चौदह सितारे
समूहन शियो का इतिहास
लेखक मौलाना नजमुल हसन करारवी
पुस्तक की भाषा هندی
मुद्रण वर्ष 1404

चौदह सितारे

लेखकः नजमुल हसन कर्रारवी

नोटः ये किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क के ज़रीऐ अपने पाठको के लिऐ टाइप कराई गई है और इस किताब मे टाइप वग़ैरा की ग़लतीयो को सही किया गया है।

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पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा ( स अ व व )

पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ . व . व . ) के मुख़्तसर ख़ानदानी हालात

पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) हज़रत इब्राहीम (स अ व व ) की नस्ल से थे। हज़रत इब्राहीम अहवाज़ , बाबुल या ईराक़ के एक क़रये कोसा में तूफ़ाने नूह से 1081 साल बाद पैदा हुए। जब आपकी उम्र 86 साल की हुई तो आपके यहां जनाबे हाजरा से हज़रे इस्माईल पैदा हुए और 90 साल की उम्रें जनाबे सारा से हज़रते इस्हाक़ पैदा हुए। हज़रत इब्राहीम (अ.स.) ने दोनों बीवीयों को एक जगह रखना मुनासिब न समझ कर सारा को मैय इस्हाक़ शाम में छोड़ा और हाजरा को इस्माईल के साथ हिजाज़ के शहर मक्का में ख़ुदा के हुक्म से पहुँचा आये। इस्हाक़ (अ.स.) की शादी शाम में और इस्माईल (अ.स.) की मक्का में क़बीलाए जुरहुम की एक लड़की से हुई। इस तरह इस्हाक़ (अ.स.) की नस्ल शाम में और इस्माईल (अ.स.) की नस्ल मक्का में बढ़ी। जब हज़रते इब्राहीम (अ.स.) की उम्र 100 साल की हुई और जनाबे हाजरा का इन्तेक़ाल भी हो गया तो आप मक्का तशरीफ़ लाये और इस्माईल (अ.स.) की मदद से ख़ाना ए काबा की तामीर की। मुवर्रेख़ीन का कहना है कि यह तामीर हिजरते नबवी से 2793 साल पहले हुई थी। उन्होंने एक ख़्वाब के हवाले से बहुक्मे ख़ुदा अपने बेटे (इस्माईल) को ज़िबह करना चाहा था जिसके बदले में ख़ुदा ने दुम्बा (भेड़) भेज कर फ़रमाया कि तुम ने अपना ख़्वाब सच कर दिखाया। इब्राहीम सुनो ! हम ने तुम्हारे फ़िदये (इस्माईल) को ज़बहे अज़ीम इमामे हुसैन (अ.स.) से बदल दिया है। मुवर्रेख़ीन का कहना है कि यह वाक़िया हज़रत आदम (अ.स.) के दुनिया में आने के 3435 साल बाद का है। इसके बाद चन्द बातों में आपका इम्तेहान लिया गया जिसमें कामयाबी के बाद आपको दरजाए इमामत पर फ़ाएज़ किया गया। आपने ख़्वाहिश की कि यह ओहदा मेरी नस्ल से मुस्तक़र कर दिया जाय। इरशाद हुआ बेहतर है लेकिन तुम्हारी नस्ल में जो ज़ालिम होंगे वह इस्से महरूम रहेंगे। आपका लक़ब ख़लील अल्लाह था और आप उलुल अज़्म पैग़म्बर थे। आप साहबे शरीयत थे और ख़ुदा की बारगाह में आपका यह दरजा था कि ख़ातेमुल अम्बिया (स अ व व ) को आपकी शरीयत के बाक़ी रखते का हुक्म दिया गया। आपने 175 साल की उम्र में इन्तेक़ाल फ़रमाया और मक़ामे कु़द्स (ख़लील अर रहमान) में दफ़्न किये गये। वफ़ात से पहले आप ने अपना जानशीद हज़रते इस्माईल (अ.स.) को क़रार दिया। अंग्रेज़ इतिहासकारों का कहना है कि हज़रते इस्माईल का जन्म जनाबे मसीह से 1911 साल पहले हुआ था।

हज़रत इस्माईल (अ.स.) के यह ख़ास इमतेआज़ात हैं कि उन्हीं कि वजह से मक्का आबाद हुआ। चाह ज़मज़म बरामद हुआ। हज्जे काबा की इबादत की शुरूआत हुई। 10 ज़िलहिज को ईदे क़ुरबान की सुन्नत जारी हुई। आप का इन्तेक़ाल 137 साल की आयु में हुआ और आप हिजरे इस्माईल मक्का के क़रीब दफ़्न हुए। आपने बारह बेटे छोड़े। आपकी वफ़ात के बाद ख़ाना ए काबा की निगरानी व दीगर खि़दमात आपके पुत्र ही करते रहे। इनके पुत्रों में क़ेदार को विशेष हैसियत हासिल थी ग़रज़ कि अवलादे हज़रत इस्माईल (अ.स.) मक्का मोअज़्ज़ाम में बढ़ती और नशोनुमा पाती रही यहां तक कि तीसरी सदी में एक शख़्स फ़हर नामी पैदा हुआ जो इन्तेहाई बा कमाल था। इस फ़हर की नस्ल से पैग़म्बरे इस्लाम पैदा हुए। अल्लामा तरीही का कहना है कि इसी फ़हर या इसके दादा नज़र बिन कनाना को क़ुरैश कहा जाता है क्यो कि बहरिल हिन्द से उसने एक बहुत बड़ी मछली शिकार की थी जिसको क़ुरैश कहा जाता था और उसे ला कर मक्का मे रख दिया था जिसे लोग देखने के लिये दूर दूर से आते थे। लफ़्ज़े फ़हर इब्रानी है और इसके मानी पत्थर के हैं और क़ुरैश के मानी क़दीम अरबी में सौदागर के हैं।

क़ुसई

पांचवीं सदी इसवी में एक बुज़ुर्ग फ़हर की नस्ल से गुज़रे हैं जिनका नाम क़ुसई था। शिबली नोमानी का कहना है कि उन्हीं क़ुसई को क़ुरैश कहते हैं लेकिन मेरे नज़दीक़ ये ग़लत है क़ुसई का असली नाम ज़ैद और कुन्नियत अबुल मुग़ैरा थी। उनके बाप का नाम कलाब और मां का नाम फातेमा बिन्ते असद और बीबी का नाम आतका बिन्दे ख़ालिख़ बिन लैक था। यह निहायत ही नामवर , बुलन्द हौसला , जवां मर्द , अज़ीमुश्शान बुज़ुर्ग थे। उन्होंने ज़बरदस्त इज़्ज़त व इख़तेदार हासिल किया था यह नेक चलन बा मुरव्वत , सख़ी व दिलेर थे। इनके विचार पवित्र और बेलौस थे। इनके एख़लाक़ बुलन्द , शाइस्ता और मोहज़्ज़ब थे। इनकी एक बीबी हबी बिन्ते ख़लील ख़ेज़ाईं थीं। यह ख़लील बनु ख़ज़आ का सरदार था। इसने मरने के समय ख़ाना ए काबा की तौलीयत हबी के हवाले कर देना चाही , इसने अपनी कमज़ोरी के हवाले से इन्कार कर दिया फिर उसने अपने एक रिश्तेदार अबू ग़बशान ख़ेज़ाई के सुपुर्द की। उसने इस अहम खि़दमत को क़ुसई के हाथो बेच दिया। इस तरह क़ुसई इब्ने क़लाब इस अज़ीम शरफ़ के भी मालिक बन गए। उन्होंने ख़ाना ए काबा की मरम्मत कराई और बरामदा बनवाया। रिफ़ाहे आम के सिलसिले में अनगिनत खि़दमते कीं। मक्का में कुवां खुदवाया जिसका नाम अजूल था। क़ुसई का देहान्त 480 ई 0 में हुआ। मरने के बाद उन्हें मुक़ामे हजून में दफ़्न किया गया और उनकी क़ब्र ज़्यारत गाह बन गई। क़ुसई अगरचे नबी या इमाम न थे लेकिन हामिले नूरे मोहम्मदी (स अ व व ) थे। यही वजह है कि आसमाने फ़ज़ीलत के आफ़ताब बन गये।

अब्दे मनाफ़

क़ुसई के छः बेटे थे जिन में अब्दुलदार सब से बड़ा और अब्दुल मुनाफ़ सब से लाएक़ था। उन्होंने मरते समय बड़े बेटे को तमाम मनासिब सिपुर्द किये लेकिन अब्दे मनाफ़ ने अपनी लेआक़त की वजह से सब में शिरकत हासिल कर ली। यह क़ुरैश के मुस्सलेमुससबूत सरदार बन गये। अब्दे मनाफ़ का असली नाम मुग़ैरा और कुन्नियत अबू अब्दे शम्स थी और माँ का नाम हबी बिन्ते ख़लील था। उन्होंने आमका बिन्ते मरह सलेमह बिन हलाल से शादी की। उन्हें हुसनों जमाल की वजह से क़मर कहा जाता था। दियारे बकरी का कहना है कि अब्दे मनाफ़ को मुग़ैरा कहते थे। वह तक़वा व सिलाए रहम की तलक़ीन किया करते थे। बाप और बेटे एक ही अक़ीदे पर थे और उन्होंने कभी बुत परस्ती नहीं की। यह भी अपने बाप क़ुसई की तरह मनाक़िब बेहद और फ़ज़ाएले बेशुमार के मालिक और नूरे मोहम्मदी के हामिल थे। उन्होंने मुल्के शाम के मक़ाम ग़ज़वे में इन्तेक़ाल किया।

अब्दे मनाफ़ के जीते जी तो कोई झगड़ा डठा नहीं इनके बाद उनकी अवलाद जिनमें हाशिम , मुत्तलिब अब्दे शम्स और नौफ़िल नुमाया हैसियत रखते थे उन्में यह जज़बा उभर पड़ा कि अब्दुलदार की औलाद से वह मनासिब ले लेने चाहिये जिनके वह अहल नहीं चुनान्चे इन लोगों ने बनी अब्दुलदार से मनासिब की वापसी या तकसीम का सवाल किया उन्होने इन्कार कर दिया। इसके बाद जंग का मैदान हमवार हो गया। बिल आख़िर इस बात पर सुलह हो गई कि रेफ़ायदा सक़ाया की क़यादत बनी अब्दे मुनाफ़ में है और लवा बरदारी का मनसब बनी अब्दुलदार के पास रहे और दारूल नदवा की सदारत मुश्तरका हो।

हाशिम

आप का नाम अम्र कुन्नियत अबू नाफ़ला थी। आपके वालिद अब्दे मनाफ़ और वालेदा आतका बिनते मरह अल सलमिया थी। आपको उलू मरतबा की वजह से अम्र अलअला भी कहते थे। आप और अब्दुल शम्स दोनों इस तरह जुडवाँ पैदा हुए थे के इनके पाँव का पन्जा अब्दुल शम्स की पेशानी से चिपका हुआ था जिसे तलवार के ज़रिये अलाहेदा किया गया और बेइन्तेहा ख़ून बहा जिस की ताबीर नुजूमियों ने बाहमी खूंरेज़ जंग से की जो बिल्कुल सही उतरी और दोनो ख़ानदानों के दरमियान हमेशा जंग मुतावरिस रही। जिसका एख़तेताम 133 हिजरी में हुआ। बनी अब्बास (हाशमी) और बनी उमय्या (शम्सी) में ऐसी ख़ूंरेज़ जंग हुई जिसने बनी उमय्या की क़ुव्वत व ताक़त और बुलन्दीए इक़बाल का चिराग़ हमेशा के लिये गुल कर दिया। आप फ़ितरतन सैर चश्म और फ़य्याज़ थे। दौलत मन्दी में भी बड़ी हैसियत के मालिक थे हुजाज की खि़दमत आप की ज़िन्दगी का कारनामा था। मुवर्रेख़ीन का कहना है कि आप को हाशिम इस लिये कहते हैं कि आपने एक शदीद क़हत के मौक़े पर अपनी ज़ाती दौलत से शाम जा कर बहुत काफ़ी केक ख़रीदे थे और उसे ला कर तक़सीम करते हुए कहा कि इसे शोरबा में तोड़ कर खा जाओ। हाशिम के मानी तोड़ने के हैं लेहाज़ा हाशिम कहे जाने लगे। आप ने अपनी शादी अपने ख़ानदान की एक लड़की से की जिससे हज़रत असद पैदा हुए। दूसरी शादी ख़ज़रजियों के एक मश्हूर क़बीले बनी अदी इब्ने नजार यसरब (मदीना) की नजीबुत तरफ़ैन दुख़्तर से की। उसी के बतन से एक बा वेक़ार लड़का पैदा हुआ जो आगे चल कर अब्दुल मुत्तलिब शेबत उल हम्द से पुकारा गया। अब्दुल मुत्तलिब अभी दूध ही पीते थे कि जनाबे हाशिम का इन्तेक़ाल हो गया। आपकी औलाद के मुतअल्लिक़ हज़रत जिबराईल का कहना है कि मैंने मशरिक़ो मग़रिब को छान कर देखा है कि मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) से बेहतर कोई नहीं है और बनी हाशिम से बेहतर कोई ख़ानदान नहीं है। जनाबे हाशिम ने 510 ई 0 में बामक़ाम ग़ज़वाए शाम में इन्तेक़ाल फ़रमाया।

जनाबे असद

आप हज़रते हाशिम के बड़े बेटे थे , आपकी विलादत 497 ई 0 से क़ब्ल हुई थी। आप में इन्सानी हमदर्दी बहद्दे कमाल पहुँची हुई थी। फ़ख़रूद्दीन राज़ी का बयान है कि जनाबे असद ने एक दिन एक दोस्त को सख़्त भूखा पा कर (जो बनी खज़दम से था) अपनी वालेदा से कहा कि इसके लिये खाने का बन्दोबस्त करो , उन्होंने पनीर और आटा वग़ैरा काफ़ी मिक़दार में इसके घर भिजवा कर उसे सुकून बख़्शा फिर इस वा़के़ए से मुताअस्सिर हो कर जनाबे हाशिम ने अहले मक्का को जमा किया और इनमें तिजारत का जज़बा व शौक़ पैदा किया। असद के मानी शेर के हैं। इब्ने ख़ालविया का यह कहना है कि शेर के पांच सौ नाम हैं जिनमें एक असद भी है। शेर भूख और प्यास पर साबिर होता है। अल्लामा तरीही का कहना है कि शेर की अवलाद कम होती है शायद यही वजह थी कि हज़रते असद के अवलाद कम थी बल्कि अवलादे ज़कूर मफ़क़ूद और ग़ालेबन सिर्फ़ फातेमा बिन्ते असद ही थीं जो बाद में हज़रत अली (अ.स.) वालेदा गिरामी क़रार पायीं।

जनाबे अब्दुल मुत्तलिब

आप हज़रत हाशिम के नेहायत जलीलउल क़द्र साहबज़ादे थे। 497 ई 0 में पैदा हुए वालिद का इन्तेक़ाल बचपने में ही हो चुका था। परवरिश के फ़राएज़ आपके चचा मुत्तलिब के कनारे आतफ़त में अदा हुए और ख़ुश क़िस्मती से आखि़र में अरब के सब से बड़े सरदार क़रार पाए। आपके वालिद ही की तरह आपकी वालेदा भी (जिनका नाम सलमा था) शराफ़त व अज़मत में इन्तेहाई बुलन्दी की मालिक थीं। इब्ने हाशिम का कहना है कि वह वेक़ारे ख़ानदानी की वजह से अपने निकाह को इस शर्त से मशरूत करती थीं कि तौलीद के मौक़े पर अपने मैके में रहूगीं। जनाबे अब्दुल मुत्तलिब का एक नाम शेबातुल हम्द भी था क्यों कि आप की विलादत के वक़्त आपके सर पर सफ़ेद बाल थे और शेब सफ़ेद सर को कहते हैं। हम्द से उसे मुज़ाफ़ इस लिये किया कि आगे चल कर बे इन्तेहा मम्दूह होने की इनमें अलामतें देखी जा रही थीं। आप सिने शऊर तक पहुँचते ही जनाबे हाशिम की तरह नामवर और मशहूर हो गये। आपने अपने आबाओ अजदाद की तरह अपने ऊपर शराब हराम कर रखी थी और ग़ारे हिरा में बैठ कर इबादत करते थे। आपका दस्तर ख़्वान इतना वसी था कि इन्सानों के अलावा परिन्दों को भी खाना खिलाया जाता था। मुसीबत ज़दों की इमदाद और अपाहिजों की ख़बर गीरी इनका ख़ास शेवा था। आप ने बाज़ ऐसे तरीक़े राएज किये जो बाद में मज़हबी नुक़ताए नज़र से इन्सानी ज़िन्दगी के उसूल बन गये। मसलत इफ़ाए नज़र निकाह मेहरम से इजतेनाब , दुख़्तर कशी की मुमानियत ख़मरो ज़िना की हुरमत और क़ितए यदे सारिक़ के अब्दुल मुत्तलिब का यह अज़ीम कारनामा है कि उन्होंने चाहे ज़मज़म को जो मरूर ज़माने से बन्द हो चुका था फिर ख़ुदवा कर जारी किया।

आपके अहद का एक अहम वाक़ेया काबा ए मोअज़्ज़मा पर लश्कर कशी है। मुवर्रेख़ीन का कहना है कि अबरहातुल अशरम का ईसाई बादशाह था। उसमें मज़हबी ताअस्सुब बेहद था। ख़ाना ए काबा की अज़मत व हुरमत देख कर आतिशे हसद से भड़क उठा और इसके वेक़ार को घटाने के लिये मक़ामे सनआ में एक अज़ीमुश्शान गिरजा बनवाया। मगर इसकी लोगों की नज़र में ख़ाना ए काबा वाली अज़मत न पैदा हो सकी तो इसने काबे को ढाने का फ़ैसला किया और असवद बिन मक़सूद हबशी की ज़ेरे सर करदगी में एक अज़ीम लशकर मक्के की तरफ़ रवाना कर दिया। क़ुरैश , कनाना , ख़ज़ाआ और हज़ील पहले तो लड़ने के लिये तैय्यार हुए लेकिन लशकर की कसरत देख कर हिम्मत हार बैठे और मक्के की पहाड़ियो में अहलो अयाल समेत जा छिपे। अल बत्ता अब्दुल मुत्तलिब अपने चन्द साथियों समेत ख़ाना ए काबा के दरवाज़े में जा खडे़ हुए और कहा ! मालिक यह तेरा घर है और सिर्फ़ तू ही बचाने वाला है। इसी दौरान में लशकर के सरदार ने मक्के वालों के खेत से मवेशी पकड़े जिनमें अब्दुल मुत्तलिब के 200 ऊँट भी थे। अलग़रज़ अबराहा ने हनाते हमीरी को मक्के वालों के पास भेजा और कहा के हम तुम से लड़ने नहीं आये हमारा इरादा सिर्फ़ काबा ढाने का है। अब्दुल मुत्तलिब ने पैग़ाम का जवाब यह दिया कि हमें भी लड़ने से कोई ग़रज़ नहीं और इसके बाद अब्दुल मुत्तलिब ने अबराहा से मिलने की दरख़्वास्त की। उसने इजाज़त दी यह दाखि़ले दरबार हुए। अबराहा ने पुर तपाक ख़ैर मक़दम किया और इनके हमराह तख़्त से उतर कर फ़र्श पर बैठा। अब्दुल मुत्तलिब ने दौनाने गुफ्तुगू में अपने ऊँटों की रेहाई और वापसी का सवाल किया। उसने कहा तुम ने अपने आबाई मकान काबे के लिये कुछ नहीं कहा। उन्होंने जवाब दिया अना रब्बिल अब्ल वलिल बैत रब्बुन समीनाह मैं ऊँटों का मालिक हूँ अपने ऊँट मांगता हूँ जो काबे का मालिक है अपने घर को ख़ुद बचाऐगा। अब्दुल मुत्तलिब के ऊँट उन को मिल गये और वह वापस आ गये और क़ुरैश को पहाड़ियों पर भेज कर ख़ुद वहीं ठहर गये। ग़रज़ कि अबराहा अजी़मुश्शान लश्कर ले कर ख़ाना ए काबा की तरफ़ बढ़ा और जब इसकी दीवारे नज़र आने लगीं तो धावा बोल देने का हुक्म दिया। ख़ुदा का करना देखिए कि जैसे ही ग़ुस्ताख़ व बेबाक लशकर ने क़दम बढ़ाया मक्के के ग़रबी सिमत से ख़ुदा वन्दे आलम का हवाई लशकर अबा बील की सूरत में नमूदार हुआ। इन परिन्दों की चोंच और पन्जों में एक एक कंकरी थी। उन्होंने यह कंकरियां अबराहा के लशकर पर बरसाना शुरू कीं। छोटी छोटी कंकरयों ने बड़ी बड़ी गोलियों का काम कर के सारे लशकर का काम तमाम कर दिया। अबराहा जो महमूद नामी सुखऱ् हाथी पर सवार था ज़ख़्मी हो कर यमन की तरफ़ भागा लेकिन रास्ते ही में वासिले जहन्नम हो गया। यह वाक़ेया 570 ई 0 का है।

1.सना यमन का दारूल हुकूमत है। उसे क़दीम ज़माने में उज़ाली भी कहते थे। तमाम अरब में सब से उम्दा और ख़ूब सूरत शहर है। अदन से 260 मील के फ़ासले पर एक ज़रख़ेज़ वादी में वाक़े है इसकी आबो हवा मोतादिल और ख़ुश गवार है। इसके जुनूब मशरिक़ में तीन दिन की मसाफ़त पर शहर क़रीब है जिसको सबा भी कहते हैं सना के शुमाल मग़रिब में 60 फ़रसख़ पर सुरह है यहां का चमड़ा दूर दराज़ मुल्कों में तिजारत को जाता है। सना के मग़रिब में बहरे कुल्जुम से एक मन्ज़िल की मसाफ़त पर शहर ज़ुबैद वाक़े है जहां से तिजारत के वास्ते कहवा अतराफ़ में जाता है। ज़ुबैद से 4 मन्ज़िल और सना से 6 मन्ज़िल पर बैतुल फ़क़ीह वाक़े है। ज़ुबैद के शुमाल मशरिक़ में शहर मोहजिम है सना से 6 मन्ज़िल के फ़ासले पर ज़ुबैद के जुनूब में क़िला ए तज़ है। सना के शुमाल में 10 मन्ज़िल की मुसाफ़त पर नज़रान है।

चूकि अबराहा हाथी पर सवार था और अरबों ने इस से पहले हाथी न देखा था नीज़ इस लिये कि बड़े बड़े हाथियों को छोटे छोटे परिन्दों की नन्हीं नन्हीं कंकरियों से बा हुक्मे ख़ुदा तबाह कर के ख़ुदा के घर को बचा लिया इस लिये इस वाक़ये को हाथी की तरफ़ से मन्सूब किया गया और इसी से सने आमूल फ़ील कहा गया। मेंहदी का खि़जा़ब अब्दुल मुत्तलिब ने ईजाद किया है। इब्ने नदीम का कहना है कि आपके हाथ का लिखा हुआ एक ख़त मामून रशीद के कुतुब ख़ाने में मौजूद था। अल्लामा मजलिसी और मौलवी शिब्ली का कहना है कि आपने 82 साल की उम्र में वफ़ात पाई और मक़ामे हुज़ून में दफ़्न हुए। मेरे नज़दीक आपका सने वफ़ात 578 ईसवी है।

जनाबे अब्दुल्लाह

आप जनाबे अब्दुल मुत्तलिब के बेटे थे। कुन्नियत अबू अहमद थी आपकी वालिदा का नाम फातेमा था जो उमरे बिन साएद बिन उमर बिन मख़्जूम की साहब ज़ादी थी। आपके कई भाई थे जिनमें अबू तालिब को बड़ी अहमियत थी। जनाबे अब्दुल्लाह ही वह अज़ीमुल मर्तबत बुर्ज़ुग हैं जिनको हमारे नबीए करीम के वालिद होने का शरफ़ हासिल हुआ। आप नेहायत मतीन , संजीदा और शरीफ़ तबीयत के इन्सान थे और न सिर्फ़ जलालते निसबत बल्कि मुकारिमें इख़्लाक़ की वजह से तमाम जवानाने क़ुरैश में इम्तियाज़ की नज़रों से देखे जाते थे। मुहासिने आमल और शुमाएले मतबू में फ़र्द थे। हरकात मौजू और लुत्फ़े गुफ़तार में अपना नज़ीर न रखते थे। जनाबे अब्दुल मुत्तलिब आपको सब से ज़्यादा चाहते थे। एक दफ़ा ज़िक्र है कि अब्दुल मुत्तलिब ने यह नज़र मानी कि अगर ख़ुदा ने मुझे दस बेटे दिये तो मैं इन में से एक राहे ख़ुदा में क़ुर्बान कर दूंगा , और इसकी तकमील में अब्दुल्लाह को ज़ब्ह करने चले तो लोगों ने पकड़ लिया और कहा कि आप क़ुरबानी के लिये क़ुरा डालें। चुनान्चे बार बार अब्दुल्लाह के ज़ब्ह पर ही क़ुरा निकलता रहा। अब्दुल मुत्तलिब ने सख़्त इसरार के साथ उन्हें ज़ब्ह करना चाहा लेकिन ऊँटों की तादाद बढ़ा कर क़ुरे के लिये सौ तक ले गये बिल आखि़र तीन बार अब्दुल्लाह के मुक़ाबले में सौ ऊँटों पर क़ुरा निकला और अब्दुल्लाह ज़ब्ह से बच गये। उसके बाद आपकी शादी क़बीलाए ज़हरा में वहाब इब्ने अब्दे मनाफ़ की साहब ज़ादी (आमिना) से हो गयी।। शादी के वक़्त जनाबे अब्दुल्लाह की उम्र तक़रीबन 18 साल की थी। आप ने 28 साल की उम्र में इन्तेक़ाल फ़रमाया। मुवर्रेख़ीन का कहना है कि आप मक्के से बा सिलसिलाए तिजारत मदीना तशरीफ़ ले गये थे वहीं आप का इन्तेक़ाल हो गया और आप मक़ामे अब्वा में दफ़्न किये गये। आपने तरके में ऊँट , बकरियां और एक लौंड़ी छोड़ी जिसका नाम (बरकत) और उर्फ़ उम्मे ऐमन था।

हज़रत अबुतालिब

आप हज़रते हाशिम के पोते , अब्दुल मुत्तलिब के बेटे और जनाबे अब्दुल्लाह के सगे भाई थे। आपका असली नाम इमरान था कुन्नियत अबू तालिब थी। आपकी मादरे गेरामी फातेमा बिन्ते अम्र मख़जूमी थीं। शम्सुल उलेमा नज़ीर अहमद का कहना है कि आप अब्दुल मुत्तलिब के अवलादे ज़कूर में सब से ज़्यादा बवक़ार और अक़्ल मन्द थे। अब्दुल मुत्तलिब के बाद पै़ग़म्बरे इस्लाम की परवरिश आपने शुरू की और ता हयात उनकी नुसरत व हिमायत करते रहे। मोल्वी शिब्ली का कहना है कि अबू तालिब का यह तरीक़ा ता जी़स्त रहा कि आं हज़रत (स अ व व ) को अपने साथ सुलाते थे और जहां जाते थे साथ ले जाते थे। कुफ़्फ़ारे क़ुरैश और अशरार यहूद से आपने आं हज़रत की हिफ़ाज़त की और उन्हें किसी क़िस्म का ग़ज़न्द नहीं पहुँचने दिया। मुवर्रिख़ इब्ने कसीर का कहना है कि सफ़रे शाम के मौक़े पर एक राहिब की नज़र आप पर पड़ी। उसने इन में बुर्ज़ुगी के आसार देखे और अबु तालिब से कहा कि उन्हें जल्द वापस वतन ले जाओ नहीं तो यहूद इन्हें क़त्ल कर डालेगें। अबू तालिब ने अपना सारा सामाने तिजारत बेच कर के वतन की राह ली। मुवर्रिख़ दयारे बकरी का कहना है कि हज़रत मोहम्मद (स अ व व ) जनाबे अबू तालिब की तहरीक से जनाबे ख़दीजा का माल बेचने के लिये शाम की तरफ़ ले जाया करते थे। कुछ दिनों मे ख़दीजा ने शादी की ख़्वाहिश की और निसबत ठहर गयी। जनाबे अबू तालिब ने आं हज़रत (स अ व व ) की तरफ़ से ख़ुत्बा ए निकाह पढ़ा अबू तालिब के ख़ुत्बे की शुरूआत इन लफ़्ज़ों मे है। (अल्हम्दो लिल्लाहिल लज़ी जाअल्ना मिन ज़ुर्रियते इब्राहीम) तमाम तारीफ़ें उस ख़ुदा के लिये हैं जिसने हमें ज़ुर्रियते इब्राहीम में क़रार दिया।

चार सौ दीनार सुख्र पर अक़्द हुआ। अक़्द निकाह के बाद हज़रत अबू तालिब बहुत ही ख़ुश हुए। अल्लामा तरही का बा हवाला ए इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) कहना है कि अबू तालिब ईमान के ताहफ़्फ़ुज़ हैं असहाबे क़हफ़ के मानिन्द थे। शमशुल उलमा नज़ीर अहमद का कहना है कि अब्दुल मुत्तलिब और अबू तालिब दीने फ़ितरत को मज़बूती से पकड़े हुए थे। अल्लामा स्यूती का कहना है कि अन अबल नबी लम यकुन फ़ीहुम मुशरिक आँ हज़रत (स अ व व ) के आबाव अजदाद मे एक शख़्स भी मुशरिक नहीं था। क़ुरआन मजीद में है कि ऐ नबी हम ने तुम को सजदा करने वालों की पुशत में रखा। अबू तालिब के मुताअल्लिक़ शमशुल उलमा नज़ीर अहमद का कहना है कि वह दिल से पैग़म्बर को सच्चा पैग़म्बर और इस्लाम को ख़ुदाई दीन समझते थे। शमशुल उलमा शिब्ली का कहना है कि अबू तालिब मरते वक़्त भी कलमा पढ़ते रहे थे लेकिन बुख़ारी की एक ऐसी मुरसिल रवायत की बिना पर जिसमे मुसय्यब शामिल हैं उन्हें ग़ैर मुस्लिम कहा जाता है। जो क़ाबिले सेहत लाएक़े तसलीम नहीं है। ग़रज़ कि आपके मोमिन और मुसलमान होने पर मुन्सिफ़ मुवर्रेख़ीन का इत्तेफ़ाक़ है। अबू तालिब के दो शेर क़ाबिले मुलाहेज़ा हैं।

ودعوتني وزعمت انك ناصحي *** ولقد صدقت وكنت ثم امينا

ولقد علمت بان دين محمد *** من خير اديان البرية دينا

तरजुमा ऐ मोहम्मद (स अ व व ) ! तुम ने मुझे इस्लाम की तरफ़ दावत दी और मैं ख़ूब जानता हूँ कि तुम यक़ीनन सच्चे हो क्यों कि तुम इस अहदे नबूवत के इज़हार से क़ब्ल भी लोगों की नज़र में सच्चे रहे हो। मैं अच्छी तरह जाने हुए हूँ कि ऐ मोहम्मद ! तुम्हारा दीन दुनियां के तमाम अदयान से बेहतर है।

आपकी बीवी फातेमा बिन्ते असद थीं जो सन् 1 बेसत में ईमान लाईं और 4 हिजरी में बा मुक़ाम मदीना ए मुनव्वरा इन्तेक़ाल फ़रमा गईं और ख़ुद आप का इन्तेक़ाल 85 साल की उम्र में शव्वाल 10 बेसत में हुआ। आपके इन्तेक़ाल के साल को रसूल अल्लाह (स अ व व ) ने आमुल हुज़्न से मौसूम कर दिया था।

जनाबे अब्बास

आप जनाबे अब्दुल मुत्तलिब के बेटे और पैग़म्बरे इस्लाम के चचा थे। आपकी वालेदा फ़तीला थीं। आप रसूले ख़ुदा (स अ व व ) से 2 या 3 साल बड़े थे। आपका क़द तवील और बदन ख़ूब सूरत था। आप हिजरत से क़ब्ल इस्लाम लाए थे। आप बड़े साएबुल राय थे। आपने फ़तहे मक्का और ग़ज़वा हुनैन में शिरकत की थी। आप के 10 बेटे और कई बेटियां थीं। आखि़र उम्र में नाबीना हो गये थे। आपने 77 साल की उम्र में बा तारीख़ 12 रजब 32 हिजरी बा मुक़ाम मदीनाए मुनव्वरा में इन्तेक़ाल फ़रमाया और जन्नतुल बक़ी में दफ़न किये गये। आपका मक़बरा खोद डाला गया है लेकिन निशाने क़ब्र अभी भी बाक़ी है। मोअल्लिफ़ ने 1972 ई 0 में बा मौक़ा हज उसे देखा है।

जनाबे हमज़ा

आप जनाबे अब्दुल मुत्तलिब के साहब ज़ादे और आँ हज़रत (स अ व व ) के चचा थे। आपकी वालदा का नाम हाला बिन्ते वाहब था जो कि जनाबे आमेना की चचा जा़द बहन थीं। आपने बेसत के छटे साल इस्लाम क़ुबूल किया था। आपने जंगे बद्र में शिरकत की थी और बड़े कारहाय नुमाया किये थे। आप जंगे ओहद में भी शरीक हुए और ज़बर दस्त नबरद आज़माई की। 31 काफ़िरों को क़त्ल करने के बाद आपका पांव फ़िसला और आप ज़मीन पर गिर पड़े। जिसकी वजह से पुश्त से ज़िरह हट गई और मौक़ा पर एक वैहशी नामी हब्शी ने तीर मार दिया और आप दिन बल्कि इसी वक़्त बा तरीख़ 5 शव्वाल 3 हिजरी शहीद हो गये। काफ़िरों ने आप को क़त्ल कर डाला और अमीरे माविया की माँ हिन्दा ने आपका जिगर निकाल कर चबा डाला। इसी लिये अमीरे माविया को अक़ल्लुत अक़बाद कहते हैं। आपकी उम्र 57 साल की थी नमाज़े जनाज़ा रसूले ख़ुदा (स अ व व ) ने पढ़ाई थी। तारीख़ का मशहूर वाक़िया है कि 40 हिजरी में जब अमीरे माविया ने नहर खुदवाई तो शोहदा ए ओहद की क़ब्रे खोदी गईं और इसी सिलसिले में एक तैश (बेलचा) जनाबे हमज़ा के पैर पर लगा जिससे ख़ूने ताज़ा जारी हो गया था।

हज़रत अबू तालिब के बेटे

इब्ने क़तीबा का कहना है कि हज़रत अबू तालिब के चार बेटे थे 1. तालिब , 2. अक़ील , 3. जाफ़र , 4. हज़रत अली (अ.स.) इनमें छोटाई बडा़ई दस साल की थी। दयारे बकरी का कहना है कि दो बहने भी थीं उम्मे हानी और जमाना। तालिब ने जंगे बद्र में मुसलमानों से न लड़ने के लिये अपने को समुन्द्र में गिरा कर डुबा दिया उनकी कोई औलाद नहीं थी। अक़ील आप 590 हिजरी में पैदा हुए थे। आपकी कुन्नियत अबू यज़ीद थी। हुदैबिया के मौक़े पर इस्लाम ज़ाहिर किया और आठ हिजरी में मदीना आ गये आपने जंगे मौतह में भी शिरकत की थी। आप ज़बर दस्त नस्साब थे। आप में अदाए क़रज़ के लिये माविया से मुलाक़ात की थी और बा रवाएते इब्ने क़तीबा तीन लाख अशरफ़ियां हासिल कर ली थीं। आप बड़े हाज़िर जवाब थे। आखि़री उम्र में आप ना बीना हो गये थें आप ने 96 साल की उम्र में 5 हिजरी मुताबिक़ 670 ई 0 में इन्तेक़ाल किया। जाफ़र आप सूरतो सीरत में रसूल अल्लाह (स अ व व ) से बहुत मुशाबेह थे आपने शुरू ही में ईमान जा़िहर किया था। आपने हिजरत हबशा और हिजरते मदीना दोनों में शिरकत की थी। आपको जमादिल अव्वल 8 हिजरी में जंगें मौता के लियेय भेजा गया। आपने अलम ले कर ज़बर दस्त जंग की। आप के दोनों हाथ कट गये। अलम दांतों से संभाला बिल आखि़र शहीद हो गये। आपके लिये आं हज़रत (स अ व व ) ने फ़रमाया है कि उन्हें इनके हाथों के एवज़ ख़ुदा ने जन्नत में ज़मुरदैन पर अता फ़रमाए हैं और आप फ़रिश्तों के साथ उड़ा करते हैं। आपके शहीद होते ही पैग़म्बरे इस्लाम और फातेमा ज़हरा (स अ व व ) असमा बिन्ते उमैस के पास अदाए ताज़ियत के लिये गये। आपने हुक्म दिया की जाफ़र के घर खाना भेजो। आपने 41 साल की उम्र में शहादत पाई। आपके जिस्म पर 90 जख़्म थे। आप ने आठ बेटे छोड़े। जिनकी माँ असमा बिन्ते उमैस थीं। यही अब्दुल्लाह बिन जाफ़र और मोहम्मद बिन जाफ़र ज़्यादा नुमाया थे। यही अब्दुल्लाह हज़रत जै़नब के और मोहम्मद हज़रत उम्मे कुलसूम बिन्ते फातेमा (स अ व व ) के शौहर थे। 4. हज़रत अली (अ. स.) थे।


पैग़म्बरे इस्लाम अबुल क़ासिम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा ( स अ व.व. )

दो टुकड़े एक इशारे में जिसके क़मर हुआ।

जिस दर पा झुक गई है जबीं आफ़ताब की।।

तफ़सीर उसकी ज़ुल्फ़ है वल लैल की निदा।

क्या शान है , जनाबे रिसालत मआब की।।

निदा कलकत्तवी (पेशावर)

ऐ नूर के पुतले तुझे क्या ख़ाक से नसबतं

एहसान तेरा है जो ज़मी पर उतर आया।।

ख़ल्लाक़े आालम ने अपने बन्दों की रहबरी और रहमानी के लिये एक लाख चौबीस हज़ार हादी भेजे जिनमें 313 रसूल बाक़ी नबी थे रसूल में पांच उलुल अज़्म थे इन अम्बिया व रसूल पर ईमान ज़रूरी है। उन्हें मासूम मन्सूस आलिमे इल्मे लदुन्नी और अफ़ज़ले कायनात क़रार दिया गया था। यह न सिर्फ़ बतने मादर बल्कि बदवे फ़ितरत में ही नबी बनाए गये थे जिन्हें ख़ल्लाक़े आलम ने अपने नूरे अज़मत व जलाल से पैदा किया था। वह नूरी थे इनके जिस्म का साया न था।

ख़ालिके कायनात ने इनकी नबूवत व रिसालत को दवाम दे कर इस सिलसिले को ख़त्म कर दिया लेकिन चूंकि सिलसिला तख़लीक़ का जारी रहना मुसल्लम था ज़रूरते तबलीग़ की बक़ा लाज़मी थी लेहाज़ा दाना व बीना ख़ुदा ने अपने अज़ली फ़ैसले के मुताबिक़ बाबे नबूवत इमामत का लाअब्दी दरवाज़ा खोल दिया और बारह इमामों के इन असमा की बज़बाने रसूल वज़ाहत करा दी लौहे महफ़ूज़ में लिखे हुए थे। यह नूरी मख्लूक़ भी साय से बे नियाज़ थे। इन्हें भी खुदा ने मासूम मन्सूस आलमे इल्मे लदुन्नी और अफ़ज़ले कायनात क़रार दिया है। यह हुज्जते ख़ुदा भी हैं और इमामे ज़माना भी उसे ख़ुदा ने इस्लाम की हिफ़ाज़त दीन की सियानत कायनात की इमामत और रसूले ख़ुदा (स अ व व ) की खि़लाफ़त की ज़िम्मेदारी सौंपी है और इस सिलसिले को क़यामत तक के लिये क़ाएम कर दिया है।

आं हज़रत की विलादत बसाअदत

आपके नूरे वजूद की खि़ल्क़त बा रवाएते हज़रत आदम की तख़लीक़ से नौ लाख बरस पहले बा रवाएते 4- 5 लाख क़ब्ल हुई थी। आपका नूरे अक़दस असलाबे ताहेरा और अरहामे मुताहर में होता हुआ जब सुलबे जनाबे अब्दुल्लाह बिन अब्दुल मुत्तलिब तक पहुँचा तो आपका ज़हूरो शहूद बशक्ले इन्सानी बतने जनाबे आमना बिन्ते वहब से मक्काए मोअज़्ज़मा में हुआ।

आँ हज़रत (स अ व व) की विलादत के वक़्त हैरत अंगेज़ वाक़ेयात का ज़हूर

आपकी विलादत से मुताअल्लिक़ बहुत से उमूर रूनुमा हुए जो हैरत अंगेज़ हैं। मसलन आपकी वालदा माजदा को बारे हमल महसूस नहीं हुआ और वह तौलीद के वक़्त कसाफ़तों से पाक थीं। आप मख़्तून और नाफ़ बुरीदा थे। आपके ज़हूर फ़रमाते ही आपके जिस्म से ऐसा नूर साते हुआ जिससे सारी दुनिया रौशन हो गई। आपने पैदा होते ही दोनों हाथों को ज़मीन पर टेक कर सज्दाए ख़ालिक़ अदा किया। फिर आसमान की तरफ़ सर बुलन्द कर के तकबीर कही और ला इलाहा इललल्लाहो इना रसूलल्लाहे ज़बान पर जारी किया। ब रवायते इब्ने वाजेए अल मतूफ़ी 292 हि 0 शैतान को रजम किया गया और उसका आसमान पर जाना बन्द हो गया। सितारे मुसलसल टूटने लगे तमाम दुनिया में ऐसा ज़लज़ला आया कि तमाम दुनिया के कलीसे और दीगर ग़ैर उल्लाह की इबादत करने के मुक़ामात मुन्हदिम हो गये। जादू और कहानत के माहिर अपनी अक़्लें खो बैठे और उनके मुवक्लि मजूस हो गये। ऐसे सितारे आसमान पर निकल आय जिन्हें कभी किसी ने देखा न था। सावा की वह झील जिसकी परसतिश की जाती थी जो काशान में है वह ख़ुश्क हो गई। वादिउस समा जो शाम में है और हज़ार साल से ख़ुश्क पड़ी थी इसमें पानी जारी हो गया। दजला में इस क़दर तगयानी हुई कि इसका पानी तमाम इलाक़ों में फैल गया। महले क़िसरा में पानी भर गया और ऐसा ज़लज़ला आया कि ऐवाने किसरा के 14 कंगूरे ज़मीन पर गिर पड़े और ताक़े किसरा शिग़ाफ़ हो गया और फ़ारस की वह आग जो एक हज़ार साल से मुसलसल रौशन थी फ़ौरन बुझ गई।(तारीख़े अशाअत इस्लाम देवबन्दी पृष्ठ 218 तबाअ लाहौर)

