इस्लामी तालीम
समूहन अख़लाक़ी किताबें
लेखक अल्लामा मजलिसी
पुस्तक की भाषा هندی
मुद्रण वर्ष 1404

इस्लामी तालीम

तर्जुमा तहज़ीबुल इस्लाम

लेखकः अल्लामा मजलिसी

रूपांतरणकर्ताः हैदर मेहदी एम.ए.

नोटः ये किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क के ज़रीऐ अपने पाठको के लिऐ टाइप कराई गई है और इस किताब मे टाइप वग़ैरा की ग़लतीयो को सही किया गया है।

ALHASSANAIN.ORG/HINDI


बिस्मिल्लाह हिर्रहमा निर्रहीम

पेश लफ़्ज़

रसूले अकरम (स.अ.) ने फ़रमाया हैः

“ मैं बनी नौ-ए-इन्सान में आला अख़्लाक़ कि तकमील के लिए भेजा गया हुँ।

पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मौहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.) और आपके फ़र्ज़न्दाने गिरामी (अहले बैत (अ.स.)) इमान और हुस्ने सीरत के उन आला मुक़ामात पर फ़ायज़ है कि उनका किरदार बनी नौ-ए-इन्सान के लिए मिसाल और नमूना बन गया है। इन बुज़ुर्गवारों ने लोगो को एक नया रास्ता दिखाया और इन्तेहाई ना-मसाइद हालात के बावाजूद एक अज़ीमुश्शान इन्क़ेलाब बरपा किया। उन्होने मुआशरे की पेशरफ्त एक ख़ास मकतबे फ़िक्र व अमल क़ायम किया , लोगों को उसकी पैरवी करने की दावत दी , उन्हेँ एक शानदार मुस्तक़बिल की नवेद सुनाई और उनके दिलों में उम्मीद ,ख़ुशी , जोश और वलवला पैदा किया ताकि वो अपनी गलत आदत तर्क कर दें और ऐसी बा-मक़सद ज़िन्दगी गुज़ार दें जो दुनिया और आख़ेरत में उनकी फलाह की ज़ामिन है।

अहलेबैत (अ.स.) के इस बुलन्दो बाला मरतबे को समझने के लिए ज़रूरी है कि क़ुर्आने मजीद की तालीमात और मासूमीन (अ.स.) की अहादीस से रूजूअ किया जाये जिनको इल्मे हदीस के अज़ीम इस्कालर अल्लामा मजलिसी (मुतवफ़्फा 1111 हिजरी) ने अपनी किताब बेहारूल अनवार के मुख़तालिफ़ अबवाब में जमा कर दिया है।

चूँकि दर्सगाहों के लिए मुक़र्रर करदा निसाब के मुताबिक़ इस मौज़ू पर एक निस्बतन मुख़्तसर किताब की ज़रूरत थी लिहाज़ा हमने अल्लामा मरहूम की किताब शाया करने का फ़ैसला किया , जिसको फ़ाज़िल मुसन्निफ़ ने आइम्मा-ए-मासूमीन (अ.स.) की अहादीस की बुनियाद पर तरतीब दिया है। चूँकि यह किताब भी ख़ासी मुफ़स्सिल थी , लिहाज़ा हमने इख़्तेसार की ज़रूरत के तहत मोहद्दिस कुम्मी (मुतावफ़्का 1359 हिजरी) के मुरत्तब करदा तलख़ीस को अपना माख़ज़ बनाया उसमे से कुछ अहादीस का इन्तेसाब करके उसे मौजूदा शक्ल में शाया किया है।

हमे उम्मीद है कि यह मुख़्तसर रिसाला तलबा के लिए बिल-ख़ुसूस और जुमला मोमेनीन के लिए बिल उमूम मुफ़ीद साबित होगा।

यह किताब जाम-ए-तालिमाते इस्लामी करांची पाकिस्तान से उर्दू मे छपी है और अब हमारा इदारा इसे हिन्दी रस्मुलख़त मे शाया करने का शरफ़ हासिल कर रहा है।

नाशिर

सैय्यद अली अब्बास तबातबाई

अब्बास बुक ऐजन्सी , लखनऊ

बिस्मिल्लाह हिर्रहमा निर्रहीम

अल्हमदो लिल्लाहे तआला , हमदन युवाज़ी रहमतहू व युकाफ़ी नेअमतहू , वस्सलातो वस्सलामो अला सय्येदे ख़ल्क़ेही , व हामेले रिसालतेही , अस-सादेक़िल अमीने मोहम्मदिन व अला असफ़ेया –इल्लाहे व अविद्दिदाएही , अहले बैतिन नुबुव्वते , व अला अहिब्बा इल्लाहे व औलियाएही , असहाबिर्रसूलिल अबरार , अद्दुआतिल अख़्यार , व अला जमी-इस्साएरीना एला यौमिद्दीन।

लिबास

इस हक़ीकत के बावजूद कि इस्लाम ने अपने पैरूओं को ऐश व इशरत की ज़िन्दगी गुज़ारने से मना फ़रमाया और फ़ज़ीलत , रूहानियत नीज़ आख़ेरत की रहमतों की जानिब उनकी रहनुमाई की है – उसने दुनिया की नेमतों से परहेज़ करने और राहेबाना ज़िन्दगी गुज़ारने की भी मुमानेअत की है – चुनाँचे क़ुर्आने मजीद राहेबों के तर्ज़े-फ़िक्र की वाज़ेह तौर पर मुख़ाल्फ़त करते हुए फ़रमाता हैः

“ कह दो कि तुम्हें अच्छा लिबास पहनने और अल्लाह नें जो पाकीज़ा चीज़ें अपने बन्दों को एनायत की हैं उनके खाने सेकिसने मना किया है ?” (सुर-ए-एअराफ़ , आयत 32)

इस तरह इस्लाम नें अपने पैरूओं को अच्छा और आबरूमन्दाना लिबास पहनने का हुक्म दिया है। पस एक मुसलमान को चाहिये कि अपनी हैसियत के मुताबिक़ उम्दा और साफ़ सुथरा लिबास पहने ब-शर्ते कि वह लिबास जायज़ तरीक़े हासिल किया गया हो अगर वह जायज़ ज़राय से अपने लिए उम्दा लिबास मोहय्या न कर सके तो फिर उसे चाहिये कि अपने हुदूद में रहते हुए शायस्तगी के साथ मामूली लिबास पहने रहे।

इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने फ़रमाया हैः

“ अल्लाह जमील है , वह ख़ूबसूरती को पसन्द करता है और अफ़्सुर्दगी को नापसन्द फ़रमाता है , इसलिए कि जब वह अपने बन्दों को नेमतें अता करता है तो वह उनपर नेमतो के असरात भी देखना चाहता है ” -

जब पूछा गया कि इन्सान ख़ुदा-ए-तआला की नेमत के असर का इज़हार कैसे कर सकता है ? आपने जवाब दियाः साफ़ सुथरा लिबास पहनो और ख़ुश्बू इस्तेमाल करो , घर की सफ़ेदी कराओ और उसकी ग़लाज़त दूर करो , अल्लाह ताला ग़ुरूबे आफ़ताब से पहले (सूरज डूबने से पहले) चिराग़ जलाने को पसन्द करता है , ऐसा करने से इफ़्लास (ग़रीबी) दूर होता है और यह रिज़्क़ में फ़ेराख़ी का मोजिब बनता है-

इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) से मर्वी है एक मोअतबर हदीस में कहा गया हैः

“ अच्छे कपड़ों का इस्तेमाल दुश्मन को पस्त करता है-

बदन पर तेल मलना , ज़ेहनी खिचाओ और परेशानियों को कम करता है। बालो में कँघा करना दाँतों को मज़बूत करता है , रोज़ी में इज़ाफ़े (बढ़ोतरी) का सबब बनता है और कुव्वते-बाह को बढ़ाता है।

सबसे बेहतरीन सूती कपड़ा है और उसके बाद कतान है।

1- हमेशा ऊनी कपड़े पहनना और उन्हें अपना मुस्तक़िल लिबास क़रार देना मकरूह है , बिलख़ुलूस उस सूरत में जब यह कपड़े दूसरों पर घमंण्ड जताने के लिए इस्तेमाल किये जाऐं।

2- रसूले अकरम (स.अ) ने उन लोगो पर नफ़रीन (बुराई) की है जो अपने लिबास को दूसरों पर फ़ज़ीलत और फ़ौक़ियत का ज़रीया बनाते है। ((इस्लाम मुआशिरे (समाज) की तरबियत इस अन्दाज़ से करता है कि फ़ज़ीलत का मेयार फ़क़त तक़वा हो।))

3- मर्दों के लिए ख़ालिस रेशम और ज़र-तार कपड़े का लिबास पहनना हराम है।

4- मर्दों के लिए औरतों जैसा लिबास पहनना हराम है उसी तरहा औरतों के लिये भी मर्दों जैसा लिबास पहनना जायज़ नही है। ((इस्लाम यह नही चाहता कि मर्द और औरत के दरमियान मौजूद फ़ितरी फ़र्क नापैद हो जाए।))

5- मोमिनीन के लिए काफ़िरों का मख़सूस लिबास पहनना हराम है। ((इसके बर-अक्स वह इस बात पर ज़ोर देता है कि यह फ़र्क़ लिबास तक के मामले में भी बरक़रार रहे , ताकि मुअशिरे का हर फ़र्द अपने अपने फ़रायज़ अपनी फ़ितरत के मुताबिक़ अन्जाम दे। यह ज़रूरी है कि हर क़ौम का एक ख़ास तमद्दुन का एक हिस्सा है इसलिए कुफ़्फ़ार के लिबास से मुशाबे (मिलता-जुलता) लिबास का इस्तमाल एअतेमाद नफ़्स (आत्म विश्वास) के फ़ुक़दान (समाप्ति) और अग़यार (ग़ैर का बहू) पर इन्हेसार (निर्भरता) की अलामत है।))

6- लिबास के लिए बेहतरीन रंग सफ़ेद है और उसके बाद ज़र्द का नम्बर आता है फ़िर बित-तरतीब (क्रमानुसार) सब्ज़ , हल्का सुर्ख़ , हल्का नीला औऍर हल्का सब्ज़ रंग है।

7- गहरे सुर्ख़ और सियाह रंग का लिबास (ख़ास तौर से नमाज़ पढ़ते वक्त) पहनना मकरूह है।

8- जिस लिबास से तकब्बुर का इज़हार होता हो। वह नापसंदीदा है।

9- अमामे का इस्तेमाल मुस्तहब है।

10- अमामा खड़े होकर बाँधना और उसका सिरा तहतुल हनक़ (ठुड्डी के निचे से) गुज़ारना मुस्तहब है।

11- ऐसी टोपियाँ या हैट पहनना मकरूह है जो ग़ैरे मुस्लिमों से मख़सूस हैं जब आप पाजामा और ज़ेरे जामा पहनें तो क़िबला-रू (क़िब्ला की तरफ़) होकर बैठ जायें और यह दुआ पढ़ेः

“ अल्लाहुम्मस-तुर-औरती व आमिर रौ-अती व अ-इफ़्फ़ा फ़ज़ी वला तज़अल लिश-शैताने फ़ीमा रज़क़तनी नसीबवं वला लहू एला ज़ालेका वुसूलन फ़-यसनआ ले-यल मकाएदा व यो- हय्ये-जनी ले-इरतेकाबे महारेमेका। ”

ऐ परवरदीगार ! मेरा बदन ढाँप दे , मेरे आज़ा की हिफाज़त कर , मेरी इफ़्फत महफ़ूज़ फरमा और शैतान को मुझसे दूर रख ताकि वह मुझे उन बुरी बातों की तरफ़ ना खींचे जो तेरे अहकाम के ख़िलाफ़ है।

जब आप लिबास पहनने लगें तो यह दुआ पढ़ेः

“ अल्लाहुम्मज-अलहो सौबा युमनिंव व तक़वा व तुक़ा व बरकतिन अल्लाहुम्मर ज़ुक़नी फ़ीहे हुस्ना इबादतेका व अमा-लल लेता-अतेका व अदा-अ शुक्रे नेअ-मतेका- “

अल्हम्दो लिल्लाहिल लज़ी कसानी मा उवारी बेही औरती व अता-जम्मलो बेही फ़िन्नासे- “

“ या अल्लाह ! इस कपड़े को मेरे लिए बरकत , तक़वा और सवाब का मोजिब बना-

या अल्लाह ! मुझे तौफ़ीक़ दे कि जब मैं यह लिबास पहनूँ तेरी इबादत मुकम्म्ल तौर पर बजा लाऊँ , तेरे अहकाम की इताअत करूँ और तेरी नेमतों का शुक्र अदा करूँ। तमाम तारीफ़े उस अल्लाह के लिए जिसने मुझे ऐसा लिबास दिया है जो मुझे ढ़ाँपता है और लोगो के दरमियान मेरी इज़्जत और आबरू का ज़रिया है। “

जब आप लिबास पहनें तो वुज़ू करके दो रकअत नमाज़ अदा करें और फ़िर कहेः

“ ला-हौला वला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहिल अलीयिल अज़ीम ,”

“ कोई ताक़त और क़ुव्वत नही है सिवाए उसके जो अल्लाह से (मिलती) है , वही बलन्द तरीन और बुज़ुर्गतरीन है। “

12- रात के वक्त कपड़े उतार देना और बर्हना हो जाना मकरूह है।

13- जब आप कपड़े उतारने लगें तो “ बिस्मिल्लाह ” पढ़े।

14- कपडे उतारने के बाद उन्हें इधर-उधर न फेकें।

15- जब आप लिबास पहनने का इरादा करें तो नियत बाँधें कि मैं यह लिबास अपनी सतर पोशी मुसलमानों के लिए अपनी आरायश और अल्लाह की नेमतों के इज़हार की ख़ातिर पहन रहा हुँ क्योंकि अल्लाह आरायश को और नेमतों के इज़हार को पसन्द फ़रमाता है।

16- जब आप लिबास पहनें तो उसकी इब्तेदा (शुरूआत) दायें जानिब से और ख़ात्मा बायें जानिब पर करें , जब आप लिबास पहन चुकें तो अल्लाह की हम्द ब्यान करें। ((कारी ख़ूब आगाह है कि यह अख़लाक़ और आदाब एक मुसलमान की ज़िन्दगी के हर शोबे में अपने अल्लाह के कितने क़रीब ले आते हैं।))

17- जब आप नया लिबास ख़रीदें तो पुराना लिबास किसी और हाजतमन्द को दे दें। कोट और कमीज़ के बटन ख़ुले रखना इस्लामी आदाब के ख़िलाफ़ है। जूतों के लिए बेहतरीन रंग ज़र्द है , इसके बाद सफेंद भी मुनासिब है। यह रविश (तरीक़ा) मुस्तहब है कि जूतों के तले का दरमियानी हिस्सा फ़र्श को ना छुए। ((मौजूदा इल्मे हिफ़्ज़े सेहत भी इस बात की ताईद करता है।))

18- जूतों का एक अच्छा जोडा वह है कि जो इन्सान के पाँव को चोट से महफ़ूज़ रखे और नमाज़ के लिए वुज़ू करने में रूकावट ना बने।

19- ऐसे जूते नही पहनने चाहियें जो तकब्बुर का मोजिब हो।

20- जूते पहनते वक़्त इब्तेदा दाये पाँव से करें और यह दुआ पढ़ें।

“ बिस्मिल्लाहे सल्लल्लाहो अला मोहम्मदिंव व आले मोहम्मदिंव व वत्ति क़दमय्या फ़िद्दुनिया वल आख़ेरते व सब्बितहुमा अलस सिराते यौमा तज़िल्लो फ़ीहिल अक़दाम। “

“ मैं अल्लाह के नाम से शुरू करता हुँ – या अल्लाह ! दुरूद और सलाम भेज मोहम्मद (स.) पर और आले मोहम्मद (स.) पर , मेरे क़दम इस दुनिया में मज़बूत कर दे और क़यामत के दिन भी मेरे दोनो पाँव को जमाये रखना जब लोग पुले सिरात पर से जहन्नुम में जा गिरेंगे। ”

21- जब आप जूतें उतारने लगे तो यह दुआ पढ़ेः

“ बिस्मिल्लाहे अल्हम्दो लिल्लाहिल लज़ी रज़क़नी-मा-अक़ी बेही मिनल अज़ा- अल्लाहुम्मा सब्बितहुमा अला सिरातेका वला तज़िल लहुमा अन सिरातेकस सविय्ये , ”

“ मैं अल्लाह के नाम से शुरू करता हुँ तमाम तारीफ़े अल्लाह के लिए हैं जिसने मुझे यह चिज़े इनायत की जो मेरे दोनो पावँ को तकलीफ़ से महफ़ूज़ रखती हैं।

या अल्लाह ! जहन्नुम के ऊपर वाक़ेअ पुले सिरात पर मेरे दोनो पाँव को जमाये रखना और उन्हें सीधे रास्ते से इधर-उधर रपटने नही देना। ”

अरायशे जमाल

एक और पहलू जिसे इस्लाम ने बड़ी अहमीयत दी है , वह आरायशे जमाल यानी “ बनाओ-सिंघार ” है।

इस्लाम कहता है , एक औरत को चाहिये कि वह अपने शौहर की ख़ातिर उम्दा तरीक़े से बनाओ-सिंघार करे ताकि उसकी निगाहें और ख़्यालात दूसरी औरतों की तरफ़ न जायें।

इसी तरहा मर्दों के लिए भी ज़रूरी है कि वह अपनी बीवियों की ख़ातिर आरायश करें ताकि वह दूसरे मर्दों की जानिब मायल न हों ओर यूँ उनकी इफ़्फ़त और पाकदामनी में इज़ाफ़ा हो।

1- मर्दों और औरतों को दायें हाथ में अँगूठी पहनने की ताकीद की गई है।

2- इन्सान को चाहिये कि अँगूठी पहनते वक़्त यह दुआ पढ़ेः

“ अल्लाहुम्मा सव्विमनी बे-सीमाइल ईमाने वख़तिमली बे-ख़ैरिंव वजअल आक़ेबती एला ख़ैरिन इन्नाका अन-तल अज़ीज़ुल हकीमुल करीम , ”

“ या अल्लाह ! ईमान की निशानियों को मेरी पहचान का मोजिब बना- मेरा ख़ातिमा बिल-ख़ैर कर और आख़ेरत में भी मेरे लिये बेहतरी का सामान पैदा कर- बिला शुबा तू क़ुदरत वाला , हिकमत वाला और मेहरबान है ,”

3-यह हिदायत भी कि गई है कि अँगूठी के पत्थर पर मुनदर्जा-ज़ैल अल्फाज़ खुदवाये जायेः

“ माशाल्लाहो ला-क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहे अस्तग़फ़ेरूल्लाहा ,”

“ अल्लाह जो चाहता है सो करता है , कोई ताक़त ओर क़ुव्वत नही है सिवाय उसके जो अल्लाह से (मिलती) है मैं अल्लाह से बख़्शिश का तलबगार हूँ ,”

4- औरतों और बच्चों को सोने और चाँदी के ज़ेवरात पहनने में कोई हर्ज नही।

5- इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स) से रवायत है कि आपने फ़रमायाः

“ औरत के लिये अपने बनाओ सिंघार को तर्क करना मुनासिब नही , चाहे वह एक हार पहनने तक ही क्यों ना महदूद हो। ”

6- मर्दों को सोने के ज़रिये अपनी अरायश करने से बचना चाहिये , चाहे वह उनकी तलवार या क़ुर्आने मजीद में ही क्यों ना हो।

7- रवायत है कि आँखो में सुरमा लगाने के कई फ़ायदे हैं।

8- आँखों में सुरमा लगाते वक़्त यह दुआ पढ़े।

“ अल्लाहुम्मा नव्विर बसरी वज़अल फ़ीहे नूरन अवसिर बेही हक़्का वहदेनी एला सिरातिल हक़्क़े व अर्शिदनी एला सबीलिर्रशादे अल्लाहुम्मा नव्विर अलय्या दुनयाया व आख़ेरती ,”

या अल्लाह ! मेरी आँखें रोशन कर , मुझे ऎसी रौशनी अता फ़रमा कि तेरे अद्ल को देख सकूँ , तू मुझे सीधे रास्ते पर रख और मुझे नेकी की राह पर चलने का शऊर (अक़्ल) बख़्श दे-

या अल्लाह ! मुझे इस दुनिया में और आख़ेरत में भी रौशनी अता फ़रमा।

9- जब आप आईने पर निगाह डालें तो यह दुआ पढ़ेः

“ अल्लाहुम्मा कमा हस्सन्ता ख़ल्क़ी फ़हस्सिन ख़ुलुक़ी व रिज़्क़ी ,”

या अल्लाह ! जिस तरह तूने मुझे अच्छे ख़द व ख़ाल दिये हैं उसी तरह अपनी मेहरबानी से मुझे आला अख़लाक़ ओर पाकीज़ा रोज़ी भी बख़्श दे।

