अली (अ.स.) से दुश्मनी क्यों ?

मुसन्निफ़:- सैय्यद आबिद हुसैन जाफ़री

तदवीन:- सैय्यद नासिर हुसैन जाफ़री

नोटः ये किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क के ज़रीऐ अपने पाठको के लिऐ टाइप कराई गई है और इस किताब मे टाइप वग़ैरा की ग़लतीयो को सही किया गया है।

Alhassanain.org/hindi


हरफ़े अव्वल

खि़दमते अक़दस इमामे आली मक़ाम हज़रत अली इब्ने अबी तालिब (अ.स.)

तारों ने अभी आंख न खोली थी अली था

न अमन का पैग़ाम न होनी थी अली था

काबा था दुआयें थी न होली थी अली था

ख़ालिक़ की ज़ुबां कुन भी न बोली थी अली था

फ़ज़ाएलो कमालात की दुनिया में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो अपने फ़ज़ाएलों कमालात और अपनी मोजिज़ नुमाई से हमेशा दुनिया में आशकार रहते हैं और उनका तज़किरा दुनिया में ज़िक्रे अव्वल बन जाता है।

न लौहे क़लम था न मोअल्ला था अली था

मलकूतो महल थे न मोहल्ला था अली था

वाहिद इसी वाहिद का तजल्ला था अली था

उस वक़्त अली था कि जब अल्लाह था अली था

ज़ेरे नज़र किताब ‘‘ अली (अ.स.) से दुश्मनी क्यों ? ’’ आप क़ारीने हज़रात की खि़दमत में पेश की जा रही है इन्हीं मोजिज़ नुमा इमाम के बारे में है जिसे इस्लाम से हटा लिया जाये तो फिर इस्लाम तश्ना और तन्हा नज़र आयेगा । ये इमामे आली मक़ाम ही हैं जिन्होंने रिसालत के साथ क़दम से क़दम मिलाया और रिसालत की हर बात के गवाह बने हर हर दर्द व मुसीबत को बर्दाश्त किया ताकि ख़ुदा बाक़ी रहे दीने ख़ुदा नाफ़िज़ रहे।

इस्लाम के दामन में बस इसके सिवा क्या है

एक ज़र्बे यदुल्लाही एक सजदा ए शब्बीरी

लिहाज़ा मौला ए मुत्तक़ियान के किरदार पर जब हम रौशनी डालते हैं तो महसूस होता है कि ये वो ज़ाते अक़दस है जिनमें जमाले ख़ुदा वन्दी पूरी आबो ताब से चमक रहा है लिहाज़ा ख़ुद क़ुरआन गवाही दे रहा है ऐ अहलेबैत हम ने तुम्हें इस तरह पाक व साफ़ किया जिस तरह पाक व साफ़ व मुतहर होने का हक़ है ।

मौला ए कायनात की नूरानी शख़्सियत इस्लाम और ख़ुद नबूवत के लिये इतनी अहम है कि हज़रत अली (अ.स.) के लिये ख़ुद ज़ुबाने नबूवत कहती नज़र आती है। ‘‘ अली का ज़िक्र मेरा ज़िक्र , मेरा ज़िक्र ख़ुदा का ज़िक्र और ख़ुदा का ज़िक्र इबादत है । ’’

अगर गौर फ़रमायें तो बात वाज़ेह होती है कि अली (अ.स.) का ज़िक्र इबादत की मन्ज़िल तक पहुँच जाता है।

अली (अ.स.) की विलादत ख़ाना ए काबा में हुई। ख़ुदा ने उन्हें मौलूदे काबा होने का मुन्फ़रिद ऐजाज़ बख़्शा है। काबा क्या है , ख़ुदा का घर है लिहाज़ा विलादत में ही बात ख़ुदा तक पहुँच गई। विलादत के बाद आंख भी खोली तो दस्ते रसूल (स.अ.) पर , तिलावत भी की तो चारों आसमानी किताबों की जिन्हें ख़ुदा ने मुख़्तलिफ़ नबियों पर नाज़िल फ़रमाया। ये रसूल (स.अ.) किसका ? ख़ुदा का। ये किताब किसकी ? ख़ुदा की। अली (अ.स.) का ज़िक्र इबादत की मन्ज़िल से गुज़र रहा है । दावते ज़ुलअशीरा में इस्लाम और क़ुरआन की गवाही दी। इस्लाम भी ख़ुदा का क़ुरआन भी ख़ुदा की किताब। वक़्त गुज़र रहा है अली (अ.स.) का ज़िक्र इबादत बन रहा है।

शादी इन्सान की ज़िन्दगी का ज़ाती मसअला है मगर अली (अ.स.) व सय्यदा (अ.स.) का अक़्द दुनियां व आख़रत का पहला और आखि़र अक़्द था जिसे परवरदिगारे आलम ने अर्श पर पढ़ा।

सख़ावत की मन्ज़िल वो मन्ज़िल कि पूरी सूरा ए दहर इसकी गवाह बनी। शुजाअत ऐसी की एक ज़र्ब सक़लैन की इबादत से गरां ठहरी । इबादत ऐसी की तमाम रात तकबीर की सदायें आती रहती थीं।

तहारत पर आयते तत्हीर गवाह , नफ़्स की सदाक़त पर आयते मुबाहेला ने मुहर लगायी। नुमाइन्दा ए ख़ुदा की मन्ज़िल में आयते बल्लिग़ ने अली को पुकारा , ख़ैबर में कर्रार और ग़ैरे फ़र्रार का लक़ब मिला , ख़न्दक में कुल्ले ईमान कुल्ले ईमान के लक़ब से मुज़इय्यन हुए। ओहद मे ला फ़ता इल्ला अली ला सैफ़ इल्ला ज़ुलफ़ेक़ार की सदा आई। दहने रिसालत से बाबे इल्म का खि़ताब मिला। कभी लिसानुल्लाह कहा , कभी ऐनुल्लाह कहा , कभी कलामुल्लाह कहा , कभी यदुल्लाह कहा , कभी नफ़्स इतना पाक साफ़ तय्यबो ताहिर नज़र आया कि ख़ुदा को नफ़्स ख़रीदना पड़ा और रिज़ाए ईलाही की मिल्कियत अली (अ.स.) के सिपुर्द हुई और आख़री मक़सदे हयात की इस शान से पूरा किया कि शिकवा ज़रा सा भी नहीं है। मस्जिदे कूफ़ा में अली (अ.स.) ज़ख़्मी हैं और कहते जा रहे हैं ‘‘ रब्बे काबा की क़सम मैं कामयाब हो गया ’’ कामयाबी काहें की है ? यही न कि अल्लाह के लिये अपनी क़ुरबानी पेश कर रहे हैं और जमाले ख़ुदा वन्दी चेहरे पर आशकारा है।

सच्ची बात तो यह है कि एक बशर अमीरूल मोमेनीन अली (अ.स.) की क्या फ़ज़ीलत बयान कर सकता है जिसे ख़ुद ख़ुदा ने अपना मज़हर कहा है।

दुआ है ख़ुदा वन्दे आलम हमारा हशर व नशर मोहम्मद (स.अ.) व आले मोहम्मद (अ.स.) के साथ महशूर फ़रमाये। (आमीन) सैय्यदा ततहीर फ़ातिमा रिज़वी

मुनाजाते बारगाहे परवरदिगार

बारे इलाही बन के सवाली तेरे हुज़ूर

दामन में अपने लाए हैं बे इन्तेहा कुसूर

लेकिन हमारे सीनों पे मातम का देख नूर

अपने नबी के सदक़े में तो बख़्शे गा ज़रूर

या वजीहन इन्दल्लाहिशफ़ा लना इन्दल्लाह

मौला अली (अ.स.) का रब्बे जहां तुझको वास्ता

या रब बराए फ़ात्मा (अ.स.) सिद्दीक़ा ताहेरा

दे अलम और रिज़्क़ का साग़र भरा हुआ

टूटे न नेमतों का मेरे घर से सिलसिला

या वजीहन इन्दल्लाहिशफ़ा लना इन्दल्लाह

मालिक इमाम हसन (अ.स.) का तुझको वास्ता

जिसके लहू से करबोबला की है इब्तेदा

हां उस इमामे अमन के सदक़े में किबरिया

इस मुल्क में हो अम्न का परचम खुला हुआ

या वजीहन इन्दल्लाहिशफ़ा लना इन्दल्लाह

अब वास्ता हुसैन (अ.स.) का

परवर दिगार सब्रे शहे तश्ना काम का

जिसके लबों पे विर्द था तेरे ही नाम का

ख़न्जर तले जो क़ारी था तेरे कलाम का

या वजीहन इन्दल्लाहिशफ़ा लना इन्दल्लाह

या रब तू मेरी हस्ती को ऐसा संवार दे

तू अपनी रहमतों से मेरा घर निखार दे

सज्जाद (अ.स.) का तू सदक़ा ऐ परवरदिगार दे

बीमार को शिफ़ा ए मुकम्मल क़रार दे

या वजीहन इन्दल्लाहिशफ़ा लना इन्दल्लाह

मलिक इमाम बाक़र (अ.स.) व जाफ़र (अ.स.) का वास्ता

मजलिस में मैं हुसैन (अ.स.) की करता हूँ ये दुआ

दोनों का वास्ता तुझे देता हुँ ऐ ख़ुदा

मक़रूज़ जो हैं ग़ैब से कर उनका क़र्ज़ अदा

या वजीहन इन्दल्लाहिशफ़ा लना इन्दल्लाह

या रब बराए मूसा काज़िम (अ.स.) अली रजा़ (अ.स.)

मशहद में और नजफ़ में हैं जो क़िब्ला ए दुआ

तू उनके वास्ते से वो औलाद कर अता

मां बाप जिनसे शाद हों जिनकी हो ये सदा

या वजीहन इन्दल्लाहिशफ़ा लना इन्दल्लाह

या रब बराए मौला नक़ी (अ.स.) तक़वा ए तक़ी (अ.स.)

दे जज़्बा ए जिहाद बसद शाने असकरी (अ.स.)

मेहदी (अ.स.) का भी ज़हूर दिखा दे उसी सदा

तेरे हुज़ूर मेरी दुआ है ये आख़री

या वजीहन इन्दल्लाहिशफ़ा लना इन्दल्लाह

इस्लाम की पहली दावत

मैं आज की मजलिस में आपके सामने वाज़ेह करना चाहता हूँ कि लोग हज़रत अली (अ.स.) के मुख़ालिफ़ क्यों हुए और क्यों अहले बैत (अ.स.) को तरह तरह की तकलीफ़ें दीं और उनके दुश्मन हुए।

ये तो आप पहले ही जानते हैं कि हज़रत अली (अ.स.) हुज़ूर के चचा ज़ाद भाई थे। एक दिन हुज़ूर ने अली (अ.स.) से कहा कि जाओ और ख़ानदाने कु़रैश से कहो कि हज़रत मोहम्मद (स.अ.) के घर आज दावत है। लिहाज़ा सब लोग आए। जब सूरज गु़रूब हुआ और रात आई तो सब लोग हुज़ूरे अकरम (स.अ.) के घर आए।

हुज़ूरे अकरम (स.अ.) ने सब आदमियों को खाना खिलाया , जब सोब लोग सैर हो चुके तो हुज़ूर खड़े हुए और कहा , मुझे ख़ुदा ने रसूल बना कर भेजा है ताकि तुम लोगों को सही रास्ते पर लाऊं , तुम लोग बुतों की पूजा करनी छोड़ दो , ये सिर्फ़ पत्थर हैं , ये तुम्हें कुछ फ़ायदा नहीं दे सकते। सिर्फ़ एक ख़ुदा को मानो। बोलो इस नेक काम में कौन कौन मेरा साथ देगा ? हुज़ूर (स.अ.) की ये बात सुन कर सब ने अपना सर झुका लिया। हज़रत अली (अ.स.) ने जो लोगों को देखा कि सब ख़ामोश बैठे हैं। आप खड़े हुए और कहा: या रसूल अल्लाह (स.अ.) मैं आप का साथा दूंगा। हुज़ूर ने फिर कहा: कौन है जो मेरा साथ देगा ? सब ख़ामोश बैठे रहे। सरवरे कायनात ने अली (अ.स.) को गले लगा लिया और कहा मरहबा। दावत के बाद सब लोग अपने अपने घरों में चले गये और साथ में हुज़ूर नबी करीम (स.अ.) का मज़ाक उड़ाना लगे।

चन्द दिन के बाद उन्हें ख़बर मिली कि एक आदमी मुसलमान हो गया। उसको लोगों ने ख़ूब मारा लेकिन उसने इस्लाम नहीं छोड़ा। इसी तरह रोज़ किसी न किसी के मुसलमान होने की ख़बरें आने लगीं। अब तमाम कुफ़्फ़ार में ग़म व ग़ुस्से की लहर दौड़ गई। तमाम लोग तरह तरह के मन्सूबे बनाने लगे। चुनान्चे तय पाया कि सब (काफ़िर) वालदैन अपने बच्चों को कह दें कि मुहम्मद (स.अ.) जहां से गुज़रें तो वो तालियां बजाएं और मजनूं मजनूं की सदा ए लगाएं। अगर हमज़ा मदद करेगा तो हम कहेंगे कि देखो बड़ा आदमी बच्चों को मार रहा है। बच्चे अकसर शरीर होते हैं , चाहे हमारे घर के हों या आपके घर के। मसलन आप हमारे घर आए तो हमारे बच्चे आपकी मुरव्वत में कुछ देर चुप हो गये या हम आपके घर गए तो आपके बच्चे चुप हो गये तो हम समझे कि आपके बच्चे सीधे साधे हैं हालां कि न हमारे बच्चे सीधे हैं न आपके बच्चे। बच्चों का मिजाज़ एक जैसा होता है। हां फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि मुहज्ज़िब घर के बच्चे शरीर तो हो सकते हैं मगर मद तमीज़ नहीं होते , मगर जाहिलों के बच्चे न सिर्फ़ शरीर बल्कि बद तमीज़ भी होते है।

अब रसूल अकरम (स.अ.) घर से निकले। देखिये कुफ़्फ़ार ने जो पालिसी मुरत्तब की है हक़ीक़त मं यह मामूली बात नहीं। आप ज़रा मामले की नज़ाकत समझें। बहुत से वाक़ियात इस्लामी तारीख़ में ऐसे आपको मिलेंगे जिसकी नज़ाकत लोगों ने समझी नहीं।

पहले एक मिसाल से अपनी बात दोहराता हूँ कि आप जंगल में जा रहे हैं और एक शेर या किसी जंगली दरिन्दे ने आप पर हमला कर दिया , आपके हाथ में हथियार हो न हो , मगर जो हवास दुरूस्त हैं तो हो सकता है कि आप की जान बच जाए और शेर के हमले से बच जाएं। आपके पास आला दर्जे की तलवार , उम्दा क़िस्म का रिवालवर भी है , ख़न्जर और बन्दूक़ भी है और किसी ने शहद की मक्खियों के छत्ते पर पत्थर दे मारा और तमाम मक्खियां आप पर टूट पड़ें। बताएं कौन सा अस्लाह काम आयेगा ? चारों तरफ़ से मक्खियों का हमला जब कि एक मक्खी की तो कोई ताक़त नहीं। ताक़त कैसे बनी ? जब एक साथ दो लाख मक्खियों ने हमला कर दिया , उन्होंने आपको ज़रूर काट लेना है चाहें बन्दूक़ से दफ़ा करें या तलवार से।

तो ये प्लान काफ़िरों ने बना लिया था इस लिये की अगर हमज़ा (अ.स.) बोलते हैं तो ज़माना कहेगा कि हमज़ा इतने बड़े आदमी हो कर बच्चों से झगड़ा कर रहे हैं। अगर अबु तालिब (अ.स.) बोलते हैं तो तभ भी यही आवाज़ आयेगी। अगर किसी बच्चे को रसूल (स.अ.) तमाचा मारेंगे तो तब भी हमारी दिली मुराद पूरी होगी।

देखा न जी कि हम पहले ही कहते हैं कि (नाऊज़ो बिल्लाह) दिमाग़ ठीक नहीं ख़ुद मुशाहेदा कर लें कि रसूल (स.अ.) बच्चे से लड़ाई झगड़े में मसरूफ़ हैं।

तो आईय्ये असल बात की तरफ़ कि रसूल (स.अ.) निकले हैं अपने घर से तो चारों तरफ़ से कुफ़्फ़ार के बच्चों का हुजूम , हर तरफ़ से मजनूं दीवाना की आवाज़ें बलन्द हुईं।

अली (अ.स.) मुहम्मद (स.अ.) के हमराह:- रसूल (स.अ.) पर कुफ़्फ़ार के बच्चों ने पत्थर फ़ेंकना शुरू किए , मगर जो बच्चा रसूले ख़ुदा (स.अ.) के पीछे चल रहा था एक दम घूमा और घूम घूम कर बच्चों से कहने लगा कि ख़बरदार ! ‘‘ अल्लाह के रसूल के साथ गु़स्ताख़ी मत करो और भाग जाओ अपने घरों को ’’

कुफ़्फ़ार के पढ़ाए हुए जाहिल बच्चे क्या समझ पाते उस जुमले को क्यों कि वह देख रहे हैं कि यह अकेला है और हम तादाद में ज़्यादा हैं। यह हम में कितने लड़कों को मार लेगा , इतने हुजूम से तो यह मार ही खायेगा। लेकिन मुझे क़सम है उस ज़ाते किबरिया की जिसके क़ब्ज़ा ए क़ुदरत में मेरी जान है। आज तक जिसने भी अली (अ.स.) के मुताअल्लिक़ ऐसा सोचा है उसने खुद मार खाई है। अली (अ.स.) ने कहा , ख़बरदार ! भाग जाओ।

मगर वह क्यों जाते वह घर से कसीर तादाद में शरारत करने आए थे। एक लड़के ने रसूल (स.अ.) से ग़ुस्ताख़ी के लिये अपना हाथ लहराया तो लहरा कर ही रह गया। अली (अ.स.) ने बढ़ कर उस लड़के को पटख़ दिया। दूसरा उसकी मदद को आया अली (अ.स.) ने उसे गिरा दिया तीसरा आया अली (अ.स.) ने गिरा दिया। जब चारों तरफ़ से एक दूसरे पर गिरने लगे तो बाक़ी देख कर भागे। ‘‘ अरे बड़े बड़े भाग जाते हैं अली (अ.स.) के मुक़ाबले में यह तो अभी बच्चे थे। ’’

तो बच्चा जब पिट कर जाता है तो अपनी ख़ता नहीं बताता लेकिन यहां जितने पिट कर जा रहे हैं किसी का घुटना टूटा है , किसी का पांव टूटा है , किसी के कान से ख़ून बह रहा है और किसी को दिखाई नहीं दे रहा है। जब बच्चे घरों में पहुँचे तो अपनी ख़ता याद नहीं कि हम ने तालियां बजाईं थी या हम ने मजनूं कहा था सिर्फ़ यही कह रहे थे कि अम्मी मुझे अली ने मारा , हम आ रहे थे अली ने पटख़ दिया।

जब जा कर माओं से शिकायतें करने लगे तो चूंकि औरतों की आदत होती है कि फ़ौरी तौर पर लड़ने के लिये ख़ड़ी हो जाती हैं। आज भी सीधी साधी औरतें बच्चों के मामले में लड़ने के लिये निकल आती हैं तो अरब की ज़बरदस्त औरतें लड़ने के लिये निकल आईं , क्यों कि उनका लड़का अली (अ.स.) से दुश्मनी के उस बीज का पौधा निकल रहा था वो बीज जो दावते ज़ुलअशीरा में बोया गया था। औरत की फ़ितरत में है कि जब उसका बस न चले तो कोस्ती है और मर्द लड़ता है। वह कुफ़्फ़ार की औरतें सारा दिन कोस्ती रहीं। अल्लाह का नाम नहीं ले रही , रसूल (स.अ.) का नाम नहीं ले रहीं। ख़ूब ग़म व ग़ुस्से में कह रही हैं , ऐ लात ! तुम अली को पटख़ दो। ऐ हबल ! तुम अली को मार डालो। ऐ उक़्बा ! तुम अली का सर फोड़ दो। और वह ज़बाने हाल से कह रहे होंगे कि हम से क्या कह रही हो हम तो ख़ुद अपनी ख़ैर मना रहे हैं। जिस दिन इधर आ निकले हम भी यहां नहीं रहेंगे। अब दिन भर तो यह लड़के रोते पीटते रहे जब रात हुई तो कुफ़्फ़ार के मर्द घरों के लौटे और आ कर देखा कि किसी का बेटा लंगड़ा है , किसी का काना है और किसी के दांत नहीं। आप तो सारा दिन जुआ खेलने , शराब पीने और डाका डालने में मसरूफ़ रहे थे। आते ही उन्होंने अपने बच्चों का यह हाल देखा , तो अपने बच्चों से तमाम रिर्पोट तलब की। उन्होंने पूछा कि कल तुम कितने लड़के थे ? उन्होंने कहा कि हम कसीर तादाद में थे। पूछा क्या हुआ ? लड़के कहने लगे , हमने मजनूं दीवाना कहना शुरू किया , तालियां बजाईं तो अली ने हमें मना किया। हम ने अली की बात को कोई असर न दिया तो उसने हमें मारा।

कहा तुम अकेले क्यों गए थे अली के मुक़ाबले में ? कहा: मैं अकेला नहीं था हम सब मिल कर गए थे। कहा तुम्हारी तरफ़ से कोई न बोला ? कहा बोले तो सभी थे मगर सभी ने ख़ूब मार खाई।

उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि लड़का क्या कह रहा है। कहने लगे रसूल के साथ कल कितने अफ़राद थे ? क्या हमज़ा थे ? क्या अबु तालिब थे ? कहा: नहीं वह वहां नहीं आए थे। मुहम्मद लड़ रहे थे। ? कहा: नहीं वो आराम से अलाहेदा खड़े रहे। तो फिर कौन कौन था ? बस अली थे।

वो कहने लगे , तो अली ने क्या किया ? कहा: हम सब को मारा ।

तुम ने क्यों न मारा । कहा: मारा था तो मगर हाथ उन पर पड़ा ही नहीं।

कहा: फिर तुम्हारे साथियों ने तुम्हारा साथ न दिया ?

कहने लगेः कोशिश तो हर किसी ने की होगी मगर एक लमहें में अली हम सब पर वारिद ही ऐसे हुए कि हम एक दूसरे को देखते थे तो सभी पीटे हुए दिखाई देते थे। काफ़िर बड़े हैरान हुए कि अजीब बात है कि हम ज़हनी तौर पर लड़ने वाली क़ौम हैं फिर भी पिट गए।

कुफ़्फ़ार हज़रत अबु तालिब (अ.स.) की खि़दमत में:- बहर हाल उनकी ये साज़िश भी फ़ेल हो गई। वह अपने अपने बच्चों को ले कर सुबह हज़रत अबु तालिब (अ.स.) के पास आए। सरकारे अबु तालिब (अ.स.) एक पुर वक़ार शख़्सियत थे। उनके इर्द गिर्द लोग जमा थे। काफ़िर आ कर चीख़ना शुरू हो गए कि ऐ अबु तालिब ! कल तुम्हारे लड़के ने हमारे लड़कों को बहुत पीटा है। कोई कहता कि अली ने मेरे बेटे के दांत तोड़े , कोई कहता कि अली ने मेरे बेटे का सर फ़ोड़ दिया , कोई कहने लगा कि अली ने मेरे बेटे की टांग तोड़ दी। देखते जाइए अली (अ.स.) से दुश्मनी बढ़ती जा रही है। ये ऊंट का गोश्त खाने वाले कीना परवर अरबों के लड़के जब जवान होंगे तो क्या अली (अ.स.) के दोस्त होंगे ? अली (अ.स.) से दुश्मनी का पौधा बढ़ रहा है। सब जमा हो गए। अबू तालिब (अ.स.) ने उनकी तरफ़ देखा पूरी साज़िश फ़ेल हो गई , कुफ़्फ़ार के उस अज़्म पर पानी फिर गया।

अबु तालिब (अ.स.) ने कहा कि तुम ने अपनी अपनी बात ख़त्म कर ली ? अब मेरी बात सुनो ! तुम तमाम लोग अपने बच्चों को समझा दो कि वो आइन्दा कभी मेरे भतीजे और अल्लाह के रसूल से बद तमीज़ी न करें , अली तुम्हारे बच्चों को कुछ नहीं कहेगा। समझदार बाप ने बेटे का मिजाज़ बता दिया। दुनियां मोहम्मद (स.अ.) से दुश्मनी छोड़ दे अली (अ.स.) हाथ उठाना छोड़ देगा।

उस बात को ज़हन में रखयेगा कि अली (अ.स.) से दुश्मनी का बीज बोया गया। मोमिन ज़हन से तो आपको ये वाक़ेया ख़ुश गवार महसूस हो रहा है ज़रा काफ़िर ज़हन से सोचो कि ये वाक़िया तह दिल में ज़ख़्म बनाते जा रहे हैं। दावते ज़ुल अशीरा में नुस्रत के वादा किया। वहां अली (अ.स.) की दुश्मनी का बीज ज़मीन पर पड़ा। अब जो अली (अ.स.) ने बच्चों की पिटाई कर दी तो हर घर में अली (अ.स.) का नाम ले कर बुराई हो रही है। दुश्मनी का पौधा जो है वो थोड़ा थोड़ा बढ़ा हो गया।

ख़ुदा वन्द तआला र्क़ुआन मजीद में इरशाद फ़रमाता है कि ‘‘ ऐ रसूल (स.अ.) कह दीजिए कि मैं तबलीग़े रिसालत के सिलसिले में कोई मज़दूरी नहीं चाहता , कोई बदला नहीं चाहता सिर्फ़ अपने क़राबतदारों की मुहब्बत चाहता हूँ उनकी मवद्दत चाहता हूँ। ’’

इस सिलसिले में यह बात ज़हने आली में रहे कि दुनिया में मुहब्बत आला शय है। उसके दोहरे असरात होते हैं।

दुहरे असर का मतलब:- दुहरे असर का मतलब यह है कि एक वाक़ेया ये है कि एक वाक़ेआ अपने अन्दर दो असर रखता है। मसलन एक आदमी का लड़का इम्तेहान में पास हो गया , यह एक की कामयाबी है मगर उसके दो असर हैं। ये मुसर्रत भी बनेगा और सबबे ग़म भी। दोस्त के लिये यही कामयाबी सबबे मुसर्रत है और दुश्मन के लिये यह कामयाबी सबबे ग़म है। उसी तरह एक लड़का फेल हो गया उसके भी दो असर हैं। दोस्त के लिये ग़म और दुश्मन के लिये ख़ुशी। मालूम हुआ कि मुहब्बत की दुनियां बयक वक़्त अपने अन्दर दो ताक़ते रखती है। उसमें एक ही वाक़ेया एक तरफ़ ख़ुश गवार असर छोड़ता है और दूसरी तरफ़ ना ख़ुशगवार। एक तरफ़ मुसर्रत और दूसरी तरफ़ ग़म। यही कैफ़ियत मोहब्बते अली (अ.स.) की भी है। उसमें भी दोहरा असर है। फ़ज़ाएले अली (अ.स.) की मिसाल इस्लाम में बिजली के करंट की सी है। जिस तरह करंट जिधर जाता है दो काम करता है कहीं हीटर चलाता और कहीं एयर कण्डीशनर चलाता है। लाइन एक है और काम दो दो हो रहे हैं। चूल्हे (हीटर) पे खाना पक रहा है और फ्रिज में पानी ठण्डा हो रहा है। करन्ट एक ही है असर अलग अलग है।

यहां कौसर का जाम चाहने वालों के लिये ठंडा हो रहा है और इधर अली (अ.स.) से बुग़्ज़ रखने वाले जल रहे हैं। दोस्ती की दुनियां में अलग काम हो रहा है और दुश्मनी की दुनियां में अलग काम हो रहा है।

पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.) ने अली (अ.स.) को अपना वसी मुक़र्रर किया तब से अली (अ.स.) से दोस्ती और दुश्मनी का सिलसिला शुरू हो गया।

दोस्तों के दिलों में अली (अ.स.) की मुहब्बत का दरिया ठाठें मारने लगे और दुश्मनों के दिलों में बुग़्ज़े अली (अ.स.) के शोले बलन्द होने लगे फिर जब अली (अ.स.) ने कुफ़्फ़ार के बच्चों की जिन्होंने रसूल (स. .अ) को मजनूं दीवाना कहा था और तालिया बजाते थे , पिटाई की तो अली (अ.स.) से दुश्मनी का पौधा परवान चढ़ने लगा , क्यो कि हज़रत अबु तालिब (अ.स.) ने कहा था कि ऐ कुफ़्फ़ार ! आज से तुम्हारे लड़के मेरे भतीजे से कोई वाज़ेह हरकत न करें तो ये ख़ुदा का शेर तुम्हारे बेटों को कुछ नहीं कहेगा।

चूंकि ये बात माकूल थी इस लिये पलट आए और अबु तालिब (अ.स.) के सामने ज़्यादा बातें करने की र्जुअत भी नहीं थी मगर दिलों में कदूरत लिये लौट आए , दिल साफ़ नहीं हुए। जब आदमी किसी चीज़ को रोक नहीं सकता तो फिर मसालेहत वाला रास्ता इख़्तेयार करता है। अब उन्होंने महसूस किया कि ऐसे रोकने से ये तहरीक रहने वाली नहीं है।

कुफ़्फ़ार का हंगामी इजलास

इधर दूसरी काफ़िरों की मीटिंग हुई। उसमें हसब ज़ौक़ उमर हसब मिजाज़ तजवीज़ें आईं। किसी ने कहा कि इस्लाम इस लिये है कि यह कुछ माल वग़ैरा चाहते हैं , दौलत के ख़्वाहिश मन्द होंगे जिस वजह से इन्होंने ला इलाहा इल्लल्लाह का चक्कर चलाया है। किसी ने कहा कि नहीं यह तुम्हारा ख़्याल है उन्हें पैसा वग़ैरा नहीं चाहिये क्यों कि ख़दीजा (अ.स.) से बढ़ कर मालदार कौन है ? किसी ने कहा कि हो सकता है कि अबु तालिब(अ.स.) अपने भतीजे की शादी किसी आला ख़ानदान में किसी ख़ूब सूरत लड़की से करना चाहता हैं इस लिये यह ग्राउण्ड बना रहे हैं। इस पर दूसरे ने इस बात की नफ़ी की और अपना ख़्याल ज़ाहिर किया कि ऐसी बात हरगिज़ नहीं अगर ऐसा होता तो गुज़िश्ता चालीस बरस से वो हमारे दरमियान रह रहा है , ऐसी ख़्वाहिश आज तक उसमें नहीं देखी गईं। यह यकी़नन बादशाहत का चक्कर है। वह बादशाह बनना चाहता है।

बहर हाल यह तमाम तजावीज़ात उन्होंने लाकर सरवरे काएनात के सामने रख दी। कहने लगे ऐ अबू ताबिल अपने भतीजे से कह दो ला इलाहा इल्लल्लाह कहना छोड़ दे जितनी दौलत चाहता है ले ले। अगर किसी ख़ानदान में निकाह का ख़्वाहिश मन्द है तो हम निकाह करने के लिये तैय्यार हैं। अगर बादशाहत का शौक है तो ला इलाहा इल्लल्लाह कहना छोड़ दे जिस दीन पर हम क़ाएम हैं उसी पर वो क़ाएम हो तो हम उनके सर पर ताज रख कर उन्हें बादशाह बना कर उनकी ताबेदारी के लिये तैय्यार हैं।

