ग़दीरे ख़ुम
समूहन इतिहासिक कथाऐ
लेखक
पुस्तक की भाषा هندی
मुद्रण वर्ष 1404

ग़दीर और वहदते इस्लामी

उर्दू तर्जुमाः इक़बाल हैदर हैदरी

हिन्दी टाइपः सैय्यद एजाज़ हुसैन मूसवी


असरे हाज़िर में बाज़ लोग ग़दीर और हज़रते अली अलैहिस्सलाम की इमामत की गुफ़्तुगू (चूँकि इसको बहुत ज़माना गुज़र चुका है) को बेफ़ायदा बल्कि नुक़सानदेह समझते हैं , क्योकि यह एक तारीखी वाक़ेया है जिसको सदियाँ गुज़र चुकी हैं। यह गुफ़्तुगू करना कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्ललाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) का जानशीन कौन था और है ? हज़रत अली इब्ले अबी तालिब या अबू बक्र ? आज इसका कोई फ़ायदा नही है बल्कि बाज़ अवक़ात इस सिलसिले में गुफ़तुगू के नताइज में फ़ितना फ़साद बरपा होता है , उसके अलावा कोई फ़ायदा नही है। दूसरे अल्फ़ाज़ में यूँ कहा जाये: इस ज़माने में इस्लामी फ़िरक़ों के दरमियान वहदत की वाज़ेह ज़रूरत है तो फिर इस तरह की इख़्तेलाफ़ी गुफ़्तुगू क्यों की जाती है ?.....

हम ख़ुदा वन्दे आलम के लुत्फ़ व करम से असरे हाज़िर में "इमामत" के आसार व फ़वायद के लिये चंद चीज़ों को बयान करते हैं:

1. वहदत की ह़कीक़त

चूँकि ऐतेराज़ करने वाले लफ़्ज़े वहदत पर बहुत ज़्यादा अहमियत देते हैं लिहाज़ा पहले इस लफ़्ज़ की हक़ीक़त को वाज़ेह करना ज़रूरी है।

आम तौर पर दो इस्तेलाहें हमारे यहाँ पाई जाती हैं जिन पर ग़ौर व फ़िक्र करना ज़रूरी है और उनमें एक दूसरे पर क़ुर्बान नही करना चाहिये , उनमें से एक वहदत और उम्मते इस्लामिया के इत्तेहाद को महफ़ूज़ रखना है और दूसरी चीज़ अस्ले इस्लाम की हिफ़ाज़त है।

इस हक़ीक़त में कोई शक नही है कि हर मुसलमान की ज़िम्मेदारी है कि दीने हनीफ़ (हक़ीक़ी दीन) को हिफ़्ज़ और उसको फैलाने की कोशिश करे , लिहाज़ा यह सभी की अहम ज़िम्मेदारी है।

इसी तरह चूँकि मुसलमानों के बहुत से मुशतरक दुश्मन हैं जो चाहते हैं इस्लाम और मुसलमानों को नीस्त व नाबूद कर दें लिहाज़ा हमें चाहिये कि सब मुत्तहिद होकर इस्लाम के अरकान और मुसलमानों की हिफ़ाज़त की कोशिश करें , लेकिन इसके यह मायना नही है कि दूसरी ज़िम्मेदारियों को पशे पुश्त डाल दें और इस्लाम के मुसल्लम हक़ायक़ को बयान न किया जाये। लिहाज़ा वहदत और इत्तेहाद के मसले को असली हदफ़ क़रार नही देना चाहिये और शरीयत के हक़ायक़ को इत्तेहाद पर क़ुर्बान नही करना चाहिये , बल्कि उसके बर ख़िलाफ़ अगर इस्लाम ने मुसलमानों के दरमियान ताकीद की है तो इसकी वजह भी दीने इस्लाम की हिफ़ाज़त बयान की है , अब यह कैसे मुम्किन है कि किसी की नज़र में बहदत का मसअला इतना अहम दिखाई दे कि बाज़ दीनी मुसल्लमात और मज़हब के अरकान को तर्क कर दे या बेजा और फुज़ूल की ताविलात की जाये।

इस ह़कीक़त पर पैग़म्बरे इस्लाम (स) की सीरत और तारीख़ बेहतरीन गवाह है , आँ हज़रत (स) अगरचे यह जानते थे कि बनी उमय्या हज़रत अली (अ) और बनी हाशिम के मुख़ालिफ़ हैं और बहुत से लोग हज़रत अली (अ) की विलायत और हुक्मरानी को क़बूल नही करेगें और आपकी इमामत के कभी भी कबूल नही करेगें , लेकिन इस वजह से आँ हज़रत (स) ने हक़ व हक़ीक़त को बयान करने से गुरेज़ नही किया। ऐसा नही है कि हज़रत अली (अ) की विलायत व इमामत को बयान किया हो , बल्कि अपनी बेसत के 23 साल में जैसे भी मुमकिन हुआ हज़रत अली (अ) की विलायत व इमामत को असहाब के सामने बयान किया जबकि आँ हज़रत (स) इस बात पर यक़ीन रखते थे कि यह लोग मेरी वफ़ात के बाद इस मसअले पर इख़्तिलाफ़ करेगें , बल्कि यह इख़्तिलाफ़ हज़रत इमामे ज़माना (अ) के ज़हूर तक बाक़ी और जारी रहेगा। आँ हज़रत (स) ने इन तमाम चीज़ों के बावजूद भी हक़ को बयान किया। पैग़म्बरे इस्लाम (स) हालाकि जानते थे कि हज़रत अली (अ) के इमामत को मसअले पर क़यामत तक इख़्तिलाफ़ रहेगा फिर भी आँ हज़रत (स) ने इस तरह हज़रत अली (अ) की इमामत की ताकीद फरमाई यहाँ तक कि रोज़े ग़दीर शक व शुब्हे को दूर करने के लिये हज़रत अली (अ) के हाथों को उठा कर उनको अपना जानशीन मुक़र्रर किया और आपकी विलायत पर ताकीद फरमायी।

क़ारेईने केराम , यहाँ तक की बातों से यह बात बिल्कुल वाज़ेह हो जाती है कि हक़ व हक़ीक़त को बयान करना अस्ल है और कभी भी इसको नज़र अंदाज़ नही करना चाहिये। यहाँ तक कि अगर हमें मालूम हो कि इसको बयान करने की वजह से मुसलमानों की सफ़ों में इख्तिलाफ़ हो जायेगा और मुसलमानों के दरमियान दो गिरोह हो जायेगें , लेकिन इसके यह मायने नही हैं कि मुसलमान एक दूसरे के दुश्मन हो जायें और एक दूसरे को नीस्त व नाबूद करने की फ़िक्र में लग जायें , बल्कि अपना मुद्दआ बयान करने के साथ साथ एक दूसरे की बातों को भी बर्दाश्त करने का भी हौसला रखें और बेहतरीन गुफ़तार की पैरवी करने की दावत दें , लेकिन इस हाल में मुश्तरक दुश्मन से ग़ाफ़िल न हों।

हज़रत इमाम हुसैन (अ) का क़याम हमारे मुद्दआ पर बेहतरीन गवाह है , क्योकि इमाम हुसैन (अ) हाला कि जानते थे कि मेरे क़याम से मुसलमानों के दो गिरोह में इख्तिलाफ़ होगा। लेकिन इस सूरत में भी मुसलमानों के इत्तेहाद की वजह से अम्र बिल मारूफ़ व नहयी अनिल मुन्कर जैसे अहम उसूल से ग़ाफ़िल नही हुए।

हज़रत अली (अ) की सीरत भी इसी मतलब की तरफ़ इशारा करती है , क्यो कि बाज़ लोगों के नज़रिये के मुताबिक़ हज़रत अली (अ) तलहा व ज़ुबैर और मुआविया को बेजा ओहदा देकर जंगे जमल व जंगे सिफ़्फ़ीन को रोक सकते थे और इस काम के ज़रिये मुसलमानों के दरमीयान होने वाले इख्तिलाफ़ की रोक थाम कर सकते थे। जिसके नतीजे में हज़ारों लोगों की जान बच जाती। लेकिन हज़रत अली (अ) ने उसूले इस्लाम , हक़ व हक़ीक़त से और शरीयते इस्लामिया की हिफ़ाज़त के लिये उन हक़ायक़ से चश्म पोशी नही की।

लिहाज़ा वहदत की हक़ीक़त (या दूसरे लफ़्ज़ों में इत्तेहाद) के मायना यह हैं कि अपने मुसल्लम अक़ायद को महफ़ूज़ रखते हुए मुश्तरक दुश्मन के मुक़ाबले में हम आवाज़ रहें और दुश्मन से ग़फ़लत न बरतें। इसके यह मायना नही है कि ख़ालिस इल्मी गुफ़्तुगू और ताअस्सुब से ख़ाली बहस से भी परहेज़ करें , क्यो कि यह तमाम चीज़ें दर हक़ीक़त शरीयते इस्लामिया की हिफ़ाज़त के लिये हैं।

इसी वजह से जब जंगे सिफ़्फीन में हज़रत अली (अ) से नमाज़ के वक्त के बारे में सवाल किया गया और उस सवाल के बाद कि इस जंग के मौक़े पर क्या यह नमाज़ को वक्त है ? तो इमाम अली (अ) ने फ़रमाया: क्या हम नमाज़ के अलावा किसी दूसरी चीज़ के लिये जंग कर रहे हैं ? लिहाज़ा कभी भी हदफ़ को वसीले और ज़रिये पर क़ुर्बान न किया जाये।

शेख मुहम्मद आशूर , अल अज़हर युनिवर्सिटी मिस्र के सिक्रेटरी और अंदीश ए तक़रीबे मज़ाहिब कमेटी के सद्र एक बेहतरीन और मंतीक़ी गुफ़्तुगू में कहते हैं: इस्लामी मज़ाहिब के दरमीयान गुफ़्तुगू के नज़िरये का मक़सद यह नही है कि तमाम मज़हबों को एक कर दिया या किसी एक फ़िरकें से दूसरे फ़िरक़े की तरफ़ रग़बत दिलाई जाये , अगर यह मायना किये जायें तो फिर क़ुरबत का नज़रिया बेफ़ायदा हो जायेगा। क़ुरबत का नजरिया इल्मी गुफ़्तुगू की बुनियाद पर होना चाहिये ताकि इस इल्मी असलहे के ज़रिये ख़ुराफ़ात से जंग की जा सके और हर मज़हब व फ़िरक़े के उलामा और दानिशवर अपनी इल्मी गुफ़्तुगू में अपने इल्म को दूसरों के सामने पेश करें। ताकि इंसान चैन व सुकून के माहौल में हक़ीक़त से आगाह हो जाये और आसानी से किसी नतीजे पर पहुच जाये।

(बाज़ ख़्वानी अंदेश ए तक़रीब , इसकंदरी पेज 32)

हर मज़हब के मानने वालों की मुश्तरक चीज़ों पर निगाह के ज़रिये आलमी मुआशरे में ज़िन्दगी करने वाले फ़िरक़ों के दरमियान तआवुन और हम दर्दी पैदा हो जायेगी और इख्तिलाफ़ी चीज़ों पर एक इल्मी व तहक़ीक़ाती नज़र से हक़ व हक़ीकत तक पहुचने के लिये गुफ़्तगू व तहक़ीक़ को रास्ता हमवार हो जायेगा। चुनाँचे अहले बैत (अ) की विलायत से तमस्सुक के शेआर के साथ साथ शहादतैन के के इक़रार के फ़वायद और फ़िकही लवाज़िमात के नफ़ी नही की जा सकती , जिस तरह वहदते इस्लामी के उनवान के तहत या ताअस्सुब के ख़ातमे के नारे के ज़रिये ईमानी उसूल और उसके फ़वायद और बरकतों से चश्म पोशी नही की जा सकती।

ताअस्सुब की नफ़ी के मायना हक़ायक़ से पीछे हट जाना नही है , बल्कि इल्मी और तहक़ीक़ाती उसूल पर ऐतेक़ादी बुनियाद को क़ायम करना है(चाहे तहक़ीक़ के सिलसिले में हो या गुफ़्तुगू और बहस से मुताल्लिक़ हो) जिसके नतीज में फ़िक्री निज़ाम और मुख़्तलिफ़ फ़िरक़ों के दरमियान एक दुसरे से ताअल्लुक़ात , उलफ़त और हुस्ने ख़ुल्क की बुनियाद क़ायम हों।

2. हक़ीकी इमाम पर ही वहदत मुमकिन है

इस्लाम ने मुसलमानों के दरमियान बहदत व इत्तेहाद पर ज़ोर दिया है जैसा कि क़ुरआने मजीद में इरशाद होता है:

.وَاذْکُرُوا نِعْمَةَ اللهِ عَلَيکُمْ إِذْ کُنْتُمْ اٴَعْدَاءً فَاٴَلَّفَ بَينَ قُلُوبِکُمْ فَاٴَصْبَحْتُمْ بِنِعْمَته إِخْوَانًا

(सूरह आले इमरान आयत 103)

तर्जुमा

(और अल्लाह की नेमत को याद करो कि तुम आपस में दुश्मन थे और उसने तुम्हारे दिलों में उलफ़त पैदा कर दी तो तुम उसकी नेमत से भाई भाई बन गये।)

وَلاَتَکُونُوا کَالَّذِينَ تَفَرَّقُوا وَاخْتَلَفُوا مِنْ بَعْدِ مَا جَائَهُمُ الْبَينَاتُ وَاٴُوْلَئِکَ لَهُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌ

2. (सूरह आले इमरान 105)

तर्जुमा

(और ख़बर दार उन लोगों की तरह न हो जाओ जिन्होने तफ़रक़ा पैदा किया और वाज़ेह निशानियों के आ जाने के बाद भी इख्तिलाफ़ किया कि उनके लिये अज़ाबे अज़ीम है।

اِنَّمَا الْمُؤْمِنُونَ اِخْوَةٌ 3 (सूरह हुजरात आयत 10)

तर्जुमा

(बेशक मोमिनीन आपस में भाई भाई हैं ।)

اِنَّ الَّذِينَ فَرَّقُوا دِينَهمْ وَکَانُوا شِيعًا لَسْتَ مِنْهُمْ فِی شَیْءٍ 4 (सूरह अनआम आयत 159)

तर्जुमा

(जिन लोगों मे अपने दीन में तफ़रक़ा पैदा किया और टुकड़े टुकड़े हो गये उनसे आप को कोई ताअल्लुक नही है।)

وَاعْتَصِمُوا بِحَبْلِ اللهِ جَمِيعًا وَلاَتَفَرَّقُوا 5 (सूरह आले इमरान आयत 103)

तर्जुमा

(और अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से पकड़े रहो और आपस में तफ़रक़ा पैदा न करो ।)

وَلاَتَنَازَعُوا فَتَفْشَلُوا وَتَذْهَبَ رِيحُکُمْ 6 (सूरह अनफ़ाल आयत 99)

तर्जुमा

(और आपस में इख्तिलाफ़ न करो कि कमज़ोर पड़ जाओगे और तुम्हारी हवा बिगड़ जायेगी।)

اِنَّ هَذِه اٴُمَّتُکُمْ اٴُمَّةً وَاحِدَةً وَاٴَنَا رَبُّکُمْ فَاعْبُدُونِ 7 (सूरह अँबिया आयत 92)

तर्जुमा

(बेशक यह तुम्हारा दीन एक ही दीन इस्लाम है और मैं तुम सब का परवर दिगार हूँ लिहाज़ा मेरी इबादत करो।)

इस्लामी वहदत और इत्तेहाद के मसअले पर इतनी ताकीद के बावजूद इस नुक्ते से ग़ाफ़िल नही होना चाहिये कि वहदत के लिये एक महवर होना चाहिये या दूसरे अलफ़ाज़ में वहदत और इत्तेहाद तक पहुचने के लिये एक रास्ता होना ज़रूरी है लिहाज़ा वहदत पर ज़ोर देना उसके लिये कोई महवर और रास्ता मुअय्यन किये बग़ैर बेहूदा और बेफ़ायदा है।

कभी भी क़ुरआने सामित तने तन्हा वहदत के लिये महवर नही हो सकता। क्योकि हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अ) के फ़रमान के मुताबिक़ क़ुरआन में बहुत सी वुजूह मौजूद हैं जिन में हर एक वुजूह को एक लफ़्ज़ पर हम्ल किया जा सकता है , इस वजह से हम देखते हैं कि क़ुरआने करीम आसमानी किताबों को इमाम से ताबीर करता है जैसा कि इरशाद होता है:

وَمِنْ قَبْلِه کِتَابُ مُوسَی اِمَامًا وَرَحْمَةً (सूरह हूद आयत 17)

तर्जुमा

(और उसके पहले मूसा की किताब गवाही दे रही है जो क़ौम के लिये पेशवा और इमाम और रहमत थी।)

इसी तरह ख़ुदा वन्दे आलम सुहुफ़े इब्राहीम व मूसा का ज़िक्र करता है , चुनाँचे इरशाद होता है: صُحُفِ ابرَاهيمَ وَ مُوسی

(सूरह आला आयत 19)

तर्जुमा

(इब्राहीम के सहीफ़ों में भी और मूसा के सहीफ़ो में भी ।)

लेकिन सिर्फ़ इसी चीज़ पर इक्तिफ़ा नही की बल्कि जनाबे इब्राहीम (अ) का इमामे नातिक़ के उनवान से तआरुफ़ कराया है और इरशाद फ़रमाता है:

وَاِذْ ابْتَلَی اِبْرَاهِيمَ رَبُّهُ بِکَلِمَاتٍ فَاٴَتَمَّهُنَّ قَالَ اِنِّی جَاعِلُکَ لِلنَّاسِ اِمَامًا قَالَ وَمِنْ ذُرِّيتِی قَالَ لاَينَالُ عَهْدِی الظَّالِمِينَ (सूरह बक़रा आयत 124)

तर्जुमा

(और उस वक्त को याद करो जब ख़ुदा ने चंद कलिमात के ज़रिये इब्राहीम का इम्तेहान लिया और उन्होने पूरा कर दिया और उसने कहा कि हम तुम को लोगों का इमाम और क़ायद बना रहे हैं , उन्होने अर्ज़ की कि मेरी ज़ुर्रियत ? इरशाद हुआ यह ओहद ए इमामत ज़ालिमीन तक नही जायेगा ।)

कारेईने केराम , यहा तक कि गुफ़तुगू से यह बात वाजे़ह हो जाती है कि इमामे सामित जो आसमानी किताबें हैं काफ़ी नही हैं बल्कि उसके साथ साथ इमामे नातिक़ की भी ज़रूरत है जो इख्तिलाफ़ की सूरत में हक़ व हक़ीक़त को बयान करे या दूसरे अलफ़ाज़ में यूँ कहा जाये कि हक़ और इस्लामा वहदत का महवर क़रार पाये।

आयते शरीफ़ा ऐतेसाम وَاعْتَصِمُوا بِحَبْلِ الله جَمِيعًا وَلاَتَفَرَّقُوا (से भी यह नुक्ता बिल्कुल रौशन है , क्यो कि आयत मुसलमानों को हुक्म देती है कि ख़ुदा वंदे आलम की रस्सी को मज़बूती से पकड़ लो , यानी जो चीज़ तुम को यक़ीनी तौर पर ख़ुदा वंदे आलम तक पहुचा दे वह हक़ीक़ी इमाम और इमामे मासूम के अलावा कोई नही है , इस्लामी वहदत के सिलसिले में अहम क़ायदा यह है कि इस इत्तेहाद व वहदत का नतीजा वह हक़ीक़त है जो माहेरीन की दक़ीक़ बहस व तहक़ीक़ के बाद कश्फ़ व रौशन हो।

(सूरह आले इमरान आयत 103)

तर्जुमा

(और अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से पकड़े रहो और आपस में तफ़रक़ा पैदा न करो।)

वहदत का नतीजा हक़ायक़ से दस्त बरदार होना नही है बल्कि हक़ीक़त की राह में वहदत होना चाहिये , आयते ऐतेसाम , इस्लामा उम्मत में वहदत व इत्तेहाद का मेयार मुअय्यन करते हुए इस अहम राज़ से पर्दा उठा देती है कि उम्मत उस वक्त तक मुत्तहिद नही हो सकती जब तक (अल्लाह की रस्सी) से तमस्सुक न कर लिया जाये और अल्लाह की रस्सी से तमस्सुक उम्मत को तफ़रक़े , फ़ितना व फ़साद और बदबख़्ती की तारीक वादी से निजात देता है।

क़ाबिले तवज्जो नुक्ता यह है कि वहदत के महवर को हब्ल (रस्सी) से ताबीर किया गया है। जिससे रौशन हो जाता है कि रस्सी के दो सिरे होते हैं जिसके एक तरफ़ उम्मत और दूसरी तरफ़ ख़ुदा वंदे आलम है जो ज़मीन व आसमान और इंसान व ग़ैब के दरमियान वास्ता है लिहाज़ा इस इत्तेहाद के वहदत व क़ुत्ब का दायरा आलमे ग़ैब और मलाकूते आला से मुत्तसिल हो ताकि आलमे शुहूद व आलमें ग़ैब से राब्ता बर क़रार कर सके। यहा से यह नतीजा वाज़ेह हो जाता है कि वहदत व इत्तेहाद की कश्ती , हक़ व हक़ीक़त के साहिल पर चले न कि हवा व हवस के साहिल पर , हमारी नज़र में हक़ व हक़ीक़त पर इत्तेहाद होना चाहिये न कि हवा व हवस पर इत्तेफ़ाक़।

इस बेना पर हक़ीक़त उस वाक़ेईयत को कहते हैं जिसका उम्मत के किसी इत्तेफ़ाक़ या इख्तिलाफ़ से ताअल्लुक़ न हो। यह तो उम्मत की ज़िम्मेदारी है कि वह हक़ीक़त को तलाश करे और सभी उसकी पैरवी करें। यानी इस हक़ीक़त को हासिल कर के उस पर मुत्तहिद हो जायें। लिहाज़ा हक़ीक़त उम्म्त के किसी इत्तेफ़ाक का नतीजा नही है कि अगर किसी चीज़ पर मुत्तहिद हो जाये तो वही हक़ हो जाये और अगर किसी चीज़ से मुह मोड़ ले तो वह बातिल बन जाये। जिस तरह से सैयदुश शुहादा हज़रत इमाम हुसैन (अ) ने बड़ी शुजाअत के साथ इत्तेहाद को दरहम बरहम कर दिया और यज़ीद के ख़िलाफ़ क़याम किया और फ़रमाया:

انّما خرجت لطلب الاصلاح فی اٴمة جدّی اٴريد اٴن آمر بالمعروف واٴنهى عن المنکر

(बिहारुल अनवार जिल्द 44 पेज 329)

मैं अपने जद की उम्मत की इस्लाह के लिये निकल रहा हूँ , मैं अम्र बिल मारूफ़ और नहयी अनिल मुन्कर करना चाहता हूँ।

अगर उम्मत का इत्तेफ़ाक़ ही हक़ व हक़ीक़त का मेयार हो तो फिर इस्लाह की कोई ज़रूरत नही थी। इस्लाह व अम्र बिल मारुफ़ व नहयी अनिल मुन्कर इस बात पर मज़बूत दलील है कि हक़ व हक़ीक़त लोगों के जमा होने से हासिल नही होती बल्कि ख़ुदो लोगों को हक़ व हक़ीक़त के सामने सरे तसलीम को खम करना चाहिये और ख़ुद को उससे मुताबिक़त देना चाहिये , आयते शरीफ़ा ऐतेसाम के ज़ैल में बयान होने वाली रिवायात के मुतालये से भी यह नतीजा हासिल होता है कि अल्लाह की रस्सी वही आईम्मा अलैहिमुस्सलाम है जो इंसान को यक़ीनी तौर पर ख़ुदा वंदे आलम तक पहुचा देते हैं।

इब्ने हजर हैसमी (आयते ऐतेसाम) को उन आयात की रदीफ़ में शुमार करते हैं जो अहले बैत (अ) की शान में नाज़िल हुई हैं।इसी तरह हदीसे सक़लैन को आयते ऐतेसाम की तफ़सीर क़रार दी जा सकती है। क्योकि इस हदीस में पैग़म्बरे अकरम (स) ने मोमिनीन को हुक्म दिया है कि इन दो ग़रान क़्रद्र गौहरों से तमस्सुक करो जो क़ुरआन व इतरत हैं ताकि हक़ व हक़ीक़त तक पहुच जाओ और कभी गुमराह न हो।सवायक़े मोहरिक़ा पेज 90)

अबू जाफ़र तबरी आयते ऐतेसाम की तफ़सीर में कहते हैं कि ऐतेसाम का मतलब तमस्सुक करना है , क्योकि रस्सी के ज़रिये इंसान अपने मक़सद तक पहुच सकता है।इसके अलावा हदीसे सक़लैन की बाज़ तहरीरों में लफ़्ज़ें ऐतेसाम इस्तेमाल हुआ है , नमूने के तौर पर इब्ने अबी शैबा हदीसे सक़लैन को इस तरह नक़्ल करते हैं कि पैग़म्बर अकरम (स) ने फ़रमाया: انّی ترکت فيکم ما لن تضلّوا بعدی ان اعتصمتم بهکتاب الله و عترتی जामे उल बयान जिल्द 4 पेज 21

हदीस (अल मुसन्नफ़ इब्ने अबी शैबा)

इसी वजह से मुफ़स्सेरीन और मुहद्देसीन ने हदीसे सक़लैन को आयते ऐतेसाम के ज़ैल में ज़िक्र किया है।

हाकिम हसक़ानी अपनी सनद के साथ रसूले अकरम (स) से नक़्ल करते हैं

: من اٴحبّ اٴن يرکب سفينة النجاة و يتمسّک بالعروة الوثقی و يعتصم بحبل الله المتين فليوال علياً و ليا تمّ باالهداة من ولده

हदीस (शवाहिदुत तंज़ील जिल्द 1 पेज 168)

जो शख़्स चाहे इस निजात की कश्ती पर सवार हो और मज़बूत रस्सी से मुतमस्सिक हो और अल्लाह की रस्सी से तमस्सुक करे तो उसे चाहिये कि हज़रत अली (अ) की विलायत को क़बूल करे और उनके हिदायत करने बेटों की इक्तेदा करे।

नतीज़ा यह हुआ कि आयते शरीफ़ा और उसकी तफ़सीर में बयान होनी वाली रिवायात से यह मालूम होता है कि अहले बैत (अ) उम्मते इस्लामिया की वहदत व इत्तेहाद का मरकज़ हैं और उन हज़रात की इमामत व विलायत की बहस दर हक़ीक़त उस वहदत के महवर की गुफ़्तुगू है जिस पर क़ुरआने करीम और रिवायात ने ज़ोर दिया है जैसा कि दूसरी रिवायात भी इस हक़ीक़त पर ताकीद करती हैं। النجوم امان لاهل الارض من الغرق و اهل بيتی امان لامّتی من الاختلاف فاذا خالفت ها قبيلة من العرب اختلفوا فصا روا حزب ابليس

हाकिम नैशा पुरी अपनी सनद के साथ इब्ने अब्बास से नक़्ल करते हैं कि रसूले ख़ुदा (स) ने फ़रमाया:

सितारे अहले ज़मीन को ग़र्क़ होने से बचाते हैं और मेरे अहले बैत मेरी उम्मत को इख्तिलाफ़ का शिकार होने से बचाते हैं , पस अगर अरब का कोई क़बीला उनकी मुख़ालिफ़त करता है तो ख़ुद उनके दरमियान इख्तिलाफ़ हो जायेगा और उसका शुमार शैतानी गिरोह में होगा।

नीज़ मौसूफ़ अपनी सनद के ज़रिये जनाबे अबू ज़र से नक़्ल करते हैं कि जनाबे अबू ज़र ख़ानए काबा के पास खड़े हुए और अपने हाथों से ख़ानए काबा के दर को पकड़ कर लोगों को ख़िताब करते हुए फ़रमाया:

ऐ लोगो , जो मुझ को जानता है वह जानता है और जो नही जानता है वह पहचान ले मैं अबू ज़र हूँ , मैंने रसूले अकरम (स) को यह कहते सुना है

: الا ان مثل اهل بيتی فيکم مثل سفينة نوح من قومه من رکبها نجا و من تخلف عنها غرق

हदीस (मुसतदरके हाकिम जिल्द 3 पेज 151)

ऐ लोगों , आगाह हो जाओ कि तुम में मेरे अहले बैत की मिसाल नूह की कश्ती जैसी है जो उसमें सवार हो गया वह निजात पा गया और जिसने उससे रूगरदानी की वह ग़र्क़ हो गया।

और फिर मौसूफ़ उन दोनो हदीसों को सहीय शुमार करते हैं।

2. इल्मी गुफ़्तुगू , इत्तेहाद का रास्ता हमवार करती है

इस्लामी उम्मत के दरमियान सबसे बड़ा इख्तिलाफ़ इमामत व रहबरी को मसअला है चुनाँचे शहरिस्तानी कहते हैं: इस्लामी उम्मत के दरमियान सबसे बड़ा इख्तिलाफ़ इमामत का मसअला है , क्योकि इस्लाम के किसी भी मसअले में इमामत के मसले की तरह तलवार नही उठाई गयी है।

लिहाज़ा हर मुसलमान की ज़िम्मेदारी है कि मुसलमानों के इत्तेहाद के लिये कोशिश करे , लेकिन इसके मायना यह नही हैं कि ख़ालिस इल्मी और बिला ताअस्सुब गुफ़्तुगू भी न की जाये , क्यो कि इस तरह की बहस व गुफ़्तुगू मुसलमानो के इत्तेहाद पर असर अंदाज़ होती है , जब मुसलमानो का कोई एक फिरक़ा दूसरे फ़िरक़े के हक़ीक़ी अक़ायद को समझ जाता है और यह समझ लेता है कि इस फ़िरक़े के अक़ायद क़ुरआन व सुन्नत और अक़्ल से मुस्तनद है तो फिर एक दुसरे में बुग़्ज़ व हसद कम हो जाता है , कीना व दुश्मनी का एक अज़ीम हिस्सा इस वजह से होता है कि मुसलमान एक दुसरे के अक़ायद से बेख़बर हैं या उनको बिला दलील मानते हैं , अगर शियों की तरफ़ बदा के अक़ीदों की वजह से कुफ़्र की निसबत दी जाती है और तक़ैय्ये को निफ़ाक़ क़रार दिया जाता है तो इसकी वजह यह है कि दूसरे इस अक़ीदे और अमल से बाखबर नही हैं , जिस में कुछ तो हमारी भी कमी होती है कि हमने अपने अक़ायद को सही तौर पर पेश नही किया है , इमामत का मसअला भी इस मौज़ू से अलग नही है कि अगर अगर अहले सुन्नत इमामत के मसअले में शिया असना अशरी ऐतेक़ाद और उसके शरायत को ग़ुलू कहते हैं तो इसकी वजह भी यह है कि हमने इल्मी और सही तौर से इमामत के मसअले को नहै पहचनवाया और जब हमने अच्छा किरदार अदा किया तो हमें कामयाबी भी मिली और मुसलमानों के दरमियान इत्तेहाद बरक़रार भी रहा। चुनाँचे इसके चंद नमूने यहाँ बयान किये जाते हैं।अलमेलल वन नेहल जिल्द 1 पेज 24)

(अ) हक़ की तरफ़ रग़बत)

1. शेख महमूद शलतूत , अल अज़हर युनिवर्सिटी मिस्र के साबिक़ सद्र , शिया फ़िक्ह और अहले बैत (अ) की मरजईयत के बारे में काफ़ी तहक़ीक़ और मुतालआ के बाद फ़िक्ह जाफ़री को मोतबर मान लेते हैं और फिक़्ह जाफ़री पर अमल करने का फ़तवा दे देते हैं , चुनाँचे मौसूफ़ फ़रमाते हैं: मज़हबे जाफ़री जो शिया असरी अशरी के नाम से मशहूर है। उस पर अमल करना अहले बैत के दूसरे मज़ाहिब की तरह शरई तौर पर जायज़ है , लिहाज़ा मुसलमानों के लिये मुनासिब है कि इस मज़हब को पहचानें और बाज़ फ़िरकों के बेज़ा ताअस्सुब से निजात हासिल करें।

इस्लामुना , राफिई पेज 59, मजल्लए रिसालतुल इस्लाम तारीख़ 13 रबीउल अव्वल 1378 हिजरी क़ाहिरा।

2. शेख़ अज़हर डाक्टर मुहम्मद फ़ख्खा़म भी शेख़ शलतूत के फ़तवे पर तक़रीज़ लिखते हुए उनके नज़रिये की ताईद करते हैं , चुनाँचे मौसूफ़ कहते हैं: मैं शेख महमूद शलतूत और उनके अख़लाक़ , वसीअ ईल्म , अरबी ज़बान , तफ़सीर क़ुरआन और फ़िक़्ह व उसूल में महारत पर रश्क करता हूँ , मौसूफ़ ने शिया इमामिया की पैरवी करने का फ़तवा दिया है , मुझे ज़रा भी इस बात में शक नही है कि उनके फ़तवे की बुनियाद मज़बूत है और मेरी अक़ीदा भी यही है।

फ़ी सबीलिल वहदतिल इस्लामिया पेज 64

इसी तरह मौसूफ़ कहते हैं: ख़ुदा वंदे आलम रहमत नाज़िल करे शेख शलतूत पर कि उन्होने इस हक़ीकत पर तवज्जो की और दिलेरी के साथ साफ़ साफ़ फ़तवा दिया और अपने जावेदाना बना लिया , उन्होने शिया इमामिया मज़हब की पैरवी करने का फ़तवा दिया , क्योकि यह मज़हब फ़िक्ही और इस्लामी मज़हब है क़ुरआन व सुन्नत और मज़बूत दलाइल पर कायम है।

3. शेख मुहम्मद ग़ज़ाली कहते हैं: मैं इस बात का अक़ीदा रखता हूँ कि उस्तादे कबीर शेख महमूद शलतूत ने मुसलमानों को क़रीब करने के सिलसिले में एक बहुत तूलानी रास्ता तय किया है... उनका अमल दर हक़ीक़त उन ख़्यालात की तकज़ीब है जो बाज़ मग़रिबी मुवर्रेख़ीन अपने ज़हनों में समाये हुए हैं , चुनाँचे वह इस ख़्याल में थे कि मुसलमानों के दरमियान जो बुग़्ज़ व कीना और दुश्मनी पाई जाती है उसके पेशे नज़र उनको वहदत तक पहुचने और एक परचम के नीचे जमा होने पहले और मुतफ़र्रिक़ और एक दूसरे से जुदा करके नीस्त व नाबूद कर दिया जाये लेकिन मेरी नज़र में यह फ़तवा पहला क़दम और इब्तेदाए राह है।

(देफ़ा अनिल अक़ीदा वश शरीया पेज 257)

4. अब्दुल रहमान नज्जार क़ाहिरा मसाजिद कमेटी के सद्र कहते हैं: ''हम भी शेख शलतूत के फ़तवे का ऐहतेराम करते हुए उसी के मुताबिक़ फ़तवे देते हैं और लोगों को सिर्फ़ मज़हब में मुन्हसिर होने से डराते हैं , शेख शलतूत मुजतहिद और इमाम हैं , उनकी राय ऐने हक़ है फिर हम क्यो अपनी नज़र और फ़तवों में किसी खास मज़हब पर इक्तिफ़ा करें , हालाँकि वह सब मुजतहिद थे ?''।(फ़ी सबीलिल वहदतिल इस्लामिया पेज 66

5. उस्ताद अहमद बुक , जो शेख शलतूत और अबू ज़हरा के उस्ताद थे , कहते हैं: "शिया इसना अशरी सबके सब मुसलमान हैं और ख़ुदा , रसूल , क़ुरआन और पैग़म्बरे इस्लाम(स) पर नाज़िल होने वाली तमाम चीज़ों पर ईमान रखते हैं , उनके यहाँ क़दीम और असरे हाज़िर में जय्यिद फ़ुक़हा और इल्म व फ़न में माहिर उलामा पाये गये हैं , उन लोगों के अफ़कार अमीक़ और इल्म वसीअ होता था , उनके तालिफ़ात लाखों की तादाद में मौजूद हैं और बहुत ज़्यादा किताबें मेरे इल्म में हैं।"(तारिख़ित तशरीई इस्लामी।

6. शेख मुहम्मद अबू ज़हरा भी लिखते हैं: इस बात में कोई शक नही है कि शिया एक इस्लामी फ़िरक़ा है.... अपने अक़वाल में क़ुरआने मजीद और पैग़म्बरे इस्लाम (स) से मंसूब अहादीस से तमस्सुक करते हैं , वह अपने सुन्नी पड़ोसियों से दोस्ती रखते हैं और एक दूसरे से नफ़रत नही करते।

तारिखुल मज़ाहिबिल इस्लामिया पेज 39

7. उस्ताद महमूद सरतावी (मिसरी मुफ़्ती) कहते हैं: ''मैं वही बात कहता हूँ जो हमारे सलफ़े सालेह कहते रहे हैं , मैं कहता हूँ कि शिया इसना अशरी हमारे दीनी भाई हैं और हम पर हक़े बरादरी रखते हैंऔर हम भी उन पर हक़े बरादरी रखते हैं। '' (मजल्ल ए रिसाल ए सक़लैन नंबर 2 साले अव्वल 1413 हिजरी पेज 252

8. नीज़ उस्ताद अब्दुल फ़त्ताह अब्दिल मक़सूद कहते हैं: ''मेरे अक़ीदे के मुताबिक़ तंहा मज़हब जो इस्लाम का रौशन आईना है जो शख्स इस्लाम को देखना चाहता है वह शिया अक़ायद व आमाल को देखे , इस बात पर तारीख गवाह है कि शियों ने इस्लामी अक़ायद के दिफ़ा में बहुत ज़्यादा ख़िदमात अंजाम दी हैं। '' (फ़ी सबीलिल वहदतिल इस्लामिया।

9. डाक्टर हामिद हनफ़ी दाऊद , क़ाहिरा दानिशकदे में अदबियात अरब के उस्ताद कहते हैं : ''हम क़ारेईन केराम के लिये यह बात वाज़ेह कर देना चाहते हैं कि अगरचे सुफ़यानी मुन्हरेफ़ीन ने गुमान किया है कि शिईयत एक जाली और नक़ली मज़हब है या ख़ुराफ़ात व इसराईलियात से भरा हुआ है या अब्दुल्लाह इब्ने सबा तारीख़ की दूसरी ख़्याली शख्सियतों से मंसूब है लेकिन ऐसा नही है बल्कि शिईयत आज की नई इल्मी रविश में इस चीज़ के बरअक्स है जो उन्होने गुमान किया है , शिया सबसे पहला वह मज़हब है जिसने मन्क़ूल व माक़ूल पर खास तवज्जो की है और इस्लामी मज़ाहिब के दरमियान उस राह का इंतेखाब किया है कि जिसका उफ़ुक़ वसीअ है और अगर मंक़ूल व माक़ूल में शियों का इम्तियाज़ न होता तो फिर इज्तेहाद में दोबारा रूह नही फूँकी जा सकती थी और मौक़ा व महल से अपने को मुताबिक़ नही किया जा सकता था और वह भी इस तरह से कि इस्लामा शरीयत की भी कोई मुख़ालिफ़त न हो। ''

(नज़रात फ़िल कुतुबिल ख़ालिदा पेज 32)

इसी तरह मौसूफ़ ने किताब अब्दुल्लाह बिन सबा पर तक़कीज़ लिखते हुए कहा: ''इस्लामा तारीख को 13 सदिया गुज़रने वाली हैं और हमेशा शियों के खिलाफ़ फ़तवे सादिर होते हुए देखा गया है , ऐसे फ़तवे जिस में हवाए नफ़्स का शायबा पाया जाता था और यह बुरा तरीक़ा इस्लामी फ़िरकों के दरमियान इख़्तिलाफ़ और तफरक़े का बाइस बना , इस तरह इस फ़िरक़े बुज़ुर्ग उलामा की तालिमात से दीगर उलामा ए इस्लाम महरूम हो गये , जिस तरह उनके नज़रियाती नमूनों और उनके और उनके मिज़ाज़ के फवायद से महरूम रह गये , दर हक़ीक़त इस तरह से इल्म व दानिश का बहुत बड़ा नुक़सान हुआ है और सबसे ज़्यादा नुक़सान शियों की तरफ़ ख़ुराफ़ात की निस्बत देने से हुआ है जबकि वह ख़ुराफ़ात शियों के यहाँ नही पाये जाते और शिया हज़रात उनसे बरी हैं और यही आप हज़रात के लिये काफ़ी है कि इमाम जाफर सादिक (अ) (मुतवल्लिद 148 हिजरी) शिया फ़िक्ह के परचमदार और सुन्नियों के दो इमामों के उस्ताद हैं , अबू हनीफ़ा नोमान बिन साबित (मुतवल्लिद 150 हिजरी) और अबू अब्दिल्लाह मालिक बिन अनस (मुतवल्लिद 179 हिजरी) इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम के शागिर्द हैं , इसी वजह से अबू हनीफ़ा यह कहते हुए नज़र आते हैं: ''लौलस सनतान ल हलकन नोमान '' अगर वह दो साल न होते तो नोमान (अबू हनीफ़ा) हलाक हो जाते , उन दो सालों से मुराद वह दो साल हैं जिन में इमाम सादिक़ (अ) के वसीअ इल्म से फ़ैज़ हासिल किया है , इसी तरह अनस बिन मालिक कहते हैं: मैने किसी इमाम सादिक़ (अ) से ज़्यादा फ़क़ीह नही देखा।

(अब्दुल्लाह बिन सबा जिल्द 1 पेज 13)

10. डाक्टर अब्दुल्लाह कयाली हलब की मशहूर व मारूफ़ शख्सियात अल्लामा अमीनी अलैहिर्रहमह को एक ख़त में तहरीर करते हैं: ''आलमे इस्लाम इस तरह की तहक़ीक़ात का हमेशा मोहताज रहा है , क्योकि रसूले आज़म (स) की वफ़ात के बाद मुसलमानों के के दरमियान इख्तिलाफ़ हो गया जिसके नतीजे में बनी हाशिम अपने हक़ से महरूम कर दिये गये ? नीज़ इस बात की ज़रूरत है कि मुसलमानों को पस्ती और तनज़्ज़ुली में ले जाने वाले असबाब और वुजूहात की गुफ़्तुगू की जाये , आज मुसलमानों का यह क्या हाल है ? क्या यह मुम्कन है कि मुसलमानों के हाथ से खोये हुए इल्म व दानिश को अस्ल तारीख़ की तरफ़ रुजू करते हुए दोबारा हासिल किया जा सकता है। ''

(अल ग़दीर जिल्द 4 पेज 4 से 5)

11. उस्ताद अबुल वफ़ा ग़नीमी तफ़ताज़ानी (अल अज़हर कालेज में इस्लामी फ़लसफ़े के मुद्दर्रिस) कहते है: ''दुनिया में मग़रिब व मशरि़क़ के क़दीमी और असरे हाज़िर में बहस करने वाले शियों के खिलाफ़ बहुत सी गलत बातों के मुरतकिब हुए हैं जो किसी भी मन्क़ूला दलील के मुताबिक़ नही है , अवामुन नास ने भी उन ग़लत बातों को एक हाथ से दूसरे हाथ तक पहुचाया बग़ैर इसके उनके सही या गलत होने के बारे में किसी मोतबर आलिम से सवाल करें और हमेशा शियों पर तोहमतों की बौछार की , शियों की निस्बत ना इंसाफ़ी रवा रखने वाले असबाब व ऐलल में शियों के मनाबे व माखज़ से ला इल्मी है और उन पर लगाई जाने वाली तोहमतों पर सिर्फ़ शिया दुश्मन मोवल्लिफ़ीन की किताबों को देखा है। ''

(मा रिजालिल फ़िक्र फ़िल क़ाहिरा पेज 40)

ब. हक़ का इक़रार

खालिस इल्मी और ताअस्सुब व जंग व जिदाल से खाली गुफ़्तुगू और इसी तरह की किताबों की तालीफ़ ने न सिर्फ़ यह कि अहले सुन्नत के बुज़ुर्ग उलामा को इस बात की तरफ़ राग़िब किया और उन्होने इस बात का ऐतेराफ़ किया कि मज़हबे जाफ़री की पैरवी करना जायज़ है और शिया असना अशरी को इस उनवान से क़बूल करना कि इस मज़हब के उसूल व फ़ुरूअ क़ुरआन , हदीस और अक़्ल से मुसतनद हैं , बल्कि इस बात का भी बाइस बना कि अहले सुन्नत के बहुत से जय्यिद उलामा ने अपने मज़हब को छोड़ दिया और शिया मज़हब को इंतेखाब कर लिया और उन्होने इस बात का इक़रार किया कि हक़ एक ही है और वह शिया और मज़हबे अहले बैत (अ) के अलावा नही है। कारेईन केराम , हम यहाँ पर उन्ही चंद हज़रात को आप के सामने पेश कर रहे हैं:

1. अल्लामा शेख मुहम्मद मरई , अमीन अनताकी

मौसूफ़ अनताकिया के इलाक़े में उनसू नामी बस्ती 1314 हिजरी में पैदा हुए , वह शाफ़ेई फ़िरक़े से ताअल्लुक़ रखते थे , वह अपने भाई अहमद के साथ दीनी उलूम हासिल करने के लिये मिस्र रवाना हुए और उन्होने कुछ मुकद्दमात हासिल करने के बाद अल अज़हर के जय्यिद उलामा जैसे शेख मुसतफ़ा मराग़ी , महमूद अबूता महनी , शेख रहीम वग़ैरह के इल्म से फ़ैज़याब होते हुए खुद भी इल्म के बुलन्द दर्जे पर फ़ायज़ हो गये लेकिन जब वह दोनो अपने वतन तो लौटने लगे तो अल अज़हर के बुज़ुर्गों ने उनको मिस्र में बाक़ी रहने की दावत दी और उनको अल अज़हर में मुदर्रिस का ओहदा देने के लिये कहा ताकि वह मुख्तलिफ़ शागिर्दों को अपने इल्म से सैराब करें लेकिन उन दोनो भाईयों ने इस बात को कबूल नही किया और अपने शहर लौट आये और वापस लौटने के कुछ मुद्दत बाद मुख्तलिफ़ किताबों के मुतालआ से शिईयत की हक़्क़ानियत से आगाह हुए और दोनो भाईयों ने मज़हबे तशय्यों को इख़्तियार कर लिया।

शेख मुहम्मद अपनी किताब ले माज़ा इख़्तरतो मज़हब अहले बैत (अ) में तहरीर करते हैं: ''यक़ीनी तौर पर ख़ुदा वंदे आलम ने मेरी हिदायत फ़रमाई और मेरे लिये मज़हबे हक़ से तमस्सुक मुक़द्दर फ़रमाया , यानी मज़हबे अहले बैत (अ) फ़रज़ंदे रसूल (स) हज़रते इमाम जाफ़रे सादिक़ का मज़हब........... ''

मौसूफ़ मज़हबे अहले बैत (अ) तक पहुचाने वाले असबाब व ऐलल के बारे में तहरीर करते हैं:

1. मैने इस बात का मुशाहिदा किया कि शिया मज़हब पर अमल करना मुजज़ी (काफ़ी) है और मुकल्लफ़ यक़ीनी तौर पर अपनी ज़िम्मेदारी से बरी हो जाता है , अहले सुन्नत के बहुत से गुज़श्ता और और असरे हाज़िर के उलामा ने इस मज़हब को की सैहत का फ़तवा दिया है।

2. मुसतहकम दलायल , यक़ीनी बुरहान और रोज़े रौशन की तरह वाज़ेह हुज्जतों के ज़रिये मज़हबे अहले बैत (अ) की हक़्क़ानियत मुझ पर साबित हो गई और यह मेरे लिये साबित हो गया कि वह मज़हब वही है जिसको शियों ने अहले बैत (अ) से हासिल किया है और अहले बैत (अ) ने रसूले अकरम (स) से और आँ हज़रत (स) ने जिबरईल (अ) और जिबरईल (अ) ने ख़ुदा वंदे आलम से हासिल किया है।

3. उन हज़रात के घर में वहयी नाज़िल हुई और अहले ख़ाना घर की बातों को दुसरों से बेहतर जानते हैं , लिहाज़ा एक अक़्लमंद आदमी के लिये ज़रूरी है कि अहले बैत (अ) के ज़रिये जो दलायल उन तक पहुचे हैं उनको तर्क न करें और ग़ैरों के नज़रियात के पीछे न जायें।

4. क़ुरआने करीम में मुतअद्दिद आयात नाज़िल हुई हैं जो उन हज़रात की विलायत और दीनी मरजईयत की तरफ़ दावत देती हैं।

5. पैग़म्बरे अकरम (स) से बहुत सी रिवायात नक़्ल हुई हैं जो हमें मज़हबे अहले बैत (अ) की तरफ़ दावत देती हैं , जिनमें से बहुत सी रिवायात को हम ने अपनी किताब अशशिया व हुजोजुहुम फ़ित तशय्यो में बयान की हैं।

(ले माज़ा इख़्तरतो मज़हब अहले बैत (अ) पेज 16 से 17)

2. अल्लामा शेख अहमद अमीन अनताकी

मौसूफ़ शेख मुहम्मद अमीन के भाई हैं जो सैयद शरफ़ुद दीन आमुली की किताब अल मुराजेआत को पढ़ने और उसमे ग़ौर व फ़िक्र करने के बाद अपने मज़हब को छोड़ कर मज़हबे शिया को इंतेखाब करते हैं , वह भी अपनी किताब फ़ी तरीक़ी इलात तशय्यो में बयान करते हैं कि मेरे शिया होने की वजह पैग़म्बरे अकरम (स) की वह हदीस है जिस पर तमाम इस्लामा मज़ाहिब ने इत्तेफ़ाक़ किया है और वह हदीस यह है कि पैग़म्बर इस्लाम (स) ने फ़रमाया:

ऐ लोगो आगाह हो जाओ कि तुम में मेरे अहले बैत की मिसाल नूह की कश्ती जैसी है जो उसमें सवार हो गया निजात पा गया और जिसने उससे रू गरदानी की वह ग़र्क़ हो गया।

मैंने देखा कि अगर मैं ने अहले बैत (अ) की पैरवी की और अपने दीनी अहकाम उन हज़रात से हासिल किये तो मैं निजात याफ़्ता हूँ और अगर मैंने उनको तर्क कर दिया और अपने दीन के अहकाम को उनके अलावा दूसरों से हासिल किया तो मैं गुमराह हूँ।

नीज़ मौसूफ़ फरमाते हैं: मज़हबे जाफ़री से तमस्सुक करके मेरा जमीर और दिल मुतमईन हो गया है , यह मज़हब दर हक़ीक़त आले बैते नबूव्वत (अ) का मज़हब है कि रोज़े क़यामत तक उन पर ख़ुदा का दुरूद व सलाम हो , मैं अपने अक़ीद के मुताबिक़ अहले बैत (अ) की विलायत को क़बूल करके निजात पा गया हूँ , क्योकि उनकी विलायत को क़बूल किये बग़ैर निजात पाना मुम्किन नही है।

3. डाक्टर मुहम्मद तीजानी समावी

मौसूफ़ टुयुनुस में पैदा हुए , बचपन की ज़िन्दगी गुज़ारने के बाद अरबी मुमालिक के सफ़र किये ताकि मुख्तलिफ़ इल्मी शख्सीयतों से फ़ैज़याब हो , मिस्र में अल अज़हर युनिवर्सिटी के उलामा और दानिशवरों ने उन से दरख़्वास्त की कि वह वहीं रह जायें और अल अज़हर के तलबा को अपने इल्म से फ़ैज़याब करें , लेकिन मौसूफ़ ने कबूल नही किया और इराक़ के सफ़र में मुख़्तलिफ़ शिया उलामा से बहस व गुफ़्तुगू करने के बाद शिया मज़हब इंतेखाब कर लिया और इस वक़्त दुनिया में तशय्यो की तबलीग़ करने वालों में शुमार होते हैं , मौसूफ़ ने मज़हबे अहले बैत (अ) के दिफा़अ में बहुत सी किताबें भी लिखी हैं।

मौसूफ़ सुम्मा ऐहतदयतो के एक हिस्से में फ़रमाते हैं: ''शिया साबित क़दम रहे , सब्र किया , उन्होने हक़ से तमस्सुक किया है... मैं हर आलिम से दरख़्वास्त करता हूँ कि शिया उलामा की सोहबत में बैठें और उनसे बहस व गुफ़्तुगू करें , मैं यक़ीन से यह बात कहता हूँ कि उनकी सोहबत के नतीजे में मज़हबे अहले बैत (अ) को अपनाये बग़ैर उनकी सोहबत को तर्क नही कर सकता... जी हाँ , मैने अपने गुज़िशता मज़हब के बदले इस मज़हब को इंतेख़ाब कर लिया है , ख़ुदा का शुक्र है कि उसमे मुझे इस मज़हब की हिदायत फ़रमाई , वाके़यन अगर उसकी हिदायत और तवज्जो न होती तो मुझे इस मज़हब की हिदायत न होती। ''

इसका तर्जुमा फिर मैं हिदायत पा गया के नाम से छप चुका है और मुख़्तलिफ़ ऐडीशन ख़त्म हो चुके हैं , वाकेयन हक़ व हक़ीक़त को तलाश करने के लिये यह किताब बेहतरीन तोहफ़ा है।मुतर्जिम)

तमाम हम्द व सना उस ख़ुदा के लिये है जिसने मुझे फ़िरक ए नाजिया यानी निजात पाने वाले फिरक़े की रहनुमाई फरमाई , जिस फ़िरके की तरफ़ मुद्दतों ज़हमतें करने के बाद मुझे रहनुमाई मिली , मुझे इस बात में ज़रा भी शक नही है कि जो शख्स हज़रत अली (अ) और अहले बैत (अ) की विलायत को करे तो उसने मज़बूत रस्सी को पकड़ लिया है जो कभी टूटने वाली नही है , इस सिलसिले में पैग़म्बरे अकरम (स) की ऐसी बहुत सी अहादीस नक़्ल हुई हैं जिन पर मुसलमानों का इजमाअ है और अकेले अक़्ल भी तालिबे हक़ के लिये बेहतरीन रहनुमा है... जी हाँ , ख़ुदा का शुक्र है कि मैंने बेहतरीन रास्ता पा लिया है और ऐतेक़ाद में हज़रत अमीरूल मोमिनीन व सैयदिल वसीयीन इमाम अली बिन अबी तालिब (अ) और रसूले अकरम (स) की इक्तिदा की है और मैं जवानाने जन्नत के सरदार और इस उम्मत के दो गुलदस्ते हज़रत इमाम हसन मुज्तबा और इमाम हुसैन अलैहिमस्सलाम , नीज़ पार ए तन मुसतफ़ा , ख़ुलास ए नबूव्वत और मअदने रिसालत सैयदतुन निसाइल आलमीन हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्ला अलैहा कि जिन के ग़ज़ब से ख़ुदा ग़ज़बनाक होता है , उन पर अक़ीदा रखता हूँ।

मैंने इमामे मालिक की जगह तमाम आईम्मा के उस्ताद हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) और हज़रत इमाम हुसैन (अ) की नस्ल से आईम्मा ए मासूमीन का इंतेखाब किया है।

मौसूफ़ हदीसे बाबे मदीनतुल इल्म को नक़्ल करने बाद कहते हैं: ''हम अपने दीन व दुनिया में हज़रत अली (अ) की तक़लीद क्यों न करें ? अगर हम यह अक़ीदा रखते हैं कि अली (अ) पैग़म्बर (स) के इल्म का दरवाज़ा हैं तो फिर क्यो बाबे इल्में पैग़म्बर को छोड़ दिया गया है और अबू हनीफ़ा , इमाम मालिक , अहमद बिन हम्बल और इब्ने तैमिया की तक़लीद करने लगे , यह लोग इल्म व अमल और फ़ज़्ल व शरफ़ में हज़रत अली (अ 0) के दर्जे तक नही पहुच सकते। ''

उसके बाद मौसूफ़ अहले सुन्नत को ख़िताब करते हुए कहते हैं: ''ऐ मेरे दोस्तो और क़बीले वालो , मैं तुम को हक़ के बारे में बहस व गुफ़तुगू करने और ताअस्सुब व हट धर्मी को छोड़ने की दावत देता हूँ , हम बनी उमय्या और बनी अब्बास और सियाह तारीख़ की क़ुरबानी बन गये हैं , हम फ़िक्री जुमूद पर क़ुर्बान हो चुके हैं जिसको हमारे बुज़ुर्गों ने हमारे लिये मीरास छोड़ा है। ''

(सुम्मा ऐहतदयतो पेज 204)

मौसूफ़ ने शिया मज़हब के दिफ़ाअ में दर्ज ज़ैल किताबें भी लिखी हैं।

सुम्मा ऐहतदयतो , लअकूना मअस सादिक़ीन , फ़सअलू अहलज़ ज़िक्र , अश शियतो हुम अहलुस सुन्नह , इत्तक़ूल्लाह।

4. मुआसिर मुवल्लिफ़ , सायब अब्दुल हमीद

मौसूफ़ इराक़ की अज़ीम शख़्सीयत थे जिन्होने ईरान के सफ़र में बहुत ज़्यादा तहक़ीक़ात करने और ख़ुदा वंदे आलम के फ़ज़्ल व करम से अहले सुन्नत मज़हब को छोड़ कर शिया मज़हब इख्तियार कर लिया , चुनाँचे वह अपनी किताब के एक हिस्से में लिखते हैं: मैं इक़रार करता हूँ कि मेरा नफ़्स मेरा दुश्मन था और मुझे ज़लील व रूसवा कर देना चाहता था , लेकिन ख़ुदा वंदे आलम के लुत्फ़ व करम और उसकी ईनायत ने मेरी मदद की , मैं इतमिनान के साथ होश में आया हालाँ कि मैंने अपने को कश्ती ए निजात में पाया , मैंने साफ़ व शफ़्फ़ाफ़ पानी पीना शुरु कर दिया और अब आप हज़रात से इस गुलशन के बहारी साये के सिलसिले में गुफ़्तुगू करता हूँ।

इस ख़बर को सुन कर मेरे अहबाब व दोस्तों ने मुझे तर्क कर दिया और मुझ पर ज़ुल्म किया , उनका सबसे बड़ा आलिम मुझ से कहता है कि क्या तुम्हे मालूम है कि तुमने क्या किया है ? मैने कहा , हाँ मुझे मालूम है कि मैने मज़हबे इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) बिन मुहम्मद बाक़िर बिन ज़ैनुल आबेदीन बिन सैयदे जवानाने बहिश्त बिन सैयदुल वसीयीन व सैयद ए ज़नाने आलमीन व बिन सैयदुल मुरसलीन (स) से तमस्सुक किया है , उसने कहा , क्यो आपने इस तरह हम को छोड़ दिया है ? तुम जानते हो कि लोग हमारे बारे में क्या क्या बातें कर रहें हैं ? मैं वही कहता हूँ जो रसूले अकरम (स) ने फ़रमाया है। उसमे कहा , तुम क्या कहते हो , मैने कहा , मैं रसूले अकरम (स) के फ़रमान की बात करता हूँ कि आँ हज़रत ने फ़रमाया: मैं तुम्हारे दरमियान वह चीज़ छोड़े जा रहा हूँ कि अगर तुम ने उससे तमस्सुक किया तो मेरे बाद कभी गुमराह नही होगे , एक किताबे ख़ुदा , दूसरे मेरी इतरत , जो मेरे अहले बैत हैं , इसी तरह आँ हज़रत (स) का वह फ़रमान जो आपने अपने अहले बैत (अ) के बारे में फ़रमाया कि मेरे अहले बैत निजात की कश्ती हैं जो उसमें सवार हो गया वह निजात पा गया।

(मंहज फ़िल इंनतेमाइल मज़हबी पेज 311)

सायब अब्दुल हमीद ने अहले बैत (अ) और शिया मज़हब के दिफ़ाअ में बहुत सी किताबें लिखी हैं जिनमें से चंद दर्ज ज़ैल हैं।

मंहज फ़िल इंनतेमाइल मज़हबी , इब्ने तैमिया हयातुहू , अक़ायदुहू व तारीख़ुल इस्लामिस सक़ाफ़ी वस सियासी।

5. उस्ताद सालेह अल वरदानी

मौसूफ़ भी उन्ही हज़रात में से हैं जिन्होने बहुत सी किताबों के मुतालआ के बाद मज़हबे शिया की हक़्क़ानियत को समझ लिया है , उन्होने भी सुन्नी मज़हब को छोड़ कर शिया मज़हब को इख्तियार किया है , मौसूफ़ उन लोगों में से हैं कि जो किसी ख़ौफ़ व खतर की परवाह किये बग़ैर शिईयत का ऐलान करते हैं और मिस्र के लोगों को भी इस मज़हब की दावत देते हैं।

मौसूफ़ अपनी किताब अल ख़दआ , रेहलती मिनस सुन्नह इलाश शिया में रक़्म तराज़ हैं: जब मैं सुन्नी था तो मैंने लोगों को अक़्ल पसंदी की दावत दी और अक़्ल का शेआर बुलंद किया , लेकिन मैं अपनी क़ौंम के दरमियान जगह न बना पाया और हर तरफ़ से अपने ख़िलाफ़ तोहमतें और इल्ज़ाम सुनने को मिले... मैं यह बात अच्छी तरह से जानता था कि अक़्ल से काम न लेना यानी गुज़श्ता लोगों की रव में बह जाना है , जिसके नतीजे में इंसान बग़ैर शख्सीयत के रहता है जो उसके लिये हक़ीक़त के रौशन करे... मैं कभी भी कोई बात बग़ैर तहक़ीक़ और ग़ौर व फ़िक्र के नही कहता... अक़्ल पसंदी ही शिया मज़हब और अहले बैत (अ) के रास्ते को इख्तियार करने में सबसे बुनियादी सबब है।सालेहुल वरदानी , अल ख़दआ , अल अक़्लिल मुस्लिम बैना अग़लालिस सलफ़ व अवहामुल ख़लफ़।

6. उस्ताद मोतसिम सैयद अहमद सूडानी

मौसूफ़ ने भी बहुत सी तारीख व हदीस की किताबों को पढ़ने के बाद मज़हबे अहले बैत (अ) की हक़्क़ानियत को इल्म हासिल कर लिया और अपने मज़हब को तर्क करके मज़हबे शिया को इंतेख़ाब कर लिया , मौसूफ़ अपनी किताब को बेनूरे फ़ातेमा ऐहतदयतो को नाम देने के सिलसिले में कहते हैं: ''हर इंसान अपने अंदर एक ऐसे नूर को महसूस करते है जो उसको हक़ व हक़ीक़त की तरफ़ रहनुमाई करता है लेकिन हवाए नफ़सानी और ज़न व गुमान की पैरवी उस नूर पर पर्दा डाल देते हैं , लिहाज़ा इंसान को हर वक़्त याद दहानी और बेदारी की ज़रूरत है , हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्ला अलैहा इस नूर की अस्ल हैं , मैंने इस नूर को हमेशा अपने वुजूद में महसूस किया है। ''

(अल मुतहव्वलून जिल्द 1 पेज 123)

नीज़ मौसूफ़ अदालते सहाबा के नज़रिये के सिलसिले में कहते हैं: ''अदालते सहाबा का नज़रिया वह नज़रिया है जिस को अहले सुन्नत ने अहले बैत (अ) की इस्मत के मुक़ाबले में गढ़ा है , उन दोनो के दरमियान कितना फ़र्क है , अहले बैत (अ) की इस्मत एक क़ुरआनी हक़ीक़त है और पैग़म्बर अकरम (स) ने भी इस पर ताकीद फ़रमाई है और हक़ीक़त में भी ज़ाहिर हुई है लेकिन अदालते सहाबा का नज़रिया क़ुरआन मजीद के मुख़ालिफ़ है जैसा कि ख़ुद पैग़म्बर इस्लाम (स) ने भी इसके बर ख़िलाफ़ वज़ाहत फ़रमाई है , बल्कि ख़ुद सहाबा हज़रात ने पैग़म्बरे अकरम (स) के ज़माने में और आपके बाद ईजाद की हुई बिदअतों का इक़रार किया है। '' (अल मोतहव्विलून जिल्द 3 पेज 126

नीज़ मौसूफ़ एक और मौक़े पर कहते हैं: ''मैं अपने अंदर एक ऐसी चीज़ महसूस करता हूँ जिसकी तौसीफ़ नही कर सकता लेकिन इस बारे में सिर्फ़ इतना कह सकता हूँ कि अहले बैत (अ) की विलायत को क़बूल करने के बाद ख़ुदा वंदे आलम से क़ुरबत में हर रोज़ इज़ाफ़ा होता जा रहा है , जितनी भी उन हज़रात की अहादीस में गौर करता हूँ दीन के सिलसिले में मेरी मारेफ़त और यक़ीन में उतना ही इज़ाफ़ा होता जा रहा है , मेरा मानना तो यह है कि अगर मज़हबे शिया न होता तो ईमान की लज़्ज़त और यक़ीन की लताफ़त को अपने अंदर महसूस न करता और जब अहले बैत (अ) से मासूरा उन दुआयों को पढ़ता हूँ जो किसी भी मज़हब में नही पायी जाती तो अपने परवर दिगार से मुनाजात का मज़ा ही कुछ और होता है। '' (अल मोतहव्विलून जिल्द 3 पेज 127)

7. मशहूर व मारूफ़ मिस्री वकील दमरदाश ऐक़ाली

मौसूफ़ मिस्र की मशहूर व मारूफ़ शख्सीयत हैं और मुद्दतों से उनका मशग़ला वकालत रहा है , वह एक शरई मसअले में तमाम फ़िक्हों में मवाज़ना करते हैं और शिया असना अशरी फ़िक्ह को दूसरे मज़ाहिब से मुसतहकम देखते हैं जिस की बेना पर उनके दिल में शिया मज़हब की तरफ़ रग़बत की बिजली चमक उठती है और अजीब व ग़रीब वाक़ेया की बेना पर उनकी ज़िन्दगी बिलकुल बदल जाती है और वह शिया मज़हब को अपनाने का इफ़्तेख़ार हासिल कर लेते हैं , वह अजीब व ग़रीब वाक़ेया यह है कि जब ईरानी हुज्जाज ऐतेक़ादी किताबों के तकरीबन 20 कारटून लेकर सऊदी अरब जाते हैं तो सऊदी हुकूमत ने उन सारी किताबों को ज़ब्त कर लिया , ईरान के सफ़ीर ने मलिक फ़ैसल तक इस मौज़ू को पहुचाया , उसने भी सऊदी वज़ीरे दाखिला को हक़ीक़ते हाल की छान बीन का हुक्म सुनाया , जिसकी बेना पर वज़ीरे दाखिला ने हुक्म दिया कि तमाम किताबों की तहक़ीक़ की जाये , अगर उनमें कोई मुश्किल नही है तो उनके मालिकों को लौटा दी जायें , उस ज़माने में दमरदाश ऐक़ाली सरज़मीने हिजाज़ में थे , चुनाँचे उनसे उन किताबों की छान बीन की दरख़्वास्त की गई ताकि वह क़ानूनी हवाले से उन किताबों के बारे में अपना नज़रिया पेश करे , उन्होने उन किताबों के मुतालआ के बाद शिया मज़हब की हक़्कानियत का अंदाज़ा लगा लिया और उसी वक़्त से अहले बैत (अ) की राह पर क़दम बढ़ा दिया।अल मोतहव्विलून जिल्द 3 पेज 86 स् 87 ब नक़्ल अज़ सालेह अल विरदानी)

8. अल्लामा डाक्टर मुहम्मद हसन शहाता

मौसूफ़ भी अल अज़हर युनिवर्सिटी के साबिक़ मुदर्रिस हैं उन्होने भी काफ़ी मुतालआ और तहक़ीक़ के बाद शिया असना अशरी मज़हब की हक़्क़ीनियत को समझ लिया है , चुनाँचे वह अपने ईरान के सफ़रे अहवाज़ में त़करीर करते हुए कहते हैं कि इमाम हुसैन (अ) की इश्क़ इस बात का सबब बना कि मैने अपने तमाम औहदा व मक़ाम को तर्क कर दिया।

इसके अलावा अपने एक औप बयान में कहते हैं कि अगर मुझ से सवाल किया जाये कि हज़रत इमाम हुसैन (अ) को मशरिक़ या मग़रिब में तलाश किया जा सकता है तो मैं जवाब में कहूँगा कि इमाम हुसैन (अ) को मेरे दिल में देखा जा सकता है , ख़ुदा वंदे आलम ने हज़रत इमाम हुसैन (अ) की ज़ियारत का शरफ़ मुझे ईनायत किया है।

मौसूफ़ अपनी गुफ़्तुगू जारी रखते हुए कहते हैं कि 50 साल से हज़रत इमाम अली (अ) का शेफ़ता हूँ और सालों से हज़रत इमाम अली (अ) की विलायत के तवाफ़ से अपने अतराफ़ में नूर का हाला देख रहा हूँ।जमहूरी इस्लामी अख़बार शुमारा 6771 से नक़्ल , अहवाज़ में मौसूफ़ की तक़रीर।

9. फ़िलिस्तीनी आलिम शेख मुहम्मद अब्दिल आल

मौसूफ़ भी मुद्दतों तहक़ीक़ और छानबीन के बाद शिया मज़हब की हक़्क़ानियत तक पहुच गये और उन्होने अहले बैत (अ) की इक्तेदा कर ली , मौसूफ़ अपने एक इंटरवीयू में कहते हैं: ''मैंने जिन किताबों को पढ़ा है उन में सबसे अहम अलमुराजेआत '' थी , जिससे मेरे ईमान में इज़ाफ़ा नही हुआ सिर्फ़ मेरी मालूमात में इज़ाफ़ा हुआ लेकिन जिस चीज़ ने मुझे अहले बैत (अ) की विलायत की तरफ़ रहनुमाई की वह यह है कि एक रोज़ फुटपाथ पर चहल क़दमी कर रहा था जब मैं अपने एक रिश्तेदार की दुकान पर पहुचा तो कुछ देर के लिये उनकी दुकान में बैठ गया , दुकान छोटी थी , कुछ देर बाद उन्होने अपने पोतों में से एक को बुलाया और कहा तुम मेरी जगह बैठ जाओ ताकि मैं नमाज़े अस्र अदा करने जाऊ , चुनाँचे मैने यह सुना तो फ़िक्र में डूब गया कि किस तरह एक शख्स अपनी छोटी सी दुकान को इतनी देर के लिये तंहा नही छोड़ता कि वह नमाज़ पढ़ ले औप अपनी जगह किसी को मुअय्यन करता है ताकि वह उसके सामान की हिफ़ाज़त करे तो फिर यह कैसे मुमकिन है कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने अपनी उम्मत को बग़ैर किसी इमाम और जानशीन के छोड़ दिया हो , ख़ुदा की क़सम ऐसा हरगिज़ नही हो सकता।

जब उनसे सवाल किया गया कि क्या तुम अजनबी मुल्क लेबनान में ग़ुरबत और ख़ौफ़ व वहशत का अहसास नही करते हो तो उन्होने जवाब दिया हालाँकि तंहाई और ग़ुरबत के आसार संगीन होते हैं मगर मुझ पर उनका ज़रा सा भी असर नही है और हरगिज़ ख़ौफ़ व तंहाई को अहसास नही करता , क्योकि मेरे दिल में हज़रत अमीरूल मोमिनीन (अ) का कलाम महफ़ूज़ है कि आपने फ़रमाया ,

हदीस

कभी भी राहे हक़ में अफ़राद की कमी की वजह से ख़ौफ़ व वहशत न करो।अल मोतहव्विलून जिल्द 3 पेज 113)

नीज़ मौसूफ़ कहते हैं लोग ख़ुद वख़ुद मज़हबे अहले बैत (अ) को कबूल करेगें , क्यो दीन फ़ितरी है लेकिन क्या करें कि यह दीन हुकूमतों के बुलंद जूतों के नीचे है।

इसी तरह जब मौसूफ़ से सवाल हुआ कि क्या विलायते अहले बैत (अ) के लिये किसी दलील की ज़रूरत है ? तो उन्होने फ़रमाया हम इस बात पर अक़ीदा रखते हैं कि हर चीज़ के लिये किसी चीज़ की ज़रूरत है सिवाए अहले बैत (अ) की विलायत कि ख़ुद दलील उन हज़रात की मोहताज है।

(अल मोतहव्विलून जिल्द 3 पेज 117)

मौसूफ़ एक और मक़ाम पर फ़रमाते हैं जो शख्स ख़ान ए काबा का तवाफ़ करे , आलिम हो या जाहिल , इख़्तियारी हो या जबरी या उन दोनो के दरमियान की हालत हो , दर हक़ीक़त वह विलायत का तवाफ़ करता है , क्यो कि ख़ान ए काबा मज़हर है और उसमें पैदा होने वाला जौहर लिहाज़ा जो मज़हर का तवाफ़ करता है दर हक़ीक़त वह जौहर का तवाफ़ करता है।

(अल मोतहव्विलून जिल्द 3 पेज 117)

10. फ़िलिस्तीनी मुजाहिद व रहबर मुहम्मद शह्हादा

मौसूफ़ ने इसराईली क़ैद की ज़िन्दगी में लेबनानी शियों से बहस व गुफ़तुगू और मुनाज़िरा करके शिया मज़हब के सही होने का अंदाज़ा लगा लिया और मज़हबे अहले बैत (अ) को कबूल करके फ़िलिस्तीनियों को अहले बैत (अ) कै मज़हब की तरफ़ दावत देने में मशग़ूल हो गये , हम यहाँ पर उनके लिये इंटरवीयू के बाज़ हिस्सों को नक़्ल करते हैं , चुनाँचे मौसूफ़ कहते हैं फ़िलिस्तीन को मुहम्मद (स) और अली (अ) की तरफ़ पलटना है , मैं दुनिया के आज़ादी ख़्वाह लोगों को आज़ादी ख़्वाह अफ़राद के इमाम व पेशवा हज़रत इमाम हुसैन (अ) की इक्तेदा और पैरवी की दावत देता हूँ।

नीज़ मौसूफ़ कहते है मैं पैगम्बरे अकरम (स) के अहलेबैत की मज़लूमियत के सिलसिले में बहुत ज़्यादा हमदर्दी रखता हूँ और अहसास करता हूँ कि हज़रत अली बिन अबी तालिब (अ) वाक़ेयन मज़लूम थे और जब भी फिलीस्तीन में ज़ुल्म व सितम और नाजायज़ कब्ज़े में इज़ाफ़ होता है तो इमाम अली (अ) की मज़लूमियत का अहसास मेरे दिल में बढ़ जाता है।

मैं चूँकि शियों के बारे में मालूमात नही रखता था जिसकी वजह से अपने उसी मज़हब पर बाक़ी रहा और उम्मीदवार हूँ कि मैं यह कहने वाला आख़री शख्स न हूँ सुम्मा ऐहतदयतो यानी फिर मैं हिदायत पा गया , मेरा शिया होने से उन सियासी मसायल का कोई ताअल्लुक़ नही है जो आज कल हमारे सामने मौजूद हैं , मैं भी दूसरे मुसलमानो की तरह जुनुबे लेबनान में कामयाबी और सरफ़राज़ी को अपने वुजूद में महसूस करता हूँ जिस इफ़्तिख़ार में सरे फ़हरिस्त हिज़्बुल्लाह लेबनान है लेकिन इसके यह मायना नही है कि मेरे शिया होने में सियासी मसायल बुनियादी सबब थे बल्कि अहले बैत (अ) के अक़ीदे को मेरे दिल कबूल किया और मैं किसी दूसरी चीज़ से मुताअस्सिर नही हूँ , अहले बैत (अ) का रास्ता हक़ है जिसको मैंने इख़्तियार किया है , मेरा शिया होना अक़ीदती लिहाज़ से है न कि सियासी लिहाज़ से , मैं बहुत जल्द ही फ़िलिस्तीन में शिया मज़हब फैलाने की कोशिश करूगा और इस सिलसिले में ख़ुदा वंदे आलम से दुआ करता हूँ कि इस काम में मेरी मदद करे।

इमामे ज़माना क़ायमे आले मुहम्मद (अ) की ज़ाते गिरामी हमारे लिये वाइसे ख़ैर व बरकत है जिसकी वजह से फ़िलिस्तीन में तहरीक आई है और हमारे दरमियान एक मख़सूस जोश व खरोश पैदा हो गया है कि नुसरत और कामयाबी को अपनी आँखों के सामने मुजस्सम देख रहे हैं और इमाम के ज़हूर का ज़माना नज़दीक देख रहे हैं इंशाअल्लाह मैं इमाम (अ) से बातिनी तौर पर राब्ता रखता हूँ और उनसे आहिस्ता आहिस्ता बातें करता हूँ , मैं उनसे चाहता हूँ कि इस हस्सास मौक़े पर हम पर मख़सूस तवज्जो फ़रमायें।

दुनिया भर के आज़ादी ख़्वाह लोग मख़सूसन मुसलमानों को उनके उनके इख़्तिलाफ़ात के वाबजूद नसीहत करता हूँ कि ज़ुल्म व सितम के ख़िलाफ़ हज़रत इमाम हुसैन (अ) के क़याम और आपकी तहरीक को अपने लिये सर मश्क़ क़रार दें और शैताने बुजुर्ग अमेरिका नीज़ इसराईल जो इस्लामी मुमालिक के दरमियान एक सरतानी ग़ुद्दा है , उसके ज़ुल्म के ख़िलाफ़ कभी भी ख़ामोशी इख्तियार न करें।

फिलिस्तीन में होने वाली कान्फ़ेरेन्सों और दीगर मुनअक़िद होने वाले जिन जलसात में मुझे त़करीर के लिये दावत दी जाती है हज़ारों लोगों के सामने अपनी तक़रीर के तमाम हिस्सों में सीरत अहले बैत (अ) को महवर क़रार देता हूँ और अहले बैत (अ) के सिलसिल में मेरी यह तक़रीरें फिलिस्तीनी मुआशरे में बहुत मक़बूल होती हैं , मैं इस तरीक़ ए कार को जारी रखूँगा यहाँ तक कि लोग इसकी क़दर पहचान लें और उन हज़रात की इक्तेदा करते हुए ख़ुदा वंदे आलम के इज़्न व मशीयत से कामयाबी से हम किनार हो जायें।

ख़ुदा वंदे आलम की इजाज़त से अपने मोमिन भाईयों के साथ मजहबे अहले बैत (अ) को बहुत जल्दी ही फ़िलिस्तीन में नश्र करूगा , यहाँ तक कि हज़रत इमाम मेहदी आले मुहम्मद (अ) ज़हूर फ़रमायें।

जिस वक़्त अल अज़हर युनिवर्सिटी मिस्र के सद्र ने तशय्यो के नश्र और उसके दिफ़ाअ पर ऐतेराज़ किया तो उसके जवाब में मैं मौसूफ़ ने कहा , मैं सिर्फ़ यही कहता हूँ ख़ुदावंदा मेरी क़ौम की हिदायत फ़रमा वह नही जानती , उसके बाद कहते हैं , मैंने जवाब में जो अलफ़ाज़ पर जारी किये वह यह कि मज़हबे शिया की निस्बत मेरी मालूमात इस बात की बाइस हुई कि मैं मज़हबे शिया इख़्तियार कर लूँ और मैं सिर्फ़ एक नुक्ते पर ताकीद करता हूँ कि दर हक़ीक़त यह शिईयत की निस्बत ला ईल्मी और जिहालत थी जिसने मुझे उस वक़्त तक अहले सुन्नत के मज़हब पर बाक़ी रखा लेकिन अब मैं हक़ व हक़्क़ानियत का ऐतेराफ़ करता हूँ।

(अल मोतहव्विलून जिल्द 1 पेज 462)

क़ारेईने कैराम , मज़हबे शिया की हक़्कानियत इस बात का सबब बनी कि बहुत से अहले सुन्नत या दूसरे अदयान व मज़ाहिब के मानने वाले इस मज़हब के दिलदादाह हा गये और पाक फ़ितरत इँसान और हकीक़त की तलाश करने वालों ने शिईयत की हक़्क़ानियत को देख कर इस मुक़द्दस मज़हब को अपना लिया।

यहाँ तक इस मुख़्तसर सी किताब में जो कुछ बयान हुआ है वह सिर्फ़ नमूने के तौर पर बयान हुआ है।

3. दीनी मरजअ का इंतेख़ाब करना

मसअल ए इमामत के दो पहलू हैं , एक तारीख़ी और दूसरा दीनी पहलू , फ़र्ज़ करें कि इस मसअले का तारीख़ी ज़माना गुज़र गया है तो फिर भी दीनी पहलू के असर अब तक बाक़ी हैं और रोज़े क़यामत तक बाक़ी रहेगें , अगर इमामत व विलायत के सिलसिले में बहस करें तो उसका एक अहम हिस्सा यह है कि हमारा दीनी मरजा कौन है ? क्या हम दीन और मआरिफ़ व तालिमाते इस्लामी को अबुल हसन अशअरी , इब्ने तिमिया जैसे लोगों से हासिल करें और फ़ुरूए दीन यानी शरई मसायल को चारो मज़हब के किसी एक इमाम से लें जैसा कि अहले सुन्नत और वहाबी लोग करते हैं या हम मासूम हज़रात की पैरवी करें कि जो अहले बैत (अ) के अलावा कोई नही हैं।

जिस चीज़ पर आयात व रिवायात बहुत ज़ोर देती हैं और शिया असना अशरी उस पर ताकीद करते हैं और वह यह कि चूँकि साहिबे रिसालत हज़रत पैग़म्बरे इस्लाम (स) को एक तवील ज़माना गुज़र गया है और मुसलमानों के मज़ाहिब में इख़्तिलाफ़े नज़र पाया जाता है , ऐसे मौक़े पर हर मुसलमान पर वाजिब है कि सुन्नते नबवी और दीनी तालिमात तक पहुचने के लिये ऐसे रास्ते को अपनायें जिस पर वह ख़ुद मुतमईन हो लिहाज़ा हज़रत अली (अ) को मक़ामे ख़िलाफ़त और विलायत पर मंसूब मानना सिर्फ़ यह कि पैग़म्बर अकरम (स) की वफ़ात के बाद इस्लामी हुकूमत और सियासी उमूर की शक्ल को दूर कर देता है उसके अलावा अपने दीनी मसायल और शरई अहकाम में इमाम अली (अ) को अपनी दीनी मुश्किलात में मरजअ क़रार देता है वह मुश्किलात जो पैग़म्बरे इस्लाम (स) की वफ़ात के बाद पैदा हुई या उनमें शिद्दत पैदा हुई , इसी वजह से हज़रत अली (अ) ने इस अहम मसअले पर ताकीद फ़रमाई और अहले बैते पैग़म्बर (स) की तौसीफ़ करते हुए लोगों से ख़िताब फ़रमाया:

1. हदीस (नहजुल बलाग़ा , अबदहू , जिल्द 2 पेज 19)

तर्जुमा , ऐ लोगों कहाँ जा रहे हो , क्यो तुम हक़ से मुन्हरिफ़ हो रहे हो , हक़ का परचम क़ायम है और उसकी निशानियाँ वाज़ेह हैं , हालाँकि चराग़े हिदायत रास्ते को मुनव्वर किये हुए हैं लेकिन तुम गुमराहों की तरह किधर जा रहे हो , क्यो तुम सरगरदाँ व परेशान हो जबकि तुम्हारे पैग़म्बर (स) की इतरत और आपके अहले बैत तुम्हारे दरमियान मौजूद हैं वह हक़ के ज़ुमामदार , दीन के पेशवा और सिद्क़ की ज़बानें हैं।

2. हदीस (नहजुल बलाग़ा , अबदहू , जिल्द 2 पेज 19)

तर्जुमा , ऐ लोगों अपने नबी के अहले बैत (अ) की तरफ़ नज़र करो और वह जिस तरफ़ कदम बढ़ायें तुम भी उनके नक़्शे क़दम पर चलो , वह तुम को हिदायत से बाहर और पस्ती व हलाकत में नही ले जायेगें अगर वह (किसी मसअले में) ख़ामोश रहें तो तुम भी ख़ामोश रहो और अगर वह क़याम करें तो तुम भी कय़ाम करो , उठ खड़े हो जाओ , लेकिन उनसे आगे आगे न चलो कि गुमराह हो जाओगे और उनसे पीछे भी न रह जाओ कि नीस्त व नाबूद हो जाओगे।

3. हदीस (नहजुल बलाग़ा , अबदहू , जिल्द 1 पेज 278)

तर्जुमा , ऐ लोगों मैं अहले बैते पैग़म्बर , उनके जिस्म के लिबास की तरह , उनके हक़ीक़ी नासिर व मददगार , ख़ज़ानादारे ऊलूम , मआरिफ़े वहयी और उन मआरिफ़ में दाख़िल होने वाले दरवाज़े हैं , क्यो कि दरवाज़े के अलावा मकान में दाख़िल नही हुआ जा सकता और जो शख्स घर में दरवाज़े से दाख़िल न हो वह चोर कहलाता है।

4. हदीस (नहजुल बलाग़ा , अबदहू , जिल्द 2 पेज 55)

तर्जुमा , कहाँ हैं वह लोग जो अपने को .......आयत गुमान करते हैं न कि हम को ? कि उन्होने यह दावा ज़ुल्म व सितम और झूठ की बुनियाद पर हमारी ज़िद में किया है , ख़ुदावंदे आलम ने हम अहले बैत पैग़म्बर को बुलंद किया है और अपनी नेमतों के हरम में दाख़िल किया और उन (झूठा दावा करने वालो) को बाहर किया है , हमारी रहनुमाई के ज़रिये राहे हिदायत को तय करते हैं और कोर दिल हमारी रौशनी को तलाश करते फिर रहे हैं।

5. हदीस (नहजुल बलाग़ा अबदहू जिल्द 5 पेज 362)

तर्जुमा बेशक मैं तुम्हारे दरमियान तारिकी चमकते हुए चिराग़ की तरह हूँ लिहाज़ा जो उस नूर की तरफ़ आये वह उस नूर से फ़ैज़याब हो जायेगा।

6. हदीस (नहजुल बलाग़ा सुबही सालेह खुतवा 147)

तर्जुमा वह (अहले बैते पैग़म्बर) इल्म की हयात और जिहालत की मौत को राज़ है , उनका हिल्म उनके इल्म का , उनका ज़ाहिर उनके बातिन का और उनकी ख़ामोशी उनकी मंति़क़ की ख़बर देता है , वह न तो दीने ख़ुदा की मुख़ालिफ़त करतें हैं और न ही उसमें इख़्तिलाफ़ करते हैं।

5. इंसानी ज़िन्दगी पर ग़दीर का असर

हर दीन का एक इम्तियाज़ होता है कि इंसान के लिये बुलंद मक़सद पेश करता है और जब उस तक पहुचने के लिये एक रास्ता मुअय्यन करना चाहता है तो उसके लिये एक नमूना और आईडियल भी मुअय्यन करता है ताकि उसकी अमली सीरत को मद्दे नज़र रखते हुए उसकी पैरवी करते हुए इंसान बेहतर तौर पर मंज़िले मक़सूद तक पहुच जाये क्यो कि माहिरे नफ़सीयात के मुताबिक़ भी बेहतरीन नमूने के ज़रिये इंसान को हक़ व हक़ीक़त की तरफ़ बेहतर तौर पर रहनुमाई की जा सकती है।

ख़ुदा वंदे आलम ने पैग़म्बरे इस्लाम (स) को मुसलमानों के लिये बेहतरीन नमूना क़रार देते हुए फ़रमाया: قَدْ كَانَ لَكُمْ فِي رَسُولِ اللَّـهِ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ لِّمَن كَانَ يَرْجُو اللَّـهَ وَالْيَوْمَ الْآخِرَ وَذَكَرَ اللَّـهَ كَثِيرًا

(सूरह अहज़ाब आयत 21)

तर्जुमा

, मुसलमानों बेशक तुम्हारे लिये रसूल की ज़िन्दगी में बेहतरीन नमून ए अमल है।

मालूम होना चाहिये कि पैग़म्बरे अकरम (स) की वफ़ात के बाद ऐसे मवाक़े पेश आये जो आँ हज़रत (स) की ज़िन्दगी में पेश न आये थे ताकि आँ हज़रत (स) को उन मौक़ा व महल पर नमूना क़रार दिया जा सके , जिनमें से इमाम हुसैन (अ) के ज़माने में पेश आने वाला वाक़ेया है कि इस्लाम के नाम पर लेकिन इस्लाम का मुखालिफ़ यज़ीद इस्लामी मुमालिक का मालिक बन गया , इस मौक़े पर क़यामत तक के लिये इंसानी मुआशरे के लिये बेहतरीन नमूना पेश करने वाले हज़रते इमाम हुसैन (अ) हैंस जबकि अहले सुन्नत के पास ऐसा कोई नमून ए अमल नही है।

