इसके के तंगीए लहद , ज़ीक़ मकान , ख़ौफ़ और जाँकनी का शिकार हो जाओ और क़ब्ल इसके के वह मौत आ जाए जिसका इन्तज़ाम हो रहा है और वह परवरदिगार अपनी गिरफ़्त में ले ले जो साहबे इज़्ज़त व ग़लबा और साहबे ताक़त व क़ुदरत है। सय्यद रज़ी- कहा जाता है के जब हज़रत (अ 0) ने इस ख़ुतबे को इरशाद फ़रमाया तो लोगों के रोंगटे खड़े हो गए और आंखों से आंसू जारी हो गए और दिल लरज़ने लगे। बाज़ लोग इस ख़ुतबे को ख़ुत्बए ग़र्रा के नाम से याद करते हैं।

84-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें अम्र व आस का ज़िक्र किया गया है)

ताज्जुब है नाबग़ा के बेटे से , के यह अहले शाम से बयान करता है के मेरे मिज़ाज में मिज़ाह पाया जाता है और मैं कोई खेल तमाशे वाला इन्सान हूँ और हंसी मज़ाक़ में लगा रहता हूँ। यक़ीनन इसने यह बात ग़लत ही कही है और इसकी बिना पर गुनहगार भी हुआ है। आगाह हो जाओ के बदतरीन कलाम ग़लतबयानी है और यह जब बोलता है तो झूट ही बोलता है और जब वादा करता है तो वह वादाखि़लाफ़ी ही करता है और जब उससे कुछ मांगा जाता है तो कंजूसी ही करता है और जब ख़ुद मांगता है तो चिमट जाता है। अहद व पैमान में ख़यानत करता है। क़राबतों में क़तअ रहम करता है। जंग के वक़्त देखो तो क्या क्या अम्र व नहीं करता है जब तक तलवारें अपनी मन्ज़िल पर ज़ोर न पकड़ लें। वरना जब ऐसा हो जाता है तो इसका सबसे बड़ा जरबा यह होता है के दुशमन के सामने अपनी पुश्त को पेश कर दे। ख़ुदा गवाह है के मुझे खेल कूद से यादे मौत ने रोक रखा है और उसे हर्फ़े हक़ से निसयाने आख़ेरत ने रोक रखा है। इसने माविया की भी उस वक़्त तक नहीं की जब तक उससे यह तय नहीं कर लिया के उसे कोई हदिया देगा और उसके सामने तर्के दीन पर कोई तोहफ़ा पेश करेगा।

85-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें परवरदिगार के आठ सिफ़ात का तज़किरा किया गया है)

मैं गवाही देता हूँ के अल्लाह के अलावा कोई ख़ुदा नहीं है , वह अकेला है इसका कोई शरीक नहीं है , वह ऐसा अव्वल है जिससे पहले कुछ नहीं है और ऐसा आखि़र है जिसकी कोई हद मुअय्यन नहीं है। ख़यालात उसकी किसी सिफ़त का इदराक नहीं कर सकते हैं और दिल इसकी कोई कैफ़ियत तय नहीं कर सकता है। इसकी ज़ात के न अजज़ा हैं और न टुकड़े और न वह दिल व निगाह के अहाते के अन्दर आ सकता है।

बन्दगाने ख़ुदा! मुफ़ीद इबरतों से नसीहत हासिल करो और वाज़े निशानियों से इबरत को बलीग़ डराने वाली चीज़ों से असर क़ुबूल करो और ज़िक्र व मौअज़त से फ़ायदा हासिल करो। यह समझो के गोया मौत अपने पन्जे तुम्हारे अन्दर गाड़ चुकी है और उम्मीदों के रिश्ते तुमसु मुनक़ता हो चुके हैं और दहशतनाक हालात ने तुम पर हमला कर दिया है और आख़री मन्ज़िल की तरफ़ ले जाने का अमल शुरू हो चुका है। याद रखो के “ हर नफ़्स के साथ एक हँकाने वाला है और एक गवाह रहता है ” , हँकाने वाला क़यामत की तरफ़ खींच कर ले जा रहा है और गवाही देने वाला आमाल की निगरानी कर रहा है। सिफ़ाते जन्नत

इसके दरजात मुख़्तलिफ़ और इसकी मन्ज़िलें पस्त व बलन्द हैं लेकिन इसकी नेमतें ख़त्म होने वाली नहीं हैं और इसके बाशिन्दों को कहीं और कूच करना नहीं है। इसमें हमेशा रहने वाला भी बूढ़ा नहीं होता है और इसके रहने वालों की फ़क़्र व फ़ाक़े से साबक़ा नहीं पड़ता है।

((( बाज़ औक़ात यह ख़याल पैदा होता है के जब जन्नत में हर नेमत का इन्तेज़ाम है और वहां की कोई ख़्वाहिश मुस्तर्द नहीं हो सकती है तो इन दरजात का फ़ायदा ही क्या है , पस्त मन्ज़िल वाला जैसे ही बलन्द मन्ज़िल की ख़्वाहिश करेगा वहां पहुंच जाएगा और यह सब दरजात बेकार होकर रह जाएंगे। लेकिन इसका वाज़ेअ सा जवाब यह है के जन्नत उन लोगो का मुक़ाम नहीं है जो अपनी मन्ज़िल न पहचानते हों और अपनी औक़ात से बलन्दतर जगह की हवस रखते हों। हवस का मक़ाम जहन्नम है जन्नत नहीं है। जननत वाले अपने मक़ामात को पहचानते हैं। यह और बात है के बलन्द मक़ामात वालों के ख़ादिम और नौकर हैं तो खि़दमत के सहारे दीगर नौकरों की तरह बलन्द मनाज़िल तक पहुंच जाएं जिसकी तरफ़ इमाम (अ 0) ने इशारा फ़रमाया है के “ हमारे शिया हमारे साथ जन्नत में हमारे दर्जे में होंगे। ” )))

86-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें सिफ़ाते ख़ालिक़ “ जल्ला जलालोहू ” का ज़िक्र किया गया है और फिर लोगों को तक़वा की नसीहत की गई है।)

बेशक! वह पोशीदा इसरार का आलिम और दिलों के राज़ों से बाख़बर है , उसे हर शै पर अहाता हासिल है और वह हर शै पर ग़ालिब है और ताक़त रखने वाला है।

-- मोअज़्मा-- तुम में से हर शख़्स का फ़र्ज़ है के मोहलत के दिनों में अमल करे क़ब्ल इसके के मौत हाएल हो जाए और फ़ुरसत के दिनों में काम करे क़ब्ल इसके के मशग़ूल हो जाए। अभी जबके सांस लेने का मौक़ा है क़ब्ल इसके के गला घोंट दिया जाए , अपने नफ़्स और अपनी मन्ज़िल के लिये सामान मुहय्या कर ले और इस कूच के घर से उस क़याम के घर के लिये ज़ादे राह फ़राहम कर ले।

लोगों! अल्लाह को याद रखो और उससे डरते रहो इस किताब के बारे में जिसका तुमको मुहाफ़िज़ बराया गया है और उन हुक़ूक़ के बारे में जिनका तुमको अमानतदार क़रार दिया गया है। इसलिये के उसने तुमको बेकार नहीं पैदा किया है और न महमिल छोड़ दिया है और न किसी जेहालत और तारीकी में रखा है। तुम्हारे आसार को बयान कर दिया है। आमाल को बता दिया है और मुद्दते हयात को लिख दिया है। वह किताब नाज़िल कर दी है जिसमें हर शै का बयान पाया जाता है और एक मुद्दत तक अपने पैग़म्बर को तुम्हारे दरम्यान रख चुका है। यहाँ तक के तुम्हारे लिये अपने इस दीन को कामिल कर दिया है जिसे इसने पसन्दीदा क़रार दिया है और तुम्हारे लिये पैग़म्बर (स 0) की ज़बान से उन तमाम आमाल को पहुंचा दिया है जिनको वह दोस्त रखता है या जिनसे नफ़रत करता है। अपने अम्र व नवाही को बता दिया है और दलाएल तुम्हारे सामने रख दिये हैं और हुज्जत तमाम कर दी है और डराने धमकाने का इन्तज़ामक र दिया है और अज़ाब के आने से पहले ही होशियार कर दिया है लेहाज़ा अब जितने दिन बाक़ी रह गए हैं उन्हीं में तदारूक कर लो और अपने नफ़्स को सब्र आमादा कर लो के यह दिन अय्यामे ग़फ़लत के मुक़ाबले में बहुत थोडे़ हैं जब तुमने मौअज़ सुनने का भी मौक़ा नहीं निकाला , ख़बरदार अपने नफ़्स आज़ाद मत छोड़ो वरना यह आज़ादी तुमको ज़ालिमों के रास्ते पर ले जाएगी और इसके साथ नरमी न बरतो वरना यह तुम्हें मुसीबतों में झोंक देगा।

बन्दगाने ख़ुदा! अपने नफ़्स का सबसे सच्चा मुख़लिस वही है जो परवरदिगार का सबसे बड़ा इताअत गुज़ार है और अपने नफ़्स से सबसे बड़ा ख़यानत करने वाला वह है जो अपने परवरदिगार का मासियतकार है। ख़सारे में वह है जो ख़ुद अपने नफ़्स करे घाटे में रखे और क़ाबिले रष्क वह है जिसका दीन सलामत रह जाए। नेक बख़्त वह है जो दूसरों के हालात से नसीहत हासिल कर ले और बदबख़्त वह है जो ख़्वाहेशात के धोके में आ जाए।

याद रखो के मुख़्तसर सा शाएबा रियाकारी भी एक तरह का शिर्क है और ख़्वाहिश परस्तों की सोहबत भी ईमान से ग़ाफ़िल बनाने वाली है और शैतान को अलबत्ता सामने लाने वाली है। झूट से परहेज़ करो के वह ईमान से किनाराकश रहता है। सच बोलने वाला हमेशा निजात और करामत के किनारे रहता है और झूट बोलने वाला हमेशा तबाही और ज़िल्लत के दहाने पर रहता है। ख़बरदार एक दूसरे से हसद न करना “ हसद ईमान को उस तरह खा जाता है जिस तरह आग सूखी लकड़ी को खा जाती है। ” और आपस में एक दूसरे से बुग़्ज़ न रखना के बुग़़्ज़ ईमान का सफ़ाया कर देता है याद रखो के ख़्वाहिश अक़्ल को भुला देती है और ज़िक्रे ख़ुदा से ग़ाफ़िल बना देती है। ख़्वाहिशात को झुटलाओ के यह सिर्फ़ धोका हैं और इनका साथ देने वाला एक फ़रेब ख़ोरदा इन्सान है और कुछ नहीं है।

((( जब चाहें अहले दुनिया की महफ़िलों का जाएज़ा लें। दुनिया भर की महमिल बातें , खेल कूद के तज़किरे , सियासत के तबसिरे , लोगों की ग़ीबत , पाकीज़ा लोगों पर तोहमत , ताश के पत्ते , शतरन्ज के मोहरे वग़ैरा नज़र आ जाएंगे तो क्या ऐसी महफ़िलों में मलाएका मुक़र्रबीन भी हाज़िर होंगे। यक़ीनन यह मक़ामात शयातीन और ईमान से ग़फ़लत के मराहेल हैं जिनसे इजतेनाब हर मुसलमान का फ़रीज़ा है और इसके बग़ैर तबाही के अलावा कुछ नहीं है।)))

87-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें मुत्तक़ीन और फ़ासेक़ीन के सिफ़ात का तज़किरा किया गया है और लोगों को तम्बीह की गई है)

बन्दगाने ख़ुदा! अल्लाह की निगाह में सबसे महबूब बन्दा वह है जिसकी ख़ुदा ने उसके नफ़्स के खि़लाफ़ मदद की है और उसने अन्दर लिबासे हुज़्न और बाहर ख़ौफ़ का लिबास पहन लिया है। (यानी अन्दोह व मलाल उसे चिमटा रहता है और ख़ौफ़ उस पर छाया रहता है) उसके दिल में हिदायत का चिराग़ रौशन है और उसने आने वाले दिन की मेहमानी का इन्तेज़ाम कर लिया है। अपने नफ़्स के लिये आने वाले बईद (मौत) को क़रीब कर लिया है और सख़्त मरहले को आसान कर लिया है , देखता है तो बसीरत व मारेफ़त पैदा की है और ख़ुदा को याद किया है तो अमल में कसरत पैदा की है। हिदायत के इस चश्मए शीरीं व ख़ुशगवार से सेराब हो गया है जिस के घाट पर (अल्लाह की रहनुमाई ने) वारिद होने को आसान बना दिया गया है , जिसके नतीजे में ख़ूब छक कर पी लेता है और सीधे रास्ते पर चल पड़ा है। ख़्वाहिशात के लिबास को जुदा कर दिया है और तमाम अफ़कार से आज़ाद हो गया है। सिर्फ़ एक फ़िक्रे आख़ेरत बाक़ी रह गई है जिसके ज़ेरे असर गुमराही की मन्ज़िल से निकल आया है और अहले हवा व हवस की शिरकत (हवस परस्तों की हवसरानियों) से दूर हो गया है। हिदायत के दरवाज़े की कलीद बन गया है और गुमराही के दरवाज़ों का क़फ़ल बन गया है। अपने रास्ते को देख लिया है और उसी पर चल पड़ा है। हिदायत के मिनारे को पहचान लिया है और गुमराहियों के धारे को तय कर लिया है। मज़बूत तरीन वसीले से वाबस्ता हो गया है और मोहकमतरीन रस्सी को पकड़ लिया है इसलिये के वह अपने यक़ीन में बिलकुल नूर आफताब जैसी रौशनी रखता है। अपने नफ़्स को बलन्दतरीन कामो की ख़ातिर राहे ख़ुदा में आमादा कर लिया है के हर आने वाले के मसले को हल कर देगा और फ़ुरूअ को उनकी असल की तरफ़ पलटा देगा। वह तारीकियों का चिराग़ है और अन्धेरों का रौशन करने वाला मुश्तबा बातों को हल करने वाला , उलझे हुए मसलों को सुलझाने वाला , मुश्किलात का दफ़ा करने वाला और फिर सहराओं में रहनुमाई करने वाला। वह बोलता है तो बात को समझा लेता है और चुप रहता है तो सलामती का बन्दोबस्त कर लेता है। उसने अल्लाह से इख़लास बरता है तो अल्लाह ने उसे अपना बन्द-ए मुख़लिस बना लिया है। अब वह दीने ख़ुदा का मअदन है और ज़मीने ख़ुदा का कारकुन आज़म। इसने अपने नफ़्स के लिये अद्ल को लाज़िम क़रार दे लिया है और इसके अद्ल की पहली मन्ज़िल यह है के ख़्वाहिशात को अपने नफ़्स से दूर कर दिया है और अब हक़ ही को बयान करता है और उसी पर अमल करता है। नेकी की कोई मन्ज़िल ऐसी नहीं है जिसका क़स्द न करता हूँ और कोई ऐसा एहतेमाल नहीं है जिसका इरादा न रखता हो। अपने कामो की ज़माम किताबे ख़ुदा के हवाले कर दी है और अब वही उसकी क़ायद और पेशवा है जहाँ इसका सामान उतरतर है वहीं वारिद हो जाता है और जहां इसकी मंज़िल होती है वहीं पड़ाव डाल देता है। इसके बरखि़लाफ़ एक शख़्स वह भी है जिसने अपना नाम आलिम रख लिया है हालांके इल्म से कोई वाबस्ता नहीं है। जाहिलों से जेहालत को हासिल किया है और गुमराहों से गुमराही को। लोगों के वास्ते धोका के फन्दे और मक्रो फ़रेब के जाल बिछा दिये हैं। किताब की तावील अपनी राय के मुताबिक़ की है और हक़ को अपने ख़्वाहिशात की तरफ़ मोड़ दिया है। लोगों को बड़े-बड़े जरायम की तरफ़ से महफ़ूज़ बनाता है और उनके लिये गुनाहाने कबीरा को भी आसान बना देता है। कहता यही है के मैं शुबहात के मवाक़े पर तवक़फ़ करता हूं लेकिन वाक़ेअन इन्हीं में गिर पड़ता है और फिर कहता है के मैं बिदअतों से अलग रहता हूं हालांके उन्हीं के दरमियान उठता बैठता है। इसकी सूरत इन्सानों जैसी है लेकिन दिल जानवरों जैसा है। न हिदायत के दरवाज़े को पहुंचता है के इसका इत्तेबाअ करे और न गुमराही के रास्ते को जानता है के इससे अलग रहे , यह दर हक़ीक़त एक चलती फिरती मय्यत है और कुछ नहीं है। तो आखि़र तुम लोग किधर जा रहे हो और तुम्हें किस सिम्त मोड़ा जा रहा है ? जबके निशानात क़ायम रहते हैं और आयात वाज़ेअ हैं। मिनारे नसब के लिये जा चुके हैं और तुम्हें भटकाया जा रहा है और तुम भटके जा रहे हो। देखो तुम्हारे दरम्यान तुम्हारे नबी की इतरत मौजूद है। यह सब हक़ के ज़मामदार दीन के परचम और सिदाक़त के तरजुमान हैं। उन्हें क़ुरआने करीम की बेहतरीन मन्ज़िल पर जगह दो और उनके पास इस तरह वारिद हो जिस तरह प्यासे ऊँट चश्मे पर वारिद होते हैं। लोगों! हज़रत ख़ातेमुन्नबीयीन (अ 0) के इस इरशादे गिरामी पर अमल करो के “ हमारा मरने वाला मय्यत नहीं होता है और हममें से कोई मुरदर ज़माने से बोसीदा नहीं होता है। ” ख़बरदार वह न कहो जो तुम नहीं जानते हो। इसलिये के बसाऔक़ात हक़ इसी में होता है जिसे तुम नहीं पहचानते हो और जिसके खि़लाफ़ तुम्हारे पास कोई दलील नहीं है उसके बहाने को क़ुबूल कर लो और वह मैं हुँ। क्या मैंने सिक़्ले अकबर क़ुरान पर अमल नहीं किया है और क्या सक़ले असग़र अहलेबैत (अ 0) को तुम्हारे दरम्यान नहीं रखा है। मैंने तुम्हारे दरम्यान ईमान के परचम को नस्ब कर दिया है और तुम्हें हलाल व हराम के हुदूद से आगाह कर दिया है। अपने अद्ल की बिना पर तुम्हें लिबास आफ़ियत बिछाना है और अपने क़ौलो फ़ेल की नेकियों को तुम्हारे लिये फर्श कर दिया है और तुम्हें अपने बलन्द तरीन अख़लाक़ का मन्ज़र दिखला दिया है। लेहाज़ा ख़बरदार जिस बात की गहराई तक निगाहें नहीं पहुंच सकती हैं और जहां तक फ़िक्र रसाई नहीं है इसमें अपनी राय को इस्तेमाल न करना।

ग़लतफ़हमी-(बनी उमय्या के मज़ालिम ने इस क़द्र दहशतज़दा बना दिया है के बाज़ लोग ख़याल कर रहे हैं के दुनिया बनी उमय्या के दामन से बान्धी दी गई है। उन्हीं को अपने फ़वाएद से फ़ैज़याब करेगी और वही इसके चश्मे पर वारिद होते रहेंगे और अब इस उम्मत के सर से उनके ताज़याने और तलवारें उठ नहीं सकती हैं। हालांके यह ख़याल बिलकुल ग़लत है। यह हुकूमत फ़क़त एक लज़ीज़ क़िस्म का आबे दहन है जिसे थोड़ी देर चूसेंगे और फिर ख़ुद ही थूक देंगे।)

88-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें लोगों की हलाकत के असबाब बयान किये गए हैं)

अम्माबाद! परवरदिगार ने किसी दौर के ज़ालिमों की कमर उस वक़्त तक नहीं तोड़ी है जब तक उन्हें मोहलत और ढील नहीं दे दी है और किसी क़ौम की टूटी हुई हड्डी को उस वक़्त तक जोड़ा नहीं है जब तक उसे मुसीबतों और बलाओं में मुब्तिला नहीं किया है। अपने लिये जिन मुसीबतों का तुमने सामना किया है और जिन हादेसात से तुम गुज़र चुके हो उन्हीं में सामाने इबरत मौजूद है। मगर मुश्किल यह है के हर दिल वाला अक़्लमन्द नहीं होता है और हर कान वाला समीअ या हर आंख वाला बसीर नहीं होता है। किस क़द्र हैरतअंगेज़ बात है और मैं किस तरह ताअज्जुब न करूं के यह तमाम फ़िरक़े अपने दीन के बारे में मुख़तलिफ़ दलाएल रखने के बावजूद सब ग़लती पर हैं के न नबी (स 0) के नक़्शे क़दम पर चलते हैं और न उनके आमाल की पैरवी करते हैं , न ग़ैब पर ईमान रखते हैं और न ग़ैब से से परहेज़ करते हैं। शुबहात पर अमल करते हैं और ख़्वाहिशात के रास्तों पर क़दम आगे बढ़ाते हैं। इनके नज़दीक मारूफ़ वही है जिसको यह नेकी समझें और मुनकिर वही है जिसका यह इनकार कर दें। मुश्किलात में इनका मरजा ख़ुद इनकी ज़ात है और मबहम मसाएल में इनका एतमाद सिर्फ़ अपनी राय पर है। गोया के इनमें का हर शख़्स अपने नफ़्स का इमाम है और अपनी हर राय को मुस्तहकम वसाएल और मज़बूत दलाएल का नतीजा समझता है।

89-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(रसूले अकरम (स 0) और तबलीग़े इमाम के बारे में)

अल्लाह ने उन्हें उस दौर में भेजा जब रसूलों का सिलसिला मौक़ूफ़ और उम्मतें ख़्वाबे ग़फ़लत में पड़ी हुई थीं। फ़ितने सर उठाए हुए थे और जुमला कामो में एक इन्तेशार की कैफ़ियत थी और जंग के शोले भड़क रहे थे। दुनिया की रोशनी कजलाई हुई थी और उसका फ़रेब वाज़ेह था। बाग़े ज़िन्दगी के पत्ते ज़र्द हो गए थे और समराते हयात से मायूसी पैदा हो चली थी , पानी भी तहनशीन हो चुका था और हिदायत के मिनारे भी मिट गए थे और हलाकत के निशानात भी नुमायां थे। यह दुनिया अपने अहल को सख्त निगाहो से देख रही थी और अपने तलबगारों के सामने मुंह बिगाड़ कर पेश आ रही थी। इसका समरा फ़ितना था और इसकी ग़िज़ा मुरदार। इसका अन्दरूनी लिबास ख़ौफ़ था और बैरूनी लिबास तलवार। लेहाज़ा बन्दगाने ख़ुदा तुम इबरत हासिल करो और उन हालात को याद करो जिनमें तुम्हारे बाप दादा और भाई बन्दे गिरफ़्तार हैं और इनका हिसाब दे रहे हैं। मेरी जान की क़सम- अभी इनके और तुम्हारे दरम्यान ज़्यादा ज़माना नहीं गुज़रा है और न सदियों का फ़ासला हुआ है और न आज का दिन कल के दिन से ज़्यादा दूर है जब तुम उन्हीं बुज़ुर्गों के सल्ब में थे।

ख़ुदा की क़सम रसूले अकरम (स 0) ने तुम्हें कोई ऐसी बात नहीं सुनाई है जिसे आज मैं नहीं सुना रहा हूँ और तुम्हारे कान भी कल के कान से कम नहीं हैं और जिस तरह कल उन्होंने लोगों की आंखें खोल दी थीं और दिल बना दिये थे वैसे ही आज मैं भी तुम्हें वह सारी चीज़ें दे रहा हूँ और ख़ुदा गवाह है के तुम्हें कोई ऐसी चीज़ नहीं दिखलाई जा रही है जिससे तुम्हारे बुज़ुर्ग नावाक़िफ़ थे और न कोई ऐसी ख़ास बताई जा रही है जिससे वह महरूम रहे हों और देखो तुम पर एक मुसीबत नाज़िल हो गई है उस ऊंटनी के मानिन्द जिसकी नकेल झूल रही हो और जिसका तंग ढीला हो गया हो लेहाज़ा ख़बरदार तुम्हें पिछले फ़रेबख़र्दा लोगों की ज़िन्दगी धोके में न डाल दे के यह इश्क़े दुनिया एक फैला हुआ साया है जिसकी मुद्दत मुअय्यन है और फिर सिमट जाएगी।

90-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें माबूद के क़ेदम और उसकी मख़लूक़ात की अज़मत का तज़किरा करते हुए मोअज़ पर इख़्तेताम किया गया है।)

सारी तारीफ़ें उस अल्लाह के लिये हैं जो बग़ैर देखे मारूफ़ है और बग़ैर सोचे पैदा करने वाला है। वह हमेशा से क़ायम और दायम है जब न यह बुर्जों वाले आसमान थे और न बलन्द दरवाज़ों वाले हेजाबात , न अन्धेरी रात थी और न ठहरे हुए समन्दर , न लम्बे चैड़े रास्तों वाले पहाड़ थे और न टेढ़ी तिरछी पहाड़ी राहें , न बिछे हुए फर्श वाली ज़मीन थी और न किसी बल वाली मख़लूक़ात , वही मख़लूक़ात का ईजाद करने वाला है और वही आखि़र में सबका वारिस है। वही सबका माबूद है और सबका राज़िक़ है। शम्स व क़मर इसकी मर्ज़ी से मुसलसल हरकत में हैं के हर नए को पुराना कर देते हैं और हर बईद को क़रीबतर बना देते हैं। उसी ने सबके रिज़्क़ को तक़सीम किया है और सबके आसार व आमाल का अहसाए किया है। उसी ने हर एक की सांसों का शुमार किया है और हर एक की निगाह की ख़यानत और सीने के पीछे छुपे हुए इसरार और इसलाब व अरहाम में इनके मराकज़ का हिसाब रखता है यहाँ तक के वह अपनी आखि़री मन्ज़िल तक पहुंच जाएं। वही वह है जिसका ग़ज़ब दुश्मनों पर उसकी वुसअते रहमत के बावजूद शदीद है और उसकी रहमत इसके दोस्तों के लिये इसके शिद्दते ग़ज़ब के बावजूद वसीअ है जो इस पर ग़लबा पैदा करना चाहते हैं।उसके हक़ में क़ाहिर है और जो कोई इससे झगड़ा करना चाहे उसके हक़ में तबाह करने वाला है। हर मुख़ालेफ़त करने वाले का ज़लील करने वाला और हर दुश्मनी करने वाले पर ग़ालिब आने वाला है। जो इस पर तवक्कल करता है उसके लिये काफ़ी हो जाता है और जो उससे सवाल करता है उसे अता कर देता है। जो उसे क़र्ज़ देता है उसे अदा कर देता है और जो इसका शुक्रिया अदा करता है उसको जज़ा देता है।

बन्दगाने ख़ुदा , अपने आप को तौल लो , क़ब्ल इसके के तुम्हारा वज़न किया जाए और अपने नफ़्स का मुहासेबा कर लो क़ब्ल इसके के तुम्हारा हिसाब कर लिया जाए। गले का फन्दा तंग होने से पहले सांस ले लो और ज़बरदस्ती ले जाए जाने से पहले अज़ ख़ुद जाने के लिये तैयार हो जाओ और याद रखो के जो शख़्स ख़ुद अपने नफ़्स की मदद करके उसे नसीहत और तम्बीह नहीं करता है उसको कोई दूसरा न नसीहत कर सकता है अैर न तम्बीह कर सकता है।

((( यूँ तो परवरदिगार की किसी सिफ़त और उसके किसी कमाल में इसका कोई मिस्लो नज़ीर या शरीक व वज़ीर नहीं है लेकिन इन्सानी ज़िन्दगी के लिये ख़ुसूसियत के साथ यह चार सिफ़ात इन्तेहाई अहम हैं:

1. वह अपने ऊपर एतमाद करने वालों के लिये काफ़ी हो जाता है और उन्हें दूसरों का दोस्त निगर नहीं बनने देता है।

2. वह हर सवाल करने वाले को अता करता है और किसी तरह की तफ़रीक़ का क़ायल नहीं है बल्कि हक़ीक़त यह है के सवाल न करने वालों को भी अता करता है।

3. वह हर क़र्ज़ को अदा कर देता है हालांके हर क़र्ज़ देने वाला उसी के दिये हुए माल में से क़र्ज़ देता है और उसी की राह में ख़र्च करता है।

4. वह शुक्रिया अदा करने वालों को भी इनाम देता है जबके वह अपने फ़रीज़े को अदा करते हैं और कोई नया कारे ख़ैर अन्जाम नहीं देते हैं। यह और बात है के उन लोगों को भी इस बात का ख़याल रखना चाहिए के इस बात का शुक्रिया न अदा करें के हमें दिया है और “ दूसरों को नहीं दिया है ” के यह इसके करम की तौहीन है शुक्रिया यह नहीं है। शुक्रिया इस बात का है के हमें यह नेमत दी है। अगरचे दूसरों को भी मसलहत के मुताबिक़ दूसरी नेमतों से नवाज़ा है।)))

91-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(इस ख़ुतबे को ख़ुत्बए अष्बाह कहा जाता है जिसे आपके जलील तरीन ख़ुतबात में शुमार किया जाता है)

( मेदा बिन सिदक़ा ने इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0) से रिवायत की है के अमीरूल मोमेनीन (अ 0) ने यह ख़ुत्बा मिम्बरे कूफ़ा से उस वक़्त इरशाद फ़रमाया था जब एक शख़्स ने आपसे यह तक़ाज़ा किया के परवरदिगार के औसाफ़ इस तरह बयान करें के गोया वह हमारी निगाह के सामने है ताके हमारी मारेफ़त और मोहब्बते इलाही में इज़ाफ़ा हो जाए। आपको इस बात पर ग़ुस्सा आ गया और आपने नमाज़े जमाअत का एलान फ़रमा दिया। मस्जिद मुसलमानों से छलक उठी तो आप मिम्बर पर तशरीफ़ ले गए और इस आलम में ख़ुत्बा इरशाद फ़रमाया के आपके चेहरे का रंग बदला हुआ था और ग़ैज़ व ग़ज़ब के आसार नमूदार थे। हम्द व सनाए इलाही और सलवात के बाद इरशाद फ़रमाया।)

सारी तारीफ़ उस परवरदिगार के लिये है जिसके ख़ज़ाने में फ़ज़्लो करम के रोक देने और अताओं के मुन्जमिद कर देने से इज़ाफ़ा नहीं होता है और जूदो करम के तसलसुल से कमी नहीं आती है। इसलिये के उसके अलावा हर अता करने वाले के यहां कमी हो जाती है और उसके मा सेवा हर न देने वाला क़ाबिले मज़म्मत होता है। वह मुफ़ीदतरीन नेमतों और मुसलसल रोज़ियों के ज़रिये एहसान करने वाला है। मख़लूक़ात उसकी ज़िम्मेदारी में हैं और उसने सबके रिज़्क़ की ज़मानत दी है और रोज़ी मुअय्यन कर दी है। अपनी तरफ़ तवज्जो करने वालों और अपने अताया के साएलों के लिये रास्ता खोल दिया है और मांगने वालों को न मांगने वालों से ज़्यादा अता नहीं करता है। वह ऐसा अव्वल है जिसकी कोई इब्तेदा नहीं है के उससे पहले कोई हो जाए और ऐसा आखि़र है जिसकी कोई इन्तेहा नहीं है के उसके बाद कोई रह जाए। वह आँखों की बीनाई को अपनी ज़ात तक पहुँचने और उसका इदराक करने से रोके हुए है। उस पर ज़माना असर अन्दाज़ नहीं होता है के हालात बदल जाएं और वह किसी मकान में नहीं है के वहां से मुन्तक़िल हो सके अगर वह उन तमाम जवाहरात को अता कर दे जो पहाड़ों के मअदन अपनी साँसों से बाहर निकालते हैं या जिन्हें समन्दर के सदफ़ मकराकर बाहर फेंक देते हैं , याहे वह चान्दी हो या सोना , मोती हों या मरजान , तो भी उसके करम पर कोई असर न पड़ेगा और न उसके ख़ज़ानों की वुसअत में कोई कमी आ सकती है और उसके पास नेमतों के वह ख़ज़ाने रह जाएंगे जिन्हें मांगने वालों के मुतालबात ख़त्म नहीं कर सकते हैं। इसलिये के वह ऐसा जवाद व करीम है के न साएलों के सवाल इसके यहाँ कमी पैदा कर सकता है और न मुफ़लिसों का इसरार उसे बख़ील बना सकता है।

क़ुराने मजीद में सिफ़ाते परवरदिगार

सिफ़ाते ख़ुदा के बारे में सवाल करने वालों! क़ुरआन मजीद ने जिन सिफ़ात की निशानदेही की है उन्हीं का इत्तेबाअ करो।

((( इसका मतलब यह नहीं है के क़ुराने मजीद ने जितने सिफ़ात बयान कर दिये हैं उनके अलावा दीगर इस्माअ व सिफ़ात का इतलाक़ नहीं हो सकता है के बाज़ ओलमाए इस्लाम का ख़याल है के इस्माए इलायिा तोक़ीफ़िया हैं और नुसूसे आयात व रिवायात के बग़ैर किसी नाम या सिफ़त का इतलाक़ जाएज़ नहीं है। बल्कि इस इरशाद का वाज़ेअ सा मफ़हूम यह है के जिन सिफ़ात की क़ुरआने करीम ने नफ़ी कर दी है उनका इतलाक़ जाएज़ नहीं है चाहे किसी ज़बान और किसी लम्हे में क्यों न हो।)))

उसी के नूरे हिदायत से रोशनी हासिल करो आर जिस इल्म की तरफ़ शैतान मुतवज्जो करे और उसका कोई फ़रीज़ा न किताबे इलाही में मौजूद हो , न सुन्नते पैग़म्बर (स 0) आर इरशादाते आइम्माए हुदा में तो इसका इल्म परवरदिगार के हवाले कर दो के यही उसके हक़ की आखि़री हद है और यह याद रखो के “ असख़ून फ़िलइल्म ” वही अफ़राद हैं जिन्हें ग़ैबे इलाही के सामने पड़े हुए परदों के अन्दर वराना दाखि़ल होने से इस अम्र ने बेनियाज़ बना दिया है। वह इस पोशीदा ग़ैब का इजमाली इक़रार रखते हैं और परवरदिगार ने उनके इसी जज़्बे की तारीफ़ की है के जिस चीज़ को उनका इल्म अहाता नहीं कर सकता उसके बारे में अपनी आजिज़ी का इक़रार कर लेते हैं और इसी सिफ़त को उसने रूसूख़ से ताबीर किया है के जिस बात की तहक़ीक़ उनके बस में नहीं है उसकी गहराइयों में जाने का ख़याल नहीं रखते हैं। तुम भी इसी बात पर इकतेफ़ा करो और अपनी अक़्ल के मुताबिक़ अज़मते इलाही का अन्दाज़ा न करो के हलाक होने वालों में शुमार जो जाओ। देखो वह ऐसा क़ादिर है के जब फ़िक्रें उसकी क़ुदरत की इन्तेहा मालूम करने के लिये आगे बढ़ती हैं और हर तरह के वसवसे से पाकीज़ा ख़याल उसकी सलतनत के पोशीदा इसरार को अपनी ज़द में लाना चाहता है और दिल वालेहाना तौर पर इसके सिफ़ात की कैफ़ियत मालूम करने की तरफ़ मुतवज्जो करते हैं और अक़्ल की राहें इसकी ज़ात का इल्म हासिल करने के लिये सिफ़ात की रसाई से आगे बढ़ना चाहती हैं तो वह उन्हें इस आलम में वापस कर देता है के वह आलमे ग़ैब की गहराइयों की राहें तय कर रही होती हैं और मुकम्मल तौर पर इसकी तरफ़ मुतवज्जो होती हैं जिसके नतीजे में अक़्लें इस एतराफ़ के साथ पलट आती हैं के ग़लत फ़िक्रों से उसकी मारेफ़त की हक़ीक़त का इदराक नहीं हो सकता है और साहेबाने फ़िक्र के दिलों में उसके जलाल व इज़्ज़त का एक शम्मा भी ख़तूर नहीं कर सकता है। उसने मख़लूक़ात को बग़ैर किसी नमूने को निगाह में रखे हुए ईजाद किया है और किसी मासबक़ के ख़ालिक़ व माबूद के नक़शे के बग़ैर पैदा किया है। उसने अपनी क़ुदरत के इख़्तेयारात , अपनी हिकमत के मुंह बोलते आसार और मख़लूक़ात के लिये इसके सहारे की एहतेयाज के इक़रार के ज़रिये इस हक़भ्क़त को बे नक़ाब कर दिया है के हम उसकी मारेफ़त पर दलील क़ायम होने का इक़रार कर लें के जिन जदीदतरीन अशया को उसके आसारे सनअत ने ईजाद किया है और निशानहाए हिकमत ने पैदा किया है वह सब बिलकुल वाज़ेअ है और हर मख़लूक़ उसके वजूद के लिये एक मुसतक़िल हुज्जत और दलील है के अगर वह ख़ामोश भी है तो उसकी तदबीर बोल रही है और उसकी दलालत ईजाद करने वाले पर क़ायम है। ख़ुदाया- मैं गवाही देता हूं के जिसने भी तेरी मख़लूक़ात के आज़ा के इख़्तेलाफ़ और इनके जोड़ों के सरों के मिलने से तेरी हिकमत की तदबीर के लिये तेरी शबीह क़रार दिया। ((( इन्सान की ग़फ़लत की आखि़री हद यह है के वह जूद व हिकमते इलाही की दलील तलाश कर रहा है जबके उसने अदना तामल से काम लिया होता तो उसे अन्दाज़ा हो जाता के जिस निगाह से आसारे क़ुदरत को तलाश कर रहा है और जिस दिमाग़ से दलाएले हिकमत की जुस्तजू कर रहा है यह दोनों अपनी ज़बान बे ज़बानी से आवाज़ दे रहे हैं के अगर कोई ख़ालिक़े हकीम और सानेअ करीम न होता तो हमारा वजूद भी न होता। हम उसकी अज़मत व हिकमत के बेहतरन गवाह हैं। हमारे होते हुए दलाएले हिकमत व अज़मत का तलाश करना बग़ल में कटोरा रखकर शहर में ढिन्डोरा पीटने के मतरादिफ़ है और यह कारे अक़्लन नहीं है।)))

इसने अपने ज़मीर के ग़ैब को तेरी मारेफ़त से वाबस्ता नहीं किया और इसके दिल में यह यक़ीन पेवस्त नहीं हुआ के तेरा कोई मिस्ल नहीं है और गोया इसने यह पैग़ाम नहीं सुना के एक दिन मुरीद अपने पीरो मुरशद से यह कहकर बेज़ारी करेंगे के “ बख़ुदा हम खुली हुई गुमराही में थे जब तुमको रब्बुलआलमीन के बराबर क़रार दे रहे थे , बेशक तेरे बराबर क़रार देने वाले झूटे हैं के उन्होंने तुझे अपने अस्नाम से तशबीह दी है और अपने औहाम की बिना पर तुझे मख़लूक़ात का हुलिया अता कर दिया है और अपने ख़यालात की बिना पर मुजस्समों की तरह तेरे टुकड़े-टुकड़े कर दिये हैं और अपनी अक़्लों की सूझ बूझ से तुझे मुख़्तलिफ़ ताक़तों वाली मख़लूक़ात के पैमाने पर नाप तोल दिया है। मैं इस बात की गवाही देता हूँ के जिसने भी तुझे किसी के बराबर क़रार दिया उसने तेरा हमसर बना दिया और जिसने तेरा हमसर बना दिया उसने आयाते मोहकमात की तन्ज़ील का इन्कार कर दिया है और वाज़ेतरीन दलाएल के बयानात को झुटला दिया है। बेशक तू वह ख़ुदा हैजो अक़्लों की हुदूद में नहीं आ सकता है के उफ़कार की रवानी में कैफ़ियों की ज़द में आजाए और न ग़ौर व फ़िक्र की जूलानियों में समा सकता है के महदूद और तसरेफ़ात का पाबन्द हो जाए।

एक दूसरा हिस्सा

मालिक ने हर मख़लूक़ की मिक़दार मुअय्यन की है और मोहकमतरीन मोअय्यन की है औश्र हर एक की तदबीर की है और लतीफ़ तरीन तदबीर की है। हर एक को एक रूख़ पर लगा दिया है तो उसने अपनी मन्ज़ेलत के हुदूद से तजावुज़ भी नहीं किया है और इन्तेहा तक पहुँचने में कोताही भी नहीं की है और मालिक के इरादे पर चलने का हुक्म दे दिया गया तो इससे सरताबी भी नहीं की है और यह मुमकिन भी कैसे था जबके सब इस मशीअत से मन्ज़रे आम पर आए हैं। वह तमाम अशयाअ का ईजाद करने वाला है बग़ैर इसके के फ़िक्र की जूलानियों की तरफ़ रूजूअ करे या तबीअत की दाखि़ली रवानी का सहारा ले या हवादिस ज़माने के तजुर्बात से फ़ाएदा उठाए या अजीब व ग़रीब मख़लूक़ात के बनाने में किसी शरीक की मदद का मोहताज हो।

उसकी मख़लूक़ात उसके अम्र से तमाम हुई है और इसकी इताअत में सर ब सुजूद है। इसकी दावत पर लब्बैक कहती है और इस राह में न देर करने वाले की सुस्ती का शिकार होती है और न हील व हुज्जत करने वाले की ढील में मुब्तिला होती है। उसने अशयाअ की कजी को सीधा रखा है। उनके हुदूद को मुक़र्रर कर दिया है। अपनी क़ुदरत से उनके मोतज़ाद अनासिर में तनासब पैदा कर दिया है और नफ़्स व बदन का रिश्ता जोड़ दिया है। उन्हें हुदूद व मक़ादीर तबाएअ व हसयात की मुख़तलिफ़ जिन्सों में तक़सीम कर दिया है। यह नौईजाद मख़लूक़ है जिसकी सनअत मुस्तहकम रखी है और इसकी फ़ितरत व खि़लक़त को अपने इरादे के मुताबिक़ रखा है।

कुछ आसमान के बारे में

उसने बग़ैर किसी चीज़ से वाबस्ता किये आसमानों के नशेब व फ़राज़ को मुनज़्ज़म कर दिया है और उसके शिगाफ़ों को मिला दिया है और उन्हें आपस में एक दूसरे के साथ जकड़ दिया है और इसका हुक्म लेकर उतरने वाले बन्दों के आमाल को लेकर जाने वाले फ़रिश्तो के लिये बलन्दी की ना-हमवारियों को हमवार कर दिया है। अभी यह आसमान धुएं की शक्ल में थे के मालिक ने उन्हें आवाज़ दी और उनके तस्मों के रिश्ते आपस में जुड़ गए और उनके दरवाज़े बन्द रहने के बाद खुल गए। फिर उसने इनके सूरूाख़ों पर टूटते हुए सितारों के निगेहबान खड़े कर दिये और अपने दस्ते क़ुदरत से इस अम्र से रोक दिया के हवा के फैलाव में इधर उधर चले जाएं। उन्हें हुक्म दिया के इसके हुक्म के सामने सरापा तस्लीम खड़े रहें। इनके आफ़ताब को दिन के लिये रौशन निशानी और माहताब को रात की धुन्धली निशानी क़रार दे दिया और दोनों को उनके बहाव की मन्ज़िल पर डाल दिया है और उनकी गुज़रगाहों में रफ़तार की मिक़दार मुअय्यन कर दी है ताके उनके ज़रिये दिन और रात का इम्तेयाज़ क़ायम हो सके और इनकी मिक़दार से साल वग़ैरह का हिसाब किया जा सके। फिर फ़िज़ाए बसीत में सबके मराद मअल्लक़ कर दिये और उनसे इस ज़ीनत को वाबस्ता कर दिया जो छोटे-छोटे तारों और बड़े-बड़े सितारों के चिराग़ों से पैरा हुई थी। आवाज़ों के चुराने वालों के लिये टूटते तारों से संगसार का इन्तेज़ाम कर दिया और उन्हें भी अपने जब्र व क़हर की राहों पर लगा दिया के जो साबित हैं वह साबित रहें , जो सयार हैं व सयार रहें। बलन्द व पस्त नेक व बद सब उसी की मर्ज़ी के ताबे रहें।

औसाफ़े मलाएका का हिस्सा

इसके बाद उसने आसमानों को आबाद करने और अपनी सलतनत के बलन्दतरीन तबक़े को बसाने के लिये मलाएका जैसी अनोखी मख़लूक़ को पैदा किया और उनसे आसमानी रास्तों के शिगाफ़ों को पुर कर दिया और फ़िज़ा की पिनहाइयों को मामूर कर दिया। उन्हें शिगाफ़ों के दरम्यान तस्बीह करने वाले फ़रिश्तो की आवाज़े क़ुद्स की चारदीवारी , अज़मत के हेजाबात , बुज़ुर्गी के सरा पर्दों के पीछे गून्ज रही हैं और इस गूंज के पीछे जिससे कान के परदे फट जाते हैं , नूर की वह तजल्लियां हैं जो निगाहों को वहां तक पहुंचतने से रोक देती हैं और नाकाम होकर अपनी हदों पर ठहर जाती हैं। उसने फ़रिश्तो को मुख़्तलिफ़ शक्लों और अलग-अलग पैमानों के मुताबिक़ पैदा किया है। उन्हें बाल व पर इनायत किये हैं और वह उसके जलाल व इज़्ज़त की तस्बीह में मसरूफ़ हैं। मख़लूक़ात में इसकी नुमायां सनअत को अपनी तरफ़ मन्सूब नहीं करते हैं।

((( वाज़े रहे के मलाएका और जिन्नात का मसला ग़ैबियात से ताल्लुक़ रखता है और इसका इल्म दुनिया के आम वसाएल के ज़रिये मुमकिन नहीं है। क़ुराने मजीद ने ईमान के लिये ग़ैब के इक़रार को शर्ते इसासी क़रार दिया है लेहाज़ा इस मसले का ताल्लुक़ सिर्फ़ साहेबाने ईमान से है। दीगर अफ़राद के लिये दीगर इरशादात इमाम (अ 0) से इस्तेफ़ाज़ा किया जा सकता है। लेकिन इतनी बात तो बहरहाल वाज़े हो चुकी है के आसमानों के अन्दर आबादियां पाई जाती हैं और यहां के अफ़राद का वहां ज़िन्दा न रह सकना इस बात की दलील नहीं है के वहां के बाशिन्दे भी ज़िन्दा न रह सकें। मालिक ने हर जगह के बाशिन्दे में वहां के एतबार से सलाहियते हयात रखी है और उसे सामाने ज़िन्दगी इनायत फ़रमाया है। इमाम सादिक़ (अ 0) का इरशादे गिरामी है के परवरदिगार आलम ने दस लाख आलम पैदा किये हैं और दस लाख आदम और हमारी ज़मीन के बाशिन्दे आखि़री आदम की औलाद में हैं। (अलहय्यता वल इस्लाम शहरस्तानी) )))

और किसी चीज़ की तख़लीक़ का दावा नहीं करते हैं , “ यह अल्लाह के मोहतरम बन्दे हैं जो उस पर किसी बात में सबक़त नहीं करते हैं और उसी के हुक्म के मुताबिक़ अमल कर रहे हैं। ” अल्लाह ने उन्हें अपनी वही का अमीन बनाया है और मुरसलीन की तरफ़ अम्र व नहीं की अमानतों का हामिल क़रार दिया है। उन्हें शुकूक व शुबहात से महफ़ूज़ रखा है के कोई भी इसकी मज़ी की राह से इन्हेराफ़ करने वाला नहीं है। सबको अपनी कारआमद इमदाद से नवाज़ा है और सबके दिल में आजिज़ी और शिकस्तगी की तवाज़अ पैदा कर दी है। उनके लिये अपनी तमजीद की सहूलत के दरवाज़े खोल दिये हैं और तौहीद की निशानियों के लिये वाज़े मिनारे क़ायम कर दिये हैं। इनपर गुनाहों का बोझ भी नहीं है और उन्हें शबो रोज़ की गरदिशे अपने इरादों पर चला भी नहीं सकती हैं। शुकूक व शुबहात उनके मुस्तहकम ईमान को अपने ख़यालात के तीरों का निशाना भी नहीं बना सकते हैं और वहम व गुमान इनके यक़ीन की पुख़्तगी पर हमलावर भी नहीं हो सकते हैं। इनके दरम्यान हसद की चिंगारी भी नहीं भड़कती है और हैरत व इस्तेजाब इनके ज़मीरों की मारेफ़त को सल्ब भी नहीं कर सकते हैं और इनके सीनों में छिपे हुए अज़मत व हैबत व जलालते इलाही के ज़ख़ीरों को छीन भी नहीं सकते हैं और वसवसों ने कभी यह सोचा भी नहीं है के इनकी फ़िक्र को ज़ंगआलूद बना दें। उनमें बाज़ वह हैं जिन्हें बोझिल बादलों , बलन्दतरीन पहाड़ों और तारीकतरीन ज़ुल्मतों के पर्दों में रखा गया है और बाज़ वह हैं जिनके पैरों ने ज़मीन के आखि़री तबक़े को पारा कर दिया है और वह इन सफ़ेद परचमों जैसे हैं जो फ़िज़ा की वुसअतों को चीरकर बाहर निकल गए हों। जिनके नीचे एक हल्की हवा हो जो उन्हें उनकी हदों पर रोके रहे। उन्हें इबादत की मशग़ूलियत ने हर चीज़ से बेफिक्र बना दिया है और ईमान के हक़ाएक़ ने उनके और मारेफ़त के दरम्यान गहरा राब्ता पैदा कर दिया है और यक़ीने कामिल ने हर चीज़ से रिश्ता तोड़कर उन्हें मालिक की तरफ़ मुशताक बना दिया है इनकी रग़बतें मालिक की नेमतों से हट कर किसी और की तरफ़ नहीं हैं के उन्होंने मारेफ़त की हेलावत का मज़ा चख लिया है और मोहब्बत के सेराब करने वाले जाम से सरशार हो गए हैं।

((( बाज़ ओलमा ने इसकी यह तावील की है के मलाएका का इल्म ज़मीन व आसमान के तमाम तबक़ात को महीत है लेकिन बज़ाहिर इसकी कोई ज़रूरत नहीं है। जब इनका जिस्म नूरानी है और इसपर माद्दियात का दबाव नहीं है तो इनका जिस्म लतीफ़ माद्दियात के तमाम हुदूद को तोड़ सकता है और इसमें कोई बात खि़लाफ़े अक़्ल नहीं है। नूरानियत में मुख़तलिफ़ इश्काल इख़्तेयार करने की सलाहियत पाई जाती है और वह मुख़्तलिफ़ सूरतों में सामने आ सकते हैं।

मलाएका के नूरानी इजसाम की वुसअत हैरतअंगेज़ नहीं है। वह ज़मीन की आखि़री तह से आसमान की आख़ेरी बलन्दी तक अहाता कर सकते हैं। हैरतअंगेज़ उस किसाए यमानी की वुसअत है जिसमें इस गिरोहे मलाएका का सरदार भी समा जाता है और चादर की वुसअत पर कोई असर नहीं पड़ता है।

ज़ाहिर है के ज़िन्दगी में दुनिया के मसाएल तिजारत व ज़राअत , मुलाज़ेमत व सनअत और रिश्ते व क़राबत शामिल न हों। उससे ज़्यादा इबादत कौन कर सकता है और उससे ज़्यादा इबादत को कौन वक़्त दे सकता है। यह और बात है के बाज़ अल्लाह के बन्दे ऐसे भी हैं जिनकी ज़िन्दगी में ज़राअत भी है और तिजारत भी। सनअत भी है और सियासत भी , रिश्ता भी है और क़राबत भी , लेकिन इसके बावजूद इतनी इबादत करते हैं के मलक को आराम करने का हुक्म देना पड़ता है और उनकी एक ज़रबत इबादते सक़लैन पर भारी हो जाती है या वह एक नीन्द से मर्ज़ीए माबूद का सौदा कर लेते हैं।)))

और उनके दिलों की तह में उसका ख़ौफ़ जड़ पकड़ चुका है जिसकी बिना पर उन्होंने मुसलसल इताअत से अपनी सीधी कमरों को ख़मीदा बना लिया है और तूले रग़बत के बावजूद उनके तज़्रेअ वज़ारी का ख़ज़ाना ख़त्म नहीं हुआ है और न कमाले तक़र्रब के बावजूद इनके खुशु की रस्सियां ढीली हुई हैं और न ख़ुदपसन्दी ने इन पर ग़लबा हासिल किया है के वह अपने गुज़िश्ता आमाल को ज़्यादा तसव्वुर करने लगें और न जलाले इलाही के सामने इनके इन्केसार ने कोई गुन्जाइश छोड़ी है के वह अपनी नेकियों को बड़ा ख़याल करने लगें। मुसलसल ताब के बावजूद उन्होंने सुस्ती को रास्ता नहीं दिया और न इनकी रग़बत में कोई कमी वाक़ेअ हुई है के वह मालिक से उम्मीद के रास्ते को तर्क कर दें। मुसलसल मुनाजातों ने इनकी नोके ज़बान को ख़ुश्क नहीं बनाया और न मसरूफ़ियात ने इन पर क़ाबू पा लिया है के इनकी मुनाजात की ख़ुफ़िया आवाज़ें मुनक़ता हो जाएं। न मक़ामाते इताअत में इनके शाने आगे पीछे होते हैं और न तामीले एहकामे इलाहिया में कोताही की बिना पर इनकी गरदन किसी तरफ़ मुड़ जाती है। इनकी कोशिशो के अज़ाएम पर न ग़फ़लतों की नादानियों का हमला होता है और न ख़्वाहिशात की फ़रेबकारियां इनकी हिम्मतों को अपना निशाना बनाती हैं। उन्होंने अपने मालिक साहबे अर्ष को रोज़े फ़क्ऱो फ़ाक़ा के लिये ज़ख़ीरा बना लिया है और जब लोग दूसरी मख़लूक़ात की तरफ़ मुतवज्जो हो जाते हैं तो वह इसी को अपना हदफ़े निगाह बनाए रखते हैं। यह इबादत की इन्तेहा को नहीं पहुँच सकते हैं लेहाज़ा इनका इताअत का वालहाना ज़ज़्बा किसी और तरफ़ ले जाने के बजाये सिर्फ़ उम्मीद व बीम के नाक़ाबिले इख़्तेताम ज़ख़ीरों ही की तरफ़ ले जाता है। इनके लिये ख़ौफ़े ख़ुदा के असबाब मुनक़ता नहीं हुए हैं के इनकी कोशिशो में सुस्ती पैदा करा दें और न उन्हें ख़्वाहिशात ने क़ैदी बनाया है के वक़्ती कोशिशो को अबदी सई पर मुक़ददम कर दें। यह अपने गुज़िश्ता आमाल को बुरा ख़याल नहीं करते हैं के अगर ऐसा होता तो अब तक उम्मीदें ख़ौफ़े ख़ुदा को फ़ना कर देतीं। उन्होंने शैतानी ग़लबे की बुनियाद पर परवरदिगार के बारे में आपस में कोई इख़्तेलाफ़ भी नहीं किया है और न एक दूसरे से बिगाड़ने इनके दरम्यान इफ़तेराक़ पैदा किया है। न इन पर हसद का कीना ग़ालिब आता है और न वह शुकूक की बिना पर आपस में एक दूसरे से अलग हुए हैं।

((( किरदार का कमाल यही है के इन्सानी ज़िन्दगी में न उम्मीद ख़ौफ़ पर ग़ालिब आने पाए और न क़ुरबत का एहसास ख़ुज़ू व खुशु के जज़्बे को मजरूअ बना दे। मौलाए कायनात (अ 0) ने इस हक़ीक़त का इज़हार मलाएका के कमाल के ज़ैल में फ़रमाया है लेकिन मक़सद यही है के इन्सान इस सूरते हाल से इबरत हासिल करे और अशरफ़ुल मख़लूक़ात होने का दावेदार है तो किरदार में भी दूसरी मख़लूक़ात के मुक़ाबले में अशरफ़ीयत का मुज़ाहेरा करे वरना दावाए बे दलील किसी मन्तिक़ में क़ाबिले क़ुबूल नहीं होता है। इन्सान जब अपने ज़ाती आमाल का मुवाज़ना बहुत से दूसरे अफ़राद से करता है तो इसमें ग़ुरूर पैदा होने लगता है के इसकी नमाज़ें , इबादतें या इसके माल का रहाए ख़ैर दूसरे अफ़राद से ज़्यादा हैं लेकिन जब इनका मुवाज़ना करमे परवरदिगार और जलाले इलाही से करता है तो यह सारे आमाल हैच नज़र आने लगते हैं। मौलाए कायनात ने इसी नुक्ते की तरफ़ मुतवज्जो किया है के अपने अमल का मुवाज़ना दूसरे अफ़राद के आमाल से न करो। मवाज़ना करने का शौक़ है तो करमे इलाही और जलाले परवरदिगार से करो ताके तुम्हें अपनी औक़ात का सही अन्दाज़ा हो जाए और शैतान तुम्हारे ऊपर ग़ालिब न आने पाए।)))

और न पस्त हिम्मतों ने इन्हें एक-दूसरे से जुदा किया है। यह ईमान के वह क़ैदी हैं जिनकी गरदनों को कजी , इन्हेराफ़ , सुस्ती , फ़ितूर , कोई चीज़ आज़ाद नहीं करा सकती है। फ़ज़ाए आसमान में एक खाल के बराबर भी ऐसी जगह नहीं है जहां कोई फ़रिश्ता सजदा गुज़ार या दौड़ धूप करने वाला न हो। यह तूले इताअत से अपने रब की मारेफ़त में इज़ाफ़ा ही करते हैं और इनके दिलों में उसकी अज़मत व जलालत बढ़ती ही जाती है।

ज़मीन और उसके पानी पर फर्श होने की तफ़सीलात

इसने ज़मीन को तहो बाला होने वाली मौजों और अथाह समन्दर की गहराइयों के ऊपर क़ायम किया है जहां मौजों का तलातुम था और एक दूसरे को ढकेलने वाली लहरें टकरा रही थीं। इनका फेन ऐसा ही था जैसे हैजान ज़दा ऊँट का झाग। मगर इस तूफ़ान को तलातुमख़ेज़ पानी के बोझ ने दबा दिया और इसके जोश व ख़रोश को अपना सीना टेक कर साकिन बना दिया और अपने शाने टिका कर इस तरह दबा दिया के वह ज़िल्लत व ख़्वारी के साथ राम हो गया अब वह पानी मौजों की घड़घराहट के बाद साकित और मग़लूब हो गया और ज़िल्लत की लगाम में असीर व मोतीअ हो गया और ज़मीन भी तूफ़ानख़ेज़ पानी की सतह पर दामन फैलाकर बैठ गई थी के इसने इठलाने , सर उठाने , नाक चिढ़ाने जोश दिखाने का ख़ात्मा कर दिया था और रवानी की बे अतदालियों पर बन्ध बान्ध दिया था। अब पानी उछल कूद के बाद बेदम हो गया था और जस्त व ख़ेज़ की सरमस्तियों के बाद साकित हो गया था। अब जब पानी का जोश एतराफ़े ज़मीन के नीचे साकिन हो गया और सरबफ़लक पहाड़ों के बोझ ने इसके कान्धों को दबा दिया तो मालिक ने उसकी नाक के बांसों के चश्मे जारी कर दिये और उन्हें दूर-दराज़ सहराओं और गढ़ों तक मुन्तशिर दिया और फिर ज़मीन की हरकत को पहाड़ों की चट्टानों और ऊंची-ऊंची चोटियों वाले पहाड़ों के वज़्न से मोतदिल बना दिया।

((( वाज़े रहे के इस मक़ाम पर अस्ल खि़लक़ते ज़मीन का कोई तज़किरा नहीं है के इसकी तख़लीक़ मुस्तक़िल हैसियत रखती है जैसा के दौरे हाज़िर में ओलमाए तबीअत का ख़याल है या उसे सूरज से अलग करके बनाया गया है जैसा के साबिक़ ओलमाए तबीयत कहा करते थे। इस ख़ुतबे में सिर्फ़ ज़मीन के बाज़ कैफ़ियात औश्र हालात का ज़िक्र किया गया है और परवरदिगार के इस एहसास को याद दिलाया गया है के उसने ज़मीन को इन्सानी ज़िन्दगी का मुस्तख़र क़रार देने के लिये कितनी दूर से एहतेमाम किया है और इस मख़लूक़ को बसाने के लिये कितने अज़ीम एहतेमाम से काम लिया है। काश इन्सान इन एहसानात का एहसास करता और इसे यह अन्दाज़ा होता के इसके मालिक ने उसे किस क़दर अज़ीम क़रार दिया था के इसके क़याम व इस्तेक़रार के लिये ज़मीन व आसमान सब को मुन्क़लिब कर दिया और उसने अपने को इस क़द्र ज़लील कर दिया के एक-एक ज़र्रा कायनात और एक एक चप्पा ज़मीन के लिये जान देने को तैयार है और अपनी क़द्र व क़ीमत को यकसर नज़रअन्दाज़ किये हुए है। मदहोह के मानी अगरचे आमतौर से फर्ष शुदा के बयान किये जाते हैं लेकिन लुग़त में अन्डे देने की जगह को भी कहा जाता है। इसलिये मुमकिन है के मौलाए कायनात ने इस लफ़्ज़ से ज़मीन की बेज़ावी शक्ल की तरफ़ इशारा किया हो के दौरे हाज़िर की तहक़ीक़ की बिना पर ज़मीन की शक्ल करवी नहीं है , बल्के बेज़ावी है।)))

पहाड़ों के इसकी सतह के मुख़्तलिफ़ हिस्सों में डूब जाने और इसकी गहराइयों की तह में घुस जाने और इसके हमवार हिस्सों की बलन्दी पस्ती पर सवार हो जाने की बिना पर इसकी थरथराहट रूक गई और मालिक ने ज़मीन से फ़िज़ा तक एक वुसअत पैदा कर दी और हवा को इसके बन्दों के सांस लेने के लिये मुहय्या कर दिया और इसके बसने वालों को तमाम सहूलतों के साथ ठहरा दिया। इसके बाद ज़मीन के वह चटियल मैदान जिनकी बलन्दियों तक चश्मों और नहरों के बहाव का कोई रास्ता नहीं था उन्हें भी यूँ ही रहने दिया यहां तक के इनके लिये वह बादल पैदा कर दिये जो उनकी मुर्दा ज़मीनों को ज़िन्दा बना सकें और नबातात को उगा सकें। उसने अब्र की चमकदार टुकड़ियों को ऊपर परागन्दा बदलियों को जमा किया यहाँ तक के जब इसके अन्दर पानी का ज़ख़ीरा जोश मारने लगा और उसके किनारों पर बिजलियाँ तड़पने लगीं और उनकी चमक सफ़ेद बादलों की तहों और तह ब तह सोहाबों के अन्दर बराबर जारी रहीं तो उसने उन्हें मूसलाधार बारिश के लिये भेज दिया। इस तरह के इसके बोझिल हिस्से ज़मीन पर मण्डला रहे थे और जुनूबी हवाएं उन्हें मुसलसल कर बरसने वाले बादल की बून्दें और तेज़ बारिश की शक्ल में बरसा रही थीं। इसके बाद जब बादलों ने अपना सीना हाथ पांव समेत ज़मीन पर टेक दिया और पानी का सारा लदा हुआ बोझ इस पर फेंक दिया तो इसके ज़रिये इफ़तादा ज़मीनों से खेतियां उगा दीं और ख़ुश्क पहाड़ों पर हरा भरा सब्ज़् फैला दिया। अब ज़मीन अपने सब्ज़े की ज़ीनत से झूमने लगी और शुगूफ़ों की ओढ़नियों और शिगफ़ता व शादाब कलियों के से इतराने लगी। परवरदिगार ने इन तमाम चीज़ों को इन्सानों की ज़िन्दगी का सामान और जानवरों का रिज़्क़ क़रार दिया है। उसी ने ज़मीन के एतराफ़ कुशादा रास्ते निकाले हैं और शाहराहों पर चलने वालों के लिये रौशनी के मिनारे नस्ब किये हैं और फिर जब ज़मीन का फर्श बिछा लिया और अपना काम मुकम्मल कर लिया-

((( इस हिस्सए कलाम में मौलाए कायनात (अ 0) ने मालिक के दो अज़ीम एहसानात की तरफ़ इशारा किया है जिन पर इन्सानी ज़िन्दगी का दारोमदार है और वह हैं हवा और पानी। हवा इन्सान के सांस लेने का ज़रिया है और पानी इन्सान का क़वामे हयात है। यह दोनों न होते तो इन्सान एक लम्हा ज़िन्दा नहीं रह सकता था। इसके बाद इन दोनों तख़लीक़ों को मज़ीद कारआमद बनाने के लिये हवा को सारी फ़िज़ा में मुन्तशिर दिया और पानी के चश्मे अगर पहाड़ों की बलन्दियों को सेराब नहीं कर सकते थे तो बारिश का इन्तेज़ाम कर दिया ताके बलन्दी-ए-कोह (पहाड़) पर रहने वाली मख़लूक़ भी इससे इस्तेफ़ादा कर सके और इन्सानों की तरह जानवरों की ज़िन्दगी का इन्तज़ाम हो जाए। अफ़सोस , के इन्सान ने दुनिया की हर मामूली से मामूली नेमत की क़द्र व क़ीमत का एहसास किया है लेकिन इन दोनों की क़द्र-व-क़ीमत का एहसास नहीं किया वरना हर सांस पर शुक्रे ख़ुदा करता और हर क़तर-ए-आब पर एहसानाते इलाहिया को याद रखता और किसी आन इसकी याद से ग़ाफ़िल न होता और इसके एहकाम की मुक़ालफ़त न करता।)))

तब आदम (अ 0) को मख़लूक़ात में मुन्तख़ब क़रार दे दिया और उन्हें नौए इन्सानी की फ़र्दे अव्वल बनाकर जन्नत में साकिन कर दिया और उनके लिये तरह तरह के खाने पीने को आज़ाद कर दिया और जिससे मना करना था उसका इशारा भी दे दिया और यह बता दिया के इसके एक़दाम में नाफ़रमानी का अन्देशा और अपने मरतबे को ख़तरे में डालने का ख़तरा है लेकिन उन्होंने इसी चीज़ की तरफ़ रूख़ कर लिया जिससे रोका गया था के यह बात पहले से इल्मे ख़ुदा में मौजूद थी। नतीजा यह हुआ के परवरदिगार ने तौबा के बाद उन्हें नीचे उतार दिया ताके अपनी नस्ल से दुनिया को आबाद करें और उनके ज़रिये से अल्लाह बन्दों पर हुज्जत क़ायम करे। फिर उनको उठा लेने के बाद भी ज़मीन को उन चीज़ों से ख़ाली नहीं रखा जिनके ज़रिये रूबूबीयत की दलीलों की ताकीद करे और जिन्हें बन्दों की मारेफ़त का वसीला बनाए बल्कि हमेशा मुन्तख़ब अम्बियाए कराम और रिसालत के अमानतदारों की ज़बानों से हुज्जत के पहुँचाने की निगरानी करता रहा और यूँ ही सदियाँ गुज़रती रहीं यहाँ तक के हमारे पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद (स 0) के ज़रिये इसकी हुज्जत तमाम हो गई और एतमाम हुज्जत और तख़वीफ़े अज़ाब का सिलसिला नुक़्तए आखि़र तक पहुंच गया।

अल्लाह ने सबकी रोज़ियां मुअय्यन कर रखी हैं चाहे क़लील हों या कसीर और फिर तंगी और वुसअत के एतबार से भी तक़सीम कर दिया और इसमें भी अदालत रखी है ताके दोनों का इम्तेहाल लिया जा सके और ग़नी व फ़क़ीर दोनों को शुक्र या सब्र से आज़माया जा सके। फिर वुसअते रिज़्क़ के साथ फ़क़्र व फ़ाक़ा के ख़तरात और सलामती के साथ नाज़िल होने वाली आफ़ात के अन्देशे और ख़ुशी व शादमानी की वुसअत के साथ ग़म व अलम के गुलूगीर फन्दे शामिल भी कर दिये। ज़िन्दगियों की तवील व क़सीर मुद्दतें मुअय्यन कीं। उन्हें आगे-पीछे रखा और फिर सबको मौत से मिला दिया और मौत को उनकी रस्सियों का खींचने वाला और मज़बूत रिष्तों को पारा-पारा करने वाला बना दिया। वह दिलों में बातों के छुपाने वालों के इसरार , ख़ुफ़िया बातें करने वालों की गुफ़्तगू , ख़यालात में अटकल पच्चू लगाने वालो के अन्दाज़े , दिल में जमे हुए यक़ीनी अज़ाएम , पलकों में दबे हुए कनखियों के इशारे और दिलों की तहों के राज़ और ग़ैब की गहराइयों के रमूज़ , सबको जानता है।

((( इसमें कोई शक नहीं है के जनाबे आदम (अ 0) ने दरख़्त का फ़ल खाकर अपने को ज़हमतों में मुब्तेला कर लिया लेकिन सवाल यह पैदा होता है के जब उन्हें रूए ज़मीन का ख़लीफ़ा बनाया गया था तो क्या जन्नत ही में महवास्तराहत रह जाते और अपने फ़राएज़ मन्सबी की तरफ़ मुतवज्जा न होते। यह तो एहसासे ज़िम्मादारी का एक रूख़ है के उन्होंने जन्नत के राहत व आराम को नज़र अन्दाज़ करने का अज़्म कर लिया और रूए ज़मीन पर आ गए ताके अपनी नस्ल से दुनिया को आबाद कर सकें और अपने फ़रीज़ए मन्सब को अदा कर सकें। यह और बात है के तक़ाज़ाए एहतियात यह था के मालिके कायनात ही से गुज़ारिश करते के जहाँ के लिये ज़िम्मेदार बनाया है वहाँ तक जाने का इन्तेज़ाम कर दे या कोई रास्ता बता दे। उस रास्ते को इबलीस के इशारे के बाद इख़्तेयार नहीं करना चाहिये था के उसे इबलीस अपनी फ़तहे मुबीन क़रार दे ले और ख़लीफ़तुल्लाह के मुक़ाबले में अपने ग़ुरूर का इज़हार कर सके। ग़ालेबन एहतियात के इसी तक़ाज़े पर अमल न करने का नाम “ तर्के ऊला ’ रखा गया है। )))

वह उन आवाज़ों को भी सुन लेता है जिनके लिये कानों के सूराख़ों को झुकना पड़ता है। च्यूंटियों के मौसमे गर्म के मुक़ामात व दीगर हशरातिल अर्ज़ की सर्दियों की मंज़िल से भी आगाह है। पिसरे मुर्दा औरतों की दर्द भरी फ़रयाद और पैरों की चाप भी सुन लेता है। वह सब्ज़ पत्तियों के ग़िलाफ़ों के अन्दरूनी हिस्सों में तैयार होने वाले फलों की जगह को भी जानता है और पहाड़ों के ग़ारों और वादियों में जानवरों की पनाहगाहों को भी पहचानता है। वह दरख़्तों के तनों और उनके छिलकों में मच्छरों के छिपने की जगह से भी बाख़बर है और शाख़ों में पत्ते निकलने की मन्ज़िल और सल्बों की गुज़रगाहों में नुत्फ़ों के ठिकानों और आपस में जड़े हुए बादलों और तह ब तह सहाबों से पटकने वाले बारिश बारिश के क़तरों से भी आशना है बल्के जिन ज़रात को आन्धियां अपने दामन से उड़ा देती हैं और जिन निशानात को बारिशे अपने सेलाब से मिटा देती हैं उनसे भी बाख़बर है। वह रेत के टीलों पर ज़मीन के कीड़ों के चलने फिरने और सरबलन्द पहाड़ों की चोटियों पर बाल व पर रखने वाले परिन्दों के नशेमनों को भी जानता है और घोसलों के अन्धेरों में परिन्दों के नग़मों को भी पहचानता है। जिन चीज़ों को सदफ़ ने समेट रखा है उन्हें भी जानता है और जिन्हें दरिया की मौजों ने अपनी गोद में दबा रखा है उन्हें भी पहचानता है जिसे रात की तारीकी ने छिपा लिया है उसे भी पहचानता है और जिन पर दिन के सूरज ने रोशनी डाली है उससे भी बाख़बर है। जिन चीज़ों पर यके बाद दीगर अन्धेरी रातों के पर्दे और रौशन दिनों के आफ़ताब की शोआए नूर बिखरती हैं वह इन सबसे बाख़बर है , निशाने क़दम , हस्स व हरकत , अलफ़ाज़ की गूंज , होंटों की जुम्बिश , सांसों की मन्ज़िल , ज़र्रात का वज़न , ज़ीरूह की सिस्कियों की आवाज़ , इस ज़मीन पर दरख़्तों के फल , गिरने वाले पत्ते , नुत्फ़ों की क़रारगाह , मुन्जमिद ख़ून के ठिकाने , लोथड़े या इसके बाद बनने वाली मख़लूक़ या पैदा हुए बच्चे सबको जानता है और उसे इस इल्म के हिस्सों में कोई ज़हमत नहीं हुई और न अपनी मख़लूक़ात की हिफ़ाज़त में कोई रूकावट पेश आई और न अपने उमूर के नाफ़िज़ करने और मख़लूक़ात का इन्तेज़ाम करने में कोई सुस्ती या थकन लाहक़ हुई बल्कि इसका इल्म गहराइयों में उतरा हुआ है और उसने सबके आदाद को शुमार कर लिया है और सब पर इसका अद्ल शामिल और फ़ज़ल महीत है हालांके यह सब उसके शायाने शान हक़ के अदा करने से क़ासिर हैं।

((( मालिके कायनात के इल्म के बारे में इस क़द्र दक़ीक़ बयान एक तरफ़ ग़ैर हकीम फ़लासफ़े के इस तसव्वुर की तरदीद है के ख़ालिक़ हकीम के इल्म का ताल्लुक़ सिर्फ़ कुल्लियात से होता है और वह जुज़्ज़ेयात से ब हैसियत जुज़्ज़ेयात बाख़बर नहीं होता है वरना इससे बदलते हुए जुज़्ज़ेयात के साथ ज़ाते में तग़य्युरे लाज़िम आएगा और यह बात ग़ैरे माक़ूल है और दूसरी तरफ़ इन्सान को नुक्ते की तरफ़ मुतवज्जा करना है के जो ख़ालिक़ व मालिक मज़कूरा तमाम बारीकियों से बाख़बर है वह ख़लवत कदों में नामहरमों के इज्तेमाआत , नीम तारीक रक़्सगाहों के रक़्स , सड़कों और बाज़ारों के ज़रदीदा इशारात , स्कूलों और दफ़्तरों के ग़ैर शरई तसरेफ़ात और दिल व दिमाग़ में छिपे हुए ग़ैर शरीफ़ाना तसव्वुरात व ख़यालात से भी बाख़बर है। उसके इल्म से कायनात का कोई ज़र्रा मख़फ़ी नहीं हो सकता है। वह आँखों की ख़यानत और दिल के पोशीदा इसरार , दोनों से मसावी तौर पर इत्तेलाअ रखता है। “ वल्लाहो अलीमुन बे ज़ातिस्सुदूर ” )))

ख़ुदाया! तू ही बेहतरीन तौसीफ़ और आखि़र तक सराहे जाने का अहल है। तुझसे आस लगाई जाए तो बेहतरीन आसरा है और उम्मीद रखी जाए तो बेहतरीन मरकज़े उम्मीद है। तूने मुझे वह ताक़त दी है जिसके ज़रिये किसी ग़ैर की मदहा व सना नहीं करता हूँ और उसका रूख़ उन अफ़राद की तरफ़ नहीं मोड़ता हूँ जो नाकामी का मरकज़ और शुबहात की मन्ज़िल हैं। मैंने अपनी ज़बान को लोगों की तारीफ़ और तेरी परवरदा मख़लूक़ात की सना व सिफ़त से मोड़ दिया है। ख़ुदाया हर तारीफ़ करने वाले का अपने ममदोह पर एक हक़ होता है चाहे वह मुआवेज़ा हो या इनआम व इकराम , और मैं तुझसे आस लगाए बैठा हूँ के तू रहमत के ज़ख़ीरों और मग़फ़ेरत के ख़ज़ानों की रहनुमाई करने वाला है। ख़ुदाया! यह उस बन्दे की मन्ज़िल है जिसने सिर्फ़ तेरी तौहीद और यकताई का एतराफ़ किया है और तेरे अलावा औसाफ़ व कमालात का किसी को अहल नहीं पाया है। फिर मैं एक एहतियाज रखता हूँ जिसका तेरे फ़ज़्ल के अलावा कोई इलाज नहीं कर सकता है और तेरे एहसानात के अलावा कोई इसका सहारा नहीं बन सकता है। अब इस वक़्त मुझे अपनी रेज़ा इनायत फ़रमा दे और दूसरों के सामने हाथ फैलाने से बेनियाज़ बना दे के तू हर शै पर क़ुदरत रखने वाला है।

92-आपका इरशादे गिरामी

(जब लोगों ने क़त्ले उस्मान के बाद आपकी बैअत का इरादा किया)

मुझे छोड़ दो और जाओ किसी और को तलाश कर लो। हमारे सामने वह मामला है जिसके बहुत से रंग और रूख़ हैं जिनकी न दिलों में ताब है और न अक़्लें उन्हें बरदाश्त कर सकती हैं। देखो उफ़क़ किस क़दर अब्र आलूद है और रास्ते किस क़द्र अन्जाने हो गए हैं। याद रखो के अगर मैंने बैअत की दावत को क़ुबूल कर लिया तो तुम्हें अपने इल्म ही के रास्ते पर चलाऊंगा और किसी की कोई बात या सरज़निश नहीं सुनूंगा। लेकिन अगर तुमने मुझे छोड़ दिया तो तुम्हारी ही एक फ़र्द की तरह ज़िन्दगी गुज़ारूंगा बल्के शायद तुम सबसे ज़्यादा तुम्हारे हाकिम के एहकाम का ख़याल रखूं। मैं तुम्हारे लिये वज़ीर की हैसियत से अमीर की बनिस्बत ज़्यादा बेहतर रहूँगा।

((( अमीरूल मोमेनीन (अ 0) के इस इरशाद से तीन बातों की मुकम्मल वज़ाहत हो जाती है।

1. आपको खि़लाफ़त की कोई हिरस और तमाअ नहीं थी और न आप उसके लिये किसी तरह की दौड़ धूप के क़ायल थे ओहदाए इलाही ओहदेदार के पास आता है , ओहदेदार उसकी तलाश में नहीं निकलता है।

2. आप किसी क़ीमत पर इस्लाम की तबाही बरदाश्त नहीं कर सकते थे। आपकी निगाह में खि़लाफ़त के जुमला मुश्किलात व मसाएब थे और क़ौम की तरफ़ से बग़ावत का ख़तरा निगाह के सामने था लेकिन उसके बावजूद अगर मिल्लत की इस्लाह और इस्लाम की बक़ा का दारोमदार इसी खि़लाफ़त के क़ुबूल करने पर है तो आप इस राह में हर तरह की क़ुरबानी देने के लिये तैयार हैं।

3. आपकी नज़र में उम्मत के लिये एक दरम्यानी रास्ता वही था जिस पर आज तक चल रही थी के अपनी मर्ज़ी से कोई अमीर तय कर ले और फिर वक़्तन फ़वक़्तन आपसे मष्विरा करती रहे के आप मष्विरा देने से बहरहाल गुरेज़ नहीं करते हैं जिसका मुसलसल तजुरबा हो चुका है और इसी अम्र को आपने ज़रारत से ताबीर किया है। वरना जिसको हुकूमत की इमारत नाक़ाबिले क़ुबूल हो उसकी वज़ारत उससे ज़्यादा बदतर होगी। विज़ारत फ़क़त इस्लामी मफ़ादात की हद तक बोझ बटाने की हसीन तरीन ताबीर है।)))

93-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें आपने अपने इल्म व फ़ज़्ल से आगाह करते हुए बनी उमय्या के फ़ित्ने की तरफ़ मुतवज्जो किया है।)

हम्द व सनाए परवरदिगार के बाद- लोगों! याद रखो मैंने फ़ित्ने की आंख को फोड़ दिया है और यह काम मेरे अलावा कोई दूसरा अन्जाम नहीं दे सकता है जबके इसकी तारीकियां तहोबाला हो रही हैं और उसकी दीवानगी का मर्ज़ शदीद हो गया है। अब तुम मुझसे जो चाहो दरयाफ़त कर लो क़ब्ल इसके के मैं तुम्हारे दरम्यान न रह जाऊँ। उस परवरदिगार की क़सम जिसके क़ब्ज़ए क़ुदरत में मेरी जान है तुम अब से क़यामत तक के दरम्यान जिस चीज़ के बारे में सवाल करोगे और जिस गिरोह के बारे में दरयाफ़्त करोगे जो सौ अफ़राद को हिदायत दे और सौ को गुमराह कर दे तो मैं उसके ललकारने वाले , खींचने वाले , हंकान वाले , सवारियों के क़याम की मंज़िल , सामान उतारने की जगह , कौन इनमें से क़त्ल किया जाएग , कौन अपनी मौत से मरेगा। सब बता दूंगा। हालांके अगर यह बदतरीन हालात और सख़्त तरीन मुश्किलात मेरे बाद पेश आए तो दरयाफ़्त करने वाला भी परेशानी से सर झुका लेगा और जिससे दरयाफ़्त किया जाएगा वह भी बताने से आजिज़ रहेगा और यह सब उस वक़्त होगा जब तुम पर जंगें पूरी तैयारी के साथ टूट पड़ेंगी और दुनिया इस तरह तंग हो जाएगी के मुसीबत के दिन तुलानी महसूस होने लगेंगे। यहांतक के अल्लाह बाक़ीमान्दा नेक बन्दों को कामयाबी अता कर दे।

याद रखो फ़ितने जब आते हैं तो लोगों को शुबहात में डाल देते हैं और जब जाते हैं तो होशियार कर जाते हैं। यह आते वक़्त नहीं पहचाने जाते हैं लेकिन जब जाने लगते हैं तो पहचान लिये जाते हैं , हवाओं की तरह चक्कर लगाते रहते हैं। किसी शहर को अपनी ज़द में ले लेते हैं और किसी को नज़रअन्दाज़ कर देते हैं। याद रखो। मेरी निगाह में सबसे ख़ौफ़नाक फ़ितना बनी उमय्या का है जो ख़ुद भी अन्धा होगा और दूसरों को भी अन्धेरे में रखेगा। उसके ख़ुतूत आम होंगे लेकिन इसकी बला ख़ास लोगों के लिये होगी जो इस फ़ित्ने में आंख खोले होंगे और न अन्धों के पास से बा आसानी गुज़र जाएगा

ख़ुदा की क़सम! तुम बनी उमय्या को मेरे बाद बदतरीन साहेबाने इक़तेदार पाओगे जिनकी मिसाल उस काटने वाली ऊंटनी की होगी जो मुंह से काटेगी और हाथ मारेगी या पांव चलाएगी और दूध न दूहने देगी और यह सिलसिला यूँ ही बरक़रार रहेगा जिससे सिर्फ़ वह अफ़राद बख़्षेंगे जो इनके हक़ में मुफ़ीद हों या कम से कम नुक़सानदेह न हों। यह मुसीबत तुम्हें इसी तरह घेरे रहेगी यहाँ तक के तुम्हारी दाद ख़्वाही ऐसे ही होगी जैसे ग़ुलाम अपने आक़ा से या मुरीद अपने पीर से इन्साफ़ का तक़ाज़ा करे।

((( पैग़म्बरे इस्लाम (स 0) के इन्तेक़ाल के बाद जनाज़ाए रसूल (स 0) को छोड़कर मुसलमानों की खि़लाफ़त साज़ी , खि़लाफ़त के बाद अमीरूल मोमेनीन (अ 0) से मुतालेब-ए-बैयत , अबू सुफ़यान की तरफ़ से हिमायत की पेशकश , फ़िदक का ग़ासेबाना क़ब्ज़ा , दरवाज़े का जलाया जाना , फिर अबूबक्र की तरफ़ से उमर की नामज़दगी , फिर उमर की तरफ़ से शूरा के ज़रिये उस्मान की खि़लाफ़त , फिर तलहा व ज़ुबैर और आइशा की बग़ावत और फिर ख़वारिज का दीन से ख़ुरूज। यह वह फ़ित्ने थे जिनमें से कोई एक भी इस्लाम को तबाह कर देने के लिये काफ़ी था। अगर अमीरूल मोमेनीन (अ 0) ने मुकम्मल सब्र व तहम्मुल का मुज़ाहेरा न किया होता और सख़्त तरीन हालात पर सुकूत इख़्तेयार न फ़रमाया होता। इसी सुकूत और तहम्मुल को फ़ित्नों की आंख फोड़ देने से ताबीर किया गया है और इसके बाद इल्मी फ़ित्नों से बचने का एक रास्ता यह बता दिया गया है के जो जाहो दरयाफ़्त कर लो , मैं क़यामत तक के हालात से बाख़बर कर सकता हूँ। (रूहीलहल फ़िदाअ) )))

तुम पर इनका फ़ित्ना ऐसी भयानक शक्ल में वारिद होगा जिससे डर लगेगा और इसमें जाहेलीयत के अजज़ा होंगे , न कोई मिनारए हिदायत होगा और न कोई रास्ता दिखाने वाला परचम। बस हम अहलेबैत (अ 0) हैं जो इस फ़ित्ने से महफ़ूज़ रहेंगे और इसके दाइयों में से न होंगे , इसके बाद अल्लाह तुमसे इस फ़ित्ने को इस तरह अलग कर देगा , जिस तरह जानवर की खाल उतारी जाती है। इस शख़्स के ज़रिये उन्हें ज़लील करेगा और सख़्ती से हंकाएगा और मौत के तल्ख़ घूंट पिलाएगा और तलवार के अलावा कुछ न देगा और ख़ौफ़ के अलावा कोई लिबास न पहनएगा। वह वक़्त होगा जब क़ुरैश को यह आरज़ू होगी के काश दुनिया और उसकी तमाम दौलत देकर एक मन्ज़िल पर मुझे देख लेते चाहे सिर्फ़ इतनी ही देर के लिये जितनी देर में एक ऊँट नहर किया जाता है ताके मैं उनसे इस चीज़ को क़ुबूल कर लूं जिसका एक हिस्सा आज मांगता हूँ तो वह देने के लिये तैयार नहीं हैं।

94-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

( जिसमें परवरदिगार के औसाफ़ - रसूले अकरम (स 0) और अहलेबैत (अ 0) अतहार के फ़ज़ाएल और मौअज़ए हसना का ज़िक्र किया गया है)

ब-बरकत है वह परवरदिगार जिसकी ज़ात तक हिम्मतों की बलन्दियां नहीं पहुँच सकती हैं और अक़्ल व फ़हम की ज़ेहानतें उसे नहीं पा सकती हैं। वह ऐसा अव्वल है जिसकी कोई आखि़री हद नहीं है और ऐसा आखि़र है जिसके लिये कोई फ़ना नहीं है। (अम्बियाए कराम) (अ 0) परवरदिगार ने उन्हें बेहतरीन मुक़ामात परवरीयत रखा और बेहतरीन मन्ज़िल में मुस्तक़र किया। वह मुसलसल शरीफ़तरीन असलाब से पाकीज़ातरीन अरहाम की तरफ़ मुन्तक़िल होते रहे के जब कोई बुज़ुर्ग गुज़र गया तो दीने ख़ुदा की ज़िम्मेदारी बाद वाले ने संभाल ली। (रसूले अकरम (अ 0)) यहां तक के इलाही शरफ़ हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स 0) तक पहुंच गया और उसने उन्हें बेहतरीन नष्र व नुमा के मअदन और शरीफ़तरीन असल के मरकज़ के ज़रिये दुनिया में भेज दिया। इसी शजरए तय्यबा से जिस से अम्बिया को पैदा किया और अपने अमीनों का इन्तेख़ाब किया। पैग़म्बर (स 0) की इतरत बेहतरीन और उनका ख़ानदान शरीफ़तरीन ख़ानदान है। इनका शजरा बेहतरीन शजरा है जो सरज़मीने हरम पर उगा है और बुज़ुर्गी के साये में परवान चढ़ा है। इसकी शाख़ें बहुत तवील हैं और इसके फल इन्सानी दस्तरस से बालातर हैं। वह अहले तक़वा के इमाम और हिदायत हासिल करने वालों के लिये सरचश्मए बसीरत हैं।

((( अमीरूल मोमेनीन (अ 0) का यह इरशादे गिरामी इस बात की वाज़ेअ दलील है के अम्बियाए कराम के आबाओ अजदाद और उम्महात में कोई एक भी ईमान या किरदार के एतबार से नाक़िस और ऐबदार नहीं था और इसके बाद इस बहस की ज़रूरत नहीं रह जाती है के यह बात अक़्ली एतबार से ज़रूरी है या नहीं और उसके बग़ैर मन्सब का जवाज़ पैदा हो सकता है या नहीं ? इसलिये के अगर काफ़िर अस्लाब और बेदीन अरहाम में कोई नुक़्स नहीं था और नापाक ज़र्फ़ मन्सबे इलाही के हामिल के लिये नामुनासिब नहीं था तो इस क़द्र एहतेमाम की क्या ज़रूरत थी के आदम (अ 0) से लेकर ख़ातम तक किसी एक मरहले पर भी कोई नापाक या ग़ैर तय्यब रहम दाखि़ल न होने पाए।)))

ऐसा चिराग़ हैं जिसकी रोशनी लौ दे रही है और ऐसा रौशन सितारा हैं जिसका नूर दरख़्षा है और ऐसा चक़माक़ हैं जिसकी ज़ौ शोला फ़िषां है , उनकी सीरत (अफ़रात व तग़रीयत से बच कर) सीधी राह पर चलना और सुन्नत हिदायत करना है। इनका कलाम हक़ व बातिल का फ़ैसला करने वाला और हुक्म मुबीन अद्ल है। अल्लाह ने उन्हें उस वक़्त भेजा के जब रसूल की आमद का सिलसिला रूका हुआ था। बदअमली फैली हुई और उम्मतों पर ग़फ़लत छाई हुई थी।

( मोअज़) देखो। ख़ुदा तुम पर रहमत नाज़िल करे। रौशन निशानियों पर जम कर अमल करो। रास्ता बिल्कुल सीधा है। वह तुम्हें सलामतीयों के घर (जन्नत) की तरफ़ बुला रहे हैं और अभी तुम ऐसे घर में हो के जहां तुम्हें इतनी मोहलत व फ़राग़त है के इसकी ख़ुशनूदियां हासिल कर सको , अभी मौक़ा है , चूंके आमालनामे खुले हुए हैं , क़लम चल रहे हैं , बदन सही व सालिम हैं , ज़बानें आज़ाद हैं , तौबा सुनी जा रही है और आमाल क़ुबूल किये जा रहे हैं।

95-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें रसूले अकरम (स 0) के फ़ज़ाएल व मनाक़िब का तज़किरा किया गया है।)

अल्लाह ने उन्हें उस वक़्त भेजा जब लोग गुमराही , हैरत व परेशानी में गुमकर्दा राह थे और फ़ितनों में हाथ पांव मार रहे थे। ख़्वाहिशात ने उन्हें बहका दिया और ग़ुरूर ने उनके क़दमों में लग़ज़िशपैदा कर दी थी और भरपूर जाहलीयत ने उन्हें सुबक सर बना दिया था और वह ग़ैर यक़ीनी हालात और जिहालत की बलाओं की वजह से हैरान व परेशान थे। आपने नसीहत का हक़ अदा कर दिया , सीधे रास्ते पर चलने और लोगों को हिकमत और मोअज़ हसना की तरफ़ दावत दी।

96-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(हज़रत रब्बुल आलमीन और रसूले अकरम (स 0) के सिफ़ात के बारे में)

तमाम तारीफ़ें उस अल्लाह के लिये हैं जो ऐसा अव्वल है के उससे पहले कोई शय नहीं है और ऐसा आखि़र है के इसके बाद कोई शै नहीं है , वह ज़ाहिर है तो इससे माफ़ूक़ (बालातर) कुछ नहीं है और बातिन है तो इससे क़रीबतर कोई शय नहीं है। इसी ख़ुतबे के ज़ैल में (रसूले अकरम (स 0)) का ज़िक्र फ़रमाया। बुज़ुर्गी और शराफ़त के मादनों और पाकीज़गी की जगहों में इनका मुक़ाम बेहतरीन मुक़ाम और मरजियोम बेहतरीन मरज़ियोम है। उनकी तरफ़ नेक लोगों के दिल झुका दिये गए हैं और निगाहों के रूख़ मोड़ दिये गए हैं। ख़ुदा ने इनकी वजह से फ़ित्ने दबा दिये और (अदावतों के) शोले बुझा दिये भाइयों में उलफ़त पैदा की और जो (कुफ्ऱ में) इकट्ठे थे , उन्हें मुन्तशिर (अलहदा-अलहदा) कर दिया (इस्लाम की) पस्ती व ज़िल्लत को इज़्ज़त बख़्षी , और (कुफ्ऱ) की इज्ज़त व बुलन्दी को ज़लील कर दिया। इनका कलाम (शरीयत का) बयान और सुकूत (एहकाम की) ज़बान थी।

((( ओलमाए उसूल की ज़बान में मासूम की ख़ामोशी तक़रीर से ताबीर किया जाता है और वह उसी तरह हुज्जत और मुदरक एहकाम है जिस तरह मासूम का क़ौल व अमल। वह सनद की हैसियत रखता है और उससे एहकामे शरीअत का इस्तनबात व इस्तख़राज किया जाता है। आम इन्सानों की ख़ामोशी दलीले रज़ामन्दी नहीं बन सकती है लेकिन मासूम की ख़ामोशी दलीले एहकाम भी बन जाती है।)))

97-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें अपने असहाब और असहाबे रसूले अकरम (स 0) का मवाज़ाना किया गया है।)

अगर परवरदिगार ने ज़ालिम को मोहलत दे रखी है तो इसका मतलब यह नहीं है के वह उसकी गिरफ़्त से बाहर निकल गया है। यक़ीनन वह उसकी गुज़गाह और उसकी गरदन में उच्छू लगने की जगह पर उसकी ताक में है। क़सम है उस मालिक की जिसके क़ब्ज़े में मेरी जान है के यह क़ौम यक़ीनन तुम पर ग़ालिब आ जाएगी। न इसलिये के वह तुमसे ज़्यादा हक़दार हैं बल्कि इसलिये के वह अपने अमीर के बातिल की फ़ौरन इताअत कर लेते हैं और तुम मेरे हक़ में हमेशा सुस्ती से काम लेते हो। तमाम दुनिया की क़ौमें अपने हुक्काम के ज़ुल्म से ख़ौफ़ज़दा हैं और मैं अपनी रेआया के ज़ुल्म से परेशान हूँ। मैंने तुम्हें जेहाद के लिये आमादा किया मगर तुम न उठे। मौअज़ सुनाया तो तुमने न सुना , अलल एलान और ख़ुफ़िया तरीक़े से दावत दी लेकिन तुमने लब्बैक न कही और नसीहत भी की तो उसे क़ुबूल न किया। तुम ऐसे हाज़िर हो जैसे ग़ायब और ऐसे इताअत गुज़ार हो जैसे मालिक। मैं तुम्हारे लिये हिकमत आमेज़ बातें करता हूँ और तुम बेज़ार हो जाते हो। बेहतरीन नसीहत करता हूँ और तुम भाग खड़े होते हो , बाग़ियों के जेहाद पर आमादा करता हूँ और अभी आखि़रे कलाम तक नहीं पहुँचने पाता हूं के तुम सबा की औलाद की तरह फ़ैल जाते हो। अपनी महफ़िलों की तरफ़ पलट जाते हो और एक दूसरे के धोके में मुब्तिला हो जाते हो। मैं सुबह के वक़्त तुम्हें सीधा करता हूँ और तुम शाम के वक़्त यूँ पलट कर आते हो जैसे कमान , तुम्हें सीधा करने वाला भी आजिज़ आ गया और तुम्हारी इस्लाह भी नामुमिकन हो गई।

ऐ वह क़ौम जिसके बदन हाज़िर हैं और अक़्लें ग़ायब , तुम्हारे ख़्वाहिशात गो-ना-गों हैं और तुम्हारे हुक्काम तुम्हारी बग़ावत में मुब्तिला हैं। तुम्हारा अमीर अल्लाह की इताअत करता है और तुम उसकी नाफ़रमानी करते हो और शाम का हाकिम अल्लाह की मासियत करता है और उसकी क़ौम उसकी इताअत करती है। ख़ुदा गवाह है के मुझे यह बात पसन्द है के वामिया मुझसे दिरहम व दीनार का सौदा करे के तुममें के दस लेकर अपना एक दे दे।

कूफ़े वालों! मैं तुम्हारी वजह से तीन तरह की शख़्सियात और दो तरह की कैफ़ियात से दो-चार हू। तुम कान रखने वाले बहरे , ज़बान रखने वाले गूंगे और आंख रखने वाले अन्धे हो। तुम्हारी हालत यह है के न मैदाने जंग के सच्चे जवाँमर्द हो और न मुसीबतों में क़ाबिले एतमाद साथी। तुम्हारे हाथ ख़ाक में मिल जाएं , तुम उन ऊंटों जैसे हो जिनके चराने वाले गुम हो जाएं के जब एक तरफ़ से जमा किये जाएँ तो दूसरी तरफ़ से मुन्तशिर जाएं। ख़ुदा की क़सम , मैं अपने ख़याल के मुताबिक़ तुम्हें ऐसा देख रहा हूँ के जंग तेज़ हो गई और मैदाने कारज़ार गर्म हो गया तो तुम फ़रज़न्दे अबूतालिब से इस बेशर्मी के साथ अलग हो जाओगे जिस तरह कोई औरत बरहना हो जाती है , लेकिन बहरहाल मैं अपने परवरदिगार की तरफ़ से दलीले रौशन रखता हूँ और पैग़म्बर (स 0) के रास्ते पर चल रहा हूँ। मेरा रास्ता बिल्कुल रौशन है जिसे मैं बातिल के अन्धेरों में भी ढून्ढ लेता हूँ।

(((- ख़ुदा गवाह है के क़ाएद की तमाम क़ायदाना सलाहियतें बेकार होकर रह जाती हैं जब क़ौम इताअत के रास्ते से मुन्हरिफ़ हो जाती है और बग़ावत पर आमादा हो जाती है। इन्हेराफ़ भी अगर जेहालत की बिना पर होता है तो उसकी इस्लाह का इमकान रहता है , लेकिन माले ग़नीमत और रिश्वत का बाज़ार गर्म हो जाए और दौलते दीन की क़ीमत बनने लगे तो वहाँ एक सही और सॉलेह क़ाएद का फ़र्ज़ क़यादत अन्जाम देना तक़रीबन नामुमकिन होकर रह जाता है और उसे सुबह-व-शाम हालात की फ़रयाद ही करना पड़ती है ताके क़ौम पर हुज्जत तमाम कर दे और मालिक की बारगाह में अपना बहाना पेश कर दे। -)))

( असहाबे रसूले अकरम (स 0)) देखो , अहलेबैते (अ 0) पैग़म्बर (स 0) पर निगाह रखो और उन्हीं के रास्ते को इख़्तेयार करो , उन्हीं के नक़्शे क़दम पर चलते रहो के वह न तुम्हें हिदायत से बाहर ले जाएंगे और न हलाकत में पलट कर जाने देंगे। वह ठहर जाएं तो ठहर जाओ , उठ खड़े हों तो खड़े हो जाओ , ख़बरदार उनसे आगे न निकल जाना के गुमराह हो जाओ और पीछे भी न रह जाना के हलाक हो जाओ। मैंने अस्हाबे पैग़म्बर (स 0) का दौर भी देखा है मगर अफ़सोस तुममें का एक भी उनका जैसा नहीं है। वह सुबह के वक़्त इस तरह उठते थे के बाल उलझे हुए , सर पर ख़ाक पड़ी हुई जबके रात सजदे और क़याम में गुज़ार चुके होते थे और कभी पेशानी ख़ाक पर रखते थे और कभी रूख़सार। क़यामत की याद में गोया अंगारों पर खड़े रहते थे और उनकी पेशानियों पर सजदों की वजह से बकरी के घुटने जैसे गट्टे होते थे , उनके सामने ख़ुदा का ज़िक्र आता था तो आँसू इस तरह बरस पड़ते थे के गरेबान तक तर हो जाता था और उनका जिस्म अज़ाब के ख़ौफ़ और सवाब की उम्मीद में इस तरह लरज़ता था जिस तरह सख़्त तरीन आंधी के दिन कोई दरख़्त।

98-आपका इरशादे गिरामी

(जिसमें बनी उमय्या के मज़ालिम की तरफ़ इशारा किया गया है)

ख़ुदा की क़सम , यह यूँ ही ज़ुल्म करते रहेंगे यहां तक के कोई हराम न बचेगा जिसे हलाल न बना लें और कोई अहद व पैमान न बचेका जिसे तोड़ न दें और कोई मकान या ख़ेमा बाक़ी न रहेगा जिसमें इनका ज़ुल्म दाखि़ल न हो जाए और उनका बदतरीन बरताव उन्हें तर्के वतन पर आमादा न कर दे और दोनों तरह के लोग रोने पर आमादा न हो जाएं। दुनियादार अपनी दुनिया के लिये रोए और दीनदार अपने दीन की तबाही पर आँसू बहाए , और तुममें एक का दूसरे से मदद तलब करना उसी तरह हो जिस तरह के ग़ुलाम आक़ा से मदद तलब करे के सामने आ जाए तो इताअत करे और ग़ायब हो जाए तो ग़ीबत करे। और तुममें सबसे ज़्यादा मुसीबतज़दा वह हो जो ख़ुदा पर सबसे ज़्यादा एतमाद रखने वाला हो , लेहाज़ा अगर ख़ुदा तुम्हें आफ़ियत दे तो उसक क़ुबूल कर लो , और अगर तुम्हारा इम्तेहान लिया जाए तो सब्र करो के अन्जामकार बहरहाल साहेबाने तक़वा के लिये है।

(((- दुनिया के हर ज़ुल्म के मुक़ाबले में साहबाने ईमान व किरदार के लिये यही बशारत काफ़ी है के अन्जामकार साहबाने तक़वा के हाथ में है और इस दुनिया की इन्तेहाई फ़साद और तबाहकारी पर होने वाली नहीं है बल्कि उसे एक न एक दिन बहरहाल अद्ल व इन्साफ़ से मामूर होना है। उस दिन हर ज़ालिम को उसके ज़ुल्म का अन्दाज़ा हो जाएगा और हर मज़लूम को उसके सब्र का फल मिल जाएगा। मालिके कायनात की यह बशारत न होती तो साहेबाने ईमान के हौसले पस्त हो जाते और उन्हें हालाते ज़माना मायूसी का शिकार बना देते लेकिन इस बशारत ने हमेशा उनके हौसलों को बलन्द रखा है और इसी की बुनियाद पर वह हर दौर में हर ज़ालिम से टकराने का हौसला रखे रहे हैं।)))

99-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें दुनिया से किनाराकशी की दावत दी गई है।)

ख़ुदा की हम्द है उस पर जो हो चुका और उसकी इमदाद का तक़ाज़ा है के उन हालात पर जो सामने आने वाले हैं , हम उससे दीन की सलामती का तक़ाज़ा उसी तरह करते हैं जिस तरह बदन की सेहत व आफ़ियत की दुआ करते हैं।

