शियों के हौजे इल्मिया
अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क
अंदिलिस पर मुस्लमानों के क़बज़े के बाद शियों ने भी इस क्षेत्र की ओर प्रस्थान किया।लेकिन होज़ा ए शिया की स्थापना अंदिलिस मे उस समय हुई जब मिस्र मे शियाए फ़ातिमियो के शासन की स्थापना हुई और शिया विद्वानो ने मकतबे अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम के प्रचार के लिए अंदिलिस की यात्रा की। वह शिया विद्वान जिनका नाम होज़ा ए अंदिलिस मे मुख्य रूप से आता है वह अबुल अब्बास अहमद (ज.440 हिजरी क़मरी) हैं। उनके पिता अमाद महदवी तमीमी अंदिलिस मे शियो के महान मुफ़स्सिर ,नहवी (अर्बी भाषा के व्याकरण के ज्ञाता) व महान क़ारी थे।वह वास्तव मे मिस्र के महदवीया शहर के रहने वाले थे। यह शहर उस समय इस्माइलया शियो का गढ़ समझा जाता था। वह उन शिया विद्वानों मे से एक हैं जिन्होने अंदिलिस जाकर मकतबे अहलेबैत का प्रचार व प्रसार किया।उनके शिक्षण की पद्धति ,बोलने के अंदाज़ ,व समझाने के सुन्दर ढंग के कारण इल्मे कलाम व कुऑने करीम की तफ़्सीर के दर्स मे उनके शिषयो मे प्रति दिन वृद्धि होती गयी।शिया होने के कारण उनके मुखालीफ़ीन(विरोधीयो)ने अंदिलिस के शासक से शिकायत की कि यह जो तफ़्सीर का दर्स देते हैं वह तफ़्सीर इनकी स्वंय की नही है। वह किसी दूसरे की तफ़्सीर है और यह उसको अपनी कह कर ब्यान करते हैं। अंदिलिस के शासक ने वह तफ़्सीर उनसे लेली और कहा कि दूसरी तफ़्सीर लिख कर लाओ।उन्होने अत्तहसील फ़ी मुखतसःरूत्तफ़सील नामक एक नई तफ़्सीर लिखी जिसकी अनेकों इतिहासकारो ने प्रशंसा की है। इस होज़े के दूसरे विद्वान अबू अब्दुल्लाह मुहम्मद हैं जो इब्नुल अबार बलनसी अंदिलिसी के नाम से प्रसिद्ध हैं। वह अंदिलिस के बलंसा नामक शहर मे पैदा हुए और वहीं पर शिक्षा प्राप्त करके इज्तिहाद किया।और होज़े मे शिक्षण की ज़िम्मेदारी को संभाला। होज़े इल्मिया अंदिलिस के एक अन्य विद्वान शेख अबुल खत्ताब उमर (ज.633 हिजरी क़मरी) हैं।उनके पिता मुहम्मद जो कि इब्ने दहिया के नाम से प्रसिद्ध हैं। वह होज़ इल्मिया अंदिलिस के एक महान शिक्षक थे। चूँकि वहपिता की ओर से रसूल स. के सहाबी फ़रवा से और माता की ओर से जाफ़रे कज़्ज़ाब से सम्बंधित थे इस लिए अपने आपको ज़ुन्नस्बैन (अर्थात दो नस्बों वाला) लिखते थे। इन्होने हदीस को सुनने व प्राप्त करने के लिए खुरासान की यात्रा की। वह कई वर्षों तक क़ाहिरा के दारूल हदीस कामिलया मे शेखथुल हदीस रहे। इब्ने इमाद हंबली ने लिखा है कि वह हदीस के विद्वानो व अहले सुन्नत के बुज़ुर्गों को समंजस्य मे डाल देते थे।
(शज़रातुज़ ज़हब जिल्द 5 पेज 160)
इसी प्रकार एक अन्य विद्वान शेख अब्दुल्लाह (ज. 619 हिजरी क़मरी) इनके पिता अबू बकर बलंसी अंदलिसी पुत्र इब्नुल अबार हैं। शेख मुहम्मद एक शिया विद्वान व महान शिक्षक थे। वह बलंसिया की मस्जिदे सैय्यिदा मे क़ाज़ी अबुल हसन के उत्तराधिकारी के रूप मे नमाज़े जमाअत पढ़ाते थे। शिक्षण तथा फ़तवा देने के उत्तर दायित्व के साथ साथ बलंसिया के शियों का नेतृत्व भी उन्ही के काँधों पर था। सलीबी जंगों मे उन्होने एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक भूमिका निभाई जिसका वर्णन मुस्लमानो व ईसाइयों की किताबों मे उल्लेखित है।
