हज़रत आयशा की तारीख़ी हैसियत
लेखकः फ़रोग़ काज़मी
तर्जुमाः- बाबर नदीम इलाहाबादी
अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क
इन्तेसाब
उम्मुल मोमिनीन मारिया क़िबतिया के नाम जिनका मासूम फ़रज़न्द इब्राहीम उम्मुल मोमिनीन आयशा के रश्क व हसद का शिकार हो गया।
-फ़रोग़ काज़मी
हुज्जतुल इस्लाम मौलाना सैय्यद ज़ाहिद अहमद साहब क़िबला रिज़वी
सेक्रेट्रीः- अमीरूल मोमिनीन ट्रस्ट लखनऊ
उम्मलुम मोमेनीन हज़रत आयशा की तारीख़ी शख़्सियत बड़ी ही अजीब नज़र आती है। मुसलमानों की मां का किरदार इस्लामी मामलात में बड़ा ही मशकूक लगता है क्यों कि उलमा ए अहले सुन्नत ने अपनी तारीख़ी और सीरत की किताबों में जो वाक़ियात रक़म किये हैं वह ख़ुद मौसूफ़ के तलव्वुन मिजाज़ होने का एलान कर रहे हैं।
हज़रत आयशा की अज़्दवाजी ज़िन्दगी के हालात भी मुख़तलिफ़ नज़र आते हैं । मिजाज़ का चिड़चिड़ापन हादिसाना रवय्या और अक़वालों अफ़आल का इख़तिलाफ़ बड़ी शद्दोमद से दिखाई देता है।
अक़वाल का इख़तिलाफ़ हज़रत उस्मान के क़त्ल के वाक़िए में यूं नज़र आता है कि जो मोहतरमा क़त्ल से पहले कह रहीं थीं कि इस नअस्ल को क़त्ल कर दो ये काफ़िर हो गया है क़त्ल के बाद अपना अन्दाज़ यह कहकर बदल देती हैं कि उस्मान मज़लूम क़त्ल किये गये।
मोहम्मद बिन अबीबक्र को जब माविया की साज़िश से मिस्र में क़त्ल कर दिया गया और उसकी लाश को ख़च्चर की खाल में लपेट कर नज़्रे आतिश कर दिया गया तो इन बीबी ने माविया के लिए बद दुआ शुरू कर दी मगर जब इमाम हसन (अ.स) को माविया के भेजे गए ज़हर से शहीद किया गया तो इन्ही ख़ातून ने बनी उम्मया की मदद से इमाम हसन (अ.स) के जनाज़े को रसूल (स.अ.व.व) के रौज़े में दफ़्न न होने दिया और मरवान ने जनाज़े पर तीर बरसाये।
मुसलमानों की तलव्वुन मिजाज़ माँ जब अपने शौहरे नामदार हज़रत पैग़म्बर (स.अ.व.व) से नाराज़ होती तो बरजस्ता कहतीं कि क्या आप यह गुमान करते हैं कि मैं अल्लाह का रसूल हूँ ? इस क़ौल के बाद सीरत की किताबों में रसूले मक़बूल से मोहतरमा की मोहब्बत का बयान भी कुछ अजब अन्दाज़ का मिलता है।
हज़रत फातेमा (स.अ) के सिलसिले में मोहब्बत भरे अल्फ़ाज़ भी तारीख़ में मिलते हैं मगर अमलन फातेमा (स.अ) को अज़ीयत देना भी मिलता है। हज़रत ख़दीजा (स.अ.) के ज़िक्र पर चराग़पा होना और हज़रत अली (अ.स) से अमलन बरसरे पैकार रहना भी किताबों में ख़ूब नज़र आता है।
हज़रत अली (अ.स) से आम मुसलमानों की बैअत के बाद इन ख़ातून का मक्काए मोअज़्ज़मा से तल्हा और ज़ुबैर के साथ लशकर जमा कर के निकलना और फिर यह कहना कि मैं मुसलमानों के दो फ़िरक़ों में सुलह करना के लिए निकली थी , यह अमल का तज़ाद नहीं तो और क्या है ? अगर सुलह कराना थी तो मक्के की मुक़द्दस सरज़मीन सब से बेहतर थी , वहीं मुसलमानों को जमा कर के सुलह करा देतीं या फिर मदीने जा कर क़बरे रसूल (स.अ.व.व) के नज़दीक सब को इकट्ठा कर के सुलह का हुक्म देतीं।
मिज़ाज के चिड़चिड़ेपन का यह आलम था कि जंगे जमल में जंग के ख़ात्मे के बाद जब हौदज के क़रीब जा कर अम्मारे यासिर ने अम्मा कहकर सलाम किया तो अम्मार से कहा कि मैं तुम्हारी मां नहीं हूं जब कि अम्मार का क़ुसूर यह था कि वह अली (अ.स) के लशकर में शरीक थे , और अम्मां , अम्मार से इस लिए ख़फ़ा थीं कि उनकी वजह से अम्मां के लशकर को लड़ने में मुश्किल पेश आ रही थी कि कि कहीं अम्मार क़त्ल ना हो जाएं क्यों कि अम्मार के लिए रसूल (स.अ.व.व) ने फ़रमाया था कि ऐ अम्मार तुम्हें बाग़ी गिरोह क़त्ल करेगा।
यह वाक़ियात और बहुत से वाक़ियात तारीख़ की मुख़तलिफ़ किताबों में भरे पड़े हैं मगर उर्दू ज़बान में न होने के बारबर थे। मुहक़िक़्क़े बसीर जनाब फ़रोग़ काज़मी ने उर्दू ज़बान में उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा की तारीख़ी हैसियत लिख कर ये कमी पूरी कर दी। मौसूफ़ ने यह किताब लफ़्फ़ाज़ी पर मबनी दास्तान के तौर पर नहीं लिखी बल्कि ठोस तारीख़ी हवालों और मज़बूत दलीलों के साथ बड़ी मेहनत से वाक़िआत को इकट्ठा किया है जिसकी वजह से किताब का मुतालिआ करने वाला कोई शख़्स भी यह शिकवा नहीं कर सकता कि किताब में किसी की दिल आज़ारी की गयी है।
फ़रोग़ साहब की शायरी में जानी पहचानी शख़्सियत तो बहुत पहले से थी मगर एक मुअल्लिफ़ की हैसियत से किताब तफ़सीरे कर्बला लिखने के बाद पहचाने गये और किताब अलमुर्तज़ा के जवाब में अलख़ुलफ़ा की दो जिल्दें तालीफ़ कीं जिससे उनकी यह सलाहियत और भी आशकार हुई। अलखुलफ़ा ने दुशमनाने अहलेबैत (अ.स) को यह यक़ीन दिलाया कि शिओं में अभी मज़बूत क़लम के ऐसे बा सलाहियत अफ़राद बाक़ी हैं।
फ़रोग़ साहब की चौथी किताब हज़रत आयशा की तारीख़ी हैसियत के नाम से मन्ज़रे आम पर आ रही है जिसके पढ़ने के बाद ये अन्दाज़ा होगा कि इस किताब की तालीफ़ में मौसूफ़ को कितनी मुश्किलात का सामना करना पड़ा क्यों कि यह किताब ऐसी ज़ात के सिलसिले में लिखी गयी है जिन्हें ज़ौजियते रसूल (स.अ.व.व) का शरफ़ भी हासिल है लिहाज़ा इसका पास रखना भी इन्हीं मुश्किलात में से एक मुश्किल है और फिर मुसलमानों की माँ हैं इसका ख़्याल भी हर वक़्त रखना पड़ा। बहरहाल इस किताब में अम्मां के हालात रक़म कर के फ़रोग़ साहब ने एक बहुत बड़ी ज़रूरत को पूरा कर दिया है।
यहां यह बात भी वाज़ेह करना ज़रूरी है कि शायद कुछ लोग इस किताब के सिलसिले में यह कहें कि ऐसी किताब शाया कर के इत्तिहादे बैनुल मुसलिमीन को नुकसान पहुंचाया। यह ख़्याल उस वक़्त सही नज़र आता जब फ़रोग़ साहब ने मोहतरमा के सिलसिले में अपने ख़्यालात रक़म किए होते। मौसूफ़ ने तो मुसलमानों की मोतबर किताबों के हवाले से वाक़ेयात रक़म किए हैं लिहाज़ा यह ख़्याल उन मोतबर किताबों के मुसन्नेफ़ीन को करना चाहिए था जिसमें ख़ुद इमाम बुख़ारी भी शामिल हैं। तारीख़ी हक़ाहक़ पेश करने से इत्तिहाद को नुक़सान नहीं पहुंचता बल्कि ग़लत फ़हमियां दूर होती है।
ये किताब बहुत पसन्द की जाएगी और इसका हर घर में होना बहुत ज़रूरी है ताकि हक़ाइक़ से वाक़फ़ियत हो सके।
किताब की तबाअत का काम बड़ा दुशवार गुज़ार मरहला होता है और क़दम क़दम पर ज़रे कसीर की ज़रूरत होती है और मुश्किलात का सामना इस मरहले पर मौलाना अली अब्बास साहब तबातबाई के हौसले की दाद देना भी ज़रूरी है जिन्होंने क़ौम के लिए बहुत नायाब किताबें शाए कर के कारेनुमायां अन्जाम दिया है। अब अरबाबे क़ौम का फ़र्ज़ है कि वह मुअल्लिफ़ीन और नाशिरीन की हौसला अफ़ज़ाई फ़रमाएं और इस अज़ीम कारे ख़ैर में हिस्सा ले कर सवाबे अज़ीम हासिल करें। अफ़रादे क़ौम किताबें ख़ुद अपने लिए और दोस्तों को तोहफ़ा देने के लिए भी।
आख़िर में मेरी दुआ है कि ख़ुदा वन्देआलम फ़रोग़ काज़मी साहब के ज़ोरे क़लम में और इज़ाफ़ा करे और उनकी पांचवीं किताब तफ़सीरे इस्लाम बहुत जल्द तहरीर की मन्ज़िलों से गुज़रकर मन्ज़रे आम पर आ जाए। जिस से एक अहम ज़रूरत भी पूरी हो जाए।
वस्सलामः
ख़ाके पाए अहलेबैत (अ.स)
ज़ाहिद अहमद रिज़वी
सेक्रेट्री इदाराए अमीरूल मोमिनीन (अ.स)
लखनऊ
जो लोग पढ़ते रहते हैं हालात की किताब
उन को ये चाहिये कि किताबें लिखा करें।
(डा 0 हुज़ूर नवाब)
बज़ाहिर यह एक सादा सा शेर है लेकिन इस में जो पैग़ाम है और पैग़ाम में जो वुस्अतें हैं वो लामहदूद हैं। हालात इनफ़िरादी हों इजतिमाई हो या तारीख़ी.................. बहरहाल हालात है।
इनफ़िरादी हालात अगर तक़दीर की गर्दिश से वाबास्ता हैं तो दोस्तों और अज़ीज़ों को मुतास्सिर करते हैं इजतिमाई हालात अगर नासाज़गार हैं तो वह मुआशरे पर असर अन्दाज़ होते हैं , अलबत्ता तारीख़ी हालात ऐसे होते हैं जो मालूमात में इज़ाफ़े का सबब बनते हैं। मेरी यह किताब जो हज़रत आयशा की तारीख़ी हैसियत के नाम से आपके सामने आ रही हैं , उन मोतबर , सच्चे और मुस्तनद तारीख़ी हालात का निचोड़ हैं जिन्हें सवादे आज़म के उल्मा ने अपनी किताबों में तहरीर किया है।
किताब की तालीफ़ के दौरान मेरा ज़िहन इस ख़्याल से ख़ाली नहीं रहा कि उम्मूल मोमिनीन कि शख़्सियत आलमे इस्लाम में ऐसी चिंगारी है जो ज़रा सी लग़ज़िश में भड़कता हुआ शोला बन सकती है क्योंकि उनकी ख़ताकारियों को भी इजतिहाद से ताबीर किया जाता है इस लिए मैंने अपने क़लम को क़ाबू में रखते हुए बड़ी एहतियात से काम लिया है और इस बात की पूरी कोशिश की है कि उनके सिलसिले में वही हालात व वाक़यात बरादिराने अहले सुन्नत की किताबों से अख़्ज़ किये जायं जो तारीख़ी एतेबार से मुसतहकम , मुसल्लम और ठोस हों।
ये बात भी वाज़ह कर दूं कि मेरी यह किताब सिर्फ़ तारीख़ी हक़ाइक़ का मुख़्तसर सा मजमुआ है इसकी तालीफ़ का मक़सद मिल्लते इस्लामियां या उसके किसी फ़िरक़े की दिल आज़ारी हर्गिज़ नहीं है।
मैं अपने कारेईन का शुक्र गुज़ार हूं कि उन्होंने मेरी तालीफ़ अलख़ुलफ़ा हिस्सा अव्वल तफ़सीरे कर्बला और अलख़ुलफ़ा हिस्सा दोम की कामयाबी पर मुझे ख़ुतूत लिख कर मेरी हौसला अफ़ज़ाई की।
मैं क़िबला हुज्जतुल इस्लाम मौलाना सैय्यद ज़ाहिद अहमद साहब का इन्तिहाई मम्नूनों मशकूर हूं कि मौसूफ़ ने मेरी दरख़्वास्त पर अपनी बेपायां मसरूफ़ियत के बावजूद अपनी क़ीमती राय और गेरांक़द्र मज़मून को इस किताब में बतौरे पेश लफ़्ज़ शामिल फ़र्मा कर इस को ज़ीनत बख्शी है और क़दम क़दम पर मेरे मोइनों मददगार रहे और मैं मुतशक्किर हूं आली जनाब आई 0 एच 0 रिज़वी साहब का जिन्होंने इस किताब की सेहत और अदमेसेहत पर ख़ुसूसी तवज्जो फ़रमाई।
ख़ुदावन्दे आलम मेरी इस हक़ीर कोशिश को शरफ़े मक़बूलियत अता फ़रमाए।
ख़ाके पाए अहलेबैत (अ.स)
फ़रोग़ काज़मी
7. रबीउल अव्वल 1416 हिजरी ( 1995 ई 0) लखनऊ।
हज़रत आयशा
अहादीस , रवायत और तारीख़ के मजाज़ी परदों में लिपटी हुई उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा की तहदार और पुरअसरार शख़्सियत आलमें इस्लाम में तअर्रूफ़ की मोहताज नहीं। हर शख़्स जानता है कि आप ख़लीफ़ा ए अव्वल ( हजऱत अबू बक्र) की तलव्वुन मिज़ाज बेटी और पैग़म्बर इस्लाम हज़रत मोहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम की ग़ुस्ताख़ और नाफ़रमान बीवी थीं। आपकी निस्वानी सरिश्त में रश्क , हसद , जलन , नफ़रत , अदावत , ख़ुसूमत , शरारत , ग़ीबत , ऐबजुई , चुग़लख़ोरी , हठधर्मी , ख़ुदपरस्ती , कीनापरवरी और फ़ित्ना परदाज़ी का उनसुर बदर्जा ए अतम कारफ़रमा था।
रसूल (स.अ.व.व) की ज़ौजियत और ख़ुल्के अज़ीम की सोहबत से सरफ़राज़ होने के बावजूद आपका दिल इरफ़ाने नबूवत से ख़ाली और ना आशना था आपकी निगाहों में नबी और नबूवत की क़द्रो मन्ज़िलत यह थी कि जब आप पैग़म्बर से किसी बात पर नाराज़ हो जाती और आपका पारा चढ़ जाता तो पैग़म्बरे अकरम (स.अ.व.व) को नबी कहना छोड़ देती , बल्कि इब्राहीम का बाप कहकर मुख़ातिब किया करतीं थीं।( 1)
जसारतों और ग़ुस्ताख़ियों का यह हाल था कि एक बार आपने झगड़े के दौरान पैग़म्बर (स.अ.व.व) से यह भी कह दिया किः-
आप ये गुमान करते हैं कि मैं अल्लाह का नबी हूं।( 2) (मआज़ अल्लाह)
1. बुख़ारीः- जिल्द 6 पेज न. 158
2. अहयाउल उलूम ग़ेज़ालीः- जिल्द 2 पेज न. 29
नबी को नबी न समझने वाली या नबी की नबूवत में शक करने वाली शख़्सियत क्या इस्लाम की नज़र में मुसलमान हैं ? इसका फ़ैसला मोहतरम कारेईन ख़ुद फ़रमा लें , क्यों कि बात साफ़ और वाज़ेह है।
बहरहाल हज़रत आयशा के बारे में तारीख़ हमें बताती है कि अज़वाज की सफ़ में क़दम क़दम पर पैग़म्बर (स.अ.व.व) के लिए कर्ब अज़ीयत और कशमकश की दीवारें खड़ी करना आपका मशग़ला और मामूल था जिसमें हज़रत हफ़सा बिनते उमर आपकी मुईनो मददगार और साहिमों शरीक थीं चुनान्चे एक बार इन दोनों फ़रमाबरदार बीवियों ने आपस में साज़बाज़ कर के आं हज़रत (स.अ.व.व) के ख़िलाफ़ ऐसा बेहूदा मनसूबा तैयार किया जिस से तंग व परेशान हो कर सरकारे दो आलम (स.अ.व.व) ने अल्लाह के हलाल अम्र को अपने ऊपर हराम कर लिया और यह कर्बनाक , सिलसिला एक मुअय्यना मुद्दत तक क़ायम रहा जैसा कि बुख़ारी में मरक़ूम हैः-
रसूलल्लाह (स.अ.व.व) ने एक माह तक अज़वाज से कोई रब्तो ताल्लुक़ नहीं रखा और अलाहिदा चटाई पर सोते रहे। ( 1)
यहां तक कि ख़ुदा को अपने हबीब (स.अ.व.व) से पूछना पड़ाः-
ऐ नबी तुमने अपने ऊपर उस चीज़ को क्यों हराम कर लिया है जिसे तुम्हारे परवरदिगार ने तुम पर जाएज़ रखा है क्या तुम अपनी बीवियों की मर्ज़ी चाहते हो ? (तहरीम - 1)
इस वाक़िये से सहाबा में यह ख़बर मशहूर हो गयी कि हुज़ूर ((स.अ.व.व)) ने अपनी अज़वाज को तलाक़ दे दी है ( 2) हालांकि यह ख़बर ग़लत और बेबुनियाद थी सिर्फ़ आयशा और हफ़सा के बारे में अल्लाह का यह इरशाद थाः-
ऐ रसूल उन दोनों में जिसे चाहें आप (अपनी ज़ौजियत से) अलाहिदा कर दें और जिसे चाहें अपनी पनाह में रखें। (अहज़ाब – 50)
1. बुख़ारीः- जिल्द 3 पेज न. 105
2. मुआलेमुत तनज़ील पेज न. 909 तफ़सीरे दर मन्सूर मिस्रः- जिल्द 5 पेज न. 194-95
3. शराअ इब्ने अबिल हदीदः- जिल्द 2 पेज न. 159
मगर उम्मुल मोमिनीन को मोमिनीन के परवर दिगार की यह बात सख़्त नागवार गुज़री चुनान्चे आप तड़प कर उठीं , पैग़म्बर (स.अ.व.व) की ख़िदमत में हाज़िर हुई और गुस्ताख़ आमेज़ लहजे में फ़रमायाः-
मैंने अल्लाह को आप ही की नफ़सानी ख़्वाहिशात के बारे में ताजील (जल्दी) करते देखा। ( 1)
आयशा की ग़ुस्ताख़ी और बेअदबी पर क़ुदरत का अन्दाज़े गुफ़तुगू बदला और आयत इन अल्फ़ाज़ में नाज़िल हुईः-
अगर तुम दोनों (आयशा , हफ़सा) मेरे रसूल (स.अ.व.व) की मुख़ालिफ़त में एक दूसरे की मदद करती भी रहो तो कुछ परवा नहीं ख़ुदा जिब्रील , मलाइक और सालेहुल मोमिनीन उसके मुईनो मददगार हैं। (तहरीम - 4)
और यह तम्बीह भी कर दीः-
तुम दोनों अपनी हरकतों से बाज़ आओ और तौबा करो क्यों कि तुम्हारे दिलों में कजी पैदा हो गयी है। (तहरीम)
फिर आख़िर में यह सख़्त वार्निंग भी दे दीः-
अगर मेरा हबीब (स.अ.व.व) तुम्हे तलाक़ भी दे देगा तो मैं उसे तुम से बेहतर बीवियां अता करूगां जो ईमानदार , मुतीअ , इबादतगुज़ार और तौबा करने वालियां हो। (तहरीम)
ख़लीफ़ा ए सानी उमर इब्ने ख़त्ताब का क़ौल है कि ये आयतें आयशा , हफ़सा के लिए नाज़िल हुई हैं।( 2) और मेरा क़ौल है कि सूरा ए तहरीम आयशा , हफ़सा पर एताब बन कर नाज़िल हुआ है नीज़ आख़िरूज़्ज़िक्र आयत से यह सराहत भी होती है कि अरब के मुस्लिम मोआशरे में उस वक़्त आयशा , हफ़सा से बदरजहा बेहतर , हसीनो जमील और ख़ूब सूरत औरतें मौजूद थीं जो ईमानदार , मुतीअ , फ़रमाबरदार , इबादतगुज़ार और तौबा करने वालियां भी थी।
जब कि अल्लाह की निगाह मे आयशा , हफ़सा इन सिफ़ात से मुत्तसिफ़ नहीं थी।
1.बुख़ारीः- जिल्द 6 पेज न. 128
2. बुख़ारीः- जिल्द 6 पेज न. 69-71
सूरा ए तहरीम अक़ीदत मन्दाने आयशा के इस ख़्याल की भी तरदीद करता है जो इस खुश फ़हमी में मुबतिला है कि वह हिसाब किताब के बग़ैर सीधी जन्नत में चली जाएगीं क्यों कि वो रसूल (स.अ.व.व) की बीवी थीं।
इसी सूरे की दसवीं आयत में परवरदिगार ने नूह (अ.स) और लूत (अ.स) की बीवियों की मिसाल से यह सराहत फ़रमा दी कि आमाले सालेहा के बग़ैर महज़ ज़ौजियत का शरफ़ औरत को कोई फ़ैज़ नहीं पहुंचा सकता ख़्वाह उसका शौहर नही या रसूल ही क्यों न हो। चुनान्चे इरशाद हुआः-
ये दोनों (नूह और लूत की बीवियां) हमारे (नेक) बन्दों के तसर्रूफ़ में थीं लेकिन इन्होंने अपने शौहरों से दग़ा की तो इन के शौहर (इताबे ख़ुदा के सामने) इनके कुछ काम न आए और इन दोनों को हुक्म हुआ कि जहन्नम में जाने वालों के साथ तुम भी दाख़िल हो जाओ। (तहरीम – 10)
इस आयत से यह मस्अला भी साफ़ हो जाता है कि नबी की बीवियां दग़ाबाज़ और फ़रेबकार भी हो सकती हैं। अलबत्ता वह औरतें जो मुतीअ , फ़रमाबरदार , मोमिना , इताअतगुज़ार और इबादतगुज़ार हैं या वह जो आमाल ए सालेहा की अमीन है उन के लिए ख़ुदा वन्दे आलम ने आसिया (फ़िरऔन की बीवी) की मिसाल के साथ उसका क़ौल भी नक़ल किया है। ( 1) और दूसरी मिसाल मरियम बिन्दे इमरान की पेश करते हुए इरशाद फ़रमायाः-
मरियम ने अपने नामूस को महफ़ूज़ रखा तो हम ने उस में अपनी रूह फूंक दी और उस ने अपने परवरदिगार की बातों और उस की किताबों की तसदीक़ की और वह फ़रमाबरदारों में थी। (तहरीम - 12)
1.तहरीमः- अ. 11
सूरा ए तहरीम में........................... अगर एक तरफ़ अल्लाह की जानिब से आयशा , हफ़सा पर एताब का तसलसुल है तो दूसरी तरफ़ मोमिना , सालिहा और फ़रमाबरदार औरतों की तसल्ली व तशफ़्फ़ी का सामान भी फ़राहम किया गया है। अगर एक तरफ़ क़समों के कफ़्फ़ारे तौबतुन नुसूह का तज़किरा है तो दूसरी तरफ़ कफ़्फ़ारे की तशबीह और जिहाद वग़ैरह का हुक्म भी है लेकिन इन तमाम बातों के बावजूद ऐसा लगता है कि इस सूरे का पूरा पसमन्ज़र पैग़म्बरे इस्लाम की ख़ानगी और अज़्दवाजी ज़िन्दगी से वाबस्ता और मरबूत है।
ज़ाहिर है कि सरवरे काएनात सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम की पहली शादी शहज़ादिए अरब हज़रत ख़दीजतुल कुबरा (स.अ.) से हुई और उन की हयात में आपने कोई दूसरा अक़्द नहीं फ़रमाया। पच्चीस साल के बाद......... जब आपकी उम्र पचास बरस की थी तो मौत के हाथों ने इस पुर अज़मतो बाविक़ार ख़ातून और वफ़ादारो फ़रमाबरदार बीवी को आप से जुद कर दिया। इस आलमनाक हादसे के बाद सिर्फ़ तेरह बरस और आप इस दुनिया में ज़िन्दा रहे इसी तेरह बरस के अर्से में आपने यके बाद दीगरे पन्द्रह अज़वाज को अपने अयवाने ज़िन्दगी में दाख़िल किया इन औरतों में कुछ कनीज़े कुछ मुतलक़ा और बक़िया सारी औरतें बेवा थीं।
इन मुसलसल व मुतवातिर शादियों का मक़सद वह हरगिज़ नहीं था जो आम तौर पर किसी औरत के लिए किसी मर्द के दिल में होता है।
बल्कि हक़ीक़त यह है कि यह तमाम शादियां मसलिहते इलाही और बसीरते नब्वी का नतीजा थी , क्यों कि आं हज़रत दीनी पेशवा और मज़हबी रहनुमा होने के अलावा एक उभरती हुई इस्लामी सलतनत के सरबराह व ताजदार भी थे इस लिए इस्लाम के तब्लीग़ी उमूर में आसानियों और सहूलियतों के पेशे नज़र आप अरब के मुख़तलिफ़ व बाअसर क़बीलों में अज़्दवाजी रिश्ते क़ायम कर के उनकी काफ़िराना व मुशरेक़ाना सरिश्त पर मुहरे हिदायत सब्त करना चाहते थे। दूसरे यह कि आप चूंकि इन्सानियत के अलमबरदार और हुक़ूक़े बशरी के मुहाफ़िज़ भी थे इस लिए मर्दों के हुक़ूक़ में इर्तिकाई जिद्दोजहद के साथ साथ अपने ईसारो अमल के ज़रिए औरतों के हुक़ूक़ और निसवानी वक़ार को इतना सरबलन्द , मोहकम और पायदार कर देना चाहते थे कि आपके बाद आने वाला ज़माना औरतों को ज़लील , पस्त और कमतर समझने या उसके हुक़ूक़ पामाल करने की कोशीश न करे।
अगर आपको इलाही मसलेहतों के साथ साथ मोहताज कनीज़ों , लावारिस बेवाओं , और ग़रीबों नादार औरतों का ख़्याल या उनके हुक़ूक़ का पासो लिहाज़ न होता तो शहज़ादी ख़दीजा (स.अ.) के बाद आप हर्गिज़ दूसरा अक़्द न फ़रमाते। अपनी पुरआलाम और मशग़ूल तरीन ज़िन्दगी के आख़िरी तेरह साला दौर में आपने मुसलसल व पै दर पै शादियां कर के औरत के लिए शरई व क़ानूनी बदबन्दी की। अज़्दवाजी रिश्ते के तक़द्दुस का ऐलान किया और आदलों मसावत का एक ऐसा निज़ाम दुनिया वालो के सामने पेश किया जिसके बाद क़यामत तक किसी क़ानून या किसी निज़ाम की ज़रूरत न महसूस हो। हुज़ूर (स.अ.व.व) के फ़र्ज़े मनसबी का तक़ाज़ा भी यही था।
पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व) ने अपनी अज़वाज के लिए अलग अलग हुजरे बनवा दिए थे और उनकी बारी के दिन भी मुक़र्रर फ़रमा दिए थे ताकि हर एक के पास एक एक रात बसर हो सके और किसी की हक़ तल्फ़ी न हो लेकिन इन अज़वाज से आपको वह सुकून , वह इतमिनान , वह सुख , वह चैन , वह आराम , वह राहत , वह शादमानी और वह कामरानी न मिल सकी जो अपनी महरहूमा बीवी हज़रत ख़दीजा से मिली थी यही वजह थी कि आप उठते बैठते और सोते जागते जनाबे ख़दीजा (स.अ.) का ज़िक्र इस अन्दाज़ से करते कि आपकी आंखे नम हो जातां।
ख़ुल्के अज़ीम की ज़बाने मुबारक पर अपनी मरहूमा बीवी का तज़किरा इस बात की मुहकम दलील है कि उन्होंने अपने अज़ीम शौहर के दिल पर मकारमे अख़लाक़ व हुस्नों किरदार , सच्ची , पुरख़ुलूस और ग़ैरेफ़ानी मोहब्बत ईसरो क़ुरबानी , अताअतों फ़रमाबरदारी और महबूबियत के जो नुकूश पच्चीस साल की ज़ौजियत व रिफ़ाक़त के दौरान मुरत्तब किए वो मिटाए न मिट सके और पन्द्रह बीवियों की मजमूई ख़िदमतें इन नुकूश के मुक़ाबले में एक नक़्श भी मुरत्तब न कर सकीं।
पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व) की ज़बान से ख़दीजा का ज़िक्र सुनकर दीगर अज़्वाज के दिलों पर क्या गुज़रती तारीख़ चुप है , मगर आयशा व हफ़सा के बारे में तारीख़ का यह ऐलान है कि हज़रत ख़दीजा के नाम से उन पर रश्को हसद की बिजलियां गिर पड़ती जैसा कि बुख़ारी किताबुन्निसा में ख़ुद आयशा के बयान से ज़ाहिर हैः-
मैं रसूलल्लाह (स.अ.व.व) की किसी बीवी से इतना नहीं जलती जितना ख़दीजा से , क्यों कि रसूलल्लाह उठते बैठते उनकी तारीफ़ किया करते थे और इसी बुख़ारी बाबे मनाक़िबे ख़दीजा में आयशा ही से ये रवायत भी हैः-
मैंने पैग़म्बर की अज़्वाज में किसी पर इतना रश्क नहीं किया जितना की ख़दीजा पर हालां कि मैंने ख़दीजा को देखा ही नहीं लेकिन पैग़म्बर हर वक़्त उनका तज़किरा करते और जब गोसफ़न्द ज़िबह करते तो गोश्त के हिस्से उनकी सहेलियों में तक़सीम करते( 1)
बुख़ारी ही में हज़रत आयशा से ही यह रवायत भी हैः-
ख़दीजा की भांजी हाला ने पैग़म्बर की ख़िदमत में बारयाबी की इजाज़त चाही उनकी आवाज़ और लबो लहजा ख़दीजा से बिल्कुल मिलता था सुन कर आप बेचैन हो गये। इस बेचैनी पर मुझे बेहद रश्क हुआ। मैंने कहा , आप कुरैश की बुढ़ियों में उस बुढ़िया को याद करते हैं जिसकी बाछें सुर्ख़ थीं और जो मौत से हमकिनार हुई। ख़ुदा ने आपको इस से बेहतर बीवियां अता की हैं।
काश बुख़ारी ज़िन्दा होते और मैं उनसे ये पूछता कि आपने बाबे मनाकिबे ख़दीजा में उम्मुल मोमिनीन का यह क़ौल नक़्ल किया है कि मैंने ख़दीजा को नहीं देखा। और रवायते बाला में आप ही आयशा का यह क़ौल भी नक़्ल फ़रमाते हैं कि वह सुर्ख़ बाछों व ली थी.............. आख़िर क्यों ?
इन दोनों अक़्वाल में कौन सा क़ौल सही है और कौन सा ग़लत अगर पहला सही है तो इस के मानी यह है कि दूसरा ग़लत ? और अगर दूसरा सही है तो पहला ग़लत। इस ग़ल्ती और झूठ की ज़िम्मेदारी किसकी गर्दन पर है ? आपकी या आयशा की।
1.बुख़ारीः- जिल्द 2 पेज न. 210
बाज़ मुअर्रेख़ीन ने हाला की जनाबे ख़दीजा की बहन बताया है।
मसनद अहमद बिन हम्बल में भी लफ़्ज़ों की उलटफेर से यह रवायत मरक़ूम हुई है और जहां इबारत तमाम हुई है वहां यह लफ़्ज़ें भी मज़कूर हैः-
ये सुन कर पैग़म्बर (स.अ.व.व) का चेहरा इस तरह मुतग़य्यर हो गया जिस तरह नुज़ूले वही के वक़्त हो जाता था।( 1)
ये रवायात भी किताबों में मरक़ूम है कि आयशा की गुफ़्तुगू सुन कर पैग़म्बर (स.अ.व.व) ने फ़रमाया , ख़ुदा ने मुझे हरगिज़ उन से (ख़दीजा से) बेहतर बीवी अता नहीं की , वो उस वक़्त मुझ पर ईमान लायीं जब तमाम लोग मेरे मुनकिर थे। उस वक़्त उन्होंने मेरी रिसालत की तसदीक़ की जब सब मुझे झुठला रहे थे। उस वक़्त उन्होंने मुझे मालोज़र से सहारा दिया जब सब ने मुझे महरूम कर रखा था , और ख़ुदा ने मुझे उन के बतन से औलाद अता की जब मैं किसी दूसरी बीवी की औलाद से महरूम था। ( 2)
हज़रत ख़दीजा से आयशा के रश्को हसद पर मब्नी ये तमाम रवायतें ऐसी किताबों से माख़ज़ हैं जो अक़ीदतमन्दाने आयशा के लिए हुज्जत हैं और इन रवायतों से साफ़ ज़ाहिर है कि रसूले अकरम (स.अ.व.व) की ज़बान पर ख़दीजा (स.अ.) का तज़किरा और उनकी सहेलियों के साथ हुस्ने सुलूक आयशा की हासिदाना सरिश्त पर पहुत शाक गुज़रता था। चुनांचे बाज़ रवायतों से यह भी पता चलता है कि हज़रत आयशा अक्सरो बेशतर आं हज़रत से ग़ुस्ताख़ियों और तानाज़नी की मुर्तकिब भी हुई और पैग़म्बर ने उन पर दिल खोल कर लानत भी की।
1. मसनद अहमदः- जिल्द 6, पेज न. 150 – 154 बरवायते मूसा बिन तल्हा।
2. मनद अहमदः- जिल्द 1, पेज न. 117, तिर्मिज़ीः- पेज न. 247, सुन्न इब्ने माजाः- जिल्द 1, पेज न. 315. बुख़ारीः- जिल्द 2, पेज न. 177 व जिल्द 4 पेज न. 36 – 195, इब्ने कसीरः- जिल्द 3, पेज न. 138, कन्ज़ुल आमालः- जिल्द 6 पेज न. 224
पैग़म्बर (स.अ.व.व) ख़दीजा (स.अ.) और आयशा के ज़ैल में मेरी ये गुफ़्तुगू ज़िम्नी नहीं बल्कि रब्तेकलाम के तहत थी। अब मोहतरम कारेईन वो वाक़ियात भी मुलाहिज़ा फ़रमाए जो नुज़ूले सूरऐ तहरीम का सबब बने।
पहला वाक़िआः- जिस का इजमाल यह है कि रसूले अकरम की एक बीवी ज़ैनब बिनते हजश थीं जो आपके लिए शहद मुहैय्या किया करती थीं , चुनांचे आप उन के घर तशरीफ़ ले जाते और थोड़ी देर बैठ कर शहद नोश फ़रमाते , यह मामूल था और चूंकि ज़ैनब तमाम अज़वाज में सब से ज़्यादा हसीनो जमील और सब से ख़ूब सूरत थीं , इस लिए हज़रत आयशा को यह धड़का रहता कि कहीं ऐसा न हो कि हुज़ूर की मुकम्मल तवज्जो ज़ैनब ही की तरफ़ मबज़ूल हो जाए। लिहाज़ा उन्होंने हफ़सा को एतिमाद में लिया और काफ़ी ग़ौरो फ़िक्र के बाद यह मन्सूबा तैयार किया कि आं हज़रत के दिल को इस शहद की तरफ़ से फेर दिया जाए ताकि रोज़ रोज़ आपका ज़ैनब के यहां जाना छूटे। स्कीम के तहत आयशा और हफसा के दर्मियान यह तय हुआ कि शहदनोशी के बाद जब रसूलल्लाह ज़ैनब के घर से तशरीफ़ लाएं तो उन से कहा जाए कि आपके मुंह से मुग़ाफ़ीर की बू आ रही है।
ग़रज़ की जब दूसरे दिन पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व) शहद नोश फ़रमा कर ज़ैनब के घर से हफ़सा के घर तशरीफ़ लाए तो मोहतरमा नें दूर ही से नाक सिकोड़ी और मुंह पर हाथ रखते हुए फ़रमाया कि या रसूलल्लाह (स.अ.व.व) आप के दहन से मुग़ाफ़िर की बू आ रही है। पैग़म्बर (स.अ.व.व) ने मुस्कुराते हुए जवाब दियाः-
मालूम होता है तुम शहद की ख़ुशबू और मुग़ाफ़िर की बदबू से नाआशना हो।
फ़िर आप आयशा के यहां गए उन्होंने इसी हरकत का मुज़ाहिरा किया। आपने इरशाद फ़रमाया कि मैंने तो सिर्फ़ शहद नोश किया है मुग़ाफ़िर से उसका क्या ताअल्लुक़ ? उस पर आयशा तड़प कर बोलीं शहद की मक़्खियों ने मुग़ाफ़िर के फूल चूसे होंगे।
मुख़तसर यह कि रसूले अकरम (स.अ.व.व) ने आयशा को बार बार यक़ीन दिलाने की कोशिश फ़रमाई कि मैंने सिर्फ़ शहद पिया है मुग़ाफ़िर से उसका कोई ताअल्लुक़ नहीं , मगर मोअज़्ज़मा ने अपने मन्सूबे के साथ आसमान सर पे उठा लिया इस लिए कि ख़ामोश क्यों कर रह सकती थीं जब तक कि मक़सद पूरा न होता।
आख़िरकार पैग़म्बर (स.अ.व.व) को यह वादा करना पड़ा कि आइन्दा मैं वह शहद नोश नहीं करूंगा मगर इस शर्त के साथ कि यह बात किसी पर ज़ाहिर न हो वरना ज़ैनब की ख़ातिर शिकनी होगी मगर आयशा का हाज़मा इस क़ुव्वत से महरूम था जो किसी बात को हज़म करने की सलाहियत रखती है। पेट में मरोड़ पैदा हुई और मौक़ा मिलते ही हफ़सा के सामने जा कर सब कुछ उगल दिया।
*मुग़ाफ़िर एक शीरीं और बदबूदार गोंद जिसे अकसर अरब इस्तेमाल करते थे।
दूसरा वाक़िआः- मारिया क़ब्तिया (मादरे इब्राहीम) का है। एक रात हफ़सा बिनते उमर अपनी बारी पर ग़ैर हाज़िर थीं इस लिए कि वो अपने मैंके गयी थीं घर अकेला था , पैग़म्बर (स.अ.व.व) ने वहीं आराम का इरादा किया और हफ़सा की जगह मारिया को अपनी ख़िदमत में तलब फ़रमा लिया। हफ़सा जब वापस आईं और उन्हें पैग़म्बर और मारिया की शबख़्वाबी का हाल मालूम हुआ तो उनके तन बदन में आग लग गयी। अंग अंग से रश्को हसद का ज्वालामुखी उबलने लगा ग़ुस्से से बेक़ाबू हो कर पैग़म्बर पर चढ़ दौड़ीं और गला फाड़ फाड़ कर कहने लगीं कि आपने मुरी इज़्ज़तो हुरमत का भी ख़्याल नहीं किया , मारिया को मुझ पर तर्जीह दी , कहां मैं और कहां वो कनीज़ ? ये ज़ुल्म.............. ये ग़जब........... ये अन्धेरे............. कि मेरा ही घर , मेरी ही बारी , मेरा ही बिस्तर और वह लौंडी। ( 1)
1.दुर्रे मन्सूरः- जिल्द 6 पेज न. 239
रफ़्ता रफ़्ता हफ़सा की इस हंगामा आराई ने वह शक्ल इख़्तियार की कि नबी को पूछना पड़ा कि तुम क्या चाहती हो ? कहा , मारिया से आपकी किनारा कशी और वह इस तरह कि जब तक आप उसे अपने ऊपर हराम न कर लेंगे मैं आपकी तरफ़ न देखूंगी। पैग़म्बर ने फ़रमाया कि मैं तुम्हारी ख़ातिर मारिया को इस शर्त के साथ अपने ऊपर हराम करता हूं कि यह राज़ मेरे और तुम्हारे दर्मियान सरबस्ता रहे और इसकी भनक तक न फूटे........ लेकिन हफ़सा अपनी हमराज़ आयशा से कहे बग़ैर कैसे चैन लेतीं , दिल में खलबली पैदा हुई और मौक़ा पा कर उन से जड़ दिया। उसके साथ ये मुज़दा भी सुनाया कि मारिया से पीछा छुटा। यही हफ़सा की वह हरकत थी जिस पर पैग़म्बर ने उन्हें तलाक़ दे दी ( 1)
और यही वह वाक़िया था जो नुज़ूले वही का सबब बना और परवर दिगार का इरशाद हुआ किः-
और जब पैग़म्बर ने अपनी एक बीवी (हफ़सा) से कोई राज़ की बात कही और उसने चुग़ली खायी तो ख़ुदा ने उस अम्र को रसूल पर ज़ाहिर कर दिया तो रसूल ने बाज़ बातों को बताया और बाज़ को टाल दिया। बस इस (अफ़शाए राज़) की ख़बर (आयशा) को दी तो वो हैरत से बोल उठीं कि आप को किसने मुत्तला किया। रसूल ने कहा , मुझे अलीमों ख़बीर ख़ुदा ने बताया। अगर तुम दोनों ख़ुदा से तौबा करो तो कुछ फ़ायदा नहीं क्यों कि तुम दोनों के दिल टेढ़े हो गये हैं और अगर तुम दोनों (आयशा-हफ़सा) रसूल की मुख़ालिफ़त में एक दूसरे की एआनत करती हो तो कुछ परवा भी नहीं क्यों कि ख़ुदा जिब्रील मलाइक और सालेहुलमोमिनीन (अली अलैहिस्सलाम) उन के मददगार रहे हैं। (तहरीम)
इस इबरत नाक वाक़िए का इख़तिताम इस शक्ल में हुआ कि हुज़ूरे अकरम ने हफ़सा को तलाक़ देने के बाद हुक्मे इलाही के मुताबिक़ मारिया को फिर अपने ऊपर हलाल कर लिया। इब्ने अब्बास का बयान है कि मैंने मौक़ा पाकर एक दिन हज़रत उमर से पूछा कि वो औरतें कौन हैं जिन्होंने रसूलल्लाह पर ग़ल्बा हासिल करना चाहा था और जिन के दिल टेढ़े हो गये थे ? तो उन्होंने फ़रमाया कि वो आयशा और हफ़सा हैं। ( 2)
1.तारीख़े ख़मीसः- जिल्द 2 पेज न. 135, तफ़सीरे कबीरः- जिल्द 8 पेज न. 231
2. बुख़ारीः- जिल्द 3 पेज न. 138, मुस्लिमः- जिल्द 1 पेज न. 330, मिश्कात बाबे तलाक़ः- 285, मसनद अहमदः- जिल्द 1 पेज न. 230
तारीख़ का बयान है कि हफ़सा की तलाक़ के बाद......... इब्ने ख़त्ताब उम्र भर रोते रहे और फ़रमाते रहे किः-
अगर आले ख़त्ताब में कोई ख़ैरो ख़ूबी होती तो रसूलल्लाह (स.अ.व.व) मेरी बेटी हफ़सा को तलाक़ न देते।( 1)
उमर इब्ने ख़त्ताब से मरवी इस रवायत से भी अज़्वाजे रसूल की हंगामा आराइयों ख़ुसूसन हज़रत आयशा के गुरूरो घमण्ड का पता चलता है , वो बयान करते हैं किः-
हम लोग जब मक्के में थे तो हमारी औरतें हमारे दबाव और क़ाबू में थीं , मगर जब मदीने में आये तो हमारी औरतें भी मदीने की औरतों की तरह हवा में उड़ने लगीं और चढ़ चढ़ के बोलने लगीं......... मेरी बीवी भी एक दिन मुझ पर चढ़ी और उस ने कहा कि तुम ऐसे ऐसे करते तो अच्छा था। मैंने उसे डांटा और कहा , तुझसे क्या मतलब ? जैसे मेरा जी चाहता है करता हूं। मेरी इस बात पर वो बिगड़ गयी और मुझ से कहने लगी , बस तुम्हारा सारा ज़ोर और दबाव मुझ पर ही चलता है अपनी बेटी हफ़सा की ख़बर क्यों नहीं लेते जो रसूलल्लाह से आये दिन लड़ाई झगड़ा और तकरार किया करती है। मैंने हफ़सा से पूछा क्या ये सच है ? उसने कहा , एक मैं क्या उनकी सब बीवियां उन से लड़ाई झगड़ा किया करती हैं। हफ़सा की इस बात पर मुझे सख़्त ग़ुस्सा आया चुनान्चे उसे फ़टकारते हुए मैंने कहा , ख़ुदा के ग़ज़ब और रसूल के ग़ज़ब से ख़ौफ़ खाया कर , आयशा बनने की कोशीश न कर जिसे अपने हुस्नों जमान पर बड़ा ग़ुरूरो घमण्ड है। ( 2)
ये वो तारीख़ी और क़ुरआनी शवाहिद है जिन से हज़रत आयशा की ज़ाहिरी और बातिनी सरिश्त का अन्दाज़ा कुछ मुश्किल नहीं रह जाता....... लेकिन इस बदनसीबी का क्या किया जाये कि नावाकिफ़ मुसलमानों की अकसरियत (बग़ैर समझे बूझे) आपकी ज़ात से वालिहाना अक़ीदत रखती है और आप के चाल चलन को अपने लिए नजात का रास्ता समझती है।
आप से तक़रीबन दो हज़ार एक सौ दस हदीसें सहाहे सित्ता और दीगर किताबों में मरवी हैं और सवादे अज़ाम के शरई व फ़िक़ही मसाइल व दीनी अहकाम का ज़्यादह तर हिस्सा आप ही की बयान करदह अहदीस की रौशनी में मुरत्तब हुआ है।
1.मुसनद अहमदः- जिल्द 3 पेज न. 487, मुआलेमुल तन्ज़ीलः- पेज न. 165, तफ़सीरे कबीरः- जिल्द 1 पेज न. 163, 171, मदारिजुन नुबुव्वतः- जिल्द 2 पेज न. 605.
2. बुख़ारी बबुर राजुलः- पेज न. 785
हज़रत आयशा के वालिद अबू बकर बिन क़हाफ़ा बिन उस्मान बिन आमिर बिन अमर बिन क़अब बिन सअद बिन तैम बिन मुर्रह थे.............. और वालिदा.......... उम्मे रूमान बिन्ते आमिर बिन उवैमर बिन अब्दुश्शम्स बिन उताब थीं। जो अबू बकर के अक़्द में आने से पहले अब्दुल्लाह बिन हारिस बिन सनजरह की ज़ौजियत में थीं और उन से एक लड़का तुफ़ैल पैदा हुआ था। अब्दुल्लाह की वफ़ात के बाद उम्मे रूमान ने अबू बकर से अक़्द किया। ( 1) इन के नाम में भी इख़तिलाफ़ है बअज़ का कहना है कि ज़ैनब था और बअज़ ने वअहद ( 2) बताया है। इनका ताअल्लुक़ बनु कनाना से था और मां की तरफ़ से कनानिया थीं( 3) शोहरा ए आफ़ाक़ मुवर्रिख़ आलमानी का कहना है कि आयशा की माँ उम्मे रूमान असकंदरिया की रहने वाली यूनानी नज़ाद थी। ( 4)
1. आयशा (अब्बास महमूद उक़ाद) – पेज न. 51
2. सीरते आयशाः- पेज न. 7
3. आयशा (अब्बास महमूद उक़ाद) – पेज न. 51
4. आयशा बाद अज़ पैग़म्बर आलमानीः- पेज न. 14
आप कब तक शिकमें मादर में रहीं और इस दुनिया में कब वारिद हुई इस के जवाब में तारीख़ें ख़ामोश हैं शायद इस लिए कि मुवर्रेख़ीन को आप का तआर्रूफ़ उस वक़्त से हुआ जब आप रसूलल्लाह (स.अ.व.व) की ज़ौजियत में दाख़िल हुई लेकिन कुछ ज़मीर फ़रोश सीरत निगारों ने हुकूमते वक़्त की ख़ुशनूदी के लिए अक़्लो ख़िरद , फ़हमो इदराक और होशो हवास को बाला ए ताक़ रख कर रसूल की दीगर अज़्वाज पर आपको फ़ज़ीलत देने , नीज़ कम्सिन कुवांरी और दोशीजह साबित करने की ग़रज़ से क़यास की बिना पर आपके बारे में सिनो साल की जो मफ़रूज़ा इमारत खड़ी की है , उसके बेरूनी फ़ाटक पर महज़ ख़्याली साले विलादत 4 बेअसत और 5 बेअसत तहरीर फ़रमाया है जिसे शुऊर मन्तिक़ और आक़िलाना इस्तेदलाल क़ुबूल करने से क़ासिर है।
ज़ाहिर है कि हज़रत आयशा की पैदाइश के वक़्त न तो तहरीरी रिकार्ड का कोई रवाज था और न ही विलादत या मौत के बारे में कोई सरकारी या ग़ैर सरकारी रजिस्टर मुरत्तब होता था जिस से आप की विलादत का साल मालूम होता लिहाज़ा आप ही की ज़बानी रावियों को जो मालूम हुआ उसी को वह बयान करते गये और मसलेहत का क़लम उन के बयानात को कागज़ पर सब्त करता गया......... ये ज़रूरी नहीं कि ख़ुद आयशा ने अपनी उम्र का तअय्युन सही किया हो क्यों कि औरत की फ़ितरी आदत है कि वह हमेशा अपनी उम्र को कम तसव्वुर करती है और आयशा इस निसवानी ख़ुसूसियत से बालातर हर्गिज़ नहीं हो सकती थीं।
इस सिलसिले में जब हम उम्वी दौर के मुवर्रेख़ीन की मुनतशिरो मुबहम बातों को अक़्लों इस्तेदलाल की कसौटी पर रखते हैं तो ये फ़िक्री नतीजा बरामद होता है कि हज़रत आयशा की विलादत बेअसत से एक साल क़ब्ल या एक साल बाद हुई यही तहक़ीक़ मुम्ताज़ मिस्री मुवर्रिख़ अब्बास महमूद उक़ाद ने अपनी तसनीफ़ आयशा में पेश की है। उनका कहना है कि ये अम्रमुतहक़्क़ि नहीं हो सका कि हज़रत आयशा किस सन् में पैदा हुई ताहम अग़लब ख़्याल ये है कि उनकी विलादत हिजरत से ग्यारह साल क़ब्ल हुई। ( 1)
कोर्ट फ़्रेशलर आलमानी ने अपनी मायए नाज़ किताब आयशा बाद अज़ पैग़म्बर में साबित बिन इर्ताह से जो बयान नक़ल किया है उससे भी पता चलता है कि हज़रत आयशा का सने विलादत एक बेअसत है। ( 2) इस तरह अब्बास महमूद उक़ाद की तहक़ीक़ दुरूस्त और क़रीने क़यास है।
1. आयशा उक़ादः पेज न. 52
2. आयशा बाद अज़ पैग़म्बर आलमानीः- 7 से 16 तक
रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम के साथ आयशा की शादी....... इस्लामी तारीख़ का एक मुअम्मा है जो आज तक हल न हो सका।
इस पुरअसरार शादी से मुताल्लिक़ बुख़ारी , मुस्लिम मिशकात , मसनद अहमद बिन हम्बल , तबरी , तबक़ात इब्ने सअद , इस्तेयाब , इज़ालतुल ख़फ़ा और मदारिजिन नुबुव्वत वग़ैरह में जो हैरत अंगेज़ और मज़हक़ा ख़ेज़ हिकायत मरक़ूम हुई है उसका निचोड़ ये है किः-
हिजरत से तीन साल क़ब्ल 10 बेअसत में हुज़ूरे सरवरे कायनात की पाकबाज़ो ग़मगुसार बीवी , मोहसिना ए इस्लाम हज़रत ख़दीजा ताहिरा दुनिया से रूख़सत हुई और उनकी वफ़ात के तीसरे दिन आप के मुशफ़िक़ मेहरबान और मुहाफ़िज़ चचा हज़रत अबु तालिब (अ.स) का इन्तिक़ाल भी हो गया तो आप अपनी बेयारी और तन्हाई पर हर वक़्त मग़मूमो महजून रहने लगे और आप ने इस हुज़्नों मलाल के साल को आमुल हुज़्न से ताबीर किया। ( 1)
(इस किताब को आप “अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क ” पर पढ़ रहे है।)
हज़रत अबू बकर से आप के हुज़्नों मलाल की ये कैफ़ियत देखी न गयी चुनान्चे वो अपनी पांच साला बच्ची आयशा को ले कर एक दिन आं हज़रत (स.अ.व.व) की ख़िदमत में हाज़िर हुए और अर्ज़ किया , या रसूलल्लाह (स.अ.व.व) ये बच्ची हाज़िर है आप इस से दिल बहलायें ताकि आपका ग़म ग़लत हो। इस बच्ची में ख़दीजा की सलाहियत पाई जाती है। ( 2) अबू बकर की इस हैरत अंगेज़ तजवीज़ पर पैग़म्बर ने सुकूत इख़तियार किया यहां तक कि बच्ची को उन्होंने गोद में उठाया और वापस चले गये। उस के बाद बक़ौले मुअर्रिख़ पैग़म्बर अबू बकर के घर में आने जाने लगे। ( 3)
1.तफ़सीरे कबीरः- जिल्द 3 पेज न. 289, मदारिजुन्नुबूवतः- जिल्द 2 पेज न. 74
2,3. इज़ालतुल ख़फ़ा मक़सद दोमः- पेज न. 110
मगर फिर भी आं हज़रत (स.अ.व.व) के कर्बो इज़तिराब में कोई तख़फ़ीक़ नहीं हुई और हुज़्नों मलाल अपनी जगह बरक़रार रहा तो तो उस्मान बिन मज़ऊन की ज़ौजा ख़ूला बिन्ते हकीम (जो सहाबिया में थीं) ने ये कह कर आपको अक़्द पर आमादह किया कि ख़दीजा के बाद तन्हाई व बेचारगी दूर करने के लिए यह ज़रूरी है कि आप निकाह कर लें। मेरी नज़र में बाकरा और बेवा दोनों तरह की औरतें हैं अगर हुज़ूर (स.अ.व.व) इजाज़त मरहमत फ़रमायें तो मैं सिलसिला जुम्बानी करूं। मुझे उम्मीद है कि अक़्द के बाद रन्जो अलम का बोझ कुछ हल्का होगा।
पैग़्मबर (स.अ.व.व) ने पूछा...... वो औरतें कौन हैं ? ख़ूला ने कहाः- बाकरा....... आयशा बिन्ते अबू बकर है...... और बेवा....... सौदा बिन्ते जुम्आ।
आपने चन्द लम्हों तवक़्कुफ़ फ़रमाया और कहाः-
अगर तुम्हारी ख़्वाहिश यही है तो दोनों जगह पैग़ाम दे दो।
ऐसा लगता है कि अबू बकर और ख़ूला के दर्मियान मामला पहले ही से तय था इस लिए वो सीधी अबू बकर के घर गयीं। अंधा क्या चाहे दो आँखें । अबू बकर फ़ौरन राज़ी हो गये और आं हज़रत (स.अ.व.व) नुबुव्वत के ग्यारवहें साल माहे शव्वाल में पांच सौ दिरहम ( 1) मेहर पर अबू बकर की छः साला बच्ची के शौहर बन गये। उसके बाद ख़ूला ने सौदा के घर वालों से राब्ता क़ायम किया वो भी तैयार हो गए और हज़रत (स.अ.व.व) का निकाह सौदा से भी हो गया। ( 2)
हज़रत आयशा का यह बयान क़ाबिले तवज्जो है कि उन्होंने फ़रमायाः-
मैं अपने अक़्द से बिल्कुल बेख़बर थी। अक़्द के बाद जब मेरी मां ने मेरे बाहर निकलने पर पाबन्दी आइद कर दी और मुझे समझाया तो मैं समझी कि मेरा निकाह हो गया है।( 3)
1. तबरीः- जिल्द 3 पेज न. 176, मसनद अहमद पेज न. 94 तबक़ात इब्ने सअदः- पेज न. 43
2. तबरीः- जिल्द 3 पेज न. 176
3. तबक़ात इब्ने सअद पेज न. 40
बुख़ारी का कहना है कि आयशा निकाह के वक़्त इस अम्र की मुतहम्मिल नहीं थीं कि उन से ताल्लुक़ाते ज़ौजियत क़ायम किए जा सकते इस लिए उन्हें दो साल तीन माह मक्के में और नौ माह मदीने में यानी तीन बरस तक शौहर से अलग रहना पड़ा। ( 1)
मुझे नहीं मालूम कि निकाह के बाद सिर्फ़ तीन बरस के अन्दर सिर्फ़ नौ साल की उम्र में निस्वानी फ़ितरत के ख़िलाफ़ हज़रत आयशा किन वुजूह की बिना पर जवान और बालिग़ हो गयीं , और वह इस तरद्दुद में मुब्तिला हो गये कि रसूलल्लाह (स.अ.व.व) उनकी बेटी की तरफ़ मुलतफ़ित क्यों नहीं होते ? आख़िरकार एक दिन मौक़ा महल देख कर आप रसूले अकरम (स.अ.व.व) से यह कह बैठे कि या रसूलल्लाह आप आयशा को अपने तसर्रूफ़ में क्यों नहीं लाते ? हज़रत ने फ़रमाया मेरे पास मेहर नहीं है ये सुन कर अबू बकर ने साढ़े बारह अवक़िया पैग़म्बर की ख़िदमत में पेश किया और कहा ये महर हाज़िर है। ( 2)
बहरहाल इस सिलसिले की दूसरी मज़हक़ा ख़ेज़ रवायत बुख़ारी और तबरी में यूं मरक़ूम है कि रसूलल्लाह (स.अ.व.व) माहे शव्वाल में एक दिन अपने चन्द असहाब के साथ अबू बकर के घर गये। आयशा उस वक़्त अपनी हमजोलियों के साथ झूला झूलने में मशग़ूल थीं। उनकी मां (उम्मे रूमान) ने मौक़ा ग़नीमत जान कर उन्हें आवाज़ दी वह हापती हुई आयीं। मां ने उन के हाथ मुंह धुलाए उन्हें सजाया , संवारा और उसके बाद आं हज़रत (स.अ.व.व) की ख़िदमत में लेकर हाज़िर हुई और ये कह कर उनकी गोद में बिठा दिया कि ये आपकी ज़ौजा है। असहाब शरमा कर वहां से उठ गये। बुख़ारी का कहना है कि आयशा को ख़बर नहीं थी कि क्या होने वाला है( 3) और तबरी का कहना है कि जफ़ाफ के बाद उसी वक़्त से ज़ौजियत की इब्तिदा हुई। ( 4)
1. बुख़ारीः- जिल्द 2 पेज न. 229 (मिस्र)
2. इस्तेयाबः- पेज न. 11, तबक़ात इब्ने सअद बाबुन्निसाः- पेज न. 43, बुख़ारी बाबे तज्वीजे आयशा
3. बुख़ारीः- जिल्द 2 पेज न. 228
4. तबरीः- जिल्द 3 पेज न. 176
इसी रवायत को शाह अब्दुल हक़ मुहद्दिसे देहेल्वी ने हज़रत आयशा की ज़बानी यू नक़्ल फ़रमाया हैः-
आयशा फ़रमाती हैं कि जब हम लोग मदीने में वारिद हुए तो मेरे वालिद अबू बकर ने मोहल्लाह ए सख़ में हबीब इब्ने रियान या ख़ारजा बिन ज़ैद के यहां रिहाइश इख़तियार की। एक रोज़ हज़रत रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व) तशरीफ़ लाए , हज़रत के साथ अन्सार के मर्दों और औरतों का मजमा था उस वक़्त मेरी अम्मा जान ने मुझे पकड़ कर मेरे बालों में कंघी की मां निकाली , मुह धुलाया और मुझे ख़ींचती हुई उस जगह ले गयीं जहां रसूलल्लाह (स.अ.व.व) फ़रोकश थे। चूंकि मेरा नफ़्स मुझ पर तंगी कर रहा था इस लिए मेरी मां ने थोड़ी देर तवक्कुफ़ किया और जब मेरी हालत पुर्सुकून हुई तो उन्होंने मुझे आं हज़रत की गोद में बिठा दिया और कहा ये आप की बीवी है। इस के बाद सब लोग कमरे से बाहर चले गये और हज़रत ने मेरे साथ ( 1)........... और कोई ऊंट या बकरा ज़िब्ह नहीं किया गया शादी का खाना जिसे वलीमा कहते हैं एक प्याला दूध था जो मअद इब्ने उब्बादह के घर से आया था। उस रोज़ मैं नौ बरस की थी। ( 2)
यही वह ताज्जुब ख़ेज़ हिक़ायत और यही वो हैरत अंगेज़ दास्तान है जिस के पेचोख़म और दामे फ़रेब में तेरह सौ बरस से सारी दुनिया उलझी हुई है और यही वो इस्लामी तारीख़ की मुअम्मा है जिसे हल करने की कोशिश में मुसबत और मनफ़ी दलीलें अकसरों बेशतर एक दूसरे से टकराती रहती हैं मगर आयशा की तारीख़ी हैसियत उम्वी हुकमरां , हक़ फ़रोश उलमा और ज़मीर फ़रोश मुवर्रेख़ीन की बदौलत आज भी ज़िन्दा है इस का पोस्टमार्टम होना चाहिए क्यों कि इस क़िस्म की मज़हूल अहादीस व मोहमल रवायात से जो ज़्यादातर आयशा से ही मरवी है रसूल की रिसालत , इस्मत , फ़ज़ीलत और अज़मत मुतस्सिर होती है। इस्लाम दुशमन अनासिर को लबकुशाई और दरीहद देहनी का मौक़ा फ़राहम होता है।
1. इजालतुल ख़ुलफ़ा मक़सद दोमः- पेज न. 11, इस्तेयाबः- जिल्द 2 पेज न. 765, मुसतदरक , हाकिम पेज न. 5 जिल्द 4
2. मदारिजुन्नबुव्वतः- जिल्द 2 पेज न. 89
इस जुर्अतमन्दाना इक़दाम के लिए मुझ जैसे शायर और अदीब का तन्हा क़लम काफ़ी नहीं हो सकता बल्कि उन उलमा की भी ज़िम्मेदारी है कि जो हिन्दुस्तान और बैरूनी मुल्को में रवादारी के प्लेटफ़ार्म से अपनी मुनाफ़िकाना तक़रीरों और फ़रेबकारियों के ज़रिए हुसूले दौलत में मसरूफ़ हैं।
बहरहाल अक़्द की इस पूरी कहानी में आयशा और रसूले अकरम (स.अ.व.व) के दरमियान ख़ूला बिन्ते हकीम की वेसातत और उनकी ख़्वाहिश पर अक़्द के लिए आं हज़रत की आमादगी बईद अज़ क़यास है क्यों कि बाज़ अक़ीदतमंद मुअर्रिख़ीन के क़ौल के मुताबिक़ जब हिजरत से तीन बरस क़ब्ल सिर्फ़ छः साल की उम्र में मोअज़्ज़मा का निकाह हुआ और एक बेअसत में ज़फ़ाफ़ हुआ तो तीन साल तक इस निकाह से रसूल (स.अ.व.व) को क्या फ़ायदा पहुंचा ? हज़रत का कोई फ़ेअल अक़ल के ख़िलाफ़ और मसलिहत से ख़ाली नहीं होता और छः साल की बच्ची से शादी में कोई मसलिहत नज़र नहीं आती। अगर निकाह के बाद आप रूख़सती के क़ाबिल होतीं और रसूलल्लाह (स.अ.व.व) अपने घर ले आते तो एतराज़ या तन्क़ीद की गुंजाइश हर्गिज़ न होती क्यों कि उमूरे ख़ानदानी और मासूमा ए कौनेन (स.अ.) की दिल बसतगी वग़ैरह मसालह थे मगर मौसूफ़ा अक़्द के बाद भी आग़ोशे मादर में रहीं और आप पर बचपना इस क़दर ग़ालिब था कि रूख़सती के बाद भी शौहर के घर गुड़ियों और गुड्ड़ों के खेल से लुत्फ़ अन्दोज़ होती रहीं। इन वजूह से यह तसलीम करना पड़ता है कि सियासी उमूर को पेशेनज़र रख कर ख़ुद अबू बकर ने ये शादी की होगी मगर रसूलल्लाह (स.अ.व.व) से आपका यह फ़रमाना कि ये कुछ ग़म ग़लत करेगी क्यों कि इस में ख़दीजा की सलाहिय्यत पाई जाती है , इस का क्या मतलब होता है ? क्या छः बरस की बच्ची पचास या बावन बरस के शौहर का ग़म बीवी की हैसियत से ग़लत कर सकती है। जब कि आयशा इतनी नादानो ना समझ थीं कि उन का ख़ुद कहना है कि निकाह की मुझे ख़बर तक नहीं हुई जब मेरी माँ ने बाहर निकलने पर पाबन्दी लगा दी तो मुझे पता चला कि निकाह हो चुका है और बाद में मेरी माँ ने मुझे समझा भी दिया। ( 1)
1. तबक़ात इब्ने सअद जिल्द 2 पेज न 140
ग़रज़ कि तारीख़ और सीरत की किताबों में इसका जवाब किसी भी नौइय्यत से अस्बात में नहीं मिलता और उसूली हैसियत से भी इस उम्र में लड़कियों की शादी किसी मुल्क किसी मज़हब और किसी समाज में पसन्द नहीं की जाती।
अरब के हालात , तारीख़ और अदब की किताबों में तफ़सील से है , लेकिन ये किताबें भी इस क़िस्म की मिसाल पेश करने से क़ासिर हैं।
अल्लामा इब्ने हज़र की किताब असहाबा सहाबा के हालात में एक मुफ़स्सल और जामेअ किताब है उसकी आख़िरी जिल्द , जिल्दे हफ़्तुम सिर्फ़ औरतों के हालात पर मब्नी है। उस में मुख़तलिफ़ मक़ामात मुख़तलिफ़ क़बाइल , मुख़तलिफ़ ख़ानदान की तक़रीबन डेढ़ हज़ार औरतों के हालात मरक़ूम हैं (जो सहाबिया भी थीं) मगर किसी के मुताल्लिक़ ये नहीं है कि उनका निकाह छः बरस की उम्र में हुआ हो जब कि इस किताब में मुतअद्दिद औरतों की उम्र और तारीख़े विलादत व वफ़ात का तज़किरा है। ख़ुद अबू बकर की दूसरी साहबज़ादी अस्मा का निकाह इस उम्र या इस से साल दो साल आगे पीछे नहीं हुआ। अबू बकर के तीन बेटे भी थे मगर किसी बेटे की शादी ऐसी लड़की से नहीं हुई जिस की उम्र छः साल रही हो। हज़रत उमर के भी कई बेटियां थीं उन्होंने भी अपनी किसी बेटी की शादी छः बरस की उम्र में नहीं की।
हज़रत उस्मान की सत्तरह औलादें थीं मगर कोई मिसाल ऐसी नहीं मिलती। ख़ानदाने बनी उमय्या और बनी अब्बास में किसी भी लड़की के बारे में ये पता नहीं चलता कि उसकी शादी छः साल की उम्र में हुई हो। इस से मालूम होता है कि अरबों में कम उम्री और कमसिनी की शादियों का कोई दस्तूर या रवाज नहीं था। लिहाज़ा ये मानना पड़ेगा कि हज़रत आयशा इस वस्फ़ में मुनफ़रिद हैं , और अबू बकर ने दस्तूर के ख़िलाफ़ वो काम कर दिखाया जिस की नज़ीर क़यामत तक मुम्किन नहीं।
हज़रत आयशा की उम्र इज़्दिवाजी ज़िन्दगी के लिहाज़ से तीन हिस्सों पर तक़सीम हो सकती है।
1.शादी से क़ब्ल का ज़माना ,
2.शादी के बाद का दौर ,
3.बेवगी का ज़माना।
लुत्फ़ की बात यह है कि हर दौर हर ज़माने में आप का कोई न कोई हैरत अंगेज़ वाकेआ ऐसा मिलता है जो अक़्ल को हैरानों परेशान करता है।
शादी से क़ब्ल का वाकेआ यह है कि जब आप सिर्फ़ छः बरस की थीं तब आप के वालिद आप को रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व) की ख़िदमत में ले कर हाज़िर हुए और कहा , आप इस (बच्ची) से दिल बहलायें........ यक़ीनन एक अनोखी निराली और अजूबा बात थी।
शादी के बाद का वाक़ेआ अफ़क़ जिसमें आप की ज़ात इत्तिहाम का निशाना बनी , जिस से ज़्यादा शर्मनाक बदनामी औरत के लिए मुम्किन नहीं यहां तक ख़ुद पैग़म्बर (स.अ.व.व) ने इस तोहमत को ग़लत नहीं समझा जब तक वही का नुज़ूल नहीं हुआ।
बेवगी के अहद के वाक़ेआ अपनी नज़ीर नहीं रखता , और वो ये है कि जब आपकी उम्र पैंसठ साल की थी तो उन्तीस साला यज़ीद इब्ने माविया ने आप से अक़्द की ख़्वाहिश की , जिस के जवाब में आपने मुंह पीट लिया। शाह अब्दुल हक़ मुहद्दिस ने भी इस वाक़िए को नक़्ल किया है। ( 1)
1.मदारिजुन्नुबुव्वतः- जिल्द 1, पेज न. 266
ये वो वाक़ेआत है जो बजाए ख़ुद हज़रत आयशा की शख़्सियत पर तारीख़ी दस्तावेज़ है.......... इस लिए मैं अपनी तरफ़ उन के बारे में किसी तन्क़ीद का हक़ नहीं रखता मगर इस गुफ़्तुगू के ज़ैल में ये ज़रूर चाहूंगा कि तारीख़ ही की रौशनी में ये सराहत भी हो जाये कि रसूलल्लाह (स.अ.व.व) से अक़्द के वक़्त मुअज़्ज़मा क़ुआरी थीं या नहीं ?
