माहे रमज़ान
अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क
हर गतिविधि का शुभारंभ , मानव जीवन में एक नए अध्याय का आरंभ हो सकता है। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपनी निर्धारित जीवनयर्चा को ही पर्याप्त जानते हैं किंतु इसके विपरीत कुछ लोग एसे भी हैं जो प्रतिदिन कुछ नयापन चाहते हैं। इस संबन्ध में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस नएपन का समापन कैसा है ? तात्पर्य यह है कि मनुष्य हर नए कार्य के आरंभ के साथ ही उसकी समाप्ति के बारे में भी विचार करे और जब भी किसी नए कार्य को आरंभ करे तो उसका पूरा प्रयास इस कार्य को सही ढ़ंग से समाप्त करने की ओर ही होना चाहिए।
दयावान व ज्ञानी ईश्वर ने मानव की परिपूर्णता के लिए धरती तथा आकाशों में जो कुछ भी है उसे मानव के लिए विशेष कर दिया है ताकि मनुष्य , जीवन को सही ढ़ग से आरंभ कर सके। वह जीवन में आने वाले उतार-चढ़ाव से बड़ी ही होशियारी से निबट सके ताकि अच्छे परिणाम को प्राप्त कर सके। पवित्रता तथा मानवीयता से परिपूर्ण वातावरण में प्रवेश , परिवर्तन के लिए उचित अवसर है। इन उचित अवसरों में से एक अवसर पवित्र माहे रमज़ान का महीना है।
पवित्र माहे रमज़ान का महीना , हिजरी क़मरी महीनों में सर्वोत्तम महीना है। माहे रमज़ान शब्द रम्ज़ से लिया गया है जिसका अर्थ होता है छोटे पत्थरों पर पड़ने वाली सूर्य की अत्याधिक गर्मी। माहे रमज़ान ईश्वरीय नामों में से एक नाम है। इसी महीने में पवित्र क़ुरआन नाज़िल हुआ था। यह ईश्वर का महीना है। इसी महीने की जिनती भी प्रशंसा की जाए वह कम है।
माहे रमज़ान का पवित्र महीना , ईश्वर का महीना , क़ुरआन के उतरने का महीना तथा सबसे सम्मानजनक महीना है। इस महीने में आकाश तथा स्वर्ग के द्वार खुल जाते हैं तथा नरक के द्वार बंद हो जाते हैं। इस महीने की एक रात की उपासना , जिसे "शबे क़द्र" के नाम से जाना जात है , एक हज़ार महीनों की उपासना से बढ़ कर है। इस महीने मे रोज़ा रखने वाले का कर्तव्य , ईश्वर की अधिक से अधिक प्रार्थना करना है।
इस वर्ष भी माहे रमज़ान धीरे-धीरे हमारे हृदय रूपी घरों की ओर आ रहा है ताकि हमको अपनी विस्तृत एवं असीमित कृपा का पात्र बनाए। माहे रमज़ान , जीवन के दिनों और रातों के अपने मानवीय क्षणों के साथ हमारा साथी बनता है और फिर कुछ ही समय के पश्चात पुनः हमसे अलग हो जाने के लिए जल्दी करने लगता है। क्या कभी आपने इस बात का आभास किया है कि माहे रमज़ान के महीने में हम ईश्वर से अधिक निकट होने का आभास करने लगते हैं। यह विषय , इस शुभसूचना का सूचक है कि यदि उचित ढ़ंग से योजना बनाई जाए तो हमारा अंत अच्छा होगा। माहे रमज़ान के महीने में हम यदि आत्ममंथन करें तथा ईश्वरीय अनुकंपाओं की छाया में आत्मनिर्माण करें तो निःसन्देह , हमारा जीवन परिवर्तित हो जाएगा। ईश्वर की खोज में रहने वालों के लिए माहे रमज़ान का पवित्र महीना एक स्वर्णिम अवसर है। माहे रमज़ान आ चुका है अतः हमको ईश्वर की उपासना के बसंत में नए परिवर्तन का अनुभव करना चाहिए।
वे लोग जो वास्तविक आनंद की खोज में हैं उनके लिए माहे रमज़ान एक बहुमूल्य अवसर है। इस महीने में वे अपनी इच्छाओं को त्याग करते हुए पवित्र मानवीय आनंद की मिठास को प्राप्त कर सकते हैं। माहे रमज़ान के महीने में लोगों के लिए ईश्वरीय दस्तरख़ान बिछाया जाता है ताकि हर व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार ईश्वरीय अनुकंपाओं से लाभ उठाए। इस दावत का मेज़बान दयालु ईश्वर है। इसके माध्यम से उसने व्यापक स्तर पर लोगों को दावत दी है"।
माहे रमज़ान का महीना दैनिक जीवन की नीरसता को समाप्त कर देता है ताकि मनुष्य स्वयं को समझते हुए सचेत हो जाए कि कहीं ऐसा न हो कि उसकी आवश्यकताएं और निर्भरता उसे बुराइयों के मुक़ाबले में अक्षम बना दें। माहे रमज़ान का महीना उन लोगों के लिए मार्गदर्शक तथा मशाल की भांति है जो वास्तविकता के मार्ग से हट गए हैं। हालांकि ईश्वर की क्षमा के द्वार सदा ही लोगों के लिए खुले हुए हैं। वास्तविकता यह है कि ईश्वर को भूल जाने वाले लोगों ने ही स्वयं को ईश्वर की कृपा से दूर कर रखा है।
माहे रमज़ान की एक विशेषता उसका पवित्र व शुभ होना है। यही कारण है कि बहुत से स्थानों पर माहे रमज़ान को मुबारक अर्थात पवित्र और शुभ जैसे शब्दों से संबोधित किया गया है। यह विशेषता उन बहुत से लाभों के कारण है जो इस महीने में लोगों को प्राप्त होते हैं। पवित्र माहे रमज़ान के आरंभ होने के साथ ही रोज़ा रखने वाला व्यक्ति , ईश्वरीय दया और उसकी विभूतियों से परिपूर्ण वातावरण का आभास करता है तथा इस दौरान उसका समय बरकत या विभूतियों से भरा हुआ होता है। यह समय उसके लिए मुबारक होता है।
जैसाकि आप जानते हैं कि मानव जीवन के दो आयाम हैं , भौतिक तथा आध्यात्मिक। मनुष्य के अस्तित्व मे पाया जाने वाला आध्यात्मिक आयाम , ईश्वर की ओर से उसे दिया गया विशेष उपहार है। ऐसी वास्तविकता जो सृष्टि का आधार है तथा मनुष्य के अस्तित्व के निर्माण का मूल तत्व है। यह वही आत्मा है जिससे अन्य जीव वंचित हैं।
इस संदर्भ में ईश्वर , सूरए हजर की 27वीं आयत में कहता है कि मैंने मानव में अपनी आत्मा फूंकी। इस बहुमूल्य तत्व के न होने की स्थिति में मानव , अन्य पशुओं की श्रेणी में आ जाता। निश्चित रूप से मानव के असित्तव के इस तत्व को फलने-फूलने तथा विकसित होने की आवश्यकता है। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए भौतिक्ता से अलग होकर अन्य तत्वों की खोज में जाना होगा।
माहे रमज़ान महीने के मानवीय कार्यक्रम , मानव के झुकाव को संतुलित करने के उद्देश्य से है ताकि वह अपने अस्तित्व के प्रमुख तत्व का उचित ढंग से पालन-पोषण कर सके। हालांकि रोज़े से व्यक्ति तथा मानव समाज को बहुत अधिक भौतिक लाभ हैं किंतु पवित्र माहे रमज़ान का मुख्य उद्देश्य , मनुष्य के आध्यात्मिक आयाम को सचेत करना है। इस महीने में रोज़ा रखना , प्रार्थना करना , क़ुरआन का पाठ , दान-दक्षिणा , लोगों की सहायता तथा अन्य भले कार्य आत्मा को ताज़गी प्रदान करते हैं। यह महीना लोगों के आध्यात्म के विकास तथा परिपूर्णता की भूमिका प्रशस्त करता है। इस स्थिति में हम इस पवित्र महीने से अधिक से अधिक लाभ उठाएंगे। इस संदर्भ में पैग़म्बरे इस्लाम का कथन हैः-
पवित्र माहे रमज़ान के आरंभ पर हम आप सबकी सेवा में बधाई देते हुए आपकी सेवा में पैग़म्बरे इस्लाम के उस ख़ुत्बे का एक भाग प्रस्तुत कर रहे हैं जो उन्होंने माहे रमज़ान के आगमन से पूर्व दिया था।
हे लोगों , ईश्वर का महीना बरकत , विभूतियों तथा क्षमा के साथ तुम्हारी ओर आ रहा है। ऐसा महीना जो ईश्वर के निकट सर्वोत्तम महीना है , इसके दिन बेहतरीन दिनों में से हैं , इसकी रातें बेहतरीन राते हैं और इसका समय बेहतरीन समय है। इस महीने में सांस लेना पुण्य है जो ईश्वर की प्रार्थना करने के समान है , तुम्हारी नींद भी इबादत है। इस महीने में जब भी तुम ईश्वर की ओर उन्मुख होगे और उससे प्रार्थना करोगे ईश्वर तुम्हारी प्रार्थना को अवश्य स्वीकार करेगा। अतः स्वचछ तथा सच्चे मन से ईश्वर से कामना करो कि वह तुमको रोज़ा रखने तथा ४पवित्र कुरआन का पाठ करने का अवसर प्रदान करे क्योंकि दुर्भाग्यपूर्ण वह है जो इस पवित्र तथा विभूतियों से भरे महीने में ईश्वर की अनुकंपाओं और उसकी क्षमा से वंचित रह जाए।