होज़े इल्मिया बग़दाद शियों का एक पुराना होज़ा है। यह होज़ा हज़रत इमाम मुहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम के समय मे शुरू हुआ। इस होज़ ने कलाम व फ़िक़्ह के क्षेत्र मे महान कार्य किये अगर यह कहा जाय तो ग़लत न होगा कि बग़दाद का होज़ा शिया सम्प्रदाय का कलाम व फ़िक़्ह का सबसे पहला होज़ा है। बग़दाद के होज़े ने कलाम व फ़िक़्ह के विश्व विख्यात विद्वान पैदा किये। बग़दाद मे शिया शुरू से ही आबाद थे शियों का इतिहास सलमान फारसी के समय से मिलता है। अबुल इस्हाक़ नामक मुनज्जिम(नक्षत्रों का ज्ञान रखने वाला) जो कि शिया था वह पहला व्यक्ति था जिसने नक्षत्रों की चाल के अनुसार हिसाब लगा कर मंसूर को बग़दाद शहर बसाने के लिए सही समय बताया था।
(दायरतुल मुआरिफ़ तशय्यो जिल्द 4 पेज 26-27)
इस प्रकार बग़दाद की संस्कृति मे पहले दिन से ही शियों का काफ़ी योगदान रहा है।यह शहर शियों के एक केन्द्र के रूप मे जाना जाता था।
अब्बासी खलीफ़ा का व्यवहार बग़दाद के शियों के प्रति दूसरो स्थानों से भिन्न था। क्योकि यहाँ पर शिया स्वतन्त्रता पूर्वक जीवन यापन कर रहे थे इस लिए इस शहर का बहुत अधिक संस्कृतिक विकास हुआ। और जब से इस शहर मे शियों पर अत्याचार होने शुरू हुए और उनको क़त्ल किया जाने लगा इस शहर का संस्कृतिक पतन आरम्भ हो गया। आले बोया का शासन काल चौथी शताब्दी हिजरी व पाँचवी शताब्दी हिजरी का प्रथम चरण इतिहास मे शियों का सवर्ण युग समझा जाता है।
(1)काफ़ी
(2)मन ला यहज़रूल फ़क़ीह
(3)तहज़ीब
(4)इस्तबसार
इसी प्रकार इल्मे रिजाल की वह किताबें जो शिया प़ुक़्हा के समीप शरीअत का केन्द्र बिन्दु समझी जाती हैं। जैसे अलफ़हरिस्त ,रिजाले तूसी ,रिजाले नजाशी ,रिजाले कुशी इत्यादि इसी काल मे लिखी गईं। इस काल मे बारह इमामी शिया विचार धारा विकसित हुई और धीरे धीरे यह विचार धारा सबईया व ग़ुल्लात से अलग हो गई तथा मोतिज़ला ,वाक़फ़िया व अन्य विचार धाराऐं इस शिया विचार धारा मे विलीन हो गई।इस प्रकार एक विशाल और दृढ़ शिया विचारधारा का उदय हुआ।ग़ैबते सुग़रा के शुरू होने के बाद से चौथी शताब्दी हिजरी के अन्त तक शियों के होज़े इल्मिया पर अखबारी विद्वानो का क़बज़ा था। इस दौर मे महदवियत एक महत्वपूर्ण मसला बनी हुई थी। और दुशमन इसको आधार बना कर शियों पर तरह तरह के हमले कर रहे थे और इलज़ाम लगा रहे थे। आले बोया के शासन की स्थापना से इरान व इराक़ मे फ़लसफ़े व कलाम के बहुत से मदारिस स्थापित हुए।और इस प्रकार इल्मे कलाम के शिया विद्वान का एक विशाल समूह मैदान मे उतरा और उन्होने अखबारी लोगों से बहसो मुबाहिसा कर के और तसहीहुल ऐतिक़ाद ,मक़ाबीसुल अनवार फ़ी रद्दे अला अहलिल अखबार(शेख मुफ़ीद अलैहिर्रहमा) रिसाला फ़ी रद्दे अला असहाबिल अदद(शरीफ़ मुर्तज़ा) जैसी किताबें लिखीं। इससे अखबारी लोगों की पकड़ धीरे धीरे कम होती गई और इनके स्थान पर अहले अक़्ल और असहाबे इजतिहाद शक्तिसाली होते गये।