इस सिलसिले में ख़ुद आयशा की ज़बानी जो रवायतें मुवर्रेख़ीन तक पहुंची हैं , उन से यही पता चलता है कि शादी के वक़्त आप छः साल की नासमझ और नाबालिग़ बच्ची थीं मगर तीन ही साल के अन्दर न जाने कि शोअबदह बाज़ी के तहत आप पर भरपूर जवानी आ गयी , यहां तक कि नौ साल की उम्र में जफ़ाफ़ की तमामतर सऊबतों को बआसानी झेलने के क़ाबिल हो गयीं लेकिन इस रिवायती हिक़ायत को मिस्री के नामवर और मुम्ताज़ मुवर्रिख़ अब्बास महमूद उक़ाद की तहक़ीक़ ने क़ुबूल नहीं किया चुनान्चे वो अपनी किताब आयशा में तहीरर फ़रमाते हैः-
अग़लब ख़्याल ये है कि उनकी विलादत ज़िरत से ग्यारह साल क़ब्ल हुई इस एतिबार से रसूलल्लाह (स.अ.व.व) के अक़्दे ज़ौजियत में आते वक़्त उम्र लगभग चौदह साल की बनती है।( 1)
हर होशमन्द इन्सान उसी बात को मानेगा जिसे अक़्ल भी क़ुबूल करे। फ़हमो इद्राक की दुनिया हैरान थी कि जिस सन् में रसूले अकरम (स.अ.व.व) के दो अज़ीम ग़मगुसारों , मददगारों और चाहने वालों ने रेहलत की और जिस साल को आपने आमुल हुज़्न क़रार दिया उसी साल कोई दूसरा अक़्द भी किया हो ?
शुक्र का मक़ाम है कि किसी शिआ नहीं बल्कि एक सुन्नी मुहक़्क़्कि की तहक़ीक़ से यह हक़ीक़त वाज़ेह हो रही है कि सरकारे दो आलम (स.अ.व.व) ने 10 नब्वी यानी अय्यामे आमुल हुज़्न में कोई अक़्द नहीं फ़रमाया और न ही हज़रत आयशा छः साल की उम्र में रसूल (स.अ.व.व) की ज़ौजियत से मुशर्रफ़ हुईं।
अब्बास महमूद उक़ाद आयशा के अफ़सान्वी अक़्द का परदा फ़ाश करते हुए अपनी किताब के सफ़ह 91 पर मज़ीद तहरीर फ़रमाते हैः-
अभी तक किसी शख़्स को पूरा यक़ीन नहीं था कि आयशा ज़रूर रसूलल्लाह (स.अ.व.व) के अक़्द में आ जायेंगी , वजह ये थी कि वो पहले ही "जबीर बिन मुतअम बिन अदी से जो हुनूज़ हालते कुफ़्र पर क़ायम था मनसूब हो चुकी थीं।" ( 2)
फिर फ़रमाते हैः-
हमारे नज़दीक क़रीने क़ियास अम्र ये है कि रूख़सती के वक़्त आयशा की उम्र बारह से किसी तरह कम और पन्द्रह साल से ज़्यादा नहीं थीं।( 3)
1.आयशा (उक़ाद) – पेज न. 52
2. आयशा (उक़ाद 0 तरजुमाः- मुहम्मद अहमद पानी पती , पेज न. 91
3. आयशा (उक़ाद) तरजुमाः- मुहम्मद अहमद पानी पती , पेज न. 92
क़रीन क़यास नहीं बल्कि ये यक़ीनी अम्र है कि रसूलल्लाह (स.अ.व.व) से अक़्द के वक़्त हज़रत आयशा मुकम्मल तौर पर बालिग़ और भरपूर जवान थीं।
हम ज़िक्र कर चुके हैं कि पैग़म्बर (स.अ.व.व) ने 10 नब्वी में कोई अक़्द नहीं फ़रमाया क्यों कि ये साल हुज़ूर (स.अ.व.व) के लिए इन्तिहाई रंजो मलाल , कर्बो इज़तिराब और ग़मों अलम का साल था।
हक़ीक़त यह है कि वफ़ाते हज़रते ख़दीजा (स.अ.) के तीन बरस बाद 13 नब्वी में हिजरत से कुछ पहले सरकारे दो आलम (स.अ.व.व) ने आयशा से अक़्द किया जैसा कि अल्लामा शिबली नोमानी के शागिर्दे रशीद मौलवी सुलैमान नदवी ने बुख़ारी और मसनद के हवालों से अपनी किताब सीरते आयशा में तहरीर फ़रमाया है किः-
बुख़ारी और मसनद में ख़ुद उन (आयशा) से दो रवायते हैं , एक में है कि हज़रत ख़दीजा की वफ़ात के तीन बरस बाद निकाह हुआ।
इस अक़्द के बाद 10 हिजरी में रूख़सती अमल में आयी। इस हिसाब से बवक़्ते रूख़सती मोहतर्मा की उम्र तक़रीबन बीस साल की बनती है।
अब्बास महमूद उक़ाद का ये कहना बजा है कि रसूलल्लाह (स.अ.व.व) के अक़्द में आने से पहले आयशा ज़बीर इब्ने मुतअम से मनसूब हो चुकी थी। इस पूरे वाक़िए का निचोड़ हम क़दीम तरीन मुवर्रिख़ इब्ने सअदे वाक़िदी (अलमतूफ़ी 230 हिजरी) की ज़बाने क़लम से सुनाते हैं। जिस के बारे में अल्लामा शिबली नोमानी का कहना है कि मोहम्मद बिन सअद , कातिबे वाक़िदी निहायत सक़ह और मोतमिद मुवर्रिख़ हैः-
आयशा के लिए हज़रत रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व) ने हज़रत अबू बकर को पैग़ाम दिया तो उन्होंने कहा या रसूलल्लाह (स.अ.व.व) उस को तो मैं जबीर इब्ने मुतअम के हवाले कर चुका हूं मुझे ज़रा मोहलत दीजिए ताकि मैं उन लोगों से आयशा को दोबारह हासिल करूं। (चुनान्चे) अबू बकर ख़ामोशी से आयशा को वहां से ले आये (फिर) ज़बीर ने तलाक़ दी और वो रसूलल्लाह (स.अ.व.व) के साथ ब्याही गयीं( 1)
आयशा के लिए रसूल ने ख़ुद पैग़ाम दिया , किसी से दिलवाया या आयशा के वालिदैन ने ख़ुद उन्हें रसूलल्लाह (स.अ.व.व) की गोद में डाल दिया , ये अलग मसअला है बहरहाल....... वाक़िदी की इस रवायत से ये मुकम्मल तौर पर वाज़ेह है कि हज़रत आयशा न ये कि सिर्फ़ ज़बीर इब्ने मुतअम से मनसूब थीं बल्कि मोहतर्मा अक़्द और रूख़सती की मन्ज़िलों से गुज़रकर ज़फ़ाफ़ का सख़्त तरीन मरहला भी तय कर चुकी थीं।
हज़रत आयशा जबीर बिन मुतअम को कब ब्याही गयीं , और कितनी मुद्दत तक आप उसके पास रहीं ? इसके जवाब में तारीख़े ख़ामोश हैं , और तलाश के बावजूद मुझे कोई ऐसी रवायत नहीं मिली जिस से कुछ मालूम होता। लेकिन वाक़िदी के इस बयान की रौशनी में बिल ऐलान में यह कह सकता हूं कि हज़रत आयशा रसूल (स.अ.व.व) के अक़्द में आते वक़्त हर्गिज़ कुआंरी नहीं थी बल्कि एक मुतलक़ा की हैसियत से वो उम्महातुल मोमिनीन की सफ़ में शामिल हुई थी।
इस मौक़े पर यह वज़ाहत भी ज़रूरी है कि पैग़म्बर (स.अ.व.व) के अक़्द में आने से पहले भी आप औलाद से महरूम रहीं और जबीर बिन मुतअम की काफ़िराना कोशिश आप के बांझपन को कोई सौग़ात न दे सकी , और पैग़म्बर (स.अ.व.व) के अक़्द में आने के बाद भी आप की मुरादों , तम्न्नाओं और आरज़ूओं का काशकोल नेअमते औलाद से ख़ाली रहा। रसूले अकरम (स.अ.व.व) से आपकी औलाद क्यों नहीं हुई , इसका क्या सबब था ? अब्बास महमूद उक़ाद की ज़बानी सुनियेः-
इसका सबब जहां तक हमारी समझ में आ सका है वो यह है कि रसूलल्लाह (स.अ.व.व) ने औलाद की ख़ातिर अपनी अज़्वाज से निकाह नहीं किया। हुज़ूर के निकाह बिल उमूम दो अग़राज के तहत होते थेः
1. बाज़ औरतें अपने ख़ावन्द की वफ़ात के बाद बिल्कुल बे सहारा हो जाती थीं , हुज़ूर उनकी बेबसी और बेकसी का मदावा करने के लिए उन से निकाह कर लेते थे।
2. बाज़ अज़्वाज से निकाह करने में ये ग़रज़ पिन्हा थी कि हुज़ूर उन के क़बीलों को इस्लाम की तरफ़ माएल करने के लिए उनसे ताल्लुक़ क़ायम करना चाहते थे। ( 2)
1. तबक़ात इब्ने सअदे बाक़िदिः- जिल्द 8 पेज न. 40
2. आयशा (उक़ाद) तरजुमा अहमद पानीपतीः- पेज न. 118
उम्वी दौर के हक़ फ़रोश उलमा , मुवर्रेख़ीन और मुहद्दिसीन की एक बड़ी जमाअत ने हुकूमते वक़्त की ख़ुशनूदी और अपने ज़ाती मफ़ाद की ख़ातिर हबीबे किर्दिगार की दीगर अज़्वाज पर आयशा को अफ़ज़लियत और फ़ौक़ियत देने के लिए ख़ुद उन्हीं की ज़बानी उन के हुस्नों जमाल , ख़ूबसूरती रअनायी और ज़ेबाई के जो शर्मनाक तज़किरे अपनी किताबों में किए हैं , उससे ग़ैर मुस्लिमों को मज़ाक , इस्तेहज़ा और इस्तिहानत के साथ साथ पैग़म्बर (स.अ.व.व) की पाको पाकीज़ह शख़्सियत और मासूम सीरत पर इत्तिहाम एहानत और अंगुश्तनुमाई का भर पूर मौक़ा फ़राहम किया।
हज़रत आयशा के हुस्नों जमाल की हिकायों के तहरीरों और किताबों के ज़रिये अवाम में मुशतहिर करने का मक़सद इसके अलावह और क्या हो सकता है कि दुनिया वालों को ये बावर करने पर मजबूर किया जाये रसूल (स.अ.व.व) की तमाम अज़्वाज में हज़रत आयशा ही सब से ज़्यादा हसीनों जमील और ख़ूबसूरत थीं , हुज़ूर (स.अ.व.व) उन्हें सब से ज़्यादा चाहते , दिलोजान से मुहब्बत फ़रमाते , और अपनी तमामतर तवज्जेह हमावक़्त उन्हीं की तरफ़ मबज़ूल रखते।
ये ग़लत और अफ़सोसनांक बात मुशतहिर क्यों हुई इसकी असल वजह यह है कि बअदे वफ़ाते रसूल (स.अ.व.व) अहदे शेख़ैन में हज़रत आयशा को हुकूमत की बेटी होने का शरफ़ हासिल था और इक़तिदार परस्तों को इलतिफ़ात पूरी तरह आपकी ज़ाते ख़ास से जिससे वाबस्ता था। इन्हें वो हुक़ूक़ हासिल थे जिससे रसूल (स.अ.व.व) की दूसरी अज़्वाज महरूम थीं वो अज़मत वो मन्ज़िलत मयस्सर थी जो किसी ज़ौजा को नसीब न थी। हालांकि पैग़म्बर (स.अ.व.व) ने इन्तिक़ाल के वक़्त नौ बीवियां छोड़ी थी लेकिन अबू बकरो उमर ने किसी को इतनी अहमियत नहीं दी। जब कोई फ़तवा दर्याफ़्त करना होता या कोई शरई मस्अला मालूम करना होता तो यह दोनों हज़रत आयशा की दो तरफ़ रजूअ करते थे , जैसे कि इब्ने सअद का बयान हैः-
हज़रत अबू बकरो उमर और उस्मान के अहद में तन्हा हज़रत आयशा ही फ़तवा दिया करती थीं और उनकी यही कैफ़ियत मरते दम तक रही।( 1)
ये वह सियासी इक़दाम था जिसने रफ़्ता रफ़्ता हज़रत आयशा की मरज़ेइयत को उस दौर के मुसलमानों में मुस्तहकम कर दिया। इस के अलावा वज़ाइफ़ो अताया में भी उन्हें दीगर अज़्वाज पर मुक़द्दम रखा गया। चुनान्चे हज़रत उमर ने अज़्वाजे रसूल में हर एक का दस हज़ार और आपका बारह हज़ार वज़ीफ़ा मुक़र्रर किया था इन ख़ुसूसी तवज्जुतो मराआत ने आयशा की शख़्सियत को उरूज अज़ा कर के एहतिराम की उस मन्ज़िल से हम किनार कर दिया कि उन्होंने रसूल (स.अ.व.व) की ज़ौजियत और अपनी मरज़ेइयत से ख़ूब नाजाइज़ फ़ायदा उठाते हुए अपने बारे में जो कुछ भी उल्टा सीधा और औल फ़ौल अपीन ज़बान से बका वो अक़ीदत मन्दों के नज़दीक सच बनता गया। यहां तक कि उलमा , मुवर्रेख़ीन और मुहद्दिसीन भी उसे अपनी किताबों में जगह देते चले गये और किसी ने उसकी तरदीद में लब कुशाई की जसारत नहीं की।
ख़ुदा भला करे अहदे हाज़िर के सुन्नी मुवर्रिख़ अब्बास महमूद उक़ाद का जिसकी जुस्तजू आमेज़ तहक़ीक़ ने हज़रत आयशा के ख़ुद साख़्ता हुस्नों जमाल के चेहरे से मजाज के परदे और उनकी ख़ूबसूरती के देरीना घिरौंदे को हमेशा के लिए मिसमार कर दिया।
मौसूफ़ अपनी तहक़ीक़ी किताब आयशा में फ़रमाते हैः-
हज़रत आयशा का बचपन बीमारियों में गुज़रा , तारीख़ का मुतालिआ करने से मालूम होता है कि दस बरस की उम्र में उन्हें बुख़ार आया , जिससे उनके तमाम बाल झड़ गये। बाद में उनकी सेहत ठीक नहीं रही और वो अकसर बीमार हो जाया करती थीं।( 2)
इसी किताब में एक दूसरे मक़ाम पर तहरीर फ़रमाते हैः-
हज़रत आयशा की बयान कर्दह बाज़ रवायत से ये भी मालूम होता है कि शदीद बुख़ार की वजह से उनके बाल झड़ गये थे चुनान्चे मिन जुमला दीगर रवायात के एक रवायत ये भी है कि एक मरतबा उन्होंने औरतों को नसीहत करते हुए फ़रमाया कि तुम में से जिस औरत के बाल हों वो उन्हें संवार कर रखे।( 3)
इस के बाद........ उक़ाद का ये इन्किशाफ़क़ारी को हैरत ज़दह कर देता हैः-
जमल के वाक़ेआत पढ़ कर ये इल्म भी होता है कि हज़रत आयशा जहरूस सूरत थीं।( 4)
इन इन्किशाफ़ात के बाद हज़रत आयशा के हुस्नो जमाल की हक़ीक़त को अक़्लो ख़िरद की कसौटी पर परख लेना कोई दुश्वार अम्र नहीं । अगर उक़ाद की मज़कूरह तहरीरों को मुशक्कल कर दिया जाये तो मोहतरमा एक ऐसी मुहीब औरत की शक्ल में उभर कर सामने आती है कि जिसके सर पर बाल नहीं जो मुसलसल बीमार रहती है , और जिसकी आवाज़ मर्दाना और ग़रज़दार है।
अब मोहतरम कारेईन ख़ुद फ़ैसला करें कि क्या एक गंजी , दाएमुल मरीज़ और जहरूस सूरत औरत को दुनिया का कोई अक़लमन्द इन्सान हुस्नों जमाल का मुजस्समा क़रार दे सकता है ? और क्या ऐसी औरत ख़ूब सूरत कही जा सकती है ?
1. आयशा (उक़ाद) तरजुमा मोहम्मद अहमद पानी पतीः- पेज न. 119
2. आयशा (उक़ाद) तरजुमाः- मोहम्मद अहमद पानी पतीः- पेज न. 119
3. आयशा (उक़ाद) – पेज न. 54 – 55
4. आयशा (उक़ाद) – पेज न. 54 – 55
बुख़ारी में हज़रत आयशा का बयान है कि रसूलल्लाह (स.अ.व.व) ने मुझ से फ़रमायाः-
मैंने दो बार तुझको ख़्वाब में देखा कि एक शख़्स (जिब्रील) तुझको हरीर के एक टुकड़े में उठाये हुए है और वो कहता है कि ये तुम्हारी बीवी है मैंने वो कपड़ा खोला तो अन्दर तू निकली मैंने कहा , अगर ये ख़्वाब अल्लाह की तरफ़ से है तो वो ज़रूर पूरा करेगा।( 1)
चन्द लफ़्ज़ों की उलटफेर से ये हदीस मिशकात( 2) और तिर्मिज़ी( 3) में भी बयान की गई है और बाज़ मुवर्रेख़ीन का कहना है कि हज़रत आयशा की ये आसमानी तस्वीर सब्ज़ रंग के रेशमी कपड़ों में लपेट कर तीन बार आं हज़रत को ख़्वाब में पेश की गयी।( 4)
मसलिहत के स्टूडियों में पैग़म्बरी ख़्वाब के कैमरे से खींची गयी इस तस्वीर के बारे में अल्लामा अब्दुल हक़ मुहद्दिसे देहेल्वी अपनी अक़ीदत का मुज़ाहिरह करते हुए रक़म तराज़ हैः-
इस से मुराद इज़्हारे शौक़ो रंगबत है और आयशा के लिए ये मनक़बते अज़ीम है कि अल्लाह के रसूल (स.अ.व.व) के पास पहुंचने से पहले उन्होंने रसूल (स.अ.व.व) को अपने जमाले पुरअनवार का मुश्ताक कर दिया और क्यों न इश्तियाक़ होता कि ज़ुलैख़ा ने ख़्वाब में यूसुफ़ (अ.स) को एक मरतबा देखा था तो वो आशिक़ो फ़रेफ़्ता हो गयीं थीं और यहां सरवरे कायनात ने आयशा की तस्वीर तीन बार देखी , फिर उन्सो मुहब्बत में ज़्यादती क्यों न होती।( 5)
बाज़ दूसरी अज़्वाज के बारे में अल्लामा मौसूफ़ फ़रमाते हैः-
उन्होंने रसूल की ज़ौजियत में आने से पहले ख़्वाब में देखा कि उनके घरों में आफ़ताब उतर आया है या आसमान से माहताब आ गया है। जैसा कि हज़रत ख़दीजा (स.अ.) और हज़रत सौदा के हालात में मरक़ूम है मगर ये हज़रत आयशा के इन्तिहाई हुस्नो जमाल की कैफ़ियत थी वो रसूल के लिए ब बन्ज़िला ए यूसुफ़ और रसूल उनके लिए ब मन्ज़िला ए ज़ुलैख़ा थे।( 6)
वहशत में हर एक नक़्शा उल्टा नज़र आता है।
मजनू नज़र आती है लैला नज़र आता है।।
इस मोहमल और वज़ई ने अब्दुल हक़ मुहद्दिस ऐसे होशमन्द और जलीलुल क़द्र आलिम को भी चक्कर में उलझा कर उनकी अक़्ल की बिसात उल्ट दी और वो ऐसी दहशत का शिकार हुए कि ख़ुदा का रसूल (स.अ.व.व) उन्हें ज़ुलैख़ा दिखाई देने लगा और आयशा युसूफ़ नज़र आने लगीं। जब कि इस हदीस पर ग़ौरो फ़िक्र करने और इसे तारीख़ की रौशनी में देखने से यह हक़ीक़त वाज़ेह हो जाती है कि हज़रत आयशा ने अपनी फ़ज़ीलत और ख़ुदनुमाई की ज़रूरत के तहत बज़ाते ख़ुद इसको जन्म दिया या फिर इसकी इख़तिरा का सेहरा उम्बी दौर के ज़र ख़रीद मुअर्रेख़ीनो मुहद्दिसीन के सर है।
बुख़ारी ने अपनी सहीह में इन ग़लत अहदीस को आयशा की ज़बानी नक़्ल किया है और एबारत में एक शख़्स के आगे ब्रेकेट में जिब्रील का नाम तहरीर किया है जिससे ये इश्तिबाह पैदा होता है कि ये नाम इज़ाफ़ी हैं।
1.बुख़ारीः- जिल्द 3 स 21, किताबुन निकाह पेज न. 48, मतबूआ करांची , पाकिस्तान
2. मिशक़ातः- जिल्द 8 पेज न. 141
3. तिर्मिज़ी बाबे मनाक़िबे आयशा
4. मदारिजुन्नुबूवतः- जिल्द 2 पेज न. 60
5. मदारिजुन्नुबूवतः- जिल्द 2 पेज न. 60 -61
6. मदारिजुन्नुबूवतः- जिल्द 2 पेज न. 60 -61
अगर थोड़ी देर के लिए ये मान लिया जाये कि आयशा की तस्वीर लाने वाले जिब्रील ही थे तो सवाल यह पैदा होता है कि वो और किसी मौक़े पर पैग़म्बर (स.अ.व.व) के ख़्वाब में क्यों नहीं आयें ? आख़िर हज़रत आयशा में कौन सी ख़ूबी कौन सी इन्फ़िरादियत और कौन सा कमाल था कि उनकी वजह से उन्हें बार बार पैग़म्बर के ख़्वाब में आना पड़ा ? ये एक मामूली सा काम था जो रसूलल्लाह की बेदारी की हालत में भी हो सकता था और आयशा की यही तस्वीर कपड़े में लपेट कर , कागज़ के लिफ़ाफ़े में मोहर बन्द कर के या फ़्रेम मढ़वा कर उनकी ख़िदमत में पेश की जा सकती थी।
रसूले अकरम (स.अ.व.व) का ये तर्ज़े अमल भी क़ाबिले ग़ौर है कि वो आयशा की तस्वीर बार बार ख़्वाब में देखने के बावजूद हज़रत अबू बकर से उनकी ख़्वाहिश नहीं करते बल्कि अक़्द का मस्अला मशहूर सहाबी उस्मान बिन मसऊन की बीवी ख़ूला बिन्ते हकीम की बदौलत मन्ज़िले तकमील तक पहुंचता है।
इसके अलावा तारीख़ ये भी कहती हैं कि हज़रत ख़दीजा (स.अ.) की वफ़ात के बाद जब आयशा छः बरस की बच्ची थी तो अबू बकर ख़ुद ही उन्हें लेकर पैग़म्बर (स.अ.व.व) के पास पहुंचे और बच्ची को आं हज़रत की ख़िदमत में पेश करते हुए फ़रमाया किः-
या रसूलल्लाह (स.अ.व.व) आप इस से दिल बहलायें।
फिर जब मुवर्रेख़ीन की अक़सरियत इस बात पर अड़ी हुई है कि आयशा छः साल की उम्र में रसूल (स.अ.व.व) के अक़्द में आयीं तो ये सराहत क्यों नहीं की गयी कि उस वक़्त मोहतरमा की उम्र क्या थी ? आग़ोशे मादर में थीं या उम्र की दो चाल मन्ज़िले तय कर चुकी थी ? तीन चार बरस की बच्ची का जमाले पुर अनवर क्या होगा ? इसे सिर्फ़ अल्लामा मुहद्दिसे देहेल्वी की अक़ीदत ही समझ सकती है।
इस तमाम अक़्ली दलीलों के बावजूद अक़ीदतमन्दाने आयशा इस हदीस को दुरूस्त समझे और अपनी हठधर्मी पर क़ायम रहें तो किसी को क्या एतराज़ हो सकता है। हम तो इतना जानते हैं कि किसी की तस्वीर सिर्फ़ उसकी ख़ूबियों और अच्छाईयों की आईनादार नहीं होती बल्कि बुरे लोगों और मुजरिमों की पहचान के लिए भी काम आती है।
मनचली , रंगीन मिजाज़ और शौकीन औरतों की सिफ़त में हज़रत आयशा सरे फ़ेहरिस्त हैं। रसूले जैसे शाइस्ता और मोहज्ज़ब शख़्स के घर में आने के बाद भी नाच , रंग गाना , बजाना और खेल कूद आपका महबूब तरीन मशग़ला था। जैसा कि बुख़ारी , मुस्लिम , मिशक़ात और तिर्मिज़ी वग़ैरह की रवायतों से साबित है।
अहलेबैत (अ.स) से दुश्मनी और पैग़म्बर की दीगर अज़्वाज से रश्को हसद और नफ़रतों कदूरत आपकी तीनत में रवां दवां थी। आपकी मुतहर्रिको मुज़तरिब तबीअत , शरफ़ो मन्ज़िलत और बुज़ुर्गी व बरतरीका आसमान छूने के लिए हर लम्हा बेचैन रहती थी। नख़वत , ग़ुरूर और ख़ुदपरस्ती का ये आलम था कि अपने आगे किसी की कोई अहमियत नहीं समझती थीं।
उन्हें सिर्फ़ अपने मैके वाले और रिश्तेदारों का ख़्याल रहता था और उन्हीं पर जान छिड़कती थीं। मिजाज़ में चिड़चिड़ापन भी था जिसकी वजह से बात बात पर पैग़म्बर और उनकी अज़्वाज से लड़ाई झगड़ा तू-तू मैं-मैं और मारपीट हुआ करती थी , ग़ीबत और चुग़लख़ोरी की आदत से मजबूर थीं , फ़ितरत में नफ़ासत पसन्दी और ख़ुदनुमाई थी इस लिए अपने बनाव सिंघार और अराइशों ज़ेबाइश का ख़्याल रखती थीं और ख़ुश्बू में बसे हुये ज़र्दो सुर्ख़ कपड़े ज़्यादा पहनती थीं ताकि शौहर की तवज्जो आपकी भरपूर जवानी पर हमावक़्त मरक़ूज़ रहे।
हज़रत आयशा के जज़्बा ए हसद ने अज़्वाजे रसूल (स.अ.) में इफ़्तिराकों इख़तिलाफ़ पैदा कर के उन्हें बक़ायदाह दो पार्टियों में तक़्सीम कर दिया था। एक पार्टी की क़यादत मुअज़्ज़मा ख़ुद फ़रमाती थीं , जो रसूलल्लाह (स.अ.व.व) की परेशानी और ईज़ारसानी का सामान मुहैय्या करतीं थीं , और दूसरी पार्टी की नुमाइन्दह हज़रत उम्मे सलमा थीं जो पैग़म्बर (स.अ.व.व) की हमदर्द , ग़मगुसार , मोईनो मददगार दुख सुख की साथी और अहलेबैत (अ.स) की हामी व हमनवां थीं।
अल्लामा अब्दुल वहाब शेरानी ने अनस से रवायत की है कि रसूलल्लाह (स.अ.व.व) की बीवियों में दो पार्टियां थीं , एक पार्टी में आं हज़रत की और बीवियां थी( 1) मिस्री मुअर्रिख़ अब्बास महमूद उक़ाद फ़रमाते हैः-
तमाम बीवियों में हज़रत उम्मे सलमा (र) ही हज़रत आयशा का खुल्लम खुल्ला मुक़ाबला किया करती थीं चूकि रसूलल्लाह (स.अ.व.व) उनकी तबीअत और सरिश्त से अच्छी तरह वाक़िफ़ थे इस लिए उनसे बहुत अच्छा सुलूक किया करते थे। हज़रत आयशा को ये देख कर बहुत तकलीफ़ हुआ करती थी चुनान्चे वो बयान करती है कि एक दिन रसूलल्लाह (स.अ.व.व) मेरे पास तशरीफ़ लाये तो मैंने उन से कहाः-
आप सारा दिन कहां रहते हैं ?
आपने जवाब दिया – हुमैरा , मैं उम्मे सलमा के पास था।
मैंने कहाः न मालूम उम्मे सलमा के पास आपको क्या मिलता है ?
हुज़ूर (स.अ.व.व) ये सुन कर मुस्कुराए और ज़बान से कुछ नहीं कहा , फिर मैंने कहा या रसूलल्लाह (स.अ.व.व) ये तो बताइये कि अगर दो घाटियां हो , एक घाटी बंजर हो जिस में का सब्ज़ा जानवरों से महफ़ूज़ भी हो तो आप किस घाटी में सैर करना पसन्द करेंगे ? हुज़ूर (स.अ.व.व) ने जवाब दिया , सरसब्ज़ों शादाब घाटी में। तब मैंने कहा कि मेरा रूतबा तमाम बीवियों में सब से बुलन्दतर है क्यों कि मेरे सिवा कोई कुंआरी औरत आपके अक़्द में नहीं आई ये सुन कर रसूलल्लाह (स.अ.व.व) दोबारा मुस्कुरा दिये ( 2)
आयशा कितनी ज़बरदस्त कुंआरी थीं ? इसकी तफ़सील शादी के उनवान से रक़म हो चुकी है बहरहाल , इसी रवायत को बुख़ारी ने दूसरे अन्दाज़ से तहरीर फ़रमाया है। वो लिखते हैः-
आयशा ने आं हज़रत से कहाः-
या रसूलल्लाह (स.अ.व.व) आप एक जंगल में जाए और वहां एक दरख़्त देखें जिसको ऊंट चर गये हों , फिर एक (दूसरा) दरख़्त देखें जिस में किसी ने न चरा हो तो आप अपने ऊंट को किसी दरख़्त में चरायेंगे ? आपने फ़रमाया , उस दरख़्त में जिसे किसी ने न चरा हो।( 3)
इस लगों , मोहमल और मज़हका ख़ेज़ रवायत के रावियों को हज़रत आयशा की ग़ैरत ने शायद ये नहीं बताया कि उनकी इस बेहूदा और ग़ैर मुहज़्ज़ब गुफ़्तुगू का पैग़म्बर की मुहज़्ज़ब सरिश्त पर क्या रद्देअमल देखा ? यानी इस गुफ़तुगू के बाद सरकारे दो आलम आपकी सरसब्ज़ो शादाब घाटियों की सैर से लुत्फ़ अन्दाज़ हुए या नहीं ? उन्होंने अपने ऊंट को आपकी चरागाह में चराया या नहीं ?
ख़ुदा न ख़्वास्ता मुअज़्ज़मा कहीं इस अम्र की वज़ाहत फ़रमा देतीं तो बुख़ारी ऐसे न जाने कितने अक़ीदतमन्द मुद्दीसीनों मुवर्रेख़ीन अजूबा समझ कर उसे भी अपनी किताबों की ज़ीनत बना लेते और दुश्मनाने इस्लाम को पैग़म्बर (स.अ.व.व) पर अंगुश्त नुमाई का एक मौक़ा और फ़राहम हो जाता।
मेरे नज़दीक इस रवायत की कोई असलियत या अहमियत नहीं है क्यों कि इस से हज़रत आयशा की बेग़ैरती और बेहयाई का पता चलता है।
1. कशफ़ुल ग़म्माः- जिल्द 2 पेज न. 73
2. आयशा उक़ाद , तरजुमा मुहम्मद अहमद , पेज न. 39
3. बुख़ारीः- जिल्द 3 पेज न. 21 किताबुन निकाहः- पेज न. 68, 69
हज़रत आयशा और अहलेबैत (अ.स) के दरमियान अदावत का सिलसिला मासूमा ए कौनेन हज़रत फातेमा ज़हरा (स.अ) से शुरू होता है। जिनकी हमागीर अज़मतो तौक़ीर आयशा के दिल में कांटे की तरह खटकती थी चुनान्चे अंग्रेज़ी मुवर्रिख़ कोर्ट फ़्रेशलर आलमानी अपनी किताब आयशा बाद अज़ पैग़म्बर (स.अ.व.व) में लिखता हैः-
जब हज़रत आयशा का रिश्ता पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व) से तय हो गया और ये ख़बर गर्म हुई कि वो रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व) की बीवी होने वाली है तो उन्हें हज़रत फातेमा ज़हरा (स.अ) से इस लिए रश्क़ पैदा हो गया कि हज़रत रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व) उन्हें इस क़दर चाहते क्यों हैं ? उन से इतनी मोहब्बत क्यों करते हैं ? रावी कहता है कि मुझे यक़ीन है कि रोज़े अव्वल ही से आयशा के दिल में अली (अ.स) और फातेमा (स.अ) की तरफ़ से अदावत पैदा हो गयी थी।( 1)
आलमानी की ये बात इस लिए क़ाबिले क़ुबूल और क़रीने क़यास है कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व) ने हज़रत ख़दीजा र 0 के इन्तिक़ाल के बाद आयशा से अक़्द किया और उन्हें अपने घर लाये हज़रत फातेमा ज़हरा (स.अ) बहरहाल हज़रत ख़दीजा र 0 की इकलौती बेटी थी और ये मुशाहिदा है कि जब किसी लड़की की माँ दुनिया से रूख़सत हो जाती है और उस लड़की का बाप किसी दूसरी औरत से शादी कर के उसे अपने घर में ले आता है तो उस लड़की और औरत के दरमियान कशीदगी या तनाव का पैदा हो जाना एक फ़ितरी अम्र है क्यों कि बाप का रूजहानों मैलान उस औरत की तरफ़ होता है और लड़की उस अजनबी औरत की तरफ़ अपने बाप के रूजहानों मैलान को उसी तरह ना पसन्द कतरी है जिस तरह वो अपनी माँ की सौतन को। लिहाज़ा इन हालात में आयशा की तरफ़ से हज़रत फातेमा का दामन कश होना ताज्जुब ख़ेज़ नहीं हो सकता , (जबकि ऐसा नही हुआ) बल्कि ताज्जुब ख़ेज़ हज़रत आयशा का वो तर्ज़े अमल है जो अपने अज़ीम शौहर की अज़ीम बेटी की क़दरो मन्ज़िलत से वाक़िफ़ होने के बावजूद उसकी दिल जुई कर सका न प्यार दे सका और न उसे अपना सका।
तारीख़े शाहिद है कि सरवरे कायनात ने अपनी मरहूम बीवी की इस वाहिद निशानी फातेमा (स.अ) की जो ताज़ीमो करीम की उसकी मिसाल नहीं मिलती। जब सैय्यदा ए आलमिया (स.अ) आपकी ख़िदमत में तशरीफ़ लाती तो आप उन्हें देखते ही ताज़ीम के लिए खड़े हो जाते और उन्हें अपनी मसनद पर जगह देते। शायद ही किसी बाप ने अपनी बेटी की ऐसी इज़्ज़तो तौक़ीर की हो जैसी की पैग़म्बर (स.अ.व.व) ने की। चुनान्चे आपने एक मरतबा नहीं , बार बार एक मक़ाम पर नहीं , मुख़तलिफ़ मक़ामात पर , हर ख़ासो आम के सामने बिल ऐलान ये फ़रमाया किः-
फातेमा (स.अ) तमाम औरतों की सरदार हैं।( 2)
फातेमा (स.अ) मरयम बिन्ते इमरान का जवाब है। ( 3)
फातेमा (स.अ) जब मौक़िफ़े हिसाब से गुज़रेंगी तो एक मुनादी निदा देगा कि ऐ हिसाब वालों अपनी आंखें बन्द कर लो ताकि फातेमा (स.अ) बिन्ते मोहम्मद (स.अ.व.व) गुज़र जायें। ( 4)
फातेमा (स.अ) मेरे जिस्म का टुकड़ा हैं , जिस ने इन्हें अज़ीयत दी , उसने मुझे अज़ीयत दी। ( 5)
इस क़िस्म की बातें आयशा के कीना व एनाद में इज़ाफ़े का बाइस होती। सौतापे की जलन ये गवारा न कर सकती कि पैग़म्बर सौत की दुख़तर को ये मरतबा दें इस तरह चाहें कि उसे देखते ही ताज़ीम के लिए खड़े हों। अपनी मसनद पर जगह दें और सैय्यदते निसाईल आलमीन कह कर तमाम दुनिया की औरतों पर उसकी फ़ौक़ीयत को ज़ाहिर करें।
तारीख़ से निशानदही भी हो जाती है कि हज़रत अबू बकर ने रसूलल्लाह से आयशा की शादी इस ग़रज़ इस ख़्वाहिश इस आरज़ू और इस तमन्ना के तहत की थी कि उनकी बेटी के बत्न से और पैग़म्बर के नुतफ़े से जो बच्चा होगा वो रसूल का जानशीन और वारिस होगा। ख़लीफ़ातुल मुस्लिमीन बनेगा और तमाम बेलाहे इस्लामी पर उसकी हुकूमत होगी , और यक़ीन है कि ख़ुद आयशा भी यही ख़्वाब देख रही थीं चुनान्चे इब्तिदा में जब वो रसूल के घर में ब्याह कर आयीं तो अपने साथ उमंगों , आरज़ूओं , तमन्नाओं और ख़ुशियों का एक तूफ़ान लेकर आयीं , और आपका रवैया भी मियाना रहा लेकिन कुछ अर्से के बाद जब मारिया कब्तिया के बत्न से इब्राहीम (अ.स) की विलादत हुई और उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि वो अक़ीमा (बांझ) हैं तो उनका सारा ख़्वाब हवा में उड़ गया। उमंगों , आरज़ूओं तमन्नाओं का आलीशान ख़्याली क़स्र एक ही झटके में ज़मीन दोज़ हो गया। अरमानों पर ख़ाक और ख़ुशियों पर ओस पड़ गयी। जज़्बात सर्द पड़ गये ख़्यालात गुम हो गये , तसव्वुरात धुंवा हो गये और जज़्बा ए रश्को हसद पर भरपूर जवानी आ गयी।
(इस किताब को आप “अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क ” पर पढ़ रहे है।)
अल्लामा इब्ने सअदे वाक़िदी लिखते हैं किः-
अज़्वाजे रसूल पर इब्राहीम की ख़बर बार हुई और जब उन्हें इत्तिलाअ मिली कि इब्राहीम पैदा हुए हैं तो शदीद क़लक हुआ।( 6)
अज़्वाजे रसूल में इस ख़बर से किस किस पर बिजली गिरी होगी ? इसका फ़ैसला हर वो शख़्स कर सकता है जिसकी नज़र इस्लाम की तारीख़ पर है। हम भी यह वज़ाहत कर चुके हैं कि हज़रत आयशा ने अज़्वाज को दो पार्टियों में तक़सीम कर दिया था और एक पार्टी की क़यादत ख़ुद फ़रमाती थीं जिस में हफ़सा सौदा और सफ़ीया शामिल थीं लिहाज़ा जो लोग अबू बकर और आयशा के मक़सद से बा ख़बर हैं वो फ़ौरन यह कह देंगे कि इस ख़बर से आयशा और उनकी पार्टी की बीवियों पर ही बिजली गिरी होगी।
हज़रत आयशा खुद फ़रमाती हैः-
मारिया की तरफ़ से रश्को हसद का जज़्बा मेरे दिल में था , वो किसी दूसरी औरत से नहीं था क्यों कि मारिया बेहद ख़ूब सूरत और हसीन थीं चुनान्चे जब हुज़ूर (स.अ.व.व) मारिया के पास जाते तो हम पर बहुत शाक गुज़रता।( 7)
और ये बयान भी आयशा ही का है कि जब इब्राहीम पैदा हुए तो रसूलल्लाह (स.अ.व.व) उन्हें मेरे घर लाये और मुझसे फ़रमाया कि देखो , ये बच्चा मुझसे कितना मुशाबेह है मैंने जल कर कहा , मुझे तो कोई मुशाबेहत नज़र नहीं आती।
रसूलल्लाह (स.अ.व.व) ने फ़रमायाः-
क्या तुम ये नहीं देखती कि ये कितना तन्दरूस्त है और इसका रंग कितना गोरा है।
मैंने जवाब दिया कि जो बच्चा बकरी का दूध पीकर पलेगा वह ऐसा ही होगा।( 8)
औरत के लिये संग दिल होना उसके निसवाना वक़ार की पेशानी पर बदनुमा दाग़ है। आयशा ने रसूल (स.अ.व.व) के जज़्बात का भी कुछ पासो लिहाज़ न किया और उल्टे जली कटी सुनाने लगीं , दिल ही दिल में इस अन्दाज़ से कोसा कि डेढ़ ही साल की उम्र में इब्राहीम इस दुनिया से उठ गये और 10 हिजरी में आपका इन्तिक़ाल हो गया यानी आयशा की नज़र पैग़म्बर के इस नूरे नज़र को खा गयी। शायद इब्राहीम का क़ुसूर ये था कि वो आयशा के बत्न से पैदा होने के बजाय मारिया के बत्न से क्यों पैदा हो गये ?
1.आयशा बाद अज़ पैग़म्बरः- पेज न. 49 – 54
2. पेज न. 6, पेज न. 219
3. जिल्द 6, पेज न. 221
4. मुसदतरक हाकिमः- जिल्द 3, पेज न. 153 – 156
5. कन्ज़ुल आमालः- जिल्द 6, पेज न. 240 असदुल ग़ाबा , तबक़ात , इस्तेयाब वग़ैरह
6. तबक़ात इब्ने सअदः- जिल्द 1, पेज न. 86
7. तबक़ातः- जिल्द 8, पेज न. 153
8. आयशा बाद अज़ पैग़म्बर (स.अ.व.व) पेज न. 49 – 54
मुवर्रेख़ीन का कहना है कि जिस दिन इब्राहीम का इन्तिक़ाल हुआ और रसूल अल्लाह (स.अ.व.व) उन्हें सिपुर्दे ख़ाक कर चुके तो देर तक क़ब्र पर खड़े होकर आंसुओं से रोते रहे मगर आयशा पर इस हादसे का कोई असर नहीं हुआ।
जब मारिया और इब्राहीम से आयशा के रश्को हसद और ख़ुसूमतो अदावत का ये हाल था तो रसूल (स.अ.व.व) की उस बेटी को मोहब्बत की नज़र से क्यों कर देखतीं जिसका एहतराम हुज़ूर (स.अ.व.व) ख़ुद करते हों , जिस से बे पनाह मोहब्बत रखते हों , जिसको मुबाहिला में नुबुव्वत का गवाह और रिसालत का शाहिद बना कर ले गये हों , जिसको ख़ातूने जन्नत , शफ़ीआ ए महशर और जिसे सैय्यदते निसाइल आलमीन कहा हो जिसे उम्मे अबीहा का लक़ब मरहमत फ़रमाया हो और जो सूरा ए कौसर की तफ़सीर और कुफ़्फ़ारे मक्का के तानों का जवाब बन कर आई हो , और जिसकी गोद में आने वाले मासूम बच्चे इमामे हसन (अ.स) और इमामे हुसैन (अ.स) उम्मते मुस्लिमा के रहबर हों जिन के बारे में पैग़म्बर (स.अ.व.व) ने फ़रमाया हो कि ये दोनों जवानाने जन्नत के सरदार हैं और जिन्हें रसूले अकरम अपना फ़रज़न्द कहें।
इसके बरअक्स आयशा की गोद औलाद से ख़ाली थी और मां बन्ने की ख़्वाहिश ने अपने भांजे के नाम पर अपनी कुन्नियत उम्मे अब्दुल्लाह रख कर दिल को समझा लिया था , लेकिन इस एहसास की आग में मुअज़्ज़मा का वजूद हर वक़्त सुलगता रहता था कि अगर ख़ुद उनके बत्न से कोई औलाद होती तो वो हस्नैन (अ.स) के बजाय रसूल अल्लाह (स.अ.व.व) की मोहब्बतो शफ़क़त का मरक़ज़ बनती। इस उधेड़ बुन ने हज़रत फातेमा ज़हरा (स.अ) की तरफ़ से आयशा के दिल में वो नफ़रत पैदा कर दी थी कि उनका बस चलता तो मासूमा का गला ही घोंट देतीं मगर वो मजबूर थीं और सैय्यदह (स.अ) के ख़िलाफ़ लगाई बुझाई किया करतीं लेकिन इसके बावजूद वो रसूल (स.अ.व.व) की तवज्जोहात को फातेमा (स.अ) की तरफ़ से हटाने में कामयाब न हो सकीं और क़ुदरत उनके मनसूबों को ख़ाक में मिलाती रही।
इस रंजिश , कशीदगी और अदावत का तज़किरा हज़रत अबूबकर के कानों में भी पहुंचता रहता था जिससे वो दिल ही दिल में पेचोताब खाया करते थे। मगर उन के बनाये भी कुछ न बनती। सिवा इसके कि उनकी ज़बानी हमदर्दियां अपनी बेटी के साथ होती थीं। यहां तक कि रसूल (स.अ.व.व) इस दुनिया से रूख़सत हुए और हुकूमत की बागडोर उनके हाथों में आयी। अब मौक़ा था कि वो जिस तरह चाहते इन्तिक़ाम लेते जो तश्द्दुद चाहते रवा रखते। चुनान्चे उन्होंने पहला क़दम ये उठाया कि जनाबे फातेमा ज़हरा (स.अ) को विरासत से महरूम कर देने के लिए पैग़म्बरों के विरसे की नफ़ी कर दी और ये फ़रमाया कि........... अम्बिया न किसी के वारिस होते हैं और न उनका कोई वारिस होता है। बल्कि उनका तरका हुकूमत की मिल्कियत होता है। इस हादसे से जनाबे सैय्यदा इतना मुतास्सिर हुई कि उन्हों ने अबूबकर से बोलना छोड़ दिया , और इन्ही तास्सुरात के साथ दुनिया से रूख़सत हो गयीं। इस मौक़े पर भी आयशा ने अपनी रविश न बदली और ये तक गवारा न किया कि उनके इन्तिक़ाले पुरमलाल पर अफ़सोस का इज़हार करतीं।
चुनान्चे इब्ने अबिल हदीद ने तहरीर फ़रमाया है किः-
जब हज़रत फातेमा ज़हरा (स.अ) ने रेहलत फ़रमाई तो तमाम अज़्वाजे पैग़म्बर (स.अ.) बनी हाशिम के यहां जमा हो गयीं और आयशा नहीं आयी और ये ज़ाहिर किया कि वो बीमार हैं। उनकी तरफ़ से हज़रत अली (अ.स) तक जो अल्फ़ाज़ पहुंचे हैं उनसे मसर्रतो शादमानी का पता चलता है।( 1)
अस्मा बिन्ते उमैस से एक रवायत ये भी है किः-
जब फातेमा ज़हरा (स.अ) की वफ़ात हो गयी तो हज़रत आयशा तशरीफ़ लायीं मैंने उनको हुजरे में दाख़िल होने नहीं दिया तो उन्होंने ख़फ़ा हो कर अपने वालिद अबूबकर से शिकायत की। अबूबकर आये और उन्हों ने वजह दर्याफ़्त की कि आयशा को तुम बिन्ते रसूल (स.अ) के पास क्यों नहीं जाने देतीं ? मैंने कहाः-
ख़ुद बिन्ते नबी (स.अ) ने इस अम्र की मुमानिअत फ़रमाई है कि मैं इन्हें उनके जनाज़े पर न आते दूं।( 2)
अस्मा बिन्ते उमैस से मरवी ये रवायत पहली रवायत से ज़्यादा क़रीने क़यास और क़ाबिले क़ुबूल है क्यों कि मुअज़्ज़मा उस वक़्त अबू बकर की बीवी और आयशा की सौतेली मां थीं और फिर ये कि आप मौक़े पर मौजूद थीं।
इस रवायत से यह भी ज़ाहिर है कि मासूमा ए कौनेन (स.अ) से आयशा का एनाद इस हद तक था कि आपने अपने जनाज़े पर उन्हें आने से रोक दिया।
बहरहाल जब पैग़म्बर (स.अ.व.व) की बेटी से आयशा की दुश्मनी इस इन्तिहा पर थी तो जिसका दामन मासूमा से वाबस्ता हो वो किस तरह उनकी दुश्मनी से महफ़ूज़ रह सकता है और जिसके बारे में आयशा पैग़म्बर (स.अ.व.व) के ये इरशाद बराबर सुनती रहती थीं किः-
अली (अ.स) का दोस्त मोमिन और उनका दुश्मन काफ़िर है। ( 3)
मैं इल्म का शहर हूं और अली (अ.स) उसका दरवाज़ा। ( 4)
अली (अ.स) मुझ से हैं और मैं अली से हूं। ( 5)
अली (अ.स) मेरे बाद जुमला मोमिनीन के वली हैं। ( 6)
अली (अ.स) की दोस्ती गुनाहों को खा जाती है। ( 7)
अली (अ.स) और मैं एक ही नूर के दो टुकड़े हैं। ( 8)
अली (अ.स) की तरफ़ नज़र करना इबादत हैं। ( 9)
अली (अ.स) का ख़ूना मेरा ख़ून और अली (अ.स) का गोश्त मेरा गोश्त है। ( 10)
अली (अ.स) जन्नत और दोज़ख़ के तक़्सीम करने वाले हैं। ( 11)
अली (अ.स) हक़ के साथ हैं और हक़ अली के साथ हैं। ( 12)
मेरे बाद जब फ़ित्ना पैदा हो तो उस वक़्त अली (अ.स) की इताअत वाजिब है। ( 13)
अमीरूल मोमिनीन (अ.स) के इन फ़ज़ाइलों मनाक़िब के साथ रसूले अकरम (स.अ.व.व) ने यह भी फ़रमायाः-
अली (अ.स) पर ख़ुरूज करने वाला काफ़िर है। ( 14)
जंगे जमल के बाद जब हज़रत आयशा से पूछा गया कि इस हदीस की मौजूदगी में आपने हज़रत अली (अ.स) पर ख़ुरूज क्यों किया ? तो आपने फ़रमाया कि उस वक़्त मुझे यह हदीस याद नहीं रही।
पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व) ने अली (अ.स) , फातेमा (स.अ) , हसन (अ.स) , हुसैन (अ.स) से कुदूरतों अदावत रखने वालों को हरामी भी क़रार दिया। ( 15) लेकिन चूंकि हज़रत आयशा को उम्मुल मोमिनीन का मरतबा हासिल है इस लिए मैं उनके बारे में कुछ कहने का हक़ नहीं रखता मगर ये कहे बग़ैर भी नहीं रह सकता कि हज़रत अली (अ.स) फातेमा (स.अ) इमामे हसन (अ.स) और इमामे हुसैन (अ.स) के ख़िलाफ़ आप का मुख़ालिफ़ाना रवैया तारीख़ की नज़रों से पोशीदह नहीं है चुनान्चे इस ज़ैल में बुख़ारी का कहना है किः-
उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा को हज़रत अली से इस क़दर दुशमनी थी कि वो उनका नाम अपनी ज़बान पर लाना पसन्द नहीं करती थीं। ( 16)
मुवर्रिख़े इस्लाम अल्लामा एहसान उल्लाह गोरखपूरी ने इस हक़ीक़त को यूं बयान किया हैः-
आं हज़रत (स.अ.व.व) , हज़रत अली (अ.स) और हज़रत फातेमा (स.अ) पर अज़हद फ़रेफ़्ता थे आयशा को बइक़्तिज़ाए इनसानियत इस का रश्क था और ये रश्क मुख़तलिफ़ वाक़िआत से नफ़रत की हद तक पहुंच गया था। ( 17)
1. इब्ने आदिल हदीदः- जिल्द 2, पेज न. 459
2. ज़खाएरूल उक़बा मुहिउद्दीन बुख़ारीः- पेज न. 53, 1356 हिजरी , इसतेयाबा जिल्द 2, पेज न. 772
कौकबे दुर्रीः-
3. पेज न. 178
4. पेज न. 196.