प्रार्थना , उपासना की आत्मा है। विशेषकर रोज़े के समय प्रार्थना का महत्व और भी बढ़ जाता है क्योंकि इस समय मनुष्य का पूरा अस्तित्व ईश्वर से संबन्धित होता है। प्रार्थना जितनी आस्था और मन से की जाएगी उसका प्रभाव भी उतना ही व्यापक होगा। यह मन को स्वच्छ करती है। इस्लामी शिक्षाओं के संबन्ध में जर्मनी की प्रख्यात लेखिका एन मैरी शेमल , प्रार्थना के संदर्भ मे इमाम संज्जाद अलैहिस्सलाम की दुआएं प्रस्तुत करती हैं।
"मैं दुआओं को उनकी मुख्य भाषा अर्थात अरबी में ही पढ़ती हूं और किसी भी भाषा के अनुवाद में इन्हें नहीं पढ़ती। जिस समय मेरी माता अस्पताल में भर्ती थीं उस समय मैंने सहीफ़ए सज्जादिया नामक पुस्तक का जर्मनी भाषा में अनुवाद किया था। जिस समय मेरी माता सो जाती थीं उस समय मैं अस्पताल के एक कोने में बैठकर इस अनुवाद को साफ़ हैंडराइटिंग में लिखा करती थी। मेरी माता के बिस्तर के निकट ही एक अन्य बीमार महिला भी थी जो कटटर विचारों वाली कैथोलिक मतावलांबी थी। जब उसे यह ज्ञात हुआ कि मैं किसी इस्लामी दुआओं अर्थात प्रार्थनाओं का अनुवाद जर्मनी भाषा में कर रही हूं तो वह बहुत दुखी हुई। उसने बहुत ही अप्रसन्नता तथा चिंताजनक शैली में कहा कि क्या हमारी धार्मिक पुस्तकों की दुआओं में कोई कमी है जो तुमने मुसलमानों की दुआओं का अनुवाद करना आरंभ किया है। उस समय तो मैंने उससे कुछ नहीं कहा। किंतु जब मेरी किताब प्रकाशित हुई तो मैंने किताब की एक प्रति उसे भी भेजी। कुछ समय पश्चात उस महिला ने टेलिफोन के माध्यम से मुझसे सम्पर्क किया और कहा कि इस अच्छे उपहार के लिए आपकी बहुत आभारी हूं। इसका कारण यह है कि मैं प्रतिदिन उसका एक विषय पढ़ती हूं। यह पुस्तक मनमोहक तथा बहुत ही गूढ़ है।
दुआ के संदर्भ में वरिष्ठ नेता कहते हैं कि ईश्वर का मार्ग निकटस्थ मार्ग है। यदि कोई इच्छा कर ले तो फिर वह बुरे मार्ग से बच सकता है और एक अन्य मार्ग पर जो सीधा है उसपर चल सकता है। यह कार्य हर क्षण संभव है। इस्लामी शिक्षाओं में कहा गया है कि जो भी उसके अर्थात ईश्वर के मार्ग में क़दम बढ़ाता है तो ईश्वर का मार्ग निकट है। यदि एक क़दम बढ़ाओ तो उन लोगों से दूर हो जाओगे जो पतन की ओर जा रहे हैं और गिर जाने वाले हैं। तुम एक एसे मार्ग पर पहुंचोगे जिसपर चलने वाले अनंत मोक्ष या कल्याण तथा प्रकाश की ओर तेज़ी से बढ़ रहे हैं। जब हम अपनी आंतरिक इच्छाओं के दबाव में कोई कार्य करते हैं तो यह कार्य मनुष्य को ईश्वर से दूर करता है क्योंकि हमने पतन के मार्ग पर क़दम बढ़ाया है। किंतु इसके विपरीत जब हम अपनी इच्छाओं के विपरीत कार्य करने का निर्णय करते हैं तो हम उत्थान के मार्ग पर बढ़ रहे होते हैं। यह मार्ग परिवर्तन , माहे रमज़ान के पवित्र महीने में सरलता से संभव है। माहे रमज़ान वास्तव में मोक्ष तथा कल्याण प्राप्ति के लिए शार्टकट या छोटा रास्ता है।
बहुत से लोगों के अनुसार माहे रमज़ान का महीना भी वसंत की भांति है। ईश्वर , जिसने वसंत ऋतु को इसलिए बनाया कि वह प्रकृति को पुनर्जीवित करे तथा सूखी हुई टहनियों से नए फूल खिलाए , उसीने माहे रमज़ान का महीना बनाया है ताकि रोज़े रखकर लापरवाह लोगों में स्वतंत्र एवं पवित्र विचारों को जीवित किया जा सके। रोज़ा एक एसी मूल तथा मुख्य उपासना है जिसके अत्याधिक लाभों के कारण ईश्वर ने इसे धर्मों में वाजिब अर्थात अनिवार्य किया है। रोज़े के माध्यम से मानव की बहुत सी एसी आवश्यकताएं जो स्थिर तथा अपरिवर्तनीय हैं , पूरी होती हैं तथा इससे आत्मोथान होता है। यही कारण है कि रोज़े के विषय को हर धर्म में देखा जा सकता है। इस्लामी शिक्षाओं में मिलता है कि ईश्वर ने मूसा पर "वहय" अर्थात ईश्वरीय संदेश भेजा कि तुम्हारे लिए कौन सी वस्तु मेरी प्रार्थना में बाधा बनती है ? मूसा जो रोज़े से थे उन्होंने कहा कि हे , ईश्वर अपनी इस स्थिति में मैं तेरी उपासना के योग्य नहीं हूं क्योंकि रोज़ेदार के मुंह से बदबू आती है। ईश्वर ने उनके उत्तर में कहा कि हे मूसा , रोज़ेदार के मुंह से आने वाली बदबू मेरे निकट कस्तूरी की ख़ुशबू से भी अधिक प्रिय है।
एक व्यक्ति ने हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वआलेही वसल्लम के साथी इब्ने अब्बास से इस्लाम में रोज़े के कारण के संबन्ध में प्रश्न किया। उन्होंने उत्तर दिया कि यदि तुम दाऊद पैग़म्बर के रोज़े के संबन्ध में जानना चाहते हो तो वे एक दिन रोज़ा रखते थे और अगले दिन अफ़तार किया करते थे। यदि तुम उनके पुत्र सुलैमान के रोज़े के बारे में जानना चाहते हो तो वे हर महीने के तीन आरम्भिक दिनों , तीन बीच के दिनों तथा तीन अंत के दिनों में रोज़ा रखा करते थे। यदि हज़रत ईसा के रोज़े के बारे में जानना चाहते हो तो उन्होंने जीवन भर रोज़े रखे , वे जानवरों के बालों के बुने कपड़े पहना करते थे। यदि उनकी माता हज़रत मरियम के रोज़ों के बारे में जानना चाहते हो तो वे दो दिन लगातार रोज़े रखती थीं और तीसरे दिन रोज़ा अफ़तार करती थीं। यदि तुम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वआलेही वसल्लम के रोज़ों के बारे में जानना चाहते हो तो वे हर महीने में तीन दिन रोज़े अवश्य रखा करते थे और कहते थे कि यह तीन रोज़े पूरे जीवन के रोज़ों के समान हैं।
इस समय मौजूद तौरेत तथा इंजील में भी यह बात पाई जाती है कि पिछले ईश्वरीय धर्मों में रोज़ा एक पुष्टि वाला विषय है। समस्याओं के समय यहूदी रोज़े की शरण में जाया करते थे। इसाई लोग भी कई दिनों तक लगातार रोज़े रखा करते थे। यह विषय दर्शाता है कि शरीर तथा आत्मा पर प्रभाव डालने के हिसाब से रोज़े का उल्लेख सभी ईश्वरीय धर्मों में पाया जाता है और बहुत सी पीढ़ियों ने इनकी विभूतियों से लाभ उठाया है। माहे रमज़ान के इस पवित्र महीने में हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वह हमें इससे लाभान्वित होने का अवसर प्रदान करे।
मानव इतिहास के आरंभ से आज तक , जबकि वर्तमान समय में वैज्ञानिक तथा तकनीकी प्रगति हर क्षेत्र में दिखाई दे रही है , मनूष्य में सदा ही धर्म की ओर झुकाव देखा गया है तथा वह आध्यात्म की ओर उन्मुख रहा है। अलौकिक शक्ति से लगाव तथा उससे सम्पर्क ने सदा ही और हर स्थिति में मानव के मस्तिष्क को स्वयं में व्यस्त कर रखा है। ईश्वरीय दूतों ने सार्थक तथा प्रभावी आयामों से धर्म को स्पष्ट किया ताकि लोग अपनी प्रगति तथा विकास के लिए ईश्वरीय शिक्षाओं से लाभान्वित हो सकें। ईश्वरीय दूतों के मार्गदर्शन से लोगों के एक गुट ने सीधा मार्ग प्राप्त किया और इस बिंदु को भलि भांति समझ लिया कि ईश्वरीय धर्म ने जीवन के किसी भी क्षेत्र को अनदेखा नहीं किया है। सृष्टि को सही ढ़ंग से समझने तथा कल्याणपूर्ण जीवन व्यतीत करने के लिए वह लोगों की सहायता करेगा। उन लोगों ने यह बात समझ ली है कि सृष्टि का रचयिता सर्वज्ञानी है और लोग उसी पर भरोसा कर सकते हैं क्योंकि वह उनकी स्थितियों से अवगत है तथा किसी में भी उससे मुक़ाबले की शक्ति नहीं है।
कहा जा सकता है कि धार्मिक प्रवृत्ति तथा आध्यात्मिक विचारधारा की जड़ें मनुष्य की प्रवृति में निहित हैं। ईश्वरीय दूतों ने मानवीय प्रशिक्षणकर्ताओं के रूप में अपनी शिक्षाओं में मनुष्य में पाए जाने वाले इस आंतरिक झुकाव की ओर विशेष ध्यान दिया है। उन्होंने लोगों का ऐसे मार्ग की ओर मार्गदर्शन किया है जो उसके कल्याण की ओर जाता है। अलबत्ता पूरे इतिहास में धर्म तथा आध्यात्म की ओर झुकाव हर स्थान पर एक जैसा नहीं रहा है। पुनर्जागरण के पश्चात पश्चिमवासियों ने धर्म तथा आध्यात्म से दूरी बनाना आरंभ कर दी। बहुत ही कम समय में इस दूरी के दुष्परिणाम दो विश्वयुद्धों की विभीषिका के रूप में सामने आए। यह भूल या ग़लती मानव के लिए बहुत हानिकारक सिद्ध हुई। इस आधार पर धर्म से दूरी के जो दुष्परिणाम मानव जाति के सामने , आए उनके और साथ ही इस मानव प्रवृत्ति में पाई जाने वाली जिज्ञासा के कारण वर्तमान समय में हम , धर्म की ओर लोगों के उन्मुख होने के साक्षी हैं। वर्तमान आधुनिक जीवन शैली किसी भी स्थिति में आध्यात्म तथा धर्म के संबन्ध में मानव की मूल आवश्यकताओं की पूर्ति में अक्षम रही है। यही कारण है कि पूरे संसार में प्रतिदिन धर्म की ओर झुकाव रखने वालों की संख्या में वृद्धि हो रही है।