पैग़म्बरे अकरम (स) की वफ़ात के बाद इमामत व ख़िलाफ़त की बहस अगरचे एक लिहाज़ से तारीख़ी बहस है लेकिन यही सदरे इस्लाम की तारीख़ है जो इंसान की क़िस्मत को सँवारती है , आँ हज़रत (स) की वफ़ात के बाद इमाम की बहस दर हक़ीक़त उस मौज़ू की बहस है कि इमाम में इमामत करने की सलाहियत और क़ाबिलियत होना चाहिये और इमाम को ख़ुदावंदे आलम की तरफ़ से मंसूब होना चाहिये , यह बहस करना कि पैग़म्बर अकरम (स) के बाद इमाम कौन होना चाहिये ? दर हक़ीक़त बहस यह है कि इस्लामी मुआशरे बल्कि तमाम बशरियत के लिये क़यामत तक कौन नमूना क़रार पाये ? क्या अली (अ) की तरह कोई नमूना है जिस में तमाम बेहतरीन सिफ़ात जमा हैं और जो शुजाअत , अदालत , सख़ावत , इबादत , ज़ोहद व तक़वा , इंकेसारी और दीगर सिफ़ात में बेनज़ीर हो या बाज़ वह लोग जो जंग व शुजाअत में कोई मक़ाम न रखते हों , उम्मते इस्लामिया सदरे इस्लाम के बुज़ुर्गों में किसी कामिल और जामेअ नमूने की मोहताज है जो रोज़े क़यामत तक के लोगों के लिये बाईसे तहरीक हो और लोग उनके हालात , फ़ज़ायल और कमालात को देखने के बाद उनको नमूना क़रार दें और हक़ व हक़ीक़त से नज़दीक हो जायें।

क्या ऐसा नही है कि महात्मा गाँधी हिन्दुस्तान में अंग्रज़ों के ख़िलाफ़ ऐलाने जंग में नमूना और आईडियल क़रार पाये ? क्या बच्चों की किताबों में फ़िदाकार देहाती को ईसार व फ़िदाकारी का नमूना नही बयान किया जाता ताकि बच्चे शुरु से ही अपने ज़हनों में उस नौजवान की तसवीर कशी के ज़रिये ईसार व फ़िदाकारी का सबक़ लें तो फिर उम्मते इस्लामिया क्यो सोई हुई है जबकि इस्लाम और मुसलमानों के दुश्मनों ने उनके शहरों और मुल्कों पर क़ब्ज़ा कर लिया है और उन पर ग़लबा हासिल किये हुए और उनके दीन और माल व दौलत को ग़ारत कर रहे हैं ? क्या ख़ुदा वंदे आलम क़ुरआने मजीद में इरशाद नही फ़रमाता है

: وَلَن يَجْعَلَ اللَّـهُ لِلْكَافِرِينَ عَلَى الْمُؤْمِنِينَ سَبِيلًا

(सूरह निसा आयत 141)

और ख़ुदा वंदे आलम कुफ़्फ़ार के लिये साहिबाने ईमान के ख़िलाफ़ कोई राह नही दे सकता।

क्या पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने नही फ़रमाया है:

हदीस (बिहारूल अनवार जिल्द 39 पेज 44, कंज़ुल उम्माल जिल्द 1 पेज 166 हदीस 246)

तर्जुमा इस्लाम , हर दीन पर बरतरी रखता है और कोई भी दीन उस पर बरतरी नही रखता।

तो फिर मुसलमान , इसतेमार की ग़ुलामी क्यो कर रहे हैं , यहाँ तक कि दूसरे इस्लामी मुल्कों से सबक़त ले रहे हैं ? क्यो एक इस्लामी मुल्क इस्तेमार की अच्छी ख़िदमत की वजह से एक इस्लामी मुल्क पर कब्ज़े करने के ईनाम में क़ब्ज़ा करने वालों को इफ़्तेख़ार का तमग़ा दे रहा है ? हम क्यो सोए हुए हैं ? और क्यों ग़ाफ़िल हैं ? क्यो ताजिकिस्तान की क़ौम दो लाख शहीद देने और बीस लाख बेघर होने के बाद भी कामयाब न हो सकी लेकिन ईरानी क़ौम ने एक साल में बहुत कम शहीद देकर 2500 साला ताग़ूती हुकुमत को तख़्ता पलट दिया , उसका राज़ सिर्फ़ हज़रत अली (अ) और इमाम हुसैन (अ) जैसे नमूने हैं , कौन सा मुल्क है जो अपनी कामयाबी की इब्तेदाई ज़माने से इस्तेमार व इस्तिकबार की तरफ़ से थोपी गई जंग में आठ साल तक लड़ने के बाद सरफ़राज़ रहे ? क्या यह इमाम हुसैन (अ) और अहले बैत (अ) को नमून ए अमल क़रार देने के अलावा किसी और चीज़ का नतीजा है और क्या हज़रत अबुल फ़ज़्लिल अब्बास (अ) को नमून ए अमल क़रार देने के अलावा कोई और चीज़ है ? यह मेरे अलफ़ाज़ नही है कि मैं एक शिया हूँ बल्कि यह दावा बहुत से इस्लामी मुल्कों की सियासी और इंक़ेलाबी शख्सियतों ने किया है जो अपनी उम्मत की बे हिसी से रंजीदा हैं , अफ़सोस के साथ हमने फ़िलिस्तीन के वाके़या को देखा है और देख रहे हैं कि बाज़ इस्लामा मुल्कों ने ज़रा भी रद्दे अमल भी ज़ाहिर नही किया यहाँ तक कि एक मुज़ाहिरे की हद तक भी नही जो ख़ुद उनके नफ़े में था , क्यो कि इसराईल तमाम इस्लामी मुल्कों पर नज़र जमाये हुए हैं लेकिन गोया फ़िलिस्तीन क़ौम के लिये कोई हादिसा पेश नही आया , जो ख़ुद उनकी तरह इंसान और उनके ही दीन से हैं , वह इस परिन्दे की तरह बने बैठे हैं जो अपने आशियाने में सर छुपाये बैठा है और शिकारी को नही देख रहा है और कहता है कि दुश्मन नही है यह लोग ऐश व इशऱत में मशग़ूल हैं लेकिन ग़फ़लत की वजह से अचानक दुश्मन उनके सर पर मुतल्लत हो जाता है और सबको शिकार कर लेता है और उनको नीस्त व नाबूद कर देता है।

लेकिन शिया असना अशरी मुसलमान शंहनशाही हुकुमत पर कामयाबी के बावजूद तमाम इस्लामी अक़वाम की फ़िक्र में हैं , फ़िलिस्तीन , अफ़ग़ानिस्तान , चेचेन और इराक़ से लेकर बोस्निया और दूसरे अक़वाम तक तमाम मुसलमान अक़वाम को हर मुमकिन तरीक़े से मदद पहुचाने की कोशिश में हैं , अगरचे ईरान इस राह में बहुत भारी क़ीमत भी अदा कर चुका है , यह सब कुछ नही है मगर इस वजह से कि शिया असना अशरी अपने लिये कुछ नमूने रखते हैं , जिन्होने तारीख़ के आख़िर तक के लिये यादगार दर्स छोड़ें हैं , शिया इमाम अली (अ) जैसे नमूने रखते हैं और ऐतेक़ाद रखते हैं कि अगर इंसान एक यहूदी औरत के पैर से पाज़ेब चोरी करने पर मर जाये तो उसके लिये मुनासिब है , शिया हुसैन (अ) की तरह नमूने रखते हैं जो फ़रमाते हैं अरबी हम ज़िल्लत को बर्दाशत नही कर सकते और जो फ़रमाते हैं सुर्ख़ मौत (यानी शहादत) ज़िल्लत की मौत से बेहतर है , जो इस बात पर अक़ीदा रखते हैं कि अम्र बिल मारूफ़ और नहयी अनिल मुन्कर के लिये कभी जान भी दी जा सकती है।

इस ज़माने में इमामत की बहस दर हक़ीक़त नमूने की बहस है , इमामत की बहस दर हक़ीक़त हर पहलू में नमून ए अमल की बहस है। इबादत का पहलू हो या घरेलू ज़िन्दगी , ज़ाती ज़िम्मेदारियो की बात हो या मुआशेरती उमूर का मसला , ख़ुलासा हमारे पास हर पहलू में नमूने मौजूद हैं और यही नमूने है जो इंसान की आईन्दा ज़िन्दगी की तसवीर कशी करते हैं और ज़िन्दगी के सफ़हात को खोलते हैं , जो बच्चा बचपन से (अरबी) की पट्टी सर पर बाँधता है और इमाम हुसैन (अ) की मजलिस में शिरकत करता है और इमाम हुसैन (अ) को अपने लिये नमून ए अमल क़रार देता है तो ऐसा बच्चा बड़ा होकर कभी भी ज़िल्लत व रुसवाई को क़बूल नही कर सकता , जैसा कि उसके आक़ा व मौला हज़रत इमाम हुसैन (अ) ने किया है , इंसान नमूने को अपना नसबुल ऐन क़रार देता है ताकि उसकी इक्तेदा करते हुए उसके नज़दीक हो जाये , उसकी नज़दीकी से ख़ुदा वंदे आलम की क़ुरबत हासिल होती है लिहाज़ा कितना अच्छा हो कि इंसान अपने लिये बेहतरीन नमूने का इंतेख़ाब किया जाये , वह जिन्होने अपनी पूरी ज़िन्दगी में कोई भी गुनाह न किया हो और कभी किसी ग़लती और ख़ता के मुरतकिब न हुए हों , यह हक़ीक़ी इमाम की ज़ात होती है जो हक़ को बातिल से , नेक को बद से और मुफ़ीद को नुक़सान देह से अलग कर देती है , अगर मैं हुसैन इब्ने अली (अ) को पैरव हूँ तो फिर फ़ासिक़ व फाजिर हाकिम की बैअत के लिये हाथ नही बढ़ाऊगा लेकिन अब्दुल्लाह इब्ने उमर जैसे शख़्स की पैरवी करू तो फिर तारीख़ की मशहूर व मारूफ़ ख़ुनख्वार हुज्जाज बिन युसुफ़े सक़फ़ी के हाथों बैअत करूँगा , जैसा कि अहमद बिन हंबल ने अब्दुल्लाह बिन उमर को नमूना क़रार देते हुए मुतवक्किल की बैअत की , यह इमामत ही तो है जो मेयार और शेआर को मुअय्यन करती है लिहाज़ा इमामत और ग़दीर की बहस सिर्फ़ एक तारीख़ी और बेफ़ायदा नही है बल्कि एक ताज़ा बहस है , एक ज़िन्दा बहस है जिससे इस्लामी मुआशरा बल्कि बशरियत की हयात वाबस्ता है , इमामत उस चीज़ का नाम है जो इंसान की रूह और उसकी हक़ीक़त से राब्ता रखती है , इमामत इंसान के रास्ते को वाज़ेह करती है , इमामत इंसान की दुनिया व आख़िरत से राब्ता रखती है , इमामत उस हक़ीक़त को कहते हैं जो इंसान की ज़िन्दगी में क़दम क़दम पर मुवस्सिर वाक़े होती है।

दलील व बुरहान के साथ मज़हब का इंतेख़ाब

क्या हम में से हर शख्स ने अपने मज़हब को दलील व बुरहान और तहक़ीक़ के साथ इंतेख़ाब किया है , या हमको यह मज़हब मीरास में मिल गया है। क्यो कि हमारे माँ बाप इस मज़हब पर अक़ीदा रखते थे लिहाज़ा हम भी उसी मज़हब पर हैं ? क्या इमामत उन्ही ऐतेक़ादी उसूल में से नही है जिन पर हमारे पास दलील होनी चाहिये ? किन वुजुहात की बिना पर हम ने यह मज़हव क़बूल किया है ? क्या वह असबाब क़ुरआनी , हदीसी या अक़ली है या वह असबाब नस्ल परस्ती है जिसकी कोई अस्ल व बुनियाद नही होती ? किस दलील की वजह से दूसरे मज़ाहिब हमारे मज़हब से अफ़ज़सल नही हैं ? क्या कल मैं अपने इन ऐतेक़ाद का ज़िम्मेदार नही हूँ ? यह ऐसे सवालात है जो हर इंसान के ज़हन में पैदा हो सकते हैं और उनके जवाबात भी उसी को देना है , उनका जवाब इमामत की बहस के अलावा कुछ नही हो सकता। क्यो कि तमाम ही मज़ाहिब का महवर मसअल ए इमामत है।

अंधी तक़लीद

तक़लीद अगरचे बाज़ मका़मात पर सही और क़ाबिले तारीफ़ है जैसे शरई मसायल में जाहिल का किसी आलिम की तक़लीद करना , लेकिन यही तक़लीद बाज़ दूसरे मवाक़े पर सही नही है जिसकी शरीयत और अक़्ल ने मज़म्मत की है मसलन जाहिल का किसी दूसरे जाहिल की तक़लीद करना या किसी आलिम का किसी दूसरे आलिम की तक़लीद करना जबकि वह ख़ुद उसके बरखिलाफ़ नतीजे पर पहुच चुका हो लिहाज़ा क़ुरआने करीम मे इरशाद होता है

وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ تَعَالَوْا إِلَى مَا أَنزَلَ اللَّـهُ وَإِلَى الرَّسُولِ قَالُوا حَسْبُنَا مَا وَجَدْنَا عَلَيْهِ آبَاءَنَا أَوَلَوْ كَانَ آبَاؤُهُمْ لَا يَعْلَمُونَ شَيْئًا وَلَا يَهْتَدُونَ (सूरह मायदा आयत 140)

तर्जुमा

, और जब उनसे कहा जाता है कि ख़ुदा के नाज़िल किये अहकाम और उसके रसूल की तरफ़ आओ तो कहते हैं हमारे लिये वही काफ़ी है जिस पर हमने अपने आबा व अजदाद को पाया है चाहे उनके आबा व अजदाद न कुछ समझते हों और न किसी तरह की हिदायत रखते हों।

नीज़ क़ुरआने करीम में एक दूसरी जगह पर इरशाद होता है:

وَكَذَلِكَ مَا أَرْسَلْنَا مِن قَبْلِكَ فِي قَرْيَةٍ مِّن نَّذِيرٍ إِلَّا قَالَ مُتْرَفُوهَا إِنَّا وَجَدْنَا آبَاءَنَا عَلَى أُمَّةٍ وَإِنَّا عَلَى آثَارِهِم مُّقْتَدُونَ

(सूरह ज़ुख़रुफ़ आयत 23)

तर्जुमा

, और इसी तरह हमने आपसे पहले की बस्ती में कोई पैग़म्बर नही भेजा मगर यह कि इस बस्ती के ख़ुशहाल लोगों ने यह कह दिया कि हमने अपने बाप दादा को इस तरीक़े पर पाया है और हम उनही के नक्शे क़दम की पैरवी करने वाले हैं।

नीज़ दूसरी जगह पर इसी तरह इरशाद होता है:

يَوْمَ تُقَلَّبُ وُجُوهُهُمْ فِي النَّارِ يَقُولُونَ يَا لَيْتَنَا أَطَعْنَا اللَّـهَ وَأَطَعْنَا الرَّسُولَا وَقَالُوا رَبَّنَا إِنَّا أَطَعْنَا سَادَتَنَا وَكُبَرَاءَنَا فَأَضَلُّونَا السَّبِيلَا رَبَّنَا آتِهِمْ ضِعْفَيْنِ مِنَ الْعَذَابِ وَالْعَنْهُمْ لَعْنًا كَبِيرًا (सूरह अहज़ाब आयत 66-68)

तर्जुमा

, जिस दिन उनके चेहरे जहन्नम की तरफ़ मोड़ दिये जायेगें और यह कहेगें कि ऐ काश हमने अल्लाह और रसूल की इताअत की होती और कहेगें कि हमने अपने सरदारों और बुज़ुर्गों की इताअत की तो उन्होने रास्ते से बहका दिया। परवरदिगार , अब उन पर दोहरा अजाब नाज़िल कर और उन पर बहुत बड़ी लानत कर।

पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने फ़रमाया:

ऐसी उम्मत न बनो जो यह कहे कि अगर लोगों ने नेक काम किया तो हम भी करेगें और अगर लोगों ने ज़ुल्म किया तो हम भी करेंगें लिहाज़ा तुम अपने आप को तैयार कर लो कि अगर लोगों ने नेक काम किये तो तुम भी ऐसे ही नेक काम करो और अगर उन्होने बुरे काम अंजाम दिये तो तुम अँजाम न दो।अत्त तरतीब वत्त तरग़ीब जिल्द 3 पेज 341)

7. फ़िरका ए नाजिया कौन सा फ़िरक़ा हैं

हज़रत रसूले अकरम (स) ने फ़रमाया:

अरबी (सुनने इब्ने माजा जिल्द 2 पेज 1322 हदीस 3992, सुनने तिरमिज़ी जिल्द 4 पेज 134, हदीस 2778)

यहूदी इकहत्तर फ़िरक़ों में बट गये जिनमें से सिर्फ़ एक फ़िरक़ा नाजिया (निजात पाने वाला) है और सत्तर फ़िरक़े आतिशे जहन्नम में जायेगें , इसी तरह नसारा भी बहत्तर फ़िरक़ों में तक़सीम हो गये , उनमें से इकहत्तर फ़िरक़े जहन्नम में जायेगें और एक फ़िरक़ा जन्नत में जायेगा , क़सम उस परवरदिगार की जिसके क़ब्ज़ ए क़ुदरत में मुहम्मद (स) की जान है मेरी उम्मत भी तिहत्तर फ़िरक़ों में तक़सीम हो जायेगी , जिनमे से एक फ़िरक़ा जन्नत में जायेगा बाक़ी बहत्तर फ़िरक़े आतिशे जहन्नम में जलेगें।

कारेईने केराम , हम इस बात को जानते हैं कि सबसे बड़ा इख़्तिलाफ़ इमामत के मसअले में है और इसी मसअले की वजह से इस्लामी मुआशरे में मुख़्तिफ़ फ़िरक़े बन गये लिहाज़ा फ़िरक़ ए नाजिया में शामिल होने के लिये ज़रूरी है कि इस्लामी मुआशरे की इमामत व रहबरी के सिलसिले में बहस करें।

पैग़म्बर इस्लाम (स) के जानशीन को मुअय्यन करने की ज़रूरत

अहले सुन्नत का एक गिरोह इस बात पर अक़ीदा रखते है कि पैग़म्बरे अकरम (स) ने अपने बाद के लिये किसी को ख़लीफ़ा नही बनाया और ख़िलाफ़त के मसअले को असहाब पर छोड़ दिया , दूसरा गिरोह कहता है पैग़म्बरे अकरम (स) ने अपने बाद के लिये हज़रते अबू बक्र को अपना जानशीन मुअय्यन फ़रमाया , लेकिन शिया असना अशरी यह अक़ीदा रखते हैं कि पैग़म्बरे अकरम (स) ने अपने बाद के लिये ख़लीफ़ा व जानशीन मुअय्यन किया हम इस बहस में इसी मसअले की तहक़ीक़ व छानबीन करेगें और आँ हज़रत (स) के बाद जानशीन की ज़रूरत को साबित करेगें।

पैग़म्बर , उम्मत के मुस्तक़बिल से आगाह होता है

इस सिलसिले में सबसे पहला सवाल यह होता है कि पैग़म्बरे अकरम (स) अपनी वफ़ात के बाद होने वाले हवादिस से इत्तेला रखते थे या नही ?

इल्में ग़ैब , क़ुरआन की रौशनी में

इल्में ग़ैब के सिलसिले में यहाँ तक बैरूनी मौज़ूआत में अगरचे ख़ुदा वंदे आलम ने बहुत सी आयात में इल्में गैब को अपने से मख़सूस किया है चुनाँचे क़ुरआने मजीद में इरशाद होता है:

وَعِندَهُ مَفَاتِحُ الْغَيْبِ لَا يَعْلَمُهَا إِلَّا هُوَ (सूरह अनआम आयत 59)

उसके पास गै़ब के ख़ज़ाने हैं जिन्हे उसके अलावा कोई नही जानता।

नीज़ इरशाद होता है:

وَلِلَّـهِ غَيْبُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَمَا أَمْرُ السَّاعَةِ إِلَّا كَلَمْحِ الْبَصَرِ أَوْ هُوَ أَقْرَبُ إِنَّ اللَّـهَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ (सूरह नहल आयत 77)

एक और जगह ख़ुदा वंदे को इरशाद होता है:

قُل لَّا يَعْلَمُ مَن فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ الْغَيْبَ إِلَّا اللَّـهُ وَمَا يَشْعُرُونَ أَيَّانَ يُبْعَثُونَ (सूरह नमल आयत 65)

कह दीजिए कि आसमान व ज़मीन में ग़ैब का जानने वाला अल्लाह के अलावा कोई नही है।

लेकिन एक आयत ऐसी है जो कहती है कि इल्मे गैब ख़ुदा से मख़सूस नही है , चुनाँचे ख़ुदा वंदे आलम इरशाद फ़रमाता है:

عَالِمُ الْغَيْبِ فَلَا يُظْهِرُ عَلَى غَيْبِهِ أَحَدًاإِلَّا مَنِ ارْتَضَى مِن رَّسُولٍ فَإِنَّهُ يَسْلُكُ مِن بَيْنِ يَدَيْهِ وَمِنْ خَلْفِهِ رَصَدًا (सूरह जिन आयत 26, 27)

वह आलिमुल ग़ैब है और अपने ग़ैब पर किसी को मुत्तलअ नही करता है मगर जिस रसूल को पसंद कर ले।

कारेईने केराम , इस आयते शरीफ़ा और गुज़श्ता चंद आयात को एक साथ रख कर यह नतीजा हासिल होता है कि हर क़िस्म का इल्मे गै़ब ख़ुदा से मख़सूस है लेकिन ख़ुदा वंदे आलम जिस को चाहे उसको अता कर सकता है और चुँकि पैग़म्बरे इस्लाम (स) की वफ़ात के बाद ख़िलाफ़त व जानशीनी के मसअले में इख्तिलाफ़ हुआ , क़ुरआनी आयात से यह नतीजा निकलता है कि आँ हज़रत (स) मुसतक़बिल में होने वाले वाक़ेयात से बाख़बर थे लिहाज़ा अपनी वफ़ात के बाद ख़िलाफ़त व जानशीनी के मसअले में होने वाले हवादिस और फ़ितनों से आगाह थे।

इल्मे गैब , रिवायात की रौशनी में

रिवायात के मुतालए के बाद हम पर यह वाज़ेह हो जाता है कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) ख़िलाफ़त व जानशीनी के मसअले में होने वाले फ़ितने और इख्तिलाफ़ से मुकम्मल तौर पर आगाह थे , आईये उन रिवायात में से चंद रिवायतों की तरफ़ इशारा करें:

पैग़म्बर इस्लाम (स) ने फ़रमाया:

1. हदीस (सोनने इब्ने माजा जिल्द 2 पेज 1322 हदीस 3922, सोनने तिरमिज़ी जिल्द 4 पेज 134 हदीस 2778)

तर्जुमा

, मेरी उम्मत तिहत्तर फ़िरक़ों में तक़सीम हो जायेगी , जिनमें से एक फ़िरक़ा जन्नत में जायेगा और बहत्तर फ़िरक़े आतिशे जहन्नम में जलेगें।

इस हदीस को बहुत से असहाबे रसूल (स) ने नक़्ल किया है जैसे हज़रत अली बिन अबी तालिब , अनस बिन मालिक , सअद बिन अबी वक़ास , सुदी बिन अजलान , अब्दुल्लाह बिन अब्बास , अब्दुल्लाह बिन उमर , अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन आस , उमर बिन औफ़ मज़नी , औफ़ बिन मालिक अशजई , उवैयमर बिन मालिक और मुआविया बिन अबी सुफ़यान।

अहले सुन्नत बहुत से उलामा ने इस हदीस को सही माना है और इसके बारे में कहा है कि यह हदीस मुतावातिर है जैसे मुनावी ने फ़ैज़ुल क़दीर , हाकिमे नैशापुरी ने अल मुसतदरक अलस सहीहैन में , ज़हबी ने तलख़ीसुल मुसतदरक में , शातेबी ने अल ऐतेसाम में , सफ़ारिनी ने लवामेउल अनवारल बहीय्या में और नासिरुद दीन अलवानी ने सिलसिलातुल अहादीसुस सहीय्या में।

इल्मे हदीस में हदीसे तवातुर , उस हदीस को कहा जाता है जिस के रावियों की तादाद इस हद तक हो कि एक साथ जमा होकर साज़िश का क़ाबिले ऐतेमाद ऐहतेमाल हो।(मुतर्जिम)

फ़ैज़ुल क़दीर जिल्द 2 पेज 21

मुसतदरक हाकिम जिल्द 1 पेज 128

अल ऐतेसाम जिल्द 2 पेज 189

लवामेउल अनवार जिल्द 1 पेज 93

सिलसिलातुल अहादिस सहीहा जिल्द 1 पेज 359

अलबत्ता तिहत्तर का अदद या तो हक़ीक़ी है या मजाज़ी जो कि मुबालिग़े पर दलालत करता है।

हम जानते है कि सबसे ज़्यादा इख़्तिलाफ़ , इस्लामी मुआशरा की इमामत व रहबरी के मसअले में हुआ है।

2. उक़बा बिन आमिर पैग़म्बरे अकरम (स) से नक़्ल करते हैं:

हदीस (सही बुख़ारी जिल्द 4 पेज 176)

बेशक मैं रोज़े क़यामत तुम लोगों से आगे आगे और तुम पर शाहिद हूँगा , ख़ुदा की क़सम , मैं अभी अपनी हौज़ (कौसर) को देख रहा हूँ , मुझे ज़मीन के खज़ानों की कुन्जियां दी गई है , मैं इस बात से ख़ौफ़ज़दा नही हूँ कि मेरे बाद मुश्रिक हो जाओगे लेकिन ख़िलाफ़त और जानशीनी के मसअले में इख्तिलाफ़ करने से डरता हूँ।

3. इब्ने अब्बास पैग़म्बरे अकरम (स) से नक़्ल करते है कि आँ हज़रत (स) ने फ़रमाया:

हदीस (सही बुख़ारी , जिल्द 4, पेज 110)

रोज़े क़यामत मेरे असहाब के एक गिरोह को जहन्नम की तरफ़ ले जाया जायेगा , उस मौक़े पर मैं कहूँगा , पालने वाले यह तो मेरे असहाब हैं ? उस वक्त आवाज़ आयेगी , यह वही लोग हैं जो आपकी वफ़ात के बाद जाहिलीयत की तरफ़ पलट गये।

कारेईने केराम , इस तरह की बहुत सी रिवायात अहले सुन्नत की सही तरीन किताबों में नक़्ल हुई हैं जिनको बाज़ सहाबा ने भी नक़्ल किया है , जैसे अनस बिन मालिक , अबू हुरैरा , अबू बक्र , अबू सईद ख़िदरी , असमा बिन्ते उमैस , आयशा , उम्मे सलमा।

शेख महमूद अबू रय्या किताब अल इल्मुश शामिख़ में मुक़बली के नक़्ल करते हैं कि इस तरह हदीस मुतावातिरे मानवी की हद तक पहुची हुई हैं।

इल्में हदीस में हदीसे मुतावातिर उस हदीस को कहा जाता है जिसके अलफ़ाज़ मुख़्तिलफ़ हों लेकिन वह सब एक ही मायना की ख़बर देते हों।मुतर्जिम)

अलबत्ता उन अहादीस को उन असहाब रद्द पर हम्ल नही किया जा सकता जो पैग़म्बरे इस्लाम (स) की वफ़ात के बाद शिर्क व पुत परस्ती की तरफ़ पलट गये , क्योकि आँ हज़रत (स) से मनक़ूल उक़बा बिन आमिर की रिवायत में है जिस में आँ हजरत (स) ने फ़रमाया: ख़ुदा की क़सम मैं इस बात से ख़ौफ़ ज़दा नही हूँ कि तुम मेरे बाद मुशरिक हो जाओगे लेकिन मैं ख़िलाफ़त व जानशीनी के मसअले में इख़्तिलाफ़ और झगड़े से डरता हूँ।

लिहाज़ा पैग़म्बरे अकरम (स) ने उन बाज़ अहादिस के ज़ैल में फ़रमाया:

हदीस (सही बुख़ारी जिल्द 7 पेज 208, सही मुस्लिम जिल्द 7 पेज 66)

तर्जुमा , बर्बाद हो जाये , बर्बाद हो जाये , वह शख्स जो मेरे बाद तग़य्युर व तबद्दुल करे।

जब कि हम इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि दीन में तग़य्युर व तबद्दुल करना , शिर्क के अलावा एक दूसरी चीज़ है।

इसी तरह इस जैसी रिवायात को उन लोगों पर हम्ल नही किया जा सकता जिन्होने हज़रत उस्मान पर हुजूम किया और उनको क़त्ल कर डाला , जैसा कि बाज़ लोगों ने गुमान किया है क्योकि:

1. बाज़ रिवायात में बयान हुआ है कि पैग़म्बरे अकरम (स) की वफ़ात के बाद वह जाहिलियत की तरफ़ पलट जायेगें जो इस हक़ीक़त को ज़ाहिर करती है कि यह रसूले अकरम (स) ने बिला फ़ासला मुशरिक हो जायेगें।

2. अहले सुन्नत , तमाम असहाब के आदिल होने के क़ायस हैं और इस बात में कोई शक नही है कि उन लोगों के दरमियान असहाब की एक जमाअत भी थी।

4. अबू अलक़मा कहते हैं:

हदीस (अहक़ाक़ुल हक़ जिल्द 2 पेज 296 नक़्ल अज़ किताबुल मवाहिब तबरी शाफ़ेई)

मैं ने सअद बिन उबादा (जिस वक़्त लोग अबू बक्र की बैअत करना चाहते थे) से कहा: क्या तुम सब की तरह अबू बक्र की बैअत नही करोगें ? उन्होने कहा: मैरे पास आओ और जब मैं नज़दीक पहुच गया तो उन्होने कहा , ख़ुदा की कसम मैंने रसूलल्लाह से सुना है कि आपने फ़रमाया: जब मैं इस दुनिया से चला जाऊगा तो लोगों पर हवाए नफ़्स ग़लबा करेगी और उनको जाहिलियत की तरफ़ पलटा देगी , उस दिन हक़ अली के साथ होगा और किताबे ख़ुदा उनके हाथों में होगी , उनके अलावा किसी ग़ैर की बैअत न करना।

5. ख़ारज़मी हनफ़ी अपनी किताब मनाक़िब में अबू लैला से नक़्ल करते हैं कि रसूलल्लाह (स) ने फ़रमाया:

हदीस (मनाक़िबे ख़ारज़मी पेज 105)

मेरे बाद जल्दी ही फ़ितना व फ़साद बरपा होगा , उस मौक़े पर तुम लोग अली की बैअत करना , क्यो कि वही हक़ व बातिल में फ़र्क़ करने वाले हैं।

6. इब्ने असाकर सही सनद के साथ इब्ने अब्बास से नक़्स करते है:

हदीस (तर्जुमा इमाम अली (अ) , इब्ने असाकर रक़्म 834)

हम पैग़म्बरे अकरम (स) और अली (अ) के साथ मदीने की गलियों से गुज़र रहे थे और जब हमारा गुज़र एक बाग़ से हुआ तो उस मौक़े पर हज़रत अली (अ) ने रसूले अकरम (स) से अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह , यह बाग़ कितना ख़ूबसूरत है ? आँ हज़रत ने फ़रमाया: जन्नत में तुम्हारा बाग़ इससे कहीं ख़ूबसूरत है और उस मौक़े पर आँ हज़रत (स) ने हज़रत अली (अ) की रीशे मुबारक की तरफ़ इशारा किया और बुलंद आवाज़ में गिरया फ़रमाया , हज़रत अली (अ) ने अर्ज़ किया: आप क्यों गिरया फ़रमाते हैं ? आँ हज़रत ने फ़रमाया: यह मेरी उम्मत अपने दिलों में तुम्हारी निस्बत बुग़्ज़ व कीनह रखती है जिसको (अभी) ज़ाहिर नही करती , लेकिन मेरी वफ़ात के बाद ज़ाहिर करेगी।

7. अबू मोवयबह , रसूलल्लाह के ख़ादिम कहते हैं:

हदीस (कामिल इब्ने असीर जिल्द 2 पेज 318)

तर्जुमा , पैग़म्बरे अकरम (स) ने एक रात को मुझे बेदार किया और फ़रमाया: मुझे हुक्म हुआ है कि अहले बक़ी के लिये इस्तिग़फ़ार करू , मेरे साथ चलो , चुँनाचे मैं आँ हज़रत (स) के साथ चल दिया यहाँ तक कि हम बक़ी पहुच गये , पैग़म्बरे अकरम (स) ने अहले बक़ी को सलाम किया और फ़िर फ़रमाया: ख़ुदा तुम्हारे लिये अच्छा मक़ाम क़रार दे , बेशक फ़ितना व फ़साद , रात की तारीकी की तरह हमला वर होते हैं फिर फ़रमाया: मुझे बहिश्त और ज़मीन की कुंजियाँ दी गई हैं और जन्नत भी , मुझे उनके और अपने परवरदिगार की मुलाक़ात के दरमियान इख़्तियार दिया गया है , लेकिन मैं ने अपने परवरदिगार की मुलाक़ात को इख़्तियार किया है और फिकर अहले बक़ी के लिये इसतिग़फार की , उसके बाद आँ हज़रत (स) वापस आये और मरज़ में मुब्तला हो गये और उसी मरज़ में आपने रेहलत फ़रमाई।

शहीद सद्र अलैहिर्रहमह इस फ़ितना व फ़साद की वज़ाहत करते हुए फ़रमाते हैं: यह वही फ़ितने हैं जिनके बारे में हज़रत फ़ातेमा ज़हरा (स) ने ख़बर दी है जैसा कि बीबी दो आलम ने फ़रमाया:

(ख़ुतब ए हज़रते ज़हरा (स) शरहे नहजुल बलाग़ा , जिल्द 16, पेज 234)

तुम लोग फ़ितने से डर रहे थे लेकिन ख़ुद ही फ़ितने में ग़र्क़ हो गये।

जी हाँ यह वही फ़ितना है बल्कि दर हक़ीक़त यही तमाम फ़ितनों की जड़ है , ऐ पार ए तने रसूल , किस चीज़ ने आपके दिल को इतना मग़मूम कर दिया जिसने आपको तारीख़ के कड़वे वाक़ेयात को दोहराने पर मजबूर किया और आपने अपने बाबा की उम्मत के लिये बहुत तारीक मुस्तक़बिल की ख़बर दी ?

जी हाँ उस रोज़ सियासी फ़ितना एक ऐसी खेल था जो दर हक़ीक़त तमाम ही फ़ितना व फ़साद की जड़ बन गया जैसा कि उमर बिन ख़त्ताब के क़ौल से ज़ाहिर होता है कि अबू बक्र की बैअत ना सोचा समझा एक क़दम था जिसके शर से ख़ुदा वंदे आलम ने मुसलमानो को निजात दी।

(तारीख़े तबरी जिल्द 2 पेज 235, फ़िदक दर तारीख़ शहीद सद्र)


पैग़म्बरे अकरम (स) के सामने तीन रास्ते

कारेईने केराम , हमने यह अर्ज़ किया था कि पैग़म्बरे अकरम (स) ख़िलाफ़त और जानशीनी के मसअले में अपनी उम्मत के दरमियान होने वाले इख़्तिलाफ़ और फ़ितने से आगाह थे , अब सवाल यह उठता है कि आँ हज़रत (स) ने इस फ़ितने से मुक़ाबले के लिये क्या तदबीरें सोची ? क्या आपने अपनी ज़िम्मेदारी को महसूस किया और उसके लिये कोई राहे हल पेश किया या नही ?

हम इस सवाल के जवाब में अर्ज़ करते हैं कि यहाँ पर दर्ज ज़ैल तीन ऐहतेमाल का तसव्वुर किया जा सकता है:

अ. ग़ैर ज़िम्मेदाराना तरीक़ा , यानी पैग़म्बरे अकरम (स) ने अपनी ज़िम्मेदारी का ज़रा भी अहसास न किया।

ब. ज़िम्मेदारानी तरीक़ा लेकिन शूरा के हवाले करना , यानी आँ हज़रत (स) ने इख़्तिलाफ़ और झगड़े को दूर करने के लिये शूरा की तरफ़ दावत दी ताकि शूरा की नज़र के मुताबिक़ अमल किया जाये।

स. ज़िम्मेदाराना तरीक़ा लेकिन मुअय्यन करना , यानी पैग़म्बरे अकरम (स) ने फ़ितना व इख्तिलाफ़ को दूर करने के लिये अपना जानशीन मुअय्यन किया।

पहले तरीक़ ए कार के तरफ़दार

सबसे पहले जिन लोगों ने इस तरीक़ ए कार को शाया किया कि पैग़म्बरे अकरम (स) ने किसी के लिये कोई वसीयत नही , जनाबे आयशा थी , चुँनाचे वह कहती हैं: पैग़म्बरे अकरम (स) जिनका सर मेरे ज़ानू पर था , इस दुनिया से चले गये और किसी के लिये वसीयत नही की।सही बुख़ारी , जिल्द 6 पेज 16)

अबू बक्र भी आपकी वफ़ात के वक़्त कहते हैं: मैं चाहता था कि रसूलल्लाह (स) से सवाल करू कि ख़िलाफ़त का मुसतहिक़ कौन है ? ताकि इस सिलसिले में इख्तिलाफ़ न हो।(तारीख़े तबरी जिल्द 3 पेज 431)

एक दूसरे मक़ाम पर मौसूफ़ कहते हैं:

पैग़म्बरे अकरम (स) को लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया ताकि अपनी मसलहत के लिहाज़ से किसी का इंतेख़ाब कर लें।तारीख़े तबरी जिल्द 4 पेज 53)

उमर बिन ख़त्ताब भी अपने बेटे के जवाब में कहते हैं जिन्होने उनसे दरख़्वास्त की थी कि लोगों को चरवाहे के बग़ैर गोसफ़ंदों की तरह क्यो छोड़ रहे हैं , उनकी जवाब था: अगर मैं अपने लिये कोई जानशीन मुअय्यन न करू तो मैंने रसूले ख़ुदा (स) की इक्तेदा की और अगर अपने बाद के लिये कोई ख़लीफ़ा मुअय्यन करता हूँ तो मैंने अबू बक्र की इक्तेदा की।हिलयतुल अवलिया जिल्द 1 पेज 44)

पहले तरीक़ ए कार पर होने वाले ऐतेराज़

यह ऐहतेमाल कि पैग़म्बरे अकरम (स) ने अपने बाद के लिये जानशीनी के सिलसिले में किसी ज़िम्मेदारी का अहसास न किया , उस पर बहुत से ऐतेराज़ हैं , हम ज़ैल में उनकी तरफ़ इशारा करते हैं:

1. इस ऐहतेमाल का नतीजा ज़रूरीयाते इस्लाम व मुसलेमीन में लापरवाही है हम इस बात पर अक़ीदा रखते हैं कि इस्लाम एक ऐसा मुकम्मल दीन है जिस में इंसानी ज़िन्दगी के हर पहलू के लिये क़वानीन मौजूद हैं जो उसकी सआदत का ज़ामिन हैं , ऐसी सूरत में यह कैसे मुमकिन हो सकता है कि पैग़म्बरे अकरम (स) इस अहम ज़िम्मेदारी (जानशीनी) की निस्बत बे तवज्जो रहें।

2. यह ऐहतेमाल रसूले अकरम (स) की सीरत के बर खिलाफ़ है , जो हज़रात तारीख़े रसूल (स) का मुतालआ रखते हैं वह जानते हैं कि आँ हज़रत (स) ने अपनी 23 साल की ज़िन्दगी में इस्लाम की नश्र व इशाअत और मुसलमानों की इज़्ज़त व सर बुलंदी के लिये बहुत कोशिशें की हैं , आप ने अपने मरज़ुल मौत में भी इस्लामी सहहद की हिफ़ाज़त के लिये एक लश्कर तैयार किया और ख़ुद आप बीमारी के आलम में इस लश्कर को रुख़्सत करने के लिये मदीने से बाहर तशरीफ़ लाये।

आँ हज़रत (स) ने मुसलमानो के इख्तिलाफ़ और गुमराही के पेशे नज़र हुक्म दिया कि क़लम व क़ाग़ज़ लाओ ताकि तुम्हारे लिये एक ऐसी वसीयत लिख दूँ जिस पर अमल करने के बाद कभी गुमराह न हो।

आप जब जंग के लिये मदीने से बाहर तशरीफ़ ले जाते थे तो अपनी जगह पर किसी को मुअय्यन करके जाते थे ताकि वह मुसलमानो के नज़्म को बर क़रार रखे , मिसाल के तौर पर:

हिजरत के दूसरे साल ग़ज़व ए बवात के मौक़े पर सअद बिन मआज़ को ग़ज़वा ज़िल अशीरा में अबू सलम ए मख़ज़ूमी को ग़ज़वा बद्रे कुबरा में इब्ने मकतूम को ग़ज़व ए बनी क़िक़ाअ और ग़ज़व ए सवीक़ में अबू लबाबा अंसारी को अपना जानशीन बनाया।

हिजरत के तीसरे साल भी ग़ज़व ए क़रक़रतुल कुद्र जंगे ओहद और हमरा उल असद में इब्ने मकतूम और नज्द के इलाक़े में ग़ज़व ए ज़ी अम्र में उस्मान बिन अफ़्फ़ान को जानशीन क़रार दिया।

हिज़रत के चौथे साल में ग़ज़व ए बनी नज़ीर में इब्ने मकतूम को और ग़ज़व ए बद्रे सीव्वुम में अब्दुल्लाह बिन रवाहा को अपना जानशीन क़रार दिया।

हिजरत के पाँचवें साल ग़ज़व ए ज़ातुर रिका़अ में उस्मान बिन अफ़्फ़ान को और गज़व ए दौमतुस जुन्दल नीज़ खंदक़ में इब्ने मकतूम को और गज़व ए बनी मुसतग़लक़ में ज़ैद बिन हारेसा को अपनी जगह मुअय्यन किया।

हिजरत के छठे साल गज़व ए बनी लेहयान , गज़व ए ज़ी क़रद और गज़व ए होदैयबिया में इब्ने मकतूम को अपना जानशीन क़रार दिया।

हिजरत के सातवें साल गज़व ए ख़ैबर , गज़व ए उमरतुल क़ज़ा में सबाअ बिन उरफ़ता को और हिजरत के आठवें साल जंगे तबूक के मौक़े पर मदीने में हज़रत अली बिन अबी तालिब (अ) को अपना जानशीन क़रार दिया।(देखिये मआलिमुल मदरसतैन जिल्द 1 पेज 273 से 279)

इन चंद सतरों को पढ़ने के बाद हो सकता है कि किसी के ज़हन में यह सवाल आये कि आँ हज़रत (स) ने हज़रत अली (अ) को मदीने में सिर्फ़ एक बार अपना जानशीन बनाया जबकि बाज़ लोगो को कई मरतबा जानशीन बनाया तो उसकी वजह ज़ाहिर है कि हज़रत अली (अ) हर जंग में आपके साथ साथ रहते थे सिवाए जंगे तबूर में।मुतर्जिम)

कारेईने केराम , आपने मुलाहिज़ा फ़रमाया कि जब पैग़म्बरे अकरम (स) चंद रोज़ के लिये मदीने से बाहर तशरीफ़ ले जाते थे तो मदीने को अपने जानशीन से ख़ाली नही छोड़ते थे तो क्या कोई तसव्वुर कर सकता है कि पैग़म्बरे अकरम (स) अपने उस आख़िरी सफ़र के जिससे वापस नही आना है अपने बाद के लिये किसी को जानशीन मुअय्यन नही करेगें और यह काम लोगों के ज़िम्मे छोड़ देगें ?

3. यह ऐहतेमाल पैग़म्बरे अकरम (स) के हुक्म के खिलाफ़ है क्योकि आँ हज़रत (स) ने मुसलमानों से फ़रमाया है:

(उसूले काफ़ी जिल्द 2 पेज 131)

जो शख्स सुबह उठे लेकिन मुसलमानो की फ़िक्र न करे तो ऐसा शख्स मुसलमान नही है।

क्या इस सूरते हाल मे यह कहा जा सकता है कि पैग़म्बरे अकरम (स) को मुसलमानो के दरख्शाँ मुसतक़बिल की फ़िक्र नही थी ?

4. यह ऐहतेमाल ख़ुलाफ़ा की सीरत के भी बर ख़िलाफ़ है क्योकि हर ख़लीफ़ा मुसलमानो के मुसतक़बिल के लिये फ़िक्र मंद था और अपने लिये जानशीन मुअय्यन किया है।

चुनाचे तबरी कहते हैं कि अबू बक्र ने अपने आख़िरी वक़्त में कमरा ख़ाली करके उस्मान को बुलाया और उनसे कहा: बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम , यह अहद व पैमान अबू बक्र की तरफ़ से मुसलमानो के लिये है , यह कहते ही बेहोश हो गये , जनाबे उस्मान ने इस फ़िक्र से कि कहीं अबू बक्र बग़ैर जानशीन मुअय्यन किये इस दुनिया से चले जायें , वसीयत में उमर बिन ख़त्ताब का नाम लिख कर आगे लिखना शुरु कर दिया , थोड़ी देर बाद हज़रत अबू बक्र को होश आ गया और उस्मान की लिखी हुई तहरीर की तसदीक़ की , उस पर अपनी मोहर लगा दी और अपने ग़ुलाम का दी कि उसको उमर बिन ख़त्ताब तक पहुचा दे , उमर ने भी ख़त को लिया और उसको लेकर मस्जिद में गये और कहा ऐ लोगों ख़लीफ़ ए रसूल ख़ुदा अबू बक्र का ख़त है जिसमें तुम्हारे लिये कुछ नसीहते लिखी हैं।

(तारीखे तबरी जिल्द 3 पेज 429)

इस वाक़ेया से हम दो बातों का नतीजा हासिल करते है एक तो यह कि अबू बक्र व उस्मान दोनो उम्मते इस्लामिया की फ़िक्र में थे और अबू बक्र ने अपने लिये जानशीन मुअय्यन किया है जिसकी ताईद हज़रत उमर ने भी की है।

दूसरे यह कि हज़रत उमर को जाहो मक़ाम की मुहब्बत ने इस चीज़ पर मजबूर रॉकर दिया कि पैग़म्बरे अकरम (स) की वसीयत का मुक़ाबला करें और आँ हज़रत (स) की तरफ़ हिज़यान की निस्बत दें लेकिन हालते ऐहतेज़ार में अबू बक्र की वसीयत को कबूल कर लिया और उनकी तरफ़ हिज़यान की निस्बत न दी।

इसी तरह जब हज़रत उमर ने यह महसूस किया कि उनकी मौत आने वाली है , अपने बेटे अब्दुल्लाह को जनाबे आयशा के पास भेजा ताकि उनसे पैग़म्बरे अकरम (स) के हुजरे में दफ़्न होने की इजाज़त ले ले तो जनाबे आयशा ने दरख़्वास्त को कबूल करते हुए उमर के लिये यह पैग़ाम भेजा कि कहीं ऐसा न हो कि उम्मते मुहम्मदी को बग़ैर चरवाहे के गोसफ़ंदों की तरह छोड़ कर चले जायें और उनके लिये जानशीन मुअय्यन किये बग़ैर ही इस दुनिया से चले जायें।अल इमामह वस सियायह जिल्द 1 पेज 32)

इस वाक़ेया से भी यह नतीजा निकलता है कि आयशा और उमर भी उम्मते इस्लामिया के मुस्तक़बिल और उम्मत के लिये जानशीन मुअय्यन करने की फ़िक्र में थे।

मुआविया भी अपने बेटे यज़ीद की बैअत लेने के लिये मदीने आया और उसने चंद असहाब मिनजुमला अब्दुल्लाह बिन उमर से मुलाक़ात के बाद कहा: मैं उम्मते मुहम्मदी को बग़ैर चरवाहे के गोसफंदों की तरह छोड़ने से नाख़ुश हूँ लिहाज़ा अपने बेटे यज़ीद को जानशीन बनाने की फ़िक्र में हूँ।

(अल इमामह वस सियासह जिल्द 1 पेज 168)

कारेईने केराम , इन तमाम वाक़ेयात के पेशे नज़र यह कैसे मुमकिन है कि सब तो उम्मत की फ़िक्र में रहें , लेकिन पैग़म्बरे अकरम (स) को उम्मत के लिये जानशीन की फ़िक्र न हो ?

6. यह मज़कूरा ऐहतेमाल अंबिया (अ) की सीरत के भी खिलाफ़ है , क्यो कि क़ुरआने मजीद पर सरसरी नज़र से ही यह नतीजा हासिल होता है कि अंबिया ए इलाही ने अपने बाद के लिये जानशीन मुअय्यन किया है , लिहाज़ा यक़ीनी तौर पर पैग़म्बरे अकरम (स) भी इस ख़ुसूसियत से अलग नही हैं।

इसी वजह से हज़रत मूसा (अ) मे ख़ुदा वंदे आलम की बारगाह में अर्ज़ किया कि उनके लिये एक वज़ीर करे , जैसा कि क़ुरआने मजीद में इरशाद होता है:

وَاجْعَل لِّي وَزِيرًا مِّنْ أَهْلِي هَارُونَ أَخِي (सूरह ताहा आयत 29, 30)

और मेरे अहल में से मेरा वज़ीर क़रार दे हारुन को जो मेरा भाई है।

इब्ने अब्बास नक़्ल करते हैं कि नासल नामी यहूदी पैग़म्बरे अकरम (स) की ख़िदमत में हाज़िर हुआ और कहने लगा या मुहम्मद , मैं आप से चंद चीज़ों के बारे में सवाल करता हूँ जो मेरे ज़हन में पाये जाते हैं , अगर आपने उनका जवाब दे दिया तो मैं आप पर ईमान ले आऊगाँ। ऐ मुहम्मद बताओ कि तुम्हारा जानशीन कौन है ? क्यो कि हर नबी ने अपना जानशीन मुअय्यन किया , हमारे नबी (मूसा बिन इमरान) के जानशीन यूशा बिन नून हैं , चुँनाचे इस मौक़े पर रसूले अकरम (स) ने फ़रमाया:

(यनाबिउल मवद्दत बाब 76 हदीस 1)

बेशक मेरे वसी अली बिन अबी तालिब (अ) और उनके बाद मेरे दो फ़रजंद हसन व हुसैन हैं फिर हुसैन की नस्ल से नौ इमाम मेरे वसी हैं।

याक़ूबी कहते हैं: हज़रत आदम (अ) ने अपनी वफ़ात के वक़्त शीस से वसीयत की और उनको ज़ोहद व तक़वा और हुस्ने इबादत का हुक्म दिया और क़ाबील लईन की दोस्ती से मना फ़रमाया।तारीख़े याक़ूबी जिल्द 1 पेज 7)

शीस ने भी अपने फ़रज़ंद अनूश को वसीयत की , अनूश ने भी अपने बेटे क़ीनान को वसीयत की और उन्होने अपने बेटे महलाईल को , उन्होने अपने बेटे यरद को और उन्होने अपने फ़रज़ंद ईदरीस को वसीयत की।

(कामिल इब्ने असीर जिल्द 1 पेज 54, 55)

ईदरीस ने अपने बेटे मुतशल्लिख़ को , उन्होने अपने फ़रज़ंद लमक को , उन्होने अपने बेटे नूह को और उन्होने अपने फ़रज़ंद साम को वसीयत की।

(कामिल बिन असीर जिल्द 1 पेज 62)

जिस वक़्त जनाबे इब्राहीम (अ) मक्के से रवाना हुए तो अपने बेटे इस्माईल को वसीयत की कि ख़ान ए काबा के नज़दीक सुकूनत इख्तियार करना और मनासिके हज को क़ायम रखना।(जनाबे इस्माईल ने अपने भाई इसहाक़ को वसीयत की , उन्होने अपने फ़रजंद याक़ूब को वसीयत की और इसी तरह वसीयत का यह सिलसिला बाप बेटे या भाई के दरमियान चलता रहा।(तारीख़े याक़ूबी जिल्द 1 पेज 28) )

इसी तरह जनाबे दाऊद ने अपने फ़रजंद सुलेमान को वसीयत की और फ़रमाया: अपने ख़ुदा की वसीयतों पर अमल करो और तौरेत में लिखे उसके अहद व पैमान और वसीयतों की हिफ़ाज़त करना।

हज़रत ईसा (अ) ने भी शमऊन को वसीयत की और जब शमऊन की वफ़ात का वक़्त क़रीब आया तो ख़ुदा वंदे आलम ने उन पर वहयी नाज़िल की कि हिकमत (यानी नूरे ख़ुदा) और अंबिया की तमाम मीरास को यहया के पास अमानत रख दो।

और यहया को हुक्म दिया कि ख़िलाफ़त और इमामत को शमऊन की औलाद और हज़रते ईसा (अ) के हव्वारियों के हवाले कर दो और इसी तरह वसीयत की यह सिलसिला जारी रहा। यहाँ तक कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) तक पहुचा।

(इसबातुल वसीयत पेज 70)

यह वसीयतें सिर्फ़ माल या अहले ख़ाना से मुतअल्लिक़ नही थी मख़सूसन अहले सुन्नत के इस नज़रिये के मुताबिक़ कि अंबिया मीरास में माल नही छोड़ते बल्कि यह वसीयतें हिदायत और मुआशरे की रहबरी नीज़ शरीयत की हिफ़ाज़त के लिये थीं।

क्या इन तमाम हालात के बावजूद पैग़म्बरे अकरम (स) इस अक़्ली क़ानून से अलग हैं ?

जनाबे सलमाने फ़ारसी ने रसूले अकरम (स) से सवाल किया:

हदीस (कंज़ुल उम्माल जिल्द 11 पेज 610 हदीस 32953, मजमउज़ ज़वायद जिल्द 9 पेज 113, 114)

या रसूलल्लाह , हर नबी का एक वसी होता था , आपका वसी कौन है ? पैग़म्बरे अकरम (स) ने चंद लम्हे बाद फ़रमाया: ऐ सलमान , चुँनाचे मैं बहुत तेज़ी के साथ आपकी ख़िदमत में पहुचा और मैंने लब्बैक कहा , उस वक़्त आं हज़रत (स) ने फ़रमाया: क्या तुम जानते हो कि मूसा बिन इमरान का वसी कौन था ? सलमान ने कहा: जी हाँ मैं जानता हूँ कि यूशा बिन नून थे , आँ हज़रत ने फ़रमाया: क्या तुम जानते हो कि किस वजह से वह वसी हुए ? मैने अर्ज़ किया: क्यो वह अपने ज़माने के सबसे बड़े आलिम थे , उस वक़्त रसूले इस्लाम (स) ने फ़रमाया: बेशक मेरा वसी , मेरा राज़दार और मेरे बाद बेहतरीन जानशीन वह है जो मेरे वादों पर अमल करे और वह मेरे दीन के बारे में हुक्म करेगा और वह अली बिन अबी तालिब (अ) हैं।

बुरैदा भी रसूले अकरम (स) से रिवायत नक़्ल करते हैं कि आं हज़रत ने फ़रमाया:

हदीस (रियाज़ुन नज़रह जिल्द 3 पेज 138)

हर नबी और पैग़म्बर का एक वारिस था , बेशक अली (अ) मेरे वसी और वारिस हैं।

7. पैग़म्बरे अकरम (स) का फ़रीज़ा सिर्फ़ यह नही था कि वहयी को हासिल करें और उसको लोगों तक पहुचा दें , बल्कि आँ हज़रत (स) के दूसरे भी फ़रायज़ थे जैसे:

अ. क़ुरआने करीमी की तफ़सीर , अहदाफ़ व मक़ासिद की तशरीह और कश्फ़े रुमूज़ व असरार।

आ. उस ज़माने में पेश आने वाले अहकाम और मौज़ूआत की वज़ाहत।

इ. दुश्मनाने इस्लाम की तरफ़ से अपने मफ़ाद के लिये इस्लामी मुआशरे में अहम और मुश्किल सवाल व ऐतेराज़ के जवाबात देना।

ई. दीन को तहरीफ़ से महफ़ूज़ रखना।

कारेईने मोहतरम , आँ हज़रत (स) की वफ़ात के बाद इन ज़रूरतों का अहसास हुआ , लिहाज़ा आँ हज़रत (स) का ऐसा जानशीन होना बहुत ज़रूरी है जो इस तरह के सवालात व ऐतेराज़ात का जवाब दे सके।

दूसरी तरफ़ से हम जानते हैं कि इन तमाम चीज़ों का ओहदे दार सिवाए हज़रत अली (अ) के कोई दूसरा नही था।

8. जैसा कि हम देखते हैं कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) की वफ़ात के वक़्त उम्मते इस्लामिया मुख़्तलिफ़ हमलों का शिकार हुई जैसे शेमाल और मशरिक़ी इलाक़ों से दो बड़े बादशाह , रूम व ईरान कशमकश के आलम में में और अंदरूनी इलाक़ो में मुनाफ़िक़ीन का ख़तरा था , बनी क़ुरैज़ा और बनी नज़ीर के यहूद भी मुसलमानो से अच्छे ताअल्लुक़ात नही रखते थे और मुसलमानो को नीस्त व नाबूद करने का सौदा अपने ज़हनों में रखे हुए थे।

इन हालात के पेशे नज़र जानशीनी के सिलसिले में पैग़म्बरे अकरम (स) की ज़िम्मेदारी क्या थी ? क्या मुसलमानों का उनके हाल पर छोड़ दिया जाये या आपकी यह ज़िम्मेदारी बनती थी कि मुसलमानो के इख्तिलाफ़ात को दूर करने के लिये अपने जानशीन के उनवान से एक शख्स को मुअय्यन करें ताकि वह लोगों की हिदायत व रहबरी के ज़रिये इस्लाम को कमज़ोर होने से महफ़ूज़ रखे।

लिहाज़ा कतई तौर पर हमें कबूल करना चाहिये कि पैग़म्बरे अकरम (स) ने इस सिलसिले में अपने फ़र्ज को निभाया और अपना जानशीन मुअय्यन किया लेकिन बाज़ असहाब ने आँ हज़रत (स) की इस वसीयत और फ़रमाइश को नज़र अंदाज़ कर दिया और लोगों को गुमराही की तरफ़ ले गये , जिस की बेना पर मुसलमान मुआशरे में वह आशोब बरपा हुआ कि उमर बिन ख़त्ताब के बक़ौल ख़ुदा वंदे आलम ने उसके शर से मुसलमानों को निजात दी।

दूसरे तरीक़ ए कार पर ऐतेराज़

दूसरा तरीक़ ए कार जो पैग़म्बरे अकरम (स) के सामने हो सकता था वह यह है कि आँ हज़रत (स) ख़िलाफ़ते मसअले को शूरा के हवाले कर दें ताकि इत्तेफ़ाक़े राय से ख़ुद ही किसी को ख़लीफ़ा बना लें , लेकिन इस तरीक़ ए कार पर भी चंद ऐतेराज़ हैं जैसे:

1. अगर पैग़म्बरे अकरम (स) ख़िलाफ़त के लिये इस तरीक़ ए कार को इंतेख़ाब करते तो भी आँ हजरत (स) को उसकी वज़ाहत करना चाहिये था और इंतेख़ाब होने वाले और इंतेख़ाब करने वालों के शरायत को बयान करते , जबकि हम देखते हैं कि ऐसा नही हुआ , लिहाज़ा अगर यह तय हो कि ख़िलाफ़त का मसअला शूरा के हवाले कर दिया गया हो तो फिर उसको मुकर्रर और वाज़ेह तौर पर बयान करना चाहिये था।

2. न सिर्फ़ यह कि आँ हज़रत (स) ने शूरा के निज़ाम को बयान न किया बल्कि हरगिज़ लोगों में इस तरह के निज़ाम की सलाहियत नही पाई जाती थी , क्यो कि यह वही लोग थे जिन्होने हजरुल असवद को नस्ब करने के लिये झगड़ा खड़ा कर दिया , उनमें से हर क़बीला हजरे असवद को नस्ब करने का शरफ़ हासिल करना चाहता था और यह नज़ाअ जंग में तब्दील होने वाला था , चुँनाते पैग़म्बरे अकरम (स) ने सिर्फ़ अपनी तदबीर से इस झगड़े को ख़त्म किया और आपने एक चादर में हजरे असवद को रख कर तमाम क़बीलों का दावत दी कि अपना अपना नुमाइंदा भेज दें ताकि हजरे असवद को नस्ब करने में शरीक हो जाये।

ग़ज़व ए बनी मुसतलक़ में अंसार व मुहाजेरीन के दो लोगों में झगड़ा होने लगा और उनमें से हर शख्स ने अपनी क़ौम को मदद के लिये पुकारा , क़रीब था कि ख़ाना जंगी शुरु हो जाये और दुश्मन मुसलमानों पर ग़ालिब हो जाये लेकिन इस मौक़े पर पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने इस फ़ितने की आग को ख़ामोश किया और दोनो को जाहिलियत की बातों से डराया।

यह वही लोग हैं जिन्होने रसूले अकरम (स) की वफ़ात के बाद ख़िलाफ़त के मसअले में ऐसा इख्तिलाफ़ किया और चंद अंसार व मुहाजिर ने सक़ीफ़ा में बे बुनियाद दावों के ज़रियें हक़्क़े ख़िलाफ़त को ग़स्ब कर लिया , जिसको आख़िर में सहाबी रसूल (स) सअद बिन उबादा को हाथों और लातों से मारा गया और मुहाजेरीन ने हुकुमत व ख़िलाफ़त को अपने क़ब्ज़े में ले लिया।

3. यह बात कही जा चुकी कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) की ज़िम्मेदारी वहयी को हासिल करके उसकी तबलीग़ के अलावा दीगर ज़िम्मेदारियाँ भी थीं , रसूले अकरम (स) के बाद मुसलमान किसी ऐसी ज़ात के ज़रूरत मंद थे जो रसूले अकरम (स) की रेहलत से पैदा होने वाली कमी को पूरा कर सके और ऐसी ज़ात सिवाए अली और अहले बैत (अ) के को ई और नही थी।

लिहाज़ा जब हज़रत अली (अ) से सवाल किया गया कि आप पैग़म्बरे इस्लाम (स) से किस तरह सबसे ज़्यादा हदीसें नक़्ल करते हैं तो आपने फ़रमाया:

हदीस (सही तिरमिज़ी जिल्द 5 पेज 460, तबक़ात इब्ने साद जिल्द 2 पेज 101)

क्यो कि मैं जब पैग़म्बरे अकरम (स) से सवाल करता था तो आप जवाब देते थे और जब मैं ख़ामोश हो जाता था तो आँ हज़रत (स) ख़ुद हदीस बयान करना शुरु कर देते थे।

पैग़म्बरे अकरम (स) ने बारहा यह हदीस बयान फ़रमाई है:

हदीस (सही तिरमिज़ी जिल्द 5 पेज 637)

मैं शहरे हिकमत हूँ और अली (अ) उसकी दरवाज़ा।

इसी तरह आँ हज़रत (स) ने फ़रमाया:

(मुसतदरके हाकिम जिल्द 3 पेज 127)

मैं शहरे इल्म हूँ और अली उसका दरवाज़ा , जो शख्स मेरे इल्म को हासिल करना चाहता है उसको दरवाज़े से दाख़िल होना चाहिये।

कारेईने केराम , नतीजा यह निकला कि पहला और दूसरा तरीक़ा बातिल और बे बुनियाद है , तीसरा तरीक़ ए कार वही बाक़ी बचता है कि पैग़म्बरे अकरम (स) ने अपनी ज़िन्दगी में ख़लीफ़ा बनाया।

दीगर असहाब पर अली (अ) की बरतरी

इमाम की इमामत के लिये मुतकल्लेमीन के नज़दीक एक शर्त ये है कि इमाम अपने ज़माने में सब से अफ़ज़ल हो , जैसा कि ख़ुदा वन्दे आलम फ़रमाता है

: قُلْ هَلْ مِن شُرَكَائِكُم مَّن يَهْدِي إِلَى الْحَقِّ قُلِ اللَّـهُ يَهْدِي

لِلْحَقِّ أَفَمَن يَهْدِي إِلَى الْحَقِّ أَحَقُّ أَن يُتَّبَعَ أَمَّن لَّا يَهِدِّي إِلَّا أَن يُهْدَى فَمَا لَكُمْ كَيْفَ تَحْكُمُونَ

(सूरह यूनुस आयत 35)

'' और जो हक़ की हिदायत करता है वह वाक़ेअन क़ाबिले इत्तेबा है ? या जो हिदायत के क़ाबिल नही है!! मगर ये कि ख़ुद उसकी हिदायत की जाये तो आख़िर तुम्हे क्या हो गया है और तुम कैसे फैसले कर रहे हो ''!!

पैग़म्बरे अकरम (स) ने फ़रमाया: '' जो शख़्स दस लोगों पर किसी शख़्स को मुअय्यन करे और ये जानता हो कि उन दस लोगों में उस से अफ़ज़ल कोई दूसरा मौजूद है तो उसने ख़ुदा और रसूल और मोमनीन के साथ धोका किया '' (कन्ज़ुल उम्माल जिल्द 6 पेज 19 हदीस 14653)

अहमद बिन हंबल अपनी सनद के साथ पैग़म्बरे अकरम (स) से रिवायत की है कि आँ हज़रत ने फ़रमाया : ''जो शख़्स किसी को एक जमाअत पर मुअय्यन करे जब कि वह जानता हो कि उन के दरमियान उससे बेहतर कोई मौजूद है तो उसने ख़ुदा और रसूल और मोमेनीन के साथ ख़यानत की है '' (मजमउज़ ज़वायद जिल्द 5 पेज 232, मुसनद अहमद जिल्द 1 पेज 165)

ख़लील बिन अहमद से कहा गया: तुम क्यो अली (अ) की मदह नही करते ? उसने कहा मैं उस ज़ात के बारे में क्या कहूँ जिसके दोस्तों ने भी ख़ौफ़ की वजह से उसके फ़ज़ायल को छुपाया और दुश्मनों ने उनकी दुश्मनी की वजह से उनके फ़ज़ायल को छुपाया जबकि हज़रत अली (अ) के फ़ज़ायल हर तरफ़ नज़र आते हैं।

إِنَّمَا وَلِيُّكُمُ اللَّـهُ وَرَسُولُهُ وَالَّذِينَ آمَنُوا الَّذِينَ يُقِيمُونَ الصَّلَاةَ وَيُؤْتُونَ الزَّكَاةَ وَهُمْ رَاكِعُونَ

(अहक़ाक़ुल हक़ जिल्द 4 पेज 2)

अ. इमाम अली (अ) की अफ़ज़लियत पर दलालत करने वाली आयात

1. इमाम अली (अ) और विलायत

हज़रत अली (अ) की ज़ात वह है जिनकी शान में आयते विलायत नाज़िल हुई है:

(सूरह मायदा आयत 55)

तर्जुमा

, ईमान वालों , बस तुम्हारा वली अल्लाह है और उसका रसूल और वह साहिबाने ईमान जो नमाज़ क़ायम करते हैं और हालते रुकू में ज़कात देते हैं।

सुन्नी व शिया मुफ़स्सेरीन का इस बात पर इत्तेफ़ाक़ है कि यह आयत हज़रत अली (अ) की शान में नाज़िल हुई है और पचास से ज़्यादा अहले सुन्नत उलामा ने इस हक़ीक़त की तरफ़ इशारा किया है।दुर्रे मंसूर जिल्द 2 पेज 239)

2. इमाम अली (अ) और मवद्दत

हज़रत अली (अ) उन हज़रात में से हैं जिनकी मवद्दत और मुहब्बत तमाम मुसलमानों पर वाजिब की गई है जैसा कि ख़ुदा वंदे आलम ने फ़रमाया

: ذَلِكَ الَّذِي يُبَشِّرُ اللَّـهُ عِبَادَهُ الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ قُل لَّا أَسْأَلُكُمْ عَلَيْهِ أَجْرًا إِلَّا الْمَوَدَّةَ فِي الْقُرْبَى وَمَن يَقْتَرِفْ حَسَنَةً نَّزِدْ لَهُ فِيهَا حُسْنًا إِنَّ اللَّـهَ غَفُورٌ شَكُورٌ

(सूरह शूरा आयत 23)

तर्जुमा

, आप कह दीजिए कि मैं तुम से इस तहलीग़े रिसालत का कोई अज्र नही चाहता सिवाए इसके कि मेरे क़राबत दारों से मुहब्बत करो।

सुयूतीस इब्ने अब्बास से रिवायत करते हैं: जब पैग़म्बरे अकरम (स) पर यह आयत नाज़िल हुई तो इब्ने अब्बास ने अर्ज़ किया , या रसूलल्लाह आपके वह रिश्तेदार कौन है जिनकी मुहब्बत हम लोगों पर वाजिब है ? तो आँ हज़रत (स) ने फ़रमाया: अली , फ़ातेमा और उनके दोनो बेटे।अहयाउल मय्यत बे फ़ज़ायले अहले बैत (अ) पेज 239, दुर्रे मंसूर जिल्द 6 पेज 7, जामेउल बयान जिल्द 25 पेज 14, मुसतदरके हाकिम जिल्द 2 पेज 444, मुसनदे अहमद जिल्द 1 पेज 199)

3. इमाम अली (अ) और आयते ततहीर

हज़रत अली (अ) का शान में आयते ततहीर नाज़िल हुई है चुँनाचे ख़ुदा वंदे आलम का इरशाद है

: إِنَّمَا يُرِيدُ اللَّـهُ لِيُذْهِبَ عَنكُمُ الرِّجْسَ أَهْلَ الْبَيْتِ وَيُطَهِّرَكُمْ تَطْهِيرًا

(सूरह अहज़ाब आयत 33)

ऐ (पैग़म्बर के) अहले बैत , ख़ुदा तो बस यह चाहता है कि तुम को हर तरह की बुराई से दूर रखे और जो पाक व पाकीज़ा रखने का हक़ है वैसा पाक व पाकीज़ा रखे।

मुस्लिम बिन हुज्जाज अपनी मुसनद के साथ जनाबे आयशा से नक़्ल करते हैं कि रसूले अकरम (स) सुबह के वक़्त अपने हुजरे से इस हाल में निकले कि अपने शानों पर अबा डाले हुए थे , उस मौक़े पर हसन बिन अली (अ) आये , आँ हज़रत (स) ने उनको अबा (केसा) में दाख़िल किया , उसके बाद हुसैन आये और उनको भी चादर में दाख़िल किया , उस मौक़े पर फ़ातेमा दाख़िल हुई तो पैग़म्बर (स) ने उनको भी चादर में दाख़िल कर लिया , उस मौक़े पर अली (अ) आये उनको भी दाख़िल किया और फिर इस आयते शरीफ़ा की तिलावत की।

: إِنَّمَا يُرِيدُ اللَّـهُ لِيُذْهِبَ عَنكُمُ الرِّجْسَ أَهْلَ الْبَيْتِ وَيُطَهِّرَكُمْ تَطْهِيرًا

(आयते ततहीर)

(सही मुस्लिम जिल्द 2 पेज 331)

4. इमाम अली (अ) और शबे हिजरत

हज़रत अली (अ) उस शख्सीयत का नाम है जो शबे हिजरत पैग़म्बरे अकरम (स) के बिस्तर पर सोए और उनकी शान में यह आयते शरीफ़ा नाज़िल हुई: وَمِنَ النَّاسِ مَن يَشْرِي نَفْسَهُ ابْتِغَاءَ مَرْضَاتِ اللَّـهِ وَاللَّـهُ رَءُوفٌ بِالْعِبَادِ

(सूरह बक़रह आयत 207)

लोगों में से कुछ ऐसे भी हैं जो अल्लाह की ख़ुशनूदी हासिल करने के लिये अपनी जान तक बेच डालते हैं और अल्लाह ऐसे वंदों पर बड़ा ही शफ़क़त वाला और मेहरबान है।

इब्ने अब्बास कहते हैं: यह आयते शरीफ़ा उस वक़्त नाज़िल हुई जब पैग़म्बरे अकरम (स) अबू बक्र के साथ मुशरेकीने मक्का के हमलों से बच कर ग़ार में पनाह लिये हुए थे और हज़रत अली (अ) पैग़म्बरे अकरम (स) के बिस्तर पर सोए हुए थे।

(अल मुसतदरक अलल सहीहैन जिल्द 3 पेज 4)

इब्ने अबिल हदीद कहते हैं: तमाम मुफ़स्सेरीन ने यह रिवायत की है कि यह आयते शरीफ़ा हज़रत अली (अ) की शान में उस वक़्त नाज़िल हुई जब आप बिस्तरे रसूल (स) पर लेटे हुए थे।

(शरहे इब्ने अबिल हदीद जिल्द 13 पेज 263)

इस हदीस को अहमद बिन हंबल ने अल मुसनद में , तबरी ने तारिख़ुल उमम वल मुलूक में और दीहर उलामा ने भी नक़्ल किया है।

فَمَنْ حَاجَّكَ فِيهِ مِن بَعْدِ مَا جَاءَكَ مِنَ الْعِلْمِ فَقُلْ تَعَالَوْا نَدْعُ أَبْنَاءَنَا وَأَبْنَاءَكُمْ وَنِسَاءَنَا وَنِسَاءَكُمْ وَأَنفُسَنَا وَأَنفُسَكُمْ ثُمَّ نَبْتَهِلْ فَنَجْعَل لَّعْنَتَ اللَّـهِ عَلَى الْكَاذِبِينَ

5. इमाम अली (अ) और आयते मुबाहला

ख़ुदा वंदे आलम फ़रमाता है:

(सूरह आले इमरान आयत 61)

ऐ पैग़म्बर , इल्म के आ जाने के बाद जो लोग तुम से कट हुज्जती करें उनसे कह दीजिए कि (अच्छा मैदान में) आओ , हम अपने बेटे को बुलायें तुम अपने बेटे को और हम अपनी औरतों को बुलायें और तुम अपनी औरतों को और हम अपनी जानों को बुलाये और तुम अपने जानों को , उसके बाद हम सब मिलकर ख़ुदा की बारगाह में गिड़गिड़ायें और झूठों पर ख़ुदा की लानत करें।

मुफ़स्सेरीन का इस बात पर इत्तेफ़ाक़ है कि इस आयते शरीफ़ा में (अनफ़ुसना) से मुराद अली बिन अबी तालिब (अ) हैं , पस हज़रत अली (अ) मक़ामात और फ़ज़ायल में पैग़म्बरे अकरम (स) के बराबर हैं , अहमद बिन हंमल अल मुसनद में नक़्ल करते हैं: जब पैग़म्बरे अकरम (स) पर यह आयते शरीफ़ा नाज़िल हुई तो आँ हज़रत (स) ने हज़रत अली (अ) , जनाबे फ़ातेमा और हसन व हुसैन (अ) को बुलाया और फ़रमाया: ख़ुदावंदा यह मेरे अहले बैत हैं। नीज़ सही मुस्लिम , सही तिरमिज़ी और मुसतदरके हाकिम वग़ैरह में इसी मज़मून की रिवायत नक़्ल हुई है।

(मुसनदे अहमद जिल्द 1 पेज 185)

(सही मुस्लिम जिल्द 7 पेज 120)

(सोनने तिरमिज़ी जिल्द 5 पेज 596)

(अल मुसतदरके अलल सहीहैन जिल्द 3 पेज 150)

ब. हज़रत अली (अ) की अफ़ज़लियत पर दलालत करने वाली अहादीस

1. इमाम अली (अ) , पैग़म्बरे अकरम (स) के भाई

हाकिम नैशापूरी अब्दुल्लाह बिन उमर से रिवायत करते हैं: पैग़म्बरे अकरम (स) ने अपने असहाब के दरमियान अक़्दे उख़ूव्वत पढ़ा , अबू बक्र को उमर का भाई , तलहा को ज़ुबैर का भाई और उस्मान को अब्दुल्लाह बिन औफ़ का भाई क़रार दिया , हज़रत अली (अ) ने अर्ज़ किया या रसूलल्लाह , आपने अपने असहाब के दरमियान अक़्दे उख़ूव्वत पढ़ा लेकिन मेरा भाई कौन है ? उस वक़्त पैग़म्बरे (स) ने फ़रमाया:

तुम दुनिया व आख़िरत में मेरे भाई हो।अल मुसतदरक अलस सहीहैन जिल्द 3 पेज 14)

उस्ताद तौफ़ीक़ अबू इल्म (मिस्र अदलिया के वकीले अव्वल) तहरीर करते हैं कि पैग़म्बरे अकरम (स) का यह अमल तमाम असहाब पर हज़रत अली (अ) की फ़ज़ीलत को साबित करता है , नीज़ इस बात पर भी दलालत करता है कि हज़रत अली (अ) के अलावा कोई दूसरा पैग़म्बरे अकरम (स) का हम पल्ला और बराबर नही है।इमाम अली बिन अबी तालिब पेज 43)

उस्ताद ख़ालिद मुहम्मद ख़ालिद मिस्री रक़्म तराज़ है: आर उस शख्सीयत के बारे में क्या कहते हैं जिसको रसूले अकरम (स) ने अपने असहाब के दरमियान इंतेख़ाब किया ताकि उसको अक़्दे उख़ूव्वत के मौक़े पर अपनी भाई क़रार दे , बहुत मुमकिन है कि हज़रत अली (अ) के ईमान की गहराई बहुत ज़्यादा हो जिसकी वजह से आँ हज़रत (स) ने उनको दूसरों पर मुक़द्दम किया और अपने बरादर के उनवान से मुन्तख़ब किया।फ़ी रेहाब अली (अ)

उस्ताद अब्दुल करीम मिस्री तहरीर करते हैं कि यह उख़ूव्वत व बरादरी जिसको पैग़म्बरे अकरम (स) ने सिर्फ़ अली (अ) को इनायत फ़रमाई , यह बग़ैर दलील के नही थी , बल्कि ख़ुदा वंदे आलम के हुक्म से और ख़ुद हज़रत अली (अ) के फ़ज़्ल व कमाल की वजह से थी।

(अली बिन अबी तालिब बक़ीयतुन नुबुवह ख़ातिमुल ख़िलाफ़ह पेज 110)

2. इमाम अली (अ) और मौलूदे काबा

हाकिम नैशापुरी तहरीर करते हैं: मुतावातिर रिवायात इस बात पर दलालत करती है कि फ़ातेमा बिन्ते असद ने हज़रत अमीरुल मोमिनीन अली बिन अबी तालिब (अ) को ख़ान ए काबा के अंदर पैदा किया।अल मुसतरदक अलस सहीहैन जिल्द 3 पेज 550 हदीस 6044)

अहले सुन्नत मुअल्लेफ़ीन में से डाक्टर मुसम्मात सुआद माहिर मुहम्मद कहती हैं: इमाम अली (अ) किसी तारीफ़ और जिन्दगी नामे के मोहताज नही हैं , उनकी फ़ज़ीलत के लिये यही काफ़ी है कि आप ख़ान ए काबा में पैदा हुए और आप ने बैते वहयी में और क़ुरआने करीम के ज़ेरे साया तरबीयत पाई।

(मशहदुल इमाम अली (अ) फ़ीन नजफ़ पेज 6)

3- इमाम अली (अ) और तरबीयते इलाही

हाकिम नैशापुरी तहरीर करते हैं: अली बिन अबी तालिब (अ) ख़ुदा वंदे आलम की नेमतों में से अज़ीम नेमत उनकी तक़दीर थी , क़ुरैश बेशुमार मुश्किलात में गिरफ़्तार थे , अबू तालिब की औलाद ज़्यादा थी , रसूले ख़ुदा (स) ने अपने चचा अब्बास (जो बनी हाशिम में सबसे मालदार शख्सियत थी) से फ़रमाया: या अबुल फज़्ल , तु्म्हारे भाई अबू तालिब अयालदार हैं और सख्ती में ज़िन्दगी गुज़ार रहे हैं , उनके पास चलते हैं ताकि उनका कुछ बोझ कम करें , मैं उनके बेटों में से एक को ले लेता हूँ और आप भी किसी एक फ़रज़ंद का इंतेख़ाब कर लें ताकि उनको अपनी कि़फ़ालत में ले लें , चुँनाचे जनाबे अब्बास ने क़बूल कर लिया और दोनो जनाबे अबू तालिब के पास आये और मौज़ू को उनके सामने रखा , जनाबे अबू तालिब ने उनकी बातें सुन कर अर्ज़ किया: अक़ील को मेरे पास रहने दो , बक़ीया जिस को भी चाहो इँतेख़ाब कर लो , पैग़म्बरे अकरम (स) ने अली (अ) को इंतेख़ाब किया और जनाबे अब्बास ने जाफ़र को , हज़रत अली (अ) बेसत के वक्त तक पैग़म्बरे अकरम (स) के साथ रहे और आँ हज़रत (स) की पैरवी करते रहे और हमेशा आपकी तसदीक़ की।

पैग़म्बरे अकरम (स) नमाज़ के लिये मस्जिदुल हराम (ख़ान ए काबा) में जाते थे , उनके पीछे पीछे अली (अ) और जनाबे ख़दीजा जाते थे और आँ हज़रत (स) के साथ मल ए आम में नमाज़ पढ़ते थे , जबकि इन तीन अफ़राद के अलावा कोई नमाज़ नही पढ़ता था।

(अल मुसतदरक अलस सहीहैन जिल्द 3 पेज 183, मुसनद अहमद जिल्द 1 पेज 209, तारिख़े तबरी जिल्द 2 पेज 311)

उब्बाद बिन अब्दुल्लाह कहते हैं: मैंने अली (अ) से सुना कि उन्होने फ़रमाया: मैं ख़ुदा का वंदा और उसके रसूल का बरादर हूँ और मैं ही सिद्दीक़े हूँ , मेरे बाद कोई यह दावा नही कर सकता मगर यह कि वह झूटा और तोहमत लगाने वाला हो , मैं ने दूसरे लोगों से सात साल पहले रसूले अकरम (स) के साथ नमाज़ पढ़ी है।

(तारिख़े तबरी जिल्द 2 पेज 52)

उस्ताद अब्बास महमूद अक़्क़ाद मशहूर व मारूफ़ मिस्री कहते हैं: अली (अ) उस घर में तरबीयत पाई है कि जहाँ से पूरी दुनिया में इस्लाम की दावत पहुची।

(अबक़रियतुल इमाम अली (अ) पेज 43)

डाक्टर मुहम्मद अबदहू यमानी हज़रत अली (अ) के बारे में कहते हैं: वह ऐसे जवान मर्द थे जो बचपन से रसूले अकरम (स) के ज़ेरे साया परवान चढ़े और आख़िरे उम्र आँ हज़रत (स) का साथ न छोड़ा।

(अल्लिमू औलादकुम मुहब्बता आले बैतिन नबी (स) पेज 101)

4- इमाम अली (अ) ने किसी बुत के सामने सजदा नही किया

उस्ताद अहमद हसन बाक़ूरी , वज़ीरे अवक़ाफ़े मिस्र तहरीर करते हैं: तमाम असहाब के दरमियान सिर्फ़ इमाम अली (अ) को कर्मल्लाहो बजहहू कहे जाने की वजह यह है कि आपने कभी किसी बुत के सामने सजदा नही किया।

(अली (अ) इमामुल आईम्मा पेज 9)

उस्ताद अब्बास महमूद अक्क़ाद तहरीर करते हैं: मुसल्लम तौर पर हज़रत अली (अ) मुसलमान पैदा हुए हैं , क्यो कि (अशहाब के दरमियान) आप ही एक ऐसी शख्सियत थी , जिन्होने इस्लाम पर आँख़ें खोलीं और आप को हरगिज़ बुतों की इबादत की कोई शिनाख़्त न थी।

(अबक़िरयतुल इमाम अली (अ) पेज 43)

डाक्टर मुहम्मद यमानी रक़्मतराज़ है कि अली बिन अबी तालिब हमसरे फ़ातेमा , साहिबे मज्द व यक़ीन , दुख़्तरे बेहतरीने रसूल (कर्मल्लाहो बजहहू) हैं जिन्होने कभी किसी बुत के सामने तवाज़ो व इंकेसारी (यानी इबादत) नही की है।अल्लिमू औलादकुम मुहब्बता आले बैतिन नबी (स) पेज 101)

(हज़रत अली (अ) की यही फ़ज़ीलत डाक्टर मुहम्मद बय्यूमी मेहरान , उम्मुल क़ुरा मक्क ए मुअज्ज़मा शरीयत कालेज के उस्ताद और मुसम्मात डाक्टर सुआद माहिर भी बयान करते हैं।)

(अली बिन अबी तालिब (अ) पेज 50, मशहदुल इमाम अली (अ) फ़ीन नजफ़ पेज 36)

5- इमाम अली (अ) सबसे पहले मोमिन

पैग़म्बरे अकरम (स) ने हज़रत अली (अ) के बारे में फ़ातेमा ज़हरा (स) से फ़रमाया: बेशक वह (अली (अ) मेरे असहाब में सबसे पहले मुझ पर ईमान लाये।

(मुसनद अहमद जिल्द 5 पेज 662 हदीस 19796, कंज़ुल उम्माल जिल्द 11 पेज 605 हदीस 23924)

इसी तरह इब्ने अबिल हदीद रक़्मतराज़ हैं: मैं उस शख्सीयत के बारे में क्या कहूँ जिसने हिदायत में दूसरों से सबक़त ली हो , ख़ुदा पर ईमान लायें और उसकी इबादत की जबकि तमाम लोग पत्थर (के बुतों) की पूजा किया करते थे।

(शरहे इब्ने हदीद जिल्द 3 पेज 260)

6. इमाम अली (अ) ख़ुदा वंदे आलम के नज़दीक मख़लूक़ में सबसे ज़्यादा महबूब

तिरमिज़ी अपने सनद के साथ अनस बिन मालिक से रिवायत करते हैं: रसूले अकरम (स) के पास एक भूना हुआ परिन्दा (ख़ुदा की तरफ़ से नाज़िल) हुआ , उस मौक़े पर आँ हज़रत (स) ने अर्ज़ की , बारे इलाहा , तेरी मख़लूक़ में तेरे नज़दीक जो सबसे ज़्यादा महबूब हो उसको मेरे पास भेज दे ताकि वह इस भूने हुए परिन्दे में मेरे साथ शरीक हो , उस मौक़े पर हज़रत अली (अ) आये और पैग़म्बरे अकरम (स) के साथ खाना तनावुल फ़रमाया।सही तिरमिज़ी जिल्द 5 पेज 595)

उस्ताद अहमद हसन बाक़ूरी तहरीर करते हैं: अगर कोई तुम से सवाल करे कि किस दलील की वजह से लोग हज़रत अली (अ) से मुहब्बत करते हैं ? तो तुम उसके जवाब में कहो कि ख़ुदा अली (अ) को महबूब रखता है।

(अली इमाममुल आईम्मा पेज 107)

7. अली औऱ पैग़म्बर (स) एक नूर से

रसूले अकरम (स) ने फ़रमाया: मैं और अली बिन अबी तालिब , आदम की ख़िलक़त से चार हज़ार साल पहले ख़ुदा के नज़दीक एक नूर थे , जिस वक़्त ख़ुदा वंदे आलम ने (जनाबे) आदम को ख़ल्क़ फ़रमाया , उस नूर के दो हिस्से किये , जिसका एक हिस्सा मैं हूँ और दूसरा हिस्सा अली बिन अबी तालिब (अ) हैं।

(तज़किरतुल ख़वास पेज 46)

8. इमाम अली (अ) सबसे बड़े ज़ाहिद

उस्ताद अब्बास महमूद ऐक़ाद तहरीर करते हैं: ख़ुलाफ़ा के दरमियान दुनिया की लज़्ज़तों की निस्बत हज़रत अली (अ) से ज़ाहिद तरीन कोई नही था।

(अबक़रियतुल इमाम अली (अ) पेज 29)

9. इमाम अली (अ) सहाबा मे सबसे ज़्यादा शुजाअ व बहादुर

उस्ताद अली जुन्दी , मुहम्मद अबुल फ़ज़्ल इब्राहीम और मुहम्मद युसुफ़ महजूब अपनी किताब शजउल हेमाम फ़ी हुक्मिल इमाम तहरीर करते हैं: (हज़रत (अ) मुजाहेदिन के सैयद व सरदार थे , इस में किसी तरह का कोई इख़्तिलाफ़ नही है , उनकी मंज़िलत के लिये बस इतना ही काफ़ी है कि जंगे बद्र (इस्लाम की सबसे अज़ीम वह जंग जिस में पैग़म्बर अकरम (स) शरीक थे) में मुशरेकीन के सत्तर लोग हुए , जिनमे से आधे लोगों को हज़रत अली (अ) ने बाक़ी को दूसरे मुसलमानों और मलायका ने क़त्ल किया है , आप जंग में बहुत ज़्यादा ज़हमतें बर्दाश्त किया करते थे , आप रोज़े बद्र जंग करने वालों में सबसे मुक़द्दम थे , आप जंगे ओहद व हुनैन में साबित क़दम रहे और आप ही ख़ैबर के फ़ातेह और अम्र बिन अबदवद , ख़ंदक़ का नामी बहादुर और मरहब यहूदी के क़ातिल थे।

(सजउल हेमाम फ़ी हुक्मिल इमाम पेज 18)

अब्बास महमूद अक़्क़ाद तहरीर करते हैं: यह बात मशहूर थी कि हज़रत अली (अ) जब भी किसी से लड़े हैं उसको ज़ेर कर देते हैं और आपने किसी से जंग नही कि मगर यह कि उसको क़त्ल कर दिया।

(अबक़रितुल इमाम अली (अ) पेज 15)

डाक्टर मुहम्मद अबदहू यमानी हज़रत अली (अ) की तौसीफ़ में कहते हैं: हज़रत अली (अ) ऐसे बहादुर , शुजाअ और साबिक़ क़दम थे जिन्होने शबे हिजरत हज़रत रसूले अकरम (स) की जान की हिफ़ाज़त के लिये अपनी जान का तोहफ़ ख़ुलूसे के साथ पेश कर दिया , चुनाँचे आप उस मौक़े पर पैग़म्बरे अकरम (स) के बिस्तर पर सो गये।

(अल्लिमू औलादकुम मुहब्बता आलिन नबी (स) पेज 109)

10. इमाम अली (अ) सहाबा में सबसे बड़े आलिम

इमाम अली (अ) अपने ज़माने के सबसे बड़े आलिम थे , इस दावे को चंद तरीक़ों से साबित किया जा सकता है:

अ. पैग़म्बरे अकरम (स) का फ़रमान

पैग़म्बरे अकरम (स) ने फ़रमाया:

हदीस (मनाक़िबे ख़ारज़मी पेज 40)

मेरे बाद मेरी उम्मत में सबसे बड़े आलिम अली बिन अबी तालिब (अ) हैं।

तिरमिज़ी ने हज़रत रसूले अकरम (स) से रिवायत की कि आपने फ़रमाया:

हदीस (सही तिरमिज़ी जिल्द 5 पेज 637)

मैं शहरे हिकमत हूँ और अली (अ) उसका दरवाज़ा।

नीज़ पैग़म्बरे अकरम (स) ने फ़रमाया:

हदीस (अल मुसतदरक अलस सहीहैन जिल्द 3 पेज 127)

मैं शहरे इल्म हूँ और अली उसका दरवाज़ा , जो शख्स भी मेरे इल्म का तालिब है उसे दरवाज़े से दाख़िल होना चाहिये।

अहमद बिन हम्बल पैग़म्बरे अकरम (स) से नक़्ल करते हैं कि आपने जनाबे फ़ातेमा (स) से फ़रमाया:

हदीस (मुसनद अहमद जिल्द 5 पेज 26, मजमउज़ ज़वायद जिल्द 5 पेज 101)

क्या तुम इस बात पर राज़ी नही हो कि तुम्हारे शौहर इस उम्मत में सबसे पहले इस्लाम का इज़हार करने वाले और मेरी उम्मत के सबसे बड़े आलिम और सबसे ज़्यादा हिल्म रखने वाले हैं।

ब. इमाम अली (अ) की आलमीयत का इक़रार सहाबा की ज़बानी

जनाबे आयशा कहती हैं: अली (अ) दूसरे लोगों की बनिस्बत सुन्नते रसूल (स) के सबसे बड़े आलिम थे।तारीख़े इब्ने असाकर जिल्द 5 पेज 162, उस्दुल ग़ाबा जिल्द 4 पेज 22)

इब्ने अब्बास कहते हैं: जनाबे उमर ने एक ख़ुतबे में कहा: अली (अ) क़ज़ावत ओर फ़ैसला करने में बेमिसाल हैं।तारीख़े इब्ने असाकर जिल्द 3 पेज 36, मुसनद अहमद जिल्द 5 पेज 113, तबक़ाते इब्ने साद जिल्द 2 पेज 102)

हज़रत इमाम हसन (अ) ने अपने पेदरे बुज़ुर्गवार हज़रत अली (अ) की शहादत के बाद फ़रमाया: बेशक कल तुम्हारे दरमियान से ऐसी शख्सीयत उठ गयी है जिसके इल्म तक साबेक़ीन (गुज़िश्ता) और लाहेक़ीन (आईन्दा आने वाले) नही पहुच सकते।मुसनद अहमद जिल्द 1 पेज 328)

इसी तरह अब्बास महमूद अक़्क़ाद तहरीर करते है: लेकिन क़ज़ावत और फ़िक्ह में मशहूर यह है कि गज़रत अली (अ) क़ज़ावत और फ़िक्ह दोनो में उम्मते इस्लामिया के सबसे बड़े आलिम थे और दूसरे पहले वालों पर भी... जब हज़रत उमर को कोई मसअला दर पेश होता था तो कहते थे: यह ऐसा मसअला है कि ख़ुदावंदे आलम इसको हल करने के लिये अबुल हसन को हमारी फ़रयाद रसी को पहुचाये।

(अबक़रियतुल इमाम अली (अ) पेज 195)

स. तमाम उलूम का मर्कज़ इमाम अली (अ)

इब्ने अबिल हदीद शरहे नहजुल बलाग़ा में तहरीर करते हैं: तमाम उलूम के मुक़द्देमात का सिलसिला हज़रत अली (अ) तक पहुचा है , आप ही ने दीनी क़वायद और शरीयत के अहकाम को वाज़ेह किया , आपने अक़्ली और मनक़ूला उलूम की बहसों को वाज़ेह किया है। फिर मौसूफ़ ने इस बात की वज़ाहत की कि किस तरह तमाम उलूम हज़र अली (अ) की तरफड पलटते हैं।

(शरहे इब्ने अबिल हदीस जिल्द 1 पेज 17)

11. हज़रत अली (अ) ज़माने के बुत शिकन

इमाम अली (अ) फ़रमाते हैं: मैं रसूले अकरम (स) के साथ रवाना हुआ यहाँ तक कि हम ख़ान ए काबा तक पहुचे , पहले रसूले खुदा (स) मेरे शाने पर सवार हुए और मुझ से फ़रमाया: चलो , मैं चला , लेकिन जब आँ हज़रत (स) ने मेरी कमज़ोरी को मुशाहेदा किया तो फ़रमाया: बैठ जाओ , मैं बैठ गया , आँ हज़रत (स) मेरे शानों से नीचे उतर आये और ज़मीन पर बैठ गये , उसके बाद मुझ से फ़रमाया: तुम मेरे शानों पर सवार हो जाओ , चुनाँचे मैं उनके शानों पर सवार हो गया और काबे की बुलंदी तक पहुच गया , इस मौक़े रक मैने गुमान किया कि अगर मैं चाहूँ तो आसमान को छू सकता हूँ , उस वक़्त मैं ख़ान ए काबा की छत पर पहुच गया , छत के ऊपर सोने और ताँबे के बने हुए एक बुत को देखा , मैंने सोचा किस तरह उसको नीस्त व नाबूद किया जाये , उसको दायें बायें और आगे पीछे हिलाया , यहाँ तक उस पर फ़ातेह हो गया , पैग़म्बरे अकरम (स) ने फ़रमाया: उसको ज़मीन पर फेंक दो , मैंने भी उसको ख़ान ए काबा की छत से नीचे गिरा दिया और वह ज़मीन पर गिर कर टुकड़े टुकड़े होने वाले कूज़े की तरह चूर चूर हो गया , उसके बाद मैं छत से नीचे आ गया।

(मुसतदरक हाकिम जिल्द 2 पेज 366, मुसनद अहमद जिल्द 1 पेज 84, कंज़ुल उम्माल जिल्द 6 पेज 407, तारीख़े बग़दाद जिल्द 13 पेज 302 व ..)