अबु तालिब (अ.स.) ने कहा ठीक है , मैं तुम्हारा यह पैग़ाम तुम्हारी पेशकश मुहम्मद (स.अ.) तक पहुँचा दुंगा। चुनान्चे वह रसूल (स.अ.) के पास आए और कहा भतीजे काफ़िर आए थे और यह कह रहे थे। बस रसूल (स.अ.) ने कहा ऐ चचा जान ! उन से कह दें कि अगर वह अपने एक हाथ पर चांद और दूसरे हाथ पर सूरज रख कर भी आजाएं तो मैं तबलीग़े ला इलाहा इल्लल्लाह से बाज़ नहीं आऊंगा। उनसे कह दें कि रिसालत वह मन्सफ़े जलीला है जो दौलत , हुस्न और हुकूमत सब को ठुकरा दे और काफ़िर वह हैं जो रिसालत के लिये दौलत , हुस्न और हुकूमत का तसव्वुर करें।

अब जिन महलों में दौलत मिले , हुस्न मिले , हुकूमत मिले यह अबु लहबी इस्लाम है और जो दौलत , हुस्न और हुकूमत को अपनी जूती की नोक पर भी न मारे समझ लो मोहम्मदी इस्लाम है। यह काफिर यहां से भी मायूस हुए और उनकी तरकीब कामयाब न हुई। अब मुख़ालिफ़त में मज़ीद शिद्दत हुई। इतनी शिद्दत हुई कि अबु तालिब (अ.स.) को यह ख़तरा ला हक़ हुआ कि इस बड़े हंगामे में मेरे भतीजे की जान न चली जााए।

मुहम्मद (स.अ.) शेबे अबु तालिब (अ.स.) में:- चुनान्चे अबु तालिब (अ.स.) रसूल (स.अ.) को ले कर अपने उस क़िला नुमा मकान में चले गए जो एक पहाड़ की घाटी में था , जहां अच्छी तरह हिफ़ाज़त की जा सकती थी , उस जगह का नाम शेबे अबु तालिब (अ.स.) था और वहां से हर आने जाने वाले आदमी पर नज़र रखी जा सकती थी और हर तरह के हमले का सामना किया जा सकता था।

काफ़िरों ने सोशल बाईकाट कर दिया और काफ़िरों की यह स्कीम थी कि रसूल (स.अ.) की तरफ़ जाने वाली लाईन काट दो ताकि यह भूख प्यास से तंग आ कर अपना मिशन रोक देंगे या मर जायेंगे और हमारा मक़सद हल हो जायेगा। बाहर निकलेंगे तो हम अपनी शराएत पेश करेंगे और अपनी शराएत पर सुलह करेंगे।

तारीख़त शाहिद है कि यह मुहासेरा तीन बरस तक रहा। आज जिसका जी चाहे वो मोहसिने इस्लाम बने , मुहाफ़िज़े दीन बने जो खि़ताब दिल चाहे हासिल करे उसे अख़्तियार है लेकिन जिस वक़्त इस्लाम ख़तरे में था , सभी रिसालत के दुश्मन थे , ला इलाहा इल्लल्लाह ख़तरे में था उस वक़्त फ़क़त यह अबु तालिब (अ.स.) का फ़रज़न्द था जो काम आ रहा था। एक दो दिन नहीं बल्कि पूरे तीन बरस यह सख़्त मुहासेरा जारी रहा।

तारीख़ शाहिद है कि यह कमाल अली (अ.स.) का है कि उस सख़्त तरीन मुहासरे के बावजूद वो हर ज़रूरते ज़िन्दगी रसूल (स.अ.) को मोहय्या करते रहे। ख़बर आती थी कि चार मश्कें पानी और दस बोरी गेंहू पहुँच गया है। पहुँचाया कैसे ? हम तो इधर पहरे पर बैठे थे और वो मेन लाईन से ले गए। हम यह सोच भी नहीं सकते थे कि वह दिन की रौशनी में सबके सामने से ले गए , न तो उनमें से कोई अली (अ.स.) को गिरफ़्तार कर सका और न सामान छीन सका। ऐसे अली (अ.स.) नासिरे नबूवत के फ़राएज़ अन्जाम देते रहे।

ग़ौर फ़रमाईये , इस्लाम के नाम पर खाने वाले लाखों लेकिन रसूल (स.अ.) तक ग़िज़ा पहुँचाने वाला कोई नहीं। ख़बरे मुतावातिर पहुँच रही थीं आज इतनी ख़ुराक पहुँच गई , इतनी दूसरी अश्या पहुँच गईं।

हज़रात ! ज़रा अबु लहब के ज़हन से सोचिये या दीगर कुफ़्फ़ार के ख़्यालात का अन्दाज़ा लगाईये कि उनके दिल पर क्या गुज़रती होगी , जब उनकी हर साज़िश अली (अ.स.) के हाथों नाकाम हो रही थी। इसी तरह तीन बरस गुज़र गए और अली (अ.स.) से दुश्मनी का पौधा फ़लता रहा। तारीख़ गवाह है कि उस मुआहदे को दीमक खा गई थी। रसूल अल्लाह (स.अ.) ने फ़रमाया मैं निकलता हूँ और यह कह कर आप बाहर तशरीफ़ ले आए और मुहासेरा ख़त्म हो गया।

फिर तबलीग़ शुरू हो गई और मुख़ालिफ़त भी शुरू हो गई अब वो मक्का जहां ज़िन्दगी अपने बारह साल तमाम कर चुकी है , इस मुख़ालिफ़त और हंगामे के माहौल में इस्लाम के दो बडे मोहसिन यानि हज़रत अबु तालिब (अ.स.) और उम्मुल मोमेनीन जनाबे ख़दीजातुल कुबरा (अ.स.) एक ही साल में रूख़सत हो गए।

उनकी जुदाई ने रसूल (स.अ.) को ग़म ज़दा कर दिया। आप ग़म व हुज़्न में डूब गए। इतना सदमा हुआ कि सरवरे काएनात ने उस साल को ‘‘ आमुल हुज़्न ’’ यानि ग़म का साल मुक़र्रर किया।

काफ़िरों ने मीटिंग की कि अब क्या करना चाहिये , तो उन्होंने तय पाया कि उनको क़त्ल कर दें क्यों कि अब उनके दो मोतबर मद्दगार नहीं हैं , अब डर कोई नहीं।

मुझे अफ़सोस है आज के मुसलमानों पर जो कहते हैं कि अबु तालिब (अ.स.) ईमान नहीं लाए थे जब कि उस दौर के दुश्मन काफ़िर यह तस्लीम कर रहे थे कि अबु तालिब (अ.स.) मोहसिने रिसालत हैं। ख़ैर तजवीज़ यह तय पाई कि उनको क़त्ल कर दें लेकिन बनी हाशिम ज़िन्दा नहीं छोड़ेंगे , गो अबु तालिब (अ.स.) नहीं रहे अली (अ.स.) तो हैं। आखि़र में यह तजवीज़ आई कि कोई एक आदमी मोहम्मद (स.अ.) को क़त्ल न करे बल्कि तमाम अरब के क़बाएल का एक एक आदमी उनके जिस्म पर तलवार लगाए ताकि क़त्ल मुशतरका तलवारों से हो और उनका ख़ून सारे कु़रैश में बटे और यह बनी हाशिम को तमाम क़बाएल से लड़ना मुश्किल होगा वह बदला नहीं ले सकेंगे। लिहाज़ा क़ातिल भी बच जायेंगे और मुहम्मद (स.अ.) नाऊज़ो बिल्लाह क़त्ल भी हो जायेगें।

यह तजवीज़ सबको पसन्द आई और इन्हें अपनी इस बेहतरीन प्लानिंग पर बड़ी ख़ुशी हुई कि हम ने अब कामयाब हो जाना है मगर एक बोला , नहीं अब भी एक नुक़्स है वह यह है कि तमाम क़बाएल के अफ़राद तो जमा हो जाऐंगे मगर क़ुरैश में एक क़बीला बनू हाशिम भी है उनमें कौन हमारा साथ देगा ?

अगर बनी हाशिम वाला भी कोई उनमें शरीक होता तो हमारे दामन पर जो बदनामी का धब्बा लगने वाला है वो भी न लगता। इस काम के लिये अबू लहब ने अपने आपको पेश किया , इस लिये कि वह बनू हाशिम का पोता था उसने कहा कि मैं हाशिम की तरफ़ से तलवार मारूंगा।

अब आप जितनी मरज़ी उस पर लानत कर लें मगर कुफ़्फ़ार ने तो उनकी बड़ी तारीफ़ की होगी। उन्होंने तो कहा होगा कि क्या शान है आपकी , कितने बुज़ुर्ग हैं आप दीन की ख़ातिर आपकी यह क़ुर्बानी है यह सब आपके दम से ही है बुतों को सिर्फ़ एक आपके दम का सहारा है।

उन्होंने कहा हाँ मैं मारूंगा। क़त्ले रसूल (स.अ.) की यह बदतरीन तजवीज़ थी। वह बदतरीन लोग थे जिन्होंने यह साज़िश की थी उन बदतरीन इंसानों को भी इतना होश था कि इज्तेमा करें तो बनी हाशिम के नुमाइन्दे को शामिल कर लें। क़त्ले नबी (स.अ.) के लिये जमा हुए तो हाशमी को बुलाया। इधर यह जमा हुए , उधर अल्लाहा ने जिब्राईल (अ.स.) को रसूल (स.अ.) के पास भेजा , ‘‘ ऐ मेरे हबीब ! आज काफ़िरों ने अरब के सारे क़बाएल को जमा कर के यह तजवीज़ बनाई कि मुहम्मद (स.अ.) को सोते में मिल कर क़त्ल करें । ’’ बिस्तर पर ख़बर आ गई , जिब्राईल (अ.स.) ने आ कर कह दिया। रसूल (स.अ.) ने अली (अ.स.) को बुलाया , कहा या अली ! अभी अभी जिब्राईल आए थे और अल्लाह का पैग़ाम सुना कर गए हैं अल्लाह ने कहला भेजा है कि काफ़िरों ने तय पाया है कि तमाम अरब क़बाएल मिल कर आज रात मुहम्मद (स.अ.) के बिस्तर पर हमला कर देंगे और मुझे टुकड़े टुकड़े कर दें। या अली (अ.स.) क्या आज रात मेरे बिस्तर पर सो जाओगे ? दूसरे लफ़्ज़ों में कहूं कि आज रात मेरे बदले बिस्तर पर क़त्ल होना पसन्द करोगे ?

अली (अ.स.) बिस्तरे रसूल (स.अ.) पर:- अली (अ.स.) मुस्कुरा कर कहने लगे या रसूल अल्लाह (स.अ.) ! क्या मेरे क़त्ल होने से या मेरे सोने से आपकी जान बच जायेगी ?

कहा , हां या अली !

जैसे ही रसूल (स.अ.) की ज़बान से हां निकला अली (अ.स.) का सर सजदे में गिर गया। अली (अ.स.) ने सजदा ए शुक्र अदा किया और सजदे से सर उठा कर कहा , जाइये रसूल (स.अ.) मैं सो रहा हूँ। तमाम रात अली (अ.स.) आराम से सोए रहे बल्कि तारीख़ कहती है कि पूरी ज़िन्दगी इस रात के अलावा जी भर कर नहीं सोए। अली (अ.स.) सो रहे हैं और काफ़िर घर का चक्कर काट रहे हैं । कु़दरत भी शायद यह मन्ज़र देख कर ख़ुश हो रही होगी कि ठीक है काटे जाओ चक्कर। बिस्तर पर कुल्ले ईमान सो रहा है और कुफ़्र सदके़ हो रहा है। रात भर यह काफ़िर जागते रहे और घर का पहरा देते रहे। रात भर जागने से तबीयत में गिरानी है या नहीं ? और जाग इस उम्मीद पर रहे हैं कि यूं तलवार लगाएगे , यू गला काटेंगे , तरह तरह की तराकीब ज़हनों में जन्म ले रही थीं। बारह साल पहले दावते ज़ुल अशीरा में अबु तालिब (अ.स.) ज़िन्दा थे तब कुछ न कर सके। हमारे बच्चों को पिटवाया कुछ न कर सके , तीन साल मुहासेरा किये रहे तब भी कुछ न कर सके। एक एक बात याद आ रही थी हर दिल में एक अजीब ग़ुस्सा था , यहां तक कि सवेरा हो गया और सुबह की किरने फूटीं कोई भयानक क़िस्म का काफ़िर दीवार पर चढ़ का नीचे कूदा और उस के पीछे दो चार और कूदे इधर सोने वाले ने चादर उल्टी , नज़र से नज़र मिली , आंखें मिली , आंखें दो से चार हुईं , बढ़े हुए क़दम रूक गए , तलवार वाले हाथ जो उठे थे उठे ही रह गए। सब से आगे वाले काफ़िर ने चीख़ कर पूछा कहां गए तुम्हारे भाई ? अली (अ.स.) ने ग़ुस्से में कहा , क्या मेरे हवाले कर गए थे जो मांगने आए थे ? काफ़िर गु़स्से और डर से थर थर कांप रहे थे। आगे बढ़ने की जुरअत नहीं हो रही थी क्यों कि थे तो वही तो बचपन में पिट चुके थे वो गुज़रा हुआ ज़माना आंखो के सामने घूम रहा था। जहां थे वहीं रूक गए। इधर उधर देखा वो तो गए। यह जो नाकाम और मायूस पलटे होंगे , हवा में तलवार लहराते जाते क्या क्या सोच कर आए थे , घरों में कह कर आए थे कि आज रात हम घर नहीं आयेंगे , आज रात हम मोहम्मद का सर काटने जा रहे हैं , हमारा इन्तेज़ार न करना।

अब सुबह सुबह अपने दरवाज़े पर पहुँचे होंगे , दरवाज़ा ख़ुला होगा , सवाल हुआ होगा कि काट आए मोहम्मद का सर ? गु़स्से में तलवार इधर फ़ेकी , अबा इधर फेंकी , अरे क्या काट आए मोहम्मद का सर क्या हुआ ? क्या होना था वही हुआा। अरे कुछ तो बताओ। क्या बताएं वो निकल गए , वहां अली सो रहे थे। हम समझे कि मोहम्मद सो रहे हैं। अली की वजह से स्कीम फे़ल हो गई , हम ने तो काम कर दिया था। क्या वही अली जिसने हमारे भाई को मारा था ?

कहा , हां हां वही अली इब्ने अबी तालिब ।

अब यह दुश्मनी का पौधा जवान हो गया , इधर दुश्मनी का पौधा जवान हुआ , उधर हमारे दिलों में मोहब्बत का पौधा जवान हो गया। इधर बिस्तरे रसूल (स.अ.) पर अली (अ.स.) सो गए उधर ख़रीदार की सदा आई।

ख़रीदार भी कौन जो बादशाहों का बादशाह है। आदिल है , जौहरी है इस लिये माल की जांच पड़ताल करेगा , खोटा माल नहीं लेगा। बादशाह है इस लिये बेहतरीन माल ख़रीदेगा क्यों कि अद्ल से ख़रीदारी करेगा जैसा माल होगा वैसी क़िमत अदा करेगा।

ख़रीदार ने जिन्स को देखा , इब्तेदा देखी , ज़हन की परवाज़ देखी दिल की गहराई देखी , तन्हाई की ज़िन्दगी देखी , वफ़ादारी देखी , जब इब्तेदा से इन्तेहां तक देख लिया कहीं कोई धब्बा तो नहीं , कोई दाग़ तो नहीं , बे दाग़ नगीना है , मेरे ख़ज़ाने के लायक़ है। अब जौहरी हर तरह से मुतमईन हो गया और सोचने लगा कि इस बेश किमती नगीने की क्या क़ीमत लगाए ? सोचा जन्नत दे दी जाए , फिर कहा वो तो कम है क्यों कि यह तो उसकी तीन रोटियों के बारबर है।

फिर कहा विलायत दे दी जाए , फिर कहा , नहीं वो तो उसकी एक अंगूठी में मिल जाएगी। इबादतों का सवाब दिया जाए , कहा यह भी कम है , वह तो उसकी एक ज़र्बत में मिल जाएगी। जब ख़रीदार ने अपने ख़ज़ाने में नज़र दौड़ाई तो कहा फिर क़ीमत क्या दी जाए। तो ख़ुदा ने ही फ़ैसला किया कि मेरी रिज़ाए उसकी हो जाएं और उसका नफ़्स मेरा हो जाए।

अब रिज़ाए इधर आ गईं , नफ़्स उधर चला गया। वहां ख़रीद व फ़रोख़्त हो गई , सौदा हो गया , बैनामा क़ुरआन में है , सब ज़िक्र कु़रआन में है ताकि झगड़ा न हो सके।

व मिनन्नासे मन् यशरी नफ़्सहुब्तेग़ाअ मरज़ातिल्लाह बैनामा क़ुरआन में रजि. है अल्लाह ने झगड़ा ही ख़त्म कर दिया है नफ़्स बेचा अली (अ.स.) ने ख़रीदा ख़ुदा ने।

अजीब मन्ज़िल है , यह बेचना और ख़रीदना क्या है ? मिल्कियत का तबादला क्या है । शबे हिजरत से पहले पहले जिसको अल्लाह की रिज़ा (मर्ज़ी) चाहिये वह अल्लाह के पास जाए और हिजरत और हिजरत के बाद जिसे अल्लाह को राज़ी करना है वह अली (अ.स.) के पास आए। जिसको अली (अ.स.) से बैअत लेनी है ख़ुदा से बैअत ले। तारीख़े इस्लाम की यह मशहूर बात है और तारीख़ दिन में यह रात तमाम रातों से मुख़्तलिफ़ है कि रसूले ख़ुदा (स.अ.) के बिस्तर पर एक बन्दे ने अपना नफ़्स अल्लाह को बेचा है। उस रात अल्लाह मख़्लूक़ से एक जान , नफ़्स ख़रीद रहा है और एक नफ़्स के बदले में क़ीमत क्या है ? क़ीमत है अल्लाह की रिज़ा । अल्लाह ख़ुद अपनी मर्ज़ियां दे रहा है तो जब यह सौदा हुआ तो उस वक़्त अली (अ.स.) की शादी नहीं हुई थी , क्यों कि यह वाक़ेया है मक्का का और शादी हुई है मदीना जाके , बस समझ में आ गया कि नस्ले अली (अ.स.) में जितने अली (अ.स.) होंगे वो ख़ुदा के हाथ बिके हुए होंगे और जो अली (अ.स.) का वारिस होगा वह रिज़ाए का वारिस होगा।

हां हां यह कोई छोटी फ़ज़ीलत है ? उससे बढ़ कर और क्या फ़ज़ीलत हो सकती है लेकिन इधर भी तो देखिए कि बिस्तरे रसूल (स.अ.) उस रात कोई अमन की जगह नहीं। तलवारों के साए में , तीरों के निशाने पर , अल्लाह के दीन की ख़ातिर , रसूल (स.अ.) की रिसालत के लिए अबु तालिब (अ.स.) का लख़्ते जिगर सो गया ।

आवाज़े क़ुदरत आई , ऐ अली हमें जान की ज़रूरत पड़ी तुम ने दी , अब जहां मेरी रिज़ा की ज़रूरत पड़े दे देना। ऐ अली आज मेरी रिज़ा तेरी रिज़ा और तेरी जान मेरी जान। ग्यारह मरतबा ज़िन्दगी मांगी तो ज़िन्दगी पेश कर दी , बारहवीं दफ़ा कहा कि तुम्हारी हयात चाहिये। कहा ऐ माबूद ! जो तेरी मर्ज़ी , हम तेरे लिये ही जीते हैं और तेरे ही लिये शहादत क़ुबूल करते हैं।। अब समझे।

बस काफ़िर तिलमिला कर रह गए। तेरी बरस की दुश्मनीं और फिर उस रात , जिस रात उन्होंने अपनी कामयाबी के ख़्वाब देखे थे सब अधूरे रह गए।

आज दुनियां हैरान होती है कि अली (अ.स.) से मदद क्यों मांगते हैं , अली (अ.स.) के सदके़ , अली (अ.स.) के वसीले से दुआए क्यों मांगी जाती हैं। अरे ना समझ ! समझ नहीं आती कि अल्लाह की रिज़ा चाहिये तो जिसके पास रिज़ा कन्ट्रोल है उसके ज़रिए ही अल्लाह राज़ी होगा। अल्लाह आदिल है , अल्लाह अली (अ.स.) के बग़ैर राज़ी नहीं होता क्यों कि यह बात खि़लाफ़े अद्ल है कि एक चीज़ एक चीज़ के बदले में दे दी गई हो , फिर उसको इस्तेमाल किया जाए , उस नफ़्स के बग़ैर जिसके बदले में अल्लाह ने अपनी रिज़ा दी , मगर न जाने क्यों अली (अ.स.) से अदावत है इन लोगों को ?

ख़ैर जूं जूं उनके दिलों में अदावत बढ़ती जाऐगी , हमारे दिलों में मुहब्बत बढ़ती जाएगी।


हिजरते मदीना

अब मक्का की ज़िन्दगी ख़त्म हुई। रसूल (स.अ.) हिजरत कर के मदीने की तरफ़ तशरीफ़ ले गए। अली (अ.स.) रसूल (स.अ.) के बाद तीन दिन तक मक्का में रहे और बहुक्मे रसूल लोगों की अमानतें उनके हवाले कीं और ख़ानदाने रसूल (स.अ.) की कुछ मिख़्दारात को साथ लिया और मदीना रवाना हो गए।

अच्छा एक बात और आपके अज़हान और क़ुलूब तक पहुँचाता चलूं कि अहले बैत (अ.स.) ने इस्लाम को ज़िन्दा करने के लिये क्या किया ? यानि अहले बैत (अ.स.) से जो मवद्दत और मुहब्बत अल्लाह मांग रहा है यह क्या है ?

यह अहले बैत (अ.स.) पर कोई ईनाम नहीं कि बहुत बड़ा ईनाम है जो अहले बैत (अ.स.) की मुहब्बत वाजिब क़रार पाई है। यह हज़रात मुहम्मद (स.अ.) और आले मोहम्मद (अ.स.) की खि़दमात का सिला है।

इस्लाम से फ़ायदा उठाने वाले , इस्लाम के दस्तरख़्वान पर बैठ कर लज़ीज़ खाने तनावुल फ़रमाने वाले और इस्लाम के नाम पर दौलत ज़ख़ीरा करने वाले तो दुनियां में करोड़ों नहीं अरबों मिलेंगे लेकिन इस्लाम पर जान क़ुर्बान करने वाले वो , इस्लाम की बक़ा लिये अपना ख़ून निछावर करने वाले , इस्लाम पर बच्चे क़ुरबान करने वाले और इस्लाम पर अपने सर की बाज़ी लगाने वाले ढंूढ़ेगे तो बहुत कम मिलेंगे।

नहीं यकी़न तो आओ करबला के सहरा में देखो जो हुसैन (अ.स.) के साथी जो अहले बैत (अ.स.) हैं कितने है और इस्लाम से बग़ावत करने वाले कितने हैं ?

आले मोहम्मद (अ.स.) वह लोग हैं जिन्होंने इस्लाम से अपनी ज़ात को कोई फ़ायदा नहीं पहुँचाया बल्कि अपनी ज़ात से इस्लाम को फ़ायदा पहुँचाया। सो उनकी मुहब्बत फ़र्ज़ कि जाए तो यह ऐन अहसान शनासी है क्यों कि इनाम ही होता है जो बग़ैर खि़दमत के मिले और जो मामला तय किया जाए एक चीज़ के बदले में दूसरी चीज़ दी जाए उसे इनाम नहीं कहा जाता ।

यह जो मोहब्बत फ़र्ज़ की गई है यह सिला है आले मोहम्मद (अ.स.) की खि़दमत का। यह जो अली (अ.स.) और औलादे अली (अ.स.) से दुश्मनी है यह कैसे बढ़ती गई तो उम्मीद वासिक़ है कि कल की बात आपके अज़हान में होगी तो मैं सिलसिले वार आपकी खि़दमात में अर्ज़ करता जाऊँ।

कल बात शबे हिजरत तक पहुँची थी। बस एक जुमला सिलसिलेवार सुनिए दावते जु़ल अशिरा से बात की इब्तिदा हुई और काफ़िरों ने उस दावत का मज़ाक उड़ाया और उनके दिलों में पहला फ़र्क़ आया। जहां अली (अ.स.) ने उठ कर रसूल (स.अ.) की नुसरत का वायदा किया। दूसरे मौक़े पर दिल अज़ारी उस वक़्त हुई जब उनकी स्कीम जो उन्होंने बच्चों के ज़रिए की थी वो फ़ेल हो गई। तीसरे मौक़े पर उन्हें तकलीफ़ उस वक़्त हुई जब शेबे अबी तालिब (अ.स.) रसूल (स.अ.) के पूरे तीन साल ज़रूरियाते ज़िन्दगी और ग़िज़ा पहुँचाते रहे और चैथे मौक़े पर उनको तकलीफ़ पहुँची कि उनकी इतनी बड़ी साज़िश जिसकी कामयाबी का उन्हें भर पूर यक़ीन था। इस लिये कि रसूल (स.अ.) के दो अहम सहारे ख़त्म हो गए थे। उम्मुल मोमेनीन जनाबे ख़दीजा (अ.स.) और दूसरे सरकार अबू तालिब (अ.स.)।

लिहाज़ा उन दोनों के उठ जाने से कुफ़्फ़ार के हौसलें बुलन्द हो गए थे। उन्होंने रसूले ख़ुदा (स.अ.) को मारने का बड़ा कामयाब मन्सूबा बनाया था मगर अल्लाह तआला ने अपने रसूल को हिजरत का हुक्म भेज दिया और अली (अ.स.) को बिस्तर पर सुला दिया। यह भी अल्लाह तआला की मसलहत थी वरना अगर चाहता तो काफ़िरों को र्जुअत ही न होती।

मगर शायद वजह यह ही हो कि इस लिये हुक्मे हिजरत दिया गया कि हम यह सुनते हैं अकसर लोग पूछते हैं कि अकेली ख़दीजा ही दौलत मन्द थीं और भी कई दौलत मन्द रसूल (स.अ.) के साथ थे और क्या अकेले ही अबू तालिब (अ.स.) बाअसर थे और भी तो कई बाअसर थे जो रसूल (स.अ.) के साथ थे। अगर थे तो फिर रोक क्यों न लिया तमाम अरब के क़बाएल जमा हो रहे हैं किसी चन्द एक को ही रोक लिया होता। मगर अल्लाह ने हुक्मे हिजरत दिया और हुज़ूर (स.अ.) हिजरत कर के सिधार गए और अब मौला अली (अ.स.) कारवां को लिए और मख़दूराते इस्मत को लिये हुए मदीना पहुँचे।

रसूल (स.अ.) मक्का छोड़ कर मदीने चले गए , मक्का वालों को अब भी चैन न आया , फिर प्रोपेगण्डे शुरू हो गए। निपट लेगें , छोड़ेंगे नहीं , हम देख लेंगे। पालिसियां बनाते बनाते साल गुज़र गया , साल के बाद 1000 कुफ़्फ़ार का मुकम्मल जर्रार लश्कर तैयार किया गया। पूरे लश्कर के पास बेहतरीन अस्लहा , बेहतरीन सवारी और बड़े नामवर काफ़िर , बड़े जंगजू फौजी , अरब के बड़े बड़े पहलवान चले मुहम्मद (स.अ.) का सर काटने।

अली (अ.स.) बद्र के मैदान में

तारीख़ गवाह है कि रसूल (स.अ.) के पास कुल 313 आदमी और उनमें भी बे सरोसामानी का आलम। तीन आदमी सवार बक़िया सब पैदल और किसी के पास नैज़ा है तो तलवार नहीं , किसी के पास तलवार है तो तीर नहीं , किसी के पास ज़िरह नहीं , किसी के पास ढ़ाल नहीं , इस तरह लश्कर के पास सामाने जंग भी सही नहीं।

अब यह 313 का लश्कर लेकर सरवरे काएनात निकले उन एक हज़ार आदमियों का मुक़ाबला करने। बद्र नामी एक कुआं था मदीने के पास जिसकी वजह से यह जंग जंगे बद्र के नाम से मशहूर है। उस कुंए पर सरकारे दो आलम ने अपना लशकर तरतीब दिया जब कि उनके मुक़ाबले एक हज़ार का लशकर है। लशकरे कुफ़्फ़ार से तीन आदमी निकले और निकल कर उन्होंने रसूल (स.अ.) के लशकर को ललकारा।

रसूल (स.अ.) के लशकर में दो तरह के लोग थे , एक महाजिर थे और दूसरे अन्सार , जिन्होंने मदीना में रसूल (स.अ.) की मेज़बानी फ़रमाई।

अन्सार हाज़िर खि़दमते रसूल (स.अ.) हुए और कहा , सरकार ! आप और आपके शहर वाले हमारे मेहमान हैं , इस लिये हमारी ग़ैरत यह गवारा नहीं करती कि हमारे होते हुए हमारे मेहमान मैदाने जिहाद में जाएं और हम लश्कर में खड़े देखते रहें लिहाज़ा आप हमें इजाज़त बख़्शें , हम मैदान में जाते हैं। जब तक हम तमाम अन्सार राहे ख़ुदा में शहीद होते हैं आप और आपके साथी आराम से बैठें , हम लडे़गें। यह बात सुन कर रसूल (स.अ.) ख़ामोश हो गए और तीन अन्सार उन तीन काफ़िरों के मुक़ाबले में निकल आए।

तारीख़ शाहिद है कि जब काफ़िरों ने उन तीन अन्सारों को देखा तो रसूल (स.अ.) का नाम ले कर आवाज़ दी और कहा , ऐ मुहम्मद ! हम क़ुरैश हैं और हम सरदार हैं , ख़ानदानी हैं , दस्तूरे अरब के मुताबिक़ हमारे मुक़ाबले में कोई सरदार भेजो , हम अन्सारों से नहीं लड़ेंगे।

हमारी तौहीन है , हम पस्त ख़ानदान के लोगों से लड़ें , उनको क़त्ल करना भी हमारी तौहीन है और उनके हाथों क़त्ल होना भी हमारी तौहीन है।

रसूल (स.अ.) ने उन तीनों को आवाज़ दी कि पलट आओ , चूंकि हुक्मे रसूल (स.अ.) था वह पलट आए। अब क्या हुआ , रसूल (स.अ.) ने तीन सरदार चुने और वह मैदान में गए , अगर ऐतेराज़ न हो तो बताता चलूं कि वह तीन सरदार कौन थे ? यह तीनों रसूले अकरम (स.अ.) के घर के आदमी थे। पहले हज़रत हमज़ा रसूल (स.अ.) के चचा , और दूसरे हज़रत उबैदा रसूल (स.अ.) के चचाज़ाद भाई , और तीसरे जनाबे अमीरूल मोमेनीन हज़रत अली (अ.स.) यह भी रसूल (स.अ.) के चचा ज़ाद भाई। रसूल (स.अ.) ने इन तीनों को भेजा और फ़रमाया कि देखो और इतमीनान कर लो , इनसे तो लड़ोगे ?