ख़ुर्द व नौश (खाना पीना)

रोटी और पानी इन्सान की बुनयादी ज़रूरत है। इस्लाम उम्दा और लज़ीज़ ख़ुराक और सेहत बख़्श व ख़ुश ज़ायक़ा मशरूबात के इस्तेमाल से मना नही करता।

क़ुर्आने मजीद फरमाता हैः

ऐ ईमान वालों! जो पाक चीज़े हमने तुम्हें ब-तौरे रिज़्क़ दी है उनमे से खाओ और अल्लाह का शुक्र अदा करो। 13(सूर-ए-बक़रा , आयत 132)

खाने पीने के हलाल होने का आम मेयार उनका तय्यब (पाक) होना है- यानि वह पाक , साफ़ , लज़ीज़ और सेहत बख़्श हों-

ख़ुद लज़ीज़ खाने खाना , दूसरों को खिलाना और यह कोशिश करना कि वह ख़ालिस और पाक हों- यह एक बड़ी अच्छी बात है।

1- इन्सान को चाहिए कि वो चीज़े खाये पिये जो हलाल हों।

2- इन्सान को इतना भी नही खाना चाहिये कि वह उसे अल्लाह की इबादत से बाज़ (रोक) रखे।

3- जानवरों की तरह खाने पीने ही में न लगे रहें , इसके बर-अक्स (विपरीत) खाने पीने से आपका मक़सद अल्लाह की इबादत के लिए क़ुव्वत (ताक़त) का हुसूल होना चाहिये।

4- इन्सान को खाने पीने के मामले में फ़ुज़ूल ख़र्च नही होना चाहिये।

5- जब आप खा-पी कर शिकम् सेर हो जायें तो फिर कुछ न खायें।

6- जब इन्सान शिकम् सेर हो जाता है तो वह उसके फ़साद और बग़ावत पर मायल होने का मूजिब बन जाता है।

7- नाश्ते और दोपहर के खाने के बीच कुछ और खाना मुनासिब नहीं है।

8- नाश्ता न करना और दोपहर का खाना न खाना सेहत के लिये मुजिर है।

9- खाना खाने से पहले और खाना खाने के बाद हाथ धोना और कुल्ली करना सुन्नत है।

10- जब खाना चुन दिया जाये तो मुनासिब है कि आप “ बिस्मिल्लाह ” पढ़े और खाना शुरू कर दें और जब खा चुके तो थोड़ा नमक मुहँ में डाल लें।

अपने परवरदिगार के सामने इज्ज़ के तौर पर आपको दस्तरख़ान पर ग़ुलामों की तरह अदब से बैठना चाहिये।

11- (किसी मुसलमान को शरीक न करना) अकेले ही अकेले खाये जाना मकरूह है।

12- नौकरों के साथ मिलकर खाना और उसी तरह फ़र्श पर बैठकर खाना सुन्नत है।

13- नजिस और बदकार लोगों के साथ खाना खाने से परहेज़ करें हमेशा कोशिश करें कि नेकूकार सालेह (नेक) और आलिम लोगों के साथ खाना खायें।

14- खाने पीने के लिए सोने और चाँदी के बर्तनो की इस्तेमाल हराम है।

15- एक ऐसे दस्तरखान से खाना हराम है जिसमें खाने के साथ शराब भी पिलाई जाये।

यह रवायत भी आयी है कि ऐसी ज़ियाफ़त में खाना पीना हराम है जहाँ हराम चीज़े इस्तेमाल की जायें या कोई और ममनूअ (मना) बात मसलन ग़ीबत (बुराई) की जाये।

16- अपने दस्तरख़ान पर सब्ज़ियों के साथ सिरका भी इस्तेमाल करें।

17- सख़्त गर्म खाना कभी ना खायें।

18- खाने पीने की चीज़ो पर फूँक मारना मकरूह है। खाने से पहले फलों को धो लेना चाहिये और पानी ढ़ाक कर रखना चाहिये।

19- बासी और सड़ा हुआ खाना नही खाना चाहिये। रोटी की बे-हुरमती और बे-अदबी न करें।

20-जब खाना दस्तरख़ान पर आ जाये तो बिना देर किये हुए खायें और मजीद किसी चीज़ का इन्तेज़ार न करें।

21- रोटी को मत सूँघे और उसपर हाथ भी न फेरें।

22-जौ की रोटी खाना तर्क ना करें।

23-दस्तरख़ान पर जो चीज़ आपके सामने हो वह खायें और दूसरों के आगे से ना उठायें।

24-छोटे छोटे निवाले लें और उन्हें चबाकर खायें। खाने में दूसरो के चेहरों पर नज़र न डालें।

25-जब आप खाने में किसी दीनी भाई के साथ हों तो ख़ूब सेर हो कर (पेट भरकर) खायें और जो चीज़ें उसे नापसन्द हो उससे परहेज़ करें।

26-मेहमानों को दस्तरख़ान पर ग़ैर-ज़रूरी तकल्लुफ़ात में उलझाना अच्छी बात नही।

27-खाने की जो चीज़ दस्तरख़ान पर गिर जाये उसे उठाकर खा लें।

28-खाने के बाद दाँतों को ख़ेलाल करें।

29-दाँतों में ख़ेलाल करने के बाद तीन बार कुल्ली करें।

30-दीनी भाईयों को खाने की दावत देना और उन्हें खाना खिलाना बड़ा नेक काम है।

31- जो शख़्स खाना खिलाये उसके हक़ में दुआ-ए-ख़ैर (अच्छाई की दुआ) करना मुस्तहब है।

32-जब आपका कोई दीनी भाई आपसे मिलने आये तो जो कुछ घर में मौजूद हो उसके लिए ले आयें जो चीज़ मौजूद न हो उसकी तय्यारी का एहतेमाम न करें।

33-आपको अपने एक दीनी भाई से जितनी ज़्यादा मोहब्बत हो उसके यहाँ उतना ही ज़्यादा खाना खायें।

रवायत है कि एक सख़ी शख़्स अपने एक मेज़बान के यहाँ ज़्यादा खाना खाता है ताकि वह भी उसके यहाँ ज़्यादा खाये।

34-रवायत है कि जब रसूले अकरम (स.अ) मेहमानों के साथ बैठकर खाना खाते तो सबसे पहले खाना शुरू करते और सबके बाद हाथ खींचते थे ताकि कोई मेहमान भूखा न रह जाये।

(मुफ़ज़्ज़ल इब्ने उमर कहते हैं कि उन्होनें इमाम जाफरे सादिक़ (अ.स.) की ख़िदमत मे दर्दे चश्म (आँख में दर्द) की शिकायत की तो इमाम (अ.स.) ने उनसे फ़रमाया कि जब वह खाने के बाद हाथ धोयें तो वही गीले हाथ अपनी भौं और पपोटों पर लगायें और तीन मरतबा यह दुआ पढ़ेः

तमाम तारीफ़ अल्लाह के लिए है जो एहसान करता है इन्सान को ख़ूबसूरत बनाता है उस पर अपनी नेमतों की बारिश करता है और उसे बुलन्द करता है। 14

35-एक रवायत में है कि इन पाँच मौक़ों पर ज़ियाफ़त का एहतमाम करना और लोगों को दावत देना मुस्तहब है।

(1) शादी ( 2) अक़ीक़ा ( 3) लड़के का ख़त्ना कराना ( 4) मकान ख़रीदना या नया मकान बनाना ( 5) सफ़र से घर लौटना

36-किसी ऐसी ज़ियाफ़त में शरीक होना मना है जो खास तौर पर दौलत मन्द लोगों के लिये दी गई हो।

खुद्दारी

रसूल अकरम (स.अ.) का इरशाद है कि आठ क़िस्म के लोग लानत के क़ाबिल है।

(1) वह शख़्स जो बिन बुलाये किसी के यहाँ खाने में शरीक हो जाये।

(2) वह मेहमान जो मेज़बान पर हुक्म चलाये।

(3) वह शख़्स जो अपने दुश्मन से भलाई की उम्मीद रखे।

(4) वह मालदार शख़्स जो खुद कमीना और कंजूस हो फिर भी दूसरो से एहसान की उम्मीद रखे।

(5) वह शख़्स जो दूसरो की बातों में बिला –इजाज़त दख़ल अंदाज़ करे जब कि वे कोई राज़दाराना गुफ़्तुगू कर रहे हों

(6) वह शख़्स जो अहले इक़्दार (मालदार) की मुनासिब इज़्ज़त न करे।

(7) वह शख़्स जो ना अहल लोगों की सोहबत में बैठे।

(8) वह शख़्स जो उस आदमी से गुफ़तुगू करे जो उसकी बातों पर मुनासिब तवज्जोह नदों।

एक और हदीस में आया है कि ( 1) इन्सान फ़क़त उन लोगों को खाने की दावतदे जिन्हें वह सिर्फ अल्लाह की ख़ातिर दोस्त रखता है

(2) मेहमान की ज़्यादा मुददत तीन दिन है –अगर कोई मेहमान इससे ज़्यादा दिनों तक ठहरे तो उसका खाना पीना मेज़बान का सदक़ा शुमार होगा।

(3) मेहमान के साथ भलाईसे पेश आना और उसे अज़ीज़ (दोस्त) रखना मुस्तहब है

(4) मेहमान का एक गक़ यह है कि आप उसे एक ख़ेलाल मोहय्या करें और जब वह रूख़्सत हो तो उसे घर के दरवाज़ तक छोड़ने जाये

(5) जब तक कोई शख़्स आपको बुलाये न उसके खाना खाने न जायें।साहिबे ख़ाना पर हुक्म न चलाये। वह जहाँ बैठने को कहे वहीं बैठें। अगर आप को किसी जियाफ़त मे शिरकतकी दावत मिले तो उसे कुबूल करले।

पीने का पानी

इमाम जाफ़रे सादिक (अ.स.) ने फ़रमाया

ठऩडा पानी हरारते बदनको कम करता है मतली को दूर करता है , और गर्मी से बचाता है।

आपने ये भी फरमाया

गर्म पानी हर क़िस्म के दर्द को दुर करता है और किसी लिहाज़ से भी मुज़िर नहीं होता।

पानी पीते वक़्त यह दुआ पढ़नी चाहिये सलवातुल्लाहे अ-लल हुसैने व अला अहले बैतेही बैतही वअसहाबेही व लानतुललहे अलाक़ातेलीहे व आदाएही ,,

अल्ला ताला रसूले अहलेबैत (अ.स.) पर और असहाब पर अपनी रहमतें नाज़िल फ़रमाये और इमाम हुसैन (अ.स.) के क़तिलों और दुश्मने पर अपनी लानत बरसाये।

(1) रवायत है कि चाहे ज़मज़म (ज़मज़म कुँआ) का पानी बारिश का पानी और दरिया –ए –फ़ुरात का पानी बहुत से फ़ज़ीलत और फ़वायद का हामिल है।

(2) पानी रात के वक़्त बैठकर और दिन के वक़त खड़े होकर पीना चाहिये।

(3) इमाम अली (अ) ने फ़रमाया है कि इन्सान को बारिश कापानी पीना चाहिये क्यें यह बदन को पाक करता है और तमाम दुख –दर्द दुर करता है।

(4) जब आप कोई मशरूब (पीने वाली चीज़) पीनें लगें तो – बिस्मिल्लाह पढ़े , जब पीचुकें तो –अलहम्दो लिल्लाह .कहें। फिर इमाम हुसैन (अ) और उनके अहलेबैत और असहाब को याद करे।

(5) पानी आहिस्ता आहिस्ता पियें और उससे अपना मुँह न भर लें।

(6) सारा पानी एक बार में न पी जायों बल्कि तीन बार ठहर के पिये।

आदाबे तज़वीज

बीवी या शौहर का इन्तेख़ाब (पत्नि या पति का चुनाव)

इस्लाम ने मुआशेरती निज़ाम में तजवीज केमांले को बड़ी अहमियत दी है। यह दीन राहेबाना ज़न्दगी बसरकरने की तल्क़ीन नहीं करता इसके बर अक्स यह अज़्दवाज की तारीफ करता है क्यों कि यह अम्बिया (अ.स.) की सुन्नतों में से एक सुन्नत है। ता हम यह याद रखना ज़रूरी है कि निकाह का मक़सद फ़क़त जीन्सी थ़्वाहिश की तसकीन नहीं होना चाहिये बल्कि उसका अव्वलीन (पहला) मक़सद ससालेह और फ़र्ज़ –शेनास औलाद का हुसूल होना चाहिये ताकि हक़ व सदाक़त के पैरोओं (अनुयाइयों) की तादाद में इजाफ़ा हो .।

रसूले अरकम (स.अ.) ने फ़रमाया

मैंने तुम्हारी दूनिया मे तीन चीज़ों की को चुना है. ( 1) ख़ुश्बू (2) औरत और ( 3) नमाज़ कि जो मेरी आँख की ठंडक है।

इन्नी अख़तारो मिन दुनियाकुम सलासतन ( 1.) अत- तय्येबा ( 2.) वन –निसाआ व कुर्रता ऐनी.अस-सालाता ,

कुंबा

इमाम जाफ़रे सादिक (अ.स.) से मन्कूल मोअतबर अहादीस में कहा गया है कि औरतों को महबूब रखना अम्बिया (अ.स.) के आदाब में से था।आपने यह बात भी ज़ोर देकर कही कि मोमिन लोग जबतक अपनी औरतों से मोहब्बत न करें उनके ईमान में कोई पेश –रफ़्त नहीं हो सकती। आपने यह भी फ़रमाया कि जो लोग औरतों से ज़्यादा मोहब्बत करते है उनका ईमान भी ज़्यादा फुख़्ता होता है।

रसूले अकरम (स.अ.) ने फ़रमाया.

जो मर्द निकाह कर ले वह अपना आधा ईमान नहफूज़ कर लेता है। फिर अगर वह तक़वा इख़्तेयार करे तो उसकाबाक़ी बचा आधा ईमान भी महफूज़ हो जायेगा। हज़रत (स.अ.) ने मानेअ नहीं हो सकता है कि अल्लाह ताला उसको एक ऐसा फ़र्ज़न्द एनायत करे जो

कल-मए-ला-इलाहा इल्लल्लाह , , के नूर के साथ दुनिया को चमका दे , और आपने ज़ोर देकर फ़रमाया कि जो लोग आपकी सुन्नत पर यक़ीन रखते हैं उन्हे निकाह ज़रूर करना चाहिये।

इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने फरमाया.

एक शादी शुदा शख़्स का दो रकअत पढ़ना एक ग़ैर शादी शुदा के सत्तर रकअत नमाज़ अदा करने से बेहतर है।

(1) जो शख़्स शादी करे अपना आधा ईमान महफूझ़ कर लेता है

(2) आपकी बीवी आपकी हम पल्ला (बराबर) होनी चाहिये और उसे आपके बच्चों की माँ बनने के क़ाबिल होना चाहिये।

(3) किसी औरत से उसकी दौलत और हुस्न की ख़ातिर निकाह न करों क्योंकि इस सुरत में आप दोनो चीज़ों से महरूम हो जायेंगे इसके बजाय आपको उसकी परहेज़गारी और सलाहियत को मददे नज़र रखते हुए उससे निकाह करना चाहिये।

(4) बेहतरीन औरत वह है जो बहुत से बच्चों कोजन्म दे ,अपने शौहर से मोहब्बत करे पाकदामन हो अपने रिश्तेदारों में इज़्ज़त (आजिज़ी) इख़्तेयार करे शौहर की ख़ातिर बनाओ सिंघार करे और उससे खुश रहेऔर ना महरमों (गैर लोगों) से अपनी इस्मत महफूज़ रखे , शौहर की फ़रमांबर (आज्ञा का पालन) करे और उसपर क़ब्ज़ा जमाने की कोशिश न करे।

(5) जब आप किसी औरत का रिश्ता तलब करना चाहें तो दो रकअत नमाज़ अदा करे अल्लाह की तारीफ़ करें और यह दुआ पढ़े।

अल्लाह हुम्मा इन्नी ओरीदो अन अता-ज़व्वजा फ़-क़द्रदिर- लीमिनन्रनिसाये अ-इफ़्फ़ा-हुन्ना फ़रजंव व अहफ़ज़ाहुन्ना ली फ़ी नफ़सेहा व माली व औ-सआ हुन्ना रिज़क़व व अअ.-ज़मा हुन्ना बरकतंव व क़द्रदिर ली वलदन तययेबन तज-अला-हूँ ख़लक़न सालेहन फ़ी हयाती व बादा मौती , ,

या –अल्लाह , मैं निकाह करना चाहता हूँ। पस मुझे एक ऐसी औरत अता फ़अमा जो बे-हद नेक हो , वहमेरी ख़ातिर खुद अपनी और मेरे माल की हिफ़ाज़त करे औरमेरे रिज़्क में वसअत का मूजिब हो- फिर उसे इस क़बिल बना कि वह एक बेटे को जन्म दे जो मेरी ज़िन्दगी मे भी और मेरे मरने के बाद भी मेरी बेहतरीन यादगार हो , ,

(6) मर्वी है कि जब क़मर –दर अक़रब का पहरा हो तो निक़ाह करना मुनासीब नहीं ,और यह कि निकाह के लिये सबसे बेहतर जुमे का दिन है।

(7) निकाह के मौके पर वलीमा की दावत करना मुस्तहब है।

(8) निकाह से पहले खुत्बा पढ़ना मस्तहब है चुनाँचे इमाम मो तक़ी (अ.स.) से यह

ख़ुत्बा –ए-निकाह नक़्ल किया गया है.

अल्हम्दो लिल्लाहे इक़रारन बे-नेअमतेही वला इलाहा इल्लल्लाहो इख़्लासलन ले –वहदानिय्यतेही व सल्लल्लाहो अला सय्यदे बरिय्यतेही वल असफ़ेयाए मिन इत –रतेही-

अम्मा बाद. फ़कद काना मिन फ़ज़लिल्लाहे अ-लल अनामे अन अग़नाहुम बिल हलाले अनिल हरामे फ़क़ाला सब्हानहु. वअनकेहुल अयामा मिन्कुम वस्सालेहीना मिनइबादेकुम व एमाएकुम इंययकूनू फुक़ा रा-आ युग़ने-हेमुल्लाहो मिन फ़ज़लेहि वल्लाहो वासेउन अलीम (सूर-ए-नूर आयत 32)

मैं अल्लाह की नेमतों का इज़हार करते हुए उसकी तारीफ़ करता हुँ उसकी वहदानियत के साथ इस बात की भी गवाही देता हूँ कि उसके अलावा कोई खुदा नही है औरबनी नौ-ए-इन्सान के सरदार (मों. मुस्तफ़ा (स.अ.) और उनकी बर-गुज़ीदा इतरत पर दुरूद व सलाम भेजता हुँ.

(इसके बाद कहता हुँ) यह अल्लाह का अपने बन्दों पर फ़ज़्ल है कि उसने इनकी रहनुमाई हलाल और हराम इम्तियाज़ की तरफ़ की है जैसा कि हर एक से पाक खुदा फ़रमाता है।

और तुम मे से जो मर्द और औरतें कुवाँरे हो उनके निकाह करा करो अपने नेकूकार गुलामो और लोंडियों (नौकरानियों) के भी (निकाह कर दिया करो)। अगर वे फ़क्र व फ़ाका की हालत मे होंगे तो अल्लाह वुसअत वाला और इल्म वाला है।

मुस्तहब है कि शबे जुफ़्फ़ाफ़ (हमबिस्तरी की रात मे ज़ौजा और शौहर वुजू करें और दो रकअत नमाज़ अदा करे।

फिर शौहर अल्लाह की हम्द व सना (तारीफ़) करने और रसूले अकरम (स.अ.) और आपकी आल पर दुरूद व सलाम भेजने के बाद यह दुआ पढ़े।

अल्लाह हुम्मर जुक़नी उलफ़ता-हा व वुद्रदह वरेज़ाहा व अर –ज़ेनी बेहा वजमअ बै-नना बे अहसनिज तेमाइंव व उनसिंव व अयसरेअ तेला फ़िन फ़-इन्ना तो –हिब्बुल हलाला व तक-रहुल हराम ,

या अल्लाह मुझे इस औरत कीमोहब्बत , उल्फ़त उल्फ़त औरखुशी अता फ़रमा। मुझे मुतमईन कर दे और हमें हम –ख़्याली , यगानेगत और कशिसके ज़रिये एक दुसरे के साथ अच्छी तरह से वाबस्ता कर दे , क्यों कि तू हलाल को पसन्द आर हराम कोना –पसन्द फ़रमाता है।

मुनदर्जा ज़ैल (निम्नलिखित) मौक़ों और हालात में मुजामेंअत (हम- बिस्तरी) मकरूह है।

1. जब इन्सान कपड़े उतारकर बर्हना (नंगा) हो गया हो।

2. जब इन्सान खड़ा हो।

3. जब कोई तीसरा शख़्स शौहर और बीवी की आवाज़ सुन रहा हो।

4. जब उस जगह कोई बच्चा मैजूद हो।

5. वुजू किये बग़ैर (जब औरत हाम्ला हो)।

6. अज़ान और अक़ामत के दरमियान वक़्फ़े में।

7. ग़ुरूबे आफ़ताब के वक़्त।

8. रात के इब्तेदाई हिस्से में (शुरू रात में)

9. (15) शाबान की रात।

10. ईदुल –फ़ित्र और ईदुल-कुर्बान ककी रात।

11. माह शाबान की आख़िरी दिन में।

12. चाँद गहन और सूरज गहन के वक़्त।

13. जिस दिन तेज़ हवाए चले या ज़लज़ला आये।

14. खुले आसमान के नीचे।

15. सूरज के सामने

16. फलदार दरख़्त (पेड़) के नीचे।

17. किसी इमारत की छत पर।

18. जब इन्सान कश्ती में हो।

19. जब पानी दस्तेयाब न हो।

20. औरत के अय्यामे हैज़ मे उससे मुजामेअत हराम है।

(1) सोमवार की रात, मंगल की रात, जुमेरात की रात, जुमेरात के दिन और जुमे की रात मुजामेअत (सेक्स) करना मुस्तहब है।

इस्लाम ने शौहर और बीवी के कुछ फ़रायज़ मुताअय्यन (निश्चित) किये है , जिनकी सही-सही अदायगी न फ़क़त यह कि उनके इख़्तेलाफ़ात (मतभेदों) को दूर करती है बल्कि उनके दरमियान एक ऐसी उल्फ़त और मोहब्बत पैदा कर देती है जिससे उनकी ज़िन्दगी खुश्गवार हो जाती है।

बीवी के फ़रायज़ (पत्नि के कर्तव्य)

बीवी के लिये लाज़िम है कि...