इमाम अली (अ) की ख़िलाफ़त के लिये पैग़म्बरे अकरम (स) की तदबीरें

क़ारेईने केराम , हमने यह अर्ज़ किया है कि पैग़म्बरे अकरम (स) को अपना जानशीन और ख़लीफ़ा मुअय्यन करना चाहिये , लिहाज़ा ख़लीफ़ा को मुअय्यन करना शूरा पर छोड़ देने वाला नज़रिया बातिल हो चुका है और हमने यह भी अर्ज़ किया कि पैग़म्बरे अकरम (स) की जानशीनी की लियाक़त व सलाहियत सिर्फ़ अली बिन अबी तालिब (अ) में थी , क्यो कि आपकी ज़ाते मुबारक में तमाम सिफ़ात व कमालात जमा थे और आप तमाम असहाब से अफज़ल व आला थे।

अब हम देखते है कि पैग़म्बरे अकरम (स) ने हज़रत अली (अ) की जानशीनी और ख़िलाफ़त के लिये क्या क्या तदबीरें सोचीं हैं।

हम पैग़म्बरे अकरम (स) की तरफ़ से हज़रत अली (अ) की ख़िलाफ़त व जानशीनी के लिये सोची जाने वाली तदबीरों को तीन क़िस्मों में ख़ुलासा करते हैं:

1. हज़रत अली (अ) की बचपन से तरबीयत करना , जिसकी बेना पर आप ने कमालात व फज़ायल और मुख़्तलिफ़ उलूम में मखसूस इम्तियाज़ हासिल कर लिया।

2. आपकी विलायत व इमामत के सिलसिले में बयानात देना।

3. ज़िन्दगी के आख़िरी दिनों में मख़सूस तदबीरों के साथ अमली तौर पर विलायत का ऐलान करना।

अ. तरबीयती तैयारी

चूँकि तय यह था कि हज़रत अली बिन अबी तालिब (अ) , रसूले ख़ुदा के ख़लीफ़ा और जानशीन बनें , लिहाज़ा मशीयते इलाही यह थी कि इसी अहदे तफ़ूलीयत से मरकज़े वहयी और रसूले ख़ुदा (स) की आग़ोश में तरबीयत पायी।

1. हाकिम नैशापूरी तहरीर करते है: अली बिन अबी तालिब (अ) पर ख़ुदावंदे आलम की नेमतों में से एक नेमत उनकी तक़दीर थी , क़ुरैश बेशुमार मुश्किलात में गिरफ़्तार थे , अबू तालिब की औलाद ज़्यादा थीं , रसूले खु़दा ने अपने चचा अब्बास (जो बनी हाशिम में सबसे ज़्यादा मालदार शख्सियत थी) से फरमाया: या अबुल फ़ज़्ल , तुम्हारे भाई अबू तालिब अयालदार हैं और सख़्ती में ज़िन्दगी गुज़ार रहे हैं , उनके पास चलते हैं ताकि उनको बोझ को कम करें , मैं उनके बेटों में एक को ले लेता हूँ और आप भी किसी एक फ़रजंद को इंतेख़ाब कर लें , ताकि उनको अपनी किफ़ालत में ले लें , चुनाँचे जनाबे अब्बास ने क़बूल कर लिया और दोनो जनाबे अबू तालिब के पास आये और मौज़ू को उनके सामने रखा , जनाबे अबू तालिब ने उनकी बातें सुन कर अर्ज़ किया: अक़ील को मेरे पास रहने दो , बक़िया जिस को भी चाहो इँतेख़ाब कर लो , पैग़म्बरे अकरम (स) ने अली (अ) को इँतेख़ाब किया और जनाबे अब्बास ने जाफ़र को , हज़रत अली (अ) बेसत के वक़्त तक पैग़म्बरे अकरम (स) के साथ रहे और आँ हज़रत (स) की पैरवी करते रहे और आपकी तसदीक़ की।मुसतदरक हाकिम जिल्द 3 पेज 182)

2. उस ज़माने में पैग़म्बरे अकरम (स) नमाज़ के लिये मस्जिदुल हराम (ख़ान ए काबा) में जाते थे , उनके पीछे पीछे अली (अ) और जनाबे ख़दीजा जाते थे और आँ हज़रत (स) के साथ मल ए आम में नमाज़ पढ़ते थे , जबकि उन तीन अफ़राद के अलावा कोई नमाज़ नही पढ़ता था।

(मुसनद अहमद जिल्द 1 पेज 209, तारीख़े तबरी जिल्द 2 पेज 311)

अब्बाद बिन अब्दुल्लाह कहते हैं: मैंने अली (अ) से सुना कि उन्होने फ़रमाया: मैं ख़ुदा का बंदा और उसके रसूल का बरादर हूँ और मैं ही सिद्दीक़े अकबर हूँ , मेरे बाद यह दावा कोई नही कर सकता मगर यह कि वह झूठा और तोहमत लगाने वाला हो , मैंने दूसरे लोगों से सात साल पहले रसूले अकरम (स) के साथ नमाज़ पढ़ी।

(तारिख़े तबरी जिल्द 2 पेज 56)

इब्ने सब्बाग़ मालिकी और इब्ने तलहा साफ़ेई वग़ैरह नक़्ल करते हैं: रसूले अकरम (स) बेसत से पहले जब भी नमाज़ पढ़ते थे , मक्के से बाहर पहाड़ियों में जाते थे ताकि मख़्फ़ी तरीक़े से नमाज़ पढ़ें और अपने साथ हज़रत अली (अ) के साथ हज़रत अली (अ) को ले जाया करते थे और दोनो साथ में जितनी चाहते थे नमाज़ पढ़ते थे और फिर वापस आ जाता करते थे।

(अल फ़ुसुलुल मुहिम्मह पेज 14, मतालिबुस सुऊल पेज 11, तारिख़े तबरी जिल्द 2 पेज 58)

3. इमाम अली (अ) नहजुल बलाग़ा में उन दोनो की इस तरह तौसीफ़ फ़रमाते हैं:

हदीस (नहजुल बलाग़ा ख़ुतबा 192)

तुम्हे मालूम है कि रसूले अकरम (स) से मुझे किस क़दर क़रीबी क़राबत और मख़्सूस मंज़िलत हासिल है , उन्होने बचपने से मुझे अपनी गोद में इस तरह जगह दी कि मुझे अपने सीने से लगाये रखते थे , अपने बिस्तर पर जगह देते थे , अपने कलेजे लगा कर रखते थे और मुझे मुसलसल अपनी ख़ूशबू से सरफ़राज़ फ़रमाया करते थे और ग़ज़ा को अपने दाँतों से चबा कर मुझे खिलाया करते थे , न उन्होने मेरे किसी बयान में झूट पाया और न मेरे किसी अमल में ग़लती देखी और अल्लाह ने दूध बढ़ाई के दौर से ही उनके साथ एक अज़ीम तरीन मुल्क को कर दिया था जो उनके साथ बुजुर्गियों के रास्ते और बेहतरीन अख़लाक़ के तौर तरीक़े पर चलता रहता था और रोज़ाना मेरे सामने अपने अख़लाक़ का निशाना पेश करते थे और फिर मुझे उसकी इक्तेदा करने का हुक्म दिया करते थे।

वह साल में एक ज़माना ग़ारे हिरा में गुज़ारते थे जहाँ सिर्फ़ मैं उन्हे देखता था और कोई दूसरा न होता था , उस वक़्त रसूले अकरम (स) और ख़दीजा के अलावा किसी घर में इस्लाम का गुज़र न हुआ था और उनमें तीसरा मैं था , मैं नूरे वहयी रिसालत का मुशाहेदा किया करता था और ख़ूशबु ए रिसालत से दिमाग़ मुअत्तर रखता था।

मैं ने नुज़ूले वहयी के वक़्त शैतान की चीख़ की आवाज़ सुनी थी और अर्ज़ किया था: या रसूल्लाह , यह चीख़ कैसी थी ? तो फ़रमाया यह शैतान है जो अपनी इबादत से मायूस हो गया है. तुम वह सब कुछ देख रहे हो जो मैं देख रहा हूँ और वह सब कुछ सुन रहे हो जो मैं सुन रहा हूँ , सिर्फ़ फ़र्क़ यह है कि तुम नही हो लेकिन मेरे वज़ीर भी हो मंज़िल ख़ैर पर भी हो।

4. जब पैग़म्बरे अकरम (स) ने मदीने की तरफ़ हिजरत करना चाही तो हज़रत अली (अ) को इंतेख़ाब किया ताकि वह आपके बिस्तर सो जायें और (रसूले अकरम (स) के पास) मौजूद अमानतों को उनके मालिकों तक पहुचा दें और फिर बनी हाशिम की औरतों को लेकर मदीने की तरफ़ हिजरत कर जायें।मुसनद अहमद जिल्द 1 पेज 348, तारिख़े तबरी जिल्द 2 पेज 99, मुसतदरके हाकिम जिल्द 3 पेज 4, शरहे इब्ने अबिल हदीद जिल्द 13 पेज 262)

5. रसूले अकरम (स) ने हज़रत अली (अ) को उनकी जवानी के आलम में अपना दामाद बना लिया और दुनिया की बेहतरीन ख़ातून हज़रत फ़ातेमा ज़हरा (स) से आपका निकाह कर दिया , यह इस आलम में था कि अबू बक्र व उमर के रिश्ते को रद्द कर दिया था।

(अल ख़सायस पेज 102)

पैग़म्बरे अकरम (स) ने शादी के मौक़े पर (जनाबे फ़ातेमा ज़हरा (स) से फ़रमाया: मैंने तुम्हारी शादी ऐसे शख्स से की है जो इस्लाम में सबसे पहला , इल्म में सबसे ज्यादा और हिल्म में सबसे अज़ीम हैं।

(मुसनद अहमद जिल्द 5 पेज 26)

6. अक्सर जंगों में मुसलमानों या मुहाजेरीन का परचम हज़रत अली बिन अबी तालिब (अ) के हाथों में होता था।

(अल इसाबह जिल्द 2 पेज 30)

7. हज़रत अली (अ) हुज्जतुल वेदाअ में पैग़म्बरे अकरम (स) की क़ुर्बानी में शरीक थे।

(कामिले इब्ने असीर जिल्द 2 पेज 302)

8. पैग़म्बरे अकरम (स) ने अपनी हयाते तैय्यबा में आपको एक ऐसा मख़्सूस इम्तियाज़ दे रखा है कि जिसमें कोई दूसरा शरीक नही था , यानी आँ हज़रत (स) ने इजाज़त दे रखी थी कि हज़रत अली (अ) सहर के वक़्त आपके पास आये और गुफ़्तगू करें।

(अल ख़सायस हदीस 112)

इमाम अली (अ) ने फ़रमाया: मैं पैग़म्बरे अकरम (स) से दिन रात में दो बार मुलाक़ात करता था , एक दफ़ा रात में और एक दफ़ा दिन में।

(अस सुननुल कुबरा जिल्द 5 पेज 1414 हदीस 8520)

وَأْمُرْ أَهْلَكَ بِالصَّلَاةِ وَاصْطَبِرْ عَلَيْهَا

9. जिस वक़्त पैग़म्बरे अकरम (स) पर यह आयत नाज़िल हुई:

(सूरह ताहा आयत 132)

अपने अहल को नमाज़ का हुक्म दें।

पैग़म्बरे अकरम (स) नमाज़े सुबह के लिये हज़रत अली (अ) के बैतुश सऱफ़ से गुज़रते हुए फ़रमाते थे: …..(إِنَّمَا يُرِيدُ اللَّـهُ لِيُذْهِبَ عَنكُمُ الرِّجْسَ أَهْلَ الْبَيْتِ وَيُطَهِّرَكُمْ تَطْهِيرًا ) (सूरह अहज़ाब आयत 33)

तर्जुमा

, ऐ (पैग़म्बर के) अहले बैत , ख़ुदा तो बस यह चाहता है कि तुम को हर तरह की बुराई से दूर रखे और जो पाक रखने का हक़ है वैसा पाक व पाकीज़ा रखे।

(तफ़सीरे क़ुरतुबी जिल्द 11 पेज 174, तफ़सीरे फ़ख्रे राज़ी जिल्द 22 पेज 137, तफ़सीरे रुहुल मआनी जिल्द 16 पेज 284)

10. जंगे ख़ैबर में जब अबू बक्र व उमर से कुछ न हो पाया तो पैग़म्बरे अकरम (स) ने फ़रमाया: (कल) मैं अलम उसको दूँगा जो ख़ुदा व रसूल को दोस्त रखता होगा और ख़ुदा व रसूल भी उसको दोस्त रखते होंगें , ख़ुदा वंदे आलम उसको हरगिज़ ज़लील नही करेगा , वह वापस नही पलटेगा , जब तक ख़ुदा वंद आलम उसके हाथों पर फ़तह व कामयाबी न दे दे , उसके बाद हज़रत अली (अ) को तलब किया , अलम उनके हाथो में दिया और उनके लिये दुआ की (चुनाँचे) हज़रत अली (अ) को फ़तह हासिल हुई।

(सीरते इब्ने हिशाम जिल्द 3 पेज 216, तारिख़े तबरी जिल्द 3 पेज 12, कामिले इब्ने असीर जिल्द 2 पेज 219)

11. पैग़म्बरे अकरम (स) ने अबू बक्र को सूरए बराअत के साथ हुज्जाज का अमीर बनाया तो ख़ुदा वंदे आलम के हुक्म से हज़रत अली (अ) को उनके पीछे रवाना किया कि सूरह को उनसे हाथों से ले लें और ख़ुद लोगों तक सूरए बराअत की क़राअत करें , पैग़म्बरे अकरम (स) ने अबू बक्र के ऐतेराज़ में फ़रमाया: मुझे हुक्म हुआ है कि इस सूरह को ख़ुद क़राअत करू या उस शख्स को दूँ जो मुझ से हैं ताकि वह इस सूरह की तबलीग़ करे।

(मुसनद अहमद जिल्द 1 पेज 3, सोनने तिरमिज़ी जिल्द 5 हदीस 3719, हदीस 8461)

12. बाज़ असहाब ने मस्जिद (नबवी) की तरफ़ दरवाज़ा खोल रहा था , पैग़म्बरे अकरम (स) ने हुक्म दिया कि सब दरवाज़े बंद कर दिये जायें सिवाए हज़रत अली (अ) के।

(मुसनद अहमद जिल्द 1 पेज 331, सोनने तिरमिज़ी जिल्द 5 हदीस 3732, अल बिदायह वन निहाया जिल्द 7 पेज 374)

13. आयशा कहती हैं: रसूले ख़ुदा (स) ने अपनी वफ़ात के वक़्त फ़रमाया: मेरे हबीब को बुलाओ , मैंने अबू बक्र को बुलवा लिया , जैसे ही आँ हज़रत (स) का निगाह उन पर पड़ी तो आपने अपने सर को झुका लिया और फिर फरमाया: मेरे हबीब को बुलाओ , उस वक़्त मैंने उमर को बुलवा लिया , जैसे रसूले अकरम (स) की नज़र उन पर पड़ी तो (एक बार फिर) आपने अपने सर को झुका लिया और तीसरी बार फ़रमाया: मेरे हबीब को बुलवा दो , चुनाँचे हज़रत अली (अ) को बुलवाया गया , जब आप आ गये तो रसूले ख़ुदा ने अपने पास बैठाया और अपनी उस चादर में ले लिया जिस को ओढ़े हुए थे , रसूले अकरम (स) इस हाल में इस दुनिया से गये कि हज़रत अली (अ) के हाथों में आपके हाथ थे।

(अर रियाज़ुन नज़रह पेज 26, ज़ख़ायरुल उक़बा पेज 72)

उम्मे सलमा भी कहती हैं: रसूले अकरम (स) ने अपनी वफ़ात के वक़्त हज़रत अली (अ) से नजवा और राज़ की बातें कर रहे थे और इस हाल में आँ हज़रत (स) इस दुनिया से गये हैं लिहाज़ा अली (अ) रसूले ख़ुदा (स) के अहद व पैमान के लिहाज़ से लोगों में सबसे नज़दीक थे।

(मुसतदरके हाकिम जिल्द 3 पेज 138, मुसनद अहमद जिल्द 6 पेज 300)

14. तिरमिज़ी , अब्दुल्लाह बिन उमर से रिवायत करते हैं कि पैग़म्बरे अकरम (स) ने अपने असहाब के दरमियान अक़्दे उखू़व्वत पढ़ा , हज़रत अली (अ) गिरया कुनाँ अर्ज़ किया या रसूल्लाह , आपने अपने असहाब के दरमियान अक़्दे उख़ूव्वत बाँध दिया , लेकिन मेरा किसी के साथ अक़्दे उख़ूव्वत नही पढ़ा ? तो पैग़म्बरे अकरम (स) ने फ़रमाया: तुम दुनिया व आख़िरत में मेरे बरादर हो।

हज़रत अली (अ) पर रसूले अकरम (स) की मख़्सूस तवज्जो सिर्फ़ आपको ख़िलाफ़त व जानशीनी के लिये तैयार करने के लिये थी , नीज़ इस लिये भी वाज़ेह हो जाये कि इस मक़ाम व ओहदे के लिये सिर्फ़ अली (अ) ही सलाहियत रखते हैं।

ब. आपकी इमामत व विलायत पर बयान

पैग़म्बरे अकरम (स) की दूसरी तदबीर यह थी कि 23 साला ज़िन्दगी में जहाँ कहीं भी मुनासिब मौक़ा मिला तो हज़रत अली (अ) की विलायत और जानशीनी के मसअले को बयान करते थे और आप लोगों के सामने इस अहम मसअले की याद दहानी फ़रमाते रहते थे जिनमें से (वाक़ेया ए ज़ुल अशीरा और) ग़दीरे ख़ुम का ख़ुतबा मशहूर है।

स. अमली तदबीरें

पैग़म्बरे अकरम (स) ने अपनी उम्र के आख़िरी दिनों में हज़रत अली (अ) की ख़िलाफ़त को मज़बूत करने के लिये बहुत से अमली रास्तों को अपनाया ताकि इस ऐलान की मुकर्रर ताकीद के बाद दूसरों के हाथों से ग़स्बे ख़िलाफ़त का बहाना ले लें , लेकिन अफ़सोस कि उन तदबीरों का कोई असर न हुआ , क्यो कि मुख़ालिफ़ पार्टी इतनी मज़बूत थी कि पैग़म्बरे अकरम (स) की तदबीरों को अमली न होने दिया।

क़ारेईने मोहतरम , हम यहाँ पर आँ हज़रत (स) की चंद अमली तदबीरों की तरफ़ इशारा करते हैं:

1. रोज़े ग़दीर इमाम अली (अ) के हाथों को बुलंद करना

पैग़म्बरे अकरम (स) अपने बहुत से असहाब के साथ आख़िरी हज (जिसको हज्जतुल विदाअ कहा जाता है) करने के लिये रवाना हुए , सरज़मीने अरफ़ात में आँ हज़रत (स) ने मुसलमानो के दरमियान एक ख़ुतवा इरशाद फ़रमाया , आँ हज़रत (स) इस ख़ुतबे में अपने बाद होने वाले आईम्मा को उम्मत के सामने बयान करना चाहते थे ताकि उम्मत गुमराह न हो और उसमें फ़ितना व फ़साद बरपा न हो , लेकिन बनी हाशिम का मुखालिफ़ गिरोह जो अहले बैत (अ) से दुश्मनी रखता था , ताक लगाये बैठा था कि कहीं रसूले ख़ुदा (स) इस मजमे में कोई ऐसी बात न कहें जिससे उनके नक़्शे पर पानी फिर जाये। जाबिर बिन समुरा सवाई कहते हैं: मैं पैग़म्बर अकरम (स) के पास था और आँ हज़रत (स) की बातों को सुन रहा था , आँपने अपने ख़ुतबे में अपने बाद होने वाले ख़ुलाफ़ा की तरफ़ इशारा फ़रमाया कि मेरे बाद मेरे जानशीन और ख़ुलाफ़ा की तादाद बारह होगी। जाबिर कहते हैं कि जैसे पैग़म्बरे अकरम (स) ने यह फ़रमाया तो कुछ लोगों ने शोर ग़ुल बरपा कर दिया और शोर इतना ज़्यादा था कि मैं समझ नही सका कि आँ हज़रत (स) ने क्या फ़रमाया , मैं ने अपने वालिद से सवाल किया जो रसूले ख़ुदा (स) से ज़्यादा नज़दीक थे , उन्होने कहा: उसके बाद पैग़म्बर (स) ने आगे फ़रमाया: वह तमाम क़ुरैश से होंगें।

ताअज्जुब की बात है कि जिस मुसनदे अहमद में मुसनद जाबिर बिन मुसरा को देखते हैं तो उसमें जाबिर के अल्फ़ाज़ ऐसे मिलते हैं जो उससे पहले नही देखे गये हैं , जाबिर बिन समरा की बाज़ रिवायतों में बयान हुआ है कि जब पैग़म्बरे अकरम (स) की बात यहाँ तक पहुची कि मेरे बाद बारह जानशीन होंगें तो लोगों ने चिल्लाना शुरु कर दिया , इसके अलावा बाज़ दूसरी रिवायत में बयान हुआ है कि लोगों ने तकबीर कहना शुरु कर दीं , नीज़ बाज़ दूसरी रिवायतों में बयान किया कि लोगों ने शोर ग़ुल करना शुरु कर दिया और आख़िर कार बाज़ रिवायत में यह भी मिलता है कि लोग कभी उठते थे और कभी बैठते थे।

एक रावी से यह तमाम रिवायतें (अपने इख़्तिलाफ़ के बावजूद) इस बात में ख़ुलासा होती हैं कि मुख़ालिफ़ गिरोह ने बहुत सी टोलियों को इस बात के लिये तैयार कर रखा था कि पैग़म्बरे अकरम (स) को अपने बाद के लिये ख़िलाफ़त व जानशीनी का मसअला बयान करने से रोका जाये और उन टोलियों ने वही किया , चुनाँचे हर एक ने किसी न किसी तरह से निज़ामे जलसा को दरहम व बरहम कर दिया और अपने मक़सद में कामयाब हो गये।

पैग़म्बरे अकरम (स) इस अज़ीम मजमें में ख़िलाफ़त के मसअले को बयान न कर सके और मायूस हो गये और दूसरी जगह के बारे में सोचने लगे ताकि इमाम अली (अ) की ख़िलाफ़त को अमली तौर पर साबित करें , इसी वजह से आमाले हज तमाम होने और हाजियों के अलग अलग होने से पहले लोगों को ग़दीरे ख़ुम में जमा किया और इमामत व ख़िलाफ़त के मसअले को बयान करने से पहले चंद चीज़ों को मुक़द्दमें के तौर पर बयानक किया और लोगों से भी इक़रार लिया , पैग़म्बरे अकरम (स) जानते थे कि इस बार भी मुनाफ़ेक़ीन की टोली ताक में है ताकि हज़रत अली (अ) की ख़िलाफ़त के मसअले को बयान न होने दें , लेकिन आँ हज़रत (स) ने एक ऐसी अमली तदबीर सोची जिससे मुनाफ़ेक़ीन के नक़्शे पर पानी फिर गया और वह यह है कि आपने हुक्म दिया कि ऊठों के कजाओं को जमा किया जाये और एक के ऊपर एक को रखा जाये (ताकि एक बुलंद जगह बन जाये) इस मौक़े पर आँ हज़रत (स) और हज़रत अली (अ) उस मिम्बर पर तशरीफ़ ले गये , इस तरह सभी आप दोनो को देख रहे थे , आँ हज़रत (स) ने ख़ुतबे में चंद कलेमात को बयान करने और हाज़ेरीन से इक़रार लेने के बाद हज़रत अली (अ) के हाथ को बुलंद किया और लोगों के सामने ख़ुदा वंदे आलम की जानिब से हज़रत अली (अ) की विलायत व इमामत का ऐलान किया।

पैग़म्बर अकरम (स) की इस तदबीर के सामने मुनाफ़ेक़ीन कुछ न कर सके और देखते रह गये और कुछ रद्दे अमल ज़ाहिर न कर सके।

2. लश्करे ओसामा को रवाना करना

पैग़म्बरे अकरम (स) बिस्तरे बीमारी पर हैं , इस हाल में (भी) अपनी उम्मत के लिये सख़्त फ़िक्र मंद हैं , इख़्तेलाफ़ और गुमराही के सिलसिले में फ़िक्रमंद , इस चीज़ से रंजीदा कि उनकी तमाम तदबीरों को ख़राब कर दिया जाता है , इस चीज़ से ग़मज़दा कि नबूव्वत व रिसालत और शरीयत में इंहेराफ़ किया जायेगा , ख़ुलाया यह कि पैग़म्बरे अकरम (स) परेशान व मुज़तरिब हैं , रोम जैसा बड़ा दुश्मन इस्लामी सहहदों पर तैयार है ताकि जैसे मौक़ा देखे एक ख़तरनाक हमले के ज़रिये मुसलमानों को शिकस्त दे दे।

पैग़म्बरे अकरम (स) की मुख़्तलिफ़ ज़िम्मेदारियाँ हैं , एक तरफ़ तो बैरूनी दुश्मन का मुक़ाबला है लिहाज़ा आपने बहुत ताकीद के साथ उनसे मुक़ाबले के लिये एक लश्कर को रवाना किया , दूसरी तरफ़ आप हक़ीक़ी जानशीन और ख़लीफ़ा को साबित करना चाहते थे लेकिन क्या करें ? न सिर्फ़ यह कि बैरूनी दुश्मन से दस्त व गरीबाँ हैं बल्कि अंदरूनी दुश्मन से भी मुक़ाबला है जो ख़िलाफ़त व जानशीनी के मसअले में आँ हज़रत (स) की तदबीरों को अमली जामा पहनाने में मानेअ है , पैग़म्बरे अकरम (स) अपनी तदबीर को अमली करने के लिये हुक्म देते हैं कि वह सब जो जिहाद और लश्करे ओसामा में शिरकत की तैयारी रखते हैं मदीने से बाहर निकल निकलें और उनके लश्कर से मुलहक़ हो जायें लेकिन आँ हज़रत (स) ने मुलाहिज़ा किया कि बहुत से असहाब बेबुनियाद बहानों के ज़रिये ओसामा के लश्कर में शरीक नही हो रहे है , कभी पैग़म्बरे अकरम (स) पर ऐतेराज़ करते हैं कि क्यो आपने एक जवान और ना तजरुबाकार इंसान ओसामा को अमीरे लश्कर बना दिया है जबकि ख़ुद लश्कर में साहिबे तजरूबा अफ़राद मौजूद हैं ?

पैग़म्बरे अकरम (स) ने उनके ऐतेराज़ के जवाब में कहा कि अगर आज तुम लोग ओसामा की सरदारी पर ऐतेराज़ कर रहे हो तो इससे पहले तुम उसके बाप की सरदारी पर ऐतेराज़ कर चुके हो , आप की यह कोशिश थी कि मुसलमानों की कसीर तादाद मदीने से निकल कर ओसामा के लश्कर में शामिल हो जाये , नौबत यह पहुच गई कि जब पैग़म्बर अकरम (स) ने बाज़ सहाबा मिन जुमला उमर , अबू बक्र , अबू उबैदा , सअद बिन अबी वक़ास वग़ैरह की नाफ़रमानी को देखा कि यह लोग ओसामा के लश्कर में दाखिल होने में मेरे हुक्म की मुखालेफ़त कर रहे हैं तो उन पर लानत करते हुए फ़रमाया:

हदीस (मेलल व नेहल शहरिस्तानी जिल्द 1 पेज 23)

तर्जुमा , ख़ुदा लानत करे हर उस शख्स पर जो ओसामा के लश्कर में दाखिल होने की मुख़ालेफ़त करे।

लेकिन पैग़म्बरे अकरम (स) की इतनी ताकीद और मलामत के बाद भी उन लोगों ने कोई तवज्जो न की और कभी इस बहाने से कि हम पैग़म्बर (स) की रेहलत के वक़्त की जुदाई को बर्दाशत नही कर सकते , रसूले अकरम (स) को हुक्म की मुख़ालेफ़त की।

लेकिन दर हक़ीक़त मसअला दूसरा था , वह जानते थे कि पैग़म्बरे अकरम (स) अली (अ) और बाज़ दीगर असहाब को जो बनी हाशिम और हज़रत अली (अ) की इमामत व ख़िलाफ़त की मुवाफ़िक़ हैं , उनको अपने पास रोके हुए हैं ताकि रेहलत के वक़्त हज़रत अली (अ) के लिये वसीयत कर दें और आँ हज़रत (स) की वफ़ात के बाद सहाबा को वह गिरोह जो लश्करे ओसामा में जायेगा वापस आ कर हज़रत अली (अ) की बैअत करे लिहाज़ा उनको डर था कि कहीं ख़िलाफ़त उनके हाथ से निकल न जाये लेकिन उनका मंसूबा यह था कि हर मुम्किन तरीक़े से इस काम में रुकावट की जाये ताकि यह काम न हो सके।

यह नुक्ता भी क़ाबिले तवज्जो है कि क्यों पैग़म्बरे अकरम (स) ने एक कम तजरुबा कार जवान को लश्कर की सरदारी के लिये इंतेख़ाब किया और बाज़ असहाब के ऐतेराज़ पर बिल्कुल तवज्जो न दी , बल्कि उनकी सरदारी पर मज़ीद ताकीद फ़रमाई , इसका राज़ क्या है ?

पैग़म्बरे अकरम (स) जानते थे कि यही लोग उनकी वफ़ात के बाद अली बिन अबी तालिब (अ) की ख़िलाफ़त व इमामत पर मुख़्तलिफ़ तरीक़ों से ऐतेराज़ करेगें मिन जुमला यह कि अली बिन अबी तालिब (अ) एक जवान हैं , लिहाज़ा आँ हज़रत (स) ने अपने इस अमल से सहाबा को यह समझाना चाहते थे कि ख़िलाफ़त व अमारत , लियाक़त व सहालियत की बेना पर होती है न कि सिन व साल के लिहाज़ से , नीज़ मेरे बाद अली (अ) के सिन व साल को बहाना बना कर ऐतेराज़ न करें और उनके हक़ को ग़स्ब न कर लें , अगर कोई ख़िलाफ़त व अमारत की लियाक़त रखता है तो फिर सब (पीर व जवान , ज़न व मर्द) उनके मुतीअ हों लेकिन (अफ़सोस कि) पैग़म्बरे अकरम (स) की यह तदबीर भी अमली न हो सकी और लश्कर में शामिल न हो कर मुख़्तलिफ़ बहानों के ज़रिये पैग़म्बरे अकरम (स) के नक़्शों पर पानी फेर दिया।देखिये , तबक़ाते इब्ने साद जिल्द 4 पेज 66, तारिख़े इब्ने असाकर जिल्द 2 पेज 391, कंज़ुल उम्माल जिल्द 5 पेज 313, तारिख़े याक़ूबी जिल्द 2 पेज 93, शरहे इब्ने अबिल हदीद जिल्द 2 पेज 21, मग़ाज़ी वाक़ेदी जिल्द 3 पेज 111, तारिख़े इब्ने ख़लदून जिल्द 2 पेज 484, सीरये हलबिया जिल्द 3 पेज 207)

क्या ख़ुदा वंदे आलम ने क़ुरआने मजीद में पैग़म्बरे अकरम (स) के हुक्म की इताअत का करने का फ़रमान जारी नही किया है ? जहा इरशाद होता है

: مَّا أَفَاءَ اللَّـهُ عَلَى رَسُولِهِ مِنْ أَهْلِ الْقُرَى فَلِلَّـهِ وَلِلرَّسُولِ وَلِذِي الْقُرْبَى وَالْيَتَامَى وَالْمَسَاكِينِ وَابْنِ السَّبِيلِ كَيْ لَا يَكُونَ دُولَةً بَيْنَ الْأَغْنِيَاءِ مِنكُمْ وَمَا آتَاكُمُ الرَّسُولُ فَخُذُوهُ وَمَا نَهَاكُمْ عَنْهُ فَانتَهُوا وَاتَّقُوا اللَّـهَ إِنَّ اللَّـهَ شَدِيدُ الْعِقَابِ

(सूरह हश्र आयत 7)

और हाँ जो तुम को रसूल दे दें वह ले लिया करो और जिससे मना करें उससे बाज़ रहो और खु़दा से डरते रहो , बेशक ख़ुदा सख़्त अज़ाब देने वाला है।

فَلَا وَرَبِّكَ لَا يُؤْمِنُونَ حَتَّى يُحَكِّمُوكَ فِيمَا شَجَرَ بَيْنَهُمْ ثُمَّ لَا يَجِدُوا فِي أَنفُسِهِمْ حَرَجًا مِّمَّا قَضَيْتَ وَيُسَلِّمُوا تَسْلِيمًا नीज़ इरशाद होता है:

(सूरह निसा आयत 65)

तर्जुमा

, बस आपके परवरदिगार की क़मस कि यह हरगिज़ साहिबाने ईमान न बन सकेंगें जब तक आपको अपने इख़्तिलाफ़ात में हकम न बनायें और फिर जब आप फ़ैसला कर दें तो अपने दिल में किसी तरह की तंगी का अहसास न करें और आपके फ़ैसले को सामने सरापा तसलीम हो जायें।

3. वसीयत लिखने का हुक्म

जब पैग़म्बरे अकरम (स) ने देख लिया कि लोगों को लश्करे ओसामा के साथ मदीने से बाहर भेजने की तदबीर नाकाम हो गई तो आपने तय किया कि हज़रत अली (अ) की इमामत के सिलसिले में अपनी 23 साला ज़िन्दगी में जो कुछ लोगों के सामने बयान किया है , उन सब को एक वसीयतनामे में लिख दिया जाये। इसी वजह से आपने बरोज़े जुमेरात अपनी वफ़ात से चंद रोज़ क़ब्ल जबकि आप बिस्तर पर लेटे हुए थे और मुख़्तलिफ़ गिरोहों का मजमा आपके हुजरे में जमा था , मजमे से ख़िताब करते हुए फ़रमाया: क़लम व क़ाग़ज़ ले आओ ताकि मैं उसमें ऐसी चीज़ लिख दूँ जिससे मेंरे बाद गुमराह न हो। चुनाँचे बनी हाशिम और परदे के पीछे बैठी हुई अज़वाजे रसूल इस बात पर इसरार कर रहीं थी कि रसूले इस्लाम (स) को वसीयत लिखने के लिये क़लम व क़ाग़ज़ दिया जाये लेकिन वह गिरोह जिस ने मैदाने अरफ़ात में पैग़म्बरे अकरम (स) को अपने बाद के लिये ख़लीफ़ा मुअय्यन करने न दिया वही गिरोह हुजरे में जमा था , उसने आँ हज़रत (स) के इस हुक्म को अपनी न होने से रोक दिया , उमर फ़ौरन इस बात की तरफ़ मुतवज्जेह हुए कि अगर यह वसीयत लिखी गई तो ख़िलाफ़त को हासिल करने के तमाम नक़्शों पर पानी फिर जायेगा , लेकिन दूसरी तरफ़ पैग़म्बरे अकरम (स) की मुख़ालिफ़त मुनासिब दिखाई न दे रही थी।

लिहाज़ा उन्होने एक दूसरा मंसूबा बनाया और इस नतीजे पर पहुचे कि पैग़म्बरे अकरम (स) की तरफ़ एक ऐसी निस्बत दी जाये , जिसकी वजह से वसीयत नामा लिखना ख़ुद बखुद बे असर हो जाये , इसी वजह से उन्होने लोगों से ख़िताब करते हुए कहा: तुम लोग क़लम व क़ाग़ज़ न लाओ क्यो कि पैग़म्बर (स) हिज़यान कह रहे हैं , हमें किताबे ख़ुदा काफ़ी है , जैसे ही इस जुमले को उमर के तरफ़दारों यानी बनी उमय्या और कु़रैश ने सुना तो उन्होने भी इस जुमले की तकरार की , लेकिन बनी हाशिम बहुत नाराज़ हुए और उनकी मुख़ालेफ़त में खड़े हो गये , पैग़म्बरे अकरम (स) इस ना रवाँ तोहमत कि जिसने आपकी तमाम शख्सियत और अज़मत को मजरूह कर दिया , उसके मुक़ाबिल कोई कुछ न कर सके सिवाए इसके कि उनको अपने मकान से निकाल दिया , चुनाँचे आँ हज़रत (स) ने फ़रमाया: मेरे पास से उठ जाओ , पैग़म्बर के पास झगड़ा नही किया जाता।

(देख़िये , सही बुखारी , क़िताबुल मरज़ी , जिल्द 7 पेज 9, सही मुस्लिम किताबुल वसीयह , जिल्द 5 पेज 75, मुसनद अहमद जिल्द 4 पेज 356 हदीस 2992)

ताअज्जुब की बात तो यह कि उमर बिन ख़त्ताब के तरफ़दारों और कुल्ली तौर पर मदरस ए ख़ुलाफ़ा ने पैग़म्बरे अकरम (स) की तरफ़ उमर की ना रवाँ निस्बत को छुपाने के लिये बहुत कोशिश की है , चुनाँचे जब लफ़्ज़े हज्र यानी हिज़यान को नक़्ल करते हैं तो उसकी निस्बत मजमे की तरफ़ देते हैं और कहते हैं और जब इसी वाक़ेया की निस्बत उमर की तरफ़ देते हैं तो कहते हैं

लेकिन किताब अस सक़ीफ़ा में अबू बक्र जौहरी का कलाम मतलब को वाज़ेह कर देता है कि हिज़यान की निस्बत उमर की तरफ़ से शुरु हुई और बाद में उमर के तरफ़दारों ने उसकी पैरवी में यही निस्बत पैग़म्बरे अकरम (स) की तरफ़ दी है , चुनाँचे जौहरी इस निस्बत को उमर की तरफ़ से यूँ बयान करते हैं:

उमर ने एक ऐसा जुमला कहा जिसके मअना यह हैं कि पैग़म्बरे अकरम (स) पर बीमारी के दर्द का ग़लबा है पस इससे मालूम होता है कि उमर के अल्फ़ाज़ कुछ और थे जिसको क़बाहत की वजह से नक़्ले मअना किया है , अफ़सोस कि बुख़ारी और मुस्लिम वग़ैरह ने रिवायत को असली अल्फ़ाज़ में बयान नही किया है बल्कि इस जुमले की सिर्फ़ मज़मून बयान किया है , अगरचे अन निहाया में इब्ने असीर और इब्ने अबिल हदीद के कलाम से यह नतीजा निकलता है कि हिज़यान की निस्बत बराहे रास्त उमर ने दी थी।

बहरहाल पैग़म्बरे अकरम (स) ने मुख़ालिफ़ गिरोग को बाहर निकालने के बाद ख़ालिस असहाब के मजमे में अपनी वसीयत को बयान किया और सुलैम बिन क़ैस की इबारत के मुताबिक़ बाज़ असहाब के बावजूद अहले बैत (अ) में से नाम ब नाम वसीयत की और अपने बाद होने वाले ख़ुलाफ़ा के नाम बयान किये।किताब सुलैम बिन क़ैस जिल्द 2 पेज 658)

अहले सुन्नत ने भी अपनी हदीस की किताबों में इस वसीयत की तरफ़ इशारा किया है लेकिन अस्ले मौज़ू को मुब्हम दिया है।

इब्ने अब्बास इस हदीस के आख़िर में कहते हैं: आख़िर कार पैग़म्बरे अकरम (स) ने तीन चीज़ो की वसीयत की: एक यह कि मुश्रेकीन को जज़िर ए अरब से बाहर निकाल दो , दूसरे यह कि जिस तरह मैं ने क़ाफ़िलों को दाख़िल होने की इजाज़त दे रखी है , तुम भी उन्हे इजाज़त देना , लेकिन तीसरी वसीयत के बारे में इब्ने अब्बास ने ख़ामोशी इख़्तियार की और बाज़ दूसरी रिवायत में बयान हुआ है कि (इब्ने अब्बास ने कहा) मैं तीसरी वसीयत भूल गया हूँ।

(सही बुख़ारी किताबुल मग़ाज़ी बाब 78, सही मुस्लिम किताबुल वसीयत बाब 5)

ऐसा कभी नही हुआ कि इब्ने अब्बास ने किसी हदीस के बारे में कहा हो , मैं हदीस के भलाँ हिस्से को भूल गया हूँ या उनको नक़्ल न करें , इसकी वजह यह है कि इब्ने अब्बास ने उमर बिन ख़त्ताब के डर की वजह से इस तीसरी वसीयत को जो हज़रत अली (अ) और अहले बैत (अ) की विलायत , ख़िलाफ़त और इमामत के बारे में थी , बयान नही किया , लेकिन चूँकि इब्ने अब्बास , उमर से डरते थे इस वजह से इस वसीयत को बयान न किया जैसा कि वह उमर बिन ख़त्ताब के ज़माने में औल व ताअस्सुब के मसअले की मुख़ालेफ़त न कर सके , यहाँ तक उमर के इँतेका़ल के बाद हक़्क़े मसअला बयान किया और जब उन से इस मसअले के हुक्म के बारे में ताख़ीर की वजह पूछी गई तो उन्होने कहा: मैं उमर बिन ख़त्ताब के नज़रिये की मुख़ालेफ़त से डरता था।औल व ताअस्सुब का मसअला मीरास से मुताअल्लिक़ है कि अगर मीरास तक़सीम करते वक़्त कुछ चीज़ बच जाये या किसी का हिस्सा कम पड़ जाये तो उसको किसको दिया जायेगा या किससे लिया जायेगा।मुतर्जिम)

उमर ने वसीयत नामा लिखे जाने में रुकावट क्यों की ?

यह सवाल हर शख्स के ज़हन में आता है कि उमर बिन ख़त्ताब और उनके तरफ़दारों ने पैग़म्बरे अकरम (स) की तदबीर अमली होने में रुकावट क्यों पैदा की ? क्या आँ हज़रत (स) ने रोज़े क़यामत तक उम्मत को गुमराह न होने की ज़मानत नही दी थी ? इससे बढ़ कर और क्या बशारत हो सकती थी ? लिहाज़ा क्यों इस काम की मुख़ालेफ़त की गई ? और उम्मत को इस सआदत से क्यो महरूम कर दिया गया ?

हम इस सवाल के जवाब में अर्ज़ करते हैं कि जब भी ओहदा व मक़ाम का इश्क़ और बुग़्ज़ की कीना इंसान की अक़्ल पर ग़ालिब हो जाता है तो अक़्ल को सही फ़ैसला करने से रोक देता है , हम जानते हैं कि हज़रत उमर के ज़हन में क्या क्या ख़्यालात पाये जाते थे , वह जानते थे कि पैग़म्बरे अकरम (स) ने किस काम के लिये क़ाग़ज़ व क़लम तलब किया है , वह यह यह बात भी यक़ीनी तौर पर जानते थे कि पैग़म्बरे अकरम (स) हज़रत अली (अ) और अहले बैत (अ) की ख़िलाफ़त को तहरीरी शक्ल में महफ़ूज़ करना चाहते हैं , इसी वजह से इस वसीयत के लिखे जाने में रुकावट खड़ी कर दी। कारेईने केराम , यह सिर्फ़ दावा नही है बल्कि हम इसको साबित करने के लिये शवाहिद व गवाह भी पेश कर सकते हैं , हम यहाँ पर सिर्फ़ दो नमूने पेश करते हैं:

1. उमर बिन ख़त्ताब ने पैग़म्बरे अकरम (स) की ज़िन्दगी में हदीसे सक़लैन के जुमले मुक़र्रर सुने थे , जिस हदीस में पैग़म्बरे अकरम (स) ने फ़रमाया: मैं तुम्हारे दरमियान दो गराँ क़द्र चीज़ें छोड़े जा रहा हूँ जिन से तमस्सुक के बाद कभी गुमराह नही होगे (एक क़ुरआने करीम और दूसरे मेरी इतरत) उमर बिन ख़त्ताब ने क़ुरआन व इतरत के बारे में गुमराह न होने का लफ़्ज़ मुकर्रर सुना था , पैग़म्बरे अकरम (स) के हुजरे में भी जब आपने क़लम व काग़ज़ तलब किया तो आँ हज़रत (स) की ज़बान से यही जुमला सुना , जिसमें आपने फ़रमाया: एक ऐसा नामा लिख दूँ जिसके बाद गुमराह न हों , उमर ने फ़ौरन समझ लिया कि पैग़म्बरे अकरम (स) किताब व इतरत के बारे में वसीयत लिखना चाहते हैं लिहाज़ा उसकी मुख़ालिफ़त शुरु कर दी।

2. इब्ने अब्बास कहते हैं: मैं उमर बिन ख़त्ताब की ख़िलाफ़त के ज़माने के शुरु में उनके पास गया.. उन्होने मेरी तरफ़ रुख करके कहा: तुम पर ऊँटों के खून का बदला है अगर तुम से जो सवाल करू उसको मख़्फी रखो , क्या अब भी अली (अ) की ख़िलाफ़त के सिलसिले में ख़ुद को बरहक़ जानते हो ? क्या तुम यह गुमान करते हो कि रसूल अकरम (स) ने उनकी ख़िलाफ़त के बारे में नस्स और बयान दिया है ? मैंने कहा: हाँ , मैंने उसको अपने वालिद से पूछा , उन्होने भी इसकी तसदीक़ की है.... उमर ने कहा: मैं तुम से कहता हूँ कि पैग़म्बरे अकरम (स) अपनी बीमारी के आलम में अली (अ) को (बउनवाने ख़लीफ़ा व इमाम) मुअय्यन करना चाहते थे लेकिन मैं मानेअ हो गया..।

(शरहे इब्ने अबिल हदीद जिल्द 12 पेज 21)

हदीसे ग़दीर

हज़रत अली (अ) का बिला फ़स्ल ख़िलाफ़त व इमामत के मुहिम तरीन दलायल में से मशहूर व मारूफ़ हदीस हदीसे ग़दीर हैं , इस हदीस के मुताबिक़ हज़रत रसूले ख़ुदा (स) ने हज़रत अली (अ) के बारे में ख़ुदावंदे आलम की तरफ़ से अपने बाद ते लिये इमामत के लिये मंसूब किया।

इस हदीस की सनद कैसी है ? यह हदीस किस चीज़ पर दलालत करती है ? अहले सुन्नत इस सिलसिले में क्या कहते हैं और इस सिलसिले में क्या क्या ऐतेराज़ात हुए हैं ? हम इस हिस्से में उन तमाम चीज़ों के बारे में बहस करते हैं।

वाकेय ए ग़दीर

हिज़रत के दसवें साल रसूले अकरम (स) ने ख़ान ए काबा की ज़ियारत का क़स्द फ़रमाया और आँ हज़रत (स) की तरफ़ से मुसलमानों के अतराफ़ के मुख़्तलिफ़ क़बीलों को पैग़ाम दिया गया कि रसूले अकरम (स) ने मुसलमानों के इज्तेमा का हुक्म दिया है , फ़रीज़ ए हज के अंजाम देने के बाद आँ गज़रत (स) की तालिमात की पैरवी करते हुए एक बड़ी तादाद मदीने पहुच गई और यह पैग़म्बरे अकरम (स) का वह वाहिद हज था जो आपने मदीने हिजरत करने के बाद अंजाम दिया था जिसको तारीख़ ने मुख़्तलिफ़ नामों से याद किया है जैसे हज्जतुल विदा , हज्जतुल इस्लाम , हज्जतुल बलाग़ , हज्जतुल कमाल और हज्ज़तुल तमाम।

रसूले अकरम (स) ने ग़ुस्ल फ़रमाया और ऐहराम के लिये दो सादा कपड़े लिये , एक को कमर से बाँधा और दूसरे को अपने शानों पर डाल लिया , आँ हज़रत (स) 24,25 ज़िल क़अदा बरोज़े शंबा हज के लिये मदीने से पा पेयादा रवाना हुए , आपने अपने अहले ख़ाना और अज़ावाज को अमारियों में बैठाया और अपने तमाम अहले बैत और मुहाजेरीन व अंसार नीज़ अरब के दूसरे बड़े क़बीलों के साथ में रवाना हुए (बहुत से लोग छाले पड़ने की बीमारी के डर से इस सफ़र से महरूम रह गये , उसके बावजूद भी बेशुमार मजमा आप के साथ था , इस सफ़र में शिरकत करने वालों की तादाद एक लाख चौदह हज़ार , एक लाख बीस हज़ार , दो लाख चालिस हज़ार या इसके भी ज़्यादा बताई जाती है , अलबत्ता जो लोग मक्के में थे और यमन से हज़रत अली (अ) और अबू मूसा अशअरी के साथ आने वालों की तादाद का हिसाब किया जाये तो मज़कूरा रक़्म में इज़ाफ़ा हो सकता है।

(तबकात इब्ने साद , जिल्द 3 पेज 225, मक़रिज़ी , अल इमताअ पेज 511, इरशादुस सारी जिल्द 6 पेज 329)

आमाले हज अँजाम देने के बाद पैग़म्बरे अकरम (स) हाजि़यों के साथ मदीना वापसी के लिये रवाना हुए और जब यह काफ़ेला ग़दीरे ख़ुम पहुचा तो जिबरईले अमीन (अ) ख़ुदा वंदे आलम की तरफ़ से यह आयते शरीफ़ा ले कर नाज़िल हुए

: يَا أَيُّهَا الرَّسُولُ بَلِّغْ مَا أُنزِلَ إِلَيْكَ مِن رَّبِّكَ وَإِن لَّمْ تَفْعَلْ فَمَا بَلَّغْتَ رِسَالَتَهُ وَاللَّـهُ يَعْصِمُكَ مِنَ النَّاسِ إِنَّ اللَّـهَ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْكَافِرِينَ

(सूरए मायदा आयत 67)

ऐ पैग़म्बर , आप इस हुक्म को पहुचा दें जो आपके परवर दिगार की तरफ़ से आप पर नाज़िल किया गया है।

जोहफ़ा वह मंजिल है जहाँ से मुख़्तलिफ़ रास्ते निकलते हैं , पैग़म्बरे अकरम (स) अपने असहाब के साथ 18 ज़िल हिज्जा बरोज़े पंज शंबा मक़ामे जोहफ़ा पर पहुचे।

अमीने वहयी (जनाबे जिबरईल (अ) ने ख़ुदा वंदे आलम की तरफ़ से पैग़म्बरे अकरम (स) को हुक्म दिया कि असहाब के सामने हज़रत अली (अ) का वली और इमाम के उनवान से तआरुफ़ करायें और यह हुक्म पहुचा दे कि उनकी इताअत तमाम मख़लूक़ पर वाजिब है।

वह लोग जो पीछे रह गये थे वह भी पहुच गये और जो उस मक़ाम से आगे बढ़ गये थे उनको वापस बुलाया गया , पैग़म्बरे अकरम (स) ने फ़रमाया: यहाँ से ख़ाक व ख़ाशाक को साफ़ कर दिया जाये , गर्मी बहुत ज़्यादा थी , लोगों ने अपनी अबा का एक हिस्सा अपने सर पर और एक सिरा पैरों के नीचे डाला हुआ था और पैग़म्बरे अकरम (स) के आराम की ख़ातिर एक ख़ैमा बना दिया गया था।

ज़ोहर की अज़ान कही गई और सबने पैग़म्बरे अकरम (स) की इक्तेदा में नमाज़े ज़ोहर अदा की , नमाज़ के बाद पालाने शुतुर के ज़रिये एक बुलंद जगह बनाई गई।

पैग़म्बरे अकरम (स) ने बुलंद आवाज़ सबको मुतवज्जेह किया और इस तरह ख़ुतबे का आग़ाज़ किया:

तमाम तारिफ़े खुदावंदे आलम से मख़्सूस हैं , मैं उसी से मदद तलब करता हूँ और उसी पर ईमान रखता हूँ नीज़ उसी पर भरोसा करता हूँ , बुरे कामों और बुराईयों से उसकी पनाह माँगता हूँ , गुमराहों के लिये सिर्फ़ उसी की पनाह है , जिसकी वह रहनुमाई कर दे , वह गुमराह करने वाला नही हो सकता , मैं गवाही देता हूँ कि उसके सिवा कोई माबूद नही है और मुहम्मद उसके रसूल हैं।

ख़ुदावंदे आलम की हम्द व सना और उसकी वहदानियत की गवाही के बाद फ़रमाया:

ऐ लोगों , ख़ुदा वंदे मेहरबान और अलीम ने मुझे ख़बर दी है कि मेरी उमर ख़त्म होने वाली है और अनक़रीब मैं उसकी दावत को लब्बैक कहते हुए आख़िरत की तरफ़ रवाना होने वाला हूँ , मैं और तुम अपनी अपनी ज़िम्मेदारियों के ज़िम्मेदार हैं , अब तुम्हारा नज़रिया है और तुम क्या कहते हो ?

लोगों ने कहा:

हम गवाही देते हैं कि आपने पैग़ामे इलाही को पहुचा दिया है और हमको नसीहत करने और अपनी ज़िम्मेदारियों को समझाने में कोई कसर नही छोड़ी , ख़ुदा वंदे आलम आपको जज़ाए ख़ैर इनायत फरमाये।

फिर फ़रमाया:

क्या तुम लोग ख़ुदावंदे आलम की वहदानियत और मेरी रिसालत की गवाही देते हो ? और क्या यह गवाही देते हो कि जन्नत व दोज़ख व क़यामत के दिन में कोई शक व शुब्हा नही है ? और यह कि ख़ुदावंदे आलम मुर्दों को दोबारा ज़िन्दा करेगा ? क्या तुम इन चीज़ों पर अक़ीदा रखते हो ?

सबने कहा: हाँ (या रसूलल्लाह) इन तमाम हक़ायक़ की गवाही देते हैं ?

उस वक़्त पैगम़्बरे अकरम (स) ने फ़रमाया: ख़ुदावंद , तू गवाह रहना फिर बहुत ताकीद के साथ फरमाया बेशक मैं आख़िरत में जाने और हौज़े (कौसर) पर पहुचने में तुम पर पहल करने वाला हूँ और तुम लोग हौज़े कौसर पर मुझ से आकर मिलोगे , मेरे हौज़ (कौसर) की वुसअत सनआ और बसरा के दरमियान फ़ासले की तरह है , वहाँ परस्तारों के बराबर साग़र और चाँदी के जाम है , ग़ौर व फ़िक्र करो और होशियार रहो कि मैं तुम्हारे दरमियान दो गराँ क़द्र चीज़े छोड़ कर जा रहा हूँ , देखो तुम लोग इनके साथ कैसा सुलूक करते हो ?

उस मौक़े पर लोगों ने आवाज़ बुलंद की , या रसूलल्लाह , वह दो गराँ क़द्र चीज़े कौन सी हैं ?

रसूले अकरम (स) ने फ़रमाया: उन में सिक़्ले अकबर अल्लाह की किताब क़ुरआने मजीद है , जिसका एस सिरा ख़ुदावंदे आलम के हाथ और दूसरा सिरा तुम्हारे हाथों में है। लिहाज़ा उसको मज़बूती से पकड़े रहना ताकि गुमराह न हो और सिक़्ले असग़र मेरी इतरत है , बेशक ख़ुदावंदे अलीम व मेहरबान ने मुझे ख़बर दी है कि यह दोनों एक दूसरे से जुदा नही होंगे , यहाँ तक हौज़े कौसर पर मेरे पास वारिद हों। मैं ने ख़ुदा वंदे आलम से इस बारे में दुआ की है। लिहाज़ा उन दोनो से आगे न बढ़ना और उनकी पैरवी से न रुकना कि हलाक हो जाओगे।

उस मौक़े पर हज़रत अली (अ) के हाथों को पकड़ बुलंद किया यहाँ तक कि आपकी सफ़ीदी ए बग़ल नमूदार हो गई , तमाम लोग आपको देख रहे थे और पहचान रहे थे , फिर रसूले अकरम (स) ने इस तरह फरमाया: ऐ लोगो , मोमिनीन पर ख़ुद उनके नफ़्सों पर कौन औला है ?

सबको ने कहा: ख़ुदा और उसका रसूल बेहतर जानता है , आँ हज़रत (स) बेशक ख़ुदा वंदे आलम मेरा मौला है और मैं मोमिनीन का मौला हूँ और उन पर ख़ुद उनके नफ़्सों से ज़्यादा औला हूँ और जिसका मैं मौला हूँ उसके यह अली मौला हैं।

और अहमद बिन हंबल (हंमबियों के इमाम) के बक़ौल , पैग़म्बरे अकरम (स) ने इस जुमले को चार मर्तबा तकरार किया।

और फिर दुआ के लिये हाथ उठाये और फरमाया: पालने वाले , तू उसको दोस्त रख जो अली को दोस्त रखे और दुश्मन रख उसको जो अली को दुश्मन रखे , उसके नासिरों की मदद फ़रमा और उनके ज़लील करने वाले को ज़लील व रूसवा फ़रमा और उनको हक़ व सदाक़त का मेयार और मर्कज़े क़रार दे।

और फिर आँ हज़रत (स) ने फ़रमाया: हाज़ेरीने मजलिस इस वाकेये पर ख़बर ग़ायब लोगों तक पहचायें।

मजमे के जुदा होने से पहले जिबरईले अमीन पैग़म्बरे अकरम (स) पर यह आय ए शरीफ़ा लेकर नाज़िल हुआ:

(الْيَوْمَ أَكْمَلْتُ لَكُمْ دِينَكُمْ وَأَتْمَمْتُ عَلَيْكُمْ نِعْمَتِي وَرَضِيتُ لَكُمُ الْإِسْلَامَ دِينًا ) (सूरये मायदा आयत 6)

तर्जुमा

, आज मैंने तुम्हारे दीन को कामिल कर दिया और तुम पर अपनी नेमत पूरी कर दी और तुम्हारे इस दीन इस्लाम को पसंद किया।

उस मौक़े पर पैग़म्बरे अकरम (स) ने फ़रमाया: अल्लाहो अकबर , दीन के कामिल होने , नेमत के मुकम्मल होने और मेरी रिसालत और मेरे बाद अली (अ) की विलायत पर ख़ुदा के राज़ी व ख़ुदनूद होने पर।

हाज़ेरीने मजलिस मिनजुमला शैखैन (अबू बक्र व उमर) ने अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ) की ख़िदमत में पहुच कर इस तरह मुबारक बाद पेश की: मुबारक हो मुबारक , या अली बिन अबी तालिब कि आज आप मेरे और हर मोमिन व मोमिना के आक़ा व मौला बन गये।

इब्ने अब्बास कहते हैं: ख़ुदा की क़सम हज़रत अली (अ) की विलायत सब पर वाजिब हो गई।

हस्सान बिन साबित ने कहा: या रसूलल्लाह क्या आप इजाज़त देते हैं कि हज़रत अली (अ) की शान में क़सीदा पढ़ूँ ? पैग़म्बरे अकरम (स) ने फ़रमाया: ख़ुदा की मैमनत और उसकी बरकत से पढ़ो , उस मौक़े पर खड़े हुए और इस तरह अर्ज़ किया: ऐ क़ुरैश के बुज़ुर्गों , पैग़म्बरे अकरम (स) के हुज़ूर में विलायत (जो मुसल्लम तौर पर साबित हो चुकी है।) के बारे में अशआर पेश करता हूँ और इस तरह अशआर पढ़े:

शेर

तर्जुमा

, ग़दीर के दिन नबी लोगों को निदा कर रहे थे और नबी की यह निदा मैं सुन रहा था।

और इस तरह क़सीदा सबसे सामने पेश किया।

हमने वाक़ेया ग़दीर को मुख़्तसर तौर पर बयान किया है कि जिसपर तमाम उम्मते इस्लामिया इत्तेफ़ाक़ रखती हैं , क़ाबिले ज़िक्र है कि दुनिया का कोई भी वाक़ेया या दास्तान इस शान व शौकत और ख़ुसूसीयात के साथ ज़िक्र नही हुई हैं।

(अल ग़दीर जिल्द 1 पेज 31, 36, तबका़त इब्ने साद जिल्द 2 पेज 173, अल अमताअ मक़रीज़ी पेज 510, इसरादुल सारी जिल्द 9 पेज 426, सीरये हलबी जिल्द 3 पेज 257, सीरये ज़ैनी दहलान जिल्द 2 पेज 143, तज़किरतुल ख़वास , पेज 30, ख़सायसे निसाई पेज 96, दायरतुल मआरिफ़ फ़रीद वजदी जिल्द 3 पेज 542)


वाक़ेय ए ग़दीर

ग़दीर ख़ुम में हज़रत अली (अ) को मक़ामे विलायत के लिये मंसूब करना , तारिख़े इस्लाम के अहम वाक़ेयात में से है , शायद इस वाक़ेया से ज़्यादा अहम कोई और वाक़ेया हमें न मिल सके , हज़रत अली (अ) की शक्ल में पैग़म्बरे अकम (स) की रिसालत बाक़ी रहने को यह वाक़ेया बयान करता है।

ग़दीर , इत्तेहाद की निशानी और रिसालत व इमामत के इत्तेसाल का नाम है , उन दोनो की अस्ल एक ही है , मख़्फ़ी हक़ायक़ के ज़ाहिर होने , पोशिदा असरार के ज़ाहिर होने और लोगों की हिदायत इसी ग़दीर की राह में मुम्किन है।

गद़ीर , हक़ से बैअत करने और सरे तसलीम के ख़म करने का दिन है , गद़ीर , हिज़्बे रहमान से हिज़्बे शैतान की शिकस्त का दिन है।

गद़ीर , ख़ुर्शीदे आलम ताब की तारीक बादलों के बाद चमकने का दिन है।

गद़ीर की ज़ुग़राफ़ियाई हैसियत

गदीर के लुग़वी माना से गढ़हे के हैं जिस में बारिश या सैलाब का पानी एक मुद्दत के लिये जमा हो जाता है ।

लफ़्ज़े ''ख़ुम '' के बारे में याक़ूत हमवी , ज़मख़्शरी से नक़्ल करते हैं कि ''ख़ुम '' एक रंगरेज़ का नाम था और मक्का व मदीना के दरमियान ''जुहफा '' में जो ग़दीर है इसी शख़्स के नाम से मंसूब है।मोजमुल बल्दान जिल्द 2 पेज 389)

''ग़दीरे ख़ुम '' जैसा कि इशारा हुआ मक्का और मदीना के दरमियान एक मक़ाम का नाम है जो मदीना की निस्बत मक्का से ज़्यादा नज़दीक है और ''जोहफ़ा '' से दो मील है। (मरासिदुल इत्तेलाआत जिल्द 1 पेज 315-482)

''जोहफ़ा '' मक्के और मदीना के दरमियान , मक्के के शिमाल मग़रिबी में एक बस्ती थी जिस को क़दीम ज़माने में ''महीआ '' कहते थे , लेकिन बाद में उसका नाम बदल कर ''जोहफ़ा '' कर दिया गया , क्योंकि ''जोहफ़ा '' के माना कूच के हैं , उस ज़माने में जो सैलाब आते थे जिस की बिना पर उस इलाक़े के लोगों को कूच करना पड़ता था , लेकिन ये इलाक़ा अब वीरान है। (मोजम अल बलदान जिल्द 1 सफ़ा 111)

हदीसे ग़दीर के सहाबा रावी

सहाबा की कसीर तादाद ने हदीसे ग़दीर को नक़्ल किया है , अब हम यहाँ पर अल्फ़ा बेड के लिहाज़ से उन असहाब के असमा की फ़ेहरिस्त बयान करते हैं , लेकिन सबसे पहले तबर्रुकन असहाबे किसा के असमा को नक़्ल करते हैं :

1. हज़रत अमीर अल मोमीनीन अली इब्ने अबी तालिब अलैहिस्सलाम

2. सिद्दीक़ ए ताहिरा हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा

3. हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम

4. हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम

अलिफ़

5. अबू बक्र बिन अबी क़ुहाफ़ ए तमीमी

6. अबू ज़वीब ख़ुवैलद

7. अबी राफ़ए क़ुतबी

8. अबू ज़ैनब बिन औफ़े अंसारी

9. अबू अम्रा बिन अम्र बिन महसने अंसारी

10. अबू फ़ज़ालए अंसारी , जो जंगे बद्र में भी शरीक थे और जंगे सिफ़्फ़ीन में भी हज़रत अली अलैहिस्सलाम की रकाब में शहीद हुये हैं।

11. अबू क़ुदामा अंसारी

12. अबी लैला अंसारी , बाज़ नक़्लों के मुताबिक़ ये जंगे सिफ़्फ़ीन में शहीद हुये।

13. अबू हुरैर ए दूसी

14. अबुल हैसम बिन तैहान , जो जंगे सिफ़्फ़ीन में शहादत के दर्जे पर फ़ाएज़ हुये।

15. ओबई बिन कअबे अंसारी ख़ज़रजी , बुज़ुर्ग क़ुर्रा

16. उसामा बिन ज़ैद बिन हारिसे कल्बी

17. असअद बिन ज़ोरार ए अंसारी

18. असमा बिन्ते उमैस ख़सअमिया

19. उम्मे सलमा , ज़ौज ए रसूले अकरम (स)

20. उम्मे हानी , बिन्ते अबूतालिब अलैहिस्सलाम

21. अनस बिन मालिके अंसारी ख़ज़रजी , ख़ादिमे पैग़म्बर (स)

बे

22. बराअ बिन आज़िबे अंसारी औसी

23. बरीदा बिन आज़िबे औसी अंसारी

से

24. साबित बिन वदीअ ए अंसारी , अबू सईद ख़ज़रजी मदनी

जीम

25. जाबिर बिन समुरा बिन जुनादा , अबू सुलैमाने सुवाई

26. जाबिर बिन अब्दुल्लाहे अंसारी

27. जबला बिन अम्रे अंसारी

28. जबीर बिन मुतअम बिन अदी क़रशी नौफ़ली

29. जरीर बिन अब्दुल्लाहे बिजिल्ली

30. जुन्दब बिन जुनाद ए ग़फ़्फ़ारी अबूज़र

31. जुन्दब बिन अम्र बिन माज़ने अंसारी , अबू जुनैदा

हे

32. हुब्बा बिन जवीन , अबू क़ुदाम ए उरफ़ी बजली

33. हुब्शी बिन जुनादा सलूली

34. हबीब बिन बुदैल बिन वरक़ा ए ख़ुज़ाई

35. हुज़ैफा बिन उसैद , अबू सरीयहे ग़फ़्फ़ारी , मौसूफ़ का शुमार असहाबे शजरा में होता है।

36. हुज़ैफ़ा बिन यमान यमनी

37. हस्सान बिन साबित

खे़

38. ख़ालिद बिन ज़ैद , अबू अय्यूब अंसारी , मौसूफ़ रूम के साथ होने वाली जंग में शहीद हुए।

39. ख़ालिद बिन वलीद बिन मुग़िर ए मख़्ज़ूमी , अबू सुलेमान

40. खज़ीमा बिन साबिते अंसारी ज़ुश शहादतैन , जो जंगे सिफ़्फ़ीन में शहीद हुए।

41. ख़ुवैलद बिन अम्रे ख़ुज़ाई , अबू शरीह

रे , ज़े

42. रुफ़ाआ बिन अब्दुल मुन्ज़िरे अंसारी

43. ज़ुबैर बिन अवाम क़रशी

44. ज़ैद बिन अरक़मे अंसारी खज़री

45. ज़ैद बिन साबित अबू सईद

46. ज़ैद या यज़ीद बिन शराहिले अंसारी

47. ज़ैद बिन अब्दुल्लाहे अंसारी

सीन

48. साद बिन अबी बक़ास , अबू इस्हाक़

49. साद बिन जुनाद ए औफ़ी , पिदरे अतिया औफ़ी

50. साद बिन उबाद ए अंसारी , ख़ज़रजी

51. साद बिन मालिके अंसारी , अबू सईदे खिदरी

52. सईद बिन जै़द क़रशी अदबी , यह अशर ए मुबश्शेरा में से हैं।

53. सईदे बिन साद बिन उबाद ए अंसारी

54. सलमाने फ़ारसी , अबू अब्दुल्लाह

55. सलमा बिन अम्र बिन अल अकू असलम , अबू मुस्लिम

56. समुरा बिन जुन्दब फ़ज़ाज़ी , अबू सुलेमान

57. सहल बिन हुनैफ़ अंसारी , ओसी

58. सहल बिन साद अंसारी , खज़रजी , सायेदी , अबुल अब्बास

साद ज़ाद

59. सुदैय बिन अजलाने बाहुली , अबू अमामा

60. ज़ुमैर ए असदी

तो

61. तलहा बिन अब्दुल्लाहे तैमी

ऐन

62. आमिर बिन उमैरे नमीरी

63. आमिर बिन लैला बिन हमज़ा

64. आमिर बिन लैला ग़फ़्फ़ारी

65. आमिर बिन वासेल ए लैसी

66. आयशा बिन्ते अबी बक्र

67. अब्बास बिन अब्दुल मलिक बिन हाशिम , पैगम़्बर (स) के चचा

68. अब्दुर्रहमान बिन अब्दुर रब अंसारी

69. अब्दुर्रहमान बिन औफ़ करशी , ज़ोहरी , अबू मुहम्मद

70. अब्दुर्रहमान बिन यामुर दैली

71. अब्दुल्लाह बिन अब्दुल असद मख़्ज़ूमी

72. अब्दुल्लाह बिन बुदैल बिन वरक़ा

73. अब्दुल्लाह बिन बशीर माज़नी

74. अब्दुल्लाह बिन साबिते अंसारी

75. अब्दुल्लाह बिन जाफ़र बिन अबी तालिब हाशिमी

76. अब्दुल्लाह बिन हंतब करशी , मख़्ज़ूमी

77. अब्दुल्लाह बिन रबीआ

78. अब्दुल्लाह बिन अब्बास

79. अब्दुल्लाह बिन अबी औफ़ा बिन अलक़मा असलमी

80. अब्दुल्लाह बिन उमर बिन ख़त्ताब अदबी , अबू अब्दुर्रहमान

81. अब्दुल्लाह बिन मसऊदे हुज़ली

82. अब्दुल्लाह बिन यामील

83. उस्मान बिन अफ़्फ़ान

84. उबैद बिन आज़िब अंसारी

85. अदी बिन हातिम अबू तरीफ़

86. अतिया बिन बसर माज़नी

87. उक़बा बिन आमिर जोहनी

88. अम्मार बिन यासिर अनसी , अबुल यक़ज़ान

89. अमारये ख़ज़री अंसारी

90. उमर बिन अबी सलमा बिन अब्दिल असद मख़्ज़ूमी

91. उमर बिन ख़त्ताब

मख़्फ़ी न रहे कि हज़रत उमर की हदीस को हाफ़िज़ बिन मग़ाज़ेली ने किताबुल मनाक़िब में दो तरीक़े से और मुहिब्बुद दीन तबरी ने अर रियाज़ुन नज़रा और ज़ख़ायरुल उक़बा में मुसनदे अहमद से नक़्ल किया है , नीज़ इब्ने कसीर दमिश्क़ी व शमसुद्दीन जज़री ने हज़रत उमर को हदीसे ग़दीर के रावियों में शुमार किया है।

(मनाक़िबे अली बिन अबी (अ) पेज 22 हदीस 31)

(अर रियाज़ुर नज़रा जिल्द 3 पेज 113)

(ज़ख़ायरुल उक़बा पेज 67)

(अल बिदायह वन निहायह जिल्द 7 पेज 386, असनल मतालिब पेज 48)

92. इमरान बिन हसीन ख़ज़ाई , अबू नहीद

93. अम्र बिन हुम्क़े खज़ाई , कूफ़ी

94. अम्र बिन शराजील

95. अम्र बिन आस

96. अम्र बिन मर्रा जोहनी , अबू तलहा

फ़े

97. फ़ातेमा बिन्ते हमज़ा बिन अब्दुल मुत्तलिब

क़ाफ़ व काफ़

98. क़ैस बिन साबित शम्मास अंसारी

99. क़ैस बिन साद बिन उबाद ए अंसारी

100. कअब बिन अजर ए अंसारी

मीम

101. मालिक बिन हवीरस लैसी , अबू सुलैमान

102. मिक़दाद बिन अम्र कंदी

नून

103. नाजिया बिन अम्र बिन ख़ुज़ाई

104. नुज़ला बिन उबैया असलमी , अबू बरज़ा

105. नोमान बिन अजलान अंसारी

हे व या

106. हाशिम बिन मिरक़ाल बिन अतबा बिन अबी वक़ास ज़ोहरी , मदनी

107. वहन्शी बिन हर्ब हबशी , हिमसी , अबू वसमा

108. वहब बिन हमज़ा

109. वहब बिन अब्दुल्लाह सवाई , अबू जुहैफ़ा

110. याली बिन मर्रा बिन वहब सक़फ़ी , अबू मुराज़िम

कारेईने केराम , यह थे एक सौ दस बुज़ुर्ग सहाबी ए रसूल , जिनके असमा ए गेरामी हम ने बयान किये हैं , यक़ीनी तौर पर उससे ज़्यादा अफ़राद ने इस हदीसे ग़दीर को नक़्ल किया है , क्यो कि तारिख़ के मुताबिक़ सर ज़मीने ख़ुम में एक लाख से भी ज़्यादा सहाबी और हाजी हाज़िर थे , लिहाज़ा हालात के पेशे नज़र इस हदीस के रावी इससे कहीं ज़्यादा हैं , लेकिन अहले सुन्नत की किताबों की छान बीन करने से यह तादाद मिलती है।

हाफ़िज़ सजिसतानी (मुतवफ़्फ़ा 477) ने किताब अद दिराया फ़ी हदीसिल विलाया को 17 जिल्दों में तालिफ़ की है , जिसमें हदीसे ग़दीरे के तरीक़ों को ज़िक्र किया है , चुनाँचे मौसूफ़ ने इस हदीस को एक सौ बीस सहाबा से नक़्ल किया है।

(अल मनाक़िब इब्ने शहर आशूब जिल्द 3 पेज 34)

हदीसे ग़दीर को नक़्ल करने वाले ताबेईन

हदीसे ग़दीर को 84 ताबेईन ने नक़्ल किया है जैसे:

1.अबू राशिदे ख़ुबरानी शामी , दमिश्क़ में अपने ज़माने ते सबसे अफ़ज़ल शख़्स।

2. अबू सुलैमान मुवज़्ज़िन , जिनका शुमार अज़ीमुश शान ताबेईन में होता है।

3. अबू सालेह सम्मान ज़कवान मज़नी , अहमद बिन हंमल ने उनको सिक़ह सिक़ह के उनवान से याद किया है।अल ऐलल व मारेफ़तुर रेजाल जिल्द 3 पेज 161 रक़्म 4723)

4. असबग़ बिन नबाता तमीमी कूफ़ी

5. हबीब बिन अबी साबित असदी , कूफ़ी , फ़क़ीहे कूफ़ा

6. हकम बिन उतैयबा कूफ़ी , कंदी , मौसूफ़ के बारे में सिक़ह , सब्त , फ़क़ीह , जैसे अल्फ़ाज़ कहे गये है।जो उन की अज़मत पर दलालत करते हैं।)

7. हुमैद तवील बसरी , उनके बारे में हाफ़िज़ , मुहद्दिस , सिक़ह जैसे अल्फ़ाज़ को इस्तेमाल किया गया है।

8. ज़ादन बिन अम्र कंदी , बज़्ज़ाज़ , कूफ़ी , उनका शुमार अज़ीमुश शान ताबेईन में होता है।

9. ज़र्र बिन जुबैश असदी

10. सालिम बिन अब्दुल्लाह बिन उमर बिन ख़त्ताब करशी , मदनी

11. सईद बिन जुबैर असदी कूफ़ी , जो हुज्जाज (सितमगार) के हाथों शहीद हुए।

12. सईद बिन मुसय्यब करशी , मख़्ज़ूमी , अहमद बिन हंबल ने उनके बारे में कहा कि सईद की तमाम मुरासेलात सही हैं।

13. सुलैम बिन क़ैस हिलाली

14. सुलेमान बिन मेहरान अअमश

15. ज़हाक बिन मुज़ाहिम हिलाली

16. ताऊस बिन कीसान यमान जंदी

17. आयशा बिन्ते साद

18. अब्दुर्रहमान बिन अबी लैला

19. अदी बिन साबित अंसारी , कूफ़ा , ख़तमी

20. उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ , अमवी ख़लीफ़ा

21. अम्र बिन अब्दुल्लाह सबीई हमदानी

22. फ़ित्र बिन ख़लीफ़ ए मख़्ज़ूमी

23. मुस्लिम बिन सुबैह हमदानी , कूफ़ी , अत्तार

24. नज़ीर बिन सुलैम फ़ज़ारी , वास्ती

25. यज़ीद बिन अबी ज़ियाद कूफ़ी

26. यसार सक़फ़ी , अबू नजीह

उनके अलावा दूसरे ताबेईन ने भी हदीसे ग़दीर को बयान किया है।

दूसरी सदी में हदीसे ग़दीर के रावी

दूसरी सदी हिजरी में 56 उलामा ए अहले सुन्नत ने इस हदीस को नक़्ल किया है जैसे:

हाफ़िज़ मुहम्मद बिन इस्हाक़ मदनी ( 151)

हाफ़ि़ज़ सुफ़यान बिन सईद सौरी ( 161)

हाफ़िज़ वकीअ बिन जराज ( 196)

तीसरी सदी में हदीसे ग़दीर के रावी

तीसरी सदी हिजरी में 92 उलामा ए अहले सुन्नत ने इस हदीस को नक़्ल किया है जैसे:

मुहम्मद बिन इदरीसे शाफ़ेई ( 204)

(अन निहायह जिल्द 5 पेज 228)

अहमद बिन हंबल शैबानी ( 241)

(अल मुसनद)

हाफ़िज़ मुहम्मद बिन इस्माईले बुख़ारी ( 256)

(तारिख़ुल कबीर जिल्द 1 पेज 375)

हाफ़िज़ मुहम्मद बिन ईसा तिरमिज़ी ( 279)

हाफ़िज़ अहमद बिन यहया बलाज़री ( 279) वग़ैरह

(अनसाबुल अशराफ़ जिल्द 2 पेज 108)

चौथी सदी में हदीसे ग़दीर के रावी

चौथी सदी (हिजरी) में 43 उलामा ए अहले सुन्नत ने इस हदीस को नक़्ल किया है जैसे:

अहमद बिन शुऐब निसाई ( 303) इस हदीस को सोनन और ख़सायस में मुतअद्दिद तरीक़ों से नक़्ल किया है जिनमें अकसर सहीहुस सनद है।

हाफ़िज़ अहमद बिन अली मूसली , अबू यअली ( 307)

(ख़सायसुन निसाई पेज 10, 16)

(मुसनद अबी यअली जिल्द 11 पेज 307)

हाफ़िज़ मुहम्मद बिन जरीरे तबरी ( 310)

अबुल क़ासिम तबरानी ( 370) मौसूफ़ ने भी हदीसे ग़दीर को बहुत से तरीक़ों से नक़्ल किया है जिनमें से अकसर सहीहुस सनद है।

इसके अलावा भी दीगर अफ़राद ने हदीसे ग़दीर को नक़्ल किया है।तफ़सीरे तबरी जिल्द 3 पेज 428)

(मोजमुल अवसत जिल्द 3 पेज 133)

पाँचवी सदी में हदीसे ग़दीर के रावी

पाँचवी सदी हिजरी में 24 उलामा ए अहले सुन्नत ने इस हदीस को नक़्ल किया है जैसे:

क़ाज़ी अबी बक्र बाक़लानी ( 403)

अबू इस्हाक़ सालबी ( 427)

अबू मंज़ूर सआली ( 429)

हाफ़िज़ अबू उमर क़ुरतबी ( 463)

अबू बक्र ख़तीब बग़दादी ( 436)

इब्ने मग़ाज़ेली शाफ़ेई ( 483)

हाफ़िज़ हसकानी हनफ़ी ( 490)

(अत तमहीद पेज 169)

(अल कश्फ़ वल बयान पेज 181)

(सेमारुल क़ुलूब पेज 636 रक़्म 1068)

(अल इसतीआब क़िस्मे सिवम 1099)

(तारीख़े बग़दाद जिल्द 8 पेज 290)

(अल मनाक़िब अली बिन अबी तालिब (अ) पेज 25 हदीस 27)

(शवाहिदुत तनज़ील जिल्द 1 पेज 201 हदीस 211)

छठी सदी में हदीसे ग़दीर के रावी

छठी सदी हिजरी में 20 उलामा ए अहले सुन्नत ने इस हदीस को नक़्ल किया है जैसे:

हुज्जतुल इस्लाम ग़ज़ाली ( 505)

जारुल्लाह ज़मख़्शरी ( 538)

मुवफ़्फ़क़ बिन अहमद ख़ारज़मी ( 568)

इब्ने असाकर दमिश्क़ी ( 571) वग़ैरह

(रबीउल अबरार जिल्द 1 पेज 84)

सातवी सदी में हदीसे ग़दीर के रावी

सातवी सदी हिजरी में 21 उलामा ए अहले सुन्नत ने इस हदीस को नक़्ल किया है जैसे:

फ़ख़रुद्दीन राज़ी शाफ़ेई ( 606)

इब्ने असीर जज़री ( 630)

इब्ने अबिल हदीद मोतज़ली ( 655)

हाफ़िज़ गंजी शाफ़ेई ( 658)

हाफ़िज़ मुहिब्बुद्दीन तबरी शाफ़ेई ( 694) वग़ैरह

(अत तफ़सीरुल कबीर जिल्द 3 पेज 636)

(असदुल ग़ाबा जिल्द 1 पेज 364)

(शरहे नहजुल बलाग़ा जिल्द 1 पेज 13)

(किफ़ायतुल तालिब पेज 16)

आठवीं सदी में हदीसे ग़दीर के रावी

आठवीं सदी हिजरी में 18 उलामा ए अहले सुन्नत से इस हदीस से इस हदीस को नक़्ल किया है जैसे:

शैख़ुल इस्लामी जवीनी ( 722)

जमालुद्दीन ज़रन्दी ( 750)

क़ाज़ी ऐजी शाफ़ेई ( 756)

इब्ने कसीरे शाफ़ेई ( 774)

सैयद अली हमदानी ( 786)

सादुद्दीन तफ़ताज़ानी शाफ़ेई ( 791) वग़ैरह

(फ़राउदुस समतैन जिल्द 2 पेज 274)

(नज़्म दुररुस समतैन पेज 109)

(अल मवाकिफ़ पेज 405)

(अल बेदायह वन निहायह जिल्द 5 पेज 209)

(अल मवद्दतुल क़ुरबा मवद्दत पंजुम)

(शरहे मक़ासेदा जिल्द 5 पेज 273)

नवीं सदी में हदीसे ग़दीर के रावी

नवीं सदी हिजरी में 16 उलामा ए अहले सुन्नत ने इस हदीस को नक़्ल किया है जैसे:

हाफ़िज़ अबिल हसन हैसमी शाफ़ेई ( 870)

हाफ़िज़ इब्ने ख़लदून मालिकी ( 808)