तारीख़ उठा कर देख लो कि लश्करे इस्लाम से यह जो तीन सरदार निकले , उनमें सब से कमसिन हज़रत अली (अ.स.) थे। अली (अ.स.) की उम्र उस वक़्त 24 साल थी और जा कर उन तीनों काफ़िरों का मुक़ाबला किया। उनमें से सब से पहले जिसने मुक़ाबला में अपने बिलमुक़ाबिल काफ़िर को फ़िन्नार किया वह मौला अली (अ.स.) थे।

हम यहां आपको शायद पूरी जंगे बद्र तो न सुना पाएं लेकिन अहम निकात यह तवज्जो ज़रूर दिलाएंगे।

अब जंगे बद्र क़ाबिले दीद थी कि इधर मैदान में अली (अ.स.) और उधर तेरह साल के पिटे काफ़िर , वह भी थे जो बचपन में भी अली (अ.स.) के हाथों पिटे थे और उनके बाप भी , और वह भी थे जो रात भर शबे हिजरत टहलते रहे थे और सब जले भुने लोग अली (अ.स.) को देख रहे थे। एक गिरा तो दूसरा आया , वह भी गया , तीसरा बड़ा पहलवान आया , मैं उससे मुक़ाबला करूंगा , वह भी वासिले जहन्नम हुआ। जब दस बारह काफ़िर अली (अ.स.) के हाथों वासिले जहन्नम हुए तो सब काफ़िर बिलबिला कर अबू जहल से कहने लगे , चचा ! अब आप ही जाएं यह लड़कों के बस की बात नहीं। उन्होंने कहा , हां भई । अब मुझे ही जाना पड़ेगा , देखो मैं चलता हूँ। अब चचा चले होंगे मसलन 46, 47 साल के होंगे। बड़े ताक़तवर , लहीम सहीम , बड़े जंग जू। अब जो देखा तो वह चचा भी , भतीजे भी गए। अब जानते हो लड़ाई का क्या रूख़ हो गया ? बस अली (अ.स.) की तलवार पहले से ज़्यादा तेज़ चलना शुरू हो गई हत्ता कि काफ़िर अपने लाशे छोड़ कर , क़ैदी छोड़ कर भागे।

उधर में हिसाब हो रहे हैं कि 8 दिन जाने में लगे और 8 दिन आने में यह 16 दिन भी निकल गए मुम्किन है कि तीन चार दिन लड़ाई में लग गए हों यह तीन दिन भी निकल गए। जब 20 दिन हुए तो इन्तेज़ार शुरू हुआ। बच्चों की ड्यूटी लगा दी गई वह सारा सारा दिन पहाड़ों की चोटियों पर जमा हो जाते और लश्कर के आने का इन्तेज़ार करने लगे। अब लड़कों को एक दिन दूर से एक लश्कर आता दिखाई दिया कि लश्कर आ रहा है। उन्होंने तुरन्द घरों में इत्तेला दी , अब बड़े भी जमा हो गए , उन्होंने देखा कि मालूम हो रहा है लेकिन नज़रे कमज़ोर होने की वजह से मालूम नहीं होता। यह बात तो उनकी दुरूस्त थी। वाक़ई अगर नज़रे दुरूस्त होतीं तो हक़ को न पहचान लेते।

अब लश्कर क़रीब आना शुरू हुआ। पहचान गए कि यह वही लश्कर है जो गया था। जूं जूं लश्कर क़रीब पहुँचा तो यह सब लोग भी उनके इस्तेक़बाल के लिये बढ़े कि लश्कर गया था मदीने मोहम्मद का सर लेने और मोहम्मद का सर ला रहे होंगे। उन्होंने कहा चेहरा कोई दिखाई नहीं दे रहा , शायद किसी सन्दूक़ में सर को बन्द किया हो। अब यह बढ़ कर उनके बिल्कुल क़रीब हुए तो देखा कि चेहरे उतरे हुए हैं हवास फ़ाख़्ता हैं। जब सामने आए तो कहा , कहो भई क्या हुआ ? उन्होंने कहा वही हुआ जो पहले होता था। कहने लगे मोहम्मद का सर लाए हो ? उन्होंने कहा ? तुम तो 1000 जंग जू थे तो कैसे हार गए ? कहने लगे , बस हम हार गए। वह कहते हैं , क्यों ? क्या मोहम्मद के साथ बहुत बड़ा लश्कर था ? क्या उनके पास बहुत क़ीमती हथियार थे ? या उनकी सवारियां तुम्हारी सवारियों से बेहतर थीं ? कहने लगे , न लश्कर बड़ा था , न हथियार ज़्यादा थे। बस अली की वजह से हमें शिकस्त हुई। अली न होते तो हम तमाम लश्कर को कच्चा चबा जाते। उसने हमारे बड़े बन्दे मारे हैं।

सामेईन ! अच्छा अब आप इन्साफ़ से बताए कि जब लश्कर आ रहा हो और साथ में यह बात कहें कि सबको अली ने क़त्ल किया तो हर एक अपने रिश्तेदारों को ढूंढ़ेगा या नहीं ? बस यह फ़ितरी बात है कि हर को ढंूढेगा अपने रिश्तेदारों को । एक आया लश्कर में एक एक को देखता रहा और पुकार कर कहने लगा कि मेरा लड़का नहीं है। पता चला कि वह अली (अ.स.) के हाथों मारा गया। दूसरा आया तलाश करते करते कहने लगा कि मेरा भाई नहीं है तो पता चला कि वह अभी अली (अ.स.) के हाथों मारा गया। तीसरा बढ़ा कि मैं देखूं कि मेरे वालिदे मोहतरम मोहम्मद (स.अ.) का सर काटने के बड़े ख़्वाहिशमन्द थे। ढूंढता रहा तो पता चला कि बाप भी अली (अ.स.) के हाथों वासिले जहन्नम हुआ। जब चारों तरफ़ से अली (अ.स.) अली (अ.स.) होना शुरू हुई।

सामेईन हज़रात ! आप चन्द लम्हों के लिये ज़रा मक्का के काफ़िरों के ज़हन का अन्दाज़ा लगाएं कि जब हर घर में अली ने मारा , अली ने मारा की आवाज़ें आईं तो माहौल क्या होगा ? हर तरफ़ काफ़िर (आदमी औरत) अली (अ.स.) को कोसने लगे। कोई कहता अली ने मेरे बाप को मारा , कोई कहता अली ने मेरे भाई को मारा , कोई कहता अली ने मेरा बेटा मारा और हिन्दा का तो सारा ख़ानदान ही ख़त्म हो गया।

मोमेनीन कराम ! हिन्दा जानते हैं कौन है ? हिन्दा यज़ीद मलऊन की दादी है , मुआविया की मां है और अबु सुफ़ियान की बीवी है। उसका सारा ख़ानदान साफ़ हो गया। उसका बाप , उसका चचा , उसका भाई और इस्लाम का सबसे बड़ा दुश्मन और उनका सरदार अबु जहल भी मारा गया।

अबु जहल चूंकि गया नहीं था वह उस ग़म में घुल घुल कर मर गया। हर तरफ़ चर्चा था अली , अली , अली।

किसने मारा ? अली ने।

किसकी तलवार लगी ? अली की।

किसने सर काटा ? अली ने।

बस हर तरफ़ अली ने मारा , अली ने मारा की आवाज़ें आ रही थीं। अब क्या हुआ , अबु सुफ़ियान ने क़यादत संभाल ली। अब तक तो अबु जहल और अबु लहब साथ साथ थे। अबु जहल बद्र में मारा गया और अबु लहब उसके ग़म में घुल घुल कर मर गया बाक़ी रह गया अबु सुफ़ियान , अबु सुफ़ियान पर एक मुसीबत आन पड़ी । वह मुसीबत क्या थी ? सुन लीजिए।

हाज़रीने कराम !

ज़िन्दगी में आप लोगों को तर्जुबा होगा कि बहुत सी बातें ऐसी होती हैं जिसमें बीवी अपने शौहर को कसूर वार समझती है तो हिन्दा ने कहा कि यह तुम्हारी ग़लती से हुआ। मसलन बीवी ने फ़र्माइश की कि फ़लां चीज़ मेरे लिये ले आना , शौहर ने बाज़ार से पता किया नहीं मिली , जब घर पहुँचा तो बीवी ने पूछा कि मेरी चीज़ लाए हो ? मर्द अब जितना मर्ज़ी यक़ीन दिलाने की कोशिश करे , बीवी यही कहती है कि तुमने पता ही नहीं किया होगा , कहीं देखा ही नहीं होगा , तुमने ढंूढा ही नहीं होगा। भला यह मुम्किन है कि चीज़ भरे शहर में मौजूद ही न हो ? तो ऐसी मुश्किल अबु सुफ़ियान पर आ पड़ी। कहने लगी , तुम लोग लड़े ही न होंगे , यह कैसे हो सकता है कि सबको अली ने मार डाला ? उसने बड़ा यक़ीन दिलाया कि हम यूं लड़े हैं , ऐसे हमले किये हैं और अली के हाथों पिट कर आ रहे हैं। हिन्दा कहती है कि तुम बहाने करते हो तुम लड़े ही नहीं ।

अब एक तो लड़ाई हार गए , जो मिलता है उसे समझाना मुश्किल है। घर आते हैं तो घर में बीवियां जूते मारती हैं। अब उसका बाप मारा गया , चचा मारा गया , भाई क़त्ल हो गया उसके कलेजे में आग के शोले भड़क रहे थे। अब यह मियां बीवी मिल कर तहरीक चलाने लगे , साल भर की मेहनत के बाद 3000 का लश्कर तैयार किया।

अबु सुफ़ियान यह तीन हज़ार का लश्कर ले कर दूसरे साल लड़ने के लिये रवाना हुआ कि इस दफ़ा हम बद्र की शिकस्त का बदला लेने जा रहे हैं और अबु सुफ़ियान की बे यक़ीनी का यह खुला सुबूत है कि हिन्दा इस दफ़ा उनके साथ रवाना हुई।

सवाल यह पैदा होता है कि पिछले साल जो लड़ाई हार चुके थे , ज़ख़्मी क़ैदी और लाशे छोड़ का भाग चुके थे उसका मतलब यह है कि मुसलमानों के मुक़ाबला आसान नहीं है। ऐसे मौक़े पर औरतों को साथ ले जाने का मसरफ़ क्या है ? अबु सुफ़ियान ख़ुद अपनी मर्ज़ी से हिन्दा को साथ नहीं ले गया था बल्कि यह ज़बरदस्ती गई थी कि मैं ख़ुद देखुंगी की अली के आगे लड़ कर तुम कैसे भागते हो ? मैं भी देखूं कि अली तुम को कैसे मारता है , तुम लड़ते नहीं हो।

अच्छा यह काफ़ेला चला , एक राइटर है ‘‘ अबु नुस्रान ’’ उसकी तहरीर है उन्होंने रसूल (स.अ.) की लाइफ़ हिस्ट्री लिखी है। सादुल्लाहुल अरब उनका नाम है। उसमें उन्होंने लिखा है , जब जंगे ओहद में काफ़िरों का लश्कर जा रहा था तो मक्का और मदीना के दरमियान एक जगह है जिसका नाम अलवा है। वहां रसूल (स.अ.) की वालेदा ए मोहतरमा की क़ब्रे मुबारक है। वह कहते हैं कि जैसे ही हिन्दा उस क़ब्र पर पहुँची और उसको मालूम हुआ कि रसूल (स.अ.) की वालेदा आमेना की क़ब्र है वह मचल गई कि मैं क़ब्र खोद कर हड्डियां निकाल कर उन हड्डियों को हार बना कर पहनुगी। वह कहते हैं कि यह बहुत बेचैन थी और बग़ैर क़ब्र खोदे जाने के लिये रिज़ा मन्द न थी और लिखते हैं कि रसूल (स.अ.) वहां से गुज़र रहे थे तो आप उस क़ब्र के सरहाने बैठे रहे। बहुत देर उनकी आंखों से अश्क जारी रहे , लोगों ने रसूल (स.अ.) को मां की क़ब्र पर रोते देखा।

अज़ीज़ाने गिरामी ! यह बात क़ाबिले ग़ौर है कि रसूल (स.अ.) का अमल , रसूल (स.अ.) का अमल था और हिन्दा का अमल एक काफ़िर औरत का अमल था लेकिन बाद में यह हिन्दा भी दाखि़ले इस्लाम हुई तो अब दोनों तर्ज़े अमल का फ़क्र समझ लीजिए।

जो मोहतरम क़ब्र के सराहने बैठ कर रोए वह रसूल (स.अ.) थे और जो क़ब्र की बे हुरमती करे वह हिन्दा है।

अब जब मुसलमानों में दोनों शामिल हो गए। मोहम्मद (स.अ.) वाला इस्लाम क़ब्र की ताज़ीम करेगा और अबु सुफ़ियान वाला इस्लाम क़ब्रों की तौहीन करेगा। बहर हाल यह लश्कर चला। सरवरे काएनात के पास उस वक़्त सात सौ आदमी थे और काफ़िर 3000 यानि काफ़िर मुसलमानों से चार गुना ज़्यादा थे।

अली (अ.स.) ओहद के मैदान में:- रसूल (स.अ.) ने कुछ तरह से अपनी सफ़ें जमाई कि एक तरफ़ मदीना शहर है और दूसरी तरफ़ ओहद की पहाड़ियां। ओहद की पहाड़ियां इस लिये कि दुश्मन पीछे से हमला न कर सके मगर ओहद की पहाड़ियों में सुरंगे थीं तो अन्देशा यह था कि उस सुरंग के ज़रिए काफ़िर हमला करें तो रसूल अल्लाह (स.अ.) की पुश्त ख़ाली थी।

हज़राते गिरामी ! उस वाक़ेआ पर ख़ुसूसी तवज्जो की ज़रूरत है और अगर आपने समझने की कोशिश की तो इन्शाअल्लाह बड़ा नतीजा निकलेगा।

रिसालत मआब ने अपने लश्कर में से 50 आदमी अलग किए और उनमें से एक को उनका सरदार मुक़र्रर किया और उनके सामने खड़े हो कर तक़रीर फ़रमाई कि देखों हम लड़ाई जीत जायें और दुश्मन को भगाते हुए मक्का तक ले जाएं या दुश्मन हम पर ग़ालिब आ जाए और हमें दबाता हुआ मदीना तक ले जाए तुम्हें हम जहां मुक़र्रर कर रहे हैं वहीं खड़े रहना अपनी जगह से न हटना और उस दर्रे की हिफ़ाज़त करते रहना और उस तरफ़ तीर मारते रहना ताकि उधर से हमला न हो सके। जब तक मैं ख़ुद आदमी भेज कर तुम्हें वापस न बुलाऊं तुम्हें अपनी जगह नहीं छोड़नी , तुम्हें लड़ाई के अन्जाम से कोई सरोकार नहीं और देखो यह ख़्याल न करना कि तुम लड़ाई से अलग हो , इस लिये माले ग़नीमत में उतना ही हिस्सा मिलेगा जितना दूसरे मुसलमानों को मिलेगा।

बात हो गई 50 आदमी वहां खड़े हो गए। अब रसूल (स.अ.) के पास 650 आदमी बाक़ी लश्कर में रह गए और तीन हज़ार काफ़िरों का मुक़ाबला करना है। उन 50 सिपाहियों का वाक़िया ज़हन में है। अब 650 आदमियों के लश्कर का अलम हैदरे कर्रार (अ.स.) के हाथ आया और इधर काफ़िरों का तीन हज़ार का लश्कर आने से पहले यह यज़ीद की दादी हिन्दा एक पल्ले हुए ऊँट पर सवार हो कर जिसके गले में ढ़ोल पड़ा हुआ था और उसके साथ उसके ख़ानदान की तीन औरतें और भी थीं। यह ढ़ोल बजाती हुई और गीत गाती हुई लश्कर के सामने से गुज़री जब कि हिन्दा गा रही थी।

ग़नी बनात तारिक़ ग़नी अली तारिक़

हम सितारा सहरी की बेटियां हम मुख़्मल के फ़र्श पर चलने वालियां हैं।

यह गीत यज़ीद की दादी साहिबा और मुआविया की वालेदा साहिबा जब कि अबु सुफ़ियान की ज़ौजा मुहतरमा गा रही थीं और दूसरी औरतें उसकी आवाज़ में आवाज़ और लह में लह मिला रही थीं और ढोल बज रहा है और वो खरामा ख़रामा मैदान की तरफ़ बढ़ रही हैं।

नख़न बनात तारिक़ फ़हशी तारिक़ के अलावा भी उसके कुछ अश्आर हैं लेकिन हमें अदब इजाज़त नहीं देता कि इस मिम्बर पर गोश गुज़ार करूं क्यों कि इस मिम्बर के कुछ तक़ाज़े हैं। भले कोई सच्चा वाक़ेआ ही क्यों न हो लेकिन खि़लाफ़े अदब व तहज़ीब है तो बयान नहीं कर सकते।

ख़ैर यह गाती हुई और ढोल बजाती हुई अपने ख़ानदान का कल्चर पेश कर रही थी कि हमारे ख़ानदान का यह है ।

हम सितारा सहरी की बेटियां , हम मख्मल के फ़र्श पर चलने वालियां ’’ मैं कहूंगा सितारा सहरी की बेटी तेरा मुक़द्दर ही ख़राब है। सितारा सहरी की बेटियों ! यह याद रखो कि लश्करे मोहम्मद (स.अ.) में एक आफ़ताब है वह जब निकलेगा तो तमाम सितारे ख़ुद ब खु़द मान्द पड़ जाते हैं। जब आफ़ताब तुलू होता है तो सितारे डूब जाते हैं। अब इधर से हैदरे करार अपना लश्कर लेकर बढ़े उधर कुफ़्फ़ार बढ़े लश्करे कुफ़्फ़ार से एक सरदार काफ़िर मैदान में उतरा। मेरे मौला अली (अ.स.) ने मैदान में आ कर उसे दावते इस्लाम दी , उसने इन्कार किया फिर मेरे मौला ने कहा कि वार कर , उसने वार किया , अली (अ.स.) ने वार को रोका और वार किया और उसका सर तन से जुदा कर दिया। फिर दूसरा आया , दूसरे को भी अली (अ.स.) ने मार गिराया। इस के बाद दीगरे जब सात काफ़िर अली (अ.स.) के हाथों वासिले जहन्नम हुए और उनका अलम अलग ज़मीन पर पड़ा है। अब फिर यही औरतें जो देर से खेल देख रही थीं कि काफ़ी देर कोई अलम उठाने के लिये नहीं पहुँचा।

अब उठाए कौन ? जो यह अलम उठाने के लिये आयेगा , मारा जाएगा। उन तीन औरतों में से एक बढ़ी और बढ़ कर अपना अस्लाह उठाया। अली (अ.स.) ने लाहौल पढ़ते हुए अपने राहवार को मोड़ा , लश्करे कुफ़्फ़ार ने लश्करे इस्लाम पर भरपूर हमला किया। दोबुद लड़ाई होने लगी , मुसलमानों ने बड़ी दिलेरी से इतने बड़े लश्कर का मुक़ाबला किया। लोहे से लोहा टकराने लगा , तलवारें चलने लगीं , अली (अ.स.) अपनी तलवार के जौहर दिखा रहे हैं , हमज़ा भी तलवार चला रहे हैं और भी मुसलमान मैदाने जिहाद में बड़े जोश व ख़रोश से हमलावर हैं।

थोड़ी देर में ही काफ़िरों के क़दम उखड़ने शुरू हो गए और वह आहिस्ता आहिस्ता मैदान छोड़ कर भागना शुरू हो गए। जब वह भाग रहे थे तो मुसलमानों ने माले ग़नीमत को अपने क़ब्ज़े में लेना शुरू कर दिया। अब पोज़िशन देखें कि काफ़िर भाग रहे हैं अपना माल अस्बाब छोड़ कर और मुसलमान सिपाहियों ने जेब भरना शुरू कि। अच्छा इधर तो यह हो रहा है और उधर पचास आदमी जो वहां दर्रे पर खड़े हैं उनमें खलबली मच गयी। उन्होंने कहा कि काफ़िर तो भाग गए अब क्या ख़्याल है ? चलो चलें: उनके सरदार ने कहा , कहां चलें ? कहने लगे माले ग़नीमत लूटने। उसने कहा: ख़्वाम ख़्वाह हमारे जज़्बात से न खेलो , वहां देखो माले ग़नीमत लूटा जा रहा है और तुम कहते हो कि यहां रहो। कहा , रसूल (स.अ.) ने कहा था कि दर्रा नहीं छोड़ना तुम्हें तुम्हारा हिस्सा मिलेगा।

कहने लगे: हां हिस्सा तो मिलेगा जो रसूल (स.अ.) तक पहुँचेगा उसी में से ही हिस्सा मिलेगा। सरदार ने कहा: देखो ऐसी बातें न सोचो , तुम्हें ख़ुदा के रसूल का हुक्म है कि यहीं रहो । मगर जो सिर्फ़ माल इकट्ठा करने के लिये परचमे इस्लाम के तले जमा हुए थे न रूके।

तारीख़ बताती है कि पचास आदमी में से 47 आदमी चले गए सिर्फ़ तीन आदमी बचे थे।

मेरे मोहतरम भाईयों ! जब यह 47 आदमी माले ग़नीमत लूटने के लिये चले गए और भागते हुए काफ़िरों ने देखा कि दर्रा ख़ाली पड़ा है सिर्फ़ तीन आदमी हैं। उन्होंने उन पर मिल कर हमला किया , अब यह तीन मुजाहिद लड़े और लड़ते लड़ते जामे शहादत नोश किया , और दर्रा बिल्कुल ख़ाली हो गया और उसके नतीजे में ओहद की लड़ाई का बना बनाया नक़्शा बिगड़ गया।

मोमिनो ! आपके अज़हान व क़ुलूब में भी शायद यह बात न हो कि यह वाक़ेआ मैंने किस लिये आपके हवाले किया है तवज्जो फ़रमायें कि चैदह सौ बरस के बाद उस वाक़ेआ से कोई इस्तेदलाल करेगा। सीने पचास 50 में से सैंतालीस 47 कितने प्रतिशत हुए 94 प्रतिशत ये 94 प्रतिशत मोर्चा छोड़ कर चले गए।

अब यह कहां थे ? कराची के , लाहोर के थे या लखनऊ के थे ? वह कुछ मक्के के थे और कुछ मदीने के थे। कौन थे ? वह थे सहाबी ए रसूल । रसूल (स.अ.) के सामने रसूल (स.अ.) के हुक्म की नाफ़रमानी कर रहे थे।

अब जो लोग समझते हैं कि ग़दीर में अगर रसूल (स.अ.) ने अली (अ.स.) के लिये ऐलान किया होता तो क्या मुसलमान इतने ही गए गुज़रे थे कि रसूल (स.अ.) की बात न मानते ? मैं यह कहता हूँ कि रसूल (स.अ.) की ज़िन्दगी में उनका हुक्म नहीं माना तो अगर उनकी ज़िन्दगी के बाद नाफ़रमानी कर रहे हैं तो कोई अजीब बात नहीं।

सरवरे काएनात मैदान में खड़े थे , रिसालत की चादर ओढ़े थे , भागे नहीं मैदान छोड़ कर , इस लिये कि रसूल अगर भाग जायें तो वरक़े हिदायत उलट जाए। रहमत हाथ पकड़े थी जो तलवार चलाने नहीं देती थी। रहमत अगर तलवार चलाए तो सारी काएनात पर बिजलियां बरस जाएं , अजब शान से रसूल (स.अ.) खड़े थे , क़दम लंग़रे हिदायत बने हुए थे।

दुनिया कहती है कि लड़ाई में अली (अ.स.) बढ़ते हैं , मोहम्मद (स.अ.) नहीं बढ़ते हैं। मैं यह कहता हूँ कि कोई इतनी देर ठहरे तो मोहम्मद (स.अ.) को देखे , सरदारे दो आलम शुक्र और इतमीनान का पैकर बने हुए मैदान में खड़ा है , न तलवार है हाथ में , मगर मैदान में एक इन्च भी पीछे नहीं हटते , उसी दौरान काफ़िरों ने शोर कर दिया कि मोहम्मद क़त्ल हो गए।

एक आवाज़ आई कि मोहम्मद (स.अ.) क़त्ल हो गए। बाद में यह तहक़ीक़ हुई जब मामलात ठहर गए तो पूछा गया कि किसने कहा था कि मुहम्मद क़त्ल हो गए , तो मुसलमानों ने कहा कि हमने यह आवाज़ सुनी थी , तो हमने कहा कि जब मुहम्मद (स.अ.) क़त्ल हो गए हैं तो फिर लड़ने का क्या फ़ायदा ? लिहाज़ा हम भाग गये।

और अक़्ल के अन्धे मैं कहता हूँ कि जब तुमने यह ख़बर सुन ली तो मैदान से भागे क्यों ? वहां ठहरते , वहां इज्तेमा करते किसी को ख़लीफ़ा मुक़र्रर करते। समझे आप , मौक़ा था न उसका ?

ख़ैर बाद में यह बात सामने आई कि वो शैतान ने कहा था कि मुहम्मद (स.अ.) शहीद हो गए। तो मुसलमान क्यों भागे ?

उन्होंने कहा कि हम समझे कि जिब्राईल बोल रहा है। तो जनाब होशियार रहियेगा कि ऐसे लोग न हो कही कहें शैतान और समझें कि जिब्राईल कह रहा है।

सब भाग निकले मगर अली (अ.स.) बिखरे हुए शेर की तरह हमले पर हमला कर रहे हैं। काफिरों की सफ़े चीरते हुए , काफ़िरों को फ़िन्नार करते हुए , मुसलमानों को पुकारते हुए , वहां पहुँचे जहां रहमते कुल जलवा अफ़रोज़ थे। अली (अ.स.) ने देखा कि काफ़िर रसूल (स.अ.) के इर्द गिर्द पहुँचे हुए हैं। रसूल (स.अ.) को घेर रखा था काफ़िरों ने , क्यों दोनों ग्रुप इधर उधर के मिल गए थे। पत्थर फंेक रहे थे कि अचानक एक पत्थर हबीबे ख़ुदा के रूख़सार पर लगा जिसके नतीजे में वह लोहे की जाली जो चेहरा ए अक़दस पर थी जिसे जंगी नक़ाब कहते हैं वो टूटी और उसकी कड़ी रूख़सारे मुबारक में उतर गई और ख़ून जारी हो गया। दूसरा पत्थर दहने अक़दस पर लगा जिसके नतीजे में दनदाने मुबारक शिकस्ता हो गया और होंठ ज़ख़्मी हो गए और दहने मुबारक से ख़ून जारी हुआ मगर रसूल (स.अ.) उसी शान से खड़े थे , भागे नहीं फ़र्क़ नही आया शाने रिसालत में। अली (अ.स.) पहुँचे , रसूल (स.अ.) ने कहा , या अली (अ.स.) ! ये वक़्त नुसरत का है। मैं कहता हूँ कि या रसूल अल्लाह (स.अ.) आप अली (अ.स.) से मदद क्यांे मांग रहे हैं ? अल्लाह से मांगे। आज लोग या अली (अ.स.) मदद कहने पर एतराज़ करते हैं आओ देखो कि रसूल अल्लाह (स.अ.) किसको पुकार रहे हैं।

तारीख़े उठा कर देखो कि मेरे मौला अली (अ.स.) ने वो आली शान लड़ाई लड़ी है जो अली (अ.स.) और अली (अ.स.) के घराने के लिये मख़सूस थी वो लड़ाई देखी ही नहीं।

तारीख़े अरब में घोड़े को कावे पर लगाना एक इस्तेलाह है यानी मैदान में गोल चक्कर दिया जाता है घोडे़ को जिसको कावा देना कहते हैं।

तारीख़ लिखती है कि रसूल (स.अ.) बीच में थे चारों तरफ़ काफ़िर थे। अली (अ.स.) ने बिखरे हुए शेर की तरह चारों तरफ़ से काफ़िरों पर झपटना शुरू किया। अली (अ.स.) की तलवार बिजली की तरह चल रही थी। अब नबुव्वत व इमामत यकजा हुईं । अली (अ.स.) ने मोहम्मद (स.अ.) को सहारा दिया और घोड़े को लगाया काव पर और अली (अ.स.) चक्कर लगा रहे हैं रसूल (स.अ.) के चारों तरफ़ मन्डलाते काफ़िरों की गर्दनें कटती जा रही हैं , काफ़िर गिरते जा रहे हैं और दाएरा फैल रहा है।

देखिए यह है तवाफ़े काबा , अली (अ.स.) ने घोड़े को कावे में लगाया जितनी देर में काफ़िर वार करते हैं उतनी देर में अली (अ.स.) जा चुके होते तो उनका वार आपस में ही किसी के लगता या राएगा जाता।

थोड़ी देर में बिखला कर चारों तरफ़ से सिमट कर एक तरफ़ आ गए , यही अली (अ.स.) चाहते थे कि चारों तरफ़ का हमला सिमट कर एक तरफ़ आ जाए । जूंही काफ़िर सिमट कर एक तरफ़ आए तो जंग ने एक रूप धरा , लड़ाई क़ाबिले दीद हुई। ढाई हज़ार 2500 का लशकर एक तरफ़ और अल्लाह का वली शेरे ख़ुदा मेरा मौला अली (अ.स.) एक तरफ़। मैदान से अल्लाहो अकबर अल्लाहो अकबर की सदाएं बलन्द हो रही हैं , हर तरफ़ सन्नाटा है।

इस्लाम के लश्कर में अब तीन हस्तियां रह गईं , पहली हस्ती वह अल्लाह , जिसका दीन है , दूसरी हस्ती मोहम्मद (स.अ.) जो दीन ले कर आए हैं और तीसरी हस्ती वह अली (अ.स.) है जिसने हर मक़ाम पर नुसरत का वादा किया है।

बरादराने इस्लाम ! ओहद के मैदान में देखो , ऐ कलमा पढ़ने वालों ! कलमा देखो , ओहद के मैदान में और पढ़ो , ‘‘ ला इलाहा इल्लल्लाह मोहम्मदुर्रूसूलुल्लाह अलीयं वली युल्लाह ’’ काफ़िर हवास बाख़्ता हो कर चिल्लाए कि जितनी जल्दी हो सके अली को गिराओ वरना गड़बड हो जाऐगी। जितना बढ़ चढ़ कर हमला करते हैं उतनी तेज़ी से सर अलग धड़ अलग होते हैं। इसी कशमकश में काफ़िर भागना शुरू हुए कि अली (अ.स.) के हाथ में जो तलवार थी टूट गई। अब जैसे ही तलवार टूटी , अली (अ.स.) पलटे रसूल (स.अ.) की तरफ़ और कहा या रसूल अल्लाह (स.अ.) तलवार टूट गई है।

रसूले ख़ुदा (स.अ.) जिस इतमीनान से खड़े थे , खडे़ रहे। मैं कहता हूं कि या रसूल अल्लाह (स.अ.) फौरी तौर पर कोई तलवार या कोई नैज़ा अली (अ.स.) को थमा देते , आप इतने इत्मीनान से क्यों खड़े हैं ?