(मजल्ला होज़े 78 ,1375 हिजरी शम्सी ,146)
सन् 334 हिजरी क़मरी मे अलमुतीओ बिल्लाह अब्बासी के शासन काल मे बग़दाद पर माज़ुद्दौला अहमद बुबही ने क़ब्ज़ा कर लिया इससे शियों को शक्ति प्राप्त हुई और जनता की स्वतन्त्रा के साथ साथ ज्ञान के क्षेत्र मे भी काफ़ी विकास हुआ इल्मे कलाम ,फलसफ़ा ,(दर्शन शास्त्र) चिकित्सा ,नजूम (नक्षत्र ज्ञान) इरफ़ान ,गणित व अन्य अनेकों ज्ञान विकसित हुए।
1सिक़्क़तुल इस्लाम अबु जाफ़र मुहम्मद पुत्र याक़ूबे कुलैनी जिन्होने प्रसिद्ध किताब काफ़ी के लेखक हैं।
2शेख़ुल मशाइख़ अबु अब्दुल्लाह मुहम्मद (शेख मुफ़ीद)
3इल्मुल हुदा शरीफ़ मुर्तज़ा
4शेख अबु जाफ़र मुहम्मद तूसी
उस समय शियों का बग़दाद का होज़ा धर्म ज्ञानीयों ,मुजतहिदों ,फ़क़ीहों व इल्मे कलाम के विद्वानो के एक महान प्रशिक्षण केन्द्र के रूप मे पहचाना जाता था। इस होज़े ने हज़ारों की संख्या मे ऐसे विद्वान पैदा किये जिन्होने संसार के कोने कोने अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम के विचारों को फैलाया।
चूँकि शिया विचार धारा अब्बासी शासकों के अत्याचार के बावजूद मुसलमानों के मध्य एक उच्च स्थान प्राप्त कर चुकी थी। अतः इससे अब्बासी खलीफ़ा के दरबार को खतरा पैदा हुआ और अन्ततः सुन्नी तुर्क सरदारों ने ईरानी शिया सरदारों के विरूद्ध आपस मे एक समझौता किया। इस समझौते का परिणाम यह हुआ कि मावरा- उन्नहर खुरासान का क्षेत्र जिस पर समानियान का शासन था। अलपुतकिन नामक ग़ज़नवी के एक तुर्क सरदार द्वारा व आले बोया का शासन सलाजक़ा के द्वारा समाप्त हो गया। जब सन् 447 हिजरी क़मरी मे बग़दाद पर तग़रल बेग सलजूक़ी का क़बज़ा हुआ तो शियों के होज़े इल्मिया बग़दाद और उनके किताब खानों को आग लगा दी गई। इनमे मुख्य रूप से इल्मुल हुदा का किताब खाना जिसमे अस्सी हज़ार किताबें थीं व अबू नस्र शाहपुर का किताब खाना उल्लेखनीय है। इसी प्रकार शेख तूसी के घर व किताब खाने को आग लगादी गई और उनकी दरीसे कलाम की कुर्सी को क्रख़ के मैदान मे रख कर जला दिया गया। शेख तूसी अन इच्छा पूर्वक छुप कर कर्बला के होज़े चले गये।कुछ समय वहाँ रुकने के बाद नजफ़ चले गये और वहाँ पर अपने मदरसे की बुनियाद रखी।
होज़े इल्मिया बसरा का पहला दौर असहाबे रसूल व आइम्मा ए मासूमीन अलैहिमुस्सलाम से सम्बंधित है। उन्होने वहाँ पर हिदायत के कार्य को किया।यह पहला दौर पहली शताब्दी हिजरी से तीसरी शताब्दी हिजरी तक चला।
आइम्मा ए मासूमीन अलैहिस्सलाम के असहाब की एक बड़ी संख्या बसरे मे रहती थी। जिसकी वजह से होज़े इल्मिया बसरे को हदीस के क्षेत्र मे बहुत उन्नति प्राप्त हुई। दुनिया के कोने कोने से हदीस के रावी लम्बी लम्बी यात्राऐं करके बसरा आते थे तथा आइम्मा ए मासूमीन की हदीसें उनके असहाब से हासिल करते थे।