बन्दगाने ख़ुदा! मैं तुम्हें वसीयत करता हूँ के उस दुनिया को छोड़ दो जो तुम्हें बहरहाल छोड़ने वाली है चाहे तुम उसकी जुदाई पसन्द न करो , वह तुम्हारे जिस्म को बहरहाल बोसीदा कर देगी तुम लाख उसकी ताज़गी की ख़्वाहिश करो , तुम्हारी और उसकी मिसाल उन मुसाफ़िरों जैसी है जो किसी रास्ते पर चले और गोया के मन्ज़िल तक पहुंच गए। किसी निशाने राह का इरादा किया और गोया के उसे हासिल कर लिया और कितना थोड़ा वक़्फ़ा होता है इस घोड़ा दौड़ाने वाले के लिये जो दौड़ाते ही मक़सद तक पहुंच जाए। इस शख़्स की बक़ा ही क्या है जिसका एक दिन मुक़र्रर हो जिससे आगे न बढ़ सके और फ़िर मौत तेज़ रफ़्तारी से उसे हंका कर ले जा रही हो यहाँ तक के बादिले-नाख़्वास्ता दुनिया को छोड़ दे , ख़बरदार दुनिया की इज़्ज़त और इसकी सरबलन्दी में मुक़ाबला न करना और इसकी ज़ीनत व नेमत को पसन्द न करना और इसकी दुशवारी और परेशानी से रंजीदा न होना के इसकी इज़्ज़त व सरबलन्दी ख़त्म हो जाने वाली है और उसकी ज़ीनत व नेमत को ज़वाल आ जाने वाला है और उसकी तंगी और सख़्ती बहरहाल ख़त्म हो जाने वाली है , यहाँ हर मुद्दत की एक इन्तेहा है और हर ज़िन्दा के लिये फ़ना है। क्या तुम्हारे लिये गुज़िश्ता लोगों के आसार में सामाने तम्बीह नहीं है ? और क्या आबा व अजदाद की दास्तानों में बसीरत व इबरत नहीं है ? अगर तुम्हारे पास अक़्ल है , क्या तुमने यह नहीं देखा है के जाने वाले पलट कर नहीं आते हैं और बाद में आने वाले रह नहीं जाते हैं , क्या तुम नहीं देखते हो के अहले दुनिया मुख़्तलिफ़ हालात में सुबह व शाम करते हैं। कोई मुर्दा है जिस पर गिरया हो रहा है और कोई ज़िन्दा है तो उसे पुरसा दिया जा रहा है। एक बिस्तर पर पड़ा हुआ है तो एक इसकी अयादत कर रहा है और एक अपनी जान से जा रहा है। कोई दुनिया तलाश कर रहा है तो मौत उसे तलाश कर रही है और कोई ग़फ़लत में पड़ा हुआ है तो ज़माना उससे ग़ाफ़िल नहीं है और इस तरह जाने वालों के नक़्शे क़दम पर रह जाने वाले चले जा रहे हैं। आगाह हो जाओ के अभी मौक़ा है उसे याद करो जो लज़्ज़तों को फ़ना कर देने वाली , ख़्वाहिशात को मुकदर कर देने वाली और उम्मीदों को क़ता कर देने वाली है। ऐसे औक़ात में जब बुरे आमाल का इरतेकाब कर रहे हो और अल्लाह से मदद मांगो के इसके वाजिब हक़ को अदा कर दो और उन नेमतों का शुक्रिया अदा कर सको जिनका शुमार करना नामुमकिन है।

(((- ख़ुदा जानता है के ज़िन्दगी की इससे हसीनतर ताबीर नहीं हो सकती है के इन्सान ज़िन्दगी के प्रोग्राम बनाता ही रह जाता है और मौत सामने आकर खड़ी हो जाती है , ऐसा मालूम होता है के घोड़े ने दम भरने का इरादा ही किया था के मन्ज़िल क़दमों में आ गई और सारे हौसले धरे रह गये। ज़ाहिर है के इस ज़िन्दगी की क्या हक़ीक़त है के जिसकी मीआद मुअय्यन है और वह भी ज़्यादा तवील नहीं है और हर हाल में पूरी हो जाने वाली है चाहे इन्सान मुतवज्जोह हो या ग़ाफ़िल , और चाहे उसे पसन्द करे या नापसन्द।)))

100-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(रसूले अकरम (स 0) और आपके अहलेबैत (अ 0) के बारे में)

शुक्र है उस ख़ुदा का जो अपने फ़ज़्लो करम का दामन फैलाए हुए है और अपने जूदो-अता का हाथ बढ़ाए हुए है। हम उसकी हम्द करते हैं उसके तमाम मआमलात में उसकी मदद चाहते हैं ख़ुद उसके हुक़ूक़ का ख़याल रखने के लिये , हम शहादत देते हैं के उसके अलावा कोई ख़ुदा नहीं है और मोहम्मद (स 0) उसके बन्दे और रसूल हैं। जिन्हें उसने अपने अम्र के इज़हार और अपने ज़िक्र के बयान के लिये भेजा तो उन्होंने निहायत अमानतदारी के साथ उसके पैग़ाम को पहुंचा दिया और राहे रास्त पर इस दुनिया से गुज़र गए और हमारे दरम्यान एक ऐसा परचमे हक़ छोड़ गए के जो उससे आगे बढ़ जाए वह दीन से निकल गया और जो पीछे रह जाए वह हलाक हो गया और जो इससे वाबस्ता रहे वह हक़ के साथ रहा। उसकी तरफ़ रहनुमाइ करने वाला वह है जो बात ठहर कर करता है और क़याम इत्मीनान से करता है लेकिन क़याम के बाद फिर तेज़ी से काम करता है। देखो जब तुम उसके लिये अपनी गरदनों को झुका दोगे और हर मसले में उसकी तरफ़ इशारा करने लगोगे तो उसे मौत आ जाएगी और उसे लेकर चली जाएगी। फिर जब तक ख़ुदा चाहेगा तुम्हें उसी हाल में रहना पड़ेगा यहां तक के वह इस शख़्स को मन्ज़रे आम पर ले आए , जो तुम्हें एक मक़ाम पर जमा कर दे और तुम्हारे इन्तेशार को दूर कर दे। तो देखो जो आने वाला है उसके अलावा किसी की लालच न करो और जो जा रहा है उससे मायूस न हो जाओ , हो सकता है के जाने वाले का एक क़दम उखड़ जाए तो दूसरा जमा रहे और फिर ऐसे हालात पैदा हो जाएं के दोनों क़दम जम जाएं। देखो आले मोहम्मद (स 0) की मिसाल आसमान के सितारों जैसी है के जब एक सितारा ग़ायब हो जाता है तो दूसरा निकल आता है , तो गोया अल्लाह की नेमतें तुम पर तमाम हो गई हैं और उसने तुम्हें वह सब कुछ दिखला दिया है जिसकी तुम आस लगाए बैठे थे।

101-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जो उन ख़ुत्बों में है जिनमें हवादिस ज़माना का ज़िक्र किया गया है)

सारी तारीफ़ उस अव्वल के लिये हैं जो हर एक से पहले है और उस आखि़र के लिये है जो हर एक के बाद है। उसकी अव्वलीयत का तक़ाज़ा है के उसका अव्वल न हो और इसकी आखि़रत का तक़ाज़ा है के इसका कोई आखि़र न हो। मैं गवाही देता हूँ के उसके अलावा कोई ख़ुदा नहीं है और इस गवाही में मेरा बातिन ज़ाहिर के मुताबिक़ है और मेरी ज़बान दिल से मुकम्मल तौर पर हमआहंग है।

(((- उससे मुराद ख़ुद हज़रत अली (अ 0) की ज़ाते गिरामी है जिसे हक़ का महवर व मरकज़ बनाया गया है और जिसके बारे में रसूले अकरम (स 0) की दुआ है के मालिक हक़ को उधर-उधर फेर दे जिधर-जिधर अली (अ 0) मुड़ रहे हों (सही तिरमिज़ी) और बाद के फ़िक़रात में आले मोहम्मद (अ 0) के दीगर अफ़राद की तरफ़ इशारा है जिनमें मुस्तक़बिल क़रीब में इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ 0) और इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ 0) का दौर था जिनकी तरफ़ अहले दुनिया ने रूजू किया और उनकी सियासी अज़मत का भी एहसास किया और मुस्तक़बिल बईद में इमाम मेहदी (अ 0) का दौर है जिनके हाथों उम्मत का इन्तेशार दूर होगा और इस्लाम पलटकर अपने मरकज़ पर आ जाएगा। ज़ुल्म व जौर का ख़ात्मा होगा और अद्ल व इन्साफ़ का निज़ाम क़ायम हो जाएगा-)))

ऐ लोगो! ख़बरदार मेरी मुख़ालफ़त की ग़लती न करो और मेरी नाफ़रमानी करके हैरान व सरगर्दान न हो जाओ और मेरी बात सुनते वक़्त एक-दूसरे को इशारे न करो के उस परवरदिगार की क़सम जिसने दाने को शिगाफ़्ता किया है और नुफ़ूस को ईजाद किया है के मैं जो कुछ ख़बर दे रहा हूँ वह रसूले उम्मी की तरफ़ से है जहां न पहुंचाने वाला ग़लत गो था और न सुनने वाला जाहिल था और गोया के मैं उस बदतरीन गुमराह को भी देख रहा हूँ जिसने शाम में ललकारा और कूफ़े के एतराफ़ में अपने झण्डे गाड़ दिये और उसके बाद जब इसका दहाना खुल गया और उसकी लगाम का दहाना मज़बूत हो गया और ज़मीन में उसकी पामालियां सख़्ततर हो गई तो फ़ितने अबनाए ज़माना को अपने दांतों से काटने लगे और जंगों ने अपने थपेड़ों की लपेट में ले लिया और दिनों की सख्तियां और रातों की जराहतें मन्ज़रे आम पर आ गईं और फिर जब इसकी खेती तैयार होकर अपने पैरों पर खड़ी हो गई और इसकी सरमस्तियां अपना जोश दिखलाने लगीं और तलवारें चमकने लगीं तो सख़्त तरीन फ़ितनों के झण्डे गाड़ दिये गए और वह तारीक रात और तलातुम ख़ेज़ समन्दर की तरह मन्ज़रे आम पर आ गए , और कूफ़े को इसके अलावा भी कितनी ही आन्धियां पारा-पारा करने वाली हैं और उस पर से कितने ही झक्कड़ गुज़रने वाले हैं और अनक़रीब वहां जमाअतें जमाअतों से गुथने वाली हैं और खड़ी खेतियां काटी जाने वाली हैं और कटे हुए माहसल को भी तबाह व बरबाद किया जाएगा।

102-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें क़यामत और इसमें लोगों के हालात का ज़िक्र किया गया है)

वह दिन वह होगा जब परवरदिगार अव्वलीन व आख़ेरीन को दक़ीक़तरीन हिसाब और आमाल की जज़ा के लिये इस तरह जमा करेगा के सब ख़ुज़ू व खुशु के आलम में खड़े होंगे , पसीना इनके दहन तक पहुँचा होगा और ज़मीन लरज़ रही होगी। बेहतरीन हाल उसका होगा जो अपने क़दम जमाने की जगह हासिल कर लेगा और जिसे सांस लेने का मौक़ा मिल जाएगा।

(((- रसूले अकरम (स 0) के दौर में अब्दुल्लाह बिन उबी और मौलाए कायनात (अ 0) के दौर में अशअत बिन क़ैस जैसे अफ़राद हमेशा रहे हैं जो बज़ाहिर साहेबाने ईमान की सफ़ों में रहते हैं लेकिन इनका काम बातों का मज़ाक़ उड़ाकर उन्हें मुश्तबा बना देने और क़ौम में इन्तेशार पैदा कर देने के अलावा कुछ नहीं होता है। इसलिये आपने चाहा के अपनी ख़बरों के मसदर व माखि़ज़ की तरफ़ इशारा कर दें ताके ज़ालिमों को शुबहा पैदा करने का मौक़ा न मिले और आप इस हक़ीक़त को भी वाज़े कर सकें के मेरे बयान में शुबह दर हक़ीक़त रसूले अकरम (स 0) की सिदाक़त में शुबह है जो कुफ़्फ़ार व मुष्रेकीने मक्का भी न कर सके तो मुनाफ़िक़ीन के लिये इसका जवाज़ किस तरह पैदा हो सकता है ? इसके बाद आपने इस नुक्ते की तरफ़ भी इशारा फ़रमा दिया के अगर बाक़ी लोग यह काम नहीं कर सकते हैं तो इसका ताल्लुक़ उनकी जेहालत से है रिसालत के ओहदए फ़याज़ से नहीं है , उसने तो हर एक को तालीमे दुनिया चाही लेकिन बे सलाहियत अफ़राद इस फ़ैज़ से महरूम रह गए तो करीम का क्या क़ुसूर है।)))

इसी ख़ुतबे का एक हिस्सा

ऐसे फ़ित्ने जैसे अन्धेरी रात के टुकड़े जिसके सामने न घोड़े खड़े हो सकेंगे और न उनके परचमों को पलटाया जा सकेगा , यह फ़ित्ने लगाम व सामान की पूरी तैयारी के साथ आएँगे के इनका क़ाएद उन्हें हंका रहा होगा और उनका सवाल उन्हें थका रहा होगा। इसकी अहल एक क़ौम होगी जिसके हमले सख़्त होंगे लेकिन लूट मार कम और उनका मुक़ाबला राहे ख़ुदा में सिर्फ़ वह लोग करेंगे जो मुस्तकबरीन की निगाह में कमज़ोर और पस्त होंगे। वह अहले दुनिया में मजहूल और अहले आसमान में मारूफ़ होंगे।

ऐ बसरा! ऐसे वक़्त में तेरी हालत क़ाबिले रहम होगी इस अज़ाबे इलाही के लशकर की बना पर जिसमें न ग़ुबार होगा न शोर व ग़ोग़ा और अनक़रीब तेरे बाशिन्दों को सुखऱ् मौत और सख़्त भूक में मुब्तिला किया जाएगा।

103-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(ज़ोहद के बारे में)

ऐ लोगो! दुनिया की तरफ़ इस तरह देखो जैसे वह लोग देखते हैं जो ज़ोहद रखने वाले और उससे नज़र बचाने वाले होते हैं के अनक़रीब यह अपने साकिनों को हटा देगी और अपने ख़ुशहालों को रन्जीदा कर देगी। इसमें जो चीज़ मुंह फेरकर जा चुकी वह पलट कर आने वाली नहीं है और जो आने वाली है उसका हाल नहीं मालूम है के इसका इन्तेज़ार किया जाए। इसकी ख़ुशी रन्ज से मख़लूत है और इसमें मर्दों की मज़बूती ज़ोफ़ व नातवानी की तरफ़ माएल है। ख़बरदार इसकी दिल लुभाने वाली चीज़ें तुम्हें धोके में न डाल दे के इसमें से साथ जाने वाली चीज़ें बहुत कम हैं।

ख़ुदा रहमत नाज़िल करे उस शख़्स पर जिसने ग़ौर व फ़िक्र किया तो इबरत हासिल की और इबरत हासिल की तो बसीरत पैदा कर ली के दुनिया की हर मौजूद शै अनक़रीब ऐसी हो जाएगी जैसे थी ही नहीं और आख़ेरत की चीज़ें इस तरह हो जाएंगी जैसे अभी मौजूद हैं। हर गिनती में आने वाला कम होने वाला है और हर वह शै जिसकी उम्मीद हो वह अनक़रीब आने वाली है और जो आने वाला है वह गोया के क़रीब और बिल्कुल क़रीब है।

( सिफ़ते आलिम) आलिम वह है जो अपनी क़द्र ख़ुद पहचाने और इन्सान की जेहालत के लिये इतना ही काफ़ी है के वह अपनी क़द्र को न पहचाने। अल्लाह की निगाह में बदतरीन बन्दा वह है जिसे उसने उसी के हवाले कर दिया हो के वह सीधे रास्ते से हट गया है और बग़ैर रहनुमा के चल रहा है।

(((- हक़ीक़ते अम्र यह है के इन्सान अपनी क़द्र व औक़ात को पहचान लेता है तो उसका किरदार ख़ुद-ब-ख़ुद सुधर जाता है और इस हक़ीक़त से ग़ाफ़िल हो जाता है तो कभी क़द्र व मन्ज़िलत से ग़फ़लत दरबारदारी , ख़ुशामद , मदहे बेजा , ज़मीर फ़रोशी पर आमादा कर देती है के इल्म को माल व जाह के एवज़ बेचने लगता है और कभी औक़ात से नावाक़फ़ीयत मालिक से बग़ावत पर आमादा कर देती है के अवामुन्नास पर हुकूमत करते-करते मालिक की इताअत का जज़्बा भी ख़त्म हो जाता है और एहकामे इलाही को भी अपनी ख़्वाहिशात के रास्ते पर चलाना चाहता है जो जेहालत का बदतरीन मुज़ाहिरा है और इसका इल्म से कोई ताल्लुक़ नहीं है-!)))

ऐ दुनिया के कारोबार की दावत दी जाए तो अमल पर आमादा हो जाता है और आख़ेरत के काम की दावत दी जाए तो सुस्त हो जाता है। गोया के जो कुछ किया है वही वाजिब था और जिसमें सुस्ती बरती है वह उससे साक़ित है।

( आखि़र ज़माना) वह ज़माना ऐसा होगा जिसमें सिर्फ़ वही मोमिन निजात पा सकेगा जो गोया के सो रहा होगा के मजमे में आए तो लोग उसे पहचान न सकें और ग़ाएब हो जाए तो कोई तलाश न करे। यही लोग हिदायत के चिराग़ और रातों के मुसाफ़िरों के लिये निशाने मन्ज़िल होंगे न इधर उधर लगाते फिरेंगे और न लोगों के उयूब की इशाअत करेंगे। उनके लिये अल्लाह रहमत के दरवाज़े खोल देगा और उनसे अज़ाब की सख्तियो को दूर कर देगा।

लोगों! अनक़रीब एक ज़माना आने वाला है जिसमें इस्लाम को इसी तरह उलट दिया जाएगा जिस तरह बरतन को उसके सामान समेत उलट दिया जाता है। लोगों! अल्लाह ने तुम्हें इस बात से पनाह दे रखी है के वह तुम पर ज़ुल्म करे लेकिन तुम्हें इस बात से महफ़ूज़ नहीं रखा है के तुम्हारा इम्तेहान न करे। इस मालिके जल्लाजलालोह ने साफ़ एलान कर दिया है के “ इसमें हमारी खुली हुई निशानियां हैं और हम बहरहाल तुम्हारा इम्तेहान लेने वाले हैं ”

सय्यद शरीफ़ रज़ी - मोमिन के नौमए (ख़्वाबीदा) होने का मतलब इसका गुमनाम और बेशर होना है और मसायीह , मिस्याह की जमा है और वह वह शख़्स है के जिसे किसी का ऐब मालूम हो जाए तो उसकी इशाअत के बग़ैर चैन न पड़े। बुज़ुर-बुज़दर की जमा है यानी वह शख़्स जिसकी हिमाक़त ज़यादा है और उसकी गुफ़्तगू लगवियात पर मुष्तमिल हो।


104-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

अम्माबाद! अल्लाह ने हज़रत मोहम्मद (स 0) को उस दौर में भेजा है जब अरब में न कोई किताब पढ़ना जानता था और न नबूवत और वही का इदआ करने वाला था। आपने इताअतगुज़ारों के सहारे नाफ़रमानों से जेहाद किया के उन्हें मन्ज़िले निजात की तरफ़ ले जाना चाहते थे और क़यामत के आने से पहले हिदायत दे देना चाहते थे। जब कोई थका मान्दा रूक जाता था और कोई लौटा हुआ ठहर जाता था तो उसके सर पर खड़े हो जाते थे के उसे मन्ज़िल तक पहुंचा दें मगर यह के कोई ऐसा लाख़ैरा हो जिसके मुक़द्दर में हलाकत हो। यहाँ तक के आपने लोगों को मरकज़े निजात से आशना बना दिया और उन्हें उनकी मन्ज़िल तक पहुँचा दिया उनकी चक्की चलने लगी और उनके टेढ़े सीधे हो गए।

और ख़ुदा की क़सम! मैं भी उनके हंकाने वालों में से था यहाँ तक के वह मुकम्मल तौर पर पस्पा हो गए और अपने बन्धनों में जकड़ दिये गए , इस दरम्यान में मैं न कमज़ोर हुआ न बुज़दिली का शिकार हुआ। न मैंने ख़यानत की और न सुस्ती का इज़हार किया।

(((- इमाम अलैहिस्सलाम की ज़िन्दगी का बेहतरीन नक़्षा है और इसी की रोशनी में दूसरे किरदारों का जाएज़ा लिया जा सकता है जिन्हें मैदाने तारीख़ ने तो पहचाना है लेकिन मैदाने जेहाद इनकी गर्दे क़दम से भी महरूम रह गया। मगर अफ़सोस के जानी पहचानी शख़्िसयतें अजनबी हो गईं और अजनबी शहर के मशाहीर बन गए।-)))

ख़ुदा की क़सम! मैं बातिल का पेट चाक करके उसके पहलू से हक़ को बहरहाल निकाल लूंगा।

सय्यद रज़ी - इस ख़ुतबे का एक इन्तेख़ाब पहले नक़्ल किया जा चुका है। लेकिन चूंकि इस रिवायत में क़द्रे कमी और ज़्यादती पाई जाती थी लेहाज़ा हालात का तक़ाज़ा यह था के इसे दोबारा इस शक्ल में भी दर्ज किया जाए।

105-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें रसूले अकरम (स 0) के औसाफ़ , बनी उमय्या की तहदीद और लोगों की नसीहत का तज़किरा किया गया है।)

( रसूले अकरम (स 0) - यहाँ तक के परवरदिगार ने हज़रत मोहम्मद (स 0) को उम्मत के आमाल का गवाह , सवाब की बशारत देने वाला , अज़ाब से डराने वाला बनाकर भेज दिया। आप बचपने में बेहतरीन मख़लूक़ात और सिन रसीदा होने पर अशरफ़े कायनात थे , आदात के एतबार से तमाम पाकीज़ा अफ़राद से ज़्यादा पाकीज़ा और बाराने रहमत के एतबार से हर सहाब रहमत से ज़्यादा करीम व जवाद थे।

( बनी उमय्या) - यह दुनिया तुम्हारे लिये उसी वक़्त अपनी लज़्ज़तों समेत ख़ुशगवार बनी है और तुम उसके फ़वाएद हासिल करने के क़ाबिल बने हो जब तुमने देख लिया के इसकी मेहार झूल रही है और इसका तंग ढीला हो गया है। इसका हराम एक क़ौम के नज़दीक बग़ैर कांटे वाली बेर की तरह मज़ेदार हो गया है और इसका हलाल बहुत दूर तक नापसन्द हो गया है और ख़ुदा की क़सम तुम इस दुनिया को एक मुद्दत तक फैले हुए साये की तरह देखोगे के ज़मीन हर टोकने वाले से ख़ाली हो गई है और तुम्हारे हाथ खुल गए हैं और क़ाएदीन के हाथ बन्धे हुए हैं। तुम्हारी तलवारें उनके सरों पर लटक रही हैं और उनकी तलवारें न्याम में हैं लेकिन याद रखो के हर ख़ून का एक इन्तेक़ाम लेने वाला और हर हक़ का एक तलबगार होता है और हमारे ख़ून का मुन्तक़िम गोया ख़ुद अपने हक़ में फै़सला करने वाला है और वह , वह परवरदिगार है जिसे कोई मतलूबे आजिज़ नहीं कर सकता है और जिससे कोई फ़रार करने वाला भाग नहीं सकता है। मैं ख़ुदा की क़सम खाकर कहता हूँ के बनी उमय्या के अनक़रीब तुम इस दुनिया को अग़्यार के हाथों और दुश्मनों के दयार में देखोगे , आगाह हो जाओ के बेहतरीन नज़र वह है जो ख़ैर में डूब जाए और बेहतरीन कान वह है जो नसीहत को सुन लें और क़ुबूल कर लें।

( मोअज़ा) लोग! एक बाअमल नसीहत करने वाले के चिराग़े हिदायत से रोशनी हासिल कर लो और एक ऐसे साफ़ चश्मे से सेराब हो जाओ जो हर आलूदगी से पाक व पाकीज़ा है।

(((- इस ख़ुतबे में इस नुक्ते की तरफ़ भी इशारा हो सकता है के ग़ासिब अफ़राद ने जिन अमवाल को हज़म कर लिया है , वह एक दिन इनका शिकम चाक करके इसमें से निकाल लिया जाएगा और इस अम्र की तरफ़ भी इशारा हो सकता है के हक़ अभी फ़ना नहीं हुआ है। उसे बातिल ने दबा दिया है और गोया के अपने शिकम के के अन्दर छिपा लिया है और मुझमें इस क़दर ताक़त पाई जाती है के मैं इस शिकम को चाक करके इस हक़ को मन्ज़रे आम पर ले आऊं और बातिल के हर राज़ को बेनक़ाब कर दूँ।-)))

अल्लाह के बन्दों! देखो अपनी जेहालत की तरफ़ झुकाव मत पैदा करो और अपनी ख़्वाहिशात के ग़ुलाम न बन जाओ के इस मन्ज़िल पर आ जाने वाला गोया सेलाबज़दा दीवार के किनारे पर खड़ा है और हलाकतों को अपनी पुश्त पर लादे हुए इधर से उधर मुन्तक़िल हो रहा है। इन उफ़्कार की बिना पर जो यके बाद दीगरे ईजाद करता रहेगा और उन पर ऐसे दलाएल क़ाएम करेगा जो हरगिज़ जस्पां ना होंगे और उससे क़रीबतर भी न होंगे। लेहाज़ा ख़ुदा का ख़याल रखो के अपनी फ़रयाद उस शख़्स से करो जो उसका एज़ाला न कर सके और अपनी राय से हुक्मे इलाही को तोड़ न सके। याद रखो के इमाम की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ वह है जो परवरदिगार ने इसके ज़िम्मे रखी है के बलीग़तरीन मोअज़्ज़म करे , नसीहत की कोशिश करे। सुन्नत को ज़िन्दा करे , मुस्तहक़ीन पर हुदूद का इजरा करे और हक़दारों तक मीरास के हिस्से पहुँचा दे।

देखो इल्म की तरफ़ सबक़त करो क़ब्ल इसके के इसका सब्ज़ा ख़ुश्क हो जाए और तुम उसे साहेबाने इल्म से हासिल करने में अपने कारोबार में मशग़ूल हो जाओ , मुन्करात से रोको और ख़ुद भी बचो के तुम्हें रोकने का हुक्म रूकने के बाद दिया गया है।

106-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें इस्लाम की फ़ज़ीलत और रसूले इस्लाम (स 0) का तज़किरा करते हुए असहाब की मलामत की गई है)

सारी तारीफ़ उस ख़ुदा के लिये हैं जिसने इस्लाम का क़ानून मुअय्यन किया तो उसके हर घाट को वारिद होने वाले के लिये आसान बना दिया और उसके अरकान को हर मुक़ाबला करने वाले के मुक़ाबले में मुस्तहकम बना दिया। इसने उस दिन को वाबस्तगी इख़्तेयार करने वालों के लिये जाए-अमन और उसके दार्रा में दाखि़ल हो जाने वालों के लिये महले सलामती बना दिया है। यह दीन अपने ज़रिये कलाम करने वालों के लिये बरहान और अपने वसीले से मुक़ाबला करने वालों के लिये शाहिद क़रार दिया गया है। यह रोशनी हासिल करने वालों के लिये नूर , समझने वालों के लिये फ़हम , फ़िक्र करने वालों के लिये मग़्ज़े कलाम , तलाशे मन्ज़िल करने वालों के लिये निशाने मन्ज़िल , साहेबाने अज़्म के लिये सामाने बसीरत , नसीहत हासिल करने वालों के लिये इबरत , तस्दीक़ करने वालों के लिये निजात , एतमाद करने वालों के लिये क़ाबिले एतमाद , अपने कामो को सुपुर्द कर देने वालों के लिये राहत और सब्र करने वालों के लिये सिपर है। यह बेहतरीन रास्ता और वाज़ेअतरीन दाखि़ले की मन्ज़िल है , उसके मीनार बलन्द , रास्ते रौशन , चिराग़ ज़ूबार , मैदाने अमल बावेक़ार और मक़सद बलन्द है। इसके मैदान में तेज़ रफ़्तार घोड़ों का इज्तेमाअ है और इसकी तरफ़ सबक़त और इसका इनआम हर एक को मतलूब है , इसके शहसवार बाइज़्ज़त हैं। (((- इस मक़ाम पर मौलाए कायनात (अ 0) ने इस्लाम के चैदह सिफ़ात का तज़किरा किया है और इसमें नोए बशर के तमाम एक़ाम का अहाता कर लिया है जिसका मक़सद यह है के इस इस्लाम के बरकात से दुनिया का कोई इन्सान महरूम नहीं रह सकता है और कोई शख़्स किसी तरह के बरकात का तलबगार हो उसे इस्लाम के दामन में इस बरकत का हुसूल हो सकता है और वह अपने मतलूबे ज़िन्दगी को हासिल कर सकता है , शर्त सिर्फ़ यह है के इस्लाम ख़ालिस हो और उसकी तफ़सीर वाक़ेई अन्दाज़ से की जाए वरना गन्दे घाट से प्यासा सेराब नहीं हो सकता है और कमज़ोर अरकान के सहारे पर कोई शख़्स ग़लबा नहीं हासिल कर सकता है।-)))

इसका रास्ता तस्दीक़े ख़ुदा और रसूल (स 0) है और इसका मिनारा नेकियाँ हैं , मौत एक मक़सद है जिसके लिये दुनिया घोड़दौड़ का मैदान है और क़यामत इसके इज्तेमाअ की मन्ज़िल है और फिर जन्नत इस मुक़ाबले का इनाम है।

( रसूले अकरम (स 0)) यहाँ तक के आपने हर रोशनी के तलबगार के लिये आग रौशन कर दी और हर गुमकर्दा राह ठहरे हुए मुसाफ़िर के लिये निशाने मन्ज़िल रौशन कर दिये। परवरदिगार! वह तेरे मोतबर अमानतदार और रोज़े क़यामत के गवाह हैं। तूने उन्हें नेमत बनाकर भेजा और रहमत बनाकर नाज़िल किया है।

ख़ुदाया! तू अपने इन्साफ़ से इनका हिस्सा अता फ़र्मा और फिर अपने फ़ज़्ल व करम से उनके ख़ैर को दुगना-चैगना कर दे। ख़ुदाया! इनकी इमारत को तमाम इमारतों से बलन्दतर बना दे और अपनी बारगाह में इनकी बाइज़्ज़त तौर पर मेज़बानी फ़रमा और इनकी मन्ज़िलत को बलन्दी अता फ़रमा। उन्हें वसीला और रफ़अत व फ़ज़ीलत करामत फ़रमा और हमें उनके गिरोह में महषूर फ़रमा जहां न रूसवा हों और न शर्मिन्दा हों , न हक़ से मुन्हरिफ़ हों न अहद शिकन हों , न गुमराह हों और न गुमराहकुन और न किसी फ़ित्ने में मुब्तिला हों।

सय्यद रज़ी- यह कलाम इससे पहले भी गुज़र चुका है लेकिन हमने इख़्तेलाफ़े रिवायत की बिना पर दोबारा नक़्ल कर दिया है।

( अपने असहाब से खि़ताब फ़रमाते हुए)- तुम अल्लाह की दी हुई करामत से इस मन्ज़िल पर पहुँच गए जहां तुम्हारी कनीज़ों का भी एहतराम होने लगा और तुम्हारे हमसाये से भी अच्छा बरताव होने लगा। तुम्हारा एहतराम वह लोग भी करने लगे जिनपर न तुम्हें कोई फ़ज़ीलत हासिल थी और न उनपर तुम्हारा कोई एहसान था और तुमसे वह लोग भी ख़ौफ़ खाने ले जिन पर न तुमने कोई हमला किया था और न तुम्हें कोई इक़्तेदार हासिल था। मगर अफ़सोस के तुम अहदे ख़ुदा को टूटते हुए देख रहे हो और तुम्हें ग़ुस्सा भी नहीं आता है जबके तुम्हारे बाप दादा के अहद को तोड़ा जाता है तो तुम्हें ग़ैरत आ जाती है। एक ज़माना था के अल्लाह के काम तुम ही पर वारिद होते थे और तुम्हारे ही पास से बाहर निकलते थे और फिर तुम्हारी ही तरफ़ पलट कर आते थे लेकिन तुमने जाहिलों को अपनी मन्ज़िलों पर क़ब्ज़ा दे दिया और उनकी तरफ़ अपनी ज़मामे अम्र बढ़ा दी और उन्हें सारे काम सुपुर्द कर दिये के वह शुबहात पर अमल करते हैं और ख़्वाहिशात में चक्कर लगाते रहते हैं और ख़ुदा गवाह है के अगर यह तुम्हें हर सितारे के नीचे मुन्तशिर देंगे तो भी ख़ुदा तुम्हें उस दिन जमा कर देगा जो ज़ालिमों के लिये बदतरीन दिन होगा।

107-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(सिफ़्फ़ीन की जंग के दौरान)

मैंने तुम्हें भागते हुए और अपनी सफ़ों से फ़ैलते हुए देखा जबके तुम्हें शाम के जफ़ाकार ओबाश और देहाती बद्दू अपने घेरे में लिये हुए थे हालांके तुम अरब के जवाँमर्द बहादुर और शरफ़ के रासवरीं थे। मगर इसकी ऊंची नाक और चोटी की बलन्दी वाले अफ़राद थे , मेरे सीने की कराहने की आवाज़ें उस वक़्त दब सकती हैं जब मैं यह देख लूं के तुम उन्हें इसी तरह अपने घेरे में लिये हुए हो जिस तरह वह तुम्हें लिये हुए थे और उनको उनके मवाक़िफ़ से इसी तरह ढकेल रहे हों जिस तरह उन्होंने तुम्हें हटा दिया था के उन्हें तीरों की बौछार का निशाना न बनाए हुए हो और नैज़ों की ज़द पर इस तरह लिये हुए हो के पहली सफ़ को आख़री सफ़ पर उलट रहे हो जिस तरह के प्यासे ऊंट हंकाए जाते हैं जब उन्हें तालाबों से दूर फेंक दिया जाता है और घाट से अलग कर दिया जाता है।

108-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें मलाहम और हवादिस व फ़ित्न का ज़िक्र किया गया है)

सारी तारीफ़ उस अल्लाह के लिये है जो अपनी मख़लूक़ात के सामने तख़लीक़ात के ज़रिये जलवागर होता है और उनके दिलों पर दलीलों के ज़रिये रोशन होता है। उसने तमाम मख़लूक़ात को बग़ैर सोच विचार की ज़हमत के पैदा किया है के सोचना साहेबाने दिल व ज़मीर का काम है वह इन बातों से बलन्दतर है। उसके इल्म ने पोशीदा इसरार के तमाम पर्दों को चाक कर दिया है और वह तमाम अक़ाएद की गहराइयों का अहाता किये हुए है।

( रसूले अकरम (स 0)) उसने आपका इन्तेख़ाब अम्बियाए कराम के शजरे , रोशनी के फ़ानूस , बलन्दी की पेशानी , अर्ज़े तबहा की नाफे़ ज़मीन , ज़ुलमतों के चिराग़ों और हिकमत के सरचश्मो के दरम्यान से किया है। आप वह तबीब थे जो अपनी तबाबत के साथ चक्कर लगा रहा हो के अपने मरहम को दुरूस्त कर लिया हो और दाग़ने के आलात को तपा लिया हो के जिस अन्धे दिल , बहरे कान , गूंगी ज़बान पर ज़रूरत पड़े फ़ौरत इस्तेमाल कर दे। अपनी दवा को लिये हुए ग़फ़लत के मराकज़ और हैरत के मक़ामात की तलाश में लगा हुआ हो।

( फ़ित्नाए बनी उमय्या) इन ज़ालिमों ने हिकमत की रोशनी से नूर हासिल किया और उलूम के चक़माक़ को रगड़कर चिंगारी नहीं पैदा की। इस मसले में इनकी मिसाल चरने वाले जानवरों और सख़्त तरीन पत्थरों की है।

बेशक अहले बसीरत के लिये इसरार नुमायां हैं और हैरान व सरगर्दां लोगों के लिये हक़ का रास्ता रौशन है। आने वाली साअत ने अपने चेहरे से नक़ाब को उलट दिया है और तलाश करने वालों के लिये अलामतें ज़ाहिर हो गई हैं। आखि़र क्या हो गया है के मैं तुम्हें बिल्कुल बेजान पैकर और बिला पैकर रूह की शक्ल में देख रहा हूँ। तुम वह इबादत गुज़ार हो जो अन्दर से सॉलेह न हो और वह ताजिर हो जिसको कोई फ़ायदा न हो। वह बेदार हो जो ख़्वाबे ग़फ़लत में हो और वह हाज़िर हो जो बिल्कुल ग़ैर हाज़िर हो।

अन्धी आंख , बहरे कान और गूंगी ज़बान , गुमराही का परचम अपने मरकज़ पर जम चुका है और इसकी शाख़ें हर सू फैल चुकी हैं। वह तुम्हें अपने पैमाने में तोल रहा है और अपने हाथों इधर-उधर बहका रहा है। इसका क़ाएद मिल्लत से ख़ारिज और ज़लालत पर क़ाएम है। उस दिन तुमसे कोई बाक़ी न रह जाएगा मगर उसी मिक़दार में जितना पतीली का तह देग होता है , या थैली के झाड़े हुए रेज़े। यह गुमराही तुम्हें उसी तरह मसल डालेगी जिस तरह चमड़ा मसला जाता है और इसी तरह पामाल कर देगी जिस तरह कटी हुई ज़राअत रौंदी जाती है और मोमिन ख़ालिस को तुम्हारे दरम्यान से इस तरह चुन लेगी जिस तरह परिन्दा बारीक दानों से मोटे दानों को निकाल लेता है।

आखि़र तुमको यह ग़लत रास्ते किधर ले जा रहे हैं और तुम अन्धेरों में कहां बहक रहे हो और तुमको झूटी उम्मीदें किस तरह धोका दे रही हैं किधर से लाए जा रहे हो और किधर बहकाए जा रहे हो। हर मुद्दत का एक नोष्ता होता है और ग़ैबत के लिये एक वापसी होती है लेहाज़ा अपने ख़ुदा व सय्यदे आलम की बात सुनो। इसके लिये दिलों को हाज़िर करो , वह आवाज़ दे तो बेदार हो जाओ। हर नुमाइन्दे को अपनी क़ौम से सच बोलना चाहिये , उसकी परागन्दगी को जमा करना चाहिये। इसके ज़ेहन को हाज़िर रखना चाहिए। अब तुम्हारे रहनुमा ने तुम्हारे लिये मसलए को इस क़द्र वाशिगाफ़ कर दिया है जिस तरह मेहरा को चीरा जाता है और इस तरह छील डाला है जिस तरह गोन्द खुरचा जाता है। मगर इसके बावजूद बातिल ने अपना मरकज़ संभाल लिया है और जेहल अपने मरकब पर सवार हो गया है और सरकशी बढ़ गई है और हक़ की आवाज़ दब गई है और ज़माने ने फाउण्डेशऩ खाने वाले दरिन्दे की तरह हमला कर दिया है और बातिल का ऊंट चुप रहने के बाद फिर बिलबिलाने लगा है और लोगों ने फिस्क़ व फ़ुजूर की बिरादरी क़ायम कर ली है और सबने मिलकर दीन को नज़रअन्दाज़ कर दिया है। झूट परवस्ती की बुनियादें क़ायम हो गई हैं और सच्चाई पर एक दूसरे के दुशमन हो गए हैं। ऐसे हालात में बेटा बा पके लिये ग़ैज़ व ग़ज़ब का सबब होगा और बारिश गर्मी का बाएस होगी। कमीने लोग फैल जाएंगे और शरीफ़ लोग सिमट जाएंगे। इस दौर के अवाम भेड़िये होंगे और सलातीन दरिन्दे। दरम्यानी तबक़े वाले खाने वाले और फ़क़रा व मसाकीन मुर्दे होंगे। सच्चाई कम हो जाएगी और झूठ फैल जाएगा। मोहब्बत का इस्तेमाल सिर्फ़ ज़बान से होगा और अदावत दिलों के अन्दर पेवस्त हो जाएगी। ज़िनाकारी नसब की बुनियाद होगी और उफ़त एक अजीब व ग़रीब शै हो जाएगी। इस्लाम यूँ उलट दिया जाएगा जैसे कोई पोस्तीन को उलटा पहन ले।

109-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(क़ुदरते ख़ुदा अज़मते इलाही और रोज़े महशर के बारे में)

हर शै उसकी बारगाह में सर झुकाए हुए है और हर चीज़ उसी के दम से क़ायम है। वह हर फ़क़ीर की दौलत का सहारा और हर ज़लील की इज़्ज़त का आसरा है। हर कमज़ोर की ताक़त वही है और हर फ़रयादी की पनाहगाह वही है। हर बोलने वाले के नतक़ को सुन लेता है और हर ख़ामोश रहने वाले के राज़ को जानता है। जो ज़िन्दा है उसका रिज़्क़ उसके ज़िम्मे है जो मर गया उसकी बाज़गष्त उसी की तरफ़ है।

ख़ुदाया! आँखों ने तुझे देखा नहीं है के तेरे बारे में ख़बर दे सकें , तू तमाम तौसीफ़ करने वाली मख़लूक़ात के पहले से है , तूने मख़लूक़ात को तन्हाई की वहशत की बिना पर नहीं ख़ल्क़ किया है और न उन्हें किसी फ़ाएदे के लिये इस्तेमाल किया है। तू जिसे हासिल करना चाहे वह आगे नहीं जा सकता है और जिसे पकड़ना चाहे वह बच कर नहीं जा सकता है। नाफ़रमानों से तेरी सल्तनत में कमी नहीं आती है और इताअत गुज़ारों से तेरे मुल्क में इज़ाफ़ा नहीं होता है जो तेरे फ़ैसले से नाराज़ हो वह तेरे हुक्म को टाल नहीं सकता है और जो तेरे अम्र से रूगरदानी करे वह तुझसे बेनियाज़ नहीं हो सकता है। हर राज़ तेरे सामने रौशन है और हर ग़ैब तेरे लिये हुज़ूर है। तू अबदी है तो तेरी कोई इन्तेहा नहीं है और तू इन्तेहा है तो तुझसे कोई छुटकारा नहीं है , तू सबकी वादागाह है तो तुझसे निजात हासिल करने की कोई जगह नहीं है। हर ज़मीन पर चलने वाले का इख़्तेयार तेरे हाथ में है और हर जानदार की बाज़गष्त तेरी ही तरफ़ है। पाक व बे नियाज़ है तू , तेरी शान क्या बाअज़मत है और तेरी मख़लूक़ात भी क्या अज़ीमुष्षान है और तेरी क़ुदरत के सामने हर अज़ीम शै किस क़द्र हक़ीर है और तेरी सल्तनत किस क़द्र पुरशिकोह है और यह सब तेरी इस ममलेकत के मुक़ाबले में जो निगाहों से ओझल है किस क़द्र मामूली है। तेरी नेमतें इस दुनिया में किस क़द्र मुकम्मल हैं और फ़िर नेमाते आख़ेरत के मुक़ाबले में किस क़द्र मुख़्तसर हैं।

( मलाएका मुक़र्रबीन) यह तेरे मलाएका हैं जिन्हें तूने आसमानों में आबाद किया है और ज़मीन से बलन्दतर बनाया है। यह तमाम मख़लूक़ात से ज़्यादा तेरी मारेफ़त रखते हैं और तुझसे ख़ौफ़ज़दा रहते हैं और तेरे क़रीबतर भी हैं। यह न असलाबे पिदर में रहे हैं और न अरहामे मादर में और न हक़ीर नुत्फ़े से पैदा किये गए हैं और न इन पर ज़माने के इन्क़ेलाबात का कोई असर है। यह तेरी बारगाह में एक ख़ास मक़ाम और मन्ज़िलत रखते हैं। इनकी तमामतर ख़्वाहिशात सिर्फ़ तेरे बारे में हैं और यह बकसरत तेरी ही इताअत करते हैं और तेरे हुक्म से हरगिज़ ग़ाफ़िल नहीं होते हैं। लेकिन इसके बावजूद अगर तेरी अज़मत की तह तक पहुंच जाएं तो अपने आमाल को हक़ीरतरीन तसव्वुर करेंगे और अपने नफ़्स की मज़म्मत करेंगे और उन्हें मालूम हो जाएगा के इन्होंने इबादत का हक़ अदा नहीं किया है और हक़क़े इताअत के बराबर इताअत नहीं की है।

तू पाक व बे नियाज है , ख़ालकीयत के एतबार से भी और इबादत के एतबार से भी। मेरी तस्बीह इस बेहतरीन बरताव की बिना पर है जो तूने मख़लूक़ात के साथ किया है। तूने एक घर बनाया है , उसमें एक दस्तरख़्वान बिछाया है। जिसमें खाने-पीने , ज़ौजियत , खि़दमत , क़स्र , नहर , ज़राअत , समर सबका इन्तज़ामक र दिया है और फिर एक दाई को इसकी तरफ़ दावत देने के लिये भेज दिया है। लेकिन लोगों ने न दाई की आवाज़ पर लब्बैक कही और न जिन चीज़ों की तरफ़ तूने रग़बत दिलाई थी राग़िब हुए और न तेरी तशवीक़ का शौक़ पैदा किया।

सब उस मुरदार पर टूट पड़े जिसको खाकर रूसवा हुए आर सबने इसकी मोहब्बत पर इत्तेफ़ाक़ कर लिया और ज़ाहिर है के जो किसी का भी आशिक़ हो जाता है वह शै उसे अन्धा बना देती है और उसके दिल को बीमार कर देती है। वह देखता भी है तो ग़ैर सलीम आंखों से और सुनता भी है तो ग़ैर समीअ कानों से। ख़्वाहिशात ने इनकी अक़्लों को पारा-पारा कर दिया है और दुनिया ने उनके दिलों को मुर्दा बना दिया है। उन्हें इससे वालहाना लगाव पैदा हो गया है और वह उसके बन्दे हो गए हैं और उनके ग़ुलाम बन गए हैं , जिनके हाथ में थोड़ी सी भी दुनिया है के जिस तरफ़ झुकती है यह भी झुक जाते हैं और जिधर वह मुड़ती है यह भी मुड़ जाते हैं , न कोई ख़ुदाई रोकने वाला उन्हें रोक सकता है और न किसी वाएज़ की नसीहत इन पर असरअन्दाज़ होती है। जबके उन्हें देख रहे हैं जो इसी धोके में पकड़ लिये गए हैं के अब न माफ़ी का इमकान है और न वापसी का। किसी तरह इन पर वह मुसीबत नाज़िल हो गई है जिससे नावाक़िफ़ थे और फ़िराक़े दुनिया की वह आफ़त आ गई है जिसकी तरफ़ से बिल्कुल मुतमइन थे और आख़ेरत में इस सूरते हाल का सामना कर रहे हैं जिसका वादा किया गया था। अब तो उस मुसीबत का बयान भी नामुमकिन है जहां एक तरफ़ मौत का सकरात है और दूसरी तरफ़ फ़िराक़े दुनिया की हसरत। हालत यह है के हाथ पांव ढीले पड़ गए हैं और रंग उड़ गया है इसके बाद मौत की दख़ल अन्दाज़ी और बढ़ी तो वह गुफ़्तगू की राह में भी हाएल हो गई के इन्सान घरवालों के दरम्यान है उन्हें आखों से देख रहा है , कान से उनकी आवाज़ें सुन रहा है , अक़्ल भी सलामत है और होश भी बरक़रार है। यह सोच रहा है के उम्र को कहां बरबाद कर दिया है और ज़िन्दगी को कहां गुज़ारा है। उन अमवाल को याद कर रहा है जिन्हें जमा किया था और उनकी जमाआवरी में आंखें बन्द कर ली थीं के कभी वाज़ेअ रास्तों से हासिल किया और कभी मुश्तबा तरीक़ों से के सिर्फ़ इनके जमा करने के असरात बाक़ी रह गये हैं और उनसे जुदाई का वक़्त आ गया है। अब यह माल बादवालों के लिये रह जाएगा जो आराम करेंगे और मज़े उड़ाएंगे। यानी मज़ा दूसरों के लिये होगा और बोझ इसकी पीठ पर होगा लेकिन इन्सान इस माल की ज़न्जीरों में जकड़ा हुआ है और मौत ने सारे हालात को बेनक़ाब कर दिया है के निदामत से अपने हाथ काट रहा है और इस चीज़ से किनाराकश होना चाहता है जिसकी तरफ़ ज़िन्दगी भर राग़िब था। अब यह चाहता है के काश जो शख़्स इससे माल की बिना पर हसद कर रहा था यह माल उसके पास होता और इसके पास न होता।

इसके बाद मौत इसके जिस्म में मज़ीद दरान्दाज़ी करती है और ज़बान के साथ कानों को भी शामिल कर लेती है के इन्सान अपने घरवालों के दरम्यान न बोल सकता है और न सुन सकता है। हर एक के चेहरे को हसरत से देख रहा है। इनकी ज़बान की जुम्बिश को भी देख रहा है लेकिन अल्फ़ाज़ को नहीं सुन सकता है। इसके बाद मौत और चिपक जाती है तो कानों की तरह आंखों पर भी क़ब्ज़ा हो जाता है और रूह जिस्म से परवाज़ कर जाती है। अब वह घरवालों के दरम्यान एक मुरदार होता है। जिसके पहलू में बैठने से भी वहशत होने लगती है और लोग दूर भागने लगते हैं। यह अब न किसी रोने वाले को सहारा दे सकता है और न किसी पुकारने वाले की आवाज़ पर आवाज़ दे सकता है। लोग उसे ज़मीन के एक गढ़े तक पहुंचा देते हैं और उसे उसके आमाल के हवाले कर देते हैं के मुलाक़ातों का सिलसिला भी ख़त्म हो जाता है।

यहाँ तक के जब क़िस्मत का लिखा अपनी आख़री हद तक और अम्रे इलाही अपनी मुक़र्ररा मन्ज़िल तक पहुंच जाएगा और आख़ेरीन को अव्वलीन से मिला दिया जाएगा और एक नया हुक्मे इलाही आ जाएगा के खि़लक़त की तजदीद की जाए तो यह अम्र आसमानों को हरकत देकर शिगाफ़ता कर देगा और ज़मीन को हिलाकर खोखला कर देगा और पहाड़ों को जड़ से उखाड़कर उड़ा देगा और हैबते जलाले इलाही और ख़ौफ़े सितवते परवरदिगार से एक दूसरे से टकरा जाएंगे और ज़मीन सबको बाहर निकाल देगी और उन्हें दोबारा बोसीदगी के बाद ताज़ा हयात दे दी जाएगी और इन्तेशार के बाद जमा कर दिया जाएगा और मख़फ़ी आमाल पोशीदा अफ़आल के सवाल के लिये सबको अलग-अलग कर दिया जाएगा और मख़लूक़ात दो गिरोहों में तक़सीम हो जाएंगी। एक गिरोह मरकज़े नेमात होगा और दूसरा महले इन्तेक़ाम।

अहले इताअत को इस जवारे रहमत में सवाब और दारे जन्नत में हमेशगी का इनाम दिया जाएगा जहां के रहने वाले कूच नहीं करते हैं और न उनके हालात में कोई तग़य्युर पैदा होता है और न इन पर रन्ज व अलम तारी होता है और न उन्हें कोई बीमारी लाहक़ होती है और न किसी तरह का ख़तरा सामने आता है और न सफ़र की ज़हमत से दो-चार होना पड़ता है। लेकिन अहले मासीयत के लिये बदतरीन मन्ज़िल होगी जहां हाथ गरदन से बन्धे होंगे और पेशानियों को पैरों से जोड़ दिया जाएगा। तारकोल और आग के तराशीदा लिबास पहनाए जाएंगे। इस अज़ाब में जिसकी गर्मी शदीद होगी और जिसके दरवाज़े बन्द होंगे और उस जहन्नम में जिसमें शरारे भी होंगे और शोर व ग़ोग़ा भी , भड़कते हुए शोले भी होंगे और हौलनाक चीख़ें भी , न यहाँ के रहने वाले कूच करेंगे और न यहाँ के क़ैदियों से कोई फ़िदया क़ुबूल किया जाएगा और न यहाँ की बेड़ियां जुदा हो सकती हैं , न इस घर की कोई मुद्दत है जो तमाम हो जाए और न इस क़ौम की कोई अजल है जो ख़त्म कर दी जाए।

( ज़िक्रे रसूले अकरम (स 0)) आपने इस दुनिया को हमेशा सग़ीर व हक़ीर और ज़लील व पस्त तसव्वुर किया है और यह समझा है के परवरदिगार ने इस दुनिया को आपसे अलग रखा है और दूसरों के लिये फर्श कर दिया है तो यह आपकी इज़्ज़त और दुनिया की हेक़ारत ही की बुनियाद पर है लेहाज़ा आपने उससे दिल से किनाराकशी इख़्तेयार की और उसकी याद को दिल से बिलकुल निकाल दिया और यह चाहा के इसकी ज़ीनतें निगाहों से ओझल रहें ताके न उमदा लिबास ज़ेबे तन फ़रमाएं और न किसी ख़ास मक़ाम की उम्मीद करें। आपने परवरदिगार के पैग़ाम को पहुंचाने में सारे बहाने तमाम कर दिये और उम्मत को अज़ाबे इलाही से डराते हुए नसीहत फ़रमाई। जन्नत की बशारत सुनाकर उसकी तरफ़ दावत दी और जहन्नम से बचने की तलक़ीन करके इसका ख़ौफ़ पैदा कराया।

( अहलेबैत (अ 0)) हम नबूवत का शजरा , रिसालत की मन्ज़िल , मलाएका की रफ़्तो आमद की जगह , इल्म के माअदन और हिकमत के चश्मे हैं। हमारा मददगार और मोहिब हमेशा मुन्तज़िर रहमत रहता है और हमारा दुशमन और कीनापरवर हमेशा मुन्तज़िरे लानत व इन्तेक़ामे इलाही रहता है।

(((- ताअज्जुब न करें के ख़ुदाए रहमान व रहीम अपने बन्दों के साथ इस तरह का बरताव किस तरह करेगा के यह अन्जाम उन्हीं लोगों का है जो दारे दुनिया में अल्लाह के कमज़ोर और नेक बन्दों के साथ उससे बदतर बरताव कर चुके हैं तो क्या मालिके कायनात दुनिया में इख़्तेयारात देने के बाद आख़ेरत में भी उन्हें बेहतरीन नेमतों से नवाज़ देगा और मज़लूमीन का दुनिया व आख़ेरत में कोई पुरसान हाल न होगा। ? -)))

110-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(अरकाने इस्लाम के बारे में)

अल्लाह वालों के लिये उसकी बारगाह ते पहुंचने का बेहतरीन वसीला अल्लाह और उसके रसूल (स 0) पर ईमान और राहे ख़ुदा मे जेहाद है के जेहाद इस्लाम की सरबलन्दी है , और कलमए इख़लास है के यह फ़ितरते इलाहिया है और नमाज़ का क़याम है के ऐन दीन है और ज़कात की अदायगी है के यह फ़रीज़ाए वाजिब है और माहे रमज़ान का रोज़ा है के यह अज़ाब से बचने का सिपर है और हज बैतुल्लाह है और उमरा है के यह फ़क़्र को दूर कर देता है और गुनाहों को धो देता है और सिलए रहम है के यह माल में इज़ाफ़ा और अजल के टालने का ज़रिया है और पोशीदा तरीक़े से ख़ैरात है के यह गुनाहों का कफ़्फ़ारा है और अलल एलान सदक़ा है के यह बदतरीन मौत के दफ़ा करने का ज़रिया है और अक़रेबा के साथ नेक सुलूक है के यह ज़िल्लत के मक़ामात से बचाने का वसीला है। ज़िक्रे ख़ुदा की राह में आगे बढ़ते रहो के यह बेहतरीन ज़िक्र है और ख़ुदा ने मुत्तक़ीन से जो वादा किया है उसकी तरफ़ रग़बत पैदा करो के इसका वादा सच्चा है। अपने पैग़म्बर की हिदायत के रास्ते पर चलो के यह बेहतरीन हिदायत है और उनकी सुन्नत को इख़्तेयार करो के यह सबसे बेहतर हिदायत करने वाली है। (क़ुराने करीम) क़ुराने मजीद का इल्म हासिल करो के यह बेहतरीन कलाम है और इसमें ग़ौर व फ़िक्र करो के यह दिलों की बहार है। इसके नूर से शिफ़ा हासिल करो के यह दिलों के लिये शिफ़ा है और इसकी बाक़ायदा तिलावत करो के यह मुफ़ीदतरीन क़िस्सों का मरकज़ है , और याद रखो के अपने इल्म के खि़लाफ़ अमल करने वाला आलिम भी हैरान व सरगर्दां जाहिल जैसा है जिसे जेहालत से कभी ओफ़ाक़ा नहीं होता है बल्कि इस पर हुज्जते ख़ुदा ज़्यादा अज़ीमतर होती है और इसके लिये हसरत व अन्दोह भी ज़्यादा लाज़िम होता है और वह बारगाहे इलाही में ज़्यादा क़ाबिले मलामत होता है।

111-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(मज़म्मते दुनिया के बारे में)

अम्माबाद! मैं तुम लोगों को दुनिया से होशियार कर रहा हूँ के यह शीरीं और शादाब है लेकिन ख़्वाहिशात में घिरी हुई है। अपनी जल्द मिल जाने वाली नेमतों की बिना पर महबूब बन जाती है और थोड़ी सी ज़ीनत से ख़ूबसूरत बन जाती है। यह उम्मीदों से आरास्ता है और धोके से मुज़य्यन है। न इसकी ख़ुशी दाएमी है और न इसकी मुसीबत से कोई महफ़ूज़ रहने वाला है यह धोकेबाज़ नुक़सान रसां , बदल जाने वाली , फ़ना हो जाने वाली , ज़वाल पज़ीर और हलाक हो जाने वाली है। यह लोगों को खा भी जाती है और मिटा भी देती है।

(((- बाज़ नादानों का ख़यल है के जब दुनिया बाक़ी रहने वाली नहीं है और इसके शबो रोज़ का एतबार नहीं है तो बेहतरीन बात यह है के जिस क़द्र हासिल हो जाए इन्सान हासिल कर ले और इसकी नेमतों से लुत्फ़ अन्दोज़ हो जाए के कहीं दूसरे दिन हाथ से निकल न जाए। लेकिन यह ख़याल उन्हीं लोगों का है जो आख़ेरत की तरफ़ से यकसर ग़ाफ़िल हैं और उन्हें इस लुत्फ़ अन्दोज़ी के अन्जाम की ख़बर नहीं है वरना इस नुक्ते की तरफ़ मुतवज्जे हो जाते तो मारगुज़ीदा की तरह तड़पने को बिस्तरे हरीर पर आराम करने से ज़्यादा पसन्द करते और मुफ़लिसतरीन ज़िन्दगी गुज़ारने ही को आफ़ियत व आराम तसव्वुर करते।-)))

जब अपनी तरफ़ रग़बत रखने वालों और अपने से ख़ुश हो जाने वालों को ख़्वाहिशात की इन्तेहा को पहुंच जाती है तो बिलकुल परवरदिगार के इस इरशाद के मुताबिक़ हो जाती है “ जैसे आसमान से पानी नाज़िल होकर ज़मीन के नबातात में शामिल हो जाए और फिर इसके बाद वह सब्ज़ा सूखकर ऐसा तिनका हो जाए जिसे हवाएं उड़ा ले जाएं और ख़ुदा हर शै पर क़ुदरत रखने वाला है ” इस दुनिया में कोई शख़्स ख़ुश नहीं होता है मगर यह के उसे बाद में आँसू बहाना पड़ें और कोई शख़्स ख़ुशी को आते नहीं देखता है मगर यह के वह मुसीबत में डालकर पीठ दिखला देती है और कहीं राहत व आराम की हल्की-हल्की बारिश नहीं होती है मगर यह के बलाओं का दोगड़ा करने लगता है। इसकी शान ही यह है के अगर सुबह को किसी तरफ़ से बदला लेने के लिये आती है तो शाम होते-होते अन्जान बन जाती है और अगर एक तरफ़ से शीरीं और ख़ुश गवार नज़र आती है तो दूसरे रूख़ से तल्ख़ और बलाख़ेज़ होती है। कोई इन्सान इसकी ताज़गी से अपनी ख़्वाहिश पूरी नहीं करता है मगर यह के इसके पै-दर-पै मसाएब की बिना पर रन्ज व ताब का शिकार हो जाता है और कोई शख़्स को अम्न व अमान के परों पर नहीं रहता है मगर यह के सुबह होते होते ख़ौफ़ के बालोपर पर लाद दिया जाता है। यह दुनिया धोके बाज़ है और इसके अन्दर जो कुछ है सब धोका है यह फ़ानी है और इसमें जो कुछ है सब फ़ना होने वाला है। इसके किसी ज़ादे राह में कोई ख़ैर नहीं है सिवाए तक़वा के। इसमें से जो कम हासिल करता है उसी को राहत ज़्यादा नसीब होती है और जो ज़्यादा से चक्कर में पड़ जाता है उसके मोहलकात भी ज़्यादा हो जाते हैं और यह बहुत जल्द उससे अलग हो जाती है। कितने इस पर एतबार करने वाले हैं जिन्हें अचानक मुसीबतों में डाल दिया गया और कितने इस पर इत्मीनान करने वाले हैं जिन्हें हलाक कर दिया गया और कितने साहेबाने हैसियत थे जिन्हें ज़लील बना दिया गया और कितने अकड़ने वाले थे जिन्हें हिक़ारत के साथ पलटा दिया गया। इसकी बादशाही पलटा खाने वाली , इसका ऐश मुकद्दर , इसका शीरीं शूर , इसका मीठा कड़वा , इसकी ग़िज़ा ज़हर आलूद और इसके असबाब सब बोसीदा हैं। इसका ज़िन्दा मारिज़ हलाकत में है और इसका सेहतमन्द बीमारियों की ज़द पर है। इसका मुल्क छिनने वाला है और इसका साहेबे इज़्ज़त मग़लूब होने वाला है। इसका मालदार बदबख़्ितयों का शिकार होने वाला है और इसका हमाया लुटने वाला है। क्या तुम इन्हीं के घरों में नहीं हो जो तुमसे पहले तवीले उम्र , पाएदार आसार और दूर रस उम्मीदों वाले थे , बेपनाह सामान मुहय्या कया , बड़े-बड़े लशकर तैयार किये और जी भरकर दुनिया की परस्तिश की और उसे हर चीज़ पर मुक़द्दम रखा लेकिन इसके बाद यूँ रवाना हो गए के न मन्ज़िल तक पहुँचाने वाला ज़ादे राह साथ था और न रास्ता तय करने वाली सवारी। क्या तुम तक कोई ख़बर पहुँची है के इस दुनिया ने इनको बचाने के लिये कोई फ़िदया पेश किया हो या इनकी कोई मदद की हो या इनके साथ्ज्ञ अच्छा वक़्त गुज़ारा हो ?

(((- दुनिया से इबरत हासिल करने का बेहतरीन ज़रिया ख़ुद इसकी तारीख़ है के इसने आज तक किसी से वफ़ा नहीं की है। इसका एक पेशा भी उस वक़्त तक काम नहीं आता है जब तक मालिक से जुदा नहीं हो जाता है और इसकी सल्तनत भी अपने सुलतान को फ़िशारे क़ब्र से निजात देने वाली नहीं है। ऐसे हालात में तारीख़ी हवादिस से आंख बन्द कर लेना जेहालत के मासेवा कुछ नहीं है और साहबे इल्म व अक़्ल वही है जो माज़ी के तजुर्बात से फ़ायदा उठाए।-)))

हरगिज़ नहीं- बल्कि उन्हें मुसीबतों में गिरफ़्तार कर दिया और आफ़तों से आजिज़ व बेबस बना दिया। पै-दर-पै ज़हमतों ने उन्हें झिन्झोड़ कर रख दिया और इनकी नाक रकड़ दी और उन्हें अपने सुमों से रोन्द डाला और फिर हवादिस रोज़गार को भी सहारा दे दिया और तुमने देख लिया के यह अपने इताअत गुज़ारों , चाहने वालों और चिपकने वालों के लिये भी ऐसी अन्जान बन गई के जब उन्होंने यहाँ से हमेशा के लिये कूच किया तो उन्हें सिवाए भूक के कोई ज़ादे राह और तंगी-ए लहद के कोई मकान नहीं दिया। ज़ुल्मत ही इनकी रोशनी क़रार पाई और निदामत ही इनका अन्जाम ठहरा। तो क्या तुम इसी दुनिया को इख़्तेयार कर रहे हो और इसी पर भरोसा कर रहे हो और इसी की लालच में मुब्तिला हो। यह अपने से बदज़नी न रखने वालों और एहतियात न करने वालों के लिये बदतरीन मकान है। लेहाज़ा याद रखो और तुम्हें मालूम भी है के तुम उसे छोड़ने वाले हो और इससे कूच करने वाले हो। उन लोगों से नसीहत हासिल करो जिन्होंने यह दावा किया था के “ हमसे ज़्यादा ताक़तवर कौन है ” और फिर वह भी अपनी क़ब्रों की तरफ़ इस तरह पहुँचाए गए के उन्हें सवारी भी नसीब नहीं हुई और क़ब्रों में इस तरह उतार दिया गया के उन्हें मेहमान भी नहीं कहा गया। पत्थरों से इनकी क़ब्रें चुन दी गईं और मिट्टी से उन्हें कफ़न दे दिया गया। सड़ी गली हड्डियाँ इनकी हमसाया बन गई और अब यह सब ऐसे हमसाये हैं के किसी पुकारने वाले की आवाज़ पर लब्बैक नहीं कहते हैं और न किसी ज़्यादती को रोक सकते हैं और न किसी रोने वाले की परवाह करते हैं। अगर इनपर मूसलाधार बारिश हो तो उन्हें ख़ुशी नहीं होती है और अगर क़हत पड़ जाए तो मायूसी का शिकार नहीं होते हैं। यह सब एक मुक़ाम पर जमा हैं मगर अकेले हैं और हमसाये हैं मगर दूर-दूर हैं। ऐसे एक-दूसरे से क़रीब के मुलाक़ात तक नहीं करते हैं और ऐसे नज़दीक के मिलते भी नहीं हैं। अब ऐसे बरबाद हो गए हैं के सारा कीना ख़त्म हो गया है और ऐसे बेख़बर हैं के सारा बाज़ व अनाद मिट गया है। न इनसे किसी ज़रर का अन्देशा है और न किसी दिफ़ाअ की उम्मीद है। उन्होंने ज़मीन के ज़ाहिर के बजाए बातिन को और वुसअत के बजाए तंगी को और साथियों के बदले ग़ुरबत को और नूर के बदले ज़ुल्मत को इख़्तेयार कर लिया है। इसकी गोद में वैसे ही आ गए हैं जैसे पहले अलग हुए थे पा-बरहना और नंगे। अपने आमाल समेत दाएमी ज़िन्दगी और अबदी मकान की तरफ़ कूच कर गए हैं जैसा के मालिके कायनात ने फ़रमाया है “ जिस तरह हमने पहले बनाया था वैसे ही वापस ले आएंगे , यह हमारा वादा है और हम उसे बहरहाल अन्जाम देने वाले हैं।

112-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें मलकुल मौत इनके क़ब्ज़े रूह और मख़लूक़ात के तौसीफ़े इलाही से आजिज़ी का ज़िक्र किया गया है।)

क्या जिस वक़्त मलकुल मौत घर में दाखि़ल होते हैं तुम्हें कोई एहसास होता है और क्या उन्हें रूह क़ब्ज़ करते हुए तुमने कभी देखा है ? भला वह शिकमे मादर में बच्चे को किस तरह मारते हैं। क्या किसी तरफ़ से अन्दर दाखि़ल हो जाते हैं या रूह ही इनकी आवाज़ पर लब्बैक कहती हुई निकल आती है या पहले से बच्चे के पहलू में रहते हैं। सोचो! जो शख़्स एक मख़लूक़ के कमालात को न समझ सकता हो वह ख़ालिक़ के औसाफ़ को क्या बयान कर सकेगा।

113-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(मज़म्मते दुनिया)

मैं तुम्हें इस दुनिया से होशियार कर रहा हूँ के यह कूच की जगह है। आबो दाना की मन्ज़िल नहीं है , यह धोके ही से आरास्ता हो गई है और अपनी आराइश ही से धोका देती है। इसका घर परवरदिगार की निगाह में बिल्कुल बे अर्ज़िश है इसीलिये उसने इसके हलाल के साथ हराम , ख़ैर के साथ्ज्ञ शर , ज़िन्दगी के साथ मौत , और शीरीं के साथ तल्ख़ को रख दिया है और न उसे अपने औलिया के लिये मख़सुस किया है और न अपने दुश्मनों को उससे महरूम रखा है। इसका ख़ैर बहुत कम है और इसका शर हर वक़्त हाज़िर है। इसका जमा किया हुआ ख़त्म हो जाने वाला है और इसका मुल्क छिन जाने वाला है और इसके आबाद को एक दिन ख़राब हो जाना है। भला उस घर में क्या ख़ूबी है जो कमज़ोर इमारत की तरह गिर जाए और उस अम्र में क्या भलाई है जो ज़ादे राह की तरह ख़त्म हो जाए और इस ज़िन्दगी में क्या हुस्न है जो चलते-फ़िरते तमाम हो जाए।

देखो अपने मतलूबे उमूर में फ़राएज़े इलाहिया को भी शामिल कर लो और इसी से इसके हक़ के अदा करने की तौफ़ीक़ का मुतालेबा करो। अपने कानों को मौत की आवाज़ सुना दो क़ब्ल इसके के तुम्हें बुला लिया जाए। दुनिया में ज़ाहिदों की शान यही होती है के वह ख़ुश भी होते हैं तो उनका दिल रोता रहता है और वह हंसते भी हैं तो इनका रंज व अन्दोह शदीद होता है। वह ख़ुद अपने नफ़्स से बेज़ार रहते हैं चाहे लोग इनके रिज़्क़ से ग़बता ही क्यों न करें। अफ़सोस तुम्हारे दिलों से मौत की याद निकल गई है और झूठी उम्मीदों ने उन पर क़ब्ज़ा कर लिया है। अब दुनिया का इख़्तेयार तुम्हारे ऊपर आख़ेरत से ज़्यादा है और वह आक़बत से ज़्यादा तुम्हें खींच रही है। तुम दीने ख़ुदा के एतबार से भाई-भाई थे। लेकिन तुम्हें बातिन की ख़बासत और ज़मीर की ख़राबी ने अलग-अलग कर दिया है के अब न किसी का बोझ बटाते हो , न नसीहत करते हो , न एक दूसरे पर ख़र्च करते हो और न एक दूसरे से वाक़ेअन मोहब्बत करते हो। आखि़र तुम्हें क्या हो गया है के मामूली सी दुनिया को पाकर ख़ुश हो जाते हो और मुकम्मल आख़ेरत से महरूम होकर रन्जीदा नहीं होते हो , थोड़ी सी दुनिया हाथ से निकल जाए तो परेशान हो जाते हो और इसका असर तुम्हारे चेहरों से ज़ाहिर हो जाता है और इसकी अलाहेदगी पर सब्र नहीं कर पाते हो जैसे वही तुम्हारी मन्ज़िल है और जैसे इसका सरमाया वाक़ई बाक़ी रहने वाला है। तुम्हारी हालत यह है के कोई शख़्स भी दूसरे के ऐब के इज़हार से बाज़ नहीं आता है मगर सिर्फ़ इस ख़ौफ़ से के वह भी इसी तरह पेश आएगा। तुम सबने आख़ेरत को नज़रअन्दाज़ करने और दुनिया की मोहब्बत पर इत्तेहाद कर लिया है और हर एक का दीन ज़बान की चटनी बनकर रह गया है। ऐसा लगता है के जैसे सबने अपना अमल मुकम्मल कर लिया है और अपने मालिक को वाक़ेअन ख़ुश कर लिया है।

114-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें लोगों की नसीहत का सामान फ़राहम किया गया है)

सारी तारीफ़ उस अल्लाह के लिये है जिसने हम्द को नेमतों से और नेमतों को शुक्रिया से मिला दिया है। हम नेमतों में इसकी हम्द उसी तरह करते हैं जिस तरह मुसीबतों में करते हैं और उससे इस नफ़्स के मुक़ाबले के लिये मदद के तलबगार हैं जो अम्र की तामील में सुस्ती करता है और नवाही की तरफ़ तेज़ी से बढ़ जता है। उन तमाम ग़लतियों के लिये अस्तग़फ़ार करते है। जिन्हें इसके इल्म ने अहाता कर रखा है और उसकी किताब ने जमा कर रखा है। इसका इल्म क़ासिर नहीं है और इसकी किताब कोई चीज़ छोड़ने वाली नहीं है। हम उस पर इसी तरह ईमान लाए हैं जैसे ग़ैब का मुशाहेदा कर लिया हो और वादा से आगाही हासिल कर ली हो। हमारे इस ईमान के इख़लास ने शिर्क की नफ़ी की है और इसके यक़ीन ने शक का एज़ाला किया है। हम गवाही देते हैं के इसके अलावा कोई ख़ुदा नहीं है। वह एक है उसका कोई शरीक नहीं है और हज़रत मोहम्मद (स 0) इसके बन्दे और रसूल हैं। यह दोनों शहादतें वह हैं जो अक़वाल को बलन्दी देती हैं और आमाल को रफ़अत अता करती हैं। जहां यह रख दी जाएं वह पल्ला हल्का नहीं होता है और जहां से उन्हें उठा लिया जाए उस पल्ले में कोई वज़न नहीं रह जाता है।

अल्लाह के बन्दों! मै। तुम्हें तक़वाए इलाही की वसीअत करता हूँ जो तुम्हारे लिये ज़ादे राह है और इसी पर आख़ेरत का दारोमदार है। यही ज़ादेराह मन्ज़िल तक पहुँचाने वाला है और यही पनाहगाह काम आने वाली है। उसी की तरफ़ सबसे बेहतर दाई ने दावत दे दी है और उसे सबसे बेहतर सुनने वाले ने महफ़ूज़ कर लिया है। चुनांचे उसके सुनाने वाले ने सुना दिया और उसके महफ़ूज़ करने वाले ने कामयाबी हासिल कर ली।

अल्लाह के बन्दों! इसी तक़वाए इलाही ने औलियाए ख़ुदा को मोहर्रमात से बचाकर रखा है और इनके दिलों में ख़ौफ़े ख़ुदा को लाज़िम कर दिया है यहाँ तक के इनकी रातें बेदारी की नज़र हो गईं और इनके यह तपते हुए दिन प्यास में गुज़र गए। उन्होंने राहत को तकलीफ़ के एवज़ और सेराबी को प्यास के ज़रिये हासिल किया है वह मौत को क़रीबतर समझते हैं तो तेज़ अमल करते हैं और उन्होंने उम्मीदों को झुठला दिया है तो मौत को निगाह में रखा है , फिर यह दुनिया तो बहरहाल फ़ना और तकलीफ़ तग़य्युर और इबरत का मक़ाम है। फ़ना ही का नतीजा है के ज़माना हर वक़्त अपनी कमान चढ़ाए रहता है के इसके तीर ख़ता नहीं करते हैं और इसके ज़ख़्मों का इलाज नहीं हो पाता है। वह ज़िन्दा को मौत से , सेहतमन्द को बीमारी से और निजात पाने वाले को हलाकत से मार देता है। इसका खाने वाला सेर नहीं होता है और पीने वाला सेराब नहीं होता है। और इसके रन्ज व ताब का असर यह है के इन्सान अपने खाने का सामान फ़राहम करता है , रहने के लिये मकान बनाता है और उसके बाद अचानक ख़ुदा की बारगाह की तरफ़ चल देता है। न माल साथ ले जाता है और न मकान मुन्तक़िल हो पाता है। इसके तग़य्युरात का हाल यह है के जिसे क़ाबिले रहम देखा था वह क़ाबिले रश्क हो जाता है और जिसे क़ाबिले रष्क देखा था वह क़ाबिले रहम हो जाता है। गोया एक नेमत है जो ज़ाएल हो गई और एक बला है जो नाज़िल हो गई। इसकी इबरतों की मिसाल यह है के इन्सान अपनी उम्मीदों तक पहुंचने वाला ही होता है के मौत इसके सिलसिले को क़ता कर देती है और न कोई उम्मीद हासिल होती है और न उम्मीद करने वाला ही छोड़ा जाता है। ऐ सुबहानल्लाह- इस दुनिया की ख़ुशी भी क्या धोका है और इसकी सेराबी भी कैसी तष्नाकामी है और इसके साये में भी किस क़द्र धूप है , न यहाँ आने वाली मौत को वापस किया जा सकता है और न किसी जाने वाले को पलटाया जा सकता है। सुबहानल्लाह ज़िन्दा मुर्दे से किस क़द्र जल्दी मुलहक़ होकर क़रीबतर हो जाता है और मुर्दा ज़िन्दा से रिश्ता तोड़कर किस क़द्र दूर हो जाता है। (याद रखो) शर से बदतर कोई शै इसके अज़ाब के अलावा नहीं है और ख़ैर से बेहतर कोई शै उसके सवाब के सिवा नहीं है। दुनिया में हर शै का सुनना उसके देखने से अज़ीमतर होता है और आख़ेरत में हर शै का देखना उसके सुनने से बढ़-चढ़ कर होता है। लेहाज़ा तुम्हारे लिये देखने के बजाय सुनना और ग़ैब के मुशाहिदे के बजाय ख़बर ही को काफ़ी हो जाना चाहिए। याद रखो के दुनिया में किसी शै का कम होना और आख़ेरत में ज़्यादा होना इससे बेहतर है के दुनिया में ज़्यादा हो और आख़ेरत में कम हो जाए के कितने ही कम वाले फ़ायदे में रहते हैं और कितने ही ज़्यादती वाले घाटे में रह जाते हैं। बेशक जिन चीज़ों का तुम्हें हुक्म दिया गया है उनमें ज़्यादा वुसअत है ब निस्बत उन चीज़ों के जिनसे रोका गयाहै और जिन्हें हलाल किया गया है वह उनसे कहीं ज़्यादा हैं जिन्हें हराम क़रार दिया गया है। लेहाज़ा क़लील को कसीर के लिये और तंगी को वुसअत की ख़ातिर छोड़ दो। परवरदिगार ने तुम्हारे रिज़्क़ की ज़िम्मेदारी ली है और अमल करने का हुक्म दिया है लेहाज़ा ऐसा न हो के जिसकी ज़मानत ली गई है इसकी तलब उससे ज़्यादा हो जाए जिसको फ़र्ज़ किया गया है। ख़ुदा गवाह है के तुम्हारे हालात को देख कर यह शुबह होने लगता है और ऐसा लगता है के शायद जिस की ज़मानत ली गई है वही तुम पर वाजिब किया गया है और जिसका हुक्म दिया गया है उसी को साक़ित कर दिया गया है। ख़ुदारा अमल की तरफ़ सबक़त करो और मौत के अचानक वारिद हो जाने से डरो इसलिये के मौत के वापस होने की वह उम्मीद नहीं है जिस क़द्र रिज़्क़ के पलट कर आ जाने की है। जो रिज़्क़ आज हाथ से निकल गया है उसके कल इज़ाफ़े का इमकान है लेकिन जो उम्र आज निकल गई है उसके कल वापस आने का भी इमकान नहीं है। उम्मीद आने वाले की हो सकती है जाने वाले की नहीं। इससे तो मायूसी ही हो सकती है “ अल्लाह से इस तरह डरो जो डरने का हक़ है और ख़बरदार उस वक़्त तक दुनिया से न जाना जब तक वाक़ेई मुसलमान न हो जाओ। ”


115-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(तलबे बारिश के सिलसिले में)

ख़ुदाया! हमारे पहाड़ों का सब्ज़ा ख़ुश्क हो गया है और हमारी ज़मीन पर ख़ाक उड़ रही है। हमारे जानवर प्यासे हैं और अपनी मन्ज़िल की तलाश में सरगर्दां हैं और अपने बच्चों के हक़ में इस तरह फ़रयादी हैं जैसे ज़न पिसर मुर्दा , सब चरागाहों की तरफ़ फेरे लगाने और तालाबों की तरफ़ वालेहाना तौर पर दौड़ने से आजिज़ आ गए हैं , ख़ुदाया! अब इनकी फ़रयादी की बकरियों और इष्तिेयाक़ आमेज़ पुकारने वाली ऊंटनियों पर रहम फ़रमा। ख़ुदाया! इनकी राहों में परेशानी और मन्ज़िलों पर चीख़ व पुकार पर रहम फ़रमा। ख़ुदाया् हम इस वक़्त घर से निकल कर आए हैं जब क़हत साली के मारे हूए लाग़र ऊंट हमारी तरफ़ पलट पड़े हैं और जिनसे करम की उम्मीद थी वह बादल आकर चले गए हैं। अब दर्द के मारों का तू ही आसरा है और इल्तिजा करने वालों का तू ही सहारा है। हम उस वक़्त दुआ कर रहे हैं जब लोग मायूस हो चुके हैं। बादलों के ख़ैर को रोक दिया गया है और जानवर हलाक हो रहे हैं तो ख़ुदाया हमारे आमाल की बिना पर हमारा मवाखि़ज़ा न करना , और हमें हमारे गुनाहों की गिरफ़्त में मत ले लेना , अपने दामने रहमत को हमारे ऊपर फैला दे बरसने वाले बादल , मूसलाधार बरसात और इसीन सब्ज़ा के ज़रिये। ऐसी बरसात जिससे मुरदा ज़मीन ज़िन्दा हो जाएं और गई हुई बहार वापस आ जाए। ख़ुदाया! ऐसी सेराबी अता फ़रमा जो ज़िन्दा करने वाली , सेराब बनाने वाली। कामिल व शामिल , पाकीज़ा व मुबारक , ख़ुशगवार व शादाब हो जिसकी बरकत से नबातात फलने फूलने लगें। शाख़ें बारआवर हो जाएं , पत्ते हरे हो जाएं , कमज़ोर बन्दों को उठने का सहारा मिल जाए , मुर्दा ज़मीनों को ज़िन्दगी अता हो जाए। ख़ुदाया! ऐसी सेराबी अता फ़रमा जिससे टीले सब्ज़ापोश हो जाएं , नहरें जारी हो जाएं , आस-पास के इलाक़े शादाब हो जाएं , फल निकलने लगें , जानवर जी उठें , दूर दराज़ के इलाक़े भी तर हो जाएं और खुले मैदान भी तेरी इस वसीअ बरकत और अज़ीम अता से मुस्तफ़ैज़ हो जाएं जो तेरी तबाह हाल मख़लूक़ आवारागर्द जानवरों पर है। हम पर ऐसी बारिश नाज़िल फ़रमा जो पानी से शराबोर कर देने वाली , मूसलाधार , मुसलसल बरसने वाली हो , जिसमें क़तरात , क़तरात को ढकेल रहे हों और बून्दें बून्दों को तेज़ी से आगे बढ़ा रही हों। न उसकी बिजली धोका देने वाली हो और न उसके बादल पानी से ख़ाली हों न उसके अब्र से सफ़ेद टुकड़े बिखरे हों और न सिर्फ़ ठण्डे झोंकों की बून्दाबान्दी हो , ऐसी बारिश हो के क़हत के मारे हुए इसकी सरसब्ज़ियों से ख़ुशहाल हो जाएं और ख़ुश्क साली के शिकार इसकी बरकत से जी उठें। इसलिये के तू ही हमारी मायूसी के बाद पानी बरसाने वाला और दामाने रहमत का फैलाने वाला है तू ही क़ाबिले हम्द व सताइश , सरपरस्त व मददगार है।

सय्यद रज़ी- इन्साहत जबालना- यानी पहाड़ों में ख़ुश्कसाली से शिगाफ़ पड़ गए हैं के इन्साहलसौब कपड़े के फट जाने को कहा जाता है। या इसके मानी घास के ख़ुश्क हो जाने के हैं। साहा-इन्साह ऐसे मवाक़ेअ पर भी इस्तेमाल होता है , हामत दवाबना - यानी प्यासे हैं और हयाम यहाँ अतश के मानी हैं।

हदाबीरल सनीन- हदबार की जमा है , वह ऊंट जिसे सफ़र लाग़र बना दे , गोया के क़हतज़दा साल को इस ऊंट से तशबीह दी गई है जैसा के ज़वालरमा शाएर ने कहा था- (यह लाग़र और कमज़ोर ऊंटनिया हैं जो सख़्ती झेलकर बैठ गई हैं या फिर बेआब व ग्याह सहरा में ले जाने पर चली जाती हैं)

या क़ज़अ रबाबहा- क़जअ - बादल के छोटे-छोटे टुकड़े , ला शफ़्फ़ान ज़हाबहा - असल में “ ज़ाते शफ़ान ” है- शफ़ान ठण्डी हवा को कहा जाता है और ज़ेहाब हल्की फवार का नाम है। यहाँ लफ़्ज़ “ ज़ात ” हज़फ़ हो गया है।

116-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें अपने असहाब को नसीहत फ़रमाई है)

अल्लाह ने पैग़म्बर (स 0) को इस्लाम की तरफ़ दावत देने वाला और मख़लूक़ात के आमाल का गवाह बनाकर भेजा तो आपने पैग़ामे इलाही को मुकम्मल तौर से पहुंचा दिया। न कोई सुस्ती और न कोई कोताही , दुश्मनाने ख़ुदा से जेहाद किया और इस राह में न कोई कमज़ोरी दिखलाई और न किसी बख़ीला और बहाने का सहारा लिया। आप मुत्तक़ीन के इमाम और तलबगाराने हिदायत के लिये आंखों की बसारत थे।

अगर तुम इनत माम बातों को जान लेते जो तुमसे मख़फ़ी रखी गई हैं और जिनको मैं जानता हूँ तो सहराओं में निकल जाते। अपने आमाल पर गिरया करते और अपने किये पर सर व सीना पीटते और सारे अमवाल को इस तरह छोड़ कर चल देते के न इनका कोई निगहबान होता और न वारिस और हर शख़्स को सिर्फ़ अपनी ज़ात की फ़िक्र होती। कोई दूसरे की तरफ़ रूख़ भी न करता। लेकिन अफ़सोस के तुमने इस सबक़ को बिल्कुल भुला दिया जो तुम्हें याद कराया गया था और उन हौलनाक मनाज़िर की तरफ़ से यकसर मुतमईन हो गए जिनसे डराया गया था। तो तुम्हारी राय भटक गई और तुम्हारे कामो में इन्तेशार पैदा हो गया और मैं यह चाहने लगा के काश अल्लाह मेरे और तुम्हारे दरम्यान जुदाई डाल देता और मुझे उन लोगों से मिला देता जो मेरे लिये ज़्यादा सज़ा थे। वह लोग जिनकी राय मुबारक और जिनका हिल्म ठोस है। हक़ की बातें करते हैं और बग़ावत व सरकशी से किनारा करने वाले हैं। उन्होंने रास्ते पर क़दम आगे बढ़ाए और राहे रास्त पर तेज़ी से बढ़ते चले गये , जिसके नतीजे में दाएमी आख़ेरत और पुरसुकून करामत हासिल कर ली।

आगाह हो जाओ के ख़ुदा की क़सम तुम पर वह नौजवान बनी सक़ीफ़ का मुसल्लत हो जाएगा जिसका क़द तवील होगा और वह लहराकर चलने वाला होगा। तुम्हारे सब्ज़े को हज़म कर जाएगा और तुम्हारी चर्बी को पिघला दे , हाँ , हाँ अबू ऐ अबू वज़हा कुछ और।

(((- अमीरूल मोमेनीन (अ 0) की ज़िन्दगी का अज़ीमतरीन इल्मिया है के आँख खोलने के बाद से 30साल तक रसूले अकरम (स 0) के साथ गुज़ारे। इसके बाद चन्द मुख़लिस असहाबे कराम के साथ रहा इसके बाद जब ज़माने ने पलटा खाया और इक़्तेदार क़दमों में आया तो एक तरफ़ नाक्सीन , क़ासेतीन और ख़वारिज का सामना करना पड़ा और दूसरी तरफ़ अपने गिर्द कूफ़े के बेवफ़ाओं का मजमा लग गया। ज़ाहिर है के ऐसा शख़्स इस हाल को देख कर उसके माज़ी की तमन्ना न करे तो और क्या करे और उसने ज़ेहन से अपना माज़ी किस तरह निकल जाए।-)))

117-आपका इरशादे गिरामी

(जिसमें जान व माल से कंजूसी करने वालों की सरज़निश गई है)

न तुमने माल को उसकी राह में ख़र्च किया जिसने तुम्हें अता किया था और न जान को उसकी ख़ातिर ख़तरे में डाला जिसने पैदा किया था। तुम अल्लाह के नाम पर बन्दों में इज्ज़त हासिल करते हो और बन्दों के बारे में अल्लाह का एहतेराम नहीं करते हो , ख़ुदारा इस बात से ग़ैरत हासिल करो के अनक़रीब उन्हें मनाज़िल में नाज़िल होने वाले हो जहां पहले लोग नाज़िल हो चुके हैं और क़रीबतरीन भाइयों से पलट कर रह जाने वाले हो।

118-आपका इरशादे गिरामी

(अपने असहाब में नेक किरदार अफ़राद के बारे में)

तुम हक़ के सिलसिले में मददगार और दीन के मामले में भाई हो। जंग के रोज़ मेरी सिपर और तमाम लोगों में मेरे राज़दार हो। मैं तुम्हारे ही ज़रिया रूगरदानी करने वालों पर तलवार चलाता हूँ और रास्ते पर आने वालों की इताअत की उम्मीद रखता हूँ। लेहाज़ा ख़ुदारा मेरी मदद करो इस नसीहत के ज़रिये जिसमें मिलावट न हो और किसी तरह के शक व शुबहे की गुन्जाइश न हो के ख़ुदा की क़सम मैं लोगों की क़यादत के लिये तमाम लोगों से ऊला और अहक़ हूँ।

119-आपका इरशादे गिरामी

(जब आपने लोगों को जमा करके जेहाद की तलक़ीन की और लोगों ने सुकूत इख़्तेयार कर लिया तो फ़रमाया)

तुम्हें क्या हो गया है , क्या तुम गूंगे हो गए हो ? इस पर एक जमाअत ने कहा के या अमीरूल मोमेनीन (अ 0)! आप चलें हम चलने के लिये तैयार हैं। फ़रमाया , तुम्हें क्या हो गया है- अल्लाह तुम्हें हिदायत की तौफ़ीक़ न दे और तुम्हें सीधा रास्ता नसीब न हो। क्या ऐसे हालात में मेरे लिये मुनासिब है के मैं ही निकलूँ ? ऐसे मौक़े पर एक शख़्स को निकलना चाहिये जो तुम्हारे बहादुरों और जवाँमर्दों में मेरा पसन्दीदा हो और हरगिज़ मुनासिब नहीं है के मैं लशकर , शहर बैतुलमाल , ख़ेराज की फ़राहेमी , क़ज़ावत , मुतालबात करने वालों के हुक़ूक़ की निगरानी का सारा काम छोड़कर निकल जाऊँ और लशकर लेकर दूसरे लशकर का पीछा करूं और इस तरह जुम्बिश करता रहूँ जिस तरह ख़ाली तरकश में तीर। मैं ख़ेलाफ़त की चक्की का मरकज़ हूँ जिसे मेरे गिर्द चक्कर लगाना चाहिये के अगर मैंने मरकज़ छोड़ दिया तो उसकी गर्दिश का दाएरा मुतज़लज़ल हो जाएगा और उसके नीचे की बिसात भी जाबजा हो जाएगी। ख़ु़दा की क़सम यह बदतरीन राय है और वही गवाह है के अगर दुशमन का मुक़ाबला करने में मुझे शहादत की आरज़ू न होती , जबके वह मुक़ाबला मेरे लिये मुक़द्दर हो चुका हो , तो मैं अपनी सवारियों को क़रीब करके उनपर सवार होकर तुमसे बहुत दूर निकल जाता और फिर तुम्हें उस वक़्त तक याद भी न करता जब तक शिमाली व जुनूबी हवाएं चलती रहें। तुम तन्ज़ करने वाले , ऐब लगाने वाले , किनारा कशी करने वाले और सिर्फ़ शोर मचाने वाले हो , तुम्हारे आदाद की कसरत का क्या फाएदा है जब तुम्हारे दिल यकजा नहीं हैं। मैंने तुमको इस वाज़ेअ रास्ते पर चलाना चाहा जिस पर चलकर कोई हलाक नहीं हो सकता है मगर यह के हलाकत इसका मुक़द्दर हो। इसी राह पर चलने वाले की वाक़ेई मन्ज़िल जन्नत है और यहाँ फिसल जाने वाले का रास्ता जहन्नम है।

(((- ऐ लोग हर दौर में दीनदारों में भी रहे हैं और दुनियादारों में भी , जो क़ौम से हर तरह के एहतेराम के तलबगार होते हैं और क़ौम का किसी तरह का एहतेराम नहीं करते हैं , लोगों से दीने ख़ुदा की ठेकेदारी के नाम पर हर तरह की क़ुरबानी का तक़ाज़ा करते हैं और ख़ुद किसी तरह की क़ुरबानी का इरादा नहीं करते हैं उनकी नज़र में दीने ख़ुदा दुनिया कमाने का बेहतरीन ज़रिया है और यह दरहक़ीक़त बदतरीन तिजारत है के इन्सान दीन की अज़ीम व शरीफ़ दौलत को देकर दुनिया जैसी हक़ीर व ज़लील शै को हासिल करने का मन्सूबा बनाए , ज़ाहिर है के जब दनिदारों में ऐसे किरदार पैदा हो जाते हैं तो दुनियादारों का क्या ज़िक्र है उन्हें तो बहरहाल उससे बदतर होना चाहिये।-)))

120-आपका इरशादे गिरामी

(जिसमें अपनी फ़ज़ीलत का ज़िक्र करते हुए लोगों को नसीहत फ़रमाई है)

ख़ुदा की क़सम- मुझे पैग़ामे इलाही के पहुँचाने , वादाए इलाही के पूरा करने और कलेमाते इलाहिया की मुकम्मल वज़ाहत करने का इल्म दिया गया है। हम अहलेबैत (अ 0) के पास हिकमतों के अबवाब और मसाएल की रौशनी मौजूद है , याद रखो , दीन की तमाम शरीअतों का मक़सद एक है और उसके सारे रास्ते दुरूस्त हैं , जो इन रास्तों को इख़्तेयार कर लेगा वह मन्ज़िल तक पहुंच भी जाएगा और फ़ायदा भी हासिल कर लेगा और जो रास्ते ही में ठहर जाएगा वह बहक भी जाएगा और शर्मिन्दा भी होगा। अमल करो उस दिन के लिये जिस के लिये ज़ख़ीरे फ़राहम किये जाते हैं और जिस दिन नीयतों का इम्तेहान होगा और जिसको अपनी मौजूद अक़्ल फ़ायदा न पहुँचाए उसे दूसरों की ग़ायब और दूरतरीन अक़्ल क्या फ़ायदा पहुंचा सकती है। इस आगणन से डरो जिसकी तपिश शदीद , गहराई बईद , आराइश हदीद और पीने की शै सदीद (पीप) है। याद रखो , वह ज़िक्रे ख़ैर जो परवरदिगार किसी इन्सान के लिये बाक़ी रखता है वह उस माल से कहीँ ज़्यादा बेहतर होता है जिसे इन्सान उन लोगों के लिये छोड़ जाता है जो तारीफ़ तक नहीं करते हैं।

121-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

जब लैलतलहरीर के बाद आपके असहाब में से एक शख़्स ने उठकर कहा के आपने पहले हमें हकम बनाने से रोका और फिर उसी का हुक्म दे दिया तो आखि़र इन दोनों में से कौन सी बात सही थी ? तो आपने हाथ पर हाथ मारकर फ़रमाया , अफ़सोस यही उसकी जज़ा होती है जो अहद व पैमान को नज़र अन्दाज़ कर देता है। याद रखो अगर मैं तुमको इस नागवार अम्र (जंग) पर मामूर कर देता जिसमें यक़ीनन अल्लाह ने तुम्हारे लिये ख़ैर रखा था , इस तरह के तुम सीधे रहते तो तुम्हें हिदायत देता और टेढ़े हो जाते तो सीधा कर देता और इन्कार करते तो इसका इलाज करता तो यह इन्तेहाई मुस्तहकम तरीक़ए कार होता , लेकिन यह काम किसके ज़रिये करता और किसके भरोसे पर करता। मैं तुम्हारे ज़रिये क़ौम का इलाज करना चाहता था लेकिन तुम्हें तो मेरी बीमारी हो , यह तो ऐसा ही होता जैसे कांटे से कांटा निकाला जाए , जबके इसका झुकाव उसी की तरफ़ हो। ख़ुदाया! गवाह रहना के इस मूज़ी मर्ज़ के इतबा आजिज़ आ चुके हैं और इस कुएं से रस्सी निकालने वाले थक चुके हैं।

कहाँ हैं वह लोग जिन्हें इस्लाम की दावत दी गई तो फ़ौरत क़ुबूल कर ली और उन्होंने क़ुरान को पढ़ा तो बाक़ाएदा अमल भी किया और जेहाद के लिये आमादा किये गए तो इस तरह शौक़ से आगे बढ़े जिस तरह ऊंटनी अपने बच्चों की तरफ़ बढ़ती है।

(((- मक़सद यह है के तुम लोगों ने मुझसे इताअत का अहद व पैमान किया था लेकिन जब मैंने सिफ़्फ़ीन में जंग जारी रखने पर इसरार किया तो तुमने नैज़ों पर क़ुरआन देखकर जंग बन्दी का मुतालबा कर दिया और अपने अहद व पैमान को नज़रअन्दाज़ कर लिया , ज़ाहिर है के ऐसे एक़दाम का ऐसा ही नतीजा होता है जो सामने आ गया तो अब फ़रयाद करने का क्या जवाज़ है ?-)))

मैंने तलवारों को न्यामों से निकाल लिया और दस्त दस्त , सफ़ ब सफ़ आगे बढ़कर तमाम एतराफ़े ज़मीन पर क़ब्ज़ा कर लिया। उनमें से बाज़ चले गये और बाज़ बाक़ी रह गये। उन्हें न ज़िन्दगी की बशारत से दिलचस्पी थी और न मुर्दों की ताज़ियत से। उनकी आंखें ख़ौफ़े ख़ुदा में गिरया से सफ़ेद हो गई थीं , पेट रोज़ों से धंस गए थे , होंट दुआ करते-करते ख़ुश्क हो गए थे , चेहरे शब-बेदारी से ज़र्द हो गए थे और चेहरों पर ख़ाकसारी की गर्द पड़ी हुई थी। यही मेरे पहले वाले भाई थे जिनके बारे में हमारा यक़ीन है के हम इनकी तरफ़ प्यासों की तरह निगाह करें और इनके फ़िराक़ में अपने ही हाथ काटें।

यक़ीनन शैतान तुम्हारे लिये अपनी राहों को आसान बना देता है और चाहता है के तुम एक-एक करके तुम्हारी सारी गिरहें खोल दे , वह तुम्हें इज्तेमाअ के बजाए इफ़तेराक़ देकर फ़ितनों में मुब्तिला करना चाहता है लेहाज़ा इसके ख़यालात और इसकी झाड़ फूंक से मुंह मोड़े रहो और उस शख़्स की नसीहत क़ुबूल करो जो तुम्हें नसीहत का तोहफ़ा दे रहा है और अपने दिल में इसकी गिरह बांध लो।

122-आपका इरशादे गिरामी

(जब आप ख़वारिज के उस पड़ाव की तरफ़ तशरीफ़ ले गए जो तहकीम के इन्कार पर अड़ा हुआ था और फ़रमाया)

क्या तुम सब हमारे साथ सिफ़्फ़ीन में थे ? लोगों ने कहा बाज़ अफ़राद थे और बाज़ नहीं थे! फ़रमाया तो तुम दो हिस्सों में तक़सीम हो जाओ , सिफ़्फ़ीन वाले अलग और ग़ैर सिफ़्फ़ीन वाले अलग , ताके मैं हर एक से उसके हाल के मुताबिक़ गुफ़्तगू कर सकूँ।

इसके बाद क़ौम से पुकारकर फ़रमाया तुम सब ख़ामोश हो जाओ और मेरी बात सुनो और अपने दिलों को भीं मेरी तरफ़ मुतवज्जो रखो ताके अगर मैं किसी बात की गवाही तलब करूं तो हर शख़्स अपने इल्म के मुताबिक़ जवाब दे सके , ( यह कहकर आपने एक तवील गुफ़्तगू फ़रमाई जिसका एक हिस्सा यह था)

ज़रा बतलाओ के जब सिफ़्फ़ीन वालों ने हीला व मक्र और जाल व फ़रेब से नैज़ों पर क़ुरआन बलन्द कर दिये थे तो क्या तुमने यह नहीं कहा था के यह सब हमारे भाई और हमारे साथ के मुसलमान हैं। अब हमसे माफ़ी के तलबगार हैं और किताबे ख़ुदा से फैसला चाहते हैं लेेहाज़ा मुनासिब यह है के इनकी बात मान ली जाय और उन्हें सांस लेने का मौक़ा दे दिया जाए। मैंने तुम्हें समझाया था के इसका ज़ाहिर ईमान है लेकिन बातिन सिर्फ ज़ुल्म और तादी है। इसकी इब्तेदा रहमत व राहत है लेकिन इसका अन्जाम शर्मिन्दगी और निदामत है लेहाज़ा अपनी हालत पर क़ायम रहो और अपने रास्ते को मत छोड़ो और जेहाद पर दांतों को भींचे रहो और किसी बकवास करने वाले की बकवास को मत सुनो के उसके क़ुबूल कर लेने में गुमराही है और नज़रअन्दाज़ कर देने में ज़िल्लत है। लेकिन जब तहकीम की बात तय हो गई तो मैंने देखा के तुम्हीं लोगों ने उसकी रज़ामन्दी दी थी हालांके ख़ुदा गवाह है के अगर मैंने उससे इन्कार कर दिया होता तो उससे मुझ पर कोई फ़रीज़ा आयद न होता और न परवरदिगार मुझे गुनहगार क़रार देता और अगर मैंने उसे इख़्तेयार किया होता तो मैं ही वह साहेबे हक़ था जिसका इत्तेबाअ होना चाहिए था के किताबे ख़ुदा मेरे साथ है और जबसे मेरा इसका साथ हुआ है कभी जुदाई नहीं हुई। हम रसूले अकरम (स 0) के ज़माने में उस वक़्त जंग करते थे जब मुक़ाबले पर ख़ानदानों के बुज़ुर्ग , बच्चे , भाई बन्द और रिश्तेदार होते थे लेकिन हर मुसीबत व शिद्दत पर हमारे ईमान में इज़ाफ़ा ही होता था और हम अम्रे इलाही के सामने सरे तस्लीम ख़म किये रहते थे। राहे हक़ में बढ़ते ही जाते थे और ज़ख़्मों की टीस पर सब्र ही करते थे मगर अफ़सोस के अब हमें मुसलमान भाइयों से जंग करना पड़ रही है के इनमें कजी , इन्हेराफ़ , शुबह और ग़लत तावीलात का दख़ल हो गया है लेकिन इसके बावजूद अगर कोई रास्ता निकल आए जिससे ख़ुदा हमारे इन्तेशार को दूर कर दे और हम एक-दूसरे से क़रीब होकर रहे सहे , ताल्लुक़ात को बाक़ी रख सकें तो हम इसी रास्ते को पसन्द करेंगे और दूसरे रास्ते से हाथ रोक लेंगे।