सैयद शरीफ़ जुरजानी हनफ़ी ( 816)

इब्ने हजरे असक़लानी शाफ़ेई ( 852)

इब्ने सब्बाग़ मालिकी ( 855)

अलाऊद्दीन क़ौशजी ( 889) वग़ैरह

(मजमउज़ ज़वायद जिल्द 9 पेज 165)

(मुक़द्दम ए इब्ने ख़लदून जिल्द 1 पेज 246)

(शरहे मवाक़िफ़ जिल्द 8 पेज 360)

(अल इसावह जिल्द 7 पेज 780)

(अल फ़ुसूलुल मुहिम्मा पेज 24)

(शरहे तजरीद पेज 477)

दसवीं सदी में हदीसे ग़दीर के रावी

दसवीं सदी हिजरी में 14 उलामा ए अहले सुन्नत ने इस हदीस को नक़्ल किया है जैसे:

हाफ़िज़ जलालुद्दीन सुयुती ( 911)

नुरूद्दीन समहूदी शाफ़ेई ( 911)

हाफ़िज़ अबिल अब्बास क़सतानी शाफ़ेई ( 923)

इब्ने हजरे हैसमी शाफ़ेई ( 974)

मुत्तक़ी हिन्दी (वग़ैरह)

(तारिख़ुल ख़ुलाफ़ा पेज 114)

(अस सवायक़ुल मोहरिक़ा पेज 25)

(कंज़ुल उम्माल जिल्द 2 पेज 154)

गवारहवीं सदी में हदीसे ग़दीर के रावी

गयारहवीं सदी में 12 उलामा ए अहले सुन्नत ने इस हदीस के नक़्ल किया है जैसे:

ज़ैनुद्दीन मनावी शाफ़ेई ( 1031)

नूरुद्दीन हलबी शाफ़ेई ( 1044) वग़ैरह

कंनूज़ुल हक़ायक़ जिल्द 2 पेज 118

अस सीरतुल हलबीया जिल्द 3 पेज 274

बारहवीं सदी में हदीसे ग़दीर के रावी

बारहवीं सदी हिजरी में 13 उलामा ए अहले सुन्नत ने इस हदीस को नक़्ल किया है जैसे:

ज़याऊद्दीन मुक़बेली ( 1108)

इब्ने हमज़ा हर्रानी ( 1120)

अबी अब्दिल्लाह ज़रक़ावी मालिकी ( 1122) वग़ैरह

(अल बयान वत तारीफ़ जिल्द 3 पेज 74)

(शरहुल मवाहिब जिल्द 7 पेज 13)

तेरहवीं सदी में हदीसे ग़दीर के रावी

तेरहवीं सदी हिजरी में 12 उलामा ए अहले सुन्नत ने इस हदीस को नक़्ल किया है जैसे:

अबुल इरफ़ान मुहम्मद बिन सब्बान शाफ़ेई ( 1206)

क़ाज़ी शौकानी ( 1250)

शहाबुद्दानी आलूसी ( 1270) वग़ैरह

(अल असआफ़ दर हाशिया नूरुल अबसार पेज 152)

(रुहुल मआनी जिल्द 6 पेज 194)

चौदहवीं सदी में हदीसे ग़दीर के रावी

चौदहवीं सदी हिजरी में 19 उलामा ए अहले सुन्नत ने इस हदीस को नक़्ल किया है जैसे:

सैयद अहमद बिन ज़ैनी दहलान शाफेई ( 1304)

सैयद मोमिन शबलंजी

शेख़ मुहम्मद अबहदू मिस्री ( 1323)

(तफ़सीरे अल मनार जिल्द 6 पेज 464)

सैयद अब्दुल हमीद आलूसी ( 1324)

अब्दुल फ़त्ताह अब्दुल मक़सूद वग़ैरह

(नसरुल लयाली पेज 166)


हदीसे ग़दीर का तवातुर

हर वह अहम तारिख़ी वाक़ेया जिस में उम्मत के रहबर की बात हो और बहुत सी जमाअत के दरमियान वह वाक़ेया पेश आया हो , इस बात का तक़ाज़ा करता है कि वह मुतवातिर हो , मख़्सूसन अगर इस वाक़ेया में अज़ीमुश शान रहबराने इलाही ने ऐहतेमाम भी किया हो और हर मुल्क व हर शहर के लोग इस वाक़ेया के शाहिद व नाज़िर हों , नीज़ उस रहबर की तरफ़ से इस वाक़ेया को नश्र करने की मज़ीद ताकीद भी हो तो ऐसे हालात के पेशे नज़र क्या यह दावा किया जा सकता है कि ऐसे वाक़ेया को एक या दो या चंद लोग बयान करेंगें ? या यक़ीनी तौर पर इस वाक़ेया की नक़्ल मुतावातिर होगी ? हदीसे ग़दीर इसी क़िस्म का वाक़ेया है , क्यो कि पैग़म्बरे अकरम (स) ने इस हदीस को मुख़तलिफ़ इस्लामी मुमालिक और मुख़्तलिफ़ इस्लामी शहरों के दसियों हज़ार लोगों के मजमे में बयान किया है और ताकीद फ़रमाई कि इस वाक़ेया के दरमियान बयान किया जाये।

हदीसे ग़दीर के तवातुर का इक़रार करने वाले उलामा

1. जलालुद्दीन सुयूती

2. अल्लामा मनावी

3. अल्लामा अज़ीज़ी

4. मुल्ला अली क़ारी हनफ़ी

(अल फ़वायदुल मुताकासिरा फ़ी अख़बारिल मुतावातिरा)

(अत तयसीर फ़ी शरहे जामेइस सग़ीर जिल्द 2 पेज 442)

(शरहे जामेइस सग़ीर जिल्द 3 पेज 360)

(अलमिरक़ात फी शरहिल मिशकात जिल्द 5 पेज 568)

5. मीरज़ा मख़दूम बिन मीर अब्दुल बाक़ी

6. मुहम्मद बिन इस्माईले यमानी

7. मुहम्मद सद्र आलिम

8. शेख़ अब्दुल्लाह शाफ़ेई

9. शेख़ ज़ियाऊद्दीन मुक़बेली

10. इब्ने कसीरे दमिश्क़ी

11. अबी अब्दिल्लाह हाफ़िज़ ज़हबी

12. इब्ने जज़री

13. शेख़ हुसामुद्दीन मुत्तक़ी

14. जमालुद्दीन हुसैनी शीराज़ी

15. हाफ़िज़ शहाबुद्दीन अबुल फ़ैज़ अहमद बिन मुहम्मद बिन सदीक़ ग़मारी मग़रबी

मौसूफ़ कहते हैं: हदीसे पैग़म्बरे इस्लाम (स) से मुतावातिर तरीक़ों से बयान हुई है और अगर सबकी सनद बयान करें तो बहुत तूलानी फ़ेहरिस्त हो जायेगी , लेकिन बहस कामिल होने की वजह सिर्फ़ नक़्ल करने वालों की तरफ़ इशारा करते हैं और जो शख़्स इन सब को सनदों के बारे में मज़ीद मालूमात हासिल करना चाहे वह हमारी किताब अल मुतावातिर का मुतालआ करे।

(नफ़हातुल अज़हार जिल्द 6 पेज 121)

(नफ़हातुल अज़हार जिल्द 6 पेज 126)

(नफ़हातुल अज़हार जिल्द 6 पेज 127)

(अल अल अरबईन)

(नफ़हातुल अज़हार जिल्द 6 पेज 125)

(अल बिदायह वन निहायह)

(तुरुक़े हदीसे मन कुन्ता मौला)

(असनल मतालिब)

(अल अरबईन)

(तशनीफ़िल आज़ान पेज 77)

हदीसे ग़दीर की सेहत को इक़रार करने वाले उलामा

बहुत से उलामा ए अहले सुन्नत ने हदीसे गदीर की सेहत का इक़रार किया है जैसे:

1. इब्ने हजरे हैतमी

मौसूफ़ कहते हैं: हदीसे ग़दीर सही है और उसमें किसी तरह कोई शक व शुब्हा नही है , एक जमाअत जैसे तिरमिज़ी , निसाई और अहमद ने इसको नक़्ल किया है और वाक़ेयन इसके तरीक़े ज़्यादा हैं।

नीज़ वह कहते हैं: इस हदीस की बहुत सी सनद सही और हसन हैं और जो शख्स इस हदीस को ज़ईफ़ क़रार देना चाहे , उसके लिये कोई दलील नही है , नीज़ अगर कोई शख़्स यह कहे कि अली (अ) उस वक़्त यमन में थे तो उस पर तवज्जो नही की जायेगी , क्यो कि यह बात साबित हो चुकी है कि वह यमन से वापस आ गये थे और हुज़्जतुल वेदा में पैग़म्बरे अकरम (स) के साथ थे और बाज़ लोगों का यह कहना कि जाली है तो उसका क़ौल भी बातिल है क्योकि यह जुमला ऐसे तरीक़ों से वारिद हुआ है कि ज़हबी ने इसके बहुत से तरीक़ो को सही माना है।

(अस सवाएक़े मोहरेक़ा पेज 42, 43)

2. हाकिम नैशा पुरी

मौसूफ़ ने ज़ैद बिन अरक़म से हदीस नक़्ल करने के बाद उसको सही माना है और वह इस बात की वज़ाहत करते हैं कि इस हदीस में शैख़ैन के नज़दीक सेहत के सारे शरायत पाये जाते हैं।

(मुसतदरके हाकिम जिल्द 3 पेज 109)

3. हलबी

मौसूफ़ ने हदीसे ग़दीर को नक़्ल करने के बाद कहा: यह एक ऐसी हदीस है जो सही है और सही व हसन सनदों के साथ नक़्ल हुई है और जो शख्स इस हदीस को शक व शुबहे की नज़र से देखे तो उसकी तरफ़ तवज्जो नही की जायेगी।

(अस सीरतुल हलबीया जिल्द 3 पेज 274)

4. इब्ने कसीरे दमिश्क़ी

वह अपने उस्ताद ज़हबी से हदीस नक़्ल करने के बाद इसकी सेहत के क़ायल हुए हैं।

(अल बिदायह वन निहायह जिल्द 5 पेज 288)

5. तिरमिज़ी

वह हज़रत अली (अ) के मनाक़िब में इस हदीसे ग़दीर को नक़्ल करने के बाद कहते हैं कि यह हदीस हसन और सही है।

(सही तिरमिज़ी जिल्द 2 पेज 298)

6. अबू जाफ़रे तहावी

मौसूफ़ हदीसे ग़दीर को नक़्ल करने के बाद कहते हैं कि यह हदीस सनद के लिहाज़ से सही है और किसी ने भी इस हदीस के रावियों पर ऐतेराज़ नही किया है।

7. इब्ने अब्दुल बर्र क़ुरतुबी

मौसूफ़ अक़्दे उख़ूवत , ऐताये इल्म और ग़दीर की हदीस के बारे में कहते हैं: यह तमाम रिवायात साबित शुदा अहादिस में से हैं।

(मुश्किलुल आसार जिल्द 2 पेज 308)

(अल इस्तिआब जिल्द 2 पेज 373)

8. सिब्ते बिन जौज़ी

मौसूफ़ तहरीर करते हैं: अगर कोई शख्स यह ऐतेराज़ करे कि यह रिवायत कि उमर ने हज़रत अली (अ) से कहा जईफ़ है तो हम उसके जवाब में कहेगें , यह रिवायत सही है।

(तज़किरतुल ख़वास पेज 18)

9. आसेमी

वह अपनी किताब ज़ैनुल फ़ता फ़ी तफ़सीरे सूरते हल अता में इस हदीस के सिलसिले से कहते हैं: यह ऐसी हदीस है जिसको उम्मत ने क़बूल किया है और उसूल के मुवाफ़िक़ है।

(ज़ैनुल फ़ता)

10. आलूसी

आलूसी अपनी तफ़सीर में इस हदीस को नक़्ल करने के बाद कहते हैं: हमारे नज़दीक यह साबित है कि पैग़म्बरे अकरम (स) ने हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अली बिन अबी तालिब (अ) के हक़ में रोज़े ग़दीर फ़रमाया: ……

(रुहुल मआनी जिल्द 6 पेज 61)

11. इब्ने हजरे असक़लानी

मौसूफ़ कहते हैं: लेकिन हदीसे को तिरमिज़ी और निसाई ने नक़्ल किया है और उसके बहुत से तरीक़े हैं और इब्ने उक़दा ने तमाम तरीक़ों को एक मुसतक़िल किताब में बयान किया है और उसकी बहुत सी सनद सही और हसन है।

(फ़तहुल बारी जिल्द 7 पेज 61)

12. इब्ने मग़ाज़ेली शाफ़ेई

उन्होने अबुल क़ासिम फ़ज़्ल बिन मुहम्मद से हदीसे ग़दीर के बारे में नक़्ल किया है वह कहते हैं: यह हदीस सही है जिस को तक़रीबन 100 असहाब मिन जुमला अशर ए मुबश्शेरा ने पैग़म्बरे अकरम (स) से नक़्ल किया है और यह हदीस इतनी मुसल्लम है कि जिसमें किसी तरह का कोई ऐब नही दिखाई देता , सिर्फ़ सिर्फ़ हज़रत अली (अ) की यह फ़ज़ीलत है , एक ऐसी फ़ज़ीलत जिसमे कोई दूसरा शरीक नही है।

(मनाक़िबे अली बिन अबी तालिब (अ) पेज 26)

13. फ़क़ीहे अबू अब्दुल्लाह बग़दादी ( 330)

उन्होने ने भी अपनी किताब अल अमाली में हदीसे ग़दीर को सही माना है।

14. अबू हामिद ग़ज़ाली

मौसूफ़ कहते हैं: (इस हदीस की) हुज्जत और दलील वाज़ेह है और सभी मुसलमानों ने इस हदीस की तहरीर पर इजमा किया है कि पैग़म्बरे अकरम (स) ने रोज़े ग़दीरे ख़ुम तमाम हाजियों के दरमियान फ़रमाया: उस मौक़े पर उमर ने कहा , मुबारक हो मुबारक...।

(सिर्रुल आलमीन पेज 21)

15. हाफ़िज़ इब्ने अबिल हदीद मोतज़ेली

मौसूफ़ ने अपनी किताब शरहे नहजुल बलाग़ा में हदीसे ग़दीर को हज़रत अली (अ) के फ़ज़ायल में मशहूर व मारूफ़ हदीस शुमार की है।

(शरहे इब्ने अबिल हदीद जिल्द 9 पेज 166 ख़ुतबा 154)

16. हाफ़िज़ अबू अब्दुल्लाह गंजी शाफ़ेई

वह कहते हैं कि यह हदीस मशहूर और हसन है , इसके तमाम ही रावी सिक़ह हैं और बाज़ सनद को दूसरी सनद के साथ ज़मीमा करने से इस हदीस की सेहत पर दलील बन जाती है।

(किफ़ायतुत तालिब पेज 61)

17. शेख अबुल मकारिम अलाऊद्दीन समनानी ( 736)

मौसूफ़ हदीसे ग़दीर के ज़ैल में कहते हैं: यह हदीस उन अहादिस में से है जिसकी सेहत पर उलामा का इत्तेफ़ाक़ है लिहाज़ा आपको सैयदुल औवलिया में शुमार किया जाता है।अल उरवा ले अहलिल ख़ुलवा पेज 422)

18. शमसुद्दीन ज़हबी शाफ़ेई ( 748)

मौसूफ़ ने हदीसे ग़दीर के मुतअल्लिक़ एक मुसतक़िल किताब लिखी है , चुनाँचे उन्होने इस हदीस की सनद की छान बीन करने के बाद इस हदीस की बहुत सी सनदों को सही क़रार दिया है , नीज़ मुसतदरके हाकिम के ख़ुलासा इस हदीस के सही होने का इक़रार किया है।

(तुरुक़े मन कुन्तो मौला)

(तलख़ीसुल मुसतदरक जिल्द 3 पेज 613 हदीस 6272)

इसी तरह मौसूफ़ अपनी किताब रिसालतुन फ़ी तुरुक़े हदीसे मन कुन्तो मौला में कहते हैं कि हदीस मन कुन्तो मौला फ़ अलीयुन मौला उन मुतवातिर हदीसों में से है कि जिसको पैग़म्बरे अकरम (स) ने कतई तौर पर बयान किया है और उनमें से बहुत से सही और हसन तरीक़े पाये जाते हैं।

(तुरुक़े हदीसे मन कुन्तो मौला पेज 11)

उसके बाद मौसूफ़ इस हदीस के तरीक़ो को नक़्ल करते हैं और दसियों तरीक़ो के बारे में सेहत या क़ुव्वत या विसाक़त का इक़रार करते हैं।

19. हाफ़िज़ नूरुद्दीन हैसमी ( 807)

मौसूफ़ ने इस हदीस को मुख़्तलिफ़ तरीक़ो से बयान किया है और हदीसे ग़दीर की बहुत सी सनदों को रेजाल को रेजाले सही माना है।

(मजमउज़ ज़वायद जिल्द 9 पेज 104 से 109)

20. शहाबुद्दीन क़सतानी ( 923)

मौसूफ़ भी हदीसे ग़दीर के ज़ैल में कहते हैं: इस हदीस के बहुत से तरीक़े हैं , इब्ने उक़दा ने उसको तरीक़ों को एक मुसतक़िल किताब में बयान किया है और इस हदीस की बहुत सी सनदें सही और हसन हैं।

(अल मवाहिवुल लदुन्निया जिल्द पेज 365)

21. शेख़ नूरुद्दीन हरवी हनफ़ी ( 1014)

मौसूफ़ इस हदीस के बारे में कहते हैं: यह एक ऐसी हदीस है जिसके बारे में ज़रा भी शक व शुब्हा नही किया जा सकता , बल्कि बहुत से हुफ़्फ़ाज़े हदीस ने इस हदीस को मुतावातिर शुमार किया है।

(अल मिरक़ात फ़ी शरहिल मिशकात जिल्द 10 पेज 464 हदीस 6091)

22. शेख़ अहमद बिन बाकसीर मक्की ( 1047)

वह इस हदीस के बारे में कहते हैं: इस रिवायत को बज़रा ने सही रेजाल के ज़रिये फ़ित्र बिन ख़लीफ़ा से नक़्ल किया है जो सिक़ह है।

(वसीलतुल मआल फ़ी मनाक़िबिल आल पेज 117, 118)

23. मीरज़ा मुहम्मद बदख़शी

मौसूफ़ हदीसे ग़दीर के बारे में कहते हैं: यह हदीस सही और मशहूर है और सिवाए मुतअस्सिब और मुन्किर के जिसके क़ौल का कोई ऐतेबार नही होता , किसी ने इसमें शक व शुब्हे नही किया है , क्यो कि हदीसे ग़दीर के बहुत से तरीक़े हैं।

(नज़लुल अबरार पेज 54)

24. अबुल इरफ़ान सब्बान शाफ़ेई ( 1206)

मौसूफ़ हदीसे ग़दीर को नक़्ल करने बाद कहते हैं: इस हदीस को 30 असहाबे पैग़म्बर (स) ने रिवायत किया है , जिसके बहुत से तरीक़े सही या हसन हैं।

(असआफ़ुर राग़ेबीन दर हाशिय ए नूरूल अबसार पेज 153)

25. नासिरूद्दीन अलबानी

मौसूफ़ हदीसे ग़दीर के बारे में कहते हैं: यह हदीस सही है जिसको सहाबा की एक जमाअत ने नक़्ल किया है।

(अल सुन्नह इब्ने अबी आसिम बा तहक़ीक़े अलबानी जिल्द 2 पेज 566)

अलबानी और हदीसे ग़दीर की सनद

अलबानी ने अपनी मोजम अहादीस सिलसिलतुल अहादिसिस सहीहा जिसमें सहीहुस सनद अहादीस को नक़्ल किया है और उनको सही माना है , इस हदीस (ग़दीर) को भी नक़्ल करने के बाद कहा है: हदीसे ग़दीर ज़ैद बिन अरक़म , साद बिन अबी वक़ास , बुरैदा बिन हसीब , अली बिन अबी तालिब , अबू अय्यूब अंसारी , बरा बिन आज़िब , अब्दुल्लाह बिन अब्बास , अनस बिन मालिक , अबी सईद और अबू हुरैरा से नक़्ल हुई है।

अ. हदीसे जै़द बिन अरक़म , पाँच सनदों के साथ नक़्ल हुई है तो सबकी सब सहीहुस सनद हैं:

1. अबुल तुफ़ैल ने ज़ैद बिन अरक़म से

2. मैमून अबी अब्दिल्लाह ने ज़ैद बिन अरक़म से

3. अबी सुलेमान मुवज़्ज़िन ने ज़ैद बिन अरक़म से

4. यहया बिन जोअदा ने ज़ैद बिन अरक़म से

5. अतिय ए औफ़ी ने ज़ैद बिन अरकम से

हदीसे साद बिन अबी वक़ास तीन तरीक़ों से बयान हुई है जिनमें सभी सहीहुस सनद हैं:

1. अब्दुर्रहमान बिन साबित से साद ने

2. अब्दुल वाहिद बिन ऐमन से साद ने

3. ख़ुसैमा अब्दुर्रहमान से साद ने

ब. हदीस बुरैद भी तीन तरीक़ों से बयान हुई है जिनमे सभी सहीहुस सनद हैं:

1. इब्ने अब्बास ने बुरैद से

2. फ़रजंदे बुरीदा ने बुरैद से

3. ताऊस ने बरीद से

स. हज़रत अली (अ) से हदीसे ग़दीर 9 तरीक़ों से बयान हुई है जिनमें सभी सहीहुस सनद हैं:

1. अम्र बिन सईद ने इमाम अली (अ) से

2. ज़ाज़ान बिन उमर ने इमाम अली (अ) से

3. सईद बिन वहब ने इमाम अली (अ) से

4. ज़ैद बिन यसी ने इमाम अली (अ) से

5. शरीक ने इमाम अली (अ) से

6. अब्दुर्रहमान बिन अबी लैला ने इमाम अली (अ) से

7. अबू मरियम ने इमाम अली (अ) से

8. इमाम अली (अ) के एक सहाबी ने ने इमाम अली (अ) से

9. तलबा बिन मसरफ़ ने इमाम अली (अ) से

ह. हदीसे अबू अय्यूब अँसारी , रियाह बिन हारिस से नक़्ल हुई है जिसकी सनद के सभी रेजाल सिक़ह हैं।

व. हदीसे बरा बिन आज़िब , अदी बिन साबित से नक़्ल हुई है जिसके सभी रेजाल सिक़ह हैं।

ल. हदीसे इब्ने अब्बास , उमर बिन मैमून से रिवायत हुई है जिसकी सनद भी सही है।

ष. हदीसे अनस बिन मालिक , हदीसे अबू सईद और हदीसे अबू हुरैरा , उमैरा बिन साद से नक़्ल हुई है जिनमें सभी सही और मुवस्सक़ सनद मौजूद हैं।

इस हदीस की मुख़्तलिफ़ सनद को नक़्ल करने और उनकी तसहीह के बाद अलबानी साहब कहते हैं: अब जबकि यह मतलब मालूम हो गया तो हम कहते हैं कि इस हदीस की तफ़सील और उसकी सेहत को बयान करने का मक़सद यह है कि शैख़ुश इस्लाम इब्ने तैमिया ने इस हदीस के पहले हिस्से को जईफ़ क़रार दिया है और दूसरे हिस्से को बातिल होने का गुमान किया है लेकिन मेरी नज़र में यह इब्ने तैमीया साहब ने मुबालेग़ा और हदीस को ज़ईफ़ क़रार देने में जल्दी बाज़ी से काम लिया है और इस हदीस के तरीक़ों को जमा करने और उनमें ग़ौर व फ़िक्र करने से पहले ही फ़तवा दे दिया है।

(सिलसिलतुल अहादिसिस सहीहा हदीस 1750)

हदीसे तहनीयत

अहले सुन्नत के मशहूर व मारूफ़ मुवर्रिख़ मीर ख़्वान्द अपनी किताब रौज़तुस सफ़ा में हदीसे ग़दीर को नक़्ल करने के बाद कहते हैं: उस वक़्त रसूले इस्लाम (स) अपने मख़्सूस खै़मे में तशरीफ़ रखते थे , उस वक़्त आपने हज़रत अली (अ) को एक दूसरे ख़ैमे में बैठने का हु्क्म दिया और फिर तमाम लोगों से फ़रमाया: हज़रत अली (अ) के ख़ैमे में जाकर उनको तैहनियत और मुबारकबाद पेश करो।

जब तमाम मर्दों ने हज़रत अमीर (अ) को मुबारक बाद पेश कर दी तो रसूले अकरम (स) ने अपनी अज़वाज को हुक्म दिया कि वह भी हज़रत अली (अ) के पास जाकर उनको मुबारकबाद पेश करें , चुनाँचे उन्होने ने भी मुबारक बाद पेश की , तहनीयत पेश करने वालों में उमर बिन ख़त्ताब भी थे जिन्होने इस तरह से मुबारक बाद पेश की: मुबारक हो मुबारक , ऐ फ़रज़ंदे अबी तालिब , आप मेरे और तमाम मोमिनीन व मोमिनात के मौला (आक़ा) बन गये।

(तारिख़े रौज़तुस सफ़ा जिल्द 2 पेज 541

हदीसे तहनीयत के अहले सुन्नत रावी

इस मज़मून को अहले सुन्नत के उलामा ए हदीस , तफ़सीर और तारीख़ ने नक़्ल किया है जिनमें से बाज़ ने इस (हदीसे तहनियत) को मुसल्लेमात में माना है और बाज़ दूसरे उलामा ने इसको सही सनदों के साथ बाज़ सहाबा से नक़्ल किया है जैसे , इब्ने अब्बास , अबू हुरैरा , बरा बिन आज़िब और ज़ैद बिन अरक़म।

हदीसे तहनीयत को नक़्ल करने वाले हज़रात कुछ इस तरह हैं:

1. हाफ़िज़ अबू बक्र अब्दुल्लाह बिन मुहम्मद बिन अबी शैबा ( 235)

2. अहमद बिन हंबल ( 241)

3. हाफ़िज़ शैबानी नसबी ( 303)

4. हाफ़िज़ अबू यअली मूसली ( 307)

(अल मुसन्नफ़ जिल्द 12 पेज 78 हदीस 12167)

(अल मुसनद जिल्द 5 पेज 355 हदीस 18011)

(मुसनदे शैबानी नसवी)

(मुसनदे अबी यएली)

5. हाफ़िज़ अबू जाफ़र मुहम्मद बिन जरीरे तबरी ( 310)

6. हाफ़िज़ अली बिन उमर दारक़ुतनी बग़दादी ( 358)

7. क़ाज़ी अबू बक्र बाक़लानी ( 403)

8. अबू इस्हाक़ सालबी ( 427)

9. हाफ़िज़ अबू बक्र बैहक़ी ( 458)

10. हाफ़िज़ अबू बक्र ख़तीब बग़दादी ( 463)

11. फ़क़ीहे शाफ़ेई अबुल हसन बिन मग़ाज़ेली ( 483)

12. अबू हामिद ग़ज़ाली ( 505)

13. शहरिसतानी ( 548)

14. ख़तीब ख़ाऱज़मी ( 568)

15. फ़ख़रे राज़ी ( 606)

16. अबू सादात इब्ने असीर शैबानी ( 606)

17. इज़्ज़ुद्दीन अबुल हसन इब्ने असीरे शैबानी ( 630)

18. हाफ़िज़ अबू अब्दिल्लाह गंजी शाफ़ेई ( 658)

(जामेउल बयान जिल्द 3 पेज 428)

(अससवाएक़े मोहरेक़ा पेज 44)

(अत तमहीद पेज 171)

(अल कश्फ़ वल बयान सूरये मायदा आयत 67 के ज़ैल में)

(अल फ़ुसुलुल मुहिम्मा पेज 40)

(तारीख़े बग़दाद जिल्द 8 पेज 290)

(मनाक़िबे अली (अ) पेज 18 हदीस 24)

(सिर्रुल आलमीन पेज 21)

(अल मेलल वन नेहल जिल्द 1 पेज 145)

(अल मनाक़िब पेज 94 फ़स्ल 14)

(अत तफ़सीरिल कबीर जिल्द 12 पेज 49)

(अन निहायह जिल्द 5 पेज 228)

(उसदुल ग़ाबा जिल्द 4 पेज 108)

(किफ़ायतुत तालिब पेज 62)

19. सिब्ते इब्ने जौज़ी हनफ़ी ( 654)

20. मुहिब्बुद्दीन तबरी ( 694)

21. शेख़ुल इस्लाम हमूई ( 722)

22. निज़ामुद्दीन नैशा पुरी

23. वलीयुद्दीन ख़तीब

24. जमालुद्दीन ज़रनदी

25. इब्ने कसीरे दमिश्क़ी

26. तक़ीयुद्दीन मक़रीज़ी

27. नूरुद्दीन इब्ने सबाग़े मालिकी

28. मुत्तक़ी हिन्दी

29. अबुल अब्बास शहाबुद्दीन क़सतानी

30. इब्ने हजर हैसमी

31. शमसुद्दीन मनावी शाफ़ेई

32. अबू अब्दिल्लाह ज़रक़ावी मालिकी

(तज़किरतुल ख़वास पेज 29)

(अर रियाज़ुन नज़रा जिल्द 3 पेज 113)

(फ़रायदुस समतैन जिल्द 1 पेज 77 हदीस 44)

(ग़रायबुल क़ुरआन जिल्द 6 पेज 194)

(मिशकातुल मिसबाह जिल्द 3 पेज 360 हदीस 6103)

(नज़्म दुर्रुस समतैन पेज 109)

(अल बिदायह वन निहायब जिल्द 5 पेज 229)

(अल ख़ुतत जिल्द 1 पेज 388)

(अल फ़ुसुलुल मुहिम्मा पेज 40)

(कंज़ुल उम्माल जिल्द 13 पेज 133 हदीस 36420)

(अल मवाहिवुल लदुन्निया जिल्द 3 पेज 365)

(अस सवाएक़े मोहरेक़ा पेज 44)

(फ़ैज़ुल क़दीर जिल्द 6 पेज 218)

(शरहुल मवाहिब जिल्द 7 पेज 13)

33. सैयद अहमद ज़ैनी दहलान मक्की शाफ़ेई (वग़ैरह

(अल फ़ुतूहातुल इस्लामी जिल्द 2 पेज 306)

मुवल्लेफ़ीने हदीसे ग़दीर

क़दीम ज़माने से आज तक बहुत से उलामा ए अहले सुन्नत ने हदीसे ग़दीर के सिलसिले में बहुत सी किताबें लिखी हैं और उनमें हदीस की सनद को ज़िक्र किया है जैसे:

1. मुहम्मद बिन जरीरे तबरी

मौसूफ़ ने अपनी किताब अल विलायह फ़ी तुरुक़े हदीसिल ग़दीर तालिफ़ की है।

इब्ने कसीर कहते हैं: अबू जाफ़र मुहम्मद बिन जरीरे तबरी (साहिबे तफ़सीर व तारीख़) ने इस हदीस पर मख़्सूस तवज्जो की है और इस सिलसिल में दो जिल्द किताबें तालीफ़ की हैं , नीज़ इस हदीस के तरीक़ों और अल्फ़ाज़ को जमा किया है।

ज़हबी कहते हैं: हदीसे ग़दीर के तरीक़ों के बारे में दो जिल्द किताबें इब्ने जरीर की देखीं , जिनमें तरीकों की कसीर तादाद ने मुझे हैरान कर दिया।अल बिदायह वन निहायह जिल्द 5 पेज 183

(तबक़ातुल हुफ़्फ़ाज़ जिल्द 2 पेज 54)

2. हाफ़िज़ बिन उक़दा

मौसूफ़ ने अल विलायह फ़ी तुरुक़े हदीसिल ग़दीर तालीफ़ की , जिसमें इस हदीस के 150 तरीक़े नक़्ल किये हैं।

इब्ने हजर हदीसे ग़दीर के बारे में कहते हैं: इस हदीस को इब्ने उक़दा ने सही क़रार दिया है और उसके तरीक़ों को जमा करने में ख़ास तवज्जो दी है और उसको 70 या उससे ज़्यादा सहाबा से नक़्ल किया है।

(तहज़ीबुत तहज़ीब जिल्द 7 पेज 337)

3. अबू बक्र जुआली

मौसूफ़ ने इस बारे में किताब मन रवा हदीसे ग़दीरे ख़ुम तालीफ़ की है और हदीसे ग़दीर को 125 तरीक़ों से नक़्ल किया है।

4. अली बिन उमर दारक़ुतनी

गंजी शाफ़ेई कहते हैं: हाफ़िज़ दार क़ुतनी ने इस हदीस के तरीक़ो को एक जिल्द किताब में जमा किया है।

(अल ग़दीर जिल्द 1 पेज 145)

(अल ग़दीर जिल्द 1 पेज 145)

5. शमसुद्दीन ज़हबी

उन्होने भी एक किताब बनाम तुरुक़े हदीसे मन कुन्तो मौला तालीफ़ की है , जिसमें इस हदीस की दसियों सही , हसन और मुवस्सक़ सनदों को नक़्ल किया है , उन्होने ख़ुद इस किताब की तरफ़ इशारा किया है , चुनाँचे मौसूफ़ कहते हैं: लेकिन हदीसे मन कुन्तो मौला की बहुत अच्छी अच्छी सनदें हैं जिनको मैंने एक मुसतक़िल किताब में जमा किया है।

(तज़किरतुल हुफ़्फ़ाज़ जिल्द 3 पेज 231)

6. जज़री शाफ़ेई

मौसूफ़ ने हदीसे ग़दीर के तवातुर को साबित करने के लिये एक मुसतक़िल रिसाला लिखा है जिसका नाम असनल मतालिब फ़ी मनाक़िबे सैयदेना अली बिन अबी तालिब क़रार दिया है और उस किताब में हदीसे ग़दीर के 80 तरीक़े नक़्ल किये हैं।

(अल ग़दीर जिल्द 1)

7. अबू सईद सजिसतानी़

मौसूफ़ ने भी हदीसे ग़दीर के सिलसिले में अद दिरायह फ़ी हदीसिल विलायह नामी किताब लिखी है।

(नफ़हातुल अज़हार)

8. अबुल क़ासिम उबैदुल्लाह हसकानी

मौसूफ़ ने इस हदीस के सिलसिले में एक किताब बनाम दुआतुल हुदात इला अदा ए हक़्क़िल मवालात तालीफ़ की है , जिसकी तरफ़ शवाहिदुत तंज़ील में इशारा हुआ है।

(शवाहिदुत तंज़ील जिल्द 1 पेज 190 हदीस 246)

9. इमामुल हरमैन जवीनी

कंदूज़ी हनफ़ी ने किताब यनाबीउल मवद्दत में हदीसे ग़दीर के सिलसिले में जवीनी की तरफ़ एक मुसतक़िल किताब की निस्बत दी है।

(यनाबीउल मवद्दत पेज 36

हदीसे ग़दीर की दलादत

हदीसे ग़दीर में लफ़्ज़े मौला सर परस्त , इमाम और औला बित तसर्रुफ़ के मायने में हैं , इस मतलब को मुख़्तलिफ़ तरीक़ों से साबित किया जा सकता है:

1. ख़ुद लफ़्ज़ से इसी मायना का तबादुर होना

लफ़्ज़े वली और मौला लुग़ते अरब में अगरचे मुख़्तलिफ़ मायना के लिये इस्तेमाल होता है लेकिन जब किसी क़रीने से ख़ाली हो तो अरब उसको सर परस्त और औला बित तसर्रुफ़ के मायना में लेते हैं (और यही मायना इमामत के हैं) जबकि तबादुर , हक़ीक़त की निशानी होता है।

2. किसी इंसान की तरफ़ इज़ाफ़े की सूरत में तबादुर

अगर फ़र्ज़ करें कि ख़ुद लफ़्ज़ से इस मायना का तबादुर न होता हो तो भी यह दावा किया जा सकता है कि जब इस लफ़्ज़ को किसी इंसान की तरफ़ इज़ाफ़ा किया जाये जैसे अरब कहते हैं: वली ए ज़ौजा तो इसके मआनी यानी ज़ौजा का सर परस्त होते हैं या कहा जाता है: वली व मौला ए तिफ़्ल , तो इससे बच्चे के सर परस्त मुराद होता है।

3. क़ुरआनी इस्तेमाल

क़ुरआने करीम की आयात के मुतालआ के बाद यह नतीजा हासिल होता है कि लफ़्ज़े मौला औवलवियत के मअना में इस्तेमाल हुआ है जैसा कि खुदा वंदे आलम का इरशाद है: فَالْيَوْمَ لَا يُؤْخَذُ مِنكُمْ فِدْيَةٌ وَلَا مِنَ الَّذِينَ كَفَرُوا مَأْوَاكُمُ النَّارُ هِيَ مَوْلَاكُمْ وَبِئْسَ الْمَصِيرُ

(सूरये हदीद आयत 15)

तो न आज तुम से कोई फ़िदया लिया जायेगा और न कुफ़्फ़ार से , तुम सब का ठिकाना जहन्नम है , वही तुम सबका साहिबे इख़्तियार (और मौला) है औ तुम्हारा बदतरीन अंजाम है।

इस आयत में लफ़्ज़े मौला औवलवियत के मअना में इस्तेमाल हुआ है।

4. फ़हमें सहाबा

तारीख़े के मुतालआ से यह नतीज़ा हासिल होता है कि ग़दीरे ख़ुम में मौजूद सहाबा ने पैग़म्बरे अकरम (स) के कलाम को सुना तो सबने इस हदीस से सर परस्ती , औला बित तसर्रुफ़ और इमामत के मअना समझे और जो लोग आँ हज़रत (स) के ज़माने में ज़िन्दगी बसर करते थे और आँ हज़रत (स) के मक़सूद और मंज़ूर के ख़ूब समझते थे , उनके यह मअना समझना हमारे लिये हुज्जत व दलील बन सकते हैं , सहाबा ए केराम की इस समझ पर किसी ने मुख़ालेफ़त नही की बल्कि बाद वाली नस्लों ने भी यही मअना मुराद लिये हैं और अपने अशआर व नज़्म में इसी मअना को इस्तेमाल किया है।

बहुत सी अज़ीम शख़्सियतों ने इस हदीस से सर परस्ती के मअना समझे हैं और उसी मअना को अपने अशआर में बयान किया है जैसे मुआविया के जवाब में हज़रत अली (अ) ने जो ख़त लिखा और हस्सान बिन साबित , क़ैस बिन साद बिन उबाद ए अंसारी , मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह हिमयरी , अब्द कूफ़ी , अबी तमाम , देबले ख़ुज़ाई , हम्मानी कूफ़ी , अमीर अबी फ़रास , अलमुल हुदा वग़ैरह।

क्या ऐसा नही है कि उमर व अबू बक्र ने पैग़म्बरे अकरम (स) से ख़ुतब ए ग़दीर और हदीसे ग़दीर सुनने के बाद हज़रत अली (अ) की ख़िदमत में तहनीयत और मुबारकबाद दी , क्यो उन्होने इमामात व ख़िलाफ़त के मअना नही समझे थे ?।

क्यो हारिस बिन नोमान फ़हरी ने हज़रत अली (अ) की विलायत को बर्दाश्त न किया और ख़ुदा वंदे आलम से अज़ाब की दरख़्वास्त कर डाली ? क्या वह पैग़म्बरे अकरम (स) के बाद हज़रत अली (अ) की विलायत व ख़िलाफ़त को नही समझ रहा था ?

कूफ़ा में कुछ लोग हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अ) की ख़िदमत मे पहुच कर अर्ज़ करते थे: इमाम अली (अ) ने उनसे फ़रमाया: मैं किस तरह तुम लोगों का मौला हूँ जबकि तुम अरब के एक ख़ास क़बीले से ताअल्लुक़ रखते हो ? उन्होने जवाब में कहा: क्यो कि हमने रसूरे अकरम (स) से रोज़े ग़दीर सुना है कि आपने फ़रमाया: .........।

(इरशादुस सारी जिल्द 7 पेज 280)

5. इशतेराके मअनवी

इब्ने तरीक़े कहते हैं: जो शख़्स लुग़त की किताबों को देखे तो वह इस नतीजे पर पहुचता है कि लफ़्ज़े मौला के मुख़्तलिफ़ मअना हैं , नमूने के तौर पर फ़िरोज़ाबादी कहते हैं: मौला के मअना मालिक , अब्द , आज़ाद करने वाला , आज़ाद शुदा , क़रीबी साथी , जैसे चचा ज़ाद भाई वग़ैरह , पड़ोसी क़सम में शरीक फ़रज़ंद , चचा , नाज़िल होने वाला , शरीक , भाँजा , सर परस्त , तरबीयत करने वाला , यावर , नेमत अता करने वाला , जिसको नेमत दी गई हो , दोस्त , पीर व दामाद के हैं।

(क़ामूसुल मुहीत जिल्द 4 पेज 410)

इसके बाद इब्ने तरीक़ कहते हैं: हक़ यह है कि लफ़्ज़े मौला के एक से ज़्यादा मअना नही हैं और वह मअना किसी चीज़ पर औला और ज़्यादा हक़दार के हैं , लेकिन यह औवलवियत इस्तेमाल के लिहाज़ से हर जगह बदल जाती है , पस नतीजा यह हुआ कि लफ़्ज़े मौला उन मुख़्तलिफ़ मअना में शरीके मअनवी है , और मुशतरके मअनवी , मुशतरके लफ़्ज़ी से ज़्यादा मुनासिब होता है।

(इब्ने तरीक़ , अल उमदा पेज 114, 115)

क़ारेईने मोहतरम , हम इब्ने तरीक़ के कलाम की वज़ाहत के लिये अर्ज़ करते हैं:

हम थोड़ी ग़ौर व फ़िक्र के बाद इस नतीजे पर पहुचते हैं कि किसी चीज़ में औवलवियत के मअना , एक लिहाज़ से लफ़्ज़े मौला के हर मअना में पाये जाते हैं और उन तमाम मअना में इस लफ़्ज़ का इतलाक़ औवलवियत के मअना की वजह से होता है।

1. मौला के एक मअना मालिक के थे , लेकिन मालिक को मौला इस वजह से कहा जाता है कि वह अपने माल में तसर्रुफ़ करने में औला होता है।

2. एक मअना अब्द के थे , अब्द भी अपने मौला की इताअत करने में दूसरे की निस्बत औला होता है।

3. आज़ाद करने वाला अपने ग़ुलाम पर फ़ज़्ल व करम करने में दूसरों की निस्बत औला होता है।

4. आज़ाद होने वाला , दूसरों की निस्बत अपने मौला के शुक्रिया का ज़्यादा हक़दार होता है।

5. साथी , अपने साथी के हुक़ूक़ की मारेफ़त का ज़्यादा हक़दार होता है।

6. नज़दीक , अपनी क़ौम के देफ़ाअ का ज़्यादा हक़दार होता है।

7. पड़ोसी , अपने पड़ोसियों के हुक़ूक़ की रियाअत करने का ज़्यादा हक़दार होता है।

8. क़सम में शरीक़ , अपने हम क़सम के देफ़ाअ और उसकी हिमायत का ज़्यादा हक़दार होता है।

9. औलाद अपने बाप की इताअत करने की ज़्यादा हक़दार होती है।

10. चचा , अपने भतीजे की देखभाल का ज़्यादा हक़दार होता है वग़ैरह।

नतीजा यह हुआ कि लफ़्ज़े मौला लुग़ते अरब में ज़्यादा हक़दार के मअना में इस्तेमाल होता है , हदीसे ग़दीर में लफ़्ज़े मौला ..की तरफ़ इज़ाफ़ा होने (यानी मौलाहु) की वजह से चूँकि लोगों की तरफ़ इज़ाफ़ा हुआ है लिहाज़ा इसके मअना वही सर परस्ती के है जो इमामत की ही रदीफ़ में है।

6. सद्रे हदीस में मौजूद क़रीना

पैग़म्बरे अकरम (स) ने हदीस से पहले फ़रमाया: ....क्या मैं तुम लोगों पर ख़ुद तुम से ज़्यादा हक़दार नही हूँ ? तो सब लोगों ने एक जवाब होकर कहा: जी हाँ , उस वक़्त रसूले अकरम (स) ने फ़रमाया: और फ़मन में फ़ा तफ़रीई है यानी यह जुमला पहले वाले जुमले की एक फ़रअ है , दर हक़ीक़त पहले वाला जुमला हदीसे ग़दीर की तफ़सीर करने वाला है , इस मअना में कि (रसूले ख़ुदा (स) फ़रमाते हैं कि) ख़ुदा वंदे आलम ने जो मक़ाम मेरे लिये क़रार है और मुझे तुम लोगों का सर परस्त क़रार दिया है , वही मक़ाम और ओहदा मेरे बाद हज़रत अली (अ) के भी है और यहा मअना क़ुरआने करीम से भी हासिल होते हैं जैसा कि ख़ुदा वंदे आलम ने फ़रमाया

: النَّبِيُّ أَوْلَى بِالْمُؤْمِنِينَ مِنْ أَنفُسِهِمْ

(यह जुमला हदीसे ग़दीर की बहुत सी अहादिस में बयान हुआ है।)

(सूरये अहज़ाब आयत 6)

बेशक नबी तमाम मोमिनीन से उनके नफ़्स की वनिस्बत ज़्यादा औला है।

क़सतानी मज़कूरा आयत की तफ़सीर में कहते हैं: पैग़म्बरे अकरम (स) मुसलमानों के तमाम उमूर में हुक्म नाफ़िज़ करने और इताअत के लिहाज़ से ज़्यादा हक़दार हैं। इब्ने अब्बास और आता कहते हैं: जब पैग़म्बरे इस्लाम (स) लोगों को किसी काम के लिये हुक्म दें , जबकि उनका नफ़्स उनको किसी दूसरे काम का हुक्म देता हो तो वह पैग़म्बरे अकरम (स) की इताअत के ज़्यादा हक़दार हैं , क्योकि पैग़म्बरे अकरम (स) उनको सिर्फ़ उन्ही चीज़ों का हुक्म देते हैं और उसी काम से राज़ी होते हैं जिसमें उनकी ख़ैर व भलाई हो , बरख़िलाफ़ उनके नफ़्सों के।

बैज़ावी कहते हैं: पैग़म्बरे अकरम (स) तमाम उमूर में मोमिनीन की निस्बत ख़ुद उनके नफ़्सों का ज़्यादा हक़दार हैं , क्योकि आँ हज़पत (स) दूसरों के बर ख़िलाफ़ उस काम का हुक्म नही करेगें जिसमें उनकी मसलहत न हो और न उस काम पर राज़ी होगें।

(इरशादुस सारी जिल्द 7 पेज 280)

(अनवारूत तंज़ील बैज़ावी सूरये अहज़ाब आयत 6 के ज़ैल में)

ज़मख़्शरी कहते है: पैग़म्बरे अकरन (स) मोमिनीन की निस्बत दीन व दुनिया की हर चीज़ में ख़ुद उनसे औला हैं , इसी वजह से आयते शरीफ़ा में मुतलक़ तौर पर हुक्म हुआ है और किसी चीज़ की क़ैद नही है , लिहाज़ा मोमिनीन पर वाजिब है कि उनके नज़दीक आँ हज़रत (स) की शख़्सीयत सबसे ज़्यादा महबूब क़रार पाये और उनका हुक्म अपने हुक्म से भी ज़्यादा नाफ़िज़ मानें , नीज़ आँ हज़रत (स) का हुक्म ख़ुद उनके हुक्म पर भी मुक़द्दम है।

यही तफ़सीर नसफ़ी और सुयूती ने भी की है।

(अलकाशिफ़ जिल्द 3 पेज 523)

(मदारिकुत तंज़ील नसफ़ी , जिल्द 3 पेज 294, तफ़सीरे जलालैन , मज़कूरा आयत के ज़ैल में)

क़ाबिले ज़िक्र है कि का फ़िक़रा बहुत से उलामा अहले सुन्नत ने नक़्ल किया है जैसे अहमद बिन हंबल , इब्नेम माजा , निसाई , शैबानी , ज़हबी , हाकिम , सअलबी , अबू नईम , बैहक़ी , ख़तीबे बग़दादी , इब्ने मग़ाज़ेली , ख़ारज़मी , बैज़ावी , इब्ने असाकर , इब्ने असीर , गंजी शाफ़ेई , तफ़ताज़ानी , क़ाज़ी ऐजी , मुहिब्बुद्दीन तबरी , इब्ने कसीर , हमूई , ज़रन्दी , क़सतानी , जज़री , मक़रीज़ी , बान सब्बाग़ हैसमी , इब्ने हजर , समहूदी , सुयूती , हलबी , इब्ने हजरे मक्की , बदख़शी वग़ैरह।

7. ज़ैले हदीस

बहुत सी हदीसे ग़दीर के ज़ैल में यह जुमला नक़्ल हुआ है ..........(ख़ुदा वंदा , जो अली (अ) की विलायत को कबूल करे , उसको दोस्त रख और जो उनकी विलायत को कबूल न करे और उनसे दुश्मनी करे , उनको तू भी दुश्मन रख।

(मुसनदे अहमद जिल्द 1 पेज 118, मुसतदरके हाकिम जिल्द 3 पेज 109)

यह जुमला जिसको चंद उलामा ए अहले सुन्नत जैसे इब्ने कसीर और अलबानी ने सही माना है , सिर्फ़ सर परस्ती और इमामत से हम आहंग है न कि मुहब्बत व दोस्ती के मअना से , जैसा कि बाज़ अहले सुन्नत ने कहा है क्योकि हज़रत अली (अ) को दोस्त रखने वालों के लिये आँ हज़रत (स) का दुआ करना कोई मअना नही रखता।

8. मुसलमानों को गवाह बनाना

हुज़ैफ़ा बिन उसैद सही सनद के साथ नक़्ल करते हैं कि रसूले अकरम (स) ने रोज़े ग़दीरे ख़ुम फ़रमाया: क्या तुम लोग ख़ुदा वंदे आलम की वहदानियत और मेरी नबूव्वत की गवाही देते हो ? तो सब लोगों ने एक ज़बान हो कर कहा: जी हाँ या रसूलल्लाह , हम उन चीज़ों की गवाही देते हैं , उस वक़्त पैग़म्बरे अकरम (स) ने फ़रमाया , ऐ लोगों , ख़ुदा वंदे आलम मेरा सर परस्त है और मैं मोमिनीन का सर परस्त और तुम पर तुम्हारे नफ़्सों से ज़्यादा औला हूँ , लिहाज़ा जिसका मैं मौला हूँ उसके यह अली भी (अ) मौला हैं।

(उसदुल ग़ाबा जिल्द 6 पेज 136 हदीस 5940, तारीख़े दमिश्क़ जिल्द 12 पेज 226, सीरये हलबी जिल्द 3 पेज 374)

क़ारेईने केराम , आँ हज़रत (स) ने हज़रत अली (अ) की विलायत को तौहीद व रिसालत की गवाही की रदीफ़ में क़रार दिया , यह ख़ुद इस बात की दलील है कि हज़रत अली (अ) की विलायत इसी इमामत और उम्मत की सर परस्ती के मअना में है।

9. इमाम अली (अ) की विलायत पर दीन की मुकम्मल होना

सूरए मायदा आयत 3 आयते इकमाल को ज़ैल में सहीहुसस सनद रिवायतों के मुताबिक़ ख़ुदा वंदे आलम ने वाक़ेया ए ग़दीर में रसूल अकरम (स) के ख़ुतबे के बाद यह आय ए शरीफ़ नाज़िल हुई:

الْيَوْمَ يَئِسَ الَّذِينَ كَفَرُوا مِن دِينِكُمْ فَلَا تَخْشَوْهُمْ وَاخْشَوْنِ ۚ الْيَوْمَ أَكْمَلْتُ لَكُمْ دِينَكُمْ وَأَتْمَمْتُ عَلَيْكُمْ نِعْمَتِي وَرَضِيتُ لَكُمُ الْإِسْلَامَ دِينًا ۚ فَمَنِ اضْطُرَّ فِي مَخْمَصَةٍ غَيْرَ مُتَجَانِفٍ لِّإِثْمٍ ۙ فَإِنَّ اللَّـهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ (सूरए मायदा आयत 3)

आज मैंने तुम्हारे दीन को कामिल कर दिया और तुम पर अपनी नेमत पूरी कर दी और तुम्हारे इस दीन इस्लाम को पसंद किया।

इस आयत से यह नतीजा निकलता है कि ख़ुदावंदें आलम इस इस्लाम से राज़ी है जिसमें हज़रत अली (अ) की विलायत पाई जाती हो , क्यो कि दीन आप की विलायत से कामिल हुआ है और नेमतें भी आपकी विलायत का वजह से तमाम हुई हैं और यह हज़रत अली (अ) की इमामत और सर परस्ती से हम आहंन्ग है , लिहाज़ा बाज़ रिवायात के मुताबिक़ आय ए इकमाल के नाज़िल होने के बाद और ग़दीर ख़ुम से लोगों के अलग अलग होने से पहले रसूले अकरम (स) ने फ़रमाया:

हदीस

(अल बिदाया वन निहायह जिल्द 5 पेज 214, शवाहिदुत तंज़ील जिल्द 1 पेज 157)

अल्लाहो अकबर , दीन के कामिल होने , नेमतें तमाम करने , मेरी रिसालत और मेरे बाद अली (अ) की विलायत पर राज़ी होने पर।

10.पैग़म्बरे अकरम (स) की वफ़ात की ख़बर

पैग़म्बरे अकरम (स) ने ख़ुतब ए ग़दीर के पहले हिस्से में लोगों के सामने यह ऐलान फ़रमा दिया था: ……. गोया मुझे ख़ुदा वंदे आलम की तरफ़ से दावत दी गई है और मैं उसको क़बूल करने वाला हूँ और बाज़ रिवायात की बेना पर आँ हजरत (स) ने फ़रमाया: नज़दीक है कि मुझे ख़ुदा वंदे आलम की तरफ से दावत दी जाये और मैं भी उसको क़बूल कर लूँ।

हदीस में इस्तेमाल होने वाले अल्फ़ाज़ से यह नतीजा हासिल होता है कि पैग़म्बरे अकरम (स) एक बहुत अहम ख़बर देना चाहते हैं जिससे पहले चंद चीज़ें मुक़द्दमें के तौर पर बयान फ़रमाई और बाद में अपनी रेहलत की खबर सुनाई और यह बात सिर्फ़ इमामत , ख़िलाफ़त , सर परस्ती और जानशीनी के अलावा किसी दूसरे मअना से हम आहंग नही है।

11.पैग़म्बरे अकरम (स) की ख़िदमत में मुबारकबाद पेश करना

बाज़ रिवायात के मुताबिक़ पैग़म्बरे अकरम (स) ने वाक़ेया ए ग़दीर और ख़ुतबे के तमाम होने के बाद असहाब को हुक्म दिया कि हमें तहनीयत और मुबारक बाद पेश करो। किताब शरफ़ुल मुसतफ़ा में हाफ़िज़ अबू सईद नैशा पुरी ( 407) की नक़्ल के मुताबिक़ मौसूफ़ अपनी सनद के साथ बरा बिन आज़िब और अबू सईद ख़िदरी से नक़्ल करते हैं कि रसूले अकरम (स) ने फ़रमाया:

हदीस.....

मुझे मुबारक बाद पेश करो , मुझे मुबारक बाद पेश करो , क्योकि ख़ुदावंदे आलम ने मुझे नबूव्वत और मेरे अहले बैत को इमामत से मख़्सूस फ़रमाया है।

उमर बिन ख़त्ताब इस मौक़े पर आगे बढ़े और हज़रत अली (अ) की ख़िदमत में मुबारक बाद पेश की।

12.रसूले अकरम (स) का ख़ौफ़

अल्लामा सुयूती ने नक़्ल किया है कि पैग़म्बरे अकरम (स) ने फ़रमाया: बेशक ख़ुदावंदे आलम ने मुझे मबऊस बरिसालत फ़रमाया और यह बात मेरे लिये संगीन थी , मैं जानता था कि जब मैं लोगों के सामने इस अम्र को पेश करूँगा तो वह मुझे झुटलायेगें , उस मौक़े पर ख़ुदावंदे आलम ने मुझे डराया कि इस अम्र को आप ज़रूर पहुचायें वर्ना आप के लिये अज़ाब होगा। चुनाँचे इस मौक़े पर यह आयत नाज़िल हुई: واللہ یعصمک من الناس

(दुर्रे मंसूर जिल्द 2 पेज 298)

क़ारेईने केराम , पैग़म्बरे अकरम (स) ख़ौफ़ ज़दा थे लेकिन किस चीज़ से ख़ौफ़ ज़दा थे ? क्या इस बात को पहुचाने से ख़ौफ़ ज़दा थे कि हज़रत अली (अ) तुम्हारे दोस्त और मददगार हैं ? हरगिज़ ऐसा नही है बल्कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) हज़रत अली (अ) की ख़िलाफ़त व विलायत और सर परस्ती को पहुचाने में लोगों से ख़ौफ़ ज़दा थे , क्यो कि आप जानते थै कि कु़रैश हज़रत अली (अ) से ख़ुसूमत और दुश्मनी रखते हैं , क्योकि यह वही शख़्सीयत हैं जिन्होने उनके आबा व अजदाद को मुख़्तलिफ़ जंगों में क़त्ल किया था।

النَّبِيُّ أَوْلَى بِالْمُؤْمِنِينَ مِنْ أَنفُسِهِمْ چ 13 .हारिस बिन नोमान का इंकार

बाज़ रिवायात के मुताबिक़ हारिस बिन नोमान फ़हरी ग़दीर की ख़बर सुन कर रसूले अकरम (स) की ख़िदमत में आया और अर्ज़ की: ऐ मुहम्मद , तुमने ख़ुदा वंदे आलम की तरफ़ से हमें हुक्म दिया कि ख़ुदा की वहदानियत और तुम्हारी रिसालत की गवाही दें , तो हमने क़बूल किया , तुमने हमें पाँच वक़्त की नमाज़ का हुक्म दिया , हमने उसको भी क़बूल किया , तुमने रोज़ा , ज़कात और हज का हुक्म दिया , हमने मान लिया , लेकिन इस पर राज़ी नही हुए और अपने चचाज़ाद भाई को हाथ पकड़ कर बुलंद किया और उसको हम पर फ़ज़ीलत दी और कहा क्या यह हुक्म अपनी तरफ़ से था या ख़ुदा वंदे आलम की तरफ़ से ? रसूले अकरम (स) ने फ़रमाया: क़सम उस ख़ुदा की जिसके अलावा कोई माबूद नही है , मैंने इस हुक्म को भी ख़ुदा वंदे आलम की तरफ़ से पहुचाया है। उस मौक़े पर हारिस बिन नोमान मुँह मोड़ कर चल पड़ा और अपनी सवारी की तरफ़ यह कहता हुआ चला कि पालने वाले , अगर जो मुहम्मद कह रहे हैं हक़ है तो मुझ पर आसमान से पत्थर भेज दे या मुझे दर्दनाक अज़ाब में मुब्तला कर दे , चुनाँचे वह अभी अपनी सवारी तक नही पहुच पाया था कि ख़ुदा वंदे आलम ने आसमान से उस पर एक पत्थर नाज़िल फ़रमाया जो उसके सर पर आ कर लगा और उसकी पुश्त से बाहर निकल गया और वहीं वासिले जहन्नम हो गया , उस मौक़े पर यह आय ए शरीफ़ा नाज़िल हुई:

(سَأَلَ سَائِلٌ بِعَذَابٍ وَاقِعٍ ﴿﴾ لِّلْكَافِرِينَ لَيْسَ لَهُ دَافِعٌ ) (सूरए मआरिज आयत 1,2)

एक माँगने वाले ने वाक़े होने वाले अज़ाब का सवाल किया।

इस हदीस को सअलबी ने अपनी तफ़सीर में मज़कूरा आयत के ज़ैल में और दीगर उलामा ने भी नक़्ल किया है।

अगर हदीसे ग़दीर सिर्फ़ हज़रत अली (अ) की मुहब्बत और आपकी नुसरत की ख़बर थी तो हारिस को ख़ुदा वंदे आलम से अज़ाब माँगने की क्या ज़रूरत थी ? यह तो सिर्फ़ सर परस्ती की सूरत में मुमकिन है जिसको बाज़ लोग कबूल नही करना चाहते हैं।

14.मंसूब करने के लफ़्ज़ का इस्तेमाल

बाज़ रिवायाते ग़दीरे ख़ुम में लफ़्ज़े नस्ब बयान हुआ है।

शहाबुद्दीन हमदानी उमर बिन ख़त्ताब से नक़्ल करते हैं कि उन्होने कहा: रसूले अकरम (स) ने हज़रत अली (अ) को अलम के उनवान से नस्ब किया और फ़रमाया: ………….

(मवद्दतुस क़ुरबा , मवद्दते पंजुम)

हमविनी अपनी सनद के साथ हज़रत अली (अ) से रिवायत करते हैं कि आपने फ़रमाया: ख़ुदा वंदे आलम ने अपने पैग़म्बर को हुक्म दिया कि मुझे लोगों पर मंसूब करें।जबकि हम जानते हैं कि लफ़्ज़ किसी को नस्ब या मंसूब करना , इमामत और सर परस्ती से मुताबेक़त रखता है।

(फ़रायदुस समतैन जिल्द 1 पेद 312)

15. ताजे शराफ़त

बाज़ रिवायात के मुताबिक़ पैग़म्बरे अकरम (स) ने वाक़ेय ए ग़दीरे के बाद अपने मारूफ़ अम्मामा बनामे शहाब को हज़रत अली (अ) के सरे मुबारक पर रखा।

इब्ने क़ैयिम कहते है: रसूले ख़ुदा का एक अम्मामा बनामे शहाब था जिसको हज़रत अली (अ) के सर पर रखा।

(ज़ादुल मआद जिल्द 1 पेज 121)

मुस्लिम भी नक़्ल करते हैं कि रसूले अकरम (स) इस अम्मामे को मख़्सूस दिनों में जैसे रोज़े फ़तहे मक्का सर पर रखते थे।

मुहिबुद्दीन तबरी , अब्दुल आला बिन अदी बहरानी से रिवायत करते हैं कि उन्होने कहा: रोज़े ग़दीरे ख़ुम रसूले अकरम (स) ने हज़रत अली (अ) को बुलाया और उनके सर पर अम्मामा रखा और उसके एक सिरे को आपकी कमर पर डाल दिया।

(सही मुस्लिम किताबुल हज हदीस 451, सोनने अबी दाऊद जिल्द 4 पेज 54)

(अर रेयाज़ुन नज़रा जिल्द 2 पेज 289, उसदुल ग़ाबा जिल्द 3 पेज 114)

बहुत से उलामा ए अहले सुन्नत ने हज़रत अली (अ) की ताज पोशी की हदीस को रिवायत की है जैसे:

• अबू दाऊदे तयालसी

• इब्ने अबी शैबा

• अहमद बिन हसन बिन अली बैहक़ी

• मुहम्मद बिन युसुफ़ ज़रन्दी

• अली बिन हम्द मारूफ़ बे इब्ने सब्बाग़े मालिकी

• जलालुद्दीने सुयूती वग़ैरह

16.औलवियत की लफ़्ज़

सिब्ते बिन जौज़ी ने हदीसे ग़दीर में औलवियत व सर परस्ती के अलावा दूसरे मअना को रदद् करते हुए कहा: पस दसवे मअना मुअय्यन हो गये , लिहाज़ा हदीसे के मअना यह हैं। मैं जिसकी निस्बत ख़ुद उसके नफ़्स से औला हूँ , पस अली भी उसकी निस्बत औला हैं। उसके बाद कहते हैं कि इसी मअना की तरफ़ हाफ़िज़ अबुल फ़रज यहया बिन सईद सक़फ़ी इस्फ़हानी ने अपनी किताब मरजुल बहरैन में वज़ाहत की है , क्योकि इस हदीस को अपने असातिद से नक़्ल किया है , जिसमें यह बयान हुआ है कि रसूले अकरम (स) ने हज़रत अली (अ) के हाथ को बुलंद करके फ़रमाया:

हदीस

(तज़किरतुल ख़वास पेज 32)

जिस शख़्स का मैं वली और उसके नफ़्स से औला (बित तसर्रुफ़) हूँ पस अली भी उसके वली और सर परस्त हैं।

विलायत पर हदीसे ग़दीर की दलालत का इक़रार करने वाले हज़रात

अहले सुन्नत के मुतअद्दिद उलामा ने काफ़ी हद तक इंसाफ़ से काम लिया है और हदीसे ग़दीर में इस हदीस को क़बूल किया है कि यह हदीस हज़रत अली (अ) की इमामत और सर परस्ती पर दलालत करती है , अगरचे दूसरी तरफ़ से इसकी तौजीह और तावील भी की है , अब हम यहाँ पर उनमें से बाज़ की तरफ़ इशारा करते हैं।

1.मुहम्मद बिन मुहम्मद ग़ज़ाली

मौसूफ़ हदीसे ग़दीर को नक़्ल करने के बाद कहते हैं: यह तसलीनॉम , रज़ा और तहकीम है , लेकिन इस वाक़ेया के बाद मक़ामे ख़िलाफ़त तक पहुचने और रियासत तलबी की मुहब्बत ने उन पर ग़लबा कर लिया..लिहाज़ा अपने बुज़ुर्गों के दीन की तरफ़ वापस पलट गये और इस्लाम से मुँह मोड़ लिया और अपने इस्लाम को कम क़ीमत पर बेच डाला , वाक़ेयन कितना बुरा मुआमला है।

इसी मतलब को सिब्ते बिन जौज़ी ने भी ग़ज़ाली से नक़्ल किया है।

(सिर्रुल आलमीन पेज 39, 40 तबअ दारुल आफ़ाक़िल अरबिया मिस्र)

(तज़किरतुल ख़वास पेज 62)

2.अबुल मज्द मजदूद बिन आदम , मारूफ़ बे हकीम निसाई

मौसूफ़ हज़रत अमीर की मदह में कहते हैं:

शेयर

रोज़े ग़दीर मुझे रसूले अकरम (स) ने अपनी शरीयत का हाकिम क़रार दिया।

(हदीक़तुल हक़ीक़ा , हकीम नेसाई)

3.फ़रीदुद्दीन अत्तार नैशा पुरी

मौसूफ़ भी हदीसे ग़दीर के मअना के पेशे नज़र कहते हैं:

शेर

(मसनवी मज़हरे हक़)

तर्जुमा ए अशआर

जब ख़ुदा वंदे आलम ने ग़दीरे ख़ुम में हुक्म नाज़िल किया कि ऐ मेरे रसूल , मेरे पैग़ाम को पहुचा दो और मुसलमानों के सामने इस पैग़ाम को आम कर दो क्योकि इस वक़्त यह रिसालत का सबसे अहम पैग़ाम है , लिहाज़ा रसूले इस्लाम (स) ने कहा: मैं इस पैग़ाम को पहुचा कर ही रहूँगा और असरारे हक़ को आसान कर दूँगा , जब जिबरईले अमीन नाज़िल हुए और असरारे इलाही को लेकर आये कि ख़ुदा वंदे क़ह्हार कहता है वह खुदा जो हय व क़य्यूम और आलिमुल ग़ैब है , मुर्तज़ा मेरे दीन पर वाली और हाकिम हैं और जो इस हुक्म को क़बूल न करे वह मुसलमान नही है।

4.मुहम्मद बिन तलहा शाफ़ेई

मौसूफ़ कहते है:

मालूम होना चाहिये कि हदीस (ग़दीर) आयए मुबाहेला में क़ौले ख़ुदे वंदे आलम के असरार में से है जहाँ इरशाद होता है:

فَمَنْ حَاجَّكَ فِيهِ مِن بَعْدِ مَا جَاءَكَ مِنَ الْعِلْمِ فَقُلْ تَعَالَوْا نَدْعُ أَبْنَاءَنَا وَأَبْنَاءَكُمْ وَنِسَاءَنَا وَنِسَاءَكُمْ وَأَنفُسَنَا وَأَنفُسَكُمْ ثُمَّ نَبْتَهِلْ فَنَجْعَل لَّعْنَتَ اللَّـهِ عَلَى الْكَاذِبِينَ

(सूरए आले इमरान आयत 61)

आयत में लफ़्ज़े (अनफ़ुसना) से मुराद हज़रत अली (अ) कू जान है जैसा कि गुज़र चुका है , क्योकि ख़ुदा वंदे आलम ने रसूले अकरम (स) की जान और हज़रत अली (अ) को एक साथ क़रार दिया है और दोनो को एक साथ जमा किया है , लिहाज़ा हदीसे ग़दीर में जो कुछ मोमिनीन की निस्बत रसूले अकरम (स) के लिये साबित है वही हज़रत अली (अ) के लिये भी साबित है। पैग़म्बरे अकरम (स) की निस्बत औला , नासिर और मोमिनीन के आक़ा है , लफ़्ज़े मौला से जो मअना भी रसूले अकरम (स) के लिये हो सकते हैं , वही मअना हज़रत अली (अ) के लिये साबित हैं और यह एक अज़ीम व बुलंद मर्तबा है जिसको रसूले अकरम (स) ने सिर्फ़ हज़रत अली (अ) से मख़्सूस किया है , इसी वजह से रोज़े ग़दीरे ख़ुम , रोज़े ईद और औलियाए खु़दा के लिये ख़ुशी का दिन है।

तर्जुमा , तो कहो कि (अच्छा मैदान में) आओ हम अपने बेटों को बुलायें , तुम अपने बेटों को और हम अपनी औरतों को (बुलायें) और तुम अपनी औरतों को , और हम अपनी जानों को (बुलायें) और तुम अपनी जानों को उसके बाद हम सब मिल कर ख़ुदा की बारगाह में गिड़गिड़ायें और झूठो पर ख़ुदा की लानत करें।

(मतालबुस सुउल पेज 44, 45)

5.सिबते बिन जौज़ी

मौसूफ़ हदीसे ग़दीर के बारे में कहते है: इस हदीस के मअना यह है: जिसका मैं मौला और उस की निस्बत औला हूँ , पस अली भी उसकी निस्बत औला (बित्तसर्रुफ़) हैं।

6.मुहम्मद युसुफ़ शाफ़ेई गंजी

वह कहते हैं: लेकिन हदीसे ग़दीरे ख़ुम , औला (बित्तसर्रुफ़) और आपकी ख़िलाफ़त पर दलालत करती है।

(तज़किरतुल ख़वास पेज 30 से 34)

(किफ़ायतुत तालिब पेज 166 से 167)

7.सईदुद्दीन फ़रग़ानी

मौसूफ़ इब्ने फ़ारिज़ के एक शेयर की तशरीह करते हुए कहते हैं , चुनाँचे इब्ने फ़ारिज़ का शेयर यह है:

शेर

फरग़ानी साहब कहते हैं: इस शेयर में इस मतलब की तरफ़ इशारा हुआ है कि हज़रत अली (अ) वह शख्सियत हैं जिन्होने क़ुरआने व सुन्नत की मुश्किल चीज़ों को बयान किया और अपने इल्म के ज़रिये किताब व सुन्नत के मुश्किल व पेचीदा मसायल को वाज़ेह किया है। क्योकि पैग़म्बरे अकरम (स) ने उनको अपना वसी और क़ायम मक़ाम क़रार दिया है जिस वक़्त आपने फ़रमाया:

(शरहे ताइया ए इब्ने फ़ारिज़ , फ़रग़ानी)

8.तक़ीउद्दीन मक़रेज़ी

मौसूफ़ ने इब्ने ज़ूलाक़ से नक़्ल किया है: 18 ज़िल हिज्जा रोज़े ग़दीरे ख़ुम सन् 363 हिजरी को मिस्र और मग़रिब की जमाअत आपस में जमा होकर दुआ पढ़ने में मशग़ूल थी , क्योकि उस रोज़ हज़रते रसूले अकरम (स) ने हज़रत अली (अ) से अहद किया और उनको अपना ख़लीफ़ा बनाया।

9.सअदुद्दीन तफ़ताज़ानी

मौसूफ़ हदीसे ग़दीर की दलालत के बारे में कहते हैं: (मौला) कभी आज़ाद करने वाले , कभी आज़ाद होने वाले , कभी हम क़सम , पड़ोसी , चचाज़ाद भाई , यावर और सर परस्त के मअना में इस्तेमाल होता है जैसा कि ख़ुदा वंदे आलम फ़रमाता है: (....) यानी नारे जहन्नम तुम्हारे लिये सज़ावार तर है , इस मअना को अबू उबैदा ने नक़्ल किया है और पैग़म्बरे अकरम (स) ने फ़रमाया: ...................(यानी वह औरत जो अपने मौला की इजाज़त के बग़ैर किसी से निकाह कर ले) इस हदीस लफ़्ज़े मौला के मअना वली और सर परस्त के हैं , इस मअना की मिसाल अशआर में बहुत ज़्यादा पाई जाती हैं और तौर पर लफ़्ज़ मौला के के मअना कलामे अरब में मुतवल्ली , मालिक और औला बित तसर्रुफ़ के मशहूर हैं। जिनको बहुत से उलामा ए अहले लुग़त ने बयान किये हैं और इस लफ़्ज़ का मक़सूद यह होता है कि इस लफ़्ज़े मौला इस मअना के लिये इस्म है न कि सिफ़त और औला बित तसर्रुफ़ का क़ायम मक़ाम , जिससे यह ऐतेराज़ हो सके कि यह लफ़्ज़ इस्मे तफ़ज़ील का सिग़ा नही है और इस मअना में इस्तेमाल नही होता , जरूरी है कि हदीसे ग़दीर में लफ़्ज़े मौला से यही मुराद लिये जायें , ताकि सद्रे हदीस से मुताबेक़त हासिल हो जाये और यह मअना यानी नासिर से भी मेल नही खाता , क्योकि ऐसा नही हो सकता कि पैग़म्बरे अकरम (स) इस गर्मी के माहौल और तपती हुई ज़मीन पर इतने बड़े मजमे को जमा करें और इस मअना को पहुचायें लिहाज़ा यह मतलब भी वाज़ेह है।

मौसूफ़ आख़िर में कहते हैं: यह बात मख़्फ़ी न रहे कि लोगों पर विलायत , उनकी सरपरस्ती , लोगों के उमूर में तदबीर करना और उनके कामों में दख़्ल अँदाज़ी करना पैग़म्बर अकरम (स) की मंज़िलत की तरह इमामत के मअना के मुताबिक़ है।

(अल मवायज़ वल ऐतेबार बेज़िक्रिल ख़ुतत वल आसार जिल्द 2 पेज 220)

(शरहे मक़ासिद जिल्द 2 पेज 290)

हदीसे ग़दीर को छिपाने वाले

बाज़ रिवायात के मुताबिक़ हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अ) ने एक मजमे असहाब से कहा कि जो लोग ग़दीर में मौजूद थे और उन्होने हदीसे ग़दीर को सुना है वह खड़े हों और इस मजमे के सामने गवाही दें , असहाब के एक गिरोह ने खड़े होकर इस चीज़ की गवाही दी लेकिन बाज़ असहाब ने मख़्सूस वुजूहात की बेना पर गवाही नही दी और मुख़्तलिफ़ बहाने पेश किये , जिसके नतीजे में वह ऐसी सख़्त बीमारों में मुब्तला हो गये जिनका इलाज न हो सका , जिनमें से दर्ज ज़ैल का असहाब का नाम लिया जा सकता है:

1. अनस बिन मालिक , उन्होने हदीसे ग़दीर को छुपाया और बरस (सफ़ेद कोढ़) के मरज़ में मुब्तला हो गये।(

2. बरा बिन आज़िब , यह हदीस छिपाने की वजह से अंधे हो गये।

3. ज़ैद बिन अरक़म , यह भी हदीसे ग़दीर को छिपाने की वजह से नाबीना हो गये।(

4. जरीर बिन अब्दुल्लाह बजली , यह हदीसे ग़दीर को छुपाने और अमीरुल मोमिनीन (अ) की लानत की वजह से जाहिलीयत की तरफ़ से पलट गये।

(अल मआरिफ़ , इब्ने क़तीबा पेज 194, शरहे इब्ने अबिल हदीद जिल्द 1 पेज पेज 362)

(अहक़ाक़ुल हक़ जिल्द 6 पेज 560, अरजहुल मतालिब पेज 580)

(शरहे इब्ने अबिल हदीद जिल्द 1 पेज 362, सीरय ए हलबिया जिल्द 3 पेज 337)

(अन साबुल अशराफ़ जिल्द 2 पेज 156)

रोज़े ग़दीर की फ़ज़ीलत

ख़तीब बग़दादी सही सनद के साथ अबू हुरैरा से नक़्ल करते हैं: जो शख्स 18 हिज़हिज्जा को रोज़ा रखे , उसको 60 महीनों के रोज़ों का सवाब मिलेगा और रोज़े ग़दीर ख़ुम है , जिस वक़्त पैग़म्बरे अकरम (स) ने हज़रत अली बिन अबी तालिब (अ) के हाथ बुलंद करके फ़रमाया: क्या मैं मोमिनीन का वली और सरपरस्त नही हूँ ? सबने कहा: जी हाँ या रसूल्लाह (स) उस वक़्त रसूले अकरम (स) ने फ़रमाया: जिसका मैं मौला हूँ उसके यह अली भी मौला हूँ , उमर बिन ख़त्ताब ने कहा: मुबारक हो मुबारक ऐ अबू तालिब के बेटे , तुम मेरे और हर मोमिन व मोमिना के आक़ा व मौला बन गये , उस मौक़े पर ख़ुदा वंदे आलम ने यह आयए शरीफ़ा नाज़िल फ़रमाई:

الْيَوْمَ أَكْمَلْتُ لَكُمْ دِينَكُمْ وَأَتْمَمْتُ عَلَيْكُمْ نِعْمَتِي وَرَضِيتُ لَكُمُ الْإِسْلَامَ دِينًا

(तारीख़े बग़दाद जिल्द 8 पेज 290, मनाक़िबे इब्ने मग़ाज़ेली पेज 18, हदीस 24, तज़किरतुल ख़वास पेज 30, फ़रायदुस समतैन जिल्द 1 पेज 77 हदीस 44)

इस हदीस को खतीबे बग़दादी ने अब्दुल्लाह बिन अली बिन मुहम्मद बिन बशरान से , उन्होने हाफ़िज़ अली बिन उमर दारक़ुतनी से , उन्होने अबी नस्र हबीशून ख़ल्लाल , उन्होने अली बिन सईद रमली से , उन्होने ज़मरा बिन रबीआ से , उन्होने अब्दुल्लाह बिन शौज़ब से , उन्होने मतर वर्राक़ से , उन्होने शहरर बिन हौशब से उन्होने अबू हुरैरा से नक़्ल किया है।

• अबू हुरैरा , उन रावियों में से हैं जिसकी विसाक़त और अदालत पर सभी अहले सुन्नत ने इजमा किया है।

• शरहे हौशब अशअरी , अबू नईम (इसफ़हानी) ने उनको औलिया में शुमार किया है।और उनके बारे में ज़हबी कहते हैं: बुख़ारी ने उनकी मदह व सना की है और अहमद बिन अब्दुल्लाह अजली व यहया बिन अबी शैबा व अहमद वनसवी ने उनकी तौसीक़ की है।और इब्ने असाकर नक़्ल करते हैं कि उनके बारे में अहमद बिन हंबल से सवाल हुआ तो उन्होने उनकी हदीस की तारीफ़ की और ख़ुद भी उनकी तौसीक़ की और उनकी मदह व सना की।

(हिलयतुल औवलिया जिल्द 6 पेज 67 से 69)

(मीज़ानुल ऐतेदाल जिल्द 2 पेज 283 हदीस 3756)

(तारीख़े मदीना दमिश्क़ जिल्द 8 पेज 137 से 148)

• मतर बिन तहमान वर्राक़ , अबू रजा ए ख़ुरासानी , उनको अबू नईम ने औवलिया में शुमार किया है।

• (और इब्ने हब्बान ने उनको सेक़ात का जुज़ क़रार दिया है और अजली से नक़्ल किया है कि वह बहुत ज़्यादा सच बोलने वाले थे।(बुख़ारी व मुस्लिम और दीगर सेहाह ने उनसे रिवायात नक़्ल की हैं।

• अबू अब्दुर्रहमान (अब्दुल्लाह) बिन शौज़ब , उनको भी हाफ़िज़े ने औवलिया में शुमार किया है।(नीज़ ख़ज़रजी ने अहमद और इब्ने मुईन से नक़्ल किया है कि वह सिक़ह थे।(

(हिलयतुल औवलिया जिल्द 3 पेज 75)

(अस सिक़ात जिल्द 5 पेज 435)

(हिलयतुल औवलिया जिल्द 6 पेज 125 से 135)

(ख़ुलासतुल ख़ज़रजी जिल्द 2 पेज 66 हदीस 3566)

इब्ने हजर ने उनको सिक़ात में से माना है और सुफ़याने सौरी से नक़्ल किया है कि वह हमारे सिक़ात असातीज़ में शुमार होते हैं और इब्ने हलफ़ून ने उनकी तौसीक़ को इब्ने नमीर , अबू तालिब , अजली , इब्ने अम्मार , इब्ने मुईन और निसाई से नक़्ल किया है।

• ज़मरा बिन रबीआ करशी अबू अब्दिल्लाह दमिश्क़ी , इब्ने असाकरने अहमद बिन हंबल से नक़्ल किया है कि वह सिक़ह , अमीन , नेकमर्द और मलीहुल हदीस थे , और इब्ने मुईन से नक़्ल हुआ है कि वह सिक़ह थे।(नीज़ इब्ने साद को उनको भी , अमीन और अहले ख़ैर शुमार करते हैं , जो अपने ज़माने में सबसे अफ़ज़ल थे।

(तहज़ीबुत तहज़ीब जिल्द 5 पेज 225)

(तारीख़े दमिश्क़ जिल्द 8 पेज 475)

(अत तबक़ातुल कुबरा जिल्द 7 पेज 471)

• अबू नस्र अली बिन सईद हमल ए रमली , ज़हबी ने उनकी तौसीक़ की है और कहते हैं कि मैंने आज तक उनके बारे में कोई गुफ़गुतू नही सुनी , (इब्ने हजर ने किताब लेसानुल मीज़ान , में उनकी तौसीक़ को इख़्तियार किया है।

• अबू नस्रे हबशून बिन मूसा बिन अय्यूब ख़ल्लाल , ख़तीबे बग़दादी ने उनकी तौसीक़ की है और दारकु़तनी से हिकायत हुई है कि वह सदूक़ यानी बहुत ज़्यादा सच बोलने वाले थे।

• हाफ़िज़ अली बिन उमर , अबुल हसन बग़दादी , जो साहिबे सोनन हैं और दार क़ुतनी के नाम से मशहूर हैं , बहुत से उलामा ए अहले सुन्नत ने उनकी तारीफ़ की है , ख़तीबे बग़दादी ने उनको वहीदुल अस्र क़रार दिया है।(और इब्ने ख़लक़ान (व हाकिमे नैशापुरी ने उनकी बहुत ज़्यादा तारीफ़ की है।

(मीज़ानुल ऐतेदाल , जिल्द 3 पेज 125 हदीस 5833, पेज 131 हदीस 5851)

(लेसानुल मीज़ान जिल्द 4 पेज 260 हदीस 5806)

(तारीख़े बग़दाद जिल्द 8 पेज 284 हदीस 4392)

(वफ़ायातुल आयान जिल्द 3 पेज 279 हदीस 434)

(तज़किरतुल हुफ़्फ़ाज़ जिल्द 3 पेज 991 हदीस 925)

ऐहतेजाजात बे हदीसे ग़दीर

1. ऐहतेजाजे इमाम अली (अ)

ऐहतेजाज यानी किसके सामने दलील क़ायम करना।(मुतर्जिम)

हज़रत अली (अ) ने पैग़म्बरे अकरम (स) की वफ़ात के बाद जहा भी मुनासिब मौक़ा देखा हर मौक़ा तरीक़े से अपनी हक़्क़ानियत साबित की , जिनमें से हदीसे ग़दीर के ज़रिये अपनी विलायत को साबित करना है हम यहाँ पर चंद मकामात की तरफ़ इशारा करते हैं:

अ. रोज़े शूरा

ख़तीबे बग़दादी हनफ़ी और हमूई शाफ़ेई ने अपनी सनद के साथ अबित तफ़ील आमिर बिन वासेला से नक़्ल किया है कि उन्होने कहा: मैं शूरा (सक़ीफ़ ए बनी सायदा) के दिन एक कमरा के दरवाज़े के पास था जिसमें हज़रत अली (अ) और पाच दूसरे अफ़राद भी थे , मैंने ख़ुद सुना कि हज़रत अली (अ) ने उन लोगों से फ़रमाया: बेशक तुम लोगों के सामने ऐसी चीज़ से दलील पेश करूँगा जिसमें अरब व अजम कोई भी तग़य्युर व तबद्दुल नही कर सकता।

और फिर फ़रमाया: ऐ जमाअत , तुम्हे ख़ुदा की क़सम , क्या तुम्हारे दरमियान कोई ऐसा शख्स है जिस ने मुझ से पहले वहदानियत का इक़रार किया हो ? सबने कहा: नही , उसके बाद इमाम अली (अ) ने फ़रमाया: तुम्हे ख़ुदा की क़सम , क्यो तुम्हारे दरमियान कोई ऐसा शख्स है जिसके बारे में पैग़म्बरे अकरम (स) ने फ़रमाया हो: من کنت مولا فھذا علی مولی

जिसका मैं मौला हूँ उसके यह अली भी मौला हैं , पालने वाले , तू उसको दोस्त रख जो अली को दोस्त रखे और दुश्मन रख उसको जो अली को दुश्मन रखे , उसके नासिरों की मदद फ़रमा , और उन को ज़लील करने वालों को ज़लील व ख़्वार फ़रमा , हाज़ेरीने मजलीस इस वाक़ेया की ख़बर ग़ायब लोगों तक पहुचायें।

सब लोगों ने कहा: ख़ुदा की क़सम , हरगिज़ नही।(

इस रिवायत के मज़मून को अहले सुन्नत के बहुत से उलामा ने अपनी किताबों में बयान किया है मिनजुमला:

• इब्ने हजरे शामी

• इब्ने हजरे हैसमी

• इब्ने उक़दा

• हाफ़िज़ अक़ीली

• इब्ने अब्दुल बर

• बुख़ारी

• इब्ने असाकर

(मनाक़िबे ख़ारज़मी पेज 313 हदीस 314, फ़रायदुस समतैन जिल्द 1 पेज 319 हदीस 251)

(अद्दुरुन नज़ीम जिल्द 1 पेज 116)

(अस सवायक़े मोहरेक़ा पेज 126 ब नक़्ल अज़ दारक़ुतनी)

(अमाली , तूसी पेज 332 हदीस 667)

(मीज़ानुल ऐतेदाल जिल्द 1 पेज 431 हदीस 1643, लेसानुल मीज़ान जिल्द 2 पेज 198 हदीस 2212)

(अल इसतीआब क़िस्में सिव्वुम 1098 हदीस 1855)

(तारीख़ुल कबीर जिल्द 2 पेज 382)

(तारीख़े दमिश्क़ हदीस 1140, 1141, 1142)

• क़ाज़ी अबू अब्दिल्लाहिल हुसैन बिन हारून ज़ब्बी ( 398)

• गंजी शाफ़ेई

• इब्ने मग़ाज़ेली शाफ़ेई

• सुयूती शाफ़ेई

• मुत्तक़ी हिन्दी

(इमाम ज़ब्बी मजलिस 61)

(किफ़ायतुत तालिब पेज 386)

(अलमनाक़िब हदीस 155)

(जमउल जवामेअ जिल्द 2 पेज 165, 166, मुसनदे फ़ातेमा सलामुल्लाह पेज 21)

(कंज़ुल उम्माल जिल्द 5 पेज 717 से 726, हदीस 14241 से 14243 )

ब. ख़िलाफ़ते उस्मान के ज़माने में

हमूई शाफ़ेई अपनी सनद के साथ ताबेईन की अज़ीम शख़्सीयत सुलैम बिन क़ैस हेलाली से रिवायत करते हैं कि उन्होने फ़रमाया: मैंने ख़िलाफ़ते उस्मान के ज़माने में हज़रत अली (अ) को मस्जिदे नबी में देखा कि और देखा कि कुछ लोग आपस में बैठे हुए एक दूसरे से इल्म व फ़िक्ह के सिलसिले में गुफ़तगू कर रहे हैं। जिसके दरमियान क़ुरैश की फ़ज़ीलत और सवाबिक़ का ज़िक्र हुआ और जो कुछ रसूलल्लाह (स) ने उनके बारे में फ़रमाया था , उनको बयान किया जाने लगा और उस मजमें 200 से ज़्यादा अफ़राद थे जिनमें हज़रत अली (अ) , साद बिन अबी वक़ास , अब्दुर्रहमान बिन औफ़ , तलहा , ज़ुबैर , मिक़दाद , हाशिम बिन उबैया , इब्ने उमर , हसन (अ) , हुसैन (अ) , इब्ने अब्बास , मुहम्मद बिन अबी बक्र और अब्दुल्लाह बिन जाफ़र थे।

और अंसार में से उबैय बिन कअब , ज़ैद बिन साबित , अबू अय्यूब अंसारी , अबुल हैसम बिन तीहान , मुहम्मद बिन सलमा , क़ैस बिन साद , जाबिर बिन अब्दुल्लाह , अनस बिन मालिक वग़ैरह थे , हज़रत अली (अ) और आपके अहले बैत ख़ामोश बैठे हुए थे , एक जमाअत ने हज़रत अली (अ) की तरफ़ रुख करके अर्ज़ किया या अबुल हसन आप क्यो कुछ नही कहते ?