अली (अ.स.) सैफ़ुल्लाह

आवाज़े रिसालत आई ख़ामोश ! जिसका सिपाही मैदान में लड़ रहा है वह उसे तलवार भी देगा , कि जिब्राईले अमीन का नुज़ूल हुआ और आ कर तलवार पेश की और कहा , ‘‘ ला फ़ता इल्ला अली ला सैफ़ा इल्ला ज़ुल्फ़ेक़ार ’’

मैं कहता हूँ कि जिब्राईल (अ.स.) तुम्हें क़सम है भेजने वाले की , सच बता पहले किताबे लेकर आए हो , किसी के लिये ज़ुल्फ़ेक़ार भी लाए हो ? तो आवाज़ आई कि साहबे किताब नबी बहुत हैं मगर साहबे ज़ुल्फ़ेक़ार सिर्फ़ एक अली (अ.स.) हैं।

अब जब तलवार भी इधर की , हाथ भी इधर का यकजा हुए तो क़यामत बरपा हो गई। अब ज़रा हाथ तेज़ किया तो हर कोई अपने सर पर तलवार देखता है। हर काफ़िर यह महसूस कर रहा था कि तलवार मेरे सर पर है , अली (अ.स.) मेेरे पीछे हैं। अब तीन हज़ार का लश्कर घिरा हुआ है , जिधर से भी कोई काफ़िर निकलना चाहता है तो देखता है कि अली (अ.स.) उसके सामने हैं।

अब अली (अ.स.) की ज़ुल्फ़ेक़ार से यह हज़ारों का लश्कर बिखला कर भागा , जब पहले भागे तो कहते थे कि लशकर ने भगाया है मगर अब जो भागे तो हर किसी के मुंह पर यही था कि अली (अ.स.) मेरे पीछे , अली मेरे पीछे। अब यह भागते भी जाते हैं और अपने पैरों से मुड़ मुड़ कर कहते जाते हैं कि अली (अ.स.) ने मारा , अली (अ.स.) ने मारा है जब कि मौला अली (अ.स.) भागने वालों का पीछा नहीं करते थे। यह अपने पैरों की चाप से मुड़ मुड़ कर देख रहे थे कि अली (अ.स.) तो नहीं आ रहे।

मन्ज़र क़ाबिले दीद था , वह सितारों की बेटियां आगे आगे और बेटे पीछे पीछे थे , भागते भी जाते थे और मुड़ मुड़ कर देखते भी जाते थे।

मैं कहता हूँ कि ऐ सितारों की औलाद ! आईन्दा कभी भुल कर भी अली (अ.स.) के मुक़ाबिल आने की र्जुअत न करना।

भागने वालों के मुंह उतरे हैं और भागते जाते हैं रास्ते में जो किसी ने पूछा कि क्या हुआ ? कहने लगे , वही कुछ हुआ , आज फिर अली (अ.स.) ने हमारा बेड़ा ग़र्क कर दिया। हमने कुछ मुसलमान तो मारे हैं मगर अली ने हमारी दौड़ लगा दी है , फ़ायदा कोई नहीं हुआ।

कहने लगे कि मोहम्मद को तो हमने मार लिया था मगर क्या करें सामने अली आ गये। हमारा मक़सद पूरा नहीं हुआ। कहा , हां भाई यही ग़म है हर समय पर अली आ जाते हैं।

तवज्जो फ़रमाईये , अब दुश्मनी का पौधा बहुत मज़बूत हो चुका है अब उसकी जड़े नीचे तक उतर चुकि हैं , अब ख़ुद ब ख़ुद बढ़ेगा।

उस भागे हुए लश्कर को मक्का पहुँचने दीजिए। अली (अ.स.) लश्करे कुफ़्फ़ार को पिस्पा कर रहे थे , मुसलमानों का पता मैदान में न था और इधर हिन्दा को समय मिला अपने दिल की अदावत निकालने का।

हिन्दा कलेजा ए हमज़ा पर

उसने जो देखा कि हमज़ा का लाशा बे यारो मददगार पड़ा है , यह जल्लाद सिफ़त औरत हमज़ा के लाशे पर झपटी और जनाबे हमज़ा का सीना चाक किया और सरकार हमज़ा का कलेजा निकाला । कलेजा भी हमज़ा का था किसी ऐसे वैसे का नहीं।

आप सोचें कि यह सनफ़े के दामन पर दाग़ है कि यह दरिन्दा सिफ़त औरत दुश्मनी इस्लाम में मख़्मूर हर कर हमज़ा के कलेजा पर मुंह मारती है कि चबा जाऊँ मगर तारीख़ गवाह है कि बहुक्मे ख़ुदा कलेजा पत्थर का हो गया। उसने जो मुंह मारा तो उसके दांत टूट गये।

दोस्ताने गरामी ! मैं कहता हूँ कि मरहबा क्या शान है मुजाहिदे इस्लाम हज़रत हमज़ा (अ.स.) कि , कैसा दन्दान शिकन जवाब दिया है , मरने के बाद भी दुश्मने इस्लाम के दांत तोड़ कर रख दिये हैं। लश्कर मैदान से फ़रार हुआ और हमज़ा की लाश जिसका सीना भी चाक किया जा चुका था मैदान में पड़ी थी।

इधर सरकारे दो आलम के ज़ख़्मों से ख़ून बह रहा था और जब रसूले ख़ुदा (स.अ.) की बेटी जनाबे सैयदा (स.अ.) ने अपने बाबा को ज़ख़्मी देखा और बेक़रार हुईं। जब जनाबे सैयदा (स.अ.) ने अपने बाबा को ज़ख़्मी देखा तो बीबी के हाथ में रेशमी रूमाल था जबकि अरब का दस्तूर था कि ज़ख़्म पर रेशम को जलाकर लगा देते थे तो ज़ख़्म बन्द हो जाता था। अली (अ.स.) लश्करे कुफ़्फ़ार को भगा कर रसूल (स.अ.) के लिये ढ़ाल में पानी लाये और चेहरा ए मुबारक का ज़ख़्म धोया , दहने मुबारक का ज़ख़्म धोया। जनाबे सैयदा (स.अ.) ने रूमाल जलाया और रसूल अल्लाह (स.अ.) के ज़ख़्म पर लगाया। जनाबे फ़ात्मा (स.अ.) की आंखों से आंसू जारी थे और जख़्मी बाप की तीमारदारी कर रही थीं।

इधर मैदान में से कुछ और आदमी भी पलट आये और उन्होंने आ कर ख़बर दी , एक दफ़ा महशर बरपा हो गई कि हज़रत हमज़ा की बहन सफ़िया जनाबे हमज़ा के लाशे पर आ रही हैं।

हज़रत हमज़ा रसूल (स.अ.) के चचा थे और यह बीबी जो तशरीफ़ ला रही थीं रसूल (स.अ.) की फुफी हैं। रसूल (स.अ.) से कहा गया कि आपकी फुफी अपने भाई की शहादत की ख़बर सुन कर लाशे पर आ रही हैं। सरवरे काएनात ने हुक्म दिया कि सफ़िया को रोको , लाश पर न आने दो । लोगों ने कहा , मौला ! वह बेताब हैं नहीं रूक रहीं , मैय्यत पर चली आ रही हैं , कहा , मना कर दो , सफ़िया को न आने दो । लोगो ने बहुत रोका मगर बहन फ़रते मोहब्बत में डूबी चली आईं , उसकी दुनिया अन्धेर हो चूकी थी। चली आई।

रसूल (स.अ.) ने हज़रत हमज़ा (अ.स.) के लाशे को देखा तो कहा , इस पर चादर डाल दो ताकि बहन अपने भाई के लाशे को उरियां न देखे। मैदाने जंग में फ़ौरी तौर पर चादर न मिली।

तारीख़ शाहिद है कि बहन अपने भाई के लाशे के क़रीब आ चुकी थी तो रसूले ख़ुदा (स.अ.) ने फ़ौरन अपनी ऐबा उतारी और जल्दी से हज़रत हमज़ा के लाशे पर डाल दी और लाश को ढांप दिया ताकि बहन अपने भाई के लाशे को उरियां न देखे।

दोस्ताने गेरामी ! अपनी निगाहों को किसी और मैदान की तरफ़ ज़रा मोड़िये मैं क़ुरबान जाऊँ मेरे मज़लूम मौला हुसैन (अ.स.) तेरी बहनों के , मौमिनों और देखो एक बहन नहीं , तीन बहने थीं और साथ बेटियां थीं , एक भाई की लाश नहीं बल्कि कई भाईयो के लाशे उरयां पड़े थे। मैं कहता हूँ या रसूल अल्लाह (स.अ.) आईये एक रिदा भाई के उरियां लाशे पर डालिये और एक रिदा बहन के सर पर। गुज़िश्ता बात यहां तक पहुँची थी कि अली (अ.स.) से दुश्मनी का पौधा एक पूरा तनावुर दरख़्त बन चुका था।

अली (अ.स.) का मुक़ाबला कैसे ? और अब वह काफ़िर जो ओहद से वापिस जा रहे थे उनके दिमाग़ों में एक तसव्वुर था वह यह कि जब तक अली (अ.स.) का इन्तेज़ाम न होगा तब तक मोहम्मद (स.अ.) को ख़त्म करना मुश्किल है और जब तक अली (अ.स.) को ज़हर न दिया जायेगा उस वक़्त तक लश्करे इस्लाम को शिकस्त देना ख़्वाब व ख़्याल की बात होगी। अब दुश्मनी एक मंज़िल पर पहुँच गई कि जिसके बाद दोस्ती का कोई तसव्वुर बाक़ी ही नहीं ।

सुबूत उसका यह है कि अब कि दफ़ा जंग की तैयारी की जाए तो सबसे पहले इन्तेज़ाम किसी पहलवान का क्या जाये। पहलवान की तलाश शुरू की गई। इस्लाम की तीसरी लड़ाई जंगे खन्दक है , उसमें लश्कर की तैयारी से ज़्यादा पहलवान की तलाश पर ज़ोर दिया गया। यह नुक़्ता भी क़ाबिले ग़ौर है कि पहली दो लड़ाईयांे में यह कोशिश नहीं हुई अब की दफ़ा यह कोशिश क्यों ?

अबु सुफ़ियान ने वापिस आते ही एक तहरीक चलाई , तमाम क़बाएल जो कि ग़ैर मुस्लिम थे उन्हें जमा किया और यह एजेण्डा पेश किया गया कि आपस के ज़ाती इख़्तेलाफ़ात ख़त्म कर के इस्लामी दुश्मनी में एक हो जाओ और मिल कर इस्लाम और बानिए इस्लाम को मिटा डालो , अगर इस्लाम ज़िन्दा रह गया तो तुम में से कोई ज़िन्दा नहीं बचेगा। जंगे ओहद की नाकामी के बाद अबु सुफ़ियान ने इस्लामी दुश्मनों के नाम पर युनाईटेड फ़्रन्ट चलाया , अहज़ाब का तर्जुमा यही है।

जंगे ख़न्दक़ की तैयारिया

हज़ब कहते हैं अरबी में गिरोह को और एहज़ाब उसकी जमा है यानि कई गिरोह की लड़ाई । जितने गिरोह खि़लाफ़े इस्लाम थे वह सब एक हो गए इस्लाम को मिटाने के लिये।

दस हज़ार का लश्कर था , बड़ी जद्दो जहद के बाद एक पहलवान का इन्तेख़ाब किया गया जिसका नाम ‘‘ उमर बिन अब्दवद था ’’ उसे लाया गया। यह उमर अब्दवद पूरे लश्कर से लड़ने के लिये नहीं आया था उसे सिर्फ़ अली (अ.स.) से मुक़ाबिले के लिये लाया गया था , इस लिये कि दो जंगों में काफ़िरों को अन्दाज़ा हो गया था और तमाम दस्त व बाज़ु आज़माये जा चुके थे लिहाज़ा यह पहलवान एक हज़ार 1000 आदमियों का मुक़ाबला करने की ताक़त रखता था। पूरे अरब में उसका बड़ा नाम था। रसूल अल्लाह (स.अ.) ने जब लश्कर की आदम की ख़बर सुनी तो मदीना के सामने ख़न्दक़ ख़ुदवाई इसलिये यह लड़ाई जंगे ख़न्दक़ कहलाती है। ख़न्दक़ इस लिये खुदवाई कि दुश्मन आते ही हमला न कर दें।

दुश्मन जो आये उन्हें आते ही नई सूरते हाल का मुक़ाबला करना पडे़। खन्दक़ खुद चुकी थी लश्करे कुफ़्फ़ार मदीना से बाहर जमा हो चुका था , खन्दक़ के बाहर जमा हो चुका था। खन्दक़ के पार फ़ख़्रे अबु सुफ़ियान उमरो बिन अब्दवद निकल कर टहलता , काफ़िरों को यक़ीन था कि इस दफ़ा हमारी फ़तेह होगी , उमर इब्ने अब्दवद अली (अ.स.) को क़त्ल कर देगा , फिर मोहम्मद (स.अ.) को ख़त्म करना हमारे लिये आसान हो जायेगा। अब्दवद खन्दक़ के पार टहलता रहा और उस बात का अन्दाज़ा करना चाह रहा था कि ख़न्दक़ को कहां से उबूर करे। एक जगह से ख़न्दक़ ज़रा कम चैड़ी थी। अब्दवद घोड़े पर सवार हुआ और घोड़े को ऐड़ी लगाई और घोड़े को उड़ाता हुआ इस पार आ गया। घोड़ा दौड़ते हुए खेमा ए रसूल (स.अ.) तक पहुँचा और हज़रत (स.अ.) के ख़ैमा पर नैज़ा मार कर कहने लगा ऐ मोहम्मद ! कोई जवान है तो बाहर भेजो मेरा मुक़ाबला करे ?

मेरे ख़ामोश दोस्तो ! मुझे अफ़सोस है कि वो ख़ैमा रसूल (स.अ.) तक पहुँच गया और रास्ते में मुसलमानों ने कोई मज़हमत तक न की। अब्दवद कहने लगा , ऐ मोहम्मद ! कहां गई तुम्हारी जन्नत , क़त्ल करो तो ग़ाज़ी और क़त्ल हो जाओ तो शहीद। उसकी आवाज़ सुन कर रसूल (स.अ.) की ख़ेमा में आवाज़ गुंजी है कोई जो इस कुत्ते की ज़बान बन्द करे ? यह कौन कह रहा था , रसूल (स.अ.) कह रहे थे। जिन्होंने दुश्मन के लिये भी ऐसे अल्फ़ाज़ कभी इस्तेमाल न किऐ थे।

मैं कहता हूँ या रसूल अल्लाह (स.अ.) ऐसा लबो लहजा पहले कभी आपका नहीं सुना। तो आवाज़े रिसालत आई कि जो भी मासूम के दरवाज़े पर आ कर ऊंचा बोल कर ग़ुस्ताख़ी करता है वह कुत्ता होता है।

इतने में फिर उसकी आवाज़ आई। सरवरे काएनात ने फिर फ़रमाया , कोई है जो इस कुत्ते की ज़बान बन्द करे ? तो वही आवाज़ गुंजी लब्बैक या रसूल अल्लाह (स.अ.) मैं हाज़िर हूँ।

यह कौन सी आवाज़ थी ? यह वही आवाज़ थी जो दावते ज़ुल्अशीरा में आई थी। रसूल अल्लाह ने कहा , या अली (अ.स.) ! बैठ जाओ। रसूल अल्लाह (स.अ.) ने फिर आवाज़ दी , कि है कोई जो इस कुत्ते की ज़बान बन्द करे ? जब कोई न उठा तो फिर रसूल अल्लाह (स.अ.) ने कहा , बैठ जाओ , फिर फ़रमाया कि जो जाऐगा मेरा वसी होगा मेरा वज़ीर होगा।

तो अली (अ.स.) ने फ़रमाया , या रसूल अल्लाह (स.अ.) क़रीबी बैठे रहे और कोई दूसरा जाके कट जाए ? अली (अ.स.) उठे।

अली (अ.स.) खन्दक़ के मैदान में:- इधर अब्दवद रजज़ नहीं पढ़ रहा था बल्कि कह रहा था कि जन्न्त लेने वाले आओ! हालांकि दस्तूरे ज़माना है कि रजज़ पढ़ा जाता है। मैं फ़लां बिल फ़लां हूँ मैं यह हूँ वह हूँ। मगर वह कह रहा है कि अगर जन्नत पर यक़ीन है तो आओ मेरी तलवार की धार के नीचे जन्नत है। मेरी तलवार की धार पर चल कर आओ।

इधर रसूल (स.अ.) हज़रत अली (अ.स.) को तैयार कर रहे हैं , अस्लाह पहना रहे हैं , जंग के लिये सामाने जंग अली (अ.स.) पे सजा रहे हैं कि किसी की आवाज़ आई कि सरकार यह काफ़िर (अब्दवद) और मैं जब मैं उनका हम रक़ीब हुआ करता था तो हम जंगल में जा रहे थे कि जंगल में डाकुओं ने हमें लूटना चाहा और हम पर हमला कर दिया तो उसने अकेले डाकुओं का मुक़ाबला किया , लड़ते लड़ते उसकी तलवार गिर गई तो उसने ग़ुस्से और जोश में आ कर ऊँट के बच्चे को टांग से पकड़ कर चकर दिया और दुश्मनों को मारने लगा। सरकार यह बड़ा ताक़तवर है।

अली (अ.स.) कुल्ले ईमान हैं:- हुज़ूर (स.अ.) ने कहा , तुम जानते हो कि अली अल्लाह का मज़हर है।

अली (अ.स.) मैदान में आए। इधर अली (अ.स.) मैदान की तरफ़ बढ़ रहे थे कि रिसालत मआब ने कहा: ‘‘ आज कुल्ले ईमान कुल्ले कुफ़्र के मुक़ाबले में जा रहा है। ’’ मेरे मौला उमरो इब्ने अब्दवद के मुक़ाबले में आए । कहा कि सुना है कि तू तीन बातों में से एक बात को ज़रूर मानता है। उसने कहा , हां ठीक सुना है। तो आपने फ़रमाया , कलमा पढ़ ले और मुसलमान हो जा। वह कहने लगा , ऐसा नहीं हो सकता। देखिए इस्लाम की थ्योरि है कि जब्र नहीं करता , तलवार नहीं चलाता जब तक इत्मामे हुज्जत न कर ले। आपने कहा अगर मुसलमान नहीं होता तो वापस चला जा। कहने लगा कि यह भी नहीं हो सकता , न मुसलमान हो सकता हूँ न वापस जा सकता हूँ। तीसरी बात की घोड़े से नीचे उतर आ। हां यह हो सकता है , और वह घोड़े से नीचे उतर आया।

अली (अ.स.) ने कहा कि वार कर तेरे दिल में हसरत न रहे कि शायद पहले मैं वार करता तो कामयाब हो जाता । तलवार चली बहुत से वार उसने किये। अली (अ.स.) ने रोके। अली (अ.स.) ने सत्तर वार करने का मौक़ा दिया। इतना तवील मौक़ा इस लिये दिया था कि वक़्ते रूख़सत रसूल (स.अ.) ने कहा था कि आज कुल्ले ईमान कुल्लेे कुफ़्र के मुक़ाबले में जा रहा है ,, और कुफ़्र के दिल में हसरत न रहे। उसके बाद अली (अ.स.) ने वार किया , लड़ाई की तस्वीर लफ़्ज़ों से बयान नहीं हो सकती। तारीख़ बताती है कि इतनी गर्द उड़ी मैदान में कि सिवाए तलवारों की चमक के कुछ दिखाई नहीं देता था। बाहर दोनों तरफ़ नज़रे जमी हुई थीं। कुफ़्फ़ार की तमन्ना थी कि अली (अ.स.) क़त्ल हो जायंे और मुसलमान की तमन्ना थी कि अब्दवद क़त्ल हो जाये। यूं कहूं कि उमर इब्ने अब्दवद कल कुल्ले कुफ़्र की निचोड़ था और मेरे मौला अली (अ.स.) कुल्ले ईमान की निचोड़ थे।

तलवार चल रही थी कि मैदान से नारा ए तकबीर की आवाज़ गंूजी। मेरे मौला ने अब्दवद के पांव पर वार किया और उसके पैर काट दिये , वह गिरा गर्द फटी दूर खड़े तमाशाईयों ने नज़ारा देखा कि अली (अ.स.) उमरो इब्ने अब्दवद को नीचे गिरा कर इसके सीने पर सवार हैं और तलवार हाथ में है कि देखने वालों ने देखा कि अली (अ.स.) अचानक गला काटे बग़ैर उसके सीने से नीचे उतर आए हैं। यह मन्ज़र फ़िदइयाने इस्लाम को बहुत बुरा लगा। उन्होंने तुरन्द रसूल (स.अ.) को शिकायत की कि या रसूल अल्लाह (स.अ.) देखें अली (अ.स.) ने कैसी ग़लती की , अच्छा भला दुश्मन को क़ाबू में ला कर फिर छोड़ दिया , हम अगर अली (अ.स.) की जगह होते तो कभी गला काटे बग़ैर नीचे न उतरते।

रसूल (स.अ.) ने कहा , ख़ामोश जब अली (अ.स.) आयेगें तो खुद पूछ लेना कि उन्होंने ऐसा क्यों किया ? वह लेटा रहा , अली (अ.स.) ने टहलना शुरू किया , थोड़ी देर के बाद उसके सीने पर बैठे और गला काट लिया। जब उसका सर ले कर चले। जब अली (अ.स.) का अमल ख़ुदा को पसन्द है तो फिर अली (अ.स.) की पसन्द का इस्लाम चाहिए तुम्हारी पसन्द का इस्लाम नहीं चाहिए। सर ला कर रसूल (स.अ.) के क़दमों में डाल दिया। कहा: या रसूल अल्लाह (स.अ.) यह सर हाज़िर है। यही था जो चन्द मिनट पहले बहुत ललकार रहा था। यह उस दुश्मने ख़ुदा और दुश्मने रसूल का सर है। फ़रमाया:

ज़रबतो अलीयिन यौमल ख़न्दक़े अफ़ज़लो मिन इबादतिस्सक़लैन.

अली (अ.स.) की यह ज़रबत जो आज यौमे ख़न्दक़ उमर इब्न अब्दवद के सर पर लगी है वह सक़लैन की इबादत से अफ़ज़ल है।

क़यामत तक की इबादत एक तरफ़ अली (अ.स.) की यह एक ज़रबत एक तरफ़।

अब अली (अ.स.) के फ़ज़ाएल पर पर्दा डालने वालों ने अपना काम शुरू कर दिया। एक मोमेण्ट चली कि बहुत बूढ़ा था , डेढ़ सौ बरस का था उसे राशा था , हाथ भी हिलते थे , पांव भी लरज़ते थे , यह था वो था मगर मैं कहता हूँ ओ अक़ल के अंधों जो उसको लड़ाने के लिये लाये थे , जिन्होंने पूरे अरब में बड़ी जद्दो जहद के बाद उसे मुन्तख़ब किया था क्या वह नहीं जानते थे ? ज्यूही नहीं उमर बिन अब्दवद क़त्ल हुआ। तो अब अबु सुफ़ियान समझ गया कि आगे बढ़ना ख़ुद कुशी है। तारीख़ी सुबूत है कि उसी रात मुहासेरा ख़त्म हो गया और लश्कर चला गया।

अली (अ.स.) के ख़ौफ़ से दिल में तूफ़ान आते हैं:- बाद में मुआविया के दौर में उसके ख़रीदे हुए मोअर्रेख़ीन ने यूं कह कर बात बराबर की है कि वो तूफ़ान आ गया , खैमे उखड़ गए , यह हो गया वो हो गया। मेरी समझ में यह नहीं आता कि ख़न्दक़ कितनी चैड़ी थी ? दस फ़िट थी या बीस फिट। बस इतनी चैड़ी थी कि घोड़ा जम्प कर के इस पार आ गया। तो उधर तूफ़ान आया है और खे़मे तक उखड़ गए हैं और उधर तूफ़ान से रसूल (अ.स.) के लश्कर के ख़ैमों में चिराग़ तक नहीं बुझा। हमारी अक़्ल में यह तूफ़ान नहीं आया। यह दस हज़ार 10,000 जंगजू समझ गए थे कि जिसको बुनियाद बना कर लाए थे वह तो क़त्ल हो गया , लिहाज़ा अली (अ.स.) के ख़ौफ़ से उनके दिलों में तूफ़ान बरपा था , सो भाग गए।

अबु सुफ़ियान की जद्दो जहद

अब अबु सुफ़ियान लश्कर ले कर ख़ुद वापस नहीं आया। अब उसने ख़ैबर के यहूदियों को मुसलमानों के खि़लाफ़ भड़काया और माल व मुताअ का लालच दे कर मुसलमान काफ़िलों पर हमले शुरू करवा दिये और मुसलमानों की ज़िन्दगी और उनके काफ़िलों के लिये ख़तरा पैदा हो गया।

सरवरे काएनात (स.अ.) ने बार बार वारनिंग दी की होश में रहो , मुसलमानों से यह ज़्यादती न करो , वह न माने। आखि़रकार रसूल (स.अ.) अपना लश्कर ले कर वहां पहुँच गए। तारीख़ बताती है कि उनके छोटे मोटे इलाक़े फ़तेह कर लिये और जब उस इलाक़े में पहुँचे जहां क़िला क़ामूस था उसके अन्दर उनका मशहूर नामी गिरामी पहलवान मरहब रहता था। (मुझै ख़ैबर नहीं पढ़ना वाक़ेआ आपके बच्चों का भी सुना है) कि लशकर जाता था और जब मरहब कहता कि आऊं तो बहादुर जवान कहते थे कि तुम ज़हमत न करो हम ख़ुद ही चले जाते हैं। 40 दिन तक का मुआहेदा हुआ था , क़िला ए क़मूस फ़तेह करेंगे मगर 39 दिन गुज़र गए क़िला की ईंट भी न हिली। अब सवाल यह पैदा होता है कि 39 दिन में राशन तो तमाम ख़त्म हो गया मगर ख़ैबर क्यों फ़तेह न हुआ क्यों कि 39 दिनों में लश्कर के दरमियान अली (अ.स.) न थे।

जब उन्तालीस 39 दिन गुज़र गए तो तारीख़े इस्लाम की मशहूर हदीस , सरवरे काएनात ने कहा ‘‘ मैं कल अलम उसे दुंगा जो कर्रार होगा , ग़ैरे फ़र्रार होगा ख़ुदा और रसूल को दोस्त रखता होगा और ख़ुदा और रसूल उसको दोस्त रखते होगे।

सारी रात मुसलमानों के लश्कर में इज़्तेराब रहा कि देखें कल अलम किसको मिलता है। सुबह हुई मुसलमानों का मजमा रसूल (स.अ.) के ख़ैमा के गिर्द अलम लेने के लिये जमा है , रसूल (स.अ.) जब तशरीफ़ लाए मजमा पर नज़र की। हर एक के दिल में तमन्ना थी अलम मिले मगर रसूल (स.अ.) ने मजमा पर नज़र डाल कर कहा , ऐना अली , अली कहां हैं ?

अली (अ.स.) से मदद मांगना हुक्मे ख़ुदा है

उससे चन्द लम्हें पहले यह नादे अली नाज़िल हुई रसूल (स.अ.) पर यह हदीसे क़ुदसी है। हदीसे क़ुदसी अल्लाह के उस कलाम को कहते हैं जो क़ुरआन न हो मगर कलामे ख़ुदा हो। नादे अली जो है यह हदीसे क़ुदसी है। नाद है अरबी में अम्र का सेग़ा है। नाद माने निदा , पुकारो। नादे अली यानी अली (अ.स.) को पुकारो। यह हुक्मे ख़ुदा हो रहा है रसूल (स.अ.)ं को।

नादे अलीयन , अली (अ.स.) को पुकारो , मज़हरल अजाएब , तुम उन्हें मज़हरल अजाएब पाओगे। उसकी ज़ात से अजाएबात ज़ाहीर होंगे।

उन्होंने पुकारा यहां आओ पर दो रवायतें हैं। एक रवायत यह है कि हज़रत अली (अ.स.) ख़ैबर में थे लेकिन आशब चश्म में मुब्तेला थे। दूसरी रवायत यह है कि मदीना में थे अगर मदीना में भी थे तो जब मज़हरल अजाएब हैं तो मदीना से भी आना कोई हैरत नहीं। रसूल (स.अ.) ने पुकारा और अली (अ.स.) आए। अब मदीना से आए या ख़ैमा से , मुझे उससे बहस नहीं लेकिन जिस शान से ख़ैमा में दाखि़ल हुए वह शान मैंने किताबों में देखी।

मौला अली (अ.स.) की आंखों में शदीद तकलीफ़ थी कि आंखें खोलना दुश्वार था तो इस तरह ख़ैमा रसूल (स.अ.) में आए कि एक हाथ सलमान के कंधे पर रखे हुए और एक हाथ अबुज़र के कांधे पर रखे हुए हैं।

मन्ज़र क़ाबिले दीद था। एक तरफ़ नवें 9 दर्जा का ईमान और एक तरफ़ दसवें दर्जे का ईमान , दरमियान में कुल्ले ईमान तशरीफ़ ला रहे हैं।

कहा: क्या हाल हैं या अली (अ.स.) ? अली (अ.स.) ने कहा: मौला ! आपकी ज़्यारत की तमन्ना है लेकिन आंखों में शदीद तकलीफ़ के बाइस आंख खोलना दुश्वार है। कहा: क़रबी आओ। अली (अ.स.) क़रीब आए और हुज़ूर सरवरे काएनात (स.अ.) ने अपनी अंगुश्ते शहादत ज़बाने मुबारक से मस की और फिर अली (अ.स.) की आंखों पर अपना लुबाबे दहन लगाया। रसूल (स.अ.) ने अली (अ.स.) की आंखों को उस तरह खोला जिस तरह क़ारी र्क़ुआन के वरक़ उलटता है।

अली (अ.स.) ने कहा: रसूल (स.अ.) का हाथ लगाना था कि मुझे आंखों की कोई तकलीफ़ नहीं रही।

तवज्जो फ़रमाईये ! लड़ाई में शाने एजाज़ी न रसूल (स.अ.) ने दिखाई न अली (अ.स.) ने लेकिन ख़ैबर में ऐजाज़ी मामले में अल्लाह ने मज़हरल अजाएब कह दिया था लिहाज़ा अजाएबात ज़ाहिर हुए ।

रसूल (स.अ.) ने कहा: या अली ! लो अलम। अली (अ.स.) कहते हैं या रसूल अल्लाह (स.अ.) कब तक लड़ूं ? कहा जब तक फ़तेह न हो जाए।

अली (अ.स.) ख़ैबर के मैदान में:- अब अली (अ.स.) को फ़िक्र न थी कि कौन पीछे आ रहा है और कौन नहीं , लश्कर आ रहा है कि नहीं। सरकार घोड़ा उड़ाते हुए आए क़िला की तरफ़ और वहां एक बूढ़ा यहूदी आलम था जो बैठा तो रात का मुतालेआ करता रहता था। वह यहूदी आलम मरहब का ख़ास आदमी था। क़िला के ऊपर बैठा था उसने जो ग़ौर से देखा तो तुरन्द मरहब को इत्तेला की कि ऐ मरहब ! गुज़िश्ता अय्याम जितने आते रहे हैं वह और थे , यह जो आज आया है यह और है। तुम्हारी बेहतरी इसमें है कि तू उससे मुक़ाबला न कर , वरना तेरी मौत उसके हाथों में है। परवरदिगार की क़सम तुम हार गए।

ख़ाली सूरते हाल देख कर कहा , लड़ते नहीं देखा। कहा मूसा के परवरदिगार की क़सम तुम हार गए। यह वही आ रहा है जिसका ज़िक्र तौरैत में है।

टली (अ.स.) ने मैदान में आ कर अलम एक पत्थर पर नस्ब किया। अलम का दस्ता पत्थर में यूं उतर गया जैसे पत्थर किसी मौम का बना है। अलम नस्ब कर दिया। उसके बाद क़िले का दरवाज़ा खुला , पहले हारिस निकला , मरहब के बदले अन्तर निकला उनको अली (अ.स.) ने फ़िन्नार किया और फिर वह निकला जिसका पूरे ख़ैबर में डंका बजता था।

मरहब निकल , महरब ने दो ज़िरह , दो ख़ुद सर पर , दो तलवारें दो नैज़े लगा रखे थे चूंकि लम्हे पहले उसके दो बहादुर सिपाही जंगी जवान क़त्ल हुए थे लिहाज़ा अपनी हिफ़ाज़त का पूरा इन्तेज़ाम कर के निकला। आते ही उसने रजज़ पढ़ा कि मैं मरहब हूँ और मेरी माँ ने मेरा नाम मरहब रखा है। सारा ख़ैबर मुझे जानता है। मैं बहादुर पहलवान हूँ।

अली (अ.स.) ख़ुदा का शेर हैं

इधर अली (अ.स.) ने मुस्कुरा कर कहा मेरी मां ने मेरा नाम हैदर रखा है और मैं ख़ुदा का शेर हूँ।

मरहब की बहन ने कहा: तेरी दाइया ने मना किया था कि हैदर नाम के किसी आदमी से न लड़ना। शैतान ने तुरन्त यह उसके कान में फूंका कि यह ज़रूरी नहीं कि यह वही हैदर हो। मरहब घमण्ड में आ गया। फिर अली (अ.स.) ने उसे दावते इस्लाम दी और उसने इन्कार किया और कहने लगा कि अगर मैंने इस्लाम क़ुबूल कर लिया और मैदान से वापस चला गया तो औरतें हंसेंगी। काफ़िरों को भी इसी बात का एहसास है कि मैदान से भागा तो औरते शर्मसार करेंगी।

और बाज़ लोग ऐसे होते हैं कि कोई हंसे भी तो उन्हें परवाह नहीं , ज़िन्दा तो रहेंगे। इमाम (अ.स.) ने कहा , अच्छा मरहब , वार करो ताकि तुम्हें दिल में हसरत न रहे। मरहब ने वार किया। मेरे मौला ने रद किया , फिर वार किया , फिर वार रद किया , फिर मेरे मौला ने नारा ए तकबीर बुलन्द किया और वही मरहब जो दो ज़िरा , दो खुद , दो तलवारे , दो कमन्द , दो नैज़े , सब चीज़े दो दो ले कर निकला था मेरे आदिल इमाम (अ.स.) ने उस मरहब को दो हिस्सों में तक़सीम कर दिया। मरहब क़त्ल हो गया। काफ़िर भागे और भाग कर क़िले का दरवाज़ा बन्द कर दिया।

तारीख़ बताती है कि अली (अ.स.) बढ़े और बाएं हाथ की उंगलियां ख़ैबर के दरवाज़े में डालीं । यह अल्लाह का हाथ था । उंगलियां फ़ौलादी दरवाज़े के अन्दर उतर गईं। झटका दिया और दरवाज़े को उड़ाकर फ़ेंक दिया और फिर उसी दरवाज़े को पुल बनाया और लश्करे इस्लाम से कहा चलो आओ। इधर लोग दौड़े , या रसूल अल्लाह (स.अ.) अली (अ.स.) ख़ैबर का दरवाज़ा हाथ पर लिये हैं। रसूल (स.अ.) ने कहा तुमने हाथ देखा है पैर नही देखे ? कहा , नहीं। कहा , जाओ देख कर आओ। जब देखा तो अली (अ.स.) के पैर हवा में थे। अली (अ.स.) मज़हरल अजाएब हैं लिहाज़ा अजाएबात ज़ाहिर हो रहे हैं। अली (अ.स.) दरवाज़ा हाथ पर लिये हैं और लोग गुज़र रहे हैं।

अली (अ.स.) के फ़ज़ाएल को नज़र अन्दाज़ करने के लिये मौलाना शिब्ली नौमानी अपनी एक किताब में लिखते हैं कि ख़ुदा ने रोज़े अव्वल से फ़तेह ख़ैबर अली (अ.स.) के मुक़द्दर में लिख दी थी इस लिये फ़तेह कर लिया और लोगों ने भी दरवाज़े पर बहस की है कि लोहे का न था , मामूली था वग़ैरा । यह शिया लोगों की ख़ाली बात है उनका इज़ाफ़ा है जो जोश मोहब्बत में पढ़ रहे हैं। वैसे ऐसा दरवाज़ा कहां था।

मैं कहता हूँ कि वह दरवाज़ा ही नहीं था फ़क़त कागज़ का टुकड़ा था या कपड़े का पर्दा पड़ा था , दरवाज़ा था ही नहीं। आप यही समझ लें तो अली (अ.स.) ने ख़ैबर का दरवाज़ा उखाड़ा या नहीं ?