123-आपका इरशादे गिरामी

(जो सिफ़्फ़ीन के मैदान में अपने असहाब से फ़रमाया था)

देखो! अगर तुमसे कोई शख़्स भी जंग के वक़्त अपने अन्दर क़ूवते क़ल्ब और अपने किसी भाई में कमज़ोरी का एहसास करे तो उसका फ़र्ज़ है के अपने भाई से इसी तरह दिफ़ाअ करे जिस तरह अपने नफ़्स से करता है के ख़ुदा चाहता तो उसे भी वैसा ही बना देता लेकिन उसने तुम्हें एक ख़ास फ़ज़ीलत अता फ़रमाई है।

देखो! मौत एक तेज़ रफ़्तार तलबगार है जिससे न कोई ठहरा हुआ बच सकता है और न भागने वाला बच निकल सकता है और बेहतरीन मौत शहादत है। क़सम है उस परवरदिगार की जिसके क़ब्ज़ए क़ुदरत में फ़रज़न्दे अबूतालिब की जान है के मेरे लिये तलवार की हज़ार ज़र्बें इताअते ख़ुदा से अल होकर बिस्तर पर मरने से बेहतर हैं। गोया मैं देख रहा हूँ के तुम लोग वैसी ही आवाज़ें निकाल रहे हो जैसी सौ समारों के जिस्मों की रगड़ से पैदा होती हैं के न अपना हक़ हासिल कर रहे हो और न ज़िल्लत का दिफ़ाअ कर रहे हो जबके तुम्हें रास्ते पर खुला छोड़ दिया गया है और निजात इसीके लिये है जो जंग में कूद पड़े और हलाकत उसी के लिये है जो देखता ही रह जाए।

124-आपका इरशादे गिरामी

(अपने असहाब को जंग पर आमादा करते हुए)

ज़िरहपोश अफ़राद को आगे बढ़ाओ और बेज़िरह लोगों को पीछे रखो। दांतों को भींच लो के इससे तलवारें सर से उचट जाती हैं और नैज़ों के एतराफ़ से पहलूओं को बचाए रखो के इससे नैज़ों के रूख़ पलट जाते हैं। निगाहों को नीचा रखोे के इससे क़ूवते क़ल्ब में इज़ाफ़ा होता है और हौसले बलन्द रहते हैं। आवाज़ें धीमी रखो के इससे कमज़ोरी दूर होती है। देखो अपने परचम का ख़याल रखना। वह न झुकने पाए और न अकेला रहने पाए। उसे सिर्फ़ बहादुर अफ़राद और इज़्ज़त के पासबानों के हाथों में रखना के मसाएब पर सब्र करने वाले ही परचमों के गिर्द जमा होते हैं और दाहिने बाएं , आगे-पीछे हर तरफ़ से घेरा डालकर उसका तहफ़्फ़ुज़ करते हैं , न इससे पीछे रह जाते हैं के इसे दुश्मनों के हवाले कर दें और न आगे बढ़ जाते हैं के वह तन्हा रह जाए।

देखो। हर शख़्स अपने मुक़ाबिल का ख़ुद मुक़ाबला करे और अपने भाई का भी साथ दे और ख़बरदार अपने मुक़ाबिल को अपने साथी के हवाले न कर देना के इस पर यह और इसका साथी दोनों मिलकर हमला कर दें।

ख़ुदा की क़सम अगर तुम दुनिया की तलवार से बचकर भाग भी निकले तो आखि़रत की तलवार से बचकर नहीं जा सकते हो। फिर तुम तो अरब के जवाँमर्द और सरबलन्द अफ़राद हो। तुम्हें मालूम है के फ़रार में ख़ुदा का ग़ज़ब भी है और हमेशा की ज़िल्लत भी है। फ़रार करने वाला न अपनी उम्र में इज़ाफ़ा कर सकता है और न अपने वक़्त के दरम्यान हाएल हो सकता है। कौन है अल्लाह की तरफ़ यूँ जाए जिस तरह प्यासा पानी की तरफ़ जाता है। जन्नत नैज़ों के एतराफ़ के साये में है आज हर एक के हालात का इम्तेहान हो जाएगा। ख़ुदा की क़सम मुझे दुश्मनों से जंग का इष्तेयाक़ उससे ज़्यादा है जितना उन्हें अपने घरों का इष्तेयाक़ है। ख़ुदाया यह ज़ालिम अगर हक़ को रद कर दें तो उनकी जमाअत को परागन्दा कर दे , उनके कलमे को मुत्तहिद न होने दे , उनको उनके किये की सज़ा दे दे के यह उस वक़्त तक अपने मौक़फ़ से न हटेंगे जब तक नैज़े इनके जिस्मों में नसीम सहर के रास्ते न बना दें और तलवारें उनके सरों को शिगाफ़्ता , हड्डियों को चूर-चूर और हाथ पैर को शिकस्ता न बना दें और जब तक उन पर लशकर के बाद लशकर और सिपाह के बाद सिपाह हमलावर न हो जाएं और उनके शहरों पर मुसलसल फ़ौजों की यलग़ार हो और घोड़े उनकी ज़मीनों को आखि़र तक रौन्द न डालें और उनकी चरागाहों और सब्ज़े जारों को पामाल न कर दें।

(((- हक़ीक़ते अम्र यह है के इन्सान की ज़िन्दगी की हर तशनगी का इलाज जन्नत के अलावा कहीं नहीं है , यह दुनिया सिर्फ़ ज़र व रियात की तकमील के लिये बनाई गई है और बड़े से बड़े इन्सान का हिस्सा भी उसके ख़्वाहिशात से कमतर है वरना सारे रूए ज़मीन पर हुकूमत करने वाला भी उससे बेशतर का ख़्वाहिश मन्द रहता और दामाने ज़मीन में उससे ज़्यादा वुसअत नहीं है। यह सिर्फ़ जन्नत है जिसके बारे में यह एलान किया गया है के वहां हर ख़्वाहिश नफ़्स और लज़्ज़ते निगाह की तस्कीन का सामान मौजूद है। अब सवाल सिर्फ़ यह रह जाता है के वहाँ तक जाने का रास्ता क्या है। मौलाए कायनात ने अपने साथियों को इसी नुक्ते की तरफ़ मुतवज्जो किया है के जन्नत तलवारों के साये के नीचे है और इसका रास्ता सिर्फ़ मैदाने जेहाद है लेहाज़ा मैदाने जेहाद की तरफ़ उस तरह बढ़ो जिस तरह प्यासा पानी की तरफ़ बढ़ता है के इसी राह में हर जज़्बए दिल की तस्कीन का सामान पाया जाता है और फिर दीने ख़ुदा की सरबलन्दी से बालातर कोई शरफ़ भी नहीं है।-)))

125-आपका इरशादे गिरामी

(तहकीम के बारे में , हकमीन की दास्तान सुनने के बाद)

याद रखो , हमने अफ़राद को हकम नहीं बनाया था बल्के क़ुरआन को हकम क़रार दिया था और क़ुरान वही किताब है जो दफ़्तियों के दरम्यान मौजूद है लेकिन मुश्किल यह है के यह ख़ुद नहीं बोलता है और उसे तर्जुमान की ज़रूरत है और तर्जुमान अफ़राद ही होते हैं। इस क़ौम ने हमें दावत दी के हम क़ुरान से फ़ैसले कराएं तो हम तो क़ुरान से रूगर्दानी करने वाले नहीं थे जबके परवरदिगार ने फ़रमाया है के अपने खि़लाफ़त को ख़ुदा व रसूल की तरफ़ मोड़ दो और ख़ुदा की तरफ़ मोड़ने का मतलब उसकी किताब से फ़ैसला कराना ही है और रसूल (स 0) की तरफ़ मोड़ने का मक़सद भी सुन्नत का इत्तेबाअ करना है और यह तय है के अगर किताबे ख़ुदा से सच्चाई के साथ फ़ैसला किया जाए तो उसके सबसे ज़्यादा हक़दार हम ही हैं और इसी तरह सुन्नते पैग़म्बर के लिये सबसे ऊला व अक़रब हम ही हैं।

अब तुम्हारा यह कहना के आपने तहकीम की मोहलत क्यों दी ? तो किसका राज़ यह है के मैं चाहता था के बेख़बर बाख़बर हो जाए और बाख़बर तहक़ीक़ कर ले के शायद परवरदिगार इस वक़्फ़े में उम्मत के कामो की इस्लाह कर दे और इसका गला न घोंटा जाए के तहक़ीक़े हक़ से पहले गुमराही के पहले ही मरहले में भटक जाएं और याद रखो के परवरदिगार के नज़दीक बेहतरीन इन्सान वह है जिसे हक़ पर अमल दरआमद करना (चाहे इसमें नुक़सान ही क्यों न हो) बातिल पर अमल करने से ज़्यादा महबूब हो (चाहे इसमें फ़ायदा ही क्यों न हो) , तो आखि़र तुम्हें किधर ले जाया जा रहा है और तुम्हारे पास शैतान किधर से आ गया है , देखो इस क़ौम से जेहाद के लिये तैयार हो जाओ जो हक़ के मामले में इस तरह सरगर्दां है के उसे कुछ दिखाई ही नहीं देता है और बातिल पर इस तरह अक़ारद कर दी गई है के सीधे रास्ते पर जाना ही नहीं चाहती है। यह किताबे ख़ुदा से अलग और वह राहे हक़ से मुन्हरिफ़ हैं मगर तुम भी क़ाबिले एतमाद अफ़राद और लाएक़ तमस्सुक शरफ़ के पासबान नहीं हो। तुम आतिशे जंग के भड़काने का बदतरीन ज़रिया हो , तुम पर हैफ़ है मैंने तुमसे बहुत तकलीफ़ उठाई है , तुम्हें अलल एलान भी पुकारा है और आहिस्ता भी समझाया है लेकिन तुम न आवाज़े जंग पर सच्चे शरीफ़ साबित हुए और न राज़दारी पर क़ाबिले एतमाद साथी निकले।

(((- हज़रत ने तहकीम का फ़ैसला करते हुए दोनों अफ़राद को एक साल की मोहलत दी थी ताके इस दौरान नावाक़िफ़ अफ़राद हक़ व बातिल की इत्तेलाअ हासिल कर लें और जो किसी मिक़दार में हक़ से आगाह हैं वह मज़ीद तहक़ीक़ कर लें , ऐसा न हो के बेख़बर अफ़राद पहले ही मरहले में गुमराह हो जाएं और अम्र व आस की मक्कारी का शिकार हो जाएं। मगर अफ़सोस यह है के हर दौर में ऐसे अफ़राद ज़रूर रहते हैं जो अपने अक़्ल व फ़िक्र को हर एक से बालातर तसव्वुर करते हैं और अपने क़ाएद के फ़ैसलों को भी मानने के लिये तैयार नहीं होते हैं और खुली हुई बात है के जब इमाम (अ 0) के साथ ऐसा बरताव किया गया है तो नाएब इमाम या आलिमे दीन की क्या हक़ीक़त है ?-)))

126-आपका इरशादे गिरामी

(जब अताया की बराबरी पर एतराज़ किया गया)

क्या तुम मुझे इस बात पर आमादा करना चाहते हो के मैं जिन रिआया का ज़िम्मेदार बनाया गया हूँ उन पर ज़ुल्म करके चन्द अफ़राद की कमक हासिल कर लूँ। ख़ुदा की क़सम जब तक इस दुनिया का क़िस्सा चलता रहेगा और एक सितारा दूसरे सितारे की तरफ़ झुकता रहेगा ऐसा हरगिज़ नहीं हो सकता है। यह माल अगर मेरा ज़ाती होता जब भी मैं बराबर से तक़सीम करता , चे जाएका यह माल माले ख़ुदा है और याद रखो के माल का नाहक़ अता कर देना भी इसराफ़ और फ़िज़ूल ख़र्ची में शुमार होता है और यह काम इन्सान को दुनिया में बलन्द भी कर देता है तो आख़ेरत में ज़लील कर देता है। लोगों में मोहतरम भी बना देता है तो ख़ुदा की निगाह में पस्ततर बना देता है और जब भी कोई शख़्स माल को नाहक़ या ना अहल पर सर्फ़ करता है तो परवरदिगार उसके शुक्रिया से भी महरूम कर देता है और उसकी मोहब्बत का रूख़ भी दूसरों की तरफ़ मुड़ जाता है। फ़िर अगर किसी दिन पैर फैल गए और उनकी इमदाद का भी मोहताज हो गया तो वह बदतरीन दोस्त और ज़लीलतरीन साथी ही साबित होते हैं।

127-आपका इरशादे गिरामी

( जिसमें बाज़ एहकामे दीन के बयान के साथ ख़वारिज के शुबहात का एज़ाला और हकमीन के तोड़ का फ़ैसला बयान किया गया है।)

अगर तुम्हारा इसरार इसी बात पर है के मुझे ख़ताकार और गुमराह क़रार दो तो सारी उम्मते पैग़म्बर (स 0) को क्यों ख़ताकार दे रहे हो और मेरी “ ग़लती ” का मवाख़ेज़ा उनसे क्यों कर रहे हो और मेरे “ गुनाह ” की बिना पर उन्हें क्यों काफ़िर क़रार दे रहे हो। तुम्हारी तलवारें तुम्हारे कान्धों पर रखी हैं जहां चाहते हो ख़ता , बेख़ता चला देते हो और गुनहगार और बेगुनाह में कोई फ़र्क़ नहीं करते हो हालांके तुम्हें मालूम है के रसूले अकरम (स 0) ने ज़िनाए महज़ा के मुजरिम को संगसार किया तो उसकी नमाजे़ जनाज़ा भी पढ़ी थी और उसके अहल को वारिस भी क़रार दिया था और इसी तरह क़ातिल को क़त्ल किया तो उसकी मीरास भी तक़सीम की और चोर के हाथ काटे या ग़ैर शादी शुदा ज़िनाकार को कोड़े लगवाए तो उन्हें माले ग़नीमत में हिस्सा भी दिया और उनका मुसलमान औरतों से निकाह भी कराया गोया के आपने इन लोगों के गुनाहों का मवाख़ेज़ा किया और उनके बारे में हक़े खुदा को क़ायम किया लेकिन इस्लाम में उनके हिस्से को नहीं रोका और न उनके नाम को अहले इस्लाम की फ़ेहरिस्त से ख़ारिज किया। मगर बदतरीन अफ़राद हो के शैतान तुम्हारे ज़रिये अपने मक़ासिद को हासिल कर लेता है और तुम्हें सहराए ज़लालत में डाल देता है और अनक़रीब मेरे बारे में दो तरह के अफ़राद गुमराह होंगे- मोहब्बत में ग़लू करने वाले जिन्हें मोहब्बत ग़ैरे हक़ की तरफ़ ले जाएगी और अदावत में ज़्यादती करने वाले जिन्हें अदावत बातिल की तरफ़ खींच ले जाएगी और बेहतरीन अफ़राद वह होंगे जो दरम्यानी मन्ज़िल पर हों , लेहाज़ा तुम भी इसी रास्ते को इख़्तेयार करो और इसी नज़रिये की जमाअत के साथ हो जाओ के अल्लाह का हाथ इसी जमाअत के साथ है और ख़बरदार तफ़रिक़े की कोशिश न करना के जो ईमानी जमाअत से कट जाता है वह उसी तरह शैतान का शिकार हो जाता है जिस तरह गल्ले से अलग हो जाने वाली भेड़ भेड़िये की नज़र हो जाती है। आगाह हो जाओ के जो भी इस इन्हेराफ़ का नारा लगाए उसे क़त्ल कर दो चाहे वह मेरे ही अमामे के नीचे क्यों न हो। इन दोनों अफ़राद को हकम बनाया गया था ताके उन उमूर को ज़िन्दा करें जिन्हें क़ुरआन ने ज़िन्दा किया है और इन उमूर को मुर्दा करें जिन्हें क़ुरान ने मुर्दा बना दिया है और ज़िन्दा करने के मानी इस पर इत्तेफ़ाक़ करने और मुर्दा बनाने के मानी इससे अलग हो जाने के हैं। हम इस बात पर तैयार थे के अगर क़ुरान हमें दुश्मनों की तरफ़ खींच ले जाएगा तो हम उनका इत्तेबाअ कर लेंगे और अगर उन्हें हमारी तरफ़ ले आएगा तो उन्हें आना पड़ेगा लेकिन ख़ुदा तुम्हारा बुरा करे , इस बात में मैंने कोई ग़लत काम तो नहीं किया और न तुम्हें कोई धोका दिया है और न किसी बात को शुबह में रखा है। लेकिन तुम्हारी जमाअत ने दो आदमियों के इन्तेख़ाब पर इत्तेफ़ाक़ कर लिया और मैंने उन पर शर्त लगा दी के क़ुरान के हुदूद से तजावुज़ नहीं करेंगे मगर वह दोनों क़ुरान से मुन्हरिफ़ हो गए और हक़ को देख भाल कर नज़रअन्दाज कर दिया और असल बात यह है के इनका मक़सद ही ज़ुल्म था और वह उसी रास्ते पर चले गए जबके मैंने उनकी ग़लत राय और ज़ालिमाना फ़ैसले से पहले ही फ़ैसले में अदालत और इरादाए हक़ की शर्त लगा दी थी।


128-आपका इरशादे गिरामी

(बसरा के हवादिस की ख़बर देते हुए)

ऐ अहनफ़! गेया के मैं उस शख़्स को देख रहा हूँ जो एक ऐसा लशकर लेकर आया है जिसमें न गर्द व ग़ुबार है और न शोर वग़ोग़ा है , न लजामों की खड़खड़ाहट है और न घोड़ों की हिनहिनाहट , यह ज़मीन को उसी तरह रोन्द रहे हैं जिस तरह शुर्तमुर्ग़ के पैर।

सय्यद रज़ी - हज़रत ने इस ख़बर में साहबे रन्ज की तरफ़ इशारा किया है (जिसका नाम अली बिन मोहम्मद था और उसने सन 225हि 0में बसरा में ग़ुलामों को मालिकों के खि़लाफ़ मुत्तहिद किया और हर ग़ुलाम से उसके मालिक को 500कोड़े लगवाए।

अफ़सोस है तुम्हारी आबाद गलियों और उन सजे सजाए मकानात के हाल पर जिन के छज्जे गिदों के पर और हाथियों के सूंड़ के मानिन्द हैं उन लोगों की तरफ़ से जिनके मक़तूल पर गिरया नहीं किया जाता है और उनके ग़ाएब को तलाश नहीं किया जाता है , मैं दुनिया को मुंह के बल औन्धा कर देने वाला और इसकी सही औक़ात का जानने वाला और उसकी हालत को उसके शायाने शान निगाह से देखने वाला हूँ।

( तुर्कों के बारे में) मैं एक ऐसी क़ौम को देख रहा हूँ जिनके चेहरे चमड़े से मन्ढी ढाल के मानिन्द हैं , रेशम व दीबा के लिबास पहनते हैं और बेहतरीन असील घोड़ों से मोहब्बत रखते हैं , उनके दरम्यान अनक़रीब क़त्ल की गर्म बाज़ारी होगी जहाँ ज़ख़्मी मक़तूल के ऊपर से गुज़रंेगे और भागने वाले क़ैदियों से कम होंगे। (यह तातारियों के फ़ित्ने की तरफ़ इशारा है जहां चंगेज़ ख़ाँ और उसकी क़ौम ने तमाम इस्लामी मुल्कों को तबाह व बरबाद कर दिया और कुत्ते , सुअर को

अपनी ग़िज़ा बनाकर ऐसे हमले किये के शहरों को ख़ाक में मिला दिया) यह सुनकर एक शख़्स ने कहा के आप तो इल्मे ग़ैब की बातें कर रहे हैं तो आपने मुस्कुराकर इस कलबी शख़्स से फ़रमाया ऐ बरादरे कल्बी! यह इल्मे ग़ैब नहीं है बल्के साहेबे इल्म से तअल्लुम है।

(((- बनी तमीम के सरदार अहनफ़ बिन क़ैस से खि़ताब है जिन्होंने रसूले अकरम (स 0) की ज़ेयारत नहीं की मगर इस्लाम क़ुबूल किया और जंगे जमल के मौक़े पर अपने इलाक़े में उम्मुल मोमेनीन के फ़ित्नों का दिफ़ाअ करते रहे और फिर जंगे सिफ़फ़ीन में मौलाए कायनात के साथ शरीक हो गए और जेहाद राहे ख़ुदा का हक़ अदा कर दिया।-)))

इल्मे ग़ैब क़यामत का और उन चीज़ों का इल्म है जिनको ख़ुदा ने क़ुराने मजीद में शुमार कर दिया है के अल्लाह के पास क़यामत का इल्म है बारिश के बरसाने वाला वही है और पेट में पलने वाले बच्चे का मुक़द्दर वही जानता है। उसके अलावा किसी को नहीं मालूम है के वह क्या कमाएगा और किस सरज़मीन पर मौत आएगी। परवरदिगार जानता है के रह्म का बच्चा लड़का है या लड़की , हसीन है या बदसूरत , सख़ी है या बख़ील , शफ़ी है या सईद , कौन जहन्नम का कुन्दा बन जाएगा और कौन जन्नत में अम्बियाए कराम का हमनशीन होगा। यह वह इल्मे ग़ैब है जिसे ख़ुदा के अलावा कोई नहीं जानता है। इसके अलावा जो भी इल्म है वह ऐसा इल्म है जिसे अल्लाह ने पैग़म्बर (स 0) को तालीम दिया है और उन्होंने मुझे इसकी तालीम दी है और मेरे हक़ में दुआ की है के मेरा सीना उसे महफ़ूज़ कर ले और उस दिल में उसे महफ़ूज़ कर दे जो मेरे पहलू में हो।

129-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(नाप तौल के बारे में)

अल्लाह के बन्दों! तुम और जो कुछ इस दुनिया से तवक़्क़ो रखते हो सब एक मुक़र्ररा मुद्दत के मेहमान हैं और ऐसे क़र्जदार हैं जिनसे क़र्ज़ का मुतालबा हो रहा हो , उम्रें घट रही हैं और आमाल महफ़ूज़ किये जा रहे हैं , कितने दौड़ धूप करने वाले हैं जिनकी मेहनत बरबाद हो रही है और कितने कोशिश करने वाले हैं जो मुसलसल घाटे का शिकार हैं। तुम ऐसे ज़माने में ज़िन्दगी गुज़ार रहे हो जिसमें नेकी मुसलसल मुंह फेरकर जा रही है और बुराई बराबर सामने आ रही है। शैतान लोगों को तबाह करने की हवस में लगा हुआ है , इसका साज़ व सामान मुस्तहकम हो चुका है उसकी साज़िशे आम हो चुकी हैं और उसके शिकार उसके क़ाबू में हैं। तुम जिधर चाहो निगाह उठाकर देख लो सिवाए उस फ़क़ीर के जो फ़क़्र की मुसीबत झेल रहा है और उस अमीर के जिसने नेमते ख़ुदा की नाषुक्री की है और उस कंजूसी के जिसने हक़क़े ख़ुदा में बुख़्ल ही को माल के इज़ाफ़े का ज़रिया बना लिया है और उस सरकश के जिसके कान नसीहतों के लिये बहरे हो गए हैं और कुछ नज़र नहीं आएगा। कहां चले गए वह नेक और स्वालेह बन्दे और किधर हैं वह शरीफ़ और करीमुन्नफ़्स लोग , कहां हैं वह अफ़राद जो कस्ब माश में एहतियात बरतने वाले थे और रास्तों में पाकीज़ा रास्ता इख़्तेयार करने वाले थे , क्या सब के सब इस पस्त और ज़िन्दगी को मकदर बना देने वाली दुनिया से नहीं चले गये और क्या तुम्हें ऐसे अफ़राद में नहीं छोड़ गए जिनकी हिक़ारत और जिनके ज़िक्र से एराज़ की बिना पर होंठ सिवाए इनकी मज़म्मत के किसी बात के लिये आपस में नहीं मिलते हैं। इन्ना लिल्लाह व इन्ना इलैहे राजेऊन। फ़साद इस क़द्र फ़ैल चुका है के न कोई हालात का बदलने वाला है और न कोई मना करने वाला और न ख़ुद परहेज़ करने वाला है तो क्या तुम इन्हीं हालात के ज़रिये ख़ुदा के मुक़द्दस जवार में रहना चाहते हो और उसके अज़ीज़तरीन दोस्त बनना चाहते हो। अफ़सोस! अल्लाह को जन्नत के बारे में धोका नहीं दिया जा सकता है और न उसकी मर्ज़ी को इताअत के बग़ैर हासिल किया जा सकता है। अल्लाह लानत करे उन लोगों पर जो दूसरों को नेकियों का हुक्म देते हैं और ख़ुद अमल नहीं करते हैं। समाज को बुराइयों से रोकते हैं और ख़ुद उन्हीं में मुब्तिला हैं।

130-आपका इरशादे गिरामी

(जो आपने अबूज़र ग़फ़्फ़ारी से फ़रमाया जब उन्हें रब्ज़ा की तरफ़ शहर बदर कर दिया गया)

अबूज़र! तुम्हारा ग़ैज़ व ग़ज़ब अल्लाह के लिये है लेहाज़ा उससे उम्मीद वाबस्ता रखो जिसके लिये यह ग़ैज़ व ग़ज़ब इख़्तेयार किया है। क़ौम को तुमसे अपनी दुनिया के बारे में ख़तरा था और तुम्हें उनसे अपने दीन के बारे में ख़ौफ़ था लेहाज़ा जिसका उन्हें ख़तरा था वह उनके लिये छोड़ दो और जिसके लिये तुम्हें ख़ौफ़ था उसे बचाकर निकल जाओ। यह लोग बहरहाल उसके मोहताज हैं जिसको तुमने उनसे रोका है और तुम उससे बहरहाल बेनियाज़ हो जिससे इन लोगों ने तुम्हें महरूम किया है। अनक़रीब यह मालूम हो जाएगा के फ़ायदे में कौन रहा और किससे हसद करने वाले ज़्यादा हैं। याद रखो के किसी बन्दए ख़ुदा पर अगर ज़मीन व आसमान दोनों के रास्ते बन्द हो जाएं और वह तक़वाए इलाही इख़्तेयार कर ले तो अल्लाह उसके लिये कोई न कोई रास्ता ज़रूर निकाल देगा। देखो तुम्हें सिर्फ़ हक़ से उन्स और बातिल से वहशत होनी चाहिए तुम अगर इनकी दुनिया को क़ुबूल कर लेते तो यह तुमसे मोहब्बत करते और अगर दुनिया में से अपना हिस्सा ले लेते तो तुम्हारी तरफ़ से मुतमइन हो जाते।

131-आपका इरशादे गिरामी

(जिसमें अपनी हुकूमत तलबी का सबब बयान फ़रमाया है और इमामे बरहक़ के औसाफ़ का तज़किरा किया है।)

अगर वह लोग जिनके नफ़्स मुख़्तलिफ़ हैं और दिल मुतफ़र्रिक़ , बदन हाज़िर हैं और अक़्लें ग़ायब , मैं तुम्हें मेहरबानी के साथ हक़ की दावत देता हूँ और तुम इस तरह फ़रार करते हो जैसे शेर की डकार से बकरियां। अफ़सोस तुम्हारे ज़रिये अद्ल की तारीकियों को कैसे रौशन किया जा सकता है और हक़ में पैदा हो जाने वाली कजी को किस तरह सीधा किया जा सकता है। ख़ुदाया तू जानता है के मैंने हुकूमत के बारे में जो एक़दाम किया है उसमें न सलतनत की लालच थी और न माले दुनिया की तलाश , मेरा मक़सद सिर्फ़ यह था के दीन के आसार को उनकी मन्ज़िल तक पहुंचाऊं और शहरों में इस्लाह पैदा कर दूँ ताके मज़लूम बन्दे महफ़ूज़ हो जाएं और मोअत्तल हुदूद क़ाएम हो जाएं। ख़ुदाया तुझे मालूम है के मैंने सबसे पहले तेरी तरफ़ रूख़ किया है और उसे क़ुबूल किया है और तेरी बन्दगी में रसूले अकरम (स 0) के अलावा किसी ने भी मुझ पर सबक़त नहीं की है।

तुम लोगों को मालूम है के लोगों की आबरू , उनकी जान , उनके मनाफ़े , इलाही एहकाम और इमामते मुस्लेमीन का ज़िम्मेदार न कोई बख़ील हो सकता है के वह अमवाले मुस्लेमीन पर हमेशा दांत लगाए रहेगा और न कोई जाहिल हो सकता है के वह अपनी जेहालत से लोगो को गुमराह कर देगा और न कोई बद अख़लाक़ हो सकता है के वह बद अख़लाक़ी के चरके लगाता रहेगा और न कोई मालियात का बद दियानत हो सकता है के वह एक को माल दे देगा और एक को महरूम कर देगा और न कोई फैसले में रिश्वत लेने वाला हो सकता है के वह हुक़ूक़ को बरबाद कर देगा और उन्हें इनकी मन्ज़िल तक न पहुंचने देगा और न कोई सुन्नत को मुअत्तल करने वाला हो सकता है के वह उम्मत को हलाक कर देगा।

132-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें लोगों को नसीहत फ़रमाई है और ज़ोहद की तरग़ीब दी है)

शुक्र है ख़ुदा का उस पर भी जो दिया है और उस पर भी जो ले लिया है। उसके इनआम पर भी और उसके इम्तेहान पर भी वह हर मख़फ़ी के अन्दर का भी इल्म रखता है और हर पोशीदा अम्र के लिये हाज़िर भी है। दिलों के अन्दर छिपे हुए इसरार और आँखों के चोरी छिपे इशारों को बख़ूबी जानता है और मैं इस बात की गवाही देता हूं के उसके अलावा कोई ख़ुदा नहीं है और हज़रत मोहम्मद (स 0) उसके भेजे हुए रसूल हैं और इस गवाही में बातिन ज़ाहिर से और दिल ज़बान से हम आहंग है।

ख़ुदा की क़सम वह शै जो हक़ीक़त है और खेल तमाशा नहीं है , हक़ है और झूठ नहीं है वह सिर्फ़ मौत है जिसके दाई ने अपनी आवाज़ सबको सुना दी है और जिसका हंकाने वाला जल्दी मचाए हुए है लेहाज़ा ख़बरदार लोगों की कसरत तुम्हारे नफ़्स को धोके में न डाल दे , तुम देख चुके हो के तुमसे पहले वालों ने माल जमा किया , इफ़लास से ख़ौफ़ज़दा रहे , अन्जाम से बेख़बर रहे , सिर्फ़ लम्बी-लम्बी उम्मीदों और मौत की ताख़ीर के ख़याल में रहे और एक मरतबा मौत नाज़िल हो गई और उसने उन्हें वतन से बेवतन कर दिया। महफ़ूज़ मक़ामात से गिरफ़तार कर लिया और ताबूत पर उठवा दिया जहां लोग कान्धों पर उठाए हुए , उंगलियों का सहारा दिये हुए एक-दूसरे के हवाले कर रहे थे। क्या तुमने उन लोगों को नहीं देखा जो दूर दराज़ उम्मीदें रखते थे और मुस्तहकम मकानात बनाते थे और बेतहाशा माल जमा करते थे के किसी तरह उनके घर क़ब्रों में तब्दील हो गए और सब किया धरा तबाह हो गया। अब अमवाल विरसे के लिये हैं और अज़वाज दूसरे लोगों के लिये। न नेकियों में इज़ाफ़ा कर सकते हैं और न बुराइयों के सिलसिले में रिज़ाए इलाही का सामान फ़राहम कर सकते हैं। याद रखो जिसने तक़वा को शआर बना लिया वही आगे निकल गया और उसी का अमल कामयाब होगा , लेहाज़ा तक़वा के मौक़े को ग़नीमत समझो और जन्नत के लिये उसके आमाल अन्जाम दे लो। यह दुनिया तुम्हारे क़याम की जगह नहीं है। यह फ़क़त एक गुज़रगाह है के यहाँ से हमेशगी के मकान के लिये सामान फ़राहम कर लो , लेहाज़ा जल्दी तैयारी करो और सवारियों को कूच के लिये अपने से क़रीबतर कर लो।

133-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें अल्लाह की अज़मत और क़ुरआन की जलालत का ज़िक्र है और फिर लोगों को नसीहत भी की गई है)

( परवरदिगार) दुनिया व आख़ेरत दोनों ने अपनी बागडोर उसी के हवाले कर रखी है और ज़मीन व आसमान ने अपनी कुन्जीयात उसी की खि़दमत में पेश कर दी है। उसकी बारगाह में सुबह व शाम सरसब्ज़ व शादाब दरख़्त सजदारेज़ रहते हैं और अपनी लकड़ियों से चमकदार आग निकालते रहते हैं और उसी के हुक्म के मुताबिक़ पके हुए फल पेश करते रहते हैं।

(((- इन्सानी ज़िन्दगी में कामयाबी का राज़ यही एक नुक्ता है के यह दुनिया इन्सान की मन्ज़िल नहीं है बल्कि एक गुज़रगाह है जिससे गुज़रकर एक अज़ीम मन्ज़िल की तरफ़ जाना है और यह मालिक का करम है के उसने यहाँ से सामान फ़राहम करने की इजाज़त दे दी है और यहाँ के सामान को वहाँ के लिये कारआमद बना दिया है। यह और बात है के दोनों जगह का फ़र्क़ यह है के यहाँ के लिये सामान रखा जाता है तो काम आता है और वहाँ के लिये राहे ख़ुदा में दे दिया जाता है तो काम आता है। ग़नी और मालदार दुनिया सजा सकते हैं लेकिन आख़ेरत नहीं बना सकते हैं। वह सिर्फ़ करीम और साहबे ख़ैर अफ़राद के लिये है जिनका शआर तक़वा है और जिनका एतमाद वादाए इलाही पर है।-)))

( क़ुराने हकीम) किताबे ख़ुदा निगाह के सामने है वह नातिक़ है जिसकी ज़बान आजिज़ नहीं होती है और वह घर है जिसके अरकान मुनहदिम नहीं होते हैं , यही वह इज़्ज़त है जिसके ऐवान व अन्सार शिकस्त ख़ोरदा नहीं होते हैं।

( रसूले अकरम स 0) अल्लाह ने आपको उस वक़्त भेजा जब रसूलों का सिलसिला रूका हुआ था और ज़बानें आपस में टकरा रही थीं। आपके ज़रिये रसूलों के सिलसिले को तमाम किया और वही के सिलसिले को मौक़ूफ़ किया तो आपने भी उससे इन्हेराफ़ करने वालों और उसका हमसर ठहराने वालों से जम कर जेहाद किया। (दुनिया) यह दुनिया अन्धे की बसारत की आख़री मन्ज़िल है जो उसके मावरा कुछ नहीं देखता है जबके साहेबे बसीरत की निगाह उस पार निकल जाती है और वह जानता है के मन्ज़िल उसके मावदा है। साहबे बसीरत उससे कूच करने वाला है और अन्धा इसकी तरफ़ कूच करने वाला है। बसीर इससे ज़ादे राह फ़राहम करने वाला है और अन्धा इसके लिये ज़ादे राह इकट्ठा करने वाला है।

( मोअज़) याद रखो के दुनिया में जो शै भी है उसका मालिक सेर हो जाता है और उकता जाता है अलावा ज़िन्दगी के , के कोई शख़्स मौत में राहत नहीं महसूस करता है और यह बात उस हिकमत की तरह है जिसमें मुर्दा दिलों की ज़िन्दगी , अन्धी आंखों की बसारत , बहरे कानों की समाअत और प्यासे की सेराबी का सामान है और इसी में सारी मालदारी है और मुकम्मल सलामती है।

यह किताबे ख़ुदा है जिसमें तुम्हारी बसारत और समाअत का सारा सामान मौजूद है। इसमें एक हिस्सा दूसरे की वज़ाहत करता है और एक दूसरे की गवाही देता है। यह ख़ुदा के बारे में इख़्तेलाफ़ नहीं रखता है और अपने साथी को ख़ुदा से अलग नहीं करता है , मगर तुमने आपस में कीना व हसद पर इत्तेफ़ाक़ कर लिया है और इसी घूरे पर सब्ज़ा उग आया है। उम्मीदों की मोहब्बत में एक-दूसरे से हम-आहंग हो और माल जमा करने में एक-दूसरे के दुशमन हो , शैतान ने तुम्हें सरगर्दां कर दिया है और फ़रेब ने तुमको बहका दिया है। अब अल्लाह ही मेरे और तुम्हारे नफ़्सों के मुक़ाबले में एक सहारा है।

(((- अगरचे दुनिया में ज़िन्दा रहने की ख़्वाहिश आम तौर से आख़ेरत के ख़ौफ़ से पैदा होती है के इन्सान अपने आमाल और अन्जाम की तरफ़ से मुतमईन नहीं होता है और इसी लिये मौत के तसव्वुर से लरज़ जाता है लेकिन इसके बावजूद यह ख़्वाहिश ऐब नहीं है बल्कि यही जज़्बा है जो इन्सान को अमल करने पर आमादा करता है और इसी के लिये इन्सान दिन और रात को एक कर देता है। ज़रूरत इस बात की है के इस ख़्वाहिशे हयात को हिकमत के साथ इस्तेमाल करे और उससे वैसा ही काम ले जो हिकमत सही और फ़िक्रे सलीम से लिया जाता है वरना यही ख़्वाहिश वबाले जान भी बन सकती है।-)))

134-आपका इरशादे गिरामी

(जब उमर ने रोम की जंग के बारे में आपसे मशविरा किया)

अल्लाह ने साहेबाने दीन के लिये यह ज़िम्मेदारी ले ली है के वह उनके हुदूद को तक़वीयत देगा और उनके महफ़ूज़ मक़ामात की हिफ़ाज़त करेगा , और जिसने उनकी उस वक़्त मदद की है जबके वह क़िल्लत की बिना पर इन्तेक़ाम के क़ाबिल नहीं थे और अपनी हिफ़ाज़त का इन्तेज़ाम भी न कर सकते थे , वह अभी भी ज़िन्दा है और उसके लिये मौत नहीं है। अगर ख़ुद दुशमन की तरफ़ जाओगे और उनका सामना करोगे और निकबत में मुब्तिला हो गए तो मुसलमानों के लिये आख़ेरी शहर के अलावा कोई पनाहगाह न रह जाएगी और तुम्हारे बाद मैदान में कोई मरकज़ भी न रह जाएगा जिसकी तरफ़ रूजू कर सकें लेहाज़ा मुनासिब यही है के किसी तजुर्बेकार आदमी भेजो और उसके साथ साहेबाने ख़ैर व महारत की एक जमाअत को कर दो। उसके बाद अगर ख़ुदा ने ग़लबा दे दिया तो यही तुम्हारा मक़सद है अगर इसके खि़लाफ़ हो गया तो तुम लोगों का सहारा और मुसलमानों के लिये एक पलटने का मरकज़ रहोगे।


135-आपका इरशादे गिरामी

(जब आपके और उस्मान के दरम्यान इख़तेलाफ़ पैदा हुआ

और मग़ीरा बिन अख़स ने उस्मान से कहा के मै। उनका काम तमाम कर सकता हूँ तो आपने फ़रमाया।)

ऐ बदनस्ल मलऊन के बच्चे! और उस दरख़्त के फ़ल जिसकी न कोई असल है और न फ़ूरूअ। तू मेरे लिये काफ़ी हो जाएगा ? ख़ुदा की क़सम जिसका तू मददगार हो उसके लिये इज़्ज़त नहीं है और जिसे तु उठाएगा वह खड़े होने के क़ाबिल न होगा। निकल जा , अल्लाह तेरी मन्ज़िल को दूर कर दे। जा अपनी कोशिशे कर ले , ख़ुदा तुझ पर रहम न करेगा अगर तू मुझ पर तरस भी खाए।

136-आपका इरशादे गिरामी

(बैअत के बारे में)

मेरे हाथों पर तुम्हारी बैअत कोई नागहानी हादसा नहीं है और मेरा और तुम्हारा मामला एक जैसा भी नहीं है। मैं तुम्हें अल्लाह के लिये चाहता हूँ और तुम मुझे अपने फ़ाएदे के लिये चाहते हो। लोगों! अपनी नफ़्सानी ख़्वाहिशात के मुक़ाबले में मेरी मदद करो , ख़ुदा की क़सम मैं मज़लूम को ज़ालिम से उसका हक़ दिलवाऊगा और ज़ालिम को उसकी नाक में नकेल डाल कर खींचूंगा ताके उसे चश्मए हक़ पर वारिद कर दूँ चाहे वह किसी क़द्र नाराज़ क्यों न हो।

(((- मैदाने जंग में नकबत व रूसवाई के इहतेमाल के साथ किसी मर्द मैदान के भेजने का मशविरा उस नुक्ते की तरफ़ इशारा है के मैदाने जेहाद में सेबाते क़दम तुम्हारी तारीख़ नहीं है और न यह तुम्हारे बस का काम है लेहाज़ा मुनासिब यही है के सिकी तजुर्बेकार शख़्स को माहेरीन की एक जमाअत के साथ रवाना कर दो ताके इस्लाम की रूसवाई न हो सके और मज़हब का वक़ार बरक़रार रहे। उसके बाद तुम्हें “ फ़ातहे आज़म ” का लक़ब तो बहरहाल मिल ही जाएगा के जिसके दौर में इलाक़ा फ़तेह होता है तारीख़ उसी को फ़ातेह का लक़ब देती है और मुजाहेदीन को यकस नज़र अन्दाज़ कर देती है।

यह भी अमीरूल मोमेनीन (अ 0) का एक हौसला था के शदीद इख़्तेलाफ़ात और बेपनाह मसाएब के बावजूद मशविरा से दरीग़ नहीं किया और वही मशविरा दिया जो इस्लाम और मुसलमानों के हक़ में था। इसलिये के आप इस हक़ीक़त से बहरहाल बाख़बर थे के अफ़राद से इख़तेलाफ़ मक़सद और मज़हब की हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी से बेनियाज़ नहीं हो सकता है और इस्लाम के तहफ़्फ़ुज़ की ज़िम्मेदारी हर मुसलमान पर आएद होती है चाहे वह बरसरे इक़्तेदार हो या न हो।)))

137-आपका इरशादे गिरामी

(तल्हा व ज़ुबैर और उनकी बैअत के बारे में)

ख़ुदा की क़सम उन लोगों ने न मेरी किसी वाक़ेई बुराई की गिरफ़्त की है और न मेरे और अपने दरम्यान इन्साफ़ से काम लिया है। वह ऐसे हक़ का मुतालबा कर रहे हैं जिसको ख़ुद उन्होंने नज़र अन्दाज़ किया है और ऐसे ख़ून का बदला चाहते हैं जिसको ख़ुद उन्होंने बहाया है। अगर मैं इस मामले में शरीक था तो एक हिस्सा उनका भी होगा और अगर यह तन्हा ज़िम्मेदार थे तो मुतालबा ख़ुद उन्हीं से होना चाहिये और मुझसे पहले उन्हें अपने खि़लाफ़ फै़सला करना चाहिये।

( अल्हम्दो लिल्लाह) मेरे साथ मेरी बसीरत है न मैंने अपने को धोके में रखा है और न मुझे धोका दिया जा सका है। यह लोग एक बाग़ी गिरोह हैं जिनमें मेरे क़राबतदार भी हैं और बिच्छू का डंक भी हैं और फिर हक़ाएक़ की परदापोशी करने वाला शुबा भी है , हालांके हक़ बिल्कुल वाज़ेअ है और बातिल अपने मरकज़ से हट चुका है और इसकी ज़बान शोर व शख़ब के सिलसिले में कट चुकी है। ख़ुदा की क़सम मैं उनके लिये ऐसा हौज़ छलकाउंगा जिससे पानी निकालने वाला भी मैं ही हूँगा। यह न उससे सेराब होकर जा सकेंगे और न इसके बाद किसी तालाब से पानी पीने के लाएक़ रह सकेंगे।

( सिलए बैअत) तुम लोग “ कल ” बैअत-बैअत का शोर मचाते हुए मेरी तरफ़ इस तरह आए थे जिस तरह नई जनने वाली ऊंटनी अपने बच्चों की तरफ़ दौड़ती है। मैंने अपनी मुट्ठी बन्द कर ली मगर तुमने खोल दी। मैंने अपना हाथ रोक लिया मगर तुमने खींच लिया। ऐ ख़ुदा , तू गवाह रहना के इन दोनों ने मुझसे क़तअ ताल्लुक़ करके मुझ पर ज़ुल्म किया है और मेरी बैअत तोड़ कर लोगों को मेरे खि़लाफ़ भड़काया है। अब तू इनकी गिरहों को खोल दे और जो रस्सी उन्होंने बटी है उसमें इस्तेहकाम न पैदा होने दे और उन्हें उनकी उम्मीदों और उनके आमाल के बदतरीन नताएज को दिखला दे। मैंने जंग से पहले उन्हें बहुत रोकना चाहा और मैदाने जेहाद में उतरने से पहले बहुत कुछ मोहलत दी , लेकिन इन दोनों ने नेमत का इन्कार कर दिया और आफ़ियत को रद कर दिया।

(((- कारोबार ज़ूलैख़ा के दौर से निसवानी फ़ितरत में दाखि़ल हो गया है के जब दुनिया की निगाहें अपनी ग़लती की तरफ़ उठने लगें तो फ़ौरन दूसरे की ग़लती का नारा लगा दिया जाए ताके मसलए शुबह हो जाए और लोग हक़ाएक़ का सही इदराक न कर सकें , क़त्ले उस्मान के बाद यही काम आएशा ने किया के पहले लोगों को क़त्ले उस्मान पर आमादा किया। उसके बाद ख़ुद ही ख़ूने उस्मान की दावेदार बन गईं और फिर उनके साथ मिलकर यही ज़नाना एक़दाम तलहा व ज़ुबैर ने भी किया। इसीलिये अमीरूल मोमेनीन ने आखि़रे कलाम में अपने मर्दे मैदान होने का इशारा दिया है के मर्दाने जंग इस तरह की निस्वानी हरकात नहीं किया करते हैंं बल्कि शरीफ़ औरतें भी अपने को ऐसे किरदार से हमेशा अलग रखती हैं और हक़ का साथ देती हैं और हक़ पर क़ायम रह जाती हैं उनके किरदार में दोरंगी नहीं होती है।-)))

138-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें मुस्तक़बिल के हवादिस का इशारा है)

वह बन्दए ख़ुदा ख़्वाहिशात को हिदायत की तरफ़ मोड़ देगा जब लोग हिदायत को ख़्वाहिशात की तरफ़ मोड़ रहे होंगे और वह राय को क़ुरआन की तरफ़ झुका देगा जब लोग क़ुरान को राय की तरफ़ झुका रहे होंगे।

( दूसरा हिस्सा) यहाँ तक के जंग अपने पैरों पर खड़ी हो जाएगी दांत निकाले हुए और थनों को पुर किये हुए , लेकिन इस तरह के इसका दूध पीने में शीरीं मालूम होगा और अन्जाम बहुत बुरा होगा। याद रखो के कल और कल बहुत जल्द वह हालात लेकर आने वाला है जिसका तुम्हें अन्दाज़ा नहीं है। इस जमाअत से बाहर का वाली तमाम अम्माल की बदआमालियों का मुहासेबा करेगा और ज़मीन तमाम जिगर के ख़ज़ानों को निकाल देगी और निहायत आसानी के साथ अपनी कुन्जियां उसके हवाले कर देगी और फिर वह तुम्हें दिखलाएगा के आदिलाना सीरत क्या होती है और मुर्दा किताब व सुन्नत को किस तरह ज़िन्दा किया जाता है।

( तीसरा हिस्सा) मैं यह मन्ज़र देख रहा हूँ के एक शख़्स (दाई बातिल) शाम में ललकार रहा है और कूफ़े के गिर्द उसके झण्डे लहरा रहे हैं और इसकी तरफ़ काट खाने वाली ऊंटनी की तरह मुतवज्जो है और ज़मीन पर सरों का फर्श बिछा रहा है। उसका मुंह खुला हुआ है और ज़मीन पर इसकी धमक महसूस हो रही है। वह दूर-दूर तक जूलानियां दिखलाने वाला है और शदीदतरीन हमले करने वाला है। ख़ुदा की क़सम वह तुम्हें एतराफ़े ज़मीन में इस तरह मुन्तशिर देगा के सिर्फ़ उतने ही आदमी बाक़ी रह जाएंगे जैसे आंख में सुरमा , और फिर तुम्हारा यही हष्र रहेगा। यहां तक के अरबों की गुमषुदा अक़्ल पलट कर आ जाए लेहाज़ा अभी ग़नीमत है मज़बूत तरीक़े , वाज़ेअ आसार और इस क़रीबी अहद से वाबस्ता रहो जिसमें नबूवत के पाएदार आसार हैं और यह याद रखो के शैतान अपने रास्तों को हमवार रखता है ताके तुम उसके हर क़दम पर बराबर चलते रहो।

139-आपका इरशादे गिरामी

(शूरा के मौक़े पर)

( याद रखो) के मुझसे पहले हक़ की दावत देने वाला , सिलए रहम करने वाला और जूदो करम का मुज़ाहिरा करने वाला कोई न होगा। लेहाज़ा मेरे क़ौल पर कान धरा और मेरी गुफ़्तगू को समझो के अनक़रीब तुम देखोगे के इस मसले पर तलवारें निकल रही हैं। अहद व पैमान तोड़े जा रहे हैं और में से बाज़ गुमराहों के पेशवा हुए जा रहे हैं और बाज़ जाहिलों के पैरोकार।

140-आपका इरशादे गिरामी

(लोगों को बुराई से रोकते हुए)

देखो , लो लोग गुनाहों से महफ़ूज़ हैं और ख़ुदा ने उन पर इस सलामती का एहसान किया है उनके शायाने शान यही है के गुनाहगारों और ख़ताकारों पर रहम करें और अपनी सलामती का शुक्रिया ही इन पर ग़ालिब रहे और उन्हें इन हरकात से रोकता रहे। चे जाएक इन्सान ऐब लगाने वाला अपने किसी भाई की पीठ पीछे बुराई करे और उसके ऐब बयान करके तान व तिशना करे (ख़ुद ऐबदार हो और अपने भाई का ऐब बयान करे और उसके ऐब की बिना पर उसकी सरज़निश भी करे)। यह आखि़र ख़ुदा की उस परदा पोशी को क्यों नहीं याद करता के परवरदिगार ने उसके जिन उयूब को छिपाकर रखा है वह उससे बड़े हैं जिन पर यह सरज़निश कर रहा है और उस ऐब पर किस तरह मज़म्मत कर रहा है जिसका ख़ुद मुरतकब होता है और अगर बैनिया इसका मुरतकब नहीं होता है तो इसके अलावा दूसरे गुनाह करता है जो इससे भी अज़ीमतर हैं और ख़ुदा की क़सम अगर इससे अज़ीमतर नहीं भी हैं तो ज़रूर ही हैं और ऐसी सूरत में बुराई करने और सरज़निश करने की जराअत बहरहाल इससे भी अज़ीमतर है।

(((- इन्सानियत उस अहद ज़र्रीं के लिये सरापा इन्तज़ार है जब ख़ुदाई नुमाइन्दा दुनिया के तमाम हुक्काम का मुहासेबा करके अद्ल व इन्साफ़ का निज़ाम क़ायम कर दे और ज़मीन अपने तमाम ख़ज़ाने उगल दे। दुनिया में राहत व इतमीनान का दौरे दौरा हो और दीने ख़ुदा इक़्तेदारे कुल्ली का मालिक हो जाए।-)))

बन्दए ख़ुदा- दूसरे के ऐब बयान करने में जल्दी न कर शायद ख़ुदा ने उसे माफ़ कर दिया हो और अपने नफ़्स को मामूली समझ के उसके बारे में महफ़ूज़ तसव्वुर न करना शायद के ख़ुदा इसी पर अज़ाब कर दे। (अपने छोटे से छोटे गुनाह को भी मामूली न समझना शायद के इस पर तुझे अज़ाब हो) हर शख़्स को चाहिये के दूसरे के ऐब बयान करने से परहेज़ करे के उसे अपना ऐब भी मालूम है और अगर ऐब से महफ़ूज़ है तो इस सलामती के शुक्रिया ही में मशग़ूल रहे।

141-आपका इरशादे गिरामी

(जिसमें ग़ीबत के सुनने से रोका गया है और हक़ व बातिल के फ़र्क़ को वाज़ेअ किया गया है।)

लोगों! जो शख़्स भी अपने भाई के दीन की पुख़्तगी और तरीक़ाए कार दुरूस्तगी का इल्म रखता है उसे उसके बारे में दूसरों के अक़वाल पर कान नहीं धरना चाहिये के कभी-कभी इन्सान तीरअन्दाज़ी करता है और इसका तीर ख़ता कर जाता है और बातें बनाता है और बातिल बहरहाल फ़ना हो जाता है और अल्लाह सबका सुनने वाला भी है और गवाह भी है। याद रखो के हक़ व बातिल में सिर्फ़ चार अंगुल का फासला होता है।

लोगों ने अर्ज़ की हुज़ूर इसका क्या मतलब है ? तो आपने आँख और कान के दरम्यान चार उंगलियाँ रख कर फ़रमाया बातिल वह है जो सिर्फ़ सुना-सुनाया होता है और हक़ वह है जो अपनी आँख से देखा हुआ होता है।

142-आपका इरशादे गिरामी

(नाअहल के साथ एहसान करने के बारे में)

याद रखो के ग़ैर मुस्तहक़ के साथ एहसान करने वाले और ना अहल के साथ नेकी करने वाले के हिस्से में कमीने लोगों की तारीफ़ और बदतरीन अफ़राद की मदह व सना ही आती है और वह जब तक करम करता रहता है जेहाल (जाहिल) कहते रहते हैं के किस क़द्र करीम और सख़ी है यह शख़्स , हालाँके अल्लाह के मामले में यही शख़्स बख़ील भी होता है।

देखो अगर ख़ुदा किसी शख़्स को माल दे तो उसका फ़र्ज़ है के क़राबतदारों का ख़याल रखे। मेहमान नवाज़ी करे। क़ैदियों और ख़स्ता हालों को आज़ाद कराए। फ़क़ीरों और क़र्ज़दारों की इमदाद करे। अपने नफ़्स को हुक़ूक़ की अदायगी और मसाएब पर आमादा करे के इसमें सवाब की उम्मीद पाई जाती है और उन तमाम ख़सलतों के हासिल करने ही में दुनिया की शराफ़तें और करामतें हैं और उन्हीं से आखि़रत के फ़ज़ाएल भी हासिल होते हैं। (इन्शा अल्लाह)

(((- अगर यह बात सही और यक़ीनन सही है के माल वही बेहतर होता है जिसका माल और अन्जाम बेहतर होता है तो हर शख़्स का फ़र्ज़ है के अपने माल को उन्हें मवारिद में सर्फ़ करे जिसकी तरफ इस ख़ुतबे में इशारा किया गया है वरना बेमहल सर्फ़ से जाहिलों और बदकिरदारों की तारीफ़ के अलावा कुछ हाथ आने वाला नहीं है और इसमें न ख़ैरे दुनिया है और न ख़ैरे आखि़रत। बल्कि दुनिया और आखि़रत दोनों की तबाही और बरबादी का सबब है। परवरदिगार हर शख़्स को इस जेहालत और रियाकारी से महफ़ूज़ रखे-)))


143आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(तलबे बारिश के सिलसिले में)

याद रखो के जो ज़मीन तुम्हारा बोझ उठाए हुए है और जो आसमान तुम्हारे सर पर सायाफ़िगाँ है दोनों तुम्हारे रब के इताअतगुज़ार हैं और यह जो अपनी बरकतें तुम्हें अता कर रहे हैं तो उनका दिल तुम्हारे हाल पर नहीं कुढ़ रहा है।

और न यह तुमसे तक़र्रब चाहते हैं और न किसी ख़ैर के उम्मीदवार हैं। बात सिर्फ़ यह है के उन्हें तुम्हारे फ़ायदों के बारे में हुक्म दिया गया है तो यह इताअते परवरदिगार कर रहे हैं और उन्हें तुम्हारे मसालेह के हुदूद पर खड़ा कर दिया गया है तो खड़े हुए हैं।

याद रखो के अल्लाह बदआमालियों के मौक़े पर अपने बन्दों को उन मसाएब में मुब्तिला कर देता है के फल कम हो जाते हैं , बरकतें रूक जाती हैं , ख़ैरात के ख़ज़ानों के मुंह बन्द हो जाते हैं ताके तौबा करने वाला तौबा कर ले और बाज़ आ जाने वाला बाज़ आ जाए। नसीहत हासिल करने वाला नसीहत हासिल कर ले और गुनाहों से रूकने वाला रूक जाए। परवरदिगार ने अस्तग़फ़ार को रिज़्क़ के नुज़ूल और मख़लूक़ात पर रहमत के विरूद का ज़रिया क़रार दे दिया है। उसका इरशादे गिरामी है के “ अपने रब से अस्तग़फ़ार करो के वह बहुत ज़्यादा बख़्शने वाला है। वह अस्तग़फ़ार के नतीजे में तुम पर मूसलाधार पानी बरसाएगा। तुम्हारी अमवाल और औलाद के ज़रिये मदद करेगा , तुम्हारे लिये बाग़ात और नहरें क़रार देगा। ” अल्लाह उस बन्दे पर रहम करे जो तौबा की तरफ़ मुतवज्जे हो जाए , ख़ताओं से माफ़ी मांगे और मौत से पहले नेक आमाल कर ले।

ख़ुदाया हम परदों के पीछे और मकानात के गोशों से तेरी तरफ़ निकल पड़े हैं , हमारे बच्चे और जानवर सब फ़रयादी हैं। हम तेरी रहमत की ख़्वाहिश रखते हैं। तेरी नेमत के उम्मीदवार हैं और तेरे अज़ाब और ग़ज़ब से ख़ौफ़ज़दा हैं। ख़ुदाया हमें बाराने रहमत से सेराब कर दे और हमें मायूस बन्दों में क़रार न देना और न क़हत से हलाक कर देना और न हमसे उन आमाल का मुहासेबा करना जो हमारे जाहिलों ने अन्जाम दिये हैं। ऐ सबसे ज़्यादा रहम करने वाले!

ख़ुदाया हम तेरी तरफ़ उन हालात की फ़रयाद लेकर आए हैं जो तुझसे मख़फ़ी नहीं हैं और उस वक़्त निकले हैं जब हमें सख़्त तंगियों ने मजबूर कर दिया है और क़हत सालियों ने बेबस बना दिया है और शदीद हाजत मन्दियों ने लाचार कर दिया है और दुष्वारियों व फ़ित्नों ने ताबड़तोड़ हमले कर रखे हैं। ख़ुदाया हमारी इल्तेमास यह है के हमें महरूम वापस न करना और हमें नामुराद न पलटाना। हमसे हमारे गुनाहों की बात न करना और हमारे आमाल का मुहासेबा न करना बल्के हम पर अपनी बारिश रहमत , अपनी बरकत , अपने रिज़्क़ और करम का दामन फैला दे और हमें ऐसी सेराबी अता फ़रमा जो तष्नगी को मिटाने वाली , सेर व सेराब करने वाली और सब्ज़ा उगाने वाली हो ताके जो खेतियां गई गुज़री हो गई हैं दोबारा उग आएं और जो ज़मीनें मुर्दा हो गई हैं वह ज़िन्दा हो जाएं। यह सेदाबी फ़ायदेमन्द और बेपनाह फलों वाली हो जिससे हमवार ज़मीनें सेराब हो जाएं और वादियां बह निकलें। दरख़्तों में पत्ते निकल आएं और बाज़ारी की क़ीमतें नीचे आ जाएं के तू हर शै पर क़ादिर है।

144-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें बअसत अम्बिया का तज़किरा किया गया है)

परवरदिगार ने मुरसेलीन कराम को मख़सूस वही से नवाज़ कर भेजा है और उन्हें अपने बन्दों पर अपनी हुज्जत बना दिया है ताके बन्दों की यह हुज्जत तमाम न होने पाए के उनके बहाने का ख़ातेमा नहीं किया गया है। परवरदिगार ने इन लोगों को इसी लिसाने सिद्क़ के ज़रिये राहे हक़ की तरफ़ दावत दी है। इसे मख़लूक़ात का हाल मुकम्मल तौर से मालूम है वह न उनके छिपे हुए इसरार से बेख़बर है और न पोशीदा बातों से नावाक़िफ़ है जो उनके दिलों के अन्दर मख़फ़ी है। वह अपने एहकाम के ज़रिये इनका इम्तेहान लेना चाहता है के हुस्ने अमल के एतबार से कौन सबसे बेहतर है ताके जज़ा में सवाब अता करे और पादाश में मुब्तिलाए अज़ाब कर दे।

( अहलेबैत अलैहिस्सलाम) कहाँ हैं वह लोग जिनका ख़याल यह है के हमारे बजाय वही रासख़्ून फ़िल इल्म हैं और यह ख़याल सिर्फ़ झूट और हमारे खि़लाफ़ बग़ावत से पैदा हुआ है के ख़ुदा ने हमें बलन्द बना दिया है और उन्हें पस्त रखा है। हमें कमालात इनायत फ़रमा दिये हैं और उन्हें महरूम रखा है। हमें अपनी रहमत में दाखि़ल कर दिया है और उन्हें बाहर रखा है। हमारे ही ज़रिये से हिदायत तलब की जाती है और अन्धेरों में रोशनी हासिल की जाती है। याद रखो क़ुरैश के सारे इमाम जनबा हाशिम की इसी किष्ते ज़ार में क़रार दिये गए हैं और यह अमानत न उनके अलावा किसी को ज़ेब देती है और न उनसे बाहर कोई इसका अहल हो सकता है।

( गुमराह लोग) इन लोगों ने हाज़िर दुनिया को इख़्तेयार कर लिया है और देर में आने वाली आख़ेरत को पीछे हटा दिया है। साफ़ पानी को नज़रअन्दाज़ कर दिया है और गन्दा पानी को पी लिया है। गोया के मैं उनके फ़ासिक़ को देख रहा हूँ जो मुनकिरात से मानूस हैं और बुराइयों से हमरंग व हमआहंग हो गया है , यहांतक के इसी माहौल में इसके सारे बाल सफ़ेद हो गए हैं और इसी रंग में इसके एख़लाक़ियात रंग गए हैं। इसके बाद एक सेलाब की तरह उठा है जिसे इसकी फ़िक्र नहीं है के इसको डुबो दिया है और भूसे की एक आग है जिसे इसकी परवाह नहीं है के क्या जला दिया है।

क्हां हैं वह अक़्लें जो हिदायत के चराग़ों से रोशनी हासिल करने वाली हैं और कहां हैं वह निगाहें जो मिनारए तक़वा की तरफ़ नज़र करने वाली हैं , कहां हैं वह दिल जो अल्लाह के लिये दिये गये हैं और इताअते ख़ुदा पर जम गए हैं। लोग तो माले दुनिया पर टूट पड़े हैं और हराम पर बाक़ायदा झगड़ा कर रहे हैं और जब जन्नत व जहन्नम का परचम बलन्द किया गया तो जन्नत की तरफ़ से मुँह को “ शैतान ने दावत दी तो लब्बैक कहते हुए आ गए।

145-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(दुनिया की फ़ना के बारे में)

लोगों! तुम उस दुनिया में ज़िन्दगी गुज़ार रहे हो जहाँ मौत के तीरों के मुस्तक़िल हदफ़ हो। यहाँ हर घूंट के साथ उच्छू है और हर लुक़्मे के साथ गले का फ़न्दा। यहाँ कोई नेमत उस वक़्त तक नहीं मिलती है जब तक दूसरी हाथ से निकल न जाए और यहाँ की ज़िन्दगी में एक दिन का भी इज़ाफ़ा नहीं होता है जब तक एक दिन कम न हो जाए। यहाँ के खाने में ज़्यादती भी पहले रिज़्क़ के ख़ात्मे के बाद हाथ आती है और कोई असर भी पहले निशान के मिट जाने के बाद ही ज़िन्दा होता है। हर जदीद के लिये एक जदीद को क़दीम बनना पड़ता है और हर घास के उगने के लिये एक खेत को काटना पड़ता है। पुराने बुज़ुर्ग जो हमारी असल थे गुज़र गए अब हम उनकी शाख़ें हैं और खुली हुई बात है के असल के चले जाने के बाद फ़ुरूअ की बक़ा ही क्या होती है।

( मज़म्मते बिदअत) कोई बिदअत उस वक़्त तक ईजाद नहीं होती है जब तक कोई सुन्नत मर न जाए। लेहाज़ा बिदअतों से डरो और सीधे रास्ते पर क़ायम रहो के मुस्तहकमतरीन मुआमलात ही बेहतर होते हैं और दीन में जदीद ईजादात ही बदतरीन शै होती हैं।

146-आपका इरशादे गिरामी

(जब अम्र बिन ख़त्ताब ने फ़ारस की जंग में जाने के बारे में मष्विरा तलब किया)

याद रखो के इस्लाम की कामयाबी और नाकामयाबी का दारोमदार क़िल्लत व कसरत पर नहीं है बल्कि यह दीन , दीने ख़ुदा है जिसे उसी ने ग़ालिब बनाया है और यह उसी का लशकर है जिसे उसी ने तैयार किया है और उसी ने इसकी इमदाद की है यहाँतक के इस मन्ज़िल तक पहुँच गया है और इस क़द्र फैलाव हासिल कर लिया है। हम परवरदिगार की तरफ़ से एक वादा पर हैं और वह अपने वादे को बहरहाल पूरा करने वाला है और अपने लशकर की बहरहाल मदद करेगा।

मुल्क में निगराँ की मंिन्ज़ल महरों के इज्तेमाअ में धागे की होती है के वही सबको जमा किये रहता है और वह अगर टूट जाए तो सारा सिलसिला बिखर जाता है और फिर कभी भी जमा नहीं हो सकता है। आज अरब अगरचे क़लील हैं लेकिन इस्लाम की बिना पर कसीर हैं और अपने इत्तेहाद व इत्तेफ़ाक़ की बिना पर ग़ालिब आने वाले हैं। लेहाज़ा आप मरकज़ीन में रहें और इस चक्की को उन्हीं के ज़रिये गर्दिश दें और जंग की आग का मुक़ाबला उन्हीं को करने दें आप ज़हमत न करें के अगर आपने इस सरज़मीन को छोड़ दिया तो अरब चारों तरफ़ से टूट पड़ेंगे और सब इसी तरह शरीके जंग हो जाएंगे के जिन महफ़ूज़ मुक़ामात को आप छोड़कर गए हैं उनका मसला जंग से ज़्यादा अहम हो जाएगा।

इन अजमों ने अगर आपको मैदाने जंग में देख लिया तो कहेंगे के अरबीयत की जान यही है इस जड़ को काट दिया तो हमेशा हमेशा के लिये राहत मिल जाएगी और इस तरह उनके हमले शदीदतर हो जाएंगे और वह आपमें ज़्यादा ही लालच करेंगे और यह जो आपने ज़िक्र किया है के लोग मुसलमानों से जंग करने के लिये आ रहे हैं तो यह बात ख़ुदा को आपसे ज़्यादा नागवार है और वह जिस चीज़ को नागवार समझता है उसके बदल देने पर क़ादिर भी है। और यह जो आपने दुशमन के अदद का ज़िक्र किया है तो याद रखो के हम लोग माज़ी में भी कसरत की बिना पर जंग नहीं करते थे बल्कि परवरदिगार की नुसरत और इआनत की बुनियाद पर जंग करते थे।

147-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

परवरदिगारे आलम ने हज़रत मोहम्मद (स 0) को हक़ के साथ मबऊस किया ताके आप लोगों को बुत परस्ती से निकाल कर इबादते इलाही की मन्ज़िल की तरफ़ ले आएँ और “ शैतान की इताअत से निकाल कर रहमान की इताअत कराएं। इस क़ुरान के ज़रिये जिसे उसने वाज़ेअ और मोहकम क़रार दिया है ताके बन्दे ख़ुदा को नहीं पहचानते हैं तो पहचान लेँ और उसके मुन्किर हैं तो इक़रार कर लें और हठधर्मी के बाद उसे मान लें। परवरदिगार अपनी क़ुदरते कामेला की निशानियों के ज़रिये बग़ैर देखे जलवा नुमाँ है और अपनी सुतूत के ज़रिये उन्हें ख़ौफ़ज़्दा बनाए हुए हैं के किस तरह उसने उक़ूबतों के ज़रिये उसके मुस्तहक़ीन को तबाह व बरबाद कर दिया है और अज़ाब के ज़रिये उन्हें तहस-नहस कर दिया है।

याद रखो- मेरे बाद तुम्हारे सामने वह ज़माना आने वाला है जिसमें कोई “ शै हक़ से ज़्यादा पोशीदा और बातिल से ज़्यादा नुमायाँ न होगी। सबसे ज़्यादा रिवाज ख़ुदा और रसूल पर इफ़तरा का होगा और उस ज़माने वालों के नज़दीक किताबे ख़ुदा से ज़्यादा बेक़ीमत कोई क़िताअ न होगी अगर इसकी वाक़ेई तिलवात की जाए और इससे ज़्यादा कोई फ़ायदेमन्द बज़ाअत न होगी अगर इसके मफ़ाहिम को उनकी जगह से हटा दिया जाए। शहरों में “ मुन्किर ” से ज़्यादा मारूफ़ और “ मारूफ़ ” से ज़्यादा मुन्किर कुछ न होगा। हामेलाने किताब को छोड़ देंगे और हाफ़िज़ाने क़ुरान क़ुरान को भुला देंगे। किताब और उसके वाक़ेई अहल शहर बदर कर दिये जाएंगे और दोनों एक ही रास्ते पर इस तरह चलेंगे के कोई पनाह देने वाला न होगा। किताब और अहले किताब इस दौर में लोगों के दरम्यान रहेंगे लेकिन वाक़ेअन न रहेंगे। उन्हीं के साथ रहेंगे लेकिन हक़ीक़तन अलग रहेंगे। इसलिये के गुमराही हिदायत के साथ नहीं चल सकती है चाहे एक ही मक़ाम पर रहे। लोगों ने इफ़्तेराक़ पर इत्तेहाद और इत्तेहाद पर इफ़तेराक़ कर लिया है जैसे यही क़ुरान के पेशवा हैं और क़ुरान उनका पेशवा नहीं है। अब उनके पास सिर्फ़ क़ुरान का नाम बाक़ी रह गया है और वह सिर्फ़ उसकी किताबत व इबारत को पहचानते हैं और बस! इसके पहले भी यह नेक किरदारों को बेहद आज़ियत कर चुके हैं और इनकी सिदाक़त को इफ़तेरा का नाम दे चुके हैं उन्हें नेकियों पर बुराइयों की सज़ा दे चुके हैं।

तुम्हारे पहले वाले सिर्फ़ इसलिये हलाक हो गये के उनकी उम्मीदें दराज़ थीं और मौत उनकी निगाहों से ओझल थी यहाँतक के वह मौत नाज़िल हो गई जिसके बाद माज़रत वापस कर दी जाती है और तौबा की मोहलत उठा ली जाती है और मुसीबत व अज़ाब का वुरूद हो जाता है।

ऐ लोगो! जे परवरदिगार से वाक़ेअन नसीहत हासिल करना चाहता है उसे तौफ़ीक़ नसीब हो जाती है और जो उसके क़ौल को वाक़ेअन राहनुमा बनाना चाहता है उसे सीधे रास्ते की हिदायत मिल जाती है। इसलिये के परवरदिगार का हमसाया हमेशा अम्नो अमान में रहता है और उसका दुशमन हमेशा ख़ौफ़ज़दा रहता है। याद रखो जिसने अज़मते ख़ुदा को पहचान लिया है उसे बड़ाई ज़ेब नहीं देती है के ऐसे लोगों की रफ़अत व बलन्दी तवाज़अ और ख़ाकसारी ही में है और इसकी क़ुदरत के पहचानने वालों की सलामती उसके सामने सरे तस्लीम ख़म कर देने ही में है। ख़बरदार हक़ से इस तरह न भागो जिस तरह सही व सालिम ख़ारिशज़दा से , या सेहत याफ़्ता बीमार से फ़रार करता है। याद रखो तुम हिदायत को उस वक़्त तक नहीं पहचान सकते हो जब तक उसे छोड़ने वालों को न पहचान लो और किताबे ख़ुदा के अहद व पैमान को उस वक़्त तक इख़्तेयार नहीं कर सकते हो जब तक उसके तोड़ने वालों की मारेफ़त हासिल न कर लो और उसे तमस्सुक उस वक़्त तक मुमकिन नहीं है जब तक उसे नज़र अन्दाज़ करने वालों का इरफ़ान हो जाए। हक़ को उसके अहल के पास तलाश करो के यही लोग इल्म की ज़िन्दगी और जेहालत की मौत हैं। यही लोग वह हैं जिनका हुक्म उनके इल्म का और उनकी ख़ामोशी उनके तकल्लुम का और उनका ज़ाहिर उनके बातिन का पता देता है। यह लोग दीन की मुख़ालफ़त नहीं करते हैं और न उसके बारे में आपस में इख़्तेलाफ़ करते हैं दीन उनके दरम्यान बेहतरीन सच्चा गवाह और ख़ामोश बोलने वाला है।

(((- यह हर दौर का ख़ासेरा है और सरकारे दो आलम (स 0) के बाद बनी उमय्या ने तो इस इफ़तरा का बाज़ार इस तरह गर्म किया था के बाद के मोहद्देसीन को लाखों हदीसों के ज़ख़ीरे में से चन्द हज़ार के अलावा कोई हदीस सही नज़र न आई और उनमें भी बाज़ हदीसें दूसरे ओलमा की नज़र में मशकूक रह गईं।

ख़ुदा व रसूल (स 0) पर इफ़तरा के एतबार से ज़मानों को तक़सीम किया जाए तो शायद आज का दौर सद्रे इस्लाम से बेहतर ही नज़र आएगा के इस बदअमली की कसरत के बावजूद इस तरह की बेदीनी का रिवाज यक़ीनन कम हो गया है और अब मुसलमान इस क़िस्म की रिवायत साज़ी को पसन्द नहीं करते हैं अगरचे बदक़िस्मती से जाली रिवायात पर अमल कर रहे हैं-)))

148-आपका इरशादे गिरामी

(अहले बसरा (तल्हा व ज़ुबैर) के बारे में)

यह दोनों अम्रे खि़लाफ़त के अपनी ही ज़ात के लिये उम्मीदवार हैं और उसे अपनी ही तरफ़ मोड़ना चाहते हैं। इनका अल्लाह के किसी वसीले से राबेता और किसी ज़रिये से ताअल्लुक़ नहीं है। हर एक दूसरे के हक़ में कीना रखता है और अनक़रीब इसका परदा उठ जाएगा। ख़ुदा की क़सम अगर उन्होंने अपने मुद्दआ को हासिल कर लिया तो एक दूसरे की जान लेकर छोड़ेंगे और इसकी ज़िन्दगी का ख़ात्मा कर देंगे। देखो बाग़ी गिरोह उठ खड़ा हुआ है। तो राहे ख़ुदा में काम करने वाले कहाँ चले गए जबके उनके लिये रास्ते मुक़र्रर कर दिये गए हैं और उन्हें इसकी इत्तेलाअ दी जा चुकी है ? मैं जानता हूँ के हर गुमराही का एक सबब होता है और हर अहद शिकन एक शुबह ढूंढ लेता है लेकिन मैं उस शख़्स के मानिन्द नहीं हो सकता हूँ जो मातम की आवाज़ सुनता है। मौत की सनानी कानों तक आती है। लोगों का गिरया देखता है और फिर इबरत हासिल नहीं करता है।

149-आपका इरशादे गिरामी

(अपनी शहादत से क़ब्ल)

लेगों! देखो हर शख़्स जिस वक़्त से फ़रार कर रहा है उससे बहरहाल मुलाक़ात करने वाला है और मौत ही हर नफ़्स की आखि़री मन्ज़िल है और उससे भागना ही उसे पा लेना है। ज़माना गुज़र गया जबसे मैं इस राज़ की जुस्तजू में हूँ लेकिन परवरदिगार मौत के इसरार को परदए राज़ ही में रखना चाहता है। यह एक इल्म है जो ख़ज़ानए क़ुदरत में महफ़ूज़ है। अलबत्ता मेरी वसीअत यह है के किसी को अल्लाह का शरीक न क़रार देना और पैग़म्बरे अकरम (स 0) को ज़ाया न कर देना के यही दोनों दीन के सुतून हैं उन्हीं को क़ायम करो और उन्हीं दोनों चिराग़ों को रोशन रखो। इसके बाद अगर तुम मुन्तशिर नहीं होगे तो तुम पर कोई ज़िम्मेदारी नहीं है। हर शख़्स अपनी ताक़त भर बोझ का ज़िम्मेदार बनाया गया है और जाहिलों का बोझ हल्का रखा गया है के परवरदिगार रहीम व करीम है और दीन मुस्तहकम है और राहनुमा भी अलीम व दाना है। मैं कल तुम्हारे साथ था और आज तुम्हारे लिये मन्ज़िले इबरत मैं हूँ और कल तुमसे जुदा हो जाऊंगा , अल्लाह तुम्हें और मुझे दोनों को माफ़ कर दे।

देखो! इस मन्ज़िले लग़ज़िशमें अगर साबित रह गए तो क्या कहना। वरना अगर क़दम फिसल गए तो याद रखना के हम भी उन्हीं शाख़ों की छावें , उन्हीं हवाओं की गुज़रगाह और उन्हीं बादलों के साये में थे लेकिन इन बादलों के टुकड़े फ़िज़ा में फ़ैला जाओगे और इन हवाओं के निशानात ज़मीन से छुप गए।

(((- इसमें कोई शक नहीं है के मुसलमानों ने खि़लाफ़त का झगड़ा दफ़ने पैग़म्बर (स 0) से पहले ही शुरू कर दिया था और फिर उसे मुसलसल जारी रखा और मुख़्तलिफ़ अन्दाज़ से जोड़-तोड़ के ज़रिये खि़लाफ़तों का फ़ैसला होता रहा लेकिन किसी दौर में भी खि़लाफ़त के फ़ैसले के लिये तलवार और जंग का सहारा नहीं लिया गया। यह बिदअत सिर्फ़ हज़रत उम्मुलमोमेनीन की ईजाद है के उन्होंने तल्हा व ज़ुबैर की खि़लाफ़त के लिये तलवार का भी सहारा ले लिया और फिर माविया के लिये ज़मीन हमवार कर दी और उसके नतीजे में खि़लाफ़त का फ़ैसला जंग व जेदाल से शुरू हो गया और इस राह में बेशुमार जानें ज़ाया होती रहीं।

अफ़सोस के जंगे हमल और सिफ़फ़ीन में तौ शुबे की भी कोई गुन्जाइश नहीं थी , हज़रत आइशा , तल्हा , ज़ुबैर , माविया , अम्र व आस कोई ऐसा नहीं था जो हज़रत अली (अ 0) की शख़्सियत और उनके बारे में इरशादाते पैग़म्बर (स 0) से बाख़बर न हो। इसके बाद शुबह या ख़ताए इज्तेहादी का नाम देकर अवामुन्नास को तो धोका दिया जा सकता है , दावरे महशर को धोका नहीं दिया जा सकता है।-)))

मैं कल तुम्हारे हमसाये में रहा , मेरा बदन एक अरसे तक तुम्हारे दरम्यान रहा और अनक़रीब तुम उसे जसे बिला रूह की शक्ल में देखोगे जो हरकत के बाद साकिन हो जाएगा और तकल्लुम के बाद साकित हो जाएगा। अब तो तुम्हें इस ख़ामोशी , इस सुकूत और इस सुकून से नसीहत हासिल करनी चाहिए के यह साहेबाने इबरत के लिये बेहतरीन मुक़र्रर और क़ाबिले समाअत बयानात से ज़्यादा बेहतर नसीहत करने वाले हैं। मेरी तुमसे जुदाई इस शख़्स की जुदाई है जो मुलाक़ात के इन्तेज़ार में है। कल तुम मेरे ज़माने को पहचानोगे और तुम पर मेरे इसरार मुन्कशिफ होंगे और तुम मेरी सही मारेफ़त हासिल करोगे जब मेरी जगह ख़ाली हो जाएगी और दूसरे लोग इस मन्ज़िल पर क़ाबिज़ हो जाएंगे।

150-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें ज़माने के हवादिस की तरफ़ इशारा किया गया है और गुमराहों के एक गिरोह का तज़किरा किया गया है)

डन लोगों ने गुमराही के रास्तों पर चलने और हिदायत के रास्तों को छोड़ने के लिये दाहिने बायें रास्ते इख़्तेयार कर लिये हैं मगर तुम इस अम्र में जल्दी न करो जो बहरहाल होने वाला है और जिसका इन्तेज़ार किया जा रहा है और उसे दूर न समझो जो कल सामने आने वाला है के कितने ही जल्दी के तलबगार जब मक़सद को पा लेते हैं तो सोचते हैं के काश उसे हासिल न करते , आज का दिन कल के सवेरे से किस क़द्र क़रीब है।

लोगों! यह हर वादे के वुरूद और हर उस चीज़ के ज़हूर की क़ुरबत का वक़्त है जिसे तुम नहीं पहचानते हो लेहाज़ा जो शख़्स भी इन हालात तक बाक़ी रह जाए उसका फ़र्ज़ है के रौशन चिराग़ के सहारे क़दम आगे बढ़ाए और स्वालेहीन के नक़्शे क़दम पर चले ताके हर गिरह को खोल सके और हर ग़ुलामी से आज़ादी पैदा कर सके , हर मुज्तमा को बवक़्ते ज़रूरत मुन्तशिर कर सके और हर इन्तेशार को मुज्तमा कर सके और लोगों से यूँ मख़फ़ी रहे के क़या़फ़ाशिनास भी उसके नक़्शे क़दम को ताहद्दे नज़र न पा सकें। उसके बाद एक क़ौम पर इस तरह सैक़ल की जाएगी जिस तरह लोहार तलवार की धार पर सैक़ल करता है। इन लोगों की आंखों को क़ुरआन के ज़रिये रौशन किया जाएगा और उनके कानों में तफ़सीर को मुसलसल पहुंचाया जाएगा और उन्हें सुब्ह व शाम हुकुमत के जामों से सेराब किया जाएगा।

इन गुमराहों को मोहलत दी गई ताके अपनी रूसवाई को मुकम्मल कर लें और हर तग़य्युर के हक़दार हो जाएं। यहाँ तक के जब ज़माना काफ़ी गुज़र चुका और एक क़ौम फ़ित्नों से मानूस हो चुकी और जंग की तख़हम पाशियों के लिये खड़ी हो गई , तो वह लोग भी सामने आ गए जो अल्लाह पर अपने सब्र का एहसान नहीं जताते और राहे ख़ुदा में जान देने को कोई कारनामा नहीं तसव्वुर करते , यहाँ तक के जब आने वाले हुक्म क़ज़ाने आज़्माइश की मुद्दत को तमाम कर दिया।

(((- अमीरूल (अ 0) ने अपने बाद पैदा होने वाले फ़ित्नों की तरफ़ भी इशारा किया है और इस नुक्ते की तरफ़ भी मुतवज्जो किया है के ज़माना बहरहाल हुज्जते ख़ुदा से ख़ाली न रहेगा। और इस अन्धेरे में भी कोई न कोई सिराज मुनीर ज़रूर रहेगा लेहाज़ा तुम्हारा फ़र्ज़ है के इसका सहारा लेकर आगे बढ़ो और बेहतरीन नताएज हासिल कर लो। इसका बेहतरीन दौर इमाम बाक़र (अ 0) और इमाम सादिक़ (अ 0) का दौर है जहाँ चार हज़ार असहाबे फ़िक्र व नज़र इमाम (अ 0) के मदरसे में हाज़री दे रहे थे और आपके तालीमात से अपने दिल व दिमाग़ को रौशन कर रहे थे। कानों में क़ुरान सामित की आवाज़े थी और निगाहों में क़ुराने नातिक़ का जलवा-)))

तो इन्होंने अपनी बसीरत को अपनी तलवारों पर मुसल्लत कर दिया और अपने नसीहत करने वाले के हुक्म से परवरदिगार की बारगाह में झुक गए। मगर इसके बाद जब परवरदिगार ने पैग़म्बरे अकरम (स 0) को अपने पास बुला लिया तो एक क़ौम उलटे पांव पलट गई और उसे मुख़तलिफ़ रास्तों ने तबाह कर दिया। उन्होंने महमिले अक़ायद का सहारा लिया और ग़ैर क़राबतदार से ताल्लुक़ात पैदा किये और इस सबब को नज़रअन्दाज़ कर दिया जिससे मवद्दत का हुक्म दिया गया था। इमारत को जड़ से उखाड़ कर दूसरी जगह पर क़ायम कर दिया जो हर ग़लती का मोअद्दन व मख़ज़न है और हर गुमराही का दरवाज़ा थे , हैरत में सरगर्दां और आले फ़िरऔन की तरह नशे में ग़ाफ़िल थे इनमें कोई दुनिया की तरफ़ मुकम्मल कट कर आ गया था और कोई दीन से मुस्तक़िल तरीक़े पर अलग हो गया था।

151-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें फ़ित्नों से डराया गया है)

मैं ख़ुदा की हम्द व सना करता हूँ और उसकी मदद चाहता हूँ उन चीज़ों के लिये जो शयातीन को हंका सकें , भगा सकें और उसके फन्दों और हथकण्डों से महफ़ूज़ रख सकें और मैं उस अम्र की गवाही देता हूं के उसके अलावा कोई ख़ुदा नहीं है और हज़रत मोहम्मद (स 0) उसके बन्दे और रसूल , उसके मुन्तख़ब और मुस्तफ़ा हैं उनके फ़ज़्ल का कोई मुक़ाबला नहीं कर सकता है और उनके फ़िक़दान की कोई तलाफ़ी नहीं है। उनकी वजह से तमाम शहर ज़लालत की तारीकी , जेहालत के ग़लबे और बदसरशती और बद एख़लाक़ी की शिद्दत के बाद जब लोग हराम को हलाल बनाए हुए थे और साहबाने हिकमत को ज़लील समझ रहे थे , रसूलों से ख़ाली दौर में ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे और कुफ्ऱ की हालत में मर रहे थे , मुनव्वर और रौशन हो गए।

(फ़ित्नों से आगाही)

इसके बाद तुम ऐ गिरोहे अरब उन बलाओं के निशाने पर हो जो क़रीब आ चुकी हैं लेहाज़ा नेमतों की मदहोशियों से बचो और हलाक करने वाले अज़ाब से होशियार रहो। अन्धेरों के धुन्धलकों में क़दम जमाए रहो और फ़ित्नों की कजरवी से होशियार हो जिस वक़्त उनका पोशीदा ख़दशा सामने आ रहा हो और मख़फ़ी अन्देशा ज़ाहिर हो रहा हो और खूंटा मज़बूत हो रहा हो। यह फ़ित्ने इब्तेदा में मख़फ़ी रास्तों से शुरू होते हैं और आखि़र में वाज़ेअ मसाएब तक पहुंच जाते हैं। इनका आग़ाज़ बच्चों के आग़ाज़ जैसा होता है लेकिन इनके आसार नक़श काले हजर जैसे होते है। दुनिया के ज़ालिम बाहमी अहद व पैमान के ज़रिये उनके वारिस बनते हैं। अव्वल आखि़र का क़ाएद होता है और आखि़र अव्वल का मुक़तदी। हक़ीर दुनिया के लिये एक दूसरे से मुक़ाबला करते हैं और बदबूदार मुर्दे पर आपस में जंग करते हैं।

(((- सही बुख़ारी के किताबुलफ़ित्न में इसी सूरते हाल की तरफ़ इशारा किया गया है के जब रसूले अकरम (स 0) हौज़े कौसर पर बाज़ असहाब का हष्र देख कर उन्हें हंकाया जा रहा है। फ़रयाद करेंगे के ख़ुदाया मेरे असहाब हैं तो इरशाद होगा के तुम्हें नहीं मालूम के इन्होंने तुम्हारे बाद क्या-क्या बिदअतें ईजाद की हैं और किस तरह दीने ख़ुदा से मुनहरिफ़ हो गए हैं।

इन्सानी बसीरत का सबसे बड़ा कारनामा यह है के इन्सान फ़ित्ने को पहले मरहले पर पहचान ले और वहीं उसका सदबाब कर दे वरना जब उसका रिवाज हो जाता है तो उसका रोकना नामुमकिन हो जाता है लेकिन मुश्किल यह है के इसका आग़ाज़ इतने मख़फ़ी और हसीन अन्दाज़ से होता है के उसका पहचानना हर एक के बस का काम नहीं है और इस तरह अवामुन्नास अपने मनहूस अक़ायद व नज़रियात या अवातिफ़ व जज़्बात की बिना पर फ़ितनों का शिकार हो जाते हैं और आखि़र में उनकी मुसीबत का इलाज नामुमकिन हो जाता है। ओलमा , आलाम और मुफ़क्केरीने इस्लाम की ज़रूरत इसीलिये होती है के वह फ़ित्नों को आग़ाजकार ही से पहचान सकते हैं और उनका सद्दबाब कर सकते हैं बशर्ते के अवामुन्नास उनके ऊपर एतमाद करें और उनकी बसीरत से फायदा उठाने के लिये तैयार हों।-)))

जबके अनक़रीब मुरीद अपने पीर और पीर अपने मुरीद से बराअत करेगा और बुग़्ज़ व अदावत के साथ एक दूसरे से अलग हो जाएंगे और वक़्ते मुलाक़ात एक-दूसरे पर लानत करेंगे , इसके बाद वह वक़्त आएगा जब ज़लज़लए अफ़गन फ़ित्ना सर उठाएगा जो कमर तोड़ होगा और शदीद तौर पर हमलावर होगा। जिसके नतीजे में बहुत से दिल इस्तेक़ामत के बाद कजी का शिकार हो जाएंगे और बहुत से लोग सलामती के बाद बहक जाएंगे। इसके हुजूम के वक़्त ख़्वाहिशात में टकराव होगा और उसके ज़हूर के हंगाम अफ़्कार मुश्तबा हो जाएंगे। जो उधर सर उठाकर देखेगा उसकी कमर तोड़ देगे और जो उसमें दौड़ धूप करेगा उसे तबाह कर देंगे। लोग यूँ एक-दूसरे को काटने दौड़ेंगे जिस तरह भीड़ के अन्दर गधे। ख़ुदाई रस्सी के बल खुल जाएंगे और हक़ाएक़ के रास्ते मुश्तबा हो जाएंगे। हिकमत का चश्मा ख़ुश्क हो जाएगा और ज़ालिम बोलने लगेंगे। देहातियों को हथोड़ों से कूट दिया जाएगा और अपने सीने से दबाकर कुचल दिया जाएगा। अकेले अकेले अफ़राद उसके ग़ुबार में गुम हो जाएंगे और उसके रास्ते में सवार हलाक हो जाएंगे। यह फ़ित्ने क़ज़ाए इलाही की तल्ख़ी के साथ वारिद होंगे और दूध के बदले ताज़ा ख़ून निकालेंगे। दीन के मिनारे (ओलमा) हलाक हो जाएंगे और यक़ीन की गिरहें टूट जाएंगी , साहेबाने होश उनसे भागने लगेंगे और ख़बीसुन्नफ़्स अफ़राद इसके मदारे इलहाम हो जाएंगे। यह फ़ितने गरजने वाले चमकने वाले और सरापा तैयार होंगे। उनमें रिश्तेदारों से ताल्लुक़ात तोड़ लिये जाएंगे और इस्लाम से जुदाई इख़्तेयार कर ली जाएगी। उससे अलग रहने वाले भी मरीज़ होंगे और कूच कर जाने वाले भी गोया मुक़ीम ही होंगे।

अहले ईमान में बाज़ ऐसे मक़तूल होंगे जिनका ख़ुन बहा तक न लिया जा सकेगा और बाज़ ऐसे ख़ौफ़ज़दा होंगे के पनाह की तलाश में होंगे। उन्हें पुख़्ता क़िस्मों और ईमान की फ़रेबकारियों में मुब्तिला किया जाएगा लेहाज़ा ख़बरदार तुम फ़ित्नों का निशाना और बिदअतों का निशान मत बनना और इसी रास्ते को पकड़े रहना जिस पर ईमानी जमाअत क़ायम है और जिस पर इताअत के अरकान क़ायम किये गये हैं। ख़ुदा की बारगाह में मज़लूम बन कर जाओ , ख़बरदार ज़ालिम बनकर मत जाना। “ शैतान के रास्तों और ज़ुल्म के मरकज़ों से महफ़ूज़ रहो और अपने शिकम में लुक़म-ए-हराम को दाखि़ल मत करो के तुम उसकी निगाह के सामने हो जिसने तुम पर मासियत को हराम किया है और तुम्हारे लिये इताअत के रास्तों को आसान कर दिया है।

(((- अमीरूल मोमेनीन (अ 0) जिस क़िस्म के फ़ित्नों की तरफ़ इशारा किया है उनका सिलसिला अगरचे आपके बाद से ही शुरू हो गया था लेकिन अभी तक मौक़ूफ़ नहीं हुआ और न फ़िलहाल मौक़ूफ़ होने के इमकानात हैं। जिस तरफ़ देखो वही सूरते हाल नज़र आ रही है जिसकी तरफ़ आपने इशारा किया है और उन्हीं मज़ालिम की गरम बाज़ारी है जिनसे आपने होशियार किया है। ज़रूरत है के साहेबाने ईमान हिदायत से फ़ायदा उठाएं , फ़ित्नों से महफ़ूज़ रहें , साहेबाने बसीरत से वाबस्ता रहें और कम से कम इतना ख़याल रखें के ख़ुदा की बारगाह में मज़लूम बन कर हाज़िर होने में कोई ज़िल्लत नहीं है बल्कि उसी में दाएमी इज्ज़त और अबदी शराफ़त है। ज़िल्लत ज़ुल्म में होती है मज़लूमियत में नहीं-)))


152-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें परवरदिगार के सिफ़ात और आइम्माए ताहेरीन (अ 0) के औसाफ़ का ज़िक्र किया गया है)

सरी तारीफ़ उस अल्लाह के लिये हैं जिसने अपनी तख़लीक़ से अपने वजूद का , अपनी मख़लूक़ात के जादिस होने से अपनी अज़लियत का और उनकी बाहेमी मुशाबेहत से अपने बेनज़ीर होने का पता दिया है। उसकी ज़ात तक हवास की रसाई नहीं है और फिर भी परदे उसे पोशीदा नहीं कर सकते हैं।

मौज़ू सानेअ से और हदबन्दी करने वाला महदूद से और परवरिश करने वाला परवरिश पाने वाले से बहरहाल अलग होता है। वह एक है मगर अदद के एतबार से नहीं। वह ख़ालिक़ है मगर हरकत व ताब के ज़रिये नहीं , वह समीअ है लेकिन कानों के ज़रिये नहीं और वह बसीर है लेकिन न इस तरह के आंखों को फैलाए।

वह हाज़िर है मगर छुआ नहीं जा सकता और वह दूर है लेकिन मसाफ़तों के एतबार से नहीं , वह ज़ाहिर है लेकिन देखा नहीं जा सकता है और वह बातिन है लेकिन जिस्म की लताफ़तों की बिना पर नहीं। वह चीज़ो से अलग है अपने क़हर व ग़लबे और क़ुदरत व इख़्तेयार की बिना पर और मख़लूक़ात उससे जुदागाना है ख़ुज़ू व खुशु और उसकी बारगाह में बाज़गश्त की बिना पर। जिसने उसके लिये अलग से औसाफ़ का तसव्वुर किया उसने उसे आदाद मुअय्यन में लाकर खड़ा कर दिया और जिसने ऐसा किया उसने उसे हादस बनाकर उसकी अज़लियत का ख़ात्मा कर दिया और जिसने यह सवाल किया के वह कैसा है उसने अलग से औसाफ़ की जुस्तजू की और जिसने यह दरयाफ़्त किया के वह कहाँ है ? उसने उसे मकान में महदूद कर दिया। वह उस वक़्त से आलिम है जब मालूमात का पता भी नहीं था और उस वक़्त से मालिक है जब ममलूकात का निशान भी नहीं था और उस वक़्त से क़ादिर है जब मक़दूरात परदए अदम में पड़े थे।

( आइम्माए (अ 0) दीन) देखो तुलूअ करने वाला तालेअ हो चुका है और चमकने वाला रौशन हो चुका है , ज़ाहिर होने वाले का ज़हूर सामने आ चुका है , कजी सीधी हो चुकी है और अल्लाह एक क़ौैम के बदले दूसरी क़ौम और एक दौर के बदले दूसरा दौर ले आया है। हमने हालात में इन्क़ेलाब का उसी तरह इन्तेज़ार किया है जिस तरह क़हत ज़दा बारिश का इन्तेज़ार करता है। आइम्मा दर हक़ीक़त अल्लाह की तरफ़ से मख़लूक़ात के निगरां और अल्लाह के बन्दों पर उसकी मारेफ़त का सबक़ देने वाले हैं। कोई शख़्स जन्नत में क़दम नहीं रख सकता है जब तक वह उन्हें न पहचान ले और आइम्मा हज़रात उसे अपना न कह दें और कोई शख़्स जहन्नुम में जा नहीं सकता है मगर यह के वह इन हज़रात का इन्कार कर दे और वह भी उसे पहचानने से इन्कार कर दें। परवरदिगार ने तुम लोगों को इस्लाम से नवाज़ा है और तुम्हें उसके लिये मुन्तख़ब किया है। इसलिये के इस्लाम सलामती का निशान और उम्मत का सरमाया है। अल्लाह ने इसके रास्ते का इन्तेख़ाब किया है। इसके दलाएल को वाज़ेअ किया है। ज़ाहिरी इल्म और बातिनी हुकूमतों के मानिन्द इसके ग़राएब फ़ना होने वाले और इसके अजाएब ख़त्म होने वाले नहीं हैं। इसमें नेमतों की बहार और ज़ुल्मतों के चिराग़ हैं। नेकियों के दरवाज़े इसकी कुन्जियों से खुलते हैं और तारीकियों का इज़ाला इसी के चराग़ों से होता है। इसने अपने हुदूद को महफ़ूज़ कर लिया है। उसने अपनी चरागाह को आम कर दिया है। इसमें तालिबे शिफ़ा के लिये शिफ़ा और उम्मीदवार किफ़ायत के लिये बेनियाज़ी का सामान मौजूद है।


153-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(गुमराहों और ग़ाफ़िलों के बारे में)

( गुमराह) यह इन्सान अल्लाह की तरफ़ से मोहलत की मन्ज़िल में है , ग़ाफ़िलों के साथ तबाहियों के गढ़े में गिर पड़ता है और मक्कारों के साथ सुबह करता है। न इसके सामने सीधा रास्ता है और न क़यादत करने वाला पेशवा।

( ग़ाफ़ेलीन) यहाँ तक के जब परवरदिगार ने उनके गुनाहों की सज़ा को वाज़ेअ कर दिया और उन्हें ग़फ़लत के पर्दों से बाहर निकाल दिया तो जिससे मुंह फिराते थे उसी की तरफ़ दौड़ने लगे और जिसकी तरफ़ मुतवज्जो थे उससे मुंह फिराने लगे। जिन मक़ासिद को हासिल कर लिया था उससे भी कोई फ़ायदा नहीं उठाया और जिन हाजतों को पूरा कर लिया था उनसे भी कोई नतीजा नहीं हासिल हुआ!