हज़रत अली (अ) ने फ़रमाया: हर क़बीले ने अपनी अपनी फ़ज़ीलत बयान कर दी है और अपना हक़ ज़िक्र कर दिया है , लेकिन मैं तुम जमाअते क़ुरैश और अंसार से सवाल करता हूँ कि ख़ुदा वंदे आलम ने किसके ज़रिये तुम्हे यह फ़ज़ीलत अता की है ? क्या यह फ़ज़ीलत ख़ुद तुम ने हासिल की है या तुम्हारी कौ़म व क़बीले ने अता की है या तुम्हारे अलावा किसी और ने यह फ़ज़ीलत तुम्हे दी है ? सबने अर्ज़ किया यक़ीनन यह फ़ज़ीलतें हमको हज़रत मुहम्मद मुसतफ़ा (स) और उनके ख़ानदान के ज़रिये अता हुई है और यह फ़ज़ीलतें न हमने ख़ुद हासिल की हैं न हमारी क़ौम व क़बीले ने अता की है। उस मौक़े पर हज़रत अली (अ) ने अपने फ़ज़ायल व मनाक़िब बयान करना शुरु किये और एक के बाद एक फ़ज़ीलत शुमार करने लगे , यहाँ तक कि फ़रमाया: तुम लोगों को ख़ुदा की क़सम , क्या तुम जानते हो कि यह आयए शरीफ़ा कहाँ नाज़िल हुई:

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا أَطِيعُوا اللَّـهَ وَأَطِيعُوا الرَّسُولَ وَأُولِي الْأَمْرِ مِنكُمْ ۖ

(सूरए निसा आयत 59)

तर्जुमा , ऐ ईमान वालो , अल्लाह की इताअत करो , रसूल और साहिबाने अम्र की इताअत करो जो तुम ही में से हैं।

और यह आयत कहाँ नाज़िल हुई:

إِنَّمَا وَلِيُّكُمُ اللَّـهُ وَرَسُولُهُ وَالَّذِينَ آمَنُوا الَّذِينَ يُقِيمُونَ الصَّلَاةَ وَيُؤْتُونَ الزَّكَاةَ وَهُمْ رَاكِعُونَ

(सूरए मायदा आयत 55)

तर्जुमा , ईमान वालो , बस तुम्हारा वली अल्लाह है और उसका रसूल और वह साहिबाने ईमान जो नमाज़ क़ायम करते हैं और हालते रूकू में ज़कात देते हैं।

नीज़ यह आयत कहाँ नाज़िल हुई:

أَمْ حَسِبْتُمْ أَن تُتْرَكُوا وَلَمَّا يَعْلَمِ اللَّـهُ الَّذِينَ جَاهَدُوا مِنكُمْ وَلَمْ يَتَّخِذُوا مِن دُونِ اللَّـهِ وَلَا رَسُولِهِ وَلَا الْمُؤْمِنِينَ وَلِيجَةً ۚ وَاللَّـهُ خَبِيرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ

(सूरए तौबा आयत 16)

तर्जुमा

, जिन्होने ख़ुदा , रसूल और साहिबाने ईमान को छोड़ कर किसी को दोस्त नही बनाया है।

उस मौक़े पर उन्होने कहा या अमीरल मोमिनीन , क्या यह आयत बाज़ मोमिनीन से मख़सूस है या तमाम मोमिनीन को शामिल है ? आपने फ़रमाया कि ख़ुदा वंदे आलम ने अपने पैग़म्बर (स 0 को हुक्म दिया कि अपने की पहचान करा दो , और जैसा कि आँ हज़रत (स) ने तुम लोगों के लिये नमाज़ , ज़कात और हज की तफ़सीर की है , उसी तरह विलायत की भी तफ़सीर व वज़ाहत की है और मुझे ग़दीरे ख़ुम के मैदाने में ख़िलाफ़त के लिये मंसूब किया। उस वक़्त पैग़म्बर (स) ने अपने ख़ुतबे में फ़रमाया: ऐ लोगों , ख़ुदा वंदे आलम ने मुझे ऐसे फ़रमान का हुक्म दिया है जिसकी वजह से मैं परेशान हूँ कि अगर मैंने उस हुक्म को पहुचाया तो लोग मुझे झुटलायेगें लेकिन (ख़ुदा वंदे आलम) ने मुझे डराया है कि इस अम्र को ज़रूर पहुचायें , वर्ना आपका रिसालत को ख़तरा है। उस मौक़े पर रसूले अकरम (स 0 ने हुक्म दिया कि अज़ान कही जाये , (नमाज़ के बाद) आं हज़रत (स) ने ख़ुतबे में फ़रमाया: ऐ लोगों क्या तुम जानते हो कि ख़ुदा वंदे आलम मेरा आक़ा व मौला है और क्या मैं मोमिनीन का मौला व आक़ा और उनके नफ़्सों से औला हूँ ? तो सबने कहा , जी हा या रसूलल्लाह , उस वक़्त पैग़म्बरे अकरम (स 0 ने मुझ से फ़रमाया: ऐ अली खड़े हो जाओ , मैं खड़ा हुआ तो आपने फ़रमाया: जिसका मैं मौला पस उसके यह अली मौला हैं।

पालने वाले , जिसने उनकी विलायत को क़बूल किया और उनको दोस्त रखा तू भी उनको अपनी विलायत के ज़ेरे साया क़रार दे और जो शख्स उनसे दुश्मनी रखे और उनकी विलायत का इंकार करे तू भी उसको दुश्मन रख।

(फ़रायदुस समतैन जिल्द 1 पेज 312 हदीस 350)

(स) कूफ़े के मजमे में)

जब हज़रत अली (अ) को कूफ़े में यह ख़बर दी गई कि कुछ लोग ख़िलाफ़त के सिलसिले में आपकी हक़्क़ानीयत पर ऐतेराज़ करते हैं तो आप रहबा कूफ़े के मजमे के दरमियान हाज़िर हुए और उन लोगों के सामने हदीसे ग़दीर को दलील के तौर पर बयान किया जो आपकी विलायत को क़बूल नही करते थे।

यह ऐहतेजाज इतना मशहूर और अलल ऐलान था कि बहुत से ताबेईन ने इस वाक़ेया को नक़्ल किया है और बहुत से उलामा ए अहले सुन्नत ने मुख़्तलिफ़ सनदों के साथ काफ़ी मिक़दार में अपनी अपनी किताबों में नक़्ल किया है , अब हम यहाँ पर इस वाक़ेया के बाज़ रावियों की तरफ़ इशारा करते हैं:

1. असबग़ बिन नबाता

2. हत्ता बिन जवीन उरफ़ी ,

3. अबू क़ुदामा ए बजली ( 76, 79 हिजरी)

4. ज़ाज़ान बिन उमर

5. ज़र्रीन बिन जबीश असदी

6. ज़ियाद बिन अबी ज़ियाद

(शरहे इब्ने अबिल हदीद जिल्द 4 पेज 74 ख़ुतबा 56)

(उसदुल ग़ाबा जिल्द 3 पेज 479 हदीस 3341)

(मनाक़िब अली बिन अबी तालिब (अ) , इब्नुल मग़ाज़ेली पेज 20 हदीस 27)

(मुसनद अहमद जिल्द 1 पेज 135 हदीस 642, मजमउज़ ज़वायद जिल्द 9 पेज 109, सिफ़तुस सिफ़ात जिल्द 1 पेज 121, मतालिबुस सुउल पेज 54, अल बिदाया वन निहाया जिल्द 5 पेज 210 जिल्द 7 पेज 348, तज़किरतुल ख़वास पेज 17, क़ज़ुल उम्माल जिल्द 13 पेज 170 हदीस 36514, तारिख़े दमिश्क़ ऱक्म 524 , मुसनदे अली (अ) , सुयूती हदीस 144)

(शरहुल मवाहिब जिल्द 7 पेज 113, उसदुल ग़ाबा जिल्द 1 पेज 441, अल इसाबा जिल्द 1 पेज 305, क़ुतनुल अज़हारुल मुतनाज़िरा , सुयूती पेज 278)

(मुसनदे अहमद जिल्द 1 पेज 142 हदीस 672, मजमउज़ ज़वायद जिल्द 9 पेज 106, अल बिदाया वन निहाया जिल्द 7 पेज 384 हवादिस साल 40 हिजरी , रियाज़ुन नज़रा जिल्द 3 पेज 114, ज़खायरुल उक़बा पेज 67, तारिख़े दमिश्क़ रक़्म 532, अल मुख़्तारा हाफ़िज़ ज़िया जिल्द 2 पैज 80 हदीस 458, दुर्रुल सहाबा शौकानी पेज 211)

7. ज़ैद बिन अरक़म

8. ज़ैद बिन यूसीअ

9. सईज बिन अबी हद्दान

10. सईद बिन वहब

11. अबुत तुफ़ैल आमिर बिन वासेला

12. अबू अमारा , अब्द ख़ैर बिन यज़ीद

13. अब्दुर्रहमान बिन अबी लैला

(मुसनदे अहमद जिल्द 6 पेज 510 हदीस 22633, मजमउज़ ज़वायद जिल्द 9 पेज 116, अलमोजमुल कबीर जिल्द 5 पेज 175 हदीस 4996, मनाक़िब अली बिन अबी तालिब (अ) इब्नुल मग़ाज़ेली पेज 23 हदीस 33, ज़खायरुल उक़बा पेज 667, अल बिदाया वन निहाया जिल्द 7 पेज 383 हवादिस साल 40 हिजरी)

(मुसनदे अहमद जिल्द 1 पेज 189 हदीस 953, अल बिदाया वन निहाया जिल्द 5 पेज 229, किफ़ायतुत तालिब पेज 63, असनल मतालिब पेज 49, ख़सायसे अमीरुल मोमिनीन (अ) , निसाई पेज 101 हदीस 87 पेज 102 हदीस 88, सोनने निसाई जिल्द 5 पेज 131 हदीस 8472, मजमउज़ ज़वायद जिल्द 9 पेज 105, जामेउल अहादीस सुयूती जिल्द 16 पेज 263 हदीस 7899, कंज़ुल उम्माल जिल्द 13 पेज 158 हदीस 36487 व ...)

(फ़राउदुल समतैन जिल्द 1 पेज 68 हदीस 34)

(मुसनदे जिल्द 1 पेज 189 हदीस 953 जिल्द 6 पेज 506 हदीस 22597, ख़सायसे अमीरुल मोमिनीन निसाई जिल्द 117 हदीस 98, सोनने निसाई जिल्द 5 पेज 136 हदीस 8483, उसदुल ग़ाबा जिल्द 3 पेज 492 रक़्म 3382, मजमउज़ ज़वायद जिल्द 9 पेज 104, अव बिदाया वन निहाया जिल्द 5 पेज 229 जिल्द 7 पेज 383, मनाक़िबे ख़ारज़मी पेज 156 हदीस 185, अल मोजमुल कबीर जिल्द हदीस 5056, मोजमुल औसत हदीस 1987, तारिख़े दमिश्क़ रक़्म 517 से 522, अल मुख़्तारा ज़िया मुक़द्दसी रक़्म 479, 480, 481)

(मुसनदे अहमद जिल्द 5 पेज 498 हदीस 18815, मजमउज़ ज़वायद जिल्द 9 पेज 104, ख़सायसे अमीरुल मोमिनीन (अ) निसाई पेज 112 हदीस 193, अस सोननुल कुबरा जिल्द 5 पेज 134 हदीस 8478, किफ़ायतुत तालिब पेज 55, अर रियाज़ुन नज़रा जिल्द 3 पेज 114, अल बिदाया वन निहाया जिल्द 5 पेज 231, नज़लुल अबरार पेज 52, उसदुल ग़ाबा जिल्द 6 पेज 252 रक़्म 6169, यनाबीउल मवद्दत जिल्द 1 पेज 36 बाब 4)

(अल मनाक़िबे ख़ारज़मी पेज 156 हदीस 185, अल मनाक़िबे इब्नुल मग़ाज़ेली रक़्म 27, तारिख़े दमिश्क़ रक़्म 520)

(मुसनदे अहमद जिल्द 1 पेज 191 हदीस 964, तारिख़े बग़दाद जिल्द 14 पेज 236, मुश्किलुल आसार जिल्द 2 पेज 308, उसदुल ग़ाबा जिल्द 4 पेज 108 रक़्म 3783, फ़रायदुस समतैन जिल्द 1 पेज 69 हदीस 36, असनल मतालिब पेज 47, 48, अल बियादा वन निहाया जिल्द 5 पेज 230, नज़लुल अबरार जिल्द 131 हदीस 36417, मुसनदे बज़्ज़ाज़ रक़्म 632, मुसनदे अली (अ) सुयूती पेज 46, मुसनदे अबू यअली रक़्म 567, जमउज़ जवामेअ जिल्द 2 पेज 155, तारिख़े अमीरुल मोमिनीन इब्ने असाकर रक़्म 510, अल मुख़्तारा ज़िया मुक़द्देसी जिल्द 2 पेज 273 रक़्म 654)

14. उमर बिन ज़िल मर

15. उमैरा बिन साद

16. यअली बिन मर्रा

17. हानी बिन हानी

18. हारिसा बिन मुज़र्रब

19. हुबैरा बिन मरियत

20. अबू रमला अब्दुल्लाह बिन अबी अमामा

21. अबू वायल शक़ीक़े बिन सलमा

22. हारिस आवर

(मुसनदे अहमद जिल्द 1 पेज 189 हदीस 954, ख़सायसे निसाई पेज 117 हदीस 99, सोनने निसाई जिल्द 5 पेज 136 हदीस 8484, फ़रायदुस समतैन जिल्द 1 पेज 68 हदीस 36, मजमउज़ ज़वायद जिल्द 9 पेज 105, किफ़ायतुत तालिब पेज 63, अल मीज़ानुल ऐतेदाल जिल्द 3 पेज 294 रक़्म 6481, अल बिदाया वन निहाया जिल्द 5 पेज 230, तारिख़ुल ख़ुलाफ़ा पेज 168, कंज़ुल उम्माल जिल्द 13 पेज 158 हदीस 3648, मुसमदे बज़्ज़ाज़ जिल्द 3 पेज 35 रक़्म 766, असनल मतालिब पेज 49, अल मोजमुल कबीर हदीस 5059, अल मोजमुल औसत हदीस 2130, 5301, तारिख़े अमीरुल मोमिनीन (अ) इब्ने असाकर रक़्म 515, 516, जमउल जवामेअ जिल्द 2 पेज 72, दुर्रुस सहाबा पेज 209)

(हिलयतुल औलिया जिल्द 5 पेज 26, ख़सायसे निसाई पेज 100 हदीस 85, सोनने निसाई जिल्द 5 पेज 131 हदीस 8470, अल मनाक़िब इब्नुल मग़ाज़ेली पेज 26 हदीस 38, अल बिदाया वन निहाया जिल्द 5 पेज 230 जिल्द 7 पेज 384, कंज़ुल उम्माल जिल्द 13 पेज 154 हदीस 36480 पेज 157 हदीस 36486)

(उसदुल ग़ाबा जिल्द 5 पेज 297 हदीस 5162)

(उसदुल ग़ाबा जिल्द 3 पेज 492 रक़्म 3382)

(ख़सायसे निसाई पेज 167 हदीस 58, अस सोननुल कुबरा जिल्द 5 पेज 154 हदीस 8542, शरहे नहजुल बलाग़ा इब्ने अबिल हदीद जिल्द 2 पेज 228 ख़ुतबा 37, अस सीरतुल हलबीया जिल्द 3 पेज 274 )

(अल मोजमुल कबीर हदीस 8058)

(किताबुल मवातात , तबरी)

(अनसाबुल अशराफ़ तर्जुम ए अमीरूल मोमिनीन (अ) रक़्म 169)

लिसानुल मीज़ान जिल्द 2 पेज 379

गवाही देने वाले हज़रात

दर्ज ज़ैल हज़रात ने रोज़े रहबा हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अ) के लिये हदीसे ग़दीर की गवाही दी है:

1. अबू ज़ैनब बिन औफ़ अंसारी

2. अबू अमरा बिन अम्र बिन महसन अंसारी

3. अबू फ़ज़ाल ए अँसारी

4. अबू क़ुदाम ए अँसारी

5. अबू लैला अंसारी

6. अबू हुरैरा दूसी

7. अबुल हैसम बिन तीहान

8. साबित बिन वदीअ ए अँसारी

9. हैश बिन जुनाद ए अंसारी

10. अबू अय्यूब ख़ालिद अंसारी

11. ख़ुज़ैमा बिन साबित अँसारी

12. बू शरीह ख़ुवैलद बिन अम्र ख़ुज़ाई

13. जै़द या यज़ीद बिन शराहिले अंसारी

14. सहल बिन हनीफ़ बिन अंसारी वासी

15. अबू सईद साद बिन मालिक ख़ुदरी अँसारी

16. अबुल अब्बास सहल बिन साद अँसारी

17. आमिर बिन लैला ग़फ़्फ़ारी

18. अब्दुर्रहमान बिन अब्दे रब अँसारी

19. अब्दुल्लाह बिन साबित अँसारी , ख़ादिमे रसूले अकरम (स)

20. उबैद बिन आज़िब अँसारी

21. अबू तुरैफ़ अदी बिन हातिम

22. उक़बा बिन अम्र बिन जहनी

23. नाजिया बिन अम्र ख़ुज़ाई

24. नोमान बिन अजलान अंसारी

25. हाफ़िज़ हैसमी ने सही सनद के साथ नक़्ल किया है कि जब हज़रत अली (अ) ने हदीसे ग़दीर के ज़रिये ऐहतेजाज किया तो उस मौक़े पर 30 लोग मौजूद थे।

(मजमउज़ ज़वायद जिल्द 9 पेज 104)

चूँकि यह ऐहतेजाज सन् 35 हिजरी में हुआ और हदीसे ग़दीर को बयान किये हुए 25 साल का अरसा गुज़र गया , ज़ाहिर सी बात है कि बहुत से वह असहाब जिन्होने हदीसे ग़दीर को सुना होगा लेकिन वह इस ऐहतेजाज के वक़्त दुनिया में नही होगें और बहुत असहाब जंगों में शहीद हो चुके थे औप बहुत से दीगर मुल्कों में मुतफ़र्रिक़ हो गये होगें और यह 30 अफ़राद वह थे जो कि कूफ़े के अलावा में और वह भी रहबा नामी मक़ाम पर हाज़िर थे हज़रत अली (अ) की ख़िलाफ़त व विलायत के लिये हदीसे ग़दीर की गवाही दी।

ल. जंगे जमल में ऐहतेजाज

जिन मक़ामात पर हज़रत अली (अ) ने हदीसे ग़दीर के ज़रिये ऐहतेजाज किया है उनमें से जंगे जमल में तलहा के सामने ऐहतेजाज भी है।

हाफ़िज़ नैशा पुरी अपनी सनद के साथ नज़ीर ज़ब्बी कूफ़ी ताबेई से नक़्ल करते हैं कि उन्होने कहा कि हम हज़रत अली (अ) के साथ जंगे जमल में थे , इमाम अली (अ) ने किसी को तलहा बिन उबैदुल्लाह के पास भेज कर उसको मुलाक़ात के बुलवाया , चुनाचे तलहा आपकी ख़िदमत में हाज़िर हुआ , आपने तलहा से फ़रमाया: तुम्हे ख़ुदा की क़मस , क्या तुमने रसूलल्लाह (स) से नही सुना

तो उसने कहा , जी हाँ सुना है , इमाम अली (अ) ने फ़रमाया: तो फिर क्यो हमसे जंग करता है ? उसने कहा: मेरे याद नही है और यह कहते ही वहाँ उठ खड़ा हुआ।

(अल मुसतदरक अलल सहीहैन जिल्द 3 पेज 419 हदीस 5594, अल मनाक़िबे ख़ारज़मी पेज 182, तारिख़े दमिश्क़ जिल्द 8 पेज 568, तज़किरतुल ख़वास पेज 72, मजमउज़ ज़वायद जिल्द 9 पेज 107, क़ंज़ुल उम्माल जिल्द 11 पेज 332 हदीस 31662 )

ह. कूफ़े में हदीसे सवारान

अहमद बिन हंबल ने अपनी सनद के साथ रियाह बिन हारिस से नक़्ल किया है कि कूफ़े में कुछ लोग हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अ) की ख़िदमत में पहुच कर अर्ज़ करते हैं इमाम (अ) ने उनसे फ़रमाया: मैं किस तरह से तुम लोगों का मौला हूण जबकि तुम अरब के (ख़ास) कबीले से ताअल्लुक़ रखते हो ? उन्होने जवाब में कहा: क्योकि हमने रसूलल्लाह (स) से रोज़े ग़दीर सुना है कि आपने फ़रमाया:

(मुसनदे अहमद बिन हंबल जिल्द 6 पेज 583 हदीस 23051 से 23052, उसदुल ग़ाबा जिल्द 1 पेज 441 रक़्म 1038, रियाज़ुन नज़रा जिल्द 3 पेज 113, अल बिदाया वन निहाया जिल्द 5 पेज 231 जिल्द 7 पेद 384 से 385, अल मोजमुल कबीर जिल्द 4 पेज 173 हदीस 4053, मुख़्तसरे तारीख़ जिल्द 17 पेज 354)

ल. जंगे सिफ़्फ़ीन में ऐहतेजाज

सुलैम बिन क़ैस हेलाली , बुज़ुर्गे ताबेई अपनी किताब में नक़्ल करते हैं कि हज़रत अमीर मोमिनीन जंगे सिफ़्फ़ीन में अपने लश्कर के दरमियान मिम्बर पर गये और लोगों को अपने पास जमा किया , जो मुख़्तलिफ़ इलाक़ों से आये हुए थे जिनमें मुहाजिर व अंसार भी थे , सब के सामने ख़ुदावंदे आलम की हम्द व सना करने के बाद आपने फ़रमाया: ऐ जमाअत , बेशक मेरे मनाक़िब व फ़ज़ायल उससे कहीं ज़्यादा हैं जिनका शुमार किया जा सके।

इस हदीस में हज़रत अली (अ) ने तफ़सीली तौर पर अपने फज़ायल बयान किये जिनमें हदीस ग़दीर का भी ज़िक्र किया।

(किताबे सुलैम बिन क़ैस जिल्द 2 पेज 757 हदीस 25)

2. हदीसे ग़दीर के ज़रिये हज़रते ज़हरा (स) का ऐहतेजाज

शमसुद्दीन अबुल ख़ैरी जज़री दमिश्क़ी शाफ़ेई ने अपनी सनद के साथ उम्मे कुलसूम बिन्ते अली (अ) से नक़्ल किया कि उन्होने हज़रत फ़ातेमा ज़हरा (स) से नक़्ल किया कि (बीबी ए दो आलम) ने फ़रमाया:

हदीस

(असनल मतालिब पेज 49)

क्या तुमने ग़दीरे ख़ुम में हज़रत रसूले ख़ुदा (स) के इस क़ौल को भुला दिया कि आँ हज़रत (स) ने फ़रमाया: जिसका मैं मौला हूँ उसके यह अली भी मौला हैं , इसी तरह आँ हज़रत (स) का यह क़ौल कि या अली , तुम मेरे नज़दीक वही निस्बत रखते हो जो हारून को मूसा से थी।

हज़रत इमाम हसन (अ) और हज़रत इमाम हुसैन (अ) ने भी हदीस ग़दीर से ऐहतेजाज किया है।

(यनाबीउल मवद्दत जिल्द 3 पेज 150 बाब 90, किताब सुलैम जिल्द 2 पेज 788 हदीस 26)

3. हदीसे ग़दीरे ज़रिये दीगर हज़रात का ऐहतेजाज

अहले बैत (अ) के अलावा बाज़ मक़मात पर दीगर हज़रात ने भी हदीसे ग़दीर से ऐहतेजाज किया है जो ख़ुद इस बात पर दलील करता है कि मुसलमानों के दरमियान हदीस ग़दीर एक मख़सूस अहमियत रखती थे , अब यहाँ हम उन लोगों के असमाए गिरामी को बयान करते हैं:

1. अब्दुल्लाह बिन जाफ़र का हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अ) की शहादत के बाद मुआविया पर हदीसे ग़दीर के ज़रिये ऐहतेजाज किया।

2. बुरद का अम्र बिन आस पर हदीसे ग़दीर के ज़रिये ऐहतेजाज।

3. अम्र बिन आस का मुआविया पर हदीसे ग़दीर के ज़रिये ऐहतेजाज।

4. अम्मारे यासिर का जंगे सिफ़्फ़ीन में अम्र बिन आस पर हदीस ग़दीर के ज़रिये ऐहतेजाज।

5. असबग़ बिन नबाता का हदीसे ग़दीर के ज़रिये मुआविया के जलसे में सन् 37 हिजरी में ऐहतेजाज।

6. अबू हुरैरा से एक जवान का मस्जिदे कूफ़ा में हदीसे ग़दीर के बारे में मुनाज़िरा:

इस मुनाज़िरा को अबू बक्र हैसमी ने अपनी किताब मजमउज़ ज़वायद में अबी यअली , तबरानी और बज़्ज़ाज़ से दो तरीक़ों से नक़्ल किया है जिनमें एक तरीक़े को सही माना है लेकिन दूसरे तरीक़े की तौसीक़ नही की है।(

7. एक शख्स का जै़द बिन अरक़म पर हदीसे ग़दीर के ज़रिये ऐहतेजाज।

8. एक इराक़ी शख्स का जाबिर बिन अब्दुल्लाह अंसारी से हदीसे ग़दीर के ज़रिये मुनाज़िरा।

9. क़ैस बिन साद का मुआविया से सन् 50, 56 में हदीसे ग़दीर के ज़रिये ऐहतेजाज।

10. दारमिया ए हजूनिया का मुआविया के सन् 50, 56 में हदीसे ग़दीर के ज़रिये ऐहतेजाज।

(किताब सुलैम जिल्द 2 पेज 834 हदीस 42)

(अल इमामह वस सियासह जिल्द 1 पेज 97)

(मनाक़िबे ख़ारज़मी पेज 199 हदीस 240)

(शरहे इब्ने अबिल हदीद जिल्द 2 पेज 206 हदीस 240 ख़ुतबा 35 वक़ ए सिफ़्फ़ीन पेज 338)

(मनाक़िबे ख़ारज़मी पेज 205 हदीस 240, तज़किरतुल ख़वास पेज 85)

(मुसमदे अबी यअली मूसली जिल्द 11 पेज 307 हदीस 6423, मजमउज़ ज़वायद जिल्द 9 पेज 105)

(यनाबीउल मवद्दत जिल्द 2 पेज 73 बाब 56)

(किफ़ायतुत तालिब पेज 61)

(किताबे सुलैम जिल्द 2 पेज 777 हदीस 26)

(रबीउल अबरार जिल्द 2 पेज 599)

11. उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ ख़लीफ़ ए बनी उमय्या का हदीसे ग़दीर के ज़रिये ऐहतेजाज।

12. ख़लीफ़ ए अब्बासी मामून का फ़ुक़हा व उलामा के सामने हदीसे ग़दीर के ज़रिये ऐहतेजाज।

(हिलयतुल औवलिया जिल्द 5 पेज 364)

(अक़दुल फ़रीद जिल्द 5 पेज 56 से 61)


ऐतेराज़ात की तहक़ीक़

चूँकि हदीस ग़दीर हज़रत अमीरुल मोमिनीन की विलायत व इमामत पर बहुत ही मज़बूत और मुसतहकम दलील है लेकिन अहले सुन्नत ने इस हदीस पर सनदी या दलाली ऐतेराज़ करने की (बेजा) कोशिश की है , लिहाज़ा हम यहाँ पर उन ऐतेराज़ को बयान करे उनके जवाबात पेश करते हैं:

1. हदीसे ग़दीर सिक़ा तरीक़े से नक़्ल नही हुई है।

इब्ने जज़्म का कहना है कि लेकिन हदीस मुवस्सक़ तरीक़े से नक़्ल नही हुई है लिहाज़ा सही नही है।

(अल फ़ेसल जिल्द 4 पेज 224)

जवाब:

अव्वल: जैसा कि हमने पहले अर्ज़ किया कि बहुत से उलामा ए अहले सुन्नत ने इस हदीसे ग़द़ीर के सही होने का इक़रार किया है।दोबारा इस हिस्से का मुतालआ कर लें)

दुव्वुम: इब्ने हज़्म , उन लोगों में से जिसके बारे में उस वक़्त के उलामा ने उसके गुमराह होने पर इत्तेफ़ाक़ किया है और यही नही बल्कि अवामुन नास को उसके क़रीब होने से मना किया करते थे।

सिव्वुम: उसके कुछ नज़रियात ही कुछ ऐसे थे जिनसे मालूम होता है कि वह एक मुतअस्सिब और हट धर्म आदमी था , यहाँ तक कि हज़रत अली (अ) से बुग़्ज़ की कीना और दुश्मनी रखता था।

वह अपनी किताब अल मुहल्ली में कहता है कि उम्मत के दरमियान इस चीज़ में कोई इख़्तिलाफ़ नही है कि अब्दुर्रहमान बिन मुल्जिम ने अपनी दलील के तहत अली को क़त्ल किया है , उसके इज्तेहाद ने उसको इस नतीजे पर पहुचाया था कि और उसने यह हिसाब किया था कि उसका काम सही है।

(लिसानुल मीज़ान जिल्द 4 पेज 229 रक़्म 5737)

(अल मुहल्ली जिल्द 10 पेज 482)

जबकि बहुत से उलामा ए अहले सुन्नत ने पैग़म्बरे अकरम (स) से नक़्ल किया है कि आपने हज़रत अली (अ) से फ़रमाया: तुम्हारा क़ातिल आख़रीन में सबसे ज़्यादा सख़ी होगा। एक दूसरी हदीस में बयान हुआ है कि लोगों में सबसे ज़्यादा शक़ी होगा। नीज़ एक दूसरी ताबीर में बयान हुआ है: इस उम्मत का सबसे ज़्यादा शक़ी इंसान होगा जैसा कि क़ौमे समूद में नाक़ ए सालेह को क़त्ल करने वाला था।

और एक दूसरी रिवायत में पैग़म्बरे अकरम (स) से नक़्ल हुआ है कि आँ हज़रत (स 0 ने हज़रत अली (अ) से फ़रमाया: क्या मैं तुम्हे उस शख्स के बार में ख़बर दूँ जिसको रोज़े क़यामत सबसे ज़्यादा अज़ाब किया जायेगा। हज़रत अली (अ) ने अर्ज़ किया: जी या रसूलल्लाह , आप मुझे ख़बरदार फ़रमायें , उस मौक़े पर आँ हज़रत (स) ने फ़रमाया: बेशक रोज़े क़यामत मैं सबसे ज़्यादा अज़ाब होने वाला शख्स नाक़ ए सालेह को क़त्ल करने वाला है और वह शख्स जो आपकी रीशो मुबारक को आपके सर के ख़ून से रंगीन करेगा।

और आँ हज़रत (स) ने फ़रमाया: तुम्हारा क़ातिल यहूदी के मुशाबेह बल्कि ख़ुद यहूदी होगा।

(मुसनद अहमद जिल्द 5 पेज 326 हदीस 17857, ख़सायसे निसाई पेज 162, अल मुसतदरके हाकिम जिल्द 3 पेज 151 हदीस 4679)

(अक़्दुल फ़रीद जिल्द 4 पेज 155)

(क़ंज़ुल उम्माल जिल्द 13 पेज 195 हदीस 36582)

हज़रत अली (अ) ने एक रोज़ इब्ने मुलजिम से ख़िताब करते हुए फ़रमाया: मैं तूझे मख़्लूक़ाते ख़ुदा में सबसे ज़्यादा शरूर और बुर मानता हूँ।

(तारिख़े तबरी जिल्द 5 पेज 145, कामिले इब्ने असीर जिल्द 2 पेज 435)

क़ारेईने मोहतरम , किस तरह से इब्ने मुलजिम को मुजतहिद का नाम दिया जा सकता है जबकि उसने अपने वाजिबुल इताअत इमाम को क़त्ल किया। मगर क्या पैग़म्बरे अकरम (स) ने इमामे मुसलेमीन पर ख़ुरूज करने को मुसलमानों की जमाअत से ख़ारिज होने का सबब क़रार नही दिया है और इमाम के क़त्ल से नही फ़रमाई।

(सही मुस्लिम किताबुल अमारा)

इब्ने हज़्म वह शख्स है जिसने क़ातिल अम्मार (अबुल ग़ादरिया यसार बिन सबए सलमी) को भी अहले तावील और मुजतहिद माना है कि इस काम पर उसके लिये एक सवाब है चुँनाचे वह कहते है कि यह अमल क़त्ले उस्मान की तरह नही हैं क्योकि उस्मान के क़त्ल में इजतेहाद का मक़ाम नही है।(

(अल फ़स्ल जिल्द 4 पेज 161)

जबकि अबुल ग़ाद का दुनिया के जाहिलों में शुमार होता है और किसी ने भी उसकी तारीफ़ और तौसीक़ नही है।

यह कैसा इजतेहाद है कि जो बिलकुल वाज़ेह बयान के मुक़ाबले में है ? क्या पैग़म्बरे अकरम (स) ने सहीहुस सनद अहादीस के मुताबिक़ अम्मार से नही फ़रमाया: तुम्हे ज़ालिम गिरोह क़त्ल करेगा। (

मगर क्या पैग़म्बरे अकरम (स) ने उनके बारे में नही फ़रमाया: जब लोगों के दरमियान इख़्तिलाफ़ हो जाये तो (अम्मार) फ़रज़ंदे सुमय्या हक़ पर होगें।

क्या आँ हज़रत (स) ने नही फ़रमाया: पालने वाले , क़ुरैश अम्मार को हिर्स व तमअ की निगाहों से देखते हैं बेशक अम्मार का क़ातिल और (उनके) कपड़ों को फाड़ने वाला आतिशे जहन्नम में जायेगा।

(अल ऐसाबा जिल्द 2 पेज 512 हदीस 5704)

(अल मोजमुल कबीर जिल्द 10 पेज 96 पहदीस 10071)

(अल मुसतदरके हाकिम जिल्द 3 पेज 437 हदीस 5661)

2. हदीसे ग़दीर की सेहत में लोगों के दरमियान इख़्तिलाफ़ है

(हदीस गद़ीर के सिलसिले में दूसरा ऐतेराज़ यह है कि) इब्ने तैमीया कहते है: लेकिन हदीस ........सेहाह में बयान नही हुई है लेकिन हमारे दीगर उलामा ने इसको नक़्ल किया है और लोगों के दरमियान इस हदीस के सिलसिले में इख़्तिलाफ़ पाया जाता है। बुख़ारी , इब्राहीम हरबी और दीगर उलामा ए हदीस से नक़्ल हुआ है कि उन्होने इस हदीस पर ऐतेराज़ किया है और इस हदीस को जईफ़ शुमार किया है।)

(मिनहाजुस सुन्नह जिल्द 7 पेज 319)

जवाब:

1. तिरमीज़ी ने इस हदीस को अपनी सही में नक़्ल किया है और इसकी सेहत का इक़रार किया है।

2. हम किसी ऐसे शख्स को नही जानते जिसने इस हदीस में इख़्तिलाफ़ किया हो , अगर कोई होता तो इब्ने तैमिया को उस नाम को ज़रूर बयान करना चाहिये था।

3. अहले बैत (अ) मख़्सूसन हज़रत अली (अ) की फ़ज़ीलत में वारिद होने वाली हदीस के सिलसिले में इब्ने तैमिया ने ऐसा रवैया इख़्तियार किया है कि नासिरुद्दीन अलबानी ने जो ऐतेक़ादी मसायल में ख़ुद इब्ने तैमिया के पैरवकार हैं , वह भी इब्ने तैमिया के इस अमल से नाराज़ी हैं और इस बात की वज़ाहत करते हुए कहते हैं कि इब्ने तैमिया ने अहादिस को ज़ईफ़ शुमार करने में बहुत जल्दी बाज़ी से काम लिया है क्योकि अहादिस की सनदों की छानबीन करने से पहले ही उनको ज़ईफ़ क़रार दे दिया है।

(सिलसिलतुल अहादिसिस सहीहा हदीस 1750)

क़ारेईने मोहतरम , दर हक़ीक़त इस सूरते हाल के पेशे नज़र यह कहा जाये कि इब्ने तैमिया ने शियों से बल्कि अहेल बैत (अ) से दुश्मनी की वजह से उन तमाम अहादीस को ज़ईफ़ क़रार देने की कोशिश की है जो अहले बैत (अ) और उनके सर फ़ेहरिस्त हज़रत अली (अ) की शान में बयान हुई हैं।

3. मौला के मअना औला (बित तसर्रुफ़) के नही हैं।

महमूद ज़अबी , अल्लामा शरफ़ुद्दीन पर ऐतेराज़ करते हुए कहते है: लुग़ते अरब में लफ़्ज़े मौला औलवियत और औला (बित तसर्रुफ़) के मअना में इस्तेमाल नही हुआ है।

(अल बय्येनात महमूद जअबा)

यह दावा कि लफ़्ज़ मौला औलवियत और औला (बित तसर्रुफ़) के मअना में इस्तेमाल नही हुआ है बिला दलील बल्कि हक़ीक़त के बर ख़िलाफ़ है , क्योकि इल्मे कलाम , इल्में तफ़सीर औ इल्में लुग़त के दर्ज ज़ैल बुज़ुर्ग उलामा मे लफ़्ज़े मौला के इस मअना को क़बूल किया है।

अलिफ़. मुफ़स्सेरीन के बयानात

अल्लामा फ़ख़रुद्दीन राज़ी आयए शरीफ़ा

(فَالْيَوْمَ لَا يُؤْخَذُ مِنكُمْ فِدْيَةٌ وَلَا مِنَ الَّذِينَ كَفَرُوا ۚ مَأْوَاكُمُ النَّارُ ۖ هِيَ مَوْلَاكُمْ ۖ وَبِئْسَ الْمَصِيرُ ) की तफ़सीरे के सिलसिले में कलबी , ज़ुज्जाज , अबी उबैदा और फ़र्रा से नक़्ल करते हैं कि मौला के मअना औला (बित तसर्रुफ़) के हैं।

(सूरए हदीद आयत 15 तर्जुमा वही तुम सबका साहिबे इख़्तियार (मौला) है।)

(तफ़सीरे राज़ी जिल्द 29 पेज 227)

बग़वी ने भी इस आयत की तफ़सीर यूँ बयान की है: (यानी तुम्हारा हमदम और तुम पर औला और ज़्यादा हक़दार शख्स।

यही तफसीर जमख़्शरी , अबुल फ़रज , इब्ने जौज़ी , नैशापुरी , क़ाज़ी बैज़ावी , नसफ़ी , सुयूती और अबुस सऊद से भी वज़कूरा आयत के ज़ैल में बयान हुई है।

(मआलिमुत तंजील जिल्द 8 पेज 29)

(अल कश्शाफ़ जिल्द 4 पेज 476, ज़ादुल मसीर जिल्द 8 पेज 168, ग़रायबुल क़ुरआन दर हाशिय ए तफसीर तबरी जिल्द 27 पेज 131, अनवारुत तंज़ील , मदारिकुत तंज़ील जिल्द 4 पेज 226, तफसीरे जलालैन व ..।)

बे. मुतकल्लेमीन के बयानात

बहुत से उलामा ए इल्में कलाम जैसे साद तफ़तज़ानी , अला क़ौशजी वग़ैरह ने भी लफ़्ज़े मौला के लिये इसी मअना को क़बूल किया है , चुँनाचे तफ़तज़ानी कहते हैं: कलामे अरब में लफ़्ज़े मौला का इस्तेमाल , मुतवल्ली , मालिके अम्र और औला बित तसर्रुफ़ के मअना में मशहूर है और बहुत से उलामा ए लुग़त ने इस मअना की तरफ़ इशारा किया है।

जीम. अहले लुग़त का बयान

बुज़ुर्ग उलामा ए लुग़त जैसो फ़र्रा , ज़ुज्जाज़ , अबू उबैदा , अख़फ़श , अली बिन ईसा रम्मानी , हुसैन बिन अहमद ज़ूज़नी , सअलब और जौहरी वग़ैरह ने लफ़्ज़े मौला के लिये औला बित तसर्रुफ़ के मअना की तरफ़ इशारा किया है।

लफ़्ज़े मौला की अस्ल

लफ़्ज़े मौला की अस्ल विलायत है , इस लफ़्ज़ का अस्ल माद्दा क़ुर्ब और नज़दीकी पर दलालत करते है यानी दो चीज़ों के दरमियान ऐसे क़ुर्ब की निस्बत हो जिनके दरमियान कोई चीज़ फासला न हो।

इब्ने फ़ारस कहते है: वाव , लाम , या (वली) क़ुर्ब और नज़दीकी पर दलालत करता है , लफ़्ज़े वली की अस्ल क़ुर्ब और नज़दीकी है और लफ़्ज़े मौला भी इसी बाब से है और यह लफ़्ज़ आज़ाद करने वाला , आज़ाद होने वाला , साहिब , हम क़सम , इब्ने अम , नासिर और पड़ोसी पर भी इतलाक़ होता है , उन तमाम की अस्ल वली है जो क़ुर्ब के मअना मे हैं।

(इब्ने फ़ारस मोअजम मक़ायसुल लुग़त पेज 1104)

राग़िब इसफ़हानी कहते हैं: विला और तवाली का मतलब यह है कि दो या चंद चीज़ों का इसतरह होना कि कोई दूसरी चीज़ उनके फ़ासला न हो , यह मअना क़ुरबे मकानी और निस्बत के लिहाज़ से दीन , सदाक़त , नुसरत और ऐतेक़ाद के लिये इसतेआरे के तौर पर इस्तेमाल होता है।

लफ़्ज़े विलायत (बर वज़्ने हिदायत) नुसरत के मअना में और लफ़्ज़े विलायत (बर वज़्ने शहादत) वली अम्र के मअना हैं और यह भी कहा गया है कि उन दोनो लफ़्ज़ के एक ही मअना हैं और उनकी हक़ीक़त वही वली अम्र (सर परस्त) होना है।

(राग़िबे इसफ़हानी पेज 533 )

क़ारेईने मोहतरम , इँसान के क़दीमी हालात के पेशे नज़र शुरु शुरु में अल्फ़ाज़ महसूसात से मुतअल्लिक़ मअना के लिये इस्तेमाल होते हैं , चुँनाचे इस मौक़े पर कहा जाये कि लफ़्ज़ विलायत शुरु शुरु में महसूसात के बारे में मख्सूस क़ुर्ब व नज़दीकी के मअना में इस्तेमाल हुआ , जिसके बाद मअनवी क़ुर्ब के मअना में इस्तेआरा (और इशारा) में इस्तेमाल होने लगा। लिहाज़ा जब यह लफ़्ज़ मअनवी उमूर में इस्तेमाल हो तो एक क़िस्म की क़राबत पर दलालत करता है , जिसका मुलाज़ेमा यह है कि वली जिस पर दलालत करता है उस पर एक ऐसा हक़ रखता है दो दूसरा नही रखता और वह ऐसे तसर्रुफ़ात कर सकता है जो दूसरा बग़ैर इजाज़त के नही कर सकता। मिसाल के तौर पर वली ए मय्यत (मय्यत) के माल में तसर्रुफ़ कर सकता है और यह दलालत वारिस होने की वजह से है और जो शख्स किसी बच्चे पर विलायत रखता है वह उसके उमूर में तसर्रुफ़ का हक़ रखता है। जो शख्स विलायते नुसरत रखता है वह मंसूर (जिसकी नुसरत व मदद का अहद किया हो) पर तसर्रुफ़ का हक़ रखता है।और ख़ुदा वंदे आलम अपने बंदों का वली है यानी अपने बंदों के दुनयवी व दीनी कामों का तदबीर करता है और वह मोमिनीन का वली है यानी उन पर मख़्सूस विलायत रखता है।

इस बिना पर विलायत के हर मअना के इस्तेमाल एक क़िस्म की क़राबत पाई जाती है जो एक क़िस्म का तसर्रुफ़ और साहिबे तदबीर होने का सबब बनती है।

दूसरे लफ़्ज़ो में यूँ कहा जाये कि विलायत ऐसी क़राबत और नज़दीकी है जो दरमियान से हिजाब और मवानेअ को ख़त्म कर देती है।

(तफ़सीरे अल मीज़ान जिल्द 6 पेज 12)

(तफ़सीरे अलमीज़ान जिल्द 5 पेज 368)

अब अगर कोई नफ़्सियाती रियाज़तों और अपनी क़ाबिलीयत की बेना पर नीज़ ख़ुदा वंद आलम के मख़्सूस लुत्फ़ व करम की वजह से मुकम्मल क़ुरबे इलाही पर पहुच जाये और ख़ुदा वंदे आलम की तरफ़ से विलायत हासिल कर लो तो वह शख्स ऐसा हक़ हासिल कर लेता है जो दूसरा नही रखता और वह ऐसे दख्ल व तसर्रुफ़ात कर सकता है जो कोई दूसरा बग़ैर इजाज़त के नही कर सकता और यह तमाम चीज़ें ख़ुदा वंदे आलम के इज़्न व इरादा और उसकी मशीयत से है।

4. मुहब्बत में औला और सज़ावार होना

(हदीस ग़दीर के सिलसिले में एक ऐतेराज़) ज़अबी और दूसरे यह करते हैं कि शियों ने लफ़्ज़े मौला के मअना औला लेने के बाद उसकी निस्बत तसर्रुफ़ की तरफ़ दी है और उस लफ़्ज़ से औला बित तसर्रुफ़ के मअना किये हैं क्योकि उन लोगों ने उसकी निस्बत मुहब्बत की तरफ़ नही दी है ?()

(अल बय्येनात)

जवाब:

अव्वल. कु़रआने करीम में लफ़्ज़े मौला उमूर में दख्ल व तसर्रुफ़ करने वाले के मअना में इस्तेमाल हुआ है , ख़ुदा वंदे आलम का इरशाद है ( وَاعْتَصِمُوا بِاللَّـهِ هُوَ مَوْلَاكُمْ ) अल्लामा फ़ख़रुद्दीन राज़ी ने इस आयत की तफ़सीर में लफ़्ज़े मौला के मअना आक़ा और तसर्रुफ़ करने वाले के लिये है।

(सूरए हज आयत 78 तर्जुमा , और अल्लाह से बक़ायदा तौर पर वाबस्ता हो जाओ कि वही तुम्हारा मौला है।)

(तफ़सीरे राज़ी जिल्द 23 पेज 74)

नैशापुरी ने आयए शरीफ़ा ( ثُمَّ رُدُّوا إِلَى اللَّـهِ مَوْلَاهُمُ الْحَقِّ ) के ज़ैल में लफ़्ज़े मौला के मअना दख्ल व तसर्रुफ़ करनेवाले के लिये है. , चुनाँचे मौसूफ़ कहते हैं: वह लोग दुनिया में बातिल मौला के तसर्रुफ़ के तहत थे।(

(सूरए अनआम आयत 62 तर्जुमा , फिर सब अपने मौला ए बरहक़ परवरदिगार की तरफ़ पलटा दिये जाते हैं।()

(तफ़सीरे नैशापुरी जिल्द 7 पेज 128)

दूसरे. यह बात साबित हो चुकी है कि लफ़्ज़े मौला का इस्तेमाल वली ए अम्र के मअना में होता है और मुतवल्ली व मुतसर्रिफ़ में कोई फ़र्क़ नही है।

तीसरे. लफ़्ज़े मौला मलीक के मअना में (भी) आया है जिसके मअना वही उमूर में दख्ल व तसर्रुफ़ करने वाले के हैं।

चौथे. अपनी जगह यह बात साबित हो चुकी है कि हदीसे ग़दीर मुहब्बत से हम आहंग नही है और सिर्फ़ उमूर में तसर्रुफ़ और मुतवल्ली के मअना से मुनासेबत रखता है।

5. उस्मान के बाद हज़रत अमीर (अ) की इमामत

बाज़ लोगों का यह कहना है: हम इस हदीस को हज़रत अली (अ) की इमामत व ख़िलाफ़त पर सनद और दलालत के लिहाज़ से सही मानते हैं लेकिन इस हदीस में यह इशारा नही हुआ है कि हज़रत अली (अ) रसूले अकरम (स) के फ़ौरन बाद ख़लीफ़ा व इमाम हैं लिहाज़ा हम दूसरी दलीलों के साथ जमा करते हुए आप को चौथा ख़लीफ़ा मानते हैं।

जवाब:

अव्वल. कोई भी दलील हज़रत अली अ) की ख़िलाफ़त से पहले दीगर ख़ुलाफ़ा की ख़िलाफ़त पर मौजूद नही है ताकि उनके दरमियान जमा करते हुए यह बात कहें।

दूसरे. इस हदीस और हदीसे विलायत को जमा करते हुए कि जिसमें ...(यानी मेरे बाद) को लफ़्ज़ मौजूद है , यह नतीजा हासिल होता है कि हज़रत अली (अ) , रसूले अकरम (स) के बाद फ़ौरन ख़लीफ़ा हैं। क्योकि सहीहुस सनद अहादीस के मुताबिक़ रसूले अकरम (स) ने हज़रत अली (अ) के बारे मे फ़रमाया:

हदीस

(मुसनद अहमद जिल्द 4 पेज 438)

(अली (अ) मेरे बाद हर मोमिन के वली व आक़ा है।)

तीसरे. ख़ुद हदीसे ग़दीर का ज़हूर मख़सूसन क़रायने हालिया व मक़ालिया के पेशे नज़र यह है कि हज़रत अली (अ) पैगम्बरे अकरम (स) के बिला फ़स्ल ख़लीफ़ा है।

चौथे. हदीसे गद़ीर का नतीजा यह है कि हज़रत अली (अ) तमाम मुसलमानों के यहाँ तक कि ख़ुलाफ़ा ए सलासा के भी सरपरस्त हैं तो फिर यह बात हज़रत अली (अ) की बिला फ़स्त खिलाफ़त से हम आहंग हैं।

पाँचवे. अगर उस्मान के बाद हजरत अली (अ) ख़लीफ़ा है तो फिर उमर बिन ख़त्ताब ने रोज़े ग़दीरे ख़ुम हज़रत अली (अ) को क्यो मुबारकबाद पेश की और आपको अपना और हर मोमिन व मोमिना का मौला कह कर ख़िताब किया ?।

6. बातिनी इमामत , न कि ज़ाहिरी इमामत

बाज़ लोगों का कहना है: हदीसे ग़दीर में विलायत से मुराद विलायते बातिनी है न कि ज़ाहिरी , जो हुकूमत और आम मुसलमानों पर ख़िलाफ़त और सर परस्ती के मुतारादिफ़ है , इस ताविल के ज़रिये अहले सुन्नत ने कोशिश की है कि हज़रत अमीर (अ) और ख़ुलाफ़ा ए सलासा की ख़िलाफ़त के दरमियान जमा करें।

जवाब:

अव्वल. अगर यह तय हो कि इस तरह के अलफ़ाज़ को ज़ाहिर के ख़िलाफ़ हम्ल किया जाये तो फिर नबूव्वत के लिये भी इसी तरह की तावील करना सही होना चाहिये जबकि ऐसा करना किसी भी सूरत में सही नही है।

दूसरे. किस दलील के ज़रिये ख़ुलाफ़ा ए सलासा की ख़िलाफ़त साबित है ताकि उनकी ख़िलाफ़त और हदीसे ग़दीर के दरमियान जमा करने की कोशिश की जाये।

तीसरे. यह तफ़सीरे लफ़्ज़े मौला के ज़ाहिर और मफ़हूफ़े विलायत के बर ख़िलाफ़ है क्योकि लफ़्ज़े मौला और विलायत के ज़ाहिर से वही सर परस्त के मअना हासिल होते हैं।

चौथे. हम इस बात का अक़ीदा रखते हैं कि हदीसे ग़दीर और दीगर अहादीस में विलायत से वही ख़ुदा वंदे आलम की विलायते आम्मा मुराद है जो सियासी हाकिमियत और दीनी मरजईत की क़ीस्म में से है।

7. ताज़ीम में अवलवियत का ऐहतेमाल

शाह वलीयुल्लाह देहलवी कहते हैं: इस बात का ऐहतेमाल पाया जाता है कि लफ़्ज़े मौला से ताज़ीम में अवलवियत मुराद हो।

जवाब:

अव्वल. यह ऐहतेमाल लफ़्ज़े मौला के ज़ाहिर के ख़िलाफ़ है जैसा कि पहले इशारा किया जा चुका है कि किसी लफ़्ज़ को ख़िलाफ़े ज़ाहिर और मजाज़ी मअना में इस्तेमाल करने के लिये हक़ीक़ी मअना से मुनसरिफ़ करने वाले करीने की ज़रूरत होती है।

दूसरे. यह ऐहतेमाल हदीसे ग़दीर में मौजूद क़रायन जो कि सर परस्ती के मअना से मुनासिबत रखते हैं , उनके बर ख़िलाफ़ है क्योकि पैग़म्बरे अकरम (स) ने अपने ख़ुतबे से आग़ाज़ फ़रमाया और उसके ज़रिये बित तसर्रुफ़ और विलायत के मफ़हूफ़ का इक़रार लिया जिसके बाद आँ हज़रत (स) ने फ़रमाया: जो हज़रत अली बिन अबी तालिब (अ) की विलायत व इमामत पर साफ़ साफ़ अल्फ़ाज़ है।

तीसरे. लफ़्ज़े मौला के ज़ाहिर से इमामत व सर परस्ती के मफ़हूफ़ के अलावा कोई दूसरे मअना मुराद लेना किस तरह हज़रत उमर बिन ख़त्ताब की मुबारकबाद से हम आहंग हो सकते हैं।

चौथे. (अगर थोड़ी देर के लिये) फ़र्ज करें कि लफ़ज़े मौला से ताज़ीम में अवलवियत मुराद हो तो हम कहते है कि इससे कोई मुनाफात नही है क्योकि जो शख्स दूसरों की निसाबत दीनी और शरई लिहाज़ से ताज़ीम में औला हो तो वह सबसे अफ़ज़ल व बरतर है , ज़ाहिर है कि जो अफ़ज़ल व बरतर हो वही ख़िलाफ़त व इमामत के लिये मुनासिब होता है।

8. सूरए आले इमरान की आयत 68 की मुख़ालिफ़त

शाह वलीयुल्लाह देहलवी साहब यह भी कहते हैं: इस बात की क्या ज़रूरत है कि हम हदीसे ग़दीर में लफ़्ज़े मौला के मअना औला बित तसर्रुफ़ और सर परस्ती के लें जबकि क़ुरआने मजीद में इस मअना के बर ख़िलाफ़ इस्तेमाल हुआ है जैसा कि ख़ुदा वंदे आलम की इरशाद है

: إِنَّ أَوْلَى النَّاسِ بِإِبْرَاهِيمَ لَلَّذِينَ اتَّبَعُوهُ وَهَـذَا النَّبِيُّ وَالَّذِينَ آمَنُوا

(सूरए आले इमरान आयत 69)

तर्जुमा

, यक़ीनन इब्राहीम से क़रीब तर उनके पैरव हैं और फिर यह पैग़म्बर साहिबाने ईमान हैं।

मुकम्मल तौर पर वाज़ेह व रौशन है कि हज़रत इब्राहीम (अ) के पैरव ख़ुद जनाबे इब्राहीम (अ) से औला और तसर्रुफ़ में सज़ावार तर नही थे।

जवाब:

अव्वल यह कि क़ुरआने करीम की बाज़ आयतों में लफ़्ज़े मौला उसी औवलवियत के मअना में इस्तेमाल हुआ है जैसे कि यह आयते शरीफ़ा مَأْوَاكُمُ النَّارُ ۖ هِيَ مَوْلَاكُمْ

(सूरए हदीद आयत 15)

तर्जुमा

तुम सब का ठिकाना जहन्नम है वही तुम सब का साहिबे इख़्तियार (मौला) है।

दूसरे यह कि हदीसे ग़दीर में लफ़्ज़े मौला हदीस में मौजूद बाज़ क़रायन की वजह से औला बित तसर्रुफ़ के मअना में है।

तीसरे. हज़रत इब्राहीम (अ) से मुताअल्लिक़ आयते शरीफ़ा में ऐसा क़रीना मौजूद है जिसकी वजह से औला बित तसर्रुफ़ के मअना नही लिये जा सकते और वह क़रीना यह है कि कोई भी शख्स पैग़म्बरे ख़ुदा से अफ़ज़ल व मुकद्दम नही होता , बर ख़िलाफ़े हदीसे ग़दीर के (इसमें कोई ऐसा क़रीना नही है जो औला बित तसर्रुफ़ के मअना मुराद लेने में माने हो)

9. ज़ैले हदीस

मौसूफ़ भी कहते है: हदीसे ग़दीर के ज़ैल में ऐसा क़रीना मौजूद है जो इस बात पर दलालत करता है कि लफ़्ज़े मौला से मुहब्बत मुराद है क्योकि पैग़म्बरे अकरम (स 0 ने फ़रमाया: पालने वाले तू उसको दोस्त रख जो अली को दोस्त रखे और दुश्मन रख उसको जो अली को दुश्मन रख।

जवाब:

अव्वल. इस दुआ के सदरे हदीस की वजह से यह मअना होगे कि पालने वाले जो शख्स अली की विलायत को क़बूल करे उसको दोस्त रख और जो उनकी विलायत को क़बूल न करे उसको दुश्मन रख।

दूसरे. यह मअना पैग़म्बरे अकरम (स) के उस अज़ीम ऐहतेमाम के पेशे नज़र क़ाबिले ज़िक्र नही है क्योकि यह किस तरह कहा जा सकता है कि हम यह कहें कि पैग़म्बरे अकरम (स) ने उस तपते सहरा में उस अज़ीम मजमें को जमा किया और एक मामूली बात को बयान करने के लिये उस मजमें को इतनी ज़हमत में डाला कि हज़रत अली (अ) तुम्हारे दोस्त हैं।

तीसरे. बाज़ रिवायात में के साथ साथ भी आया है जो इस बात पर शाहिद है कि पहला फ़िक़रा मुहब्बत के मअना में नही है वर्ना अगर पहला जुमला के मअना में हो तो दूसरे जुमले में उसी मतलब की तकरार होती है।

इब्ने कसीर ने वाक़ेय ए रहबा को तबरानी से नक़्ल किया है जिसके ज़ैल में बयान हुआ है कि उस मौक़े पर 13 असहाब खड़े हुए और उन्होने गवाही दी कि रसूले अकरम (स) ने फ़रमाया:

मुत्तक़ी हिन्दी ने भी इस हदीस को नक़्ल किया हैऔर उसके ज़ैल में हैसमी से नक़्ल किया है कि उन्होने कहा कि इस हदीस के सारे रिजाल सिक़ह हैं।

चौथे. अहले सुन्नत के बाज़ बुज़ुर्गों नें जैसे मुहिबुद्दीन तबरी शाफ़ेई ने इस मअना (यानी मौला ब मअना मुहब्बत) को बईद शुमार किया है।

(अल बिदाया वन निहाया जिल्द 7 पेज 347

(कंज़ुल उम्माल जिल्द 13 पेज 158)

(अर रियाज़ुन नज़रा जिल्द 1 पेज 205)

पाँचवे. एक ऐसी दुआ जिसको पैग़म्बरे अकरम (स) ने ख़ुतबे के बाद की है लिहाज़ा इस जुमले में लफ्ज़े मौला को मुहब्बत के मअना मुराद लेने के लिये क़रीना नही बनाया जा सकता। बल्कि उससे पहले वाला जुमला इस बात पर बेहतरीन क़रीना है कि लफ़्ज़े मौला को इमामत , औला बित तसर्रुफ़ और सर परस्ती के मअना में लिया जाये।

छठे. बाज़ रिवायात में लफ़्ज़े (यानी मेरे बाद) आया है। इब्ने कसीर अपनी सनद के साथ बरा बिन आज़िब से नक़्ल करते हैं कि पैग़म्बरे अकरम (स) ने ग़दीरे ख़ुम में असहाब के मजमे में फ़रमाया:

हदीस

तर्जुमा , अगर पैग़म्बरे अकरम (स) ने लफ़्ज़े मौला से मुहब्बत का इरादा किया होता तो बअदी का लफ़्ज़ कहने की क्या ज़रूरत थी , क्योकि यह मअना सही नही है कि पैग़म्बरे अकरम (स 0 फ़रमायें कि हज़रत अली (अ) मेरे बाद तुम्हारे दोस्त हैं न कि मेरे रहते हुए।

10. मौला के मअना महबूब के हैं।

इब्ने हजरे मक्की और शाह वलीयुल्लाह देहलवी जैसे अफ़राद कहते हैं: हदीसे ग़दीर में लफ़्ज़े मौला से महबूब मुराद है यानी रसूल अकरम (स) के फ़रमान के यह मअना हैं कि जिस का मैं महबूब हूँ उसके यह अली भी महबूब हैं।

जवाब:

अव्वल , यह दावा बग़ैर दलील के हैं , क्योकि लुग़क की किताबों को देखने के बाद इंसान इस नतीजे पर पहुचता है कि किसी भी लुग़वी ने लफ़्ज़े मौला के लिये यह मअना नही किये हैं।

दूसरे , यह मअना क़रीने के ब़गैर हदीस में मुताबादिर मअना से हम आहंग नही है।

तीसरे , यह मअना रिवायत में मौजूद क़रायने मख़सूसन हदीस के शुरु में से मुनासेबत नही रखता।

चौथे , अगर पैग़म्बरे अकरम (स 0 की इस हदीस से यह मअना मुराद हों तो फिर मुआविया , आयशा , तलहा , ज़ुबैर और अम्र बिन आस जैसे लोगों ने हज़रत अली (अ 0 से जंग क्यो की ? क्यो मुआविया ने हज़रत अली (अ) पर अलल ऐलान लानत नही कराई ?

पाँचवें , यह मअना उस चीज़ के बर ख़िलाफ़ हैं जो हदीस ग़दीर से सहाबा ने समझा है लिहाज़ा हस्सान बिन साबित अपने शेयर में क़ौले रसूले अकरम (स) को बयान करते हुए कहते हैं ..........(मैं इस बात से राज़ी हूँ कि मेरे बाद अली (अ) इमाम और हादी हैं।)

11. हसने मुसन्ना की रिवायत से इस्तिदलाल

शाह वलीयुल्लाह देहलवी कहते है: अबू नईम इस्फ़हानी ने हसने मुसन्ना से नक़्ल किया है कि उनसे सवाल हुआ कि हज़रत अली (अ) की ख़िलाफ़त पर दलील है ? तो उन्होने जवाब में कहा: अगर इस हदीस से रसूले अकरम (स) की मुराद ख़िलाफ़त थी तो उसको उसको साफ़ साफ़ अल्फ़ाज़ में बयान करना चाहिये था क्योकि आँ हज़रत (स) सबसे ज़्यादा फ़सीह व बलीग़ थे...।

जवाब:

अगर हसन मुसन्ना की रिवायत को थोड़ी देर के लिये क़बूल भी कर लिया जाये तो भी उसकी कोई ऐतेबार और हुज्जत नही है क्योकि वह कोई मासूम नही थे और उनका शुमार सहाबा नही होता ताकि उनका यह यह मअना समझना अहले सुन्नत के नज़दीक मोतबर माना जाये।

दूसरे , इस हदीस की कोई सनद नही है।

तीसरे , किस तरह हज़रत रसूले अकरम (स) ने इस हदीस में इमामत व ख़िलाफ़त के मसले को फ़सीह तौर पर बयान नही किया है ? जबकि क़रायने हालिया और क़रायने मक़ालिया के पेशे नज़र रसूले अकरम (स) ने हज़रत अली (अ) के लिये ख़िलाफ़त व इमामत को हदीसे ग़दीर में वाज़ेह तौर पर बयान किया है और उलामा ए बलाग़त का कहना है कि किनाया सराहत से ज़्यादा फ़सीह होता है , नीज़ यह कि रसूले अकरम (स) ने दूसरी रिवायात में हज़रत अली (अ) की ख़िलाफ़त व इमामत को वाज़ेह तौर पर बयान किया है।

12. मुहब्बत के मअना मुराद लेने पर क़रीने का मौजूद होना

शेख सलीम अल बशरी का कहना है: हदीस ग़दीर में ऐसा क़रीना पाया जाता है जिसकी बेना पर लफ़्ज़े मौला से मुहब्बत के मअना लेना सही है और वह क़रीना यह है कि यह हदीस उस वाक़ेया के बाद बयान हुई है जो यमन में पेश आया था और बाज़ लोगों ने आपके ख़िलाफ़ क़दम उठाया था लिहाज़ा रसूले अकरम (स) ने रोज़े ग़दीर हज़रत अली (अ) की महद व तारीफ़ करना चाहते थे ताकि लोगों के सामने उनके फ़ज़ायल व अज़मत बयान हो जाये और जिनसे हज़रत अली (अ) पर हमला किया था उसके मुक़ाबले पर यह बात कहें।

(अल मुराजेआत रक़्म 58)

देहलवी साहब कहते है: इस ख़ुतबे का सबब (जैसा कि मुवर्रेख़ीन और सीरह नवीसान कहते हैं) यह था कि असहाब की एत जमाअत जो हज़रत अली (अ) के साथ यमन में थी जैसे बुरैद ए असलमी , ख़ालिद बिन वलीद वग़ैरह उन्होने यह तय किया था कि वापसी पर आँ हजरत (स) से हज़रत अली (अ) के ख़िलाफ़ जंग की शिकायत करेगें...पैग़म्बरे अकरम (स) ने उन हालात के पेशे नज़र रोज़े ग़दीरे ख़ुम हज़रत अली (अ) की मुहब्बत की दावत दी।

जवाब:

पैग़म्बरे अकरम (स) ने उसी मौक़े पर हज़रत अली (अ) के ख़िलाफ़ ऐतेराज़ करने वालों के लिये डराते हुए तीन बार फ़रमाया: तुम अली (अ) से क्या चाहते हो..

दूसरे , बहुत सी रिवायात के मुताबिक़ रोज़े ग़दीर का वाक़ेया ख़ुदा वंदे आलम के हुक्म से था न कि बाज़ लोगों की तरफ़ से हज़रत अली (अ) की शिकायत की बेना पर।

तीसरे , और अगर फ़र्ज़ करें कि दोनो वाक़ेया एक हैं तो भी हदीसे ग़दीर की दलालत हज़रत अली (अ) की इमामत और सर परस्ती पर कामिल है क्योकि बुरैदा वग़ैरह का ऐतेराज़ तक़सीम से पहले ग़नायम में तसर्रुफ़ करने की वजह से था कि हज़रत रसूले ख़ुदा (स) ने इस हदीस और हदीस ग़दीर को बयान करके इस नुक्ते की तरफ़ इशारा फ़रमाया कि हज़रत अली (अ) हर क़िस्म के दख़ल और तसर्रुफ़ का हक़ रखते हैं क्योकि वह इमाम और वली ए ख़ुदा हैं।

चौथे , रोज़े ग़दीर का वाक़ेया बुरैदा के वाक़ेया से बाद पेश आया और जिसका इस वाक़ेया से कोई ताअल्लुक़ नही था। अल्लामा सैयद शरफ़ुद्दीन तहरीर करते हैं: पैग़म्बरे अकरम (स) ने हज़रत अली (अ) को दो मर्तबा यमन भेजा , पहली मर्तबा सन् 8 हिजरी में कि जब जब हज़रत अली (अ) यमन से वापस आये तो कुछ लोगों ने रसूले अकरम (स) की ख़िदमत में आपकी शिकायत की , उस मौक़े पर रसूले अकरम (स) उन लोगों पर ग़ज़बनाक हुए और उन लोगों ने भी ख़ुद अपने से अहद किया कि उसके बाद फिर कभी हज़रत अली (अ) पर ऐतेराज़ न करेंगें। दूसरी मर्तबा सन् 10 हिजरी में उस साल पैग़म्बरे अकरम (स) ने अलम हज़रत अली (अ) के हाथों में दिया , अपने मुबारक हाथो से आपके सर पर अम्मामा बाँधा और आपसे फ़रमाया: रवाना हो जाये और किसी पर तवज्जो न करें। उस मौक़े पर किसी ने रसूले अकरम (स) से हज़रत अली (अ) की शिकायत नही की और आप पर हमला नही किया तो फिर किस तरह मुमकिन है कि हदीसे ग़दीर बुरैद वग़ैरह के ऐतेराज़ करने की वजह से बयान हुई हो।

(सीरए नबविया ज़ैनी दहलान दर हाशिय ए सीरए हलबी जिल्द 2 पेज 346)

(सीरए इब्ने हिशाम जिल्द 4 पेज 212)

(अल मुराजेआत पेज 407)

पाँचवे , फ़र्ज़ करें कि किसी ने हज़रत अली (अ) के ख़िलाफ़ कुछ कहा हो तो कोई भी वजह दिखाई नही देती कि पैग़म्बरे अकरम (स) उस अज़ीन मजमे को तपते हुए सहरा में रोकें और एक छोटी की चीज़ की वजह से उसको इतनी अहमियत दें।

छठे , अगर रसूले अकरम (स) की मुराद सिर्फ़ हज़रत अमीर (अ) की फ़ज़ीलत बयान करना और ऐतेराज़ करने वालों की तरदीद थी तो वाज़ेह अल्फ़ाज़ में इस मतलब को बयान करना चाहिये था , मिसाल के तौर पर फ़रमाना चाहिये था: यह शख्स मेरे चचाज़ाद , मेरे दामाद , मेरे फ़रज़ंदों के पेदरे गिरामी और मेरे अहले बैत के सैयद व सरदार हैं , उनको अज़ीयत न पहुचाना वग़ैरह वगैरह , ऐसे अल्फ़ाज़ जो हज़रत अली (अ) की अज़मत व जलालत पर दलालत करते हों।

सातवे , इस हदीस शरीफ़ से औला बित तसर्रुफ़ , सर परस्ती और इमामत के अलावा कोई दूसरे मअना ज़हन में तबादुर नही करते , अब चाहे इस हदीस के ज़िक्र करने का सबब कुछ भी है , हम अल्फ़ाज़ को उनके हक़ीक़ी मअना पर हम्ल करेंगें और असबाब व एलल से हमें कोई ताअल्लुक़ नही है मख़सूसन जबकि अक़्ली और मंक़ूला क़रायन इस मअना का ताईद करते हैं।

13. दो तसर्रुफ़ करने वालों को एक साथ जमा होना

महमूद ज़अबी का कहना है: अगर हदीसे ग़दीर की दलालत को विलायत , औला बित तसर्रुफ़ और सर परस्ती पर क़बूल करें तो इससे यह लाज़िम आता है कि एक ज़माने में मुसलमानों के दो सर परस्त और दो मुतलक़ तसर्रुफ़ करने वाले जमा हो जायेगें। चुनाचे अगर ऐसा हो तो बहुत सी मुश्किलात पैदा हो जायेगी।

(अल बय्येनात)

जवाब:

अव्वल , हदीसे ग़दीर से हज़रत अली (अ) की विलायत , सर परस्ती और औला बित तसर्रुफ़ होना साबित होता है लेकिन पैग़म्बरे अकरम (स) के ज़माने के तसर्रुफ़ात रसूले अकरम (स) के तसर्रुफ़ के मा तहत होते थे , यानी हज़रत अली (अ) आँ हज़रत (स) की ग़ैर मौजूदगी में तसर्रुफ़ात करते थे।

दूसरे , दो विलायतों के जमा होने में कोई मुश्किल नही है , अगर कोई है भी तो दो तसर्रुफ़ के जमा होने में है , नीज़ दो विलायतों का साबित होना तसर्रुफ़ के फ़ेअली होने का लाज़िमा नही है।

तीसरे , दो तसर्रुफ़ के जमा होने में मुश्किल उस वक़्त पेश आती है कि एक तसर्रुफ़ दूसरे के बर ख़िलाफ़ हो जबकि पैग़म्बरे अकरम (स) और हज़रत अली (अ) के तसर्रुफ़ में कोई इख़्तिलाफ़ नही है।

चौथे , सबसे अहम बात यह है कि हज़रत अली (अ) की विलायत रसूले अकरम (स) के बाद नाफ़िज़ है।

आयए बल्लिग़

जिन आयात को इमामत मख़सूसन हज़रत अली (अ) की इमामत के तौर पर पेश किया जा सकता है उनमें से एक आयए बल्लिग़ है जिसमें ख़ुदा वंदे आलम इरशाद फ़रमाता है:

يَا أَيُّهَا الرَّسُولُ بَلِّغْ مَا أُنزِلَ إِلَيْكَ مِن رَّبِّكَ ۖ وَإِن لَّمْ تَفْعَلْ فَمَا بَلَّغْتَ رِسَالَتَهُ ۚ وَاللَّـهُ يَعْصِمُكَ مِنَ النَّاسِ ۗ إِنَّ اللَّـهَ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْكَافِرِينَ

(सूरए मायदा आयत 67)

तर्जुमा

, ऐ पैग़म्बर , आप उस हुक्म को पहुचा दें जो आपके परवर दिगार की तरफ़ से नाज़िल किया गया है और अगर यह न किया गया कि गोया उसके पैग़ाम को नही पहुचाया और ख़ुदा आपको लोगों के शर से महफ़ूज़ रखेगा।

शिया मुफ़स्सेरीन और उलामा ए अहले कलाम ने इस आयत से हज़रत अली (अ) की इमामत व विलायत और ख़िलाफ़त पर इस्तिदलाल किया है और इसी नज़रिया पर मुत्तफ़िक़ हैं। अब हम मज़कूरा आयत के बारे में तहक़ीक़ व बहस करेगें।

आयत के बारे में तहक़ीक़

बहस में दाख़िल होने से पहले आयए बल्लिग़ के सिलसिले में चंद नुकात की तरफ़ इशारा करना मुनासिब है।

1. ज़ुहूरे फ़ेल , माज़ी में होता है

जुमल ए (का ज़हूरे माज़ी और गुज़श्ता ज़माने में हक़ीक़ी है न कि मुज़ारेअ और आईन्दा में , जिसके लिये दो दलील बयान की जाती है:

अ. सीग़ ए माज़ी , गुजश्ता ज़माने के लिये वज़ा हुआ है और जब तक मुज़ारेअ पर हम्ल करने के लिये कोई क़रीना न हो तो वह अपने हक़ीक़ी मअना पर हम्ल होता है।

आ. मज़कूरा आयत पैग़म्बरे अकरम (स) की नुबूवत के आख़री महीनों में नाज़िल हुई है , अगर फ़ेल (से मुज़ारेअ और मुस्तक़बिल के मअना मुराद लें तो आयत के मअना यह होगें। जो चीज़ हम बाद में नाज़िल करेगें अगर नबूवत के बाक़ी बचे महीनों में उनको न पहुचाये तो गोया आपने रिसालत का कोई काम अंजाम नही दिया। और यह एक ऐसे मअना होगें कि जिसकी तरफ़ किसी भी रिवायत ने इशारा नही किया है और किसी भी शिया व सुन्नी आलिमें दीन ने यह मअना नही किये हैं।

इस सूरत में आयत इस बात पर दलालत करती है कि ख़ुदा वंदे आलम ने अपने पैग़म्बर पर ऐसे मतालिब नाज़िल किये हैं जिनका पहुचाना आँ हज़रत (स) के लिये सख़्त और दुशवार था। दूसरी तरफ़ पैग़म्बर अकरम (स) पर उसके पहुचाने की ज़िम्मेदारी थी। आँ हज़रत (स) उसको पहुचाने की फ़िक्र में थे उस मौक़े पर गुज़श्ता आयत नाज़िल हुई और आप तक यह पैग़ाम पहुचा कि आप किसी परेशानी का अहसास न करें कि आप के इस पैग़ाम के पहुचाने पर लोगों का क्या रवैय्या होगा।

2. शर्त की अहमियत का बयान

आयत की यह फ़िक़रा आँ हज़रत (स) के लिये एक धमकी के उनवान से बयान हुआ है क्यो कि आयत की यह फ़िक़रा (शर्तिया है , जो दर हक़ीक़त इस हुक्म की अहमियत को बयान करता है यानी अगर यह हुक्म न पहुचाया गया और उसके हक़ की रियायत न की गई तो गोया दीन के किसी भी जुज़ की रिआयत नही हुई , नतीजा यह हुआ कि जुमल ए शर्तिया , शर्त की अहमियत को बयान करने के सिलसिले में जज़ा (यानी नतीजा) के मुरत्तब होने के लिये मुहिम होता है लिहाज़ा इस क़िस्म के जुमल ए शर्तिया को दूसरे शर्तिया जुमलों की तरह क़रार नही दिया जा सकता जो गुफ़्तगू में रायज हैं क्यो कि आम तौर पर शर्तिया जुमले वहाँ इस्तेमाल होते हैं जहाँ इंसान जज़ा के मुहक्क़क़ होने से गाफ़िल हो क्यो कि शर्त के मुहक्क़क़ होने का इल्म नही होता लेकिन पैग़म्बरे अकरम (स) के हक़ में यह ऐहतेमाल सही नही है।

(तफ़सीरे अल मीज़ान जिल्द 6 पेज 49)

3. पैग़म्बरे अकरम (स) को क्या ख़ौफ़ था ?

चूँकि पैग़म्बरे अकरम (स) शुजाअ और बहादुर थे और इस्लाम के अहदाफ़ व मक़ासिद को आगे बढ़ान के लिये किसी भी तरह की कुर्बानी से दरेग़ नही करते थे लिहाज़ा मज़कूरा आयत के पेशे नज़र जो खौफ़ पैग़म्बरे अकरम (स) को लाहक़ था वह अपनी ज़ात से मुताअल्लिक़ नही था बल्कि आँ हज़रत (स) को खौफ़ इस्लाम और रिसालत के बारे में था।

4. अन्नास से क्या मुराद है ?

