सृष्टि का मोती
समूहन इमाम मेहदी (अ)
लेखक
पुस्तक की भाषा هندی
मुद्रण वर्ष 1404

सृष्टि का मोती

अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क

इमामे ज़माना (अलैहिस्सलाम) के जीवन पर एक तहक़ीक


संकलनकर्ता :

मुहम्मद अमीन बाला दस्तियान

मुहम्मद महदी हाईरी पुर

महदी यूसुफ़ियान

अनुवादक : सैयद क़मर ग़ाज़ी

प्रकाशक : बुनियादे फरहन्गी महदी ए मऊद (अ.)


विषय सूची

सृष्टि का मोती 1

प्रस्तावना 11

इमामे ज़माना पर बहस की ज़रुरत 11

पहला अध्याय 15

इमामत 15

इमाम की ज़रुरत 18

इमाम की विशेषताएं 20

इमाम का इल्म 21

इमाम की इस्मत 22

इमाम , समाज को व्यवस्थित करने वाला होता है 25

इमाम का अख़लाक बहुत अच्छा होता है 26

इमाम ख़ुदा की तरफ़ से मंसूब (नियुक्त) होता है 27

सबसे अच्छी बात 28

दूसरा अध्याय 30

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की शनाख़्त 31

पहला हिस्सा 31

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की ज़िन्दगी पर एक नज़र 31

इमामे ज़माना का नाम कुन्नियत और अलक़ाब 33

जन्म की स्थिति 34

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की विशेषताएं 39

दूसरा हिस्सा 42

जन्म के समय से हज़रत इमाम अस्करी (अ.स.) की शहादत तक 42

इमाम महदी (अ.स.) से शिओं का परिचय 42

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के मोजज़ें और करामतें 45

सवालों के जवाब 47

तोहफ़ें क़बूल करना 50

अपने पिता की नमाज़े मैय्यत पढ़ाना 52

तीसरा हिस्सा 56

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) कुरआन व हदीस की रौशनी में 56

कुरआने क़रीम की रौशनी में 56

रिवायत की रौशनी में 59

चौथा हिस्सा 63

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) ग़ैरों की नज़र में 63

तीसरा अध्याय 67

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) का इन्तेज़ार 67

पहला हिस्सा 67

ग़ैबत 67

ग़ैबत का अर्थ 67

ग़ैबत का इतिहास 69

ग़ैबत की वजह 71

जनता को अदब सिखाना 72

लोगों से अनुबंध किये बग़ैर काम करना 73

लोगों का इम्तेहान 74

इमाम की हिफ़ाज़त 75

दूसरा हिस्सा 76

ग़ैबत की क़िस्में 77

ग़ैबते सुग़रा (अल्पकालीन ग़ैबत) 78

ग़ैबते कुबरा 83

तीसरा हिस्सा 86

ग़ायब इमाम के फ़ायदे 87

इमाम संसार का केन्द्र होता है 87

उम्मीद की किरण 92

विचार धारा की मज़बूती 93

तरबियत 97

इल्मी और फ़िक्री पनाह गाह 98

आन्तरिक हिदायत 102

मुसीबतों से सुरक्षा 103

रहमत की बारिश 105

चौथा हिस्सा 107

इमाम की ज़ियारत 107

पाँचवां हिस्सा 117

लंबी उम्र 117

छटा हिस्सा 122

इन्तेज़ार 123

इन्तेज़ार की हक़ीक़त और उसका महत्ता 124

इमामे ज़माना (अ.स.) के इन्तेज़ार की विशेषताएं 126

इन्तेज़ार के पहलू 128

इन्तेज़ार करने वालों की ज़िम्मेदारियाँ 132

इमाम की पहचान 133

इमाम (अ.) को नमून ए अमल व आदर्श बनाना 136

इमाम (अ.स.) को याद रखना 138

हार्दिक एकता 142

इन्तेज़ार के प्रभाव 146

इन्तेज़ार करने वालों का सवाब 148

चौथा अध्याय 154

ज़हूर का ज़माना 154

पहला हिस्सा 154

ज़हूर से पहले दुनिया की हालत 154

दूसरा हिस्सा 158

ज़हूर का रास्ता हमवार होना और ज़हूर की निशानियां 159

ज़हूर की शर्तें और रास्ते का हमवार होना 159

योजना व प्लान 162

रहबरी व नेतृत्व 164

मददगार 165

क- इमामत की शनाख़्त व आज्ञापालन 167

ख- इबादत और दृढ़ता 168

ग- शहादत की तमन्ना 169

घ- बहादुरी और दिलेरी 169

ङ- सब्र और बुर्दबारी 170

च- एकता 171

छ- ज़ोह्द व तक़वा 171

आम तैयारियाँ 173

ज़हूर की निशानियाँ 176

सुफ़यानी का ख़रुज (आक्रमण) 178

खस्फ़े बैदा 179

यमनी का क़ियाम (आन्दोलन) 180

आसमान से आवाज़ का आना 180

नफ़्से ज़किया का क़त्ल 181

तीसरा हिस्सा 183

ज़हूर 183

ज़हूर का ज़माना 183

ज़हूर के वक़्त को छुपाने का राज़ 185

उम्मीद का बाक़ी रखना 185

ज़हूर के रास्तों को हमवार करना 186

इन्केलाब का आरम्भ 187

क़ियाम की स्थिति 188

पाँचवां अध्याय 194

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत 194

पहला हिस्सा 195

उद्देश्य 195

आध्यात्मिक तरक़्क़ी 196

न्याय का विस्तार 198

दूसरा हिस्सा 201

हुकूमत की योजनाएं 201

अ- सांस्कृतिक योजना 203

किताब व सुन्नत को ज़िन्दा करना 203

अखलाक का विस्तार 205

इल्म व ज्ञान की तरक़्क़ी 207

बिदअतों से मुकाबला 208

आ- आर्थिक योजना 210

प्राकृतिक संपदा का दोहन 211

धन का न्यायपूर्वक वितरण 212

वीरानों को आबाद करना 214

इ- सामाजिक योजना 215

अम्र बिल मारुफ़ और नही अनिल मुनकर 215

बुराइयों से मुक़ाबला 216

अल्लाह की हदों को जारी करना 217

न्याय पर आधारित फ़ैसले 218

तीसरा हिस्सा 220

हुकूमत के नतीजे 220

न्याय का विस्तार 221

ईमान , अख़लाक़ और फिक्र का विकास 223

एकता और मुहब्बत 225

जिस्म और रूह की सलामती 226

बहुत ज़्यादा खैर व बरकत 228

ग़रीबी व फ़क़ीरी का अंत 229

इस्लाम की हुकूमत और कुफ्र का ख़ात्मा 232

शाँती व सुरक्षा 235

इल्म की तरक्की 237

चौथा हिस्सा 240

हुकूमत की विशेषताएं 240

हुकूमत की सीमाएं और उसका केन्द्र 240

हुकूमत की मुद्दत 244

इमाम (अ.स.) की प्रशासनिक की शैली 247

जिहाद की कार्य शैली 249

इमाम (अ.स.) के फ़ैसले 251

इमाम (अ.स.) का हुकूमत का अंदाज़ 252

इमाम (अ.स.) की आर्थिक शैली 253

इमाम (अ.स.) की ख़ुद की सीरत 256

आम मक़बूलियत 258

छठा अध्याय 261

महदवियत के लिए नुक्सानदेह चीज़ों की पहचान 261

ग़लत नतीजा निकालना 262

ज़हूर में जल्द बाज़ी 265

ज़हूर के लिए वक़्त निश्चित करना 267

ज़हूर की निशानियों की ग़लत व्याख्या 268

बेकार बहसें 269

झूठा दावा करने वाले 271

सहायक किताबों की सूची 274


प्रस्तावना

بِسْمِ اللّٰہِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیْمِ الحمد لله رب العالمین و بہ نستعین و صلی الله علٰی محمد و آلہ الطیبین الطاھرین۔

इमामे ज़माना पर बहस की ज़रुरत

शायद कुछ लोग यह सोचें कि बहुत सी कल्चरल और आधारभूत ज़रुरतों के होते हुए हज़रत इमाम महदी (अज्जल अल्लाहु तआला फ़रजहू शरीफ़) के बारे में बहस करने की क्या ज़रुरत है ? क्या इस बारे में काफ़ी हद तक बहस नही हो चुकी है ? क्या इस बारे में किताबें और लेख नहीं लिखे गए हैं ?

तो इसके जवाब में हम यह कहते हैं कि महदवियत एक ऐसा विषय है जो इंसान की ज़िन्दगी में एक महत्व पूर्ण स्थान रखता है और इसका इंसानी ज़िन्दगी के विभिन्न पहलुओं से सीधा सम्बन्ध है। अतः इस बारे में जो लिखा जा चुका है उसके बावजूद भी इस विषय पर लिखने व कहने के लिए बहुत कुछ बाक़ी है। इस लिए हमारे उलमा ए कराम व बुद्धिजीवी लोगों को चाहिए कि वह इस बारे में और ज़्यादा लिखें।

हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम के बारे में बहस करने की ज़रुरत को अत्यधिक स्पष्ट करने के लिए यहाँ कुछ चीज़ों की तरफ़ इशारा किया जा रहा है।

1. हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम का विषय , इमामत के उस आधार भूत मसले की तरफ़ पलटता है जो शिओं के एतेक़ादी (आस्था संबंधी) उसूल में से है। इस पर बहुत अधिक ज़ोर दिया गया है और इसे कुरआने करीम और इस्लामी रिवायतों में बहुत अधिक महत्व प्राप्त है। शिया और सुन्नी दोनों सम्प्रदायों ने पैग़म्बरे इस्लाम (स.) से यह रिवायत नक्ल की है।

”مَنْ مَاتَ وَ لَمْ یَعْرِفْ اِمَامَ زَمَانِہِ مَاتَ مِیْتَةً جَاہِلِیَةً۔ “

जो इंसान इस हालत में मर जाये कि अपने ज़माने के इमाम को न पहचानता हो तो उसकी मौत जाहिलियत (कुफ़्र) की मौत होगी। (अर्थात उसने इस्लाम से कोई फायदा नहीं उठाया है।).

वास्तव में यह एक ऐसा विषय है जो इंसान के आध्यात्मिक जीवन से संबंधित है अतः इस मसले पर विशेष रूप से ध्यान देने की आवश्यक्ता है।

2. हज़रत इमाम महदी (अ.स.) , इमामत की उस पवित्र श्रंखला की बारहवीं कड़ी हैं , जो पैग़म्बरे इस्लाम (स.) की दो निशानियों में से एक है। शिया और सुन्नी दोनों ही सम्प्रदायों ने पैग़म्बरे इस्लाम (स.) से यह रिवायत नक्ल की हैः

” اِنِّی تَارِکٌ فِیْکُمُ الثَّقَلَیْنِ کَتَابَ اللهِ وَ عِتْرَتِی؛ مَا اِنْ تَمَسَّکْتُمْ بِہِمَا لَنْ تَضِلُّوْا بَعْدِی اَبَداً

बेशक़ मैं तुम्हारे बीच दो महत्वपूर्ण चीज़ें छोड़े जा रहा हूँ , एक अल्लाह की किताब और दूसरे मेरी इतरत (वंश) , जब तक तुम इन दोनों के संपर्क में रहोगे मेरे बाद कदापि गुमराह नहीं हो सकते।

इस आधार पर कुरआने क़रीम के बाद जो कि अल्लाह का कलाम है , कौनसा रास्ता इमाम (अ.स.) के रास्ते से ज़्यादा रौशन और हिदायत करने वाला है। क्या बुनियादी तौर पर पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के सच्चे जानशीन के अलावा अन्य कोई कुरआने करीम की जो कि अल्लाह का कलाम है , तफ़सीर कर सकता है।

3. हज़रत इमाम महदी (अ.स.) ज़िन्दा व मौजूद हैं और उनके बारे में नौजवानों और जवानों के ज़हनों में बहुत से सवाल पैदा होते रहते हैं। यद्यपि पिछले ज़माने के आलिमों ने अपनी अपनी किताबों में बहुत से सवालों के जवाब दिये हैं , लेकिन फिर भी बहुत से शक व शुब्हे बाकी हैं और कुछ पुराने जवाब आज कल के ज़माने के अनुरूप नही हैं।

4. इमामत के महत्व और उसकी केन्द्रीय हैसियत की वजह से दुश्मनों ने हमेशा ही शिओं को फिक़्री और इल्मी लिहाज़ से निशाना बनाया है ताकि इमाम महदी (अ.स.) के बारे में विभिन्न प्रकार के शुब्हे व एतेराज़ उत्पन्न कर के उनके मानने वालों को शक में डाल दिया जाये। जैसे उनकी लम्बी उम्र को एक असंभव और बुद्धि में न आने वाली बात घोषित करना , या उनकी ग़ैबत को एक तर्क विहीन चीज़ बताना या इसी तरह के अन्य बहुत से एतेराज़। इसके अलावा अहलेबैत (अ.स.) की तालीमात को न जानने वाले कुछ लोग महदवियत के बारे में कुछ ग़लत और बेबुनियाद बातें बयान कर देते हैं और उनसे कुछ लोग गुमराह हो जाते हैं या उन को गुमराह कर दिया जाता है। मिसाल को तौर पर हज़रत इमाम महदी (अ.स.) का इन्तेज़ार , उनका ख़ूनी क़ियाम , उनकी ग़ैबत के ज़माने में उनसे मुलाक़ात की संभावना आदि के बारे में बहुत से गलत और रिवायतों के मुखालिफ़ मतलब बयान कर देते हैं। अतः महदवियत के बारे में इस तरह की ग़लत बातों की सही तहक़ीक़ की जाये और उन एतेराज़ों का बुद्धि पर आधारित तर्क पूर्ण जवाब दिया जाये।

इन्हीँ बातों को आधार बना कर यह कोशिश की गई है कि इस किताब में हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की नूरानी ज़िन्दगी के विभिन्न पहलुओं को बयान किया जाये और उन के बारे में जवानों के ज़ेहनों में जो सवाल मौजूद उनका जवाब दिया जाये और इसी तरह इमाम के ज़माने से संबंधित सवालों का भी जवाब दिया जाये। इसके अलावा इस किताब में महदवियत के अक़ीदे के लिए नुक्सान देह चीज़ों और कुछ ग़लत फिक्रों के जवाब भी दिये गए हैं , ताकि तमाम इंसान अल्लाह की आख़िरी हुज्जत हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की मारेफ़त के रास्ते में सही एक क़दम उठा सकें।


पहला अध्याय

इमामत

पैग़म्बरे इस्लाम (स.) की शहादत के बाद इस्लामी समाज में पैग़म्बर (स.) के जानशीन (उत्तराधिकारी) और खिलाफ़त का मसला सब से ज़्यादा महत्वपूर्ण था। एक गिरोह ने पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के कुछ असहाब के कहने पर हज़रत अबू बकर को पैग़म्बर (स.) का ख़लीफ़ा (उत्तराधिकारी) चुन लिया , लेकिन दूसरा गिरोह पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के हुक्म के अनुसार हज़रत अली (अ.स.) की खिलाफ़त के ईमान पर अटल रहा। एक लम्बा समय बीतने के बाद पहला गिरोह अहले सुन्नत व अल- जमाअत के नाम से और दूसरा गिरोह शिया के नाम से मशहूर हुआ।

यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि शिया व सुन्नी के बीच जो अन्तर पाया जाता है वह सिर्फ पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के जानशीन के आधार पर नहीं है , बल्कि इमाम के मअना व मफ़हूम के बारे में भी दोनों मज़हबो (सम्प्रदायों) के दृष्टिकोणों में बहुत ज़्यादा फर्क पाया जाता है। अतः इसी आधार पर दोनों मज़हब एक दूसरे से अलग हो गये हैं।

हम यहाँ पर इस बात की वज़ाहत (व्याख़्या) के लिए (इमाम और इमामत) के मअना की तहक़ीक़ करते हैं ताकि दोनों के नज़रिये स्पष्ट हो जायें।

शाब्दिक आधार पर इमामत का अर्थ व मअना नेतृत्व व रहबरी हैं और एक निश्चित मार्ग में किसी गिरोह की सर परस्ती करने वाले ज़िम्मेदार को इमाम कहा जाता है। मगर दीन की इस्तलाह (धार्मिक व्याख़यानो व लेखों में प्रयोग होने वाले विशेष शब्दों को इस्तलाह कहा जाता है) में इमामत के विभिन्न अर्थ व मअना उल्लेख हुए हैं।

सुन्नी मुसलमानों के नज़रिये के अनुसार इमामत दुनिया की बादशाही का नाम है और इस के द्वारा इस्लामी समाज का नेतृत्व किया जाता है। अतः जिस तरह हर समाज को एक रहबर व उच्च नेतृत्व की ज़रुरत होती है और उसमें रहने वाले लोग अपने लिए एक रहबर को चुनते हैं , इसी तरह इस्लामी समाज के लिए भी ज़रुरी है कि वह पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के बाद अपने लिए एक रहबर का चुनाव करे , और चूँकि इस्लाम धर्म में इस चुनाव के लिए कोई खास तरीका निश्चित नहीं किया गया है इस लिए पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के जानशीन (उत्तराधिकारी) के चुनाव के लिए विभिन्न तरीकों को अपनाया जा सकता है। जैसे- जिसे पब्लिक या बुज़ुर्गों का अधिक समर्थन मिल जाये या जिसके लिए पहला जानशीन वसीयत करदे या जो बगावत कर के या फौजी ताक़त का प्रयोग कर के हुकूमत पर क़ब्ज़ा कर ले।

लेकिन शिया मुसलमानों का मत है कि हज़रत मुहम्मद (स.) अल्लाह के आख़िरी पैग़म्बर थे और उनके बाद पैग़म्बरी ख़त्म हो गई। उनके बाद पैग़म्बरी की जगह इमामत ने लेली अर्थात अल्लाह ने इंसानों की हिदायत के लिए पैग़म्बर के स्थान पर इमाम भेजने शुरू कर दिये। इमाम मखलूक के बीच अल्लाह की हुज्जत और उसके फ़ैज़ का वास्ता होता है। अतः शिया इस बात पर यक़ीन व ईमान रखते हैं कि इमाम को सिर्फ अल्लाह निश्चित व नियुक्त करता है और उसे पैग़म्बर , वही का पैग़ाम लाने वाले के द्वारा पहचनवाता है। यह नज़रिया इमामत की अज़मत और बलन्दी (महानता) के साथ शिया फ़िक्र में पाया जाता है। इस नज़रिये के अनुसार इमाम का कार्य क्षेत्र बहुत व्यापक है वह इस्लामी समाज का सरपरस्त होता है और अल्लाह के अहकाम को बयान करता है , क़ुरआन का मुफ़स्सिर होता है और इंसानों को राहे सआदत (कल्याण व निजात) की हिदायत करता हैं। बल्कि इससे भी अधिक स्पष्ट शब्दों में यह कहा जा सकता है कि शिया संस्कृति में “इमाम ” पब्लिक की दीन और दुनिया की मुश्किलों को हल करने वाले व्यक्तित्व का नाम है। इसके विपरीत अहले सुन्नत का मानना यह है कि खलीफ़ा या इमाम की ज़िम्मेदारी सिर्फ दुनिया से संबंधित कामों में हुकूमत करना है।

इमाम की ज़रुरत

इन नज़रीयों के उल्लेख के बाद अब इस सवाल का जवाब देना उचित है कि कुरआने करीम और सुन्नते पैग़म्बर (स.) के बावजूद इमाम की क्या ज़रुरत है ? इमाम की ज़रुरत के लिए बहुत से दलीलें पेश की गई हैं लेकिन हम यहाँ पर उन में से सिर्फ़ एक को अपने सादे शब्दों में पेश कर रहे हैं।

जिस दलील के द्वारा नबियों (अ.स.) की ज़रुरत साबित होती है , वही दलील इमाम की ज़रुरत को भी साबित करती है। एक बात तो यह कि क्यों कि इस्लाम आखरी दीन है और हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स.) अल्लाह की तरफ़ से आने वाले आखरी पैग़म्बर हैं , अतः ज़रूरी है कि इस्लाम में इतनी व्यापकता हो कि वह क़ियामत तक की इंसानों की सारी ज़रुरतों को पूरा कर सके। दूसरी बात यह कि कुरआने करीम में इस्लाम के उसूल (आधारभूत सिद्धान्त) , अहकाम (आदेश) और इलाही तालीमों (शिक्षाओं) को आम व आंशिक रूप में उल्लेख किया गया हैं और उनकी तफ़्सीर व व्याख़्या पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के ज़िम्मे है। यह बात स्पष्ट है कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने मुसलमानों के हादी और रहबर के रूप में ज़माने की ज़रुरतों के अनुसार और अपने ज़माने के इस्लामी समाज की योग्यता के अनुरूप अल्लाह की आयतों को बयान किया अतः पैग़म्बर इस्लाम (स.) के लिए आवश्यक है कि अपने बाद वाले ज़माने के लिए कुछ ऐसे लायक जानशीनों को छोड़ें जो ख़ुदा वन्दे आलम के ला महदूद (अपार व असीमित) इल्म के दरिया से संबंधित हो ताकि जिन चीज़ों को पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने बयान नहीं किया , वह उनको बयान करें और हर ज़माने में इस्लामी समाज की ज़रूरतों को पूरा करते रहें ।

इसी लिए इमाम (अ.स.) पैग़म्बरे इस्लाम (स.) की छोड़ी हुई मिरास के मुहाफिज़ (रक्षा करने वाले) , कुरआने करीम के सच्चे मुफ़स्सिर और उस के सही मअना बयान करने वाले हैं , ताकि अल्लाह का दीन स्वार्थी दुशमनों के द्वारा तहरीफ (परिवर्तन) का शिकार न हो और यह पाक व पाक़ीज़ा दीन क़ियामत तक बाकी रहे।

इसके अलावा , इमाम इंसाने कामिल (पूर्ण रूप से विकसित इन्सान) के रूप में इन्सानियत के तमाम पहलुओं में नमूनए अमल (आदर्श) है। क्यों कि इन्सानियत को एक ऐसे नमूने की सख्त ज़रुरत है जिसकी मदद और हिदायत के द्वारा इंसानी सामर्थ्य के अनुसार तरबियत (प्रशिक्षण) पा सके और इन आसमानी प्रशिक्षकों के आधीन रह कर भटकाव व अपने नफ्स की इच्छाओं के जाल और बाहरी शैतानों से सुरक्षित रह सके।

उपरोक्त विवरण से ये बात स्पष्ट हो जाती है कि जनता को इमाम की बहुत ज़रुरत है और इमाम की ज़िम्मेदारियाँ निमन लिखित हैं।

o समाज का नेतृत्व व समाजी मुश्किलों का समाधान करना अर्थात हुकूमत की की स्थापना।

o पैग़म्बरे इस्लाम के दीन को तहरीफ़ (परिवर्तन) से बचाना और कुरआन के सही मअनी बयान करना।

o लोगों के दिलों का तज़किया करना अर्थात उन्हें पवित्र बनाना और उन की हिदायत करना।

इमाम की विशेषताएं

पैग़म्बरे इस्लाम (स.) का जानशीन अर्थात इमाम , दीन को ज़िन्दा रखता और इंसानी समाज की ज़रुरतों को पूरा करता है। इमाम के व्यक्तित्व में इमामत के महान पद के कारण कुछ विशेषताएं पाई जाती हैं जिन में से कुछ मुख़्य विशेषताएं निम्न लिखित हैं।

 इमाम , मुत्तक़ी , परहेज़गार और मासूम होता है , जिसकी वजह से उससे एक छोटा गुनाह भी नहीं हो सकता।

 इमाम के इल्म का आधार पैग़म्बरे इस्लाम (स.) का इल्म होता है और वह अल्लाह के इल्म से संपर्क में रहता है , अतः वह भौतिक व आध्यात्मिक , दीन और दुनिया की तमाम मुश्किलों के हल का ज़िम्मेदार होता है।

 इमाम में तमाम फ़ज़ायल (सदगुण) मौजूद होते हैं और वह उच्च अख़लाक़ का मालिक होता है।

 दीन के आधार पर इंसानी समाज को सही रास्ते पर चलाने की योग्यता रखता है।

उरोक्त वर्णित विशेषताओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि इमाम का चुनाव जनता के बस से बाहर है। अतः सिर्फ़ ख़ुदा वन्दे आलम ही अपने असीम इल्म के आधार पर पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के जानशीन (इमाम) का चुनाव कर सकता है। अतः इमाम की विशेषताओं में सब से बड़ी व मुख्य विशेषता उसका ख़ुदा वन्दे आलम की तरफ़ से मन्सूब नियुक्त) होना है।

प्रियः पाठको इमाम की इन विशेषताओं के महत्व को ध्यान में रखते हुए हम यहाँ पर इन में से हर विशेषता के बारे में संक्षेप में लिख रहे

हैं।

इमाम का इल्म

इमाम , जिस पर लोगों की हिदायत और रहबरी की ज़िम्मेदारी होती है , उसके लिए ज़रुरी है कि दीन के तमाम पहलुओं को पहचानता हो और उसके क़ानूनों से पूर्ण रूप से परिचित हो। कुरआने करीम की तफ़्सीर को जानता हो और पैग़म्बरे इस्लाम (स.) की सुन्नत को भी पूरी तरह से जानता हो ताकि अल्लाह को पहचनवाने वाली चीज़ों और दीन की शिक्षाओं को भली भाँती स्पष्ट रूप से बयान करे और जनता के विभिन्न सवालों के जवाब दे तथा उनका बेहतरीन तरीके से मार्गदर्शन करे। स्पष्ट है कि ऐसी ही इल्म रखने वाले इंसान पर लोगों को विश्वास हो सकता है , और ऐसा इल्म सिर्फ़ ख़ुदा वन्दे आलम के असीम इल्म से संमपर्क रहने की सूरत में ही मुम्किन है। इसी वजह से शिया इस बात पर यक़ीन रखते हैं कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के जानशीन (इमाम) का इल्म ख़ुदा के असीम इल्म से संबंधित होता है।

हज़रत इमाम अली (अ.स.) सच्चे इमाम की निशानियों के बारे में फरमाते हैं।

“ इमाम , अल्लाह के द्वारा हलाल व हराम किये गये कामों , विभिन्न आदेशों , अल्लाह के अम्र व नही और लोगों की ज़रुरतों का सब से ज़्यादा जानने वाला होता है। ”

इमाम की इस्मत

इमाम की महत्वपूर्ण विशेषताओं और इमामत की आधारभूत शर्तों में से एक शर्त इस्मत है। (इस्मत यानी इमाम का मासूम होना) इस्मत एक ऐसा मल्का है जो हक़ीक़त के इल्म और मज़बूत इरादे से वजूद में आता है। चूँकि इमाम में ये दोनों चीज़ें पाई जाती हैं इस लिए वह हर गुनाह और खता से दूर रहता है। इमाम भी दीन की शिक्षाओं को जानने , उन्हें बयान करने , उन पर अमल करने और इस्लामी समाज की अच्छाईयों और बुराईयों की पहचान के बारे में ख़ता व ग़लती से महफूज़ रहता है।

इमाम की इस्मत के लिए कुरआन , सुन्नत और अक्ल से बहुत सी दलीलें पेश की गई हैं। उन में से कुछ महत्वपूर्ण दलीलें निम्न लिखित हैं हैं।

1. दीन और दीनदारी की हिफाज़त इमाम की इस्मत पर आधारित है। क्यों कि इमाम पर लोगों को दीन की तरफ़ हिदायत करने और दीन को तहरीफ़ (परिवर्तन) से बचाये रखने की ज़िम्मेदारी होती है। इमाम का कलाम (प्रवचन) , उनका व्यवहार और उनके द्वारा अन्य लोगों के कामों का समर्थन या खंडन करना समाज के लिए प्रभावी होता हैं। अतः इमाम दीन को समझने और उस पर अमल करने (क्रियान्वित होने) में हर ख़ता व ग़लती से सुरक्षित होना चाहिए ताकि अपने मानने वालों को सही तरीके से हिदायत कर सके।

2. समाज को इमाम की ज़रुरत की एक दलील यह भी है कि जनता दीन , दीन के अहकाम और शरियत के क़ानूनों को समझने में खता व गलती से ख़ाली नहीं हैं। अतः अगर उनका रहबर , इमाम या हादी भी उन्हीँ की तरह हो तो फिर उस इमाम पर किस तरह से भरोसा किया जा सकता है ? दूसरे शब्दों में इस तरह कहा जा सकता है कि अगर इमाम मासूम न हो तो जनता उसका अनुसरन करने और उसके हुक्म पर चलने में शक व संकोच करेगी।

इमाम की इस्मत पर कुरआने करीम की आयतें भी दलालत करती हैं जिन में सूरह ए बकरा की 124 वीं आयत है , इस आयते शरीफ़ा में बयान हुआ है कि जब ख़ुदा वन्दे आलम ने जनाबे इब्राहीम (अ.स.) को नबूवत के बाद इमामत का बलन्द (उच्च) दर्जा दिया तो उस मौक़े पर हज़रत इब्राहीम (अ.स.) ने ख़ुदा वन्दे आलम की बारगाह में दुआ की कि इस ओहदे को मेरी नस्ल में भी बाक़ी रखना , जनाबे इब्राहीम (अ.स.) की इस दुआ पर ख़ुदा वन्दे आलम ने फरमायाः

यह मेरा ओहदा (इमामत) ज़ालिमों और सितमगरों तक नहीं पहुच सकता , यानी इमामत का यह ओहदा हज़रत इब्राहीम (अ.स.) की नस्ल में उन लोगों तक पहुंचेगा जो ज़ालिम नही होंगे।

हालांकि कुरआने करीम ने ख़ुदा वन्दे आलम के साथ शिर्क को अज़ीम ज़ुल्म क़रार दिया है और अल्लाह के हुक्म के विपरीत काम करने को अपने नफ़्स (आत्मा) पर ज़ुल्म माना है और यह गुनाह है। यानी जिस इंसान ने अपनी ज़िन्दगी के किसी भी हिस्से में कोई गुनाह किया है , वह ज़ालिम है अतः वह किसी भी हालत में इमामत के ओहदे के योग्य नहीं हो सकता है।

दूसरे शब्दो में यह कह सकते हैं कि इस बात में कोई शक नहीं है कि जनाबे इब्राहीम (अ.स.) ने इमामत को अपनी नस्ल में से उन लोगों के लिए नहीं मांगा था , जिन की पूरी उम्र गुनाहों में गुज़रे या जो पहले नेक हों और बाद में बदकार हो जायें। अगर इस बात को आधार मान कर चलें तो सिर्फ दो किस्म के लोग बाक़ी रह जाते हैं।

1. वह लोग जो शुरु में गुनहगार थे , लेकिन बाद में तौबा कर के नेक हो गए।

2. वह लोग जिन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी में कोई गुनाह न किया हो।

3. ख़ुदा वन्दे आलम ने अपने कलाम में पहली किस्म को अलग कर दिया , यानी पहले गिरोह को (वह लोग जो शुरु में गुनहगार थे , लेकिन बाद में तौबा कर के नेक हो गए।) इमामत नहीं मिलेगी इस का नतीजा यह निकलता है कि इमामत का ओहदा सिर्फ़ दूसरे गिरोह से मख्सूस हैं , यानी उन लोगों से जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी में कोई गुनाह न किया हो।

इमाम , समाज को व्यवस्थित करने वाला होता है

चूँकि इंसान एक समाजिक प्राणी है और समाज इसके दिल व जान और व्यवहार को बहुत ज़्यादा प्रभावित करता है , अतः इंसान की सही तरबियत और अल्लाह की तरफ़ बढ़ने के लिए समाजिक रास्ता हमवार होना चाहिए और यह चीज़ इलाही और दीनी हुकूमत के द्वारा ही मुम्किन हो सकती है। अतः ज़रूरी है कि लोगों का इमाम व हादी ऐसा होना चाहिए जिसमें समाज को चलाने व उसे दिशा देने की योग्यता पाई जाती हो और वह कुरआन की शिक्षाओं और नबी की सुन्नत (कार्य शैली) का सहारा लेते हुए बेहतरीन तरीके से इस्लामी हुकूमत की बुनियाद डाल सके।

इमाम का अख़लाक बहुत अच्छा होता है

इमाम चूँकि पूरे इंसानी समाज का हादी (मार्गदर्शक) होता है अतः उसके लिए ज़रूरी है कि वह तमाम बुराईयों से पाक हो और उसके अन्दर बेहतरीन अख़लाक पाया जाता हो , क्यों कि वह अपने मानने वालों के लिए इंसाने कामिल का बेहतरीन नमूना माना जाता है।

हज़रत इमामे रिज़ा (अ.स.) फरमाते हैं कि :

इमाम की कुछ निशानियां होती हैं , जैसे , वह सब से बड़ा आलिम , सब से ज़्यादा नेक , सब से ज़्यादा हलीम (बर्दाश्त करने वाला) , सब से ज़्यादा बहादुर , सब से ज़्यादा सखी (दानी) और सब से ज़्यादा इबादत करने वाला होता है।

इसके अलावा चूँकि इमाम , पैग़म्बरे इस्लाम (स.) का जानशीन (उत्तराधिकारी) होता है , और वह हर वक़्त इंसानों की तालीम व तरबियत की कोशिश करता रहता है अतः उसके लिए ज़रूरी है कि वह अख़लाक़ के मैदान में दूसरों से ज़्यादा से सुसज्जित हो।

हज़रत इमाम अली (अ.स.) फरमाते हैं कि :

जो इंसान (अल्लाह के हुक्मे) ख़ुद को लोगों का इमाम बना ले उसके लिए ज़रुरी है कि दूसरों को तालीम देने से पहले ख़ुद अपनी तालीम के लिए कोशिश करे , और ज़बान के द्वारा लोगों की तरबियत करने से पहले , अपने व्यवहार व किरदार से दूसरों की तरबियत करे।

इमाम ख़ुदा की तरफ़ से मंसूब (नियुक्त) होता है

शिया मतानुसार पैग़म्बर (स.) का जानशीन (इमाम) सिर्फ अल्लाह के हुक्म से चुना जाता है और वही इमाम को मंसूब (नियुक्त) करता है। जब अल्लाह किसी को इमाम बना देता है तो पैग़म्बर (स.) उसे इमाम के रूप में पहचनवाते हैं। अतः इस मसले में किसी भी इंसान या गिरोह को हस्तक्षेप का हक़ नहीं है।

इमाम के अल्लाह की तरफ़ से मंसूब होने पर बहुत सी दलीलें है , उनमें से कुछ निमन लिखित हैं।

1. कुरआने करीम के अनुसार ख़ुदा वन्दे आलम तमाम चीज़ों पर हाकिमे मुतलक़ (जो समस्त चीज़ों को हुक्म देता है या जिसका हुक्म हर चीज़ पर लागू होता है , उसे हाकिमे मुतलक़ कहते हैं।) है और उसकी इताअत (अज्ञा पालन) सब के लिए ज़रुरी है। ज़ाहिर है कि यह हाकमियत ख़ुदा वन्दे आलम की तरफ़ से (इसकी योग्यता रखने वाले) किसी भी इंसान को दी जा सकती है। अतः जिस तरह नबी और पैग़म्बर (अ.स.) ख़ुदा की तरफ़ से नियुक्त होते हैं , उसी तरह इमाम को भी ख़ुदा नियुक्त करता है और इमाम लोगों पर विलायत रखता है यानी उसे समस्त लोगों पर पूर्ण अधिकार होता है।

2. इस से पहले (ऊपर) इमाम के लिए कुछ खास विशेषताएं लिखी गई हैं जैसे इस्मत , इल्म आदि.... , और यह बात स्पष्ट है कि इन ऐसी विशेषताएं रखने वाले इंसान की पहचान सिर्फ़ ख़ुदा वन्दे आलम ही करा सकता है , क्यों कि वही इंसान के ज़ाहिर व बातिन (प्रत्यक्ष व परोक्ष) से आगाह है , जैसा कि ख़ुदा वन्दे आलम कुरआने मजीद में जनाबे इब्राहीम (अ.स.) को संबोधित करते हुए फरमाता हैः

हम ने , तुम को लोगों का इमाम बनाया।

सबसे अच्छी बात

अपनी बात के इस आखरी हिस्से में हम उचित समझते हैं कि आठवें इमाम हज़रत अली रिज़ा (अ.स.) की वह हदीस बयान करें जिसमें इमाम (अ.स.) इमाम की विशेषताओं का वर्णन किया है।

इमाम (अ.स.) ने कहा कि : जिन्होंने इमामत के बारे में मत भेद किया और यह समझ बैठे कि इमामत एक चुनाव पर आधारित मसला है , उन्होंने अपनी अज्ञानता का सबूत दिया।....... क्या जनता जानती है कि उम्मत के बीच इमामत की क्या गरीमा है , जो वह मिल बैठ कर इमाम का चुनाव कर ले।

इसमें कोई शक नही है कि इमामत का ओहदा बहुत बुलन्द , उच्च व महत्वपूर्ण है और उस की गहराई इतनी ज़्यादा है कि लोगों की अक्ल उस तक नहीं पहुँच पाती है या वह अपनी राय के द्वारा उस तक नहीं पहुँच सकते हैं।

बेशक इमामत वह ओहदा है कि ख़ुदा वन्दे आलम ने जनाबे इब्राहीम (अ.स.) को नबूवत व खिल्लत देने के बाद तीसरे दर्जे पर इमामत दी है। इमामत अल्लाह व रसूल (स.) की ख़िलाफ़त और हज़रत अमीरुल मोमेनीन अली (अ.स.) व हज़रत इमाम हसन व हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) की मीरास है।

सच्चाई तो यह है कि इमामत , दीन की बाग ड़ोर , मुसलमानों के कामों की व्यवस्था की बुनियाद , मोमिनीन की इज़्ज़त , दुनिया की खैरो भलाई का ज़रिया है और नमाज़ , रोज़ा , हज , जिहाद , के कामिल होने का साधन है। , इमाम के ज़रिये ही (उस की विलायत को क़बूल करने की हालत में) सरहदों की हिफ़ाज़त होती है।

इमाम अल्लाह की तरफ़ से हलाल कामों को हलाल और उसकी तरफ़ से हराम किये गये कामों को हराम करता है। वह ख़ुदा वन्दे आलम के हक़ीक़ी हुक्म के अनुसार हुक्म करता है) हुदूदे उलाही को क़ायम करता है , ख़ुदा के दीन की हिमायत करता है , और हिकमत व अच्छे वाज़ व नसीहत के ज़रिये , बेहतरीन दलीलों के साथ लोगों को ख़ुदा की तरफ़ बुलाता है।

इमाम सूरज की तरह उदय होता है और उस की रौशनी पूरी दुनिया को प्रकाशित कर देती है , और वह ख़ुद उफ़क़ (अक्षय) में इस तरह से रहता है कि उस तक हाथ और आँखें नहीं पहुँच पाते। इमाम चमकता हुआ चाँद , रौशन चिराग , चमकने वाला नूर , अंधेरों , शहरो व जंगलों और दरियाओं के रास्तों में रहनुमाई (मार्गदर्शन) करने वाला सितारा है , और लड़ाई झगड़ों व जिहालत से छुटकारा दिलाने वाला है।

इमाम हमदर्द दोस्त , मेहरबान बाप , सच्चा भाई , अपने छोटे बच्चों से प्यार करने वाली माँ जैसा और बड़ी - बड़ी मुसीबतों में लोगों के लिए पनाह गाह होता है। इमाम गुनाहों और बुराईयों से पाक करने वाला होता है। वह मख़सूस बुर्दबारी और हिल्म (धैर्य) की निशानी रखता है। इमाम अपने ज़माने का तन्हा इंसान होता है और ऐसा इंसान होता है , जिसकी अज़मत व उच्चता के न कोई क़रीब जा सकता है और न कोई आलिम उस की बराबरी कर सकता है , न कोई उस की जगह ले सकता है और न ही कोई उस जैसा दूसरा मिल सकता है।

अतः इमाम की पहचान कौन कर सकता है ? या कौन इमाम का चुनाव कर सकता ? यहाँ पर अक़्ल हैरान रह जाती है , आँखें बे नूर , बड़े छोटे और बुद्दीजीवी दाँतों तले ऊँगलियाँ दबाते हैं , खुतबा (वक्ता) लाचार हो जाते हैं और उन में इमाम का क्षेष्ठ कामों की तारीफ़ करने की ताक़त नहीं रहती और वह सभी अपनी लाचारी का इक़रार करते हैं।

दूसरा अध्याय

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की शनाख़्त

पहला हिस्सा

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की ज़िन्दगी पर एक नज़र

शियों के आखरी इमाम और रसूले इस्लाम (स.) के बारहवें जानशीन 15 शाबान सन् 255 हिजरी क़मरी व सन् 868 ई. में जुमे के दिन सुबह के वक़्त इराक के शहर (सामर्रा) में पैदा हुए।

उन के पिता शियों के ग्यारहवें इमाम हज़रत हसन अस्करी (अ.स.) और उन की माता जनाबे नर्जिस ख़ातून थीं। उनकी माता की क़ौम के बारे में रिवायतों में मत भेद पाया जाता हैं। एक रिवायत के अनुसार जनाबे नर्जिस खातून , रोम के बादशाह यशूअ की बेटी थीं और उन की माँ , हज़रत ईसा (अ.स.) के वसी जनाबे शमऊन की नस्ल से थीं। एक रिवायत के अनुसार जनाबे नर्जिस खातून एक ख्वाब के नतीजे में मुसलमान हुईं और इमाम हसन अस्करी (अ.स.) की हिदायत (मार्गदर्शन) की वजह से मुसलमानों से जंग करने वाली रोम की फ़ौज के साथ रहीं और जब उस जंग में मुसलमानों को सफलता मिली तो वह भी अन्य बहुत से लोगों के साथ इस्लामी फ़ौज के द्वारा क़ैदी बना ली गईं। हज़रत इमाम अली नकी (अ.स.) ने एक इंसान को वहाँ भेजा ताकि वह उन्हें खरीद कर सामर्रा ले आये।

इस बारे में अन्य रिवायतें भी मिलती हैं लेकिन महत्वपूर्ण और ध्यान देने योग्य बात यह है कि हज़रत नर्जिस खातून एक मुद्दत तक हक़ीमा खातून (इमाम अली नक़ी (अ.स.) की बहन) के घर में रहीं और उन्होंने ही जनाबे नर्जिस ख़ातून की तरबियत की , जिस की वजह से जनाबे हकीमा खातून उन का बहुत ज़्यादा एहतिराम किया करती थीं।

जनाबे नर्जिस खातून (अ.स.) वह बीबी हैं जिनकी पैग़म्बरे इस्लाम (स.) हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) और हज़रत इमाम सादिक़ (अ.स.) ने बहुत ज़्यादा तारीफ़ की है और उन को क़नीज़ों में बेहतरीन क़नीज़ और क़नीज़ों की सरदार कहा है।

यह बात बताना भी ज़रूरी है कि हज़रत इमामे ज़माना (अज्जल अल्लाहु तआला फरजहु शरीफ़) की आदरनीय माता को दूसरे नामों से भी पुकारा जाता था , जैसे- सोसन , रिहाना , मलीका , और सैक़ल व सक़ील।

इमामे ज़माना का नाम कुन्नियत और अलक़ाब

हज़रत इमामे ज़माना (अज्जल अल्लाहु तआला फरजहु शरीफ़) का नाम और क़ुन्नियत पैग़म्बरे इस्लाम (स.) का नाम और कुन्नियत है। कुछ रिवायतों में उनके ज़हूर तक उनका नाम लेने से मना किया गया है।

उन के मशहूर अल्काब इस तरह हैं , महदी , क़ाइम , मुन्तज़िर , बक़ीयतुल्लाह , हुज्जत , ख़लफे सालेह , मंसूर , साहिबुल अम्र , साहिबुज़्ज़मान , और वली अस्र , इन में महदी लक़ब सब से ज़्यादा मशहूर है।

इमाम (अ.स.) का हर लक़ब उनके बारे में एक मख़सूस पैग़ाम रखता है।

खूबियों के इमाम को (महदी) कहा गया है , क्यों कि वह ऐसे हिदायत याफ्ता हैं जो लोगों को हक़ की तरफ़ बुलायें गे और उन को क़ाइम इस लिए कहा गया है क्यों कि वह हक़ के लिए क़ियाम करेंगे और उन को मुन्तज़िर इस लिए कहा गया है क्यों कि सभी उन के आने का इन्तेज़ार कर रहे हैं। उन्हें ब़कीयतुल्लाह लक़ब इस वजह से दिया गया है क्यों कि वह ख़ुदा की हुज्जतों में से बाक़ी हुज्जत हैं और वही अल्लाह का आख़िरी ज़ख़ीर हैं।

(हुज्जत) का अर्थ मखलूक पर ख़ुदा के गवाह , और ख़लफ़े सालेह का अर्थ अल्लाह के नेक जानशीन है। उनको मंसूर इस वजह से कहा गया है कि ख़ुदा की तरफ़ से उनकी मदद होगी। वह साहबे अम्र इस वजह से कहलाये जाते हैं कि अदले इलाही की हुकूमत क़ायम करना उन्हीं की ज़िम्मेदारी है। साहिबुज़्ज़मान और वली अस्र भी इसी अर्थ में हैं कि वह अपने ज़माने के तन्हा हाकिम होंगे।

जन्म की स्थिति

बहुत सी रिवायतों में पैग़म्बरे इस्लाम (स.) से नक्ल हुआ है कि मेरी नस्ल से महदी नाम का इंसान क़याम करेगा , जो ज़ुल्मो सितम की बुनियादों को खोखला कर देगा।

बनी अब्बास के ज़ालिम व सितमगर बादशाहों ने इन रिवायत को सुन कर यह तय कर लिया था कि इमाम महदी (अ.स.) को जन्म के समय ही क़त्ल कर दिया जाये। इसी वजह से इमाम मुहम्मद तक़ी (अ.स.) के ज़माने से ही अइम्मा ए मासूमीन (अ.स.) पर बहुत ज़्यादा सख्तियाँ की गईं और इमाम हसन अस्करी (अ.स.) के ज़माने में यह सख्तियां अपनी आख़िरी हद तक पहुँच गईं। हालत यह थी कि अगर कोई हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) के घर पर जाता था तो उसका आना जाना उस वक़्त की हुकूमत की नज़रों से छुपा नहीं था। ज़ाहिर है कि ऐसे माहौल में अल्लाह की आखरी हुज्जत का जन्म गोपनीय तरीके से होना चाहिए था। इसी दलील की वजह से इमाम के जन्म को इतना छुपा कर रखा गया कि हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) के नज़दीकी साथी भी हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के जन्म से बे खबर थे। हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के जन्म से कुछ घण्टे पहले तक भी उनकी माँ जनाबे नर्जिस खातून के जिस्म में किसी बच्चे को जन्म देने की निशानियाँ नही पाई जाती थीं।

जनाबे हकीमा खातून जो कि हज़रत इमाम मुहम्मद तकी (अ.स.) की बेटी हैं , हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के जन्म के बारे में इस तरह विवरण देती हैं।

हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) ने मुझे बुलाया और कहा : ऐ फुफी जान आज आप हमारे यहाँ इफ़्तार करना , क्यों कि आज पन्द्रहवीं शाबान की रात है और ख़ुदा वन्दे आलम इस रात में अपनी आख़री हुज्जत को ज़मीन पर ज़ाहिर करने वाला है। मैं ने सवाल किया उसकी माँ कौन है ? इमाम (अ.स.) ने जवाब दिया कि नर्जिस खातून। मैं ने कहा कि मैं आप पर कुर्बान , उन में तो हम्ल (गर्भ) की कोई भी निशानी नही दिखाई दे रही हैं। इमाम (अ.स.) ने फरमाया : बात वही है जो मैं ने कही है। इस के बाद मैं नर्जिस ख़ातून के पास गई और सलाम कर के उन के पास बैठ गई। वह मेरी जूतियाँ उतारने के लिए मेरे पास आईं और मुझ से कहा कि ऐ मेरी मलका , आपका क्या हाल है ? मैं ने कहा कि नहीं आप ही मेरी और मेरे खानदान की मलीका हैं। उन्हों ने मेरी बात को नही माना और कहा फुफी जान आप क्या फरमाती हैं ? मैं ने कहा , आज की रात ख़ुदा वन्दे आलम तुम को एक बेटा ऐसा बेटा देगा जो दुनिया और आखिरत का सरदार होगा। वह यह सुन कर शर्मा गईं।

हक़ीमा खातून कहती हैं कि मैं ने इशा की नमाज़ के बाद इफ़्तार किया और उस के बाद आराम के लिए अपने बिस्तर पर लेट गई। आधी रात बीतने के बाद मैं नमाज़े शब पढ़ने के लिए उठी और नमाज़ पढ़ कर नर्जिस की तरफ़ देखा तो वह उस वक़्त तक आराम से ऐसे सोई हुई थीं , जैसे उनके सामने कोई मुश्किल न हो। मैं नमाज़ की ताक़िबात (नमाज़ के बाद पढ़ी जाने वाली दुआओं को ताक़ीबात कहते हैं) के बाद फिर पलटी और नर्जिस खातून की तरफ़ देखा तो वह उसी तरह सोई हुई थीं। थोड़ी देर के बाद वह नींद से जागी और नमाज़े शब पढ़ कर दो बारा सो गईं।

हकीमा खातून का कहना है कि मैं सहन में आई ताकि देखूं कि सुब्हे सादिक (सुब्ह की नमाज़ के वक़्त को सुब्हे सादिक़ कहते हैं) हुई या नहीं , मैं ने देखा कि अभी सुब्हे काज़िब (रात का वह आख़िरी हिस्सा जिस में ऐसा लगता है कि सुब्ह हो गई है , लेकिन वास्तव में रात ही होती है उसे सुब्हे काज़िब कहते हैं) है। मैं जब यह देखने के बाद अन्दर आयी तो उस वक़्त तक भी नर्जिस खातून सोई हुई थीं। मुझे शक होने लगा ! अचानक हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) ने अपने बिस्तर से आवाज़ दी : ऐ फुफी जान जल्दी न करें बच्चे के जन्म का समय नज़दीक है। मैं ने सूरः ए सजदा और सूरः ए यासीन की तिलावत शुरु कर दी। तभी जनाबे नर्जिस परेशानी की हालत में नींद से जागीं , मैं जल्दी से उन के पास गई और कहा , ”اسم اللہ علیک “ (तुम से बला दूर हो) क्या तुम्हें किसी चीज़ का एहसास हो रहा है ? उन्होंने कहा कि हाँ फुफी जान , मैं ने कहा कि अपने ऊपर कन्ट्रोल रखो , और अपने दिल को मज़बूत कर लो , यह वही वक़्त है जिस के बारे में मैं आपको पहले बता चुकी हूँ। इस मौके पर मुझे और नर्जिस खातून को कमज़ोरी का एहसास हुआ। इस के बाद मेरे सैय्यद व सरदार बच्चे की आवाज़ सुनाई दी। मैं ने उनके ऊपर से चादर हटाई तो उन को सजदे की हालत में देखा , मैं आगे बढ़ी और बच्चे को गोद में ले लिया। मैंने देखा कि बच्चा पूरी तरह से पाक व पाक़ीज़ा है।

उस मौक़े पर हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) ने मुझ से फरमाया : ऐ फुफी जान मेरे बेटे को मेरे पास ले आइये। मैं उस को उनके पास ले गई , उन्होंने अपनी गोद में ले कर फरमायाः ऐ मेरे बेटे कुछ बोलो ! यह सुन कर वह बच्चा बोलने लगा और कहा कि اشھد ان لا الہ الا الله وحدہ لا شریک لہ و اشھد انّ محمداً رسول الله “ , इस के बाद अमीरुल मोमिनीन और अन्य मासूम इमामों (अ.स.) पर दुरुद भेजा और अपने पिता का नाम लेने पर रुक गये। इमामे हसन अस्करी (अ.स.) ने फरमायाः फुफी जान! इस बच्चे को इस की माँ के पास ले जाओ , ताकि यह उन्हें सलाम करे।

हकीमा खातून कहती हैं , कि दूसरे दिन जब में इमाम हसन अस्करी (अ.स.) के यहाँ गई तो मैं ने इमाम (अ.स.) को सलाम किया , मैं ने अपने मौला व आक़ा (इमाम महदी) को देखने के लिए पर्दा उठाया , लेकिन वह दिखाई न दिये , अतः मैं ने उन के हज़रत इमाम हसन अस्करी से सवाल किया : मैं आप पर कुर्बान , क्या मेरे मौला व आक़ा के लिए कोई इत्तिफाक़ पेश आ गया है ? इमाम (अ.स.) ने फरमायाः ऐ फुफी जान मैं ने उस को उस ख़ुदा के सुपुर्द कर दिया है जिस को जनाबे मूसा की माँ ने जनाबे मूसा को सिपुर्द किया था।

हकीमा खातून कहती हैं , जब सातवां दिन आया मैं फिर इमाम (अ.स.) के यहाँ गई और सलाम करके बैठ गई। इमाम (अ.स.) ने फरमायाः मेरे बेटे को मेरे पास लाओ , मैं अपने मौला व आक़ा को उन के पास ले गई , इमाम (अ.स.) ने फरमाया : ऐ मेरे बेटे कुछ बात करो , बच्चे ने ज़बान खोली और ख़ुदा वन्दे आलम की वहदानियत (एकेश्वरवाद) की गवाही देने और पैग़म्बरे इस्लाम (स.) व अपने बाप दादाओं पर दुरुद व सलाम भेजने के बाद इन आयतों की तिलावत फरमाई।

और हम ये जानते हैं कि जिन लोगों को ज़मीन में कमज़ोर कर दिया गया है उन पर एहसान करें और उन्हें लोगों का इमाम और ज़मीन का वारीस बनायें और उन्हीं को ज़मीन पर हुकूमत दें और फिरौन व हामान और उनकी फ़ौजों को उन्हीँ कमज़ोरों के हाथों वह मंज़र दिखलायें जिस से ये डर रहे हैं।

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की विशेषताएं

पैग़म्बरे इस्लाम (स.) और अहलेबैत (अ.स.) की रिवायतों में इमाम महदी (अ.स.) की शक्ल व सूरत और विशेषताओं का जो उल्लेख मिलता है , यहाँ पर उन में से कुछ की तरफ़ इशारा किया जा रहा है।

इमाम के चेहरे का रंग गेहूँआ , ऊँचा व चमकता हुआ माथ , भंवैं गोल और आँखें बड़ी बड़ी , नाक लम्बी और खूबसूरत , दाँत चौड़े और चमकदार , दाहिने गाल पर एक काले तिल का निशान , काँधे पर नबूवत जैसी एक निशानी , जिस्म मज़बूत और दिलरुबा है।

आपकी जो निशानियाँ व विशेषताएं मासूम इमामों (अ.स.) की हदीसों में बयान हुई हैं उन में से कुछ इस तरह हैं।

(हज़रत महदी अ. स.) बहुत इबादत करने वाले हैं और वह रात भर जाग कर इबादत करते हैं। वह ज़ाहिद और सादी ज़िन्दगी बसर करने वाले हैं। वह सब्र और बर्दाश्त करने वाले हैं। वह न्याय से काम करने वाले और नेक किरदार के मालिक हैं। वह इल्म के लिहाज़ से सब लोगों से उत्तम हैं और उनका मुबारक वजूद बरकत और पाकिज़गी का समुन्द्र है। वह जुल्म के ख़िलाफ़ उठ खड़े होंगे और जंग करेंगे। वह पूरी दुनिया के लोगों का नेतृत्व करेंगे और दुनिया में बहुत बड़ा इन्केलाब (परिवर्तन) लायेंगे। वह लोगों को निजात (मुक्ति) दिलाने वाले आख़िरी हादी होंगे और इंसानियत का सुधार करने वाले होंगे। वह पैग़म्बरे इस्लाम (स.) की नस्ल से , हज़रत फ़ातिमा (स.अ.) की औलाद हैं और हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) के नवें बेटे हैं। वह अपने ज़हूर के वक़्त खान- ए- काबा की दीवार के सहारे खड़े होंगे और पैग़म्बरे इस्लाम (स.) का परचम अपने हाथ में लिए होंगे। वह अपने क़ियाम से अल्लाह के दीन को ज़िन्दा करेंगे और अल्लाह के अहकाम (आदेशों) को पूरी दुनिया में लागू करेंगे। वह अपने ज़हूर के बाद दुनिया को अदल व इंसाफ (न्याय) और मुहब्बत से भर देंगे , जैसा कि वह उनके आने से पहले ज़ुल्म व अत्याचार से भरी होगी।

इमाम महदी (अज्जल अल्लाहु तआला फरजहु शरीफ़) की ज़िन्दगी तीन हिस्सों में बटी हुई है-

1. मख़फ़ी ज़माना — जन्म के वक़्त से हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) की शहादत तक आपकी ज़िन्दगी लोगों से मख़फ़ी (गुप्त) रही।

2. ग़ैबत का ज़माना- हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) की शहादत के बाद से इमाम (अ.स.) की ग़ैबत का सिलसिला शुरु हुआ और जब तक ख़ुदा वन्दे आलम चाहेगा ये सिलसिला जारी रहेगा।

3. ज़हूर का ज़माना- ग़ैबत का वक़्त पूरा होने के बाद इमामे ज़माना (अ.स.) अल्लाह के हुक्म से ज़हूर फरमायेंगे और दुनिया को अदल व इन्साफ़ और नेकियों से भर देंगे। उनके ज़हूर का वक़्त कोई भी नहीं जानता और इमामे ज़माना (अ.स.) से रिवायत है कि जो लोग हमारे ज़हूर के लिए कोई ख़ास वक़्त निश्चित करें वह झूठे हैं।


दूसरा हिस्सा

जन्म के समय से हज़रत इमाम अस्करी (अ.स.) की शहादत तक

हज़रत इमाम महदी (अज्जल अल्लाहु तआला फरजहु शरीफ) की ज़न्दगी का यह ज़माना बहुत से महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर आधारित है जिन में से कुछ की तरफ यहाँ पर इशारा किया जाता है।

इमाम महदी (अ.स.) से शिओं का परिचय

चूँकि हज़रत इमाम महदी (अज्जल अल्लाहु तआला फरजहु शरीफ) का जन्म बहुत ही गुप्त रूप से हुआ था , इस वजह से यह डर था कि शिया आखरी इमाम की पहचान में ग़लत फ़हमी या भटकाव का शिकार हो सकतें हैं। इस लिए हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) की यह ज़िम्मेदारी थी कि वह बुज़ुर्ग और भरोसेमंद शिया लोगों को अपने बेटे के जन्म के बारे में बतायें और उनकी पहचान करायें ताकि वह इमाम महदी (अज्जल अल्लाहु तआला फरजहु शरीफ) के जन्म की खबर को अहलेबैत (अ.स.) के शियों तक पहुँचा दें। इस सूरत में इमाम की शिनाख्त और पहचान भी हो जायेगी और उनके सामने कोई खतरा भी नहीं आयेगा।

हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) के एक खास शिया , अहमद इब्ने इस्हाक़ कहते हैं कि :

मैं एक बार हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) के पास गया। मैं उन से यह सवाल पूछना चाहता था कि आपके बाद इमाम कौन होगा ? लेकिन मेरे कहने से पहले ही इमाम (अ.स.) ने फरमाया : ऐ अहमद ! बेशक ख़ुदा वन्दे आलम ने जिस वक़्त से हज़रत आदम (अ.स.) को पैदा किया उस वक़्त से आज तक ज़मीन को कभी भी अपनी हुज्जत से खाली नहीं रखा और यह सिलसिला कयामत तक जारी रहेगा। अल्लाह अपनी हुज्जत के ज़रिये ज़मीन से बलाओं को दूर करता है और उसी के वजूद की बरकत से)रहमत की बारिश करता रहता है।

मैं ने अर्ज़ किया ऐ अल्लाह के रसूल के बेटे आपके बाद आपका जानशीन व इमाम कौन है ?

हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) फौरन अपने घर के अन्दर तशरीफ़ ले गए और एक तीन साल के बच्चे को अपनी गोद में ले कर वापस आये। उस बच्चे की सूरत चौदहवीं रात के चाँद की तरह चमक रही थी। इमाम (अ.स.) ने फरमाया : ऐ अहमद बिन इस्हाक़ ! अगर तुम ख़ुदा वन्दे आलम और उसकी हुज्जतों के नज़दीक़ मोहतरम व आदरनीय न होते तो मैं अपको अपने इस बेटे को कभी न दिखाता। बेशक इस का नाम और कुन्नियत , पैग़म्बरे इस्लाम (स.) का नाम और कुन्नियत है और यह वही है जो ज़मीन को अदल व इन्साफ़ से भर देगा जिस तरह वह इस से पहले ज़ुल्म व सितम से भरी होगी।

मैं ने अर्ज़ किया : ऐ मेरे मौला व आक़ा क्या कोई ऐसी निशानी है जिस से मेरे दिल को सकून हो जाये ?

इस मौक़े पर उस बच्चे ने अपनी ज़बान को खोला और बेहतरीन अरबी में इस तरह बात की:

” اٴنَا بَقِیَّةُ اللهِ فِی اٴرْضِہِ وَ المُنتَقِمُ مِنْ اٴعْدَائِہِ۔۔۔ “

मैं ज़मीन पर बक़ीयतुल्लाह हूँ और अल्लाह के दुश्मनों से बदला लेने वाला हूँ। ऐ अहमद इब्ने इस्हाक़ ! तुम ने अपनी आँखों से सब कुछ देख लिया है अतः अब किसी निशानी की ज़रुरत नहीं है।

अहमद इब्ने इस्हाक़ कहते हैं कि : मैं (यह बात सुनने के बाद) खुशी खुशी हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) के मकान से बाहर आ गया...

इसी तरह मोहम्द इब्ने उस्मान और कुछ बुज़ुर्ग शिया नक्ल करते हैं कि :

हम चालीस लोग मिल कर हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) की खिदमत में गये। हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) ने अपने बेटे की ज़ियारत कराई और फरमाया : मेरे बाद यही बच्चा , मेरा जानशीन और तुम्हारा इमाम होगा। तुम लोग इसकी इताअत (आज्ञा पालन) करना , और मेरे बाद अपने दीन में बिखर न जाना वर्ना हलाक़ हो जाओगे और (जान लो कि) आज के बाद तुम इन को नहीं देख पाओगे...।

यह बात भी महत्वपूर्ण है कि जन्म के बाद बच्चे का अक़ीका सुन्नत है और इसकी बहुत ताकीद भी की गई है। दीन के इस हुक्म के बारे में कहा गया है कि भेड़ बकरी ज़िब्ह कर के कुछ मोमेनीन को खाना खिलाये , इस की बरकत से बच्चे की उम्र लंबी होती है। अतः हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) ने अपने इस बेटे ( हज़रत इमाम महदी (अ. स).) के लिए अक़ीक़ा किया.. ताकि नबी (स.) की इस इबेहतरीन सुन्नत पर अमल करते हुए बहुत से शियों को बारहवें इमाम के जन्म से अवगत करायें।

मुहम्मद इब्ने इब्राहीम कहते हैं कि :

हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) ने अक़ीक़े में ज़िब्ह की गई भेड़ अपने एक शिया के पास भेजी और फरमाया : यह मेरे बेटे (मुहम्मद) के अक़ीक़े का गोश्त है....

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के मोजज़ें और करामतें

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की ज़िन्दगी का एक हिस्सा , उनके बचपन का ज़माना है जिस में उनके ज़रिये बहुत से मोजज़ें और करामतें देखने को मिलीं हैं , जब कि अल्लाह की इस आख़री हुज्जत की ज़िन्दगी का यह हिस्सा हमारी ग़फ़लत का शिकार हुआ है। हम यहाँ पर उनकी करामतों में से सिर्फ़ एक नमूना पेश कर रहे हैं।

इब्राहीम इब्ने अहमद निशा पूरी कहते हैं कि :

जिस वक़्त अम्र बिन औफ़ ने (वह एक ज़ालिम और सितमगर बादशाह था और उसे शियों को क़त्ल करने का बहुत ज़्यादा शौक़ था) मुझे क़त्ल करने का इरादा किया , उस वक़्त मैं बहुत ज़्यादा डरा हुआ था। मेरा पूरा जिस्म डर से काँप रहा था। मैं अपने दोस्तों और परिवार वालों से ख़ुदा हाफ़िज़ी कर के हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) के घर की तरफ़ रवाना हुआ ताकि उन से भी ख़ुदा हाफिज़ी कर लूँ। मेरा इरादा था कि हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) से मुलाक़ात के बाद कहीँ भाग जाऊँगा। जब मैं हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) के मकान पर पहुँचा तो हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) के पास एक बच्चे को देखा उसका चेहरा चौदहवीं रात के चाँद की तरह चमक रहा था। मैं उस का नूर देख कर हैरान रह गया , और क़रीब था कि अपने इरादे (क़त्ल के डर से भागने का इरादा) को भूल जाऊँ।

उस मौक़े पर उस बच्चे ने मुझ से कहा कि ऐ इब्राहीम भागने की ज़रूरत नही है। अल्लाह बहुत जल्दी तुम्हें उसके ज़ुल्म से बचा लेगा।

यह सुन कर मेरी हैरानी और बढ़ गई , मैं ने हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) से कहा : मैं आप पर कुर्बान ये बच्चा कौन है , जो मेरे इरादों से जानता है ? हज़रत इमाम अस्करी (अ.स.) ने फ़रमाया : ये मेरा बेटा है और मेरे बाद मेरा जानशीन है।

इब्राहीम कहते हैं कि : मैं हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) के मकान से इस हालत में बाहर निकला कि मुझे ख़ुदा के लुत्फ़ व करम की उम्मीदवार थी और मैं ने जो बारहवें इमाम (अ.स.) से सुना था उस पर यक़ीन रखता था। अतः कुछ दिनों के बाद ही मेरे चचा ने मुझे अम्र बिन औफ़ के क़त्ल होने की खुश खबरी दी...

सवालों के जवाब

आसमाने इमामत के आख़री रौशन सितारे हज़रत इमाम महदी (अ.स.) अपनी ज़िन्दगी के शुरू से शियों को उनके सवालों के सही , ठोस और संतुष्ट करने वाले जवाब देते थे। उनके जवाबों को सुन कर शियों के दिलों में सकून व इत्मिनान पैदा होता था। हम यहाँ पर ऐसे ही सवालों व जवाबों से संबंधित एक रिवायत नमूने को तौर पर लिख रहे हैं।

सअद इब्ने अब्दुल्लाह क़ुम्मी (यह शियों में एक बहुत बड़ी शख्सीयत थे।) , अहमद इब्ने इस्हाक़ क़ुम्मी (यह हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) के वकील थे।) के साथ कुछ सवालों के जवाब मालूम करने के लिए हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) के पास गये , वापस आकर उन्होंने इस मुलाक़ात का विवरण इस तरह बताया :

जब मैं ने सवाल करना चाहा तो हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) ने अपने बेटे की तरफ़ इशारा करते हुए फरमाया : मेरे इस बेटे से सवाल करो। यह सुन कर बच्चे ने मेरी तरफ़ मुँह करके फरमाया : तुम जो सवाल भी पूछना चाहते हो पूछ सकते हो। मैं ने सवाल किया कुरआन के हुरुफ़ मुकत्तेआत में से ”کھیعص “ का क्या मक़सद है ? इमाम (अ.स.) ने फरमाया : य u हुरुफ़ ग़ैब के मसाइल में से हैं। ख़ुदा वन्दे आलम ने अपने बन्दे और पैग़म्बर जनाब ज़करिया को उनके बारे में बताया और फिर उनके बाद पैग़म्बरे इस्लाम (स.) को दो बारा बताया।

वाक़िया यूं है कि हज़रत ज़करिया (अ.स.) ने ख़ुदा वन्दे आलम से दुआ की कि मुझे पंजतन (आले एबा) के नाम बता दे , ख़ुदा वन्दे आलम ने जनाबे जिब्रईल को नाज़िल किया और उन्होंने उनको पंजतन के नाम बताये। जैसे ही जनाबे ज़करीया ने इन मुकद्दस नामों हज़रत मुहम्मद (स.) हज़रत अली (अ.स.) , हज़रत फातिमा (स. अ.) और हज़रत हसन (अ.स.) को अपनी ज़बान से लिया तो उनकी मुशकिलें दूर हो गईं और जब उनकी ज़बान पर हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) का नाम आया तो उनका दिल भर आया और वह चकित हो कर रह गये। उन्होंने एक दिन अल्लाह की बारगाह में दुआ की कि ऐ अल्लाह ! जिस वक़्त मैं इन चार इंसानों के नामों को लेता हूँ तो मेरी परेशानियाँ और मुश्किलें दूर हो जाती हैं और दिल को सकून मिलता है , लेकिन जब मैं हुसैन (अ.स.) का नाम लेता हूँ तो मेरी आँखों से आँसू बहने लगते हैं और मेरे रोने की आवाज़ बुलन्द हो जाती है ! पालने वाले इस की क्या वजह है ? ख़ुदा वन्दे आलम ने उनको हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) का वाकिया सुनाया और फरमाया : ”کھیعص “ इसी वाकिये की तरफ़ इशारा है। इन हरफ़ों में ”کاف “ से मुराद वाकिया ए करबला , और ”ھا “ से उनके खानदान की हलाकत (शहादत) मुराद है और ”یا “ से यज़ीद के नाम की तरफ़ इशारा है , जो इमाम हुसैन (अ.स.) पर ज़ुल्मो सितम करने वाला है , और ”ع “ से इमाम हसन (अ.स.) की अतश और प्यास मुराद है , और ”صاد “ से हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) का सब्र व मुराद है।

मैं ने सवाल किया : मेरे मौला व आक़ा लोगों को अपने लिए ख़ुद इमाम बनाने से क्यों रोका गया है ?

इमाम (अ.स.) ने फरमाया : इमाम से तुम्हारा अभिप्रायः कौनसा इमाम है , बुराईयाँ फैलाने वाला इमाम या समाज को सुधारने वाला इमाम ? मैं ने कहा : समाज को सुधारने वाला इमाम , इमाम (अ.स.) ने फरमाया : क्योंकि कोई भी किसी दूसरे के दिल की बातें नहीं जानता हैं कि वह नेकी व भलाई के बारे में सोचता है या बुराई के बारे में , इस सूरत में क्या इस बात की शंका नहीं पाई जाती कि जनता जिसे अपना इमाम चुने वह बुराईयाँ फैलाने वाला हो। मैं ने कहा : जी हाँ इस बात की शंका तो पाई जाती है। मेरे इस जवाब को सुनकर इमाम (अ.स.) ने फरमाया : बस यही वजह है...

उल्लेखनीय है कि इस रिवायत के अन्त में इमामे ज़माना (अ.स.) ने दूसरे कारणो का भी वर्णन किया हैं और दूसरे सवालों के जवाब भी दिये हैं , हम ने संक्षेप की वजह से पूरी रिवायत का उल्लेख नहीं किया है।

तोहफ़ें क़बूल करना

शिया लोग मासूम इमामों (अ.स.) के लिए तोहफे और माली वाजेबात (ख़ुम्स) ले जाया करते थे और मासूम इमाम इन को क़बूल कर के ग़रीब और मुहताज लोगों में बाँट दिया करते थे।

इमाम हसन अस्करी (अ.स.) के वकील इब्ने इस्हाक़ कहते हैं कि :

मैं ने शियों की भेजी हुई कुछ रक़म हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) की सेवा में प्रस्तुत की , उस समय इमाम (अ.स.) का एक छोटा बच्चा जिस का चेहरा चौदहवीं रात के चाँद की तरह चमक रहा था , इमाम के पास मौजूद था। इमाम हसन अस्करी (अ.स.) ने उसकी तरफ़ मुँह कर के फरमाया : ऐ मेरे बेटे ! अपने शियों और दोस्तों के तोहफ़ों को खोलो , यह सुन कर उस बच्चे ने कहा : ऐ मेरे मौला व आक़ा , क्या यह बात उचित है कि मैं उन नापाक़ और तुच्छ तोहफ़ों की तरफ़ अपने पाक व पाक़ीज़ा हाथों को बढ़ाऊँ जो हलाल व हराम से मिले हुए हैं।

हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) ने फरमाया : ऐ इब्ने इस्हाक़ ! इन सब तोहफ़ों व उपहारों को बाहर निकालो ताकि इन में से हलाल व हराम को अलग अलग किया जाये। इमाम के हुक्म पर मैं ने एक थैली बाहर निकाली तो उस बच्चे ने कहा : यह थैली क़ुम से उस मुहल्ले और उस इंसान की है (जिस इंसान ने वह थैली भेजी थी इमाम ने उस इंसान और उसके मुहल्ले का नाम लिया) इस थैली में 62 दीनार हैं इस में से 45 दीनार एक बंजर ज़मीन को बेच कर के कमाये गये है , और उसके मालिक को वह ज़मीन मीरास में मिली थी और इस में 14 दीनार 9 जोड़ी कपड़ो को बेच करके कमाये गये हैं , और बाक़ी तीन दीनार दुकान के किराये के हैं।

हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) ने फरमाया : ऐ मेरे प्यारे बेटे आप ने सही फरमाया , अब इस मर्द की रहनुमाई (मार्गदर्शन) करो कि इस माल में कौन सा माल हराम है। यह सुन कर उस बच्चे ने भर पूर दिक्कत के साथ हराम सिक्कों को निश्चित किया और उनके हराम होने की वजह को स्पष्ट रूप में बताया।

मैं ने दूसरी थैली निकाली तो उस बच्चे ने उस के मालिक का नाम और पता बताने के बाद फरमाया : इस थैली में 50 दीनार हैं और उनको हाथ लगाना हमारे लिए जायज़ नहीं है। इस के बाद उस माल में से हर एक के हराम होने की वजह बताई।

उस मौके पर हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) ने फरमाया : ऐ मेरे बेटे आप ने सही फरमाया। फिर इमाम (अ.स.) ने अहमद इब्ने इस्हाक़ की तरफ़ चेहरा करके फरमाया : इन सब को इन के मालिकों को वापस कर दो , और उन से कहना कि वह इन्हें उन के मालिकों को वापस कर दें , हमें इस माल की कोई ज़रुरत नहीं है....

अपने पिता की नमाज़े मैय्यत पढ़ाना

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की ग़ैबत से पहले और मख्फ़ी (छुप कर) रहने के ज़माने का आखरी हिस्सा अपने पिता की नमाज़े जनाज़ा पढ़ाना है।

इस बारे में हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) के ग़ुलाम अबुल अदियान का कहना है कि :

हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) ने अपनी उम्र के आखरी दिनों में मुझे कुछ ख़त दिये और फरमाया : इन को मदाइन नामक शहर में पहुँचा दो , जब तुम इनको पहुँचा कर 15 दिन के बाद सामर्रा वापस पलटोगे तो मेरे घर से रोने पीटने की आवाज़ें सुनोगे और (मेरे बदन को) गुस्ल के तख्ते पर देखोगे। मैं ने इमाम अ. स. से पूछा ऐ मेरे मौला व आक़ा ! इस घटना के घटित होने के बाद आप का जानशीन और हमारा इमाम कौन होगा ? इमाम (अ.स.) ने फरमाया : जो भी तुम से इन ख़त के जवाब माँगेगा वही मेरे बाद तुम्हारा इमाम होगा। मैं ने कहा उसकी कोई दूसरी निशानी बताईये , हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) ने फरमाया : जो इंसान मेरी नमाज़े जनाज़ा पढ़ायेगा वही मेरे बाद तुम्हारा इमाम होगा। मैं ने कहा कुछ और निशानी बताईये , हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) ने फरमाया : जो इंसान यह बता दे कि इस थैली में क्या है , वही तुम्हारा इमाम होगा। उस वक़्त मुझ पर इमाम (अ.स.) का ऐसा रोब छाया कि मैं यह सवाल न कर सका कि इस थैली में क्या है।

मैं इमाम (अ.स.) के उन खतों को ले कर मदाइन गया और उनका जवाब ले कर वापस आया। इमाम (अ.स.) ने जो फरमाया था वह सच हुआ , जब मैं 15 दिन के बाद सामर्रा वापस पलटा तो देखा कि हज़रत इमाम अस्करी (अ.स.) के घर से रोने पीटने की आवाज़ें आ रही हैं और हज़रत इमाम अस्करी (अ.स.) के मुबारक बदन को गुस्ल के लिए तख़्ते पर लिटा रखा है। मैं ने देखा कि इमाम हसन अस्करी (अ.स.) के भाई जाफ़र दरवाज़े पर खड़े हैं और कुछ शिया उनको भाई की शहादत पर दिलासा दे रहे हैं और साथ ही साथ उन्हें इमामत की मुबारक बाद भी पेश कर रहे हैं। मैं ने अपने दिल में कहा कि अगर यह (जाफ़र) इमाम हो गए तो इमामत तबाह व बर्बाद हो जायेगी , क्यों कि मैं उसको पहचानता था व शराबी और जुवारी इंसान था। लेकिन चूँकि मैं निशानियों की तलाश में था इस लिए मैं भी आगे बढ़ा और मैं ने भी दूसरों की तरह दिलासा देते हुए मुबारक़ बाद पेश की , लेकिन उसने मुझ से किसी भी चीज़ (अर्थात खतों के जवाबों व अन्य चीज़ों) के बारे में सवाल नही किया। उसी वक़्त इमाम के घर का नौकर अक़ीद घर से बाहर आया और उसने जाफ़र को संबोधित करते हुए कहा : ऐ मेरे मौला व आक़ा ! आप के भाई हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) को कफ़न दिया जा चुका है , अब चल कर उनकी नमाज़े जनाज़ा पढ़ा दीजिये। जब मैं दूसरे शियों के साथ इमाम के घर में दाखिल हुआ तो मैं ने देखा कि हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) के जनाज़े को क़फ़न दे कर ताबूत में रखा जा चुका है। जाफ़र अपने भाई की नमाज़े जनाज़ा पढ़ाने के लिए आगे बढ़े , लेकिन जैसे ही उन्होंने तक़बीर कहनी चाही तभी एक गेहूँवे रंग , घुंघराले बाल और चमकदार व आपस में मिले हुए दाँतों वाला बच्चा आगे बढ़ा और जाफ़र का दामन पकड़ कर कहा : ऐ चचा आप पीछे हटें , मैं अपने बाप के जनाज़े पर नमाज़ पढ़ने का ज़्यादा हक़दार हूँ। जाफ़र के चेहरे का रंग बदल गया और वह शर्मिन्दा हो कर पीछे हट गये। वह बच्चा आगे बढ़ा और हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) के जनाज़े पर नमाज़ पढ़ी। उस के बाद मुझ से फरमाया : तुम्हारे पास खतों के जो जवाब हैं वह मुझे दे दो। मैं ने वह खत उनको दिये और अपने दिल ही दिल में कहा कि मुझे इस बच्चे की इमामत पर दो निशानियाँ मिल गई हैं और अब सिर्फ़ थैली वाली बात बाक़ी रह गई है। मैं जाफ़र के पास गया तो देखा कि वह आहे भर रहे हैं , किसी शिया ने उन से सवाल किया यह बच्चा कौन है ?

जाफ़र ने कहा : ख़ुदा की क़सम मैं ने इस को अभी तक नहीं देखा था और न ही मैं इस को पहचानता हूँ।

अबूल अदियान कहते हैं कि हम बैठे हुए थे कि कुछ लोग क़ुम से आये और हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) के बारे में सवाल करने लगे। जब उनको मालूम हुआ कि हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) की शहादत हो चुकी है तो कहने लगे कि अब हम किस के पास अफ़सोस के लिए जायें तो लोगों ने जाफ़र की तरफ़ इशारा किया , वह आगे बढ़े और उन्होंने जाफ़र को सलाम करने के बाद इमाम की शहादत पर दिलासा देते हुए इमामत की मुबारकबाद पेश की और फिर उन्होंने जाफ़र को संबोधित कर के कहा : हमारे पास कुछ ख़त और कुछ रक़म हैं , आप सिर्फ़ यह बता दीजिये कि यह ख़त किस के हैं और रक़म कितनी है।

जाफ़र नाराज़ हो कर अपनी जगह से उठे और कहने लगे : क्या हमारे पास गैब का इल्म हैं। इसी वक़्त हज़रत इमाम महदी (अ.स.) का एक ग़ुलाम बाहर निकला और उसने कहा : यह ख़त उस उस इंसान के हैं (ख़त भेजने वालों के नाम व पते बताये) और तुम्हारे पास एक थैली है जिस में एक हज़ार दिनार है उस में से दस दिनारों की तस्वीर मिट चुकी है। यह सुनकर उन लोगों ने वह ख़त और रक़म उसको दे दी और कहा : जिस ने तुम्हें यह चीज़ें लेने के लिए भेजा है वही इमाम हैं.....।

तीसरा हिस्सा

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) कुरआन व हदीस की रौशनी में

कुरआने क़रीम की रौशनी में

कुरआने करीम अल्लाह को पहचनवाने वाला , हमेशा बाकी रहने वाला और इंसानों के लिए ज़रुरी इल्म का बहता हुआ दरिया है। यह एक ऐसी किताब है जिस में पूरी सच्चाई पाई जाती है। इस में पूर्व में घटित घटनाओ और आगे घटित होने वाली घटनाओं आदि का उल्लेख मिलता है। अल्लाह ने इस किताब में किसी भी हक़ीक़त को वर्णन किये बग़ैर नहीं छोड़ा है। यह बात स्पष्ट है कि दुनिया की बहुत सी हक़ीक़तें अल्लाह की इन आयतों में छुपी हुई हैं और उन हक़ीक़तों तक सिर्फ़ वही लोग पहुँच पाते हैं जो कुरआन की गहराई तक पहुँच जाते हैं। कुरआने करीम के सच्चे मुफ़स्सिर पैग़म्बरे इस्लाम (स.) और उनकी पाक औलाद है।

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) का कियाम (आन्दोलन) और इन्क़ेलाब (क्रान्ति) इस दुनिया की सब से बड़ी हक़ीक़त है जिस के बारे में कुरआने करीम की कुछ आयतों और उन आयतों की तफ़्सीर से संबंधित बहुत सी रिवायत में इशारा हुआ है। हम यहाँ पर इसके कुछ नमूने पेश कर रहे हैं।

सूरः ए नबियों की आयत न. 105 में वर्णन होता है :

<وَلَقَدْ کَتَبْنَا فِی الزَّبُورِ مِنْ بَعْدِ الذِّکْرِ اٴَنَّ الْاٴَرْضَ یَرِثُہَا عِبَادِی الصَّالِحُونَ۔ >

और हम ने ज़िक्र के बाद ज़बूर में भी लिख दिया है कि हमारी ज़मीन के वारीस हमारे नेक बन्दे ही होंगे।

हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ.स.) ने फरमाया :

ज़मीन को विरासत में लेने वालों से अभिप्रायः अल्लाह के वह नेक बन्दे हैं जो हज़रत इमाम महदी (अ.स.) मददगार हैं....

इसी तरह सूरः ए क़िसस में वर्णन होता है :

وَنُرِیدُ اٴَنْ نَمُنَّ عَلَی الَّذِینَ اسْتُضْعِفُوا فِی الْاٴَرْضِ وَنَجْعَلَہُمْ اٴَئِمَّةً وَنَجْعَلَہُمْ الْوَارِثِینَ

और हम यह चाहते हैं कि जिन लोगों को ज़मीन में कमज़ोर बना दिया गया है ( अर्थात जिनका शोषण किया गया) हम उन पर एहसान करें और उन्हें लोगों का इमाम बनाये और उन्हीँ को ज़मीन के वारिस भी बनायें।

हज़रत इमाम अली (अ.स.) फरमाते हैं कि :

यहाँ पर शोषित वर्ग से अभिप्रायः पैग़म्बरे इस्लाम (स.) की औलाद है , ख़ुदा वन्दे आलम इस खानदान की परेशानियों के बाद (महदी) के ज़रिये एक इन्क़ेलाब को कामयाब बनायेगा और उनकी हुकूमत को आख़िरी हद तक पहुँचा देगा और उनके दुशमनों को ज़लील कर देगा....

इसी तरह सूरः ए हूद आयत 86 में वर्णन हुआ है :

بَقِیَّةُ اللهِ خَیْرٌ لَکُمْ إِنْ کُنتُمْ مُؤْمِنِینَ

अगर तुम मोमिन हो तो अल्लाह की तरफ़ का ज़ख़ीरा तुम्हारे हक़ में बहुत बेहतर है।

हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ.स.) ने फरमाया :

जिस वक़्त हज़रत इमाम महदी (अ.स.) ज़हूर करेंगे खाना ए काबा की दीवार से टेक लगायेंगे और सब से पहले इसी आयत की तिलावत करेंगे और उस के बाद कहेंगे : اَنَا بَقِیَّةُ اللهِ فی اٴَرْضِہِ وَ خَلِیفَتُہُ وَ حُجَّتُہُ عَلَیکُمْ “ मैं ज़मीन पर बक़ीयतुल्लाह , अल्लाह का ख़लीफ़ा और तुम पर उस की हुज्जत हूँ।

इसके बाद जो इंसान भी इमाम (अ.स.) को सलाम करेगा वह इस तरह कहेगा :

اَلسّلامُ عَلَیکَ یَا بَقِیَّةَ اللهِ فی اٴَرْضِہِ “ .

और सूरः ए हदीद की आयत न. 17 में वर्णन होता है :

اعْلَمُوا اٴَنَّ اللهَ یُحْیِ الْاٴَرْضَ بَعْدَ مَوْتِہَا قَدْ بَیَّنَّا لَکُمْ الْآیَاتِ لَعَلَّکُمْ تَعْقِلُونَ۔

याद रखो कि ख़ुदा मुर्दा ज़मीनों को ज़िन्दा करने वाला है और हम ने तमाम निशानियों का स्पष्ट रूप में वर्णन कर दिया है ताकि तुम अक्ल से काम ले सको।

हज़रत इमाम सादिक़ (अ.स.) ने फरमाया :

अभिप्रायः यह है कि ख़ुदा वन्दे आलम ज़मीन को हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के ज़हूर के वक़्त उनकी अदालत के ज़रिये ज़िन्दा करेगा जो ज़ालिम बादशाहों के ज़ुल्मो सितम की वजह से मुर्दा हो चुकी होगी....

रिवायत की रौशनी में

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के बारे में हमारे पास बहुत सी रिवायतें मौजूद हैं और इन रिवायतों में हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की ज़िन्दगी के विभिन्न पहलुओं को मासूम इमामों (अ.स.) ने अलग अलग बयान किया है , जैसे इमाम का जन्म , बच्पन का ज़माना , ग़ैबते सुग़रा , ग़ैबते कुबरा , ज़हूर की निशानियां , ज़हूर का ज़माना , विश्व व्यापी हुकूमत आदि आदि। अतः इमाम महदी (अ.स.) की ज़ाहिरी और अख़लाक़ी विशेषताओं , ग़ैबत के ज़माने और उन के ज़हूर के मुन्तज़िरों (प्रतिक्षा करने वालों) के सवाब के बारे में बहुत महत्वपूर्ण रिवायतें मौजूद हैं। यह बात उल्लेखनीय है कि उन में से कुछ रिवायतें ऐसी हैं जो शिया और अहले सुन्नत दोनों की क़िताबों में मौजूद हैं। इमाम महदी (अ.स.) के बारे में बहुत ज़्यादा रिवायत मुतावातिर हैं।

यह बात भी उल्लेखनीय है कि हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की विशेषताओं में से एक विशेषता यह भी है कि सब ही मासूम इमामों (अ.स.) ने उनके बारे में बेहतरीन हदीसें बयान की हैं जो वास्तव में इल्म पर ही आधारित हैं। उन में समानता व न्याय फैलाने वाले इस इमाम के क़ियाम व इंकिलाब (आन्दोलन) का वर्णन है। हम यहाँ पर हर मासूम से एक एक हदीस बयान करना बेहतर समझते हैं।

पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने फरमाया :

खुश नसीब हैं वह लोग जो महदी (अ.स.) की ज़ियारत करेंगे और खुश नसीब है वह इंसान जो उन से मुहब्बत करता होगा , और खुश नसीब है वह इंसान जो उन की इमामत को मानता होगा....

हज़रत अली (अ.स.) ने फरमाया :

(आले मुहम्मद) के ज़हूर के मुंतज़िर रहो , और ख़ुदा की रहमत से मायूस न होना , बेशक ख़ुदा वन्दे आलम के नज़दीक सब से अच्छा काम ज़हूर का इन्तेज़ार करना है..

हज़रत फातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा के लोह.. में वर्णन हुआ है :

इस के बाद अपनी रहमत की वजह से वसी का सिलसिला इमाम हसन अस्करी (अ.स.) के बेटे पर पूरा कर दूंगा , जो मूसा का कमाल , ईसा का शिकोह , और जनाबे अय्यूब का सब्र रखाता होगा...

हज़रत इमाम हसन मुजतबा (अ.स.) एक रिवायत में रसूले ख़ुदा (स.) के बाद घटित होने वाली घटनाओं का वर्णन करते हुए फरमाते हैं कि :

ख़ुदा वन्दे आलम अख़िरी ज़माने में एक क़ाइम को भेजेगा...और अपने फ़रिश्तों के ज़रिये उनकी मदद करेगा , और उनके मददगारों की हिफ़ाज़त करेगा...और उनको तमाम ज़मीन पर रहने वालों पर विजयी बनायेगा...वह ज़मीन को अदालत , नूर और स्पष्ट दलीलों से भर देंगे...खुश नसीब हैं वह इंसान जो उस ज़माने में होंगे और उन की इताअत (आज्ञा पालन) करेंगे...

हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) ने फरमाया :

ख़ुदा वन्दे आलम उनके ( हज़रत इमाम महदी अ. स.) ज़रिये मुर्दा ज़मीन को ज़िन्दा और आबाद कर देगा , और उनके ज़रिये दीने हक़ को अन्य सब दीनों पर गालिब कर देगा , चाहे यह बात मुशरिकों को अच्छी न लगे , वह ग़ैबत को अपनायेंगे जिसकी वजह से एक गिरोह दीन से गुमराह हो जायेगा और एक गिरोह दीने हक़ पर क़ायम रहेगा...बेशक जो इंसान उनकी ग़ैबत के ज़माने में परेशानियों और झुटलाये जाने पर सब्र करेगा वह उस इंसान की तरह होगा जिस ने रसूले ख़ुदा (स.) के साथ रह कर तलवार से जिहाद किया हो....

हज़रत इमाम सज्जाद (अ.स.) ने फरमाया :

जो इंसान क़ाइमे आले मुहम्मद के ज़माने में हमारी मुहब्बत और दोस्ती पर साबित क़दम रहेगा ख़ुदा वन्दे आलम उसे बदर व ओहद के हज़ार शहीदों के बराबर सवाब देगा...

इमाम मुहम्मद बाकिर (अ.स.) ने फरमाया:

एक ज़माना वह आयेगा कि जब लोगों का इमाम ग़ायब होगा , ख़ुश नसीब है वह इंसान जो उस ज़माने में हमारी दोस्ती पर साबित क़दम रहे...

हज़रत इमाम सादिक (अ.स.) ने फरमाया:

काइमे आले मुहम्मद के लिए दो ग़ैबतें होंगी एक ग़ैबते सुग़रा दूसरी ग़ैबते कुबरा होगी...

हज़रत मूसा क़ाज़िम (अ.स.) ने फरमाया :

इमाम महदी अ. स. लोगों की नज़रों से छिपे रहेंगे , लेकिन मोमिनों के दिलों में उन की याद ताज़ा रहेगी...

हज़रत इमामे रिज़ा (अ.स.) ने फरमाया :

जब (इमाम महदी अ. स.) क़ियाम करेंगे उस वक़्त उनके वजूद के नूर से ज़मीन रौशन हो जायेगी और वह लोगों के बीच हक़ व अदालत की तराज़ू स्थापित करेंगे और उस ज़माने में कोई किसी पर ज़ुल्म व सितम नहीं करेगा...

हज़रत इमाम मुहम्मद तकी (अ.स.) ने फरमाया :

क़ाइमे आले मुहम्मद की ग़ैबत के ज़माने में मोमिनों को उनके ज़हूर का इन्तेज़ार करना चाहिए और जब उनका ज़हूर हो जाये और वह क़ियाम करें तो उनकी इताअत (आज्ञा पालन) करनी चाहिए...

हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) ने फरमाया :

मेरे बाद मेरा बेटा हसन (अस्करी) इमाम होगा और उनके बाद उनका बेटा (क़ाइम) इमाम होगा , वह ज़मीन को अदल व इन्साफ़ (न्याय व समानता) से उसी तरह भर देंगे जैसे वह ज़ुल्म व जौर (अत्याचार व भेद भाव) से भरी होगी....

हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) ने फरमाया :

उस अल्लाह का शुक्र है जिसका कोई शरीक नही है , जिस ने मेरी ज़िन्दगी में मुझे जानशीन (उत्तराधिकारी) दे दिया है , वह शक्ल , सूरत और अख़लाक़ में रसूले ख़ुदा (स.) से सब से ज़्यादा मिलता है...

चौथा हिस्सा

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) ग़ैरों की नज़र में

خوشتر آن باشد کہ سرّ دلبران -- گفتہ آید در حدیث دیگران

अर्थात सच्चाई वह है जिसका इक़रार दुशमन भी करे।

इमाम महदी (अ.स.) के विश्वव्यापी आंदोलन का उल्लेख सिर्फ़ शिया किताबों में ही नही बल्कि दूसरे इस्लामी फिरकों की एतेक़ादी किताबों में भी मिलता है और इन किताबों में उनके बारे में विस्तार पूर्वक वर्णन हुआ है। वह लोग भी मानते हैं कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.) की नस्ल और हज़रत फातिमा ज़हरा (स. अ.) की औलाद से महदी ज़हूर करेंगे। इमाम महदी (अ.स.) के बारे में अहले सुन्नत के अक़ीदे को जानने के लिए अहले सुन्नत के बड़े आलिमों की किताबों को पढ़ना चाहिए। सुन्नी मुफ़स्सिरों ने अपनी तफ़सीरों में इस बात को स्पष्ट किया है कि क़ुरआने मजीद की कुछ आयतें , आखरी ज़माने में हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के ज़हूर की तरफ़ इशारा करती हैं , जैसे फख़रुद्दीन राज़ी.. और अल्लामा क़ुरतुबी..

इसी तरह अहले सुन्नत के अधिकतर मुहद्दिसों (हदीस का वर्णन करने वालों व लिखने वालों को मुहद्दिस कहते हैं) ने इमाम महदी (अ.स.) के संबंध में वर्णित हदीसों को अपनी किताबों में नक्ल किया है और इन में अहले सुन्नत की मोतबर किताबें भी शामिल हैं , जैसे सहाहे सित्ता.. और मुसनदे अहमद इब्ने हंबल (हंबली फिरक़े के स्संथापक))

अहले सुन्नत के कुछ इस ज़माने और कुछ पिछले ज़माने के आलिमों ने इमाम महदी (अ.स.) के बारे में किताबें भी लिखी हैं , जैसे अबू नईम इस्फ़हानी ने (मजमूअतुल अरबईन) चालीस हदीस और सुयूती ने किताब (अलउरफ़ुल वरदी फि अखबारिल महदी (अ.स.)।

यह बात भी उल्लेखनीय है कि अहले सुन्नत के कुछ आलिमों ने महदवीयत के अक़ीदे के पक्ष में और इस अक़ीदे को न मानने वालों की रद में भी किताबें और लेख लिखे हैं। उन्होंने इल्मी बयानों और हदीसों की रौशनी में इमाम महदी (अ.स.) के वाकिये को यक़ीनी माना है और इस वाक़िये को उन मसाइल में रखा है जिनसे इंकार नही किया जा सकता , जैसे मुहम्मद सिद्दीक मग़रिबी इन्हों ने इब्ने ख़ल्दून की रद में एक किताब लिखी है और उसकी बातों का मुँह तोड़ जवाब दिया है...

प्रियः पाठकों हम यहाँ पर हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के बारे में अहले सुन्नत के अक़ीदे के बारे में कुछ नमूने पेश कर रहे हैं।

पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने फ़रमाया :

अगर दुनिया की उम्र का सिर्फ़ एक दिन भी बाक़ी रह जायेगा तो बेशक ख़ुदा वन्दे आलम उस दिन को इतना लंबा बना देगा कि मेरी नस्ल से मेरा हम नाम एक इंसान क़ियाम करेगा...

पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने फरमाया :

मेरी नस्ल से एक इंसान क़ियाम करेगा , जिस का नाम और सीरत मुझसे मिलती जुलती होगी , वह दुनिया को अदल व इन्साफ़ से भर देगा जैसा कि वह ज़ुल्म व सितम से भरी होगी...

यह बात भी उल्लेखनीय है कि यह सब लोग मानते हैं कि आख़िरी ज़माने में इंसानों को निजात दिलाने और इस दुनिया में अदल व इन्साफ़ फैलाने वाला एक इंसान ज़रूर आयेगा। यह अक़ीदा विश्वव्यापी है और इसे सभी लोग क़बूल करते हैं। यह बात भी सच है कि आसमानी धर्मों के मानने वाले सभी लोग अपनी अपनी किताबों की शिक्षाओं के आधार पर उस क़ाइम का इन्तेज़ार कर रहे हैं। मुकद्दस किताब ज़बूर , तौरैत , इनजील और हिन्दुओं व पारसियों की किताबों में भी मानवता को मुक्ति देने वाले एक इंसान के ज़हूर की तरफ़ इशारा हुआ है। यह बात अलग है कि हर क़ौम ने उसे अलग अलग नामों से याद किया है। पारसियों ने उसे सोशियान्स यानी दुनिया को नेजात देने वाला , और ईसाईयों ने उसे मसीहे मौऊद और यहूदीयों ने सरुरे मीकाइली के नाम से याद किया है।

पारसियों की मुकद्दस किताब "जामा सब नामे" में इस तरह उल्लेख हुआ है।

अरब का पैग़म्बर आखरी पैग़म्बर होगा , जो मक्का के पहाड़ों के बीच पैदा होगा , वह गुलामों के साथ मुहब्बत करेगा और गुलामों की तरह रहे सहेगा , उसका दीन सभी दीनों से बेहतर होगा , उसकी किताब तमाम किताबों को बातिल (निष्क्रिय) करने वाली होगी। उस पैग़म्बर की बेटी जिसका नाम खुरशीद जहां और शाहे ज़मां होगा उसकी नस्ल से ख़ुदा के हुक्म से इस दुनिया में एक ऐसा बादशाह होगा जो इस पैग़म्बर का आखरी जानशीन (उत्तराधिकारी) होगा और उसकी हुकूमत क़ियामत से मिल जायेगी...


तीसरा अध्याय

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) का इन्तेज़ार

पहला हिस्सा

ग़ैबत

प्रियः पाठकों ! अब जबकि आप इंसानों को निजात व मुक्ति देने वाले और हज़रत आदम (अ.स.) से लेकर पैग़म्बरे इस्लाम (स.) तक सभी नबियों (स.) के मक़सद को पूरा करने वाले , अल्लाह के आख़िरी वली हज़रत इमाम महदी (अ.स.) से परिचित हो गये हैं तो हम चाहते हैं कि उनकी ग़ैबत के बारे में कुछ बातें करें क्योंकि ग़ैबत उनकी ज़िन्दगी का एक महत्वपूर्म हिस्सा है।

ग़ैबत का अर्थ

सबसे पहली , उल्लेखनीय और महत्वपूर्ण बात यह है कि ग़ैबत का अर्थ “ किसी चीज़ का आँखों से छुपा रहना ” है , उसका अनुपस्थित होना नही है। अतः इस हिस्से में उस ज़माने की बातें है जब इमाम महदी (अ.स.) लोगों की नज़रों से छिपे थे। यानी लोग आप को नहीं देख पाते थे जब कि आप लोगों के बीच में ही रहते थे , और उन्हीं के बीच ज़िन्दगी बसर किया करते थे। इस वास्तविक्ता का वर्णन मासूम इमामों (अ.स.) की हदीसों व रिवायतों में विभिन्न तरीकों से हुआ है।

हज़रत इमाम अली (अ.स.) फरमाते हैं :

अल्लाह की क़सम ! अल्लाह की हुज्जत लोगों के बीच रहती है , रास्तों गलियों व बाज़ारों में मौजूद होती है , लोगों के घरों में आती जाती है , पूरब से लेकर पश्चिम तक पूरी ज़मीन का भ्रमण करती है , लोगों की बातों का सुनती है और उन पर सलाम भेजती है , वह सबको देखती है लेकिन लोगों की आँखें उसे उस वक़्त तक नहीं देख सकतीं जब तक ख़ुदा की मर्ज़ी और उस का वादा पूरा न हो जाये...

इमाम महदी (अ.स.) के लिए ग़ैबत की एक दूसरी किस्म भी बयान हुई है। हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के दूसरे ख़ास नायब बयान फरमाते है :

इमाम महदी (अ.स.) हज के दिनों में हर साल हाज़िर होते हैं , वह लोगों को देखते हैं और उनको पहचानते हैं। लोग उनको देखते हैं लेकिन नही पहचानते ...।.

इस आधार पर हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की ग़ैबत दो प्रकार की हैः वह कुछ जगहों पर लोगों की नज़रों से छिपे रहते हैं और कुछ जगहों पर लोगों को दिखाई देते हैं , लेकिन उनकी पहचान नहीं हो पाती है , जो भी हो यह तय है कि हज़रत इमाम महदी (अ.स.) लोगों के बीच मौजूद रहते हैं।

ग़ैबत का इतिहास

ग़ैबत में और छुपकर ज़िन्दगी व्यतीत करना कोई ऐसी बात नहीं है जो सिर्फ़ हज़रत इमाम महदी (अ.स.) से ही संबंधित हो , बल्कि कुछ रिवायतों से ये नतीजा निकलता है कि बहुत से नबियों (अ.स.) की ज़िन्दगी का एक हिस्सा ग़ैबत में गुज़रा है और उन्होंने एक समय तक छुपकर जीवन व्यतीत किया है और यह चीज़ ख़ुदा वन्दे आलम की मर्ज़ी के अनुसार थी किसी ज़ाती और खानदानी हित के लिए नही।

ग़ैबत , अल्लाह की एक सुन्नत है.. जो बहुत से नबियों (अ.स.) की ज़िन्दगी में देखी गई है , जैसे जनाबे इदरीस , जनाबे नूह , जनाबे सालेह , जनाबे इब्राहीम , जनाबे यूसुफ़ जनाबे मूसा , जनाबे शुऐब , जनाबे इल्यास , जनाबे सुलेमान , जनाबे दानियाल और जनाबे ईसा (अ.स.) और विभिन्न हालतों के कारण इन सब नबियों (अ.स.) का जीवन कई सालों तक ग़ैबत में लोगों की नज़रों से छुपकर व्यतीत हुआ है..।

इसी वजह से हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की ग़ैबत की रिवायतों में (ग़ैबत) को नबियों (अ.स.) की सुन्नत के रूप में याद किया गया है और हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की ज़िन्दगी में नबियों (अ.स.) की सुन्नत का जारी होना ग़ैबत की दलीलों में माना गया है।

हज़रत इमाम सादिक़ (अ.स.) ने फरमाया :

बेशक हमारे क़ाइम (इमाम महदी (अ.स.) के लिए ग़ैबत होगी और उसकी मुद्दत बहुत लंबी होगी। जब रावी ने पूछा कि ऐ रसूल के बेटे ग़ैबत की वजह क्या है तो हज़रत इमाम सादिक़ (अ.स.) ने फरमाया : ख़ुदा वन्दे आलम का इरादा यह है कि ग़ैबत की जो सुन्नत उसने नबियों (अ.स.) के लिए रखी है वह सुन्नत उनके बारे में भी जारी रहे..।

प्रियः पाठकों ! उपरोक्त विवरण से ये बात भी स्पष्ट हो जाती है कि हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के पैदा होने से वर्षों पहले से उनकी ग़ैबत का मसला बयान होता रहा है और पैग़म्बरे इस्लाम (स.) से लेकर हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) तक सब इमामों ने उनकी ग़ैबत , उनके ज़माने में घटित होने वाली घटनाओ और उनकी विशेषताओं का भी वर्णन किया है। यह ही नही बल्कि ग़ैबत के ज़माने में मोमिनों की ज़िम्मेदारियों का भी वर्णन किया हैं..।

पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने फरमाया :

महदी (अ.स.) मेरी ही नस्ल से होगा... और वह ग़ैबत में रहेगा , लोगों की हैरानी व परेशानी इस हद तक बढ़ जायेगी कि लोग दीन से गुमराह हो जायेंगे और फिर जब अल्लाह का हुक्म होगा तो वह चमकते हुए सितारे की तरह ज़हूर करेगा और ज़मीन को अदल व इन्साफ़ से भर देगा जिस तरह वह ज़ुल्म व जौर (अत्याचार) से भरी होगी...

ग़ैबत की वजह

हमारे बारहवें इमाम और अल्लाह की आख़िरी हुज्जत हज़रत इमाम महदी (अ.स.) क्यों ग़ैबत का जीवन व्यतीत कर रहे हैं और क्या वजह है कि हम इमाम के ज़हूर की बरकतों से महरुम (वंचित) हैं ?

प्रियः पाठकों ! इस बारे में बहुत ज़्यादा बात चीत होती है और इस से संबंधित बहुत सी रिवायतें भी मौजूद हैं , लेकिन हम यहाँ इस सवाल का जवाब देने से पहले एक बात की तरफ़ इशारा कर रहे हैं।

हम इस बात पर ईमान रखते हैं कि ख़ुदा वन्दे आलम का झोटे से छोटा और बड़े से बड़ा काम हिकमत व मसलेहत (अक़्लमंदी और भलाई व हित) से खाली नहीं होता है , चाहे हम उन हितों को जानते हों या न जानते हों और इस संसार की हर छोटी बड़ी घटना ख़ुदा वन्दे आलम की युक्ति और उसी के इरादे से घटित होती है। उन्हीं में से एक महत्वपूर्ण घटना हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की ग़ैबत भी है। अतः उनकी ग़ैबत भी हिकमत व मसलेहत के अनुसार है अगरचे हम उसके मूल कारण को न जानते हों।

हज़रत इमाम सादिक़ (अ.स.) ने फरमाया :

बेशक साहिबुल अस्र (हज़रत इमाम महदी (अ.स.)) के लिए ऐसी ग़ैबत होगी जिस में बातिल का का हर पुजारी शक व शुब्हे का शिकार हो जायेगा।

जब रावी ने इमाम की ग़ैबत की वजह मालूम की तो इमाम (अ.स.) ने फरमाया :

ग़ैबत की वजह एक ऐसी चीज़ है जिस को हम तुम्हारे सामने बयान नहीं कर सकते , ग़ैबत अल्लाह के राज़ों में से एक राज़ है। लेकिन चूँकि हम जानते हैं कि ख़ुदा वन्दे आलम हिकमत वाला है और उसके सब काम हिकमत के आधार होते हैं , चाहे हम उनकी वजह न जानते हो..

इंसान अधिकाँश अवसरों पर ख़ुदा वन्दे आलम के कामों को हिकमत के अनुसार मानते हुए उनके सामने अपना सर झुका देता है , लेकिन फिर भी कुछ चीज़ों के राज़ों को जानने की कोशिश करता है ताकि उनकी हक़ीक़त को जान कर उसे और अधिक इत्मिनान हो जाये। अतः इसी इत्मिनान के लिए हम इमाम महदी (अ.स.) की ग़ैबत की हिकमत और उसके असर की तहक़ीक शुरु करते हैं और इस बारे में बयान होने वाली रिवायतों की तरफ़ इशारा करते हैं।

जनता को अदब सिखाना

जब उम्मत अपने नबी या इमाम की क़दर न करे और अपनी ज़िम्मेदारियों को न निभाये , बल्कि इसके विपरीत उसकी अवज्ञा करे तो ख़ुदा वन्दे आलम के लिए यह बात उचित है कि उनके रहबर , हादी या इमाम को उन से अलग कर दे , ताकि वह उस से अलग रह कर अपने गरेबान में झाँके और उस के वजूद की कद्र व क़ीमत और बरकत को पहचान लें। अतः इस सूरत में इमाम की ग़ैबत उम्मत की भलाई में है चाहे उम्मत को यह बात मालूम न हो और वह इस बात को न समझ सकती हो।

हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ.स.) से रिवायत है :

जब ख़ुदा वन्दे आलम किसी क़ौम में हमारे वजूद से खुश नही होता तो हमें उन से अलग कर लेता है...।

लोगों से अनुबंध किये बग़ैर काम करना

जो लोग किसी जगह इंकेलाब (परिवर्तन) लाना चाहते हैं , वह अपने इंकेलाब के शुरू में अपने मुखालिफ़ों से कुछ समझौते करते हैं ताकि अपने मक़सद में कामयाब हो जायें , लेकिन हज़रत इमाम महदी (अ.स.) वह महान सुधारक व उद्धारक हैं जो अपने इंकेलाब और न्याय व समानता पर आधारित विश्वव्यापी हुकूमत स्थापित करने के लिए किसी भी ज़ालिम व अत्याचारी से किसी भी तरह का कोई समझौता नहीं करेंगे। क्यों कि बहुत सी रिवायतों में मिलता है कि उनको सभी ज़ालिमों से खुले आम मुक़ाबेला करने का हुक्म है। इसी वजह से जब तक इस इंक़ेलाब का रास्ता हमवार नहीं हो जाता उस वक़्त तक वह ग़ैबत में रहेंगे ताकि उन्हें अल्लाह के दुश्मनों से को ई समझौता न करना पड़े।

ग़ैबत की वजह के बारे में हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) से मन्कूल हैः

उस वक़्त जब कि इमाम महदी (अ.स.) तलवार के ज़रिये क़ियाम फरमायेगे तो आप का किसी के साथ अहदो पैमान न होगा...

लोगों का इम्तेहान

ख़ुदा वन्दे आलम की एक सुन्नत लोगों का इम्तेहान करना भी है। वह अपने बन्दों को विभिन्न तरीक़ों से आज़माता है ताक़ि हक़ के रास्ते में उनका अडिग व अटल रहना स्पष्ट हो सके। जबकि वास्तविक्ता यह है कि उस इम्तेहान का नतीजा ख़ुदा वन्दे आलम को पहले से मालूम होता है लेकिन इम्तेहान की इस भट्टी में तपने के बाद बन्दों की हक़ीक़त स्पष्ट हो जाती है और वह अपने वजूद (अस्तित्व) के जौहर को पहचान लेते हैं।

हज़रत इमाम मूसा क़ाज़िम (अ.स.) ने फरमाया :

जब मेरा पाँचवां बेटा गायब हो जाये तो तुम लोग अपने दीन की हिफ़ाज़त करना ताकि कोई तुम्हें तुम्हारे दीन से विचलित न कर सके , क्यों कि साहिबे अम्र (हज़रत इमाम महदी (अ.स.)) के लिए ग़ैबत होगी जिस में उनके मानने वाले अपने अक़ीदे से फिर जायेगे और उस ग़ैबत के ज़रिये ख़ुदा वन्दे आलम अपने बन्दों का इम्तेहान करेगा..