देखो मैं तुम्हें और ख़ुद अपने नफ़्स को भी इस सूरते हाल से होशियार कर रहा हूँ। हर शख़्स को चाहिये के अपने नफ़्स से फ़ायदा उठाए। साहेबे बसीरत वही है जो सुने तो ग़ौर भी करे और देखे तो (हक़ीक़तों पर) निगाह भी करे और फिर इबरतों से फ़ायदा हासिल करके उस रौशन रास्ते पर चल पड़े जिसमें गुमराही के गड्ढ़े में गिरने से परहेज़ करे और शुबहात में पड़कर गुमराह न हो जाए। हक़ से बेराह होने और बात में रद्दो बदल करने और सच्चाई में ख़ौफ़ खाने से गुमराहियों की मदद करके ज़ियाँकार न बने। (हक़ के खि़लाफ़ गुमराहों की इस तरह मदद न करे के हक़ की राह से इन्हेराफ़ कर ले या गुफ़्तगू में तहरीफ़ से काम ले या सच बोलने का शिकार हो रहा हो।)

मेरी बात सुनने वालों! अपनी मदहोशी से होश में आ जाओ और अपनी ग़ज़ब (ग़फ़लत) से बेदार हो जाओ। सामाने दुनिया मुख़्तसर कर लो और उन निशानियों पर ग़ौरो फ़िक्र करो जो बातें तुम्हारे पास पैग़म्बर उम्मी (स 0) की ज़बान मुबारक से आई हैं उनमें और जिनका इख़्तेयार करना ज़रूरी है (उनमें अच्छी तरह ग़ौरो फ़िक्र) करो के उनसे न कोई चारा है और न कोई गुरेज़ की राह। जो इस बात की मुख़ालफ़त करे उससे इख़्तेलाफ़ करके दूसरे रास्ते पर चल पड़ो और उसे उसकी मर्ज़ी पर चलने दो (के वह अपने नफ़्स की मर्ज़ी पर चलता है) , फ़ख़्रो मुबाहात को छोड़ दो , तकब्बुर को ख़त्म कर दो (बुराई के सर को नीचा कर दो) और अपनी क़ब्र को याद रखो के इसी रास्ते से गुज़रना है और जैसा करोगे वैसा ही मिलेगा और जैसा बोओगे वैसा ही काटना है जो आज भेज दिया है कल उसी का सामना करना है। अपने क़दमों के लिये ज़मीन लो और उस दिन के लिये सामान पहले से भेज दो , होशियार होशियार ऐ सुनने वालों और मेहनत (कोशिश करो) , मेहनत (कोशिश करो) ऐ ग़फलत वालों! मुझ जैसे बाख़बर की तरह कोई (दूसरा) न बताएगा।

देखो! क़ुराने मजीद में परवरदिगार के मुस्तहकम उसूलों में जिस पर सवाब व अज़ाब और रिज़ा व नाराज़गी का दारोमदार है। यह बात है के इन्सान इस दुनिया में किसी क़द्र मेहनत क्यों न करे और कितना ही मुख़लिस क्यों न हो जाए अगर दुनिया से निकल कर अल्लाह की बारगाह में जाना चाहे और दर्ज ज़ैल ख़सलतों से तौबा न करे तो उसे यह जद्दो जेहद और एख़लास अमल कोई फ़ायदा नहीं पहुंचा सकता है। इबादत इलाही में किसी को शरीक क़रार दे अपने नफ़्स की तस्कीन के लिये किसी को हलाक कर दे , एक के काम पर दूसरों को लगा दे , दीन में कोई बिदअत ईजाद करके उसके ज़रिये लोगों से फ़ायदा हासिल करे , लोगों के सामने पालीसी इख़्तेयार करे , या दो ज़बानों के साथ ज़िन्दगी गुज़ारे उस हक़ीक़त को समझ लो के हर शख़्स अपनी नज़र की दलाली पाता है। ;( यह चीज़ है के किसी बन्दे को चाहे वह जो कुछ जतन करवा ले दुनिया से निकल कर अल्लाह की बारगाह में जाना ज़रा फ़ायदा नहीं पहुंचा सकता जबके वह इन ख़सलतों में से किसी एक ख़सलत से तौबा किये बग़ैर मर जाए एक यह के फ़राएज़े इबादत में किसी को इसका शरीक ठहराया हो या किसी को हलाक करके अपने ग़ज़ब को ठन्डा किया हो , या दूसरे के किये पर ऐब लगाया हो या दीन में बिदअतें डाल कर लोगों से अपना मक़सद पुरा किया हो या लोगों से दो रूख़ी चाल चलता हो या वह ज़बानों से लोगों से गुफ़्तगू करता हो इस बात को समझो इसलिये के एक नज़ीर दुसरी नज़ीर की दलील हुआ करती है।)

यक़ीनन चोपायों का सारा हदफ़ उनका पेट होता है और दरिन्दों का सारा निशाना दूसरों पर ज़ुल्म होता है और औरतों का सारा ज़िन्दगानी मक़सद दुनिया की ज़ीनत और फ़साद पर होता है। लेकिन साहेबाने ईमान ख़ुज़ू व खुशु रखने वाले , ( मोमिन वह है जो तकब्बुर व ग़ुरूर से दूर हों) ख़ौफ़े ख़ुदा रखने वाले और उसकी बारगाह में तरसाँ और लरज़ाँ रहते हैं।

154 -आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें फ़ज़ाएले अहलेबैत (अ 0) का ज़िक्र किया गया है)

अक़्लमन्द वह है जो दिल की आंखों से अपने अन्जाम कार को देख लेता है और उसके नशेब व फ़राज़ को पहचान लेता है। दावत देने वाला दावत दे चुका है और निगरानी (निगेहदाष्त) करने वाला निगरानी का फ़र्ज़ अदा कर चुका है। अब तुम्हारा फ़रीज़ा है के दावत देने वाले की आवाज़ पर लब्बैक कहो और निगराँ (निगेहदाष्त करने वाले) के नक़्शे क़दम पर चल पड़ो।

यह लोग फ़ित्नों के दरयाओं में डूब गए हैं और सुन्नत को छोड़कर बिदअतों को इख़्तेयार कर लिया है। मोमेनीन गोशा व किनार में दबे हुए हैं और गुमराह और इफ़तेराए परवाज़ मसरूफ़े कलाम हैं।

दर हक़ीक़त हम अहलेबैत ही देन के निशान और उसके साथी , इसके एहकाम के ख़ज़ानेदार और इसके दरवाज़े हैं , ज़ाहिर है के घरों में दाखि़ल दरवाज़ों के बग़ैर नहीं हो सकता है वरना इन्सान चोर कहा जाता है।

इन्हीं अहलेबैत (अ 0) के बारे में क़ुरआने करीम की अज़ीम आयात हैं और यही रहमान के ख़ज़ानेदार हैं , यह जब बोलते हैं तो सच बोलते हैं और जब क़दम आगे बढ़ाते हैं तो कोई इन पर सबक़त नहीं ले जा सकता है। हर ज़िम्मेदार क़ौम का फ़र्ज़ है के अपने क़ौम से सच बोले और अपनी अक़ल को गुम न होने दे और फ़रज़न्दाने आख़ेरत में शामिल हो जाए के उधर ही से आया है और उधर ही पलट कर जाना है। यक़ीनन दिल की आंखों से देखने वाले और देख कर अमल करने वाले के अमल की इब्तेदा उसके इल्म से होती है के इसका अमल उसके लिये मुफ़ीद है या इसके खि़लाफ़ है। अगर मुफ़ीद है तो इसी रास्ते पर चलता रहे और अगर मुज़िर है तो ठहर जाए के इल्म के बग़ैर अमल करने वाला ग़लत रास्ते पर चलने वाले के मानिन्द है के जिस क़द्र रास्ते तय करता जाएगा मन्ज़िल से दूरतर होता जाएगा और इल्म के साथ अमल करने वाला वाज़ेअ रास्ते पर चलने के मानिन्द है। लेहाज़ा हर आंख वाले को यह देख लेना चाहिये के वह आगे बढ़ रहा है या पीछे हट रहा है और याद रखो के हर ज़ाहिर के लिये उसी का जैसा बातिन भी होता है लेहाज़ा अगर ज़ाहिर पाकीज़ा होगा तो बातिन भी पाकीज़ा होगा और अगर ज़ाहिर ख़बीस हो गया तो बातिन भी ख़बीस हो जाएगा। रसूले सादिक़ ने सच फ़रमाया है के “ अल्लाह कभी कभी किसी बन्दे को दोस्त रखता है और उसके अमल से बेज़ार होता है और कभी अमल को दोस्त रखता है और ख़ुद उसी से बेज़ार रहता है।

याद रखो के हर अमल सब्ज़े की तरह गिरने वाला होता है और सब्ज़ा पानी से बेनियाज़ नहीं हो सकता है और पानी भी तरह तरह के होते हैं लेहाज़ा सिंचाई पाकीज़ा पानी से होगी तो पैदावार भी पाकीज़ा होगी और फल भी शीरीं होगा और अगर सिंचाई ही ग़लत पानी से होगी तो पैदावार भी ख़बीस होगी और फल भी कड़वे होंगे।

155-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें चिमगादड़ की अजीब व ग़रीब खि़लक़त का ज़िक्र किया गया है)

सरी तारीफ़ उस अल्लाह के लिये है जिसकी मारेफ़त की गहराइयों से औसाफ़ आजिज़ हैं और जिसकी अज़मतों ने अक़्लों को आगे बढ़ने से रोक दिया है तो अब इसकी सल्तनतों की हदों तक पहुंचने का कोई रास्ता नहीं रह गया है।

वह ख़ुदाए बरहक़ व आशकार है , उससे ज़्यादा साबित और वाज़ेह है जो आंखों के मुशाहिदे में आ जाता है , अक़्लें उसकी हदबन्दी नहीं कर सकती हैं के वह किसी की शबीह क़रार दे दिया जाए और ख़यालात उसका अन्दाज़ा नहीं लगा सकते हैं के वह किसी की मिसाल बना दिया जाए। उसने मख़लूक़ात को बग़ैर किसी नमूने और मिसाल के और किसी मुशीर के मश्विरे या मददगार की मदद के बनाया है। उसकी तख़लीक़ उसके अम्र से तकमील हुई है और फिर उसी की इताअत के लिये सर ब सुजूद है और बिला तौक़फ़ उसकी आवाज़ पर लब्बैक कहती है और बग़ैर किसी इख़्तेलाफ़ के सामने सरनिगूं होती है।

उसकी लतीफ़तरीन सनअत और अजीबतरीन खि़लक़त का एक नमूना वह है जो उसने अपनी दक़ीक़तरीन हिकमत से चमगादड़ की तख़लीक़ में पेश किया है के जिसे हर “ शै को वुसअत देने वाली रोशनी सुकेड़ देती है और हर ज़िन्दा को सुकेड़ देने वाली तारीकी वुसअत अता कर देती है। किस तरह उसकी आँखें चकाचैन्द हो जाती है के रौशन आफ़ताब की शुआओं से मदद हासिल करके अपने रास्ते तय कर सके और खुली हुई आफ़ताब की रोशनी के ज़रिये अपनी जानी मन्ज़िलों तक पहुंच सके (हालांके वह हर ज़िन्दा “ शै की आंखों पर नक़ाब डालने वाला है और क्यूंके चमकते हुए सूरज में इनकी आंखें चुन्धिया जाती हैं के वह उसकी नूरपाश शुआओं से मदद ले कर अपने रास्तों पर आ जा सकें और नूरे आफ़ताब के फैलाव में अपनी जानी पहचानी हुई चीज़ों तक पहुंच सकें)। नूरे आफ़ताब ने अपनी चमक दमक के ज़रिये उसे रौशनी के तबक़ात में आगे बढ़ने से रोक दिया है और रोशनी के उजाले में आने से रोक कर मख़फ़ी मक़ामात पर छिपा दिया है। दिन में इसकी पलकें आंखों पर लटक आती हैं और रात को चिराग़ बनाकर वह तलाशे रिज़्क़ में निकल पड़ती है। इसकी निगाहों को रात की तारीकी नहीं पलटा सकती है और इसको रास्ते में आगे बढ़ने से शदीद ज़ुलमत भी नहीं रोक सकती है। इसके बाद जब आफ़ताब अपने नक़ाब को उलट देता है और दिन का रौशन चेहरा सामने आ जाता है और आफ़ताब की किरने बिज्जू के सूराख़ तक पहुंच जाती हैं तो इसकी पलकें आंखों पर लटक आती हैं और जो कुछ रात की तारीकियों में हासिल कर लिया है उसी पर गुज़ारा शुरू कर देती है। क्या कहना उस माबूद का जिसने इसके लिये रात को दिन और वसीलए मआश बना दिया है और दिन को वज्हे सुकून व क़रार मुक़र्रर कर दिया है और फिर उसके लिये ऐसे गोश्त के पर बना दिये हैं जिसके ज़रिये वक़्ते ज़रूरत परवाज़ भी कर सकती है। गोया के यह कान की लौएं हैं जिनमें न पर हैं और न करयां मगर इसके बावजूद तुम देखोगे के कानों की जगहों के निशानात बिल्कुल वाज़ेअ हैं और इसके ऐसे दो पर बन गए हैं जो न इतने बारीक हैं के फट जाएं और न इतने ग़लीज़ हैं के परवाज़ में ज़हमत हो। इसकी परवाज़ की शान यह है के अपने बच्चे को साथ लेकर सीने से लगाकर परवाज़ करती है , जब नीचे उतरती है तो बच्चा साथ होता है और जब ऊपर उड़ती है तो बच्चा हमराह होता है और उस वक़्त तक उससे अलग नहीं होता है जब क उसके आज़ाअ मज़बूत न हो जाएं और उसके पर उसका बोझ उठाने के क़ाबिल न हो जाएं और वह अपने रिज़्क़ के रास्तों और मसलहतों को ख़ुद पहचान न ले। पाक व बेनियाज़ है वह हर “ शै का पैदा करने वाला जिसने किसी ऐसी मिसाल का सहारा नहीं लिया जो किसी दूसरे से हासिल की गई हो।

156-आपका इरशादे गिरामी

(जिसमें अहले बसरा से खि़ताब करके उन्हें हवादिस से बाख़बर किया गया है)

ऐसे वक़्त में अगर कोई शख़्स अपने नफ़्स को सिर्फ़ ख़ुदा तक महदूद रखने की ताक़त रखता है तो उसे ऐसा ही करना चाहिये। फिर अगर तुम मेरी इताअत करोगे तो मैं तुम्हें इन्शा अल्लाह जन्नत के रास्ते पर चलाउंगा चाहे इसमें कितनी ही ज़हमत और तल्ख़ी क्यों न हो।

रह गई फ़लां ख़ातून की बात तो उन पर औरतों की जज़्बाती राय का असर हो गया है और इस कीने ने असर कर दिया है जो उनके सीने में लोहार के कढ़ाव की तरह खौल रहा है।

(((- इस लफ़्ज़ से मुरद मुसल्लम तौर पर हज़रत आइशा की ज़ात है लेकिन आपने उन्हें नाम के साथ क़ाबिले ज़िक्र नहीं क़रार दिया है और उनकी दो अज़ीम कमज़ारियों की तरफ़ मुतवज्जो किया है , एक यह है के इनमें आम औरतों की जज़्बाती कमज़ोरी पाई जाती है जो अक्सर एहकामे दीन और मर्ज़ीए परवरदिगार पर ग़ालिब आ जाती है जबके अज़वाजे रसूल (स 0) को इस कमज़ोरी से बलन्दतर होना चाहिए , और दूसरी बात यह है के इनके दिल में कीना पाया जाता है के इनके बारे में रसूले अकरम (स 0) के वह इरशादात नहीं हैं जो हज़रत अली (अ 0) के बारे में हैं और उन्हें क़ुदरत ने क़ाबिले औलाद न बनाकर नस्ले अली (अ 0) को नस्ले पैग़म्बर (स 0) बना दिया है।-)))

उन्हें अगर मेरे अलावा किसी और के साथ इस बरताव की दावत दी जाती तो कभी न आतीं लेकिन उसके बाद भी मुझे उनकी साबेक़ा हुरमत का ख़याल है। इनका हिसाब बहरहाल परवरदिगार के ज़िम्मे है।

ईमान का रास्ता बिल्कुल वाज़ेह और इसका चिराग़ मुकम्मल तौर पर नूर अफ़्षाँ है। ईमान ही के ज़रिये नेकियों का रास्ता हासिल किया जाता है और नेकियों ही के ज़रिये से ईमान की पहचान होती है। ईमान से इल्म की दुनिया आबाद होती है और इल्म से मौत का ख़ौफ़ हासिल होता है और मौत ही पर दुनिया का रास्ता है। (ईमान की राह सब राहों से वाज़ेअ और सब चिराग़ों से ज़्यादा नुरानी है ईमान से नेकियों पर इस्तेदलाल किया जाता है और नेकियों से ईमान पर दलील लाई जाती है , ईमान से इल्म की दुनिया आबाद होती है और इल्म की बदौलत मौत से डराया जाता है और दुनिया से आख़ेरत हासिल की जाती है।) और दुनिया ही के ज़रिये आख़ेरत हासिल की जाती है और आखि़रत ही में जन्नत को क़रीब कर दिया जाएगा और जहन्नम को गुमराहों के लिये बिल्कुल नुमायां किया जाएगा। मख़लूक़ात के लिये क़यामत से पहले कोई मन्ज़िल नहीं है। उन्हें इस मैदान में आखि़री मन्ज़िल की तरफ़ बहरहाल दौड़ लगाना है।

( क दूसरा हिस्सा) वह अपनी क़ब्रों से उठ खड़े हुए और अपनी आखि़री मन्ज़िल की तरफ़ चल पड़े। हर घर के अपने अहल होते हैं जो न घर को बदलते हैं और न उससे मुन्तक़िल हो सकते हैं।

यक़ीनन अम्रे बिल मारूफ़ और नहीं अनिल मुन्किर यह दो ख़ुदाई इख़्लाक़ हैं और यह न किसी की मौत को क़रीब बनाते हैं और न किसी की रोज़ी को कम करते हैं। तुम्हारा फ़र्ज़ है के किताबे ख़ुदा से वाबस्ता रहो के वही मज़बूत रसीमाने हिदायत और रौशन नूरे इलाही है। इसी में मनफ़अत बख़्श शिफ़ा है और इसी में प्यास बुझाने वाली सेराबी है। वही तमस्सुक करने वालों के लिये वसीलए अज़मत किरदार है और वही राबेता रखने वालों के लिये ज़रियए निजात है। उसी में कोई कजी नहीं है जिसे सीधा किया जाए और उसी में इन्हेराफ़ नहीं है जिसे दुरूस्त किया जाए , मुसलसल तकरार उसे पुराना नहीं कर सकती है और बराबर सुनने से उसकी ताज़गी में फ़र्क़ नहीं आता है जो इसके ज़रिये कलाम करेगा वह सच्चा होगा और जो इसके मुताबिक़ अमल करेगा वह सबक़त ले जाएगा।

इस दरम्यान एक शख़्स खड़ा हो गया और उसने कहा या अमीरूल मोमेनीन (अ 0) ज़रा फ़ित्ना के बारे में बतलाएं ? क्या आपने इस सिलसिले में रसूले अकरम (स 0) से दरयाफ़्त किया है ? फ़रमाया जिस वक़्त आयत शरीफ़ नाज़िल हुई “ क्या लोगों का ख़याल यह है के उन्हें ईमान के दावा ही पर छोड़ दिया जाएगा और उन्हें फ़ित्नों में मुब्तिला नहीं किया जाएगा ” तो हमें अन्दाज़ा हो गया के जब तक रसूले अकरम (स 0) मौजूद हैं फ़ित्ना का कोई अन्देशा नहीं है लेहाज़ा मैंने अर्ज़ किया के या रसूलल्लाह यह फ़ित्ना क्या है जिसकी परवरदिगार ने आपको इत्तेलाअ दी है ? फ़रमाया या अली (अ 0)! यह उम्मत मेरे बाद फ़ित्ने में मुब्तिला होगी। मैंने अर्ज़ की क्या आपने ओहद के दिन जब कुछ मुसलमान राहे ख़ुदा में शहीद हो गए और मुझे शहादत का मौक़ा नसीब नहीं हुआ और मुझे यह सख़्त तकलीफ़ महसूस हुई , तो क्या यह नहीं फ़रमाया था के या अली (अ 0)! बशा रत हो , शहादत तुम्हारे पीछे आ रही है ? फ़रमाया बेशक! यूं कहो उस वक्त तुम्हारा सब्र कैसा होगा ? मैंने अर्ज़ की के या रसूलल्लाह यह तो सब्र का मौक़ा नहीं है बल्कि मसर्रत और शुक्र का मौक़ा है।

(((- इन फ़िक़रों को देखने के बाद कोई शख़्स ईमान व अमल के राबते को नज़र अन्दाज़ नहीं कर सकता है और न ईमान को अमल से बे नियाज़ बना सकता है। ईमान से लेकर आख़ेरत तक इतना हसीन तसलसुल किसी दूसरे इन्सान के कलाम में नज़र नहीं आ सकता है और यह मौलाए कायनात की एजाज़े बयानी का एक बेहतरीन नमूना है।

अम्र बिल मारूफ़ और नहीं अनिल मुन्किर के बारे में पैदा होने वाले “ शैतानी वसवसों का जवाब इन कलेमात में मौजूद है और इन दोनों की अज़मत के लिये इतना ही काफ़ी है के न सिर्फ़ इन कामों में मालिक भी बन्दों के साथ शरीफ़ है बल्के उसने पहले अम्र व नहीं किया है। इसके बाद बन्दों को अम्र व नहीं का हुक्म दिया है। इस कुल्ले ईमान का किरदार जो ज़िन्दगी को हदफ़ और मक़सद नहीं बल्कि वसीलाए ख़ैरात तसव्वुर करता है और जब यह अन्दाज़ा हो जाता है के ज़िन्दगी की क़ुरबानी ही तमाम ख़ैरात , ज़कात का मक़सद है तो इस क़ुरबानी के नाम पर सजदए शुक्र करता है और लफ़्ज़े सब्र व तहम्मूल को बरदाश्त नहीं करता है।-)))

बन्दगाने ख़ुदा! उस दिन से डरो जब आमाल की जांच पड़ताल की जाएगी और ज़लज़लों की बोहतात होगी के बच्चे तक बूढ़े हो जाएंगे। याद रखो ऐ बन्दगाने ख़ुदा! के तुम पर तुम्हारे ही नफ़्स को निगराँ बनाया गया है और तुम्हारे आज़ा व जवारेह तुम्हारे लिये जासूसों का काम कर रहे हैं और कुछ बेहतरीन मुहाफ़िज़ हैं जो तुम्हारे आमाल और तुम्हारी सांसों की हिफ़ाज़त कर रहे हैं। उनसे न किसी तारीक रात की तारीकी छिपा सकती है और न बन्द दरवाज़े उनसे ओझल बना सकते हैं। और कल आने वाला दिन आज से बहुत क़रीब है। आज का दिन अपना साज़ व सामान लेकर चला जाएगा और कल का दिन उसके पीछे आ रहा है , गोया हर शख़्स ज़मीन में अपनी तन्हाई की मन्ज़िल और गढ़े के निशान तक पहुंच चुका है। हाए वह तन्हाई का घर , वहशत की मन्ज़िल और ग़ुरबत का मकान , गोया के आवाज़ तुम तक पहुंच चुकी है और क़यामत तुम्हें अपने घेरे में ले चुकी है और तुम्हें आखि़री फ़ैसले के लिये क़ब्रों से निकाला जा चुका है। जहां तमाम बातिल बातें ख़त्म हो चुकी हैं और तमाम हीले बहाने कमज़ोर पड़ चुके , हक़ाएक़ साबित हो चुके हैं और उमूर पलट कर अपनी मन्ज़िल पर आ गए हैं। लेहाज़ा इबरतों से नसीहत हासिल करो। तग़य्युराते ज़माना से इबरत का सामान फ़राहम करो और फिर डराने वाले की नसीहत से फ़ायदा उठाओ।


157-आपका इरशादे गिरामी

तमाम हम्द उस ख़ुदा के लिये है जिसने हम्द को अपने ज़िक्र का इफ़तेताहिया , अपने फ़ज़्ल व एहसान के बढ़ाने का ज़रिया और अपनी नेमतों और अज़मतों का दलीले राह क़रार दिया है।

ऐ अल्लाह के बन्दों! बाक़ी मान्दा लोगों के साथ भी ज़माने की वही रौशन रहेगी जो गुज़र जाने वाले के साथ थी। जितना ज़माना गुज़र चुका है वह पलट कर नहीं आएगा और जो कुछ उसमें है वह भी हमेशा रहने वाला नहीं , आखि़र में भी इसकी कारगुज़ारियां वही होंगी जो पहले रह चुकी हैं और इसके झण्डे एक दूसरे के अक़ब में हैं। गोया तुम क़यामत के दामन से वाबस्ता हो के वह तुम्हें धकेलकर इस तरह लिये जा रही है जिस तरह ललकारने वाला अपनी ऊंटनियों को , जो शख़्स अपने नफ़्स को संवारने के बजाए चीज़ों में पड़ जाता है वह तीरगियों में सरगर्दां और हलाकतों में फंसा रहता है और शयातीन उसे सरकशियों में खींच कर ले जाते हैं और उसकी बदआमालियों को उसके सामने सज (सजा) देते हैं आगे बढ़ने वालों की आखि़री मंज़िल जन्नत है और अमदन कोताहियां करने वालों की हद जहन्नम है।

अल्लाह के बन्दों! याद रखो के तक़वा एक मज़बूत क़िला है और फ़िस्क़ व फ़ुजूर एक (कमज़ोर) चारदीवारी है के जो न अपने रहने वालों से तबाहियों को रोक सकती है और न उनकी हिफ़ाज़त कर सकती है। देखो तक़वा ही वह चीज़ है के जिससे गुनाहों का डंक काटा जाता है और यक़ीन ही से मुफ़तबाए मक़सद की कामरानियां हासिल होती हैं। ऐ अल्लाह के बन्दों। अपने नफ़्स के बारे में के जो तुम्हें तमाम नफ़्सों से ज़्यादा अज़ीज़ व महबूब है अल्लाह से डरो! उसने तुम्हारे लिये हक़ का रास्ता खोल दिया है और उसकी राहें उजागर कर दी हैं। अब या तो अनमिट बदबख़्ती होगी या दाएमी ख़ुश बख़्ती व सआदत , दारे फ़ानी से आलिमे बाक़ी के लिये तौशा मुहय्या कर लो , तुम्हें ज़ादे राह का पता दिया जा चुका है और कूच का हुक्म मिल चुका है और चल चलाओ के लिये जल्दी मचाई जा रही है , तुम ठहरे हुए सवारों के मानिन्द हो के तुम्हें यह पता नही के कब रवानगी का हुक्म दिया जाएगा , भला वह दुनिया को लेकर क्या करेगा जो आख़ेरत के लिये पैदा किया गया हो , और उस माल का क्या करेगा जो अनक़रीब उससे छिन जाने वाला है और उसका मज़लेमा व हिसाब उसके ज़िम्मे रहने वाला है।

अल्लाह के बन्दों! ख़ुदा ने जिस भलाई का वादा किया है उसे छोड़ा नहीं जा सकता और जिस बुराई से रोका है उसकी ख़्वाहिश नहीं की जा सकती। अल्लाह के बन्दों! उस दिन से डरो के जिसमें हमलों की जांच पड़ताल और ज़लज़लों की बोहतात होगी और बच्चे तक इसमें बूढ़े हो जाएंगे।

अल्लाह के बन्दों! यक़ीन रखो के ख़ुद तुम्हारा ज़मीर तुम्हारा निगेहबान और ख़ुद तुम्हारे आज़ा व जवारेह तुम्हारे निगरान हैं और तुम्हारे हमलों और सांसों की गिनती को सही-सही याद रखने वाले (करामा कातिबैन) हैं उनसे न अन्धेरी रात की अन्धयारियां छिपा सकती हैं और न बन्द दरवाज़े तुम्हें ओझल रख सकते हैं बिला शुबह आने वाला “ कल ” आज के दिन से क़रीब है।

“ आज का दिन ” अपना सब कुछ लेकर जाएगा और “ कल ” उसके अक़ब में आया ही चाहता है। गोया तुममें से हर शख़्स ज़मीन के इस हिस्से पर के जहां तन्हाई की मन्ज़िल और गड्ढे का निशान (क़ब्र) है पहुंच चुका है और क़यामत तुम पर छा गई है और आख़ेरी फ़ैसला सुनने के लिये तुम (क़ब्रों से) निकल आए हो बातिल के परदे तुम्हारी आंखों से हटा दिये गये हैं और तुम्हारे हीले बहाने दब चुके हैं और हक़ीकतें तुम्हारे लिये साबित हो गई हैं और तमाम चीज़ें अपने-अपने मक़ाम की तरफ़ पलट पड़ी हैं , इबरतों से पन्द व नसीहत और ज़माने के उलटफेर से इबरत हासिल करो , और डराने वाली चीज़ों से फ़ायदा उठाओ।

158-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें रसूले ख़ुदा की बासत और क़ुरान की फ़ज़ीलत के साथ बनी उमय्या की हुकूमत का ज़िक्र किया गया है)

अल्लाह ने पैग़म्बर को उस वक़्त भेजा जब रसूलों का सिलसिला रूका हुआ था और क़ौमें गहरी नींद में मुब्तिला थीं और दीन की मुस्तहकम रस्सी के बल खुल चुके थे , आपने आकर पहले वालों की तस्दीक़ की और वह नूर पेश किया जिसकी इक़्तेदा की जाए और वह यही क़ुरान है। उसे बुलवाकर देखो और यह ख़ुद नहीं बोलेगा , मैं इसकी तरफ़ से तर्जुमानी करूंगा , याद रखो के इसमें मुस्तक़बिल का इल्म है और माज़ी की दास्तान है। तुम्हारे दर्द की दवा है और तुम्हारे कामो की तन्ज़ीम का सामान है। (इसका दूसरा हिस्सा) उस वक़्त कोई शहरी या देहाती मकान ऐसा न बचेगा जिसमें ज़ालिम ग़म व अलम को दाखि़ल न कर दें और उसमें सख्तियो का गुज़र न हो जाए। उस वक़्त इनके लिये न आसमान में कोई माफ करने वाला होगा और न ज़मीन में मददगार , तुमने इस अम्र के लिये नाअहलों का इन्तेख़ाब किया है और उन्हें दूसरे के घाट पर उतार दिया है और अनक़रीब ख़ुदा ज़ालिमों से इन्तेक़ाम लेगा। खाने के बदले में खाने से , पीने के बदले में पीने का यूं के इन्हें खाने के लिये ख़ेज़ाल का खाना और पीने के लिये एलवा का और ज़हर हलाहल का पीना , ख़ौफ़ का अन्दरूनी लिबास और तलवार का बाहर का लिबास होगा , यह ज़ालिम लोगों की सवारियां और गुनाहों के बारे बरादार ऊंट हैं , लेहाज़ा मैं बार-बार क़सम खाकर कहता हूं के बनी उमय्या मेरे बाद इस खि़लाफ़त को इस तरह थूक देंगे , ( थूक देना पड़ेगा) जिस तरह बलग़म को थूक दिया जाता है और फिर जब तक शब व रोज बाक़ी हैं इसका मज़ा चखना और उससे लज़्ज़त हासिल करना नसीब न होगा।

(((- मालिके कायनात ने इन्सान की फ़ितरत के अन्दर एक सलाहियत रखी है जिसका काम है नेकियों पर सुकून व इत्मीनान का सामान फ़राहम करना और बुराइयों पर तम्बीह व सरज़निश करना , अर्फ़ आम में इसे ज़मीर से ताबीर किया जाता है जो उस वक़्त भी बेदार रहता है जब आदमी ग़फ़लत की नींद सो जाता है और उस वक़्त भी मसरूफ़े तम्बीह रहता है जब इन्सान मुकम्मल तौर पर गुनाहों में डूब जाता है। यह सलाहियत अपने मक़ाम पर हर इन्सान में वदीअत की गई है। फ़र्क़ सिर्फ़ यह है के अच्छाई और बुराई का इदराक भी कभी फ़ितरी होता है जैसे एहसान की अच्छाई और ज़ुल्म की बुराई , और कभी इसका ताल्लुक़ समाज , मुआशरा या दीन व मज़हब से होता है। तो जिस चीज़ को मज़हब या समाज अच्छा कह देता है ज़मीर उससे मुतमईन हो जाता है आर जिस चीज़ को बुरा क़रार दे देता है इस पर मज़म्मत करने लगता है और उस मदह या ज़म का ताअल्लुक़ फ़ितरत के एहकाम से नहीं होता है बल्कि समाज या क़ानून के एहकाम से होता है।-)))

159-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें रिआया के साथ अपने हुस्ने सुलूक का ज़िक्र फ़रमाया है)

मैं तुम्हारे हमसाये में निहायत दरजए ख़ूबसूरती के साथ रहा और जहां तक मुमकिन हुआ तुम्हारी हिफ़ाज़त और निगेहदाष्त करता रहा और कजी ज़िल्लत की रस्सी और ज़ुल्म के फन्दों से आज़ाद कराया के मैं तुम्हारी मुख़्तसर नेकी का शुक्रिया अदा कर रहा था और तुम्हारी उन तमाम बुराईयों को जिन्हें मैंने देख लिया था उससे चश्म पोशी कर रहा था (जो मेरी आंखों के सामने और मेरी मौजूदगी में होती थीं)।

160-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(अज़मते परवरदिगार)

उसका अम्र फ़ैसलाकुन और सरापा हिकमत है और उसकी रिज़ा मुकम्मल अमान और रहमत है , वह अपने इल्म से फ़ैसला करता है और अपने हिल्म की बिना पर माफ़ कर देता है। (हम्दे ख़ुदा) परवरदिगार तेरे लिये इन तमाम चीज़ों पर हम्द है जिन्हें तू ले लेता है या अता कर देता है और जिन बलाओं से निजात देता है या जिन में मुब्तिला कर देता है , ऐसी हम्द जो तेरे लिये इन्तेहाई पसन्दीदा हो और महबूबतरीन हो और बेहतरीन हो। (तेरे नज़दीक हर सताइश से बढ़ चढ़ कर हो) ऐसी हम्द जो सारी कायनात को ममलूक कर दे (भर दे) और जो तूने चाहा है उसकी हद तक पहुंच जाए (जहां तक चाहे पहुंच जाए) , ऐसी हम्द के जिसके आगे तेरी बारगाह तक पहुंचने से न कोई हिजाब है और न उसके लिये कोई बन्दिश ? ऐसी हम्द के जिसकी गिनती न कहीं पर टूटे और न इसका सिलसिला ख़त्म हो , हम तेरी अज़मत व बुज़ुर्गी की हक़ीक़त को नहीं जानते मगर इतना के तू ज़िन्दा व कारसाज़ (आलम) है न तुझे ग़ुनूदगी होती है और न नींद आती है , न तारे नज़र तुझ तक पहुंच सकता है और न निगाहें तुझे देख सकती हैं तूने नज़रों को पा लिया है और उम्रों का अहाता कर लिया है और पेशानी के बालों को पैरों (से मिलाकर) गिरफ़्त में ले लिया है , यह तेरी मख़लूक़ क्या है जो हम देखते हैं और इसमें तेरी क़ुदरत (की कारफ़रमाइयों) पर इसकी तौसीफ़ करते हैं हालांके दर हक़ीक़त वह (मख़लूक़ात) जो हमारी आंखों से ओझल है और जिस तक पहुंचने से हमारी नज़रें आजिज़ और अक़्लें दरमान्दा हैं और हमारे और जिन के दरम्यान ग़ैब के परदे हाएल हैं इससे कहीं ज़्यादा बा अज़मत है जो शख़्स (वसवसों से) अपने दिल को ख़ाली करके और ग़ौर व फ़िक्र (की क़ूवतों) से काम लेकर यह जानना चाहे के तूने क्योंकर अर्ष को क़ायम किया है और किस तरह मख़लूक़ात को पैदा किया है और क्योंकर आसमानों को फ़िज़ा में लटकाया है और किस तरह पानी के थपेड़ों पर ज़मीन को बिछाया है। तो उसकी आंखें थक कर और अक़्ल मग़लूब होकर और कान हैरान व सरासीमा और फ़िक्र गुमगष्ता राह होकर पलट आएगी।

इसी ख़ुतबे का एक जुज़ यह है वह अपने ख़याल में इसका दावेदार बनता है के उसका दामने उम्मीद अल्लाह से वाबस्ता है , ख़ुदाए बरतर की क़सम वह झूठा है (अगर ऐसा ही है) तो फिर क्यों उसके आमाल में इस उम्मीद की झलक नुमायां नहीं होती जबके हर उम्मीदवार के कामों में उम्मीद की पहचान हो जाया करती है। सिवाये उस उमीद के जो अल्लाह से लगाई जाए के उसमें खोट पाया जाता है और हर ख़ौफ़ व हेरास जो (दूसरों से हो) एक मुसल्लमए हक़ीक़त रखता है , मगर अल्लाह का ख़ौफ़ ग़ैर यक़ीनी है और अल्लाह से बड़ी चीज़ों का और बन्दों से छोटी चीज़ों का उम्मीदवार होता है फिर भी जो आजिज़ी का रवैया बन्दों से रखता है वह रवय्या अल्लाह से नहीं बरतता तो आखि़र क्या बात है के अल्लाह के हक़ में इतना भी नहीं किया जाता जितना बन्दों के लिये किया जाता है क्या तुम्हें कभी इसका अन्देशा हुआ है के कहीं तुम इन उम्मीदों (के दावों ) में झूटे तो नहीं ? या यह के तुम महले उम्मीद ही नहीं समझते। यूंही इन्सान अगर उसके बन्दों में से किसी बन्दे से डरता है तो जो ख़ौफ़ की सूरत इसके लिये इख़्तेयार करता है अल्लाह के लिये वैसी सूरत इख़्तेयार नहीं करता , इन्सानों का ख़ौफ़ तो उसने नक़द की सूरत में रखा है और अल्लाह का डर सिर्फ़ टाल मटोल और (ग़लत सलत) वादे यूंही जिसकी नज़रों में दुनिया अज़मत पा लेती है और उसके दिल में इसकी अज़मत व वुसअत बढ़ जाती है तो वह उसे अल्लाह पर तरजीह देता है और उसकी तरफ़ मुड़ता है और उसी का बन्दा होकर रह जाता है। तुम्हारे लिये रसूलल्लाह (स 0) का क़ौल व अमल पैरवी के लिये काफ़ी है और उनकी ज़ात दुनिया के ऐब व नुक़्स और उसकी रूसवाइयों और बुराइयों की कसरत दिखाने के लिये रहनुमा है। इसलिये के इस दुनिया के दामनों को उससे समेट लिया गया और दूसरों के लिये उसकी वुसअतें मुहय्या कर दी गईं और इस (ज़ाले दुनिया की छातियों से) आपका दूध छुड़ा दिया गया अगर दूसरा नमूना चाहो तो मूसा कलीमुल्लाह हैं के जिन्होंने अपने अल्लाह से कहा के परवरदिगार! तू जो कुछ भी इस वक़्त थोड़ी बहुत नेमत भेज देगा मैं उसका मोहताज हूं। ख़ुदा की क़सम उन्होंने सिर्फ़ खाने के लिये रोटी का सवाल किया था , चूंके वह ज़मीन का साग पात खाते थे और लाग़री और (जिस्म पर) गोश्त की कमी की वजह से उनके पेट की नाज़ुक जिल्द से घास पात की सब्ज़ी दिखाई देती थी , अगर चाहो तो तीसरी मिसाल दाऊद (अ 0) की सामने रख लो , जो साहबे ज़बूर और अहले जन्नत के क़ारी हैं , वह अपने हाथ से खजूर की पत्तियों की टोकरियां बनाया करते थे और अपने साथियों से फ़रमाते थे के तुममें से कौन है जो इन्हें बेच कर मेरी दस्तगीरी करे (फिर) जो उसकी क़ीमत मिलती उससे जौ की रोटी खा लेते थे , अगर चाहो तो ईसा इब्ने मरयम (अ 0) का हाल कहो के जो (सर के नीचे) पत्थर का तकिया रखते थे सख़्त और खुरदुरा लिबास पहनते थे और (खाने) में सालन के बजाय भूक और रात के चिराग़ की जगह चान्द और सर्दियों में साये के बजाये (उनके सर पर) ज़मीन के मशरिक़ व मग़रिब का साएबान होता था और ज़मीन जो घास फूस चैपायों के लिये उगाती थी वह उनके लिये फल फूल की जगह थी न उनकी बीवी थीं जो उन्हें दुनिया (के झंझटों) में मुब्तिला करतीं और न बाल बच्चे थे के उनके लिये फ़िक्र व अन्दोह का सबब बनते और न माल व मताअ था के उनकी तवज्जो को मोड़ता और न कोई लालच थी के उन्हें रूसवा करती। उनकी सवारी उनके दोनों पांव और ख़ादिम उनके दोनों हाथ थे। तुम अपने पाक व पाकीज़ा नबी (स 0) की पैरवी करो चूंके उनकी ज़ात इत्तेबाअ करने वाले के लिये नमूना और सब्र करने वाले के लिये ढारस है। उनकी पैरवी करने वाला और उनके नक़्शे क़दम पर चलने वाला ही अल्लाह को सबसे ज़्यादा महबूब है जिन्होंने दुनिया को (सिर्फ़ ज़रूरत भर) चखा और उसे नज़र भर कर नहीं देखा वह दुनिया में सबसे ज़्यादा शिकम तही में बसर करने वाले और ख़ाली पेट रहने वाले थे। उनके सामने दुनिया की पेशकश की गई तो उन्होंने उसे क़ुबूल करने से इन्कार कर दिया और (जब) जान लिया के अल्लाह ने एक चीज़ को बुरा जाना है तो आप (अ 0) ने भी उसे बुरा ही जाना और अल्लाह ने एक चीज़ को हक़ीर समझा है तो आपने भी उसे हक़ीर ही समझा और अल्लाह ने एक चीज़ को पस्त क़रार दिया है तो आप ने भी उसे पस्त ही क़रार दिया। अगर हम में सिर्फ़ यही एक चीज़ हो के हम उस “ शै को चाहने लगें जिसे अल्लाह और रसूल (स 0) बुरा समझते हैं तो अल्लाह की नाफ़रमानी और उसके हुक्म से सरताबी के लिये यही बहुत है। रसूलल्लाह (स 0) ज़मीन पर बैठकर खाना खाते थे और ग़ुलामों की तरह बैठते थे , अपने हाथ से जूती टांकते थे और अपने हाथों से कपड़ों में पेवन्द लगाते थे और बेपालान के गधे पर सवार होते थे और अपने पीछे किसी को बिठा भी लेते थे , घर के दरवाज़े पर (एक दफ़ा) ऐसा पर्दा पड़ा था जिसमें तसवीरें थें तो आपने अपनी अज़वाज में से एक को मुख़ातब करके फ़रमाया इसे मेरी नज़रों से हटा दो , जब मेरी नज़रें इस पर होती हैं तो मुझे दुनिया और इसकी आराइशे याद आ जाती हैं। आपने दुनिया से दिल हटा लिया था और उसकी याद तक अपने नफ़्स से मिटा डाली थी और यह चाहते थे के उसकी सज धज निगाहों से पोशीदा रहे ताके न उससे उम्दा उम्दा लिबास हासिल करें और न उसे अपनी मन्ज़िल ख़याल करें और न उसमें ज़्यादा क़याम की आस लगाएं। उन्होंने इसका ख़याल नफ़्स से निकाल दिया और दिल से उसे हटा दिया था और निगाहों से उसे ओझल रखा था , यूंही जो शख़्स किसी “ शै को बुरा समझता है तो न उसे देखना चाहता है और न उसका ज़िक्र सुनना गवारा करता है। रसूलल्लाह (स 0) (के आदात व ख़साएल) में ऐसी चीज़ें हैं के वह तुम्हें दुनियां के उयूब व क़बाएह का पता देंगी जबके आप (स 0) इस दुनिया में अपने ख़ास अफ़राद समेत भूके रहा करते थे और बावजूद इन्तेहाई क़र्ब मन्ज़िलत के इसकी आराइशे इनसे दूर रखी गईं। चाहे के देखने वाला अक़्ल की रौशनी में देखे के अल्लाह ने उन्हें दुनिया न देकर उनकी इज़्ज़त बढ़ाई है या अहानत की है अगर कोई यह कहे के अहानत की है तो उसने झूठ कहा है और बहुत बड़ा बोहतान बान्धा और अगर यह कहे के इज़्ज़त बढ़ाई है तो उसे यह जान लेना चाहिये के अल्लाह ने दूसरों की बे इज़्ज़ती ज़ाहिर की जबके उन्हें दुनिया की ज़्यादा से ज़्यादा वुसअत दे दी और उसका रूख़ अपने मुक़र्रबतरीन बन्दे से मोड़ रखा। पैरवी करने वाले को चाहिये के इनकी पैरवी करे और उनके निशाने क़दम पर चले और उन्हीं की मन्ज़िल में आए वरना हलाकत से महफ़ूज़ नहीं रह सकता। क्यूंकि अल्लाह ने इनको (क़ुर्ब) क़यामत की निशानी और जन्नत की ख़ुशख़बरी सुनाने वाला और अज़ाब से डराने वाला क़रार दिया है। दुनिया से आप (स 0) भूके निकल खड़े हुए और आखि़रत में सलामतियों के साथ पहुंच गए। आप (स 0) ने तामीर के लिये कभी पत्थर पर पत्थर नहीं रखा , यहाँ तक के आखि़रत की राह पर चल दिये और अल्लाह की तरफ़ बुलावा देने वाले की आवाज़ पर लब्बैक कही। यह अल्लाह का हम पर कितना बड़ा एहसान है के उसने हमें एक पेशरौ व पेशवा जैसी नेमत बख़्शी के जिनकी हम पैरवी करते हैं और क़दम ब क़दम चलते हैं (इन्हीं की पैरवी में) ख़ुदा की क़सम मैंने अपनी इस क़मीज़ में इतने पैवन्द लगाए हैं के मुझे पैवन्द लगाने वाले से शर्म आने लगी है , मुझसे एक कहने वाले ने कहा के क्या आप इसे उतारेंगे नहीं ? तो मैंने उसे कहा के मेरी (नज़रों से) दूर हो के सुबह के वक़्त ही लोगों को रात के चलने की क़द्र होती है और वह उसकी मदहा करते हैं।

(((- जब इन्सान उन्हीं मख़लूक़ात के इदराक से आजिज़ हों के सामने आ रही हैं जो इदराक व एहसास के हुदूद के अन्दर हैं तो उन मख़लूक़ात के बारे में क्या कहा जा सकता है जो इन्सानी हवास की ज़द से बाहर हैं और जिन तक अक़्ल की रसाई नहीं है और जब मख़लूक़ात की हक़ीक़त तक इन्सानी फ़िक्र की रसाई नहीं है तो ख़ालिक़ की हक़ीक़त का इरफ़ान किस तरह मुमकिन है और इन्सान इसकी हम्द का हक़ किस तरह अदा कर सकता है। इन्सान की निजात व आख़ेरत के दो बुनियादी रूकन हैं एक ख़ौफ़ और एक उम्मीद , इस्लाम ने क़दम-क़दम पर इन्हीं दो चीज़ों की तरफ़ तवज्जो दिलाई है और इन्हें ईमान और अमल का ख़ुलासा क़रार दिया है। सूरा मुबारकए हम्द जिस में सारा क़ुरान सिमटा हुआ है। इसमें भी रहमान व रहीम उम्मीद का इशारा और मालिके यौमिद्दीन ख़ौफ़ का , लेकिन अफ़सोसनाक बात यह है के इन्सान न वाक़ेअन ख़ुदा से उम्मीद रखता है और न उससे ख़ौफ़ज़दा होता है। उम्मीदवार होता तो दुआओं और इबादतों में दिल लगता के इनमें तलब ही तलब पाई जाती है और ख़ौफ़ज़दा होता तो गुनाहों से परहेज़ करता के गुनाह ही इन्सान को अज़ाबे अलीम से दो-चार कर देते हैं। दुनिया की हर उम्मीद और इसके हर ख़ौफ़ का किरदार से नुमायां हो जाना और आख़ेरत की उम्मीद वहम का वाज़ेअ न होना इस बात की अलामत है के दुनिया इसके किरदार में एक हक़ीक़त है और आख़ेरत सिर्फ़ अलफ़ाज़ का मजमूआ और तलफ़्फ़ुज़ की बाज़ीगरी है और इसके अलावा कुछ नहीं है। वाज़ेअ रहे के पर्दे वाले वाक़ेए का ताल्लुक़ अज़वाज की ज़िन्दगी और उनके घरों से है। इसका अहलेबैत (अ 0) के घर से कोई ताल्लुक़ नहीं है जिसे बाज़ रावियों ने अहलेबैत (अ 0)की तरफ़ मोड़ दिया है ताके उनकी ज़िन्दगी में भी ऐश व इशरत का इसबात कर सकें। जबके अहलेबैत (अ 0) की ज़िन्दगी तारीख़े इस्लाम में मुकम्मल तौर पर आईना है और हर शख़्स जानता है के इन हज़रात ने तमामतर इख़्तेयारात के बावजूद अपनी ज़िन्दगी इन्तेहाई सादगी से गुज़ारी है और सारा माले दुनिया राहे ख़ुदा में ख़र्च कर दिया है- पैग़म्बरों की ज़िन्दगी की मिसाल का मतलब यह नहीं है के मुसलमान को आवारावतन और ख़ानाबदोश होना चाहिये और ख़ेमों और छोलदारियों में ज़िन्दगी गुज़ार देना चाहिये , इसका मक़सद सिर्फ़ यह है के मुसलमान को दुनिया की अहमियत व अज़मत का क़ायल नहीं होना चाहिये और उसे सिर्फ़ बतौर ज़रूरत और बक़द्र ज़रूरत इस्तेमाल करना चाहिये वह मुकम्मल तौर से क़ब्ज़े में आ जाए तो इन्सान को बाइज्ज़त नहीं बना सकती है और सौ फ़ीसदी हाथों से निकल जाए तो ज़लील नहीं कर सकती है , इज़्ज़त व ज़िल्लत का मेयार माल व दौलत और जाह व मन्सब नहीं है , इसका मेयार सिर्फ़ इबादते इलाही और इताअते परवरदिगार है जिसके बाद मुल्क दुनिया की कोई हैसियत नहीं रह जाती है।)))

161-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

( जिसमें रसूले अकरम (स 0) के सिफ़ात , अहलेबैत (अ 0) की फ़ज़ीलत और तक़वा व इत्तेबाअ रसूल (स 0) की दावत का तज़किरा किया गया है)

परवरदिगार ने आपको रोशन नूर , वाज़ेह दलील , नुमायां रास्ता और हिदायत करने वाली किताब के साथ भेजा है। आपका ख़ानदान बेहतरीन ख़ानदान , और आपका शजरा बेहतरीन शजरा है , जिसकी शाख़ें मोअतदिल हैं (सीधी हैं) और समरात दस्त-रस के अन्दर (झुके हुए) हैं। आपकी जाए विलादत मक्के मुकर्रमा है और मक़ामे हिजरत अर्ज़े तय्यबा। यहीं से आपका ज़िक्र बलन्द हुआ है और यहीं से आपकी आवाज़ फै़ली है। परवरदिगार ने आपको किफ़ायत करने वाली हुज्जत , शिफ़ा देने वाली नसीहत , गुज़िश्ता तमाम उमूर की तलाफ़ी करने वाली दावत के साथ भेजा है , आपके ज़रिये ग़ैर मारूफ़ शरीअतों को ज़ाहिर किया है और महमिल बिदअतों का क़िला क़मा कर दिया है और वाज़ेह एहकाम को बयान कर दिया है लेहाज़ा अब जो भी इस्लाम के अलावा किसी रास्ते को इख़्तेयार करेगा उसकी शक़ावत साबित हो जाएगी और रसीमाने हयात बिखर जाएगी और मुंह के बल गिरना सख़्त हो जाएगा और अन्जामकार दाएमी हुज़्न व इल्म और शदीदतरीन अज़ाब होगा।

मैं ख़ुदा पर इसी तरह भरोसा करता हूं जिस तरह उसकी तरफ़ तवज्जो करने वाले करते हैं और उससे उस रास्ते की हिदायत तलब करता हूँ जो उसकी जन्नत तक पहुंचाने वाला और उसकी मन्ज़िले मतलूब की तरफ़ ले जाने वाला है।

बन्दगाने ख़ुदा! मैं तुम्हें तक़वा इलाही और इसकी इताअत की वसीयत करता हूं के इसी में कुल निजात है और यही हमेशा के लिये मरकज़े निजात है। उसने तुम्हें डराया तो मुकम्मल तौर से डराया और (जन्नत की) रग़बत दिलाई तो मुकम्मल रग़बत का इन्तेज़ाम किया , तुम्हारे लिये दुनिया आर उसकी जुदाई , उसके फ़ना व ज़वाल और उससे इन्तेक़ाल सबकी तौसीफ़ कर दी है लेहाज़ा उसमें जो चीज़ अच्छी लगे उससे एराज़ करो (पहलू बचाए रखो) के साथ जाने वाली “ शै बहुत कम है (जान लो) यह (दुनिया का) घर ग़ज़बे इलाही से क़रीबतर और रिज़ाए इलाही से दूरतर है।

बन्दगाने ख़ुदा! हम-व-ग़म और इसके इष्ग़ाल से चश्मपोशी कर लो (इसकी फ़िक्रों और उसके धन्दों से आंखें बन्द कर लो) तुम्हें मालूम है के इससे बहरहाल जुदा होना है और इसके हालात बराबर बदलते रहते हैं इससे इस तरह एहतियात करो जिस तरह एक ख़ौफ़ज़दा और अपने नफ़्स का मुख़लिस और जाँफ़ेशानी के साथ कोशिश करने वाला एहतियात करता है और उससे इबरत हासिल करो उन मनाज़िर के ज़रिये जो तुमने ख़ुद देख लिये हैं के गुज़िश्ता नस्लें हलाक हो गईं , उनके जोड़ बन्द अलग-अलग हो गए , उनकी आंखें और उनके कान ख़त्म हो गए , उनकी शराफ़त और इज़्ज़त चली गई , उनकी मसर्रत और नेमत का ख़ात्मा हो गया। औलाद का क़ुर्ब फ़िक़दान में तब्दील हो गया और अज़वाज की सोहबत फ़िराक़ में बदल गई। अब न बाहमी सिफ़ाख़रत रह गई है और न नस्लों का सिलसिला , न मुलाक़ातें रह गई हैं और न बात-चीत। (उनका शरफ़ व वक़ार मिट गया , उनकी मसर्रतें और नेमतें जाती रहीं और बाल बच्चों के क़रीब के बजाए अलाहेदगी और बीवियों से हमनशीनी के बजाए उनसे जुदाई हो गई। अब न वह फ़ख़्र करते हैं और न उनके औलाद होती है , न एक दूसरे से मिलते मिलाते हैं और न आपस में एक दूसरे के हमसाया बन कर रहते हैं।)

लेहाज़ा बन्दगाने ख़ुदा! डरो उस शख़्स की तरह जो अपने नफ़्स पर क़ाबू रखता हो , अपनी ख़्वाहिशात को रोक सकता हो और अपनी अक़्ल की आंखों से देखता हो , मसएल बिलकुल वाज़ेह है , निशानियां क़ायम हैं , रास्ता सीधा है और सिरात बिल्कुल मुस्तक़ीम है।

162-आपका इरशादे गिरामी

(उस शख़्स से जिसने यह सवाल कर लिया के लोगों ने आपको आपकी मन्ज़िल से किस तरह हटा दिया)

ऐ बरादरे बनी असद! तुम बहोत तंग हौसला हो और ग़लत रास्ते पर चल पड़े हो , लेकिन बहरहाल तुम्हें क़राबत (- 1-) का हक़ भी हासिल है और सवाल का हक़ भी है और तुमने दरयाफ़्त भी कर लिया है तो अब सुनो! हमारे बलन्द नसब रसूले अकरम (स 0) से क़रीबतरीन ताल्लुक़ के बावजूद क़ौम ने हमसे इस हक़ को इसलिये छीन लिया के इसमें एक ख़ुदग़र्ज़ी थी जिस पर एक जमाअत (- 2-) के नफ़्स मर मिटे थे और दूसरी जमाअत ने चश्मपोशी से काम लिया था लेकिन बहरहाल हाकिम अल्लाह है और रोज़े क़यामत उसी की बारगाह में पलट कर जाना है। इस लूट मार का ज़िक्र छोड़ो जिसका शोर चारों तरफ़ मचा हुआ था (- 3-) अब ऊंटनियों की बात करो जो अपने क़ब्ज़े में रह कर निकल गई हैं (((- 1-शायद इस अम्र की तरफ़ इशारा हो के सरकारे दो आलम (स 0) की एक ज़ौजा ज़ैनब बिन्त जहश असदी थीं और उनकी वालेदा असीमा बिन्ते अब्दुल मुत्तलिब आपकी फूफी थीं। - 2- इसमें दोनों इहतमालात पाए जाते हैं , या उस क़ौम की तरफ़ इशारा है जिसने हक़्क़े अहलेबैत (अ 0) का तहफ़्फ़ुज़ नहीं किया और तग़ाफ़ुल से काम लिया। या ख़ुद अपने करदार की बलन्दी की तरफ़ इशारा है के हमने भी चश्म पोशी से काम लिया और मुक़ाबला करना मुनासिब नहीं समझा और इस तरह ज़ालिमों ने मन्सब पर मुकम्मल तौर से क़ब्ज़ा कर लिया।

-3- यह अम्र अलक़ैस का मिसरा है जब उसके बाप को क़त्ल कर दिया गया तो वह इन्तेक़ाम के लिये क़बाएल की कमक तलाश कर रहा था एक मक़ाम पर मुक़ीम था के लोग उसके ऊंट पकड़ ले गए , उसने मेज़बान से फ़रयाद की , मेज़बान ने कहा के मैं अभी वापस लाता हूं सबूत में तुम्हारी ऊंटनियां ले जाता हूँ और इस तरह ऊंट के साथ ऊंटनी पर भी क़ब्ज़ा कर लिया-)))

अब आओ इस मुसीबत को देखो जो अबूसुफ़ियान के बेटे की तरफ़ से आई है के ज़माने ने रूलाने के बाद हंसा दिया है और बख़ुदा इसमें कोई ताज्जुब की बात नहीं है। ताज्जुब तो इस हादिस (मुसीबत) पर है जिसने ताज्जुब (की हद) का भी ख़ात्मा कर दिया है और कजी को बढ़ावा दिया है। क़ौम ने चाहा था के नूरे इलाही को उसके चिराग़ ही से रूपोश कर दिया जाए (अल्लाह के रौशन चिराग़ का नूर बुझाना चाहा) और फ़व्वारे को चश्मा (सरचश्मए हिदायत) ही से बन्द कर दिया जाए। मेरे और अपने दरम्यान ज़हरीले घूंटों की आमेज़िश कर दी के अगर मुझसे और क़ौम के दरम्यान से इब्तेला की ज़हमतें ख़त्म हो गईं तो मैं उन्हें ख़ालिस हक़ के रास्ते पर चलाऊंगा और अगर कोई दूसरी सूरत हो गई तो तुम्हें हसरत व अफ़सोस से तुम्हें जान नहीं देनी चाहिये। अल्लाह इनके आमाल से ख़ूब बाख़बर है।

163-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

सारी तारीफ़े उस अल्लाह के लिये हैं जो बन्दों का ख़ल्क़ करने वाला , ज़मीन का फर्श बिछाने वाला , वदियों में पानी का बहाने वाला और टीलों को सरसब्ज़ व शादाब बनाने वाला है। उसकी औलियत की कोई इब्तेदा नहीं है और इसकी अज़लियत की कोई इन्तेहा नहीं है। वह इब्तेदा से है और हमेशा रहने वाला है। वह बाक़ी है और उसकी बक़ा की कोई मुद्दत नहीं है। पेशानियां उसके सामने सजदारेज़ और लब उसकी वहदानियत का इक़रार करने वाले हैं। उसने तख़लीक़ के साथ ही हर “ शै के हुदूद मुअय्यन कर दिये हैं ताके वह किसी से मुशाबेह न होने पाएं। इन्सानी औहाम उसके लिये हुदूद व हरकात और आज़ा व जवारेह का तअय्युन नहीं कर सकते हैं। इसके लिये यह नहीं कहा जा सकता है के वह कब से है और न यह हद बन्दी की जा सकती है के कब तक रहेगा वह ज़ाहिर है लेकिन यह नहीं कहा जा सकता है के किस चीज़ से और बातिन है लेकिन यह नहीं सोचा जा सकता है के किस चीज़ में ? वह न कोई ढांचा है के ख़त्म हो जाए और न किसी हिजाब में है के महदूद हो जाए। ज़ाहेरी इत्तेसाल की बुनियाद पर चीज़ो इससे क़रीब नहीं हैं और जिस्मानी जुदाई की बिना पर दूर नहीं है। इसके ऊपर बन्दों के हालात में से न एक का झीकना मख़फ़ी है और न अलफ़ाज़ का दोहराना। न बलन्दी का दूर से झलकना पोशीदा है और न क़दम का आगे बढ़ना , न अन्धेरी रात में और न छाई हुई अन्धियारियों में जिन पर रोशन चान्द अपनी किरनों का साया डालता है और रौशन आफ़ताब तुलूअ व ग़ुरूब में और ज़माने की इन गर्दिषों में जो आने वाली रात की आमद और जाने वाले दिन के गुज़रने से पैदा होती हैं। वह हर इन्तेहा व मुद्दत से पहले है और हर एहसाए और शुमार से मावराए है। वह इन सिफ़ात से बलन्दतर है जिन्हें महदूद समझ लेने वाले इसकी तरफ़ मन्सूब कर देते हैं चाहे वह सिफ़तों के अन्दाज़े हों या इतराफ़ व जवानिब की हदें। मकानात में क़याम हो या मसाकिन में क़रार , हदबन्दी उसकी मख़लूक़ के लिये है और उसकी निस्बत इसके ग़ैर की तरफ़ होती है।

((( यह मकतबे अहलेबैत (अ 0) का ख़ासा है के हमेशा हक़ के रास्ते पर चलना चाहिये और दूसरों को भी इसी रास्ते पर चलाना चाहिये और इस राह में किसी तरह की ज़हमत व मुसीबत की परवाह नहीं करना चाहिये , चुनांचे बाज़ मोअर्रेख़ीन के बयान के मुताबिक़ जब दौरे उमर बिन ख़त्ताब में सलमान फ़ारसी को मदाएन का गवर्नर बनाया गया और उन्होंने कारोबार की निगरानी का क़ानून नाफ़िज़ किया तो अरबाबे सरवत व तिजारत ने खलीफ़ा से शिकायत कर दी और उन्होंने फ़िलज़ोर जनाबे सलमान को माज़ूल कर दिया के कहीं निगरानी और मुहासेबा का तसव्वुर सारे मुल्क में न फैल जाए के अरबाबे मसालेह व मुनाफ़ेअ बग़ावत पर आमादा हो जाएं और हुकूमत को हक़ की राह पर चलने के लिये ख़ातिर ख़्वाह क़ीमत अदा करना पड़े। (फ़ी ज़लाल नहजुल बलाग़ा ( 2/ 447) -)))

उसने अष्याए की तख़लीक़ न अज़ली मवाद से की है और न अबदी मिसालों से , जो कुछ भी ख़ल्क़ किया है ख़ुद ख़ल्क़ किया है और उसकी हदें मुअय्यन कर दी हैं और हर सूरत को हसी बना दिया है। कोई “ शै भी इसके हुक्म से सरताबी नहीं कर सकती है और न किसी की इताअत में उसका कोई फ़ायदा है। उसका इल्म माज़ी के मरने वाले अफ़राद के बारे में वैसा ही है जैसा के रह जाने वाले ज़िन्दों के बारे में है। और वह बलन्दतरीन आसमानों के बारे में वैसा ही इल्म रखता है जिस तरह के पस्त तरीन ज़मीनों के बारे में रखता है।

( दूसरा हिस्सा) ऐ वह इन्सान जिसे हर एतबार से दुरूस्त बनाया गया है और रहम के अन्धेरों और पर्दा दर पर्दा ज़ुल्मतें मुकम्मल निगरानी के साथ ख़ल्क़ कया गया है। तेरी इब्तेदा ख़ालिस मिट्टी से हुई है और तुझे एक ख़ास मरकज़ में ख़ास मुद्दत तक रखा गया है। तू शिकमे मादर में इस तरह हरकत कर रहा था के न आवाज़ का जवाब दे सकता था और न किसी को सुन सकता था। इसके बाद तुझे वहाँ से निकाल कर उस घर में लाया गया जिसे तूने देखा भी नहीं था और जहां के मुनाफ़ेअ के रास्तों से बाख़बर भी नहीं था। बता तुझे पिस्ताने मादर से दूध हासिल करने की हिदायत किसने दी है और ज़रूरत के वक़्त मवारिद तलब व इरादे का पता किसने बताया है ? होशियार , जो शख़्स एक साहबे हैसियत व आज़ाए मख़लूक़ के सिफ़ात के पहचानने से आजिज़ होगा वह ख़ालिक़ के सिफ़ात को पहचानने से यक़ीनन ज़्यादा आजिज़ होगा और मख़लूक़ात के हुदूद के ज़रिये उसे हासिल करने से यक़ीनन दूरतर होगा।

(((- अमीरूल मोमेनीन (अ 0) के अलावा दुनिया का कोई दूसरा इन्सान होता तो इस मौक़े को ग़नीमत तसव्वुर करके एहतेजाज करने वालों के हौसले मज़ीद बलन्द कर देता और लम्हों में उस्मान का ख़ात्मा करा देता लेकिन आपने अपनी शरई ज़िम्मेदारी और इस्लामी सहूलियत का ख़याल करके इन्क़ेलाबी जमाअत को रोका और चाहा के पहले एतमामे हुज्जत कर दिया जाए ताके उस्मान को इस्लाहे अम्र का तवक़ोअ मिल जाए और बनी उमय्या मुझे नस्ले उस्मान का मुलज़िम न ठहराने पाएं। वरना उस्मान के दौर के मज़ालिम आलम आष्कार थे। उनके बारे में किसी तहक़ीक़ और तफ़तीश की ज़रूरत नहीं थी। जनाबे अबूज़र का शहरबदर करा दिया जाना , जनबो अब्दुल्लाह बिन मसऊद की पस्लियों का तोड़ दिया जाना , जनबो अम्मारे यासिर के शिकम को जूतियों से पामाल कर देना , वह मज़ालिम हैं जिन्हें सारा आलमे इस्लाम और बालनहूस मदीनतुर्ररसूल ख़ूब जानता था और यही वजह है के आपने दरम्यान में पड़ कर इस्लाह हाल के बारे में यह फ़ारमूला पेश किया के मदीने के मामेलात की फ़िलफ़ौर इस्लाह की जाए और बाहर के लिये बक़द्रे ज़रूरत मोहलत ले ली जाए लेकिन ख़लीफ़ा को इस्लाह नहीं करना थी नहीं की , और आखि़रश वही अन्जाम हुआ जिसके पेशे नज़र अमीरूल मोमेनीन (अ 0) ने इस क़द्र ज़हमत बरदाश्त की थी और जिसके बाद बनी उमय्या को नए फ़ित्नों का मौक़ा मिल गया और उनसे अमीरूल मोमेनीन (अ 0) को भी दो चार होना पड़ा था।-)))

164-आपका इरशादे गिरामी

(जब लोगों ने आपके पास आकर उस्मान के मज़ालिम का ज़िक्र किया और उनकी फ़हमाइश और तम्बीह का तक़ाज़ा किया तो आपने उस्मान के पास जाकर फ़रमाया)

लोग मेरे पीछे मुन्तज़िर हैं और उन्होंने मुझे अपने और तुम्हारे दरम्यान वास्ता क़रार दिया है और ख़ुदा की क़सम मैं नहीं जानता हूँ के मैं तुमसे क्या कहूं ? मैं कोई ऐसी बात नहीं जानता हूं जिसका तुम्हें इल्म न हो और किसी ऐसी बात की निशानदेही नहीं कर सकता हूं जो तुम्हें मालूम न हो। तुम्हें तमाम वह बातें मालूम हैं जो मुझे मालूम हैं और मैंने किसी अम्र की तरफ़ सबक़त नहीं की है के उसकी इत्तेलाअ तुम्हें करूं और न कोई बात चुपके से सुन ली है के तुम्हें बाख़बर करूं। तुमने वह सब ख़ुद देखा है जो मैंने देखा है और वह सब कुछ ख़ुद भी सुना है जो मैंने सुना है और रसूले अकरम (स 0) के पास वैसे ही रहे हो जैसे मैं रहा हूँ। इब्ने अबी क़हाफ़ा और इब्निल ख़त्ताब हक़ पर अमल करने के लिये तुमसे ज़्यादा ऊला नहीं थे के तुम उनकी निस्बत रसूलल्लाह से ज़्यादा क़रीबी रिश्ता रखते हो।

तुम्हें वह दामादी का शरफ़ भी हासिल है जो उन्हें हासिल नहीं था लेहाज़ा ख़ुदारा अपने नफ़्स को बचाओ के तुम्हें अन्धेपन से बसारत या जेहालत से इल्म दिया जा रहा है। रास्ते बिल्कुल वाज़ेअ हैं और निशानाते दीन क़ायम हैं। याद रखो ख़ुदा के नज़दीक बेहतरीन बन्दा वह इमामे आदिल है जो ख़ुद हिदायत याफ़्ता हो और दूसरों को हिदायत दे। जानी पहचानी सुन्नत को क़ायम करे और मजहोल बिदअत को मुर्दा बना दे। देखो ज़िया बख़्श सुन्नतों के निशानात भी रौशन हैं और बिदअतों के निशानात भी वाज़ेह हैं और बदतरीन इन्सान ख़ुदा की निगाह में वह ज़ालिम पेशवा है जो ख़ुद भी गुमराह हो और लोगों को भी गुमराह करे। पैग़म्बर से मिली हुई सुन्नतों को मुर्दा बना बना दे आर क़ाबिले तर्क बिदअतों को ज़िन्दा कर दे। मैंने रसूले अकरम (स 0) को यह फ़रमाते हुए सुना है के रोज़े क़यामत ज़ालिम रहनुमा को इस आलम में लाया जाएगा के न कोई उसका मददगार होगा और न उज़्र ख़्वाही करने वाला और उसे जहन्नम में डाल दिया जाएगा और वह इस तरह चक्कर खाएगा जिस तरह चक्की। इसके बाद उसे क़ारे जहन्नम में जकड़ दिया जाएगा। मैं तुम्हें अल्लाह की क़सम देता हूं के ख़ुदारा तुम इस उम्मत के मक़तूल पेशवा न बनो इसलिये के दौरे क़दीम से कहा जा रहा है के इस उम्मत में एक पेशवा क़त्ल किया जाएगा जिसके बाद क़यामत तक क़त्ल व के़ताल का दरवाज़ा खुल जाएगा और सारे उमूर मुश्तबा हो जाएंगे और फ़ित्ने फैल जाएंगे और लोग हक़ व बातिल में इम्तियाज़ न कर सकेंगे और इसी में चक्कर खाते रहेंगे और तहो बाला होते रहेंगे। ख़ुदारा मरवान की सवारी न बन जाओ के वह जिधर चाहे खींच कर ले जाए के तुम्हारा सिन ज़्यादा हो चुका है और तुम्हारी उम्र ख़ात्मे के क़रीब आ चुकी है। उस्मान ने इस सारी गुफ़्तगू को सुनकर कहा के आप उन लोगों से कह दे के ज़रा मोहलत दें ताके मैं उनकी हक़ तलफ़ियों का इलाज कर सकूं ? आपने फ़रमाया के जहां तक मदीने के मामेलात का ताल्लुक़ है उनमें किसी मोहलत की कोई ज़रूरत नहीं है और जहां तक बाहर के मामलात का ताल्लुक़ है उनमें सिर्फ़ इतनी मोहलत दी जा सकती है के तुम्हारा हुक्म वहां पहुंच जाए।

(((- दर हक़ीक़त रहनुमा और ज़ालिम वह दो मुतज़ाद अलफ़ाज़ हैं जिन्हें किसी आलमे शराफ़त व करामत में जमा नहीं होना चाहिये , इन्सान को रहनुमाई का शौक़ है तो पहले अपने किरदार में अदालत व शराफ़त पैदा करे उसके बाद आगे चलने का इरादा करे। इसके बग़ैर रहनुमाई का शौक़ इन्सान को जहन्नम तक पहुंचा सकता है रहनुमा नहीं बना सकता है। जैसा के सरकारे दो आलम (स 0) ने फ़रमाया है और इस अज़ाब की शिद्दत का राज़ यही है के रहनुमा की वजह से बेशुमार लोग मज़ीद गुमराह होते हैं और उसके ज़ुल्म से बेहिसाब लोगों को ज़ुल्म का जवाज़ फ़राहम हो जाता है और सारा मुआशेरा तबाह व बरबाद होकर रह जाता है। उस्मान का दौर पहला दौर था जब साबिक़ की ज़ाहिरदारी भी ख़त्म हो गई थी और खुल्लम खुल्ला ज़ुल्म का बाज़ार गर्म हो गया था। इसलिये इतना शदीद रद्दे अमल देखने में आया और न इसके बाद से तो आज तक सारा आलमे इन्सान उन्हीं ख़ानदान परवरियों का शिकार है और अवाम की सारी दौलत एक-एक ख़ानदान के अय्याश शहज़ादों पर सर्फ़ हो रही है और मदीने के मुसलमानों में भी ग़ैरत की हरकत नहीं पैदा हो रही है तो बाक़ी आलमे इस्लाम और दूसरे इलाक़ों का क्या तज़किरा है।-)))

165-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें मोर की अजीब व ग़रीब खि़लक़त का तज़किरा किया गया है)

अल्लाह ने अपनी तमाम मख़लूक़ात को अजीब व ग़रीब बनाया है चाहे वह ज़ी हयात हों या बेजान , साकिन हों या मुतहर्रिक और इन सब के ज़रिये अपनी लतीफ़ सनअत और अज़ीम क़ुदरत के शवाहिद क़ायम कर दिये हैं जिनके सामने अक़्लें बकमाले एतराफ़ व तस्लीम सर ख़म किये हुए हैं और फिर हमारे कानों में उसकी वहदानियत के दलाएल। इन मुख़तलिफ़ सूरतों के परिन्दों की तख़लीक़ की शक्ल में गूंज रहे हैं जिन्हें ज़मीन के गड्ढों , दरों के शिगाफ़ों , पहाड़ों की बलन्दियों पर आबाद किया है जिनके पर मुख़्तलिफ़ क़िस्म के और जिनकी हैसियत जुदागाना अन्दाज़ की है उन्हें तसख़ीर की ज़माम के ज़रिये हरकत दी जा रही है और वह अपने परों को वसीअ फ़िजा के रास्तों और कुशादा हवा की वुसअतों में फड़फड़ा रहे हैं। उन्हें आलमेे अदम से निकाल कर अजीब व ग़रीब ज़ाहेरी सूरतों में पैदा किया है और गोश्त व पोस्त में ढके हुए जोड़ों के सरों से उनके जिस्मों की साख़्त क़ायम की है। बाज़ को उनके जिस्म की संगीनी ने हवा में बलन्द होकर तेज़ परवाज़ से रोक दिया है और वह सिर्फ़ ज़रा ऊंचे होकर परवाज़ कर रहे हैं और फिर अपनी लतीफ़ क़ुदरत और दक़ीक़ सनअत के ज़रिये उन्हें मुख़तलिफ़ रंगों के साथ मुनज़्ज़म व मुरत्तब किया है के बाज़ एक ही रंग में डूबे हुए हैं के दूसरे रंग का शाएबा भी नहीं है और बाज़ एक रंग में रंगे हैं लेकिन इनके गले का तौक़ दूसरे रंग का है। (ताउस) इन सब में अजीब तरीन खि़लक़त मोर की है जिसे मोहकम तरीन तवाज़ुन के सांचे में ढाल दिया है और उसके रंगों में हसीन तरीन तंज़ीम क़ायम की है उसे वह रंगीन पर दिये हैं जिनकी जड़ों को एक दूसरे से जोड़ दिया है और वह दम दी है जो दूर तक खींचती चली जाती है। जब वह अपनी मादा का रूख़ करता है तो उसे फैला लेता है और अपने सर के ऊपर इस तरह साया फ़िगन कर लेता है जैसे मक़ामे दारैन की किश्ती का बादबान जिसे मल्लाह इधर उधर मोड़ रहा हो। वह अपने रंगों पर इतराता है और इसकी जुम्बिशो के साथ झूमने लगता है अपनी मादा से इस तरह जफ़ती खाता है जिस तरह मुर्ग़ और उसे इस तरह हामेला बनाता है जिस तरह ख़ुश व हैजान में भरे हुए जानवर। मैं इस मसले में तुम्हें मुशाहेदे के हवाले कर रहा हूँ। न उस शख़्स की तरह जो किसी कमज़ोर सनद के हवाले कर दे और अगर गुमान करने वालों का यह गुमान सही हो ताके वह उन आंसुओं के ज़रिये हमल ठहराता है जो उसकी आंखों से बाहर निकल कर पलकों पर ठहर जाते हैं और मादा उसे पी लेती है उसके बाद अण्डे देती है और उसमें नर व मादा का कोई इत्तेसाल नहीं होता है सिवाई उन फूट पड़ने वाले आंसूओं के तो यह बात कौए के बाहेमी खाने पीने के ज़रिये हमल ठहराने से ज़्यादा ताअज्जुब ख़ेज़ न होती।

(((- इल्मुल हैवान के माहिर रॉबर्टसन का बयान है के दुनिया में एक अरब क़िस्म के परिन्दे पाए जाते हैं और सब अपने-अपने मक़ाम पर अजीब व ग़रीब खि़लक़त के मालिक हैं सबसे बड़ा परिन्दा शुतुर्मुग़ है और सबसे छोटा तनान जिसका तूल पांच सेन्टीमीटर होता है लेकिन एक घन्टे में 80- 90किलोमीटर परवाज़ कर लेता है और एक सेकेन्ड में 50से लेकर 200मरतबा अपने परों को हरकत देता है।

बाज़ परिन्दों का एक क़दम छः मीटर के बराबर होता है और ज़मीन पर 80किलोमीटर फ़ी घन्टे की रफ़्तार से चल सकते हैं और बाज़ छः हज़ार मीटर की बलन्दी पर परवाज़ कर सकते हैं , बाज़ पानी के अन्दर 18मीटर की गहराई तक चले जाते हैं और बज़ सिर्फ़ समन्दरों के इस पार से उस पार तक चक्कर लगाते रहते हैं।

लेकिन इन सबसे ज़्यादा हैरत अंगेज़ अमीरूल मोमेनीन (अ 0) की निगाह में मोर की खि़लक़त है जिसको मुख़्तलिफ़ रंगों में रंग दिया गया है और मुख़्तलिफ़ ख़ुसूसियात से नवाज़ दिया गया है यह और बात है के बेहतरीन परों के साथ नाज़ुक तरीन पैर भी दिये गए हैं ताके इसमें भी ग़ुरूर न पैदा हो और इन्सान को भी होश आ जाए के जिसके वजूद का एक रूख़ रंगीन होता है और इसका दूसरा रूख़ कमज़ोर भी होता है लेहाज़ा ग़ुरूर व इस्तेकबार का कोई इमकान नहीं है , बल्कि तक़ाज़ाए शराफ़त यह है के हसीन रूख़ का शुक्रिया अदा करे के यह भी मालिक का करम है इसका अपना कोई हक़ नहीं है जिसे मालिक ने अदा कर दिया हो।

यह एक हसीन तरीन फ़ितरत है के नर अपनी मादा के पास जाए तो हुस्न व जमाल के साथ जाए ताके उसे भी इन्स हासिल हो और वह भी अपने नर के जमाल पर फ़ख़्र कर सके ऐसा न हो के अमल फ़क़त एक जिन्सी अमल रह जाए और सुकूने नफ़्स का कोई रास्ता न निकल सके -)))

तुम इसकी रंगीनी पर ग़ौर करो तो ऐसा महसूस करोगे जैसे परों की दरम्यानी तीलियां चान्दी की सलाइयां हों और इन पर जो अजीब व ग़रीब हाले और सूरज की शुआओं जैसे जो परो-बाल आग आए हैं वह ख़ालिस सोने और ज़मर्द के टुकड़े हैं और अगर उन्हें ज़मीन के नबातात से तशबीह देना चाहोगे तो यह कहोगे के यह हर मौसमे बहार के फूलों ( 1) का एक शुगूफ़ा है और अगर लिबास से तशबीह देना चाहोगे तो कहोगे के यह नक़्शे दारे हुल्लों या ख़ुशनुमा यमनी चादरों जैसे हैं और अगर ज़ेवरात ही से तशबीह देना चाहोगे तो इस तरह कहोगे के यह रंग-बिरंग के नगीने हैं जो चान्दी के दाएरों में जड़ दिये गए हैं। यह जानवर अपनी रफ़्तार एक मग़रूर और मुतकब्बिर शख़्स की तरह ख़राम नाज़ से चलता है और अपने बालो पर अपनी दुम को देखता रहता है। अपने फ़ितरी लिबास की ख़ूबसूरती और अपनी चादरे हयात की रंगीनी को देखकर क़हक़हे लगाता है और इसके बाद जब पैरों पर नज़र पड़ जाती है तो इस तरह बलन्द आवाज़ से रोता है जैसे फ़ितरत की सितमज़रीफ़ी की फ़रयाद कर रहा हो और अपने वाक़ेई दर्दे दिल की शहादत दे रहा हो इसलिये के इसके पैर दोग़ले मुर्ग़ों के पैरों की तरह दुबले पतले और बारीक होते हैं। और इसकी पिण्डली के किनारे पर एक हल्का सा कांटा होता है और इसकी गरदन पर बालों के बदले सब्ज़ रंग के मुनक़्क़श परों का एक गुच्छा होता है। इसकी गरदन का फैलाव सुराही की गरदन की तरह होता है और इसके गर्दन की जगह से लेकर पेट तक का हिस्सा यमनी वस्मा जैसा सब्ज़ रंग या उस रेशम जैसा होता है जिसे सैक़ल किये हुए आईने पर पहना दिया गया हो। ऐसा मालूम होता है के वह स्याह रंग की ओढ़नी में लिपटा हुआ है लेकिन वह अपनी आब व ताब की कसरत और चमक-दमक की शिद्दत से इस तरह महसूस होती है जैसे इसमें तरो ताज़ा सब्ज़ी अलग से शामिल कर दी गई हो।

इसके कानों के शिगाफ़ मुत्तसिल बाबूना के फूलों जैसी नोके क़लम के मानिन्द एक बारीक लकीर होती है और वह अपनी सफ़ेदी के साथ उस जगह की स्याही के दरम्यान चमकती रहती है। शायद ही कोई रंग ऐसा हो जिसका कोई हिस्सा इस जानवर को न मिला हो मगर इस लकीर की सैक़ल और इसके रेशमीं पैकर की चमक दमक सब पर ग़ालिब रहती है। इसकी मिसाल उन बिखरी हुई कलियों के मानिन्द होती है जिन्हें न बहार की बारिशो ने पाला हो और न गर्मी के सूरज की शुआओं ने , व कभी-कभी अपने बाल व पर से जुदा भी हो जाता है और इस रंगीन लिबास को उतार कर बरहना हो जाता है। इसके बाल व पर झड़ जाते हैं और दोबारा ( 2) फिर उग आते हैं।

(((- (1) कहा जाता है के सिर्फ़ फ़िलपीन में दस हज़ार क़िस्म के फूल पाए जाते हैं तो बाक़ी कायनात का क्या ज़िक्र है।

(2) बाज़ अफ़राद का ख़याल है के मोर के बदन में तक़रीबन हज़ार से चार हज़ार तक पर होते हैं और वह उन्हीं परों को देख कर अकड़ता रहता है और सहरा में रक़्स करता रहता है। यह और बात है के अपने कमाल का मुज़ाहिरा वहां करता है जहां कोई क़द्रदान नहीं होता है और न इससे इस्तेफ़ादा करने वाला होता है। सिर्फ़ अपनी ज़ात की तस्कीन और अपनी अना की तसल्ली का सामान फ़राहम करता है और यही फ़र्क़ है इन्सान और हैवान में के इन्सानी कमालात अना की तस्कीन और तसल्ली के लिये नहीं हैं इनका मसरफ़ ख़ल्क़े ख़ुदा को फ़ायदा पहुंचाना और समाज को फ़ैज़याब करना है। लेहाज़ा इन्सान अपने कमालात से मुआसेरा को मुसतफ़ैज़ करता है तो इन्सान है वरना एक मोर है जो सहरा में नाचता रहता है और अपने नफ़्स को ख़ुश करता रहता है। यह और बात है के यह ख़ुशी भी दाएमी नहीं होती है और उसे भी चन्द लम्हों में पैरों की हिक़ारत ख़त्म कर देती है और एक नया सबक़ सिखा देती है के उमूमी अफ़ादियत तो काम भी आ सकती है और उसे दवाम भी मिल सकता है लेकिन ज़ाती तस्कीन की न कोई हक़ीक़त है और न उसे दवाम नसीब हो सकता है।-)))

यह बालो-पर इस तरह गिरते हैं जैसे दरख़्त की शाख़ों से पत्ते गिरते हैं और फिर दोबारा यूँ उग आते हैं के बिल्कुल पहले जैसे हो जाते हैं। न पुराने रंगों से कोई मुख़्तलिफ़ रंग होता है और न किसी रंग की जगह तबदील होती है। बल्कि अगर तुम इसके रेषों में किसी एक रेशे पर भी ग़ौर करोगे तो तुम्हें कभी गुलाब की सुर्खी नज़र आएगी ज़मरू की सब्ज़ी और फिर कभी सोने की ज़र्दी , भला उस तख़लीक़ की तौसीफ़ तक फ़िक्रों की गहराइयां किस तरह पहुंच सकती हैं और इन दक़ाएक़ को अक़्ल की जोदत किस तरह पा सकती है या तौसीफ़ करने वाले इसके औसाफ़ को किस तरह मुरत्तब कर सकते हैं।

जबके इसके छोटे से एक जुज़ए ने औहाम को वहां तक रसाई से आजिज़ कर दिया है और ज़बानों को उसकी तौसीफ़ से दरमान्दा कर दिया है।

पाक व बेनियाज़ है वह मालिक जिसने अक़्लों को मुतहीर कर दिया है इस एक मख़लूक़ की तौसीफ़ से जिसे निगाहों के सामने वाज़ेह कर दिया है और निगाहों ने उसे महदूद और मुरत्तब व मुरक्कब व मुलव्वन शक्ल में देख लिया है और फिर ज़बानों को भी इसकी सिफ़त का ख़ुलासा बयान करने और इसकी तारीफ़ का हक़ अदा करने से आजिज़ कर दिया , और पाक व पाकीज़ा है वह ज़ात जिसने च्यूंटी और मच्छर से लेकर इनसे बड़ी मछलियों और हाथियों तक के पैरों को मज़बूत व मुस्तहकम बनाया है और अपने लिये लाज़िम क़रार दे लिया है के कोई ज़ीरूह ढांचा हरकत करेगा मगर यह के उसकी असल वादागाह मौत होगी और उसका अन्जाम कार फ़ना होगा।

अब अगर तुम इन बयानात पर दिल की निगाहों से नज़र डालोगे तो तुम्हारा नफ़्स दुनिया की तमाम शहवतों , लज़्ज़तों और ज़ीनतों से बेज़ार हो जाएगा और तुम्हारी फ़िक्र उन दरख़्तों के पत्तों की खड़खड़ाहट में गुम हो जाएगी जिनकी जड़ें साहिले दरिया पर मुश्क के टीलों में डूबी हुई होती हैं और उन तरो ताज़ा मोतियों के गुच्छों के लटकने और सब्ज़ पत्तियों के ग़िलाफ़ों में मुख़्तलिफ़ क़िस्म के फलों के निकलने के नज़ारों में गुम हो जाएगी जिन्हें बग़ैर किसी ज़हमत के हासिल किया जा सकता है।

(((- क्या इबरतनाक है यह ज़िन्दगी के एक तरफ़ राहतें , लज़्ज़तें , आराइशे , ज़ेबाइशे हैं और दूसरी तरफ़ मौत का भयानक चेहरा! इन्सान एक नज़र इस आराइश व ज़ेबाइश की तरफ़ करता है और दूसरी नज़र उसके अन्जाम की तरफ़। बिल्कुल ऐसा महसूस होता है के एक तरफ़ मोर के पर हैं और दूसरी तरफ़ पैर , परों को देखकर ग़ुरूर पैदा होता है और पैरों को देखकर औक़ात का अन्दाज़ा हो जाता है।

इन्सान अपनी ज़िन्दगी के हक़ाएक़ पर नज़र करे तो उसे अन्दाज़ा होगा के इसकी पूरी हयात एक मोर की ज़िन्दगी है जहां एक तरफ़ राहत व आराम , आराइश व ज़ेबाइश का हंगामा है और दूसरी तरफ़ मौत का भयानक चेहरा।

ज़ाहिर है के जो इन्सान इस चेहरे को देख ले उसे कोई चीज़ हसीन और दिलकश महसूस न होगी और वह इस पुरफ़रेब दुनिया से जल्द अज़ जल्द निजात हासिल करने की कोशिश करेगा।-)))

और वहां वारिद होने वालों के गिर्द महलोल के आंगनों में साफ़ व शफ़ाफ़ शहद और पाक व पाकीज़ा शराब के दौर चल रहे होंगे। वहाँ वह क़ौम होगी जिसकी करामतों ने उसे खींचकर हमेशगी की मन्ज़िल तक पहुंचा दिया है और उन्हें सफर की मज़ीद ज़हमत से महफ़ूज़ कर दिया है। ऐ मेरी गुफ़्तगू सुनने वालों! अगर तुम लोग अपने दिलों को मशग़ूल कर लो इस मन्ज़िल तक पहुंचने के लिये जहां यह दिलकश नज़ारे पाए जाते हैं तो तुम्हारी जान इश्तियाक़ के मारे अज़ख़ुद निकल जाएगी और तुम मेरी इस मजलिस से उठकर क़ब्रों में रहने वालों की हमसायगी के लिये आमादा हो जाओगे ताके जल्द यह नेमतें हासिल हो जाएं। अल्लाह हमें और तुम्हें दोनों को अपनी रहमत के तुफ़ैल इन लोगों में क़रार दे जो अपने दिल की गहराइयों से नेक किरदार बन्दों की मन्ज़िलों के लिये सई कर रहे हैं।

(((- ( बाज़ अल्फ़ाज़ की वज़ाहत) क़ला कशती के बादबान को कहा जाता है और दारी मक़ाम दारैन की तरफ़ मन्सूब है जो साहिल बहर पर आबाद है और वहां से ख़ुशबू वग़ैरा वारिद की जाती है। अन्जा यानी मोड़ दिया जिसका इस्तेमाल इस तरह होता है के अन्जतुन्नाक़ता यानी मैंने ऊंटनी के रूख़ को मोड़ दिया।

नौती मल्लाह को कहा जाता है , ज़फ़ती ज़फ़ूना यानी पलकों के किनारे , ज़फ़तान यानी दोनों किनारे)))

166-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

( दावते इत्तेहाद व इत्तेफ़ाक़) तुम्हारे छोटों को चाहिये के अपने बड़ों की पैरवी करें और बड़ों का फ़र्ज़ है के अपने छोटों पर मेहरबानी करें और ख़बरदार तुम लोग जाहेलियत के इन ज़ालिमों जैसे न हो जाना जो न दीन का इल्म हासिल करते थे और न अल्लाह के बारे में अक़्ल व फ़हम से काम लेते थे। उनकी मिसाल अण्डों के छिलकों जैसी है जो शुतुरमुर्ग़ के अण्डे देने की जगह पर रखे हों के उनका तोड़ना तो जुर्म है लेकिन परवरिश करना भी सिवाए शर के कोई नतीजा नहीं दे सकता है।

( एक और हिस्सा) यह लोग बाहेमी मोहब्बत के बाद अलग-अलग हो गए और अपनी असल से जुदा हो गए। बाज़ लोगों ने एक शाख़ को पकड़ लिया है और अब उसी के साथ झुकते रहेंगे यहां तक के अल्लाह उन्हें बनी उमय्या के बदतरीन दिन के लिये जमा कर देगा जिस तरह के ख़रीफ़ में बादल के टुकड़े जमा हो जाते हैं फिर उनके दरम्यान मोहब्बत पैदा करेगा फिर उन्हें तह ब तह अब्र के टुकड़ों की तरह एक मज़बूत गिरोह बना देगा। फिर उनके लिये ऐसे दरवाज़ों को खोल देगा के यह अपने उभरने की जगह से शहरे सबा के दो बाग़ों के उस सैलाब की तरह बह निकलेंगे जिनसे न कोई चट्टान महफ़ूज़ रही थी और न कोई टीला ठहर सका था न पहाड़ की चोटी उसके धारे को मोड़ सकी थी और न ज़मीन की ऊंचाई। अल्लाह उन्हें घाटियों के नशेबों में मुतफ़र्रिक़ कर देगा और फिर उन्हें चश्मों के बहाव की तरह ज़मीन में फैला देगा।

उनके ज़रिये एक क़ौम के हुक़ूक़ दूसरी क़ौम से हासिल करेगा और एक जमाअत को दूसरी जमाअत के दयार में इक़्तेदार मुहैया करेगा। ख़ुदा की क़सम उनके इख़्तेदार व इख़्तेयार के बाद जो कुछ भी उनके हाथों में होगा वह इस तरह पिघल जाएगा जिस तरह के आग पर चर्बी पिघल जाती है।

( आखि़र ज़माने के लोग) ऐ लोगो! अगर तुम हक़ की मदद करने में कोताही न करते और बातिल को कमज़ोर बनाने में सुस्ती का मुज़ाहिरा न करते तो तुम्हारे बारे में वह क़ौम लालच न करती जो तुम जैसी नहीं है और तुम पर यह लोग क़वी न हो जाते , लेकिन अफ़सोस के तुम बनी इसराईल की तरह गुमराह हो गए और मेरी जान की क़सम मेरे बाद तुम्हारी यह हैरानी और सरगर्दानी दो चन्द हो जाएगी (कई गुना बढ़ जाएगी) चूंके तुमने हक़ को पसे पुश्त डाल दिया है। क़रीबतरीन से क़तए ताअल्लुक़ कर दिया है और दूर वालों से रिश्ता जोड़ लिया है। याद रखो के अगर तुम दाई हक़ का इत्तेबाअ कर लेते तो वह तुम्हें रसूले अकरम (स 0) के रास्ते पर चलाता और तुम्हें कजरवी की ज़हमतों से बचा लेता और तुम उस संगीन बोझ को अपनी गर्दनों से उतारकर फेंक देते।

167-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(इब्तेदाए खि़लाफ़त के दौर में)

परवरदिगार ने इस किताबे हिदायत को नाज़िल किया है जिसमें ख़ैर व शर की वज़ाहत कर दी है लेहाज़ा तुम ख़ैर के रास्ते को इख़्तेयार करो ताके हिदायत पा जाओ और शर के रूख़ से मुंह मोड़ लो ताके सीधे रास्ते पर आ जाओ।

फ़राएज़ का ख़याल रखो और उन्हें अदा करो ताके वह तुम्हें जन्नत तक पहुंचा दें। अल्लाह ने जिस हराम को हराम क़रार दिया है वह मजहोल नहीं है और जिस हलाल को हलाल बनाया है वह मुष्तबह नहीं है। उसने मुसलमान की हुरमत को तमाम मोहतरम चीज़ों से अफ़ज़ल क़रार दिया है और मुसलमानों के हुक़ूक़ को उनकी मन्ज़िलों में इख़लास और यगाँगत से बान्ध दिया है। अब मुसलमान वही है जिसके हाथ और ज़बान से तमाम मुसलमान महफ़ूज़ रहें मगर यह के किसी हक़ की बिना पर उन पर हाथ डाला जाए और किसी मुसलमान के लिये मुसलमान को तकलीफ़ देना जाएज़ नहीं है मगर यह के उसका वाक़ेई सबब पैदा हो जाए।

उस अम्र की तरफ़ सबक़त करो जो हर एक के लिये है और तुम्हारे लिये भी है और वह है मौत। लोग तुम्हारे आगे जा चुके हैं और तुम्हारा वक़्त तुम्हें हँका कर ले जा रहा है। सामान हल्का रखो ताके अगले लोगों से मुलहक़ हो जाओ इसलिये के इन पहले वालों के ज़रिये तुम्हारा इन्तेज़ार किया जा रहा है।

अल्लाह से डरो उसके बन्दों के बारे में भी और शहरों के बारे में भी। इसलिये के तुमसे ज़मीनों और जानवरों के बारे में भी सवाल किया जाएगा। अल्लाह की इताअत करो और नाफ़रमानी न करो। ख़ैर को देखो तो फ़ौरन ले लो और शर पर नज़र पड़ जाए तो किनाराकश हो जाओ।

(((- इस क़ानून में मुसलमान की कोई तख़सीस नहीं है। मुसलमान वही होता है जिसके हाथ या उसकी ज़बान से किसी फ़र्दे बशर को अज़ीयत न हो और उसके शर से लोग महफ़ूज़ रहें। लेकिन यह उसी वक़्त तक है जब किसी के बारे में ज़बान खोलना या हाथ उठाना शर शुमार हो वरना अगर इन्सान इस अम्र का मुस्तहक़ हो गया है के उसके किरदार पर तन्क़ीद न करना या उसे क़रार वाक़ेई सज़ा न देना दीने ख़ुदा की तौहीन है तो कोई शख़्स भी दीने ख़ुदा से ज़्यादा मोहतरम नहीं है। इन्सान का एहतेराम दीने ख़ुदा के तुफ़ैल में है। अगर दीने ख़ुदा ही का एहतेराम न रह गया तो किसी शख़्स के एहतेराम की कोई हैसियत नहीं है।-)))

168-आपका इरशादे गिरामी

(जब बैअते खि़लाफ़त के बाद बाज़ लोगों ने मुतालेबा किया के काश आप उस्मान पर ज़्यादती करने वालों को सज़ा देते)

भाईयों! जे तुम जानते हो मै। उससे नावाक़िफ़ नहीं हूँ लेकिन मेरे पास इसकी ताक़त कहाँ है ? अभी वह क़ौम अपनी ताक़त व क़ूवत पर क़ायम है। वह हमारा इख़्तेयार रखती है और हमारे पास इसका इख़्तेयार नहीं है और फिर तुम्हारे ग़ुलाम भी उनके साथ उठ खड़े हुए हैं और तुम्हारे देहाती भी इनके गिर्द जमा हो गए हैं और वह तुम्हारे दरम्यान इस हालत में हैं के तुम्हें जिस तरह चाहें अज़ीयत पहुंचा सकते हैं। क्या तुम्हारी नज़र में जो कुछ तुम चाहते हो उसकी कोई गुन्जाइश है। बेशक यह सिर्फ़ जेहालत और नादानी का मुतालबा है और इस क़ौम के पास ताक़त का सरचश्मा मौजूद है। इस मामले में अगर लोगों को हरकत भी दी जाए तो वह चन्द फ़िरक़ों में तक़सीम हो जाएंगे। एक फ़िरक़ा वही सोचेगा जो तुम सोच रहे हो और दूसरा गिरोह उसके खि़लाफ़ राय का हामिल होगा। तीसरा गिरोह दोनों से ग़ैर जानिबदार बन जाएगा लेहाज़ा मुनासिब यही है के सब्र करो यहां तक के लोग ज़रा मुतमईन हो जाएं और दिल ठहर जाएं और इसके बाद देखो के मैं क्या करता हूँ। ख़बरदार कोई ऐसी हरकत न करना जो ताक़त् को कमज़ोर बना दे और क़ूवत को पामाल कर दे और कमज़ोरी व ज़िल्लत का बाएस हो जाए। मैं जहां तक मुमकिन होगा इस जंग को रोके रहूँगा। इसके बाद जब कोई चाराएकार न रह जाएगा तो आखि़री इलाज दाग़ना ही होता है।

169-आपका इरशादे गिरामी

(जब असहाबे जमल बसरा की तरफ़ जा रहे थे)

अल्लाह ने अपने रसूले हादी को बोलती किताब और मुस्तहकम अम्र के साथ भेजा है। उसके होते हुए वही हलाक हो सकता है जिसका मुक़द्दर ही हलाकत हो और नई नई बिदअतें और नए-नए शुबहात ही हलाक करने वाले होते हैं मगर यह के अल्लाह ही किसी को बचा ले और परवरदिगार की तरफ़ से मुअय्यन होने वाला हाकिम ही तुम्हारे उमूर की हिफ़ाज़त कर सकता है लेहाज़ा उसे ऐसी मुकम्मल इताअत दे दो जो न क़ाबिले मलामत हो और न बददिली का नतीजा हो। ख़ुदा की क़सम या तो तुम ऐसी इताअत करोगे या फिर तुमसे इस्लामी इक़्तेदार छिन जाएगा और फिर कभी तुम्हारी तरफ़ पलट कर न आएगा यहां तक के किसी ग़ैर के साये में पनाह ले ले।

देखो यह लोग मेरी हुकूमत से नाराज़गी पर मुत्तहिद हो चुके हैं और अब मैं उस वक़्त तक सब्र करूंगा जब तक तुम्हारी जमाअत के बारे में कोई अन्देशा न पैदा हो जाए।

(((- उस्मान के खि़लाफ़ क़यामक रने वाले सिर्फ़ मदीने के अफ़राद होते जब भी मुक़ाबला आसान था , चे जाएका बक़ौल तबरी इस जमाअत में छः सौ मिस्री भी शामिल थे और एक हज़ार कूफ़े के सिपाही भी आ गए थे और दीगर और दीगर इलाक़े के मज़लूमीन ने भी मुहिम में शिरकत कर ली थी। ऐसे हालात में एक शख़्स जमल व सिफ़फ़ीन के मारेके भी बरदाश्त करे और इनत माम इन्क़ेलाबियों का मुहासेबा भी शुरू कराए यह एक नामुमकिन अम्र है और फिर मुहासिबे के अमल में उम्मुल मोमेनीन और माविया को भी शामिल करना पड़ेगा के क़त्ले उस्मान की मुहिम में यह अफ़राद भी बराबर के शरीक थे बल्कि उम्मुल मोमेनीन ने तो बाक़ायदा लोगों को क़त्ल पर आमादा किया था।

ऐसे हालात में मसला इस क़द्र आसान नहीं था जिस क़द्र बाज़ सादा लोह अफ़राद तसव्वुर कर रहे थे या बाज़ फ़ित्ना परवाने उसे हवा दे रहे थे-)))

इसलिये के अगर वह अपनी राय की कमज़ोरी के बावजूद इस अम्र में कामयाब हो गए तो मुसलमानों का रिश्तए नज़्म व नस्क़ बिल्कुल टूटकर रह जाएगा। उन लोगों ने इस दुनिया को सिर्फ़ न लोगों से हसद की बिना पर तलब किया है जिन्हें अल्लाह ने ख़लीफ़ा व हाकिम बनाया है। अब यह चाहते हैं के मुआमलात को उलटे पांव जाहेलीयत की तरफ़ पलटा दें। तुम्हारे लिये मेरे ज़िम्मे यही काम है के किताबे ख़ुदा और सुन्नते रसूल (स 0) पर अमल करूं उनके हक़ को क़ायम करूं और उनकी सुन्नत को बलन्द व बाला क़रार दूँ।

170-आपका इरशादे गिरामी

( दलील क़ायम हो जाने के बाद हक़ के इतेबाअ के सिलसिले में जब अहले बसरा ने बाज़ अफ़राद को उस ग़र्ज़ से भेजा के अहले जमल के बारे में हज़रत के मौक़ूफ़ को दरयाफ़्त करें ताके किसी तरह का शुबह बाक़ी न रह जाए तो आपने जुमला उमूर की मुकम्मल वज़ाहत फ़रमाई ताके वाज़ेह हो जाए के आप हक़ पर हैं। इसके बाद फ़रमाया के जब हक़ वाज़ेह हो गया तो मेरे हाथ पर बैअत कर लो। उसने कहा के मैं एक क़ौम का नुमाइन्दा हूँ और उनकी तरफ़ रूजूअ किये बग़ैर कोई एक़दाम नहीं कर सकता हूँ- फ़रमाया के)

तुम्हारा क्या ख़याल है अगर इस क़ौम ने तुम्हें नुमाइन्दा बनाकर भेजा होता के जाओ तलाश करो जहां बारिश हो और पानी की कोई सबील हो और तुम वापस जाकर पानी और सब्ज़ा की ख़बर देते और वह लोग तुम्हारी मुख़ालफ़त करके ऐसी जगह का इन्तेख़ाब करते जहां पानी का क़हत और ख़ुश्कसाली का दौरे दौरा हो तो उस वक़्त तुम्हारा एक़दाम क्या होता ? उसने कहा के मैं उन्हें छोड़कर आबो दाना की तरफ़ चला जाता। फ़रमाया फिर अब हाथ बढ़ाओ और बैअत कर लो के चश्मए हिदायत तो मिल गया है। उसने कहा के अब हुज्जत तमाम हो चुकी है और मेरे पास इन्कार का कोई जवाज़ नहीं रह गया है और यह कह कर हज़रत के दस्ते हक़ पर बैअत कर ली। (तारीख़ में इस शख़्स को कलीब जर्मी के नाम से याद किया जाता है)

171-आपका इरशादे गिरामी

(जब असहाबे माविया से सिफ़्फ़ीन में मुक़ाबले के लिये इरादा फ़रमाया)

ऐ परवरदिगार जो बलन्दतरीन छत और ठहरी हुई फ़िज़ा का मालिक है। जिसने इस फ़िज़ा को शब व रोज़ के सर छिपाने की मन्ज़िल और शम्स व क़मर के सेर का मैदान और सितारों की आमद व रफ़्त की जूलाँगाह क़रार दिया है। इसका साकिन मलाएका के उस गिरोह को क़रार दिया है जो तेरी इबादत से ख़स्ताहाल नहीं होते हैं। तू ही इस ज़मीन का भी मालिक है जिसे लोगों का मुस्तक़र बनाया है और जानवरों , कीड़ों मकोड़ों और बेशुमार मुरई और ग़ैर मुरई मख़लूक़ात के चलने-फिरने की जगह क़रार दिया है।

तू ही इन सरबफ़लक पहाड़ों का मालिक है जिन्हें ज़मीन के ठहराव के लिये मेख़ का दरजा दिया गया है और मख़लूक़ात का सहारा क़रार दिया गया है।

(((- यह इस्तेदलाल अपने हुस्न व जमाल के अलावा इस मानवीयत की तरफ़ भी इशारा है के इस्लाम में मेरी हैसियत एक सरसब्ज़ व शादाब गुलिस्तान की है जहां इस्लामी एहकाम व तालीमात की बहारें ख़ेमाज़न रहती हैं और मेरे अलावा तमाम अफ़राद एक रेगिस्तान से ज़्यादा कोई हैसियत नहीं रखते हैं। किस क़द्र हैरत की बात है के इन्सान सब्ज़ाजार और चश्मए आबे हयात को छोड़कर फिर रेगिस्तानों की तरफ़ पलट जाए और तष्नाकामी की ज़िन्दगी गुज़ारता है। जो तमाम अहले शाम का मुक़द्दर है।-)))

अगर तूने दुशमन के मुक़ाबले में ग़लबा इनायत फ़रमाया तो हमें ज़ुल्म से महफ़ूज़ रखना और हक़ के सीधे रास्ते पर क़ायम रखना और अगर दुशमन को हम पर ग़लबा हासिल हो जाए तो हमें शहादत का शरफ़ अता फ़रमाना और फ़ित्ना से महफ़ूज़ रखना।

( दावते जेहाद) कहाँ हैं वह इज़्ज़त व आबरू के पासबान और मुसीबतों के नुज़ूल के बाज़ नग व नाम की हिफ़ाज़त करने वाले साहेबाने इज़्ज़त व ग़ैरत। याद रखो ज़िल्लत व आर तुम्हारे पीछे है और जन्नत तुम्हारे आगे।

(((- बाज़ हज़रात का ख़याल है के यह बात शूरा के मौक़े पर साद बिन अबी वक़ास ने कही थी और बाज़ का ख़याल है के सक़ीफ़ा के मौक़े पर अबू उबैदा बिन अलजराह ने कही थी और दोनों ही इमकानात पाए जाते हैं के दोनों की फ़ितरत एक जैसी थी और दोनों अमीरूलमोमेनीन (अ 0) की मुख़ालफ़त पर मुत्तहिद थे।

- इससे मुदार तल्हा व ज़ुबैर हैं जिन्होंने ज़ौजए रसूल (स 0) का इतना भी एहतेराम नहीं किया जितना अपनी घर की औरतों का किया करते थे-)))

172-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

( हम्दे ख़ुदा) सारी तारीफ़ उस अल्लाह के लिये है जिसके सामने एक आसमान दूसरे आसमान को और एक ज़मीन दूसरी ज़मीन को छुपा नहीं सकती है।

( रोज़े शूरा) एक शख़्स ( 1) ने मुझसे यहाँ तक कह दिया के फ़रज़न्द्र अबूतालिब! आप में इस खि़लाफ़त की लालच पाई जाती है ? तो मैंने कहा के ख़ुदा की क़सम तुम लोग ज़्यादा हरीस हो हालांके तुम दूर वाले हो। मैं तो उसका अहल भी हूँ और पैग़म्बर (स 0) से क़रीबतर भी हूँ। मैंने इस हक़ का मुतालबा किया है जिसका मैं हक़दार हूँ लेकिन तुम लोग मेरे और उसके दरम्यान हाएल हो गए हो और मेरे ही रूख़ को उसकी तरफ़ से मोड़ना चाहते हो। फिर जब मैंने भरी महफ़िल में दलाएल के ज़रिये से कानों के पर्दों को खटखटाया तो होशियार हो गया और ऐसा मबहूत हो गया के कोई जवाब समझ में नहीं आ रहा था।

( क़ुरैश के खि़लाफ़ फ़रियाद) ख़ुदाया! मैं क़ुरैश और उनके अन्सार के मुक़ाबिल में तुझसे मदद चाहता हूँ के इन लोगों ने मेरी क़राबत का रिश्ता तोड़ दिया और मेरी अज़ीम मन्ज़िलत को हक़ीर बना दिया। मुझसे इस अम्र के लिये झगड़ा करने पर तैयार हो गए जिसका मैं वाक़ेअन हक़दार था और फिर यह कहने लगे के आप से ले लें तो भी सही है और इससे दस्तबरदार हो जाएं तो भी बरहक़ है। (असहाबे जमल के बारे में) यह ज़ालिम इस शान से बरामद हुए के रसूल (स 0) को यूँ खींच कर मैदान में ला रहे थे जैसे कनीज़ें ख़रीद व फ़रोख़्त के वक़्त ले जाई जाती हैं। इनका रूख़ बसरा की तरफ़ था। इन दोनों ने ( 2) अपनी औरतों को घर में बन्द कर रखा था और ज़ौजाए रसूल (स 0) को मैदान में ला रहे थे। जबके इनके लशकर में कोई ऐसा न था जो पहले मेरी बैअत न कर चुका हो और बग़ैर कसी ख़बर व इकराह के मेरी इताअत में न रह चुका हो। यह लोग पहले मेरे आमिले बसरा ( 3) और ख़ाज़ने बैतुलमाल जैसे अफ़राद पर हमलावर हुए तो एक जमाअत को गिरफ़्तार करके क़त्ल कर दिया और एक को धोके में तलवार के घाट उतार दिया। ख़ुदा की क़सम अगर यह तमाम मुसलमानों में सिर्फ़ एक शख़्स को भी क़सदन क़त्ल कर देते तो भी मेरे वास्ते पूरे लशकर से जंग करने का जवाज़ मौजूद था के दीगर अफ़राद हाज़िर रहे और उन्होंने नापसन्दीदगी का इज़हार नहीं किया और अपनी ज़बान ( 4) या अपने हाथ से दिफ़ाअ नहीं किया और फिर जबके मुसलमानों में से इतने अफ़राद को क़त्ल कर दिया है जितनी उनके पूरे लशकर की तादाद थी।

(((-(1) बाज़ हज़रात का ख़याल है के यह बात शूरा के मौक़े पर साद बिन अबी वक़ास ने कही थी और बाज़ का ख़याल है के सक़ीफ़ा के मौक़े पर अबू उबैदा बिन अलजराह ने कही थी और दोनों ही इमकानात पाए जाते हैं के दोनों की फ़ितरत एक जैसी थी और दोनों अमीरूल मोमेनीन (अ 0) की मुख़ालफ़त पर मुत्तहिद थे। ( 2) उससे मुराद तल्हा व ज़ुबैर हैं जिन्होंने ज़ौजए रसूल (स 0) का इतना भी एहतेराम नहीं किया जितना अपने घर की औरतों का किया करते थे।

(3) जनाबे उस्मान बिन ख़ैफ़ का मुसला कर दिया और उनके साथियों की एक बड़ी जमाअत को तहे तेग़ कर दिया। ( 4) फ़िक़ही एतबार से दिफ़ाअ न करने वालों का क़त्ल जाएज़ नहीं होता है लेकिन यहां वह लोग मुराद हैं जिन्होंने इमामे बरहक़ के खि़लाफ़ ख़ुरूज करके फ़साद फ़िल अर्ज़ का इरतेकाब किया था और यह जुर्म जवाज़े क़त्ल के लिये काफ़ी होता है।-)))

173-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(रसूले अकरम (स 0) के बारे में और इस अम्र की वज़ाहत के सिलसिले में के खि़लाफ़त का वाक़ेई हक़दार कौन है ?)