अली (अ.स.) के फ़ज़ाएल में एक फ़ज़ीलत कम हो जाए या बढ़ जाए तो फ़र्क़ नहीं पड़ता। अली (अ.स.) ने वह दरवाज़ा लोहे का था या लकड़ी का या कपडे़ का पर्दा , बहस यह नहीं , बात है फ़तेह की तो ख़ैबर दस्ते अली (अ.स.) पर फ़तेह हुआ तो उनकी शख़्सियत में कमी हुई या ज़्यादती ? मगर लोगों को यह सोचना चाहिये कि दुश्मनी ए अली (अ.स.) में दूसरों को बदनाम कर रहे हैं कि जिनसे वह भी फ़तेह नहीं हुआ। कहा कि वह तो अली (अ.स.) के मुक़द्दर में लिखा था , यह भी अजीब मामला है। मुक़द्दर हमेशा बुराई के ज़माने में याद आता है अच्छाई के ज़माने में नहीं। एक लड़का चार साल से बी 0 एस 0 सी 0 में फे़ल हो रहा है तो उसके बाप ने कहा क्या बताएं शायद उसके मुक़द्दर में ही नहीं। पढ़ता है , मेहनत करता है मगर न जाने क्यों हर साल फे़ल हो जाता है , किसी न किसी मज़मून में रह जाता है और एक साहब के लड़के ने पहली दफ़ा इम्तेहान दिया और यूनिवर्सिटी में टाप किया। अब आप मुबारक बाद देने जा रहे हैं। मियां तुम्हारा लड़का क्या पास हुआ है वह तो मुक़द्दर में ही लिखा है , पास होना था सो पास हो गया। उसमें तुम्हारे लड़के का कोई कमाल नहीं। तो वह यह सुन कर आपका मुहं नोचने तक जाऐगा।

आप बड़े आए मेरे बेटे के चाहने वाले , हमारे लड़के ने मेहनत की , मशक़्क़त की , रातों को रात न समझा , दिनों को दिन न समझा , दिन रात एक करके मेहनत करता रहा और टाप किया है आप कह रहे हैं कि उसने पास होना ही था उसके मुक़द्दर में लिखा था।

अली (अ.स.) का मुक़द्दर

अजीब मामला है अली (अ.स.) के मुक़द्दर का भी , काबा में पैदा होना अली (अ.स.) का मुक़द्दर , रसूल (स.अ.) की गोद में पलना अली (अ.स.) का मुक़द्दर , अलम अली (अ.स.) के मुक़द्दर में , मिम्बर अली (अ.स.) के मुक़द्दर में , दोशे पैग़म्बर अली (अ.स.) के मुक़द्दर में , आयते तत्हीर अली (अ.स.) के मुक़द्दर में , अक़्दे फ़ातेमा (स.अ.) अली (अ.स.) के मुक़द्दर में। अब दुनियां अपने मुक़द्दर फोड़े , उस मुक़द्दर का कोई जवाब नहीं , जनाब मुझे कह लेने दीजिए कि क्या कातिबे तक़दीर भी अली (अ.स.) का मज़हब तो नहीं रखता था ? जो यह सब चीज़ें अली (अ.स.) के मुक़द्दर में लिख दीं।

अब उस ख़ैबर की लड़ाई के बाद काफ़िरों के खुले मैदान में चैलेन्ज देने के दम ख़म हो गए और समझ गए कि उनसे यूं निमट नहीं सकते। अब आखि़री मंज़िल आई उनकी दाएमी अदावत की जब रसूल (स.अ.) फ़तेह मक्का के लिये मक्का में दाखि़ल हुए। (ज़रा कड़ियां ज़हन में मिलती रहें अगर ज़हन से एक कड़ी भी छट गयी तो बात समझ में नहीं आएगी।) इन्सान को अपनी जान प्यारी होती है माल और औलाद प्यारी होती है और बाज़ हालात में उनसे बढ़ कर दीन और ईमान प्यारा होता है। जिन बुतों के तहफ़्फ़ुज़ में यह काफ़िर लड़ रहे थे फ़तेह मक्का के दिन उन्होंने देखा कि अली (अ.स.) और रसूल (स.अ.) उसी काबा में दाखि़ल हुए जिस काबा से निकले गए थे अब इतनी बड़ी ताक़त थी कि काफ़िर सामने आ कर मुक़ाबला करते तो मुम्किन न था। रसूल (स.अ.) लश्कर लिये हुए फ़तेह मक्का पर मोहर लगाने के लिये मक्का के दरवाज़े पर आ गए थे। शाम हो रही थी जब हुज़ूर मक्का के पास पहुँचे। दुश्मन के शहर में रात को दाखि़ल होना मुनासिब न समझा तो मक्का के बाहर मैदान में लश्कर ठहराया गया। इधर दो आदमी पहाड़ी पर चढ़े एक मुसलमान था और दूसरा काफ़िर। यह तारीख़ पेश कर रहा हूँ तमाम मकतबे फ़िक्र मोअर्रेख़ीन ने रक़म किया है । मुसलमान का नाम अब्बास था जो कि रसूल (स.अ.) के चचा थे और काफ़िर का नाम अबु सुफ़ियान था। यह दोनों बलन्द मक़ाम से रसूल (स.अ.) के लश्कर का नज़ारा करने लगे। अबु सुफ़ियान जो कि पुराना जंग जु , तर्जुबा कार जिसकी ज़िन्दगी मैदाने जंग में गुज़री थी अपनी तर्जुबे कार आंखों से फेले हुए लश्कर का जायज़ा लेने लगा। हद्दे निगाह तक ख़ैमे लगे हुए हैं , दूर दूर तक लश्कर फेला हुआ है , हर तरफ़ बेहतर इन्तेज़ाम हैं। अबु सुफ़ियान ने अपनी ज़िन्दगी भर की तर्जुबे कार आंखों से लश्कर को देखा और हज़रात अब्बास से कहने लगा: वाह तुम्हारे भतीजे ने बहुत बड़ी हुकूमत बना ली है। हज़रत अब्बास ने उसको कोहनी मार कर कहा , ओ बदबख़्त यह हुकूमत नहीं है रिसालत है।

दो नज़रिये

देखिये रात तक वह लफ़्ज़ कानों तक पहुँचे , रात तक दो मुख़्तलिफ़ नज़रिये थे । मुसलमान ने लश्करे इस्लाम को देख कर कहा कि यह रिसालत है और काफ़िर ने लश्कर को देख कर कहा कि यह हुकूमत है। रात तक नज़रिया ए हुकूमत काफ़िर के पास था एक नज़रिया ए इस्लाम मुसलमान के पास था।

सुबह हुई तो यही काफ़िर अबु सुफ़ियान कलमा पढ़ कर मुसलमान हो गया नज़रिया अपनी जगह क़ायम है। अब मुसलमानों में दो नज़रिये आ गए। नज़रिया ए हुकूमत भी और नज़रिया ए इस्लाम भी। अब नज़रिया हुकूमत जो क्मअवसवचम हुआ तो उसने इस्लाम में अहलेबैत (अ.स.) के खि़लाफ़ अपनी सारी सर गरमियां दिखाईं। उसके मेरे पास और बहुत सारे तारीख़ी सुबूत मौजूद हैं।

काफ़िरों से मोहब्बत कैसी ? इस्लाम क़ुबूल करने के बाद भी लोगों के दिलों में अपने मक़तूल काफ़िरों की मोहब्बत थी। जैसा कि एक मशहूर सहाबी ने अपने बिगड़ बिगड़े रहते हो , तुम्हारे दिल में मेरे लिये बुग़्ज़ है और मैं यह भी जानता हूँ कि क्यों बुग़्ज़ और फ़र्क़ है। तुम आज तक यही समझ रहे हो कि तुम्हारे मामू को मैंने क़त्ल किया है जब कि मैंने उसे मैदान में देखा ज़रूर था कि वह ख़ून में लत पत लेट रहा है मगर मैं आगे बढ़ गया जब कि मेरे पीछे अली था उन्होंने उसे क़त्ल किया।

क्या मतलब निकला इस वाक़ेए का ? लोग अपनी सफ़ाईयां देते थे कि हमने काफ़िरों को क़त्ल नहीं किया बल्कि अली (अ.स.) ने अक्सर काफ़िर क़त्ल किये हैं। अब यह रात को काफ़िर और मुसलमान दोनों इन्तेज़ाम में हैं कि कब सुबह हो और रसूल (स.अ.) का अज़ीम लश्कर सफ़ेद परचम लिए अमान का मक्का में दाखि़ल हुआ।

कहा बदला नहीं लिया जायेगा , अमान है उन लोगों के लिये जो अस्लाह खोल के घर से निकले , उसको अमान है जो अपने घर के दरवाज़े बन्द कर ले , उसको अमान है जो अबु सुफ़ियान के घर चला जाए , उसको अमान है जो उम्मे हानी के घर चला जाए। किसी ने दुश्मन को इतना मरतबा दिया है जितना रसूल (स.अ.) ने दिया।

जो उम्मे हानी के घर चला जाए उसको अमान। उम्मे हानी हज़रत अली (अ.स.) की बहन का नाम है। उम्मे हानी बिन्ते हज़रत अबु तालिब (अ.स.) । हज़रत अली (अ.स.) की बड़ी बहन थीं। जो मस्जिेदिल हराम की हद में आजाए उसको अमान।

लश्करे इस्लाम का मक्का में दाखि़ला:- यह थे मक्का दाखि़ला के वक़्त लश्कर के ऐलानात। उसके बाद सरवरे काएनात अली (अ.स.) को साथ लिये सीधे ख़ाना ए काबा में तशरीफ़ लाए। आ कर देखा कि काबा पर बुतों का क़ब्ज़ा है। नबी (स.अ.) और अली (अ.स.) ने मिल कर बुतों को तोड़ना शुरू किया जो दीवारों पर सजे थे उन्हें गिराना शुरू किया। तवज्जो ! अब यह बुत नहीं टूट रहे , काफ़िरों के दिल टूट रहे हैं। अब हर तरफ़ बुत बिखरे पड़े हैं।

निगाहे रिसालत व इमामत जब काबा की दीवार पर पड़ी ,, ऊंचा देखा तो एक सब से बड़ा बुत जिस पर बहुत ज़्यादा नज़रो न्याज़ें और चढ़ावे चढ़ते थे दीवार में नस्ब है। अली (अ.स.) और नबी (स.अ.) में कुछ बातें हुईं। बातों के बाद नबी ए करीम (स.अ.) ने अली (अ.स.) को अपने दोश पर सवार किया अली (अ.स.) रसूल (स.अ.) के कंधों पर सवार हो कर बुत तोड़ने शुरू किये जब तमाम बुत अली (अ.स.) ने गिरा दिये तो यूं कहूं कि जब तमाम काफ़िरों के दिल टूट चुके। नूर अला नूर की तस्वीर देखना है तो बस यही देख लीजिए। यह मन्ज़र भी क़ाबिले दीद है। कभी दोशे रसूल (स.अ.) पर अली (अ.स.) हैं कभी दोशे पैग़म्बर (स.अ.) पर हसन (अ.स.) और कभी हुसैन (अ.स.) हैं लेकिन हासिद कहते हैं कि कोई बड़ी बात नहीं हर बड़ा अपने छोटे को अपने दोश पर बिठा लेता है अगर रसूल (स.अ.) ने बिठा लिया तो क्या हुआ ? बड़ी बात नहीं होती लेकिन एक मिसाल से बात वाज़ेअ करता हूँ कि मैं अपने दोनों पर कन्धों पर रखता हूँ क़ुरआन और उसके ऊपर अपना नवासा या पोता बिठा लेता हूँ तो आप क्या कहोगे कि यह क्या बदतमीज़ी है ? सारा मजमा एतेराज़ करेगा। तो अक़्ल के अन्धे शर्म नहीं आती , फ़ज़ीलते अली (अ.स.) पर पर्दा डालते हुए कि दुनियां में हर कन्धा आम कन्धा है मगर रसूल (स.अ.) का कन्धा आम कन्धा नहीं यह वह कन्धा है जिस पर मोहरे नबूवत नस्ब है और मोहरे नबूवत क्या है ? मुहरे नबूवत क़ुरआन है। तो फ़िर र्क़ुआन पर सिर्फ़ क़ुरआन ही रखा जा सकता है कोई दूसरी चीज़ नहीं रखी जा सकती जब कि दोशे रसूल (स.अ.) पर सिवाए अली (अ.स.) और हसनैन (अ.स.) के अगर कोई सवार हुआ है तो सामने ला ?

मक्का मुसलमान हो गया

जब काफ़िरों की अली (अ.स.) से दुश्मनी की हुदूद कलाई मेट तक पहुँच गई तो अब यह मजबूर हो चुके थे लिाहज़ा यह ज़ौक़ दर ज़ौक़ आ कर रसूल (स.अ.) के हाथों पर मुसलमान होने लगे और शाम तक सारा मक्का मुसलमान हो गया , जो कल शाम तक काफ़िर थे। उनमें उनका सरदार अबु सुफ़ियान भी मुसलमान हो गया जिसने ज़िन्दगी भर लड़ाईयां लड़ीं वह तो वह थे , हिन्दा भी मुसलमान हो गई जिसने हज़रत हमज़ा का कलेजा चबाया था तो क्या ख़्याल है कि वह मुसलमान हो गई ? कितने भोले हैं मोअर्रिख़े इस्लाम।

मेरी समझ में आज तक एक कुफ़्र नहीं आया और एक इस्लाम बता दूं कि कौन सा कुफ़्र और कौन सा इस्लाम ।

अबु तालिब (अ.स.) का कुफ़्र समझ में नहीं आता और अबु सुफ़ियान और हिन्दा का इस्लाम मेरी अक़्ल में नहीं समाता।

बड़े बड़े कहते हैं कि अबु तालिब (अ.स.) मुसलमान न थे , रसूल (स.अ.) ने मरते वक़्त भी कान में कहा कि चचा कलमा पढ़ लो मगर उन्होंने नहीं पढ़ा। बड़ी अजीब बात है कि जो मुहाफ़िज़े नबुव्वत है वह काफ़िर और जो मुख़ालिफ़े नबुव्वत व रिसालत है वह मुसलमान।

अबु तालिब (अ.स.) मुसलमान न थे जब कि अबु सुफ़ियान मुसलमान हो गया था।

यह बाहर की लड़ाईयां थीं अब घर के अन्दर की लड़ाई सुनाऊंगा। मदीने के अन्दर ही अन्दर अली (अ.स.) से दुश्मनी कैसे बढ़ती गई। यह मक्का वालों की कहानी थी अब मदीने वालों की सुनाऊंगा। जब यह बयान मुकम्मल होगा। अभी तसव्वुर का एक रूख़ आपके सामने आया है तो दो काफ़िर हैं और मुसलमान। अब यज़ीद का ज़िक्र आया तो कहा बहर हाल वह मुसलमान तो था। अबु सुफ़ियान की बात आए तो कहते हैं कि वह मुसलमान हो गए थे। यह ठहरे मुसलमान।

अब दूसरी तरफ़ आते हैं , एक अबु तालिब (अ.स.) काफ़िर एक हम काफ़िर तो हमारी समझ में बात आ गई , इस्लाम और काफ़िर का मेयार समझ में आ गया। जो पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.) को पाले वह काफ़िर और और जो पैग़म्बरे अकरम (स.अ.) के नवासे पर रोऐं वह काफ़िर। जो पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.) से लड़े वह मुसलमान और जो उनके नवासे को शहीद करे वह मुसलमान।

तो हम कहते हैं कि ऐ पालने वाले ! तुझे रूहे मुहम्मद (स.अ.) का वास्ता हमंे क़यामत के दिन हज़रत अबु तालिब (अ.स.) और हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) के साथ महशूर फ़रमा और जो हमें और सरकार अबु तालिब (अ.स.) को काफ़िर कहते हैं उन्हें बरोज़े महशर अबु सुफ़ियान और यज़ीद के साथ उठा। काफ़िर काफ़िर एक जगह रहने दो और मुसलमान मुसलमान एक जगह। झगड़ा किस बात का।

अजीब नज़रिया

ख़ुदा की क़सम यह अजीब नज़रिया है , अजब इस्लाम है। अफ़सोस................ कि जो ज़िन्दगी भर हक़ के साथ लड़ता रहे वह मुसलमान , जो हमज़ा का कलेजा चबाए वह मुसलमान , जो अली (अ.स.) के साथ बहत्तर जंगे करे वह मुसलमान , जो फ़रज़न्दे रसूल (स.अ.) को तीन दिन का भूखा प्यासा दरिया के किनारे गये यारो अन्सार के साथ क़त्ल करे वह मुसलमान , जो ख़ानदाने इस्मत व तहारत की शहज़ादियों को असीर करे वह मुसलमान , जो फ़रज़न्दे रसूल (स.अ.) का कटा हुआ सर नौके नेज़ा पर देख कर कहे , काश ! आज मेरे बद्र वाले ज़िन्दा होते तो मेरे शाने थपक कर कहते , शाबाश , वह मुसलमान और जो मज़लूमे करबला के ग़म में ग़मगीन हो वह काफ़िर................ ?

देखा आपने ! यह बद्र की लड़ाई का शोला भड़क कर वहां तक गया था। यह वही तलवार की दुश्मनी थी जो वहां तक पहुँची , जो यज़ीद ने कहाः आज मेरे बद्र वले ज़िन्दा होते और यह मन्ज़र देख कर मुझे दुआएं देते कि ऐ यज़ीद ! तेरे हाथ कभी शल न हों।

यह जो अहलेबैत (अ.स.) पर ज़ुल्म व सितम हुए हैं यह वही बद्र के कुत्तों का इन्तेक़ाम लिया जा रहा है , वह दुश्मनी के शोले थे।

वह कैसे बे ग़ैरत थे उस लईन के दरबार में बैठने वाले जिनके ईमान बिक गये थे , जिनके ज़मीर बिक गये थे , जो दीन फ़रोश थे। आज वह इस्लाम के ठेकेदार बन कर अपने आप को सफ़े अव्वल का मुसलमान कहते हैं। वह सफ़े अव्वल का मुसलमान है जो यज़ीद को छटा इमाम माने , जिसने नवासे रसूल (स.अ.) को शहीद कर दिया और उनके छोटे छोटे बच्चे शहीद कर दियो और इस्मत व तहारत की मलका बीबियों को सर खुले भरे बाज़ार में ले आए और बे ग़ैरत मुसलमान ने पलट कर यह न पूछा कि यह किस घराने की शहज़ादियां हैं ?

अज़ीज़े गिरामी ! आले मोहम्मद (स.अ.) पर ज़ुल्म मामूली नहीं हुआ , साल भर क़ैद रहे। आले मोहम्मद (स.अ.) , तक़रीबन एक साल यह यज़ीदियों का प्रोपेगन्डा है कि नहीं एक दिन दरबार में आये थे और एक रात क़ैद की मुद्दत है। एक रात कहां क़ैद की मुद्दत है ? एक साल क़ैद की मुद्दत है। 61 हिजरी में इमाम हुसैन (अ.स.) शहीद हुए हैं और 20 सफ़र सन् 62 हिजरी में जनाबे ज़ैनब (अ.स.) पलट कर आई हैं क़ब्रे हुसैन (अ.स.) पर। 11 मुहर्रम सन् 61 हिजरी को आले मोहम्मद (स.अ.) क़ैद हुए थे और 20 सफ़र 62 हिजरी को यह काफ़ेला क़ब्रे हुसैन (अ.स.) पर आया था। 8 दिन क़ैद से रिहाई के बाद असीराने शाम ने शाम में मातम किया है और जितने दिन सफ़र में लगे उनको नफ़ी कर के हिसाब कर लें तो आले मोहम्मद (अ.स.) की असीरी का पता चल जायेगा।

उसी मुद्दत में वह ज़माना भी आ गया जब उस घर के छोटे छोटे बच्चों ने क़ैदखाने में दम तोड़ दिया। उनमें से सब से दर्दनाक वाक़ेआ जो मिलता है वह शहज़ादी सकीना (अ.स.) का है। क़ाफ़ेला ए हुसैनी (अ.स.) में शहज़ादी सकीना (अ.स.) थीं जो अक्सर ज़िन्दाने में शाम में सै. सज्जाद (अ.स.) से सवाल किया करती थीं भाई सज्जाद (अ.स.) कब वो दिन आएगा जब हम इस ज़िन्दान से रिहा हो कर मदीना जाएंगे ?

कभी कभी सुबह को शहज़ादी आसमान की तरफ़ देख कर पूछतीं भाई सज्जाद (अ.स.) ! यह परिन्दे कहां जा रहे हैं ? तो बीमार सज्जाद (अ.स.) रो कर कहते: बहन यह परिन्दे अपनी खुराक को ढ़ूढने के लिये जा रहे हैं। जब शाम होती तो बीबी फिर पूछतीं भय्या अब यह परिन्दे कहां जा रहे हैं ? मेरे क़ैदी इमाम की आंखों से ख़ून के आंसू टपकते और कहते सकीना यह परिन्दे अब अपने घर जा रहे हैं , तो बीबी तड़प कर कहजी भय्या ! वह दिन कब आयेगा जब हम भी अपने घर जायेंगे ? सय्यदे सज्जाद (अ.स.) रो कर बहन का माथा चूम कर कहते सकीना! हर किसी को अपने घर जाना नसीब होगा मगर एक तुझे अपने घर जाना नसीब नहीं होगा।

यह बच्ची हर वक़्त बाबा बाबा कर के रोती तो शाम के दर व दीवार हिल जाते एक रात बच्ची की बेताबी हद से बढ़ गई और मासूमा बहुत बेचैन हुईं तो जनाबे ज़ैनब ने बड़ी मुश्किल से तसल्ली दे कर सकीना (अ.स.) को सुलाया , शहज़ादी रात के पिछले पहर चूंकि यह कहती कि फुफी अम्मा ! अभी तो मेरे बाबा आए थे , कहां चले गए ? सकीना (अ.स.) ने बहुत गिरया किया अपने बाबा के लिये तड़प तड़प् कर रोने लगीं , शहज़ादी उम्मे कुलसूम रोने लगीं , जनाबे लैला और जनाबे उम्मे रूबाब बल्कि ज़िन्दान में पूरा हुसैनी काफ़िला रोने लगा। वा हुसैना वा मुहम्मदा की सदाए गूंज उठीं।

यज़ीद ने आदमी भेजा , मालूम हुआ कि हुसैन (अ.स.) की बेटी सकीना ने अपने बाबा को ख़्वाब में देखा है और बाप से मिलने के लिये बेताब है। ज़ालिम ने तसल्ली के लिये नया सामान किया , एक ख्वान में इमाम हुसैन (अ.स.) का कटा हुआ सर रख कर भेज दिया। क़ैद ख़ाने का भारी ताला खुला और क़ैद ख़ाने में शम्मे जलीं , सकीना (अ.स.) के सामने ख़्वान रखा गया। बच्ची के सामने कपड़ा उठाया गया , चाहने वाली बेटी ने बाप का सर देखा , सर को सीने से लगाया और बैन करना शुरू किये बच्ची कहती है , बाबा ! मेरे कान ज़ख़्मी हैं , बाबा मुझे शिम्र ने तमांचे मारे हैं , बाबा आपके बाद हमें ज़ालिमों ने बहुत रूलाया है। बच्ची ने सर ख़ाक पर रख दिया और ज़ैनब (अ.स.) की गोद से फ़ातिमा (अ.स.) की गोद में सिधार गईं।

अज्रे रिसालत

ख़ुदा वन्दे आलम ने क़ुरआने मजीद में इरशाद फ़रमाया है कि: कु़ल ला अस्अलोकुम अलैहे अजरन इल्लल मवद्दता फ़िल क़ुर्बा ‘‘ ऐ रसूल (स.अ.) कह दीजिए कि मैं तबलीग़े रिसालत के सिलसिले में कोई मज़दूरी नहीं चाहता , कोई बदला नहीं चाहता सिर्फ़ अपने क़राबतदारों की मुहब्बत और मवद्दत चाहता हूँ । ’’

इससे क़ब्ल कह चुका हूँ कि जब अल्लाह ने अहले बैत (अ.स.) से मुहब्बत का हुक्म दिया तो अहले बैत (अ.स.) से अदावत क्यों ? और यह हक़ हमारा इस लिये गहरा हो जाता है कि अदावते अहले बैत (अ.स.) के नतीजे में दुनियां का अज़ीम तरीन वाक़ेआ करबला रूनुमा हुआ। जिसने सिर्फ़ रसूल (स.अ.) के घराने को नुक़सान पहुँचाया बल्कि आज चैहदा सौ साल से मुसलमान उस वाक़ेआ से मवस्सिर भी हो रहे हैं तो यह एक ग़ैर मामूली तासीर और यह रसूल (स.अ.) के घराने का होने वाले नुक़्सान बहैसियत एक मुसलमान के किया हमें हक़ नहीं पहुँचता कि हम एक मामला की तहक़ीक़ात करें कि उसके अस्बाब क्या हैं ? यह बात ज़हने आली में रहे कि यह बात जिसको लिख रहा हूँ और उसका राज़ क्या है और मुहब्बते अहले बैत (अ.स.) से उन वाक़ेआत का रिश्ता क्या है ?