मानव की आत्मा की स्फूर्ति के लिए आध्यात्म एक मूलभूत आवश्यकता है। पवित्र क़ुरआन की दृष्टि से मानव में आगे की ओर बढ़ने की क्षमता पाई जाती है। यही कारण है कि धर्म में मानव के लिए एसे विशेष कार्यक्रम दृष्टिगत रखे गए हैं जो आगे बढ़ने में उसकी सहायता करते हैं। इस्लाम के पास एसा व्यापक कार्यक्रम है जिसमें मानव के लोक-परलोक दोनों से संबन्धित आयामों का ध्यान दिया गया है। इन कार्यक्रमों में से कुछ को व्यवहारिक बनाना अनिवार्य है जबकि कुछ एसे भी है जिनपर स्वेच्छा से कार्य किया जा सकता है। रोज़ा उन उपासनाओं मे से है जो अपनी कुछ शर्तों के साथ हर व्यक्ति के लिए अनिवार्य है। किंतु इसे स्वेच्छा से भी रखा जा सकता है। धार्मिक शिक्षाओं में रोज़ा रखने यहां तक कि स्वेच्छा से रोज़ा रखने की बहुत सिफ़ारिश की गई है। एक दिन पैग़म्बरे इस्लाम ने अबी अमामा नामक व्यक्ति को संबोधित करते हुए कहा कि रोज़ा रखो क्योंकि उसके बराबर कोई चीज़ नहीं है तथा कोई भी पुण्य उसके समान नहीं है।
ईश्वर रोज़े का निमंत्रण देकर मनुष्य का उच्च स्थान की ओर मार्गदर्शन कर रहा है जिससे वह इच्छाओं के बंधन से स्वतंत्र हो जाएगा। रोज़े की संस्कृति में मनुष्य बहुत सी ऐसी विभूतियों और अनुकंपाओं को कुछ समय के लिए अनदेखा करके , जिनसे रोज़े से पूर्व लाभ उठाया करता था , प्रयास करता है कि वह उन आदतों से छुटकारा पा ले जो कल्याण तथा मोक्ष के मार्ग में बाधा बनती हैं।
रोज़े का एक रोचक उपहार मन की शांति है। मन की यह शांति ऐसा बहुमूल्य अमृत है जिसे प्राप्त करने के लिए आज का मनुष्य अधिक से अधिक धन ख़र्च करने के लिए तैयार है। रोज़े में मनुष्य का मन हर प्रकार की इच्छाओं से दूर हो जाता है और वह सृष्टि के सर्वज्ञानी रचयिता की शरण में जाकर शांति का आभास करता है। इस आधार पर रोज़ा रखने वाला ईश्वरीय अनुकंपाओं तथा ईश्वर से निकट होने के आभास के दृष्टिगत आध्यात्मिक शांति से परिपूर्ण होता है। यही कारण है कि एक संक्षिप्त और आकर्षण कथन में इमाम मुहम्म बाक़िर अलैहिस्लाम फ़रमाते हैं कि , रोज़ा हृदयों की शांति का कारण है।
सामान्यतः मनुष्य आध्यात्म की ओर उन्मुख है। इसी बीच कभी धार्मिक दायित्वों के निर्वाह में विदि बाधाएं लापरवाही का कारण बनती हैं किंतु जब व्यक्ति सार्वजनिक रूप से लोगों के साथ रोज़ा रखने का सुअवसर प्राप्त करता है तो फिर स्थति थोड़ी बदली हुई होती है। एसी स्थिति में माहे रमज़ान में उसका प्रवेश एक ऐसे नगर में प्रवेश की भांति है जहां के लोग एक साथ प्रेमपूर्ण वातावरण में एक उद्देश्य की प्राप्ति में प्रयासरत हैं। यह एकता तथा समरस्ता व्यक्ति के मनोबल को सुदृढ़ करने के साथ ही दायित्वों के निर्वाह के लिए प्रेरित करती है। भूख और प्यास जैसे कुछ विषयों के दृष्टिगत जो रोज़े के साथ-साथ हैं , रोज़ा रखने में सफलता , रोज़ेदार को अन्य धार्मिक कार्यों को करने के लिए तत्पर कर सकती है। यही कारण है कि पैग़म्बरे इस्लाम ने रोज़े को उपासना के नगर में प्रवेष के समान बताते हुए कहा है कि हर चीज़ के लिए द्वार है तथा उपासना का द्वार रोज़ा है।
मानव इतिहास में अपने आरंभ से आज तक , जिसमें वर्तमान समय में वैज्ञानिक तथा तकनीकी प्रगति हर क्षेत्र में दिखाई दे रही है , सदा ही धर्म की ओर झुकाव देखा गया है तथा वह आध्यात्म की ओर उन्मुख रहा है। अलौकिक शक्ति से लगाव तथा उससे सम्पर्क ने सदा ही और हर स्थिति में मानव के मस्तिष्क को स्वयं में व्यस्त कर रखा है। ईश्वरीय दूतों ने सार्थक तथा प्रभावी आयामों से धर्म को स्पष्ट किया ताकि लोग अपनी प्रगति तथा विकास के लिए ईश्वरीय शिक्षाओं से लाभान्वित हो सकें।
ईश्वरीय दूतों के मार्गदर्शन से लोगों के एक गुट ने सीधा मार्ग प्राप्त किया। सीधा मार्ग प्राप्त करने वालों ने इस बिंदु को भलि भांति समझ लिया कि ईश्वरीय धर्म ने जीवन के किसी भी क्षेत्र को अनदेखा नहीं किया है। सृष्टि को सही ढ़ंग से समझने तथा कल्याणपूर्ण जीवन व्यतीत करने के लिए वह लोगों की सहायता करेगा। उन लोगों ने यह बात समझ ली है कि सृष्टि का रचयिता सर्वज्ञानी है और लोग उसी पर भरोसा कर सकते हैं जो उनकी स्थितियों से अवगत हो तथा किसी में भी उससे मुक़ाबले की शक्ति नहीं है।
कहा जा सकता है कि धार्मिक प्रवृत्ति तथा आध्यात्मिक विचारधारा की जड़ें मनुष्य की प्रवृति में निहित है। ईश्वरीय दूतों ने मानवीय प्रशिक्षणकर्ताओं के रूप में अपनी शिक्षाओं में मनुष्य में पाए जाने वाले इस आंतरिक झुकाव को ओर विशेष ध्यान दिया है। उन्होंने लोगों का एसे मार्ग की ओर मार्गदर्शन किया है जो उसके कल्याण की ओर जाता है। अलबत्ता पूरे इतिहास में धर्म तथा आध्यात्म की ओर झुकाव हर स्थान पर एक जैसा नहीं रहा है। पुनर्जागर के पश्चात पश्चिमवासियों ने धर्म तथा आध्यात्म से दूरी बनानी आरंभ कर दी। बहुत ही कम समय में इस दूरी के दुष्परिणाम दो विश्वयुद्धों की विभीषिका के रूप में सामने आए। यह भूल या ग़लती मानव के लिए बहुत हानिकारक सिद्ध हुई। इसी आधार पर धर्म से दूरी के जो दुष्परिणाम मानव जाति के सामने आए और साथ ही इस मानव प्रवृत्ति में पाई जाने वाली जिज्ञासा के कारण वर्तमान समय में हम , लोगों के धर्म की ओर उन्मुख होने के साक्षी हैं। आधुनिक वर्तमान जीवन शैली किसी भी स्थिति में आध्यात्म तथा धर्म के संबन्ध में मानव की मूल आवश्यकताओं की पूर्ति में अक्षम रही है। यही कारण है कि पूरे संसार में प्रतिदिन धर्म की ओर झुकाव रखने वालों की संख्या में वृद्धि हो रही है।
मानव की आत्मा की स्फूर्ति के लिए आध्यात्म एक मूलभूत आवश्यकता है। पवित्र क़ुरआन की दृष्टि से मानव में आगे की ओर बढ़ने की क्षमता पाई जाती है। यही कारण है कि धर्म में मानव के लिए एसे विशेष कार्यक्रम दृष्टिगत रखे गए हैं जो आगे बढ़ने में उसकी सहायता करते हैं। इस्लाम के पास एसा व्यापक कार्यक्रम है जिसमें मानव के लोक-परलोक दोनों से संबन्धित आयामों का ध्यान दिया गया है। इन कार्यक्रमों में से कुछ को व्यवहारिक बनाना अनिवार्य है जबकि कुछ एसे भी है जिनपर स्वेच्छा से कार्य किया जा सकता है। रोज़ा उन उपासनाओं मे से है जो अपनी कुछ शर्तों के साथ हर व्यक्ति के लिए अनिवार्य है। किंतु इसे स्वेच्छा से भी रखा जा सकता है। धार्मिक शिक्षाओं में रोज़ा रखने यहां तक कि स्वेच्छा से रोज़ा रखने की बहुत सिफ़ारिश की गई है। एक दिन पैग़म्बरे इस्लाम ने अबी अमामा नामक व्यक्ति को संबोधित करते हुए कहा कि रोज़ा रखो क्योंकि उसके बराबर कोई चीज़ नहीं है तथा कोई भी पुण्य उसके समान नहीं है।
ईश्वर रोज़े का निमंत्रण देकर मनुष्य का उच्च स्थान की ओर मार्गदर्शन कर रहा है कि जिससे वह इच्छाओं के बंधन से स्वतंत्र हो जाएगा। रोज़े की संस्कृति में मनुष्य बहुत सी एसी विभूतियों और अनुकंपाओं को कुछ समय के लिए अनदेखा करके , जिनसे रोज़े से पूर्व लाभ उठाया करता था , प्रयास करता है कि वह उन आदतों से छुटकारा पा ले जो कल्याण तथा मोक्ष के मार्ग में बाधा बनती हैं।