1. अपने शौहर की इताअत करे।

2. शौहर की इजाज़त के बग़ैर न तो उसका माल ख़र्च करे और न किसी को ब-तौर तोहफ़ा दे।

3. शौहर की इजाज़त के बग़ैर अपने माल में से भी किसी को कुछ न दे।

4. शौहर की इजाज़त के बग़ैर इस्तहबाबी रोज़ा न रखे।

5. अगर शौहर उससे ख़फ़ा हो तो (चाहे ज़्यादती शौहर की ही हो) रात को न सोये बल्कि उसे और ख़ुश करने की कोशिश करे।

6. अपने शौहर की ख़ातिर बनाओ सिंघार करे।

शौहर के फ़रायज़

शौहर के लिये लाज़िम है कि..

1. बीवी को रोटी रपड़ा मोहय्या करे

2. बीवी को ऐसा सामान खाने पीने का मोहय्या करे जो लोग आम तौर से इस्तेमाल करते हों।

3. ईदों (त्योहारों) के मौक़ो पर उसे मामूल मोहय्या करे।

4. बीवी के साथ अच्छा सुलूक करें।

5. अगर बीवी से कोई गलती हो जाये तो माफ़करदे।

6. बीवी के साथ सख़्ती से पेश न आये।

7. अपने कारोबार का इन्तेज़ाम उसके सुपुर्द न करे।

8. बीवी को एक ऐसा काम करने ब़ाज़ रखे जिसका अन्जाम बुरा होने का इम्कान हो।

9.हरचार रातों मे से कम से कम एक रात उसके साथ सोये और हर चार महीनों में कम से कम एक मर्तबा उससे मुजामेअत करे।

औलाद

1.अगर कोई शख़्स ला-वलद मर जाये तो वह एसा ही है जैसे कि पैदा ही न हुआ हो और अगर अपने पीछे औलाद छोड़कर मरे तो ऐसा है जैसे वह मरा ही न हो।

2.रवायत है कि बेटियाँ तो नेकियाँ है और बेटे नेमतें हैं। अल्लाह नेकियो का अज्र देता है और नेमतो के बारे में ब़ाज़ पुर्स करता है।

बेटी और बहन की बरकत

रसूले अकरम (स.) ने फ़रमाया , अगर किसी श़ख़्स की तीन बेटियाँ या तीन बहनें हों वह उनकी ज़िम्मेदारी सँभाले औऱ उनकी परवरिश की ख़ातिर ज़हमत उठाये तो अल्लाह ताला अपने फ़ज़ल व करम से उसे जन्नत में दाख़िल करेगा

इस पर एक शख़स ने सवाल किया ,या रसूलल्लाह (स.) अगर उसकी दो बेटियाँ यादो बहने हो।

रसूले अकरम (स़.अ.) ने फ़रमाया

तब भी वह जन्नत मे दाख़ि होगा।

तलबे औलाद

रवायत है कि तलबे औलाद के लिये इन्सान को चाहिये कि फ़ज्रऔर इशा की नमाज़ के बाद सत्तर मर्तबा अस्तग़फेरूल्लाह को और उसकेबाद यह आयत पढे

अस्तग़फ़ेरू रब-बा- कुम इन्नहु कानाग़फ़्फ़ारंम युर-सेलिससमाआ अलैयकुम मिदरारंव व युमदिदकुम बे-अमवीलिंव व बनीना व यजअल लकुम मिदरारंव व यज अल लकुम अन्हार।

अपने परवरदिगार से मग़फ़ेरत चाहतें हैं बेशक वह बड़ा बख़्श ने वाला है वह तुम पर आसमान (की तरफ़) से ख़ूब मेंह (मूसलाधार बारिश) बरसायेगा बरसायेगा और तुम्हें माल व औलाद में तरक़्क़ी देगा।

वह तुम्हारे लिये बाग़ात पैदा करेगा और नहरें जारी करेगा।

एक और रवायत में है कि औलाद तलब करने के लिये बिस्तर में लेटे-लेटे मुन दर्जा ज़ैल आयत पढ़नी चाहिये।

व ज़न्नूने इज़-ज़-हबा मुग़ाज़ेबन फ़-ज़न्ना अल-लन नक़देरा अलैय-हे फ़नादा फ़िज़-ज़लोमाते अल-ला-इलाहा इल्ला अन्ता सुब्हानका इन्नी कुन्तो मिनज़ ज़लेमीन फ़स-त-जबना लहू व नजजैनाहोमिनल ग़म्मे वक़जालेका नुनजिल मोमेनीना व अन्ता ख़ैरूल वीरेसिन।

और जब ज़न्नून (यूनुस (अ.स.)) गुस्से में आकर चले गये उन्होने गुमान किया कि हम उनकी रोज़ी तंग न कर दें फिर उन्होने तारीकिये में से पुकारा कि तेरे सिवा कोई माबूद नहीं और तू पाक है बेशक मैं (ही) क़ुसूरवार हूँ पस हमने उनकी दुआ कुबूल की और उन्हें ग़मसे निजात दी। हम मोमिनो को इसी तरह निजात दी। हम मोमिन को इसी तरह निजात दी। हम मोमिन को इसी तरह निजात दिया करते हैं। जब ज़करिया (अ.स.) नेअपनॊ रब को पुकारा कि ऐ परवरदिगार मुझे तनहा (बे-औलाद) न छोड़ना और तु ही सब वारिसों से बेहतर (वारिस) है।

(सूर - ए - अम्बिया आयत 87से 89 तक )

कुछ और हदीसो में आया है कि अगर किसी शख़्सकी बीवी हामिला हो औरवह नियत करे कि वह अपने बेटे का नाम मोहम्मद या अली रखेगा तो अल्ला उसे बेटे से नवाज़ेगा।

हामिला औरत को चाहिये कि वह बेही और .क़ीकर .का गोंद खाये और बच्चे की पैदाइश के बाद ताज़ी खजूरें खाये।

बच्चे की पैदाइश

मुनासिब है कि बच्चे की पैदाइश के बाद इमाम हुसैन (अ.स.) के रौज़े की ख़ाके शिफ़ा को दरिया-ए-फुरात के पानी में मिलाकर उसके तालू पर लगाई जाये। अगर दरिया-ए-फुरात का पानी दस्तियाब न हो तो बारिश का पानी इस्तेमाल किया जाये।बच्चे के दायें कान में अज़ान और बायें कान में अक़ामत कही जाये।

2. रवायत है कि जब किसी औरत के लियेबच्चे को जन् देना मुश्किलहो जाये तो उसके लिये यह आयात पढ़ना चाहिये ,

फ़ अजा-अ-हल मख़ाज़ो एला जिज़ इन नख़-लतेक़ालत या लयतनी मित्तो क़ब्ला हाज़ा व जाला रब्बोके तहतके सरिय्यन व हुज़्ज़ी एलायके बे जिज़-इन-नख़-लते तो-साक़ित अलैयके रूतबन जनिय्यन ,,

पस दर्द ज़ेह उन्हें खजूर के दरख़्त तले ले आया तो उन्होंने कहा ऐ काश कि मौं इससे क़ब्ल ही मर गई होती और भूली बिसरी हो जाती तब किसी ने उन्हें ज़मीन के नीचे से पुकारा कि रंजीदा ख़ातिर न हो तेरे परवरदिगार ने

तेरे पाँव के नीचे एक चश्मे को जारी कर दिया है और तुम ख़जूर के तने को पकड़कर अपनी तरफ हिलाओ तुम पर पके हुए खुर्मे गिरंगे।

( सुर .- ए - मर्यम - आयात 23से 25 तक )

3.बेहतरीन नाम वह है जिससे अल्लाह के सामने इन्सान कीउबूदियत का इज़हार होता है।होता है (मसलन अब्दुल्लाह) इसके बाद अम्बिया (अ.स.) केनाम हैं।

4.मुनासिब है किबच्चे की पैदाइश से पहले ही उसका एक अच्छा सा नाम रख दिया जाये।

5. रसूले अकरम (स.) ने फ़रमाया है जिस शख़्स के चार फ़र्ज़न्द हों और वह उनमें सें एक को भी मेरा हम नाम न बनाये तो उसे मेरे साथ मोहब्बत नहीं है।

6. पैदाइश के वक़्त बच्चे को नहलाने की ताकीदी हिदायत की गई है।

हजामत ,ख़ाना और अक़ीक़ा

1. जो शख़्स हैसियत वाला हो उसे बच्चे का अक़ीक़ा (जानवर की क़र्बानी) करने की पुरज़ोर ताकीद की गई है और बेहतर यह है कि अक़ीक़ा बच्चे की पैदाइश के सातवें दिन किया जाये अगर इसमे ताख़ीर हो जाये तो बच्चे के बाप को चाहिये कि बच्चे के सिव — बुलूग़ियत को पहुँचने तक उसका अक़ीक़ा कर दे नही तो उसबच्चे के बालिग़ होजाने के बाद ख़ुद उसके लिये मुस्तहब है कि वह जीते जी अपना अक़ीक़ा करे।

2. बच्चे की पादाइश के सातवेंदिन उसका अक़ीक़ा करने सेपहले उसका सिर मुऩडवाना मुस्तहब है। फिर उसके सिरके बालों के बराबर चाँदी या सोना बतौरे सदका देना चाहिये फ़र्ज़न्दे नरीना (लड़के का) ख़त्ना कराना पैदाइश के सातवें दिन ही अंजाम दिया जाये।

3. रवायत के मुताबिक़ बच्चे का ख़त्ना कराते वक़्त यह दुआ पड़नी चाहिये

अल्लाह हुम्मा हाज़ेही सुन्नतोका व सन्नतो नबिय्येका सलावातोका अलैयहेव आलेही वत्तेबाउम मिन्ना-लका वले नबिय्येका बे मशिय्यतेका व अमरिन अन-कज़ा-का ले-अमरिन अ-रत्तहू व क़ज़ा-इन हत्तम-तहू व अमरिन अन्ता अअ-फ़ज़-तहू व अ-ज़फ़-तहू हर्रल-हदीदेफ़ी ख़ेतानेहि व हजा- मतेहि बेअमरिन अन्ता अअ.-रफ़ो बेही मिन्नी

अललाह –हुम्मा फ़-तहहिरहो मिनज़ ज़ुनूबे व ज़िदफ़ी उमरेही वद-फ़-इलआल्लाह- हुम्मा फ़अ. अनहुल फ़क़रा फ़-इन्नाका तअ.-लमो वला नअ.-लमो ,,।

या अल्लाह यह तेरा मुक़र्रर किया हुआ तरीक़ा और तेरे नबी की सुन्नत है कि तू उन पर और उनकी पाक आलपर दुरूद भेजता है (ख़त्ने के) इस अमलमें हम तेरी मशिय्यत , इरादे और फ़ैसले के मुताबिक तेरी इताअत और तेरे नबी की इताअत करते हैं ,जैसा कि तूने इरादा किया मोहकम फ़ैसला किया और इसका सवाब क्या है तेरा वह हुक्म जिसके तहत तूने इस (बच्चे) को इसका सिर मुऩडवाने और ख़त्ना करवाने मे लोहे (के औज़ार) की काट का मज़ा चखाया है।इसकाम की मसलहत को तू मुझसे ज़्यादा जानत है।

या अल्ला तू इस बच्चे को गुनाहों से पाक कर दे.इसको लम्बी उम्र अता फ़रमा दे , इसके बदन को आज़ार (तकलीफ़ों से बचाये रख , इसे कशायश अता करना और मुफ़्लसी से बचाये रकना और जो कुछ तू जानता है , हम नहींजानते ,,।


शीर-खार्गी (दूध पिलायी)

1.शीर-ख़ार्गी की ज़्यादा से ज़यादा मुददत दो साल है और किसी माकूल (सही) उज्र के बच्चे को इससे ज़्यादा अर्से तक दुध पिलाना जायज़ नहीं।इसके अलावा जब तक ज़रूरी न हो दुध पिलाने की मुददत 21 माह से कम नहीं चाहिये।

2. बच्चे केलिये सबसे मुफ़ीद (फ़ायदेमन्द) और मुआफ़िक़ दुध माँ का है और वह दोनों तरफ से पिलाना चाहिये।

3. अगर बच्चे को दूध पिलाने के लिये आया (दुध पिलाने वाली) रखी जाये तो उसे कुबूलसूरत और नेक सीरत होना चाहिये क्योकि बच्चे पर दुध का असर पड़ता है।

तालीम व तरबियत (शिक्षा-दीक्षा)

1 बच्चे की परवरिश (पालन-पोषऩ) के बारे में कहा गया है कि सात साल की उम्र तक उन्हें खेलने देना चाहिये।अगलू सात साल उन्हें लिखना पढ़ना सीख़ना चाहिये। और फिर सात साल तक उन्हें हलाल व हराम के बारे में तालीम देना चाहिये।

2 जब लड़के छ. ( 6) साल की उम्र को पहुँच जायें तो उन्हे एक रज़ाई ओढ़ कर इकटठा नहीं सोना चाहिये। नीज़जब लड़के और लड़कियाँ दस साल की उम्र को पहुँच जायें तो उनके बिस्तर अलग जगह पर कर देना चाहिये।च्चों को नौ-उम्री (बचपन) मे ही हदीसे याद करा देनी चाहिये और उनकी तरबियत इस अंदाज़ से करनी चाहिये कि उनके दिलों में अमीरूल-मोमिनीन (अ.स.) की मोहब्बतऔर अक़ीदत पैदा हो जाये। इसके अलावा उन्हें कुर्आने मजीद ठीक पढ़ना चाहिये और तालीम दिलाकर किसी अच्छे रोज़गार पर लगा देना चाहिये।

3 अपने बच्चे की नौ-उम्र (बचपन) में गुस्ताख़ी और मुतहम्मुल मिज़ाजी (स्वभाविक सहनशीलता) की दलील है।

4 अपने बच्चों को तैराकी और तीर अन्दाज़ी ,निशाने बाज़ी ज़रूर सिखायें।

5 बच्चों से मोहब्बत करें उनके साथ बे-वक़अती (बे — हैसियती) और सख़्ती से पेश न आये।

6 ऐसा मुश्किल काम उनके ज़िम्मे न पेश न आये।

7 अगर आप उनके साथ कोई वायदा करे तो ज़रूर पूरा करें।

8 उन्हें बोसा दें (चूमें) क्यों जो शख़्स अपने बच्चे को चूमे अल्लाह ताला उसके नाम-ए-आमाल में एक नेकी लिख देता है।

9 अपने बच्चे को खुश करें ताकि अल्लाह ताला क़यामत के दिन आपको खुश करें।

10 बच्चों के साथ बच्चे की तरह ख़ेले।

11 इल्म और नेकी के अलावा किसी और बिना पर उनके बीच इमतियाज़ (फ़र्क़) न बर्ते।

12 रात को सोने से पहले उनका हाथ मुँह धलायें।

13 जब कभी आप अपने घर के तरजीह (प्रधानता) दें।

14 अपने बच्चे को ख़ुश व खुर्रम रखें।

15 इस बातका ख़याल रखें कि जब लड़की छ.साल की हो जाये तो कोई ना- महरम (अपरिचित , ख़ूनी रिश्तेदार छोड़कर सभी लोग) न तो उसका बोसा लें और न उसे अपनी गोद में बैठायें।

16 जिस लड़के की उम्र सात से ज़्यादा हो उसके लिये आरतो का बोसा लेना दुरूस्त नहीं।

17 इमाम मूसा काज़िम (अ.स.) से रवायत है कि आपने फ़रमाया .एक शख़्स के घर के अफ़राद उसके गुलाम है लिहाज़ा जब अल्लाह ताला किसी शख़्स को अपनी रहमत से नवाज़े तो उसे चाहिये कि उसको अपने गुलामो तक फैला दे वरनःजल्द ही वह रहमत मादूम (ख़त्म) हो जाती है।

वालदैन (माता –पिता)

वालदैन (माता-पिता) की इज़्ज़त करना दीन की अहम तरीन हिदायत में से है. उनकी नाफ़रमानी (बात न मानना) करना गुनाहे कबीरा (बड़ा गुनाह) है।

1.एक बेटे को अपने वालेदैन के हुक्म को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिये सिवाये इसके जब व उसे दीन इस्लाम को तर्क करनेपर मजबूर करें।वालदैन के साथ अच्छा बर्ताव करना चाहिये।

2. इन्सान को चाहिये कि अपने बाप को नाम लेकर न पुकारे रास्ता चलते हुए उनसे पे-क़दमी न करे ,जिसके नतीजे (स.अ.) ने फ़रमाया है कि चार लौगों के चेहरे पर निगाह डालना अल्लाह के ज़िक्र के बराबर हैः

(1) इमाम आदिल ( 2) आलिमे हक ( 3) वालिद ( 4) वालिदा हज़रत (स़.अ.) न यह भी फ़रमाया है कि तीन गुनाह ऐसे हैं जिनकी सज़ा इन्सान इसी दुनिया में जल्द ही पा लेता है।

(1) वालदैन की नाफ़रमानी ( 2) अल्लाह की मख़लूत़ (नौ-ए-इन्सान) पर जुल्म करना ( 3) अल्लाह और उसकी मख़लूक़ का ना-शक्रगुज़ार होना।

3. अपनी माँ के साथ बहुत ही अच्छा बर्ताव करे।

4. अपने वालदैन को सख़्त नज़रों से न देखे बल्कि उन पर मोहब्बत और हमदर्दी की निगाह डाले।

5. जब वालदैन फौत (मर जाये) हो जाये तो उनका अपने फरज़न्दो पर हक कि व उनके क़र्ज़े अदा करें और क़ुनूत में उनके लिये दुआ-ए-मग़्फ़ेरत (क्षमा हेतु प्रार्थना) करे और नमाज़ के बाद यह दुआ पढ़े।

रब-बनग़ फ़िर्ली वले वाले दय्या व लिल मोमेनीनीना यौमा यक़ूमुल हिसाब ,,

ऐ परवरदिगार हिसाब के दिन मुझे मेरे वालदैन और मौमेनीन को बख़श देना। (सूरः-ए-इब्राहीम (अ.स.) आयात न. 41)

सफ़ाई और तहारत

इस्लाम ने सफ़ाई को इतनी अहमियत दी है कि उसे ईमान का एक हिस्सा क़रार दे दिया है। जैसा कि कुर्आने मजीद सफ़ाई और तहारत की ताकीद करते हुए फ़रमाता है

मा युरीदुल्लाहो ले यजअला अलैयकुम मिन हरा-जिंव वला किंय योरीदो ले-यो-तह-हेरा कुम वले योतिम्मा नेअ-मता-हू अलैयकम अल-लकुम तशकुरून ,

(सूरः - ए - मायदा आयात न 6)

अल्लाह नहीं चाहता कि तुम्हारे लिये कोई तंगी (मुशकिल) पैदा करे मगर यह कि तुम्हें पाक कर दे और अपनी नेमततुम पर तमाम कर दे ताकि तुम शक्रगुज़ार बनो।

इन्नल्लाह यो हिब्बुतृ-तव्वाबीना व यो हिब्बुल मुतह-हेरीना.