पैग़म्बरे इस्लाम (स 0) वहीए इलाही के अमानतदार और ख़ातमुल मुरसलीन थे रहमते इलाही की बशारत देने वाले और अज़ाबे इलाही से डराने वाले थे।

लोगों! याद रखो उस अम्र का सबसे ज़्यादा हक़दार वही है जो सबसे ज़्यादा ताक़तवर और दीने इलाही का वाक़िफ़कार हो। इसके बाद अगर कोई फ़ित्ना परवाज़ फ़ित्ना खड़ा हो जाएगा तो पहले उसे तौबा की दावत दी जाएगी , उसके बाद अगर इन्कार करेगा तो क़त्ल कर दिया जाएगा। मेरी जान की क़सम अगर उम्मत का मसल तमाम अफ़रादे बशर के इज्तेमाअ के बग़ैर तय नहीं हो सकता है तो इस इज्तेमाअ का तो कोई रास्ता ही नहीं है। होता यही है के हाज़िरीन का फ़ैसला ग़ायब अफ़राद पर नाफ़िज़ हो जाता है और न तो हाज़िर को अपनी बैअत से रूजू करने का हक़ होता है और न ग़ायब को दूसरा रास्ता इख़्तेयार करने का जवाज़ होता है। याद रखो के मैं दोनों तरह के अफ़राद से जेहाद करूंगा। उनसे भी जो ग़ैरे हक़ के दावेदार होंगे और उनसे भी जो हक़दार को उसका हक़ न देंगे। बन्दगाने ख़ुदा! मैं तुम्हें तक़वाए इलाही की वसीयत करता हूँ के यह बन्दों के दरम्यान बेहतरीन वसीयत है और पेशे परवरदिगार अन्जाम के ऐतबार से बेहतरीन अमल है। देखो! तुम्हारे और अहले क़िबला मुसलमानों के दरम्यान जंग का दरवाज़ा खोला जा चुका है। अब इस अलम को वही उठाएगा जो साहेबे बसीरत व सब्र होगा और हक़ के मराकज़ का पहचानने वाला होगा। तुम्हारा फ़र्ज़ है के मेरे एहकाम के मुताबिक़ क़दम आगे बढ़ाओ और मैं जहांँ रोक दूं वहाँ रूक जाओ और ख़बरदार किसी मसले में भी तहक़ीक़ के बग़ैर जल्दबाज़ी से काम न लेना के मुझे जिन बातों का तुम इन्कार करते हो उनमें ग़ैर मामूली इन्के़लाबात का अन्देशा रहता है। याद रखो- यह दुनिया जिसकी तुम आरज़ू कर रहे हो और जिसमें तुम रग़बत का इज़हार कर रहे हो और जो कभी कभी तुमसे अदावत करती है और कभी तुम्हें ख़ुश कर देती है। यह तुम्हारा वाक़ेई घर और तुम्हारी वाक़ेई मन्ज़िल नहीं है जिसके लिये तुम्हें ख़ल्क़ किया गया है और जिसकी तरफ़ तुम्हें दावत दी गई है और फिर यह बाक़ी रहने वाली भी नहीं है और तुम भी उसमें बाक़ी रहने वाले नहीं हो। यह अगर कभी धोका देती है तो दूसरे वक़्त अपने शर से होशियार भी कर देती है , लेहाज़ा इसके धोके से बचो और इसकी तम्बीह पर अमल करो। इसकी लालच को नज़र अन्दाज़ करो और इसकी तख़वीफ़ का ख़याल रखो। इसमें रहकर इस घर की तरफ़ सबक़त करो जिसकी तुम्हें दावत दी गई है और अपने दिलों का रूख़ उसकी तरफ़ से मोड़ लो और ख़बरदार तुममें से कोई शख़्स इसकी किसी नेमत से महरूमी की बुनियाद पर कनीज़ों की तरह रोने न बैठ जाए। अल्लाह से उसकी नेमतों की तकमील का मुतालेबा करो , उसकी इताअत पर सब्र करने और इसकी किताब के एहकाम की मुख़ालफ़त करने के ज़रिये।

याद रखो अगर तुमने दीन की बुनियाद को महफ़ूज़ कर दिया तो दुनिया की किसी “ शै की बरबादी भी तुम्हें नुक़सान नहीं पहुंचा सकती है और अगर तुमने दीन को बरबाद कर दिया तो दुनिया में किसी “ शै की हिफ़ाज़त भी फ़ायदा नहीं दे सकती है। अल्लाह हम सबके दिल को हक़ के रास्ते पर लगा दे और सबको सब्र की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।

(((- अलम लशकरे क़ौम की सरबलन्दी की निशानी और लशकर के वेक़ार व इज़्ज़त की अलामत होता है। लेहाज़ा इसको उठाने वाले को भी साहबे बसीरत व बरदाश्त होना ज़रूरी है वरना अगर परचम सरनिगूँ हो गया तो न लशकर का कोई वेक़ार रह जाएगा और न मज़हब का कोई एतबार रह जाएगा।

सरकारे दो आलम (स 0) ने इन्हें ख़ुसूसियात के पेशे नज़र ख़ैबर के मौक़े पर एलान फ़रमाया था के कल मैं उसको अलम दूंगा जो कर्रार , ग़ैरे फ़र्रार , मोहिब्बे ख़ुदा व रसूल (स 0) , महबूबे ख़ुदा व रसूल (स 0) और मर्दे मैदाँ होगा के इसके अलावा कोई शख़्स अलमबरदारी का अहल नहीं हो सकता है!-)))


174-आपका इरशादे गिरामी

( तल्हा बिन अब्दुल्लाह के बारे में जब आपको ख़बर दी गई के तल्हा व ज़ुबैर जंग के लिये बसरा की तरफ़ रवाना हो गए हैं)

मुझे किसी ज़माने में भी न जंग से मरऊब किया जा सका है और न हर्ब व ज़र्ब से डराया जा सका है। मैं अपने परवरदिगार के नुसरत पर मुतमईन हूँ और ख़ुदा की क़सम उस शख़्स ने ख़ूने उस्मान के मुतालबे के साथ तलवार खींचने में सिर्फ़ इसलिये जल्दबाज़ी से काम लिया है के कहीं उसी से इस ख़ून का मुतालेबा न कर दिया जाए के इसी अम्र का गुमान ग़ालिब है और क़ौम में उससे ज़्यादा उस्मान के ख़ून का प्यासा कोई न था। अब यह इस फ़ौजकशी के ज़रिये लोगों को मुग़ालते में रखना चाहता है और मसले को मुश्तबा और मशकूक बना देना है। हालांके ख़ुदा गवाह है के उस्मान के मामले में उसका मुआमला तीन हाल से ख़ाली नहीं था , अगर उस्मान ज़ालिम था जैसा के इसका ख़याल था तो इसका फ़र्ज़ था के क़ातिलों की मदद करता और उस्मान के मददगारों को ठुकरा देता और अगर वह मज़लूम था तो उसका फ़र्ज़ था के इसके क़त्ल से रोकने वालों और उसकी तरफ़ से माज़ेरत करने वालों में शामिल हो जाता और अगर यह दोनों बातें मशकूक थीं तो इसके लिये मुनासिब था के इस मामले से अलग होकर एक गोशे में बैठ जाता और उन्हें क़ौम के हवाले कर देता लेकिन उसने इन तीन में से कोई भी तरीक़ा इख़्तेयार नहीं किया और ऐसा तरीक़ा इख़्तेयार किया जिसकी सेहत का कोई जवाज़ नहीं था और इसकी माज़ेरत का कोई रास्ता नहीं था।

175-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें मौअज़त के साथ रसूले अकरम से क़राबत का ज़िक्र कर किया गया है)

ऐ वह ग़ाफ़िलों जिनकी तरफ़ से ग़फ़लत नहीं बरती जा सकती है और ऐ छोड़ देने वालों जिनको छोड़ा नहीं जा सकता है। (ताअज्जुब है) मुझे क्या हो गया के मैं तुम्हें अल्लाह से दूर भागते हुए और ग़ैरे ख़ुदा की रग़बत करते हुए देख रहा हूँ। गोया तुम वह ऊंट हो जिनका चरवाहा उन्हें एक हलाक कर देने वाली चरागाह और तबाह कर देने वाले घाट पर ले आया हो या वह चैपाया हो जिसे छुरियों (से ज़िबह करने) के लिये पाला गया है के उसे नहीं मालूम है के जब उनके साथ अच्छा बरताव किया जाता है तो उससे मक़सूद किया है। यह तो अपने दिन को अपना पूरा ज़माना ख़याल करते हैं और पेट भर कर खा लेना ही अपना काम समझते हैं।

ख़ुदा की क़सम मैं चाहूँ तो हर शख़्स को इसके दाखि़ल और ख़ारिज होने की मन्ज़िल से आगाह कर सकता हूं और जुमला हालात को बता सकता हूँ। लेकिन मैं डरता हूँ के कहीं तुम मुझमें गुम होकर रसूले अकरम (स 0) का इन्कार न कर दो और याद रखो के मैं इन बातों से उन लोगों को बहरहाल आगाह करूंगा जिनसे गुमराही का ख़तरा नहीं है। क़सम है उस ज़ाते अक़दस की जिसने उन्हें हक़ के साथ भेजा है और मख़लूक़ात में मुन्तख़ब क़रार दिया है के मैं सिवाए सच के कोई कलाम नहीं करता हूँ।

(((- मोअर्रेख़ीन का इस अम्र पर इत्तेफ़ाक़ है के उस्मान के आखि़र दौरे हयात में इनके क़ातिलों का इज्तेमाअ तल्हा के घर में हुआ करता था और अमीरूल मोमेनीन (अ 0) ही ने इस अम्र का इन्केशाफ़ किया था इसके बाद तल्हा ही ने जनाज़े पर तीर बरसाए थे और मुसलमानों के क़ब्रिस्तान में दफ़न करने से रोक दिया था लेकिन चार दिन के बाद वह ज़ालिम ख़ूने उस्मान का वारिस बन गया और उस्मान के वाक़ेई मोहसिन को उनके ख़ून का ज़िम्मेदार ठहरा दिया। कहीं ऐसा न हो के मुसलमानों को सोचने का मौक़ा मिल जाए , बनी उमय्या तल्हा से इन्तेक़ाम लेने के लिये तैयार हो जाएं और यह तरीक़ा हर शातिर सियासतकार का होता है।-))) रसूले ख़ुदा (स 0) ने सारी बातें मुझे बता दी हैं और हलाक होने वाले की हलाकत और निजात पाने वाले की निजात का रास्ता भी बता दिया है मुझे इस अम्रे खि़लाफ़त के अन्जाम से भी बाख़बर कर दिया है और कोई ऐसी “ शै नहीं है जो मेरे सर से गुज़रने वाली हो और उसे मेरे कानों में न डाल दिया हो और मुझ तक पहुंचा न दिया हो।

ऐ लोगों! ख़ुदा गवाह है के मैं तुम्हें किसी इताअत पर आमादा नहीं करता हूँ मगर पहले ख़ुद सबक़त करता हूँ और किसी मासियत से नहीं रोकता हूं मगर यह के पहले ख़ुद उससे बाज़ रहता हूँ।

176-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

( जिसमें मौअज़ा के साथ क़ुरान के फ़ज़ाएल और बिदअतों के कानअत का तज़किरा किया गया है)

( क़ुराने हकीम) देखो परवरदिगार के बयान से फ़ायदा उठाओ और उसके मवाएज़ से नसीहत हासिल करो और उसकी नसीहत को क़ुबूल करो। उसने वाज़ेह बयानात के ज़रिये तुम्हारे हर बहाने को ख़त्म कर दिया है और तुम पर हुज्जत तमाम कर दी है। तुम्हारे लिये अपने महबूब और नापसन्दीदा तमाम आमाल की वज़ाहत कर दी है ताके तुम एक क़िस्म का इत्तेबाअ करो और दूसरी से इज्तेनाब करो (बचो) के रसूले अकरम (स 0) बराबर यह फ़रमाया करते थे के जन्नत नागवारियों में घेर दी गई है और जहन्नुम को ख़्वाहिशात के घेरे में डाल दिया गया है।

याद रखो के ख़ुदा की कोई इताअत ऐसी नहीं है जिसमें नागवारी की शक्ल न हो और इसकी कोई मासीयत ऐसी नहीं है जिसमें ख़्वाहिश का कोई पहलू न हो। अल्लाह उस बन्दे पर रहमत नाज़िल करे जो ख़्वाहिशात से अलग हो जाए और नफ़्स के हवा व होस को (जड़े बुनियाद से) उखाड़ कर फेंक दे के यह नफ़्स ख़्वाहिशात में बहुत दूर तक खिंच जाने वाला है और यह हमेशा गुनाहों की ख़्वाहिश ही की तरफ़ खींचता है।

बन्दगाने ख़ुदा! याद रखो के मर्दे मोमिन हमेशा सुबह व शाम अपने नफ़्स से बदगुमान ही रहता है और उससे नाराज़ ही रहता है और (उससे) नाराज़गी में इज़ाफ़ा ही करता रहता है लेहाज़ा तुम भी अपने पहले वालों के मानिन्द हो जाओ जो तुम्हारे आगे-आगे जा रहे हैं के उन्होंने दूनियां से अपने ख़ेमे डेरा को हटा लिया है (रूख़सते सफ़र बान्धा जिस तरह मुसाफ़िर अपना डेरा उठा लेता है) और एक मुसाफ़िर की तरह दुनिया की मन्ज़िलों को तय करते हुए आगे बढ़ गए हैं।

याद रखो के यह क़ुरान वह नासेह (नसीहत करने वाला) है जो धोका नहीं देता है और वह हादी है जो गुमराह नहीं करता है। वह बयान करने वाला है (और) ग़लत बयानी से काम लेने वाला नहीं है। कोई शख़्स उसके पास ( 2) नहीं बैठता है मगर यह के जब उठता है तो हिदायत में इज़ाफ़ा कर लेता है या इससे गुमराही में कमी कर लेता है (गुमराही हो घटाकर उससे अलग करता है)।

(((- इन नागवारियों और दुष्वारियों से मुराद सिर्फ इबादत नहीं है के वह सिर्फ़ काहिल और बेदीन अफ़राद के लिये दुशवार हैं वरना सन्जीदा और दीनदार अफ़राद इनमें लज्ज़त और राहत ही का एहसास करते हैं। दर हक़ीक़त इन दुष्वारियों से मुराद वह जेहाद है जिसमें हर राहे हयात में सारी तवानाइयों को ख़र्च करना पड़ता है और हर तरह की ज़हमत का सामना करना पड़ता है जैसा के सूरए मुबारका तौबा में एलान किया गया है के अल्लाह ने साहेबाने ईमान के जान व माल को ख़रीद लिया है और उन्हें जन्नत दे दी है। यह लोग राहे ख़ुदा में जेहाद करते हैं और दुशमन को तहे तेग़ करने के साथ ख़ुद भी शहीद हो जाते हैं। ( 2) कितनी हसीन तरीन ताबीर है तिलावते क़ुरान की के इन्सान क़ुरान के साथ इस तरह रहे जिस तरह कोई शख़्स अपने हमनशीन के साथ बैठता है और जिसके नतीजे में जमाल , हमनशीन से मुतास्सिर होता है। मुसलमान का ताल्लुक़ सिर्फ़ क़ुराने मजीद से नहीं होता है बल्कि उसके मानी से होता है ताके इसके मफ़ाहिम से आश्ना हो सके और उसके तालीमात से फ़ायदा उठा सके। -)))

याद रखो! क़ुरान के बाद कोई किसी का मोहताज नहीं हो सकता है और क़ुरान से (कुछ सीखने से) पहले कोई बे नियाज़ नहीं हो सकता है। अपनी बीमारियों की इससे शिफ़ा हासिल करो और अपनी मुसीबतों में इससे मदद मांगो के इसमें बदतरीन बीमारी कुफ्ऱ व निफ़ाक़ और गुमराही व बेराहरवी का इलाज भी मौजूद है , इसके ज़रिये अल्लाह से सवाल करो और इसकी मोहब्बत के वसीले से उसकी तरफ़ रूख़ करो (अल्लाह से मांगो) और इसके अलावा मख़लूक़ात से सवाल न करो (इसे लोगों से मांगने का ज़रिया न बनाओ)। इसलिये के मालिक की तरफ़ मुतवज्जो होने का इसका जैसा कोई वसीला नहीं है और याद रखो के वह ऐसा शफ़ीअ (शिफ़ाअत करने वाला) है जिसकी शिफ़ाअत मक़बूल है और ऐसा बोलने वाला है जिसकी बात मुसद्देक़ा है। जिसके लिये क़ुरान रोज़े क़यामत सिफ़ारिश कर दे उसके हक़ में शिफ़ाअत क़ुबूल है और जिसके ऐब को वह बयान कर दे उसका ऐब तस्दीक़ शुदा है। रोज़े क़यामत एक मुनादी (निदा देने वाला) आवाज़ देगा के हर (हर क़ुरान की खेती बोने वाला और उसके अलावा हर बोने वाला) अपनी खेती और अपने अमल के अन्जाम में मुब्तिला है लेकिन जो अपने दिल में क़ुरान का बीज बोने वाले थे वह कामयाब हैं लेहाज़ा तुम लोग उन्हीं लोगों और क़ुरान की पैरवी करने वालों में शामिल हो जाओ। उसे मालिक की बारगाह तक पहुंचने में अपना रहनुमा बनाओ और उससे अपने नफ़्स के बारे में नसीहत हासिल करो और अपने ख़यालात को मुतहम (ग़लत) क़रार दो और अपने ख़्वाहिशात को फ़रेबख़ोरदा तसव्वुर करो।

अमल करो अमल- अन्जाम पर निगाह रखो अन्जाम- इस्तेक़ामत से काम लो और इस्तेक़ामत और एहतियात करो एहतियात- तुम्हारे लिये एक इन्तेहा मुअय्यन है उसकी तरफ़ क़दम आगे बढ़ाओ और अल्लाह की बारगाह में उसके हुक़ूक़ की अदायगी और उसके एहकाम की पाबन्दी के साथ हाज़री दो। मैं तुम्हारे आमाल का गवाह बनूंगा और रोज़े क़यामत तुम्हारी तरफ़ से वकालत (हुज्जत पेश) करूंगा।

( नसाएह) याद रखो के जो कुछ होना था वह हो चुका और जो फ़ैसला ख़ुदावन्दी था वह सामने आ चुका। मैं ख़ुदाई वादे और उसकी बुरहान के सहारे कलाम कर रहा हूं बेशक जिन लोगों ने ख़ुदा को ख़ुदा माना और इसी बात पर क़ायम रह गए , उन पर मलाएका इस बशारत के साथ नाज़िल होते हैं के ख़बरदार डरो नहीं और परेशान मत हो , तुम्हारे लिये उस जन्नत की बशारत है जिसका तुमसे वादा किया गया है ” और तुम लोग तो ख़ुदा को ख़ुदा कह चुके हो तो अब उसकी किताब पर क़ायम रहो और उसके अम्र के रास्ते पर साबित क़दम रहो। उसकी इबादत के नेक रास्ते पर जमे रहो और उससे ख़ुरूज न करो और न कोई बिदअत ईजाद करो और न सुन्नत से इख़्तेलाफ़ करो। इसलिये के इताअते इलाही से निकल जाने वाले का रिश्ता परवरदिगार से रोज़े क़यामत टूट जाता है। इससे (के फ़रेब से) होशियार रहो के तुम्हारे अख़लाक़ में उलट फ़ेर अदल-बदल न होने पाए। अपनी ज़बान को एक रखो और उसे महफ़ूज़ रखो इसलिये के यह ज़बान अपने मालिक से बहुत मुंहज़ोरी करती है। ख़ुदा की क़सम मैंने किसी बन्दए मोमिन को नहीं देखा जिसने अपने तक़वा से फ़ायदा उठाया हो मगर यह के अपनी ज़बान को रोक कर रखा है। मोमिन की ज़बान हमेशा उसके दिल के पीछे होती है और मुनाफ़िक़ का दिल हमेशा उसकी ज़बान के पीछे होता है। इसलिये के मोमिन जब बात करना चाहता है तो पहले दिल में ग़ौर-व-फ़िक्र करता है। इसके बाद हर्फ़े ख़ैर होता है तो उसका इज़हार करता है वरना उसे दिल ही में छिपा रहने देता है। लेकिन मुनाफ़िक़ जो इस के मुंह में आता है बक देता है। उसे इस बात की फ़िक्र नहीं होती है के मेरे मवाफ़िक़ है या मुख़ालिफ़।

पैग़म्बरे इस्लाम (स 0) ने फ़रमाया है के किसी शख़्स का ईमान उस वक़्त तक दुरूस्त नहीं हो सकता है जब तक उसका दिल दुरूस्त न हो और किसी शख़्स का दिल दुरूस्त नहीं हो सकता है जब तक उसकी ज़बान दुरूस्त न हो। अब जो शख़्स भी अपने परवरदिगार से इस आलम में मुलाक़ात कर सकता है के उसका हाथ मुसलमानों के ख़ून और उनके माल से पाक हो और उसकी ज़बान उनकी आबरूरेज़ी से महफ़ूज़ हो तो उसे बहरहाल ऐसा ज़रूर करना चाहिये।

( बिदअतों की मोमानिअत) याद रखो के मर्दे मोमिन उस साल इसी चीज़ को हलाल कहता है के जिसे अगले साल हलाल कह चुका है और इस साल उसी “ शै को हराम क़रार देता है जिसे पिछले साल हराम क़रार दे चुका है। और लोगों की बिदअतें और उनकी ईजादात हरामे इलाही को हलाल नहीं बना सकती हैं हलाल व हराम वही है जिसे परवरदिगार ने हलाल व हराम कह दिया है। तुमने तमाम उमूर को आज़मा लिया है और सबका बाक़ायदा तजुर्बा कर लिया है और तुम्हें पहले वालों के हालात से नसीहत भी की जा चुकी है और उनकी मिसालें भी बयान की जा चुकी हैं और एक वाज़ेअ अम्र की दावत भी दी जा चुकी है के अब इस मामले में बहरापन इख़्तेयार नहीं करेगा मगर वही जो वाक़ेअन बहरा हो और अन्धा नहीं बनेगा मगर वही जो वाक़ेअन अन्धा हो और फिर जिसे बलाएं और तजुर्बात फ़ायदा न दे सकें उसे नसीहतें क्या फ़ायदा देंगी। इसके सामने सिर्फ़ कोताहियां ही रहेंगी जिनके नतीजे में बुराईयों को अच्छा और अच्छाइयों को बुरा समझने लगेगा।

लोग दो ही क़िस्म के होते हैं- या वह जो शरीअत का इत्तेबाअ करते हैं या वह जो बिदअतों की ईजाद करते हैं और उनके पास न सुन्नत की कोई दलील होती है और न हुज्जते परवरदिगार की कोई रोशनी।

( क़ुरान) परवरदिगार ने किसी शख़्स को क़ुरान से बेहतर कोई नसीहत नहीं फ़रमाई है। के यही ख़ुदा की मज़बूत रस्सी और इसका अमानतदार वसीला है। इसमें दिलों की बहार का सामान और इल्म के सरचश्मे हैं और दिल की जिलाए इसके अलावा कुछ नहीं है। अब अगरचे नसीहत हासिल करने वाले जा चुके हैं और सिर्फ भूल जाने वाले या भुला देने वाले बाक़ी रह गये हैं लेकिन फ़िर भी तुम कोई खै़र देखो तो उस पर लोगों की मदद करो और कोई शर देखो तो उससे दूर हो जाओ के रसूले अकरम (स 0) बराबर फ़रमाया करते थे “ फ़रज़न्दे आदम ख़ैर पर अमल कर और शर को नज़रअन्दाज़ कर दे ताके बेहतरीन नेक किरदार और मयाना रद हो जाए।

( इक़सामे ज़ुल्म) याद रखो के ज़ुल्म की तीन क़िस्में हैं , वह ज़ुल्म जिसकी बख़्शिश नहीं है और वह ज़ुल्म जिसे छोड़ा नहीं जा सकता है और वह ज़ुल्म जिसकी बख़्शिश हो जाती है और उसका मुतालेबा नहीं होता है।

वह ज़ुल्म जिसकी बख़्शिशनहीं है वह अल्लाह का शरीक क़रार देना है के परवरदिगार ने ख़ुद एलान कर दिया है के इसका शरीक क़रार देने वाले की मग़फ़िरत नहीं हो सकती है और वह ज़ुल्म जो माफ़ कर दिया जाता है वह इन्सान का अपने नफ़्स पर ज़ुल्म है मामूली गुनाहों के ज़रिये। और वह ज़ुल्म जिसे छोड़ा नहीं जा सकता है वह बन्दों का एक-दूसरे पर ज़ुल्म है के यहां क़ेसास बहुत सख़्त है और यह सिर्फ़ छुरी का ज़ख़्म और ताज़ियाने की मार नहीं बल्कि ऐसी सज़ा है जिसके सामने यह सब बहुत मामूली हैं लेहाज़ा ख़बरदार दीने ख़ुदा में रंग बदलने की रोशइख़्तेयार मत करो के जिस हक़ को तुम नापसन्द करते हो उस पर मुत्तहिद रहना इस बातिल पर चलकर मुन्तशिर हो जाने से बहरहाल बेहतर है जिसे तुम पसन्द करते हो , परवरदिगार ने इफ़तेराक़ व इन्तेशार में किसी को कोई ख़ैर नहीं दिया है न उन लोगों में जो चले गए और न उनमें जो बाक़ी रह गए हैं।

(((- इस्लाम के हलाल व हराम दो क़िस्म के हैं , बाज़ उमू रवह हैं जिन्हें मुतलक़ तौर पर हलाल या हराम क़रार दिया गया उनमें तग़य्युर का कोई इमकान नहीं है और उन्हें बदलने वाला दीने ख़ुदा में दख़लअन्दाज़ी करने वाला है जो ख़ुद एक तरह का कुफ्ऱ है , अगरचे बज़ाहिर इसका नाम कुफ्ऱ या शिर्क नहीं है और बाज़ उमू रवह हैं जिनकी हिलयत या हुरमत हालात के एतबार से रखी गई है। ज़ाहिर है के इनका हुक्म हालात के बदलने के साथ ख़ुद ही बदल जाएगा। इसमें किसी के बदलने का कोई सवाल नहीं पैदा होता है। एक मुसलमान और ग़ैर मुसलमान या एक मोमिन और ग़ैर मोमिन का फ़र्क़ यही है के मुसलमान और अम्रे इलाहिया का मुकम्मल इत्तेबाअ करता है और काफ़िर या मुनाफ़िक़ इन एहकाम को अपने मसालेह और मनाफ़ेह के मुताबिक़ बदल लेता है और इसका नाम मसलहते इस्लाम या मस्लहते मुस्लेमीन रख देता है।-)))

लोगों! ख़ुशनसीब है वह जिसे अपना ऐब दूसरों के ऐब पर नज़र करने से मशग़ूल कर ले और क़ाबिले मुबारकबाद है वह शख़्स जो अपने घर में बैठ रहे। अपना रिज़्क़ खाए और अपने परवरदिगार की इताअत करता रहे और अपने गुनाहों पर गिरया करता रहे। वह अपने नफ़्स में मशग़ूल रहे और लोग उसकी तरफ़ से मुतमईन रहें।

177-आपका इरशादे गिरामी

(सिफ़्फ़ीन के बाद हकमीन के बारे में)

तुम्हारी जमाअत ही ने दो आदमियों के इन्तेख़ाब पर इत्तेफ़ाक़ कर लिया था। मैंने तो उन दोनों से शर्त कर ली थी के क़ुरान की हुदूद पर तौक़फ़ करेंगे और उससे तजावुज़ नहीं करेंगे। उनकी ज़बान इसके साथ रहेगी और वह इसी का इत्तेबाअ करेंगे। लेकिन वह दोनों भड़क गए और हक़ को देख भाल कर नज़र अन्दाज़ कर दिया। ज़ुल्म उनकी आरज़ू था और कजरवी फ़हमी इनकी राय (रोशथी) , जबके इस बदतरीन राय और इस ज़ालिमाना फ़ैसले से पहले ही मैंने यह शर्त कर दी थी के अदालत के साथ फ़ैसला करेंगे और हक़ के मुताबिक़ अमल करेंगे लेहाज़ा मेरे पास अपने हक़ में हुज्जत व दलील मौजूद है के इन लोगों ने राहे हक़ से इख़्तेलाफ़ किया है और तै शुदा क़रारदाद के खि़लाफ़ उलटा हुक्म किया है।

178-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(शहादत ईमान और तक़वा के बारे में)

न इस पर कोई हालत तारी हो सकती है और न उसे कोई ज़माना बदल सकता है और न उस पर कोई मकान हावी हो सकता है और न उसकी तौसीफ़ हो सकती है। उसके इल्म से न बारिशके क़तरे मख़फ़ी हैं और न आसमान के सितारे। न फ़िज़ाओं में हवा के झक्कड़ मख़फ़ी हैं और न पत्थरों पर च्यूंटी के चलने की आवाज़ और न अन्धेरी रात में उसकी पनाहगाह , वह पत्तों के गिरने की जगह भी जानता है और आंख के दज़दीदा इशारे भी।

मैं गवाही देता हूं के उसके अलावा कोई ख़ुदा नहीं है। न उसका कोई हमसर व अदील है और न उसमें किसी तरह का शक है , न उसके दीन का इन्कार हो सकता है और न उसकी तख़लीक़ से इन्कार किया जा सकता है।

(((- जब माविया ने सिफ़्फ़ीन में अपने लशकर को हारते हुए देखा तो नैज़ों पर क़ुरान बलन्द कर दिया के हम क़ुरान से फ़ैसला चाहते हैं। अमीरूलमोमेनीन (अ 0) ने फ़रमाया के यह सिर्फ़ मक्कारी और ग़द्दारी है वरना मैं तो ख़ुद ही क़ुराने नातिक़ हूं , मुझसे बेहतर फ़ैसला करने वाला कौन हो सकता है लेकिन शाम के नमकख़्वार और ज़मीर फ़रोशसिपाहियों ने हंगामा कर दिया और हज़रत को मजबूर कर दिया के दो अफ़राद को हकम बनाकर उनसे फ़ैसला कराएं , आपने अपनी तरफ़ से इब्ने अब्बास को पेशकिया लेकिन ज़ालिमों ने उसे भी न माना , बाला आखि़र आपने फ़रमाया के कोई भी फ़ैसला करे लेकिन क़ुरान के हुदूद से आगे न बढ़े के मैंने क़ुरान ही के नाम पर जंग को मौक़ूफ़ किया है। मगर अफ़सोस के यह कुछ न हो सका और अम्र व आस की अय्यारी ने आपके खि़लाफ़ फ़ैसला करा दिया और इस तरह इस्लाम एक अज़ीम फ़ित्ने से दो-चार हो गया लेकिन आपका बहाना वाज़ेह रहा के मैंने फ़ैसले में क़ुरान की शर्त की थी और यह फ़ैसला क़ुरान से नहीं हुआ है लेहाज़ा मुझ पर कोई ज़िम्मेदारी नहीं है-)))

शहादत उस शख़्स की है जिसकी नीयत सच्ची है और बातिन साफ़ है और इसका यक़ीन ख़ालिस है और मीज़ाने अमल गराँबार।

और फिर मैं शहादत देता हूँ के हज़रत मोहम्मद (स 0) उसके बन्दे और तमाम मख़लूक़ात में मुन्तख़ब रसूल हैं। उन्हें हक़ाएक़ की तशरीह के लिये चुना गया है और बेहतरीन शराफ़तों से मख़सूस किया गया है। अज़ीमतरीन पैग़ामात के लिये उनका इन्तेख़ाब हुआ है और उनके ज़रिये हिदायत की अलामात की वज़ाहत की गई है और गुमराही की तारीकियों को दूर किया गया है।

लोगों! याद रखो यह दुनिया अपने से लौ लगाने वाले और अपनी तरफ़ खिंच जाने वाले को हमेशा धोका दिया करती है। जो इसका ख़्वाहिशमन्द होता है उससे कंजूसी नहीं करती है और जो इस पर ग़ालिब आ जाता है उस पर क़ाबू पा लेती है। ख़ुदा की क़सम कोई भी क़ौम जो नेमतों की तरोताज़ा और शादाब ज़िन्दगी में थी और फिर इसकी वह ज़िन्दगी ज़ाएल हो गई है तो उसका कोई सबब सिवाए इन गुनाहों के नहीं है जिनका इरतेकाब इस क़ौम ने किया है। इसलिये के परवरदिगार अपने बन्दों पर ज़ुल्म नहीं करता है। फ़िर भी जिन लोगों पर इताब नाज़िल होता है और नेमतें ज़ाएल हो जाती हैं अगर सिद्क़े नीयत और तवज्जो-ए-क़ल्ब के साथ परवरदिगार की बारगाह में फ़रयाद करें तो वह गई हुई नेमतों को वापस कर देगा और बिगड़े कामों को बना देगा। मैं तुम्हारे बारे में इस बात से ख़ौफ़ज़दा हूँ के कहीं तुम जेहालत और नादानी में न पड़ जाओ। कितने ही मुआमलात ऐसे गुज़र चुके हैं जिनमें तुम्हारा झुकाव उस रूख़ की तरफ़ था जिसमें तुम क़तअन क़ाबिले तारीफ़ नहीं थे। अब अगर तुम्हें पहले की रविशकी तरफ़ पलटा दिया जाए तो फिर नेक बख़्त हो सकते हो लेकिन मेरी ज़िम्मेदारी सिर्फ़ मेहनत करना है और अगर मैं कहना चाहूँ तो यही कह सकता हूँ के परवरदिगार गुज़िश्ता मुआमलात से दरगुज़र फ़रमाए।

179-आपका इरशादे गिरामी

( जब ज़ालिब यमानी ने दरयाफ़्त किया के या अमीरूल मोमेनीन (अ 0) क्या आपने अपने ख़ुदा को देखा है तो फ़रमाया क्या मैं ऐसे ख़ुदा की इबादत कर सकता हूं जिसे देखा भी न हो , अर्ज़ की मौला! उसे किस तरह देखा जा सकता है ? फ़रमाया)

उसे निगाहें आँखों के मुशाहेदे से नहीं देख सकती हैं। उसका इदराक दिलों को हक़ाएक़ ईमान के सहारे हासिल होता है। वह अष्याह से क़रीब है लेकिन जिस्मानी इक़साल की बिना पर नहीं और दूर भी है लेकिन अलाहेदगी की बुनियाद पर नहीं। वह कलाम करता है लेकिन फ़िक्र का मोहताज नहीं और वह इरादा करता है लेकिन सोचने की ज़रूरत नहीं रखता। वह बिला आज़ाए व जवारेह के सानेअ है और बिला पोशीदा हुए लतीफ़ है। ऐसा बड़ा है जो छोटों पर ज़ुल्म नहीं करता है और ऐसा बसीर है जिसके पास हवास नहीं हैं और उसकी रहमत में दिल की नर्मी शामिल नहीं है। तमाम चेहरे उसकी अज़मत के सामनी ज़लील व ख़्वार हैं और तमाम क़ुलूब उसके ख़ौफ़ से लरज़ रहे हैं।

(((- बाज़ हज़रात ने यह सवाल उठाया है के अगर अफ़राद का ज़वाल सिर्फ़ गुनाहों की बुनियाद पर होता है तो क्या वजह है के दुनिया में बेशुमार बदतरीन क़िस्म के गुनहगार पाए जाते हैं लेकिन उनकी ज़िन्दगी में राहत व आराम , तक़दम और तरक़्क़ी के अलावा कुछ नहीं है। क्या इसका यह मतलब नहीं है के गुनाहों का राहत व आराम या रन्ज व अलम में कोई दख़ल नहीं है और इन मसाएल के असबाब किसी और “ शै में पाए जाते हैं। लेकिन इसका वाज़ेह सा जवाब यह है के अमीरूल मोमेनीन (अ 0) ने अफ़राद का ज़िक्र नहीं किया है , क़ौम का ज़िक्र किया है और क़ौमों की तारीख़ गवाह है के उनका ज़वाल हमेशा इन्फ़ेरादी या इज्तेमाई गुनाहों की बिना पर हुआ है और यही वजह है के जिस क़ौम ने शुक्रे ख़ुदा नहीं अदा किया वह सफ़ए हस्ती से नाबूद हो गई और जिस क़ौम ने नेमत की फ़रावानी के बावजूद शुक्रे ख़ुदा से इन्हेराफ़ नहीं किया उसका जिक्र आज तक ज़िन्दा है और क़यामत तक ज़िन्दा रहेगा।-)))

180-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

मैं ख़ुदा का शुक्र करता हूं उन उमूर पर जो गुज़र गए और उन अफ़आल पर जो उसने मुक़द्दर कर दिये और अपने तुम्हारे साथ मुब्तिला होने पर भी ऐ वह गिरोह जिसे मैं हुक्म देता हूं तो इताअत नहीं करता है और आवाज़ देता हूं तो लब्बैक नहीं कहता है , तुम्हें मोहलत दे दी जाती है तो ख़ूब बातें बनाते हो और जंग में शामिल कर दिया जाता है तो बुज़दिली का मुज़ाहिरा करते हो। लोग किसी इमाम पर इज्तेमाअ करते हैं तो एतराज़ात करते हो और घेर कर मुक़ाबले की तरफ़ लाए जाते हो तो फ़रार इख़्तेयार कर लेते हो।

तुम्हारे दुश्मनों का बुरा हो आखि़र तुम मेरी नुसरत और अपने हक़ के लिये जेहाद में किस चीज़ का इन्तेज़ार कर रहे हो ? मौत का या ज़िल्लत का , ख़ुदा की क़सम अगर मेरा दिन आ गया जो बहरहाल आने वाला है तो मेरे तुम्हारे दरम्यान उस हाल में जुदाई होगी के मैं तुम्हारी सोहबत से दिल बरदाष्ता हूंगा और तुम्हारी मौजूदगी से किसी कसरत का एहसास न करूंगा।

ख़ुदा तुम्हारा भला करे! क्या तुम्हारे पास कोई दीन नहीं है जो तुम्हें मुत्तहिद कर सके और न कोई ग़ैरत है जो तुम्हें आमादा कर सके ? क्या यह बात हैरतअंगेज़ नहीं है के माविया अपने ज़ालिम और बदकार साथियों को आवाज़ देता है तो किसी इमदाद और अता के बग़ैर भी उसकी इताअत कर लेते हैं और मैं तुमको दावत देता हूं और तुमसे अतिया का वादा भी करता हूं तो तुम मुझसे अलग हो जाते हो और मेरी मुख़ालफ़त करते हो , हालांके अब तुम्हीं इस्लाम का तरकह और इसके बाक़ी मान्दा अफ़राद हो। अफ़सोस के तुम्हारी तरफ़ न मेरी रज़ामन्दी की कोई बात ऐसी आती है जिससे तुम राज़ी हो जाओ और न मेरी नाराज़गी का कोई मसला ऐसा आता है जिससे तुम भी नाराज़ हो जाओ। अब तो मेरे लिये महबूबतरीन “ शै जिससे मैं मिलना चाहता हूं सिर्फ़ मौत ही है , मैंने तुम्हें किताबे ख़ुदा की तालीम दी , तुम्हारे सामने खुले हुए दलाएल पेशकिये , जिसे तुम नहीं पहचानते थे उसे पहचनवाया और जिसे तुम थूक दिया करते थे उसे ख़ुशगवार बना दिया। मगर यह सब उस वक़्त कारआमद है जब अन्धे को कुछ दिखाई दे और सोता हुआ बेदार हो जाए। वह क़ौम जेहालत से किस क़द्र क़रीब है जिसका क़ायद माविया हो और उसका अदब सिखाने वाला नाबालिग़ा का बेटा हो।

(((- इन्सान के पास दो ही सरमाये हैं जो उसे शराफ़त की दावत देते हैं दीनदार के पास दीन और आज़ादन्ष के पास ग़ैरत , मगर अफ़सोस के अमीरूलमोमेनीन (अ 0) के एतराफ़ जमा हो जाने वाले अफ़राद के पास न दीन था और न क़ौमी शराफ़त का एहसास , और ज़ाहिर है के ऐसी क़ौम से किसी ख़ैर की तवक़्क़ो नहीं की जा सकती है और न वह किसी वफ़ादारी का इज़हार कर सकती है।

किस क़द्र अफ़सोसनाक यह बात है के आलमे इस्लाम में माविया और अम्र व आस की बात सुनी जाए और नफ़्से रसूल (स 0) की बात को ठुकरा दिया जाए बल्कि उससे जंग की जाए। क्या उसके बाद भी किसी ग़ैरतदार इन्सान को ज़िन्दगी की आरज़ू हो सकती है और वह इस ज़िन्दगी से दिल लगा सकता है। अमीरूलमोमेनीन (अ 0) के इस फ़िक़रे में “ फ़ुज़तो व रब्बिल काबा ” बे पनाह दर्द पाया जाता है। जिसमें एक तरफ़ अपनी शहादत और क़ुरबानी के ज़रिये कामयाबी का एलान है और दूसरी तरफ़ इस बेग़ैरत क़ौम से जुदाई की मसर्रत का इज़हार भी पाया जाता है के इन्सान ऐसी क़ौम से निजात हासिल कर ले और इस अन्दाज़े से हासिल कर ले के इसपर कोई इल्ज़ाम नहीं हो बल्कि मारकए हयात में कामयाब रहे।-)))

181-आपका इरशादे गिरामी

( जब आपने एक शख़्स को उसकी तहक़ीक़ के लिये भेजा-- जो ख़वारिज से मिलना चाहती थी और हज़रत से ख़ौफ़ज़दा थी

और वह शख़्स पलट कर आया तो आपने सवाल किया के क्या वह लोग मुतमईन होकर ठहर गए हैं या बुज़दिली का मुज़ाहेरा करके निकल पड़े हैं ,

उसने कहा के वह कूच कर चुके हैं , तो आपने फ़रमाया-)

ख़ुदा इन्हें क़ौमे समूद की तरह ग़ारत कर दे , याद रखो जब नैज़ों की अनियां इनकी तरफ़ सीधी कर दी जाएंगी और तलवारें इनके सरों पर बरसने लगेंगी तो इन्हें अपने किये पर शर्मिन्दगी का एहसास होगा। आज “ शैतान ने इन्हें मुन्तशिर कर दिया है और क लवही इनसे अलग होकर बराअत व बेज़ारी का एलान करेगा। अब उनके लिये हिदायत से निकल जाना , ज़लालत और गुमराही में गिर पड़ना , राहे हक़ से रोक देना और गुमराही की मुंहज़ोरी करना ही इनके तबाह होने के लिये काफ़ी है।

182-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

नोफ़ बकाली से रिवायत की गई है के अमीरूल मोमेनीन (अ 0) ने एक दिन कूफ़े में एक पत्थर पर खड़े होकर ख़ुत्बा इरशाद फ़रमाया जिसे जादह बिन हुबैरा मखज़ूमी ने नस्ब किया था और उस वक़्त आप उन का एक जबह पहने हुए थे और आपकी तलवार का पर तला भी लैफ़ ख़ुरमा का था और पैरों में लैफ़ ख़ुरमा ही की जूतियां थीं आप की पेशानी अक़दस पर सजदों के गट्टे नुमायां थे , फ़रमाया- सारी तारीफ़ उस अल्लाह के लिये है जिसकी तरफ़ तमाम मख़लूक़ात की बाज़गष्त और जुमला उमूर की इन्तेहा है , मैं उसकी हम्द करता हूं , उसके अज़ीम एहसान , वाज़ेअ दलाएल और बढ़ते हुए फ़ज़ल व करम पर , वह हम्द जो उसके हक़ को पूरा कर सके और उसके शुक्र को अदा कर सके। उसके सवाब से क़रीब बना सके और नेमतों में इज़ाफ़ा का सबब बन सके। मैं उससे मदद चाहता हूं उस बन्दे की तरह जो उसके फ़ज़ल का उम्मीदवार हो , उसके मनाफ़ेअ का तलबगार हो उसके दफ़ाए बला का यक़ीन रखने वाला हो , उसके करम का एतराफ़ करने वाला हो और क़ौल व अमल में उस पर मुकम्मल एतमाद करने वाला हो।

मैं उस पर ईमान रखता हूं उस बन्दे की तरह जो यक़ीन के साथ उसका उम्मीदवार हो और ईमान के साथ उसकी तरफ़ मुतवज्जो हो , अज़आन के साथ उसकी बारगाह में सर-ब-सुजूद हो और तौहीद के साथ उससे इख़लास रखता हो , तमजीद के साथ उसकी अज़मत का इक़रार करता हो और रग़बत व कोशिशके साथ उसकी पनाह में आया हो।

वह पैदा नहीं किया गया है के कोई उसकी इज़्ज़त में शरीक बन जाए और उसने किसी बेटे को पैदा नहीं किया है के ख़ुद हलाक हो जाए और बेटा वारिस हो जाए , न उससे पहले कोई ज़मान व मकान था और न उस पर कोई कमी या ज़्यादती तारी होती है। उसने अपनी मोहकम तदबीर और अपने हतमी फ़ैसले की बिना पर अपने को अक़लों के सामने बिल्कुल वाज़ेअ और नुमायां कर दिया है। इसकी खि़लक़त के शवाहेदीन में उन आसमानों की तख़लीक़ भी है जिन्हें बग़ैर सुतून के रोक रखा है और बग़ैर किसी सहारे के क़ायम कर दिया है।

(((- बनी नाजिया का एक शख़्स जिसका नाम ख़रैत बिन राशिद था , अमीरूल मोमेनीन (अ 0) के साथ सिफ़फ़ीन में शरीक रहा और उसके बाद गुमराह हो गया , हज़रत से कहने लगा के मैं न आपकी इताअत करूंगा और न मैं आपके पीछे नमाज़ पढ़ूंगा , आपने सबब दरयाफ़्त किया ? उसने कहा कल बताउंगा , और फिर आने के बजाय तीस अफ़राद को लेकर सहराओं में निकल गया और लूट-मार का काम शुरू कर दिया। एक अमीरूल मोमेनीन (अ 0) के चाहने वाले मुसाफ़िर को सिर्फ़ हुब्बे अली (अ 0) की बुनियाद पर काफ़िर क़रार देकर क़त्ल कर दिया और एक यहूदी को आज़ाद छोड़ दिया। हज़रत ने इसकी रोक थाम के लिये ज़ियाद बिन अबी हफ़सा को 130अफ़राद के साथ भेजा , ज़ियाद ने चन्द अफ़राद को तहे तेग़ कर दिया और ख़रैत फ़रार कर गया और कुरदों को बग़ावत पर आमादा करने लगा। आपने माक़ल बिन क़ैस रियाही को दो हज़ार सिपाहियों के साथ रवाना किया , उन्होंने ज़मीने फ़ारस तक उसका पीछा किया यहांतक के तरफ़ैन में शदीद जंग हुई और ख़रैत नोमान बिन सहयान को उसी के हाथों फ़ना के घाट उतार दिया गया और इस फ़ित्ने का ख़ात्मा हो गया।-)))

( ख़ुदावन्दे आलम ने उन्हें पुकरातो बग़ैर कसी सुस्ती और तौक़फ़ के इताअत व फ़रमाबरदारी करते हुए लब्बैक कह उठे। अगर वह उसकी रूबूबियत का इक़रार न करते और उसके सामने सरे इताअत न झुकाते तो वह उन्हें अपने अर्श का मक़ाम और अपने फ़रिश्तो का मस्कन और पाकीज़ा कलमों और मख़लूक़ के नेक अमलों के बलन्द होने की जगह न बनाता। अल्लाह ने उनके सितारों को ऐसी रौशन निशानियां क़रार दिया है के जिनसे हैरान व सरगर्दां एतराफ़े ज़मीन की राहों में आने जाने के लिये रहनुमाई हासिल करते हैं , अन्धेरी रात की अन्धियारियों के स्याह परदे उनके नूर की ज़ौपाशियों को नहीं रोकते और न शबहाए तारीक की तीरगी के परदे यह ताक़त रखते हैं के वह आसमानों में फैली हुई चान्द के नूर की जगमगाहट को पलटा दें पाक है वह ज़ात जिस पर पस्त ज़मीन के क़ितओं और बाहम मिले हुए स्याह पहाड़ों की च्यूटियों में अन्धेरी रात की अन्धयारियां और पुरसूकून शब की ज़ुलमतें पोशीदा नहीं हैं और न उफ़क़ आसमान में राद की गरज उससे मख़फ़ी है और न वह चीज़ें के जिन पर बादलों की बिजलियां कौंद कर नापैद हो जाती हैं और न वह पत्ते जो टूटकर गिरते है। के जिन्हें बारिश के नछत्रों की तन्द हवाएं और मूसलाधार बारिशे उनके गिरने की जगह से हटा देती हैं। वह जानता है के बारिशके क़तरे कहां गिरेंगे और कहां ठहरेंगे और छोटी च्यूटियां कहां रेंगेंगी और कहां अपने को खींच कर ले जाएंगी मच्छरों को कौन सी रोज़ी किफ़ायत करेगी और मादा अपने पेट में क्या लिये हुए है।

तमाम हम्द उस अल्लाह के लिये है जो अर्श व कुर्सी ज़मीन व आसमान और जिन व इन्स से पहले मौजूद था। न इन्सानी वाहमों से उसे जाना जा सकता है और न अक़्ल व फ़हम से उसका अन्दाज़ा हो सकता है। उसे कोई सवाल करने वाला (दूसरे साएलों से) ग़ाफ़िल नहीं बनाता और न बख़्षिशव अता से उसके हां कुछ कमी आती है। वह आंखों से देखा नहीं जा सकता और न किसी जगह में उसकी हदबन्दी हो सकती है। न साथियों के साथ मुत्तसिफ़ किया जा सकता है और न आज़ाअ व जवारेह की हरकत से वह पैदा करता है और न हवास से वह जाना पहचाना जा सकता है और न इन्सानों पर उसका क़यास हो सकता है। वह ख़ुदा के जिसने बग़ैर आज़ाअ व जवारेह और बग़ैर कोयाई और बग़ैर हलक़ के कोवस को हिलाए हुए मूसा अलैहिस्सलाम से बातें कीं और उन्हें अपने अज़ीम निशानियां दिखाईं ऐ अल्लाह की तौसीफ़ में रन्ज व ताब उठाने वाले अगर तू (उससे ओहदा बरा होने में) सच्चा है तो पहले जिबराईल व मीकाईल और मुक़र्रब फरिष्तों के लाव लशकर का वसफ़ बयान कर के जो पाकीज़गी व तहारत के हिजरवी में इस आलम में सर झुकाए पड़े हैं के उनकी अक़्लें शशदर व हैरान हैं के इस बेहतरीन ख़ालिक़ की तौसीफ़ कर सकें। सिफ़तों के ज़रिये वह चीज़ें जानी पहचानी जाती हैं जो शक्ल व सूरत और आज़ा व जवारेह रखती हूँ और व हके जो अपनी हदे इन्तेहा को पहुंच कर मौत के हाथों ख़त्म हो जाएं। उस अल्लाह के अलावा कोई माबूद नही ंके जिसने अपने नूर से तमाम तारीकियों को रोशन व मुनव्वर किया और ज़ुल्मत (अदम) से हर नूर को तीरा व तार बना दिया है। अल्लाह के बन्दों! मैं तुम्हें उस अल्लाह से डरने की वसीयत करता हूँ जिसने तुमको लिबास से ढांपा और हर तरह का सामाने मईशत तुम्हारे लिये मुहैया किया अगर कोई दुनियावी बक़ा की (बुलन्दियों पर) चड़ने का ज़ीना या मौत को दूर करने का रास्ता पा सकता होता तो वह सुलेमान इब्ने दाऊद (अ 0) होते के जिनके लिये नबूवत व इन्तेहाए तक़र्रब के साथ जिन व इन्स की सल्तनत क़ब्ज़े में दे दी गई थी। लेकिन ज बवह अपना आबोदाना पूरा और अपनी मुद्दते (हयात) ख़त्म कर चुके तो फ़ना की कमानों ने उन्हें मौत के तीरों की ज़द पर रख लिया। घर उनसे ख़ाली हो गए और बस्तियां उजड़ गई और दूसरे लोग उनके वारिस हो गए। तुम्हारे लिये गुज़िश्ता दौरों (के हर दौर) में इबरतें (ही इबरतें) हैं (ज़रा सोचो) तो के कहां हैं अमालक़ा और उनके बेटे और कहां हैं फ़िरऔन और उनकी औलादें , और कहां हैं असहाबे अर्रस के शहरों के बाशिन्दे जिन्होंने नबियों को क़त्ल किया जो पैग़म्बर के रौशन तरीक़ों को मिटाया और ज़ालिमों के तौर तरीक़ों को ज़िन्दा किया , कहां हैं वह लोग जो लष्करों को लेकर बढ़े हज़ारों को शिकस्त दी और फ़ौजों को फ़राहम करके शहरों को आबाद किया।

इसी ख़ुतबे के ज़ैल में फ़रमाया है वह हिकमत की सिपर पहने होगा और उसको उसके तमाम शराएत व आदाब के साथ हासिल किया होगा (जो यह हैं के) हमह तन इसकी तरफ़ मुतवज्जो हो उसकी अच्छी तरह शिनाख़्त हो और दिल (अलाएक़े दुनिया से) ख़ाली हो चुनान्चे वह उसके नज़दीक उसी की गुमषुदा चीज़ और उसी की हाजत व आरज़ू है के जिसका वह तलबगार व ख़्वास्तगार है। वह उस वक़्त (नज़रों से ओझल होकर) ग़रीब व मुसाफ़िर होगा के जब इस्लामे आलम ग़ुरबत में और मिस्ल उस ऊँट के होगा जो थकन से अपनी दुम ज़मीन पर मारता हो और गर्दन का अगला हिस्सा ज़मीन पर डाले हुए हो। वह अल्लाह की बाक़ीमान्दा हुज्जतों का बक़िया और अम्बिया के जानशीनों में से एक वारिस व जानशीन है। इसके बाद हज़रत ने फ़रमाया- ऐ लोगों! मैंने तुम्हें इसी तरह नसीहतें की हैं जिस तरह की अम्बिया अपनी उम्मतों को करते चले आए हैं और उन चीज़ों को तुम तक पहुंचाया है जो औसिया बाद वालों तक पहुंचाया किये हैं मैंने तुम्हें अपने ताज़ियाने से अदब सिखाना चाहा मगर तुम सीधे न हुए और ज़जर व तौबीह से तुम्हें हंकाया लेकिन तुम एकजा न हुए। अल्लाह तुम्हें समझे , क्या मेरे अलावा किसी और इमाम के उम्मीदवार हो जो तुम्हें सीधी राह पर चलाए और सही रास्ता दिखाए। देखो! दुनिया की तरफ़ रूख़ करने वाली चीज़ों ने जो रूख़ किये हुए थीं पीठ फिराई , और जो पीठ फिराए हुए थे उन्होंने रूख़ कर लिया। अल्लाह के नेक बन्दों ने (दुनिया से) कूच करने का तहैया कर लिया और फ़ना होने वाली थोड़ी सी दुनिया हाथ से देकर हमेशा रहने वाली बहुत सी आख़ेरत मोल ले ली। भला हमारे उनभाई बन्दों को कहा जिन के ख़ून सिफ़्फ़ीन में बहाए गए उससे क्या नुक़सान पहुंचा ?)

आख़ेरत के अज्रे कसीर के मुक़ाबले में जो फ़ना होने वाला नहीं है , हमारे वह ईमानी भाई जिन का ख़ून सिफ़फ़ीन के मैदान में बहा दिया गया उनका नुक़सान हुआ है अगर वह आज ज़िन्दा नहीं हैं के दुनिया के मसाएब के घूंट पीएं और गन्दे पानी पर गुज़ारा करें , वह ख़ुदा की बारगाह में हाज़िर हो गए और उन्हें इनका मुकम्मल अज्र मिल गया , मालिक ने उन्हें ख़ौफ़ के बाद अमन की मन्ज़िल में वारिद कर दिया है।

कहां हैं मेरे वह भाई जो सीधे रास्ते पर चले और हक़ की राह पर लगे रहे। कहां हैं अम्मार ? कहां हैं इब्ने इतेहान ? कहां हैं ज़ुल मशहादीन ? कहां हैं उनके जैसे ईमानी भाई जिन्होंने मौत का अहद व पैमान बान्ध लिया था और जिनके सर फ़ाजिरों के पास भेज दिये गए।

( यह कहकर आपने महासन शरीफ़ पर हाथ रखा और तावीरे गिरया फ़रमाते रहे इसके बाद फ़रमाया)

आह! मेरे उन भाइयों पर जिन्होंने क़ुरान की तिलावत की तो उसे मुस्तहकम किया और फ़राएज़ पर ग़ौर व फ़िक्र किया तो उन्हें क़ायम किया (अदा किया) , सुन्नतों को ज़िन्दा बनाया और बिदअतों को मुर्दा बनाया , उन्हें जेहाद के लिये बुलाया गया तो लब्बैक कही और अपने क़ाएद पर एतमाद किया तो उसका इत्तेबाअ भी किया।

( इसके बाद बुलन्द आवाज़ से पुकार कर फ़रमाया) जेहाद , जेहाद ऐ बन्दगाने ख़ुदा , आगाह हो जाओ के मैं आज अपनी फ़ौज तय्यार कर रहा हूं , अगर कोई ख़ुदा की बारगाह की तरफ़ जाना चाहता है तो निकलने के लिये तैयार हो जाए।

नोफ़ का बयान है के इसके बाद हज़रत ने दस हज़ार का लशकर इमाम हसन (अ 0) के साथ , दस हज़ार क़ैस बिन साद के साथ , दस हज़ार अबू अयूब अन्सारी के साथ और इसी तरह मुख़तलिफ़ तादाद में मुख़तलिफ़ अफ़राद के साथ तैयार किया और आपका मक़सद दोबारा सिफ़फ़ीन की तरह कूच करने का था लेकिन नौचन्दा जुमा आने से पहले ही आपको इब्ने मुल्जिम ने ज़ख़्मी कर दिया और इस तरह सारा लशकर पलट गया और हम सब इन चैपायों की मानिन्द हो गये जिनका हंकाने वाला गुम हो जाए और उन्हें चारों तरफ़ से भेड़िये उचक लेने की फ़िक्रें हों।


183-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(क़ुदरते ख़ुदा फ़ज़ीलते क़ुरान और वसीयते तक़वा के बारे में)

सारी तारीफ़ उस अल्लाह के लिये है जो बग़ैर देखे भी पहचाना हुआ है और बग़ैर किसी तकान के भी ख़ल्क़ करने वाला है। उसने मख़लूक़ात को अपनी क़ुदरत से पैदा किया और अपनी इज्ज़त की बिना पर उनसे मुतालेबा-ए-अबदीयत किया। वह अपने जूद व करम में तमाम अज़माए आलम से बालातर है। उसी ने इस दुनिया में अपनी मख़लूक़ात को आबाद किया है और जिन व इन्स की तरफ़ अपने रसूल भेजे हैं ताके वह निगाहों से परदा उठा दें और नुक़सानात से आगाह कर दें , मिसालें बयान कर दें और उयूब से बाख़बर कर दें। सेहत व बीमारी के तग़य्युरात से इबरत दिलाने का सामान करें और हलाल व हराम और इताअत करने वालों के लिये मुहय्या शुदा अज्र और नाफ़रमानों के लिये अज़ाब से आगाह कर दें। मैं उसकी ज़ाते अक़दस की इसी तरह हम्द करता हूं जिस तरह उसने बन्दों से मुतालबा किया है और हर “ शै की एक मिक़दार मुअय्यन है और हर क़द्र की एक मोहलत रखी है और हर तहरीर की एक मेयार मुअय्यन की है। देखो क़ुरान अम्र करने वाला भी है और रोकने वाला भी। वह ख़ामोशभी है और गोया भी , वह मख़लूक़ात पर परवरदिगार की हुज्जत है।

लोगों से अहद लिया गया है और उनके नफ़्सों को उसका पाबन्द बना दिया गया है। मालिक ने उसके नूर को तमाम बनाया है और उसके दीन को कामिल क़रार दिया है। अपने पैग़म्बर को उस वक़्त अपने पास बुलाया है ज बवह उसके एहकाम के ज़रिये लोगों को हिदायत कर चुके थे लेहाज़ा परवरदिगार की अज़मत का एतराफ़ इस तरह करो जिस तरह उसने अपनी अज़मत का ऐलान किया है के उसने दीन की किसी बात को मख़फ़ी नहीं रखा है और कोई ऐसी पसन्दीदा या न पसन्दीदा बात नहीं छोड़ी है जिसके लिये वाज़ेअ निशाने हिदायत न बता दिया हो या कोई मोहकम आयत न नाज़िल कर दी हो जिसके ज़रिये रोका जाए या दावत दी जाए। उसकी रिज़ा और नाराज़गी मुस्तक़बिल में भी वैसी ही रहेगी जिस तरह वक़्ते नुज़ूल थी। और यह याद रखो के वह तुमसे किसी ऐसी बात पर राज़ी न होगा जिस पर पहले वालों से नाराज़ हो चुका है और न किसी ऐसी बात से नाराज़ होगा जिस पर पहले वालों से राज़ी रह चुका है। तुम बिल्कुल वाज़ेअ निशाने क़दम पर चल रहे हो और उन्हीं बातों को दोहरा रहे हो जो पहले वाले कह चुके हैं। उसने तुम्हें दुनिया की ज़हमतों से बचा लिया है और तुम्हें शुक्रे खुदा पर आमादा किया है और तुम्हारी ज़बानों से ज़िक्र का मुतालबा किया है।

तुम्हें तक़वा की नसीहत की है और उसे अपनी मर्ज़ी की हद आखि़र क़रार दिया है और यही मख़लूक़ात से उसका मुतालेबा है लेहाज़ा उससे डरो जिसकी निगाह के सामने हो और जिसके हाथों में तुम्हारी पेशानी है और जिसके क़ब्ज़ए क़ुदरत में करवटें बदल रहे हो। और अगर किसी बात पर पर्दा डालना चाहो तो वह जानता है और अगर एलान करना चाहो तो वह लिख लेता है और तुम्हारे ऊपर मोहतरम कातिबे आमाल मुक़र्रर कर दिये हैं जो किसी हक़ को साक़ित नहीं कर सकते हैं और किसी बातिल को सब्त नहीं कर सकते हैं। और याद रखो के जो शख़्स भी तक़वाए इलाही इख़्तेयार करता है परवरदिगार उसके लिये फ़ित्नों से बाहर निकल जाने का रास्ता बना देता है और उसे तारीकियों में नूर अता कर देता है। उसके नफ़्स के तमाम मुतालबात के दरम्यान दाएमी ज़िन्दगी अता करता है और करामत की मन्ज़िल में नाज़िल करता है। उस घर में जिसको अपने लिये पसन्द फ़रमाया है। जिसका साया उसका अर्श है और जिसका नूर इसकी ज़िया है। इसके ज़ायेरीने मक्का हैं और इसके रफ़क़ाए। अब अपनी बाज़गश्त की तरफ़ सबक़त करो और मौत से पहले सामान मुहैया कर लो के अनक़रीब लोगों की उम्मीदें खत्म हो जाने वाली हैं और मौत का फन्दा गले में पड़ जाने वाला है जब तौबा का दरवाज़ा भी बन्द हो जाएगा , अभी तुम उस मन्ज़िल में हो जिसकी तरफ़ पहले वाले लौट कर आने की आरज़ू कर रहे हैं और तुम मुसाफ़िर हो और इस घर से सफ़र करने वाले हो जो तुम्हारा वाक़ेई घर नहीं है। तुम्हें कूच की इत्तेलाअ दी जा चुकी है और सामाने सफर इकट्ठा करने का हुक्म दिया जा चुका है और यह याद रखो के यह ज़म नाज़ूक जिल्द आतिशे जहन्नुम को बरदाश्त नहीं कर सकती है। लेहाज़ा ख़ुदारा अपने नफ़्सों पर रहम करो के तुम इसे दुनिया के मसाएब में आज़मा चूके हो। क्या तुमने नहीं देखा है के तुम्हारा क्या आलम होता है जब एक कांटा चुभ जाता है या एक ठोकर लगने से ख़ून निकल आता है , या जलती हुई रेत तपने लगती है (तपिश से जलने पर किस तरह बेचैन होकर चीख़ता है) तो फिर उस वक़्त क्या होगा जब तुम जहन्नुम के दो तबक़ों के दरम्यान होगे। दहकते हुए पत्थरों के दहकते तबक़ों में और शयातीन के हमसाये में। क्या तुम्हें यह मालूम है के मालिक (दारोग़ाए जहन्नम) जब आग पर ग़ज़बनाक होता है तो उसके अजज़ा एक दूसरे से टकराने लगते हैं और जब इसे झिड़कता है तो वह घबराकर (तिलमिलाकर) दरवाज़ों के दरम्यान उछलने लगती है।

ऐ पीरे कुहन साल (बूढ़े) के जिस पर बढ़ापा छा चुका है। उस वक़्त तेरा क्या आलम होगा जब आग के तौक़ गरदन की हड्डियों में ग़ुस जाएंगे और हथकड़ियां हाथों में गड़कर कलाइयों का गोश्त तक खा जाएंगी।

अल्लाह के बन्दों! अल्लाह को याद करो उस वक़्त जबके तुम सेहत के आलम में हो क़ब्ल इसके के बीमार हो जाओ और वुसअत के आलम में क़ब्ल इसके के तंगी का शिकार हो जाओ अपनी गर्दनों को आतिशे जहन्नम से आज़ाद कराने की फ़िक्र करो क़ब्ल इसके के वह इस तरह गिरवीदा हो जाएं के फिर चढ़ाई न जा सकें। अपनी आंखों को बेदार रखो अपने शिकम को लाग़र बनाओ और अपने पैरों को राहे अमल में इस्तेमाल करो। अपने माल को ख़र्च करो और अपने जिस्म को अपनी रूह पर क़ुरबार कर दो। ख़बरदार इस राह में कंजूसी न करना के परवरदिगार ने साफ़ साफ़ फ़रमा दिया है के “ अगर तुम अल्लाह की नुसरत करोगे तो अल्लाह भी तुम्हारी मदद करेगा और तुम्हारे क़दमों को सिबात इनायत फ़रमाएगा ” उसने यह भी फ़रमा दिया है के “ कौन है जो परवरदिगार को बेहतरीन क़र्ज़ दे ताके वह उसे दुनिया में चैगुना बना दे और इसके लिये बेहतरीन जज़ा है ” तो उसने तुमसे कमज़ोरी की बिना पर नुसरत का मुतालबा नहीं किया है और न ग़ुरबत की बिना पर क़र्ज़ मांगा है। जबके ज़मीन व आसमान के सारे ख़ज़ाने उसी की मिल्कियत हैं और वह ग़नी हमीद है ” । वह चाहता है के तुम्हारा इम्तेहान ले के तुम में हसन अमल के एतबार से सबसे बेहतरीन कौन है। अब अपने आमाल के साथ सबक़त करो ताके अल्लाह के घर में उसके हमसाये के साथ ज़िन्दगी गुज़ारो। जहां मुरसलीन की रिफ़ाक़त होगी और मलाएका ज़ियारत करेंगे और कान जहन्नुम की आवाज़ सुनने से भी महफ़ूज़ रहेंगे और बदन किसी तरह की तकान और ताब से भी दो-चार न होंगे। “ यही वह फ़ज़्ले ख़ुदा है के जिसको चाहता है इनायत कर देता है और अल्लाह बेहतरीन फ़ज़्ल करने वाला है। ” मैं वह कह रहा हूं जो तुम सुन रहे हो। इसके बाद अल्लाह ही मददगार है मेरा भी और तुम्हारा भी और वही हमारे लिये काफ़ी है और वही बेहतरीन कारसाज़ है।

184-आपका इरशादे गिरामी

( जो आपने बुर्ज में मसहरे ताई ख़ारेजी से फ़रमाया जब यह सुना के वह कह रहा है के ख़ुदा के अलावा किसी को फ़ैसले का हक़ नहीं है)

ख़ामोशहो जा। ख़ुदा तेरा बुरा करे ऐ टूटे हुए दांतों वाले। ख़ुदा शाहिद है के जब हक़ का ज़हूर हुआ था उस वक़्त तेरी शख़्सियत कमज़ोर और तेरी आवाज़ बेजान थी। लेकिन जब बातिल की आवाज़ बलन्द हुई तो तू बकरी की सींग की तरह उभर कर मन्ज़रे आम पर आ गया।

(((- यह एक ख़ारेजी शाएर था जिसने मौलाए कायनात के खि़लाफ़ यह आवाज़ बलन्द की के आपने तहकीम को क़ुबूल करके ग़ैरे ख़ुदा को हकम बना दिया है और इस्लाम में अल्लाह के अलावा किसी की हाकमीयत का कोई तसव्वुर नहीं है

हज़रत इमाम आलीमक़ाम (अ 0) ने इस फ़ित्ने के दूररस असरात का लेहाज़ करके सख़्त तरीन लहजे में जवाब दिया और क़ाएल की औक़ात का एलान कर दिया के शख़्स बातिल परस्त और हक़ बेज़ार है। वरना उसे इस अम्र का अन्दाज़ा होता के किताबे ख़ुदा से फ़ैसला कराना ख़ुदा की हाकमीयत का इक़रार है इन्कार नहीं है। हाकमीयते ख़ुदा के मुन्किर अम्र व आस जैसे अफ़राद हैं जिन्होंने किताबे ख़ुदा को नज़र अन्दाज़ करके सियासी चालों से फ़ैसला कर दिया और दीने ख़ुदा को यकसर नाक़ाबिले तवज्जो क़रार दे दिया -)))

185-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें हम्दे ख़ुदा , सनाए रसूल (स 0) और बाज़ मख़लूक़ात का तज़किरा है)

सारी तारीफ़ उस अल्लाह के लिये है जिसे न हवास पा सकते हैं और न मकान घेर सकते हैं , न आंखे उसे देख सकती हैं और न परदे उसे छिपा सकते हैं उसने अपने क़दीम होने की तरफ़ मख़लूक़ात के हादिस होने से रहनुमाई की है और उनके वजूद बाद अज़ अदम को अपने वजूदे अज़ल का सबूत बना दिया है और इनकी बाहेमी मुशाबेहत से अपने बेमिसाल होने का इज़हार किया है। वह अपने वादे में सच्चा है और अपने बन्दों पर ज़ुल्म करने से अजल व अरफ़ा है। उसने लोगो में अद्ल का क़याम किया है और फ़ैसलों पर मुकम्मल इन्साफ़ से काम लिया है। अशयाअ के हदूस से अपनी अज़लीयत पर इस्तेदलाल किया है और इन पर आजिज़ी का निशान लगाकर अपनी क़ुदरते कामेला का असबात किया है। अशयाअ के जबदी फ़ना व अदम से अपने दवाम का पता दिया है। वह एक है लेकिन अदद के एतबार से नहीं , दाएमी है लेकिन मुद्दत के एतबार से नहीं और क़ाएम है लेकिन किसी के सहारे नहीं। ज़ेहन उसे क़ुबूल करते हैं लेकिन हवास की बिना पर नहीं और शाहदात उसकी गवाही देते हैं लेकिन इसकी बारगाह में पहुंचने के बाद नही। औहाम इसका अहाता नहीं कर सकते हैं बल्कि वह उनके लिये उन्ही के ज़रिये रौशन हुआ है और उन्हीं के ज़रिये इनके क़ब्ज़े में आने से इन्कार कर दिया है और इसका हकम भी उन्हीं को ठहराया है। वह एतबार से बड़ा नहीं है के उसके एतराफ़ ने फैल कर इसके जिस्म को बड़ा बना दिया है और न ऐसा अज़ीम है के उसकी जसामत ज़्यादा हो और उसने उसके जसद को अज़ीम बना दिया हो , वह अपनी शान में कबीर और अपनी सल्तनत में अज़ीम है।

और मैं गवाही देता हूं के हज़रत मोहम्मद उसके बन्दे और मुख़लिस रसूल और पसन्दीदा अमीन हैं। अल्लाह उन पर रहमत नाज़िल करे। उसने उन्हें नाक़ाबिले इन्कार दलाएल , वाज़ेअ कामयाबी और नुमायां रास्ते के साथ भेजा है और उन्होंने उसके पैग़ाम को वाशगाफ़ अन्दाज़ में पेशकर दिया है और लोगों को सीधे रास्ते की रहनुमाई कर दी है। हिदायत के निशानात क़ायम कर दिये हैं और रोशनी के मिनारे इस्तेवार कर दिये है। इस्लाम की रस्सियों को मज़बूत बना दिया है और ईमान के बन्धनों को मुस्तहकम कर दिया है।

अगर यह लोग इसकी अज़ीम क़ुदरत और वसीअ नेमत में ग़ौर व फ़िक्रर करते तो रास्ते की तरफ़ वापस आ जाते और जहन्नम के अज़ाब से ख़ौफ़ज़दा हो जाते। लेकिन मुश्किल यह है के इनके दिल मरीज़ हैं और इनकी आंखें कमज़ोर हैं। क्या यह एक छोटी सी मख़लूक़ को भी नहीं देख रहे हैं के उसने किस तरह उसकी तख़लीक़ को मुस्तहकम और इसकी तरकीब को मज़बूत बनाया है। इस छोटे से जिस्म में कान और आंखें सब बना दी हैं और इसमें हड्डियां और खाल भी दुरूस्त कर दी है।

ज़रा इस च्यूंटी के छोटे से जिस्म और उसकी लतीफ़ शक्ल व सूरत की बारीकी की तरफ़ नज़र करो जिसका गोशाए चश्म से देखना भी मुश्किल है और फ़िक्रों की गिरफ़्त में आना भी दुशवार है , किस तरह ज़मीन पर रेंगती है और किस तरह अपने रिज़्क़ की तरफ़ लपकती है , दाने को अपने सूराख़ की तरफ़ ले जाती है और फिर वहां मरकज़ पर महफ़ूज़ कर देती है। गर्मी में सर्दी का इन्तेज़ाम करती है और तवानाई के दौर में कमज़ोरी के ज़माने का बन्दोबस्त करती है। इसके रिज़्क़ की कफ़ालत की जा चुकी है और इसी के मुताबिक़ उसे बराबर रिज़्क़ मिल रहा है।

(((- एक छोटी सी मख़लूक़ च्यूंटी में यह दूरअन्देशी और इस क़द्र तन्ज़ीम व तरतीब और एक अशरफ़ुल मख़लूक़ात में इस क़द्र ग़फ़लत और तग़ाफ़िल किस क़द्र हैरत अंगेज़ है और उससे ज़्यादा हैरत अंगेज़ क़िस्साए जनाबे सुलेमान है जहां च्यूंटी ने लशकरे सुलेमान को देखकर आवाज़ दी के फ़ौरन अपने अपने सूराख़ों में दाखि़ल हो जाओ के कहीं लशकरे सुलेमान तुम्हें पामाल न कर दे और उसे एहसास भी न हो। गोया के एक च्यूंटी के दिल में क़ौम का इस क़द्र दर्द है और उसे सरदारे क़ौम होने के एतबार से इस क़द्र ज़िम्मेदारी का एहसास है के क़ौम तबाह न होने पाए और आज आलम इस्लाम व इन्सानियत इस क़द्र तग़ाफ़ुल का शिकार हो गया है के किसी के दिल में क़ौम का दर्द नहीं है बल्कि हक्काम क़ौम के कान्धों पर अपने जनाज़े उठा रहे हैं और उनकी क़ब्रों पर अपने ताजमहल तामीर कर रहे हैं।-)))

न एहसान करने वाला ख़ुदा उसे नज़र अन्दाज़ करता है और न साहेबे जज़ा व अता उसे महरूम रखता है चाहे वह ख़ुश्क पत्थर के अन्दर हो या जमे हुए संगे ख़ारा के अन्दर। अगर तुम उसकी ग़िज़ा को पस्त व बलन्द नालियों और उसके जिस्म के अन्दर शिकम की तरफ़ झुके हुए पस्लियों के किनारों और सर में जगह पाने वाले आंख और कान को देखोगे तो तुम्हें वाक़ेअन इसकी तख़लीक़ पर ताअज्जुब होगा और इसकी तौसीफ़ से आजिज़ हो जाओगे। बलन्द व बरतर है वह ख़ुदा जिसने इस जिस्म को उसके पैरों पर क़ायम किया है और उसकी तामीर इन्हीं सुतूनों पर खड़ी की है। न इसकी फ़ितरत (बनाने में) में किसी ख़ालिक़ ने हिस्सा लिया है और न इसके तख़लीक़ में किसी क़ादिर ने कोई मदद की है। और अगर तुम फ़िक्रर के तमाम रास्तों को तय करके इसकी इन्तेहा तक पहुंचना चाहोगे तो एक ही नतीजा हासिल होगा के जो च्यूंटी का ख़ालिक़ है वही दरख़्त का भी परवरदिगार है। इसलिये के हर एक तख़लीक़ में यही बारीकी है और हर जानदार का दूसरे से निहायत दरजाए बारीक ही इख़तेलाफ़ है। इसकी बारगाह में अज़ीम व लतीफ़ , सक़ील व ख़फ़ीफ़ , क़वी व ज़ईफ़ सब एक ही जैसे हैं।

यही हाल आसमान और फ़िज़ा और हवा और पानी का है , के चाहो शम्स व क़मर को देखो या नबातात व शजर को , पानी और पत्थर पर निगाह करो या शबो रोज़ की आमद व रफ़्त पर , दरयाओं के बहाव को देखो या पहाड़ों की कसरत और च्यूंटियों के तूलवार तफ़ाअ को , लुग़ात के इख़तेलाफ़ को देखो या ज़बानों के इफ़तेराक़ को , सब उसकी क़ुदरते कामेला के बेहतरीन दलाएल हैं। हैफ़ है उन लोगों पर जिन्होंने तक़दीर साज़ से इन्कार किया है और तदबीर करने वाले से मुकर गए। उनका ख़याल है के सब घास फूस की तरह हैं के बग़ैर खेती करने वाले के उग आए हैं और बग़ैर सानेअ के मुख़तलिफ़ शक्लें इख़्तेयार कर ली हैं। हालांके इन्होने इस दावा में न किसी दलील का सहारा लिया है और न ही अपने अक़ाएद की कोई तहक़ीक़ की है वरना यह समझ लेते के न बग़ैर बानी के इमारत हो सकती है और न बग़ैर मुजरिम के जुर्म हो सकता है।

और अगर तुम चाहो तो यही बातें टिड्डी के बारे में कही जा सकती हैं के इसके अन्दर दो सुर्ख़ सुर्ख़ आंखें पैदा की हैं और चान्द जैसे दो हलक़ों में आंखों के चिराग़ रौशन कर दिये हैं। छोटे-छोटे कान बना दिये हैं और मुनासिब सा दहाना खोल दिया है लेकिन इसके लिबास को क़वी बना दिया है। इसके दो तेज़ दांत हैं जिनसे पत्तियों को काटती है और दो पैर दनदानावार हैं जिनसे घास वग़ैरा को काटती है। काष्तकार अपनी काष्त के लिये इनसे ख़ौफ़ज़दा रहते हैं लेकिन इन्हें हंका नहीं सकते हैं चाहे किसी क़द्र ताक़त क्यों न जमा कर लें। यहां तक के वह खेतियों पर जस्त व ख़ेज़ करते हुए हमलावर हो जाती हैं और अपनी ख़्वाहिशपूरी कर लेती हैं। जबके उस का कुल वजूद एक बारीक उंगली से ज़्यादा नहीं है।

पस बा-बरकत है वह ज़ाते अक़दस जिसके सामने ज़मीन व आसमान की तमाम मख़लूक़ात परग़बत या नजबदराकराह सर-ब ’ सुजूद रहती हैं।

उसके लिये चेहरा और रुख़सार को ख़ाक पर रखे हुए हैं और अज्ज़ व इन्केसार के साथ इसकी बारगाह में सरापा इताअत हैं और ख़ौफ़ व दहशत से अपनी ज़माम इख़्तेयार उन्हीं के हवाले किये हुए हैं। परिन्दे उसके अम्र के ताबे हैं के वह उनके परों और सांसों का शुमार रखता है और उनके परों को तरी या ख़ुश्की में जमा दिया करता है , इनका फ़ौत मुक़र्रर कर दिया है और इनकी जिन्स का एहसा कर लिया है के यह कव्वा है वह अक़ाब है यह कबूतर है वह शुतरमुर्ग़ है , हर परिन्दे को उसके नाम से क़याम वजूद में दावत दी है और हर एक की रोज़ी की केफ़ालत की है। संगीन क़िस्म के बादल पैदा किये तो उनसे मूसलाधार पानी बरसा दिया और इसकी तक़सीमात का हिसाब भी रखा। ज़मीन को ख़ुश्की के बाद तर कर दिया और इसके नबातात को बन्जर हो जाने के बाद दोबारा उगा दिया।

(((- दरहक़ीक़त घास फूस के बारे में भी यह तसव्वुर खि़लाफ़े अक़्ल है के इसकी तख़लीक़ बग़ैर किसी ख़ालिक़ के हो गई है , लेकिन यह तसव्वुर सिर्फ़ इस लिये पैदा कर लेता है के इसकी हिकमत और मसलहत से बाख़बर नहीं है और यह ख़याल करता है के इस बरसात ने पानी के बग़ैर किसी तरतीब व तन्ज़ीम के उगा दिया है और इसके बाद इस तख़लीक़ पर सारी कायनात का क़यास करने लगता है। हालांके उसे कायनात की हिकमत व मसलहत को देखकर यह फ़ैसला करना चाहिये था के तख़लीक़े कायनात के बाज़ इसरार तो वाज़ेह भी हो गए हैं लेकिन तख़लीक़े नबातात का तो कोई राज़ वाज़ेअ नहीं हो सका है और यह इन्सान की इन्तेहाई जेहालत है के वह इस क़द्र हक़ीर और मामूली मख़लूक़ात की हिकमत व मसलेहत से भी बाख़बर नहीं है और हौसला इस क़दर बलन्द है के मालिके कायनात से टक्कर लेना चाहता है। और एक लफ़्ज़ में इसके वजूद का ख़ात्मा कर देना चाहता है-)))


186-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(तौहीद के बारे में और उसमें वह तमाम इल्मी मतालिब पाए जाते हैं जो किसी दूसरे ख़ुतबे में नहीं हैं)

वह उसकी तौहीद का क़ायल नहीं है जिसने उसके लिये कैफ़ियात का तसव्वुर पैदा कर लिया और वह उसकी हक़ीक़त से नाआश्ना है जिसने उसकी तमसील क़रार दे दी। उसने उसका क़स्द ही नहीं किया जिसने उसकी शबीह बना दी और वह उसकी तरफ़ मुतवज्जो ही नहीं हुआ जिसने इसकी तरफ़ इशारा कर दिया या उसे तसव्वुर का पाबन्द बना देना चाहा। जो अपनी ज़ात से पहचाना जाए है वह मख़लूक़ है और जो दूसरे के सहारे क़ायम हो वह उस इल्लत का मोहताज है। परवरदिगार फ़ाएल है लेकिन आज़ा के हरकात से नहीं और अन्दाज़े मुक़र्रर करने वाला है लेकिन फिक्र की जूलानियों से नहीं। वह ग़नी है लेकिन किसी से कुछ लेकर नहीं , ज़माना उसके साथ नहीं रह सकता और आलात उसे सहारा नहीं दे सकते। उसका वजूद ज़माने से पहले है और इसका वजूद अदम से भी साबिक़ और उसकी अज़लियत इब्तेदा से भी मुक़द्दम है। इसके हवास को ईजाद करने से अन्दाज़ा हुआ के वह हवास से बेनियाज़ है और उसके चीज़ो के दरम्यान ज़दयत क़रार देने से मालूम हुआ के उसकी कोई ज़िद नहीं है और उसके चीज़ो में मुक़ारनत क़रार देने से साबित हुआ के उसका कोई क़रीन और साथी नहीं है। उसने नूर को ज़ुल्मत की , वज़ाहत को इबहाम की , ख़ुश्की को तरी की और गरमी को सरदी की ज़िद क़रार दिया है। वह एक दूसरे की दुशमन चीज़ो को जमा करने वाला , एक-दूसरे से जुदागाना चीज़ो का साथ कर देने वाला , बाहमी दूरी रखने वालों को क़रीब बना देने वाला और बाहेमी क़ुरबत के हामिल उमूर का जुदा कर देने वाला है। वह न किसी हद के अन्दर आता है और न किसी हिसाब व शुमार में आ सकता है के जिस्मानी क़ूवतें अपनी जैसी चीज़ो ही को महदूद कर सकती हैं और आलात अपने इमसाल ही की तरफ़ इशारा कर सकते हैं। इन चीज़ो को लफ़्ज़ मुन्ज़ो (कब) ने क़दीम होने से रोक दिया है और हर्फ़ क़द (हो गया) ने अज़लियत से अलग कर दिया है और लौला ने उन्हें तकमील से जुदा कर दिया है। उन्हें चीज़ो के ज़रिये बनाने वाला अक़्लों के सामने जलवागर हुआ है और उन्हीं के ज़रिये आंखों की दीद से बरी हो गया है। इसपर हरकत व सुकून का क़ानून जारी नहीं होता है के उसने ख़ुद हरकत व सुकून के निज़ाम को जारी किया है और जिस चीज़ की इब्तिदा उसने की है वह उसकी तरफ़ किस तरह आएद हो सकती है या जिसको उसने ईजाद किया है वह उसकी ज़ात में किस तरह शामिल हो सकती है। ऐसा हो जाता तो उसकी ज़ात भी तग़य्युर पज़ीद हो जाती।

(((- मालिके कायनात ने तख़लीक़े कायनात में ऐसे ख़ुसूसियात को वदीअत कर दिया है जिनके ज़रिये उसकी अज़मत का बख़ूबी अन्दाज़ा किया जा सकता है। सिर्फ़ इस नुक्ते की तरफ़ तवज्जो देने की ज़रूरत है के जो “ शै भी किसी की ईजाद कर्दा होती है उसका इतलाक़ मौजद की ज़ात पर नहीं हो सकता है लेहाज़ा अगर उसने हवास को पैदा किया है तो इसके मानी यह हैं के उसकी ज़ात हवास से बालातर है और अगर उसने बाज़ चीज़ो में हमरंगी और बाज़ में इख़्तेलाफ़ पैदा किया है तो यह इस बात की अलामत है के उसकी ज़ाते अक़दस न किसी की हमरंग है और न किसी से ज़िदयत की हामिल है। यह सारी बातें मख़लूक़ात के मुक़द्दर में लिखी गई हैं और ख़ालिक़ की ज़ात इन तमाम बातों से कहीं ज़्यादा बलन्द व बाला है।-)))

इसकी हक़ीक़त भी क़ाबिले तजज़िया हो जाती और इसकी मानवीयत भी अज़लियत से अलग हो जाती और इसके यहां भी अगर सामने की जहत होती तो पीछे की सिम्त होती और वह भी कमाल का तलबगार होता अगर उसमें नुक़्स पैदा हो जाता , उसमें मसनूआत की अलामतें पैदा हो जाती और वह मदलोल (सारी चीज़े उसकी हस्ती की दलील) होने के बाद ख़ुद दूसरे की तरफ़ (दलील बन जाने) रहनुमाई करने वाला हो जाता। (हालांकि वह इस अम्रे मुसल्लेमा की रू से के इसकें मख़लूक़ की सिफ़तों का होना ममनूअ है ,) वह अपने इम्तेनाअ व तहफ़्फ़ुज़ की ताक़त की बिना पर इस हद से बाहर निकल गया है के कोई ऐसी शै इस पर असर करे जो दूसरों पर असरअन्दाज़ होती है। इसके यहां न तग़य्युर है और न ज़वाल और न उसके आफ़ताबे वजूद के लिये कोई ग़ुरूब है। वह न किसी का बाप है के उसका कोई फ़रज़न्द हो और न किसी का फ़रज़न्द है के महदूद होकर रह जाए। वह औलाद बनाने से भी बे नियाज़ और औरतों को हाथ लगाने से भी बलन्द व बाला है। औहाम उसे पा नहीं सकते हैं के उसका अन्दाज़ा मुक़र्रर करें और होशमन्दियां उसका तसव्वुर नहीं कर सकती हैं के इसकी तस्वीर बना सकें। हवास इसका इदराक नहीं कर सकते हैं के उसे महसूस कर सकें और हाथ उसे छू नहीं सकते हैं के मस कर लें। वह किसी हाल में मुतग़य्यर नहीं होता है और मुख़्तलिफ़ हालात में बदलता (मुन्तक़िल होता) भी नहीं है। शब व रोज़ उसे पुराना नहीं कर सकते हैं और तारीकी व रोशनी उसमें तग़य्युर नहीं पैदा कर सकती हैं। वह न अजज़ाअ से मौसूफ़ होता है और न जवारेह व आज़ा से , न किसी अर्ज़ से मुत्तसिफ़ होता है और न ही क़ुरबत और जुजि़्ज़यत से (उसे अजज़ाअ व जवारेह सिफ़ात में से किसी सिफ़त और ज़ात के अलावा किसी भी चीज़ और हिस्सों से मुत्तसिफ़ नहीं किया जा सकता)। उसके लिये न हद और इन्तेहा का लफ़्ज़ इस्तेमाल होता है और न इख़्तेताम और ज़वाल का। न चीज़ो उस पर हावी हैं के जब चाहें पस्त कर दें या बलन्द कर दें , और न कोई चीज़ उसे उठाए हुए है के जब चाहे सीधा कर दे या मोड़ दे। वह न चीज़ो के अन्दर दाखि़ल है और न उनसे ख़ारिज है। वह कलाम करता है मगर ज़बान और तालू के सहारे नहीं और सुनता है लेकिन कान के सूराख़ और आलात के ज़रिये नहीं। बोलता है लेकिन तलफ़्फ़ुज़ से नहीं और हर चीज़ को याद रखता है लेकिन हाफ़ेज़ा के सहारे नहीं। इरादा करता है लेकिन दिल से नहीं और मोहब्बत व रिज़ा रखता है लेकिन नर्मी क़ल्ब के वसीले से नहीं और बुग़्ज़ व ग़ज़ब भी रखता है लेकिन ग़म व ग़ुस्से की तकलीफ़ से नहीं। जिस चीज़ को ईजाद करना चाहता है उससे कुन कह देता है और वह हो जाती है। न कोई आवाज़ कानों से टकराती है और न कोई निदा सुनाई देती है। उसका कलाम दरहक़ीक़त उसका फ़ेल है जिसको उसने ईजाद किया है और उसके पहले से होने का कोई सवाल नहीं है वरना वह भी क़दीम और दूसरा ख़ुदा हो जाता।

उसके बारे में यह नहीं कहा जा सकता है के वह अदम से वजूद में आया है के इस पर हादस सिफ़ात का इतलाक़ हो जाए और दोनों में न कोई फ़ासला रह जाए और न उसका हवादिस पर कोई फ़ज़ल रह जाए और फ़िर सानेअ व मसनूअ दोनों बराबर हो जाएं और मसनूअ सनअत के मिस्ल हो जाए। उसने मख़लूक़ात को बग़ैर किसी दूसरे के छोड़े हुए नमूने के बनाया है और इस तख़लीक़ में किसी की मदद भी नहीं ली है। ज़मीन को ईजाद किया और उसमें उलझे बग़ैर उसे रोक कर रखा और फ़िर बग़ैर किसी सहारे के गाड़ दिया और बग़ैर किसी सुतून के क़ायम कर दिया और बग़ैर खम्बों के बलन्द भी कर दिया। उसे इस तरह की कजी और टेढ़ेपन से महफ़ूज़ रखा और हर क़िस्म के शिगाफ़ और इन्तेशार से बचाए रखा। उसमें पहाड़ों की मीख़ें गाड़ दीं और चट्टानों को मज़बूती से नस्ब कर दिया। चश्मे जारी कर दिये और पानी की गुज़रगाहों को शिगाफ़्ता कर दिया। उसकी कोई सनअत कमज़ोर नहीं है और उसने जिसको क़ूवत दे दी है वह ज़ईफ़ नहीं है। वह हर “ शै पर अपनी अज़मत व सल्तनत की बिना पर ग़ालिब है।

(((- इसमें कोई शक नहीं है के परवरदिगार का इरफ़ान उसके सिफ़ात व कमालात ही से होता है और उसकी ज़ाते अक़दस भी मुख़तलिफ़ सिफ़ात से मुत्तसिफ़ है। बात सिर्फ़ यह है के सिफ़ात हादिस नहीं हैं , बल्कि ऐन ज़ात हैं और एक ज़ाते अक़दस है जिससे उसके तमाम सिफ़ात का अन्दाज़ा होता है और उसकी तरह के तादद का कोई इमकान नहीं है।-)))

वह इल्म व इरफ़ान की बिना पर अन्दर तक की ख़बर रखता है। जलाल व इज़्ज़त की बिना पर हर “ शै से बलन्द व बाला है और अगर किसी “ शै को तलब करना चाहे तो (वह उसके दस्तरस से बाज़ नहीं) कोई “ शै उसे आजिज़ नहीं कर सकती है और उससे इन्कार नहीं कर सकती है के इस पर ग़ालिब आ जाए। तेज़ी दिखलाने वाले उससे बच कर आगे नहीं जा सकते हैं और वह किसी साहेबे सरवत की रोज़ी का मोहताज नहीं है। तमाम चीज़ो उसकी बारगाह में ख़ुज़ूअ करने वाली और इसकी अज़मत के आगे ज़लील हैं। कोई चीज़ उसकी सलतनत से फ़रार करके दूसरे की तरफ़ नहीं जा सकती है के उसके नफ़े व नुक़सान से महफ़ूज़ हो जाए। न उसका कोई कफ़ू (हमसर) है के हमसरी करे और न कोई मिस्ल है के बराबर हो जाए। वह हर “ शै को वजूद के बाद फ़ना करने वाला है के एक दिन फिर ग़ायब हो जाए (यहां तक के मौजूद चीज़ें उन चीज़ों की तरह हो जाएं के जो कभी थीं ही नहीं) और उसके लिये दुनिया का फ़ना कर देना इससे ज़्यादा हैरत अंगेज़ नहीं है के जब उसने इसकी अख़्तेराअ व ईजाद की थी। भला यह कैसे हो सकता है जबके सूरते हाल यह है के अगर तमाम हैवानात परिन्दे और चरिन्दे रात को मन्ज़िल पर वापस आने वाले और घरों में रह जाने वाले , तरह-तरह के अनवाअ व इक़साम वाले और तमाम इन्सान ग़बी और होशमन्द सब मिलकर एक मच्छर को ईजाद करना चाहें तो नहीं कर सकते हैं और न उन्हें यह अन्दाज़ा होगा के इसकी ईजाद का तरीक़ा और रास्ता क्या है बल्कि उनकी अक़्लें इसी राह में भटक (हैरान हो) जाएंगी और उनकी ताक़तें जवाब दे जाएंगी और आजिज़ व दरमान्दा होकर मैदाने अमल से वापस आ जाएंगी और उन्हें महसूस हो जाएगा के उनपर किसी का ग़लबा है और उन्हें अपनी आजिज़ी का इक़रार भी होगा और उन्हें फ़ना कर देने के बारे में भी कमज़ोरी का एतराफ़ होगा। बेशक , वह ख़ुदाए पाक व पाकीज़ा ही है जो दुनिया के फ़ना हो जाने के बाद भी रहने वाला है और उसके साथ रहने वाला कोई नहीं है। वह इब्तेदा में भी ऐसा ही था और इन्तेहा में भी ऐसा ही होने वाला है। उसके लिये न वक़्त है न मकान , न साअत है न हंगाम और ज़मान है। उस वक़्त मुद्दतें और वक़्त सब फ़ना हो जाएंगे और साअत व साल सबका ख़ात्मा हो जाएगा। उस ख़ुदाए वाहिद व क़ह्हार के अलावा कोई ख़ुदा नहीं है। उसी की तरफ़ तमाम उमूर की बाज़गष्त है और किसी “ शै को भी अपनी ईजाद से पहले अपनी तख़लीक़ का यारा ना था और न फ़ना होते वक़्त इनकार करने का दम होगा। अगर इतनी ही ताक़त होती तो हमेशा न रह जाते। उस मालिक को किसी “ शै के बनाने में किसी दुशवारी का सामना नहीं करना पड़ा और उसे किसी “ शै की तख़लीक़ व ईजाद थका भी नहीं सकी। उसने इस कायनात को न अपनी हुकूमत के इस्तेहकाम के लिये बनाया है और न किसी ज़वाल और नुक़सान के ख़ौफ़ से बचने के लिये। न उसे किसी मद्दे मुक़ाबिल के मुक़ाबले में मदद की ज़रूरत थी और न वह किसी हमलावर दुशमन से बचना चाहता था। उसका मक़सद अपने मुल्क व सल्तनत में कोई इज़ाफ़ा था और न किसी शरीक के सामने अपनी कसरत का इज़हार करना (इतराना) था और न तन्हाई की वहशत से उन्स हासिल करना था। इसके बाद वह इस कायनात को फ़ना कर देगा , न इसलिये के इसकी तदबीर और इसके तसर्रुफ़ात से आजिज़ आ गया है और न इसलिये के अब आराम करना चाहता है या उस पर किसी ख़ास चीज़ का बोझ पड़ रहा है।