रोज़े का एक रोचक उपहार मन की शांति है। मन की यह शांति एक एसा बहुमूल्य अमृत है जिसे प्राप्त करने के लिए आज का इंसान अधिक से अधिक धन ख़र्च करने के लिए तैयार है। रोज़े में मनुष्य का मन हर प्रकार की इच्छाओं से दूर हो जाता है और सृष्टि के सर्वज्ञानी रचयता की पनाह में जाकर शांति का आभास करता है। इस आधार पर रोज़ा रखने वाला ईश्वरीय अनुकंपाओं तथा ईश्वर से निकट होने के आभास के दृष्टिगत आध्यात्मिक शांति से परिपूर्ण होता है। यही कारण है कि एक संक्षिप्त और आकर्षण कथन में इमाम मुहम्म बाक़र अलैहिस्लाम फ़रमाते हैं कि , रोज़ा हृदयों की शांति का कारण है।
सामान्यतः मनुष्य आध्यात्म की ओर उन्मुख है। इसी बीच कभी धार्मिक दायित्वों के निर्वाह में विदि बाधाएं लापरवाही का कारण बनती हैं किंतु जब व्यक्ति सार्वजनिक रूप से लोगों के साथ रोज़ा रखने का सुअवसर प्राप्त करता है तो फिर स्थति थोड़ी बदली हुई होती है। एसी स्थिति में माहे रमज़ान में उसका प्रवेश एक एसे शहर में प्रवेश की भांति है जहां के लोग एक साथ प्रेमपूर्ण वातावरण में एक उद्देश्य की प्राप्ति में प्रयासरत हैं। यह एकता तथा समरस्ता व्यक्ति के मनोबल को सुदृढ़ करने के साथ ही दायित्वों के निर्वाह के लिए प्रेरित करती है। भूख और प्यास जैसे कुछ विषयों के दृष्टिगत जो रोज़े के साथ-साथ हैं रोज़ा रखने में सफलता , रोज़ेदार को अन्य धार्मिक कार्यों को करने के लिए तत्पर कर सकती है। यही कारण है कि पैग़म्बरे इस्लाम ने रोज़े को उपासना के नगर में प्रवेष के समान बताते हुए कहा है कि हर चीज़ के लिए द्वार है तथा उपासना का द्वार रोज़ा है।
माहे रमज़ान का पवित्र महीना प्रतिवर्ष हमारे जीवन में प्रविष्ट होकर हमको बहुत से संदेश उपहारस्वरूप देता है। प्रायश्चित तथा ईश्वर की ओर वापसी के साथ ही व्यक्तिगत तथा समाजिक जीवन में आध्यात्मिक तथा नैतिक मूल्यों की ओर ध्यान , इस महीने के महत्वपूर्ण संदेश हैं। यह वही नियम हैं जिनकी आवश्यकता संसार को बहुत ही तीव्रता से है। समाज शास्त्रियों के अनुसार विश्व स्तर पर अत्याचार तथा गुंडागर्दी का विस्तार , राजनीति तथा अर्थव्यवस्था में भ्रष्टाचार , युवाओं विशेषकर प्रगतिशील देशों के युवाओं में अपनी पहचान को लेकर भ्रम की स्थिति , बहुत सी कुरीतियों का प्रचलन आदि एसी बाते हैं जो केवल इसलिए है कि मानव अपनी पवित्रता तथा आत्मशुद्धि के प्रयास में नही रहा है।
पवित्र ग्रंथ क़ुरआन , अपनी विभिन्न आयतों तथा विविध शैलियों के माध्यम से मनुष्य को "तक़वा" तथा पवित्रता का निमंत्रण देता है। तक़वे का एक अर्थ है पापों से दूरी। मनुष्य को यह जानना चाहिए कि वह क्या कर रहा है और उसे अपने जीवन के मार्ग का चयन बहुत ही होशियारी से करना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति अपने कार्यों के प्रति बहुत संवेदनशील हो और ईश्वर की प्रसन्नता को दृष्टिगत रखे तो यह कार्य उसे सीधे रास्ते पर रोके रखता है। वास्तव में जो भी व्यक्ति तक़वा तथा पवित्रता के आभूषण से सुसज्जित है , वह जब कभी भी समस्याओं में घिरता है तो एसे में उसे ईश्वर की ओर से सहायता प्राप्त होती है। क़ुरआन , अच्छे अंत को ईश्वर से भय रखने वालों से संबन्धित मानता है।
इमाम अली अलैहिस्सलाम ने तक़वे की संज्ञा एसे घोड़े से दी है जो अपने स्वामी के नियंत्रण में रहता है। एसे घोड़े पर उसका सवार बड़ी सरलता से बैठ कर सवारी करता है। यह घोड़ा भी बिना किसी कठिनाई के अपने स्वामी को उसके गंतव्य तक पहुंचा देता है। इसके विपरीत हज़रत अली अलैहिस्सलाम आंतरिक इच्छाओं की संज्ञा एक एसे अनियंत्रित घोड़े से देते हैं कि जब उसका स्वामी उसपर सवार होता है तो वह आना-कानी करता है और उसे धरती पर पटक देता है। हज़रत अली अलैहिस्लाम एक संक्षिप्त से वाक्य में कहते हैं कि ईश्वर के दासों , मैं तुमको बुराइयों से बचने तथा तक़वा अपनाने की सिफ़ारिश करता हूं।
मानव जाति के लिए ईश्वरीय दूतों की महत्वपूर्ण सिफ़ारिश , तक़वे का अनुसरण अर्थात पापों से बचना , रही है। क़ुरआन शरीफ़ के विभिन्न सूरों में हम पढ़ते हैं कि ईश्वरीय दूतों ने लोगों को सदा ही पापों से बचने का निमंत्रण दिया है। यदि मनुष्य पापों से बचे तो फिर उसे ईश्वरीय मार्गदर्शन प्राप्त होगा। वह अज्ञानता के अंधकार से निकल जाएगा और उसे प्रकाश प्राप्त होगा। वह स्पष्ट प्रकाश में अच्छे और बुरे को सरलता से समझ सकेगा। सूरए हदीद की 28वीं आयत के अनुसार तक़वा मानव के जीवन तथा उसके हृदय में प्रकाश प्रज्वलित करता है ताकि वह उसकी छाया में चलते हुए जीवन के मार्ग को प्राप्त कर सके। ईश्वर कहता है कि "हे ईमान लाने वालों तक़वा अपनाओ और उसके रसूल पर ईमान लाओ। वह अपनी कृपा से तुमको दो हिस्से देगा और तुमहारे लिए प्रकाश उपलब्ध करेगा जिसके साथ तुम चलो-फिरोगे और तुम्हारे पापों को क्षमा कर देगा। अल्लाह बड़ा ही क्षमाशील तथा दयावान है"।
कहा जा सकता है कि अपने मन को आंतिरक इच्छाओं के हवाले करना और उसका अंधा अनुसरण , तक़वा न होने का चिन्ह है। यह कार्य उच्च लक्ष्यों तक पहुंचने में बाधा बनता है। इसके विपरीत तक़वा अर्थात पापों से बचाव ईश्वरीय अनुकम्पाओं को आकर्षित करता है और लोगों तथा राष्ट्रों के कल्याग तथा उनके गर्व का कारण बनात है। यहां पर तक़वे से हमारा तात्पर्य केवल स्वर्ग की कामना तथा मोक्ष की प्राप्ति नहीं है बल्कि यह विशेषता इस नश्वर संसार में भी अपने बहुत से प्रभाव प्रकट करती है। वह समाज जो अपने मार्ग का सही ढ़ंग से चयन करता है और बड़ी ही दृढ़ता तथा दूरदर्षिता से उस पर चलता है एसे समाज में जीवन का वातावरण स्वस्थय और सदस्यों के बीच परस्पर सार्थक सहकारिता पर आधारित होता है। पवित्र क़ुरआन ने सही मार्ग का मानव के लिए मार्गरदर्शन किया है। वह चाहता है कि मनुष्य हर स्थिति में इस बात का ध्यान रखे कि उसके क्रियाकलापों पर ईश्वर दृष्टि रखे हुए है। अतः मनुष्य को विनम्र होना चाहिए ताकि वह मोक्ष और कल्याण को प्राप्त कर सके। सीधे मार्ग पर चलने के लिए हमे तक़वे की आवश्यकता है। पवित्र माहे रमज़ान के रोज़े तक़वे की प्राप्ति तक पहुंच की भूमिका प्रशस्त करते हैं।
अभी तक हमने तक़वा अर्थात ईश्वरीय भय के बारे में वार्ता की। उचित होगा कि हम यह जानें कि जिन लोगों में तक़वा पाया जाता है उनकी क्या विशेषताएं होती हैं। पवित्र क़ुरआन ईश्वरीय भय रखने वालों अर्थात मुत्तक़ियों की स्पष्ट विशेषता यह बताता है कि ईश्वर ने उन्हें जो कुछ दिया है वह उसे ईश्वर के मार्ग में दान करते हैं। ईश्वर कुरआन में इस विशेषता की ओर संकेत करता है कि मनुष्य लालची स्वभाव का है। जब उसे किसी कठिनाई का सामना होता है तो वह अधीर हो जाता है और जब उसे कुछ धन या माल मिल जाता है तो वह दूसरों को देने या दान करने में आना-कानी करता है। केवल वही लोग लालच से बच सकते हैं और उससे दूर रह सकते हैं जो परहेज़ करने वाले हैं। दान-दक्षिणा को कुरआन ने इतना अधिक महत्व दिया है कि उसे वह आर्थिक जेहाद की संज्ञा देता है। नमाज़ के साथ ईश्वर के मार्ग में दान को कुरआन , हानिरहित तथा लाभदायक व्यापार की भांति बताता है।
परोपकार या दान-दक्षिणा के महत्व को दर्शाने के लिए ईश्वर ने बहुत ही सटीक सज्ञा देते हुए इसे बीज की उपमा दी है। इस बीज में कोपल आने के बाद सात गुच्छे उगते हैं। हर गुच्छे में सौ दाने होते हैं। दूसरे शब्दों में जो वस्तु भी दान की जाती है वह सात सौ गुना बढ़ती है। विभिन्न स्थानों पर दान देने वालों को यह शुभ सूचना दी गई है कि उनका कार्य ईश्वर के निकट अनदेखा नहीं किया जाएगा। बल्कि उनके माल में बढ़ोत्तरी होगी। यह एसी स्थिति में है कि दान और परोपकार , केवल ईश्वर की प्रसन्नता के मार्ग में ही प्रशंसनीय है।