उसी रात को फ़ारस के अज़ीम आलम ने जिसे (मोबज़्ज़ाने मोबज़्ज़न) कहते थे ख़्वाब में देखा कि तुन्द व सरकश और वैहशी ऊँट अरबी घोड़ों को ख़ींच रहे हैं और उन्हे बलादे फ़ारिस में मुताफ़रिक़ करतें हैं। उसने इस ख़्वाब का बादशाह से ज़िक्र किया। बादशाह नवशेरवां किसरा ने एक क़ासिद के ज़रिए से अपने हैराह के गर्वनर नुमान बिन मन्ज़र को कहला भेजा कि हमारे आलम ने एक अजीब व ग़रीब ख़्वाब देखा है तू किसी ऐसे अक़्लमन्द और होशियार शख़्स को मेरे पास भेज दे जो इसकी इतमिनान बख़्श ताबीर दे कर मुझे मुतमईन कर सके। नोमान बिन मन्ज़र ने अब्दुल मसीह बिन उमर अलग़सानी को जो कि बहुत लाएक़ था बादशाह के पास भेज दिया। नवशेरवान ने अब्दुल मसीह से तमाम वाक़ेयात बयान किये और उससे ताबीर की ख़्वाहिश की उसने बड़े ग़ौर व खौज के बाद अर्ज़ कि , ऐ बादशाह शाम में मेरा मामूँ सतीह काहिन रहता है वह इस फ़न का बहुत बड़ा आलिम है वह सही जवाब दे सकता है और इस ख़्वाब की ताबीर बता सकता है। नव शेरवां ने अब्दुल मसीह को हुक्म दिया कि फ़ौरन शाम चला जाए। चुनान्चे वह रवाना हो कर दमिश्क पहुँचा और बा रवायत इब्ने वाज़े बाबे जांबिया में इससे इस वक़्त मिला जब कि वह आलमे एहतिज़ार में था। अब्दुल मसीह ने कान में चीख़ कर अपना मुद्दा बयान किया उसने कहा कि एक अज़ीम हस्ती दुनिया मे आ चुकी है। जब नव शेरवां की नस्ल के 14 मर्दो ज़न हुकमरां कंगूरों के अदद के मुताबिक़ हुकूमत कर चुकेगें तो यह मुल्क इस ख़ानदान से निकल जाऐगा। सुम्मा फ़ज़तन फ़सहू यह कह क रवह मर गया।(रौज़तुल अहबाब जिल्द 1 पृष्ठ 56, सीरते हलबिया जिल्द 1 पृष्ठ 83, हयात अल क़ुलूब जिल्द 2 पृष्ठ 46, अल याक़ूबी पृष्ठ 9 )

आपकी तारीख़े विलादत

आपकी तारीख़े विलादत में इख़्तेलाफ़ है बाज़ मुसलमान 2 रबीउल अव्वल बाज़ 6, बाज़ 12 बताते हैं लेकिन जम्हूरे उलमा अहले तशैय्यो और बाज़ उल्मा अहले तसन्नुन 17 रबीउल अव्वल सन् 1 आमुलफ़ील मुताबिक़ 570 ई 0 को सही समझते हैं।

अल्लामा मजलिसी (अलैरि रहमा) हयात अल क़ुलूब जिल्द 2 पृष्ठ 44 में तहरीर फ़रमाते हैं कि उलमाये इमामिया का इस पर इजमा व इत्तेफ़ाक़ है कि आप 17 रबीउल अव्वल सन् 1 आमुल फ़ील यौमे जुमा शब या बवक़्ते सुबह सादिक़ शुऐब अबी तालीब में पैदा हुए हैं। इस वक़्त नव शेरवां किसरा की हुकूमत का बयालिसवां साल था।

आपका पालन पोषण और आपका बचपना

मुवर्रिख़ ज़ाकिर हुसैन लिखते हैं कि बारवायते आपके पैदा होने से पहले और बारवायते आप दो माह के भी न होने पाए थे कि आपके वालिद आब्दुल्लाह का इन्तेक़ाल ब मुक़ामे मदीना हो गया क्यों कि वहीं तिजारत के लिये गये थे उन्होंने सिवाए पांच ऊँट और चन्द भेडों और एक हबशी कनीज़ बरकत (उम्मे ऐमन) के और कुछ विरसे में न छोड़ा था। हज़रत आमना को हज़रत अब्दुल्लाह की वफ़ात का इतना सदमा हुआ की दूध सूख गया चूंकि मक्का की आबो हवा बच्चों के वास्ते चन्दा मुवाफ़िक़ न थी इस वास्ते क़रीब की बद्दू औरतों में से दूध पिलाने के वास्ते तलाश की गई। अन्ना के दस्तीयाब होने तक अबू लहब की कनीज़ सूबिया ने आं हज़रत (स अ व व ) को तीन चार महीने तक दूध पिलाया। अक़वामे बद्दू की आदत थी कि साल में दो मरतबा मौसमे बहार और मौसमे खि़ज़ां में दूध पिलाने और बच्चे पालने की नौकरी की तलाश में आया करती थीं आखि़र हालीमा सादिया के नसीब ने ज़ोर किया और वह आपको अपने घर ले गईं और आप हलीमा के पास परवरिश पाने लगे।(तारीख़े इस्लाम जिल्द 2 पृष्ठ 32, तारीख़े अबुल फ़िदा जिल्द 2 पृष्ठ 20 )

मुझे इस तहरीर के इस जुज़ से कि रसूले खुदा (स अ व व ) को सूबिया और हलीमा ने दूध पिलाया है इत्तेफ़ाक़ नहीं है। मुवर्रेख़ीन का बयान है कि आप में नमू की क़ुव्वत अपने सिन के एतेबार से बहुत ज़्यादा थी जब तीन माह के हुए तो ख़ड़े होने लगे , और जब सात माह के हुये तो चलने लगे आठवें महीने अच्छी तरह बोलने लगे , नवें महीने इस फ़साहत से कलाम करने लगे कि सुन्ने वालों को हैरत होती थी।

हाशिया:-

1. सतीह एक अजीबउल खि़लक़त इन्सान था। उसके जिस्म में मफ़ासिल यानी जोड़ बन्द न थे। वह उठ बैठ नहीं सकता था , मगर ग़ुस्से के वक़्त उठ बैठता था। उसके बदन में खोपड़ी के सिवा कोई हड्डी न थी। उसके सरो गर्दन न थी और मुँह सीने में था। वह जाबिया में रहता था। जब उसे कहीं ले जाना होता था तो उसे गठरी की तरह बांध लेते थे जब उससे कुछ पूछना मक़सूद होता था तो उसे झींझोड़ते थे फिर वह औंधा हो कर ग़ैब की बाते बताता था। दोनों फ़िरको के उलेमा का बयान है कि वह काहिन था और कहानत के माने ग़ैब की ख़बर देने के हैं। बरवाएते सफ़ीनातुल बिहार उसने हज़रत रसूले करीम (स अ व व ) की नबूवत और हज़रत अली (अ.स.) की खि़लाफ़त और हज़रत मेंहदी (अ.स.) की ग़ैबत की ख़बर दी थी। इसकी उम्र ब रवाएते रौज़तुल अहबाब 600 बरस और ब रवाएते हयात अल क़ुलूब 900 बरस की थी। इन दानों उलमा के बयान में फ़रक़ इस लिये है कि इसकी विलादत बन्दे एरम के टूटने के वक़्त हुई थी और बन्दे एरम टूटने को बाज़ मुवर्रेख़ीन साबेक़ीन ने हज़रत मसीह से 302 बरस पहले और बाज़ ने पहली सदी मसीह के आग़ाज में लिखा है।

मजमाउल बहरीन में है कि काहिन के मानी साहिर के हैं या बाज़ का ख़्याल है कि काहिन के जिन्न ताबे होते हैं। बाज़ का ख़्याल है कि कहानत एक इल्म है जो हिसाब से ताअल्लुक़ रखता है। बाज़ का ख़्याल है कि शैतान जब आसमान पर जाता था तो वहां से ख़बरे लाता था और शैतानी अफ़राद को बताता था। दुनिया में दो बड़े काहन गुज़रे हैं एक शक़ दूसरा सतीह। रसूले करीम (स अ व व ) की विलादत के बाद फ़ने कहानत ख़त्म हो गया था।

अगरचे तक़रीबन तमाम मुवर्रेख़ीन ने सूबिया और हलीमा के मुताअल्लिक़ यह लिखा है कि इन औरतों ने हज़रत रसूले करीम (स अ व व ) को दूध पिलाया था और थोड़े दिनों नहीं बल्कि काफ़ी अर्से तक पिलाया था लेकिन मेरे नज़दीक यह दुरूस्त नहीं है क्यों कि यह दुनिया की किसी तारीख़ मे नहीं है कि किसी नबी को उसकी माँ के अलावा किसी और ने दूध पिलाया हो। हज़रत नूह (स अ व व ) से हज़रत ईसा (स अ व व ) तक के हालात देखे जाऐ कोई एक मिसाल भी ऐसी न मिलेगी जिससे रसूले ख़ुदा (स अ व व ) को हलीमा वग़ैरा के दूध पिलाने की ताईद होती हो और हमे तो ऐसा नज़र आता है कि जैसे क़ुदरत को इस अम्र पर इसरारे शदीद था िकवह अपने नबी को इसकी माँ ही का दूध पिलवाए। मिसाल के लिये हज़रत इब्राहीम (अ.स.) और हज़रत मूसा (अ.स.) का वाक़िया देख लिजये और अन्दाज़ा लगा लिजये कि किन ना साज़गार हालात व वाक़ेयात में उनकी माओं को दूध पिलाने के लिये उन तक पहुँचाया गया और जब ऐसा देखा कि माँ के पहुँचने में देर हो रही है तो खुद उसी बच्चे के अगूँठे से दूध पैदा कर दिया जैसा कि हज़रत इब्राहीम (अ.स.) के लिये हुआ। मतलब यह था कि अगर बच्चे को माँ का दूध दस्तयाब न हो सके तो किसी दूसरे तरीक़े से शिकम सेर हो जाए। इन हालात से मेरी समझ में नहीं आता कि अम्बियाए मा साबक़ के तरीक़े और उसूल से हट कर रसूले करीम (स अ व व ) को माँ के अलावा किसी दूसरी औरत के दूध पिलाने को क्यों कर तस्लीम कर दिया जाए खुसूसन ऐसी सूरत में जब कि यह तसलीम शुदा हो लहमतुल रेज़ा कुलेहमतुल नसब दूध से जो गोश्त पैदा होता है वह नसब के गोश्त व पोस्त के मानिन्द होता है। वयहरम मिन रेज़ा मा यहरमा मन नसब और दूध पीने से वह रिश्ता ना जायज़ हो जाता है जो नसब से ना जायज़ होता है।(मफ़रूदाते इमामे राग़िब असफ़हानी पृष्ठ 62 ) और फिर ऐसी सूरत में जब कि मौजूद थी और अहदे रज़ाअत के बाद तक ज़िन्दा रहीं। मैं तो यह समझता हूँ कि आँ हज़रत (स अ व व ) को जनाबे आमना ने दूध पिलाया था और सूबीया व हलीमा ने उनकी परवरिश व परदाख़्त की थी।

मेरे इस नज़रिये को इससे और तक़वीयत पहुँचती है कि ख़ुदा वन्दे आलम हज़रते मूसा (स अ व व ) के लिए इरशाद फ़रमाता है कि हर मना एलैह अलमराज़ा मन क़बल हमने दूध पिलाये जाने के सवाल से पहले ही तमाम दाईयों के दूध को मूसा (स अ व व ) के लिये हराम कर दिया था।(पारा 20 रूकू 4 ) यह कैसे मुम्किन है कि ख़ुदा वन्दे आलम हज़रते मूसा (स अ व व ) को माँ के अलावा किसी के दूध पीने से बचाने का इतना अहतिमाम करे और फ़ख़रे मूसा (स अ व व ) को इस तरह नज़र अन्दाज़ कर दे कि ऐसी औरतें उन्हें दूध पिलाऐं जिनका इस्लाम भी वाज़े नहीं है।

आपकी सायाए मादरी से महरूमी

आपकी उमर जब 6 साल की हुई तो सायाए मादरी से महरूम हो गये। आपकी वालेदा जनाबे आमना बिन्ते वहब हज़रत अब्दुल्लाह की क़ब्र की ज़्यारत के लिये मदीना गईं थीं वहां उन्होंने एक महीना क़याम किया जब वापिस आने लगीं तो मुक़ाम अबवा (जो कि मदीने से 22 मील दूर मक्का की जानिब वाक़े है) इन्तेक़ाल फ़रमा गईं और वहीं दफ़न हुईं। आपकी ख़ादेमा उम्मे ऐमन आपको मक्का ले आईं।(रौज़तुल अहबाब जिल्द 1 पृष्ठ 67 ) जब आपकी उम्र 8 साल की हुई तो आपको दादा अब्दुल मुत्तलिब का 120 साल की उम्र में इन्तेक़ाल हो गया। अब्दुल मुत्तलिब की वफ़ात के बाद आपके बड़े चचा जनाबे अबू तालिब और आपकी चची जनाबे फातेमा बिन्ते असद ने फ़राएज़े तरबियत अन्जाम दिये और इस शान से तरबियत की कि दुनिया ने आपकी हमदर्दी और ख़ुलूस का लौहा मान लिया। हज़रत अब्दुल मुत्तलिब के बाद हज़रत अबु तालिब भी ख़ाना ए काबा के मुहाफ़िज़ और मुतवल्ली और सरदारे कुरैश थे। हज़रत अली (अ.स.) फ़रमाते हैं कि कोई अरब इस शान का सरदार नहीं हुआ जिस शानों शौकत की सरदारी मेरे पदरे मोहतरम को ख़ुदा ने दी थी।(याक़ूबी जिल्द 2 पृष्ठ 11 )

हज़रत अबु तालिब (अ.स.) को हज़रत अब्दुल मुत्तलिब की वसीयत व हिदायत

बाज़ मुवर्रेख़ीन ने लिखा है कि जब हज़रत अब्दुल मुत्तलिब का वक़्ते वफ़ात क़रीब पहुँचा तो उन्होंने आं हज़रत (स अ व व ) को अपने सीने से लगाया और सख़्त गिरया किया और अपने फ़रज़न्द अबु तालिब की तरफ़ मुतावज्जे हो कर फ़रमाया कि , ऐ अबू तालिब यह तेरे हक़ीकी भाई का बेटा है इस दुरे यगाना की हिफ़ज़त करना , इसे अपना नूरे नज़र और लख़्ते जिगर समझना , इसकी सुरक्षा में कोई कमी न रखना , अपने हाथ , ज़बान औन जान व माल से इसकी मदद करते रहना।(रौज़तुल अहबाब)

हज़रत अबु तालिब (अ.स.) के तिजारती सफ़रे शाम में आं हज़रत (स अ . व . व . ) की हमराही और बहीरा राहिब का वाक़ेया

हज़रत अबू तालिब जो तिजारती सफ़र में अक्सर जाया करते थे जब एक दिन रवाना होने लगे तो आं हज़रत को जिनकी उम्र उस वक़्त बा रवायते तबरी व इब्ने असीर 9 साल और ब रवायते अबुल फ़िदा व इब्ने ख़ल्दून 13 साल की थी , अपने बाल बच्चों में छोड़ दिया और चाहा कि रवाना हो जायें। यह देख कर आं हज़रत (स अ व व ) ने इसरार किया कि मुझे अपने साथ लेते चलिये , आपने यह ख्याल करते हुये कि मेरा भतीजा यतीम है उन्हें अपने साथ ले लिया और चलते चलते जब शहरे बसरा के क़रयए कफ़र पहुँचे जो के शाम की सरहद पर 6 मील के फ़ासले पर वाक़े है जो उस वक़्त बहुत बड़ी मन्डी थी और वहां नस्तूरी ईसाई रहते थे। वहां एक नस्तूरी राहिबों के माअबद के पास क़याम किया। राहिबों ने आं हज़रत (स अ व व ) और अबू तालिब (अ.स.) की बडी ख़ातिर दारी की फिर उनमें से एक ने जिसका नाम जरजीस और क़ुन्नियत अबू अदास और लक़ब बहीरा राहिब था आपके चेहरा ए मुबारक से आसारे अज़मतों जलालत और आला दर्जे के कमालाते अक़ली और महामदे इख़लाक़ नुमायां देख कर और इन सिफ़ात से मौसूफ़ पा कर जो उसने तौरैत और इन्जील और दूसरी आसमानी किताबों में पढ़ी थीं पहचान लिया कि यही पैग़म्बरे आख़ेरूज़ ज़मान हैं। अभी उसने इज़हारे ख़्याल न किया था कि एक दम बादल को हुज़ूर पर साया करते हुए देखा , फिर शाना खुलवा कर मोहरे नबूवत को देखा उसके बाद फ़ौरन मोहरे नबूवत का बोसा (चूमना) लिया और नबूवत की तसदीक़ कर के अबु तालिब से कहा कि इस फ़रज़न्दे अरजूमन्द का दीन तमाम अरब व अजम में फैलेगा और यह दुनिया के बहुत बड़े हिस्से का मालिक बन जायेगा। यह अपने मुल्क को आज़ाद कराऐगा और अपने अहले वतन को नजात दिलायेगा। ऐ अबू तालिब इसकी बड़ी हिफ़ज़त करना और इसको दुश्मनों के अत्याचार से बचाने की पूरी कोशिश करना , देखो कहीं ऐसा न हो कि यह यहूदियों के हाथ लग जाए। फिर उसने कहा कि मेरी राय यह है कि तुम शाम न जाओ और अपना माल यहीं बेच कर के मक्का वापस चले जाओ चुनान्चे अबु तालिब ने अपना माल बाहर निकाला वह हज़रत की बरकत से आन्न फ़ानन बहुत ज़्यादा नफ़े पर फ़रोख़्त हो गया और अबू तालिब मक्का वापस चले गये।(रौज़तुल अहबाब जिल्द 1 पृष्ठ 71, तन्क़ीदुल कलाम पृष्ठ 30, एयर दंग पृष्ठ 24, तफ़रीउल अज़किया वग़ैरा)

आं हज़रत (स अ . व . व . ) का मक्के को रूमीयों के इक़्तेदार से बचाना

जस्टिस अमीर अली बा हवाला तारीख़ कासन डी 0 परसून लिखते हैं कि हुनूज़ का काबा दोबारा तामीर न हो चुका था कि आपने मक्के मोअज़्ज़मा को इस ख़ुफ़िया साज़िश से बचा लिया जो उसकी आजा़दी को मिटाने के लिये की गई थी जिसमें उस्मान बिन हरीर को बड़ा दख़्ल था। उसने क़ुसतुनतुनया के दयारे के दयारे क़ैसरी में जाकर दीने मसीही क़ुबूल कर लिया था और क़ैसरे रूम से मालो ज़र ले कर हिजाज़ वापस आया था। उसकी कोशिश थी कि मक्के पर यूनानियों का इक़्तेदार क़ायम करा दे। वह ख़ुफ़िया कोशिशें कर रहा था लेकिन उसका यह राज़ खुल गया और उसकी वजह यह थी कि आं हज़रत ने उसका मक़सद अपने ज़राये से मालूम कर लिया था। आखि़र में वह हुज़ूर की कोशिशों से नाकामयाब हो गया। अहले फ़िरंग (यूरोपियन) इस बात को मानते हैं कि पैग़म्बरे इस्लाम ने अपने मौलद व मसकन को कुसतुनतुनया के बादशाहों के क़ब्ज़े से बचा कर मुसलमानों पर बड़ा एहसान किया है जिसकी वजह से वह अब्दी शुक्र गुज़ारी के मुस्तहक़ हैं। यही कुछ इब्ने ख़ल्दून ने भी लिखा है।(तन्क़ीदुल कलाम पृष्ठ 33 )

ख़ाना ए काबा में हजरे असवद को नस्ब करने में आं हज़रत (स . अ . व . व . ) की हिकमते अमली

मुवर्रेख़ीन का बयान है कि बेअसते पैग़म्बर से पहले क़ुरैश ने यह फ़ैसला किया था कि ख़ाना ए काबा को ढा़ कर फिर से इसकी तामीर की जाये और उसे बलन्द कर दिया जाये। चुनान्चे इसे गिरा कर उसकी तामीर शुरू कर दी गई फिर जब इमारते हजरे असवद के नस्ब करने की जगह तक पहुँची और उसके नस्ब करने का सवाल पैदा हुआ तो क़ुरैश में शदीद इख़्तेलाफ़ पैदा हो गया हर क़बीले का सरदार यह चाहता था कि इस शरफ़ को वह हासिल करें आखि़रकार बहुत कोशिश के बाद यह तय पाया कि कल जो सब से पहले हरम में दाखि़ल हो उसे हकम (फै़सला करने वाला) बना कर इस झगड़े को ख़त्म किया जाये , वह नस्बे हजर के बारे में जो फ़ैसला दे दे उसकी पाबन्दी हर एक को करना होगी।

ग़रज़ कि जब सुबह हुई तो हज़रत रसूले करीम (स अ व व ) सब से पहले हरम में दाखि़ल हुए लिहाज़ा उन्हीं को हकम बना दिया गया। हज़रत ने फ़रमाया कि एक मज़बूत चादर लाई जाए और उसमें हजरे असवद को रखा जाए और चादर के गोशों को हर क़बीले का सरदार पकड़ कर उसे उठाए और मुक़ामे हजर तक लाए , चुनान्चे ऐसा ही किया गया।

फिर जब हजरे असवद बैतुल्लाह के क़रीब आ गया तो हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) ने अपने हाथों से उठा कर उसे नस्ब कर दिया। हुज़ूर (स अ व व ) की इस हिकमते अमली से फ़ितनाए अज़ीम का सद्दे बाब हो गया।(तारीख़ अबुल फ़िदा , जिल्द 2 पृष्ठ 26 वा याक़ूबी जिल्द 2 पृष्ठ 14 )

जनाबे ख़दीजा (स . अ . व . व . ) के साथ आपकी शादी ख़ाना आबादी

जब आपकी उम्र 25 साल की हुई और आपके हुस्ने सीरत , आपकी रास्त बाज़ी (सत्यता) और दयानत की आम शोहरत हो गई और आपको सादिक़ और अमीन का खि़ताब दिया जा चुका तो जनाबे ख़दीजा (स अ व व ) बिन्ते ख़ुवेलद ने जो बहुत ही पाकीज़ा नफ़्स , ख़ुश इख़लाक़ और ख़ानदाने क़ुरैश में सब से ज़्यादा दौलत मन्द थीं ऐसे हाल में अपनी शादी का पैग़ाम पहुँचाया जब कि उनकी उम्र 40 साल की थी। शादी का पैग़ाम मंज़ूर हुआ और हज़रत अबू तालिब (अ.स.) ने निकाह पढ़ा।(तलख़ीस सीरतून नबी अल्लामा शिब्ली पृष्ठ 99 लाहौर 1965 0 ) मुवर्रेख़ीन इब्ने वाज़ेह अलमतूफ़ी 292 ई 0 का बयान है कि हज़रत अबू तालिब ने जो ख़ुतबा ए निकाह पढ़ा था उसकी शुरूआत इस तरह थी।

अलहम्दो लिल्लाहिल लज़ी जाअल्ना मिन ज़रा इब्राहीम व ज़ुर्रियते इस्माईल तमाम तारीफ़ें उस एक ख़ुदा के लिये हैं जिसने हमें नस्ले इब्राहीम और ज़ुर्रियते इस्माईल से क़रार दिया है।(अल याक़ूबी जिल्द दो पृष्ठ 16 मुद्रित नजफ़े अशरफ़)

मुवर्रेख़ीन का बयान है कि हज़रत ख़दीजा (स अ व व ) का महर 12 औंस सोना और 25 ऊँट मुक़र्रर हुआ जिसे हज़रत अबू तालिब ने उसे समय अदा कर दिया।(मुसलमानाने आलम पृष्ठ 38 प्रकाशित लाहौर) तवारीख़ में है कि जनाबे ख़दीजा (स अ व व ) की तरफ़ से अक़्द पढ़ने वाले उनके चचा अम्र बिन असद और हज़रते रसूले ख़ुदा (स अ व व ) की तरफ़ से हज़रत अबू तालिब (अ.स.) थे।(तारीख़े इस्लाम जिल्द 2 पृष्ठ 87 मुद्रित लाहौर 1962 0 )

एक रवायत में है कि शादी के समय जनाबे ख़दीजा बाकरा थीं , यह वाक़िया निकाह 595 ई 0 का है। मुनाक़िब इब्ने शहरे आशोब में है कि रसूले ख़ुदा (स अ व व ) के साथ ख़दीजा का यह पहला अक़्द था। सीरते इब्ने हशशाम जिल्द 1 पृष्ठ 119 में है जब तक ख़दीजा ज़िन्दा रहीं रसूले करीम (स अ व व ) ने कोई अक़्द नहीं किया।

कोहे हिरा में आं हज़रत (स . अ . व . व . ) की इबादत गुज़ारी

तारीख़ में है कि आपने 38 साल की उम्र में (कोहे हिरा) जिसे जबले सौर भी कहते हैं को अपनी इबादत गुज़ारी की मंज़िल क़रार दिया और उसके एक ग़ार में बैठ कर जिसकी लम्बाई 4 हाथ और चौढ़ाई डेढ़ हाथ थी इबादत करते और ख़ाना ए काबा को देख कर लज़्ज़त महसूस करते थे। यू तो दो दो , चार चार शबाना रोज़ वहां रहा करते थे लेकिन माहे रमज़ान सारे का सारा वहीं गुज़ारते थे।

आपकी बेअसत

मुवर्रेख़ीन का बयान है कि आं हज़रत (स अ व व ) इसी आलमे तनहाई में मशग़ूले इबादत थे कि आपके कानों में आवाज़ आई या मोहम्मद (स अ व व ) आपने इधर उधर देखा कोई दिखाई न दिया , फिर आवाज़ आई फिर आपने इधर उधर देखा , नागाह आपकी नज़र एक नूरानी मख़लूक़ पर पड़ी वह जनाबे जिब्राईल थे उन्होंने कहा इक़रा पढ़ो , हुज़ूर ने इरशाद फ़रमाया माइक़रा क्या पढ़ूं ? उन्होनें अर्ज़ की इक़रा बइस्मे रब्बेकल लज़ी ख़लक़ फिर आपने सब कुछ पढ़ दिया क्यो कि आपको इल्में क़ुरआन पहले से हासिल था। जिब्राईल (अ.स.) के इस तहरीक़े इक़रा का मक़सद यह था कि नुज़ूले क़ुरआन की इब्तेदा हो जाए। उस वक़्त आपकी उम्र 40 साल 1 दिन की थी। उसके बाद जिब्राईल ने वज़ू और नमाज़ की तरफ़ इशारा किया व अरकात की तादाद की तरफ़ भी हुज़ूर को मुतवज्जे किया चुनान्चे हुज़ूरे आला ने वज़ू किया और नमाज़ पढ़ी आपने सब से पहले जो नमाज़ पढ़ी वह ज़ोहर की थी। फिर हज़रत वहां से अपने घर तशरीफ़ लाये और ख़दीजातुल कुबरा और अली बिन अबी तालिब से वाक़िया बयान फ़रमाया। इन दोनों ने इज़हारे ईमान किया और नमाज़े अस्र इन दोनों ने ब जमाअत अदा की। यह इस्लाम की पहली नमाज़े जमाअत थी जिसमें रसूले करीम (स अ व व ) इमाम और ख़दीजा (स अ व व ) और अली (अ.स.) मासूम थे। आप दरजाए नबूवत पर बदोफ़ितरत ही से फ़ायज़ थे। 27 रजब को मबऊसे रिसालत हुए।(हयातूल कु़लूब , किताब अलमुनतक़ा , मवाहिबुल दुनिया) इसी तारीख़ के नुज़ूले क़ुरआन की इब्तेदा हुई।

हाशिया हज़रत अली बिन अबी तालिब के साबेकु़ल इस्लाम होने के बारे में इतनी ज़्या रवायत व शवाहिद मौजूद है कि अगर उन्हें जमा किया जाय तो एक किताब बन सकती है। हज़रते रसूले करीम (स अ व व ) ने खुद इसकी तसदीक़ फ़रमाई है चुनान्चे दार क़त्नी ने अबू सईद हजरी से इमाम अहमद ने हज़रत उमर से हाकिम ने माअज़ से अक़्ली ने हज़रत आयशा से रवायत की है कि हज़रत रसूले ख़ुदा (स अ व व ) ने अपनी ज़बाने मुबारक से इरशाद फ़रमाया है कि मुझ पर ईमान लाने वालों में सब से पहले अली (अ.स.) हैं। हज़रत अली (अ.स.) खुद इरशाद फ़रमाते हैं :-

سبقتکم الی الاسلام طفلا صغیرا ما بلغت او ان حلمی

मैंने तुम सब से पहले इस्लाम की तरफ़ बढ़ कर उसका ख़ैर मक़दम किया है। यह वाक़िया है उस वक़्त का जब कि मैं बालिग़ भी न हुआ था। शैख़ अल इस्लाम हाफ़िज़ इब्ने हजर असकलानी , तकरीब अल तहज़ीब मुद्रित देहली के पृष्ठ 84 पर कुछ अक़वाल लिखने के बाद लिखते हैं अलमरजाअनहा अव्वलीन असलम तरजीह उसी को है कि आपने सब से पहले इस्लाम ज़ाहिर किया। अल्लामा अब्दुल रहमान इब्ने ख़ल्दून लिखते हैं कि हज़रत ख़दीजा के बाद हज़रत अली इब्ने अबी तालिब ईमान लाये।(तारीख़ इब्ने ख़ल्दून पृष्ठ 295 मुद्रित लाहौर) मुवर्रीख़ अबुल फ़िदा लिखते हैं कि जनाबे ख़दीजा के अव्वल ईमान लाने में और मुसलमान होने में किसी को इख़्तेलाफ़ नहीं , मगर इख़्तिलाफ़ उनके बाद में है कि बीबी ख़दीजा (स अ व व ) के बाद कौन पहले ईमान लाया। साहेबे सीरत और बहुत से अहले इल्म बयान करते हैं कि मर्दों मे सब से पहले हज़रत अली बिन अबी तालिब (अ.स.) 9, 10 या 11 बरस की उम्र में सब से पहले मुसलमान हुए। अफ़ीक़ कन्दी की रवायत से भी इसी की तस्दीक़ होती है जिसमें उन्होंने चशमदीद गवाह की हैसियत से वज़ाहत की है कि मैंने रसूले ख़ुदा (स अ व व ) को नमाज़ पढ़ते हुए बेअसत के फ़ौरन बाद इस आलम में देखा कि उनके पीछे जनाबे ख़दीजा और हज़रत अली (अ.स.) खड़े थे उस वक़्त कोई ईमान न लाया था। इस रवायत को अल्लामा बिन अब्दुल जज़री क़रतबी ने इस्तेयाब जिल्द 2 पृष्ठ 225 मुद्रित हैदराबाद दकन में अल्लामा इब्ने असीर जरज़ी ने असद उलग़ाबा जिल्द 3 पृष्ठ 414 मुद्रित मिस्र में अल्लामा इब्ने जरीर तबरी ने तारीख़े क़दीर जिल्द 2 पृष्ठ 212 मुद्रित मिस्र में अल्लामा इब्ने असीर ने तारीख़े कामिल जिल्द 2 पृष्ठ 20 में दर्ज किया है।

साहेबे तफ़रीह अल अज़किया ने सबीहतुल महफ़िल से नक़्ल किया है कि दोशम्बे को रसूले ख़ुदा (स अ व व ) मबऊसे रिसालत हुए हैं और उसी दिन आखि़रे वक़्त हज़़रत अली (अ.स.) मुशर्रफ़ बा इस्लाम हुए हैं। यही कुछ रौज़तुल अहबाब जिल्द 1 पृष्ठ 83 में भी है। अल्लामा अब्दुल बर ने दावा किया है कि बिल इत्तेफ़ाक़ साबित है कि ख़दीजा के बाद सब से पहले हज़रत अली (अ.स.) मुशर्रफ़ ब इस्लाम हुए हैं। अल्लामा इक़बाल कहते है।

मुस्लिम अव्वल शहे मर्दाने अली -- इश्क़ रा सरमायाए ईमाने अली

वाज़े हो कि हज़रत अली (अ.स.) अज़ल से ही मुसलमान और मोमिन थे , उनके लिये इस्लाम लाने का जुम्ला मुनासिब नहीं है लेहाज़ा जहां कहीं भी तारीख़ में उनके बारे में इस्लाम या ईमान लाने का जुम्ला है इससे इज़हारे इस्लाम वा ईमान समझना चाहिए।

दावते ज़ुल अशीरा का वाक़ेया और ऐलाने रिसालत व वज़ारत

बेअसत के बाद आपने तीन साल तक निहायत राज़दारी और पोशीदगी के साथ फ़रायज़ की अदायगी फ़रमायी इसके बाद खुले बन्दों तबलीग़ का हुक्म आ गया। फ़सद अबेमह तोमर तो हुक्म दिया गया है उसकी तकमील करो। मैं इस मक़ाम पर तारीख़ अबुल फ़िदा के इश्क़ तरजुमा की लफ़्ज़ ब लफ़्ज़ इबारत नक़ल करता हूँ जिसे मौलाना करीम उद्दीन हनफ़ी इंस्पेक्टर मद्रास पंजाब ने 1846 ई 0 में किया था।

वाज़े हो के तीन बरस तक पैग़म्बरे ख़ुदा (स अ व व ) दावते तरफ़े इस्लाम ख़ुफ़िया करते रहे मगर जब कि यह आयत नाज़िल हुई वा अनज़र अशीरतेक़ल अक़रबैन यानी डरा अपने कुन्बे वालों को जो क़रीब रिश्ते के हैं। इस वक़्त हज़रत ने बमुजिब हुक्मे ख़ुदा के इज़हार करना दावत का शुरू किया। बाद नाज़िल होने इस आयत के पैग़म्बरे ख़ुदा (स अ व व ) ने अली से इरशाद किया कि ऐ अली एक पैमाना खाने का मेरे वास्ते तैयार कर और एक बकरी का पैर उस पर छुआ ले और एक बड़ा कासा दूध का मेरे वास्ते ला और अब्दुल मुत्तलिब की औलाद को मेरे पास बुला कर ला ताकि मैं उससे कलाम करूं और सुनाऊँ उनको वह हुक्म जिस पर जनाबे बारी से मामुर हुआ हूँ चुनान्चे हज़रत अली (अ.स.) ने वह खाना एक पैमाना बामोजिब हुक्म तैयार करके औलादे अब्दुल मुत्तलिब को जो करीब 40 आदमी के थे बुलाया , उन आदमियों में हज़रत के चचा अबु तालिब , हज़रते हमज़ा और हज़रते अब्बास भी थे। उस वक़्त हज़रत अली ने वह खाना जो तैयार किया था ला कर हाज़िर किया। सब खा पी कर सेर हो गये। हज़रत अली ने इरशाद किया कि जो खाना इन सब आदमियों ने खाया है वह एक आदमियों की भूख के लिये काफ़ी था। इसी दौरान हज़रत चाहते थे कि कुछ कहूँ कि अबू लहब जल्दी बोल उठा और यह कहा कि मोहम्मद ने बड़ा जादू किया है। यह सुनते ही तमाम आदमी अलग अलग हो गये थे , चले गये। पैग़म्बरे ख़ुद कुछ कहने न पाये थे यह हाल देख कर जनाबे रिसालत माअब (स अ व व ) ने इरशाद किया कि ऐ अली देखा तूने उस शख़्स ने कैसी सबक़त की , मुझको बोलने ही न दिया। अब फिर कल को तैयार कर जैसा कि आज किया था और फिर उनको बुला कर जमा कर। चुनान्चे हज़रत अली (अ.स.) ने दूसरे रोज़ फिर मुवाफ़िक़े आं हज़रत (स अ व व ) खाना तैयार कर के सब लोगों को जमा किया। जब वह खाने से फ़राग़त पा चुके उस वक़्त रसूल अल्लाह (स अ व व ) ने इरशाद किया कि तुम लोगों की बहुत अच्छी क़िस्मत और नसीब है क्यों कि ऐसी चीज़ मैं अल्लाह की तरफ़ से लाया हूँ कि उससे तुम को फ़जी़लत हासिल होती है और ले आया हूँ तुम्हारे पास दुनिया और आख़ेरत में अच्छा। ख़ुदा ताअला ने मुझको तुम्हारी हिदायत का हुक्म फ़रमाया है। कोई शख़्स तुम में से इस अम्र का इक़्तेदा कर के मेरा भाई , वसी और ख़लीफ़ा बनना चाहता है , इस वक़्त सब मौजूद थे और हज़रत पर एक हुजूम था और हज़रत अली ने अर्ज़ किया कि या रसूल अल्लाह (स अ व व ) मैं आपके दुश्मनों को नैज़ा मारूँगा और उनकी आँखें फोड़ दूँगा , पेट चीरूंगा और टांगें काटूगां और आपका वज़ीर हूंगा। हज़रत (स अ व व ) ने उस वक़्त हज़रत अली ए मुर्तज़ा की गरदन पर हाथ मुबारक रख कर इरशाद फ़रमाया कि यह मेरा भाई है और मेरा वसी है और मेरा ख़लीफ़ा है तुम्हारे बीच इसकी सुनो और इताअत क़ुबूल करो। यह सुन कर सब क़ौम के लोग मज़ाक़ में हंस कर खड़े हो गये और अबू तालिब से कहने लगे कि अपने बेटे की बात सुन और इताअत कर यह तुझे हुक्म हुआ है।(अल्ख़ पृष्ठ 33 से 36 मुद्रित लाहौर)

मुवर्रिख़ अबुल फ़िदा मतूफ़ी 732 हिजरी की तहरीर पर मेरा वज़ाहत नोट

आयए अनज़ेरा अशीरतेकल अक़रबैन के नुज़ूल की तफ़सील हज़रत अली (अ.स.) की खि़लाफ़त बिला फ़सल की बुनियाद क़ाएम करती है। इस पर अमले रसूल फ़ेले रसूल (स अ व व ) और क़ौले रसूल (स अ व व ) ने साबित कर दिया कि हज़रत अली (अ.स.) ही रसूले करीम (स अ व व ) के ख़लीफ़ा ए अव्वल और ख़लीफ़ा ए बिला फ़स्ल हैं उन्हीं को उन्होंने अपना जां नशीन बनाया था जिसकी जिसकी तजदीद अपनी ज़िन्दगी के मुख़तलिफ़ अदवार में फ़रमाते रहे यहां तक कि नस्से सरीह आया ए या अयोहल रसूल बल्लिग़ मा उनज़ेला एलैका मिन रब्बक के ज़रिये से ग़दीरे ख़ुम में हजजे आखि़र के मौक़े पर आख़री ऐलान फ़रमाया और वाज़े कर दिया कि मेरे बाद अली इब्ने अबी तालिब (अ.स.) ही मेरे जानशीन और ख़लीफ़ा हैं।

मुवर्रिख़ अबू अल फ़िदा ने इस्लाम की इस पहली और बुनियादी दावते तबलीग़ की मुनासिब वज़ाहत फ़रमा दी है और साफ़ लफ़्ज़ों में वाज़े कर दिया कि हज़रत रसूले करीम (स अ व व ) ने हज़रत अली (अ.स.) को अपना जानशीन और ख़लीफ़ा इसी बुनियादी दावत के मौक़े पर बना दिया था और लोगों को हुक्म दे दिया था कि फ़ इसमऊ इलहे व अतीयहू इनकी बात कान धर कर सुनो और इनकी इताअत करो।

कुछ कमो बेश लफ़्ज़ों के साथ यह वाक़ेया तारीख़ तबरी जिल्द 2 पृष्ठ 217 तारीख़ कामिल बिन असीर जिल्द 2 पृष्ठ 122 लुबाब अलतावील जिल्द 5 पृष्ठ 106 मुआलिमुत तनज़ील बर हशिया ख़ाज़िन जिल्द 6 पृष्ठ 105 ख़साएस निसाई पृष्ठ 13, मसनद अहमद बिन हमबल जिल्द 3 पृष्ठ 360, कनज़ुल माल जिल्द 6 पृष्ठ 397, सीरते इब्ने इसहाक़ , तफ़सीर इब्ने हातिम , दलाएल बहीकी , मुनाक़िब इमामे अहमद , मुसन्निफ़ अबू बकर इब्ने अबी शबीता , तारीख़े ख़मीस , तफ़सीर इब्ने मरदूया , तफ़सीर सिराजे मुनीर , तफ़सीर शिबली , तफ़सीरे वाहेदी , हुलयतुल औलिया , ज़ख़ीरतुल आमाल अजली , मुख़्तारे ज़िया मुक़दसी , तहज़ीब अल आसार तिबरी , इकतेफ़ा आसमी , रौज़तुल अलसफ़ा , हबीब अलसैर , मआरिज अल नबूअता मदारिज अल नबूअता अज़ालतुल ख़फ़ा तारीख़े इस्लाम अब्दुल हकीम नशतर जिल्द 1 पृष्ठ 44 वग़ैरा में मौजूद है। इन इसलामी किताबों के अलावा इसका तज़किरा अहले फिरगं की तसनीफ़ात में भी है। मुलाहेज़ा हो अपालोजी जान डीवन पोस्ट पृष्ठ 5, कारलायल पृष्ठ 61 ख़ुल्फ़ा मोहम्मद एयरविंग पृष्ठ 3 तारीख़े गिबन जिल्द 3 पृष्ठ 499, ओकली पृष्ठ 15।

दावते ज़ुल अशीरा के सिलसिले में यह अमर क़ाबिले ज़िक्र है कि इस अहम वाक़ेए का ज़िक्र इमाम बुख़ारी ने अपनी सही में नहीं किया जिससे उनकी ज़ेहनियत का पता चलता है नीज़ यह कि जरमन में जो तारीख़े तबरी छपी है इसकी जिल्द 9 पृष्ठ 68 में वसी व ख़लीफ़ती के बजाय कज़ा व कज़ा दरज है जिससे अहले मिस्र की तहरीफ़ी जद्दो जेहद का अन्दाज़ा लगाया जा सकता है , वाज़े हो कि दावते ज़ुल अशीरा का वाक़ेया 4 बेअसत का है।

हिजरते हब्शा 5बेअसत

ऐलाने नबूवत के बाद अरब की ज़मीन और अरब के आसमान यानी अपने पराये सब दुश्मन हो गये। उन दुश्मनों में अबू सुफ़ियान , अबू जेहल और अबू लहब ख़ास थे। उन लोगों ने आप पर गंदगी डालना और आपको जादूगर और मजनून (पागल) कह कर सताना अपना तरीक़ा बना लिया था। बाज़ मुवर्रेख़ीन का कहना है कि दुश्मनों ने एक दफ़ा कम्बल उढ़ा कर मार डालने का इरादा कर लिया था। इस तरह के मसाएब और ज़ुल्म से जब आं हज़रत (स अ व व ) और आपके पैरव परेशान हुए और आपने महसूस कर लिया कि मुसलमान की हैसियत से मक्के में ज़िन्दगी के दिन गुज़ारना मुश्किल है तो हिजरते हब्शा का फ़ैसला कर के अपने असहाब को हिकमत का हुक्म दिया चुनान्चे 5 बेअसत में 100 सौ मर्द , औरतों ने हिजरत की और हबश पहुंच गये। हबश का बादशाह नजाशी( 1 ) था जो नस्तूरी फ़िरक़े का ईसाई था। उसने इन लोगों की आओ भगत की और इनका ख़ैर मक़दम किया मगर दुश्मनों ने वहां पहुँच कर कोशिश की कि यह लोग ठहरने न पाएं लेकिन वह कामयाब न हुये।

मुवर्रेख़ीन का बयान है कि इन हिजरत करने वालों में जाफ़रे तय्यार भी थे जो उनमें सरबराह की हैसियत रखते थे। यह लोग 7 हिजरी तक वहीं क़याम करते रहे और फ़तेह ख़ैबर के मौक़े पर वापस आये , उनकी वापसी पर रसूले करीम (स अ व व ) ने फ़रमाया था कि मैं हैरान हूँ कि दो ख़ुशियों में से किस को तरजीह दूँ। मैं फ़तेह ख़ैबर की ख़ुशी को अहम समझूं या जाफ़रे तय्यार वग़ैरा की वापसी को अहमियत दूं।