(((- दुनिया में ईजादात और हुकूमात का फ़लसफ़ा यही होता है के कोई ईजादात के ज़रिये हुकूमत का इस्तेहकाम चाहता है और कोई हुकूमत के ज़रिये ख़तरात का मुक़ाबला करना चाहता है। इसलिये बहुत मुमकिन था के बाज़ जाहिल अफ़राद मालिके कायनात की तख़लीक़ और उसकी हुकूमत के बारे में भी इसी तरह का ख़याल क़ायम कर लेते। आप हज़रत ने यह चाहा के इस ग़लत फ़हमी का इज़ाला कर दिया जाए और इस हक़ीक़त को बेनक़ाब कर दिया जाए के ख़ालिक़ व मख़लूक़ में बे पनाह फ़र्क़ है और किसी भी मख़लूक़ का क़यास ख़ालिक़ में नहीं किया जा सकता है। मख़लूक़ का मिज़ाज एहतियाज है और ख़ालिक़ का कमाल बेनियाज़ी है लेहाज़ा दोनों के बारे में एक तरह के तसव्वुरात नहीं क़ायम किये जा सकते हैं।)))

न इसलिये के बक़ाए कायनात ने उसे थका दिया है तो अब उसे मिटा देना चाहता है , ऐसा कुछ नहीं है। उसने अपने लुत्फ़ से इसकी तद्बीर की है और अपने अम्र से इसे रोक रखा है। अपनी क़ुदरत से इसे मुस्तहकम बनाया है और फिर फ़ना करने के बाद दोबारा ईजाद कर देगा (न इसलिये के इनमें से किसी चीज़ की उसे एहतियाज है और उनकी मदद का ख़्वाहं है और न तन्हाई की उलझन से मुनतक़िल होकर दिलबस्तगी की हालत पैदा करने के लिये और जेहालत व बेबसीरती की हालत से वाक़फ़ीयत व तजुरबात की दुनिया में आने के लिये और फ़क्ऱो एहतियाज से दौलत व फ़रावानी और ज़िल्लत व पस्ती से इज़्ज़त व तवानाई की तरफ़ मुन्तक़िल होने के लिये इनको दोबारा पैदा करता है।) हालांके उस वक़्त भी न उसे किसी “ शै की ज़रूरत है और न किसी से मदद लेना होगी। न वहशत से उन्स की तरफ़ मुन्तक़िल होना होगा और न जेहालत की तारीकी से इल्म और तजुर्बे की तरफ़ आना होगा न फ़क्ऱो एहतियाज से मालदारी और कसरत की तलाशहोगी और न ज़िल्लत व कमज़ोरी से इज़्ज़त व क़ुदरत की जुस्तजू होगी।

187-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें हवादिसे रोज़गार का ज़िक्र किया गया है)

मेरे मां बाप उन चन्द अफ़राद पर क़ुरबान हो जाएं जिनके नाम आसमान में मारूफ़ हैं और ज़मीन में मजहोल। आगाह हो जाओ और उस वक़्त का इन्तेज़ार करो जब तुम्हारे अम्र उलट जाएंगे और ताल्लुक़ात टूट जाएंगे और बच्चों के हाथ में इक़तेदार आ जाएगा यही वह वक़्त होगा जब एक दिरहम के हलाल के ज़रिये हासिल करने से आसानतर तलवार का ज़ख़्म होगा और लेने वाले फ़क़ीर का अज्र देने वाले मालदार से ज़्यादा होगा।

तुम बग़ैर किसी शराब के नेमतों के नशे में सरमस्त होगे और बग़ैर किसी मजबूरी के क़सम खाओगे और बग़ैर किसी ज़रूरत के झूट बोलोगे और यही वह वक़्त होगा जब बलाएं तुम्हें इस तरह काट खाएंगी जिस तरह उट की पीठ को पालान। हाए यह रन्ज व अलम किस क़द्र तवील होगा और उससे निजात की उम्मीद किस क़द्र दूरतर होगी।

लोगों! उन सवारियों की बागडोर उतार कर फेंक दो जिनकी पुश्त पर तुम्हारे ही हाथों गुनाहों का बोझ है और अपने हाकिम से इख़्तेलाफ़ न करो के बाद में अपने किये पर पछताना पड़े। वह आग के शोले जो तुम्हारे सामने हैं उनकें कूद न पड़ों। उनकी राह से अलग होकर चलो और रास्ते को उनके लिये ख़ाली कर दो के मेरी जान की क़सम इस फ़ितने की आग में मोमिन हलाक हो जाएगा और ग़ैर मुस्लिम महफ़ूज़ रहेगा।

मेरी मिसाल तुम्हारे दरम्यान अन्धेरे में चिराग़ जैसी है के जो इसमें दाखि़ल हो जाएगा वह रोशनी हासिल कर लेगा। लेहाज़ा ख़ुदारा मेरी बात सुनो और समझो। अपने दिलों के कानों को मेरी तरफ़ मसरूफ़ करो ताके बात समझ सको।

(((- जिस तरह मालिक ने रसूले अकरम (स 0) को जाहेलीयत के अन्धेरे में सिराजे मुनीर बनाकर भेजा था उसी तरह फ़ितनों के अन्धेरों में मौलाए कायनात की ज़ात एक रौशन चिराग़ की है के अगर इन्सान इस चिराग़ की रौशनी में ज़िन्दगी गुज़ारे तो कोई फ़ित्ना उस पर असर अन्दाज़ नहीं हो सकता है और किसी अन्धेरे में उसके भटकने का इमकान नहीं है। लेकिन शर्त यही है के इस चिराग़ की रौशनी में क़दम आगे बढ़ाए वरना अगर उसने आंखें बन्द कर लीं और अन्धेपन के साथ क़दम आगे बढ़ाता रहा तो चिराग़ रौशन रहेगा और इन्सान गुमराह हो जाएगा जिसकी तरफ़ इन कलेमात के ज़रिये इशारा किया गया है के ख़ुदारा मेरी बात सुनो और समझो के इसके बग़ैर हिदायत का कोई इमकान नहीं है और गुमराही का ख़तरा हरगिज़ नहीं टल सकता है।)))

188-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(मुख़तलिफ़ उमूर की वसीयत करते हुए)

ऐ लोगो! मैं तुम्हें वसीयत करता हूं तक़वा इलाही और नेमतों , एहसानात और फ़ज़ल व करम पर शुक्रे ख़ुदा करने की। देखो कितनी नेतमें हैं जो उसने तुम्हें इनायत की हैं और कितनी बुराइयों की मुकाफ़ात से अपनी रहमत के ज़रिये बचा लिया है। तुमने खुलकर गुनाह किये और उसने परदा पोशी की , तुमने काबिले मवाख़ेज़ा आमाल अन्जाम दिये और उसने तुम्हें मोहलत दे दी।

मैं तुम्हें वसीयत करता हूं के मौत को याद रखो और उससे ग़फ़लत न बरतो। आखि़र उससे कैसे ग़फ़लत कर रहे हो जो तुमसे ग़फ़लत करने वाली नहीं है। और फ़रिश्तए मौत से कैसे उम्मीद लगाए हो जो हरगिज़ मोहलत देने वाला नहीं है। तुम्हारी नसीहत के लिये वह मुर्दे ही काफ़ी हैं जिन्हें तुम देख चुके हो के किस तरह अपनी क़ब्रों की तरफ़ बग़ैर सवारी के ले जाए गए और किस तरह क़ब्र में उतार दिये गए के ख़ुद से उतरने के भी क़ाबिल नहीं थे। ऐसा मालूम होता है के उन्होंने कभी इस दुनिया को बसाया ही नहीं था और गोया के आखि़रत ही उनका हमेशगी का मकान है। वह जहां आबाद थे उसे वहशत कदा बना गए और जिससे वहशत खाते थे वहां जाकर आबाद हो गए। यह इसी में मशग़ूल रहे थे जिसको छोड़ना पड़ा और उसे बरबाद करते रहे थे जिधर जाना पड़ा। अब किसी बुराई से बचकर कहीं जा सकते हैं और न किसी नेकी में कोई इज़ाफ़ा कर सकते हैं। दुनिया से उन्स पैदा किया तो उसने धोका दे दिया और इस पर एतबार कर लिया तो उसने तबाह व बरबाद कर दिया।

ख़ुदा तुम पर रहमत नाज़िल करे , अब से सबक़त करो उन मनाज़िल की तरफ़ जिनको आबाद करने का हुक्म दिया गया है और जिनकी तरफ़ सफ़र करने की रग़बत दिलाई गई है और दावत दी गई है। अल्लाह की नेमतों की तकमील का इन्तेज़ाम करो उसकी इताअत के अन्जाम देने और मासियत से परहेज़ करने पर सब्र के ज़रिये। इसलिये के कल का दिन आज के दिन से दूर नहीं है। देखो दिन की साअतें , महीने के दिन , साल के महीने और ज़िन्दगी के साल किस तेज़ी से गुज़र जाते हैं।

189-आपका इरशादे गिरामी

(ईमान और वजूबे हिजरत के बारे में)

ईमान का एक वह हिस्सा है जो दिलों में साबित और मुस्तहकम होता है और एक वह हिस्सा है जो दिल और सीने के दरम्यान आरज़ी तौर पर रहता है , लेहाज़ा अगर किसी से बराअत और बेज़ारी भी करना हो तो इतनी देर इन्तेज़ार करो के उसे मौत आ जाए के उस वक़्त बेज़ारी बरमहल होगी।

हिजरत का क़ानून आज भी वही है जो पहले था , अल्लाह किसी क़ौम का मोहताज नहीं है चाहे जो ख़ुफ़िया तौर पर मोमिन रहे या अलल एलान ईमान का इज़हार करे हिजरत का इतलाक़ हुज्जते ख़ुदा की मारेफ़त के बग़ैर नहीं हो सकता है। लेहाज़ा जो शख़्स इसकी मारेफ़त हासिल करके इसका इक़रार कर ले वही मोहाजिर है।

(((- ईमान वह अक़ीदा है जो इन्सान के दिल की गहराइयों में पाया जाता है और जिसका वाक़ेई इज़हार इन्सान के अमल व किरदार से होता है के अमल और किरदार के बग़ैर ईमान सिर्फ़ एक दावा रहता है जिसकी कोई तस्दीक़ नहीं होती है। लेकिन यह ईमान भी दो तरह का होता है। कभी इन्सान के दिल की गहराइयों में यूं पेवस्त हो जाता है के ज़माने के झक्कड़ भी उसे हिला नहीं सकते हैं और कभी हालात की बिना पर तज़लज़ल के इमकानात पैदा हो जाते हैं। हज़रत (अ 0) ने इस दूसरी क़िस्म के पेशे नज़र इरशाद फ़रमाया है के किसी इन्सान की बदकिरदारी की बिना पर बराअत करना है तो इतना इन्तेज़ार कर लो के उसे मौत आ जाए ताके यह यक़ीन हो जाए के ईमान उसके दिल की गहराइयों में साबित नहीं था वरना तौबा व इस्तग़फ़ार करके राहे रास्त पर आ जाता।

हिजरत का वाक़ेई मक़सद जान का बचाना नहीं बल्कि ईमान का बचाना होता है , लेहाज़ा जब तक ईमान के तहफ़्फ़ुज़ का इन्तेज़ाम न हो जाए उस वक़्त तक हिजरत का कोई मफ़हूम नहीं है और जब मारेफ़ते हुज्जत के ज़रिये ईमान के तहफ़्फ़ुज़ का इन्तेज़ाम हो जाए तो समझो के इन्सान मुहाजिर हो गया , चाहे उसका क़याम किसी मन्ज़िल पर क्यों न रहे।)))

इसी तरह मुस्तज़ाफ़ उसे नहीं कहा जाता है जिस तक ख़ुदाई दलील पहुंच जाए और वह उसे सुन भी ले और दिल में जगह भी दे दे। हमारा मामला निहायत दरजए सख़्त और दुशवारगुज़ार है। इसका मुतहम्मल सिर्फ़ वह बन्दए मोमिन कर सकता है जिसके दिल का इम्तेहान ईमान के लिये लिया जा चुका हो , हमारी बातें सिर्फ़ उन्हीं सीनों में रह सकती हैं जो अमानतदार हों और उन्हीं अक़्लों में समा सकती हैं जो ठोस और मुस्तहकम हों।

लोगों! जो चाहो मुझसे दरयाफ़्त कर लो कब्ल इसके के मुझे न पाओ , मैं आसमान के रास्तों को ज़मीन की राहों से बेहतर जानता हूं , मुझसे दरयाफ़्त कर लो क़ब्ल इसके के वह फ़ित्ना अपने पैर उठा ले जो अपनी मेहार को भी पैरों तले रौंदने वाला है और जिससे क़ौम की अक़्लों के ज़वाल का अन्देशा है।

190-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें हम्दे ख़ुदा , सनाए रसूल (स 0) और नसीहते तक़वा का ज़िक्र किया गया है)

मैं उसकी हम्द करता हूं उसके इनआम का शुक्रिया अदा करने के लिये और उससे मदद चाहता हूं उसके हुक़ूक़ से ओहदाबरा होने के लिये , उसका शुक्र ग़ालिब है और बुज़ुर्गी अज़ीम है। मैं इस बात की शहादत देता हूं के मोहम्मद (स 0) अल्लाह के बन्दे और उसके रसूल हैं। उन्होंने उसकी इताअत की दावत दी है और उसके दुश्मनों पर ग़लबा हासिल किया है उसके दीन में जेहाद के ज़रिये। उन्हें इस बात से न ज़ालिमों का उनके झुठलाने पर इज्तेमाअ रोक सका है और न उनकी नूरे हिदायत की ख़ामोश करने की ख़्वाहिश मना कर सकी है। तुम लोग तक़वाए इलाही से वाबस्ता हो जाओ के उसकी रस्सी के बन्धन मज़बूत और उसकी पनाह की चोटी हर तरफ से महफ़ूज़ है। मौत और उसकी सख्तियो के सामने आने से पहले उसकी तरफ़ सबक़त करो और उसके आने से पहले ज़मीन हमवार कर लो। उसके नुज़ूल से पहले तैयारी मुकम्मल कर लो के अन्जामकार बहरहाल क़यामत है और यह बात हर उस शख़्स की नसीहत के लिये काफ़ी है जो साहबे अक़्ल हो और उसमें जाहिल के लिये बड़ी इबरत का सामान है और तुम्हें यह भी मालूम है के इस अन्जाम तक पहुंचने से पहले लहद और शिद्दते बरज़क़ का भी सामना है जहां बरज़ख़ की हौलनाकी , ख़ौफ़ की दहशत , पस्लियों का इधर से उधर हो जाना , कानों का बहरा हो जाना , क़ब्र की तारीकियां , अज़ाब की धमकियां क़ब्र के शिगाफ़ का बन्द किया जाना और पत्थर की सिलों से पाट दिया जाना भी है।

बन्दगाने ख़ुदा! अल्लाह को याद रखो के दुनिया तुम्हारे लिये एक ही रास्ते पर चल रही है और तुम क़यामत के साथ एक ही रस्सी में बन्धे हुए हो और गोया के उसने अपने अलामात को नुमायां कर दिया है और उसके झण्डे क़रीब आ चुके हैं।

((( बाज़ हज़रात का ख़याल है के अहलेबैत (अ 0) के मामले से मुराद दीन व इमामत और अक़ीदे व किरदार है के उसका हर हाल में बरक़रार रखना और उससे किसी भी हाल में दस्तबरदार न होना ह शख़्स के बस की बात नहीं है वरना लोग अदना मुसीबत में भी दीन से दस्तबरदार हो जाते हैं और जान बचाने की पनाहगाहें ढूंढने लगते हैं और बाज़ हज़रात का ख़याल है के इससे मुराद अहलेबैत (अ 0) की रूहानी अज़मत और उनकी नूरानी मन्ज़िल है जिसका इदराक हर इन्सान के बस का काम नहीं है बल्कि उसके लिये अज़ीम ज़र्फ़ दरकार है लेकिन बहरहाल इस तसव्वुर में भी उनके नक़्शे क़दम पर चलने को भी शामिल करना पड़ेगा वरना सिर्फ़ अक़ीदा क़ायम करने के लिये इम्तेहान शुदा और आज़माए हुए दिल की ज़रूरत नहीं है।)))

तुम्हें अपने रास्ते पर खड़ा कर दिया है और गोया के वह अपने ज़लज़लों समेत नमूदार हो गई है और अपने सीने टेक दिये हैं और दुनिया ने अपने बसने वालों से मुंह मोड़ लिया है और उन्हें अपनी गोद से अलग कर दिया है। गोया के यह एक दिन था जो गुज़र गया या एक महीना था जो बीत गया , और इसकी नई चीज़ पुरानी हो गई और उसका तन्दरूस्त , लाग़र हो गया। उस मौक़फ़ में जिसकी जगह तंग है और जिसके उमूर मुश्तबा (पेचीदा) और अज़ीम हैं वह आग है जिसका ज़ख़्म कारी है और जिसके शोले बलन्द हैं (जिसकी ईज़ाएं शदीद और चीख़ें बलन्द हैं)। इसकी भड़क नुमायां है और भड़कने की आवाज़ें ग़ज़बनाक हैं। इसकी लपटें तेज़ हैं और बुझने के इमकानात बईद (मुश्किल) हैं। इसका भड़कना तेज़ है और इसके ख़तरात दहशतनाक हैं इसका गढ़ा तारीक है और इसके हर तरफ़ (एतराफ़) अन्धेरा ही अन्धेरा है। इसकी देगें खौलती हुई हैं और इसके उमूर दहशतनाक हैं उस वक़्त सिर्फ़ ख़ौफ़े ख़ुदा रखने वालों को गिरोह गिरोह जन्नत की तरफ़ ले जाया जाएगा जहां अज़ाब से महफ़ूज़ होंगे और इताब का सिलसिला ख़त्म हो चुका होगा। जहन्नुम से अलग कर दिये जाएंगे और अपने घर में इतमीनान से रहेंगे जहां अपनी मन्ज़िल और अपने मुस्तक़र से ख़ुशहोंगे यही वह लोग हैं जिनके आमाल दुनिया में पाकीज़ा थे और जिनकी आंखें ख़ौफ़े ख़ुदा से गिरयां थीं। इनकी रातें खुशु और अस्तग़फ़ार की बिना पर दिन जैसी थीं और इनके दिन दहशत और गोशानशीनी की बिना पर रात जैसे थे। अल्लाह ने जन्नत को उनकी बाज़गष्त की मन्ज़िल बना दिया है और जज़ाए आख़ेरत को उनका सवाब। यह हक़ीक़तन इसी इनाम के हक़दार और अहल थे जो मुल्के दाएम और नईम अबदी में रहने वाले हैं।

बनदगाने ख़ुदा! उन बातों का ख़याल रखो जिनके ज़रिये से कामयाबी हासिल करने वाला कामयाब होता है और जिनको सानेअ कर देने से बातिल वालों का घाटा होता है। अपनी मौत की तरफ़ आमाल के साथ सबक़त करो के तुम गुज़िश्ता आमाल के गिरवी हो और पहले वाले आमाल के मक़रूज़ हो और अब गोया के ख़ौफ़नाक मौत तुमपर नाज़िल हो चुकी है जिससे न वापसी का इमकान है और न गुनाहों की माफ़ी मांगने की गुन्जाइशहै। अल्लाह हमें और तुम्हें अपनी और अपने रसूल (स 0) की इताअत की तौफ़ीक़ दे और अपने फ़ज़्ल व रहमत से हम दोनों से दरगुज़र फ़रमाए।

ज़मीन से चिमटे रहो और बलाओं पर सब्र करते रहो। अपने हाथ और अपनी तलवारों को ज़बान की ख़्वाहिशात का ताबेअ न बनाना और जिस चीज़ में ख़ुदा ने जल्दी नहीं रखी उसकी जल्दी न करना के अगर कोई शख़्स ख़ुदा और रसूल (स 0) व अहलेबैत (अ 0) के हक़ की मारेफ़त रखते हुए बिस्तर पर मर जाए तो वह भी शहीद ही मरता है और उसका अज्र भी ख़ुदा ही के ज़िम्मे होता है और वह अपनी नीयत के मुताबिक़ नेक आमाल का सवाब भी हासिल कर लेता है ख़ुद नीयत भी तलवार खींचने के क़ाएम मुक़ाम हो जाती है और हर “ शै की एक मुद्दत होती है और उसका एक वक़्त मुअय्यन है।

(((- हालात इस क़द्र संगीन थे के इमाम (अ 0) के मुख़लिस असहाब मुनाफ़िक़ीन और मुआनेदीन की रविश को बरदाश्त न कर सकते थे और हर एक की फ़ितरी ख़्वाहिश थी के तलवार उठाने की इजाज़त मिल जाए और दुशमन का ख़ात्मा कर दिया जाए जो हर दौर के जज़्बाती इन्सान की तमन्ना और आरज़ू होती है , लेकिन हज़रत यह नहीं चाहते थे के कोई काम मर्ज़ीए इलाही और मसलहते इस्लाम के खि़लाफ़ हो और मेरे मुख़लिसीन भी जज़्बात व ख़्वाहिशात के ताबेअ हो जाएं , लेहाज़ा पहले आपने सब्र व सुकून की तल्क़ीन की और इस अम्र की तरफ़ मुतवज्जो किया के इस्लाम ख़्वाहिशात का ताबेअ नहीं होता है। इस्लाम की शान यह है के ख़्वाहिशात इसका इत्तेबाअ करें और इसके इशारे पर चलें , इसके बाद मुख़्लेसीन के इस नेक जज़्बे की तरफ़ तवज्जो फ़रमाई के यह शौक़े शहादत व क़ुरबानी रखते हैं , कहीं ऐसा न हो के इनके हौसले पस्त हो जाएं और यह मायूसी का शिकार हो जाएं , लेहाज़ा इस नुक्ते की तरफ़ तवज्जो दिलाई के शहादत का दारोमदार तलवार चलाने पर नहीं है। शहादत का दारोमदार इख़लासे नीयत के साथ जज़्बए क़ुरबानी पर है लेहाज़ा तुम इस जज़्बे के साथ बिस्तर पर भी मर गए तो तुम्हारा शुमार शोहदा और स्वालेहीन में हो जाएगा तुम्हें इस सिलसिले में परेशान होने की ज़रूरत नहीं है-)))

191-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें हम्दे ख़ुदा , सनाए रसूल (स 0) और वसीयते ज़ोहद व तक़वा का तज़किरा किया गया है)

सारी तारीफ़ उस अल्लाह के लिये है जिसकी हम्द हमहगीर और जिसका लशकर ग़ालिब है और जिसकी अज़मत बलन्द व बाला है। मैं उसकी मुसलसल नेमतों और अज़ीमतरीन मेहरबानियों पर उसकी हम्द करता हूं के इसका हुक्म इस क़द्र अज़ीम है के वह हर एक को माफ़ करता है और फिर हर फ़ैसले में इन्साफ़ से भी काम लेता है और जो कुछ गुज़र गया और गुज़र रहा है सबका जानने वाला भी है। वह मख़लूक़ात को सिर्फ़ अपने इल्म से पैदा करने वाला है और अपने हुक्म से ईजाद करने वाला है। न किसी की इक़्तेदा की है और न किसी से तालीम ली है। न किसी सानेअ हकीम की मिसाल की पैरवी की है और न किसी ग़लती का शिकार हुआ है और न मुशीरों की मौजूदगी में काम अन्जाम दिया है।

और मैं गवाही देता हूं के मोहम्मद (स 0) उसके बन्दे और रसूल हैं। उन्हें उस वक़्त भेजा है जब लोग गुमराहियों में चक्कर काट रहे थे और जब हैरानियों में ग़लतां व पेचां थे। हलाकत की मेहारें उन्हें खींच रही थीं और कुदूरत व ज़न्ग के ताले इनके दिलों पर पड़े हुए थे।

बन्दगाने ख़ुदा! मैं तुम्हें तक़वाए इलाही की नसीहत करता हूं के यह तुम्हारे उपर अल्लाह का हक़ है और इससे तुम्हारा हक़ परवरदिगार पर पैदा होता है। इसके लिये अल्लाह से मदद मांगो और उसके ज़रिये उसी से मदद तलब करो के यह वक़वा आज दुनिया में सिपर और हिफ़ाज़त का ज़रिया और कल जन्नत तक पहुंचने का रास्ता है। इसका मसलक वाज़ेह और इसका राहेरौ फ़ायदा हासिल करने वाला है। और इसका अमानतदार हिफ़ाज़त करने वाला है। यह तक़वा अपने को उन पर भी पेशकरता रहा है जो गुज़र गए और उन पर भी पेशकर रहा है जो बाक़ी रह गए हैं के सबको कल इसकी ज़रूरत पड़ने वाली है। जब परवरदिगार अपनी मख़लूक़ात को दोबारा पलटाएगा और जो कुछ अता किया है उसे वापस ले लेगा और जिन नेमतों से नवाज़ा है उनका सवाल करेगा , किस क़द्र कम हैं वह अफ़राद जिन्होंने इसको क़ुबूल किया है और इसका वाक़ेई हक़ अदा किया है। यह लोग अदद में बहुत कम हैं लेकिन परवरदिगार की इस तौसीफ़ के हक़दार हैं के “ मेरे शुक्रगुज़ार बन्दे बहुत कम हैं ” । अब अपने कानों को उसकी तरफ़ मसरूफ़ करो और सई व कोशिशसे इसकी पाबन्दी करो और उसे गुज़रती हुई कोताहियों का बदल क़रार दो।

(((- खुली हुई बात है के बन्दा किसी क़ीमत पर परवरदिगार पर हक़ पैदा करने के क़ाबिल नहीं हो सकता है , उसका हर अमल करमे परवरदिगार और फ़ज़्ले इलाही का नतीजा है। लेहाज़ा इसका कोई इमकान नहीं है के वह इताअते इलाही अन्जाम देकर उसके मुक़ाबले में साहबे हक़ हो जाए और उस पर उसी तरह हक़ पैदा करे जिस तरह उसका हक्के़ इबादत व इताअत हर बन्दे पर है।

इस हक़ से मुराद भी परवरदिगार का यह फ़ज़्लो करम है के उसने बन्दों से इनाम और जज़ा का वादा कर लिया है और अपने बारे में यह ऐलान कर दिया है के मैं अपने वादे के खि़लाफ़ नहीं करता हूं जिसके बाद हर बन्दे को यह हक़ पैदा हो गया है के वह मालिक से अपने आमाल की जज़ा और उसके इनाम का मुतालेबा करे न इसलिये के उसने अपने पास से और अपनी ताक़त से कोई अमल अन्जाम दिया है के यह बात ग़ैरे मुमकिन है। बल्कि इसलिये के मालिक ने उससे सवाब का वादा किया है और वह अपने वादे को वफ़ा करने का ज़िम्मेदार है और उससे ज़र्रा बराबर इन्हेराफ़ नहीं कर सकता है। रिवायत में हक़्क़े मोहम्मद (स 0) व आले मोहम्मद (स 0) का मफ़हूम यही है के उन्होंने अपनी इबादात के ज़रिये वादाए इलाही की वफ़ा का इतना हक़ पैदा कर दिया है के उनके वसीले से दीगर अफ़राद भी इस्तेफ़ादा कर सकते हैं। बशर्ते के वह भी उन्हीं के नक़्शे क़दम पर चलें और उन्हीं की तरह इताअत व इबादत अन्जाम देने की कोशिश करें।)))

और मुख़ालिफ़ के मुक़ाबले में मवाक़िफ़ बनाओ , उसके ज़रिये अपनी नीन्द को बेदारी में तब्दील करो और अपने दिन गुज़ार दो। उसे अपने दिलों का शोआर बनाओ , उसी के ज़रिये अपने गुनाहों को धो डालो , अपने इमराज़ का इलाज करो और अपनी मौत की तरफ़ सबक़त करो , उनसे इबरत हासिल करो जिन्होंने इसे ज़ाया कर दिया है और ख़बरदार वह तुमसे इबरत न हासिल करने पाएं जिन्होंने इसका रास्ता इख़्तेयार किया है। इसकी हिफ़ाज़त करो और इसके ज़रिये से अपनी हिफ़ाज़त करो। दुनिया से पाकीज़गी इख़्तेयार करो और आख़ेरत के आशिक़ बन जाओ। जिसे तक़वा बलन्द कर दे उसे पस्त मत बनाओ और जिसे दुनिया उचा बना दे उसे बलन्द मत समझो। इस दुनिया के चमकने वाले बादल पर नज़र न करो और इसके तरजुमान की बात मत सुनो इसके आवाज़ देने वाले की आवाज़ पर लब्बैक मत कहो और इसकी चमक-दमक से रोशनी मत हासिल करो और इसकी क़ीमती चीज़ों पर जान मत दो इसलिये के इसकी बिजली फ़क़त चमक दमक है और इसकी बातें सरासर ग़लत हैं इसके अमवाल लुटने वाले हैं और इसका बेहतरीन छिनने वाला है (इसका उमदा मताअ ग़ारत होने वाला है)।

आगाह हो जाओ के यह दुनिया झलक दिखाकर मुंह मोड़ लेने वाली चण्डाल , मुंह ज़ोर अड़ियल झूटी , ख़ाएन , हटधर्म , नाशुक्री करने वाली सीधी राह से मुन्हरिफ़ और मुंह फेरने वाली और कज् व पेच व ताब खाने वाली है। इसका तरीक़ा इन्तेक़ाल है और इसका हर क़दम ज़लज़ला अंगेज़ है। इसकी इज़्ज़त भी ज़िल्लत है और इसकी माक़ईयत भी मज़ाक़ है ( इसकी सन्जीदगी ऐन हरज़ह सराई है ) इसकी बलन्दी पस्ती है और यह जंगो जदल , हर्ब व ज़र्ब , लूट मार , हलाकत व ताराजी का घर है , इसके रहने वाले पा-बरकाब हैं और चल चलाव के लिये तैयार हैं , इनकी कैफ़ियत वस्ल व फ़िराक़ की कशमकशकी है , जहां रास्ते गुम हो गए हैं और गुरेज़ की राहें मुश्किल हो गई हैं और मन्सूबे नाकाम हो चुके हैं , महफ़ूज़ घाटियों ने उन्हें मुश्किलात के हवाले कर दिया है और उनके घरों ने उन्हें दूर फेंक दिया है , दानिशमन्दियों ने भी उन्हें दरमान्दा कर दिया है। अब जो बच गए हैं उनमें कुछ की कोंचें कटी हुई हैं , कुछ गोश्त के लोथड़े हैं जिनकी खाल उतार ली गई है। कुछ कटे हुए जिस्म और बहते हुए ख़ून जैसे हैं कुछ अपने हाथ काटने वाले हैं और कुछ कफे अफ़सोस मिलने वाले , कुछ फ़िक्र व तरद्दुद में कोहनियां रूख़सारों पर रखे हुए और कुछ अपनी फ़िक्र से बेज़ार और अपने इरादे से रूजू करने वाले हैं। (लेकिन अब कहां) जबके चारासाज़ी का मौक़ा हाथ से निकल चुका है। धेलों ने मुंह फेर लिया है और हलाकत सामने आ गई है मगर छुटकारे का वक़्त निकल चुका है। यह एक न होने वाली बात हैं जो चीज़ गुज़र गई वह गुज़र गई , ( अब निकल भागने का वक़्त कहां , यह तो एक अनहोनी बात है) और जो वक़्त चला गया वह चला गया और दुनिया अपने हाल में मनमानी करती हुई गुज़र गई- “ न उन पर आसमान रोया और न ज़मीन और न ही उन्हें मोहलत दी गई। ”

(((- ख़ुदा जानता है के इस दुनिया का कोई हाल क़ाबिले एतबार नहीं है और इसकी किसी कैफ़ियत में सुकून व क़रार नहीं है। इसका पहला ऐब तो यह है के इसके हालात में ठहराव (सुकून) नहीं है। सुबह का सवेरा थोड़ी देर में दोपहर बन जाता है और आफ़ताब का शबाब थोड़ी देर में ग़ुरूब हो जाता है। इन्सान बचपने की आज़ादियों से मुस्तफ़िद भी नहीं होने पाता है के जवानी की धूप आ जाती है और जवानी की रानाइयों से लज्ज़त अन्दोज़ नहीं होने पाता है के ज़ईफ़ी की कमज़ोरियां हमलावर हो जाती हैं , ग़रज़ कोई हालत ऐसी नहीं है जिसपर एतबार किया जा सके और जिसे किसी हद तक पुरसुकून कहा जा सके।

और दूसरा ऐब यह है के अलग-अलग कोई दौर भी क़ाबिले इत्मीनान नहीं है , दौलतमन्द दौलत को रो रहे हैं और ग़रीब ग़ुरबत को , बीमार बीमारियों का रोना रो रहे हैं और सेहतमन्द सेहत के तक़ाज़ों से आजिज़ हैं , बेऔलाद औलाद के तलबगार हैं और औलाद वाले औलाद की ख़ातिर परेशान।

ऐसी सूरतेहाल में तक़ाज़ाए अक़्ल यही है के दुनिया को हदफ़ और मक़सद तसव्वुर न किया जाए और इसे सिर्फ़ आखि़रत के वसीले के तौर पर इस्तेमाल किया जाए , इसकी नेमतों में से इतना ही ले लिया जाए जितना आखि़रत में काम आने वाला है और बाती को इसके अहल के लिये छोड़ दिया जाए।-)))

192-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(ख़ुत्बए क़ासअ) (इस ख़ुतबे में इबलीस के तकब्बुर की मज़म्मत की गई है और इस अम्र का इज़हार किया गया है के सबसे पहले तास्सुब और ग़ुरूर का रास्ता इसी ने इख़्तेयार कया है लेहाज़ा इससे इजतेनाब ज़रूरी है)

सारी तारीफ़ उस अल्लाह के लिये हैं जिसका लिबास इज़्ज़त और किबरियाई है और उसने इस कमाल में किसी को शरीक नहीं बनाया है। उसने दोनों सिफ़तों को हर एक के लिये हराम और ममनूअ क़रार देकर सिर्फ़ अपनी इज़्ज़त व जलाल के लिये मुन्तख़ब कर लिया है और जिसने भी इन दोनों सिफ़तों में उससे मुक़ाबला करना चाहा है उसे मलऊन क़रार दे दिया है। इसके बाद इसी रूख़ से मलाएका मुक़र्रबीन का इम्तेहान लिया है ताके तवाज़ोह करने वालों और ग़ुरूर रखने वालों में इम्तियाज़ क़ायम हो जाए और इसी बुनियाद पर उस दिलों के राज़ और ग़ैब के इसरार से बाख़बर परवरदिगार ने यह एलान कर दिया के “ मैं मिट्टी से एक बशर पैदा करने वाला हूँ और जब इसका पैकर तैयार हो जाए और मैं इसमें अपनी रूहे कमाल फूंक दूं तो तुम सब सजदे में गिर पड़ना ” जिसके बाद तमाम मलाएका ने सजदा कर लिया , सिर्फ़ इबलीस ने इन्कार कर दिया ” के उसे तास्सुब लाहक़ हो गया और उसने अपनी तख़लीक़ के माद्दे से आदम पर फ़ख़्र किया और अपनी असल की बिना पर इस्तकबार का शिकार हो गया। जिसके बाद यह दुष्मने ख़ुदा तमाम मुतास्सुब अफ़राद का पेशवा और तमाम मुतकब्बिर लोगों का मोरिसे आला बन गया। उसी ने असबियत की बुनियाद क़ायम की और उसी ने परवरदिगार से जबरूत की रिदा में मुक़ाबला किया और अपने ख़याल में इज़्ज़त व जलाल का लिबास ज़ेबे तन कर लिया और तवाज़ोअ का नक़ाब उतार कर फ़ेंक दिया।

अब क्या तुम नहीं देख रहे हो के परवरदिगार ने किस तरह उसे तकब्बुर की बिना पर छोटा बना दिया है और बलन्दी के इज़हार की बुनियाद पर पस्त कर दिया है। दुनिया में इसे मलऊन क़रार दे दिया है और आख़ेरत में उसके लिये आतिशे जहन्नम का इन्तेज़ाम कर दिया है।

अगर परवरदिगार यह चाहता के आदम (अ 0) को एक ऐसे नूर से ख़ल्क़ करे जिसकी ज़िया आंखों को चकाचैंद कर दे और जिसकी रौनक़ अक़्लों को मबहूत कर दे या ऐसी ख़ुशबू से बनाए जिसकी महक सांसों को जकड़ ले तो यक़ीनन कर सकता था और अगर ऐसा कर देता तो यक़ीनन गर्दनें उनके सामने झुक जातीं और मलाएका का इम्तेहान आसान हो जाता लेकिन वह उन चीज़ों से इम्तेहान लेना चाहता था जिनकी असल मालूम न हो ताके इसी इम्तेहान से इनका इम्तियाज़ क़ायम हो सके और उनके इस्तेकबार का इलाज किया जा सके और उन्हें ग़ुरूर से दूर रखा जा सके।

तो अब तुम परवरदिगार के इबलीस के साथ बरताव से इबरत हासिल करो के उसने इसके तवील अमल और बेपनाह जद्दो जेहद को तबाह व बरबाद कर दिया जबके वह छः हज़ार साल इबादत कर चुका था।

(((- इसमें कोई शक नहीं है के मलाएका की इस्मत बशर जैसी इख़्तेयारी नहीं है जहां इन्सान सारे जज़्बात व ख़्वाहिशात से टकराकर इस्मते किरदार का मुज़ाहिरा करता है। लेकिन इसमें भी कोई शक नहीं है के मलाएका बिल्कुल जमादात व नबातात जैसे नहीं हैं के उन्हें किसी तरह का इख़्तेयार हासिल न हो। वरना अगर ऐसा होता तो न तकलीफ़ के कोई मानी होते और न इम्तेहान का कोई मक़सद होता। इनमें जज़्बात व एहसासात हैं लेकिन बशर जैसे नहीं हैं। उन्हें फ़ेल व तर्क का इख़्तेयार हासिल है लेकिन बिल्कुल इन्सानों जैसा नहीं है। इसी बिना पर इनका इम्तेहान लिया गया और इम्तेहान सिर्फ़ जज़्बा हब ज़ात और अनानीयत से मुताल्लिक़ था के यह जज़्बा मलक के अन्दर भी बज़ाहिर पाया जाता है। और इसी जज़्बे की आज़माइशके लिये आदम (अ 0) को बज़ाहिर “ पस्त तरीन अनासिर ” से पैदा किया गया जिसे आम तौर से पैरों से रौन्द दिया जाता है लेकिन इसी पैकरे ख़ाकी में रूहे कमाल को फूंक कर इतना बलन्द बना दिया के मलाएका के मसजूद बनने के लाएक़ हो गए और क़ुदरत ने इन्सानों को भी मुतवज्जो कर दिया के तुम्हारा कमाल तुम्हारी असल से नहीं है , तुम्हारा कमाल हमारे राबते और ताल्लुक़ से है , लेहाज़ा जब तक यह राबेता बरक़रार रहेगा तुम साहेबे कमाल रहोगे और जिस दिन यह राबेता टूट जाएगा , तुम ख़ाक का ढेर हो जाओगे और बस!-))) जिनके बारे में किसी को मालूम नहीं है के वह दुनिया के साल थे या आख़ेरत के मगर एक साअत के तकब्बुर ने सबको मलियामेट कर दिया तो अब इस (इबलीस) के बाद कौन रह जाता है जो ऐसी मासियत के अज़ाबे इलाही से महफ़ूज़ रह सकता है। यह हरगिज़ मुमकिन नहीं है के जिस जुर्म की बिना पर मलक को निकाल बाहर किया उसके साथ बशर को दाखि़ले जन्नत कर दे जबके ख़ुदा का क़ानून ज़मीन व आसमान के लिये एक ही जैसा है और अल्लाह और किसी ख़ास बन्दे के दरम्यान कोई ऐसा ख़ास ताल्लुक़ नहीं है के वह उसके लिये इस चीज़ को हलाल कर दे जो उसने सारे आलमीन के लिये हराम क़रार दी है।

बन्दगाने ख़ुदा! इस दुष्मने ख़ुदा से होशियार रहो , कहीं तुम्हें भी अपने मर्ज़ में मुब्तिला न कर दे और कहीं अपनी आवाज़ पर खींज न ले और तुम पर अपने सवारों और प्यादे लशकर से हमला न कर दे। इसलिये के मेरी जान की क़सम उसने तुम्हारे लिये शरांगेज़ी के तीर को चिल्लए कमान में जोड़ लिया है और कमान को ज़ोर से खींच लिया है और तुम्हें बहुत नज़दीक से निशाना बनाना चाहता है। उसने साफ़ कह दिया है (अल्लाह ने उसकी ज़बानी फ़रमाया है) के “ परवरदिगार जिस तरह तूने मुझे बहका दिया है अब मैं भी इनके लिये गुनाहों को आरास्ता कर दूंगा और इन सबको गुमराह कर दूंगा ” हालांके यह बात बिल्कुल अटकल पच्चू में कही थी और बिल्कुल ग़लत अन्दाज़े की बिना पर ज़बान से निकाली थी लेकिन ग़ुरूर की औलाद , तास्सुब की बिरादरी और तकब्बुर व जाहेलीयत के शहसवारों ने इसकी बात की तस्दीक़ कर दी। यहां तक के जब तुम में से मुंहज़ोरी करने वाले उसके मुतीअ हो गए और उसकी लालच तुम में मुस्तहकम हो गई तो बात परदए राज़ से निकल कर मन्ज़रे आम आ गई। उसने अपने इक़तेदार को तुम पर क़ायम कर लिया और अपने लष्करों का रूख़ तुम्हारी तरफ़ मोड़ दिया। फ़ित्नों ने तुम्हें ज़िल्लत के ग़ारों में ढकेल दिया और तुम्हें क़त्ल व ख़ून के भंवर में फंसा दिया और मुसलसल ज़ख़्मी करके पामाल कर दिया। तुम्हारी आंखों में नैज़े चुभो दिये , तुम्हारे हल्क़ पर ख़न्जर चला दिये और तुम्हारी नाक (नथनों) को रगड़ (पारा-पारा कर) दिया , तुम्हारे जोड़ बन्द को तोड़ दिया और तुम्हारी नाक में तस्लत व ग़लबे की नकेलें डाल कर तुम्हें उस आग की तरफ़ खींच लिया जो तुम्हारे ही वास्ते मुहैया की गई है । वह तुम्हारी दीन को इन सबसे ज़्यादा मजरूह करने वाला और तुम्हारी दुनिया में उन सबसे ज़्यादा फ़ित्ना व फ़साद की आग भड़काने वाला है जिनसे मुक़ाबले की तुमने तैयारी कर रखी है और जिनके खि़लाफ़ तुमने लशकर जमा किये हैं। लेहाज़ा अब अपने ग़ैज़ व ग़ज़ब का मरकज़ उसी को क़रार दो और सारी कोशिशउसी के खि़लाफ़ सर्फ़ करो। ख़ुदा की क़सम उसने तुम्हारी असल पर अपनी बरतरी का इज़हार किया है और तुम्हारे हसब में ऐब निकाला है और तुम्हारे नसब पर ताना दिया है और तुम्हारे खि़लाफ़ लशकर जमा किया है और तुम्हारे रास्ते को अपने प्यादों से रौंदने का इरादा किया है। जो हर जगह तुम्हारा शिकार करना चाहते हैं और हर मक़ाम पर तुम्हारे एक-एक उंगली के पोर ज़र्ब लगाना चाहते हैं और तुम न किसी हीले से अपना बचाव करते हो और न किसी अज़्म व इरादे से अपना दिफ़ाअ करते हो , दरआन्हालीके तुम ज़िल्लत के भंवर , तंगी के दाएरे , मौत के मैदान और बलाओं की जूला निगाह में हो।

(((- इस मक़ाम पर यह सवाल ज़रूर पैदा होता है के सूरए कहफ़ की आयत नम्बर 5में इबलीस को जिन्नात में क़रार दिया गया है तो इस मक़ाम पर इसे मलक के लफ़्ज़ से किस तरह ताबीर किया गया है। इसका जवाब बिल्कुल वाज़ेह है के मक़ामे तकलीफ़ में हमेशा ज़ाहिर को देखा जाता है और मक़ामे जज़ा में हक़ीक़त पर निगाह की जाती है , ईमान के एहकाम उन तमाम अफ़राद के लिये हैं जिनका ज़ाहिर ईमान है लेकिन ईमान की जज़ा और उसका इनआम सिर्फ़ उन अफ़राद के लिये है जो वाक़ेई साहेबाने ईमान हैं। यही हाल मलाएका और जिन्नात का है के मलाएका के एहकाम में वह तमाम अफ़राद शामिल हैं जो अपने मलक होने के दावेदार हैं चाहे वाक़ेअन क़ौमे जिन से ताल्लुक़ रखते हों और मलाएका की अज़मत व शराफ़त सिर्फ़ उन अफ़राद के लिये है जो वाक़ेअन मलक हैं और उसका क़ौमे जिन से कोई ताल्लुक़ नहीं है।-)))

अब तुम्हारा फ़र्ज़ है के तुम्हारे दिलों में जो अस्बियत और जाहेलियत के कीनों की आग भड़क रही है उसे बुझा दो के यह ग़ुरूर एक मुसलमान के अन्दर “ शैतानी वसवसों , फ़ितना अंगेज़ियों और फ़सोकारियों का नतीजा है (क्योंके मुसलमान में यह ग़ुरूर ख़ुद पसन्दी “ शैतान की वसवसा अन्दाज़ी , नख़वत पसन्दी , फ़ित्ना अंगेज़ी और फसांेकारी ही का नतीजा होती है अज्ज़ व फ़रवतनी का सरताज बनाए कब्र व ख़ुद बीनी को पैरों तले रौंदने और तकब्बुर व रऊनत का तौक़ गर्दन से उतारने का अज़म बिल जज़्म कर लो) अपने सर पर तवाज़ोह का ताज रखने का अज़म करो और तकब्बुर को पैरों तले रख कर कुचल दो , ग़ुरूर के तौक़ को अपनी गर्दनों से उतार कर फेंक दो और अपने दुशमन इब्लीस और उसके लष्करों के दरम्यान तवाज़ोह व इन्केसार का मोर्चा क़ायम कर लो के उसने हर क़ौम में अपने लशकर , मददगार , प्यादे , सवार सब का इन्तेज़ाम कर लिया है और तुम उस शख़्स के जैसे न हो जाओ जिसने अपने माँजाए के मुक़ाबले में ग़ुरूर किया बग़ैर इसके के अल्लाह ने उसे कोई फ़ज़ीलत अता की हो , अलावा इसके के हसद की अदावत ने उसके नफ़्स में अज़मत का एहसास पैदा करा दिया और बेजा ग़ैरत ने उसके दिल में ग़ज़ब की आग भड़का दी। “ शैतान ने इसकी नाक में तकब्बुर की हवा फूंक दी और अन्जामकार निदामत ही हाथ आई और क़यामत तक के तमाम क़ातिलों का गुनाह इसके सर आ गया के इसने क़त्ल की बुनियाद क़ायम की है।

याद रखो तुमने अल्लाह से खुल्लम खुल्ला दुश्मनी और साहेबाने ईमान से जंग का एलान करके ज़ुल्म की इन्तेहा कर दी है और ज़मीन में फ़साद बरपा कर दिया है। ख़ुदारा ख़ुदा से डरो , तकब्बुर के ग़ुरूर और जाहेलियत के तफ़ाख़र के सिलसिले में के यह अदावतों के पैदा करने की जगह और “ शैतान की फ़सोंकारी की मन्ज़िल है। (तुम ज़माने जाहिलीयत वाली ख़ुदबीनी की बिना पर फ़ख़्र व ग़ुरूर करने से अल्लाह का ख़ौफ़ खाओ क्योंके यह दुश्मनी व अनाद का सरचश्मा और “ शैतान की फ़सोंकारी का मरकज़ है , जिससे उसने गुज़िश्ता उम्मतों और पहली क़ौमों को वरग़लाया , यहाँ तक के वह इसके ढकेलने और आगे से खींचने पर बे चूँ व चरा जेहालत की अन्ध्यारियों और ज़लालत के गढ़ों में तेज़ी से गिर पड़े हैं। ऐसी सूरत से जिसमें ऐसे लोगों के तमाम दिल मिलते-जुलते हुए हैं और सदियों का हाल एक ही सा रहा है और ऐसा ग़ुरूर जिसके छिपाने से सीनों की वुसअतें तंग होती हैं।

आगाह हो जाओ! अपने उन सरदारों और बड़ों (बुज़ुर्गों) की इताअत से मोहतात रहो जिन्होंने अपने हसब पर ग़ुरूर किया और अपने नसब की बलन्दियों की बुनियाद पर ऊंचे बन गए। बदनुमा चीज़ों को अल्लाह के सर डाल दिया और उसके एहसानात का सरीही इन्कार कर दिया। उन्होंने उसके क़ज़ा व क़द्र से टक्कर लेने और उसकी नेमतों पर ग़लबा पाने के लिये उसके एहसानात से यकसर इन्कार कर दिया। यही वह लोग हैं जो अस्बियत की बुनियाद के सुतुन (फ़ितने के काख़ व ऐवान के सुतून) और जाहेलीयत के नसबी तफ़ाख़ुर की तलवारें हैं।

अल्लाह से डरो और ख़बरदार उसकी नेमतों के दुशमन और उसके दिये हुए फ़ज़ाएल के हासिद न बनो। इन झूठे मदइयाने इस्लाम का इत्तेबाअ न करो जिनके गन्दे पानी को अपने साफ़ पानी में मिलाकर पी रहे हो और जिनकी बीमारियों को तुमने अपनी सेहत के साथ मख़लूत कर दिया है और जिनके बातिल को अपने हक़ में शामिल कर लिया है , यह लोग फ़िस्क़ व फ़ुजूर की बुनियाद हैं और नाफ़रमानियों के साथ चिपके हुए हैं।

(((- माँजाये से हाबील और क़ाबील की तरफ़ इशारा है जहां क़ाबील ने सिर्फ़ हम्द और तास्सुब की बुनियाद पर अपने हक़ीक़ी भाई का ख़ून कर दिया और अल्लाह की पाकीज़ा ज़मीन को खून ब हक़ से रंगीन कर दिया और इस तरह दुनिया में क़त्ल व ख़ून का सिलसिला शुरू हो गया जिसके हर जुर्म में क़ाबील का एक हिस्सा बहरहाल रहेगा। किसी क़ौम की तबाही और बरबादी में सबसे बड़ा हाथ उन रईसों और सरदारों का होता है जिनकी हैसियत कुछ नहीं होती है लेकिन अपने को इस क़द्र अज़ीम बनाकर पेशकरते हैं जिसका अन्दाज़ा करना मुश्किल होता है। उनके पास तास्सुब , अनाद , ग़ुरूर और तकब्बुर के अलावा कुछ नहीं होता है और ग़रीब बन्दगाने ख़ुदा को यह समझाना चाहते हैं के अल्लाह ने हमको बलन्द बनाया है और उसी ने तुम्हें पस्त क़रार दिया है लेहाज़ा अब तुम्हारा फ़र्ज़ है के उसके फ़ैसले पर राज़ी रहो और हमारी इताअत की राह पर चलते रहो , बग़ावत का इरादा मत करो के यह क़ज़ा व क़द्रे इलाही से बग़ावत है और यह शाने इस्लाम के खि़लाफ़ है-)))

इबलीस ने उन्हें गुमराही की सवारी बनाया है और ऐसा लशकर क़रार दे लिया है जिसके ज़रिये लोगों पर हमला करता है और यही उसके तर्जुमान हैं जिनकी ज़बान से वह बोलता है। तुम्हारी अक़्लों को छीनने के लिये तुम्हारी आंखों में समा जाने के लिये और तुम्हारे कानों में अपनी बातों को फूंकने के लिये उसने तुम्हें अपने तीरों का निशाना और अपने क़दमों की जुला निगाह और अपने हाथों का खिलौना बना लिया है।

देखो तुमसे पहले इस्तेकबार करने वाली क़ौमों पर जो ख़ुदा का अज़ाब , हमला , क़हर और इताब नाज़िल हुआ है उससे इबरत हासिल करो। इनके ख़सारों के भल लेटने और पहलुओं के भल गिरने से नसीहत हासिल करो , अल्लाह की बारगाह में तकब्बुर की पैदावार की मन्ज़िलों से इस तरह पनाह मांगो जिस तरह ज़माने के हवादिस से पनाह मांगते हो। अगर परवरदिगार तकब्बुर की इजाज़त किसी बन्दे को दे सकता तो सबसे पहले अपने मख़सुस अम्बिया और औलिया को इजाज़त देता लेकिन उस बेनियाज़ ने इनके लिये भी तकब्बुर को नापसन्दीदा क़रार दिया है और उनकी भी तवाज़ोह ही से ख़ुशहुआ है। उन्होंने अपने रूख़सारों को ज़मीन से चिपका दिया था और अपने चेहरों को ख़ाक पर रख दिया था और अपने शानों को मोमेनीन के लिये झुका दिया था।

यह सब समाज के वह कमज़ोर बना दिये जाने वाले अफ़राद थे जिनका ख़ुदा ने भूक से इम्तेहान लिया , मसाएब से आज़माया ख़ौफ़नाक मराहेल से इख़्तेयार किया और नाख़ुशगवार हालात में उन्हें तहो बाला करके देख लिया। ख़बरदार ख़ुदा की ख़ुशनूदी और नाराज़गी का मेयार माल और औलाद को क़रार न देना के तुम फ़ित्ने की मन्ज़िलों को नहीं पहचानते हो और तुम्हें नहीं मालूम है के ख़ुदा मालदारी और इक़्तेदार से किस तरह इम्तेहान लेता है। उसने साफ़ एलान कर दिया है “ क्या इन लोगों का ख़याल है के हम उन्हें माल व औलाद की फ़रावानी अता करके उनकी नेकियों में इज़ाफ़ा कर रहे हैं , हक़ीक़त यह है के उन्हें कोई शऊर नहीं है। ” अल्लाह अपने को ऊंचा समझने वालों का इम्तेहान अपने कमज़ोर क़रार दिये जाने वाले औलिया के ज़रिये लिया करता है।

देखो मूसा बिन इमरान अपने भाई हारून के साथ फ़िरऔन के दरबार में इस शान से दाखि़ल हुए के उनके बदल पर ऊन का पैराहन था और उनके हाथ में एक असा था , इन हज़रात ने इससे वादा किया के “ अगर इस्लाम क़ुबूल करेगा तो उसके मुल्क और उसकी इज़्ज़त को दवाम व बक़ा अता कर देंगे तो उसने लोगों से कहा ” क्या तुम लोग इन दोनों के चाल पर ताज्जुब नहीं कर रहे हो जो इन फ़क़्र-व-फ़ाक़ा की हालत में मेरे पास आए हैं और मेरे मुल्क को दवाम की ज़मानत दे रहे हैं , अगर यह ऐसे ही ऊंचे हैं तो इन पर सोने के कंगन क्यों नहीं नाज़िल हुए ?” उसकी नज़र में सोना और इसकी जमा आवरी एक अज़ीम कारनामा था और ऊन का लिबास पहनना ज़िल्लत की अलामत था। हालांके अगर परवरदिगार चाहता तो अम्बियाए कराम की बअसत के साथ ही उनके लिये सोने के ख़ज़ाने , तलाए ख़ाहज़ के मआवन , बाग़ात के कष्तज़ारों के दरवाज़ों के दरवाज़े खोल देता और उनके साथ फ़िज़ा में परवाज़ करने वाले परिन्दे और ज़मीन के चैपायों को उनका ताबेअ फ़रमान बना देता , लेकिन ऐसा कर देता तो आज़माइशख़त्म हो जाती और इनआमात का सिलसिला भी बन्द हो जाता।

(((- वाक़ेअन अजीब व ग़रीब मन्ज़र रहा होगा जब अल्लाह के दो मुख़लिस बन्दे मामूली लिबास पहले हुए फ़िरऔन के दरबार में खड़े होंगे और उसे दीने हक़ की दावत दे रहे होंगे और उससे जज़ा व इनआम का वादा कर रहे होंगे और वह मुस्कुराकर दरबारियों की तरफ़ देख रहा होगा , ज़रा इन दोनों की जराअत तो देखो , ख़ुदाए वक़्त को दावते बन्दगी दे रहे हैं और फिर हौसले तो देखो , बोसीदा लिबास के बावजूद इनामात का वादा कर रहे हैं और मामूली हैसियत के साथ अज़ाबे अलीम से डरा रहे हैं। लेकिन जनाबे मूसा (अ 0) ने इन हालात की कोई परवाह नहीं की और निहायत सुकून व वेक़ार के साथ अपना पैग़ाम सुनाते रहे के अल्लाह वाले सल्तनत व जबरूत से मरऊब नहीं होते हैं और बेहतरीन जेहाद यही है के सुलतान जाबिर के सामने कलमए हक़ बलन्द कर दिया जाए और हक़ की आवाज़ को दबने न दिया जाय।-)))

आसमानी ख़बरें भी बेकार व बरबाद हो जातीं। न मसाएब को क़ुबूल करने वालों को इम्तेहान देने वाले का अज्र मिलता और न साहेबाने ईमान को ऐसे (फ़िरऔन जैसे) किरदारों जैसा इनाम मिलता और न अलफ़ाज़ मानी का साथ देते।

अलबत्ता परवरदिगार ने अपने पुरसलीन को इरादों के एतबार से इन्तेहाई साहबे क़ूवत क़रार दिया है अगरचे देखने में हालात के एतबार से बहुत कमज़ोर हैं उनके पास वह क़नाअत है जिसने लोगों के दिल व निगाह को उनकी बे नियाज़ी से मामूर कर दिया है और वह ग़ुरबत है जिसकी बिना पर लोगों की आंखों और कानों को अज़ीयत होती है।

अगर अम्बियाए कराम ऐसी क़ूवत के मालिक होते जिसका इरादा भी न किया जा सके और ऐसी इज़्ज़त के दारा होते जिसको ज़लील न किया जा सके और ऐसी सल्तनत के हामिल होते जिसकी तरफ़ गर्दनें उठती हों और सवारियों के पालान कसे जाते हों तो यह बात लोगों की इबरत हासिल करने के लिये आसान होती और उन्हें इस्तकबार से बा-आसानी दूर कर सकती और सब के सब क़हर आमेज़ ख़ौफ़ और लज़्ज़त आमेज़ रग़बत की बिना पर ईमान ले आते , सब की नीयतें एक जैसी होतीं और सबके दरम्यान नेकियां तक़सीम हो जातीं। लेकिन उसने यह चाहा के उसके रसूलों का इत्तेबाअ और उसकी किताबों की तस्दीक़ और उसकी बारगाह में ख़ुज़ू और उसके सामने फ़रवतनी और उसके एहकाम की फ़रमाबरदारी और उसकी इताअत सब उसकी ज़ाते अक़दस से मख़सूस रहें और इसमें किसी तरह की मिलावट न होने पाए और ज़ाहिर है के जिस क़दर आज़माइश और इम्तेहान में शिद्दत होगी उसी क़द्र अज्र व सवाब भी ज़्यादा होगा।

क्या तुम यह नहीं देखते हो के परवरदिगारे आलम ने आदम (अ 0) के दौर से आज तक अव्वलीन व आख़ेरीन सबका इम्तेहान लिया है उन पत्थरों के ज़रिये जिनका बज़ाहिर न कोई नफ़ा है और न नुक़सान , न उनके पास बसारत है और न समाअत , लेकिन उन्हीं से अपना वह मोहतरम मकान बनवा दिया है जिसे लोगों के क़याम का ज़रिया क़रार दे दिया है और फिर उसे ऐसी जगह क़रार दिया है जो रूए ज़मीन पर इन्तेहाई पथरीली व बलन्द ज़मीनों में इन्तेहाई मिटटी वाली वादियों में एतराफ़ के एतबार से इन्तेहाई तंग है उसके एतराफ़ सख़्त क़िस्म के रेतीले मैदान , के पानी वाले चश्मे और मुनतशिर क़िस्त की बस्तियां हैं जहां न ऊंट परवरिशपा सकते हैं और न गाय और न बकरियां।

इसके बाद उसने आदम (अ 0) और उनकी औलाद को हुक्म दे दिया के अपने कान्धों को उसकी तरफ़ मोड़ दें और इस तरह उसे सफ़रों से फ़ायदा उठाने की मन्ज़िल और पालानों के उतारने की जगह बना दिया जिसकी तरफ़ लोग दौरे इफ़तादा बेआब-व-ग्याह बियाबानों , दूर-दराज़ घाटियों के नशेबी रास्तों , ज़मीन से कटे हुए दरियाओं के जज़ीरों से दिल व जान से मुतवज्जो होते हैं ताके ज़िल्लत के साथ अपने कान्धों को हरकत दें और उसके गिर्द अपने परवरदिगार की उलूहियत का एलान करें और पैदल इस आलम में दौड़ते रहें के उनके बाल बिखरे हुए हों और सर पर ख़ाक पड़ी हुई हो। अपने पैराहनों को उतार कर फेंक दें।

(((- यह उस अम्र की तरफ़ इशारा है के तामीरे ख़ानए काबा का ताल्लुक़ जनाबे इबराहीम (अ 0) से नहीं है बल्कि जनाबे आदम (अ 0) से है। सबसे पहले उन्होंने हुक्मे ख़ुदा से उसका घर बनाया और उसका तवाफ़ किया और फिर अपनी औलाद को तवाफ़ का हुक्म दिया और यह सिलसिला यूँ ही चलता रहा यहाँ तक के तूफ़ाने नूह (अ 0) के मौक़े पर इस तामीर को बलन्द कर लिया गया और इसके बाद जनाबे इबराहीम (अ 0) ने अपने दौर में इसकी दीवारों को बलन्द करके एक मकान की हैसियत दे दी जिसका सिलसिला आजतक क़ायम है और सारी दुनिया से मुसलमान इस घर का तवाफ़ करने के लिये आ रहे हैं जबके इसकी तामीरी हैसियत लाखों मकानों से कमतर है लेकिन मसल इसकी माद्दी हैसियत का नहीं है , मसला इसकी निस्बत का है जो परवरदिगार ने अपनी तरफ़ दे दी है और इसे मरजअ ख़लाएक़ बना दिया है जिस तरह के सरकारे दो आलम (स 0) ने ख़ुद मौलाए कायनात को “ अन्ता बेमन्जे़लतिल काबते ’ ( काबा) ” कह के मरजअ अवाम व ख़वास बना दिया है के इससे इन्हेराफ़ की कोई गुन्जाइशनहीं रह गई है। ” -)))

और बाल बढ़ाकर अपने हुस्न व जमाल को बदनुमा बना लें यह एक अज़ीम इब्तिला , शदीद इम्तेहान और वाज़ेह इख़्तेयार है जिसके ज़रिये अबदीयत की मुकम्मल आज़माइश हो रही है , परवरदिगार ने इस मकान को रहमत का ज़रिया और जन्नत का वसीला बना दिया है। वह अगर चाहता तो इस घर को और उसके तमाम मशाएर को बाग़ात और नहरों के दरम्यान नर्म व हमवार ज़मीन पर बना देता जहां घने दरख़्त होते और क़रीब क़रीब फ़ल। इमारतें एक दूसरे से जुड़ी होतीं और आबादियाँ एक दूसरे से मुत्तसिल , कहीं सुरख़ी माएल गन्दुम के पौदे होते और कहीं सरसब्ज़ बाग़ात , कहीं चमन ज़ार होता और कहीं पानी में डूबे हुए मैदान , कहीं सरसब्ज़ व शादाब किष्तज़ार होते और कहीं आबाद गुज़रगाहें लेकिन इस तरह आज़माइशकी सहूलत के साथ जज़ा की मिक़दार भी घट जाती। और अगर जिस बुनियाद पर इस मकान को खड़ा किया गया है वह सब्ज़ ज़मदावर सुखऱ् याक़ूत जैसे पत्थरों और नूर व ज़िया की ताबानियों से इबारत होती तो सीनों पर शुकूक के हमले कम हो जाते और दिलों से इबलीस की मेहनतों का असर ख़त्म हो जाता और लोगों के ख़लजाने क़ल्ब का सिलसिला ख़त्म हो जाता। लेकिन परवरदिगार अपने बन्दों को सख़्त तरीन हालात से आज़माना चाहता है और उनसे संगीनतरीन मशक़्क़तों के ज़रिये बन्दगी कराना चाहता है और उन्हें तरह-तरह के नाख़ुशगवार हालात से आज़माना चाहता है ताके उनके दिलों से तकब्बुर निकल जाए और उनके नुफ़ूस में तवाज़ोअ और फ़रवतनी को जगह मिल जाए और इसी बात को फ़ज़्ल व करम के खुले हुए दरवाज़ों और अफ़ू व मग़फ़ेरत के आसानतरीन वसाएल में क़रार दे दे।

देखो दुनिया में सरकशी के अन्जाम , आख़ेरत में ज़ुल्म के अज़ाब और तकब्बुर के बदतरीन नतीजे के बारे में ख़ुदा से डरो के यह तकब्बुर “ शैतान का अज़ीमतरीन जाल और बुज़ुर्गतरीन मक्र है जो दिलों में इस तरह उतर जाता है जैसे ज़हरे क़ातिल के न इसका असर ज़ाएल होता है और न इसका वार ख़ता करता है , न किसी आलिम के इल्म की बिना पर और न किसी नादार पर इसके फटे कपड़ों की बिना पर।

और इसी मुसीबत से परवरदिगार ने अपने साहेबाने ईमान बन्दों को नमाज़ और ज़कात और मख़सूस दिनों में रोज़े की मशक़्क़त के ज़रिये बचाया है के उनके आज़ा व जवारेह को सुकून मिल जाए , निगाहों में खुशु पैदा हो जाए , नफ़्स में एहसासे ज़िल्लत पैदा हो , दिल बारगाहे इलाही में झुक जाएं और उनसे ग़ुरूर निकल जाए और इस बुनियाद पर के नमाज़ में नाज़ुक चेहरे तवाज़ोअ के साथ ख़ाक आलूद किये जाते हैं और मोहतरम आज़ा व जवारेह को ज़िल्लत के साथ ज़मीन से मिला दिया जाता है और रोज़े में एहसासे आजिज़ी के साथ पेट पीठ से मिल जाते हैं और ज़कात में ज़मीन के बेहतरीन नताएज को फ़ोक़रा व मसाकीन के हवाले कर दिया जाता है।

(((- इन्सान की सबसे बड़ी मुसीबत “ शैतान का इत्तेबाअ है और “ शैतान का सबसे बड़ा जरबा फ़साद और इस्तेकबार है इसलिये परवरदिगार ने इन्सान को इस हमले से बचाने के लिये नमाज़ , रोज़ा और ज़कात को वाजिब कर दिया के नमाज़ के ज़रिये ख़ुज़ू व खुशु का इज़हार होगा। रोज़ा के ज़रिये मशक़्क़त बरदाश्त करने का जज़्बा पैदा होगा और ज़कात के ज़रिये अपनी मेहनत के नताएज में फ़ोक़रा और मसाकीन को मुक़द्दम करने का ख़याल पैदा होगा और इस तरह वह ग़ुरूर निकल जाएगा जो इस्तेकबार की बुनियाद बनता है और जिसकी बिना पर इन्सान “ शैतनत से क़रीबतर हो जाता है-)))

और देखो के इन आमाल में किस तरह तफ़ाख़ुर के आसार को जड़ से उखाड़ कर फेंक दिया जाता है और तकब्बुर के नुमायां होने वाले आसार को दबा दिया जाता है। मैंने तमाम आलमीन को परख कर देख लिया है , कोई शख़्स ऐसा नहीं है जिसमें किसी “ शै का तास्सुब पाया जाता हो और उसके पीछे कोई ऐसी इल्लत न हो जिसमें जाहिल धोका खा जाएं या ऐसी दलील न हो जो अहमक़ों की अक़्ल से चिपक जाए , अलावा तुम लोगों के के तुम ऐसी चीज़ का तास्सुब रखते हो जिसकी कोई इल्लत और जिसका कोई सबब नहीं है , देखो इबलीस ने आदम (अ 0) के मुक़ाबले में असबियत का इज़हार किया तो अपनी असल की

बुनियाद पर उनकी तख़लीक़ पर तन्ज़ किया और यह कह दिया के मैं आग से बना हूँ और तुम ख़ाक से बने हो।

इसी तरह उम्मतों के दौलतमन्दों ने अपनी नेमतों के आसार की बिना पर ग़ुरूर का मुज़ाहिरा किया और यह एलान कर दिया के “ हम ज़्यादा माल व औलाद वाले हैं लेहाज़ा हम पर अज़ाब नहीं हो सकता है ” लेकिन तुम्हारे पास तो ऐसी कोई बुनियाद भी नहीं है। लेहाज़ा अगर फ़ख़्र ही करना चाहते हो तो बेहतरीन आदात , क़ाबिले तहसीन आमाल और हसीनतरीन ख़साएल की बिना पर करो जिनके बारे में अरब के ख़ानदानों , क़बाएल के सरदारों के बुज़ुर्ग और शरीफ़ लोग किया करते थे , यानी पसन्दीदा एख़लाक़ , अज़ीम व दानाई , आला मरातब और क़ाबिले तारीफ़ कारनामे।

तुम भी इन्हीं क़ाबिले सताइशआमाल पर फ़ख़्र करो , हमसायों का तहफ़्फ़ुज़ करो , अहद व पैमान को पूरा करो , नेक लोगों की इताअत करो , सरकषों की मुख़ालफ़त करो , फ़ज़्ल व करम को इख़्तेयार करो , ज़ुल्म व सरकशी से परहेज़ करो , ख़ूंरेज़ी से पनाह मांगो , ख़ल्क़े ख़ुदा के साथ इन्साफ़ करो , ग़ुस्से को पी जाओ , फ़साद फ़िल अर्ज़ से इज्तेनाब करो के यही सिफ़ात व कमालात क़ाबिले फ़ख्ऱ व मुबाहात हैं।

बदतरीन आमाल की बिना पर गुज़िश्ता उम्मतों पर नाज़िल होने वाले अज़ाब से अपने को महफ़ूज़ रखो , खै़र व शर हर हाल में इन लोगों को याद रखो और ख़बरदार उनके जैसे बदकिरदार न हो जाना।

अगर तुमने उनके अच्छे बुरे हालात पर ग़ौर कर लिया है तो अब ऐसे उमूर को इख़्तेयार करो जिनकी बिना पर इज़्ज़त हमेशा इनके साथ रही। दुशमन उनसे दूर-दूर रहे , आफ़ियत का दामन उनकी तरफ़ फ़ैला दिया गया , नेमतें उनके सामने सर निगूं हो गईं और करामत व शराफ़त ने उनसे अपना रिश्ता जोड़ लिया के वह इफ़तेराक़ से बचे , मोहब्बत के साथ , इसी पर दूसरों को आमादा करते रहे और इसी की आपस में वसीयत और नसीहत करते रहे।

और देखो हर उस चीज़ से परहेज़ करो जिसने इनकी कमर को तोड़ दिया , उनकी ताक़त को कमज़ोर कर दिया , यानी आपस का कीना , दिलों की अदावत , नफ़्सों का एक-दूसरे से मुंह फेर लेना और हाथों का एक-दूसरे की इमदाद से रूक जाना। ज़रा अपने पहले वाले साहेबाने ईमान के हालात पर भी ग़ौर करो के वह किस तरह बला और आज़माइशकी मन्ज़िलों में थे , क्या वह तमाम मख़लूक़ात में सबसे ज़्यादा बोझ के मुतहम्मिल और तमाम बन्दों में सबसे ज़्यादा मसाएब में मुब्तिला नहीं थे और तमाम अहले दुनिया सबसे ज़्यादा तन्गी में बसर नहीं कर रहे थे , फ़राअन ने उन्हें ग़ुलाम बना लिया था और तरह-तरह के बदतरीन अज़ाब में मुब्तिला कर रहे थे , उन्हें तल्ख़ घूंट पिला रहे थे और वह इन्हीं हालात में ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे के हलाकत की ज़िल्लत भी थी और तग़लुब की क़हर सामानी भी , न बचाव का कोई रास्ता था और न दिफ़ाअ की कोई सबील।

(((- तारीख़ किरदारसाज़ी का बेहतरीन ज़रिया है और इससे इस्तेफ़ादा करने का बुनियादी उसूल यह है के इन्सान दोनों तरह की क़ौमों के हालात का जाएज़ा ले , इन क़ौमों को भी देखे जिन्होंने सरफ़राज़ी और बलन्दी हासिल की है और उन क़ौमों के हालात का भी मुतालेआ करे के जिन्होंने ज़िल्लत और रूसवाई का सामना किया है। ताके इन अक़वाम के किरदार को अपनाए जिन्होंने अपने वजूद को सरमाया तारीख़ बना दिया है और उन लोगों के किरदार से परहेज़ करे जिन्होंने अपने को ज़िल्लत के ग़ार में ढकेल दिया है।-)))

यहाँ तक के जब परवरदिगार ने देख लिया के उन्होंने उसकी मोहब्बत में तरह-तरह की अज़ीयतें बरदाश्त कर ली हैं और उसके ख़ौफ़ से हर नागवार हालात का सामना कर लिया है तो उनके लिये इन तंगियों में वुसअत का सामान फ़राहम कर दिया औश्र उनकी ज़िल्लत को इज़्ज़त में तब्दील कर दिया , ख़ौफ़ के बदले अम्न व अमान अता फ़रमा दिया और वह ज़मीन के हाकिम और बादशाह , क़ाएद और नुमायां अफ़राद बन गए , इलाही करामत ने उन्हें इन मन्ज़िलों तक पहुंचा दिया जहां तक जाने का उन्होंने तसव्वुर भी नहीं किया था। देखो जब तक इनके इज्तेमाआत यकजा रहे उनके ख़्वाहिशात में इत्तेफ़ाक़ रहा , उनके दिल मोतदिल रहे , उनके हाथ एक-दूसरे की इमदाद करते रहे , इनकी तलवारें एक-दूसरे के काम आती रहीं , इनकी बसीरतें नाफ़िज़ रहीं और इनके अज़ाएम में इत्तेहाद रहा , वह किस तरह बाइज़्ज़त रहे , क्या वह तमाम एतराफ़े ज़मीन के अरबाब और तमाम लोगों की गर्दनों के हुक्काम नहीं थे।

लेकिन फ़िर आखि़रकार इनका अन्जाम क्या हुआ जब इनके दरम्यान इफ़तेराक़ पैदा हो गया और मोहब्बतों में इन्तेशार पैदा हो गया , बातों और दिलों में इख़्तेलाफ़ पैदा हो गया और सब मुख़्तलिफ़ जमाअतों और मुतहारिब गिरोहों में तक़सीम हो गए , तो परवरदिगार ने इनके बदन से करामत का लिबास उतार लिया और उनसे नेमतों की शादाबी को सल्ब कर लिया और अब उनके क़िस्से सिर्फ़ इबरत हासिल करने वालों के लिये सामाने इबरत बन कर रह गए हैं।

लेहाज़ा अब तुम औलादे इस्माईल और औलादे इस्हाक़ व इसराईल (याक़ूब) से इबरत हासिल करो के सबसे हालात किस क़द्र मिलते हुए और कैफ़ियात किस क़द्र यकसाँ हैं , देखो इनके इन्तेशार व इफ़तेराक़ के दौर में इनका क्या आलम था के क़ैसर व कसरा इनके अरबाब बन गए थे , और इन्हें एतराफ़े आलम के सब्ज़ा ज़ारों , इराक़ के दरयाओं , और दुनिया की शादाबियों से निकाल कर ख़ारदार झाड़ियों और आन्धियों की बेरोक गुज़रगाहों और मईशत की दुशवार गुज़ार मन्ज़िलों तक पहुंचाकर इस आलम में छोड़ दिया था के वह फ़क़ीर व नादार , ऊंट की पुश्त पर चलने वाले और बालू के ख़ेमों में क़यामक रने वाले हो गए थे , घर बार के एतबार से तमाम क़ौमों से ज़्यादा ज़लील और जगह के एतबार से सबसे ज़्यादा ख़ुश्क सालियों का शिकार थे , न उनकी आवाज़ थी जिनकी पनाह लेकर अपना तहफ़्फ़ुज़ कर सकें और न कोई उलफ़त का साया था जिसकी ताक़त पर भरोसा कर सकें , हालात मुज़तरिब , ताक़तें मुन्तशिर , कसरत में इन्तेशार , बलाएं सख़्त , जेहालत तह ब तह , ज़िन्दा दरगोर बेटियां , पत्थर पर सतशके क़ाबिल , रिश्तेदारियां टूटी हुई और चारों तरफ़ से हमलों की यलग़ार।

(((- आलमे इस्लाम को बनी इसराईल के हालात से इबरत हासिल करना चाहिये के उन्हें क़ैसर व कसरा और दीगर सलातीने ज़माना ने किस क़द्र ज़लील किया और कैसे-कैसे बदतरीन हालात से दो चार किया , सिर्फ़ इसलिये के इनके दरम्यान इत्तेहाद नहीं था और वह ख़ुद भी बुराइयों में मुब्तिला थे और दूसरों को भी बुराइयों से रोकने का ख़याल नहीं रखते थे , नतीजा यह हुआ के परवरदिगार ने उन्हें इस अज़ाब में मुब्तिला कर दिया औश्र इनका यह तसव्वुर महमिल होकर रह गया के हम अल्लाह के मुन्तख़ब बन्दे और उसकी औलाद का मरतबा रखते हैं , दौरे हाज़िर में मुसलमानों का यही आलम है के सिर्फ़ उम्मते दस्त के नाम पर झूम रहे हैं , इसके अलावा इनके किरदार में किसी तरफ़ से एतदाल की कोई झलक नहीं है। हर तरफ़ इन्हेराफ़ ही इन्हेराफ़ और कजी ही कजी नज़र आती है , न कहीं वहदते कलमा है और न कहीं इत्तेहादे कलाम। इख़्तेलाफ़ात का ज़ोर है और दुश्मनों की हुक्मरानी , आपस का झगड़ा है और ग़ैरों की ग़ुलामी , इन्नालिल्लाहे व इन्ना इलैहे राजेऊन!-)))

इसके बाद देखो के परवरदिगार ने उनपर किस क़द्र एहसानात किये जब इनकी तरफ़ एक रसूल भेज दिया जिसने अपने निज़ाम से इनकी इताअत का पाबन्द बनाया और अपनी दावत पर इनकी उलफ़तों को मुत्तहिद किया और इसके नतीजे में नेमतों ने इन पर करामत के बालो पर फैला दिये और राहतों के दरया बहा दिये। शरीयत ने उन्हें अपनी बरकतों के बेशक़ीमत फ़वाएद में लपेट लिया , वह नेमतों में ग़र्क़ हो गए और ज़िन्दगी की शादाबियों में मज़े उड़ाने लगे , एक मज़बूत फ़रमान्दवा (इस्माल के ज़ेरे साया उनकी ज़िन्दगी) के ताम शोबे (नज़म व तरतीब) क़ायम हो गए (हालात साज़गार हो गए) और हालात ने ग़लबा व बुज़ुर्गी के पहलू में जगह दिलवा दी और एक मुस्तहकम मुल्क की बुलन्दियों पर दुनिया व दीन की सआदतें उनकी तरफ़ झुक पड़ीं , वह आलमीन के हुकाम हो गए और एतराफ़े ज़मीन के बादशाह शुमार होने लगे जो कल उनके उमूर के मालिक थे आज वह उनके उमूर के मालिक हो गए और अपने एहकाम उन पर नाफ़िज़ करने लगे , जो कल अपने एहकाम इन पर नाफ़िज़ कर रहे थे के न इनका दम ख़म निकाला जा सकता था और न इनका ज़ोर ही तोड़ा जा सकता था। देखो तुमने अपने हाथों को इताअत के बन्धनों से झाड़ लिया है और अल्लाह की तरफ़ से अपने गिर्द खिंचे हुए हिसार में जाहेलीयत के एहकाम की बिना पर रख़ना पैदा कर दिया है। अल्लाह ने इस उम्मत के इज्तेमाअ पर यह एहसान किया है के उन्हें उलफ़त की ऐसी बन्दिषों में गिरफ़्तार कर दिया है के इसी के ज़ेरे साया सफ़र करते हैं और इसी के पहलू में पनाह लेते हैं और यह वह नेमत है जिसकी क़द्र व क़ीमत को कोई शख़्स नहीं समझ सकता है इसलिये के यह हर क़ीमत से बड़ी क़ीमत और हर शरफ़ व करामत से बालातर करामत है। और याद रखो के हिजरत के बाद फ़िर सहराई बद्दू हो गए हो और बाहमी दोस्ती के बाद फ़िर गिरोहों में तक़सीम हो गए हो , तुम्हारा इस्लाम से राबता सिर्फ़ नाम का रह गया है और तुम ईमान में से सिर्फ़ अलामतों को पहचानते हो और रूहे मज़हब से बिल्कुल बेख़बर हो। तुम्हारा कहना है के आग बर्दाष्त कर लेंगे मगर ज़िल्लत नहीं बदाष्त करेंगे , गोया के इस्लाम के हुदूद को तोड़ कर और इसके उस अहद व पैमान को पारा-पारा करके जिसे अल्लाह ने ज़मीन में पनाह और मख़लूक़ात में अमन क़रार दिया है। इस्लाम को उलट देना चाहते हो , हालांके अगर तुमने इस्लाम के अलावा किसी और तरफ़ रूख़ भी किया तो अहले कुफ्ऱ तुमसे बाक़ाएदा जंग करेंगे और उस वक़्त न जिब्राईल आएंगे न मीकाईल , न महाजिर तुम्हारी इमदाद करेंगे और न अन्सार , सिर्फ़ तलवारें खड़खड़ाती रहेंगी यहाँतक के परवरदिगार अपना आखि़री फ़ैसला नाफ़िज़ कर दे। तुम्हारे पास तो ख़ुदाई इताब व अज़ाब और हवादिस व हलाकत के नमूने मौजूद हैं लेहाज़ा ख़बरदार उसकी गिरफ्त से ग़ाफ़िल होकर दूर न समझो और उसके हमले को आसान समझ कर उसकी सख़्ती से ग़ाफ़िल होकर अपने को मुतमईन न बना लो। देखो परवरदिगार ने तुमसे पहले गुज़र जाने वाली क़ौमों पर सिर्फ़ इसी लिये लानत की है के उन्होंने अम्र बिल मारूफ़ और नहीं अनिल मुनकिर तर्क कर दिया था जिसके नतीजे में जेहला पर मआसी के इरतेकाब की बिना पर लानत हुई और दानिष्मन्दों पर उन्हें न मना करने की बिना पर

(((- अफ़सोस जिस क़ौम ने चार दिन पहले इज़्ज़त के दिन देखे हों , अपने इत्तेहाद व इत्तेफ़ाक़ और अपनी इताअत शआरी के असरात का मुशाहेदा किया हो , वह यकबारगी इस तरह मुन्क़लिब हो जाए और राहत पसन्दी उसे दोबारा ढकेलकर माज़ी के गढ़े में ढाल दे और ज़िल्लत व रूसवाई उसका मुक़द्दर बन जाए।

(2) यह नुकता हर दौर के लिये क़ाबिले तवज्जो है के दीने ख़ुदा में लानत का इस्तेहक़ाक़ सिर्फ़ जेहालत और बदअमली ही से नहीं पैदा होता है बल्कि अकसर औक़ात उसके हक़दार अहले इल्म और दीनदार हज़रात भी बन जाते हैं , जब उनके किरदार में अनानीयत पैदा हो जाती है और वह दूसरों की तरफ़ से यकसर ग़ाफ़िल हो जाते हैं , न नेकियों का हुक्म देते हैं और न बुराइयों से रोकते हैं , दीने ख़ुदा की बरबादी की तरफ़ से उसी तरह आंखें बन्द कर लेते हैं जैसे किसी ग़रीब का सरमाया लुट रहा है और हमसे इसका कोई ताल्लुक़ नहीं जबके दीने इस्लाम हर मुसलमान का सरमायाए हयात है और इसके तहफ़्फ़ुज़ की ज़िम्मेदारी हर साहेबे ईमान पर आएद होती है-)))

आगाह हो जाओ के तुमने इस्लाम की पाबन्दियों को तोड़ दिया है , उसके हुदूद को मोअत्तल कर दिया है और उसके एहकाम को मुर्दा बना दिया है परवरदिगार ने मुझे हुक्म दिया है के मैं बग़ावत करने वाले अहद शिकन और मुफ़सेदीन (ज़मीन में फ़साद बरपा करने वालों) से जेहाद करूं। चुनांचे मैं अहद व पैमान तोड़ने वालों (असहाबे जमल) से जेहाद कर चुका ना फ़रमानों (अहले सिफ़्फ़ीन) से मुक़ाबला कर चुका और बेदीन ख़वारिज (ख़वारिजे नहरवान) को मुकम्मल तरीक़े से ज़लील कर चुका। रह गया गढ़े में गिरने (गिरकर मरने) वाला “ शैतान तो उसका मसला उस चिंघाड़ से हल हो गया जिसके दिल की धड़कन और सीने की थरथराहट की आवाज़ मेरे कानों में पहुच रही थी। अब सिर्फ़ बाग़ियों में थोड़े से अफ़राद बाक़ी रह गए हैं के अगर परवरदिगार उन पर हमला करने की इजाज़त दे दे तो उन्हें भी तबाह करके हुकूमत का रूख़ दूसरी तरफ़ मोड़ दूंगा फिर वही लोग बाक़ी रह जाएंगे जो मुख़्तलिफ़ शहरों (की दूर दराज़ हुदूद) में बिखरे पड़े हैं। (मुझे पहचानो) मैंने कमसिनी ही में अरब के सीनों को ज़मीन से मिला दिया था और रबीया व मुज़िर (के क़बीलों) की सींगों को तोड़ दिया था। तुम्हें मालूम है के रसूले अकरम (स 0) से मुझे किस क़द्र क़रीबी क़राबत और मख़सूस मन्ज़िलत हासिल है। उन्होंने बचपने से मुझे अपनी गोद में इस तरह ले लिया था के मुझे अपने सीने से लगाए रखते थे। अपने बिस्तर पर जगह देते थे , अपने कलेजे से लगाकर रखते थे शैर मुझे मुसलसल अपनी ख़ुशबू से सरफ़राज़ फ़रमाया करते थे और ग़िज़ा को अपने दांतों से चबाकर मुझे खिलाते थे , न उन्होंने मेरे कसी बयान में झूठ पाया और न मेरे किसी अमल में ग़लती देखी। और अल्लाह ने दूध बढ़ाई के दौर ही से उनके साथ एक अज़ीम तरीन मलक को कर दिया था जो उनके साथ बुजु़र्गियों के रास्ते और बेहतरीन अख़लाक़ के तौर तरीक़े पर चलता रहता था और शब व रोज़ यही सिलसिला रहा करता था , और मैं भी उनके साथ उसी तरह रहता था जिस तरह बच्चा नाक़ा अपनी माँ के हमराह चलता है। वह रोज़ाना मेरे सामने अपने अख़लाक़ का एक निशाना पेशकरते थे और फिर मुझे उसकी इक़तेदा करने का हुक्म दिया करते थे।

वह साल में एक ज़माना ग़ारे हिरा में गुज़ारा करते थे जहां सिर्फ़ मैं उन्हें देखता था और कोई दूसरा न होता था , उस वक़्त रसूले अकरम (स 0) और ख़दीजा के अलावा किसी घर में इस्लाम का गुज़र न हुआ था और इनमें का तीसरा मैं था। मैं नूरे वहीए रिसालत का मुशाहेदा किया करता था और ख़ुशबूए रिसालत से दिमाग़ को मोअत्तर रखता था। मैंने नुज़ूले वही के वक़्त “ शैतान की चीख़ की आवाज़ सुनी थी और अर्ज़ की थी या रसूलल्लाह! यह चीख़ किसकी है ? तो फ़रमाया के यह “ शैतान है जो आज अपनी इबादत से मायूस हो गया है , तुम वह सब देख रहे हो जो मैं देख रहा हूँ और वह सब सुन रहे हो जो मैं सुन रहा हूँ। सिर्फ फ़र्क यह है के तुम नबी नहीं हो , लेकिन तुम मेरे वज़ीर भी हो और मन्ज़िले ख़ैर पर भी हो।

मैं उस वक़्त भी हज़रत के साथ था जब क़ुरैश के सरदारों ने आकर कहा था के मोहम्मद (स 0)! तुमने बहुत बड़ी बात का दावा किया है जो तुम्हारे घरवालों में किसी ने नहीं किया था। अब हम तुमसे एक बात का सवाल कर रहे हैं , अगर तुमने सही जवाब दे दिया और हमें हमारे मुदआ को दिखला दिया तो हम समझ लेंगे के तुम नबीए ख़ुदा और रसूले ख़ुदा हो वरना अगर ऐसा न कर सके तो हमें यक़ीन हो जाएगा के तुम जादूगर और झूठे हो , तो आपने फ़रमाया था तुम्हारा सवाल क्या है ? उन लोगों ने कहा के आप उस दरख़्त को दावत दे ंके वह जड़ से उखड़ कर आ जाए और आपके सामने खड़ा हो जाए ? आपने फ़रमाया के परवरदिगार हर “ शै पर क़ादिर है अगर उसने ऐसा कर दिया तो क्या तुम लोग ईमान ले आओगे ? और हक़ की गवाही दे दोगे! डन लोगों ने कहा बेशक। आपने फ़रमाया के मैं अनक़रीब यह मन्ज़र दिखला दूँगा लेकिन मुझे मालूम है के तुम कभी ख़ैर की तरफ़ पलट कर आने वाले नहीं हो। तुममें वह शख़्स भी मौजूद है जो कुंवे में फेंका जाएगा और वह भी है जो जो एहज़ाब क़ायम करेगा। यह कहकर आपने दरख़्त को आवाज़ दी के अगर तेरा ईमान अल्लाह और रोज़े आखि़रत पर है और तुझे यक़ीन है के मैं अल्लाह का रसूल हूँ तो जड़ से उखड़ कर मेरे सामने आजा और इज़्ने ख़ुदा से खड़ा हो जा। क़सम है उस ज़ात की जिसने उन्हें हक़ के साथ मबऊस किया है के दरख़्त जड़ से उखड़ गया और इसी आलम में हुज़ूर के सामने आ गया के इसमें सख़्त खड़खड़ाहट थी और परिन्दों के परों जैसी फड़फड़ाहट भी थी। उसने (कुछ)एक शाख़े सरकार के सर पर साया फ़िगन कर दी और (कुछ)एक मेरे कान्धे पर , जबके मैं आपके दाहिने पहलू में था। उन लोगों ने जैसे ही यह मन्ज़र देखा निहायत दरजए सरकशी और ग़ुरूर के साथ कहने लगे के अच्छा अब हुक्म दीजिये के आधा हिस्सा आप के पास आ जाए और आधा रूक जाए , आपने यह भी कर दिया और आधा हिस्सा निहायत दरजा-ए-हैरत के साथ और सख़्त तरीन खड़खड़ाहट के साथ आ गया और आपका हिसार कर लिया। उन लोगों ने फ़िर बरबिनाए कुफ्ऱ व सरकशी यह मुतालबा किया के अच्छा अब इससे कहिये के वापस जाकर दूसरे निस्फ़ हिस्से से मिल जाए (जैसा पहले था) , आपने यह भी करके दिखला दिया तो मैंने आवाज़ दी के मैं तौहीदे इलाही का पहला इक़रार करने वाला और इस हक़ीक़त का पहला एतराफ़ करने वाला हूँ के दरख़्त ने अम्रे इलाही से आपकी नबूवत की तस्दीक़ की और आपके कलाम की बलन्दी (दिखाने) के लिये (जो कुछ किया वह अम्रे वाक़ेई है) आपके हुक्म की मुकम्मल इताअत कर दी। लेकिन सारी क़ौम ने आपको झूठा और जादूगर क़रार दे दिया के इनका जादू अजीब भी है और बारीक भी है और ऐसी बातों की तस्दीक़ ऐसे ही अफ़राद कर सकते हैं , हम लोग नहीं कर सकते हैं। लेकिन मैं बहरहाल उस क़ौम में शुमार होता हूँ जिन्हें ख़ुदा के बादे में किसी मलामत करने वाले की मलामत की परवाह नहीं होती है। जिनकी निशानियां सिद्दीक़ीन जैसी हैं और जिनका कलाम नेक किरदार अफ़राद जैसा , यह रातों को आबाद रखने वाले और दिनों के मिनारे हैं। क़ुरान की रस्सी से मुतमस्सिक हैं और ख़ुदा व रसूल की सुन्नत को ज़िन्दा रखने वाले हैं , उनके यहाँ न ग़ुरूर है और न सरकशी , न ख़यानत है और न फ़साद , उनके दिल जन्नत में लगे हुए हैं और उनके जिस्म अमल में मसरूफ़ हैं।

(((- अगरचे कुफ़्फ़ार व मुष्रेकीन ने यह बात बतौर तमस्ख़ुर व इस्तेहज़ा कही थी लेकिन हक़ीक़ते अम्र यह है के ऐसे हक़ाएक़ का इक़रार ऐसे ही अफ़राद कर सकते हैं और ईमान की दौलत से सरफ़राज़ होना हर एक के बस की बात नहीं है। इस दौलत से महरूम आजके वह दानिशवर भी हैं जिनकी समझ में मोजिज़ा ही नहीं आता है और वह मोजिज़े को खि़लाफ़े क़ानून तबीअत क़रार देकर रद कर देते हैं और उनका ख़याल यह है के क़ानून साहबे क़ानून पर भी हुकूमत कर रहा है और साहबे क़ानून को भी यह हक़ नहीं है के वह अपने किसी बन्दे के मन्सब की तस्दीक़ के लिये अपने क़ानून में तबदीली कर दे जबके इसकी हज़ारों मिसालें तारीख़ में मौजूद हैं और वह जेहला और मुतास्सुब अफ़राद भी हैं जिनकी समझ में शक़्क़ुल क़मर और रद्दे शम्स जैसा रौशन मोजिज़ा नहीं आता है तो क़ुरान मजीद की बारीकियों और दीगर करामात की नज़ाकतों को क्या समझेंगे और किस तरह ईमान ला सकेंगे।-)))  


193-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें साहेबाने तक़वा की तारीफ़ की गई है)

कहा जाता है के अमीरूल मोमेनीन (अ 0) के एक आबिद व ज़ाहिद सहाबी जिनका नाम हमाम था , एक दिन हज़रत से अर्ज़ करने लगे के हुज़ूर मुझसे मुत्तक़ीन के सिफ़ात कुछ इस तरह बयान फ़रमाएं के गोया मैं उनको देख रहा हूँ , आपने जवाब से गुरेज़ करते हुए फ़रमाया के हमाम अल्लाह से डरो और नेक अमल करो के अल्लाह तक़वा और हुस्ने अमल वालों को दोस्त रखता है (अल्लाह उन लोगों के साथ है जो मुत्तक़ी और नेक किरदार हैं)। हमाम इस मुख़्तसर बयान से मुतमईन न हुए तो हज़रत ने हम्द व सनाए परवरदिगार और सलवात व सलाम के बाद इरशाद फ़रमाया-

अम्माबाद! परवरदिगार ने तमाम मख़लूक़ात को इस आलम में पैदा किया है के वह उनकी इताअत से मुस्तग़नी और उनकी नाफ़रमानी से महफ़ूज़ था , न उसे किसी नाफ़रमान की मासीयत नुक़सान पहुंचा सकती थी और न किसी इताअत गुज़ार की इताअत फ़ायदा दे सकती थी। उसने सबकी माशियत को तक़सीम कर दिया , और सबकी दुनिया में एक मन्ज़िल क़रार दे दी , इस दुनिया में मुत्तक़ी अफ़राद वह हैं जो साहेबाने फ़ज़ाएल व कमालात होते हैं के उनकी गुफ़्तगू हक़ व सवाब , उनका लिबास मोतदिल , उनकी रफ़्तार मुतवाज़ेअ होती है। जिन चीज़ों को परवरदिगार ने हराम क़रार दे दिया है उनसे नज़रों को नीचा रखते हैं और अपने कानों को उन उलूम के लिये वक़्फ़ रखते हैं जो फ़ायदा पहुंचाने वाले हैं। उनके नुफ़ूस बला व आज़माइशमें ऐसे ही रहते हैं जैसे राहत व आराम में , अगर परवरदिगार ने हर शख़्स की हयात की मुद्दत मुक़र्रर न कर दी होती तो इनकी रूहें इनके जिस्म में पलक झपकने के बराबर भी ठहर नहीं सकती थीं के उन्हें सवाब का शौक़ है और अज़ाब का ख़ौफ़। ख़ालिक़ इनकी निगाह में इस क़द्र अज़ीम है के सारी दुनिया निगाहों से गिर गई है। जन्नत उनकी निगाह के सामने इस तरह है जैसे इसकी नेमतों से लुत्फ़ अन्दोज़ हो रहे हों और जहन्नुम को इस तरह देख रहे हैं जैसे इसके अज़ाब को महसूस कर रहे हों। उनके दिल नेकियों के ख़ज़ाने हैं और इनसे शर का कोई ख़तरा नहीं है। इनके जिस्म नहीफ़ और लाग़र हैं और इनके ज़रूरियात निहायत दर्जए मुख़्तसर और इनके नुफ़ूस भी तय्यबो ताहिर हैं। इन्होंने दुनिया में चन्द दिन तकलीफ़ उठाकर अबदी राहत का इन्तेज़ाम कर लिया है और ऐसी फ़ायदा बख़्श तिजारत की है जिसका इन्तेज़ाम इनके परवरदिगार ने कर दिया था। दुनिया ने उन्हें बहुत चाहा लेकिन उन्होंने इसे नहीं चाहा और इसने उन्हें बहुत गिरफ़्तार करना चाहा लेकिन उन्होंने फ़िदया देकर अपने को छुड़ा लिया।

रातों के वक़्त मुसल्ला पर खड़े रहते हैं , ख़ुशअलहानी के साथ (ठहर-ठहर कर) तिलावते क़ुरान करते रहते हैं। अपने नफ़्स को ग़मज़दा रखते हैं और इसी तरह अपनी बीमारीए दिल का इलाज करते हैं। जब किसी आयत तरग़ीब से गुज़रते हैं तो इसकी तरफ़ मुतवज्जो हो जाते हैं और जब किसी आयते तरहीब व तख़वीफ़ से गुज़रते हैं तो दिल के कानों को इसकी तरफ़ यूं मसरूफ़ कर देते हैं जैसे जहन्नुम के शोलों की आवाज़ और वहां की चीख़ पुकार मुसलसल इनके कानों तक पहुंच रही हो , यह रूकूअ में कमर ख़मीदा और सजदे में पेशानी , हथेली , अंगूठों और घुटनों को फ़र्षे ख़ाक किये रहते हैं। परवरदिगार से एक ही सवाल करते हैं के इनकी गर्दनों को आतिशे जहन्नुम से आज़ाद कर दे। इसके बाद दिन के वक़्त यह ओलमा और दानिशमन्द , नेक किरदार और परहेज़गार होते हैं जैसे उन्हें तीरअन्दाज़ के तीर की तरह ख़ौफ़े ख़ुदा ने तराशा हो।

(((- यूँ तो तिलावते क़ुरान का सिलसिला घरों से लेकर मस्जिदों तक और गुलदस्तए अज़ान से लेकर टीवी स्टेशन तक हर जगह हावी है और जुस्ने क़राअत के मुक़ाबलों में “ अल्लाह-अल्लाह ” की आवाज़ भी सुनाई देती है लेकिन कहां हैं वह तिलावत करने वाले जिनकी शान मौलाए कायनात ने बयान की है के हर आयत उनके किरदार का एक हिस्सा बन जाए और हर फ़िक़रा दर्दे ज़िन्दगी के एक इलाज की हैसियत पैदा कर ले। आयते नेमत पढ़ें तो जन्नत का नक़्षा निगाहों में खिंच जाए और तमन्नाए मौत में बेक़रार हो जाएं और आयत ग़ज़ब की तिलावत करें तो जहन्नुम के शोलों की आवाज़ कानों में गूंजने लगे और सारा वजूद थरथरा जाए। दरहक़ीक़त यह अमीरूलमोमेनीन (अ 0) ही की ज़िन्दगी का नक़्षा है जिसे हज़रत ने मुत्तक़ीन के नाम से बयान किया है वरना दीदा तारीख़ ऐसे मुत्तक़ीन की ज़ियारत के लिये सरापा इश्तियाक़ है-)))

देखने वाला इन्हें देखकर बीमार तसव्वुर करता है हालांके यह बीमार नहीं हैं और इनकी बातों को सुनकर कहता है के इनकी अक़्लों में फ़ितूर है हालांके ऐसा क़तई नहीं है। बात सिर्फ़ यह है के इन्हें एक बहुत बड़ी बात ने मदहोशबना रखा है के यह न क़लीले अमल से राज़ी होते हैं और न कसीर अमल को हक़ीर समझते हैं। हमेशा अपने नफ़्स ही को मुतहम करते रहते हैं (कोताहियों का इलज़ाम रखते हैं) और अपने आमाल से ख़ौफ़ ज़दा रहते हैं जब इनमें से किसी एक को (सलाह व तक़वा की बिना पर) सरापा जाना जाता है (तारीफ़ की जाती है) तो वह अपने हक़ में कही हुई बात से ख़ौफ़ज़दा हो जाते हैं और कहते हैं के मैं ख़ुद अपने नफ़्स को दूसरों से बेहतर पहचानता हूँ और मेरा परवरदिगार तो मुझसे भी बेहतर जानता है।

ख़ुदाया! मुझसे उनके अक़वाल का मुहासेबा न करना और मुझे उनके हुस्ने ज़न से भी बेहतर क़रार दे दुनिया और फिर उन गुनाहों को माफ़ भी कर देना जिन्हें यह सब नहीं जानते हैं।

उनकी एक अलामत यह भी है के इनके पास दीन में क़ुवत , नर्मी में शिद्दते एहतियात , यक़ीन में ईमान , इल्म के बारे में लालच , हिल्म की मंज़िल में इल्म , मालदारी में मयानारवी , इबादत में खुशु-ए-क़ल्ब , फ़ाक़े में ख़ुद्दारी , सख्तियो में सब्र , हलाल की तलब , हिदायत में निशात , लालच से परहेज़ जैसी तमाम बातें पाई जाती हैं। वह नेक आमाल भी अन्जाम देते हैं तो लरज़ते हुए अन्जाम देते हैं। शाम के वक़्त इनकी फ़िक्र शुक्रे परवरदिगार होती है और सुबह के वक़्त ज़िक्रे इलाही। ख़ौफ़ज़दा आलम में रात करते हैं और फ़रह व सुरूर में सुबह , जिस ग़फ़लत से डराया गया है उससे मोहतात रहते हैं और जिस फ़ज़्ल व रहमत का वादा किया गया है उससे ख़ुशरहते हैं। अगर नफ़्स नागवार अम्र के लिये सख़्ती भी करे तो इसके मुतालबे को पूरा नहीं करते हैं इनकी आंखों की ठण्डक लाज़वाल नेमतों में है और इनका परहेज़ फ़ानी अष्यिा के बारे में है। यह हिल्म को इल्म से और क़ौल को अमल से मिलाए हुए हैं। तुम हमेशा इनकी उम्मीदों को मुख़्तसर , दिल को ख़ाशा (मुतवाज़ेअ) , नफ़्स को क़ानेअ , खाने को मामूली , मुआमलात को आसान , दीन को महफ़ूज़ , ख़्वाहिशात को मुर्दा और ग़ुस्से को पिया हुआ देखोगे।

उनसे हमेशा नेकियों की उम्मीद रहती है और इन्सान इनके शर की तरफ़ से महफ़ूज़ रहता है। यह ग़ाफ़िलों में नज़र आएं तो भी यादे ख़ुदा करने वालों में कहे जाते हैं और याद करने वालों में नज़र आए तो भी ग़ाफ़िलों में शुमार नहीं होते हैं। ज़ुल्म करने वाले को माफ़ कर देते हैं , महरूम रखने वाले को अता कर देते हैं , क़तए रहम करने वालों से ताल्लुक़ात रखते हैं , लगवियात से दूर , नर्म कलाम , मुनकिरात ग़ाएब , नेकियां हाज़िर , ख़ैर आता हुआ , शर जाता हुआ , ज़लज़्लों में बावक़ार , दुष्वारियों में साबिर , आसानियों में शुक्रगुज़ार , दुशमन पर ज़ुल्म नहीं करते हैं चाहने वालों की ख़ातिर गुनाह नहीं करते हैं। गवाही तलब किये जाने से पहले हक़ का एतराफ़ करते हैं , अमानतों को ज़ाया नहीं करते हैं , जो बात याद दिलाई जाए उसे भूलते नहीं हैं और अलक़ाब के ज़रिये एक-दूसरे को चिढ़ाते नहीं हैं और हमसाये को नुक़सान नहीं पहुंचाते हैं।

(((- ख़ुदा गवाह है के एक-एक लफ़्ज़ आबे ज़र से लिखने के क़ाबिल है और इन्सानी ज़िन्दगी में इन्क़ेलाब पैदा करने के लिये काफ़ी है। साहेबाने तक़वा की वाक़ेई निशान यही है के इनसे हर ख़ैर की उम्मीद की जाए और इनके बारे में किसी शर का तसव्वुर न किया जाए। वह ग़ाफ़िलों के दरम्यान भी रहें तो ज़िक्रे ख़ुदा में मशग़ूल रहें और बेईमानों की बस्ती में भी आबाद हों तो ईमान व किरदार में फ़र्क़ न आए। नफ़्स इतना पाकीज़ा हो के हर बुराई का जवाब नेकी से दें और हर ग़लती को माफ़ करने का हौसला रखते हों , गुफ़्तगू , आमाल , रफ़्तार , किरदार हर एतबार से तय्यब व ताहिर हों और कोई एक लम्हा भी ख़ौफ़े ख़ुदा से ख़ाली न हो। तलाशकीजिये आज के दौर के साहेबाने तक़वा और मदअयाने परहेज़गारी की बस्ती में , कोई एक शख़्स भी ऐसा जामेअ सिफ़ात नज़र आता है और किसी इन्सान के किरदार में भी मौलाए कायनात के इरशाद की झलक नज़र आती है , और अगर ऐसा नहीं है तो समझिये के हम ख़यालात की दुनिया में आबाद हैं और हमारा वाक़ेयात से कोई ताल्लुक़ नहीं है-)))

जो मसाएब में किसी को ताने नहीं देते हैं , हर्फ़े बातिल में दाखि़ल नहीं होते हैं और कलमए हक़ से बाहर नहीं आते हैं , यह चुप रहें तो उनकी ख़ामोशी हम व ग़म की बिना पर नहीं है और यह हंसते हैं तो आवाज़ बलन्द नहीं करते हैं , इन पर ज़ुल्म किया जाए तो सब्र कर लेते हैं ताके ख़ुदा इसका इन्तेक़ाम ले। इनका अपना नफ़्स हमेशा रन्ज में रहता है और लोग इनकी तरफ़ से हमेशा मुमतईन रहते हैं इन्होंने अपने नफ़्स को आखि़रत के लिये थका डाला है और लोग इनके नफ़्स की तरफ़ से आज़ाद हो गए हैं। दूर रहने वालों से इनकी दूरी ज़ोहद और पाकीज़गी की बिना पर है और क़रीब रहने वालों से इनकी क़ुरबत नर्मी और मरहमत की बिना पर है , न दूरी तकब्बुर व बरतरी का नतीजा है और न क़ुरबत मकरो फ़़रेब का नतीजा।

रावी कहता है के यह सुनकर हमाम ने एक चीख़ मारी और दुनिया से रूख़सत हो गए।

तो अमीरूल मोमेनीन (अ 0) ने फ़रमाया के मैं इसी वक़्त से डर रहा था के मैं जानता था के साहेबाने तक़वा के दिलों पर नसीहत का असर इसी तरह हुवा करता है। यह सुनना था के एक शख़्स बोल पड़ा के फिर आप पर ऐसा असर क्यों नहीं ?