बसरे मे शिया विचारधारा धारे-धारे विकसित हुई। हज़रत इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम के समय तक बसरे मे ऐसे लोग मौजूद थे जो इमाम सादिक़ की हदीसों पर अहलेसुन्नत के रिजाल पर आधारित हदीसों को वरीयता देते थे। परन्तु धीरे-धीरे बसरा शियों की हदीस का एक महत्वपूर्ण केन्द्र बन गया। मुहम्मद पुत्र ज़करियापुत्रदीनारजोहरीग़ुलाबी बसरी जिनका 298 हिजरी मे स्वर्गवास हुआ वह इस दौर के महान फ़क़ीह व मुहद्दिस थे।इल्मे रिजाल के महान विद्वान नजाशी ने उनक आदरस पूर्वक वर्णन किया है।
होज़े इल्मिया बसरे का दूसरा दौर चौथी शताब्दी हिजरी से शुरू होकर आठवी शताब्दी हिजरी तक समाप्त होता है। चूँकि यह होज़ा मक्के जाने वाले मार्ग पर स्थित था अतः मक्का जाने वाले बहुत से ज़ायिर (दर्शानर्थी) यहाँ पर ज्ञान प्राप्ति के लिए रुक जाते थे और अहले बैत अलैहिमुस्सलाम के ज्ञान से अपने ज्ञान मे वृद्धि करते थे।
अबदुल अज़ीज़ पुत्र याहिया पुत्र सईद बसरी चौथी शताब्दी हिजरी के महान मुहद्देसीन मे गिने जाते हैं। उन्होने मुहम्मद पुत्र अतीया से हदीस का ज्ञान प्राप्त किया था।शेख सदूक़ अलैहिर्रहमा के उस्ताद मुहम्मद पुत्र इबराहीम पुत्र इसहाक़ इन्हीं के शिष्य थे।
शरीफ़ अबूतालिब मुज़फ़्फ़र पुत्र जाफ़र पुत्र मुज़फ्फ़र अलवी समरक़न्दी बसरी भी बसरे के चौथी शताब्दी हिजरी के एक विद्वान हैं।उन्होने जाफ़र पुत्र मुहम्मद पुत्र मसऊद अयाशी और जाफ़र पुत्र मुहम्मद से उमरकी पुत्र अली बूफ़की के हवाले से रिवायात ब्यान की हैं। वह शेख सदूक़ अलैहिर्रहमा के उस्तादों मे गिने जाते हैं। तथा शेख सदूक़ की किताब आमाली व इकमालुद्दीन की तमाम सनदें इन्ही की ओर दी गयी हैं।
मुहम्मद पुत्र उमर पुत्र अली बसरी भी चौथी शताबदी हिजरी के शिया सम्प्रदाय के एक मुहद्दिस हैं। शेख सदूक़ अलैहिर्रहमा ने उनसे रिवायात नक़ल की हैं।उन्होने अबुल हसन अली पुत्र हसन मुसन्ना जैसे अपने समय के उच्च स्तरीय विद्वानो रिवायात प्राप्त की हैं।
शेख आक़ा बुज़ुर्ग तेहरानी ने लिखा हैं कि पाँचवी शताब्दी हिजरी मे बसरे मे शिया सम्प्रदाय के नौ विद्वान थे। छटी शताब्दी हिजरी मे यह संख्या घट कर पाँच होगयी तथा सातवी शताबदी हिजरी मे यह संख्या तीन व आठवी शताबदी हिजरी मे यह संख्या दो विद्वानो तक ही सीमित रह गयी। तथा नौवी शताब्दी हिजरी मे बसरे के होज़े से किसी उच्च कोटी के विद्वान का नाम नही मिलता। इस प्रकार होज़े इल्मिया बसरा जो कि इमाम के सामने से ही प्रचलित था आठवी शताब्दी हिजरी तक महान विद्वान उत्पन्न करके मुस्लमानो व शियों के सपुर्द करता रहा। होज़े इल्मिया बसरे को शियों के हदीस के महान होज़े के रूप मे गिना जाता है। शेख सदूक़ के नजाशी जैसे उस्ताद इसी होज़े की देन थे।
होज़े इल्मिया बसरे का तीसरा दौर एक शताब्दी के अन्तराल के बाद दसवी शताब्दी हिजरी से शुरू होकर वर्तमान काल तक प्रचलित है। आक़ा बज़ुर्ग तेहरानी ने दसवी हिजरी शताब्दी मे इस होज़े के मुहम्मद तुलानी नामक केवल एक विद्वान का उल्लेख किया है। परन्तु ग्यारहवी शताब्दी हिजरी मे इस होज़े के छः विद्वानो का उल्लेख मिलता है। ऐसा प्रतीत होता है कि शायद अल अहसा जैसे दूसरे होज़ों से विद्वान वहाँ पर गये हों। आक़ा बुज़ुर्ग तेहरानी ने बारहवी शताब्दी हिजरी मे बसरे के होज़े के पाँच शिया विद्वानो का उल्लेख किया है इनमे से कुछ बहरैन से यहाँ पर आये थे।