इससे पहले कह चुका हूँ कि कौन से हालात थे जिसने काफ़िरों को अली (अ.स.) का दुश्मन बनाया और वह दुश्मनी रोज़ ब रोज़ बढ़ती गई और गहरी हो गई। इसके अस्बाब क्या थे ? इस सिल सिले में उन वाक़ेआत का खुलासा कर दूं।

दावते ज़ुलअशीरा में हज़रत अली (अ.स.) का नुसरत का वादा करने से काफ़िरों के दिलों में अली (अ.स.) की दुश्मनी का आग़ाज़ हुआ। फिर मक्का के पुरआशोब दौर में हर क़दम पर नुसरते रसूल (स.अ.) करने से काफ़िरों के दिलों में दुश्मनी की जड़ें मज़बूत होती चली गईं। फिर शबे हिजरत काफ़िरों की साज़िश को बिस्तरे रसूल (स.अ.) पर आराम कर के नाकाम बना दिया । उसके नतीजे में दुश्मनी और मुस्तहकम हो गई। उसके बाद मुतावित मसतह तसादिम शुरू हो गए। मदीने की ज़िन्दगी , बद्र की लड़ाई में तो अली (अ.स.) की तलवार चली , ओहद की लड़ाई हुई तो अली (अ.स.) ने रसूल (स.अ.) की जान बचा ली। वैसे जान बचाने वाला तो अल्लाह है मगर ज़ाहिरी सबब अली (अ.स.) हैं। ख़न्दक़ की लड़ाई हुई तो उनके माया नाज़ पहलू उनको अली (अ.स.) ने क़त्ल किया और ख़ैबर की लड़ाई हुई तो जिस क़िला पर यहूदियों को नाज़ था उस क़िला को अली (अ.स.) ने फ़तह किया। यह मुसलसल तारीख़ अली (अ.स.) की चल रही है। यहां तक कि फ़तेह मक्का करने की मंज़िल आई तो अली (अ.स.) रसूल (स.अ.) के दोश पर बुत शिकनी कर रहे थे।

दावते ज़ुल अशीरा से फ़तेह मक्का तक जो कुफ़्फ़ार के रेज़ो रेश की तारीख़ है उसमें अली (अ.स.) का नाम मुसलसल है। मुसलसल टकराव दावते अशीरा से फ़तेह मक्का तक अली (अ.स.) हर जगह सामने रहे। अब उन काफ़िरों के दिल में अली (अ.स.) की तरफ़ से वह गहरे ज़ख़्म हैं जिनको वह नज़र अन्दाज़ नहीं कर सकते। यह थी एक बैरूनी लड़ाई जिसमें अली (अ.स.) काफ़िरों से टकरा रहे हैं मोहब्बते ख़ुदा और रसूल (स.अ.) में। अब घर के अन्दर के हालात का जायज़ा लें कि घर के अन्दर के हालात क्या हैं ? उसके लिये नफ़्सियात को समझना ज़रूरी है।

जब तक आप उसकी स्टडी न करेंगे तब तक मामला समझ में नहीं आएगा। किसी लाइन पर अगर आप मिल कर एक कर रहे हैं और एक आदमी ग़ैर मामूली तौर पर तरक़्क़ी कर जाए तो बहुत फ़रिश्ता ख़साएल आप होंगे। अगर आप के दिल में उससे मोहब्बत पैदा हो जाए , मिसाल के तौर पर स्कूल में एक तालिबे इल्म हमेशा पहली पोज़िशन हासिल करता है , खेल के मैदान में भी हमेशा पहली पोज़िशन हासिल करता है , हर काम में अव्वल रहता है तो शायद दो चार तालिबे इल्म ऐसे होंगे जो उससे मोहब्बत करते होंगे बक़ाया सब उससे जलते होंगे। देखिए यह इन्सानी फ़ितरत है और यह कभी तब्दील नहीं होती , न रसूल (स.अ.) से पहले बदली और न उनके बाद।

तारीख़ यह बताती है कि अली (अ.स.) रोज़े अव्वल से इस्लाम में नुमाया रहे यानि यह तज़किरा जो मैंने किया इस्लाम के दाएरे से बाहर का है यानि काफ़िरों वाला मामला अली (अ.स.) से नुमाया रहे। दाएरा ए इस्लाम के अन्दर भी अली (अ.स.) के दो साहब ज़ादे थे जो रसूल (स.अ.) की गोद में और रसूल (स.अ.) के घर में पल रहे थे। आग़ाज़े इस्लाम में , दावते ज़ुल अशीरा में ख़ानदाने क़ुरैश वाले ही थे कोई ग़ैर नहीं थे लिहाज़ा ला मुहाला अली (अ.स.) का नाम आया , उसके बाद नुसरते इस्लाम जो होती रही मक्का में उसमें अली (अ.स.) और अली (अ.स.) के वालिद अबु तालिब (अ.स.) , अली (अ.स.) का घराना , अली (अ.स.) के भाई जाफ़र (अ.स.) , अली (अ.स.) के वालिद के भाई हमज़ा , यही लोग नुमाया रहे।

लिहाज़ा मक्का की ज़िन्दगी में भी अली (अ.स.) और अली (अ.स.) के घराने वाले नुमाया हैसियत के मालिक रहे। जब रसूल (स.अ.) हिजरत कर के चले तो अली (अ.स.) ने तारीख़ी किरदार अदा किया। बिस्तरे रसूल (स.अ.) पर तलवारों के साए तले सोए , यह अली (अ.स.) की गै़र मामूली क़ुरबानी जो थी उसने इतना बड़ा असर छोड़ा कि रसूल (स.अ.) मदीना में दाखि़ल नहीं हुए जब तक अली (अ.स.) न आ गए। अब मदीने में जा कर फ़ज़ाएल का रूख़ अली (अ.स.) के ंघर की तरफ़ मुड़ा। सितारा उतरता है तो उसी के घर पर , बद्र के फ़तेह बनते हैं तो यही , तलवार आती है तो इन्हीं के लिये , जो कुल्ले ईमान बनते हैं , ज़र्बतें सक़लैन पर भारी होती हैं तो इन्ही की , ख़ैरून्निसा सैय्यदा ए कौनैन का अक़्द होता है तो इन्हीं से , जिन बच्चों को रसूल (स.अ.) अपना बेटा कह रहे हैं वह अली (अ.स.) के बच्चे हैं , जिस दरवाज़े पर रसूल (स.अ.) सलाम कर रहे हैं तो वह दरवाज़ा अली (अ.स.) का है , अंगूठी हालते रूकुअ में ज़कात दी तो अली (अ.स.) ने , आयत उतरी तो रोटियां गईं तो उन्हीं की। जितने भी फ़ज़ाएल हैं अली (अ.स.) के घर को रूख़ किए हुए हैं मैं उसके तारीख़ी सुबूत दूंगा ताकि किसी को इन्कार की गुंजाईश न रहे।

हज़रत अली (अ.स.) मस्जिदे नबवी में बैठे हैं और ऐसा लगता है कि फ़ज़ाएल अली (अ.स.) को ढूंढ़ रहें हैं , यह शायरी नहीं कर रहा हूँ हक़ीक़त बयान कर रहा हूँ। दलील , सीना ए विलायत को अली (अ.स.) की तमन्ना नहीं है , अली (अ.स.) को विलायत की तमन्ना नहीं। अगर साएल को बुलाने जाएं तो अली (अ.स.) को विलायत की तमन्ना और अगर अंगुशतरी हालते नमाज़ में उतार कर ले जाए तो विलायत को अली (अ.स.) की तमन्ना। अली (अ.स.) को सूरा ए दहर की तमन्ना कि सूरा ए दहर को अली (अ.स.) की तमन्ना ? अगर मिस्कीन व असीर व ग़रीब के घर रोटियां ले कर जाएं और रोज़े बाद में खोलें तो अली (अ.स.) को सूरा ए दहर की तमन्ना और अगर दरवाज़े से मांग कर ले जाएं तो सूरा ए दहर को अली (अ.स.) की तमन्ना। इसी तरह ज़रा मेरे साथ साथ चलते आएं तो मुझे वाज़ेह करने में आसानी होगी , अली (अ.स.) को अलम की तमन्ना नहीं बल्कि अलम को अली (अ.स.) की तमन्ना है , वाज़ेह कर दूं ? अगर ख़ैबर के दिन अली (अ.स.) अलम मांगने आए हैं तो फिर अली (अ.स.) को अलम की तमन्ना है और अगर रसूल (स.अ.) नादे अली (अ.स.) पढ़ कर बुलाए तो फिर यक़ीन करना पड़ेगा कि अलम को अली (अ.स.) की तमन्ना है।

तवज्जो ! आज का मुल्ला कहां तक अली (अ.स.) के फ़ज़ाएल पर पर्दा डालेगा । मैं कहता हूँ कि काबा को अली (अ.स.) की तमन्ना है। दलील से , अगर बिन्ते असद काबा में दरवाज़े से तशरीफ़ ले गईं तो तमन्ना अली (अ.स.) की और अगर दीवारे काबा फटी और काबा पुकार कर बीबी को बुलाए तो फिर मानना पड़ेगा कि काबा की आरज़ू है।

फ़ज़ाएल अली (अ.स.) का रूख़ किए हुए हैं। यह नजम आई तो उनके लिये , आय ए इस्तेख़लाल आई तो उनके लिये , इमामे मुबीन की आयत नाज़िल हुई तो उनके लिये , फ़ज़ाएल जो हैं जैसे घर पहचानते हैं।

यह तो अल्लाह की मरज़ी है मैं क्या करूं लेकिन है कुछ ऐसा ही कि फ़ज़ाएल जो थे अली (अ.स.) के घर का रूख़ करते हैं। थोड़े दिनों के बाद यह फ़ज़ाएल जो थे मदीना में लोगों को नागवार गुज़रने लगे जिसके इशारे रसूल (स.अ.) की मस्जिद में हमें मिलते हैं। पहले बयान कर चुका हूँ कि अली (अ.स.) सर काट कर ले कर चले तो लोगों ने कहा था कि हमें यह चाल पसन्द नहीं। जब अली (अ.स.) अम्र इब्ने अब्दवद के सीने से उतरे तो लोगों ने ऐतराज़ किया कि हमें यह तरीक़ा पसन्द नहीं और जब अली (अ.स.) के घर का दरवाज़ा मस्जिद में खुला रहा तो लोगों ने ऐतराज़ किया कि अली (अ.स.) का दरवाज़ा खुला रहा और हमारे दर बन्द हो गए।

यह वाक़ेआ भी है तारीख़े इस्लाम में , आग़ाज़ में हर किसी का दरवाज़ा मस्जिदे नबवी में खुलता था फिर हुक्म हुआ की मस्जिद में खुलने वाले तमाम दरवाज़े बन्द कर दिये जाएं सिर्फ़ रसूले ख़ुदा (स.अ.) के घर का दरवाज़ा खुला रहे और हज़रत अली (अ.स.) के घर का दरवाज़ा खुला रहे। अगर बात फ़क़त रसूल (स.अ.) के दरवाज़े की होती तो किसी को ऐतराज़ नहीं होता चूंकि दरमियान में मसला अली (अ.स.) का था लिहाज़ा लोगों को नागवार गुज़रा , दिल अज़ारी हुई , चेमीगोइयां होने लगीं।

सरकारे दो आलम मिम्बर पर तशरीफ़ लाए , फ़रमाया:- मैंने सुना है कि तुम्हारे दरमियान दरवाज़े के सिलसिले में कोई इख़्तेलाफ़ हो रहा है , क़सम खु़दा की जिसके क़ब्ज़ा ए कु़दरत में मोहम्मद (स.अ.) की जान है , न मैंने दरवाज़ा अपनी मर्ज़ी से बन्द किया है जिस जिस का दरवाज़ा ख़ुदा ने अपनी मर्ज़ी से बन्द करने का हुक्म दिया उसका दरवाज़ा बन्द कर दिया , सिजका दरवाज़ा ख़ुदा ने खुला रहने का हुक्म दिया है उसका दरवाज़ा खुला है। मैं कहूंगा कि रसूल (स.अ.) उन लोगों की अक़्ल का ठिकाना ही नहीं है , उनको यह समझना चाहिये कि जिसके लिये काबा में नया दरवाज़ा खुला उसका दररवाज़ा मस्जिद में कैसे बन्द होगा ?

यह तफ़सीली वाक़ेयात हैं , मैं तफ़्सील में नहीं पड़ता सिर्फ़ इशारे करूंगा , सितारा उतरने का वाके़आ , सूरज के पलटने का वाक़ेआ सूरा ए दहर के आने का वाक़ेआ ख़ुसूसन जनाबे सैय्यदा (स.अ.) से अमीरूल मोमेनीन अली (अ.स.) की शादी का वाक़ेआ। यह तमाम वाक़ेआत अहम हैं मगर मैं इशारे करता हुआ गुज़र रहा हूँ ताकि आपके ज़हन में ख़ाके आ जांए।

बस अली (अ.स.) इधर इस लिये बढ़े हैं कि तलवार की मार लग रही है। यही फ़र्क़ है कि मुख़्तलिफ़ मौक़ों पर अली (अ.स.) बढ़ गए और लोग पीछे रह गए। नतीजा यह है कि दोनों तरफ़ अली (अ.स.) की मुख़ालिफ़त और दिलों में कशीदगी है। मेरे पास उसके सुबूत बड़े ज़बरदस्त हैं । मेरा दावा है कि जिस सिजको सुबूत चाहियें मैं हाज़िर हूँ। रसूल (स.अ.) को उनकी ज़िन्दगी में मुसलमानों ने कहा कि यह मोहब्बते अहलेबैत (अ.स.) में गुमराह हो गए हैं। अगर यक़ीन नही तो क़ुरआन गवाह है क़ुरआने मजीद में आयत ‘‘ न तुम्हारा साहब बहका है , न गुमराह है , न बहकी बहकी बातें करता है । ’’

यह न कहियेगा कि यह बात काफ़िरों की थी , आप काफ़िरों के साहब नहीं थे। लफ़्ज़े साहब जो है यह कुछ ऐसे ही लोगों की तरफ़ इशारा कर रहा है जो सहाबियत के दावेदार हैं। ये मैं नहीं जानता हूँ कि कौन थे मगर कुछ ऐसे भी थे जो यह इल्ज़ाम रखते थे और यह इल्ज़ाम रखा रसूल (स.अ.) की ज़िन्दगी में , रसूल (स.अ.) पर। तारीख़ गवाह है कि मोहब्बते अली (अ.स.) का इल्ज़ाम दिया जाता है रसूल (स.अ.) को कि मोहब्बते अली (अ.स.) में हक़ से तजाविज़ कर गए थे।

इस लिये तो फिर ख़ुदा ने डांटा जो क़ुरआन गवाही दे रहा है कि ‘‘ तुम्हारा साहब बहका नहीं न गुमराह हुआ है । ’’

यह मदीना में अली (अ.स.) की तरफ़ से फर्क़ पैदा हो रहे हैं दिलों में। मैं बस एक बात के लिये आप से ख़ास तवज्जो चाहता हूँ कि एक तरफ़ अहले मदीना के दिलों में फ़र्क पैदा हो रहे हैं मगर दोनों शहर अपनी अपनी नौइय्यत के हामिल हैं। मक्का काफ़िरों का शहर है और मदीना मुसलमानों का शहर है। आमद व रफ़्त बहुत कम है , मक्के वाले मदीना नहीं आते और मदीना वाले मक्का नहीं जाते। उनको वहां ख़ौफ़ है और उन्हें यहां ख़ौफ़ है। यह सिलसिला फ़तह मक्का तक रहा। फ़तेह मक्का के दिन मक्का वाले भी मस्लहतन कलमा पढ़ कर मुसलमान हो गए और वह दीवार जो मक्का और मदीना के दरमियान कुफ़्र के नाम से खै़ंची गई थी गिर गई।

अब जब दीवार गिर गई तो ज़बान एक थी , दोनों का समाज एक था , कलचर एक था , तहज़ीब एक थी , बाप यहां था तो बेटा वहां , एक ख़ानदानी भाई इधर है तो दूसरा उधर , एक अज़ीज़ यहां है तो दूसरा वहां। यानि की ख़ानदान बटें हुए थे और जब ख़ानदान किसी मौक़े पर एक दूसरे से मिल जाएं तो पूछने की ज़रूरत नहीं क्या पकाते हो क्या पहनते हो या किसी लफ़्ज़ के मानी समझाने की ज़रूरत नहीं।

बस फ़तेह मक्का के बाद यह मामला हुआ , वह लोग अलग अलग क़ौमंे नहीं थीं , अलग अलग लोग नहीं थे , अलग अलग तहज़ीब न थी सब एक दूसरे को जानते थे। इस्लाम और कुफ़्र की वजह से अलग अलग हो गए थे। अब जब यह दोनेां शहर मुसलमानों के हो गए तो बिछड़े हुए मिल गए।

अग वह साथ उठने बैठने लगे वह लाइन कुफ़्र और इस्लाम की ख़त्म हो गई। अब मिले तो बिते दिन याद आए , गुज़िश्ता ज़माने की बातें याद आईं। तो बवउउवद चवपदज जो उनमें निकला वह अली (अ.स.) की दुश्मनी थी। उन्होंने कहा और तो सब ठीक है इस्लाम अच्छा है , सब बातें माक़ूल हैं पर हमारा दिल अली (अ.स.) की तरफ़ से साफ़ नहीं है। क्यों कहा ? उसका दिल अली (अ.स.) के लिये इस लिये साफ़ नहीं कि उसका चचा अली (अ.स.) के हाथों क़त्ल हुआ था। वह कौन था ? वह मक्का वाला था जो अब मुसलमान हो गया था तो उस पर मदीने वाले दोस्त ने कहा कि भई कहते तो तुम ठीक हो। उसने क्यों कहा ? इस लिये कि वह चोट खाया हुआ है ख़ैबर के अलम की , वह अलम बड़ा तमन्नाई था जो कि उस दिन उसे नहीं मिला , उसके लिये उसके दिल में ख़राश थी। अब एक तरफ़ मदीना और मक्का के लोगों के दिलों में अली (अ.स.) की दुश्मनी बवउउवद कुछ फ़ज़ाएल के हाथों पीटे हुए , कुछ तलवारों के हाथों पिटे हुए। मैं किसी के जज़्बात या किसी शख़्सियत पर तन्ज़ का क़ाएल नहीं हूँ मगर जो हक़ीक़तें हैं वह तारीख़ के आईने में और हदीस की रौशनी में पेश करूंगा कि किसी को कुछ कहने की गुंजाइश न रह जाए।

तो यह बात कामन है कि कुछ फ़ज़ाएल के हाथों , कुछ तलवार के हाथों दोनों के दिल के अन्दर दुश्मनी अली (अ.स.) और इधर रसूल (स.अ.) के अन्दाज़ बार बार यह बता रहे हैं , इरशाद यह बता रहे हैं कि उनको ही अपने दौर में ख़लीफ़ा मुक़र्रर कर के जाएगें। यह अपनी मस्नद पर उन्हें बिठा कर जायेगें। बात अगर ख़ाली नियाबते रिसालत की होती तो शायद लोगों को उसकी फ़िक्र ज़्यादा लाहक़ न होती लेकिन फ़तेह मक्का के बाद रिसालत के इक़्तेदार को लोगों ने आपस में बांट लिया। नतीजा यह हुआ , इस्लाम के अन्दर रसूल (स.अ.) की ज़िन्दगी में एक अज़ीम ज़ाज़िश ने जन्म लिया जिसका नाम कोई हो न हो हमने उसको दुश्मनी ए अली (अ.स.) का नाम दिया है।

अब सुबूत उसका सीना , क्यों कि मामला उस ज़माने का है जिस ज़माने से लोग अक़ीदें वाबस्ता करते हैं। अक़ीदतें मेरी भी वाबस्ता हैं , मैं दिल व जान से बुज़ुर्गाने इस्लाम का क़ाएल हूँ मगर बुज़ुर्गी यानी मैं उम्मती हूँ रसूल (स.अ.) का। उनके बताए हुए मज़हब पर चलता हूँ लेकिन अगर आप मुझ से यह मुतालेबा करते हैं कि मैं हज़रत मोहम्मद (स.अ.) को ख़ुदा के बराबर मानने लगूं तो मेरी गर्दन काट लें मैं मोहम्मद (स.अ.) को ख़ुदा न कहूंगा। इसका यह मतलब नहीं हुआ कि मआज़अल्लाह रसूल (स.अ.) की तौहीन की , नहीं क्यों कि हज़रत मोहम्मद (स.अ.) अल्लाह के बन्दे हैं , अल्लाह नहीं और दोस्ती का तक़ाज़ा भी यही है कि जैसे मानने का हमें हुक्म हुआ है वैसे मानें।

मैं अपने आपको अली (अ.स.) का ग़ुलाम कहता हूँ , अली (अ.स.) का चाहने वाला कहता हूँ लेकिन अगर आप यह कहें कि मैं अली (अ.स.) को ख़ातेमुल अम्बिया कहूं तो नहीं कहूंगा। वह इमामे अव्वल हैं , सैय्यदुल औसिया हैं लेकिन आप कहंे कि सैय्यदुल अम्बिया कहूं तो मेरे बस की बात नहीं और न उससे मौला अली (अ.स.) ख़ुश होंगे कि मैं रसूले आज़म (स.अ.) या आखि़री रसूल (स.अ.) कहुंगा। मेरे लिये जन्नत की सिफ़ारिश नहीं करेंगे।

तो मक़सद मेरी बात का यह है कि हम हर किसी को उसके मक़ाम पर मानते हैं हमारी मोहब्बत दर्जा ब दर्जा है। कौन कहता है कि हम साहबा को नहीं मानते , हम हर साहबा को मोहतरम मानते हैं मगर अहलेबैत (अ.स.) के बाद। रसूल (स.अ.) हमारे लिये क़ाबिले अहतराम है मगर अल्लाह के बाद। अली (अ.स.) हमारे लिये क़ाबिले एहतेराम हैं अहलेबैत के बाद। अब अगर रसूल (स.अ.) को ख़ुदा कहें तो मैं राज़ी नहीं , अगर अली (अ.स.) को रसूल (स.अ.) कहें तो मैं राज़ी नहीं और अगर अस्हाब को अहलेबैत (अ.स.) की जगह रखें तो मैं राज़ी नहीं। तो जनाबे आली दुश्मनी हो गई मज़बूत और इधर इक़्तेदार पर क़ब्ज़ा करते की फ़िक़े्र हुई और यह ज़बरदस्त तनज़ीम भी जो मुसलमानों के दरमियान बन गई न्दकमत ळतवनदक जिससे रसूल (स.अ.) बा ख़बर हैं मगर हालात ऐसे हैं कि उसे कैसे म्गचवेम किया जाए।

दलील सुनिए र्क़ुआन से , यह मामेला ऐसा है कि जब तक र्क़ुआन और हदीस की मज़बूत दलीले न लाऊंगा लोग मानने के लिये तैयार न होंगे।

सरवरे काएनात जब आखि़री हज के बाद चले तो पूरी साज़िश तैयार थी रसूल (स.अ.) ने अरफ़ात में जो ख़ुत्बा पढ़ा है उसमें अपने जाने की ख़बर दी है। अपने बाद वाले को नहीं बताया कि क्या होगा या रसूल (स.अ.) ने जो ख़ुत्बा ग़दीरे खुम में दिया है वह मैदाने अरफ़ात में क्यों नहीं दिया ? उसके लिये मेरे पास कोई जवाब नहीं है क्यों कि किसी किताब में से यह तज़किरा मैं नहीं पढ़ रहा हूँ लेकिन एक बात मेरी समझ में आती है कि हर आदमी ने चाहे वह रसूल (स.अ.) हों या इमाम (अ.स.) हों एहतेरामे काबा का ख़्याल रखा है। शायद इस ऐलान को मक्का की सरज़मीन पर इस लिये मुलतवी रखा हो कि अगर उस वक़्त हंगामा हो जाए तो मक्का की पाक ज़मीन ख़ून से रंगीन न हो।

इधर इस ऐलान की मन्ज़िल आई रास्ते में तो आयत क्यों कर उतरी या यहां रसूल (स.अ.) ‘‘ बल्लिग़ मा उन्ज़िला इलैक मिन रब्बिक ’’ यहा आयत का पहला टुकड़ा आया कि ‘‘ ऐ रसूल (स.अ.) ! उसे पहुँचा दें जो आपके परवरदिगार की तरफ़ से नाज़िल हो गया । ’’ पर आप आगे बढ़ गए। रसूल (स.अ.) ने पहुँचाया फिर आयत आई। ‘‘ व-इन्लम तफ़अल फ़मा अब्लग़्तो रिसालतहु । ’’ ‘‘ अगर नहीं पहुँचाया तो कोई रिसालत नहीं पहुँचाई ’’

फिर रसूल (स.अ.) आगे बढ़े फिर आयत आई ‘‘ वल्लाहो याफ़ेमोका मिनन्नास ’’ ‘‘ अल्लाह आपको लोगों के ख़तरे से बचाएगा ’’

अब रसूल (स.अ.) ने काफ़िला ठहरा लिया। जब उधर से ख़तरे के बचाव की ज़िम्मेदारी आ गयी तो रसूल (स.अ.) ने काफ़िले को रोका। दोस्तो यह बात क़ाबिले ग़ौर है कि आज कौन सा ख़तरा है 11 ज़िल्हिज्जा 10 हिजरी का क्या ख़तरा है यह आयत तो आनी चाहिये थी दावते ज़ुल अशीरा में कि अपने ख़ानदानों वालों को बताव अल्लाह आपको ख़तरे से बचाएगा। यह आयत आनी चाहिये थी शबे हिजरत में कि ऐ मेरे हबीब ! आप हिजरत कर जाएं अल्लाह आपको ख़तरे से बचाएगा , यह आयत आनी चाहिये थी बद्र में कि मेरे रसूल तीन सौ तेरह आदमी ले कर जंग करें काफ़िरों के ख़तरे से अल्लाह आपको बचाएगा , यह आयत आनी चाहिये थी जंगे ओहद में कि ऐ रसूल (स.अ.) ! अगर मुसलमान आपको छोड़ कर भी चले जाएं तो ग़म न कीजिएगा अल्लाह आपको ख़तरे से बचाएगा , यह आयत आनी चाहिये थी जंगे ख़न्दक़ में कि अगर दुश्मन क़वी हैं तो आप घबराइये नहीं अल्लाह आपको ख़तरे से बचाएगा। यह आयत अगर कहीं रूक गई थी तो कम अज़ कम फ़तह मक्का तक आ जाती मगर जो ख़तरे के मौक़े थे जब तो आई नहीं अब कौन सा ख़तरा रह गया था ? ऐ माबूद ! शम्मा ए इस्लाम रवानों के झुर्मुठ में है। तेरा हबीब , सरवरे काएनात (स.अ.) जिन लोगों के साथ चल रहे हैं तीन तीन तमज़ों के मालिक हैं , सब मुसलमान हैं , सब हामी हैं , सब के सब साहबी हैं। यह जो इतना बड़ा एक लाख चैबीस हज़ार का इज्तेमा आखि़री हज करके पलट रहा है सब मुसलमान , सब हामी , सब सहाबी हैं। मआज़अल्लाह उनमें भी कोई ख़तरा है। लेकिन रसूल (स.अ.) ने हर हुक्म पहुँचाया उस हुक्म के पहुँचाने में इस लिये देर की कि बात खुल कर सामने आ जाए कि कोई ख़तरा है जभी तो कहा गया कि अल्लाह ख़तरे से बचाएगा। यह आयत न दावते अशीरा , न बद्र , न ओहद , न ख़न्दक़ किसी मौक़े पर न आयी , मालूम हुआ कि यह ख़तरा काफ़िरों के ख़तरात से बड़ा ख़तरा है जो अल्लाह ने कहा कि मेरे हबीब अल्लाह हर ख़तरे से बचाएगा। यह र्क़ुआन है जो मैंने पढ़ा।

रसूल (स.अ.) ने ग़दीरे ख़ुम के मैदान में अल्लाह की हम्दो सना के बाद ऐलाने विलायते अली (अ.स.) कर दिया और मिम्बर पर बैठ कर सबको समझा दिया कि

‘‘ मनकुन्तो मौलाहो फ़हाज़ा अलीयुन मौला ’’ ‘‘ जिस जिसका मैं मौला उस उसका यह अली (अ.स.) मौला ’’

मुबारक बादें भी हुईं । दलील सुने , मेरा कहना यह है कि अली (अ.स.) की मुख़ालिफ़त की तहरीक इतनी मज़बूत हो चुकी थी कि अगर रसूल (स.अ.) कुछ दिन और ज़िन्दा रहते तो जो कुछ वीसाले रसूल (स.अ.) के बाद हुआ वह रसूल (स.अ.) की ज़िन्दगी में ही हो जाता । तारीख़ बताती है कि सरवरे काएनात ऐलाने ग़दीर के बाद मदीना की तरफ़ बढे़ । रास्ते में एक पहाड़ी , घाट आती है जिसका नाम उक़्बा की घाटी है। रात के वक़्त रसूल (स.अ.) का ऊंट उस घाटी से गुज़र रहा था। साज़िश यह थी कि रसूल (स.अ.) ज़िन्दा मदीना न पहुँचने पाएं लिहाज़ा रास्ते में रसूल अकरम (स.अ.) के ऊंट को घाटी में गिराने की साज़िश हुई। तारीख़ शाहिद है कि उस वक़्त जब रसूल (स.अ.) का नाक़ा उक़्बा की घाटी से गुज़र रहा था तो रसूल (स.अ.) के नाक़ा की मिहार हुज़ेफ़ा यमानी थामे हुए थे और अम्मारे यासिर ऊंट को पीछे से हांक रहे थे। ऊंट ऊपर से गुज़र रहा था जहां से जाना था रसूले अकरम (स.अ.) को। उस पर लोगों ने पत्थर लटकाए कि नाक़ा रात को अंधेरे में पहाड़ी (घाटी) में नीचे गिर जाए। यहां बिजली चमकी रसूल (स.अ.) ने सूरतें देखीं।

मेरा अक़ीदा यह है कि ख़ुदा ने रसूल (स.अ.) को दिखाने के लिये बिजली नहीं चमकाई। रसूल (स.अ.) तो नस्लो में देख लेता है , रसूल (स.अ.) तो सदियों के पीछे देख लेता है यह बिजली इस लिये चमकी ताकि लोग समझ लें कि देख लिये गए। रसूल (स.अ.) ने हुज़ैफ़ा यमानी को बुलाकर कान में नाम बताए और कहा: हुज़ैफ़ा सुनो ! फ़लां फ़लां लोग थे मगर हुज़ैफ़ा इस बात को बल्कि उन नामों को राज़ में रखना किसी से नामों को इज़हार न करना। या रसूल अल्लाह (स.अ.) जब इज़हार से मना फ़रमाया तो बताया क्यों ?