अल ग़रज़ हिजरते हब्शा के सिलसिले में कुफ़्फ़ारे मक्का को जब मालूम हुआ कि यहां के वह बाशिन्दे जो मुसलमान होते हैं चुपके से हबशा चले जाते हैं और वहां आराम से बसर करते हैं तो उनकी दुश्मनी और ज़िद व क़द और बढ़ गयी और उन्होंने बारवायते इब्ने असीर अब्दुल्लाह बिन उमय्या को उमरे आस ( 2) के साथ नजाशी और अराकीने सलतनत के वास्ते हदिया व तहायफ़ रवाना किया , इन दोनों ने हबशा पहुँच कर नजाशी को मुख़्तलिफ़ तरीक़ों से भड़काना चाहा मग रवह न भड़का और मुसलमानों की हिमायत करता रहा आखि़रकार यह लोग ख़ायब व ख़ासिर वापस आये।

हज़रते रसूले करीम (स . अ . व . व . ) दारूल अरक़म में 6 बेअसत

मुवर्रिख़ ज़ाकिर हुसैन बा हवाला सीरत इब्ने हश्शाम कहते हैं कि जब मुसलमान हबशा की तरफ़ महाजेरत कर गये तो भी रसूल अल्लाह (स अ व व ) बराबर वाअज़ फ़रमाते रहे और नये नये लोग दीने इस्लाम में दाखि़ल होते रहे , कुफ़्फ़ार ने यह देख कर आं हज़रत (स अ व व ) को और ज़्यादा सताना शुरू कर दिया नाचार आं हज़रत (स अ व व ) अपने बचे हुये असहाब को साथ ले कर अरक़म बिन अबी अरक़म बिन अब्दे मनाफ़ बिन असद के मकान में एक महीने तक रहे। यह मकान कोहे पृष्ठ के ऊपर वाक़े था। आप वहां लोगों को इस्लाम की तरफ़ दावत देते थे।(तारीख़े इस्लाम जिल्द 2 पृष्ठ 52 )


हज़रत रसूले करीम (स अ . व . व . ) शोएबे अबी तालिब में (मोहर्रम 7 बेअसत)

मुवर्रेख़ीन का बयान है कि जब कुफ़्फ़ारे क़ुरैश ने देखा कि इस्लाम रोज़ ब रोज़ तरक़्क़ी करता चला जा रहा है तो बहुत परेशान हुये। पहले तो कुछ क़ुरैश दुश्मन थे अब सब के सब मुख़ालिफ़ हो गये और बा रवायते इब्ने हश्शाम व इब्ने असीर व तबरी , अबू जेहल बिन हश्शाम , शेबा अतबा बिन रबिया , नसर बिन हारिस , आस बिन वाएल और अक़बा बिन अबी मूईत एक गिरोह के साथ रसूले ख़ुदा (स अ व व ) के क़त्ल पर कमर बांध कर हज़रत अबू तालिब के पास आये और साफ़ लफ़्ज़ों में कहा कि मोहम्मद ने एक नये मज़हब की शुरूआत की है और हमारे ख़ुदाओं को हमेशा बुरा भला कहा करते हैं लिहाज़ा उन्हें हमारे हवाले कर दो , हम उन्हें क़त्ल कर दें या फिर आमादा ब जंग हो जाओ। हज़रत अबू तालिब ने उन्हें उस वक़्त टाल दिया और वह लोग वापस चले गये और रसूले करीम (स अ व व ) अपना काम बराबर करते रहे। कुछ दिनों के बाद दुश्मन फिर आये और उन्होंने आ कर शिकायत की और हज़रत के क़त्ल पर ज़ोर दिया। हज़रत अबू तालिब ने आं हज़रत से वाक़िया बयान किया , उन्होंने फ़रमाया कि ऐ चचा मैं जो कहता हूँ कहता रहूँगा मैं किसी की धमकी से डर नहीं सकता और न मैं किसी लालच में फंस सकता हूँ। अगर मेरे एक हाथ पर आफ़ताब और दूसरे पर महताब रख दिया जाये तब भी मैं अल्लाह के हुक्म को पहुँचाने में न रूकूगां। मैं जो करता हूँ अल्लाह के हुक्म से करता हूँ वह मेरा मुहाफ़िज़ है। यह सुन कर हज़रत अबू तालिब ने फ़रमाया कि बेटा तुम जो करते हो करते रहो मैं जब तक ज़िन्दा हूँ तुम्हारी तरफ़ कोई नज़र उठा कर नहीं देख सकता। कुछ समय के बाद बा रवायत इब्ने हश्शाम व इब्ने असीर कुफ़्फ़ार ने अबू तालिब (अ.स.) से कहा कि तुम अपने भतीजे को हमारे हवाले कर दो हम उसे क़त्ल कर दें और उसके बदले में एक नवजवान हम से बनी मख़जूम में से ले लो। हज़रत अबू तालिब ने फ़रमाया कि तुम बेवकूफ़ी की बातें करते हो , यह कभी नहीं हो सकता। यह क्यो कर मुम्किन है कि तुम्हारे लड़के को ले कर उसकी परवरिश करूं और हमारे बेटे को ले कर क़त्ल कर दो। यह सुन कर उनका ग़ुस्सा और बढ़ गया और उनको सताने पर भरपूर तुल गये। हज़रत अबू तालिब (अ.स.) ने उसके रद्दे अमल में बनी हाशिम और बनी मुत्तलिब से मदद चाही और दुश्मनों से कहला भेजा कि काबा व हरम की क़सम अगर मोहम्मद (स अ व व ) के पांव में कांटा भी चुभा तो मैं सब को क़त्ल कर दूगां। हज़रत अबू तालिब के इस कहने पर दुश्मनों के दिलों में आग लग गई और वह आं हज़रत (स अ व व ) के क़त्ल पर पूरी ताक़त से तैय्यार हो गये।

हज़रत अबू तालिब ने जब आं हज़रत (स अ व व ) की जान को ग़ैर महफ़ूज़ देखा तो फ़ौरत उन लोगों को लेकर जिन्होंने हिमायत का वायदा किया था जिनकी तादाद बरवायते हयातुल क़ुलूब चालीस थी , मोहर्रम 7 बेअसत में शोएबे अबू तालिब के अन्दर चले गये और उसके ऐतराफ़ को महफ़ूज़ कर दिया।

कुफ़्फ़ारे क़ुरैश ने अबू तालिब के इस अमल से मुताअस्सिर हो कर एक अहद नामा मुरत्तब किया जिसमें बनी हाशिम और बनी मुत्तलिब से मुकम्मल बाईकाट का फ़ैसला था। तबरी में है कि इस अहद नामे को मन्सूर बिन अकरमा बिन हाशिम ने लिखा था जिसके बाद ही उसका हाथ शल (बेकार) हो गया था।

तवारीख़ में है कि शोएब का दुश्मनों ने चारों तरफ़ से भरपूर घिराव कर लिया था और उनको मुकम्मल क़ैद कर दिया था इस क़ैद ने अहले शोएब पर बड़ी मुसिबतें डालीं , जिसमानी और रूहानी तकलीफ़ के अलावा रिज़्क़ की तंगी ने उन्हें तबाही के किनारे पर पहुँचा दिया और नौबत यहां तक पहुँची कि वह दींदार (धर्म पालक) पेड़ों के पत्ते खाने लगे। नाते कुनबे वाले अगरचे चोरी छुपे कुछ खाने पीने की चीज़ें पहुचा देते और उन्हें मालूम हो जाता तो सख़्त सज़ाऐं देते। इसी हालत में तीन साल गुज़र गये। एक रवायत में है कि जब अहले शोएब के बच्चे भूख से बेचैन हो कर चीखते और चिल्लाते थे तो पड़ोसियों की नींद हराम हो जाती थी। इस हालत में भी आप पर वही नाज़िल होती रही और हुज़ूर कारे रिसालत अंजाम देते रहे।

तीन साल के बाद हश्शाम बिन उमर बिन हरस के दिल में यह ख़्याल आया कि हम और हमारे बच्चे खाते पीते और ऐश करते हैं और बनी हाशिम और उनके बच्चे भूखे रह रहे हैं , यह ठीक नहीं है। फिर उसने और कुछ आदमियों को हम ख़्याल बना कर क़ुरैश के जलसे में इस सवाल को उठाया अबू जहल और उसकी बीवी उम्मे जमील जिसे ब ज़बाने क़ुरआन हिमा लतल हतब कहा जाता है ने विरोध (मुख़ालेफ़त) किया लेकिन अवाम के दिल पसीज उठे। इसी दौरान में हज़रत अबू तालिब आ गये और उन्होंने कहा कि मोहम्मद (स अ व व ) ने बताया है कि तुमने जो अहद नामा लिखा है उसे दीमक खा गई है और कागज़ के उस हिस्से के सिवा जिस पर अल्लाह का नाम है सब ख़त्म हो गया है। ऐ क़ुरैश बस ज़ुल्म की हद हो गई , तुम अपने अहद नामे को देखो अगर मोहम्मद का कहना सच हो तो इन्साफ़ करो और अगर झूठ हो तो जो चाहे करो।

हज़रत अबू तालिब के इस कहने पर अहद नामा मंगवाया गया और हज़रत रसूले करीम (स अ व व ) का इरशाद इसके बारे में बिल्कुल सच साबित हुआ जिसके बाद क़ुरैश शर्मिन्दा हो गये और शोएब का घिराव टूट गया। उसके बाद हश्शाम बिन उमर बिन हरस और उसके चार साथी , ज़ुबैर बिन अबी , उमय्या मख़्ज़ूमी और मुतअम बिन अदी , अबुल बख़्तरी बिन हश्शाम , ज़माअ बिन असवद बिन अल मुत्तलिब बिन असद शोएबे अबू तालिब में गये और उन तमाम लोगों को जो उसमें क़ैद थे उनके घरों में पहुँचा दिया।(तारीख़े तबरी , तारीखे़ कामिल , रौज़तुल अहबाब) मुवर्रिख़ इब्ने वाज़े जिनका देहांत 292 में हुआ का बयान है कि इस घटना के बाद अस्लम यू मस्ज़िदिन ख़लक़ मिनन नास अज़ीम बहुत से काफ़िर मुसलमान हो गये।(अल याक़ूबी जिल्द 2 पृष्ठ 25 मुद्रित नजफ़ 1384 हिजरी)

रूमियों की हार पर आं हज़रत (स अ व व) की कामयाब पेशीन गोई ( 8 बेअसत)

मुवर्रेख़ीन लिखते हैं कि 8 बेअसत में ईरानियों ने रूमियों को हरा दिया और चूंकि ईरानी आतिश परस्त और रूमी ईसाई अहले किताब थे इस लिये कुफ़्फ़ारे मक्का को इस वाक़िये से ख़ुशी हुई और मुसलमानों को दुख हुआ। मुसलमानों के दुख को हज़रत रसूल अल्लाह (स अ व व ) ने अपनी तसल्ली से दूर किया और उनसे बतौर पेशीन गोई फ़रमाया कि घबराओ नहीं 3 और 9 साल के दरमियान रूमी ईरानियों को शिकस्त दे कर कामयाब हो जायेगें चुनान्चे ऐसा ही हुआ 9 बेअसत गुज़रने से पहले रूमी ईरानियों पर ग़ालिब आये इस पेशीन गोई का ज़िक्र क़ुराने मजीद में मौजूद है। मेरे नज़दीक इस पेशीन गोई की सेहत ने हक़ीक़ते क़ुरान और हक़ीक़ते रिसालत को उजागर कर दिया है।

गिबन और दीगर ईसाई मुवर्रेख़ीन ने लिखा है कि वह लड़ाई जिसमें ईरानियों ने फ़तेह पाई थी 611 ई 0 से 617 ई 0 तक जारी रही और जिसमें रूमियों ने फ़तेह पाई वह 622 ई 0 से 628 ई 0 तक रही। ईरानियों ने 617 ई 0 तक तमाम एशियाई कोचक और मिस्र फ़तेह कर लिया था और कुसतुनतुनिया से एक मील की दूरी पर पड़ाव डाल दिया था और आगे बढ़ने का ईरादा कर रहे थे सिर्फ़ अबनाए फ़ासक़रस हद्दे फ़ासिल था मगर 623 ई 0 में रूमियों ने ईरानियों को भारी शिकस्त दे कर अपने इलाक़े वापिस लेने शुरू कर दिये।

तारीख़े तबरी जिल्द 2 पृष्ठ 360 में है कि इस घटना के सम्बन्ध में क़ुरान में लफ़ज़ बज़ा सनीन आया है जिसके मानी दस के हैं यानि फ़तेह दस साल के अन्दर होगी चुनान्चे ऐसा ही हुआ।

आपका मोजिज़ा ए शक़ उल क़मर 9बेअसत

इब्ने अब्बास इब्ने मसूद अनस बिन मालिक हुज़ैफ़ा बिन उमर जिब्बीर बिन मुतअम का बयान है कि शक़ उल क़मर का मोजिज़ा कोहे अबू क़ुबैस पर ज़ाहिर हुआ था जब कि अबू जेहल ने बहुत से यहूदीयों को हमराह ला कर हज़रत से चाँद को दो टुकड़े करने की ख़्वाहिश ज़ाहिर की थी। यह वाक़िया चौहदवी रात को हुआ था जब कि आपको मौसमें हज में शुऐब अबी तालिब से निकलने की इजाज़त मिल गई थी। अहले सैर लिखते हैं कि यह वाक़िया 9 बेअसत का है। इस मौजिज़े का ज़िक्र तारीख़ फ़रिश्ता में भी है। हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) फ़रमाते हैं कि मुजिब एतक़ादो क़ौलेही इस मौजिज़े के वाक़े होने पर ईमान वाजिब है।(सफ़ीनतुल अल बहार जिल्द 1 पृष्ठ 709 ) इस मोजिज़े का ज़िक्र अज़ीज़ लखनवी मरहूम ने क्या ख़ूब किया है।

मोजिज़ा शक़्क़ुल क़मर का है मदीने से अयाँ

मह ने शक़ हो कर लिया है दीन को आग़ोश में

हज़रत अबू तालिब (अ.स.) और जनाबे ख़तीजातुल कुबरा (स.) की वफ़ात 10बेअसत

हयातुल हैवान दमीरी में है कि शुऐब अबी तालिब से निकलने के आठ महीने ग्यारह दिन बाद बेअसत माह शव्वाल में हज़रत अबू तालिब ने इन्तेक़ाल किया। बरवायते इब्ने वाज़े इस वक़्त इनकी उम्र 86 साल की थी।(अल याक़ूबी ज. 2 स. 28 ) कशमीर तवारीख़ में है कि इनकी वफ़ात के तीन दिन बाद जनाबे ख़तीजतुल कुबरा ने भी इन्तेक़ाल फ़रमाया उस वक़्त इनकी उम्र 65 साल की थी।(अल याक़ूबी जिल्द 2 पृष्ठ 28 )

उन दो अज़ीम हमर्ददों और मददगारों के इन्तेक़ाल पुर मलाल से हज़रत रसूले करीम (स अ व व ) को सख़्त रंज पहुँचा। आपने शदीद रंज व ग़म अैर सदमओ अलम के तअस्सुर में इस साल का नाम आम उल हुज़्न ग़म का साल रख दिया।

मोमिन क़ुरैश हज़रत अबू तालिब और जनाबे खतीजातुल कुबरा की क़ब्र मक्का के क़ब्रस्तान हजून में एक पहाड़ी पर वाक़े है। यह क़ब्रें पहले गुम्बद वाली न थीं। बा रवायत मुवर्रिख़ ज़ाकिर हुसैन , मिर्ज़ा असग़र हुसैन , अली फ़सीह लखनवी ने तेरहवीं सदी के वसत में मोमेनीन की मदद से इन पर गुम्बद तैयार कराया था।

इसी 10 बेअसत में अबू तालिब के इन्तेक़ाल के बाद क़ुरैश ने यह देख कर कि अब इनका कोई मज़बूत हामी और मददगार नहीं है आं हज़रत (स अ व व ) पर दस्ते ज़ुल्म व ताअद्दी और भी ज़्यादा दराज़ कर दिया और बनी हाशिम अपने रईस के मर जाने से आपकी कमा हक़्क़हू हिफ़ाज़त व अयानत न कर सके और दुश्मनों की ईज़ा रसाई उरूज को पहुँच गई। बारवायते तारीख़े खमीस हज़रत की यह हालत पहुँच गई कि आपने घर से निकलना छोड़ दिया फिर यह ख़्याल कर के कि ताएफ़ में बनी सक़ीफ़ रहते हैं और वहीं चचा अब्बास की ज़मीन है। ताएफ़ चले जाने का क़स्द कर लिया और अपने ग़ुलाम आज़ाद ज़ैद बिन हारसा को हम्राह ले कर रवाना हो गये। रास्ते में बनी बकर और बनी क़हतान में ठहरना चाहा मगर कोई सूरत नज़र न आई बिल आखि़र ताएफ़ चले गये जो मक्का से सत्तर मील के फ़ासले पर वाक़े है। वहां तवक़्क़ो के खि़लाफ़ सख़्त दुश्मनी का मुज़ाहेरा देखा 10 दिन और बरवायते एक महीना बमुश्किल गुज़रा। बिल आखि़र ग़ुलामी कमीनों और ग़ुन्डों ने आप पर पथराव कर के आपको जख़्मी कर दिया फिर इसी पर इकतिफ़ा नहीं की बल्कि पत्थर मारते हुए फ़सीले शहर से बाहर निकाल दिया। आपके पांव ज़ख़्मी हो गये और ज़ैद का सर फूट गया। एक रवायत में है कि आपके सर पर इतने पत्थर लगे थे कि आपके सर का ख़ून एड़ी से बह रहा था अलग़रज़ वहां से बइरादा ए मक्का रवाना हो कर जब बतने नख़्ला में पहुँचे जो मक्का से एक रात की मसाफ़त पर पहले वाक़े है तो रात को वहीं क़याम किया और क़ुरआन पढ़ने लगे नसीब से यमन जाते हुए जिनों के एक गिरोह ने कलामे ख़ुदा सुना और वह मुसलमान हो गये , फिर आपने ज़ैद को मक्के भेजा कि किसी मददगार का पता लगायें मगर कोई न मिला , अलबत्ता मुतअम बिन अदी ने हामी भरी और आप मक्के वापस आ गये।(रौज़तुल अहबाब)

इसी सन् 10 बेअसत में वफ़ाते ख़दीजा के बाद आं हज़रत (स अ व व ) ने सौदा बिन्ते ज़म्आ से निकाह किया और इसी साल हज़रत आयशा बिन्ते अबी बक्र से भी अक़्द फ़रमाया। मोअर्रेख़ीन का कहना है कि उस वक़्त हज़रत आयशा की उम्र 6 साल की थी इसी लिये 1 हिजरी में जब कि नौ 9 साल की हो गईं थी ज़फ़ाफ़ वाक़े हुआ।(रौज़तुल अहबाब)

एक रवायत में हज़रत आयशा का यह क़ौल मिलता है कि मेरी माँ मुझे ककड़ी खिलाती थीं ताकि मैं ज़फ़ाफ़ के का़बिल बन जाऊँ।(सुनन इब्ने माजा , जिल्द 3 अनुवादक बाबुल कशा बल रूत्ब जिल्द 62 पृष्ठ 61 )

क़बीलाए ख़जरज का एक गिरोह खि़दमते रसूल (स अ . व . व . ) में 11 बेअसत

रजब के महीने में एक दिन आं हज़रत (स अ व व ) मिना में खड़े थे कि एक दम एक गिरोह एहले यसरब का क़बीलाए खज़रज से हज़रत के पास आया। इस गिरोह में 6 अफ़राद थे। हज़रत ने उनके सामने क़ुराने मजीद की तिलावत की और इस्लाम के महासनि (नियम क़ानून) बयान किये। वह मुसलमान हो गये और उन्होंने यसरब में जा कर काफ़ी तबलीग़ की और वहां के घरों में इस्लाम का चर्चा हो गया।

आं हज़रत (स अ . व . व . ) की मेराजे जिस्मानी 12 बेअसत

27 रजब बेअसत की रात को ख़ुदा वन्दे आलम ने जिब्राईल को भेज कर बुराक़ के ज़रिये आं हज़रत (स अ व व ) को काबा कौसैन की मंज़िल पर बुलाया और वहंा अली बिन अबी तालिब (अ.स.) की खि़लाफ़त व इमामत के बारे में हिदायत दीं।(तफसीरे क़ुम्मी) इसी मुबारक सफ़र और ऊरूज को (मेराज) कहा जाता है। यह सफ़र उम्मे हानी के घर से शुरू हुआ था। पलहे आप बैतुल मुक़द्दस तशरीफ़ ले गये फिर वहां से आसमान की तरफ़ रवाना हुए। मंज़िले आसमानी को तय करते हुये एक ऐसी मंज़िल पर पहुँचे जिसके आगे जिब्राईल का जाना ना मुम्किन हो गया। जिब्राईल ने अर्ज़ की हुज़ूर लौदनूत लता लाहतरक़ता अब अगर एक उंगल भी आगे भढ़ूगां तो जल जाऊगां।

اگر یک سر موی برتر روم بنور تجلی بسوزد پرم

फिर आप बुराक़ पर सवार हो कर आगे बढ़े एक मुक़ाम पर बुराक़ रूक गया और आप रफ़रफ़ पर बैठ कर आगे रवाना हो गये। यह एक नूरी तख़्त था जो नूर के दरिया में जा रहा था यहां तक कि मंज़िले मक़सूद पर आप पहुँच गये। आप जिस्म समेत गये और फ़ौरन वापस आये। क़ुरान मजीद में असरा बे अब्देही आया है। अब्दा का इतलाक़ जिस्म और रूह दोनों पर होता है। वह लोग जो मेराजे रूहानी के क़ायल हैं ग़ल्ती पर हैं।(शरए अक़ाएदे नस्फ़ी पृष्ठ 68 ) मेराज का इक़रार और उसका एतक़ाद ज़ुरूरियाते दीन से है। हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) फ़रमाते हैं कि जो मेराज का मुन्किर हो उसका हम से कोई ताअल्लुक़ नहीं।(सफ़ीनतुल बिहार जिल्द 2 पृष्ठ 174 ) एक रवायत में है कि पहले सिर्फ़ दो नमाज़ें वाजिब थीं। मेराज के बाद पांच वक़्त की नमाज़े मुक़र्रर र्हुइं।

1. यसरब यानी मदीने में ओस व ख़ज़रज दो अरब क़बीले रहते थे दोनों एक बाप की औलाद थे इनका मसकने क़दीम (निवास स्थान) पुराना यमन था। रसूले करीम (स अ व व ) जब तक मदीने नहीं पहुँचे यह शहर यसरब के नाम से मशहूर था ज्योंही रसूले करीम (स अ व व ) वहां तशरीफ़ ले गये उसका नाम मदीनातुल रसूल हो गया। फिर बाद में मदीना कहलाने लगा। यह शहर मक्का के शुमाल (उत्तर) की तरफ़ 270 मील की दूरी पर स्थित है।

बैअते उक़बा ऊला

इसी सन् 12 बेअसत के हज के ज़माने में उन 6 आदमियों में से जो पिछले साल मुसलमान हो कर मदीने वापस गये थे पांच आदमियों के साथ सात 7 आदमी मदीने वालों में से और आकर मुर्शरफ़ ब इस्लाम हुए। हज़रत की हिमायत का अहद किया। यह बैअत भी उसी उक़बा के मकान में हुई जो मक्के से थोड़े फ़ासले पर उत्तर की ओर स्थित है। मोअर्रिख़ अबुल फ़िदा लिखता है कि इस अहद पर बैअत हुई कि ख़ुदा का कोई शरीक न करो , चोरी न करो , बलात्कार न करो , अपनी औलाद को क़त्ल न करो जब वह बैअत कर चुके तो हज़रत ने मुसअब बिन उमैर बिन हाशिम बुन अब्दे मनाफ़ इब्ने अब्द अल अला को तालीमे क़ुरान और तरीक़ाए इस्लाम बताने के लिये नियुक्त किया।

(तारीख़े अबुल फ़िदा जिल्द 2 पृष्ठ 52 )

बैअते उक़बा (दूसरी)

13 बेअसत के ज़िल्हिज्जा के महीने में मुसअब बिन उमैर 13 मर्द और दो औरतों को मदीने से ले कर मक्के आये और उन्होंने मक़ामे उक़बा पर रसूले करीम (स अ व व ) की खि़दमत में उन लोगों को पेश किया वह मुसलमान हो चुके थे उन्होंने भी हज़रत की हिमायत का अहद किया और आपके दस्ते मुबारक पर बैअत की , उनमें(ओस और ख़ज़रज) दोनों के लोग शामिल थे।

हिजरते मदीना

14 बेअसत मुबाबिक़ 622 ई 0 में हुक्मे रसूल (स अ व व ) के मुताबिक़ मुसलमान चोरी छिपे मदीने की तरफ़ जाने लगे और वहां पहुँच कर उन्होंने अच्छा स्थान प्राप्त कर लिया। क़ुरैश को जब मालूम हुआ कि मदीने में इस्लाम ज़ोर पकड़ रहा है तो (दारूल नदवा) में जमा हो कर यह सोचने लगे कि अब क्या करना चाहिये। किसी ने कहा मोहम्मद को यहीं क़त्ल कर दिया जाये ताकि उनका दीन ही ख़त्म हो जाये। किसी ने कहा जिला वतन कर दिया जाये। अबू जहल ने राय दी कि विभिन्न क़बीलों के लोग जमा हो कर एक साथ उन पर हमला कर के उन्हें क़त्ल कर दें ताकि क़ुरैश ख़ूं बहा न ले सकें। इसी राय पर बात ठहर गई और सब ने मिल कर आं हज़रत (स अ व व ) के मकान का घेराव कर लिया। परवरदिगार की हिदायत के अनुसार जो हज़रत जिब्राईल् के ज़रिये पहुँची आपने अपने बिस्तर पर हज़रत अली (अ.स.) के लिटा दिया और एक मुटठी धूल ले कर घर से बाहर निकले और उनकी आंखों में झोंकते हुए इस तरह निकल गये जैसे कुफ्र से ईमान निकल जाये। अल्लामा शिब्ली लिखते हैं कि यह सख़्त ख़तरे का मौक़ा था। जनाबे अमीर को मालूम हो चुका था कि क़ुरैश आपके क़त्ल का इरादा कर चुके हैं और आज रसूल अल्लाह (स अ व व ) का बिस्तरे ख़्वाब क़त्लगाह की ज़मीन है लेकिन फ़ातेहे ख़ैबर के लिये क़त्लगाह फ़र्शे गुल था।(सीरतुन नबी व मोहसिने आज़म सन् 165 ) सुबह होते होते दुश्मन दरवाज़ा तोड़ कर घर में घुसे तो अली को सोता हुआ पाया। पूछा मोहम्मद कहां हैं ? जवाब दिया जहां हैं ख़ुदा की अमान में हैं। तबरी में है कि अली (अ.स.) तलवार सूंत कर खड़े हो गये और सब घर से निकल भागे। अहयाअल ऊलूम ग़ेज़ाली में है कि अली की हिफ़ाज़त के लिये ख़ुदा ने जिब्राईल और मीकाईल को भेज दिया था , यह दोनों सारी रात अली की ख़्वाबगाह का पहरा देते रहे। हज़रत अली (अ.स.) का फ़रमान है कि मुझे शबे हिजरत जैसी नीन्द आई सारी उम्र न आई थी। तफ़सीरों में है कि इस मौक़े के लिये आयत व मिन्न नासे मन यशरी नाज़िल हुई है। अल ग़रज आं हज़रत (स अ व व ) के रवाना होते ही हज़रत अबू बकर ने उनका पीछा किया आपने रात के अन्धेरे में यह समझ कर कि कोई दुश्मन आ रहा है अपने क़दम तेज़ कर दिये। पांव में ठो कर लगी ख़ून बहने लगा , फिर आपने महसूस किया कि इब्ने अबी क़हाफ़ा आ रहे हैं। आप खड़े हो गये।(सही बुख़ारी जिल्द 1 भाग 3 पृष्ठ 69 ) में है कि रसूले ख़ुदा (स अ व व ) ने अबू बकर बिन क़हाफ़ा से एक ऊँट ख़रीदा और मदारिजुल नबूवत में है कि हज़रत अबू बकर ने दो सौ दिरहम में ख़रीदी हुई ऊँटनी आं हज़रत के हाथ 900 नौ सौ दिरहम की बेची इसके बाद यह दोनों ग़ारे सौर तक पहुँचे , यह ग़ार मदीने की तरफ़ मक्के से एक घण्टे की राह पर ढ़ाई या तीन मील दक्षिण की तरफ़ स्थित है। इस पहाड़ की चोटी तक़रीबन एक मील ऊँची है समुन्द्र वहां से दिखाई देता है।

(तलख़ीस सीरतुन नबी पृष्ठ 169 व ज़रक़ानी)

यह हज़रात ग़ार में दाखि़ल हो गये ख़ुदा ने ऐसा किया कि ग़ार के मुँह पर बबूल का पेड़ उगा दिया। मकड़ी ने जाला तना , कबूतर ने अन्डे दे दिये और ग़ार में जाने का शक न रहा। जब दुश्मन इस ग़ार पर पहुँचे तो वह यही सब कुछ देख कर वापस हो गये। अजायब अल क़सस पृष्ठ 257 में है कि इसी मौक़े पर हज़रत ने कबूतर को ख़ानाए काबा पर आकर बसने की इजाज़त दी। इससे पहले और परिन्दों की तरह कबूतर भी ऊपर से गुज़र नहीं सकता था। मुख़्तसर यह कि 1 रबीउल अव्वल सन् 14 बेअसत(जुमेरात) के दिन शाम के वक़्त क़ुरैश ने हज़रत के घर का घेराव किया था। सुबह से कुछ पहले 2 रबीउल अव्वल जुमे के दिन को ग़ारे सौर में पहुँचे। इतवार के दिन 4 रबीउल अव्वल तक ग़ार में रहे। हज़रत अली (अ.स.) आप लोगों के लिये रात में खाना पहुँचाते रहे। चौथे रोज पांच रबीउल अव्वल दोशम्बे के रोज़ अब्दुल्लाह इब्ने अरीक़त और आमिर बिन फ़हीरा भी आ पहुँचे और यह चारों शख़्स मामूली रास्ता छोड़ कर बहरे कुलजुम के किनारे मदीने की तरफ़ रवाना हुए। कुफ़्फ़ारे मदीना ने ईनाम मुक़र्रर कर दिया कि जो शख़्स उनको ज़िन्दा पकड़ कर लायेगा या उनका सर काट कर लाऐगा तो 100 ऊँट ईनाम में दिये जाऐंगे। इस पर सराक़ा इब्ने मालिक आपकी ख़ोज लगाता हुआ ग़ार तक पहुँचा उसे देख कर हज़रत अबू बकर रोने लगे तो हज़रत ने फ़रमाया रोते क्यों हो ख़ुदा हमारे साथ है सराक़ा क़रीब पहुँचा ही था कि उसका घोड़ा उसके ज़ानू तक ज़मीन में धंस गया। उस वक़्त हज़रत रवानगी के लिये बाहर आ चुके थे। उसने माफ़ी मांगी , हज़रत ने माफ़ी दे दी। घोड़ा ज़मीन से निकल आया। वह जान बचा कर भागा और काफ़िरों से कह दिया कि मैंने बहुत तलाश किया मगर मोहम्मद (स अ व व ) का पता नहीं मिलता। अब दो ही सूरतें हैं या ज़मीन में समा गये या आसमान पर उड़ गये। ( 1)

हज़रत का क़बा के स्थान पर पहुँचना 12 रबीउल अव्वल दो शम्बा दो पहर के समय आप क़बा के स्थान पर पहुँचे जो मदीने से दो मील के फ़ासले पर एक पहाड़ी है। आपका ऊँट उस जगह ख़ुद ही रूक गया और आगे न बढ़ा। आप उतर पड़े। वहां के रहने वालों ने ख़ुशी के मारे नारा ए तकबीर बुलन्द किया। आपने यहां एक मस्जिद की बुनियाद डाली।

इसी मक़ाम पर हज़रत अली (अ.स.) भी मक्के से अमानतों की अदायगी से सुबुक दोशी हासिल करने के बाद आं पहुँचे। आपके साथ औरतें और बच्चे थे। औरतें और बच्चे ऊँटों पर सवार थे और हज़रत अली (अ.स.) पैदल थे। इसी वजह से आपके पैरों पर वरम था और बक़ौल इब्ने ख़ल्दून आपके पैरों से ख़ून जारी था। आं हज़रत (स अ व व ) की नज़र जब अली (अ.स.) के पैरों पर पड़ी तो आप रोने लगे और लोआबे दहन (थूक) लगा कर अच्छा कर दिया।

मदीने में दाखि़ला मक़ामें क़बा में चार दिन रूकने के बाद आप मदीने की तरफ़ रवाना हुए और 16 रबीउल अव्वल जुमे के दिन मदीने में दाखि़ल हो गये। महल्ले बनी सालिम में नमाज़ का वक़्त आ गया आपने नमाज़े जुमा यहीं अदा फ़रमाई। यह इस्लाम में सब से पहली नमाज़े जुमा थी। यह वही जगह है जहां अब मस्जिदे नबवी है।

मस्जिदे नबवी की तामीर मदीने में दाखि़ले के बाद आपने सब से पहले एक मस्जिद की बुनियाद डाली जो बहुत सादगी के साथ तैयार की गई। उसकी ज़मीन अबू अय्यूब अंसारी ने ख़रीदी और उसमें मज़दूरों की हैसियत से दूसरे असहाब के साथ आं हज़रत (स अ व व ) भी काम करते रहे। मस्जिद के साथ साथ हुजरे भी तैयार किये गये और एक चबूतरा जिसे सुफ़्फ़ा कहते थे , यही वह जगह थी जहां नये मुसलमान ठहराये जाते थे। उन्हीं लोगों को अस्हाबे सुफ़्फ़ा कहा जाता था और उनकी परवरिश सदक़े वग़ैरा से की जाती थी।

नमाज़ व ज़कात का हुक्म मस्जिदे नबवी की तामीर के बाद नमाज़ की रकअतों को भी तय कर दिया गया यानी पहले मग़रिब के अलावा सब नमाज़ें दो रकअती थीं फिर 17 रकअतें मुअय्यन कर दी गईं और उनके औक़ाद बता दिये गये। इब्ने ख़ल्दून के अनुसार इसी साल ज़कात भी फ़र्ज़ की गई।

एक 1हिजरी के महत्वपूर्ण वाक़ेयात

अज़ान व अक़ामत

एक हिजरी में अज़ान मुक़र्रर की गई जिसे हज़रत अली (अ.स.) ने हुक्में रसूले ख़ुदा (स अ व व ) से बिलाल (र.अ.) को तालीम कर दी और वह मुस्तक़िल मोअजि़्ज़न क़रार पाये और अक़ामत का तक़र्रूर भी हुआ।

अक़्दे मवाख़ात (भाईचारा कराना)

हिजरत के 5 या 8 महीने बाद महाजेरीने मक्का की दिलबस्तगी के लिये आं हज़रत (स अ व व ) ने 50 महाजिर व अनसार में मवाख़ात (भाई चारगी) क़ायम कर दी जिस तरह एक बार मक्का में कर चुके थे। तारीख़े ख़मीस और रियाज़ुल नज़रा में है कि वहां हज़रत अबू बकर को उमर का तलहा को ज़ुबैर का , उस्मान को अब्दुल रहमान का , हमज़ा को इब्ने हारसा का और अली (अ.स.) को खुद अपना भाई बनाया था। अल्लामा शिब्ली का कहना है कि आं हज़रत (स अ व व ) ने इत्तेहादे मज़ाक़ तबीयत और फ़ितरत के लेहाज़ से एक दूसरे को भाई बनाया था। मज़ाके़ नबूवत का इत्तेहाद फ़ितरते इमामत ही से हो सकता है इसी लिये आं हज़रत (स अ व व ) ने हर मरतबा अपना भाई अली (अ.स.) को ही चुना यही वजह है कि आं हज़रत (स अ व व ) हज़रत अली (अ.स.) से फ़रमाया करते थे।

انت اخی فی الدنیا والاخر

यानी दुनिया और आख़ेरत दोनों में मेरे भाई हो।

2हिजरी के महत्वपूर्ण वाक़ेयात

जनाबे सैय्यदा (स अ . व . व . ) का निकाह

15 रजब 2 हिजरी को जनाबे सैय्यदा (स अ व व ) का अक़्द हज़रत अली (अ.स.) से हुआ और 19 ज़िलहिज्जा को आपकी रूख़सती हुई। सीरतुन नबी में है कि जब जनाबे सैय्यदा (स अ व व ) की शादी की बात चली तो सब से पहले हज़रत अबू बकर फ़िर हज़रत उमर ने पैग़ाम भेजा। कन्ज़ुल आमाल 7 पृष्ठ 113 में है कि इन पैग़ामात से आं हज़रत ग़ज़बनाक हुये और उनकी तरफ़ से मुँह फेर लिया। रियाजु़ल नज़रा जिल्द 2 पृष्ठ 184 में है कि आं हज़रत (स अ व व ) ने हज़रत अली (अ.स.) से ख़ुद फ़रमाया कि ऐ अली मुझसे ख़ुदा ने कह दिया है कि फातेमा (स अ व व ) की शादी तुम्हारे साथ कर दूं , क्या तुम्हें मन्ज़ूर है ? अर्ज़ कि बेशक , अल ग़रज़ अक़्द हुआ और शहनशाहे कायनात ने सय्यदए आलमयान को एक बान की चारपाई , एक चमड़े का गद्दा , एक मशक , दो चक्कियां , दो मिट्टी के घड़े वग़ेरा दे कर रूख़सत किया। इस वक़्त अली (अ.स.) की उम्र 24 साल और फातेमा (स अ व व ) की उम्र 10 साल थी।

तहवीले काबा

माहे शाबान 2 हिजरी में बैतुल मुक़द्दस की तरफ़ से क़िबले का रूख़ काबे की तरफ़ मोड़ दिया गया। क़िबला चूंकि आलमे नमाज़ में बदला गया इस लिये आं हज़रत (स अ व व ) का साथ हज़रत अली (अ.स.) के अलावा और किसी ने नहीं दिया क्यों कि वह आं हज़रत (स अ व व ) के हर फ़ेल या क़ौल को हुक्में ख़ुदा समझते थे इसी लिये आप मक़ामे फ़ख़्र में फ़रमाया करते थे इन्ना मुसल्ली अल क़िबलतैन मैं ही वह हूं जिसने एक नमाज़ बयक वक़्त (एक ही समय) में दो क़िब्लों की तरफ़ पढ़ी।

जेहाद

जब क़ुरैश को मालूम हुआ कि रसूले इस्लाम (स अ व व ) बख़ैर व ख़ूबी मदीना पहुँच गये और उनका मज़हब दिन दूनी रात चौगनी तरक़्क़ी कर रहा है तो उनकी आख़ों में ख़ून उतर आया और दुनिया अंधेर हो गयी और वह मदिने के यहूदियों के साथ मिल कर कोशिश करने लगे कि इस बढ़ती हुई ताक़त को कुचल दें। इसके नतीजे में हज़रत को मुशरेक़ीन क़ुरैश और यहूदियों के सााथ बहुत सी देफ़ाई (आत्म रक्षक) लडा़ईयां लड़नी पड़ीं जिनमें से अहम मौक़ों पर हज़रत खुद फ़ौजे इस्लाम के साथ तशरीफ़ ले गये ऐसी मुहिमों को ग़ज़वा कहते है और जिन मौकों पर आप असहाब में से किसी को फ़ौज का सरदार बना कर भेज दिया करते थे उनको सरिया कहा जाता है। ग़ज़वात की कुल संख्या 26 है जिनमें बद्र , ओहद , खन्दक़ और हुनैन बहुत मशहूर हैं और सरियों की संख़्या 36 थी जिनमें सबसे मशहूर मौता है जिसमें हज़रते जाफ़रे तय्यार शहीद हुये।

जंगे बद्र

मदीना ए मुनव्वरा से तक़रीबन 80 मील पर बद्र एक गांव था। मदीने में ख़बर पहुँची कि क़ुरैश बड़ी आमादगी के साथ मदीने पर हमला करने वाले हैं और सुन्ने में आया कि अबू सुफ़ियान 30 सवारों के साथ हज़ार आदमियों के काफ़िले को ले कर शाम से व्यापार का सामान मक्के लिये जा रहा है और मदीने से गुज़रेगा। हज़रत रसूले खु़दा (स अ व व ) 313 साथियों के साथ रवाना हुये और मक़ामे बद्र पर जा उतरे। कु़रैश 950 आदमियों की टोली के साथ अबूू सुफ़ियान से मिलने के लिये रवाना हुये। लड़ाई हुई ख़ुदा ने मुसलमानों को मदद दी , जिससे इनको जीत हुई। 70 कुफ़्फ़ार मारे गये और 70 ही गिरफ़्तार हुए। 36 काफ़िरों को हज़रत अली (अ.स.) ने क़त्ल किया। इस लडा़ई में अबू जेहेल और उसका भाई आस और अतबा , शैबा , वलीद बिन अतबा और इस्लाम के बहुत से दुश्मन मारे गये। इस पहली इस्लमी जंग के अलम बरदार हज़रत अली (अ.स.) थे। क़ैदियों में नसर बिन हारिस और ओक़ब बिन अबी मूईत क़त्ल कर दिये गये और बाक़ी लोगों को ज़रे फ़िदया (फ़िदये का पैसा) ले कर छोड़ दिया गया। हज़रत अबू बक्र ने इस ग़ज़वे में जंग नहीं की। ग़ज़वाए बद्र के बाद कुफ़्फ़ार का घर घर मातम कदा बन गया और मरने वालों के बदले का जज़बा (भावनाएं) मक्के के बूढ़े और जवानों में पैदा हो गया जिसके नतीजे में ओहद की जंग हुयी।

यह जंग रमज़ान के महीने 2 हिजरी में हुई। इसी 2 हिजरी में रोज़े फ़र्ज़ किये गये। ईद उल फ़ित्र के अहकाम (नियम) लागू हुये और ग़ज़वाए बनू क़ैनक़ा से वापसी पर ईद अल अज़हा के आदेश आये और ख़ुम्स वाजिब किया गया।

3हिजरी के अहम वाके़यात

जंगे ओहद

जंगे बद्र का बदला लेने के लिये अबू सुफ़ियान ने तीन हज़ार ( 3000) की फ़ौज से मदीने पर चढ़ाई की। एक हिस्से का अकरमा इब्ने अबी जेहेल और दूसरे का ख़ालिद बिन वलीद सरदार था। आं हज़रत (स अ व व ) के साथ पूरे एक हज़ार आदमी भी न थे। ओहद पर लड़ाई हुई जो मदीने से 6 मील की दूरी पर है। आं हज़रत (स अ व व ) ने मुसलमानों को ताकीद कर दी थी कि कामयाबी के बाद भी पुश्त (पीछे) के तीर अंदाज़ों का दस्ता अपनी जगह से न हटे , मुसलमानों की जीत होने को थी ही कि तीर अंदाज़ों का वही दस्ता जिसके हटने को मना किया था ख़ुदा और रसूल (स अ व व ) के हुक्म की खि़लाफ़ वरज़ी करके माले ग़नीमत (जंग जीतने पर प्राप्त धन दौलत) की लालच में अपनी जगह से हट गया जिसके नतीजे में निश्चित जीत हार में बदल गई। हज़रत हमज़ा असद उल्लाह शहीद हो गये , मैदान में भगदड़ पड़ गई , बड़े बड़े पहलवान और अपने को बहादुर कहने वाले मैदाने जंग छोड़ कर भाग गये और किसी ने रसूले इस्लाम (स अ व व ) की ओर ध्यान न दिया। तारीख़ में है कि तमाम सहाबा रसूले ख़ुदा (स अ व व ) को मैदाने में जंग में छोड़ कर भाग गये। बरवायते अल याक़ूबी की पृष्ठ 39 की रवायत के अनुसार केवल तीन सहाबी रह गये जिनमें हज़रत अली (अ.स.) और दो और थे। बुख़ारी की रवायत के अनुसार हज़रत अबू बकर और हज़रत उमर और हज़रत उस्मान भी भाग निकले। दुर्रे मन्शूर जिल्द 2 पृष्ठ 88 कंज़ुल आमाल जिल्द 1 पृष्ठ 238 में है कि हज़रत अबू बकर पहाड़ की चोटी पर चढ़ गये थे वह कहते हैं कि मैं चोटी पर इस तरह उचक रहा था जैसे पहाड़ी बकरी उचकती है। क़ुराने मजीद में है कि यह सब भाग रहे थे और रसूल (स अ व व ) चिल्ला रहे थे कि मुझे अकेला छोड़ कर कहां जा रहे हो मगर कोई पलट कर नहीं देखता था।(पारा 4 रूकू 7 आयत 153 ) एक दुश्मन ने गोफ़ने में पत्थर रख कर आं हज़रत (स अ व व ) की तरफ़ फेंका जिसकी वजह से आपके दो दांत शहीद हो गये और माथे पर काफ़ी चोटें आईं। तलवारे लगने के कारण कई घाव भी हो गये और आप (स अ व व ) एक गढ़े में गिर पड़े। जब सब भाग रहे थे , उस समय हज़रत अली (अ.स.) जंग कर रहे थे और रसूल (स अ व व ) की हिफ़ाज़त भी कर रहे थे। आखि़र कार कुफ़्फ़ार को हटा कर आं हज़रत (स अ व व ) को पहाडी़ पर ले गये। रात हो चुकी थी दूसरे दिन सुबह के वक़्त मदीने को रवानगी हुई। इस जंग में 70 मुसलमान मारे गये और 70 ही ज़ख़्मी हुए और कुफ़्फ़ार सिर्फ़ 30 क़त्ल हुये जिनमें 12 काफ़िर अली के हाथ क़त्ल हुये। इस जंग में भी अलमदारी का ओहदा (पद) शेरे ख़ुदा हज़रत अली (अ.स.) के ही सुपुर्द था।