उल्लेखनीय यह है कि हकीमे मुताला मुहम्मद पुत्र इब्राहीम क़िवामी शीराज़ी जो कि सदरा व सदरूल मुताल्लेहीन के नाम से प्रसिद्ध हैं ,वह जब सातवा हज करने के लिए पैदल जारहे थे तो बसरे मे उनका स्वर्गवास हुआ और उनको वहीँ पर दफ़न किया गया।
एहसा या लेहसा शियत का एक पुराना केन्द्र है। वर्तमान समय मे यह सऊदी अरब का पूर्वी परान्त है जो खलीजे फारस(ईरान की खाड़ी) के पश्चिमी तट पर स्थित है। तथा इसका केन्द्र हफ़ूफ़ नामक शहर है।
आदरनीय रसूले अकरम स. ने हिजरत के पहले साल आला पुत्र खज़रमी नामक सहाबी को इस क्षेत्र मे भेजा जिन्होने यहाँ पर इस्लाम का प्रचार किया। इस क्षेत्र की मस्जिदे अब्दुल क़ैस ,मस्जिदे नबी के बाद वह पहली मस्जिद है जिसमे नमाज़े जुमा क़ाइम हुई।एहसा के समस्त निवासी मुसलमान हैं और इनमे आधे शिया हैं। यहाँ पर उसूली व शैखिया दोनो विचार धाराओं वाले शिया पाये जाते हैं। यहाँ पर पहली शताब्दी हिजरी से ही शिया विचार धारा के अनुयायी पाये जाते हैं। जब ईरान मे सफ़वी शासन की स्थापना हुई उस समय संसार के विभिन्न क्षेत्रों से शिया विद्वान ईरान आये इनमे एहसा से आने वाले विद्वानो की भी एक बड़ी संख्या थी।
एहसा के समस्त शिया अरब हैं इनमे से कुछ का सम्बंध हज़रत इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम से है। हफ़ूफ़ व अलमुबरज़ नामक दोनो शहरों मे शिया बड़ी मात्रा मे पाये जाते हैं। एहसा के शिया फ़िक़्ह और रिजाल मे निपुण थे। एहसा क्षेत्र मे अहमद पुत्र फ़हद ,इब्ने इबी जमहूर व शेख अहमद एहसाई जैसे विद्वान पैदा हुए हैं। यहाँ के शिया का ईरान ,हिन्दुस्तान ,इराक़ ,क़ुतैब ,कुवैत ,बहरैन ,सीरिया ,लुबनान ,पाकिस्तान ,व मुत्ताहिदा अरब इमारात के शियों के साथ अच्छा सम्बंध रहे हैं।
वर्तमान समय मे शियों के कार्यो से सम्बंधित क़ाज़ी जाफ़री शिया हैं इस पद पर शासन की ओर से नियुक्ति होती है। तथा इसका कार्यालय हफ़ूफ़ नामक शहर मे है। अहमद पुत्र फ़हद इस क्षेत्र के एक महान विद्वान थे। वह नौवी शताब्दी हिजरी के विद्वानों मे गिने जाते हैं। उनेहोने बहुतसी किताबें लिखी हैं उनकी इद्दातुद्दाई व खुलासातुत्नक़ीह फ़ी मज़हबिल हक़्क़ुस्सही फ़ी शरहिल इरशाद नामक दोनो किताबें बहुत अधिक प्रसिद्ध हैं। वह एहसा मे पैदा हुए तथा हुल्ला नामक स्थान फर उनका स्वर्गवास हुआ तथा वह वहीं पर दफ़्न कर दिये गये।
इस क्षेत्र मे अनेकों विद्वान पैदा हुए जिन्होने अपनी किताबों और तबलीग़ के द्वारा इस क्षेत्र मे शियत को जीवित रखा।इनमे से एक महान विद्वान मुहम्मद बाक़िरूश शख्स हैं जो चौदहवी शताब्दी हिजरी के विद्वानों मे गिने जाते हैं। वह सन्1314 हिजरी क़मरी मे इस क्षेत्र के अलक़ार्रा नामक गाँव मे पैदा हुए। प्रारम्भिक शिक्षा समाप्त करने के बाद वह नजफ़ चले गये।तथा वहाँ पर मिर्ज़ा मुहम्मद हुसैन नाईनी व शेख मुहम्मद रज़ा आले यासीन की सेवा मे रह कर अपने ज्ञान मे वृद्धि की। उन्होने इन दो महान फ़क़ीहों से इज्तिहाद का इजाज़ा प्राप्त किया। उन्होनें फ़िक़्ह ,उसूल व अन्य इस्लामी विषयों पर बहुत सी किताबें लिखीं।