5. पेज न. 155
6. पेज न. 154
7. पेज न. 157
8. पेज न. 152
9. पेज न. 161
10. पेज न. 263
11. पेज न. 167
12. पेज न. 166
13. पेज न. 168.
14. पेज न. 186, मनक़बतः- पेज न. 138
15. रियाज़ुन नज़रहः- जिल्द 2, पेज न. 189
16. बुख़ारीः- जिल्द 1, पेज न. 81, मिस्र
17. चारीख़े इस्लामः- पेज न. 285
अल्लामा मौसूफ़ के बइक़तिजाए इनसानियत से मुझे क़तई इत्तिफ़ाक़ नहीं है क्यों कि रश्को हसद हर इन्सान में नहीं होता बल्कि बाज़ लोगों की सरिश्त में फ़ितरतन हासिदाना उन्सूर पाया जाता है और रश्क उसी हासिदाना उन्सूर का हिस्सा है। इस के अलावा अल्लामा को यह सराहत भी फ़रमाना चाहिए था कि वो मुख़तलिफ़ वाक़िआत क्या थे जो आयशा की मुख़ालिफ़त को हवा देते रहे और उन के जज़्बा ए नफ़रत को उभारते रहे ? जिसकी वजह से आप नफ़रत के समन्दर में ग़र्क़ हो गयीं।
तारीख़ बताती है कि इन वाक़िआत में सब से अहम वाक़िआ वाक़ेया ए अफ़क़ है जिस के ज़ैल में पैग़म्बर (स.अ.व.व) से हज़रत अली (अ.स) ने ये फ़रमाया कि आयशा आपकी जूती का तसमा हैं इसे छोड़िये और तलाक़ दे कर अलग कीजिए।
ज़ाहिर है कि हज़रत आयशा ने अपने बारे में जब हज़रत अली (अ.स) के ये कल्मात सुने होंगे तो बेक़रारी के बिस्तर पर करवटें बदलने लगी होंगी और उनके दिल में अमीरूल मोमिनीन के ख़िलाफ़ नफ़रतों अदावत का जज्बा इन्तिहाई शिद्दत से उभरा होगा। इस के अलावा ऐसे भी वाक़ेआत पेश आते रहे कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व) ने बाज़ उमूर में उनके वालिद अबूबकर के मुक़ाबले में हज़रत अली (अ.स) को इम्तियाज़ी और ख़ुसूसी मरतबा अता किया और उन के मदारिज़ को नुमाया और बलन्द किया जैसा सूरा ए बराअत की तबलीग़ के मौक़े पर अबूबकर को माजूल कर के उन्हें वापस बुला लेना और हुक्में इलाही के तहत अज़ीम ख़िदमत हज़रत अली (अ.स) के सिपुर्द कर देना या इसी तरह मस्जिदे नब्वी में खुलने वाले तमाम दरवाज़ों को (जिन में अबूबकर का दरवाज़ा भी शामिल था) बन्द कर देना और सिर्फ़ हज़रत अली (अ.स) के घर का दरवाज़ा खुला रहने देना।
आयशा को अपने बाप के मुक़ाबले में हज़रत अली (अ.स) का तफ़व्वुक़ क्यों कर गवारा होता। चुनान्चे जब भी कोई इम्तियाज़ी सूरत पैदा होती तो मुअज़्ज़मा उसका डटकर मुक़ाबला करतीं और उसे मिटाने में कोई कसर न उठा रखतीं।
चुनान्चे उनकी इस जद्दो जहद का अन्दाज़ा उस वाक़ेए से होता है जब पैग़म्बर (स.अ.व.व) ने वक़्ते आख़िर असामा का लश्कर तरतीब दिया और तमाम अंसारों मुहाजिरीन के साथ अबूबकर और उमर को भी उस लशकर में शामिल हो कर जाने का हुक्म दिया और जब ये लशकर इन दोनों हज़रात के इन्तिज़ार में हुदूदे मदीना से बाहर निकल कर ख़ैमाज़न हुआ तो आयशा की तरफ़ से उन्हें यह पैग़ाम मिला कि आं हज़रत (स.अ.व.व) की हालत इन्तिहाई नाज़ुक है लिहाज़ा लश्कर को पेश क़दमी करने के बजाय पलट आना चाहिए , शायद उनकी नज़रों ने यह भांप लिया था कि मदीने को मुहाजिरीन , अनसार और अकाबिरी ने सहाबा से ख़ाली कराने का मक़सद सिर्फ़ ये हो सकता है कि वफ़ाते रसूल (स.अ.व.व) के बाद ख़िलाफ़त के मस्अले में हज़रत अली से कोई शख़्स वज़ाओ मुज़ाहमत न कर सके और किसी शोरिश अंगेज़ी के बग़ैर ख़िलाफ़त के मनसब पर आसानी से फ़ाइज़ हो सके।
चुनान्चे असामा का लश्कर हज़रत आयशा के इस पैग़ाम पर अफ़रा तफ़री का शिकार हुआ। जब पैग़म्बर ने यह देखा तो असामा को फ़िर लशकर ले जाने की ताक़ीद की और ये तक फ़रमा दिया कि जो शख़्स असामा के लशकर से तख़ल्लुफ़ करेगा उस पर ख़ुदा की लानत होगी। असामा लशकर के साथ रवाना हो गये मगर उन्हें फिर पलटाया गया जब कि आयशा को ये मालूम था कि ख़ुदा और रसूल की नाफ़रमानी कुफ़्र की दलील है। ग़रज़ कि हुज़ूरे अकरम (स.अ.व.व) के मरज़ में शिद्दत पैदा हुई और लशकर का मामला आगे न बढ़ सका इस कार्यवाई के फ़ौरन बाद आयशा ने बिलाल के ज़रिये अपने वालिद अबूबकर को ये पैग़ाम भेजा कि नमाज़ में रसूल की जगह वो इमामत के फ़राइज़ अन्जाम दें ताकि उनके लिए ख़िलाफ़त का रास्ता हमवार हो सके और यही वो हरबा था जिसने रसूल के बाद अबूबकर को ख़लीफ़ा बना दिया। इसके बाद भी ख़िलाफ़त के मस्अले में उम्मुल मोमिनीन की पुश्ते परदा कोशिश यही रही कि वो हज़रत अली (अ.स) के हाथों तक न पहुंच सके लेकिन क़त्ले उस्मान के बाद हालात ने इस तरह करवटें ली कि उम्मते मुस्लिमा हज़रत अली (अ.स) के हाथ पर बैअत के लिए मजबूर हो गयी। आयशा उस मौक़े पर मक्के में थीं , जब उन्हें हज़रत अली (अ.स) के हाथों पर मुसलमानों की बैअत का हाल मालूम हुआ तो आपे से बाहर हो गयीं। आंखों से शरारे बरसने लगे , ग़ैज़ो ग़ज़ब ने मिज़ाज में बरहमी पैदा कर दी और नफ़रतों अदावत ने वो शिद्दत इख़्तियार की , कि जिस ख़ूंन के मुबाह होने का फ़त्वा दे चुकी थीं उसी के क़िसास का सहारा ले कर उठ खड़ी हुई और ख़ुल्लम ख़ुल्ला हज़रत अली (अ.स) के साथ जंग का ऐलान कर दिया। जिस के नतीजे में ऐसा कुश्तो ख़ून हुआ कि बसरा की ज़मीन सुर्ख़ हो गयी और इफ़तिराक़ का दरवाज़ा हमेशा के लिए खुल गया लेकिन इसके बाद भी हज़रत आयशा के दिल में अदावत की ये आग मुसलसल भड़कती रही , यहां तक कि हज़रत अली (अ.स) की शहादत वाक़े हुई तो आपने शुक्र का सज्दा किया , मसर्रतो शादमानी का इज़हार फ़रमाया और तरबिया अशआर पढ़े जिस पर ज़ैनब बिन्ते सलमा ने आपको टोका और कहा , ये क्या ग़ज़ब कर रही है , तो आप ने फ़रमाया कि मैं तो भूल गयी थी।
हज़रत अली (अ.स) की शहादत के मौक़े पर हज़रत आयशा की ये भूल कयामत के दिन उन्हें किस तरफ़ ले जायेगी , इसके बारे में कोई कुछ नहीं कह सकता , सिर्फ़ अन्दाज़ा मुम्किन है।
आयशा की यही नफ़रतों अदावत हज़रत अली (अ.स) और हज़रत फातेमा (स.अ) से एक क़दम आगे बढ़ कर उनके फ़रज़न्दों इमामे हसन (अ.स) और इमामे हुसैन (अ.स) तक इस अंदाज़ से पहुंची कि आप उनसे परदह करने लगीं।( 1) ग़ालिबन नवासों से नानी जान का परदह इस्लामी शरियत का वो पहला , आख़िरी और वाहिद परदह है जिसकी मिसाल ज़माना पेश करने से क़ासिर है।
तारीख़े गवाह हैं कि अपने इन नवासों से नानी जान की अदावत का ये हाल था कि जब इमामे हसन (अ.स) को माविया ने जअदह बिन्ते अशअस के ज़रिये ज़हर दिलवा दिया और आपकी शहादत वाक़े हो गयी तो मुअज़्ज़मा ने आपके जनाज़े को रसूल (स.अ.व.व) के रौज़े में दफ़्न नहीं होने दिया( 2) और हंगामा करने की ग़रज़ से मरवान बिन हकम और सईद बिन आस वग़ैरह के साथ खच्चर पर सवार हो कर ख़ुद भी निकल पड़ी चुनान्चे आपकी क़यादत में इमामे हसन (अ.स) के जसदे ख़ाकी (पार्थिव शरीर) पर इतने तीर बरसाये गये कि सत्तर तीर जनाज़े में पेवस्त हो गये। ( 3) और मजबूरन इमाम (अ.स) का जनाज़ा जन्नतुल बक़ी में दफ़्न कर दिया गया।
इस वाक़े को शोअरा ने भी नज़्म किया है। किसी शाइर का एक शेर बहुत मशहूर है जिसका तर्जुमा ये हैः-
ऐ आयशा तुम कल ऊंट पर सवार थीं , और आज मैं देखता हूं कि खच्चर पर सवार होकर निकली हो।
अहलेबैत अतहार (अ.स) से हज़रत आयशा की अदावतो ख़ुसूमत निस्वानी तारीख़ का एक ऐसा अल्मिया हैं जिसकी मिसाल क़यामत तक ज़माना पेश करने से आजिज़ो क़ासिर रहेगा। ( 3)
1. दर मन्सूर सुयूतीः- पेज न. 215, तबक़ात इब्ने सअद
2. अबुल फ़िदाः- जिल्द 2, पेज न. 183
3. मक़ातिलुत तालिबीनः- पेज न. 30, 1307 हिजरी
4. तारीख़ अबुल फ़िदाः- जिल्द 2, पेज न. 183
रसूल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम का ये दस्तूर था कि आप (स.अ.व.व) जब किसी सफ़र या मुहिम से पलट कर वापस आते तो सबसे पहले मस्जिद में जा कर दो रकअत नमाज़ अदा करते थे , फिर उसके फ़ौरन बाद अपनी ग़मगुसार बेटी हज़रत फातेमा ज़हरा सल्वातुल्लाहे अलैहा के दौलत सरा पर तशरीफ़ ले जाते उनका हाल मालूम करते , ख़ैरियत दर्याफ़्त करते और उनसे अपने सफ़र की सरगुज़श्त बयान फ़रमाते। उसके बाद नवासों से दिल बहलाते , उन्हें प्यार करते और कुछ देर वहां आराम फ़रमाते। इन तमाम बातों से फ़राग़त के बाद फिर आप (स.अ.व.व) उम्मुहातुल मोमिनीन की तरफ़ मुतवज्जे होते और एक एक के घर जाकर उनकी ख़ैरियत से आगाह होते।
हज़रत आयशा के लिए सरकारे दो आलम सल्लल्लाहे अलैहे व आले ही वसल्लम का ये तौरो तरीक़ा इन्तेहाई तकलीफ़ हद , अज़ीयत , आमेज़ और क़र्बो इज़तिराब का बाइस होता चुनान्चे आप (स.अ.व.व) अकसरो बेशतर इस नाक़ाबिले बर्दाश्त तौरो तरीक़े के बारे में पैग़म्बर (स.अ.व.व) से शिकवा शिकायत और झक झक बक बक करती रहती थीं और कभी कभी तक़रार की नौबत भी आ जाती थी।
ये भी इत्तेफ़ाक़ था कि शहज़ादिये कौनेन (स.अ) और आयशा के घर एक दूसरे से मुत्तसिल थे , दर्मियान में सिर्फ़ एक दीवार हायल थी , और उस दीवार में एक मुख़तसर सी खिड़की थी जिसका नाम ख़ोफ़ा था। आं हज़रत (स.अ.व.व) कभी कभी उसी खिड़की से आयशा के घर से हज़रत फातेमा ज़हरा (स.अ) के घर में चले जाते थे और कभी मासूमा (स.अ) के घर से आयशा की तरफ़ आ जाते थे।
निस्फ़े शब से कुछ पहले , एक मरतबा पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व) कहीं से तशरीफ़ लाए और हस्बे दस्तूर अपनी बेटी के घर गये। जनाबे फातेमा (स.अ) से गुफ़्तुगू के दौरान हुज़ूर (स.अ.व.व) की आवाज़ आयशा के कानों से टकराई बस फिर क्या था ? जवानी की उमंगे करवटें लेने लगी , बिस्तर से उठ कर बैठ गयीं....... ग़ालेबन वो शब आपकी बारी थी इस लिए कुछ देर तक हुज़ूर (स.अ.व.व) के आने का इन्तिज़ार करती रहीं फिर न जाने क्यों आप पर यक़ बारगी ऐसी जुनूनी कैफ़ियत तारी हो गयी कि आप झपट कर उठीं और दर्मियानी खिड़की खोल कर आपने मासूमा (स.अ) के घर में छलांग लगा दी और आस्तीने समेट समेट कर फातेमा ज़हरा (स.अ) और रसूले अकरम (स.अ.व.व) से लड़ने लगीं।
आयशा की इस नाशइस्ता हरकत पर सैय्यद फातेमा (स.अ) बेहद रंजीदाह व मुलूल हुई और पैग़म्बर के दिल को भी इन्तेहाई सदमा हुआ। शहज़ादी फातेमा (स.अ) की ख़्वाहिश पर दूसरे ही दिन आं हज़रत (स.अ.व.व) ने वो खिड़की बन्द करा दी( 1) ताकि आयशा की अचानक छलांग का ख़तरा आइन्दा न रहे।
1.जज़बुल क़ुलूबः- पेज न. 157, कलकत्ता
पैग़म्बर (स.अ.व.व) का ये उसूल मुअय्यन था कि आप अपनी अज़्वाज में हर ज़ौजा के यहां उसकी बारी की शब इस्तेराहत फ़रमाते थे , कभी कभी ऐसा भी होता था कि किसी ज़रूरत के तहत या इबादत की ग़रज़ से आपको कुछ देर के लिए बाहर भी जाना पड़ता था और किसी बीवी की ये मजाल न थी कि वो रसूल (स.अ.व.व) के इस फ़ेल पर लबकुशाई कर सके लेकिन आयशा की बारी में जब आप कहीं गये तो वो ये समझीं कि आं हज़रत (स.अ.व.व) मुझे छोड़ कर किसी दूसरी बीवी के पास चले गये हैं।
फिर आयशा ने क्या तर्ज़े अमल इख़्तियार किया इस ज़िम्न में ख़ुद मौसूफ़ा ने मुख़तलिफ़ लोगों से जो मुख़तलिफ़ बातें की हैं उन्हें हम उन की ज़बान में नक़ल कर रहे हैं फ़रमाती हैं किः-
मैंने (अपने बिस्तर पर) एक मरतबा पैग़म्बर (स.अ.व.व) को न पाया मैं समझी कि आप किसी कनीज़ के यहां तशरीफ़ ले गये हैं मैं आपकी जुस्तुजू में निकल पड़ी देखा कि आप मस्जिद में हैं और फ़रमा रहे हैं कि परवरदिगार मुझे बख़्श दे।( 1)
ये आपने हेलाल बिन यसाफ़ से फ़रमाया। फिर आपने अबू मलीका से फ़रमाया किः-
एक रात मैंने पैग़म्बर (स.अ.व.व) को अपने बिस्तर पर न पाया , मैं समझी कि वो अपनी किसी बीवी के पास चले गये हैं तलाश में निकली तो देखा कि आप हालते रूकू में हैं।( 2)
अबू हुरैरा से बयान फ़रमाया किः-
मैंने एक मरतबा पैग़म्बर (स.अ.व.व) को अपने बिस्तर पर न पाया तो इधर उधर ढूंढा मेरा हाथ आपकी तलवार पर पड़ा आप सजदे में थे और इस्तिग़फ़ार फ़रमा रहे थे।( 3)
मज़कूरा तीनों बयानात में हर बयान की नौइय्यत मुख़तलिफ़ है जिससे आयशा की सदाक़त का पता चलता है। अब आप मुअज़्ज़मा की ज़बानी पूरी हिकायत समाअत फ़रमायेः-
जब मेरी बारी की वो रात आई जिस रात पैग़म्बर (स.अ.व.व) को मेरे पास होना चाहिये था आप तशरीफ़ ले आये रिदा उतार कर रखी जूतियां पैरों के पास ही उतारी , बिस्तर पर अपनी चादर डाली और लेट गये थोड़ी देर बाद आपको यक़ीन हो गया कि मैं सो रही हूं तो चुपके से उठे दोश पर रिदा डाली , नालैन पहली आहिस्ता से दरवाज़ा खोला और बाहर निकल गये और मैं ख़ामोश सब कुछ देखती रही। फिर मैं भी तेज़ी से उठी और चादर औढ़ कर पैग़म्बर (स.अ.व.व) के तअक़्क़ुब मैं पीछे पीछे चल पड़ी आं हज़रत (स.अ.व.व) बक़ीअ के क़ब्रस्तान तक गये और कुछ देर वहां खड़े रहे फिर आपने तीन मरतबा अपने हाथ को बुलन्द किया और पलट पड़े मैं भी वापस हुई पैग़म्बर (स.अ.व.व) ने तेज़ क़दम उठाये ये भी तेज़ क़दमों से चलने लगीं। फिर आप दौड़ने लगे मैं भी दौड़ने लगी और इस क़दर तेज़ दौड़ी कि उन से पहले पहुंच कर अपने बिस्तर पर चुपचाप लेट गयी।
मेरे बाद जब आं हज़रत (स.अ.व.व) तशरीफ़ लाये तो उन्होंने मुझ से पूछाः- ऐ आयशा तुम्हारी सांसे क्यों फूल रहीं हैं ? मैंने कहा नहीं ऐसी तो कोई बात नहीं , उस पर आपने फ़रमाया कि तुम सच सच पताओगी , कि ख़ुदा को बताना पड़ेगा।
फिर मैंने तअक़्क़ुब का सारा क़िस्सा पैग़म्बर (स.अ.व.व) से बयान कर दिया तो आपने फ़रमायाः-
अच्छा मेरे आगे जो साया था वह तुम थीं ?
मैंने कहा हां , उस पर हुज़ूर (स.अ.व.व) ने मेरी पीठ पर एक हाथ मारा और फ़रमाया किः-
क्या तुम्हे ये गुमान था कि ख़ुदा और उसका रसूल तुम्हारी हक़ तल्फ़ी करेंगे।( 4)
हज़रत आयशा के इन मुख़तलिफ़ बयानात पर ग़ौर करने से हस्बे ज़ेल उमूर का पता चलता हैः-
1. हेलाल बिन यसाफ़ , अबूमली का और अबू हुरैरा से बयान कर्दह रवायतों में रसूल का अमल तज़ाद की मन्ज़िल में हैं , आं हज़रत (स.अ.व.व) रूकू में थे , सजदे में थे या इस्तिग़फ़ार फ़रमा रहे थे ? वल्लाहो आलम , इसकी ज़िम्मेदारी आयशा पर आइद होती है।
2. आयशा को पैग़म्बर पर भरोसा और इत्मीनान नहीं था इस लिए आप आं हज़रत (स.अ.व.व) की ख़ुफ़िया निगरानी किया करती थी।
3. आयशा किसी उलझन का शिकार रहती थीं जिसकी वजह से आपको नींद नहीं आती थी।
4. आयशा इस तअक़्क़ुब में रसूल के नज़दीक एक सियाह साया थीं।
1. मसनद इमाम अहमद बिन हम्बलः- जिल्द 6 पेज न. 147
2. मसनद अहमद बिन हम्बलः- जिल्द 6, पेज न. 151
3. मसनद अहमद बिन हम्बलः- जिल्द 6, पेज न. 201
4. मसनद अहमद बिन हम्बलः- जिल्द 6 पेज न. 221
ख़ुद आयशा का बयान है किः-
रसूलल्लाह (स.अ.व.व) एक रात मेरे पास से उठ कर कहीं चले गये तो मुझ पर जुनून तारी हो गया थोड़ी देर बाद आप वापस आये और मेरे जुनून को देखा तो फ़रमाया , ऐ आयशा , तुम्हे क्या हो गया है ? ये बदगुमानी , मैंने कहा , मैं आप जैसे इन्सान की तलाश क्यों न करूं ? रसूल ने फ़रमायाः-
क्या तुम पर शैतान सवार हो गया है ?(1)
हज़रत आयशा पर तसकीने नफ़्स का भूत सवार था या किसी और बात का इसकी सराहत नहीं है। लेकिन इस अम्र में कोई शको शुबहे नहीं है कि जब उन पर शैतान होता था बल्कि उनके अन्दर हुलूल कर जाता था तो मोहतर्मा से अजीबो ग़रीब हरकते सरज़द होती थीं जैसे बरतनों को तोड़ना , लिबास का फ़ाड़ना वग़ैरह।
1.मसनद अहमद बिन हम्बल जिल्द 6 पेज न. 115
हज़रत आयशा पर जब हसद का इब्लीस सवार होना था तो आप जुनून की हद से गुज़र कर तोड़ फोड़ पर भी उबर आती थीं। चुनांचे आपकी बारी के दिन अज़्वाजे रसूल (स.अ.व.व) में किसी ने अगर कोई अच्छी चीज़ पकाई और रसूल (स.अ.व.व) की ख़िदमत में भेजी तो आपने कभी उसके बरतन तोड़ दिये और कभी वो खाना रसूल के सामने से उठा कर फ़िकवा दिया। इमाम मुस्लिम ने अपनी सहीह में जनाबे उम्मे सलमा से रवायत की है किः-
उम्मे सलमा पैग़म्बर (स.अ.व.व) के पास एक प्याले में खाने की कोई चीज़ ले कर हाज़िर हुई , हज़रत आयशा की नज़र पड़ी उनके हाथ में पत्थर था उस पत्थर से उन्होंने उस प्याले को तोड़ दिया। पैग़म्बर (स.अ.व.व) ने आयशा का प्याला उम्मे सलमा के हवाले कर दिया। ( 1)
तोड़ फोड़ के बारे में खुद हज़रत आयशा का बयान है किः-
मेरी बारी थी , मैंने रसूलल्लाह (स.अ.व.व) के लिए खाना पकाया और हफ़सा ने भी उनके लिए माहज़र का इन्तिज़ाम किया। मुझे जब यह मालूम हुआ कि हफ़सा ने भी खाना पकाया है तो मैं खौलने लगी कनीज़ को बुलाया और उससे कहा कि अगर हफ़सा ने रसूल (स.अ.व.व) के सामने खाना ला कर रख दिया है तो जाओ और उसे उठा कर फेंक दो। चुनान्चे कनीज़ ने ऐसा ही किया और वो खाना उठा कर फेंका तो बरतन टूट गया। उस पर पैग़म्बर (स.अ.व.व) ने हफ़सा से फ़रमाया कि तुम अपने बरतन के बदले में दूसरा बरतन आयशा से वसूल कर लो।( 2)
ऐसा ही वाक़िआ उम्मुल मोमिनीन सफ़ीया के साथ भी पेश आया। आयशा बयान फ़रमाती हैं किः-
रसूलल्लाह (स.अ.व.व) मेरे यहां हमपाश थे कि सफ़ीया ने उनके लिए खाना भेजा। मैंने जब कनीज़ को खाना लाते देखा तो मुझ पर लर्ज़ा तारी हो गया। मैंने हाथ मार कर प्याला इस तरह उछाला कि वो टूट गया और सारा खाना गिर कर बरबाद हो गया। रसूलल्लाह (स.अ.व.व) ने मुझे घूर कर ग़ज़बनाक निगाहों से देखा तो मैंने ख़ुशामद की और कहा कि मैं ख़ुदा के रसूल से पनाह मांगती हूं कि आज आप मुझ पर लानत फ़रमायें। पैग़म्बर (स.अ.व.व) ने गुस्से की नज़रों से मेरी तरफ़ देखा और फ़रमाया कि इस (कुसूर) का तवान अदा कर दो। मैंने पूछा इसका कफ़्फ़ारा क्या होगा ? आपने फ़रमायाः- वैसा ही खाना और वैसा ही बरतन। ( 3)
मज़कूरा तीनों ख़्याले हज़रत आयशा के तख़रीबकार मिजाज़ की अक्कासी करती हैं और उनमें तख़रीबकारी का हर पहलू साफ़ और नुमायां है इस लिए मज़ीद किसी वज़ाहत की ज़रूरत नहीं है।
1. सहीह मुस्लिम बाबुल ग़ैरत किताबुल इशरत
2. मसनद अहमद जिल्द 6, पेज न. 111, कन्ज़ुल आमाल जिल्द 3, पेज न. 44
3. मसनद अहमद जिल्द 6, पेज न. 277, सोनन निसाई जिल्द 2, पेज न. 148, हाशिया सिरते हलबीया पेज न. 183- 284
तारीख़ ये बताती है कि हज़रत आयशा वक़्ते ज़रूरत गालम गलौज पर भी उतर आती थी। तबक़ात इब्ने सअद में है किः-
हज़रत आयशा और सफ़ीया में गालम गलौज हुई इसकी वजह यह थी कि आयशा ने सफ़ीया पर अपनी बरतरी जतायी थी और इस क़दर उन्हें गालियां दी थीं कि वो बैठी रो रहीं थीं। इतने में हज़रत रसूल (स.अ.व.व) तशरीफ़ लाये और आपने सफ़ीया से रोने की वजह दरयाफ़्त की तो सफ़ीया ने कहा कि आयशा और हफ़सा मुझे गालियां देती हैं और बुरा भला कहती हैं पैग़म्बर (स.अ.व.व) ने फ़रमाया कि तुमने आयशा और हफ़सा के मुक़ाबले में ये क्यों नहीं कहा कि हारून (अ.स) मेरे बाप और जनाबे मूसा (अ.स) मेरे चचा हैं( 1)
तिर्मिज़ी में हज़रत आयशा का बयान है कि मैंने रसूले ख़ुदा से कहा कि सफ़ीया ऐसी है सफ़ीया वैसी है तो पैग़म्बर (स.अ.व.व) ने फ़रमाया कि तुमने ऐसी गंदी बात कही है कि अगर समन्दर के पानी में मिला दिया जाये तो सारा पानी गन्दा हो जायेगा।( 2)
हज़रत आयशा ने हज़रत सौदा को एक बार ये गुनगुनाते हुए सुनाः-
आयशा ने इसका मतलब ये समझा कि सौदा कह रही हैं कि आयशा क़बीला ए तैम और हफ़सा क़बीला ए बनी अदी से है। चुनान्चे आप आपे से बाहर हो गयीं और हफ़सा को भी उभारा कि सौदा हम दोनों को ऐसा ऐसा कह रही थीं। हफ़सा ने पूछा........ फिर क्या होना चाहिए आयशा ने कहा चलो चलें जब मैं सौदा का सर पकड़ू तो मेरी मदद करना और तमाशा देखना। वो दोनों सौदा के पास आयीं , आयशा ने उनका सर पकड़ा और हफ़सा ने मदद की। इतने में उम्मे सलमा पहुंच गई उन्होंने सौदा की मदद की। बस फिर क्या था , बाज़ाब्ता गुत्थम गुत्था शुरू हो गयी। किसी ने पैग़म्बर (स.अ.व.व) को जा कर ख़बर की कि जल्दी जाइये और अज़्वाज की ख़बर लीजिए। जब पैग़म्बर (स.अ.व.व) ने ये हाल देखा तो फ़रमायाः-
वाय हो तुम पर , ये सब क्या हो रहा है ? आयशा ने कहा या रसूल अल्लाह (स.अ.व.व) क्या आपने इन्हें ये कहते नहीं सुना किः-
आपने फ़रमाया , वाय हो तुम पर ! इस से मुराद तुम्हारे अदी और तैम नहीं है बल्कि इनकी मुराद तमीम के अदी और तमीम के तैम से है।( 3)
1. तबक़ात जिल्द 8 पेज न. 127, मुस्तरक हाकिम जिल्द 4, पेज न. 29.
2. तिर्मिज़ी बेनाबर रवायत ज़रकशी , इजाबा पेज न. 73, मदारेजुन्नुबवा जिल्द 2, पेज न. 616
3. इजाबाः- ज़रकशी पेज न. 18
आयशा और रसूले ख़ुदा सल्लाल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम में एक मरतबा किसी बात पर लड़ाई हो रही थी , और आप इस नोक झोक से परेशान हो चुके थे कि इतने में अबू बकर वारिद हुए। हुज़ूर (स.अ.व.व) ने अबू बकर से फ़रमाया कि मैं तंग आ चुका हूं , मुझे आयशा से बचाओ।
पैग़म्बर (स.अ.व.व) की ये फ़रियाद सुन कर अबू बकर ग़ैज़ के आलम में आयशा की तरफ़ बेइख़तियार बढ़े और एक ऐसा हाथ रसीद किया कि वो लहू लोहान हो गयी। ( 1)
आप (स.अ.व.व) ने फ़रमाया कि मेरा मक़सद ये नहीं था कि तुम इन्हें इस तरह से मारो।
बुख़ारी बाबुत्तमीम और मुस्लिम बाबुल क़सम बैनज़ ज़ौजात में है कि कई मरतबा अबूबकर ने उनको अदब सिखाया है।
जंगे खंन्दक के मौक़े पर आयशा के दिल में मरदान्गी का जज़्बा बेदार हुआ और उन्हें यह शौक पैदा हुआ कि मैं भी लड़ाई देखूं। चुनान्चे आप रसूल से इजाज़त हासिल किये बग़ैर घर से निकल खड़ी हुई , और मैदाने जंग के क़रीब पहुंच गयीं। रास्ते में देखा कि असहाब आलाते जंग से आरास्ता जोशो ख़रोश में रज्ज पढ़ते हुए जा रहे हैं। इतने में आपकी नज़र एक बाग़ पर पड़ी और आप उसके अन्दर चली गयीं। वहां बहुत से असहाब खड़े थे जिन में हज़रत उमर भी थे। उमर की नज़र जब आयशा पर पड़ी तो हवास बाख़्ता हो गये और डांट कर कहने लगे , तुम यहां क्यों चली आयीं ? अगर कोई बला नाज़िल हो गई तो (तुम्हे बचाने में) हम सब कट मर जायेंगे। आयशा फ़रमाती हैं कि उस वक़्त उमर ने मुझ पर इतनी लानत मलामत की कि मेरा जी चाहा कि ज़मीन फट जाये और मैं उसमें समा जाऊं। ( 2)
बुख़ारी कहते हैं कि एक मरतबा और भी आं हज़रत (स.अ.व.व) से जंग में शिरकत की इजाज़त चाही थी मगर हुज़ूर (स.अ.व.व) ने ये कह कर उन्हें रोक दिया था कि औरतों का जिहाद सिर्फ़ हज है। ( 3)
ताज्जुब , बालाए ताज्जुब ये अम्र है कि जिस बेटी का बाप हमेशा मैदाने जंग से फ़रार इख़तियार रहा हो , उसमें ये हौसला कहां से पैदा हो गया कि वो मैदाने जंग के ख़ूनी धमाकों से लुत्फ़ अन्दोज़ होने की ख़्वाहिश करें और हैरत बालाए हैरत इस बात पर है कि जब रसूल (स.अ.व.व) ने जो आयशा के शौहर भी थे इससे क़ब्ल मैदाने जंग में जाने से ये कह कर मना कर दिया था कि औरतों का जिहाद हज है तो पैग़म्बर (स.अ.व.व) की इजाज़त के बग़ैर इस मौक़े पर उन्होंने घर से बाहर क़दम क्यों निकाला ? कि अम्र को रसूल (स.अ.व.व) की एक ज़ौजा पर लानत मलामत करना पड़ी। फिर ये सवाल भी पैदा होता है कि हज़रत उमर जिन्हें मैदाने जंग में होना चाहिए , चन्द असहाब को लिए बाग़ में क्या कर रहे थे ? इसका जवाब हर वो तारीख़ दे सकती है जिसमें मैदान जन्म से हज़रत उमर के फ़रार की दास्ताने मरक़ूम हैं।
1. तबक़ात इबने सअद जिल्द 8, पेज न. 56
2. मसनद अहमदः- पेज न. 99 -141
3. सहीह बुख़ारीः- बाबे हज्जुन निसा
मोवर्रेख़ीन ने तहरीर किया है कि आयशा का रवय्या मारिया क़ब्तिया , ज़ैनब बिन्ते हजश , सफ़ीया बिन्ते हई और मलीका बिन्ते क़अब वग़ैरा से बेहद हासेदाना था क्यों कि ये सब औरतें आयशा से कहीं ज़्यादा ख़ूब सूरत और हसीन थीं। जिन्होंने अपना नफ़्स पैग़म्बर (स.अ.व.व) को हेबा कर दिया था चुनान्चे आप खुद फ़रमाती हैं किः-
मैं उन औरतों से बहुत जलती थी जिन्होंने पैग़म्बर को अपना नफ़्स हेबा कर दिया था और मैं कहा करती थी कि कहीं कोई शरीफ़ औरत अपना नफ़्स किसी को हेबा करती हैं ? (1)
(इस किताब को आप “अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क ” पर पढ़ रहे है।)
इब्ने सअदे वाक़दी ने तबक़ात ( 2) में बसिलसिला ए हालाते उम्मे शरीक इस रवायत को तफ़सील से बयान किया है और लिखा है कि वो मोअज़्ज़मा जिन्होंने अपना नफ़्स पैग़म्बर (स.अ.व.व) को हेबा कर दिया था उनका नाम ग़ज़ीया था। और ये रवायत असाबा( 3) में तफ़सील से बयान हुई है। लेकिन उन मोअज़्ज़मा के नामो नसब और कुन्नियत में उलमा ने इख़्तेलाफ़ किया है। उसकी वजह ये मालूम होती है कि ऐसी कई औरतें थी जिन्होंने अपना नफ़्स पैग़म्बर (स.अ.व.व) को हेबा कर दिया था और जिन से आयशा को बेज़ारी थी आयशा ने भी अपने बयान में औरतों कह कर जमा का सीग़ा इस्तेमाल किया है नीज़ मसनद अहमद में है कि आयशा उन औरतों को ताना दिया करती थीं जिन्होंने अपना नफ़्स पैग़म्बर (स.अ.व.व) को हेबा किया था।( 4)
सहीह मुस्लिम में हिशाम से रवायत है कि ख़ूला बिन्ते हकीम भी उन औरतों में शामिल है जिन्होंने अपना नफ़्स हेबा किया था और आयशा उनके मुताल्लिफ़ फ़रमाती थीं कि इस औरत को शर्म नहीं आती कि इसने अपना नफ़्स हेबा कर दिया।( 5)
1. बुख़ारीः- जिल्द 3, पेज न. 118, मुस्लिम बाबे जवाज़े हिबाः- जिल्द 4, पेज न. 374
2. तबक़ातः- जिल्द 8, पेज न. 154
3. असाबाः- जिल्द 4, पेज न. 362, 784
4. मसनद अहमदः- जिल्द 4, पेज न. 198
5. सहीह मुस्लिमः- जिल्द 2, पेज न. 164
तबक़ात इब्ने सअद में इब्ने अब्बास से मरवी है कि रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम ने असमा बिन्ते नोमान (जौनिया) से अक़्द फ़रमाया , ये अपने वक़्त की इन्ताहाई हसीनों जमील और ख़ूब सूरत ख़ातून थी। पैग़म्बर की दीगर अज़्वाज ने जब अस्मा को देखा तो उन पर रश्को हसद तारी हुआ आयशा इस मामले में सब से आगे थीं लिहाज़ा उन्होंने फ़रेबकारी का एक मुनज़्ज़म मन्सूबा तैय्यार किया और असमा से ये कहा कि रसूलल्लाह उस औरत से बहुत ख़ुश होते हैं जो दुख़ूल के वक़्त उनसे आऊज़ो बिल्लाहे मिनक (यानी मैं आप से ख़ुदा की पनाह चाहती हूं) कहे। आयशा की ये बात भोली भाली असमा पर असर अन्दाज़ हुई। चुनान्चे जब पैग़म्बर (स.अ.व.व) तशरीफ़ लाए और उन्होंने असमा की तरफ़ हाथ बढ़ाना चाहा तो असमा ने कहा आऊज़ो बिल्लाहे मिनक , पैग़म्बर ने उसकी तरफ़ से हाथ ख़ींच लिया और फ़रमाया तुम ने बहुत बड़ी पनाह मांगी है लिहाज़ा मैं तुम्हे आज़ाद करता हूं तुम अपने घर जा सकती हो। ( 1)
हमज़ा बिन सईदे सायदी ने अपने बाप से रवायत की है कि वो फ़रमाते थेः-
पैग़म्बर (स.अ.व.व) ने असमा बिन्ते नोमान (जौनिया) से अक़्द फ़रमाया और मुझसे लाने को कहा मैं उसे लेकर हाज़िरे ख़िदमत हुआ। हफ़सा ने आयशा से या आयशा ने हफ़सा से कहा कि तुम इसके हाथों में मेंहदी लगाओ मैं बालों में कंघी करती हूं। दोनों ने मिल कर मेंहदी लगाई और बाल संवारे। उसके बाद उन दोनों में से किसी एक ने असमा से कहा कि पैग़म्बर उस औरत को बहुत महबूब रखते हैं जो जिमा (संभोग) के वक़्त आऊज़ो बिल्लाहे मिनक कहती है। चुनान्चे जब पैग़म्बर (स.अ.व.व) उसके ख़लवत कदे में तशरीफ़ लाये और आपने उसकी तरफ़ हाथ बढ़ाना चाहा तो उसकी ज़बान से आऊज़ो बिल्लाहे मिनक...... निकला। हुज़ूर (स.अ.व.व) ने अपना हाथ समेट लिया और अपनी आस्तीनों से अपना चेहरा ढक लिया और तीन मरतबा इरशाद फ़रमाया कि तूने बड़ी पनाह मांगी है लिहाज़ा अपने घर चली जा। ( 2)
अबू सईद कहते हैं थोड़ी देर बाद हज़रत अली (अ.स) तशरीफ़ लाये और उन्होंने मुझसे कहा कि इसे इसके घर वालों के पास पहुंचा दो और दो जोड़े कपड़े दे दो।
इस वाक़िये के बाद असमा कहा करती थी कि मैं बद बख़्त हूं। ( 3)
तहज़ीबे इब्ने असाकर में है कि जब असमा को ग़ैरे मामूली तौर पर हसीनों जमील पाया गया तो अज़्वाज की तरफ़ से उसे धोखा दिया गया। जब रसूल को ये ख़बर हुई कि ये आयशा और हफ़सा की हरकत थी तो आपने फ़रमायाः-
ये सब युसूफ़ वालियां है और उन्हीं की तरफ़ मक्कारो फ़रेबकार भी। ( 4)
1.तबक़ात इब्ने सादः- जिल्द 8, पेज न. 145
2. तबरीः- जिल्द 3, पेज न. 79, मुसतदरकः- जिल्द 4, पेज न. 37, इस्तेयाबः- जिल्द 2, पेज न. 73
3. असाबाः- जिल्द 3, पेज न. 350
4. तहज़ीबः- इब्ने असाकरः- जिल्द 1, पेज न. 309
इब्ने सअद ने तबक़ात में और इब्ने क़सीर ने अपनी तारीख़ में ये वाक़िआ नक़ल किया है कि रसूल (स.अ.व.व) ने मलीका बिन्ते काब से अक़्द किया जो हुस्नो जमाल में यकता थीं। हज़रत आयशा को ये बात नागवार गुज़री क्यों कि मलीका का ग़ैरे मामूली हुस्न उनके लिए नाक़ाबिले बर्दाश्त था।
मलीका का बाप फ़त्हे मक्का के मौक़े पर ख़ालिद बिन वलीद के हाथों क़त्ल हो चुका था चूंकि वो अपने बाप के क़ातिल के नाम से आशना थी इस लिए आयशा से जब उसका सामना हुआ तो मोहतर्मा ने उस पर अपना नफ़सियाती हर्बा इस्तेमाल किया और उससे कहा कि तुम्हें अपने बाप के क़ातिल से निकाह करते शर्म नहीं आयी। ( 1)
मलीका ने आयशा से कहाः-
अब क्या हो सकता है मुझे तो ये गुमान भी नहीं था कि रसूल (स.अ.व.व) मेरे बाप के क़ातिल है।
आयशा ने कहाः- ये सूरत हो सकती है कि जब आं हज़रत (स.अ.व.व) तुम्हारे साथ ख़लवत नशीन हों तो उनसे कहना कि मैं आप से ख़ुदा की पनाह मांगती हूं। मुम्किन है पनाह मिल जाये। चुनान्चे आयशा के भड़काने पर मलीका ने ऐसा ही किया और रसूल अल्लाह (स.अ.व.व) ने उसे तलाक़ दे दी। तलाक़ के बाद मलीका के ख़ानदान वाले रसूल के पास आये और आप से कहाः
या रसूलल्लाह (स.अ.व.व) , ये नासमझ और कमसिन है , बहकावे और बरग़लाने में आ गयी है आप उससे दोबारा रूजूअ फ़रमा लें लेकिन रसूल (स.अ.व.व) ने इन्कार कर दिया। ( 2)
ये रवायत इस बात पर दलालत करती है कि रसूलल्लाह (स.अ.व.व) को कमसिन हसीन और ख़ूब सूरत लड़कियों से निकाह करने का कोई शौक़ नहीं था वरना वो मलीका बिन्ते काब को तलाक़ न देते क्यों कि वो कमसिन भी थीं और हुस्नों जमाल का मुजस्समा भी।
नीज़ असमा बिन्ते नोमान पर गुज़रने वाले और इस वाक़ेए की नौइयत भी तक़रीबन एक सी है जो ज़ाहिर करती है कि आयशा ने नेक और शरीफ़ औरतों को धोखे दिये और उन्हें नबी (स.अ.व.व) की ज़ौजियत से महरूम कर दिया। चुनान्चे उन्होंने असमा को फ़रेब दिया कि पैग़म्बर (स.अ.व.व) उस औरत से बहुत ख़ुश होते हैं जो आऊज़ो बिल्लाहे मिनक कहती है और मलीका को ये बावर कराया कि तुम्हारे बाप के क़ातिल रसूल (स.अ.व.व) हैं ये वो जादू था कि जिसने उन दोनों सादा लौह औरतों का मुस्तक़बिल तबाहो बरबाद कर दिया जिसकी मुजरिम आयशा और सिर्फ़ आयशा है ये और बात है कि इस काम के लिए हफ़सा को भी इस्तेमाल किया।
1. तबक़ात इब्ने सअदः- जिल्द 8, पेज न. 148, तारीख़ इब्ने क़सीरः- जिल्द 5, पेज न. 299
2. असाबाः- जिल्द 4, पेज न. 392, तारीख़ इब्ने असाकरः- जिल्द 1, पेज न. 309, ज़हबीः- जिल्द 1, पेज न. 325
तबक़ात इब्ने साद की रवायत है कि असकन्दर्या के शाह ने सात हिजरी में मारिया क़ब्तिया और उनकी बहन सीरीन को एक हज़ार मिस्क़ाल सोना बीस उम्दा नफ़ीस और बेशक़ीमत कपड़े अफ़ीर या बाफ़ूर नामी गधे और दुल्दुल नामी खच्चर दे कर हातिब बिन बल्का के हमराह पैग़म्बरे इस्लाम की ख़िदमत में रवाना किया और उसके साथ ही और उसके साथ ही मर्दे ख़सी जिसका नाम माबूर* था , को भी भेजा जो मारिया का भाई और एक सिन रसीदा शख़्स था। हातिब ने मारिया और सीरीन के सामने इस्सलाम क़ुबूल किया और इन्हें भी रंगबत दिलायी। चुनान्चे वो दोनों बहनें भी मुसलमान हो गयीं मगर वो मर्दे ख़सी अपने आबाई दीन पर क़ायम रहा और कुछ दिनों बाद पैग़म्बर (स.अ.व.व) की ज़िन्दगी ही में मुसलमान हो गया।
रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व) इन मारिया को जो आगे चल कर इब्राहीम की मां हुई बेहद चाहते थे। ये इन्ताहाई हसीनों ख़ूबसूरत भी थी और इनके बाल भी काफ़ी लम्बे और दिल कश थे। रसूल ने इन्हें परदे में रखा और मक़ामें आलिया में ठहराया। आप उनके पास बराबर आते जाते रहे यहां तक कि ये हाम्ला हुई और वहीं उनका वज़ैहम्ल हुआ। पैग़म्बर (स.अ.व.व) की कनीज़ सलमा ने दाया की ख़िदमत अन्जाम दी और सलमा के शौहर अबूराफ़े ने पैग़म्बर (स.अ.व.व) को इब्राहीम की विलादत की ख़ुशख़बरी सुनाई। आपने उन्हें एक ग़ुलाम इनाम दिया। ये वाक़ेआ माहे ज़िल्हिज आठ हिजरी का है। ( 1)
अल्लामा जलालुद्दीन सुयूती की तसनीफ़ हुस्नुल मोहाज़ेरा के मुतालिए से पता चलता है कि शाह मक़ूक़स ने पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व) की ख़िदमत में एक ख़त इरसाल किया था जिसका खुलासा ये है किः-
जिन बातों की तरफ़ आप ने मेरी तवज्जो मबज़ूल कराई है और जिस अम्र की दावत दी है उस पर मैंने सन्जीदगी और मतानत से ग़ौर किया। मुझे मालूम था कि एक नबी आने वाले हैं मगर मैं समझता था कि वो मुल्के शाम में मबऊस होंगे। बहरहाल मुख़तसर तहाएफ़ के साथ दो लड़कियां ऐसी आपकी ख़िदमत में रवाना कर रहा हूं जो क़ब्तियों में बड़ी इज़्ज़तो शरफ़ और अज़मतों एहतराम की मालिक हैं। ( 2)
आयशा का बयान है किः-
जो हसद और जलन मुझे मारिया से थी वो किसी औरत से नहीं थी क्यों कि ये इन्तेहाई हसीनों जमील होने के साथ साथ बड़े लम्बे और ख़ूब सूरत बालों वाली थी। पैग़म्बर ने उन्हें ख़ुद पसन्द किया था और जब उन्हें ले आये तो पहले हारिस बिन नोमान के घर उतारा , फिर वो हम से घबराई और परेशान हुईं तो आं हज़रत ने उन्हें मक़ामे आलिया में मुन्तक़िल कर दिया और आप बराबर वहां आते जाते रहे। पैग़म्बर (स.अ.व.व) का मारिया के पास आना जाना मुझ पर शाक गुज़रता था और मैं हसद की आग में जलती रहती थी। यहां तक कि मारिया के बत्न से ख़ुदा ने उन्हें फ़रज़न्द अता किया और मैं महरूम रही। ( 3)
तबक़ात इब्ने सअद की रवायत हुस्नुल मोहज़रा से माख़ूज़ खुलासा ए मक़तूब और खुद आयशा के बयान से उनके हसदो जलन की मुनदर्जा ज़ैल वुजूहात का पता चलता हैः-
1. मारिया क़ाब्तिया के हुस्नों जमाल के सामने आयशा एहसासे कमतरो का शिकार थीं।
2. मारिया , शहज़ादी और अज़मतों एहतराम की मालिक थी नीज़ काफ़ी साज़ो समान के साथ बावेक़ार तौर पर रसूल (स.अ.व.व) के घर आयी थीं जब कि आयशा को अपने वाल्दैन की तरफ़ से कुछ भी न मिल सका था।
3. पैग़म्बर ने मारिया को खुद पसन्द फ़रमाया था और वो उन्हें बेहद चाहते थे।
4. मारिया के बाल लम्बे और ख़ूब सूरत थे जब कि आयशा गंजी थी और आपके बाल बीमारी की नज़्र हो चुके थे।
5. ख़ुदा ने पैग़म्बर को मारिया से औलाद अता की जब कि आयशा इस नेमत से महरूम थीं।
ये तमाम बातें ऐसी हैं जिनका तसव्वुर आयशा के लिए यक़ीनन अंगारों का बिस्तर था जिस पर आपका मजरूह पिन्दांरे ख़ुदी करवटें लिया करता था। और आप दिल ही दिल में कुढ़ती और जलती रहती थीं। फिर इब्राहीम की विलादत ने आपके वुगज़ों एनाद में और इज़ाफ़ा किया जैसा कि ख़ुद आपका बयान है कि ख़ुदा ने मारिया के बत्न से रसूल को फ़रज़न्द अता किया और मैं यूं ही रह गयी।
अब आप सोंचे समझें और ख़ुद फ़ैसला करें कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व) ऐसी किसी बीवी को क्यों कर अज़ीज़ रख सकते थे जो आपकी दिगर अज़्वाज से बेपनाह रश्को हसद रखती हो। उन्हें बुरा भला कहतीं हो , उनके बरतन तोड़ती हो , लड़ाई , झगड़ा और मारपीट करती हो , उन्हें बरग़लाती और बहकाती हों , फ़रेब देती हों , झूठ बोलती हो , ग़ीबत करती हो और ऐब जुई उसका शआर हो। पैग़म्बर (स.अ.व.व) ऐसी किसी बीवी को क्यों कर मुहब्बत दे सकते थे जो आपके मासूम बच्चे इब्राहीम से नफ़रत करती हो , आपकी क़ुदसी सिफ़ात बेटी फातेमा (स.अ) से अदावत रखती हो। अपने नवासों से परदा करती हों और आपके इब्ने अम (चचा के बेटे) हज़रत अली इब्ने अबी तालीब (अ.स) की ऐसी दुशमन हों कि उनका नाम लेना भी गवारा न करती हों। पैग़म्बर (स.अ.व.व) ऐसी किसी बीवी को क्यों कर मुंह लगा सकते थे जो आपकी दूसरी बीवी को ये बावर कर दे कि उसके बाप का क़ातिल ख़ुद रसूल है।
इन्ही वजूहात की बिना पर अक़्ल ये तस्लीम करने पर तैयार नहीं होती कि पैग़म्बर (स.अ.व.व) आयशा को अपनी तमाम बीवियों से ज़्यादा चाहते रहे होंगे बल्कि अक़्ल का फ़ैसला यह है कि पैग़म्बर (स.अ.व.व) आयशा से नफ़रत करते थे और आपने उम्मत को भी इन के शर से बचने की तलक़ीन फ़रमाई है। ( 4)
नीज़ बुख़ारी की यह रवायत भी इस अम्र पर दलालत करती है कि हुज़ूरे अकरम (स.अ.व.व) आयशा से कतई ख़ुश नहीं थे। तहरीर फ़रमाते हैः-
मैंने क़ासिम इब्ने मोहम्मद से सुना कि उन्होंने कहाः-
आयशा ने कहा हाय मेरा सर फटा तो रसूल (स.अ.व.व) ने कहा अगर ऐसा होता तो मैं तुम्हारे लिए ख़ुदा से दुआ करता। आयशा ने कहा , बामुसीबता , ख़ुदा की क़सम आप चाहते हैं कि मैं मर जाऊं ताकि आप अपनी आख़री उम्र तक दूसरी अज़्वाज से लुत्फ़ उठाते रहें। ( 5)
1. तबक़ातः- जिल्द 8, पेज न. 212 व जिल्द 1, पेज न. 134, हालाते इब्राहीम फ़रज़न्दे नबी (स.अ.)