तो आपने फ़रमाया के ख़ुदा तेरा बुरा करे , हर अजल के लिये एक वक़्त मुअय्यन है जिससे आगे बढ़ना नामुमकिन है और हर “ शै के लिये एक सबब है जिससे तजावुज़ करना नामुमकिन है , ख़बरदार अब ऐसी गुफ़्तगू न करना , यह “ शैतान ने तेरी ज़बान पर अपना जादू फूंक दिया है।

194-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें मुनाफ़ेक़ीन के औसाफ़ बयान किये गए हैं)

हम उस परवरदिगार का शुक्र अदा करते हैं के उसने इताअत की तौफ़ीक़ अता फ़रमाई और मासीयत से दूर रखा और फिर उससे एहसानात के मुकम्मल करने और उसकी रीसमाने हिदायत से वाबस्ता रहने की दुआ भी करते हैं। और इस बात की शहादत देते हैं के मोहम्मद (स 0) उसके बन्दे और रसूल हैं। उन्होंने उसकी रिज़ा की ख़ातिर हर मुसीबत में अपने को डाल दिया और हर ग़ुस्से के घूंट को पी लिया। क़रीब वालों ने उनके सामने रंग बदल दिया और दूर वालों ने उन पर लशकर कशी कर दी। अरबों ने अपनी ज़माम का रूख़ उनकी तरफ़ मोड़ दिया और अपनी सवारियों को उनसे जंग करने के लिये महमीज़ कर दिया यहां तक के अपनी औरतों को दूर दराज़ इलाक़ों और दूर इफ़तादा सरहदों से लाकर उनके सहन में उतार दिया।

बन्दगाने ख़ुदा! मैं तुम्हें तक़वा इलाही की वसीयत करता हूं और तुम्हें मुनाफ़ेक़ीन से होशियार कर रहा हूँ के यह गुमराह भी हैं और गुमराह कुन भी , मुनहरिफ़ भी हैं और मुनहरिफ़साज़ भी , यह मुसलसल रंग बदलते रहते हैं और तरह-तरह के फ़ितने उठाते रहते हैं , हर मक्रो फ़रेब के ज़रिये तुम्हारा ही क़स्द करते हैं और हर घात में तुम्हारी ही ताक में बैठते हैं। इनके दिल बीमार हैं और इनके चेहरे पाक व साफ़ , अन्दर ही अन्दर चाल चलते हैं और नुक़सानात की ख़ातिर रेंगते हुए क़दम बढ़ाते हैं। इनका तरीक़ा दवा जैसा और इनका कलाम शिफ़ा जैसा है लेकिन इनका किरदार नाक़ाबिले इलाज मर्ज़ है , यह राहतों में हसद करने वाले , मुसीबतों में मुब्तिला कर देने वाले और उम्मीदों को नाउम्मीद बना देने वाले हैं। जिस राह पर देखो इनका मारा हुआ पड़ा है और जिस दिल को देखो वहाँ तक पहुंचने का एक सिफ़ारिशी ढूंढ रखा है।

(((- अगर सारी दुनिया के जराएम की फ़ेहरिस्त तैयार की जाए तो इसमें सरे फेहरिस्त निफ़ाक़ ही का नाम होगा जिसमें हर तरह की बुराई और हर तरह का ऐब पाया जाता है। निफ़ाक़ अन्दर से कुफ्ऱ व शिर्क की ख़बासत रखता है और बाहर से झूठ और ग़लत बयानी की कसाफ़त रखता है और इन दोनों से बदतरीन दुनिया का कोई जुर्म और कोई ऐब नहीं है। दौरे हाज़िर का दक़ीक़तरीन जाएज़ा लिया जाए तो अन्दाज़ा होगा के इस दौर में आलमी सतह पर निफ़ाक़ के अलावा कुछ नहीं रह गया है। हर शख़्स जो कुछ कर रहा है उसका बातिन उसके खि़लाफ़ है और हर हुकूमत जिस बात का दावा कर रही है उसकी कोई वाक़ईयत नहीं है। तहज़ीब के नाम पर फ़साद , मवासलात के नाम पर तबाहकारी , अमने आलम के नाम पर असलहों की दौड़ , तालीम के नाम पर बद एख़लाक़ी और मज़हब के नाम पर लामज़हबीयत ही इस दौर का का तरहे इम्तेयाज़ है और इसी को ज़बाने शरीअत में निफ़ाक़ कहा जाता है-)))

हर रन्ज व ग़म के लिये आंसू तैयार रखे हुए हैं , एक दूसरे की तारीफ़ में हिस्सा लेते हैं और इसके बदले के मुन्तज़िर रहते हैं। सवाल करते हैं तो चिपक जाते हैं और बुराई करते हैं तो रूसवा करके ही छोड़ते हैं और फ़ैसला करते हैं तो हद से बढ़ जाते हैं।

हर हक़ के लिये एक बातिल तैयार कर रखा है और हर सीधे के लिये एक कजी का इन्तेज़ाम कर रखा है। हर ज़िन्दा के लिये एक क़ातिल मौजूद है और हर दरवाज़े के लिये एक कुन्जी बना रखी है और हर रात के लिये एक चिराग़ मुहैया कर रखा है। लालच के लिये नामूस को ज़रिया बनाते हैं ताके अपने बाज़ार को रवाज दे सकें और अपने माल को राएज कर सकें। जब बात करते हैं तो मुश्तबा क़िस्म की और जब तारीफ़ करते हैं तो बातिल को हक़ का रंग देकर। उन्होंने अपने लिये रास्ते को आसान बना लिया है और दूसरों के लिये तंगी पैदा कर दी है। यह “ शैतान के गिरोह हैं और जहन्नुम के शोले , यही हिज़्बुष्षैतान के मिसदाक़ हैं और हिज़्बुष्षैतान का मुक़द्दर सिवाए ख़सारे के कुछ नहीं है।

(((- हक़ीक़ते अम्र यह है के मुनाफ़िक़ीन का कोई अम्र क़ाबिले एतबार नहीं होता और इनकी ज़िन्दगी सरापा ग़लत बयानी होती है। तारीफ़ करने पर आ जाते हैं तो ज़मीन व आसमान के क़लाबे मिला देते हैं और बुराई करने पर तुल जाते हैं तो आदमी को आलमी सतह पर ज़लील करके छोड़ते हैं। इसलिये के इनका न कोई ज़मीर होता है और न कोई मेयार , इन्हें सिर्फ़ मौक़े परस्ती से काम लेना है और इसी के एतबार से ज़बान खोलना है।

ख़ुतबे के उनवान से यह अन्दाज़ा हुआ था के यह समाज के चन्द अफ़राद का एक गिरोह है जिसके किरदार वाज़ेह किया जा रहा है ताके लोग इस किरदार से होशियार रहें और अपनी ज़िन्दगी को निफ़ाक़ से बचाकर ईमान व तक़वा के रास्ते पर लगा दें , लेकिन तफ़सीलात को देखने के बाद महसूस होता है के यह पूरे समाज का नक़्षा है और सारा आलमे इन्सानियत इसी रंग में रंगा हुआ है। ज़िन्दगी का कोई शोबा ऐसा नहीं है जिसमें निफ़ाक़ की हुकमरानी न हो और इन्सान के किरदार का कोई रूख़ ऐसा नहीं है जिसमें वाक़ईयत और हक़ीक़त पाई जाती हो और जिसे निफ़ाक़ से पाक व पाकीज़ा क़रार दिया जा सके।

ऐसे हालात में तो हर शख़्स को अपने नफ़्स का जाएज़ा लेना चाहिये और मुनाफ़ेक़ीन के बारे में बयान किये हुए सिफ़ात से इबरत हासिल करनी चाहिये।-)))

195-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

सारी तारीफ़ उस अल्लाह के लिये जिसने अपनी सल्तनत के आसार और किबरियाई के जलाल को इस तरह नुमायां किया है के अक़्लों की निगाहें अजायबे क़ुदरत से हैरान हो गई हैं और नुफ़ूस के तसव्वुरात व इफ़्कार उसके सिफ़ात की हक़ीक़त के इरफ़ान से रूक गए हैं।

मैं गवाही देता हूँ के उसके अलावा कोई ख़ुदा नहीं है और यह गवाही सिर्फ़ ईमान व यक़ीन , इख़लास व एतेक़ाद की बिना पर है और फिर मैं गवाही देता हूँ के मोहम्मद (स 0) उसके बन्दे और रसूल हैं , उसने इन्हें उस वक़्त भेजा है जब हिदायत के निशानात मिट चुके थे और दीन के रास्ते बेनिशान हो चुके थे। उन्होंने हक़ का वाशिगाफ़ अन्दाज़ से इज़हार किया। लोगों को हिदायत दी और सीधे रास्ते पर लगाकर मयानारवी का क़ानून बना दिया।

बन्दगाने ख़ुदा , याद रखो परवरदिगार ने तुमको बेकार नहीं पैदा किया है और न तुमको बेलगाम छोड़ दिया है। तुमको दी जाने वाली नेमतों के हुदूद को जानता है और तुम पर किये जाने वाले एहसानात का शुमार रखता है लेहाज़ा उससे कामरानी और कामयाबी का तक़ाज़ा करो , उसकी तरफ़ दस्ते तलब बढ़ाओ और उससे अताया का मुतालेबा करो , कोई हेजाब तुम्हें इससे जुदा नहीं कर सकता है और कोई दरवाज़ा उसका तुम्हारे लिये बन्द नहीं हो सकता है , वह हर जगह और हर आन मौजूद है , हर इन्सान और हर जिन के साथ है , न अता उसके करम में रख़ना डाल सकती है और न हिदाया उसके ख़ज़ाने में कमी पैदा कर सकते हैं। कोई साएल इसके ख़ज़ाने को ख़ाली नहीं कर सकता है और कोई अतिया उसके करम की इन्तेहा को नहीं पहुंच सकता है। एक शख़्स की तरफ़ तवज्जो दूसरे की तरफ़ से रूख़ मोड़ नहीं सकती है और आवाज़ दूसरी आवाज़ से ग़ाफ़िल नहीं बना सकती है। इसका अतिया छीन लेने से मानेअ नहीं होता है और इसका ग़ज़ब रहमत से मशग़ूल नहीं करता है। रहमते इताब से ग़फ़लत में नहीं डाल देती है और हस्ती का पोशीदा होना ज़हूर से मानेअ नहीं होता है और आसार का ज़हूर हस्ती की परदावारी को नहीं रोक सकता है , वह क़रीब होके भी दूर है और बलन्द होकर भी नज़दीक है , वह ज़ाहिर होकर भी पोशीदा है और पोशीदा होकर भी ज़ाहिर है। वह जज़ा देता है लेकिन उसे जज़ा नहीं दी जाती है , उसने मख़लूक़ात को सोच बिचार करके नहीं बनाया है और न ख़स्तगी (तकान) की बिना पर उनसे मदद ली है।

बन्दगाने ख़ुदा! मैं तुम्हें तक़वा इलाही की वसीयत करता हूँ के यही हर ख़ैर की ज़माम और हर नेकी की बुनियाद है , इसके बन्धनों से वाबस्ता रहो और इसके हक़ाएक़ से मुतमस्सिक रहो , यह तुमको राहत की महफ़ूज़ मन्ज़िलों और वुसअत के बेहतरीन इलाक़ों तक पहुंचा देगा , तुम्हारे लिये महफ़ूज़ मुक़ामात होंगे और बाइज़्ज़त मनाज़िल , उस दिन जिस दिन आंखें फटी की फटी रह जाएंगी और एतराफ़ अन्धेरा छा जाएगा। बोटियां मोअत्तल कर दी जाएंगी (दस-दस महीने की गाभिन ऊंटनियां बेकार कर दी जाएंगी) और सूर फूंक दिया जाएगा। उस वक़्त सबका दम निकल जाएगा और हर ज़बान गूंगी हो जाएगी। बलन्दतरीन पहाड़ और मज़बूत तरीन चट्टानें रेज़ा रेज़ा हो जाएंगी , पत्थरों की चट्टानें चमकदार सराब की शक्ल में तब्दील हो जाएंगी और उनकी मन्ज़िल एक साफ़ चटियल मैदान हो जाएगी , न कोई शफ़ीअ शिफ़ाअत करने वाला होगा और न कोई दोस्त काम आने वाला होगा , और न कोई माज़ेरत व दिफ़ाअ करने वाली होगी।

(((- जिन लोगों के सिफ़ात व कमालात पर मिज़ाज या आदात की हुकमरानी होती है , इनके कमालात में इस तरह की यकसानियत पाई जाती है के मेहरबान होते हैं और मेहरबान ही होते हैं और ग़ुस्सावर ही होते हैं। लेकिन मालिके कायनात के औसाफ़ व कमालात इससे बिलकुल मुख़्तलिफ़ हैं उसके औसाफ़ व कमालात का सरचश्मा इसका मिज़ाज या उसकी तबीअत नहीं है। बल्कि उनका वाक़ेई सरचश्मा इसकी हिकमत और मसलेहत है , लेहाज़ा उसके बारे में ऐन मुमकिन है के एक ही वक़्त में मेहरबान भी हो और ग़ज़बनाक भी , नेमतें अता भी कर रहा हो और सल्ब भी कर रहा हो , उसके कमाल का ज़हूर भी हो और पर्दा भी हो , वह दूर भी नज़र आए और क़रीब भी , इसलिये के मसालेह का तक़ाज़ा हमेशा अफ़राद के एतबार से मुख़्तलिफ़ होता है। एक शख़्स का किरदार रहमत चाहता है और दूसरे का ग़ज़ब , एक के हक़ में मसलेहत अता कर देना है और दूसरे के हक़ में छीन लेना , एक जज़ा और ईनाम का सज़ावार है और दूसरा सज़ा व इताब का हक़दार। तू हकीम अललइतलाक़ का फ़र्ज़ है के एक ही वक़्त में हर शख़्स के साथ वैसा ही बरताव करे जिसका वह अहल है और एक बरताव उसे दूसरे बरताव से ग़ाफ़िल न बना सके-)))

196-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें सरकारे दो आलम (स 0) की मद्हा की गई है)

प्रवरदिगार ने आपको उस वक़्त मबऊस किया जब न कोई निशाने हिदायत क़ायम रह गया था और न कोई मिनारए दीन रौशन था और न कोई रास्ता वाज़ेह था। बन्दगाने ख़ुदा! मैं तुम्हें तक़वा इलाही की वसीयत करता हूँ और दुनिया से होशियार कर रहा हूँ के यह कूच का घर और बदमज़गी का इलाक़ा है , इसका बाशिन्दा हर हाल सफ़र करने वाला है और इसका मुक़ीम बहरहाल जुदा होने वाला है। यह अपने अहल को लेकर इस तरह लरज़ती है जिस तरह गहरे समन्दरों में तन्द व तेज़ हवाओं की ज़द पर किष्तियां , कुछ लोग ग़र्क़ और हलाक हो जाते हैं और कुछ मौजों के सहारे पर बाक़ी रह जाते हैं। तेज़ हवाएं उन्हें अपने दामन में लिये फ़िरती रहती हैं और अपनी हौलनाक मन्ज़िलों की तरफ़ ले जाती रहती हैं। जो ग़र्क़ हो गया वह दोबारा पाया नहीं जा सकता (हाथ नहीं आ सकता) और जो बच गया है उसका रास्ता हलाकत की ही तरफ़ जा रहा है।

बन्दगाने ख़ुदा! अभी बात को समझ लो और जबके ज़बानें आज़ाद हैं और बदन सही व सालिम हैं। आज़ा में लचक बाक़ी है और आने-जाने की जगह वसीअ और काम का मैदान तवील व अरीज़ है। क़ब्ल इसके के मौत नाज़िल हो जाए और अजल का फन्दा गले में पड़ जाए , अपने लिये मौत की आमद को यक़ीनी समझ लो और उसके आने का इन्तेज़ार न करो।

197-आपका इरशादे गिरामी

(जिसमें पैग़म्बरे इस्लाम (स 0) के अम्र व नहीं और तालीमात को क़ुबूल करने के ज़ैल में फ़ज़ीलत का ज़िक्र किया गया है)

असहाबे पैग़म्बर (स 0) में शरीअत के अमानतदार अफ़राद इस हक़ीक़त हैं के मैंने एक लम्हे के लिये भी ख़ुदा और रसूल (स 0) की बात को रद नहीं किया और मैंने पैग़म्बरे अकरम (स 0) पर अपनी जान उन मुक़ामात पर क़ुरबान की है जहां बड़े-बड़े बहादुर भाग खड़े होते हैं और उनके क़दम पीछे हट जाते हैं , सिर्फ़ इस बहादुरी की बुनियाद पर जिससे परवरदिगार ने जुझे सरफ़राज़ फ़रमाया था।

रसूले अकरम (स 0) उस वक़्त दुनिया से रूख़सत हुए हैं जब उनका सर मेरे सीने पर था और उनकी रूहे अक़दस मेरे हाथों पर जुदा हुई है तो मैंने अपने हाथों को चेहरे पर मल लिया , मैंने ही आपको ग़ुस्ल दिया है जब मलाएका मेरी इमदाद कर रहे थे और घर के अन्दर और बाहर एक कोहराम बरपा था , एक गिरोह नाज़िल हो रहा था और एक वापस जा रहा था। सब नमाज़े जनाज़ा पढ़ रहे थे और मैं मुसलसल उनकी आवाज़ें सुन रहा था , यहां तक के मैंने ही हज़रत को सुपुर्दे लहद किया है। तो अब बताओ के ज़िन्दगी और मौत में मुझसे ज़्यादा उनसे क़रीबतर कौन है ? अपनी बसीरतों के साथ और सिद्क़े नीयत के एतमाद पर आगे बढ़ो , अपने दुशमन से जेहाद करो , क़सम है उस परवरदिगार की जिसके अलावा कोई ख़ुदा नहीं है के मैं हक़ के रास्ते पर पर हूँ और वह लोग बातिल की लग़्ज़िशो की मन्ज़िल में , मैं जो कह रहा हूँ वह तुम सुन रहे हो और मैं अपने और तुम्हारे दोनों के लिये ख़ुदा की बारगाह में अस्तग़फ़ार कर रहा हूँ।

(((- मौलाए कायनात (अ 0) की पूरी हयात इस इरशादे गिरामी का बेहतरीन मुरक़्क़ा है जहां हिजरत की रात से लेकर फ़तहे मक्का तक और उसके बाद तबलीग़े बराअत तक कोई मौक़ा ऐसा नहीं था जहां आपने सरकारे दो आलम (स 0) और उनके मक़सद की ख़ातिर अपनी जान को ख़तरे में न डाल दिया हो और उस वहदत ज़ात व इताअत का सुबूत न दिया हो जिसकी तरफ़ ख़ुद हज़रत ने मैदाने ओहद में इशारा किया था जब जिबराईले अमीन (अ 0) ने अज़ की के हुज़ूर अली (अ 0) की मवासात को देख रहे हैं ? तो आपने फ़रमाया के इसमें हैरत की बात क्या है “ अली (अ 0) मुझसे है और मैं अली (अ 0) से हूँ ” ।

इसके बाद इन्तेक़ाल से लेकर दफ़्न के आखि़री मरहले तक हर क़दम पर हुज़ूर के उमूर के ज़िम्मेदार रहे जबके मोअर्रेख़ीन के बयान की बिना पर बड़े बड़े सहाबाए कराम दफ़न में शिरकत की सआदत हासिल न कर सके और खि़लाफ़त साज़ी की मुहिम में मसरूफ़ रह गए।-)))

198-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें ख़ुदा के आलिमे जुजि़्यात होने पर ताकीद की गई है और फिर तक़वा पर आमादा किया गया है)

वह परवरदिगार सहराओं में जानवरों की फ़रयाद को भी जानता है और तनहाइयों में बन्दों के गुनाहों को भी , वह गहरे समन्दरों में मछलियों के रफ़्त व आमद से भी बाख़बर है और तेज़ व तन्द हवाओं से पैदा होने वाले तलातुम से भी। और मैं गवाही देता हूँ के मोहम्मद (स 0) ख़ुदा के मुन्तख़ब बन्दे , उसकी वही के सफ़ीर और उसकी रहमत के रसूल हैं।

अम्माबाद! मैं तुम सबको उसी ख़ुदा से डरने की नसीहत कर रहा हूँ जिसने तुम्हारी खि़लक़त की इब्तेदा की है और उसी की बारगाह में तुम्हें पलट कर जाना है , उसी के ज़रिये तुम्हारे मक़ासिद की कामयाबी है और उसी की तरफ़ तुम्हारी रग़बतों की इन्तेहा है। उसी की सिम्त तुम्हारा सीधा रास्ता है और उसी की तरफ़ तुम्हारी फ़रयादों का निशाना है।

यह तक़वाए इलाही तुम्हारे दिलों की बीमारी की दवा है और तुम्हारे क़ुलूब के अन्धेपन की बसारत , यह तुम्हारे जिस्मों की बीमारी की शिफ़ा का सामान है और तुम्हारे सीनों के फ़साद की इस्लाह , यही तुम्हारे नुफ़ूस की गन्दगी की तहारत है और यही तुम्हारी आंखों के चुन्धियाने की जला , इसी में तुम्हारे दिल के इज़्तेराब का सुकून है और यही ज़िन्दगी की तारीकियों की ज़िया है , इताअते ख़ुदा को अन्दर का शोआर बनाओ सिर्फ़ बाहर का नहीं , और उसे बातिन में हासिल करो सिर्फ़ ज़ाहिर में नहीं। अपनी पस्लियों के दरम्यान समो लो और अपने जुमला उमूर का हाकिम क़रार दो , तष्नगी में विरूद के लिये चश्मा तसव्वुर करो और मन्ज़िले मक़सूद तक पहुंचने के लिये वसीला क़रार दो। अपने रोज़े फ़ुरूअ के लिये सिपर बनाओ और अपनी तारीक क़ब्रों के लिये चिराग़ , अपनी तूलानी वहशते क़ब्र के लिये मोनिस बनाओ और अपने रन्ज व ग़म के मराहेल के लिये सहारा , इताअते इलाही तमाम घेरने वाले बरबादी के असबाब , आने वाले ख़ौफ़नाक मराहेल और भड़कती हुई आग के शोले के लिये हरज़बान है। जिसने तक़वा को इख़्तेयार कर लिया उसके लिये सख्तियां क़रीब आकर दूर चली जाती हैं और उमूरे ज़िन्दगी तल्ख़ (बदमज़ा) होने के बाद शीरीं हो जाते हैं। मौजें तह ब तह हो जाने के बाद भी हट जाती हैं और दुशवारीया मशक़्क़तों में मुब्तिला कर देने के बाद भी आसान हो जाती हैं। क़हत के बाद करामतों की बारिश शुरू हो जाती है और सहाबे रहमत हट जाने के बाद फिर बरसने लगता है और नेमतों के चश्मे जारी जो जाते हैं , फ़ुवार की कमी के बाद बरकत की बरसात शुरू हो जाती है।

(((- इस मुक़ाम पर मौलाए कायनात ने इस नुक्ते की तरफ़ मुतवज्जो करना चाहा है के तक़वा का फ़ायदा सिर्फ़ आखि़रत तक महदूद नहीं है के तुम यहाँ गुनाहों से परहेज़ करो , मालिक वहां तुम्हें आतिशे जहन्नम से महफ़ूज़ कर देगा बल्कि यह तक़वा आखि़रत के साथ दुनिया के हर मरहले पर काम आने वाला है और किसी मरहले पर इन्सान को नज़रअन्दाज़ करने वाला नहीं है। मुश्किलात से निजात दिलाना इसी तक़वा का कारनामा है और तूफ़ान का मुक़ाबला इसी तक़वा की ताक़त से होता है , रहमत के चश्मे इसी से जारी होते हैं और फ़़ल व करम के बादल इसी की बरकत से बरसते हैं और शायद यह इस नुक्ते की तरफ़ इशारा ह के इन्सानी ज़िन्दगी की सारी परेशानियां उसके आमाल की कमज़ोरियों से पैदा होती हैं , जब इन्सान तक़वा के ज़रिये किरदार को मज़बूत करेगा तो हर परेशानी से मुक़ाबला आसान हो जाएगा। इसका यह मतलब हरगिज़ नहीं है के मुत्तक़ीन की ज़िन्दगी में परेशानी नहीं होती है और वह चैन और सुकून की ज़िन्दगी गुज़ारते हैं , ऐसा होता तो सब्र का कोई काम न होता और मुत्तक़ीन का सिलसिला साबेरीन से अलग हो जाता , बल्कि इसका मतलब सिर्फ़ यह है के तक़वा सब्र का हौसला पैदा करता है और तक़वा के ज़रिये मसाएब से मुक़ाबला करने का हौसला पैदा हो जाता है और उसकी बरकत से रहमतों का नुज़ूल शुरू हो जाता है-)))

अल्लाह से डरो जिसने तुम्हें नसीहत से फ़ायदा पहुंचाया है और अपने पैग़ाम के ज़रिये नसीहत की है और अपनी नेमत से तुम पर एहसान किया है , अपने नफ़्स को उसकी इबादत के लिये हमवार करो और उसके हक़ की इताअत से ओहदा बरआ होने की कोशिश करो , और इसके बाद याद रखो के यह इस्लाम वह दीन है जिसे मालिक ने अपने लिये पसन्द फ़रमाया है और अपनी निगाहों में इसकी देख भाल की है और इसे बेहतरीन ख़लाएक़ के हवाले किया है और अपनी मोहब्बत पर इसके सुतूनों को क़ायम किया है। इसकी इज़्ज़त के ज़रिये अदयान को सरनिगों किया है और इसकी बलन्दी के ज़रिये मिल्लतों की पस्ती का इज़हार किया है। इसके दुश्मनों को इसकी करामत के ज़रिये ज़लील किया है और इससे मुक़ाबला करने वालों को इसकी नुसरत के ज़रिये रूसवा किया है इसके रूकन के ज़रिये ज़लालत के अरकान को मुनहदिम किया है और इसके हौज़ से प्यासों को सेराब किया है और फ़िर पानी उलचने वालों के ज़रिये इन हौज़ों को भर दिया है। इसके बाद इस दीन को ऐसा बना दिया है के इसके बन्धन टूट नहीं सकते हैं , इसकी कड़ियां खुल नहीं सकती हैं , इसकी बुनियाद मुनहदिम नहीं हो सकती है , इसके सुतून गिर नहीं सकते हैं , इसका दरख़्त उखड़ नहीं सकता है , उसकी मुद्दत तमाम नहीं हो सकती है , उसके आसार मिट नहीं सकते हैं (न उसके क़वानीन महो होते हैं) उसकी शाख़ें कट नहीं सकती हैं उसके रास्ते तंग नहीं हो सकते हैं। उसकी आसानियां दुशवार नहीं हो सकती हैं , उसकी सफ़ेदी में स्याही नहीं है और उसकी इस्तेक़ामत में कजी नहीं है , इसकी लकड़ी टेढ़ी नहीं है और इसकी वुसअत में दुशवारी नहीं है। इसका चिराग़ बुझ नहीं सकता है और इसकी हिलावत में तल्ख़ी नहीं आ सकती है। इसके सुतून ऐसे हैं जिनके पाये हक़ की ज़मीन में नस्ब किये गये हैं और फिर इसकी असास को पाएदार बनाया गया है। इसके चश्मों का पानी कम नहीं हो सकता है और इसके चिराग़ों की लौ मद्धम नहीं हो सकती है। इसके मिनारों से राहगीर हिदायत पाते हैं और इसके निशानात को राहों में निशाने मन्ज़िल बनाया जाता है। इसके चश्मों से प्यासे सेराब होते है और परवरदिगार ने इसके अन्दर अपनी रिज़ा की इन्तेहाई रखी , अपने बलन्दतरीन अरान और अपनी इताअत का उरूज क़रार दिया है। यह दीन उसके नज़दीक मुस्तहकम अरकान वाला बलन्दतरीन बुनियादों वाला हक़ीक़ी (बलन्द) दलाएल वाला , रौशन ज़ियाओं वाला , ग़ालिब सलतनत वाला , बलन्द बुनियाद वाला और नामुमकिन तबाही वाला है। इसके शरफ़ का तहफ़्फ़ुज़ करो , इसके एहकाम का इत्तेबाअ करो , उसके हुक़ूक़ को अदा करो और उसे उसकी वाक़ई मन्ज़िल पर क़रार दो।

(((- दीने इस्लाम का सबसे बड़ा इम्तेयाज़ यह है के इसके क़वानीन ख़ालिक़े कायनात ने बनाए हैं और हर क़ानून को फ़ितरते बशर से हमआहंग बनाया है उसने इसकी तशरीह में अपने महबूबतरीन बन्दे को भी दख़ील नहीं किया है और न किसी को इसके क़वानीन में तरमीम करने का हक़ दिया है। ज़ाहिर है के जो क़ानूने ख़ालिक़ व मालिक के कलाम के नतीजे में मन्ज़रे आम पर आएगा उसकी बक़ा की ज़मानत उसके दफ़आत के अन्दर ही होगी और जब तक यह कायनात बाक़ी रहेगी इसके मामलात में तग़य्युर व तबद्दुल की ज़रूरत न होगी। इस्लाम के दीने पसन्दीदा होने का असर है के इसके सामने तमाम अदयाने आलम हक़ीर इसके मुक़ाबले में तमाम दुश्मनाने मज़हब ज़लील हैं। मालिक ने इसकी बुनियाद मोहब्बत पर रखी है और इसकी असास रहमत और रूबूबीयत को क़रार दिया है। इसका तसलसुल नाक़ाबिले इख़्तेताम है और इसके हलक़े नाक़ाबिले इन्फ़ेसाम। इसी में इन्सानियत की प्यास बुझाने का सामान है और इसी में हिदायत के तलबगारों के लिये बेहतरीन वसीलाए रहनुमाई है। रिज़ाए इलाही का सामन यही है इसके बग़ैर हिदायत का तसव्वुर मोहमिल है और इसके अलावा हर दीन नाक़ाबिले क़ुबूल है।-)))

इसके बाद मालिक ने हज़रत मोहम्मद (स 0) को हक़ के साथ मबऊस किया जब दुनिया फ़ना की मन्ज़िल से क़रीबतर हो गई और आखि़रत सर पर मण्डलाने लगी , जब उजाला अन्धेरों में तबदील होने लगा और वह अपने चाहने वालों के लिये एक मुसीबत बनकर खड़ी हो गई , इसका फर्श खुरदुरा हो गया और फ़ना के हाथों में अपनी मेहार देने के लिये तैयार हो गई। इस तरह के इसकी मुद्दत ख़ातमे के क़रीब पहुंच गई। इसकी फ़ना के आसार क़रीब आ गए। इसके अहल ख़त्म होने लगे , इसके हलक़े टूटने लगे , इसके असबाब मुन्तशिर होने लगे , इसके निशानात मिटने लगे , इसके ऐब खुलने लगे और इसके दामन सिमटने लगे।

अल्लाह ने इन्हें पैग़ाम रसानी का वसीला , उम्मत की करामत , अहले ज़माना की बहार , आवान व अन्सार की बलन्दी का ज़रिया और मददगार व अन्सार अफ़राद की इज़्ज़त व शराफ़त का वास्ता क़रार दिया है।

इसके बाद इन पर उस किताब को नाज़िल किया जिसकी कन्दील बुझ नहीं सकती है और जिसके चिराग़ की लौ मद्धम नहीं पड़ सकती है वह ऐसा समन्दर है जिसकी थाह मिल नहीं सकती है और ऐसा रास्ता है जिस पर चलने वाला भटक नहीं सकता है। ऐसी शुआअ जिसकी ज़ौ तारीक नहीं हो सकती है और ऐसा हक़ व बातिल का इम्तियाज़ जिसका बरहान कमज़ोर नहीं हो सकता है। ऐसी वज़ाहत जिसके अरकान मुनहदिम नहीं हो सकते हैं और ऐसी शिफ़ा जिसमें बीमारी का कोई ख़ौफ़ नहीं है। ऐसी इज़्ज़त जिसके अन्सार पस्पा नहीं हो सकते हैं और ऐसा हक़ किसके आवान बेयार व मददगार नहीं छोड़े जा सकते हैं।

यह ईमान का मअदन व मरकज़ , इल्म का चश्मा और समन्दर , अदालत का बाग़ और हौज़ , इस्लाम का संगे बुनियाद और असास , हक़ की वादी और इसका हमवार मैदान है। यह वह समन्दर है जिसे पानी निकालने वाले ख़त्म नहीं कर सकते हैं और वह चश्मा है जिसे उलचने वाले ख़ुश्क नहीं कर सकते हैं। वह घाट है जिस पर वारिद होने वाले इसका पानी कम नहीं कर सकते हैं और वह मन्ज़िल है जिसकी राह पर चलने वाले मुसाफ़िर भटक नहीं सकते हैं। वह निशाने मन्ज़िल है जो राहगीरों की नज़रों से ओझल नहीं हो सकता है और वह टीला है जिसका तसव्वुर करने वाले आगे नहीं जा सकते हैं।

परवरदिगार ने इसे ओलमा की सेराबी का ज़रिया , फ़ोक़हा के दिलों की बहार , सालेहीन के रास्तों के लिये शाहेराह क़रार दिया है।

(((- कितना हसीन दौर था जब अम्बियाए कराम का सिलसिला क़ायम था , किताबें और सहीफ़े नाज़िल हो रहे थे , मुबल्लिग़ीने दीन व मज़हब अपने किरदार से इन्सानियत की रहनुमाई कर रहे थे और ज़मीन व आसमान के रिश्ते जुड़े हुए थे फिर यकबारगी क़ेरत का ज़माना आ गया और यह सारे सिलसिले टूट गए , दुनिया पर जाहेलियत का अन्धेरा छा गया और इन्सानियत ने अपनी ज़माम क़यादत जेहल व जाहेलीयत के हवाले कर दी।

ऐसे हालात में अगर सरकारे दो आलम (स 0) का विरूद न होता तो यह दुनिया घटाटोप अन्धेरों ही की नज़र हो जाती और इन्सानियत को कोई रास्ता नज़र न आता। लेकिन यह मालिक का करम था के उसने रहमतुल लिलआलमीन को भेज दिया और अन्धेरी दुनिया को फिर दोबारा नूरे रिसालत से मुनव्वर कर दिया और आप के साथ एक नूर और नाज़िल कर दिया जिसका नाम क़ुराने मजीद था और जिसकी रौशनी नाक़ाबिले इख़्तेताम थी। यह बयकवक़्त दस्तूर भी था और एजाज़ भी , समन्दर भी था और चिराग़ भी। हक़ व बातिल का फ़ुरक़ान भी था और दीन व ईमान का बरहान भी , इसमें हर मर्ज़ का इलाज भी था और हर बीमारी का मदावा भी। इसे मालिक ने सेराबी का ज़रिया भी बनाया था और दिलों की बहार भी। निशाने राह भी क़रार दिया और मन्ज़िले मक़सूद भी , जो शख़्स जिस नुक़्तए निगाह से देखे उसकी तस्कीन का सामान क़ुराने हकीम में मौजूद है और एक किताब सारी कायनात जिन व इन्स की हिदायत के लिये काफ़ी है बशर्ते के इसके मतालिब उन लोगों से उख़ज़ किये जाएं जिन्हें रासख़ोन फ़िल इल्म बनाया गया है और जिनके इल्मे क़ुरान की ज़िम्मेदारी मालिके कायनात ने ली है-)))

वह सरासर शिफ़ा है जिसके बाद कोई मर्ज़ नहीं रह सकता और वह नूर है जिसके बाद किसी ज़ुल्मत का इमकान नहीं है। वह रीसमान है जिसके हलक़े मुस्तहकम हैं और वह पनाहगाह है जिसकी बलन्दी महफ़ूज़ है। चाहने वालों के लिये इज़्ज़त , दाखि़ल होने वालों के लिये सलामती , इक़्तेदा करने वालों के लिये हिदायत , निस्बत करने वालों (जो इसे अपनी तरफ़ निस्बत दे उस) के लिये हुज्जत , बोलने वालों के लिये बुरहान (जो इसकी रू से बात करे उसके लिये दलील) और मनाज़िरा करने वालों के लिये शाहिद है। बहस करने वालों की कामयाबी का ज़रिया है इसका बार उठाने वालों के लिये बोझ बटाने वाला , अमल करने वालों के लिये बेहतरीन सवारी , हक़ीक़त शिनासों के लिये बेहतरीन निशानी और असलहे सजने वालों के लिये सिपर है। फ़िक्र करने वालों के लिये इल्म और रिवायत करने वालों के लिये हदीस और क़ज़ावत करने वालों के लिये क़तई हुक्म और फ़ैसला है।

199-आपका इरशादे गिरामी

(जिसकी असहाब को वसीयत फ़रमाया करते थे)

देखो नमाज़ की पाबन्दी और उसकी निगेहदाश्त करो , ज़्यादा से ज़्यादा नमाज़ें पढ़ो और उसे तक़र्रुबे इलाही का ज़रिया क़रार दो के यह साहेबाने ईमान के लिये वक़्त की पाबन्दी के साथ वाजिब की गई है। क्या तुमने अहले जहन्नम का जवाब नहीं सुना है के जब उनसे सवाल किया जाएगा के तुम्हें किस चीज़ ने यहां तक पहुंचा दिया है तो कहेंगे के हम नमाज़ी नहीं थे। यह नमाज़ गुनाहों को इस तरह झाड़ती है जिस तरह दरख़्त के पत्ते झड़ जाते हैं और इसी तरह गुनाहों से आज़ादी दिलाती है जिस तरह जानवर आज़ाद किये जाते हैं। रसूले अकरम (स 0) ने इसे उस गर्म चश्मे से तश्बीह दी है जो इन्सान के दरवाज़े पर हो और वह रोज़ाना उसमें पांच मरतबा ग़ुस्ल करे। ज़ाहिर है के इसपर किसी कसाफ़त के बाक़ी रह जाने का इमकान नहीं रह जाता है।

इसके हक़ को वाक़ेअन उन साहेबाने ईमान ने पहचाना है जिन्हें ज़ीनते मुताअे दुनिया या तिजारत और कारोबार कोई शै भी यादे ख़ुदा आौर नमाज़ व ज़कात से ग़ाफ़िल नहीं कर सकते है। रसूले अकरम (स 0) इस नमाज़ के लिये अपने को ज़हमत में डालते थे हालांके उन्हें जन्नत की बशारत दी जा चुकी थी इसलिये के परवरदिगार ने फ़रमा दिया था के अपने अहल (घर वालों) को नमाज़ का हुक्म दो और ख़ुद भी इसकी पाबन्दी करो तो आप अपने अहल को हुक्म भी देते थे और ख़ुद ज़हमत भी बरदाश्त करते थे।

इसके बाद ज़कात को नमाज़ के साथ मुसलमानों के लिये वसीलाए मुक़र्रब क़रार दिया गया है , जो इसे तय्यब ख़ातिर से अदा करेगा उसके गुनाहों के लिये यह कफ़्फ़ारा बन जाएगी और उसे जहन्नम से बचा लेगी , ख़बरदार कोई शख़्स इसे अदा करन के बाद इसके बारे में फ़िक्र न करे और न अफ़सोस करे के जो शख़्स दिली लगन के बग़ैर इसे अदा करता है और फ़िर इससे बेहतर अज्र व सवाब की उम्मीद करता है (उससे बेहतर चीज़ के लिये चश्मे बराह रहता है) वह सुन्नत से बेख़बर और अज्र व सवाब के एतबार से ख़सारे में है और उसका आमाल बरबाद है और उसकी निदामत दाएमी है।

(((- इसमें कोई शक नहीं है के सरकारे दो आलम (स 0) ने नमाज़ क़ायम करने की राह में बेपनाह ज़हमतों का सामना किया है। रात रात भर मुसल्ले पर क़याम किया है और तरह-तरह की दुश्मनों की अज़ीयतों को बरदाश्त किया है लेकिन मालिके कायनात ने इसका अज्र भी बेहिसाब इनायत किया है के नमाज़ सरकार की याद का बेहतरीन ज़रिया बन गई है और इसके ज़रिये सरकार की शख़्सीयत और रिसालत को अबदी हैसियत हासिल हो गई है। नमाज़ी अज़ान व अक़ामत ही से सरकार का कलमा पढ़ना शुरू का देता है आौर फ़िर तशहुद व सलाम तक यह सिलसिला जारी रहता है और इस तरह तमाम उम्मतों का रिश्ता इनके पैग़म्बरों से टूट चुका है लेकिन उम्मते इस्लामिया का रिश्ता सरकारे दो आलम (स 0) से नहीं टूट सकता है और यह नमाज़ बराबर आपकी याद को ज़िन्दा रखेगी और मुसलमानों को हुस्ने किरदार की दावत देती रहेगी। ज़कात को नमाज़ के साथ बयान करने का ज़ाहेरी फ़लसफ़ा यह है के नमाज़ अब्द व माबूद के दरम्यान का रिश्ता है और ज़कात बन्दों और बन्दों के दरम्यान का ताल्लुक़ है आौर इस तरह इस्लाम का निसाब मुकम्मल हो जाता है के मुसलमान अपने मालिक की इताअत भी करता है और अपने बनी नौअ के कमज़ोर अफ़राद का ख़याल भी रखता है और उनकी शिरकत के बग़ैर ज़िन्दा नहीं रहना चाहता है।)))

इसके बाद अमानतों की अदायगी का ख़याल रखो के अमानतदारी न करने वाला नाकाम होता है। अमानत को बलन्दतरीन आसमानों , फ़र्श शुदा ज़मीनों और बलन्द व बाला पहाड़ों के सामने पेश किया गया है जिनसे बज़ाहिर तवील व अरीज़ और आला व अरफ़ा कोई शै नहीं है और अगर कोई शै अपने तूल व अर्ज़ (लम्बाई , चैड़ाई या क़ूवत और ग़लबे) और ताक़त की बिना पर अपने को बचा सकती है तो यही चीज़ है। लेकिन यह सब ख़यानतत के अज़ाब से ख़ौफ़ज़दा हो गए और इस नुक्ते को समझ लिया है जिसको इनसे ज़ईफ़तर इन्सान ने नहीं पहचाना के वह अपने नफ़्स पर ज़ुल्म करने वाला और नावाक़िफ़ था। परवरदिगार पर बन्दों के दिन व रात के आमाल में से कोई शै मख़फ़ी नहीं है। वह लताफ़त की बिना पर ख़बर रखता है और इल्म के एतबार से अहाता रखता है। तुम्हारे आज़ा ही उसके गवाह हैं और तुम्हारे हाथ पांव ही उसके लशकर हैं। तुम्हारे ज़मीर उसके जासूस हैं और तुम्हारी तन्हाइयां भी उसकी निगाह के सामने हैं।

200-आपका इरशादे गिरामी

(माविया के बारे में)

ख़ुदा की क़सम माविया मुझसे ज़्यादा होशियार नहीं है लेकिन क्या करूं के वह मक्रो फ़रेब और फ़िस्क़ व फ़ुजूर भी कर लेता है और अगर यह चीज़ मुझे नापसन्द नहीं होती तो मुझसे ज़्यादा होशियार कौन होता लेकिन मेरा नज़रिया यह है के हर मक्रो फ़रेब गुनाह है आौर हर गुनाह परवरदिगार के एहकाम की नाफ़रमानी है। हर ग़द्दार के हाथ में क़यामत के दिन एक झण्डा दे दिया जाएगा जिससे उसे अरसए महशर में पहचान लिया जाएगा। ख़ुदा की क़सम मुझे न इन मक्कारियों से ग़फ़लत में डाला जा सकता है और न इन सख़्तीयो से दबाया जा सकता है।

201-आपका इरशादे गिरामी

(जिसमें वाज़ेह रास्तों पर चलने की नसीहत फ़रमाई गई है)

ऐ लोगो! देखो हिदायत के रास्ते पर चलने वालों की क़िल्लत की बिना पर चलने से मत घबराओ के लोगों ने एक ऐसे दस्तरख़्वान पर इज्तेमाअ कर लिया है जिसमें सेर होने की मुद्दत बहुत कम है और भूक की मुद्दत बहुत तवील है।

लोगों! याद रखो के रज़ामन्दी और नाराज़गी ही सारे इन्सानों को एक नुक्ते पर जमा कर देती है , नाक़ाए स्वालेह के पैर एक ही इन्सान ने काटे थे लेकिन अल्लाह ने अज़ाब सब पर नाज़िल कर दिया के बाक़ी लोग इसके अमल से राज़ी थे और फ़रमाया के इन लोगों ने नाक़े के पैर काट डाले और आखि़र में मज़ामत का शिकार हो गए। इनका अज़ाब यह था के ज़मीन झिटके से घड़घड़ाने लगी जिस तरह के ज़म ज़मीन में लोहे की तपती हुई फाली चलाई जाती है।

लोगों! देखो जो रौशन रास्ते पर चलता है वह सरचश्मे तक पहुंच जाता है और जो इसके खि़लाफ़ करता है वह गुमराही में पड़ जाता है।

(((- खुली हुई बात है के जिसे परवरदिगार ने नफ़्से रसूल (स 0) क़रार दिया हो और ख़ुद सरकारे दो आलम (स 0) ने बाबे मदीनतुल इल्म क़रार दिया हो उससे ज़्यादा होशियार , होशमन्द और साहेबे इल्म व हुनर कौन हो सकता है। लेकिन इसके बावजूद बाज़ नादान अफ़राद का ख़याल है के माविया ज्यादा होशियार और ज़ीरक था और इसीलिये उसकी सियासत ज़्यादा कामयाब थी , हालांके इसका राज़ होशियारी और होशमन्दी नहीं है , बल्कि इसका राज़ मक्कारी और ग़द्दारी है के माविया मक़सद के हुसूल के लिये हर वसीले को जाएज़ क़रार देता था और इसका मक़सद भी सिर्फ़ हुसूले इक़्तेदार और तख़्ते हुकूमत था और मौलाए कायनात की निगाह में न मक़सद वसीले के जवाज़ का ज़रिया था और न आपका मक़सद इक़तेदारे दुनिया का हुसूल था। आपका मक़सद दीने ख़ुदा का क़याम था और इस राह में इन्सान को हर क़दम फूंक-फूंक कर उठाना पड़ता है और हर सांस में मर्ज़ीए परवरदिगार का ख़याल रखना पड़ता है।))).

202-आप का इरशादे गिरामी

कहा जाता है के यह कलेमाते सय्येदतुल निसाइल आलमीन फ़ातेमा ज़हरा (स 0) के दफ़्न के मौक़े पर पैग़म्बरे इस्लाम (स 0) से राज़दाराना गुफ़्तगू के अन्दाज़ से कहे गये थे।

सलाम हो आप पर ऐ ख़ुदा के रसूल (स 0) ! मेरी तरफ़ से और आपकी उस दुख़्तर की तरफ़ से जो आपके जवार में नाज़िल हो रही है और बहुत जल्दी आप से मुलहक़ हो रही है। या रसूलल्लाह! मेरी क़ूवते सब्र आपकी मुन्तख़ब रोज़गार (बरगुज़ीदा) दुख़्तर के बारे में ख़त्म हुई जा रही है और मेरी हिम्मत साथ छोड़े दे रही है सिर्फ़ सहारा यह है के मैंने आपके फ़िराक़ के अज़ीम सदमे और जानकाह हादसे पर सब्र कर लिया है तो अब भी सब्र करूंगा के मैंने ही आपको क़ब्र में उतारा था और मेरे ही सीने पर सर रखकर आपने इन्तेक़ाल फ़रमाया था। बहरहाल मैं अल्लाह ही के लिये हूँ और मुझे भी उसी की बारगाह में वापस जाना है। आज अमानत वापस चली गई और जो चीज़ मेरी तहवील में थी वह मुझसे छुड़ा ली गई। अब मेरा रंज व ग़म दाएमी है और मेरी रातें नज़रबेदारी हैं जब तक मुझे भी परवरदिगार उस घर तक न पहुंचा दे जहाँ आपका क़याम है। अनक़रीब आपकी दुख़्तरे नेक अख़्तर उन हालात की इत्तेलाअ देगी के किस तरह आपकी उम्मत ने उस पर ज़ुल्म ढाने के लिये इत्तेफ़ाक़ कर लिया था। आप उससे मुफ़स्सिल सवाल फ़रमाएं और जुमला हालात दरयाफ़्त करें।

अफ़सोस के यह सब उस वक़्त हुआ है जब आपका ज़माना गुज़रे देर नहीं हुई है और अभी आपका तज़किरा बाक़ी है। मेरा सलाम हो आप दोनों पर , उस शख़्स का सलाम जो रूख़सत करने वाला है और दिले तंग व मलोल नहीं है। मैं अगर इस क़ब्र से वापस चला जाऊं तो यह किसी दिले तंगी का नतीजा नहीं है और अगर यहीं ठहर जाऊं तो यह उस वादे के बेएतबारी नहीं है जो परवरदिगार ने सब्र करने वालों से किया है।

203-आपका इरशादे गिरामी

(दुनिया से परहेज़ और आख़ेरत की तरग़ीब के बारे में)

लोगों! यह दुनिया एक गुज़रगाह है क़रार की मन्ज़िल आखि़रत ही है लेहाज़ा इस गुज़रगाह से वहाँ का सामान लेकर आगे बढ़ो और उसके सामने अपने परदए राज़ को चाक मत करो जो तुम्हारे इसरार से बाख़बर है। दुनिया से अपने दिलों को बाहर निकाल लो क़ब्ल इसके के तुम्हारे बदन को यहाँ से निकाला जाए , यहाँ सिर्फ़ तुम्हारा इम्तेहान लिया जा रहा है वरना तुम्हारी खि़लक़त किसी और जगह के लिये है। कोई भी शख़्स जब मरता है तो इधर वाले यह सवाल करते हैं के क्या छोड़कर गया है और उधर के फ़रिश्ते यह सवाल करते हैं के क्या लेकर आया है ? अल्लाह तुम्हारा भला करे। कुछ वहां भेज दो जो मालिक के पास तुम्हारे क़र्ज़े के तौर पर रहेगा और सब यहीं छोड़कर मत जाओ के तुम्हारे ज़िम्मे एक बोझ बन जाए।


204-आपका इरशादे गिरामी

(जिसके ज़रिये अपने असहाब को आवाज़ दिया करते थे)

ख़ुदा तुम पर रहम करे , तैयार हो जाओ के तुम्हें कूच करने के लिये पुकारा जा चुका है और ख़बरदार दुनिया की तरफ़ ज़्यादा तवज्जो मत करो , जो बेहतरीन ज़ादे राह तुम्हारे सामने है उसे लेकर मालिक की बारगाह की तरफ़ पलट जाओ के तुम्हारे सामने एक बड़ी दुशवारगुज़ार घाटी है और चन्द ख़तरनाक और ख़ौफ़नाक मन्ज़िलें हैं जिनपर बहरहाल वारिद होना है और वहीं ठहरना भी है।

(((- इस्लाम का मुद्दआ तर्के दुनिया नहीं है और न वह यह चाहता है के इन्सान रहबानियत की ज़िन्दगी गुज़ारे , इस्लाम का मक़सद सिर्फ़ यह है के दुनिया इन्सान की ज़िन्दगी का वसीला रहे और इसके दिल का मकीन न बनने पाए वरना हुब्बे दुनिया इन्सान को ज़िन्दगी के हर ख़तरे से दो-चार कर सकती है और उसे किसी भी गढ़े में गिरा सकती है-)))

और यह याद रखो के मौत की निगाहें तुमसे क़रीबतर हो चुकी हैं और तुम उसके पन्जों में आ चुके हो जो तुम्हारे अन्दर गड़ाए जा चुके है। मौत के शदीदतरीन मसाएल और दुशवारतरीन मुश्किलात तुम पर छा चुके हैं , अब दुनिया के ताल्लुक़ात को ख़त्म करो और आखि़रत के ज़ादेराह तक़वा के ज़रिये अपनी ताक़त का इन्तेज़ाम करो। (वाज़ेह रहे के इससे पहले भी इस क़िस्म का एक कलाम दूसरी रिवायत के मुताबिक़ गुज़र चुका है)

205-आपका इरशादे गिरामी

(जिसमें तल्हा व ज़ुबैर को मुख़ातिब बनाया गया है जब इन दोनों ने

बैयत के बावजूद मष्विरा न करने और मदद न मांगने पर आपसे नाराज़गी का इज़हार किया)

तुमने मामूली सी बात पर तो ग़ुस्से का इज़हार कर दिया लेकिन बड़ी बातों को पसे पुश्त डाल दिया , क्या तुम यह बता सकते हो के तुम्हारा कौन सा हक़ ऐसा है जिससे मैंने तुमको महरूम कर दिया है ? या कौन सा हिस्सा ऐसा है जिसपर मैंने क़ब्ज़ा कर लिया है ? या किसी मुसलमान ने कोई मुक़द्दमा पेशकिया हो और मैं उसका फ़ैसला न कर सका हूँ या उससे नावाक़िफ़ रहा हूँ या इसमें किसी ग़लती का शिकार हो गया हूँ।

ख़ुदा गवाह है के मुझे न खि़लाफ़त की ख़्वाहिश थी और न हुकूमत की एहतियाज , तुम्हीं लोगों ने मुझे इस अम्र की दावत दी और इस पर आमादा किया। इसके बाद जब यह मेरे हाथ में आ गई तो मैंने इस सिलसिले में किताबे ख़ुदा और इसके दस्तूर पर निगाह की और जो उसने हुक्म दिया था उसी का इत्तेबाअ किया और इस तरह रसूले अकरम (स 0) की सुन्नत की इक़्तेदा की। जिसके बाद न मुझे तुम्हारी राय की कोई ज़रूरत थी और न तुम्हारे अलावा किसी की राय की और न मैं किसी हुक्म से जाहिल था के तुमसे मशविरा करता या तुम्हारे अलावा दीगर बरादराने इस्लाम से , और अगर ऐसी कोई ज़रूरत होती तो मैं न तुम्हें नज़रअन्दाज़ करता और न दीगर मुसलमानों को। रह गया यह मसला के मैंने बैतुलमाल की तक़सीम में बराबरी से काम लिया है तो यह न मेरी ज़ाती राय है और न इस पर मेरी ख़्वाहिश की हुक्मरानी है बल्कि मैंने देखा के इस सिलसिले में रसूले अकरम (स 0) की तरफ़ से हमसे पहले फ़ैसला हो चुका है तो ख़ुदा के मुअय्यन किये हुए हक़ और उसके जारी किये हुए हुक्म के बाद किसी की कोई ज़रूरत ही नहीं रह गई है।

ख़ुदा शाहिद है के इस सिलसिले में न तुम्हें शिकायत का कोई हक़ है और न तुम्हारे अलावा किसी और को , अल्लाह हम सबके दिलों को हक़ की राह पर लगा दे और सबको सब्र व शकीबाई की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। ख़ुदा उस शख़्स पर रहमत नाज़िल करे जो हक़ को देख ले तो उस पर अमल करे या ज़ुल्म को देख ले तो उसे ठुकरा दे और साहेबे हक़ के हक़ में इसका साथ दे।

(((- अमीरूल मोमेनीन (अ 0) ने इन तमाम पहलुओं का तज़किरा इसलिये किया है ताके तल्हा व ज़ुबैर की नीयतों का मुहासेबा किया जा सके और उनके अज़ाएम की हक़ीक़तों को बेनक़ाब किया जा सके के मुझसे पहले ज़मानों में यह तमाम नक़ाएस मौजूद थे , कभी हुक़ूक़ की पामाली हो रही थी , कभी इस्लामी सरमाये को अपने घराने पर तक़सीम किया जा रहा था। कभी मुक़द्देमात में फ़ैसले से आजिज़ी का एतराफ़ था और कभी सरीही तौर पर ग़लत फ़ैसला किया जा रहा था। लेकिन इसके बावजूद तुम लोगों की रगे हमीयत व ग़ैरत को कोई जुम्बिश नहीं हुई और आज जबके ऐसा कुछ नहीं है तो तुम बग़ावत पर आमादा हो गए हो। इसका मतलब यह है के तुम्हारा ताल्लुक़ दीन और मज़हब से नहीं है। तुम्हें सिर्फ़ अपने मफ़ादात से ताल्लुक़ है जब तक यह मफ़ादात महफ़ूज़ थे , तुमने हर ग़लती पर सुकूत इख़्तेयार किया और आज जब मफ़ादात ख़तरे में पड़ गए हैं तो शोरश और हंगामे पर आमादा हो गए हो।-)))

206-आपका इरशादे गिरामी

(जब आपने जंगे सिफ़्फ़ीन के ज़माने में अपने बाज़ असहाब के बारे में सुना के वह अहले शाम को बुरा भला कह रहे हैं)

मैं तुम्हारे लिये इस बात को नापसन्द करता हूँ के तुम गालियां देने वाले हो जाओ , बेहतरीन बात यह है के तुम उनके आमाल और हालात का तज़किरा करो ताके बात भी सही रहे और हुज्जत भी तमाम हो जाए और फिर गालियां देने के बजाए यह दुआ करो के ख़ुदाया! हम सबके ख़ूनों को महफ़ूज़ कर दे और हमारे मुआमलात की इस्लाह कर दे और उन्हें गुमराही से हिदायत के रास्तु पर लगा दे ताके नावाक़िफ़ लोग हक़ से बाख़बर हो जाएं और हर्फ़े बातिल कहने वाले अपनी गुमराही और सरकशी से बाज़ आ जाएं।

(((- यह उस अम्र की तरफ़ इशारा है के मकान की वुसअत ज़ाती अग़राज़ के लिये हो तो उसका नाम दुनियादारी है , लेकिन अगर इसका मक़सद मेहमान नवाज़ी , सिलाए रहम , अदाएगीए हुक़ूक़ , हिफ़ज़े आबरू , इज़हारे अज़मत व मज़हब हो तो इसका कोई ताल्लुक़ दुनियादारी से नहीं है और यह दीन व मज़हब ही का एक शोबा है , फ़र्क़ सिर्फ़ यह है के यह फ़ैसला नीयतों से होगा और नीयतों का जानने वाला सिर्फ़ परवरदिगार है कोई दूसरा नहीं-)))

207-आपका इरशादे गिरामी

(जंगे सिफ़्फ़ीन के दौरान जब इमाम हसन (अ 0) को मैदाने जंग की तरफ़ सबक़त करते हुए देख लिया)

देखो! इस फ़रज़न्द को रोक लो कहीं इसका सदमा मुझे बेहाल न कर दे , मैं इन दोनों (हसन (अ 0) व हुसैन (अ 0)) को मौत के मुक़ाबले ज़्यादा अज़ीज़ रखता हूँ। कहीं ऐसा न हो के इनके मर जाने से नस्ले रसूल (स 0) मुन्क़ता हो जाए।

सय्यद रज़ी - “ अमलको आनी हाज़ल ग़ुलाम ” अरब का बलन्दतरीन कलाम और फ़सीहतरीन मुहावरा है।

208-आपका इरशादे गिरामी

(जो उस वक़्त इरशाद फ़रमाया जब आपके असहाब में तहकीम के बारे में इख़्तेलाफ़ हो गया था)

लोगों! याद रखो के मेरे मामलात तुम्हारे साथ बिल्कुल सही चल रहे थे जब तक जंग ने तुम्हें ख़स्ताहाल नहीं कर दिया था , इसके बाद मुआमलात बिगड़ गए हालांके ख़ुदा गवाह है के अगर जंग ने तुमसे कुछ को ले लिया और कुछ को छोड़ दिया तो इसकी ज़द तुम्हारे दुशमन पर ज़्यादा ही पड़ी है।

अफ़सोस के मैं कल तुम्हारा हाकिम था और आज महकूम बनाया जा रहा हूँ। कल तुम्हें मैं रोका करता था और आज तुम मुझे रोक रहे हो। बात सिर्फ़ यह है के तुम्हें ज़िन्दगी ज़्यादा प्यारी है और मैं तुम्हें किसी ऐसी चीज़ पर आमादा नहीं कर सकता हूँ जो तुम्हें नागवार और नापसन्द हो।

209-आपका इरशादे गिरामी

( जब बसरा में अपने सहाबी अला बिन ज़ियाद हारिसी के घर अयादत के लिये तशरीफ़ ले गए और उनके घर की वुसअत का मुशाहेदा फ़रमाया)

तुम इस दुनिया में इस क़द्र वसीअ मकान को लेकर क्या करोगे जबके आखि़रत में इसकी एहतियाज ज़्यादा है। तुम अगर चाहो तो इसके ज़रिये आखि़रत का सामान कर सकते हो के इसमें मेहमानों की ज़ियाफ़त करो। क़राबतदारों से सिलए रहम करो और मौक़े व महल के मुताबिक़ हुक़ूक़ को अदा करो के इस तरह आखि़रत को हासिल कर सकते हो।

(((- यह इस अम्र की तरफ़ इशारा है के मकान की वुसअत ज़ाती आराज़ के लिये हो तो उसका नाम दुनियादारी है , लेकिन अगरर इसका मक़सद मेहमान नवाज़ी , सिलए अरहाम , अदाएगीए हुक़ूक़ हिफ़्ज़े आबरू , इज़हारे अज़मत व मज़हब हो तो इसका कोई ताल्लुक़ दुनियादारी से नहीं है और यह दीन व मज़हब ही का एक शोबा है , फ़र्क़ सिर्फ़ यह है के यह फ़ैसला नीयतों से होगा और नीयतों का जानने वाला सिर्फ़ परवरदिगार है कोई दूसरा नहीं है।-)))

यह सुनकर अला बिन ज़ियाद ने अर्ज़ की के या अमीरूल मोमेनीन (अ 0) मैं अपने भाई आसिम बिन ज़ियाद की शिकायत करना चाहता हूँ , फ़रमाया के उन्हें क्या हो गया है ? अर्ज़ की के उन्होंने एक अबा ओढ़ ली है और दुनिया को यकसर तर्क कर दिया है , फ़रमाया उन्हें बुलाओ , आसिम हाज़िर हुए तो आपने कहा के- ऐ दुश्मने जान , तुझे शैतान ख़बीस ने गिरवीदा बना लिया है , तुझे अपने अहल व अयाल पर क्यों रहम नहीं आता है , क्या तेरा ख़याल यह है के ख़ुदा ने पाकीज़ा चीज़ों को हलाल तो किया है लेकिन वह उनके इस्तेमाल को नापसन्द करता है , तू ख़ुदा की बारगाह में इससे ज़्यादा पस्त है।

आसिम ने अर्ज़ की के या अमीरूल मोमेनीन (अ 0)! आप भी तो खुरदुरा लिबास , मामूली खाने पर गुज़ारा कर रहे हैं , फ़रमाया , तुम पर हैफ़ है के तुमने मेरा क़यास अपने ऊपर कर लिया है जबके परवरदिगार ने आईम्माए हक़ पर फ़र्ज़ कर दिया है के अपनी ज़िन्दगी का पपैमाना कमज़ोरतरीन इन्सानों को क़रार दें ताकि फ़क़ीर अपने फ़क़्र की बिना पर किसी पेच व ताब का शिकार न हो।

210-आपका इरशादे गिरामी

(जब किसी शख़्स ने आपसे बिदअती अहादीस और मुतज़ाद रिवायात के बारे में सवाल किया)

लोगों के हाथों में हक़ व बातिल , सिद्क़ व कज़्ब नासिख़ व मन्सूख़ , आम व ख़ास , मोहकम व मुतशाबेह और हक़ीक़त व वहम सब कुछ है और मुझ पर बोहतान लगाने का सिलसिला रसूले अकरम (स 0) की ज़िन्दगी ही से शुरू हो गया था जिसके बाद आपने मिम्बर से एलान किया था के “ जिस शख़्स ने भी मेरी तरफ़ से ग़लत बात बयान की उसे अपनी जगह जहन्नम में बना लेना चाहिये ’ याद रखो के हदीस के बयान वाले चार तरह के अफ़राद होते हैं जिनकी पांचवी कोई क़िस्म नहीं है-

एक वह मुनाफ़िक़ है जो ईमान का इज़हार करता है , इस्लाम की वज़ा क़ता इख़्तेयार करता है लेकिन गुनाह करने और अफ़्तरा में पड़ने से परहेज़ नहीं करता है। अगर लोगों को मालूम हो जाए के यह मुनाफ़िक़ और झूठा है तो यक़ीनन उसके बयान की तस्दीक़ न करेंगे लेकिन मुश्किल यह है के वह समझते हैं के यह सहाबी है , इसने हुज़ूर को देखा है , उनके इरशाद को सुना है और उनसे हासिल किया है और इस तरह उसके बयान को क़ुबूल कर लेते हैं जबके ख़ुद परवरदिगार भी मुनाफ़िक़ीन के बारे में ख़बर दे चुका है और उनके औसाफ़ का तज़किरा कर चुका है और यह रसूले अकरम (स 0) के बाद भी बाक़ी रह गए थे , और गुमराही के पेशवाओं और जहन्नुम के दाइयों की तरफ़ इसी ग़लत बयानी और इफ़्तरा परवाज़ी से तक़र्रब हासिल करते थे। वह उन्हें ओहदे देते रहे और लोगों की गर्दनों पर हुक्मरान बनाते रहे और उन्हीं के ज़रिये दुनिया को खाते रहे और लोग तो बहरहाल बादशाहों और दुनियादारों ही के साथ रहते हैं , अलावा उनके जिन्हें अल्लाह इस शर से महफ़ूज़ कर ले।

(((- वाज़े रहे के इस्लामी उलूम में इल्मुल रेजाल आौर अल्मे दरायत का होना इस बात की दलील है के सारा आलमे इस्लाम इस नुक्ते पर मुत्तफ़िक़ है के रिवायात क़ाबिले क़ुबूल भी हैं और नाक़ाबिले क़ुबूल भी , और रावी हज़रात सक़ा और मोतबर भी हैं और ग़ैर सक़ा और ग़ैर मोतबर भी , इसके बाद अदालत सहाबा और एतबार , तमाम ओलमा का अक़ीदा , एक मज़हके के अलावा कुछ नहीं है। हज़रत ने यह भी वाज़ेह कर दिया है के मुनाफ़िक़ीन का कारोबार हमेशा हुकाम की नालाएक़ी से चलना है वरना हुकाम दयानतदार हों और ऐसी रिवायात के ख़रीदार न बनें ता मुनाफ़ेक़ीन का कारोबार एक दिन में ख़त्म हो सकता है।-)))

चार में से एक क़िस्म यह हुआ और दूसरा शख़्स वह है जिसने रसूले अकरम (स 0) से कोई बात सुनी है लेकिन उसे सही तरीक़े से महफ़ूज़ नहीं कर सका है (याद नहीं रख सका है) और इसमें सहो का शिकार हाो गया है , जान बूझकर झूठ नहीं बोलता है , जो कुछ उसके हाथ में है उसी की रिवायत करता है आौर उसी पर अमल करता है और यह कहता है के यह मैंने रसूले अकरम (स 0) से सुना है हालांके अगर मुसलमानों को मालूम हो जाए के इससे ग़लती हो गई है तो हरगिज़ इसकी बात न मानेंगे बल्कि अगर उसे ख़ुद भी मालूम हो जाए के यह बात इस तरह नहीं है तो तर्क कर देगा और नक़ल नहीं करेगा।

तीसरी क़िस्म उस शख़्स की है जिसने रसूले अकरम (स 0) को हुक्म देते सुना है लेकिन हज़रत ने जब मना किया तो उसे इत्तेला नहीं हो सकी या हज़रत को मना करते देखा है फिर जब आपने दोबारा हुक्म दिया तो इत्तेलाअ न हो सकी , इस शख़्स ने मन्सूख़ को महफ़ूज़ कर लिया है और नासिख़ को महफ़ूज़ नहीं कर सका है के अगर उसे मालूम हो जाए के यह हुक्म मन्सूख़ हो गया है तो उसे तर्क कर देगा और अगर मुसलमानों को मालूम हो जाए के इसने मन्सूख़ की रिवायत की है तो वह भी उसे नज़रअन्दाज़ कर देंगे। चैथी क़िस्म उस शख़्स की है जिसने ख़ुदा व रसूल (स 0) के खि़लाफ़ ग़लत बयानी से काम नहीं लिया है और वह ख़ौफ़े ख़ुदा और ताज़ीमे रसूले ख़ुदा के ऊपर झूठ का दुश्मन भी है और इससे भूल-चूक भी नहीं हुई है बल्कि जैसे रसूले अकरम (स 0) ने फ़रमाया है वैसे ही महफ़ूज़ रखा है। न उसमें किसी तरह का इज़ाफ़ा किया है और न कमी की है नासिख़ ही को महफ़ूज़ किया है और उसी पर अमल किया है और मन्सूख़ को भी अपनी नज़र में रखा है और उससे इजतेनाब बरता है , ख़ास व आम और मोहकम व मुतशाबेह को भी पहचानता है और उसी के मुताबिक़ अमल भी करता है। लेकिन मुश्किल यह है के कभी कभी रसूले अकरम (स 0) के इरशादात के दो रूख़ होते थे , बाज़ का ताल्लुक़ ख़ास अफ़राद (या ख़ास वक़्त) से होता था और कुछ आम होते थे (कुछ वह कलेमात जो तमाम औक़ात और तमाम अफ़राद के मुताल्लिक़) और इन कलेमात को वह शख़्स भी सुन लेता था जिसे यह नहीं मालूम था के ख़ुदा और रसूल का मक़सद क्या है तो यह सुनने वाले उसे सुन तो लेते थे और कुछ इसका मफ़हूम भी क़रार दे लेते थे मगर इसके हक़ीक़ी मानी और मक़सद और वजह से नावाक़िफ़ होते थे और तमामम असहाबे रसूले अकरम (स 0) की हिम्मत भी नहीं थी के आपसे सवाल कर सकें और बाक़ायदा तहक़ीक़ कर सकें बल्कि इस बात का इन्तेज़ार किया करते थे के कोई सहराई या परदेसी आाकर आपसे सवाल करे तो वह भी सुन लें , यह सिर्फ़ मैं था के मेरे सामने से कोई ऐसी बात नहीं गुज़रती थी मगर यह के मैं दरयाफ़्त भी कर लेता था और महफ़ूज़ भी कर लेता था।

यह हैं लोगों के दरमियान इख़्तेलाफ़ात के असबाब और रिवायात में तज़ाद के अवामिल व मोहर्रकात।

(((- जिस तरह एक इन्सान की ज़िन्दगी के मुख़्तलिफ़ रूख़ होते हैं और बाज़ औक़ात एक रूख़ दूसरे से बिल्कुल अजनबी होता है के बेख़बर इन्सान इसे दोरंगियों मे शामिल कर देता है। इसी तरह मुआसेरा और रिवायात के भी मुख़्तलिफ़ रूख़ होते हैं और बाज़ औक़ात एक रूख दूसरे से बिलकुल अजनबी और जुदागाना होता है और हर रूख़ के लिये अलग मफ़हूम होता है और हर रूख़ के अलग एहकाम होते हैं। अब अगर कोई शख़्स इस हक़ीक़त से बाख़बर नहीं होता है तो वह एक ही रूख़ या एक ही रिवायत को ले उड़ता है और वसूक़ व एतबार के साथ यह बयान करता है के मैंने ख़ुद रसूले अकरम (स 0) से सुना है मगर उसे यह ख़बर नहीं होती है के ज़िन्दगी का कोई दूसरा रूख़ भी है , या इस बयान का कोई और भी पहलू है जो क़ब्ल या बाद दूसरे मनासिब मौक़े पर बयान हो चुका है या बयान होने वाला है और इस तरह इश्तेहाबात का एक सिलसिला शुरू हो जाता है और दरहक़ीक़त रिवयात में गुम हो जाती है। चूंके दीदा व दानिस्ता कोई गुनाह या इश्तेबाह नहीं होता है।-)))


211-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(हैरत अंगेज़ तख़लीक़े कायनात के बारे में)

यह परवरदिगार के इक़्तेदार की ताक़त और उसकी सनाई (सनअत) की हैरतअंगेज़ लताफ़त है के उसने गहरे और तलातुम समन्दर में एक ख़ुश्क और बेहरकत ज़मीन को पैदा कर दिया और फ़िर बख़ारात के तबक़ात बनाकर (पानी की तहों पर तहें चढ़ाकर जो आपस में मिली हुई थी) उन्हें शिगाफ़्ता करके सात आसमानों की शक्ल दे दी जो उसके अम्र से ठहरे हुए हैं और अपनी हदों पर क़ायम हैं , फ़िर ज़मीन को यूँ गाड़ दिया के उसे सब्ज़ रंग का गहरा समन्दर उठाए हुए है जो क़ानूने इलाही के आगे मुसख़्ख़र है , उसके अम्र का ताबे है और उसकी हैबत के सामने सरनिगूँ है और उसके ख़ौफ़ से इसका बहाव थमा हुआ है। फ़िर पत्थरों , टीलों और पहाड़ों को ख़ल्क़ करके उन्हें उनकी जगहों पर गाड़ दिया और उनकी मन्ज़िलों पर मुस्तक़र कर दिया के अब उनकी बलन्दियां फ़िज़ाओं से गुज़र रही हैं और उनकी जड़ें पानी के अन्दर रासेख़ हैं , उनके पहाड़ों को हमवार ज़मीनों से ऊंचा किया और उनके सुतूनों को एतराफ़ के फै़लाव और मराकज़ के ठहराव में नस्ब कर दिया। अब उनकी चोटियां बलन्द हैं और उनकी बलन्दियां तवीलतरीन हैं , इन्हीं पहाड़ों को ज़मीन का सुतून क़रार दिया है और इन्हीं को कील बनाकर गाड़ दिया है जिनकी वजह से ज़मीन हरकत के बाद साकिन हो गई और न अहले ज़मीन को लेकर किसी तरफ़ झुक सकी और न उनके बोझ से धंस सकी और न अपनी जगह से हट सकी। पाक व बेनियाज़ है वह मालिक जिसने पानी के तमोज के बावजूद उसे रोक रखा है और एतराफ़ की तरी के बावजूद उसे ख़ुश्क बना रखा है और फिर उसे अपनी मख़लूक़ात के लिये गहवारा और फ़र्श की हैसियत दे दी है , उस गहरे समन्दर के ऊपर जो ठहरा हुआ है और बहता नहीं है और एक मक़ाम पर क़ायम है किसी तरफ़ जाता नहीं है हालांके उसे तेज़ व तन्द हवाएं हरकत दे रही हैं और बरसने वाले बादल उसे मथकर उससे पानी खींचते रहते हैं- “ इन तमाम बातों में इबरत का सामान है उन लोगों के लिये जिनके अन्दर ख़ौफ़े ख़ुदा पाया जाता है।

(((- कितना हसीन निज़ामे कायनात है के तलातुम पानी पर ज़मीन क़ायम है और ज़मीन के ऊपर हवा का दबाव क़ायम है और इन्सान इस तीन मन्ज़िला इमारत में दरम्यानी तबक़े पर इस तरह सुकूनत पज़ीद है के उसके ज़ेरे क़दम ज़मीन और पानी है और इसके बालाए सर फ़िज़ा और हवा है। हवा उसकी ज़िन्दगी के लिये सांसें फ़राहम कर रही है और ज़मीन उसके सुकून व क़रार का इन्तेज़ाम करके उसे बाक़ी रखे हुए हैं। पानी इसकी ज़िन्दगी का क़ेवाम है और समन्दर उसकी ताज़गी का ज़रिया। कोई ज़र्राए कायनात उसकी खि़दमत से ग़ाफ़िल नहीं है और कोई अनासिर अपने से अशरफ़ मख़लूक़ की इताअत से मुनहरिफ़ नहीं है। ताके वह भी अपनी अशरफ़ीयत की आबरू का तहफ़्फ़ुज़ करे और सारी कायनात से बालातर ख़ालिक़ व मालिक की इताअत व इबादत में हमातन मसरूफ़ रहे।-)))

212-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें अपने असहाब को अहले शाम से जेहाद करने पर आमादा किया है)

ख़ुदाया! तेरे जिस बन्दे ने भी मेरी आदिलाना गुफ्तगू (जिसमें किसी तरह का ज़ुल्म नहीं है) और मसलेहाना नसीहत (जिसमें किसी तरह का फ़साद नहीं है) सुनने के बाद भी तेरे दीन की नुसरत से इन्हेराफ़ किया और तेरे दीन के एज़ाज़ में कोताही की है , मैं उसके खि़लाफ़ तुझे गवाह क़रार दे रहा हूँ के तुझसे बालातर कोई गवाह नहीं है और फ़िर तेरे तमाम साकेनाने अर्ज़ व समा (ज़मीनो आसमान के रहने वालो) को गवाह क़रार दे रहा हूँ। इसके बाद तू ही इनकी नुसरत व मदद से बेनियाज़ भी है और हर एक के गुनाह का मवाख़ेज़ा करने वाला भी है।

213-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(परवरदिगार की तमजीद उसकी ताज़ीम के बारे में)

सारी तारीफ़ें उस अल्लाह के लिये हैं जो मख़लूक़ात की मुशाबेहत से बलन्दतर और तौसीफ़ करने वालों की गुफ़्तगू से बालातर है। वह अपने अजीब व ग़रीब लज़्म व नस्ख़ की बदौलत देखने वालों के सामने भी है और अपने जलाल व इज़्ज़त की बिना पर मुफ़क्किरीन की फ़िक्र से पोशीदा भी है। वह आलिम है बग़ैर इसके के किसी से कुछ सीखे या इल्म में इज़ाफ़ा और कहीं से इस्तेफ़ादा करे (उसका इल्म किसी इस्तेफ़ादे का नतीजा भी नहीं है) तमाम उमूर का तक़दीर साज़ है और इस सिलसिले में (मुशीर , तदबीर) और सोच बिचार का मोहताज भी नहीं है। तारीकियां उसे ढांप नहीं सकती हैं और रोशनियों से वह किसी तरह का कस्बे नूर नहीं है , ( न वह रौशनियों से कस्बे ज़िया करता है) न रात उस पर ग़ालिब आ सकती है और न दिन उसके ऊपर से गुज़र सकता है। उसका इदराक आंखों का मोहताज नहीं है और उसका इल्म इताअत का नतीजा नहीं है। उसने पैग़म्बर (स 0) को एक नूर देकर भेजा है और उन्हें सबसे पहले मुन्तख़ब क़रार दिया है , उनके ज़रिये परागन्दियों को जमा किया है (उनके ज़रिये से तमाम परागन्दियों और परेशानियों को दूर किया और ग़लबा पाने वालों को क़ाबू में रखा है) दुश्वारियों को आसान किया है और नाहमवारियों को हमवार बनाया है। यहाँ तक के गुमराहियों को दाएं , बाएं हर तरफ़ से दूर कर दिया है।(((-सही मुस्लिम किताबुल फ़ज़ाएल में सरकारे दो आलम (स 0) का यइ इरशाद दर्ज है के अल्लाह ने औलादे इस्माईल में कोनाना का इन्तेखा़ब किया है और फिर कुनाना में क़ुरैश को मुन्तक़ब क़रार दिया है , क़ुरैश में बनी हाशिम मुनतख़ब हैं और बनी हाशिम में मैं। लेहाज़ा दुनिया की शख़्सियत का सरकारे दोआलम (स 0) और अहलेबैत (अ 0) पर क़यास नहीं किया जा सकता है।-)))

214-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें रसूले अकरम (स 0) की तारीफ़ , ओलमा की तौसीफ़ और तक़वा की नसीहत का ज़िक्र किया गया है)

मैं गवाही देता हूँ के वह परवरदिगार ऐसा आदिल है जो अद्ल ही से काम लेता है , और ऐसा हाकिम है जो हक़ व बातिल को जुदा कर देता है और मैं शहादत देता हूँ के मोहम्मद (स 0) उसके बन्दे और रसूल हैं और फिर तमाम बन्दों के सरदार भी हैं। जब भी परवरदिगार ने मख़लूक़ात को दो गिरोहों (हक़ व बातिल) में तक़सीम किया है उन्हें (मोहम्मद स 0को) बेहतरीन हिस्से ही में रखा है। आपकी तख़लीक़ (आपके नसब) में न किसी बदकार का कोई हिस्सा है और न किसी फासिक़ व फ़ाजिर का कोई दख़ल है। याद रखो के परवरदिगार ने हर ख़ैर के लिये अहल क़रार दिये हैं और हर हक़ के लिये सुतून और हर इताअत के लिये वसीलाए हिफ़ाज़त क़रार दिया है और तुम्हारे लिये हर इताअत के मौक़े पर ख़ुदा की तरफ़ से एक मददगार का इन्तेज़ाम रहता है जो ज़बानों पर बोलता है और दिलों को ढारस इनायत करता है। इसके वजूद में हर इकतेफ़ा करने के लिये किफ़ायत है और तलबगारे सेहत के लिये शिफ़ा व आफ़ियत है (हर बेनियाज़ी चाहने वाले के लिये बेनियाज़ी और शिफ़ा चाहने वाले के लिये शिफ़ा है)।

याद रखो के अल्लाह के वह बन्दे जिन्हें उसने इल्म का मुहाफ़िज़ बनाया है वह उसका तहफ़्फ़ुज़ भी करते हैं और उसके चश्मों को जारी भी करते रहते हैं। आपस में मोहब्बत से एक-दूसरे की मदद करते हैं और चाहत के साथ मुलाक़ात करते हैं। सेराब करने वाले (इल्म व हिकमत के साग़रों) चश्मों से मिलकर (छककर) सेराब होते हैं और फिर सेरो सेराब होकर ही बाहर निकलते हैं। उनके आमाल में रैब (शक व शुबह) की आमेज़िश नहीं है और उनके मुआशरे में ग़ीबत का गुज़र नहीं है। इसी अन्दाज़ से मालिक ने उनकी तख़लीक़ की है और उनके अख़लाक़ क़रार दिये हैं और इसी बुनियाद पर वह आपस में मोहब्बत भी करते हैं और मिलते भी रहते हैं। उनकी मिसाल उन दानों की है जिनको इस तरह चुना जाता है के अच्छे दानों को ले लिया जाता है और ख़राब को फेंक दिया जाता है। उन्हें इसी सफ़ाई ने मुमताज़ बना दिया है और उन्हें इसी परख ने साफ़ सुथरा क़रार दे दिया है।

अब हर शख़्स को चाहिये के उन्हीं सिफ़ात को क़ुबूल करके करामत को क़ुबूल करे और क़यामत के आन से पहले होशियार हो जाए। अपने मुख़्तसर दिनों और थोड़े से क़याम के बारे में ग़ौर करे के इस मन्ज़िल को दूसरी मन्ज़िल में बहरहाल बदल जाना है। अब इसका फ़र्ज़ है के नई मन्ज़िल और जानी पहचानी जाए बाज़गश्त (क़ब्र , बरज़ख़ , हश्र) के बारे में अमल करे।

ख़ुशाबहाल (मुबारकबाद) इन क़ल्बे सलीम वालों के लिये जो रहनुमा की इताअत करें और हलाक होने वालों से परहेज़ करें। कोई रास्ता दिखा दे तो देख लें और वाक़ेई राहनुमा अम्र करे तो उसकी इताअत करें , हिदायत की तरफ़ सबक़त करें क़ब्ल इसके के इसके दरवाज़े बन्द हो जाएं और इसके असबाब मुनक़ता हो जाएं। तौबा का दरवाज़ा खोल लें और गुनाहों के दाग़ों को धो ढालें , यही वह लोग हैं जिन्हें सीधे रास्ते पर खड़ा कर दिया गया है और उन्हें वाज़ेह रास्ते की हिदायत मिल गई। (मुबारक हो उस पाक व पाकीज़ा दिल वाले को जो हिदायत करने वाले की पैरवी और तबाही डालने वाले से किनारा करता है और दीदाए बसीरत में जिला बख़्शने वाले की रोशनी और हिदायत करने वाले के हुक्म की फ़रमाबरदारी से सलामती की राह पा लेता है और हिदायत के दरवाज़ों के बन्द और वसाएल व ज़राए के क़ता होने से पहले हिदायत की तरफ़ बढ़ जाता है।)

(((- दुनिया में साहेबाने इल्म व फ़ज़्ल बेशुमार हैं लेकिन वह अहले इल्म जिन्हें मालिक ने अपने इल्म और अपने दीन का मुहाफ़िज़ बनाया है वह महदूद ही हैं जिनकी सिफ़त यह है के इल्म का तहफ़्फ़ुज़ भी करते हैं और दूसरों को सेराब भी करते रहते हैं , ख़ुद भी सेराब रहते हैं और दूसरों की तशनगी का भी इलाज करते रहते हैं। इनके इल्म में जेहालत और “ लाअदरी ’ का गुज़र नहीं है और वह किसी साएल को महरूम वापस नहीं करते हैं-)))

215 -आपकी दुआ का एक हिस्सा

(जिसकी बराबर तकरार फ़रमाया करते थे)

ख़ुदा का शुक्र है के उसने सुबह के हंगाम (मुझे) न मुर्दा बनाया है और न बीमार , न किसी रग पर मर्ज़ का हमला हुआ है और न किसी बदअमली का मुवाख़ेज़ा किया गया है। न मेरी नस्ल को मुनक़ता किया गया है और न अपने दीन में इरतेदाद का शिकार हुआ हूं , न अपने दीन से मुरतद हूँ और न अपने रब का मुनकिर। न अपने ईमान से मुतवह्हश और न अपनी अक़्ल का मख़बूत और न मुझ पर गुज़िश्ता उम्मतों जैसा कोई अज़ाब हुआ है। मैंने इस आलम मे सुबह की है के मैं एक बन्दए ममलूक हूँ जिसने अपने नफ़्स पर ज़ुल्म किया है। ख़ुदाया! तेरी हुज्जत मुझ पर तमाम है और मेरी कोई हुज्जत नहीं है (मेरे लिये अब बहाना की कोई गुन्जाइश नहीं है)। तू जो दे दे उससे ज़्यादा ले नहीं सकता है (ख़ुदाया मुझमें किसी चीज़ के हासिल करने की क़ूवत नहीं सिवा उसके के जो तू मुझे अता कर दे) और जिस चीज़ से तू न बचाए उससे बच नहीं सकता।

ख़ुदाया! मैं उस अम्र से पनाह चाहता हूं के तेरी दौलत में रह कर फ़क़ीर हो जाऊ या तेरी हिदायत के बावजूद गुमराह हो जाऊ , या तेरी सलतनत के बावजूद सताया जाऊं या तेरे हाथ में सारे इख़्तेयारात होने के बावजूद मुझ पर दबाव डाला जाए। ख़ुदाया! मेरी जिन नफ़ीस चीज़ों को मुझसे वापस लेना और अपनी जिन अमानतों को मुझसे पलटाना , उनमें सबसे पहली चीज़ मेरी रूह को क़रार देना।

ख़ुदाया! मैं उस अम्र से तेरी पनाह चाहता हूँ के मैं तेरे इरशादात से बहक जाऊँ या तेरे दीन में किसी फ़ित्ने में मुब्तिला हो जाऊँ या तेरी आई हुई हिदायतों के मुक़ाबले में मुझ पर ख़्वाहिशात का ग़लबा हो जाए।


216-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसे मुक़ामे सिफ़्फ़ीन में इरशाद फ़रमाया)

अम्माबाद! परवरदिगार ने वली अम्र होने की बिना पर मेरा एक हक़ क़रार दिया है और तुम्हारा भी मेरे ऊप एक तरह का हक़ है और हक़ मदह सराई के एतबार से तो बहुत वुसअत रखता है लेकिन इन्साफ़ के एतबार से बहुत तंग है। यह किसी का उस वक़्त तक साथ नहीं देता है जब तक उसके ज़िम्मे कोई हक़ साबित न कर दे और किसी के खि़लाफ़ फ़ैसला नहीं करता है जब तक उसे कोई हक़ न दिलवा दे। अगर कोई हस्ती ऐसी मुमकिन है जिसका दूसरों पर हक़ हो और उस पर किसी का हक़ न हो तो वह सिर्फ़ परवरदिगार की हस्ती है के वह हर शै पर क़ादिर है और उसके तमाम फ़ैसले अद्ल व इन्साफ़ पर मबनी हैं लेकिन उसने भी जब बन्दों पर अपना हक़ इताअत क़रार दिया है तो अपने फ़ज़्ल व करम और अपने उस एहसान की वुसअत की बिना पर जिसका वह अहल है उनका यह हक़ क़रार दे दिया है के उन्हें ज़्यादा से ज़्यादा सवाब दे दिया जाए। परवरदिगार के मुक़र्रर किये हुए हुक़ूक़ में से वह तमाम हुक़ूक़ है जो उसने एक दूसरे पर क़रार दिये हैं और उनमें मसावात भी कऱार दी है के एक हक़ से दूसरा हक़ पैदा होता है और एक हक़ नहीं पैदा होता है जब तक दूसरा हक़ न पैदा हो और इन तमाम हुक़ूक़ में सबसे अज़ीमतरीन हक़ रिआया पर वाली का हक़ और वाली पर रियाया का हक़ है जिसे परवरदिगार ने एक को दूसरे के लिये क़रार दिया है और इसी से उनकी बाहमी उलफ़तों को मुनज़्ज़म किया है और उनके दीन को इज़्ज़त दी है। रिआया की इस्लाह मुमकिन नहीं है जब तक वाली सॉलेह न हो और वाली सॉलेह नहीं रह सकते हैं जब तक रिआया सॉलेह न हो। अब अगर रिआया ने वाली को उसका हक़ दे दिया और वाली ने रिआया को उनका हक़ दे दिया तो हक़ दोनों के दरम्यान अज़ीज़ रहेगा। दीन के रास्ते क़ायम हो जाएंगे। इन्साफ़ के निशानात बरक़रार रहेंगे और पैग़म्बरे इस्लाम (स 0) की सुन्नतें अपने ढर्रे पर चल पड़ेंगी और ज़माना ऐसा सॉलेह हो जाएगा के बक़ाए हुकूमत की उम्मीद भी की जाएगी और दुश्मनों की तमन्नाएं भी नाकाम हो जाएंगी।

लेकिन अगर रिआया हाकिम पर ग़ालिब आ गई या हाकिम ने रिआया पर ज़्यादती की तो कलेमात में इख़्तेलाफ़ हो जाएगा , ज़ुल्म के निशानात ज़ाहिर हो जाएंगे , दीन में मक्कारी बढ़ जाएगी। सुन्नतों के रास्ते नज़र अन्दाज़ हो जाएंगे , ख़्वाहिशात पर अमल होगा , एहकाम मुअत्तल हो जाएंगे और नफ़सानी बीमारियां बढ़ जाएंगी , न बड़े से बड़े हक़ के मोअत्तल हो जाने से कोई वहशत होगी और न बड़े से बड़े बातिल पर अमल दरआमद से कोई परेशानी होगी।

ऐसे मौक़े पर नेक लोग ज़लील कर दिये जाएंगे और शरीर लोगों की इज़्ज़त होगी और बन्दों पर ख़ुदा की उक़ूबतें अज़ीमतर हो जाएंगी।

ख़ुदारा आपस में एक-दूसरे के मुख़लिस रहो (एक दूसरे को समझाते-बुझाते रहो) और एक-दूसरे की मदद करते रहो इसलिये के तुममें कोई शख़्स भी कितना ही ख़ुशनूदिये ख़ुदा की लालच रखता हो और किसी क़द्र भी ज़हमते अमल बरदाश्त कर ले इताअते ख़ुदा की उस मन्ज़िल तक नहीं पहुंच सकत है जिसका वह अहल है लेकिन फिर भी मालिक का यह हक़्के़ वाजिब उसके बन्दों के ज़िम्मे है के अपने इमकान भर नसीहत करते रहें और हक़ के क़याम में एक दूसरे की मदद करते रहें इसलिये के कोई शख़्स भी हक़ की ज़िम्मेदारी अदा करने में दूसरे की इमदाद से बेनियाज़ नहीं हो सकता है चाहे हक़ में इसकी मन्ज़िलत किसी क़द्र अज़ीम क्यों न हो और दीन में उसकी फ़ज़ीलत को किसी क़द्र तक़द्दुम क्यों न हासिल हो और न कोई शख़्स हक़ में मदद करने या मदद लेने की ज़िम्मेदारी से कमतर हो सकता है चाहे लोगों की नज़र में किसी क़द्र छोटा क्यों न हो (चाहे लोग उसे ज़लील समझें) और चाहे उनकी निगाहों में किसी क़द्र क्यों न गिर जाए (चाहे उनकी निगाहों में किसी क़द्र हक़ीर क्यों न हो)। (इस गुफ़्तगू के बा आपके असहाब में से एक शख़्स ने एक तवील तक़रीर की जिसमें आपकी मदहा व सना के साथ इताअत का वादा किया गया तो आपने फ़रमाया के-)

याद रखो के जिसके दिल में जलाले इलाही की अज़मत और जिसके नफ़्स में इसके मक़ामे उलूहियत की बलन्दी है उसका हक़ यह है के तमाम कायनात उसकी नज़र में छोटी हो जाए और ऐसे लोगों में इस हक़ीक़त का सबसे बड़ा अहल वह है जिस पर उसकी नेमतें अज़ीम और उसके अच्छे एहसानात किये हों , इसलिये के किसी शख़्स पर अल्लाह की नेमतें अज़ीम नहीं होतीं मगर यह के उसका हक़ भी अज़ीमतर हो जाता है और एहकाम के हालात में नेक किरदार अफ़राद के नज़दीक बदतरीन हालत ये है के उनके बारे में ग़ुरूर का गुमान हो जाए और उनके मामेलात को तकब्बुर पर मबनी समझा जाए और मुझे यह बात सख़्त नागवार है के तुम में से किसी को यह गुमान पैदा हो जाए के मैं रोसा (बढ़ चढ़ कर सराहे जाने) को दोस्त रखता हूँ या अपनी तारीफ़ सुनना चाहता हूँ और बेहम्दे अल्लाह मैं ऐसा नहीं हूँ और अगर मैं ऐसी बातें पसन्द भी करता होता तो भी उसे नज़रअन्दाज़ कर देता के मैं अपने को उससे कमतर समझता हूँ के इसी अज़मत व किबरियाई का अहल बन जाऊँ जिसका परवरदिगार हक़दार है। यक़ीनन बहुत से लोग ऐसे हैं जो अच्छी कारकर्दगी पर तारीफ़ को दोस्त रखते हैं लेकिन ख़बरदार तुम लोग मेरी इस बात पर तारीफ़ न करना के मैंने तुम्हारे हुक़ूक़ अदा कर दिये हैं के अभी बहुत से ऐसे हुक़ूक़ का ख़ौफ़ बाक़ी है जो अदा नहीं हो सके हैं और बहुत से फ़राएज़ हैं जिन्हें बहरहाल नाफ़िज़ करना है। देखो मुझसे उस लहजे में बात न करना जिस लहजे में जाबिर बादशाहों से बात की जाती है और न मुझसे इस तरह बचने की कोशिश करना जिस तरह तैश में आने वालों से बचा जाता है , न मुझसे ख़ुशामद के साथ ताल्लुक़ात रखना और न मेरे बारे में यह तसव्वुर करना के मुझे हर्फ़े हक़ गराँ गुज़रेगा और न मैं अपनी ताज़ीम का तलबगार हूँ। इसलिये के जो शख़्स भी हर्फ़े हक़ सुनने को गराँ समझता है या अदल की पेशकश को नापसन्द करता है वह हक़ व अदल पर अमल को यक़ीनन मुश्किलतर ही तसव्वुर करेगा। लेहाज़ा ख़बरदार हर्फ़े हक़ कहने में तकल्लुफ़ न करना और मुन्सिफ़ाना मश्विरा देने से गुरेज़ न करना इसलिये के मैं ज़ाती तौर पर अपने को ग़लती से बालातर नहीं तसव्वुर करता हूँ और न अपने अफ़आल को इस ख़तरे से महफ़ूज़ समझता हूँ मगर यह के मेरा परवरदिगार मेरे नफ़्स को बचा ले के वह इसका मुझसे ज़्यादा साहबे इख़्तेयार है।

देखो हम सब एक ख़ुदा के बन्दे और उसके ममलूक हैं और उसके अलावा कोई दूसरा ख़ुदा नहीं है। वह हमारे नुफ़ूस पर इतना इख़्तेयार रखता है जितना ख़ुद हमें भी हासिल नहीं है और उसी ने हमें साबेक़ा हालात से निकाल कर इस इस्लाह के रास्ते पर लगा दिया है के अब गुमराही हिदायत में तबदील हो गई है और अन्धेपन के बाद बसीरत हासिल हो गई है।

217-आपका इरशादे गिरामी

(क़ुरैश से शिकायत और फ़रयाद करते हुए)

ख़ुदाया! मैं क़ुरैश से और उनके मददगारों से तेरी मदद चाहता हूँ के इन लोगों ने मेरी क़राबतदारी का ख़याल नहीं किया और मेरे ज़र्फे़ अज़मत को इलट दिया है और मुझसे उस हक़ के बारे में झगड़ा करने पर इत्तेहाद कर लिया है जिसका मैं सबसे ज़्यादा हक़दार था और फिर यह कहने लगे के आप इस हक़ को ले लें तो यह भी सही है और आपको इससे रोक दिया जाए तो यह भी सही है। अब चाहें हम्म व ग़म के साथ सबर करें या रन्ज व अलम के साथ मर जाएं।

ऐसे हालात में मैंने देखा के मेरे पास न कोई मददगार है और न कोई दिफ़ाअ करने वाला सिवाए मेरे घरवालों के , तो मैने उन्हें मौत के मुंह में देने से गुरेज़ किया और बाला आखि़र आँखों में ख़स व ख़ाशाक के होते हुए चश्मपोशी की और गले में फन्दे के होते हुए लोआबे दहन निगल लिया और ग़ुस्से को पीने में ख़ेज़ल से ज़ियाह तल्ख़ ज़ाएक़े पर सब्र किया और छुरियों के ज़ख़्मों से ज़्यादा तकलीफ़देह हालात पर ख़ामोशी इख़्तेयार कर ली।