अगरचे फ़खरे राज़ी जैसे अफ़राद ने इस बात की कोशिश की है कि आयत के ज़ैल में क़रीने की वजह से नास (यानी लोगों) से मुराद क़ुफ़्फार हैं जैसा कि इरशाद होता है ( وَاللَّـهُ يَعْصِمُكَ مِنَ النَّاسِ ) लेकिन यह मअना लफ़्ज़े नास के ज़ाहिर के बर ख़िलाफ़ है क्योकि नास में काफ़िर व मोमिन दोनो शामिल हैं और कु़फ़्फ़ार से मख़सूस करने की कोई वजह नही है लिहाज़ा आयत में लफ़्ज़े काफ़ेरीने से मुराद कुफ़्र का एक मर्तबा मुराद लिया जाये जिसमें हज़रते रसूले अकरम (स) के ज़माने के मुनाफ़ेक़ीन भी शामिल हो जाये जिनसे रसूले अकरम (स) को डर था।

5. इस्मत के मअना

गुज़श्ता बयानाते के मुताबिक़ इस्मते इलाही जिसका वादा ख़ुदा वंदे आलम ने अपने पैग़म्बर से किया है इससे मुराद इस्मत की वह किस्म है जो रसूले अकरम (स) के ख़ौफ़ से मुनासेबत रखती हो और यह वह इस्मत है जिसके बारे में पैग़म्बरे अकरम (स) की नबूवत पर ऐसी तोहमतें लगाना जो आपकी नुबूवत से मुताबिक़त न रखती हो।

रिवायात की छानबीन

क़ारिये मोहतरम , अब हम यहाँ पर आयते बल्लिग़ की तफ़सीर में हज़रत अली (अ) की शान में फ़रीक़ैन के तरीक़ों से बयान होने वाली रिवायात की तरफ़ इशारा करते हैं:

1. अबू नईम इस्फ़हानी की रिवायत

अबू नईम ने अबू बक्र ख़लाद से उन्होने मुहम्मद बिन उस्मान बिन इब्ने अबी शैबा से , उन्होने इब्राहीम बिन मुहम्मद बिन मैमून से , उन्होने अली बिन आबिस से , उन्होने अबू हज्जाफ़ व आमश से , उन्होने अतिया से , उन्होने अबी सईदे ख़िदरी से नक्ल किया है कि रसूले अकरम (स) पर यह आयते शरीफ़ा (हज़रत अली (अ) की शान में नाज़िल हुई है।

(अल ख़सायस , इब्ने तरीक़ ब नक़्ल अज़ किताब मा नज़ला मिनल कुरआन फ़ी अलीयिन , अबू नईम इसफ़हानी)

सनद की छान बीन

• अबू बक्र बिन ख़लाद , यह वही अहमद बिन युसुफ़े बग़दादी है कि जिनको ख़तीबे बग़दादी ने उनसे सुनने को सही माना है और अबू नईम बिन अबी फ़रास ने उनका तआरूफ़ सिक़ह के नाम से कराया है (और ज़हबी ने उनको शैख सदुक़ (यानी बहुत ज़्यादा सच बोलने वाले उस्ताद) का नाम दिया है।

• मुहम्मद बिन उस्मान बिन अबी शैबा , उनको ज़हबी ने इल्म का ज़र्फ़ क़रार दिया है और सालेह जज़रा ने उनको सिक़ह शुमार किया है नीज़ इब्ने अदी है: मैंने उनसे हदीसे मुन्कर नही सुनी जिसको ज़िक्र करू।(

• इब्राहीम बिन मुहम्मद बिन मैमून , इब्ने हय्यान ने उनका शुमार सिक़ह रावियों में किया है(और किसी ने उनको कुतुबे ज़ईफ़ा में ज़िक्र नही किया है , अगर उनके लिये कोई ऐब शुमार किया जाता है तो उसकी वजह यह है कि उन्होने अहले बैत (अ) मख़सूसन हज़रत अली (अ) के फ़ज़ायल को बयान किया है।

• अली बिन आबिस , यह सही तिरमिज़ी के सही रिजाल में से हैं।(अगर उनके मुतअल्लिक़ कोई ऐब तराशा जाता है तो उनके शागिर्दों का तरह अहले बैत (अ) के फ़ज़ायल नक़्ल करने की वजह से लेकिन इब्ने अदी के क़ौल के मुताबिक़ उनकी अहादिस को लिखना सही है।

(तारिख़े बग़दाद जिल्द 5 पेज 220 से 221)

(सेयरे आलामुन नबला जिल्द 16 पेज 69)

(तारिख़े बग़दाद जिल्द 3 पे 43)

(अस सेक़ात जिल्द 8 पेज 74)

(तक़रीबुत तहज़ीब जिल्द 2 पेज 39)

(अल कामिल फ़िज ज़ुआफ़ा जिल्द 5 पेज 190 हदीस 1347)

• अबुल हज्जाफ़ , उनका नाम दाउद बिन अबी औफ़ है। मौसूफ़ अबी दाउद , निसाई और इब्ने माजा के रेजाल में शुमार होते हैं कि अहमद बिन हंमल और यहया बिन मुईन ने उनको सिक़ह माना है और अबू हातिम ने भी उनको सालेहुल हदीस क़रार दिया है।(अगरचे इब्ने अदी ने उनको अहले बैत (अ) के फज़ायल व मनाक़िब में अहादिस बयान करने की वजह से ज़ईफ़ शुमार किया है।(

• आमश , मौसूफ़ का शुमार सेहाहे सित्ता के रेजाल में होता है।(

नतीजा यह हुआ कि इस हदीस के सारे रावी ख़ुद अहले सुन्नत के मुताबिक़ मोतबर हैं।

(मीज़ानुल ऐतेदाल जिल्द 2 पेज 18)

(अल कामिल फ़िज़ ज़ुआफ़ा जिल्द 3 पेज 82, 83 हदीस 625)

(तक़रीबुत तहज़ीब जिल्द 1 पेज 331)

2. इब्ने असाकर की रिवायत

इब्ने असाकर ने अबू बक्र वजीह बिन ताहिर से , उन्होने अबी हामिदे अज़हरी से , उन्होने अबू मुहम्मद मुख़ल्लदी हलवानी से , उन्होने हसन बिन हम्माद सज्जादा से , उन्होने अली बिन आबिस से , उन्होने आमश और अबिल हज्जाफ़ से , उन्होने अतिया से उन्होने सईद बिन ख़िदरी से नक़्ल किया है कि रसूले अकरम (स) पर आयते शरीफ़ा:

ا أَيُّهَا الرَّسُولُ بَلِّغْ مَا أُنزِلَ إِلَيْكَ مِن رَّبِّكَ ۖ وَإِن لَّمْ تَفْعَلْ فَمَا بَلَّغْتَ رِسَالَتَهُ ۚ وَاللَّـهُ يَعْصِمُكَ مِنَ النَّاسِ ۗ إِنَّ اللَّـهَ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْكَافِرِينَ

रोज़े ग़दीरे ख़ुम में हज़रत अली (अ) की शान में नाज़िल हुई है।

सनद की छानबीन

• वजीह बिन ताहिर , इब्ने जौज़ी ने उनको शेख़ सालेद सदूक़ (और ज़हबी ने शैख़ आलिम व आदिल के नाम से सराहा है।(

• अबू हामिद अज़हरी , मौसूफ़ वही अहमद बिन हसने नैशापुरी हैं जिनको ज़हबी ने आदिल और सदूक़ के नाम से याद किया है।

• अबू मुहम्मद मुख़ल्लदी , हाकिम ने उनसे हदीस को सुनना सही क़रार दिया है और रिवायत में मुसतहकम शुमार किया है।(और ज़हबी ने भी उनको शेख सदूक़ और आदिल क़रार दिया है।

(तर्जुमा ए इमाम अली बिन अबी तालिब (अ) अज़ तारिख़े दमिश्क़ जिल्द 2 पेज 86)

(अल मुनतज़िम जिल्द 18 पेज 54)

(सेयरे आलामुन नबला जिल्द 20 पेज 109)

(सेयरे आलामुन नबली जिल्द 18 पेज 254)

(सेयरे आलामुन नबला जिल्द 16 पेज 540)

• अबू बक्र मुहम्मद बिन इब्राहिम हलवानी , ख़तीबे बग़दादी ने उनको सिक़ह शुमार किया है।हाकिमे नैशापुरी ने उनको सिक़ह रावियों में माना है और ज़हबी ने उनको हाफ़िज़े सब्त के उनवान से याद किया है। नीज़ इब्ने जौज़ी ने उनको सिक़ह क़रार दिया है।

• हसन बिन हम्माद सजादा , मौसूफ़ अबी दाउद , निसाई और इब्ने माजा के रेजाल में से हैं जिनके बारे में अहमद बिन हंबल ने कहा है कि उनसे मुझ तक ख़ैर के अलावा कुछ नही पहुचा। ज़हबी ने उनको जैयद उलामा और अपने ज़माने के सिक़ह रावियों में से माना है। नीज़ इब्ने हजर ने उनको सदूक़ के नाम से याद किया है।

और बाक़ी सनद के रेजाल की छानबीन गुज़िश्ता हदीस में हो चुकी है।

(सेयरे आलामुन नबला जिल्द 16 पेज 539)

(तारिख़े बग़दाद जिल्द 1 पेज 398)

(सेयरे आलामुन नबला जिल्द 15 पेज 61)

(सेयरे आलामुन नबला जिल्द 15 पेज 60)

(अल मुनतज़िम जिल्द 12 पेज 279)

(सेयरे आलामुन नबला जिल्द 11 पेज 393)

(सेयरे आलामुन नबला जिल्द 11 पेज 393)

(तक़रीबुत तहज़ीब जिल्द 1 पेज 165 )

3. वाहिदी की रिवायत

वाहिदी ने अबू सईद मुहम्मद बिन अली सफ़्फार से , उन्होने हसन बिन अहमद मुख़ल्लदी से , उन्होने मुहम्मद बिन हमदून से , उन्होने मुहम्मद बिन इब्राहीम ख़ल्वती (हलवानी) से , उन्होने हसन बिन हम्माद सजादा से , उन्होने अली बिन आबिस से , उन्होने आमश और अबी हज्जाफ़ से , उन्होने अतिया से , उन्होने अबू सईदे ख़िदरी से नक्ल किया है कियह आयते शरीफ़ा ( ا أَيُّهَا الرَّسُولُ بَلِّغْ مَا أُنزِلَ إِلَيْكَ مِن رَّبِّكَ ۖ وَإِن لَّمْ تَفْعَلْ فَمَا بَلَّغْتَ رِسَالَتَهُ ۚ وَاللَّـهُ يَعْصِمُكَ مِنَ النَّاسِ ۗ إِنَّ اللَّـهَ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْكَافِرِينَ ) रोज़े ग़दीरे ख़ुम में हज़रत अली (अ) की शान में नाज़िल हुई।

सनद की छानबीन

महमूद जअबी ने अपनी किताब अल बय्येनात फ़िर रद्दे अलल मुराजेआत में इस हदीस की सनद पर यह ऐतेराज़ किया है कि इसकी सनद में अतिया शामिल है।

चुनाचे उनका कहना है कि अतिया को इमाम अहमद बिन हंबल ने ज़ईफ़ुल हदीस माना है और अबू हातिम ने भी उसकी तज़ईफ़ की है और इब्ने अदी ने उसको शियाने कूफ़ा में शुमार किया है।

लेकिन यह तज़ईफ़ यक़ीनी तौर पर सही नही है क्योकि:

अव्वल. अतिया औफ़ी ताबेईने में से हैं जिनके बारे में रसूले अकरम (स) ने मदह की है।

दूसरे. अल अदबुल मुफ़रद में बुख़ारी और सही अबी दाऊद , सही तिरमिज़ी , सही इब्ने माजा और मुसनदे अहमद के रेजाल में उनका शुमार होता है और उलामा ए अहले सुन्नत ने बहुत ज़्यादा मदह की है।

लेकिन जौज़जानी जैसे लोगों ने उनको ज़ईफ़ माना है जो ख़ुद नासेबी होने और हज़रत अली (अ) से मुनहरिफ़ होने में मशहूर है और उसकी तज़ईफ़ करना भी इसी वजह से कि मौसूफ़ हज़रत अली (अ) को सभी सहाबा पर तरजीह देते थे और जब हुज्जाज की तरफ़ से हज़रत अली (अ) पर तअन व तअन करने का हुक्म दिया गया तो उन्होने क़बूल नही किया , जिसके नतीजे में उनको चार सौ कोड़े लगाये गये और उनकी दाढ़ी को भी दिया गया।

4. हिबरी की रिवायत

हिबरी ने हसन बिन हुसैन से , उन्होने हबान से , उन्होने कलबी से , उन्होने अबी सालेह से , उन्होने इब्ने अब्बास से आयते शरीफ़ा ( ا أَيُّهَا الرَّسُولُ بَلِّغْ مَا أُنزِلَ إِلَيْكَ مِن رَّبِّكَ ۖ وَإِن لَّمْ تَفْعَلْ فَمَا بَلَّغْتَ رِسَالَتَهُ ۚ وَاللَّـهُ يَعْصِمُكَ مِنَ النَّاسِ ۗ إِنَّ اللَّـهَ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْكَافِرِينَ ) की तफ़सीर में नक़्ल किया है कि यह आयते शरीफ़ा हज़रत अली (अ) की शान में नाज़िल हुई है। चुनाचे रसूले ख़ुदा (स) को हुक्म हुआ कि जो कुछ (हज़रत अली (अ) के बारे में) नाज़िल हो चुका है उसको पहुचा दो। उस मौक़े पर आँ हज़रत (स) ने हज़रत अली (अ) का हाथ बुलंद करके फ़रमाया:

हदीस

जिसका मैं मौला हूँ पस उसके यह अली मौला हैं , पालने वाले , जिसने उनकी विलायत को क़बूल किया और उनको दोस्त रखा तू भी उसको अपनी विलायत के ज़ेरे साया क़रार दे और जो शख़्स उनसे दुश्मनी रखे और उनकी विलायत का इंकार करे तू भी उसको दुश्मन रख।(

अहले सुन्नत के नज़दीक इस रिवायत की सनद मोतबर है।

(तफ़सीरे हिबरी पेज 262 )

अहले बैत (अ) की निगाह में आयत का शाने नुज़ूल

शेख़ कुलैनी ने सही सनद के साथ ज़ुरारा से , उन्होने फ़ुज़ैल बिन यसार से , उन्होने बुकैर बिन आयुन से , उन्होने मुहम्मद बिन मुस्लिम से , उन्होने बरीद बिन मुआविया और अबिल जारू से और उन्होने हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ) से रिवायत की है कि ख़ुदा वंदे आलम ने अपने रसूल को हज़रत अली की विलायत का हुक्म दिया और यह आयए शरीफ़ा नाज़िल फ़रमाई

إِنَّمَا وَلِيُّكُمُ اللَّـهُ وَرَسُولُهُ وَالَّذِينَ آمَنُوا الَّذِينَ يُقِيمُونَ الصَّلَاةَ وَيُؤْتُونَ الزَّكَاةَ وَهُمْ رَاكِعُونَ

(सूरये मायदा आयत 55)

ईमान वालो , बस तुम्हारा वली अल्लाह है और उसका रसूल और वह साहिबाने ईमान जो नमाज़ कायम करते हैं और हालते रुकू में ज़कात देते हैं।

ख़ुदा वंदे आलम ने उलिल अम्र की विलायत को वाजिब क़रार दिया है , वह नही जानते थे कि विलायत क्या है ? पस ख़ुदा वंदे आलम ने हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स) को हुक्म दिया कि उनके लिये विलायत की तफ़सीर फ़रमा दें , जैसा कि नमाज़ , रोज़ा , हज और जकात की तफ़सीर की है , जब यह हुक्म नाज़िल हुआ तो आँ हज़रत (स) परेशान हुए कि कहीं लोग अपने दीन से फिर न जायें और मुझे झुटलाने लगें , आँ हज़रत (स) ने अपने परवरदिगार की तरफ़ रुजू किया उस मौक़े पर ख़ुदा वंदे आलम ने यह आयत नाज़िल फरमाई

: يَا أَيُّهَا الرَّسُولُ بَلِّغْ مَا أُنزِلَ إِلَيْكَ مِن رَّبِّكَ وَإِن لَّمْ تَفْعَلْ فَمَا بَلَّغْتَ رِسَالَتَهُ وَاللَّـهُ يَعْصِمُكَ مِنَ النَّاسِ إِنَّ اللَّـهَ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْكَافِرِينَ

ऐ पैग़म्बर , आप उस हुक्म को पहुचा दें जो आपके परवरदिगार की तरफ़ नाज़िल किया गया है और अगर यह न किया तो गोया उसके पैग़ाम को नही पहुचाया और ख़ुदा आपको लोगों के शर से महफ़ूज़ रखेगा।

पस आँ हज़रत (स) ने ख़ुदा के हुक्म से विलायत को वाज़ेह कर दिया और रोज़े गदीरे ख़ुम में हज़रत अली (अ) की ख़िलाफ़त का ऐलान किया... और मुसलमानों को हुक्म दिया कि हाज़ेरीन ग़ायेबीन तक इस वाक़ेया की इत्तेला दें।

(काफ़ी जिल्द 1 पेज 290 हदीस 5)

हदीस की रिवायत करने वाले सहाबा

उलामा ए अहले सुन्नत ने सहाबा से मुतअल्लिक़ रिवायत नक़्ल की है कि यह आयते शरीफ़ा की शान में नाज़िल हुई है जैसे:

1. ज़ैद बिन अरक़म

(अल ग़दीर जिल्द 1 पेज 424)

2. अबू सईद ख़िदरी

(तफ़सीरुल क़ुरआनिल अज़ीम जिल्द 4 पेज 173 हदीस 669, दुर्रे मंसूर जिल्द 3 पेज 117 तर्जुम ए अल इमाम अली (अ) अज़ तारीख़े दमिश्क़ जिल्द 2 पेज 85 हदीस 588 )

3. अब्दुल्लाह बिन असाकर

अल अमाली पेज 162 हदीस 133, मनाक़िबे अली बिन अबी तालिब पेज 240 हदीस 349, अल क़श्फ़ वल बयान जिल्द 4 पेज 92, शवाहिदुत तंज़ील जिल्द 1 पेज 239 हदीस 240

3. अब्दुल्लाह बिन मसऊद

(मनाकि़ब अली बिन अबी तालिब (अ) पेज 239 हदीस 346, दुर्रे मंसूर जिल्द 3 पेज 117, फ़तहुल क़दीर जिल्द 2 पेज 60, रुहुल मआनी जिल्द 4 पेज 282)

4. जाबिर बिन अब्दुल्लाह अंसारी

(शवाहिदुत तंज़ील जिल्द 1 पेज 255 हदीस 249)

5. अबू हुरैरा (

शवाहिदुत तंज़ील जिल्द 1 पेज 249 हदीस 244, फ़रायदुस समतैन जिल्द 1 पेज 158 हदीस 120

6. अब्दुल्लाह बिन अबी औफ़ी असलमी

(शवाहिदुत तंज़ील जिल्द 1 पेज 252 हदीस 247)

7. बरा बिन आज़िब अंसारी

(मफ़ातिहुल ग़ैब जिल्द 12 पेज 50, अल कश्फ़ वल बयान जिल्द 4 पेज 92)

हदीस की रिवायत करने वाले ताबेईन

ताबेईन ने भी इस आयत का शाने नुज़ूल रोज़े ग़दीरे ख़ुम में हज़रत अली (अ) को क़रार दिया है जैसे:

1. इमाम बाक़िर (अ)

(अल कश्फ़ वल बयान जिल्द 4 पेज 92, यनाबीउल मवद्दत जिल्द पेज 119 बाब 39, शवाहिदुत तंज़ील जिल्द 1 पेज 254 हदीस 248, मफ़ातिहुल ग़ैब जिल्द 12 पेज 50, उमदतुल क़ारी जिल्द 18 पेज 206)

2. इमाम जाफ़र सादिक़ (अ)

(तफ़सीरुल हिबरी पेज 285 हदीस 41)

3. अतिया बिन सईद औफ़ी

(अन नूरुल मुशतइल मिन किताबे मा नज़ल मिन क़ुरआन फ़ी अलियिन पेज 86 पेज 16)

4. ज़ैद बिन अली

(मनाक़िबे अली बिन अबी तालिब (अ) पेज 240 हदीस 348)

5. अबू हमज़ा सुमाली

(मनाक़िबे अली बिन अबी तालिब (अ) पेज 240 हदीस 347)

हदीस की रिवायत करने वाले उलामा ए अहले सुन्नत

बहुत से उलामा ए अहले सुन्नत ने इस हदीस को अपनी अपनी किताबों में ज़िक्र किया है जैसे:

1. अबू जाफ़र तबरी

(अल विलायह फ़ी तरीक़े हदीसिल ग़दीर)

2. अबी हातिमें राज़ी

(दुर्रे मंसूर जिल्द 2 पेज 298, फ़तहुल क़दीर जिल्द 2 पेज 57)

3. हाफ़िज़ अबू अब्दिल्लाह महामिली

(कंज़ुल उम्माल जिल्द 11 पेज 603 हदीस 3291)

4. हाफ़िज़ इब्ने मरदवेह

(दुर्रे मंसूर जिल्द 2 पेज 298)

5. अबू इसहाक़ सालबी

(अल कश्फ़ वल बयान जिल्द 4 पेज 92)

6. अबू नईम इसफ़हानी

(मा नज़ल मिनल क़ुरआन फ़ी अलियिन (अ) पेज 86)

7. वाहिदी नैशापुरी

(असबाबुन नुज़ूल पेज 135)

8. हाकिम हसकानी

(शवाहिदुत तंज़ील जिल्द 1 पेज 255 हदीस 249)

9. अबू सईद सजिसतानी

(किताबुल विलायह ब नक़्ल अज़ अत तरायफ़ जिल्द 1 पेज 121)

10. अबुल क़ासिम इब्ने असाकर शाफ़ेई

(तारिख़े मदीन ए दमिश्कि़ जिल्द 12 पेज 237)

11. फ़ख़रे राज़ी

(अत तफ़सीरुल कबीर जिल्द 12 पेज 49)

12. अबू सालिम नसीबी शाफ़ेई

(मतालिबुस सुऊल पेज 16)

13. शेख़ुल इस्लाम हमूई

(फ़रायदुस समतैन जिल्द 1 पेज 158 हदीस 120)

14. सैयद अली हमदानी

(मवद्दतुल क़ुरबा मवद्दत पंजुम)

15. इब्ने सबाग़ मलिकी

(अल फ़ुसुलुल मुहिम्मा पेज 42)

16. क़ाज़ी ऐनी

(उमदतुल क़ारी फ़ी शरहे सहीहिल बुख़ारी जिल्द 18 पेज 206)

17. निज़ामुद्दीन नैशापुरी

(ग़रायबुल क़ुरआन व रग़ायबुल फ़ुरक़ान जिल्द 6 पेज 14)

18. कमालुद्दीन मैबदी

(शरहे दीवाने अमीरुल मोमिनीन (अ) पेज 406)

19. जलालुद्दीन सुयूती

(दुर्रे मंसूर जिल्द 3 पेज 116)

20. मीरज़ा मुहम्मद बदख़शानी

(मिफ़ताहुन नजास पेज 34 से 36 बाब 3 फ़स्ल 11)

21. शहाबुद्दीन आलूसी

(रुहुल मआनी जिल्द 5 पेज 192)

22. क़ाज़ी शौकानी

(फ़तहुल क़दीर जिल्द 2 पेज 60)

23. क़ंदूज़ी हनफ़ी

(यनाबिऊल मवद्दत पेज 119 बाब 39)

24. शेख़ मुहम्मद अबदहू

(अल मनार जिल्द 6 पेज 463 )

आय ए बल्लिग़ के बारे में शिया नज़िरया

शिया इस बात पर अक़ीदा रखते हैं कि आय ए बल्लिग़ हज़रत अली (अ) की विलायत से मुतअल्लिक़ है और ( ا أَيُّهَا الرَّسُولُ بَلِّغْ مَا أُنزِلَ إِلَيْكَ مِن رَّبِّكَ ۖ وَإِن لَّمْ تَفْعَلْ فَمَا بَلَّغْتَ رِسَالَتَهُ ۚ وَاللَّـهُ يَعْصِمُكَ مِنَ النَّاسِ ۗ إِنَّ اللَّـهَ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْكَافِرِينَ ) का मिसदाक़ हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अ) की विलायत है क्योकि:

अव्वल. ख़ुदा वंदे आलम ने इस सिलसिले में इतना ज़्यादा ऐहतेमाम किया कि अगर इस हुक्म को न पहुचाया तो गोया पैग़म्बर ने अपनी रिसालत ही नही पहुचाई और यह अम्र हज़रत अली (अ) की ज़आमत , इमामत और जानशीनी के अलावा कुछ नही था और यह ओहदा नबी ए अकरम (स) की तमाम ज़िम्मेदारियों का हामिल है सिवाए वहयी के।

दूसरे. मज़कूरा आयत से यह नतीजा हासिल होता है कि रसूले ख़ुदा के लिये इस अम्र का पहुचाना दुशवार था क्यो कि इस चीज़ का ख़ौफ़ पाया जाता था कि बाज़ लोग इस हुक्म की मुख़ालेफ़त करेंगें और इख़्तेलाफ़ व तफ़रेक़ा बाज़ी के नतीजे में आँ हज़रत (स) की 23 साल की ज़हमतों पर पानी फिर जायेगा और यह मतलब (तारीख़ का वरक़ गरदानी के बाद मालूम हो जाता है कि) हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अ) की विलायत के ऐलान के अलावा और कुछ नही था।

क़ुरआनी आयात की मुख़्तसर तहक़ीक़ के बाद मालूम हो जाता है कि रसूले अकरम (स) नबूवत पर अहद व पैमान रखते थे और ख़ुदा वंदे आलम की तरफ़ से सब्र व इस्तेक़ामत पर मामूर थे। इसी वजह से आँ हज़रत (स) ने दीने ख़ुदा की तबलीग़ और पैग़ामे इलाही को पहुचाने में कोताही नही की है और ना माक़ूल दरख़्वास्तों और मुख़्तलिफ़ बहाने बाज़ियों के सामने सरे तसलीम के ख़म नही किया। पैग़म्बरे अकरम (स) ने पैग़ामाते इलाही को पहुचाने में ज़रा भी कोताही नही की। यहाँ तक कि जिन मवारिद में आँ हज़रत (स) के लिये सख्ती और दुशवारियाँ थी जैसे ज़ौज ए ज़ैद जै़नब का वाक़ेया और मोमिनीन से हया का मसला या मज़कूरा आयत को पहुचाने के मसला , उन तमाम मसायल में आँ हज़रत (स) को अपने लिये कोई ख़ौफ़ नही था।

(सूरए अहज़ाब आयत 7)

(सूरए हूद आयत 12)

(सूरए युनुस आयत 15)

(सूरए अहज़ाब आयत 37)

(सूरए अहज़ाब आयत 53)

लिहाज़ा पैग़म्बरे अकरम (स) की परेशानी को दूसरी जगह तलाळ करना चाहिये और वह इस पैग़ाम के मुक़ाबिल मुनाफ़ेक़ीन के झुटलाने के ख़तरनाक नतायज और आँ हज़रत (स) के बाज़ असहाब के अक्सुल अमल के मनफ़ी असरात थे जिनकी वजह से उनके आमाल ज़ब्त हो गये और मुनाफ़ेक़ीन के निफ़ाक़ व क़ुफ्र में इज़ाफ़ा हो जाता और दूसरी तरफ़ उनकी तकज़ीब व क़ुफ्र की वजह से रिसालत को आगे बढ़ना यहाँ तक कि अस्ले रिसालत नाकाम रह जाती और दीन ख़त्म हो जाता।

तीसरे. आय ए इकमाल की शाने नुज़ूल के बारे में शिया और सुन्नी तरीक़ों से सहीहुस सनद रिवायात बयान हुई हैं कि यह आयत हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अ) के बारे में नाज़िल हुई हैं।

नतीजा यह हुआ कि

(ا أَيُّهَا الرَّسُولُ بَلِّغْ مَا أُنزِلَ إِلَيْكَ مِن رَّبِّكَ ۖ وَإِن لَّمْ تَفْعَلْ فَمَا بَلَّغْتَ رِسَالَتَهُ ۚ وَاللَّـهُ يَعْصِمُكَ مِنَ النَّاسِ ۗ إِنَّ اللَّـهَ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْكَافِرِينَ )

से हज़रत अली (अ) की विलायत मुराद है जिसको पहुचाने का हुक्म आँ हज़रत (स) को दिया गया था।

ऐतेराज़ात की छानबीन

बाज़ उलामा ए अहले सुन्नत ने दूसरी ताविलात करने की कोशिश की है जिससे मसअल ए ग़दीर से आयत का कोई ताअल्लुक़ न हो और यह आयत हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अ) के फ़ज़ायल में शुमार न हो , अब हम यहाँ पर उन ताविलात की छानबीन करते हैं:

1. आयत का नुज़ूल मदीने में पैग़म्बरे अकरम (स) की हिफ़ाज़त के लिये हुआ था।

अहले सुन्नत बाज़ रिवायात की बिना पर कहते हैं: इस आयत के नाज़िल होने से पहले पैग़म्बरे अकरम (स) की हिफ़ाज़त की जाती थी लेकिन इस आयत के नाज़िल हो जाने के बाद ख़ुदा वंदे आलम ने आँ हज़रत (स) की जान की ज़िम्मेदारी ले ली और मुहाफ़िज़ों के लिये (जंग में न जाने के लिये) कोई बहाना न छोड़ा , चुनाचे आं हज़रत (स) ने फ़रमाया: तुम लोग चले जाओ ख़ुदा वंदे आलम मेरी हिफ़ाज़त ख़ुद फऱमायेगा।

जवाब:

अव्वल. अगर फ़र्ज़ करें कि यह रिवायात सही भी हैं तो मज़कूरा आयत के नुज़ूल को बयान नही करतीं और विलायत अली (अ) के मुख़ालिफ़ नही हैं बल्कि उनमे सिर्फ़ पैग़म्बरे अकरम (स) की निस्बत उस आयत के शाने नुज़ूल के एक हिस्से को बयान किया गया है और चूँकि बाज़ रिवायात में इस बात की वज़ाहत की गई है कि यह रुख्सत मदीने में रसूले इस्लाम स की तरफ़ से दी गई है और इस चीज़ का ऐहतेमाल है कि ग़दीरे ख़ुम से आँ हज़रत स की वफ़ात तक का फ़ासला मुराद हो।

दूसरे. बुनियादी तौर पर अहले सुन्नत मुफ़स्सेरीन ने इस तरह की रिवायात को अजीब व ग़रीब क़रार दिया है और इस बात पर मुत्तफ़िक़ है कि चूँकि मज़कूरा आयत मदनी है और बेसत के आख़िरी दिनों में नाज़िल हुई है लिहाज़ा मक्के में जनाबे अबू तालिब अ की हिफ़ाज़त करने से कोई ताअल्लुक़ नही रखती।

तीसरे. यह कहना कि मज़कूरा आयत दोबार नाज़िल हुई है एक मर्तबा बेसत के शुरु में और दूसरी बार बेसत के आख़िरी में मदीने में नाज़िल हुई इससे भी मुश्किल हल नही होती , क्योकि फ़र्ज़ करें कि आयत बेसत के शुरु में नाज़िल हुई हो जिसमें ख़ुदा वंदे आलम ने आँ हज़रत स की हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी ली हो लेकिन फिर मदीने में असहाब के ज़रिये आँ हज़रत स की हिफा़ज़त की कोई ज़रूरत नही है।

तफ़सीरे इब्ने कसीर जिल्द 2 पेज 79

2. मक्के में हिफ़ाज़त के सिलसिले में आयत का नुज़ूल

अल्लामा सुयूती इब्ने अब्बास से नक्ल करते हैं कि रसूले अकरम (स) से सवाल किया गया कि आप पर कौन सी आयत सख़्त नाज़िल हुई है ? आं हज़रत (स) ने फ़रमाया: मैं मौसमें हज के दौराम मिना में था और मुशरेकीन अरब और दूसरे लोग मौजूद थे। उस वक़्त हज़रत जिबरईल यह आयत लेकर मुझ पर नाज़िल हुए (.....) मैं खड़ा हुआ और यह ऐलान किया: ऐ लोगो , तुम में कौन है जो परवर दिगार के पैग़ाम को पहुचाने में मेरी मदद करे ताकि उसको जन्नत की ज़मानत दे दूँ , ऐ लोगों , ख़ुदा की वहदानियत और मेरी रिसालत की गवाही दो ताकि कामयाब हो जाओ और निजात पाकर जन्नत में दाख़िल हो जाओ , उस मौक़े पर औरत मर्द , छोटे बड़े सभी लोंगो ने मुझ पर ढेलों और पत्थरों की बारिश कर दी और मेरे मुँह पर लुआबे दहन फ़ेकने लगे और कहने लगे यह झूटा है.. उस मौक़े पर आँ हज़रत (स) के चचा अब्बास आये और उनको लोगों से निजात दी और पीछे हटा दिया।(

(तफ़सीरे इब्ने कसीर जिल्द 2 पेज 79)

जवाब:

यह रिवायत बनी अब्बास की तरफ़ से जाली और मन गढ़त है ताकि अलवियों के मुक़ाबले में फ़ज़ीलत पेश कर सकें क्योकि:

अव्वल. मज़कूरा आयत शिया और सुन्नी इत्तेफ़ाक़ की बेना पर मक्के में नाज़िल नही हुई है और आयत के दो बार नाज़िल होने की भी कोई दलील नही है।

दूसरे. यह रिवायत ख़बरे वाहिद है और तमाम अहादीस के मुख़ालिफ़ है लिहाज़ा उसको मोतबर नही माना जा सकता।

3. बनी अनमार से जंग के वक़्त आयत का नुज़ूल

इब्ने अबी हातम , जाबिर बिन अब्दुल्लाह अंसारी से रिवायत नक़्ल करते हैं:

बनी अनमार से जंग के दौरान आँ हज़रत (स) एक कूँए पर बैठे हुए थे। उस मौक़े पर बनी नज्जार कबीले से वारिस या ग़ौरस नामी शख्स ने आँ हज़रत (स) को क़त्ल करने का मंसूबा बनाया.. चुनाँचे वह आँ हज़रत (स) के नज़दीक आ कर कहता है कि आप मुझे अपनी तलवार दे दें ताकि मैं उसे सूँघू , आपने उसको तलवार दे दी। उस मौक़े पर उसका हाथ लड़खड़ाया और तलवार गिर गई , उस मौक़े पर पैग़म्बरे अकरम (स) ने उससे फ़रमाया: ख़ुदावंदे आलम तेरे और तेरे इरादे में मानेअ हो गया। चुनाचे उसी मौक़े पर यह आयत नाज़िल हुई:

يَا أَيُّهَا الرَّسُولُ بَلِّغْ مَا أُنزِلَ إِلَيْكَ مِن رَّبِّكَ وَإِن لَّمْ تَفْعَلْ فَمَا بَلَّغْتَ رِسَالَتَهُ وَاللَّـهُ يَعْصِمُكَ مِنَ النَّاسِ إِنَّ اللَّـهَ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْكَافِرِينَ

ऐ पैग़म्बर , आप उस हुक्म को पहुचा दें जो आपके परवर दिगार की तरफ़ से नाज़िल किया गया है।

(तफ़सीरुल क़ुरआनिल करीम जिल्द 4 पेज 1173 हदीस 6614)

जवाब:

अव्वल. इब्ने कसीर हदीस को नक़्ल करने के बाद कहते हैं: जाबिर से इस सूरत में हदीस नक़्ल होना (वाक़ेयन अजीब व) ग़रीब है।(

दूसरे. इस वाक़ेया के नक़्ल में इख़्तिलाफ़ है क्यो कि अबू हुरैरा ने इसको दूसरे तरीक़े से नक़्ल किया है और नक़्ल में अगर इख़्तिलाफ़ हो तो रिवायत ज़ईफ़ शुमार की जाती है।

तीसरे. यह वाक़ेया आयत के अल्फ़ाज़ के मुख़ालिफ़ है क्यो कि (आयत में) पहुचाने पर आँ हज़रत (स) की हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी ली गई है।

चौथे. रसूले अकरम (स) के क़त्ल की साजिश कोई नया मसला नही था जिसकी वजह से ख़ुदा वंदे आलम बेसत के आख़िरी ज़माने में मज़क़ूरा आयत के मुताबिक़ आँ हज़रत (स) की जान की ज़मानत लेता।

पाँचवे. यह वाक़ेया फ़रीक़ैन के नज़दीक बयान होने वाली तमाम रिवायात के मुख़ालिफ़ है क्योकि उन रिवायात में पैग़म्बरे अकरम (स) की परेशानी उस हुक्म के पहुचाने में थी जो आप नाज़िल हुआ था।

(तफ़सीरे इब्ने कसीर जिल्द 2 पेज 79)

असबाबुन नुज़ूल सुयूती पेज 52, दुर्रे मंसूर जिल्द 3 पेज 119, तफ़सीरे इब्ने कसीर जिल्द 2 पेज 79

4. रज्म व क़िसास के बारे में आयत का नुज़ूल

बाज़ अहले सुन्नत मज़ूकरा आयत के शाने नुज़ूल के बारे में कहते हैं: ख़ुदावंदे ने अपने रसूल स को हुक्म दिया कि रज्म व क़िसास के बारे में जो हुक्म आप नाज़िल हुआ है उसको पहुचा दें और दर हक़ीक़त यह ऐलान यहूदियों के नज़रिये के मुक़ाबले में था जो तौरेत में बयान होने के बाद हुक्म यानी शौहर दार औरत से ज़ेना की सज़ा रज्म और क़िसास के हुक्म से बचना चाहते थे। इस वजह से कुछ लोगों को रसूले अकरम (स) के पास भेजा ताकि उनसे इस हुक्म के बारे में सवाल करें , जिबरईल अमीन नाज़िल हुए और रज्म व क़िसास का हुक्म लाये।

(उमदतुल क़ारी जिल्द 18 पेज 206, तफ़सीरुल मआलिमित तंज़ील , बग़बी जिल्द 2 पेज 51, मफ़ातिहुल ग़ैब जिल्द 12 पेज 48)

अहले सुन्नत कहते हैं कि सूरये मायदा आयात नंबर 41, 43 जो मज़कूरा आयत से पहले हैं इसी सिलसिले में नाज़िल हुई हैं।

जवाब:

अव्वल. यह मुद्दआ बिला दलील है और तमाम सहाबा के क़ौल के मुख़ालिफ़ है।

दूसरे. आयात के अल्फ़ाज़ इस क़ौल को रद्द करने के लिये काफ़ी है क्योकि बेसत के आख़िर में इस सूरह के नाज़िल होने के वक़्त यहूदी मुतफ़र्रिक़ और मग़लूब हो गये थे और वह इस हालत में नही थे कि आँ हज़रत (स) को कोई नुक़सान पहुचा सकें ताकि ख़ुदा वंदे आलम आपको महफ़ूज़ रखने का वादा देता।

5. यहूद की मक्कारी के बारे में आयत का नुज़ूल

आय ए बल्लिग़ को यहूदियों की मक्कारी के बारे में तफ़सीर करने वाले पहले शख़्स मक़ातिल बिन सुलेमान हैं। जिसके बाद तबरी , बग़वी , मुहम्मद बिन अबू बक राज़ी ने इस क़ौल और तफ़सीर को इख़्तियार किया है। फ़ख़े राज़ी मज़कूरा आयत के शाने नुज़ूल के सिलसिले में बहुत से ऐहतेमालात बयान करने के बाद उसी क़ौल को इख़्तियार करते हैं और इस क़ौल की तन्हा दलील मज़कूरा आयत से पहले और बाद वाली आयात को क़रार देते हैं जो सबकी सब यहूदियों के बारे में नाज़िल हुई हैं।

तफ़सीरे मक़ातिल बिन सुलेमान जिल्द 1 पेज 491, 492

जामेउल बयान तबरी जिल्द 4 पेज 307, मआलिमुत तंज़ील बग़वी जिल्द 2 पेज 51, तफ़सीरे असअलतुल क़ुरआन व अजवतिहा राज़ी पेज 74

मफ़ातिहुल ग़ैब जिल्द 12 पेज 50

जवाब:

अव्वल. सूरए मायदा वह आख़िरी सूरह है जो पैग़म्बरे अकरम स पर हुज्जतुल विदा में नाज़िल हुआ है , उस मौक़े पर यहूदियों की कोई हैसियत नही थी जिसकी वजह से पैग़म्बरे अकरम स ख़ौफ़ज़दा होते और उनकी वजह से हिफ़ाज़त और निगहबानी की ज़रूरत होती।

दूसरे. क़ुरआने करीम नुज़ूल की तरतीब से नही है जिसकी वजह से पहली आयत को किसी मअना के लिये क़रीना क़रार दिया जा सके।

तीसरे. पहली आयत के पेशे नज़र अगर फ़र्ज़ भी कर लें कि इस मअना में ज़हूर रखता है तो भी यह क़रीना मक़ामी होगा और दूसरी रिवायात के साफ़ साफ़ अल्फ़ाज़ दूसरे क़रायन की वजह से उसका कोई ज़हीर बाक़ी नही बचेगा।

चौथे. फख़रे राज़ी के कहने के मुताबिक़ यहूदियों के बारे में जो हुक्म ख़ुदा वंदे आलम ने नाज़िल किया उन लोगों पर इतना महंगा पड़ा कि रसूले अकरम स की तरफ़ से पहुचाने में ताख़ीर हुई और वह हुक्म यह था:

قُلْ يَا أَهْلَ الْكِتَابِ لَسْتُمْ عَلَىٰ شَيْ

कह दीजिए कि ऐ अहले किताब तुम्हारा कोई मज़हब नही है।

सूरह मायदा आयत 68

हालाकि क़ुरआने करीम ने इस आयत से पहले इसी सूरह की आयत में यहूदियों से बहुत सख़्त ख़िताब किया

: وَقَالَتِ الْيَهُودُ يَدُ اللَّـهِ مَغْلُولَةٌ غُلَّتْ أَيْدِيهِمْ وَلُعِنُوا بِمَا قَالُوا

और यहूदी कहते हैं कि ख़ुदा के हाथ बंधे हुए हैं जबकि अस्ल में उन्ही के हाथ बंधे हुए हैं और यह अपने क़ौल के बेना पर मलऊन हैं।

सूरह मायदा आयत 64

पाँचवें. मुम्किन है कि इन आयात के दरमियान इस आयत का वुजूद इस नुक़्ते की तरफ़ इशारा हो कि जिन मुनाफ़ेक़ीन से पैग़म्बरे अकरम स को ख़ौफ़ था वह यहूदियों की तरह या कुफ़ व ज़लालत में उन्ही की क़िस्म हैं।

आय ए इकमाल

हज़रत अली अ की इमामत व विलायत पर दलालत करने वाली आयात में से और हदीसे ग़दीर से इमामत व विलायत के मअना को ताईद करने वाली मशहूर आयत आय ए इकमाल है जिसमें ख़ुदा वंदे आलम फ़रमाता हैं: الْيَوْمَ أَكْمَلْتُ لَكُمْ دِينَكُمْ وَأَتْمَمْتُ عَلَيْكُمْ نِعْمَتِي وَرَضِيتُ لَكُمُ الْإِسْلَامَ دِينًا

आज मैने तुम्हारे दीन को कामिल कर दिया और तुम पर अपनी नेंमत पूरी कर दी और तुम्हारे इस दीन इस्लाम को पसंद किया।

(सूरह मायदा आयत 3)

इस आयत के ज़ैल में फ़रीक़ैन से मुतअद्दिद रिवायात बयान हुई है कि यह आय ए शरीफ़ा हज़रत अमीरुल मोमिनीन अ की शान में नाज़िल हुई है। चुनाचे अब हम उन रिवायात की छानबीन शुरु करते हैं।

अहादीस की छानबीन

अहले सुन्नत की मोतबर किताबों की वरक़ गरदानी से ऐसी सहीहुस सनद रिवायात मिलती है जो आयत के शाने नुज़ूल को हज़रत अली अ से मख़सूस मानती है। अब हम उन रिवायात की तहक़ीक़ करते हैं:

1. अबू नईम इस्फ़हानी की रिवायत

अबू नईम , मुहम्मद बिन अहमद बिन अली मुख़ल्लदी से , वह मुहम्मद बिन उस्मान बिन अबी शैबा से , वह यहया हमानी से , वह क़ैस बिन रबी से , वह अबी हारून बिन अबदी से और वह अबू सईद ख़िदरी से रिवायत करते हैं कि पैग़म्बरे अकरम (स) ने रोज़े ग़दीरे ख़ुम लोगों को हज़त अली (अ) की तरफ़ दावत दी और हुक्म दिया कि इस दरख़्त के नीचे से ख़ाक व ख़ाशाक (यानी झाड़ी वग़ैरह) साफ़ कर दें और यह जुमेरात के दिन का वाक़ेया है , आँ हज़रत (स) ने अली (अ) को बुलाया और उनके दोनो बाज़ू को पकड़ कर बुलंद फ़रमाया , यहाँ तक कि रसूलल्लाह (स) की सफ़ेदी ए बग़ल नमूदार हो गयीं.. अबी लोग मुतफ़र्रिक़ नही हुए थे कि यह आय ए शरीफ़ा नाज़िल हुई:

الْيَوْمَ أَكْمَلْتُ لَكُمْ دِينَكُمْ وَأَتْمَمْتُ عَلَيْكُمْ نِعْمَتِي وَرَضِيتُ لَكُمُ الْإِسْلَامَ دِينًا

उसी मौक़े पर रसूलल्लाह (स) ने फ़रमाया: अल्लाहो अकबर दीन कामिल करने , नेमतें तमाम होने , मेरी रिसालत और मेरे बाद अली (अ) की विलायत पर परवरदिगार के राज़ी होने पर और उस मौक़े पर फ़रमाया: जिसका मैं मौला हूँ उसके यह अली भी मौला हैं। पालने वाले , जो शख्स उनकी विलायत को क़बूल करे तू भी उसको दोस्त रख और जो उनसे दुश्मनी करे तू भी उस को दुश्मन रख , जो उनकी मदद करे तू भी उसकी मदद कर और जो उनकी ज़लील करना चाहे तू भी उसको ज़लील व ख़्वार फ़रमा...।

(ख़सायसुस वहयिल मुबीन पेज 61,62 नक़्ल अज़ किताब मा नज़ल अली मिनल क़ुरआन , अबी नईम इस्फ़हानी।)

सनद की छानबीन

• मुहम्मद बिन अहमद बिन मुख़ल्लदी मारुफ़ ब इब्ने मुहर्रम , मौसूफ़ इब्ने ज़रीरे तबरी के बड़े शागिर्दों में और उनके हम अक़ीदा है , जिनको दार क़ुतनी और अबू बक्र बऱक़ानी ने मोतबर माना है और ज़हबी ने उनको इमाम का लक़्ब दिया है।(और अगर बाज़ लोगों की तरफ़ से उनकी तज़ईफ़ हुई है तो उसकी वजह अहले बैत (अ) के फज़ायल व मनाक़िब बयान करना है।

• मुहम्मद बिन उस्मान बिन अबी शैबा , ज़हबी ने उनको इल्म का ज़र्फ़ क़रार दिया है और सालेह जज़रा ने उनको सिक़ह शुमार किया है नीज़ इब्ने अदी कहते हैं: मैंने उनसे हदीसे मुन्कर नही सुनी जिसको ज़िक्र करू ।(

(सीयरे आलामुन नबला जिल्द 16 पेज 61, तारीख़े बग़दाद जिल्द 1 पेज 331, शज़रातुज़ ज़हब जिल्द 3 पेज 26()

(तारीख़े बग़दाद जिल्द 3 पेज 43()

• यहया हमानी , मौसूफ़ सही मुस्लिम के रेजाल में से हैं और अबी हातिम व मुतय्यन जैसे बुज़ुर्ग उलामा ए अहले सुन्नत के असातीज़ में से हैं और बाज़ लोगों ने यहया बिन मुईन से नक़्ल किया है कि उन्होने उनको सदूक़ और सिक़ह का लक़्ब माना है नीज़ इल्मे रेजाल के बहुत से उलामा ने उनको मुवस्सक़ क़रार दिया है और अगर किसी ने उनके बारे में नामुनासिब बात कही है तो सिर्फ़ उनसे हसद की वजह से कहा जाता है कि वह उस्मान को दोस्त नही रखते थे और मुआविया के बारे में कहते थे कि वह मिल्लते इस्लाम पर नही था।

• क़ैस बिन रबी , मौसूफ़ अबी दाऊद , तिरमिज़ी और इब्ने माजा के रेजाल में शुमार होते हैं और इब्ने हजर ने उनको सदूक़ कहा है।(

• अबू हारुने अब्दी , मौसूफ़ वही अमार ए जवीन हैं जो ताबेईन की मशहूर व मारुफ़ शख़्सीयत हैं और ख़ल्क़ो अफ़आलिल इबाद में बुख़ारी के और तिरमिज़ी और इब्ने माजा के रेजाल में से हैं और सौरी व हम्मादीन वग़ैरह जैसे बुज़ुर्गाने अहले सुन्नत के उस्ताद हैं। अगरचे बाज़ लोगों ने उनके उन पर शिया होने की वजह से ऐतेराज़ात किये हैं।(लेकिन उनके ज़रिये उनको रद्द नही किया जा सकता क्योकि उनकी अहादीस को बुख़ारी और अहले सुन्नत की दो सही किताबों में बयान किया गया है। इसके अलावा अपने मक़ाम पर यह बात साबित हो चुकी है कि रावी का शिया होना जबकि वह सच बोलता हो , हदीस बयान करने में नुक़सान देह नही है।

(तहज़ीबुत तहज़ीब जिल्द 11 पेज 213 से 218

(तक़रीबुत तहज़ीब जिल्द 2 पेज 128)

(तहज़ीबुत तहज़ीब जिल्द 7 पेज 361, 362)

(देखिये मुक़द्दम ए फ़तहुल बारी)

2 ख़तीबे बग़दादी की रिवायत

ख़तीबे बग़दादी अब्दुल्लाह बिन अली बिन मुहम्मद बिन बशरान से , वह अली बिन उमर हाफ़िज़ से , वह अबू नस्र हबशून बिन मूसा बिन अय्यूब ख़ल्लाल से , वह अली बिन सईद रमली से वह ज़मीर बिन रबीआ करशी से , वह इब्ने शौज़ब से , वह मतर वर्राक़ से , वह शहर बिन हौशब से और वह अबू हुरैरा से रिवायत करते हैं:

जो शख्स 18 ज़िल हिज्जा को रोज़ा रखे , उसको 60 महीनों के रोज़ों का सवाब मिलेगा और वह रोज़े ग़दीरे ख़ुम है , जिस वक़्त पैग़म्बरे अकरम (स) ने हज़रत अली बिन अबी तालिब (अ) का हाथ बुलंद करके फ़रमाया: क्या मोमिनीन का वली और सर परस्त नही हूँ ? जी हाँ या रसूल्लाह , उस वक़्त रसूले अकरम (स) ने फ़रमाया: जिसका मैं मौला हूँ उसके यह अली भी मौला हैं , उमर बिन ख़त्ताब ने कहा: मुबारक हो मुबारक , यबना अबी तालिब , तुम मेरे और हर मोमिन व मोमिना के मौला व आक़ा बन गये , उस मौक़े पर ख़ुदा वंदे आलम ने यह आय ए शरीफ़ा नाज़िल फ़रमाई।

الْيَوْمَ أَكْمَلْتُ لَكُمْ دِينَكُمْ وَأَتْمَمْتُ عَلَيْكُمْ نِعْمَتِي وَرَضِيتُ لَكُمُ الْإِسْلَامَ دِينًا ۚ

(तारीख़े बग़दाद जिल्द 8 पेज 290)

सनद की छानबीन

• इब्ने बशरान (मुतवफ़्फ़ा 451) को ख़तीबे बग़दादी ने सदूक़ , सिक़ह और ज़ाबित के नाम से याद किया है और ज़हबी ने उनको आदिल माना है।

• अली बिन हाफ़िज़ , यह वही दार क़ुतनी है (मुतवफ़्फ़ा 388) जिनकी बहुत से उलामा ए रेजाल ने तारीफ़ व तमजीद की है।

• अबू नस्रे हबशून , ज़हबी ने उनको सदूक़ क़रार दिया है और ख़तीबे बग़दादी ने उनकी तौसीक़ की है और उनके बारे में मुख़ालिफ़ क़ौल का ज़िक्र नही किया है।

• अली बिन सईद रमली , ज़हबी उनकी विसाक़त की वज़ाहत करते हुए कहते हैं: मैने अभी तक किसी ऐसे शख़्स को नही देखा जिसने उनकी मज़म्मत की हो।

• ज़मरा बिन रबीआ (मुतवफ़्फ़ा 202) मौसूफ़ किताब अल अदबुल मुफ़रद में बुख़ारी और अहले सुन्नत की दूसरी चार सही किताबों के रेजाल हैं। अब्दुल्लाह बिन अहमद ने अपने बाप से नक़्ल किया है कि वह सालेहुल हदीस और सिक़ह रावियों में शुमार होते थे। उस्मान बिन सईद दारमी ने यहया बिन मुईन और निसाई से उनकी तौसीक़ नक़्ल की है और अबू हातिम ने उनको सालेह और मुहम्मद बिन सअद ने उनको सिक़ह और नेक व अमीन माना है कि जिनसे अफ़ज़ल कोई नही है।

• अब्दुल्लाह बिन शौज़ब (मुतवफ़्फ़ा 156) उनका शुमार अबी दाऊद , तिरमिज़ी , निसाई और इब्ने माजा के रेजाल में होता है। ज़हबी कहते हैं: एक जमाअत ने उनकी तौसीक़ की है।और इब्ने हजर ने उनको सदूक़ आबिद क़रार दिया है।और सुफ़यान से नक़्ल किया है कि इब्ने शौज़ब हमारे सिक़ह असातिद में शुमार होते हैं। इब्ने मुईन व इब्ने अम्मार और निसाई ने भी उनको सिक़ह क़रार दिया है। नीज़ इब्ने हब्बान ने उनको सिक़ह रावियों में शुमार किया है।

(सेयरे आलामुन नबला जिल्द 17 पेज 311)

(तारिख़े बग़दाद जिल्द 12 पेज 34, सेयरे आलामुन नबला जिल्द 16 पेज 449)

(मिज़ानुल ऐतेदाल जिल्द 4 पेज 125)

(तहज़ीबुल कमाल जिल्द 13 पेज 319, 320)

(अल काशिफ़ जिल्द 1 पेज 356)

(तक़रीबुत तहज़ीब जिल्द 1 पेज 423)

(तहज़ीबुत तहज़ीब जिल्द 5 पेज 255 से 261)

• मतर वर्राक़ (मुतवफ़्फ़ा 129) मौसूफ़ बुख़ारी , मुस्लिम और दीगर चार सही किताबों के रेजाल हैं।

• शहर बिन हौशब (मुतवफ़्फ़ा 112) उनका शुमार किताब अल अदबुल मुफ़रद में बुख़ारी , सही मुस्लिम और दीगर सेहाहे सित्ता के रेजाल में होता है और यही चीज़ अहले सुन्नत के नज़दीक सिक़ह होने के लिये काफ़ी है।

(तहज़ीबुल कमाल जिल्द 28 पेज 551, तक़रीबुत तहज़ीब जिल्द 2 पेज 252)

(तहज़ीबुल कमाल जिल्द 12 पेज 578, तक़रीबुत तहज़ीब जिल्द 1 पेज 355)

3. इब्ने असाकर की रिवायत

इब्ने असाकर ने मुख़्तलिफ़ तरीक़ों सेइस मज़मून को एक सनद के साथ ख़तीबे बग़दादी से रिवायत की है जिसका ज़िक्र पहले हो चुका है।

दूसरी सनद में अबू बक्र बिन मज़रफ़ी से , वह हुसैन बिन मोहतदी से , वह उमर बिन अहमद से , वह अहमद बिन अब्दुल्लाह बिन अहमद से , वह अली बिन सईद रक़्क़ी से , वह ज़मरा से , वह इब्ने शौज़ब से , वह मतर बिन वर्राक़ से , वह शहर बिन हौशब से और वह अबू हुरैरा से पहले वाली रिवायत का मज़मून नक़्ल करते हैं।

सनद की छान बीन

• अबू बक्र बिन मज़रफ़ी (मुतवफ़्फ़ा 527) इब्ने जौज़ी कहते हैं: मैंने उनसे हदीस सुनी है , वह नक़्ले हदीस में साबित क़दम , आलिम और अच्छा अक़ीदा रखते हैं।ज़हबी ने भी उनको सिक़ह और मुतक़न क़रार दिया है।

• अबुल हसन बिन मुहतदी (मुतवफ़्फ़ा 465) ख़तीबे बग़दादी ने उनको सिक़ह और समआनी ने भी उनको सिक़ह के नाम से याद किया है और उनकी अहादीस को क़ाबिले ऐहतेजाज माना हैं।

(तर्जुम ए अमीरुल मोमिनीन (अ) अज़ तारिख़े दमिश्क़ रक़्म 575, 578, 585)

(अल मुनतज़िम जिल्द 17 पेज 281)

(सेयरे आलामुन नबला जिल्द 18 पेज 241)

(सेयरे आलामुन नबला जिल्द 18 पेज 241)

• उमर बिन अहमद , यह वही इब्ने शाहीन हैं (मुतवफ़्फ़ा 385) ख़तीबे बग़दादी और इब्ने माकूला ने उनको सिक़ह , अमीन , दार क़ुतनी , अबुल वलीद वाजी और अज़हरी ने भी उनको सिक़ह क़रार दिया है और ज़हबी ने उनको शेख़ सदूक़ और हाफ़िज़ का नाम दिया है।

• अहमद बिन अब्दुल्लाह बिन अहमद , वही गुज़श्ता इब्नुन नैरी हैं और सनद के बाक़ी रेज़ाल की तहक़ीक़ हो चुकी है।

(सेयरे आलामुन नबला जिल्द 16 पेज 431)

4. इब्ने असाकर की दूसरी रिवायत

इब्ने असाकर ने मज़कूरा रिवायत दूसरे तरीक़े से नक़्ल की है। इब्ने असाकर ने अबुल क़ासिमे समरकंदी से , उन्होने अबुस हसन बिन नक़ूर से , उन्होने मुहम्मद बिन अब्दिल्लाह बिन हुसैन दक़्क़ाक़ से , उन्होने अहमद बिन अब्दुल्लाह बिन अहमद बिन अब्बास बिन सालिम बिन महरान से जो इब्नुन नैरी के नाम से मशहूर हैं , उन्होने सईद ऱक्क़ी से , उन्होने ज़मरा से , उन्होने इब्ने शौज़ब से , उन्होने मतर वर्राक़ से , उन्होने शहर बिन हौशब से उन्होने अबू हुरैरा से इसी मज़मून को नक़्ल किया है।

सनद की छानबीन

• अबुल क़ासिन बिन समरकंदी (मुतवफ़्फ़ा 536) इब्ने असाकर और सलफ़ी ने उनको सिक़ह और ज़हबी ने उनको हदीस का उस्ताद और इमाम क़रार दिया है।

• अबुल हसन बिन नक़ूर (मुतवफ़्फ़ा 470) ख़तीबे बग़दादी ने उनको सादिक़ , इब्ने ख़ैरून ने सिक़ह और ज़हबी ने शेख जलील और सादिक़ जैसे अलक़ाबात से नवाज़ा है।और बाक़ी रेजाल की तहक़ीक़ गुज़श्ता रिवायत में हो चुकी है। (

(तर्जुम ए अमीरुल मोमिनीन (अ) अज़ तारिख़े दमिश्क़ जिल्द 2 हदीस 575, 578, 585)

(सेयरे आलामुन नबला जिल्द 2 पेज 28)

(सेयरे आलामुन नबला जिल्द 18 पेज 372)

रोज़े ग़दीरे ख़ुम में आयत के नुज़ूल के रावी

बहुत से उलामा ए अहले सुन्नत ने सर ज़मीने ग़दीरे ख़ुम पर 18 ज़िल हिज्जा को मज़कूरा आयत के नुज़ूल की रिवायत को अपनी अपनी किताबों में नक़्ल किया है जिनकी तरफ़ हम इशारा करते हैं:

1. हाफ़िज़ अबू जाफ़र मुहम्मद बिन जरीर तबरी (मुतवफ़्फ़ा 310)

(किताबुल विलायह)

2. हाफ़िज़ बिन मरदुवह इस्फ़हानी (मुतवफ़्फ़ा 410)

तफ़सीरे इब्ने कसीर जिल्द 2 पेज 14, दुर्रे मंसूर जिल्द 3 पेज 19, तारीख़े मदीन ए दमिश्क़ जिल्द 12 पेज 237, अल इतक़ान जिल्द 1 पेज 53

3. हाफ़िज़ अबी नईम इस्फ़हानी

(मा नज़ल मिनल क़ुरआन फ़ी अली (अ) पेज 56)

4. हाफ़िज़ अबू बक्र ख़तीबे बग़दादी (मुतवफ़्फ़ा 463)

(तारिख़े बग़दाद जिल्द 8 पेज 290)

5. हाफ़िज़ अबू सईद सजिसतानी (मुतवफ़्फ़ा 477)

(किताबुल विलायह)

6. अबुल हसन बिन मग़ाज़ेली शाफ़ेई (मुतवफ़्फ़ा 483)

(मनाक़िबे अली बिन अबी तालिब (अ) पेज 18 हदीस 24)

7. हाफ़िज़ अबुल क़ासिम बिन हसक़ानी

(शवाहिदुत तंज़ील जिल्द 1 पेज 201 हदीस 211)

8. हाफ़िज़ अबुल क़ासिम बिन असाकर दमिश्क़ी शाफ़ेई (मुतवफ़्फ़ा 571)

(तर्जुमा ए अमीरुल मोमीनीन (अ) अज़ तारिख़े दमिश्क़ हदीस 575, 578, 585)

9. ख़तीबे ख़ारज़मी

(अलमनाक़िब पेज 135 हदीस 152)

10. सिब्ते इब्ने जौज़ी

(तज़किरतुल ख़वास पेज 30)

11. शेख़ुल इस्लाम हमूई

फ़रायदुस समतैन जिल्द 1 पेज 72 हदीस 39

12. इमादुद्दीन इब्ने कसीर दमिश्क़ी शाफ़ेई

(अल बिदाया वन निहाया जिल्द 5 पेज 232)

13. जलालुद्दीन सुयूती शाफ़ेई

(दुर्रे मंसूर जिल्द 3 पेज 19, अल इतक़ान फ़ी उलूमिल क़ुरआन जिल्द 1 पेज 53)

14. मीरज़ा मुहम्मद बदख़शी और दूसरे लोग

(मिफ़ताहुल नजा बाब 3 फ़स्ल 11 पेज 34)


आयत की शाने नुज़ूल के बारे में नज़रियात

आयत की शाने नुज़ूल के बारे में तीन अहम नज़रियात पाये जाते हैं:

1. अज़मते इस्लाम के ज़माने की तरफ़ इशारा

फ़ख़रे राज़ी ऐहतेमाल देते है कि इस आयत में लफ़्ज़े (यानी आज के दिन) अपने हक़ीक़ी मअना में इस्तेमाल नही हुआ है बल्कि उसके लिये एक मजाजी मअना हैं और वह यह है कि यहाँ पर ज़माने और ज़माने के एक हिस्से के मअना में है न सिर्फ़ मुख़्तसर से ज़माने के लिये।

इस नज़रिये के मुताबिक़ मज़कूरा आयत किसी ख़ास वाक़ेया से मख़सूस नही है बल्कि अज़मते इस्लाम के जम़ाने और कुफ़्फ़ार की नाउम्मीदी के ज़माने की ख़बर देती है।

जवाब:

अव्वल. मजाज़ी और गै़र हक़ीक़ी मअना के लिये एक वाज़ेह क़रीने की ज़रूरत होती है कि फ़ख़रे राज़ी ने इस मजाज़ी मअना के लिये कोई क़रीना पेश नही किया।

दूसरे. अगर यह मअना सही हों तो फिर आयत का फ़तहे मक्का के मौक़े पर नाज़िल होना ज़्यादा मुनासिब था।

तीसरे. जो रिवायात 18 ज़िल हिज्जा में आयत के नुज़ूल को बयान करती हैं उनसे यह मअना हम आहंग नही है।

2. रोज़े अरफ़ा आयत का नुज़ूल

फ़ख़रे राज़ी एक दूसरा ऐहतेमाल यह देतें है कि हम यह कहें कि यह आयत अरफ़े के दिन पैग़म्बरे अकरम (स) पर नाज़िल हुई है और लफ़्ज़े यौम भी इसके हक़ीक़ी मअना में इस्तेमाल हुआ है जो एक मख़्सूस और मुअय्यन दिन है यानी 18 ज़िल हिज्जा की तारीख़ और पैग़म्बरे अकरम (स) के हज का आख़िरी सफ़र हिजरत का दसवाँ साल था।

बुख़ारी अपनी सनद के साथ उमर बिन ख़त्ताब से नक़्ल करते हैं कि एक यहूदी ने उनसे कहा: या अमीरल मोमिनीन , एक आयत तुम्हारी किताब में है जिसको तुम पढ़ते हो , अगर हमारी जमाअत यहूद के बारे में नाज़िल होती तो हम उस रोज़ को ईद क़रार देते , हज़रत उमर ने कहा: वह कौन सी आयत है ? उसने कहा

(يَا أَيُّهَا الرَّسُولُ بَلِّغْ مَا أُنزِلَ إِلَيْكَ مِن رَّبِّكَ ۖ وَإِن لَّمْ تَفْعَلْ فَمَا بَلَّغْتَ رِسَالَتَهُ ۚ وَاللَّـهُ يَعْصِمُكَ مِنَ النَّاسِ ۗ إِنَّ اللَّـهَ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْكَافِرِينَ ) हज़रत उमर ने कहा: हम जानते है कि यह आयत पैग़म्बरे अकरम (स) पर कहाँ और किस रोज़ नाज़िल हुई। यह आयत रोज़े अरफ़ा जुमे के दिन नाज़िल हुई है।)

(सही बुख़ारी जिल्द 1 पेज 16)

जवाब:

अव्वल. इस तरह की तमाम रिवायतों की सनद ज़ईफ़ है , क्योकि (यह रिवायत) पाच सहाबा से नक़्ल हुई है जिनमें से दो नफ़र उमर बिन ख़त्ताब और मुआविया हैं , और चूँकि रोज़े अरफ़ा में इस आयत के नाज़िल होने का क़ौल उनके नफ़े में है , क्योकि दोनो अमीरुल मोमिनीन (अ) की ख़िलाफ़त के ग़ासिब हैं लिहाज़ा उनका क़ौल क़ाबिले क़बूल नही होगा।

और समरा बिन जुन्दब ने इब्ने अब्बास और इमाम अली (अ) से भी नक़्ल किया है , लेकिन चूँकि समरा की रिवायत में उमर बिन मूसा बिन वहबा है जो ज़ईफ़ है लिहाज़ा हैसमी ने उनकी रिवायत को रद्द किया है।और इब्ने अब्बास से मंसूब रिवायत में अम्मार मौला बनी हाशिम है जिसको बुख़ारी ने ज़ईफ़ शुमार करने की कोशिश की है... और हज़रत अली (अ) के मंसूब रिवायत में भी अहमद बिन कामिल है , जिसको दार क़ुतनी ने रिवायत में ला उबाली करने वाला क़रार दिया है।

दूसरे. फ़ख़रे राज़ी कहते हैं: मुवर्रेख़ीन और मुहद्देसीन का इस बात पर इत्तेफ़ाक़ है कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) इस आयत के नाज़िल होने के बाद 81 या 82 दिन से ज़्यादा ज़िन्दा नही रहे....

(मजमऊज़ ज़वायद जिल्द 7 पेज 13)

(तहज़ीबुत तहज़ीब जिल्द 7 पेज 404)

(लिसानुल मीज़ान जिल्द 1 पेज 249)

(तफ़सीरे फ़ख़रे राज़ी जिल्द 11 पेज 139)

दूसरी तरफ़ अहले सुन्नत इस बात पर अक़ीदा रखते हैं कि पैग़म्बरे अकरम (स) की पैदाईश 12 रबीउल अव्वल को हुई और इत्तेफ़ाक़ से 12 रबीउल अव्वल ही को रेहलत हुई और अगर थोड़ा ग़ौर व फ़िक्र करें तो यह मुद्दत सिर्फ़ 18 ज़िल हिज्जा से हम आहंग हैं न कि रोज़े अरफ़ा से।

तीसरे. मुम्किन है कि उन दोनो अक़वाल को अगर सही फ़र्ज़ भी कर लें तो इस तरह दोनो के दरमियान जमा किया जा सकता है कि यह आयत पैग़म्बरे अकरम (स) पर दो बार नाज़िल हुई है।

चौथे. और यह भी मुम्किन है कि उन दोनो अक़वाल को इस तरह से जमा किया कि आयते अरफ़े के दिन पैग़म्बरे अकरम (स) पर नाज़िल हुई लेकिन आँ हज़रत (स) ने उसकी तिलावत 18 ज़िल हिज्जा को की , क्योकि पैग़म्बर अकरम (स) ख़ुदा वंदे आलम की तरफ़ से हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अ) की विलायत को हुज्जतुल विदा में पहुचाने पर मामूर थे।

पाँचवे. मुम्किन है कि उस रोज़ दिन के कामिल होने से मुराद हज और हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अ) की विलायत को पहुचाने से दिन को कामिल होना मुराद हो। क्योकि बाज़ रिवायात के मुताबिक़ जनाबे जिबरईल पैग़म्बरे अकरम (स) पर नाज़िल हुए और और ख़ुदा वंदे आलम की जानिब से आप के लिये हुक्म लेकर नाज़िल हुए कि आपने तमाम चीज़ों को तो बयान कर दिया सिवाए दो चीज़ों के कि उनको अमली जामा पहना दीजिए एर हज और दूसरे विलायत।

(देखिये तफ़सीरे साफ़ी आय ए इकमाल के ज़ैल में)

अल्लामा तबातबाई फ़रमाते हैं: यह कहना सही है कि ख़ुदा वंदे आलम ने इस सूरह (मायदा) को जिसमें आय ए इकमाल है , उसके ज़्यादा हिस्से को रोज़े अरफ़ा नाज़िल किया है , लेकिन पैग़म्बरे अकरम (स) ने उसको और विलायत के बयान को रोज़े ग़दीरे ख़ुम 18 ज़िल हिज्जा पर छोड़ दिया , अगर चे उसको रोज़े अरफ़ा भी तिलावत किया हो और जैसा कि बाज़ रिवायात में बयान हुआ है कि आय ए इकमाल रोज़े ग़दीरे ख़ुम में नाज़िल हुई है। यह बात भी अक़्ल से दूर नही दिखाई देती कि उससे मुराद आँ हज़रत (स) की तिलावते विलायत के ऐलान के साथ साथ हो , जो उस दिन अंजाम पाई है , लिहाज़ा इस तावील की बेना पर रिवायात में कोई मुनाफ़ात नही है।

(तफ़सीरे अल मीज़ान जिल्द 6 पेज 196 से 197)

3. रोज़े ग़दीरे ख़ुम में आयत का नुज़ूल

शिया अस्ना अशरी और बहुत से उलामा ए अहले सुन्नत यह नज़रिया रखते है कि पैग़म्बरे अकरम (स) पर यह आय ए इकमाल ब रोज़े ग़दीरे ख़ुम नाज़िल हुई है , जिनमें से सहीहुस सनद रिवायात की तरफ़ इशारा किया जाता है।

मरहूम कुलैनी अपनी सनद के साथ इमाम बाक़िर (अ) से नक़्ल फ़रमाते हैं कि आपने फ़रमाया:

हदीस

(उसूले काफ़ी जिल्द 1 पेज 289)

आँ हज़रत (स) पर एक के बाद एक फ़रीज़ा नाज़िल होता था , विलायत को पहुचाना सबसे आख़िरी फ़रीज़ा था , जिसके बाद ख़ुदा वंदे आलम ने यह आयत नाज़िल फ़रमाई

: الْيَوْمَ أَكْمَلْتُ لَكُمْ دِينَكُمْ وَأَتْمَمْتُ عَلَيْكُمْ نِعْمَتِي وَرَضِيتُ لَكُمُ الْإِسْلَامَ دِينًا

आज मैने तुम्हारे दिन को कामिल कर दिया और तुम पर अपनी नेमत पूरी कर दी..।

यह नज़िरया आय ए शरीफ़ा के मज़मून से भी हम आहंग है क्योकि:

अव्वल. इस्लाम के दुश्मन हर मैदान और साज़िशों में नाकाम होने के बाद सिर्फ़ इस बात पर ख़ुश थे कि रसूले अकरम (स) के इंतेक़ाल के बाद अपनी आरज़ू तक पहुच जायेगें और इस्लाम पर आख़िरी हमला कर डालेगें लेकिन जब उन्होने देखा कि आँ हज़रत (स) ने 18 ज़िल हिज्जा हिजरत के दसवें साल एक कसीर मजमें से दरमियान एक बेनज़ीर शख्सियत को अपनी जानशीनी के लिये मुन्तख़ब कर के ऐलान कर दिया तो उन्होने अपनी उस आरज़ू पर पानी फिरता नज़र आने लगा।

दूसरे. इमामत व विलायत के लिये हज़रत अली (अ) के इंतेख़ाब के ज़रिये नबूवत भी अपने कमाल की मंज़िल को तय करने लगी और उसकी वजह से दीन कामिल और तमाम हो गया।

तीसरे. ख़ुदा वंदे आलम की नेमतें , इमामत और रसूल अकरम (स) के बाद जानशीनी के लिये मंसूब करने से कामिल हो गयीं।

चौथे. इसमें कोई शक नही है कि इमामत और आँ हज़रत (स) रे बाद रहबरी के बग़ैर एक आलमी दीन नही हो सकता था।

लफ़्ज़े अल यौम के इस्तेमालात

1. तुलूए फज्र से ग़ुरूबे आफ़ताब तक की मुद्दत को यौम कहा जाता है , लिहाज़ा यौम के मअना दिन के हैं और यह रात के मुक़ाबिल में बोला जाता है जैसा कि क़ुरआने मजीद में इरशाद होता है: وَاسْأَلْهُمْ عَنِ الْقَرْيَةِ الَّتِي كَانَتْ حَاضِرَةَ الْبَحْرِ إِذْ يَعْدُونَ فِي السَّبْتِ إِذْ تَأْتِيهِمْ حِيتَانُهُمْ يَوْمَ سَبْتِهِمْ شُرَّعًا وَيَوْمَ لَا يَسْبِتُونَ لَا تَأْتِيهِمْ كَذَلِكَ نَبْلُوهُم بِمَا كَانُوا يَفْسُقُونَ

(सूर ए आराफ़ आयत 163)

उनकी मछलियाँ शंबे के दिन सतहे आब तक आ जाती थीं और दूसरे दिन नही आती थीं।

नीज़ इरशाद होता है

: فَمَن كَانَ مِنكُم مَّرِيضًا أَوْ عَلَى سَفَرٍ فَعِدَّةٌ مِّنْ أَيَّامٍ أُخَرَ

(सूर ए बक़रह आयत 184)

लेकिन इसके बाद भी कोई शख़्स मरीज़ है या सफ़र में है तो उतने ही दिन दूसरे ज़माने में रोज़ा रख ले।

2. दिन रात के मजमूए को यौम कहा जाता है जैसा कि दिन रात में पढ़ी जाने वाली नमाज़ को नमाज़े यौमिया कहा जाता है।

3. ज़माना , ज़माने के किसी हिस्से को भी यौम कहा जाता है जैसा कि क़ुरआने मजीद में इरशाद हुआ है:

وَتِلْكَ الْأَيَّامُ نُدَاوِلُهَا بَيْنَ النَّاسِ

(सूरए आले इमरान आयत 140)

और हम तो ज़माने को लोगों के दरमियान उलटते पलटते रहते हैं।

हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अ) फ़रमाते हैं:

(नहजुल बलाग़ा , हिकमत 396)

ज़माने के दो दिन होते हैं एक दिन तुम्हारे नफ़े में तो दूसरा तुम्हारे नुक़सान में।

4. मरहला , जैसा कि ज़मीन व आसमान की ख़िलक़त के बारे में ख़ुदा वंदे आलम का क़ौल है: الَّذِي خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ فِي سِتَّةِ أَيَّامٍ

सूर ए आराफ़ आयत 54, सूर ए हदीद आयत 4

जिसने आसमानों और ज़मीन को छ: दिन में पैदा किया है।

नीज़ इरशाद होता है: قُلْ أَئِنَّكُمْ لَتَكْفُرُونَ بِالَّذِي خَلَقَ الْأَرْضَ فِي يَوْمَيْنِ

सूर ए फ़ुस्सिलत आयत 9

जिसने सारी जमीन को दो दिन में पैदा कर दिया है।

5. क़यामत , क़ुरआने करीम में लफ़्ज़े यौम के ज़्यादा तर इस्तेमालात रोज़ें क़यामत के लिये है , क़यामत को यौम कहने का राज़ यह है कि यह निज़ामे कायनात का एक दूसरा और आख़िरी मरहला है।

अल यौंम , में अलिफ़ लाम अहदे ज़िक्री है और एक मख़्सूस रौज़ की तरफ़ इशारा हुआ है जो कहने वाले और सुनने वाले दोनो को मालूम है। इस बेना पर लफ़्ज़े अल यौम आज के मअना में है जो गुज़रे हुए कल के मुकाबिल में होता है।

क़ारेईने केराम , हक़ व इंसाफ़ यह है कि यह आय ए शरीफ़ा ज़माने के एक हिस्से की तरफ़ इशारा करती है जिस ज़माने का आग़ाज़ आयत के नाज़िल होने का दिन है। इस वजह से नुज़ूल आयते के दिन के बारह या चौबीस घंटों से मख़्सूस नही है।

आयत में दूसरा अल यौम भी उसी अहम रोज़ की अहमियत के लिये है और उसी मअना में है।

कुफ़्फ़ार का लालच

आयत के इस फ़िक़रे (....) में कुफ़्फ़ार से हिजाज़ या मुशरेकीने मक्का मुराद नही है बल्कि इल्लत मुतलक़ और आम है जिसकी वजह से तमाम मुशरेकीन , बुत परस्त और यहूद व नसारा भी शामिल हैं।

कुफ़्फ़ार की यह कोशिश क़ुरआने मजीद की आयात से समझ में आती है कि वह दीन को नीस्त व नाबूद करने के लिये दीन में दाख़िल होना चाहते थे लेकिन ख़ुदा वंदे आलम ने कुफ़्फ़ार के अहदाफ़ व मक़ासिद को दर्ज ज़ैल मवाक़े पर वाज़े कर दिया:

1. उनकी पहली कोशिश यह थी कि दीन के चराग़ को बिलकुल ख़ामोश कर दिया जाये और दीन के उस पौधे को जड़ से उखाड़ कर फ़ेंक दें जैसा कि क़ुरआने मजीद में इरशाद होता है: يُرِيدُونَ أَن يُطْفِئُوا نُورَ اللَّـهِ بِأَفْوَاهِهِمْ وَيَأْبَى اللَّـهُ إِلَّا أَن يُتِمَّ نُورَهُ وَلَوْ كَرِهَ الْكَافِرُونَ

(सूर ए तौबा आयत 32)

यह लोग चाहते हैं कि नूरे ख़ुदा को अपने मुँह से फ़ूंक मार कर बुझा दें हालाकि ख़ुदा उसके अलावा कुछ मानने के लिये तैयार नही है कि वह अपने नूर को तमाम कर दे , चाहे काफ़िरों को कितना ही बुरा क्यो न लगे।

2. जब उन्होने यह देख लिया कि दीन की जड़ें उखाड़ने और दीन का चराद़ बुझाने में कामयाब न हो पायेगें तो उन्होने कोशिश की कि मुसलमानों को उनके दीन से गुमराह कर दें , चुनाचे ख़ुदा वंदे आलम का फ़रमान हैं: وَلَا يَزَالُونَ يُقَاتِلُونَكُمْ حَتَّى يَرُدُّوكُمْ عَن دِينِكُمْ إِنِ اسْتَطَاعُوا

(सूर ए बक़रह आयत 217)

और यह कुफ़्फ़ार बराबर तुम से जंग करते रहेगें यहाँ तक कि उनके इमकान में हो तो तुम को तुम्हारे दीन से पलटा दें।

और यह सक़ाफ़ती और फ़ौजी कोशिशे सिर्फ़ मुश्रेकीन से मख़्सूस नही है बल्कि अहले किताब भी इस कोशिश में शरीक थे: وَدَّ كَثِيرٌ مِّنْ أَهْلِ الْكِتَابِ لَوْ يَرُدُّونَكُم مِّن بَعْدِ إِيمَانِكُمْ كُفَّارًا حَسَدًا مِّنْ عِندِ أَنفُسِهِم مِّن بَعْدِ مَا تَبَيَّنَ لَهُمُ الْحَقُّ

(सूर ए बक़रह आयत 109)

बहुत से अहले किताब यह चाहते हैं कि तुम्हे भी ईमान के बाद काफ़िर बना लें वह तुम से हसद रखते है।

गुज़िश्ता दोनो मंसूबों में नाकामी के बाद उन्होने यह कोशिश की कि मुसलमानों को यहूद व नसारा की तरफ़ मायल करें और एक ऐसा दीन बनायें जो लोगों की दीन पसंदी को क़ानेअ कर सके , इसी वजह से उन्होने लोगों को इस काम की तरफ़ दावत देते हुए कहा

: وَقَالُوا لَن يَدْخُلَ الْجَنَّةَ إِلَّا مَن كَانَ هُودًا أَوْ نَصَارَى

सूर ए बक़रह आयत 111

(यह यहूदी कहते हैं कि) जन्नत में यहूदियों और ईसाईयों के अलावा कोई दाख़िल न होगा।)

या जैसा कि एक दूसरी जगह पर इरशाद होता है: وَقَالُوا كُونُوا هُودًا أَوْ نَصَارَى تَهْتَدُوا

(सूर ए बक़रह आयत 135)

और यह यहूदी व ईसाई कहते हैं कि तुम लोग भी यहूदी और ईसाई हो जाओ।

कुफ़्फ़ार के सर बराह सब्र व इस्तेक़ामत की वसीयत करते हुए कहते थे कि अपने ख़ुदाओं की हिफ़ाज़त और उनकी इबादत के सिलसिले में सब्र व पायदारी करो। أَنِ امْشُوا وَاصْبِرُوا عَلَى آلِهَتِكُمْ

(सूर ए साद आयत 6)

चलो अपने ख़ुदाओं पर क़ायम रहो।

4. जब उन लोगों की तमाम साज़िशें नाकाम हो गयीं तो उन्हे एक और तरकीब सूझी और उनके दिल इस बात से ख़ुश थे कि पैग़म्बरे अकरम (स) के कोई बेटा नही है ताकि वह उनका जानशीन बन कर उनके रास्ते को आगे बढ़ाये और अपनी जानशीनी के लिये अब तक किसी को अलल ऐलान मंसूब नही किया है लिहाज़ा उन्होने रसूले अकरम (स) की वफ़ात के बाद के लिये एक नक़्शा बनाया और उसी बात पर अपने दिल को ख़ुश किया लेकिन रोज़े ग़दीरे ख़ुम रसूले अकरम (स) ने हज़रत अली (अ) को अपना जानशीन बना कर लोगों के सामने ऐलान कर दिया और एक कसीर मजमे में आप को ख़िलाफ़त के लिये मंसूब कर दिया। चुनाचे यही वह मक़ाम था जहाँ कुफ़्फ़ार व मुशरेकीन अपनी साज़िशों से मायूस हो गये , लिहाज़ा ख़ुदा वंदे आलम ने उस मौक़े पर इस आयत को नाज़िल फ़रमाया:

الْيَوْمَ يَئِسَ الَّذِينَ كَفَرُوا مِن دِينِكُمْ فَلَا تَخْشَوْهُمْ وَاخْشَوْنِ الْيَوْمَ أَكْمَلْتُ لَكُمْ دِينَكُمْ وَأَتْمَمْتُ عَلَيْكُمْ نِعْمَتِي وَرَضِيتُ لَكُمُ الْإِسْلَامَ دِينًا فَمَنِ اضْطُرَّ فِي مَخْمَصَةٍ غَيْرَ مُتَجَانِفٍ لِّإِثْمٍ فَإِنَّ اللَّـهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ

(सूर ए मायदा आयत 3)

और कुफ़्फ़ार तुम्हारे दीन से मायूस हो गये लिहाज़ा तुम उन से न डरो और मुझ से डरो , आज मैने तुम्हारे दीन को कामिल कर दिया और तुम पर अपनी नेमत पूरी कर दी और तुम्हारे इस दीन इस्लाम को पसंद किया।

इकमाले दीन का मतलब क्या है ?

मज़कूरा आयत में इकमाले दीन से क्या मुराद है ? इस सिलसिले में तीन नज़रिये पाये जाते हैं:

1. दीन से मुराद शरीयत के अहकाम व क़वानीन हैं यानी उस दीन इस्लाम के क़वानीन मुकम्मल हो गये और उसके बाद से इस्लाम में क़ानूनी लिहाज़ से कोई मुश्किल नही है।

जवाब:

अगर इकमाले दीन से मुराद शरीयत का कामिल होना था तो फिर रसूले अकरम (स) पर कोई हुक्म नाज़िल नही होना चाहिये था , जबकि बहुत सी रिवायात के मुताबिक़ उसके बाद भी पैग़म्बरे अकरम (स) पर कलाला (मादरी या पेदरी भाई बहन) के बारे में आयत , सूद के हराम होने की आयत और दूसरे अहकाम भी नाज़िल हुए हैं।

तबरी , बरा बिन आज़िब से नक़्ल करते हैं किपैग़म्बरे अकरम (स) पर सबसे आख़िर में नाज़िल होने वाली आयत यह है:

يَسْتَفْتُونَكَ قُلِ اللَّـهُ يُفْتِيكُمْ فِي الْكَلَالَةِ إِنِ امْرُؤٌ هَلَكَ لَيْسَ لَهُ وَلَدٌ وَلَهُ أُخْتٌ فَلَهَا نِصْفُ مَا تَرَكَ وَهُوَ يَرِثُهَا إِن لَّمْ يَكُن لَّهَا وَلَدٌ فَإِن كَانَتَا اثْنَتَيْنِ فَلَهُمَا الثُّلُثَانِ مِمَّا تَرَكَ وَإِن كَانُوا إِخْوَةً رِّجَالًا وَنِسَاءً فَلِلذَّكَرِ مِثْلُ حَظِّ الْأُنثَيَيْنِ يُبَيِّنُ اللَّـهُ لَكُمْ أَن تَضِلُّوا وَاللَّـهُ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ

(सूर ए निसा आयत 176)

पैग़म्बर यह लोग आप से फ़तवा दरयाफ़्त करते हैं तो आर कह दीजिये कि कलाला (भाई , बहन) के बारे में ख़ुदा यह हुक्म बयान करता है।

अबू हय्याने उनदुलुसी कहते हैं: इस आयत (आय ए इकमाल) के नाज़िल होने के बाद पैग़म्बरे अकरम (स) पर बहुत सी आयात जैसे आयाते रेबा , आयाते कलाला और दीगर आयात नाज़िल हुई हैं।

2. बाज़ लोगों का मानना है कि आय ए इकमाल में दीन से मुराद हज है यानी इस ख़ालिस और बा शिकोह रोज़ ख़ुदा वंदे आलम ने तुम्हारे हज को कामिल कर दिया।

जवाब:

अव्वल. हज , शरीयते इस्लामी का जुज़ है , न कि दीन का , और दीन को शरीयत पर हम्ल करना कि जिसका एक जुज़ हज है , लफ़्ज़ के बर ख़िलाफ़ है।

दूसरे. यह तावील लफ़्ज़े अल यौम के ज़ाहिर से हम आहंग नही है क्योकि अल यौम से मुराद वही ज़माना है जिसमें आयत नाज़िल हुई है लिहाज़ा हमें यह देखना होगा कि उस रोज़ कौन सा वाक़ेया पेश आया जिसके सबब दीन कामिल हो गया जबकि हम जानते हैं कि उस रोज़ हज़रत अली (अ) की विलायत के ऐलान के अलावा कोई दूसरा वाक़ेया पेश नही आया।

3. इकमाले दीन से मुराद अमीरुल मोमिनीन (अ) की इमामत व विलायत के ज़रिये दीन का कामिल होना है क्योकि इमामत के ज़रिये नबूवत का जारी व सारी रहना दीन को कमाल की बुलंदी पर पहुचाना है।


आयत में रोज़े ग़दीर के ख़ुसूसियात

सूर ए मायदा की तीसरी आयत के मुताबिक़ रोज़े ग़दीरे ख़ुम 18 ज़िल हिज्जा जिसमें हज़रत अमीर (अ) की इमामत का ऐलान हुआ , उस रोज़ के 6 ख़ुसूसियात मौजूद हैं:

1. उन तमाम दुश्मनों की उम्मीद , यास व नाउम्मीदी में तब्दील हो गई जो इस्लाम की नाबूदी के लिये अपनी कमर बाँधे हुए थे।.....)

2. उनकी उम्मीद , नाउम्मीदी में तब्दील होने के अलावा , उनकी साज़िशें इस तरह नाकारा हो गयीं कि उनसे मुसलमानों के ख़ौफ़ को बिला वजह क़रार दिया गया है।...)

3. मुम्किन था कि मुसलमान इस अज़ीम नेंमत को नज़र अंदाज़ करते और उससे मुँह मोड़ते हुए इस अज़ीन नेमत के मुक़ाबले में नाशुक्री करते और ग़ज़बे इलाही और कुफ़्फ़ार रे ग़लबे का रास्ता फ़राहम कर लेते और कुफ़्फ़ार के दिल में एक नई उम्मीद पैदा कर देते , इसी वजह से इस मसले से रोक थाम के लिये फ़रमाया: (...)

4. दीने इलाही में कैफ़ियत के लिहाज़ से कमाल पैदा हो और दीन की तरक्क़ी का रास्ता फ़राहम हो।....)

5. मुतलक़े नेमते इलाही (यानी विलायत) में कम्मी (यानी तमामियत) के लिहाज़ से तरक्क़ी हो और उसके आख़िरी दर्जे तक पहुच जाये। (.....)

6. ऐलान की मंज़िल में ख़ुदा वंदे आलम राज़ी हो गया कि विलायत के साथ इस्लाम हमेशा के लिये लोगों का दीन क़रार पाये।.....)

लिहाज़ा यह रोज़ तारिख़े इस्लाम के लिये एक नये ज़माने का आग़ाज़ है।

नुज़ूले आयत की कैफ़ियत

बाज़ उलामा ए शिया ने मुतअद्दिद रिवायात के ज़ुहूर की बेना पर यह ऐहतेमाल दिया है कि आयत का यह हिस्सा दूसरे हिस्सों से अलग नाज़िल हुआ है और जब क़ुरआन को जमा किया गया तो इस हिस्से को दीगर आयात के साथ रख दिया गया जबकि अकसर या तमाम अहले सुन्नत मुफ़स्सेरीन का कहना है कि आयात का यह मजमूआ एक साथ नाज़िल हुआ है और उनके मुख़्तलिफ़ हिस्से मज़मून के लिहाज़ से मुश्तरक हैं। इस वजह से दोनो ऐहतेमाल पर अलग अलग बहस व गुफ़तगू करना ज़रूरी है:

1. शिया उलामा का नज़रिया

शिया उलामा कहते है: सिर्फ़ आयात का वाहिद या मुतअद्दिद होना दलील बनने के लिये काफ़ी नही होता कि यह आयत एक मर्तबा नाज़िल हुई है या चंद बार , जिस तरह दो आयतों का होना उनके मुतअद्दिद बार नाज़िल होने की निशानी नही है , एक आयत का होना भी उस हिस्से की तमाम आयात के एक होने की दलील नही बन सकती। मिसाल के तौर पर सूर ए आहज़ाब में नाज़िल होने वाली आयके ततहीर इस बात की निशानी है कि यह आयत अपने मा क़ब्ल व मा बाद के मुख़ातब के अलावा है। उलामा ए अहले सुन्नत ने आयत के लिये जो शाने नुज़ूल बयान किया है वह भी इस बात की निशानी है कि आयत का यह हिस्सा एक मख़्सूस वाक़ेया में नाज़िल हुआ है।

मज़कूरा आयत भी इसी तरह है: क्योकि ख़ुदा वंदे आलम ख़ून , मुर्दार और गोश्ते ख़िन्ज़ीर वग़ैरह के हुक्म को बयान करते वक़्त फ़रमाता है: (आयत....)

जैसा कि हम जानते हैं कि ख़ून और गोश्ते ख़िन्ज़ीर का हुक्म मालूम होना दुश्मन के ना उम्मीद और दीन के कामिल होने को सबब नही होगा। इस बात पर शाहिद है कि यह अहकाम पहले भी दो मक्की सूरों (सूर ए अनआम आयत 145 और सूर ए नहल आयत 115) में नीज़ सूर ए बक़रह जो सबसे पहला मदनी सूरह है उसकी आयत नम्बर 173 में हुक्म नाज़िल हो चुका है लेकिन उनमें कुफ़्फ़ार की ना उम्मीदी और तकमीले दीन की बात नही आई है जबकि अगर उन अहकाम का नुज़ूल और उनका ऐलान ऐसी ख़ुसूसियत के हामिल हैं तो उन सूरों में भी बयान होना चाहिये था।.......)

इस तरह (....) के ज़रिये ख़ून और मुर्दार के हुक्म के नाज़िल होने के दिन की तरफ़ इशारा नही किया जा सकता बल्कि एक ऐसे रोज़ की तरफ़ इशारा होना चाहिये जिसमें कोई अहम वाक़ेया पेश आया हो , इस वजह से शिया ऐतेक़ाद रखते हैं कि (.......) उस रोज़ की तरफ़ इशारा है कि जिसमें रसूले अकरम (स) ने आय ए बल्लिग़ को अमली जामा पहनाया और जो कुछ ख़ुदा वंदे आलम ने फ़रमाया था

: يَا أَيُّهَا الرَّسُولُ بَلِّغْ مَا أُنزِلَ إِلَيْكَ مِن رَّبِّكَ وَإِن لَّمْ تَفْعَلْ فَمَا بَلَّغْتَ رِسَالَتَهُ

(सूर ए मायदा आयत 67)

ऐ पैग़म्बरे , आप उस हुक्म को पहुचा दें जो आपके परवर दिगार की तरफ़ से नाज़िल किया गया है।

एक इतना अहम हुक्म कि अगर उस अमल न होता रसूले अकरम (स) की 23 साल की मेहनत बर्बाद हो जाती और रिसालत का ऐलान न होता।

नतीजा:

इन तमाम बातों के पेशे नज़र हम कहते हैं: यह दो हिस्से अपने मा क़ब्ल व बाद से जुदा और मुस्तक़िल नाज़िल हुए हैं , लेकिन क़ुरआन की तरतीब के वक़्त ख़ुद पैग़म्बरे अकरम (स) या जिन्होने आँ हज़रत (स) के बाद क़ुरआन को जमा किया है।क़ुरआन को तरतीब देने में मुख़्तलिफ़ उसूल के मुताबिक़) उनके हुक्म से उस जगह रख दिया गया है। या हम यह कहें: यह दो जुमले अपने मा क़ब्ल व मा बाद के साथ नाज़िल हुए है लेकिन नुज़ूले आयत के रोज़ इस वजह से कि बाज़ शरई अहकाम के नुज़ूल का ज़र्फ़ है इशारा नही करती बल्कि एक मोतरेज़ा जुमला है जो उन जुमलों के दरमियान वाक़े है।

इस दावे की दलील यह है कि अगर उन दो जुमलों को हज़्फ़ कर दिया जाये तो बाक़ी आयात कामिल और पूरी हैं और उनके मअना में कोई ख़लल और कमी वाक़े नही होती जैसा कि आयते ततहीर को हज़्फ़ करके गुज़िश्ता आयात के मअना में कोई ख़लल वाक़े नही होता बल्कि उसके मअना मज़ीद वाज़ेह और उसका तर्जुमा व तफ़सीर मज़ीद आसान हो जाती है।

2. दूसरा ऐहतेमाल , अहले सुन्नत का नज़रिया

दूसरा ऐहतेमाल यह है कि आयत का यह फ़िक़रा आयात के दूसरे हिस्सों के साथ नाज़िल हुआ है और उनसे जुदा नही है जैसा कि अहले सुन्नत मुफ़स्सेरीन का अक़ीदा है।

इस ऐहतेमाल की बेना पर भी यह कहा जाये: अल यौम आयत में मज़कूरा अहाकाम के नुज़ूल की तरफ़ इशारा है क्योकि एक साथ नाज़िल होना इस लिहाज़ से कोई असर नही रखता जैसा कि सूर ए युसुफ़ की 29 वीम आयत का पहला हिस्सा हज़रत युसुफ़ (अ) से मुख़ातब है: (आयत) (ऐ युसुफ़ इस वाक़ेया से सरफ़े नज़र कर लो) और आयत का बाद वाला हिस्सा अज़ीज़े मिस्र की ज़ौजा से मुख़ातब है (आयत) (और तू ऐ औरत अपने गुनाह से तौबा कर ले) जबकि यह दोनो जुमले एक ही आयत के हैं और दरमियान में अज़ीज़े मिस्र का नाम भी नही आया है। इस आयत में किसी ने यह दावा नही किया है कि यह आयत के दोनो हिस्से एक शख़्स से ख़िताब हैं लिहाज़ा मुहावरों और आम गुफ़्तगू में वहदते सियाक़ को एक क़ानून और अक़्ली क़ायदे के उनवान से याद किया जाता है और उसको अहमियत दी जाती है लेकिन यह नही कहा जा सकता कि यह एक कुल्ली और आम क़ायदा है और हमेशा उसको दलील और ताईद के उनवान से मान लिया जाये , मख़सूसन अगर अंदरुनी या बेरुनी निशानियाँ उसके बर ख़िलाफ़ हों।

बाज़ लोगों का कहना है: सूर ए मायदा की तीसरी आयत के शुरु हराम गोश्तों के बारे में गुफ़्तगू होती है और उसके आख़िर में इज़तेराब और मजबूरी की हालत को बयान किया गया है और उन दोनो के दरमियान आय ए इकमाल से मुराद विलायत व इमामत और पैग़म्बरे अकरम (स) की जानशीनी हो तो पहले हिस्से और बाद वाले हिस्से में क्या मुनासेबत पाई जाती है ?