2. हुस्नुल मुहाज़राः- जिल्द 1 पेज न. 47 (मिस्र)
3. तबक़ात इब्ने सादः- जिल्द 8, पेज न. 150, 202
4. तबक़ात इब्ने सादः- जिल्द 2, पेज न. 29
5. बुख़ारीः- जिल्द 7, पेज न. 8
तारीख़ पुकार पुकार कर कहती है कि आयशा ख़ाना ए रसूल (स.अ.व.व) में एक आफ़त बनकर नाज़िल हुई थी। रसूले करीम (स.अ.व.व) से बात-बात पर तू-तू मैं-मैं , लड़ाई झगड़ा , बहसो मुबाहेसा और गुफ़्तारो तक़रार आपका मामूल था। आपकी नज़र में न तो मनसबे नुबूवत की कोई अहमियत थी और न ही रसूले पाक की अज़मतों का कोई पासो लिहाज़ था। जिसकी वजह से पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व) हमेशा आप पर नराज़ो ग़ज़बनाक रहा करते थे जैसा कि ख़ुद आपका बयान है। आप फ़रमाती हैः-
(इस किताब को आप “अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क पर पढ़ रहे है।)
पैग़म्बर (स.अ.व.व) अकसर मुझ से नाराज़ो ग़ज़बनाक रहते थे...... एक बार किसी मस्अले पर मुझ से और हुज़ूर (स.अ.व.व) से बहसो तकरार हो गयी। हुज़ूर ने फ़रमाया कि तुम इस पर राज़ी हो कि उमर बिन ख़त्ताब मेरे और तुम्हारे बीच फ़ैसला करे ? मैंने कहा नहीं वो बद मिजाज़ और संगदिल इन्सान है। फ़रमाया , फिर किस को सालिस बनाना चाहती हो ? मैंने कहा अपने वालिद अबू बकर को। चुनान्चे उन्हें तलब किया गया और जब वो आये तो हुज़ूर ने सारा माजरा बयान किया। मैंने कहा ख़ुदा से डरिये और हक़ के ख़िलाफ़ कुछ न कहिये। मेरी ज़बान से ये कलमात सुन कर मेरे वालिद ने मेरे मुंह पर ऐस थप्पड़ मारा कि मेरी नाक से ख़ून जारी हो गया। ( 1)
मिस्री मोवर्रिख़ मोहक्किक़ अब्बास महमूद ओक़ाद अपनी किताब आयशा में रक़म तराज़ हैं किः-
अहादीस में हज़रत आयशा से एक रवायत मरवी है जिसमें वह कहती हैं कि एक मरतबा किसी बात पर मुझमें और रसूल में बहस हो रही थी। हुज़ूर (स.अ.व.व) ने फ़रमाया यूं नहीं , किसी को सालिस मुक़र्रर कर लो। कहो , अबू उबैदए ज़र्राह को सालिस मुक़र्रर करने पर रज़ामन्द हो ? मैंने कहा वो सादा मिजाज़ इन्सान है आपकी तरफ़दारी करेंगे। हुज़ूर ने फ़रमाया तो फिर अपने वालिद को मुक़र्रर कर लो। मैं राज़ी हो गयी हुज़ूर (स.अ.व.व) ने अबू बकर को बुलवाया और मुझसे फ़रमाया कि तुम अपनी बात बयान करो। मैंने कहा पहले आप बयान करें चुनान्चे हुज़ूर (स.अ.व.व) ने वो बात जिसके मुतालिक़ बहस हो रही थी अबू बकर से बयान की और जब बात ख़त्म हो गयी तो मैंने अपने वालिद से कहा कि अब आप बताइये क हम दोनों में किसकी बात सही है ? ये सुनते ही मेरे बाप ने मेरे मुंह पर एक ज़ोरदार तमाचा मारा और कहा कि रसूल की मुख़ालेफ़त करती है। तमाचा ऐसा था कि मेरी नाक से ख़ून जारी हो गया। ( 2)
क़ुरान कहता है कि रसूल (स.अ.व.व) की आवाज़ पर अपनी आवाज़ को बलन्द न करो लेकिन आयशा के नज़्दीक क़ुरानी आयात की भी कोई अहमियत नहीं थी। जैसा कि ओक़ाद की तहरीर से पता चलता है। चुनान्चे वो लिखते हैः-
एक बार हज़रत अबू बकर आयशा के हुजरे के क़रीब से गुज़रे उन्होंने अपनी बेटी को रसूलल्लाह (स.अ.व.व) से बुलन्द आवाज़ से बातें करते हुए सुना , वह ग़ुस्से की हालत में हुजरे में दाख़िल हुए और इस ग़ुस्ताख़ी की सज़ा देने के लिये आयशा को थप्पड़ मारना चाहा लेकिन रसूलल्लाह (स.अ.व.व) ने दर्मियान में खड़े हो कर उन्हें ऐसा करने से रोक दिया। ( 3)
अल्लामा शेख़ अब्दुर रहमान शाफ़ेई भी इसी क़िस्म का एक वाक़ेआ तहरीर फ़रमाते हैः-
किसी मौक़े पर रसूलल्लाह (स.अ.व.व) और आयशा में बहसो तकरार हो गयी। रसूलल्लाह (स.अ.व.व) ने फ़रमाया क्या तुम अपने बाप को सालिस मुक़र्रर करने पर तैयार हो ? आयशा ने कहा हां। चुनान्चे अबूबकर सालसी के लिए तलब किये गये। उनसे रसूल (स.अ.व.व) ने फ़रमाया की ये मस्अला है और ऐसी ऐसी बातें हैं। आयशा ने कहाः ख़ुदा से डरिये और हक़ बात कहिये। उस पर अबूबकर ने उन्हें ऐसा तमाचा मारा कि नाक से ख़ून जारी हो गया फिर डंडा उठाया और इस तरह ज़दोकोब किया कि आख़िरकार वो (आयशा) भाग कर रसूल (स.अ.व.व) की पुश्त से लिपट गई। ( 4)
मज़कूरा वाक़ेआत से मुन्दर्जा ज़ेल बातों का पता चलता है।
1. आयशा रसूल (स.अ.व.व) का अदबो एहतराम कतई नहीं करती थीं।
2. आयशा रसूल (स.अ.व.व) की मुख़ालेफ़त करती थीं।
3. आयशा रसूल (स.अ.व.व) की पर आवाज़ बलन्द करती थीं।
4. आयशा रसूल (स.अ.व.व) से बहसो मुबाहेसा और तकरार करती थीं।
5. आयशा हज़रते रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व) पर बोहतान और इत्तेहाम की मुर्तक़िब भी क़रार पाती हैं जैसा कि आपका बयान हैः-
हम रसूलल्लाह के लिये एक मशकीज़ा नबीज़* तैयार करते थे जिसे सुब्ह उठकर आप पी जाते थे। ( 5) (मआज़ल्लाह)
शराब के लिये अरबी ज़बान में बहुत सी लफ़्ज़े इस्तेमाल हुई हैं जिनमें ख़मर और नबीज़ भी हैं। ख़मर उस शराब को कहते हैं जो अंगूर से बनायी जाय और नबीज़ वो शराब है जो खजूर से हासिल की जाय जिसे हम अपनी इस्तेलाह में ताड़ी कहते हैं।
अब्दुल्लाह इब्ने उमर का बयान है कि मेरे बाप उमर ने मिम्बर पर तक़रीर करते हुए कहा कि ये अम्र तहक़ीक़ शुदा है कि ख़मर , अंगूर , जौ , गेहूं और शहद से तैय्यार होती है और नबीज़ खजूर से और ये दोनों चीज़े हराम हैं। ( 6)
इमाम ग़ेज़ाली अपनी किताब मनखूल में रक़म तराज़ हैः-
इमामे अबू हनीफ़ा ने शरीअत को उलट पलट दिया और निज़ामे शर्अ को दरहम बरहम कर दिया। उनके मज़हब का तज़ाद उनकी नमाज़ों की तफ़सीलों में पोशीदा हैं। नमाज़ की क़द्र ज़रूरी जो अबू हानीफ़ा ने तज़वीज की है उसमें उनका ख़ब्त ज़ाहिर है और ये ऐसी नमाज़ है जो किसी जाहिल और सुस्त आदमी के सामने भी पेश की जाये तो वो उसके इत्तेबा से बाज़ रहेगा। इस लिये कि जो शख़्स नबीज़ में ग़ोता लगाये और कुत्ते की खाल पहन कर निकले और नीयत न करे।
इमाम ग़ेज़ाली ने इमाम अबू हनीफ़ा के इस फ़त्वे का मतलब ये अख़्ज़ किया है कि अबू हनीफ़ा का ये कहना कि नबीज़ में ग़ोता लगा कर नमाज़ पढ़ना जायज़ और दुरूस्त है। अगर इमाम ग़ज़ाली के मशरब में नबीज़ हलाल होती तो वो अबू हनीफ़ा के फ़त्वे पर एतराज़ क्यों करते ?
किताब रद्दुल मुख़तार जिल्द 5 सफ़ा 301 के मुताले से ये भी मालूम होता है कि अबू हनीफ़ा हर क़िस्म की नबीज़ को दिल में हराम समझते थे मगर चूंकि साहबा ए केबार इसको बेधड़क पीते थे इस लिये वो इसके हलाल होने का फ़त्वा देने पर मजबूर थे। जैसा कि उनका ये क़ौल बहुत मशहूर है कि अगर तमाम दुनिया मेरे क़ब्ज़े में दे दी जाए तो भी मैं नबीज़ को हराम होने का फ़त्वा नहीं दे सकता। क्यों कि इससे बाज़ सहाबा का फ़ासिक़ होना साबित होगा इस लिये कि ये हज़रात बे ताम्मुल उसे पिया करते थे लेकिन अगर मुझे कोई पूरी दुनिया दे कर ये कहे कि इसे पिया करो तो मैं पियूंगा भी नहीं।
मौलाना शिबली नौमानी अपनी किताब अलमामून दूसरी जिल्द के पेज 221 पर तहरीर फ़रमाते हैं किः-
उस वक़्त इस्लामी सोसाइटियां उमूमन इस रंग में डूबी हुई थीं। मुसलमानों को उस अहद में अम्न , फ़राग़ , इत्मीनान और ज़रोमाल सब कुछ मयस्सर था। कुछ चीज़े थीं जो उनको ज़िन्दगी के पुरख़त मक़ासिद से रोक सकती थी ? एक मज़हब अलबत्ता दरअन्दाज़ हो सकता था लेकिन जिद्दत पसन्द तबीअते उसे खींच तान कर अपने ढबका बना लेती थीं। शराब की जगह नबीज़ (खजूर की ताड़ी) मौजूद थी उसको उमूमी तौर पर इराक के मज़हबी पेशवाओं से जाएज़ होने की सनद मिल चुकी थी।
नबीज़ क्या है ? इसे क्यों हलाल क़रार दिया गया ? हज़रत उमर के क़ौल , इब्ने असीर की तशरीह , इमाम ग़ेज़ाली की तन्क़ीद , इमाम अबू हनीफ़ा के फ़तवे , रद्दुल मुख़्तार के इक़तेबास और शिबली नोमानी की इबारत से ज़ाहिर है। उनकी तसरीहात की रौशनी में हज़रत आयशा की बयान करदा हदीस का मतलब ये निकलता है कि मआज़ल्लाह पैग़म्बर (स.अ.व.व) भी अपने को इससे महरूम नहीं रखते थे।
पैग़म्बर (स.अ.व.व) पर आयशा का ये इत्तेहाम यक़ीनन एक ग़ौरतलब मस्अला है।
1. कशफ़ुल ग़म्माः- जिल्द 2, पेज न. 76
2. आयशा (उक़ाद) – पेज न. 30.
3. आयशा (उक़ाद) – पेज न. 98
4. नुज़हतुल मजालिसः- जिल्द 1, पेज न. 102
* एक तरह की शराब।
5. तलख़ीसुस सहाहः- जिल्द 3, पेज न. 112, मतबुआ लाहौर
6. मिशकातः- जिल्द 5, पेज न. 42 मतबुआ लाहौर
मुस्लिम , बुख़ारी और तिर्मिज़ी वग़ैरा में ये रवायत भी हज़रत आयशा की ज़बान से मरकूम है जिसमें आपने ये फ़रमाया है किः-
पैग़म्बर (स.अ.व.व) पर वही का सिलसिला अच्छे ख़्वाबों से शुरू हुआ। आं हज़रत , शुरू ज़माना ए नबुवत में जब कोई ख़्वाब देखते तो वह सुबह की रौशनी की तरह होता , यानी सच्चा ख़्वाब होता , जैसा देखते वैसा ही बेदारी मं ज़ाहिर होता। फिर आपको ख़लवत नशीनी , महबूब रहने लगी , चुनान्चे ग़ारे हिरा में तन्हा जा कर बैठा करते थे। एक दिन फ़रिश्ता आपके पास आया , और कहा पढ़िये , आं हज़रत (स.अ.व.व) ने फ़रमाया मैं पढ़ा नहीं हूं। फिर आं हज़रत (स.अ.व.व) ने फ़रमाया कि इस जवाब पर जिब्रील ने मुझे पकड़ कर इस तरह दबाया की मैं कांपने लगा फिर मुझे छोड़ दिया और कहा , अब पढ़िये। मैंने फिर वही जवाब दिया , मैं पढ़ा नहीं हूं। उस पर फिर उसने मुझे दबोचा कि मेरी जान पर बन गई। फिर छोड़ा और कहा पढ़ियेः- इक़रा बिइस्मे रब्बेका..........
हज़रत आयशा फ़रमाती हैं किः-
रसूलल्लाह (स.अ.व.व) घर वापस आये , आप पर लर्ज़ा तारी था और दिल बुरी तरह धड़क रहा था। ख़दीजा (स.अ.) से फ़रमाया मुझे उढ़ा दो। आपको उढ़ा दिया गया थोड़ी देर आपने ख़दीजा से सारा वाक़िआ बयान किया और फ़रमाया उस वक़्त मुझ पर ख़ौफ़ो हेरास तारी था। ख़दीजा (स.अ.) ने कहा , ख़ुदा आपको बेसहारा न छोड़ता क्यों कि आप सिला ए रहम करते हैं , दूसरों का बोझ अपने सर पर लेते हैं , नादारों मोहताजों और ग़रीबों की ख़बरगिरी करते हैं , मेहमानों की ज़ियाफ़त करते हैं , हक़ की हिमायत करते हैं और हक़दारों को उनका हक़ दिलवाते हैं।
हज़रत आयशा फिर बयान करती हैः-
ख़दीजा , आं हज़रत को अपने इब्ने अम (चचा के बेटे) वरक़ा बिन नोफ़ल के पास ले गयीं , जो नसरानी , नाबीना और बूढ़ा था , ख़दीजा ने वरक़ा से कहाः-
अपने भतीजे मुहम्मद का वक़िआ सुनों , आं हज़रत ने सरगुज़श्त बयान की। वरक़ा ने कहा यह नामूस फ़रिश्ता था इसे ख़ुदा ने मूसा (अ.स) पर नाज़िल किया था। काश मैं उस वक़्त तक ज़िन्दा रहता जब तुम्हारी क़ौम के लोग तुम्हें मक्के से निकाल देंगे।( 1)
आयशा की इस हदीस से ज़ाहिर होता है कि नबी हो जाने के बाद भी आं हज़रत (स.अ.व.व) को अपनी नबूवत पर यक़ीन नहीं था , फ़रिश्ता आने के बाद भी आप इश्तेबाही कैफ़ियत में मुबतिला रहे , क़ुर्आन नाज़िल होने के बाद भी ये न समझ सके कि ये कलामे इलाही है या कुछ और है , फिर आप इस क़दर ख़ौफ़ज़दा हुए कि ख़दीजा को ढारस बंधाना बड़ी। और आप वरक़ा बिन नौफ़िल के पास जाने को मजबूर हो गये जो ज़माने जिहालत का नसरानी और नाबीना शख़्स था। उसने आपको तसल्ली दी और पेशिनगोई भी की कि आपकी क़ौम आपको मक्के से निकाल देगी। ये तमाम बाते नामुम्किन और अक़्ल के ख़िलाफ़ हैं।
जब हम इस बात पर ग़ौर करते हैं कि जिब्रील ने पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व) को पकड़ा या जकड़ कर इस क़ुव्वत से दबाया कि आंपने या कांपने लगे , आपका दिल बुरी तरह धड़कने लगा , आप ख़ौफ़ज़दा हो गये तो हमारी समझ में यह नहीं आता कि यो सब क्यों हुआ ? जिब्रील ने किस ज़रूरत के तहत ये सब किया ? ये बातें तो न ख़ुदा के लिए मुनासिब हो सकती हैं न रसूल के लिये और न मलायका के लिये और न अम्बियाओं मुर्सलीन के लिये। बुख़ारी के शारेहीन ने ये वजाहत भी की है कि किसी नबी के साथ इस क़िस्म का वाक़ेआ पेश नहीं आया तो फिर अल्लाह का अपने हबीब पर ये ख़ुसूसी और अज़ीयतनाक बरताव क्यों ? जिब्रील कहते हैं पढ़िये हुज़ूर कहते हैं मैं पढ़ा नहीं हूं क्या आपकी समझ में यह नहीं आया कि फ़रिश्ते का मतलब क्या है ? फ़रिश्ता कहता है , इक़रा आप फ़रमाते हैं मैं पढ़ा नहीं हूं आप दोहराते जायें लेकिन पैग़म्बर ये समझ रहे थे कि वो मुझसे कोई ख़त या कोई किताब पढ़वाना चाहता है। अक़्ल के नज़दीक ये तमाम बातें नामुम्किन और मुहाल हैं और ये रवायत आयशा की तरफ़ से पैग़म्बर (स.अ.व.व) पर सरीही तोहमत और बोहतान हैं।
ये रवायत मज़मून के लिहाज़ से भी बातिल है और अस्नाद के लिहाज़ से भी ग़लत और मोहमल। अस्नाद के लिहाज़ से मोहमल और ग़लत होने की ये दलील काफ़ी है कि आयशा ने इस वाक़िये को जिससे सुना होगा उसका कोई ज़िक्र नहीं है और ये वाक़िआ आयशा की पैदाइश से पहले का है जब कि उनका कोई वजूद भी नहीं था , और न वो नुज़ूले वही की इब्तेहा के वक़्त मौजूद थीं।
रसूल (स.अ.व.व) के घर में आने के बाद जहां और तमाम ख़ुराफ़ाती मशागेल हज़रत आयशा की ज़ाती सिफ़ात से वाबस्ता थे वहीं ये भी था कि उन्होंने अपने बचपन की आदतों को तर्क नहीं किया था बल्कि खेल कूद , नाच रंग और सहेलियों की बज़्म आराइयों को बदस्तूर बाक़ी रखा था। चुनान्चे मोवर्रेख़ीन का कहना है कि वो एक मरतबा अपनी कुछ सहेलियों के साथ गुड़ियां खेल रही थीं उन गुड़ियों में एक घोड़ा भी था जिसके पर थे , रसूलल्लाह (स.अ.व.व) की नज़र जो पड़ी तो आपने फ़रमायाः-
आयशा , ये बीच में क्या चीज़ है ?
कहाः- घोड़ा है।
फ़रमायाः- घोड़ों के पर कहां होते हैं ?
आयशा ने कहा हज़रत सुलेमान के घोंड़ों के पर भी थे।
इस पर रसूलल्लाह हंस पड़े। ( 2)
आयशा का बयान है कि हज़रत भी इस खेल को देखते थे तो खुश होते थे और ख़ामोश रहते थे। ( 3)
गुड़ियां गुड्डों (गुलाबों , सताबो) का यह खेल मआज़ल्लाह रसूल भी देख कर महजूज होते थे , हज़रत आयशा का कम्सिनी और खुर्दसाली का नतीजा नहीं कहा जा सकता क्यों कि परदार घोड़े का वाक़िआ ग़ज़वा ए हुनैन या तबूक की वापसी का है अगर आम ख़्याल के मुताबिक़ हम थोड़ी देर के लिए फ़र्ज़ भी कर लें कि ब वक़्ते रूख़सती हज़रत आयशा की उम्र नौ बरस की थी तो इस वाक़िये के वक़्त उनकी उम्र तक़रीबन सत्रह , अट्ठारह साल की क़रार पाती है। क्या ये उम्र गुड़िया खेलने की है ? और क्या रसूल (स.अ.व.व) के घर की तहज़ीब आयशा को इस बात की इजाज़त दे सकती है।
1. बुख़ारी जुज़्वे अव्वल , बाबुल वही , बसिलसिलला ए तफ़सीरे सूरा ए इक़रा , मुस्लिम तिर्मिज़ी वग़ैरह ,
2. मिशकातुल मुसाबीहः- पेज न. 282,
3. मदारे जुन नुबूवतः- जिल्द 2, पेज न. 602, सहीह मुस्लिम बाबे मनाक़िबे आयशा अबू दाउद किताबुल अदब , रफउल एजाबा , तरजुमा इब्ने माजा जिल्द 2, पेज न. 53 सतर 19, सिद्दीक़ी प्रेस लाहौर , अलमुअल्लेम तर्जुमा सहीह मुस्लिम जिल्द 2 पेज न. 19 -24
सहाह और मसानीद में हज़रत आयशा की बयान करदह हदीसें मरक़ूम हैं। उनकी मजमूई तादाद दो हज़ार एक सौ दस बताई जाती है। बाज़ मुहद्देसीन दो हज़ार एक सौ दस बताते हैं यक़ीनन ये एक बहुत बड़ी तादाद है और वज़ए अहादीस में अबूं हुरैरा के बाद आप ही का नम्बर है। अबू हुरैरा के अलावा इतनी अहादीस किसी ने नहीं बयान कीं। यहां तक की खुल्फ़ा ए अर्बा (चारों ख़लीफ़ा) और उम्महातुल मोमनीन की जुमला हदीसें एक जगह इकट्ठा कर ली जायें और आयशा की हदीसे एक तरफ़ तो तादाद के लिहाज़ से आयशा की हदीसों का पल्ला भारी होगा।
(इस किताब को आप “अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क ” पर पढ़ रहे है।)
हालात और कैफ़ियत के मुताबिक़ जो तरीक़ा आपने हदीस बयान करने का इख़्तियार किया था वो हर दौर और हर अहद की ख़ुसूसियातों ज़ुरूरियात को मद्देनज़र रखते हुए , जिस तरह आपने रंग बिरंगी हदीसें बयान की हैं वो दुनिया की निगाहों से पोशीदाह नहीं है।
मोअज़्ज़मा की बयान हुई चन्द मुज़ख़रफ़ और कराहत आमेज़ हदीसों को हम बतौरे नमूना ज़ेल में पेश करेंगे जिनका ज़िक्र अरबाबे सहाह व मसानीद ने बड़े एहतेमाम से किया है लेकिन उन हदीसों से इस्लाम और पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व) से मुताल्लिक़ कोई अच्छा तास्सुर पैदा नहीं होता , बल्कि ये हदीसें इस्लाम के दुशमनों को तमसख़ुर और इस्तेहज़ा का मौक़ा फ़रहम करती हैं।
ये भी हो सकता है कि ये हदीसें आयशा ने बयान ही न की हों , उमवी दौर के रावियों ने इन्हें उनके नाम से मन्सूब कर दिया हो जैसा कि उस दौर में ऐसा हुआ है और हज़ारों की तादाद में हदीसें गढ़ी गयी हैं। बहरहाल हक़ीक़त कुछ सही अहादीस की किताबों में ये हदीसें आयशा से मरवी हैं लिहाज़ा जिस तरह अबू हुरैरा अजीबो ग़रीब हदीसें बयान करने के मामले में मतऊन हैं उसी तरह ये हदीसें भी आयशा के दामन पर बदनुमा धब्बा हैं।
वो रसूल (स.अ.व.व) जिसका नूर अल्लाह का नूर है जो तमाम अम्बियाओं मुर्सलीन का सरदार है जिसकी बदौलत ज़मीनों आसमान की ख़िल्क़त हुई जो मासूमो है , जिसकी चौखट पर मलाएका की जबीने झुकती हैं और जिसका किरदार ऐने क़ुर्आन है वही रसूल (स.अ.व.व) (ख़ाकम ब दहन) आयशा की हदीसों की रौशनी में एक मामूली इन्सान से भी पस्त नज़र आता है........... ये कितना अजीब बात है ?
ये अम्र भी क़ाबिले ग़ौर है कि हज़रत आयशा ने रसूले अकरम (स.अ.व.व) से इतनी हदीसें क्यों कर सुनलीं कि उनकी तादाद दो हज़ार से ज़्यादा हो गयी। क्या पैग़म्बर शबोरोज़ सिर्फ़ आयशा ही के पास बैठे रहते थे और हदीसे बयान किया करते थे ? जब कि आपके दिन मस्जिदे नब्वी में मुसलमानों की तालीमों तर्बियत और मुल्की व क़ौमी उमूर पर सर्फ होते थे और रातें अज़्वाज में तक़सीम थीं। हज़रत आयशा के हिस्से में ज़्यादा से ज़्यादा महीने की सिर्फ़ तीन रातें आती थीं और उन रातों को भी दो तिहाई हिस्सा पैग़म्बरे इस्लाम ख़ुदा की इबादत में गुज़ार देते थे। हदीसे बयान करने का वक़्त कहां था ?
इस से ज़्यादा अहम बात यह है कि आय़शा ही की बारी में आं हज़रत महवे तकल्लुम होते और हदीसों पे हदीसें इरशाद फ़रमाते ? आख़िर आपकी और बीवियां भी तो थीं उनकी बारी में आप ख़ामोश क्यों रहते थे ? क्या वो आप से हदीसें सुनने की मुस्तहक़ नहीं थीं ? आयशा ही में कौन सी ख़ुसूसीयत थी कि आप सिर्फ़ उन्हीं से हदीसें बयान फ़रमाते थे ? फिर ऐसी मुबतजल हदीसें जो इन्सान को बदहवास कर दें।
इन तमाम बातों के पेशे नज़र ये नतीजा अख़्ज़ करना पड़ता है कि ये हदीसें फ़र्ज़ी है और इस्लाम व पैग़म्बरे इस्लाम को बदनाम करने के ख़्याल से दुशमनों ने इन हदीसों को वज़अ कर के आयशा के सर मंढ दिया है। अगर हज़राते अहले सुन्नत वाक़ई इन हदीसों को आयशा ही का कारनामा समझते हैं तो ये इन्तिहाई क़ाबिले अफ़सोस बात है क्यों कि इन आहदीस से उम्मुल मोमिनीन के क़लबी रूजहानात और नफ़सानी ख़्वाहिशात की ताईद भी होती है।
जिसके चन्द नमूने गुज़श्ता सफ़हात में हम पेश कर चुके हैं। चन्द मज़ीद नमूने ज़ैल में मुलाहेज़ह फ़रमाएं।
सहीह बुख़ारी में इब्ने शहाब से रवायत है कि मुझ से उर्वह ने और उनसे आयशा ने बयान किया किः-
जब रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व) नमाज़ पढ़ते तो मैं उनके और कि क़िबला के दर्मियान फ़र्श पर इस तरह पड़ी रहती जैसे कोई जनाज़ा रखा हो। और जब पैग़म्बर (स.अ.व.व) सजदे में जाते तो वो मुझे दबाते थे उस पर मैं अपनी दोनों टांगे उठा लेती थी , और जब आप सजदे से सर उठाते तो फिर फैला दिया करती थी। ( 1)
अल्लामा इब्ने हजरे असक़लानी रक़म तराज़ हैः-
हज़रत आयशा इस तरह लेटी रहती थीं जिस तरह सामने जनाज़ा रखा जाता है , और मुराद ये है कि हज़रत आयशा इस तरह आं हज़रत (स.अ.व.व) के सामने होतीं कि उनका सर पैग़म्बर (स.अ.व.व) के दायें हाथ की तरफ़ होता और पांव बाये हाथ की तरफ़ जिस तरह जनाज़ा पढ़ने वाले शख़्स के सामने जनाज़ा होता है। ( 2)
बुख़ारी ही ने हज़रत आयशा का ये बयान भी क़लम बन्द किया हैः-
मैं हज़रत रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व) के सामने सोती रहती थी और मेरे दोनों पांव क़िब्ले की तरफ़ दराज़ रहते थे चुनान्चे जब हज़रत सजदह में जाते और मेरे पैरों में चुटकियां लेते तो मैं उन्हें समेट लेती थी और जब खड़े होते तो फिर पैर फ़ैला देती थी। ( 3)
इस आख़री रवायत से पता चलता है कि आयशा का बयान ग़लत है। पैग़म्बर (स.अ.व.व) की नमाज़ के वक़्त वो सोई हुई नहीं होती थी बल्कि जागती रहती थीं और आंखे खोले हुए हुज़ूर (स.अ.व.व) की नक़्लों रहकत को देखा करती थीं क्यों कि सोने वाला शख़्स तक़रीब मुर्दा होता है और उसे ये अन्दाज़ा नहीं हो सकता कि कौन नमाज़ पढ़ रहा है , कौन कब सजदे में गया , और कौन कब खड़ा हुआ , या कौन घर में दाख़िल हुआ और कौन चला गया।
चेजाइकि आयशा का ये बयान कि आं हज़रत (स.अ.व.व) हालते नमाज़ में मेरे पैरों में जब चुटकियां लेते तो मैं उन्हें समेट लेती और जब सजदें के बाद क़याम फ़रमाते तो फिर फैला लेती , किस क़द्र मज़हका ख़ेज़ इबरदनाक और बेअदबी का मज़हर है।
ये सवाल भी पैदा होता है कि हज़रत रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व) इस तरह नमाज़ ही क्यों पढ़ते थे कि आयशा एक मैय्यत की तरह आपके सामने होतीं ? आख़िर इसमें कौन सी मसलेहत और कौन सा राज़ पिन्हा था जो मुसलमानों या ख़ुद आयशा के लिए नामूना ए अमल बन सकता था और अगर ये कहा जाए कि हज़रत आयशा का हुज़रह तंग था इस लिए रसूल (स.अ.व.व) को मजबूरन इस तरह नमाज़ अदा करनी पड़ती थी , तो इसका खुला हुआ जवाब यह है कि आयशा का हुजरा मस्जिद से मुलहक़ो मुत्तसिल था , हुज़ूर (स.अ.व.व) वहां , यानी मस्जिद में नमाज़ अदा कर सकते थे , क्या ज़रूरी था कि आयशा की इस ग़ुस्ताख़ी और बेअदबी के सामने बेचारी नमाज़ की हुर्मत पामाल होती।
दूसरी रवायत जिस में आयशा फ़रमाती हैं कि मैं पैग़म्बर (स.अ.व.व) के सामने इस तरह लेटी होती कि मेरे पांव हुज़ूर (स.अ.व.व) के बायें हाथ की तरफ़ और सरो धड़ दाहिने हाथ की तरफ़ होता , अजीब दरद्दद पैदा करती है। इसका मतलब तो ये हुआ कि रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम का सरे अक़दस हज़रत आयशा की कमर के आस पास होता था। (लाहौला वला क़ुव्वत)
हाय उस ज़ूद पशेमां का पशेमां होना
हज़रत आयशा फ़रमाती हैं कि तुमने बुरा किया जो हम लोगों को कुत्ते और गधे के बराबर कर दिया , बेशक मैंने अपने को देखा कि रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व) नमाज़ पढ़ते होते थे और मैं आपके और क़िब्ले के दर्मियान लेटी होती। ( 4)
ये हदीस इस लिहाज़ से भी नाक़िस है कि इसमें ये सराहत नहीं है कि आयशा का तख़ातुब किन लोगों से है , जिन्होंने उनके हक़ में बुरा किया , और इस ग़ुस्ताख़ी के मुर्तकिब हुए कि उन्हें कुत्ते और गधे के बराबर कर दिया। इस मन्ज़ेलत और फ़ज़ीलत में सहाबा का हाथ था या किसी और का ? बुख़ारी के मुतर्जिम (जिन्होंने ये रवायत नक़ल की है) मिर्ज़ा हैरत ने भी कोई तसरीह नहीं फ़रमाई जिस से कुछ पता चलता , फिर आयशा ने हम लोगों का जुमला इस्तेमाल किया है जिससे ये इश्तेबाह पैदा होता है।
इस फ़ज़ीलत में मौसूफ़ा के अलावह उनके ग्रुप की कोई और औरत भी शामिल है।
1. बुख़ारीः- प. 2 पेज न. 245, उमदतुलक़ारी शरह बुख़ारीः- जिल्द 2 पेज न. 502
2. फतहुल बारीः- पेज न. 245
3. बुख़ारीः- जिल्द 1 पेज न. 51, बाबुस सलात समनद जिल्द 6 पेज न. 125
4. तर्जुमाः- सहीह बुख़ारी , मिर्ज़ा हैरत देहल्वी
आयशा का बयान है किः-
दसतरख़्वान पर जब आं हज़रत (स.अ.व.व) मेरे साथ खाना खाते तो उसी हड्डी को आप भी चूसते , जिसे मैं चूसती थी , और उसी प्याले में उसी जगह आप भी मुंह लगा कर पीते जिस प्याले में जहां पर मैं मुहं लगाती थी , हालांकि मैं हैज़ की हालत में होती थी। ( 1)
इस बयान के ज़रिये हज़रत आयशा का मक़सद सिर्फ़ ये ज़ाहिर करना है कि रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व) आपको इस क़द्र चाहते थे कि उन्हें आपके थूक या हैज़ से कोई गुरेज़ नहीं था लेकिन यह बात समझ में नहीं आती कि आख़िर आं हज़रत उसी हड्डी को क्यों चूसते थे जिसे आप चूसती थीं ? क्या आधी हड्डी आपके और आधी हड्डी पैग़म्बर (स.अ.व.व) के मुंह में होती थी क्या उस हड्डी में दोनों तरफ़ छेद होता था कि आधा गूदा आपके हिस्से में और आधा गूदा पैग़म्बर के हिस्से में आता था ? या फिर चूसने का कोई और तरीक़ा था कि जब आप उस हड्डी को चूस लेती थीं तो पैग़म्बर चूसते थे ? मगर आपके चूसने के बाद उसमें गोश्त , गूदा या शोर्बा वग़ैरह तो रहता न होगा , फिर पैग़म्बर क्या चूसते थे ?
बयान में ये सराहत भी नहीं की गयी कि जिस प्याले में आयशा और पैग़म्बर एख ही जगह मुंह लगा कर पीते थे उसमें क्या चीज़ होती थी ? पानी........... या कुछ और।
फ़िर ये बयान करती हैं कि मैं हैज़ की हालत में होती थी कौन सी ख़ुसूसियत पिन्हा हैं ? इससे तो आयशा की बेग़ैरती और बेशर्मी का पता चलता है।
1.अहमद बिन हम्बलः- जिल्द 6, पेज न. 64
एक मरतबा ईद के मौक़े पर अबू बकर अपनी बेटी आयशा से मिलने आये तो उन्होंने देखा कि उनके साथ कुछ लड़कियां गाना गा रही हैं और रसूलल्लाह (स.अ.व.व) क़रीब ही कपड़ा होढ़े लेटे हुए हैं। अबू बकर को ये देख कर कुछ ग़ुस्सा आया और वो बेटी पर चीख़ पड़े। रसूल अल्लाह के घर में ये शैतानी काम ! रसूल अल्लाह (स.अ.व.व) ने अपने चेहरे से कपड़ा हटाया और फ़रमायाः- अबू बकर ! इन्हें कुछ न कहो , ईद का दिन है , लड़कियां अपना दिल बहला रही हैं। ( 1)
ताज्जुब की बात तो ये है कि अबू बकर इस फ़ेल को शैतानी काम से ताबीर करते हैं और रसूलल्लाह (स.अ.व.व) कहते हैं , कुछ न कहो इसका मतलब तो ये हुआ कि आयशा के इस शग़ले ग़िना को पैग़म्बर रहमानी फ़ेल पर महमूल करते हैं। (अयाज़न बिल्लाह) ख़ुदा समझे उन रावियों से जो अल्लाह के हबीब पर इस बोहतान के मुर्तक़िब हैं।
बुख़ारीः- जिल्द 1. पेज न. 108, किताबुल ईदैन
आयशा फ़रमाती हैं कि ईद का दिन था , मस्जिद में हब्शियों की एक टोली अपना नाच और कर्तब दिखा रही थी। रसूलल्लाह ने मुझसे फ़रमाया , क्या तुम भी नाच देखोगी ? मैंने रज़ामन्दी ज़ाहिर की तो आं हज़रत (स.अ.व.व) मुझे ले गये और इस तरह अपनी पुश्त पर मुझे खड़ा किया कि मेरे रूख़सार आपके रूख़सारों पर थे। नाचने वालों को आं हज़रत लल्कार लल्कार कर झूम झूम कर नाचने की तरग़ीब दे रहे थे और मैं लुत्फ़ अन्दोज़ हो रही थी। यहां तक कि मैं थक गयी तो तो आपने फ़रमाया , अच्छा अब घर चलो। ( 1)
ये वाक़िआ मुसलमानों की ग़ैरते इस्लामी के लिए इबरत का एक ताज़ियाना है। सिर्फ़ ये ज़ाहिर करने के लिए कि रसूले करीम (स.अ.व.व) आयशा को कितना चाहते थे , उम्मते मुस्लिमा ने दुशमनाने इस्लाम की गढ़ी हुई रवायतों को बख़ुशी क़ुबूल कर लिया और ये न सोचा कि मुर्सले आज़म को इन ख़ुराफ़ात , लग़्वियान और मुज़रवफ़रात से क्या सरोकार ? अज़मत , विक़ार और मनसब के लिहाज़ से क्या इस अम्र की तवक़्क़ो की तवक़्क़ो की जा सकती है कि रसूल अल्लाह (स.अ.व.व) हब्शियों का नाच और तमाशा देखते ? वो भी मस्जिद में........। क्या एक शौक़ीन मिज़ाज औरत के लिये हुज़ूर (स.अ.व.व) मस्जिद के एहतिराम को अपने हाथों दफ़्न कर सकते हैं ? ग़ैर........ मुम्किन है।
1.बुख़ारीः- जिल्द 4 पेज न. 30, 5118 नसरूल बारी (तरजुमा) सहीह बुख़ारीः- जिल्द 1, पेज न. 178, मसनद अहमद बिन हम्बलः- पेज न. 499, मुस्लिम व तिर्मिज़ी वग़ैरह
अक़ीदत मन्दाने आयशा बड़े फ़ख़्र से बयान करते हैं कि उम्मुल मोमिनीन को कहानियां सुनने और सुनाने का शौक़ था। चुनान्चे कभी आप आं हज़रत (स.अ.व.व) को क़िस्से , कहानियां सुनाया करती थीं और कभी आं हज़रत (स.अ.व.व) आपको कहानी सुनाया करते थे। ( 1)
ये अम्र ग़ौर तलब है कि क़ससों हिक़ायत की ख़ुराफ़ात और दास्तानों अफ़साना गोई की लग़्वियात से रसूल (स.अ.व.व) की परहेज़गारी का ऐलान परवरदिगार रिसालत से पहले करता है , मगर मबऊस बरिसालत होने के बाद आप तबलीग़ के मैदाने में उतरे तो ख़ुदा की तरफ़ से ये हुक्म हो गया कि आप रात रात भर बिवियों का दिल बहलायें क़िस्से सुनायें कहानियां और दास्तानें बयान करें और उनसे ख़ुद भी सुनें। गानें सुनिये और हब्शियों का नाच दिखाईये और देखिये।
1.मिशकातः- पेज न. 281 रफ़ाउल अजाज़ा तर्जुमा सुन्ने इब्ने माजा जिल्द 2, पेज न. 52
हज़रत आयशा का बयान हैः-
एक सफ़र में रसूल अल्लाह (स.अ.व.व) के साथ मैं भी थी। अचानक आपने अस्हाब को हुक्म दिया कि तुम सब लोग आगे बढ़ जाओ। जब लोग कुछ दूर आगे चले गये तो आं हज़रत ने मुझसे फ़रमाया आयशा आओ हम दोनों दौड़े तो मैं आगे निकल गयी और आं हज़रत पीछे रह गये। उन्हें शर्मिन्दगी हुई और वो इस बात को दिल में लिए रहे। फिर ऐसा ही एक दूसरा मौक़ा आया , और हम दोनों की दौड़ हुई। अब चूंकि मैं मोटी हो चुकी थी इस लिये हार गयी। रसूल अल्लाह (स.अ.व.व) ने फ़रमाया ये उस दिन का बदला है। ( 1)
अगर ये वाक़िया सहीह है तो पहली बार आयशा की सूर्अते रफ़्तार और दूसरी बार मोटापे की दौड़ को देख कर मलाएका भी खिलखिला कर हंस पड़े होंगे , इसके अलावा इस लम्बी दौड़ का मक़सद क्या था ख़ुदा जानें।
आयशा का बयान है कि आं हज़रत (स.अ.व.व) मेरे साथ छुली छुलय्या खेला करते थे। चुनान्चे जब मैं भागती तो वो मेरे पीछे दौड़ते और जब मैं छुप जाती तो वो मुझे ढ़ूंड निकालते। ( 2)
काश........ मैं उम्मुल मोमिनीन के दौर में पैदा हुआ होता तो इन्तिहाई अदबों एहतिराम से उनसे पूछता कि ऐ मादरे गिरामी , रसूलल्लाह (स.अ.व.व) की नमाज़ के वक़्त उनके सामने मैय्यत की तरह आपका पड़ी रहना ये ज़ाहिर करता है कि आपका हुजरा इतना तंग था कि उसमें छुली छुलय्या खेलने की गुन्ज़ाइश नहीं थी , आख़िर ये छुली छुलय्या खेलने कहां जाती थी ? किसी और के घर में ?
1. मसनद अहमद बिन हम्बलः- जिल्द 6, पेज न. 157, बुख़ारी बाब हसुनुल मुआशिरत पेज न. 780
2. अल मुअल्लिम तरज़मा मुस्लिमः- जिल्द 2 पेज न. 536, मज़ाहिरे हक़ः- जिल्द 3, पेज न. 162
आयशा फ़रमाती हैं कि मैं आं हज़रत (स.अ.व.व) के कपड़ों से मनी ख़ुरच कर साफ़ कर देती थी और आप उसी को पहन कर नमाज़ पढ़ते थे। ( 1)
आयशा फ़रमाती हैं कि हालते हैज़ में आं हज़रत (स.अ.व.व) मेरे साथ मुबाशिरत फ़रमाते थे। ( 2)
आयशा फ़रमाती हैं कि हालते हैज़ में आं हज़रत (स.अ.व.व) अपनी अज़वाज के साथ कपड़ों के ऊपर से मुबाशिरत करते थे। ( 3)
आयशा फ़रमाती हैं कि मैं हालते हैज़ से होती थी और आं हज़रत (स.अ.व.व) मेरी गोद में सर रख कर क़ुर्आन की तिलावत किया करते थे। ( 4)
आयशा फ़रमाती हैं कि लड़कियों को आं हज़रत (स.अ.व.व) अपने कंधों पर बिठा कर नमाज़ पढ़ाते थे। ( 5)
आयशा फ़रमाती हैं कि हालते सौम में आं हज़रत मेरा मुंह चूमते थे और कभी कभी मेरी ज़बान अपने दहन में ले कर चूसा करते थे। ( 6)
अब मुसलमान खुद फ़ैसला करें कि एक ऐसी औरत जिसकी नफ़सानी , शहवानी , अख़लाक़ी , मुआशीराती , दीनी और ईमानी हालातों ख्यालात ऐसे नागुफ़्ताबह हों और जिस रसूल (स.अ.व.व) जैसी अज़ीमुश्शान व अज़ीमुल मरतबत हस्ती पर इस क़िस्म के बेहूदह , लग़्व नाजाइज़ और तहज़ीब से गुज़रे हुए इलज़ामात आइद करते हुए शर्म , हया और ग़ैरत न आती हो और न जिसे अपने शौहर की अज़मत , बुज़ुर्गी औ वक़ार का पासो लिहाज़ हो। इस्लाम और हले इस्लाम की नज़र में किस हैसियत की हामिल हो सकती है और किस नज़र से देखी जा सकती है।
1. अल मुअल्लिम तरजुमा सहीह मुस्लिमः- जिल्द 1, पेज न. 468
2. बुख़ारीः- जिल्द 1 पेज न. 40- 46, किताबुल हैज़ अल मोअल्लिम तरजुमा मुस्लिमः- जिल्द 1 पेज न. 474, 489 मदारेजुन्नुबूव्वत जिल्द 2 पेज न. 601 सहीह मुस्लिम जिल्द 1 पेज न. 41
3. मसनद अहमद बिन हम्बलः- जिल्द 6 पेज न. 37
4. बुख़ारीः- जिल्द 1, पेज न. 41, मिशकातः- पेज न. 56
5. नसरूल बारी तरजुमा सहीह बुख़ारीः- जिल्द 1, पेज न. 2000, एहकामुल मसाजिद , मसनद अहमद बिन हम्बलः- जिल्द 6 पेज न. 101
6. बुख़ारीः- जिल्द 1, पेज न. 211
अबू बकर बिन हफ़स का बयान है कि मैंने अबू सलमा से सुना , वो कहता है कि मैं आयशा के भाई के हमराह आयशा के पास इस ग़रज़ से गया कि उनसे ये मालूम करूं कि रसूल अल्लाह (स.अ.व.व) किस तरह और कितने पानी से ग़ुस्ल फ़रमाते थे ?