यही कारण है कि माहे रमज़ान के पवित्र महीने में घरों और मस्जिदों में आडंबर से दूर परोपकार के लिए दस्तरख़ान बिछाए जाते हैं। ईमान के साथ पवित्र हृदय , ईश्वरीय प्रेम के साथ तथा उसकी इच्छा को आकर्षित करने के लिए लोगों को खाना खिलाते हैं।
माहे रमज़ान के महीने में ईश्वर ने सभी लोगों को निमंत्रित किया है अतः सब लोग ही उसके अतिथि हैं। अब देखना यह है कि लोग स्वयं को किसी सीमा तक ईश्वर से निकट करने में सफल होते हैं। एक दिन हज़रत मूसा अलैहिस्लाम ईश्वर की प्रार्थना के लिए तूर पर्वत पर गए। मार्ग में उनकी भेंट एक बूढ़े काफिर से हुई। बूढ़े ने पूछा कि आप कहां जा रहे हैं ? हज़रत मूसा ने उत्तर दिया कि मैं उपासना के लिए तूर पर्वत पर जा रहा हूं। उस व्यक्ति ने कहा कि क्या तुम मेरा संदेश ईश्वर तक पहुंचा सकते हो ? हज़रत मूसा ने कहा कि तुम्हारा संदेश क्या है ? बूढ़े ने कहा कि अपने ईश्वर से कहो कि न तो मैं तेरा दास हूं और न ही तू मेरा ईश्वर है। मुझे तुमसे कोई काम नहीं है। हज़रत मूसा तूर पर्वत पर गए। अपनी प्रार्थना के पश्चात उन्होंने बूढ़े व्यक्ति की बात का उल्लेख नहीं किया। जब वे वापस आना चाह रहे थे तो ईश्वर ने उनसे पूछा कि तुमने क्यों मेरे दास का संदेश मुझको नहीं दिया। हज़रत मूसा ने कहा कि हे ईश्वर , उसके द्वारा आपके संबन्ध में कहे गय वाक्यों को कहने से मुझे लज्जा आ रही थी। ईश्वर ने कहा कि तुम मेरे उस दास के पास जाओ और उससे कहो कि यदि तुम मुझको महत्वहीन समझते हो किंतु मैं तुमको महत्वहीन नहीं समझता हूं। यदि तुमको मुझसे कोई कार्य नहीं है किंतु हम तुमसे लापरवाह नहीं हैं। हमसे न बचो , क्योंकि हम खुले मन से तुम्हारी प्रतीक्षा में हैं।
बूढ़े व्यक्ति ने जब मूसा को वापस आते देखा तो उनसे पूछा कि क्या तुमने मेरे संदेश को अपने ईश्वर तक पहुंचा दिया था ? ईश्वर ने जो कुछ भी कहा था उसे हज़रत मूसा ने उस बूढ़े को बता दिया। यह सुनकर बूढ़े का रंग उड़ गया। ईश्वरीय संदेश ने उस बूढ़े को परिवर्तित कर दिया। उसने लज्जा से अपना सिर नीचे झुकाया और भर्राई हुई आवाज़ में कहा , हे मूसा मैं बहुत लज्जित हूं। मैं ईश्वर की सेवा में प्रायश्चित करना चाहता हूं। तुम मेरी सहायता करो।
उस दिन जब , हज़रत आदम में ईश्वरीय आत्मा फूंके जाने से मानव के सिर पर श्रेंष्ठता का मुकुट रखा गया , इबलीस के मन में घृणा , द्वेष तथा ईर्श्या की भावना बैठ गई। उसने आदम का सजदा करने से इन्कार किया तथा स्वयं को ईश्वर के दरबार से वंचित कर लिया। बस उसी समय से शैतान अपनी समस्त संभावनाओं के साथ आदम की संतान के कल्याण तथा आध्यात्मिक विकास के मार्ग मे बाधा बना हुआ है। शैतान अपनी पूरी भ्रष्ट सेना के साथ मानवजाति के साथ युद्धरत है तथा मानवजाति के जीवन के अन्तिम दिन तक वह अपने इस कार्यक्रम को जारी रखेगा ताकि अपने विचार में , वह कल्याण के सार को मनुष्य से छीन ले।
शैतान सदा ही मानव के भीतर शंका उत्पन्न करते हुए इस बात का प्रयास करता है कि उसकी कमियों से लाभ उठाते हुए उसे मोक्ष तथा कल्याण के मार्ग से रोक दे। यहां पर उल्लेखनीय बात यह है कि शैतान के सारे ही कार्य शंका उत्पन्न करने तक ही सीमित हैं और वह विवश्ता की सीमा तक नहीं होते। शैतान द्वारा उत्पन्न की गई शंकाओं को व्यावहारिक बनाना मानव की आंतरिक कमज़ोरी का चिन्ह है। क़ुरआन के कथनानुसार शैतान का वर्चस्व , ईमान या आस्था की दृष्टि से कमज़ोर लोगों पर ही होता है जो उसके वर्चस्व को स्वीकार करते हैं। दुष्ट शैतान पाप करने के लिए मानव के मन में शंकाएं उत्पन्न करता है और साथ ही उस पाप का औचित्य भी उनको सिखाता है।
सूरए नहल की आयत संख्या 99 तथा 100 में आया है किः- निःसन्देह , उसका (शैतान का) उनपर कुछ भी ज़ोर नहीं चलता जो ईमान ले आए और अपने रब पर भरोसा रखते हैं। उसका ज़ोर तो केवल उन लोगों पर ही चलता है जो उससे (शैतान से) मित्रता का नाता जोड़ते हैं। वास्तव में जो लोग दृढ़ विश्वास रखते हैं और ईश्वर पर भरोसा करते हैं उनपर शैतान के "वसवसे" अर्थात शंका उत्पन्न करने या बहकावे का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
शैतान की ओर से अपहरण की प्रक्रिया सामान्यतः धीरे-धीरे होती है जो अद्रश्य होती है। सामान्यतः मनुष्य को इस ख़तरनाक शत्रु के षडयंत्र का आभास ही नहीं होता। हालांकि मनुष्य तक़वा अर्थात ईश्वरीय भय और आस्था की सहायता से शैतान के बहकावे और ईश्वरीय संदेश के बीच अंतर को सरलता से समझ सकता है। क्योंकि ईश्वरीय संदेश मानव की पवित्र अन्तरात्मा से मेल खाते हैं अतः जब वे हृदय तक पहुंचते हैं तो मनुष्य में प्रभुल्लता की भावना उत्पन्न हो जाती है। दूसरी ओर शैतान का बहकावा या उसकी ओर से उत्पन्न की जाने वाली शंकाएं मनुष्य की अन्तरात्मा से मेल नहीं खातीं इसीलिए जब मानव का उनसे सामना होता है तो उसमें अप्रसन्नता की भावना जाग्रत होती है। इस शत्रु से मुक़ाबले के लिए धर्म ने हमारा मार्गदर्शन किया है जो मनुष्य के ज्ञान में वृद्धि करता हैं और उसको ख़तरे से मुक्ति दिलाता है। इस बीच रोज़ा एसा कार्यक्रम है जो हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वआलेही वसल्लम के कथनानुसार शैतान को मानव से दूर करता है और उसमें इच्छा शक्ति और आस्था को प्रबल बनाने का अवसर प्रदान करता है। एक दिन आपने फ़रमाया कि क्या तुम यह चाहते हो कि मैं तुमको एक एसे कार्य के बारे में बताऊं जिसके करने से शैतान तुम से दूर हो जाए। लोगों ने बड़े ही उत्साह से कहा कि हां या रसूलल्लाह। आपने कहा कि रोज़ा रखो क्योंकि रोज़ा शैतान का मुंह काला करता है।
ईश्वर ने हमें बहुत से अवसर प्रदान किये हैं। किंतु इन अवसरों का प्रदान किया जाना इस अर्थ में नहीं है कि यह निरंतर हमारे साथ भी रहेंगे। इन अवसरों का बाक़ी रहना या उनसे लाभान्वित होना , हमारे क्रियाकलापों पर निर्भर है। महापुरूषों के बहुत से कथनों में यह मिलता है कि ईश्वरीय अनुकंपाओं को अपनी "नाशुक्री" से दूर न करो। इमाम अली अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं कि तुमपर ईश्वर का सबसे छोटा अधिकार यह है कि उसकी विभूतियों को उसके मार्ग के विपरीत मार्ग में ख़र्च न करो। निश्चित रूप से ईश्वरीय विभूतियों से मुंह मोड़ना और इन विभूतियों के महत्व को न समझना , पतन के कारकों में से एक है।
एक कथन में आया है कि एक दिन हज़रत दाऊद ने ईश्वर से मांग की थी कि उनके साथी को स्वर्ग में उनके साथ स्थान मिले। आवाज़ आई कि कल उसको शहर के दरवाज़े के बाहर देखोगे। अगले दिन हज़रत दाऊद शहर के दरवाज़े से निकले। उन्होंने यूनुस पैग़म्बर के पिता मत्ता से भेंट की। उनके कंधे पर थोड़ा सा ईंधन था और वे उसे बेचने के लिए ग्राहक की तलाश में थे। हज़रत दाऊद उनके साथ हो लिए और उनसे बात कर
ने लगे। इसी बीच एक व्यक्ति ने ईंधन ख़रीदा। मत्ता ने पैसों से आंटा और नमक ख़रीदा। उन्होंने दाऊद , सुलैमान और अपने लिए रोटियां पकाई। रोटी खाते समय हज़रत दाऊद ने देखा कि मत्ता ने अपना सिर ऊपर उठाते हुए कहा , हे ईश्वर मैने जो ईंधन इकट्ठा किया था उसके पेड़ तूने उपजाए। मेरी भुजाओं को शक्ति तूने प्रदान की। ईंधन का बोझ ढोने की शक्ति तूने ही मुझकत दी। ईंधन के ग्राहक को तूने मेरे पास भेजा। गेहूं तूने पैदा किया। यह सब शक्तियां तूने मुझको प्रदान कीं ताकि मैं तेरी अनुकंपाओं से लाभ उठा सकूं। जिस समय मत्ता यह बातें कह रहे थे उस समय उनकी आखों से आंसू बह रहे थे। इसी बीच हज़रत दाऊद ने हज़रत सुलैमान को ओर मुख करते हुए कहा कि इस प्रकार का शुक्र ही मानव को उच्च स्थान की ओर ले जाता है।