इमाम की हिफ़ाज़त

नबियों (अ.स.) के अपनी क़ौम से अलग होने की एक वजह अपनी जान की हिफ़ाज़त भी है। नबी (अ.स.) अपनी जान बचाने के लिए कुछ खतरनाक मौक़ों पर लोगों की नज़रों से छुप जाते थे ताकि किसी उचित मौक़े पर अपनी ज़िम्मेदारी को पूरा करें और अल्लाह के पैग़ाम को पहुँचायें। जैसा कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.) मक्क ए मोज़्ज़मा से निकल कर एक गार में छुप गये थे। लेकिन हमेशा याद रखना चाहिए कि यह सब ख़ुदा वन्दे आलम के हुक्म और इरादे से होता था।

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) और उनकी ग़ैबत के बारे में भी कुछ रिवायतों में यही बात बयान हुई है। हम यहाँ पर उनमें से कुछ रिवायतों को नमूने के तौर पर लिख रहे हैं। जैसे ----

हज़रत इमाम सादिक़ (अ.स.) ने फरमाया :

इमामे मुन्तज़र (जिसका इन्तेज़ार किया जाता है उसे मुन्तज़र कहते हैं) अपने क़ियाम (आन्दोलन) से पहले एक लंबे समय तक लोगों की नज़रों से गयायब रहेंगे।

जब इमाम (अ.स.) से ग़ैबत की वजह मालूम की गई तो उन्होंने फरमाया :

उन्हें अपनी जान का खतरा होगा..।

शहादत की तमन्ना अल्लाह के सभी नेक बन्दों के दिलों में होती है , लेकिन ऐसी शहादत जो दीन , समाज सुधार और अपनी ज़िम्मेदारियों निभाते हुए हो। इसके विपरीत अगर किसी का क़त्ल होना उसके मक्सद के ख़त्म हो जाने का कारण बने तो ऐसे मौक़े पर क़त्ल होने से डरना और बचना अक़्लमन्दी का काम है। अल्लाह के आख़िरी ज़ख़ीरे यानी बारहवें इमाम हज़रत महदी के क़त्ल होने का मतलब यह हैं कि खाना ए काबा गिर जाये सारे नबियों और वलियों (अ.स.) की तमन्नाओं पर पानी फिर जाये और न्याय व समानता पर आधारित विश्वव्यापी हुकूमत की स्थापना के बारे में ख़ुदा का वादा पूरा न हो।

यह बात भी उल्लेखनीय है कि कुछ रिवायतों में ग़ैबत के कुछ अन्य कारणों का भी वर्णन हुआ हैं , परन्तु हम संक्षिप्तता को ध्यान में रख कर और विस्तार से बचने के लिए यहाँ उनका उल्लेख नहीं कर रहे हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि ग़ैबत अल्लाह के राज़ों में से एक राज़ है और इस की असली व आधारभूत वजह इमाम (अ.स.) के ज़हूर के बाद ही स्पष्ट होगी। हम ने हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की ग़ैबत के कारणों के बारे में जिन चीज़ों का वर्णन किया है , उन चीज़ों का इमाम (अ.स.) की ग़ैबत में असर रहा है।

दूसरा हिस्सा

ग़ैबत की क़िस्में

प्रियः पाठकों ! उपरोक्त विवरण के आधार पर हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की ग़ैबत ज़रुरी व अनिवार्य हो जाती है। लेकिन चूँकि हमारे हादियों के सब काम और कारनामे लोगों के ईमान व अक़ीदों को मज़बूत बनाने के लिए होते थे , अतः इस बात का डर था कि अल्लाह की इस आख़री हुज्जत की ग़ैबत की वजह से मुसलमानों की दीनदारी को नुक्सानात पहुंचेंगे , इसी लिए ग़ैबत का ज़माना बहुत ही हिसाब और किताब के साथ शुरू हुआ जो आज तक चल रहा है।

इमाम महदी (अ.स.) के जन्म से वर्षों पहले से उनकी ग़ैबत और उसकी ज़रुरत के बारे में बात चीत हो रही थी और मासूम इमामों (अ.स.) व उन के असहाब की महफिलों में इस पर चर्चा होती थी। इसी तरह हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) और हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) लोगों से एक नए अन्दाज़ और खास हालात में ही मिलते थे। अहले बैत अलैहिमु अस्सलाम के शिया भी आहिस्ता आहिस्ता यह जान गये थे कि वह दीन और दुनिया की बहुत सी ज़रुरतों में इमाम मासूम (अ.स.) से मुलाक़ात पर मजबूर नहीं हैं , बल्कि इमामों (अ.स.) की तरफ़ से नियुक्त वकीलों और भरोसेमंद लोगों के ज़रिये भी अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा किया जा सकता है। हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) की शहादत और हज़रत हुज्जत इब्नुल हसन (अ.स.) की ग़ैबते सुग़रा के शुरू होने से इमाम और उम्मत के बीच राब्ता (संबंध) ख़त्म नही हुआ था , बल्कि मोमेनीन अपने मौला व इमाम के नायबों के ज़रिये इमाम से राब्ता किया करते थे। यही ज़माना था जिस में शियों को दीनी आलिमों से बड़े पैमाने पर राब्ते की आदत हुई और इसी राब्ते की वजह से हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की ग़ैबत के ज़माने में भी दीनी फ़राइज़ की पहचान का रास्ता बन्द नहीं हुआ। इसी मौक़े पर उचित था कि बक़ीयतुल्लाह हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की ग़ैबते कुबरा शुरू हो और इमाम (अ.स.) व शियों के बीच पिछले ज़माने में प्रचलित आम राब्ते का सिलसिला बन्द हो जाये।

प्रियः पाठकों ! हम यहाँ ग़ैबते सुग़रा और ग़ैबते क़ुबरा की कुछ विशेषताओं का उल्लेख कर रहे हैं।

ग़ैबते सुग़रा (अल्पकालीन ग़ैबत)

सन् 260 हिजरी क़मरी में हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) की शहादत के फ़ौरन बाद हमारे बारहवें इमाम हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की इमामत शुरू हुई और उसी वक़्त से उनकी गैबते सुग़रा भी शुरू हो गई और यह ग़ैबत सन् 320 हिजरी क़मरी तक (लग भग 60 साल) रही।

ग़ैबते सुग़रा की सब से बड़ी विशेषता यह थी कि इस में मोमेनीन हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के ख़ास नायबो के ज़रिये , इमाम से राब्ता किया करते थे और उनके ज़रिये ही अपने सवालात हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के पास भेजते थे और इमाम (अ.स.) के जवाब व पैग़ाम प्रप्त करते थे

कभी कभी हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के इन्हीँ नायबों के ज़रिये ही इमाम (अ.स.) की ज़ियारत का शरफ़ भी हासिल हो जाता था।

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की ग़ैबते सुग़रा में उनके चार ख़ास नायब हुए हैं और उन्हें नव्वाबे अर्बा कहा जाता हैं। वह अपने ज़माने के बड़े शिया आलिम थे और हज़रत इमाम महदी (अ.स.) उन्हें ख़ुद अपनी नियाबत के लिए चुनते थे। उनके नाम नियाबत के क्रमानुसार निम्न लिखित हैं।

1. उस्मान पुत्र सईद अमरी , यह इमाम महदी (अ.स.) की ग़ैबत के शुरू से ही इमाम की नियाबत करते थे , इनकी मृत्यु सन् 265 हिजरी क़मरी में हुई। यह बात भी उल्लेखनीय है कि यह हज़रत इमाम अली नकी (अ.स.) और हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) के भी वक़ील थे।

2. मुहम्मद पुत्र उस्मान अमरी , यह हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के पहले नायब के बेटे थे और अपने पिता की मृत्यु के बाद इमाम (अ.स.) के नायब बने। इनकी मृत्यु सन् 305 हिजरी क़मरी में हुई।

3. हुसैन पुत्र रौह नौ बख्ती , यह हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के 21 साल तक नायब रहे। इनकी मृत्यु सन् 326 हिजरी क़मरी में हुई।

4 अली पुत्र मुहम्मद समरी , यह हज़रत इमाम महदी ( अ स ) के चौथे व आख़िरी नायब थे। इनकी मृत्यु सन् 329 हिजरी क़मरी में हुई और उनके देहान्त के बाद ग़ैबते सुग़रा का ज़माना ख़त्म हो गया।

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के खास नायब हज़रत इमाम हसन अस्करी ( अ स .) और ख़ुद हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के ज़रिये चुने जाते थे और लोगों में पहचनवाए जाते थे। शेख तूसी अलैहिर्रहमा अपनी किताब ( अल ग़ैबत ) में इस रिवायत का उल्लेख करते हैं कि एक दिन हज़रत इमाम महदी ( अ स .) के पहले नायब उस्मान पुत्र सईद के साथ चालीस मोमेनीन हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) के पास पहुँचे इमाम (अ.स.) ने उन्हें अपने बेटे की ज़ियारत कराई और फरमाया :

मेरे बाद यही बच्चा मेरा जानशीन ( उत्तराधिकारी ) और तुम्हारा इमाम होगा , तुम लोग इसकी इताअत ( आज्ञापालन ) करना और यह भी जान लो कि आज के बाद तुम इसे नहीं देख पाओगे , यहाँ तक कि इसकी उम्र पूरी हो जाये। अतः इस की ग़ैबत के ज़माने में उस्मान पुत्र सईद जो कुछ कहें उसे क़बूल करना और उनकी इताअत करना क्योंकि वह तुम्हारे इमाम के जानशीन हैं और तमाम कामों की ज़िम्मेदारी इन्हीँ की है

हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) की दूसरी रिवायत में मुहम्मद पुत्र उस्मान को इमाम महदी (अ.स.) के दूसरे नायब के रूप में याद किया है।

शेख तूसी अलैहिर्रहमा उल्लेख करते हैं :

उस्मान पुत्र सईद ने एक बार हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) के हुक्म से यमन के शियों द्वारा लाया गया माल अपने क़ब्ज़े में लिया , उस वक़्त वहाँ मौजूद कुछ मोमेनीन जो इस घटना को देख रहे थे , उन्होंने इमाम (अ.स.) से कहा : ख़ुदा की क़सम उस्मान आपके बेहतरीन शियों में से हैं , लेकिन आपके नज़दीक उनका क्या मक़ाम है यह हम पर इस काम से स्पष्ट हो गया है।

हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) ने फरमाया : जी हाँ ! तुम लोग गवाह रहना कि उस्मान पुत्र सईद उमरी मेरे वक़ील हैं और इसका बेटा मुहम्मद मेरे बेटे महदी का वक़ील होगा ।

यह सब घटनाएं हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की ग़ैबत से पहली हैं , ग़ैबते सुग़रा में भी इमाम का हर नायब अपनी मृत्यु से पहले हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की तरफ़ से चुने जाने वाले नये नायब की पहचान करा देता था।

यह महान व्यक्ति चूँकि उच्च गुणों व सिफ़तों के मालिक़ थे इस लिए उनके अन्दर हज़रत इमाम महदी (अ.स.) का नायब बनने की योग्यता पैदा हुई। इन महानुभावों की कुछ मुख्य सिफ़तें इस प्रकार थीं , अमानतदारी , पाकीज़गी , व्यवहार में न्याय , राज़दारी और हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के ज़माने के मख़सूस हालात में अहले बैत (अ.स.) के राज़ों को छुपाये रखना आदि। यह महानुभव हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के भरोसेमंद साथी थे और इनकी तरबियत अहले बैत के द्वारा हुई थी। उन्होंने पक्के व सच्चे ईमान के साये में इल्म की दौलत प्राप्त की थी। उनका नेक नाम मोमिनों की ज़बान पर आम था। सख्तियों और परेशानियों में सब्र व बुर्दबारी की यह हालत थी कि वह सख्त से सख्त हालत में भी अपने इमाम (अ.स.) की पूर्ण रूप से आज्ञापालन किया करते थे। इन सब अच्छी सिफ़तों के साथ उनमें शियों का नेतृत्व करने की भी योग्यता पाई जाती थी। वह अपनी योग्यताओं के आधार पर ज़माने की चाल ढाल को देख व परख कर और अपने पास मौजूद साधनों के ज़रिये शिया समाज की सिराते मुस्तक़ीम की तरफ़ हिदायत भी करते थे। इसी आधार पर उन्होंने अल्लाह की मदद से मोमिनो को ग़ैबते सुग़रा से सही व सालीम ग़ुज़ार दिया।

ग़ैबते सुग़रा में इमाम और उम्मत के बीच संबंध स्थापित करने में नव्वाबे अर्बा की भूमिका का गहरा अध्ययन हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की ज़िन्दगी के उस हिस्से के महत्व को स्पष्ट कर देता है। इस संबंध का वजूद और ग़ैबते सुग़रा में कुछ शिओं का इमाम महदी (अ.स.) की ज़ियारत करना , बारहवें इमाम और अल्लाह की इस आख़री आख़री हुज्जत के जन्म को सिद्ध व साबित करने में बहुत प्रभावी रहा है। यह महत्वपूर्ण नतीजे उस समय में प्राप्त हुए जब दुशमन यह कोशिश कर रहे थे कि शिओं को हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) के बेटे के जन्म के संबंध में शक व शुब्हे में डाल दिया जाये। इसके अलावा ग़ैबते सुग़रा का यह ज़माना , उस ग़ैबते कुबरा के लिए रास्ता हमवार कर रहा था जिस में मोमेनीन अपने इमाम से राब्ता नहीं कर सकते थे। लेकिन ग़ैबते सुग़रा की वजह से वह अपने इमाम (अ.स.) के वजूद और उनकी बरकतों से लाभान्वित होते हुए ग़ैबते कुबरा के ज़माने में दाखिल हो गए।

ग़ैबते कुबरा

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) ने अपने चौथे नायब की ज़िन्दगी के आख़री दिनों में उनके नाम एक ख़त लिखा जिसका विषय निम्न लिखित था।

ऐ अली पुत्र मुहम्मद समरी ! ख़ुदा वन्दे आलम आपकी मृत्यु पर आपके दीनी भाइयों को सब्र दे , क्योंकि आप छः दिन के बाद आलमे बक़ा ( परलोक ) की तरफ़ कूच कर जाओगे , इस लिए अपने कामों को खूब देख भाल लो और अपने बाद किसी को अपना नायब न बनाओ , क्यों कि लंबी ग़ैबत का ज़माना शुरू होने वाला है , जब तक ख़ुदा का हुक्म नहीं होगा तुम मुझे नहीं देख पाओगे , इस के बाद एक लंबी समय सीमा होगी जिस में दिल सख्त हो जायेंगे और ज़मीन ज़ुल्म व सितम से भर जायेगी

इस आधार पर बारहवें इमाम के आखरी नायब की मृत्यु के बाद सन् 329 हिजरी क़मरी से गैबते कुबरा शुरू हो गई और इस ग़ैबत का यह सिलसिला आज तक जारी है और इसी तरह जारी रहेगा जब तक ख़ुदा की मर्ज़ी से ग़ैबत के बादल न छट जायें। जब अल्लाह का हुक्म होगा तब यह दुनिया विलायत के चमकते हुए सूरज से प्रकाशित होगी।

जैसा कि ऊपर वर्णन किया जा चुका है कि ग़ैबते सुग़रा में शिया व मोमेनीन , इमाम (अ.स.) के मखसूस नायब के ज़रिये अपने इमाम से राब्ता रखते थे और अपने दीन के फ़राइज़ से परिचित होते थे। लेकिन ग़ैबते कुबरा में इस राब्ते का सिलसिला ख़त्म हो गया। अब मोमेनीन को चाहिए कि अपने दीन के फ़राइज़ को जानने लिए इमाम (अ.स.) के आम नायबों ( जो कि आलिमे दीन व मराजा ए तक़लीद हैं ) से राब्ता करें और यह वह स्पष्ट रास्ता है जो हज़रत इमाम महदी (अ.स.) ने अपने एक भरोसेमंद आलिमे दीन के सामने पेश किया है , हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के दूसरे ख़ास नायब के ज़रिये पहुँचे हुए एक ख़त में इस तरह लिखा है :

” وَ اٴمَّا الحَوَادِثُ الوَاقِعَةُ فَارْجعوا إلیٰ رُواةِ حَدیثنَا فَإنّہُمْ حُجَّتِي عَلَیْکُم وَ اٴَنَا حُجَّةُ اللهِ عَلَیْہِمْ “

और आगे घटित होने वाली घटनाओं व परिस्थितियों में ( अपनी शरई ज़िम्मेदारियों को जानने के लिए ) हमारी हदीसों के रावियों ( फ़ोकहा ) से संबंध स्थापित करना क्यों कि वह तुम पर हमारी हुज्जत हैं और हम उन पर ख़ुदा की हिज्जत हैं।

दीनी सवालों के जवाब और शिओं की नीजी व सामाजिक ज़िम्मेदारियों की पहचान के लिए यह नया तरीका इस हक़ीक़त को स्पष्ट करता है कि शिया तहज़ीब में इमामत का निज़ाम , एक बेहतरीन और ज़िन्दा निज़ाम है। इस निज़ाम के अन्तर्गत विभिन्न परिस्थितियों में मोमिनों की हिदायत बहुत अच्छे ढंग से की जाती है और इस निज़ाम को मानने वालों को किसी भी ज़माने में हिदायत के सर चश्मे के बग़ैर नहीं छोड़ा गया है। बल्कि उनकी नीजी व समाजिक ज़िन्दगी के विभिन्न मसाइल को दीनी आलिमों और पर्हेज़गार मुजतहिदों के सिपुर्द कर दिया गया है और वह मोमेनीन के दीन और दुनिया के अमानतदार हैं , ताकि इस्लामी समाज की किश्ती तूफ़ान और दरिया के उतार चढ़ाव व साम्राज्वाद की गन्दी सियासत के दलदल में फ़ंसने से बची रहे और शिया अक़ाइद की सरहदों की हिफ़ाज़त होती रहे।

हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) ग़ैबत के ज़माने में दीन के आलिमों की बूमिका को बयान करते हुए फरमाते हैं :

अगर ऐसे आलिम न होते जो इमाम महदी (अ.स.) की ग़ैबत के ज़माने में लोगों को उनकी तरफ बुलाते हैं और उनको अपने इमाम की तरफ़ हिदायत करते हैं , अल्लाह की हुज्जतों और ख़ुदा वन्दे आलम के दीन की मज़बूत दलीलों की हिमायत करते हैं , और अगर ऐसे बुद्धीमान व सूज बूझ आलिमे दीन न होते जो ख़ुदा के बन्दों को शैतान व शैतान सिफत लोगों और अहलेबैत (अ.स.) के दुशमनों की दुशमनी के जाल से न बचाते तो फिर कोई भी अल्लाह के दीन पर बाक़ी न रहता !! ( और सब दीन से बाहर निकल चुके होते ) लेकिन उन्होंने शिओं के अक़ीदों व फ़िक्रों को अपने हाथों में ले लिया जैसे किश्ती का ना ख़ुदा कश्ती में सवार मुसाफिरों को अपने हाथों में ले लेता है। यह आलिम ख़ुदा वन्दे आलम के नज़दीक सब से बेहतरीन ( बन्दे ) हैं

यह बात ध्यान देने योग्य है कि समाज की इमामत के लिए कुछ ख़ास सिफ़तों व कमालों की ज़रूरत होती है। क्योंकि मोमेनीन के दीन व दुनिया के सब कामों को उन इंसान के हाथों में दे दिया जाता है जो इस महान ज़िम्मेदारी के ओहदेदार होते हैं अतः उनका बुद्धिमान होना और सही मौक़े पर सही फ़ैसला लेने की योग्यता रखना ज़रुरी है। इसी वजह से मासूम इमामों (अ.स.) ने मुराजा ए दीनी और उन से बढ़ कर वली ए अम्रे मुस्लेमीन ( वलीए फ़कीह ) की कुछ ख़ास शर्तें बयान की हैं।

हज़रत इमाम सादिक (अ.स.) ने फरमाया :

दीनी आलिमों व फ़कीहों में जो इंसान , छोटे व बड़े गुनाहों के मुक़ाबले में अपने को बचाये रखे , दीन व मोमेनीन के अक़ाइद का मुहाफिज़ हो , अपने नफ्स व इच्छाओं की मुख़ालेफ़त करता हो और अपने ज़माने के मौला व आक़ा ( इमाम ) की इताअत ( आज्ञापालन ) करता हो तो मोमेनीन पर वाजिब है कि उसकी पैरवी करें। यह भी याद रहे कि सिर्फ़ कुछ शिया फ़क़ीह ही ऐसे होंगे न कि सब लोग

तीसरा हिस्सा

ग़ायब इमाम के फ़ायदे

इंसानी समाज , सैंकड़ों साल से अल्लाह की हुज्जत के ज़हूर के फ़ायदों से वंचित है और इस्लामी समाज उस आसमानी व मासूम इमाम के पास जाने में असमर्थ है। इस स्थिति से यह सवाल यह उठता है कि उनके ग़ायब होने और लोगों की नज़रों व पहुँच से दूर , छुप कर जीवन व्यतीत करने से इस दुनिया व दुनिया वासियों को क्या फ़ायदे हैं ? क्या यह नहीं हो सकता था कि ज़हूर के ज़माने के नज़दीक उनका जन्म होता जिससे उनकी ग़ैबत के सख्त ज़माने को उनके शिया न देखते ?

यह सवाल और इसी तरह के अन्य सवाल इमाम और अल्लाह की हुज्जत की सही पहचान न होने की वजह से पैदा होते हैं।

इस संसार में इमाम का मर्तबा क्या है ? क्या उन के वजूद के सब फ़ायदे उन के ज़हूर पर ही आधारित हैं ? और क्या वह सिर्फ़ लोगों की हिदायत के लिए है , या उन का वजूद अल्लाह की पूरी मखलूक़ के लिए फ़ायदे व बरकत का कारण है ?

इमाम संसार का केन्द्र होता है

धार्मिक शिक्षाओं के आधार पर शियों का यह मत है कि इस संसार में मौजूद हर चीज़ के पास अल्लाह का फ़ैज़ इमाम के वास्ता से ही पहुँचता है। इस संसार के निज़ाम में इमाम एक ध्रुव व केन्द्र के समान है तथा संसार का पूरा निज़ाम उसी के चारों ओर घूमता है। उस के वजूद के बग़ैर इस संसार में इंसानों , जिन्नों , फ़रिश्तों और संक्षेप में यह कि किसी भी जानदार व बेजान चीज़ का नाम व निशान बाक़ी न रहता।

हज़रत इमाम सादिक़ (अ.स.) से सवाल पूछा गया कि क्या ज़मीन इमाम के बग़ैर बाक़ी रह सकती है ? इमाम (अ.स.) ने जवाब में कहा कि

अगर ज़मीन पर इमाम का वजूद न हो तो वह उसी वक़्त फ़ना हो जाये अर्थात उसका विनाश हो जाये ।

चूँकि वह लोगों तक ख़ुदा के पैगाम को पहुँचाने और लोगों को इंसानी कमालों की ओर की हिदायत करने में वास्ता होता हैं और इस संसार में मौजूद हर चीज़ तक हर तरह का फ़ैज़ व करम उसी के वजूद के ज़रिये पहुँचता है। यह बात स्पष्ट है कि ख़ुदा वन्दे आलम ने इंसानी समाज की हिदायत शुरु में नबियों (अ.स.) के जरिये और बाद में उन के जानशीनों ( इमामों ) के ज़रिये की है। लेकिन मासूम इमामों (अ.स.) के कलाम ( प्रवचनों ) से यह नतीजा निकलता है कि इस संसार में ख़ुदा वन्दे आलम की तरफ़ से हर छोटे व बड़े वजूद तक जो नेमत और फ़ैज़ पहुँचता है उस में इमाम ही वास्ता बनता है। इससे भी अधिक स्पष्ट रूप में यह कहा जा सकता है कि इस संसार में मौजूद प्रत्येक चीज़ ख़ुदा वन्दे आलम की तरफ़ से जो कुछ भी प्राप्त करती है वह इमाम के ज़रिये ही उस तक पहुँचती है। यही नही बल्कि उन का ख़ुद का वजूद भी इमाम के ही कारण है और वह अपनी ज़िन्दगी में जो कुछ भी प्राप्त करते हैं उस में भी इमाम की ज़ात ही वास्ता ( माध्यम ) बनती है।

ज़ियारते जामेआ ( जो कि हक़ीक़त में इमाम की पहचान के लिए एक अच्छी किताब है ) के एक वाक्य में इस तरह से वर्णन हुआ है कि :

” بِکُمْ فَتَحَ اللهُ وَ بِکُمْ یَخْتِمُ وَ بِکُمْ یُنَزِّلُ الغَیْثَ وَ بِکُمْ یُمسِکُ السَّمَاءَ اٴنْ تَقَعَ عَلَی الاٴرضِ إلاَّ بِإذْنِہِ ।

ऐ मासूम इमामों ! ख़ुदा वन्दे आलम ने इस संसार का ारम्भ तुम्हारी ही वजह से किया है और वह तुम्हारी ही वजह से उसे आख़िर तक पहुँचाएगा और तुम्हारे ही वजूद की वजह से रहमत की बारिश करता है और तुम्हारे ही वजूद की बरकत से ज़मीन पर आसमान को गिरने से बचाये हुए है , यह सब उसके के इरादे से है।

अतः यह नही कहा जा सकता कि इमाम (अ.स.) के वजूद के असर सिर्फ उन के ज़हूर की सूरत में ही हैं। इसके विपरीत वास्तविक्ता यह है कि उनका वजूद संसार में ( यहाँ तक कि उनकी ग़ैबत के ज़माने में भी ) अल्लाह की पूरी मख़लूक़ के बीच जीवन का स्रोत है। ख़ुद ख़ुदा वन्दे आलम की मर्ज़ी भी है कि सब से उत्तम व महान और हर प्रकार से पूर्ण वजूद ( अर्थात इमाम ) अल्लाह की अनुकम्पा को अल्लाह से प्राप्त कर के उसे उसकी अन्य मखलूक़ तक पहुँचाने में वास्ता बने , अतः इस आधार पर इमाम के ग़ायब या ज़ाहिर रहने से कोई फर्क नहीं पड़ता।

जी हाँ ! सभी , इमाम (अ.स.) के वजूद के असर से लाभान्वित होते हैं और इमाम महदी (अ.स.) की ग़ैबत इस बारे में कोई रुकावट नहीं है। ध्यान देने योग्य बात ये है कि जब हज़रत इमाम महदी (अ.स.) से उनकी ग़ैबत के ज़माने में उनसे लाभान्वित होने के तरीके के बारे में पूछा गया तो उन्होंने फरमाया :

” وَ اٴمَّا وَجہُ الإنْتِفَاعِ بِی فِی غَیْبَتِی فَکا الإنْتِفَاعِ بِالشَّمْسِ إذَا غَیَّبَتْہَا عَنِ الاٴبْصَارِ السَّحَابَ “ ....

मेरी ग़ैबत के ज़माने में मुझ से उसी तरह फ़ायदा होगा , जिस तरह बादलों के पीछे छिपे सूरज से फायदा उठाया जाता है।

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) ने अपनी मिसाल सूरज से और अपनी ग़ैबत की मिसाल बादल के पीछे छिपे सूरज की सी दी है। इस मिसाल में बहुत से रहस्य पाये जाते हैं , अतः हम यहाँ पर उन में से कुछ की तरफ़ इशारा कर रहे हैं।

सौर मंडल ( सोलर सिस्टम ) में सूरज एक केन्द्र का काम करता है और अन्य सब ग्रह उसी के चारों ओर घूमते हैं , इसी तरह हज़रत इमाम महदी (अ.स.) का वजूद भी इस संसार के निज़ाम व व्यवस्था में ध्रुवीय स्थान रखता है।

”بِبَقَائِہِ بَقِیَتِ الدُّنْیَا وَ بِیُمْنِہِ رُزِقَ الوَریٰ وَ بِوُجُوْدِہِ ثَبَتَتِ الاٴرْضُ وَ السَّمَاءُ “

उस ( इमाम ) के बाक़ी रहने की वजह से ही दुनिया बाकी है और उस के वजूद की बरकत से संसार के हर मौजूद को रोज़ी मिलती है और उस के वजूद की वजह से ही ज़मीन और आसमान बाक़ी हैं।

सूरज एक पल के लिए भी अपने प्रकाश की किरणें फैलाने में कंजूसी नहीं करता और हर चीज़ अपनी आवश्यक्ता अनुसार सूरज के प्रकाश से लाभान्वित होती है। इसी तरह हज़रत इमाम महदी (अ.स.) का वजूद भी समस्त भौतिक व आध्यात्मिक नेमतों को प्राप्त करने का माध्यम है। हर इंसान कमालों के उस केन्द्र से अपने संबंध के अनुसार लाभान्वित होता है।

अगर यह सूरज बादलों के पीछे भी न रहे तो इस इतनी अधिक ठंड हो जायेगी और अंधेरा फैल जायेगा कि कोई भी जानदार ज़मीन पर नहीं रह सकेगा। इसी तरह अगर यह संसार इमाम (अ.स.) के वजूद से वंचित हो जाये ( वह ग़ैबत में भी न रहे ) तो मुश्किलें , परेशानियाँ , कठिनाईयाँ और विपत्तियाँ इतनी बढ़ जायेंगी कि इंसानी ज़िन्दगी आगे बढ़ने से रुक जायेगी और समस्त प्राणियों का अन्त हो जायेगा।

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) ने शेख मुफीद अलैहिर्रहमा को एक ख़त लिखा , जिस में उन्होंने अपने शिओं के लिए निमन लिखित पैग़ाम लिखा था।

” اِنَّا غَیْرُ مُہْمِلِیْنَ لِمُرَاعَاتِکُمْ وَ لاٰ نَاسِیْنَ لِذِکْرِکُمْ وَ لَولٰا ذَلِکَ لَنَزَلَ بِکُمُ اللاَّوَاءُ وَ اصْطَلَمَکُمُ الاٴعْدَاءُ

न हम तुम्हें कभी तुम्हारे हाल पर छोडते हैं और न कभी तुम्हें भूलते हैं , अगर तुम पर हमेशा हमारी तवज्जोह न होती तो तुम पर बहुत सी विपत्तियाँ और बलायें नाज़िल होतीं और दुश्मन तुम को मिटा कर रख देते।

अतः इमाम (अ.स.) के वजूद का सूरज पूरे संसार पर चमकता है और संसार में मौजूद हर चीज़ को लाभ पहुँचता है और उन समस्त प्राणियों के बीच इंसानों को और इंसानों में इस्लामी समाज को और इस्लामी समाज में मुख्यः रूप से शिओं को विशेष ख़ैर व बरकत पहुँचाता है। हम यहाँ पर इस के कुछ नमूने आप की सेवा में पेश कर रहे हैं।

उम्मीद की किरण

इंसान की ज़िन्दगी का सबसे महत्वपूर्ण धन उम्मीद होती है , उम्मीद ही इंसान की ज़िन्दगी में जीवन का आधार और खुशी का कारण बनती है। इंसान के क्रिया कलापों का आधार उम्मीद ही होती है। इस संसार में इमाम (अ.स.) का वजूद उज्जवल भविषय और ख़ुशी की उम्मीद का आधार है। शिया अपने चौदह सौ साल के इतिहास में हमेशा ही विभिन्न मुश्किलों और परेशानियों में घिरे रहे हैं। जिस चीज़ ने हमें ज़ुल्म व अत्याचार के विरुद्ध आन्दोलन चलाने की ताक़त दी और ज़ालिम व अत्याचारियों के सामने न झुकने दिया वह अच्छे व उज्जवल भविषय की उम्मीद थी। ऐसा उज्जवल भविषय काल्पनिक और मन गड़त नहीं , बल्कि वास्तविक्ता रखता है और नज़दीक है और बहुत नज़दीक भी हो सकता है , क्यों कि जो इंसान विश्वव्यापी आन्दोलन और इंकेलाब के नेतृत्व की ज़िम्मेदारी संभाले हुए है , वह ज़िन्दा है और हर वक़्त तैयार है। यह तो हम हैं जिन्हें तैयार होने की ज़रूरत है।

विचार धारा की मज़बूती

हर समाज को अपनी सुरक्षा और अपने निश्चित उद्देशयों को पाने के लिए एक माहिर नेतृत्व की ज़रुरत होती है , ताकि वह समाज उसकी हिदायत (मार्गदर्शन) के अनुसार सही रास्ते पर क़दम बढ़ाये। किसी भी समाज के लिए इमाम और हादी का वजूद बहुत ही आवश्यक है ताकि वह समाज एक बेहतरीन निज़ाम व व्यवस्था के अन्तर्गत अपने अस्तित्व को बाकी रख सके और भविषय के परोग्रामों व योजनाओं को स्थायित्व प्रदान करने के लिए अपनी कमर कस कर बाँध ले। ज़िन्दा और अच्छा रहबर अगर लोगों के बीच न रहे तब भी आधारभूत विषयों और काम करने के उपायों को बताने में लापरवाई नहीं करता और भटकाने वाले रास्तों से विभिन्न तरीकों से होशियार करता रहता है।

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) ग़ैबत में हैं लेकिन उनका वजूद शिया मज़हब की सुरक्षा का सबसे अच्छा साधन है। वह पूर्ण जानकारी के साथ शिया अक़ीदों को दुश्मनों की साज़िशों से विभिन्न तरीक़ों से बचाते हैं और जब मक्कार दुश्मन विभिन्न चालों के ज़रिये शिया मज़हब के उसूल (आधारभूत सिद्धान्तों) और एतेक़ादों को निशाना बनाता है तो उस वक़्त वह (अ.स.) कुछ ख़ास लोगों व आलिमों की हिदायत कर के दुश्मन के मक्सद को नाकाम बना देते हैं।

नमूने के तौर पर बहरैन के शिओं के संबंध में हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की मेहरबानी और तवज्जोह को अल्लामा मजलिसी अलैहिर्रहमा की ज़बानी सुनते हैं। यह घटना निम्न लिखित है---

पिछले ज़माने में बहरैन में एक नासबी की हुकूमत थी और उसका वज़ीर वहाँ के शिओं से बहुत ज़्यादा दुशमनी रखता था। एक दिन वज़ीर बादशाह के पास एक अनार लेकर पहुँचा। उस अनार पर क़ुदरती तौर पर यह वाक्य लिखा हुआ था :

”لا الہ الا الله محمد رسول الله، و ابوبکر و عمر و عثمان و علی خلفاء

رسول الله “

ला इलाहा इल्लल्लाह , मुहम्मदुर रसूलुल्लाह व अबू बकर व उमर व उस्मान व अली ख़ुलफ़ा ए रसूलुल्लाह। बादशाह उस अनार को देख कर ताज्जुब में पड़ गया और उस ने अपने वज़ीर से कहा : यह तो शिया मज़हब के बातिल (असत्य) होने की स्पष्ट व खुली दलील है। बादशाह ने वज़ीर से पूछा कि बहरैन के शिओं को बारे में तुम्हारा क्या ख़्याल है ?! वज़ीर ने जवाब दिया : मेरी राय के अनुसार उन को हाज़िर किया जाये और उन्हें यह निशानी दिखाई जाये , अगर उन लोगों ने मान लिया तो उन को अपना मज़हब छोड़ना होगा , वर्ना तीन चीज़ों में से एक को ज़रुर मानना होगा! या तो वह संतुष्ट करने वाला जवाब ले कर आयें या जज़िया.. दिया करें , या उनके मर्दों को क़त्ल कर के उनके बीवी बच्चों को क़ैदी बना लें और उनके माल व दौलत को ग़नीमत का माल मानते हुए अपने माल में मिला लें।

बादशाह ने उसकी राय को मान लिया और शिया आलिमों को अपने पास बुला भेजा। जब शिया आलिम उसके पास पहुँचे तो उसने उन्हें वह अनार दिखाया और कहा कि अगर तुम इस बारे में कोई सबूत न पेश कर सके तो मैं तुम्हे क़त्ल कर दूँगा और तुम्हारे बीवी बच्चों को क़ैदी बना लूँगा या फिर तुम्हें जज़िया देना होगा। यह सुन कर शिया आलिमों ने उस से तीन दिन की मोहलत मांगी। इसके बाद उन आलिमों ने आपस में राय मशवरा करने के बाद यह तय किया कि अपने बीच से बहरैन के दस नेक और पर्हेज़गार आलिमों को चुना जाये और वह दस आलिम अपने बीच से तीन आलिमों को चुने और वह इमामे ज़माना से इस मसले का हल मालूम करें। जब वह तीन आलिम चुन लिये गये तो उन्होंने उन में से एक आलीम से कहा : आप आज जंगल में निकल जाइये और इमामे ज़माना (अ.स.) से फ़रियाद कर के उनसे इस मुसीबत से छुटकारे का रास्ता मालूम कीजिये , क्यों कि वही हमारे इमाम और हमारे मालिक हैं। उन साहब ने जंगल में जा कर इमामे ज़माना को पुकारना शुरू किया , लेकिन इमामे ज़माना (अ.स.) से मुलाक़ात न हो सकी। दूसरी रात दूसरे इंसान को भेजा गया , लेकिन उनको भी कोई जवाब न मिल सका। आख़िरी रात तीसरे आलिम मुहम्मद पुत्र ईसा को भेजा गया। वह भी जंगल में गये और उन्होंने रोते हुए इमाम (अ.स.) से मदद गुहार की , जब रात अपनी आखरी मंज़िल पर पहुंची तो उन्होंने सुना कि कोई इंसान उनसे संबोधित हो कर कह रहा है कि ऐ मुहम्मद पित्र ईसा! मैं तुम्हें इस हालत में क्यों देख रहा हूँ ?! और तुम इस जंगल में परेशान क्यों घूम रहे हो ?! मोहम्द पुत्र ईसा ने कहा कि आप मुझे मेरे हाल पर छोड़ दीजिये , उन्होंने फरमाया : ऐ मुहम्मद पुत्र ईसा ! मैं तुम्हारे ज़माने का इमाम हूँ। तुम अपनी परेशानी बयान करो। मुहम्मद पुत्र ईसा ने कहा : अगर आप मेरे ज़माने के इमाम हैं तो मेरी परेशानी भी जानते हैं मुझे बताने की क्या ज़रुरत है ?! फरमाया : तुम सही कहते हो। तुम अपनी मुसीबत की वजह से यहाँ आये हो। उन्होंने कहा : जी हाँ आप जानते हैं कि हम पर क्या मुसीबत पड़ी है। आप ही हमारे इमाम और हमारी पनाहगाह हैं।

यह सुनने के बाद इमाम (अ.स.) ने फरमाया : ऐ मुहम्मद पुत्र ईसा ! उस वज़ीर (लाअनतुल्लाह अलैह) के यहाँ एक अनार का दरख्त है जिस वक़्त उस दरख्त पर अनार लगना शुरु हुए तो उसने मिट्टी का एक साँचा बनवाया और उस पर यह वाक्य लिख कर एक छोटे अनार पर उस सांचे को बांध दिया। जैसे जैसे वह अनार बड़ा होता गया उसके छिलके पर उस वाक्य के शब्द अंकित होते गये। तुम उस बादशाह के पास जाना और उस से कहना कि मैं तुम्हारा जवाब वज़ीर के घर जा कर दूँगा। जब तुम उसके साथ वज़ीर के घर पहुँच जाओ तो वज़ीर से पहले फलां कमरे में जाना , वहाँ तुम्हें एक सफ़ैद थैला मिलेगा उसी थैले में वह मिट्टी का साँचा रखा हुआ है , उस को निकाल कर बादशाह को दिखाना। दूसरी निशानी यह है कि बादशाह से कहना कि हमारा दूसरा मोजज़ा यह है कि जब अनार के दो हिस्से करोगे तो अनार के अन्दर से मिट्टी और धुँऐं के अलावा कोई चीज़ नही निकलेगी।

मुहम्मद पुत्र ईसा , इमाम (अ.स.) के इस जवाब से बहुत खुश हुऐ और शिया आलिमों के पास लौट आये। अगले दिन वह सब बादशाह के पास पहुँचे और जो इमाम (अ.स.) ने जो फरमाया था उसको बादशाह के सामने पेश कर दिया।

बहरैन के बादशाह ने इस मोजज़े को देखा तो शिया मज़हब का आशिक़ हो गया और हुक्म दिया कि इस मक्कार वज़ीर को क़त्ल कर दिया जाये...

तरबियत

कुरआने करीम में वर्णन होता है :

< وَقُلْ اعْمَلُوا فَسَیَرَی اللهُ عَمَلَکُمْ وَرَسُولُہُ وَالْمُؤْمِنُون۔۔۔ >

और (ऐ पैग़म्बर) आप कह दीजिये कि तुम लोग अमल (कार्य) करते रहो , तुम्हारे अमल को अल्लाह , रसूल और मोमेनीन देख रहे हैं।

रिवायतों में उल्लेख मिलता है कि इस आयत में मोमेनीन अइम्मा ए मासूमीन (अ.स.) को कहा गया हैं..। इस आधार पर मोमेनीन के आमाल (अच्छे व बुरे सब कार्य) इमामे ज़माना (अ.स.) की नज़रों के सामने होते हैं और वह ग़ैबत में रहते हुए भी हमारे क्रिया कलापों पर नज़र रखे हुए हैं। यह बात तरबियत के दृष्टिकोण से बहुत अधिक महत्वपूर्ण है और शिओं को अपने इक्रया कलापों को सुधारने की प्रेरणा देती है। यही बात शियों को अल्लाह की हुज्जत और मोमिनों के इमाम के सामने बुराइयों और गुनाहों में लिप्त होने से रोकती है। यह बात पूर्ण रूप से स्वीकारीय है कि इंसान उस पाक़ और साफ़ ज़ात पर जितना अधिक ध्यान देगा , उस के दिल का आइना उतनी ही पाक़ीज़गी और सफ़ाई उसकी रुह में भर देगा और फिर यह प्रकाश उसकी बात चीत व व्यवहार में झलकने लगेगा।

इल्मी और फ़िक्री पनाह गाह

अइम्मा मासूमीन (अ.स.) समाज के सच्चे व वास्तविक शिक्षक और सही तरबियत करने वाले हैं। मोमेनीन हमेशा उन्हीं हज़रात के साफ़ सुथरे व पाक इल्म से लाभान्वित होते हैं। ग़ैबत के ज़माने में क्योंकि हम सीधे इमाम (अ.स.) की सेवा में नही पहुँच सकते हैं और उनसे लाभान्वित होने का जो हक़ है उस मात्रा में उन से लाभान्वित नहीं हो सकते है , लेकिन वह अल्लाह के इल्म के केन्द्र फिर भी शिओं की इल्म और फिक्र से संबंधित मुश्किलों को दूर करते रहते हैं। ग़ैबते सुग़रा के ज़माने में बहुत से मोमिनों और आलिमों के सवालों के जवाबात इमाम (अ.स.) के ज़रिये ही हल हुए हैं..

हज़रत इमामे ज़माना (अ.स.) ने इस्हाक़ पुत्र याक़ूब के सवाल के जवाब में इस तरह लिखा था--

ख़ुदा वन्दे आलम तुम्हारी हिदायत करे और तुम्हें साबित क़दम रखे , चूँकि आप ने हमारे खानदान और चचा ज़ाद भाईयों में से हमारा इन्कार करने वालों के बारे में सवाल किया तो तुम्हें मालूम होना चाहिए कि ख़ुदा के साथ किसी की कोई रिश्तेदारी नहीं है , अतः जो इंसान भी मेरा इन्कार करेगा वह हम में से नहीं है और उसका अन्त जनाबे नूह (अ.स.) के बेटे की तरह होगा और जब तक तुम अपने माल को पाक़ न करलो , हम उसे क़बूल नहीं कर सकते।

लेकिन जो रक्म आप ने हमारे लिए भेजी है उसको इस वजह से क़बूल करते हैं कि पाक व पाकीज़ा है।

और जो इंसान हमारे माल को अपने लिए हलाल समझता है और उसको हज़्म कर लेता है , वह ऐसा है हजन्नम की आग खा रहा है। अब रहा मुझ से फ़ायदा उठाने का मसला तो जिस तरह बादलों में छिपे सूरज से फ़ायेदा उठाया जाता है ,उसी तरह मुझ से भी फायेदा हासिल किया जा सकता है , और मैं ज़मीन वालों के लिए उसी तरह अमान हूँ , जिस तरह सितारे आसमान वालों के लिए अमान हैं। जिन चीज़ों का तुम्हें कोई फ़ायेदा नहीं हैं उनके बारे में सवाल न करो , और जिस चीज़ का तुम से तक़ाज़ा नहीं किया गया उस चीज़ को सीखने से बचो , और हमारे ज़हूर के लिए ज़्यादा दुआयें किया करो कि इस से तुम्हारे लिए भी आसानियाँ होंगी। ऐ इस्हाक़ पुत्र याक़ूब तुम पर हमारा सलाम हो और उन मोमिनों पर जो हिदायत के रास्ते हासिल करते हैं...

इस के अलावा ग़ैबते सुग़रा के बाद भी शिया आलिमों ने अनेकों बार इल्म व फ़िक्र से संबंधित अपनी मुश्किलों को इमाम (अ.स.) से बयान करके उनका हल मालूम किया है।

मीर अल्लामा , मुकद्दस अरदबेली के शागिर्द इस तरह लिखते हैं।

आधी रात का वक़्त था और मैं नजफ़े अशरफ़ में हजरत इमाम अली (अ.स.) के रोज़ा ए अक़दस में था। अचानक मैं ने एक इंसान को रौज़े की तरफ़ आते देखा , मैं आने वाले की तरफ़ बढ़ा जैसे ही कुछ क़रीब पहुँचा तो देखा कि वह हमारे उस्ताद मुल्ला अहमद मुकद्दस अरदबेली अलैहीर्रहमा हैं। मैं उन्हें देख कर जल्दी से एक तरफ़ छिपा गया। मेरे बाहर अने के बाद रोज़े का दरवाज़ा बंद हो चुका था , वह रौज़ ए मुतहर के दरवाज़े पर पहुँचे मैं ने देखा की अचानक दरवाज़ा खुला और वह रौज़ा ए मुकद्दस के अंदर दाखिल हो गये और थोड़ी ही देर बाद रौज़े से बाहर निकले और कूफ़े शहर की तरफ़ रवाना हो गये।

मैं , उन के पीछे पीछे , छिप कर इस तरह चलने लगा ताकि वह मुझे न देख सकें , यहाँ तक कि वह मस्जिदे कूफ़ा में दाखिल हो गये और सीधे उस मेहराब के पास गए जहाँ हज़रत अली (अ.स.) को ज़रबत लगी थी। कुछ देर वहाँ रहने के बाद मस्जिद से बाहर निकले और फिर नजफ़ की तरफ़ रवाना हो गये। मैं फिर उनके पीछे पीछे चलने लगा वहाँ से वह मस्जिदे हन्नाना में पहुँचे , वहाँ पहुँच कर अचानक मुझे खाँसी आ गई , जैसे ही उन्होंने मेरे खाँसने की आवाज़ सुनी , घूम कर मेरी तरफ़ देखा और मुझे पहचान लिया और कहा : आप मीर अल्लामा ही तो हैं ?! मैं ने कहा : जी हाँ। उन्हों ने पूछा : यहाँ क्या कर रहे हो ? मैं ने जवाब दिया : जब से आप हज़रत अली (अ.स.) के रौज़े में दाखिल हुए थे , मैं उसी वक़्त से आप के साथ हूँ। आप को उस क़ब्र में सोई हुई ज़ात के हक़ का वास्ता ! मैं ने जो आज यह वाकिया देखा है , मुझे इसका राज़ बता दीजिये।

उन्होंने फरमाया : ठीक है , लेकिन इस शर्त के साथ कि जब तक मैं ज़िन्दा रहूँगा आप इस बात को किसी के सामने बयान नहीं करेंगे। जब मैं ने उन्हें इस बात का इत्मिनीन दिलाया तो उन्होंने फरमाया : जब मेरे सामने कोई मुश्किल पेश आती है तो मैं उसके हल के लिए हज़रत अली (अ.स.) से तवस्सुल करता हूँ। इस रात भी मेरे सामने एक मुश्किल मसला पेश आया और मैं उसके बारे में ग़ौर व फिक्र करता रहा , अचानक मेरे दिल में यह बात आई कि हज़रत अली (अ.स.) की बारगाह में जाऊँ और उन्हीं से इस मसले का हल मालूम करूँ।

जब मैं रौज़ ए मुकद्दस के पास पहुँचा तो जैसा कि आप ने भी देखा कि बन्द दरवाज़ा खुल गया। मैंने रौज़े में दाखिल हो कर ख़ुदा की बारगाह में रोना और गिड़गिड़ाना शुरू कर दिया ताकि हज़रत इमाम अली (अ.स.) की बारगाह से इस मसले का हल मिल जाये। अचानक कब्रे मुनव्वर से आवाज़ आई कि कूफ़ा जाओ और हजरत क़ायम (अ.स.) से इस मसले का हल मालूम करो , क्यों कि वही तुम्हारे इमामे ज़माना हैं। अतः मैं यह सुनने के बाद मस्जिदे कूफ़ा की मेहराब के पास गया और हज़रत इमाम महदी (अ.स.) से उस सवाल का जवाब मालूम किया और अब इस वक़्त अपने घर की तरफ़ जा रहा हूँ...

आन्तरिक हिदायत

इमाम , क्योंकि लोगों की हिदायत और उनका नेतृत्व करने का ज़िम्मेदार होता है , अतः उसकी यह कोशिश होती है कि जिन लोगों में हिदायत हासिल करने की योग्यता पाई जाती हैं , उनकी हिदायत करे। अतः ख़ुदा वन्दे आलम की तरफ़ से सौंपी गई इस ज़िम्मेदारी को पूरा करने के लिए कभी वह सीधे सादे तरीक़े से इंसानों से संबंध स्थापित करता है और अपनी बात चीत से उन्हें कामयाबी का रास्ता दिखा देता है और कभी कभी ख़ुदा वन्दे आलम की तरफ़ से प्रदान की गई विलायत की ताक़त से फ़ायेदा उठाते हुए लोगों के दिलों को अपने क़ब्ज़ें में कर लेता है और इस ख़ास करम के ज़रिये दिलों को नेकियों व अच्छाईयों की तरफ़ झुका देता है और उनके लिए फलने फूलने का रास्ता हमवार कर देता हैं। इस दूसरी सूरत में इमाम (अ.स.) के खुले आम मौजूद रहने और लोगों से सीधा संपर्क बनाने की ज़रुरत नहीं होती बल्कि अन्दर ही अन्दर दिल को साफ़ कर के हिदायत कर दी जाती है। हज़रत इमाम अली (अ.स.) इस बारे में इमाम के काम को बयान करते हुए फरमाते हैं :

ख़ुदा वन्दे आलम ! तेरी तरफ़ से ज़मीन पर एक हुज्जत होती है जो मख़लूक को तेरे दीन की तऱफ़ हिदायत करती है और अगर वह ज़ाहिरी तौर पर लोगों के बीच न रहे तब भी उसकी तालीम और उसके बताये हुए आदाब मोमेनीन के दिलों में मौजूद रहते हैं और वह उसी के अनुसार कार्य करते हैं...

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) ग़ैबत में रहते हुए इसी तरह विश्वव्यापी परिवर्तन व आन्दोलन के लिए कार आमद लोगों की हिदायत की कोशिश करते रहते है और जिन लोगों में यह ज़रूरी योग्यता पाई जाती हैं वह इमाम (अ.स.) की ख़ास तरबियत के अन्तर्गत उनके ज़हूर के लिए तैयार हो जाते हैं। यह ग़ैबत में रहने वाले इमाम के मंसूबों में से एक मंसूबा है जो उनके वजूद की बरकत से पूरहा होता है।

मुसीबतों से सुरक्षा

इस बात में कोई शक़ नहीं है कि इंसान की ज़िन्दगी का सबसे बड़ी व आधारभूत दौलत शाँति और सुरक्षा है , संसार में घटित होने वाली विभिन्न घटनाएं हमेशा ही समस्त प्राणियों की प्राकृतिक ज़िन्दगी को खतरे में डाल कर मौत के मुँह तक पहुंचती रही हैं। वैसे तो विपत्तियों और मुसीबतों को भौतिक चीज़ों के ज़रिये रोका जा सकता है , लेकिन आध्यात्मिक चीज़ें भी उन में बहुत प्रभावी सिद्ध होती हैं। हमारे अइम्मा मासूमीन (अ.स.) की रिवायतों में इस संसार के निज़ाम में इमाम और अल्लाह की हुज्जत के वजूद को ज़मीन और इस इसके वासियों के लिए शाँति व सुरक्षा की वजह माना गया है।

हज़रत इमामे ज़माना (अ.स.) ख़ुद फरमाते हैं कि :

” وَ إنِّی لَاَمَانٌ لِاٴہْلِ الاٴرْضِ “

और मैं ज़मीन वासियों के लिए (विपत्तियों से) अमान हूँ।

इमाम (अ.स.) का वजूद , लोगों को उनके गुनाहों और बुराईयों की वजह से अल्लाह के सख्त अज़ाब में फँसने और ज़मीन वासियों की ज़िन्दगी को ख़त्म होने से रोकता है।

इस बारे में कुरआने करीम में पैग़म्बरे इस्लाम (स.) को संबोधित करते हुए वर्णन होता है-

<وَمَا کَانَ اللهُ لِیُعَذِّبَہُمْ وَاٴَنْتَ فِیہِمْ ۔۔۔ >

और अल्लाह उन पर उस वक़्त तक अज़ाब नही करेगा , जब तक पैग़म्बर (स.) आप उनके बीच में मौजूद हैं।

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) जो अल्लाह की रहमत व मुहब्बत को प्रदर्शित करने वाले हैं , वह भी अपनी खास तवज्जोह के ज़रिये बड़ी बड़ी विपत्तियों व बलाओं को ख़ास तौर पर हर शिया से दूर करते हैं। जबकि हम बहुत सी जगहों पर उनके करम की तरफ़ नहीं देते और मदद करने वाले को नहीं पहचानते।

आप ख़ुद अपनी शिनाख्त के बारे में फरमाते हैं कि :

”اَنَا خَاتِمُ الاٴوْصِیَاءِ، وَ بِی یَدْفَعُ اللهُ عَزَّ وَ جَلَّ الْبَلَاءُ مِنْ اٴَہْلِی وَ شِیْعَتِی “

मैं अल्लाह के पैग़म्बर (स.) का आख़री जानशीन (उत्तराधिकारी) हूँ , और ख़ुदा वन्दे आलम मेरे वजूद के ज़रिये मेरे खानदान और मेरे शिओं से बलाओं को दूर करता है।

ईरान के इस्लामी इंक़ेलाब के प्रारम्भिक दौर में और इराक व ईरान की जंग के दौरान विभिन्न अवसरों पर इमामे ज़माना (अ.स.) के करम व मुहब्बत को इस क़ौम और हुकूमत पर साया करते हुए देखा गया है और इमाम ने इस्लामी हुकूमत और अपने चाहने वाले शिओं को दुशमन की खतर्नाक साज़िशों से सही व सालिम रखा है। 21 बहमन (एक ईरानी महीने का नाम) को इमाम खुमैनी अलैहर्रहमा के हाथों शहनशाही हुकूमत का खात्मा , सन् 1359 हिजरी में तबस के बयाबान में अमेरीकी फ़ौजी हेली कोप्टरों का ज़मीन पर गिरना , सन् 1361 हिजरी में 21 तीर (ईरानी महीने का नाम) को नोज़ह नामी बग़ावत की असफलता और इराक से आठ साल की जंग में दुशमन की नाकामी आदि ऐसे नमूने हैं जो इस बात के ज़िन्दा गवाह हैं।

रहमत की बारिश

पूर्ण संसार के महान महदी मऊद (पलट कर आने वाले को मऊद कहते हैं , क्योंकि हज़रत महदी अलैहिस्सलाम ग़ैब हो गये थे और बाद में अल्लाह के हुक्म से पलट कर आयेंगे इसी वजह से उन्हें महदी मऊद कहा जाता है और यह उनका मशहूर लक़ब है।) मुसलमानों की तमन्नाओं के केन्द्र और शिओं के दिलों के महबूब , हजरत इमामे ज़माना (अ.स.) हमेशा लोगों की ज़िन्दगी के हालात पर नज़र रखे हुए हैं। उनका ग़ैब रहना चाहने वालों पर करम करने व मुहब्बतें लुटाने के रास्ते में रुकावट नहीं है। वह चौदहवीं रात का चाँद अपने शिओं और मदद माँगने वालों से हमेशा मुहब्बत करता है। वह कभी तो बीमार लोगों के सिरहाने हाज़िर होते हैं और अपने हाथों को उनके ज़ख्मों के लिए मरहम का रूप देते हैं। कभी जंगलों में भटकते हुए मुसाफिरों पर करम करते हैं और तन्हाई की वादी में भटकते हुए लाचार व बेकस लोगों की मदद और मार्गदर्शन करते हुए ना उम्मीदी की ठंडी हवाओं में इन्ज़ार करने वाले दिलों को उम्मीद की गर्मी प्रदान करते हैं। वह अल्लाह की रहमत की बारिश हैं जो दिलों के खुश्क बंजरों पर बरस कर शिओं के लिए अपनी दुआओं के ज़रिये हरयाली व खुशी पेश करते हैं। वह जानमाज़ पर बैठ कर ख़ुदा वन्दे आलम की बारगाह में अपने हाथों को फ़ैला कर हमारे लिए यह दुआ करते है :

ऐ नूरों के नूर ! ऐ तमाम कामों की प्रबंध करने वाले ! ऐ मुर्दों को ज़िन्दा करने वाले ! मुहम्मद व आले मुहम्मद पर सलवात भेज और मुझे और मेरे शिओं को मुश्किलों से निजात व छुटकारा दे और दुखः दर्दों को दूर कर , और हमारे लिए हिदायत के रास्ते को बड़ा कर दे , और जिस रास्ते में हमारे लिए आसानियाँ हों उसे हमारे लिए खोल दे, ऐ करीम ! तू हमारे साथ वह सलूक कर जिसका तू अहल है।

प्रियः पाठकों ! हम अब तक जो कुछ उल्लेख कर चुके हैं , वह इस बात का स्पष्ट करता हैं कि इमाम (अ.स.) से उनकी ग़ैबत के दौरान राब्ता करना मुम्किन है और उनसे मुत्तसिल होना कोई मुश्किल बात नहीं है। यह इमाम (अ.स.) के वजूद का असर है और जो लोग इस बात की योग्यता व सलाहियत रखते थे उन्होंने अपने महबूब इमाम से मुलाक़ात की लज़्ज़त ली हैं और उनके समीपय का लाभ उठाया है।

चौथा हिस्सा

इमाम की ज़ियारत

इस ग़ैबत के ज़मान की सब से बड़ी मुश्किल और परेशानी यह है कि शिया अपने मौला व आक़ा के दर्शन से वंचित हैं। ग़ैबत का ज़माना शुरु होने के बाद से उनके ज़हूर का इन्तेज़ार करने वालों के दिलों को हमेशा यह तमन्ना बेताब करती रही है कि किसी भी तरह से यूसुफे ज़हरा (अ.स.) की ज़ियारत हो जाये। वह इस जुदाई में हमेशा ही रोते बिलकते रहते हैं। ग़ैबते सुग़रा के ज़माने में शिया अपने महबूब इमाम से उनके खास नायबों के ज़रिये संबंध स्थापित किये हुए थे और उनमें से कुछ लोगों को इमाम (अ.स.) की ज़ियारत का भी श्रेय प्राप्त हुआ और इस बारे में बहुत सी रिवायतें मौजूद हैं , लेकिन इस ग़ैबते कुबरा के ज़माने में , जिस में इमाम (अ.स.) पूर्ण रूप से ग़ैबत को अपनाये हुए हैं और किसी से भी उनकी मुलाक़ात संभव नही है , वह संबंध ख़त्म हो गया है। अब इमाम (अ.स.) से आम तरीक़े से या ख़ास लोगों के ज़रिये मुलाक़ात करना भी संभव नहीं है।

लेकिन फिर भी बहुत से आलिमों का मत है कि इस ज़माने में भी उस चमकते हुए चाँद से मुलाक़ात करना संभव है और अनेकों बार ऐसी घटनाएं घटित हुई हैं। कुछ महान आलिमों जैसे अल्लामा बहरुल उलूम , मुकद्दस अरदबेली और सय्यद इब्ने ताऊस आदि की इमाम से मुलाक़ात की घटनाएं बहुत मशहूर हैं और बहुत से आलिमों ने अपनी किताबों में उनका उल्लेख किया है...