( सुरः-ए-बक़रा आयात न. 222)

बेशक अल्लाह तौबा कने वालों को पंसन्द करता है।

इस्लाम ने बर्तनों , कपड़ो , बदन , बालो , दातों , पीने के पानी , वुज़ू और गुस्ल करने के पानी रिहाईश गाहों , गली-कूचों अवामी जगहों खाने पीने की चीज़ो और इन्सान पर ज़ोर दिया है। रसूले अकरम (स.अ.) और आइम्मा-ए-ताहेरीन (अ.स.) की कई एक अहादीस में हर उस नफ़रत-अंगेज़ चीज़ को जो बीमारी पैदा करती है , उस (मसलन जरासीम) को शैतान से मनसूब किया गया है और ऐसी तमाम चीज़ों को गुर्बत और मुसीबत का मूजिब गर्दाना गया है।

दाँत साफ़ करना

1. रवायत की गई है कि रसूले अकरम (स.अ.) ने फ़रमाया जिब्रईल ने मिसवाक करने पर इतना ज़ोर दिया कि मैं समझा कियह अमल मेरी उम्मत पर वाजिब कर दिया जायेगा।

2. मिसवाक (टूथब्रश) से दाँत नीचे से ऊपर को साफ़ किये जायें और उसके बाद पानी के साथकुल्ली कर लेना चाहिये।*

3. नमाज़ अदा करनेसे पहले मिसवाक करने के 12 फ़ायदे हैं।

(1) यह पैग़म्बरों का अमल है।

(2) यह अल्लाह की ख़ुशनूदी का मूजिब है

(3) यह मुँह को साफ करता है।

(4) यह आँखो की रौशनी को तेज़ करता है।

(5) यह बलग़म निकालता है।

(6) यह हाफ़िज़े (याद-दाश्त) को बढ़ाता है।

(7) इससे दाँत साफ़ होते है।

(8) इस नेक आमाल का सवाब कई गुना बढ़ जाता है।

(9) यह दाँतो की कम ज़ोरी दूर करता है और उन्हें गिरने से रोकता है।

(10) यह दाँतों की जड़ो को मज़बूत करता है।

(11) फ़रिश्ते उन लोगों से खुश होते हैं जो मिसवाक करते है।

(12) यह भूख के सेहत मन्दाना अंदाज़ में बढ़ाता है।

4. इमाम मूसा काज़िम (अ.स.) और इमाम अली रज़ा (अ.स.) के इरशाद के मुताबिक हज़रत इब्राहीम (अ.स.) की आदतों मे से पाँच ऐसी है। जिनका ताल्लुक़ धड़ से है।

जिन पाँच चीज़ो का ताल्लुक़ सर से है , वे यह है।

(1) मिसवाक करना।

(2) मुँछों को काटकर दुरूस्त करना।

(3) वुजू में सर का मसा करनेके लिये बालोंमे मांग निकालना।

(4) पानी के साथ कुल्ली करना।

(5) पानी के साथ नाक साफ़ करना।

जिन पाँच चीज़ों का ताल्लुक़ धड़ से है वे यह हैः

(1) खत्ने कराना

(2) नाफ़ के नीचे के ग़ैर ज़रूरी बाल साफ करना।

(3) बग़लों के बाल साफ़करना।

(4) नाख़ुन काटना।

(5) पेशाब के बाद शर्मगाह को पानी से धोना

5. रसूले अकरम (स.अ.) के फ़रमान के मुताबिक़ तीन चीज़ें ऐसी हैं जो इनसान के हाफ़िज़े कोतेज़ करती और तमाम दर्दो से शिफ़ा बख़्शती हैं।

(1) गोंद का चबाना।

(2) मिसवाक करना

(3) क़ुरआने मजीद की तिलावत करना

एक और हदीस में रसूले अकरम (स.अ.) ने फ़रमाया है कि मिसवाक करने के बाद नमाज़ की दो रकअते अदा करना सत्तर रकअतों से बेहतर है जो मिसवाक किये बग़ैर अदा की जाये।

बाल तर्शवाना

1 .जब सर के बाल लम्बे हो जाये तो उन्हें तर्शवा दें।

जब आप बाल तर्शवाना चाहें तो क़िब्ला –रू (किब्ले के सामने होकर) बैठें और शुरू में यह दुआ पढेः

अल्लाह हुम्मा अअ-तेनी बे-कुल्ले शअ-रतिन नू-रंय यौमल केयामते ,,।

मैं यह अमल अल्लाह के नाम से शुरू करता हुँ। इसे अंजाम देने में उसकी मदद चाहता हूँ और मैं यह अमल रसूलल्लाह के दीनी अहकाम के मुताबिक़ कर रहा हूँ। ऐ परवरदिगार मेरे बाल के एवज़ क़यामत के दिन मुझे एक रौशनी अता फ़रमा।

जब आप बाल तरशवा चुकें तो कहेः

अल्लाह हुम्मा ज़य्यिन्नी बित-तवा व जन्निब निर –रेदा ,,

ऐ परवरदिगार मेरी आराइश तक़वा से कर और मुझे ग़ुमराही से बचा।

2. बनाओ सिघांर की ख़ातिर औरतों का अपने माथे और चेहरे के बाल उखाड़ने में कोई हर्ज नहीं।

3. मर्दो के लिये मुस्तहब है कि मुनदर्जा ज़ैल (निम्नलिखित) तरीक़ों में से काई एक इख़्तेयार करें।

(बेहतर है कि) वे अपने सर के बाल तर्शवायें या उन्हें बढ़ने दें कि चंदिया नज़र आने लगे।

मुँछे तराशना

इमाम जाफ़रे सादिक (अ.स.) ने फ़रमाया कि जो शख़्स जुमे के दिन मूँछें तराशेया नाख़ुन काटे उसके लिये ज़रूरी है कि यह दुआ पड़ेः

बिहिमल्लाहे व बिल्लाहे व अला सुन्नते मोहम्मदिंव व आले मोहम्मद व आलेमोहम्मद की सुन्नत के मुताबिक़ अमल करता हुँ।

अल्लाह के नाम से , मैं उसी पर भरोसा करता हुँ और मोहम्मद व आले मोहम्मद के मुताबिक़ अमल करता हुँ।

इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ) की एक और हदीस के मुताबिक़ मूँचों का तराशना ग़मगीनी और औहाम परस्ती (वहम का बहु औहाम) को कम करता है और यह रसूले अकरम (स.अ.) की सुन्नत भी है।

मूँछो का काटना सुन्नते मौअक्केदा (ऐसी सुन्नत जिसकी ताकीद की गई है और जितना आप उन्हे उनकी जड़ों से काटें उतना ही बेहतर है।

इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) अपनी मूँछो को बालो की जड़ों तक काटा करते थे आप यह भी फ़रमाते थे कि नाख़ुनों का जुमे के दिन काटना इन्सान को उस जुमे से अगले जुमे तक बफ़ा (सर के बालों की सकरी) के आर्ज़े से महफूज़ रखता है।

दाढ़ी रखना

इन्सान क़ी दाढ़ी दरमियाना सी होनी चाहिये यानि न बहुत लम्बी और न बहुत छोटी हो। दाड़ी का मुठ्ठी भर से लम्बी होना मकरूह है और उसके ना जायज़ होने का भी इम्कान है।

उलमा मे यह क़ौल मशहूर है कि दाढी का मुंडवाना जायज़ नहीं है।

नाखून काटना

1. हर जुमे को नाख़ून काटना , मुँछे तराशना और नाक के अन्दर से बाल खींचना मुसतहसन (अच्छा) है।

2. नाख़ून काटना सुन्नते मौअक्कदा है।

3. औरतों के लिये जायज़ है कि नाख़ून छोड़ दें , लेकिन मर्दो को चाहिये है कि बढ़े हुए नाख़ून पूरे काटें।

4. नाखून काटने के लिये बेहतरीन दिन जुमे का है।

5. जो बाल नाख़ून और ख़ून बदन से अलग हो जाये उसे ज़मीन में दफ़न कर देना चाहिये।

कंघा करना

सर और दाढ़ी के बालो में कंघा करने के कई फ़वायद हैं एक मोअतबर रवायत के मुताबिक़ इमामं जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने फ़रमाया कि अच्छे कपड़ों का इस्तेमाल दुश्मन को पस्त करता है , बदन पर तेल लगाना ज़ेहनी ख़िचाव और परेशानियों को कम करता है बालों मे कंघा करना दाँतों को मज़बूत करता है। रोज़ी में इज़ाफ़े का बायस बनता और कुव्वते बाह (बाजुओं की ताक़त को बढ़ाता है।

इत्र , खुश्बू और तेल का इस्तेमाल

इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने फरमाया है कि इत्र का इस्तेमाल दिल को मज़बूत करता है और क़ुव्वेते बाह को बढाता है।

अमीरूल मोमिनीन इमाम अली (अ.स.) ने फ़रमाया है कि एक औरत के लिये लाज़िम है कि वह हमेशा अपने शौहर की ख़ातिर ख़ुश्बू लगाये।

इमाम अली (अ.स.) का फ़रमान है कि तेल का इस्तेमाल बदन को ज़्यादा जाज़िब बनाता है कि क़ुव्वत और ताज़गी बख़्शता है। बदन के मसानो को खोलता है जिल्द (खाल) की ख़ुश्की और सख़्ती को दूर करता है और चेहरे पर अजीब सी चमक लाता है।

इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) फ़रमाते हैं कि ख़ुश्बुओं में मुश्क अंबर , ज़ाफ़रान और ऊद शामिल है।

1. इत्र और ख़श्बू का इस्तेमाल अम्बिया-ए-केराम के पंसदीदा मामूलात में से हैं।

2. जुमे केदिन ख़शबू के इस्तेमाल की बड़ी ताकीद की गई है।

3. यह ज़रूरी है कि मर्द तेज़ इत्र इस्तेमाल करे और औरत हल्का इत्र लगाये।

4. एक मुसलमाल औरत को अपने शौहर की ख़ातिर हर रोज़ इत्र इस्तेमाल करे लेकिन इत्र लगा कर घर से बाहर न निकले।

5. जब आरके लिये खुश्बू लाई जाये तो उसे क़ुबूल कर लेंऔर उसके लेने से इन्कार न करें।

बदन पर तेल लगाना

हर महीने में एक बार बदन पर तेल की मालिश मर्दो के लिये मुफ़ीद है जहाँ तक औरतों का ताल्लुक़ है अगर वहहर रोज़ भी तेल मलें तो उसमें कोई क़बाहत नहीं।

मालिश के लिये ब — नफ़्शा और सोसन के तेल सबसे बेहतर हैं।

ग़ुस्ल

ग़ुस्ल करना मुस्तहब है , हर रोज़ हमाम जाना मुनासिब नही लेकिन एक दिन छोड़कर अगले दिन हमाम में जाना ठीक है।

1.बदन का निचला हिस्सा ढ़ाँके बग़ैर खुले आसमान तले ग़ुस्ल करना और बर्हन्गी की हालत में नदी (या नहर) में दाख़िल होना मना है।

2. शिकम सेरी की हालत में हमाम में दाख़िल न हों।

3.जब भूख लगी हो तो ग़ुस्ल ख़ाने में जाये बलिकि उससे पहले कुछ खा पी लें।

4. हमाम में ठऩडा पानी न पियें और तर्बूज़ भी न खायें।

5. हमाम से बाहर आन के बादअपने पाँवों को ठऩडे पानी से धोयें।

6. गुस्ल ख़ाने में दाख़िल होने से पहले यह दुआ पढ़ें।

अल्लाह हुम्मा अज़ हिब अन्निर रिज्सा वन-नजा-सा व तहहिर जसा-दी व क़लबी। ,,

ऐ परवरदिगार मुझसे निजासत को दुर कर देऔर मेरे बदन और दिल को पाक करदे।

7. जब आप हमाम में हों तो पीठ या पहलू के बल न करे।

फ़िक़ा- हुर्रेज़ा में लिखा है कि ग़स्ले जुमा के बाद मुन-दर्जा ज़ैल (निम्नलिखित) दुआ पढ़नी चाहिये।

अल्लाह हुम्मा तहहिरनी व तहहिर क़ल्बी व अनके गुस्ली व अजरे अला लिसानी ज़िक-रका व ज़िकरा नबिय्येका मोहम्मदिन सल्ल्लाहो अलैयहे व आलेही वज अलनी मिनत-तववाबीना वल मुतह-हरन ,,

या अल्लाह मुझे और मेरे दिल के पाक कर दे , मेरे ग़ुस्ल को बा बरकत बना दे – मेरी ज़बान को अपनी और अपने रसूल मोहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.) और उनके अहैले बैत (अ.स.) की तारीफ़ में मशग़ूल कर दे और मुझे उन पाक दिल लोगों मे शामिल कर दे जिनकी तौबा क़बूल हो चुकी हो।

8. इन्सान को अपना सर और कपड़े धोने की ताकीद की गई है।

9. अपने बदन से उसबदबू को दुर कीजिये जिससे लोगों को तकलीफ़ पहुँचती है। अल्ला ताला उन लोगों से नफ़रत करता है जो गन्दे हों और जिनकी फैलाई हुई बदबू से लोगों को तकलीफ़ पहुँचे।

10. बग़ल और नाफ़ के नीचे उगने वाले बालों को ना तराशना एक ना पसंदीदा फ़ेल है।

11. मुस्तहब है कि गुस्ले जनाबत करते वक़्त यह दुआ पढ़ी जाये।

अल्लाह हुम्मा तहहिर क़ल्बी वज़क्की अमली व तक़ब्बल सअ-यी वजअल मा इन – दका ख़ैरल-ली-अल्लाह हुम्मज अलनी मिनत-तव्वाबीना वज –अलनी मिनल मुतह-हरीन ,,

या अल्लाह मेरा दिल पाक कर दे , मेरा अमल ख़ालिस बना दे , मेरी कोशिश क़बूल फ़रमा मुझे वही एनायत कर जो मेरे लिये अचछा हो मुझे उन लोगो में शामिल कर दे जो पाक दिल और सालेह हैं और जनकी तौबा कुबूल की गई है।

12. मनासिब है कि गुस्ले जुमा उस दिन की सुबह से दोपहर तक तर्क न किया जाये और यह दोपहर के जिस क़द्र क़रीब हो बेहतर है।

गुस्ले जुमा दोपहर के बाद शाम तक क़ज़ा गुस्ल की नियत करके भी किया जा सकता है।

13. रवायत के मुताबिक़ मुस्तहब गुसल इस तरह हैः

(1) रमज़ानुल मुबारक की ताक रातो-और ख़ास कर की पहली पन्द्रहवी सत्ररहवीं , उन्नीसवी , इक्कीसवीं और तेईसवी रात को।

(2) ईदुल फ़ित्र की रात को ईदुलक़ुर्बान के दिन।

(3) आठवी ज़िल – हिजा के दिन।

(4) अर्फ़े के दिन तक़रीबन ज़ोहर के वक़्त।

(5) माहे शाबान की दरमियानी रात को।

(6) माहे रजब की दरमियानी रात को।

(7) रसूले अकरम (स.अ.) की बेसत के दिन ( 27 रजब)

(8) ग़दीरे ख़ुम के दिन ( 18 ज़िल-हिज्जा)

(9) मुबाहेला के दिन ( 24 या 25 ज़िल-हिज्जा)

(10) नौ –रोज़ के दिन ( 21 मार्च)

इसी तरह मुनदर्जा ज़ैल पर ग़ुस्ल करना भी मुस्तहब है।

(1) हज या उमराह के लिये अहराम बाँधते वक़्त।

(2) रसुले अकरम (स.अ.) और आइम्मा –ए- ताहेरीन (अ.स.) की ज़ियारत के मौक़ै पर।

(3) इस्तेख़ारा करते व़क़्ते

(4) तौबा करते वक़्त

(5) सूरज गहन की क़ज़ा नमाज़ पढ़ने के वक़्त चाहे नमाज़जान बुझ कर तर्क की गई हो।

(6) हरमे मदीना , मदीना शहर और मस्जिद नबवी में दाख़िले के वक्त।

(7) तवाफ़ की ख़ातिर खान-ए-काबा में दाख़िले के वक़त।

(8) क़ुर्बानी के तौरपर जानवर ज़िबह करते वक़्त।

(9) पैदा हुए बच्चे को नहलाते वक़्त।

(10) यौमे मीला-दुन्नबी (स.अ.) ( 17 रबी-उल-अव्वल)।

(11) दुआ-ए-बारां करने के लिये।

(12) एक ऐसे शख़्स को देखने के बाद जिसे सही या ग़लत तौर पर फाँसी दे दी गई हो

(13) मय्यित को गुस्ल दिये जाने के बाद मस करने के लिये

(14) छिपकली को मारने के बाद।

सोना , जागना और बैतुल ख़ला में जाना

सूरज निकलने के बाद , मग़्रिब और इशा की नमाज़ों के दरमियान और अस्र की नमाज़ के बाद सोन मकरूह है और फ़ज्र और सुरज निक़लने के बीच सोना मना है।

1 .क़ैलूला करना (यानि दोपहर को सेना) सुन्नत है।

2 .सोने से पहले वुज़ू या तयम्मुम करके सोये तो जब तक वह सोया रहे ऐसे ही है जैसे कि नमाज़ पढ़ रहा है।

3 सोते वक़्त दायें पहलू पर क़िब्ला –रू-होकर सोये और दायां बाजू अपने सर के नीचे रखें

सोने के आदाब

इमाम मो.बाक़िर (अ.स.) से मर्वी है कि जब इन्सान अपना दायां हाथ अपने सर के नीचे रख कर बिस्तर में लेट जाये तो उसे चाहिये कि यह दुआ पढ़ेः

बिस्मिल्लाहे , अल्लाह हुम्मा इन्नी अस-लमतो नफ़्सी एलयका व वज- जैहतो वज-ही एलयका , व फ़व-वज़तो अमरी एलयका व अल-जैतो ज़हरी एलयका वता- वक्कलतो अल़ैयका रहबतम मिनतो बे- किताबेकल लज़ी अन-ज़लता व-बे-रसूलेकल-लज़ी अर-सल्ता ”

मैं अल्लाह के नाम से शुरू करता हुँ — याल्लाह. मैं अपनी जान तेरी हिफ़ाज़त में देता हुँ –अपना मुँह तेरी जानिब करता हुँ अपना मामला तुझे सौंपता हुँ तेरा सहारा लेकर लेटा हुँ मैं फ़क़त तुझ ही से डरता हुँ और तुझ ही से पनाह चाहता हुँ तेरी नाज़िल की हुई किताब और तेरे भेजे हुए रसूल पर ईमान ला चुका हूँ।

हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक (अ.स.) भी पढ़ना चाहिये।

1.बे — सबब और जरूरत से ज़्यादा सोना।

2.किसी माक़ुल वजह के बग़ैर हँसना।

3.शिकमसेरी की हालत में कुछ और खाना।

आपने यह भी फ़रमाया कि शुरू में लोगों ने जिन छः आमाल के बारे में ना –फ़रमानी की ,वे यह हैः

1. दुनिया से मोहब्बत।

2 .सल्तनत से मोहब्बत।

3 औरत से मोहब्बत।

4 खूराक से मोहब्बत।

5 नींद से मोहब्बत।

6 आसाश से मोहब्बत।

(1) मस्जिद में सोना मकरूह है।

(2) अगर इन्सान किसी मकान में अकेला हो और सोना चाहे तो उसे चाहिये कि यह दुआ पढ़ेः-

अल्लाह हुम्मा आनिस वह शति व अ-इन्नी अला वह दती ”

या अल्ला खौफ़ और परेशानी में मेरा मददगार रह और इस तन्हाई में मेरी मदद फ़रमा।

ऐसी छत पर सोना जिसका जंगला न हो ऐसी जगह सोना जहाँ दो रास्ते अलग होते हों औरआलूदा हाथों के साथ सोना मना है।

(3) सोने से पहले और जाग उठने के बाद बैयतुल — ख़ला में जायें

(4) सोने से पहले अल्लाह को याद करना और क़र्आने मजीद की तिलावत करना सुन्नत हैं।इस सिलसिले में मुन-दर्जा ज़ैल सूरतो और आयतो को तिलावत की पुर ज़ोर सिफ़ारिश की गई हैः-

(1.) सूर-ए-काफ़ेरून

(2.) सूर-ए-काफ़ेरून

(3.) सूर-ए-नास (इन दो सूरतो को मोअव्वज़ातैन भी कहा जाता है)

(4.) सूर-ए-इख़्लास

(5.) आयतल कुर्सी

(6.) सूर-ए-साफ़्फ़ात की पहली दस आयात

(7.) सूर-ए-तकासुर

(8.) सूर-ए-तकासुर

(1) सूर-ए-फ़लक़

बिस्मिल्लाह-हिर्रहमा-निर्रहीम 0

क़ुल अ-ऊज़ो बे-रब्बिल फ़लक़े 0 मिनशर्र मा-ख़लाका 0व मिन शर्रे ग़ासेक़िन इज़ै 0 व मिन शर्रिन नफ़फासाते फ़िल-उक़दे 0 व मिन शर्रे हासे दिन इज़ा हसद 0”

अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है , कह दे कि मैं सुबह के परवरदिगार की पनाह माँगता हुँ हर उस चीज़ के शर से जो उसने ख़ल्क़ की है , रात की तारीकी के शर से , और हासिद के शर से जब वह हसद करे।

(2) सूर-ए-नास

बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम 0

क़ुल अ-ऊज़ो बे रब्ब्नि नासे 0 मलेकिन नासे 0 इलाहिन नासे 0 मिन शर्रिल वसवीसिल ख़न्नासिल लज़ी यो वसवेसो फ़ी सुदूरिन नासे 0मिनल जिन्नते वन्नास 0

अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबाननिहायत रहम वाला है ,कह दे मै इन्सानों के परवरदिगार की इन्सानों के बादशाह की और इन्सानों के बादशाह की और इन्सानों के माबूद की पनाह माँगता हुँ (छुप जाने वाले शैतान) के वुसवास के शर से जो इन्सानों के दिलों में वसवास डालता रहता है (चाहे) वह जिनों मे से हों या इनसानो में से हों।

(3) सूर-ए-काफ़ेरून

बिस्मिल्लाह हिर्रहमा-निर्रहीम 0

.कुलया अय्योहल ताफ़ेरूना 0 ला-अअबुदो मा-तअबोदूना 0वला अन्तुम आबेदूना मा-अअबुद 0 वला अना आबेदुम मा अबत्तुम वला अन्तुम आबेदूना मा-अअबुद 0लकुम दीनोकुम वलेया दीन 0

अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है , कह दे कि ऐ इन्कार करने वालो ,मैं उसकी बनदग़ी नहीं करूगाँ जिसकी तुम बनदगी किया करते हो , न ही तुम उसकी बनदगी करने वाले हो जिसकी मैं बनदगी करता हूँ न ही मैं उसकी बंदगी करने वाला हुँ जिसकी तुम बनदगी करते हो और न ही तुम उसकी बनदगी करने वाले हो जिसकी मैं बनदगी करता हुँ (पस) तुम्हारा दीन तुमहारे लिये और मेरा दीन मेरे लिये है।

(4) सुर-ए-इख़्लास

बिस्मल्लाह हिर्रहमा-निर्रहीम 0

.कुल हो वल्लाहो अहद 0 अल्लाहुस संमद लम यलिद वलम यूलद 0 वलम यकुल्लहू कुफ़ोवन अ-हद ”

अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है , कह देकि वह अल्लाह यकता (और यगाना) है अल्लाह बे नियाज़ है (जिसके सभी मौहताज हैं) न उसने किसी को जन्म दिया , ना ही वह खुद किसी से पैदा हुआ और उसका कोई हमसर (सानी , दुसरा) नहीं है।

(5) आयतुल कुर्सी

बिस्मिल्लाह हिर्रहमा-निर्रहीम 0

अल्लाहो ला इलाहा इल्ला होवा अल हय्युमो ला ताखुजोहू सिनातुंव वला नौमुन लहू मा फ़िस समावाते वमा फ़िल अर्ज़मनज़ल लज़ी यसफ़ओ इनदहू इल्ला बे इज़नेही यअलमो मा बैना अयदीहिम वमा ख़ल फ़हुम वला योहीतूना बे शैइम मिन इल्मेही इल्ला बेमा शाआ वसेआ कुर्सियोहुस समावाते वल अर्ज़ावला यओदोहू हिफ़्ज़ोहुमा व होवल अलीयुल अज़ीम 0 ला इक रहा फ़िददीन ख़त तबय्यनर रूश्दो मिनल ग़इये फमयं यक़फ़ुर बित तागूते व योअ मिम बिल्लाहे फ़क़ा-दिस तमसका बिल उर वतिल वुसक़ा लन फ़ेसामा लहा वल्लाहो समीउन अलीम अल्लाहो वलिय्युल लज़ीना आ-मन युख़रेजोहुम मिनज़ ज़लोमाते एलन नुर वल लज़ीना कफ़ा-रू औलियाओ हुमुत ताग़ूतो युख़रे जू नहुम मिनन नुरे एलज़ जुलोमाते ऊलायाका असहाबुननीरे हुम फ़ीहा ख़ालेदुन ”

अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है ,वही अल्लाह है कि उसके सिवा कोई माबुद नहीं वह हमेशा ज़िन्दा हर चीज़ का क़ायम रखने वाला है न उसे ऊँग आती है न नींद जो कुछ आसमानौ और ज़मीनों में है वह सब उसी का है। कौन है जो उसके हुजूर मै बग़ैर उसकी इजाज़त के सिफ़ारिश करे वह (इन्सान) उसके इल्म में से किसी चीज़ का इदराक नहीं कर सकते सिवाय उसके जो वह (ख़ुद) चाहे उसकी सलतनत आसमानो और ज़मीनो से वसीअ (बड़ी) है उसे इन दोनो की हिफ़ाज़त करने में कोई ज़हमत नही होती और वह बहुत आली मरतबत है।

दीन में कोई जब्र नही क्योकि हिदायत और गुमराहीमेंफ़र्क वाज़ेह हौ चुका है पस जिसने झूठे खुदाओं का इन्कार किया और अल्लाह पर ईमान लाया यक़ीनन उसने मज़बूत रस्सी को पकड़ लिया जो टुटनहीं सकती और अललाह सब सुनता जानता है अल्लाह सर परस्त है उनका जो ईमान लाये वह उन्हें गुमराही की तारीकियों सेहिदायत की रौशनी (नूर) की तरफ़ लाता है , वह जो (हक से) मुन्किर हो गये तो उनके कर परस्त शैतान हैं जो उन्हे नूर से तारीकियों की तरफ़ जाते हैं यही लोग अहले जहन्नुम है जो हमेशा उसमें रहैंगे।

(6) सू-ए-साफ़फ़ात (पहली दस आयतें)

बिसिमिल्लाह हिर्रहमा निर्रहीम)

वस्साफ़्फ़ाते सफ़्फ़न 0 फ़ज़्ज़ाजेराते ज़जरन 0 फ़त तालेयाते ज़िकरन 0इन्ना-इला-ह-कुम ल-वाहेदुन 0 रब्बुस समावातेवल अर्ज़ेवमा बैयना हुमा व रब्बुल मशारेक़े 0 इन्ना ज़य्यन्नससमा अददुनिया बे जीनते-निल कवाकिबे 0हिफ़्ज़म मिन कुल्ले शैतानिम मारेदिन 0 ला-यस्सम-मऊना एलल मलाइल अअलाव युक़-ज़फूना मिन कुलले जानेबिन 0 दोहूरव व लहुम अज़ाबुंन साक़ेबुन 0”

अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है क़सम है उन (मौमिनों) की जो डाँटकर (बुराईसे) हटाते हैं नीज़ (और) क़सम है उन (आबिदों) की जो कुर्आन पढ़ते हैं कि बेशक तुम्हारा माबूद यकता है वह आसमानो , ज़मीनों और जो कुछ इनके बीच है सबका परवरदिगार और मश्रिक़ों (और मग़िरबों) का मालिक है।

बेशक हमने इस निचले आसमान को सितारों के ज़ेवर से सजाया और इसहर सरकश शैतान से महफूज़ रखा वे (शयातीन) बलन्द मरतबत फ़रिश्तों के कलाम की कन्सूइंयाँ नहीं ले सकते। वे हर तरफ़ से ढ़केले और धुतकारे जाते हैऔरउनके लिये दायमी (हमेशा का) अज़ाब है मगर वे (शैतान) जिसने कोई बात उचक ली हो तो उसके पीछे एकतेज़ शोला लग जाता है।

(7) सूर-ए-साफ़्फ़ात (आख़िरी दस आयतें)

‘’ व इन्ना जुन-दना लहुमुल ग़ालेबून 0 फ़ता-ववल्ला अन्हुम हत्ता हीन 0 व अबसिर हुम फ़-सौफ़ा युबसेरून 0 अफ़ा-बे-अज़ाबेना यस-तअ-जेलूना 0 फ़ 0 इज़ा न-ज़ला बे-सा-हतेहिम फ़सा-अ सबाहुल मुनज़रीना 0 वता-वल्ला अन्हुम हत्ता हीनिंव व अबसिर फ़-सौफ़ा युबसेरूना 0 सुब्हाना रब्बेका रब्बिलइज़्ज़ते अम्मा यसेफ़ना 0 व सलामुन अलल मुर-सलिना वल हम्दो लिल्लाहे रब्बिलआलमीन 0

और यक़ीनन हमारा लश्कर ही ग़ालिब रहेगा पस ऐ (रसूल (स.)) इनकी हालत को देखते रहो और वे भी अनकरीब (अपना अंजाम) देख लेगें-क्या ये हमारे अज़ाब में ताजील पस जब वह (आज़ाब) इनके आँगन में उतर आयेगा तो जिन्हें उससे डराया जा चुका है , वह उनकी क्या ही जाओ उनकी हालत देखते रहो और अनकरीब वे खुद भी (अपना अंजाम) देख लेगें तुम्हारा साहिबे इज़्ज़त परवरदिगार मुनज़्ज़ा है (पाक) है उन बातों से जो यह लोग बनाया करते हैं दुरूद व सलाम हौ अम्बिया-ए- मुरसलीन पर और तमाम तारीफ़ें तो जहानो के पालने वाले उसअल्लाह ही के लिये हैं।

(8) सूर-ए-तकासुर

बिस्मिल्लाह हिर्रहमा-निर्रहीम

अल- हाकुमुततकासुरो 0 हत्ता जुर्रतुमुल मक़ाबेरा 0 कल्ला सौफ़ा तअलामूना 0 सुम्मा कल्ला सैफ़ा तअलामूना 0कल्ला लौ तअलामूना इल्मल यक़ीने 0 लता-र-वुन्नल जहीम 0 सुम्मा लता-र- वुन्नह ऐनलयक़ीन 0 सुम्मा लतुस-अ-लुन्ना यौअ- एज़िन अनिन-नईम 0

अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है।

तुम्हें तो नस्ल की बोतात (ज़्यादती) ने ग़ाफ़िल बना रखा यहाँ तक कि तुम क़ब्रो में जा पड़े। आगाह हो जाओ कितुम जल्दी ही जान लोगे फिर आगाह हो जाओ कि तुम बहुत जल्द ही जान लेगे फिर आगाह हो जाओ कि तुम बहुत जल्द (इस ग़फ्लत का अंजाम) जान जाओगे। देखो अगर तुम यक़ीनी तौर पर जानते (तो हर्ग़िज़ गाफ़िल न होते) तुम लोग ज़रूर जहन्नम को देखोगे हाँ तुम उस यक़ीनी निगाहोंके साथ देखोगे फ़िर उस दिन तुम से नेमतो के बारे में भी ज़रूर पूछ ताछ की जायेगी।

मुन-दर्जाज़ैल (निम्नलिखित) बातों के अलावा रात भर जागना पसंदीदा ल नहीं है।

1 नमाज़े शब के लिये जागना

2. हासिले इल्म की ख़ातिर और तिलावते क़आर्ने पाक के लिये।

3.उस दुल्हन का जागना जिसे शौहर के घर ले जाया जाये।

रात को बहुत ज़्यादा सोना और बहुत ज़्यादा जागना पसंदीदा फ़ेल नहीं है।

पेशाब करना

वह हालतें और जगहें जहाँ पेशाब करना मना है।

1. जहाँ पेशाब की छींटें इन्सान पर पड़े।

2. खड़े होकर पेशाब करना।

3. जानवरों के ब़िलों मे पेशाब करना

4. पानी में पेशाब करना।

5. सड़कों और रास्तो में पेशाब करना।

6. मस्जिदों की दीवारों के साथ पेशाब करना।

7. घरों के चारों तरफ पेशाब करना।

8. मेवेदार पेड़ों के नीचे पेशाब करना।

9. जहाँ पेशाब करने से लोगों को तकलीफ होती है।

पाख़ाने जाना

1.जब आप पाख़ाने जाना चाहें तो पहले बायां पाँव अन्दर रखें।

2. जब बैठ जायें तो बायें पाँव पर ज़ोर डालें।

3. जब अपने पेशाब पाख़ाने पर नज़र पड़े तो आप यह गौर करें कि इसका माख़ज़ क्या था यह क्या चीज़ थी आपने कहाँ से हासिल की और अब इसकी क्या सूरत हो गई।

4. जब पेशाब कर चुकें तो इस्तिब्रा करना मुस्तहब है।

5. बदन का निचला हिस्सा ठण्डे पानी से धोना सुन्नत है चूँकि ऐसा करने से बवासीर के मर्ज़ से शिफ़ा हासिल होती है। पाख़ाने में बहुत देर तक बैठना मकरूह है , जैसा कि कहा गया है , लुकमान पैग़म्बर ने अपने बेटू को हुक्म दिया था कि वह पाख़ाने के दरवाज़े पर यह इन्तेबाह (चेतावनी) लिख दे।

‘’पाख़ाने में ज़्यादा देर तक बैठने से बवासीर का मर्ज़ लग जाता है ;

6. अल्लाह कौ याद करने के अलावा पाख़ाने में कोई और बात करना मकरूह है।

7. बैयतुल — ख़ला (पाख़ाने) मे बैठे हुए शख़्स को यह दुआ पढ़ना चाहिये :

“ अल्लाह-हुम्मर जुक़निल हलाला वजनुबनी अनिल हराम ,

याल्लाह ; मुझे रिज़के हलाल अता फ़रमा और मुझे हराम चीज़ों से महफ़ूज़ रख।

8.इन्सान को चाहिये कि इस्तिन्जा करते वक्त यह दुआ पढे:

9. इस्लाम इन्सान को हर जगह और हर हालत में अल्लाह को याद करने का हुक्म देता है।

“ अल्लाह-हुम्मा हस्सिन फ़र्जी वस्तुर औरती व हर्रिमनिन नारा व वक़किफ़नी लेमा यो-क़र्रेबुऩी मिन्का या ज़ल-जलाले वल इकरामे “ ,

या अल्लाह मुझे (यानि मेरी शर्मगाहों को) ना-जायज़ चीज़ो से महफुज़ रख ,उनके पोशीदा रखने में मेरी मदद कर और मुझे जहन्नम की आग से बचाना- याल्लाह अपने जलाल और बुजर्गी की बदौलत उन अहकाम की पैरवी की तौफ़ीक़ दे जिनके ज़रिये मैं तेरा कुर्ब (नज़दीक़ी) हासिल कर सकूँ।

10. उठते वक़्त इन्सान को चाहिये कि अपना हाथ पेट पर रखेऔरयह दुआ पढे:

‘’अलहम्दो लिल्लाहिल लज़ी हन्ना फ़ी तआमी व शराबी व आफानी मिनल बल्वा “

सबतारीफ़ें अल्लाह के लिये हैं जिसने मेरे खाने को हज़म होने के क़ाबिल बनाया और मुझे उसकी तक्लीफ़ो से बचाया है।

11. बैतुल-ख़ला (पाख़ाने) से निकलते वक़्त इन्सान को चाहिये कि पहले दायां पाँव बाहर निकाले और दुबारा अपना हाथ पेट पररखकर यह दुआ पढ़े :

“ अल्हमदो लिल्लाहिल लज़ी अर्रफ़्नी लज़ ज़ता-हू व अबक़ा फ़ी जसा-दी कुव्वता-हू व अख़रजा अन्नी अज़ाहो ,या लहू मिननेअमतिन , नेअ-मतिल ला यक़देरूल क़ादेरूना क़द-रहा ” ,

सब तारीफ़ें अल्लाह के लिये जिसने मुझे ग़िज़ा का मज़ा चखाया उसकी कुव्वत मेरे बदन में महफूज़ कर दी और उसकी ग़लाज़त को मेरे पेट से ख़ारिज (निकाल) कर दिया।

हाँ.अल्ला की नेमते तो इतनी ज़्यादा हैं कि बड़े से बडे हिसाबदँ भी उनको शुमार करने से आजिज़ है।

बीमारिया और उनका इलाज

जब एक-ए-मोमिन बीमार होतो अल्लाह ताला एक फ़रिशते को मुक़र्रर कर देता है ताकि वह उस शख़्स के उन आमाल को लिखे जो उसने सेहत की हालत में अंजाम दिये हों।

1. बीमारी की हालत में आपको अपनी ज़बान पर हर्फे शिकायत नहीं लाना चाहिये , मसलन यह क़हना कि

“ मुझ पर एक ऐसी मुसीबत आ पड़ी है जो किसी और पर नहीं पड़ी होगी ” और इसके अलावा भी इस तरह की कोई बात नही कहना चाहिये।

2. फ़स्द खुलवाना सेहत के लिये मुफ़ीद है।

3. पेट तमाम बीमारियोँ की जड़ और परहेज़ तमाम दवाओं की जान है। जब तक आपका बदन बीमारी को बदर्शत कर सके ,दवाई न खायें।

अगर आप मुन-दर्जा ज़ैल उसूलो पर अमल करें तो आप हमेशा सेहतमन्द रहेंगे।

(1) खाना उस वक़्त खायें जब भूख लगे।

(2) पानी उस वक़्त पियें जब प्यास लगे।

(3) जब पेशाब की हाजत महसूस हो तो बिला ताखीर पेशाब करें

(4) जब तक ज़रूरी न हो नुजामेअतन करे।

(5) जब नीद , आजाये तो सोने में देर न करेम

(6) शहद हर मर्ज़ की दवा है

(7) मर्वी है कि तुम्हें अपने बीमारें का इलाज सदक़े सेकरना चहिये क्योकि सदका बड़ी से बड़ी मुसिबत को टाल देता है।

(8) एक ग़ैर मुस्लिमतबीब (डाक्टर) से इलाज कराने में कोई हर्ज नहीं

(9) अल्ला ताला ने अपने एक नबी से फ़रमाया जब तक तुम अपना तिब्बी इलाज नही कराओगे में तुम्हें शिफ़ा न दुँगा।

(10) नाश्ता करते वक़त ठणडे पानी के साथ मिस्री की एक छोटी सी डली ख़ाना बुखार से बचाओ के लिये मुफ़ीद है।

जैसा कि पेश्तर कहा गया है , जब कोई शख़्स किसी मुसीबतया बीमारी में गिरफ़्तार हो जाये तो उसे चाहिये कि मुसीबत से बचने की ख़ातिर अमली तदबीर और बीमारी से बचाओ के लिये उसका तिब्बी इलाज करे फिर उसके साथ साख अल्लाह ताला कि जो हर चीज़ का ख़ालिक़ है उसकी बारगाह में दुआ भी करे कि वह इस तदबीर या इलाज में तासीर डाल दे यही वजह हैं कि इस सिलसिलें में बहुत सी आयतों और दुआओं का ज़िक्र आया है।

इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) से रवायत है कि इमाम अली (अ) ने अपने घर में एक कमरा अपने लिये मख़सूस कर रखा था , जिसमे फ़क़त कुर्आन हकीम का एक नुस्ख़ा और एक तलवार होती थी आप वहाँ इबादत (पूजा) किया करते थे।

एक मोअतबर हदीस में है एक मुसलमान को चाहिये कि तिलावते क़ुर्आन के ज़रिये अपने घर की आराइश व ज़ेबाइश करे और उसे कब्र न बना दे ,यानि वह यहूदी और ईसाई लोगों का तरीक़ा न अपनाये कि जो अपने घरों में जिक्रे इलाही नहीं करते और फ़क़त ग़िर्जो और इबादत ख़ानों ही में इबादत करते है। जिस घर में क़आर्ने मजीद की ज़्यादा तिलावत की जाये उसकी हालत सुधर जाती है उसके मकीन एक इत्मीनान महसूस करते और आसमान वाले सितारों से रौशन हासिल करते हैं।

कुरआने मजीद की तिलावत सेहत के लिये मुफ़ीद है और इस सिलसिले में सूर-ए-फ़ातिहा और आयतुल कुर्सी पढ़ने पर बार बार ज़ोर दिया गया है।

सूर-ए-फातिहा

‘’ बिस्मिल्लाह-हिरर्हमा-निर्रहीम

अल्हम्दो लिल्लाहे रब्बिल आलमीन 0अर्रहमा निर्रहीम मालिके यौमिद्दीन 0 इय्याका नअबुदो व इय्याका नस-तईन एहदिनस सिरातल मुस्तक़ीमा 0सिरातल लज़ीना अनअम्ता अलैयाहिम ग़ैरिल मग़ज़ूबे अलैयहिम वलज़ ज़ाल्लीन 0’’

अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है तमाम तारिफें अल्लाह के लिये हैं जो तमाम जहानों का पालने वाला मालिक है (ऐ अल्लाह) हम सिर्फ़ तेरी ही इबादत करते हैं (इसके लिये) तुझ ही से मदद माँगते हैं हमें सीधे रास्ते की हिदायत फरमा जो उन लोगों का रास्ता है जिन पर तेरा इनाम हुआ न उनका रास्ता कि जिन पर तेरा ग़ज़ब हुआ और न गुमराहों का