जीवन और उससे संबन्धित विषयों के बारे में लोगों का दृष्टिकोण उनके व्यवहार की शैली पर बहुत प्रभाव पड़ता है। निश्चित रूप से जीवन के संबन्ध में लोगों का दृष्टिकोण और उनका मनोबल , उनके अंदर परिस्थितियों और विशेष प्रकार के व्यवहार को असित्तव प्रदान करता है। इस बात को मनुष्य सुनिश्चित करता है कि वह जीवन को किस प्रकार से देखता है। दूसरे शब्दों में सोच-विचार की शैली कभी सकारात्मक तो कभी नकारात्मक विचारधारा का कारण बनती है। सामान्यतः हमारे आंतरिक विचार/ घटनाओं , पवित्र आस्था , मूल्यों , और विचारों से गुज़रते हुए हमारे मस्तिष्क में अंकित होते हैं।
किंतु बाईमान लोग जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं। एसे लोगों का मानना है कि सृष्टि को ईश्वर ने बनाया है। वही सृष्टि को चलाने वाला है। वह शक्ति तथा दया का प्रतीक है। उसीने अपनी दया से मानव को उचित मार्ग दर्शाया है। अब अगर कोई सीधे मार्ग को अपनाता है तो वह सफलता अर्जित करता है। ईमान रखने वाले व्यक्ति को जब सही रास्ता मिल जाता है और वह अच्छे कार्य करता है तो उसे ईश्वर की सहायता पर विश्वास होता है। एसे व्यक्ति के अनुसार ईश्वर सर्वशक्तिमान है फिर भी वह दूसरों पर अत्याचार नहीं करता। अपने दासों की प्रार्थना को सुनता है। वह उनसे बहुत ही निकट है। वह बहुत अधिक क्षमाशील तथा दयालु है। यहां तक कि जो लोग बुराई करने वाले हैं वे भी उसकी असीम कृपा के पात्र बनते हैं।
इस दृष्टिकोण के साथ जो भी सृष्टि के रचयता पर विश्वास रखता है वह सृष्टि को लक्ष्यहीन और बेकार नहीं जानता। वह संसार को कार्यस्थल तथा उचित प्रयास का स्थान समझता है। एसा व्यक्ति अपने व्यव्हार पर ईश्वर को निरीक्षक समझता है। घटनाएं चाहें वे अच्छी हो या बुरी उसकी मानसिक शांति को प्रभावित नहीं करती। इसका कारण यह है कि वह अपने जीवन के अंधकारमय छणों में भी अकेलेपन का भी आभास नहीं करता है और सदा ही अपने निकट ईश्वर का आभास करता है। ईश्वर के आभास के विचार के साथ वह यह समझता है कि उसे स्वतंत्र नहीं छोड़ा गया है और सृष्टि में उसके प्रयास विफल नहीं होंगे। एक अमरीकी मनोवैज्ञानिक के अनुसार ईमान एसी शक्ति है जिसकी मानव जीवन में सहायता के लिए ईमान की शक्ति की नितांत आवश्यकता होती है और ईमान का न होना जीवन की कठिनाइयों में मानव की पराजय के लिए ख़तरे की घण्टी के समान है।
माहे रमज़ान के पवित्र महीने में कुछ विशेष क्षण होते हैं। इन विशेष क्षणों में सबसे सुंदर क्षण सहर अर्थात भोर के समय के होते हैं। बड़े खेद के साथ कहना पड़ता है कि वर्तमान जीवन शैली तथा शारीरिक एवं मानसिक थकान ने अधिकांश लोगों को भोर समय में उठने से वंचित कर रखा है। माहे रमज़ान के पवित्र महीने में हमें यह सुअवसर प्राप्त होता है कि भोर समय उठने के आनन्द तथा उसके लाभ का हम आभास कर सकें। दिन भर के 24 घण्टों में भोर का समय ही सबसे अच्छा समय होता है। इस समय का महत्व इतना अधिक है कि ईश्वर ने पवित्र क़ुरआन की आयतों में इसकी सौगंध खाई है ताकि लोग भोर के बारे में अधिक विचार करें।
इस्लाम के बड़े-बड़े महापुरूषों तथा विद्धानों के जीवन पर यदि एक दृष्टि डाली जाए तो हमें ज्ञात होगा कि वे सब ही भोर समय उठा करते थे। वे लोग इस समय ईश्वर की उपासना , चिंतन तथा ज्ञानार्जन में व्यस्त रहा करते थे। भोर समय की प्रार्थना या उपासना मनुष्य के मन तथा आत्मा पर गहरा प्रभाव डालती है। पैग़म्बरे इस्लाम का कथन है कि दुआ के लिए बेहतरीन समय भोर समय है। भोर समय की अनुकंपाओं के संबन्ध में इमाम जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम का कथन है कि ईश्वर अपने मोमिन बंदों में से उस बंदे से अधिक प्रेम करता है जो अधिक दुआ करता है। इसीलिए भोर समय से सूर्योदय तक प्रार्थना किया करो क्योंकि उस समय आकाशों के द्वार खुल जाते हैं , लोगों की रोज़ी बांटी जाती है और बड़ी-बड़ी दुआएं स्वीकार की जाती हैं।
भोर में उठने से आत्मा को आनन्द एवं शान्ति प्राप्त होती है। लगभग सभी धर्मों में भोर समय उठकर उपासना करने के आदेश मिलते हैं। इस्लामी शिक्षाओं में यह भी आया है कि भोर में उठने से आजिविका में वृद्धि होती है। पैग़म्बरे इस्लाम का इस संबन्ध में कथन है कि प्रातःकाल मे अपनी रोज़ी प्राप्त करने के लिए घर से निकल जाओ क्योंकि भोर में उठना विभूतियों की प्राप्ति का कारण बनता है। माहे रमज़ान का पवित्र महीना आत्मनिर्णाण का महीना है। महापुरुषों का कहना है कि आत्मनिर्माण में भोर समय उठने की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है।
विश्व में जिन लोगों ने कोई विशेष स्थान प्राप्त किया है उनके जीवन का अध्धयन करने से ज्ञात होता है कि वे प्रातः उठा करते थे। अरबी भाषा में भी एक कथन है जिसका अर्थ यह है कि जो भी सफलता की कामना करता है उसे भोर समय उठना चाहिए। भोर समय उठने से केवल आत्मा को ही लाभ नहीं मिलता बल्कि शरीर को भी इसका लाभ प्राप्त होता है। भोर समय उठने वाला व्यक्ति शारीरिक दृष्टि से स्वस्थय रहता है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि भोर समय उठना मनुष्य के लिए हर दृष्टि से लाभकारी है अतः हमें इसे अपनाना चाहिए।
माहे रमज़ान के पवित्र महीने में तौबा करने अर्थात प्रायश्चित करने पर विशेष बल दिया गया हैं। तो आरंभ कर रहे हैं इसी विषय से।
जिस प्रकार से ईश्वर का आज्ञापालन मनुष्य को श्रेष्ठता तथा मार्गदर्शन के मार्ग पर अग्रसर करता है और कृपालु ईश्वर के साथ उसके संबन्धों को सुदृढ़ बनाता है उसी प्रकार से पाप इस संबन्ध को तोड़ दिया करते हैं। पाप ही मनुष्य को ईश्वर की व्यापक अनुकंपाओं से दूर कर देते हैं। पाप तथा ईश्वर अवज्ञा मनुष्य को परिपूर्णता के मार्ग से विचलित कर देती है। ईश्वर का मार्ग दर्शन मानव जाति की भलाई , उसके कल्याण तथा विकास के लिए है इसीलिए इनकी अनदेखी , उसकी आध्यत्मिक परिपूर्णता के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा होगी। क्योंकि मनुष्य हर प्रकार का कार्य करने के लिए स्वतंत्र है अतः उसमे ग़लती की संभावना भी पाई जाती है। यही कारण है कि मनुष्य कभी-कभी ईश्वर की अवज्ञा करते हुए पाप कर लेता है। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि ग़लती करने के पश्चात वापस लौटने का मार्ग उसके लिए बंद नहीं होता। ईश्वर ने अपनी असीम कृपा से वापसी का मार्ग उन लोगों के लिए खोल रखा है जो अपने ग़लत कार्यों पर पश्चाताप करते हैं। यह तौबा और प्रायश्चित का मार्ग है। एसे लोग जो अपने पापों से लज्जित होकर पवित्रता तक पहुंचने का मार्ग खोजने लगते हैं वे प्रायश्चित करके अपने मन से बुराइयों की गंदगी को धो डालते हैं। इस आधार पर कहा जा सकता है कि हर पापी जो अपने पापों पर लज्जित हो वह प्रायश्चित करके ईश्वर की ओर पलट सकता है। इसके लिए शर्त यह है कि मनुष्य का प्रायश्चित या उसकी तौबा वास्तविक हो। कहने का तात्पर्य यह है कि ईश्वर से क्षमा याचना के पश्चात मनुष्य भले और अच्छे कार्य में व्यस्त रहे। एसी स्थिति में ईश्वर भी अपने उस बंदे की ओर विशेष ध्यान देता है जो उससे प्रायश्चित करता है।
पवित्र क़ुरआन के सूरए फ़ुरक़ान की 70वीं आयत में हम पढ़ते हैः- सिवाए उनके जो ईश्वर की ओर पलटा और ईमान लाया और अनुकूल कार्य किया , तो एसे लोगों की बुराइयों को ईश्वर भलाइयों से बदल देगा। और ईश्वर अत्यन्त क्षमाशील तथा दया करने वाला है।