हलब के इतिहास के अध्धयन से पता चलता है कि होज़े इल्मिया हलब का पहला दौर हमदानियों के समय से शुरू होता है। इस दौर मे जो विद्वान हलब मे जीवन यापन करते थे उनमे से अबुनस्र मुहम्मदपुत्रमुहम्मद पुत्र तरफ़ान जो कि अबुनस्र फ़ाराबी के नाम से प्रसिद्ध हैं।(जीवन काल259- 339 हिजरी क़मरी) उन्होने एक लम्बे समय तक बग़दाद मे रह कर बहुत से उलूम सीखे और 330 हिजरी क़मरी मे हलब चले गये।वहाँ पर वह अमीर सैफ़ुद्दौला की शरण मे जीवन यापन करने लगे। उन्होने बहुत सी किताबें लिखी उनमे से मुख्य इस प्रकार हैं।
1-आरा अहले मदीनातुल फ़ाज़िला
2-अहसाउल उलूम
3-फ़सूसुल हकम
4-अस्सियासातुल मदीनिया
5-किताबुल जम बैना राय अफ़लातून अलइलाही व अरस्तु।
चूँकि हमदान वासी इस्लामी संस्कृति व शिया विचारधारा पर बहुत अधिक ध्यान देते थे। इस लिए विद्वानो का आदर व किताब खाने आदि बनाने के लिए प्रयासरत रहते थे।
होज़े इल्मिया हलब के पहले दौर के एक अन्य विद्वान शेख अबुल हुसैन साबित पुत्र असलम पुत्र अब्दुल वहाब हलबी हैं। वह इल्मे नह्व (अर्बी भाषा के व्याकरण का ज्ञान) के विशेषज्ञय थे तथा सैफ़ुद्दौला के समय मे हलब के किताब खाने के अधिकारी थे। उन्होने इस्माइलियों की उत्पत्ति व उनकी विचारधारा के निर्धार होने से सम्बंधित एक किताब लिखी थी जिसके कारण इस्माइलियों ने उनको शहीद कर दिया था।
यह दौर आले मिरदास के समकालीन है।इस दौर मे शिया ने बहुत विकास किया। शेख मुफ़ीद अलैहिर्रहमा और सैय्यिद मुर्तज़ा के कुछ शिष्य यहाँ पर जीवन यापन करते थे। और उन्होने कुछ रिसाले भी लिखे हैं जो हलब निवासियों के जवाब मे लिखे गयें हैं।
अबुस्सलाह तक़ी नजमुद्दीन हलबी जो कि हलब के क्षेत्र मे सैय्यिद मुर्तज़ा के उतराधिकारी के रूप मे कार्यरत थे।और हलब वासियों के फ़िक़्ही व कलामी प्रश्नो के उत्तर व होज़े मे शिक्षण के लिए नियुक्त किये गये थे।
हमज़ा पुत्र अब्दुल अज़ीज़ दीलमी जो कि सलार के नाम से प्रसिद्ध हैं। इस दौर के एक और विद्वान हैं।वह होज़े इल्मिया बग़दाद से हलब गये थे। वह शेख मुफ़ीद व सैय्यिद मुर्तज़े के शिष्य थे। तथा सैय़्यिद मुर्तज़ा ने उनको अपना प्रतिनिधि बनाकर हलब के होज़े मे भेजा ताकि वह वहाँ पर शिक्षण कार्य करें। उन्होने जो किताबें लिखी उनमे से मुख्य तीन इस प्रकार हैं---
1-अत्तक़रीब
2-अलमरासिम
3-अत्तज़किराह फ़ी हक़ीक़तिल जोहर वल अरज़
दूसरे दौर के एक अन्य विद्वान इज़्ज़ुद्दीन अबुल मकारिम हमज़ा पुत्र अली पुत्र ज़ोहरा हुसैनी हलबी हैं। जो कि इब्ने ज़ोहरा के नाम से प्रसिद्ध हैं। इब्ने ज़ोहरा छटी शताब्दी हिजरी क़मरी मे ऐतिहासिक शहर हलब मे एक महान फ़क़ीह व मुतकल्लिम के रूप मे पहचाने जाते थे।वह इल्मे फ़िक़्ह ,उसूल ,कलाम ,व अर्बी साहित्य व व्याकरण के पारंगत विद्वान थे। वह आठवी पीढ़ी मे हज़रत इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम की संतान थे।इब्ने ज़ोहरा का परिवार हलब मे ज्ञान व धर्म के क्षेत्र मे शियों का नेतृत्व करता था व सदैव आदर की दृष्टि से देखा जाता था। चूँकि इब्ने ज़ोहरा होज़े मे शिक्षण कार्य़ करते थे अतः उन्होने बहुत से शिष्यों को प्रशिक्षित किया।