आयतल कुर्सी

आयतल कुर्सी और उसका तर्जुमा इससे पहले लिखा जा चुका है।

दुआ-ए-नूर

रवायत है कि यह दुआ-ए-नूर बीबी फातिमा ज़हरा (अ 0) ने सलमाने फारसी को सिखाई और उनसे कहा अगर तुम इस दुनिया में कभी भी बुख़ार में मुबतला नहीं होना चाहते हो तो यह दुआ रोज़ाना पढ़ा करो फिर सलमान ने यह दुआ एक हज़ार ऐसे अश्ख़ास को सिखाई जो बुख़ार में मुबतला थे और वह सबके सब शिफ़ायाब हो गये ,वह दुआ यह है :

बिस्मिल्लाह हिर्रहमा निर्रहीम

बिस्मिल्लाहिन नूरो 0 बिस्मिल्लाहे नूरून नूरे 0बिस्मिल्लाहे नूरून अलन नूरे 0 बिस्मिल्लाहे लज़ी होवा मुदब्बेरूल उमूरे 0बिस्मिल्लाहिल लज़ी ख़ला- क़न नूरा मिनन नूरे 0 अल्हम्दो लिल्लाहिल लज़ी ख़ला-क़न-नुरा मिनन नूर व अनज़लन नूरा अलत तूरे फ़ी किताबिम मस्तूरे फ़ी रक़्क़िम मन्शूरिन बे-क़दा-रिम-मक़दूरिन अला नबिय्यिम महबूरिन 0 अल्हम्दो लिल्लाहिल लज़ी होवा बिल-इज़ज़े मज़कूरून व बिल-फ़ख़्रे मशहुरून व अलस सर्राय वज़ जर्राये मशकूरून व सल्लल्लाहो अला सययेदेना मोहम्मदिंव व आलेहित ताहेरीन 0”

अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है अल्लाह के नाम से जो रौशन करने वाला है अल्लाह के नाम से जो रौशनी के ऊपर रौशनी है अल्लाह के नाम से जो निज़ामें आलम का तरतीब देने वाला है अल्लाह के नाम से जिसने रौशनी को रौशनी से पैदा किया तमाम तारीफ़ें अल्लाह के लियेहैं जिसने रौशनी को रौशनी से पैदा किया और रौशनी को पहाड़ (तूरे सीना) पर नाज़िल किया जिसका ज़िक्रसतरों वाली किताब मों हैं जो उम्दा चर्म पर लिखी है जिसे बुजुर्गी और शान वशौकत के साथ याद किया जाता है और बुजुर्गी औरशान व शौकत के साथ याद किया जाता है और जिसका शुक्र खुशहाली में और परेशानी मे भी अदा किया जाता है हमारे खुशहाली में और परूशानी मैं भी अदा किया जाता है हमारे सरदार मोहम्मद मुस्तफ़ा (स. अ.) और उनकी पाक व पाक़ीज़ इतरत पर खुदा का दुरूद व सलाम हो

1. नाश्ते के तौर पर सलाद और खजूरे खाने के अलावा दूध पीने की ताकीद की गयी है।

2. कई हदीसों मे आया है कि “ लाहौल ” पढने से ग़म दुरहो जाता है।

“ ला-हौला वला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहिल अलिय्यल अज़ीम ”

कोई ताक़त और क़ुव्वत नहीं सिवाय उसके जो बलन्द और बुजुर्ग ख़दा से (मिलती) है।

3.सैय्यदुश शोहदा हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) के रौज़ेकती ख़ाक पाक शिफ़ा बख़्श है ,ब-शर्तेकि इस बात पर आपका यक़ीन हो और आप उसे मटर के एक दाने से ज़्यादा इस्तेमाल न करें।

4. अगर कोई शख़्स अपने एक मुसलमान भाई की अयादत (बीमार को देखने जाना) के लिये जाये तो उस दिन सत्तर हज़ार फ़रिश्ते उस पर सलाम भेजते है। अपने बीमार आदमी की दुआ की तरह होती है और जल्दी क़बूल होती है।

5. अगर आप एक बीमार की अयादत के लिये जायें तो अपने साथ उसके लिये सेब , बेही चकोतरा या इत्र लेते जायें।


मुआशरती हुक़क (सामाजिक अधिकार)

एक शख़्स रसूले अकरम (स.) की ख़िदमत में आया और अर्ज़ किया या रसूलल्लाह (स.अ) आप मुझे ज़िन्दगी बसर करने का ऐसा तरीक़ा बतायें कि जिसकी बदौलत मैं बेहिश्त का हक़दार हो जाऊँ----हजूर (स.अ.) ने फ़रमाया तुम उनसे अपने लिये चाहते हो पस जो चीज़ तुम अपने लिये पसन्द नहीं करते वह दूसरौ के लिये भी पसन्द न करो।

चुनाँचे इस्लामी तालीमात कि वह दुसरो का सरदार है औरहर चीज़ का महवर है उसे चाहिये कि वह दूसरों का सरदार है और हर चीज़ का महवर है उसे चाहिये कि वह दूसरों को भी यही रूत्बा दे जो अपने को देता है यह तालीम इस्लाम के फ़लसफ़ — ए — मुसावात पर मब्नी (निभर्र) है जिसके मुताबिक़ तमाम इन्सान आपस में बराबर हैं। जैसा कि रसूले अकरम (स.अ.) का इरशाद है सबसे बड़ी फ़ज़ीलत यह है कि इनसान इन्साफ़ पर मब्नी फ़ैसला करे चाहे वह फ़ैसला उसके अपने दीनी भाई को अपने बराबर समझो और हर हालत में अपने अल्लाह को याद रखो।

यही वह सिफ़त है जो ईमान का मेयार है और इन्सान और इन्सानी मुआशरे के लिये मूजिबे इफ़्तेख़ार है। जब एक इन्सान यह चाहता है कि दसरे उसकी इज़्ज़त करें उसके सामने सच बोलें ,उसकी मदद करें उससे खुलूस बर्ते , उसके हुक़क अदा करें और उसके साथ खुशख़ल्क़ी के साथ पेश आयें तो उसे भी दूसरों के साथ ऐसा ही बर्ताव करना चाहिये यानि वह भी उनकी इज़्ज़त करे उनके सामने सच बोले , उनकी मदद करे उनसे खुलूस बर्ते ,और उनके हक़ूक़ अदा करे और उनसे खुश खुल्की से पेश आये। क्योंकि अस्लमें उसके और दूसरो के दरमियान कौई फ़र्क नहीं है। इसी तरह जब वह इस बात को पसन्द नही करता कि दूसरे उसे बदनाम करें , उसकी बुराई करे उस पर इल्ज़ाम लगायें , उसकी तरक़्क़ी की राह में रोड़े अटकायें या उसके साथ घमण्ड से पेश आयें तो फ़िर उसे भी उनसे बद सुलूकी नहीं करनी चाहिये उसे भी हर किस्म के ज़ल्म और सितम व ज़्यादती से बाज़ रहना चाहिये। और महसूस करना चाहिये कि दूसरे भी उसी की तरह इन्सान हैं उसे चाहिये कि उनके ग़म और ख़ुशी में शरीक हों लिहाज़ा बनी-नौ-ए-इन्सान कौ फ़ायदा पहुँचाना और मुआशरे की ख़िदमत करना क़ुर्बे इलाही के वसीले हैं।

सिल-ए-रहमी

कोई अमल ऐसा नहीं जिसका बदला इतनी जल्दी मिलता हो जितनी जल्दी सिल-ए-रहमी का बदला जल्दी मिलता हो जितनी जल्दी सिल-ए-रहमी का बदला मिलता है पस जो शख़्स रिशते दारी के ताल्लुक़ात को तोड़ देता है वह बेहिश्त में दाख़िल नहीं होगा।

हमसायों के हुक़क़ (पड़ोसियों के अधिकार)

इस्लाम में हम सायों के हुक़ुक़ को बड़ी अहमियत दी गई है जैसा कि रवायत है कि रसूले अकरम (स.अ.) ने फ़रमाया , जिब्रईल ने मुझे हमसाये के साथ हुस्ने सुलूक के बारे में अक्सर सिफ़ारिश की ,हत्ता कि मैं ने ख़याल किया कि शायद वह विरासत में भीहमसाये का हिस्सा वह बेहिश्त की खुश्बू नही सूँघेंगा।

1. इमामे सादिक (अ.स.) से रवायत है कि आपने फ़रमाया जो लोग एक आदमी के दोनो तरफ़ में चालीस घरों मे रहते हैं उसके हमसाये हैं।

2. हमसाये के मुख़तलिफ़ हक़ूक़ में से एक हक़ “ माअन ” हैं इसके माना (अर्थ) उस क़र्ज़ के हैं जो हम साये को दिया जाये या वह एहसान जौ उसके साथ किया जाये या वह चीज. जो घरेलू ज़रूरयात के सिलसिले में उसे मुस्तआर (अस्तआई रूप से) दी जाये।

3. यतीम के हुक़ूक़ (अनाथ के अधिकार)

(1) यतीम का माल ग़ज़्ब करना गुनाहे कबीरा है।

(2) यतीम को चुम्कारने और प्यार करने का बड़ा सवाब है।

(3) ऐसी बहुत सी हदीसें हैं जिनके मुताबिक़ यतीम की परवरिश करना और उसके ख़र्चो की ज़िम्मेदारी लेना बड़े सवाब का काम है।

दीनी भाईयों के हुकूक़

1.भाई एक निहायत ही पंसदीदा फ़ेल है।

2. एक सालेह भाई के चेहरे पर निगाह डालना , ख़दा की इबादत बजा लाने के बराबर है।

3. एक मोमिन दूसरे मोमिन का भाई है वह उसकी आँख़ोंकी तरह है और उसका रहनुमा है वरना तो अपने दीनी भाई से बे वफ़ाई करता है और न ही उस पर जुल्म करता है वह न उसे धोका देता और न उससे किया हुआ वायदा तोड़ता है वह न उस भाई से झूठ बोलता है और न उसकी ग़ीबत (निन्दा) करता है।

4. आप अपने किसी दोस्त को अपने सारे राज़ (भेद) न बतायें कही ऐसा न हो कि एक दिन वही आपका दुश्मन बन जाये।

5. जो शख़्स किसी पर तोहमत (इल्ज़ाम) लगने का सबब बन जाये उसे उस आदमी को मलामत नहीं करनी चाहिये जो उसके मुताल्लिक़ बुरी राय रखना हो।

6. जब आप किसी से बरादराना ताल्लुक़ात क़ायम करें तो उसका जो अमल देखें उसे अच्छा माना (अर्थ) पहनायें सिवाय इसके जब नौबत यहाँ तक पहुँच जाये कि आप उसकेबारे में अच्छी राय क़ायम न कर सकें इसके अलावा उस पर शक करने से भी परहेज़ करें।

7. उन लोगों से मश्विरा कीजिये जो अल्लाह से डरते और उसके अहकाम की पैरवी करते हैं।

8. अपने दीनी भाइयों से उनके तक़वे के मेयार के मुताबिक़ मोहब्बत करें।

9. बुरी औरतों से बचें और जो अच्छी हों उनसे मोहतात रहें।

मोमिनीन के एक दूसरे पर बहुत से हुकूक़ हैं और जैसा कि इमाम जाफरे सादिक़ (अ.स.) से मन्क़ूल है उनमें से सहल और आसान यह हैं :-

1.आप किसी मोमिन के लिये वही पसन्द करें जो ख़ुद अपने लिये पसन्द करतें और वह नापसन्द करें जो अपने लिये नापसन्द करते हैं।

2. आप उसके उज़्र को कुबूल करलें और उसकी ख़ता से दर गुज़र करें।

3. ज़रूरत के वक़्त रक़म जिन्स (चीज़ों) से उसकी मदद कर दिया करें।

4. आपको उसकी आँखे , उसका रहनुमा और उसका आईना बन जाना चाहिये।

5. आपको चाहिये कि वह भूखा हो तो खुद सेर न हों , वह प्यासा हो तो अपनी प्यास न बुझायें और वह बर्हना होतो खुद लिबास न पहने यानि यह चीज़े अपने से पहले उसको मोहय्या (उपलब्ध) करें।

6.अगर आपके पास मुलाज़िम हो और उसके पास न हो तो आप पर लाज़िम है कि अपने मुलाज़िम को उसकेपास भेजें , ताकि वह उसका बिस्तर लगा दे।

7. आपको चाहिये कि वह क़सम खाये तो उसकी तसदीक़ करें वह आपको अपने घर बुलाये तो उसकी दावत क़ुबूल करले कर लें ,वह बीमार पड़े तो उसकी अयादत को जायें , अगर वह फ़ौत (मर) हो जाये तो उसके जनाज़े की तशीअ करें (साथ जायें) , अगर आपको पता चले कि उसे किसी चीज़ की की ज़रूरत है तो पेश्तर इसके कि वह आपसे माँगे उसकी ज़रूरत पूरी कर दें। पस आप ऐसा करेंगे तो जब ही आप उसके साथ अपना ताल्लुक़ क़ायम करेंगे और आप उससे दोस्ताना और बरादराना रवाबित मुस्तहकम करेंगे।

8. इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) से नक़्ल किया गयाहैं किआपने फ़रमाया “ यहलाजिम है कि तुम मख़्लूक केसाथ करीमुन नफ़्सी का बर्ताव करो ,क्यों कि अल्लाह की निगाह में इससे अच्छा कोई फ़ेल (काम) नहीं है।

9. अल्लाह को इससे ज़्यादा कोई इबादत पसन्द नहीं कि एक मोमिन को खुश किया जाये।

10. एक मोमिन के सामने मुस्कुराना एक पसन्दीदा फ़ेल है और उसके बदन से गर्द व गुबार को झाड़ना भी एक अच्छा फ़ेल है।

11. मौमेनीन की हाजत बर-आरी की कोशश करना बड़े सवाब का काम है। (ज़रूरत को पूरा करना)

12. अगर आप एक ऐसे शख़्स को देखे जो उम्र में आपसे बड़ा हो तो आपको कहना चाहिये “ यह शख़्स ईमान और नेक आमाल के मामले में मुझ पर सबक़्क़त ले गया है ले गया है लिहाज़ा यह मुझ से बेहतर है। इसी तरह अगर आपअपने से कम उम्र के आदमी को देखें तो कहें “ मैं ने इससे ज़्यादा गुनाह किये हैं लिहाज़ा यह मुझसे बेहतर है ” और जब आप किसी अपने हम उम्र शख़्स को देखें तो कहें “ मुझे अपने गुनाहों का यक़ीन है लेकिन इसके गुनाहों के बारे में शक है लिहाज़ा मैं शक के मुक़ाबिल यक़ीन को कैसे नज़र अन्दाज़ कर सकता हुँ “ जब आप देखे कि लोग आपकी इज़्ज़त करते हैं तो आपको कहना चाहिये “ यह उन्हीं की अच्छाई है कि वे अछ्छे अखलाक़ व अतवार का मुज़ाहिरा करते है ” लोग आपसे दूर रहें और आपकी इज़्ज़त न करें तो आपको कहना चाहिये “ इसकी वजह मेरे वे गुनाह हैं जिनको मैं ने किया है ” अगर आप ऐसा करेंगें तो आपकी ज़िन्दगी चैन से गुज़रेगी , आपके दोस्तों में इजाफ़ा होगा और आप लोगों की अच्छाई सेखुश होगें और उनकी बद सुलूकी पर ग़मगीन नहीं होंगे।

13. एक मोमिन भाई को अल्लाह की ख़ातिर जाकर मिलने का बड़ा सवाब है और बेहतर है कि मुलाक़ात के वक़्त अहले बैत (अ.स.) के इरशादात के मुताल्लिक़ गुफ़्तुगू की जाये।

14. एक मोमिन भाई को खाना खिलाने की बड़ी ताकीद की गई है।

रसूले अकरम (स.अ.) से रवायत है कि आपने फ़रमाया यह तीन आमाल अल्लाह ताला की निगाह में बहुत महबूब है।

(क) एक भूखे मुसलमान को पेट भरके खाना खिलाना

(ख) एक कर्ज़दार का क़र्ज़ा अदा करना।

(ग) एक मुसलमान को किसी मुसीबत से रिहाई दिलाना।

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) से रवायत है कि आपने फ़रमाया अगर एक शख़्स के पास ज़्यादा लिबास हो और उसे इल्म हो जाये कि उसके एक मोमिन भाई को उसकी ज़रूरत है ,लेकिन वह उसे न दे तो अल्लाहताला उसे सर के बल जहन्नम में झोंक देगा।

15. रसुले अकरम (स.अ.) से रवायत है कि आपने फ़रमाया अगर कोई शख़्स पेट भर के खाये जब कि उसका मुसलमान भाई भूखा हो तो वह शक़्स मेरी नबुव्वत पर ईमान नहीं रखता।

16. रसूले अकरम (स.अ.) ने फ़रमाया जो शख़्स मुसलमान के रास्ते से एक काँटा हटा दे वह जन्नत में दाख़िल होगा। एक और हदीस में आपने फ़रमाया जो शख़्स मुसलमानों के रास्ते से कोई ऐसी चीज़ हटा दे जो उनके लिये ज़हमत का मूजिब हो तो अल्लाह ताला उख़्स को क़ुर्आन मजीद की चार सौ आयातकी तिलावत के बराबर सवाब अता करता है।

17. मुसलमानों का एक दुसरे को तोहफ़े भिजवाना मुस्तहब है वह तोहफ़ा बहुत ही अच्छा है जो सिर्फ़ अल्लाह की ख़ातिर और किसी दुनियावी ग़रज़ के बग़ैर भेजा गया हो।

18. जो शख़्स किसी मोमिन को उसकी ज़बों हाली की बिना पर हक़ीर और क़ाबिले नफ़रत समझे , अल्लाह ताला उसे क़यामत के दिन तमाम मख़्लूक़ के सामने रूस्वा करेगा एक और रवायत में है कि जो शख़स किसी मोमिन को ज़लील करे अल्लाहा ताला उसे भी ज़लील करेगा।

19. हदीसे कुदसी में अल्लाह ताला फ़रमाता है जो शख़्स किसी मोमिन को दिर्क़ (परेशान) करे वह मेरे साथ लड़ने की तैयारी करता है।

20. इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) से रवायत है कि आपने फ़रमाया: जो शख़्स किसी मुसलमान को नुक़सान पहुँचाने की ख़ातिर आधे लफ़्ज़ से भी मदद दे , क़यामत दिन उसकी आँखो के बीच यह अल्फ़ाज़ लिखे जायेंगे:

21. एक मोमिन को मोमिन इस लिये कहा जाता है कि लोगों किजान और माल वग़ैरा (सब कुछ) उसके तार्रूज़से महफ़ूज़ रहता है-

मुस्लिम वह है जिसके हाथ और ज़बान से लोग महफ़ूज हों- “ मुहाजिर ” वह है जो गुनाहोंसे हिजरत करे (यानि दुरी इख़्तेयार करे)।

रसूले अकरम (स.अ.) ने फ़रमाया :

“ मै उस परवरदिगार की क़सम खाकर कहता हुँ जिसके क़ब्ज़-ए-कुदरत में मेरी जान है कि अगर आसमान और ज़मीन के तमाम रहने वाले मिलकर एक मोमिन को क़त्ल कर दें या उसके क़त्ल परमुत्तफ़िक़ हो जायें तोअल्लाह उन सबको जहन्नम वासिल कर देगा।

मैं उस परवरदिगार की क़सम खाता हूँ , जिसके क़ब्ज़-ए-कुदरत में मेरी जान है कि कोई किसी को बिला जवाज़ कोड़ानहीं मारता मगर यह कि उसे जहन्नम में उसी तरह कोड़े लगाये जायेंगे।

रसूले अकरम (स.अ.) ने यह भी फ़रमाया अगर एक शख़्स एक बूढे आदमी के बूढापे की बिना पर उसकी इज़्ज़त और ताज़ीम करे अल्लाह ताला क़यामत के दिन उसे ख़ौफ़ से महफूज़ रखेगा ,आपने यह भी फ़रमाया: “ एक सफ़ेदरीश (सफ़ेद दाढ़ी) मोमिन की ताज़ीम करना हक़ीक़त में अल्लाह ताला की ताज़ीम है ” -

हज़रत (स.अ.) ने फरमाया :जो शख़्स छोटों पर मेहरबान न हो और बड़ों का अदब न करे वह हममें से नही है “

इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) से रवायत है कि आपने फ़रमाया :-

“ अगर तुम कोईबात एक बहरे शख़्स को इस तरह समझाओ कि वह सुनले और तुमहें भी नागवार न गुज़रे तो तुम्हारा यह फ़ेल सदक़ा शुमार होगा। “