हज़रत आयशा ने एक बरतन में सवा सेर पानी मंगवाया और परदह दर्मियान में डाल कर ग़ुस्ल किया इस तरह कि पानी अपने सर पर डाला। ( 1)
पूछने वाले इस लिए गये थे कि उम्मुल मोमिनीन से ग़ुस्ल का तरीक़ा मालूम करें और मुअज़्ज़मा ने ग़ुस्ल कर के अमली तौर पर बता भी दिया , लेकिन दर्मियान में परदह हाइल था। पूछने वालों को बग़ैर देखे ग़ुस्ल का तरीक़ा क्यों कर मालूम हुआ ? अक़्ल में सिर्फ़ एक बात आती है और वो ये कि परदह बारीक था उधर की चीज़ इधर दिखाई दे रही थी।
एक दिन आयशा के घर की तरफ़ इशारा करते हुए मुख़बिरे सादिक़ (स.अ) ने मस्जिद में बालाए मिम्बर इरशाद फ़रमायाः-
इस घर में फ़ितना है और यहीं से शैतान अपनी सींग निकालेगा। ( 2)
एक बार हज़रत अली (अ.स) की मौजूदगी में रसूले अकरम (स.अ.व.व) ने आयशा से फ़रमायाः-
मेरी बीवियों में एक बीवी मेरे इब्ने अम पर ख़ुरूज करेगी।
आं हज़रत (स.अ.व.व) की ज़बाने मुबारक से ये फ़िरक़ा सुन कर आयशा बेइख़्तियार हंस पड़ी तो आपने मज़ीद फ़रमायाः-
ऐ आयशा कहीं वो तुम न हो।
फिर अली (अ.स) से मुख़ातिब हुए और कहाः-
अगर इसका मामला तुम्हारे सिपुर्द हो जाये तो इसके साथ नर्मीं करना। ( 3)
एक बार फिर आपने आयशा से फ़रमायाः-
मेरी एक बीवी सुर्ख़ ऊँट पर सवार हो कर अली पर ख़ुरूज करेगी और उस पर हव्वाब के कुत्ते भौंकेगें। ( 4)
रसूल अल्लाह (स.अ.व.व) इन पेशिन गोईयों के ज़रिये आयशा को आगाह भी कर रहे थे और हुज्जत भी तमाम कर रहे थे वरना आप जुम्ला हालात से बख़ूबी वाक़िफ़ और बा ख़बर थे।
1. बुख़ारीः- जिल्द 1 पेज न. 39, किताबुल ग़ुस्ल तबआ मुजतबाई 1332 हिजरी
2. बुख़ारीः- जिल्द 2 पेज न. 132 (मिस्र)
3. अबुल फ़िदाः- जिल्द 2 पेज न. 71, (मिस्र) सवाइक़े मुहर्रिक़ाः- पेज न. 71 (मिस्र)
4. अबुल फ़िदाः- जिल्द 2 पेज न. 71, अवाहिबः- जिल्द 2 पेज न. 95
क़त्ले उस्मान के ख़ुसूसी मुजरिम तल्हा इब्ने उबैदुल्लाह के लिए हज़रत आयशा के दिल में किस क़िस्म के ख़्यालातो जज़्बात थे ? ख़ुदा जाने। तारीख़ें तो हमें यही बताती हैं कि मिस्टर तल्हा अकसर ये कहा करते थे कि रसूलल्लाह (स.अ.व.व) की वफ़ात के बाद मैं आयशा से अक़्द करूंगा। ( 1)
तुम्हारे लिये ये हर्गिज़ जाइज़ नहीं कि तुम रसूल को अज़ीयत दो और उनके बाद उनकी बीवियों से अक़्द का इरादा करो। ( 2)
ये अम्र ग़ौर तलब है कि तल्हा की इस ग़ुस्ताख़ी और दरीदा दहनी पर बरहम व नाराज़ होने के बजाय हज़रत आयशा ने सिर्फ़ ख़ामोशी इख़्तियार की बल्कि ऐसे कमीना ख़सलत इन्सान के हर फेल में सहीमों शरीक रहीं , यहां तक कि उसकी रिफ़ाक़त में आपने अपनी ग़ैरत , हया और शर्म को बालाए ताक़ रख कर ख़ुदा और रसूल की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ क़दम उठाया और घर का गोशा छोड़ कर वो तवील सफ़र इख़्तियार किया जिसकी मन्ज़िल जमल में हज़रत अली के ख़िलाफ़ महाज़ अराई पर ख़त्म हुई।
इसके बरअक्स हज़रत आयशा अमीरूल मोमिनीन से महज़ इस बात पर तमाम उम्र बरहमों बरग़शता रहीं कि अफ़क़ के मामलें में उन्होंने रसूलल्लाह (स.अ.व.व) को ये मशवरह दिया था कि ये (आयशा) आपकी जूती का तसमा है , तलाक़ दे कर उससे पीछा छुड़ाइये , आपके लिए औरतों की कमी नहीं है।
यक़ीनन ये वाक़िआ ऐसा है जो उम्मुल मोमिनीन के बातिनी किरदार का आईनादार है।
दूसरा अफ़सोस नाक वाक़िया माविया के फ़ासिक़ो फ़ाजिर बेटे यज़ीद से मुताल्लिक़ है , जिसने 29 साल की उम्र में हज़रत आयशा से अक़्द की ख़्वाहिश का इज़हार कर के मुअज़्ज़मा के 65 साला बुढ़ापे को चक्कर में डाल दिया था , शाह अब्दुल हक़ मुहद्दिसे देहल्वी फ़रमाते हैः-
किताबों में मिलता है कि यज़ीदे शक़ी ने हज़रत आयशा से निकाह की ख़्वाहिश का इज़हार किया , लोगों ने उसे बहुत समझाया और इस इरादा ए बद से बाज़ रखने के लिए क़ुर्आन की आयत पढ़ी कि नबी की बीवी से निकाह नाजाइज़ है तब कहीं जा कर वो मन्हूस बाज़ आया। ( 3)
कौन कह सकता है कि यज़ीदे मलऊन के इस ख़बीस इरादे में इस्लाम और पैग़म्बरे इस्लाम की तौहीनों तज़लील का जज़्बाकार फ़रमा नहीं था , बड़ी ख़ैरियत हुई की आयत आयशा के हक़ में सिपर बन गयी वरना इस कमबख़्त की जवानी मुअज़्ज़मा के बुढ़ापे की मिट्टी ख़राब कर देती। अब ऐसी सूरत में अगर कोई शख़्स तल्हा और यज़ीद पर लानत करे तो उसके इस फेल को हक़ ब जानिब क्यों न कहा जाय।
1. दर मन्सूरः- जिल्द 5 पेज न. 214 (मिस्र)
2. क़ुर्आने मजीदः- पा. 22, आयत 54
3. मदारिजुन्नुबूव्वतः- जिल्द 1, पेज न. 266
हज़रत मोहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम से इमामे हसन असकरी (अ.स) तक मासूमों की फ़ेहरिस्त में कोई मासूम ऐसा नहीं है जो शहादत के दर्जे पर फ़ाइज़ न हुआ हो। किसी को ज़हर दिया गया और किसी की शहादत तलवार से वाक़े हुई। इन तमाम शहीदों की सफ़ में एक मासूमा भी शामिल हैं जो उमर इब्ने ख़त्ताब की शमशीरे ज़ुल्म से मनसबे शहादत पर फ़ाइज़ हुईं। इन तमाम मासूमों की शहादत का हाल किताबों में मरक़ूम है लेकिन रसूले अकरम की शहादत पर उलमाए अहले सुन्नत की तरफ़ से अख़फ़ाए जुर्म और शिया उलमा की तरफ़ से चश्मपोशी , ख़ामोशी और रवादारी के मज़ाजी पर्दे पड़े हुए हैं जिसकी वजह से मुसलमानों की अकसरियत अपनी नावाक़िफ़ियत की बिना पर हुज़ूर की शहादत को वफ़ात से ताबीर करती है। उन परदो को चाक होना चाहिये और हक़ीक़त को सामने आना चाहिये जैसा कि अमीरूल मोमिनीन हज़रत अली इब्ने अबी तालीब (अ.स) का इरशाद है कि हक़ बात कहो वो अपने ही ख़िलाफ़ क्यों न हो।
सहीह बुख़ारी , सिर्रूल आलमीन , अलवाफ़ि और मिशक़ात की रवायतों से इस बात की निशानदेही होती है कि सरवरे कायनात (स.अ.व.व) को आपकी अलालत के दौरान मदीने में ज़हर दे कर शहीद किया गया। ( 1)
इस इनकिशाफ़ के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि ख़ैबर में ज़हर ख़ूरानी की तशहीर महज़ धोका थी और इसी जुर्म को छिपाने की ग़रज़ से अमल में लाई गयी थी।
(इस किताब को आप “अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क ” पर पढ़ रहे है।)
अब सवाल यह पैदा होता है कि हुज़ूर (स.अ.व.व) को ज़हर देने वाला कौन था ? इसके जवाब में किताबें ख़ामोश हैं लिहाज़ा ऐसी सूरत में ज़रूरी है कि हक़ीक़त की तह तक पहुंचने के लिए रसूल (स.अ.व.व) के आख़िरी दौर में रूनुमा होने वाले उन हालात पर नज़र डाली जाए जिनके पस मन्ज़र में ज़हर दिये जाने के इमकानात मसतूरो मुज़्मर हैं।
तारीख़ गवाह है कि रसूल (स.अ.व.व) की ज़िन्दगी के आख़िरी दौर यानी 8 हिजरी के अवाइल में कुछ मफ़ाद परस्तों और शर पसन्दों ने आपके ख़िलाफ़ साज़िशों का आग़ाज़ कर दिया था। जिसकी सब से बड़ी दलील सूरा ए मुनाफ़िक़ून का नुज़ूल है। ये तमाम साज़िशें रसूलल्लाह (स.अ.व.व) के इर्द गिर्द रहने वाले अफ़राद और मुनाफ़ित सहाबा की आग़ोशे मुनाफ़िक़न में पल और बढ़ रही थी। ख़ास सबब ? पैग़म्बर (स.अ.व.व) की जानशीनी , इस्लामी क़यादत और इक़्तिदारी का मस्अला था।
इन साज़िशों में शिद्दत और सुरअत उस वक़्त पैदा हुई जब 9 हिजरी में पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व) तीस हज़ार का लश्कर लेकर शहनशाहे रूम (हरक़ल) के मुक़ाबिले को निकले और तबूक नामी बसती में बीस रोज़ तक क़ियाम फ़रमाया। मगर चूंकि जंग की नौबत नहीं आयी इस लिए इक्कीसवें दिन हुज़ूरे अकरम को लौट आना पड़ा।
वाज़ह रहे कि इस मारके में रसूले अकरम (स.अ.व.व) तमाम जंगों के फ़ात्ह अली को अपने हमराह नहीं ले गये थे जिस पर अमीरूल मोमिनीन कबींदह ख़ातिर हुए थे और आपने पैग़म्बर (स.अ.व.व) से शिकवा भी किया था। हुज़ूर ने फ़रमाया कि ऐ अली ! ? तुम मेरे जानशीन और ख़लीफ़ा हो इस लिये तुम्हारा यहां रहना और मेरा वहां जाना ज़्यादा मुनासिब है। ( 2)
तज़किरा ए ख़वासुल उम्मा में है कि पैग़म्बर (स.अ.व.व) ने फ़रमाया कि ऐ अली ! क्या तुम इस बात पर ख़ुश नहीं हो कि तुमको मुझसे वही निसबत है जो हारून को मूसा (अ.स) से थी। ( 3)
कनज़ूल आमाल में है कि हुज़ूरे अकरम (स.अ.व.व) ने फ़रमाया कि ऐ अली ! मैं तुम्हें इस लिये अपने साथ नहीं ले गया कि तुम ही मेरे बाद उम्मत के ख़लीफ़ा और मेरे जानशीन हो। मदीने की हालत सिर्फ़ मेरे और तुम्हारे रहने से ही दुरूस्त रह सकती है। ( 4)
यक़ीनन दहने रिसालत से निकले इन जुमलों से साज़िशी ये समझ गये होंगे कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व) ने हज़रत अली (अ.स) को अपना जानशीन और ख़लीफ़ा मुक़र्रर करना तय कर लिया है और शायद यही वजह थी इनही साज़िशों ने रसूले अकरम (स.अ.व.व) की शम्मे हयात गुल करने की नापाको नाकाम कोशिश भी की जो तारीख़ में वाक़ेए उक्बा के नाम से मशहूर है।
इसमें कोई शक नहीं कि ये इक़्दाम इस्लाम में पहला शैतानी इक़दाम था। इज़माल यह है कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व) का नाका तबूक़ की वापसी पर उक़्बा नामी पहाड़ी की ख़तरनाक ढलानों से गुज़र रहा था , रात तारीक थी और उसी तारीकी में मुनाफ़िक़ीन अपने चेहरों को नक़ाब से छिपाये ख़तमी मरतबत को मौत के घाट उतारने के लिए घात लगाये खड़े थे कि इतने में बएजाज़े इलाही बिजली चमकी और उसकी रौशनी इतनी देर तक क़ायम रही कि पैग़म्बर (स.अ.व.व) ने उन सब को पहचान लिया और नाक़े की मेहार थामे हुए हुज़ैफ़ाए यमानी (र) को उनके नामों से आगाह कर दिया लेकिन इस के साथ ही ये ताक़ीद भी फ़रमा दी कि किसी से इसका तज़किरह न करना वरना फ़साद बरपा हो जाएगा। ( 5)
तारीख़ ये बताती है कि इस वाक़िए के बाद हज़रत उमर हुज़ैफ़ा से अकसर पूछा करते थे कि क्या साज़िशी मुनाफ़िक़ीन में मेरा नाम भी शामिल है। ( 6)
हुज़ैफ़ा उमर के इस सवाल पर हमेशा ख़ामोश रहे , आख़िरकार वो वक़्त भी आ गया कि दमाग़ी कचोकों और क़ल्बी टहोंकों से मजबूर हो कर हज़रत उमर ने ख़ुद ब ख़ुद ये एतिराफ़ कर लिया कि , ऐ हुज़ैफ़ा ख़ुदा की क़सम मैं भी उन मुनाफ़िक़ीन में शामिल हूं जो रसूलल्लाह (स.अ.व.व) को मौत के घाट उतारना चाहते थे। ( 7)
इस अफ़सोस नाक वाक़िये के बाद व हिजरी में एक वाक़िआ और रूनुमा हुआ जिसने मुनाफ़िक़ीन की साज़िशी मसरूफ़ियात में मज़ीद तेज़ी पैदा कर दी , और वो यह है कि माहे ज़िल्हिज में पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व) ने तीन सौ मुसलमानों का एक काफ़िला अबू बकर की सरबराही में मदीने से मक्के की तरफ़ बग़रज़े हज रवाना किया और इसके साथ ही सूरा ए बराअत भी अबू बकर के हवाले कर के ये हुक्म सादिर फ़रमाया कि वो इसकी तब्लीग़ हज के मौक़े पर कर दें। हज़रत अबू बकर ने अपने मुक़द्दर पर नाज़ किया और काफ़िला लेकर रवाना हो गये। अभी कुछ ही दूर काफ़िला पहुंचा था कि जिब्रील नाज़िल हुए और उन्होंने फ़रमाया कि या रसूलल्लाह (स.अ.व.व) परवर दिगारे आलम का ये हुक्म है कि सूरा ए बराअत की तब्लीग़ आप ख़ुद फ़रमायें या उसके हवाले करें जो आपकी ज़ुर्रियत में शामिल हो , कोई दूसरा शख़्स इस काम को अंजाम देने का मजाज़ नहीं है।
इस हुक्म के मौसूल होते ही रसूल (स.अ.व.व) ने अपने इब्ने अम हज़रत अली इब्ने अबी तालिब (अ.स) को तलब किया और उन्हें इस तब्लीग़ी मनसब पर फ़ाइज़ करते हुए ये इरशाद फ़रमाया कि तेज़ी से जाओ और अबू बकर से सूरा ए बराअत वापस ले कर उन्हें मदीने भेज दो। चुनान्चे अबू बकर जब हज से महरूमी और तबलीग़ से माज़ूली का ग़म ले कर मदीने वापस आये तो रसूल (स.अ.व.व) के सामने फूट फूट कर रोने लगे। ( 8)
एक रवायत ये भी है कि अबू बकर के साथ उमर भी तब्लीग़ पर मामूर हुए थे और वो भी माज़ूल किये गये।
ज़ाहिर है कि हज़रत आयशा अबू बकर की बेटी थीं लिहाज़ा बाप की इस तौहीनो तज़लील पर उन्हें फ़ितरी तौर पर सदमा ज़रूर हुआ होगा।
10 हिजरी में पैग़म्बर (स.अ.व.व) ने आखिरी फ़रीज़ा ए हज अदा किया अल्लामा तरीही का कहना है कि इस हज के मौक़े पर अबू बकर , उमर , अबू उबैदह , अब्दुर्रहमान और सालिम (हुज़ैफ़ा का ग़ुलाम) ने ख़ाना ए कआबा में ये अहद किया कि वो ख़िलाफ़त को बनी हाशिम में नहीं जाने देंगे।
अल्लामा की तहरीर से ये इन्किशाफ़ भी होता है कि उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा इस साज़िशी गिरोह की सरगर्म मेम्बर थीं।
अंग्रेज़ मुवर्रिख़ डेविन पोर्ट अपनी किताब तारीख़े ख़िलाफ़त में लिखता है कि रसूल (स.अ.व.व) की ज़िन्दगी ही में ये मस्अला तय हो चुका था कि हज़रत अली (अ.स) जो हर तरह ख़िलाफ़त के हक़दार हैं अपने हक़ को पहुंचने न पायें।
लुत्फ़ की बात तो यह है कि एक तरफ़ साज़िशी हज़रत अली (अ.स) को ख़िलाफ़त से महरूम रखने के लिए कोशां थे और दूसरी तरफ़ परवर दिगारे आलम अपने हबीब को ये हुक्म दे रहा था कि जब तुम हज से फ़ारिग़ हो चुको तो अपना जानशीन मुक़र्रर कर लो। ( 9)
ग़रज़ कि रसूल जब हज से फ़ारिग़ हुए और उनके साथ एक अज़ीम काफ़िला पलटा तो रास्ते में ग़दीरे ख़ुम के मक़ाम पर जलाले किबरिया का आईना बनकर ये आयत नाज़िल हुई कि ऐ रसूल (स.अ.व.व) जो तुम पर नाज़िल किया गया है उसे फ़ौरी तौर पर पहुंचा दो और अगर तुमने ऐसा न किया तो गोया रिसालत का कोई काम अन्जाम ही नहीं दिया। ख़ुदा तुम्हें मुनाफ़िक़ीन के शर से महफ़ूज़ रखेगा। ( 10)
अब रसूल के लिए ताख़ीर मुम्किन नहीं थी चुनान्चे आपने ज़ुल अशीरा में किये गये वादे के मुताबिक़ मनकुन्तो मौला ही फ़हाज़ा अलीयुन मौला कह कर अली को अपना जैसा हाकिम बना दिया। ( 11)
अबनाअना , निसाअना , वअनफ़ोसना की अमली तफ़सीर के ज़रिये अहलेबैत (अ.स) में शामिल जुमला अफ़राद का ताअर्रूफ़ भी करा दिया।
साज़िशायों और साज़िशों से पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व) हर्गिज़ बे ख़बर नहीं थे अगर बे ख़बर होते तो अपनी ज़िन्दगी के आख़िरी अय्याम में ऐसे अहकाम सादिर न फ़रमाते जिनसे आक़ाबिरीने सहाबा ने न सिर्फ़ इख़तिलाफ़ किया बल्कि ऐसी नाफ़रमानियों और ग़ुस्ताख़ियों के मुर्तकिब हुए कि सरकारे दो आलम को लानत जैसा अबदी हर्बा इस्तेमाल करना पड़ा।
अपनी अलालत और शहादत के दरमियान रसूले अकरम (स.अ.व.व) ने उम्मत को इन्तिशारों इफ़्तिराक़ और दाएमीं फ़िर्क़ा बन्दी से बचाने के लिए बड़े ही हकीमाना अन्दाज़ में लशकर की तशकील की जिसकी सरबराही और क़यादत पर असामा बिन ज़ैद को मामूर फ़रमाया।
ख़तमी मरतबत ने इस लशकर में हज़रत अली (अ.स) और चन्द मख़सूस सहाबा को छोड़ के तमाम अंसारों मुहाजिरीन और आयाने मदीना के हमराह अबू बकरो , उमरों उस्मान , सअद इब्ने अबी विक़ास , उबैदए जर्राह , अब्दुर्रहमान बिन औफ़ , तल्हा और ज़ुबैर वग़ैरह को भी शामिल किया और उन्हें ये ताजीली हुक्म दिया कि सब लोग बग़ैर किसी ताख़ार के मदीना छोड़ के असामा के साथ महाजे जंग पर रवाना हो जायें।
असामा बिन ज़ैद हुक्में पैग़म्बर (स.अ.व.व) के मुताबिक़ लशकर लेकर मदीने से रवाना हुए मगर अभी सिर्फ़ तीन मील का रास्ता तय हुआ था कि उन्हें ज़रफ़ नामी एक मक़ाम पर ठहर जाना पड़ा , इसका सबब ये था कि अबू बकर वग़ैरह इस लशकर में शामिल नहीं हुए थे। ( 12)
असामा तीन दिन तक इन लोगों का इन्तिज़ार करते रहे मगर उन्हें न जाना था न गये। अलबत्ता असामा को उम्मे ऐमन के तवस्सुल से हज़रत आयशा का ये पैग़ाम ज़रूर मौसूल हुआ कि पैग़म्बर (स.अ.व.व) की हालत नाज़ुक है , लिहाज़ा लशकर को पेशक़दमी करने के बजाय मदीने की तरफ़ वापस पलट आना चाहिये।
अबू बकर वग़ैरह की तरफ़ से असामा का तख़ल्लुफ़ और हज़रत आयशा की तरफ़ से हुक्में पैग़म्बर (स.अ.व.व) के ख़िलाफ़ लशकर को पलटाने का नारवा इक़्दाम हमें ये सोचने पर मजबूर करता है कि बाप और बेटी के दर्मियान ख़िलाफ़त के बारे में कोई तालमेल ज़रूर था और शायद आयशा की दूर रस निगाहों ने ये भी महसूस कर लिया था कि ख़िलाफ़त के बारे में पैग़म्बर को जिन लोगों से ख़तरा था उन्हें आप मदीने से बाहर भेज देना चाहते थे ताकि अली से कोई झगड़ा न कर सके। ये भी मुम्किन है कि आयशा ने लशकर को वापस पलटा कर रसूल के बाद ख़िलाफ़त के मस्अले पर साहिबे ज़ुल्फ़िक़ार के मुक़ाबले में अपने बाप को तहफ़्फ़ुज़ देने का ख़्याल किया हो।
बहर हाल तारिख़ी तजज़िये के बाद हर इन्साफ़ पसन्द शख़्स ये कहने पर मजबूर होगा कि हज़रत आयशा की इस हिकमते अमली ने रसूले अकरम (स.अ.व.व) के तमाम मनसूबों पर पानी फेर दिया।
इस वाक़ेए के बाद तमाम साज़िशी लोग खुल कर रसूल (स.अ.व.व) के सामने आ गये। इसकी मोहकम दलील ये है कि वक़्ते आख़िर जब सरकारे दो आलम ने मिल्लते मुस्लिमा को गुमराही से बचाने और ख़िलाफ़त के इशकाल को दूर करने के लिये क़लम , दवात और काग़ज़ तलब किया तो इन्हीं साज़िशियों ने मुख़ालिफ़त की और हंगामा बरपा किया। उमर इब्ने ख़त्ताब इस क़दर मुश्तइल हुए कि उन्होंने यहां तक कह दिया कि इस मर्द को इसके हाल पर छोड़ दो क्यों कि ये हिज़्यान बक रहा है। हमारे लिये ख़ुदा की किताब काफ़ी है। ( 13) मज़ीद किसी नविशते की ज़रूरत नहीं। ये बात अलाहिदा है कि उमर की इस ग़ुस्ताख़ी पर आं हज़रत (स.अ.व.व) ने उन्हें और उनके साथियों को अपने घर से निकाल बाहर किया। ( 14)
ये वो हादसात हैं जो पैग़म्बर (स.अ.व.व) के आख़िरी दौरे हयात में यके बाद दीगरे रूनुमा होते रहे। इनको तसलसुल ये बताता है कि इन तमाम वाक़िआत के पसे पर्दा सिर्फ़ हवसे इक़्तिदार का जज़्बाकार फ़रमा था और तमाम साज़िशी ये उम्मीद लिए बैठे थे कि किसी तरह रसूल (स.अ.व.व) की आंखे बन्द हों और अपने देरीना मनसूबों को अमली जामा पहना सकें। जैसा कि डॉक्टर मोहम्मद अबू बकर खां मलिहाबादी अपने एक मज़मून में तहरीर फ़रमाते हैः-
सादा लौह मुसलमान और चालाक मुनाफ़िक़ीन मरे नहीं थे बल्कि मुनाफ़िक़त की नक़ाब चेहरों पर डाले मुसलमानों में घुल मिल गये थे और उस दिन का इन्तिज़ार कर रहे थे कि पैग़म्बर (स.अ.व.व) की आंखे बन्द हो और वो सल्तनते इस्लामी पर क़ब्ज़ा करके ख़ूब गुलछर्रे उड़ायें। ( 15)
अज़मतों इक़्तिदार की भूकी शख़्सियतें कितनी परेशान थीं और साज़िशी गिरोह के अरकान पर ख़िलाफ़त का भूत किस हद तक सवार था इसका अन्दाज़ा हज़रत आयशा के उस बयान से होता है जिसमें आप फ़रमाती हैं किः-
वक़्ते आख़िर पैग़म्बर (स.अ.व.व) ने मुझसे फ़रमाया कि मेरे हबीब को बुलाओं तो मैंने अपने वालिद अबू बकर को बुलाया आं हज़रत (स.अ.व.व) ने उन्हें देखा तो मुंह फेर लिया। कुछ तवक़्क़ुफ़ के फिर फ़रमाया कि मेरे हबीब को बुलाओ तो मैंने उमर को बुलाया। उन्हें भी देख कर आं हज़रत (स.अ.व.व) ने मुंह फेर लिया। तीसरी मरतबा फिर फ़रमाया कि मेरे हबीब को बुलाओ तो मैंने अली को तलब किया जब वो आए तो सरकारे दो आलम (स.अ.व.व) ने उन्हें अपनी चादर में ले लिया और उस वक़्त तक अपने सीने से लगाये रहे जब तक कि आपकी रूह आपके जिस्म से परवाज़ न कर गयी। ( 16)
हज़रत आयशा के मज़कूरह बयान पर ग़ौर करने से मुन्दर्जा ज़ैल बातों का इन्किशाफ़ होता है।
1. ये कि दौराने अलालत पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व) के पास साज़िशियों और आयशा के अलावा ख़ानदाने बनी हाशिम में से कोई मौजूद नहीं था।
2. पैग़म्बर (स.अ.व.व) के मुताल्लेक़ीन और क़राबतदारों को पैग़म्बर (स.अ.व.व) की क़ुर्बत से अलग रखा गया था।
3. हज़रत आयशा की नीयत साफ़ न थी वरना वो रसूल (स.अ.व.व) की पहली ही आवाज़ पर हज़रत अली (अ.स) को तलब करतीं क्यों कि वो जानती थीं कि ख़ुदा को हबीब हज़रत अली के अलावा और कोई नहीं हो सकता।
4. हज़रत आयशा ने ऐसे लोगों को क्यों तलब किया जो साज़िशी गिरोह के मुखिया थे और जिनके मकरूह चेहरों को देख कर पैग़म्बर (स.अ.व.व) ने अपना मुंह फेर लिया।
इन तमाम उमूर का ख़ास सबब आले रसूल (स.अ.व.व) और अली (अ.स) से हज़रत आयशा की बुनियादी दुशमनी थी जैसा कि अंग्रेज़ मुवर्रिख़ मिस्टर गिबन का कहना है किः-
रसूल का बिसतरे मरज़ आयशा जैसी चालाक औरत के मुहासिरे में था जो अबू बकर की बेटी और अली की बदतरीन दुश्मन थीं। ( 17)
शम्सुल उलमा डिप्टी नज़ीर अहमद फ़रमाते हैः-
आयशा इब्तिदा ए अलालत से तादमें मर्ग पैग़म्बर (स.अ.व.व) के पास से न खिसकीं। ( 18)
इसकी वजह मौसूफ़ ये बयान करते हैं किः-
वो (आयशा) दिल से बाप की इमामत और ख़िलाफ़त सभी कुछ चाहती थीं। ( 19)
अपने बाप के लिए आयशा की तमन्नाऐं ख़िलाफ़त के बारे में शम्सुल उलमा का नज़रिया सौ फ़ीसद दुरूस्त है , मगर अबू बकर की इमामत यानी पेश नमाज़ी की फ़रसूदह दास्तान से मुझे क़तई इत्तिफ़ाक़ नहीं है हालांकि इस दास्तान को तमाम मुवर्रेख़ीनों मुहद्दिसी ने हज़रत आयशा की ज़बान से बयान किया है , और मौसूफ़ भी तहरीर फ़रमाते हैः-
तसफ़ीया ए ख़िलाफ़त के वक़्त इसी इमामत को ख़िलाफ़ते अबू बकर के लिए ताज़ह सनद गर्दान कर इसी बिना पर सहाबा ने बिल इजमाअ हज़रत अबू बकर को पैग़म्बर साहब का ख़लीफ़ा तस्लीम कर लिया। ( 20)
तारीख़े शाहिद हैं कि अबू बकर मुनाफ़िक़ भी थे और मुशरिक भी। ( 21)
इसके अलावा अगर अबू बकर में इस्लामी और दीनी उमूर की सलाहियत होतीं तो वो सूरा ए बराअत से माज़ूल न किये जाते या असामा के लशकर से तख़ल्लुक़ की बिना पर पैग़म्बरे इस्लाम उन पर लानत न फ़रमाते। भला ये कैसे मुम्किन था कि रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व) किसी ऐसे शख़्स को अपनी जगह पेशनमाज़ी जैसे अहम फ़रीज़े के लिए नामज़द करते जो मुनाफ़िक़ भी हो , मुशरिक भी हो , लानती भी हो और बहुक्मे ख़ुदा क़ुर्आन के तबलीग़ी मनसब से माज़ूल भी किया गया हो। फिर ख़ुद अबू बकर ने भी सक़ीफ़ा में बैअत के मौक़े पर इस दलील को ख़िलाफ़त की बुनियाद नहीं बनाया कि मैं मस्जिदे नब्वी में का इमामे जमाअत हूं और पैग़म्बरे इस्लाम ने मुझे इस मनसब पर फ़ाइज़ किया है और न ही उमर ने इस दलील की तरफ़ अबू बकर की तवज्जो मबज़ूल कराई और न आयशा ने अपने वालिदे मोहतरम को ख़िलाफ़त के अखाड़े में भेजते वक़्त ये कहा कि आपकी ख़िलाफ़त के लिए आपकी इमामत की दलील मोहकम और काफ़ी है। अबू बकर जब ख़लीफ़ा बनने के बाद तख़ते ख़िलाफ़त पर मुतमक़्क़िन हुए तो दरबारे ख़िलाफ़त में उन्होंने हज़रत अली के सामने भी इस्तेहक़ाक़े ख़िलाफ़त के बारे में इस दलील को पेश नहीं किया। बहरहाल मेरे नज़दीक इस वाक़िए की कोई हक़ीक़तों अहमियत क़तई नहीं हैं ये सिर्फ़ मनगढ़त फ़र्ज़ी और बनी उमय्या की इख़तिराअ है जिसे हज़रत आयशा की तरफ़ मनसूब कर दिया गया है।
हक़ीक़त यही है कि पैग़म्बरे इस्लाम की हयात के आख़िरी दौर में हुज़रा (स.अ.व.व) के ख़िलाफ़ जुम्ला साज़िशों और साज़िशी गिरोह की तमामतर सरगर्मियां और महाज आराइयां सिर्फ़ और सिर्फ़ ख़िलाफ़त की बाज़याबी के लिये थी। हज़रत आयशा चूंकि अबू बकर की बेटी थीं लिहाज़ा फ़ितरी तौर पर उनकी दरपर्दा कोशिश ये थी कि रसूलल्लाह (स.अ.व.व) के बाद ख़िलाफ़त की बागडोर उनके बाप अबू बकर के हाथों में रहे मगर ये काम आसान नहीं था , क्यों कि पैग़म्बर आख़िरी हज से वापसी के दौरान ग़दीर में बहुक्में ख़ुदा हज़रत अली की ख़िलाफ़तो विलायत का एलान कर के तक़रीबन दो लाख मुसलमानों की मौजूदगी में उन्हें अपना जानशीन और ख़लीफ़ा मुक़र्रर कर चुके थे। अब मस्अला सिर्फ़ उम्मते मुस्लिमा की तरफ़ से अली की ख़िलाफ़त पर अमल दर आमद का था जिसके बारे में पैग़म्बर ख़ुद भी ये महसूस कर रहे थे कि जब साज़िशी गिरोह के अफ़राद मदीने में मौजूद हैं , मुसलमानों को अली की ख़िलाफ़त पर मुत्तफ़िक़ो मुत्ताहिद होने न देंगे इस लिये आप तमाम साज़िशियों को असामा बिन ज़ैद के लशकर में शामिल कर के मदीने से बाहर महाज़े जंग पर रवाना कर देना चाहते थे ताकि बाद में कोई झगड़ा ही न रहे। मगर हज़रत आयशा ने अपने सियासी जोड़ तोड़ से पैग़म्बर (स.अ.व.व) के इस मनसूबे को नाकाम बना कर अपने मक़सद में कामयाबी हासिल कर ली। जिसका नतीजा ये हुआ कि इस्लाम में फ़ितनाओं फ़साद के दरवाज़े खुल गये और मुसलमान तिहत्तर फ़िरक़ों में तक़सीम हो गये।
(इस किताब को आप “अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क ” पर पढ़ रहे है।)
हुसूले ख़िलाफ़त की इस रस्साकशी के अलावा दूसरा अहमतरीन - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - -
1. बुख़ारीः- जिल्द 3, पेज न. 127, बाबुल लदु किताबुल तिब तबअ मिस्र 1314 हिजरी सिर्रूल आलमी बइमाम ग़ेज़ाली तबअ बम्बईः- पेज न. 7 अल्वाफ़ीः- जिल्द 1 पेज न. 166 बहवाला ए तहज़ीबुल एहकाम मिश्कात बाबः- 3, पेज न. 85.
2. इज़ालतुल ख़ुल्फ़ाः- जिल्द 2 पेज न. 261
3. तज़किरा ए ख़वासुल उम्माः- पेज न. 12
4. कन्ज़ुल आमालः- जिल्द 6 पेज न. 404
5. तारीख़े ख़मीसः- जिल्द 2 पेज न. 144
6. मदारिजुन्नुबूव्वतः- जिल्द 2 पेज न. 302
7. मीज़ानुल एतिदाल तरजुमा ज़ैद बिन वहबः- जिल्द 1 पेज न. 336, मतबअ लखनऊ
8. बुख़ारीः- जिल्द 6 पेज न. 238, फ़तहुल बारीः- जिल्द 10 पेज न. 194, तारीख़े ख़मीसः- जिल्द 2 पेज न. 156 दर मन्सूरः- जिल्द 2 पेज न. 156 जिल्द 3 पेज न. 110 कन्ज़ुल आमालः- जिल्द 1 पेज न. 146
9. इबशेराह आयतः 7
10. माइदहः- आयतः 67
11. तफ़सीर दर मन्सूरः- जिल्द 2 पेज न. 398
12. कामिलः- जिल्द 2, पेज न. 120, तबरीः- जिल्द 3 पेज न. 188
13. बुख़ारीः- जिल्द 1 पेज न. 134, मुस्लिमः- जिल्द 5 पेज न. 76, सिर्रूल आलेमीनः- पेज न. 90
14. बुख़ारीः- जिल्द 3 पेज न. 701, मुस्लिमः- जिल्द 5 पेज न. 77
15. माख़ूज़ अलख़ुलफ़ाः- जिल्द 1 पेज न. 91
16. रियाज़ुन्नज़रहः- जिल्द 2, पेज न. 180
17. तारीख़े उरूजे ज़वाले सल्तनते रूमः- पेज न. 928
18. उम्माहातुल उम्माः- पेज न. 91
19. उम्माहातुल उम्माः- पेज न. 102
20. उम्माहातुल उम्माः- पेज न. 98
21. अलख़ुलफ़ाः- जिल्द 1 पेज न. 52 दरमन्सूरः- जिल्द 4 पेज न. 84, कन्ज़ुल आमालः- जिल्द 1 पेज न. 271, इज़ालतुल ख़ुल्फ़ाः- जिल्द 1 पेज न. 199, तफ़सीरे कबीर बर हाशिम फ़तहुल बयान ज़. 5 पेज न. 229 (मिस्र)
रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम के अहद में हज़रत आयशा की पूरी ज़िन्दगी खेलकूद , हंगामा आराई , धमा चौकड़ी , नफ़रतो अदावत , रश्को हसद इख़तेलाफ़ और लड़ाई झगड़े में गुज़री जिसकी वजह से रसूल को भी बाज़ मवाक़े पर सख़्त अज़ीयतों और दुशवारियों में मुब्तिला होना पड़ा।
रसूलल्लाह (स.अ.व.व) की शहादत के बाद आपकी मनचली तबीअत क़दरे सन्जीदगी की तरफ़ माएल हुई। अबू बकर का ज़माना आपकी ज़िन्दगी और शख़्सियत साज़ी का बेहतरीन ज़माना था। बाप की हुकूमत का सुकूनों आराम मयस्सर था , ख़ुशहाली और कामरानी आपके क़दमों में थी , सियाह-सफ़ेद का इख़्तियार हासिल था , गोया आप मलका ए वक़्त थीं और कुल सल्तनत आप ही की थी।
इब्ने सअद का कहना है कि अहदे अबू बकरो उमर में हज़रत आयशा फ़तवे दिया करती थीं और अकाबेरीने सहाबा उनसे पैग़म्बर के अहकामात मालूम किया करते थे। ( 1)
अबू बकर के बाद उमर के दौरे हुकूमत में भी आपको वही अज़मतों मन्ज़ेलत मयस्सर रही। ख़लीफ़ा ए वक़्त ने तमाम अज़्वाजे रसूल का सालाना वज़ीफ़ा दस हज़ार मुक़र्रर किया था लेकिन आपकी ख़ुसूसी मुराआत के तहत बारह हज़ार मिलते थे। ( 2)
(ज़ुक़वान) ग़ुलामे आयशा का बयान है कि एक मरतबा ईराक़ से उमर के पास एक सन्दूक भेजा गया जो बेशक़ीमत जवाहरात से भरा हुआ था , उमर ने लोगों से दर्याफ़्त किया कि अगर तुम लोग कहो तो मैं ये सन्दूक आयशा को दे दूं क्यों कि वह रसूल की चहीती हैं , सब ने मन्ज़ूर कर लिया और उमर ने वो सन्दूक आयशा को नज़्र कर दिया। ( 3)
हज़रत आयशा की क़द्रो मन्ज़िलत का अन्दाज़ा इस वाक़ेए से होता है कि 23 हिजरी में उमर आख़िरी हज के लिये तैय्यार हुए तो ज़ैनब और सौदा के अलावा दीगर उम्माहातुल मोमिनीन के साथ आयशा ने भी हज की ख़्वाहिश की जिसे उमर ने ब सरो चश्म मन्ज़ूर ही नहीं किया बल्कि ये हुक्म भी दिया कि सामाने सफ़र के साथ उम्मुल मोमिनीन के लिए ख़ुसूसी इन्तिज़ामात भी किये जायें और जुम्ला आसाइशें भी मुहय्यां की जायें।
चुनांचे अमारियां आरास्ता की गयीं और उन पर सब्ज़ रंग के ख़ुशनुमा पर्दे डाले गये। उस्मान बिन उफ़्फ़ान और अब्दुर रहमान बिन औफ़ ऊंटों की सारबरानी पर मुक़र्रर हुए और उम्मुल मोमिनीन इस शानो शौकत और जाहो जलाल के साथ दीगर अज़्वाज के हमराह हज के लिए रवाना हुईं कि उनके नाक़े के आगे उस्मान थे जो चीख़ चीख़ कर ये आवाज़ देते जाते थे कि...... होशियार........ ख़बरदार...... इधर को कोई रूख़ न करे और न नज़र उठा कर देखने की कोशिश करे अज़्वाजे पैग़म्बर के साथ उम्मुल मोमिनीन महवे सफ़र हैं। अब्दुर रहमान बिन औफ़ काफ़िले के पीछे चल रहे थे और उनकी भी वही हालत थी जो उस्मान की थी। ( 4)
उम्मुल मोमिनीन ज़ैनब और सौदा ने इस सफ़र में आयशा का साथ इस लिये नहीं दिया कि उनका कहना था कि अब ऊंट की पीठ हमें हरकत नहीं दे सकती। रसूले ख़ुदा के साथ हमने हज भी कर लिया और उमरा भी , अब हमारे लिये ख़ुदा का हुक्म यही है कि हम घर में बैठे।
ग़रज़ की हज़रत आयशा ख़ुसूसी तवज्जो और इनायात का अज़ीम मरकज़ थीं। ख़लीफ़ा ए सानी के दौर में उन्हें जो मरतबा हासिल हुआ वो किसी को भी नसीब न हो सका। आयशा भी उमर का पूरी तरह एहतिराम करती थीं और उन दोनों के क़ौलो अमल में बड़ी हद तक यकसानियत भी थी। बुख़ारी , बैअते उस्मान के वाक़ेआत में और इब्ने सअद ने तबक़ात में एक तवील रवायत नक़ल की है जिससे दोनों के ख़्यालात की हम आहंगी का पता चलता है , इस रवायत को नज़र अन्दाज़ कर देना ही मेरे ख़्याल से मुनासिब है।
अल्लामा इब्ने अबदरबा ने अक़्दे फ़रीद में मिम्बराने शूरा की ज़बानी उमर की गुफ़्तुगू नक़ल की है जिसका खुलासा ये है कि उमर की वसीयत ये थी कि मेरे बाद तुम लोग आयशा के हुजरे में ही ख़लीफ़ा का इन्तिख़ाब करना चुनान्चे उमर की तदफ़ीन हो चुकी तो मिक़दाद बिन अस्वद ने आयशा की मर्ज़ी से अरकाने शूरा को उनके घर में इकट्ठा किया , अमरे आस और मुगीरा बिन शैबा भी दरवाज़े पर आकर बैठ गये लेकिन सअद ने उन्हें पत्थर मार कर भगा दिया और कहा कि कल तुम दोनों भी अपने आप को मिम्बराने शूरा में शुमार करने लगोगे और लोगों से कहोगे कि हम भी शूरा में मौजूद थे। ( 5)
उमर ने अपनी ज़िन्दगी के आख़िरी लम्हों तक आयशा का पासो लिहाज़ किया और इम्तियाज़ी और तरजीही सुलूक़ को बदस्तूर रवा रखा और उन्हें इस क़ुव्वतो ताक़त का मालिक बना दिया कि बाद में वो हर हुकूमत से टकरायी और उसे लिए दर्दे सर बन गयी।
उमर अगर एक तरफ़ हज़रत आयशा की ज़ात से वालिहाना अक़ीदतों मुहब्बत रखते थे तो दूसरी तरफ़ अपने मौकिफ़ में इन्तिहाई सख़्त भी थे जिसका अन्दाज़ा उल्लामा मुहिबउद्दीन तबरी की इस रवायत से होता है। वो तहरीर फ़रमाते हैः-
जब अबू बकर का इन्तिक़ाल हो गया तो आयशा ने ग़म में सफ़े मातम बिछाई और गिरया ओ मातम का एहतिमाम किया। उमर को जब ये ख़बर मालूम हुई तो वो कुछ हमराहियों के साथ आ धमके और दरवाज़े पर खड़े हो कर अपनी गरजदार आवाज़ में गिरयाओ मातम से मना करने लगे मगर जब आयशा और दूसरी औरतें रोने से बाज़ न आयीं तो उमर ने हिशाम बिन ख़ालिद को हुक्म दिया कि घर में घुस जाओ और रोने वालियों को ज़बरदस्ती घसीट लाओ। हिशाम घर में अन्दर घुस गया और आयशा की बहन उम्मे फ़रवा को ख़ींचता हुआ बाहर ले आया। उमर ने रोने के जुर्म में उम्मे फ़रवा को इतने दुर्रे मारे कि वो लहू लुहान हो गयीं।
बज़ाहिर उम्मे फ़रवा और आयशा का जुर्म एक था मगर उमर ने उम्मे फ़रवा को जदोकोब करने के बाद आयशा को छोड़ दिया , शायद इस लिये कि उनकी हुकूमत आयशा की मरहूमे मिन्नत थी।
उमर के इस इक़दाम पर आयशा जितनी भी फ़ख़्र करें कम है क्यों कि उमर ने उनका वो पासो लिहाज़ किया जो रसूल के बाद उनकी कुदसी सिफ़ात बेटी फातेमा ज़हारा (स.अ.) का भी नहीं किया।
तबरी की इस रवायत से ये भी पता चल गया कि ग़मे हुसैन (अ.स) में गिरयाओ मातम के ख़िलाफ़ बिदअत के फ़तवे इसी उमरी सीरत पर अलक का शाख़साना है।
1. तबक़ातः- जिल्द 8 पेज न. 375
2. मुसतदरक हाकिम ज़िक्रे आयशा फ़िस सहाबियात व किताबुल ख़िराजः- 25
3. तबक़ात इब्ने सअदः- जिल्द 8, पेज न. 208- 209
4. तबक़ातः- जिल्द 8 पेज न. 208- 209
5. अब्दुल फ़रीदः- जिल्द 4 पेज न. 275
ख़िलाफ़ते उस्मानियां के इब्तिदाई छः बरसों में हज़रत आयशा उस्मान की सरगर्म हिमायती रहीं और क़दम क़दम पर उनकी इताअत करती रहीं। उसके बाद दोनों के दर्मियान इख़तिलाफ़ पैदा हो गया। इस इख़तिलाफ़ की वजह यह बताई जाती है कि , उमर ने तमाम अज़्वाजे पैग़म्बर (स.अ.व.व) का सालाना वज़ीफ़ा 10 हज़ार मुक़र्रर किया था और आयशा को बारह हज़ार देते थे। उस्मान ने दो दो हज़ार कम करे उनका वज़ीफ़ा भी दीगर अज़्वाज के मसावी कर दिया।
रफ़्ता रफ़्ता इसी मुख़ालिफ़त ने ख़तरनाक सूरत इख़तियार कर ली और आयशा खुल कर उस्मान से मुक़ाबले के लिये मैदान में उतर आयीं। उन्होंने मुसलमानों को वरग़लाया , भड़काया और आमादा ए पैकार किया और फ़तवा दिया कि उस्मान काफ़िर हो गया है इस नअसल को क़त्ल कर दो।
जब मुसलमान उस्मान के ख़िलाफ़ पूरी तरह मुशतइल और बरगश्ता हो गये और हालात इन्तिहाई नाज़ुक मोड़ पर आ गये तो आप मदीना छोड़ कर हज के बहाने से मक्के रवाना हो गयीं। आपके जाते ही आपके हिमायती तल्हा ज़ुबैर वग़ैरह की मदद से आम मुसलमानों को आमादा कर के हुकूमते उस्मान का तख़्ता पलट दिया और उस्मान बड़ी बेदर्दी से मौत के घाट उतार दिये गये।
बलाज़री का कहना है किः-
हज़रत आयशा की वो पहली ज़ात है जिसने उस्मान की मुख़ालिफ़त में आवाज़ बलन्द की , उनके मुख़ालिफ़ीन के लिये जाए पनाह बनीं और उनसे आमादा ए पैकार लोगों की क़ियादत की। उस वक़्त पूरी ममलेकते इस्लामिया में हज़रत अबू बकर के ख़ानदान से बढ़ कर उस्मान का दुश्मन न था। ( 1)
हज़रत उस्मान से आयशा के इख़तिलाफ़ का सबब उनके वज़ीफ़े में तख़फ़ीफ़ के अलावा वो ज़ियादतियां मज़ालिम और तशद्दुद भी थे जिन्हें उस्मान और उनके आमिलों ने आम मुसलमानों पर रवा रखे थे और जिनकी वजह से मुसलमानों और असहाबे पैग़म्बर (स.अ.व.व) में ग़मों ग़ुस्सा और बरहमी की लहर पैदा हो चुकी थी। तल्हा और ज़ुबैर की वो मिली भगत भी थी जिसके ज़रिये वो लोग हुकूमतो अमारत के ख़्वाहां थे और जिसकी हक़ीक़ी तस्वीर जंगे जमल के मौक़े पर उभर कर सामने आयीं।
इस दलील के तमाम हालात और वाक़ेआत को हम अपनी किताब अल ख़ुलफ़ा हिस्सा दोम में मुफ़स्सल तौर पर तहरीर कर चुके हैं मुनासिब होगा कि कारेईने किराम उस किताब का मुतालिआ फ़रमायें।
(माख़ज़ अज़ अल ख़ुलफ़ा)
मुग़ीरा एक दिन आयशा के पास आया तो उन्होंने उस से फ़रमाया कि ऐ अबू अब्दुल्लाह ! काश तुम जंगे जमल में देखते कि तीर किस तरह मेरे हौदज को तोड़ कर निकल रहे थे। मुग़ीरह ने कहा काश उन तीरों में से कोई तीर आपका ख़ात्मा कर देता। आयशा ने फ़रमाया , आख़िर क्यों ? मुग़ीरह ने कहा तुम्हारे क़त्ल से उस सइए क़त्ल का कफ़्फ़ारह हो जाता जो उस्मान के लिये आपने की है। ( 2)
सअद से एक शख़्स ने पूछा कि उस्मान का क़ातिल कौन है ? उन्होंने कहा , उस तलवार से क़त्ल हुए जो आयशा ने खींची थी। ( 3)
हिसारे उस्मान के वक़्त आयशा मक्के चली गयी थी और जब उस्मान क़त्ल हो गये तो मक्के से फिर मदीने की तरफ़ पलटीं। सर्फ़ के मक़ाम पर इब्ने कलाब से मुलाक़ात हुई , पूछा , क्या ख़बर है ? कहा उस्मान क़त्ल कर दिये गये। ये सुन कर आयशा फिर मक्के की तरफ़ पलटीं और फ़रमाया उस्मान बे गुनाह क़त्ल हुए।
इब्ने कलाब ने कहा , आप ही ने उस्मान का क़त्ल चाहा आप ही वो हैं कि जिसने ये फ़तवा दिया कि नअसल को क़त्ल कर डालों क्यों कि ये काफ़िर हो गया है। ( 4)
उस्मान के क़त्ल होने पर आयशा ने शोर मचाया कि उस्मान बे गुनाह क़त्ल हुए। उस पर अम्मार ने कहा , कल तुम उनके क़त्ल के लिये लोगों को भड़काती थीं और आज शोर मचाती हो। ( 5)
जब अमीरूल मोमिनीन हज़रत अली (अ.स) के बैअत की ख़बर आयशा को मिली तो वो उस वक़्त मदीने में नहीं थी। उनसे कहा गया कि उस्मान क़त्ल हो गये और अली के हाथ पर बैअत हो गयी। ये सुन कर आयशा ने कहा , मुझे परवाह नहीं , अगर ज़मीनों आसमान मुझ पर फट पड़ें। ख़ुदा की क़सम उस्मान बेगुनाह क़त्ल हुए और अब मैं उनके ख़ून का इन्तिक़ाम लूंगी। उस पर उबैद ने कहा , ऐ उम्मुल मोमिनीन ! सबसे पहले जिसने उस्मान पर तअन की और लोगों को उनके क़त्ल पर उभारा वो आप थीं और आप ही ने कहा कि इस नअस्ल को क़त्ल कर डालो क्यों कि ये काफ़िर हो गया है। आयशा ने कहा , हां ख़ुदा की क़सम मैंने ये ज़रूर कहा और किया , मगर दूसरा क़ौल पहले क़ौल से बेहतर है। उबैद ने कहा , हमारे नज़दीक क़ातिल वो है जिसने क़त्ल का हुक्म दिया। ( 6)
इब्ने क़ैबा ने अपनी किताब अल इमामत वल सियासत में तहरीर किया है कि जिस वक़्त उस्मान क़त्ल हुए अमरए आस फ़िलिस्तीन में था। उसे ख़बर मालूम हुई तो उसने सअद इब्ने अबी विक़ास को ख़त लिख कर पूछा कि उस्मान को किसने क़त्ल किया। जवाब में सअद ने लिखा , कि उस तलवार से उस्मान क़त्ल हुए जो आयशा ने तैय्यार की थी और तल्हा ने उस पर सैक़ल की थी। ( 7)
ये वो तारिख़ी शवाहिद हैं जो इस सरबस्ता राज़ पर पड़े हुए पर्दे को चाक कर देते हैं कि उस्मान का अस्ल क़ातिल कौन है ? अब सवाल ये है कि अगर आयशा ने उस्मान के क़त्ल का हुक्म दिया और इस हुक्म के अमल दर आमद पर मुसलमानों को हमवार किया तो फिर उस्मान के क़त्ल हो जाने के बाद उन्होंने ख़ूने उस्मान के क़िसास का नारा क्यों बलन्द किया जिसके नतीजे में जंगे जमल के नाम से एक हौलनाक हादसा रूनुमा हुआ। इसका जवाब यह है कि सियासी नुक़्ता ए नज़र से आयशा के लिए इससे बेहतर कोई सूरत नहीं थी कि मुसलमानों को फ़रेब में मुब्तिला कर के अपने दामन से क़त्ले उस्मान के धब्बों को साफ़ कर लें।
दूसरे ये कि वो दुश्मनी और अदावत जो हज़रत अली (अ.स) की तरफ़ से आपके दिल में थी उसके इन्तिक़ाम के लिये भी ज़रूरी था कि वो इस मौक़े से फ़ायदा उठाते हुए मैदाने कारज़ार गर्म कर दें। अगर जंग में ये कामयाब हो जातीं तो उनकी सारी दिली मुरादें पूरी हो जातीं यानी हज़रत अली (अ.स) भी क़त्ल हो जाते और हुकूमत की बागडोर भी उनके हाथों में आ जाती।
क्यों कि आयशा , तल्हा , ज़ुबैर और माविया इन चारों में हर एक ये चाहता था कि वो इक़्तिदार का मालिक बने। हज़रत आयशा की सियासत ये भी कि अगर मैं किसी वजह से इक़्तिदार की मालिक न बन सकूं तो मेरी बहन का लड़का अब्दुल्लाह इब्ने ज़ुबैर इस मनसब पर फ़ाइज़ हो। यही वजह थी कि उस्मान के क़त्ल में उन्होंने अपना पूरा सियासी ज़ोर सर्फ़ कर दिया।
1. अल निसाबुल अशरफ़ः- जिल्द 5, पेज न. 68
2. अक़दुल फ़रीदः- जिल्द 2, पेज न. 190
3. अल इमामत वल सियासतः-पेज न. 49, अक़दुल फ़रीदः- जिल्द 3 पेज न. 188
4. अक़दुल फ़रीदः- जिल्द 3 पेज न. 187
5. तारीख़े कामिलः- जिल्द 3, पेज न. 80
6. कामिलः- जिल्द 3 पेज न 80, तबरीः- जिल्द 3, पेज न. 173
7. अल इमामत वल सियासतः- पेज न. 54
एक मुहक़्क़िक़ की जुस्तुजू हज़रत अली इब्ने अली तालिब अलैहिस्सलाम के ख़िलाफ़ आयशा के मौक़फ़ में अहले बैत से दुश्मनी और अदावत के अलावा और कुछ नहीं पाती ये भी एक मोज़िजा है कि आले रसूल (स.अ.) ख़ुसूसन हज़रत अली (अ.स) से आयशा की दुश्मनी और अदावत को तारीख़ ने क़यामत तक के लिए महफ़ूज़ कर लिया है। चुनान्चे बुख़ारी का बयान है कि हज़रत अली से आयशा का बुग़्ज़ो हसद इस नुक़्ताए उरूज पर था कि वो अमीरूल मोमिनीन का नाम लेना भी गवाराह नहीं करती थीं। ( 1)
अल्लामा एहसान उल्लाह गोरखपुरी ने अपनी तारीख़े इस्लाम में तहरीर किया है कि अली और फातेमा (स.अ) से आयशा का रश्को हसद मुख़तलिफ़ वाक़ेआत से गुज़र कर नफ़रत की हदों तक पहुंच गया था। ( 2)
इमाम अहमद बिन हम्बल का कहना है कि एक रोज़ अबू बकर रसूल अल्लाह की ख़िदमत में हाज़िर हुए और बारयाबी की इजाज़त चाही लेकिन घर में दाख़िल होने से क़ब्ल उन्होंने आयशा की आवाज़ सुनी जो चीख़ चीख़ कर बुलन्द आवाज़ में पैग़म्बर (स.अ.व.व) से कह रहीं थी कि ख़ुदा की क़सम आप अली को मुझसे और मेरे बाप से ज़्यादा चाहते हैं। ( 3)
इब्ने अबुल हदीदे मोअतज़ेली का बयान है कि एक दिन रसूल अल्लाह (स.अ.व.व) हज़रत अली (अ.स) के हमराह गुफ़्तुगू करते हुए जा रहे थे , आयशा उनके पीछे पीछे चल रही थीं , अचानक मोअज़्ज़मा की रग भड़क गयी और वो रसूल अल्लाह और अली के दरमियान हायल होते हुए कहने लगीं कि बस बहुत हो चुकी अब ख़त्म करो इस गुफ़्तुगू को आयशा की इस नाशाइस्ता हरकत पर रसूले अकरम बेहद ग़ज़बनाक हुए। ( 4)
मसरूफ से एक रिवायत है कि मैं उम्मुल मोमिनीन आयशा की ख़िदमत में हाज़िर था और उनसे मसरूफ़े गुफ़्तुगू था कि इतने में आयशा ने अब्दुर रहमान के नाम से अपने एक हब्शी ग़ुलाम को आवाज़ दी वो आकर खड़ा हो गया। आयशा ने मुझ से फ़रमाया कि मसरूफ़ तुम्हे मालूम है कि इस ग़ुलाम का नाम अब्दुर रहमान क्यों रखा ? मैं ग़ौर ही कर रहा था कि फिर फ़रमाया कि चूंकि अब्दुर रहमान इब्ने मुलजिम अली क़ा क़ातिल था इस लिये ये नाम मुझे बहुत अज़ीज़ है और मैं इस नाम से इन्तिहाई मोहब्बत करती हूं।
इस वाक़ेए को अल्लामा शेख़ मुफ़ीद (र) ने अपनी किताब अल जमल में तहरीर फ़रमाया है और उस में शेख़ अबू जाफ़रे तूसी (र) ने अपनी किताब अशशाफ़ी जिल्द 4 स. 158 पर नक़्ल किया है।
गुजश्ता सफ़हात में हम अहलेबैत से आयशा की अदावत के नाम से तहरीर कर चुके हैं कि हज़रत अली की शहादत पर आयशा ने शुक्र का सज्दा किया मसर्रतों शादमानी का इज़हार फ़रमाया और तरबिया अशआर पढ़े।
आप हसनैन अलैहेमुस्सलाम से पर्दा करती थीं और जब इमाम हसन (अ.स) की शहादत वाक़ेए हुए तो उनके जनाज़े को रसूल (स.अ.व.व) के रौज़े में दफ़्न नहीं होने दिया हद ये है कि ख़ुद खच्चर पर सवार हो कर निकल पड़ी और इमाम के जनाज़े पर इतने तीर बरसाये कि सत्तर तीर जसदे अतहर में पेवस्त हो गये।
(इस किताब को आप “अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क ” पर पढ़ रहे है।)
ये वो तारीख़ी हक़ाएक़ हैं जिन से इन्कार की कोई गुन्जाइश नहीं है।
क़त्ले उस्मान के बाद जब ख़िलाफ़त हज़रत अली की तरफ़ मुनतक़िल हुई तो आप मक्के से मदीने की तरफ़ वापस आ रही थीं , रास्ते में मालूम हुआ कि अली की बैअत हो गई तो फ़रमाने लगीं कि मुझे आसमान का फट पड़ना गवारा है मगर अली का ख़लीफ़ा होना गवारा नहीं। फिर आप क़िसासे ख़ूने उस्मान का सहारा ले कर उठ खड़ी हुई , लशकर जमा किया जिसके नतीजे में एक ऐसी ख़ूंरेज़ हौलनाक और तबाह कुन जंग हुई जो तारीख़ में जंगे जमल के नाम से याद की जाती है।
1. सहीह बुख़ारीः- जिल्द 1 पेज न. 162, जिल्द 5 पेज न. 140
2. तारीख़े इस्लामः- पेज न. 258
3. मसनद अहमद बिन हम्बलः- जिल्द 4 पेज न. 275
4. शरह नहजुल बलाग़ाः- जिल्द 9 पेज न. 195
दुनिया की ख़ूनी जंगों में जंगे जमल वो हौलनाक और हलाकत ख़ेज़ जंग है जो ख़िलाफ़ते अली के इब्तिदाई दौर में क़िसासे ख़ूने उस्मान के नाम से लड़ी गयी।
इस तबाहकुन और ख़ुंरेज़ जंग के अफ़सोसनाक नताइज और इफ़तेराक़ बैनल मुस्लिमीन की तमामतर मुजरिमाना ज़िम्मेदारियां हज़रत आयशा , तल्हा और ज़ुबैर पर आइद होती है जो इन्तिक़ामे ख़ूने उस्मान की आड़ में अमीरूल मोमिनीन बनने का जज़्बा ले कर तलवारों के साथ उठ खड़े हुए थे। हालांकि यही लोग उस्मान की ज़िन्दगी में उनके सख़्त मुख़ालिफ़ रहे , यहां तक कि इन्ही की कोशिश से तीसरे ख़लीफ़ा बड़ी बेदर्दी के साथ मौत के घाट उतार दिये गये।
उस्मान के ख़िलाफ़ लोगों को भड़काने उकसाने और वरग़लाने में हज़रत आयशा का किरदार बहुत ही अहम है। वो इस अम्र से बख़ूबी वाक़िफ़ थीं कि रसूले अकरम (स.अ.व.व) से वालिहाना अक़ीदत की बिना पर मुसलमान हुज़ूरे (स.अ.व.व) के जिस्मे अतहर से मस होने वाले वाक़िआत और आसार की ज़ियारत को तरस रहे हैं लिहाज़ा इन्ही वाक़िआत का तवस्सुल उस्मानी हुकूमत का तख़ता पलट देने के लिये काफ़ी है। जब ये चीज़े मुसलमानों के सामने रखी जायेंगी तो वो जज़्बात से मग़लूब होकर बेक़ाबू हो जायेंगे और उनके दिलों में एक हैज़ानी कैफ़ियत पैदा हो जायेगी।
हज़रत आयशा का ये हर्बा , यक़ीनन असरदार तरीन हर्बा था। चुनान्चे उन्होंने सरकारे दो आलम की नअलैने मुबारक और पैराहने अक़दस का सहारा लिया और ये दोनों चीज़े मुसलमानों के सामने रख कर माइल ब फ़रयाद हुई कि अभी ये चीज़ें कोहना भी नहीं होने पायीं कि उस्मान ने आं हज़रत (स.अ.व.व) की शरीअत को एकदम बदल कर रख दिया। काश ! इस नअसल को कोई क़त्ल कर दे क्यों कि ये काफ़िर हो गया है।
हज़रत आयशा की ये सियासी तदबीर किसी तरह सऊदी पेट्रोल से कम न थी। इसने उस्मान के ख़िलाफ़ सुलगती हुई चिंगारी को शोला बना दिया। आवाम में ग़मों ग़ुस्से की आग भड़क उठी , और मुख़ालेफ़ीन के बिखरे हुए सैलाब ने क़सरे ख़िलाफ़त को चारों तरफ़ से घेर लिया। जब आपने देखा कि मुख़ालिफ़ीनो मोहासेरीन की गिरफ़्त मज़बूत हो चुकी है तो ज़ैद इब्ने साबित , मरवान बिन हकम और अब्दुर रहमान बिन उताब की मिन्नत समाजत के बवजूद उस्मान को मुहासरे में छोड़ कर हज के बहाने से मक्के रवाना हो गयीं। सफ़र के दौरान भी उस्मान के ख़िलाफ़ आपका तब्लीग़ी अमल जारी रहा। चुनान्चे मदीने से कुछ दूर निकल कर सलसल के मक़ाम पर जब आपकी मुलाक़ात इब्ने अब्बास से हुई जो अमीरे हज की हैसियत से मक्के जा रहे थे तो आपने उनसे भी फ़रमायाः-
ऐ इब्ने अब्बास ! ख़ुदा ने तुम्हे क़ुव्वते गोयाई अता की है तो लोगों को उस्मान की मदद से रोको और उनके बारे में उन्हें शको शुबहे में मुब्तिला करो रास्ता हमवार हो चुका है , मुख़ालिफ़ शहरों से लोग फ़ैसलाकुन अम्र के लिए मदीने में जमा हो चुके हैं। तल्हा ने बैतुल माल की कुंजियों पर क़ब्ज़ा कर लिया है अगर वो ख़लीफ़ा हो गये तो अपने इब्ने अम अबूबकर की सीरत पर अमल करेंगें। ( 1)
हज़रत आयशा की इस गुफ़्तुगू से ये अम्र पोशीदा नहीं रह जाता कि वो उस्मान के बाद तल्हा की ख़िलाफ़त का ख़्वाब देख रहीं थी और उनके ज़रिये इक़तिदार का रूख़ भी अपने ख़ानदान की तरफ़ मोड़ना चाहती थीं।
उस्मानी अहदे हुकूमत के इब्तिदाई छः सालों में हज़रत आयशा उस्मान की ख़ैरख़्वाह , हमनवा , तरफ़दार और मोईनों मददगार रहीं मगर उसके बाद मुख़ालिफ़ हो गयीं मुख़ालिफ़त की वजह ये बयान की जाती है कि हज़रत उमर ने अपने दौरे हुकूमत में अज़्वाजे रसूल का वज़ीफ़ा दस हज़ार मुक़र्रर किया था , लेकिन आयशा को तरजीही बुनियाद पर बारह हज़ार मिलता था।
उस्मान ने दो हज़ार कम करे उनका वज़ीफ़ा भी दीगर अज़्वाज के बराबर कर दिया था। जैसा कि याक़ूबी का कहना है किः-
हज़रत उस्मान और आयशा के दर्मियान मुख़ालिफ़त की वजह ये थी कि उस्मान ने उनका वज़ीफ़ा जो हज़रत उमर उन्हें दिया करते थे कम कर दिया। ( 2)
हज़रत उस्मान और उनके उम्माल की आमिराना रविश की वजह से सहाबा का एक गिरोह पहले ही से उस्मान का मुख़ालिफ़ था। मुस्तजाद ये कि आयशा की इश्तेआल अंगेज़ी ने उसे और हवा दी यहां तक कि उस मुख़ालिफ़त ने ज़ोर पकड़ लिया और लोग उस्मान के ख़िलाफ़ सरगर्मे अमल हो गये ख़ुसूसन तल्हा इब्ने उबैदुल्लाह और उनका क़बीला बनी तैम इस मुख़ालिफ़त में पेश पेश रहा जिसकी क़ाएद हज़रत आयशा थीं। उन लोगों ने क़त्ले उस्मान के असबाब फ़राहम करने में कोई कसर उठा नहीं रखी। बलाज़री रक़म तराज़ है किः-
तल्हा से बढ़ कर हज़रत उस्मान पर सख़्तगीर कोई नहीं था। ( 3)
तल्हा ने अपनी हिकमते अमली से मुहासेरीन में जोशो ख़रोश पैदा कर के उस्मान पर मुहासरे को मज़ीद तंग किया। उन पर पानी बन्द किया। रात के अन्धेरे में क़सरे ख़िलाफ़त पर तीरों की बारिश की और अब्दुर रहमान बिन अदबस को इस अम्र पर मजबूर किया कि वो उनके घर आने जाने वालों पर पाबन्दी आएद कर दें। चुनान्चे उस्मान को इन बातों का इल्म हुआ तो उन्होंने कहाः-
परवर दिगार मुझे तल्हा के शर से महफ़ूज़ रखे इसी ने लोगों को मेरे ख़िलाफ़ भड़काया है और मेरे गिर्द घेरा डलवा दिया। ( 4)
उस्मान के क़त्ल हो जाने के बाद तल्हा के रवय्ये में फ़र्क़ न आया। उनकी लाश पर पत्थर बरसाये और उन्हें जन्नतुल बक़ी में दफ़्न न होने दिया और यही हालत ज़ुबैर की भी थी कि वो मुहासेरीन के दर्मियान आयशा की इस बात को दोहराते रहते थे किः-
उस्मान को क़त्ल कर दो उसने तो तुम्हारे दीन ही को बदल दिया। ( 5)
यही वो लोग थे जिन्होंने क़त्ले उस्मान की बुनियाद रखी , और उनके ख़िलाफ़ ऐसी फ़ज़ा पैदा कर दी कि जिसके नतीजे में वो क़त्ल कर दिये गये। अगर उस्मान का क़त्ल वाक़ई जुर्म था तो ये लोग उस जुर्म से बरी हरग़िज़ नहीं क्यों कि क़ातिलों और मुजरिमों की मदद और पुश्त पनाही भी जुर्म है।
हज़रत आयशा को अपनी कामयाबी का यक़ीन था उनका बोया हुआ बीज फल ज़रूर देगा इस लिये वो क़त्ले उस्मान से बीस दिन पहले ही इस ख़्याल के तहत मदीने से खिसक लीं कि दुनिया उनको तमाम हंगामा आराइयों से बेताल्लुक़ तसव्वुर करे और जब उस्मान का काम तमाम हो जाये तो वो तल्हा या ज़ुबैर को बरसरे इक़्तिदार लाकर उस माली नुक़्सान की तलाफ़ी कर सके जो मौजूदा हुकूमत से उन्हें पहुंचा है। मगर वो अपने इस मक़सद में कामयाब न हो सकीं और उनकी अहम मौजूदगी में ही मुसलमानों ने हज़रत अली की ख़िलाफ़त का फ़ैसला कर लिया।
हज़रते उस्मान ने जो शूरा क़ायम किया था उसके रूक्न तल्हा और ज़ुबैर भी थे इस लिये उनका ज़हन भी ख़िलाफ़त के तसव्वुर से ख़ाली नहीं था , चुनान्चे क़त्ले उस्मान के सिलसिले की तमाम तर कोशिशें इसी मक़सद के हुसूल का नतीजा थीं मगर उन लोगों ने जब ये देखा कि लोग हज़रत अली की ख़िलाफ़त पर बज़िद हैं और उनके अलावा किसी की बैअत पर रज़ामन्द नहीं हैं तो उन लोगों ने भी राय आम्मा का रूख़ देख कर पेश क़दमी की और हज़रत अली की बैअत कर ली और दूसरे ही दिन ये मुतालिबा किया कि उन्हें कूफ़ा और बसरा की अमारत दे दी जाये। लेकिन हज़रत आली ने ये गवारा न किया कि उन इलाक़ों को जो हुकूमत के मुहासिल का सरचश्मा हैं उनकी बढ़ती हुई हिर्सो हवस की आमाजगाह बनने दें। चुनान्चे आपने ये कह कर इन्कार कर दिया की मैं तुम्हारे मामलात में जो बेहतर होगा वो करूगां , फ़िलहाल तुम दोनों का मेरे पास ही मरकज़ में रहना ज़्यादा बेहतर है।
तल्हा और ज़ुबैर समझ रहे थे कि कूफ़ा और बसरा में उनके असरात हैं और उन्हीं की आवाज़ पर वहां के लोग उस्मानी हुकूमत में इन्क़िलाब बरपा करने की ग़रज़ से जमा हुए थे इस लिये अमीरूल मोमिनीन उन असरो रूसूख़ से मुतास्सिर हो कर उन्हें कूफ़े और बसरे की हुकूमत का परवाना लिख देंगे। मगर मायूसी के अलावा उन्हें और कुछ हासिल न हुआ और उन्होंने समझ लिया कि अली (अ.स) के होते हुए उन्हें न तो मनमानी करने का मौक़ा फ़राहम होगा और न ही वो ख़ुसूसी मुराआत हासिल होंगी जो सबका हुकूमतों में हासिल थीं लिहाज़ा उन्होंने अपने मक़ासिद की तकमील के लिए ग़ैर आईनी ख़ुतूत पर सोचना शुरू किया और अपनी तवज्जो का रूख़ आयशा की नक़्लों हर्कत की तरफ़ मोड़ दिया ताकि उनके अज़ाइम की रौशनी में मुस्तक़बिल का प्रोगाम तरतीब दें।
हज़रत आयशा ये चाहती थीं कि उस्मान के क़त्ल के बाद , तल्हा को बरसरे इक़तिदार लायें और इस तरह ख़िलाफ़त को मुस्तक़िलन अपने क़बीले बनी तैम में मुन्तक़िल कर दें इस लिये की मक्के में क़याम के दौरान बलवाइयों की यूरिश का नतीजा मालूम करने के लिये बेचैन रहती थीं और हर आने जाने वाले से मदीने के हालात और उस्मान के अंजाम के बारे में मालूम करती रहती थीं। इसी अस्ना में मदीने से अख़ज़र नामी एक शख़्स मक्के आया। हज़रत आयशा ने उसे बुलवाकर पूछा कि मदीने की शोरिश अंगेज़ी का क्या नतीजा हुआ ? उसने कहा कि हज़रत उस्मान ने मिस्र के बलवाइयों को मौत के घाट उतार दिया है और शोरिशो हंगामें पर क़ाबू पा लिया है। इस ख़बर ने उनके सारे ख़्यालात का शीराज़ा दरहम बरहम कर दिया , उन्होंने तास्सुफ़ आमेज़ लहजे में कहाः-
इन्ना लिल्लाहे व इन्ना एलैहे राजेऊन ! क्या उन लोगों को उस्मान ने क़त्ल कर दिया जो अपना हक़ मांगने और ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ बलन्द करने की ग़रज़ से गये थे ? ख़ुदा की क़सम हम इस पर राज़ी नहीं हैं। ( 6)
अभी आयशा अफ़सुर्दगी की हालत में थी कि एक दूसरे शख़्स ने आकर ये इत्तिला दी कि अख़ज़र की बातें ग़लत हैं मिस्रियों में से कोई क़त्ल नहीं हुआ , वो खुले बन्दो मदीने में दनदनाते हुए फिर रहे हैं , अलबत्ता हज़रत उस्मान उन लोगों के हाथों मारे गये हैं। ये सुन कर उम्मुल मोमिनीन पर मसर्रतो शादमानी तारी हो गयी और उन्होंने मुस्कुराते हुए फ़रमायाः-
ख़ुदा उसे अपनी रहमत से दूर रखे , वो अपने करतूतों को पहुंच गया। ( 7)
इस ख़बर के बाद हज़रत आयशा के लिए मदीने जाना ज़रूरी हो गया ताकि तल्हा की ख़िलाफ़त का रास्ता हमवार करें और फ़िज़ा को उनके लिए अपने असरात से साज़गार बनायें।
चुनान्चे उन्होंने फ़ौरन सामाने सफ़र बांधा और मदीने की तरफ़ चल पड़ीं। लेकिन अभी मक्के से तक़रीबन 10 किलोमीटर का फ़ासला तय किया होगा कि सर्फ़ के मक़ाम पर उबैदुल्लाह इब्ने अबी सलमा से मुलाक़ात हुई। आपने उस्मान और मदीने के सियासी हालात के बारे में उस से दर्याफ़्त किया। उसने कहा हज़रत उस्मान क़त्ल कर दिये गये हैं पूछा , फिर क्या हुआ ? कहा ! मुसलमानों ने हज़रत अली की बैअत कर ली है। ये सुनते ही ज़मीन पैरो तले से ख़िसकने लगी और आसमान धुंवा बन कर उड़ता नज़र आने लगा। कानों को यक़ीन न आया तो फिर पूछा कि क्या वाक़ई अली की बैअत हो गयी है। भला उनसे ज़्यादा मसनदे ख़िलाफ़त का मुस्तहक़ और सज़ावार कौन था ? अब आयशा के लिये अपने जज़्बात पर क़ाबू रखना मुशकिल हो गया। तेवराकर गिरने ही वाली थीं कि बेसाख्ता उनकी ज़बान से निकलाः-
काश ये आसमान मुझ पर फट पड़े और मैं उसमें समा जांऊ। ( 8)
ग़रज़ कि मुअज़्ज़मा उल्टे पैरों मक्के की तरफ़ पलट पड़ी और रंजोग़म के स्टेज पर इन अलफ़ाज़ के साथ एक नया ड्रामा शुरू कर दियाः-
ख़ुदा की क़सम उस्मान मज़लूम मारे गये , मैं उनके ख़ून का इन्तिक़ाम ले कर रहूंगी। ( 9)
अब्दुल्लाह इब्ने अबी सलमा इस मुतज़ाद तर्ज़े अमल को देख कर हैरत और इस्तेजाब के दरिया में ग़र्क़ हो गया उसने आयशा से कहाः-
आप तो बार बार ये कहा करती थी कि इस नअस्ल को क़त्ल कर डालो ये काफ़िर हो गया है। ( 10)
अब ये तब्दीली कैसी ? कहाः-
हां ! पहले मैं यही कहा करती थी लेकिन अब ये मेरी राय पहली राय से ज़्यादा बेहतर है। हज़रत आयशा की इस बात से उबैद मुतमइन न हो सके। चुनान्चे उन्होंने कहा कि ऐ उम्मुल मोमिनीन ! ख़ुदा की क़सम ये इन्तिहाई बौदा उज़्र है। ( 11)
उसके बाद उबैद इब्ने अबी सल्मा ने हज़रत आयशा को मुख़ातिब कर के अरबी में कुछ शेर पढ़े , जिनका उर्दू तर्जमा हस्बे ज़ैल है।
1. आप ही ने पहल की आप ही ने मुख़ालिफ़त के तूफ़ान उठाये और अब आप अपना रंग बदल रही हैं।
2. आप ही ने ख़लीफ़ा के क़त्ल का हुक्म दिया और हम से कहा कि वो काफ़िर हो गया।
3. हमने माना की आपके हुक्म की तामील में ये क़त्ल हमारे हाथों से हुआ , मगर हमारे नज़्दीक अस्ल क़ातिल आप हैं जिस ने क़त्ल का हुक्म दिया।
4. (सब कुछ हो गया) मगर न आसमान हमारे ऊपर फट पड़ा और न चांद , सूरज को गहन लगा।
5. और लोगों ने उसकी बैअत कर ली जो क़ुव्वतों शिकोह से दुश्मनों को हकाने वाला है , तलवारों की धारों को क़रीब फ़टकने नहीं देता और गर्दन कशों के बल निकाल देता है।
उम्मुल मोमिनीन चूंकि जल्द अज़ जल्द मक्के पहुंच जाना चाहती थीं , इस लिये उन्होंने उबैद के अशआर पर कोई तवज्जो नहीं दी और आगे बढ़ गयीं। जब मक्के वापस पहुंची तो लोगों ने कहाः-
ऐ उम्मुल मोमिनीन ! अभी तो आप रवाना हुई थीं आख़िर पलट क्यों आयीं ? बोलीः-
उस्मान बेगुनाह मारे गये , मैं उनका ख़ून राएगां नहीं जाने दूंगी और उस वक़्त तक वापस नहीं जाऊंगी जब तक उनके ख़ून का इन्तिक़ाम नहीं ले लूंगी।
लोग उनकी साबेक़ा और मौजूदा रविश के तज़ाद पर सख़्त हैरान हो गये मगर कुछ कहने के बजाय ख़ामोश रहे। ग़रज़ कि आयशा ने उस्मान की मज़लूमियत का ढिडोंरा पीट पीट कर मक्के ही में हज़रत अली के ख़िलाफ़ एक मज़बूत महाज़ क़ायम कर लिया और जब तल्हा और ज़ुबैर को मालूम हुआ कि उनकी मादरे गिरामी मक्के में उस्मान की मज़लूमियत का प्रचार कर रही हैं और अली को उनके क़त्ल का ज़िम्मेदार ठहरा रही हैं तो उन्होंने अब्दुल्लाह इब्ने ज़ुबैर को चन्द ख़ुतूत के साथ चुपके से आयशा के पास मक्के रवाना किया और उस पर ज़ोर दिया कि वो क़िसासे ख़ूने उस्मान की तहरीक चलायें और जिस तरह मुम्किन हो मज़ीद लोगों को अली की बैअत से बाज़ रखें। इन पैग़ामात ने उनके इरादों को और मज़बूत किया और उन्होंने पूरे जोशो ख़रोश और ज़ोर शोर से क़िसासे उस्मान के नाम पर लोगों को दावत देना शुरू कर दी। चुनान्चे सब से पहले अब्दुल्लाह इब्ने आमिर ने जो उस्मान की तरफ़ से मक्के का गवर्नर था उनकी आवाज़ पर लब्बैक कही और सईद इब्ने आस और वलीद इब्ने उक़्बा भी उनके हमनवा बन गयें।
तल्हा और ज़ुबैर क़िसासे उस्मान की आड़ में हंगामा खड़ा कर के अपनी महरूमी और नाकामी का बदला लेना चाहते थें लेकिन मदीने की फ़ज़ा इस हंगामा आराई के लिए साज़गार न थी क्यों कि क़त्ले उस्मान के सिलसिले में अहले मदीना उनका किरदार देखे हुए थे। अलबत्ता मक्के में तहरीक कामियाब हो सकती थी क्यों कि उम्मुल मोमिनीन के अलावा साबिक़ा गवर्नरे मक्का मरवान बिन हकम और मदीने से निकल खड़े होने वाले दीगर बनी उमय्या वहां जमा हो गये थे। चुनान्चे उन दोनों (तल्हा ज़ुबैर) ने भी मक्का जाने का फ़ैसला किया और अमीरूल मोमिनीन हज़रत अली (अ.स) से कहा कि हम लोग उमरा की नीयत से मक्के जाना चाहते हैं। लिहाज़ा हमें इजाज़त मरहमत फ़रमाये। अमीरूल मोमिनीन हज़रत अली उनके तेवरों को फ़ौरन भांप गये कि ये लोग बैअत की जकड़ बन्दियों से निकल कर अपनी जोलानियों और शोरिशों का मरकज़ मक्के को बनाना चाहते हैं चुनान्चे आपने फ़रमायाः-
ख़ुदा की क़सम उनका इरादा उमरा का नहीं है कि ये लोग ग़द्दारी और फ़रेबदारी पर उतर आये हैं। ( 12)
अमीरूल मोमिनीन ने उन्हें समझाया कि तुम लोगों का मक्के जाना मुनासिब नहीं है मगर ये लोग बराबर इसरार करते रहे और अपनी ज़िद पर अड़े रहे बिल आख़िर हज़रत ने उन से दूबारा बैअत ले कर उन्हें मक्के जाने की इजाज़त दे दी और ये लोग भी मक्के पहुंच कर हज़रत आयशा की जमाअत के सरगर्म मिम्बर बन गये और बाक़ायदा क़िसास की मुहिम शुरू कर दी।
इस मुहिम को कामयाब बनाने के लिये सरमाये की ज़रूरत भी थी , उसका हल यूं निकल आया कि बसरा का माज़ूल हाकिम अब्दुल्लाह इब्ने आमिर बैतुलमाल की सारी पूंजी ले कर मक्के पहुंच गया और यमन से यअली इब्ने उमय्या छः लाख दिरहम और छः सौ ऊंट अपने साथ लाया और ये तमाम सरमाया जंगी इख़राजात के लिये महफ़ूज़ कर दिया गया।
अबुल फ़िदा ने तहरीर किया किः-
यअली तमाम पूंजी समेट कर निकल खड़ा हुआ और मक्के पहुंच कर आयशा तल्हा और ज़ुबैर के साथ हो गया और वो माल उनकी तहवील में दे दिया। ( 13)
अहले मक्का से भी सरमाया फ़राहम किया गया और माली एतबार से लोग मुतमइन हो गये। जंग तो बहरहाल एक तय शुदा अम्र थी मगर रज़्मगाह की तजवीज़ में फ़िक्रे लड़ी हुई थीं। चुनांचे हज़रत आयशा की रिहाइशगाह पर एक मीटिंग रखी गयी जिसमें सब लोग शरीक हुए। उम्मुल मोमिनीन की तजवीज़ थी कि मदीने पर हमला कर के उसे तराज़ो मिसमार किया जाये मगर कुछ लोगों ने इसकी मुख़ालिफ़त की और कहा कि अहले मदीना से जंग एक मुश्किल मरहला होगी लिहाज़ा किसी और मक़ाम को मरकज़ बनाना चाहिये। कुछ लोगों ने ये मशवरा भी दिया कि शाम को महाज़े जंग क़रार दिया जाये। इस पर इब्ने आमिन ने कहा कि माविया के होते हुए शाम में तुम्हारी ज़रूरत नहीं है। ( 14)
शाम को महाज़ क़रार देने ये शायद ये अम्र भी माने था कि माविया जिसने उस्मान का मातहत होते हुए भी उनकी मदद से गुरेज़ किया था , वो इन लोगों की मदद पर क्यों आमादा होता ? फिर जिसने हज़रत अली की ख़िलाफ़त को क़ुबूल न किया हो वो इन लोगों की कामयाबी के बाद तल्हा और ज़ुबैर की ख़िलाफ़त को क्यों कर तस्लीम करता ?