मुवर्रेख़ीन का कहना है कि हज़रत अली (अ.स.) महवे जंग रहे आपके जिस्म पर सोलह ज़र्बे लगीं और आपका एक हाथ टूट गया था। आप बहुत ज़ख़्मी होने के बावजूद तलवार चलाते और दुश्मनों की सफ़ों को उलटते जाते थे।(सीरतुन नबी जि 0 1 पृष्ठ 277 ) इसी दौरान में आं हज़रत (स अ व व ) ने फ़रमाया अली तुम क्यो नहीं भाग जाते ? अर्ज़ की मौला क्या ईमान के बाद कुफ्ऱ इख़्तेयार कर लूँ।(मदारिज अल नबूवत) मुझे तो आप पर क़ुर्बान होना है। इसी मौक़े पर हज़रत अली (अ.स.) की तलवार टूटी थी और जु़ल्फ़ेक़ार दस्तयाब हुई थी।(तारीख़ तबरी जिल्द 4 पृष्ठ 406 व तारीख़े कामिल जिल्द 2 पृष्ठ 58 )

नादे अली का नुज़ूल भी एक रवायत की बिना पर इसी जंग में हुआ था। मुवर्रेख़ीन का कहना है कि आं हज़रत (स अ व व ) के ज़ख़्मी होते ही किसी ने यह ख़बर उड़ा दी कि आं हज़रत (स अ व व ) शहीद हो गये। इस ख़बर से आपके फ़िदाई मक़ामे ओहद पर पहुँचे जिनमें आपकी लख़्ते जिगर हज़रत फातेमा (स अ व व ) भी थीं।

क्सीर तवारीख़ में है कि दुश्मनाने इस्लाम की औरतों ने मुस्लिम लाशों के साथ बुरा सुलूक किया। अमीरे माविया की मां ने मुसलमान लाशों के नाक कान काट लिये और उनका हार बना कर अपने गले में डाला और अमीर हमज़ा का जिगर निकाल कर चबाया। इसी लिये मादरे माविया हिन्दा को जिगर ख़्वारा (जिगर खाने वाली) कहते हैं।

मदीना मातम कदा बन गया

अल्लामा शिब्ली लिखते हैं कि आं हज़रत (स अ व व ) मदीने में तशरीफ़ लाये तो तमाम मदीना मातम कदा था। आप जिस तरफ़ से गुज़रते थे घरों से मातम की आवाज़ें आती थीं। आपको इबरत हुई कि सबके रिश्तेदार मातम दारी का फ़र्ज़ अदा कर रहे हैं लेकिन हमज़ा का कोई नौहा ख़्वां नहीं है। रिक़्क़त के जोश में आपकी ज़बान से बे इख़्तेयार निकला अमा हमज़ा फ़लाबोवा क़ी लहा अफ़सोस हमज़ा को रोने वाला कोई नहीं। अन्सार ने अल्फ़ाज़ सुने तो तड़प उठे। सबने जा कर अपनी औरतों को हुक्म दिया कि वह हुज़ूर के दौलत कदे पर जा कर हज़रत हमज़ा का मातम करें। आं हज़रत (स अ व व ) ने देखा तो दरवाज़े पर परदा नशीनान की भीड़ थी और हमज़ा का मातम बलन्द था। इनके हक़ में दुआए ख़ैर की और फ़रमाया कि मैं तुम्हारी हमदर्दी का शुक्र गुज़ार हूँ।(सीरतुन नबी जिल्द न 0 1 पृष्ठ न 0 283 ) यह जंग मंगल के दिन 15 शव्वाल 3 हिजरी में हुई। हज़रत इमाम हसन (अ.स.) पैदा हुए और रसूले ख़ुदा (स अ व व ) का निकाह हफ़सा बिन्ते उम्र के साथ हुआ। और ग़ज़्वाए (अहमर अल असद) के लिये आप बरामद हुये। हज़रत अली (अ.स.) अलमबरदार थे।

4हिजरी के अहम वाक़ेयात

मोहर्रम 4 हिजरी में बनी असद ने मदीने पर हमला करना चाहा जिसे रोकने के लिये आपने अबू सलमा को भेजा उन्होंने दुश्मनों को मार भगाया। फिर सुफ़ियान बिन ख़ालिद ने हमले का इरादा किया जिसके मुक़ाबले के लिये अब्दुल्लाह इब्ने अनीस भेजे गये।

वाक़ये बैरे मऊना

सफ़र 4 हिजरी में अबू बरा आमिर बिन मालिक क़लाबी की दरख़्वास्त पर आं हज़रत (स अ व व ) ने 70 अंसार को तबलीग़ के लिये उन्हीं के साथ रवाना किया। यह लोग मक़ामे बैरे मऊना पर ठहरे जो मदीने से 4 मंज़िल के फ़ासले पर वाक़े है और एक शख़्स आमिर बिन तुफ़ैल के पास भेजा उसने क़ासिद को क़त्ल कर दिया फिर एक बड़ा लश्कर भेज कर मौत के घाट उतार दिया।

ग़ज़वा बनी नुज़ैर

उमर बिन उमैया ने क़बीलाए आमिर के दो आदमी क़त्ल कर दिये थे और उनका ख़ून बहा अब तक बाक़ी था। तबरी की रवायत के अनुसार आं हज़रत (स अ व व ) उसके मुतालिबे के लिये कुछ असहाब के साथ बनी नुज़ैर के पास गये उन्होंने मुतालिबा तो क़ुबूल कर लिया मगर आपको क़त्ल कर देने का यह ख़ुफ़िया प्रोग्राम बनाया कि एक शख़्स कोठे पर जा कर एक भारी पत्थर आप पर गिरा दे। चुनान्चे उमर बिन हज्जाश यहूदी बाला ख़ाने पर गया हज़रत को इसकी इत्तेला मिल गई और आप वहां से मदीना तशरीफ़ ले आये। बनी नुज़ैर एक क़िले में रहते थे जिसका नाम ज़हरा था। यह क़िला मदीने से 3 मील के फ़ासले पर था। हज़रत ने इसकी इस ग़लत हरकत की वजह से जिला वतनी का हुक्म दे दिया। आपने कहला भेजा कि 10 दिन के अन्दर यह जगह ख़ाली करो। उन्होंने अब्दुल्लाह बिन अबी खि़रजी मुनाफ़िक़ के बहकाने से बात न मानी क़िले का घिराव कर लिया गया आखि़र वह लोग 6 दिन में वहां से भाग गये।

ग़ज़वा ज़ातुल रूक़ा

इसी 4 हिजरी जमादिल अव्वल के महीने में क़बीलाए इनमारो साअलबता और ग़त्फ़न ने मदीने पर हमला करना चाहा आं हज़रत (स अ व व ) असहाब को ले कर उनको आगे बढ़ने से रोकने के लिये आगे बढ़े लेकिन वह सामने न आये और भाग निकले। इसी मौक़े पर एक शख़्स ने क़त्ल के इरादे से आं हज़रत (स अ व व ) से तलवार मांगी थी और आपने दे दी थी , मगर वह क़त्ल की हिम्मत न कर सका।(अबुल फ़िदा जिल्द 2 पृष्ठ 88 ) इसी 4 हिज़री मे ग़ज़वा बद्र सानी (दूसरी बद्र) भी पेश आया लेकिन जंग नहीं हुई। इस ग़ज़वे में भी हज़रत अली (अ.स.) अलम बरदार थे। इसी साल शाबान के महीने में हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) पैदा हुए और उम्मे सलमा (र.) का रसूले करीम (स अ व व ) के साथ अक़्द हुआ और फातेमा बिन्ते असद ने वफ़ात पाई।

5हिजरी के अहम वाक़ेयात

जंगे ख़न्दक़ इस जंग को ग़ज़वाए अहज़ाब भी कहते हैं। यह जंग ज़ीका़द 5 हिजरी में वाक़े हुई। इसकी तफ़सील के मुतालुक़ अरबाबे तवारीख़ लिखते हैं कि मदीने से निकाले हुए बनी नुज़ैर के यहूदी जो ख़ैबर में ठहरे हुए थे वह शब व रोज़ और सुबह शाम मुसलमानों से बदला लेने के लिये इसकीमे बनाया करते थे। वह चाहते थे की कोई ऐसी शक्ल पैदा हो जाए कि जिससे मुसलमानों का तुख़म तक न रहे। चुनान्चे उसमें से कुछ लोग मक्का चले गये और अबू सुफ़ियान को बुला कर बनी ग़तफ़ान और क़ैस से रिश्तए अख़ूवत क़ाएम कर लिया और एक मोआहेदे में यह तय किया कि हर क़बीले के सूरमा इकठ्ठा हो कर मदीने पर हमला करें ताकि इस्लाम की बढ़ती हुई ताक़त का क़ला क़मा हो जाए। स्कीम मुकम्मल होने के बाद इसको अमली जामा पहनाने के लिये अबू सुफ़ियान 4 हज़ार का लश्कर ले कर मक्का से निकला और यहूदियों के दीगर क़बाएल ने 6 हज़ार के लश्कर से पेश क़दमी की ग़रज़ कि 10 हज़ार की जमीयात मदीने पर हमला करने के इरादे से आगे बढ़ी।

आं हज़रत को इस हमले की इत्तेला पहले हो चुकी थी इसी लिये आपने मदीने से निकल कर कोहे सिला को पुश्त पर ले लिया और जनाबे सलमाने फ़ारसी की राय से पांच गज़ चौड़ी और पांच गज़ गहरी ख़न्दक खुदवाई और ख़न्दक़ खोदने में खुद भी कमाले जां फ़िशानी के साथ लगे रहे। इस जंग में अन्दरूनी ख़लफ़िशार और मुनाफ़िको की रेशादवानियां भी जारी रहीं। जलालउद्दीन स्यूती का कहना है कि अन्दरूनी हालात की हिफ़ाज़त के लिये आं हज़रत (स अ व व ) ने अबू बकर फिर उमर को भेजना चाहा लेकिन इन हज़रात के इन्कार कर देने की वजह से हज़रत ने हुज़ैफ़ा को भेजा।

(दुर्रे मन्शूर जिल्द 5 पृष्ठ 185 )

ख़न्दक़ की खुदाई का काम 6 रोज़ तक जारी रहा। ख़न्दक़ तैयार हुई ही थी कि कुफ़्फ़ार का एक बड़ लश्कर आ पहुँचा। लश्कर की कसरत देख कर मुसलमान घबरा गये। कुफ़्फ़ार यह हिम्मत तो न कर सके कि मुसलमानों को एक दम से हमला कर के तबाह कर देते लेकिन इक्का दुक्का ख़न्दक़ पर कर के हमला करने की कोशिश करते रहे और यह सिलसिला 20 दिन तक चलता रहा। एक दिन अम्र बिन अबदोवुद जो कि लवी बिन ग़ालिब की नस्ल से था और अरब में एक हज़ार बहादुरों के बराबर माना जाता था ख़न्दक़ फांद कर लश्करे इस्लाम तक आ पहुँचा और हल मिन मुबारिज़ की सदा दी। अम्र बिन अबदोवुद की आवाज़ सुनते ही उमर बिन ख़त्ताब ने कहा कि यह तो अकेला एक हज़ार डाकुओं का मुक़ाबला करता है यानी बहुत ही बहादुर है। यह सुन कर मुसलमानों के रहे सहे होश भी जाते रहे। पैंग़म्बरे इस्लाम (स अ व व ) ने इसके चैलेंज पर लश्करे इस्लाम को मुख़ातिब कर के मुक़ाबले की हिम्मत दिलाई लेकिन एक नौजवान बहादुर के अलावा कोई न सनका। तारीख़े ख़मीस रौज़तुल अहबाब और रौज़तुल पृष्ठ में है कि तीन मरतबा आं हज़रत (स अ व व ) ने अपने असहाब को मुक़ाबले के लिये निकलने की दावत दी मगर हज़रत अली (अ.स.) के सिवा कोई न बोला। तीसरी मरतबा आपने अली (अ.स.) से कहा कि यह अम्र अबदवुद है आपने अर्ज़ कि मैं भी अली इब्ने अबी तालिब हूँ।

अल ग़रज़ आं हज़रत (स अ व व ) ने हज़रत अली (अ.स.) को मैदान में निकलने के लिये तैयार किया। आपने ज़ेरह पहनाई अपनी तलवार कमर में डाली , अपना अमामा अपने हाथों से अली (अ.स.) के सर पर बांधा और दुआ के लिये हाथ उठा कर अर्ज़ की , ख़ुदाया जंगे बद्र में उबैदा को , जंगे ओहद में हमज़ा को दे चुका हूँ पालने वाले अब मेरे पास अली (अ.स.) रह गये हैं मालिक ऐसा न हो कि आज इनसे भी हाथ धो बैठूं। दुआ के बाद अली (अ.स.) को पैदल रवाना किया और साथ ही साथ कहा बरज़ल ईमान कुल्लहू इल्ल कुफ़्र कुल्लहू आज कुल्ले ईमान कुल्ले कुफ्र के मुक़ाबले में जा रहा है।(हयातुल हैवान जिल्द 1 पृष्ठ 238 व सीरते मोहम्मदिया जिल्द 2 पृष्ठ 102 )

अल ग़रज़ आप रवाना हो कर अम्र के मुक़ाबले में पहुँचे। अल्लामा श्ब्लिी का कहना है कि हज़रत अली (अ.स.) ने अम्र से पूछा के क्या सच में तेरा यह क़ौल है कि मैदाने जंग में अपने मुक़ाबिल की तीन बातों में से एक बात ज़रूर क़ुबूल करता है। उसने कहा हां। आपने फ़रमाया कि अच्छा इस्लाम क़ुबूल कर उसने कहा ना मुम्किन फिर फ़रमाया ! अच्छा मैदाने जंग से वापस जा उसने कहा यह भी नहीं हो सकता फिर फ़रमाया ! अच्छा घोड़े से उतर आ और मुझ से जंग कर वह घोड़े से उतर पड़ा , लेकिन कहने लगा मुझे उम्मीद न थी कि आसमान के नीचे कोई शख़्स भी मुझसे यह कह सकता है जो तुम कह रहे हो , मगर देखो मैं तुम्हारी जान नहीं लेना चाहता। ग़रज़ जंग शुरू हो गई और सत्तर वारों की नौबत आई , बिल आखि़र उसकी तलवार अली (अ.स.) के सिपर काटती हुई सर तक पहुँची। हज़रत अली (अ.स.) ने जो संभल कर हाथ मारा तो अम्र बिन अब्दवुद ज़मीन पर लोटने लगा। मुसलमानों को इस दस्त ब दस्त लड़ाई की बड़ी फ़िक्र थी। हर एक दुआऐं मांग रहा था। जब अम्र से हज़रत अली (अ.स.) लड़ रहे थे तो ख़ाक इस क़दर उड़ रही थी कि कुछ नज़र न आता था गरदो ग़ुबार में हाथों की सफ़ाई तो नज़र न आई हां तकबीर की आवाज़ सुन कर मुसलमान समझे की अली (अ.स.) ने फ़तेह पाई।

अम्र बिन अब्दवुद मारा गया और उसके साथी ख़न्दक़ कूद कर भाग निकले। जब फ़तेह की ख़बर आं हज़रत (स अ व व ) तक पहुँची तो आप ख़ुशी से बाग़ बाग़ हो गये। इस्लाम की हिफ़ाज़त और अली (अ.स.) की सलामती की ख़ुशी में आपने फ़रमाया ज़रबते अली यौमुल ख़न्दक़ अफ़ज़ल मिन इबादतुल सक़लैन आज की एक ज़रबते अली (अ.स.) मेरी सारी उम्मत वह चाहे ज़मीन में बस्ती हो या आसमान में रहती हो की तमाम इबादतों से बेहतर है।

बाज़ किताबों में है कि अम्र बिन अब्द वुद के सीने पर हज़रत अली (अ.स.) सवार हो कर सर काटना ही चाहते थे कि उसने चेहराए अक़दस पर लोआबे देहन से बे अदबी की हज़रत को ग़ुस्सा आ गया , आप यह सोच कर फ़ौरन सीने से उतर आये कि कारे ख़ुदा में जज़्बाए नफ़्स शामिल हो रहा था , जब ग़ुस्सा ख़त्म हुआ तब सर काटा और ज़िरह उतारे बग़ैर खि़दमते रिसालत माआब में जा पहुँचे। आं हज़रत (स अ व व ) ने हज़रत अली (अ.स.) को सीने से लगा लिया। जिब्राईल ने बरावायत सुलैमान क़नदूज़ी , आसमान से अनार ला कर तोहफ़ा इनायत किया। जिसमें हरे रंग का रूमाल था और उस पर अली वली अल्लाह लिखा हुआ था।

हज़रत अली (अ.स.) मैदाने जंग से कामयाबो कामरान वापस हुये और अम्र बिन अब्द वुद की बहन भाई की लाश पर पहुँची और खोदो ज़िरह बदस्तूर उसके जिस्म पर देख कर कहा मा क़त्लहा अला कफ़वुन करीम इसे किसी बहुत ही मोअजज़िज़ (आदरणीय) बहादुर ने क़त्ल किया है। उसके बाद कुछ शेर पढ़े जिनका मतलब यह है कि ऐ अम्र ! अगर तुझे इस क़ातिल के अलावा कोई और क़त्ल करता तो मैं सारी उम्र (जीवन भर) तुझ पर रोती। माआरेजुन नबूवता और रौज़ातुल पृष्ठ में है कि फ़तेह के बाद जब हज़रत अली (अ.स.) वापस हुए तो हज़रत अबू बकर और उमर ने उठ कर आपकी पेशानी मुबारक को बोसा दिया।


ग़ज़वाए बनी मुस्तलक़ और वाकिए अफ़क़

आं हज़रत (स अ व व ) को इत्तेला मिली कि क़बीलाए मुस्तलक़ मदीने पर हमला करना चाहता है। आपने उसे रोकने के लिये 2 शाबान 5 हिजरी को इनकी तरफ़ बढ़े। हज़रत अली (अ.स.) अलमदारे लशकर थे। घमासान की जंग हुई , मुसलमान कामयाब हुए। वापसी के मौक़े पर हज़रत आयशा इसी जंगल में रह गईं। जो बाद में एक शख़्स सफ़वान इब्ने माअतल के साथ ऊँट पर बैठ कर आं हज़रत (स अ व व ) तक पहुँची। आं हज़रत (स अ व व ) ने इसे महसूस किया और लोगों ने शुकूक का चरचा कर दिया। बारवायत तारीख़े आइम्मा आं हज़रत (स अ व व ) को भी शक हो गया था और आप कुछ समय तक कशीदा (नाराज़) रहे फिर फ़रमाया मुझे जहां तक मालूम है मैं अपनी बीवी में सिवाय नेकी और भलाई कुछ नहीं पाता और जिस मर्द यानी सफ़वान इब्ने माअतल के बारे में जो लोग चरचा करते हैं मैं इसमें भी किसी तरह की ख़राबी नहीं पाता , वह बे शक मेरे घर में आमदो रफ़्त रखता था मगर हमेशा मेरे हुज़ूर में।(उम्मेहात अल उम्मा पृष्ठ 166 )

इसी 5 हिजरी में ग़ज़वाए बनी क़ुरैज़ा , सरया , सैफ़ अल बहर , ग़ज़वए बनी अयान भी वाक़े हुए हैं और तयम्मुम का हुक्म भी नाज़िल हुआ है और बक़ौल मुहीउद्दीन इब्ने अरबी इसी 5 हिजरी में सफ़रे ख़न्दक़ के मौक़े पर आं हज़रत (स अ व व ) ने ख़ुद अज़ान में हय्या अला ख़ैरिल अमल का हुक्म दिया। किबरियत अहमर बर हाशिया अल वियाक़ियत वल जवाहर , जिल्द 1 पृष्ठ 43 व मोअल्लिमे तरजुमा मुस्लिम पृष्ठ 528 व कनज़ुल आमाल जिल्द 4 पृष्ठ 226 वाज़े हो कि हय्या अला ख़ैरिल अमल रसूले करीम (स अ व व ) की तशकीले अजां का जुज़ है लेकिन हज़रत उमर ने उसे अपने अहद में अज़ान से ख़ारिज (निकाल) कर दिया। मुलाहेज़ा हो(नील अल वतारा , इमामे शोकानी जिल्द 1 पृष्ठ 339 व सही मुस्लिम मुतारज्जिम जिल्द 2 पृष्ठ 10 )

6हिजरी के अहम वाक़ेयात

सुलैह हुदैबिया ज़ीक़ाद 6 हिजरी मुताबिक़ 628 ई 0 में आं हज़रत (स अ व व ) हज के इरादे से मक्के की तरफ़ चले , कु़रैश को ख़बर हुई तो जाने से रोका , हज़रत एक कुएं पर जिसका हुदैबिया नाम था रूक गए और असहाब से जां निसारी की बैअत ली। इसी को बैत अल रिज़वान कहते हैं और बैअत करने वालों को असहाबे सुमरा से ताबीर किया जाता है। क़ुरैश के ऐलची उरवा ने कहा कि इस साल हज से बाज़ आएं और यह भी कहा कि मैं आपके हमराह ऐसे लोग देख रहा हूँ जो ओबाश हैं और जंग से भाग निकलेंगे यह सुन कर हज़रत अबू बकर ने बज़रआलात चूसने की गाली दी। इसके बाद आं हज़रत (स अ व व ) बारवायत इब्ने असीर हज़रत उमर को क़ुरैश के पास इस लिये बेजना चाहा कि वह उन्हें समझा बुझा कर सुलह करने पर राज़ी कर लें लेकिन वह ना गए और हज़रत उस्मान को भेजने की राय दी हज़रत उस्मान जो अबू सुफ़ियान के भतीजे थे इनके पास गए इनकी अच्छी तरह आव भगत हुई लेकिन आखि़र में गिरफ़्तार हो गए और जल्दी छूट कर चले गए। आखि़र अम्र क़ुरैश की तरफ़ से पैग़ामे सुलह लाया और हज़रत ने सुलह कर ली। सुलह नामा हज़रत अली (अ.स.) ने लिखा है। तरफ़ैन से शाहदते ले ली गईं। इस सुलह के बाद क़ुरैश बे खटके मुसलमान होने लगे और मक्के में बिला मज़ाहमत क़ुरान पढ़ा जाने लगा क्यों कि अमन क़ाएम हो गया और रसूल (स अ व व ) का नाम लेना जुर्म न रहा। एक दूसरे से मिलने लगे और इस्लाम का नया दौर शुरू हो गया। (तारीखे़ ख़मीस जिल्द 2 पृष्ठ 15 और दुर्रे मन्शूर जिल्द 6 पृष्ठ 77 में है कि सुलैह हुदैबिया के बाद हज़रत उमर ने कहा कि मोहम्मद (स अ व व ) की नबूवत में जैसा मुझे आज शक हुआ है कभी नहीं हुआ था। यह उन्होंने इस लिये कहा कि वह सुलह पर राज़ी न थे। इब्ने ख़ल्दून का बयान है कि इनके इस तरज़े अमल से हज़रत रसूले ख़ुदा (स अ व व ) सख़्त रंजीदा हुए।(तारीखे़ इब्ने ख़ल्दून पृष्ठ 361 )

तारीख़े इस्लाम एहसान उल्लाह अब्बासी में है कि हुदैबिया से वापस होते हुए रास्ते मे सूरा ए इन्ना फ़तैहना लका फ़तैहना मुबीनन नाज़िल हुआ। इसी साल ग़ज़वह ज़ी क़रद , सरया दो मताउल जिन्दल , सरया फ़िदक़ , सरया वादिउल क़ुरा और सरया अरनिया भी वाक़े हुये हैं।

इसी 6 हिजरी में हज़रत रसूले करीम (स अ व व ) ने ज़ैद बिन हारेसा की ज़ेरे सर करदगी चालीस आदमियों की एक जमाअत हमूम की तरफ़ रवाना की जिसने क़बीलाए मुज़ीना की औरत हलीमा और उसके शौहर को गिरफ़्तार कर के आपकी खि़दमत में हाज़िर किया आपने मियां बीवी दोनों को आज़ाद कर दिया।(तारीख़े कामिल बिन असीर जिल्द 2 पृष्ठ 78 व अल रक़ फ़िल इस्लाम , लेखक अतीक़ुर रहमान उस्मानी जिल्द 1 पृष्ठ 107 )

7हिजरी के अहम वाक़ेयात

जंगे ख़ैबर ख़ैबर मदीनए मुनव्वरा से तक़रीबन 50 मील के फ़ासले पर यहूदियों की बस्ती थी। इसके बाशिन्दे यूंही इस्लाम के ऊरूज व इक़बाल से जल भुन रहे थे कि मदीने में जिला वतन यहूदियों ने उनसे मिल कर उनके हौसले बलन्द कर दिये उन्होंने बनी असद और बनी ग़तफ़ान के भरोसे पर मदीने को तबाह व बरबाद कर डालने का मन्सूबा बांधा और उसके लिये मुकम्मल फ़ौजे तैय्यार लीं। जब आं हज़रत (स अ व व ) को उनके अज़मो इरादे की ख़बर हुई तो आप 14 सफ़र 7 हिजरी को चौदह सौ ( 1400) पैदल और दो सौ ( 200) सवार ले कर फ़ितने को ख़त्म करने के लिये मदीने से बरामद हुए और ख़ैबर में पहुँच कर क़िला बन्दी कर ली और मुसलमान उन्हें घेरे में ले कर बराबर लड़ते रहे लेकिन क़िलै क़मूस फ़तेह न हो सका।

तारीख़े तबरी व ख़मीस और शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 85 में है कि आं हज़रत (स अ व व ) ने क़िला फ़तेह करने के लिये हज़रत उमर को भेजा फिर हज़रत अबू बकर को रवाना किया उसके बाद फिर हज़रत उमर को हुक्मे जिहाद दिया लेकिन यह हज़रात नाकाम वापस आये। (तारीख़े तबरी जिल्द 3 पृष्ठ 93 में है कि तीसरी मरतबा जब अलमे इस्लाम पूरी हिफ़ज़त के साथ आं हज़रत (स अ व व ) की खि़दमत में पहुँच रहा था रास्ते में भागते हुए लश्कर वालों ने सिपहे सालार की बुज़दिली पर इजमा कर लिया और सालारे लश्कर इन लशकरियों को बुज़दिल कह रहा था। इन हालात को देखते हुए आं हज़रत (स अ व व ) ने फ़रमाया! कल मैं अलमे इस्लाम ऐसे बहादुर को दूंगा जो मर्द होगा और बढ़ बढ़ कर हमले करने वाला होगा और किसी हाल में भी मैदाने जंग से न भागे गा। वह ख़ुदा व रसूल को दोस्त रखता होगा और खुदा व रसूल उसको दोस्त रखते होगें और वह उस वक़्त तक मैदान से न पलटे गा जब तक ख़ुदा वन्दे आलम उसके दोनों हाथों पर फ़तेह न दे देगा।

पैग़म्बरे इस्लाम (स अ व व ) के इस फ़रमाने से अहले इस्लाम में एक ख़ास कैफ़ियत पैदा हो गई और हर एक के दिल में यह उमंग आ मौजूद हुई कि कल अलमे इस्लाम किसी सूरत से मुझे ही मिलना चाहिये। (तबरी जिल्द 3 पृष्ठ 93 में है कि हज़रत उमर कहते हैं कि मुझे सरदारी का हैसला आज के रोज़ से ज़्यादा कभी न हुआ था। मुवर्रिख़ का बयान है कि तमाम असहाब ने बहुत ही बेचैनी में रात गुज़ारी और सुबह होते ही अपने को आं हज़रत (स अ व व ) के सामने पेश किया। असहाब को अगरचे उम्मीद न थी लेकिन बताये हुए सिफ़ात का तक़ाज़ा था कि अली (अ.स.) को आवाज़ दी जाए , कि नागाह ज़बाने रिसालत (स अ व व ) से अयना अली इब्ने अबू तालिब की आवाज़ बलन्द हुई , लोगों ने हुज़ूर वह तो आशोबे चश्म में मुब्तिला हैं , आ नहीं सकते। हुक्म हुआ कि जा कर कहो कि रसूले ख़ुदा (स अ व व ) बुलाते हैं। पैग़ाम पहुँचाने वाले ने रसूल (स अ व व ) की आवाज़ हज़रत अली (अ.स.) के कानों तक पहुँचाइ और आप उठ ख़ड़े हुए। असहाब के कंधों का सहारा ले कर आं हज़रत (स अ व व ) की खि़दमत में हाज़िर हुए। आपने अली (अ.स.) का सर अपने ज़ानू पर रखा और बुख़ार उतर गया। लुआबे दहन लगाया आशोबे चश्म जाता रहा। हुक्म हुआ अली मैदाने जंग में जाओ और क़िलाए क़मूस को फ़तेह करो। अली (अ.स.) ने रवाना होते ही पूछा हुज़ूर ! कब तक लडूँ़ और कब वापस आऊँ , फ़रमाया जब तक फ़तेह न हो।

हुक्मे रसूल (स अ व व ) पा कर अली (अ.स.) मैदान में पहुँचे। पत्थर पर अलम लगाया। एक यहूदी ने पूछा आपका नाम क्या है फ़रमाया अली इब्ने अबी तालिब उसने अपनों से कहा कि(तौरैत) की क़सम यह शख़्स ज़रूर जीत लेगा क्यों कि इस क़िले के फ़ातेह के जो सिफ़ात तौरैत में बयान किये गये हैं वह बिल्कुल सही हैं इसमें सब सिफ़ात पाए जाते हैं। अल ग़रज़ हज़रत अली (अ.स.) से मुक़ाबले के लिये लोग निकल ने लगे और फ़ना के घाट उतर ने लगे। सब से पहले हारिस ने जंग आज़माई की और एक दो वारों की रद्दो बदल में ही वासिले जहन्नम हो गया। हारिस चूंकि मरहब का भाई था इस लिये मरहब ने जोश में आ कर रजज़ कहते हुए आप पर हमला किया। आपने इसके तीन भाल वाले नैज़े के वार को रोक कर के ज़ुलफ़ेक़ार का ऐसा वार किया कि इससे आहनी खोद , सर और सीने तक दो टुकड़े हो गये। मरहब के मरने से अगरचे हिम्मतें ख़त्म हो गईं थीं लेकिन जंग जारी रही और अन्तर रबी यासिर जैसे पहलवान मैदान में आते और मौत के घाट उतरते रहे। आखि़र में भगदड़ मच गई। मुवर्रेख़ीन का कहना है कि जंग के बीच में एक शख़्स ने आपके हाथ पर एक ऐसा हमला किया कि सिपर छूट कर ज़मीन पर गिर गई और एक दूसरा यहूदी उसे ले भागा। हज़रत को जलाल आ गया आप आगे बढ़े और क़िला ख़ैबर के आहनी दर पर बायाँ हाथ रख कर ज़ोर से दबा दिया। आपकी उंगलियां उसकी चौखट में इस तरह दर आईं जैसे मोम में लौहा दर आता है। इसके बाद आपने झटका दिया और ख़ैबर के क़िले का दरवाज़ा जिसे चालीस आदमी हरकत न दे सकते थे , जिसका वज़न बरवायत मआरिज अल नबूवत आठ सौ मन और बरवायत रौज़तुल पृष्ठ तीन हज़ार मन था उख़ड़ कर आपके हाथ में आ गया और आपके इस झटके से क़िले में ज़लज़ला आ गया और सफ़ीहा बिन्ते हई इब्ने अख़्तब मुहँ के बल ज़मीन पर गिर पड़े। चूंकि यह अमल इन्सानी ताक़त के बाहर था इस लिये आपने फ़रमाया मैंने दरे क़िला ए ख़ैबर को कू़व्वते रब्बानी से उखाड़ा है। उसके बाद आपने उसे सिपर बनाकर जंग की और इसी दरवाज़े को पुल बना कर लशकरे इस्लाम को उस पर उतार लिया। मदारिज अल नबूवा जिल्द 2 पृष्ठ 202 में है कि जब मुकम्मल फ़तेह के बाद आप वापस तशरीफ़ ले गये तो पैग़म्बरे इस्लाम (स अ व व ) आपके इस्तेक़बाल के लिये निकले और अली (अ.स.) को सीने से लगा कर पेशानी पर बोसा दिया और फ़रमाया कि ऐ अली (अ.स.) खुदा और रसूल (स अ व व ) जिब्राईल व मिकाईल बल्कि तमाम फ़रिश्तें तुम से राज़ी व ख़ुश हैं। अल्लामा शेख़ ख़न्दूज़ी किताब नियाबुल मोअदता में लिखते हैं कि आं हज़रत (स अ व व ) ने यह भी फ़रमाया था कि ऐ अली (अ.स.) तुम्हें ख़ुदा ने वो फ़जी़लत दी है कि अगर मैं उसे बयान करता तो लोग तुम्हारी ख़ाके क़दम तबर्रूक समझ कर उठा कर रखते। तारीख़ में है कि फ़तेह खै़बर के दिन हुज़ूर (स अ व व ) को दोहरी ख़ुशी हुई थी। एक फ़तेह ख़ैबर की और दूसरी हबश से मराजेअते जाफ़रे तैयार की। कहा जाता है कि इसी मौक़े पर एक औरत जै़नब बिन्ते हारिस नामी ने आं हज़रत (स अ व व ) को भुने हुये गोश्त में ज़हर दिया था और इसी जंग से वापसी में सहाबा के मक़ाम पर रजअते शम्स हुई थी।(शवाहिद अल नबूवतः पृष्ठ 86, 87 )

हज़रत अली (अ.स.) के लिये रजअते शम्स

मुवर्रेख़ीन का बयान है कि जब आं हज़रत (स अ व व ) लश्कर समेत ख़ैबर से वापसी में मक़ामे वादी अल क़रा की तरफ़ जाते हुए मक़ामे सहाबा में पहुँचे और वहां ठहरे हुए थे तो एक दिन आप पर वही के नुज़ूल का सिलसिला ऐेसे वक़्त में शुरू हुआ कि सूरज डूबने से पहले ख़त्म न हुआ। हज़रत रसूले करीम (स अ व व ) हज़रत अली (अ.स.) की गोद में सर रखे हुए थे। जब वही का सिलसिला ख़त्म हुआ तो आं हज़रत (स अ व व ) ने हज़रत अली (अ.स.) से पूछा कि ऐ अली तुम ने नमाज़े अस्र भी पढ़ी या नहीं ? अर्ज़ की , मौला ! नमाज़ कैसे पढ़ता , आपका सरे मुबारक ज़ानू पर था और वही का सिलसिला जारी था। यह सुन कर हज़रत रसूले करीम (स अ व व ) ने दुआ के लिये हाथ बलन्द किये और कहा कि बारे इलाहा अली तेरी और तेरे रसूल (स अ व व ) की इताअत में था इसके लिये सूरज को पलटा दे ताकि यह नमाज़े अस्र अदा कर ले चुनान्चे सूरज पलट आया और अली (अ.स.) ने नमाज़े अस्र अदा की।(हबीब असीर , रौज़ातुल सफ़ा , रौजा़तुल अहबाब , शरहे शफ़ा क़ाज़ी अयाज़ , तारीख़े ख़मीस) बाज़ रवायात में है कि रसूले ख़ुदा (स अ व व ) ने अली (अ.स.) से फ़रमाया कि सूरज को हुक्म दो वह पलटे गा चुनान्चे अली (अ.स.) ने हुक्म दिया और सूरज पलट आया। अल्लामा अब्दुल हक़ मोहद्दिस देहलवी लिखते हैं यह हदीस रजअते शम्स सही है सुक़्क़ा रावियों से मरवी है। अल्लामा इक़बाल फ़रमाते हैं।

आं के दर आफ़ाक़ , गरद्द बूतुराब।

बाज़ गर दानद ज़े मग़रिब आफ़ताब।।

तबलीगी ख़ुतूत

हज़रत को अभी सुलेह हुदयबिया के ज़रिये से सुकून नसीब हुआ ही था कि आपने सात 7 हिजरी में एक मोहर बनवाई जिस पर मोहम्मद रसूल अल्लाह कन्दा कराया। इसके बाद दुनिया के बादशाहों को ख़त लिखे। इन दिनों अरब के इर्द गिर्द चार बड़ी सलतनतें क़ायम थीं।

1. हुकूमते ईरान जिसका असर मध्य ऐशिया से ईराक़ तक फैला हुआ था।

2. हुकूमते रोम जिसमें ऐशियाए कोचक , फ़िलिस्तीन , शाम और यूरोप के बाज़ हिस्से शामिल थे।

3. मिस्र।

4. हुकूमते हबश जो मिस्री हुकूमत के जुनूब से ले कर बहरे कुलजुम के मग़रबी साहिल पर हिजाज़ व यमन की तरह क़ायम थी और उसका असर सहराए आज़म अफ़रीक़ा के तमाम इलाक़ों पर था।

हज़रत ने बादशाहे हबश नजाशी , शाहे रोम , क़ैसर हरकुल , गर्वरने मिस्र जरीह इब्ने मीना क़िब्ती उर्फ़ मक़वुक़श बादशाहे इरान ख़ुसरो परवेज़ और गर्वनर यमन बाज़ान , वाली दमिश्क हारिस वग़ैरह के नाम ख़ुतूत रवाना फ़रमाये।

आपके ख़ुतूत का बादशाहों पर अलग अलग असर हुआ। नजाशी ने इस्लाम क़ुबूल कर लिया। शाहे इरान ने आपका ख़त पढ़ कर ग़ुस्से के मारे ख़त के टुकड़े कर दिये और ख़त ले कर आने वाले को निकाल दिया और गर्वनरे यमन को लिखा कि मदीने के दीवाने आं हज़रत (स अ व व ) को गिरफ़्तार कर के मेरे पास भेज दे। उसने दो सिपाही मदीने भेजे ताकि हुजू़र को गिरफ़्तार करें। हज़रत (स अ व व ) ने फ़रमाया , जाओ तुम क्या गिरफ़्तार करो गे , तुम्हें ख़बर भी है तुम्हारा बादशाह इन्तेक़ाल कर गया। सिपाही जो यमन पहुँचे तो सुना की शाहे ईरान मर चुका है। आपकी इस ख़बर देने से बहुत से काफ़िर मुसलमान हो गये। क़ैसरे रोम ने आपके ख़त की ताज़िम की। मिस्र के गर्वनर ने आपके क़ासिद की बड़ी आवभगत की और बहुत से तोफ़ो समेत उसे वापस कर दिया। इन तोहफ़ो में मारिया क़िब्तिया (आं हज़रत की पत्नी) और उनकी बहन शीरीं (जौजा ए हस्सान बिन साबित) एक दुलदुल नामी घोड़ा हज़रत अली (अ.स.) के लिये , याफ़ूर नामी दराज़ गोश माबूर नामी ख़्वाजा सरा शामिल थे।

हुसूले फ़िदक़

फ़िदक ख़ैबर के इलाक़े में एक क़रिया (गांव) है। फ़तेह ख़ैबर के बाद आं हज़रत (स अ व व ) ने अली (अ.स.) को फ़ेदक वालों की तरफ़ भेजा और हुक्म दिया कि उन्हें दावते इस्लाम दे कर मुसलमान करें। इन लोगों ने इस बात पर सुलह करनी चाही कि आधी ज़मीन आं हज़रत को दे दें और आधी पर ख़ुद क़ाबिज़ रहें। हज़रत ने उसे मंज़ूर फ़रमाया लिया। तबरी जिल्द 3 पृष्ठ 95 में है कि चूंकि यह फ़ेदक बग़ैर जंगों जेदाल मिला था इस लिये आं हज़रत (स अ व व ) की मिलकियत क़रार पाया। दुर्रे मन्शूर जिल्द 7 पृष्ठ 177 में है कि फ़ेदक के क़ब्ज़े में आते ही हुक्मे ख़ुदा नाज़िल हुआ वात जिल क़ुरबा हक़्क़ा अपने क़राबत दार को हक़ दे दो। शरह मवाक़िफ़ के पृष्ठ 735 में है कि आं हज़रत (स अ व व ) ने आताहा फ़ेदक तख़लता फ़ातमा ज़ैहरा (स अ व व ) को बतौरे अतिया फ़ेदक़ दे दिया। रौज़तुल पृष्ठ जिल्द 2 पृष्ठ 377, मआरिज अल नबूवता पैरा 4 पृष्ठ 221 में है कि आं हज़रत (स अ व व ) ने तहरीरी तसदीक़ नामा यानी बज़रिये दस्तावेज़ जायदाद फ़ेदक़ जनाबे सैय्यदा (स अ व व ) के नाम हिबा कर दी। यही कुछ सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 21, 22, वफ़ा अल वफ़ा जिल्द 2 पृष्ठ 63, फ़तावे अज़ीजी़ पृष्ठ 143, रौज़ातुल पृष्ठ जिल्द 2 पृष्ठ 135 जिल्द 1 पृष्ठ 85 मारिज अल नबूवत मुईन कशफ़ी रूकन 4 पृष्ठ 221, मोअजम अल बलदान में इस ज़मीन को बहुत उपजाऊ बताया गया है और कहा गया है कि यह ज़मीन बहुत से चश्मों से सेराब होती थी। इसमें काफ़ी बागा़त भी थे। अबू दाऊद के किताब ख़ेराज में इसकी आमदनी 4000, चार हज़ार दीनार (अशरफ़ी) सलाना लिखी है।

एक वाकेया

इसी साल मक़ामे सहाबा से वापसी में ग़ज़वा वादी अल क़ुरा वाक़े हुआ। यहूदियों से लड़ाई हुई और बहुत सा माले ग़नीमत हाथ आया। इसी साल मुसलमानों के मशहूर हदीस गढ़ने वाले अबू हुरैरा मुसलमान हुए। यह इस्लाम लाने से पहले यहूदी थे। 3 साल अहदे रिसालत में ज़िन्दगी बसर की। आपने 5304 पांच हज़ार तीन सौ चार हदीसे नक़्ल की हैं। शरह मुस्लिम नूरी पृष्ठ 377, सही मुस्लिम जिल्द 2 पृष्ठ 509, अलफ़ारूक़ जिल्द 2 पृष्ठ 105, मीज़ान अल क़ूबरा जिल्द 1 पृष्ठ 71 में है कि अब्दुल्लाह बिन उमर हज़रत आयशा और हज़रत अली (अ.स.) इन्हें झूठा जानते थे।