(5.)ज़ालिम लोगों के साथ मेल जोल

1. इन्सान को चाहिये कि ज़ालिमो के साथ मेल जोल रखने से परहेज़ करें

2. जो शख़्स किसी ज़ालिम बादशाह या हाकिम की तारीफ़ करे और दुनियावी फ़यादे की ख़ातिर अपने आप को उसके सामने ज़लील करे वह जहन्नम में ज़ालिम हाकिम का साथी होगा।

3. फ़ासिक़ व फ़ाजिर के साथ मिलकर खाना पीना मना है।

4. ज़ालिमो के कामो में उनके साथ शरीक होना उनकी मदद करना और उनकी ज़रूरत (आवश्यकतायें) पूरी करने की कोशिश करना कुफ्र के बराबर है।

5. अगर काई आदमी किसी अमीर आदमी से मिलने जाये और उसकी दौलत की बिना पर अपने आपको उसके सामने ज़लील करे वह अपना दो तिहाई ईमान खो बैठता है।

6. जो शख़्स किसी बादशाह के दरबार में हो और वह ललोगों को उसके ज़ुल्म व सितम से बचाये मुसलमानों केहालात को बेहतर बनाये और लोगों ख़सतौर से मोमेनीन की आवश्यतताओ को पूरा करेतो वह सच्चा मोमिनऔरतमाम ज़मीन पर अल्लाह का अमीन है।

7 रवायत है कि तक़य्ये में बड़ी फ़ज़ीलत है जैसा कि हदीस में है कि जो शख़्स तक़य्या न करे वह ईमाननही रखता और तक़य्य ईमान का 1/10हिस्सा है।

8. तकय्या हर उस चीज़ में ज़रूरी है जिसमें इन्सान को नुक़सान पहुँचने का इम्कान हो सिवाय ख़ून बहाने के कि इसमें कोई तक़य्या नहीं है। (यानि इन्सान को ख़ून बहाने से परहेज़ करना चाहिये)

9. इन्सान को चाहिये कि ग़ैर मुस्लिमों से इतनी गहरी दोस्ती पैदा न करे (कि जिससे ख़ुद उसके ईमान या उम्मते मुस्लिमा को नुक़सान पहुँचे।

(6.)सलाम

1. तवाज़ोअ (सत्यकार) के इज़हार का एक तरीक़ा यह है कि आप जिस किसी से मिलें उसे सलाम कहें (यानि “ सलाम अलैयकुम ” कहकर उसके हक़ में दुआ-ए-ख़ैर करें इसके माना है तुमपर सलामती हो)

2. रवायत है कि एक नौ उम्र आदमी को मुक़ाबलतन अपने से बड़े को सलाम कहना चाहिये एक राहगीर उस शख़्स को सलाम कह जो बैठा हुआ हो एक छोटा गिरोह बड़े गिरोह को सलाम कहे और एक छोटा गिरोह बड़े गिरोह को सलाम कहे और एक सवार पैदल चलने वाले को सलाम कहे।

3. अगर कोई शख़्स एक गरोह को सलाम कहे और उनमे से कोई एक जवाब देदे तो बाकी लोगों पर जवाब देने की ज़िम्मेदारी साक़ित हो जाती है।

4. किसी नौजवान औरत को सलाम कहना मकरूह है (जब कि बूढ़ी औरतों को सलाम कहने में कोई हर्ज नहीं है)

5. एक शख़्स के साथ हाथ मिलाने से सलाम मुकम्मल हो जाता है जो शख़्स सफ़र सें वापस आये उसके साथ गले मिलने से सलाम मुकम्मल हो जाता है।

इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने फ़रमाया , जब रसूले अकरम (स.अ.) किसी से हाथ मिलाते थे तो आप उस वक़्त तक हाथ नहीं ख़ींचतेथे जब तक वह अपना हाथ नहीं ख़ींच लेता था।

(क) एक और हदीस में रसूले अकरम (स.अ.) ने फ़रमाया , इन्सान को हाथ मिलाना चाहिये क्योंकि हाथ मिलाने से नाचाक़ी ख़त्म होती है।

(ख) अपनी बीवी और बच्चे के अलावा किसी का बोसा लेना मुनासिब नही है। लेकिन दीनी भाई के एक रूख़सार (गाल) या माथे का बोसा लेना चाहिये और अगर एक शख़्स आलिमे दीन हो तो उसके हाथ का बोसा भी लेना चाहिये।

(ग) इमाम जाफ़रे सादिक (अ.स.) ने फ़रमाया , हमारे पैरोऔं (अनुयायियों) की पेशानी मे एक रोशनी होती है , जिसकी बदौलत दुनिया के लोग उन्हें आसानी से पहचान लेते है पस जब वे आपस में सलाम व दुआ करें तो उन्हें एक दुसरे का माथा चूमना चाहिये।

(7)मुआशरती आदाब

1. जब आप किसी जमाअत में शामिल होना चाहों तो पहले इत्मीनान कर लें कि यह ऐसी जमाअत तो नहीं कि जिससे आप पर शक किया जाये या इल्ज़ाम लगाया जाये अगर इस बिना पर लोगों की राय आपके बारेमे ख़राब हो जाये तो उसकी तमाम तर ज़िम्मेदारी ख़ुद आप पर होगी।

2. अगर किसी महफ़िल में ऐसे लोग मौजूद हो जो आपसे ज़्यादा इल्म रकते हो तो आप उनकी जगह से बलन्दतर जगह पर न बैठे , बल्कि आपको चाहियें वहाँ आप किसी ऐसी चीज़ के बारे में गुफ़तुगू न करें जिसका आपको इल्म न हो।

3. अगर आप किसी ऐसी जगह बैठें जो आपके मर्तबे और मक़ाम से फ़रोतर (कम) हो तो इसमे कोई हर्ज नहीं ,बल्कि यह फ़रोतनी (ख़ाकसारी) की निशानी है।

4. जब आपको किसी ज़ियाफ़त (खान पान) में बुलाया जाये तो उस जगह बैठें जो साहिबे ख़ाना आपके लिये तजवीज़ करे।

एक हदीस में हैं कि जिन मक़ामात पर जाने के लिये एक इन्सान का अपने घर से निकलना बेहतर है वह ये है।

(क) हज या उमराह अदा करने के लिये बैतुल्लाह (क़ाबे) जाना।

(ख) उलमा –ए-दीन के घरों पर जाना , जिससे इन्सान को फ़यदा पहुँचता है और वह उनसे दूर हो कर घाटे मे रहता है।

(ग) दीनी या दुनियावी इल्म हासिल करने के लिये उलमा से मुलाक़ात करने जाना।

(घ) सख़ी (धनी) लेगों के घरों पर जाना ” जो क़यामत के दिन अज्र (सवीब) पाने के लिये अपनी दौलत दूसरों कोदे देते है।

5. किसी बेवकूफ़ शख़्स के यहाँ जाना कि कुछ हालात इन्सान को ऐसे लोगों के एहसान का बार उठाने पर भी मजबूर कर देते हैं।

6. इज़्ज़त के हुसूल और हाजत बरआरी के लिये मालदार लोगों के घरों पर जाना।

7. सलाह मशवरे के लिये ऐसे लोगों के पास जाना जिन्हें लोग ज़िम्मेदार समझते हों और उनकी माक़ूलियत पसन्दी और मुस्तक़िल मिज़ाजी की बिना पर उनसे बहुत से फ़ायदे की उम्मीद की जा सकती हो।

8. एक दीनी भाई के घर जाना क्योंकि एक मोमिन का अख़्लाक़ी फ़रीज़ा है कि वह दूसरे मोमिन का ख़याल रखे।

9. अपने दुश्मनके घर जाना (जब कि उसमें ख़तरा न हो) क्यों कि इन्सान अक्सर आता जाता रहे तो दुश्मनी मांद पड़ जाती है और ग़लत फ़हमी दुर हो जाती है।

10. ऐसी महफ़िल में जाना जहाँ इन्सान और फ़य्याज़ी के जज़बात पैदा हो जायें।

इमाम जाफ़रे सादीक (अ.स.) से रवायत है कि आपने फ़रमाया

(क) जो शख़्स एक तंग जगह पर चार ज़ानू होकर यानि आल्ती पाल्ती मारकर बैठे वह इन्सान ही नहीं है।

(ख) जब कोई शख़्स आपसे मिलने आये तो चन्द क़दम आगे बढ़कर उसका इस्तक़बाल करें जब वह जाने लगे तो दरवाज़े तक उसे छोड़ने जायें और जो कुछ करने को कहे वह करें।

इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) से रवायत है कि आपने फ़रमाया

(1) अपनी जगह से उठकर किसी का इस्तक़बाल करना मकरूह है सिवाय उस शख़्स के जिसकी उसके ईमान (मसलन इल्म , आला ,अख़्लाक , और नेकी) की वजह से इज़्ज़त की जाती हो।

(2) अपको एक ऐसे साथी का इन्तेख़ाब करना चाहिये जो आपको अल्लाहकी याद दिलाये , इल्मे दीन सिखाये ,आख़ेरत के लिये अमले ख़ैर करने का शौक़दिलाये और दुनिया में और आख़ेरत में आपकी बेहतरी चाहे।

एक और हदीस में आपने फ़रमाया , जिन चार अफ़आल (कामों) की कोई फ़सल नहीं काटी जाती वे यह है।

(क) उस शख़्स से मोब्बत करनाजो आपकी मोहब्बत का जवाब न दे।

(ख) एक ऐसे शख़्स पर एहसान करना जो आपका एहसान क़ुबूल करने को तैयार न हो।

(ग) एक ऐसे शख़्स को इल्म सिखाना जो उसकी क़द्र न करे।

(घ) अपना भेद ऐसे शख़्स को बताना जो उसे अपने दिल में न रख सके

एक हदीस में आया है कि सहाबा-ए- केराम नेरसूले अकरम (स.अ.) से पूछा हम किस की सोहबत में रहें ?

हज़रत (स.अ.) ने फ़रमाया , तुम उन लोगों की सोहबत में रहे जिनके दीदार से तुम्हें अल्लाह की याद आये ,जिनके अहवाल तुम्हारे इल्म कोबढ़ाये और जिनके आमाल तुम्हें हक़ व हक़ीकत के क़रीब ले आये।

1. अगर एक शख़्स देखे कि उसका दीनी भाई ना मुनासिब काम कर रहा है और वह उसको न रोके तो वह हक़्क़े

बरादर (भाई के अधिकार केमामले में उससे ग़ददारी करता है।

2. इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने फ़रमाया मैं उस शख़्स को अपना बेहतरीन दोस्त तसव्वुर करता हूँ जो मेरे उयूब (ऐबों) को मुझपर ज़ाहिर कर दे।

3. अगर एकदोस्त ईमान के मामले में आपको कुछ फ़ायदा न पहुँचाये।तो उसकी तरफ़ कोई तवज्जो न दें और उससे मेल जोल की ख़वाहिश न रखें।

रसूले अकरम (स.अ.) से रवायत है कि आपने फ़रमाया चार ऐसी हैं जो दिल को मुर्दा कर देत हैं।

(क) मुसलसल (बराबर , निरन्तर) गुनाह करना।

(ख) औरत से ज़्यादा बातें करना।

(ग) एक ऐसे आदमी से बहस मुबाहिसा करना जिससे तुम एक बात कहो तो वह कोई दूसरी कह और हकीक़त को तसलीम न करे।

4 .मर्द से मेल जोल रखना।

हाज़िरीन ने कहा , या रसुलल्लाह ये मर्दे कौन हैं ?आपने फ़रमाया वे दौलत मंद लोग जिन्होंने अल्लाह को भुला दिया है।

रसूले अकरम (स.अ.) ने फ़रमाया अल्लाह ताला नहीं चाहता कि उसके रसूल में छ: आदतें हों।

(क) नमाज़ पढते वक़्त अपनी दाढ़ी या कपड़ें से खेलना।

(ख) रोज़े की हालत में बदज़बानी करना।

(ग) दूसरे जितलाना कि तुमने उसे ख़ैरात देकर एहसान किया है।

(घ) नजिस होने की हालत में मस्जिद में दाख़िल होना।

(ड़) क़ब्रिस्तान में हँसना

(च) दूसरे लोगों के घरों में झाँकना।


छींक

जब आपको छींक आये तो यह पढ़े

“ अलहम्दो लिल्हे रब्बिल आलामीन व सल्लल्लहो अला मोहम्मदिंन व अहले बैयतेही ”

तमाम तारीफ़ें अल्लाह के लिये हैं जो सब जहानों का परवरदिगार है।

मोहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.) और उनके अहले बैत (अ.स.) पर दरूद व सलाम हो।

जो शख़्स छींके उससे यह कहें

“ यर-हमोकल्लाहो ”

अल्लाह ताला तमपर रहम करे

फिर छींक मारने वाला यह कहे

“ व यग़फ़ेरूल्लाहो लना व लकुम “

अल्लाह ताला हमें और तुम्हें बख़श दे।

1. मामूली मज़ाक़ करना एक क़ाबिले तारीफ़ फ़ेल (अमल) ख़ुश मेज़ाजी की निशानी और भाई की राहत का मूजिब है।

2. इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) से रवायत है कि आपने फरमाया जो शख़्स लोगों के दरमियान हँसी मज़ाक़ करे अल्लाह ताला उसे पसन्द करता है उस नक़्त तक कि वह नाशायस्त ज़बान इस्तेमाल न करे।

3. इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने फ़रमाया ,इन्सान को ज़्यादा हँसी मज़ाक से परहेज़ करना चाहिये क्योंकि यह इन्सान को इज़्ज़त से महरूम कर देती है उसके वेकांर और रोब का ख़ात्मा कर देती है और दुसरों से दुश्मनी पैदा कर देती है।

4. हँसना अगर मुस्तराहट और-रूई की शक्ल में हो तो मुस्तहसन है क्योंकि एक मोमिन को चाहिये कि ख़श व ख़र्रम रहे और हँसे मुस्कराये और हँसे मुस्कराये , नयह कि मायूस और बेज़ार बेज़ार सा रहे।

5. बहुत ज़यादा हँसना बेवकूफ़ी की अलामत है यह दिल को मुर्दा कर देती है और इन्सान के ईमान कर देती है।

क़हक़हे लगाकर हँसना एक बेजा फ़ेल है जब आप इस तरह हँसें तो यह दुआ पढ़े:

“ अल्लाहुम्मा-ला-तमक़ुतनी ”

ऐ परवरदिगार मुझसे नाख़ुश न होना।

6. रसूले अकरम (स.अ.) से रवायत है कि आपने फ़रमाया , किसी शख़्स तो वह अल्फ़ाज़ बोलने का हक़ हासिल नहीं है कि जो बोलने वाले ने पोशीदा रखे हो बजुज़ इसकि वे दानाई की बातें हो जिनकी तशहीर (प्रचार) ज़रूरी हो या उनमें ख़ुद उस शख़्स की अच्छाई का तज़किरा किया गया हो।

7. यह ज़रूरी है कि जो शख़स आपसे मेल जोल रखे आप उसके अच्छे साथ बनें।

8. अगर आप किसी शख़्स को पसन्द करते हो अपनी पसन्द का इज़हार उस पर कर दें क्योंकि ऐसा करने से दोस्ती बढ़ती है और बाहमी मोहब्बत की पुख़्तगी का मूजिब बनता है।

9. जब आप एक मुसलमान भाई से मोहब्बत करते हों तो ज़रूरी है कि आप उसके नाम के साथ साथ उसके वालिद , उसके कुंबे और रिश्तेदारों के नाम जानते हों क्येंकि दोस्ती और भाई चारे में यह एक लाज़मी बात है।

10. अपने और अपने दोस्तों के भेद ज़ाहिर न करें क्योंकि यह चीज़ शर्म व हया का ख़ातिमा कर देती है।

11. अपने भाईयों से खुशदिली के साथ मिलें , क्योंकि लोगों से खुशदिली के साथ मिलना दुश्मनी को दूर करता है।

12. लोगों के साथ झगड़ा न करें क्योंकि ऐसा करना शख़्सी वेक़ार ,आली ज़र्फी और करीमुन नफ़्सी का ख़ातिमा कर देता है।

इमाम जाफरे सादिक़ (अ.स.) ने फरमाया ,तीन चीज़ें इस दुनिया और आख़ेरत के लिये भी अच्छी है

क) उन लोगों को माफ करना जिन्होंने तुम पर ज़ुल्म किया है।

ख) उस शख़्स के साथ तहम्मुल के साथ पेश आना जिसने तुम्हारे साथ गुस्ताख़ी किया हो।

ग) उस शख़्स से मेल जोल रखना जो तुम्हारे साथ अपनी दोस्ती ख़त्म करना चाहता हो।

13. गुस्सा न करें बल्कि उस पर काबू पायें क्योंकि गुस्से पर क़ाबू पाना इस दुनिया और आख़ेरत में इज़्ज़त का मूजिब है।

14. इमाम जाफरे सादिक़ (अ.स.) ने फरमाया ,जो शख़्स हाकिमाना हैसियत रखते हुए अपने गुस्से पर क़ाबू पा लें ,वह कयामत के दिन ईमान से पुर होगा और उसे परेशानी और अफ़्सुर्दगी से बचा लिया जायेगा।

15. इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) ने फ़रमाया , जो शख़्स आला (बलन्द) मर्तबा रखतेहुए अपने ग़ुस्से पर क़ाबू पाले ,अल्लाह ताला इस दुनिया और आख़ेरत में भी उसकी इज़्ज़त बढायेगा।

16. अल्लाह ताला के नाम का विर्द करना और हर जगह और हर हालत में उसे याद रखना अच्छी बात है।

17.मोमिन के मजमे में एक मोमिनको याद करना इस अम्र का मुजिब है कि अल्लाह ताला उस याद करेगा।

18. जो शख़्स अल्लाह ताला को ऐसे लोगों के दरमियन याद करे जो ग़ाफ़िल हों वह उस शख़्स की तरह है जो अल्लाह की राह में जिहाद करता है।

19. अगर कुछ लोग जमा हों और वे (अल्लाह की ख़ालक़ियत ,उसके सिफ़ात , उसके पैग़ाम और उसकी बड़ाई के बार में ग़ौर करके) उसको याद न करें और रसूले अकरम (स.अ.) पर दरूद न भेजें तो उन लोगों का इजतेमाअ कयामत के दिन पछतायेगा।

20. एक इजतेमाअ से पूरा सवाब हासिल करने की तरकीब यह है कि जब एक शख़्स उसमें से उठे तो यह आयत पढ़े

“ सुब्हाना रब्बेका रब्बिल इज़्ज़ते अम्मा यसेफ़ून व सलामुन अ-लल मुरसलीना वल हम्दो लिल्लाहे रब्बिल आलामीन ”

तम्हारा परवरदिगार जो इज़्ज़त का मालिक है वह उससे बहुत बलन्द है जो सिफ़ात वे उसके लिये बयान करते है सलाम हो सब अंबिया पर दोनो जहानो का परवरदिगार आल्लाह ही है जो तमाम तारीफों का मुस्तहक है (सुर-ए-साफ़्फ़ात आयत 180—181)

21. रवायत है कि इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) ने एक शख़्स से पुछा क्या तुम ख़िल्वत में एक दुसरे से मिलते हो और अहले बैत (अ.स.) के इल्म और फ़जायल के बारे में जो कुछ कहना चाहो कहते हो ?