जवाब:

क़ुरआने मजीद की आयात किसी क्लास की किताब की तरह तंज़ीम नही हुई है बल्कि जिस शक्ल में पैग़म्बरे अकरम (स) पर नाज़िल हुई थी , आँ हज़रत (स) के हुक्म से क़रार दी जाती थी। इस बेना पर मुम्किन है कि मौरिदे बहस आयत का पहला हिस्सा रसूले अकरम (स) से हराम गोश्तों के बारे में सवाल करने की वजह से वाक़ेय ए ग़दीर से पहले नाज़िल हुआ हो और एक मुद्दत के बाद वाक़ेय ए ग़दीर पेश आया हो और आय ए इकमाल नाज़िल हुई हो और कातेबाने वहयी ने हराम गोश्तों के हुक्म के बाद रख दिया हो। उसके बाद इज़्तेरार और मजबूरी का वाक़ेया पेश आया हो और उसका हुक्म नाज़िल हुआ हो और इस आयत के ज़ैल में जिसमें इज़्तेरार का हुक्म है उसके बाद और आयत के दरमियान में रख दिया हो। लिहाज़ा मज़कूरा नुक्ते के पेशे नज़र यह ज़रुरी नही है कि आयात के दरमियान मख़सूस मुनासेबत पाई जाती है।

आय ए सअला सायलुन

ग़दीरे ख़ुम के वाकेया से मुतअल्लिक़ नाज़िल होने वाली आयात में से नीज़ हज़रत अली (अ) की विलायत व ख़िलाफ़त पर हदीसे ग़दीर की दलालत की ताईद करने वाली एक आयत है जिसमें ख़ुदा वंदे आलम इरशाद फ़रमाया है:

سَأَلَ سَائِلٌ بِعَذَابٍ وَاقِعٍ لِّلْكَافِرِينَ لَيْسَ لَهُ دَافِعٌ

(सूर ए मआरिज आयत 1,2)

एक माँगने वाले ने वाक़े होने वाले अज़ाब का सवाल किया , जिसका काफ़िरों के हक़ में कोई दफ़ा करने वाला नही है।

अस्ली वाक़ेया क्या है ? और वाक़ेय ए ग़दीर से इसका क्या ताअल्लुक़ है ? और किस तरह इमामत व विलायत पर हदीसे ग़दीर की दलालत पर ताईद करता है ? यह ऐसे सवालात हैं जिनके सिलसिले में हम यहाँ बहस करते हैं।

वाक़ेय ए ग़दीर में आयत के नुज़ूल का इक़रार

बहुत से अहले सुन्नत उलामा ने वाक़ेय ए ग़दीर में इस आयत का इक़रार किया है जैसे:

1. अबू इसहाक़ सालबी

मौसूफ़ कहते हैं: सुफ़यान बिन ऐनिया से ख़ुदा वंदे आलम ने क़ौल (...) की तफ़सीर के बारे में सवाल हुआ कि यह आयत किस की शान में नाज़िल हुई है ? तो उन्होने जवाब में कहा: तुम ने मुझ से एक ऐसे मसले के बारे में सवाल किया है कि उससे पहले किसी ने यह सवाल नही किया है। मुझ से मेरे वालिद ने , उन्होने जाफ़र बिन मुहम्मद से और उन्होने अपने आबा व अजदाद से रिवायत की है कि जिस वक़्त रसूले अकरम (स) ग़दीरे ख़ुम की सर ज़मीन पर पहुचे तो सभी हाजियों को ऐलान करके एक जगह पर जमा किया और उस मौक़े पर अली बिन अबी (अ) के हाथ को बुलंद करके फ़रमाया: जिस का मैं मौला हूँ उसके यह अली भी मौला हैं। यह ख़बर इतनी मशहूर हुई कि सभी मुल्कों और शहरों में फैल गई , चुनाचे जब यह ख़बर हारिस बिन नोमान फ़हरी तक पहुची। वह अपने ऊँट पर सवार था और उस वक़्त वह सर ज़मीने अबतह पर था , चुँनाचे अपने ऊँट से उतरा , ऊँट को बिठाया और उसके पैरों को बाँध दिया और उसने रसूले अकरम (स) की ख़िदमत में आया , हाँलाकि उसके साथ उसके चंद साथी भी थे। उसने कहा: ऐ मुहम्मद , आपने हमको ख़ुदा वंदे आलम की तरफ़ से हुक्म दिया कि ख़ुदा की वहदानियत और मेरी रिसालत की गवाही दें और हमने क़बूल किया , आपने हुक्म दिया कि पाँच वक़्त की नमाज़ें पढ़ो , हमने उसको भी मान लिया , आपने माहे रमज़ान के रोज़े नीज़ ज़कात व हज का हुक्म दिया हमने उसको भी मान लिया (लेकिन) आप इस पर राज़ी न हुए और अपने चचा ज़ाद के हाथों को बुलंद किया और उनको हम पर बरतरी दे दी और फ़रमाया: हदीस.... (जिसका मैं मौला हूँ उसके यह अली मौला हैं) क्या आपने यह बात अपनी तरफ़ से कही है या ख़ुदा वंदे आलम की तरफ़ से ?।

पैग़म्बरे अकरम (स) ने फ़रमाया: क़सम उसकी कि जिसके अलावा कोई ख़ुदा नही है , बेशक इस बात को मैने ख़ुदा वंदे आलम की तरफ़ से बयान किया है , उस मौक़े पर हारिस बिन नोमान पैग़म्बरे अकरम (स) से मुँह मोड़ कर अपने ऊँट की तरफ़ यह कहता हुआ चला पालने वाले , अगर जो कुछ मुहम्मद कहते हैं कि वह हक़ है तो मुझ पर आसमान से पत्थर गिरा दे या दर्रनाक अज़ाब में मुब्तला कर दे , वह अभी अपने ऊँट तक नही पहुचा था कि ख़ुदा वंदे आलम ने उसके ऊपर एक पत्थर नाज़िल किया जो उसके सर पर आ कर लगा और उसकी पीठ से निकल गया और उसी जगह पर ढेर हो गया। उस मौक़े पर ख़ुदा वंदे आलम ने यह आयत नाज़िल फ़रमाई:

سَأَلَ سَائِلٌ بِعَذَابٍ وَاقِعٍ لِّلْكَافِرِينَ لَيْسَ لَهُ دَافِعٌ

(अल कश्फ़ वल बयान मज़कूरा आयत के ज़ैल में

अबू इसहाक़ सालबी के मुख़्तसर हालात

इब्ने ख़लक़ान कहते हैं: अबू इसहाक़ अहमद बिन मुहम्मद बिन इब्राहीम सालबी नैशापूरी , वह मशहूर व मारुफ़ मुफ़स्सिरे क़ुरआन और इल्मे तफ़सीर में अपने ज़माने की बेनज़ीर शख़्सियत थे , उन्होने ऐसी तफ़सीर लिखी है जिसकी वजह से उन्हे दूसरे मुफ़स्सेरीन पर बरतरी हासिल है। अब्दुल ग़ाफ़िर बिन इस्माईल फ़ारसी ने अपनी किताब सयाक़े तारिख़े नैशापूर में उनका ज़िक्र किया है और उन पर दुरुद भेजा है , नीज़ उनको सहीहुन नक़्ल , मौरिदे इतमिनान और साहिबे वुसूक़ माना है।

सफ़दी भी उनके बारे में कहते हैं: वह हाफ़िज़ , आलिम , उलूमे अरब में साहिबे नज़र और मुवस्सक़ हैं।

सुफ़यान बिन ऐनिया के मुख़्तसर हालात

सुफ़यान बिन ऐनिया अहले सुन्नत की क़ाबिले वुसूक़ और मशहूर शख़्सियत हैं। नोवी साहब उनके बारे में कहते हैं: सुफ़यान बिन ऐनिया... आमश , सौरी , मुसइर , इब्ने जरीह , शोअबा , हम्मामस वकीअ , इब्ने मुबारक , इब्ने मेहदी , क़त्तान , हम्माद बिन ज़ैद , क़ैस बिन रबीअ , हसन बिन सालेह , शाफ़ेई , इब्ने वहब , अहमद बिन हंबल , इब्ने मदीनी , इब्ने मुईन , इब्ने राहवय , हमीदी और ख़लायक़ी वग़ैरह जिनका शुमार करना मुश्किल है , उन सब ने उनसे रिवायत की है और सौरी ने कत्तान से उन्होने इब्ने ऐनिया से रिवायत नक़्ल की है। उलामा उनकी इमामत , जलालत और अज़मत पर इत्तेफ़ाक़ रखते हैं।

ज़हबी कहते हैं: इमाम अबू मुहम्मद सुफ़यान बिन ऐनिया हेलाली शेख़ हिजाज़ हैं।

शाफ़ेई कहते हैं: अगर न होते मालिक और सुफ़यान तो हिजाज़ का इल्म ख़त्म हो जाता.. मौसूफ़ हदीस में साबित क़दम थे। बहज़ बिन असद कहते हैं: मैंने इब्ने ऐनिया की तरह किसी को नही देखा... और अहमद कहते हैं: मैंने किसी को हदीस में उनसे ज़्यादा आलिम नही पाया।

याफ़ेई कहते हैं: उलामा ने उनके सिलसिले में कहा कि वह इमाम , आलिम , साबित , बा तक़वा , थे और उनकी अहादीस को सही मानने पर इजमाअ है।

(वफ़यातुल आयान जिल्द 1 पेज 61, 62)

(अल वाफ़ी बिल वफ़यात जिल्द 8 पेज 33)

(तहज़ीबुल असमा वल लुग़ात जिल्द 1 पेज 224)

(अल ऐबर सन् 197 हिजरी के वाक़ेयात)

(मेरातुल जेनान सन् 198 के वाक़ेयात)

2. अबू उबैद हरवी (मुतवफ़्फ़ा 223)

हरवी अपनी तफ़सीर ग़रायबुल क़ुरआन में आय ए के ज़ैल में तहरीर करते हैं: जिस वक़्त रसूले अकरम (स) ने ग़दीर में तय शुदा हुक्म लोगों के सामने बयान कर दिया और यह ख़बर मुल्कों और शहरो में पहुच गई , जाबिर बिन नज़्र बिन हारिस बिन कलद ए अब्दरी ने (रसूले अकरम (स) की ख़िदमत में आकर अर्ज़ किया: ऐ मुहम्मद , आपने हमें ख़ुदा वंदे आलम की जानिब से हुक्म दिया कि ख़ुदा की वहदानियत की गवाही दो....रिवायत के आख़िर तक।

इब्ने ख़लक़ान , हरवी की सवानेह हयात तहरीर करते हैं: वह रूहानी शख़्सियत और इस्लामी उलूम में मुख़्तलिफ़ फ़ुनून के मालिक थे , उनकी रिवायत हसन और सहीहुन नक़्ल है और हम किसी ऐसे शख्स को नही पहचानते जिसने उनको दीनी हवाले से बुरा भला कहा हो।

(वफ़यातुल आयान जिल्द 4 पेज 60 रक्म 534)

3. शेखुल इस्लाम हम्मूई

मौसूफ़ किताब फ़रायदुस समतैन के 15 वें बाब में शेख़ इमादुद्दीन अब्दुल हाफ़िज़ बिन बदरान से , वह क़ाज़ी जमालुद्दीन अब्दुल क़ासिम बिन अब्दुल समद अँसारी से , वह अब्दुल ज़ब्बार बिन मुहम्मद ख़ारज़मी बैहक़ी से और वह अबिल हसन अली बिन अहमद वाहेदी से नक़्ल करते हैं: मैंने अपने उस्ताद अबू इस्हाक़ सालबी की तफ़सीर में पढ़ा कि सुफ़यान बिन ऐनिया से इस आयत (आयत) के बारे में सवाल हुआ कि यह आयत किसकी शान में नाज़िल हुई है ? तो उन्होने इसी हदीस को नक़्ल किया (जिसको हमने इससे पहले नक़्ल किया है ).

हमूई वही इब्राहीम बिन हम्द बिन मुअय्यद बिन हमविया सदरुद्दीन अबुल मजामेअ शाफ़ेई हैं जो ज़हबी के उस्ताद हैं , जिनकी वफ़ात 722 हिजरी में हुई। उलामा ए अहले सुन्नत ने उनको उलूमे हदीस और फ़िक्ह में इमाम के नाम से याद किया है।

उनकी किताब फ़रायदुस समतैन की तालीफ़ 716 हिजरी में तमाम हुई है।

(फ़रायदुस समतैन जिल्द 1 पेज 82 हदीस 63)

(तज़किरतुल हुफ़्फ़ाज़ जिल्द 4 पेज 505, मोजमे शुयूख़ुज़ ज़हबी पेज 125 रक़्म 156)

बग़दादी कहते हैं: जवीनी अपनी किताब फ़रायदुस समतैन की तालीफ़ से 716 हिजरी में फ़ारिग़ हुए है।

उनकी किताब उन बेहतरीन किताबों में से है जो अहले सुन्नत ने अहले बैत (अ) के फज़ायल व मनाक़िब में लिखी हैं।

(इज़ाहुल मकनून दर ज़ैले क़श्फ़ुज़ ज़ुनून जिल्द 4 पेज 182)

4. हाकिम हसकानी

हाकिम हसकानी हनफ़ी ने इस रिवायत की बहुत सी सनदों को आईम्म ए अहले बैत (अ) और बहुत से असहाब से नक़्ल किया है। हम यहाँ पर उनमें से एक रिवायत नक़्स करते हैं:

हाकिम हसकानी , अबू बक्र मुहम्मद बिन मुहम्मद बग़दादी से , वह अबू मुहम्मद अब्दुल्लाह बिन अहमद बिन जाफ़रे शैबानी से , वह अब्दुर्रहमान बिन हसन असदी से , वह इब्राहीम बिन हुसैन कसाई से , वह फ़ज़्ल बिन दकीन से , वह सुफ़यान बिन सईद से , वह मंसूर से , वह रुबई से और वह हुज़ैफ़ा बिन यमान से नक़्ल करते हैं कि उन्होने कहा: जिस वक़्त रसूले अकरम (स) ने अली (अ) के बारे में फ़रमाया: (हदीस)

नोमान बिन मुन्ज़िर फ़हरी खड़ा हुआ और उसने कहा... और फिर पूरा वाक़ेया नक़्ल किया।

• अबू बक्र मुहम्मद बिन मुहम्मद बग़दादी: हाफ़िज़ अब्दुल ग़ाफ़िर नैशापूरी उनके हालाते ज़िन्दगी में कहते हैं: वह फ़क़ीह , फ़ाज़िल और दीनदार थे।

• अब्दुल्लाह बिन अहमद बिन जाफ़रे शैबानी नैशापूरी: ख़तीबे बग़दादी उनकी सवानेह उमरी के बारे में कहते हैं: उनके पास बहुत सी दौलत थी लेकिन उस दौलत को राहे इल्म , अहले इल्म , हज , जेहाद और नेक कामों में ख़र्च करते रहते थे और उन्होने अपने ज़माने के तमाम उलामा से ज़्यादा हदीसें सुनी हैं.... और वह मौरिदे वुसूक़ थे।

(शवाहिदुत तंज़ील जिल्द 2 पेज 381 से 385)

(अस सेयाक़ फ़ित तारीख़ नैशापूर पेज 37)

(तारिख़े बग़दाद जिल्द 9 पेज 391)

अब्दुर्हमान बिन असदी:

ख़तीबे बग़दादी ने उनकी सवानेह हयात में तारीफ़ व तमजीद की है।अगर चे उनके बाज़ हम अस्र उलामा ने उनकी तज़ईफ़ की है लेकिन ज़हबी और इब्ने हजर के नज़रिये के मुताबिक़ हम अस्र लोगों की तज़ईफ़ क़ाबिले तवज्जो नही होती।

इब्राहीम बिन हुसैन कसाई मारुफ़ बे इब्ने दैज़ल: ज़हबी ने उनके बारे में कहा: वह इमाम , हाफ़िज़ , सिक़ह औऱ आबिद थे.... हाकिम ने उनको सिक़ह अमीन में शुमार किया है।

फज़्ल बिन दकीन: यह सेहाहे सित्ता के रेजाल में शुमार होते हैं। इब्ने हजर कहते हैं: वह सिक़ह और ज़ाबित थे और उनका शुमार बुख़ारी के बुज़ुर्ग असातिज़ में होता था।

(तारिख़े बग़दाद जिल्द 10 पेज 292)

(लिसानुल मीज़ान जिल्द 5 पेज 234, मीज़ानुल ऐतेदाल जिल्द 1 पेज 111)

(सेयरे आलामुन नबला जिल्द 13 पेज 184)

(तक़रीबुत तहज़ीब जिल्द 2 पेज 110)

सुफ़यान बिन सईद:

सौरी के नाम से मशहूर हैं , शोअबा , सुफ़यान बिन ऐनिया , अबू आसिम नबील , यहया बिन मुईन और बहुत से दीगर उलामा ने उनको हदीस में अमीरुल मोमिनीन का लक़्ब दिया है। सुफ़यान ऐनिया कहते हैं: असहाबे हदीस तीन हज़रात हैं , अपने ज़माने में इब्ने अब्बास , अपने ज़माने में शअबी और अपने ज़माने में सौरी। अब्बास दौरी कहते हैं: मैंने इस बात का मुसाहिदा किया है कि यहया बिन मुईन , फ़िक्ह व हदीस और ज़ौहद वग़ैरह में सुफ़यान पर किसी को मुक़द्दम नही मानते थे और वह सिहाहे सित्ता के रेजाल में से हैं।

रुबई: यह वही मंसूर बिन मोतमिर हैं जिनका शुमार सिहाहे सित्ता के रेजाल में होता है। इब्ने हजर उनके बारे में कहते हैं: वह सिक़ह और साबित थे और धोके बाज़ नही थे।

हुज़ैफ़ा बिन यमान: मौसूफ़ जलीलुल क़द्र असहाब में से हैं।

(तहज़ीबुल कमाल जिल्द 11 पेज 164 से 169)

(तक़रीबुत तहज़ीब जिल्द 2 पेज 177)

(तक़रीबुत तहज़ीब जिल्द 1 पेज 243)

अहले बैत (अ) और असहाब में हदीस के रावी

इस रिवायत को बाज़ आईम्म ए अहले बैत (अ) और बहुत से असहाब ने रिवायत की है जैसे:

1. इमाम अमीरुल मोमिनीन (अ)

2. इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ)

3. इमाम जाफ़क सादिक़ (अ)

4. अब्दुल्लाह बिन अब्बास

5. हुज़ैफ़ा बिन यमान

6. सअद बिन अबी वक़ास

7. अबू हुरैरा

अहले सुन्नत उलामा में हदीस के रावी

इस मज़मून की हदीस को बहुत से उलाम ए अहले सुन्नत ने अपनी अपनी किताबों में रिवायत किया है जैसे:

हाफ़िज़ अबू उबैद हरवी ( 1223)

(तफ़सीरे ग़रीबुल क़ुरआन)

अबू बक्रे नकास मूसली बग़दादी ( 351)

(तफ़सीरे शिफ़ाउस सुदूर)

3. अबू इसहाक़ सालबी नैशा पूरी ( 427)

(अल कश्फ़ वल बयान)

4. हाकिम हसकानी हनफ़ी

(शवाहिदुत तंजील जिल्द 2 पेज 383)

5. अबू बक्रे यहया क़ुरतुबी ( 567)

(अल जामेउल अहकामिल क़ुरआन जिल्द 8 पेज 278)

6. सिब्ते बिन जौज़ी हनफ़ी ( 654)

(तज़किरतुल ख़वास पेज 30)

7. शेख़ुल इस्लाम हमूई

(फ़रायदुस समतैन जिल्द 1 पेज 82 हदीस 63)

8. शेख़ मुहम्मद ज़रन्दी हनफ़ी

(नज़्म दुररुस समतैन पेज 93)

9. नुरूद्दीन इब्ने सब्बाग़े मालिकी

(अल फ़ुसूलुल मुहिम्मा पेज 41)

10. सैयद नुरूद्दीन समहूदी शाफ़ेई

(जवाहिरुल अक़दैन पेज 179)

11. अबुस सईद इमादी

(इरशादुल अक़्लिस सलीम जिल्द 9 पेज 29)

12. शमसुद्दीन शिराज़ी

(अस सिराजिल मुनीर जिल्द 4 पेज 380)

13. सैयद जमालुद्दीन शिराज़ी

(अरबईन फ़ी मनाक़िब अमीरिल मोमिनीन पेज 40)

14. शेख़ ज़ैनुद्दीन मनावी शाफ़ेई

(शरहे जामेउस सग़ीर जिल्द 6 पेज 218)

15. शेख़ बुरहानुद्दीन अली हलबी शाफ़ेई

(अस सिरतुल हल्बिया जिल्द 3 पेज 274)

16. सैयद मोमिन शबलंजी शाफ़ेई

(नुरुल अबसार पेज 159)

17. शेख़ अहमद बिन बाकसीर मक्की शाफ़ेई

(वसीलतुल मआल पेज 119)

18. शेख़ अब्दुर्हमान सफ़ूरी

(नुज़हतुल मजालिस जिल्द 2 पेज 209)

19. शमसुद्दीन हनफ़ी शाफ़ेई

(शरहे जामेउस सग़ीर जिल्द 2 पेज 378)

20. अबू अब्दिल्लाह ज़रक़ानी मालिकी

(शरहुल मवाहिबिल लदुन्निया जिल्द 7 पेज 13)

21. कंदूज़ी हनफ़ी

(यनाबीउल मवद्दत पेज 274)

22. मुहम्मद बिन युसुफ़ गंजी और दीगर हज़रात

(किफ़ायतुत तालिब)

हदीस की दलालत

यह रिवायत उन शवाहिद और क़रायन में से है जो दलालत करती हैं कि हदीस ग़दीर में मौला के मअना सर परस्ती के हैं , क्योकि अगर हदीसे ग़दीर में मौला के मअना मुहब्बत व नुसरत के हों तो फिर हारिस बिन नोमान को क्यो ज़रुरत थी कि वह रसूले इस्लाम (स) से इस तरह कट हुज्जती करता और आख़िर में इस तरह ख़ुदा वंदे आलम से अज़ाब की दर ख़्वास्त करता ? बेशक उसने हदीसे ग़दीर से हज़रत अली (अ) की इमामत व सर परस्ती को समझा था। लिहाज़ा वह हज़रत अली (अ) से दुशमनी की वजह से बर्दाश्त न कर सका , उसका हसद इस बात का बाइस बना कि वह ख़ुदा से ऐसी दरख़्वास्त करे।

चंद ऐतेराज़ और उनके जवाब

अहले सुन्नत के बाज़ मुतअस्सिब उलामा ने इस हदीस की तावील या तकज़ीब करने की (बेजा) कोशिश की है। अब यहाँ पर उन ऐतेराज़ात को बयान करके उनकी तहक़ीक़ व तंक़ीद करते हैं:

1. सूर ए मआरिज मक्की है!!

इब्ने तैमिया ने इस हदीस पर बाज़ ऐतेराज़ात किये हैं: सूर ए मआरिज जिसकी यह पहली आयत है , उलामा के इत्तेफ़ाक़ के मुताबिक़ मक्की है , नतीजा यह हुआ कि यह आयत वाक़ेय ए ग़दीर से दस साल या उससे भी ज़्यादा पहले नाज़िल हुई है।

(मिनहाजुस सुन्नह जिल्द 4 पेज 31)

जवाब:

जिस इजमाअ का इब्ने तैमिया ने दावा किया है उससे यक़ीनी बात यह है कि सूरह मजमू तौर पर मक्की है न कि मजमूई तौर पर तमाम आयात मक्की हैं क्योकि मुम्किन है कि मख़्सूस तौर पर यह आयत मदनी हो।

अगर कोई यह ऐतेराज़ करे कि सूरों के मक्की या मदनी होने में क़ायदा यह है कि सूरह के शुरु की आयत कहाँ नाज़िल हुई है और चूँकि सूरह की शुरुआत मदनी आयात से हुई है तो वह सूरह मक्की होने के मुवाफ़िक़ नही है।

तो हम जवाब में कहते हैं: यह दावा हक़ीक़त के ख़िलाफ़ है क्योकि बहुत से मक़ामात पर इस चीज़ के बर ख़िलाफ़ हैं जैसे:

अलिफ़. सूर ए अंकबूत: इस सूरह की तमाम आयात मक्की हैं सिवाए शुरु की दस आयात के।

बे. सूर ए कहफ़: इसकी तमाम आयते मक्की हैं , सिवाए शुरु की सात आयतों के कि जो मदनी हैं।

जीम. सूर ए मुतफ़्फ़ेफ़ीन: इसकी तमाम आयात मक्की है सिवाए पहली आयत के।

दाल. सूर ए लैल: इसकी तमाम आयात मक्की हैं , सिवाए पहली आयत के।

हे. सूर ए मुजादेला: इसकी तमाम आयात मक्की हैं सिवाए शुरु की दस आयात के।

वाव. सूर ए बलद. इसकी तमाम आयात मक्की हैं सिवाए पहली आयत के।

(जामेउल बयान जिल्द 20 पेज 133, अल जामेउल अहकामिल क़ुरआन जिल्द 13 पेज 41,)

(अल जामेउल अहकामिल क़ुरआन जिल्द 10 पेज 235, अल इतक़ान जिल्द 1 पेज 41)

(जामेउल बयान जिल्द 30 पेज 91)

(अल इतक़ान जिल्द 1 पेज 47)

(इरशादुल अक़्लिस सलीम जिल्द 8 पेज 215)

(अल इतक़ान जिल्द 1 पेज 47)

2.ख़ुदा वंदे आलम पैग़म्बरे अकरम (स) के होते हुए अज़ाब नही करेगा!!

इब्ने तैमिया का यह भी कहना है कि यह आयत मक्के के मुशरेकीन के ताने की वजह से नाज़िल हुई है और इसकी वजह से उसके बाद अज़ाब नाज़िल नही हुआ है क्योकि ख़ुदा वंदे आलम का फ़रमान है:

وَمَا كَانَ اللَّـهُ لِيُعَذِّبَهُمْ وَأَنتَ فِيهِمْ ۚ وَمَا كَانَ اللَّـهُ مُعَذِّبَهُمْ وَهُمْ يَسْتَغْفِرُونَ

लेकिन (ऐ पैग़म्बर) जब तक आप उनके दरमियान हैं , ख़ुदा वंदे आलम उनको अज़ाब नही करेगा और जब तक इसतिग़फ़ार करेगें तो (भी) ख़ुदा उन पर अज़ाब नाज़िल नही करेगा।

(सूर ए अनफ़ाल आयत 33)

(मिनहाजुल सुन्नह)

जवाब:

अव्वल. इसमें कोई क़बाहत नही है कि मक्के के मुशरेकीन पर अज़ाब नाज़िल न हुआ हो लेकिन इस मक़ाम पर हारिस पर अज़ाब नाज़िल हुआ है।

दूसरे. बाज़ रिवायात से यह नतीजा निकलता है कि पैग़म्बरे अकरम (स) के ज़माने में भी बाज़ लोगों पर अज़ाब नाज़िल हुआ है:

अलिफ़. मुस्लिम ने अपनी सहीह में अपनी सनद के साथ इब्ने मसऊद से नक़्ल किया है कि क़ुरैश ने रसूले अकरम (स) की नाफ़रमानी की और इस्लाम कबूल नही किया। पैग़म्बरे अकरम (स) ने उनके हक़ में नफ़रीन (द दुआ) की और ख़ुदा वंदे आलम की बारगाह में अर्ज़ किया: पालने वाले , जनाबे युसुफ़ के (ज़माने की) तरह सात साल तक इन पर क़हत नाज़िल फ़रमा , उसी मौक़े पर शिबहे जज़ीर ए हिजाज़ में ख़ुश्क साली शुरु हो गई और नौबत यह पहुच गई कि लोग मुरदार का गोश्त खाने लगे और भूक प्यास की शिद्दत से आसमान धूँए की तरह दिखाई देने लगा।

बे. इब्ने अब्दुलबर रिवायत करते हैं: पैग़म्बरे अकरम (स) जिस रास्ते पर चलते थे तो कभी दाहिनी तरफ़ झुकते थे तो कभी बायीं तरफ़। हक्म बिन आस ने भी इसी तरह आँ हज़रत (स) की नक़्ल करना शुरु की , एक रोज़ पैग़म्बरे अकरम (स) ने उसको देख लिया कि यह मेरी नक़्लें उतारता है , आँ हज़रत (स) ने उस पर नफ़रीन की कि ख़ुदा करे तू ऐसा ही हो जा। चुँनाचे उसी मौक़े से वह ऐसी हालतमुब्तला हो गया कि चलते वक़्त उसका बदन लरज़ता था।

जीम. बैहक़ी अपनी सनद के साथ ओसामा बिन ज़ैद से नक़्ल करते हैं कि रसूले अकरम (स) ने किसी शख्स को एक मुहल्ले में भेजा , उसने रसूले अकरम (स) की तरफ़ झूठी निस्बत दी , जिसके बाद आँ हज़रत (स) ने उस पर नफ़रीन की को लोगों ने उसको मुर्दा पाया और देखा कि उसका पेट फटा पड़ा है और जब उसको दफ़्न करना चाहा तो लाख कोशिश की लेकिन ज़मीन ने उसको क़बूल नही किया।

(सही मुस्लिम जिल्द 5 पेज 342 हदीस 39, सही बुख़ारी जिल्द 4 पेज 1730 हदीस 4416)

(अल इस्तिआब क़िस्मे अव्वल पेज 359)

(अल ख़सायसुल कुबरा जिल्द 2 पेज 130)

इन वाक़ेयात और इस तरह के दीगर वाक़ेयात से नतीजा हासिल होता है कि पैग़म्बरे अकरम (स) या तमाम अंबिया के होते हुए जो अज़ाबे इलाही नाज़िल नही होता वह आम अज़ाब होता है न मख़्सूस अज़ाब या किसी ख़ास शख़्स पर , यह मतलब हिकमत के मुवाफ़िक़ है , क्योकि कभी कभी हालात इस बात का तक़ाज़ा करते हैं।

3. अगर ऐसा था तो मोजिज़ा होना चाहिये था!!

इब्ने तैमिया का यह भी कहना है: अगर यह वाक़ेया सही होता तो असहाबे फ़ील के वाक़ेया की तरह मोजिज़े के उनवान से लोगों में मशहूर हो जाता और सभी लोग उसको देखते जबकि ऐसा कुछ नही है।

जवाब:

अव्वल. इब्ने तैमिया का एक इंफ़ेरादी वाक़ेया का असहाबे फ़ील के वाक़ेया से क़यास करना क़यास मअल फ़ारिक़ है क्योकि असहाबे फ़ील के वाक़ेया में एक अज़ीम हादेसा सबकी नज़रो के सामने पेश आया लिहाज़ा उसकी ख़बर बहुत तेज़ी से लोगों के दरमियान फ़ैल गई , बर ख़िलाफ़ हारिस बिन नोमान के वाक़ेया के कि एक शख़्स के लिये और मख़्सूस जगह पर पेश आया।

दूसरे. चूँकि यह वाक़ेया हज़रत अमीर (अ) के फ़ज़ायल से मुतअल्लिक़ है और मकतबे ख़ुलाफ़ा का हमेशा से यह नसबुल ऐन रहा है कि वह आपके फ़ज़ायल को मख़्फ़ी रखने की कोशिश करते रहे हैं।

3. मुसलमान पर दुनिया में अज़ाब नही होता!!

इब्ने तैमिया मज़ीद कहते हैं: हारिस के ज़ाहिरी अल्फ़ाज़ से यह मालूम होता है कि वह मुसलमान था और पाँचों वक़्त की नमाज़ का इक़रार कर रहा था और यह मालूम है कि दुनिया में मख़सूसन पैग़म्बरे अकरम (स) के ज़माने में किसी मुसलमान को अज़ाब नही होता।

जवाब:

जिस तरह मज़कूरा हदीस से हारिस का इस्लाम साबित होता है , उसी गुफ़्तगू के आख़िर में उसने ऐसी बात कही कि जिससे मालूम होता है कि वह मुरतद हो गया था और हक़ीक़त में मुशरिक हो गया था लिहाज़ा इस तरह के अज़ाब का मुसतहिक़ था।

(मिनहाजुस सुन्ना)

(मिनहाजुस सुन्ना)

हदीस ग़दीर पर अक्सर सहाबा के ऐतेराज़ का राज़

जब अहले सुन्नत और शियों के दरमियान हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अ) की हक़्क़ानियत व विलायत की बहस तूलानी होती है और अहले सुन्नत हज़रत अमीर (अ) की ख़िलाफ़त व इमामत के दलायल मिन जुमला हदीसे ग़दीर को मुलाहिज़ा करते हैं और उसकी सनद की सेहत और इसतेहकाम को देखते हैं तो उनकी तरफ़ से आख़िरी सवाल या ऐतेराज़ यह होता है कि हज़रत अली (अ) की शान और आपकी इमामत के बारे में इतनी ज़्यादा आयात व रिवायात के बावजूद सहाबा केराम ने उन पर क्यों तवज्जो नही की है ? और हज़रत अली बिन अबी तालिब (अ) को छोड़ कर दूसरों की तरफ़ चले गये और उनको ख़िलाफ़त के लिये मुन्तख़ब कर लिया ? क्यो हज़रत अली (अ) से लोगों ऐराज़ (यानी बे तवज्जोही) उन मज़कूरा रिवायात के ज़ईफ़ होने की निशानी नही है ?

शेख़ सलीम अल बशरी , मरहूम शरफ़ुद्दीन आमिली से तूलानी बहस करने और हज़रत अली (अ) की बिला फ़स्ल इमामत व विलायत से मुतअल्लिक़ अहादीस की तसदीक़ करने के बाद कहते हैं: मैं क्या कहूँ! अगर इन दलीलों के देखता हूँ तो सनद और दलालत के लिहाज़ से मुकम्मल तौर पर सही पाता हूँ लेकिन दूसरी तरफ़ देखता हूँ कि अक्सर सहाबा ने हज़रत अली (अ) से ऐराज़ किया है , जिसके मअना यह है कि उन्होने उन रिवायतों पर अमल नही किया है , मैं ऐसे हालात में क्या करू ?

(अल मुराजेआत)

लिहाज़ा इस मौक़े पर मुनासिब है कि इस सवाल और ऐतेराज़ की छान बीन करें और मसले को अच्छी तरह से वाज़ेह करें ताकि हक़ व हक़ीक़त रौशन हो जाये।

पहला सबब: सहाबा के दरमियान दो नज़रियों का वुजूद

जो शख़्स पैग़म्बरे अकरम (स) के ज़माने या उन के बाद हयाते सहाबा के सिलसिले में किताबों की वरक़ गरदानी करे तो उसको यह मालूम हो जायेगा कि सहाबा ए केराम के दरमियान फ़िक्री लिहाज़ से दो नजरिये पाये जाते थे:

अलिफ़. नस्स के मुक़ाबले में इज्तेहाद का नज़रिया

इस नज़रिये पर ऐतेक़ाद रखने वाले इस बात पर अक़ीदा रखते थे कि पैगम्बरे अकरम (स) की तमाम ख़बरों और अहकाम पर ईमान लाना और उनको बिदूने चूँन व चराँ कबूल करना ज़रूरी नही है बल्कि दीनी तहरीरों में मसलहत के पेशे नज़र इज्तेहाद करते हुए उनमें तसर्रुफ़ किया जा सकता है। यह नज़रिया मकतबे ख़ुलाफ़ा का बुनियादी मसअला है। चुँनाचे पैग़म्बरे अकरम (स) ने इस नज़रिये की वजह से बहुत से मसायब बर्दाश्त किये हैं।

बे. इस नज़रिये के मुक़ाबले में एक दूसरा नज़रिया भी है कि जिसका अक़ीदा यह है कि जिसका ऐतेक़ाद है कि दीन व शरीअत के तमाम अहकाम के सामने सरे तसलीम ख़म किया जाये और उनको चूंन व चराँ के बग़ैर कबूल किया जाये। यह नज़रिया वही अहले बैत (अ) का रास्ता या दूसरे लफ़्ज़ो में अहले बैत (अ) का मकतब है।

इज्तेहादी तरीक़े के तरफ़दार

चूँकि नस्स के मुक़ाबले में इज्तेहाद मसलहत की रिआयत की ख़ातिर इँसान की अपनी मर्ज़ी और ख़्वाहेशात नफ़्स के मुताबिक़ होता है लिहाज़ा बाज़ असहाब ने पैग़म्बरे अकरम (स) के ज़माने से ही यह काम करना शुरु कर दिया और अमली तौर पर आँ हज़रत (स) से मुक़ाबला शुरु किया , जिनकी सरे फ़ेहरिस्त हज़रत उमर बिन ख़त्ताब का नाम आता है। मौसूफ़ ने सुल्हे हुदैबिया के मौक़े पर शदीदन पैग़म्बरे अकरम (स) की मुख़ालेफ़त की (और आज़ान में दख़्ल व तसर्रुफ़ किया। .....(को निकाल दिया और उसकी जगह सुबह की आज़ान में रख दिया(मुतअतुन निसा को हराम किया (और हज तमत्तोअ की तातील कर दी (मौसूफ़ ने और भी दीगर उमूर में जैसे लश्करे ओसामा में शिरकत करने (और पैग़म्बरे अकरम (स) के आख़िरी वक़्त में वसीयत लिखने के लिये क़लम व क़ाग़ज़ हाजिर करने की अमली तौर पर मुख़ालेफ़त की (यह सब ऐसी चीज़ें इस बात पर दलालत करती है कि असहाब के दरमियान एक मख़्सूस नज़रिया पाया जाता था जिसकी वजह से पैग़म्बरे अकरम (स) के साथ इस तरह का रवय्या इख़्तियार किया जाता था क्योकि वह पैग़म्बरे अकरम (स) को वहयी के अलावा दूसरी चीज़ों में एक आम इंसान फ़र्ज़ किया करते थे।

उमर बिन ख़त्ताब , पैग़म्बरे अकरम (स) के वसीयत नामा लिखे जाने की मुख़ालेफ़त में कहते हैं: मैं जानता था कि पैग़म्बरे अकरम (स) क्या चीज़ लिखना चाहते थे , आँ हज़रत (स) चाहते थे कि अपने बाद के लिये हज़रत अली (स) के लिये वसीयत करें लेकिन मैं इस्लाम की दिल सोज़ी और मेहरबानी की ख़ातिर इस काम में मानेअ हो गया।

(सही मुस्लिम किताबुल जिहाद वस सेयर बाब 34 जिल्द 3 पेज 1412 हदीस 1785)

(सीरये हलबी जिल्द 2 पेज 98, नीलुल अवतार जिल्द 2 पेज 32)

(अल मुवत्ता पेज 57 पेज हदीस 151)

(सही मुस्लिम जिल्द 4 पेज 131 बाब निकाहुल मुतआ)

(ज़ादुल मआद जिल्द 2 पेज 184, सही मुस्लिम जिल्द 4 पेज 48)

(तबक़ात इब्ने साद जिल्द 2 पेज 190, सीरये हलबी जिल्द 3 पेज 207)

(सही बुख़ारी जिल्द 7 पेज 9 किताबुल मर्ज़ी)

(शरहे नहजुल बलागा़ , इब्ने अबिल हदीद जिल्द 12 पेज 21)

इमाम अली (अ) की मुख़ालिफ़त में मकतबे ख़ुलाफ़ा का बहाना

तारिख़ और मकतबे ख़ुलाफ़ा के अरकान के कलाम को देखने के बाद यह मालूम होता है कि अमीरुल मोमिनीन (अ) के हक़े ख़िलाफ़त को छिनने की कोशिशों में मुख़्तलिफ़ बहानो का सहारा लिया गया है , जो न सिर्फ़ उनके लिये शरई और अक़्ली उज़्र नही है बल्कि ख़ुद ही उनके नज़रियात के बातिल होने पर दलालत करते हैं। अब हम यहाँ पर उन तौजीहात व ताविलात की तरफ़ इशारा करते हैं:

1. क़ुरैश का पसंद न करना

कभी कभी अपने नाशाइस्ता अमल को सही पेश करने के लिये ऐसे जुमले कहते थे जैसा कि आज बहुत से लोग इस तरह के शेयार अपनी ज़बानो पर जारी करते हैं और उसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हैं। चुँनाचे वह कहते थे: क़ुरैश को यह बात नापसंद थी कि नबूवत व ख़िलाफ़त एक ही ख़ानदान में जमा हो जाये , अगर नबूवत ख़ानदाने बनी हाशिम में थी तो इमामत और पैग़म्बरे अकरम (स) की ख़िलाफ़त किसी दूसरे ख़ानदान में होना चाहिये।और चूँकि इस्लामी हुकूमत में सियासी वुसअत होना चाहिये लिहाजा कु़रैश की तवज्जो मबज़ूल करने के लिये अली (अ) से कि जो बनी हाशिम से थे , छीन लेना चाहिये।

(कामिले इब्ने असीर जिल्द 3 पेज 63, तारिख़े तबरी जिल्द 4 पेज 323, शरहे इब्ने अबिल हदीद जिल्द 3 पेज 107)

जवाब:

इस इस्तिदलाल का बेहतरीन जवाब उसी ज़माने में जनाबे इब्ने अब्बास ने दिया है। उन्होने उन लोगों के जवाब में कहा: अगर क़ुरैश ने अपने लिये ख़िलाफ़त का इंतेख़ाब किया तो उसकी वजह थी कि ख़ुदा वंदे आलम का यही इरादा था , इसमें कोई मुश्किल नही है लेकिन हक़ इसके बर ख़िलाफ़ है , ख़ुदा वंदे आलम ने बाज़ लोगों की हिदायत की कराहत को बयान करते हुए फ़रमाया:

ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ كَرِهُوا مَا أَنزَلَ اللَّـهُ فَأَحْبَطَ أَعْمَالَهُمْ

(सूर ए मुहम्मद आयत 9)

यह इस लिये कि उन्होने ख़ुदा के नाज़िल किये हुए अहकाम को बुरा समझा तो ख़ुदा ने भी उनके आमाल को ज़ाय कर दिया।

ख़ुदा वंदे आलम की मर्ज़ी यही थी कि अली (अ) और उनके अहले बैत (अ) को दूसरों पर फ़ज़ीलत दे , क्योकि उनके दिल , क़ल्बे रसूले ख़ुदा से हैं , यह वह हज़रात हैं जिनके वुजूद से ख़ुदा वंदे आलम ने रिज्स और बुराई को दूर रखा है और उनके दिलों को पाक व पाकीज़ा क़रार दिया है।

(तारिख़े तबरी जिल्द 4 पेज 224)

क़ारेईने मोहतरम , जो हुकूमत , इस्लाम और दीन के नाम पर क़ायम हो , उसके लिये जायज़ नही है कि बाज़ बेदीन और बे तवज्जो नीज़ इस्लाम और मुसलमानों के दुश्मनों को बिला वजह इम्तियाज़ दे , यहाँ तक कि अहम ओहदों पर उनको मुक़र्रर किया जाये या आदिल इस्लामी हाकिम को जो मुआशिरा की रहबरी के लिये ख़ुदा वंदे आलम की जानिब से मुअय्यन हुआ हो , उसको माज़ूल करके नाअहल लोगों को इस ओहदे पर बिठा दिया जाये। क्या यह क़ुरैश वही नही थे जिन के लिये वह दिलसोज़ी करते थे कि जब तक कि मक्के व मदीने में आँ हज़रत (स) बा हयात रहे , इस्लाम और मुसलमानों और ख़ुदा आँ हज़रत (स) पर ख़तरनाक हमले किये और आख़िर में मुसलमानों से ख़ौफ़ ज़दा होकर इस्लाम को इख़्तियार कर लिया ?

क्या ऐसे लोगों की तवज्जो जल्ब करने के लिये हक़ व हक़ीक़त के साथ हाथ धो लिया जाये ? और साहिबे हक़ को ख़ाना नशीन कर दिया जाये और किसी ऐसे शख्स को इस्लामी हुकूमत के ओहदे पर मुक़र्रर कर दिया जाये , जिसको दीन व इस्लाम की ख़ास मालूमात भी न हो ?

2. अरब को अली (अ) बर्दाश्त नही थे

हज़रत अली (अ) की ख़िलाफ़त को ग़स्ब करने के लिये कभी कभी बहाना पेश करते थे: चूँकि हज़रत अली (अ) अदल व अदालत के मज़हर थे और अरब इमाम अली (अ) के अदल व इंसाफ़ को बर्दाश्त नही करसकते थे लिहाज़ा उनके लिये ख़लीफ़ा बनने में मसलहत नही थी।

(अत तबक़ातुल कुबरा जिल्द 5 पेज 20, तारिख़े याक़ूबी जिल्द 2 पेज 158, क़ामूसुर रेजाल जिल्द 6 पेज 36)

जवाब:

अव्वल , यह नस के मुका़बिल इज्तेहाद है जो लोग बिल फ़र्ज़ ऐसी नियत रखते थे , क्या उन लोगों ने हज़रत अली (अ) की शान में रसूले अकरम (स) की इतनी ज़्यादा सिफ़ारिशें , वसीयतें और बहुत ज़्यादा ताकीदात को नही देखा था ? क्या वह रसूले इस्लाम (स) को मासूम , उम्मत का ख़ैर ख़्वाह और उम्मत के लिये मसलहत अंदेश नही मानते थे ? क्या हक़ को बर्दाश्त न करने की वजह से वजह से हक़ से मुँह मोड़ा जा सकता है और बातिल का रुख़ किया जा सकता है ? ऐसा बातिल जिसमें गुमराही के अलावा कुछ भी तो नही है। ख़ुदा वंदे आलम क़ुरआने मजीद में इरशाद फ़रमाता है:

فَذَٰلِكُمُ اللَّـهُ رَبُّكُمُ الْحَقُّ ۖ فَمَاذَا بَعْدَ الْحَقِّ إِلَّا الضَّلَالُ ۖ فَأَنَّىٰ تُصْرَفُونَ

(सूर ए युनुस आयत 32)

और हक़ के बाद ज़लालत के सिवा कुछ भी नही है।

अगर ऐसा है तो फिर क्यो रसूले अकरम (स) मुशरेकीन को अपनी तरफ़ ख़ैचने के लिये अपने उसूल से एक क़दम पीछे नही हटे ? यहाँ तक कि आपको अपने वतन से हिजरत और जंग जैसी मुश्किलात का सामना करना पड़ा , लेकिन आप अपने उसूल से एक क़दम भी पीछे न हटे।

दूसरे , क्या अरब अली (अ) के अलावा दूसरे लोगों की निस्बत राज़ी थे जो अली (अ) से राज़ी न थे ? क्या ऐसा नही था कि साद बिन ओबादा एक बड़े क़बीले के सरदार ने अबू बक्र कि मुख़ालिफ़त नही की।क्या ऐसा नही था कि एक गिरोह रसूले इस्लाम (स) के दीन से बिल्कुल निकल गया और मुरतद हो गया ? क्या ऐसा नही है कि बाज़ लोगों ने क़सम ख़ाई कि जब तक ज़िन्दा है अबू फ़सील की बैअत नही करेगें ? (क्या सक़ीफ़ा में अंसार ने अबू बक्र पर ऐतेराज नही किया जिसकी बेना पर क़ुरैश ग़ज़बनाक हो गये यहाँ तक कि उनके दरमियान झगड़ा हो गया और एक दूसरे को गालियाँ देने और नाज़ेबा अल्फ़ाज़ कहने लगे ?

(तारिख़े याक़ूबी जिल्द 2 पेज 103)

(तारिख़े याक़ूबी जिल्द 3 पेज 254)

(तारिख़े याक़ूबी जिल्द 2 पेज 128)

कभी भी अंसार का यह नही था कि अली (अ) को ख़िलाफ़त से दूर रखा जाये , क्योकि उनमें से अकसर लोग यह करते थे: हम अली के अलावा किसी से बैअत नही करेंगें।

अगर अली (अ) ख़िलाफ़त पर पहुत जाते तो किसी भी सूरत में अरब के क़बीले आपके ख़िलाफ़ कोई सरकशी नही कर सकते थे , वह ख़ुद अपने दरमियान अली (अ) से बेहतर ख़िलाफ़ते रसूल (स) का मुसतहिक़ नही मानते थे।

जनाब आलूसी साहब इस वाक़ेया की तावील में कि क्यों रसूले अकरम (स) ने सूर ए बराअत की तबलीग़ को अबू बक्र से लेकर हज़रत अली बिन अबी तालिब (अ) का इंख़ेताब किया ? और आँ हज़रत (स) ने फ़रमाया: इस सूरह की तबलीग़ मेरे या मुझ जैसे शख़्स के अलावा कोई नही कर सकता। कहते हैं: क्योकि अरब का मानना था कि कोई इलाही अहद व मीसाक़ या उसके नक़्ज़ का मुतवल्ली नही हो सकता मगर ख़ुद पैग़म्बरे अकरम (स) या जो उनके क़रीबी हो ताकि लोगों पर हुज्जत तमाम हो जाये।

जनाबे आलूसी की गुफ़तुगू से अच्छी तरह मालूम हो जाता है कि मुसलमान रसूले अकरम (स) के नुमाइंदे और ख़लीफ़ा को अच्छी तरह क़बूल कर लेते लेकिन क्या करें कि बाज़ लोगों ने अपनी मख़्सूस चालों और चालाकियों से लोगों की अक़्लों पर पर्दा डाल दिया और उनको मुनहरिफ़ कर दिया।

क़ारिये मोहतरम , हक़ यह है कि अरब या क़ुरैश जिससे राज़ी नही थे और उसकी सर परस्ती को कबूल नही करना चाहते थे वह अली (अ) नही थे बल्कि वही मुहाजेरीन के चंद लोग थे कि जिनकी हक़ीक़त सबको मालूम थी , लिहाज़ा अपने अहदाफ़ व मक़ासिद तक पहुचने के लिये हर तरीक़ ए कार को अपनाया यहाँ तक कि ताक़त व तलवार का भी सहारा लिया गया।

इब्ने अबिल हदीद कहते हैं: अगर उमर के ताज़याने और शल्लाक़े नही न होतीं तो अबू बक्र की ख़िलाफ़त क़ायम न होती।

(तारिख़े तबरी जिल्द 3 पेज 202, अल कामिल जिल्द 2 पेज 325)

(रुहुल मआनी जिल्द 10 पेज 45)

(शरहे इब्ने अबिल हदीद ख़ुतब ए सिव्वुम)

उन्होने हक़ व हक़ीक़त और हज़रत अमीरिल मोमिनीन (अ) के हक़्क़े विलायत और इमामत की तरफ़ दावत देने के बजाए लोगों को दूर किया और उनकी अक़्लों को मुसख़्ख़र कर लिया , लोगों को धोखा दिया और ख़िलाफ़त को अपने नाम कर लिया। मख़्सूसन हज़रत उमर ने अबू बक्र की ख़िलाफ़त के लिये जो कारनामें अंजाम दिये हैं अगर उनके आधे भी हज़रत अली (अ) की ख़िलाफ़त को साबित करने के लिये अँजाम दिये होते तो तौबत यहाँ तक नही पहुचती। क्या अबू सुफ़यान , तलहा व ज़ुबैर उस ज़माने में हज़रत अली (अ) के मुदाफ़ेअ और आपके तरफ़दार नही थे , क्या अबू सुफ़यान सरदारे क़ुरैश ने रसूले अकरम (स) की वफ़ात के बाद हज़रत अली (अ) की बैअत करने का मशविरा नही दिया। क्या मुहाजेरीन व अंसार के एक गिरोह ने अबू बक्र की मुख़ालेफ़त करते हुए हज़रत अली (अ) के बैतुश शरफ़ में पनाह नही ली थी , यहाँ तक कि उनको खौफ़ ज़दा करके बैअत के लिये ले जाया गया , क्या ज़ुबैर ने तलवार नही निकाली और क्या यह नही कहा कि मैं अपनी तलवार नियाम में नही रखूँगा जब तक अली (अ) की बैअत न हो जाये।

(अल अक़दुल फ़रीद जिल्द 4 पेज 85)

उन लोगों ने मुख़्तलिफ़ बहानों से हज़रत अली (अ) का हक़ ग़स्ब कर लिया क्यो कि यह लोग सिर्फ़ अपनी मनमानी हुकूमत चाहते थे , उन्हे इस्लाम और दीगर लोगों की फ़िक्र नही थी लेकिन उन्होने और साज़िशों के ज़रिये लोगों की अक़्लों को मुसख़्ख़र कर लिया।

ख़ुज़री कहते हैं: इस बात में कोई शक नही है कि अगर ख़लीफ़ ए अव्वल अहले बैते नबूवत में से होता तो यक़ीनन तौर पर लोग ज़्यादा मायल होते और भरपूर रिज़ायत के साथ उसकी बैअत करते , जैसा कि लोगों ने अपनी मर्ज़ी व रग़बत के साथ पैग़म्बरे अकरम (स) की बैअत की थी और उनके इर्द गिर्द जमा हो गये थे क्योकि लोगों के दरमियान दीनी पहलू बहुत ज़्यादा असर व रुसूख़ रखते थे। इसी वजह से दूसरी हिजरी के शुरु में अहले बैते पैग़म्बर (स) के उनवान से लोगों को अपनी तरफ़ दावत दी जाती थी और वह उसमें कामयाब भी हुए हैं।

(तारिख़ुल उममिल इस्लामिया पेज 497)

कम उम्र होना

उमर बिन ख़त्ताब , इब्ने अब्बास के ऐतेराज़ पर कहते हैं , जब उन्होने यह ऐतेराज़ किया कि क्यो तुम लोगों ने अली (अ) का हक़ ले लिया है ? तो हज़रत उमर कहते हैं: मैं गुमान नही करता कि अली (अ) को ख़िलाफ़त से दूर रखने में इस इल्लत के अलावा कोई और वजह हो कि क़ौम उनको कम उम्र और छोटा शुमार करती थी।

इब्ने अब्बास ने हज़रत उमर के जवाब में कहा: चूँकि ख़ुदावंदे आलम ने उनको मुनतख़ब किया है लिहाज़ा अली (अ) को छोटा शुमार नही किया है।

(शरहे इब्ने अबिल हदीद जिल्द 6 पेज 45)

क्या मक़ामे फ़ज़ीलत उम्र और सिन् व साल से होता है ? क्या ऐसा नही है कि ओसामा बिन ज़ैद एक 19, 20 साल के जवान थे , क्यो पैग़म्बरे अकरम (स) ने अपने लश्कर की अमारत के लिये इतना इसरार किया यहाँ तक कि उमर और अबू बक्र वग़ैरह की तरफ़ से बहुत इसरार हुआ कि वह (ओसामा बिन जै़द) कमसिन हैं , हमारे दरमियान जंग में माहिर और तजरूबाकार लोग मौजूद हैं , फिर आपने उनको लश्कर की सरदारी के लिये क्यो मुनतख़ब फ़रमाया ? आँ हज़रत (स) ने उनकी बातों पर तवज्जो न दी और फ़रमाया: अगर आज तुम लोग उनकी अमारत व सरदारी में शक व शुब्हा करते तो पहले भी उनके बाप की सरदारी में भी शक व शुब्हा करते थे। पैग़म्बरे अकरम (स) के इस तरीक़ ए कार से यह मालूम होता है कि ओहदा व मक़ाम , सलाहियत की बेना पर होता है न कि सिन व साल के बल बूते पर।

ख़ुदा ने नही चाहा

बाज़ लोगों ने अपनी ग़लत कारकरदगी की तसहीह के लिये मसअल ए जब्र का सहारा लेते हुए यह कहा: अगर ऐसा हुआ तो उसकी वजह यह थी कि ख़ुदा ने नही चाहा कि अली (अ) को ख़िलाफ़त मिले , अगरचे रसूले ख़ुदा (स) ने इस सिलसिले में काफ़ी कोशिश की और जब ख़ुदा वंदे आलम और रसूले ख़ुदा के इरादे में तआरुज़ और टकराओ तो ख़ुदा वंदे आलम का इरादा मुक़द्दम है।

(शरहे इब्ने अबिल हदीद जिल्द 12 पेज 78)

अव्वल. यह तावील , दर हक़ीक़त मसअल ए जब्र का बाब खोलना है कि अगर यह दरवाज़ा खुल जाये कि तो फिर यह मसअला गुनाहाने कबीरा तक भी पहुच जाता है , जिसके नतीजे में तमाम उक़लाई , अक़्ली और मंक़ूला बुनियादें दरहम व बरहम हो जाती हैं , ख़ुदा वंदे आलम हर इंसान से अपने इख़्तियार से कोई अमल चाहता है न कि जब्र कि बेना पर।

दूसरे. क्या विलायते अबी बिन अबी तालिब (अ) की दरख़्वास्त हज़रत रसूले अकरम (स) की ज़ात से मख़्सूस है , जिसका ख़ुदा वंदे आलम की मर्ज़ी से टकराओ हो जाये ? क्या ख़ुदा वंदे आलम ने क़ुरआने मजीद की बहुत सी आयात जैसे आय ए विलायत में हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अ) की विलायत के बारे में गुफ़तुगू नही की है ?

तीसरे. क्या हज़रते रसूले अकरम (स) ख़ुदा वंदे की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ कोई इरादा कर सकते हैं ? क्या क़ुरआने मजीद में इरशाद नही हुआ है

: قُلْ إِن كُنتُمْ تُحِبُّونَ اللَّـهَ فَاتَّبِعُونِي يُحْبِبْكُمُ اللَّـهُ وَيَغْفِرْ لَكُمْ ذُنُوبَكُمْ وَاللَّـهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ

(सूर ए आले इमरान आयत 31)

ऐ पैग़म्बर , आप कह दीजिये कि अगर तुम अल्लाह से मुहब्बत करते हो तो मेरी पैरवी करो , ख़ुदा भी तुम से मुहब्बत करेगा।

नीज़ एक दूसरी जगह इरशाद होता है:

مَّن يُطِعِ الرَّسُولَ فَقَدْ أَطَاعَ اللَّـهَ وَمَن تَوَلَّى فَمَا أَرْسَلْنَاكَ عَلَيْهِمْ حَفِيظًا

(सूर ए निसा आयत 80)

जो शख्स रसूल की इताअत करेगा बेशक उसने अल्लाह की इताअत की।

नतीजा: पहली तावील में रसूले अकरम (स) की वफ़ात के बाद असहाब का हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अ) से ऐराज़ और रूगरदानी के बारे में हमने कहा कि असहाब के दरमियान दो रविशे फिक़्र और दो नज़रिये पाये जाते थे , जिन में से बाज़ ख़ुद को शरीयत के मुक़ाबिल साहिबे नज़र जानते थे और वह शरीयत के मुक़ाबिल मसहलत अंदेशी और इज्तेहाद किया करते थे। उन लोगों ने हज़रत अली (अ) की इमामत व ख़िलाफ़त के दलायल के साथ भी ऐसा ही कुछ किया और मुख़्तलिफ़ बहानों से उसकी तसहीह करना चाही।

दूसरी तरफ़ असहाब के एक दूसरे गिरोह पर यह बात ज़ाहिर न हो सकी , क्योकि वह इस नज़रिये के हामिल लोगों को भी हक़ीक़ी असहाब गरदानते थे जो लोग रसूले अकरम (स) के पास बैठते हों , इस दूसरे गिरोह को यह यक़ीन नही था कि इस गिरोह के लोग इतने ज़्यादा मक्कार हैं और हक़ व हक़ीक़त को पाँव तले रौंद देते हैं।

एक और गिरोह जो हज़रत अली (अ) की ताबीर के मुताबिक़ हुमुज रेआअ.. था जो हर हवा के झोकें में उड़ने लगता था , मख़्सूसन जो लोग पैग़म्बरे अकरम (स) की वफ़ात से मुसीबत ज़दा और बहुत ग़म ज़दा थे यहाँ तक कि उनमें सोचने समझने की सलाहियत भी बाक़ी नही थी लिहाज़ा मकतबे ख़ुलाफ़ो के सरदारों ने उस वक़्त को बेहतरीन ग़नीमत शुमार किया और अपने नक़्शों को अमली जामा पहनाने की कोशिश की और बहुत तेज़ी के साथ सक़ीफ़ा में गये और मसअल ए ख़िलाफ़त को अपने हक़ में तमाम कर लिया।

दूसरा सबब: दुश्मनी व कीना

इमाम अली (अ) ने उन्ही ताज़ा मुसलमानों के काफ़िर आबा व अजदाद को मुख़्तलिफ़ जंगों में क़त्ल किया था लिहाज़ा उनके दिल में आपकी दुश्मनी भरी हुई थी।

अली बिन हसन बिन फ़ज़्ज़ाल ने अपने पिदरे बुज़ुर्गा वार से रिवायत की है: मैंने इमाम अबुल हसन अली बिन मूसर रिज़ा (अ) से हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अ) के बारे में सवाल किया कि लोगों ने किस वजह की बेना पर आप से मुँह मोड़ा और दूसरों की तरफ़ मायल हो गये , जबकि हज़रत अली (अ) के फ़ज़ायल व मनाक़िब और रसूले अकरम (स) के नजदीक आपकी बहुत ज़्यादा अज़मत थी ? उस मौक़े पर इमाम रेज़ा (अ) ने फ़रमाया: इसकी वजह यह है कि इमाम अली (अ) ने उनके आबा व अजदाद , भाईयों , चचा , मामू और दूसरे उन रिश्तेदारों में से बहुत से लोगों को क़त्ल किया था जो दुश्मने ख़ुदा व रसूल थे , इस वजह से उन लोगों के दिलों में आपकी दुश्मनी और किनह भरा हुआ था , लिहाज़ा वह नही चाहते थे कि अली (अ) उनके सर परस्त हों , लेकिन हज़रत अली (अ) के अलावा दूसरे लोगों की दुश्मनी उनके दिलों में इतनी नही थी जितनी हज़रत अली (अ) की थी , क्योकि हज़रत अली (अ) की तरह किसी ने भी मुशरेकीन से जिहाद नही किया है , इसी वजह से इमाम अली (अ) से लोगों ने मुँह मोड़ लिया और दूसरों की तरफ़ चले गये।

अब्दुल्लाह बिन उमर ने हज़रत अली (अ) की ख़िदमत में अर्ज़ किया: आप को क़ुरैश किस तरह दोस्त रखें जबकि आपने जंगे बद्र में उनके सत्तर बुज़ुर्गों को कत्ल किया है।

हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ) और इब्ने अब्बास से सवाल हुआ: क्यो क़ुरैश , हज़रत अली (अ) से बुग़्ज़ रखते थे ? इमाम (अ) ने फ़रमाया: क्योकि उनमें से एक गिरोंह को वासिले जहन्नम किया और उनके एक गिरोह को ज़लाल व ख़ार किया।

अबू हफ़्स कहते हैं: हरीज़ बिन उस्मान , हज़रत अली (अ) पर शदीद हमला किया करता था और मिम्बर पर जाकर आपको गालियाँ देता था और वह हमेशा कहता था: मैं इस वजह से उनको दोस्त नही रखता कि उन्होने मेरे आबा व अजदाद को क़त्ल किया है।

(ऐललुश शराये जिल्द 1 पेज 146 हदीस 3, उयूने अख़बारे रिज़ा जिल्द 2 पेज 81 हदीस 15)

(अल मनाक़िब जिल्द 3 पेज 220)

(बिहारुल अनवार जिल्द 29 पेज 482, तारिख़े दमिश्क़ जिल्द 42 पेज 291, मारेफ़तुस सहाबा अबी नईम पेज 22 मख़तूत , शरहे इब्ने अबिल हदीद जिल्द 2 पेज 23)

(मुख़तसरे तारिख़े दमिश्क़ जिल्द 6 पेज 276, तहज़ीबुल कमाल जिल्द 5 पेज 59, तहज़ीबुत तहज़ीब जिल्द 2 पेज 210, अल मजरूहीन इब्ने हब्बान जिल्द 1 पेज 268, अल अंसाब समआनी जिल्द 3 पेज 50)

लिहाज़ा हम तारिख में देखते हैं कि यज़ीद बिन मुआविया ने हज़रत इमाम हुसैन बिन अली बिन अबी तालिब (अ) को क़त्ल करने के बाद आपके सरे मुबारक से ख़िताब किया और इब्ने ज़बअरी के इन अशआर को पढ़ा जिनमें बद्र के मक़तूलीन के बदले की तरफ़ इशारा किया है।

शेर

(अल बिदाया वन निहाया जिल्द 8 पेज 142, तज़किरतुल ख़वास पेज 235, शरहे अबिल हदीद जिल्द 3 पेज 283)

तर्जुम ए अशआर:

ऐ काश मेरे क़बीले के वह आबा व अजदाद ज़िन्दा होते जो जंगे बद्र में क़त्ल हो गये तो वह देखते कि नैज़े लगने की वजह से क़बील ए ख़ज़रज किस तरह से गिरया व ज़ारी कर रहा था , यह देख कर वह ख़ुशी व मुसर्रत में यह नारा लगाते: ऐ यज़ीद , तेरे हाथ शल न हों। कि तूने अपने बुज़ुर्गों को क़त्ल कर दिया और यह बद्र का बदला था , बनी हाशिम हुकूमत के साथ खेले हैं क्योकि न कोई आसमान से ख़बर आई है और न वहयी नाज़िल हुई है , मैं ख़दफ़ की औलाद से नही हूँ , अगर आले अहमद की दुश्मनी का बदला उसकी औलाद से न ले लूँ।

तीसरा सबब: इमाम अली (अ) की अदालत

हज़रत अली (अ) तक़वा और इलाही जिहात के बग़ैर किसी को दूसरे पर मुक़द्दम नही किया करते थे। वह सभी को एक नज़र से देखते थे। इसी वजह से आपकी ख़िलाफ़त के ख्वाहा सिर्फ़ कुछ ही लोग थे। वह लोग चाहते थे कि ख़िलाफ़त के लिये कोई ऐसा शख़्स मुअय्यन हो जो उनके दरमियान फ़र्क़ का क़ायल हो और उनको मुसलमानों के बैतुल माल से ज़्यादा फायदा पहुचाये।

इब्ने अबिल हदीद लिखते हैं: अमीरिल मोमिनीन (अ) से अरब के मुँह मोड़ने की सबसे बड़ी अहम वजह माली मसला था। क्योकि अली (अ) ऐसे शख़्स न थे जो बिला वजह किसी को दूसरों फ़ज़ीलत देंते और अरब को अजम पर तरजीह देते। जैसा कि दीगर बादशाहों का रवैय्या होता है। आप कभी किसी को इजाज़त नही देते थे कि किसी ख़ास वजह से आप की तरफ़ मायल हो।

(शरहे अबिल हदीद जिल्द 2 पेज 197)

इब्ने अबिल हदीद , हारून बिन सअद से रिवायत करते हैं कि अब्दुल्लाह बिन जाफ़र बिन अबी तालिब ने हजरत अली (अ) से अर्ज़ किया: या अमीरल मोमिनीन , मैं आप से मदद चाहता हूँ , ख़ुदा की कसम , आज खाने पीने के लिये कुछ भी नही है मगर यह कि अपनी सवारी को बेच डालूँ और उसकी क़ीमत से अपनी ज़िन्दगी के इख़राजात पूरे करूँ।

इमाम (अ) ने फ़रमाया: नही ख़ुदा की क़सम , मैं तुम्हारे लिये कोई चीज़ नही पाता हूँ मगर यह कि तुम अपने चचा को चोरी करने का हुक्म दो जिसमें से वह तुम्हे कुछ दे सके।

हमू कहते हैं: हज़रत अली (अ) से रू गरदानी करने वालों में से अनस बिन मालिक भी हैं , जिसने हज़रत अली (अ) के फ़ज़ायल को छुपाया है और दुनिया की मुहब्बत में आपके दुश्मनों की मदद की।

(शऱहे अबिल हदीद जिल्द 2 पेज 200)

(शरहे अबिल हदीद जिल्द 4 पेज 174)

चौथा सबब: बनी हाशिम से दुश्मनी

तारिख़ इस बात की गवाही देती है कि क़ुरैश , हज़रत रसूले अकरम (स) के ज़माने ही से बनी हाशिम से ख़ास दुश्मनी रखते थे। यहाँ तक कि जब तक रसूले अकरम (स) ज़िन्दा रहे , हर तरह के आज़ार व अज़ीयत से बाज़ नही आये। क्योकि जब उन्होने ज़हूरे इस्लाम और पैग़म्बरे इस्लाम (स) के नये दीन की दावत को देखा कि हमें उनके दीन की वजह से बहुत ज़्यादा नुक़सान पहुचा है , मख़सूसन यह कि उस दीन का असली मक़सद बुत परस्ती और उनके ऐतेक़ादात का ख़ातमा था। चुँनाचे जब उन्होने यह देख लिया कि मुहम्मद (स) की दीन रोज़ ब रोज़ लोगों के दिलों में नाफ़िज़ होता जा रहा है , और लोग मुसलसल उनके दीन में दाख़िल होते जा रहे हैं तो उनके मुक़ाबले में एक अज़ीम मोरचा तैयार हो रहा है लिहाज़ा उनके दिलों में आँ हज़रत (स) की दुश्मनी भर गई और आँ हज़रत (स) से मुक़ाबला करने की कोशिश करने लगे और शिद्दत के साथ आपके मुक़ाबले के लिये खड़े हो गये।

अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब एक रोज़ ग़ुस्से के आलम में रसूले अकरम (स) की ख़िदमत में आये तो आँ हज़रत (स) ने उनसे सवाल किया: किस वजह से आप ग़ज़बनाक हैं ? उन्होने अर्ज़ किया या रसूलल्लाह , हमने क़ुरैश के साथ क्या किया है कि जब वह आपस में एक दूसरे से मिलते हैं तो बहुत ही गर्म जोशी से गले मिलते हैं लेकिन जब हम से मिलते हैं तो उनका अँदाज़ बदला बदला सा होता है ?

रावी कहता है उस मौक़े पर रसूले अकरम (स) इस क़दर ग़ज़बनाक हुए कि आप का चेहरा सुर्ख हो गया और फ़रमाया: क़सम उसकी जिसके क़ब्ज़ ए क़ुदरत में मेंरी जान है , किसी के दिल में उस वक़्त तक ईमान दाख़िल नही हो सकता जब तक वह ख़ुदा व रसूल की वजह से तुम को न रखे।

(यनाबीउल मवद्दत जिल्द 1 पेज 53)

हज़रत रसूले अकरम (स) चूँकि अपने इलाही मक़सद को आगे बढ़ाने के लिये उनसे मुक़ाबला करना पर मजबूर थे लिहाजा इस सिलसिले में हज़रत अली (अ) से बहुत मदद मिली , उनके क़ौम व क़बीले के बहुत से लोग जंगों में क़त्ल हुए थे जिसकी वजह से रसूले अकरम (स) की वफ़ात के बाद , उन्होने हजरत अली (अ) से अपनी दुश्मनी निकाली और आपसे उनका बदला लिया और ख़ुदा वंदे आलम के मुअय्यन किये हुए हक़ तक पहुचने में मानेअ हो गये।

उमर बिन ख़त्ताब , इब्ने अब्बास से मुनाज़ेरे के आख़िर में कहते हैं: ख़ुदा की क़मस , बेशक तुम्हारा चचाज़ाद ख़िलाफ़त के मसले में सबसे ज़्यादा हक़दार है लेकिन क़ुरैश उनको बर्दाश्त नही कर सकते।

अनस बिन मालिक कहते हैं: मैं रसूले ख़ुदा (स) और अली बिन अबी तालिब (अ) के साथ था कि हमारा गुज़र एक बाग़ की तरफ़ से हुआ , अली (अ) ने अर्ज़ किया या रसूलल्लाह , क्या आपने मुलाहिज़ा फ़रमाया कि कितना हसीन बाग़ है ? पैग़म्बरे अकरम (स) ने फ़रमाया: जन्नत में आपका बाग़ इससे कहीं ज़्यादा हसीन है। अनस कहते हैं हम सात बाग़ों से गुज़रे और यही सवाल व जवाब तकरार हुए , उस मौक़े पर रसूले ख़ुदा रुक गये और हम भी खड़े हो गये , उस मौक़े पर आँ हज़रत (स) ने अपने सर को अली (अ) के शाने पर रखा और गिरया करना शुरु कर दिया , अली (अ) ने अर्ज़ किया या रसूलल्लाह , आप के गिरया फ़रमाने की क्या वजह है ? तो आँ हज़रत (स) ने फ़रमाया: इस क़ौम के दिलों में आपकी दुश्मनी भरी हुई है जिसको यह लोग अभी ज़ाहिर नही करते यहाँ तक मैं इस दुनिया से चला जाऊ...(उस वक़्त उनकी दुश्मनी आपके सामने ज़ाहिर हो जायेगी।

पैग़म्बरे अकरम (स) ने एक हदीस के ज़िम्न मे हज़रत अली (अ) से ख़िताब करते हुए फ़रमाया: बेशक मेरे बाद अन क़रीब यह उम्मत आपके साथ साज़िश करेगी।

नीज़ आँ हज़रत (स) ने हज़रत अली (अ) से ख़िताब करते हुए फ़रमाया: आगाह हो जाओ कि मेरे बाद अनक़रीब आपको मसायब का सामना होगा , अली (अ) ने अर्ज़ किया: क्या मेरा दीन सालिम रहेगा ? तो पैग़म्बरे अकरम (स) ने फ़रमाया: हाँ आपका दीन सालिम रहेगा।

हज़रत उस्मान , एक रोज़ अली (अ) से ख़िताब करते हुए कहते हैं: मैं क्या करूँ कि क़ुरैश तुम को दोस्त नही रखते , क्योकि तुम ने जंगे बद्र में उनके सत्तर लोगों को क़त्ल किया हैं।

(तारिख़े याक़ूबी जिल्द 2 पेज 137, कामिल बिन असीर जिल्द 3 पेज 24)

(शरहे इब्ने अबिल हदीद जिल्द 4 पेज 107)

(मुसतदरके हाकिम जिल्द 3 पेज 150 हदीस 4676)

(मुसतदरके हाकिम जिल्द 3 पेज 151 हदीस 4677)

(शरहे इब्ने अबिल हदीद जिल्द 9 पेज 23)

हज़रत अली (अ) ख़ुदा वंदे आलम की बारगाह में अर्ज़ करते हैं: तेरी बारगाह में क़ुरैश की शिकायत करता हूँ , उन्होने तेरे रसूल के साथ बहुत शरारतें और धोखे बाज़ियाँ कीं , लेकिन उनके मुक़ाबले की ताब न ला सके और तू उनके दरमियान हायल हो गया लेकिन पैग़म्बरे अकरम (स) के बाद यह लोग मेरे पास जमा हो गये और अपने पलीद इरादों को मुझ पर जारी करने लगे , पालने वाले , हसन व हुसैन की हिफ़ाज़त फ़रमा और जब तक मैं ज़िन्दा हूँ , उनके क़ुरैश के शर से महफ़ूज़ रख , और जब तू मेरी रुह कब्ज़ कर लेगा उसके बाद उनकी हिफ़ाज़त करना और तू हर चीज़ पर शाहिद है।

एक शख़्स ने हज़रत अली (अ) की ख़िदमत में अर्ज़ किया आप मुझे बतायें कि अगर पैग़म्बरे अकरम (स) को कोई बालिग़ और रशीद बेटा होता तो क्या अरब उसकी ख़िलाफत को क़बूल कर लेते ? इमाम (अ) ने फ़रमाया: हरगिज़ नही , बल्कि अगर जिन तदबीरों से मैने काम लिया है वह उन तदबीरों से काम न लेता तो उसको क़त्ल कर डालते , अरब को हज़रत मुहम्मद मुसतफ़ा सल्ललाहो अलैहे वा आलिही वसल्लम के काम पसंद नही थे और जो कुछ ख़ुदा वंदे आलम ने अपने फज़्ल व करम से आँ हज़रत (स) को अता किया था उस पर हसद किया करते थे...।

(शरहे इब्ने अबिल हदीद जिल्द 20 पेज 298 रक़्म 413)

(शरहे इब्ने अबिल हदीद जिल्द 20 पेज 298 रक़्म 414)

हदीसे ग़दीर के इंकार के नतायज

हज़रत रसूले अकरम (स) की वफ़ात के बाद अकसर मुसलमानों ने हदीसे ग़दीर से मुँह मोड़ लिया और उसका इंकार कर दिया या उसको भूला डाला जबकि क़ुरआने मजीद उनकी पैरवी की दावत करता है , जिस के नतीजे में बहुत से मसायब में मुबतला हो गये।

ख़ुदा वंदे आलम क़ुरआने मजीद में इरशाद फ़रमाता है:

1. يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اسْتَجِيبُوا لِلَّـهِ وَلِلرَّسُولِ إِذَا دَعَاكُمْ لِمَا يُحْيِيكُمْ وَاعْلَمُوا أَنَّ اللَّـهَ يَحُولُ بَيْنَ الْمَرْءِ وَقَلْبِهِ وَأَنَّهُ إِلَيْهِ تُحْشَرُونَ

(सूर ए अनफ़ाल आयत 24)

ऐ ईमान वालों , अल्लाह और रसूल की आवाज़ पर लब्बैक कहो जब वह तुम्हे इस अम्र की तरफ़ दावत दें जिसमें तुम्हारी ज़िन्दगी (की भलाई) है...।

2. وَمَا كَانَ لِمُؤْمِنٍ وَلَا مُؤْمِنَةٍ إِذَا قَضَى اللَّـهُ وَرَسُولُهُ أَمْرًا أَن يَكُونَ لَهُمُ الْخِيَرَةُ مِنْ أَمْرِهِمْ وَمَن يَعْصِ اللَّـهَ وَرَسُولَهُ فَقَدْ ضَلَّ ضَلَالًا مُّبِينًا

(सूर ए अहज़ाब आयत 36)

और किसी मोमिन मर्द या औरत को यह इख़्तियार नही है कि जब ख़ुदा व रसूल किसी अम्र के बारे में फ़ैसला कर दें तो अपने अम्र के बारे में साहिबे इख़्तियार बन जायें और जो ख़ुदा व रसूल की नाफ़रमानी करेगा वह बड़ी खुली हुई गुमराही में मुबतला होगा।

3. وَرَبُّكَ يَخْلُقُ مَا يَشَاءُ وَيَخْتَارُ مَا كَانَ لَهُمُ الْخِيَرَةُ سُبْحَانَ اللَّـهِ وَتَعَالَى عَمَّا يُشْرِكُونَ

(सूर ए क़सस आयत 68)

और तुम्हारा परवर दिगार जिसे चाहता है पैदा करता है और जिसे चाहता है मुन्तख़ब करता है।

अहले सुन्नत की जबान से हदीस के इंकार के (बुरे) नतायज का इक़रार

यह बात ज़ाहिर है कि इमामे मासूम के बारे में इलाही शरई नस्स (व हुक्म) का इंकार करने और इस काम को उम्मत के सुपुर्द करने के नतायज ख़तरनाक होगें कि जो अहले सुन्नत के रौशन फिक्र हज़रात पर मख़्फ़ी नही हैं। अब हम यहाँ चंद हज़रात की तहरीर पेश करते हैं:

1. डाक्टर अहमद महमूद सुबही

मौसूफ़ कहते हैं:

सियासत का उसूले हुकूमत के मसले या वाज़ेह अल्फ़ाज़ में निज़ामे बैअत ने अहले बैत के तर्ज़े फ़िक्र में बहुत सी मुश्किलात पैदा कीं हैं जैसे ख़ुलाफ़ा ए सलासा में से हर एक ने दूसरे के तरीक़े के बर ख़िलाफ़ अमल किया है। इस सूरत में उन हज़रात की मुख़्तलिफ़ कार करदगी से इस्लाम के नज़रिये को किस तरह से समझा जा सकता है , ताकि तमाम मुसलमानों का उस पर इत्तेफ़ाक़ हो जाये।

मौसूफ़ यह भी कहते हैं: जब मुआविया ने यह सोचा कि अपने बाद ख़िलाफ़त अपने बेटे यज़ीद के हवाले कर दे तो उसने इस्लामी निज़ाम में एक नई बिदअत पैदा कर दी और इस सिलसिले में एक ऐसी तक़लीद ईजाद की जिसने सुन्नते सलफ़ को बदस डाला और ख़िलाफ़त को फ़ारसी और बैज़नती बादशाहत के मुशाबेह कर दिया और ख़िलाफ़त को (जैसा कि जाहिज़ ने भी कहा है) क़ैसर व कसरा की बादशाहत में बदल डाला।

नीज़ मौसूफ़ रक़्मतराज़ है: जो कुछ भी इस्लाम के नाम पर ज़ालिम व सितमगर ख़ुलाफ़ा के ज़माने में नागवार वाक़ेयात पेश आये हैं , दीने ख़ुदा उससे बरी है और उनका गुनाह रोज़े क़यामत तक उन्हे लोगों की गर्दन पर है जिन्होने ऐसी हुकूमत की बुनियाद डाली है।

(नज़रियतुल इमामह लदश शिया असना अशरी पेज 501)

(अन नज़मुल इस्लामी नशअतुहा व ततवुरेहा पेज 267)

(अन नज़मुल इस्लामी नशअतुहा व ततवुरेहा पेज 279)

2. जाहिज़

मौसूफ़ हाँलाकि उस्मान के तरफ़दारों में से हैं लेकिन फिर भी मुआविया की हूकूमत के तरीक़ ए कार पर ऐतेराज़ करते हुए कहते हैं: मुआविया ने अपने हुकूमत को ज़ुल्म व सितम के आगे बढ़ाया और शूरा के बाक़ी अरकान नीज़ अंसार व मुहाजेरीन की जमाअत पर ज़ुल्म व सितम किया हाँलाकि उस साल को साले जमाअत के नाम दिया था मगर वह जमाअत का साल नही बल्कि तफ़रेक़ा और क़हर व ग़लबे का साल था। जिस साल इमामत , बादशाही में बदल गई और ख़िलाफ़त शहन्शाही मंसब बन गया।

(रसायले जाहिज़ पेज 292, 297 रिसाला नंबर 11)

3. इब्ने क़तीबा

वह कहते है: जहमिय्या और मुशब्बिहा ने हज़रत अली (कर्रमल लाहो वजहहु) की ताख़ीर में ग़ुलू किया है और आपके हक़ को ज़ाया किया है और वह अपनी गुफ़तुगू में कट हुज्जती करते रहे , उन्होने अपने ज़ुल्म का इक़रार न किया और मज़लूमों के ख़ून को नाहक़ और ज़ुल्म व सितम की बिना पर बहाया.. और उन्होने अपनी जिहालत की वजह से आइम्मा को इमामत से ख़ारिज कर दिया और फ़ितना गर इमामों की सफ़ में क़रार दे दिया , उनकी ख़िलाफ़त पर लोगों के इख़्तिलाफ़ की वजह से ख़िलाफ़त का नाम नही दिया जिसकी बिना पर यज़ीद बिन मुआविया को लोगों के इजमा की वजह से ख़िलाफ़त का मुसतहिक़ समझ लिया...।

(अल इख़्तिलाफ़ फ़िद रद्दे अलल जहमिया वल मुशब्बिहा पेज 47 से 49)

4. मक़रेज़ी

मक़रेज़ी साहब लिखते हैं: ख़ुदा व रसूल ने सच फ़रमाया है कि रसूले अकरम (स) के बाद ऐसे ख़लीफ़ा आयेगें जो हिदायत और दीने हक़ के मुताबिक़ फ़ैसले नही करेंगें और हिदायत की सुन्नतों को बदल देगें...।

(अन निज़ाअ वत तख़ासुम जिल्द 12 पेज 315, 317)

5.इब्ने हज़्म ज़ाहिरी

मौसूफ़ कहते हैं: यज़ीद बिन मुआविया ने इस्लाम पर बुरे नतायज छोड़े हैं , उसने अहले मदीना , बुज़ुर्गाने क़ौम और बाक़ी असहाब को रोज़े हर्रा अपनी हुकूमत के आख़िरी वक़्त में क़त्ल करा दिया और (इमाम) हुसैन (अ)

और आपके अपनी बैत को अपनी हुकूमत के शुरु में क़त्ल कराया। और इब्ने ज़ुबैर को मस्जिदुल हराम में घेर लिया और ख़ान ए काबा और इस्लाम का अज़मत का ख़्याल तक न किया....।

मौसूफ़ किताब अल महल्ली में कहते हैं: बनी उमय्या के बादशाहों ने नमाज़ से तकबीर को ख़त्म कर दिया और नमाज़े ईदे क़ुरबाँ के ख़ुतबों को मुक़द्दम कर दिया यहाँ तक कि यह मसायल पूरी दुनिया में फैल गये लिहाज़ा यह कहना सही है कि रसूले अकरम (स) के अलावा किसी दूसरे का अमल हुज्जत नही है।

(जमहरतिल अंसाबिल अरब पेज 112)

(अल महल्ली जिल्द 1 पेज 55)

2. अबुस सना आलूसी

وَإِذْ قُلْنَا لَكَ إِنَّ رَبَّكَ أَحَاطَ بِالنَّاسِ وَمَا جَعَلْنَا الرُّؤْيَا الَّتِي أَرَيْنَاكَ إِلَّا فِتْنَةً لِّلنَّاسِ وَالشَّجَرَةَ الْمَلْعُونَةَ فِي الْقُرْآنِ وَنُخَوِّفُهُمْ فَمَا يَزِيدُهُمْ إِلَّا طُغْيَانًا كَبِيرًا

मौसूफ़ मज़कूरा आय ए शरीफ़ा की तफ़सीर में इब्ने जरीर से , वह सहल बिन साद से , वह इब्ने अबी हातम और इब्ने मरदुवा से , और अद दयायल में बैहक़ी व इब्ने असाकर से , वह सईद बिन मुसय्यब से , और रिवायते इब्ने अबी हातम याली बिन मर्रा से , और वह इब्ने उमर से पैग़म्बरे अकरम (स) के ख़्वाब के बारे में रिवायत करते हैं कि रसूले अकरम (स) ने ख़्वाब देखा कि बनी उमय्या मेरे मिम्बर पर बंदर की तरह चढ़ रहे हैं। आपको यह ख़्वाब ना गवार लगा और उसी मौक़े पर ख़ुदा वंदे आलम ने मज़कूरा आयत नाज़िल फ़रमाई..।

(सूर ए इसरा आयत 60)

तर्जुमा , जैसे आपने देखा है वह हमने इसलिये दिखाया है कि वह लोगों के दरमियान फ़ितना हैं और क़ुरआने मजीद में वह शजर ए मलऊना है और हम लोगों को डराते रहते हैं लेकिन उनकी सरकशी बढ़ती हा जा रही है।

(तफ़सीरे आलूसी मज़कूरा आयत के ज़ैल में)

3. डाक्टर ताहा हुसैन मिस्री

मौसूफ़ अपनी किताब मिरातुल इस्लाम में कहते हैं: ख़ुदा वंदे आलम ने क़ुरआने मजीद में मक्के की अज़मत बयान की है और मदीने को पैग़म्बरे अकरम (स) के ज़रिये मोहतरम क़रार दिया लेकिन बनी उमय्या ने मक्के और मदीने को मुबाह कर दिया। यज़ीद बिन मुआविया के जम़ाने में शुरु हुआ जिसने मदीने को तीन बार मुबाह और ताराज किया है। अब्दुल मलिक बिन मरवान ने भी मक्के को मुबाह करने की इजाज़त हुज्जाज बिन युसुफ़ को दी और क्या क्या ज़ुल्म व सितम वहाँ अंजाम न दिये ?। और यह सब इसलिये था कि शहरे मुक़द्दस (के रहने वाले) अबू सुफ़यान और बनी मरवान की औलाद के सामने झुके रहे , इब्ने ज़ियाद ने यज़ीद बिन मुआविया के हुक्म से (इमाम) हुसैन (अ) और आपके बेटों और भाईयों को क़त्ल किया और रसूलल्लाह (स) की बेटियों को असीर कर लिया... मुसलमानों का माल ख़ुलाफ़ा की ज़ाती मिल्कियत बन कर रह गया और जिस तरह चाहा उसको ख़र्च किया , न जिस तरह से ख़ुदा वंदे आलम चाहता था...।

नीज़ मौसूफ़ का बयान है: तुग़यान व सरकशी मशरिक़ व मग़रिब तक फैल गई , ज़ियाद उसकी औलाद ज़मीन पर फ़साद रहे थे ता कि बनी उमय्या की हुकूमत बरक़रार रह सके और बनी उमय्या ने उनके लिये उन फ़सादात को मुबाह कर दिया था और हुज्जाज ज़ियाद व इब्ने ज़ियाद के बाद इराक़ में वारिद हुआ जिसने इराक़ को शर व फ़साद और बुराईयों से भर दिया।

(मरअतुल इस्लाम पेज 268, 270)

(मरअतुल इस्लाम पेज 268, 272)

इसी तरह मौसूफ़ अपनी किताब अल फ़ितनतुल कुबरा में रक़्म तराज़ है: अली (अ) रसूले अकरम (स) के सबसे करीबी शख़्स थे , वह आँ हज़रत (स) के तरबीयत याफ़्ता और आपकी अमानतों को वापस करने में जानशीन थे वह पैग़म्बरे इस्लाम (स) के अक़्दे उख़ूवत की बिना पर आँ हज़रत (स) के भाई थे , वह दामादे पैग़म्बर और रसूले ख़ुदा (स) की ज़ुर्रियत के बाप थे , वह पैग़म्बरे अकरम (स) के अलमदार और आपके अहले बैत के दरमियान थे और हदीसे नबवी के मुताबिक़ रसूले अकरम (स) के नज़दीक आपका मर्तबा जनाबे मूसा के नज़दीक हारुन के मर्तबे की तरह था। अगर तमाम मुसलमान यही सब कुछ कहते औऱ उन्ही मतालिब की वजह से अली (अ) का इंतेख़ाब करते तो कभी भी हक़ से दूर न होते और मुनहरिफ़ न होते।

यह सब चीजें हज़रत अली (अ) की ख़िलाफ़त की निशानियाँ थीं , आपकी रसूले अकरम (स) से रिश्तेदारी , इस्लाम में सबक़त , मुसलमानो के दरमियान अज़मत , जिहाद और जंग में मसायब का बर्दाश्त करना और ऐसी सीरत जिसमें किसी तरह का कोई इंहेराफ़ और कजी नही थी। दीन व फ़क़ाहत में शिद्दत और किताब व सुन्नत का इल्म और राय में इसतेहकाम वग़ैरह वग़ैरह , तमाम सिफ़ात आपका रास्ता हमवार करने वाली थीं , बनी हाशिम को ख़िलाफ़त से बिल्कुल दूर रखा गया , क़ुरैश ने उनके साथ यह सुलूक किया क्योकि वह इस बात से ख़ौफ़ज़दा थे कि बनी हाशिम के पास एक जमाअत जमा हो जायेगी वह नही चाहते थे कि ख़िलाफ़त उनके क़बीले के अलावा किसी दूसरे कबीले में जाये।

नीज़ मौसूफ़ कहते हैं: "मुआविया के बारे में जो कुछ भी लोग कहें लेकिन वह अबू सुफ़यान का बेटा है जो जंगे ओहद व ख़ंदक़ में मुशरेकीन का सरदार था , वह हिन्दा का बेटा है जो हमज़ा के क़त्ल का बाइस बनी और उनके शिकम को चाक करके जीगर को निकाला , चुँनाचे पैग़म्बरे अकरम (स) के नज़दीक यह एक ऐसा हादेसा था जिसको देख कर गोया आपकी जान निकली जा रही हो....।"

(अल फ़ितनतुल कुबरा जिल्द 1 पेज 152)

(अल फ़ितनतुल कुबरा जिल्द 2 पेज 15)