इस आयत में महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि हम अपने पापों का यदि प्रायश्चित कर लें तो फिर महान सर्व शक्तिशाली परमेश्वर बुरे कामों को भलाई में परिवर्तित कर देता है। यह आयत लज्जित होने तथा पछतावा करने वाले बंदों के प्रति ईश्वर की दया , उसकी कृपा तथा अनुकंपा की निशानी है। सच्ची तौबा या वास्तविक प्रायश्चित से अमृत की भांति मनुष्य के पूरे असितत्व में एक गहरी हलचल उत्पन्न हो जाती है। वास्तविक प्रायश्चित इस प्रकार है मानों मनुष्य ने पुनः जन्म लिया हो। तौबा करके एक बुरा व्यक्ति , भले व्यक्ति में परिवर्तित हो जाता है। वास्तविक प्रायश्चित के पश्चात पाप और बुरे कर्मों के चिन्ह भी मिट जाते हैं और वे भलाई में परिवर्तित हो जाते हैं। इस प्रकार जो भी व्यक्ति वास्तविक रूप से ईश्वर की ओर लौटता है उसका व्यक्तिव भी अलग होता है। इस स्थिति में उसका अशांत मन , ईश्वर की मित्रता के शांत साहिल तक पहुच जाता है
अब जब हमने देख लिया कि पापों की क्षमा याचना मनुष्य की आत्मा और उसके मन को इस प्रकार परिवर्तित कर देती है , उचित होगा कि हम भी कृपा के इस साहिल तक पहुंच जाएं और पवित्र माहे रमज़ान के मूल्यवान क्षणों से भरपूर लाभ उठाने का प्रयास करें। यहां हमें यह बात ध्यान में रखनी होगी कि माहे रमज़ान का अवसर हमें वर्ष में केवल एक बार ही मिलता है। अंत में हम प्रायश्चित के संबन्ध में यह दुआ पढ़ते हैं। हे पालनहार , हमने स्वयं पर अत्याचार किया , यदि तूने हमे क्षमा न किया और हमपर दया न की तो निश्चित रूप से हम घाटा उठाने वालों में से हो जाएंगे।
पवित्र माहे रमज़ान का महीना ईश्वर के भक्तों के लिए धैर्य तथा शुभ सूचना का महीना है। माहे रमज़ान ईश्वरीय विभूतियों में डिबो देने वाला महीना है। हम इस बात की आशा करते हैं कि आप इस पवित्र महीने के प्रत्येक क्षण से लाभ उठा रहे होंगे।
जैसाकि आप जानते हैं कि मनुष्य के लिए भौतिक तथा आध्यात्मिक दृष्टि से रोज़े के बहुत लाभ हैं। रोज़े का महत्वपूर्ण उद्देश्य आत्म प्रशिक्षण है। धार्मिक मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि सबसे अधिक बुरा प्रभुत्व , मानव के असितत्व पर उसकी इच्छाओं का नियंत्रण है। रोज़ा मानव को आंतरिक इच्छाओं के बंधन से मुक्त करवाने में सक्षम है। रोज़े का प्रशिक्षणात्मक कार्यक्रम मनुष्य के लिए यह अवसर उपलब्ध करवाता है कि वह दिन और रात के निर्धारित समय में अपने शरीर तथा आत्मा को अपनी बहुत सी आंतरिक इच्छाओं को नियंत्रित करे। यह समय अनियंत्रित आंतरिक इच्छाओं को नियंत्रित करने का अच्छा अवसर है। रोज़ा मनुष्य की इच्छा शक्ति को मज़बूत करने में सहायक सिद्ध होता है। पैग़म्बरे इस्लाम का कथन है कि माहे रमज़ान का महीना , धैर्य का महीना है और धैर्य का बदला स्वर्ग है।
इस्लामी शक्षाओं में धैर्य को मानवीय विशेषताओं में से एक महत्वपूर्ण विशेषता के रूप में प्रस्तुत किया गया है और धैर्य करने वालों का सम्मान किया गया है। वे लोग जो संसार में ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए धैर्य का सहारा लेते हैं वे मोक्ष प्राप्त करते हैं और स्वर्ग तक पहुंचने के योग्य हो जाते हैं। सूरए रअद की आयत संख्या 24 में आया है कि तुम पर सलाम है। यह तुम्हारे सब्र का बदला है। तो क्या ही अच्छा है "आख़िरत के" घर का परिणाम।
परिपूर्णता के मार्ग पर चलने के लिए आवश्यक है कि मनुष्य की आंतरिक क्षमताएं और योग्यताएं सामने आएं। समस्याओं के सामने आते समय निश्चित रूप से धैर्य , मनुष्य की योग्यताओं और क्षमताओं को उजागर करने का सबसे उचित साधान है। इस आधार पर धैर्य के माध्यम से प्रगति तथा कल्याण के मार्ग को प्रशस्त किया जा सकता है। जैसाकि हमने बताया कि रोज़े का सबसे महत्वपूर्ण लाभ , मनुष्य की इच्छा शक्ति का सुदृढ़ होना और उसकी इच्छाओं को नियंत्रित होना है। आंतिरक इच्छाओं का मुक़ाबला करने में जिन लोगों की प्रतिरोधक क्षमता कम होती है वे उस वृक्ष की भांति हैं जो नहर के किनारे या किसी बाग़ की दीवार के निकट लगा हुआ है। एसे वृक्षों की प्रतिरोधक क्षमता कम होती है। यदि कुछ दिनों तक इनकी सिंचाई न की जाए तो यह मुरझा जाएंगे। इसके विपरीत वे वृक्ष जो जंगलों में उगते हैं उनकी प्रतिरोधक क्षमता भी अधिक होती है। रोज़ा भी मनुष्य की आत्मा के साथ कुछ एसा ही कार्य करता है। यह निर्धारित समय के लिए कुछ प्रतिबंध लगाकर मनुष्य की इच्छा शक्ति को मज़बूत तथा समस्याओं के मुक़ाबले में प्रतिरोध क्षमता को बहुत बढ़ा देता है। क्योंकि रोज़े और धैर्य से मनुष्य की अनियंत्रित इच्छाएं नियंत्रित हो जाती हैं , रोज़ा रखने वाले का मन और उसकी भावनाएं स्वच्छ तथा प्रकाशमई हो जाती हैं।
पैग़म्बरे इस्लाम का कथन है कि जो भी ईश्वर के लिए गर्मी में रोज़ा रखे और उसे बहुत तेज़ प्यास लगे तो ईश्वर हज़ार फ़रिश्तों को नियुक्त करता है कि वे उसके मुख को छुएं और उसको शुभसूचना दें यहां तक कि वह इफ़तार करे। ईश्वर कहता है कि हे फ़रिश्तों , मैं शहादत देता हूं कि मैंने उसको क्षमा कर दिया है।
स्वस्थ लोगों की विशेषताओं में से स्पष्ट विशेषता , समस्याओं के समय उनसे उचित ढ़ंग से निबटना है। वर्तमान समय में संसार में एसे लोग पाए जाते हैं जिनमें व्यक्तिगत तथा समाजिक जीवन जीने के लिए आवश्यक क्षमताएं ओर योग्यताएं पाई जाती हैं। इन लोगों में समन्वय की उचित शक्ति पाई जाती है। सकारात्मक विचारधारा वाले लोगों में यह शक्ति अधिक पाई जाती है। यदि हम धार्मिक शिक्षाओं पर दृष्टि डालें तो इस बात को स्वीकार करेंगें कि यह ईश्वरीय शिक्षाएं मनुष्य को भविष्य के प्रति आशान्वित करते हुए एक सार्थक जीवन की ओर बढ़ाती हैं। धार्मिक शिक्षाओं का मूलतः उददेश्य समाज तथा व्यक्ति को प्रगति के लिए प्रेरित करना तथा कल्याण के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करना है। धार्मिक शिक्षाओं में महत्वपूर्ण तत्व जो मानव के मनोस्वास्थय को बहुत अधिक प्रभावित करता है वह मनुष्य को ईश्वरीय अनुकंपाओं से निराश न होने देना है। क्योंकि ईश्वर की कृपा और उसकी अनुकंपाओं से निराशा मनुष्य की बहुत सी आध्यात्मिक तथा मानसिक समस्याओं की जड़ है। सूरए ज़ोमर की 53वी आयत में आया है कि ईश्वर की कृपा से कदापि निराश न हो।
एक ईरानी मनोचिकित्सक डाक्टर बुर्जअली कहते हैं कि ख़तरों तथा नकारात्म विचारधारा के मुक़ाबले में हमारा समर्थन करने वाला सबसे महत्वपूर्ण तत्व , ईश्वर तथा प्रलय पर भरोसा है। हमको शक्तशाली , शक्तिवर्धक तथा आशा बढ़ाने वाले स्रोतो की तलाश में रहना चाहिए। इसका कारण यह है कि हमारे पास जितनी अधिक आध्यात्मिक शक्ति होगी हम उतने अधिक आशावान होंगे। इस्लामी शिक्षाओं में निराशा की बहुत अधिक भर्तस्ना की गई है। सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 87 में कहा गया है कि ईश्वर की अनुकंपा से निराश न हो , केवल काफ़िर ही ईश्वर की अनुकंपा से निराश होते हैं।
एकेश्वरवादी विचारधारा में आशा एक एसा बहुमूल्य पुरूस्कार है जो जीवन के चक्र को चलाता है। यही आशा , प्रयास और सक्रियता को तेज़ कर देती है। आशा को नाव के नाविक की संज्ञा दी जा सकती है। जिस प्रकार नाव बिना नाविक के उफनती नदी में अनियंत्रित हो जाएगी। मनुष्य भी आशा के बिना इस संसार में परेशान हो जाएगा। आशा जीवन में इस शर्त के साथ बहुत से सार्थक परिवर्तनों का कारण है कि मनुष्य काल्पनिक विचारों के मायाजाल में न फंस जाए। जीवन में आशा तथा सकारात्मक विचारधारा , मनुष्य में सकारात्मक विचारों का कारण बनती है। सकारात्मक विचारधारा भी उत्साहवर्धन करती है।