8हिजरी के अहम वाक़ेयात

जंगे मौता

जंगे मौता उस मशहूर जंग को कहते हैं जिसमें इस्लाम के तीन सरदार एक के बाद एक शहीद हुए। जिनमें विशेष स्थान जाफ़रे तैयार को हासिल था। मौता यह शाम के इलाक़े बल्क़ा का एक क़रिया है। इस जंग का वाके़या यह है कि हुज़ूर (स अ व व ) ने इस्लामी दावत नामा दे कर बादशाहों और धनी लोगों की ही तरह शाम के ईसाई हाकिम शरजील बिन अम्र ग़सानी के पास भी भेजा। उसने हुज़ूर (स अ व व ) के का़सिद हारिस इब्ने अमीर को मौता के मक़ाम पर क़त्ल कर दिया चूंकि उसने इस्लामी तौहीन के साथ साथ दुनिया के बैनुल अक़वामी क़ानून के खि़लाफ़ किया था लेहाज़ा आँ हज़रत (स अ व व ) ने तीन हज़ार की फ़ौज दे कर अपने ग़ुलाम ज़ैद को रवाना किया और यह प्रोग्राम बना दिया कि अगर यह क़त्ल हो जायें तो जाफ़रे तैयार और अगर यह क़त्ल हो जायें तो उनके बाद अब्दुल्लाह इब्ने रवाह अलमदारी करें (यानी सरदारी करें) मैदान में पहुँच कर मालूम हुआ कि मुक़ाबले के लिये एक लाख का लश्कर आया है। हुक्मे रसूल (स अ व व ) था लेहाज़ा हज़रते ज़ैद ने जंग की और शहीद हो गये। हज़रत जाफ़र ने अलम संभाला और बहुत ही बहादुरी और बे जिगरी के साथ वह लड़ने लगे फ़ौज मे हलचल डाल दी लेकिन सीने पर 90 ज़ख़्म खा कर ताब न ला सके और ज़मीन पर आ कर गिरे। उनके बाद अब्दुल्लाह इब्ने रवाह ने अलम संभाला और जंग में मशग़ूल हुये , आखि़रकार उन्होंने भी शहादत पाई। फिर और एक बहादुर ने अलम संभाला। कामयाबी के बाद मदीना वापसी हुई। मुसलमानों ख़ास कर आं हज़रत (स अ व व ) को इस जंग में तीन सिपाह सालारों के क़त्ल होने का सख़्त मलाल हुआ। जाफ़रे तैयार के लिये आपने फ़रमाया ख़ुदा ने उन्हें जन्नत में परवाज़ के लिये दो ज़मर्रूद के पर अता किये हैं। मुवर्रेख़ीन का कहना है कि इसी लिये आपको जाफ़रे तैयार कहा जाता है। तारीख़े कामिल में है कि आं हज़रत (स अ व व ) जब जाफ़र के घर गये तो उनकी बीवी को रोता देख कर अपने घर पहुँचे तो फ़ातेमा (स अ व व ) को रोते देखा। हुज़ूर ने सबको तसल्ली दी और जाफ़रे तैयार के घर खाना पकवा कर भिजवाया। यह जंग जमादिल अव्वल 8 हिजरी में वाक़े हुई।

ज़ातुल सलासिल

इसी जमादिल अव्वल 8 हिजरी में यह सरिया (जंग) ज़ातुल सलासिल भी वाक़े हुई। आं हज़रत (स अ व व ) ने तीन सौ सिपाहीयों के साथ अम्र आस को क़बीलाए फ़ज़ाआ के सर कुचलने के लिये भेजा मगर वह कामयाब न हो सके तो अबू उबैदा बिन जर्राह को रवाना फ़रमाया उन्होंने कामयाबी हासिल की।

मिम्बरे नबवी की इब्तेदा

अब से पहले आं हज़रत (स अ व व ) के लिये मस्जिद में कोई मिम्बर न था। आप सुतून (ख्म्बे) से टेक लगा कर ख़ुतबा दिया करते थे। आपको लिये आयशा अन्सारिया ने तीन दरजे का मिम्बर अपने रूमी ग़ुलाम बाक़ूम नामी से जो बढ़ई का काम जानता था बनवा दिया।

फ़तेह मक्का

सुलैह हुदैबिया की वजह से 10 साल तक आपसी जंगों जेदाल मना होने के बावजूद क़ुरैश के दुश्मन क़बिले बनू बक्र ने आं हज़रत (स अ व व ) के दुश्मन क़बीले बनू ख़ज़ाआ पर चढ़ाई कर दी और क़ुरैश की मदद से उन्हें तबाह व बरबाद कर डाला। आखि़रकार हालात से मजबूर हो कर बनी ख़ज़ाआ ने आं हज़रत (स अ व व ) से मद्द मांगी। आं हज़रत (स अ व व ) ने 10 हज़ार का लश्कर तैयार कर के मक्के का इरादा किया। अबू सुफ़ियान ने जब यह तैयारी देखी तो यह दरख़्वास्त पेश करने के लिये कि सुलह नामा हुदैबिया की तजदीद (रीनीवल) कर दी जाय। मदीने आया और अपनी बेटी उम्मे हबीब रसूल (स अ व व ) की पत्नी के घर गया उन्होंने यह कह कर उसे बिस्तरे रसूल (स. अ.)से हटा दिया कि तू काफ़िरो मुशरिक है। (अबुल फ़िदा) फिर आं हज़रत (स अ व व ) के पास गया , आपने ख़ामोशी इख़्तेयार की। फिर हज़रत अली (अ.स.) से मिला। उन्होंने भी मुंह न लगाया। फिर हज़रत फातेमा (स अ व व ) के पास पहुँचा और इमाम हसन (अ.स.) और इमाम हुसैन (अ.स.) के वास्ते से अमान मांगी उन्होंने भी कोई सहारा न दिया। इसके बाद मस्जिद में तजदीदे सुलोह का ऐलान कर के वापस चला गया। हज़रत मोहम्मद (स अ व व ) ने पूरे पूरे ध्यान के साथ जंग की ख़ुफ़िया तैयारियां कर लीं मगर यह न ज़ाहिर होने दिया कि किस तरफ़ जाने का इरादा है। इसी ख़ुफ़िया तैयारी की इस्कीम के तहत इस्कीम के तहत आपने मक्के आना जाना बिल्कुल बन्द कर दिया था। आपका ख़्याल था कि अगर मक्के वालों को वक़्त से पहले यह ख़बर मिल जायेगी तो कामयाबी मुश्किल हो जायेगी। मगर एक चुग़लख़ोर सहाबी हातिब इब्ने बलतअः ने जिसके बच्चे मक्के में थे , एक औरत के ज़रिये से हमले का मुकम्मल हाल लिख भेजा। वह तो कहिये हज़रत को इत्तेला मिल गई आपने अली (अ.स.) को भेज कर ख़त वापस करा लिया।

अलग़रज़ 10 रमज़ान 8 हिजरी को आप अन्जान रास्तों से अचानक मक्के पहुँचे और मक्के से चार फ़रसक़ की दूरी पर सरा नतहरान पर पड़ाओ डाला। लश्कर की कसरत का चरचा हो गया। अबू सुफ़ियान हज़रते अब्बास से मशविरे से मुसलमान हो गया। आं हज़रत (स अ व व ) ने उसके लिये यह छूट कर दी कि जो उसके घर में फ़तेह मक्का के मौक़े पर पनाह ले उसे छोड़ दिया जाय। अबू सुफ़ियान मक्के वापस गया और उसने आं हज़रत (स अ व व ) की तरफ़ से ऐलान कर दिया कि जो मक्के में मेरे मकान में पनाह लेगा महफ़ूज़ रहेगा। जो हथियार लगाये बग़ैर सामने आयेगा उस पर हाथ न उठाया जायेगा। उसके बाद जंग शुरू हुई और थोड़ी सी रूकावट के बाद मक्के पर क़ब्ज़ा हो गया। सरदारे लशकर हज़रत अली (अ.स.) थे। आं हज़रत (स अ व व ) क़सवा नामी ऊँट पर सवार हो कर मक्के में दाखि़ल हुए और ज़ुबैर के लगाए हुए इस्लामी झंडे के क़रीब जा कर उतरे। ख़ेमें लगाए गए। आपने क़ुरैश से फ़रमाया बताओ तुम्हारे साथ क्या सुलूक करूं। सबने कहा आप करीम इब्ने करीम हैं हमें माफ़ फ़रमायें। आपने माफ़ी दी और आप सात मरतबा तवाफ़ के बाद दाखि़ले हरमे काबा हो गये और उन तमाम बुतों को अपने हाथ से तोड़ा जो नीचे थे और ऊंचे बुतों को तोड़ने के लिये हज़रत अली (अ.स.) को अपने कंधे पर चढ़ाया। अली (अ.स.) ने तमाम बुतों को तोड़ कर ज़मीन पर फेंक दिया गोया पत्थर के ख़ुदाओं को मिट्टी मे मिला दिया। मुवर्रेख़ीन का बयान है कि जिस जगह मोहरे नबूवत थी और जहां मेराज की शब रसूल (स अ व व ) के कांधे पर हाथ रखा हुआ महसूस हुआ था , उसी जगह अली (अ.स.) ने पांव रख कर बुतों को तोड़ा। उनका यह भी बयान है कि हज़रत अली (अ.स.) को रसूल (स अ व व ) ने अपनी पीठ पर सवार किया और जिब्राईल (अ.स.) ने बुत तोड़ने के बाद अपने हाथों से उतारा।(तारीख़े ख़मीस जिल्द 2 पृष्ठ 92 ज़िन्देगानी मोहम्मद पृष्ठ 77, अजायब अल क़स्स पृष्ठ 278 में है कि काबे में तीन सौ साठ ( 360 ) बुत थे।

दावते बनी ख़ज़ीमा

मक्काए मोअज़्ज़ेमा फ़तेह हो जाने के बाद आं हज़रत (स अ व व ) ने कुछ लोगों को तबलीग़े इस्लाम के लिये क़रीब की जगहों पर भेजा। जिन्में ख़ालिद बिन वलीद भी थे। यह लोग जब बनी ख़ज़ीमा के पास पहुँचे तो उन्होंने अपने मुसलमान होने का यक़ीन दिलाया लेकिन इब्ने वलीद ने कोई परवाह न की और उन पर ग़ैर इख़लाकी़ ज़ुल्म किया। आं हज़रत (स अ व व ) ने जब यह ख़बर सुनी तो आपने अपने बरी उज़ ज़िम्मा होने का ऐलान किया और हज़रत अली (अ.स.) को भेज कर हर क़िस्म का तावान अदा किया और ख़ूं बहा दिया।(तबरी जिल्द 3 पृष्ठ 124 )

जंगे हुनैन

हुनैन मक्के से तीन मील के फ़ासले पर ताएफ़ की तरफ़ एक वादी का नाम है। फ़तेह मक्का की ख़बर से बनी हवाज़न , बनी सक़ीफ़ , बनी हबशम और बनी सअद ने आपस में फ़ैसला किया कि सब मिल कर मुसलमानों से लड़ें। उन्होंने अपना सरदारे लशकर मालिक इब्ने औफ़ नफ़री और अलमदार अबू जरवल को क़रार दिया और वह अपने साथ दरीद इब्ने सम्मा नमी 120 साल का तजरूबे कार सिपाही मशवेरे के लिये पांय हज़ार सिपहियों का लशकर ले कर हुनैन और ताएफ़ के बीच मक़ामे अवतास पर जमा हो गये। जब आं हज़रत (स अ व व ) को इस इजतेमा की ख़बर मिली तो आप बारह हज़ार ( 12,000) या ( 16, 000) सोलह हज़ार का लशकर ले कर जिसमें मक्के के दो हज़ार ( 2000) नौ मुस्लिम भी शामिल थे। 6 शव्वाल 8 हिजरी को दुलदुल पर सवार मक्के से निकल पड़े। हज़रत अली (अ.स.) हमेशा की तरह अलमदारे लशकर थे। मैदान में पहुँच कर हज़रत अबू बकर ने कहा कि हम लोग इतने ज़्यादा हैं कि आज शिकस्त नहीं खा सकते। मैदाने जंग में इस तरह के मंसूबे बांधे जा रहे थे कि वह दुश्मन जो पहाड़ों में छुपे हुये थे निकल आये और तीरों नैजो और पत्थरों से ऐसे हमले किये कि बुज़दिलों की जान के लाले पड़ गये। सब सर पर पांव रख कर भागे। किसी को रसूले ख़ुदा (स अ व व ) की ख़बर न थी , वह पुकार रहे थे। ऐ बैअते रिज़वान वालों ! कहां जा रहे हो , लेकिन कोई न सुनता था। ग़रज़ कि ऐसी भगदड़ मची कि उसूले जंग शुरू होने से पहले ही हज़रत अली (अ स ) , हज़रते अब्बास , इब्ने हारिस और इब्ने मसूद के अलावा सब भाग गये।(सीरते हलबिया जिल्द 3 पृष्ठ 109 ) इस मौक़े पर अबू सुफ़ियान कह रहा था कि अभी क्या है मुसलमान समन्दर पार भागें गे।

हबीब अल सियर और रौज़ातुल अहबाब में है कि सब से पहले ख़ालिद इब्ने वलीद भागे उनके पीछे क़ुरैश के नौ मुस्लिम चले , फिर एक एक कर के महजिर व अन्सार ने राहे फ़रार इख़्तेयार की। इसी दौरान में दुश्मनों ने आं हज़रत (स अ व व ) पर हमला कर दिया जिसे जां निसारों ने रद्द कर दिया। हालात की नज़ाकत को देख कर रसूल अल्लाह (स अ व व ) खुद लड़ने के लिये आगे बढ़े मगर हज़रते अब्बास ने घोड़े की लजाम थाम ली , और मुसलमानो को पुकारा , आप की आवाज़ पर नौ सौ ( 900) मुसलमान वापस आ गये और दुश्मन भी सब के सब मुक़ाबिल हो गये। घमासान की जंग शुरू हुई , अबू जरवल अलमदारे लशकर ने मुक़ाबिल तलब किया। हज़रत अली (अ.स.) अलमदारे लशकरे इस्लाम मुक़ाबले में तशरीफ़ लाये और एक ही वार में उसे फ़ना के घाट उतार दिया। मुसलमानों के हौसले बढ़े और कामयाब हो गये। सीरत इब्ने हश्शाम , जिल्द 2 पृष्ठ 261 में है कि इस जंग में चार मुसलमान और 70 काफ़िर क़त्ल हुए जिनमें से चालिस 40 हज़रते अली (अ.स.) को हाथ से मारे गये। इस जंग में ग़ैबी इमदाद मिली थी जिसका ज़िक्र क़ुरआने मजीद में है। इसके बाद मक़ामे अवतास में जंग हुई और वहां भी मुसलमान कामयाब हुए। इन दोनों जंगों में काफ़ी माले ग़नीमत हाथा आया। अवतास में असमा बिन्ते हलीमा साबिया भी हाथ आईं।

हलीमा सादिया की सिफ़ारिश

जंगे हुनैन की बची हुई फ़ौज ताएफ़ में पनाह गुज़ीन हो गई। आपने शव्वाल 8 हिजरी में इसके मोहासरे का हुक्म दिया और 20 दिन तक मोहासरा (घिराव) जारी रहा। उसके बाद आप ने मोहासरा उठा लिया और मक़ामे जवाना पर चले गये। वहां पांच ज़िकाद को बनी हवाज़न की तरफ़ से दरख़्वास्त आई कि हम आपकी इताअत क़ुबूल करते हैं। आप हमारी औरतें माल वापस कर दीजिये। बनी हवाज़न की सिफ़ारिश में जनाबे हलीमा साबीया भी आई। आं हज़रत (स अ व व ) ने उनकी सिफ़ारिश कु़बूल फ़रमाई।

9हिजरी के अहम वाके़यात

फिलिस की तबाही

क़बीलाए बनी तय जिसमें मशहूर सक़ी हातम ताई पैदा हुआ था फिलिस नामी बुत को पूजता था। फ़तेह मक्का के कुछ दिन बाद आं हज़रत (स अ व व ) ने 150 डेढ़ सौ सवारों समैत रबीउल अव्वल 9 हिजरी में उसकी तरफ़ हज़रत अली (अ.स.) को भेजा। अदी अब्ने हातम जो सरदारे क़बीला था भाग गया। बहुत सा माले ग़नीमत और क़ैदी हाथ आये। हज़रते अली (अ.स.) ने इन्सान और माल लशकर में बांट दिये और अदी की बहन यानी हातम ताई की बेटी सफ़ाना में बहुत ही इज़्ज़तो एहतेराम के साथ आं हज़रत की खि़दमत मे पहुँचाया। उसने शराफ़ते ख़ानदान का हवाला दे कर रहम की दरख़्वास्त की। आपने उसे आज़ाद कर दिया और किराया दे कर उसको उसके भाई के पास भिजवा दिया। आपके इस हुस्ने इख़्लाक़ी से अदी बहुत प्रभावित हुआ। 10 हिजरी में आकर मुसलमान हो गया।

ग़ज़वा ए तबूक़

तबूक़ और दमिश्क के बीच 12 या 14 मंज़िल पर था। हज़रत को ख़बर मिली कि नसारा शाम ने हरक़ुल बादशाहे रूम से चालीस हज़ार ( 40, 000) फ़ौज मगा कर मदीने पर हमला करने का फ़ैसला किया है। आपने हिफ़ाज़त को ध्यान में रखते हुए पेश क़दमी की। मदीने का निज़ाम हज़रते अली (अ.स.) के सिपुर्द फ़रमाया और 30,000 (तीस हज़ार) फ़ौज ले कर शाम की तरफ़ रवाना हो गये। रवानगी के वक़्त हज़रत अली (अ.स.) ने अर्ज़ की मौला मुझे बच्चों और औरतों में छोड़े जाते हैं। क्या तुम इस पर राज़ी नहीं हो कि मैं उसी तरह अपना जां नशीन बना कर जाऊं जिस तरह जनाबे मूसा आपने भाई हारून को बना कर जाया करते थे।(सही बुख़ारी किताबुल मग़ाज़ी) ऐ अली ख़ुदा का हुक्म है कि मैं मदीने रहूं या तुम रहो।(फ़तेहुल बारी जिल्द 3 पृष्ठ 387 ) ग़रज़ की आप रवाना हो कर मंज़िले तबूक़ तक पहुँचे। आपने वहां दुश्मनों का 20 दिन तक इन्तेज़ार किया लेकिन कोई भी मुक़ाबले के लिये न आया। दौराने क़याम में अरीब क़रीब में दावते इस्लाम का सिलसिला जारी रहा। बिल आखि़र वापस तशरीफ़ लाये। यह वाक़ेया रजब 9 हिजरी का है।

वाक़ऐ उक़बा

तबूक़ से वापसी में एक घाटी पड़ती थी जिसका नाम उक़बा ज़ी फ़तक़ था। यह घाटी सवारी के लिये इन्तेहाई ख़तरनांक थी। अन्देशा यह था कि कहीं ऊंट का पांव फिसल न जाये कि हज़रत को चोट न लगे। इसी वजह से ऐलान करा दिया गया कि जब तक हज़रत का ऊँट गुज़र न जाए कोई भी घाटी के क़रीब न आय। ग़रज़ कि रवानगी हुई हज़रत सवार हुए। हुज़ैफ़ा ने मेहार(ऊँट की रस्सी) पकड़ी , अम्मार हंकाते हुये रवाना हुए। यह हज़रात समझ रहे थे कि निहायत पुर अमन जा रहे हैं नागाह बिजली चमकी और उनकी नज़र कुछ ऐसे सवारों पर पड़ी जो चेहरों को कपड़े से छुपाये हुए थे। हज़रत ने फ़रमाया ऐ हुज़ैफ़ा तुम ने पहचाना यह मुनाफ़िक़ मेरी जान लेना चाहते हैं। फिर आपने सब के नाम बता दिये और कहा किसी से कहना नहीं वरना फ़साद होगा। रौज़तुल अहबाब में है कि वह अकाबिर (बड़े सहाबा) थे।

तबलीग़े सूरा ए बराअत

9 हिजरी में आं हज़रत (स अ व व ) ने 300 (तीन सौ) आदमियों के साथ हज़रते अबू बकर को हज और तबलीग़े सूरा ए बराअत के लिये भेजा। अभी आप ज़्यादा दूर न जाने पाये थे कि वापस बुला लिये गये और यह सआदत हज़रत अली (अ. स.) के सिपुर्द कर दी गई। हज़रत अबू बकर के एक सवाल के जवाब में फ़रमाया कि मुझे ख़ुदा का यही हुक्म है कि मैं जाऊं या मेरी आल में से कोई जाए। शाह वली उल्लाह कहते हैं कि शेख़ैन दोनों के दोनों मामूर थे मगर माज़ूल (बरखा़स्त) किये गये। क़ुर्रतुल एैन पृष्ठ 234 सही बुखा़री पैरा 2 पृष्ठ 238, कन्ज़ुल आमाल जिल्द 1 पृष्ठ 126, दुर्रे मन्शूर जिल्द 3 पृष्ठ 310, तारीख़े ख़मीस जिल्द 2 पृष्ठ 157 से 160 तक , ख़माएसे निसाई पृष्ठ 61, रौज़ौल अनफ़ जिल्द 2 पृष्ठ 328, तबरी जिल्द 3 पृष्ठ 154, रियाज़ुल नज़रा पृष्ठ 174।

जंगे वादीउल रमल

वादीउल रमल मदीने से पांच मंज़िल के फ़ासले पर वाक़े है। वहां अरबों की एक बड़ी जमीअत (ग्रुप) ने मदीने पर शब ख़ूं (रात के अंधेरे में चुपके से हमला करना) मारने और अचानक शहर पर क़ब्ज़ा कर के इस्लामी ताक़त को चकना चूर कर देने का मन्सूबा तैयार किया। हज़रत (स अ व व ) को जैसे ही ख़बर मिली आपने उनकी तरफ़ एक लशकर भेज दिया और अलमदारी हज़रत अबू बकर के सिपुर्द की। उन्हें हज़ीमत (शिकस्त) हुई। फिर हज़रत उमर को अलमदार बनाया। वह ख़ैर से घर को आ गये। फिर उमर बिन आस को रवाना किया वह भी शिकस्त खा गये। जब का कामयाबी किसी तरह न हुई तो आं हज़रत (स अ व व ) ने हज़रत अली (अ.स.) को अलम दे कर रवाना किया। ख़ुदा ने अली (अ.स.) को शानदार कामयाबी अता की। जब हज़रत अली (अ.स.) वापस हुए तो आं हज़रत (स अ व व ) ने खुद हज़रत अली (अ.स.) का इस्तेक़बाल किया। (हबीबुस सियर , माआरिजुन नुबूवा)

वफ़ूद

9 हिजरी में वफ़ूद आना शुरू हुए और आं हज़रत (स अ व व ) की वफ़ात से पहले तक़रीबन अरब का बड़ा हिस्सा मुसलमान हो गया। इसी हिजरी मे हुक्मे नजासते मुशरेकीन भी नाज़िल हुआ।

वुसूलीए सदक़ात

इसी 9 हिजरी में बनी तय से अदी बिन हातम ताई , बनी हंज़ला से मालिक इब्ने नवेरा , बनी नजरान से हज़रत अली (अ.स.) जज़िया व सदक़ात वुसूल करने गये और माल भिजवाया।(इब्ने ख़ल्दून)

10हिजरी के अहम वाक़ेयात

यमन में तबलीग़ी सरगरमियां 10 हिजरी में आं हज़रत (स अ व व ) ने ख़ालिद बिन वलीद को तबलीग़े दीन के ख़्याल से यमन भेजा। यह वहां जा कर छः 6 महीने तक इधर उधर फिरते रहे और कोई काम न कर सके। यानी उनकी तबलीग़ से कोई भी मुसलमान न हो सका तो हज़रत अली (अ.स.) को भेजा गया। आपने ज़ोरो इल्म सलीक़ाए तबलीग़ी की वजह से सारे क़बीलाए हमदान को मुसलमान कर लिया। उसके बाद अहले यमन मुसलसल दाख़ले इस्लाम होने लगे। जब आं हज़रत (स अ व व ) को यह शानदार कामयाबी मालूम हुई तो आपने सजदाए शुक्र अदा किया और क़बीलाए हमदान के लिये दुआ की और फ़रमाया ख़ुदा क़बीलाए हमदान पर सलामती नाज़िल करे।(तारीख़े तबरी जिल्द 3 पृष्ठ 159 )

यमन में हज़रत अली (अ.स.) की शानदार कामयाबी पर मुख़ालिफ़ों की हासेदाना रविश

मुवर्रेख़ीन का बयान है कि यमन में ख़ालिद बिन वलीद बिलकुल कामयाब नहीं हुए फिर जब हज़रत अली (अ.स.) को शानदार कामयाबी नसीब हुई तो बाज़ लोगों ने हज़रत अली (अ.स.) पर माले ग़नीमत के सिलसिले में ऐतेराज़ किया।

किताब खि़लाफ़त व इमामत के पृष्ठ 79 लाहौर की छपी , में है जब जनाबे अमीर तबलीग़े अहले यमन के लिये मामूर किये गये थे और आपके खि़लाफ़ कुछ लोगों की शिकायत सुन कर आं हज़रत (स अ व व ) ने फ़रमाया था कि मुझ से अली (अ.स.) की बुराई न करो। फ़ाफ़हा मिनी राआना मिन्हो व हुव्वद लैकुम बाअदी (अली मुझसे है और मैं अली से हूँ और वह मेरे बाद तुम्हारा हाकिम है।) बाद अहादीस में अल्फ़ाज़ वहू वलेकुम बाअदी के नहीं पाये जाते और बाज़ में वहू मौला कुल मोमिन व मोमेनात पाये जाते हैं। शिकायत यह थी के जनाबे अमीर ने ख़ुम्स में से एक लौंड़ी चुन ली थी। बुख़ारी की रवायत से मालूम होता है कि यह शिकायत सुन कर रसूल अल्लाह (स अ व व ) ने फ़रमाया था फ़ा अन लहा फ़िल ख़ुम्स अक्सर मिन ज़ालेका अली का हिस्सा ख़ुम्स में इससे भी ज़्यादा है। यह हदीस भी अहले तसन्नुन की तमाम मोतबर किताबों में पाई जाती है और इससे जो मंज़िलत जनाबे अमीर (अ.स.) की जा़हिर होती है वह भी किसी से छुपी नहीं है।

यमन का निज़ामे हुकूमत

इसी 10 हिजरी में बाजा़न हाकिमे यमन ने इन्तेक़ाल किया। उसकी वफ़ात के बाद यमन को विभिन्न भागों में , विभिन्न हाकिमों के सिपुर्द किया गया। 1. सनआ का गर्वनर बाज़ान के बेटे को। 2. हमदान का गर्वनर आमिर इब्ने शहरे हमदानी को। 3. मआरब का हाकिम अबू मूसा अशअरी को। 4. जनद का अफ़सर लाअली इब्ने उमैया को। 5. मुल्को अशरा में ताहिर इब्ने अबी हाला को। 6. नजरान में उमर इब्ने ख़रम को। 7. नजरान , जुम्आ , ज़ुबैद के दरमियान , सईद इब्ने आस को। 8. सकासक व सुकून में अक्काशा इब्ने सौर को मुक़र्रर कर दिया गया।

असहाब का तारीख़ी इजतेमाऔर तबलीग़े रिसालत की आख़री मंज़िल

हज़रत अली (अ.स.) की खि़लाफ़त का ऐलान

यह एक हक़ीक़त है कि दुनिया के पैदा करने वाले ने इन्तेख़ाबे खि़लाफ़त को अपने लिये मख़सूस रखा है और इसमें लोगों का दस्त रस नहीं होने दिया। फ़रमाता है।

وربك يخلق ما يشاء ويختار ما كان لهم الخيرة سبحان الله وتعالى عما يشركون

तुम्हारा रब ही पैदा करता है और जिसको चाहता है(नबूवत व खि़लाफ़त) के लिये चुनता है। याद रहे इन्सान को न चुन्ने का हक़ है और न वह इस में ख़ुदा के शरीक हो सकते है।(सूरऐ कसस आयत 68 )

यही वजह है कि उसने अपने तमाम ख़ुलफ़ा , आदम से खातम तक खुद मुक़र्रर किये हैं और उनका ऐलान अपने नबियों के ज़रिये से कराया है।(रौज़तुल सफ़ा , तारीखे़ कामिल , तारीखें इब्ने अल वरदी , अराईस शाअल्बी वग़ैरा) और इसमें तमाम अम्बिया के किरदार की मवाफ़ेक़त का इतना लेहाज़ रखा है कि तारीख़े ऐलान तक में फ़र्क नहीं आने दिया। अल्लामा बहाई व अल्लामा मजलिसी लिखते हैं कि तमाम अम्बिया ने खि़लाफ़त का ऐलान 18 ज़िलहिज्जा को ही किया है।(जामे अब्बासी व इख़्तेयाराते मजलिसी) इतिहासकारों का इत्तेफ़ाक़ है कि आं हज़रत (स अ व व ) ने हज्जतुल विदा के मौक़े पर 18 ज़िलहिज्जा को ग़दीरे खुम के स्थान पर ख़ुदा के हुक्म से हज़रत अली (अ.स.) के जानशीन होने का ऐलान फ़रमाया है।

हुज्जतुल विदा

हज़रत रसूले करीम (स अ व व ) 25 ज़िकाद 10 हिजरी को हज्जे आखि़र के ईरादे से रवाना हो कर 4 ज़िलहिज को मक्का मोअज़्ज़मा पहुँचें। आपके साथ आपकी तमाम बीबीयां और हज़रत सैय्यदा सलाम उल्लाहे अलैहा थीं। रवानगी के वक़्त हज़ारों सहाबा साथ रवाना हुए और बहुत से मक्का ही में जा मिले। इस तरह आपके असहाब की तादाद एक लाख चौबीस हज़ार हो गई। हज़रत अली (अ.स.) यमन से मक्का पहुँचे। हुज़ूर (स अ व व ) ने फ़रमाया कि तुम क़ुर्बानी और मनासिके हज में मेरे शरीक हो। इस हज के मौक़े पर लोगों ने अपनी आँखों से आं हज़रत (स अ व व ) को मनासिके हज अदा करते हुए देखा और मारेकते अलारा ख़ुतबे सुने। जिनमें बाज़ बातें यह थी

1. जाहिलीयत के ज़माने के दस्तूर कुचल डालने के का़बिल हैं।

2. अरबी को अजमी और अजमी को अरबी पर कोई फ़ज़ीलत नहीं।

3. मुसलमान एक दूसरे के भाई हैं।

4. गु़लामों का ख़्याल ज़रूरी है।

5. जाहिलयत के तमाम ख़ून माफ़ कर दिये गये।

6. जाहिलयत के तमाम वाजिबुल अदा बातिल कर दिये गये। ग़रज़ कि हज से फ़रागत के बाद आप मदीने के इरादे से 14 ज़िलहिज को रवाना हुए। एक लाख चैबीस हज़ार असहाब आपके हमराह थे। हज़फ़ा के क़रीब मुक़ामे ग़दीर पर पहुँचते ही आयए बल्लिग़ का नुज़ूल हुआ आपने पालान शुतर का मिम्बर बनाया और बिलाल(र.) को हुक्म दिया कि हय्या अला ख़ैरिल अमल कह कर आवाज़ दें। मजमा सिमट कर नुक्ताए एतिदाल पर आ गया। आपने एक फ़सीह व बलीग़ ख़ुतबा फ़रमाया जिसमें हम्दो सना के बाद अपनी फ़ज़ीलत का इक़रार लिया और फ़रमाया कि मैं तुम में दो गिदां क़द्र चीजें छोड़ जाता हुँ एक क़ुरआन और दूसरे अहले बैत। इसके बाद अली (अ.स.) को अपने नज़दीक बुला कर दोनों हाथों से उठाया और इतना बुलन्द किया कि सफ़ेदी ज़ेरे बग़ल ज़ाहिर हो गई। फिर फ़रमाया मन कुन्तो मौला फ़ा हाज़ा अलीउन मौला जिसका मैं मौला हूँ उसका यह अली भी मौला है। ख़ुदाया अली जिधर मुड़े हक़ को उसी तरफ़ मोड़ देना। फिर अली (अ.स.) के सर पर सियाह अमामा बाधां , लोगों ने मुबारक बादियां देनी शुरू कीं। सब आपकी जां नशीनी से ख़ुश हुए। हज़रत उमर ने भी नुमाया अल्फ़ाज़ में मुबारक बाद दी। जिब्राईल ने भी बाज़बाने क़ुरआन अकमाले दीं और एतिमामे नेमत का मुजदा सुनाया। सीरतुल हलबिया में है कि यह जां नशीनी 18 ज़िलहिज को वाक़े हुई। नूरूल अबसार पृष्ठ 78 में है कि एक शख़्स हारिस बिन नोमान फ़हरी ने हज़रत के अमल ग़दीरे खुम पर एतिराज़ किया तो उसी वक़्त आसमान से उस पर एक पत्थर गिरा और वह मर गया।

वाज़े हो कि इस वाक़ेए ग़दीर को इमामुल मुहद्देसीन हाफ़िज़ इब्ने अब्दहु ने एक सौ सहाबा से इस हदीसे ग़दीर की रवायत की है। इमामे जज़री व शाफ़ेई ने इन्हीं सहाबियों से इमाम अहमद बिन हम्बल ने तीस सहाबियों और तबरी ने पछत्तर सहाबियों से रवाएत की है अलावा इसके तमाम अक़ाबिर इस्लाम मसलन ज़हबी सनाई और अली अल क़ारी वग़ैरा से मशहूर और मुतावातिर मानते हैं। महज़ मिनहाजुल उसूल , सिद्दीक़ हसन पृष्ठ 13 तफ़सीर साअलबी फ़तेहुल बयान सिद्दीक़ हसन जिल्द 1 पृष्ठ 48।

वाक़ेए मुबाहेला

बख़रान यमन में एक मुक़ाम है वहां ईसाई रहते थे और वहां एक बड़ा कलीसा था। आं हज़रत (स अ व व ) ने उन्हें भी दावते इस्लाम भेजी उन्होंने तहक़ीक़े हालात के लिये एक वफ़द ज़ेरे क़यादत अब्दुल मसीह आक़िब मदीना भेजा। वह वफ़द मस्जिदे नबवी के सहन में आ कर ठहरा। हज़रत से मुबाहेसा हुआ मगर वह क़ाएल न हुए। हुक्मे ख़ुदा नाज़िल हुआ फ़कु़ल तआलो अन्दाअ अब्ना आना ऐ पैग़म्बर उनसे कह दो कि दोनों अपने बेटों अपनी औरतों और अपने नफ़सों को लाकर मुबाहेला करें। चुनान्चे फ़ैसला हो गया और 24 ज़िलहिज 10 हिजरी को पंजेतने पाक झूटों पर लानत करने के लिये निकले। नसारा के सरदारों ने जूँही इनकी शकले देखीं कापने लगे और मुबाहेले से बाज़ आय। ख़ेराज़ देना मन्ज़ूर कर लिया। जज़िया दे कर रेआया बनाना क़ुबूल किया।

(मआरिज अल इरफ़ान पृष्ठ 135, तफ़सीर बैज़ावी पृष्ठ 74 )

सरवरे काऐनात के के आख़री लम्हाते ज़िन्दगी

हुज्जतुल विदा से वापसी के बाद आपकी वह अलालत जो बारवाएते मिशक़ात ख़ैबर में दिये हुए ज़हर के करवट लेने से उभरा करती थी , मुस्तमिर हो गई। आप अकसर बीमार रहने लगे , बीमारी की ख़बर आम होते ही झूटे मुद्दई नबूवत पैदा होने लगे जिनमें मुसालमा कज़्ज़ाब असवद अनसी तलहा सुजाह ज़्यादा नुमाया थे लेकिन ख़ुदा ने उन्हें ज़लील किया। इसी दौरान में आपको इत्तेला मिली कि हुकूमते रोम मुसलमानों को तबाह करने को तबाह करने का मन्सूबा तैयार कर रही है। आपने इस ख़तरे के पेश नज़र कि कहीं वह हमला न कर दें। उसामा बिन ज़ैद की सर करदगी में एक लशकर भेजने का फ़ैसला किया और हुक्म दिया कि अली के अलावा अयाने महाजिर व अनसार में से कोई भी मदीने में न रहे और इसी रवानगी पर इतना ज़ोर दिया कि यह तक फ़रमा दिया लाअनल्लाह मन तखलफ़अनहा जो इस जंग में न जायेगा उस पर ख़ुदा की लानत होगी। इसके बाद आं हज़रत (स अ व व ) ने असामा को अपने हाथों से तैयार कर के रवाना किया। उन्होंने तीन मिल के फ़ासले पर मुक़ामे ज़रफ़ में कैम्प लगाया और अयाने सहाबा का इन्तेज़ार करने लगे , लेकिन वह लोग न आये। मदारिज अल नबूवत जिल्द 2 पृष्ठ 488 व तारीख़े कामिल जिल्द 2 पृष्ठ 120, तबरी जिल्द 3 पृष्ठ 188 में है कि न जाने वालों में हज़रत अबू बकर व हज़रत उमर भी थे। मदारिज अल नबूवत जिल्द 2 पृष्ठ 494 में है कि आखि़र सफ़र में जब कि आपको शदीद दर्दे सर था। आप रात के वक़्त अहले बक़ी के लिये दुआ की ख़ातिर तशरीफ़ ले गए। हज़रत आएशा ने समझा कि मेरी बारी में किसी और बीवी के यहां चले गएं हैं इस पर वह तलाश के लिये निकलीं तो आपको बक़ीया में महवे दुआ पाया। इसी सिलसिले में आपने फ़रमाया क्या अच्छा होता ऐ आयशा कि तुम मुझ से पहले मर जाती और मैं तुम्हारी अच्छी तरह तजहीज़ो तकफ़ीन करता। उन्होंने जवाब दिया कि आप चाहते हैं मैं मर जाऊँ तो आप दूसरी शादी कर लें। इसी किताब के पृष्ठ 495 में है कि आं हज़रत (स अ व व ) की तीमार दारी आपके अहले बैत करते थे। एक रवायत में है कि अहले बैत को तीमार दारी में पीछे रखने की कोशिश की जाती थी।

वाक़ेए क़िरतास

हुज्जतुल विदा से वापसी पर बामुक़ामे ग़दीरे ख़ुम अपनी जां नशीनी का ऐलान कर चुके थे। अब आखि़री वक़्त में आपने यह ज़रूरी समझते हुए कि उसे दस्तावेज़ी शक्ल दे दें। असहाब से कहा कि मुझे क़लम दवात और कागज़ दे दो ताकि मैं तुम्हारे लिये एक ऐसा नविश्ता लिख दूं जो तुम्हें गुम्राही से हमेशा हमेशा बचाने के लिये काफ़ी हो। यह सुन कर असहाब में आपस में चीमी गोयां होने लगी लोगों के रूजाहनात क़लम दवात दे देने की तरफ़ देख कर हज़रत उमर ने कहा ! अनल रजुल लेहिजर हसबुना किताब अल्लाह यह मर्द हिज़यान बक रहा है। हमारे लिये किताबे ख़ुदा ही काफ़ी है।(सही बुख़ारी पैरा 30 पृष्ठ 842 ) अल्लामा शिब्ली लिखते हैं रवायत में हजर का लफ़्ज़ है जिसके माने हिज़यान के है।

हज़रत उमर ने आं हज़रत (स अ व व ) के इस इरशाद को हिज़यान से ताबीर किया था।(अल फ़ारूक़ पृष्ठ 61 ) लुग़त में हिज़यान के माने बेहूदा गुफ़तन यानी बकवास के हैं।(सराह जिल्द 2 पृष्ठ 123 ) शमशुल उलमा मौलवी नज़ीर अहमद देहलवी लिखते हैं जिन के दिल में तमन्नाए खि़लाफ़त चुटकियां ले रही थी उन्होंने तो धींगा मुश्ती से मन्सूबा ही चुटकियों में उड़ा दिया और मज़हामत की यह तावील की कि हमारी हिदायत के लिये क़ुरआन बस काफ़ी है और चूंकि इस वक़्त पैग़म्बर साहब के हवास बजा नहीं हैं , कागज़ क़लम दवात लाना कुछ ज़रूरी नहीं ख़ुदा जाने क्या लिखवा देगें।(उम्मेहातुल उम्मत पृष्ठ 92 ) इस वाक़ेए से आं हज़रत (स अ व व ) को सख़्त सदमा हुआ और आपने झुंझला कर फ़रमाया कूमू इन्नी मेरे पास से उठ कर चले जाओ। नबी के रूबरू शोर ग़ुल इन्सानी अदब नहीं है। अल्लामा तरही लिखते हैं कि ख़ाना ए काबा में पांच लोगों ने हज़रत अबू बकर , हज़रत उमर , अबु उबैदा , अब्दुर्रहमान , सालिम ग़ुलाम हुज़ैफ़ा ने मुत्तफ़िका़ अहदो पैमान किया था कि ला नुज़्दो हाज़ल अमरनीफ़ा बनी हाशिम पैग़म्बर के इन्तेका़ल के बाद खि़लाफ़त बनी हाशिम में न जाने देगें।(मजमुर बहरैन) मैं कहता हूं कौन यक़ीन कर सकता है कि जेशे उसामा में रसूल से सरताबी करने वालों जिसमें लानत तक की गई है और वाक़ेआ क़िरतास हुक्म को बकवास बतलाने वालों को रसूले ख़ुदा (स अ व व ) ने नमाज़ की इमामत का हुक्म दे दिया होगा मेरे नज़दीक इमामते नमाज़ की हदीस ना क़ाबिले कु़बूल है।

हाशिया अली क़ारी बर हाशिया नसीम अल रियाज़

वसीयत और एहतिज़ार हज़रत आयशा फ़रमाती हैं कि आख़री वक़्त आपने फ़रमाया मेरे हबीब को बुलाओ। मैंने अपने बाप अबू बकर फिर उमर को बुलाया। उन्होंने फिर यही फ़रमाया तो मैंने अली को बुला भेजा। आपने अली को चादर में ले लिया और आखि़र तक सीने से लिपटाए रहे।(रेआज़ अल नज़रा पृष्ठ 180 ) मुवर्रिख़ लिखते हैं कि जनाबे सैय्यदा (स अ व व ) हसनैन (अ.स.) को तलब फ़रमाया और हज़रत अली को बुला कर वसीयत की और कहा जैश असामह के लिये मैंने फ़लां यहूदी से क़रज़ लिया था उसे अदा कर देना और ऐ अली तुम्हें मेरे बाद सख़्त सदमें पहुँचेंगे तुम सब्र करना और देखो जब अहले दुनियां दुनियां परस्ती करें तो तुम दीन इख़्तेयार किए रहना।(रौज़तुल अहबाब जिल्द 1 पृष्ठ 559 मदारिज अल नबूवत जिल्द 2 पृष्ठ 511 व तारीख़ बग़दाद जिल्द 1 पृष्ठ 219 ) (स. अ.)