4. मशहूर मुवर्रिख़ सैयद अमीर अली हिन्दी

मौसूफ़ कहते हैं: हुकूमते बनी उमय्या ने सिर्फ़ ख़िलाफ़त के उसूल और उसकी तालिमात ही को नही बदला बल्कि उनकी हुकूमत ने इस्लाम की बुनियादों को पलट कर रख दिया।

मौसूफ़ एक दूसरी जगह कहते हैं: जब शाम में मुआविया ने ख़िलाफ़त पर क़ब्ज़ा कर लिया तो उसकी हुकूमत गुज़िश्ता बुत परस्ती की तरफ़ पलट गई और उसने इस्लामी डेमोक्रेसी की जगह ले ली....।

एक और जगह मौसूफ़ तहरीर करते हैं: इस तरह मक्के की बुत परस्ती वापस लौट आई और उसने शाम में सर निकाला।

नीज़ मौसूफ़ कहते हैं: बनी उमय्या में उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ के अलावा सब बुत परस्त थे वह लोग अहकामें शरीयत की रिआयत न करने और अरकाने दीन को मुनहदिम करने पर फ़ख़र व मुबाहात किया करते थे , वही दीन जिसका इक़रार करते थे... उन्होने ख़िलाफ़त की कुर्सी को बहुत से जरायम से मुलव्विस किया और ख़ून के दरिया में ग़ोता दिया...।

(मुख़तसर तारिख़िल अरब वत तमद्दुनिल इस्लामी पेज 63)

(रुहुल इस्लाम पेज 296)

(रुहुल इस्लाम पेज 300)

(रुहुल इस्लाम पेज 301)

5. डाक्टर अहमद अमीन मिस्री

मौसूफ़ अपनी किताब ज़ुहल इस्लाम में तहरीर करते हैं: ख़िलाफ़त के सिलसिले में अहले सुन्नत का नज़रियी मुताआदिल तर , मुसतहकम तर और अक़्ल के नज़दीक तर है अगरचे उनसे इस सिलसिले में बाज़ पुर्स होना चाहिये कि उन्होने अपने नज़रिये को मुसतहकम और अच्छी तरह अमली नही किया है , उन्होने अपने आईम्मा की वाज़ेह तौर पर तंक़ीद नही की है और जब उन्होने ज़ुल्म किया तो उनके मुक़ाबले में खड़े नही हुए और जब उन्होने ज़ुल्म किया तो वह उनको राहे मुस्तक़ीम पर नही लाये और उन्होने ऐसे कवानीन नही बनाये जो ख़लीफ़ो को उम्मत पर ज़ुल्म करने से रोक सकें बल्कि उनके मुक़ाबले में सरे तसलीम ख़म किये रखा जो वाक़ेयन नागवार था , इसी वजह से उन्होने उम्मत पर बहुत ज़ुल्म किया है।

वह अपनी दूसरी किताब यौमुल इस्लाम में तहरीर करते हैं: रसूले इस्लाम (स) ने उस बीमारी में जिसमें आपने रेहलत फ़रमाई , यह इरादा किया कि अपने बाद के लिये मुसलमानों का वली ए अम्र मुअय्यन कर दें जैसा कि बुख़ारी और सही मुस्लिम में रिवायत है कि आँ हज़रत (स) ने फ़रमाया: लाओ तुम्हारे लिये एक ऐसा ख़त लिख दूँ जिससे मेरे बाद गुमराह न हों... लेकिन उन लोगों ने ख़िलाफ़त की मेहार को अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ अपने हाथों में ले लिया , इसी वजह से ख़िलाफत के सिलसिले में आज तक इख़्तिलाफ़ बाक़ी है। रसूले अकरम (स) के जम़ाने में इस्लाम मुसतहकम और मतीन था लेकिन जब आँ हज़रत (स) की रेहलत हुई तो ख़तरनाक जंगें शुरु हो गयीं।

नीज़ मौसूफ़ कहते हैं: इख़्तिलाफ़ का एक मिसदाक़ वह इख़्तिलाफ़ था जो रसूले अकरम (स) के बाद ख़िलाफ़त के सिलसिले में हुआ और यह चीज़ ख़ुद उन लोगों की कमज़ोरी की निशानी है क्योकि रसूले अकरम (स) ने दफ़्न होने से पहले ही इख़्तिलाफ़ शुरु कर दिये....।

मौसूफ़ अपनी एक किताब और किताब फजरे इस्लाम (स) में तहरीर करते हैं: जब बनी उमय्या ने ख़िलाफ़त को अपने हाथों में ले लिया तो फिर तअस्सुब ज़मान ए जाहिलियत की तरह अपनी पुरानी हालत पर पलट गया।

(ज़ुहल इस्लाम जिल्द 3 पेज 225)

(यौमुल इस्लाम पेज 41)

(यौमुल इस्लाम पेज 53)

(फ़जरुल इस्लाम पेज 79)

नीज़ मौसूफ़ कहते हैं: ख़लिफ़ ए दमिश्क़ (मुआविया) का कनीज़ों के गानों और लह व लअब को साज़ व सामान से भरे हुए थे। वह अलल ऐलान और मख़्फ़ी तौर पर गुनाह करता था और लोगों के दरमियान फ़हशा व मुन्कर को रायज करता था...।

नीज़ मौसूफ़ एक दूसरी तरह तहरीर करते हैं: अबू सुफ़यान ने अपने कुफ़्र आमेज़ अक़ीदे का इज़हार उस वक़्त किया कि जब उस्मान बिन अफ़्फ़ान हुकूमत पर पहुचे , चुँनाचे उसने कहा: तीम व अदी के बाद हुकूमत तुम तक पहुची है लिहाज़ा इसको गेंद की तरह एक दूसरे हाथ में देते रहो और उसके अरकान में बनी उमय्या को क़रार दो , क्योकि ख़िलाफ़त , मुल्क और हुकूमत है और मैं नही जानता था कि जन्नत व जहन्नम है भी या नही ? (और अगरचे उस्मान ने उनको दूर रखा लेकिन कुछ मुद्दत में उस काफ़िर घराने की रस्सी का जाल ख़िलाफ़त पर आ गिरा और जब उस घराने में हुकूमत आई तो उनके ज़हरीले आसार अकसर औक़ात ज़ाहिर होते रहे हैं।

नीज़ मौसूफ़ कहते हैं: मैं मुआविया को इस बात से बरी नही करूँगा कि उसने (इमाम) हसन (अ) को ज़हर दिया , क्योकि यह शख़्स हरगिज़ पक्का मुसलमान नही था बल्कि यूँ कहा जाये तो बेहतर है कि यह एक ऐसा जाहिल था जो अपने बेटे के लिये हर गुनाह और जुर्म अंजाम देने के लिये तैयार था। यह शख़्स फ़तहे मक्का के वक़्त आज़ाद हुआ था लेकिन उसने अपनी ज़िन्दगी में बड़े बड़े सहाबा जैसे हज्र बिन अदी और उनके साथियों को दर्दनाक तरीक़े से क़त्ल किया और लोगों से अपने बेटे यज़ीद की बैअत के लिये न जाने क्या क्या कारनामे अंजाम दिये , लिहाज़ा ख़िलाफ़त जाहिलियत की बादशाही में बदल गई , जिसको आले मुआविया एक के बाद दूसरे की तरफ़ मुन्तक़िल करते रहे।

(नशअतुल फ़िक्रिल फ़लसफ़ी फ़िल इस्लाम जिल्द 1 पेज 229)

(अन नज़ाअ वन तख़ासुम पेज 31)

(नशअतुल फ़िक्रिल फ़लसफ़ी फ़िल इस्लाम जिल्द 1 पेज 198)

(नशअतुल फ़िक्रिल फ़लसफ़ी फ़िल इस्लाम जिल्द 2 पेज 46)

11. अब्बास महमूद अक़्क़ाद

मौसूफ़ अपनी किताब मुआविया फ़िल मीज़ान में तहरीर करते हैं: ख़िलाफ़त के ज़माने के बाद बनी उमय्या की हुकूमत का क़ायम होना तारीख़े इस्लाम और तारिख़े बशरी का सबसे ख़तरनाक हादेसा था।

(मुआविया फ़िल मीज़ान जिल्द 3 पेज 542)

तबरी , सईद बिन सवीद से एक मदरक व सनद के साथ रिवायत करते हैं कि मुआविया ने लोगों से ख़िताब करते हुए कहा: मैंने तुम्हारे साथ इस वजह से जंग नही की है कि तुम रोज़ा रखो , नमाज़ पढ़ो , हज करो और ज़कात दो , क्योकि मैं जानता हूँ कि यह आमाल तो तुम अंजाम देते ही रहते हो , मैंने तुम से सिर्फ़ वजह से जंग की है कि मैं तुम्हारा अमीर हो जाऊँ।

12. डाक्टर महमूद ख़ालिदी , प्रोफ़ेसर यरमूक युनिवर्सिटी (जार्डन)

मौसूफ़ तहरीर करते हैं: रसूले अकरम (स) की वफ़ात के बाद निज़ामे ख़िलाफ़त एक नये अंदाज़ में ज़ाहिर हुआ... और उसमें बाबे इज्तेहाद खुल गया , ख़िलाफ़त के ऊपर आम लोगों के दरमियान बहस व जदल और इज्तेहाद का बाज़ार गर्म हो गया और इस सिलसिले में बहुत से नज़रियात पैदा हो गये। ख़िलाफ़त की शक्ल व सूरत और उसको इख़्तियार करने या जिस घर से ख़लीफ़ का इंतेख़ाब हो , उन तमाम चीज़ों के सिलसिले में मुख़्तलिफ़ राय और नज़रियात सामने आये और उस इख़्तिलाफ़ के नतीजे में ख़िलाफ़त की मुख़्तलिफ़ शक्लें सामने आयीं....।

क़ारिये मोहतरम , यह तमाम मुश्किलात और इख़्तिलाफ़ात नतीजा हैं अहले बैत और उनके सरे फ़ेहरिस्त हज़रत अली (अ) के मुतअल्लिक़ अहादिस के इंकार का।

(अल उसूलुल फ़िकरिया लिस सक़ाफ़तिल इस्लामिया जिल्द 3 पेज 16)

13. मुस्तफ़ा राफ़ेई , पेरिस युनिवर्सिटी में हुक़ूक़ के माहिर

मौसूफ़ बनी उमय्या के ज़माने के सिलसिले में कहते हैं: तुम्हारे ज़माने में एक इंक़ेलाब आया बल्कि तुमने ख़िलाफ़त को निज़ामे हुकूमत के उनवान से देखा। ऐसी हुकूमत जो अपने पहले जौहर और दीनी अमल के उनवान से दूर हो गई है। इस ज़माने में ख़लीफ़ा अपने लिये महल बनाता था और तकिया लगाकर ख़िदमत गुज़ार रखता था.... उसी ज़माने में मुआविया ने नई सुन्नतों का इज़ाफ़ा किया और उनको अमली जामा पहनाने के लिये हर हीला व मक्कारी से काम लिया ताकि आम मुसलमान उस निज़ाम का पैरवी करें।

(मुस्तफ़ा राफ़ेई , अल इस्लाम निज़ामे इँसानी पेज 30)

14. मुहम्मद रशीद रज़ा

मौसूफ़ अपनी तफ़सीर अलमनार में तहरीर करते हैं: किस तरह बनी उमय्या ने इस इस्लामी हुकूमत को गंदा कर दिया , उसके क़वायद व उसूल को पामाल कर दिया और मुसलमानों के लिये ज़ाती हुकूमत बना कर रख दिया , लिहाज़ा जिस शख़्स ने उस पर अमल किया और जो शख़्स रोज़े क़यामत तक उस पर अमल करेगा उसका गुनाह उन्ही की गर्दन पर है।

तफ़सीरे अल मनार जिल्द 5 पेज 188

क़ारेईने केराम , यह तमाम मुश्किलात ख़लीफ़ ए मुसलेमीन की ख़िलाफ़त व इमामत पर इलाही हुक्म के इंकार करने की वजह पेश आई। अगर मुसलमान रसूले अकरम (स) के बाद होने वाले हक़ीक़ी आईम्मा के बारे में अहादीस का इंकार न करते तो फिर ऐसे मसायब व मुश्किलात में गिरफ़्तार न होते। यह ऐसी मुसीबतें हैं जिनका इक़रार ख़ुद अहले सुन्नत के उलामा ने किया है और वह उनके तौर व तरीक़े से शिकायत करते हैं लेकिन अहले बैत (अ) की पैरवी करने वाला शिया मुआशरा उन मुसीबतों में मुब्तला नही है।


जश्ने ग़दीर मुनअक़िद करना

मख़्सूस तारिख़ों और ख़ास हालातों में मुसलमानों के दरमियान अंजाम पाने वाले आमाल में से एक काम मख़्सूस दिनों में जश्न व महफ़िल मुनअक़िद करना है और यह काम इस रोज़ की अहमियत और अज़मत की वजह से होता है , चाहे रसूले अकरम (स) की बेसत का दिन हो या किसी इमाम की विलादत का दिन या कोई मख़्सूस मुनासेबत।

मुसलमान इन मुक़द्दस दिनों में मासूम (अ) से मानवी और रूहानी फ़ैज़ हासिल करने के लिये इस तरह की महाफ़िल मुनअक़िद करते हैं और उनके ज़रिये अज़ीम बरकतें हासिल करते हैं लेकिन अफ़सोस कि हमेशा से बह्हाबी लोग इन बरकतों से महरूम रहने के अलावा दूसरों को भी इस तरह की महफ़िल मुनअक़िद करने से रोकते हैं और इस तरीक़े से दुश्मनाने इस्लाम के मक़ासिद को पूरा करते हैं क्योकि दुश्मन कभी भी यह नही चाहता कि मुसलमान अपने मुक़द्देसात से दोबारा अहद व पैमान करते रहें। लिहाज़ा मौज़ू की अहमियत के पेशे नज़र इस सिलसिले में तहक़ीक़ करते हैं।

वह्हबियों के फ़तवे

इब्ने तैमिया का कहना है: दिनों की दूसरी क़िस्म वह दिन हैं जिनमें बाज़ वाक़ेयात रुनूमा हुए हैं जैसे 18 ज़िल हिज्जा और जैसा कि बाज़ लोग इस दिन ईद मनाते हैं जबकि कोई अस्ल और बुनियाद नही है , क्योकि असहाब और अहले बैत वग़ैरह ने इस दिन इस दिन को ईद क़रार नही दिया है , क्योकि ईज उस शरई हुक्म को कहा जाता है जिसकी पैरवी का हुक्म हुआ हो , न यह कि बिदअत ईजाद की जाये। यह काम ईसाईयों की तरह है जिन्होने हज़रत ईसा (अ) से मुताअल्लिक़ बाज़ वाक़ेयात के दिन ईद मनाना शुरु कर दिया।

शेख़ अब्दुल अज़ीज़ बिन बाज़ का कहना है: यह जायज़ नही है कि पैग़म्बर या किसी ग़ैर के लिये कोई महफ़िल मुनअक़िद की जाये और यह काम दीन में पैदा होने वाली बिदअतों में से है , क्योकि पैग़म्बरे अकरम (स) और ख़ुलाफ़ा ए राशेदीन नीज़ असहाब व ताबेईन ने ऐसा कोई काम अंजाम नही दिया है।

3. वहाबियत फ़तवा कमेटी के दायमी मिम्बरों का कहना है: यह जायज़ नही है कि अंबिया व सालेहीन के सोग में या उनके उनके रोज़े पैदाइश पर उनकी याद को ज़िन्दा करने के लिये महफ़िल व मजलिस मुनअक़िद की जाये और इसी तरह अलम उठाना और उनकी क़ब्रों पर शमा जलाना (भी जायज़ नही है) क्योकि यह तमाम चीज़ें दीन में ईजाद की गई बिदअतें और शिक्र है , पैग़म्बरे अकरम (स) गुज़श्ता अंबिया और सालेहीन ने इस तरह का कोई काम अंजाम नही दिया है। इस तरह शुरु की तीन सदियों में जो कि इस्लाम की बेहतरीन सदियाँ कहलाती हैं उनमें किसी सहाबी या मुसलमानों के इमाम ने यह अमल अँजान नही दिया है।

4. इब्ने फ़ौज़ान का कहना है: इस ज़माने में बहुत सी बिदअतें पैदा हो गई हैं जैसे माहे रबीउल अव्वल में पैग़म्बरे अकरम (स) की विलादत की मुनासेबत पर महफ़िल वग़ैरह मुनअक़िद करना।

5. इब्ने उसीमैन का कहना है: अपने बच्चो को रोज़े विलादत पर जश्न मनाना चूँकि दुश्मनाने ख़ुदा से मुशाबेहत रखता है और मुसलमानों के यहाँ यह काम नही होता था बल्कि ग़ैरों से हमारे यहाँ आया है , पैग़म्बरे अकरम (स) ने फ़रमाया: जो शख़्स किसी (दूसरी) क़ौम के मुशाबेह होगा वह उसी क़ौम में श़ुमार किया जायेगा।

(इक़तेज़ाउल सिरातिल मुस्तक़ीम पेज 293, 295)

(मजमू ए फ़तावा व मक़ालाते मुतनव्व)

(अल लुजनतुल दायमा मिन फ़तवा रक़्म 1774)

(अल बिदअत , इब्ने फ़ौज़ान पेज 25, 27)

(फ़तावा मनारुल इस्लाम जिल्द 1 पेज 43)

जश्ने मुनअक़िद करना मुहब्बत की निशानी है

मुहब्बत व दुश्मनी दो ऐसी चीज़े हैं जो इँसान के अँदर क़रार दी गयीं हैं जिसको इँसान की चाहत और नफ़रत से ताबीर किया जाता है।

वुजूबे मुहब्बत

अक़्ली और मंक़ूला दलीलों से मालूम होता है कि बाज़ हज़रात से मुहब्बत इंसान पर वाजिब है जैसे:

1. ख़ुदा वंदे आलम की मुहब्बत

ख़ुदा वंदे आलम उन हज़रात में सरे फ़ेररिस्त है जिनकी मुहब्बत उसूलन वाजिब है क्योकि ख़ुदा वंदे आलम तमाम सिफ़ात कमाल व जमाल का मज़हर है और तमाम मौजूदात उसी के मोहताज हैं लिहाज़ा ख़ुदा वंदे आलम ने क़ुरआने मजीद में इरशाद फ़रमाया:

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِنَّ كَثِيرًا مِّنَ الْأَحْبَارِ وَالرُّهْبَانِ لَيَأْكُلُونَ أَمْوَالَ النَّاسِ بِالْبَاطِلِ وَيَصُدُّونَ عَن سَبِيلِ اللَّـهِ ۗ وَالَّذِينَ يَكْنِزُونَ الذَّهَبَ وَالْفِضَّةَ وَلَا يُنفِقُونَهَا فِي سَبِيلِ اللَّـهِ فَبَشِّرْهُم بِعَذَابٍ أَلِيمٍ

(सूर ए तौबा आयत 24)

पैग़म्बर , आप कह दीजिये कि अगर तुम्हारे बाप , दादा , औलाद , बिरादरान , अज़वाज , अशीरा व क़बीला और वह अमवाल जिन्हे तुमने जमा किया और वह तिजारत जिसके ख़सारे की तरफ़ से तुम फ़िक्र मंद रहते हो और वह मकानात जिन्हे पसंद करते हो , तुम्हारी निगाह में अल्लाह , उसके रसूल और राहे ख़ुदा में जिहाद से ज़्यादा महबूब हैं तो वक़्त का इंतेजार करो यहाँ तक कि अम्रे इलाही आ जाये और अल्लाह फ़ासिक़ क़ौम की हिदायत नही करता है।

2. रसूले अकरम (स) की मुहब्बत

ख़ुदा वंदे आलम की ख़ातिर रसूले अकरम (स) की मुहब्बत भी वाजिब है क्योकि आँ हज़रत (स) वास्ता ए फ़ैज़ हैं लिहाज़ा मज़कूरा आयत में ख़ुदा वंदे आलम के साथ आँ हज़रत (स) का भी ज़िक्र आया है और आपकी मुहब्बत का हुक्म हुआ है।

पैग़म्बरे अकरम (स) ने फ़रमाया:

(मुसतदरके हाकिम जिल्द 3 पेज 149)

ख़ुदा वंदे आलम से इस वजह से मुहब्बत करों कि वह तुम्हे रोज़ी देती है और मुझ से ख़ुदा की वजह से मुहब्बत करो।

आँ हज़रत (स) के फ़ज़ायल व मनाक़िब और कमालात भी उन असबाब में से हैं जिनकी वजह से इंसान उनकी तरफ़ मायल हो जाता है और आँ हज़रत (स) की मुहब्बत उसके दिल में पैदा हो जाती है।

3. अहले बैते पैग़म्बर (स)

जिन हज़रात की मुहब्बत वाजिब है उनमें से अहले बैते रसूले अकरम (स) भी हैं क्योकि उनके फ़ज़ायल व मनाक़िब और कमालात और वास्ता ए फ़ैज़ होने से कतए नज़र पैग़म्बरे अकरम (स) ने उनसे मुहब्बत का हुक्म दिया है , चुँनाचे गुज़श्ता हदीस (के ज़िम्न) में आँ हज़रत (स) इरशाद फ़रमाते हैं:

(और मेरे अहले बैत से मेरी मुहब्बत की वजह से मुहब्बत रखो।)

किन वुजूहात की बेना पर आले रसूल (स) से मुहब्बत की जाये ?

चूँकि पैग़म्बरे अकरम (स) की मुहब्बत वाजिब है , दर्ज जै़ल वुजूहात की बेना पर आले रसूले (स) से भी मुहब्बत वाजिब व लाज़िम है:

1. इन हज़रात का रिश्ता साहिबे रिसालत हज़रत मुहम्मद (स) से है लिहाज़ा रसूले अकरम (स) ने फ़रमाया: रोज़े क़यामत के दिन हर नसब और सबब ख़त्म हो जायेगा सिवाए मेरे नसब और सबब के।

2. अहले बैत (अ) ख़ुदा और रसूल (स) के महबूब हैं जैसा कि हदीसे इल्म और हदीसे तैर में इस बात की तरफ़ इशारा हो चुका है।

3. अहले बैत (अ) की मुहब्बत , अजरे रिसालत है जैसा कि ख़ुदा वंदे आलम क़ुरआने मजीद में इरशाद फ़रमाता है:

قُل لَّا أَسْأَلُكُمْ عَلَيْهِ أَجْرًا إِلَّا الْمَوَدَّةَ فِي الْقُرْبَىٰ

(सूर ए शूरा आयत 23)

आप कह दिजीये कि मैं तुम से इस तबलीग़ का कोई अजर नही चाहता सिवाए इसके कि मेरे क़राबत दारों से मुहब्बत करो

4. रोज़े क़यामत आले रसूले (स) की मुहब्बत के बारे में सवाल किया जायेगा

(وَقِفُوهُمْ ۖ إِنَّهُم مَّسْئُولُونَ )

सिब्ते बिन जौज़ी ने मुजाहिद से यूँ नक़्ल किया है: क़यामत के दिन हज़रत अली (अ) की मुहब्बत के बारे में सवाल किया जायेगा। )

(सूर ए साफ़ात आयत 24)

(तज़किरतुल ख़वास पेज 10)

5. आले रसूल और मासूमीन (अ) , क़ुरआने मजीद के हम पल्ला हैं जैसा कि पैग़म्बरे अकरम (स) ने हदीस सक़लैन में इस चीज़ की तरफ़ इशारा किया है....हदीस

6. अहले बैत (अ) की मुहब्बत ईमान की शर्त है क्योकि शिया व सुन्नी किताबों में सही अहादीस बयान हुई हैं कि पैग़म्बरे अकरम (स) ने हज़रत अली (अ) से ख़िताब करते हु फ़रमाया: या अली , तुम्हे कोई दोस्त नही रखेगा मगर जो मोमिन होगा और तुम्हे कोई दुश्मन नही रखेगा मगर यह कि वह मुनाफ़िक़ होगा।

7. अहले बैत (अ) कश्ती ए निजात हैं जैसा कि पैग़म्बरे अकरम (स) ने फ़रमाया:

مَثَلُ أهلِ بَيتي مَثَلُ سَفينَةِ نُوحٍ؛ مَن رَكِبَها نَجا و مَن تَخَلّفَ عَنها غَرِقَ

मेरे अहले बैत की मिसाल कश्ती ए नूह जैसी है कि जो उसमे सवार हो गया वह निजात पा गया और जिसने रू गरदानी की वह ग़र्क़ हो गया।

8. अहले बैत (अ) की मुहब्बत , आमाल और इबादात क़बूल होने के लिये ज़रूरी है क्योकि पैग़म्बरे अकरम (स) ने हज़रत अली (अ) से फ़रमाया: अगर मेरी उम्मत इतने रोज़े रखे कि उनकी कमर झुक जाये और पेट अंदर चले जायें और इतनी नमाज़ पढ़े कि रस्सी के मानिन्द हो जायें लेकिन अगर आप से दुश्मनी रखे तो ख़ुदा वंदे आलम उनको आतिशे जहन्नम में डाल देगा।

(तारिख़े दमिश्क़ जिल्द 12 पेज 143)

9. अहले बैत (अ) अहले ज़मीन के लिये अमान हैं जैसा कि पैग़म्बरे अकरम (स) ने फ़रमाया: मेरे अहले बैत अहले ज़मीन के लिये अमान हैं।

क़ारेईने केराम , यह नुक्ता क़ाबिले तवज्जो है कि मुहब्बत एक मोटर की तरह है जो इंसान की की ताक़त को तहरीक करता है ताकि वह महबूब की तरफ़ और उसकी इक़्तेदा में परवाज़ करने के लिये तैयार हो जायें।

इन तमाम मतालिब के पेशे नज़र यह नतीजा हासिल होता है कि जश्न व महफ़िल मुनअक़िद करना अपने महबूब की मुहब्बत के जलवे हैं। क्योकि दूसरी तरफ हम जानते हैं कि लोगों में मुहब्बत के लिहाज़ से मुख़्तलिफ़ दर्जे होते हैं , दूसरी तरफ़ मुहब्बत का असर सिर्फ़ नफ़सियाती नही है बल्कि उसके असरात बाहर की दुनिया में भी दिखाई देते हैं। अलबत्ता उसका बेरुनी असर भी सिर्फ़ महबूब की इताअत और पैरवी में मुनहसिर नही है।जैसा कि बाज़ लोग कहते हैं) बल्कि उसके लिये दूसरे आसार और जलवे भी होते हैं कि मुहब्बत की दलीलों का इतलाक़ उन सबको शामिल होता है मगर यह कि दूसरी दलीलों से टकराव हो जाये। जैसे महबूब की मुहब्बत में किसी को क़त्ल करना।

इँसान की ज़िन्दगी में मुहब्बत के जलवे कुछ इस तरह होते हैं:

1. इताअत व पैरवी

2. महबूब की ज़ियारत

3. महबूब की ताज़ीम व तकरीम

4. महबूब की ज़रुरतों को पूरा करना

5. महबूब का दिफ़ाअ

6. महबूब के फ़िराक़ में हुज़्न व मलाल जैसे जनाबे याक़ूब (अ) फ़िरोक़े युसुफ़ में ग़म ज़दा थे।

7. महबूब की निशानियों की हिफ़ाज़त

8. महबूब की नस्ल और औलाद का ऐहतेराम

9. महबूब से मुताअल्लिक़ हर चीज़ को बोसा देना

10. महबूब के रोज़े पैदाईश पर जश्न व महफ़िल का मुनअक़िद करना

याद मनाना क़ुरआन की रौशनी में

क़ुरआने मजीद की आयात में ग़ौर व फिक्र करने से मालूम होता है कि किसी चीज़ की याद मनाना उन कामों में से एक है जिसकी ताईद क़ुरआने मजीद ने की है बल्कि उसकी तरफ़ रग़बत दिलाई है:

हज

1.हज से मुतअल्लिक़ आयात से यह नतीजा हासिल होता है कि उनमें से अकसर व बीशतर गुज़श्ता अंबिया व औलिया ए इलाही की याद मनाना है , जिसके चंद नमूने आपकी ख़िदमत में पेश किये जाते हैं:

अलिफ़. मक़ामे इब्रहीम (अ)

وَإِذْ جَعَلْنَا الْبَيْتَ مَثَابَةً لِّلنَّاسِ وَأَمْنًا وَاتَّخِذُوا مِن مَّقَامِ إِبْرَاهِيمَ مُصَلًّى

(सूर ए बक़रा आयत 125)

और मक़ामें इब्राहीम को मुसल्ला बनाओ।

ख़ुदा वंदे आलम हुक्म फ़रमाता है कि जनाबे इब्राहीम (अ) के क़दमों की जगह को मुतबर्रक मानें और उसको मुसल्ला क़रार दें ताकि जनाबे इब्राहीम (अ) और ख़ान ए काबा की तामीर की याद बाक़ी रहे।

बुख़ारी ने अपनी सही में नक़्ल किया है कि जिस वक़्त ख़ान ए काबा की तामीर के लिये जनाबे इस्माईल (अ) पत्थर उठा कर लाते और जनाबे इब्राहीम (अ) तामीर करते जाते थे यहाँ तक कि इमारत ऊची हो गई तो फिर एक (बड़ा) पत्थर लाया गया और जनाबे इब्राहीम (अ) उस पर खड़ो होकर तामीर करने लगे और इसी तरह उन दोनो ने ख़ान ए काबा की इमारत को मुकम्मल कर दिया।

(सही बुख़ारी किताबुल अंबिया जिल्द 2 पेज 158)

ब. सफ़ा व मरवा

ख़ुदा वंदे आलम क़ुरआने मजीद में इरशाद फ़रमाता है:

إِنَّ الصَّفَا وَالْمَرْوَةَ مِن شَعَآئِرِ اللّهِ فَمَنْ حَجَّ الْبَيْتَ أَوِ اعْتَمَرَ فَلاَ جُنَاحَ عَلَيْهِ أَن يَطَّوَّفَ بِهِمَا وَمَن تَطَوَّعَ خَيْراً فَإِنَّ اللّهَ شَاكِرٌ عَلِيمٌ

बेशक सफ़ा व मरवा दोनों पहाड़ियाँ अल्लाह की निशानियों में से हैं लिहाज़ा जो शख़्स भी हज या उमरा करे उस के लिये कोई हरज नही है कि उन दोनो पहाड़ियों का तवाफ़ करे।

ख़ुदा वंदे आलम ने सफ़ा व मरवा के दरमियान सई को हज के अरकान में से क़रार दिया है ताकि सफ़ा व मरवा के दरमियान जनाबे हाजरा की कोशिश की याद ज़िन्दा रहे।

बुख़ारी में नक़्ल हुआ है: जब जनाबे इब्राहीम (अ) ने हाजरा और अपने बेटे इस्माईल को मक्के मे छोड़ दिया और (कुछ मुद्दत बाद) पानी ख़त्म हो गया और दोनो पर प्यास का ग़लबा हुआ , इस्माईल प्यास की शिद्दत की वजह से तड़पने लगे , उस वक़्त जनाबे हाजरा सफ़ा पहाड़ी पर गयीं ताकि अपन बेटे के लिये पानी तलाश करें और वहाँ किसी को देखें और उससे पानी तलब करें लेकिन मायूस होककर सफ़ा से नीचे उतरीं और तेज़ी से मरवा की तरफ़ चलीं , पहाड़ी पर चढ़ी ताकि कोई ऐसा मिल जाये जिससे पानी तलब कर सकें लेकिन वहाँ भी को न मिला , यहाँ तक कि इसी तरह सात बार सफ़ा व मरवा के दरमियान कोशिश की। इब्ने अब्बास पैग़म्बरे अकरम (स) से रिवायत नक़्ल करते हैं कि आपने फ़रमाया: इसी वजह से हज करने वाले सात बार सफ़ा व मरवा के दरमियान सई करते हैं।

जीम. क़ुर्बानी

ख़ुदा वंदे आलम का इरशाद है:

فَبَشَّرْنَاهُ بِغُلَامٍ حَلِيمٍ فَلَمَّا بَلَغَ مَعَهُ السَّعْيَ قَالَ يَا بُنَيَّ إِنِّي أَرَى فِي الْمَنَامِ أَنِّي أَذْبَحُكَ فَانظُرْ مَاذَا تَرَى قَالَ يَا أَبَتِ افْعَلْ مَا تُؤْمَرُ سَتَجِدُنِي إِن شَاءَ اللَّـهُ مِنَ الصَّابِرِينَ فَلَمَّا أَسْلَمَا وَتَلَّهُ لِلْجَبِينِ وَنَادَيْنَاهُ أَن يَا إِبْرَاهِيمُ قَدْ صَدَّقْتَ الرُّؤْيَا إِنَّا كَذَلِكَ نَجْزِي الْمُحْسِنِينَ إِنَّ هَـذَا لَهُوَ الْبَلَاءُ الْمُبِينُ وَفَدَيْنَاهُ بِذِبْحٍ عَظِيمٍ

(सूर ए साफ़ात आयत 101 से 107)

फिर हमने उन्हे एक नेक दिल फ़रजंद की बशारत दी। फिर जब वह फ़रजंद उनके साथ दौड़ धूप करने के क़ाबिल हो गया तो उन्होने कहा: बेटा मैं ख़्वाब में देख रहा हूँ कि मैं तुम्हे ज़िब्ह कर रहा हूँ , अब तुम बताओ कि तुम्हारा क्या ख़्याल है ? फ़रंज़ंद ने जवाब दिया कि बाबा जो आपको हुक्म दिया जा रहा है आप उस पर अमल करें , इंशा अल्लाह आप मुझे सब्र करने वालों में से पायेगें। फिर जब दोनो ने सरे तसलीम ख़म कर दिया और बाप ने बेटे को माथे के बल लिटा दिया और हमने आवाज़ दी कि ऐ इब्राहीम तुमने अपने ख़्वाब सच कर दिखाया , हम इसी तरह अमल करने वालों को जज़ा देते हैं। बेशक यह बड़ा खुला हुआ इम्तेहान है और हमने उसका बदला एक अज़ीम क़ुर्बानी को क़रार दिया है।

ख़ुदा वंदे आलम ने उस फ़िदाकारी और क़ुर्बानी की वजह से हाजियों को हुक्म दिया कि मेना के मैदान में हज़रत इब्राहीम (अ) की पैरवी करें और उस अज़ीम अमल और इम्तेहाने बुज़ुर्ग की याद मनाने के लिये गोसफ़ंद ज़िब्ह करें।

द. रमिये जमरात

अहमद बिन हंबल और तियालसी अपनी मुसनद में रसूले ख़ुदा (स) से यूँ रिवायत करते हैं: जब जिबरईल जनाबे इब्राहीम को जमर ए उक़बा की तरफ़ लेकर चले , उस मौक़े पर शैतान उनके पास ज़ाहिर हुआ तो जनाबे इब्राहीम (अ) ने सात पत्थर फेंके कि शैतान की चीख निकल गई , उसके बाद जनाबे इब्राहीम (अ) जमर ए वुसता के पास आये तो वहाँ भी शैतान ज़ाहिर हुआ , आपने सात पत्थर मारे जिससे शैतान की चीख निकल गई , उसके बाद जनाबे इब्राहीम (अ) जमर ए क़सवा के पास आये एक बार फिर शैतान ज़ाहिर हुआ और जनाबे इब्राहीम (अ) ने सात पत्थर मारे यहाँ तक कि शैतान की चीख़ निकल गई।

(मुसनदे अहमद जिल्द 1 पेज 306, मुसनदे अत तियालसी हदीस 2697)

क़ारेईने केराम , आपने मुशाहेदा फ़रमाया कि ख़ुदा वंदे आलम ने किस तरह इस याद को हाजियों के लिये वाजिब क़रार दिया ताकि इस वाक़ेया की याद को ताज़ा रखें।

2. ख़ुदा वंदे आलम इरशाद फ़रमाता है:

ذَلِكَ وَمَن يُعَظِّمْ شَعَائِرَ اللَّـهِ فَإِنَّهَا مِن تَقْوَى الْقُلُوبِ

(सूर ए हज आयत 32)

और यह हमारा फ़ैसला है और जो भी अल्लाह की निशानियों की ताज़ीम करेगा यह ताज़ीम उसके दिल के तक़वे का नतीजा होगी।

इस आय ए शरीफ़ा के ज़रिये इस्तिदलाल यह है कि शआयर शईर की जमा है जिसके मअना निशानी हैं और शआयरे इलाही यानी ख़ुदा और दीन की निशानियाँ , लिहाज़ा हर वह अमल जो लोगों को ख़ुदा और दीन की तरफ़ रहनुमाई करे वह शआयरे इलाही में शामिल है जिनमें से जश्ने ग़दीर का मुन्क़िद करना है जिसमें मोमिनीन , वली ए ख़ुदा (हज़रत अली (अ) के फ़ज़ायल व कमालात को सुन कर ख़ुदा से नज़दीक होते हैं।

3.ख़ुदा वंदे आलम इरशाद फ़रमाता है:

وَذَكِّرْهُم بِأَيَّامِ اللَّـهِ

और उन्हे ख़ुदाई दिनों की याद दिलायें।

(सूर इब्राहीम आयत 5)

मतलब यह है कि अय्यामुल्लाह बातिल पर हक़ के ग़लबे और हक़ के ज़ाहिर होने के दिन हैं जिनमें से एक रोज़े ग़दीरे है क्योकि उस रोज़ रसूले अकरम (स) ने अपना जानशीन मुअय्यन किया है ताकि आपके अहदाफ़ व मक़ासिद को आगे बढ़ा सकें।

4.ख़ुदा वंदे आलम का इरशाद फ़रमाता है:

قُل لَّا أَسْأَلُكُمْ عَلَيْهِ أَجْرًا إِلَّا الْمَوَدَّةَ فِي الْقُرْبَى

आप कह दिजिये कि मैं तुम से इस तबलीग़े रिसालत का कोई अज्र नही चाहता सिवाए इस के कि मेरे क़राबत दारों से मुहब्बत करो।

(सूर ए शूरा आयत 23)

इस तरह हम जश्ने ग़दीर मुनअक़िद करके अजरे रिसालत का एक हिस्सा अदा करते हैं।

5.ख़ुदा वंदे आलम इरशाद फ़रमाता है:

क़सम है एक पहर चढ़े दिन की और क़सम है रात की जब वह चीज़ों की पर्दापोशी कर ले।

وَالضُّحَى وَاللَّيْلِ إِذَا سَجَى

(सूर ए ज़ुहा आयत 1,2)

हलबी अपनी किताब सीरये हलबिया में तहरीर करते हैं: ख़ुदा वंदे आलम इस आयत मे पैग़म्बरे अकरम (स) की शबे विलादत की क़सम खाता है। बाज़ लोगों का कहना है कि इससे मुराद शबे असरा है लेकिन दोनो की क़सम मुराद होने में भी कोई हरज नही है।

(सीरये हलबिया जिल्द 1 पेज 58)

रौशन है कि किसी चीज़ की क़सम खाना उसकी अहमियत की निशानी है लिहाज़ा क़सम के ज़रिये उसकी याद ज़हनों में ताज़ा की जा सकती है ताकि मोमिनीन उसका ऐहतेराम करें। इसी तरह जश्ने ग़दीर भी है।

6.ख़ुदा वंदे आलम पैग़म्बरे अकरम (स) की नुसरत व मदद और ताज़ीम करने वालों की ताईद के सिलसिले में फ़रमाता है:

فَالَّذِينَ آمَنُوا بِهِ وَعَزَّرُوهُ وَنَصَرُوهُ وَاتَّبَعُوا النُّورَ الَّذِي أُنزِلَ مَعَهُ أُولَـئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ

पस जो लोग ईमान लाये उनका ऐहतेराम किया और उनकी इमदाद किया और उनके नूर का इत्तेबा किया जो उनके साथ नाज़िल हुआ है वही दर हक़ीक़त फ़लाह याफ़्ता औक कामयाब हैं।

(सूर ए आराफ़ आयात 157)

इस आयत में ख़ुदा वंदे आलम पैग़म्बरे अकरम (स) की नुसरत व मदद और ताज़ीम करने वालों की तारीफ़ करते है और उनको निजात की बशारत देता है लिहाज़ा पैग़म्बरे अकरम (स) के रोज़े विलादत या रोज़े मबअस नीज़ रोज़े ग़दीरे ख़ुम जो आँ हज़रत (स) के जानशीनी का दिन है यह सब आँ हज़रत (स) की ताज़ीम व तकरीम नही तो और क्या है ?

7.ख़ुदा वंदे आलम पैग़म्बरे अकरम (स) की शान में इरशाद फ़रमाता है:

فَإِذَا فَرَغْتَ فَانصَبْ

लिहाज़ा जब आप फ़ारिग़ हो जायें तो नस्ब कर दें।

(सूर ए इनशेराह आयत 7)

लिहाज़ा जश्ने ग़दीर मनाना लोगों में रसूले अकरम (स) और आपके जानशीन की निसबत लोगों की फ़िक्री सतह में बढ़ावा देना और ख़ुद आँ हज़रत (स) अज़मत को बयान करना है।

लेकिन अगर कोई यह ऐतेराज़ करे कि मज़कूरा आय ए शरीफ़ा के पेशे नज़र आँ हज़रत (स) की नुसरत , ताज़ीम और तकरीम ख़ुदा वंदे आलम से मख़्सूस है तो हम जवाब में अर्ज़ करते है कि ख़ुदा वंदे आलम एक दूसरी जगह पर इरशाद फ़रमाता है:

وَيَنصُرَكَ اللَّـهُ نَصْرًا عَزِيزًا

और ज़बरदस्त तरीक़े से आपकी मदद करे

(सूर ए फ़तह आयत 3)

क्या कोई इस सिलसिले में गुमान करे कि पैग़म्बरे अकरम (स) की नुसरत व मदद अल्लाह से मख़्सूस है और इस सिलसिले में हमारा कोई फ़र्ज़ नही है ?

8.इसी तरह ख़ुदा वंदे आलम एक दूसरी जगह इरशाद फऱमाता है:

وَكُلًّا نَّقُصُّ عَلَيْكَ مِنْ أَنبَاءِ الرُّسُلِ مَا نُثَبِّتُ بِهِ فُؤَادَكَ وَجَاءَكَ فِي هَـذِهِ الْحَقُّ وَمَوْعِظَةٌ وَذِكْرَى لِلْمُؤْمِنِينَ

और हम गुज़श्ता रसूलों के वाक़ेयात आपसे बयान कर रहे हैं कि उनके ज़रिये आपके दिल को मज़बूत रखें।

(सूर ए हूद आयत 120)

इस आयत से यह बात अच्छी तरह से मालूम हो जाती है कि पैग़म्बरे अकरम (स) के लिये गुज़श्ता अंबिया के वाक़ेयात बयान करने की हिकमते आँ हज़रत (स) के दिल को सुकून पहुचाना है ताकि आप मुश्किलात और परेशानियों में साबित क़दम रहें और इसमें कोई शक नही है कि उस जम़ाने में साबित क़दम रहने की कितनी ज़रुरत थी लिहाज़ा इस बात की ज़रुरत है कि मख़्सूस दिनों जैसे रोज़े विलादते आँ हज़रत (स) या रोज़े मबअस या ईदे ग़दीर के मौक़े पर मोमिनीन को एक मुक़द्दस जगह पर जमा किया जाये और उनको उस रोज़ की फ़ज़ीलत से आशना किया जाये , नीज़ पैग़म्बरे अकरम (स) की सीरत उनके सामने बयान की जाये ताकि मोमिनीन के दिलों में दीने इलाही की निस्बत मुहब्बत में इज़ाफ़ा हो।


जश्न और याद मनाना , हदीस की रौशनी में

मुतअद्दिद रिवायात की रौशनी में इस तरह के जश्न और महफ़िल के जवाज़ को साबित किया जा सकता है:

1. मुस्लिम ने इब्ने क़तादा से नक़्ल किया है कि जब रसूले अकरम (स) से यह सवाल किया गया कि पीर के दिन रोज़ा रखना मुसतहब क्यों हैं ? तो आपने फ़रमाया: उसकी वजह यह है कि मैं उस रोज़ पैदा हुआ हूँ और उसी रोज़ मुझ पर क़ुरआने मजीद नाज़िल हुआ है।

2. मुस्लिम इब्ने अब्बास से रिवायत करते है कि जब रसूले अकरम (स) मदीने में वारिद हुए तो देखा कि यहूदी रोज़े आशूरा को रोज़ा रखते हैं , उनसे इस काम की वजह मालूम की गई तो उन्होने कहा: यह वह रोज़ा है जिसमें ख़ुदा वंदे आलम ने बनी इस्राईल को फ़िरऔन पर कामयाबी दी है लिहाज़ा हम उस दिन का ऐहतेराम करते हैं , उस मौक़े रक पैग़म्बरे अकरम (स) ने फ़रमाया: हम इस अमल के ज़्यादा मुसतहिक़ है। लिहाज़ा आपने हुक्म दिया कि रोज़े आशूर का रोज़ा रखा करें।

अल्लामा सुयूती की नक़्ल के मुताबिक़ इब्ने हजर असक़लानी इस हदीस के ज़रिये पैग़म्बरे अकरम (स) के रोज़े विलादत पर जश्न मनाने पर इस्तिदलाल करते हैं।

(सही मुस्लिम जिल्द 2 पेज 819)

(सही मुस्लिम हदीस 130, सही बुख़ारी जिल्द 7 पेज 215)

(अलहावी लिल फ़तावा जिल्द 1 पेज 196)

3. हाफ़िज़ बिन नासिरुद्दीन दमिश्क़ी रिवायत करते हैं: सही तरीक़े से बयान हुआ है कि पीर के रोज़ अबू लहब ने अज़ाब मे कमी हो जाती थी क्योकि उसने पैग़म्बरे अकरम (स) को रोज़े विलादत पर ख़ुश हो कर अपनी कनीज़ सौबिया को आज़ाद कर दिया था।

क़ारेई मोहतरम , गुज़श्ता रिवायत के ज़रिये ब तरीक़े औला यह नतीजा हासिल होता है कि आँ हज़रत (स) के रोज़े विलादत पर जश्न मनाना और आँ हज़रत (स) की याद मनाना जायज़ है।

4. बैहक़ी , अनस बिन मालिक से यूँ रिवायत करते हैं: पैग़म्बरे अकरम (स) ने अपनी नुबूवत के बाद अपने तरफ़ से एक गोसफ़ंद का अक़ीक़ा किया , जबकि रिवायात में भी वारिद हुआ है कि अबू तालिब ने आपकी विलादत के साँतवें दिन आपके अक़ीक़े में एक गोसफ़ंद ज़िब्ह किया था।

सुयूती कहते हैं: दूसरी मर्तबा अक़ीक़ा नही किया जा सकता लिहाज़ा पैग़म्बरे अकरम (स) के इस अमल को इस बात पर हम्ल करें कि आँ हजरत (स) ने इस चीज़ का शुक्रिया अदा करते हुए अक़ीक़ा किया कि मैं ख़ुदा वंदे आलम ने उनको ख़ल्क़ फ़रमाया और दोनो आलम के लिये रहमत बना कर भेजा , जैसा कि आँ हज़रत (स) ने ख़ुद अपने ऊपर दुरुद भेजे थे , इसी वजह से मुसतहब है कि हम भी ख़ुदा की बारगाह में शुक्रे इलाही को बजा लाने के लिये आपके रोज़े विलादत पर इजतेमाअ करें , खाना खिलाये और मिठाई तक़सीम करें जिनकी वजह से ख़ुदा की क़ुरबत हासिल होती है।

5. तिरमिज़ी ने पैग़म्बरे अकरम (स) से नक़्ल किया है कि आँ हज़रत (स) ने जुमे के दिन के रोज़े की फ़ज़ीलत के बारे में फ़रमाया: उस रोज़ जनाबे आदम (अ) ख़ल्क़ हुए हैं।

(मैरिदुस सादी फ़ी मौलिदिन नबी)

(अलहावी जिल्द 1 पेज 196)

(अलहावी जिल्द 1 पेज 196)

(सही तिरमिज़ी हदीस 491)

क़ारेईने मोहतरम , इन अहादीस से यह नतीजा हासिल होता है कि बाज़ दिन फ़ज़ीलत रखते हैं जिनमें ख़ास और मुबारक वाक़ेयात पेश आये हैं। लिहाज़ा उस रोज़ की तो बड़ी अहमियत होनी चाहिये जिसमें पैग़म्बरे अकरम (स) पैदा हुए या जिस रोज़ आपने (ग़दीरे ख़ुम) में अपना जानशीन मुअय्यन किया।

जश्न मनाने के फ़वायद

जश्न व महफ़िल मुनअक़िद करने और औलिया ए इलाही की याद मनाने में बहुत सी बरकतें और फ़वायद हैं जिनमें से चंद चीज़ों की तरफ़ इशारा किया जाता है:

1. इस तरह के जश्न व महफ़िल में मोमिनीन अपने दीन व मज़हब की बुनियाद रखने वालों से दोबारा अहद व पैमान बाँधते हैं कि उनकी राह को आगे बढ़ायेगें और उनके अंदर यह अहसास पैदा होता है कि हमें अपने अज़ीम इमाम और मुक़तदा की राह पर कदम बढ़ाना चाहिये।

2. उनसे मुहब्बत के इज़हार और बातिनी राब्ते के ज़रिये उन हज़रात के मअनवी फ़ैज़ और बरकतों से बहरा मंद होना।

3. शिया उन महफ़िलों के ज़रिये दर हक़ीक़त अपने दुश्मनों को पैग़ाम देते है कि हमारे मौला व रहबर अली (अ) हैं। वह ज़ुल्मे सतीज़ और ज़ुल्म का मुक़ाबला करने वाले थे , वह अहकामे इलाही को नाफ़िज़ करने में किसी की रिआयत नही करते थे वग़ैरह वग़ैरह लिहाज़ा हम भी उसी रास्ते पर चलते हैं और उन्ही की पैरवी करते हैं।

4. हर साल उस रोज़ पैग़म्बरे अकरम (स) और औलिया ए इलाही को याद करके उनकी निस्बत मुहब्बत में इज़ाफ़ा होता है।

5. इन महफ़िलों में उन हज़रात के बाज़ फ़ज़ायल व कमालात की तौज़ीह व तशरीह की जाती है और मोमिनीन उनकी पैरवी करते हुए ख़ुदा वंदे आलम से नज़दीक होते हैं।

6. ख़ुशी व मुसर्रत के इज़हार से पैग़म्बरे अकरम (स) और औलिया ए इलाही के ईमान का इज़हार करके उसको मुसतहकम करते हैं।

7. जश्न व महफ़िल के आख़िर में मिठाई या खाना खिलाने से सवाबे इतआम से बहरा मंद होते हैं और बाज़ ग़रीबों को इस तरह के जश्न से माद्दी फ़ायदा होता है।

8. इस तरह की महफ़िलों में ख़ुदा की याद ज़िन्दा होती है और क़ुरआनी आयात की तिलावत होती है।

9. ऐसे मवाक़े पर मोमिनीन पैग़म्बरे अकरम (स) पर बहुत ज़्यादा दुरुद व सलाम भेजते हैं।

10. ऐसे मवाक़े पर लोगों को ख़ुदा और उसके अहकाम की तरफ़ दावत देने का बेहतरीन मौक़ा होता है।

इस्लाम में ईदे ग़दीर की अहमियत

जिस चीज़ ने वाक़ेया ए ग़दीर के जावेदाना क़रार दिया और उसकी हक़ीक़त को साबित किया है वह उस रोज़ का ईद क़रार पाना है। रोज़े ग़दीर ईद शुमार होती है और उसके शब व रोज़ में इबादत , ख़ुशू व ख़ुज़ू , जश्न और ग़रीबों के साथ नेकी नीज़ ख़ानदान में आमद व रफ़्त होती है और मोमिनीन इस जश्न में अच्छे कपड़े पहनते और ज़ीनत करते हैं।

जब मोमिनीन ऐसे कामों की तरफ़ राग़िब हों तो उनके असबाब की तरफ़ की तरफ़ मुतवज्जेह होकर उसके रावियों की तहक़ीक़ करते हैं और उस वाक़ेया को नक़्ल करते हैं , अशआऱ पढ़ते हैं , जिसकी वजह से हर साल जवान नस्ल की मालूमात में इज़ाफ़ा होता है और हमेशा उस वाक़ेया की सनद और उससे मुताअल्लिक़ अहादीस पढ़ी जाती है , जिसकी बेना पर वह हमेशगी बन जाती हैं। रोज़े ग़दीर से मुतअल्लिक़ दो तरह की बहस की जा सकती है:

1. शियों से मख़्सूस न होना

यह ईद सिर्फ़ शियों से मख़्सूस नही है। अगर चे उसकी निस्बत शिया ख़ास अहमियत रखते हैं , मुसलमानों के दीगर फ़िरके भी ईदे ग़दीर में शियों के साथ शरीक हैं , ग़ैर शिया उलामा ने भी उस रोज़ की फ़ज़ीलत और पैग़म्बरे अकरम (स) की तरफ़ से हज़रत अली (अ) के मक़ामे विलायत पर फ़ायज़ होने की वजह से ईद क़रार देने के सिलसिले में गुफ़्तुगू की है क्योकि यह दिन हज़रत अली (अ) के चाहने वालों के लिये ख़ुशी व मुसर्रत का दिन है चाहे आपको आँ हज़रत (स) का बिला फ़स्ल ख़लीफ़ा मानते हों या चौथा ख़लीफ़ा।

बैरनी आसारुल बाक़िया में रोज़े ग़दीर को उन दिनों में शुमार करते हैं जिसको मुसलमानों ने ईद क़रार दिया है।

इब्ने तलहा शाफ़ेई कहते हैं: हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अ) ने अपने अशआर में रोज़े ग़दीरे ख़ुम का ज़िक्र किया है और उस रोज़ को ईद शुमार किया है क्योकि उस रोज़ में रसूले इस्लाम (स) ने आपको अपना जानशीन मंसूब किया और तमाम मख़लूक़ात पर फ़ज़ीलत दी है।

(अल आसारुल बाक़िया फ़िल क़ुरुनिल ख़ालिया पेज 334)

(मतालिबुस सुऊल पेज 53)

नीज़ मौसूफ़ कहते हैं: लफ़्ज़े मौला का जो मअना भी रसूले अकरम (स) के लिये साबित करना मुमकिन हो वही हज़रत अली (अ) के लिये भी मुअय्यन है और यह एक बुलंद मर्तबा , अज़ीम मंज़िलत , बुलंद दर्जा और रफ़ीअ मक़ाम है जो पैग़म्बरे अकरम (स) ने हज़रत अली (अ) से मख़्सूस किया , लिहाज़ा औलिया ए इलाही के नज़दीक यह दिन ईद और मुसर्रत का रोज़ क़रार पाया है।

तारिख़ी कुतुब से यह नतीजा हासिल होता है कि उम्मते इस्लामिया मशरिक़ व मग़रिब में उस दिन के ईद होने पर मुत्तफ़िक़ है , मिस्री , मग़रबी और इराक़ी (ईरानी , हिन्दी) उस रोज़ की अज़मत के क़ायल है और उनके नज़दीक रोज़े ग़दीर नमाज़ , दुआ , खुतबा और मदह सराई का मुअय्यन दिन है और उस रोज़ के ईद होने पर उन लोगों का इत्तेफ़ाक़ है।

इब्ने ख़ल्लक़ान कहत हैं: पैग़म्बरे अकरम (स) हुज्जतुल विदा में मक्के से वापसी में जब ग़दीरे ख़ुम पहुचे , अपने और अली के दरमियान अक़्दे उख़ूवत पढ़ा और उनको अपने लिये मूसा के नज़दीक हारुन की तरह क़रार दिया और फ़रमाया: ख़ुदाया , जो उनकी विलायत को क़बूल करे उसको दोस्त रख और जो उनकी विलायत के तहत न आये और उनसे दुश्मनी करे उसको दुश्मन रख और उनके नासिरों का मदद गार हो जा और उनको ज़लील करने वालों को रुसवा कर दे और शिया उस रोज़ को ख़ास अहमियत देते हैं।

मसऊदी ने इब्ने ख़ल्लक़ान की गुफ़्तुगू की ताईद की है , चुँनाचे मौसूफ़ कहते हैं: औलादे अली (अ) और उनके शिया उस रोज़ की याद मनाते हैं।

सआलबी , शबे ग़दीर को उम्मते इस्लामिया के नज़दीक मशहूर शबों में शुमार करते हुए कहते हैं: यह वह शब है जिसकी कल में पैग़म्बरे अकरम (स) ने ग़दीरे ख़ुम में ऊटों के कजावों के मिम्बर पर एक ख़ुतबा दिया और फ़रमाया:

और शियों ने उस शब को मोहतरम शुमार किया है और वह इस रात में इबादत और शब बेदारी करते हैं।

(मतालिबुस सुऊल पेज 56)

(वफ़यातुल आयान इब्ने ख़लक़ान जिल्द 1 पेज 60 व जिल्द 2 पेज 223)

(वफ़यातुल आयान इब्ने ख़लक़ान जिल्द 1 पेज 60 व जिल्द 2 पेज 223 )

(अत तंबीह वल इशराफ़ मसऊदी पेज 221)

(सेमारुल क़ुलूब सआलबी पेज 511)

2. ईदे ग़दीर की इब्तेदा

तारीख़ की वरक़ गरदानी से यह मालूम होता है कि इस अज़ीम ईद की इब्तेदा पैग़म्बरे अकरम (स) के ज़माने से हुई है। इसकी शुरुआत उस वक़्त हुईजब पैग़म्बरे अकरम (स) ने ग़दीर के सहरा में ख़ुदा वंदे आलम की जानिब से हज़रत अली (अ) को इमामत व विलायत के लिये मंसूब किया। जिसकी बेना पर उस रोज़ हर मोमिन शाद व मसरुर हो गया और हज़रत अली (अ) के पास आकर मुबारक बाद पेश की। मुबारक बाद पेश करने वालों में उमर व अबू बक्र भी हैं जिनकी तरफ़ पहले इशारा किया जा चुका है और इस वाक़ेया को अहम क़रार देते हुए और उस मुबारक बाद की वजह से हस्सान बिन साबित और क़ैस बिन साद बिन ओबाद ए अंसारी वग़ैरह ने इस वाक़ेया को अपने अशआर में बयान किया है।

ग़दीर के पैग़ामात

उस ज़माने में बाज़ अफ़राद ग़दीर के पैग़मात को इस्लामी मुआशरे में नाफ़िज़ करना चाहते थे। लिहा़ज़ा मुनासिब है कि इस मौज़ू की अच्छी तरह से तहक़ीक़ की जाये कि ग़दीरे ख़ुम के पैग़ामात क्या क्या हैं ? क्या उसके पैग़ामात रसूले अकरम (स) की हयाते मुबारक के बाद के ज़माने से मख़्सूस हैं या रोज़े तक उन पर अमल किया जा सकता है ? अब हम यहाँ पर ग़दीरे पैग़ाम और नुकात की तरफ़ इशारा करते हैं जिनकी याद दहानी जश्न और महफ़िल के मौक़े पर कराना ज़रुरी है:

1. हर पैग़म्बर के बाद एक ऐसी मासूम शख़्सियत को होना ज़रुरी है जो उसके रास्ते को आगे बढ़ाये और उसके अग़राज़ व मक़ासिद को लोगों तक पहुचाये और कम से कम दीन व शरीयत के अरकान और मजमूए की पासदारी करे जैसा कि रसूले अकरम (स) ने अपने बाद के लिये जानशीन मुअय्यन किया और हमारे ज़माने में ऐसी शख़्सियत हज़रत इमाम मेहदी अलैहिस्सलाम हैं।

2. अंबिया (अ) का जानशीन ख़ुदा वंदे आलम की तरफ़ मंसूब होना चाहिये जिनका तआरुफ़ पैग़म्बर के ज़रिये होता है जैसा कि पैग़म्बरे अकरम (स) ने अपने बाद के लिये अपना जानशीन मुअय्यन किया , क्योकि मक़ामे इमामत एक इलाही मंसब है और हर इमाम ख़ुदा वंदे की तरफ़ से ख़ास ता आम तरीक़े से मंसूब होता है।

3. ग़दीर के पैग़ामात में से एक मसअला रहबरी और उसके सिफ़ात व ख़ुसूसियात का मसअला है , हर कस न नाकस इस्लामी मुआशरे में पैग़म्बरे अकरम (स) का जानशीन नही हो सकता , रहबर हज़रत अली (अ) की तरह हो जो पैग़म्बरे अकरम (स) का रास्ते पर हो और आपके अहकाम व फ़रमान को नाफ़िज़ करे , लेकिन अगर कोई ऐसा न हो तो उसकी बैअत नही करना चाहिये , लिहाज़ा ग़दीर का मसअला इस्लाम के सियासी मसायल के साथ मुत्तहिद है।

चुँनाचे हम यमन में मुलाहिज़ा करते हैं कि चौथी सदी के वसत से जश्ने ग़दीर का मसअला पेश आया और हर साल अज़ीमुश शान तरीक़े पर यह जश्न मुनअक़िद होता रहा और मोमिनीन हर साल उस वाक़ेया की याद ताज़ा करते रहे और नबवी मुआशरे में रहबरी के शरायत से आशना होते रहे , अगरचे चंद साल से हुकूमते वक़्त उस जश्न के अहम फ़वायद और पैग़ामात की बेना पर उसमें आड़े आने लगी , यहाँ तक कि हर साल इस जश्न को मुनअक़िद करने की वजह से चंद लोग क़त्ल हो जाते हैं , लेकिन फिर भी मोमिनीन इस्लामी मुआशरे में इस जश्न की बरकतों और फ़वायद की वजह से इसको मुनअक़िद करने पर मुसम्मम हैं।

4. ग़दीर का एक हमेशगी पैग़ाम यह है कि पैग़म्बरे अकरम (स) के बाद इस्लामी मुआशरे का रहबर और नमूना हज़रत अली (अ) या उन जैसे आईम्मा ए मासूमीन में से हो। यह हज़रात हम पर विलायत व हाकिमियत रखते हैं , लिहाज़ा हमें चाहिये कि उन हज़रात की विलायत को क़बूल करते हुए उनकी बरकात से फ़ैज़याब हों।

5. ग़दीर और जश्ने ग़दीर , शिईयत की निशानी है और दर हक़ीक़त ग़दीर का वाक़ेया इस पैग़ाम का ऐलान करता है कि हक़ (हज़रत अली (अ) और आपकी औलाद की महवरियत में है) के साथ अहद व पैमान करें ता कि कामयाबी हासिल हो जाये।

6. वाक़ेय ए ग़दीर से एक पैग़ाम यह भी मिलता है कि इंसान को हक़ व हकी़क़त के पहचानने के लिये हमेशा कोशिश करना चाहिये और हक़ बयान करने में कोताही से काम नही लेना चाहिये , क्योकि पैग़म्बरे अकरम (स) अगरचे जानते थे कि उनकी वफ़ात के बाद उनकी वसीयत पर अमल नही किया जायेगा , लेकिन लोगों पर हुज्जत तमाम कर दी और किसी भी मौक़े पर मख़ूससन हज्जतुल विदा में हक़ बयान करने में कोताही नही की।

7. रोज़े क़यामत तक बाक़ी रहने वाला ग़दीर का एक पैग़ाम अहले बैत (अ) की दीनी मरजईयत है , इसी वजह से पैग़म्बरे अकरम (स) ने उन्ही दिनों में हदीस सक़लैन को बयान किया और मुसलमानों को अपने मासूम अहले बैत से शरीयत व दीनी अहकाम हासिल करने की रहनुमाई फ़रमाई।

8. ग़दीर का एक पैग़ाम यह है कि बाज़ मवाक़े पर मसलहत की ख़ातिर और अहम मसलहत की वजह से मुहिम मसलहत को मनज़र अंदाज़ किया जा सकता है और उसको अहम मसलहत पर क़ुर्बान किया जा सकता है। हज़रत अली (अ) हालाकि ख़ुदा वंदे आलम की तरफ़ से और रसूले अकरम (स) के ज़रिये इस्लामी मुआशरे की रहबरी और मक़ामे ख़िलाफ़त पर मंसूब हो चुके थे , लेकिन जब आपने देखा कि अगर मैं अपना हक़ लेने के लिये उठता हूँ तो क़त्ल व ग़ारत और जंग का बाज़ार गर्म हो जायेगा और यह इस्लाम और मुसलमानों की मसलहत में नही है तो आपने सिर्फ़ वअज़ व नसीहत , इतमामे हुज्जत और अपनी मज़लूमीयत के इज़हार को काफ़ा समझा ताकि इस्लाम महफ़ूज रहे , क्योकि हज़रत अली (अ) अगर उशके अलावा करते जो आपने किया तो फिर इस्लाम और मुसलमानों के लिये एक दर्दनाक हादेसा पेश आता जिसकी तलाफ़ी मुमकिन नही थी , लिहाज़ा यह रोज़ क़यामत तक उम्मते इस्लामिया के लिये एक अज़ीम सबक़ है कि कभी कभी अहम मसलहत के लिये मुहिम मसलहत को छोड़ा जा सकता है।

9. इकमाले दीन , इतमामे नेमत और हक़ व हक़ीक़त के बयान औप लोगों पर इतमामे हुज्जत करने से ख़ुदा वंदे आलम की रिज़ायत हासिल होती है जैसा कि आय ए शरीफ़ ए इकमाल में इशारा हो चुका है।

10. तबलीग़ और हक़ के बयान के लिये आम ऐलान किया जाये और छुप कर काम न किया जाये जैसा कि पैग़म्बरे अकरम (स) ने हुज्जतुल विदा में विलायत का ऐलान किया और लोगों के मुतफ़र्रिक़ होने से पहले मला ए आम में विलायत को पहुचा दिया।

11. ख़िलाफ़त , जानशीनी और उम्मते इस्लामिया की सही रहबरी का मसअला तमाम मासयल में सरे फैररिस्त है और कभी भी इसको तर्क नही करना चाहिये जैसा कि रसूले अकरम (स) हालाकि मदीने में ख़तरनाक बीमारी फैल गई थी और बहुत से लोगों को ज़मीन गीर कर दिया था लेकिन आपने विलायत के पहुचाने की ख़ातिर इस मुश्किल पर तवज्जो नही की और आपने सफ़र का आग़ाज़ किया और इस सफ़र में अपने बाद के लिये जानशीनी और विलायत के मसअले को लोगों के सामने बयान किया।

12. इस्लामी मुआशरे में सही रहबरी का मसअला रुहे इस्लामी और शरीयत की जान की तरह है कि अगर इस मसअले को बयान न किया जाये तो तो फिर इस्लामी मुआशरे के सुतून दरहम बरहम हो जायेगें , लिहाज़ा ख़ुदा वंदे आलम ने अपने रसूल (स) से ख़िताब करते हुए फ़रमाया:

وَإِن لَّمْ تَفْعَلْ فَمَا بَلَّغْتَ رِسَالَتَهُ

और अगर आप ने यह न किया तो गोया उसके पैग़ाम को नही पहुचाया।

(सूर ए मायदा आयत 67)


वहाबियों के ऐतेराज़ात की तहक़ीक़

आयात , रिवायात और मुसलमानों की सीरत से जश्न व महफ़िल के ज़ायज़ बल्कि रुजहान व मुसतहब होने की दलीलों के बावजूद भी वह्हाबी लोग मुसलमानों के इस अमल का मुक़ाबला करते हैं और बेजा ऐतेराज़ात की बेना पर इस मुक़द्दस अमल में मानेअ होने की कोशिश करते हैं। अब हम यहाँ पर पहले उनके ऐतेराज़ात बयान करते हैं और फिर उनके जवाबात पेश करते हैं:

पहला ऐतेराज़:

किसी की याद मनाने के लिये कोई प्रोग्राम करना ग़ैरे ख़ुदा की इबादत है।

जवाब:

यह बात अपनी जगह पर साबित हो चुकी है कि इबादत का उन्सुरे मुक़व्विम (यानी जिस पर इबादत का इतलाक़ किया जाता है) उसकी उलूहीयत या रूबूबीयत का ऐतेक़ाद है जिसकी ताज़ीम की जाये , लिहाज़ा अगर किसी की ताज़ीम व तकरीम उस उन्सुर से ख़ाली हो तो उसको इस्तेलाह में इबादत नही कहा जाता।

दूसरा ऐतेराज़:

इस तरह के प्रोग्राम में ऐसे काम होते हैं जो ग़ालेबन हराम हैं जैसे औरतों और मर्दों का एक साथ जमा होना या मौसीक़ी के साथ नज़्म व क़सीदा पढ़ना।

जवाब:

गुनाह किसा भी ज़माने या किसी भी जगह हो हराम है , चाहे किसी प्रोग्राम में हो या उसेक अलावा , लेकिन हम एक ममदूह और पसंदीदा अमल को इस वजह से हराम नही कह सकते कि उसमें कभी कभी कोई गुनाह अंजाम पाता है , बल्कि हमें चाहिये कि हराम और गुनाह से रोक थाम की जाये।

(फ़तहुल मजीद बे शरहे अक़ीदतित तौहीद पेज 154,155 हाशिया में)

(अल मदख़ल , इब्नुल हाज जिल्द 2 पेज 2)

(अलहावी लिलफ़तावा , सुयूती जिल्द 1 पेज 19)

तीसरा ऐतेराज़:

पैग़ंम्बरे अकरम (स) ने फ़रमाया: अपने घरों को क़ब्र और मेरी क़ब्र को ईद क़रार न दो।इब्ने क़य्यिम ने इस हदीस के ज़रिये जश्न व महफ़िल की हुरमत पर इस्तिदलाल किया है।

जवाब:

अव्वल. दलील मुद्दआ से ख़ास है क्योकि रिवायत में सिर्फ़ क़ब्रे पैग़म्बर (स) की तरफ़ इशारा हुआ है न कि आम मका़मात की तरफ़।

दूसरे. इस की वजह शायद यह हो कि इँसान पैग़म्बरे अकरम (स) के हुज़ूर में इंसान को ख़ुज़ू व ख़ुशू के आलम में होना चाहिये और यह मसअला पैग़म्बरे अकरम (स) की कब्रे मुनव्वर के पास ख़ुशी व मुसर्रत के साथ हम आहंग नही है लेकिन इस चीज़ से कोई मुमानेअत नही पाई जाती कि दूसरे मक़मात पर भी ख़ुशी व मुसर्रत का इज़हार न किया जाये।

सुबकी कहते हैं: इस हदीस के मअना में यह ऐहतेमाल है कि मेरी कब्र को रोज़ ईद की तरह क़रार न दो बल्कि मेरी कब्र पर ज़ियारत , सलाम व दुआ पढ़ो।

(मुसमदे अहमद जिल्द 2 पेज 246)

(हाशिय ए औनिल मअबूद जिल्द 6 पेज 32)

(कशफ़ुल इरतियाब पेज 449)

चौथा ऐतेराज़:

इस तरह के प्रोग्राम में नज़्म व क़सीदा ख़्वानी में ईसाईयों से मुशाबेहत पाई जाती है।

(इक़तेज़ाउस सिरात पेज 294)

जवाब:

अव्वल. मुशाबेहत का तअल्लुक़ इरादे से है यानी जब इंसान इस शबाहत का क़स्द करता है तब ही उस पर उस मुशाबेहत का हुक्म लागू होता है। अब हम सवाल करते हैं कि क्या कोई मुसलमान इस तरह की महफ़िल में कुफ़्फ़ार और ईसाईयों से शबाहत का क़स्द करता है ? हरगिज़ ऐसा नही है।

बुख़ारी अपनी सही किताब मग़ाज़ी में बाब ग़ज़व ए औहद में नक़्ल करते हैं: अबू सुफ़यान ने मुशरेकीन को तहरीत करते हुए यह नारा लगाया: ज़िन्दाबाद बुते हुबल , पैग़म्बरे अकरम (स) ने फ़रमाया: तुम भी उसका जवाब दो , जवाब दिया हम क्या कहें ? तो आँ हज़रत (स) ने फ़रमाया: तुम कहो अबू सुफ़यान ने मुशरेकीन को हमले की तहरीक के लिये दूसरा नारा लगाया: हमारे पास उज़्ज़ा है और तुम्हारे पास उज़्ज़ा नही है। पैग़म्बरे अकरम (स) ने फ़रमाया: तुम भी जवाब दो , असहाब ने अर्ज़ किया हम जवाब में क्या कहें ? तो आँ हज़रत (स) ने फ़रमाया कि कहो:

(यानी अल्लाह हमारा मौला है लेकिन तुम्हारा कोई मौला नही है।)

(सही बुख़ारी हदीस 4043, अल बिदाया वन निहाया जिल्द 4 पेज 28)

क्या कोई वह्हाबियों की तरह पैग़म्बरे अकरम (स) से यह कह सकता है कि या रसूलल्लाह , आपका यह अमल काफ़िरों से मुशाबेह है लिहाज़ा जायज़ नही है ? क्या ख़ुदा वंदे आलम ने क़ुरआने मजीद में नही फ़रमाया है:

آمَنُوا كُتِبَ عَلَيْكُمُ الصِّيَامُ كَمَا كُتِبَ عَلَى الَّذِينَ مِن قَبْلِكُمْ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ

उसी तरह तुम पर रोज़े लिख दिये गये हैं जिस तरह तुम्हारे से पहले वालों पर लिख दिये गये थे।

(सूर ए बकरह आयत 183)

शेख़ शलतूत ने अपनी किताब अल फ़तावा में इस सवाल के जवाब में लिखते है , जिसमें उनसे सवाल किया गया था कि मग़रिबी मुमालिक से आने वाले टोपों का पहनना कैसा है ? तो उन्होने जवाब दिया: यह कहना सही नही है कि यह टोपे ग़ैर मुस्लिम और ग़ैर इस्लामी शेआर में से हैं बल्कि उनको मुसलमान व ग़ैर मुसलमान सभी पहनते हैं और जब मुसलमान इस तरह के टोपों को पहनते हैं तो ग़ैर मुसलमानों को दीन से मुशाबेहत का इरादा नही होता बल्कि वह गर्मी या सर्दी से बचने के लिये पहनते हैं। लिहाज़ा उनके पहनने में कोई हरज नही है।

(अल फ़तावा , शलतूत पेज 88)

दूसरे. किसी अमल के जायज़ होने में क़ुरआने मजीद और सुन्नते रसूल (स) से मुताबिक़त होना मेयार होता है चाहे वह दूसरे से मुशाबेह हो या न हो और हमने जश्न व महफ़िल को ख़ास व आम दलीलों से साबित कर दिया है।

तीसरे. जैसा कि शेख शलतूत के कलाम से मालूम होता है कि ईसाईयों की मुशाबेहत से मक़सूद उनके कामों में मुशाबेहत हैं जैसे सलीब और नाक़ूस बजाना न कि हर अमल में मुशाबेहत मुराद है।

पाचवाँ ऐतेराज़:

सलफ़े सालेह ने इस अमल को अंजाम नही दिया है।

जवाब:

अव्वल , उसूल में यह बात साबित हो चुकी है कि मासूम का कोई काम न करना , उस काम के हराम होने पर दलील नही है , बल्कि सिर्फ़ किसी काम का न करना , उस काम के वाजिब न होने और किसी फ़ेअल का अंजाम देना उसके हराम न होने पर दलालत करता है। लिहाज़ा किसी अमल का सिर्फ़ अंजाम न देना उसके हराम होने पर दलील नही है।

दूसरे , इब्ने तैमिया के ज़माने से पहले मुसलमानों का अमल और सीरत इस तरह की महफ़िल क़ायम करने पर थी और अहले सुन्नत इस बात के क़ायल हैं कि इजमाअ हुज्जत है।

तीसरे , जैसा कि इब्ने तैमिया के कलाम में बयान हुआ है: रसूले अकरम (स) की निस्बत सलफ़े सालेह की मुहब्बत ज़्यादा थी और अगर यह अमल जायज़ होता तो वह भी अंजाम देते , यह कलाम हदीसे नबवी के बर ख़िलाफ़ है क्योकि रसूले अकरम (स) ने अपने असहाब से खिताब करते हुए फ़रमाया है: बेशक अनक़रीब एक ऐसी क़ौम आने वाली है जिनकी मुहब्बत मेरी निस्बत तुम लोगों से ज़्यादा होगी।

(मजमउज़ ज़वायद जिल्द 10 पेज 66, क़ंज़ुल उम्माल जिल्द 2 पेज 374)

छठा ऐतेराज़:

किसी मख़सूस दिन को ख़ुशी व मुसर्रत से मख़सूस करना बिदअत है।

जवाब:

अव्वल , जैसा कि यह बात साबित हो चुकी है कि कभी कभी कोई मक़ाम , मज़रूफ़ के लिहाज़ से शरफ़ पैदा कर लेता है , इसी तरह ज़माने में बाज़ ज़माने उन मे मख़सूस अमल की वजह से बा अहमियत बन जाते हैं जैसे शबे क़द्र , चुनाचे क़ुरआने मजीद में इरशाद होता है:

انا انزلناه في ليلة مباركة

हमने क़ुरआने को एक मुबारक शब में नाज़िल किया है।

लिहाज़ा अगर हम रोज़े विलादते पैग़म्बरे इस्लाम (स) या ईदे ग़दीर के मौक़े पर कोई जश्न मनाते हैं तो इस वजह से कि यह मुबारक शब है।

दूसरे , कभी कभी अहकामे शरीयत किसी आम उनवान के तहत किसी चीज़ से मुतअल्लिक़ होते हैं जिनकी ततबीक़ मुकल्लफ़ के ज़िम्मे होती है जैसे ग़रीबों और फ़क़ीरों की मदद करना एक आम हुक्म है लेकिन उसके मिसदाक़ को मुनतबिक़ करना हमारी ज़िम्मेदारी है कि ग़रीब को किस चीज़ की ज़रूरत है या हम उसको अंजाम दे सकते हैं या नही ? यह काम ख़ुद हमारा है। यहाँ भी वक़्त को मुनतबिक़ करना मुकल्लफ़ पर छोड़ा गया है ताकि जब भी मुनासिब वक़्त देखे मुनतबिक़ कर दे।

अल हम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन , व लहुश शुक्रो अला हाज़न नेअमा

रब्बना तक़ब्बल मिन्ना इन्नका अनतस समीऊल अलीम

इक़बाल हैदर हैदरी

इतमामे तर्जुमा 13 रजबुल मुरज्जब 1427 हिजरी ब रोज़े शंबा मुताबिक़ 8 अगस्त 2006

हिन्दी टाइप

सैयद एजाज़ हुसैन मूसवी

(2008)


फेहरिस्त

Contents

ग़दीर और वहदते इस्लामी 1

1. वहदत की ह़कीक़त 2

2. हक़ीकी इमाम पर ही वहदत मुमकिन है 8

(अ) हक़ की तरफ़ रग़बत) 18

ब. हक़ का इक़रार 24

3. दीनी मरजअ का इंतेख़ाब करना 43

5. इंसानी ज़िन्दगी पर ग़दीर का असर 46

दलील व बुरहान के साथ मज़हब का इंतेख़ाब 53

अंधी तक़लीद 54

इल्मे गैब , रिवायात की रौशनी में 59

पैग़म्बरे अकरम (स) के सामने तीन रास्ते 67

पहले तरीक़ ए कार के तरफ़दार 68

पहले तरीक़ ए कार पर होने वाले ऐतेराज़ 69

दूसरे तरीक़ ए कार पर ऐतेराज़ 80

ब. हज़रत अली (अ) की अफ़ज़लियत पर दलालत करने वाली अहादीस 89

1. इमाम अली (अ) , पैग़म्बरे अकरम (स) के भाई 89

2. इमाम अली (अ) और मौलूदे काबा 91

3- इमाम अली (अ) और तरबीयते इलाही 91

5- इमाम अली (अ) सबसे पहले मोमिन 94

6. इमाम अली (अ) ख़ुदा वंदे आलम के नज़दीक मख़लूक़ में सबसे ज़्यादा महबूब 95

7. अली औऱ पैग़म्बर (स) एक नूर से 96

8. इमाम अली (अ) सबसे बड़े ज़ाहिद 96

9. इमाम अली (अ) सहाबा मे सबसे ज़्यादा शुजाअ व बहादुर 96

10. इमाम अली (अ) सहाबा में सबसे बड़े आलिम 98

ब. इमाम अली (अ) की आलमीयत का इक़रार सहाबा की ज़बानी 99

स. तमाम उलूम का मर्कज़ इमाम अली (अ) 100

11. हज़रत अली (अ) ज़माने के बुत शिकन 101

अ. तरबीयती तैयारी 103

ब. आपकी इमामत व विलायत पर बयान 111

स. अमली तदबीरें 111

1. रोज़े ग़दीर इमाम अली (अ) के हाथों को बुलंद करना 112

2. लश्करे ओसामा को रवाना करना 115

3. वसीयत लिखने का हुक्म 119

उमर ने वसीयत नामा लिखे जाने में रुकावट क्यों की ? 123

हदीसे ग़दीर 126

वाकेय ए ग़दीर 126

वाक़ेय ए ग़दीर 135

गद़ीर की ज़ुग़राफ़ियाई हैसियत 135

हदीसे ग़दीर के सहाबा रावी 136

हदीसे ग़दीर को नक़्ल करने वाले ताबेईन 145

दूसरी सदी में हदीसे ग़दीर के रावी 147

तीसरी सदी में हदीसे ग़दीर के रावी 148

चौथी सदी में हदीसे ग़दीर के रावी 148

पाँचवी सदी में हदीसे ग़दीर के रावी 149

छठी सदी में हदीसे ग़दीर के रावी 150

सातवी सदी में हदीसे ग़दीर के रावी 151

आठवीं सदी में हदीसे ग़दीर के रावी 152

नवीं सदी में हदीसे ग़दीर के रावी 153

दसवीं सदी में हदीसे ग़दीर के रावी 154

गवारहवीं सदी में हदीसे ग़दीर के रावी 154

बारहवीं सदी में हदीसे ग़दीर के रावी 155

तेरहवीं सदी में हदीसे ग़दीर के रावी 155

चौदहवीं सदी में हदीसे ग़दीर के रावी 156

हदीसे ग़दीर का तवातुर 157

हदीसे ग़दीर के तवातुर का इक़रार करने वाले उलामा 157

हदीसे तहनीयत 170

हदीसे तहनीयत के अहले सुन्नत रावी 171

मुवल्लेफ़ीने हदीसे ग़दीर 175

हदीसे ग़दीर की दलादत 178

हदीसे ग़दीर को छिपाने वाले 200

ऐहतेजाजात बे हदीसे ग़दीर 205

अ. रोज़े शूरा 206

ब. ख़िलाफ़ते उस्मान के ज़माने में 208

(स) कूफ़े के मजमे में) 212

गवाही देने वाले हज़रात 218

ल. जंगे जमल में ऐहतेजाज 220

ह. कूफ़े में हदीसे सवारान 221

ल. जंगे सिफ़्फ़ीन में ऐहतेजाज 221

2. हदीसे ग़दीर के ज़रिये हज़रते ज़हरा (स) का ऐहतेजाज 222

3. हदीसे ग़दीरे ज़रिये दीगर हज़रात का ऐहतेजाज 223

ऐतेराज़ात की तहक़ीक़ 226

2. हदीसे ग़दीर की सेहत में लोगों के दरमियान इख़्तिलाफ़ है 230

बे. मुतकल्लेमीन के बयानात 233

जीम. अहले लुग़त का बयान 233

लफ़्ज़े मौला की अस्ल 234

4. मुहब्बत में औला और सज़ावार होना 236

5. उस्मान के बाद हज़रत अमीर (अ) की इमामत 238

7. ताज़ीम में अवलवियत का ऐहतेमाल 240

8. सूरए आले इमरान की आयत 68 की मुख़ालिफ़त 242

9. ज़ैले हदीस 243

10. मौला के मअना महबूब के हैं। 246

11. हसने मुसन्ना की रिवायत से इस्तिदलाल 247

12. मुहब्बत के मअना मुराद लेने पर क़रीने का मौजूद होना 248

आयए बल्लिग़ 253

आयत के बारे में तहक़ीक़ 254

1. ज़ुहूरे फ़ेल , माज़ी में होता है 254

2. शर्त की अहमियत का बयान 255

3. पैग़म्बरे अकरम (स) को क्या ख़ौफ़ था ? 256

4. अन्नास से क्या मुराद है ? 256

5. इस्मत के मअना 257

रिवायात की छानबीन 257

1. अबू नईम इस्फ़हानी की रिवायत 258

सनद की छान बीन 258

2. इब्ने असाकर की रिवायत 260

सनद की छानबीन 261

3. वाहिदी की रिवायत 263

4. हिबरी की रिवायत 264

अहले बैत (अ) की निगाह में आयत का शाने नुज़ूल 265

हदीस की रिवायत करने वाले उलामा ए अहले सुन्नत 269

ऐतेराज़ात की छानबीन 275

1. आयत का नुज़ूल मदीने में पैग़म्बरे अकरम (स) की हिफ़ाज़त के लिये हुआ था। 275

2. मक्के में हिफ़ाज़त के सिलसिले में आयत का नुज़ूल 277

3. बनी अनमार से जंग के वक़्त आयत का नुज़ूल 278

4. रज्म व क़िसास के बारे में आयत का नुज़ूल 280

5. यहूद की मक्कारी के बारे में आयत का नुज़ूल 281

आय ए इकमाल 283

अहादीस की छानबीन 284

1. अबू नईम इस्फ़हानी की रिवायत 284

सनद की छानबीन 285

2 ख़तीबे बग़दादी की रिवायत 287

सनद की छानबीन 288

3. इब्ने असाकर की रिवायत 290

सनद की छान बीन 291

4. इब्ने असाकर की दूसरी रिवायत 292

सनद की छानबीन 292

आयत की शाने नुज़ूल के बारे में नज़रियात 296

1. अज़मते इस्लाम के ज़माने की तरफ़ इशारा 296

2. रोज़े अरफ़ा आयत का नुज़ूल 297

लफ़्ज़े अल यौम के इस्तेमालात 302

कुफ़्फ़ार का लालच 305

आयत में रोज़े ग़दीर के ख़ुसूसियात 311

नुज़ूले आयत की कैफ़ियत 312

1. शिया उलामा का नज़रिया 313

2. दूसरा ऐहतेमाल , अहले सुन्नत का नज़रिया 315

आय ए सअला सायलुन 317

वाक़ेय ए ग़दीर में आयत के नुज़ूल का इक़रार 318

1. अबू इसहाक़ सालबी 318

अबू इसहाक़ सालबी के मुख़्तसर हालात 320

सुफ़यान बिन ऐनिया के मुख़्तसर हालात 321

2. अबू उबैद हरवी (मुतवफ़्फ़ा 223) 322

3. शेखुल इस्लाम हम्मूई 323

4. हाकिम हसकानी 324

अब्दुर्हमान बिन असदी: 325

सुफ़यान बिन सईद: 326

अहले बैत (अ) और असहाब में हदीस के रावी 327

हदीस की दलालत 331

चंद ऐतेराज़ और उनके जवाब 331

1. सूर ए मआरिज मक्की है!! 332

2.ख़ुदा वंदे आलम पैग़म्बरे अकरम (स) के होते हुए अज़ाब नही करेगा!! 334

3. अगर ऐसा था तो मोजिज़ा होना चाहिये था!! 336

3. मुसलमान पर दुनिया में अज़ाब नही होता!! 337

इज्तेहादी तरीक़े के तरफ़दार 340

इमाम अली (अ) की मुख़ालिफ़त में मकतबे ख़ुलाफ़ा का बहाना 342

कम उम्र होना 350

ख़ुदा ने नही चाहा 351

दूसरा सबब: दुश्मनी व कीना 354

तीसरा सबब: इमाम अली (अ) की अदालत 357

चौथा सबब: बनी हाशिम से दुश्मनी 358

हदीसे ग़दीर के इंकार के नतायज 363

1. डाक्टर अहमद महमूद सुबही 364

2. जाहिज़ 366

3. इब्ने क़तीबा 366

4. मक़रेज़ी 367

5.इब्ने हज़्म ज़ाहिरी 367

2. अबुस सना आलूसी 368

3. डाक्टर ताहा हुसैन मिस्री 369

4. मशहूर मुवर्रिख़ सैयद अमीर अली हिन्दी 372

5. डाक्टर अहमद अमीन मिस्री 373

11. अब्बास महमूद अक़्क़ाद 376

12. डाक्टर महमूद ख़ालिदी , प्रोफ़ेसर यरमूक युनिवर्सिटी (जार्डन) 377

13. मुस्तफ़ा राफ़ेई , पेरिस युनिवर्सिटी में हुक़ूक़ के माहिर 377

14. मुहम्मद रशीद रज़ा 378

जश्ने ग़दीर मुनअक़िद करना 380

वह्हबियों के फ़तवे 381

वुजूबे मुहब्बत 383

1. ख़ुदा वंदे आलम की मुहब्बत 383

2. रसूले अकरम (स) की मुहब्बत 384

3. अहले बैते पैग़म्बर (स) 385

किन वुजूहात की बेना पर आले रसूल (स) से मुहब्बत की जाये ? 385

याद मनाना क़ुरआन की रौशनी में 389

हज 389

ब. सफ़ा व मरवा 390

जीम. क़ुर्बानी 391

द. रमिये जमरात 392

जश्न और याद मनाना , हदीस की रौशनी में 398

जश्न मनाने के फ़वायद 401

इस्लाम में ईदे ग़दीर की अहमियत 403

1. शियों से मख़्सूस न होना 403

2. ईदे ग़दीर की इब्तेदा 406

ग़दीर के पैग़ामात 407

वहाबियों के ऐतेराज़ात की तहक़ीक़ 412

फेहरिस्त 419