हुज़ैफ़ा ने फ़ौरन दूसरे दिन सुबह को ऐलान कर दिया कि साज़िश नाकाम हो गई , बिजली चमक गई थी , रसूल (स.अ.) ने सब को पहचान लिया , मुझे नाम बताए हैं और मना फ़रमाया है कि नाम न बताना। भरा मदीना था कभी अली (अ.स.) ने न पूछा हुज़ैफ़ा से कि वह कौन लोग थे , कभी सलमान न पूछा कि मुझे बताओ , कभी अबुज़र ने न पूछा कि नाम बताओ। कुछ लोग आ कर नाम पूछा करते थे और हुज़ैफ़ा हां नहीं करते थे , कहते मुझे रसूल (स.अ.) ने मना किया है।

सुनिए दूसरी साज़िश , अब रसूल (स.अ.) मदीने आ कर थोड़े दिनों बाद बिमार हो गए। पहले ख़बर दे चुके थे कि मेरी ज़िन्दगी के चन्द दिन बाक़ी हैं समझदारों के समझने के लिये यह बात काफ़ी थी कि यह बीमारी आखि़री बीमारी है।

तारीख़ शाहिद है कि उसी बीमारी में एक मन्ज़िल पर रसूल (स.अ.) ने कहा कि लाओ क़लम दवात मैं तुम्हें एक ऐसी तहरीर लिख दूं कि मेरे बाद तुम लोग गुमराह न होगे।

मुसलमानों को चाहिये था कि सर आंखों से क़लम दवात ले कर आते और रसूल (स.अ.) से लिखवाते लेकिन तारीख़ यह बताती है कि यहां झगड़ा होने लगा कि क़लम दवात दी जाए या नहीं।

इतने में एक क़रीबी सहाबी जिसको बड़ा दीन का ठेकेदार समझा जाता है और जिसको ख़लिफ़ा ए दोम भी कहा जाता है , ने कहा कि उनको दर्द की शिद्दत है और मअज़ाल्लाह मेरी ज़बान ज़ेब नहीं देती। उसने कहा कि उनका दिमाग़ दुरूस्त नहीं है। इस वक़्त यही किताबल्लाह काफ़ी है। (बुख़ारी शरीफ़)

रसूल (स.अ.) ने बीमारी के आलम में दस हज़ार 10000 का लश्कर मुरत्तब किया और उस 10000 के लश्कर का सरदार ओसामा बिन ज़ैद को बनाया और तमाम बुज़ुर्ग सहाबा और अन्सार को सिवाए अली (अ.स.) और अब्बास जो कि रसूल (स.अ.) के चचा थे और बड़े बड़े मुहाजेरीन और अन्सार को हुक्म दिया कि जाओ ओसामा के लश्कर में। तारीख़ बताती है कि लश्कर मदीना के बाहर जा कर ठहर गया। रसूल (स.अ.) बुख़ार की शिद्दत में भी जब आंख खोलते थे तो पूछते थे लश्कर गया ? कहा , नहीं। हुज़ूर सरवरे काएनात फ़रमाते थे , जाओ उनसे कहो कि जाएं। लश्कर न जाना था न गया। तारीख़ में यहां तक कि है कि आखि़री में रसूले ख़ुदा ने बरहम हो कर कहा: मगर फिर भी लश्कर न गया। सवाल यह है कि क्यों न गया ? जब हुज़ूर हुक्म दे रहे थे। यह बात में सवाल कीजिएगा कि रसूल (स.अ.) जो ग़दीर में कह गए थे उस पर अमल दर आमद क्यों नहीं हुआ ? यह सब इस्लाम की तारीख़ है जो मैं आपके सामने पेश कर रहा हूँ। क़यास से बहस नहीं कर रहा हूँ। रसूल (स.अ.) कहते हैं जाओ लश्कर नहीं जाता। इसका मतलब यह है कि अब पार्टी इतनी मज़बूत हो गई है कि रसूल (स.अ.) की बात का असर ही नहीं है। अब रसूल (स.अ.) भी हुक्म देने वाली हालत में नहीं रह गए कि जो हुक्म करें वह हो जाए , अपनी ज़िन्दगी के आखि़री दिनों में। अच्छा सुनिये मामला हल्का नहीं तारीख़े की मजबूर हैं।

सुनिए मिसाल से वाज़ेह करता हूँ। आप काम करते हैं अबु ज़हनी में जबकि कोई है रहना वाला लखनऊ का , पाकिस्तान का कोई कहीं का और कोई कहीं का , अब एक साहब अपने वतन कह कर गया था कि महीना के बाद वहां जाना है ड्यूटी पर बीस दिन गुज़र गए और उसका वालिद बीमार हो गया और उसकी हालत बिगड़ गई। बाप ने कहा बेटा जाओ यहां हालत बिगड़ रही है , बेटा नहीं गया। बाप बीमारी में फिर उठा , आंखें खोली , कहाः बेटा ! तुम अभी तक नहीं गए ? लड़का नहीं जा रहा है। और यह अपनी जगह दुरूस्त है , क्यों ? अगर चला गया तो कहीं ऐसा न हो कि अब इधर जहाज़ से उतरे और वहां तार मिला की पीछे मामला ख़राब हो गया कि वालिद साहब का इन्तेक़ाल हो गया। अब या तो वह फिर पलट कर आए या ज़िन्दगी भर का दाग़ लगाए कि बेटा दूर था बाप के जनाज़े में शरीक न हो सका। लेहाज़ा जैसा होगा देखा जायेगा इस हाल में हम छोड़ कर न जायेंगे तो बेटा बाप को इस हाल में छोड़ कर न जायेगा। तो बाप का अगर इन्तेक़ाल हो जाए तो उसे रोते हुए आना चाहिये न मैय्यत उठानी चाहिये , क़्रब्रिस्तान पहुँचाना और दफ़्न करना चाहिए था। अगर बेटा जहां ठहरा हुआ था वहां ठहरा रहा , बाप की मैय्यत दफ़्न हो गई मगर बेटा नहीं आया तो अब आप यह न कहिएयेगा कि बाप की मुहब्बत में ठहरा था बल्कि वाज़ेह हो गया कि जायदाद पर क़ब्ज़ा लेने के लिये ठहरा हुआ था।

यह जो दस हज़ार का लश्कर मदीना के दरवाज़े पर ठहरा हुआ था अगर रसूल (स.अ.) के इन्तेक़ाल की ख़बर सुनकर मदीने में रोता पीटता आ जाता तो हमारे दिल को शिकोह न होता। लश्कर जहां था वहां ठहरा रहा। रसूल (स.अ.) दफ़्न हो गए और लश्कर न आया , इसका मतलब की मोहब्बते रसूल (स.अ.) में नहीं ठहरे थे , मदीना के दरवाज़े पर ठहरे थे मदीना में होने वाले इन्क़ेलाब की पुश्त पनाही के लिये।

यह लश्कर नहीं आया। यह तारीख़ का अजीब व ग़रीब मरहला है अगर जैसा पढ़ा है तारीख़ में वैसे पेश किया तो शायद किसी की दिल अज़ारी तक बात चली जाए। मैं एक मिसाल से अपने मक़सद को वाज़ेह करता हूँ। मसलन एक बाप के दो बेटे थे और बाप बड़ा मालदार और रईस आदमी था। अब दोनों बेटों में से एक को बाप की ज़ात से बड़ी मोहब्बत थी और दूसरे को बाप के माल से प्यार था। इत्तेफ़ाक़ से बाप बीमार पड़ गया। अब दोनों आ कर पूछते हैं कि अब्बा कैसे हो ? मगर जवाब की तमन्ना अलग अलग होगी , जिसकी मोहब्बत बाप की ज़ात के साथ है वह मुन्तज़िर होगा की बाप की हालत बेहतर हो रही है यानि की वह चाहेगा की बाप कहे , बेटे ! अल्हम्दो लिल्लाह मैं ठीक हो रहा हूँ। मगर जिसकी मोहब्बत है माल और दौलत के साथ वह चाहेगा कि बाप कहे कि मेरा कोई पता नहीं , न जाने किस वक़्त मेरी रूह निकल जाए। यहां तक कि उसी हाल में एक दिन बाप का इन्तेक़ाल हो गया। जिसको ज़ात प्यारी है वह मैय्यत के पास बैठा रो रहा था। ग़ुस्ल व कफ़न के इन्तेज़ामात में लगा है और जिसको जायदाद प्यारी थी जायदाद पर क़ब्ज़ा ले रहा है। वह सेफ़ की चाबी कहां है ? वह बैंक के चैक बुक कहां हैं ? उस कोठी के कागज़ात कहां हैं ? फ़लां ज़मीन के कागज़ात कहां हैं ? नतीजा क्या निकला कि एक के हिस्से में दौलत और जायदाद और दूसरे के हिस्से में आई मैय्यत और जिसने दौलत पर क़ब्ज़ा जमा लिया वह कुछ दिन तो इधर रहा दौलत समैटने के चक्कर में , बाद में दो चार मुल्कों की सैर के बाद आया तो किसी ने पूछा कि साहब यही ज़माना था कि आपके वालिदे मोहतरम का इन्तेक़ाल हुआ था तो साहब लगे सोचने , हां शायद यही ज़माना था। दिसम्बर का महीना था और तारीख़ भूल गए और भूलते भी कैसे ना मैय्यत पर रोए , होते तो तारीख़ याद रहती , जनाज़ा में शिरकत की होती तो तारीख़ याद रहती।

इसी तरह दर्दनाक वाक़िआ यह है कि न उम्मत को तारीख़े पैदाइश याद है न तारीख़े वफ़ाते रसूल (स.अ.)। यह क्या फ़लसफ़ा है कि बारह तारीख़ के अन्दर पैदाइश भी वफ़ात भी।

रसूल (स.अ.) को पूछना है तो अबु तालिब (अ.स.) से पूछो:-

अरे ! रसूल (स.अ.) की विलादत व वफ़ात का पूछना है तो अबु तालिब (अ.स.) से पूछो। जिनकी गोद में आंख खोली और वफ़ात का पूछना है तो अली (अ.स.) से पूछो जिनके सीने पर दम निकला। दोनों ने न दुनिया से झगड़ा किया न लोगों को तारीख़े पैदाइश याद रही न तारीख़े वफ़ात। अब बताइये यह क्या चक्कर है इस्लाम के अन्दर ? अब कहते हैं कि अली (अ.स.) ने तलवार क्यों नहीं उठाई अपने हक़ के लिये ? अली (अ.स.) के किस किस से लड़ते ? ऐजाज़े क़ुव्वत से सारे मक्का व मदीना को ख़त्म कर देते तो इल्ज़ाम अली (अ.स.) पर ही रहता कि मोहम्मद (स.अ.) ने दीन को ख़ून से सींचा था अली (अ.स.) ने ख़ून से नहा दिया। फ़ातेह ख़ैबर ने तलवार क्यों न चलाई ? तलवार चलाते तो पहले यह दस हज़ार का लश्कर था मदीना के दरवाज़े पर उस से निपटते। हालात पहचानिये कि अली (अ.स.) ने तलवार क्यों न उठाई ? कह देना हर किसी ज़बाना के लिये आसान है। दूसरी बात मौला अली (अ.स.) क़लम दवात ले कर ख़ुद क्यों न आ गए लिखवाने ? अगर अली (अ.स.) क़लम दवात और काग़ज़ ले कर आते तो शायद इतना हंगामा होता कि वहीं शहादते रसूल (स.अ.) हो जाती। हालात का तजज़िया तो फ़रमाईये कि जब तक ‘‘ वलिल्लाहे या-सेमोका मिनन्नास ’’ की ।नजीवतपजल न आ गई तब तक ऐलाने ग़दीर न हुआ। अब आख़री दलील सुनिये। ऐसी दलील जिसे कोई काट न सके इस लिये कि क़ुरआन की बात हो तो आप तफ़सीर में उलझाइये , हदीस की बात हो तो आप रवायत में उलझाइये।

अली (अ.स.) का मुख़ालिफ़ कौन ?

मैंने इतने दिन जो पढ़ा है उसका निचोड़ यह है कि अली (अ.स.) की मुख़ालिफ़त के दो गिरोह थे।

एक गिरोह वह जो अली (अ.स.) की तलवार के पिटे हुए थे और दूसरे वह जो फ़ज़ाएले अली (अ.स.) की वजह से मुतअस्सिर हुए थे। दलील यह है कि जब रसूल (स.अ.) ? की वफ़ात के पचीस साल के बाद इत्तेफ़ाक हालात के तहत अली (अ.स.) तख़्ते हुकूमत पर आ गए तो वह दोनों गिरोह अली (अ.स.) के खि़लाफ़ सर गरम हो गए। जो तलवार से पिटा था उसका बेटा सामने आया और जो फ़ज़ाएल से मोअस्सिर हुआ उसकी बेटी सामने आई।

आपने गौर फ़रमाया यह कौन मुसलमान थे जो अली (अ.स.) के मुक़ाबिल आए ? अली (अ.स.) के तख़्त नशीन होते ही यह तलवारें ले कर ख़ड़े हो गए। तारीख़ से पूछिये आज भी तारीख़ अली (अ.स.) का कुसूर नहीं बताती , अली (अ.स.) तो ऐसे मासूम हैं कि अली (अ.स.) को आज भी तारीख़ बे ख़ता कह रही है। लेकिन वह भी प्यारे हैं लिहाज़ा उनकी ख़ता ख़ताए इज्तेहादी है। अब समझे कि वह क्यों आलमगीर तनज़ीम बन गई अली (अ.स.) के खि़लाफ़ जिसने इस्लाम की तारीख़ के रूख़ को भी बदला और ज़माने ने अली (अ.स.) के साथ क्या किया और रसूल (स.अ.) की बेटी फ़ातेमा (स.अ.) के साथ क्या किया ? यही मुख़ालिफ़ते अली (अ.स.) थी और यही अदावते अली (अ.स.) थी जिसका शोला कर्बला में भड़का। जब इमाम हुसैन (अ.स.) ने उमरे साअद से पूछा कि मेरी ख़ता क्या है ? तो उस लाअनती मलऊन ने कहा कि बुग़्ज़ है। तेेरे बाप की दुश्मनी में मैं तुमसे लड़ रहा हूँ और जब हुसैन (अ.स.) का कटा हुआ सर यज़ीद के सामने रखा गया तो उसने ख़ुश हो कर शेर पढ़ा। ‘‘ काश आज मेरे बद्र वाले ज़िन्दा होते तो इस मन्ज़र को देख कर खुश हो कर मुझे दुआएं देते ’’ सब से ज़्यादा अफ़सोस मुसलमान के भोलेपन पर। किसी तरह आंखें नहीं खुलती यज़ीद का शेर सबने सुना अब जो कहोगे कि मुसलमानों की लड़ाई न थी। बच्चों को भी जंगे बद्र याद होगी जो यज़ीद के दादा और हुसैन (अ.स.) के नाना के दरमियान हुई थी। हुसैन (अ.स.) के नाना कह रहे थे कि ख़ुदा एक है , यज़ीद का दादा कहता नहीं यह तीन सौ साठ हैं और जब तलवार चली तो हुसैन (अ.स.) के बुर्ज़ुगों ने अल्लाह की तरफ़ से तलवार चलाई और यज़ीद के बुर्ज़ुगों ने बुतों की तरफ़ से , जिसके नतीजे में यज़ीद के बुर्ज़ुग मारे गए। हुसैन (अ.स.) के बाप ने यज़ीद के बुर्ज़ुगों को क़त्ल किया राहे ख़ुदा में लड़ते लड़ते। अब यज़ीद जो याद कर रहा है किसको याद कर रहा है ? जो बुतों के नाम पर मरे थे। अब कर्बला में होने वाली जंग को दो मुसलमानों की जंग न कहें। यह ख़ुदा व सनम की लड़ाई थी और वह भी ख़ुदा और सनम की लड़ाई फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि हुसैन (अ.स.) के बुर्ज़ुग ने सर काट कर मुहब्बते ख़ुदा का सुबूत दिया और हुसैन (अ.स.) ने सर कटवा कर मुहब्बते ख़ुदा का सुबूत दिया।

मसलहते ख़ुदा:- बाज़ मक़ाम ऐसे होते हैं जहां दीन के लिये सर काटना फ़र्ज़ होता है और बाज़ मक़ाम पर सर कटवाना फ़र्ज़ होता है। बद्र की लड़ाई में इब्तेदा में सर काटना फ़र्ज़ था चूंकि अगर अली (अ.स.) सर कटवा देते तो सारी लड़ाईयां कौन लड़ता ? जब कि कर्बला की लड़ाई अन्जामे इस्लाम था जहां पर सर कटवाना ज़रूरी था। वहां अगर अली (अ.स.) सर कटवा देते तो इस्लाम न फैलता। 61 हिजरी में इस्लाम फैल चुका था यहां अगर सर काट लेते तो आम लड़ाई तसव्वुर होती। सर कटवा कर इस्लाम बचाया ताकि क़यामत तक दिलों पर जंगे कर्बला की मोहर लगी रहे क्यों कि उसमें हुसैन (अ.स.) ने बहुत से सरों का नज़राना दिया है। कभी अट्ठारह साल वाले ने सीने पर बरछी खाई , कभी तेरह साल वाले क़ासिम ने मौत को शहद से ज़्यादा शीरीं समझा और कहीं चैंतीस साल के कड़ियल जवान अलमदार भाई दरियाए फ़ुरात से प्यासा निकला और कभी छः महीने के असग़र ने मुसकुरा कर तीर खाया। कभी किसी बहन ने अपने हाथों से ला कर भाई को कफ़न दिया और कभी कमसिन बेटी रात की तारीकी में बाबा की लाश को सीने से लगाने आई। अफ़सोस सद अफ़सोस।

अली (अ.स.) से दुश्मनी के अस्बाब

सिलसिला ए कलाम ज़हने आली में होगा कि वह अस्बाब क्या हैं जिनकी बिना पर दुनियां ने अली (अ.स.) से दुश्मनी इख़्तियार की। उसका खुलासा पहले आपकी खि़दमत में पेश किया कि उसके ख़ास असबाब दो थे एक वह लोग जो अली (अ.स.) की तलवार से कटे हुए थे और दूसरे वह जो फ़ज़ाएल की दौड़ में अली (अ.स.) से बहुत पीछे रह गए थे।

इस्लाम की तारीख़ में वह वाक़ेआत रूनुमा हुए जिससे इस्लाम टुकड़ों में बंट गया , इस्लाम मलूकियत में बदल गया बजाए मज़हब या दीन के लोगों ने इस्लाम को मलूकियत समझा। जब इस्लाम मलूकियत और सलतनत बन गया तो मलूकियत और सलतनत का दामन दाग़ों से ख़ाली नहीं रह सकता। इसी तो दुनियां दामने इस्लाम को भी दाग़दार समझी हालांकि दामने इस्लाम दाग़दार न था। दामने सलतनत दाग़दार थाा मगर इंसान की नज़र में इतनी तेज़ी न थी कि फ़र्क़ महसूस कर सकती कि दामने सलतनत क्या है और दामने इस्लाम क्या है ? नतीजा यह निकला कि इस्लाम को बदनाम किया गया जब कि सलतनत के दामन पर दाग़ थे उसके लिये मैं सुबूत पेश करूंगा कि ग़ैरों ने इस्लाम को देखकर जो तसव्वुर पेश किया वह भी सुन लीजिए। गबून एक मशहूर राइटर गुज़रा है उसने इस्लाम का चीर फाड़ करते हुए लिखा है:- ‘‘ मोहम्मद (स.अ.) ने एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में क़ुरआन लेकर अपनी सलतनत की बुनियादें रूम और ईसाइयत के खण्डरात पर वसीअ की । ’’

हमारे रसूल (स.अ.) रहमत थे , वह तलवार उठाते ही न थे और न वह रूम तक तशरीफ़ ले गए। कभी तारीख़ नहीं बताती तो मिस्टर गबून ने कैसे लिख दिया कि एक हाथ में क़ुरआन और एक में तलवार ? उसने कहा ज़बरदस्ती लड़ते हो तुम उस शक्ल से आए थे हमने लिख दिया मालूम हुआ की तसव्वुर मुसलमान का था और नाम लिखा गया रसूल (स.अ.) का। यह तो गए थे मुसलमान इस तरह एक हाथ में तलवार और दूसरे में क़ुरआन तो रसूल (स.अ.) ने कहा , मुझसे शिकवा न करना , मैं मुसलमानों के दोनों हाथ मसरूफ़ कर के गया था। एक हाथ में क़ुरआन और दूसरे हाथ में दामने अहले बैत (अ.स.) मगर मेरे बाद अकसर लोगों ने दामने अहले बैत (अ.स.) छोड़ा और हाथ में तलवार आ गई। मैं क्या करूं ?

समझे आप इस्लाम की बदनसीबी। यही मैं करता हूँ कि इस्लाम और मुसलमानों की बदनसीबी की इब्तेदा यह है कि अहले बैत (अ.स.) का दामन छोड़ा तो एक हाथ हुआ ख़ाली , ख़ाली हाथ तलवार आ गई।

मैंने कहा गबून तूने एक रूख़ देखा है और तू समझ नहीं सका हमने क़रीब से देखा है उनके हाथ में क़ुरआन नहीं पत्थर है जो क़ुरआन कह रहा है , क़ुरआन नहीं है क़ुरआन नुमा कोई चीज़ है जो दूर से क़ुरआन दीखाई देता है।

तो अज़ीज़ाने गेरामी ! तारीख़े इस्लाम में रसूल (स.अ.) की आंख बन्द होते ही वह नाज़ुक दौर आ गया कि जिसका नतीजा आज तक निगाहों में है और आज तक आलमे इस्लाम में तफ़र्रक़ा की सूरत में वह नतीजा नुमायां है।

अब यह रह गया कि हमने उस कशमकश के माहौल में और उस माहौल में यह तै किया कि हमें अली (अ.स.) का साथ देना है। यह क्यों तै किया ? इस लिये कि अली (अ.स.) का साथ देने में सेफ़ साइड तो आई और यह सेफ़ साइड सुन लीजिए। हर आदमी अपनी ज़िन्दगी में ख़तरे से महफ़ूज़ रास्ता चाहता है , ख़तरे वाला रास्ता नहीं चाहता। जब तारीख़े इस्लाम में उलझने हुई तो हमने पूछा यह उलझने कैसी हैं ? उसने कहाः एक बात तो बताओ एक मुसलमान पर वाजिब कितना है।

देखिए आज आलमे इस्लाम में दो नज़रिये हैं , एक नज़रिया हमारा है , जो शिया लोग वह यह कि रसूल (स.अ.) ख़ुदा के हुक्म से हज़रत अली (अ.स.) को ख़लीफ़ा बना गए थे ख़ुद नहीं बना गए थे हुक्मे ख़ुदा से बना गए थे जैसे रसूले खुदा (स.अ.) नमाज़ पहुँचा गए थे रसूल (स.अ.) अपनी तरफ़ से नमाज़ नहीं दे गए थे , ख़ुदा ने भेजी थी तो रसूल (स.अ.) ने पहुँचाई थी। रसूल (स.अ.) रोज़ा पहुँचा गए तो रसूल (स.अ.) के वाजिब किये हुए थोड़े हैं ? ख़ुदा के वाजिब किए हुए हैं। जैसे रसूल (स.अ.) हुक्मे हज पहुँचा गए थे। हज जो है रसूल (स.अ.) ने नहीं वाजिब किया , अल्लाह ने वाजिब किया है।

वैसे ही अली (अ.स.) को वली बना गए थे , रसूल (स.अ.) ने नहीं बनाया , अल्लाह ने बनाया , अल्लाह ने बनाया , हर बात अल्लाह की रसूल (स.अ.) ही के ज़रिए से मिली है तो एक नज़रिया यह है नज़रिया ए इस्लाम में।


अली (अ.स.) ग़दीरे ख़ुम में

मैं तन्ज़ नहीं करता , मैं उसका क़ाएल नहीं मगर बात सीधी है बिगाड़ने की ज़रूरत नहीं। किसी भी नज़रिये का मुसलमान क्यों न हो एक नज़रिया आलमे इस्लाम में यह है कि ख़ुदा के हुक्म से रसूल (स.अ.) ग़दीरे ख़ुम में अपना नाएब मुक़र्रर फ़रमा गए थे मगर सियासी वजूह पर मुसलमानों ने माना। अलबत्ता इस्लाम के दूसरे नज़रिये के लोग कहते हैं कि नहीं रसूल (स.अ.) किसी को अपना ख़लीफ़ा बना कर नहीं गए थे न अली (अ.स.) को और न किसी और को उनका यूं ही इन्तेक़ाल हो गया था । बग़ैर इस मसले पर रौशनी डाले , तो जब रसूल (स.अ.) ज़माने से डठ गए तो मुसलमानों ने सोचा कि बग़ैर सरदार के तो फ़ौज हो नहीं सकती। बग़ैर रहबर के तो निज़ाम चल नहीं सकता लिहाज़ा कैसे चलेगा। पस उस उम्मत ने अपनी राय की अकसरियत से सद्र मुन्तख़ब कर लिया। इस लिये उम्मत को चाहिये उस रहबर को मान ले। यह दूसरा नज़रिया है। मैंने उसमें से पहले नज़रिया को मुन्तख़ब किया ज़िन्दगी के लिये क्यों कि यह सेफ़ साइड है। वह कैसे ? उन नज़रियों में से एक ही सही होगा या हमारा नज़रिया कि बहुक्मे ख़ुदा आप अली (अ.स.) को अपना नाएब मुक़र्रर फ़रमा गए थे या दूसरा कि किसी को नहीं बना गए थे। अब आप से एक बात पूछता हूँ एक मुसलमान पर कितना इल्म वाजिब है जो ख़ुदा कहे उस पर अमल करना ? जो रसूल (स.अ.) कहें उस पर अमल करना ? या जो रसूल (स.अ.) कहें उस पर अमल करना वाजिब है या नहीं ?

कहीं लिखा है कि मुसलमान का हुक्म मानना मुसलमान पर वाजिब है ? अब अगर हमारी क़ौल सही है कि जिसने अली (अ.स.) को माना उसने हुक्मे ख़ुदा और रसूल (स.अ.) की खि़लाफ़ वर्ज़ी न की और अगर हमारे मुख़ालिफ़ नज़रिये का क़ौल सही है तो उसने न ख़ुदा का , न रसूल (स.अ.) का हुक्म तस्लीम किया बल्कि सिर्फ़ मुसलमानों का हुक्म माना।

अगर क़यामत के दिन उस जुर्म में पकड़े गए कि मुसलमानों ने तो तय किया तुमने क्यों नहीं माना तो हम कहेंगे कि ऐ माबूद ! तूने अपनी इताअत का हुक्म दिया था या वह आयत बता जिसमें मुसलमानों के हुक्म को मानने का हुक्म दिया हो। वह आयत चाहिये ?

जनाबे आली ! मैं मजलिस पढ़ कर उतरा आप ठण्डे पानी का गिलास लाए और कहा कि जनाब आप पसीना पसीना हो रहे हैं पानी पी लें। मैंने कहा कि कल भी मजलिस पढ़नी है आवाज़ ख़राब हो जाऐगी अगर पानी पियुंगा तो आपने कहा नहीं ठण्डा पानी है आप पी लीजिए , सबकी ख़्वाहिश है। मैंने कहा , इससे निमोनिया भी हो सकता है और नज़ला भी , सारा जिस्म गर्म है और यह पानी ठण्डा है। कहा नहीं। मौलवी साहब सारे मुसलमान चाहते हैं , पी लीजिए । मैंने कहाः नहीं मैं नहीं पियुंगा। अब सारे मुसलमानों ने भी कहा कि जनाब पी लीजिए मैंने कहा नहीं मैं नहीं पियुगां।

फिर उन मुसलमानों की ताईद में सारी दुनियां के मुसलमानों ने ताईद की कि पी लीजिए। मैंने कहा: नहीं पियुगा बल्कि बजाए पीने के मैंने नीचे गिरा दिया। अब आप बताएं कि मैंने कितना बड़ा जुर्म किया कि अगर सारी दुनिया के मुसलमानों का कहना टाल दूं क्यों कि यह हुक्मे ख़ुदा नहीं है और न ही हुक्मे रसूल (स.अ.) है।

अज़ीज़ाने गिरामी ! मसला सिर्फ़ इतना है कि हमारी समझ में यह बात नहीं आई कि रसूल (स.अ.) जो सुर्मा लगाने के आदाब , कंघा करने के आदाब , आईना देखने के आदाब , टोपी पहनने के आदाब , घर से बाहर क़दम रखने के आदाब , घर में क़दम रखने के आदाब और बेशुमार मसाएल भी अपनी तब्लीग़ में नज़र अन्दाज़ न करें सब कुछ बता गए वह इस्लाम के मुस्तक़बिल का इतना बड़ा मसला नज़रअन्दाज़ कर के कैसे चले गए ? यह छोटे छोटे मसाएल न बताए होते तो उनके बदले में यह मसाएल दिया होता कि जिसके सबब तफ़र्रूका पड़ रहा है।

रसूल (स.अ.) का विसाल

जनाब ! इस्लाम में तफ़र्रूक़ा की इब्तेदा हुई और मस्जिदुन्नबी में यह मन्ज़र नज़र आने लगा कि अली (अ.स.) और अली (अ.स.) के घराने के चन्द लोग रसूल (स.अ.) के पास बैठे हैं। हम तो यह समझते थे कि मदीना के सब लोग सर पीटते हुए आएंगे रसूल (स.अ.) के पास और ग़म के मारे अपनी जाने दे देंगे।

मदीना के दर व दीवार से रोने की सदाए आएंगी लेकिन मदीना में ऐसा सन्नाटा छाया कि अगर कोई परदेसी भी मदीना में आकर मर जाता तो इतना सन्नाटा न होता।

हमें तो तारीख़ में नहीं मिलता कि मस्जिदे नबवी में कोहराम मचा है हमें तो तारीख़ में सिर्फ़ यह मिलता है कि एक बेटी के रोने की आवाज़ आ रही थी। वहां न भीड़ थी न कोई मजमा था । कुछ भी नहीं था , सिर्फ़ अली (अ.स.) थे अब्बास और दो तीन आदमी और थे और मस्जिद में कोई न था। हज़रत अली (अ.स.) सरवरे काएनात की मय्यत को ग़ुस्ल दे रहे थे और हज़रत अब्बास , हसन और सकरानी पानी डाल रहे थे।

उन तीनों की आंखों पर पट्टी बंधी थी। अली (अ.स.) की आंखे खुली थीं इस लिये कि रसूल (स.अ.) की वसीयत थी कि या अली (अ.स.) तुम ग़ुस्ल देना और अब्बास , हसन , सकरानी तुम्हारी मदद करेंगे मगर उनको इतना बता देना कि मेरी मय्यत देखें नहीं वरना नाबीना हो जाएंगे इस लिये उन तीनों की आंखों पर पट्टी बंधी थी।

तारीख़े इस्लाम में एक और जुमला मिलता है। यह लिखा है कि अब्बास की पट्टी बंधी थी जबकि अब्बास रसूल (स.अ.) के चचा थे

वाज़ेह रहे कि हज़रत अब्बास ने हज़रत अली (अ.स.) से कहा कि ऐ भतीजे ! अपना हाथ लाओ , तो अली (अ.स.) ने पूछा कि चचा हाथ क्या कीजिएगा ? कहा: कि बैअत करूंगा तुम्हारी। कहा क्यों चचा ? तो हज़रत अब्बास ने कहा , इस लिये कि जब दुनिया देखेगी कि रसूल (स.अ.) के चचा ने अली (अ.स.) के हाथों पर बैअत कर ली तो सब कर लेंगे। अली (अ.स.) ने कहा: नहीं मुझे ऐसी बैअत नहीं करनी चाहिये। हाथ नहीं दिया। या अली (अ.स.) बड़ी सियासी बात थी जो अब्बास कह रहे थे , हाथ बढ़ा देते। मौला अली (अ.स.) ने हाथ अब्बास के हाथ में नहीं दिया। अगर अली (अ.स.) उस बैअत के बाद ख़लीफ़ा बनते तो यह होता कि अब्बास ने बैअत की इस लिये ख़लीफ़ा बने।

अली (अ.स.) अब्बास के बनाए नहीं बनना चाहते थे खु़दा के बनाए थे। अली (अ.स.) को ख़लीफ़ा मानना या न मानना यह एक अलग मौज़ू है।

बड़ी हैरत का मक़ाम है कि रसूल (स.अ.) के जनाज़े में कुल 9 या 11 आदमी थे। इससे ज़्यादा तो किसी परदेसी के जनाज़े में होते हैं। यहां मुरसले आज़म का जनाज़ा दफ़्न हो रहा था और उसके बाद जब रसूल (स.अ.) की मैय्यत दफ़्न हो गई तो नए मक़ामात (सक़ीफ़ा) से फ़ारिग़ हो हो कर लोग आए और इधर अली (अ.स.) अपने घर से निकले मस्जिद में सब जमा हुए। अली (अ.स.) ने कहा: यह क्या हुआ ? कहाः या अली (अ.स.) ! सब ने मिल कर ख़लीफ़ा बना लिया , अकसरियत ने बनाया है। कहा: मदीना में अकसरियत अन्सार की थी और तुम तो महाजरीन हो ? कहाः या अली हमने दलील दी। अली (अ.स.) ने कहा क्या दलील है ? कहने लगे: हमने दलील यह दी कि तुम्हारी निस्बत हम रसूल (स.अ.) के ज़्यादा क़रीब हैं। अली (अ.स.) ने उनके मुहं से कहलवा लिया कि अकसरियत से नहीं दलील से बनते हैं तो आपने कहा: ‘‘ जो दलील तुुम्हारी अन्सार पर है वही दलील मेरी तुम पर है । ’’

मेरे मौला अली (अ.स.) के उस जवाब पर आज तक तारीख़ ला जवाब है। अब तक किसी ने उसका जवाब नहीं दिया। यह कह कर अली (अ.स.) मस्जिद से अपने घर आ गए और ख़ामोश बैठे रहे। तारीख़े इस्लाम हमारे सामने अजीबो ग़रीब मन्ज़र पेश करती है। ज़रा तवज्जो चाहता हूँ इस लिये कि आदमी मुसलमान बने तो आंखें खोल कर मुसलमान हो क्यों कि इस्लाम अंधेरे का नाम नहीं , इल्म का नाम है , इल्म की रौशनी का नाम है।

अब तारीख़ हमारे सामने दूसरा मसअला लाती है वह यह है कि क़ुरआन में कहीं लफ़्ज़े अहलेबैत है और कहीं लफ़्ज़े क़ुर्बा इस्लाम होना है। कहीं लफ़्ज़े ज़ुल्क़र्बा से कौन मुराद है अब आले रसूल (अ.स.) से कौन मुराद हैं ? अहलेबैते रसूल (स.अ.) से कौन मुराद हैं ? और ज़ुल्क़र्बा से कौन मुराद हैं। इस मसअले पर आलमे इस्लाम में बहसें हैं।

रसूल (स.अ.) के रिश्तेदारों में तअय्युन में भी इस्लाम में बहसें हैं। बाज़ कहते हैं कि बीवियां भी शामिल हैं , बाज़ कहते हैं नहीं यह झगड़ा है। मगर इसमें कोई झगड़ा नहीं कि बेटी रसूल (स.अ.) की रिश्तेदार है।

जनाबे सैय्यदा के मसअले में है कि जनाबे सैय्यदा (स.अ.) आया ए ततहीर में भी हैं जनाबे सैय्यदा (स.अ.) ज़ुल्क़र्बा में भी हैं। जनाबे सैय्यदा (स.अ.) आइम्मा ए मवद्दत में भी हैं , इसमें कोई झगड़ा नहीं इस लिये हर रिश्ते पर बहस हो सकती है मगर बाप बेटी के रिश्ते पर बहस नहीं हो सकती। यह रिश्ता हर बहस से बाला तर है। यह तय शुदा बात है।

कोई आया ए ततहीर में हो या न हो मगर जनाबे सैय्यदा (स.अ.) हैं। ज़ुल्क़ुर्बा में कोई आए या न आए मगर जनाबे सैय्यदा हैं। तारीख़े इस्लाम गवाह हैं कि रसूल (स.अ.) के बाद बरसरे इक़्तेदार का टुकड़ा जो सबसे पहले होता है वह जनाबे सैय्यदा (स.अ.) हैं। यह तारीख़े इस्लाम का हैरत अंगेज़ मसअला है कि बरसरे इक़्तेदार जमाअत जो टकराती है तो पहले जनाबे सैय्यदा (स.अ.) से। कौन सैय्यदा ? जिसकी शान बुतूल और लक़ब ख़ातूने जन्नते और ख़ातूने क़यामत है।

कौन ख़ातूने क़यामत ? :- जिसका लक़ब ज़हरा है। ज़हरा कली को भी कहते हैं और जे़या को भी कहते हैं। रसूले मुअज़्ज़म फ़रमाते हैं ‘‘ मेरी बेटी से जन्नत की ख़ुश्बू आती है। ’’ आप जन्नत की उस कली को सूंघा करते थे।

कौन ख़ातूने जन्नत ? जिसकी सवारी मैदाने महशर में आएगी तो निदा दी जायेगी कि ऐ अहले महशर ! अपनी निगाहे निची कर लो मुहम्मद (स.अ.) की बेटी की सवारी गुज़रने वाली है।

कौन ख़ातूने क़यामत ? जिसकी सवारी सत्तर हज़ार हूरों के झुर्मुट में पुले सिरात से ऐसे गुज़र जाएगी जैसे बिजली कूद जाती है।

मोमिनीने कराम ! मैं सैय्यदा ए कौनैन का क्या ताअर्रूफ़ कराऊँ यह वह सैय्यदा हैं जिनके लिये रसूल (स.अ.) ने फ़रमाया , ‘‘ फ़ातिमा मेरा टुकड़ा है । ’’

वह सैय्यदा हैं जिनके दरवाज़े पर रसूल (स.अ.) सलाम किया करते थे। यह वह सैय्यदा हैं जिनकी ताज़ीम के लिये रसूले अकरम (स.अ.) खड़े हो जाते थे।

तारीख़ शाहिद है कि सरवरे काएनात (स.अ.) के दुनिया से चले जाने के बाद जब जनाबे सैय्यदा फ़ातिमा (स.अ.) अपना हक़ मांगने दरबार में गईं तो बरसरे मिम्बरे ने कहा कौन सा हक़ ?