( सय्यद रज़ी - गुज़िश्ता ख़ुतबे में यह मज़मून गुज़र चुका है लेकिन रिवायतें मुख़्तलिफ़ थीं लेहाज़ा मैंने दोबारा उसे नक़्ल कर दिया)

218-आपका इरशादे गिरामी

(बसरा की तरफ़ आपसे जंग करने के लिये जाने वालों के बारे में)

यह लोग मेरे आमिलों , मेरे ज़ेरे दस्त बैतुलमाल के ख़ेरानादारों और तमाम अहले शहर जो मेरी इताअत व बैअत में थे सबकी तरफ़ वारिद हुए। इनके कलेमात में इफ़तेराक़ पैदा किया। इनके इजतेमाअ को बरबाद किया और मेरे चाहने वालों पर हमला कर दिया और इनमें से एक जमाअत को धोके से क़त्ल भी कर दिया लेकिन दूसरी जमाअत ने तलवारें उठाकर दाँत भींच लिये और बाक़ायदा मुक़ाबला किया यहां तक के हक़ व सिदाक़त के साथ ख़ुदा की बारगाह में हाज़िर हो गए।

(((- हैरत अंगेज़ बात है के मुसलमान अभी तक इन दो गिरोहों के बारे में हक़ व बातिल का फ़ैसला नहीं कर सका है जिनमें एक तरफ़ नफ़्स रसूल (स 0) अली बिन अबीतालिब (अ 0) जैसा इन्सान था जो अपनी तारीफ़ को भी गवारा नहीं करता था और हर लम्हे अज़मते ख़ालिक़ के पेशे नज़र अपने आमाल को हक़ीर व मामूली तसव्वुर करता था और एक तरफ़ तल्हा व ज़ुबैर जैसे वह दुनिया परस्त थे जिनका काम फ़ितना परवाज़ी शरांगेज़ी , तफ़रिक़ा अन्दाज़ी और क़त्ल व ग़ारत के अलावा कुछ न था और जो दौलत व इक़तेदार की ख़ातिर व दुनिया की हर बुराई कर सकते थे और हर जुर्म का इरतेकाब कर सकते थे।))

219-आपका इरशादे गिरामी

(जब रोज़े जमल तल्हा बिन अब्दुल्लाह और अब्दुर्रहमान बिन अताब बिन उसीद की लाशों के क़रीब से गुज़र हुआ)

अबू मोहम्मद (तल्हा) ने इस मैदान में आलमे ग़ुरबत में सुबह की है , ख़ुदा गवाह है के मुझे यह बात हरगिज़ पसन्द नहीं थी के क़ुरैश के चमकते सितारों के नीचे ज़ेरे आसमान पड़े रहें लेकिन क्या करूं। बहरहाल मैंने अब्द मुनाफ़ की औलाद से उनके किये का बदला ले लिया है (लेकिन) अफ़सोस के बनी जमअ बच कर निकल गए उन सबने अपनी गर्दनें इस अम्र की तरफ़ उठाई थीं जिसके यह हरगिज़ अहल नहीं थे। इसीलिये यहाँ तक पहुंचने से पहले ही इनकी गर्दनें तोड़ दी गईं।


220-आपका इरशादे गिरामी

(ख़ुदा की राह में चलने वाले इन्सानों के बारे में)

ऐसे शख़्स ने अपनी अक़्ल को ज़िन्दा रखा है और अपने नफ़्स को मुर्दा बना दिया है। इसका जिस्म बारीक हो गया है और इसका भारी भरकम तनो तोश हल्का हो गया है इसके लिये बेहतरीन ज़ोपाश नूरे हिदायत चमक उठा है और उसने रास्ते को वाज़ेह करके इसी पर चला दिया है। तमाम दरवाज़ों ने उसे सलामती के दरवाज़े और हमेशगी के घर तक पहुंचा दिया है और इसके क़दम तमानीयते बदन के साथ अम्न व राहत की मन्ज़िल में साबित हो गए हैं के इसने अपने दिल को इस्तेमाल किया है और अपने रब को राज़ी कर लिया है।

221-आपका इरशादे गिरामी

(जिसे अलहाकोमुत्तकासोर की तिलावत के मौक़े पर इरशाद फ़रमाया)

ज़रा देखो तो इन आबा व अजदाद पर फ़ख़्र करने वालों का मक़सद किस क़़द्र बईदुज़ अक़्ल है और यह ज़ियारत करने वाले किस क़द्र ग़ाफ़िल हैं और ख़तरा भी किस क़द्र अज़ीम है। यह लोग तमाम इबरतों से ख़ाली हो गए हैं और इन्होंने मुर्दों को बहुत दूर से ले लिया है और आखि़र यह क्या अपने आबा व अजदाद के लाशों पर फ़ख़्र कर रहे हैं , या मुर्दो की तादाद से अपनी कसर में इज़ाफ़ कर रहे हैं ? या उन जिस्मों को वापस लाना चाहते हैं जो रूहों से ख़ाली हो चुके हैं और हरकत के बाद साकिन हो चुके हैं। उन्हें तो फ़ख़्र के बजाए इबरत का सामान होना चाहिये था और उनको देखकर इन्सान को इज़्ज़त के बजाय ज़िल्लत की मन्ज़िल में उतरना चाहिये था मगर अफ़सोस के इन लोगों ने उन मुर्दों को चुन्धियाई हुई आंखों से देखा है और उनकी तरफ़ से जेहालत के गढ़े में गिर गए हैं।

(((- यह सिलसिलए तफ़ाख़ुर हर दौर में रहा है और आज भी बरक़रार है के इन्सान सामाने इबरत को वजहे फ़ज़ीलत क़रार दे रहा है और इस तरह मुसलसल वादीए ग़फ़लत में मन्ज़िल से दूरतर होता चला जा रहा है। काश उसे इसक़द्र शऊर होता के आबा व अजदाद की बोसीदा लाशें या क़ब्रें बाइसे इफ़्तेख़ार नहीं हैं। बाइसे इफ़्तेख़ार इन्सान का अपना किरदार है और दर हक़ीक़त किरदार भी इस क़ाबिल नहीं है के उसे सरमायए इफ़्तेख़ार क़रार दिया जा सके। इन्सान के लिये वजहे इफ़्तेख़ार सिर्फ़ एक चीज़ है के इसका मालिक परवरदिगार है जो सारी कायनातत से बालातर है जैसा के मौलाए कायनात ने अपनी मुनाजात में इशारा किया है के “ ख़ुदाया! मेरी इज़्ज़त के लिये यह काफ़ी है के मैं तेरा बन्दा हूँ और मेरे फ़ख़्र के लिये यह काफ़ी है के तू मेरा रब है। अब इसके बाद मेरे लिये किसी शै की कोई हक़ीक़त नहीं है। सिर्फ़ इल्तिजा यह है के जिस तरह तू मेरी मर्ज़ी का ख़ुदा है , उसी तरह मुझे अपनी मर्ज़ी का बन्दा बना ले। -)))

उनके बारे में गिरे पड़े मकानों और ख़ाली घरों से दरयाफ़्त किया जाए तो यही जवाब मिलेगा के लोग गुमराही के आलम में ज़ेरे ज़मीन चले गए (और) तुम जेहालत के आालम में इनके पीछे चले जजा रहे हो , इनकी खोपड़ियों को रौन्द रहे हो और उनके जिस्मों पर इमारतें खड़ी कर रहे हो , जो वह छोड़ गए हैं उसी को चर रहे हो और जो वह बरबाद कर गए हैं उसी में सुकूनत पज़ीद हो। तुम्हारे और उनके दरम्यान के दिन तुम्हारे हाल पर रो रहे हैं और तुम्हारी बरबादी का नौहा पढ़ रहे हैं।

यह हैं तुम्हारी मन्ज़िल पर पहले पहुंच जाने वाले और तुम्हारे चश्मों पर पहले वारिद हो जाने वाले। जिनके लिये इज़्ज़त की मन्ज़िलें थीं , फ़ख़्र व मुबाहात की फ़रावानियां थीं , कुछ सलातीने वक़्त थे और कुछ दूसरे दर्जे के मनसबदार , लेकिन सब बरज़ख़ की गहराइयों में राह पैमाई कर रहे हैं। ज़मीन उनके ऊपर मुसल्लत कर दी गई है। उसने इनका गोश्त खा लिया है और ख़ून पी लिया है अब वह क़ब्र की गहराइयों में ऐसे जमा दिये गये हैं जिनमें नमो नहीं है और ऐसे गुम हो गए हैं के ढूंढे नहीं मिल रहे हैं। न हौलनाक मसाएब का विरूद उन्हें ख़ौफ़ज़दा बना सकता है और न बदले हालात उन्हें रन्जीदा कर सकते हैं। न उन्हें ज़लज़लों की परवाह है और न गरज और कड़क की इत्तेलाअ। ऐसे ग़ायब हुए हैं के इनका इन्तेज़ार नहीं किया जा रहा है और ऐसे हाज़िर हैं के सामने नहीं आते हैं। कल सब यकजा थे अब मुन्तशिर हो गए हैं और सब एक दूसरे के क़रीब थे और अब जुदा हो गए हैं। उनके हालात की बेख़बरी और उनके दयार की ख़ामोशी तूले ज़मान और बोअद मकान की बिना पर नहीं है बल्कि उन्हें मौत का वह जाम पिला दिया गया है जिसने उनकी गोयाई को गूंगेपन में और उनकी समाअत को बहरेपन में और उनकी हरकात को सुकून में तब्दील कर दिया है। उनकी सरसरी तारीफ़ हो सकती है के जैसे नीन्द में बेख़बर पड़े हों के हमसाये हैं लेकिन एक-दूसरे से मानूस नहीं हैं और अहबाब हैं लेकिन मुलाक़ात नहीं करते हैं। उनके दरम्यान बाहमी तआरूफ़ के रिश्ते बोसीदा हो गए हैं और बिरादरी के असबाब मुन्क़ता हो गए हैं। अब जब इकट्ठा होने के बावजूद अकेले हैं और दोस्त होने के बावजूद एक दूसरे को छोड़े हुए हैं। न किसी रात की सुबह से आश्ना हैं और न किसी सुबह की शाम ही पहचानते हैं। दिन व रात में जिस साअत में भी दुनिया से गए हैं वही उनकी अबदी साअत है।

(((;- यह सूरते हाल किसी सुकून और इतमीनान का इशारा नहीं है बल्कि दर असल इन्सान की मदहोशी और बदहवासी का इज़हार है के साहबे अक़्ल व शऊर भी जमादात की शक्ल इख़्तेयार कर गया है और सूरते हाल यह हो गई है के इधर से जुमला हालात से बेख़बर हो गया है लेकिन उधर के हालात से बेख़बर नहीं है। सुबह व शाम अरवाह के सामने जहन्नुम पेशे नज़र किया जाता है और बेअमल और बदकिरदार इन्सान एक नई मुसीबत से दो चार हो जाता है। दर हक़ीक़त मौलाए कायनात ने इन फ़ोक़रात में मरने वालों के हालात का ज़िक्र नहीं किया है बल्कि ज़िन्दा अफ़राद को इस सूरते हाल से बचाने का इन्तेज़ाम किया है के इन्सान इस अन्जाम से बाख़बर है और चन्द रोज़ा दुनिया के बजाए अबदी आक़ेबत और आखि़रत का इन्तेज़ाम करे जिससे बहरहाल दो चार हाोना है और इससे फ़रार का कोई इमकान नहीं है।-)))

और दारे आखि़रत के ख़तरात को उससे ज़्यादा देख लिया है और उनको उससे भी कहीं ज़्यादा हौलनाक पाया जितना उन्हें डर था और वहाँ के आसार को उससे अज़ीम देखा जितना के वह अन्दाज़ा लगाते थे। (मोमिनों और काफ़िरों की) मन्ज़िले इन्तेहा को जाए बाज़गश्त दोज़ख़ व जन्नत तक फेला दिया गया है। वह (काफ़िरों के लिये) हर दरजा ख़ौफ़ से बलन्दतर और (मोमिनों के लिये) हर दर्जा उम्मीद से बालातर है , अगर वह बोल सकते होते जब भी देखी हुई चीज़ों के बयान से उनकी ज़बानें गंग हो जातीं अगरचे उनके निशानात मिट चुके हैं और उनकी ख़बरों का सिलसिला क़ता हो चुका है , लेकिन उन्हें देखती और गोशे अक़्ल वह ख़ुर्द उनकी सुनते हैं (यह लोग अगर बोलने के लाएक़ भी हैं तो उन हालात की तौसीफ़ नहीं कर सकते थे जिनका मुशाहेदा कर लिया है और अपनी आंखों से देख लिया है अब अगर इनके आसार गुम भी हो गए हैं और इनकी ख़बरें मुनक़ता भी हो गई हैं तो इबरत की निगाहें बहरहाल उन्हें देख रही हैं) वह बोले मगर नत्क़ व कलाम के तरीक़े पर नहीं बल्कि उन्होंने ज़बाने हाल से कहा शगुफ्ता चेहर बिगड़ गए , नर्म व नाज़ुक बदन मिट्टी में मिल गए और हमने बोसीदा कफ़न पहन रखा है और क़ब्र की तंगी ने हमें आजिज़ कर दिया है। ख़ौफ़ व दहशत का एक-दूसरे से विरसा पाया है और ख़ामोश मन्ज़िलें वीरान हो चुकी हैं जिस्म के महासिन महो हो चुके हैं और जानी-पहचानी सूरतें भी तबदील हो गई हैं। मन्ज़िले वहशत में क़याम तवील हो गया है और किसी कर्ब से राहत की उम्मीद नहीं है और न किसी तंगी में वुसअत का कोई इमकान है। अब अगर तुम अपनी अक़्लों से इनकी तस्वीरकशी करो या तुम से ग़ैब के परदे उठा दिये जाएं और तुम उन्हें इस आलम में देख लो के जब कीड़ों की वजह से उनके कान समाअत को खोकर बहरे हो चुके हैं और उनकी आंखें ख़ाक का सुरमा लगाकर अन्दर को धंस चुकी हैं और उनके मुंह में ज़बानें तलाक़त व रवानी दिखाने के बाद पारा-पारा हो चुकी हैं और सीनों में दिल चैकन्ना रहने के बाद बेहरकत हो चुके हैं और उनके एक-एक अज़ो को नई बोसीदगियों ने तबाह करके बद हैसियत बना दिया है और इस हालत में के वह (हर मुसीबत सहने के लिये) बिला मज़ाहमत आमादा हैं। उनकी तरफ़ आफ़तों का रास्ता हमवार कर दिया है , न कोई हाथ है जो उनका बचाव करे और न (बख़्शने वाले) दिल हैं जो बेचैन हो जाएं अगर तुम अपनी अक़्लों में उनका नक़्शा जमाओ या यह के तुम्हारे सामने से उन पर पड़ा हुआ परदा हटा दिया जाए तो अलबत्ता तुम उनके दिलों के अन्दोह और आंखों में पड़े हुए ख़स व ख़ाशाक को देखोगे के उन पर शिद्दत व सख़्ती की ऐसी हालत है के वह बलन्दी नहीं और ऐसी मुसीबत व जान गाही है के हटने का नाम नहीं लेती

उफ! यह ज़मीन कितने अज़ीज़तरीन बदन और हसीनतरीन रंग खा गई (जिनको दौलत व राहत की ग़िज़ा मिल रही थी) जो रंज की घड़ियों में भी मसर्रत अंगेज़ चेहरों से दिल बहलाते थे , अगर कोई मुसीबत उन पर आ पड़ती थी तो अपने ऐश की ताज़गियों पर ललचाए रहने और खेल तफ़रीह पर फ़रेफ़्ता होने की वजह से ख़ुश व क़त्तियों के सहारे ढूंढते थे इसी दौरान में के वह ग़ाफ़िल व मदहोश करने वाली ज़िन्दगी की छांव में दुनिया को देख कर हस रहे थे और दुनिया उन्हें देखकर क़हक़हे लगा रही थी (और अपने लहू व लाब पर फ़रेक़्ता होने की बिना पर तसल्ली का सामान फ़राहम कर लिया करते थे। यह अभी ग़फ़लत में डाल देने वाले ऐश के सरमायए दुनिया को देखकर मुस्करा रहे थे और दुनिया इन्हें देखकर हंस रही थी)

(((- अमीरूल मोमेनीन (अ 0) की तस्वीरकशी पर एक लफ़्ज़ के भी इज़ाफ़े की गुन्जाइश नहीं है और अबूतुराब से बेहतर ज़ेरे ज़मीन का नक़्शा कौन खींच सकता है। बात सिर्फ़ यह है के इन्सान इस संगीन सूरते हाल का अन्दाज़ा करे और इस तसवीर को अपनी निगाहे अक़्ल व बसीरत में मुजस्सम बनाए ताके उसे अन्दाज़ा हो के इस दुनिया की हैसियत और औक़ात क्या है और इसका अन्जाम क्या होने वाला है। हक़ीक़ते अम्र यह है के ज़ेरे ज़मीन ख़ाक का ढेर बन जाने वाले कैसे कैसी ज़िन्दगियां गुज़ार गए हैं और किस किस तरह की राहत पसन्दियों से गुज़र चुके हैं। लेकिन आज मौत उनकी हैसियत का इक़रार करने के लिये तैयार नहीं है और क़ब्र उनके किसी क़िस्म के एहतेराम की क़ाएल नहीं है। यह तो सिर्फ़ ईमान व किरदार या साहबे क़ब्र व बारगाह के जवार का असर है के इन्सान फ़िशारे क़ब्र और बोसीदगी जिस्म से महफ़ूज़ रह जाए। वरना ज़मीन अपने टुकड़े को असल से मिला देने में किसी तरह के तकल्लुफ़ से काम नहीं लेती है।-)))

के अचानक ज़माने ने उन्हें कांटों की तरह रौन्द दिया और उनके सारे ज़ोर तोड़ दिये और क़रीब ही से मौत की नज़रें उन पर पड़ने लगीं और ऐसा ग़म व अन्दोह उन पर तारी हुआ के जिससे वह आशना न थे और ऐसे अन्दरूनी क़लक़ में मुब्तिला हुए के जिससे कभी साबेक़ा न पड़ा था और इस हालत में के वह सेहत से बहुत ज़्यादा मानूस थे , उनमें मर्ज़ की कमज़ोरियां पैदा हो गईं तो अब उन्होंने अपनी चीज़ों की तरफ़ रूजू किया जिनका तबीबों ने उन्हें आदी बना रखा था के गर्मी के ज़ोर को सर्द दवाओं से फ़रो किया जाए और सर्दी को गर्म दवाओं से हटाया जाए। मगर सर्द दवाओं ने गर्मी को बुझाने के बाद और भड़का दिया और गर्म दवाओं ने ठण्डक को हटाने के बजाय इसका जोश और बढ़ा दिया और न इन तबीअतों में मख़लूत होने वाली चीज़ों उनके मिज़ाज नुक़्ताए एतदाल पर आए बल्कि इन चीज़ों ने हर अज़ो माऊफ़ का आज़ार और बढ़ा दिया। यहां तक के वह चारागर सुस्त पड़ गए , तीमारदार (मायूस होकर) सुस्त हो गए और इलाज करने वाले ग़फ़लत बरतने लगे , घरवाले मर्ज़ की हालत बयान करने से आजिज़ आ गए और मिज़ाज पुरसी करने वालों के जवाब से ख़ामोशी इख़्तेयार कर ली और उससे छुपाते हुए इस अन्दोहनाक ख़बर के बारे में इख़्तेलाफ़ राए करने लगे। एक कहने वाला यह कहता था के इसकी हालत जो है सो ज़ाहिर है और एक सेहत व तन्दरूस्ती के पलट आने की उम्मीद दिलाता था और एक इसकी (होने वाली) मौत पर उन्हें सब्र की तलक़ीन करना और इससे पहले गुज़र जाने वालों की मुसीबतें उन्हें याद दिलाता था। इसी असना में के वह दुनिया से जाने और दोस्तों को छोड़ने के लिये पर तोल रहा था के नागाह गुलूगीर फनदों में से एक ऐसा फनदा उसे लगा के उसके होश व हवास पाशाने व परेशान हो गए और ज़बान की रूतूबत (तरी) ख़ुश्की में तब्दील हो गई और कितने ही मुबहम सवालात थे के जो अब वह जानता था मगर बयान करने से आजिज़ हो गया और कितनी ही दिल सोज़ सदाएं उसके कान से टकराईं के जिनके सुनने से बहरा हो गया और वह आवाज़ या किसी ऐसे बुज़ुर्ग की होती थी जिसका यह बड़ा एहतेराम करता था , या किसी ऐसे छोटे की होती थी जिस पर यह मेहरबान व शफ़क़ था। मौत की सख्तियां इतनी हैं के मुश्किल है के दाएरए बयान में आ सकें या अहले दुनिया की अक़्लों के अन्दाज़े पर पूरी उतर सकें।

(((- हाए वह बेकसी का आलम के न मरने वाला दर्दे दिल की तर्जुमानी कर सकता है और न रह जाने वाले इसके किसी दर्द का इलाज कर सकते हैं। जबके दोनों आमने-सामने ज़िन्दा मौजूद हैं तो इसके बाद किसी से क्या तवक़्क़ो रखी जाए जब एक मौत की आग़ोश में सो जाएगा और दूसरा कन्जे लहद के हालात से भी बेख़बर हो जाएगा और उसे मरने वाले के हालात की भी इत्तेलाअ नहीं होगी। क्या यह सूरते हाल इस अम्र की दावत नहीं देती है के इन्सान इस दुनिया से इबरत हासिल करे और अहले दुनिया पर एतमाद करने के बजाय अपने ईमान व किरदार और औलियाए इलाही की नुसरत व हिमायत हासिल करने पर तवज्जो दे के इसके अलावा कोई सहारा नहीं है।)))

222-आपका इरशादे गिरामी

( जिसे आयते करीम “ योसब्बेह लहू फीहा ..................तेजारता वला यबआ अन ज़िकरिल्लाह ” ( उन घरों में सुबहो शाम तस्बीहे परवरदिगार करने वाले वह अफ़राद हैं जिन्हें तिजारत और कारोबार यादे ख़ुदा से ग़ाफ़िल नहीं बना सकते हैं) की तिलावत के बाद फ़रमाया)

बेशक परवरदिगार (अल्लाह सुबहानहू) ने अपने ज़िक्र को दिलों के लिये सैक़ल क़रार दिया है जिसकी बिना पर वह बहरेपन के बाद सुनने लगते हैं और अन्धेपन के बाद देखने लगते हैं और अनाद और ज़िद (दुश्मनी) के बाद फ़रमाबरदार हो जाते हैं और ख़ुदाए अज़्ज़ व जल (जिसकी नेमतें अज़ीम व जलील हैं) के लिये हर दौर में और हर अहदे फ़ितरत में ऐसे बन्दे रहे हैं जिनसे उसने उनके उफ़कार के ज़रिये राज़दाराना गुफ़्तगू की है और उनकी अक़्लों के वसीले से उनसे कलाम किया है और उन्होंने अपनी बसारत , समाअत और फ़िक्र की बेदारी के नूर की रौशनी हासिल की है। उन्हें अल्लाह के मख़सूस दिनों की याद अता की गई है और वह उसकी अज़मत से ख़ौफ़ज़दा रहते हैं। इनकी मिसाल बियाबानों के राहनुमाओं जैसी है के जो सही रास्ते पर चलता है उसकी रूश की तारीफ़ करते हैं और उसे निजात की बशारत देते हैं और जो दाहिने बाएं चला जाता है उसके रास्ते की मज़म्मत करते हैं और उसे हलाकत से डराते हैं और इसी अन्दाज़ से यह ज़ुल्मतों के चिराग़ और शबाहत के रहनुमा हैं।

बेशक ज़िक्रे ख़ुदा के भी कुछ अहल हैं जिन्होंने इसे सारी दुनिया का बदल क़रार दिया है और अब उन्हें तिजारत या ख़रीद फ़रोख़्त उस ज़िक्र से ग़ाफ़िल नहीं कर सकती है। यह उसके सहारे ज़िन्दगी के दिन काटते हैं और ग़ाफ़िलों के कानों में मोहर्रमात के रोकने वाली आवाज़ें दाखि़ल कर देते हैं। लोगों को नेकियों का हुक्म देते हैं और ख़ुद भी इसी पर अमल करते है। बुराइयों से रोकते हैं और ख़ुद भी बाजज़ रहते हैं गोया उन्होंने दुनिया मेंरहकर आखि़रत तक का फ़ासला तय कर लिया है और पस पर्दाए दुनिया जो कुछ है सब देख लिया है और गोया के उन्होंने बरज़ख़ के तवील व अरीज़ ज़माने के मख़फ़ी हालात पर इत्तेला हासिल कर ली है और गोया के क़यामत ने उनके लिये अपने वादों को पूरा कर दिया है और उन्होंने अहले दुनिया के लिये इस पर्दे को उठा दिया है। के अब वह उन चीज़ों को देख रहे हैं जिन्हें आम लोग नहीं देख सकते हैं और उन आवाज़ों को सुन रहे हैं जिन्हें दूसरे लोग नहीं सुन सकते हैं। अगर तुम अपनी अक़्ल से उनकी इस तसवीर को तैयार करो जो उनके क़ाबिले तारीफ़ मक़ामात और क़ाबिले हुज़ूर मजालिस की है। जहां उन्होंने अपने आमाल के दफ़्तर फैलाए हुए हैं और अपने हर छोटे बड़े अमल का हिसाब देने के लिये तैयार हैं जिनका हुक्म दिया गया था और उनमें कोताही हो गई है या जिनसे रोका गया था और तक़सीर हो गई है और अपनी पुश्त पर तमाम आमाल का बोझ उठाए हुए हैं लेकिन उठाने के क़ाबिल नहीं हैं और अब रोते रोते हिचकियाँ बन्ध गई हैं और एक दूसरे को रो-रो कर उसके सवाल का जवाब दे रहे हैं और निदामत और एतराफ़े गुनाह के साथ परवरदिगार की बारगाह में फ़रयाद कर रहे हैं। तो वह तुम्हें हिदायत के निशान और तारीकी के चिराग़ नज़र आएंगे जिनके गिर्द मलाएका का घेरा होगा और उन पर परवरदिगार की तरफ़ से सुकून व इतमीनान का मुसलसल नुज़ूल होगा और उनके लिये आसमान के दरवाज़े खोल दिये गए होंगे और करामतों की मन्ज़िलें मुहैया कर दी गई होंगी।

(((- इन हक़ाएक़ का सही इज़हार वही कर सकता है जो यक़ीन की इस आखि़री मंज़िल पर फ़ाएज़ हो जिसके बाद खुद यह एलान करता हो के अब अगर पर्दे हटा भी दिये जाएं तो यक़ीन में किसी तरह का इज़ाफ़ा नहीं हो सकता और हक़ीक़ते अम्र यह है के इस्लाम में अहले ज़िक्र सिर्फ़ साहेबाने इल्म व फ़ज़ल का नाम नहीं है बल्कि ज़िक्रे इलाही का अहल बनाकर उन अफ़राद को क़रार दिया गया है जो तक़वा और परहेज़गारी की आखि़री मन्ज़िल पर हों और आखि़रत को अपनी निगाहों से देखकर सारी दुनिया को राह व चाह से आगाह कर रहे हों। मलाएका मुक़र्रबीन में उनके गिर्द घेरे डाले हों लेकिन इसके बाद भी अज़मत व जलाले इलाही के तसव्वुर अपने आमाल को बेक़ीमत समझ कर लरज़ रहे हों और मुसलसल अपनी कोताहियों का इक़रार कर रहे हों। -)))

ऐसे मक़ाम पर जहां मालिक की निगाह उनकी तरफ़ हो और वह उनकी सई से राज़ी हो और उनकी मन्ज़िल की तारीफ़ कर रहा हो। वह मालिक को पुकारने की फ़रहत से बख़्िशश की हवाओं में सांस लेते हों। उसके फ़ज़्ल व करम की एहतियाज के हाथों रेहन (गिरवीं) हों और उसकी अज़मत के सामने ज़िल्लत के असीर हों। ग़म व अन्दोह के तूले ज़मान ने उनके दिलों को मजरूह कर दिया हो और मुसलसल गिरया ने उनकी आंखों को ज़ख़्मी कर दिया हो। मालिक की तरफ़ रग़बत के हर दरवाज़े को खटखटा रहे हों और उससे सवाल कर रहे हों जिसके जूदो करम की वुसअतों में तंगी नहीं आती है और जिसकी तरफ़ रग़बत करने वाले कभी मायूस नहीं होते हैं। देखो अपनी भलाई के लिये ख़ुद अपने नफ़्स का हिसाब करो के दूसरों के नफ़्स का हिसाब करने वाला कोई और है।

223-आपका इरशादे गिरामी

(जिसे आयत शरीफ़ “ या अय्योहल इन्सान मा ग़र्रका बे रब्बेकल करीम... ” ( ऐ इन्सान तुझे ख़ुदाए करीम के बारे में किस शै ने धोके में डाल दिया है ? ) के ज़ैल में इरशाद फ़रमाया है)

देखो यह इन्सान जिससे यह सवाल किया गया है वह अपनी दलील के एतबार से किस क़द्र कमज़ोर है और अपने फ़रेबखोरदा होने के एतबार से किस क़द्र नाक़िस माज़ेरत का हामिल है। यक़ीनन उसने अपने नफ़्स को जेहालत की सख्तियो में मुब्तिला कर दिया है।

ऐ इन्सान! सच बता , तुझे किस शै ने गुनाहों की जराअत दिलाई है और किस चीज़ ने परवरदिगार के बारे में धोके में रखा है और किस अम्र ने नफ़्स की हलाकत पर भी मुतमईन बना दिया है , क्या तेरे इस मर्ज़ का कोई इलाज और तेरे इस ख़्वाब की कोई बेदारी नहीं है और क्या अपने नफ़्सपर इतना भी रहम नहीं करता है जितना दूसरों पर करता है के जब कभी आफ़ताब की हरारत में किसी को तपता देखता है तो साया कर देता है या किसी को दर्द व रन्ज में मुब्तिला देखता है तो उसके हाल पर रोने लगता है तो आखि़र किस शै ने तुझे ख़ुद अपने मर्ज़ पर सब्र दिला दिया है। और अपनी मुसीबत पर सामाने सुकून फ़राहम कर दिया है और अपने नफ़्स पर रोने से रोक दिया है जबके वह तुझे सबसे ज़्यादा अज़ीज़ है , और क्यों रातों रात अज़ाबे इलाही के नाज़िल हो जाने का तसव्वुर तुझे बेदार नहीं रखता है जबके तू उसकी नाफ़रमानियों की बिना पर उसके क़हर व ग़लबे की राह में पड़ा हुआ है।

अभी ग़नीमत है के अपने दिल की सुस्ती का अज़्म रासिख़ से इलाज कर ले और अपनी आंखों में ग़फ़लत की नीन्द का बेदर्दी से मदावा कर ले अल्लाह का इताअत गुज़ार बन जा। उसकी याद से उन्स हासिल कर और उस अम्र का तसव्वुर कर के किस तरह वह तेरे दूसरों की तरफ़ मुंह मोड़ लेने के बावजूद वह तेरी तरफ़ मुतवज्जेह रहता है। तुझे माफ़ी की दावत देता है। अपने फ़ज़्ल व करम में ढांप लेता है हालांके तू दूसरों की तरफ़ रूख़ किये हुए है। बलन्द व बाला है वह साहेबे क़ूवत जो इस क़द्र करम करता है और ज़ईफ़ व नातवां है तू इन्सान जो उसकी मासीयत की इस क़द्र जराअत रखता है जबके उसी के ऐबपोशी के हमसाये में मुक़ीम है और उसी के फ़ज़्ल व करम की वुसअतों में करवटें बदल रहा है। वह न अपने फ़ज़्ल व करम को तुझसंे रोकता है और न तेरे परदाएराज़ को फ़ाश करता है।

(((- हक़ीक़ते अम्र यह है के इन्सान आखि़रत की तरफ़ से बिलकुल ग़फ़लत का मुजस्समा बन गया है के दुनिया में किसी को तकलीफ़ में नहीं देख पाता है और उसकी दादरसी के लिये तैयार हो जाता है और आखि़रत में पेश आने वाले ख़ुद अपने मसाएब की तरफ़ से भी यकसर ग़ाफ़िल है और एक लम्हे के लिये भी आफ़ताबे महशर के साये और गर्मी क़यामत की तश्नगी का इन्तेज़ाम नहीं करता है। बल्कि बाज़ औक़ात इसका मज़ाक़ भी उड़ाता है “ इन्ना लिल्लाहे ..... ”-)))

यह तो पलक झपकने के बराबर भी इसकी मेहरबानियों से ख़ाली नहीं है , कभी नई नई नेमतें अता करता है , कभी बुराइयों की परदापोशी करता है और कभी बलाओं को रद कर देता है जबके तू इसकी मासियत कर रहा है तो सोच अगर तू इताअत करता तो क्या होता ?

ख़ुदा गवाह है के अगर यह बरताव दो बराबर की क़ूवत व क़ुदरत वालों के दरम्यान होता और तू दूसरे के साथ ऐसा ही बरताव करता तो ख़ुद ही सबसे पहले अपने नफ़्स के बदअख़लाक़ और बदअमल होने का फ़ैसला कर देता लेकिन अफ़सोस ?

मैं सच कहता हूं के दुनिया ने तुझे धोका नहीं दिया है तूने दुनिया से धोका खाया है , उसने तो नसीहतों को खोल कर सामने रख दिया है और तुझे हर चीज़ से बराबर आगाह किया है। उसने जिस्म पर जिन नाज़िल होने वाली बलाओं का वादा किया है और क़ूवत में जिस कमज़ोरी की ख़बर दी है उसमें वह बिलकुल सही और वफ़ाए अहद करने वाली है। न झूठ बोलने वाली है और न धोका देने वाली। बल्कि बहुत से उसके बारे में नसीहत करने वाले हैं जो तेरे नज़दीक नाक़ाबिले एतबार हैं और सच-सच बाोलने वाले हैं जो तेरी निगाह में झूठे हैं।

अगर तूने उसे गिर पड़े मकानात और ग़ैर आबाद मन्ज़िलों में पहचान लिया होता तो देखता के वह अपनी याद देहानी और बलीग़तरीन नसीहत में तुझपर किस क़द्र मेहरबान है और तेरी तबाही के बारे में किसी क़द्र कंजूसी से काम लेती है। यह दुनिया उसके लिये बेहतरीन घर है जो इसको घर बनाने से राज़ी न हो और उसके लिये बेहतरीन वतन है जो इसे वतन बनाने पर आमादा न हो , इस दुनिया के रहने वालों में कल के दिन नेक बख़्त वही होंगे जो आज इससे गुरेज़ करने पर आमादा हों। देखो जब ज़मीन को ज़लज़ला आ जाएगा और क़यामत अपनी अज़ीम मुसीबतों के साथ खड़ी हो जाएगी और हर इबादतगाह के साथ उसके इबादत गुज़ार , हर माबूद के साथ उसके बन्दे और हर क़ाबिले इताअत के साथ उसके मुतीअ व फ़रमाबरदार मुलहक़ कर दिये जाएंगे तो कोई हवा में शिगाफ़ करने वाली निगाह और ज़मीन पर पड़ने वाले क़दम की आहट ऐसी न होगी जिसका अद्ल व इन्साफ़ के साथ पूरा बदला न दे दिया जाए। उस दिन कितनी ही दलीलें होंगी जो बेकार हो जाएंगी और कितने ही माज़ेरत के रिश्ते होंगे जो कट के रह जाएंगे। लेहाज़ा मुनासिब है के अभी से इन चीज़ों को तलाश कर लो जिनसे बहाना क़ायम हो सके और तुम्हारी हुज्जतें साबित हो सकें। जिस दुनिया में तुमको नहीं रहना है उसमें से वह ले लो जो तुम्हारे लिये हमेशा बाक़ी रहने वाली हैं निजात की रोशनी की चमक देख लो और आमादगी की सवारियों पर सामान बार कर लो।

224-आपका इरशादे गिरामी

(जिसमें ज़ुल्म से बराअत व बेज़ारी का इज़हार फ़रमाया गया है।)

ख़ुदा गवाह है के मेरे लिये सादान की ख़ारदार झाड़ी पर जाग कर रात गुज़ार लेना या ज़न्जीरों में क़ैद होकरर खींचा जाना इस अम्र से ज़्यादा अज़ीज़ है के रोज़े क़यामत परवरदिगार से इस आलम में मुलाक़ात करूं के किसी बन्दे पर ज़ुल्म कर चुका हूँ या दुनिया के किसी मामूली माल को ग़स्ब किया हो , भला किसी शख़्स पर भी उस नफ़्स के लिये किस तरह ज़ुल्म करूंगा जो फ़ना की तरफ़ बहुत जल्द पलटने वाला है और ज़मीन के अन्दर बहुत दिनों तक रहने वाला है।

ख़ुदा की क़सम मैंने अक़ील को ख़ुद देखा है के उन्होंने फ़क़्र व फ़ाक़े की बिना पर तुम्हारे हिस्से गन्दुम में से तीन किलो का मुतालेबा किया था जबके उनके बच्चों के बाल ग़ुरबत की बिना पर परागन्दा हो चुके थे और उनके चेहररों के रंग यूँ बदल चुके थे जैसे उन्हें तेल छिड़क कर सियाह बनाया गया हो और उन्होंने मुझसे बार-बार तक़ाज़ा किया और मगर अपने मुतालबे को दोहराया तो मैंने उनकी तरफ़ कान धर दिये और वह यह समझे के शायद मैं दीन बेचने और अपने रास्ते को छोड़कर उनके मुतालबे पर चलने के लिये तैयार हो गया हूँ। लेकिन मैंने उनके लिये लोहा गरम किया और फिर उनके जिस्म के क़रीब ले गया ताके इससे इबरत हासिल करें। उन्होंने लोहा देखकर यूँ फ़रयाद शुरू कर दी जैसे कोई बीमार अपने दर्द व अलम से फ़रयाद करता हो और क़रीब था के उनका जिस्म इसके दाग़ देने से जल जाए। तो मैंने कहा रोने वालियां आपके ग़म में रोएं ऐ अक़ील! आप इस लोहे से फ़रयाद कर रहे हैं जिसे एक इन्सान ने फ़क़त हंसी मज़ाक़ में तपाया है और मुझे उस आग की तरफ़ खींच रहे हैं जिसे ख़ुदाए जब्बार ने अपने ग़ज़ब की बुनियाद पर भड़काया है। आप अज़ीयत से फ़रयाद करें और मैं जहन्नुम से फ़रयाद न करूं।

इससे ज़्यादा ताज्जुब ख़ेज़ बात यह है के एक रात एक शख़्स (अशअस बिन क़ैस) मेरे पास शहद में गुन्धा हुआ हलवा बर्तन में रखकर लाया जो मुझे इस क़द्र नागवार था जैसे सांप के थूक या क़ै से गून्धा गया हो। मैंने पूछा के यह कोई इनआम है या ज़कात या सदक़ा जो हम अहलेबैत पर हराम है ? उसने कहा के यह कुछ नहीं है , यह फ़क़त एक हदिया है! मैंने कहा के पिसरे मुर्दा औरतें तुझको रोएं तू दीने ख़ुदा के रास्ते से आकर मुझे धोका देना चाहता है , तेरा दिमाग़ ख़राब हो गया है या तू पागल हो गया है या हिज़यान का शिकार रहा है , आखि़र है क्या ? ख़ुदा गवाह है के अगर मुझे हफ़्त अक़लीम की हुकूमत तमाम ज़ेरे आसमान दौलतों के साथ दे दी जाए और मुझसे यह मुतालबा किया जाए के मैं किसी च्यूंटी पर सिर्फ़ इस क़द्र ज़ुल्म करूँ के उसके मुंह से उस छिलके को छीन लूँ जो वह चबा रही है तो हरगिज़ ऐसा नहीं कर सकता हूँ। यह तुम्हारी दुनिया मेरी नज़र में उस पत्ती से ज़्यादा बेक़ीमत है जो किसी टिड्डी के मुंह में हो और वह उसे चबा रही हो। भला अली (अ 0) को इन नेमतों से क्या वास्ता जो फ़ना हो जाने वाली हैं और उस लज़्ज़त से क्या ताल्लुक़ जो बाक़ी रहने वाली नहीं है। मैं ख़ुदा की पनाह चाहता हूँ , अक़्ल के ख़्वाबे ग़फ़लत मे पड़ जाने और लग़्ज़िशों की बुराइयों से और मैं उसी से मदद का तलबगार हूँ।

(((- जनाबे अक़ील आपके बड़े भाई और हक़ीक़ी (सगे) भाई थे लेकिन इसके बावजूद आपने यह आदिलाना बरताव करके वाज़ेह कर दिया के दीने इलाही में रिश्ता व क़राबत का गुज़र नहीं है। दीन का ज़िम्मेदार वही शख़्स हो सकता है जो माले ख़ुदा को माले ख़ुदा तसव्वुर करे और इस मसले में किसी तरह की रिश्तेदारी और ताल्लुक़ को शामिल न करे। अमीरूल मोमेनीन (अ 0) के किरदार का वह नुमायां इम्तियाज़ है जिसका अन्दाज़ा दोस्त और दुश्मन दोनों को था और कोई भी इस मारेफ़त से बेगाना न था।-)))

225-आपकी दुआ का एक हिस्सा

(जिसमें परवरदिगार से बेनियाज़ी का मुतालबा किया गया है)

ख़ुदाया मेरी आबरू को मालदारी के ज़रिये महफ़ूज़ फ़रमा और मेरी मन्ज़िलत को ग़ुरबत की बिना पर निगाहों से न गिरने देना के मुझे तुझसे रिज़्क़ (रोज़ी) मांगने वालों से से मांगना पड़े या तेरी बदतरीन मख़लूक़ात से रहम की दरख़्वास्त करना पड़े और इसके बाद मैं हर अता करने वाले की तारीफ़ करूं और हर इन्कार करने वाले की मज़म्मत में मुब्तिला हो जाऊ जबके इन सब के पसे पर्दा अता व इनकार दोनों का इख़्तेयार तेरे ही हाथ में है और तू ही हर शै पर क़ुदरत रखने वाला है।

226-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

(जिसमें दुनिया से नफ़रत दिलाई गई है)

यह एक ऐसा घर है जो बलाओं में घिरा हुआ है और अपनी ग़द्दारी में मशहूर है न इसके हालात को दवाम है और न इसमें नाज़िल होने वालों के लिये सलामती है। इसके हालात मुख़्तलिफ़ और इसके अतवार बदलने वाले हैं। इसमें पुरकैफ़ ज़िन्दगी क़ाबिले मज़म्मत है और इसमें अम्न व अमान का दूर दूर पता नहीं है। इसके बाशिन्दे वह निशाने हैं जिन पर दुनिया अपने तीर चलाती रहती है और अपनी मुद्दत के सहारे उन्हें फ़ना के घाट उतारती रहती है।

बन्दगाने ख़ुदा! याद रखो इस दुनिया में तुम और जो कुछ तुम्हारे पास है सबका वही रास्ता है जिस पर पहले वाले चल चुके हैं जिनकी उम्रें तुमसे ज़्यादा तवील और जिनके इलाक़े तुमसे ज़्यादा आबाद थे। उनके आसार (पाएदार निशानियां) भी दूर दूर तक फैले हुए थे। लेकिन अब उनकी आवाज़ें दब गई हैं उनकी हवाएं उखड़ गई हैं। इनके जिस्म बोसीदा हो गए हैं। इनके मकानात ख़ाली हो गए हैं और इनके आसार मिट गए हैं। वह मुस्तहकम क़िलों और बिछी हुई मसनदों को पत्थरों और चुनी हुई सिलों और ज़मीन के अन्दर लहद वाली क़ब्रों में तबदील कर चुके हैं। उनके सहनों की बुनियाद तबाही पर क़ायम है और जिनकी इमारत मिट्टी से मज़बूत की गई है। इन क़ब्रों की जगहें तो क़रीब-क़रीब हैं लेकिन इनके रहने वाले सब एक-दूसरे से ग़रीब और अजनबी हैं। ऐसे लोगों के दरम्यान हैं जो बौखलाए हुए हैं और यहों के कामों से फ़ारिग़ होकर वहाँ की फ़िक्र में मशग़ूल हो गए हैं। न अपने वतन से कोई उन्स रखते हैं और न अपने हमसायों से कोई राबेता रखते हैं।

(((- यह फ़िक़रात बेऐनेही इसी तरह इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ 0) की मकारमे इख़लाक़ में भी पाए जाते हैं जो इस बात की अलामत है के अहलेबैत (अ 0) का किरदार और उनका पैग़ाम हमेशा एक अन्दाज़ का होता है और इसमें किसी तरह का इख़्तेलाफ़ व इन्तेशार नहीं होता है।

इस ख़ुतबे में दुनिया के हस्बे ज़ैल ख़ुसूसियात का तज़किरा किया गया हैः 1- यह मकान बलाओं में घिरा हुआ है। 2- इसकी ग़द्दारी मारूफ़ है। 3- इसके हालात हमेशा बदलते रहते हैं। 4- इसकी ज़िन्दगी का अन्जाम मौत है। 5- इसकी ज़िन्दगी क़ाबिले मज़म्मत है। 6- इसमें अम्न व अमान नहीं है। 7- इसके बाशिन्दे बलाओं और मुसीबतों का हदफ़ हैं।-)))

बल्कि बिल्कुल क़रीब व जवार और नज़दीक तरीन दयार में हैं और ज़ाहिर है के अब मुलाक़ात का क्या इमकान है जबके बोसीदगी ने उन्हें अपने सीने से दबाकर पीस डाला है और पत्थरों और मिट्टी ने उन्हें खाकर बराबर कर दिया है और गोया के अब तुम भी वहीं पहुंच गए हो जहां वह पहुंच चुके हैं और तुम्हें भी इसी क़ब्र ने गिर्द रख लिया है और इसी अमानतगाह ने जकड़ लिया है। सोचो! उस वक़्त क्या होगा जब तुम्हारे तमाम मुआमलात आखि़री हद को पहुंच जाएंगे और दोबारा क़ब्रों से निकाल लिया जाएगा , उस वक़्त हर नफ़्स अपने आमाल का ख़ुद मुहासेबा करेगा और सबको मालिके बरहक़ की तरफ़ पलटा दिया जाएगा और किसी की कोई इफ़तर परवाज़ी काम आने वाली नहीं होगी।

227-आपकी दुआ का एक हिस्सा

(जिसमें नेक रास्ते की हिदायत का मुतालेबा किया गया है)

परवरदिगार तू अपने दोस्तों के लिये तमाम उन्स फ़राहम करने वालों से ज़्यादा सबबे उन्स और तमाम अपने ऊपर (तुझ पर) भरोसा करने वालों के लिये सबसे ज़्यादा हाजतरवाई के लिये हाज़िर है। तू उनकी बातिनी कैफ़ियतों को देखता और उनके छिपे हुए भेदों पर निगाह रखता है और उनकी बसीरतों की आखि़री हदों को भी जानता है। उनके इसरार तेरे लिये रौशन और उनके क़ुलूब तेरी बारगाह में फ़रियादी हैं। जब ग़ुरबत उन्हें मुतवहश (घबराहट) करती है तो तेरी याद उन्स का सामान फ़राहम कर देती है और जब मसाएब उन पर उन्डेल दिये जाते हैं तो वह तेरी पनाह तलाश कर लेते हैं इसलिये के उन्हें इस बात का इल्म है के तमाम मामलात की ज़माम तेरे हाथ में है और तमाम उमूर का फ़ैसला तेरी ही ज़ात से सादर (वाबस्ता) होता है।

ख़ुदाया! अगर मैं अपने सवालात को पेश करने से आजिज़ हूँ और मुझे अपने मुतालेबात की राह नज़र नहीं आती है तो तू मेरे मसालेह की रहनुमाई फ़रमा और मेरे दिल को हिदायत की मन्ज़िलों तक पहुंचा दे के यह बात तेरी हिदायतों के लिये कोई अनोखी नहीं है और तेरी हाजत रवाइयों के सिलसिले में कोई निराली नहीं है। ख़ुदाया मेरे मामलात को अपने अफ़्व व करम पर महमूल (तय) करना और अद्ल व इन्साफ़ पर महमूल (तय) न करना।


228-आपका इरशादे गिरामी

(जिसमें अपने बाज़ असहाब का तज़किरा फ़रमाया है)

अल्लाह फ़ुलां शख़्स ( 1) का भला करे के उसने कजी को सीधा किया और मर्ज़ का इलाज किया , सुन्नत को क़ायम किया और फ़ितनों को छोड़ कर चला गया। दुनिया से इस आलम में गया के उसका लिबास हयाते पाकीज़ा था और उसके ऐब बहुत कम थे।

(((- इब्ने अबिल हदीद ने सातवीं सदी हिजरी में यह इनकेशाफ़ किया के इन फ़िक़रात में फ़लां से मुराद हज़रत उमर हैं और फिर उसकी वज़ाहत में 87सफ़हे स्याह कर डाले हालांके इसका कोई सबूत नहीं है और न सय्यद रज़ी के दौर के नुस्ख़ों में इसका कोई तज़किरा है और फिर इस्लामी दुनिया के सरबराह की तारीफ़ के लिये लफ़्ज़े फ़ुलां के कोई मानी नहीं हैं। ख़ुतबए शक़शक़िया में लफ़्ज़े फ़ुलां का इमकान है लेकिन मदह में लफ़्ज़े फ़ुलां में अजीब व ग़रीब मालूम होता है। इस लफ़्ज़ से यह अन्दाज़ा होता है के किसी ऐसे सहाबी का तज़किरा है जिसे आम लोग बरदाश्त नहीं कर सकते हैं और अमीरूल मोमेनीन (अ 0) उसकी तारीफ़ ज़रूरी तसव्वुर फ़़रमाते हैं)))

उसने दुनिया के ख़ैर को हासिल कर लिया और उसके शर से आगे बढ़ गया। अल्लाह की इताअत का हक़ अदा कर दिया और इससे मुकम्मल तौर पर ख़ौफ़ज़दा होकर वह दुनिया से इस आलम में रूख़सत हुआ के (ख़ुद चला गया और) लोग मुतफ़र्रिक़ (गुमकर्दा) रास्तों पर थे जहां न गुमराह हिदायत पा सकता था और न हिदायत याफ़्ता यक़ीन तक जा सकता था।

229-आपका इरशादे गिरामी

अपनी बैयते खि़लाफ़त के बारे में)

तुमने बैअत के लिये मेरी तरफ़ हाथ फैलाना चाहा तो मैंने रोक लिया और उसे खींचना चाहा तो मैंने समेट लिया , लेकिन इसके बाद तुम इस तरह मुझ पर टूट पड़े जिस तरह पानी पीने के दिन प्यासे ऊंट तालाब पर गिर पड़ते हैं। यहाँ तक के मेरी जूती का तस्मा टूट गया और अबा कान्धे से गिर गई और कमज़ोर अफ़राद कुचल गए। तुम्हारी ख़ुशी का यह आलम था के बच्चों ने ख़ुशियां मनाईं , बूढ़े लड़खड़ाते हुए क़दमों से आगे बढ़े , बीमार उठते-बैठते पहुंच गए और मेरी बैअत के लिये नौजवान लड़कियाँ भी पर्दे से बाहर निकल आईं (दौड़ पड़ीं)।

(((- किस क़द्र फ़र्क़ है इस बैअत में जिसके लिये बूढ़े , बच्चे , औरतें सब घर से निकल आए और कमाले इश्तियाक़ में साहबे मन्सब की बारगाह की तरफ़ दौड़ पड़े और इस बैअत में जिसके लिये बिन्ते रसूल (स 0) के दरवाज़े में आग लगाई गई , नफ़्से रसूल (स 0) को गले में रस्सी का फनदा डालकर घर से निकाला गया और सहाबाए कराम को ज़दो कोब किया गया। क्या ऐसी बैअत को भी इस्लामी बैअत कहा जा सकता है और ऐसे अन्दाज़ को भी जवाज़े खि़लाफ़त की दलील बनाया जा सकता है ? अमीरूल मोमेनीन (अ 0) ने अपनी बैअत का तज़किरा इसीलिये फ़रमाया है के साहेबाने अक़्ल व शऊर और अरबाबे अद्ल व इन्साफ़ बैअत के मानी का इदराक कर सकें और ज़ुल्म व जौर जब्र व इसतबदाद को बैअत का नाम न दे सकें और न उसे जवाज़े हुकूमत की दलील बना सकें-)))

230-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

यक़ीनन तक़वा इलाही हिदायत की कलीद और आखि़रत का ज़ख़ीरा है , हर गिरफ़्तारी से आज़ादी और हर तबाही से निजात का ज़रिया है। उसके वसीले से तलबगार कामयाब होते हैं , अज़ाब से फ़रार करने वाले निजात पाते हैं और बेहतरीन मतालिब हासिल होते हैं।

लेहाज़ा अमल करो के अभी आमाल बलन्द हो रहे हैं और तौबा फ़ायदामन्द है और दुआ सुनी जा रही है , हालात पुरसुकून हैं , क़लमे आमाल चल रहा है। अपने आमाल के ज़रिये आगे बढ़ जाओ जो उलटे पाँव चल रही है और इस मर्ज़ से जो आमाल से रोक देता है और इस मौत से जो अचानक झपट लेती है , इसलिये के मौत तुम्हारी लज़्ज़तों को फ़ना कर देने वाली , तुम्हारी ख़्वाहिशात को बदमज़ा कर देने वाली और तुम्हारी मन्ज़िलों को दूर कर देने वाली है। वह ऐसी ज़ाएर है जिसे कोई पसन्द नहीं करता है और ऐसी मुक़ाबिल है जो मग़लूब नहीं होती है और ऐसी क़ातिल है जिससे खूंबहा का मुतालबा नहीं होता है। उसने अपने फन्दे तुम्हारे गलों में डाल रखे हैं और उसकी हलाकतों ने तुम्हें घेरे में ले लिया है और इसके तीरों ने तुम्हें निशाना बना लिया है। इसकी सतवत (ग़लबा व तसलत) तुम्हारे बारे में अज़ीम है और इसकी तादियां मुसलसल हैं और इसका वार उचटता (वार ख़ाली जाने का इमकान) भी नहीं है। क़रीब है के इसके सहाबे मर्ग की तीरगियां , इसके मर्ज़ की सख्तियां , इसकी जाँकनी की अज़ीयतें , इसकी दम उखड़ने की बेहोशियाँ , इसके हर तरफ़ छा जाने की तारीकियां और बदमज़गियां , इसकी सख्तियो के अन्धेरे तुम्हें अपने घेरे में ले लें। गोया वह अचानक उस वारिद हो गई के तुम्हारे राज़दारों को ख़ामोश कर दिया , साथियों को मुन्तशिर कर दिया , आसार को महो कर दिया , दयार को मोअत्तल कर दिया और वारिसों को आमादा कर दिया , अब वह तुम्हारी मीरास को तक़सीम कर रहे हैं उन ख़ास अज़ीज़ों के दरम्यान जो काम नहीं आए और सन्जीदा रिश्तेदारों के दरम्यान जिन्होंने मौत को रोका नहीं (रोक न सके) और उन ख़ुश होने वालों के दरम्यान जो हरगिज़ बेचैन नहीं हैं। अब तुम्हारा फ़र्ज़ है के सई करो , कोशिश करो , तैयारी करो , आमादा हो जाओ , उस ज़ादे राह की जगह से ज़ादे सफ़र ले लो और ख़बरदार दुनिया मुम्हें उस तरह धोका न दे सके जैसे पहले वालों को दिया है जो उम्मतें गुज़र गईं और जो नस्लें तबाह हो गईं , जिन्होंने इसका दूध दोहा था , उसकी ग़फ़लत से फ़ायदा उठाया था , उसके बाक़ीमान्दा दिनों को गुज़ारा था और इसकी ताज़गियों को मुर्दा बना दिया था अब उनके मकानात क़ब्र बन गए हैं और उनके अमवाल मीरास क़रार पा गए हैं। न उन्हें अपने पास आने वालों की फ़िक्र है और न रोने वालों की परवाह है और न पुकारने वालों की आवाज़ पर लब्बैक कहते हैं। इस दुनिया से बचो के यह बड़ी धोकेबाज़ , फ़रेबकार , ग़द्दार , देने वाली और छीनने वाली और लिबास पिन्हाकर उतार लेने वाली है। न इसकी आसाइशें रहने वाली हैं और न इसकी तकलीफ़ें ख़त्म होने वाली हैं और न इसकी बलाएं थमने वाली हैं।

कुछ ज़ाहिदों के बारे में

यह उन्हीं दुनियावालों में मकीन अहले दुनिया नहीं थे , ऐसे थे जैसे इस दुनिया के न हों। देख भाल कर अमल किया और ख़तरात से आगे निकल गए। गोया इनके बदन अहले आखि़रत के दरम्यान करवटें बदल रहे हैं और वह यह देख रहे हैं के अहले दुनिया इनकी मौत को बड़ी अहमियत दे रहे हैं हालांके वह ख़ुद इन ज़िन्दों के दिलों की मौत को ज़्यादा बड़ा हादसा क़रार दे रहे हैं (जो ज़िन्दा हैं मगर उनके दिल मुर्दा हैं)।

(((- मौत का अजीबो ग़रीब कारोबार है के मालिक को दुनिया से उठा ले जाती है और उसका माल ऐसे अफ़राद के हवाले कर देती है जो ज़िन्दगी में काम आए और न मरहले ही में साथ दे सके। क्या इससे ज़्यादा इबरत का कोई मक़ाम हो सकता है के इन्सान ऐसी मौत से ग़ाफ़िल रहे और चन्द रोज़ा ज़िन्दगी की लज़्ज़तों में मुब्तिला होकर मौत के जुमला ख़तरात से बेख़बर हो जाए। दुनिया की इससे बेहतर कोई तारीफ़ नहीं हो सकती है के यह एक दिन बेहतरीन लिबास से इन्सान को आरास्ता करती है और दूसरे दिन उसे उतार कर सरे राह बरहना कर देती है। यही हाल ज़ाहिरी लिबास का भी होता है और यही हाल मानवी लिबास का भी होता है। हुस्न देकर बदशक्ल बना देती है। जवानी देकर बूढ़ा कर देती है , ज़िन्दगी देकर मुर्दा बना देती है तख़्त व ताज देकर कुन्ज व क़ब्र के हवाले कर देती है और साहेबे दरबार व बारगाह बनाकर क़ब्रिस्तान के वहशतकदे में छोड़ आती है।-)))

231-आपका इरशादे गिरामी

( अमीरूल मोमेनीन (अ 0) ने बसरा की तरफ़ जाते हुए मक़ामे ज़ीक़ार में यह ख़ुत्बा इरशाद फ़रमाया , इसका वाक़दी ने किताबुल जमल में ज़िक्र किया है)

रसूले अकरम (स 0) को जो हुक्म था उसे आप (स 0) ने खोल कर बयान कर दिया और अल्लाह के पैग़ामात पहुंचा दिये , अल्लाह ने आप (अ 0) के ज़रिये बिखरे हुए अफ़राद की शीराज़ाबन्दी की , सीनों में भरी हुई सख़्त अदावतों और दिलों में भड़क उठने वाले कीनों के बाद ख़विश व अक़ारब को आपस में शीरो शकर कर दिया।

232-आपका इरशादे गिरामी

( अब्दुल्लाह इब्ने ज़मा जो आपकी जमाअत में महसूब होता था आप (अ 0) के ज़मानए खि़लाफ़त में

कुछ माल तलब करने के लिये हज़रत (अ 0) के पास आया तो आप (अ 0) ने इरशाद फ़रमाया)

यह माल न मेरा है न तुम्हारा बल्कि मुसलमानों का हक़्क़े मुश्तरका और उनकी तलवारों का जमा किया हुआ सरमाया है। अगर तुम उनके साथ जंग में शरीक हुए होते तो तुम्हारा हिस्सा भी उनके बराबर होता , वरना उनके हाथों की कमाई दूसरों के मुंह का निवाला बनने के लिये नहीं है।

233-आपका इरशादे गिरामी

मालूम होना चाहिये के ज़बान इन्सान (के बदन का) एक टुकड़ा है जब इन्सान (का ज़ेहन) रूक जाए तो फिर कलाम उनका साथ नहीं दिया करता और जब उसके (मालूमात में) वुसअत हो तो फ़िर कलाम ज़बान को रूकने की मोहलत नहीं दिया करता और हम (अहलेबैत) अक़लीम सुख़न के फ़रमान रवा हैं। वह हमारे रगो पै में समाया हुआ है और उसकी शाख़ें हम पर झुकी हुई हैं। ख़ुदा तुम पर रहम करे इस बात को जान लो के तुम ऐसे दौर में हो जिसमें हक़ गो (हक़ बोलने वाले) कम , ज़बानें सिद्क़ बयानी से कुन्द और हक़ वाले ज़लील व ख़्वार हैं। यह लोग गुनाह व नाफ़रमानी पर जमे हुए हैं और ज़ाहिरदारी व निफ़ाक़ की बिना पर एक-दूसरे से सुलह व सफ़ाई रखते हैं। इनके जवान बदख़ू , इनके बूढ़े गुनहगार , इनके आलिम मुनाफ़िक़ और उनके वाएज़ चापलूस हैं , न छोटे बड़ों की ताज़ीम करते हैं और न मालदार फ़क़ीर व बेनवा की दस्तगीरी करते हैं।

234-आपका इरशादे गिरामी

ज़ालब यमानी ने इब्ने क़तीबा से और उसने अब्दुल्लाह इब्ने यज़ीद से उन्होंने मालिक इब्ने वहीह से रिवायत की है के उन्होंने कहा के हम अमीरूल मोमेनीन (अ 0) की खि़दमत में हाज़िर थे के लोगों के इख़्तेलाफ़ (सूरत व सीरत) का ज़िक्र छिड़ा तो आप (अ 0) ने फ़रमाया- इनके मबदातीनत ने इनमें तफ़रीक़ पैदा कर दी है और यह इस तरह के वह शूरा ज़ार व शीरीं ज़मीन और सख़्त व नर्म मिट्टी से पैदा हुए हैं लेहाज़ा वह ज़मीन के कुर्ब के एतबार से मुत्तफ़िक़ होते और इख़्तेलाफ़ के तनासुब से मुख़्तलिफ़ होते हैं (इस पर कभी ऐसा होता है के) पूरा ख़ुश शक्ल इन्सान अक़्ल में नाक़िस और बलन्द क़ामत आदमी पस्त हिम्मत हो जाता है और नेकोकार , बदसूरत और कोताह क़ामत दूरअन्देश होता है और तबअन नेक सरिश्त कसी बुरी आदत को पीछे लगा लेता है , और परेशान दिन वाला परागान्दा अक़्ल और चलती हुई ज़बान वाला होशमन्द दिल रखता है।


235-आपका इरशादे गिरामी

(रसूलल्लाह (स 0) को ग़ुस्ल कफ़न देते वक़्त फ़रमाया)

या रसूलल्लाह (स 0)! मेरे माँ बाप आप (स 0) पर क़ुरबान हों। आप (स 0) के रेहलत फ़रमा जाने से नबूवत , ख़ुदाई एहकाम और आसमानी ख़बरों का सिलसिला क़ता हो गया जो किसी और (नबी) के इन्तेक़ाल से क़ता नहीं हुआ था (आप (स 0) ने) इस मुसीबत में अपने अहलेबैत (अ 0) को मख़सूस किया यहाँ तक के आप (अ 0) ने दूसरों के ग़मों से तसल्ली दे दी और (इस ग़म को) आम भी कर दिया के सब लोग आप (अ 0) के (सोग में) बराबर के शरीक हैं। अगर आप (अ 0) ने सब्र का हुक्म और नाला व फ़रियाद से रोका न होता तो हम आप (अ 0) के ग़म में आंसुओं का ज़ख़ीरा ख़त्म कर देते और यह दर्द मन्नत पज़ीद दरमाँ न होता और यह ग़म व हुज़्न साथ न छोड़ता। (फिर भी यह) गिरया व बुका और अन्दोह व हुज़्न आपकी मुसीबत के मुक़ाबले में कम होता , लेकिन मौत ऐसी चीज़ है के जिसका पलटाना इख़्तेयार में नहीं है और न इसका दूर करना बस में है , मेरे माँ-बाप आप (अ 0) पर निसार हों हमें भी अपने परवरदिगार के पास याद कीजियेगा और हमारा ख़याल रखियेगा।

236- आपका इरशादे गिरामी (इसमें पैग़म्बर (स 0) की हिजरत के बाद अपनी कैफ़ियत और फिर उन तक पहुंचने तक की हालत का तज़किरा किया है)

मैं रसूलल्लाह (स 0) के रास्ते पर रवाना हुआ और आपके ज़िक्र के ख़ुतूत पर क़दम रखता हुआ मक़ामे अर्ज तक पहुंच गया।

सय्यद रज़ी - यह टुकड़ा एक तवील कलाम का जुज़ है और (फाता ज़िक्रा) ऐसा कलाम है जिसमें मुन्तहा दरजे का इख़्तेसार और फ़साहत मलहूज़ रखी गई है। इससे मुराद यह है के इब्तेदाए सफ़र से लेकर यहाँ तक के मैं इस मुक़ामे अरज तक पहुंचा बराबर आप (अ 0) की इत्तेलाआत मुझे पहुंच रही थीं। आप (अ 0) ने इस मतलब को इस अजीब व ग़रीब कनाया में अदा किया है।

237-आपका इरशादे गिरामी

आमाल बजा लाओ , अभी जबके तुम ज़िन्दगी की फ़िराख़ी व वुसअत में हो आमाल नामे खुले हुए हैं और तौबा का दामन फैला हुआ है। अल्लाह से रूख़ फ़ेर लेने वाले को पुकारा जा रहा है और गुनहगारों को उम्मीद दिलाई जा रही है क़ब्ल इसके के अमल की रोशनी गुल हो जाए और मोहलत हाथ से जाती रहे और मुद्दत ख़त्म हो जाए और तौबा का दरवाज़ा बन्द हो जाए और मलाएका आसमान पर चढ़ जाएं चाहिये के इन्सान ख़ुद अपने से (ख़ुद से) अपने वास्ते और ज़िन्दा से मुर्दा के लिये और फ़ानी से बाक़ी की ख़ातिर और जाने वाली ज़िन्दगी से हयाते जावेदानी के लिये नफ़ा व बहबूद हासिल करे वह इन्सान जिसे एक मुद्दत तक उम्र दी गई है और अमल की अन्जाम दही के लिये मोहलत भी मिली है उसे अल्लाह से डरना चाहिये मर्द वह है जो अपने नफ़्स को लगाम दे के उसकी बागें चढ़ाकर अपने क़ाबू में रखे और लगाम के ज़रिये उसे अल्लाह की नाफ़रमानियों से रोके और उसकी बागें थाम कर अल्लाह की इताअत की तरफ़ खींच ले जाए।

238- आपका इरशादे गिरामी

(दोनों सालेसों (अबू मूसा व अम्रो इब्ने आस) के बारे में और अहले शाम की मज़म्मत में फ़रमाया)

वह तून्दख़ू औबाश और कमीने बदक़माश हैं के जो हर तरफ़ से इकट्ठा कर लिये गये हैं और मख़लूतुन नसब लोगों में से चुन लिये गए हैं , वह उन लोगों में से हैं जो जेहालत की बिना पर इस क़ाबिल हैं के उन्हें (अभी इस्लाम के मुताल्लिक़) कुछ बताया जाए और शाइस्तगी सिखाई जाए (अच्छाई और बुराई की तालीम) दी जाए और (अमल की) मशक़ कराई जाए और उन पर किसी निगरान को छोड़ा जाए और उनके हाथ पकड़कर चलाया जाए , न तो वह मुहाजिर हैं न अन्सार और न इन लोगों में से हैं जो मदीने में फरोकश थे। देखो! अहले शाम ने तो अपने लिये ऐसे शख़्स को मुन्तख़ब किया है जो उनके पसन्दीदा मक़सद के बहुत क़रीब है और तुमने ऐसे शख़्स को चुना है जो तुम्हारे नापसन्दीदा मक़सद से इन्तेहाई नज़दीक है। तुमको अब्दुल्लाह इब्ने क़ैस (अबू मूसा) का कल वाला वक़्त याद होगा (के वह कहता फिरता था) के “ यह जंग एक फ़ित्ना है लेहाज़ा अपनी कमानों के चिल्लों को तोड़ दो और तलवारों को न्यामों में रख लो ” अगर वह अपने इस क़ौल में सच्चा था तो (हमारे साथ) चल खड़ा होने में ख़ताकार है के जबके इस पर कोई जब्र भी नहीं और अगर झूठा था तो इस पर (तुम्हें) बे एतमादी होना चाहिये लेहाज़ा अम्रो इब्ने आस के धकेलने के लिये अब्दुल्लाह इब्ने आस को मुन्तख़ब करो , इन दोनों की मोहलत ग़नीमत जानो और इसलामी (शहरों की) सरहदों को घेर लो क्या तुम अपने शहरों को नहीं देखते के उन पर हमले हो रहे हैं और तुम्हारी क़ूवत व ताक़त को निशाना बनाया जा रहा है।

239-आपका इरशादे गिरामी

(इसमें आले मोहम्मद अलैहिस्सलाम का ज़िक्र किया गया है)

यह लोग इल्म की ज़िन्दगी और जेहालत की मौत हैं। इनका हिल्म उनके इल्म से और इनका ज़ाहिर इनके बातिन से और इनकी ख़मोशी उनके कलाम से बाख़बर करती है। यह न हक़ की मुख़ालेफ़त करते हैं और न हक़ के बारे में कोई इख़्तेलाफ़ करते हैं। यह इस्लाम के सुतून और हिफ़ाज़त के मराकज़ हैं। उन्हीं के ज़रिये हक़ अपने मरकज़ की तरफ़ वापस आया है और बातिल अपनी जगह से उखड़ गया है और इसकी ज़बान जड़ से कट गई है। उन्होंने दीन को इस तरह पहचाना है जो समझो और निगरानी का नतीजा है। सिर्फ़ सुनने और रिवायत का नतीजा नहीं है। इसलिये के (यूं तो) इल्म की रिवायत करने वाले बहुत हैं और (मगर) इसका ख़याल रखने वाले बहुत कम हैं।

(((- इब्ने अबी अलहदीद ने इ समक़ाम पर ख़ुद अबू मूसा अशअरी की ज़बान से यह हदीस नक़ल की है के सरकारे दो आलम (स 0) ने फ़रमाया के जिस तरह बनी इसराईल में दो गुमराह हकम थे उसी तरह इस उम्मत में भी होंगे। तो लोगों ने अबू मूसा से कहा के कहीं आप ऐसे न हो जाएं , उसने कहा यह नामुमकिन है ,, और इसके बाद जब वक़्त आया तो तमए दुनिया ने ऐसा ही बना दिया जिसकी ख़बर सरकारे दो आल (स 0) ने दी थी।

हैरत की बात है के हकमीन के बारे में रिवायत ख़ुद अबू मूसा ने बयान की है और जो आपके सिलसिले में रिवायत ख़ुद उम्मुल मोमेनीन आइशा ने नक़्ल की है , लेकिन इसके बावजूद न उस रिवायत का कोई असर अबू मूसा पर हुआ और न इस रिवायत का कोई असर हज़रत आइशा पर।

इस सूरतेहाल को क्या कहा जाए और उसे क्या नाम दिया जाए , इन्सान का ज़ेहन सही ताबीर से आजिज़ है , और “ नातक़ा सर ब गरीबां है इसे क्या कहिये। ” सरकारे दो आलम (स 0) ने एक तरफ़ नमाज़ को इस्लाम का सुतून क़रार दिया है और दूसरी तरफ़ अहलेबैत (अ 0) के बारे में फ़रमाया है के जो मुझ पर और इन पर सलवात न पढ़े उसकी नमाज़ बातिल और बेकार है , जिसका खुला हुआ मतलब यह है के नमाज़ इस्लाम का सुतून है और मोहब्बते अहलेबैत (अ 0) नमाज़ का सुतूने अकबर है। नमाज़ नहीं है तो इस्लाम नहीं है और अहलेबैत (अ 0) नहीं हैं तो नमाज़ नहीं है-)))


240-आपका इरशादे गिरामी

( जिन दिनों में उस्मान इब्ने अफ़्फ़ान मुहासेरे में थे तो अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास उनकी एक तहरीर लेकर अमीरूल मोमेनीन (अ 0) के पास आए जिसमें आपसे ख़्वाहिश की थी के आप अपनी जागीरी नबा की तरफ़ चले जाएं ताके खि़लाफ़त के लिये जो हज़रत का नाम पुकारा जा रहा है उसमें कुछ कमी आ जाए और वह ऐसी दरख़्वास्त पहले भी कर चुके थे जिस पर हज़रत (अ 0) ने इब्ने अब्बास से फ़रमाया) -

ऐ इब्ने अब्बास! उस्मान तो बस यह चाहते हैं के वह मुझे अपना शतरआब कश बना लें जो डोल के साथ कभी आगे बढ़ता है और कभी पीछे हटता है , उन्होंने पहले भी यही पैग़ाम भेजा था के मैं (मदीने) से बाहर निकल जाऊं और इसके बाद यह कहलवा भेजा के मैं पलट आऊं , अब फिर वह पैग़ाम भेजते हैं के मैं यहां से चला जाऊँ (जहां तक मुनासिब था) मैंने उनको बचाया , अब तो मुझे डर है के मैं (उनको मदद देने से) कहीं गुनहगार न हो जाऊं।

241-आपका इरशादे गिरामी

ख़ुदा वन्दे आलम तुमसे अदाए शुक्र का तलबगार है और तुम्हें अपने इक़तेदार का मालिक बनाया है और तुम्हें इस (ज़िन्दगी के) महदूद मैदान में मोहलत दे रखी है ताके सबक़त का इनआम हासिल करने में एक-दूसरे से बढ़ने की कोशिश करो , कमरें मज़बूती से कस लो , और दामन गरदान लो , बलन्द हिम्मती और दावतों की ख़्वाहिश एक साथ नहीं चल सकती। रात की गहरी नीन्द दिन की महूमों में बड़ी कमज़ोरी पैदा करने वाली है और (इसकी) अन्धयारियां हिम्मत व जुरात की याद को बहुत मिटा देने वाली हैं।

ख़ुत्ब-ए-बिला नुक़्ता

मैं अल्लाह की हम्द करता हूँ जो बादशाह है , हम्द करदा मालिक है , मोहब्बत करने वाला हर मौलूद का मुसव्विर और हर ठुकराए हुए की बाज़गश्त है , फ़र्शे ज़िन्दगी का बिछाने वाला , पहाड़ों का क़ायम करने वाला , बारिश का भेजने वाला और सख्तियो का आसान करने वाला है , वह इसरार का जानने वाला मुदर्रिक और मुल्कों का बरबाद करने वाला और ज़मानों का गर्दिश देने वाला उनका लौटाने वाला और उमूर का मौरिद व मुसद्दर है उसकी सख़ावत आम है और उसका इन्तेज़ाम कामिल है। उसने मोहलत दी है और सवाल व उम्मीद में मतावेअत पैदा की है और रमुल व अरमुल को वुसअत दी।

मैं उसकी हम्द करता हूँ ऐसी हम्द के जो तवील है और उसकी तौहीद बयान करता हूँ जैसा के उसकी तरफ़ रूजू होने वालों ने बयान किया है। वही वह ख़ुदा है के उम्मतों का उसके सिवा कोई ख़ुदा नहीं। कोई उस शख़्स का बिगाड़ने वाला नहीं है जिसको उसने दुरूस्त किया हो , उसने मोहम्मद (स 0) को इस्लाम का इल्म और हुक्काम का इमाम ज़्यादतियों का रोकने वाला और वद और सेवाअ (दोनों बुत हैं) के एहकाम को बातिल करने वाला बनाकर भेजा उसने तालीम दी और हुक्म दिया और उसूलों को मुक़र्रर किया और हिदायत की वादा वफ़ाई की ताकीद की और अल्लाह ने इकराम को उसके साथ मुत्तसिल कर लिया और वदीअत की रूह को सलामती के साथ और उस पर रहम और उसके अहलेबैत को मुकर्रम किया। जब तक सराब की चमक बाक़ी है और चान्द रौशन है , और हलाल को देखने वाला सुनता रहे , जान लो ख़ुदा तुमसे रिआयत करे तुम्हारे आमाल की इस्लाह करे हलाल के रास्तों पर गामज़न रहो और हराम को तर्क करो और हुक्मे ख़ुदा को मानो , उसकी हिफ़ाज़त करो और सिलए रहम करो और उसकी रिआयत करो और ख़्वाहिशात की मुख़ालेफ़त करो और उनको छोड़ो और नेको कारों का साथ इख़्तेयार करो। लहो व लाब और लालचों से जुदाई इख़्तेयार करो तुम्हारे हम सोहबत लोग मुआमलात की हैसियत से पाक व पाकीज़ा हों और सरदारी की हैसियत से मुन्तख़ब हों और बहैसियत मेज़बान के शीरीं बयान हों और आगाह हो के उसी ने हराम किया है तुम्हारी माओं को और हलाल किया है तुम्हारी बीवियों को और मालिक बनाया है तुमको तुम्हारी मुकर्रम दुलहनों का और बनाया है तुमको उनका मेहर देने वाला जैसा के रसूलुल्लाह (स 0) ने उम्मे सलमा का मेहर अदा किया वह ख़स्र की हैसियत से बुज़ुर्गतरीन हस्ती हैं उन्होंने औलाद छोड़ी और मालिक बननाया हर उस चीज़ का जो उन्होंने चाहा उस मालिक बनाने वाले ने न ही सहो किया और न वहम व ग़फ़लत। मैं अल्लाह से तुम्हारे लिये सवाल करता हूँ के उनके वसाल की अच्छाईयां तुम्हें मिलें और उनकी सआदत की मदावमत हासिल हो और कल के लिये इस्लाह हासिल की और उसके माल व मआद के सामान के लिये यानी उसकी दुनिया व आख़ेरत की बहबूदी के लिये ख़्वाहिश करता हूँ हम्द व हमेशगी उसी के लिये है और मदहा उसके रसूल (स 0) के लिये है जिसका नाम अहमद (स 0) है।

ख़ुत्बए मोजिज़ा

((( इब्ने अबी अलहदीद अपनी शर्ह नहजुल बलाग़ा में नाक़िल हैं के एक दिन “ सहाबाए कराम ” में यह बहस हो रही थी के हुरूफ़े तहज्जी में सबसे ज़्यादा कसीरूल इस्तेमाल हर्फ़ कौन सा है ? तै हुआ के कलाम में “ अलिफ़ ” बग़ैर काम नहीं चल सकता। यह सुनकर अली इब्ने अबीतालिब (अ 0) खड़े हो गए और फ़िल बदीहा एक ऐसा ख़ुत्बा इरशाद फ़रमाया जो मफ़हूम के एतबार से निहायत पुरमग़्ज़ और बलीग़ लफ़्ज़ों के लेहाज़ से इन्तेहाई पुर असर और फ़सीह है फ़िर लुत्फ़ यह है के मक़फ़ी होते हुए भी इब्तिदा से आखि़र तक “ आविर्द ” की तरह “ अलिफ़ ” से भी ख़ाली है।)))

मुस्तहके़ हम्द है वह माबूद जिसकी अज़मत ख़ेज़ मिन्नत मुकम्मल नेमत , ग़ज़ब से बढ़ी हुई रहमत , हमहगीर मशीयत , महीते हुज्जत , दुरूस्त फ़ैसले मुझे दावते हम्द दे रहे हैं।

जिस तरह कोई रूबूबियत से मुतमस्सिक उबूदियत में मुस्तग़र्रिक़ , तौहीद में मुतफ़र्रिद , लग़ज़िश से बड़ी , धमकियों से ख़ौफ़ज़दा , महशर की किस्मपुरसी में बख़्शतों की तरफ़ मुतवज्जेह होकर माबूद की तारीफ़ करे , बईना यू नहीं हैं भी मदहेगुस्तर हूँ।

हम माबूद ही से रशद व मदद व रहबरी के मुतमन्नी हैं वही हस्ती हम सबके लिये मरकज़तरीन व महबूब तवक्कल है अब्दे मुख़लिस की तरह हम वजूदे माबूद के मुक़र्रर हैं मोमिन मुत्तक़ीन की तरह मुनफ़रिद समझते हैं मज़बूत अक़ीदा बन्दे की तरह फ़र्द फ़रीद तस्लीम करते हैं न कोई मुल्क में शरीक है , न सनअतगरी में दस्तगीर वह मुशीर व वज़ीर के मशविरों से बरतर है , नीज़ मदद व मददकुनन्दा हम पस्त व हमर की ज़रूरत से मुस्तग़नी , क़ुदरत हमस ब की लग़्ज़िशों को ख़ूब समझती है मगर मख़फ़ी रखती है वह तो तह की चीज़ों से भी ख़बर रखती है वह हुकूमत में सबको मुनज़्ज़म रखती है , हुक्म से सरकशी के वक़्त भी अफ़ो के क़लम को हरकत देती है , लोग बन्दगी करते हैं तो क़ुदरत एवज़ शुक्रिया पेश करती है , फ़ैसले में हमेशा अद्ल को मद्दे नज़र रखती है वह हमेशा से है हमेशा रहेगी। माबूद की मिस्ल व नज़ीर न कोई चीज़ थी , न है , न होगी , वह हर शै से पहले है , नीज़ हर शै के बाद है वह इज़्ज़त से

मोअजि़्ज़ज़ है , क़ूवत से मुतमक्कुन , बुज़ुर्गी की वजह से मु़क़द्दस है बरतरी की वजह से मुतकब्बिर है , चश्मे मख़लूक़ न माबूदे हक़ीक़ी को देख सकती है न किसी की नज़र महीत हो सकती है , वह क़वी व मुनीअ , समीअ व बसीर , रऊफ़ व रहीम है वस्फ़ कुन्दा माबूद , की ग़ैर महदूद सिफ़तों को देखकर गंग हैं बल्कि मारेफ़त के मुद्दई भी हक़ीक़ी तारीफ़ से गुमगश्ता हैं वह नज़दीक होते हुए दूर है , दूर होते हुए नज़दीक है। यह क़ुदरत ही तो है जो हर दावत पर लब्बैक कहती है , रिज़्क़ देती है बल्कि ज़रूरत से बढ़कर भी बख़्श देती है , वही तो मख़फ़ी मुरव्वत क़वी शौकत की मज़हर नीज़ वसीअ रहमत , तकलीफ़देह उक़ूबत की मिसदर है। यह वही हस्ती तो है जिसकी रहमत लम्बी चैड़ी क़ुबूल सूरत जन्नत है , जिसकी उक़ूबत वसीअ व तहलकाख़ेज़ दोज़ख़ है मेरी हस्ती बअसते मोहम्मद (स 0) की मिस्दक़ है जो रसूले अरबी अब्दे हक़ीक़ी बुरगज़ीदा नबी , शरीफ़ ख़सलत , हबीब व ख़लील हैं। वह हज़रत बेहतरीन अहद मगर कुफ्ऱ व बेअमली के दौर में मन्सबे नबूवत पर मुतमक्कन हुए बन्दों पर रहम करते हुए मिन्नत व करम में मज़ीद तरक़्क़ी देते हुए क़ुदरत ने कुल कमी पूरी कर दी यानी मोहम्मद (स 0) पर नबूवत ख़त्म करके हुज्जत मुस्तहकम कर दी।

हज़रत ने भी लोगों को वएज़ व नसीहत करने में कोई कमी नहीं की बल्कि भरपूर जद्दो जेहद की। वह हज़रत जुमला मोमेनीन के लिये शफ़ीअ हमदर्द , रहम दिल , सख़ी , पसन्दीदा व बरगुज़ीदा वली थे रब्ब व रहीम , क़रीब व मुजीब हकीम की तरफ़ से मोहम्मदे अरबी पर रहमत व तस्लीम नीज़ बरकत व ताज़ीम व तकरीम की बढ़न्ती (कसरत) हो , गिरोहे मौजूद! मेरे ज़रिये से तुम लोगों के लिये रब्बे क़दीर की वसीयत , नबीए करीम की सुन्नत पेश हो रही है जिसमें तुम सबके लिये नीज़ मेरे लिये नसीहत व मौएज़त के दफ़्तर हैं। तुम पर फ़र्ज़ है के तुम में वह डर मौजूद हो जिससे ख़ुद तुम्हीं लोगों के दिल को सुकून मयस्सर हो , वह ख़ौफ़ मख़फ़ी हो जिसकी मौजूदगी में चश्मे नम से सील न निकले , वह तक़य्या हो जो बोसीदगी के दिन से पहले ही कल महलकों से महफ़ूज़ कर दे , नीज़ रोज़े महशर से बेफ़िक्र कर दे जबके नेकियों की तूल वज़नी बदियों की तूल सुबुक होने की वजह से बशर को ऐश व इशरत की ज़िन्दगी नसीब होगी। तुम लोगों पर यह भी फ़र्ज़ है के ख़ुशू व ख़ुज़ू , तौबा व रूजूअ ज़िल्लत व शर्मिन्दगी की सूरत से माबूद की खि़दमत में अर्ज़ व मअरूज़ व तमलक़ करो। नीज़ तुम लोग मौक़े को ग़नीमत समझो , मर्ज़ से पहले सेहत की क़द्र करो , पीर फरतूत होने से पहले पीरी की इज़्ज़त करो , फ़क़ीरी से पहले दौलत की तौक़ीर करो। मशग़ूलियत से पहले वक़्ते फ़ुरसत को मद्दे नज़र रखो , सफ़र से पेशतर हिज़्र की क़द्र करो , करने से पहले ज़िन्दगी की हक़ीक़त को समझ लो , न मालूम कितने होंगे जो ज़ईफ़ व कमज़ोर मरीज़ बन गए हों जिनकी कैफ़ियत यह होगी के ख़ुद तबीब (नुस्ख़ा लिखते लिखते) थकन महसूस करने लगेंगे , दोस्त भी परहेज़ करने लगेंगे उम्र ख़त्म के क़रीब होगी , अक़्ल व फ़हम मुंह मोड़ चुके होंगे , कुछ लोग यह कह रहे होंगे के यह तो (जूतों से) पटी हुई सूरत है , जिस्म भी (पतली छड़ी की तरह) मदक़ूक़ है के यक ब यक नज़अ की कैफ़ियत शुरू हो गई नज़दीक व दूर के सब लोग मौजूद होंगे। मरीज़ के दीदों की गर्दिश सल्ब होगी। टकटकी बन्धी होगी , जबीन अर्क़ रेज़ , बीनी कज , तकलीफ़देह चीख़ में सुकून , बस नफ़्स में रन्ज व ग़म की कैफ़ियत महसूस हो रही होगी। बीवी रो-पीट रही होगी , बच्चे यतीम हो रहे होंगे। लहद दुरूस्त हो रही होगी। अज़ीज़ों में तफ़रिक़े की नीव पड़ रही होगी। तरके की तक़सीम होती होगी मगर ख़ुद मय्यत चश्म व गोश से बेताल्लुक़ होगी नौबत यह पहुंचेगी के लोग जिस्म के हिस्से खींच-खींच कर दुरूस्त कर देंगे फिर बदन से कपड़े दूर करेंगे यूं ही बरहना ग़ुस्ल देंगे , फिर धो- पोंछ कर किसी चीज़ पर रख देंगे। बादहू कफ़न में लेटेंगे। पहले मय्यत की ठुड्डी की बन्दिश करेंगे फिर क़ैस देकर सर पर पगड़ी लपेट देंगे , फिर तस्लीम करके रूख़सत करेंगे यानी किसी तख़्त पर मय्यत को रखेंगे , फिर बग़ैर सजदे के फ़रीज़े से तकबीर कह कर सब लोग सुबुकदोश होंगे , नीज़ मय्यत के लिये मग़फ़ेरत तलब करेंगे। फ़िर ज़ेब व ज़ीनत दिये हुए घर , मज़बूत व मुस्तहकम बने हुए क़स्र , सरबलन्द व मज़ीन महल से मुन्तक़िल करके लहद बनी हुई क़ब्र पहले से दुरूस्त किये हुए गड्ढे के सुपुर्द कर देंगें जिस पर संग व ख़ुश्त को बहम करके (मामूली सी) छत दुरूस्त कर देंगे फिर कुछ मिट्टी कुछ ढेले से गड्ढे को भर देंगे यही पर लोग जदीद मुसीबत को देखकर माबूद की खि़दमत में हुज़ूरी को यक़ीनी समझेंगे लेकिन ख़ुद मुर्दे को सहो महो कर देंगे। दोस्त हमदम हम मशरिब , अज़ीज़ क़रीब दफ़्न से पलटने के बाद दूसरे दूसरे दोस्त व रफ़ीक़ ढूंढ लेंगे मगर मय्यत ग़रीब बेकसी के घर में गरो है बल्कि क़ब्र के पेट में लुक़्मा है कैफ़ियत यह है के लहद के कीड़े बेहिस जिस्म पर दौड़ रहे हैं , नथनों से रूतूबत बह रही है , कीड़े तोड़े गोश्त व पोस्त को छलनी कर रहे हैं , ख़ून पी रहे हैं हड्डियों को बोसीदा कर रहे हैं , यौमे महशर तक यही सूरते हाल रहेगी। फिर सूर फूंकने के वक़्त हश्र व नश्र के लिये तलब होंगे। यही तो वह वक़्त है के क़ब्रों की जुस्तजू होगी सीने के मख़फ़ी ख़ज़ीने पेश होंगे नबी सिद्दीक़ शहीद (यानी मोहम्मद (स 0) अली (अ 0) हुसैन (अ 0)) महशर में तलब होंगे फिर रब्बे क़दीर की तरफ़ से जो के ख़बीर व बसीर है सबके फ़ैसले होंगे। मुल्के अज़ीम के पेशे नज़र जो हर छोटी बड़ी चीज़ से मुतलअ है , महशर के ज़बरदस्त पुरहौल मौक़ुफ़ में न मालूम कितने ज़िन्दगीकश शयून बलन्द होंगे , न मालूम कितनी दबी हुई हसरतें पूरी होंगी (यानी ज़ुल्म पेशा गिरोह से मज़लूमों के हुक़ुक़ मिलेंगे) यही वह वक़्त है जबके गले गले पसीने में सब ग़र्क़ होंगे , जहन्नम के शोले हर तरफ़ से घेरे होंगे , चश्मे हसरत से मुसलसल झड़ी बन्धने के बाद भी रहमत के दरमस्दूद चीख़ें बेसूद दलीलें मरदूद होंगी। जुर्म हद को पहुंच चुके होंगे दफ़्तरे अमल खुले रखे होंगे पेशे नज़र बुरे अमल होंगे चश्मे मुजरिम , नज़र की लग़ज़िश की , दस्ते ज़ुल्म तादी के , क़दम ग़लत रोश के , जिल्दे बदन , ग़ैर महरम से मिलने के जिस्म के मख़फ़ी हिस्से लम्स व तक़बील के ख़ुद ब ख़ुद मुक़र्रर होंगे। ख़त्मे हुज्जत के बाद , तौक़ दरे गरदन , दस्त ब ज़न्जीर खींचते घसीटते दोज़ख़ की तरफ़ ले चलेंगे फिर कर्ब व शिद्दत की मईयत में जहन्नुम के सुपुर्द कर देंगे पस तरह-तरह की उक़ूबतें शुरू होंगी , पीने के लिये ख़ून , पीप पेश करेंगे जिसकी वजह से सूरत झुलसी हुई मालूम होगी। जिस्म की जिल्द गल-गल के गिर रही होगी। लोहे के गुर्ज़ से फ़रिश्ते पीट रहे होंगे , जिल्दे बदन जल-जल के गिरती होगी। दूसरी नई जिल्द बनती होगी। बदनसीब के दोने पीटने की तरफ़ से जहन्नुम के मोवक्किल फ़रिश्ते भी मुंह फेरे होंगे। ग़रज़ के यूंहीं मुद्दतों चीख़ नीज़ शर्मिन्दगी की कैफ़ियत में बसर होगी। हम रब्बे क़दीर से हर तरह के फ़ित्ने व शर से तलबे हिफ़्ज़ करते हैं वह जिन लोगों से ख़ुश होकर जिस मक़बूलियत की सफ़ में जगह दिये हुए है हम भी कुछ वैसी ही मग़फ़ेरत व मक़बूलियत के मुतमन्नी हैं क्योंके वही हस्ती हम सबके हर मक़सूद व मतलब की मुतकफ़िल है बेशक जो लोग माबूद की उक़ूबतों से (नेक चलन होने की वजह से) बच गए वह इज़्ज़त माबूद ही के तुफ़ैल से जन्नत में पहुंचेंगे। सर बलन्द व मुस्तहकम महलों में हमेशा हमेशा के लिये ठहरेंगे जिस जगह ऐश व इशरत के लिये हूरें मिलेंगी , खि़दमत के लिये नौकर मौजूद होंगे , शीशा व ख़म गर्दिश में होंगे मुक़द्दस मन्ज़िलों में मुक़ीम होंगे। नेमतों में करवटें बदलते होंगे , तसनीम व सलसबील को मुतमईन होकर पीते होंगे जिसके हर जरए तरह तरह की ख़ुशबुओं में बसे होंगे। यह सब चीज़ें हमेशगी की मिल्कियत होंगी जिसमें सूरूर की हिस क़वी होगी , हरे भरे चमन में मय नौशी होगी , मै नौशों को न दर्देसर की तकलीफ़ होगी न कोई दूसरी ज़हमत होगी। मगर यह मन्ज़िलत ख़ौफ़ व ख़शीयत से मुत्तसिफ़ लोगों की है जो नफ़्स की सरकशियों से हर वक़्त ख़तरे में रहते हैं। (यानी हिरस व हवस के फन्दों से बच कर निकलने की कोशिश करते रहते हैं) बेशक जो लोग हक़ के मुन्किर हों , मज़कूरा हक़ीक़तों को भूले बैठे हों मासीयत कोशी में निडर हों , पुरफ़रेब नफ़्स के धोके में पड़े हों , वह माबूद हक़ीक़ी की तरफ़ से उक़ूबत के मुस्तहेक़ हैं। क्योंके दुरूस्त फ़ैसला मोतदिल हुक्म यही है। (देखो- सबसे बेहतर क़िस्सा सबसे खरी नसीहत हकीमे मुतलक़ की तन्ज़ील है जिसे जिबरईल पहले से रहबरे कुल हज़रत मोहम्मद (स 0) के क़ल्बे मोहतरम के सुपुर्द कर चुके हैं। मुकर्रम व नेक मन्श सफ़ीरों की तरफ़ से हज़रत पर दुरूदो रहमत हो। हम हर लईन व रजीम दुश्मन के शर से बचने के लिये रब्बे अलीम , रहीम , करीम से मदद तलब करते हैं। तुम लोग भी तज़र्रोअ करो। गिरया में मशग़ूल रहो , नीज़ तुम में हर शख़्स जो नेमते रब से बहरो वर है ख़ुद नीज़ मेरे लिये तलबे मग़फ़ेरत करे। बस मेरे लिये रब्बे क़दीर की हस्ती बहुत है- फ़क़त


फेहरीस्त

खुतबाते इमाम अली (उपदेश )1

मुक़द्देमा 2

खुतबाते इमाम अली (उपदेश) 3

1.आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 3

तख़लीक़े जनाबे आदम (अ) की कैफ़ियत 9

अम्बिया-ए-कराम का इन्तेख़ाब 11

बैसत रसूले अकरम (स 0) 12

क़ुरआन और एहकामे शरीया 13

ज़िक्रे बैतुल्लाह 14

2-सिफ़्फ़ीन से वापसी पर आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 15

आले रसूले अकरम (स 0) 16

एक दूसरी क़ौम 17

3-आपके एक ख़ुतबे का हिस्सा 17

4-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 23

5-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 25

6-हज़रत का इरशादे गिरामी 26

7-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 27

8-आपका इरशादे गिरामी ज़ुबैर के बारे में 28

9-आपके कलाम का एक हिस्सा 29

10-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 29

11-आपका इरशादे गिरामी 29

12-आपका इरशादे गिरामी 31

13-आपका इरशादे गिरामी 32

14-आपका इरशादे गिरामी 33

15-आपके कलाम का एक हिस्सा 35

16-आपके कलाम का एक हिस्सा 35

17-आपका इरशादे गिरामी 38

18-आपका इरशादे गिरामी 41

19-आपका इरशादे गिरामी 42

20-आपका इरशादे गिरामी 43

21-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 43

22-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 45

23-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 46

24-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 49

25-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 50

26-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 52

(बैयत के हंगाम) 53

27-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 54

28-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 58

29-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 61

30-आपका इरशादे गिरामी 64

31-आपका इरशादे गिरामी 65

32-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 65

33-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 68

34-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 71

35-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 74

36-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 75

37-आपका इरशादे गिरामी 76

38-आपका इरशादे गिरामी 77

39-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 78

40-आपका इरशादे गिरामी 79

41-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 80

42-आपका इरशादे गिरामी 82

43-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 82

44-हज़रत का इरशादे गिरामी 84

45-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 84

46-आपका इरशादे गिरामी 86

47-आपका इरशादे गिरामी 86

48-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 87

49-आपका इरशादे गिरामी 88

50-आपका इरशादे गिरामी 89

51-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 90

52-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 90

53-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 92

54-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 93

55-आपका इरशादे गिरामी 94

56-आपका इरशादे गिरामी 95

57-आपका इरशादे गिरामी 97

58-आपका इरशादे गिरामी 97

59-आपका इरशादे गिरामी 98

60-आपका इरशादे गिरामी 99

61-आपका इरशादे गिरामी 100

62-आपका इरशाद गिरामी 100

63-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 100

64-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 101

65-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 102

66-आपका इरशादे गिरामी 104

67-आपका इरशादे गिरामी 106

68-आपका इरशादे गिरामी 106

69-आपका इरशादे गिरामी 108

70-आपका इरशादे गिरामी 109

71-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 110

72-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 111

73-आपका इरशादे गिरामी 113

74-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 114

75-आपका इरशादे गिरामी 115

76-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 116

77-आपका इरशादे गिरामी 117

78-आपकी दुआ 118

79-आपका इरशादे गिरामी 118

80-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 120

81-आपका इरशादे गिरामी 121

82-आपका इरशादे गिरामी 122

83-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 123

84-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 138

85-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 139

86-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 140

87-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 143

88-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 146

89-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 147

90-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 148

91-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 150

क़ुराने मजीद में सिफ़ाते परवरदिगार 152

एक दूसरा हिस्सा 155

कुछ आसमान के बारे में 156

औसाफ़े मलाएका का हिस्सा 157

ज़मीन और उसके पानी पर फर्श होने की तफ़सीलात 162

92-आपका इरशादे गिरामी 170

93-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 171

94-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 174

95-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 176

96-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 176

97-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 177

98-आपका इरशादे गिरामी 180

99-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 181

100-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 183

101-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 184

102-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 186

इसी ख़ुतबे का एक हिस्सा 187

103-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 188

104-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 191

105-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 192

106-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 194

107-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 197

108-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 198

109-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 200

110-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 206

111-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 207

112-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 211

113-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 212

114-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 214

115-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 218

116-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 220

117-आपका इरशादे गिरामी 221

118-आपका इरशादे गिरामी 222

119-आपका इरशादे गिरामी 222

120-आपका इरशादे गिरामी 224

121-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 225

122-आपका इरशादे गिरामी 227

123-आपका इरशादे गिरामी 228

124-आपका इरशादे गिरामी 229

125-आपका इरशादे गिरामी 231

126-आपका इरशादे गिरामी 233

127-आपका इरशादे गिरामी 234

128-आपका इरशादे गिरामी 236

129-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 238

130-आपका इरशादे गिरामी 239

131-आपका इरशादे गिरामी 240

132-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 241

133-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 242

134-आपका इरशादे गिरामी 245

135-आपका इरशादे गिरामी 246

136-आपका इरशादे गिरामी 246

137-आपका इरशादे गिरामी 247

138-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 249

139-आपका इरशादे गिरामी 250

140-आपका इरशादे गिरामी 251

141-आपका इरशादे गिरामी 252

142-आपका इरशादे गिरामी 253

143आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 255

144-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 257

145-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 258

146-आपका इरशादे गिरामी 259

147-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 260

148-आपका इरशादे गिरामी 263

149-आपका इरशादे गिरामी 264

150-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 266

151-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 268

(फ़ित्नों से आगाही) 269

152-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 272

153-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 274

154 -आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 276

155-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 278

156-आपका इरशादे गिरामी 280

157-आपका इरशादे गिरामी 285

158-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 287

159-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 288

160-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 289

161-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 295

162-आपका इरशादे गिरामी 297

163-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 299

164-आपका इरशादे गिरामी 302

165-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 305

166-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 312

167-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 314

168-आपका इरशादे गिरामी 316

169-आपका इरशादे गिरामी 317

170-आपका इरशादे गिरामी 318

171-आपका इरशादे गिरामी 319

172-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 321

173-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 323

174-आपका इरशादे गिरामी 326

175-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 327

176-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 328

177-आपका इरशादे गिरामी 335

178-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 336

179-आपका इरशादे गिरामी 338

180-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 339

181-आपका इरशादे गिरामी 341

182-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 342

183-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 349

184-आपका इरशादे गिरामी 352

185-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 353

186-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 359

187-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 365

188-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 367

189-आपका इरशादे गिरामी 368

190-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 370

191-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 374

192-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 379

193-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 404

194-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 409

195-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 412

196-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 415

197-आपका इरशादे गिरामी 416

198-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 417

199-आपका इरशादे गिरामी 424

200-आपका इरशादे गिरामी 427

201-आपका इरशादे गिरामी 427

202-आप का इरशादे गिरामी 429

203-आपका इरशादे गिरामी 430

204-आपका इरशादे गिरामी 431

205-आपका इरशादे गिरामी 432

206-आपका इरशादे गिरामी 434

207-आपका इरशादे गिरामी 434

208-आपका इरशादे गिरामी 435

209-आपका इरशादे गिरामी 436

210-आपका इरशादे गिरामी 437

211-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 441

212-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 442

213-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 443

214-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 444

215 -आपकी दुआ का एक हिस्सा 446

216-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 448

217-आपका इरशादे गिरामी 451

218-आपका इरशादे गिरामी 452

219-आपका इरशादे गिरामी 453

220-आपका इरशादे गिरामी 454

221-आपका इरशादे गिरामी 454

222-आपका इरशादे गिरामी 461

223-आपका इरशादे गिरामी 464

224-आपका इरशादे गिरामी 467

225-आपकी दुआ का एक हिस्सा 469

226-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 470

227-आपकी दुआ का एक हिस्सा 472

228-आपका इरशादे गिरामी 473

229-आपका इरशादे गिरामी 474

230-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा 475

कुछ ज़ाहिदों के बारे में 476

231-आपका इरशादे गिरामी 477

232-आपका इरशादे गिरामी 478

233-आपका इरशादे गिरामी 478

234-आपका इरशादे गिरामी 479

235-आपका इरशादे गिरामी 480

237-आपका इरशादे गिरामी 481

238-आपका इरशादे गिरामी 482

239-आपका इरशादे गिरामी 483

240-आपका इरशादे गिरामी 485

241-आपका इरशादे गिरामी 485

ख़ुत्ब-ए-बिला नुक़्ता 486

ख़ुत्बए मोजिज़ा 488

फेहरीस्त 494