हाशिया अली क़ारी बर हाशिया नसीम अल रियाज़ व मदारिज अल नबूअत प्रकाशित कानपुर पृष्ठ 542 हबीब उस सियर पृष्ठ 78 व मकतूबात शेख़ अहमद सर हिन्दी मुजद्दि अलिफ़ सानी जिल्द 2 पृष्ठ 61- 62 वग़ैरा में है। उन्हीं कुतूब की रोशनी में शम्शुल उलमा ख़्वाजा हसन निज़ामी देहलवी लिखते हैं इसी बीमारी के ज़माने में एक दिन बहुत से लोग हज़रत (स अ व व ) के पास जमा थे आपने इरशाद फ़रमाया लाओ कागज़ मैं तुम को कुछ लिख दूं ताकि तुम मेरे बाद गुमराह न हो जाओ , यह सुन कर हज़रत उमर बोले हज़रत रसूल (स अ व व ) पर बुख़ार की तकलीफ़ का ग़लबा है इसके सबब से ऐसा फ़रमाते हैं वसीअत नामे की कुछ ज़रूरत नहीं हमको ख़ुदा की किताब काफ़ी है।(मोहर्रम नामा पृष्ठ 10 प्रकाशित देहली)

रसूले करीम (स अ . व . व . ) की शहादत

हज़रत अली (अ.स.) से वसीयत फ़रमाने के बाद आपकी हालत ग़ैर हो गई। हज़रत फातेमा (स अ व व ) जिनके ज़ानू पर सरे मुबारक रिसालत माब (स अ व व ) था फ़रमाती हैं कि हम लोग इन्तेहाईं परेशानी में थे कि नागाह एक शख़्स ने इज़्ने हुज़ूरी चाहा , मैंने दाखि़ले से मना कर दिया और कहा ऐ शख़्स यह वक़्ते मुलाक़ात नहीं है इस वक़्त वापस चला जा। इसने कहा मेरी वापसी नामुम्किन है मुझे इजाज़त दीजिए की मैं हाज़िर हो जाऊँ। आं हज़रत (स अ व व ) को जो क़दरे अफ़ाक़ा हुआ तो आप (स अ व व ) ने फ़रमाया ऐ फातेमा (स अ व व ) इजाज़त दे दो यह मलाकुल मौत है। फातेमा (स अ व व ) ने इजाज़त दे दी और वह दाखि़ले ख़ाना हुए। पैग़म्बर की खि़दमत में पहुँच कर अर्ज़ कि मौला यह पहला दरवाज़ा है जिस पर मैंने इजाज़त मांगी है और अब आप (स अ व व ) के बाद किसी के दरवाज़े पर इजाज़त तलब न करूंगा।(अजाएब अल क़सस अल्लामा अब्दुल वाहिद पृष्ठ 2882 व रौज़तुल पृष्ठ जिल्द 2 पृष्ठ 216 व अनवार अल क़ुलूब पृष्ठ 188 )

अल ग़रज़ मलकुल मौत ने अपना काम शुरू किया हुज़ूर रसूल करीम (स अ व व ) ने बतारीख़ 28 सफ़र 11 हिजरी योमे दोशम्बा ब वक्ते दो पहर खि़लअते हयात उतार दिया।(मुवद्दतुल कु़र्बा पृष्ठ 49, 14 प्रकाशित बम्बई 310 ) हिजरी अहले बैत कराम में रोने का कोहराम मच गया। हज़रत अबू बकर उस वक़्त अपने घर महल्ला सख़ गए हुए थे जो मदीने से एक मील के फ़ासले पर था। हज़रत उमर ने वाक़ेए वफ़ात को नशर होने से रोका और जब हज़रत अबू बकर आ गए तो दोनों सक़ीफ़ा बनी सआदा चले गए जो मदीने से तीन मील के फ़ासले पर था और बातिल मशविरों के लिये बनाया गया था।(ग़यासुल लुग़ात) और उन्हीं के साथ अबू अबीदा भी चले गए जो ग़स्साल थे। ग़रज कि अकसर सहाबा रसूले ख़ुदा (स अ व व ) की लाश छोड़ कर हंगामाए खि़लाफ़त में जा शरीक हुए और हज़रत अली (अ.स.) ने ग़ुस्लो कफ़न का बन्दोबस्त किया। हज़रत अली (अ.स.) ने ग़ुस्ल देने में फ़ज़ल इब्ने अब्बास हज़रत का पैराहन ऊँचा करने में अब्बास और क़सम करवट बदलवाने में और उसामा व शकराना पानी डालने में मसरूफ़ हो गए और उन्हीं छः आदमियों ने नमाज़े जनाज़े पढ़ी और इसी हुजरे में आपके जिस्मे अतहर को दफ़्न कर दिया गया। जहां आपने वफ़ात पाई थी। अबू तलहा ने क़ब्र खोदी। हज़रत अबू बकर व हज़रत उमर आपके ग़ुस्लो कफ़न और नमाज़ में शरीक न हो सके क्यो कि जब यह हज़रात सक़ीफ़ा से वापस आए तो आं हज़रत (स अ व व ) की लाशे मुतहर सुपुर्दे खाक की जा चुकी थी। कंज़ुल आमाल जिल्द 3 पृष्ठ 140, अरजहुल मतालिब पृष्ठ 670, अल मुतर्ज़ा पृष्ठ 39 फ़तेहुलबारी जिल्द 6 पृष्ठ 4, वफ़ात के वक़्त आपकी उम्र 63 साल की थी।(तारीख़ अबुल फ़िदा जिल्द 1 पृष्ठ 152 )

वफ़ात और शहादत का असर

सरवरे कायनात की वफ़ात का असर यूँ तो तमाम लोगों पर हुआ असहाब भी रोए और हज़रत आयशा ने भी मातम किया।(मसनदे अहमद बिन हम्बल जिल्द 6 पृष्ठ 274 व तारीख़े कामिल जिल्द 2 पृष्ठ 122 व तारीखे़ तबरी जिल्द 3 पृष्ठ 197 ) लेकिन जो सदमा हज़रत फ़ातेमा (स अ व व ) को पहुँचा इसमें वह मुनफ़रिद थीं। तारीख़ से मालूम होता है कि आपकी वफ़ात से आलमे अलवी और आलमे सिफ़ली भी मुत्तसिर हुए और उनमें जो चीज़ें हैं उनमें भी असरात हुवैदा हुए हैं। अल्लामा ज़मख़्शरी का बयान है कि एक दिन आं हज़रत (स अ व व ) ने उम्मे माअबद के वहां क़याम फ़रमाया। आपके वज़ू के पानी से एक पेड़ निकला जो बेहतरीन फल लाता रहा। एक दिन मैंने देखा कि इसके पत्ते झड़े हुए हैं और मेवे गिरे हुए हैं। मैं हैरान हुई कि नागहाँ ख़बरे वफ़ात सरवरे आलम पहुँची। फिर तीस साल बाद देखा गया कि इस में तमाम कांटे उग आए थे। बाद में मालूम हुआ कि हज़रत अली (अ.स.) ने शहादत पाई। फिर मुद्दत मदीद के बाद इसकी जड़ से ख़ून ताज़ा उबलता हुआ देखा गया बाद में मालूम हुआ हज़रत इमामे हुसैन (अ.स.) ने शहादत पाई। इसके बाद वह सूख गया।(अजाएब अल क़सस पृष्ठ 159 बा हवालाए रबीउल अबरार ज़मख़्शरी)

आं हज़रत (स अ . व . व . ) की शहादत का सबब

यह ज़ाहिर है कि चाहरदा मासूमीन (अ.स.) में से कोई भी ऐसा नहीं जिसने शहादत न पाई हो। हज़रत रसूले करीम (स अ व व ) से लेकर इमामे हसन असकरी (अ.स.) तक सब ही शहीद हुए हैं। कोई ज़हर से शहीद हुआ है कोई तलवार से शहीद हुआ। इनमें से एक औरत भी थीं हज़रत फ़ातेमा बिन्ते रसूल (स अ व व ) वह ज़र्बे शदीद से शहीद हुईं। इन चौदह मासूमों में लगभग तमाम की शहादत का सबब वाज़े है लेकिन हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) की शहादत के सबब से अकसर हज़रात न वाक़िफ़ हैं इस लिये मैं इस पर रौशनी डालता हूँ।

हुज्जतुल इस्लाम इमाम अबू हामिद मोहम्मद अल ग़ज़ाली की किताब सिरूल आलमीन के पृष्ठ 7 प्रकाशित बम्बई 1214 हिजरी और किताब मिशक़ात शरीफ़ के हिस्सा 3 पृष्ठ 58 से वाज़े है कि आपकी शहादत ज़हर के ज़रिए से हुई है और बुख़ारी शरीफ़ की जिल्द 3 प्रकाशित मिस्र 1314 हिजरी के हिस्सा अल्लददू पृष्ठ 127 किताब अल तिब से मुस्तफ़ाद और मुस्तमिबत होता है कि आं हज़रत को दवा में मिला कर ज़हर दिया गया था।

1.तारीख़े तबरी जिल्द 4 पृष्ठ 436 में है कि अन्सार ने जब हज़रत अली (अ.स.) की बैअत करना चाही तो हज़रत उमर ने हज़रत अबू बकर का हाथ पकड़ कर बैअत कर ली और कहा कि आप भी क़रशी हैं और हम में सज़ावार तर हैं।

मेरे नज़दीक रसूले करीम (स अ व व ) के बिस्तरे अलालत पर होने के वक़्त के वाक़ेआत व हालात के पेशे नज़र दवा में ज़हर मिला कर दिया जाना गै़र मुतवक़्क़ा नहीं है। अल्लामा मोहसिन फ़ैज़ किताब अलवाफ़ी की जिल्द 1 के पृष्ठ 166 में बा हवाला तहज़ीबुल एहकाम तहरीर फ़रमाते हैं कि हुज़ूर मदीने में ज़हर से शहीद हुए हैं। अलख़ मुझे ऐसा मालूम होता है कि ख़ैबर में ज़हर ख़ूरानी की तशहीर अख़फ़ाए जुर्म के लिए की गई थी।

अज़वाज

चन्द कनीज़ों के अलावा जिनमे मारिया और रेहाना भी शामिल थीं आपके ग्यारह बीबीयां थीं जिन में हज़रत ख़दीजा और ज़ैनब बिन्ते ख़जी़मह ने आपकी ज़िन्दगी में वफ़ात पाई थी और नौ 9 बीबीयों ने आपकी वफ़ात के बाद इन्तेक़ाल किया। आं हज़रत (स अ व व ) की बीबीयों के नाम निन्मलिखित हैं:-

1.ख़तीजातुल कुबरा , 2. सूदा , 3. आयशा , 4. हफ़सा , 5. ज़ैनब बिन्ते ख़ज़ीमह , 6. उम्मे सलमा , 7. ज़ैनब बिन्ते हजश , 8. जवेरिहा बिन्ते हारिस , 9. उम्मे हबीबा , 10. सफ़िया , 11. मैमूना।

औलाद

आपके तीन बेटे थे और एक बेटी थी। जनाबे इब्राहीम के अलावा जो मारिया क़िबतिया के बतन से थे सब बच्चे हज़रत ख़तीजा के बतन से थे हुज़ूर के औलाद के नाम निम्न लिखित हैं:-

1. हज़रत क़ासिम तैय्यब आप बेअसत से पहले मक्का में पैदा हुए और दो साल की उम्र में वफ़ात पा गए।

2. जनाबे अब्दुल्लाह जो ताहिर के नाम से मशहूर थे बेअसत से पहले मक्का में पैदा हुए और बचपन ही में इन्तेक़ाल कर गए।

3. जनाबे इब्राहीम 8 हिजरी में पैदा हुए और 10 हिजरी में इन्तेक़ाल कर गए।

4. हज़रत फ़ातेमा ज़हरा आप पैग़म्बरे इस्लाम (स अ व व ) की इकलौती बेटी थीं। आपके शौहर हज़रत अली (अ.स.) और बेटे हज़रत इमाम हसन (अ.स.) और हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) थे। फातेमा ज़हरा (स अ व व ) की नसल से ग्यारह इमाम पैदा हुए और इन्हीं के ज़रिए से रसूल (स अ व व ) की नसल बढ़ी और आपकी औलाद को सयादत का शरफ़ हासिल हुआ और वह क़यामत तक सय्यद कही जायगी।

हज़रत रसूले करीम (स अ व व ) इरशाद फ़रमाते हैं कि क़यामत में मेरे सिलसिले नसब के अलावा सारे सिलसिले टूट जायेगें और किसी का रिश्ता किसी के काम न आयेगा।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 93 ) अल्लामा हुसैन वाएज़ काशफ़ी लिखते हैं कि तमाम अम्बिया की औलाद हमेशा क़ाबिले ताज़ीम समझी जाती रही है। हमारे नबी (स अ व व ) इस सिलसिले में सब से ज़्यादा हक़ दार हैं।(रौज़ातुल शोहदा पृष्ठ 404 )

इमाम उल मुसलेमीन अल्लामा जलालुद्दीन फ़रमाते हैं कि हज़रत हसनैन (अ.स.) वह क़यामत की औलाद के लिये सयादत मख़सूस है। मर्द हो या औरत जो भी इनकी नस्ल से है वह क़यामत तक सय्यद रहेगा। वयजुब अला इजमा अल ख़लक़े ताज़ीमहुम अब अन और सारी कायनात पर वाजिब है कि हमेशा हमेशा इनकी ताज़ीम करती रहे।(लवायमुल तंज़ीम जिल्द 3 पृष्ठ 3, 4 असआफ़ अल राग़ेबीन बर हाशिया नूर अल अबसार शिबलन्जी पृष्ठ 114 प्रकाशित मिस्र)

उम्मुल आइम्मा हज़रत फातेमा ज़हरा ( स अ ) ख़ातूने जन्नत

ख़दीजा को मिला बेटी , नबी को बिज़अतो मिन्नी

हुई तकमीले तबलीग़े अमल तन्ज़ीमे ईमां में

रिसालत आमदे ज़हरा पा , यह एलान करती है

करेंगी फातेमा (स.अ) , कारे रिसालत सिन्फ़े निस्वां में

जलवा नुमा ए शम्मे हक़ीक़त हैं फातेमा।

आइना ए कमाले नबूवत हैं , फातेमा।।

यह मानता हूं इनको रिसालत नहीं मिली।

लेकिन , शरीके कारे रिसालत हैं फातेमा।।

हज़रत फातेमा (स.अ) , पैग़म्बरे इस्माल हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) और जनाबे ख़दीजातुल कुबरा की इक लौती बेटी हज़रत अली अ 0 की रफ़ीक़ा ए हयात और इमाम हसन (अ.स.) व इमामे हुसैन (अ.स.) जनाबे ज़ैनब व उम्मे कुलसूम की मादरे गिरामी और नौ , ( 9) इमामों की जद्दे माजेदा थीं। आपकी मशहूर कुन्नियत उम्ममुल आइम्मा , उम्मुल हसनैन और इमाम अल सिबतैन थी। मशहूर अलक़ाब ज़हरा व सय्यातुलनिस्सां थे। एक रवायत में है कि आपकी कुन्नियत उम्मे अबीहा भी थी जो मेरे नज़दीक़ यह उम्मे इब्नीहा है यानी हसन व हुसैन की माँ।

आप की विलादत

आप का नूरे वजूद नूरे रिसालत (स अ व व ) के साथ ख़िलक़ते कायनात से बहुत पहले पैदा हो चुका था। अलबत्ता आपके ज़ाहिरी नमूद व शहूद के लिए उलमा ने लिखा है कि आप मेराजे रिसालत मआब (स अ व व ) के बाद 5 बैअसत में तारीख़ 20 जमादुस्सानी जुमे के दिन मक्का मोअज़्ज़मा में पैदा हुईं। आप का साले विलादत आमुल फ़ील के लिहाज़ से 46 और इसवी नुक़ताये निगाह से 614, 615 ई 0 था। आपकी विलादत के वक़्त जन्नत से हूरों और आसिया बिन्ते मज़ाहम , मरयम बिन्ते इमरान , सफ़ूरा बिन्ते शुऐब , कुल्सूम हमशीरा ए , मूसा का आना किताबों से साबित है। जनाबे ख़दीजा का बयान है कि चूंकि मैंने अपने क़बीले के मनशा के बर ख़िलाफ़ सरवरे काएनात से शादी कर ली थी , इस लिए मेरी क़ौम ने मेरा बाईकाट कर दिया था। मैंने विलादत के वक़्त हसबे दस्तूर इत्तेला दी लेकिन कोई न आया। अल्लाह की रहमत शामिले हाल हुई , हूरों और पाक बीबीयों ने क़ाबला और दाया का काम किया बच्ची पैदा हुई। हुज्जतुल आलमीन का घर बुक़्क़ा ए नूर बन गया।

(तारीख़े ख़मीस जिल्द 1 स. 313 व दम ए साक़ेबा पृष्ठ 53 )

आप का इकलौती बेटी होना

मुनाक़िब इब्ने शहर आशोब में है कि जनाबे ख़दीजा के साथ जब आं हज़रत (स अ व व ) की शादी हुई तो आप बाकरह थीं। यह तसलीम शुदा अमर है कि क़ासिम अब्दुल्ला यानी तैय्यब व ताहिर और फातेमा ज़हरा बतने ख़दीजा से रसूले इस्लाम की औलाद थीं। इस में इख़्तेलाफ़ है कि ज़ैनब , रूक़य्या , उम्मे कुल्सूम , आं हज़रत की लड़कियां थीं या नहीं , यह मुसल्लम है कि यह लड़कियां ज़हूरे इस्लाम से क़ब्ल काफ़िरों अतबा , पिसराने अबू लहब और अबू आस , इब्ने रबी के साथ ब्याही थीं। जैसा कि मवाहिबे लदुनिया जिल्द 1 स. 197 मुद्रित मिस्र व मुरव्वज उज ज़हब मसूदी जिल्द 2 स. 298 मुद्रित मिस्र से वाज़े है। यह माना नहीं जा सकता कि रसूले इस्लाम अपनी लड़कियों को काफ़रों के साथ ब्याह देते। लेहाज़ा यह माने बग़ैर चारा नहीं है कि यह औरतें हाला बिन्ते ख़वैला हमशीर जनाबे ख़दीजा की बेटियां थीं। इन के बाप का नाम अबू लहनद था। जैसा कि अल्लामा मोतमिद बदख़शानी ने मरजा उल अनस , में लिखा है। यह वाक़ेया है कि यह लड़कियां ज़माना ए कुफ़्र में हाला और अबू लहनद में बाहमी चपकलिश की वजह से जनाबे ख़दीजा के ज़ेरे केफ़ालत और तहते तरबीयत रहीं और हाला के मरने के बाद मुतलक़न उन्हीं के साथ हो गईं और ख़दीजा की बेटी कहलाईं। इसके बाद बा ज़रिया ए जनाबे ख़दीजा आं हज़रत से मुनसलिक हो कर उसी तरह रसूल (स अ व व ) की बेटियां कहलाईं। जिस तरह जनाबे ज़ैद मुहावरा अरब के मुताबिक़ रसूल के बेटे कहलाते थे। मेरे नज़दीक इन औरतों के शौहर मुताबिक़ दस्तूरे अरब के मुताबिक़ दामादे रसूल कहे जाने का हक़ रखते हैं। यह किसी तरह नहीं माना जा सकता कि रसूल की सुलबी बेटियां थीं क्यों कि हुज़ूरे सरवरे आलम (स अ व व ) का निकाह जब बीबी ख़दीजा से हुआ था तो आपके ऐलाने नबूवत से पहले इन लड़कियों का निकाह मुशरिकों से हो चुका था और हुज़ूर सरकारे दो आलम का निकाह 25 साल के सिन में ख़दीजा से हुआ और 30 साल तक कोई औलाद नहीं हुई और चालीस साल के सिन में आपने ऐलाने नबूवत फ़रमाया और इन लड़कियों का निकाह मुशरिक़ों से आप की चालीस साल की उम्र से पहले हो चुका था , और इस दस साल के अर्से में आपके फ़रज़न्द का भी पैदा होना और तीन लड़कियों का पैदा होना तहरीर किया गया है। जैसा कि मदारिज अल नबूवत में तफ़सील मौजूद है। भला ग़ौर तो कीजिए की दस साल की उमर में चार , पांच औलादें भी पैदा हो गईं और इतनी उमर भी हो गई के निकाह मुशरिक़ों से हो गया। क्या यह अक़ल व फ़हम में आने वाली बात है कि चार साल की लड़कियों का निकाह मुशरिक़ों से हो गया और हज़रत उस्मान से भी एक लड़की का निकाह हालते शिर्क ही में हो गया। जैसा कि मदारिज अल नबूवत में मज़कूर है। इस हक़ीक़त पर ग़ौर करने से मालूम होता है कि लड़कियां हुज़ूर की न थीं बल्कि हाला ही की थीं और इस उम्र में थीं कि इनका निकाह मुशरिक़ों से हो गया था।

(सवानेह हयाते सैय्यदा पृष्ठ 34 )

बचपन और तरबीयत

जनाबे सैय्यदा (स.अ) में बचपन के वह आसार ही न थे जो आम लड़कियों में हुआ करते हैं। उम्मे सलमा से कहा गया कि फातेमा को ऊसूले तहज़ीब सीखायें। उन्होंने जवाब दिया कि मैं मुजस्समाये अस्मत व तहारत को अख़लाक़ व आदात की क्या तालीम दे सकती हूं। मैं तो ख़ुद इस कमसीन बच्ची से तालीमें उसूम हासिल किया करती हूं। किताबों से मालूम होता है कि आपका सारा बचपन इबादत और ख़िदमते वालदैन में गुज़रा। एक मरतबा आं हज़रत (स अ व व ) सहने काबा में नमाज़ अदा फ़रमा रहे थे कि अबू जहल जो हज़रत उमर का मामू था।(तारीख़े इस्माल जिल्द 2 पृष्ठ 20 ) की नज़र आप पर पड़ी तो उसने हालते सजदे में ऊंट की औझड़ी गोबर भरी पुश्ते हुज़ूर पर रख दी , फातेमा को ख़बर मिली , आप दौड़ी हुई आयीं और पुश्ते रिसालत से औझड़ी हटा दी और पुश्ते मुबारक को पानी से धोया। रसूले अकरम (स अ व व ) ने फ़रमाया , बेटी एक दिन दुश्मन भी मग़लूब होंगे और ख़ुदा मेरे दीन को इन्तेहाईं बुलन्द करेगा। तारीख़ में है कि ख़दीजा (स.अ) किसी शादी में जाने को तैय्यार हुईं और कपड़े पहन्ने लगीं तो पता चला कि जनाबे सैय्यदा के लिए कपड़े नहीं हैं , मां इसी तरद्दुद में थी कि बेटी को एहसास हो गया , अर्ज़ कि मादरे गिरामी मैं पुराने कपड़े में ही चलूंगी , क्यों कि बाबा जान फ़रमाते हैं कि मुसलमान लड़कियों का सब से बेहतर ज़ेवर हयाते तक़वा है और बेहतरीन अराईश शर्म व हया है।

फातेमा ज़हरा (स.अ) का सारा बचपन फ़क़्र फ़ाक़ा और तंगी व मसाएब में गुज़रा। आपको जिन हज़रात से तालीम मिली वह यह हैं। 1.ख़दीजातुल कुबरा , 2. सरवरे काएनात (स अ व व ) , 3. फातेमा बिन्ते असद , 4. उम्मे अफ़ज़ल ज़ौजा ए अब्बास , 5. असमा बिन्ते उमैस ज़ौजा जाफ़रे तैय्यार , 6. उम्मे हानी हम्शीरा जनाबे अबू तालिब अ 0, 7 उम्मे ऐमन , 8. सफ़िया बिन्ते जनाबे हमज़ा।

मदारिजुल नबूवत में है कि हज़रत रसूले करीम (स अ व व ) जनाबे सैय्यदा को जब कि वह कमसिन थी अकसर अपनी आग़ोश में बिठा लिया करते थे और उन के होठों को बोसा देते थे। इस पर हज़रत आयशा ने कहा कि जनाबे फातेमा के बोसे देते हैं और अपनी ज़बान उनके मुंह में देते हैं , हुज़ूर ने इरशाद फ़रमाया तुम्हें मालूम नहीं जब मैं मेराज पर गया था जिबरईल ने एक सेब जन्नत में दिया था , मैंने उसे खाया था और इसी से फातेमा का नुतफ़ाये वुजूद क़ायम हुआ था। ऐ आयशा जब मैं जन्नत का मुशताक़ होता हूं तो फातेमा (स.अ) की ख़ुशबू सूंघता हूं और दहने फातेमा से मेवा ए जन्नत का लुत्फ़ उठाता हूं।

(मदारिज 1 पृष्ठ 192 )

आपकी इस्मत

इस्मत कोई ऐसी सिफ़त नहीं जो किसी अमल पर मौक़ूफ़ हो , यह ख़ुदा का अतीया होता है और बदो फ़ितरत में अता हुआ करता है। मलाएक अम्बिया और औसिया ख़ास के अलावा यह पाकीज़ा सिफ़त जिन अहम शख़्सियतों को अता हुई उनमें हज़रत फातेमा(स . अ) को ख़ास हैसीयत हासिल है। उलमा का इत्तिफ़ाक़ है कि जिस तरह एक लाख चौबीस हज़ार अम्बिया और बारह इमाम दुनिया में हिदायते ख़ल्क़ के लिए भेजे गये और सब मासूम थे इसी तरह सिनफ़े नाज़ुक़ के लिए हज़रत मरयम (स अ) हज़रत फातेमा ज़हरा (स अ) तशरीफ़ लायीं और यह दोनों बीबीयां मासूम थीं और दोंनो की इस्मत पर क़ुरआन गवाह है।

आप की वालेदा की वफ़ात

आपकी वालेदा जनाबे ख़दीजातुल कुबरा थीं हज़रत फातेमा (स.अ) को पांच साल मां की आग़ोश में तरबीयत नसीब रही। जनाबे ख़दीजा की अलालत से जनाबे सैय्यदा को बेहद दुख हुआ। आप इनकी तीमारदारी में रात और दिन लगी रहती थी और उनके चेहरे पर नज़र जमाए उन्हीं को देखा करती थीं। मां का चेहरा बहाल देखा तो ख़ुश हो गयीं। मां की शकल पज़मुर्दा देखी तो रंजीदा हो गयीं। यही तरज़े अमल रहा कि एक दिन ख़दीजा (स.अ) ने फातेमा (स.अ) को अपने सीने से लगाया और फूट फूट कर रोने लगीं। बेटी ने पूछा- अम्मा जाना आपके रोने का अन्दाज़ कुछ निराला है फ़रमाया- बेटी ! मैं तुझसे रूख़सत हो रही हूं , अफ़सोस तुझे दुल्हन न देख सकी। मां बेटी में अलमनाक बात चीत हो रही थी कि माथे पर मौत का पसीना आ गया और ख़दीजा (स.अ) 10 रमज़ान 10 बेअसत को इन्तेक़ाल फ़रमा गयीं मौत के वक़्त आपकी उम्र 65 साल की थी। आप को मक़बरा ए हज़ून में दफ़्न किया गया। ख़दीजा (स.अ) के इन्तेक़ाल से फातेमा (स.अ) को इन्तेहाई दुख हुआ और आप से ज़्यादा सरवरे कायनात (स अ व व ) को दुख हुआ। इसी वजह से आपने इस साल को आम उल हुज़्न कहा है।

सही बुख़ारी जिल्द 3 पृष्ठ 419 में है कि आं हज़रत (स अ व व ) जनाबे ख़दीजा की याद में गोसफ़न्द (बकरा) ज़िब्ह कर के उनकी सहेलियों के पास भेजा करते थे। एक मरतबा हज़रत आयशा ने कहा कि उस बूढ़ी औरत को जिस के मुंह में दांत भी न थे। कब तक याद करते रहेंगे यह सुन कर आं हज़रत (स अ व व ) ग़ज़ब नाक हो गये और फ़रमाया कि इससे बेहतर मुझे कोई औरत नसीब नहीं हुई। वह उस वक़्त ईमान लायीं जब कि सब काफ़िर थे और वक़्त मेरे लिये माल ख़र्च किया जब लोग महरूम करना चाहते थे। हयात अल क़ुलूब में है हज़रत अबूतालिब और उनके तीन दिन बाद हज़रत ख़दीजा का इन्तेक़ाल हुआ था।

हिजरते फातेमा (स.अ)

10 बेसत जुमे की रात यकुम रबीउल अव्वल को आं हज़रत (स अ व व ) ने हिजरत फ़रमाई और 16 रबीउल अव्वल जुमे के दिन को दाख़िले मदीना हुए। वहां पहुंचने के बाद आपने ज़ैद बिन हारेसा और अबू राफ़ये को 5 सौ दिरहम और दो ऊंट दे कर मक्का की तरफ़ रवाना किया कि हज़रत फातेमा , फातेमा बिन्ते असद , उम्मुल मोमिनीन सौदा , उम्मे ऐमन वग़ैरा को ले आए। चुनान्चे यह बीबीयां चन्द दिनों के बाद मदीना पहुंच गयीं आप के अक़्द में उस वक़्त सिर्फ़ दो बीबीयां थीं। एक सौदा और दूसरी आयशा। 2 हिजरी में आप (स अ व व ) ने उम्मे सलमा से अक़्द किया। उम्मे सलमा ने निगहदाश्ते फातेमा (स.अ) का बीड़ा उठाया और इस अन्दाज़ से ख़िदमत गुज़ारी की कि फातेमा ज़हरा (स.अ) से मां को भुला दिया।

हज़रत फातेमा ज़हरा (स.अ) की शादी

पैग़म्बरे इस्लाम (स अ व व ) ने अली अ 0 की विलादत के वक़्त अली को ज़बान दे दी थी और बाद में फ़रमाया था कि मेरी बेटी का कफ़ू ख़ाना ज़ादे ख़ुदा के कोई नहीं हो सकता। (नूरूल अनवार सहीफ़ाये सज्जादिया) हालात का तक़ाज़ा और नसबी वा ख़ानदानी शराफ़त का मुक़तज़ा यह था कि फातेमा की ख़्वास्तगारी के सिलसिले में अली के सिवा किसी का तज़किरा तक न आता लेकिन किया क्या जाए कि दुनिया इस एहमियतक को समझने से क़ासिर रही है। यही वजह है कि फातेमा (स.अ) के सिने बुलूग़ तक पहुंचते ही लोगों के पैग़ामात आने लगे। सब से पहले अबू बकर ने फिर हज़रत उमर ने ख़्वास्गारी की और इनके बाद अब्दुर रहमान ने पैग़ाम भेजा। हज़राते शेख़ैन के जवाब में रहमतुल लिल आलेमीन (स अ व व ) ग़ज़बनाक हुए और उनकी तरफ़ से मुंह फेर लिया।

(कन्ज़ुल आमाल जिल्द 7 पृष्ठ 113)

और अब्दुर रहमान से फ़रमाया कि फातेमा की शादी हुक्मे ख़ुदा से होगी तुम ने जो महर की ज़्यादती का हवाला दिया है वह अफ़सोस नाक है। तुम्हारी दरख़्वास्त क़ुबूल नहीं की जा सकती।

(बिहारुल अनवार जिल्द 10 पृष्ठ 14)

इसके बाद हज़रत अली अ 0 ने दरख़्वास्त की तो आप (स अ व व ) ने फातेमा (स.अ) की मरज़ी दरयाफ़्त फ़रमाई , वह चुप ही रहीं यह एक तरह का इज़हारे रज़ामन्दी था।

(सीरतुल अल नबी जिल्द 1 पृष्ठ 26 )

बाज़ उलमा ने लिखा है कि आं हज़रत (स अ व व ) ने ख़ुद अली अ 0 से फ़रमाया कि ऐ अली अ 0 मुझे ख़ुदा ने फ़रमाया है कि अपने लख़्ते जीगर का अक़्द तुम से करूं क्या तुम्हें मनज़ूर है ? अर्ज़ की जी हां ! इसके बाद शादी हो गयी।

(रेयाज़ अल नज़रा जिल्द 2 पृष्ठ 184 प्रकाशित मिस्र)

अल्लामा मजलिसी लिखते हैं कि पैग़ाम महमूद नामी एक फ़रिश्ता ले कर आया था।

(बिहारूल अनवार जिल्द 1 पृष्ठ 35 )

बाज़ उलमा ने जिबरील का हवाला दिया है। ग़रज़ हज़रत अली (अ.स) ने 500 दिरहम में अपनी ज़िरह उस्मान ग़नी के हाथों बेची और इसी को महर क़रार दे कर बातारीख़ 1 ज़िलहिज 2 हिजरी हज़रत फातेमा ज़हरा (स.अ) के साथ निकाह किया

जनाबे सैय्यदा का जहेज़

निकाह के थोड़े समय बाद 24 ज़िल हिज को हज़रत सैय्यदा की रूख़सती हुई सरवरे काएनात (स अ व व ) ने अपनी इकलौती चहीती बेटी को जो जहेज़ दिया उसकी तफ़सील यह है।

1.एक कमीज़ क़ीमती सात दिरहम ,

2. एक मक़ना ,

3. एक सियाह कम्बल ,

4. एक बिस्तर खजूर के पत्तों का बना हुआ ,

5. दो मोटे टाट ,

6. चमड़े के चार तकिये ,

7. आटा पीसने की चक्की ,

8. कपड़ा धोने की लगन ,

9. एक मशक ,

10. लकड़ी का बादिया ,

11. खजूर के पत्तों का बना हुआ एक बरतन ,

12. दो मिट्टी के आब ख़ोरे ,

13. एक मिट्टी की सुराही ,

14. चमड़े का फ़र्श ,

15. एक सफ़ेद चादर ,

16. एक लोटा।

यह ज़ाहिर है कि रसूल (स अ व व ) आला दरजे का जहेज़ दे सकते थे मगर अपनी उम्मत के ग़ुरबा के ख़्याल से इसी पर इक़तेफ़ा फ़रमाया।

जुलूसे रूख़सत

खाने पीने के बाद जुलूस रवाना हुआ। अशहब नामी नाक़ा पर हज़रत फातेमा (स.अ) सवार थीं। सलमान सारबान थे , अज़वाजे रसूल नाक़े के आगे आगे थीं , बनी हाशिम नंगी तलवारे लिये हुए थे , मस्जिद का तवाफ़ कराया और अली अ 0 के घर में फातेमा (स.अ) को उतार दिया इसके बाद आं हज़रत (स अ व व ) ने फातेमा (स.अ) से एक बरतन में पानी मंगाया और कुछ दुआयें दम कीं और उसे फातेमा और अली के सर सीने और बाज़ू पर छिड़का और बरगाहे अहदीयत में अर्ज़ की बारे इलाह इन्हें और इनकी औलादों को शैतान रजीम से तेरी पनाह में देता हूं।

(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 84 )

इसके बाद फातेमा (स.अ) से कहा देखो अली से बेजा सवाल न करना। यह दुनियां में सब से आला और अफ़ज़ल है लेकिन दौलत मन्द नहीं है। अली से कहा कि यह मेरे जिगर का टुकड़ा है कोई ऐसी बात न करना कि उसे दुख हो।

तज़किरा ए अलख़्वास सिब्ते इब्ने जौज़ी के पृष्ठ 365 में है कि फातेमा के साथ जिस वक़्त अली की शादी हुई उन के घर में एक चमड़ा था , रात को बिछाते थे और दिन में उस पर ऊंट को चारा दिया जाता था।

हज़रत फातेमा (स.अ) का निज़ामे अमल

शौहर के घर जाने के बाद आप ने जिस निज़ामे ज़िन्दगी का नमूना पेश किया वह तबक़ा ए निसवां के लिए एक मिसाली हैसीयत रखता है। आप घर का तमाम काम अपने हाथों से करती थीं। झाड़ू देना , खाना पकाना , चरख़ा कातना , चक्की पीसना और बच्चों की तरबीयत करना यह सब काम और अकेली सय्यादा ए आलम , लेकिन न कभी तेवरी पर बल आते थे और न कभी शौहर से मददगार न ख़ादमा की फ़रमाईश की। फिर जब 7 हिजरी में पैग़म्बरे ख़ुदा (स अ व व ) ने एक ख़ादमा अता की जो फ़िज़्ज़ा के नाम से मशहूर हैं , तो रसूल अल्लाह (स अ व व ) की हिदायत के अनुसार सैय्यदाए आलम फ़िज़्ज़ा के साथ एक कनीज़ का सा नहीं , बल्कि एक अज़ीज़ रफ़ीक़ कार जैसा बरताव करती थीं और एक दिन घर का काम ख़ुद करती थीं। दरअस्ल यह मसावाते मोहम्मदी की आला मिसाल हैं।

(सैय्यदा की अज़मत , मुसन्नेफ़ मौलाना कौसर नियाज़ पृष्ठ 5 )

फातेमा (स.अ) और पर्दा

आप ने औरतों की मेराज पर्दादारी को बताया है और ख़ुद भी हमेशा इस पर आमिल रही हैं और इतनी सख़्ती के साथ कि मस्जिदे रसूल (स अ व व ) बिल्कुल मुतास्सिल क़याम रखने और मस्जिद के अन्दर घर का दरवाज़ा होने के बावजूद कभी अपने वालिदे बुज़ुर्गवार के पीछे नमाज़े जमाअत में शिरकत या आपके मौवाएज़ के सुनने के लिए भी मस्जिद में तशरीफ़ नहीं लाईं। एक मरतबा पैग़म्बर (स अ व व ) ने मिम्बर पर यह सवाल पेश फ़रमा दिया कि औरत के लिये सब से बेहतर क्या चीज़ है ? यह बात जनाबे सैय्यदा (स.अ) तक पहुंची , आपने जवाब दिया , औरत के लिये सब से बेहतर यह बात है कि न इसकी नज़र किसी ग़ैर मर्द पर पड़े और न किसी ग़ैर मर्द की नज़र उस पर पड़े। रसूल (स अ व व ) के सामने यह जवाब पेश हुआ आपने फ़रमाया , क्यों न हो फातेमा मेरा ही एक जुज़ है।

जनाबे सैय्यदा (स.अ) का जिहाद

इस्लाम में औरत का जिहाद मर्द से अलग है इस लिए सैय्यदा (स.अ) ने कभी मैदाने जंग में क़दम नहीं रखा मगर रसूल (स अ व व ) जब कभी ज़ख़्मी हो कर घर वापस तशरीफ़ लाते थे तो पैग़म्बर (स अ व व ) के ज़ख़्मों को धुलाने वाली , और अली अ 0 जब ख़ून में डूबी तलवार ले कर आते थे तो उनकी तलवार को साफ़ करने वाली फातेमा ज़हरा ही होती थीं। एक मरतबा नुसरते इस्लाम के लिए मैदान में गईं मगर उस पुर अमन मामले में जो नसारा के मुक़ाबले में हुआ था और जिस में सिर्फ़ रूहानी फ़तेह का सवाल था। इस जिहाद का नाम मुबाहेला है और इस में पर्दा दारी के तमाम इमकानी तक़ाज़ों की पाबन्दी के साथ सैय्यदा ए आलम बाप बेटों और शौहर के बीच मरकज़ी हैसीयत रखती थी।

(वसाएल अल शिया जिल्द 3 पृष्ठ 61 )

हज़रत फातेमा (स.अ) और उमूरे ख़ानादारी

औरतों का ज़ौहरे ज़ाती शौहरों की ख़िदमत और अमूर ख़ाना दरी में कमाल हासिल करना है। फातेमा ज़हरा (स.अ) ने अली (अ.स) की ऐसी ख़िदमत की कि मुश्किल से इसकी मिसाल मिल सकेगी। हर मुसीबत और तकलीफ़ में फ़रमा बरदारी पर नज़र रखी और अगर मैं यह कहूं तो बेजा न होगा कि जिस तरह ख़दीजा (स.अ) ने इस्लाम और पैग़म्बरे इस्लाम की ख़िदमत की , इसी तरह बिन्ते रसूल (स.अ) ने इस्लाम और अली अ 0 की ख़िदमत की , यही वजह है कि जिस तरह रसूले करीम (स अ व व ) ने ख़दीजा (स.अ) की मौजूदगी में दूसरा अक़्द नहीं किया हज़रत अली अ 0 ने भी फातेमा (स.अ) की मौजूदगी में दूसरा अक़्द नहीं किया।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 85 व मुनाक़िब पृष्ठ 8 ) हज़रत अली अ 0 से किसी ने पूछा के फातेमा (स.अ) आप की नज़र में कैसी थीं ? फ़रमाया ख़ुदा की क़सम वह जन्नत का फूल थीं। दुनियां से उठ जाने के बाद मेरा दिमाग़ उनकी ख़ुशबू से मुअत्तर है।

उमूरे ख़ानदानी में जनाबे सैय्यदा आप ही अपनी नज़र थीं। 7 हिजरी तक आप के पास कोई कनीज़ न थी। कनीज़ न होने की सूरत में घर का सारा काम ख़ुद करती थीं , झाड़ू देती थीं , पानी भरती , चक्की पीसती थीं , आटा छानती थीं , आटा गुंधती थी , तनूर जलाकर रोटी पकाती थीं। हज़रत अली (अ.स) सवेरे उठ कर मस्जिद चले जाते थे और वहां से मज़दूरी की फ़िक्र में लग जाते थे। फ़िज़्ज़ा के आ जाने के बाद काम बांट लिया गया था। बल्कि बारी बांट ली थी। एक दफ़ा सरकारे दो आलम (स अ व व ) ख़ाना ए सैय्यदा स. में तशरीफ़ लाये। देखा कि सैय्यदा गोद में बच्चे को लिये चक्की पीस रही हैं , फ़रमाया बेटी एक काम फ़िज़्ज़ा के हवाले कर दो। अर्ज़ की बाबा जान ! आज फ़िज़्ज़ा की बारी का दिन नहीं है।

(मनाक़िब पृष्ठ 14 )

हज़रत फातेमा (स.अ) और बाहम गुज़ारदारी ज़ौजा व ख़ावन्द

हज़रत इमाम मूसा काज़िम अ 0 इरशाद फ़रमाते हैं कि जिहाद अल मरअतल हसन अल तबअल , औरत का जिहाद शौहर के साथ हुस्ने सुलूक है।(वसाएल एल शिया जिल्द 12 पृष्ठ 116 ) एक हदीस में है कि , ला तूदी अलमुरतह हक़ अल्लाह हत्ती तूदी हक़ ज़ौजह , औरत अगर ख़ावन्द का हक़ अदा नहीं करती तो समझ लेना चाहिए कि वह अल्लाह ते हुक़ूक़ भी अदा नहीं कर सकती।

(मकारिमुल अख़लाक़ पृष्ठ 247 )

रसूले करीम (स अ व व ) फ़रमाते हैं कि अगर ख़ुदा के अलावा किसी को सज्दा जाएज़ होता तो मैं औरतों को हुक्म देता कि अपने शौहरों को सज्दा करें।

(वसाएल जिल्द 14 पृष्ठ 114 )

हज़रत फातेमा (स.अ) हुक़ूक़े ख़ावन्द से जिस दर्जा वाक़िफ़ थीं कोई भी वाक़िफ़ न थी। उन्होंने हर मौक़े पर अपने शौहर हज़रत अली (अ.स) का लिहाज़ व ख़्याल रखा। उन्होंने कभी उन से कोई ऐसा सवाल नहीं किया जिसके पूरा करने से हज़रत अली अ 0 आजिज़ रहे हों। किताब रेयाहीन अल शरीअत में है कि एक मरतबा हज़रत फातेमा (स.अ) बीमार पड़ीं तो हज़रत अली अ 0 ने उनसे फ़रमाया कुछ खाने को दिल चाहता हो तो बताओ , हज़रत सैय्यदा ने अर्ज़ की किसी चीज़ को दिल नहीं चाहता। हज़रत अली अ 0 ने इसरार किया तो अर्ज़ की मेरे पदरे बुज़ुर्गवार ने मुझे हिदायत की है कि मैं आप से किसी चीज़ का सवाल न करूं मुम्किन है आप उसे पूरा न कर सके तो आप को दुख हो इस लिये मैं कुछ नहीं कहती। हज़रत अली (अ.स) ने जब क़सम दी तो अनार का ज़िक्र किया।

यह तारीख़ का मुसल्लेमा अमर है कि हज़रत अली अ 0 और हज़रत फातेमा (स.अ) में कभी किसी बात पर नाराज़गी नहीं हुई और दोनों ने बाहम दिगर ख़ुशगवार ज़िन्दगी गुज़ारी है।