लेकिन हम यहाँ पर यह बता देना ज़रुरी समझते हैं कि इमामे ज़माना (अज्जल अल्लाहु तआला फ़रजहू शरीफ़) की मुलाक़ात के बारे में निम्न लिखित बातो पर ज़रूर ध्यान देना चाहिए।

पहली बात तो यह है कि इमाम महदी (अ.स.) से मुलाक़ात बहुत ही ज़्यादा परेशानी और लाचारी की हालत में होती है लेकिन कभी कभी आम हालत में और किसी परेशानी के बग़ैर भी हो जाती है। इससे भी अधिक स्पष्ट शब्दों में यूँ कहें कि कभी इमाम (अ.स.) की मुलाक़ात मोमेनीन की मदद की वजह से होती है जब कुछ लोग परेशानियों में घिर जाते हैं और तन्हाई व लाचारी का एहसास करते हैं तो उन्हें इमाम की ज़ियारत हो जाती है। जैसे कोई हज के सफर में रास्ता भटक गया और इमाम (अ.स.) अपने किसी सहाबी के साथ तशरीफ़ लाये और उसे भटकने से बचा लिया। इमाम (अ.स.) से अधिकतर मुलाक़ातें इसी तरह की हैं।

लेकिन कुछ मुलाक़ातें सामान्य हालत में भी हुई हैं और मुलाक़ात करने वालों को अपनी आध्यात्मिक उच्चता की वजह से इमाम (अ.स.) से मुलाक़ात करने का श्रेय प्राप्त हुआ।

अतः इस पहली बात के मद्दे नज़र यह ध्यान रहे कि इमाम (अ.स.) से मुलाक़ात के संबंध में हर इंसान के दावे को क़बूल नहीं किया जा सकता।

दूसरी बात ये है कि ग़ैबते कुबरा के ज़माने में ख़ास तौर पर आज कल कुछ लोग इमामे ज़माना (अ.स.) से मुलाक़ात का दावा कर के मशहूर होने के चक्कर में रहते हैं। वह अपने इस काम से बहुत से लोगों को अक़ीदे और अमल में गुमराह कर देते हैं। वह कुछ बे-बुनियाद व निराधार दुआओं को पढ़ने और कुछ ख़ास काम करने के आधार पर इमामे ज़माना की ज़ियारत करने का भरोसा दिलाते हैं। वह इस तरह उस ग़ायब इमाम की मुलाक़ात को सबके लिए एक आसान काम के रूप में प्रस्तुत करते हैं , जबकि इस बात में कोई शक नहीं है कि इमाम (अ.स.) ख़ुदा वन्दे आलम के इरादे के अनुसार पूर्ण रूप से ग़ैबत में हैं और सिर्फ कुछ गिने चुने शीर्ष के लोगों से ही इमाम (अ.स.) की मुलाक़ात होती है और उनकी निजात का रास्ता भी अल्लाह के करम को प्रदर्शित करने वाले इमाम का करम है।

तीसरी बात यह है कि मुलाकात सिर्फ़ इसी सूरत में संभव है जब इमामे ज़माना (अ.स.) उस मुलाक़ात में कोई मसलेहत या भलाई देखें। अतः अगर कोई मोमिन अपने दिल में इमाम (अ.स.) की ज़ियारत का शौक पैदा करे और इमाम ( अ. स.) से मुलाक़ात न हो सके तो फिर ना उम्मीदी का शिकार नहीं होना चाहिए और इसको इमाम (अ.स.) के करम के न होने की निशानी नहीं मानना चाहिए , जैसा कि जो अफराद इमाम (अ.स.) से मुलाक़ात में कामयाब हुए हैं उस मुलाक़ात को तक़वे और फ़ज़ीलत की निशानी बताने लगे।

नतिजा यह निकलता है कि इमाम ज़माना (अ.स.) के नूरानी चेहरे की ज़ियारत और दिलों के महबूब से बात चीत करना वास्तव में एक बहुत बड़ी सआदत है लेकिन अइम्मा (अ.स.) ख़ास तौर पर ख़ुद इमामे ज़माना (अ.स.) अपने शिओं से ये नहीं चाहते कि वह उन से मुलाक़ात की कोशिश करें और अपने इस मक़सद तक पहुँचने के लिए चिल्ले ख़ीँचें या जंगलों में भटकते फिरें। बल्कि इसके विपरीत आइम्मा ए मासूमीन (अ.स.) ने बहुत ज़्यादा ताकीद की है कि हमारे शिओं को हमेशा अपने इमाम को याद रखना चाहिए , उनके ज़हूर के लिए दुआ करनी चाहिए , उनको ख़ुश रखने के लिए अपने व्यवहार व आचरण को सुधारना चाहिए और उनके महान उद्देश्यों के लिए आगे क़दम बढ़ाना चाहिए ताकि जल्दी से जल्दी दुनिया की आख़िरी उम्मीद के ज़हूर का रास्ता हमवार हो जाये और संसार उनके वजूद से सीधे तौर पर लाभान्वित हो सके।

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) ख़ुद फरमाते हैं कि

” اٴَکثرُوا الدُّعاءَ بِتَعجِیْلِ الفرجِ، فإنَّ ذَلکَ فرَجُکُم

मेरे ज़हूर के लिए बहुत ज़्यादा दुआएं किया करो , उसमें तुम्हारी ही भलाई और आसानी है।

उचित था कि हम यहाँ पर मरहूम हाज अली बगदादी (जो अपने ज़माने के नेक इंसान थे) की दिल्चस्प मुलाक़ात का सविस्तार वर्णन करते लेकिन संक्षेप की वजह से अब हम उसके महत्वपूर्ण अंशों की तरफ़ इशारा करते हैं।

वह मुत्तक़ी और नेक इंसान हमेशा बगदाद से काज़मैन जाया करते थे और वहाँ दो इमामों (हज़रत इमाम मूसा काज़िम (अ.स.) और हज़रत इमाम मुहम्मद तक़ी (अ.स.) की ज़ियारत किया करते थे। वह कहते हैं कि मेरे ज़िम्मे ख़ुम्स और कुछ अन्य शरई रक़म थी , इसी वजह से मैं नजफ़े अशरफ़ गया और उनमें से 20 दीनार आलमे फ़क़ीह शेख अन्सारी (अलैहिर्रहमा) को और 20 दीनार आलमे फ़क़ी शेख मुहम्मद हसन काज़मी (अलैहिर्रहमा) को और 20 दीनार आयतुल्लाह शेख मुहम्मद हसन शरुक़ी (अलैहिर्रहमा) को दिये और यह इरादा किया कि मेरे ज़िम्मे जो 20 दीनार बाक़ी रह गये हैं वह बग़दाद वापसी पर आयतुल्लाह आले यासीन (अलैहिर्रहमा) को दूँगा। जब जुमेरात के दिन बगदाद वापस आया तो सब से पहले काज़मैन गया और दोनों इमामों की ज़ियारत करने के बाद आयतुल्लाह आले यासीन के घर पर गया। मेरे ज़िम्मे खुम्स की रक्म का जो एक हिस्सा बाक़ी रह गया था वह उनकी खिदमत में पेश की और उन से इजाज़त माँगी कि इसमें से बाक़ी रक़म (इन्शाअल्लाह) बाद में ख़ुद आप को या जिस को मुस्तहक़ समझूँगा अदा कर दूंगा। वह मुझे अपने पास रोकने की ज़िद कर रहे थे , लेकिन मैं ने अपने ज़रुरी काम की वजह से उनसे माफ़ी चाही और ख़ुदा हाफिज़ी कर के बगदाद की तरफ़ रवाना हो गया। जब मैं ने अपना एक तिहाई सफर तय कर लिया तो रास्ते में एक तेजस्वी सैय्यद को देखा। वह हरे रंग का अम्मामा बाँधे हुए थे और उन के गाल पर काले तिल का एक निशान था। वह ज़ियारत के लिए काज़मैन जा रहे थे। वह मेरे पास आये और मुझे सलाम करने के बाद बड़ी गर्म जोशी के साथ मुझ से हाथ मिलाया और मुझे गले लगा कर कहा खैर तो है कहाँ जा रहे हैं ?

मैं ने जवाब दिया : ज़ियारत कर के बगदाद जा रहा हूँ , उन्हों ने फरमाया : आज जुमे की रात है काज़मैन वापस जाओ और आज की रात वहीं रहो। मैं ने कहा : मैं नहीं जा सकता। उन्होंने कहाः तुम यह काम कर सकते हो , जाओ ताकि मैं यह गवाही दूँ कि तुम मेरे जद्द अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) के और हमारे दोस्तों में से हो , और शेख भी गवाही देते हैं , ख़ुदा वन्दे आलम फरमाता है :

وَ اسْتَشْہِدُوا شَہِیدَیْنِ مِنْ رِجَالِکُم

और अपने मर्दों में से दो को गवाह बनाओ।

हाज अली बग़दादी कहते हैं कि मैं ने इस से पहले आयतुल्लाह आले यासीन से दर्ख्वास्त की थी कि मेरे लिए एक सनद लिख दें जिस में इस बात की गवाही हो कि मैं अहले बैत (अ.स.) के चाहने वालों में से हूँ ताकि इस सनद को अपने कफ़न में रखूँ। मैं ने सैय्यिद से सवाल किया आप मुझे कैसे पहचानते हैं और किस तरह गवाही देते हैं ? उन्होंने जवाब दिया : इंसान उस इंसान को किस तरह न पहचाने जो उस का पूरा हक़ अदा करता हो , मैं ने पूछा कौन सा हक़ ? उन्होंने कहा कि वही हक़ जो तुम ने मेरे वक़ील को दिया है। मैं ने पूछा : आपका वक़ील कौन है ? उन्होंने फरमाया : शेख मुहम्मद हसन। मैं ने पूछा कि क्या वह आप के वक़ील हैं ? उन्होंने जवाब दिया : हाँ।

मुझे उनकी बातों पर बहुत ज़्यादा ताज्जुब हुआ ! मैं ने सोचा कि मेरे और उन के बीच कोई बहुत पुरानी दोस्ती है जिसे मैं भूल चुका हूँ , क्यों कि उन्हों ने मुलाक़ात के शुरु ही में मुझे मेरे नाम से पुकारा था। मैं ने यह सोचा चूँकि वह सैय्यिद हैं अतः मुझ से खुम्स की रक़म लेना चाहते हैं। अतः मैं ने उनसे कहा कि कुछ सहमे सादात मेरे ज़िम्मे है और मैं ने उसे खर्च करने की इजाज़त भी ले रखी है। यह सुन कर वह मुस्कुराए और कहा : जी हाँ , आप ने हमारे सहम का कुछ हिस्सा नजफ़ में हमारे वकीलों को अदा कर दिया है। मैं ने सवाल किया : क्या ये काम ख़ुदा वन्दे आलम की बारगाह में क़ाबिले क़बूल है ? उन्हों ने फरमाया : जी हाँ।

मैं ने सोचा भी कि यह सैय्यिद इस ज़माने के बड़े आलिमों को किस तरह अपना वकील बता रहे हैं , लेकिन एक बार फिर मुझे गफ़लत सी हुई और मैं इस बात को भूल गया।

मैं ने कहा : ऐ बुज़ुर्गवार ! क्या यह कहना सही है कि जो इंसान जुमे की रात हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) की ज़ियारत करे वह अल्लाह के अज़ाब से बचा रहता है। उन्होंने फरमाया : जी हाँ , यह बात सही है। अब मैं ने देखा कि उनकी आँखें फ़ौरन आंसूओं से भर गईं। कुछ देर बीतने के बाद हम ने अपने ापको काज़मैन के रौजे पर पाया , किसी सड़क और रास्ते से गुज़रे बग़ैर , हम रोज़े के सद्र दरवाज़े पर खड़े हुए थे , उन्होंने मुझसे फ़रमाया : ज़ियारत पढ़ो। मैं ने जवाब दिया : बुज़ुर्गवार मैं अच्छी तरह नहीं पढ़ सकूँगा। उन्होंने फरमाया : क्या मैं पढ़ूँ , ताकि तुम भी मेरे साथ पढ़ते रहो ? मैं ने कहा : ठीक है।

अतः उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम और अन्य इमामों पर एक एक कर के सलाम भेजा और हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) के नाम के बाद मेरी तरफ़ रुख कर के सवाल किया : क्या तुम अपने इमामे ज़माना को पहचानते हो ? मैं ने जवाब में कहा क्यों नहीं पहचानूंगा ! यह सुन कर उन्होंने फ़रमाया तो फिर उन पर सलाम करो। मैं ने कहा:

لسَّلامُ عَلَیْکَ یَا حُجَّةَ اللهِ یَا صَاحِبَ الزَّمَانِ یَابْنَ الْحَسَنِ !

अस्सलामो अलैक या हुज्जत अल्लाहे या साहेबज़्ज़मान यबनल हसन। वह बुज़ुर्गवार मुसुकुराए और फरमाया عَلَیکَ السَّلام وَ رَحْمَةُ اللّٰہِ وَ بَرَکَاتُہُ۔ अलैकस्सलाम व रहमतुल्लाहे व बरकातोह।

उस के बाद हरम में वारिद हुए और ज़रीह का बोसा लेकर मुझ से फरमाया: ज़ियारत पढ़ो। मैं ने अर्ज़ किया ऐ बुज़ुर्गवार मैं अच्छी तरह नहीं पढ़ सकता। यह सुन कर उन्होंने फरमाया : क्या मैं आप के लिए पढ़ूँ , मैं ने जवाब दिया : जी हाँ , अप ही पढ़ा दीजिए। उन्होंने अमीनुल्लाह नामक मशहूर ज़ियारत पढ़ी और फरमाया : क्या मेरे जद (पूर्वज) इमाम हुसैन (अ.स.) की ज़ियारत करना चाहते हो ? मैं ने कहा : जी हाँ , आज जुमे की रात है और यह हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) की ज़ियारत की रात है। उन्होंने हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) की मशहूर ज़ियारत पढ़ी। उस के बाद नमाज़े मगरिब का वक़्त हो गया। उन्होंने ने मुझ से फरमाया : नमाज़ को जमाअत के साथ पढ़ो। नमाज़ के बाद वह बुज़ुर्गवार अचानक मेरी नज़रों से गायब हो गए , मैं ने बहुत तलाश किया लेकिन वह न मिल सके।

फिर मेरे ध्यान में आया कि सैय्यिद ने मुझे नाम ले कर पुकारा था और मुझ से कहा था कि काज़मैन वापस लौट जाओ , जबकि मैं नहीं जाना चाहता था। उन्हों ने ज़माने के बड़े फ़क़ीहों और आलिमों को अपना वकील बताया और आखिर में मेरी नज़रों से अचानक गायब हो गये। इन तमाम बातों पर ग़ौर व फिक्र करने के बाद मुझ पर ये बात स्पष्ट हो गई कि वह हज़रत इमामे ज़माना (अ.स.) थे , लेकिन अफ़सोस कि मैं इस बात को बहुत देर के बाद समझ सका...


पाँचवां हिस्सा

लंबी उम्र

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की ज़िन्दगी से संबंधित जो बहसें हैं उन में से एक बहस उनकी लंबी उम्र के बारे में भी है। कुछ लोगों के दिमाग़ों में यह सवाल पैदा होता है कि एक इंसान की इतनी लंबी उम्र कैसे हो सकती है ?

इस सवाल का आधार और कारण यह है कि आज कल के ज़माने में साधारण रूप से 80 से 100 साल उम्र होती है... अतः इतनी कम उम्र को देखने और सुनने के बाद , इतनी लंबी उम्र पर कैसे यक़ीन करें !। वरना तो लंबी उम्र का मसला अक़्ल और साइंस के आधार पर भी कोई असंभव बात नहीं है। बहुत से बुद्धिजीवियों ने इंसान के बदन के अंशों पर तहक़ीक़ कर के यह नतीजा निकाला है कि इंसान बहुत ज़्यादा लंबी उम्र भी पा सकता है , यहाँ तक कि उसे बुढ़ापे और कमज़ोरी का एहसास तक नही होगा।

बरनार्ड शा कहता है कि

“ सभी बायोलोजिस्ट इस बात को क़बूल करते हैं कि इंसान की उम्र के लिए किसी हद व सामा का निर्धारण नहीं किया जा सकता है , और न ही लंबी उम्र के लिए कोई हद निश्चित नहीं की जा सकती...। ”

प्रोफेसर अटेन्गर लिखते हैं कि

“ मेरी अपनी राय यह है कि टैक्निकल तरक्की और हमाने जो काम शुरु किया है उसके आधार पर इक्कीसवीं सदी के लोग हज़ारों साल जीवित रह सकते हैं..। ”

अतः बुढ़ापे पर क़ाबू पाने और एक लंबी उम्र तक जीवन यापन करने के बारे में बुद्धिजीवियों के लिए कुछ रास्ते हमवार हुए हैं और इस से इस बात का अंदाज़ा होता है कि इस तरह लंबी उम्र पाने की संभावना पाई जाती है। अतः इस बारे में कुछ सकारात्मक क़दम उठाए गए हैं और इस वक़्त भी दुनिया में बहुत से ऐसे लोग मौजूद हैं जो उचित खान पान , जल वायु और अन्य शारीरिक व मानसिक कामों के आधार पर 150 साल या उस से भी ज़्यादा जीवित रहते हैं। इस के अलावा सब से महत्वपूर्ण बात यह है कि इतिहास में ऐसे बहुत से लोग पाये जाते हैं जिन्हों ने लंबी उम्र पाई है। इतिहास व आसमानी किताबों में ऐसे बहुत से लोगों के नाम और उनकी ज़िन्दगी के हालात का वर्णन मिलता हैं जिनकी उम्र आज कल के इंसानों से बहुत ज़्यादा थी।

इस बारे में बहुत सी किताबें और लेख लिखे गए हैं , हम यहाँ पर निम्न लिखित नमूने पेश कर रहे हैं।

1. कुरआने करीम में एक ऐसी आयत है जो न सिर्फ़ यह कि इंसान की लंबी उम्र की खबर देती है बल्कि उम्रे जावेदां (अमरता) के बारे में खबर दे रही है , चुनांचे हज़रत यूनुस (अ.स.) के बारे में वर्णन होता है

فَلَوْلاَاٴَنَّہُ کَانَ مِنْ الْمُسَبِّحِینَ # لَلَبِثَ فِی بَطْنِہِ إِلَی یَوْمِ یُبْعَثُونَ

अगर वह (जानाबे यूनुस अ. स.) मछली के पेट में तस्बीह न पढ़ते तो क़ियामत तक मछली के पेट में ही रहते।

अतः यह आयत बहुत ज़्यादा लंबी उम्र (जानाबे यूनुस (अ.स.) के ज़माने से क़ियामत तक) के बारे में खबर दे रही है और इसे बुद्धिजीवियों व विशेषज्ञों की ज़बान में उम्रे जावेदां (अमरता) कहा जाता है। अतः इंसान और मछली के बारे में लंबी उम्र का मसला एक संभव बात है...।

2. कुरआने करीम में हज़रत नूह (अ.स.) के बारे में वर्णन होता है कि

बेशक हम ने नूह को उन की क़ौम में भेजा जिन्हों ने उन के बीच 950 साल जीवन व्यतीत किया...

इस आयत में जिस मुद्दत का वर्णन हुआ है वह उन की नबूवत और तबलीग की मुद्दत है , क्योंकि कुछ रिवायतों में उल्लेख मिलता है कि हज़रत नूह (अ.स.) की उम्र 2450 साल थी...।

उल्लेखनीय बात यह है कि हज़रत इमाम ज़ैनुल आबदीन (अ.स.) की एक रिवायत में वर्णन हुआ है कि

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की ज़िन्दगी में जनाबे नूह (अ.स.) की सुन्नत पाई जाती है और वह सुन्नत उनकी लंबी उम्र है...।

3. और इसी तरह जनाबे ईसा (अ.स.) के बारे में वर्णन होता है कि

बेशक उनको क़त्ल नहीं किया गया और न ही उनको सूली दी गई है बल्कि उनको ग़लत फहमी हुई है , बेशक उनको क़त्ल नहीं किया गया है बल्कि ख़ुदा वन्दे आलम ने उनको अपनी तरफ़ बुला लिया है कि ख़ुदा वन्दे आलम कुदरत वाला और हकीम है...।

सभी मुसलमान कुरआन व अहादीस के अनुसार इस बात पर ईमान रखते हैं कि हज़रत ईसा (अ.स.) ज़िन्दा हैं और वह आसमानों में रहते हैं। वह हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के ज़हूर के वक़्त आसमान से नाज़िल होंगे और उनकी मदद करेंगे।

हज़रत इमाम मुहम्मद बाकिर (अ.स.) फरमाते हैं कि

“ उन साहिबे अम्र (इमाम महदी अ.स.) की ज़िन्दगी में चार नबियों (अ.स.) की चार सुन्नतें पाई जाती हैं....उन में हज़रत ईसा (अ.स.) की सुन्नत यह है कि उनके (इमाम महदी अ.स.) बारे में भी लोग यही कहेंगे कि वह मर चुके हैं , जबकि वह ज़िन्दा रहेंगे...

कुरआने करीम के अलावा ख़ुद तौरैत और इंजील में भी लंबी उम्र वाले लोगों का वर्मन हुआ है , जैसा कि तौरैत में उल्लेख हुआ है कि :

जनाबे आदम की पूरी उम्र नौ सौ तीस साल थी जिस के बाद वह मर गए। अनूश की उम्र नौ सौ पांच थी , क़िनान की उम्र नौ सौ दस साल थी , मतूशालेह की उम्र नौ सौ उनहत्तर साल थी...।

इस आधार पर ख़ुद तौरात में बहुत से लोगों की लंबी उम्रों (नौ सौ साल से भी ज़्यादा) का वर्णन किया गया है।

इंजील में भी कुछ ऐसा वर्णन मिलता हैं जिस से यह बात स्पष्ट होती है कि जनाबे ईसा (अ.स.) सूली पर चढ़ाए जाने के बाद दोबारा ज़िन्दा हुए और आसमानों में ऊपर चले गए... ...और एक ज़माने में आसमान से नाज़िल होंगे जबकि इस वक़्त जनाबे ईसा (अ.स.) की उम्र दो हज़ार साल से भी ज़्यादा है।

प्रियः पाठकों ! इस विवरण से ये बात स्पष्ट हो जाती है कि यहूदी व ईसाई धर्मों के मानने वाले चूँकि अपनी पवित्र किताब पर ईमान रखते हैं अतः उनके अनुसार से भी लंबी उम्र का अक़ीदा सही है।

इन सब के अलावा लंबी उम्र का मसला अक्ल और साइंस के आधार पर भी स्वीकारीय है और इतिहास में इस के बहुत से नमूने मिलते हैं। ख़ुदा वन्दे आलम की असीम कुदरत व शक्ति के आधार पर भी इसे सिद्ध किया जा सकता है। सभी आसमानी धर्मों के अनुयायी इस बात में विश्वास रखते है कि इस संसार का कण कण ख़ुदा वन्दे आलम के क़ब्ज़े में है और समस्त घटकों का प्रभाव भी उसी की ज़ात से संबंधित है , अगर वह न चाहे तो कोई भी घटक अपना असर न दिखाये , लेकिन वह किसी भी घटक के बग़ैर उसके असर व प्रभाव को पैदा कर सकता है।

वह ऐसा अल्लाह है जो पहाड़ो के अन्दर से ऊँट निकाल सकता है , भड़कती हुई आग से जनाबे इब्राहीम (अ.स.) को सकुशल बाहर निकाल सकता है और जनाबे मूसा (अ.स.) व उनके मानने वालों के लिए दरिया को सुखा कर ऐसा रास्ता बना सकता है कि वह दो दीवारों के बीच से आराम से निकल सकें... तो अगर वही अल्लाह तमाम नबियों और वलियों के वारिस , तमाम नेक इंसानों की तमन्नाओं के केन्द्र और कुरआने करीम के इस महान वादे को पूरा करने वाली अपनी आख़िरी हुज्जत को इतनी लंबी उम्र दे तो इस में ताज्जुब की कौन सी बात है।

हज़रत इमाम हसने मुजतबा (अ.स.) फरमाते हैं कि

“ ख़ुदा वन्दे आलम उन (इमाम महदी अ.स.) की उम्र को उनकी ग़ैबत के ज़माने में लंबी कर देगा और फिर अपनी कुदरत के ज़रिये उनको जवानी की हालत में (चालीस साल से कम) ज़ाहिर करेगा , ताकि लोगों को यह यक़ीन हो जाये कि ख़ुदा वन्दे आलम हर चीज़ पर क़ादिर है...।

अतः हमारे बारहवें इमाम हज़रत महदी (अ.स.) की लंबी उम्र भी विभिन्न तरीक़ों , अक्ल साइंस और इतिहास के आधार पर संभव व स्वीकारीय है और इन सबके अलावा ख़ुदा वन्दे आलम और उसकी क़ुदरत के जलवों में से एक जलवा है।

छटा हिस्सा

इन्तेज़ार

जब काले बादल सूरज के तेजस्वी चेहरे को छिपा दें , दश्त व जंगल सूरज की चरण स्पर्श से वंचित हो जायें और पेड़ पौधे व फल फूल उस सूरज की मुहब्बत की दूरी से बेजान हो जायें तो उस वक़्त क्या किया जाये ? जब अच्छाईयों का मुजस्समा और खुबसूरतियों का आइना अपने चेहरे पर ग़ैबत की नकाब ड़ाल ले और इस दुनिया में रहने वाले उसके लाभ से वंचित हो जायें तो क्या करना चाहिए ?

चमन के फूलों को इंतेज़ार है कि मेहरबान बाग़बान उनको देखता रहे और वह उसकी मुहब्बत भरी बातों से जीवन अमृत पियें। दिल में शौक़ व उमंग है और आँखें बेताब हैं कि किसी तरह जल्दी से जल्दी उस के नूरानी चेहरे की ज़ियारत हो जाये। यहीँ से इंतेज़ार का अर्थ व मअना समझ में आते हैं। जी हाँ ! सभी इंतेज़ार कर रहें हैं कि वह आयें और अपने साथ ख़ुशियों का तोहफ़ा ले कर आयें।

वास्तव में यह इन्तेज़ार कितना दिलकश , खुबसूरत , हसीन व मिठास से भरा हुआ है ! अगर इस की खुबसूरती को नज़र में रखा जाये और इस के मिठास को दिल की गहराईयों से चखा जाये , तो यह बात समझ में आ सकती है।

इन्तेज़ार की हक़ीक़त और उसका महत्ता

इन्तेज़ार के विभिन्न अर्थ व मअनी वर्णन किये गए हैं , लेकिन इस शब्द पर गौर व फिक्र के ज़रिये इसके अर्थ की वास्तविक्ता तक पहुँचा जा सकता है। इन्तेज़ार का अर्त किसी के लिए आँखे बिछाना है। यह इन्तेज़ार शर्तें पूरी करने व रास्ता तैयार करने के लिहाज़ से महत्व पैदा करता है और इस से बहुत से नतीजे ज़ाहिर होते हैं। इन्तेज़ार सिर्फ़ रुह से संबंधित और आंतरिक हालत का नाम नहीं है , बल्कि यह एक ऐसी हालत होती है जो अन्दर से बाहर की तरफ़ असर करती है और इस के नतीजे में इंसान अपने अन्दर के एहसास के अनुसार काम करता है। इसी वजह से रिवायतों में इन्तेज़ार को एक बेहतरीन अमल बल्कि तमाम आमाल में बेहतरीन अमल की शक्ल में याद किया गया है। इन्तेज़ार , इन्तेज़ार करने वाले को एक हैसियत देता है और उसके कामों व कोशिशों की एक खास तरफ़ हिदायत करता है। इन्तेज़ार वह रास्ता है जो उसी चीज़ पर जा कर खत्म होता है जिस का इंसान को इन्तेज़ार होता है।

अतः इन्तेज़ार का अर्थ हाथ पर हाथ रख कर बैठना नही है , इंसान दरवाज़े पर आँखें जमाए रखे और हसरत लिए बैठा रहे , इसे इन्तेज़ार नहीं कहते , बल्कि हक़ीक़त तो यह है कि इन्तेज़ार में ख़ुशी , शौक व जज़्बा छुपा होता है।

जो लोग किसी अपने महबूब मेहमान का इन्तेज़ार करते हैं , वह ख़ुद को और अपने चारों ओर मौजूद चीज़ों को उस मेहमान के लिए तैयार करते हैं और उसके रास्ते में मौजूद रुकावटों को दूर करते हैं।

हमारी बात उस ला जवाब घटना के इन्तेज़ार के बारे में है जिसकी खूबसूरती और कमाल की कोई हद नहीं है। इन्तेज़ार उस ज़माने का है जिसकी खुशी और मज़े की मिसाल पिछले ज़माने में नहीं मिलती और इस दुनिया में अब तक ऐसा ज़माना नहीं आया है। हमें हज़रत इमामे ज़माना (अ.स.) की उस विश्वव्यापी हुकूमत के स्थापित होने का इन्तेज़ार है जिसे रिवायतों में इन्तेज़ारे फर्ज के नाम से याद किया गया है और जिसको आमाल व इबादत में बेहतरीन अमल बताया गया है , बल्कि जिसे तमाम ही आमाल क़बूल होने का वसीला क़रार दिया गया है।

हज़रत पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने फरमाया :

मेरी उम्मत का सब से बेहतरीन अमल (इन्तेज़ारे फरज) है...

हज़रत इमाम सादिक (अ.स.) ने अपने असहाब से फरमाया :

क्या मैं तुम लोगों को उस चीज़ के बारे में बताऊँ जिसके बग़ैर ख़ुदा वन्दे आलम अपने बन्दों से कोई भी अमल क़बूल नहीं करता ?! सब ने कहा : जी हाँ। इमाम (अ.स.) ने फरमाया :

ख़ुदा के एक होने का इक़रार , पैग़म्बरे इस्लाम (स.) की नबूव्वत की गवाही , ख़ुदा वन्दे आलम की तरफ़ से नाज़िल होने वाली चीज़ों का इकरार , हमारी विलायत और हमारे दुशमनों से नफ़रत व दूरी (यानी ख़ास तौर पर हम इमामों के दुशमनों से दूरी) , अइम्मा (अ.स.) की इताअत (आज्ञापालन) करना , तक़वा व परहेज़गारी को अपनाना , कोशिश करना व बुर्दबारी व सयंम से काम करना और क़ाइम आले मुहम्मद (अ.स.) का इन्तेज़ार...

बस इन्तेज़ारे फरज , ऐसा इन्तेज़ार है जिसकी कुछ विशेषताएं है और कुछ अपने तरीक़े के अलग ही एहसास हैं और उनको पूर्ण रूप से पहचानना ज़रुरी है ताकि उसके बारे में बयान किये जाने वाले तमाम फज़ाइल का राज़ मालूम हो सके।

इमामे ज़माना (अ.स.) के इन्तेज़ार की विशेषताएं

जैसे कि हम ने ऊपर उल्लेख किया है कि इन्तेज़ार इंसान की फितरत में शामिल है और हर कौम , दीन व मज़हब में इन्तेज़ार का तस्व्वुर पाया जाता है। इंसान की नीजी और सामाजिक ज़िन्दगी में पाया जाने वाला साधारण इन्तेज़ार चाहे कितना ही महत्वपूर्ण हो , वह हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के इन्तेज़ार के मुक़ाबले में बहुत छोटा है क्यों कि उनके ज़हूर के इन्तेज़ार की कुछ ख़ास विशेषताएं है ।

इमाम ज़माना (अ.स.) के ज़हूर का इन्तेज़ार , एक ऐसा इन्तेज़ार है जो संसार के आरम्भ से मौजूद था। यानी बहुत पुराने ज़माने में भी नबी (अ.स.) और वली उनके ज़हूर की खुश खबरी सुनाते थे और हमारे सभी मासूम इमाम (अ.स.) उनकी हुकूमत के ज़माने की तमन्ना रखते थे।

हज़रत इमाम सादिक़ (अ.स.) फरमाते हैं कि

"अगर मैं उनके (हज़रत इमाम महदी अ. स.) ज़माने में होता तो तमाम उम्र उनकी खिदमत करता...।"

इमाम महदी (अ.स.) का इन्तेज़ार , एक विश्व सुधारक का इन्तेज़ार है , न्याय व समानता पर आधारित एक विश्वव्यापी हुकूमत का इन्तेज़ार है , और समस्त अच्छाइयों के फलने फूलने व लागू होने का इन्तेज़ार है। अतः आज इंसानी समाज इसी इन्तेज़ार में अपनी आँखे बिछाए हुए है और ख़ुदा द्वारा प्रदान की गई पाक व पवित्र फ़ितरत के आधार पर उसकी तमन्ना करता है। यह इंसानी समाज किसी भी ज़माने में पूर्ण रूप से उस तक नहीं पहुँच सका है। हज़रत इमाम महदी (अ.स.) उस शख्सियत का नाम है जो न्याय , समानता , आध्यात्म , सयंम , बराबरी , ज़मीन की आबादी , मेल मुहब्बत , अक्ल की परिपक्वता व पूर्णता , और इंसानों के विभिन्न इल्मों की तरक्की को तोहफ़े में लायेंगे तथा साम्राज्यवाद व गुलामी , ज़ुल्म व अत्याचार , और अख़लाकी बुराईयों को जड़ से मिटा कर उनको ख़त्म करना उनकी हुकूमत का महत्वपूर्ण काम होगा।

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) का इन्तेज़ार , ऐसा इन्तेज़ार है जिसके फलने फूलने का रास्ता हमवार होने से ख़ुद इन्तेज़ार को भी चार चाँद लग जायेंगे और वह ऐसा आख़िरी ज़माना होगा जब तमाम इंसान एक समाज सुधारक और निजात व मुक्ति देने वाले की तलाश में होंगे। उस समय वह आयेंगे और अपने मददगारों के साथ बुराईयों के खिलाफ़ आन्दोलन चलायेंगे। ऐसा नही होगा कि वह आते ही अपने किसी मोजज़े (चमत्कार) से पूरी दुनिया के निज़ाम व व्यवस्था को बदल देंगे।

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) का इन्तेज़ार , उनका इन्तेज़ार करने वालों में उनकी मदद का शौक पैदा करता है और इंसान को हैसियत व ज़िन्दगी देता है और साथ ही साथ उनको उद्देशयहीनता व भटकने से बचाता है।

प्रयः पाठकों ! यह हैं उस इन्तेज़ार की कुछ विशेषताएं जो पूरे इतिहास की बराबर व्यापकता रखती हैं और हर इंसान की रुह में उस की जड़ें मिलती हैं। इसी लिए कोई दूसरा इन्तेज़ार इस महान इन्तेज़ार का ज़र्रा बराबर भी मुक़ाबेला नहीं सकता। अतः उचित है कि अब हम हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के इन्तेज़ार के विभिन्न पहलुओं और उसकी निशानियों व फ़ायदों को पहचानें और उनके ज़हूर का इन्तेज़ार करने वालों की ज़िम्मेदारियों और इस इन्तेज़ार के बे मिसाल सवाब के बारे में बाते करें।

इन्तेज़ार के पहलू

ख़ुद इंसान की ज़ात में विभिन्न पहलु पाये जाते हैं , एक तरफ़ जहाँ उस में थयोरिकल व परैक्टिकल पहलू पाया जाता हैं , वहीँ दूसरी तरफ़ उस में व्यक्तिगत और सामाजिक पहलू भी पाया जाता है। एक अन्य दृष्टिकोण से इंसान में जिस्म के पहलू के साथ रुह और नफ़्स का पहलू भी मौजूद होता है। इस बात में कोई शक नहीं है कि इन सब पहलुओं के लिए निश्चित क़ानूनों की ज़रुरत है , ताकि उनके अन्तर्गत इंसान के लिए ज़िन्दगी का सही रास्ता खुल जाये और भटकाने व गुमराह करने वाला रास्ते बन्द हो जायें।

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के ज़हूर का इन्तेज़ार , इन्तेज़ार करने वाले के तमाम पहलुओं को प्रभावित करता है। इंसान के सोच विचार व चिंतन का पहलू जो कि इंसान के व्यवहार व आमाल (क्रिया कलापों) का आधारभूत पहलू है , यह इंसानी ज़िन्दगी के बुनियादी अक़ीदों की हिफ़ाज़त करता है। दूसरे शब्दों में इस तरह कहा जा सकता है कि सही इन्तेज़ार इस बात का तक़ाज़ा करता है कि इन्तेज़ार करने वाला अपने ईमान व फ़िक्र की बुनियादों को मज़बूत करे ताकि गुमराह करने वाले मज़हब के जाल में न फँस सके। या हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की ग़ैबत लंबी हो जाने की वजह से ना उम्मीदी के दलदल में न फँस सके।

हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ.स.) फरमाते हैं कि

"लोगों के सामने एक ऐसा ज़माना आयेगा , जब उनका इमाम गायब होगा , खुश नसीब है वह इंसान जो उस ज़माने में हमारे अम्र (यानी विलायत) पर बाक़ी रहे...।"

यानी ग़ैबत के ज़माने में दुशमन विभिन्न शुबहें पैदा कर के शिओं के सही अक़ीदों को ख़त्म करने की कोशिश में लगा हुआ है , इस लिए हमें इन्तेज़ार के ज़माने में अपने अक़ीदों की हिफ़ाज़त करनी चाहिए।

इन्तेज़ार , अपने अमली पहलू में इंसान के कामों व किरदार को सही रास्ता दिखाता है। एक सच्चे मुन्तज़िर (इन्तेज़ार करने वाला) को अमल के मैदान में यह कोशिश करनी चाहिए कि इमाम महदी (अ.स.) की हक़ व सच्चाई पर आधारित हुकूमत का रास्ता हमवार हो जाये। अतः मुन्तज़िर को इस बारे में अपने और समाज के सुधार के लिए कमर बाँध लेनी चाहिए। मुन्तज़िर को चाहिए कि अपनी व्यक्तिगत ज़िन्दगी में अपनी आध्यात्मिक ज़िन्दगी और अखलाक़ी फज़ीलतों (श्रेष्ठताओं) को उच्चता प्रदान करने की कोशिश करे और अपने जिस्म व बदन को मज़बूत बनाये ताकि एक कारामद ताक़त के लिहाज़ से नूरानी मोर्चे के लिए तैयार रहे।

हज़रत इमाम सादिक (अ.स.) फरमाते हैं कि

"जो इंसान इमाम क़ाइम (अ.स.) के मददगारों में शामिल होना चाहता है उसे इन्तेज़ार करना चाहिए और इन्तेज़ार की हालत में तक़वे व परेहेज़गारी का रास्ता अपनाना चाहिए और अच्छे अखलाक़ व सदव्यवहार से सुसज्जित होना चाहिए...

इस इन्तेज़ार की एक विशेषता यह है कि यह इंसान को व्यक्तिगत ज़ीवन से ऊपर उठा कर उसे समाज के हर इंसान से जोड़ देता है। अर्थात इन्तेज़ार न सिर्फ़ यह कि इंसान के व्यक्तिगत जीवन में प्रभारी होता है बल्कि समाज में इंसानों के लिए एक खास योजना पेश करता है और समाज में सकारात्मक क़दम उठाने का शौक भी दिलाता है। चूँकि हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत सार्वजनिक है , अतः हर इंसान को अपनी सामर्थ्य अनुसार समाज सुधार के लिए काम करना चाहिए और समाज में फैली बुराईयों के प्रति खामोश व लापरवाह नहीं रहना चाहिए , क्यों कि विश्वव्यापी सुधार करने वाले के मुन्तज़िर को फिक्र व अमल के आधार पर सुधार व भलाई के रास्ते को अपनान चाहिए।

संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि इन्तेज़ार एक ऐसा मुबारक झरना है जिसका जीवन अमृत इंसान और समाज की रगों में जारी है और यह ज़िन्दगी के हर पहलू में इंसान को अल्लाह के रंग में रंगता है। अब आप ही फैसला करें कि अल्लाह के रंग से अच्छा रंग कौनसा हो सकता है ?!

कुरआने करीम में वर्णन होता है कि :

सिबग़तल्लाहे व मन अहसनु मिन अल्लाहे सिबग़तन व नहनु लहु आबेदून....

صِبْغَةَ اللهِ وَمَنْ اٴَحْسَنُ مِنْ اللهِ صِبْغَةً وَنَحْنُ لَہُ عَابِدُونَ

रंग तो सिर्फ़ अल्लाह का रंग है और उससे अच्छा किस का रंग हो सकता है और हम सब उसी के इबादत गुज़ार हैं।

उपरोक्त उल्लेखित अंशों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि हज़रत इमामे ज़माना (अ.स.) का इन्तेज़ार करने वालों की ज़िम्मेदारी अल्लाह के रंग में रंगे जाने के अलावा कुछ नहीं है। इन्तेज़ार की बरकत से यह रंग इंसान की व्यक्तिगत व सामाजिक ज़िन्दगी के विभिन्न पहलुओं में झलकता है। अगर इस नज़र से देखा जाये तो हम मिन्तज़िरों की यह ज़िम्मेदारियाँ हमारे लिए मुश्किल नहीं होंगी , बल्कि एक अच्छी घटना के रूप में हमारी ज़िन्दगी के हर पहलू को बेहतरीन आध्यातमिक रूप देंगी। वास्तव में अगर देश का मेहरबान बादशाह और काफ़ले का प्यारा सरदार हमें एक अच्छे व लायक़ सिपाही की हैसियत से ईमान के खेमे में बुलाए और हक़ व हक़ीक़त के मोर्चे पर हमारे आने का इन्तेज़ार करे तो फिर हमें कैसा लगेगा ? क्या उस समय हमें अपनी इन ज़िम्मेदारियों को निभाने में कोई परेशानी होगी कि ये काम करो और ऐसे न बनो ?, या हम ख़ुद इन्तेज़ार के रास्ते को पहचान कर अपने चुने हुए उद्देश्य व मक़सद की तरफ क़दम बढाते हुए नज़र आयेंगे ?

इन्तेज़ार करने वालों की ज़िम्मेदारियाँ

मासूम इमामों की हदीसों और रिवायतों में ज़हूर का इन्तेज़ार करने वालों की बहुत सी ज़िम्मेदारियों का वर्णन हुआ हैं। हम यहाँ पर उन में से कुछ महत्वपूर्ण निम्न लिखित ज़िम्मेदारियों का उल्लेख कर रहे हैं ।

इमाम की पहचान

इन्तेज़ार के रास्ते को तय करना , इमाम (अ.स.) की शनाख्त और पहचान के बग़ैर संभव नहीं है। इन्तेज़ार की वादी में सब्र से काम लेते हुए अडिग रहना , इमाम (अ.स.) की सही शनाख्त से संबंधित है। अतः हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के नाम व नस्ब की शनाख्त के अलावा उनकी महानता , महत्ता और उनके ओहदे को पहचानना भी बहुत ज़रुरी है।

अबू नस्र , जो कि हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) के सेवक थे , वह हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की ग़ैबत से पहले हज़रत इमाम हसन अस्करी (अ.स.) की सेवा में उपस्थित हुए। हज़रत इमाम महदी (अ.स.) ने उन से सवाल किया कि क्या आप मुझे पहचानते हैं ? उन्होंने जवाब दिया : जी हाँ ! आप मेरे मौला व आक़ा और मेरे मौला व आक़ा के बेटे हैं। इमाम (अ.स.) ने फरमाया : मेरा मक़सद ऐसी पहचान नहीं है , अबू नस्र ने कहा कि आप ही फरमाइये कि आप का मक़सद क्या था।

इमाम (अ.स.) ने फरमाया :

मैं पैग़म्बरे इस्लाम (स.) का आखरी जांनशीन हूँ , और ख़ुदा वन्दे आलम मेरी बरकत की वजह से हमारे खानदान और हमारे शिओं से बलाओं व विपत्तियों को दूर करता है...।

अगर इन्तेज़ार करने वालों को इमाम (अ.स.) की सही पहचान हो जाये तो फिर वह उसी वक़्त से ख़ुद को इमाम (अ.स.) के मोर्चे पर देखेगा और एहसास करेगा कि वह इमाम (अ.स.) और उनके ख़ेमे के नज़दीक़ है। अतः अपने इमाम के मोर्चे को मज़बूत बनाने में पल भर के लिए भी लापरवाही नहीं करेगा।

हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ.स.) ने फरमाया :

مَنْ مَاتَ وَ ہُوَ عَارِفٌ لِاِمَامِہِ لَمْ َیضُرُّہُ، تَقَدَّمَ ہَذَا الاٴمْرِ اٴوْ تَاٴخَّرَ، وَ مَنْ مَاتَ وَ ہُوَ عَارِفٌ لِاِمَامِہِ کَانَ کَمَنْ ہُوَ مَعَ القَائِمِ فِی فُسْطَاطِہِ “

जो इंसान इस हालत में मरे कि अपने ज़माने के इमाम को पहचानता हो तो ज़हूर में जल्दी या देर से होन से उसे कोई नुक्सान नहीं पहुँचाता , और जो इंसान इस हाल में मरे कि अपने ज़माने के इमाम को पहचानता हो तो वह उस इंसान की तरह है जो इमाम के ख़ेमे में और इमाम के साथ हो।

उल्लेखनीय है कि यह शनाख़्त और पहचान इतनी महत्वपूर्ण है कि मासूम इमामों (अ.स.) की हदीसों में बयान हुई है और इसको हासिल करने के लिए ख़ुदा वन्दे आलम से मदद माँगनी चाहिए।

हज़रत इमाम सादिक़ (अ.स.) ने फरमाया :

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की लंबी ग़ैबत के ज़माने में बातिल ख्याल के लोग अपने दीन और अक़ीदे में शक व शुब्हे में पड़ जायेंगे। इमाम (अ.स.) के खास शागिर्द जनाबे ज़ुरारा ने इमाम (अ.स.) से पूछा कि मौला अगर मैं उस ज़माने तक रहूँ तो क्या काम करूँ ?

हज़रत इमाम सादिक़ (अ.स.) ने फरमाया : इस दुआ को पढ़ना।

अल्लाहुम्म अर्रिफनी नफसक फइनलम तोअर्रिफनी नफसक लमआरिफ नबियक अल्लाहुम्मा अर्रिफनी रसूलक फइनलम तोअर्रिफनी रसूलक लमआरिफ हुज्जतक अल्लाहुम्म अर्रिफनी हुज्जतक फइन्नक लन तोअर्रिफनी हुज्जतक ज़ललतो अन दीनी..

. ”اَللّٰہُمَّ عَرِّفْنِی نَفْسَکَ فَإنَّکَ إنْ لَمْ تُعَرِّفْنِی نَفْسَکَ لَمْ اٴعْرِفْ نَبِیَّکَ، اَللّٰہُمَّ عَرِّفْنِی رَسُولَکَ فَإنَّکَ إنْ لَمْ تُعَرِّفْنِی رَسُولَکَ لَمْ اٴعْرِفْ حُجَّتَکَ، اَللّٰہُمَّ عَرِّفْنِی حُجَّتَکَ فَإنَّکَ إنْ لَمْ تُعَرِّفْنِی حُجَّتَکَ ضَلَلْتُ عَنْ دِیْنِی “

ऐ अल्लाह ! तू मुझे अपनी ज़ात की पहचान करा दे क्योंकि अगर तूने मुझे अपनी ज़ात की पहचान न कराई तो मैं तेरे नबी को नहीं पहचान सकता। ऐ अल्लाह : तू मुझे अपने रसूल की पहचान करा दे क्योंकि अगर तूने अपने रसूल की पहचान न कराई तो मैं तेरी हुज्जत को नहीं पहचान सकूंगा। ऐ अल्लाह ! तू मुझे अपनी हुज्जत की पहचान करा दे क्योंकि अगर तूने मुझे अपनी हुज्जत की पहचान न कराई तो मैं अपने दीन से गुमराह हो जाऊँगा।

प्रियः पाठकों ! इस दुआ में इस संसार के निज़ाम व व्यवस्था में इमाम (अ.स.) की महानता व महत्ता की पहचान है...। इमाम ख़ुदा वन्दे आलम की तरफ़ से हुज्जत और पैग़म्बरे इस्लाम (स.) का सच्चा जांनशीन और तमाम लोगों का हादी व इमाम होता है और उसकी इताअत (आज्ञा पालन) सब पर वाजिब है , क्यों कि उसकी इताअत ख़ुदा वन्दे आलम की इताअत है।

इमाम की शनाख़्त का दूसरा पहलू , इमाम (अ.स.) की सिफ़तों और उनकी सीरत की पहचान है।। शनाख़्त का यह पहलू इन्तेज़ार करने वाले के व्यवहार को बहुत ज़्यादा प्रभावी करता है। यह बात स्पष्ट है कि इंसान को इमाम (अ.स.) की जितनी ज़्यादा पहचान होगी , उसकी ज़िन्दगी में उसके उतने ही ज़्यादा असर पैदा होंगें।

इमाम (अ.) को नमून ए अमल व आदर्श बनाना

जब इमाम (अ.स.) की सही पहचान हो जायेगी और उनके खुबसूरत जलवे हमारी नज़रों के सामने होंगे तो उस कमाल ज़ाहिर करने वाली उस ज़ात को नमूना व आदर्श बनाने की बात आयेगी।

पैग़म्बरे इस्लाम (स.) फरमाते हैं कि :

"खुश नसीब है वह इंसान जो मेरी नस्ल के क़ाइम को इस हाल में देखे कि उस के क़ियाम (आन्दोलन) से पहले ख़ुद उसका और उस से पहले इमामों का अनुसरण करे और उनके दुशमनों से दूरी व नफ़रत का ऐलान करे , तो ऐसे लोग मेरे दोस्त और मेरे साथी हैं और यही लोग मेरे नज़दीक मेरी उम्मत के सब से महान इंसान हैं..।.

वास्तव में जो इंसान तक़वे , इबादत , सादगी , सखावत , सब्र और तमाम अखलाक़ी फज़ाइल में अपने इमाम का अनुसरण करे , उसका का रुतबा अपने इमाम के नज़दीक कितना ज़्यादा होगा और वह उनके पास पहुँचने से कितना गौरान्वित व सर बुलन्द होगा!।

क्या इस के अलावा और कुछ है कि जो इंसान दुनिया के सब से ख़ूबसूरत मंज़र को देखने का मुन्तज़िर हो , वह ख़ुद को अच्छाईयों से सुसज्जित करे और बुराईयों व बद अखलाक़ियों से दूर रहे और इन्तेज़ार के ज़माने में अपनी फ़िक्र व क्रिया कलापों की हिफ़ाज़त करता रहे , वरना आहिस्ता आहिस्ता बुराइयों के जाल में फँस जायेगा और उसके व इमाम के बीच फासला ज़्यादा होता जायेगा। ये एक ऐसी हक़ीक़त है जो ख़तरों से परिचित करने वाले इमाम (अ.स.) की हदीस में में बयान हुई है। यह हदीस निम्न लिखित है।

”فَمَا یَحْبِسُنَا عَنْہُمْ إلاَّ مَا یَتَّصِلُ بِنَا مِمَّا نُکْرِہُہُ وَ لاٰ نُوٴثِرُہُ مِنْہُم “

कोई भी चीज़ हमें हमारे शिओं से जुदा नहीं करती , मगर उनके वह बुरे काम जो हमारे पास पहुँचते हैं। न हम उन कामो को पसन्द करते हैं और न शिओं से उनको करने की उम्मीद रखते हैं।

इन्तेज़ार करने वालों की आखिरी तमन्ना यह है कि हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की वह विश्वव्यापी हुकूमत जो न्याय व समानता पर आधारित होगी , उसमें उनका भी कुछ हिस्सा हो और अल्लाह की उस आखरी हुज्जत की मदद करने का गौरव उन्हें भी प्राप्त हो। लेकिन यह महान सफलता व गौरव ख़ुद को बनाने संवारने और उच्च सदव्यवहार से सुसज्जित हुए बग़ैर संभव नहीं है।

हज़रत इमाम सादिक (अ.स.) फरमाते हैं कि

” مَنْ سَرَّہُ اٴنْ یَکُوْنَ مِنْ اٴصْحَابِ الْقَائِمِ فَلْیَنْتَظِرْ وَ لِیَعْمَلْ بِالْوَرَعِ وَ مَحَاسِنِ الاٴخْلاَقِ وَ ہُوَ مُنْتَظِر “

जो इंसान हज़रत क़ाइम (अ.स.) के मददगारों में शामिल होना चाहता हो , उसे तक़वे , पर्हेज़गारी और अच्छे अखलाक़ से सुसज्जित हो कर इमाम के ज़हूर का इन्तेज़ार करना चाहिए।

यह बात स्पष्ट है कि इस तमन्ना को पूरा करने के लिए ख़ुद हज़रत इमाम महदी (अ.स.) से अच्छा कोई नमूना व आदर्श नहीं मिल सकता क्योंकि वह सभी अच्छाईयों , नेकियों और खुबसूरतियों का आइना हैं।

इमाम (अ.स.) को याद रखना

जो चीज़ हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की पहचान और उनका अनुसरण व पैरवी करने में मददगार साबित होगी और इन्तेज़ार की राह में सब्र व दृढ़ता प्रदान करेगी , वह , रुह व आत्मा के वैद्य व चिकित्सक (हज़रत इमाम महदी अ. स.) से हमेशा संबंध बनाये रखना है।

वास्तव में जब वह मेहरबान इमाम (अ.स.) हर वक़्त और हर जगह शिओं के हालात पर नज़र रखता और किसी भी भी वक़्त उनको नहीं भूलता तो क्या यह उचित है कि उसके चाहने वाले दुनिया के कामों में उलझ कर उस महबूब इमाम (अ.स.) को भूल जायें और उन से बेखबर हो जायें ?! नही दोस्ती व मुहब्बत का तक़ाज़ा यह है कि उन्हें हर काम में अपने और अन्य लोगों पर वरीयता दी जाये। जिस वक़्त दुआ के लिए मुसल्ले पर बैठें तो पहले उनके लिए दुआ करें , उनकी सलामती और ज़हूर की दुआ करने के लिए अपने हाथों को ऊपर उठायें। इसके लिए ख़ुद उन्हेंने फरमाया है :

"मेरे ज़हूर के लिए बहुत दुआ किया करो कि उसमें ख़ुद तुम्हारी भलाई है।"

अतः हमारी ज़बान पर हमेशा यह निम्न लिखित दुआ रहनी चाहिए।

अल्लाहुम्मा कुन लिवलिये-कल हुज्जत इब्निल हसन सलवातुका अलैहि व अला आबाएहि फ़ी हाज़ेहिस्साअत व फ़ी कुल्ले साअत वलियंव व हाफ़िज़ंव व काइदंव व नासिरंव व दलीलंव व ऐना हत्ता तुस्कि-नहु अर्ज़का तौअंव व तुमत्तेअहु फ़ीहा तवीला..