बेशक माविया इन लोगों का हमनवा था मगर उसी हद तक कि जिस हद तक हज़रत अली को इक़तिदार से हटाने का ताल्लुक़ हो।
आख़िरकार बड़ी रद्दोक़द और सोच विचार के बाद महाज़े जंग के लिए बसरा की सरज़मीन का इन्तिख़ाब अमल में आया। बसरा को महाज़े जंग बनाने में जहां ये मसलेहत कार फ़र्मा थी कि वहां उनके हमनवा कसरत से मौजूद थे जो जंग में उनका साथ देते वहां से फ़ायदा भी मद्देनज़र था कि हिजाज़ के एक तरफ़ शाम है जहां माविया की हुकूमत है और दूसरी तरफ़ इराक़ है। अगर इराक़ पर तसल्लुत क़ायम रह जायेगा जिसके बाद अमीरूल मोमिनीन की सिपाह को बआसानी ज़ेर करके इक़तिदार पर क़ब्ज़ा किया जा सकता है या इन दोनों ताक़तों के ज़ेरे असर उन्हें रखा जा सकता है लेकिन ये महज़ उन लोगों की ख़ाम ख़्याली थी क्यों कि साहेबे ज़ुल्फ़िक़ार से मुक़ाबिला उनके इमकान से क़तई बाहर था।
इन तमाम बातों से ये अन्दाज़ा भी होता है कि आयशा और उनके हमनवाओं के पेशेनज़र ख़ूने उस्मान का क़िसास था ही नहीं। अगर क़िसास मक़सूस होता तो ये लोग बसरा को महाज़े जंग बनाने के बजाय मदीने ही को अपनी तख़रीब कारियों की आमाजगाह बनाते जो हज़रत आय़शा की साबेक़ा जौलानियों का मसकन भी था और जहां उस्मानी हादसे के ज़िम्मेदार अफ़राद भी काफ़ी तादाद में मौजूद थे।
1. तबरीः- जिल्द 3 पेज न. 434
2. तारीख़े याक़ूबीः- जिल्द 2 पेज न. 132
3. अल निसाबुल अशरफ़ः- जिल्द 1 पेज न. 113
4. तबरीः- जिल्द 3 पेज न. 411
5. इब्ने अबिल हदीद मोअतज़ेलीः- जिल्द 2 पेज न. 404
6. तबरीः- जिल्द 3 पेज न. 468
7. शराह इब्ने अबिल हदीदः- जिल्द 2 पेज न. 77
8. तारीख़े कामिलः- जिल्द 3 पेज न. 105
9. तारीख़े कामिलः- जिल्द 3 पेज न. 105
10. कामिलः- जिल्द 3 पेज न. 105
11. अल इमामत वल सियासतः- जिल्द 1 पेज न. 52
12. तारीख़े याक़ूबीः- जिल्द 2 पेज न. 156
13. अबुल फ़िदाः- जिल्द 1 पेज न. 172
14. तबरीः- ज 3 पेज न. 434
महाज़े जंग के तसफ़िये के बाद कूच की तैय्यारियां शुरू हो गयीं। यअली बिन उमैय्या ने क़बीलाए उर्निया के एक शख़्स से छः सौ दिरहम में एक बदनसीब ऊंट ख़रीद कर आयशा के हवाले किया और उमूमी तौर पर ये ऐलान किया कि जिसके पास हथियार और सवारी नहीं है वो आये उसे तमाम चीज़ें मुहैय्या की जायेंगी।
चुनान्चे अमीरूल मोमिनीन ने यअली के बारे में फ़रमाया किः-
वो मुझसे लड़ने के लिए लोगों को घोड़ा हथियार और तीस तीस दीनार देता था। ( 1)
तल्हा और ज़ुबैर ने अब्दुल्लाह इब्ने उमर पर दबाव भी डाला कि वो उनकी मुवाफ़िक़त और हमराही इख़्तियार करे मगर उन्होंने ये कह कर इन्कार कर दिया कि आयशा के लिए हौदज में बैठने से घर में क़ैद रहना और तुम लोगों के लिए बसरा से मदीने में रहना ज़्यादा बेहतर है। ( 2)
हज़रत आयशा ने हफ़सा और उम्महातुल मोमिनीन को जो हज के बाद मक्के में क़याम पज़ीर थीं अपना हम ख़्याल बनाने की कोशिश की और उन्हें भी अपने हमराह जंग में हिस्सा लेने की दावत दी। हफ़सा तैय्यार हो गयीं मगर बक़िया अज़्वाजे पैग़म्बर (स.अ.व.व) ने साफ़ इनकार कर दिया। चुनान्चे अब्दुल्लाह इब्ने उमर को जब अपनी बहन हफ़सा के इस इरादे का इल्म हुआ तो उन्होंने उन्हें भी रोक दिया।
इब्ने असीर का कहना है किः-
अज़्वाजे रसूल आयशा के साथ मदीने जाने का इरादा रखती थीं मगर जब आयशा की राय बदल गयी और वो (हज़रत अली से मुक़ाबले के लिए) बसरा जाने पर तैय्यार हो गयीं तो सब ने उनका साथ छोड़ दिया मगर हफ़सा उनके साथ बसरा जाने पर तैय्यार हो गयीं , मगर जब अब्दुल्लाह इब्ने उमर को मालूम हुआ तो उन्होंने रोक दिया। ( 3)
हफ़सा की आमादगी ख़िलाफ़े तवक़्क़ो न थी इस लिए कि उनके और आयशा के नज़रियात में बड़ी हद तक हमआहंगी थी। न उनके मिज़ाजों में तज़ाद था और न तबीअतों में इख़तिलाफ़ और इसी बिना पर दोनों अज़्वाजे रसूल एक ही गिरोह से वाबस्ता थीं।
जैसा कि बुख़ारी ने तहरीर किया है किः-
अज़्वाजे पैग़म्बर में दो गिरोह थे। एक में आयशा और हफ़सा और सौदा थीं और दूसरे गिरोह में उम्मे सलमा और दीगर अज़्वाज थीं। ( 4)
हज़रत उम्मे सलमा की तमाम तर हमदर्दियां हज़रत अली (अ.स) के साथ थीं चुनान्चे जब आयशा ने उन्हें अपना हमनवा बनाने की कोशिश की तो उन्होंने उनके इस इक़दाम की मुख़ालिफ़त की और जवाब दियाः-
अगर रसूलअल्लाह (स.अ.व.व) ये समझते कि औरतें जिहाद का बोझ उठा सकती हैं तो वो अपनी हयात में इसका हुक्म ज़रूर देते। क्या तुम्हें मालूम नहीं कि पैग़म्बर तुम्हे दीनी मामलात में तजावुज़ से मना फ़रमा गये हैं। वो जानते थे कि अगर दीन का सुतून झुक गया तो औरतों से तो थम नहीं सकता और अगर उसमें शिग़ाफ़ पड़ गया तो औरतों के ज़रिये उसकी दुरूस्तगी और इस्लाम मुम्किन नहीं। औरतों का जिहाद सिर्फ़ ये है कि वो निगाहें नीचीं रखें। अपने ताल्लुक़ात को महदूद रखें और अपने दामन को समेंटे। अगर रसूल (स.अ.व.व) तुम्हें इन सहराओं में ऊंट दौड़ाते हुए एक चश्मे से दूसरे चश्में तक जाते हुए देखते तो क्या कहते ? कल तुम्हे रसूलल्लाह (स.अ.व.व) के सामने जाना होगा तो तुम क्या जवाब दोगी ? ख़ुदा की क़सम अगर हश्र में मुझसे ये कहा गया कि ऐ उम्मे सलमा तुम जन्नत में दाख़िल हो जाओ तो अगर मैंने उस हिजाब को तोड़ा है जिसका रसूल मुझे पाबन्द बना गये थे तो मुझे उनका सामना करते हुए शर्म आएगी। लिहाज़ा बेहतर है कि तुम पर्दे की पाबन्द और घर की चारदीवारी में बन्द रहो। ( 5)
हज़रत उम्मे सलमा की इन नसीहत आमेज़ बातों से सबक़ हासिल करने के बजाये आयशा ने उन्हें ये जवाब दिया कि मैं दो मुतहारिब गिरोहों में सुल्ह कराने और बरगश्ता माहौल को पुरअम्न और साज़गार बनाने की ग़रज़ से जा रही हूं।
(इस किताब को आप “अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क ” पर पढ़ रहे है।)
ज़ाहिर है कि उम्मुल मोमिनीन का ये जवाब दफ़उल वक़्ती के लिए था वरना हक़ीक़त ढकी छुपी नहीं थी कि वो इस लड़ाई में ख़ुद एक फ़रीक़ की हैसियत रखती थीं। अगर वो ख़ुदा और रसूल के हुक्म पर अमल पैरा हो कर घर में बैठी रहती और लशकर जमा कर के बसरा का रूख न करतीं तो दो फ़रीक़ पैदा ही न होते और न ही जंगो जदल की नौबत ही आती और अगर मुअज़्ज़मा का मक़सद दो गिरोहों में सुल्हों सफ़ाई पर मब्नी था तो फिर उन्हें सामाने हर्बो ज़र्ब और लशकर इकट्ठा करने की क्या ज़रूरत थी ?
बहरहाल हज़रत आयशा सात सौ की जमीअत के साथ जो उस वक़्त उनके परचम के नीचे जमा हो चुकी थी बसरा की तरफ़ रवाना हो गयीं।
इस तरह कि आयशा ऊंट पे बैठी थीं रसूलन बन कर रास्ते में वो लोग भी उनकी चिकनी चुपड़ी बातों से मुतास्सिर हो कर फ़रेब में मुब्तिला होते गये जो बे समझें बूझे उनके साथ हो गए। इस तरह लशकरियों की तादाद तीन हज़ार तक पहुंच गयीं और जब ये लशकर उस मोड़ (ज़ाते अर्क़) पर पहुंचा जहां से बसरा की राह लेनी थी तो सईद इब्ने आस ने मरवान से पूछाः-
हम लोग आख़िर किस तरफ़ मुंह उठाये हुए चले जा रहे हैं ? और इस दस्त पैमाई का मक़सद क्या है ? मरवान ने कहाः-
हम बसरा जा रहे हैं। सईद ने कहाः-
बसरा में क्या है ? मरवान ने कहा हम उस्मान के क़ातिलों से बदला लेना चाहते हैं। उस पर सईद ने सख्त लहजे में कहाः-
उस्मान के क़ातिल (तल्हा व ज़ुबैर) तो तुम लोगों के साथ ही हैं , उन्हीं को क़त्ल कर डालो और अपने घरों को वापस चले जाओ। एक दूसरे का नाहक़ ख़ून न बाहाओ। ( 6)
उसके बाद सईद इब्ने आमिर तल्हा और ज़ुबैर के पास आये , और उनसे तन्हाई में पूछाः-
ये बताओ अगर तुम लोगों ने ये जंग जीत ली और अपने मक़सद में कामयाब हो गये तो ख़लीफ़ा कौन होगा ? सईद ने कहाः- जब तुम ख़ूने उस्मान के क़िसास पर जंग का इरादा रखते हो तो तुम्हें उस्मान के बेटों में से किसी को ख़लीफ़ा बनाना चाहिये। जब कि उनके दो साहबज़ादे अबान और वलीद तुम्हारे साथ हैं और अगर तुम ने ऐसा न किया तो दुनिया के लोग यही कहेंगे कि ख़ूने उस्मान के क़िसास का लबादा ओढ़ कर अपने इक़तिदार की राह हमवार करने निकले थे।
उस पर तल्हा और ज़ुबैर दोनों एक साथ तड़प कर बोल उठेः-
क्या हम बुज़ुर्गो सिन रसीदा मुहाजिरीन को छोड़ के उस्मान के बाल बच्चों को ख़लीफ़ा बनायेंगे। ( 7)
तल्हा और ज़ुबैर की इस गुफ़्तुगू ने सईद पर वाज़ेह कर दिया कि ये लोग क़िसास तलबी के लिए नहीं निकले बल्कि ये सारा हड़बोग हुकूमत और इक़तिदार के लिए है। चुनान्चे वो किनाराकश हो गये और उनके साथ अब्दुल्लाह इब्ने ख़ालिद , मुग़ीरह बिन शैबा और क़बीलाए बनी सक़ीफ़ के लोग भी अलाहिदा हो कर ताएफ़ की तरफ़ चले गये। बाक़ी लशकर अपनी मन्ज़िल की तरफ़ रवाना हो गया।
1. तारीख़े इस्लाम ज़हबीः- जिल्द 2 पेज न. 14
2. अल इमामत वल सियासतः- जिल्द 1 पेज न. 61
3. कामिलः- जिल्द 3 पेज न. 106
4. बुख़ारीः- जिल्द 2 पेज न. 59
5. अक़दुल फ़रीदः- जिल्द 2 पेज न. 99
6. तबरीः- जिल्द 3 पेज न. 472
7. तबरीः- जिल्द 3 पेज न. 472
लशकर अपनी मुअय्यना मन्ज़िल की तरफ़ गामज़न था कि दौराने सफ़र एक ऐसा वाक़ेआ रूनुमा हुआ जिसने आयशा के होशों हवास को दरहम बरहम और उनके अजाएमों इरादों को मुतज़लज़िल कर दिया। वो ये कि जब उम्मुल मोमिनीन अपने लशकर के साथ हव्वाब ( 1) नामी एक चश्में के क़रीब शब गुज़ारी के लिए फ़रोकश हुईं तो आपने कुत्तों के भौंकने की आवाज़े सुनीं जो भौंक भौंक कर आपका ख़ैर मक़दम कर रहे थे और अपनी ज़बान में ये पूछ रहे थे कि ऐ उम्मुल मोमिनीन ! ख़ुदा और रसूल के हुक्म के ख़िलाफ़ आप घर से क्यों निकल खड़ी हुंईं ? आख़िर आपके साथ क्या मजबूरी थी जब कि पैग़म्बर की तरफ़ से आपको घर में बैठने की सख़्त ताक़ीद थी। क्या आप हुज़ूर (स.अ.व.व) की तम्बीह भूल गयीं थीं जिसमें आपने अपनी अज़्वाज को मुख़ातिब करके फ़रमाया था कि वो कौन हैं जिस पर हव्वाब के कुत्ते भौंकेंगे ?
फिर कुत्तों ने ये फ़र्याद भी कीः-
हमें अफ़सोस है कि आपने अपने ही हाथों अपना दामने इज़्ज़तों हुर्मत चाक कर डाला। ख़ुदा के लिये वापस जाइये और तौबा और इसतिग़फ़ार के ज़रिये अपनी इस ग़लती की तलाफ़ी कीजिए और हमें ज़्यादा भौंकने पर मजबूर न कीजिए।
कुत्तों की इस फ़र्याद और इसतेफ़्सार का असर आयशा पर हुआ हो या न हुआ हो लेकिन उनके दिमाग़ों दिल में एक ख़लिश और उलझन ज़रूर पैदा हो गयी , चुनान्चे उन्होंने क़रीब खड़े सारबान से पूछा कि ये कौन सा मक़ाम है ? उसने कहा ये हव्वाब है। हव्वाब का नाम सुनना था कि आप पर लर्ज़ा जारी हो गया , ख़ौफ़ो दहशत से कांपने लगीं और चींख़ चींख़ कर कहने लगीं किः-
मुझे वापस जाने दो , ख़ुदा की क़सम मैं ही वो हव्वाब वाली हूं। ( 2)
तल्हा और ज़ुबैर वग़ैरह को भी उनकी इस अचानक तबदीली पर हैरत हुई , उन लोगों ने उन्हें तसल्ली दी और कहा हव्वाब है तो दुआ करें आप इस क़दर सरासीमा और परेशान क्यों हैं ? और वापसी पर इसरार क्यों हैं ? जवाब में आपने फ़रमायाः-
एक मरतबा रसूलल्लाह (स.अ.व.व) की बीवियां उनके गिर्द जमा थीं कि मैंने आपको फ़रमाते हुए सुना कि तुम में वो कौन है जिस पर हव्वाब के कुत्ते भौंकेंगे। ( 3)
लिहाज़ा अब मुझे कोई शको शुब्ह नहीं कि उससे मुराद मैं हूं और आं हज़रत (स.अ.व.व) का इशारा मेरी ही तरफ़ था। बेहतर यही है कि मुझे वापस चला जाना चाहिये।
जब तल्हा ज़ुबैर ने सारा मामला बिगड़ते देखा तो कहा कि कुत्तों को भौंकने दीजिए और सारबान को कहने दीजिए ये हव्वाब नहीं है। फिर मुअज़्ज़मा को यक़ीन दिलाने के लिए अब्दुल्लाह इब्ने ज़ुबैर ने आस पास के पचास आदमियों को इकटठा किया और उन्हें कुछ दे दिला कर इस अम्र की झूठी गवाही दिलवा दी कि ये हव्वाब नहीं है। इमामे शअबी का कहना है कि ये पहली झूठी गवाही थी जो इस्लाम में दी गयी। ( 4)
अभी उम्मुल मोमिनीन ज़ेहनी कशमकश और तज़बजुब के आलम में मुबतला ही थीं कि तल्हा ने एक तरफ़ से ये हुल्लड़ मचवा दिया कि जल्दी करो , उठो और चलो , अली इब्ने अबी तालीब (अ.स) सरों पर आ पहुंचे हैं। ( 5)
तल्हा की ये तदबीर कारगर हुई , सुनते ही लोग अफ़रा तफ़री के आलम में खड़े हो गये और हज़रत अली का नाम सुनते ही उम्मुल मोमिनीन के ख़्यालात ने इस तरह पलटा खाया कि उन्हें न तो कुत्तों को भौंकना याद रहा न हव्वाब , न क़ौले पैग़म्बर (स.अ.व.व)। अमीरूल मोमिनीन की अदावत और दुश्मनी में उनके मुज़महिल इरादों और पसमुर्दा हौसलों पर फिर से शबाब आ गया और वो मुकम्मल जोशों ख़रोश के साथ लशकर की क़यादत करती हुई बसरा की तरफ़ फिर चल पड़ी।
एक तरफ़ हज़रत आयशा क़दम क़दम पर नये नये गुल खिला रहीं थी और दूसरी तरफ़ अमीरूल मोमिनीन हज़रत अली (अ.स) माविया की तरफ़ से शाम में रूनुमा होने वाली बग़ावत को फरो करने की फ़िक्र में थे कि उन्हें तल्हा और ज़ुबैर की बैअत शिकनी और आयशा की लशकर कशी की इत्तेला मदीने में फ़राहम हुई।
आपको तल्हा और ज़ुबैर की तरफ़ से ये अन्देशा ज़रूर था कि वो माविया से साज़ बाज़ कर के फ़ित्ना व शर को हवा देंगे। मगर आयशा की तरफ़ से ख़्याल भी न था कि वो मारका आराई के लिए फौज कशी करेंगी और ख़ुदा व रसूल के ख़िलाफ़ घर से निकल खड़ी होंगी। लिहाज़ा आपने मजबूरन शाम की मुहिम का ख़्याल तर्क किया ताकि मौजूदा सूरते हाल से निपटा जा सके। चुनान्चे मदीने के सरकर्दा अफ़राद को आपने मस्जिदे नब्वी में जमा किया और फ़रमाया कि तल्हा और ज़ुबैर के बाग़ियाना इक़दाम का तुम्हे इल्म हो चुका है , तुम लोग मेरा साथ दो ताकि बसरा पहुंचने से पहले ही उन लोगों को रास्ते में रोक लिया जाये। कुछ लोग आयशा तल्हा और ज़ुबैर जैसी बाअसर शख़्सियतों के मुक़ाबले खड़े होने से खिचकिचाने लगे , कुछ लोगों ने साफ़ इनकार कर दिया अलबत्ता ज़्यादा इब्ने हन्ज़ला , हसीम इब्ने तैहान और अबू क़सावए अन्सारी वग़ैरह ने हिमायत का यक़ीन दिलाया , अबू क़सावा ने एक पुरज़ोर तक़रीर भी की और ये कहाः-
या अमीरूल मोमिनीन ! ये तलवार मुझे रसूलल्लाह (स.अ.व.व) ने सौंपी थी और एक अर्से से ये मियान में है लेकिन अब वक़्त आ गया है कि मैं इन ज़ालिमों के ख़िलाफ़ इसे बे नियाम करूं जो उम्मत को फ़रेब देने में आगे है। ( 6)
हज़रत उम्मे सलमा ने अपने फ़रज़न्द उमर इब्ने अली सलमा को अमीरूल मोमिनीन की ख़िदमत में पेश किया और फ़रमायाः-
मैं इसे आपके हवाले करती हूं ये जान से ज़्यादा मुझे अज़ीज़ है। मेरा फ़रज़न्द तमाम मारको में आपके साथ रहेगा यहां तक कि ख़ुदा वन्दे आलम वो फ़ैसला करे जो करने वाला है। अगर रसूलल्लाह (स.अ.व.व) के हुक्म की ख़िलाफ़ वर्ज़ी न होती तो मैं भी आपके हमराह जाती जिस तरह आयशा , तल्हा और ज़ुबैर के साथ निकल खड़ी हुई है। ( 7)
हज़रत उम्मे सलमा की इस पेशकश पर हक़ परस्ती जिस क़दर भी फ़ख़्र करे कम है।
1. ये चश्मा ए हव्वाब बिन्ते कल्ब इब्ने दबुर्रह के नाम पर हव्वाब कहलाता है।
2. तारीख़े कामिलः- जिल्द 3 पेज न. 107
3. तारीख़े कामिलः- जिल्द 3 पेज न. 107
4. तज़किरा ए खवासुल उम्माः- पेज न. 39
5. कामिलः- जिल्द पेज न. 108
6. तारीख़े कामिलः- जिल्द 3 पेज न. 13
7. अनसाबुल अशनफ़ः- जिल्द 1 पेज न. 430
अमीरूल मोमिनीन हज़रत अली (अ.स) ने मदीने में सहल इब्ने हुनैफ़े अनसारी और मक्के में क़सम इब्ने अब्बास को अपना क़ायम मक़ाम मुक़र्रर किया और इस शान से मुहिम सर करने के लिए कि आम लशकरियों के अलावा सत्तर बद्र में और चार सौ बैअते रिज़वान में शरीक होने वाले सहाबा आपके शरीक थे।
मक़ामे ज़ीवक़ार पर पहुंच कर आपने मन्ज़िल की और जंग की नज़ाकत को मद्देनज़र रखते हुए इमामे हसन (अ.स) और अम्मारे यासिर को कूफ़ा रवाना किया कि वहां के लोगों को जिहाद की दावत दें। जब ये लोग कूफ़े पहुंचे और अहले कूफ़ा को अमीरूल मोमिनीन का पैग़ाम दिया तो वालिए कूफ़ा अबू मूसा अशअरी दर्मियान में दीवार बन कर हाएल हो गया और ये कहकर लोगों को रोकना शुरू किया कि ये इक़तिदार की जंग है जो दुनिया का तलबगार हो वो जाये और जो आख़ेरत का ख़्वाहगार हो वो गोशा नशीन हो कर घर में बैठे। अबू मूसा अशअरी की इस रख़ना अंदाज़ी की इत्तेला जब अमीरूल मोमिनीन को मिली तो आपने इब्ने अब्बास और मालिके अशतर को कूफ़े भेजा कि वो अबू मूसा को समझायें कि वो इन हरकतों से बाज़ रहें। चुनान्चे मस्जिदे कूफ़ा में उन लोगों ने समझाया कि अमीरूल मोमिनीन की नुसरतों मदद का मक़सद फ़ित्ना व शर का इन्सेदाद और इस्लाह बिन्नास है। मगर उसने कहा कि मैंने रसूलल्लाह (स.अ.व.व) को फ़रमाते सुना है कि अनक़रीब एक फ़ितना बरपा होगा जिसमें बैठने वाला खड़े होने वाले से , खड़ा होने वाला चलने वाले से और चलने वाला सवार होने वाले से बेहतर होगा। ( 1)
आख़िर वो लोग (तल्हा और ज़ुबैर) भी तो हमारे ही भाई बन्द हैं , न उनका ख़ून हमारे लिए मुबाह है और न उनका माल छीनना हमारे लिए जाएज़ है। उस पर अम्मारे यासिर ने बिगड़ कर कहाः-
बेशक तुम्हारा गोशा नशीन हो जाना बेहतर है। ( 2)
फिर ये दोनों एक दूसरे से उलझते रहे और अबुमूसा यही इसरार करता रहा कि ये एक फ़ितना है इससे किनारा कशी ही बेहतर है।
इधर ये कशमकश जारी थी , उधर ज़ैद इब्ने सौहान ने हज़रत आयशा की तरफ़ से मूसा के नाम मौसूल शुदा दो ख़ुतूत हाज़िरीन को पढ़ कर सुनाये जिन में अबू मुसा को ये ताक़ीद की गयी थी कि तुम मेरी मदद को आओ और अगर किसी मजबूरी के तहत न आ सको तो अहले कूफा को अली की नुसरत और मदद से रोको।
इन ख़ुतूत को पढ़ने के बाद ज़ैद ने तन्ज़िया लहजे में कहाः-
तुम दरिया के बहाव को नहीं रोक सकते , लिहाज़ा जो बात तुम्हारे इख़्तियार में नहीं है उससे दस्तबरदार हो जाओ और लोगों को अमीरूल मोमिनीन की नुसरत से रोकने के बजाये ख़ामोश हो कर घर में बैठ जाओ।
मगर उस पर किसी बात का असर न हुआ और वो बराबर ये कहता रहा कि ये एक फ़ितना है इससे बचना चाहिये। इमामे हसन (अ.स) भी मस्जिद में मौजूद थे , जब आपने अबू मूसा का ये मुआनिदाना रवैय्या देखा तो उसे फटकारते हुए फ़रमायाः-
हमारी मस्जिद से निकल और जहां तेरा दिल चाहे चला जा। ( 3)
फिर आपने मिम्बर से एक बलीग़ और पुरअसर तक़रीर की और लोगों को अमीरूल मोमिनीन की नुसरत पर आमादा किया। इसका असर ये हुआ कि अहले कूफ़ा ने करवट ली और अवामी सैलाब आगे बढ़ने लगा। जब कूफ़े की फ़ज़ा मुकम्मल तौर पर साज़गार हो गयी तो मालिके अशतर ने दारूल अमारा पर क़ब्ज़ा कर लिया और अबू मूसा को क़स्र में दाख़िल होने से रोक दिया। अबू मूसा ने गिड़गिड़ा कर खुशामद की और कहा कि मुझे एक रात की मोहलत दीजिये।
मालिके अशतर ने कहा कि तुम्हें सिर्फ़ इशा तक मोहलत दी जाती है , अपना मुंह काला करो और शहर से निकल जाओ। चुनान्चे वो शाम की तरफ़ निकल गया। इधर अहले कूफ़ा गिरोह दर गिरोह उठ खड़े हुए और अबू मूसा की कोशिश और आयशा के ख़ुतूत के बावजूद बारह हज़ार शमशीर ज़न रातो रात मक़ामे ज़ीक़ार मे अमीरूल मोमिनीन के परचम तले जमा हो गये।
अमीरूल मोमिनीन हज़रत अली (अ.स) का ये जंगी इक़दाम हुक्मे रसूल (स.अ.व.व) के ऐन मुताबिक़ था और इस मुहिम को सर करने की पैग़म्बर ने आपको हिदायत की थी। जैसा कि अबू अय्यूबे अन्सारी का बयान है किः-
रसूलल्लाह (स.अ.व.व) ने हज़रत अली को ये हुक्म दिया था कि वो बैअत शिकनों (असहाबे जमल) बेराहरूओं (अस्हाबे सिफ़्फ़ीन) और बेदीनों (ख़वारिज) से जंग करें। ( 4)
पैग़म्बरे इस्लाम ने हज़रत अली के इस इक़दाम को एक मज़लूम और हक़ परस्त का इक़दाम और इसके मुक़ाबले में ज़ुबैर की जंग को ज़ालिमाना वा ज़ारिहाना क़रार देते हुए बतौरे पेशिनगोई फ़रमाया थाः-
ऐ ज़ुबैर ! जब तुम अली से जंग करोगे तो उनके हक़ में ज़ालिम हो गये। ( 5)
और हज़रत आयशा को हव्वाब के सिलसिले में मुतनब्बे करते हुए फ़रमाया थाः-
ख़बरदार , ऐ आयशा ! कहीं वो तुम ही न हो। ( 6)
इन इरशादाते पैग़म्बर के अलावा क़ुर्आने मजीद में भी बाग़ियों के बारे में ये सरीही हुक्म है किः-
अगर अहले ईमान के दो गिरोह आपस में बरसरे पैकार हों तो उनमें सुल्ह कराओ , और अगर उनमें से एक गिरोह दूसरे गिरोह पर ज़ियादती करे तो तुम उस ज़ियादती करने वाले गिरोह से जंग करो।
इस नुसूस के होते हुए कौन कह सकता है कि हज़रत का ये इक़दाम आयशा के मुक़ाबले में ग़लत था।
1. कामिलः- जिल्द 3 पेज न. 117
2. कामिलः- जिल्द 3 पेज न. 117
3. अख़बारूत तौलः- पेज न. 145
4. मुसतदरक हाकिमः- जिल्द 3 पेज न. 139
5. कामिलः- जिल्द 3 पेज न. 122
6. याक़ूबीः- जिल्द 3 पेज न. 157
हज़रत आयशा का लशकर चश्माए हव्वाब से रवाना हो कर जब चाहे अबू मूसा नामक जगह पर पहुंचा और हाकिमे बसरा उस्मान बिन हुनैफ़ को लशकर के साथ अचानक वारिदे बसरा होने की ख़बर मिली तो उसने अबू असवदे वाएली और इमरान इब्ने हसीन को भेजा कि वो आपसे बसरा आने का सबब मालूम करे चुनान्चे लोग गये और आयशा से पूछाः-
ऐ मादरे गिरामी ! आप किस मक़सद से यहां तशरीफ़ लायी हैं , और ये फ़ौजो सिपाह आपके साथ क्यों है ? कहा कि मैं ख़ूने उस्मान का इन्तिक़ाम लेने आई हूं जो बेजुर्मो ख़ता घर के अन्दर क़त्ल कर दिये गये। अबुल असवद ने कहा कि बसरा में उस्मान का क़ातिल कोई नहीं है , आप ग़लतफ़हमी में मुब्तिला हैं।
आयशा ने कहा कि मैं अहले बसरा के तआव्वुन से इन्तिक़ाम लेना चाहती हूं। अबुल असवद ने कहा , रसूलल्लाह आपको घर में बैठने का हुक्म दे गये हैं , इन मारका आराईयों से आपको क्या मतलब ? क्या आपके शायाने शान ये बात है कि घर का गोशा छोड़ कर मैदाने कारज़ार गर्म करने निकल खड़ी हों ?
हज़रत आयशा ने कहा हम से लड़ने की हिम्मत कौन करेगा ? इस पर अबुल असवद ने कहा , हम लड़ेगे , और दुनिया देखेगी कि किस तरह लड़ा जाता है।
आयशा का ये ग़ुरूर और ये घमण्ड शायद इस लिये था कि वो उम्मुल मोमिनीन हैं और ज़ौजाए रसूल होने की वजह से इन्तिहाई इज़्ज़तों तौक़ीर की मुस्तहक़ हैं लिहाज़ा ऐसी सूरत में कौन उनसे नबर्द आज़मायी की जसारत कर सकता है ? मगर उनका ये ख़्याल उस वक़्त सही होता जब वो ख़ुद इस एहतिराम को बरक़रार रखतीं , और घर का गोशा न छोड़तीं। जब वो अपनी मन्ज़िलत का पासो लिहाज़ न कर सकीं तो उन्हें ये तवक़्क़ों क्यों थी कि जो एहतिराम उन्हें घर के अन्दर रहने में हासिल था , बाहर भी बरक़रार रहता। इस सिलसिले में मोहतर्मा का दूसरा ख़्याल ग़ालिबन ये था कि हज़रत अली के हमराह वही चन्द गिने चुने अफ़राद होंगे जो उनके साथ मदीने से चले होंगे। कूफ़ा जहां से जंगजू सिपाह फ़राहम हो सकती हैं वो अबू मूसा अशअरी के ज़ेरे असर हैं उसके होते हुए वहां से मदद मिलने का इमकान नहीं है लिहाज़ा ऐसी सूरत में हज़रत अली मुख़तसर सी फ़ौज उनके लशकरे गरां की ताब न ला सकेगी , और वो बग़ैर लड़े ही हथियार डालने पर मजबूर हो जायेगी। लेकिन मामला इसके बरख़िलाफ़ निकला। अमीरूल मोमिनीन की आवाज़ पर अहले कूफ़ा उमंड पड़े और रातों रात उनकी सिपाह में शामिल हो कर पूरे लशकर पर छा गये।
ग़रज़ कि अबुल असवद उनकी गुफ़्तुगू से समझ गये कि ये लोग फ़ितना व शर पर आमादा और जंगो जदल पर तुले हुए हैं। अब उनसे मज़ीद बात चीत करना वक़्त को बरबाद करना है लिहाज़ा वो पलट आये और उस्मान बिन हुनैफ़ को उनके इरादों से आगाह कर दिया और साथ ही साथ उनको ये मशविरा भी दिया कि दिफ़ाई और हिफ़ाज़ती इन्तिज़ामात और मज़बूत कर दिये जाये।
चाहे अबू मूसा पर कुछ तवक़्क़ुफ़ के बाद , उम्मुल मोमिनीन का लशकर हरकत में आ गया और हुदूदे बसरा में दाख़िल हो कर उसने मज़ीद ऊंटों की मन्डी में पड़ाव डाल दिया।
अहले बसरा को जब आयशा , तल्हा और ज़ुबैर के आने की ख़बर मिली तो वो चारों तरफ़ से सिमट कर कसीर तादाद में उनके गिर्दो पेश जमा हो गये और बाहम चेमी गोइयां और क़यास आराइयां होने लगीं। कोई कुछ कहता था कोई कुछ। एक शख़्स ने खड़े हो कर मजमे को ख़िताब किया और कहाः-
ऐ लोगों ! अगर ये लोग किसी ख़ौफ़ो दहशत की वजह से हमारे शहर में आये हैं तो इन्हे पनाह दो और अगर ख़ूने उस्मान के इन्तिक़ाम की ग़रज़ से आये हैं तो हम में कोई उस्मान का क़ातिल नहीं है लिहाज़ा उन्हें वापस जाने पर मजबूर होना ही पड़ेगा।
इसके बाद जाया इब्ने क़तादा ने हिम्मत की और आगे बढ़ कर आयशा से कहाः-
ऐ उम्मुल मोमिनीन ! आपका इस मलऊन ऊंट पर बैठ कर हथियारों का निशाना बनने के लिए उठ खड़ा होना क़त्ले उस्मान से कहीं ज़्यादह मुसीबत ख़ेज़ है। ख़ुदा की तरफ़ से आपके लिए हिजाब व एहतिराम का हुक्म था जिसका दामन रक़द आप ही ने चाक कर डाला। जो शख़्स आप से जंग कर सकता है वो आपको क़त्ल करने में भी दरेग़ नहीं करेगा। अगर आप अपनी मर्ज़ी से आयी हैं तो बेहतर है कि वापस चली जाइये और अगर घेर कर लायी हैं तो लाने वालों के ख़िलाफ़ हम से मदद तलब कीजिए।
हज़रत आयशा ने ज़ारिया की इन बातों का कोई जवाब नहीं दिया क्यों कि उस वक़्त आपकी सारी तवज्जोह अपनी क़ुव्वतों ताक़त को बढ़ाने और लोगों को अपना हम ख़्याल बनाने के नुक़ते पर मर्क़ूज़ थी और उनके पेशे नज़र ये मरहला था कि अहले बसरा को किसी तदबीर से ये यक़ीन दिलायें कि क़त्ले उस्मान हज़रत अली के इशारे पर हुआ है और चन्द शोरिश पसन्दों के बल पर उन्होंने मसनदे ख़िलाफ़त पर क़ब्ज़ा कर लिया है , न राय आम्मा उनकी ताईद के हक़ में है और न उन्हें असहाबे शूरा का तआव्वुन हासिल है ग़रज़ कि आयशा , तल्हा और ज़ुबैर ने इस क़िस्म के ग़लत तास्सुरात देने के लिए मौजूदा मजमें को ख़िताब किया जिसका नतीजा ये हुआ कि हाज़ेरीन दो गिरोहों में बंट गये। एक गिरोह आयशा तल्हा और ज़ुबैर की हिमायत पर उतर आया और दूसरा गिरोह उस्मान बिन हुनैफ़ का हमनवा बन गया और बाहम तक़रार होने लगीं फिर क्या था कि एक दूसरे पर जूते चले पत्थर बरसे , और घर घर में फूट पड़ गयी और भाई भाई में तफ़र्क़ा पैदा हो गया। बसरा में ये हज़रत आयशा के क़दमों की पहली बरकत थी।
तल्हा , ज़ुबैर और आयशा की चाल बाज़ियों और मक्कारियों की बदौलत फ़रेब में मुबतिला हो कर अहले बसरा की अकसरियत उनके साथ हो गयी तो उन्हें ये फ़िक्र लाहक़ हुई कि अमीरूल मोमिनीन हज़रत अली वारिदे बसरा होने से पहले ही बैतुल माल और शहर के नज़्मों नसक़ को अपने क़ब्ज़े में ले लिया जाए। चुनान्चे उन्होंने शहर की तरफ़ रूख़ किया। बसरा के हाकिम उस्मान बिन हुनैफ़ आसानी से शहर उनके हवाले करने को तैय्यार न थे , उन्होंने तमाम रास्तों की नाका बन्दी कर के जहां तक मुम्किन हो सका हिफ़ाज़ती इक़दामात किये। यहां तक कि हमला आवर जिस रास्ते से बढ़ने की कोशिश करते उस्मान बिन हुनैफ़ के साथी आहिनी दीवार बन कर खड़े हो जाते और उन्हें आगे बढ़ने से रोक देते। लेकिन हज़ारों के रेले को कब तक रोका जा सकता था जब कि उस्मान की तरफ़ से हर महाज़ पर चन्द गिनती के लोग मामूर थे जिनमें न मुसल्लह अफ़वाज़ से मुक़ाबले की ताक़त थी और न ही मुक़ाबले में कामयाबी की उम्मीद। जब उस्मान बिन हुनैफ़ ने देखा कि शहर उनके दस्तबर्द से महफ़ूज़ नहीं रखा जा सकता तो वो एक फ़ौजी दस्ता ले कर तल्हा व ज़ुबैर के पास आए और उनसे कहा कि तुम लोग क्या चाहते हो और ये शोरिशो हंगामा क्यों ? कहा , हम ख़ूने उस्मान का क़िसास चाहते हैं। उस्मान ने कहा कि क़िसास लेने का ये कोई तरीक़ा नहीं है , ये क्यों नहीं कहते कि हम ख़िलाफ़त के लिये लड़ रहे हैं। तल्हा ने कहा , अगर ऐसा हो भी तो हम से ज़्यादा अली ख़िलाफ़त के अहल नहीं है। ग़रज़ की दोनों तरफ़ से बात बढ़ने लगी और नौबत ये आयी कि फ़रीक़ैन ने तलवारे सौंत लीं और झड़प शुरू हो गयी। जब दोनों तरफ़ से अच्छे ख़ासे लोग मारे जा चुके तो आयशा ने लड़ाई रूकवा दी और दोनों के दरमियान ये मुआहिदा हो गया की अमीरूल मोमिनीन हज़रत अली इब्ने अली तालिब (अ.स) तशरीफ़ लाये उस वक़्त तक फ़रीक़ैन खामोश रहें और हुकूमत के इन्तिज़ामी उमूर अपनी जगह बदस्तूर बरक़रार रहे। लेकिन इस मुआहिदे को अभी दो दिन ही गुज़रे थे कि एक सर्द व तारीक रात में आयशा के आदमियों ने उस्मान पर शबखून मारा और उन्हें गिरफ़्तार कर के उनकी दाढ़ी , सर , भौं और पलकों का एक एक बाल उखेड़ लिया। जैसा कि इब्ने असीर लिखते हैः-
अभी दो , तीन दिन ही गुज़रे होंगे कि उन्होंने बैतुर रिज़्क़ के नज़दीक उस्मान पर हमला कर दिया , और उन्हें गिरफ़्तार कर के चाहा कि उन्हें क़त्ल कर दें मगर इस ख़्याल से कि कहीं अन्सार बिफ़र न जायें के लोग डर गये मगर उनके सर दाढ़ी , भौ , और पलकों के बालों को उखेड़ कर उन्हें क़ैद कर दिया। ( 1)
ज़ाहिर है कि जब हाकिमे बसरा उस्मान क़ैद हो गये तो उनके बारे में उम्मुल मोमिनीन का मशवरह भी ज़रूरी था। चुनान्चे तल्हा व ज़ुबैर ने ख़लीफ़ा उस्मान के फ़रज़न्द अबान के ज़रिये आयशा से मालूम कराया कि उस्मान बिन हुनैफ़ को क़ैद रखा जाये या क़त्ल कर दिया जाये। हज़रत आयशा ने फ़ौरन हुक्म सादिर कर दिया कि उन्हें क़त्ल कर दो।
एक औरत ने जब ये सुना तो चीख़ कर आयशा से कहाः-
क्या ग़ज़ब कर रही हो , उस्मान रसूल (स.अ.व.व) का सहाबी और तुम्हारे बाप अबू बकर का दोस्त है। आयशा ने कहा अच्छा ? तो फ़िर अबान को बुलाओ।
अबान पलट कर आया तो आयशा ने दूसरा हुक्म सादिर फ़रमाया कि उन्हें क़त्ल न करो बल्कि क़ैद रहने दो।
अबान ने ये दूसरा हुक्म सुना तो कहने लगा , अगर मुझे मालूम होता कि आप इस मक़सद से बुला रही हैं तो मैं पलट कर ही न आता। ( 2)
उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा के हुक्म से उस्मान बिन हुनैफ की जान तो बच गयी मगर उनके साथियों में से चालीस आदमी बेजुर्मो ख़ता क़त्ल कर दिये गये इस कुश्तो ख़ून के बाद आयशा के लशकरियों ने बैतुल माल पर धावा बोल दिया और उसके पचास मुहाफ़िज़ों को भेड़ों और बकरियों की तरह ज़िब्ह कर डाला।
जब बसरा को एक मुम्ताज़ शख़्सियत हकीम इब्ने जबला को इस सफ़्फ़ाकी , ख़ूंरेज़ी और ज़ुल्मों तशद्दूद का हाल मालूम हुआ तो वो तड़प उठे और कहा कि अगर मैं इस मौक़े पर ख़ामोश बैठा रहा तो अपने परवरदिगार को क्या जवाब दूंगा ? चुनान्चे वो क़बीलाए बनी बकर और क़बीला ए अब्दुल क़ैस के तीन सौ आदमियों को ले कर बैतुर रिज़्क़ की तरफ़ बढ़े जहां अब्दुल्लाह इब्ने ज़ुबैर अपने आदमियों में लूट का गल्ला तक़सीम कर रहे थे। उसने हकीम को आते देखा तो आगे बढ़ कर पूछा कि तुम कैसे आये हो ? कहा इस ग़ल्ले की तक़सीम बन्द की जाये , उस्मान बिन हकीम को रिहा किया जाए और उन्हें उस वक़्त तक दारूल अमारा में रहने दिया जाये जब तक अमीरूल मोमिनीन यहां नहीं आ जाते। ख़ुदा की क़सम अगर मेरे पास यारों अन्सार होते तो मैं इस क़त्लो ग़ारतगरी का इन्तिक़ाम ज़रूर लेता जिसे तुम लोगों ने रवा रखा है।
इब्ने ज़ुबैर ने कहा , हम ने ख़ूने उस्मान का बदला लिया है।
हकीम ने कहाः-
जिन लोगों को तुम ने क़त्ल किया है वो उस्मान के क़ातिल थे ? तुम लोग कहरे ख़ुदा से क्यों नहीं डरते और क़त्लो ग़ारतगरी का सिलसिला आख़िर क्यों नहीं बन्द करते ? इस पर इब्ने ज़ुबैर ने हकीम को गालियां दीं और कहा , तुम लोग यूं ही चीख़ते चिल्लाते रहो हम वही करेंगे जो हमे करना है , अब रह गया उस्मान बिन हुनैफ़ की रिहाई का सवाल तो वो उसी वक़्त मुम्किन है जब वो अली की बैअत का तौक़ अपनी गर्दन से उतार कर हमारे साथ उनके मुक़ाबले में सफ़आरा हो जायें। हकीम ने जब ये सूरते हाल देखी तो कहने लगेः-
परवरदिगार ! गवाह रहना इन दोनों के ज़ुल्मों जौर पर तू हाकिमो आदिल है।
फिर अपने साथियों से कहाः-
मुझे इन लोगों से जंगो क़िताल के जवाज़ में कोई शुब्हा नहीं , जिसे शक हो वो वापस चला जायें। ( 3)
ये कह कर हकीम ने क़ब्ज़ा ए शमशीर पर हाथ रखा और मैंदान में उतर आये। हरीफ़ों की तलवारें भी नियामों से निकल पड़ीं और देखते ही देखते मैदाने कारज़ार गर्म होने लगा , जंग के शोले भड़कने लगे और तलवारों से तलवारें टकरा कर खून बरसाने लगीं।
हकीम पूरे जोशो ख़रोश के साथ मसरूफ़े पैकार थे कि अचानक एक शख़्स ने उनके पैर पर तलवार से ऐसा वार किया कि उनका पैर घुटने से कट कर अलग हो गया। हकीम ने अपना वही कटा हुआ पैर उठाया और पूरी क़ुव्वत से उस शख़्स पर इस तरह फ़ेंका कि वो लड़खड़ा कर ढेर हो गया। हकीम घुटनों के बल दौड़ते हुए मलऊन के पास पहुंचा और उसे इस तरह दबोंच कर उसके ऊपर बैठ गये कि जब तक उसका दम नहीं निकल गया , अलग न हुए।
हकीम बिन जबला ने बड़ी बाज़िगरी से जंग की मगर उनका मुख़तसर दस्ता हज़ारों शमशीर बकफ़ हरीफ़ों का मुक़ाबला कहां तक करता। आख़िरकार सब के सब मौत के घाट उतर गये। हकीम के भाई रअल इब्ने जबला और उनके बेटे अशरफ़ भी इस जंग में काम आये।
ये जंग तारीख़ में जंग जमले असग़र के नाम से मौसूम है जो 25 रबीउस्सानी 36 हिजरी में वाक़े हुई।
1. तारीख़े कामिलः- जिल्द 3 पेज न. 111
2. तबरीः- जिल्द 3 पेज न. 485
3. तबरीः- जिल्द 3 पेज न. 491
हकीम बिन जबला और उनके साथियों को मौत के घाट उतारने के बाद तल्हा वग़ैरह ने चाहा कि उस्मान बिन हुनैफ़ का भी ख़ात्मा कर दें। उस्मान ने उनके इरादों और चेहरों को भांप लिया। उन्होंने कहा कि अगर तुम लोगों ने मुझे क़त्ल कर दिया तो याद रखो , मेरा भाई सहल इब्ने हुनैफ़ इस वक़्त मदीने का हाकिम है , वो मेरे ख़ून के बदले में तुम्हारे ख़ानदान भर को क़त्ल कर देगा। तल्हा वग़ैरह ने जब ये बात सुनी तो उन्हें अपने अज़ीज़ों , रिश्तेदारों और घर वालों की जानों के लिए ख़तरा महसूस हुआ और इसी ख़तरे के पेशे नज़र उन्होंने उस्मान को छोड़ दिया और वो जान बचा कर बसरा से निकल खड़े हुए और किसी न किसी तरह मक़ामे ज़ीक़ार में अमीरूल मोमिनीन हज़रत अली (अ.स) की ख़िदमत में पहुंच गयें आपने जब उस्मान की हालते ज़ार देखी तो रोने लगे और जब उस्मान ने बसरा के हालात और असहाबे जमल के मज़ालिम की दास्तान सुनाई तो आपका चेहरा ग़ैज़ो ग़ज़ब से सुर्ख़ हो गया।
उस्मान बिन हुनैफ़ ने जो हालात अमीरूल मोमिनीन से बताए उन्हें सुनने के बाद बसरा की तरफ़ आपकी रवानगी नागुज़ीर हो गयी थी। चुनान्चे आपने उसी वक़्त लशकर की सफ़ बन्दी की मैमना और मैयसरा को तरतीब दिया और बीस हज़ार का लश्कर लेकर इस शान से रवाना हुए कि सत्तर बदरी सहाबा और चार सौ बैअते रिज़वान में शरीक होने वाले असहाबे पैग़म्बर (स.अ.व.व) आपके हमरकाब थे।
देखने वालों का बयान है कि जब ये सिपाह बसरा के क़रीब पहुंची तो सब से पहले अन्सार का एक दस्ता नमूदार हुआ जिसका परचम अबू अय्यूबे अन्सारी के हाथ में था। उसके बाद एक हज़ार सवारों का एक दस्ता आया जिसके सिपहसालार ख़जीमा बिन साबिते अन्सारी थे। फिर एक दस्ता और नज़र आया जिसका अलम क़तावह इब्ने रबई उठाये हुए थे। फिर एक हज़ार बूढ़ों और जवानों का जमगठा दिखाई दिया जिनकी पेशानियों पर सज्दों के निशान चमक रहे थे , चेहरे पर ख़शीयते इलाही की नक़ाबे पड़ी हुई थी , ऐसा मालूम होता था गोया जलाले किबरिया के सामने मौक़िफ़े हिसाब में खड़े हैं उनका सिपहसालार सर पर अम्मामा बांधे , सफ़ेद लिबास में मलबूस और घोड़े पर सवार बआवाज़े बलन्द क़ुर्आने मजीद की तिलावत करता जा रहा था , ये हज़रत अम्मारे यासिर थे। फिर एक अज़ीम दस्ता दिखाई दिया जिसका अलम क़ैस इब्ने सअद इब्ने उब्बादह के हाथ में था। फिर एक बड़ा दस्ता नज़र आया जिसका क़ाइद सियाह अम्मामा बांधे सफ़ेद लिबास पहने और खुश जमाल ऐसा कि निगाहें उसके चेहरे के गिर्द मसरूफ़े तवाफ़ थीं , फिर चन्द दस्ते गुज़रने के बाद एक अम्बोहे क़सीर नज़र आया जिसमें रंगारंग के फरैरे लहरा रहे थे और नैज़ों की वो कसरत थी कि एक दूसरे में गुथे जा रहे थे और बलन्दो बाला अलम इम्तियाज़ी शान लिये था उसके पीछे जलालतो अज़मत के पहरों में एक सवार दिखाई दिया , जिसके बाज़ू भरे हुए और निगाहे ज़मीन पर गड़ी हुई थीं और हैबत व वक़ार का ये आलम था कि कोई नज़र उठाकर देख न सकता था ये असदउल्लाहुलग़ालिब अली इब्ने अबी तालिब (अ.स) थे जिनके दायें बायें रसूलल्लाह के नवासे इमामे हसन और इमामे हुसैन (अ.स) (स.अ.व.व) थे और आगे आगे मोहम्मद बिन हनफ़िया फ़त्हों ज़फ़र का परचम बलन्द किये हुए आहिस्ता आहिस्ता क़दम उठा रहे थे , पीछे जवानाने बनी हाशिम , असहाबे बद्र और अब्दुल्लाह इब्ने जाफ़र थे।
जब लशकर शुमाली बसरा के मक़ाम ज़ादिया पर पहुंचा तो शहे लाफ़ता घोड़े से उतर पड़े , आपने चार रक्अत नमाज़ पढ़ी और मुनाजात के लिए सजदे में सर रख दिया। सर उठाया तो ज़मीन आंसुओं से तर थी और ज़बान पर अलफ़ाज़ थे कि ऐ अर्शो फ़र्श के परवरदिगार ! ये बसरा है इसकी भलाई से हमारा दामन भर और इसके शर से अपनी पनाह में रख।
आपने इस मक़ाम से मुख़तलिफ़ क़ासिदों के ज़रिये चन्द ख़ुतूत आयशा तल्हा और ज़ुबैर के पास रवाना किये जिसमें उन्हें हर्बों पैकार और ख़ाना जंगी से बाज़ रहने की हिदायत की थी , लेकिन उन लोगों की समझ में कुछ न आया , अपनी ज़िद पर अड़े रहे और समझाने बुझाने के बावजूद राहे रास्त पर न आये।
फ़िर मक़ामे ज़ाबिया से आगे बढ़ कर आप मैदाने जमल में उतर पड़े जहां तीस हज़ार का मुखालिफ़ लशकर ठाठें मार रहा था। चुनान्चे आपकी फ़ौज ने भी लशकरे ग़नीम के बिलमुक़ाबिल पड़ाव डाल दिया और जब तमाम फ़ौजी अपनी अपनी जगह बैठ गये तो आपने अपनी सिपाह को ये हिदायत देते हुए फ़रमायाः-
जब तक दुश्मन की तरफ़ से इब्तिदा न हो तुम में से कोई आगे न बढ़े , और जब तक उस तरफ़ से हमला न हो तुम में से कोई वार न करे। किसी भागने वाले का पीछा न किया जाऐ , किसी ज़ख़्मी को क़त्ल न किया जाऐ , किसी के हाथ पैर न काटे जायें किसी की लाश की बेहुर्मती न की जाऐ , किसी साहेबे तौक़ीर को बेइज़्ज़त न की जाऐ और किसी औरत को ग़ज़न्द न पहुंचाया जाऐ।
जब ये हिदायत दे चुके तो ग़ैर मुसल्लह हालत में घोड़े पर सवार हुए और सफ़ों से बाहर निकल कर ज़ुबैर को ललकारा कि वो कहां है ? पहले तो वो हिचकिचाया और कुछ सोचता रहा , फिर ज़ेरह बकतर और आलाते हर्बोज़र्ब से आरास्ता हो कर सहमा हुआ हज़रत के क़रीब आया तो आपने फ़रमाया कि ऐ ज़ुबैर ! तुम लोगों का इरादा क्या है ? आख़िर बसरा में ये उधम चौकड़ी क्यों मचा रखी है ? ज़ुबैर ने मुर्दा आवाज़ में जवाब दिया , ख़ूने उस्मान के क़िसास की ख़ातिर।
आपने फ़रमायाः-
हैरत है कि तुम लोग मुझ से खूने उस्मान का क़िसास चाहते हो , हालां कि तुम ही लोगों ने उन्हें क़त्ल किया। ख़ुदा उन लोगों पर मौत को मुसल्लत करे जो उस्मान पर सख़्ती और तशद्दुद को रवा रखे हुए थे। ( 1)
फिर फ़रमायाः-
ऐ ज़ुबैर ! मैं तुम्हें ख़ुदा का वास्ता दे कर पूछता हूं कि क्या तुम ने रसूलल्लाह (स.अ.व.व) को ये फ़रमाते नहीं सुना किः-
तुम मुझसे जंग करोगे और मेरे हक़ में ज़ालिम होगे। ( 2)
ज़ुबैर ने कहाः बेशक रसूलल्लाह (स.अ.व.व) ने ये फ़रमाया था इतने में ज़ुबैर की नज़र अम्मारे यासिर पर पड़ी जो अमीरूल मोमिनीन के लशकर में मौजूद थे और जिनके बारे में पैग़म्बर (स.अ.व.व) ने इरशाद फ़रमाया था कि , ऐ अम्मार ! तुम्हे बाग़ी गिरोह क़त्ल करेगा। यहीं से ज़ुबैर ने जंग से दस्तबर्दार होने का फ़ैसला किया और अमीरूल मोमिनीन से कहा कि अब मैं आप से जंग नहीं करूंगा। चुनान्चे वो मुरझाए हुए चेहरे और थके हुए क़दमों के साथ हज़रत आयशा के पास आया और कहा कि इस जंग में न मेरी अक़्ल काम करती है न मेरी बसीरत मेरा साथ देती है लिहाज़ा मैं अली के ख़िलाफ़ जंग में हिस्सा नहीं लूंगा। आयशा ने कहाः कैसी उखड़ी उखड़ी बातें करते हो , ये आख़िर तुम्हें हो क्या गया है ? ऐसा मालूम होता है कि तुम फ़रज़न्दाने अब्दुल मुत्तलिब की चमकती हुई तलवारों लहराते हुए फ़रहरों और मौत को मंडलाते हुए देख कर खौफ़ज़दा हो गये हो ?