सास बहू के ताअल्लुक़ात

फातेमा ज़हरा स. की शादी के वक़्त जनाबे फातेमा बिन्ते असद ज़िन्दा थीं। सास बहू के ताअल्लुक़ात अकसर बेशतर नाख़ुशगवार हो जाया करते हैं लेकिन फातेमा स. ने ऐसा दस्तूर और रवैया इख्तियार किया कि कभी भी ताअल्लुक़ात में तनाव पैदा न होने पाया। फातेमा बिन्ते असद के सिपुर्द दोस्त व रिश्तेदारों की मुलाक़ात , शादी और ग़मी में शिरकत वग़ैरा क़रार दिया और अपने ज़िम्मे अमूर ख़ानदारी मसलन चक्की पीसना , रोटी पकाना वग़ैरा रख लिया था। तारीख़ में इन दोनों की बाहमी कशीदगी का सुराग़ नहीं मिलता।

आपकी औलाद

आपके तीन बेटे और दो बेटियां पैदा हुईं। 15 रमज़ान 3 हिजरी को इमाम हसन अ 0 और 3 शाबान 4 हिजरी को इमाम हुसैन अ 0 और 5 जमादिल अव्वल 6 हिजरी में हज़रत ज़ैनब स. और 9 हिजरी में जनाबे उम्मे कुलसूम और 11 हिजरी में इस्तेक़ाते मोहसिन हुआ। उलमा ने लिखा है कि ज़ैनब का निकाह अब्दुल्लाह बिन जाफ़र और उम्मे कुलसूम का निकाह मोहम्मद बिन जाफ़र से हुआ था।

(इब्ने माजा अबू दाऊद , इब्ने हजर और असआफ़ उर राग़ेबीन बर हाशिया नूर उल अबसार पृष्ठ 80 मुद्रित मिस्र)

बारवायते सिब्ते इब्ने जौज़ी हज़रत ज़ैनब के बतन से औन व अब्दुल्लाह पैदा हुए और उम्मे कुलसूम ला वलद मरीं।

(तज़किरा ख्वास पृष्ठ 380 )

आपकी इबादत

आप अनगिनत नमाज़े रात और दिन पढ़ा करती थीं। आपने अपने पदरे बुज़ुर्गवार के साथ 10 हिजरी में आख़री हज फ़रमाया था।

फातेमा ज़हरा (स.अ) पैग़म्बरे इस्लाम (स अ . व . व . ) की नज़र में

फातेमा ज़हरा (स.अ) की फ़ज़ीलत और इनके मदारिज के सिलसिले में क़ुरान मजीद की आएतें और बेशुमार हदीसें मौजूद हैं इस वक़्त चन्द अहादीस और पैग़म्बरे इस्लाम के बाज़ तरज़े अमल पर इक़तेफ़ा करता हूं। आपका इरशाद है कि फातेमा जन्नत में जाने वाली औरतों की सरदार हैं। तमाम जहान की औरतों की सरदार हैं। आपकी रज़ा से अल्लाह राज़ी होता है जिसने आपको तकलीफ़ दी उसने रसूल (स.अ) को तकलीफ़ पहुंचाई। ख़ुदा ने आपकी बदौलत आपके मानने वालों को जहन्नम से छुड़वा दिया। आप फ़रमाते हैं कि मर्दों में बहुत लोग कामिल गुज़रे हैं लेकिन औरतों में सिर्फ़ चार औरतें कामिल गुज़री हैं। 1.मरयम , 2. आसीया 3. ख़दीजा 4. फातेमा और इन में सब से बड़ा दर्जा ए कमाल फातेमा को हासिल है। उलमा का बयान है कि हज़रत पैग़म्बरे इस्लाम (स अ व व ) आप से इन्तेहाई मोहब्बत रखते थे और कमाल इज़्ज़त भी करते थे। मोहब्बत के मुज़ाहिरों में से एक यह था कि जब किसी ग़ज़वे में तशरीफ़ ले जाते थे तो सब से आख़िर में फातेमा स. से रूख़सत होते थे और जब वापिस आते थे तो सब से पहले फातेमा ज़हरा स. को देखने तशरीफ़ ले जाते थे और इज़्ज़तो एहतिराम का मुज़ाहेरा यह था कि जब हज़रत फातेमा आती थीं तो आप ताज़ीम को खड़े हो जाते थे और अपनी जगह पर बिठाते थे।

(तिरमिज़ी जिल्द 2 पृष्ठ 249 मुद्रित मिस्र)

(मतालिब सऊल पृष्ठ 22 मुद्रित लखनऊ)

मुख़तलिफ़ कुतुब सहा में मौजूद है कि आं हज़रत (स अ व व ) ने फ़रमाया , फातेमा मेरा जुज़ है जो उसे तकलीफ़ पहुंचाएगा वह मुझे तकलीफ़ पहुंचाएगा। मुवर्रेख़ीन और मुहद्देसीन का इत्तेफ़ाक़ है कि नुज़ूल आया ए ततहीर के बाद सरवरे दो आलम दरे फातेमा स पर 9 माह लगातार बवक़्ते नमाज़े सुबह जाकर आवाज़ दिया करते और फ़रते मसर्रत में फ़रमाया करते थे कि ख़ुदा ने तुम्हें हर तरह की गन्दगी से पाको पाकीज़ा किया है।

(ज़ाद उल उक़बा तरजुमा मुवद्दतुल क़ुरबा मुवद्दत 11 पृष्ठ 100 )

हज़रत फातेमा (स अ) रब्बुल इज़्ज़त की निगाह मे

मोहद्देसीन (हदीसों के ज्ञाता) का बयान है कि हज़रत फातेमा (स अ) को परवर दीगारे आलम अपनी कनीज़े ख़ास जानता था और उनकी बेहद इज़्ज़त करता था। देखा गया है कि हज़रत सैय्यदा नमाज़ में मशग़ूल होती थीं और फ़रिश्ते इनके बच्चों को झूला झुलाते थे और जब वह क़ुरआन पढ़ने बैठती थीं तो फ़रिश्ते उनकी चक्की पीसा करते थे। हज़रत रसूले करीम (स अ व व ) ने झूला झुलाने वाले फ़रिश्ते का नाम जिब्राईल और चक्की पीसने वाले का नाम औक़ाबील बताया है।(मनाक़िब इब्ने शहरे आशोब , जिल्द 2 पृष्ठ 28, मुल्तान में छपी)

फातेमा (स अ) अहदे रिसालत (स अ व व ) मे

पैग़म्बरे इस्लाम (स अ व व ) की हयात में फातेमा (स अ) की क़दरो मंज़िलत , इज़्ज़त व तौक़ीर की कोई हद न थी। इन्सान तो दर किनार मलाएका का यह हाल था कि आसमानों में उतर ज़मीन पर आते और फातेमा (स अ) की ख़िदमत करते। कभी जन्नत के तबक़ लाये , कभी हसनैन (अ.स.) का झूला झुला कर फातेमा की मदद की। अगर उनके मुंह से ईद के मौक़े पर निकल गया कि बच्चों तुम्हारे कपड़े दरज़ी लायेगा तो जन्नत के ख़ज़ानची को दरज़ी बन कर आना पड़ा। हद है कि मलकुल मौत भी आपकी इजाज़त के बग़ैर घर में दाख़िल न हुये। अल्लामा अबदुल मोमिन हन्फ़ी लिखते हैं कि सरवरे कायनात (स अ व व ) के वक़्ते आख़िर फातेमा के ज़ानू पर सरे रिसालत माआब था , मलकुल मौत ने आवाज़ दी और घर में आने की इजाज़त चाही , फातेमा (स अ) ने इन्कार कर दिया , मलकुल मौत दरवाज़े पर रूक गये लेकिन मकान में दाख़िल होने की ज़िद करते रहे। फातेमा (स अ) के बराबर इन्कार पर मलकुल मौत ने कुछ आवाज़ बदल कर आवाज़ दी। फातेमा स रो पड़ीं , आपके आंसू रूख़सारे रिसालत पर गिरे। पैग़म्बर (स अ व व ) ने पूछा क्या बात है ? आप ने वाक़िया बताया। हुक्म हुआ ?! इजाज़त दो यो मलकुल मौत हैं।(अजायब अल क़स्स , पृष्ठ 282 )

फातेमा ज़हरा रसूले इस्लाम के बाद

28 सफ़र 11 हिजरी को रसूले इस्लाम का इन्तेक़ाल हुआ। आपके इन्तेक़ाल के बाद आपके घर वालों पर ज़ुल्म व अत्याचार के पहाड़ टूट पड़े और आप इतना दुखी हुईं कि अपनी कश्तीए हयात 75 दिन से अधिक न खेंच सकीं। आपके सर पर पट्टी बंधी रहा करती थी और रात दिन अपने बाबा को रोया करती थीं। आपके लिये सरवरे कायनात का सदमा ही क्या कम था के उस पर आफ़त यह कि दुनिया दारों ने रसूल (स अ व व ) के घर को ग़मों का अड्डा बना दिया। होना यह चाहिये था कि बाप के इन्तेक़ाल के बाद कफ़न दफ़न की मुसिबत से दुख दर्द मारी बेटी को बे नियाज़ कर दिया जाता और हुज़ूर की तदफ़ीन , तकफ़ीन को बहुत अच्छी तरह अंजाम दिया जाता , लेकिन अफ़सोस इसके विपरीत दुनिया वालों ने रसूले इस्लाम (स अ व व ) की मय्यत को यूं ही घर में छोड़ दिया और ख़ुदा और रसूल की मंशे के ख़िलाफ़ अपनी हुकूमत की बुनियाद क़ायम करने के लिये सक़ीफ़ा बनी साएदा चले गये। रसूले इस्लाम (स अ व व ) की मय्यत पड़ी रही , बिल आख़िर आले मोहम्मद (स अ व व ) और दीगर चन्द मानने वालों ने इस फ़रीज़े को अदा किया। यह वाक़ेया भुलाने के क़ाबिल नहीं जब की हज़रत अबू बक्र ख़लीफ़ा बन कर और हज़रत उमर ख़लीफ़ा बना कर वापस लौटे तो सरवरे कायनात (स अ व व ) की लाशे मुतहर सुपुर्दे ख़ाक की जा चुकी थी। इन हज़रात ने इस तरफ़ ध्यान न दिया और किसी ग़म व अफ़सोस का इज़हार न किया और सब से पहले जिस चीज़ की कोशिश शुरू की वह हज़रत अली अ 0 से बैअत लेने की थी। हज़रत अली (अ.स.) और कुछ महत्वपूर्ण एंव आदरणीय सहाबा जिन में कुल बनी हाशिम , ज़ुबैरस अतबआ बिन अबी लहब , ख़ालिद बिन सईद , मिक़दाद बिन उमर , सलमाने फ़ारसी , अबू ज़रे ग़फ़्फ़ारी , अम्मारे यासिर , बरा बिन आज़िब , इब्ने अबी क़अब , और अबू सुफ़ियान क़ाबिले ज़िक्र हैं।

(तारिख़े अबुल फ़िदा , जिल्द 1 पृष्ठ 375 )

यह लोग चूकिं ख़िलाफ़ते मन्सूसा के मुक़ाबले में सक़ीफ़ाई ख़िलाफ़त को तसलीम न करते थे लेहाज़ा लिहाज़ा जनाबे फातेमा (स.अ) के घर में गोशा नशीन हो गये। इस पर हज़रत उमर आग और लकड़ियां लेकर आये और कहा घर से निकलों वरना हम घर में आग लगा दें गे। यह सुन कर हज़रत फातेमा ज़हरा (स.अ) दरवाज़े के क़रीब आईं और फ़रमाया कि इस घर में रसूल (स.अ) के नवासे हसनैन भी मौजूद हैं। कहा होने होने दीजिये।

(तारिख़ तबरी , वल इमामत वल सियासत , जिल्द 1 पृष्ठ 12 )

इसके बाद बराबर शोर ग़ुल होता रहा और अली (अ.स) को घर से बाहर निकालने की बात होती रही। मगर अली (अ.स) न निकले , फातेमा (स.अ) के घर को आग लगा दी गई।( 1) जब शोले बलन्द होने लगे तो फातेमा (स.अ) दौड़ कर दरवाज़े के क़रीब आईं और फ़रमाया , अरे अभी मेरे बाप का कफ़न भी मैला न होने पाया कि यह तुम क्या कर रहे हो ? यह सुन कर फातेमा (स.अ) के उपर दरवाज़ा गिरा दिया गया जिसकी वजह से फातेमा (स.अ) के पेट पर चोट लगी और फातेमा (स.अ) के पेट में मोहसिन नाम का बच्चा शहीद हो गया।

(किताब अल मिलल वन्नहल शहरिस्तानी , मिस्र में छपी पृष्ठ 202 )

अल्लामा मुल्ला मूईन काशफ़ी लिखतें हैं कि फातेमा इसी ज़रबे उमर से रेहलत कर गईं।

(मुलाहेज़ा हो मआरिजुन नुबूवा , पैरा 4, भाग 3 पृष्ठ 42 )

इसके बाद यह लोग हज़रत फातेमा (स.अ) के घर में बेधड़क घुस आये और अली (अ.स) को गिरफ़तार कर के उनके गले में रस्सी बांधी इब्ने अबील हदीद , 3, और लेकर दरबारे खि़लाफ़त में पहुंचे , और कहा बैअत करो , वरना ख़ुदा की क़सम तुम्हारी गरदन मार देंगे। रौज़तुल अहबाब हज़रत अली (अ.स) ने कहा , तुम क्या कर रहे हो और कि़स क़ायदे और किस बुनियाद पर मुझ से बैअत ले रहे हो। यह कभी नहीं हो सकता। अल इमामत वल सियासत , जिल्द 1 पृष्ठ 13 बाज़ इतिहास कारों का बयान है कि उन लोंगो ने सैय्यदा के घर में घुस कर धमा चौकड़ी मचा दी बिल आखि़र इबने वाज़े के अनुसार ‘‘फ़ख़्रजत फ़ात्मतः फ़ाक़ालत वल्लाहुल तजज़ जिन औला कशफ़न शआरी वल अजजन इल्ललाह ’’ फातेमा बिन्ते रसूल (स.अ) सहने ख़ाना में निकल आईं और कहने लगीं ख़ुदा की क़सम घर से निकल जाओ वरना मैं अपने सर के बाल खोल दूंगी और ख़ुदा की बारगाह में सख़्त फ़रियाद करूगीं।

तारीख़ अल याक़ूबी जिल्द 2 पृष्ठ 116 एक रवायत में है कि जब हज़रत अली (अ.स) को गिरफ़तार कर के ले जाया जा रहा था तो हज़रत फातेमा बिन्ते रसूल (स.अ) ने फ़रियाद करते हुए कहा था कि अबुल हसन को छोड़ दो वरना अपने सर के बाल खोल दूंगी। तबरी कहते हैं कि इस कहने पर मस्जिदे नबवी की दीवार कद्दे आदम बुलन्द हो गई थी।( 2) इसके बाद हज़रत फातेमा को सूचना मिली के आपकी वह जायदाद जिसका नाम फ़दक़ था जो बहुक्मे ख़ुदा रसूल (स अ व व ) के हाथों आई थी और जिसकी आमदनी फ़क़ीरों , अनाथों पर हमेशा से ख़र्च होती आई जिसका महले वक़ू मदीना मुनव्वरा से शुमाल की तरफ़ सौ मील है पर ख़लीफ़ा ए वक़्त ने क़ब्ज़ा कर लिया है। मोअजि़्ज़म अलबदान सही बुख़ारी अल फ़ारूख़ जिल्द 2 पृष्ठ 288, यह मालूम कर के आप हद् दर्जा ग़ज़ब नाक हुईं बुख़ारी और यह मालूम कर के और ज़्यादा दुखी हुईं कि एक फ़रज़ी हदीस ग़सबे फि़दक के जवाज़ में गढ़ ली है। अल ग़रज़ आप ने दरबारे खि़लाफ़त में अपना मुतालबा पेश किया और इनकारे सुबह पर बतौरे सबूत हज़रत अली (अ.स) , हज़रत हमामे हसन (अ.स) , इमामे हुसैन (अ.स) , उम्मे ऐमन और रबाह को गवाही में पेश किया लेकिन सब की गवाहियां रद्द कर दी गईं और कहा गया अली शैहर हैं हसनैन बेटे हैं उम्मे ऐमन वग़ैरा कनीज़ व ग़ुलाम हैं , इनकी गवाही नहीं मानी जा सकती। किताब अल कशफ़ा , इन्सान अल उयून व सवाएक़ पृष्ठ 32, एक रवायत की बिना पर हज़रत अबू बकर ने हेबा का तस्दीक़ नामा लिख कर फातेमा (स.अ) को दे दिया था वह ले कर जाने ही वाली थीं कि अचानक हज़रत उमर आये , पूछा क्या है ? कहा तसदीक़े हेबा नामा , आप ने वह ख़त हाथ से ले कर चाक कर डाला और बा रवायत ज़मीन पर फेक कर उस पर थूक दिया और पांव से रगड़ डाला।(सीरते हलबिया पृष्ठ 185, और मुक़दमा ख़ारिज करा दिया , इनसान अल उयून जिल्द 3 पृष्ठ 400 सबा मिस्त्र) , इसी सिलसिले में आपका ख़ुतबा लम्मा ख़ास अहमियत रखता है। इसके थोड़े दिन बाद हज़रत अबू बक्र और हज़रत उमर , अमीरूल मोमिनीन हज़रत अली (अ.स) की खि़दमत मे हाजि़र हुए और अजऱ् की कि हम ने फातेमा को नाराज़ किया है , हमारे साथ चलिए हम उन से माफ़ी मांग लें। हज़रत अली (अ.स) उनको हमराह ले कर आए और फ़रमाया ऐ फातेमा यह दोनों पहले आए थे और तुमने उन्हें अपने मकान में घुसने नहीं दिया अब मुझे ले कर आएं हैं इजाज़त दो कि दाखि़ले खाना हो जाऐं। हुक्मे अली (अ.स) से इजाज़त तो दे दी लेकिन जब यह दाखिले खाना हुए तो फातेमा ने दीवार की तरफ़ मुंह फेर लिया और सलाम का जवाब तक न दिया और फ़रमाया ख़ुदा की क़सम ता जि़न्दगी नमाज़ के बाद तुम दोनों पर बद दुआ करती रहूंगी। ग़रज़ की फातेमा ने माफ़ न किया और यह लोग मायूस वापिस हो गये। अल इमामत वल सियासत मुअल्लेफ़ा इब्ने अबी क़तीबा मतूफ़ी 276 हिजरी जिल्द 1 पृष्ठ 14 इमाम बुख़ारी कहते हैं कि फातेमा ने ता हयात उन लोगों से बात नहीं की और ग़ज़ब नाक ही दुनिया से उठ गईं।

1 रौज़ातुल अल मनाजि़र हासिया कामिल 11 पृष्ठ 113 32 व एहतिजाज तबरी

2 मुआक़ी अल अख़बार पृष्ठ 206 4, एतिजाज 1 पृष्ठ 112


आपकी अलालत

हम उपर बा हवाला अल्लामा शहर सतानी व अल्लामा मोईन काशफ़ी लिख कर आए हैं कि हज़रत उमर ने सैय्यदातुन निसां हज़रत फातेमा पर दरवाज़ा गिराया था और शिकमे मुबारक पर ज़र्ब लगाई थी जिसकी वजह से इस्तेक़ाते हमल हुआ था। और इसी सबब से आप बीमार हुईं और आखि़्र में मर गईं। अब आपकी खि़दमत में डिप्टी नज़ीर अहमद की तहरीर का एकतेबास पेश करते हैं। वह लिखते हैं , जो आदमी रसूल (स अ व व ) के मरने से सब से ज़्यादा प्रभावित हुआ वह फातेमा थीं। मां पहले ही मर चुकी थीं अब मां और बाप दोनो की जगह पैग़म्बर साहब ही थे और बाप भी कैसे दीन और दुनियां के बादशाह। ऐसे बाप का साया सर से उठना इस पर हज़रत अली (अ.स) का खि़लाफ़त से महरूम रहना तरके पदरी फि़दक का दावा करना और मुक़दमा हार जाना , इन्हीं दुखों में आप का इन्तेक़ाल हो गया। रोया ऐ सादक़ा फ़सल 14, आप इस क़द्र रोईं की अहले मोहल्ला एतेराज़ करने लगे , आखि़र में हज़रत अली ने रोने के लिये मदीने से बाहर बैतुल हुज़्न बनवाया था।

(अनवारूल हुसैनिया सफ़ा 24 प्रकाशित बम्बई)

हालात से प्रभावित हो कर हज़रत सैय्यदा ने अपने वालिद बुजुर्गवार का जो मरसिया कहा है उसका एक शेर यह है किः-

सुब्बत अलैया मसाएबुन लव अन्नहार

सुब्बत अलल अयामे सिरना लेया लिया

तरजुमाः- अब्बा जान आपके बाद मुझ पर ऐसी मुसीबतें पड़ीं कि अगर वह दिनों पर पड़तीं तो मिस्ल रात के तारीक हो जाते।

(नुरूल अबसार पृष्ठ 46, व मदारिज जिल्द 2 पृष्ठ 524 )

आपकी वसीयत

फातेमा ज़हरा (स.अ) ने अस्मा बिन्ते उमैस से फ़रमाया कि ऐ असमा मुझे मुसलमानों की औरतों की मैयित के ले जाने का तरीक़ा पसन्द नही है। यह तख़्ते पर लिटा कर कपड़ा डाल कर ले जाते हैं। अस्मा ने कहा , मैं हबशा में बहुत अच्छा ताबूत देख आईं हूं , फ़रमाया इसकी नक़ल बना दो। अली (अ.स) को बुलाया और वसीअत की। आपने कहा , मुझे खुद नहलाना , कफ़न पहनाना , मेरा जनाज़ा रात मे उठाना , जिन लोगों ने मुझे सताया है उनको मेरे जनाज़े में न शरीक होने देना। मेरे बाद शादी करना तो एक रात मेरे बच्चों के पास और एक रात अपनी बीवी के पास गुज़ारना।

शमशुल उलमा मिस्टर नज़ीर अहमद देहलवी लिखते हैं कि , फातेमा ने अबू बक्र वग़ैरा से बात करना छोड़ दी। मरते वक़्त वसीअत की कि मुझे रात के वक़्त दफ़न करना और यह लोग मेरे जनाज़े पर न आने पाऐं उम्मेहातुल उम्मत पृष्ठ 99, अल्लामा अब्दुरबर लिखते हैं कि फातेमा की वसीयत थी कि आयशा भी जनाज़े पर न आऐं।

(इस्तेआब जिल्द 2, सफ़ा 772, )

जनाबे सैय्यदा की हज़राते शेख़ैन से नाराज़गी के लिये मज़ीद मुलाहज़ा हों। तेस्पर अलक़ारी तरजुमा बुख़ारी जिल्द 12 पृष्ठ 18 -21 व पे 17 पृष्ठ 21, मुश्किलुल आसार तहावी जिल्द 1 पृष्ठ 48, तरजुमा सही मुस्लिम जिल्द 5 पृष्ठ 25, रौज़तुल अहबाब जिल्द 1 पृष्ठ 434, अज़ाला अलख़फ़ा जिल्द 2 पृष्ठ 57, बराहीने क़ाते तरजुमा सवाऐक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 21, अशअतुल मात जिल्द 3 पृष्ठ 480 अल ज़हरा- उमर अबू नसर उर्दू तरजुमा पृष्ठ 89- जमा उल फ़वाएद जिल्द 2 पृष्ठ 18 प्रकाशित मेरठ।

आपकी वफ़ात हसरते आयात

दुनिया ए इस्लाम के क़दीम मुवर्रेख़ीन इब्ने क़तीबा का बयान है कि हज़रत फातेमा हज़रते सरवरे कायनात (स अ व व ) की वफ़ात के बाद सिर्फ़ 75 दिन जि़न्दा रह कर मर गईं। अल इमामत वल सियासत जिल्द 1 पृष्ठ 14, अल्लामा बहाई का जामऐ अब्बासी पृष्ठ 79 में बयान है कि 100 दिन बाद इन्तेक़ाल हुआ। आपकी तारीख़े वफ़ात सोमवार दिन 3 जमादील सानी 11 हिजरी है।

(अनवाररूल हुसैनिया जिल्द 3 पृष्ठ 29 प्रकाशित नजफ़)

आपकी वफ़ात से सम्बन्धित हज़रत इब्ने अब्बास सहाबी रसूल का बयान है कि जब फातेमा ज़हरा के इन्तेक़ाल का समय आया तो न मासूमा को बुख़ार आया , और न दर्दे सर हुआ बल्कि इमामे हसन (अ.स) और इमामे हुसैन (अ.स) के हाथ पकड़े और दोनों को लेकर क़ब्रे रसूल (स अ व व ) पर गईं और क़ब्र और मिम्बर के बीच दो रकअत नमाज़ पढ़ी। फि़र दोनों को अपने सीने से लगाया और फ़रमाया ऐ मेरे बच्चों ! तुम दोनों एक घंटा अपने बाबा के पास बैठो , अमीरूल मोमिनीन इस वक़्त मस्जिद में नमाज़ पढ़ रहे थे , फिर वहां से घर आईं और आं हज़रत की चादर उठाई ग़ुस्ल कर के हज़रत का बचा हुआ कफ़न , या कपड़े पहने , बाद अज़ान ज़ोजा हज़रते जाफ़रे तैयार असमा को अवाज़ दी , असमा ने अजऱ् की बीबी हाजि़र होती हूं। जनाबे फातेमा ने फ़रमाया , असमा तुम मुझसे अलग न होना , मै एक घंटा इस हुजरे में लेटना चाहती हूं। जब एक घंटा गुज़र जाए और मैं बाहर न निकलूं तो मुझको तीन अवाज़े देना , अगर मैं जवाब दूं तो अन्दर चली आना , वरना समझ लेना कि मैं रसूले ख़ुदा (स अ व व ) से मुलहिक़ हो चुकी हूं। बाद अज़ां रसूले ख़ुदा (स अ व व ) की जगह पर खड़ी हुईं और दो रकअत नमाज़ पढ़ी फिर लेट गईं और अपना मुँह चादर से ढांप लिया। बाज़ उलमा का कहना है कि सैय्यदा ने सजदे मे ही वफ़ात पाई। अल ग़रज़ जब एक घंटा गुज़र गया तो असमा ने जनाबे सैय्यदा को अवाज़ दी। ऐ हसन (अ.स) और हुसैन (अ.स) की मां ! ऐ रसूले खुदा (स अ व व ) की बेटी ! मगर कुछ जवाब न मिला। तब असमा उस हुजरे में दाखि़ल हुईं , क्या देखती हैं कि वह मासूमा मर चुकी हैं , असमा ने अपना गरेबान फाड़ लिया और घर से बाहर निकल पड़ीं। हसन (अ.स) और हुसैन (अ.स) आ पहुंचे। पूछा असमा हमारी अम्मा कहां हैं ? अर्ज़ की हुजरे में हैं। शहज़ादे हुजरे मे पहुंचे तो देखा कि मादरे गिरामी मर चुकी हैं। शहज़ादे रोते पीटते मस्जिद पहुंचे। हज़रत अली (अ.स) को ख़बर दी , आप सदमे से बेहाल हो गये। फिर वहां से बहाले परेशान घर पहुंचे देखा कि असमा सरहाने बैठी रो रही हैं। आपने चेहरा ए अनवर खोला। सरहाने एक पर्चा मिला , जिसमें शहादतैन के बाद वसीयत पर अमल का हवाला था और ताक़ीद थी कि मुझे अपने हाथों से ग़ुस्ल देना , हनूत करना , कफ़न पहनाना , रात के वक़्त दफ़न करना और दुश्मनों को मेरे दफ़न की ख़बर न देना इसमें यह भी लिखा था कि मैं तुम्हें ख़ुदा के हवाले करती हूं और अपनी इन तमाम औलादों सादात को सलाम करती हूं जो क़यामत तक पैदा होगी।

जब रात हुई तो हज़रत अली (अ.स) ने ग़ुस्ल दिया , कफ़न पहनाया , नमाज़ पढ़ी , बेनाबर रवायत मशहूरा जन्नतुल बक़ी मे ले जा कर दफ़न कर दिया।

(ज़ाद अल क़बा तरजुमा मुवद्दतुल क़ुर्बा अली हमदानी शाफे़ई पृष्ठ 125 ता पृष्ठ 129 प्रकाशित लाहौर)

एक रवायत में है कि आपको मिम्बर और क़ब्रे रसूल (स अ व व ) के बीच में दफ़न किया गया।

(अनवारूल हुसैनिया जिल्द 3 पृष्ठ 39 )

मक़ातिल किताब में है कि ग़ुस्ल के वक़्त हज़रत अली (अ.स) पुश्त व बाज़ु ए फातेमा (स.अ) पर उमर के दुर्रे का निशान देखा था और चीख़ मार कर रोए थे। सही बुख़ारी और मुस्लिम मे है कि हज़रत अली (अ.स) ने फातेमा (स.अ) को रात के वक़्त दफ़न कर दिया। ‘‘वलम यूज़न बेहा अबा बक्र व सल्ली अलैहा ’’ अबू बकर वग़ैरा को शिरकते जनाज़ा की इजाज़त नहीं दी और दफ़न की भी ख़बर नहीं दी और नमाज़ ख़ुद पढ़ी। अल्लामा ऐनी शरह बुख़री लिखते हैं कि यह सब कुछ हज़रत अली (अ.स) ने जनाबे फातेमा (स.अ) की वसीअत के अनुसार किया था। सही बुख़ारी हिस्सा अल जिहाद में है कि हज़रत फातेमा (स.अ) हज़रत अबू बकर वग़ैरा से नाराज़ हो गईं और उनसे नाता तोड़ लिया और मरते दम तक बेज़ार रही। इमाम इब्ने कतीका का बयान है कि ख़ुलफ़ा को फातेमा की नाराज़गी की जानकारी थी , वह कोशिश करते रहे कि राज़ी हो जायें एक दफ़ा माफ़ी मांगने भी गये। ‘‘फासताज़ना अली फ़लम ताज़न ’’ और इज़ने हुज़ूरी चाहा , आपने मिलने से इन्कार कर दिया और इनके सलाम तक का जवाब न दिया और फ़रमाया ताजि़न्दगी तुम पर बद्दुआ करूगी और बाबा जान से तुम्हारी शिकायत करूगी।

(अल इमामत वस सियासत जिल्द 1 पृष्ठ 14 प्रकाशित मिस्र)

आपका जनाज़ा

ग़ुस्ल व कफ़न के बाद हज़रत अली (अ.स) अपनी औलाद और अपने रिश्तेदारों समेत जनाज़ा लेकर रवाना हुए। बेहारूल अनवार किताब अलफ़तन में है कि रास्ता देखने के लिए एक शमा साथ थी और हज़रत ज़ैनब जो काफ़ी कमसिन थी काले कपड़े पहने हुए थी इस साए में चल रही थीं जो शमा की वजह से ताबूत के नीचे ज़मीन पर पड़ रहा था। मुवद्दतुल क़ुर्बा पृष्ठ 129 में है कि हज़रत अली (अ.स) जब जन्नतुल बक़ी में पहुंचे तो एक तरफ़ से आवाज़ आई और खुदी खुदाई क़ब्र दिखाई दे गई। हज़रत अली (अ.स) ने उसी क़ब्र में हज़रत फातेमा (स.अ) की लाशे मुताहर दफ़न की और इस तरह ज़मीन बराबर कर दी कि निशाने क़ब्र मालूम न हो सके।

किताबे मुनतहल आमाल शेख़ अब्बास क़ुम्मी पृष्ठ 139 में है कि जब जनाबे सैय्यदा की लाश क़ब्र मे उतारी गई तो रसूले ख़ुदा (स अ व व ) के हाथों की तरह दो हाथ निकले और उन्होने जिसमे मुताहर जनाबे सैय्यदा को सम्भाल लिया। दलाएल उल इमामत में है कि चूकि क़ब्रे फातेमा (स.अ) के साथ बे अदबी का शक था इस लिए चालीस क़ब्रें बनाई गईं। मनाक़िब इब्ने शहर आशोब में है कि चालीस क़ब्रें इस लिए बनाई थी कि सही क़ब्र मालूम न हो सके और फातेमा (स.अ) को सताने वाला क़ब्र पर भी नमाज़ न पढ़ सके वरना सैय्यदा को तकलीफ़ होगी। इसके बावजूद लोगों ने क़ब्र खोद कर नमाज़ पढ़ ने की सई की जिसके रद्दे अमल में हज़रत अली (अ.स) नगीं तलवार ले कर पीले कपड़े पहन कर क़ब्र पर जा बैठे। इस वक़्त आप के मुंह से कफ़ निकल रहा था। यह देख कर लोगों की हिम्मते पस्त हो गईं और आगे न बढ़ सके। नासिख़ अल तवारीख़ वग़ैरा वफ़ात के वक़त जनाबे सैय्यदा ताहेरा (स.अ) की उम्र 18 साल की थी। इन्ना लिल्लाहे व इन्ना इलैहे राजेउन

नतीजा

वफ़ाते रसूल (स अ व व ) के बाद जनाबे सैय्यदा के साथ जो कुछ किया गया इस पर शमसुल उलमा डिप्टी नज़ीर अहमद एल.एल.डी. मोतरज्जिम क़ुरआने मजीद ने अपनी किताब ‘‘रोया ए सादेक़ा ’’ में निहायत मुफ़स्सिल और मुकम्मल तबसिरा फ़रमाया है जिसके आख़री जुमले यह हैं:-

सख़्त अफ़सोस है कि अहले बैते नबवी को पैग़म्बर साहब की वफ़ात के बाद ही ऐसे नामुलाएम इत्तेफ़ाक़ात पेश आए कि इनका वह अदब व लेहाज़ जो होना चाहिये था इसमें ज़ोफ़ आ गया और शुदा शुदा मुनजि़र हुआ। इस ना क़ाबिले बरदाश्त वाक़ेए करबला की तरफ़ जिसकी नज़ीर तारीख़ में नहीं मिलती। यह ऐसी नालायक़ हरकत मुसलमानों से हुई है कि अगर सच पूछो तो दुनिया व आख़ेरत में मुंह दिखाने के क़ाबिल न रहे।

चे खुश फ़रमूद शख़्से ईं लतीफ़ा कि कुश्ता शुद हुसैन अन्दर सक़ीफ़ा

हज़रत फातेमा (स.अ) के जनाज़े मे शिरकत करने वाले

अल्लामा हाफि़ज़ बिन अली शहर आशोब अल मतूफ़ी 588 हिजरी तहरीर फ़रमाते हैं कि हज़रत फातेमा ज़हरा (स.अ) के जनाज़े में अमीरल मोमिनीन (अ.स) , इमामे हसन (अ.स) , इमामे हुसैन (अ.स) , अक़ील , सलमाने फ़ारसी , अबूज़र , मेक़दाद , अम्मार और बरीदा शरीक थे और उन्ही लोगों ने नमाज़े जनाज़ा पढ़ी एक रवायत में अब्बास , फ़ज़ल , हुज़ैफ़ा और इब्ने मसूद का इज़ाफ़ा है। तबरी में इब्ने ज़ुबैर का भी तज़किरा है।

(उम्दतुल मतालिब तरजुमा मनाक़िब जिल्द 2 पृष्ठ 65 प्रकाशित मुल्तान)

हज़रत फातेमा (स.अ) का मदफ़न

जैसा कि उपर गुज़रा , हज़रत फातेमा (स.अ) के जाए दफ़न में अख़्तेलाफ़ है। कोई जन्नतुल बक़ी , कोई मिम्बरे रसूल (स अ व व ) के बीच में कोई क़ब्र और घर के बीच क़ब्र बताता है। मशहूर यही है कि जन्नतुल बक़ी में आप दफ़न हुई हैं लेकिन अहमद बिन मोहम्मद बिन अबी नसर ने अबुल हसन हज़रत इमाम रज़ा (अ.स) से रवायत की है , वह फ़रमाते हैं कि हज़रत फातेमा (स.अ) अपने घर मे मदफ़ून हैं। जब बनी उम्मया ने मस्जिद की तौसीफ़ की तो उनकी क़ब्र रौज़ा ए रसूल (स अ व व ) के अन्दर आ गई है।

(तरजुमा मनाक़िब इब्ने शहर आशोब जिल्द 2 पृष्ठ 69 )

हज़रत फातेमा (स.अ) की क़ब्र पर हज़रत अली (अ.स) का मरसिया

अल्लामा इब्ने शहर आशोब लिखते हैं कि हज़रत अली (अ.स) ने वफ़ाते सैय्यदा (स.अ) पर अत्याधिक दुख प्रकट किया और बे पनाह ग़मों अलम का अहसास किया। उन्हानें जो क़ब्र पर मरसिया पढ़ा वह यह है:-

लेकुले इजतेमा मन ख़लीलैन फ़रक़तह

वक़ल लज़ी दूने अल फि़राक़ क़लील

दो दोस्तों के हर इजतेमा का नतीजा जुदाई है और हर मुसीबत दिलबरों की जुदाई की मुसीबत से कम है।

वअन इफ़तेक़ादी फ़ातम बादे अहमद

वलैला अली अन लायदमू ख़लील

हज़रत रसूले करीम (स अ व व ) के तशरीफ़ ले जाने के बाद मेरी रफ़ीक़ा ए हयात फातेमा (स.अ) का दाग़े फि़राक़़ दे जाना इस अमर का सबूत है कि कोई दोस्त हमेशा नहीं रहेगा।

अल्लामा शेख़ अब्बास क़ुम्मी लिखते हैं कि हज़रत सैय्यदा को सुपुर्दे ख़ाक करने के बाद हज़रत अमीरल मोमिनीन (अ.स) क़ब्रे जनाबे सैय्यदा के पास बैठ गये और बे इन्तेहा रोए। ‘‘ पस अब्बासे उमूऐ आं हज़रत (स अ व व ) दस्तश गिरफ़त व अज़ सरे क़ब्र उरा बे बुर्द

यह देख कर चचा अब्बास बिन अब्दुल मुत्लिब ने उनका हाथ पकड़ कर उन्हें क़ब्र के पास से उठाया और घर ले गये।

(मुन्तहल आमाल जिल्द 1 पृष्ठ 140 प्रकाशित नजफ़े अशरफ़)

आपके रोज़े का इन्हेदाम

आलिमों का बयान है कि एक अरसा गुज़रने के बाद आपकी क़ब्रे मुबारक पर रौज़े की तामीर हुई। मैं कहता हूं कि अब से लगभग 43 साल पहले इब्ने सउद व अमीरे सउदी अरबिया ने आपके रौज़े मुबारक को जज़बाए वहाबीयत से मुतासिर होकर तोड़ डाला। शैख़ अल ऐराक़ीन मोहम्मद रज़ा का बयान है कि इब्ने सउद ने मक्का में 9 और मदीना में 19 मुक़द्दस मुक़ामात को मुनहादिम तोड़ कराया था कि जिनमें ख़ाना ए सैय्यदा और बैतुल हुज़्न भी थे। मुलाहेज़ा हो।

(अनवारूल हुसैनिया जिल्द 1 पृष्ठ 54 प्रकाशित बम्बई 1346 हिजरी)


अमीरल मोमेनीन हज़रत अली ( अ स )

नुसरते दीं है , अली का काम सोते जागते

ख़्वाबो बेदारी है यकसां यह हैं ऐने किरदिगार

इसकी बेदारी की अज़मत को सने हिजरी से पूछ

जिसका सोना बन गया , तारिख़े दीं की यादगार

(साबिर थरयानी , कराची)

मौलूदे काबा हज़रत अली (अ.स.) अबुल ईमान हज़रत अबू तालिब व जनाबे फ़ात्मा बिन्ते असद के बेटे पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मौहम्मद मुस्तफ़ा स. सहीमे नूर , दामाद , भाई , जानशीन और फ़ात्मा स. के शौहर हज़रत इमामे हसन (अ स ) , इमामे हुसैन (अ.स.) ज़ैनबो उम्मे कुलसूम के पदरे बुज़ुर्गवार थे। आप जिस तरह पैग़म्बरे इस्लाम के नूर में शरीक थे , उसी तरह कारे रिसालत में भी शरीक थे। यौमे विलादत से ले कर पूरी जि़न्दगी पेग़म्बरे इस्लाम के साथ उनकी मदद करने में गुज़ारी। उमूरे मम्लेकत हो या मैदाने जंग आप हर मौक़े पर ताज दारे दो आलम के पेश पेश रहे। अहदे रिसालत स. के सही फ़तूहात का सेहरा आप ही के सर रहा। इस्लाम की पहली मंजि़ल दावते ज़ुल अशीरा से ले कर ता विसाले रसूल स. आपने वह कार हाय नुमायां किये जो किसी सूरत में भूलाये नहीं जा सकते और क्यों न हो जब कि आपका गोश्त पोस्त रसूल स. का गोश्त पोस्त था और अली (अ.स.) पैदा ही किये गये थे इस्लाम और पैग़म्बरे इस्लाम के लिये।

आपकी विलादत आपकी नूरी तख़्लीक़ , खि़ल्क़ते सरवरे कायनात के साथ साथ पैदाईशे आलम व आदम (अ.स.) से बहुत पहले हो चुकी थी लेकिन इन्सानी शक्लो सूरत में आपका ज़ुहूर व नमूद 13 रजब 30 आमूल फ़ील , मुताबिक़ 600 ई0 जुमे के दिन बमुक़ामे ख़ानाए काबा हुआ। आपकी मां फ़ात्मा बिन्ते असद और बाप अबू तालिब थे। आप दोनों तरफ़ से हाशमी थे। इतिहासकारों ने आपके ख़ाना ए काबा में पैदा होने के मुताअल्लिक़ कभी कोई इख़्तेलाफ़ जा़हिर न किया बल्कि बिल इत्तेफ़ाक़ कहते हैं कि लम यूलद कि़बलहा वला बादह मौलूद फ़ी बैतुल हराम आप से पहले कोई न ख़ाना ए काबा में पैदा हुआ है न होगा। इसके बारे में उलेमा ने तवातुर का दावा भी किया है।(मुस्तदरिक इमामे हाकिम जिल्द 3 पृष्ठ 483 ) तवारिख़े इस्लाम में वाकि़याए विलादत यूं बयान किया गया है कि फ़ात्मा बिन्ते असद को जब दर्दे ज़ेह की तकलीफ़ महसूस हुई तो आप रसूल करीम के मशवरे के मुताबिक़ ख़ाना ए काबा के क़रीब गईं और उसका तवाफ़ करने के बाद दीवार से टेक लगा कर खड़ी हो गईं और बारगाहे ख़ुदा की तरफ़ मुतावज्जे हो कर अर्ज़ करने लगीं , ख़ुदाया मैं मोमेना हूं तुझे इब्राहीम बानी ए काबा और इस मौलूद का वास्ता जो मेरे पेट में है , मेरी मुशकिल दूर कर दे। अभी दुआ के जुमले ख़त्म न होने पाए थे कि दीवारे काबा शक (टूटना) हो गई और फ़ात्मा बिन्ते असद काबे में दाखि़ल हो गईं और दीवार ज्यों की त्यों हो गई।(मनाकि़ब पृष्ठ 132, वसीलतुन नजात पृष्ठ 60 ) विलादत काबा के अन्दर हुईं। अली (अ.स.) पैदा तो हुए लेकिन उन्होने आंख नहीं खोली। मां समझी की शायद बच्चा बे नूर है , मगर जब तीसरे दिन सरवरे कायनात स. तशरीफ़ लाए और अपनी आग़ोशे मुबारक में लिया तो हज़रत अली (अ.स.) ने आंखे खोल दीं और जमाले रिसालत पर पहली नज़र डाली। सलाम कर के तिलावते सहीफ़ाए आसमानी शुरू कर दी। भाई ने गले लगाया और यह कह कर कि ऐ अली (अ.स.) जब तुम हमारे हो तो मैं तुम्हारा हूं , फ़ौरत मूंह मे ज़बान दे दी। अल्लामा अरबली लिखते हैं वअज़ ज़बाने मुबारक दवाज़दह चश्मए कशूदा शुद ज़बाने रिसालत स. से दहने इमामत में बारह चशमे जारी हो गये और अली (अ.स.) अच्छी तरह सेराब हो गये। इसी लिए इस दिन को यौमुल तरविया कहते हैं क्योंकि तरविया के माने सेराबी के हैं।(कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 132 )