धार्मिक विचारधारा जीवन की कठिनाइयों के संबन्ध में मनुष्य के दृष्टिकोण को पूर्ण रूप से परिवर्तित कर देती है। हममें से अधिकांश लोग सामानयतः जीवन में आने वाली कठिनाइयों का स्वागत नहीं करते और उनका मुक़ाबला करते हुए डरते हैं। हालांकि वास्तविकता यह है कि कठिनाइयां उतनी असहनीय नहीं हैं जितनी हम सोचते हैं। कभी-कभी एसा भी होता है कि जीवन की यह कठिनाइयां और समस्याएं मानव के भीतर छिपी हुई योग्यताओं और क्षमताओं के विकसित होने का कारण बनती हैं। कहा जाता है कि सकारात्मक विचारधारा रखने वाले लोग कठिनाइयों का डट कर मुक़ाबला करते हैं। इसके विपरीत निराशावादी विचारधारा वाले लोग अवसरों से लाभ नहीं उठा पाते और उन्हें अपने हाथों से गंवा देते हैं। कठिनाइयों के बिना कोई भी आराम प्राप्त नहीं कर सकता। वे लोग जो कठिनाइयों और समस्याओं को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करते हैं और उनके सामने असमर्थता दर्शाते हैं एसे लोग अधिक्त निराशा का शिकार होते हैं। हालांकि मनुष्य का जीवन कुछ इस प्रकार है जिसमें समस्याएं और आसानियां दोनों साथ-साथ हैं। सख़तियों के बाद आसानियां भी आती हैं।
जब पवित्र भावना तथा समस्त शर्तों के प्रति सचेत रहते हुए रोज़ा रखा जाता है तो यह रोज़ा मनुष्य को उसके हर प्रकार के कर्तव्यों के बारे में संवेदनशील बना देता है।
इस्लामी शिक्षाओं में दायित्व स्वीकार करने और उनके निर्वाह की भावना पर विशेष बल दिया गया है। इन शिक्षाओं में यहां तक कहा गया है कि जो भी अपने कर्तव्यों का पालन नहीं करता उसका कोई धर्म नहीं है। प्रत्येक मनुष्य के लिए ईश्वर ने कुछ कर्तव्य निर्धारित किये हैं। उदाहरण स्वरूप अपने शरीर तथा आत्मा के प्रति कर्तव्य , समाज के प्रति कर्तव्य , लोगों के प्रति विशेष कर्तव्य यहां तक कि ईश्वर की समस्त सृष्टि के लिए अलग-अलग प्रकार के कर्तव्य। इस्लाम ने समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों के प्रति उनकी स्थिति के अनुकूल ही दायित्व निर्धारित किये हैं।
उदाहरण स्वरूप जनता के प्रति शासकों का दायित्व , संतान के प्रति माता-पिता का दायित्व , एक दूसरे के प्रति पति-पत्नी का दायित्व , शिक्षक तथा विद्यार्थी के बीच परस्पर दायित्व इत्यादि। इसी प्रकार से इस्लाम ने समाज के सभी लोगों पर एक दूसरे के प्रति कुछ आम दायित्व रखे हैं जिन्हें अपनी क्षमता के अनुसार पूरा करना सभी का कर्तव्य है। इन कर्तव्यों में समाज सुधार , लोगों की समस्याओं का समाधान , समाजिक कठिनाइयों का निवारण तथा राष्ट्र की प्रतिरक्षा के दायित्व सम्मिलित हैं। इस संबन्ध में पवित्र क़ुरआन में बहुत सी आयतें मौजूद हैं। इसी प्रकार इस संदर्भ में पैग़म्बरे इस्लाम और उनके परिजनों के बहुत से कथन भी पाए जाते हैं। सूरए बक़रा की आयत संख्या २२ में कहा गया है कि लोगों को ईमान वालों के साथ भलाई और उनके बीच सुधार का प्रयास करना चाहिए।
माहे रमज़ान का पवित्र महीना उत्तम जीवन व्यतीत करने हेतु अभ्यास तथा प्रशिक्षण प्राप्त करने का महीना है। रोज़ा रखने वाला व्यक्ति भूख और प्यास सहन करता है। क्योंकि यह कार्य वह स्वेच्छा से करता है अतः उसपर किसी भी प्रकार की विवश्ता नहीं होती और उसमें क्रोध की भावना ही उत्पन्न नहीं होती। इस प्रकार से रोज़ा रखने वाला व्यक्ति भूख-प्यास तथा अन्य प्रकार की बहुत सी आंतरिक इच्छाओं को नियंत्रित करने की शैली भी माहे रमज़ान में सीख लेता है।
हज़रत अली अलैहिस्सलाम का कथन है कि लोगों में सबसे श्रेष्ठ व्यक्ति वह है जो आंतरिक इच्छाओं पर अंकुश लगता है और उनमें सबसे शक्तिशाली वह होता है जो अपनी अंतरात्मा पर विजय प्राप्त कर लेता है। हानिकारक आदतों से छुटकारा दिलाने में मनुष्य यदि चाहे तो रोज़ा उसकी बहुत सहायता कर सकता है। उदाहरण स्वरूप धूम्रपान या फिर चाय पीने की बढ़ी हुई आदत बड़ी ही सरलता से छोड़ी जा सकती है। इसका मुख्य कारण यह है कि रोज़े की स्थिति में मनुष्य दिनभर अर्थात १५ घण्टों या उससे अधिक समय तक इन वस्तुओं का सेवन नहीं करता और उनसे दूर रहता है। इस प्रकार वह स्वयं पर यदि थोड़ा सा और नियंत्रण कर ले तो इस बुरी आदत से सरलता से मुक्ति पा सकता है।
ईश्वर मनुष्य की तपस्या को स्वीकार कर ले इसके लिए रोज़ा रखने वाले को अपने व्यवहार और कार्यों के प्रति सावधान रहना चाहिए। इस संबन्ध में यदि वह सावधान रहता है तो फिर बहुत से अनुचित कार्यों की संभावना कम हो जाती है। यह विषय् रोज़ेदार की चिंताओं को कम करके उसकी आत्मा तथा उसके मन को अदभुत शक्ति प्रदान करता है। अनुचित कार्यों में से एक कार्य क्रोधित होना है। कुछ लोग एसे भी होते हैं जो अन्य लोगों पर अपनी श्रेष्ठता जताने या फिर स्वयं को सशक्त दिखाने हेतु अपने आप को क्रोधित और कठोर स्वभाव वाला दर्शाने का प्रयास करते हैं। अपने या पराए लोगों सब के लिए अपमान जनक शब्दों का प्रयोग या बुरा व्यवहार उनकी आदत बन जाता है। एसे लोग माहे रमज़ान के पवित्र महीने में भी यदि अपनी इस आदत को बनाए रखते हैं तो फिर उन्हें ईश्वर के सामिप्य की आशा नहीं रखनी चाहिए।
माहे रमज़ान का पवित्र महीना ईश्वर से निकटता तथा उपासनाओं का महीना है। इस्लाम में ईश्वर के सामिप्य के लिए विभिन्न प्रकार की उपासनाओं का उल्लेख किया गया है। रोज़ा भी उन उपासनाओं में से एक है। यदि हम उपासनाओं पर दृष्टि डालें तो हमको यह ज्ञात होगा कि ईश्वर के लिए इन उपासनाओं का कोई लाभ नहीं है। जब वास्वत में हमारी उपासना का ईश्वर को कोई लाभ नहीं है तो फिर इस्लामी शिक्षाओं में उनके संबन्ध में इतना अधिक बल क्यों दिया गया है।
इसका कारण यह हो सकता है कि हमारा रचयिता अपनी रचना अर्थात मानव को शारीरिक तथा आध्यात्मिक दोनों रूप में सही देखना चाहता है। वह मनुष्य के जीवन को व्यक्तिगत तथा सामाजिक दोनों स्तरों पर शान्तिमय और सकारात्मक बनाना चाहता है। अतः प्रार्थना वह होती है जिससे अपने या दूसरों के शरीर तथा आत्मा को लाभ पहुंचता हो अन्यथा प्रार्थना के नाम पर किया गया कार्य केवल ढोंग होता है प्रार्थना नहीं। अन्य सभी अनिवार्य उपासनाओं की भांति रोज़ा रखने वाले के लिए ही यह आवश्यक है कि मनुष्य मानसिक रूप से स्वस्थ हो ताकि उसे पूर्ण रूप से इस बात का पता चल सके कि वह रोज़ा क्यों रख रहा है और उसके नियम क्या है ? रोज़े के लिए शारीरिक स्वास्थ का होना भी आवश्यक है क्योंकि चिकित्सक की दृष्टि से भूखा प्यासा रहने से यदि किसी व्यक्ति को नुक़सान हो रहा हो तो इस्लाम ने एसे व्यक्ति को रोज़ा न रखने की सलाह दी है। इसके साथ ही यह बात भी दृष्टिगत रखनी चाहिए कि केवल इस भय से कि रोज़ा रखने से कहीं शरीर को नुक़सान न हो और भूख प्यास सहन नहीं की जा सकती मनुष्य रोज़ा नहीं छोड़ सकता।
माहे रमज़ान का पवित्र महीना रोज़ा रखने वालों को शारीरिक और आध्यात्मिक लाभ पहुंचाने के अतिरिक्त लोगों के बीच संबन्धों के सुदृढ़ होने का भी कारण बनता है। वास्तविक रोज़ा उस रोज़े को माना जाता है जिसका रखने वाला अपने व्यक्तिगत , पारीवारिक एवं सामाजिक तीनों प्रकार के कर्तव्यों पर ध्यान रखता हो।
फेहरिस्त
माहे रमज़ान 1
पवित्र माहे रमज़ान-1 2
पवित्र माहे रमज़ान-2 8
पवित्र माहे रमज़ान- 3 12
पवित्र माहे रमज़ान- 4 16
पवित्र माहे रमज़ान-5 21
पवित्र माहे रमज़ान-6 27
पवित्र माहे रमज़ान-7 33
पवित्र माहे रमज़ान-8 36
पवित्र माहे रमज़ान-9 38
पवित्र माहे रमज़ान-10 44
पवित्र माहे रमज़ान-11 46
पवित्र माहे रमज़ान-12 47
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