आयशा ने ज़ुबैर को लाख तसल्ली दी मगर वो नहीं माने और मैदान छोड़ कर चल खड़े हुए और बसरा से सात फ़रसख के फ़ासले पर वादिए सबाअ में अमर इब्ने जरमूज़ के हाथों मारे गये। ( 3)
इस तरह अमीरूल मोमिनीन के क़ौल की तस्दीक़ हो गयी कि ख़ुदा उन लोगों पर मौत को मुसल्लत कर दे जो उस्मान पर सख़्ती और तशद्दुद को रवा रखे हुए थे।
ज़ुबैर के मरने के बाद आयशा के लशकर की कमान तन्हा तल्हा के हाथों में रह गयी।
ज़ुबैर का ये इक़दाम बजाऐ ख़ुद एक सुबूत है कि उन्होंने अपने साबिक़ा मौक़िफ़ को ग़लत समझा क्यों कि पहला मौक़िफ़ सही हो तो दूसरा इक़दाम सही नहीं हो सकता और अगर ये दूसरा इक़दाम दुरूस्त था तो पहला लामुहाला ग़लत होगा। ये नहीं हो सकता कि अली से जंग करना भी सही हो और उनके मुक़ाबले में जंग न करना भी सही हो। ज़ुबैर के इस इक़दाम ने ये भी साबित कर दिया कि इनकी तरह आयशा और तल्हा का मौक़िफ़ भी ग़लत था।
ज़ुबैर के बाद अमीरूल मोमिनीन ने चाहा कि तल्हा पर भी हुज्जत तमाम कर दी जाए , चुनान्चे उन्हें मुख़ातिब कर के आपने फ़रमायाः-
ऐ तल्हा ! तुम रसूलल्लाह (स.अ.व.व) की ज़ौजा को जंगो क़िताल के लिये लाये हो लेकिन अपनी बीवी को घर में छोड़ आये हो , क्या तुम ने मेरी बैअत नहीं की थी। ( 4)
जब तल्हा ने कोई जवाब न दिया और आपकी हुज्जत तमाम हो चुकी तो आप अपने लशकर में वापस आये और क़ुर्आन हाथों में ले कर फ़रमायाः-
तुम में कौन वो मुजाहिद है जो ये क़ुर्आन ले कर दुश्मनों की सफ़ में जाये और उन्हें इस किताबे ख़ुदा पर अमल पैरा होने की इजाज़त दे और इस मुसहफ़ का वास्ता दे कर उन्हें इस फ़ितना अंगेज़ी से मना करे मगर ये समझ लें कि वो मौत के मुंह में जा रहा है।
(इस किताब को आप “अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क ” पर पढ़ रहे है।)
कूफ़े का एक हक़ शिनास नौजवान मुस्लिम इब्ने अब्दुल्लाहे मुजाशई खड़ा हुआ और उसने कहा , या अमीरूल मोमिनीन ! इस ख़िदमत पर आप मुझे मामूर फ़रमायें। आपने दुआ ए ख़ैर दी और क़ुर्आन उसके हवाले किया। उसने क़ुर्आन को बोसा दिया और उसे हाथों पर बलन्द किये हुए दुश्मनों की तरफ़ रवाना हुआ और उन्हें सहीफ़ा ए इलाही पर अमल करने की दावत दी नीज़ उसका वास्ता दे कर फ़ितना अंगेज़ी से मना किया मगर उसकी आवाज़ सदा बसहरा साबित हुई और किसी ने कोई तवज्जो नहीं दी। इतने में हज़रत आयशा के ग़ुलाम ने आगे बढ़कर उस पर तलवार से हमला किया और उसके दोनों हाथ काट दिये। उसने क़ुर्आन को सीने से लगाया मगर दुश्मनों की तरफ़ से इतने तीर बरसाये गये कि क़ुर्आन छलनी छलनी हो गया और उसके साथ ही मुस्लिम मुशाजई की शहादत भी वाक़े हो गयी। अमीरूल मोमिनीन ने जब ये इस्लाम सोज़ मन्ज़र देखा तो आपने फ़रमायाः-
अब इन लोगों से जंग के जवाज़ में कोई शुब्ह नहीं। ( 5)
मुस्लिम मुशाजई की इस मुजाहिदाना सरफ़रोशी के बाद हज़रत अम्मारे यासिर दुश्मन की सफ़ों के क़रीब आये और उनसे तल्ख़ लहजे में मुख़ातिब हो कर फ़रमायाः-
तुम ने अपनी औरतों को घरों के अन्दर पर्दे में बिठा रखा है और रसूलल्लाह (स.अ.व.व) की बीवी को नेज़ों , भालों और तलवारों के सामने ले आये हो हालां कि तुम्हे बख़ूबी मालूम है कि उस्मान के क़ातिल कौन थे और उनके क़त्ल की ज़िम्मेदारी किन लोगों पर आएद होती है। ( 6)
हज़रत अम्मार अभी इतने ही कह पाये थे कि तीरों की बौछारों ने उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। पलटकर अमीरूल मोमिनीन की ख़िदमत में आये और कहा मौला ! अब किस बात का इन्तिज़ार है ये कमबख़्त जंग के अलावा कुछ सुनना ही नहीं चाहते।
अमीरूल मोमिनीन के सब्रो सुकूत और सुल्ह पसन्दाना रविश से दुश्मनों के हौसले ऐसे बढ़े थे कि उन्होंने आपके लशकर पर तीरों की बारिश कर दी जिससे मुतअद्दिद जांबाज़ सिपाहियों के सीने छलनी हो गये और ज़ख्मों से निहाल हो कर लोग ज़मीन पर गिरने लगे।
इस असना में एक शख़्स को उठाकर हज़रत के सामने लाया गया जो तीरों की बदौलत जां बहक़ तस्लीम हो चुका था। फिर एक दूसरे शख़्स को लाया गया वो भी तीरों का शिकार हो कर शहीद हो चुका था।
अमीरूल मोमिनीन ने ये कैफ़ियत देखी तो पेशानी पर बल पड़ आये आपने तेवरों को बदला और फ़रमायाः-
इन्ना लिल्लाहे व इन्ना इलैहे राजेऊन। अब हर तरफ़ हुज्जत तमाम हो चुकी सुलह के आसार ख़त्म हो चुके और दुशमन की तरफ़ से जंग की इब्तिदा हो चुकी। ( 7)
1. तबरीः- जिल्द 3 पेज न. 520
2. तारीख़े इस्लाम ज़हबीः- जिल्द 2 पेज न. 151
3. तबरीः- जिल्द 5 पेज न. 199, इब्ने असाकरः- जिल्द 5 पेज न. 364, कामिलः- जिल्द 3 पेज न. 94- 95
4. असदुलग़ाबाः- जिल्द 2 पेज न. 185
5. तबरीः- जिल्द 3 पेज न. 522
6. याक़ूबीः- जिल्द 3 पेज न. 117
7. कामिलः- जिल्द 3 पेज न. 117
मुख़ालिफ़ीन की तरफ़ से पहल हो चुकी थी और अमीरूल मोमिनीन के लिये मैंदान में उतरे बग़ैर कोई चारा न था चुनांचे आप अज़्मों इस्तिक़लाल के साथ उठ खड़े हुए। पैग़म्बरे इस्लाम की ज़ेरह ज़ेबेतन की सर पर सियाह अम्मामा बांधा , ज़ुल्फ़िक़ार हाथ में ली , मैंमने पर मालिके अशतर और मैसरे पर अम्मारे यासिर को मामूर किया और फ़रमायाः-
मेरे बेटे मोहम्मद को बुलाओ वो हाज़िर हुए तो रसूलल्लाह (स.अ.व.व) का अलम उक़ाब उनके सिपुर्द कर के फ़रमाया बेटा ! आगे बढ़ो और लशकरे ग़नीम पर हमला करो। मोहम्मद ने सर झुकाया और अलम ले कर मैदान की तरफ़ बढ़े मगर तीर इस कसरत से आ रहे थे कि उनके लिए आगे बढ़ना दुशवार हो गया और वो ठिठक कर खड़े हो गये। हज़रत ने जब ये देखा तो पुकारा मोहम्म्द आगे क्यों नहीं बढ़ते ? कहा बाबा ! तीरों की बौछार में आगे बढ़ने का कोई रास्ता भी तो हो , बस तवक्क़ुफ़ फ़रमाइये कि तीरों का ज़ोर कुछ कम हो जाए। फ़रमाया नहीं तीरों और सेनानों के अन्दर घुस कर हमला करो। इब्ने हनफ़ीया कुछ और आगे बढ़े। मगर तीर अन्दाज़ों ने इस तरह घेर डाला कि क़दम रोक लेना पड़े। ये देख कर अमीरूल मोमिनीन का चेहरा सुर्ख़ हो गया , पेशानी पर ग़ैज़ की शिकने उभर आयीं और आगे बढ़ कर तलवार का दस्ता मोहम्मद की पुश्त पर मारा और अलम उनके हाथ से ले लिया। फिर आस्तीनों को चढ़ा कर इस तरह हमला किया कि एक सिरे से दूसरे सिरे तक दुश्मनों की फ़ौज में तहलका मच गया। जिस सफ़ की तरफ़ मुड़े वही सफ़ ख़ाली थी और जिधर का रूख़ किया लाशे तड़पने लगीं और सर घोड़ों के सुमों से टकरा कर लुढ़कते नज़र आने लगे। जब सफ़ों को तहोबाला कर के फिर अपने मरक़ज़ की तरफ़ पलट कर आये इब्ने हनफ़ीया से फ़रमाया , देखों बेटा , ऐसे जंग की जाती है। ये कह कर फिर अलम उनके हवाले किया और कहा , अब आगे बढ़ो , इब्ने हनफ़िया दुश्मनों पर टूट पड़े। दुश्मन भी नैज़े हिलाते , बरछियां तौलते हुए सामने आये मगर शेर दिल बाप के बेटे ने परे के परे उलट दिये , मैदाने कारज़ार को लालहज़ार बना दिया और कुश्तों के ढेर लगा दिये।
इस हंगामा ए दरोगीर में मरवान बिन हकम , तल्हा की ताक में था किसी सूरत से इन्हें क़त्ल कर के ख़ूने उस्मान का बदला चुका लिया जाए क्यों कि वो जानता था कि तल्हा और ज़ुबैर ही उस्मान के क़ातिल हैं और पूरी ज़िम्मेदारी इन्हीं के सर आइद होती है। इस इन्तिक़ामी जज़्बे के अलावा तल्हा को ठिकाने लगाने में मरवान का एक सियासी मक़सद भी था , और वो ये कि मरवान समझ रहा था कि जब तक ये ज़िन्दा है ख़िलाफ़त बनी उमय्या की तरफ़ मुन्तक़िल नहीं हो सकती।
ज़ुबैर चूंकि मैंदान छोड़ चुके थे इस लिए मरवान उनके बारे में मजबूर था , अलबत्ता उसने तल्हा को मौत के घाट उतारने का मौक़ा ढ़ूंढ निकाला , और जंग की उस गर्म बाज़ारी में उसने अपने ग़ुलाम की आड़ ले कर वो ज़हर आलूद तीर उन पर चलाया जो उनकी पिडली को चीरता हुआ घोड़े के शिकम में दर आया। घोड़ा ज़ख़्मी होने के बाद भाग खड़ा हुआ और एक ख़राबे में जा रुका , जहां तल्हा ने दम तोड़ दिया इब्ने सअद का कहना है किः-
जमल के दिन मरवान बिन हकम ने तल्हा के कि जो आयशा के पहलू में खड़े थे , तीर मारा जो उनकी पिंडली में लगा फिर मरवान ने कहा , ख़ुदा की क़सम अब मुझे उस्मान के क़ातिल की तलाश नहीं रह गयी। ( 1)
अल्लामा अब्दुल बर , याकूबी , इब्ने असाकार , इब्ने असीर और हजरे मक्की वग़ैरह का कहना है कि अकाबिर उलमा के दर्मियान इस अम्र में इख़तिलाफ़ नहीं है कि मरवान ही ने जमल में तल्हा को क़त्ल किया था , हालांकि क़ातिल और मक़्तूल दोनों एक ही जमाअत से ताल्लुक़ रखते थे। मदाइनी ने रवायत की है कि जब तल्हा ज़ख़्मी हो कर मैदान से फ़रार हुए तो किसी महफ़ूज़ जगह की तलाश में थे जहां वो पनाह ले सकें। चुनान्चे हज़रत अली का जो भी सिपाही उधर से गुज़रता उससे वो कहते कि मैं तल्हा हूं , ख़ुदा के लिए मुझे कोई पनाह दे दे। फिर वो मर गये और रेगिस्तान की ज़मीन उन्हें निगल गयी। ( 2)
हज़रत अली के मुक़ाबले में जंग से ज़ुबैर की दस्त बरदारी या तल्हा के क़त्ल हो जाने से असहाबे जमल के इरादों , हौसलों और वलवलों में कोई फ़र्क़ न आया। वो लोग उसी हिम्मत , इस्तिक़लाल और जोशो ख़रोश के साथ जान देने के लिए मैदान में डटे रहे और जमे रहे। इसका सबब ये था कि उनकी नज़रों में जंग का मरकज़ी किरदार आयशा और सिर्फ़ आयशा थीं और उन्हीं से उनकी तमाम तर अक़ीदतें वाबस्ता थीं। इन्तिहा ये है कि वो लोग हज़रत आयशा के ऊंट की मेगनियां उठा कर उन्हें तोड़ते और सूंघ कर कहते कि ये हमारी मादरे गिरामी के ऊंट की मेंगनियां है इनसे मुश्को अम्बर की ख़ुशबू आती है। ( 3)
हज़रत आयशा के लशकर का अलम ख़ुद उनका मलऊन ऊंट था इस लिए अस्हाबे जमल की नज़रों में उसका वही मरतबा था जो अलम का होता है। वो लोग हमावक़्त उसके चारों तरफ़ हिसार बांधे खड़े रहते थे और जिस तरह लशकर के अलम की हिफ़ाज़त की जाती है उसी तरह उस ऊंट की हिफ़ाज़त करते थे। यहां तक कि उसकी मेहार थाम कर क़त्ल हो जाना अपने लिए सबबे इफ़तिख़ार और ज़रिया ए नजात समझते थे।
मेहार थामने वालों के हाथ कटते , सीने छलनी होते और सर तनों से जुदा हो जाते मगर उनके अज़्मों सबात में कोई फ़र्क़ न आता। हज़रत आयशा मेहारकशों को ख़ून में नहाता देखतीं तो उनकी हौसला अफ़ज़ाई करतीं। इस हिम्मत अफ़ज़ाई के नतीजे में जब भी कोई मौत से हम किनार होता तो उसकी जगह फ़ौरन कोई दूसरा आ खड़ा होता और मेहार अपने हाथों में ले लेता। उन में से ज़्यादातर बनी ज़ब्बह , बनी नाज़िया और कुरैश के लोग होते थे , जो अपनी बारी पर मेहार थामने का शरफ़ हासिल करते , रजज़िया अशआर पढ़ते और फ़ना के घाट उतर जाते।
मेहार थामने वालों के नाम से तारीख़ बख़ूबी वाक़िफ़ है उन में क़अब इब्ने सौर , अब्दुर रहमान बिन उताब और अमर बिन बतरी वग़ैरा के नाम ख़ास तौर से क़ाबिले ज़िक्र है।
क़अब इब्ने सौर लड़ाई में शरीक नहीं होना चाहते थे। इब्ने सअद ने रवायत की है कि जब तल्हा , ज़ुबैर और आयशा वारिदे बसरा हुए तो ये एक कोठरी में घुस गये और उसका दरवाज़ा चिनवा दिया सिर्फ़ एक सुराख़ बाक़ी रखा जिससे खाना पानी लेते थे। ये सिर्फ़ इस लिए था कि फ़ितने से किनाराकश रहे। हज़रत आयशा से कहा गया कि अगर क़अब आप के साथ हो गये तो पूरा क़बीला ए अज़्द आपके साथ हो जायेगा। हज़रत आयशा एक खच्चर पर सवार हो कर उसके पास गयीं , उसे आवाज़ दी मगर उसने कोई जवाब न दिया। हज़रत आयशा ने कहा , क़अब क्या मैं तुम्हारी मां नहीं हूं ? अब क़अब गुफ़्तुगू करने पर मजबूर हो गये और उम्मुल मोमिनीन उसे मैंदाने हर्बो ज़र्ब में ख़ींच लायीं। इसकी वजह से बनी अज़्द भी आपके हमराही हमनवा हो गये। क़अब बरोज़े जमल , मैदाने जंग में क़ुर्आन गले में हेमाएल किए एक हाथ से और दूसरे हाथ से मेहार पकड़े खड़ा था कि एक नामालूम सम्त से सनसनाता हुआ तीर आया जिसने उसे वहीं पर ठंडा कर दिया।
इसके बाद ऊंट की मेहार अब्दुर रहमान बिन उताब ने मांगीं और ये रजज़ पढ़ाः-
मैं फ़रज़न्दे उताब हूं , मेरी तलवार की काट मुम्किन नहीं। इतने में किसी सम्त से तलवार पड़ी और वो मौत के घाट उतर गया। फिर क़ुरैश के सत्तर आदमियों ने उस मनहूस ऊंट की मेहार थामी और सब के सब क़त्ल कर दिये गये। तबरी का कहना है कि जो भी मेहार हाथ में लेता उसका हाथ काट लिया जाता या मौत के घाट उतार दिया जाता। ( 4)
फिर बनी नाज़िया आगे बढ़े और सब के सब क़त्ल कर दिये गये।
फिर अरब के मशहूर शमशीन ज़न अमर इब्ने यसरी ने मेहार पकड़ी। अमीरूल मोमिनीन की तरफ़ से हिन्द इब्ने अमर उस पर हमला आवर हुए। उसने ऊंट की नकेल अपने बेटे के हाथ में थमा दी और हिन्द से मुक़ाबला होने लगा , आख़िरकार इब्ने असीर ग़ालिब रहा और हिन्द उसके हाथ से मारे गये। उसके बाद उसने अमीरूल मोमिनीन की फ़ौज के दो जवानों को और क़त्ल किया। आख़िरकार ये अम्मारे यासिर के हाथों क़त्ल हुआ। उसके बाद उसका बेटा और भाई भी मारा गया। तबरी का बयान है कि अमरे यासिर जंग के दौरान रजाज़िया अशआर पढ़ पढ़ के अपनी क़ौम को बराबर उभारता और बरअंगेख़्ता करता रहा यहां तक कि उसने पूरे क़बीला ए बनी जब्बा और बनी अज़्द को मरवा दिया। हज़रत आयशा का बयान है कि जब तक बनू जब्बा की आवाज़ें न थमीं मेरे ऊंट की गरदन सीधी रही। मुख़तलिफ़ मोवर्रेख़ीन का कहना है कि बनी ज़ब्बा और बनी अज़्द वालों ने ऊंट के चारों तरफ़ इन्सानी चहारदीवारी खड़ी कर दी थी। अमरे यासिर के बाद ऊंट की नकेल अमर इब्ने अशरफ़ के हाथों में आयी और हारिस से उनका मुक़ाबला हुआ। दोनों ज़ख़्मी हो कर गिरे और अमर की तलवार ने हारिस का और हारिस की तलवार ने अमर का काम तमाम कर दिया। अमर बिन अशरफ़ के साथ उसके घर के तेरह अफ़राद भी मक़तूल हुए। ( 5)
ग़रज़ की आयशा के ऊंट की मेहार दस्त ब दस्त गर्दिश करती रही और लोग मौत के घाट उतरते रहे। आख़िर में जब जुमुर इब्ने हारिस के हाथों में मेहार आयी तो घमासान की जंग शुरू हो चुकी थी।
1. तबक़ातः- जिल्द 3 पेज न. 222
2. तबरीः- जिल्द 5 पेज न. 204, याक़ूबीः- जिल्द 2 पेज न. 158, मुसतदरकः- जिल्द 2 पेज न. 271, इब्ने असाकरः- जिल्द 7 पेज न. 84, इस्तेयाबः- पेज न. 207- 208, असाबाः- जिल्द 2 पेज न. 222, अकदुल फ़रीदः- जिल्द 4 पेज न. 321
3. तबरीः- जिल्द 5 पेज न. 412, कामिलः- जिल्द 3 पेज न. 97
4. तबरीः- जिल्द 4 पेज न. 204
5. तबरीः- जिल्द 5 पेज न. 211- 212
बनी ज़ब्बा की पस्त किरदारी और दीन से बेख़बरी का अन्दाज़ा उस वाक़िए से होता है जिसे मदाएनी ने बयान किया है। वो कहते हैं कि मैंने बसरा में एक शख़्स को देखा जिसका एक कान कटा हुआ था। मैंने सबब पूछा , उसने जवाब दिया , मैं जमल के मैदान में कुश्तों का मन्ज़र देख रहा था कि मैंने एक ज़ख़्मी को देखा जो कभी सर उठाता था कभी ज़मीन पर दे मारता था। मैं क़रीब गया तो उसकी ज़बान पर दो शेर थे जिनका मफ़हूम ये थाः-
1. हमारी मां ने हमे मौत के गहरे पानी में धकेल दिया और हम ने भी उस वक़्त तक पलटने का नाम नहीं लिया जब तक सेराब न हो गये।
2. हम ने शोमिये क़िस्मत से बनी तमीम की इताअत कर ली हालांकि उनके मर्द ग़ुलाम और उनकी औरतें कनीज़े हैं।
वो शख़्स आयशा , तल्हा और ज़ुबैर पर तन्ज़ कर रहा था।
मैंने उससे कहाः अल्लाह को याद करो और कलमा पढ़ो ये शेर पढ़ने का वक़्त नहीं है। ये कहना था कि उसने मुझे ग़ुस्से की नज़रों से देखा और एक मोटी सी गाली दी और मुझ से कहा कि मैं कलमा पढ़ूं और आख़री वक़्त में डर जाऊं और बेसबरी का मुज़ाहिरा करूं। ये सुनकर मुझे बड़ी हैरत हुई और मज़ीद कुछ कहना सुनना मुनासिब न समझा और पलटने का इरादा किया। जब उसने मुझे पलटते हुए देखा तो कहने लगा , अच्छा ठहरो , तुम्हारी ख़ातिर इसे पढ़ लेता हूं लेकिन मुझे सिखा दो , मैं उसे कलमा पढ़ाने के लिए क़रीब हुआ तो उसने कहा और क़रीब आओ , मैं क़रीब गया तो उसने मेरा कान अपने दांतों से दबा लिया और उस वक़्त तक न छोड़ा जब तक कि उसे जड़ से काट न लिया। मैंने सोचा इस मरने वाले पर क्या हाथ उठाऊं , उसे लअन तअन करता हुआ चलने लगा तो उसने कहा एक बात और सुनते जाओ। मैंने कहा सुना दो कि दिल में कोई हसरत न रह जाये। उसने कहा जब अपनी मां के पास जाना और वो पूछे की कान किसने काटा तो उससे कहना अमर इब्ने अहलबे ज़ब्बी ने। जो एक ऐसी औरत के चक्कर में आ गया था जो उम्मुल मोमिनीन बनना चाहती थी।
मारका ए कारज़ार पूरी तरह गर्म हो चुका था , मैदाने जमल में हर तरफ़ ख़ून की बारिश हो रही थी। हज़रत अली जांबाज़ मुजाहिदीन सफ़ों पे सफ़ें उलट रहे थे और मुख़ालिफ़ीन बद हवासी के आलम में इधर से उधर भाग रहे थे। जब हज़रत आयशा ने ये ख़ूनी मन्ज़र देखा तो उन पर भी मायूसी के दौरे पड़ने लगे। चुनान्चे उन्होंने कुछ कंकरियां तलब कीं और हौदज से अमीरूल मोमिनीन के लशकर की तरफ़ ये कह कर फेंकी कि इनके चेहरे सियाह हो जायें ये हरबा था उस मोजिज़ाना अमल का जो जंगे हुनैन में रसूलल्लाह (स.अ.व.व) से ज़ुहूर पिज़ीर हुआ था। मगर वहां पैग़म्बर (स.अ.व.व) का अमल कुफ़्फ़ार के मुक़ाबले में वहीए इलाही के मातहत था और यहां मुक़ाबले में अमीरूल मोमिनीन , असहाबे बद्र मुम्ताज़ सहाबा और ज़ाते इलाही पर भरोसा रखने वाले सच्चे मुसलमान थे। आयशा के इस अमल का क्या असर हो सकता था ? किसी ने तवज्जो भी न की , बल्कि बिगड़े दिल मुसलमान ने मामूली तग़य्युर के साथ ये आयत पढ़ीः-
तुम ने ये कंकरिया नहीं फेंकी बल्कि अल्लाह ने फेंकी हैं। ( 1)
बहरहाल अमीरूल मोमिनीन ने मालिके अशतर को मैमने पर और हाशिम बिन अलबा को मैसरे पर हमला आवर होने का हुक्म दिया , और ये दोनों अपने दस्तों के साथ इतनी शिद्दत से हमला आवर हुए कि मैमने के क़दम उखड़ गये और हज़रत आयशा का मैसरा अपनी जगह से हटकर क़ल्बे लशकर से जा मिला। मैमने का सरदार हेलाल इब्ने वाक़ीअ मालिके अशतर की तलवार से क़त्ल हुआ तो लशकरी भाग भाग कर आयशा के इर्द गिर्द पनाह लेने पर मजबूर हो गये। चुनान्चे ऊंट के चारों तरफ़ लड़ाई शुरू हो गयी। बनी नज़्द और बनी नाज़िया ऊंट के गिर्द घेरा डाले उसकी हिफ़ाज़त कर रहे थे और तीरों और तलवारों के वार अपने सीनों पर रोक रहे थे , बक़ौले जमख़शरी , सरों पर तलवारों के पड़ने की ऐसी आवाज़े आती थीं जैसे कपड़े धोने पर चोट पड़ने की आवाज़ आती है। ( 2)
अमीरूल मोमिनीन हज़रत अली इब्ने अबी तालिब अलैहिस्सलाम ने जब ये देखा कि जंग अभी फ़ैसला कुन मरहले में दाख़िल नहीं हुई तो आपने बज़ाते ख़ुद मैदान में उतरने का फ़ैसला किया और मोहम्मदे हनफ़िया , इमामे हसन (अ.स) और इमामे हुसैन (अ.स) के हमराह अन्सारों मुहाजिरीन का दस्ता लेकर उठ खड़े हुए। पहले तो आपने एक नज़र में मैदाने कारज़ार का जाएज़ा लिया , फिर मोहम्मद से कहा , बढ़ो और सफ़ों को चीरते हुए उस मुक़ाम तक पहुंचों जहां आयशा का ऊंट खड़ा है। मोहम्मद आगे बढ़े ही थे कि चारों तरफ़ से तीरों की बरसात होने लगी। ये देख कर हज़रत ख़ुद आगे बढ़े और शेर की तरह दुश्मन की सफ़ों पर टूट पड़े। ज़ुल्फ़िक़ार की बिजलियां कौदंने लगीं और लाशों के अम्बार लगने लगे। मोतज़ेली का कहना है , आपने इस तरह हमला किया जिस तरह भूंखा शेर भेड़ बकरियों पर हमला करता है। जब अफ़वाज़े मुख़ालिफ़ की तमाम सफ़े दरहमों बरहम हो गयीं तो आप फिर अपने मरक़ज़ की तरफ़ पलट आये , चन्द लम्हें तवक़्क़ुफ़ किया और फिर दोबारा हमले के इरादे से उठ खड़े हुए। मोहम्मद बिन हनफ़िया , अम्मारे यासिर , अदि इब्ने हातिम वग़ैरह ने अर्ज़ किया कि या अमीरूल मोमिनीन ! अब आप ठहरिये हम मैदान में जाते हैं मगर आप ने कोई जवाब न दिया चेहरा ग़ैज़ो ग़ज़ब से तिलमिला रहा था , आंखों से शरारे निकल रहे थे और सीने से शेर के ग़ुर्राने की सी अवाज़े आ रहीं थी। अब किस में हिम्मत थी जो बिफ़रे हुए शेर से कुछ कहता , लिहाज़ा सब ख़ामोश रहें। इमामे हसन और इमामे हुसैन अलैहिस सलाम ने इजाज़त चाही। आपने फ़रमाया अभी नहीं और फिर दुश्मनों की तरफ़ झपट पड़े और सफ़ों के अन्दर घुस कर ऐसी तलवार चलाई कि मैदान लाशों से पट गया और लड़ते लड़ते आपकी तलवार भी टेड़ी हो गयी। फिर आप अपनी सफ़ की तरफ़ आये और घोड़े से उतर कर तलवार सीधी की। जब आपके आवानों अन्सार ने देखा कि फिर आपका इरादा मैदान की तरफ़ जाने का है तो उन लोगों ने क़सम दी और मज़ीद हमला आवर होने से मना किया कि अगर आप पर आंच आ गयी तो दीन पर बन आएगी और इस्लाम का शिराज़ा बिखर जाएगा।
अमीरूल मोमिनीन ने उन लोगों की बात मान ली।
साहिबे ज़ुल्फ़िक़ार के दो ही पुरज़ोर हमलों से असहाबे जमल के हौंसले पस्त हो चुके थे और उन पर शिकस्त के आसार जारी हो चुके थे मगर मैदान छोड़ना उनके लिए उस वक़्त तक नामुम्किन था जब तक आयशा का ऊंट उनके दरमियान खड़ा था। उसकी भी कैफ़ियत ऐसी थी कि उसके झोल और उम्मुल मोमिनीन के कजावे में तीर इस तरह पेवस्त थे जिस तरह साही के बदन में कांटे होते हैं और वो इस ख़ूनी हंगामें की ताब न ला कर इस तरह घूम रहा था जैसे चक्की घूमती है।
अमीरूल मोमिनीन ने सोचा जब तक ऊंट मैदान में खड़ा है जंग का ख़ात्मा नहीं हो सकता क्यों कि अहले बसरा किसी को ऊंट के पास फटकने नहीं देते थे चुनान्चे हज़रत ने उसे मैदान से हटाने का इरादा किया और क़बीला ए नख़अ और महदान के जवां मर्दों को ले कर आगे बढ़े। ज़ुल्फ़िक़ार चमकीस परे टूटे और आप अपने हमराहियों समेत ऊंट के पास पहुंच गये। फिर एक शख़्स (बज़ीर इब्ने दलजा ए नजई) को हुक्म दिया कि ऊंट की कोंचें काट दो , उसने ऊंट की पिछली टांगों पर तलवार चलायी। एक मुहीब आवाज़ फ़ज़ा में गूंजी और ऊंट पहलू के बल ज़मीन पर ढ़ेर हो गया। ऊंट का गिरना था कि मेहार कशों के सारे हौसले ख़ाक में मिल गये। एक आम भगदड़ मच गयी और आयशा के सिपाही इस तरह भागे जैसे तेज़ आंधी में टिड्डियां भाग ली हों। किसी को किसी का होश न था। लाशों और कराहते हुए ज़ख़्मियों को कुचलते रौंदते लोग जिधर समझ में आ रहा था मुंह उठाये भाग रहे थे। मुख़्तसर ये कि सारा मैदान ख़ाली हो गया।
फिर शाहे लाफ़ता के हुक्म पर मोहम्मद बिन अबीबकर और अम्मारे यासिर ने ऊंट के तसमें काटे और हौदज को ज़मीन पर उतार कर रख दिया। उसके बाद आपने फ़रमाया कि इस ऊंट को मार कर जला दिया जाये और इसकी राख हवा में मुनतशिर कर दी जाये। चुनान्चे वो ऊंट मार कर जलाया गया और उसकी राख हवा में उड़ा दी गयी तो आपने फ़रमायाः-
इस चौपाये पर ख़ुदा की लानत ये बनी इस्राईल के गोसाले से कितना मुशाबेह है। ( 3)
फिर अमीरूल मोमिनीन ने मोहम्मद इब्ने अबीबकर से कहा कि आयशा के लिए एक ख़ैमा नस्ब करो और उनसे उनकी ख़ैरियत मालूम करो कि उन्हें कोई गज़न्द तो नहीं पहुंचा। मोहम्मद ने ख़ैमा नस्ब किया फिर हौदज के पास आये और पर्दे में मुंह डाला। आयशा ने कहा तुम कौन हो ? मोहम्मद ने कहा , आपका सब से ज़्यादा नापसन्दीदा रिश्तेदार। आयशा ने पूछा , ख़ुसअमिया के फ़रज़न्द ? कहा हां। आयशा ने कहा कि उस मअबूद का शुक्र है जिसने तुम्हें महफ़ूज रखा।
मसऊदी ने मुरव्वेजुज़ ज़हब में तहरीर किया है कि मोहम्मद ने कहा आपका सब से ज़्यादा नापसन्दीदा रिश्तेदार और आपका नापसन्दीदा भाई हूं। अमीरूल मोमिनीन ने पूछा है आपको कोई गज़न्द तो नहीं पहुंचा ?
आयशा ने कहाः सिर्फ़ एक तीर लगा था और कोई तकलीफ़ नही है।
फिर अमीरूल मोमिनीन ख़ुद तशरीफ़ लाये आपने लकड़ी से हौदज को एक टहोका दिया और फ़रमायाः-
क्यों हुमैरा ? क्या रसूलल्लाह (स.अ.व.व) ने तुम्हें यही हुक्म दिया था ? क्या तुम्हें इस अम्र की ताक़ीद नहीं की गयी थी कि घर में बैठी रहना ? ख़ुदा की क़सम उन लोगों ने तुम्हारे साथ इन्साफ़ नहीं किया जिन्हों ने अपनी बीवियों की तो हिफ़ाज़त की और तुम्हें मैदान में ले आये।
हज़रत आयशा ने कहा , अब आप फ़त्हेयाब हो चुके हैं मुझ पर रहम फ़रमाइये। ( 4)
लड़ाई ख़त्म हो जाने के बाद अम्मारे यासिर ने हज़रत आयशा से कहा , उम्मुल मोमिनीन ! आपका तर्ज़े अमल पैग़म्बर (स.अ.व.व) के तर्ज़े अमल से कितना अलग है। आयशा ने कहा , बख़ुदा मैं हमेशा तुम्हें हक़गो (सच्चा) समझती रही। उस पर अम्मार ने कहा , ख़ुदा का शुक्र है जिसने आपकी ज़बान से ये बात कह ला दी। ( 5)
तारीख़े कामिल जिल्द न. 5 पेज न. 130 पर ये रवायत भी है कि अम्मारे यासिर ने हज़रत आयशा को जब उम्मुल मोमिनीन कह कर मुख़ातिब किया तो आपने फ़रमाया मैं तुम्हारी मां नहीं हूं। उस पर अम्मार ने कहा , आप मां तो हैं , ख़्वाह मानें या न मानें।
जंग के ख़ात्मे के बाद हज़रत अली (अ.स) के मुनादी ने ऐलान किया कि किसी ज़ख़्मी को न मारा जाये , किसी भागते हुए का पीछा न किया जाये , जो हथियार डाल दे वो अमान में है और जो घर का दरवाज़ा बन्द कर ले उसे भी अमान हासिल है।
कन्ज़ुल आमाल में इसके बाद ये इज़ाफ़ा मिलता है कि अमीरूल मोमिनीन ने फ़रमायाः-
कोई शर्मगाह हलाल न समझी जायें , कोई माल मुबाह न तसव्वुर किया जाये। मैदाने जंग में जो जुरूफ़ हाथ लगें उन पर क़ब्ज़ा कर लो बाक़ी सब कुछ मक़तूलीन के वोरसा का है। जो ग़ुलाम लशकर से निकल गया हो उसे तलाश न करो। जितने हथियार हाथ आयें वो सब तुम्हारे हैं उम्मे वलद पर तुम्हारा कोई दस्तरस नहीं है। मीरास उसी तरह तक़सीम होगी जिस तरह ख़ुदा का हुक्म है जिस औरत का शौहर इस जंग में मारा गया है उसे लाज़िम है कि चार माह दस दिन इद्दह में रहें।
इस मौक़े पर कुछ इन्तिहा पसन्दों ने नुक़्ताचीनी की और कहाः-
आप उन्हें क़त्ल करना हमारे लिए जाइज़ क़रार देते हैं लेकिन उनकी औरतों को हमारे ऊपर मुबाह क्यों नहीं करते ? अमीरूल मोमिनीन ने फ़रमाया , अहले क़िब्ला के साथ ऐसा ही बरताव किया जाना चाहिए।
अमीरूल मोमिनीन के इस जवाब पर कुछ लोग नाराज़ हो गये और हंगामा आराई पर उतर आये तो आपने फ़रमायाः-
अच्छा अगर तुम नहीं मानते तो सब से पहले आयशा के लिये क़ुंर्आ- अंदाज़ी करो क्यों कि इस झगड़े की बुनियाद और जड़ वही है। जिसके नाम कुंर्आ निकले आयशा को उसके हवाले कर दों।
ये सुनना था कि सब के होश उड़ गये। सब ने माज़रत की और कहा हम ख़ुदा से तौबा और इस्तिग़फ़ार करते हैं। ( 6)
अमीरूल मोमिनीन हज़रत अली (अ.स) ने इब्ने अब्बास को इस अम्र पर मामूर फ़रमाया कि वो हज़रत आयशा से कहें कि अब उनका यहां न कोई काम है और न मदीने से ज़्यादा अर्से तक बाहर रहना मुनासिब है लिहाज़ा वो वापस जाने की तैय्यारियां मुकम्मल करें।
अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास का बयान है कि मैं हज़रत अली का पैग़ाम ले कर आयशा के पास गया , मुलाक़ात की इजाज़त चाही उन्होंने इनकार किया तो मैं घर के अन्दर घुस गया और एक बोरिये का टुकड़ा ले कर उस पर बैठ गया। इस पर आयशा ने कहा तुम कैसे आदमी हो कि बग़ैर इजाज़त अन्दर चले आए और बग़ैर पूछे बैठ गये। एक रवायत में है कि आयशा ने कहाः-
तुम ने सुन्नते रसूल (स.अ.व.व) की दोहरी मुख़ालिफ़त की , अव्वल ये कि बग़ैर इजाज़त हमारे घर में दाख़िल हुए और दूसरे ये कि बगैर इजाज़त हमारे फ़र्श पर बैठ गये।
इब्ने अब्बास ने कहा ख़ुदा की क़सम ये सुन्नत की तालीम हम ने आपको दी हैं ये आपका घर हर्गिज़ नहीं है। आपका घर तो वो है जिस में अल्लाह और रसूल ने आपको बैठे रहने कहा हुक्म दिया है। मगर आपने हुक्म की कोई पाबन्दी नहीं की। इस वक़्त मैं अमीरूल मोमिनीन का पैग़ाम ले कर आया हूं कि आप मदीने की तैयारीयां कीजिए।
आयशा ने कहा , ख़ुदा रहम करे अमीरूल मोमिनीन पर वो उमर इब्ने ख़त्ताब थे। उस पर इब्ने अब्बास ने कहा , होंगे ! ये अमीरूल मेमिनीन , हज़रत अली इब्ने अबी तालिब (अ.स) हैं।
आयशा ने कहा , मैं नहीं मानती।
इब्ने अब्बास ने कहाः कब तक नहीं मानेंगी , आपका हाल तो ये है कि आप न कोई हुक्म देती हैं न मना करतीं हैं। न लेती हैं न देती हैं। इस पर आयशा रोने लगीं और बोली मैं ख़ुद ही बहुत जल्द ये शहर छोड़ना चाहती हूं जिस शहर में तुम लोग रहो उससे ज़्यादा क़ाबिले नफ़रत कोई शहर मेरे लिए नहीं है।
अल्लामा इब्ने अबदर्बा का कहना है कि आयशा की वापसी पर हज़रत अली (अ.स) ने बड़ा एहतिमाम किया , तमाम ज़रूरियात की चीज़ें उनके साथ कीं और चालीस या सत्तर औरतें भी उनके साथ कीं जो मदीने तक उनके साथ गयीं।
तबरी लिखते हैं कि हज़रत अली ने उन्हें जब मदीने रवाना किया तो तमाम ज़रूरियात के साथ औऱतों की एक जमाअत भी साथ और बारह दिरहम भी बैतुलमान से मरहमत फ़रमाये।
मसऊदी का बयान है कि हज़रत अली ने आयशा के भाई अब्दुर रहमान बिन अबी बक्र और बीस औरतों व उन्तीस मर्दों को आयशा के साथ मदीने रवाना किया जो क़बीला ए अब्दुल क़ैस और क़बीला ए हमदान से थे।
जंगे जमल माहे जमादी उस्सानी 36 हिजरी नवम्बर 656 ईस्वी में वाक़े हुई। मुवर्रेख़ीन ने इस जंग के हौलनाक व इबरतनाक नताइज पर भी रौशनी डाली हैं मक़तूलीन के बारे में मुख़तलिफ़ रवायते हैं। याक़ूबी का बयान है कि मजमूई तौर पर इस जंग में तीस हज़ार से ज़्यादा अफ़राद क़त्ल हुए। ( 7)
(इस किताब को आप “अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क ” पर पढ़ रहे है।)
अल्लामा इब्ने अबदरबान ने अक़दुल फ़रीद में तहरीर फ़रमाया है कि हज़रत आयशा के बीस हज़ार और हज़रत अली की तरफ़ से पांच सौ अफ़राद क़त्ल हुए। ( 8)
इब्ने आसम का कहना है कि हज़रत अली की फ़ौज के एक हज़ार सात सौ और आयशा की फ़ौज के नौ हज़ार आदमी मक़तूल हुए और तबरी की बाज़ रवायतों से ये तादाद छः हज़ार मालूम होती है। मगर मुख़तलिफ़ मुसददिक़ा रवायत का ख़ुलासा ये है कि उम्मुल मोमिनी आयशा के तीस हज़ार के लशकर में से बीस हज़ार और हज़रत अली की फ़ौज में एक हज़ार सत्तर अफ़राद मक़तूल हुए।
तबरी वग़ैरह ने असहाबे जमल से रवायत की है कि उनका कहना हैः-
जंग के दिन हम लोगों ने दौरान तीर चलाये और जब वो ख़त्म हो गये तो नैज़ा बाज़ी की यहां तक की वो हमारे और अलवी लशकरियों के सीनों में इस तरह गुथ गये थे कि उन नैज़ों पर से लशकर गुज़र सकता था। ( 9)
अबदरबा ने बाज़ लोगों का बयान नक़्ल किया है कि जब मैं धोबियों के मोहल्ले से गुज़रा और कपड़ों को तख़्तों पर पटख़ने की आवाज़ सुनीं तो मुझे जमल की वो तलवारें याद आ गयीं जो लोगों के सरों पर पड़ रहीं थी। ( 10)
इस जंग में कितने हाथ कटे , कितनी आंखे फ़ूटीं इसका तसव्वुर नहीं किया जा सकता।
बहरहाल इस जंग का ज़ाहिरी सिलसिला आयशा की शिकस्त और हज़रत अली की फ़त्ह पर ख़त्म हुआ लेकिन अगर ग़ौरों फ़िक्र की निगाहों से देखा जाये तो ये जंगी तसलसुल मुद्दतों क़ायम रहा और इस जंग से जंगे सिफ़्फ़ीन और जंगे सिफ़्फ़ीन से जंगे नहरवान ने जन्म लिया और नहरवान के बाद क़त्लों ग़ारतगरी का यही सिलसिला बनी अब्बास के दौर तक क़ायम रहा।
अगर उम्मुल मोमिनीन आयशा तल्हा और ज़ुबैर मैदाने जमल में न उतरते तो माविया हज़रत अली के मुक़ाबले में फ़ौजकशी की जसारत न करता। उसे ये बहाना मिल गया कि वो भी इन्तिक़ामे ख़ूने उस्मान पर अपनी ख़िलाफ़त को मूरूसी बनाने के लिए हज़रत अली से जंग छेड़ दे जिसका रास्ता हज़रत आयशा की निस्वानी और नाक़िस हिकमते अमली ने हमवार किया था। माविया का ये ख़्याल था कि उम्मुल मोमिनीन क़बीला ए बनी तैम की फ़र्द हो कर क़िसासे ख़ूने उस्मान के लिए हज़रत अली के मुक़ाबले में खड़ी हो सकती है तो वो क्यों नहीं खड़े हो सकते जबकि वो उस्मान के हमक़बीला और अज़ीज़ भी हैं।
यही वो मज़बूत सियासी हीला था जिसे माविया ने जंग के जवाज़ में पेश किया और क़िसासे ख़ूने उस्मान के नाम पर लोगों को भड़का कर जंगे सिफ़्फ़ीन बरपा की। उन्होंने पहले अपने इलाक़ाई इक़तिदार का तहफ़्फ़ुज़ किया फिर ख़लीफ़ातुल मुस्लिमीन बन बैठे।
जंगे जमल और जंगे सिफ़्फ़ीन ही के नतीजे में ख़वारिज फ़िर्क़े का वुजूद अमल में आया जिस ने नहरवान में हज़रत अली पर ख़ुरूज किया और आगे चल कर यही ख़वारिज जुम्ला सलातीने मुम्लिकत के लिए दर्दे सर बने। हर हुकूमत से बरसरे पैकार हुए। क़त्लो ग़ारतगरी उनका शेवह था , राहज़नी और डकैती को वाजिब समझते थे और जावजा छापे मार कर अम्नों अमान को दरहमों बरहम किया करते थें।
ख़वारिज अपने अलावा तमाम मुसलमानों को काफ़िर समझते थे।
उनका नज़रिया था कि हज़रत आयशा , तल्हा और ज़ुबैर हज़रत अली से लड़ने के बाद काफ़िर हो गये , अली उस दिन हक़ पर थे लेकिन तहकीम के बाद (मआज़ल्लाह) वो भी हक़ पर नहीं रहे। ( 11)
इन जंगों का फ़ितरी और लाज़मी नतीजा ये भी होना था कि मुसलमान मुख़तलिफ़ फ़िर्क़ों में तक़सीम हो जाये , चुनान्चे यही हुआ कि कुछ अलवी हो गये , कुछ उस्मानी और कुछ खवारिज नीज़ इसी क़िस्म के और फ़िर्क़े जो एक दूसरे के दुश्मन हो गये और एतिक़ादी जंग शुरू हो गयी।
इस जंग में हज़रत अली (अ.स) ने शुरू से आख़िर तक जिस किरदार का मुज़ाहिरा किया वो अम्न पसन्दी , सुल्ह जूई और करीमुन नफ़सी की ज़िन्दा मिसाल है। हालां कि आपको आयशा के मोहलिक और ख़तरनाक फ़ितने को दबाने के लिये एक ख़ूरेज़ जंग का उस वक़्त सामना करना पड़ा जब हालात आपके लिए क़तई साज़गार नहीं थे इसके बावजूद आपने उस वक़्त तक हाथ नहीं उठाया और न हीं अपने हमनवाओं में से किसी को उठाने दिया जब तक कि फ़रीक़े मुख़ालिफ़ की तरफ़ से बाक़ायदा जंग की इबतिदा नहीं हो गयी।
अमीरूल मोमिनीन के वारिदे बसरा होने से क़ब्ल ही मुख़ालिफ़ीन ने आपके सैंकड़ों दोस्तों और हमनवाओं को क़त्ल कर दिया था। वहां के गवर्नर उस्मान बिन हुनैफ़ पर जब ख़ून मारकर अहदशिकनी के मुर्तक़िब हो चुके थे , बैतुल माल पर क़ब्ला कर लिया था और क़त्लों ग़ारतगरी व दहशतगर्दी के ज़रिये हर तरफ़ ख़ौफ़ो हिरास पैदा कर दिया था इन नारवा बातों से हज़रत अली के लिए जंग का जवाज़ पैदा हो चुका था मगर इस के बावजूद आपकी कोशिश यही रही कि जंग के शोले भड़क ने न पायें और बाहमी गुफ़्तुगू के ज़रिये आयशा की इस ग़लत फ़हमी की इस्लाह हो जाये। चुनान्चे आपने आयशा , तल्हा और ज़ुबैर को इन्तिहाई नर्म लहजे में समझाया और उन्हें जंग के हौलनाक नताइज से आगाह किया। मुस्लिम मजाशेई के हाथों क़ुर्आन भेज कर उन्हें क़ुर्आनी अहकाम पर अलम पैरा होने की तरग़ीब दी और जब ये तमाम चीज़े बेअसर और तमाम कोशिशें बेकार हो गयीं और जवाब तीरों सेनान की सूरत में दिया जाने लगा तो बहुत ही मजबूर हो कर आपने जंग की इजाज़त दी और सफ़ों के मुक़ाबले में सफ़ें जमा कर इस तरह लड़े कि दुनिया पर साबित कर दिया कि जंग से बचने की ये तमाम कोशिशें बुज़दिली , कामचोरी और ख़ौफ़ो हिरास की बिना पर नहीं था बल्कि इन्तिहाई , यकजहती और अम्न को बरक़रार रखने नीज़ सुल्हो आशती की फिज़ा पैदा करने के लिए था।
अमीरूल मोमिनीन ने अपने फ़ौजियों को जिन बातों पर कारबन्द रहने का हुक्म दिया था वो हस्बे ज़ैल हैं।
1. जंग में पहल न की जाए।
2. किसी ज़ख्मी पर हाथ न उठाया जाए।
और किसी ने क़दम नहीं बढ़ाया। और जब मैदान में ख़ून की मूसलाधार बारिश होने लगी तो किसी ज़ख्मी पर हाथ नहीं डाला और फ़ौजे मुख़ालिफ़ शिकस्त खा कर भाग खड़ी हुई तो किसी ने किसी का ताक़्क़ुब नहीं किया और न ही उसके छोड़े हुए मालों अस्बाब पर नज़र देखा। दीनवरी का कहना है किः-
मैदाने जंग में सोना चांदी और दीगर साज़ो सामान पड़ा हुआ देखते थे मगर उन्हें छूने वाला कोई नहीं था , अलावा फ़रीक़े मुख़ालिफ़ के हथियारों और सवारों के जिन्हें वो जंग के मौक़े पर काम में ला सकते थे। ( 12)
दुनिया की जंगों का दस्तूर है कि जंग का फ़ातेह फ़त्हयाबी व कामरानी के नशे में सरशार होकर हरीफ़ अफ़सरों को बग़ावत के जुर्म में गिरफ़्तार कर लेता था। मौत के घाट उतार देता है मगर अमीरूल मोमिनीन ने इन्तिक़ामी कार्यवाही से बालातर हो कर अहले बसरा में से जिन्होंने उस जंग में नुमाया किरदार अदा किया था। किसी से कोई बाज़ पुर्स नहीं की। यहां तक कि अब्दुल्लाह बिन आमिर जैसे ग़ारतगराने अम्न को माफ़ कर दिया और आयशा को जिन्होंने आपकी मुख़ालिफ़त में कोई दक़ीक़ा उठा नहीं रखा था उनके शायाने शान हिफ़ज़ती इन्तिज़ामात के साथ मदीने भेजा। बैतुल माल को मरक़ज़ में मुन्तक़िल करने के बजाए अपने लशकरियों पर तक़सीम कर के ये साबित कर दिया जंग का मक़सद मालों दौलत की फ़राहमी नहीं है।
1. शरह इब्ने आबिल हदीद मोतज़ेलीः- जिल्द 1 पेज न. 85
2. फ़ारूक़ः- जिल्द 1 पेज न. 35
3. शरह इब्ने आबिलः- जिल्द 1 पेज न. 89
4. तबरीः- जिल्द 5 पेज न. 204
5. अक़दुल फ़रीदः- जिल्द 4 पेज न. 328, तारीख़े याक़ूबी वग़ैरह
6. कन्ज़ुल आमालः- जिल्द 8 पेज न. 215- 217
7. तारीख़े याक़ूबी हालाते जमल
8. अक़दुल फ़रीदः- जिल्द 4 पेज न. 226
9. तबरीः- जिल्द 5 पेज न. 218
10. अक़दुल फ़रीदः- जिल्द 4 पेज न. 320
11. मुल्लो नहल शहरिस्वानीः- जिल्द 1 पेज न. 158
12. अख़्बारूत तौलः- पेज न. 151
हज़रत आयशा जो आम मुसलमानों के नज़दीक़ एक आलिमा और मुहद्दिसा का दर्जा रखती हैं , इस अम्र से बख़ूबी वाक़िफ़ थीं कि ख़ूने उस्मान के क़िसास का उन्हें कोई हक़ नहीं है दर हक़ीक़त ये हक़ हुकूमते वक़्त का है या फिर मक़तूल के वारिसों को ये हक़ हासिल है।
हज़रत आयशा जो न मुसलमानों के इक़तिदार की मालिक थीं न उस्मान के वारिसों में शामिल थीं , इसके बावजूद हुकूमते वक़्त से टकराने के लिये मैदान में उतर आईं और उन्होंने मुसलमानों की एक अज़ीम जमीअत को मौत के मुंह में झोंक दिया हालां कि परवरदिगारे आलम ने उन्हें अपने घर की चहारदीवारी में रहने का हुक्म दिया था जैसा कि क़ुर्आन में हैः-
ऐ रसूल की बीवियों ! अपने घरों में बैठी रहो , ज़माना ए जाहिलियत की तरह बन ठन के न निकलों।
चुनान्चे उम्मुल मोमिनीन ज़ैनब बिन्ते हजश और उम्मुल मोमिनीन सौदा ने इस क़ुर्आनी हुक्म के एहतिराम में मदीने से बाहर निकलना गवारा न किया और ज़िन्दगी भर घर की चहारदीवारी में क़ैद रहीं और ये औरतों का शेवा भी नहीं है कि वो घर का गोशा छोड़ कर मैदाने कारज़ार में फांद पड़ें और क़त्लों ग़ारतगरी का बाज़ार गर्म करें। ख़ुद आयशा का बयान है कि मैंने पैग़म्बर से जिहाद की इजाज़त चाही तो उन्होंने फ़रमाया कि औरतों का जिहाद हज है। ( 1)
और आयशा का यही क़ौल भी है कि औरतों के हाथ में चरख़ा उस नेज़े से कहीं बेहतर है जो राहे ख़ुदा में लड़ने वाले मुजाहिद के हाथ में होती है। ( 2)
लेकिन लुत्फ़ की बात तो ये है कि इन तमाम बातों से मुत्तिला होने के बावजूद उम्मुल मोमिनीन आयशा मुसलमानों की एक बड़ी जमाअत के साथ मक्के से वारिदे बसरा हुईं और लशकर की क़ियादत करते हुए मैदानें जंग में कूद पड़ीं। उन्होंने ये भी न सोचा कि इस इक़दाम के नतीजे में हज़ारों औरतों का सुहाग उजड़ जायेगा और हमारें बच्चे यतीमी की गोद में चले जायेंगें। उन्होंने नताइज की परवाह किये बग़ैर मुसलमानों को तलवारों के सामने ला कर खड़ा कर दिया।
इस जंग में अतलाफ़े जान , क़त्लों ग़ारतगरी और तबाही व बरबादी की पूरी पूरी ज़िम्मेदारी हज़रत आयशा पर आइद होती है और उनके दौर में भी लोगों के दरमियान यही तास्सुर था। चुनान्चे एक मरतबा एक शख़्स ने ( जिसके क़बीले के सैकड़ों आदमी इस जंग में मारे गये थे) हज़रत आयशा से पूछा कि ऐ उम्मुल मोमिनीन ! आप उस औरत के बारे में क्या फ़रमाती हैं जिसने अपने बच्चे को मार डाला हो ? कहा वो औरत दोज़ख़ में जाएगी। उस शख़्स ने फिर पूछा कि उस औरत के बारे में आपका का क्या ख़्याल है जिसने अपने तीस हज़ार जवांसाल बेटों को एक ही मक़ाम पर क़त्ल कर दिया हो ?