. ”اَللَّہُمَّ کُنْ لِوَلِیِّکَ الْحُجَّةِ بْنِ الحَسَنِ صَلَوٰاتُکَ عَلَیْہِ وَ عَلٰی آبَائِہِ فِی ہَذِہِ السَّاعَةِ وَ فِی کُلِّ سَاعَةٍ وَلِیاً وَ حَافِظاً وَ قَائِداً وَ نَاصِراً وَ دَلِیلاً وَ عَیْناً حَتّٰی تُسْکِنَہُ اٴرْضَکَ طَوْعاً وَ تُمَتِّعَہُ فِیْہَا طَوِیلاً “ ۔

ऐ अल्लाह ! अपने वली , हुज्जत इब्नुल हसन के लिए (तेरा दरुद व सलाम हो उन पर और उन के बाप दादाओं पर , इस वक़्त और हर वक़्त) वली व मुहाफ़िज़ व रहबर व मददगार व दलील और देख रेख करने वाला बन जा , ताकि उनको अपनी ज़मीन पर अपनी मर्ज़ी से बसाये और उनको ज़मीन पर लंबी समय तक लाभान्वित रख।

सच्चा इन्तेज़ार करने वाला , सदक़ा देते वक़्त पहले अपने इमाम (अ.स.) को नज़र में रखता है अर्थात पहले उनका सदक़ा निकालता है और बाद में अपना। वह हर तरह से उनके दामन से चिपका रहता है और हर वक़्त उनके मुबारक ज़हूर का अभिलाषी रहता है और उनके बेमिसाल व नूरानी चेहरे को देखने के लिए रोता बिलकता रहता है।

अज़ीज़ुं अलैया अन अरल खल्क वला तुरा ”عَزِیزٌ عَلَیَّ اٴنْ اٴرَی الخَلْقَ وَ لٰا تُریٰ “

वास्तव में मेरे लिए सख्त है कि मैं सब को तो देखूँ लेकिन आपकी ज़ियारत न कर सकूँ।

इन्तेज़ार के रास्ते पर चलने वाला आशिक हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के नाम से संबंधित परोग्रामों में सम्मिलित होता है ताकि अपने दिल में उनकी मुहब्बत की जड़ों को और अधिक मज़बूत करे। वह हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के नाम से संबंधित पवित्र स्थानों पर ज़ियारत के लिए जाता है - जैसे मस्जिदे सहला , मस्जिदे जमकरान , और सामर्रा का वह तहख़ाना जिसमें से आप ग़ायब हुए थे।

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के ज़हूर का इन्तेज़ार करने वालों की ज़िन्दगी में उनकी याद का बेहतरीन जलवा यह है कि वह हर दिन अपने इमाम (अ.स.) से वादा करें और उन्हें वफ़ादारी का वचन दे और अपने उस वचन पर बाक़ी रहने का ऐलान करें।

जैसा कि हम दुआ ए अहद के इन वाक्यों में पढते हैं कि :

अल्लाहुम्मा इन्नी उजद्दिदु लहु फ़ी सबीहते यौमी हाज़ा व मा इशतु मिन अय्यामी अहदंव व अकदंव व बै-अतन लहु फ़ी उनुक़ी ला अहूलु अन्हु वला अज़ूलु अ-ब-दा अल्लाहुम्मा इजअलनी मिन अंसारिहि व आवानिहि व अद्दाब्बीना अनहु व अल-मुसारि-ईना अलैहि फ़ी क़ज़ा ए हवाइजि-हि व अल-मुमतसिलीना लि-अवामिरिही व अल-मुहाम्मीना अन्हु व अस्साबिक़ीना इला इरा-दतिहि व अल-मुस-तश-हदीना बैना यदैहि।

” اللّٰہُمَّ إِنِّي اٴُجَدِّدُ لَہُ فِي صَبِیحَةِ یَوْمِي ہَذَا وَ مَا عِشْتُ مِنْ اٴَیَّامِي عَہْداً وَ عَقْدًا وَ بَیْعَةً لَہُ فِي عُنُقِي لاَ اٴَحُولُ عَنْہ وَ لاَ اٴَزُولُ اٴَبَداً، اللّٰہُمَّ اجْعَلْنِي مِنْ اٴَنْصَارِہِ وَ اٴَعْوَانِہِ ، وَالذَّابِّینَ عَنْہُ وَ الْمُسَارِعِینَ إِلَیْہِ فِي قَضَاءِ حَوَائِجِہِ ، وَ الْمُمْتَثِلِینَ لاٴَوَامِرِہِ ، وَ الْمُحَامِینَ عَنْہُ ، وَ السَّابِقِینَ إِلیٰ إِرَادَتِہِ ، وَ الْمُسْتَشْہَدِینَ بَیْنَ یَدَیْہِ “

ऐ अल्लाह ! मैं आज की सुब्ह और जब तक ज़िन्दा रहूँ , हर सुब्ह उन की बैअत का अहद (प्रतिज्ञा) करता हूँ और उनकी यह बैअत मेरी गर्दन पर रहेगी न मैं इससे हट सकता हूँ और न कभी अलग हो सकता हूँ। ऐ अल्लाह ! मुझे उनके मददगारों , उनका बचाव करने वालों , उनकी ज़रूरतों को पूरा करने में तेज़ी से काम करने वालों , उनके हुक्म की इताअत (आज्ञा पलन) करने वालों , उनकी तरफ़ से बचाव करने वालों , उनके मक़सदों की तरफ़ आगे बढ़ने वालों और उनके सामने शहीद होने वालों में से बना दे।

अगर कोई इंसान हमेशा इस अहद (प्रतिज्ञा) को पढ़ता रहे और दिल की गहराई से इसमें वर्णित शब्दों व वाक्यों का पाबन्द रहे तो कभी भी अपने इमाम की तरफ़ से लापरवाही नही करेगा। बल्कि वह हमेशा अपने इमाम की तमन्नाओं को पूरा करने और उनके ज़हूर के लिए रास्ता हमवार करने की कोशिश करेगा। सच तो यह है कि ऐसा ही इंसान उस हक़दार इमाम (अ.स.) के ज़हूर के वक़्त उनके मोर्चे पर हाज़िर होने की योग्यता रखता है।

हज़रत इमाम सादिक़ (अ.स.) ने फरमाया :

जो इंसान चालीस दिन तक सुब्ह के वक़्त अपने अल्लाह से यह अहद (प्रतिज्ञा) करे , ख़ुदा उसे हमारे क़ाइम (अ.स.) के मददगारों में शामिल कर देगा और अगर हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के ज़हूर से पहले उसे मौत आ गई तो ख़ुदा वन्दे आलम उसे क़ब्र से उठायेगा ताकि वह हज़रत क़ाइम (अ.स.) की मदद करे।

हार्दिक एकता

इन्तेज़ार करने वाले गिरोह के हर इंसान को चाहिए कि वह अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा करने के अलावा अपने इमाम हज़रत महदी (अ.स.) के उद्देश्यों व मक़सदों के बारे में एक ख़ास योजना तैयार करे। इसस से भी अधिक स्पष्ट रूप में इस तरह कहा जा सकता है कि इन्तेज़ार करने वालों के लिए ज़रुरी है कि वह उस रास्ते पर चलने की कोशिश करें जिस से उन का इमाम राज़ी व खुश हो।

अतः इन्तेज़ार करने वालों के लिए ज़रुरी है कि वह अपने इमाम से किये हुए बादों पर बाक़ी रहें ताकि इमाम महदी (अ.स.) के ज़हूर के रास्ते हमवार हो जायें।

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) अपने एक पैग़ाम में ऐसे लोगों के बारे में यह निम्न लिखित ख़ुश ख़बरी सुनाते हैं :

अगर हमारे शिया (ख़ुदा वन्दे आलम उन्हें अपनी आज्ञ पालन की तौफ़ीक प्रदान करे) अपने किये हुए वादों पर एक जुट हो जायें तो हमारी ज़ियारत की नेमत में देर नहीं होगी और पूरी व सच्ची पहचान व शनाख़्त के साथ जल्द ही हमारी मुलाक़ात हो जायेगी...

यह वादे वही है जिनका वर्णन अल्लाह की किताब और अल्लाह के नबियों व वलियों की हदीसों में हुआ है। हम यहाँ पर उनमें से कुछ निम्न लिखित महत्वपूर्ण चीज़ों की तरफ़ इशारा कर रहे हैं।

1. जहाँ तक हो सके मासूम इमामों (अ.स.) की पैरवी करने की कोशिश करना और इमामों (अ.स.) के चाहने वालों से दोस्ती और उन के दुशमनों से दूरी व नफ़रत।

हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ.स.) पैग़म्बरे इस्लाम (स.) से रिवायत करते हैं कि उन्होंने फरमाया :

खुश नसीब है वह इंसान जो मेरे क़ाइम को इस हाल में देखे कि उन के क़ियाम (आन्दोलन) से पहले ख़ुद उनकी और उन से पहले इमामों की पैरवी करे और उनके दुशमनों से दूरी व नफ़रत का ऐलान करे , ऐसे इंसान मेरे दोस्त और मेरे साथी हैं और क़ियामत के दिन मेरे नज़दीक़ मेरी उम्मत के सब से महान इंसान होंगे...

2. इन्तेज़ार करने वालों को दीन में होने वाले परिवर्तनों , बिदअतों और समाज में फैलती हुई अश्लीलताओं व बुराईयों से लापरवा नहीं रहना चाहिए , बल्कि अच्छी सुन्नतों और अख़लाक़ी मर्यादाओं को ख़त्म होता देख उन्हें दोबारा ज़िन्दा करने की कोशिश करनी चाहिए। पैग़म्बरे इस्लाम (स.) से रिवायत है कि उन्होंने फ़रमाया : इस उम्मत के आखरी ज़माने में एक गिरोह ऐसा आयेगा कि उसका सवाब सर्व प्रथम इस्लाम क़बूल करने वालों की बराबर होगा और वह अम्र बिल मअरुफ और नही अनिल मुन्कर (अच्छे काम करने की सिफ़ारिश करना और बुरे कामों से रोकना) करेंगे और बुराईयाँ फैलाने वालों से जंग करेंगे...

3. ज़हूर का इन्तेज़ार करने वालों की यह ज़िम्मेदारी है कि दूसरों के साथ सहयोग व मदद को अपनी योजनाओं का आधार बनायें और इन्तेज़ार करने वाले समाज के लोगों को चाहिए कि संकुचित दृष्टिकोण और स्वार्थता को छोड़ कर समाज के ग़रीब व निर्धन लोगों पर ध्यान दें और उनकी ओर से लापरवाही न करें।

शिओं के एक गिरोह ने हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ.स.) से कुछ नसीहतें करने की अपील की तो इमाम (अ.स.) ने फरमाया :

तुम में जो लोग मालदार हैं उन्हें चाहिए कि ग़रीबों की मदद करें और उनके साथ प्यार व मोहब्बत भरा व्यवहार करें और तुम सबको चाहिए कि आपस में एक दूसरे के बारे में अपने मन में अच्छे विचार रखो...

उल्लेखनीय बात यह है कि इस आपसी सहयोग व मदद का दाएरा अपने इलाक़े से मख़सूस नहीं है बल्कि इन्तेज़ार करने वालों की अच्छाईयाँ और नेकियाँ दूर दराज़ के इलाक़ों में भी पहुँचती है , क्यों कि इन्तेज़ार के परचम के नीचे किसी भी तरह की जुदाई और अपने पराये का एहसास नहीं होता।

4. इन्तेज़ार करने वाले समाज के लिए ज़रुरी है कि समाज में महदवी रंग व बू पैदा करें। हर जगह उनके नाम और उनकी याद का परचम लहरायें और इमाम (अ.स.) के कलाम व किरदार को अपनी बात चीत और व्यवहार के ज़रिये सार्वजनिक करें। इस काम के लिए अपनी पूरी ताक़त के साथ कोशिश करनी चाहिए , जो इस काम को करेंगे , उन पर अइम्मा ए मासूमीन (अ.स.) का ख़ास करम होगा।

हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ.स.) के सहाबी , अब्दुल हमीद वास्ती , इमाम (अ.स.) की खिदमत में अर्ज़ करते हैं :

हम ने अम्र फरज (ज़हूर) के इन्तेज़ार में अपनी पूरी ज़िन्दगी वक्फ़ कर दी है और यह काम कुछ लोगों के लिए परेशानी का सबब बन गया है।

इमाम (अ.स.) ने जवाब में फरमाया :

ऐ अब्दुल हमीद ! क्या तुम यह सोचते हो कि जिस इंसान ने ख़ुद को ख़ुदा वन्दे आलम के लिए वक्फ़ कर दिया है , ख़ुदा वन्दे आलम ने उस बन्दे के लिए मुशकिलों से निकलने का कोई रास्ता नहीं बनाया है ?! ख़ुदा की क़सम उसने ऐसे लोगों की मुश्किलों का हल बनाया है , ख़ुदा वन्दे आलम रहमत करे उस इंसान पर जो हमारे अम्र (विलायत) को ज़िन्दा रखे...

आखरी बात यह कि इन्तेज़ार करने वाले समाज को यह कोशिश करनी चाहिए कि वह समस्त सामाजिक पहलुओं में दूसरे समाजों के लिए नमूना बने और इंसानियत को निजात व मुक्ति देने वाले के ज़हूर के लिए तमाम ज़रूरी रास्तों को हमवार करे।

इन्तेज़ार के प्रभाव

कुछ लोगों का यह विचार है कि विश्व स्तर पर सुधार करने वाले (इमाम (अ.स.) का इन्तेज़ार , इंसानों को निष्क्रिय और लापरवाह बना देता है। जो लोग इस इन्तेज़ार में रहेंगे कि एक विश्वस्तरीय समाज सुधारक आयेगा और ज़ुल्म , अत्याचार व बुराईयों को ख़त्म कर देगा , तो वह बुराइयों के सामने हाथ पर हाथ रखे बैठे रहेंगे और ख़ुद कोई क़दम नहीं उठायें बल्कि खामोश बैठे ज़ुल्म व सितम का तमाशा देखते रहेंगे।

यह दृष्टिकोण बहुत सादा व निराधार है और इसमें गहराई से काम नहीं लिया गया है। क्योंकि हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के इन्तेज़ार , उसकी विशेषताओं , उसके पहलुओं और इन्तेज़ार करने वाले की विशेषताओं के बारे में जिन बातों का वर्णन हुआ है उनसे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि हज़रत इमाम महदी (अ.स.) का इन्तेज़ार इंसान को निष्क्रिय और लापरवाह नहीं बनाता है , बल्कि उनकी गतिविधियों को तेज़ करने व उन्हें परिपक्व बनाने में सहायक है।

इन्तेज़ार , इन्तेज़ार करने वालों में एक मुबारक व उद्देश्यपूर्ण जज़बा पैदा करता है। इन्तेज़ार करने वाला , इन्तेज़ार की हक़ीक़त से जितना ज़्यादा परिचित होता जाता है , उसकी रफ़्तार मक़सद की तरफ़ उतनी ही बढ़ती जाती है। इन्तेज़ार के अन्तर्गत , इंसान स्वार्थता से आज़ाद हो कर ख़ुद को इस्लामी समाज का एक हिस्सा समझता है , अतः फिर वह समाज सुधार के लिए जी जान से कोशिश करता है। जब कोई समाज ऐसे सोगों से सुसज्जित हो जाता है तो उस समाज में अच्छाईयों व मर्यादाओं का राज हो जाता और समाज के सभी लोग नेकियों की तरफ़ कदम बढ़ाने लगते हैं। जिस समाज में सुधार , उम्मीद , ख़ुशी और आपसी सहयोग , सहानुभूति व हमदर्दी का महौल पाया जाता है उसमें घार्मिक विश्वास फलते फूलते हैं और लोगों में महदवियत का नज़रीया पैदा होता है। इन्तेज़ार की बरकत से इन्तेज़ार करने वाले , बुराईयों के दलदल में नहीं फँसते बल्कि अपने दीन और अक़ीदों की हिफ़ाज़त करते हैं। वह इन्तेज़ार के ज़माने में अपने सामने आने वाली मुश्किलों में सब्र से काम लेते हैं और ख़ुदा वन्दे आलम का वादा पूरा होने की उम्मीद में हर मुसीबत और परेशानी को बर्दाश्त कर लेते हैं। वह किसी भी वक़्त सुस्ती और मायूसी का शिकार नहीं होते।

आप ही बताईये कि ऐसा कौन सा धर्म व मज़हब है जिसने अपने अनुयायियों के सामने इतना साफ़ व रौशन रास्ता पेश किया है ? ! ऐसा रास्ता जो अल्लाह की ललक में तय किया जाता हो और उस के नतीजे में हद से ज़्यादा सवाब व ईनाम मिलता हो !।

इन्तेज़ार करने वालों का सवाब

खुश नसीब है वह इंसान जो अच्छाईयों व नेकियों के इन्तेज़ार में अपनी आँखे बिछाये हुए हैं। वास्तव उन लोगों के लिए कितना ज़्यादा सवाब है जो हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की विश्वव्यापी हुकूमत का इन्तेज़ार कर रहे हैं। और कितना बड़ा रुत्बा है उन लोगों का जो क़ाइम आले मुहम्मद (अ.स.) के सच्चे मुन्तज़िर हैं।

हम उचित समझते हैं कि इन्तेज़ार नामक इस अध्याय के अन्त में हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के ज़हूर का इन्तेज़ार करने वालों की उच्च श्रेष्ठताओं व मान सम्मान का वर्णन करें और इस संदर्भ में मासूम इमामों (अ.स.) की हदीसों को आप लोगों के सामने पेश करें।

हज़रत इमाम सादिक (अ.स.) फरमाते हैं :

"खुश नसीब हैं क़ाइमे आले मुहम्मद के वह शिआ जो ग़ैबत के ज़माने में उनके ज़हूर का इन्तेज़ार करें और उनके ज़हूर के ज़माने में उनकी आज्ञा का पालन करते हुए उनकी पैरवी करें। यही लोग ख़ुदा वन्दे आलम के महबूब (प्रियः) बंदे हैं और उनके लिए कोई दुखः दर्द न होगा...।"

वास्तव में इस से बढ़ कर और क्या गर्व होगा कि उनके सीने पर ख़ुदा वन्दे आलम की दोस्ती का तम्ग़ा लगा हुआ है।वह किसी दुखः दर्द में कैसे घिर सकते हैं , जबकि कि उनकी ज़िन्दगी और मौत दोनों की क़ीमत बहुत ज़्यादा है।

हज़रत इमाम सज्जाद (अ.स.) फरमाते हैं कि

"जो इंसान हमारे क़ाइम (अ.स.) की ग़ैबत के ज़माने में हमारी विलायत (मुब्बत) पर बाक़ी रहेगा , ख़ुदा वन्दे आलम उसे शुहदा ए बद्र व ओहद के हज़ार शहीदों का सवाब प्रदान करेगा..."

जी हाँ ! ग़ैबत के ज़माने में अपने इमामे ज़माना (अ.स.) की विलायत पर और अपने इमाम से किये हुए वादों पर बाक़ी रहने वाले लोग , ऐसे फौजी हैं जिन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के साथ मिल कर अल्लाह के दुशमनों से जंग की हो और जंग के मैदान में अपने खून में नहाये हों।

वह मुन्तज़िर जो रसूल (स.) के इस महान बेटे , इमाम ज़माना (अ.स.) के इन्तेज़ार में अपनी जान हथेली पर लिए खड़े हुए हैं , वह अभी से जंग के मैदान में अपने इमाम के साथ मौजूद हैं।

हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) फरमाते हैं :

अगर तुम शिओं में से कोई इंसान हज़रत इमाम महदी अ. स. के ज़हूर के इन्तेज़ार में मर जाये तो ऐसा है जैसे वह अपने इमाम (अ.स.) के ख़ेमे में है।---- यह कह कर इमाम (अ.स.) थोड़ी देर के लिए ख़ामोश रहे फिर फरमाया : बल्कि उस इंसान की तरह है जिसने इमाम (अ.स.) के साथ मिल कर जंग में तलवार चलाई हो। इस के बाद फरमाया : नहीं , ख़ुदा की क़सम वह उस इंसान की मिस्ल है जिसने रसूले इस्लाम (स.) के सामने शहादत पाई हो...

यह वह लोग हैं जिन को पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने सदियों पहले अपना भाई और दोस्त कहा है और उन से अपनी दिली मुहब्बत और दोस्ती का ऐलान किया है।

हज़रत इमाम मुहम्मद बाकिर (अ.स.) ने फरमाया :

एक दिन पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने अपने असहाब के सामने अल्लाह से दुआ की : पालने वाले ! मुझे मेरे भाइयों को दिखला दे। पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने इस वाक्य को दो बार कहा। पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के असहाब ने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल ! क्या हम आप के भाई नहीं हैं ?!

पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने फरमाया कि तुम लोग मेरे असहाब हो और मेरे भाई वह लोग हैं जो आख़िरी ज़माने में मुझ पर ईमान लायेंगे , जबकि उन्होंने मुझे नहीं देखा होगा। ख़ुदा वन्दे आलम ने मुझे उनके नाम उनके बापों के नाम के साथ बतायें हैं। उनमें से हर एक का अपने दीन पर अडिग व साबित क़दम रहना अंधेरी रात में गोन नामक पेड़ से कांटा तोड़ने और दहकती हुई आग को हाथ में लेने से भी ज़्यादा सख्त है। वह हिदायत की मशाल हैं ख़ुदा वन्दे आलम उनको खतरनाक बुराईयों से निजात व छुटकारा देगा...

पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने यह भी फरमाया :

खुश नसीब हैं वह इंसान जो हम अलेबैत के क़ाइम से इस हाल में मिले , कि उनके क़ियाम से पहले उनकी पैरवी करते हों , उन के दोस्तों को दोस्त रखता हों और उनके दुशमनों से दूर रहता हों व नफ़रत करता हों , वह उनसे पहले इमामों को भी दोस्त रखता हों , उनके दिलों में मेरी दोस्ती , मवद्दत व मुहब्बत हो तो वह मेरे नज़दीक मेरी उम्मत के सब से आदरनीय इंसान हैं...।

अतः जो इंसान पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के नज़दीक़ इतने प्रियः व महान हैं , वही ख़ुदा वन्दे आलम के संबोधन को सुनेगें , ऐसी आवाज़ को जो इशक व मुहब्बत में डूबी होगी और जो ख़ुदा वन्दे आलम से बहुत अधिक नज़दीक होने का इशारा करती होगी।

हज़रत इमाम मुहम्मद बाकिर (अ.स.) ने फरमाया :

एक ज़माना ऐसा आयेगा जिसमें मोमिनों का इमाम गायब होगा , अतः खुश नसीब है वह इंसान जो उस ज़माने में हमारी विलायत पर साबित क़दम रहे। बेशक उनका कम से कम ईनाम यह होगा कि ख़ुदा वन्दे आलम उनसे संबोधन करेगा कि ऐ मेरे बन्दो तुम मेरे राज़ और इमाम गायब पर ईमान लाये हो और तुम ने उसकी तस्दीक की है , अतः मेरी तरफ़ से बेहतरीन ईमान की ख़ुश ख़बरी है , तुम हक़ीक़त में मेरे बन्दे हो , मैं तुम्हारे आमाल को क़बूल करता हूँ और तुम्हारे गुनाहों को माफ़ करता हूँ , मैं तुम्हारी बरकत की वजह से अपने बन्दों पर बारिश नाज़िल करता हूँ और उनसे बलाओं को दूर करता हूँ , अगर तुम उन लोगों के बीच न होते तो मैं गुनहगार लोगों पर ज़रुर अज़ाब नाज़िल कर देता...।

लेकिन इन इन्तेज़ार करने वालों को किस चीज़ के ज़रिये आराम व सकून मिलेगा है , उनके इन्तेज़ार की घड़ियां कब खत्म होगी , किस चीज़ से उनकी आँखों को ठंडक मिलेगी , उनके बेकरार दिलों को कब चैन व सकून मिलेगा , क्या जो लोग उम्र भर इन्तेज़ार के रास्ते पर चले है और जो हर तरह की मुश्किलों को बर्दाश्त करते हुए इसी रास्ते पर इस लिए चलते हैं ताकि हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के हरे भरे चमन में क़दम रखें और अपने प्रियः मौला के साथ बैठें। वाकिअन इस से बेहतरीन और क्या अंजाम हो सकता है और इस से बेहतर और कौन सा मौक़ा हो सकता है।

हज़रत इमाम मूसा क़ाज़िम (अ.स.) ने फरमाया :

खुश नसीब हैं हमारे वह शिया जो हमारे क़ाइम की ग़ैबत के ज़माने में हमारी दोस्ती की रस्सी को मज़बूती से थामे रखें और हमारे दुशमनों से दूर रहें। वह हम से हैं और हम उनसे हैं। वह हमारी इमामत पर राज़ी हैं और हमारी इमामत को क़बूल करते हैं , अतः हम भी उनके शिआ होने से ख़ुश व राज़ी हैं , वह बहुत ख़ुश नसीब हैं! ख़ुदा की क़सम यह इंसान क़ियामत के दिन हमारे साथ हमारे दर्जे में होंगे.


चौथा अध्याय

ज़हूर का ज़माना

पहला हिस्सा

ज़हूर से पहले दुनिया की हालत

प्रियः पाठकों ! हम ने पिछले अध्यायों में इमामे ज़माना (अज्जल अल्लाहु तआला फरजहू शरीफ़) की ग़ैबत और उसके कारणों का उल्लेख किया है। हम ने बताया कि अल्लाह की वह आख़िरी हुज्जत ग़ायब हो गये हैं और जब उनके ज़हूर का रास्ता हमवार हो जायेगा तो वह ज़ाहिर हो कर दुनिया को अपनी हिदायत व मार्गदर्शन से लाभान्वित करेंगे। ग़ैबत के ज़माने में लोग ऐसे काम कर सकते हैं जिनसे इमाम (अ.स.) के ज़हूर का रास्ता जल्दी से जल्दी हमवार हो जाये। लेकिन वह , शैतान , इच्छाओं के अनुसरण , कुरआन की सही तरबियत से दूरी और मासूम इमामों (अ.स.) की विलायत और इमामत को क़बूल न करने की वजह से ग़लत रास्ते पर चल पड़े है। आज इस दुनिया में हर दिन नये ज़ुल्म व अत्याचार की बुनियादें रखी जाती हैं। पूरी दुनिया में ज़ुल्म व सितम बढ़ता जा रहा है और इंसानियत इस रास्ते के चुनाव से एक बहुत भयंकर नतीजे की तरफ़ बढ़ रही है। आज दुनिया की हालत यह है कि चारों तरफ़ ज़ुल्म व अत्याचार फैला हुआ है , बुराईयों का बोल बाला है , अखलाक़ी व सदाचारिक मर्यादाओं का अंत हो चुका है , शाँति व सुरक्षा का दूर दूर तक भी कहीँ पता नहीं है , ज़िन्दगी आध्यात्म व पवित्रता से खाली है , समाज में मातहत लोगों के हक़ों को पैरों तले रौंदा जा रहा है , यह सब चीज़ें ग़ैबत के ज़माने में इंसान का नाम ए आमाल है। यह एक ऐसी हक़ीक़त है जिस के बारे में मासूमीन (अ.स.) ने शताब्दियों पहले भविषय वाणी कर के इसकी काली तस्वीर पेश कर दी थी।

इमाम सादिक (अ.स.) अपने एक सहाबी से फरमाते हैं कि

"जब तुम देखो कि ज़ुल्म व सितम आम हो रहा है , कुरआन को एक तरफ़ रख दिया गया है , हवा व हवस के आधार पर क़ुरआन की तफ्सीर की जा रही है , अहले बातिल (झूठे) हक़ परस्तों (सच्चों) से आगे बढ़ रहे हैं , ईमानदार लोग ख़ामोश बैठे हुए हैं , रिश्तेदारी के बंधन टूट रहे हैं , चापलूसी बढ़ रही है , नेकियों का रास्ता खाली हो रहा है और बुराइयों के रास्तों पर भीड़ दिखाई दे रही है , हलाल हराम हो रहा है और हराम हलाल शुमार किया जाने लगा है , माल व दौलत गुनाहों और बुराइयों में खर्च किया जा रहा है , हुकूमत के कर्मचारियों में रिशवत का बाज़ार गर्म है , बुरे खेल इतने अधिक चलने लगे कि कोई भी उनकी रोक थाम की हिम्मत नही करता है , लोग कुरआन की हक़ीक़तों को सुनने के लिए तैयार नहीं हैं , लेकिन बातिल और फुज़ूल चीज़ें सुनना उनके लिए आसान है , अल्लाह के गर का हज दिखावे के लिए किया जा रहा है , लोग संग दिल होने लगें हैं , मोहब्बत का जनाज़ा निकल चुका है , अगर कोई अम्र बिल मअरुफ़ और नेही अनिल मुन्कर करे तो उस से कहा जाये कि यह तुम्हारी ज़िम्मेदारी नहीं है , हर साल एक नई बुराई और नई बिदअत पैदा हो रही है , तो ख़ुद को सुरक्षित रखना और इस खतरनाक माहौल से बचने के लिए अल्लाह से पनाह माँगना और समझना कि अब ज़हूर का ज़माना नज़दीक है...।

लेकिन याद रहे कि ज़हूर से पहले की यह काली तस्वीर सब लोगों की नही होगी बल्कि अधिकाँश लोगों की होगी , क्योंकि उस ज़माने में भी कुछ मोमेमीन ऐसे होंगे जो अल्लाह से किये हुए अपने वादों पर बाक़ी रहेंगे और अपने दीन व अक़ीदों की हिफ़ाज़त करेंगे। वह ज़माने के रंग में नहीं रंगे जायेंगे और अपनी ज़िन्दगी का अंजाम बुरा नहीं करेंगे। यह लोग ख़ुदा वन्दे आलम के बेहतरीन बन्दे और मासूम इमामों (अ.स.) के सच्चे शिया होंगे। यही वह लोग होंगे जिनकी रिवायतों में तारीफ़ व प्रशंसा हुई है। यह लोग ख़ुद भी नेक होंगे और दूसरों को भी नेकी की तरफ़ बुलायेंगे , क्योंकि वह इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि नेकियों और अच्छाईयों को फैलाने और ईमान के इत्र से माहौल को सुगंधित करने से नेकियों के इमाम का ज़हूर जल्दी हो सकता है और उनके क़ियाम व हुकूमत का रास्ता हमवार किया जा सकता है। वह अच्छी तरह समझते हैं कि बुराईयों का मुक़ाबला उसी वक़्त किया जा सकता है जब उस महान सुधारक (इमाम) के मददगार मौजूद हों।

हमारा यह नज़रिया उस नज़रिये के बिल्कुल मुख़ालिफ़ है जिस में कहा गया है कि बुराईयों का फैलाना ज़हूर में जल्दी का सबब बनेगा। क्या यह बात स्वीकारीय है कि मोमेनीन बुराईयों के मुक़ाबले में खामोश बैठे रहें और समाज में बुराईयां फैलती रहें ताकि इस तरह इमाम (अ.स.) के ज़हूर का रास्ता हमवार हो जाये ?! क्या नेकियों और अच्छाईयों का विस्तार इमाम (अ.स.) के ज़हूर में जल्दी का कारण नहीं बन पायेगा।

अम्र बिल मअरुफ़ और नही अनिल मुनकर ऐसा फर्ज़ है जो हर मुसलमान पर वाजिब है और इसको किसी भी ज़माने में नज़र अन्दाज़ नहीं किया जा सकता है। अतः बुराईयों और ज़ुल्म व सितम का फैलाना इमाम ज़माना (अ.स.) के ज़हूर में जल्दी का कारण किस तरह बन सकता है ?

पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने फरमाया :

उस उम्मत के आखिर में एक ऐसी क़ौम आयेगी जिसका सवाब व ईनाम इस्लाम के प्रथम चरण के मुसलमानों के बराबर होगा , वह लोग अम्र बिल मअरुफ़ और नही अनिल मुनकर करते हुए बुराईयों का मुक़ाबला करेंगे।

अनेकों रिवायतों में जो यह वर्णन हुआ है कि दुनिया ज़ुल्म व सितम से भर जायेगी , इसका मतलब यह नहीं है कि सभी इंसान ज़ालिम बन जायेंगे !। बल्कि अल्लाह के रास्ते पर चलने वाले कुछ लोग मौजूद होंगे और उस माहौल में भी अखलाक़ी व सदाचारिक मर्यादाओं की खुशबू दिलों को सुगंधित करती हुई नज़र आयेगी।

अतः ज़हूर से पहले का ज़माना वैसे तो बड़ी कड़वाहट ज़माना होगा लेकिन वह ज़हूर के मिठास पर खत्म होगा। वह ज़माना ज़ुल्म , अत्याचार और बुराईयों से तो भरा होगा , लेकिन उस ज़माने में ख़ुद पाक रहना और दूसरों को अच्छाईयों व नेकियों की तरफ़ बुलाना , इन्तेज़ार करने वालों की अत्यावश्यक ज़िम्मेदारी होगी और यह क़ाइम आले मुहम्मद (अ.स.) के ज़हूर में प्रभावी होगी।

अब हम इस हिस्से को हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की इस निम्न लिखित हदीस पर खत्म करते हैं।

"हमें अपने शिओं से कोई चीज़ दूर नहीं करती , मगर हम तक पहुँचने वाले , उनके वह क्रिया कलाप जो हमें पसन्द नहीं हैं और न हम उनसे उनको करने की उम्मीद रखते हैं...

दूसरा हिस्सा

ज़हूर का रास्ता हमवार होना और ज़हूर की निशानियां

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के ज़हूर की कुछ निशानियाँ और शर्तें हैं , उन्हीं को ज़हूर का रास्ता हमवार होना व ज़हूर की निशानियों के शीर्षक से याद किया जाता है। इन दोनों में फ़र्क यह है कि रास्ते का हमवार होना ज़हूर में प्रभावित है , अर्थात अगर रास्ता हमवार हो गया तो इमाम (अ.स.) का ज़हूर हो जायेगा और अगर रास्ता हमवार न हुआ तो ज़हूर नहीं हो होगा। इसके विपरीत निशानियाँ ज़हूर में प्रभावी नहीं हैं बल्कि सिर्फ़ ज़हूर की निशानी हैं और उनके द्वारा सिर्फ़ ज़हूर के ज़माने या ज़हूर के ज़माने के क़रीब होने का पहचाना जा सकता है।

इस फ़र्क को मद्दे नज़र रखते हुए अच्छी तरह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि ज़हूर की शर्तें और रास्ते का हमवार होना , ज़हूर की निशानियों से ज़्यादा महत्वपूर्ण है। अतः निशानियों को तलाश करने से पहले उन शर्तों पर ध्यान दें और अपनी ताक़त के अनुसार उन शर्तों को पैदा करने की कोशिश करें। इसी वजह से हम पहले ज़हूर के रास्तों के हमवार होने और ज़हूर की शर्तों की व्याख्या करते हैं और आख़िर में ज़हूर की निशानियों का संक्षेप में उल्लेख करेंगे।

ज़हूर की शर्तें और रास्ते का हमवार होना

संसार की हर चीज़ अपनी शर्तों के पूर्ण व रास्ते के हमवार होने से ही अस्तित्व व वजूद में आ जाती है। इन के बग़ैर कोई भी चीज़ वजूद में नहीं आती। हर ज़मीन दाने को उगाने व उसे परवान चढ़ाने की योग्यता नहीं रखती। प्रत्येक जल वायु हर फूल , फल के फलने व फूलने के लिए उचित नहीं होती है। एक किसान ज़मीन से अच्छी फसल काटने का उसी वक़्त उम्मीदवार हो सकता है जब उसने फसल काटने की ज़रूरी शर्तों को पूरा कर लिया हो।

इसी प्रकार कोई परिवर्तन और सामाजिक सुधार भी शर्तों के पूर्ण होने और रास्ते के हमवार होने पर ही आधारित होता है। जिस तरह ईरान का इस्लामी इन्केलाब शर्तों के पूरा होने और रास्तों के हमवार होने के बाद सफल हुआ है , इसी तरह हज़रत इमाम महदी (अ.स.) का विश्वव्यापी इन्क़ेलाब , जो कि दुनिया का सब से बड़ा इन्किलाब होगा , भी उसी क़ानून के अन्तर्गत आता है और जब तक उसका रास्ता हमवार न होगा और शर्तें पूरी न होंगी , उस वक़्त तक घटित नही हो सकता।

इस स्पष्टीकरण का उद्देश्य यह है कि हमारे दिमाग़ में यह ख़्याल न रहे कि हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के क़ियाम (आन्दोलन) व हुकूमत का मसला इस क़ानून से अलग है , और उनका यह समाज सुधार आन्दोलन किसी मोजज़े (चमत्कार) के आधार पर शर्तों व कारकों के बिना घटित हो जायेगा। बल्कि कुरआन व अहले बैत (अ.स.) की शिक्षाएं और अल्लाह की सुन्नत ये है कि संसार के तमाम काम साधारण रूप से और साधारण शर्तों व कारकों के आधार पर ही क्रियान्वित होते हैं।

हज़रत इमाम सादिक (अ.स.) ने फरमाया :

ख़ुदा वन्दे आलम सब कामों को उनके कारकों के आधार पर ही पूरा करता है...

एक रिवायत में मिलता है कि किसी इंसान ने हज़रत इमाम मुहम्मद बाकिर (अ.स.) से कहा कि मैंने सुना है कि जब हज़रत इमाम महदी (अ.स.) का ज़हूर होगा तो सारे काम उनकी मर्ज़ी के अनुसार होंगे।

इमाम (अ.स.) ने फरमाया : हरग़िज़ ऐसा नहीं है , उस ज़ात की क़सम जिस के क़ब्जें में मेरी जान है , अगर यह तय होता कि हर किसी का काम ख़ुद बख़ुद हो जायेगा तो फिर ऐसा रसूले इस्लाम (स.) के लिए होता...।

अलबत्ता इस बात का यह अर्थ नहीं है कि हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के ज़हूर के वक़्त ग़ैबी और आसमानी मदद नहीं होगी , बल्कि मक़सद यह है कि उस सहायता के साथ साथ आम शर्तों और रास्तों का हमवार होना ज़रुरी है।

इस बात के सेपष्ट हो जाने के बाद हमें चाहिए कि पहले ज़हूर की शर्तों को पहचाने और फिर उनके लिए रास्ता हमवार करने की कोशिश करें।

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के आन्दोलन और विश्वव्यापी सुधार व परिवर्तन की शर्तों और भूमिकाओं में से निम्न लिखित चार चीज़ें महत्वपूर्ण हैं , हम इन के बारे में अलग अलग वार्तालाप व बहस करते हैं।

योजना व प्लान

यह बात पूर्ण रूप से स्पष्ट है कि प्रत्येक सुधार आन्दोलन के लिए दो चीज़ों की ज़रूरत होती हैः

अ- समाज में मौजूद बुराईयों का मुक़ाबेला करने के लिए एक पूर्ण योजना।

आ- समाज की ज़रुरतों के अनुरूप ऐसे पूर्ण और उचित क़ानून जो हुकूमत की न्याय व्यवस्था में समस्त व्यक्तिगत व सामाजिक अधिकारों के रक्षक हो और जिनके आधार पर समाज तरक्की कर के अपने उद्देश्यों तक पहुँच सके।

सच्चा इस्लाम अर्थात कुरआने करीम की शिक्षाएं और मासूमों (अ.स.) की सुन्नत बेहतरीन कानून के रूप में हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के पास होगी और वह अल्लाह के इसी अमर संविधान के आधार पर काम करेंगे...। कुरआन ऐसी किताब है जिसकी आयतों का ख़ज़ाना उस ख़ुदा वन्दे आलम की तरफ़ से नाज़िल हुआ जो इंसान के तमाम पहलुओं और उसकी समस्त भैतिक व आध्यात्मिक ज़रुरतों को जानता है। अतः इमामे ज़माना (अ.स.) का विश्वव्यापी आन्दोलन हुकूमत के क़ानून के लिहाज़ से बेमिसाल तथ्यों पर आधारित होगा और किसी भी दूसरे अन्दोलन से उसका मुक़ाबेला व उसकी तुलना करना संभव नही है। इस दावे की दलील यह है कि आज की दुनिया ने बहुत से तजर्बे करने के बाद इस बात को क़बूल किया है कि इंसानों द्वारा बनाये गये क़ानूनों में कमज़ोरियाँ पाई जाती हैं। इस लिए आज इंसान आहिस्ता आहिस्ता आसमानी क़ानूनों को क़बूल करने के लिए तैयार होता जा रहा है।

अमेरीकी का राजनीतिक सलाहकार आलवीन टाफलर , इंसानी समाज को गंभीर हालत से निकालने और इसमें सुधार लाने के लिए तीसरी लहर... ...का नज़रिया पेश करता है , लेकिन वह इस बारे में आश्चर्यजनक बातों का इकरार करता है।

हमारे पश्चिमी समाज में मुशकिलों और परेशानियों की लिस्ट इतनी लंबी है कि उसका कोई अन्त नहीं है। औद्योगिक अस्थिरता और अनियमित्ता के कारण अखलाक़ी व सदाचारिक बुराईयाँ इतनी बढ़ गई हैं कि उनकी दुर्गंध से परेशान हो कर इंसान अपने गुस्से को ज़ाहिर करने और समाज में परिवर्तन लाने की कोशिश में और उस पर इसके लिए हर वक़्त दबाव बढ़ रहा है। इस दबाव के जवाब में हज़ारों ऐसी योजनायें पेश की जा चुकी हैं , जिनके बारे में यह दावा किया जाता है कि यह आधारभूत व नई हैं , लेकिन बार बार देखने में आता है कि जो क़ानून और संविधान हमारी मुशकिलों के हल के लिए पेश किये जाते हैं वह हमारी परेशानियों को और ज़्यादा बढ़ा देते हैं। इस कारण इंसान में मायूसी और ना उम्मीदी का एहसास पैदा होता जा रहा है। इसी वजह से इंसान सोचता है कि इनका कोई फायेदा नहीं है किसी क़ानून का कोई असर नहीं होता है। चूँकि यह एहसास हर डिमोक्रेटिक निज़ाम व व्यवस्था के लिए खतरनाक है , इसी लिए मिसालों में बयान होने वाले सफेद घोड़े पर सवार मर्द , की ज़रुरत का बड़ी बेचैनी से इन्तेज़ार से किया जा रहा है...।

रहबरी व नेतृत्व

हर इंकेलाब व आन्दोलन में एक रहबर व नेतृत्व करने वाले की ज़रूरत आधारभूत ज़रूरतों में गिनी जाती है। इंन्केलाब का स्तर जितना अधिक व्यापक होगा और उसके उद्देश्य जितने अधिक उच्चय होंगे , उसी के अनुरूप उसके रहबर को भी ताक़तवर व उन उद्देश्यों को प्रप्त करने में समक्ष होना चाहिए।

विश्व स्तर पर ज़ुल्म व सितम से मुक़ाबेला करने वाला , न्याय व समानता पर आधारित विश्वव्यापी हुकूमत स्थापित करने वाला और पूरी ज़मीन पर समानता फैलाने की ताक़त रखने वाला , हर इल्म का जानने वाला और अपने दिल में इंसानियत का दर्द रखने वाला रहबर , उस इंकेलाब का असली स्तंभ है। ऐसा रहबर जो वास्तव में उस इंकेलाब का सही नेतृत्व कर सके। हज़रत इमाम महदी (अ.स.) जो सब नबियों व वलियों (अ.स.) का सार हैं , वह उस महान रहबर के रूप में ज़िन्दा और हाज़िर हैं। सिर्फ वही एक ऐसे रहबर हैं जो आलमे ग़ैब (अल्लाह , फ़रिश्तें व ......) से संबंध के आधार पर संसार की हर चीज़ के बारे में पूर्ण रूप से जानकारी रखते हैं और अपने ज़माने के सब से बड़े व महान आलिम व ज्ञानी हैं।

पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने फरमाया :

जान लो कि महदी (अ.स.) सारे इल्मों के वारिस होंगे , और सारे इल्मों पर उनका वर्चस्प होगा...।

वह ऐसे रहबर हैं जो हर तरह की पाबन्दियों से आज़ाद होंगे और सिर्फ़ उनका दिल अल्लाह की मर्ज़ी के तहत होगा।

अतः वह विश्वव्यापी इंकेलाब और हुकूमत के रहबर के लिहाज़ से भी बेहतरीन होंगे।

मददगार

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के ज़हूर की ज़रुरी शर्तों मे से उन के अच्छे , उचित और ऐसे लायक मददगारों का वजूद भी है , जो इस इन्केलाब और हुकूमत के ओहदो पर रह कर इमाम (अ.स.) की मदद करें। ज़ाहिर सी बात है कि जब वह विश्वव्यापी इन्केलाब एक महान आसमानी रहबर के ज़रिये बर्पा होगा तो फिर उनके मददगार भी उसी स्तर के होंगे , ऐसा नहीं है कि जिस ने भी मदद करने का वादा कर लिया वही उन की मददगारों में शामिल हो जाये।

इस बारे में निम्न लिखित घटना पर ध्यान देने की ज़रूरत है :

हज़रत इमाम सादिक़ (अ.स.) का सुहैल पुत्र हसन खुरासानी नामक शिया इमाम (अ.स.) की खिदमत में अर्ज़ करता है :

आपके रास्ते में क्या चीज़ रुकावट है कि आप अपने हक़ (हुकूमत) के लिए क़ियाम (आन्दोलन) नहीं करते जबकि आपके एक लाख़ तलवार चलाने वाले घुड़सवार शिया मौजूद हैं ? इमाम (अ.स.) ने हुक्म दिया कि तन्दूर दहकाया जाये। इमाम के हुक्म से तन्दूर दहकाया गया और जब उसमें से आग के शोले बाहर निकलने लगे तो इमाम (अ.स.) ने सुहैल से फरमाया : ऐ खुरासानी ! उठो और इस तन्दूर में कूद जाओ। सुहैल समझे कि इमाम (अ.स.) उसकी बातों से नाराज़ हो गए हैं , अतः उन्हों ने इमाम से माफ़ी माँगते हुए कहा कि : मौला मुझे माफ़ कर दीजिये , मुझे आग में डाल कर सज़ा न दें। इमाम (अ.स.) ने फरमाया: मैं तुम्हें छोड़ता हूँ।

उसी वक़्त वहाँ पर इमाम (अ.स.) के एक सच्चे शिया हारुने मक्की आ गये , उन्होंने इमाम (अ.स.) को सलाम किया। इमाम ने सलाम का जवाब देने के बाद कुछ कहे सुने व बताये बग़ैर उन्हें हुक्म दिया कि इस तन्दूर में कूद जाओ।

हारुने मक्की यह सुनते ही फौरन उस तन्दूर में कूद गये और इमाम (अ.स.) उस खुरासानी से बात चीत करने में व्यस्त हो गये और उसे खुरासान की घटनाएं इस तरह सुनाने लगे जैसे इमाम (अ.स.) वहाँ ख़ुद मौजूद हों। कुछ देर के बाद इमाम (अ.स.) ने फरमाया : ऐ खुरासानी उठो और तन्दूर के अन्दर झाँक कर देखो ! जब सुहैल ने उठ कर तन्दूर के अन्दर झाँका तो देखा कि हारुने मक्की आग के शोलों के के बीच पलोथी मारे बैठे हुए हैं।

उस वक़्त इमाम (अ.स.) ने उस ख़ुरासानी से सवाल किया कि बताओ तुम खुरासान में हारुने मक्की जैसे कितने लोगों को पहचानते हो ? खुरासानी ने जवाब दिया : मैं तो ऐसे किसी इंसान को नहीं जानता !। इमाम (अ.स.) ने फरमाया : जान लो कि जब तक हमें पाँच मददगार नहीं मिलते , हम उस वक़्त तक क़ियाम (आन्दोलन) नहीं करते , हम बेहतर जानते हैं कि क़ियाम और इंकेलाब का कब वक़्त है... ?

अतः उचित है कि हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के मददगारों की सिफ़तों व विशेषताओं को रिवायतों के आधार पर पहचानें ताकि हम उनके अनुरूप ख़ुद को परखें और अपने अन्दर पाई जाने वाली कमियों को पूरा करने की कोशिश करें।

क- इमामत की शनाख़्त व आज्ञापालन

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के मददगारों को ख़ुदा वन्दे आलम और इमाम की गहरी शनाख्त है और वह पूरी जानकारी के साथ हक़ के मैदान में हाज़िर होते हैं।

हज़रत अली (अ.स.) उनके बारे में फरमाते हैं कि

"वह ऐसे इंसान हैं जो ख़ुदा को इस तरह पहचानते हैं कि जो उसे पहचानने का हक़ है।

इमाम की शनाख्त और इमामत का अक़ीदा भी उनके दिल की गहराइयों में अपनी जड़ें मज़बूत कर चुका है और उनके पूरे वजूद पर अपना वर्चस्व जमाये हुए है। उनकी इमामत के प्रति यह शनाख्त , इमाम (अ.स.) का नाम व नस्ब जानने से उच्च है। इमामत की शनाख़्त की वास्तविक्ता यह है कि इंसान इमाम के विलायत के हक़ और संसार में उनके बुलन्द मर्तबे को पहचानें। यही वह शनाख़्त है जिससे उनके दिल मुहब्बत से भर जाते हैं , और फिर वह उनकी आज्ञा पालन के लिए हर वक़्त और हर तरह से तैयार रहते हैं। क्योंकि वह जानते हैं कि इमाम (अ.स.) का हुक्म ख़ुदा का हुक्म है और उनकी इताअत (आज्ञा पालन) ख़ुदा की इताअत है।

पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने उनकी तारीफ़ में फरमाया कि

वह लोग अपने इमाम की आज्ञा पालन की पूरी कोशिश करते हैं...।

ख- इबादत और दृढ़ता

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के मददगार इबादत में अपने इमाम को नमून ए अमल बनाते हैं और अपना हर दिन व हर रात अल्लाह के ज़िक्र में ग़ुज़ारते हैं।

हज़रत इमाम सादिक़ (अ.स.) ने उन के बारे में फरमाया :

वह रात भर इबादत करते हैं , और दिन में रोज़ा रखते हैं...।

और एक दूसरी हदीस में फरमाते हैं कि

वह घोड़ों पर सवारी की हालत में भी अल्लाह की तस्बीह करते हैं...।

यही अल्लाह का ज़िक्र है जिस से वह फ़ौलादी मर्द बनते हैं , अतः उनकी दृढ़ता और मज़बूती को कोई भी चीज़ खत्म नहीं कर सकती।

हज़रत इमाम सादिक़ (अ.स.) फरमाते हैं कि

वह ऐसे मर्द होंगे कि उनके दिल लोहे के टुक्ड़े जैसे होंगे...।

ग- शहादत की तमन्ना

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के मददगारों की मअरेफ़त उन के दिलों को अपने इमाम की मुहब्बत से भर देती है , अतः वह जंग के मैदान में इमाम को अपने बीच में लेकर कर अपनी जान को इमाम की ढाल बना देंगे।

हज़रत इमाम सादिक़ (अ.स.) ने फरमाया :

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के मददगार जंग के मैदान में उनके चारों तरफ़ हल्का बनाए होंगें और अपनी जान को उनकी ढाल बना कर अपने इमाम की हिफ़ाज़त करेंगे...।

हज़रत इमाम सादिक़ (अ.स.) ही ने दूसरी जगह फरमाया :

वह अल्लाह की राह में शहादत पाने की तमन्ना करेंगे...।

घ- बहादुरी और दिलेरी

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के मददगार अपने मौला की तरह बहादुर और लोहपुरूष होंगे।

हज़रत अली (अ.स.) उनकी तारीफ़ में फरमाते हैं कि

"वह ऐसे शेर हैं जो अपने वन से बाहर निकल आये हैं और अगर चाहें तो पहाड़ों को भी हिला सकते हैं...।

ङ- सब्र और बुर्दबारी

स्पष्ट है कि विश्वव्यापी ज़ुल्म व सितम से मुक़ाबेला करने और विश्व स्तर पर न्याय व समानता पर आधारित हुकूमत की स्थापना करने में बहुत से मुशकिलों व परेशानियों का सामना होगा और इमाम (अ.स.) के मददगार अपने इमाम के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए मुशकिलों व परेशानियों को बर्दाश्त करेंगे , लेकिन इखलास व निस्वर्थता के आधार पर अपने काम को साधारण व बहुत छोटा मानेंगे।

हज़रत अली (अ.स.) ने फरमाया :

वह ऐसा गिरोह है जो अल्लाह की राह में काम करने पर अपनी बुर्दबारी और सब्र की वजह से अल्लाह पर एहसान नहीं जतायेंगे , और अपनी जान को हज़रते हक़ के सामने पेश करने पर अपने ऊपर गर्व नहीं करेंगे और उस चीज़ को महत्व नहीं देंगे...।

च- एकता

हज़रत अली (अ.स.) हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के मददगारों की एकता के बारे में फरमाते हैं कि

"वह लोग एक दिल और एक सूत्र में बंधे होंगे...।

उस एकता का कारण यह है कि उनके अन्दर स्वार्थता नहीं पाई जायेगी , वह सही अक़ीदे के साथ एक परचम के नीचे और एक मकसद को पाने के लिए क़ियाम (आन्दोलन) करेंगे , और यह दुशमन के मुक़ाबले में उनकी कामयाबी का एक राज़ है।

छ- ज़ोह्द व तक़वा

हज़रत अली (अ.स.) इमाम महदी (अ.स.) के यारो मददगारों के बारे में फरमाते हैं कि

वह अपने मददगारों से बैअत लेंगे कि सोना व चाँदी जमा न करें और गेहूँ व जौ का भण्डार इकठ्ठा न करें...