रशीदुद्दीन मुहम्मद पुत्र अली पुत्र शहरे आशोब माज़िन्दरानी भी कुछ समय हलब के होज़े मे रहे। वह अरब साहित्य ,शेर ,क़राअत ,तफ़्सीर ,फ़िक़्ह ,उसूल ,व उलूमे अक़ली (फ़लसफ़ा व मंतिक़) मे पारंगत थे।वह बग़दाद मे रहते थे परन्तु अपने जीवन के अंतिम चरण मे हलब चले गये थे।और वहाँ के होज़े मे शिक्षण कार्य करते थे।वह छठी शताब्दी हिजरी मे शियों के एक गौरवपूर्ण विद्वान हुए हैं। उनकी कब्र वर्तमान समय मे हलब शहर के बाहर दर्शनार्थियों के आकर्षण का केन्द्र बनी है।
चूँकि इन दो दौरों के बाद हलब के निवासी शासकों के अत्याचारों का शिकार बन गये अतः वह होज़े को अधिक क्रियात्मक न रख सके।
होज़े इल्मिया हिल्ला शियों का एक महान होज़ा था जिसमे अनेको विद्वानों तथा लेखकों ने प्रशिक्षण प्राप्त किया।इस होज़े के संस्थापक शेख अबु अबदुल्लाह फ़ख़रूद्दीन मुहम्मद अजली हैं। वह इब्ने अदरीस के नाम से प्रसिद्ध हैं। माता की ओर से वह शेख तूसी के वंश से मिलते हैँ। उन्होने शेख तूसी के स्वर्गवास के एक शताब्दी बाद नहज़ते इस्लाह तलबी(सुधार अन्दोलन) चलाई और शिया फ़िक़्ह मे इल्मी बारीकियाँ दाखिल कर उसको आकर्षक बनाया। उन्होने शिया फ़िक़्ह के विकास मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होने वीरता पूर्वक ज्ञान के क्षेत्र मे आगे क़दम बढ़ाया और शेख तूसी की राये पर कार्य करने की सुन्नत(रीती) को तोड़ कर खुद से फ़िक्र करने की रीती को अपनाया। उनकी इस विचार धारा के कारण कुछ लेखको ने उल्लेख किया है कि इब्ने इदरीस वह व्यक्ति है जिन्होने शेख तूसी की आलोचना मे ज़बान खोली। परन्तु ऐसा नही है उन्होने अपनी किताब अबवाबुस सराइर मे बहुसी जगहों पर शेख तूसी की बहुत तारीफ़ की है। जैसा कि बाबे सलाते जुमा आदि मे देखने को मिलता है।
होज़े इल्मिया हिल्ला उस समय शिक्षण के आधार पर एक बहुत बड़ा होज़ा था। अरब व अजम (अरब के अतिरिक्त दूसरे स्थानो पर रहने वाले लोगों को अरब अजम कहते हैं।) के बहुत से विद्वानों व मुजतहिदों ने इस होज़े से ज्ञान लाभ प्राप्त किया। इब्ने इदरीस के स्वर्गवास के बाद इस होज़े का नेतृत्व शेख अबुल मुज़फ़्फ़र सदीदुद्दीन युसुफ़ पुत्र अली हिल्ली ने संभाला। उन के बेटे अल्लामा हिल्ली ने उनके फ़त्वों को अपनी किताबों मे नक़्ल किया है। इसी तरह अल्लामा हिल्ली के बेटे फ़खरूल मुहक़्क़ेक़ीन ने अपने इजाज़े मे लिखा है कि मैं इजाज़त देता हूँ कि मेरे पिता और दादा की रचनाओं को उसूल हदीस मे नक़्ल कर सकते हैं।
कुछ आधुनिक लेखकों ने सही प्रकार से न समझ पाने के कारण लिखा है कि हिल्ले का होज़ा सन् 656 हिजरी क़मरी मे बग़दाद पर मुग़लों के हमले की वजह से बग़दाद के होज़े के तबाह होने के बाद वजूद मे आया जबकि हक़ीक़त यह है कि यह होज़ा इससे पहले से क्रियान्वित था। और बग़दाद के होज़े की समाप्ति के बाद जब बग़दाद व दूसरे स्थानों के विद्वान हिल्ले गये तो मुहक़्क़िक़ हिल्ली के समय मे यह होज़ा अपने विकास की चरम सीमा पर पहुँचा।