ये सुन कर उम्मुल मोमिनीन भड़क उठीं और फ़रमाने लगीं कि ऐ ख़ुदा उस दुश्मन औरत को दोज़ख़ में न जाने देना। ( 3)
बहरहाल जमल का मारका हज़रत आयशा का कोई क़ाबिले क़द्र कारनामा नहीं था। उसे ख़ुद उनके ख़ानदान के अफ़राद भी बाइसे नांगवार समझते थे जैसा कि इस रवायत से ज़ाहिर हैः-
हज़रत आयशा ने एक मौक़े पर अपने भतीजे इब्ने अबी अफ़ीक से किसी ज़रूरत के तहत खच्चर मांगा तो उन्होंने जवाब में क़ासिद से कहा कि उम्मुल मोमिनीन से कहना कि अभी तक तो हम यौमे जमल का धब्बा नहीं धो सके अब क्या यौमे बग़ल बरपा करने का इरादा है। ( 4)
इब्ने अबी अक़ीक़ ने तंज़न ये बात कही थी मगर यौमे जमल के बाद यौमे बग़ल भी दुनिया वालों ने देख लिया , उस वक़्त जब इमामे हसन (अ.स) का जसदे मुबारक दफ़्न की ग़रज़ से हुजरा ए रसूल (स.अ.व.व) में लाया गया और मरवान बिन हकम अपने हमराहियों के साथ दफ़्न में माने हुआ तो उस मौक़े पर आयशा भी खच्चर पर सवार हो कर उसके साथ थीं जैसा कि मोतज़ली का बयान है कि , हज़रत आयशा उस दिन खच्चर पर सवार हुईं जो मरवान और उसके साथियों को उभार रहीं थीं। ( 5)
और मोहतरमा ने यहां तक उभारा कि सत्तर तीर इमाम के जनाज़े में पेवस्त हो गये।
हज़रत आयशा क़िसासे ख़ूने उस्मान के नाम पर हज़रत अली के ख़िलाफ़ एक अज़ीम लशकर फ़राहम करने पर इस वजह से क़ादिर हो गयीं कि लोगों के दिलों में उनका बड़ा एहतिराम था , बड़ी इज़्ज़तों तौक़ीर थी और लोग उनके मुतीओ फ़रमा बरदार थे।
हज़रत आयशा को सियासत में महारत और तक़रीर पर उबूर हासिल था। वो इन्तिहाई फ़सीहो बलीग़ गुफ़्तुगू फ़रमाती थीं जिसका नमूना वो जवाब है जो उन्होंने उम्मे सलमा को दिया था , जब उम्मे सलमा ने उन्हें हज़रत अली के ख़िलाफ़ ख़ुरूज पर लानत मलामत की थी तो उन्होंने फ़रमाया था कि मैं बरसरे पैकार दो जमाअतों में सुल्ह कराने जा रहीं हूं। इसी तरह उनका वो फ़िक़रा जो उन्होंने बसरा में मुरीद के मक़ाम पर जब तल्हा व ज़ुबैर की तक़रीर के बाद लोगों में इख़तिलाफ़ के मौक़े पर कहा था कि तुम ने उस्मान को उनकी तौबा करने के बाद मार डाला।
उम्मुल मोमिनीन से ये कौन पूछता कि आप तल्हा और ज़ुबैर के अलावा क़त्ले उस्मान का ज़िम्मेदार और कौन है ? अगर आपने मुसलमानों को बरग़लाया भड़काया न होता या उनके क़त्ल का फ़त्वा न दिया होता तो ये नौबत ही क्यों आती ?
फिर आपने अपने दिल का राज़ उगलते हुए फ़रमाया था कि ऐ मुसलमानों ? तुम ने इब्ने अबी तालिब की बैअत बग़ैर राय मशवरे के ज़बरदस्ती और ग़स्बी तौर पर कर ली है , इस ख़िलाफ़त को फिर शूरा पर रखो और शूरा के मिम्बरान वो हों जिन्हें उमर ने मुनतख़ब किया था लेकिन इस शूरा में उसे शामिल न करो जिसने क़त्ले उस्मान में हिस्सा लिया हो।
आयशा की तक़रीरी गुफ़्तुगू का ये हिस्सा उनके ज़बरदस्त सियासी तदब्बुर का पता देता है। उनका मक़सद ये था कि हज़रत अली ख़िलाफ़त से महरूम हो जायें क्यों कि उस वक़्त मिम्बराने शूरा में सिर्फ़ चार अफ़राद यानी अली (अ.स) तल्हा , ज़ुबैर और सअद इब्ने अबी विक़ास बाक़ी थे और हज़रत अली पर चूंकि उन्होंने क़त्ले उस्मान की तोहमत आइद की थी लिहाज़ा वो शूरा में दोबारा शरीक न किये जाते अब रह गये सअद तो उनको भी मोहतमीम कर देना उनके लिए बहुत आसान था लिहाज़ा उन दोनों के बाद सिर्फ़ तल्हा और ज़ुबैर बाक़ी रह जाते हैं और उन्हीं में से कोई एक ख़लीफ़ा हो जाता और अगर बिल फ़र्ज़ तल्हा और ज़ुबैर के साथ हज़रत अली को भी शूरा में शामिल होने की इजाज़त मिल भी जाती तो भी वो तन्हा एक तरफ़ होते और तल्हा व ज़ुबैर एक तरफ़ जैसा कि उमर ने ज़ाब्ता मुअय्यन कर दिया था कि जिधर ज़्यादा अफ़राद होंगे उधर ही ख़िलाफ़त रहेगी। इसी बिना पर ख़िलाफ़त तल्हा और ज़ुबैर में ही मुनहसिर होती और हज़रत अली के ख़िलाफ़ हंगामा बरपा करने की अस्ल ग़रज़ भी यही थी।
जंगे जमल से वाबस्ता तल्हा व ज़ुबैर का मौक़िफ़ भी हज़रत आयशा के मौक़िफ़ से कम नहीं था। उन लोगों ने बसरा पहुंचते ही क़िसासे उस्मान के नाम से क़त्ले आम शुरू कर दिया और बग़ैर ये सोचे कि कौन मुजरिम है और कौन नहीं। सब को तलवार की बाढ़ पर रख लिया। हालांकी उन लोगों को ये भी हक़ नहीं पहुंचता था कि वो अहले बसरा को क़िसासन क़त्ल करते जैसा कि हम तहरीर कर चुके हैं कि ये हक़ मक़तूल के वारिस या हुकूमत का है। तल्हा व ज़ुबैर न तो ख़लीफ़ा ए वक़्त थे और न उस्मान के क़राबतदार कि बरबिना ए क़राबतदारी उन्हें ये हक़ हासिल होता। फिर हैरत और तआज्जुब की बात तो ये है कि यही लोग बैअत शिकनी को जाइज़ और अपने इस ज़ाहिराना इक़दाम को दुरूस्त समझते हुए हज़रत को क़त्ले उस्मान का ज़िम्मेदार क़रार देते रहे थे , हालां की ये उन्हें अच्छी तरह मालूम था कि क़त्ले उस्मान के सिलसिले में हज़रत अली का मौक़िफ़ क्या था और ख़ुद उनका अपना तर्ज़े अमल क्या था।
जैसा कि अमीरूल मोमिनीन का इरशाद है किः-
ख़ुदा की क़सम तल्हा और ज़ुबैर और आयशा अच्छी तरह जानते हैं कि वो बातिल पर हैं और मैं हक़ पर हूं। ( 6)
अगर ये लोग हक़ीक़तन अमीरूल मोमिनीन को क़त्ले उस्मान का ज़िम्मेदार समझ रहे थे तो उन्हें चाहिए था कि बैअत से पहले ही आवाज़ उठाते मगर न क़त्ल के मौक़े पर और न मानेहा ए क़त्ल और बैअत के दर्मियान मुद्दत में इन लोगों ने कोई आवाज़ बलन्द की न हज़रत अली पर कोई इल्ज़ाम आइद किया और न ही क़त्ल का ज़िम्मेदार ठहराया जैसा कि अक़दुल फ़रीद में है किः-
किसी ने हज़रत अली पर क़त्ले उस्मान की तोहमत नहीं लगायी यहां तक कि उनकी बैअत हुई और जब बैअत हो चुकी तो कुछ लोगों ने उनपर इल्ज़ाम लगाना शुरू कर दिया। ( 7)
इन मुत्तहम करने वालों के सरगना यही तल्हा और ज़ुबैर थे और इनकी ज़बाने भी उसी वक़्त खुलीं जब उनके मफ़ादात पर ज़र्ब लगी। और अमीरूल मोमिनीन (अ.स) ने उन्हें कूफ़े और बसरे की हुकूमत देने से इन्कार कर दिया।
अगर इन हज़रात की क़िसास तलबी में हमदर्दी और ख़ैर ख़्वाही का कोई जज़्बा था तो उसे क़त्ल के मौक़े पर ज़ाहिर होना चाहिए था और हज़रत अली के साथ पर बैअत करने के बजाए उनसे क़िसास का मुतालबा करना चाहिए था , मगर ये लोग उस वक़्त तक ख़ामोश रहे जब तक इन्हें इदारत की उम्मीद व तवक़्क़ो रहीं और जब उधर से मायूसी हुई तो क़िसास के लिए खड़े हो गयें ताकि इस क़िसास की आड़ में अपने इक़तिदार का रास्ता हमवार कर सकें।
वाक़िआत की रौशनी में बग़ैर तरदीद ये बात कही जा सकती है कि इस शोरिशों हंगामा का मक़सद सिर्फ़ हुसूले इक़तिदार था। चुनान्चे इन लोगों ने बैअत तोड़ कर दूसरों को बैअत शिकनी पर उभारा और हकीम बिन जबला से ख़ुले अल्फ़ाज़ में कहा कि जब तक उस्मान बिन हुनैफ़ हज़रत अली की बैअत नहीं तोड़ेंगे रिहा नहीं किए जायेंगे। और ख़ुद हज़रत अली के सामने भी इस अम्र का इज़हार किया कि वो उन्हें ख़िलाफ़त का अहल नहीं समझते और सईद बिन आस से ये भी वाज़ह कर दिया कि हम उस्मान के बेटों में से किसी को ख़लीफ़ा नहीं बनाएगें बल्कि हम दोनों तल्हा व ज़ुबैर में से जिसे लोग मुनतख़ब करेंगे वही ख़लीफ़ा होगा और यही वजह थी कि इन लोगों ने पहले क़त्ले उस्मान का बन्दोबस्त किया और उनके क़त्ल के बाद उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा की ताईद के सहारे अमीरूल मोमिनीन के मुक़ाबले पर उतर आऐ।
बहरहाल वो उम्मुल मोमिनीन आयशा हों या तल्हा और ज़ुबैर उनके इस इक़दाम का न कोई शरई जवाज़ है और न अख़लाक़ी। इनकी शख़्सियतें कितनी ही अहम सही मगर जुर्म बहरहाल जुर्म होता है ख़्वाह उसका मुर्तकिब कोई भी हो। इन लोगों ने एक ऐसा ख़ूंरेज़ इक़दाम किया जिससे न तो इन्कार की कोई गुंजाइश है और न ही कुश्तो ख़ून की ज़िम्मेदारी से इन्हें बरी किया जा सकता है।
अब्दुल्लाह , हज़रत आयशा की हक़ीक़ी बहन अस्मा बिन्ते अबू बकर के बेटे थे। आयशा इन्हें बेहद चाहती थीं। उनके दिल में अब्दुल्लाह की मोहब्बत ऐसे थी जैसे किसी मां के दिल में इकलौते बेटे की होती है। इन्हीं अब्दुल्लाह के नाम पर आपकी कुन्नियत उम्मे अब्दुल्लाह पड़ी। हिशाम बिन उर्वा का बयान है कि मैंने आयशा को जैसी दुआ इब्ने ज़ुबैर के हक़ में करते सुनी वैसी किसी दूसरी मख़लूक़ के लिए नहीं सुनी।
एक बार आयशा बीमार हुईं तो अब्दुल्लाह उन्हें देखने आए और दहाढ़ें मार मार कर रोने लगे। आयशा ने उन्हें सर उठा कर देखा तो बदहवास हो गयीं और ख़ुद भी रोने लगीं और फ़रमाया कि ऐ अब्दुल्लाह तुम से बढ़ कर दुनिया में मुझे कोई भी अज़ीज़ नहीं। ( 8)
जंगे जमल में जब मालिके अशतर ने इन्हें अधमुआ कर के डाल दिया और ये शदीद ज़ख़्मी हुए तो आयशा उस वक़्त तक के बेक़रारी के बिस्तर पर करवटें बदलती रहीं जब तक उन्हें अब्दुल्लाह के ज़िन्दा बच जाने की ख़बर नहीं मिल गयी। तारीख़ों से पता चलता है कि हज़रत आयशा ने उस शख़्स को दस हज़ार दिरहम दिये जिसने उनके बच जाने की ख़ुशख़बरी सुनाई थी। ( 9)
आयशा ने इन्हीं अब्दुल्लाह को अपने हुजरे में दफ़्न करने की वसीयत भी की थी ये वही हुजरा था जिसमें फ़रज़न्दे रसूल हज़रत इमामे हसन (अ.स) को उन्होंने दफ़्न न होने दिया था। ( 10)
अब्दुल्लाह की परवरिश और नशोनुमा बचपन से ही अदावत और नफ़रत की आग़ोश में हुई। ये बनी हाशिम ख़ुसूसन आले मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के सख़्त तरीन दुश्मन थे। इन्हीं का कारनामा था कि अपने बाप ज़ुबैर को भी इन्होंने हज़रत अली का दुश्मन बना दिया।
अमीरूल मोमिनीन का इरशाद हैः-
ज़ुबैर उस वक़्त तक हम अहलेबैत के बही ख़्वाह रहे जब तक कि उनका मनहूस बेटा अब्दुल्लाह जवान नहीं हुआ। ( 11)
अब्दुल्लाह की आले मोहम्मद (स.अ.व.व) से अदावत इस इन्तिहा को पहुंची हुई थी कि उन्होंने अपने ज़माना ए ख़िलाफ़त में चालीस जुम्अ (नमाज़ के मौक़े पर) पैग़म्बर (स.अ.व.व) पर दुरूद नहीं भेजा। उनका कहना था कि इससे रसूल (स.अ.व.व) के घराने की नाक ऊंची होती है। एक दूसरी रवायत में है कि उन्होंने जुम्अ में दुरूद न भेजने की वजह ये बयान की कि रसूल के घर वाले दुरूद में अपना नाम सुन कर अपना सर बलन्द करेंगे। ( 12)
इब्ने अब्बास से एक मरतबा अब्दुल्लाह इब्ने ज़ुबैर ने कहा , कि मैं चालीस बरस से अहलेबैत की अदावत अपने दिल में छिपाए हुए हूं। इन्हें हज़रत अली से ख़ुसूसी और पैदाइशी अदावत थी और ये अमीरूल मोमिनीन को बुरा भला कहा करते थे। ( 13)
यही अब्दुल्लाह इब्ने ज़ुबैर थे जिन्होंने इब्ने अब्बास , मोहम्मदे हनफ़िया और सत्तरह बनी हाशिम के अफ़राद को मक्के में महसूसर कर के पुख़्ता इरादा कर लिया था कि इन सब को ज़िन्दा जला दें और इस मक़सद की तकमील के लिए उन्होंने लकड़िया भी इकट्ठा कर ली थीं। जनाबे मुख़्तार को जब ये मालूम हुआ तो उन्होंने चार हज़ार सिपाहियों का एक दस्ता रवाना किया जो इन्तिहाई तेज़ी से मन्ज़िले तय करता हुआ मक्के आया और उसने उन लोगों की जान बचायी। ( 14)
मगर अब्दुल्लाह इब्ने ज़ुबैर के दिल में ख़ानवादा ए बनी हाशिम से दुश्मनी की जो आग भड़क रही थी वो बदस्तूर भड़कती रही , उन्होंने एक और कोशिश की कि मोहम्मदे हनफ़िया और उनके साथ तमाम बनी हाशिम को इकट्ठा कर के उन्हें क़ैद कर दिया और क़ैदख़ाने में लकड़ियां भरवा दीं और उनमें आग लगा दी। इस मरतबा अबू अब्दुल्लाहे जदली ऐन वक़्त पर अपने हमराहियों के साथ मौक़े पर पहुंच गये और बड़ी कोशिश के बाद आग पर क़ाबू हासिल कर के उन लोगों को रिहा कराया। ( 15)
यही अब्दुल्लाह इब्ने ज़ुबैर थे जिन्होंने अपने बाप के ख़यालात को तबदील करा के उन्हें हज़रत अली का दुश्मन बनाया और तल्हा वग़ैरह के साथ मिलकर आयशा को मजबूर किया कि वो अली से जंग करें। आयशा के दिल में अली की तरफ़ से अदावतों कुदूरत पहले ही से थी , इब्ने ज़ुबैर की तहरीक को तरग़ीब ने उन्हें पूरी तरह अमादाए क़िताल कर दिया।
मोवर्रेख़ीन का कहना है कि जब हव्वाब मे आयशा ने कुत्तों के भौंकने की आवाज़ सुनीं तो उन्हें पैग़म्बर की हदीस याद आ गयी और उन्होंने चाहा की यहीं से लौट जायें। इब्ने ज़ुबैर ने उन्हें यक़ीन व इतमिनान दिलाया कि जिसने इस मक़ाम को हव्वाब बताया है वो झूठा है , और ये हव्वाब नहीं है और इस क़दर बज़िद हुए कि आयशा से अपने झूठ को मनवा कर उन्हें पेश क़दमी के लिए मजबूर कर दिया।
इन तमाम हक़ाइक़ और शवाहिद की रौशनी में हम ये कह सकते है कि जंगे जमल के बानियान में अब्दुल्लाह इब्ने ज़ुबैर को नज़र अन्दाज़न नहीं किया जा सकता।
अल्लामा इब्ने असीर का बयान है कि एक दिन उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा के सामने यौमे जमल का तज़किरा छिड़ा तो आयशा ने पूछा कि क्या इस दिन को लोग यौमे जमल के नाम से याद करते हैं ? लोगों ने कहा , जी हां उस पर आयशा ने कहा , काश उस रोज़ मैं भी पैग़म्बर की दूसरी बीवियों की तरह घर में बैठी रहती........ फ़िर फ़रमाया कि अगर रसूलल्लाह (स.अ.व.व) के सुल्ब से अब्दुल्लाह इब्ने ज़ुबैर , अब्दुर रहमान बिन हारिस जैसे दस बेटे मेरे पैदा हो जाते तो मुझे इतनी ख़ुशी न होती जितनी घर में बैठ कर होती। ( 16)
मसरूक से रवायत है कि आयशा जब क़ुर्आने मजीद की वो आयात पढ़ती जिसमें कहा गया है कि , ऐ अज़्वाजे पैग़म्बर (स.अ.) अपने घरों में बैठी रहना , तो इतना रोतीं कि उनकी चादर आसुंओं से तर हो जाती। ( 17)
बलाग़ातुन निसां में है कि वाक़ेया ए जमल के बाद आयशा हर वक़्त मुज़तरिबो परेशान रहने लगीं थीं। लोगों ने पूछा की आप तो उम्मुल मोमिनीन हैं , आप पर इस क़दर इज़तेराबी कैफ़ियत क्यों तारी रहती है ? फ़रमाया , यौमे जमल मेरे गले में अटका हुआ है। काश उस दिन से पहले ही मैं मर गयी होती या उस दिन के लिए पैदा ही न हुई होती। ( 18)
हज़रत आयशा ने (अपनी किसी बीमारी के मौक़े पर) बतौरे वसीयत लोगों से कहा था कि रसूलल्लाह (स.अ.व.व) के बाद मैंने नये नये काम किये हैं लिहाज़ा अगर मैं मर जाऊं तो मुझे रसूलल्लाह (स.अ.व.व) के पास दफ़्न करना।
ज़हबी का कहना है कि नये कामों से आयशा की मुराद जंगे जमल में उनकी शिरकत है। ( 19)
1. बुख़ारीः- जिल्द 2 पेज न. 101
2. अक़दुल फ़रीदः- जिल्द 2 पेज न. 6
3. अक़दुल फ़रीदः- जिल्द 3 पेज न. 108
4. अल अनसाबुल अशरफ़ः- जिल्द 1 पेज न. 428
5. शरह इब्ने आबिल हदीदः- जिल्द 4 पेज न. 17
6. इस्तीयाबः- जिल्द 2 पेज न. 214
7. अक़दुल फ़रीदः- जिल्द 3 पेज न. 93
8. 9. 10. तहज़ीब इब्ने असाकरः- जिल्द 4 पेज न. 400- 402, शरह नहजुल बलाग़ाः- जिल्द 4 पेज न. 442- 443
11. मोरव्वेजुज़ ज़हब मसूऊदी बरहाशिया तारीख़े कामिलः- पेज न. 163, 164 जिल्द 5, याक़ूबीः- जिल्द 3 पेज न. 807
12. मोरव्वेजुज़ ज़हब मसूऊदी बरहाशिया तारीख़े कामिलः- पेज न. 163, 164 जिल्द 5, याक़ूबीः- जिल्द 3 पेज न. 807
13. मोरव्वेजुज़ ज़हबः- जिल्द 5 पेज न. 163- 164, तारीख़े याक़ूबीः- जिल्द 3 पेज न. 877
14. तहज़ीबः- जिल्द 7 पेज न. 8- 9, मुरव्वेजुज़ ज़हबः- जिल्द 5 पेज न. 158
15 आग़ानीः- जिल्द 9, पेज न. 16
16. असदुल ग़ाबाः- जिल्द 4 पेज न. 284, तबक़ात इब्ने सअदः- जिल्द 5 पेज न. 11
17. तबक़ात इब्ने सअदः- जिल्द 8 पेज न. 56
18. बलाख़तुन निसाः- पेज न. 8, तज़किरा ए ख़्वासुल उम्मा
19. अल नबलाः- जिल्द 2 पेज न. 134, मुतराक हाकिमः- जिल्द 4 पेज न. 6
माविया इब्ने अबी सुफ़ियान और हज़रत आयशा के किर्दारों अमल में हैरत अंगेज़ हद तक हम आंहगी यकसानियत और मुशाबेहत नज़र आती है। जिस तरह माविया , अमीरूल मोमिनीन हज़रत अली इब्ने अबी तालिब (अ.स) के अज़ली व जानी दुश्मन थे। उसी तरह आयशा हज़रत अली की अज़ली मुख़ालिफ़ और जानी दुश्मन थी।
जिस तरह अमीरूल मोमिनीन से माविया उम्र भर बरसरे पैकार रहे उसी तरह आयशा भी अली (अ.स) से लड़ती रहीं। जिस तरह माविया के दिल में अबू तुराब (अ.स) के ख़िलाफ़ आतिशे बुग़ज़ों इनाद भड़कती रही , उसी तरह आयशा के दिल में भी हमेशा अदावतों नफ़रत का ज्वालामुखी भड़कता रहा। जिस तरह शहादते अमीरूल मोमिनीन के बाद माविया ने हज़रत अली पर मिम्बर से तबर्रा और सबो शित्म करा के अपने दिल की भड़ास निकाली , उसी तरह आयशा ने हज़रत अली की ख़बरे शहादत सुन कर शुक्र का सजदह किया और तरबिया अशआर पढ़े और ख़ुशी के गीत गा कर अपना दिल ठंडा किया।
ये वो मुशतरक ख़ुसूसियात थीं जिन्होंने माविया और आयशा के दर्मियान क़ुरबतों में ऐसी हम आंहगी और नज़दीक़ी पैदा कर दी कि माविया और उसके हुक्काम व उम्माल की नज़र में आयशा की क़द्रों मन्ज़िलत अपनी मुअय्याना हुदूद को उबूर कर गयी। चुनान्चे उसके अहद में जब तक आयशा का एहतिरामों इक़बाल बरक़रार रहा , हुकूमत की तरफ़ से उन पर ख़ुसूसी इनायत नवाज़िशात और मराआत की बारिश होती रहती है। उर्वा बिन ज़ुबैर से रवायत है कि , माविया हज़रत आयशा का बड़ा ख़्याल रखते थे। उन्होंने एक मौक़े पर इन्हें एक लाख दिरहम दिये। ( 1)
इब्ने कसीर ने अता से रवायत की है कि जब आयशा मक्के में थीं तो माविया ने उनके पास एक हंसली भेजी जिसकी क़ीमत एक लाख दिरहम थी। ( 2)
इब्ने सआद का बयान है कि आयशा ने एक शख़्स जिसका नाम मुनक़दर बिन अब्दुल्लाह था से फ़रमाया कि अगर मेरे पास होते तो मैं तुम्हें दस हज़ार दिरहम दे देती। ये बात माविया को मालूम हुई तो उन्होंने उसी दिन शाम से पहले आयशा के पास एक बड़ी रक़म भेज दी और आपने मुनक़दर को दस हज़ार दिरहम दिए जिससे उन्होंने एक कनीज़ ख़रीदी। ( 3)
इब्ने क़सीर ने सअद बिन अज़ीज़ से रवायत की है कि माविया ने आयशा का अट्ठारह हज़ार अशरफ़ियों का क़र्ज़ा अदा किया।
इसी तरह बनी उमय्या के तमाम दौलतमन्द और सरमाया दार हज़रत आयशा का ख़ास ख़्याल रखते थे और दिरहमों दीनार के साथ मुख़तलिफ़ क़िस्म के तहाएफ़ उनकी ख़िदमत में पेश किया करते थे। ( 4)
लेकिन ये सिलसिला ज़्यादा दिनों तक क़ायम न रह सका। माविया और आयशा के दरमियान इख़तिलाफ़ ने सर उठाया और इनायतों मराआत के वो आरज़ी बादल जो करीमाना अन्दाज़ में आयशा के सर पर बरसा करते थे मुखालिफ़त की हवा में चलते फ़िरते नज़र आए।
मुख़ालिफ़त की वजह ये बताई जाती है कि माविया ने जब ख़िलाफ़त को ख़ानदानी मीरास बनाने की जिद्दो जहद की तो उन्हें मुसलमानों की तरफ़ से शदीद मुख़ालिफ़त का सामना करना पड़ा यहां तक कि उनके ख़ुसूसी असहाब और पास बैठने वाले भी ख़िलाफ़ हो गये।
चुनान्चे आयशा ने भी मुख़ालिफ़ीन की मुकम्मल ताईदन हमनवाई की जिसके नतीजे में ताल्लुक़ात ख़राब हो गये। मगर तबरी का बयान है कि दोनों के दर्मियान पहली तलख़ी सहाबी ए रसूल (स.अ.व.व) हुजर के क़त्ल से पैदा हुई। लिखते हैः-
हज़रत आयशा ने हुजर और उनके अस्हाब की सिफ़ारिश के साथ अब्दुर रहमान बिन हर्स बिन हिशाम को माविया के पास भेजा। अब्दुर रहमान उस वक़्त पहुंचे जब माविया हुजर और उनके साथियों को मौते के घाट उतार चुके थे। हज़रत आयशा इस हादसे पर बरहम , रंजीदा और मुलूल हुईं चुनान्चे वो अक्सर कहा करती थी कि काश ऐसा न होता। अब हम किसी चीज़ को बदलना चाहते हैं तो पहले से ज़्यादा मुश्किलों में पड़ जाते हैं। ख़ुदा की क़सम हम हुजर के क़त्ल को ज़रूर मुतग़य्यर कर देते। जहां तक मैं समझती हूं हुजर एक पक्के मुसलमान और हज व उमरह के बजा लाने वाले थे। ( 5)
हज़रत आयशा का ये जुमला , जब हम किसी चीज़ को बदलना चाहते हैं तो पहले से ज़्यादा मुश्किल में पड़ जाते हैं। इन्तिहाई मानी ख़ेज़ और ग़ौर तलब है इसका मतलब ये है कि आयशा ने उस्मानी हुकूमत का तख़्ता उलटना चाहा जिसके नतीजे में उस्मान क़त्ल हो गये और उनके बाद मुसलमानों ने बिलइत्तिफ़ाक़ हज़रत अली को ख़लीफ़ा मुनतख़ब कर लिया। जिनकी ख़िलाफ़त आयशा के लिये सख़्त तरीन....... मुसीबत थी। फिर आपने हज़रत अली (अ.स) की ख़िलाफ़त को उलटना चाहा तो जंगे जमल में तल्हा मारे गये जिन्हें वो ख़लीफ़ा के रूप में देखना चाहती थीं , ज़ुबैर क़त्ल हुए जो आपके हक़ीक़ी बहनोई थे। अब धड़का ये था कि माविया की हुकूमत का तख़्ता उलटने की कोशिश करूं तो इसके नतीजा इससे कहीं ज़्यादा बुरा निकलेगा।
(इस किताब को आप “अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क ” पर पढ़ रहे है।)
इस लिए उन्होंने अपने ग़मों ग़ुस्से को ज़ब्त किया और ख़ामोश रहीं।
जब माविया यज़ीद (ल) की बैअत के सिलसिले में वारिदे मदीना हुए और उम्मुल मोमिनीन आयशा से उन्होंने मुलाक़ात की तो सब से पहले जो गुफ़्तुगू माविया और आयशा के दर्मियान हुई वो हुजर के क़त्ल के बारे में थी। इस गुफ़्तुगू ने तल्ख़ी के साथ यहां तक तूल ख़ीचा कि माविया को कहना पड़ा किः-
मेरे और हुजर के मामले को छोड़ दीजिए यहां तक कि रोज़े क़यामत हम दोनों अपने रब से मिलें। ( 6)
ये गुफ़्तुगू तलख़ी और तरद्दुद की फ़ज़ा में तमाम हुई और यहीं से इख़्तिलाफ़ की ख़लीज़ और भी वसीअ से वसीअतर होती चली गयीं। फिर हज़रत आयशा के हक़ीक़ी भाई अब्दुर रहमान इब्ने अबी बकर का वाक़ेया पेश आया जिन्होंने यज़ीद (ल) की बैअत की मुख़ालिफ़त की और उसके फ़ौरन बाद नागहानी तौर पर ख़त्म कर दिये गये। बुख़ारी का कहना है कि जब अब्दुर रहमान ने यज़ीद की बैअत की मुख़ालिफ़त की और माविया और यज़ीद को बुरा भला कहा तो मरवान ने उन्हें गिरफ़्तार करना चाहा मगर वो भाग कर आयशा के घर में घुस गये। ( 7)
कुछ मोवर्रेख़ीन का कहना है कि जब लोगों को यज़ीद की बैअत पर आमादह करने के लिये मरवान तक़रीर कर रहे थे तो अब्दुर रहमान बिन अबी बकर उठ खड़े हुए और उन्होंने कहा कि तू भी झूठा है और माविया भी। तुम लोग ख़िलाफ़त को हरकली हुकूमत बनाना चाहते हो कि एक हरकल मरने के बाद दूसरा हरकल उसका जानशीन हो जाए। ( 8)
ये वो इख़तिलाफ़ी मारका था जिसके नतीजे में हज़रत आयशा को अपने हक़ीकी भाई से हाथ धोना पड़ा और इख़्तिलाफ़ात के शोले कोहे आतिश फ़िशां बन गये लेकिन चूंकि उम्मुल मोमिनीन में इतनी सकत और ताक़त नहीं रह गयी थी कि वो बनी उमय्या से जंग के लिए जंगलों और बियाबानों की ख़ाक छानती। लिहाज़ा उन्होनो ज़बानी जंग का सहारा लिया और बद्दुआओं के राकिटों से बनी उमय्या पर हमला आवर हो गयीं। अंजाम ये हुआ कि माविया की सफ़्फ़ाक़ी ने उन्हें मौत के मुंह में झोंक दिया।
माविया की मुख़ालिफ़त हज़रत आयशा को रास न आ सकी और उन्हें इन्तिहाई इबरतनाक व अलमनाक अंजाम से दो चार होना पड़ा। साहिबे हबीबुस सैर तारीख़े हाफ़िज़े अबरू , रबीउल अबरार और कामिलुस सफ़ीना के मोतबर हवालों से रक़म तराज़ है कि जब माविया इब्ने अबी सुफ़ियान अपने फ़ासिक़ो फ़ाजिर बेटे की बैअत के लिए मदीने आया और हज़रत आयशा से मिला तो उन्होंने ख़ूब खरी खरी सुनाई और उसके इस इक़दाम पर लानत मलामत की। जिस पर माविया ने उम्मुल मोमिनीन का क़िस्सा ही तमाम करने का मनसूबा तैय्यार किया और अपनी क़याम गाह के सहन में एक गहरा कुंआ खुदवाया और उसके दहाने को ख़सो ख़ाशाक से मंढ़ कर उस पर आबनूस की एक ख़ूब सूरत कुर्सी रखवा दी। जब ये सब कुछ हो चुका तो दूसरे दिन उसने उम्मुल मोमिनीन को निहायत अदबो एहतिराम से दावत पर मदू किया।
उम्मुल मोमिनीन तशरीफ़ लाईं तो उनसे माविया ने उस कुर्सी पर बैठने की दरख़्वास्त की जो मोअज़्ज़मा के लिए मख़सूस की गयी थी। आयशा ने जैसे ही क़दम बढ़ाया वैसे ही कुंए के अन्दर चली गयीं उम्मुल मोमिनीन के गिरते ही माविया ने उसमें चूना भरवा दिया। जब उम्मुल मोमिनीन ख़ाक हो गयीं तो उस कुंए को बन्द करा दिया गया और मक्के की तरफ़ रवाना हो गया। ( 9)
बाज़ मोवर्रेख़ीन ने ये भी लिखा है कि उम्मुल मोमिनीन आयशा का इन्तिक़ाल अलालत की वजह से हुआ और वो बक़ीअ में दफ़्न हुई। इस इख़तिलाफ़ की वजह ये समझ में आती है कि बाद में माविया को इस संगीन जुर्म से बरी करने के लिए ये रवायत गढ़ी गयी है।
हज़रत आयशा के बारे में मुसलमानों के मुख़तलिफ़ फ़िर्क़ों के जो अक़ाइदों नज़रियात हैं उनकी हल्की सी झलक गुज़शता सफ़हात में पेश की जा चुकी है। किसी ने उन्हें मासूम समझा , किसी ने उन्हें इमामे वक़्त के ख़िलाफ़ ख़ुरूज करने पर ख़ताकार , गुनाहगार और काफ़िर क़रार दिया। एक गिरोह आज तक कशमकश में मुबतिला है जो उनके बारे में लब कुशाई ही नहीं करना चाहता और वो फ़िर्क़ा कहता है जो कुछ उम्मुल मोमिनीन ने किया वो भी दुरूस्त और जो कुछ अमीरूल मोमिनीन ने किया वो भी दुरूस्त , ये भी राहे सवाब पर वो भी राहे सवाब पर।
इस मुख़तलिफ़ अक़ाइदों नज़रियात में जो तज़ाद और अफ़रा तफ़री है उसे मामूली अक़्ल वाला इन्सान भी समझ सकता है। अगर इन तमाम अक़ाइदों नज़रियात की रौशनी में मुनसिफ़ाना नज़र से देखा जाए तो जितना आदिलाना नज़रिया शिआ फ़िर्क़े का है उतना किसी भी फ़िर्क़े का नहीं। शियों ने आयशा के बारे में मियाना रवी इख़्तियार की है और उनका कहना है कि हज़रत आयशा मासूम न थीं। जिस तरह सहाबा ए किराम में कुछ लोग ख़ाती और मुनाफ़िक़ थे और उनसे तारिख़ी ग़ल्तियां सरज़द हुईं उसी तरह उम्मुल मोमिनीन आयशा ने उस्मान के ख़िलाफ़ लोगों को उनके क़त्ल पर आमादा और बरअंगेख़्ता किया और जब वो क़त्ल हो गये तो इन्तिक़ाम के बहाने से हज़रत अली पर ख़रूज कर के बहुत बड़ी ख़ता की। परवरदीगारे आलम गुनाहों औऱ ख़ताओं का बख़्शने वाला है अगर उम्मुल मोमिनीन ने सिद्क़ दिल से तौबा की होगी तो उनका मुआमला अदालत से तय होगा। कमोबेश यही नज़रिया ख़ुश अक़ीदा मुहक़्क़ेक़ीने अहले सुन्नत का भी है वो तस्लीम करते हैं कि उम्मुल मोमिनीन से ख़ता सरज़द हो गयी। मगर वो इस ख़ता को ख़ता ए इज़तेदादी से ताबीर करते हैं। ख़ता ए इज़तेदादी के बारे में उलमा ए अहले सुन्नत के मफ़रूज़ात ये हैं कि कितनी ही बड़ी ख़ता क्यों न हो ख़ताए इज़तेहादी के सबब से अजरो सवाब की हामिल है।
शियों का नज़रिया यह है कि बुराइयों और दानिस्ता ख़ताओं में इज़तेहाद की कोई गुनजाइश नहीं है। हज़रत अली इमामे वक़्त और वाजिबुल इताअत थे। मुत्तफ़क़ा तौर पर उनकी बैअत हो चुकी थी और तमाम मुसलमानों ने उन्हें पेशवा तस्लीम कर लिया था। ऐसी सूरत में उनके ख़िलाफ़ , ख़ुरूज को बग़ावत तो कहा जा सकता है इजतिहाद , हर्ग़िज़ नहीं।
जहां तक आयशा के उम्मुल मोमिनीन होने का सवाल है उससे कोई शिआ इन्कार नहीं करता। बेशक वो मुसलमानों की मां हैं और मुसलमानों की मां होने की हैसियत से उनका जो एहतिराम होना चाहिए उसमें शिआ फ़िर्क़ा दीगर मुसलमानों से पीछे नहीं है।
शिआ फ़िर्क़े का अक़ीदा है कि नबी की ज़ौजा काफ़िर तो हो सकती है , बदचलन और बदकार नहीं। जैसा कि हज़रत नूह और लूत की बीवियां थी। इस लिए शिआ उम्मुल मोमिनीन को वो दर्जा नहीं देते जो हक़ीक़त से ब ख़बर मुसलमान देते हैं।
अज़्वाजे नबी के बारे में किसी भी ख़ुसूसी फ़ज़ीलतों मन्ज़िलत का तज़किरह क़ुर्आने मजीद में नहीं है अलावा इसके कि पैग़म्बर (स.अ.व.व) की बीवियां तुम्हारी मांयें हैं।
इस आयत की शाने नुज़ूल के बारे में तमाम मुफ़स्सेरीन का मुत्तफ़क़ा फ़ैसला है कि तल्हा इब्ने उबैदुल्लाह ने जो अबू बकर के क़रीबी और ख़ानदानी रिश्तेदार थे अपनी इस राय का इज़हार किया था कि पैग़म्बर (स.अ.व.व) रेहलत के बाद आयशा से निकाह कर लेंगे। ख़ुदा को तल्हा की ये जसारत नगवार हुई उसके आयत , उज़्वाजुहू उम्माहातुम के ज़रिये तल्हा और उनके जैसे दीगर अफ़राद की उमंगों को हमेशा के लिए ख़त्म कर दिया।
ज़ाहिर है कि इस आयत के ज़रिये अज़्वाजे रसूल की फ़ज़ीलत का इज़हार मक़सूद न था बल्कि कुछ लोगों की नफ़सानी ख़्वाहिशात को ख़ाक में मिलाना था। इसकी ताईद उम्मुल मोमिनीन के उस जुमले से होती है कि जब किसी औरत ने उन्हें मां कह कर पुकारा तो उन्होंने कहा कि हम मर्दों की मां हैं औरतों की नहीं। और इस दलील से इस बात की भी ताईद होती है कि अज़्वाजे पैग़म्बर मुसलमानों की मांयें होने के बावजूद उनसे उसी तरह पर्दा करती थीं जिस तरह ना महरमों से किया जाता है। यही पर्दा ये बताता है कि वो हक़ीक़तन मुसलमानों की मायें नहीं थी बल्कि उन्हें इस लिए मां क़रार दिया गया था कि कोई शख़्स उनसे निकाह न कर सके।
बहरहाल इस आय़ात का मक़सद अज़्वाजे रसूल से निकाह की मुमानिअत के दाएरे में महदूद हैं इसके अलावा कोई फ़ज़ीलत इस आयत से ज़ाहिर नहीं होती।
ख़ुदा वन्दे आलम ने जाबजा क़ुर्आने मजीद में नबी की बीविंयों को मुतनब्बे भी किया है। मसलन नूह और लूत की बीवियों की मिसाल पेश करते हुए परवर दिगार ने फ़रमाया कि ये दोनों हमारे दो नेक बन्दों की ज़ौजियत और तसर्रूफ़ में थीं और दोनों ने ख़यानत की तो उनके शौहर जो नबी थे ख़ुदा के हुक्म के सामने उनके कुछ काम न आए और उन्हें हुक्म दिया गया कि जहन्नम में दाख़िल होने वाली औरतों के साथ तुम भी दाख़िल हो जाओ।
एक मक़ाम पर इरशाद हुआ कि ऐ नबी की बीवियों ! तुम में जो नेक और अच्छे अमल करने वाली है उनके लिए ख़ुदा ने बहुत बड़ा अज्र मुक़र्रर किया है और ऐ नबी की बीवियों अगर तुम में से किसी ने कोई न ज़ेबा हरकत की तो उसके लिए दुगना अज़ाब मुक़र्रर किया जायेगा।
ये तमाम आयतें सरीही तौर पर ये बताती हैं कि अज़्वाजे मासूम न थीं उनसे ख़ताओं और ग़ल्तियों का हर वक़्त इमकान था और ख़ताओं पर उनसे उसी तरह मुआख़िज़ा होगा जिस तरह आम औरतों और मर्दों से बल्कि इरशादे इलाही के मुताबिक़ वो और ज़्यादा क़ाबिले मुआख़िज़ा होगी। और यही शिआ फ़िर्क़े का नज़रिया है।
1. इब्ने क़सीरः- जिल्द 7 पेज न. 36, मुसतदरकः- जिल्द 4 पेज न. 13, हलीयतुल औलिया अबू नईमः- जिल्द 2 पेज न. 47
2. इब्ने क़सीरः- जिल्द 7 पेज न. 127
3. तबक़ात इब्ने सअदः- जिल्द 5 पेज न. 18
4. मसनद अहमदः- जिल्द 6 पेज न. 77, 459
5. तरबीः- जिल्द 6 पेज न. 156
6. इस्तेयाबः- जिल्द 1 पेज न. 134, असदुल ग़ाबाः- जिल्द 1 पेज न. 386
7. बुख़ारीः- जिल्द 3 पेज न. 126
8. तारीख़े क़ामिलः- जिल्द 3 पेज न. 199, इब्ने क़सीरः- जिल्द 4 पेज न. 236, और जिल्द 8 पेज न. 89, इस्तेयाब व असदुल ग़ाबा , असाबा हालाते हकम बिन आस
9. तारीख़े हबीबुस सैर हालाते अज़वाजे रसूलः- जिल्द 1 जुज़. 3, पेज न. 147, मतबुआ तेहरान 1271 हिजरी
जादू वही है जो सर चढ़ के बोले , इस में शक नहीं कि हज़रत आयशा अमीरूल मोमिनीन से बुग़्ज़ों हसद और अदावत रखती थी और अगर उनका बस चलता तो वो अबू तालिब के बेटे को अपने हाथों से ज़हर दे देतीं। इस अदावतों दुश्मनी के बावजूद उम्मुल मोमिनीन की ज़बान से अमीरूल मोमिनीन (अ.स) के जो फ़ज़ाइल बयान हुए वो यक़ीक़न मोजिज़ाती हैं और मुनासिब यही है कि वो कारेईंन के ईमान और रूहानी ज़ौक़ की आसूदगी के लिए पेश कर दिये जायें।
जाबिर से रवायत है कि मैं एक दिन आयशा के पास गया और उनसे पूछा कि आप हज़रत अली के बारे में क्या फ़रमाती हैं ? ये सुन कर वो कुछ देर के लिए सर झुकाये हुए सोचती रहीं फिर एक शेर पढ़ा जिसका मतलब ये था कि , जब सोना कसौटी पर कसा जाता है तो खरे खोटे की पहचान हो जाती है। जंगे जमल के बाद मुझे भी खरे खोटे का फ़र्क़ मालूम हो गया। अली हमारे दर्मियान यूं है जैसे कसौटी होती है।
(कन्ज़ुल मदफ़ून सियूतीः- पेज न. 236, इस्तेयाबः- जिल्द 3 पेज न. 328)
2. हज़रत आयशा फ़रमाती हैं कि रसूलल्लाह (स.अ.व.व) ने एक मरतबा फ़रमाया कि जो अली पर ख़ुरूज करेगा वो जहन्नमी होगा। ये सुन कर किसी ने आयशा से सवाल किया कि तो फिर आपने खुरूज क्यों किया ? आप ने कहा , मैं इस हदीस को भूल गयी थी और अब तौबा व इस्तिग़फ़ार करती हूं।
(यनाबीउल मोवद्दतः- जिल्द 2 पेज न. 71, बेरूत)
3. हज़रत आयशा कहती हैं कि रसूलल्लाह (स.अ.व.व) ने फ़रमाया कि सबक़त कुन्निदह सिर्फ़ तीन है। यूशा बिन नून जिन्होंने मूसा (अ.स) की तरफ़ सबक़त की। साहिबे यासीन जिसने ईसा (अ.स) की तरफ़ सबक़त की और अली इब्ने अली तालिब (अ.स) जिन्होंने मेरी तरफ़ सबक़त की।
(सवाइक़े मुहर्रिक़ाः- पेज न. 123)
4. किसी ने आयशा से पूछा कि रसूलल्लाह (स.अ.व.व) सब से ज़्यादा किसको दोस्त रखते थे ? तो उन्होंने फ़रमाया कि अली को जो बड़े (रोज़ादार परहेज़गार थे और नमाज़ी)
(सहीह तिर्मिज़ीः- न. 2 पेज न. 475 रियाजुन नज़रहः- जिल्द 2 पेज न. 213)
5. जमी इब्ने उमैर से रवायत है कि मैं एक मरतबा अपनी मां के साथ आयशा के पास गया तो उन्होंने आयशा से हज़रत अली के बारे में सवाल किया तो उम्मुल मोमिनीन ने जवाब दिया कि ख़ुदा की क़सम मैं किसी ऐसे मर्द को नहीं जानती जो पैग़म्बर (स.अ.व.व) को अली से ज़्यादा महबूब हो और न रूए ज़मीन पर किसी औरत को जो फातेमा (स.अ) से ज़्यादा पैग़म्बर (स.अ.व.व) को अज़ीज़ हो।
(मुसतदरकः- जिल्द 3 पेज न. 154)
6. हज़रत आयशा ने अमीरूल मोमिनीन हज़रत अली (अ.स) के बारे में फ़रमाया कि वो तमाम ख़लाइक में सब से ज़्यादा सुन्नते नबी के जानने वाले हैं।
(ज़ख़ाइरूल उक़बाः- पेज न. 78)
7. आयशा फ़रमाती हैं कि अली का ज़िक्र इबादत है।
(मुसतदरकः- जिल्द 2, पेज न. 152)
8. आयशा फ़रमाती हैं कि या अली आपके लिये ये बात काफ़ी है कि आपके चाहने वालों के लिये न मौत के वक़्त हसरत होगी , न क़ब्र में वहशत होगी , न क़यामत में दहशत होगी।
(यनाबीउल मवद्दतः- जिल्द 2 पेज न. 81)
9. आयशा फ़रमाती हैं कि मैंने अबू बकर को देखा कि अली के चेहरे की तरफ़ बहुत देखा करते हैं तो मैंने उनसे पूछा क ऐ बाबा जान आप अली के चहरे को बहुत देखा करते हैं , उन्होंने जवाब दिया कि मैंने रसूलल्लाह (स.अ.व.व) को फ़रमाते सुना कि अली के चेहरे पर नज़र करना इबादत है।
(रियाज़ुन नज़रहः- जिल्द 2 पेज न. 291)
10. उम्मुल मोमिनीन आयशा फ़रमाती हैं कि मैं एक दिन ख़िदमतें रसूल (स.अ.व.व) में हाज़िर थी कि इतने में अली इब्ने अली तालीब दाख़िल हुए। उन्हें देख कर आं हज़रत (स.अ.व.व) ने फ़रमाया कि ये सैय्यदुल अरब है।
(सवाइक़े मुहर्रिक़ाः- पेज न. 20 क़ाहिरह , कनज़ुल आमलः- जिल्द 6 पेज न. 15 यनाबीउल मुवद्दतः- पेज न. 248 हज्जुल मतालिबः- पेज न. 20)
11. अता से मरवी है कि मैंने हज़रत आयशा से पूछा कि अली के मुताल्लिक़ आपका क्या ख़्याल है ? फ़रमाया वो ख़ैरूल बशर है और तमाम इन्सानों से बेहतरों अफ़ज़ल है जो इसमें शक करें वो काफ़िर है।
(यनाबीउल मुवद्दतः- 9 पेज न. 246)
12. हज़रत आयशा फ़रमाती हैं कि ख़ुदा ने कोई मख़लूक़ ऐसी पैदा नहीं की जो रसूल (स.अ.व.व) की नज़र में अली इब्ने अबी तालिब से ज़्यादा महबूब हो।
(किफ़ायतुत तालिबः- पेज न. 184)
मज़कूरह अक़वाले आयशा , अक़ीदतमनदाने उम्मुल मोमिनीन के लिए लम्हा ए फ़िक़रियां हैं। वस्सलाम
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[[अलहम्दो लिल्लाह ये किताब ''हज़रते आयशा की तारीखी हैसीयत '' पूरी टाईप हो गई खुदा वंदे आलम से दुआगौ हुं कि हमारे इस अमल को कुबुल फरमाऐ और इमाम हुसैन फाउनडेशन को तरक्की इनायत फरमाए कि जिन्होने इस किताब को अपनी साइट (अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क) के लिऐ टाइप कराया।]]
सैय्यद मौहम्मद उवैस नक़वी
30:01:2016
हज़रत आयशा की तारीख़ी हैसियत 1
इन्तेसाब 2
हर्फ़े आग़ाज़ः 3
अर्ज़े मुअल्लिफ़ 9
हज़रत आयशा 12
नसबी सिलसिला 29
पैदाइश 30
शादी 32
हुस्नो जमाल 47
हरीर में आयशा 51
हज़रत आयशा की मिज़ाजी कैफ़ियत 56
पार्टी बन्दी 57
अहलेबैत (अ) से आयशा की अदावत 59
आयशा की छलांग 77
रसूल (स.अ.व.व) का पीछा करना 79
आयशा पर शैतान 82
तोड़ फोड़ 83
गालम गलौज 85
गुत्थम गुत्था 86
आयशा की पिटाई 87
आयशा पर हज़रत उमर की लानत मलामत 88
पैग़म्बर (स.अ.व.व) की दीगर अज़्वाज से आयशा की हसद 90
आऊज़ो बिल्लाहे मिनक 91
मलीका पर आयशा का जादू 93
मारिया क़िब्तिया की सरगुज़श्त 96
हज़रते आयशा और अज़मते रसूल (स.अ.व.व) 100
दूसरा बोहतान 107
गुड़ियों में घोड़ा 110
हज़रत आयशा की मुज़ख़रफ़ हदीसें 112
आयशा का जनाज़ा 115
हज़रत आयशा का एतेराफ़ 117
आयशा की हड्डी 118
शैतानी काम 119
हब्शियों का नाच 120
कहानियों का शौक़ 121
लम्बी दौड़ 122
छुली छुलय्या 123
आऊज़ो बिल्लाहे मिन हाज़ल ख़ुराफ़ात 124
हज़रत आयशा का अनोखा ग़ुस्ल 125
आयशा के बारे में रसूल (स.अ.व.व.) की पेशिनगोईयां 126
एक अनार दो बीमार 127
पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.व) की शहादत 130
अबू बकर व उमर का दौरे हुकूमत और आयशा 146
उस्मान का दौरे हुकूमत और आयशा 150
क़त्ले उस्मान पर आयशा के ख़िलाफ़ सहाबा की गवाहियां 152
( हिस्सा दोम) 152
सअद इब्ने अबी विक़ास 153
इब्ने कलाब 153
अम्मार बिन यासिर 154
हज़रत आयशा का इक़रार 154
अमरए आस 155
अमीरूल मोमिनीन हज़रत अली (अ.स) के ख़िलाफ़ आयशा का मौक़फ़ 157
जंगे जमल की तैयारियां और उसका पस मंज़र 160
आयशा के बढ़ते क़दम 175
कुत्तों का इसतेफ़सार 180
उम्मुल मोमिनीन उम्मे सलमा की पेशकश 183
अबू मूसा अशअरी की रख़ना अंदाज़ी (साज़ीशे) 185
आयशा और अहले बसरा 189
उस्मान बिन हुनैफ़ की दुर्गत 193
जंगे जमले असग़र 196
उस्मान बिन हुनैफ़ की रिहाई 199
बसरा में शाहेलाफ़ता की आमद 199
मैदाने जमल 202
इतमामे हुज्जत 204
मोहम्मद इब्ने हनफ़िया का हमला 208
तल्हा की हलाकत 209
ऊंट के मुहाफ़िज़ 211
अमर इब्ने अहलबे ज़ब्बी का वाक़िआ 215
घमासान की जंग 216
अमीरूल मोमिनीन (अ.स) का रहमो करम 220
आम माफ़ी 222
हज़रत आयशी की वापसी 223
जंगे जमल के नताइज 225
जंगे जमल की रौशनी में हज़रत अली का मिसाली किरदार 229
जंगे जमल की रौशनी में हज़रत आयशा 233
तल्हा और ज़ुबैर का मौक़िफ़ 238
अब्दुल्लाह इब्ने ज़ुबैर 240
हज़रत आयशा की शरमिंदगी 244
अहदे माविया और आयशा 246
हज़रत आयशा का इबरतनाक अंजाम 251
हज़रत आयशा के मुताल्लिक़ मुसलमानों के मुख़तलिफ़ नज़रियात 253
एतिराफ़ाते आयशा 257
फेहरीस्त 262