उनके उद्देश्य महान हैं और वह एक महान उद्देश्य के लिए ही क़ियाम (आन्दोलन) करेंगे। दुनिया का माल व धन उनको उस महान मक़सद से पीछे नहीं हटा सकता। अतः जिन लोगों की आँखें दुनिया की चमक दमक देख कर चौंधियां जाती हैं और जिनका दिल धन दौलत देख कर पानी पानी हो जाता है , उन लोगों को इमाम महदी (अ.स.) के ख़ास मददगारों में कोई जगह नहीं मिलेगी।

प्रियः पाठकों ! हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के मददगारों की जिन सिफ़तों व विशेषताओं का वर्णन हुआ है , इन्हीँ सिफ़तों व विशेषताओं की वजह से उन्हें रिवायतों में आदर व एहतेराम के साथ याद किया गया है और सभी मासूम इमामों (अ.स.) की ज़बानों पर उनकी तारीफ़ व प्रशंसा रही हैं।

पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने उनकी तारीफ़ में फरमाया :

”اُوْلَئِکَ ہُمْ خِیَارُ الاٴمَّةِ “

अर्थात वह लोग मेरी उम्मत के सब से अच्छे इंसान हैं।

हज़रत अली (अ.स.) फरमाते हैं कि

فَبِاَبِی وَ اُمّی مِنْ عِدّةٍ قَلِیْلَةٍ اَسْمَائُہُمْ فِی الاٴرْضِ مَجْہُولَة “

मेरे माँ बाप उस छोटे से गिरोह पर कुर्बान जो ज़मीन पर गुमनाम हैं।

अलबत्ता हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के मददगार अपनी योग्यता व सलाहियत के आधार पर विभिन्न दर्जों व श्रेणियों में बटे होंगे। रिवायतों में उल्लेख हुआ है कि हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के उन ख़ास 313 मददगारो (जिन के हाथों में क़ियाम का नक्शा होगा) के अलावा दस हज़ार लोगों की एक फ़ौज भी होगी और उनके अतिरिक्त इन्तेज़ार करने वाले मोमिनों की एक बहुत बड़ी संख्या उनकी मदद के लिए दौड़ पड़ेगी।

आम तैयारियाँ

मासूम इमामों (अ.स.) की ज़िन्दगी में विभिन्न अवसरों पर यह बात देखने में आई है कि लोग इमाम को मौजूद होने की सूरत में उनसे बेहतर फ़ायदा उठाने के लिए ज़रूरी तैयारी नहीं रखते थे। किसी भी ज़माने में मासूम इमाम (अ.स.) के मौजूद होने की क़दर नहीं की गई और उनकी हिदायत से उचित लाभ नहीं उठाया गया। अतः ख़ुदा वन्दे आलम ने अपनी आखरी हुज्जत को ग़ैबत में भेज दिया , ताकि जब सब लोग उनको क़बूल करने के लिए तैयार हो जायेंगे तो इमाम (अ.स.) को ज़ाहिर कर दिया जायेगा और तब सभी उनसे लाभान्वित होंगे।

इस आधार पर हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के ज़हूर के लिए तैयार रहना महत्वपूर्ण शर्तों में से एक है , क्योंकि इस तैयारी की वजह से इमाम (अ.स.) का समाज सुधार आन्दोलन अपने उद्देश्यों को प्राप्त कर सकता है।

कुरआने क़रीम में बनी इस्राईल के एक गिरोह का वर्णन हुआ है , उस गिरोह के लोग अपने ज़माने के ज़ालिम व आत्याचारी शासक जालूत के ज़ुल्म व अत्याचारों से बहुत ज़्यादा परेशान हो चुके थे , उन्होंने अपने ज़माने के नबी से निवेदन किया कि आप हमारे लिए एक ताक़तवर सरदार निश्चित कर दीजिये ताकि हम उसके आधीन रह कर जालूत से जंग कर सकें।

इस घटना का वर्णन कुरआने मजीद में इस प्रकार हुआ है :

< اٴَلَمْ تَرَ إِلَی الْمَلَإِ مِنْ بَنِی إِسْرَائِیلَ مِنْ بَعْدِ مُوسَی إِذْ قَالُوا لِنَبِیٍّ لَہُمْ ابْعَثْ لَنَا مَلِکًا نُقَاتِلْ فِی سَبِیلِ اللهِ قَالَ ہَلْ عَسَیْتُمْ إِنْ کُتِبَ عَلَیْکُمْ الْقِتَالُ اٴَلاَّ تُقَاتِلُوا قَالُوا وَمَا لَنَا اٴَلاَّ نُقَاتِلَ فِی سَبِیلِ اللهِ وَقَدْ اٴُخْرِجْنَا مِنْ دِیَارِنَا وَاٴَبْنَائِنَا فَلَمَّا کُتِبَ عَلَیْہِمْ الْقِتَالُ تَوَلَّوْا إِلاَّ قَلِیلًا مِنْہُمْ وَاللهُ عَلِیمٌ بِالظَّالِمِینَ >

क्या तुम ने मूसा के बाद बनी इस्राईल के उस गिरोह को नहीं देखा जिस ने अपने नबी से कहा कि हमारे लिए एक बादशाह निश्चित कर दीजिये ताकि हम अल्लाह की राह में जिहाद करें , नबी ने फरमाया कि मुझे यह अंदेशा है कि तुम पर जिहाद वाजिब हो जायेगा और तुम जिहाद नहीं करोगे , उन लोगों ने कहा कि हम क्यों जिहाद नहीं करेंगे जबकि हमें हमारे घरों बाहर निकाल दिया गया है और बाल बच्चों से अलग कर दिया गया है , इसके बाद जब उन पर जिहाद वाजिब कर दिया गया तो थोड़े से लोगों के अलावा सब अपनी बात से फिर गये और अल्लाह ज़ालमीन को अच्छी तरह जानता है।

जंग के लिए सरदार निश्चित करने का आवेदन एक तरह से इस बात को स्पष्ट करता था कि वह जंग के लिए तैयार हैं , जबकि रास्ते में एक बहुत बड़ी संख्या में लोग सुस्त पड़ गये और बहुत कम लोग जंग मैदान में हाज़िर हुए।

अतः इमाम महदी (अ.स.) का ज़हूर भी उसी वक़्त होगा जब सभी लोगों में समाजिक न्याय , अखलाक़ी व सदाचारिक स्वच्छता और आत्मीय शाँति के प्रति जागरूकता पैदा हो जायेंगी। जब लोग अनयाय और क़बीला परस्ती से थक जायेंगे , जब कमज़ोर लोगों के अधिकार मालदारों व ताक़तवरों के पैरों तले कुचले जायेंगे , जब माल व दौलत सिर्फ़ कुछ ख़ास लोगों के क़ब्ज़े में होगी और कुछ लोगों के पास रात में खाने के लिए रोटी भी न होगी , एक गिरोह अपने लिए महल बनाता हुआ दिखाई देगा और अपने परोग्रामों में बहुत ज़्यादा खर्च करेगा और उनके लिए ऐसे ऐसे खाने व ऐशो आराम के ऐसे ऐसे सामान उपलब्ध होंगे कि उन्हें देख कर आँखें चका चौंध होंगी , तो ऐसे मौक़े पर न्याय व समानता की प्यास अपने चरम बिन्दु पर पहुँच जायेगी।

जब समाज में विभिन्न बुराईयाँ फैलती जा रही हों और लोग बुरे काम करने में एक दूसरे से आगे बढ़ रहे हों , बल्कि अपने बुरे कामों पर गर्व कर रहे हो , इंसानी और इलाही उसूल से दूर भागा जा रहा हो , पवित्रता व पाकीज़गी के विपरीत कामों को कानूनी शक्ल दी जा रही हो जिसके नतीजे में पारिवारिक व्यवस्था चर मरा रही हो , लावारिस बच्चों को समाज के हवाले किया जा रहा हो , तो इस अवसर पर ऐसे रहबर के ज़हूर की अभिलाषा बहुत ज़्यादा की जायेगी जिसकी हुकूमत अखलाकी व आत्मीय सुख व शाँति का पैगाम ले कर आये। जिस वक़्त इंसान के पास मोज मस्ती के समस्त भौतिक साधन मौजूद हों लेकिन वह अपनी ज़िन्दगी से खुश न हो और उसे किसी ऐसी दुनिया की तलाश हो जो आध्यात्म से भरी हो तो उस मौक़े पर इंसान को उस महान इमाम की ज़रूरत का एहसास होगा।

स्पष्ट है कि इमाम (अ.स.) के हाज़िर होने को समझने का शौक़ उस वक़्त अपनी चरम सीमा पर होगा जब आदमी अपने व्यक्तिगत तजर्बे से इंसानी बुद्धिमत्ता के विभिन्न कारनामों को देख कर यह समझ जायेगा कि दुनिया को ज़ुलम व सितम और बुराईयों से छुटकारा दिलाने वाला ज़मीन पर अल्लाह के खलीफ़ा हज़रत इमाम महदी (अ.स.) ही हैं और इंसानों के लिए पाक व साफ और बेहतरीन ज़िन्दगी प्रदान करने वाला विधान सिर्फ़ और सिर्फ़ अल्लाह का क़ानून हैं। अतः उस मौक़े पर इंसान अपने पूरे वजूद से इमाम (अ.स.) की ज़रुरत का एहसास करेगा और इस एहसास की वजह से उनके ज़हूर के लिए रास्ता हमवार करने की कोशिश करते हुए उस राह में मौजूद रुकावटों को दूर करेगा। यह उसी वक़्त होगा जब फरज और ज़हूर का वक़्त पहुँच जायेगा।

पैग़म्बरे इस्लाम (स.) आख़िरी ज़माने अर्थात ज़हूर से पहले के ज़माने के बारे में फरमाते हैं कि

एक ज़माना ऐसा आयेगा जिसमें मोमिन को पनाह लेने की जगह नहीं मिलेगी ताकि ज़ुल्म व सितम और बर्बादी से छुटकारा मिल सके , अतः उस वक़्त ख़ुदा वन्दे आलम मेरी नस्ल से एक इंसान को भेजेगा...

ज़हूर की निशानियाँ

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के विश्वव्यापी इंकेलाब और क़ियाम व आन्दोलन के लिए कुछ निशानियों का वर्णन हुआ हैं और उन निशानियों की पहचान बहुत से सकारात्मक प्रभाव रखती हैं। चूँकि यह महदी ए आले मुहम्मद स. के ज़हूर कि निशानियाँ है अतः इनमें से हर एक के प्रकट होने से इन्तेज़ार करने वालों के दिलों में उम्मीद की किरणों में वृद्धी होगी और दुश्मनों व भटके हुए लोगों के लिए ख़तरे की घन्टी बजेगी ताकि वह बुराईयों से दूर हो जायें। इसी तरह इन तरह निशानियों के ज़ाहिर होने से इन्तेज़ार करने वालों में अपने अन्दर इमाम (अ.स.) के साथ रहने और उनकी मदद करने की क्षमता प्राप्त करने का शौक पैदा होगा। इस के अलावा भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं का परिचय इंसान को भविष्य के लिए योजना बनाने में सहायक सिद्ध होगा और यह निशानियाँ महदवियत के सच्चे और झूटे दावेदारों को परखने की सबसे अच्छी कसौटी हैं। अतः अगर कोई महदवियत का दावा करे और उसके क़ियाम (आन्दोलन) में यह ख़ास निशानियाँ न पाई जाती हों तो उसके झूठे होने का आसानी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

हमारे मासूम इमामों (अ.स.) की रिवायतों में हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के ज़हूर की बहुत सी निशानियों का वर्णन हुआ हैं. उनमें से कुछ साधारण व प्रकृतिक हैं और कुछ असाधारण व चमत्कारिक हैं।

हम इन निशानियों में से पहले उन स्पष्ट और उच्च निशानियों का उल्लेख करते हैं जिनका वर्णन विश्वसनीय किताबों और विश्वसनीय रिवायतों में हुआ हैं और आखिर में कुछ अन्य निशानियों का संक्षेप में वर्णन करेंगे।

हज़रत इमाम सादिक़ (अ.स.) ने एक रिवायत के अन्तर्गत फरमाया :

क़ाइम (अ.स.) के ज़हूर की पाँच निशानियां है , सुफ़यानी का ख़रुज , यमनी का क़ियाम , आसमानी आवाज़ , नफ्से ज़किय्या का क़तल और खस्फे बैदा... ।

प्रयः पाठकों ! अब हम उपरोक्त वर्णित इन पाँचो निशानियों के बारे में व्याख्या करते हैं इनका वर्णन अन्य बहुत रिवायतों में भी हुआ हैं , लेकिन इन घटनाओं से संबंधित समस्त व्याख्या हमारे लिए यक़ीनी नहीं है।

सुफ़यानी का ख़रुज (आक्रमण)

सुफ़यानी का आक्रमण उन निशानियों में से एक है जिनका वर्णन अनेकों रिवायतों में हुआ है। सुफ़यानी अबू सुफ़यान की नस्ल से होगा और ज़हूर से कुछ समय पहले शाम नामक स्थान से आक्रमण करेगा। वह ज़ालिम व अत्याचारी होगा और क़त्ल व ग़ारत में किसी तरह की कोई पर्वा नहीं करेगा। वह अपने दुशमनों से बहुत ही बुरा व्यवहार करेगा।

हज़रत इमाम सादिक़ (अ.स.) उसके बारे में फरमाते हैं कि

“ अगर तुमने सुफयानी को देख लिया तो ऐसा है जैसे तुमने सब से नीच और बुरे इंसान को देख लिया हो... ”

उसका आक्रमण रजब के महीने से शुरु होगा , वह शाम और उसके आस पास के इलाकों पर क़ब्ज़ा करने के बाद इराक़ पर हमला करेगा और वहाँ बड़े पैमाने पर कत्ल व ग़ारत करेगा।

कुछ रिवायतों में वर्णन मिलता है कि उसके आक्रमण और उसके क़त्ल होने तक की मुद्दत 15 महीने होगी...।

खस्फ़े बैदा

खस्फ़ का अर्थ फटना व गिरना हैं और बैदा मक्के व मदीने के बीच एक जगह का नाम है।

खस्फ़ बैदा से यह अभिप्रायः है कि सुफ़यानी इमाम महदी (अ.स.) से मुक़ाबले के लिए एक फ़ौज को मक्के की तरफ़ भेजेगा और जब उसकी यह फ़ौज बैदा नामक स्थान पर पहुँचेगी तो चमत्कारिक रूप से ज़मीन फट जायेगी और वह फ़ौज वहीँ ज़मीन में धँस जायेगी।

हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ.स.) ने इस बारे में फरमाया कि

“ सुफ़यानी की फ़ौज के सरदार को खबर मिलेगी कि हज़रत इमाम महदी (अ.स.) मक्के की तरफ़ रवाना हो चुके हैं अतः वह उनके पीछे एक फ़ौज रवाना करेगा , लेकिन वह फ़ौज उनको नहीं पा सकेगी और जब सुफ़यानी की फ़ौज बैदा नामक ज़मीन पर पहुंचेगी तो एक आसमानी आवाज़ आयेगी कि ऐ बैदा की ज़मीन इनको भस्म कर दे। यह सुनने के बाद वह ज़मीन सुफ़यानी की फौज को अपने अन्दर खींच लेगी...।

यमनी का क़ियाम (आन्दोलन)

यमन नामक जगह का एक सरदार का आन्दोलन इमाम (अ.स.) के ज़हूर की निशानी है। यह निशानी इमाम के ज़हूर से कुछ ही दिनों पहले ज़ाहिर होगी। वह एक ऐसा नेक और मोमिन इंसान होगा , जो बुराइयों के खिलाफ़ आन्दोलन चलायेगा और अपनी पूरी ताक़त से बुराइयों व अश्लीलता का मुक़ाबला करेगा , परन्तु उसके आन्दोलन का पूर्ण विवरण हमारे लिए स्पष्ट नहीं है।

इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ.स.) उस बारे में फरमाते हैं कि

“ हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के क़ियाम से पहले बुलन्द होने वाले झंड़ो के बीच यमनी का झंडा हिदायत करने वालों में सब से बेहतर होगा , क्यों कि वह लोगों को तुम्हारे मौला हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की तरफ़ बुलायेगा...। ”

आसमान से आवाज़ का आना

इमाम (अ.स.) के ज़हूर की निशानियों में से एक निशानी आसमान से चीख़ की आवाज़ आना है। कुछ रिवायत के आधार पर यह आसमानी आवाज़ जनाबे जिब्रइल की आवाज़ होगी , जो रमज़ान के महीने में सुनाई देगी...।

और चूँकि पूर्ण समाज सुधारक का इंकेलाब एक विश्वव्यापी इंकेलाब होगा और सभी को उसका इंतेज़ार होगा , अतः दुनिया भर के लोगों को उसी आसमानी आवाज़ के ज़रिये खबर दी जायेगी।

हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ.स.) ने फरमाया :

“ क़ाइम आले मुहम्मद (अ.स.) का ज़हूर उस वक़्त तक नहीं होगा जब तक आसमान से आवाज़ न दी जाये और उस आवाज़ को पूरब व पश्चिम के सभी निवासी सुनेंगे...। ”

यह आवाज़ जिस तरह मोमिनों के लिए खुशी का पैग़ाम बनेगी उसी तरह बुरे लोगों के लिए ख़तरे की घन्टी होगी ताकि वह अपने बुरे कामों से दूर हो कर हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के मददगारों में शामिल हो जायें।

उस आवाज़ की व्याख्या का विभिन्न रिवायतों में वर्णन हुआ हैं , इसके बारे में हज़रत इमाम सादिक (अ.स.) ने फरमाया :

आसमान से आवाज़ देने वाला हज़रत इमाम महदी (अ.स.) को उनके और उनके पिता के नाम के साथ पुकारेगा...।

नफ़्से ज़किया का क़त्ल

नफ्से ज़किया का अर्थ ऐसा इंसान हैं जो कमाल के बुलन्द दर्जे पर पहुँचा हुआ हो या ऐसा पाक , पाक़ीज़ा व बेगुनाह इंसान जिसने किसी को क़त्ल न किया हो। नफ्से ज़किय्या के क़त्ल से यह अभिप्रायः है कि हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के ज़हूर से कुछ पहले एक उच्च और बेगुनाह इंसान को इमाम (अ.स.) के मुखालिफ़ो के द्वारा क़त्ल किया जायेगा।

कुछ रिवायतों के आधार पर यह घटना इमाम महदी (अ.स.) के ज़हूर से 15 दिन पहले घटित होगी।

इस बारे में हज़रत इमाम सादिक़ (अ.स.) ने फरमाया :

क़ाइमे आले मुहम्मद (स.) के ज़हूर और नफ्से ज़किय्या के क़त्ल में सिर्फ़ 15 दिन का फ़ासला होगा...।

प्रियः पाठकों ! उपरोक्त वर्णित निशानियों के अलावा भी कुछ अन्य निशानियों का वर्णन हुआ हैं उनमें से कुछ ख़ास निशानियाँ निम्न लिखित है :

दज्जाल का ख़रुज , दज्जाल एक ऐसा धोकेबाज़ और मक्कार आदमी होगा जिसने बहुत से लोगों को गुमराह किया होगा , रमज़ान के मुबारक़ महीने में सूरज ग्रहण होना , चाँद ग्रहण होना , उपद्रवों का फैलना और खुरासानी का आन्दोलन।

उल्लेखनीय है कि इन निशानियों का सविस्तार वर्णन बड़ी किताबों में मौजूद हैं।


तीसरा हिस्सा

ज़हूर

जिस वक़्त ज़हूर की बातें होती हैं तो इंसान के दिल में एक बहुत सुन्दर एहसास पैदा होता है जैसे वह नहर के किनारे किसी हरे भरे बाग में बैठा हुआ है और मधुर स्वर बुलबुलों की आवाज़ सुन रहा है। जी हाँ ! अच्छाइयों का प्रकट होना और अच्छाइयों का फैलना , थकी हारी रुहों व आत्माओं को ख़ुशिया प्रदान करता है , और इससे उम्मीदवारों की आँखों में बिजली सी चमक उठती है।

हम इस हिस्से में हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के ज़हूर और उनके हुज़ूर के मौक़े पर घटने वाली घटनाओं का वर्णन करेंगे। और उस बेमिसाल जमाल को ग़ैबत का पर्दा उठाते हुए देखेंगे।

ज़हूर का ज़माना

हमेशा से लोगों के ज़ेहनों में यह सवाल पैदा होता है कि इमामे ज़माना (अ.स.) कब ज़हूर फरमायेंगे ? और क्या ज़हूर के लिए कोई वक़्त निश्चित है ?

इस सवाल का जवाब मासूमीन (अ.स.) वर्णित रिवायत के आधार यह है कि ज़हूर का ज़माना निश्चित नहीं है।

इस बारे में हज़रत इमाम सादिक़ (अ.स.) फरमाते हैं कि

“ हमने न तो कभी पहले ज़हूर के लिए कोई वक़्त निश्चित किया है और न ही इसके लिए भविष्य में कोई वक़्त निश्चित करेंगे...। ”

इस आधार पर ज़हूर के लिए कोई वक़्त निश्चित करने वाले लोग झूठे व धोखेबाज़ हैं और विभिन्न रिवायतों में इस बात की पुष्टी भी की गई है।

हज़रत इमाम मुहम्मद बाकिर (अ.स.) के एक सहाबी ने उनसे ज़हूर के बारे में सवाल किया तो उन्होंने फरमाया :

जो लोग ज़हूर के लिए वक़्त निश्चित करें वह झूटे हैं।

अतः इस तरह की रिवायतों से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि हमेशा ही कुछ लोग शैतानी वसवसों के कारण इमाम (अ.स.) के ज़हूर के लिए वक़्त निश्चित करते रहे हैं और ऐसे लोग भविष्य में भी पाये जायेंगे। इसी वजह से अइम्मा ए मासूमीन (अ.स.) ने अपने शियों को यह पैगाम दिया है कि वह कभी भी ज़हूर के लिए वक़्त निश्चित करने वालों के सामने खामोश न रहें बल्कि उनके झूट को उजागर करने की कोशिश करें।

हज़रत इमाम सादिक़ (अ.स.) इस बारे में अपने एक सहाबी से फरमाते हैं कि

“ज़हूर के लिए वक़्त निश्चित करने वालों को झुठलाने में किसी भी तरह की पर्वा न करो , क्योंकि हम ने किसी के सामने ज़हूर का वक़्त निश्चित नहीं किया है।

ज़हूर के वक़्त को छुपाने का राज़

जैसा कि ऊपर उल्लेख हो चुका है कि ख़ुदा वन्दे आलम ने किसी ख़ास वजह से हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के ज़हूर के वक़्त को हम से छुपा कर रखा है। बेशक इस मसले कुछ हिकमतें पाई जाती हैं , जिनमें से कुछ की तरफ़ हम यहाँ इशारा कर रहे हैं।

उम्मीद का बाक़ी रखना

जब ज़हूर का ज़माना मालूम नहीं होता तो इन्तेज़ार करने वालों के दिलों में हर वक़्त उम्मीद की किरणे मौजूद रहती हैं और वह उस उम्मीद के साथ ग़ैबत के ज़माने में हमेशा परेशानियों के मुक़ाबले में सब्र व दृढ़ता से काम लेते हैं। वास्तव में अगर पिछली शताब्दियों के शियों से कहा जाता कि तुम्हारे ज़माने में इमाम (अ.स.) का ज़हूर नहीं होगा , बल्कि कुछ शताब्दियों बाद ज़हूर होगा तो फिर वह किस उम्मीद के साथ अपने ज़माने की मुशकिलों का मुक़ाबला करते और किस तरह ग़ैबत के ज़माने के तंग व अँधेरे रास्ते को सही तरह से तय करते ?

ज़हूर के रास्तों को हमवार करना

बेशक इन्तेज़ार उसी सूरत में बेहतरीन कामों का कारण बन सकता है जब ज़हूर का ज़माना मालूम न हो , क्यों कि अगर ज़हूर का ज़माना निश्चित हो जाये तो फिर जिन लोगों को मालूम है कि हम ज़हूर के ज़माने तक नहीं रहेंगे तो फिर उनके अन्दर रास्ता हमवार करने का शौक पैदा नहीं होगा और वह बुराइयों के सामने हाथ पर हाथ रख कर बैठे रहेंगे।

जबकि अगर ज़हूर का ज़माना मालूम न हो तो इंसान हर वक़्त इस उम्मीद में रहता है कि न जाने कब ज़हूर हो जाये और वह ज़हूर के ज़माने को प्राप्त कर ले। अतः वह इसी कारण ज़हूर के लिए रास्ता हमवार करने की कोशिशें करता है और अपने समाज को नेक समाज में परिवर्तित करने के लिए प्रयासरत रहता है।

इसके अलावा ज़हूर का वक़्त निश्चित होने की सूरत में अगर कुछ कारणों से निश्चित समय पर ज़हूर न हो सका तो फिर कुछ लोग हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के अक़ीदे में शक करने लगेंगे।

हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ.स.) से सवाल किया गया कि क्या ज़हूर के लिए कोई वक़्त निश्चित है ? तो उन्होंने फरमाया :

जो लोग ज़हूर के लिए वक़्त निश्चित करें वह झूठे हैं। इमाम ( अ. स.) ने इस जुमले को दो बार कहा जिस वक़्त जनाबे मूसा (अ.स.) ख़ुदा के बुलाने से तीस दीन के लिए अपनी क़ौम के बीच से चले गए और ख़ुदा वन्दे आलम ने उन तीस दिनों में दस दिन और बढ़ा दिये तो उस वक़्त जनाबे मूसा (अ.स.) की क़ौम ने कहा : मूसा ने अपने वादे को वफ़ा नहीं किया है। अतः वह उन कामों को करने लगे जो उनको नहीं करने चाहिए थे। वह दीन से फिर गए और गाय की पूजा शुरु कर दी।

इन्केलाब का आरम्भ

सब लोग ये जानना चाहते हैं कि हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के इस विश्वव्यापी इंकेलाब में क्या क्या घटनाएं घटित होंगी ? इमाम का यह आन्दोलन कहाँ से और कैसे शुरु होगा ? हज़रत इमाम महदी (अ.स.) अपने मुखालिफ़ों से कैसा व्यवहार करेंगे ? वह किस तरह पूरी दुनिया पर क़ब्ज़ा करेंगे ? और तमाम महत्वपूर्ण कामों की बाग ड़ोर अपने हाथों में कैसे संभालेंगे ? यह सवाल और इन्हीँ से मिलते जुलते अन्य सवाल ज़हूर का इन्तेज़ार करने वाले इंसानों के ज़हन में आते रहते हैं। लेकिन हक़ीक़त यह है कि इंसानों की आखरी उम्मीद के ज़हूर के घटनाओं के बारे में बात करना बहुत मुशकिल काम है। क्योंकि भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं के बारे में साधारण रूप से गहरी जानकारी प्राप्त नहीं की जा सकती है।

अतः हम इस हिस्से में जो कुछ उल्लेख करेंगे वह हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के ज़हूर के ज़माने की वह घटनाएं हैं जिनका वर्णन अनेकों किताबों में हुआ हैं और जिन में इमाम (अ.स.) के ज़हूर के ज़माने की घटनाओं की एक झक मिलती है।

क़ियाम की स्थिति

जब ज़ुल्म , सितम , अत्याचार व तबाही दुनिया की शक्ल को काला कर देगी , जब ज़ालिम व अत्याचारी लोग इस ज़मीन को एक बुरे मैदान में परिवर्तित कर देंगे , और पूरी दुनिया के लोग ज़ुल्म व सितम से परेशान होकर मदद के लिए हाथों को आसमान की तरफ़ उठायेंगे तो आचानक आसमान से आने वाली एक आवाज़ रात के अंधेरों को काफ़ूर कर देगी और रमज़ान के महीने में हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के ज़हूर की खुश ख़बरी देगी। तब दिल घड़कने लगेंगे और आँखें चौधियाँ जायेंगी , रात भर अय्याशी करने वाले सुबह को इमाम के ज़ाहिर होने की वजह से परेशान होकर भागने का रास्ता ढूँढने की फ़िक्र में होंगे और हज़रत इमाम महदी (अ.स.) का इन्तेज़ार करने वाले अपने महबूब इमाम को तलाश करने और उनके मददगारों में शामिल होने के लिए बेचैन होंगे।

उस मौक़े पर सुफ़यानी जो कई देशों पर क़ब्ज़ा किये हुए होगा जैसे सीरिया , उर्दन , फ़िलिस्तीन , वह इमाम से मुक़ाबले के लिए एक फ़ौज तैयार करेगा और उसे इमाम के मुक़ाबले के लिए मक्के की ओर भेजेगा लोकिन सुफ़यानी की यह फ़ौज जैसे ही बैदा नामक जगह पर पहुँचेगी , ज़मीन में धँस कर भस्म हो जायेगी।

नफ्से ज़किया की शहादत के कुछ ही समय के बाद इमाम महदी (अ.स.) एक जवान मर्द की सूरत में मस्जिदुल हराम में ज़हूर फरमायेंगे। उनकी हालत यह होगी कि वह पैग़म्बरे इस्लाम (स.) की क़मीज़ पहने होंगे और रसूले ख़ुदा (स.) का अलम अपने हाथ में लिए होंगे। वह खाना ए काबा की दीवार से टेक लगाये हुए रुक्न व मक़ाम के बीच ज़हूर का तराना गुनगुनायेंगे। वह ख़ुदा वन्दे आलम की हम्द व सना और मुहम्मद व आले मुहम्मद पर दुरुद व सलाम के बाद यह फरमायेंगे :

ऐ लोगों ! हम ख़ुदा वन्दे आलम से मदद माँगते हैं और जो इंसान दुनिया के किसी भी कोने से हमारी आवाज़ पर आगे बढ़ने के लिए तैयार हो उसे मदद के लिए पुकारते हैं।

इसके बाद वह अपनी और अपने खानदान की पहचान कराते हुए फरमायेंगे :

” فَالله الله فِینَا لاٰتَخْذُلوْنا وَ انصرُوْنا یَنْصُرْکمُ الله تعالیٰ

हमारे हक़ की रिआयत के बारे में ख़ुदा को नज़र में रखो और न्याय फैलाने व ज़ुल्म का मुक़ाबेला करने की प्रक़िया में हमें तन्हा न छोड़ो , तुम हमारी मदद करो , ख़ुदा वन्दे आलम तुम्हारी मदद करेगा।

इमाम (अ.स.) की बात पूरी होने के बाद आसमान वाले ज़मीन वालों से आगे बढ़ जायेंगे और गिरोह - गिरोह आकर इमाम (अ.स.) की बैअत करेंगे। लेकिन उन सब से पहले वही लाने वाला महान फरिशता जिब्रईल इमाम की खिदमत में हाज़िर हो जायेगा और उसके बाद ज़मीन के 313 सितारे विभिन्न स्थानों से वही की ज़मीन अर्थात मक्का ए मोज़्ज़मा में इकठ्ठा हो कर उस इमामत के सूरज के चारों तरफ़ घेरा बना लेंगे और उनसे वफ़ादारी का वादा करेंगे। इमाम के पास आने वाले लोगों का सिलसिला जारी रहेगा यहाँ तक कि दस हज़ार सिपाहियों पर आधारित एक फ़ौज इमाम (अ.स.) के पास पहुँच जायेगी और पैग़म्बर (स.) के इस महान बेटे की बैअत करेगी।

इमाम (अ.स.) अपने मददगारों के इस महान लशकर के साथ क़ियाम का परचम लहराते हुए बहुत तेज़ी से मक्का और आस पास के इलाक़ों पर क़ाबिज हो जायेंगे ताकि उनके बीच न्याय , समानता व मुहब्बत स्थापित करें और उन शहरों के सिरफिरे लोगों का सर नीचा करें। उस के बाद वह इराक़ का रुख करेंगे और वहाँ के शहर कूफ़े को अपनी विश्वव्यापी हुकूमत का केन्द्र बना कर वहाँ से उस महान इन्क़ेलाब की देख रेख करेंगे। वह दुनिया वालों को इस्लाम और कुरआन के क़ानूनों के अनुसार काम करने और ज़ुल्म व सितम खत्म करने का निमन्त्रण देंगे और अपने नूरानी सिपाहियों को दुनिया के विभिन्न इलाक़ों की तरफ़ रवाना करेंगे।

इमाम (अ.स.) एक एक कर के दुनिया के बड़े बड़े मोर्चों को जीत लेंगे क्योंकि मोमिनों और वफ़ादार साथियों के अलावा फ़रिश्ते भी उनकी मदद करेंगे और वह पैग़म्बरे इस्लाम (स.) की तरह अपने लशकर के रोब व दबदबे से फायदा उठायेंगे। ख़ुदा वन्दे आलम इमाम (अ.स.) और उनके लशकर का इतना डर दुशमनों के दिलों में डाल देगा कि बड़ी से बड़ी ताक़त भी उनका मुकाबेला करने की हिम्मत नहीं करेगी।

हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ.स.) ने फरमाया :

क़ाइमे आले मुहम्मद (अ.स.) की मदद दुशमनों के दिल में दहशत व रोब पैदा करके की जायेगी।

उल्लेखनीय है कि इमाम (अ.स.) के लशकर के ज़रिये फतह होने वाले इलाकों में से बैतुल मुकद्दस भी है। इस के बाद एक बहुत ही मुबारक घटना घटित होगी , जिस से इमाम महदी (अ.स.) का इंकेलाब एक अहम मोड़ पर पहुँच जायेगा और इससे उनके मोर्चे को और दृढ़ता मिलेगी। वह महान व मुबारक घटना हज़रत ईसा (अ.स.) का आसमान से ज़मीन पर तशरीफ़ लाना है। कुरआने करीम की आयतों के अनुसार हज़रत ईसा मसीह ज़िन्दा हैं और आसमान में रहते हैं , लेकिन उस मौक़े पर वह ज़मीन पर तशरीफ़ लायेंगे और हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के पीछे नमाज़ पढेंगे। वह अपने इस काम से सबके सामने अपने ऊपर शियों के बारहवें इमाम हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की फज़ीलत , श्रेष्ठता , वरीयता और उनकी पैरवी का एलान करेंगे।

पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने फरमाया :

उस अल्लाह की क़सम जिस ने मुझे नबी बनाया और समस्त संसार के लिए रहमत बनाकर भेजा। अगर दुनिया की उम्र का एक दिन भी बाक़ी रह जायेगा तो ख़ुदा वन्दे आलम उस दिन को इतना लंबा कर देगा कि उस में मेरा बेटा महदी (अ.स.) क़ियाम कर सके , उस के बाद ईसा पुत्र मरियम (अ.स.) आयेंगे और हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के पीछे नमाज़ पढेंगे।

इस काम के द्वारा हज़रत ईसा (अ.स.) ईसाइयों को (जिन की संख्या उस समय दुनिया में बहुत होगी) अल्लाह की इस आख़िरी हुज्जत और शियों के इमाम पर ईमान लाने का संदेश देंगे। ऐसा लगता है कि ख़ुदा वन्दे आलम ने हज़रत ईसा (अ.स.) को इसी दिन के लिए ज़िन्दा रखा हुआ है ताकि हक़ चाहने वाले लोगों के लिए हिदायत का चिराग़ बन जायें।

वैसे हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के द्वारा मोजज़ों (चमत्कारों) को दिखाना , इंसानों की रहनुमाई व मार्गदर्शन के लिए फिक्र को खोलने वाले उच्च विचारों को प्रकट करना आदि इस महान इन्क़ेलाब की योजनाओं में सम्मिलित है ताकि लोगों की हिदायत का रास्ता हमवार हो जाये।

उसके बाद इमाम (अ.स.) यहूदियों की मुकद्दस व पवित्र किताब तौरैत की असली (जिनमें परिवर्न नही हुआ है) तख्तियों को ज़मीन से निकालेंगे। यहूदी उन तख्तियों में उनकी इमामत की निशानियों को देखने , उनके महान इंकेलाब को समझने , इमाम (अ.स.) के सच्चे पैग़ाम को सुन्ने और उनके मोजज़ों को देखने के बाद गिरोह - गिरोह कर के उनके साथ मिल जायेंगे। इस तरह ख़ुदा वन्दे आलम का वादा पूरा हो जायेगा और इस्लाम पूरी दुनिया को अपने परचम के नीचे जमा कर लेगा।

ھُوَ الَّذِی اٴَرْسَلَ رَسُولَہُ بِالْہُدَی وَدِینِ الْحَقِّ لِیُظْہِرَہُ عَلَی الدِّینِ کُلِّہِ وَلَوْ کَرِہَ الْمُشْرِکُونَ

वह अल्लाह , वह है , जिसने अपने रसूल को हिदायत और सच्चे दीन के साथ भेजा ताकि अपने दीन को तमाम धर्मों पर ग़ालिब बनाये चाहे मुशरिकों को कितना ही नागवार क्यों न हो।

प्रियः पाठकों ! इमाम ज़माना (अ.स.) के ज़हूर की इस मनज़र कशी के आधार पर यह कहा जा सकता है कि सिर्फ ज़ालिम व हठधर्म लोग ही हक़ व हकीकत के सामने नहीं झुकेंगे , लेकिन यह लोग भी मोमिनों और इंकेलाब के मुकाबले की हिम्मत नहीं जुटा पायेंगे और हज़रत महदी की न्याय व समानता फैलाने वाली तलवार से अपने शर्मनाक कामों की सज़ा भुगतेंगे इसके बाद ज़मीन और उस पर रहने वाले हमेशा के लिए बुराईयों व उपद्रवों से सुरक्षित हो जायेंगे।


पाँचवां अध्याय

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत

जब अँधेरों के बादल छट जायेंगे तो संसार को प्रकाशित करने वाले सूरज का उदय होगा और इस तरह इन्तेज़ार करने वाली आँखों को रौशनी मिलेगी।

जी हाँ ! ज़ुल्म , सितम , अत्याचार और बुराइयों से पूरा मुक़ाबेला करने के बाद न्याय व समानता पर आधारित हुकूमत स्थापित करने की बारी आयेगी। उस समय न्याय का राज होगा , ताकि हर चीज़ और हर इंसान को उसकी निश्चित जगह मिल जाये। हर चीज़ को उसका हक़ दिया जायेगा। अतः यह संसार और उस में रहने वाले लोग एक ऐसी हुकूमत को देखेंगे जो पूर्ण रूप से हक़ व अदालत और न्याय व समानता पर आधारित होगी। उस हुकूमत में किसी पर ज़र्रा बराबर भी ज़ुल्म व सितम नहीं होगा। वह हुकूमत ख़ुदा वन्दे आलम की जमाल व जलाल की सिफ़ातों का मज़हर (प्रदर्शन करने वाली) होगी और उस हुकूमत के अन्तर्गत इंसान अपनी भूली हुई समस्त इच्छाओं को प्राप्त कर लेगा।

प्रियः पाठकों ! हम इस अध्याय में चार विषयों पर अपने विचार प्रकट करेंगे।

1.हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की विश्वव्यापी हुकूमत के उद्देश्य।

2.हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत का संविधान।

3.न्याय व समानता पर आधारित उस हुकूमत के नतीजे।

4.उस हुकूमत की विशेषताएं।

पहला हिस्सा

उद्देश्य

चूँकि इस संसार की रचना का उद्देश्य , इंसान को कमाल तक पहुँचाना और सब कमालों के मालिक ख़ुदा वन्दे आलम से ज़्यादा से ज़्यादा क़रीब करना है , इस लिए इस महान इच्छा को प्राप्त करने के लिए उसके ज़रूरी साधनों का उपलब्ध कराना भी बहुत आवश्यक है। अतः हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की उस विश्वव्यापी हुकूमत का मक़सद इंसान को अल्लाह के क़रीब पहुँचने के साधन उपलब्ध कराना और इस रास्ते में आने वाली रुकावटों को दूर करना है।

क्योंकि इंसान शरीर व आत्मा से मिल कर बना है इस लिए उसकी ज़रुरतें भी भौतिक व आध्यात्मिक दो हिस्सों में विभाजित हैं। अतः कमाल तक पहुँचने के लिए ज़रुरी है कि दोनों पहलुओं को नज़र में रख कर आगे क़दम बढ़ाया जाये। चूँकि इलाही हुकूमत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह अदालत व न्याय पर आधारित होती है , इस लिए उसके अन्तर्गत इंसान भौतिक व आध्यात्मिक दोनों लिहाज़ से तरक्की की मंज़िलें बड़ी आसानी से तय कर सकता है।

इस आधार पर हमारे बारहवें इमाम हज़रत महदी (अ.स.) की हुकूमत भी समाज की आध्यात्मिक तरक़्क़ी और न्याय व समानता को स्थापित करने और उसे फैलाने के लिहाज़ से वर्णन योग्य है।

आध्यात्मिक तरक़्क़ी

उपरोक्त वर्णित दोनों उद्देश्यों की महत्ता व वास्तविक्ता को समझने के लिए ज़रूरी है कि हम पहले तागूत और ज़ालिम बादशाहों की हुकूमत के दौर में इंसानी ज़िन्दगी के इतिहास की थोड़ी सी छान बीन करें।

अब तक के मानवता के इतिहास में (अल्लाह की हुज्जत की हुकूमत को छोड़ कर) आध्यात्मिक्ता व आध्यात्मिक मर्यादाओं का क्या महत्व रहा है ? क्या इसके अलावा कुछ और है कि यह भटकी हुी मानवता हमेशा बुराइयों के रास्ते पर चलती रही है और अपनी इच्छाओं व शैतानी वसवसों का अनुसरण करने के कारण अपने हर गुण व अच्छाई को भुला बैठी है और उसने अपनी श्रेष्ठताओं को ख़ुद अपने ही हाथों से शहवतों व इच्छाओं के क़ब्रिस्तान में दफन कर दिया है ?! पाकीज़गी , पवित्रता , सच्चाई , आपसी सहयोग व मदद , त्याग व दान और नेकी व एहसान की जगह लोलुप्ता , कामुकता , झूट , धोके बाज़ी , स्वार्थता , विश्वासघात , ज़ुल्म , अत्याचार और ज़्यादा की हवस ने ले ली है। इन सबको अगर हम एक वाक्य में कहना चाहें तो इस तरह कह सकते हैं कि इंसानी ज़िन्दगी में आध्यात्मिक्ता दम तोड़ती जा रही है , बल्कि कुछ स्थानों पर तो बहुत से नाम मात्र के इंसानों के अन्दर आध्यात्मिक्ता के असर भी खत्म हो चुके हैं।

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत इंसान के वजूद व अस्तित्व में ऐसी ही चीज़ को ज़िन्दा करने के लिए क़दम उठायेगी और मुर्दा इंसान को एक नया जीवन प्रदान करने की कोशिश करेगी , ताकि जिस इंसानियत को फ़रिश्तों ने सजदा किया था उसे सच्ची ज़िन्दगी का मिठास चखाये और सबको यह याद दिलाये कि शुरु से ही तक़दीर यह थी कि तुम ऐसे ज़माने में ज़िन्दगी बसर करोगे और पाक़ीज़गी , पवित्रता और नेकियों के इतर की खुशबू अपनी रुह में पाओगे।

یَااٴَیُّہَا الَّذِینَ آمَنُوا اسْتَجِیبُوا لِلَّہِ وَلِلرَّسُولِ إِذَا دَعَاکُمْ لِمَا یُحْیِیکُمْ۔۔۔ >

ऐ ईमान लाने वालों ! अल्लाह और रसूल की आवाज़ पर आगे बढ़ो , जब वह तुम्हें उस काम की तरफ़ बुलायें जिसमें तुम्हारी ज़िन्दगी है।

अतः यह आध्यात्मिक जीवन जिसकी वजह से इंसान पशुओं से अलग होता है , यही इंसान का असली वजूद और महत्वपूर्ण हिस्सा है। क्यों कि आदमी को इसी ज़िन्दगी की वजह से इंसान कहा जाता है और यही ज़िन्दगी इंसान को ख़ुदा वन्दे आलम से नज़दीक करती है।

इसी वजह से हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत में इंसान का यह पहलू उजागर होगा और ज़िन्दगी के तमाम पहलुओं में इंसानी मर्यादाओं की धूम होगी मेल , जोल , प्यार , मोहब्बत , त्याग , वफ़ादारी , सच्चाी और हर उस चीज़ का बोल बाला होगा जो अच्छाी और नेकी के क्षेत्र में आती है।

जबकि इस महान और पवित्र मक़सद तक पहुँचने के लिए एक विशाल योजना की ज़रुरत है और उसके बारे में आगे चर्चा करेंगे।

न्याय का विस्तार

हर इंसानी समाज में ज़ुल्म व सितम सब से बड़ा ज़ख्म रहा है , इंसानियत हमेशा विभिन्न मसलों में अपने अधिकारों तक पहुँचने से वंचित रही है। इंसानी समाज में कभी भी में भौतिक और आध्यात्मिक नेमतें न्याय व समानता के आधार पर विभाजित नहीं हुई हैं। मालदार लोगों के साथ एक गिरोह हमेशा ही भूका रहा है। बड़े बड़े महलों के आस पास हमेशा ही कुछ लोग रास्तों और फुटपाथ पर ज़िन्दगी बसर करते रहे हैं। धन व दौलत की ताक़त ने सदैव गरीब और कमज़ोर लोगों को गुलामी की ज़न्जीर में जकड़ा है। गोरों ने कालों पर (सिर्फ काले होने के जुर्म में) ज़ुल्म व सितम किये हैं। अगर इन सब बातों को एक वाक्य में कहा जाये तो इस तरह कहा जा सकता है कि हमेशा और हर जगह ग़रीब व कमज़ोर लोगों के अधिकार , ताकतवरों और मक्कारों के द्वारा पैरों तले कुचले जाते रहे हैं। जबकि इंसान के दिल में हमेशा यह तमन्ना रही है कि एक दिन ऐसा आये कि समाज में न्याय व समानता का बोल बाला हो। अतः इंसान हमेशा से ही न्याय पर आधारित हुकूमत के इन्तेज़ार में है।

इस इन्तेज़ार की आखरी हद हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत का ज़माना है , और वह सब से बड़े आदिल और इंसाफ़ करने वाले हादी के रूप में पूरी दुनिया में न्याय व समानता स्थापित करेंगे। अतः इसी सच्चाई की ख़ुश ख़बरी बहुत सी रिवायतों में सुनाई गई है।

हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) ने फरमाया :

अगर दुनिया का एक दिन भी बाक़ी रह जाये तो ख़ुदा वन्दे आलम उस दिन को इतना लंबा कर देगा कि मेरी नस्ल से एक इंसान क़ियाम करेगा और ज़मीन को अदल व इंसाफ़ से वैसे ही भर देगा जैसे वह ज़ुल्म व सितम से भरी होगी , और यह बात मैं ने पैग़म्बरे इस्लाम (स.) से सुनी है।

इस के अलावा अनेको रिवायतों में हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत में विश्व स्तर पर न्याय व समानता स्थापित होने और ज़ुल्म व सितम के मिटने की ख़ुश खबरी दी गई है।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि न्याय व समानता हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की सबसे उच्च विशेषता है और इसी वजह से उन्हें कुछ दुआओं में उनके इसी लक़ब से याद किया गया है।

”اَللھم وَ صل علی ولی امرک القائم المومل و العدلِ المنتظر “

ऐ अल्लाह ! दुरुद व सलाम हो तेरे वली पर जो सब इन्तेज़ार करने वालों की तमन्ना और न्याय स्थापित करने वाले है।

जी हाँ! वह न्याय व समानता को अपने इंकेलाब का आधार बनायेंगे , क्योंकि न्याय व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में वास्तविक जिन्दगी के रास्ते को हमवार करता है। न्याय के बग़ैर ज़मीन और उस पर जीवन व्यतीत करने वाले ऐसे मुर्दा और बे रुह हैं जिनको ज़िन्दा शुमार किया जाता है।

हज़रत इमाम मूसा क़ाज़िम (अ.स.) ने निम्न लिखित आयत की तफ्सीर के बारे में में फ़रमाया है कि

< اعْلَمُوا اٴَنَّ اللهَ یُحْیِ الْاٴَرْضَ بَعْدَ مَوْتِہَا ۔۔۔ >

याद रखो कि अल्लाह मुर्दा ज़मीन को ज़िन्दा करने वाला है।

मक़सद यह नहीं है कि अल्लाह ज़मीन को बारीश के द्वारा ज़िन्दा करता है , बल्कि ख़ुदा वन्दे आलम कुछ ऐसे मर्दों को तैयार करेगा जो अदालत को ज़िन्दा करेंगे , अतः समाज में न्याय व समानता के स्थापित होने से ज़मीन ज़िन्दा हो जायेगी।

ज़मीन का ज़िन्दा होना इस बात की तरफ़ इशारा है कि हज़रत इमाम महदी (अ.स.) का न्याय आम न्याय होगा जो हर जगह स्थापित होगा , यह कुछ ख़ास इलाकों और कुछ ख़ास लोगों से संबंधित नही होगा।।

दूसरा हिस्सा

हुकूमत की योजनाएं

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की न्याय व समानता पर आधारित हुकूमत के उद्देश्यों से परिचित होने के बाद अब हम उस हुकूमत की योजनाओं और कारनामों के बारे में उल्लेख करते हैं , ताकि ज़हूर के ज़माने में होने वाले कामों को पहचान कर , ज़हूर से पहले के ज़माने के लिए एक आदर्श विधान तैयार किया जाये ताकि इंसानियत को निजात व मुक्ति दिलाने वाले उस महान इमाम के इंतेज़ार में रहने वाले लोग हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत की कार्य शैली और योजनाओं से परिचित हो कर ख़ुद को और समाज को उस रास्ते पर चलने के लिए तैयार करें।

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत के बारे में वर्णित अनेकों रिवायतों में उनकी हुकूमत के निम्न लिखित तीन आधारभूत स्तंभों का वर्णन मिलता हैं :

1-सांस्कृतिक योजना

2-आर्थिक योजना

3-सामाजिक योजना

दूसरे शब्दों में यह कहा जाये की इंसानी समाज कुरआन और अहले बैत (अ.स.) की शिक्षाओं से दूरी के कारण सासंकृतिक मैदान में भटकाव का शिकार हो गया है , अतः उसको एक महान सांस्कृतिक इंकेलाब के द्वारा कुरआन व इतरत की तरफ़ पलटना ज़रुरी है।

इसी तरह एक विस्तृत समाजिक योजना का होना भी ज़रूरी है क्योंकि आज इंसानी समाज में विभिन्न प्रकार के ज़ख्म मौजूद हैं। अतः अत्याचार व ज़ुल्म पर आधारित यह शैली जिसने समाज में अफरा तफ़री फैला रखी हैं और अनगिनत बुराइयों को जन्म दे दिया है , जिनके चलते कमज़ोर और गरीब लोगों के अधिकारों को कुचला जा रहा हैं , इसके स्थान पर एक ऐसी सही योजना के लागू होने की ज़रुरत है जो समाज के सच्चे व वास्तविक जीवन की ज़ामिन हो और जिसमें सबके इंसानी और इलाही अधिकारों का ख्याल रखा जाये।

सांस्कृतिक तरक़्क़ी और सामाजिक विकास का रास्ता हमवार करने के लिए आर्थिक योजना का होना बहुत ज़रूरी है , ताकि ज़मीन पर मौजूद भौतिक साधनों से सभी लोग न्यायपूर्वक लाभान्वित हो सकें और हर जगह व हर तबके के लोगों के लिए अपनी जीविका प्राप्त करना संभव हो।

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत की योजनाओं के बारे में संक्षिप्त जानकारी देने के बाद अब हम इस बारे में अइम्मा ए मासूमीन (अ.स.) की रिवायतों के आधार विस्तार पूर्वक वर्णन करते हैं और हर पहलु से संबंधित योजनाओं का उल्लेख करते हैं।

अ- सांस्कृतिक योजना

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की विश्वव्यापी हुकूमत में समस्त सासंस्कृतिक गतीविधियाँ लोगों के शैक्षिक व व्यवहारिक विकास के लिए होंगी और अज्ञानता का हर प्रकार से मुकाबला किया जायेगा।

इस सच्ची हुकूमत में जिन महत्वपूर्ण सासंस्कृतिक स्तंभों पर काम किया जायेगा वह निम्न लिखित हैं।

किताब व सुन्नत को ज़िन्दा करना

कुरआने करीम हर ज़माने में मज़लूम रहा है , इसको ताक़ की ज़ीनत बनाकर रखा गया है और इंसानी ज़िन्दगी में उसको भुला दिया गया है। हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत के दौरान कुरआने करीम की जीवन प्रदान करने वाली शिक्षाओं पर अमल होगा और मासूमीन (अ.स.) की सुन्नत , ज़िन्दगी के हर पहलु में इंसान के लिए नमूना ए अमल व आदर्श बनेगी। सभी के कामों को कुरआन व इतरत की पाक व पवित्र कसौटी पर परखा जायेंगे।

हज़रत अली (अ.स.) हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की कुरआनी हुकूमत की तारीफ़ करते हुए फरमाते हैं कि

“ जिस ज़माने में इंसान पर , इंसान की इच्छाएं हुकूमत करेंगी , उस वक़्त हज़रत इमाम महदी अ. स. ज़हूर करेंगे और वह इच्छाओं की जगह हिदायत को स्थापित कर देंगे , और जिस ज़माने में इंसान अपनी राय को कुरआन पर प्रथमिक्ता देंगे , वह लोगों की फ़िक्र को कुरआन की तरफ़ खीँचेंगे और कुरआन को समाज पर हाकिम बनायेंगे। ”

एक दूसरी जगह पर हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत के ज़माने में कुरआन पर अमल होने के बारे में यह ख़ुश ख़बरी सुनाते हैं कि

“ ऐसा है जैसे मैं इसी वक़्त अपने उन शियों को देख रहा हूँ कि जो मस्जिदे कूफ़ा में खेमा लगाये बैठे हैं और जिस तरह से क़ुरआन नाज़िल हुआ , बिल्कुल उसी तरह लोगों को उसकी तालीम दे रहे हैं। ”

कुरआन की तालीम हासिल करना और क़ुरआन की तालीम देना , कुरआन की संस्कृति के फैलने और इंसान की व्यक्तिगत व सामाजिक ज़िन्दगी में कुरआन व उसके अहकाम की हुकूमत के शुरू होने का आधार है।

अखलाक का विस्तार

कुरआने करीम और अहले बैत (अ.स.) की शिक्षाओं में इंसान के अख़लाक़ी व सदाचारिक विकास और आध्यात्म की तरफ़ बहुत ज़्यादा ध्यान दिया दिया गया है। क्योंकि इंसान के अपनी उत्पत्ती के महान लक्ष्य तक पहुंचने और उसके विकास के मार्ग में अच्छा अख़लाक़ बहुत महत्वपूर्ण और सहायक है। पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने अपनी पैग़म्बरी का मक़सद अख़लाक़ को पूर्ण करना माना है। कुरआने करीम ने भी पैग़म्बरे इस्लाम (स.) को मोमिनों के लिए बेहतरीन नमून ए अमल व आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया है। लेकिन अफसोस की बात यह है कि पूरे इंसानी समाज और विशेष रूप से इस्लामी समाज , कुरआन और अहलेबैत (अ.स.) की हिदायत से दूरी की वजह से बुराइयों के दलदल में फँसा हुआ है। अख़लाक़ी व सदाचारिक मर्यादाओं का त्याग इंसान की व्यक्तिगत और सामाजिक ज़िन्दगी को बर्बाद करने का कारण बना है।

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत जो कि अल्लाह के क़ानूनों व अल्लाह की सुन्नत पर आधारित होगी , उसमें अख़लाक़ी मर्यादाओं को जीवित कर समाज में लागू करने के लिए एक महत्वपूर्ण योजना बनाई जायेगी।

हज़रत इमाम मुहम्मद बाकिर (अ.स.) ने फरमाया

” اِذَا قَامَ قَائِمُنَا وَضَعَ یَدَہُ عَلٰی رُوٴُوْسِ الْعِبَادِ فَجَمَعَ بِہِ عُقُولُہُمْ وَ اَکْمَلَ بِہِ اٴَخْلاقُہُمْ “

जब हमारा क़ाइम (अ.स.) क़ियाम करेगा तो वह मोमिनों के सरों पर अपना हाथ रखेंगे जिस से उनकी अक़्ल पूर्ण हो जायेगी और उनका अख़लाक़ पूरा हो जायेगा।

यह बेहतरीन जुमले इस बात पर तर्क करते हैं कि हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत , जो कि अख़लाक़ और आध्यात्म पर आधारित हुकूमत होगी , वह इंसान की अक़्ल और अख़लाक़ के पूर्ण रूप से विकसित होने का रास्ता हमवार करेगी। क्योंकि इंसान में जो बुराइयां पाई जाती हैं वह उसकी कम अक्ली की वजह से होती हैं , और जब इंसान की अक़्ल पूर्ण हो जायेगी तो फिर इंसान में अच्छा अख़लाक़ पैदा हो जायेगा।

दूसरी तरफ़ कुरआन और अल्लाह की सुन्नत व हिदायत से सुसज्जित माहौल इंसान को नेकी और अच्छाई की तरफ़ ले जायेगा। अतः इस प्रकार ज़ाहिर और बातिन (प्रत्यक्ष व परोक्ष) दोनों रूपो में इंसान में अच्छे अख़लाक़ की तरफ़ क़दम बढ़ाने का शौक़ पैदा होगा और इस तरह पूरी दुनिया में इलाही व इंसानी मर्यादाएं लागू हो जायेंगी।

इल्म व ज्ञान की तरक़्क़ी

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत के सांस्कृतिक प्रोग्राम का एक अंश इल्म को तरक़्क़ी देना और इंसान के ज्ञान को विस्तृत रूप में विकसित करना है। क्योंकि वह ख़ुद इल्म का स्रोत और अपने ज़माने के आलिमों में सबसे श्रेष्ठ हैं।

जिस वक़्त पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के आने की ख़ुश ख़बरी दी थी , उसी वक़्त उन्होंने इमाम (अ.स.) के इस काम की तरफ़ भी इशारा किया था।

इमाम हुसैन (अ.स.) की नस्ल से नवें इमाम , हज़रत क़ाइम (अ.स.) हैं , ख़ुदा वन्दे आलम उनके मुबारक हाथों से इस दुनिया में रौशनी फैलवायेगा , जबकि उससे पहले वह अँधेरो से भरी चुकी होगी , और वह ज़मीन को न्याय व समानता से भर देगा , जबकि वह ज़ुल्म व सितम से भरी होगी। इसी तरह वह पूरी दुनिया को इल्म व ज्ञान की दौलत से माला माल कर देगा जबकि वह अज्ञानता व जिहालत से भरी होगी।

इल्म और फिक्र का यह विकास समाज के हर तबक़े के लिए होगा। इस तरक़्क़ी में औरत और मर्द में कोई फर्क नहीं होगा , बल्कि औरतें भी इल्म और दीनी मालूमात के मैदान में बुलन्द दर्जों पर पहुँच जायेंगी।

हज़रत इमाम मुहम्मद बाकिर (अ.स.) ने फरमाया :

इमाम महदी (अ.स.) के ज़माने में तुम्हें बुद्धी और इल्म प्रदान किया जायेगा , यहाँ तक कि औरतें अपने घरों में बैठ कर अल्लाह की किताब और रसूल (स.) की सुन्नत के अनुसार फैसले किया करेंगी।

बिदअतों से मुकाबला

बिदअत का प्रयोग सुन्नत के मुकाबले में होता है और इसका अर्थ दीन में किसी नई चीज़ को दाखिल करना और अपनी व्यक्तिगत राय को दीन और दीनदार में शामिल करना हैं।

हज़रत अली (अ.स.) बिदअतें पैदा करने वालों के बारे में फरमाते हैं कि

वह लोग बिदअत पैदा करने वाले हैं जो अल्लाह के हुक्म , अल्लाह की किताब और अल्लाह के पैग़म्बर (स.) का विरोध करते हैं , और अपनी इच्छा के अनुसार काम करना चाहते हैं , चाहे उन लोगों की संख्या बहुत ज़्यादा ही क्यों न हो...