उसने जवाब इस्बात में दिया

22. रवायत है कि रसूले अकरन (स.अ.) ने फ़रमाया , तुफ़ है उनपर जो जुमे के दिनअपने आप को दुनियावी मामलात से आज़ाद न कर सकें , ताकि अपने दीन के बारे में कुछ सीखें।

23. यह रवायत होता है अल्लाह ताला उसके लिये बेहिश्त की जानिब एक रास्ता खोल देता है इसकी हक़ीक़त यह है तालिबे इल्म से इज़हारे मसर्रत के तौर पर फ़रिश्ते उसके लिये अपने पर फ़ैला देते और ज़मान व आसमान में जो कुछ है , हत्ता कि समन्दरो की मछलियाँ भी उस तालिबे इल्म के लिये मग़्फ़ेरत की दुआ करती हैं चुनांचे एक आलिम को क आबिद पर वही फ़ौकियत (प्रधानता) हासिल है जो चौदहवी के चाँ को सितारो पर है।

रवायत है कि लोगों को चाहिये कि वे एक दुसरे से मुलाक़ात करें , अहादीस नक़्ल करें और फिर मुज़ाकिरा करें क्योकि अहादीस दिलों को ज़िन्दगी बख़्शती है सच तो यह है कि तलवारों की तरह दिलों को भी ज़ंग लग जाता है और अहादीस वह ज़ंग उतार कर दिलों को ज़िन्दा को देती है।

(1) इन्सान चाहे कितना ही अक्लमंद क्यो न हो उसे चाहिये कि अपने मामलात में दूसरों से मश्विरा कर ले ,क्यों जो शख़्स किसी से मश्विरा कर लेता है उसे पछताना नही पड़ता।

(2) इमाम अली (अ.स.) से रवायत हैकि पने फ़रमाया , जो शख़्स दूसरो की की राय के मुक़बले में अपनेको ज़्यादा सायब (उचित) समझता हो और किसी से मशिवरा न करता हो अपने आप को मुश्किलात में मुबतला कर लेता है ” -

(3) जिस शख़्स से आप मश्विरा करे उसके लिये लाज़िम है कि वह अक़्लमन्द , दीनदार , आपका भाई और अच्छाई चाहने वाला हो इसके अलावा आपको चाहिये कि उसे मामले के तमामपहलुओं से आगाह करदें ताकि उसे तमाम हालात का उसी तरह इल्म हो जाये जैसे कि खुद आपको — जब आप किसी ऐसे शख़्स से मश्विरा करें और वह आपके लिये राहे अमल मोअय़यन (निश्चित) कर दे तो उसके मश्विरे के ख़िलाफ़ अमल न करे , अगर आप ऐसा करेंगे तो आपके दुनिया.और आख़ेरत के तमाम मामलात खराब हो जायेंगे।

(4) जब के अलावा दूसरे मामलात में बीवी से मश्विरा करना मुनासिब नही , और एक बुज़दिल , कंजूस और तामेअ

शख़्स से भी मश्विरा नहीं करना चाहिये।

(5) जब आपका कोई दीनी भाई आपसे मश्विरा करे तो आप उसे वही बात बतायें जो उसके लिये मुफ़ीद हो।

(6) इमाम अली (अ.स.) ने फ़रमाया : मैं उस शख़्स से नफ़रत करता हुँ जिससे एक मुसलमान मश्विरा करता हैं और वह जानता है कि उसके लिये क्या बेहतर है लेकिन उसे नहीं बताता।

(7) इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) से रवायत है कि आपने फ़रमाया : दीनी भाईयों में मौहब्बत और ताल्लुक़ के बरक़रार रहने का इन्हेसार इस पर है कि जब वह हज़र में हों तो एक दुसरे के यहाँ आयें जायें और जब सफ़र में हों तो एकदुसरे के साथ ख़त व किताबत करें

(8) जब आप ख़त लिखने लगे तो उसकी शरूआत “ बिस्मिल्लाह-हिर्रहमा-निर्रहीम ” से करें।

(9) ख़त का जवाब देना वाजिब है।

मकान के सिफात

1. एक मकान की नहूसत इसबात में है कि उसका सेहन छोटा और हमसाये बुरे हों

2. हर वह मकान जो इन्सान कि जरूरत से ज़्यादा हो , वह क़यामत केदिन उसके लिये तकलीफ़ का मूजिब होगा।

3. रसूले अकरम (स.अ.) से रवायत है कि आपने फ़रमाया: अगर कोई शख़्स नुमाइश के तौर पर या अपनी फ़ौक़ियत जताने की ख़ातिर मकान तामीर करे ताकि लोग उस मकान की तारीफ़ सुने और उसे देखने आयें तो क़यामत के दिन उस मकान को ज़मीन की सातवीं तह तक आग लगा दी जायेग़ी और वह उस शख़्स के गले मॆ लटका दिया जायेगा और जहन्नम की तह तक उसे कोई सहारा मैयस्सर नही होगा लेकिन यह कि वह तौबा कर ले।

हज़रत (स.अ.) से दरियाफ़त किया गया: या रसूलल्लाह (स.अ.) नुमाइश के तौर पर या फ़ौक़ियत जताने की ख़ातिर मकान तामीर करने से क्या मुराद है ?

आपने फ़रमाया : इसका मतलब यह है कि वह मुक़ाबलतन अपनी ज़रूरत से बड़ा मकान बनाये ताकि वह अपनी दौलतमंदी का इज़हार कर सके और अपने भाइयों पर अपनी बड़ाई जताये।

4. एक रवायत में है कि इन्सान को एक बिस्तर अपने लिये एक अपनी बीवी के लिये और एक मेहमानो के लिये रखना चाहिये , इससे ज़्यादा शैतान का माल है।

5. कुर्आन मजीद की तिलावत से अपने घर को मुनव्वर करते रहें अपने घर को ज़िक्रे खुदा से ख़ाली न छोड़ें बल्कि उसमें ख़ूब नमाज़े पढ़ा करें।

6. एक ऐसे घर में रात से सुबह तक वक्त गुज़ारना मकरूह है जिसमें पर्दा और ख़िल्वत मैयस्सर न हो।

7. इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) से रवायत है कि आपने फ़रमाया :यह मुनासिब है कि कि तुम अपने घर में झाडू दो , कूड़ा- करकट बाहर निकाल फेंको और उसे रात भर पड़ा न रहने दो , घर का कुड़ा दरवाज़े के पीछे भी जमा न किया करो।घर के दरवाज़े बन्द कर दो और जिन बर्तनों में खाने-पीने की चीज़े हों उन्हें ढाँक दो।

8. जब आप घर में अकेले हों तो न वहाँ रहें और न सोयें।

9. अपने पड़ोसी के घर में कभी न झाँके।

10. पालतू जानवर खास कर कबूतर , मुर्गियाँ , भेड़ें और बकरियाँ गर में रखना मस्तहब है।

11. घर में कुत्ता रखना मकरूह है सिवाय उन घों के जो आबादी से दूर फ़ासले पर हों

घर से बाहर जाना

जब आप घर से बाहर जाये तो यह दुआ पढ़ें :

“ बिस्मिल्लाह-हिर्रहमा-निर्रहीम 0

आमन्तो बिल्लाहे 0 तवक्कलतो अ-लल लाहे 0 माशाल्लहो 0ला-होला वला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहे 0 “

अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है -------मैं अल्लाह पर ईमान रखता हूँ अल्लाह पर भरोसा करता हुँ और जो अल्लाह चाहे उसे क़ुबूलं करता हुँ कोई ताक़त और कुव्वत नहीं सिवाय उसके जो अल्लाह से (मिलती) है।

घर में दाख़िल होना

जब आप घर में दाख़िल हों तो सूर-एऎइख़्लास पढ़ें (पीछे लिखा जा चुका है) और अहले ख़ाना को सलाम कहें।

तिजारत और ज़राअत (व्यासाय और कृषि)

1 .रसूले अकरम (स.अ.) से रवायत है कि आपने फ़रमाया , ख़दा की क़सम मेरे पैरूओं में सूदख़ोर उससे ज़्यादा पोशीदा है जितनी वह जगह जहाँ एक चींटी चिकने पत्थर पर अपना पाँव रखती है।

2 कारोबार और तिजारत क़ाबिले तहसीन चीज़ है , ख़ासकर जब कारोबार में इन्सान यह इरादा रखता हो , कि वह दौलत कमाये और उसे अच्छे कामों पर सर्फ़ करे वह अपने और अपने अहले ख़ाना के ख़र्चो को पूरा करे और उन्हें इस क़बिल बनाये कि वे आराम देह ज़िन्दगी गुज़ारें और ख़ुद वह शख़स भी अपनी हाजत दूसरों के पास ले जाने से बचा रहे।

3 .अली बिन हम्ज़ा कहते है , मै ने इमाम मूसा काज़िम (अ) को देखा कि बेल्चा हाथ में लिये काम कर रहे हैं जब कि आप एड़ी से चोटी तक पसीने मे भींगे हुए थे तब इमाम (अ.स.) ने फ़रमाया रसूले अकरम (स.अ.) और इमाम अली-ए मुर्तज़ा समेत मेरे तमाम बुज़र्ग भी खेतो में अपने हाथ से काम करते थे क्योंति खुदा के पैग़म्बरो ,उनके औसिया और सालेह बन्दो का यही तरीक़ा रहा है।

4 .रवायत है कि रसूले अकरम (स.अ.) ने फ़रमाया , जो शख़्सअपने ख़ानदान के रोज़ी रोटी का बोझ किसी दुसरे के सर पर डाल दे वह मलऊन है।

5 रवायत है कि इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) को बताया गया कि एक शख़्स कहता है मैं घर पर रहता हूँ नमाज़े पढ़ता हूँ रोज़े रखता हूँ और अपने परवरदिगार की परस्तिश (पूजा) करता हूँ इस लिये मेरी रोज़ी तो यक़ीननआ जायेगी। इमाम (अ.स.) ने फ़रमाया ,यह बात कहने वाला उन तीन लोगें में से है जिनकी दुआ क़ुबूल नहीं होती।

एक हदीस में है कि किसी शख़्स ने इमाम जाफरे सादिक़ (अ.स.) से कहा आप दुआ करें कि अल्लाह मुझे रोज़ी दे आपने फरमाया ,तुम उस तरह रोज़ी तलब करो जैसे अल्लाह ने उसका हुक्म दिया है फिर मैं तुम्हारे लिये दुआ भी करूँगा।

अगरचे रोज़ी कमाना एक पंसदीदा काम है फिर भी उसके लिये इतनी कोशिश करना भी दुरूस्त नहीं कि इन्सान उसी का होकर रह जाये।

6. अगर कोई शख़्स अपनी रोज़ी हराम तरीकों से कमाता है तो उसकी हलाल रोज़ी में उतनी ही कमी कर दी जाती है फिर क़यामत के दिन उससे हराम रोज़ी के बारे में पूछ ताछ भी की जायेगी।

7. ख़रीद व फरोख़्त के वक़्त क़समें खाने से परहेज़ करें।

8. माले तिजारत के ऐब छुपाने , बेचते वक़्त उसकी तारीफ करने और ख़रीदते वक़्त उसे घटिया करार देने से बचें रहें।

9. ख़रीद व फरोख़्त के मामलात में सख़्त गीरी न करें।

10. बाज़ार में दाख़िल होते वक़्त यह दुआ पढ़ें :

“ अल्लाह हुम्मा इन्नी अस-अलोका ख़ै-रहा व ख़ैरा अहलेहा ”

ऐ परवरदिगार मैं तुझसे इस बाज़ार में यहाँ के लोगों की तरफ से मुनाफा तलब करता हुँ।

11. रवायत है कि इमाम अली — ए -- –मुर्तज़ा (अ.स.) ने फरमाया ,बाज़ार में अल्लाह को बहुत याद करो ख़ासकर जब लोग अपने दुनियावी मामलात में लगे हुए हों ताकि यह तुम्हारे गुनाहों का कफ्फारा बने ,तुम्हारे नेक कामों में इज़ाफे का मूजिब बने और तुम्हारा नाम ग़ाफिल लोगों के साथ न लिखा जाये।

12. ख़रीदार को धोका देने से बाज़ रहो।

13. ज़ख़ीरा अन्दोज़ी (जमा करना) मना है जैसा कि रसूले अकरम (स.अ.) से रवायत है कि जो कोई ख़रीदता है और बेचता है वह अपनी रोज़ी हासिल करता है लेकिन जो शख़्स कोई जिन्स रोके रखता है ,ताकि वह मँहगी हो जाये वह मलऊन है।

14. बेहतरीन पेशा काश्तकारी है क्यो कि यह अम्बिया-ए-मुर्तज़ा (अ.स.) और उनके जा-नशीने और नेक लोगों का पेशा रहा है।

15.मोअतबर अहदीस में है। कि इमाम अली (अ.स.) बेल्चे के साथ में काम करते थे और ज़मीनें आबाद करते थे।

16. हदीस में है कि खेती बाड़ी करो और पेड़ उगाओ ख़ुदा की क़सम लोग कोई ऐसा काम नहीं करते जो इससे ज़्यादा जायज़ और मुनासिब हो।

17 जब आप बीज बोयें तो यह आयत पढ़ें:

“ अ-फ़रा अयतुम तहरोसूना 0 अ- अनतुम तज़-रऊ-नहू अम नहनुज़ ज़ारेऊन 0

और क्या तुमने ग़ौर किया कि जो कुछ तुम बोते हो , आया तुम उसे उगाते हो या हम उगाने वाले है (सूर-ए- वाक़ेआ आयत 63)

जब आप कोई पौधा लगायें तो यह दुआ पढ़े:

‘’ व-मसलो कले-मतिन तय्ये –बतिन क-शजा-रतिन तय्ये-बतिन असलोहा साबितुंव व फर-ओहा फिस-समाये तूअती उको-लहा कुल्ला हीनिन बे-इज़्ने रब्बेहा ’’

अच्छी बात एक पाकीज़ा पेड़ की तरह है कि जिसकी जड़ मज़बूत है उसकी शाखें आसमान से जा लगी हैं और वह हर लम्हा अपने परवरदिगार के ईज़्न से फल दॊता है (सूर-ए-इब्राहीम आयत 24.25)

इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) से रवायत है कि आपने फ़रमाया , मेवादार दरख़्त न न क्योमकि ऐसा करना नुज़ूले अज़ाब का मूजिब है।

(1) रसूले अकरम (स.अ.) से पूछा गया कि कौन सी जिन्स अच्छी है ? आपने जवाब दिया सबसे अच्छी जिन्स वह ज़रई पैदावार है जो इन्सान ने उगाई हो और उसके वाजिबात कर दिये हों।

(2) इस्लाम कहता है कि ज़राअत दौलत का सर-चशमा है इसबिना पर इमाम अली (अ.स.) न फरमाया है कि अगर किसी शख़्स के पास पानी और ज़मीन है और फिर वह तंगदस्त हो तो अल्लाह उसे अपनी रहमत से महरूम कर देता है।

मुसाफ़रत

1. इमाम जाफ़रे सादिक (अ.स.) ने फ़रमाया , जुमे के दिन सफ़र करना मकरूह है ,कि कही ऐसा न हो कि नमाज़े जुमा क़ज़ा हो जाये।

2. जब आप सफ़रका इरादा करे तो हस्बे तौफ़ीक सदक़ा ज़रूर दें।

3. सफ़र पर रवाना होने से पहले सूर-ए-क़द्र की तिलावत करें। (इन सबको किताब में लिखा जा चुका है)

सूर-ए-कद्र

बिस्मिल्लाह हिर्रहमा निर्रहीम 0

इन्ना अन-ज़ल्नाहो फ़ी लय-लतिल क़द्रे 0 वमा अद-राका मा लय-लतुल क़द्रे 0 लय-लतुल क़द्रे ख़ैरूम मिन अल्फे शाहिरन 0 तनज़-ज़लुल मलायकतो वर्रूहो फीहा बे इज़्ने रब्बेहिम मिन कुल्ले अमरिन 0 सलामुन हेया हत्ता मतलाइल फज्र 0’’

अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है। बेशक हमने इसको शबे क़द्र में नाज़िल किया और तुम्हें क्या मालूम कि शबे क़द्र क्या है शबे क़द्र (मर्तबा और अमल में) हज़ार महीनों से बेहतर है इस रात फरिश्ते अपने रब की इजाज़तसे साल भर के लिये हर हुक्म लेकर नाज़िल होते हैं और रूहे अमरी आती है यह रात तुलू — ए — फज्र तक सरापा सलामती है

1.रसूले अकरम (स.अ.) से रवायत है कि आपने परमाया ;इन्सान घर से रवाना होते वक़्त अपने खानदान में इससे बेहतर जा-नशीन नहीं छोड़ता कि रवानगी से पहले दो रकअत नमाज़ अदा करें और फिर कहें :

“ अल्लाहुमा इन्नी असतौदेओका नफ्सी व अहली व माली वज़र्रीयति व दुनयाया व आख़ेरती व अमानती व ख़ातेमता अमली ”

या अल्लाह मैं अपनी ज़िन्दगी ‘अपना घर ‘अपना माल ‘अपनी औलाद ‘दुनिया व आख़ेरत ‘अपनी अमानतों और अंजाम तेरे सुपुर्द करता हुँ।

अकेले यानी किसी दोस्त के बग़ैर सफर करना मकरूह है।जब आप अपने खाने पीने की चीज़ों में अपने दोस्तों के साथ शरीक हों तो यह सुन्नत है कि पहले आप लोग अपना अपना सामान खुर्द व नौश निकाले और एक दूसरे के सामाने रख दें।

(1) इमाम अली (अ.स.) ने फ़रमाया , जब एक शख़्स अपने शहर में हो तो उसकी जवां मर्दी इसमे है कि वह कुर्आने मजीद पढ़े , उलमा कीसोहबत में फ़िक़ा (धर्म शास्त्र) और दूसरे उलूम हासिल करे और नमाज़े जमाअत बा-क़ायदागी से अदा करे लेकिन जब वह सफ़र में हो तो उसकी मर्दानगी इसमें है कि वह खाने पीने का ज़्यादा सामान दूसरो को दें और सवार होते , उतरते रूकते और उठते अल्लाह को बहुत याद करें।

(2) एक हम सफ़र मोमिन भाई की मदद करना बड़े सवाब का काम है।

(3) जब इन्सान सफर में होतो उसे मुनदर्जा ज़ैल दुआ पढ़नी चाहिये।

‘’ अल्लाहुम्मज- अल मसीरी एबरन व समती तफ़क्कुरन व कलामी ज़िकरन ‘’

ए परवरदिगार मेरे सफ़र को ज़रिय- ए इबरत ,मेरी ख़ामोशी को ग़ौर व फ़िक्र और मेरे कलाम को अपनी याद बना दे।

(4) मोमिनीन को खुश आमदीद कहना और उनकी मशाइयत (साथ चलना) करना एक पंसदीदा अमल है।

रवायत है कि जब रसूले अकरम (अ.स.) किसी मोमिन को अल विदा कहते तो यह दुआ पढ़ते थे।

“ रहमाकुमुल्लाहो व ज़व्वादाकुमुत तक़वा व वज्जहाकुम एला कुल्ले ख़ैरिंव व क़ज़ा लकुम कुल्ला हा- जतिन व सल्लामा दीनाकुम व दुनयाकुम व रद-मुस्लेमीन ”

अल्लाह तुम पर अपने करम की बारिश करे , परहेज़गारी को तुम्हारे रख़्ते सफ़र का हिस्सा बनायें तुम्हें तमाम खुशियाँ नसीब हों और तुम्हारी तमाम ख़्वाहिशें पूरी हों , अल्लाह तुम्हारे ईमान और तुम्हारी जान व माल को सही व सलामत रखे तुम्हें ब-ख़ैरियत वापस लाये और यहाँ आकर तुम अपने बीवी बच्चों को महफूज़ पाओ।

जब कोई शख़्स सफ़र से वापस आये तो उससे (खासकर हुज्जाजे बैयतुल्लाह और जुव्वारे (अइम्मा से) गले मिलना चाहिये।

रवायत है कि जब रसुले अकरम (स.अ.) मक्के से आने वाले किसी शख़्स से मिलते थे तो यह दुआ पढ़ते थे।

“ क़बे-लललाहो मिन्का व अख-लफ़ा अलैयका ना- क- तका व ग़फ़रा ज़म्बका ”

अल्लाह ताला तुम्हारी इबादत कुबूल करे तुम्हरे पिछलों की रोज़ी बरक़रार रखे और तुम्हारे गुनाह बख़्श दे।

आख़िर में हम अल्लाह ताला की हम्द व सना (तारीफ़) करते है जो तमाम जहानों का परवरदिगार है।

[[अलहम्दो लिल्लाह किताब (इस्लामी तालीम) पूरी टाईप हो गई खुदा वंदे आलम से दुआगौ हुं कि हमारे इस अमल को कुबुल फरमाऐ और इमाम हुसैन (अ.स.) फाउनडेशन को तरक्की इनायत फरमाए कि जिन्होने इस किताब को अपनी साइट (अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क) के लिऐ टाइप कराया। 15.11 .2017


फेहरिस्त

पेश लफ़्ज़ 2

लिबास 4

अरायशे जमाल 11

खुद्दारी 18

पीने का पानी 20

आदाबे तज़वीज 21

कुंबा 22

बीवी के फ़रायज़ (पत्नि के कर्तव्य) 28

शौहर के फ़रायज़ 28

औलाद 29

बेटी और बहन की बरकत 29

तलबे औलाद 30

बच्चे की पैदाइश 32

हजामत ,ख़ाना और अक़ीक़ा 33

शीर-खार्गी (दूध पिलायी) 36

तालीम व तरबियत (शिक्षा-दीक्षा) 36

वालदैन (माता –पिता) 38

सफ़ाई और तहारत 40

दाँत साफ़ करना 41

बाल तर्शवाना 43

मुँछे तराशना 44

दाढ़ी रखना 45

नाखून काटना 45

कंघा करना 46

इत्र , खुश्बू और तेल का इस्तेमाल 46

बदन पर तेल लगाना 47

ग़ुस्ल 48

सोना , जागना और बैतुल ख़ला में जाना 52

सोने के आदाब 52

पाख़ाने जाना 62

बीमारिया और उनका इलाज 64

मुआशरती हुक़क (सामाजिक अधिकार) 70

सिल-ए-रहमी 71

हमसायों के हुक़क़ (पड़ोसियों के अधिकार) 72

दीनी भाईयों के हुकूक़ 73

छींक 88

मकान के सिफात 95

घर से बाहर जाना 97

घर में दाख़िल होना 97

तिजारत और ज़राअत (व्यासाय और कृषि) 98

मुसाफ़रत 102