इब्ने इदरीस के बाद होज़े इल्मिया हिल्ले के इन दो महान आलिमों के नाम इतिहास मे मिलते हैं। एक शेख नजमुद्दीन अबुल क़ासिम जाफ़र(मृत्यु सन् 676 हिजरी क़मरी) यह महान विद्वान इतिहास मे मुहक़्क़िक़ हिल्ली के नाम से मशहूर हैं। इन के दर्स मे बड़े बड़े आलिम शरीक होकर अपने इल्म मे इज़ाफ़ा करते थे। एक दिन खवाजा नसीरूद्दीन तूसी हिल्ले मे इनके दर्स मे गये।खवाजा को देख कर मुहक़्क़िक़ हिल्ली इन के ऐहतिराम मे खड़े हो गये और यह चाहा कि वह कुर्सी पर बैठ कर दर्स कहें। मगर शेख नसीरूद्दीन तूसी ने हुक्म दिया कि अपने दर्स को पूरा करो। उस वक़्त मुहक़्क़िक़ क़िबले के बारे मे दर्स दे रहे थे। मुहक़्क़िक़ ने अपने दर्स को फ़िर से शुरू करते हुए कहा कि मुस्तहब है कि ईराक़ के रहने वाले थोड़ा सा बायीं तरफ घूमे। खवाजा ने ऐतेराज़ किया कि यहां पर मुस्तहब का कोई मौक़ा नही है क्योंकि अगर क़िबला रुख खड़े हैं तो उसकी तरफ़ से घूमना हराम है। और अगर ,सिम्ते क़िबले नही है तो उसकी तरफ़ घूमना वाजिब है। मुहक़्क़िक़ हिल्ली ने फौरन जवाब दिया कि क़िबले से सिम्ते क़िब्ले की तरफ़।यह सुन कर खवाजा नसीरूद्दीन तूसी खामोश हो गये। इसके बाद मुहक़्क़िक़ ने इस बहस के बारे मे एक रिसाला लिखा और उसको खवाजा के पास भेज दिया।
(किताब अज़्ज़रिया पेज मन.18)
मुहक़्क़िक़ हिल्ली ने फ़िक़्हे इमामिया के विकास मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होने हुक़ूक़ के क्षेत्र मे एक नये विधान की नीव डाली। उनकी लिखी हुई किताब शराए उल इस्लाम शियों की फ़िक़ह की एक अहम किताब समझी जाती है और अभी तक शियों के होज़े इल्मियों मे पढायी जाती है।
दूसरे आलिम शेख जमालुद्दीन अबु मंसूर हसन हैं जो तारीख मे अल्लामा हिल्ली के नाम से मशहूर हैँ। और आठवी सदी (शताब्दी) हिजरी मे मज़हबे इमामिया को एक नया रुख देने वाले समझे जाते हैं। उन्होंने हक़ूक़ के मैदान मे शिया फ़िक़्ह को बहुत ज़यादा बढ़ाया। उन्होने फ़िक़्हे इमामिय़ा मे ऐसे ऐसे नये मतालिब दाखिल किये जो उन से पहले लिखी गयीं शियों की किसी भी फ़िक़्ह की किताब मे नही मिलते थे।
अल्लामा हिल्ली की वफ़ात के बाद उनके बेटे शेख फ़खरूद्दीन अबु तालिब मुहम्मद (म. 771 हिजरी क़मरी) जो तारीख मे फ़खरूल मुहक़्क़ेक़ीन के नाम से मशहूर हैं। अपने पिता के बाद उन्होने उनकी जगह को संभाला उनके सबसे मशहूर शागिर्द (शिष्य) शहीदे अव्वल हैं।
होज़े इल्मिया हिल्ले को चलाने और नयी फ़िक्र देने मे सदीदुद्दीन हिल्ली के खानदान(परिवार) ने अहंम किरदार( महत्वपूर्ण भूमिका) निभाया।
फेहरीस्त
शियों के हौजे इल्मिया 1
होज़ा -ए -इल्मिया अंदिलिस 2
होज़े इल्मिया बग़दाद 5
इस काल मे शियों की हदीस की चार किताबें लिखी गईं। 6
बग़दाद के होज़े के कुछ प्रमुख ज़ईम(कुल पति) इस प्रकार हैं---- 8
होज़ा-ए-बसरा 9
पहला दौर (प्रथम चरण) 9
दूसरा दौर (व्दितीय चरण) 10
तीसरा दौर (तृतीय चरण) 12
होज़े इल्मिया एहसा 13
होज़े इल्मिया हलब 15
पहला दौर 16
दूसरा दौर 17
होज़े इल्मिया हिल्ला 19