फ़ातिमा (स.अ.) के हक़ से इन्कार

मोमिनों ! सैय्यदा फ़ातिमा का हक़ वह था जो जायदाद जिसका नाम फ़िदक था जो रसूल (स 0 अ 0) ने अपनी ज़िन्दगी में दे गये थे जो उनसे वापस ले लिया गया था।

आज लोग कहते हैं कि यह शिया ख़ाली झगड़े के लिये बात करते हैं वरना कोई बड़ा इलाक़ा न था बस ख़ुरमे के चन्द दरख़्त थे। मैं कहता हूं कि चन्द भी नहीं थे एक दरख़्त था। मसला च्तवचमतजल टवसनजपवद का नहीं , मसला सदाक़ते फ़ातिमा (स.अ.) का है और सदाक़ते फ़ातिमा (स.अ.) का मसला सदाक़ते क़ुरआन का मसला है। मसला जायदाद की क़िमत का नहीं , उसमें 5000 दरख़्त थे या 5 थे या एक था , उसमे बहस नहीं है बहस यह है कि अगर फ़ातिमा (स.अ.) ने दावा झूठा किया (नाऊज़ो बिल्लाह) तो आया ए ततहीर ने दावा किया। आया ए ततहीर ने दावा झूठा किया तो क़ुरआन ने दावा झूठा किया और अगर क़ुरआन का एक झूठ पकड़ा गया तो बाक़ी मामलात में ऐतेबार करेंगे ? उन वाक़ेआत से न कोई इन्कार कर सकता है और न कोई चश्म पोशी कर सकता है। तारीख़ यह बताती है कि सरवरे आलम की बेटी जो अपनी ज़ात में बेपनाह कमालात रखती थीं और बेशुमार फ़ज़ाएल की मालिक थीं वह अपने घर से निकली और मस्जिद में आईं। मैं कहूँगा शहज़ादी ! आप क्यो गईं ? अपनी वकालत के लिये अली (अ.स.) को भेज दिया होता। तो जवाब में आलिया बीबी फ़रमाती हैं , कि अगर अली (अ.स.) को भेजती तो कल मोअर्रेख़ीन लिखते कि फ़ातिमा बेचारी घर में बैठने वाली ख़ानादार ख़ातून थीं उनका क्या ताअल्लुक़ उन झगड़ों से , अली (अ.स.) उनके शौहर थे वह उनकी तरफ़ से हर से लड़ते फिरते हैं वह बेचारी क्या करें लिहाज़ा फ़ातिमा ज़हरा (स.अ.) ख़ुद गईं।

देखिए ! जब शहज़ादी ए कौनैन चलती हैं तो अकेले नहीं , क्यों कि फ़ातिमा (स.अ.) हैं। ईमान की मलका लिहाज़ा फ़ातिमा (अ.स.) चलें तो उनके साथ आया ए मवद्दत भी चलेगी , उनके साथ सूरा ए दहर भी चलेगा। जब फ़ातिमा चलेंगी तो आया ए ततहीर भी चलेगी ताकि जो ऐतेराज़ हों तो आया ए ततहीर अपने सीने पर रोके फ़ातिमा तक जाने न दे।

फ़ातिमा (अ.स.) अकेली दरबार में नहीं गईं। आया ए ततहीर , आया ए मवद्दत और सूरा ए दहर के ऐलान के अलावा अली (अ.स.) भी आए , हसन (अ.स.) और हुसैन (अ.स.) भी साथ आए।

दरबार में सन्नाटा छा गया कि सरवरे काएनात की बेटी आपने कैसी ज़हमत फ़रमाईं ? कहा ! मैं तुमसे यह कहने आई हूँ कि यह बाग़े फ़िदक मेरे बाबा मुझे दे कर गए थे , तुम ने मेरे आमिल को निकाल कर अपना आमिल भेज दिया। यह मेरी जायदाद जो मेरे बाबा मुझे दे गए थे वह वापस कर दो। तख़्त नशीन चिल्लाया , ऐ रसूल (स.अ.) की बेटी ! कोई गवाह है ? जब कि फ़ातिमा (अ.स.) से गवाह मांगना आया ए ततहीर पर अदम ऐतेमाद है क्यांे कि झूठा दावा करना है और ख़ुदा कहता है कि उनसे रिज्स दूर है।

सैय्यदा ए आलम पलट आइये बात वाज़ेह हो गईं । कहा नहीं अभी और वाज़ेह होगी। ख़ातूने जन्नत ने काहा , हां गवाह हैं।

कहा पेश कीजिए !

सब से पहले अली (अ.स.) बढ़े और बढ़ कर कहा कि मैं गवाही देता हूँ कि रसूल (स.अ.) ने उनको फिदक दिया था। उसके बाद इमाम हसन (अ.स.) बढ़े और कहा कि मैं गवाही देता हूं कि मेरे नाना ने फ़िदक मेरी मां को दिया था। उसके बाद इमाम हुसैन (अ.स.) बढ़े और कहा , मैं गवाही देता हूँ कि मेरे नाना मेरी मां को फ़िदक दे गये थे। उसके बाद उम्मे ऐमन बढ़ी जो रसूल (स.अ.) के घर की कनीज़ थीं उन्होंने कहा कि मैं गवाही देती हूँ कि रसूल (स.अ.) अपनी बेटी को फ़िदक दे गए थे। गवाहीयां गुज़र गईं जवाब दिया गया कि अली की गवाही को हम नहीं मानते कि ज़ौजा और शौहर का मसला अलग अलग नहीं होता। हसनैन की गवाही को दो वजह से नहीं मानते एक तो दोनों छोटे छोटे हैं दूसरा मां के मामले में हम बेटों की गवाही नहीं मानेंगे।

अलबत्ता उम्मे ऐमन की गवाही हम मानते हैं मगर यह एक औरत है तीन औरतें और हों या एक औरत और एक मर्द हो क्यों कि फ़ातिमा जो गवाहियां आपने पेश की हैं शहादत के हिसाब से नमुकम्मल हैं लिहाज़ा हम केस ख़ारिज करते हैं।

फ़ातिमा (अ.स.) का केस अदालत में ख़ारिज हुआ।

मैं कहूंगा कि ऐ शहज़ादी ! आप अपने बाबा के वफ़ादार मिक़दाद , अबुज़र या अम्मारे यासिर को क्यों न ले गईं जो यह बहस ही न उठती। मुम्किन है जवाब मिलता कि हक़ मेरा है मुझको न मिलता , मगर गवाही झुठलाने वाले पर जुर्म इतना ही लगता कि दो मोमिनों की गवाही झुटला दी। मैं गवाही में उन लोगों को ले गई जो एक बार ख़ुदा की गवाही में आए और एक बार रसूल (स.अ.) की गवाही में आए। अब यह गवाही क़ुबूल नहीं हुई तो ख़ुदा से भी इन्कार करो , रसूल (स.अ.) से भी इन्कार करो।

शहज़ादी ! मैं कहता हूँ कि बच्चों को क्यों ले गईं जो कहा कि बच्चों की गवाही नहीं मानते तो मुबाहेला वालों ने क्यो न कहा कि बच्चों को क्यों लाए ? अगर मां के हक़ में बच्चों की गवाही यह नहीं मानते तो हज़रत मरयम के हक़ में हज़रत ईसा (अ.स.) की गवाही है।

मख़दूमा बीबी ने तुरन्त दूसरा दावा कर दिया कि अच्छा मेरे बाबा की मीरास मुझे दो। कहा: बीबी हम ने आपके बाबा को यह कहते सुना है कि गिरोहे अम्बिया की कोई विरासत नहीं होती , वह जो छोड़ते हैं वह सदक़ा होता है। बीबी ने कहा तुम ग़लत कहते हो। मेरे बाबा ने हरगिज़ नहीं कहा इस लिये कि ख़ुदा ख़ुद क़ुरआन में फ़रमाता है कि वरसा सुलैमान में दाऊद सुलैमान के वारिस हुए। ज़करिया (अ.स.) की दुआ क़ुरआन में ख़ुदा ने नक़्ल की है । पालने वाले मुझे अकेला न छोड़ मेरा वारिस बना दे मुझे ऐसा बेटा दे वारिस , वारिसे आले याक़ूब जो मेरा वारिस हो और आले याक़ूब हो।

क्या मेरा बाप क़ुरआन के खि़लाफ़ कह गया है ? उसका कोई आज तक जवाब नहीं आया। बीबी हमने तो यूंह ी सुना है। अब समझ में आया अगर अब भी समझ में नहीं आई तो और दलील पेश करता हूँ।

उन मासूमों के हमराह ऐमन क्यों गईं थीं ? उम्मे ऐमन थीं हज़रत अब्दुल्लाह की कनीज़ , जो रसूल (स.अ.) के हिस्से में आई थीं तो रसूल (स.अ.) उसके वारिस हुए थे। वारीस होने की दलील में तीन वारिस आए थे। (जो बात मैंने कही वह यह है कि उस पूरी गुफ़्तगू के बाद जनाबे सय्यदा फ़ातिमा (अ.स.) अपने घर वापस आईं ।) और मुसलमानों से भरी मस्जिद में कोई उठकर यह नहीं कहता कि रसूल (स.अ.) की बेटी के साथ क्या सुलूक हो रहा है। आपने देखा तन्ज़ीम और व्तहंदप्रंजपवद का ज़ोर ? पूरी मस्जिद में एक आवाज़ भी नहीं आई कि फ़ातिमा (अ.स.) सही कह रही हैं हम उनका साथ देंगे ।

गवाही में कौन सच्चा ? उस पर तक उलेमा ए इस्लाम मुहद्दिस देहलवी जैसे लिखते हैं कि इस पर ग़ौर नहीं करना चाहिये , इस लिये कि इस पर ग़ौर करने से परेशानियां पैदा होती हैं और दिमाग़ यकसर नहीं रहता।

अगर यह कहते हैं कि फ़ातिमा (अ.स.) ने ग़लत दावा किया तो यह भी नहीं कह सकते और अगर यह कहें कि दरबार में तख़्त नशीनों ने ग़लत फ़ैसला किया तो यह भी नहीं कह सकते लिहाज़ा बेहतर है कि उन मसाएल को हम सोचेंगे ही नहीं। हम यह सोच रहे हैं कि अली (अ.स.) ने गवाही दी , गवाही रद हो गई। बाद में अली (अ.स.) को उम्मत ने ख़लीफ़ा चुन लिया चैथी मन्ज़िल पर। अब हम इस सोच में पड़े हैं कि जिसने गवाही दी थी वह सच्चा है या जिसने रद की थी वह सच्चा है।

शहज़ादी ए आलम ने अपना मौकूफ़ पेश किया क़ुरआन और हदीस से उसके बावजूद भी किसी ने न माना। तारीखे अलम का दर्दनाक वाक़ेआ है कि जिस दर्दनाक वाक़ेआ पर ज़बान हम खोलते हैं तो दिल ख़ून के आंसू रोने लगता है लेकिन बहर हाल इस्लाम की तारीख़ में ऐसा भी है कि फ़ातिमा ज़हरा (अ.स.) इस शान से वापस आईं हैं और उनकी आवाज़ किसी न न सुनी यह कौन सा इस्लाम था कि रसूल (स.अ.) की बेटी की मद्द को हम तैय्यार नहीं हैं और वह कौन सी हदीस थी जिसके मुक़ाबले में फ़ातिमा ज़हरा क़ुरआन से इस्तेदलाल कर रही हैं मगर क़ुरआन से सुनने को तैय्यार नहीं है।

अली (अ.स.) के गले में रस्सी

तारीख़ शाहिद है कि चन्द दिन के बाद वह समय भी आ गया जब अली (अ.स.) के गले में रस्सी डाली गई मगर उनकी तौहीन करने वालों पर पर्दा डालने , वह चेहरे नक़ाब होते है हक़ की तौहीन करने वालों ने जिसकी वजह से आज ज़मीर फ़रोश बल्कि यूं कहूं कि दीन फ़रोश मुल्ला कहता है कि नहीं यह ग़लत है। अली (अ.स.) शेरे ख़ुदा थे और शेरे ख़ुदा के गले में रस्सी ? ऐसी बात नहीं है।

मगर मैं कहता हूँ कि तुम्हारी इस दलील से दुश्मनाने अली के चेहरे बे नक़ाब होने से बच नहीं सकते। अगर अली (अ.स.) फ़कत शेर होते , शेरे ख़ुदा न होते तो वाक़ई रस्सी कोई न डालता। मेरा सवाल है कि हज़रत मोहम्मद (स.अ.) क्या रसूल नहीं थे ? रसूल (स.अ.) थे इस लिये दांत भी शहीद हुआ , पत्थर भी लगे क्या रसूल (स.अ.) कमज़ोर हो गया थे। जंगे ओहद में रसूल (स.अ.) ज़ख़्मी भी हो गए थे। अली (अ.स.) की शुजाअत कम नहीं हुई थी और न ही वह कमज़ोर हुए थे जो रस्सी गले में डाली गई और आपने रस्सी पहन ली। यह दीन की ख़ातिर क़ुरबानी है। मसलहते दीन है। जिससे ज़िन्दगी में कभी कभी ऐसे मौक़े भी आते हैं

मसलहते इलाही क्या थी ? उनकी ज़िन्दगी में किसी से सुलह हो या जंग , तलवार चलाई हो या तलवार रोकी हो हर चीज़ में मसलहते परवरदिगार है और मासूम मसलहते परवरदिगार के ताबा होते हैं। जिस तरह हज़रत इब्राहीम (अ.स.) खलीलुल्लाह को आग में डाला जाता है और उनके लिये आग को गुलज़ार किया जाता है , ठण्डा किया जाता है। यह क्या है ? यह मसलहते इलाही है और एक तरफ़ फ़िरऔन के चार अंगारों से मूसा (अ.स.) की हथेली भी जल गई और मुंह भी।

ऐ माबूद ! यह क्या च्वसपबल है ?

एक नबी पूरे जहन्नम में नहीं जलता और एक नबी चार अंगारों से जल जाता है।

मसलहते इलाही क्या थी ?

उनकी ज़िन्दगी में सुलह हो या जंग , तलवार चलाई हो या तलवार रोकी हो हर चीज़ में मसलहते परवरदिगार है और मासूम मसलहते परवरदिगार के ताबा होते हैं। जिस तरह हज़रत इब्राहीम (अ.स.) ख़लीलउल्लाह को आग में डाला जाता है और उनके लिये आग को गुलज़ार किया जाता है , ठण्डा किया जाता है। यह क्या है ? यह मसलहते इलाही है और एक तरफ़ फ़िरऔन के चार अंगारों से मूसा (अ.स.) की हथेली भी जल गई और मुह भी। ऐ माबूद ! यह क्या पोलिसी है ? एक नबी पूरे जहन्नम में नहीं जलता और एक नबी चार अंगारों से जल जाता है। ? या ख़ुदाया ! मूसा (अ.स.) के लिये आग को गुलज़ार क्यों नहीं बनाया ? क्या यह तेरा कलीमुल्लाह नहीं है ? यहां पर अपनी क़ुदरत से आग गुलज़ार क्यों नहीं बनाई ?

आवाज़े बारी ताअला आती है ख़ामोश ! वहां आग को गुलज़ार करने में मसलेहत थी यहां हाथ जल जाने में मसलेहत है। इसी तरह जब मसलेहत होती है तो हाथ पर दरे ख़ैबर होता है और जब मसलहत है तो गले में रस्सी होती है।

तारीख़ में पढ़ लीजियेगा और अब जो कुछ कह रहा हूँ एक लफ़्ज़ भी अपनी तरफ़ से नहीं कह रहा हूँ अली (अ.स.) के गले में रस्सी डाल कर जब ज़ालिम चले तो फ़ातिमातुज़्ज़हरा (स.अ.) ने बढ़ कर कहा कि अली (अ.स.) को छोड़ो और जब फ़ातिमा (स.अ.) ने कहा कि अगर तुम अली (अ.स.) को नहीं छोड़ते तो मैं सर के बाल खोलती हूँ। जब फ़ातिमा (अ.स.) ने बाल खोलने को कहा तो दरो दीवार हिलने लगी उन्होंने अली (अ.स.) को छोड़ दिया। जब अली (अ.स.) को छोड़ा तो अली (अ.स.) सीधे पहले क़ब्रे रसूल (स.अ.) पर जा कर रोए और उसके बाद मस्जिद में आए।

तारिख़ का जुमला सुनिये और तवज्जो फ़रमाईये कि पार्टी के ज़ोर पर क्या हो रहा है ? सियाह को सफ़ेद बनाया जा रहा है और सफ़ेद को सियाह बनाया जा रहा है।

हज़रत अली (अ.स.) रसूले ख़ुदा (स.अ.) के भाई थे। हज़रत अब्दुलमुत्तलीब (अ.स.) के और बेटे भी थे जिनमें से एक का नाम अब्दुल्लाह और एक का नाम अबु तालिब था। अब्दुल्लाह के बेटे रसूल (स.अ.) थे और अबु तालिब के बेटे अली (अ.स.) थे। सगे चचा ज़ाद भाई थे। जब अली (अ.स.) क़ब्र से मस्जिद में आकर बैठे और कहा कि क्या आज तुम उस आदमी कोे क़त्ल करना चाहते थे जो अल्लाह का बन्दा और रसूल (स.अ.) का भाई है तो मुक़ाबिले मिम्बरे रसूल पर बैठने वालों ने कहा कि यह अब्दुल्लाह तो तुम्हें तसलीम करते हैं मगर रसूल का भाई नहीं मानते।

अफ़सोस....................... सद अफ़सोस

आज अहलेबैत (अ.स.) से इन्कार का पहला दिन है। क़ाबिले ग़ौर बात यह है कि मक्का वाले , मदीना वाले जो साल हा साल की क़राबत से वाक़िफ़ हैं। मस्जिद में कसीर तादाद में लोग चुपके से बैठे रहे , किसी ने पलट कर नहीं कहा कि जब यह रसूले अकरम (स.अ.) के भाई हैं तो तुम कौन होते हो न मानने वाले ?

जब यह भाई हैं तो तुम्हें भाई न मानने का क्या हक़ है ?

चलो यह अच्छा हुआ हमें यह भी मालूम हो गया कि मुसलमानों को उसका भी हक़ है जिस रिश्ते को मानें और जिसे चाहें इनकार कर दें।

अली (अ.स.) को मुसलमान बवजूद इसके कि अली (अ.स.) सरवरे काएनात के सगे चचा ज़ाद भाई हैं भाई मानने पर तैयार नही ंतो हमें तो हमें भी तो हक़ पहुँचता है कि हम कह दें हम कुछ लोगों को सहाबी ए रसूल मानते है और कुछ को नहीं मानते। ज़हन में आई मेरी बात ? अब हालात क्या थे सद्र इस्लाम के ? और कैसे नाज़ुक मौक़े पर अली (अ.स.) ने दीन बचाया है । अब अली (अ.स.) की इस्लाम साज़ पोलीसी को समझिये जिसकी ख़ामोशी ने दीन को ज़िन्दा रखा वरना यह जो कह सकते हैं कि हम अली (अ.स.) को रसूलउल्लाह (स.अ.) का भाई नहीं मानते तो क्या दीन को न क़ाबिल तिलाफी नुकसान न पहुँचाता ?

दुनिया कहती है कि चौदह सौ साल के हालात का क्या मालूम ? तो जनाबे आली! आप चौदह सौ साल पहले के लिये ख़्याली घोड़े न दौड़ाईये , पहले हालात का तजज़िया कीजिए कि हालात क्या थे ? पहले तारीख़ से पूछिये मसाएल क्या थे ? उसके बाद अन्दाज़ा होगा जो इस्लाम रसूल (स.अ.) के अहले बैत (अ.स.) ने बचाया और फिर यह समझये कि उनकी मोहब्बत क्यों फ़र्ज़ कि गई ? इस लिये कि यह वह हैं जो हर हाल में अपनी जान पर खेल कर इस्लाम को बचाएगें।

तारीख़ जनाबे फ़ातिमातुज़्ज़हरा के मसले में आज तक ख़ामोश है जबकि पूरा केस आज भी हिस्ट्री में मौजूद है जोकि हर मुसलमान देख कर फ़ैसला कर सकता है।

तारीख़ बताती है कि उससे पहले मदीना में ऐलाने आम हुए थे कि रसूल (स.अ.) ने किसी से वादा किया हो तो आए। रसूल (स.अ.) का क़र्ज़ा हो तो आए , रसूल (स.अ.) पर कोई ज़िम्मेदारी हो तो आए। रसूल (स.अ.) पर हक़ क़र्ज़ा था वह भी सुन लीजिये।

अली (अ.स.) को जो वसीयते की हैं उनमें एक वसीयत यह भी है कि अली (अ.स.) हज़ार दीनार फ़लां यहूदी के मुझ पर क़र्ज़ हैं जो मैंने ओसामा के लश्कर की तैयारी पर ख़र्च किये थे मेरे बाद अदा कर देना। एक सवाल करूं , मोअर्रेख़ीन धोके में लिख गए यह बात याद न रही कि कुछ लोग बाद में पैदा हो कर उस पर ग़ौर करेंगे। जब आदमी स्टेट का मालिक होता है तो उसके दो बजट होते हैं एक स्टेट का बजट और एक अपनी खुद का बजट। दोनों को वही चलाता है मगर स्टेट के बजट की ज़िम्मेदारी उसकी अपनी ज़ात पर होती है। मेरा मुल्क एक ग़रीब मुल्क है वह अमीर मुल्कों से क़र्ज़ा लेता है बहैसियत हैड आफ स्टेट के और अगर वह मर जाए तो वह अमीर मुल्क आपके बेटे से क़र्ज़े की अदाएगी की डिमांड नहीं करते। अगर डिमांड करते हैं तो उसकी जगह बैठने वाले दूसरे सद्र से जो उसकी जगह पर आ कर बर सरे इक़्तेदार होता है। तवज्जो ! अगर आपने समझने की कोशिश की तो मेरा मक़सद हल हो जायेगा। ओसामा का क़र्ज़ा लश्करे रसूल (स.अ.) की ज़ाती जायदाद के लिये नहीं जा रहा था स्टेट के लिये जा रहा था। जंजम का क़र्ज़ा अली (अ.स.) क्यों दें ? या रसूल अल्लाह (स.अ.) जिसको स्टेट मिल रही है उससे कहिये अली (अ.स.) से क्यों कह रहें हैं ? मालूम हुआ अली (अ.स.) को ही सद्र , ख़लीफ़ा मुक़र्रर फ़रमाया था जो उनसे वसीयत की गई यह आले रसूल (अ.स.) का ही बर्तन था , या आले मोहम्मद (अ.स.) की शान थी जो इसके बाद भी ख़ामोश रहे। तारीख़ इसके आगे भी कहती है और इतना तो बुखारी ने भी कहा है रसूल (स.अ.) ने फ़ातिमा (स.अ.) के लिये कहा था:- जिसने फ़ातिमा को अज़ीयत पहुंचाई उसने मुझे अज़ीयत दी ’’ जिसने फ़ातिमा को अज़ीयत दी उसने मुझे अज़ीयत दी ‘‘

इसके बाद मोअर्रिख़ लिखते हैं कि इस वाक़िये को जब कुछ दिन गुज़र गए तो कुछ लोग अली (अ.स.) के पास आए कि या अली (अ.स.) ! रसूल (स.अ.) की बेटी हमसे नाराज़ हैं हम माफ़ी मागंने के लिये आए हैं आप हमें उनके पास ले चलें। मैं कहता हूँ कि या अली (अ.स.) न ले जाएं और उनके दिल को न दुखायें लेकिन अली (अ.स.) कहेंगे कि मैं अपने ऊपर ज़िम्मेदारी क्यों रखूं जो बाद में लोग कहें कि रहमतुल्लि आलमीन की बेटी थीं माफ़ कर देतीं अली (अ.स.) हमें ले कर नहीं गए।

अब माफ़ी भी समझ में नहीं आती। फ़र्ज़ कीजिए आप नाराज़ हो गए मैंने माफ़ी मांग ली आपने माफ़ कर दिया। आप ने मेरे पचास हज़ार दिरहम मार लिये , अब आप मेरे आगे हाथ जोड़ रहे हैं कि जनाब माफ़ कर दीजिये। तो यह भी कोई माफ़ी होगी ? पचास हज़ार दिरहम हाथ पर रखीये फिर माफ़ी मागिये फिर शायद माफ़ी की गुंजाईश निकल आए और अगर दिरहम एक न दिखाओ और माफ़ी मांगने जाओ ? तारीख़ कहती है कि अमीरूल मोमेनीन (अ.स.) ने कहा कि ज़हरा दरवाज़े पर वही लोग तुमसे माफ़ी मांगने के लिये आए हैं। ख़ातूने क़यामत पर्दे के पीछे बैठीं , उन्होंने कहा अस्सलामुन अलैयकुम बिन्ते रसूलिल्लाह , ‘‘ आप पर सलाम हो रसूल की बेटी । ’’ पर्दे के पीछे से कोई जवाब न आया। अब यह मसला पेचीदा हो गया शरह कहती है कि जवाबे सलाम वाजिब है और तारीख़ लिखती है कि जनाबे ज़हरा (स.अ.) ने जवाब नहीं दिया। ख़ातूने जन्नत ! इस्लाम कहता है जो वाजिब को तर्क करे वह गुनाहगार है। आय ए तत्हीर कहती है फ़ातिमा (अ.स.) से गुनाह होगा ही नहीं।

सलाम का जवाब आया नहीं , रसूल (स.अ.) जा चुके हैं , अब क़ानून इस्लाम बदलेगा नहीं। जिसको मोहम्मद (स.अ.) हलाल फ़रमा गए हैं वो क़यामत तक हलाल रहेगा और जिसको मोहम्मद (स.अ.) हराम बना गए है वह क़यामत तक हराम रहेगा।

इस्लाम कहता है कि कोई बड़े से बड़ा आदमी भी क़ानून नहीं तोड़ सकता । उस शशो पन्ज में हैं और वहां बात शुरू हो गई आने वाले ने कहा कि ऐ रसूल (स.अ.) की बेटी ! हम आपके बा पके , बस यहां तक कहा था कि अन्दर से आवाज़ आयी कि मैं तुम दोनों को अपने बाप की वो हदीस सुनाऊं जो तुमने सुनी है और तुम्हे क़सम दे कर पूछती हूं कि तुमने मेरे बाप से यह नहीं सुना , ‘‘ कि फ़ातिमा मेरा टुकड़ा है जिसने उसे सताया उसने मुझे सताया ’’ कहा: हमने सुना है। कहा: बस मैं ख़ुदा और रसूल (स.अ.) को और मलाएका को गवाह करती हूं कि तुमने मुझे सताया है। तो हज़राते मोहतरम! मसला हल हो गया जिसने फ़ातिमा (स.अ.) को सताया उसने रसूल (स.अ.) को सताया और जिसने रसूल (स.अ.) को सताया उसने ख़ुदा को सताया जिसने खुदा को सताया वह दाएरा ए इस्लाम से खारिज और जवाबे सलाम मुसलमान पर वाजिब है।

जिन हालात से आले रसूल (अ.स.) गुज़र रहे थे ख़ुदा की क़सम यह सारे हालात साबित न हो पाते क्यों कि तारीख़ में धांधलियां हैं जो आज तक जारी हैं। हुसैन इब्ने अली (अ.स.) ने ज़ाहिर किया सारे हालात को इस लिये कि हुसैन (अ.स.) ने दिन की दो पहर में जो कु़रबानी दी है अब किसी को कुछ कहने की गुन्जाइश नहीं रह गई कि अली असग़र (अ.स.) के गले पर तीर नहीं लगा। अब किसी को कहने के लिये यह नहीं रह गया कि अली अकबर (अ.स.) के सीने पर बरछी नहीं लगी। यह दुश्मनी का शोला जो वहां भड़का था अब पूरी आब व ताब से मैदाने करबला में फैल चुका था।

[[अलहम्दो लिल्लाह किताब (अली अलैहिस्सलाम से दुश्मनी क्यो) पूरी टाईप हो गई खुदा वंदे आलम से दुआगौ हुं कि हमारे इस अमल को कुबुल फरमाऐ और इमाम हुसैन (अ.) फाउनडेशन को तरक्की इनायत फरमाए कि जिन्होने इस किताब को अपनी साइट (अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क) के लिऐ टाइप कराया। 17.6.2017

फेहरिस्त

हरफ़े अव्वल 2

मुनाजाते बारगाहे परवरदिगार 5

इस्लाम की पहली दावत 8

कुफ़्फ़ार का हंगामी इजलास 18

हिजरते मदीना 30

अली (अ.स.) बद्र के मैदान में 33

अली (अ.स.) सैफ़ुल्लाह 52

हिन्दा कलेजा ए हमज़ा पर 54

जंगे ख़न्दक़ की तैयारिया 57

अबु सुफ़ियान की जद्दो जहद 64

अली (अ.स.) ख़ुदा का शेर हैं 68

अली (अ.स.) का मुक़द्दर 71

मक्का मुसलमान हो गया 76

अज्रे रिसालत 82

अली (अ.स.) का मुख़ालिफ़ कौन ? 104

अली (अ.स.) से दुश्मनी के अस्बाब 106

अली (अ.स.) ग़दीरे ख़ुम में 110

रसूल (स.अ.) का विसाल 112

फ़ातिमा (स.अ.) के हक़ से इन्कार 117

अली (अ.स.) के गले में रस्सी 123

मसलहते इलाही क्या थी ? 124