अतः बिदअत का अर्थ अल्लाह , उसकी किताब और उसके रसूल की मुख़ालेफ़त कर के अपनी व्यक्तिगात राय को लागू करना और अपनी इच्छाओं के अनुसार काम करना हैं। वह चीज़ इससे अलग है जो अल्लाह के क़ानूनों के आधार पर कुरआन और सुन्नत से समझ कर तहक़ीक़ के रूप में पेश की जाती है। अतः बिदअत एक ऐसी चीज़ है जो अल्लाह व रसूल की सुन्नत को ख़त्म कर देती है , जबकि दीन के लिए उससे ज़्यादा खतरनाक कोई चीज़ नहीं है।

हज़रत अली (अ.स.) ने फरमाया :

” مَا ہَدَمَ الدِّیْنُ مِثْلُ الْبِدَعِ “ ۔

बिदअत की तरह किसी भी चीज़ ने दीन को बर्बाद नहीं किया है।

इसी दलील की वजह से बिदअत पैदा करने वाले से मुकाबेला करने के लिए सुन्नत पर अमल करने वालों को क़ियाम करना चाहिए। उनकी साजिशों व मक्कारियों से पर्दा उठा कर उनके ग़लत रास्तों को लोगों के सामने स्पष्ट कर देना चाहिए और इस तरह से लोगों को गुमराही से बचा लेना चाहिए।

पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने फरमाया :

जब मेरी उम्मत में बिदअतें ज़ाहिर होने लगें तो आलिमों की ज़िम्मेदारी है कि वह अपने इल्म के ज़रिये मैदान में आयें और उन बिदअतों का मुकाबला करें , और अगर कोई ऐसा न करे तो उस पर ख़ुदा की लअनत हो।

लेकिन अफसोस की बात है कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के बाद इस्लाम में बहुत सी बिदअतें पैदा कर दी गईं!। दीन व ईमान के रास्ते में बहुत सी अड़चने डाली गईं और बहुत से लोगों को गुमराह कर दिया गया। इस तरह दीन का मुकद्दस व पवित्र चेहरा बिगाड़ दिया गया और दीन की खूबसूरत तस्वीर को अपनी इच्छाओं और व्यक्तिगत तौर तरीक़ो के बादलों से ढक दिया गया। जबकि अइम्मा ए मासूमीन (अ.स.) जो दीन के जानने वाले थे , उन्होंने इन सबको रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन बिदअत का रास्ता बंद नही हो सका और नबी की सुन्नत उसी तरह बर्बाद होती रही और अब ग़ैबत के ज़माने में उसमें और वृद्धी होती जा रही है।

अब दुनिया इस इन्तेज़ार में है कि इंसान को निजात व मुक्ति देने वाले , कुरआनी मऊद , हज़रत इमाम महदी (अ.स.) तशरीफ़ लायें और उनकी हुकूमत की छत्र छाया में नबी (स.) की सुन्नत दोबारा ज़िन्दा हो और बिदअतों का बिस्तर लिपट जाये। बेशक इमाम (अ.स.) की हुकूमत का एक महत्वपूर्म परोग्राम बिदअत और गुमराही से मुक़ाबला है ताकि इंसान की हिदायत और विकास व तरक़्क़ी का रास्ता हमवार हो जाये।

हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ.स.) हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की तारीफ़ करते हुए एक विस्तृत हदीस के अन्तर्गत फरमाते हैं कि

”وَ لَایَتْرُکُ بِدْعَةً اِلاَّ اَزَالَہَا وَ لَا سُنَّةً اِلاَّ اَقَامَہَا

कोई भी बिदअत ऐसी नहीं होगी जिसको वह जड़ से उखाड़ न फेंकें और कोई भी सुन्नत ऐसी न होगी जिस को लागू न करें।

आ- आर्थिक योजना

एक पूर्ण व अच्छे समाज की पहचान , उसकी सुदृढ़ अर्थव्यवस्था है। अगर समाज में माल व दौलत से सही फायदा उठाया जाये और पैदावार व उसको लोगों तक पहुँचाने के साधन किसी एक खास गिरोह के क़ब्ज़े में न हो बल्कि हुकूमत समाज के हर तबक़े पर तवज्जोह दे और सबके लिए जीविका प्राप्त करने के साधन जुटाये और सबको सार्वजनिक समपत्ति से लाभान्वित होने का अवसर मिले तो ऐसे समाज में इंसान के लिए आध्यात्मिक विकास व तरक़्क़ी का रास्ता अधिक हमवार हो जाता है। कुरआने करीम की आयतों और मासूमीन (अ.स.) की रिवायतों में भी आर्थिक पहलु और लोगों की अर्थिक व्य्वस्था पर तवज्जह दी गई है। इस आधार पर हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की कुरआन पर आधारित हुकूमत में पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था और जनता के लिए खास योजना का निर्धारण होगा। इसके लिए खेती के मसले पर ध्यान दिया जायेगा और प्राकृतिक सम्पदा व अल्लाह द्वारा प्रदान की गई नेमतों से पूर्ण रूप से फायदा उठाया जायेगा और उससे प्रप्त होने वाली संपत्ति को न्यायपूर्वक समाज के हर तबक़े में विभाजित किया जायेगा।

उचित है कि हम इस संबंध में पाई जाने वाली रिवायतों का संक्षेप में एक जायेज़ा लें ताकि हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत की अर्थव्यवस्था की योजना को भली भाँति पहचान सकें।

प्राकृतिक संपदा का दोहन

आर्थिक मुशकिलों में से एक बड़ी मुशकिल यह है कि अल्लाह द्वारा प्रदान की गई प्राकृतिक संपदा व नेमतों से सही फायदा नहीं उठाया जाता है। न तो ज़मीन से सही पूर्ण रूप से फायदा उठाया जाता है और न ही पानी से ज़मीन को उपजाऊ बनाने के लिए सही फायदा उठाया जाता है। हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के ज़माने में उनकी हक़ पर आधारित हुकूमत की बरकत से आसमान खुल कर पानी बरसायेगा और ज़मीन पूर्ण रूप से फसल उगायेगी।

जैसे कि हज़रत अली (अ.स.) ने फरमाया :

” ۔۔۔ وَ لَو قَدْ قَامَ قَائِمُنَا لَاٴَنْزَلَتِ السَّمَاءُ قَطْرَہَا، وَ لَاٴَخْرَجَتِ الاٴرْضُ نَبَاتَہٰا۔۔۔ “

और जब क़ाइम आले मुहम्मद (अ.स.) क] fयाम करेंगे तो आसमान से बारिश होगी और ज़मीन दाना उपजेगी।

अल्लाह की आखरी हुज्जत की हुकूमत के ज़माने में ज़मीन और उसके समस्त स्रोत हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के क़ब्ज़े में होंगे , ताकि सुदृढ़ अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा क़ज़ाना जमा हो जाये।

हज़रत इमाम मुहम्मद बाकिर (अ.स.) ने फरमाया :

” ۔۔۔تطویٰ لہ الارض و تظھر لہ الکنوز۔۔۔ “

ज़मीन उनके लिए घूम जाया करेगी और पल भर में एक जगह से दूसरी जगह पहुँच जायेगी और उनके लिए तमाम ख़ज़ाने ज़ाहिर हो जायेंगे।

धन का न्यायपूर्वक वितरण

कमज़ोर अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा कारण धन दौलत का एक खास गिरोह के कब्ज़े में चले जाना है। हमेशा यही हुआ है कि कुछ ख़ास लोगों या गिरोहों ने ख़ुद को समाज के अन्य लोगों से श्रेष्ठ मानते हुए सार्वजनिक माल व दौलत पर कब्ज़ा कर लिया और फ़िर उसको अपने व्यक्तिगत फ़ायदों या किसी खास गिरोह के लिए प्रयोग किया। हज़रत इमाम महदी (अ.स.) ऐसे लोगों से मुक़ाबला करेंगे और सार्वजनिक सम्पत्ति व धन दौलत को उनके हाथों से निकाल कर आम लोगों के क़ब्ज़े में देंगे और इस सबके सामने हज़रत अली (अ.स.) की अदालत का नमूना पेश करेंगे।

हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ.स.) ने फरमाया :

”اِذَا قَامَ قَائِمُنَا اَہْلَ الْبَیْتِ قَسَّمَ بِالسَّوِیَّةِ وَ عَدَلَ فِی الرَّعْیَةِ

जब हम अहलेबैत का क़ाइम क़ियाम करेगा तो माल व दौलत को सबमें बराबर तक्सीम करेगा और लोगों के बीच न्यायपूर्वक काम करेगा।

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के ज़माने में समानता व बराबरी के क़ानून को लागू किया जायेगा और सबको उनके इंसानी और इलाही अधिकार दिये जायेंगे।

पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने फरमाया कि

“ मैं तुम को महदी (अ.स.) की ख़ुश ख़बरी सुनाता हूँ जो मेरी उम्मत में क़ियाम करेगा...वह माल व दौलत का सही विभाजन करेगा। किसी ने सवाल किया कि इसका क्या मक़सद है ? तो पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने फरमाया : यानी लोगों के बीच समानता स्थापित करेगा...। ”

समाज में उस समानता का नतीजा यह होगा कि कोई भी फक़ीर या निर्धन नज़र नही आयेगा और वर्णव्यवस्था का समापन हो जायेगा।

हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ.स.) ने फरमाया :

तुम्हारे बीच इमाम महदी (अ.स.) ऐसी समानता स्थापित करेंगे कि कोई भी ज़कात का लेने वाला नहीं मिल पायेगा...।

वीरानों को आबाद करना

आज कल की हुकूमतों में सिर्फ़ उन्हीं लोगों की ज़िन्दगी ख़ुशहाल होती है जो हुक्काम के इर्द गिर्द घूमते रहते हैं , उन के हम फिक्र होते हैं या फिर मालदार होते हैं , हुकूमत समाज के अन्य लोगों को भुला देती , लेकिन हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत में चूँकि पैदावार और विभाजन का मसला हल हो जायेगा इस लिए हर जगह सबके पास नेमतें मौजूद रहेंगी और चारो ओर ख़ुशहाली होगी।

हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ.स.) , हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत के ज़माने की तारीफ़ करते हुए फरमाते हैं कि

” ۔۔۔ فلا یبقیٰ فی الارض خزاب الا عمَّر

पूरी ज़मीन में कोई वीराना नहीं मिलेगा मगर यह कि उसको आबाद कर दिया जायेगा।

इ- सामाजिक योजना

इंसानी समाज के सुधार का एक पहलु समाज में एक सही योजना का लागू होना है। दुनिया के सबसे बड़े न्याय प्रियः शासक की हुकूमत में समाज को सही डगर पर लगाने के लिए कुरआन और अहले बैत (अ.स.) की सुन्नत व शिक्षाओं के आधार पर पलानिग की जायेगी। उसके लागू होने से इंसानी ज़िन्दगी में विकास होगा और इंसान के बुलन्द मुक़ाम तक पहुँचने का रास्ता हमवार हो जायेगा। उस इलाही हुकूमत की छत्र छाया में इस दुनिया में नेकियों को फैलाया जायेगा और बुराइयों को रोका जायेगा। बुरे लोगों के साथ के साथ क़ानूनी काररवाई की जायेगी। समाज के समस्त लोगों को समान रूप से सामाजिक अधिकार दिये जायेंगे और पूर्ण रूप से न्याय व समानता स्थापित की जायेगी।

प्रियः पाठकों ! हम उचित समझते हैं कि यहाँ पर एक नज़र कुछ रिवायतों पर ड़ालें जिससे उस हसीन दुनिया के जलवों का अच्छी तरह नज़ारा हो सके।

अम्र बिल मारुफ़ और नही अनिल मुनकर

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की विश्वव्यापी हुकूमत में अम्र बिल मारूफ़ और नही अनिल मुनकर बहुत व्यापक पैमाने पर किया जायेगा। “अम्र बिल मारूफ़ ” का अर्थ है लोगों को अच्छे काम करने के लिए कहना और “नही अनिल मुनकर ” का अर्थ है लोगों को बुराइयों से रोकना। इस बारे में कुरआने करीम ने भी बहुत ज़्यादा ताकीद की है और इसी वजह से इस्लामी उम्मत को मुंतख़ब उम्मत (चुना हुआ समाज) के रूप में याद किया गया है।

इसके ज़रिये तमाम वाजेबाते इलाही पर अमल होता है. और इसको छोड़ना हलाक़त , नेकियों की बर्बादी और समाज में बुराइयों के फैलने का असली कारण है।

अम्र बिल मअरुफ़ और नही अनिल मुनकर का सबसे अच्छा और सबसे ऊँचा दर्जा यह है कि हुकूमत के मुखिया और उसके पदाधिकारी नेकियों की हिदायत करने वाले और बुराईयों से रोकने वाले हों।

हज़रत इमाम मुहम्मद बाकिर (अ.स.) ने फरमाया :

”اَلمَھدِی وَ اٴَصْحَابُہُ ۔۔۔ یَاٴْمُرُوْنَ بِالمَعْرُوفِ وَ یَنْہَونَ عَنِ المُنْکِر “

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) और उनके मददगार अम्र बिल मअरुफ़ और नही अनिल मुनकर करने वाले होंगे।

बुराइयों से मुक़ाबला

बुराईयों से रोकना जो कि इलाही हुकूमत की एक विशेषता है , सिर्फ़ ज़बानी तौर पर नहीं होगा , बल्कि बुराईयों का क्रियात्मक रूप में इस तरह मुकाबला किया जायेगा , कि समाज में बुराई और अख़लाक़ी नीचता का वजूद बाक़ी न रहेगा और इंसानी ज़िन्दगी बुराईयों से पाक हो जायेगी।

जैसे कि दुआए नुदबा , जो कि ग़ायब इमाम की जुदाई का दर्दे दिल है , में बयान हुआ है

”اَیْنَ قَاطِعُ حَبَائِلِ الْکِذْبِ وَ الإفْتَرَاءِ، اَیْنَ طَامِسُ آثَارِ الزَّیْغِ وَ الاٴہْوَاءِ “ ۔

कहाँ है वह जो झूठ और बोहतान की रस्सियों का काटने वाला है और कहाँ है वह जो गुमराही व हवा व हवस के आसार को ख़त्म करने वाला है।

अल्लाह की हदों को जारी करना

समाज के उपद्रवी व बुरे लोगों से मुक़ाबले के लिए विभिन्न तरीक़े अपनाये जाते हैं। हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत में बुरे लोगों से मुक़ाबले के लिए तरीक़े अपनाये जायेंगे। एक तो यह कि बुरे लोगों को सांस्कृतिक प्रोग्राम के अन्तर्गत कुरआन व मासूमों की शिक्षाओं के ज़रिये सही अक़ीदों व ईमान की तरफ़ पलटा दिया जायेगा और दूसरा तरीक़ा यह कि उनकी ज़िन्दगी की जायज़ ज़रुरतों को पूरा करने के बाद समाजिक न्याय लागू कर के उनके लिए बुराई का रास्ता बन्द कर दिया जायेगा। लेकिन जो लोग उसके बावजूद भी दूसरों के अधिकारों को अपने पैरों तले कुचलेंगे और अल्लाह के आदेशों का उलंघन करेंगे उनके साथ सख्ती से निपटा जायेगा। ताकि उनके रास्ते बन्द हो जायें और समाज में फैलती हुई बुराईयों की रोक थाम की जासके। जैसे कि बुरे लोगों की सज़ा के बारे में इस्लाम के अपराध से संबंधित क़ानूनों में वर्णन हुआ है।

हज़रत इमाम मुहम्मद तक़ी (अ.स.) ने पैग़म्बरे इस्लाम (स.) से रिवायत नक्ल की जिसमें पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की विशेषताओं का वर्णन करते हुऐ फरमाया हैं कि

वह अल्लाह की हुदूद को स्थापित करके उन्हें लागू करेंगे...

न्याय पर आधारित फ़ैसले

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत का एक महत्वपूर्ण कार्य समाज के हर पहलू में न्याय को लागू करना होगा। उनके ज़रिये पूरी दुनिया न्याय व समानता से भर जायेगी जैसे कि ज़ुल्म व सितम से भरी होगी। अदालत के फैसलों में न्याय का लागू होना बहुत महत्व रखता है और इसके न होने से सब से ज़्यादा ज़ुल्म और हक़ तलफी होती है। किसी का माल किसी को मिल जाता है ! , नाहक़ खून बहाने वाले को सज़ा नहीं मिलती ! , बेगुनाह लोगों की इज़्ज़त व आबरु पामाल हो जाती है!। दुनिया भर की अदालतों में सब से ज़्यादा ज़ुल्म समाज के कमज़ोर लोगों पर हुआ है। अदालत में फैसले सुनाने वाले ने मालदार लोगों और ज़ालिम हाकिमों के दबाव में आकर बहुत से लोगों के जान व माल पर ज़ुल्म किया है। दुनिया परस्त जजों ने अपने व्यक्तिगत फ़ायदे और कौम व कबीला परस्ती के आधार पर बहुत से गैर मुंसेफाना फैसले किये हैं और उन को लागू किया है। खुलासा यह है कि कितने ही ऐसे बेगुनाह लोग हैं , जिनको सूली पर लटका दिया गया और कितने ही ऐसे मुजरिम लोग हैं जिन पर क़ानून लागू नही हुआ और उन्हें सज़ा नहीं मिली।

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की न्याय पर आधारित हुकूमत , हर ज़ुल्म व सितम और हर हक़ तलफी को ख़त्म कर देगी। वह जो कि अल्लाह के न्याय के मज़हर है , न्याय के लिए अदालतें खोलेंगे और उन अदालतों में नेक , अल्लाह से डरने वाले और बारीकी के साथ हुक्म जारी करने वाले न्यायधीश नियुक्त करेंगे ताकि दुनिया के किसी भी कोने में किसी पर भी ज़ुल्म न हो।

हज़रत इमाम रिज़ा (अ.स.) , हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के ज़हूर के सुनहरे मौके की तारीफ़ में एक लंबी रिवायत के अन्तर्गत फरमाते हैं कि

” فَاِذَا خَرَجَ اَشْرَقَتِ الاٴرْضُ بِنُوْرِ رَبِّہَا، وَ َوضَعَ مِیزَانَ العَدْلِ بَیْنَ النَّاسِ فَلا یَظْلِمُ اَحَدٌ اَحَدًا “

जब वह ज़हूर करेंगे तो ज़मीन अपने रब के नूर से रौशन हो जायेगी और वह लोगों के बीच हक़ व अदालत की तराज़ू स्थापित करेंगे , अतः वह ऐसी अदालत जारी करेंगे कि कोई किसी पर ज़र्रा बराबर भी ज़ुल्म व सितम नहीं करेगा।

प्रियः पाठकों ! इस रिवायत से यह मालूम होता है कि उनकी हुकूमत में अदालत में न्याय व इन्साफ़ पूर्म रूप से लागू होगा , जिससे ज़ालिम और ख़ुदगर्ज़ इंसानों के लिए रास्ते बन्द हो जायेंगे । अतः इसका नतीजा यह होगा कि ज़ुल्म व सितम बंद हो जायेगा और दूसरों के अधिकारों की रक्षा होगी।

तीसरा हिस्सा

हुकूमत के नतीजे

आप ने देखा होगा कि जो लोग अपनी हुकूमत बनाकर ताक़त को अपने हाथ में लेना चाहते हैं , वह पहले अपनी हुकूमत के उद्देश्यों का वर्णन नकरते हैं। कभी कभी तो ऐसा होता है कि वह उन उद्देश्यों तक पहुँचने के लिए अपनी योजनाओं को भी लोगों के सामने पेश कर देते हैं। लेकिन वह हुकूमत व ताक़त प्राप्त करने के बाद कुछ समय बीतने पर अपने उन उद्देश्यों में नाकाम रह जाते हैं या कभी अपने किये हुए वादों से मुकर जाते हैं , या अपने उद्देश्यों को बिल्कुल ही भूल जाते हैं।

लेकिन पहले से निश्चित उन उद्देश्यों को प्राप्त न करने की वजह यह होती है कि वह उद्देश्य असली नहीं होते , या इसकी दूसरी वजह यह हो सकती है कि उन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए हुकूमत के पास कोई सही व संपूर्ण योजना नहीं होती और बहुत से स्थानों पर इस नाकामी की वजह क़ानून बनाने वालों की अयोग्यता होती है।

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत के उद्देश्य ऐसे वास्तविक व आधारभूत हैं कि उनकी जड़ें इंसानों के दिल व दिमाग की गहराईयों में मौजूद हैं और उन तक पहुँचने की सभी तमन्ना रखते हैं। उन उद्देश्यों की प्राप्ती के लिए जो योजनाएं हैं वह कुरआने क़रीम और अहलेबैत (अ.स.) की सुन्नत व शिक्षाओं पर आधारित है , अतः हर डिपारटमेन्ट में उसके लागू होने की ज़मानत मौजूद होगी , इस लिए इस महान इन्क़ेलाब के नतीजे बहुत ज़्यादा अच्छे होंगे। इस पूरे विवरण का एक वाक्य में इस तरह खुलासा किया जा सकता है कि हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत का नतीजा यह होगा कि इंसान की वह तमाम भौतिक व आध्यात्मिक ज़रुरतें पूरी हो जायेंगी , जिन को ख़ुदा वन्दे आलम ने इंसान के वजूद में अमानत रखा है।

हम यहाँ पर रिवायतों के आधार पर हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत के कुछ नतीजों की तरफ़ इशारा कर रहे हैं।

न्याय का विस्तार

अनेकों रिवायतों में मिलता है कि हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के इन्क़ेलाब व हुकूमत के नतीजों में सब से महत्वपूर्ण चीज़ दुनिया में अदल व इन्साफ़ का आम होना है। इसके बारे में उनकी हुकूमत के उद्देश्यों के अन्तर्गत उल्लेक हो चुका है। हम यहाँ पर उस हिस्से में वर्णित चीज़ों के अलावा इस चीज़ को बढ़ाते हैं कि क़ाइमे आले मुहम्मद (स.) की हुकूमत में समाज की हर सतह पर न्याय आम हो जायेगा और अदालत समाज की रगों में रच बस जायेगी। कोई भी ऐसा छोटा या बड़ा गिरोह नहीं होगा जिसमें न्याय स्थापित न हो , आपस में समस्त इंसानों का राब्ता उसी न्याय के आधार पर होगा।

हज़रत इमाम सादिक़ (अ.स.) ने इस बारे में फरमाया :

अल्लाह की क़सम लोगों के घरों में न्याय को इस तरह पहुँचा दिया जायेगा जिस तरह उन घरों में सर्दी और गर्मी पहुँचती है।

समाज का सबसे छोटा विभाग यानी इंसान का घर न्याय का केन्द्र बन जायेगा और घर के सब सदस्य एक दूसरे से न्यायपूर्वक व्यवहार करेंगे। इससे इस बात की पुष्टी होती है कि हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की न्याय व समानता पर आधारित विश्वव्यापी हुकूमत ताक़त और क़ानून के बल बूते पर नही , बल्कि कुरआन की उस तरबियत पर आधारित होगी जो न्याय व भलाी का हुक्म देती है। उसी से लोगों की तरबियत की जायेगी और ऐसे बेहतरीन माहौल में सभी लोग अपने इंसानी और इलाही कर्तव्यों को पूरा करते हुए दूसरों के अधिकारों का एहतेराम करेंगे , चाहे सामने वाला किसी ओहदे पर भी न हो।

महदवी समाज में न्याय , कुरआन और हुकूमत के आधार पर एक असली सामाजिक स्तंभ के रूप में लागू होगा और कुछ गिने चुने स्वार्थी और कुरआने करीम व अहले बैत (अ.स.) की शिक्षाओं से दूर लोगों के अलावा कोई भी उसका उलंघन नही करेगा। न्याय व समानता पर आधारित हुकूमत ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ सख्त कार्रवाई करेगी और उनको फलने फूलने का मौक़ा नहीं दिया जायेगा। ऐसे लोगों पर विशेष रूप से हुकूमत के विभागों में शामिल होने पर रोक लगा दी जायेगी।

जी हाँ ! ऐसा विस्तृत और आम न्याय हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत का नतीजा होगा। उसके लागू होने से हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के इन्केलाब का सबसे बड़ा मक़सद पूरा हो जायेगा और दुनिया न्याय व समानता से भर जायेगी और ज़ुल्म व सितम समाज के हर हिस्से से मिट जायेंगे , यहाँ तक कि घरेलू ज़िन्दगी में भी एक दूसरे के संबंधों में इसका नाम व निशान बाक़ी नहीं रहेगा।

ईमान , अख़लाक़ और फिक्र का विकास

प्रियः पाठकों ! हम ने उपरोक्त यह उल्लेख किया है कि समाज में न्याय के आम हो जाने से समाज में रहने वालों की सही तरबियत होगी और समाज में कुरआन व अहलेबैत (अ.स.) की तहज़ीब व सभ्यता फैल जायेगी। अइम्मा ए मासूमीन (अ.स.) की रिवायतों में हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत के ज़माने में ईमान , अख़लाक़ और फिक्र के विकसित होने व उनके फलने फूलने का सविस्तार वर्णन किया गया है।

हज़रत इमाम मुहम्मद बाकिर (अ.स.) ने फरमाया :

जब हमारे क़ाइम आले मुहम्मद ज़हूर करेंगे तो वह अपना दस्ते करम ख़ुदा के बन्दों के सरों पर रखेंगे उसकी बर्क़त से उनकी अक़्ल अपने क़माल पर पहुँच जायेगी।

और जब इंसान की अक़्ल कमाल पर पहुँच जाती है तो तमाम खूबिया और नेकियां ख़ुद बखुद उसमें पैदा होने लगती हैं , क्योंकि अक़्ल इंसान के लिए आन्तरिक पैग़म्बर है और अगर जिस्म व रूह के मुल्क पर इसकी हुकूमत हो जाये तो फिर इंसान को फिक्र , नेकी , सुधार और ख़ुदा की बन्दगी का अच्छा व कल्याणकारी रास्ता मिल जायेगा।

हज़रत इमाम सादिक़ (अ.स.) से सवाल हुआ कि अक़्ल क्या है ?

उन्होंने फरमाया :

अक़्ल एक ऐसी हक़ीक़त है जिसके ज़रिये ख़ुदा की इबादत की जाती है और उसी की रहनुमाई से जन्नत मिलती है।

जी हाँ ! वर्तमान समाज में हम देखते हैं कि इमाम और उनकी हुकूमत के बग़ैर अक़्ल पर इच्छाओं का अधिपत्य व ग़लबा है। विभिन्न गिरोहों और पार्टियों पर उनकी इच्छाएं हुकूमत कर रही है जिसके नतीजे में दूसरों के हक़ूक पामाल हो रहें है और इलाही इक्दार को भुलाया जा रहा है। लेकिन ज़हूर के ज़माने में , अल्लाह की हुज्जत , की हुकूमत की छत्र छाया में अक़्ल हुक्म करने वाली होगी और जब इंसान की अक़्ल कमाल की मंज़िल पर पहुँच जायेगी तो फिर नेकियों और अच्छाइयों के अलावा कोई हुक्म नहीं करेगी।

एकता और मुहब्बत

अनेकों रिवायतों में मिलता है कि हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की विश्वव्यापी हुकूमत में ज़िन्दगी बसर करने वाले लोग एकता व मुहब्बत के बंधन में बँधे होंगे और उनकी हुकूमत में मोमिनों के दिलों में ईर्श्या व दुशमनी के लिए कोई जगह न होगी।

हज़रत अली (अ.स.) ने फरमाया :

” وَ لَو قَد قَامَ قَائِمُنَا۔۔۔ لَذَہَبَتِ الشَّحْنَاءُ مِن قُلُوبِ العِبَادِ۔۔۔ “

जब हमारा क़ाइम क़ fयाम करेगा तो ख़ुदा के बंदो के दिलों में ीर्ष्या और दुशमनी नहीं रहेगी।

उस ज़माने में ईर्ष्या और दुशमनी के लिए कोई बहाना बाक़ी नहीं रहेगा , क्योंकि वह ज़माना न्याय व समानता का ऐसा दौर होगा जिसमें किसा का कोई हक़ पामाल नहीं होगा। वह ज़माना अक़्लमंदी और ग़ौर व फिक्र का ज़माना होगा , अक़्ल के ख़िलाफ़ काम करने और इच्छाओं के अनुसरण का नहीं। इस लिए ईर्ष्या और दुशमनी के लिए कोई बहाना नहीं रहेगा और लोगों के दिलों में मुहब्बत पैदा हो जायेगी , जबकि उससे पहले लोगों में दुश्मनी मौजूद होगी। उस ज़माने में सभी लोग कुरआनी भाईचारे की तरफ़ पलट जायेंगे... और आपस में दो भाइयों की तरह मुहब्बत के साथ रहेंगे।

हज़रत इमाम सादिक़ (अ.स.) हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के सुनहरे युग की तारीफ़ करते हुए फरमाते हैं कि

“ उस ज़माने में ख़ुदा वन्दे आलम परेशान और घबराये हुए लोगों में एकता और मुहब्बत पैदा कर देगा। ”

और अगर उस काम में ख़ुदा की मदद होगी तो फिर कोई ताज्जुब की बात नहीं है कि वह एकता व मुहब्बत इतनी बढ़ जाये कि इस दुनिया में , जो भौतिक कशमकश में अपनी चरम सीमा को पहुँच चुकी है , उस का अंदाज़ा लगाना मुशकिल हो जाये।

हज़रत इमाम सादिक़ (अ.स.) ने फरमाया :

जब हमारा क़ाइम क़ियाम करेगा तो सच्ची दोस्ती और वास्तविक एकता इस हद तक होगी कि ज़रुरतमंद अपने ईमानी भाई की जेब से अपनी ज़रुरत के अनुसार पैसा निकाल लेगा और उसका दीनी भाई उसे नहीं रोकेगा।

जिस्म और रूह की सलामती

आज कल इंसानों की सबसे बड़ी और लाइलाज मुश्किल ख़तरनाक बिमारियाँ हैं जो विभिन्न चीज़ो की वजह से पैदा हो रही हैं जैसे हमारे रहने के वातावरण का प्रदूषित होना , रासायनिक और एटमिक शस्त्रों का इस्तेमाल , इंसानों के आपस में अनैतिक संबंध , पेड़ों को काटना , समुन्द्रों के पानी को प्रदूषित करना आदि। इसी तरह की दूसरी चीज़ें भी विभिन्न ख़तरनाक बिमारियों को जन्म दे रही हैं जैसे कोढ़ , प्लेग , फ़ालिज , दिल और दिमाग़ का दौरा आदि बहुत सी बिमारियां जिनका आज के ज़माने में कोई इलाज नहीं है , हमारी मुश्किलें हैं। जिस्मानी बिमारियों के अलावा रुही और सैकोलोजिकल बिमारियां भी हैं जिनकी वजह से दुनिया भर में इंसान की ज़िन्दगी बद मज़ा और नाकाबिले बर्दाश्त हो गई है , लेकिन यह सब दुनिया और इंसानों पर ग़लत चीज़ों के इस्तेमाल की वजह से हैं।

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत के ज़माने में , जो कि अदल व इन्साफ़ और नेकियों का ज़माना होगा और ताल्लुकात बरादरी और बराबरी की बुनियादों पर होंगे , इंसान की जिस्मानी और सैकोलोजिकल बिमारियों का खात्मा हो जायेगा और इंसान की जिस्मानी व रुहानी ताकत ताज्जुब की हद तक बढ़ जायेगी।

हज़रत इमाम सादिक (अ.स.) ने फ़रमाया :

जब हज़रत इमाम महदी (अ.स.) क़ियाम करेंगे तो ख़ुदा वन्दे आलम मोमिनों से बिमारियों को दूर कर देगा और उन्हें सेहत व तन्दुरुस्ती प्रदान करेगा।

क्योंकि उनकी हुकूमत में इल्म व ज्ञान की बहुत ज़्यादा तरक़्क़ी होगी इस लिए कोई लाइलाज बिमारी बाक़ी नहीं रहेगी। चिकित्साशास्त्र में बहुत ज़्यादा तरक़्क़ी होगी , और हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की बरकत से बहुत से बीमारों को सेहत मिल जायेगी।

हज़रत इमाम मुहम्मद बाकिर (अ.स.) ने फरमाया :

जो इंसान हम अहलेबैत के क़ाइम का ज़माना देखेगा तो अगर उसको कोई बिमारी हो जायेगी तो ठीक हो जायेगा और अगर कमज़ोरी का शिकार हो जायेगा तो सेहत मन्द और ताक़त वर हो जायेगा...

बहुत ज़्यादा खैर व बरकत

क़ाइमे आले मुहम्मद हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत का एक बड़ा फ़ायदा यह होगा कि उस ज़माने में खैर व बरकत इतनी होगी कि इतिहास में उसकी मिसाल नहीं मिलेगी। उनकी हुकूमत की बहार में हर जगह हरा भरा और ख़ुशियों का माहौल होगा। आसमान से पानी बरसेगा और ज़मीन में अच्छी फसलें पैदा होंगी। हर तरफ ख़ुदा की बरकत बिखरी हुई नज़र आयेगी।

हज़रत इमाम सादिक़ (अ.स.) ने फरमाया :

ख़ुदा वन्दे आलम हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की वजह से ज़मीन व आसमान से बरकतों की बारिश करेगा और उनके ज़माने में आसमान से बारिशें होंगी और ज़मीन में अच्छी फसलें होंगी।

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत में कोई ज़मीन बंजर नहीं मिलेगी और हर जगह हरयाली होगी।

यह महान व बेमिसाल परिवर्तन इस वजह से होगा कि हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के ज़माने में तक़वे , पाकीज़गी और ईमान के फूल खिलने लगेंगे , समाज के तमाम लोग इलाही तरबियत के तहत अपने संबंधों को इस्लामी और इलाही मर्यादाओं के साँचे में ढाल लेंगे। अतः ख़ुदा वन्दे आलम ने ऐसी हालत के लिए पहले ही वादा किया है कि ऐसे पाक व पाक़ीज़ा माहौल को खैर व बरकत से भर दूँगा।

इस बारे में कुरआने मजीद में इस प्रकार वर्णन हुआ है :

وَلَوْ اٴَنَّ اٴَہْلَ الْقُرَی آمَنُوا وَاتَّقَوْا لَفَتَحْنَا عَلَیْہِمْ بَرَکَاتٍ مِنْ السَّمَاءِ وَالْاٴَرْضِ۔۔۔ >

और अगर बस्ती वाले ईमान ले आते और परहेज़गार बन जाते तो हम उनके लिए ज़मीन व आसमान से बरकतों के दरवाज़े खोल देते।

ग़रीबी व फ़क़ीरी का अंत

जिस वक़्त हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के लिए ज़मीन के सारे खज़ाने ज़ाहिर हो जायेंगे और ज़मीन व आसमान से लगातार बरकतें नाज़िल होंगी और मुसलमानों का बैतुलमाल (राजकीय धनकोष) अदालत की बुनियाद पर वितरित होगा तो फिर ग़रीबी व फ़क़ीरी का कोई वजूद नहीं रहेगा और उनकी हुकूमत में हर इंसान ग़रीबी के दलदल से आज़ाद हो जायेगा।

उनकी हुकूमत के ज़माने में आर्थिक संबंध समानता व भाईचारे की बुनियाद पर होंगे और स्वार्थता की जगह अपने दीनी भाईयों से हमदर्दी का जज़बा पैदा हो जायेगा। उस ज़माने में सभी लोग आपस में एक दूसरे को घर के एक मेंमबर के रूप में देखेंगे और सबको अपना तस्व्वुर करेंगे और मोहब्बत व हमदर्दी की खुशबू हर जगह फैली हुई होगी।

हज़रत इमाम मुहम्मद बाकिर (अ.स.) ने फरमाया :

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) साल में दो बार लोगों को बख्श दिया करेंगे , और महीने में दो बार उनको रोज़ी व जीविका दिया करेंगे। वह इस काम से लोगों के बीच समानता स्थापित करेंगे। उस ज़माने में लोग ऐसे इतने मालदार हो जायेंगे कि कोई ज़कात लेने वाला ज़रूरतमंद नहीं मिल पायेगा।

विभिन्न रिवायतों से यह नतीजा निकलता है कि लोगों में ग़ुरबत के एहसास के न होने की वजह यह होगी कि उनके यहाँ क़नाअत का एहसास पाया जाता होगा। दूसरे शब्दों में यूँ कहा जाये कि इस से पहले कि कोई उनको माल व दौलत दे , ख़ुद उनके अन्दर का ज़रूरत न होने का एहसास पैदा हो जायेगा। उन्हें जो कुछ ख़ुदा वन्दे आलम ने अपने फज़्ल व करम से दिया होगा वह उस पर राज़ी रहेंगे , इस लिए वह दूसरों के माल की तरफ़ आँख भी नहीं उठायेंगे।

पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत की तारीफ़ करते हुए फरमाया :

ख़ुदा वन्दे आलम अपने बन्दों के दिलों में बेनियाज़ी (ज़रूरत न होना) का एहसास पैदा कर देगा।

जबकि ज़हूर से पहले इंसान में स्वार्थता , माल व दौलत जमा करने और ग़रीबों पर खर्च न करने की आदत होगी।

ख़ुलासा यह है कि हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत में इंसान आन्तरिक व बाह्य दोनों रूपों से बेनियाज़ हो जायेगा , क्योंकि एक तरफ़ तो उन्हें बहुत सी दौलत न्यायपूर्वक विभाजन से मिल जायेगी और दूसरी तरफ इंसानों के दिल में कनाअत व निरीहता पैदा हो जायेगी।

पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने मोमिनों पर हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की बख़्शिश के बारे में बयान करते हुए फरमाया :

ख़ुदा वन्दे आलम मेरी उम्मत को बेनियाज़ कर देगा और अदालते महदवी सब पर इस तरह लागू होगी कि हज़रत इमाम महदी (अ.स.) हुक्म फरमायेंगे कि मुनादी यह ऐलान कर दे कि कौन है जिस को माल की ज़रुरत है ? लेकिन उस ऐलान को सुन कर एक इंसान के अलावा कोई आगे क़दम नहीं बढाएगा।

उस वक़्त इमाम (अ.स.) उससे फरमायेंगे : खज़ानेदार (मालखाने का इन्चार्ज) के पास जाओ और उससे कहना कि इमाम महदी (अ.स.) की तऱफ़ से तुम्हारे लिए यह हुक्म है कि मुझे कुछ माल व दौलत दे दो। यह सुन कर खज़ानेदार उससे कहेगा कि अपनी चादर फैलाओ और उसकी चादर को भर दिया जायेगा। जब वह उस चादर को कमर पर लाद कर चलेगा तो पछता कर कहेगा : उम्मते मुहम्मदी (स.) में सिर्फ़ मैं ही इतना लालची हूँ। इसके बाद वह माल वापस करने के लिए जायेगा , लेकिन उससे वह माल वापस नहीं लिया जायेगा और उससे कहा जायेगा कि हम जो कुछ दे देते हैं वह वापस नहीं लेते।

इस्लाम की हुकूमत और कुफ्र का ख़ात्मा

कुरआने करीम ने तीन जगहों पर वादा किया है कि ख़ुदा वन्दे आलम इस्लाम को पूरी दुनिया पर ग़ालिब करेगा।

<ھُوَ الَّذِی اٴَرْسَلَ رَسُولَہُ بِالْہُدَی وَدِینِ الْحَقِّ لِیُظْہِرَہُ عَلَی الدِّینِ کُلِّہِ وَلَوْ کَرِہَ الْمُشْرِکُونَ۔ >

वह ख़ुदा वह है जिसने अपने रसूल को हिदायत और दीने हक़ के साथ भेजा ताकि अपने दीन को तमाम धर्मों पर ग़ालिब बनाये चाहे मुशरेकिन को कितना ही नागवार क्यों न हो।

जबकि इस हक़ीक़त में कोई शक नही है कि अल्लाह का वादा पूरा होकर रहता है , वह कभी भी वादा ख़िलाफ़ी नही करता , जैसे क़ुराने करीम में फ़रमाया है :

۔۔۔ اِنَّ اللهَ لَا یُخْلِفُ الْمِیْعَادِ

बेशक अल्लाह वादे के खिलाफ अमल नहीं करता।

लेकिन यह बात रौशन है कि लगातार कोशिश के बावजूद भी पैग़म्बरे इस्लाम (स.) और अल्लाह के वली (अ.स.) अब तक ऐसी मुबारक तारीख नहीं देख पाए हैं।

अतः तमाम मुसलमान ऐसे दीन का इन्तेज़ार कर रहे हैं। यह एक ऐसी हक़ीक़ी तम्न्ना है जो अइम्मा मासूमीन (अ.स.) के कलाम में मौजूद है।

इसी लिए उस वली ए ख़ुदा की हुकूमत में ( ”اشھد ان لا الہ الا الله “ ) का नारा बुलन्द होगा जो तौहीद का परचम है और ”اشھد ان محمد رسول الله “ की आवाज़ जो इस्लाम का अलम है हर जगह लहराता हुआ नज़र आयेगा और किसी भी जगह कुफ़्र व शिर्क का वजूद बाकी न रहेगा।

हज़रत इमाम मुहम्मद बाकिर (अ.स.) ने निम्न लिखित आयत की व्याख्या में फरमायाः

وَقَاتِلُوہُمْ حَتَّی لاَتَکُونَ فِتْنَةٌ وَیَکُونَ الدِّینُ کُلُّہُ لِلَّہِ

और तुम लोग उन कुफ्फार से जिहाद करो यहाँ तक कि फित्ने का वजूद बाक़ी न रहे।

इस आयत की तावील अभी तक नहीं हुई है और जब हमारा क़ाइम क़ियाम करेगा और जो इंसान उनके ज़माने को पायेगा वह इसकी तावील को अपनी आँखों से देखेगा।

बेशक उस ज़माने में दीने मोहम्मदी (स.) वहाँ तक पहुँच जायेगा , जहाँ तक रात का अँधेरा पहुँचता है और पूरी दुनिया में फैल जायेगा। उस वक़्त ज़मीन से शिर्क का नाम व निशान मिट जायेगा , जैसे कि ख़ुदा वन्दे आलम में वादा फरमाया है।

लेकिन पूरी दुनिया में इस्लाम का फैलाव , इस्लाम की सच्चाी व वास्तविक्ता की वजह से होगा। क्योंकि हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के ज़माने में इस्लाम की सच्चाई बहुत स्पष्ट हो जायेगी और इस्लाम सभी को अपनी तरफ आकर्षित कर लेगा और सिर्फ वही लोग बाकी बचेंगे जो ईर्ष्या व दुश्मनी के शिकार होंगे। उस वक़्त हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की न्याय फैलाने वाली तलवार उनके सामने आयेगी और यही ख़ुदा वन्दे आलम का बदला होगा।

इस बारे का आखरी नुक्ता यह है कि अक़ीदे की यह एकता (यानी सभी का मुसलमान हो जाना) हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत के ज़माने में पेश आयेगी और यह मौक़ा विश्वव्यापी समाज की स्थापना के लिए बहुत उचित होगा। उस वक़्त पूरी दुनिया अकीदे में इसी एकता और एकेश्वरवाद के क़ानून को क़बूल करेगी और उसकी छत्र छाया में अपने व्यक्तिगत और सामाजिक संबंध इसी एक अक़ीदे से प्राप्त होने वाली कसौटी के आधार पर व्यवस्थित करेंगे। इस वर्णन के अनुसार एक अक़ीदे व एक दीन के झंडे के नीचे जमा होना उस वक़्त की एक वास्तविक ज़रुरत होगी जो हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत में पूरी होगी।

शाँती व सुरक्षा

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत में जब ज़िन्दगी के हर पहलु में अच्छाइयाँ और नेकियां आम हो जायेंगी तो शांति व सुरक्षा प्राप्त होगी जो इलाही नेमतों में से एक बड़ी नेमत है और इंसान की सब से बड़ी तमन्ना है।

जिस वक़्त तमाम इंसान एक अकीदा होकर इस्लाम की पैरवी करेंगे और समाज के बीच उच्च अख़लाक़ी मर्यादाएं लागू होंगी और अदालत हर इंसान पर हाकिम होगी तो फिर ज़िन्दगी के किसी भी हिस्से में अशाँति और खौफ व दहशत के लिए कोई जगह बाक़ी नहीं रहेगी। जिस समाज में हर इंसान को उसका हक़ मिल रहा होगा तो फिर वह किसी दूसरे पर ज़ुल्म व सितम और इंसानी व इलाही अधिकारों को पामाल नहीं करेगा , और अगर कोई ऐसा करेगा तो उसके साथ सख्त कार्रवाई की जायेगी। इस लिए उस ज़माने में हर तरफ़ शाँति और सकून रहेगा।

हज़रत अली (अ.स.) ने फरमाया :

हमारे ज़रिये और हमारी हुकूमत के ज़रिये एक सख्त ज़माना गुज़रा है और जब हमारा क़ाइम क़ियाम करेगा तो दिलों से दुशमनी और ईर्ष्या निकल जायेगी। पशुओं में भी आपस में एकता होगी , उस ज़माने में ऐसा चैन सकून स्थापित होगा कि औरतें अपने ज़ेवर पहन कर इराक़ से शाम तक का सफर करेंगी....लेकिन उन के दिल में किसी तरह का कोई डर नहीं होगा...

प्रियः पाठकों ! हम चूँकि अन्याय लालच और ईर्ष्या व दुश्मनी के ज़माने में ज़िन्दगी बसर कर रहे हैं इस लिए हमारे लिए उस हरी भरी व ख़ुशियों पर आधारित दुनिया का तसव्वुर बहुत मुशकिल है। लेकिन जैसे कि हमने उल्लेख किया अगर हम अपनी बुराइयों और गुनाहों के कारणों के बारे में गौर व फिक्र करें और यह तसव्वुर करें कि तमाम बुराइयां हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत में खत्म हो जायेंगी तो हमें मालूम हो जायेगा कि समाज में शाँति व सुरक्षा स्थापित होने का अल्लाह का वादा यक़ीनी है।

ख़ुदा वन्दे आलम कुरआने मजीद में फरमाता है कि

وَعَدَ اللهُ الَّذِینَ آمَنُوا مِنْکُمْ وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ لَیَسْتَخْلِفَنَّہُم فِی الْاٴَرْضِ کَمَا اسْتَخْلَفَ الَّذِینَ مِنْ قَبْلِہِمْ وَلَیُمَکِّنَنَّ لَہُمْ دِینَہُمْ الَّذِی ارْتَضَی لَہُمْ وَلَیُبَدِّلَنَّہُمْ مِنْ بَعْدِ خَوْفِہِمْ اٴَمْنًا۔۔۔

तुम में से जिन्होने ईमान लाने के बाद नेक काम किये अल्लाह ने उनसे वादा किया है कि उन्हें ज़मीन पर उसी तरह खलीफा बनाएगा जिस तरह पहले वालों को बनाया है और उनके लिए उस दीन को ग़ालिब बनायेगा जिसे उनके लिए पसन्द किया है और उनके खौफ़ को अमन से बदल देगा।

हज़रत इमाम सादिक़ (अ.स.) ने इसकी तफ़्सीर करते हुए फरमाया :

यह आयत हज़रत इमाम क़ाइम (अ.स.) और उनके असहाब के बारे में नाज़िल हुई है...

इल्म की तरक्की

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत के ज़माने में इस्लामी और इंसानी उलूम के बहुत से राज़ खुल जायेंगे और इंसान का इल्म बहुत तेज़ी से तरक़्क़ी करेगा।

हज़रत इमाम सादिक (अ.स.) ने फरमाया :

इल्म के 27 हर्फ हैं , और जो कुछ भी तमाम नबी (अ.स.) लेकर आये हैं वह सिर्फ तीन हर्फ़ हैं , जबकि जनता उनमें से दो हर्फो के भी नहीं जानती , जिस वक़्त हमारे क़ाइम का ज़हूर होगा तो वह उन बाक़ी 25 हरफ़ों के इल्म की भी लोगों को तालीम देंगे और उन दो हरफो को भी उनमें मिला देंगे जिसके बाद तमाम 27 हर्फ़ का इल्म नशर फरमायेंगे...

ज़ाहिर सी बात है कि इंसान इल्म के हर पहलु में तरक़्क़ी करेगा , अनेकों रिवायतों में होने वाले इशारों से मालूम होता है कि उस ज़माने औद्योगिक ज्ञान आज के ज़माने से कहीं ज़्यादा होगा।

जैसे कि इस वक़्त का उद्योग शताब्दियों पहले उद्योगों से बहुत ज़्यादा फर्क रखता है।

प्रियः पाठकों! हम यहाँ पर इस बारे में बयान होने वाली कुछ रिवायतों की तरफ़ इशारा करते हैं।

हज़रत इमाम सादिक (अ.स.) ने हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत की कैफियत के बारे में फरमाया :

क़ाइम आले मुहम्मद (स.) की हुकूमत के ज़माने में पूरब में रहने वाला मोमिन अपने पश्चिम में रहने वाले भाई को देखता होगा …

इसी तरह इमाम (अ.स.) ने फरमाया :

जिस वक़्त हम अहलेबैत (अ.स.) का क़ाइम ज़हूर करेगा तो ख़ुदा वन्दे आलम हमारे शियों की आँखो और कानों की ताक़त बढ़ा देगा इस तरह से हज़रत इमाम महदी (अ.स.) चार फर्सख़ (22 किलो मीटर) के फासले से अपने शियों से बात चीत करेंगे और वह उनकी बातों को सुनेंगे और उनको देखते भी होंगे हाँलाकि वह अपनी जगह पर खड़े होंगे।

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत में हुक्म सादिर करने वाले के रूप में इमाम के लोगों के हालात से बाखबर होने के बारे में रिवायतों कहती है कि

अगर कोई इंसान अपने घर में बात करेगा तो उसे इस चीज़ का खौफ़ होगा कि कहीं उसके घर की दिवारें उसकी बातों को (इमाम अ. स.) तक न पहुँचा दें।

आज कल की तकनीकी तरक़्क़ी के मद्दे नजर इन रिवायतों को समझना आसान है लेकिन यह बात स्पष्ट नहीं है कि क्या यही साधन और अधिक तरक़्क़ी के साथ इस्तेमाल किये जायेंगे या कोई इस से ज़्यादा अच्छी तकनीक इस्तेमाल की जायेगी।


चौथा हिस्सा

हुकूमत की विशेषताएं

इस से पहले के अध्यायों में हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत के उद्देश्यों , प्रोग्रामों और नतीजों के बारे में उल्लेख हो चुका है , इस आखरी हिस्से में उनकी हुकूमत की विशेषताओं के बारे में उल्लेख करते हैं जैसे हुकूमत की सीमाएं , हुकूमत का केन्द्र , हुकूमत की मुद्दत , कर्मचारियों के काम के तरीक़े और हुकूमत के महान रहबर हज़रत इमाम महदी अ. स. की सीरत आदि।

हुकूमत की सीमाएं और उसका केन्द्र

इस में कोई शक नहीं है कि हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत एक विश्वव्यापी हुकूमत होगी। क्योंकि पूरी इंसानियत के मौऊद और इंसानों की हर तमन्ना को पूरा करने वाले हैं , इस लिए उनकी हुकूमत की छत्र छाया में समाज में जो अच्छाइयां और नेकियां पैदा होंगी वह पूरी दुनिया में फैल जायेंगी। यह एक ऐसी हक़ीक़त है जिसके बारे में अनेकों रिवायतें गवाह हैं , हम यहां पर उनमें से कुछ रिवायतों की तरफ़ इशारा कर रहे हैं :

अ. वह अनेकों रिवायतें जिन में यह बयान हुआ है कि इमाम महदी (अ.स.) ज़मीन को अदल व इन्साफ़ से भर देंगे , जिस तरह से वह ज़ुल्म व जौर से भरी होगी। क्योंकि ज़मीन की सार्थकता पूरी दुनिया पर है और ज़मीन के अर्थ को ज़मीन के किसी एक हिस्से तक सीमित करने के लिए हमारे पास कोई दलील नहीं है।

ब. वह रिवायतें जिन में हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के विभिन्न इलाकों पर क़ाबिज़ होने की खबर दी गई है , उन इलाक़ों की व्यापकता और महत्ता के पेशे नज़र इस बात की पुष्टी होती है कि हज़रत इमाम महदी (अ.स.) पूरी दुनिया पर मुसल्लत हो जायेंगे। अर्थात कुछ शहरो और देशों का नाम मिसाल और नमूने के तौर पर लिया गया है और इन रिवायतों को समझने वालों की समझने की शक्ति को मद्दे नज़र रखा गया है।

विभिन्न रिवायतों में रोम , चीन , देलम या देलम के पहाड़ , तुर्क , सिन्ध , हिन्द , क़ुस्तुन्तुनिया , काबुल शाह और खिज़र का नाम आया है कि इन पर हज़रत इमाम महदी (अ.स.) का कब्ज़ा होगा और इमाम (अ.स.) उपरोक्त वर्णित इन तमाम जगहों को फत्ह करेंगे।

यह बात भी उल्लेखनीय है कि जिन इलाक़ों का ऊपर वर्मन किया गया है वह इलाके अइम्मा (अ.स.) के ज़माने में आज कल के इलाकों से कहीं ज़्यादा बड़े थे। मिसाल के तौर पर रोम , यूरोप और आमरीका पर आधारित था , और चीन से अभिप्रायः पूरबी ऐशिया था , जिसमें जापान भी शामिल था जैसे कि हिन्दुस्तान पाकिस्तान को भी शामिल होता था।

क़ुसतुन्तुनिया शहर वही इस्तंबूल है जिसको उस ज़माने में ताक़तवर शहर के नाम से जाना जाता था। अगर उस शहर को फत्ह कर लिया जाता था तो एक बहुत बड़ी कामयाबी मानी जाती थी क्यों कि यूरोप जाने वाले रास्तों में से एक यही रास्ता था।

खुलासा यह है कि हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के दुनिया के महत्वपूर्ण और हस्सास इलाकों पर मुसल्लत होने से इस बात की पुष्टी होती है कि उनकी हुकूमत पूरी दुनिया पर होगी।

स- पहले और दूसरे हिस्से की रिवायतों के अलावा बहुत सी ऐसी रिवायतें मौजूद हैं जिनमें हज़रत इमाम ज़माना (अ.स.) की पूरी दुनिया पर हुकूमत होने की व्याख्या की गई है।

पैग़म्बरे इस्लाम (स.) से रिवायत है कि ख़ुदा वन्दे आलम ने फरमाया :

मैं अपने दीन को उन बारह इमामों के ज़रिये तमाम धर्मों पर ग़ालिब करुँगा और उन्हीं के ज़रिये अपने हुक्म को सब पर लागू करूँगा और उनमें से आखरी इमाम महदी (अ.स.) के क़ियाम के ज़रिये पूरी दुनिया को अपने दुशमनों से पाक करूँगा और उसको पूरब व पश्चिम पर हाकिम बना दूंगा।

हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ.स.) ने फरमाया : ”اَلقَائِمُ مِنَّا۔۔۔ یَبْلُغُ سُلْطَانَہُ المَشْرِقَ وَ الْمَغْرِبَ وَ یَظْہَرُ اللهُ عَزَّ وَ جلّ بہ دِینہُ علی الدِّینِ کلہ وَ لو کرہَ المُشْرِکونَ “

क़ाइम आले मुहम्मद (स.) वह हैं जो दुनिया पूरब व पश्चिम पर हुकूमत करेंगे और ख़ुदा वन्दे आलम अपने दीन को उनके ज़रिये दुनिया के तमाम धर्मों पर ग़ालिब करेगा चाहे मुशरिकों को यह बात बुरी लगे।

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की विश्वव्यापी हुकूमत का केन्द्र ऐतिहासिक शहर कूफ़ा रहेगा जो उस ज़माने में बहुत विस्तृत हो जायेगा और उसमें वह नजफे अशरफ शहर भी शामिल हो जायेगा जो अब कुछ किलो मीटर के फासले पर है। इसी वजह से कुछ रिवायतों में कूफ़ा और कुछ रिवायतों में नजफे अशरफ को हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत का केन्द्र बताया गया है।

हज़रत इमाम सादिक (अ.स.) ने एक लंबी रिवायत के अन्तर्गत फरमाया :

महदी (अ.स.) की हुकूमत का केन्द्र कूफ़ा शहर होगा और कूफ़े की मस्जिद में ही फैसले होंगे।

उल्लेखनीय है कि पुराने ज़माने से ही कूफ़ा शहर पर अहलेबैत (अ.स.) की ख़ास तवज्जह रही है और यही शहर हज़रत अली (अ.स.) की हुकूमत का भी केन्द्र रहा है। कूफ़े की मस्जिदे इस्लामी दुनिया की मशहूर मस्जिदों में से एक है और उस में हज़रत अली (अ.स.) ने नमाज़ पढी है और खुत्बे बयान फरमाये हैं। वह उसी मस्जिद में बैठ कर लोगों के फैसले किया करते थे और आखिर में उसी मस्जिद की मेहराब में शहीद हुए हैं।

हुकूमत की मुद्दत

जब इंसानियत एक लंबे समय तक ज़ुल्म व सितम की हुकूमत को बर्दाशत कर लेगी तो ख़ुदा वन्दे आलम की आखरी हुज्जत के ज़हूर से पूरी दुनिया न्याय व समानता पर आधारित हुकूमत के स्वागत के लिए आगे बढ़ेगी। वह हुकूमत नेक और सच्चे लोगों के हाथों में होगी और यह ख़ुदा का वादा है।

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की छत्र छाया में नेक और सच्चे लोगों की उस हुकूमत का शुभारम्भ होगा और दुनिया के समापन तक यह हुकूमत बाकी रहेगी और फिर कभी भी ज़ुल्म और ज़ालिमों का ज़माना नहीं आयेगा।

पैग़म्बरे इस्लाम (स.) से एक रिवायत में नक्ल हुआ है कि ख़ुदा वन्दे आलम ने उस आखरी मासूम की हुकूमत की खुश ख़बरी अपने रसूल (स.) को दी है इस के आखिर में फरमाया :

जब इमाम महदी (अ.स.) हुकूमत की गाग डोर अपने हाथों में संभाल लेंगे तो उनकी हुकूमत का सिसिला जारी रहेगा फिर मैं क़ियाम तक ज़मीन की हुकूमत को अपने वलियों और मुहिब्बों के हाथों में देता रहूंगा...।

इस आधार पर हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के ज़रिये न्याय पर आधारित हुकूमत की स्थापना के बाद कोई दूसरा हुकूमत नहीं कर सकेगा। हक़ीक़त तो यह है इंसानी जीवन के लिए एक नया इतिहास शुरु हो जायेगा जो हुकूमते इलाही की छत्र छाया में लिखा जायेगा।

हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ.स.) ने फरमाया :

हमारी हुकूमत आखरी हुकूमत होगी और कोई भी हुकूमत करने वाला खानदान ऐसा बाकी नहीं बचेगा जो हमारी हुकूमत से पहले हुकूमत न कर ले ताकि जब हमारी हुकूमत स्थापित हो तो उसके निज़ाम , व्यवस्था और तौर तरीके को देख कर यह न कहे कि अगर हम भी हुकूमत करते तो इसी तरह अमल करते।

इस लिए ज़हूर के बाद इलाही हुकूमत की मुद्दत हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत से अलग है। रिवायत के अनुसार वह अपनी बाक़ी उम्र में हाकिम रहेंगे और आखिर कार इस दुनिया से रुखसत हो जायेंगे।

इस बात में कोई शक नहीं है कि हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत का ज़माना इतना लंबा होगा , जिस में इतना बड़ा विश्वव्यापी इन्क़ेलाब आना और दुनिया के हर कोने में न्याय व समानता की स्थापित होना संभव हो। लेकिन यह कहना कि यह मक़सद कुछ वर्षों में पूरा हो सकता है तो ऐसा सिर्फ गुमान और अन्दाज़े के आधार पर है। इस लिए इस बारे में भी अइम्मा ए मासूमीन (अ.स.) की रिवायतों को देखने की ज़रूरत है। अलबत्ता इस इलाही रहबर की लियाक़त , उनके व उनके असहाब के लिए ग़ैबी इमदाद , ज़हूर के ज़माने में विश्व स्तर पर दीन की मर्यादाओं व नेकियों को क़बूल करने की तैयारी के मद्दे नज़र संभव है कि इमाम महदी (अ.स.) की यह ज़िम्मेदारी कम मुद्दत में पूरी हो जाये और जिस इंकेलाब को बर्पा करने के लिए इंसानियत शताब्दियों से असमर्थ हो वह 10 साल से कम की समय सीमा में ही सफल हो जाये।

जिन रिवायतों में हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत के ज़माने को बयान किया गया है उनमें बहुत ज़्यादा इख़्तेलाफ़ पाया हैं। उन में से कुछ रिवायतों में हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत की मुद्दत 5 साल , कुछ में 7 साल , कुछ में 8 साल , कुछ में 10 साल वर्णन हुई है। कुछ रिवायतों में इस हुकूमत की मुद्दत 19 साल व कुछ महीने और कुछ रिवायतों में 40 और 309 साल का भी वर्णन हुआ हैं।

क्योंकि रिवायतों के इख्तेलाफ़ की वजह मालूम नहीं है इस लिए इन रिवायतों के बीच से उनकी हुकूमत की सही मुद्दत का पता लगाना एक मुशकिल काम है। लेकिन कुछ शिया आलिमों ने कुछ रिवायतों की शोहरत के आधार पर 7 साल वाले नज़रिये को चुना है।

जब कि कुछ लोगो ने यह भी कहा है कि हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत 7 साल होगी लेकिन उसका एक साल हमारे दस साल के बराबर होगा जैसे कि कुछ रिवायतों में इल तरह का वर्णन भी हुआ है कि

हज़रत इमाम सादिक (अ.स.) से रावी ने हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत की मुद्दत के बारे में सवाल किया तो इमाम (अ.स.) ने फरमाया :

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) सात साल हुकूमत करेंगे जो तुम्हारे 70 साल के बराबर होंगे।

मरहूम मजलिसी फरमाते हैं कि

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत के बारे में बयान होने वाली रिवायतों में निम्न लिखित एहतेमाल देने चाहिए

कुछ रिवायतों में हुकूमत की पूरी मुद्दत की तरफ़ इशारा हुआ है।

कुछ रिवायतों में हुकूमत के स्थापित होने व उसकी मज़बूती की तरफ़ इशारा हुआ है।

कुछ रिवायतों में हमारे ज़माने के साल और दिनों के अनुसार इशारा हुआ है।

और कुछ रिवायतों में हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के ज़माने की बात हुई है जबकि ख़ुदा वन्दे आलम हक़ीक़त को ज़्यादा जानता है।

इमाम (अ.स.) की प्रशासनिक की शैली

हर हाकिम अपनी हुकूमत और उसके विभिन्न विभागों में एक ख़ास शैली को अपनाता है और वह उसकी हुकूमत की एक विशेषता होती है। हज़रत इमाम महदी (अ.स.) भी जब पूरी दुनिया की हुकूमत की बाग डोर अपने हाथों में संभाल लेंगे तो उस विश्वव्यापी हुकूमत को एक खास शैली से कन्ट्रोल किया जायेगा। लेकिन इस विषय की महत्ता के मद्दे नज़र उचित है कि उनकी कार्य शैली की तरफ़ इशारा किया जाये और हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत के तौर तरीक़ों से संबंधित पैग़म्बरे इस्लाम (स.) और अइम्मा ए मासूमीन (अ.स.) की हदीसों को पेश किया जाये।

इस बात को स्पष्ट करते हुए कि रिवायतों में हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत की शैली के बारे में एक साफ़ तस्वीर पेश की गई है और वह यह है कि हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की शैली वही पैग़म्बरे इस्लाम (स.) की शैली होगी। जिस तरह पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने अपने ज़माने में तमाम पहलुओं में जाहिलियत का मुकाबला किया और उस माहौल में उस वास्तविक इस्लाम को लागू किया कि जो इंसान की दुनिया व आख़ेरत की कामयाबी का ज़ामिन है , हज़रत इमाम महदी (अ.स.) भी ज़हूर के बाद उसी तरह उस ज़माने की नई जाहिलियत से मुक़ाबला करेंगे। जबकि उस ज़माने की जाहिलियत पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के ज़माने की जाहिलियत से भिन्न और ज़्यादा दर्दनाक होगी। हज़रत इमाम महदी (अ.स.) आधुनिक जाहिलियत के विरानों पर इस्लामी मर्यादाओं की नई इमारत तामीर करेंगे।

हज़रत इमाम सादिक़ (अ.स.) से सवाल हुआ कि हज़रत इमाम महदी (अ.स.) का हुकूमती अंदाज़ क्या होगाः तो इमाम (अ.स.) ने फरमाया :

” یَصْنَعُ کَمَا صَنَعَ رَسُولُ ا للهِ ( ص ) یَہْدِمُ مَا کَانَ قَبْلَہُ کَمَا ہَدَمَ رَسُولُ اللهِ ( ص ) اٴمْرَ الجَاہِلِیَةِ وَ یَسْتَانِفُ الاِسْلاٰمَ جَدِیْداً “

इमाम महदी (अ.स.) पैग़म्बरे इस्लाम (स.) की तरह काम करेंगे और जिस तरह पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने लोगों की बीच प्रचलित जाहिलियत के रीती रिवाजों को खत्म किया था उसी तरह वह भी अपने ज़हूर से पहले मौजूद जाहिलियत के रीति रिवाजों को ख़त्म करेंगे और इस्लाम की नये तरीके से बुनियाद रखेंगे।

यह हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत के ज़माने की मुख्य सियासत रहेगी परन्तु विभिन्न प्रस्थितियों की आवश्यक्तानुसार हुकूमत के कुछ कार्यों में परिवर्तन संभव है। इस चीज़ को रिवायतों में भी बयान किया गया है और हम इसके बारे में बाद में उल्लेख करेंगे।

जिहाद की कार्य शैली

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) अपने विश्वव्यापी इन्केलाब के द्वारा ज़मीन से कुफ्र व शिर्क के ख़त्म कर देंगे और सभी को मुकद्दस दीन इस्लाम की तरफ़ बुला लेंगे।

इस बारे में पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने फरमाया :

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) का तरीका मेरा तरीका होगा और वह लोगों को मेरी शरीअत व मेरे इस्लाम की तरफ़ ले आयेगे।

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के ज़हूर के मौके पर हक़ स्पष्ट हो जायेगा और इस तरह दुनिया वालों पर हुज्जत तमाम हो जायेगी।

कुछ रिवायतों के अनुसार हज़रत इमाम महदी (अ.स.) उस मौके पर तौरैत व इंजील की असली प्रतिलीपियाँ इन्ताकिया की गा़र से बाहर निकालेंगे और उन्हीं से यहूदियों और ईसाईयों के सामने दलीलें पेश करेंगे इसके बाद लोगों की एक बहुत बड़ी संख्या मुसलमान हो जायेगी।

उस मौके पर जो चीज़ विभिन्न क़ौमो के लोगों के इस्लाम की तरफ़ आने का कारण बनेगी , वह हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के पास मौजूद विभिन्न नबियों (अ.स.) की निशानियाँ होंगी जैसे जनाबे मूसा (अ.स.) का असा , जनाबे सुलेमान (अ.स.) की अंगूठी और पैग़म्बरे इस्लाम (स.) का अलम , तलवार और ज़िरह (कवच)।

क्योंकि वह नबियों (अ.स.) के उद्देश्यों को पूरा करने और विश्व स्तर पर न्याय स्थापित करने के लिए क़ियाम करेंगे , जाहिर है कि जब हक़ व हकीकत स्पष्ट हो जायेगी , तो सिर्फ ऐसे ही लोग बातिल के मोर्चे पर बाकी रहेंगे जो अपनी इंसानी और इलाही मर्यादाओं को बिल्कुल भुला बैठे होंगे। वह ऐसे लोग होंगे जिनका काम सिर्फ बुराई फैलाना और ज़ुल्म व सितम करना होगा। अतः हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत का ऐसे लोगों से पाक होना ज़रुरी है , इसी लिए उस मौके पर महदवी न्याय की चमकदार तलवार नियाम से बाहर निकलेगी और पूरी ताकत के साथ हठ धर्म व ज़ालिम लोगों पर चलेगी और उसकी मार से कोई भी ज़ालिम नहीं बच सकेगा। यही तरीका पैग़म्बरे इस्लाम (स.) और अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) का भी था।

इमाम (अ.स.) के फ़ैसले

चूँकि हज़रत इमाम महदी (अ.स.) को पूरी दुनिया में न्याय व समानता फैलाने के लिए चुना गया है , इस लिए उन्हें अपनी ज़िम्मेदारी को पूरा करने के लिए एक मज़बूत न्याय पालिका की ज़रुरत है। हज़रत इमाम महदी (अ.स.) इस बारे में अपने पूर्वज हज़रत अली (अ.स.) के तरीके पर काम करेंगे और जिन लोगों के अधिकार ज़ालिमों ने छीन लिए हैं वह उन्हें अपनी पूरी ताक़त से वापस लेंगे और उन्हें उनके मालिकों पहुँचायेंगे।

वह न्याय व इंसाफ़ का ऐसा प्रदर्शन करेंगे कि उसे देख ज़िन्दा लोग यह तमन्ना करेंगे कि ऐ काश मुर्दा लोग भी ज़िन्दा हो जाते और इमाम (अ.स.) के इन्साफ़ से लाभान्वित होते।

उल्लेखनीय है कि कुछ रिवायतें इस बात की पुष्टी करती है कि इमाम (अ.स.) एक न्यायधीश के रूप में हज़रत सुलेमान (अ.स.) और हज़रत दाऊद (अ.स.) की तरह काम करेंगे और अल्लाह के इल्म के सहारे उन्हीं की तरह फैसले करेंगे न कि दलील और गवाहों की गवाही के आधार पर।

इमाम सादिक (अ.स.) ने फरमाया :

जब हमारे क़ाइम क़ियाम करेंगे तो वह जनाबे दाऊद और सुलेमान की तरह फैसले करेंगे यानी गवाह तलब नहीं करेंगे।

शायद इस तरह के फैसलों का राज़ यह हो कि अल्लाह द्वारा प्रदान किये हुए इल्म पर एतेमाद करते हुए सच्ची अदालत स्थापित होगी , जबकि अगर गवाहों की बातों पर भरोसा किया जाये तो ज़ाहिरी अदालत ही होती है। क्यों अगर इंसान गवाह हों तो उन में गलती का एहसास पाया जाता है।

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के इस तरीक़े से फासले करने के राज़ को समझना एक मुशकिल काम है लेकिन इतना तो समझ में आ ही सकता है कि उस ज़माने के लिए यह तरीका ही उचित है।

इमाम (अ.स.) का हुकूमत का अंदाज़

हुकूमत का एक महत्वपूर्ण स्तंभ उसके अधिकारी व कर्मचारी होते हैं , जिस हुकूमत में योग्य कर्मचारी होते है उस हुकूमत की व्यवस्था सही व सुचारू रूप से चलती है और हुकूमत अपने उद्देश्यों में कामयाब हो जाती है।

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) अपनी विश्वव्यापी हुकूमत के हेड के रूप में दुनिया के विभिन्न स्थानों में व्यस्था के सुचूरू रखने के लिए अपने मददगारों में से योग्य लोगों का अधिकारियों व कर्मचारियों के रूप चयन करेंगे। यह अधिकारी वह लोग होंगे जिनके अन्दर इस्लामी हाकिम की तमाम विशेषताएं पाई जाती होंगी , जैसे मनेजमैंट की योग्या , वादा वफ़ाई , नियत व काम की सच्चाई , इरादों की मज़बूती , बहादुरी आदि इस तरह हज़रत इमाम महदी (अ.स.) हुकूमत के प्रधान की हैसियत से पूरी दुनिया में फैले अपने मातहत अधिकारियों पर लगातार नज़र रखेंगे और चश्म पोशी के बग़ैर उनके कामों की छान बीन करेंगे , जबकि इस महत्वपूर्ण विशेषता को हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत से पहले सारी हुकूमतें भुलाए बैठी हैं। और इस बात को रिवायतों में हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के ज़हूर की निशानियों में गिना गया है।

पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने फरमायाः

عَلَامَةُ الْمَہْدِی اَنْ یَکُونَ شَدِیْداً عَلَی الْعُمَّالِ جَوَاداً باِلْمَالِ رَحِیْماً بِالْمَسَاکِیْنِ “

इमाम महदी (अ.स.) की निशानी यह है कि वह अपने ओहदेदारों के साथ सख्त होंगे और ग़रीबों के साथ बहुत ज़्यादा करम से पेश आयेंगे।

इमाम (अ.स.) की आर्थिक शैली

हुकूमत के आर्थिक मामलों में हज़रत इमाम महदी (अ.स.) समानता और बराबरी का क़ानून लागू करेंगे। यह वही शैली होगी जो ख़ुद पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के ज़माने में लागू थी लेकिन उनके बाद होने वाले शासकों ने , जो कि नाम मात्र मुसलमान थे , इस शैली को बदल दिया और इस की जगह पर कुछ ग़लत शैलियों व तरीक़ों को अपनाया। नतीजा यह हुआ कि कुछ लोगों को बेहिसाब माल व दौलत दे दी गई जिसकी वजह से इस्लामी समाज ग़रीब व अमीर दो तबक़ों में बंट गया और उनमें लगातार दूरी बढ़ती गई। बस हज़रत अली (अ.स.) और हज़रत इमाम हसन (अ.स.) अपनी ख़िलाफ़त के ज़माने में बैतुल माल (राजकीय कोष) को समान व बराबर बांटने के पाबन्द रहे। लेकिन उनसे पहले बनी उमैया ने मुसलमानों के बैतुल माल को व्यक्तिगत माल के रूप में अपनी मर्ज़ी से अपने रिशतेदारों और दोस्तों में बांटा कर अपनी ग़ैर क़ानूनी हुकूमत को मज़बूत बनाया। उन्होंने खेती की ज़मीनें व बैतुल माल की अन्य संपत्तियाँ अपने रिशतेदारों को भेंट कर दी और यह काम बनी उमैया के ज़माने में विशेष रूप से तीसरे खलीफ़ा के दौर में इतना प्रचलित हुआ कि इसने साधारण रूप धारण कर लिया।

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) जो कि न्याय व समानता के प्रतीक हैं , वह बैतुल माल को सार्वजिन संपत्ती घोषित करेंगे और उसमें सभी को बराबर का हिस्सेदार बनायेंगे। किसी को किसी पर वरीयता नही दी जायेगी और माल व दौलत और ज़मीन की बख़्शिश बिल्कुल बन्द कर दी जायेगी।

पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने फरमायाः

”اِذَا قَامَ قَائِمُنَا اضْمَحَلَّت القَطَائِعُ فَلَا قَطَائِع

जिस वक़्त हमारा क़ाइम क़ियाम करेगा क़ता-ए .का सिलसिला नहीं होगा और उसके बाद से यह सिलसिला बिल्कुल बन्द हो जायेगा।

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की आर्थिक शैली यह होगी कि वह तमाम लोगों को उनकी ज़रुरतों के अनुसार उनके सुख चैन व आराम के लिए माल व दौलत बख्शा करेंगे और उनकी हुकूमत में जो ज़रुरतमंद इंसान उनसे कुछ माँगा करेगा वह उसको बहुत ज़्यादा दिया करेंगे।

पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने फरमाया :

”فَہُوَ یَحْثُوا المَالَ حَثْواً

इमाम महदी (अ.स.) बहुत ज़्यादा माल बख़्शा करेंगे।

यह तरीक़ा व्यक्तिगत और सामाजिक आधार पर सुधार का रास्ता हमवार करने के लिए अपनाया जायेगा और यही अइम्मा ए मासूमीन (अ.स.) का मक़सद है। हज़रत इमाम महदी (अ.स.) का लोगों की भौतिक आवश्यक्ताओं को पूरा करने का मक़सद यह होगा कि उनके लिए ख़ुदा वन्दे आलम की इबादत और इताअत का रास्ता हमवार हो जाये। हम इस बारे में हुकूमत के उद्देश्यों वाले अध्याय में विस्तारपूर्वक उल्लेख कर चुके हैं।

इमाम (अ.स.) की ख़ुद की सीरत

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) का व्यक्तिगत व्यवहार और लोगों के साथ उनके संबंध इस्लामी अधिकारियों व हाकिमों के लिए नमूना है। इमाम (अ.स.) की नज़र में हुकूमत लोगों की ख़िदमत और इन्सानियत को कमाल की आख़िरी हद तक पहुँचाने का साधन है , माल व दौलत जमा करने और लोगों पर ज़ुल्म व सितम ढाने और ख़ुदा के बन्दों से नाजायज़ फायदा उठाने का साधन नहीं है।

वास्तव में जब वह नेक लोगों का इमाम तख्ते हुकूमत पर होगा तो पैग़म्बरे इस्लाम (स.) और अमीरुल मोमेनीन (अ.स.) की हुकूमत की याद ताज़ा हो जायेगी। जबकि उनके पास बहुत धन व दौलत होगी लेकिन उनकी अपनी व्यक्तिगत ज़िन्दगी बहुत साधारण होगी और वह कम चीज़ो पर गुज़र बसर करेंगे।

हज़रत इमाम अली (अ.स.) उनकी तारीफ़ में फरमाते हैं कि

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) पूरे इंसानी समाज के रहबर और हाकिम होंगे लेकिन वह यह प्रतिज्ञा करेंगे कि अपनी रिआया की तरह रास्ता चलें , उन्हीं की तरह कपड़े पहनें और उन्हीं की सवारी की तरह सवारी करें और कम पर ही गुज़ारा करें।

हज़रत अली (अ.स.) ख़ुद भी इसी तरह रहते थे और उनकी ज़िन्दगी , खुराक व लिबास में नबियों की तरह ज़ोह्द पाया जाता था। हज़रत इमाम महदी (अ.स.) इस बारे में भी उन्हीं का अनुसरण करेंगे।

हज़रत इमाम सादिक़ (अ.स.) ने फरमाया :

”اِنَّ قَائِمَنَا اِذَا قَامَ لَبِسَ لِبَاسَ عَلِیّ وَ سَارَ بِسِیْرَتِہِ

जब हमारा क़ाइम ज़हूर करेगा तो वह हज़रत अली (अ.स.) की तरह लिबास पहनेंगे और उन्हीं की कार्य शैली को अपनायेंगे।

वह अपने लिए तो सख्त रवैये को चुनेंगे , लेकिन उम्मत के साथ एक मेहरबान बाप की तरह पेश आयेंगे और उनके आराम के बारे में सोचेंगे। हज़रत इमाम रिज़ा (अ.स.) उनकी तारीफ़ में फरमाये हैं कि

” اَلامِامُ الاَنِیْسُ الرَّفِیْقِ وَالوَالِدُ الشَفِیْق وَ الاٴخُ الشَقِیْق وَ الاٴُمُّ البِرَّةِ بِالوَلَدِ الصََّغِیْر مَفْزِغُ العِبَادِ فِی الدَّاہِیةِ النّٰاد ِ

वह इमाम हमदर्द दोस्त , मेहरबान बाप और सच्चे भाई की तरह होंगें , (वह अपनी रिआया के प्रति) उस माँ की तरह होंगे जो छोटे बच्चे पर मेहरबान होती है , इसी तरह वह ख़तरनाक घटनाओं में बन्दों के लिए पनाहगाह होंगे।

जी हाँ ! वह अपने नाना की उम्मत के इतने करीब और इतने हमदर्द होंगे कि सभी उनको अपनी पनाहगाह मानेंगे।

पैग़म्बरे इस्लाम (स.) से रिवायत है कि उन्होंने हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के बारे में फरमाया :

उम्मत उनकी पनाह में इस तरह जायेगी , जिस तरह शहद की मक्खियाँ अपनी मल्का की पनाह में रहती हैं।

वह एक सच्चे रहबर और नमूना होंगे , उनको लोगों के बीच से चुना गया है और वह उनके बीच उन्हीं की तरह ज़िन्दगी बसर करेंगे। इसी वजह से उनकी मुशकिलों को अच्छी तरह जानते हैं और उनकी परेशानियों के इलाज को भी जानते हैं और वह उनकी कामयाबी व विकास के लिए हर तरह से कोशिश करेंगे। वह इस बारे में सिर्फ़ अल्लाह की मर्ज़ी को नज़र में रखेंगे। इन सबके होते हुए उम्मत को उनके पास आराम और शांति व सुरक्षा क्यों नही मिलेगी और वह उनको छोड़ कर किसी ग़ैर से क्यों मुहब्बत करेंगे ?

आम मक़बूलियत

हुकूमत के लिए सबसे बड़ी परेशानी आम लोगों की नाराज़गी है। चूँकि हुकूमत के विभिन्न विभागों में बहुत सी कमज़ोरियां पाई जाती हैं , अतः उनके आधार पर जनता हुकूमत से नाराज़ रहती है। हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत की एक आधारभूत विशेषता यह है कि हर इंसान और हर समाज उनकी हुकूमत को क़बूल करेगा और उससे राज़ी रहेगा। सिर्फ ज़मीन वाले ही नहीं बल्कि आसमान वाले भी उस इलाही हुकूमत और उसके न्याय प्रियः हाकिम से पूर्ण रूप से राज़ी होंगे।

पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने फरमाया :

मैं तुम्हें महदी (अ.स.) की ख़ुश ख़बरी सुनाता हूँ , उनकी हुकूमत से ज़मीन व आसमान वाले राज़ी होंगे , यह कैसे संभव है कि कोई इमाम महदी (अ.स.) की हुकूमत से नाराज़ हो जबकि पूरी दुनिया पर यह रौशन हो जायेगा कि इमाम महदी (अ.स.) की इलाही हुकूमत की छत्र छाया में इंसान के तमाम कामों में सुधार होगा और समस्त भौतिक व आध्यात्मिक पहलुओं में कामयाबी मिलेगी।

हम उचित समझते हैं कि इस हिस्से के आखिर में हज़रत अली (अ.स.) के हमेशा अमर रहने वाले प्रवचनों का समापन के रूप में उल्लेख करें।

ख़ुदा वन्दे आलम अपने फरिशतों के ज़रिये उनका (इमाम महदी अ. स.) समर्थन करेगा। उनके मददगारों को हिफाज़त से रखेगा और अपनी निशानियों के ज़रिये उनकी मदद करेगा। वह उनको ज़मीन वालों पर इस तरह ग़ालिब बनायेगा कि तमाम लोग अपनी मर्ज़ी से या शौक से या मजबूर होकर उनके पास इकठ्ठा हो जायेंगे। वह ज़मीन को न्याय , समानता , नूर और दलील से भर देंगे। हर शहर के लोग उन पर ईमान ले आयेंगे यहाँ तक कि कोई काफिर बाक़ी नहीं बचेगा। कोई ऐसा बुराई नहीं बचेगी जो अच्छाई में न बदल जाये। उनकी हुकूमत के ज़माने में दरिन्दें आपस में मेल जोल से रहेंगे और ज़मीन अपनी बरकतों को बाहर इकाल देगी( फ़सल ज़्यादा पैदा होगी) और आसमान अपने खैर को नाज़िल करेगा( आवश्यक्ता के अनुसार पानी बरसायेगा) और इमाम के लिए ज़मीन में छिपे खज़ाने ज़ाहिर हो जायेंगे। अतः खुश नसीब है वह इंसान जो उस ज़माने में मौजूद हो और उन की इताअत (आज्ञा पालन) करे।


छठा अध्याय

महदवियत के लिए नुक्सानदेह चीज़ों की पहचान

यह संभव है कि किसी सभ्यता , सांस्कृति व तहज़ीब के लिए कुछ चीज़ें नुक्सानदेह हों और वह उसके विकास व तरक़्क़ी के मार्ग रुकावट हों। कभी कभी कोई धार्मिक सभ्यता भी आफतों व विपत्तियों का शिकार हो जाती है और इस कारण उसकी तरक़्क़ी की रफ्तार को सुस्त हो जाती है। “दीन के लिए नुक्सानदेह चीज़ों की पहचान ” नामक विषय उन आफतों को पहचानने और उनसे मुक़ाबेल करने के तरीक़ों का वर्णन करने का ज़िम्मेदार है।

उचित है कि इस आखरी हिस्से में “महदवियत के लिए नुक्सानदेह चीज़ों की पहचान ” के बारे में बहस करें ताकि उन चीज़ों को पहचान कर उन्हें बेकार बनाने और उनसे मुक़ाबला करने के बारे में सोचा जा सके।

महदवियत के लिए नुक्सान देने वाली चीज़ें ऐसी हैं कि अगर उनसे लापरवाही की जाये तो मोमेनीन में विशेष रूप से जवानों में हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के वजूद या उनकी ज़िन्दगी के विभिन्न पहलुओं की पहचान का अक़ीदा सुस्त हो जायेगा और इससे उनके क़दम कुछ गुमराह लोगों या गुमराह फिर्कों की तरफ़ बढ़ जायेंगे। इस आधार पर उन नुक्सानदेह आफतों की पहचान , हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के मुन्तज़िरों को अक़ीदे व अमल में भटकने से सुरक्षित रखेगी।

अब हम यहाँ पर महदवियत को नुक्सान पहुँचाने वाली चीज़ों में से कुछ महत्वपूर्ण चीज़ों पर विभिन्न शीर्षकों के अन्तर्गत बहस करते हैं।

ग़लत नतीजा निकालना

महदवियत के लिए सबसे बड़ी आफ़त इस्लामी तहज़ीब का ग़लत अर्थ करना और ग़लत नतीजा निकालना है। रिवायतों की ग़लत या अधूरी व्याख्या करने से नतीजा भी ग़लत ही निकलता है। हम यहाँ पर इसके कुछ नमूने आपकी ख़िदमत में पेश करते हैं।

1.इन्तेज़ार का ग़लत अर्थ इस बात का कारण बना कि कुछ लोगों ने यह गुमान कर लिया कि दुनिया सिर्फ हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के ज़रिये बुराइयों से पाक हो सकती है , इस लिए बुराइयों और गुनाहों के मुक़ाबले में हमारी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है। बल्कि कुछ लोग तो यह भी कह देते हैं कि हज़रत इमाम महदी (अ. स)) के ज़हूर को नज़दीक करने के लिए समाज में गुनाहों और बुराइयों को फैलाना चाहिए। यह ग़लत नज़रीया कुरआन और अहले बैत अलैहिमुस सलाम के नज़रियों के बिल्कुल मुखालिफ़ है , क्योंकि “अम्र बिल मारुफ और नही अनिल मुनकर ” करना हर मुसलमान की ज़िम्मेदारी है।

इमाम खुमैनी अलैहिर्रहमा इस नज़रिये की रद में फरमाते हैं कि

अगर हम में इतनी ताक़त है कि पूरी दुनिया से ज़ुल्म व सितम का खात्मा कर सकें तो उसे ख़त्म करना हमारी शरई ज़िम्मेदारी होगी , लेकिन हम में इतनी ताक़त नहीं है। हज़रत इमाम महदी (अ.स.) दुनिया को अदल व इन्साफ़ से भर देंगे , इसका मतलब यह नहीं है कि तुम अपनी ज़िम्मेदारी से पीछे हट जाओ और तुम्हारी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है।

उसके बाद वह अपनी बात को जारी रखते हुए फरमाते हैं कि

क्या हम कुरआने मजीद की आयात के खिलाफ़ काम करें नही आनिल मुनकर करना छोड़ दें ? और अम्र बिल मअरुफ को छोड़ कर , गुनाहों को सिर्फ़ इस वजह से फूलने फलने दें कि हज़रत इमाम महदी (अ.स.) का ज़हूर हो जाये ?।

प्रियः पाठकों। हम ने इन्तेज़ार नामक बहस के शुरु में इन्तेज़ार के सही अर्थ का उल्लेख किया है।

2. कुछ लोगों ने कुछ रिवायतों के ज़ाहिर से यह नतीजा निकाला है कि हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के ज़हूर से पहले होने वाला हर इन्केलाब ग़लत और बातिल है। इसी लिए ईरान के इस्लामी इन्केलाब (जो कि तागूत और शैतानी ताक़तों के खिलाफ़ , अल्लाह के अहकाम लागू करने के लिए था) के मुक़ाबले में ग़लत फैसले लिये गये।

इसके जवाब में हम यह कहते हैं कि बहुत से इस्लामी अहकाम जैसे : इस्लामी हुदूद , क़िसास , दुशमनों से जिहाद , और बुराइयों से पूरा मुक़ाबला सिर्फ़ इस्लामी हुकूमत की छत्र छाया में ही संभव है। इस लिए इस्लामी हुकूमत की स्थापना एक अच्छा और क़ाबिले क़बूल काम है। कुछ रिवायतों में क़ियाम करने से इस लिए मना किया गया है ताकि बातिल और ग़ैर इस्लामी इन्केलाबों में शिरकत न की जाये , या ऐसे इन्केलाबों में जिन में शर्तों और हालात को मद्दे नज़र न रखा जाये , या ऐसा क़ियाम जो “क़ियामे महदी ” के रूप शुरु किया जाये , न यह कि समाज सुधार के लिए किया जाने वाला हर इन्केलाब ग़लत और बातिल है।

3. महदवियत से ग़लत नतीजा निकालने का एक नमूना हज़रत इमाम महदी (अ.स.) को खतरनाक शक्ल में पेश करना है।

कुछ लोग यह कल्पना करते हैं कि हज़रत इमाम महदी (अ.स.) अपनी तलवार से खून का दरिया बहायेंगे और बहुत से लोगों को तहे तेग़ कर डालेंगे , लेकिन यह तसव्वुर बिल्कुल ग़लत है। क्योंकि हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की ज़ात ख़ुदा की रहमत और मेहरबानी के ज़ाहिर होने की जगह है। वह पैग़म्बरे इस्लाम (स.) की तरह पहले लोगों के सामने इस्लाम को स्पष्ट दलीलों के साथ पेश करेंगे और इस काम से बहुत बड़ी संख्या में लोग इस्लाम क़बूल करके उनके साथ हो जायेंगे। अतः हज़रत इमाम महदी (अ.स.) सिर्फ अपने उन हठधर्म दुश्मनों के ख़िलाफ़ तलवार का इस्तेमाल करेंगे जो हक़ के रौशन हो जाने के बाद भी हक़ क़बूल नहीं करेंगे। वह लोग तलवार की ज़बान के अलावा कोई ज़बान नहीं समझते होंगे।

ज़हूर में जल्द बाज़ी

महदवियत के लिए एक नुक्सानदेह चीज़ ज़हूर में जल्द बाज़ी है। जल्द बाज़ी का मतलब यह है कि किसी चीज़ के वक़्त से पहले या उसके लिए रास्ता हमवार होने से पहले उसकी माँग करना है। जल्दबाज़ इंसान अपनी कमज़ोरी और कमज़र्फ़ी की वजह से अपनी गंभीरता और चैन व सकून को खो बैठते हैं और किसी चीज़ की शर्तें पूरी होने और स्थिति के अनुकूल होने से पहले ही उस चीज़ की माँग करने लगते है।

महदवियत में अक़ीदा रखने वाले सभी लोग “ग़ायब इमाम ” के मलसे पर हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के ज़हूर के अभिलाषी हैं और अपने पूरे वजूद के साथ ज़हूर का इन्तेज़ार करते हैं। वह उनके ज़हूर में जल्दी के लिए दुआ तो करते हैं , लेकिन कभी भी जल्द बाज़ी से काम नहीं लेते। ग़ैबत का ज़माना जितना ज़्यादा लंबा होता जाता है उनका इन्तेज़ार भी लंबा होता जाता है , लेकिन फिर भी उनके हाथ से सब्र का दामन नहीं छुटता। बल्कि वह तो ज़हूर के बहुत ज़्यादा अभिलाषी होने के बावजूद भी ख़ुदा वन्दे आलम की मर्ज़ी और उसके इरादे के सामने अपने सिर को झुकाये रखते हैं और ज़हूर की ज़रूरी शर्तों को पूरा करने और रास्ता हमवार करने के लिए कोशिश करते हैं।

अब्दुर्रहमान इब्ने कसीर कहते हैं कि मैं हज़रत इमाम सादिक़ (अ.स.) की ख़िदमत में बैठा हुआ था कि “महरम ” आये और कहा कि मैं आप पर कुर्बान , मुझे बताइये कि हम जिस चीज़ के इन्तेज़ार में हैं उस इन्तेज़ार की घडियां कब पूरी होंगी ? इमाम (अ.स.) ने फरमायाः ऐ महरम ! ज़हूर के लिए वक़्त निश्चित करने वाले झूठे हैं और जल्द बाज़ी करने वाले हलाक होने वाले हैं और इस बारे में अपने सिर को झुकाने वाले निजात व मुक्ति पाने वाले हैं।

ज़हूर के बारे में जल्द बाज़ी से इस लिए मना किया गया है कि जल्द बाज़ी की वजह से इंसान में नाउम्मीदी पैदा हो जाती है जिसकी वजह से सकून और इत्मिनान खत्म हो जाता है और उसकी स्वीकार करने की हालत , शिकवे और शिकायत में बदल जाती है। ज़हूर में दूर की वजह से उसमें बेचैनी पैदा हो जाती है और वह इस बीमारी को दूसरों तक भी पहुँचा देता है। कभी कभी ज़हूर में जल्द बाज़ी की वजह से इंसान हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के वजूद से भी इन्कार कर देता है।

उल्लेखनीय है कि ज़हूर के बारे में जल्दबाज़ी की वजह यह है कि इंसान यह नहीं जानता कि ज़हूर अल्लाह की सुन्नतों में से है और तमाम सुन्नतों की तरह उसके लिए भी शर्तों का पूरा और रास्ते हमवार होना ज़रुरी हैं , इस वजह से वह ज़हूर के बारे में जल्द बाज़ी करता है।

ज़हूर के लिए वक़्त निश्चित करना

महदवियत के लिए नुक्सानदेह चीज़ों में से एक यह है कि इंसान हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के ज़हूर के लिए वक़्त निश्चित करे। जबकि ज़हूर का ज़माना लोगों से छुपाया गया है और अइम्मा ए मासूमीन (अ.स.) की रिवायतों में ज़हूर के लिए वक़्त निश्चित करने के बारे में सख्ती के साथ मना किया गया है और वक़्त निश्चित करने वालों को झूठा कहा गया है।

हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ.स.) से सवाल हुआ कि क्या ज़हूर के लिए कोई वक़्त निश्चित है ?

इमाम (अ.स.) ने फरमाया :

जो लोग ज़हूर के लिए वक़्त निश्चित करें वह झूठे हैं। इमाम (अ.स.) ने

इस वाक्य को तीन बार कहा।..

लेकिन फिर भी कुछ लोग जान बूझ कर या भूल चूक के आधार पर हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के ज़हूर के लिए वक़्त निश्चित कर देते हैं। जिसका ग़लत असर यह होता है कि जो लोग इस तरह के झूठे वादों पर यकीन कर लेते हैं , वह उसके पूरा न होने पर ना उम्मीदी के शिकार हो जाते हैं।

इस लिए सच्चे मुन्तज़िरों की यह ज़िम्मेदारी है कि वह ख़ुद को नादान और स्वार्थी शिकारियों के जाल से दूर रखें और ज़हूर के बारे में सिर्फ़ अल्लाह की मर्ज़ी का इन्तज़ार करें ।

ज़हूर की निशानियों की ग़लत व्याख्या

अनेकों रिवायतों में हज़रत इमाम महदी (अ.स.) के ज़हूर की बहुत सी निशानियां का वर्णन हुआ हैं , लेकिन उनकी दकीक़ व सही कैफियत और विशेषताएं स्पष्ट नहीं हैं , जिसकी वजह से कुछ लोग अपनी व्यक्तिगत राये और शंकाओं से काम लेते हैं और कभी कभी ज़हूर की निशानियों को कुछ खास घटनाओं से जोड़ कर उसके द्वारा ज़हूर के नज़दीक होने की खबरें देते हैं।

यह मसला भी महदवियत के लिए एक आफत है और इसकी वजह से भी इंसान नाउम्मीदी का शिकार हो जाता है। मिसाल के तौर पर अगर किसी इलाक़े में कोई सुफ़यानी नाम का इंसान हो और उसे वास्तविक सुफ़यानी मान कर इमाम के ज़ल्द ज़हूर करने की ख़बर आम कर दी जाये या दज्जाल के बारे में बग़ैर दलील के उल्टी सीधी बातें करके उस किरदार को किसी पर चिपका दिया जाये , और उसके आधार पर लोगों को ख़ुश ख़बरी दी जाये कि अब इमाम के ज़हूर का ज़माना नज़दीक है , और वर्षों बाद भी इमाम (अ.स.) का ज़हूर न हो तो बहुत से लोग भटक जायेंगे और अपने सही अक़ीदों में शक करने लगेंगे।

बेकार बहसें

महदवियत में बहुत सी ऐसी शिक्षाएं पाई जाती हैं जिनका प्रचार व प्रसार ज़रूरी समझा जाता है और वह शियों के इल्म को बढ़ाने में आधारभूत भूमिका निभाती हैं। ग़ैबत के ज़माने में उन पर अमल करना बहुत महत्वपूर्ण है।

कभी कभी कुछ लोग या कुछ गिरोह अपनी बात-चीत में , लेख में , पत्रिकाओं में और कान्फ्रेंसों में ग़ैर ज़रूरी बहस करते हैं। जिनकी वजह से कभी कभी मुन्तज़िरों के ज़हनों में ग़लत शुब्हे और सवाल पैदा हो जाते हैं।

मिसाल के तौर पर इमाम ज़माना (अ.स.) से मुलाक़ात की बहस करना और लोगों में इमाम से मुलाक़ात का बहुत ज़्यादा शौक़ पैदा करना। इसके समाज पर बहुत ग़लत असर पड़ते हैं , ऐसी बातें ना उम्मीदी पैदा करती हैं और कभी कभी तो इमाम (अ.स.) के इन्कार का कारण भी बन जाती हैं। जबकि रिवायतों में इस चीज़ पर ज़ोर दिया गया है कि इमाम महदी (अ.स.) की मर्ज़ी के अनुसार क़दम बढ़ाया जाये और अपने व्यवहार में उनकी पैरवी की जाये। इस लिए ग़ैबत के ज़माने में इन्तेज़ार करने वालों की ज़िम्मेदारियों का वर्णन बहुत महत्वपूर्ण है। ताकि अगर इमाम (अ.स.) से मुलाक़ात हो जाये तो उस मौक़े पर इमाम (अ.स.) हम से राज़ी और खुश रहें।

इसी तरह हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की शादी , औलाद और रहने की जगह आदि के बारे में बात करना , यह तमाम ग़ैर ज़रूरी बहसें हैं। अतः इनकी जगह पर ऐसी बहसों का वर्णन करना चाहिए जो मुन्तज़िरों के लिए फ़ायदेमंद साबित हों। इसी वजह से ज़हूर की शर्तों और ज़हूर की निशानियों की बहस को प्राथमिक्ता देनी चाहिए क्योंकि इमाम (अ.स.) के ज़हूर के अभिलाषी लोगों का उन शर्तों से परिचित होना उन शर्तों को पैदा करने में सहायक बनेगा।

यह नुक्ता भी महत्वपूर्ण है कि महदवियत की बहस में हर पहलू पर नज़र रखना ज़रुरी है। यानी किसी एक विषय पर बहस करते वक़्त महदवियत से संबंधित तमाम चीज़ों पर नज़र रखनी चाहिए। क्योंकि कुछ लोग कुछ रिवायतों को पढ़ने के बाद उनकी ग़लत व्याख्या करने लगते हैं इसकी वजह यह है कि उनकी नज़र दूसरी रिवायतों पर नहीं होती। मिसाल के तौर पर कुछ रिवायतों में लंबी जंग और क़त्ल व ग़ारत की खबर दी गई है अतः कुछ लोग उन्हीं रिवायतों के आधार पर हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की बहुत ख़तरनाक तस्वीर पेश कर देते हैं और जिन रिवायतों में हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की मुहब्बत और मेहरबानियों का वर्णन हुआ है और उनके अख़लाक़ को पैग़म्बरे इस्लाम (स.) का अख़लाक़ बताया गया है , उनसे ग़ाफिल रहते हैं। ज़ाहिर है कि दोनो तरह की रिवायतों में गौर व फिक्र से यह हक़ीक़त स्पष्ट होती है कि इमाम (अ.स.) तमाम ही हक़ तलब इंसानों से (अपने शिया और दोस्तों की बात तो अलग है) मुहब्बत , रहम व करम का व्यवहार करेंगे और अल्लाह की उस आखरी हुज्जत की तलवार सिर्फ़ ज़ालिमों और उनकी पैरवी करने वालों के सरों पर चमकेगी।

इस आधार पर महदवियत के विषय पर बहस करने के लिए बहुत अधिक शैक्षिक योग्यता की ज़रुरत है। अतः जिन में यह योग्यता नहीं पाई जाती उन्हें इस मैदान में क़दम नहीं रखना चाहिए। क्योंकि उनका इस मैदान में क़दम रखना , महदवियत के लिए बहुत ख़तरनाक साबित हो सकता है।

झूठा दावा करने वाले

महदवियत के अक़ीदे के लिए एक नुक्सानदेह चीज़ इस बारे में झूठा दावा करने वाले लोग हैं। हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की ग़ैबत के ज़माने में कुछ लोग झूठा दावा करते हैं कि हम इमाम (अ.स.) से एक खास राब्ता रखते हैं या उनकी तरफ़ से उनके एक खास नायब हैं।

हज़रत इमाम महदी (अ.स.) ने अपने चौथे ख़ास नायब के नाम जो आखरी खत लिखा उसमें इस बात की वज़ाहत की हैं कि :

छः दिन के बाद आपकी मृत्यु हो जायेगी , अतः आप अपने कामों को अच्छी तरह देख भाल लेना और अपने बाद के लिए किसी को वसीयत न करना क्यों कि मुकम्मल ग़ैबत का ज़माना शुरु होने वाला है। .आने वाले ज़माने में हमारे कुछ शिया मुझसे मुलाकात और मुझसे राब्ते का दावा करेंगे। जान लो कि जो इंसान सुफियानी के खुरुज और आसमानी आवाज़ से पहले हमें देखने का दावा करे , वह झूटा है।

इमाम (अ.स.) के इस ख़त से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि हर शिया की यह ज़िम्मेदारी है कि वह इमाम (अ.स.) से राब्ते और उनकी खास नियाबत का दावा करने वाले लोगों को झुठलायें और इस तरह उन दुनिया परस्त लोगों का रास्ता बंद कर दें।

इस तरह के झूठे दावे करने वालों ने एक क़दम इससे भी आगे बढ़ाया और इमाम (अ.स.) की नियाबत के दावे के बाद ख़ुद महदवियत के ही दावेदार बन गये। उन्होंने अपने उस झूठे दावे के आधार पर एक गुमराह फिर्के की नीँव ड़ाल कर बहुत से लोगों को गुमराह करने का रास्ता हमवार कर दिया। इन गिरोहों के इतिहास को पढ़ने के बाद यह बात स्पष्ट होती है कि उनमें से बहुत से लोग साम्राज्यवाद की हिमायत और उसके इशारे पर बने हैं और उसी के सहारे अपने वजूद को बाक़ी रखे हुए हैं।

स्पष्ट है कि इस तरह के गुमराह फ़्रिक़ों और गिरोहों का वजूद में आना और महदवियत या इमाम ज़माना (अ.स.) की नियाबत का दावा करना वालों पर एतेमाद करना और उनसे संबंध स्थापित करना आदि जिहालत और नादानी की वजह से है। हज़रत इमाम महदी (अ.स.) की सही पहचान व शनाख़्त के बगैर उनके दीदार का बहुत ज़्यादा शौक़ , या इस बारे में मक्कारों के वजूद से ग़ाफिल रहना , झूठे दावेदारों के रास्ते को हमवार करता है।

इस लिए इन्तेज़ार करने वाले शिओं को चाहिए कि महदवियत के बारे में अपनी मालूमात को बढ़ा कर ख़ुद को मक्कारों और धोकेबाज़ों से सुरक्षित रखे और मोमिन व मुत्तकी शिया ओलमा की पैरवी करते हुए मक्तबे इस्लाम के रौशन रास्ते पर कदम बढ़ाते रहें।

अल्हम्दो लिल्लाहे रब्बिल आ-लमीन

रब्बना तकब्बल मिन्ना इन्नका अन्तस समी-उल अलीम।


सहायक किताबों की सूची

1. कुरआने क़रीम।

2. मफ़ातीह उल जिनान।

3. नहजूल बलागह।

4. इस्बात उल हुदात , मुहम्मद इब्ने हसन अलहुर्रुल आमली।

5. अल-एहतेजाज , अहमद बिन अली बिन अबी तालिब तबरसी , उसवा , तेहरान , 1416 हिजरी क़मरी।

6. अदयान व महदवियत , मुहम्मद बहिश्ती , कोरवश कबीर , तेहरान , 1342 हिजरी शम्सी।

7. बिहार उल अनवार , मुहम्मद बाक़िर मजलिसी , दारुल कुतुब अल-इस्लामिया।

8. तफ़्सीरे क़ुरतबी , अलक़ुरतबी।

9. तफ़्सीरे क़ुम्मी , अली इब्ने इब्राहीम क़ुम्मी।

10. तफ़्सीरे कबीर , फख़्रे राज़ी।

11. ख़िसाल , अबी जाफ़र मुहम्मद बिन अली बिन हुसैन बिन बाबवे क़ुम्मी , जामे मुदर्रेसीन होजे इल्मिया क़ुम , 1362 हिजरी श्मसी।

12. चश्म अन्दाज़ी बे हुकूमते हज़रते महदी , नजमुद्दीन तबसी , दफ़्तरे तबलीग़ाते इस्लामी , 1380 हिजरी शम्सी।

13. दलाइलुन नबूवत

14. राज़े तूले उम्र इमामे ज़मान , अली अकबर महदीपुर , ताऊस बहिश्त कु़म , 1378 हिजरी शम्सी।

15. रोज़गारे रिहाई , कामिल सुलेमान , अनुवादक अली अकबर महदीपुर।

16. जिन्दा ए रोज़गारान , हुसैन फ़रिदूनी , आफ़ाक़ , तेहरान , 1381 हिजरी सम्सी।

17. सफ़ीनतुल बिहार , शेख अब्बास क़ुम्मी , उसवा , तेहरान , 1422 हिदरी क़मरी।

18. सुनने इब्ने दाऊद , अबी दाऊद सुलेमान बिन अशअस सजिस्तानी अल-अज़दी , दार इब्ने ख़ुर्रम , बैरूत 1418 हिजरी क़मरी।

19. सहीफ़ ए नूर , इमाम रूहुल्लाह अल-मूसवी ख़ुमैनी।

20. अक़्दुद दुरर , यूसुफ़ बिन याहिया बिन अली बिन अब्दुल अज़ीज़ शाफ़ेई , उसवा , तेहरान 1416 हिजरी क़मरी।

21. इलालुश शराए , अबी जाफ़र मुहम्मद बिन अली बिन हुसैन बिन बाबवे , मोमेनीन , क़ुम , 1380 हिजरी शम्सी।

22. ग़ैबते तूसी , शेख़ुत ताइफ़ा अबी जाफ़र मुहम्मद बिन हसन तूसी , मआरिफ़ुल इस्लामिया , क़ुम , 1417 हिजरी क़मरी।

23. ग़ैबते नोमानी , इब्ने अबी ज़ैनब मुहम्मद बिन इब्राहीम बिन जाफ़र बिन कातिब नोमानी , अनुवादक मुहम्मद जवाद ग़फ़्फ़ारी , सदूक़ , 1376 हिजरी शम्सी।

24. अल-फ़ितन , हाफ़िज़ अबू अबदिल्लाह नईम बिन हम्मार मरवज़ी , तौहीद क़ाहिरा , 1412 हिजरी क़मरी।

25. काफ़ी , अबी जाफ़र मुहम्मद बिन याक़ूब बिन इस्हाक़ कुलैनी राज़ी , दारे सअब , बैरूत , 1401 हिजरी क़मरी।

26. कमालुद्दीन , अबी जाफ़र मुहम्मद बिन अली बिन हसैन बिन बाबवे क़ुम्मी , मुतरजिम पहलवान , दारुल हदीस , क़ुम , 1380 हिजरी शम्सी।

27. अल- मुस्तदरक , हाकिम नेशापुरी।

28. मआनियुल अख़बार , अबी जाफ़र मुहम्मद बिन अली बिन हसैन बिन बाबवे क़ुम्मी।

29. मोजम उल हदीस अल- इमाम अल- महदी , हेयतुल इल्मिया , मारेफ़ुल इस्लामिया , 1419 हिजरी क़मरी।

30. मोजमुल कबीर , तिबरानी।

31. मिन्तख़बुल असर , लुत्फ़ुल्लाह साफ़ी गुलपायगानी , सैयदतुल मासूमा , क़ुम , 1419 , हिजरी क़मरी।

32. मीज़ानुल हिकमत , मुहम्मद मुहम्मदी रय शहरी , अनुवादक हमीद रज़ा शैख़ी , दारुल हदीस क़ुम , 1380 हिजरी शम्सी।

33. नजमुस साक़िब , मिरज़ा हुसैन तबरसी नूरी , मस्जिदे मुक़द्दसे जमकरान , क़ुम 1380 हिजरी शम्सी।

34. वसा-इलुश शिआ , शेख मुहम्मद बिन हुसैन हुर्रे आमुली , दारु अहयाइत तुरासिल अरबी , बैरूत।

35. यौमुल ख़लास , कामिल सुलेमान , अनसारुल हुसैन सक़ाफ़िया , तेहरान , सन् 1991 ई.।