अल ग़रज़ हज़रत अली (अ.स.) ख़ाना ए काबा से चौथे रोज़ बाहर लाए गये और उसके दरवाज़े पर अली (अ.स.) के नाम का बोर्ड लगा दिया गया। जो हश्शाम इब्ने अब्दुल मलिक के ज़माने तक लगा रहा। आप पाको पाकीज़ा , तय्यबो ताहिर और मख़्तून (ख़तना शुदा) पैदा हुए। आपने कभी बुत परस्ती नहीं की और आपकी पेशानी कभी बुत के सामने नहीं झुकी इसी लिए आपके नाम के साथ करम अल्लाह वजहा कहा जाता है।(नूरूल अब्सार , पृष्ठ 76, सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 72 )

आपके नामे नामी मोवर्रेख़ीन का बयान है कि आपका नाम जनाबे अबू तालिब ने अपने जद्दे आला जामए क़बाएले अरब क़सी के नाम पर ज़ैद और मां फ़ात्मा बिन्ते असद ने अपने बाप के नाम पर असद और सरवरे काएनात स. ने ख़ुदा के नाम पर अली रखा। नाम रखने के बाद अबू तालिब और बिन्ते असद ने कहा हुज़ूर हमने हातिफ़े ग़ैबी से यही नाम सुना था।(रौज़ातुल शोहदा और किफ़ायत अल तालिब)

आपका एक मशहूर नाम हैदर भी है जो आपकी मां का रखा हुआ है। जिसकी तस्दीक़ इस रजज़ से होती है जो आपने मरहब के मुक़ाबले में पढ़ा था। जिसका पहला मिसरा यह है अना अल लज़ी समतनी अमी हैदरा इस नाम के मुताअल्लिक़ रवायतों में है कि जब आप झूले में थे एक दिन मां कही गई हुई थीं झूले पर एक सांप जा चढ़ा , आपने हाथ बढ़ा कर उसके मुँह को पकड़ लिया और कल्ले को चीर फेंका , माँ ने वापस हो कर यह माजरा देखा तो बे साख़्ता कह उठीं , यह मेरा बच्चा हैदर है।

कुन्नीयत व अल्क़ाब आपकी कुन्नीयत व अल्क़ाब बे शुमार हैं। कुन्नीयत में अबुल हसन और अबू तुराब और अल्क़ाब में अमीरूल मोमेनीन , अल मुर्तज़ा , असद उल्लाह , यदुल्लाह , नफ़्सुल्लाह , हैदरे करार , नफ़्से रसूल और साकि़ये कौसर ज़्यादा मशहूर हैं।

आपकी परवरिश

आपकी परवरिश रसूले अकरम स. ने की। पैदा होते ही गोद में लिया , मुँह में ज़बा नदी और दूध के बजाए लोआबे दहने रसूल स. से सेराब हो कर लहमोका लहमी के हक़दार बने।(सहरते हलबीता जिल्द 1 पृष्ठ 268 ) इसी दौरान में जब कि आप सरवरे कायनात के ज़ेरे साया आरज़ी तौर पर परवरिश पा रहे थे मक्के में शदीद कहर पड़ा , अबू तालिब की चूँकि औलादे ज़्यादा थीं इस लिये हज़रते अब्बास और सरवरे कायनात स. उनके पास तशरीफ़ ले गये और उनको राज़ी कर के हज़रत अली (अ.स.) को मुस्तकि़ल तौर पर अपने पास ले आये और अब्बास ने भी जाफ़रे तय्यार को ले लिया। हज़रत अली (अ.स.) सरवरे काएनात स. के पास दिन रात रहने लगे। हुज़ूरे अकरम स. ने तमाम नेमाते इलाही से बहरावर कर लिया और हर कि़स्म की तालीमात से भरपूर बना दिया यहां तक कि अली नामे ख़ुदा क़ुव्वते बाज़ू बन कर यौमे बेसत 27 रजब को कुल्ले ईमान की सूरत में उभरे और हुज़ूर की ताईद कर के इस्लाम का सिक्का बिठा दिया।

इज़हारे ईमान मुसलमानो में अक्सर यह बहस छिड़ जाती है कि सब से पहले इस्लाम कौन लाया और इस सिलसिले में हज़रत अली (अ.स.) का नाम भी आ जाता है हांलाकि आप इस मौजूए बहस से अलग हैं क्योंकि ज़ेरे बहस वह लाये जा सकते हैं जो या तो मुसलमान ही न रहे हों और तमाम उम्र र्शिको बुत परस्ती में गुज़ारी हो जैसे हज़रत अबू बक्र , हज़रत उमर , हज़रत उस्मान वग़ैरा या मुसलमान तो रहें हों और दीने इब्राहीम पर चलते रहें हों लेकिन इस्लाम ज़ाहिर न कर सके हों जैसे हज़रते हमज़ा , हज़रते जाफ़रे तय्यार और अबुल ईमान हज़रत अबू तालिब (अ.स.) वग़ैरा ऐसी सूरत में इन हज़रात के लिये कहा जायेगा कि इस्लाम क़ुबूल किया और बाद वाले ज़ैसे हज़रत अबू तालिब (अ.स.) वग़ैरा के लिये कहा जायेगा कि इसलाम ज़ाहिर किया। अब रह गये हज़रत अली (अ.स.) यह काबा में फि़तरते इस्लाम पर पैदा हुए। कुल्ले मौलूद यूलद अली फि़तरतुल इस्लाम रसूले इस्लाम स. की गोद में आँख खोली , लोआबे दहने रसूल स. से परवरिश पाई , आग़ोशे रिसालत मे पले , बढ़े , दस साल की उम्र में ब वजहे ज़ुरूरत ऐलाने ईमान किया। रसूल स. के दामाद क़रार पाये। मैदाने जंग में कामयाबियां हासिल कर के कुल्ले ईमान बने फिर अमीरूल मोमेनीन के खि़ताब से सरफ़राज़ हुए।

फ़ाजि़ल माअसर तारीख़े आइम्मा में लिखते हैं कि उल्माए मोहक़्क़ेक़ीन ने साफ़ साफ़ लिखा है कि हज़रत अली (अ.स.) तो कभी काफि़र रहे ही नहीं क्योकि आप शुरू से ही हज़रत रसूले ख़ुदा स. की किफ़ालत में इसी तरह रहे जिस तरह खुद हज़रत की औलादें रहती थीं और कुल मामेलात में हज़रत की पैरवी करते थे। इस सबब से इसकी ज़रूरत ही नहीं हुई कि आप को इस्लाम की तरफ़ बुलाया जाता और जिसके बाद कहा जाता कि आप मुसलमान हो जायें।(सिरते हलबिया जिल्द 1 पृष्ठ 269 ) मसूदी कहता है कि आप बचपन ही से रसूल स. के ताबे थे। ख़ुदा ने आपको मासूम बनाया और सीधी राह पर क़ायम रखा। आपके लिये इस्लाम लाने का सवाल ही नहीं पैदा होता।

(मरूजुल ज़हब , जिल्द 5 पृष्ठ 68 )

हज़रत अली (अ.स.) फ़रमाते हैं कि मैंने उस उम्मत में सब से पहले ख़ुदा की इबादत की और सब से पहले आं हज़रत स. के साथ नमाज़ पढ़ी।(इस्तीयाब जिल्द 2 पृष्ठ 472 ) पैग़म्बरे इस्लाम स. फ़रमाते हैं कि हज़रत अली (अ.स.) ने एक सेकेन्ड के लिये भी कुफ्ऱ इख़्तेयार नहीं किया।(सीरते हलबिया जिल्द 1 पृष्ठ 270 )

हुलिया मुबारक

आपका रंग गंदुमी , आखें बड़ी सीने पर बाल , क़द मियाना , दाढ़ी बडी और दोनों शानें कोहनिया और पिंडलियां पुर गोश्त थीं , आपके पांव के पठ्ठे ज़बरदस्त थे शेर के कंधो की तरह आपके कंधों की हड्डियां चौड़ी थीं। आपकी गरदन सुराही दार और आपकी शक्ल बहुत ही ख़ूबसूरत थी। आपके लबों पर मुस्कुराहट खेला करती थी , आप खि़ज़ाब नहीं लगाते थे।

आपकी शादी ख़ाना आबादी आपकी शादी 2 हिजरी में हुज़ूरे अकरम की दुख़्तर नेक अख़तर हज़रत फ़ात्मा ज़हरा स. से हुई। आपके घर में लौंडी , ग़ुलाम और खि़दमतगार न थे। बाहर का काम आप खुद और आपकी वालेदा मोहतरमा करती थीं और उमूरे ख़ाना दारी के फ़राएज़ जनाबे फ़ात्मा ज़हरा स. अंजाम देती थीं , हो सकता है कि यह रिश्ता आम रिश्तों की हैसियत से देखा जाए , लेकिन दर हक़ीक़त इसमें एक अहम क़ुदरती राज़ छुपा हुआ है और उसका खुलासा इस तरह हो सकता है कि इस पर ग़ौर किया जाए कि हुज़ूरे अकरम स. का इरशाद है कि , अली (अ.स.) के अलावा फ़ात्मा स. का सारी दुनियां में रहती दुनियां तक कफ़ो नहीं हो सकता।(नूरूल अनवार) फिर फ़रमाते हैं कि मुझे ख़ुदा ने हुक्म दिया है कि मैं फ़ात्मा स. की शादी अली (अ.स.) से करूं और इसी सिलसिले में इरशाद फ़रमाते हैं कि हर नबी की नस्ल उसके सुल्ब से होती है लेकिन मेरी नस्ल सुल्बे अली से क़रार दी गयी है।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा , पृष्ठ 74 ) इनत माम अक़वाल को मिलाने के बाद यह नतीजा निकलता है कि अली (अ.स.) और फ़ात्मा स. का रिैश्ता नस्ले नबूवत की बक़ा और दवाम के लिये क़ायम किया गया है। यही वजह है कि लोग पैग़ामे रिश्ता दे कर कामयाब नहीं हो सके। जिनकी बुनियाद नजासते कुफ़्र पर इस्तेवार हुई और जिनकी इन्तेहा गन्दगिऐ निफ़ाक़ पर हुई।

सरदारी और सयादते अली (अ.स.) की सिफ़ते ज़ाती हैं सरवरे कायनात स. से इत्तेहादे ज़ाती और इश्तेराके नूरी की बिना पर हज़रत अली (अ.स.) की सयादत मुसल्लम है जो मदाररिजे करम हुज़ूरे अकरम स. को नसीम हुए उन्हीं से मिलते जुलते हज़रत अली (अ.स.) को भी मिले। सयादत जिस तरह सरवरे कायनात स. के लिये ज़ाती है उसी तरह हज़रत अली (अ.स.) के लिये भी है। हाफि़ज़ अबू नईम ने हुलयतुल औलिया में लिखा है कि ग़दीर के मौक़े पर ख़ुतबे से फ़राग़त के बाद जब अमीरूल मोमिनीन हुज़ूरे अकरम स. के सामने आये तो आपने फ़रमायाः ऐ मुसलमानों के सरदार और ऐ परहेज़गारों के इमाम तुम्हें जानशीनीं मुबारक हो। इस इरशादे रसूल स. पर इज़हारे ख्याल करते हुए अल्लामा मौहम्मद इब्ने तल्हा शाफ़ेई ने मुतालेबुल सुऊल में लिखा है कि हज़रत की सयादते मुसलेमीन और इमामत मुत्तक़ीन जिस तरह सिफ़ते ज़ाती हैं। खुदा ने अपना नफ़्स क़रार दे कर , रसूल स. ने अपना नफ़्स फ़रमा कर अली (अ.स.) की शरफ़े सयादत को बामे ऊरूज पर पहुंचा दिया क्योकि जिस तरह असलिये नबविया में नफ़से नबूवत मशारिक है , उसी तरह असलिये सयादत में भी नफ़्स शरीक है। इस लिये हुज़ूरे अकरम स. हज़रत अली (अ.स.) को सय्यदुल अरब , सय्यदुल मोमेनीन , सय्यदुल मुसलेमीन फ़रमाया करते थे।(मतालिबुल सवेल , पृष्ठ 56, 57 ) और हज़रत फ़ात्मा स. को सय्यदुन्निसां अल आलेमीन और उनको फ़रज़न्दों को सय्यदे शबाबे अहले जन्ना के अलफ़ाज़ से याद किया करते थे , मालूम होना चाहिये कि अली (अ.स.) और फ़ात्मा स. की बाहमी मनाकहत व मज़ावेहत (शादी) ने सिफ़ते सयादत को दायमी फ़रोग़ दे दिया यानी जो बनी फ़ात्मा स. हैं उनका दरजा और है और जो दीगर औलादे अली (अ.स.) हैं जो बतने फ़ात्मा स. (फ़ात्मा स. के पेट) से पैदा नहीं हुए उनकी हैसियत और है क्यों कि बनी फ़ात्मा सिलसिलाए नस्ले नबूवत की ज़मानत हैं।

माँ की वफ़ात

आपकी वालेदा माजेदा जनाबे फ़ात्मा बिन्ते असद ने 1 बेसत में इज़्हारे इस्लाम किया। आप 1 हिजरी में शरफ़े हिजरत से मुशर्रफ़ हुईं। 2 हिजरी में आपने अपने नूरे नज़र को रसूल स. की लख़्ते जिगर से बियाह दिया और 4 हिजरी में इन्तेक़ाल फ़रमा गईं। आपकी वफ़ात से हज़रत अली (अ.स.) बेहद मुताअस्सिर हुए और आपसे ज़्यादा रसूले अकरम स. को रन्ज हुआ। रसूले करीम स. हज़रत अली (अ.स.) की वालेदा को अपनी माँ फ़रमाते थे और उनके वहां जा कर रहते थे। इन्तेक़ाल के बाद आपने क़ब्र खोदने में ख़ुद हिस्सा लिया। अपनी चादर और अपने कुरते को शरीके कफ़न किया और क़ब्र में लेट कर उसकी कुशदगी का अन्दाज़ा किया।

(कंज़ुल आमाल जिल्द 6 पृष्ठ 7, फ़ुसूले महमा , पृष्ठ 15 व असाबा जिल्द 8 पृष्ठ 160 व अज़ालतूल ख़फ़ा जिल्द 1 पृष्ठ 215 )

आपके वालिदे माजिद का इन्तेक़ाल

आपके वालिदे माजिद अबुल ईमान हज़रत अबू तालिब (अ.स.) 535 ई0 में बमक़ामे मक्का पैदा हुए और वहीं पले बढ़े , आपकी बुनियाद दीने फि़तरत पर थी।(उमहातुल आइम्मता पृष्ठ 143 ) आपने हज़रत अली (अ.स.) को हिदायत की थी कि रसूल स. का साथ न छोड़ना।(तारीख़े कामिल , जिल्द पृष्ठ 60 ) आप ही की हिदायत से हज़रत जाफ़रे तय्यार ने हुज़ूरे अकरम स. के पीछे नमाज़ पढ़ना शुरू की थी।

(असाबा जिल्द 7 पृष्ठ 113 )

हज़रत अब्दुल मुत्तालिब के इन्तेक़ाल के वक़्त 578 ई0 में जब कि रसूले करीम स. की उम्र आठ साल की थी , आपने उनकी परवरिश अपने जि़म्मे ले ली और 45 साल की उम्र तक महवे खि़दमत रहे। इसी उम्र में ग़ालेबन 594 ई0 में आपने रसूले करीम स. की शादी जनाबे ख़दीजा के साथ कर दी औ ख़ुतबाए निकाह ख़ुद पढ़ा।

(असनिल मतालिब पृष्ठ 34, मिस्र में छपी , तारीख़े ख़मीस मोवाहेबुल दुनिया)

आपका इन्तेक़ाल 15 शव्वाल 10 बेसत में 80 साल की उम्र में हुआ। आपके इन्तेक़ाल से हज़रत अली (अ.स.) को बेइन्तेहा रंज हुआ और रसूल अल्लाह स. भी बे हद मुताअस्सिर हुए। आपने इन्तेहाई ताअस्सुर की वजह से इस साल का नाम आमुलहुज़्न रखा। हज़रत अबू तालिब को इस्लामी उसूल पर दफ़न किया गया।

(तारीख़े ख़मीस , सीरते हलबिया)

हज़रत अली (अ.स.) के जंगी कारनामे

उलेमा का इत्तेफ़ाक है कि इल्म और शुजाअत इकठ्ठा नहीं हो सकते लेकिन हज़रत अली (अ.स.) की ज़ात ने इसे वाज़े कर दिया कि मैदाने इल्म और मैदाने जंग दोनों पर क़ाबू किया जा सकता है बशरते इन्सान में वही सलाहियतें हों जो कु़दरत की तरफ़ से हज़रत अली (अ.स.) को मिली थीं। 2 हिजरी से ले कर अहदे वफ़ाते पैग़म्बरे इस्लाम तक नज़र डाली जाय तो अली (अ.स.) के जंगी कारनामे अवराक़े तारीख़े पर नज़र आयेंगे। जंगे ओहद हो या जंगे बद्र , जंगे ख़ैबर हो या जंगे ख़न्दक़ , जंगे हुनैन या कोई और मारेका हर मन्जि़ल में हर मौकि़फ़ पर अली (अ.स.) की ज़ुल्फि़क़ार चमकती हुई दिखाई देती है। तारीख़ शाहिद है कि अली (अ.स.) के मुक़ाबले में कोई बहादुर टिका ही नहीं। आपकी तलवार ने मरहब , अन्तर , हारिस व उम्रो बिन अब्दवुद जैसे बहादुरों को दमे ज़दन में फ़ना के घाट उतार दिया। (जंग के वाकि़यात गुज़र चुके हैं) याद रखना चाहिये कि अली (अ.स.) से मुक़ाबला जिस तरह इन्सान नहीं कर सकते थे , उसी तरह जिन भी आपसे नहीं लड़ सकते थे।

जंगे बेरूल अलम

मनाकि़ब इब्ने आशोब जिल्द 2 पृष्ठ 90 व कनज़ुल वाएज़ीन मुलला सालेह बरग़ानी में बा हवाला , इमामुल मोहक़्क़ेक़ीन अलहाज मौहम्मद तक़ी अल क़रदीनी बतवस्सुल हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) व अबू सईद ख़दरी व हुज़ैफ़ा यमानी लिखते हैं कि रसूले ख़ुदा स. जंगे सिकारसिक से वापसी में एक उजाड़ वादी से गुज़रें आपने पूछा यह कौन सा मका़म है , उम्र बिन अमिया ज़मरी ने कहा इसे वादी कसीबे अरज़क़ कहते हैं। इस जगह एक कुआं है जिसमें वह जिन रहते हैं जिन पर जनाबे सुलैमान (अ.स.) को क़ाबू नहीं हासिल हो सका। इधर से तेग़े यमानी गुज़रा था उसके दस हज़ार सिपाही इन्हीं जिनों ने मार डाले थे। आपने फ़रमाया कि अगर ऐसा है तो फिर यही ठहर जाओ। काफि़ला ठहरा , आपने फ़रमाया दस आदमी जा कर जिनों के कुऐं से पानी लायें। जब यह लोग कुएं के पास पहुँचे तो एक ज़बरदस्त इफ़रीयत बरामद हुआ और उसने एक ज़बरदस्त आवाज़ दी। सारा जंगल आग का बन गया। धरती कांपने लगी , सब सहाबी भाग निकले लेकिन अबुल आस सहाबी पीछे हटने के बजाए आगे बढ़े। और थोड़ी देर में जंगल जल कर राख हो गये। इतने में जिब्रईल नाजि़ल हुए और उन्होंने सरवरे कायनात स. से कहा कि किसी और को भेजने के बजाय आप अलम दे कर अली इब्ने अबी तालिब (अ.स.) को भेजिये। अली (अ.स.) रवाना हुए , रसूल स. ने दस्ते दुआ बलन्द किया , अली (अ.स.) पहुँचे इफ़रीयत बरामद हुआ और बड़े ग़ुस्से में रजज़ पढ़ने लगा। आपने फ़रमाया मैं अली इब्ने अबी तालिब हूँ। मेरा शेवा मेरा अमल सरकशों की सर कोबी है। यह सुन कर उसने आप पर ज़बरदस्त करतबी हमला किया। आप ने वार ख़ाली दे कर उसे ज़ुल्फि़क़ार से दो टुकड़े कर डाला। उसके बाद आग के शोले और धुएं के तूफ़ान कुऐं से बरामद हुए और ज़बरदस्त शोर मचा और बेशुमार डरावनी शक्लें सामने आ गईं , अली (अ.स.) ने बरदन व सलामन कहा और चन्द आयतें पढ़ीं। आग बुझने लगी धुवां हवा होने लगा। हज़रत अली (अ.स.) कुऐं की जगत पर चढ़ गए , और डोल डाल दिया। कुऐं से डोल बाहर फ़ेंक दिया। हज़रत अली (अ.स.) ने रजज़ पढ़ा और कहा मुक़ाबले के लिये आ जाओ। यह सुन कर एक इफ़रीयत बरामद हुआ। आपने उसे क़त्ल किया , फिर कुऐं में डोल डाला वह भी बाहर फेक दिया गया , ग़रज़ कि इसी तरह तीन बार हुआ। आखि़र में आपने असहाब से कहा कि मैं कमर में रस्सी बांध कर कुएं में उतरता हूँ , तुम रस्सी पकड़े रहो। असहाब ने रस्सी पकड़ ली और अली (अ.स.) कुएं में उतरे , थोड़ी देर बाद रस्सी कट गई और अली (अ.स.) और असहाब के बीच रिश्ता टूट गया। असहाब बहुत परेशान हुए और रोने लगे। इतने में कुऐ से चीख़ पुकार की आवाज़ें आने लगीं। उसके बाद यह सदा आईः अली हमें पनाह दो। आपने फ़रमाया क़ता व बुरीद और ज़रबे शदीद कलमें पर मौकूफ़ है। कलमा पढ़ो , अमान लो। ग़रज़ की कलमा पढ़ा गया। इसके बाद रस्सी डाली गई और अमीरूल मोमेनीन 20,000 (बीस हज़ार) जिनों को क़त्ल कर के और 24,000 (चौबीस हज़ार) क़बाएल को मुसलमान बना कर कुऐं से बाहर आये। असहाब ने ख़ुशी का इज़हार किया और सब के सब आं हज़रत स. की खि़दमत में हाजि़र हुए। हुज़ूरे अकरम स. ने अली (अ.स.) को सीने से लगाया , उनकी पेशानी का बोसा दिया और मुबारकबाद से हिम्मद अफ़ज़ाई फ़रमाई। फिर एक रात क़याम के बाद मदीने को रवानगी हुई।(अद्दमतुस् साकेबा पृष्ठ 176 ईरान में छपी व शवाहेदुन नबूवत अल्लामा जामी रूक्न 6 पृष्ठ 165, लखनऊ में 1920 0 में छपी)

इस्लाम पर अली (अ.स.) के एहसानात

इस्लाम पर अली (अ.स.) के एहसानात की फ़हरीस्त इतनी मुख़्तसर नहीं है कि हम उसे इस मुख़्तसर मजमूए हालात में लिख सकें। ताहम मुश्ते अज़ ख़र दारे लिख देते हैं।

1. दावते ज़ुलअशीरा के मौक़े पर जिस जगह रसूले अकरम स. को तक़रीर करने का मौक़ा नहीं मिल रहा था। आपने ऐसी जुर्रत और हिम्मत का मुज़ाहेरा किया के पैग़म्बरे इस्लाम स. कामयाब हो गये और आपने इस्लाम का डंका बजा दिया।

2. शबे हिजरत फ़र्शे रसूल स. पर सो कर इस्लाम की किस्मत बेदार कर दी और जान जोखम में डाल कर ग़ार में तीन रोज़ खाना पहुँचाया।

3. जंगे बद्र में जबकि मुसलमान सिर्फ़ 313 (तीन सौ तेरह) और कुफ़्फ़ार बेशुमार थे। आपने कमाले जुर्रत और हिम्मत से कामयाबी हासिल की।

4. जंगे ओहद में जब कि मुसलमान सरवरे आलम स. को मैदाने जंग में छोड़ कर भाग गये थे , उस वक़्त आप ही ने रसूले अकरम स. की जान बचाइ और इस्लाम की इज़्जत महफ़ूज़ कर ली थी।

5. कुफ़्फ़ार जिनके दिलों में बदले की आग भड़क रही थी , उमरो बिल अब्द वुद जैसे बहादुर को ले कर मैदान में आ पहुँचे और इस्लाम को चौलेंज कर दिया। पैग़म्बरे इस्लाम स. परेशान थे , और मुसलमानों को बार बार उभार रहे थे कि मुक़ाबले के लिये निकलें लेकिन अली (अ.स.) के अलावा किसी ने हिम्मत न की। आखि़र कार रसूल अल्लाह स. को कहना पड़ा कि आज अली (अ.स.) की एक ज़रबत इबादते सक़लैन से बेहतर है।

6. इसी तरह ख़ैबर में कामयाबी हासिल कर के आपने इस्लाम पर एहसान फ़रमाया।

7. मेरे ख्याल के मुताबिक़ हज़रत अली (अ.स.) का इस्लाम पर सब से बड़ा एहसान यह था कि , वफ़ाते रसूल स. के बाद दुख भरे वाके़यात और जान लेवा हालात के बावजूद आपने तलवार नहीं उठाई वरना इस्लाम मंजि़ले अव्वल पर ही ख़त्म हो जाता।

दुनिया हज़रत अली (अ.स.) की निगाह में

यह एक मुसल्लेमा हक़ीक़त है कि हज़रत अली (अ.स.) दुनिया और दुनिया के कामों से हद दरजा बेज़ार थे। आपने दुनिया को मुख़ातिब कर के बारह कहा कि ऐ दुनिया जा मेरे अलावा और किसी को धोखा दे। मैंने तुझे तलाक़े बाइन दे दी है जिसके बाद रूजु करने का सवाल ही पैदा नहीं होता। इब्ने तल्हा शाफ़ेई लिखते हैं कि , एक दिन हज़रत अली (अ.स.) ने जाबिर इब्ने अब्दुल्लाह अन्सारी को लम्बी लम्बी सांस लेते हुए देखा तो पूछा ऐ जाबिर क्या यह तुम्हारी ठंडी ठंडी सांस दुनिया के लिये है ? अर्ज़ की मौला , है। तो ऐसा ही आपने फ़रमाया। जाबिर सुनो इन्सान की जि़न्दगी का दारो मदार सात चीज़ो पर है और यही सात चीज़ें वह हैं जिन पर लज़्ज़तों का ख़ातमा है , जिनकी तफ़सील यह है 1. खाने वाली चीज़ें , 2. पीने वाली चीज़ें , 3. पहन्ने वाली चीज़ें , 4. लज़्ज़्ते निकाह वाली चीज़ें , 5. सवारी वाली चीज़ें , 6. सूंघने वाली चीज़ें 7. सुन्ने वाली चीज़ें।

ऐ जाबिर , अब इनकी हक़ीक़तों पर गौ़र करो। खाने में बेहतरीन चीज़ शहद है , यह मख्खी का लोआबे दहन (थूक) है और बेहतरीन पीने की चीज़ पानी है , यह ज़मीन पर मारा मारा फिरता है। बेहतरीन पहनने की चीज़ दीबाज़ है , यह कीड़े का लोआब है और बेहतरीन मन्क़ूहात औरत है जिसकी हद यह है कि पेशाब का मक़ाम पेशाब के मक़ाम में होता है , दुनिया इसकी जिस चीज़ को अच्छी निगाह से देखती है वह वही है जो उसके जिस्म में सब से गंदी है। और बेहतरीन सवारी की चीज़ घोड़ा है जो क़त्लो कि़ताल का मरकज़ है और बेहतरीन सूंघने की चीज़ मुश्क है जो एक जानवर के नाफ़ का सूखा हुआ ख़ून है। और बेहतरीन सुनने की चीज़ गि़ना (गाना) है जो बहुत बड़ा गुनाह है। ऐ जाबिर ऐसी चीज़ों के लिये आकि़ल क्यो ठंडी सांस ले ? जाबिर कहते हैं कि इस इरशाद के बाद मैंने कभी दुनिया का ख़्याल तक न किया।

(मतालेबुल सूउल , पृष्ठ 191 )

कसबे हलाल की जद्दो जहद

आपके नज़दीक कसबे हलाल बेहतरीन सिफ़त थी। जिस पर आप खुद भी अमल पैरा थे। आप रोज़ी कमाने को ऐब नहीं समझते थे और मज़दूरी को बहुत ही अच्छी निगाह से देखते थे। मोहद्दिस देहलवी का बयान है कि हज़रत अली (अ.स.) ने एक दफ़ा कुएं से पानी खींचने की मज़दूरी की और उजरत के लिये फ़ी डोल एक ख़ुरमे का फ़ैसला हुआ। आपने 16 डोल पानी के खींचे और उजरत ले कर सरवरे कायनात स. की खिदमत में हाजि़र हुए और दोनों ने मिल कर तनावुल (खाया) फ़रमाया। इसी तरह आपने मिट्टी खोदने और बाग़ में पानी देने की भी मज़दूरी की है। अल्लामा मुहिब तबरी का बयान है कि , एक दिन हज़रत अली (अ.स.) ने बाग़ सींचने की मज़दूरी की और रात भर पानी देने के लिये जौ की एक मिक़दार (मात्रा) तय हुई। आपने फ़ैसले के अनुसार सारी रात पानी दे कर सुबह की और जौ (एक प्रकार का अनाज) हासिल कर के आप घर तशरीफ़ लाये। जौ फ़ात्मा ज़हरा स. के हवाले किये। उन्होंने उस के तीन हिस्से कर डाले और तीन दिन के लिये अलग अलग रख लिया। इसके बाद एक हिस्से को पीस कर शाम के वक़्त रोटियां पकाईं इतने में एक यतीम आ गया , और उसने मांग लीं। फिर दूसरे दिन रोटियां तय्यार की गईं , आज मिस्कीन ने सवाल किया , और सब रोटियां दे दी गईं , फिर तीसरे दिन रोटियां तय्यार हुईं आज फ़कीर ने आवाज़ दी , और सब रोटियां फ़कीर को दे दी गईं। अली (अ.स.) और उनके घर वाले तीनों दिन भूखे ही रहे। इसके इनाम में ख़ुदा ने सूरा हल अताः नाजि़ल फ़रमाया(रियाज़ुन नज़रा जिल्द 2 पृष्ठ 237 ) बाज़ रवायत में है कि सूरा हल अता के बारे में इसके अलावा दूसरे अन्दाज़ का वाके़या मिलता है।

हज़रत अली (अ.स.) अख़लाक़ के मैदान में

आप बहुत ही ख़ुश अख़लाक़ थे। उलेमा ने लिखा है कि आप रौशन रू और कुशादा पेशानी रहा करते थे। यतीम नवाज़ थे। फ़़कीरों में बैठ कर ख़ुशी महसूस करते थे। मोमिनों में अपने को हक़ीर और दुश्मनों में अपने को बा रोब रखते थे। मेहमानों की खि़दमत खुद किया करते थे। कारे ख़ैर में सबक़त करते थे। जंग में दौड़ कर शामिल होते थे। हर मुस्तहक़ की इमादाद करते थे। हर काफि़र के क़त्ल पर तकबीर कहते थे। जंग में आपकी आंखे ख़ून के मानन्द होती थीं। इबादत खाने में इन्तेहाई ख़ुज़ु व ख़ुशु की वजह से बेहिस मालूम होते थे। हर रात को वह हज़ार रकअत नवाफि़ल अदा करते थे। अपने बाल बच्चों के साथ घर के कामां में मदद करते थे। घर में इस्तेमाल होने वाला सारा सामान ख़ुद बाज़ार से ख़रीद कर लाते थे। अपने कपड़ों में ख़ुद पेवन्द लगाते थे। अपनी और रसूले अकरम स. की जूती ख़ुद टांकते थे। हर रोज़ दुनिया को तीन तलाक़ देते थे। वह ग़ुलाम अपनी मज़दूरी से ख़ुद ख़रीद कर आज़ाद करते थे।(जन्नातुल ख़ुलूद) किताब अरजहुल मतालिब पृष्ठ 201 में है कि हज़रत अली (अ.स.) हुज़ूरे अकरम स. की तरह कुशादा हंसने वाले और ख़ुश तबआ थे और मिज़ाह (मज़ाक़) भी फ़रमाया करते थे।

हज़रत अली (अ.स.) ख़ल्लाक़े आलम की नज़र में

1. ख़ल्लाक़े आलम ने खि़लक़ते कायनात से पहले नूरे अलवी को नूरे नब्वी स. के साथ पैदा किया।

2. फिर मसजूदे मलाएक क़रार दिया।

3. फिर जिब्राईल का उस्ताद बनाया।

4. फिर अम्बिया के साथ अपनी तरफ़ से मददगार बना कर भेजा।(हदीसे क़ुदसी व मदीनतुल मगा़हिज़ पृष्ठ 19 ईरान में छपी)

5. अपने मख़सूस घर , ख़ाना ए काबा में अली (अ.स.) को पैदा किया।

6. इस्मत से बहरावर फ़रमाया।

7. आपकी मोहब्बत दुनिया वालों पर वाजिब क़रार दी।

8. रसूले अकरम स. का खुद जां नशीन बनाया।

9. मेराज में अपने हबीब से उन्हीं के लहजे में कलाम किया।

10. हर इस्लामी जंग में उनकी मदद की।

11. आसमान से अली (अ.स.) के लिये ज़ुल्फि़क़ार नाजि़ल फ़रमाई।

12. अली (अ.स.) को अपना नफ़्स क़रार दिया।

13. इल्मे लदुन्नि से मुम्ताज़ किया।

14. फ़ात्मा स. के साथ अक़्द का खुद हुक्म दिया।

15. मुबल्लिग़े सूरा ए बराअत बनाया।

16. मदहे अली (अ.स.) में कसीर (काफ़ी तादाद में) आयात नाजि़ल फ़रमाईं।

17. अली (अ.स.) ने इन्तेहाई सबरो ज़ब्त दे कर रसूल स. के बाद फ़ौरी तलवार उठाने से रोका।

18. उनकी नस्ल से क़यामत तक के लिये इमामत क़रार दी।

19. क़सीम अल नारो जन्नतः बनाया (जन्नत और दौज़ख़ को बांटने वाला)।

20. लवाएल हम्द का मालिक बनाया।

21. और साकि़ये कौसर क़रार दिया।

अली (अ.स.) की शान में मशहूर आयात

1. आयए तत्हीर 2. आयए सालेह अल मोमेनीन 3. आयए विलायत 4. आयए मुबाहेला 5. आयए नजवा 6. इज़्ने वायता 7. आयए अतआम 8. आयए बल्लिग़ , तफ़सील के मुलाहेज़ा हों रूह अल क़ुरआन , मोअल्लेफ़ा हक़ीर लाहौर में छपा।

हज़रत अली (अ.स.) रसूले ख़ुदा की निगाह में

1. फ़ख़रे मौजूदात हज़रत मौहम्मद मुस्तफ़ा स. ने अली (अ.स.) के काबा में पैदा होते ही मुँह में अपनी ज़बान दी।

2. अली (अ.स.) को अपना लोआबे दहन चूसाया।

3. परवरिश व परदाख़्त खुद की।

4. दावते ज़ुलअशीरा के मौक़े पर जब कि अली (अ.स.) की उम्र 10 या 14 साल की थी।

5. दामादी का शरफ़ बख़्शा।

6. बुत शिकनी के वक़्त अली (अ.स.) को अपने कन्धों पर सवार किया।

7. जंगे खन्दक़ में आपके कुल्ले ईमान होने की तस्दीक़ की।

8. इल्मो हिक्मत से बहरा वर किया।

9. अमीरूल मोमेनीन का खि़ताब दिया।

10. आपकी मोहब्बत ईमान और आपका बुग़्ज़ कुफ्र क़रार दिया।

11. अली (अ.स.) को अपना नफ़्स क़रार दिया।

12. शबे हिजरत आपने अपने बिस्तर पर जगह दी।

13. आप पर भरोसा कर के फ़रमाया कि अमानतें वग़ैरा तुम अदा करना।

14. अली (अ.स.) को मख़सूस क़रार दिया कि वह ग़ार मे खाना पहुँचाएं।

15. 18 जि़ल्हिज को आपकी खि़लाफ़त का 1,24,000 (एक लाख चौबीस हज़ार) असहाब के मजमे में ग़दीर ख़ुम के मक़ाम पर एलान फ़रमाया।

16. वफ़ात के करीब जांनशीनी की दस्तावेज़ लिखने की कोशिश की।

17. आपकी मदहो सना में बेशुमार अहादीस फ़रमाईं।

18. आपको हुक्म दिया कि मेरे बाद फ़ौरी जंग न करना।

19. मौक़ा हाथ आने पर मुनाफि़क़ों से जंग करना ताके हुक्मे खुदा जाहद अल कुफ़्फ़ा रवल मुनाफ़ेक़ीन की तकमील हो सके जो कि मेरे लिये है।

अली (अ.स.) की शान में मशहूर अहादीस

1. हदीसे मदीने , 2. हदीसे सफ़ीना , 3. हदीसे नूर , 4. हदीसे मन्जि़लत 5. हदीसे ख़ैबर 6. हदसे खन्दक़ , 7. हदीसे तैर , 8. हदीसे सक़लैन , 9. हदीसे ग़दीर।

(तफ़सील के लिये अब्क़ातुल अनवार मुलाहेज़ा हो)

नक़्शे ख़ातमे रसूल स. और अली वली अल्लाह

इमामुल मोहद्देसीन अल्लामा मौहम्मद बाक़िर मजलिसी , अल्लामा मौहम्मद बाक़र नजफ़ी , अल्लामा शेख़ अब्बास क़ुम्मी तहरीर फ़रमाते हैं कि रसूले करीम स. हज़रत अली (अ.स.) को एक नगीना दे कर मोहर कुन (नगीने पर नक़्श बनाने वाले) के पास जो अंगूठियों के नगीनों पर कन्दा करता था भेजा और फ़रमाया कि इस पर मौहम्मद बिन अब्दुल्ला कन्दा करा लाओ। हज़रत अली (अ.स.) ने उसे कन्दा करने वाले को दे कर इरशादे रसूल स. के मुताबिक़ हिदायत कर दी। अमीरूल मोमेनीन (अ.स.) जब शाम के वक़्त उसे लाने के लिये गये तो उस पर मौहम्मद बिन अब्दुल्ला के बजाय मौहम्मद रसूल अल्लाह कन्दा था। हज़रत ने फ़रमाया कि मैंने जो इबारत बताई थी तुमने वह क्यो न कन्दा की। कन्दा करने वाले ने अर्ज़ की मौला , आप इसे हुज़ूर के पास ले जाइये फिर वह जैसा इरशाद फ़रमाऐगें वैसा किया जाऐगा। हज़रत ने उसे क़ुबूल फ़रमा लिया। रात गुज़री , सुबह के वक़्त वजू़ करते हुए देखा कि इस पर मौहम्मद रसूल अल्लाह स. के नीचे अली वली अल्लाह कन्दा है। आप इस पर ग़ौर फ़रमा रहे थे कि जिब्राईल अमीन ने हाजि़र हो कर अर्ज़ कि हुज़ूर फ़रमाया गया है कि ऐ नबी। जो तुमने चाहा तुमने लिखवाया , जो मैने चाहा मैंने लिखवा दिया। तुम्हें इसमें तरदुद क्या है।

(बेहारूल अनवार , दमए साकेबा , सफ़ीनतुल बेहार , लिल्द 1 पृष्ठ 376 नजफ़े अशरफ़ में छपी)

नियाबते रसूल (स अ . व . व . )

हर अक़्ले सलीम यह करने पर मजबूर है कि मनीब व मनाब में तवाफ़ुक़ होना चाहिये। यानी जो सिफ़ात नाएब बनाने वाले में हो , उसी कि़स्म की सिफ़तें नाएब बनने वाले में भी होनी चाहिये। अगर नाएब बनाने वाला नूर से पैदा हो तो जां नशीन को भी नूरी होना चाहिये। अगर वह मासूम हो तो , उसे भी मासूम होना चाहिये। अगर उसे ख़ुदा ने बनाया हो तो , उसे भी ख़ुदा के हुक्म से ही बनाया गया हो। हज़रत अली (अ.स.) हज़रत मौहम्मद मुस्तफ़ा के जां नशीन थे , लिहाज़ा उनमें नब्वी का सिफ़ात का होना ज़रूरी था। यही वजह है कि जिन सिफ़ात के हामिल सरवरे कायनात थे , उन्हीं सिफ़ात से हज़रत अली (अ.स.) भी बहरावर थे।

जानशीन बनाने का हक़ सिर्फ़ ख़ुदा को है क़ुरआने मजीद के पारा 20 , रूकू 7 - 10 में ब सराहत मौजूद है कि ख़लीफ़ा और जानशीन बनाने का हक़ सिर्फ़ ख़ुदा वन्दे करीम को है। यही वजह है कि उसने तमाम अम्बिया का तक़र्रूर खुद किया और उनके जांनशीन को खुद मुक़र्रर कराया , अपने किसी नबी तक को यह हक़ नहीं दिया विह बतौर खुद अपना जांनशीन मुक़र्रर कर दे। न कि उम्मत को इख़्तेयार देना कि इजमा से काम ले कर मन्सबे इलाहिया पर किसी को फ़ाएज़ कर दे। और यह हो भी नहीं सकता था क्योंकि तमाम उम्मत ख़ताकार है। ख़ताकारों का इजमा न सवाब बन सकता है और न खातियों का मजमूआ मासूम हो सकता है और जांनशीने रसूल स. का मासूम होना इस लिये ज़रूरी है कि रसूल मासूम थे। यही वजह है कि खुदा ने रसूले करीम स. का जांनशीन हज़रत अली (अ.स.) और उनकी 11 (ग्यारह) औलाद को मुक़र्रर फ़रमाया।(यनाबिउल मोअद्दता पृष्ठ 93 ) जिसकी संगे बुनियाद दावते ज़ुलअशीरा के मौक़े पर रखा और आयते विलायत और वाकि़ए तबूक़(सही मुस्लिम जिल्द 2 पृष्ठ 272 ) से इस्तेहकाम पैदा किया। फिर इज़ा फ़रग़ता फ़ननसब से हुक्मे निफ़ाज़ का फ़रमान जारी फ़रमाया और आयए बल्लिग़ के ज़रिये से ऐलाने आम का हुक्म नाफि़ज़ फ़रमाया।

चुनांचे रसूले करीम स. ने यौमे जुमा 18 जि़ल्हिज्जा 10 हिजरी को बामुक़ामे ग़दीर ख़ुम एक लाख चौबीस हज़ार (1,24,000) असहाब की मौजूदगी में हज़रत अली (अ.स.) की खि़लाफ़त का ऐलाने आम फ़रमाया।(रौज़ातुल सफ़ा जिल्द 2 पृष्ठ 215 ) में है कि मजमे को एक जगह पर जमा करने के लिये जो ऐलान हुआ था वह हय्या अला ख़ैरिल अमल के ज़रिये से हुआ था। कुतुबे तवारीख़ व अहादीस में मौजूद है कि इस ऐलान पर हज़रत उमर ने भी मुबारक बाद अदा की थी जिसकी तफ़सील बाब 1 में गुज़री।

18 जि़ल्हिज्जा

अल्लामा जलाल उद्दीन स्यूती ने लिखा है कि हज़रत उमर ने इस तारीख़ को यौमे ईद क़रार दिया है। रईसुल उलेमा हज़रत अल्लामा बहावुद्दीन आमेली तहरीर फ़रमाते हैं कि सरवरे कायनात स. की विलादत से 4 साल बाद 18 जि़ल्हिज्जा 10 हिजरी को हज़रत अली (अ.स.) की जांनशीनी अमल में आई और आपके इमाम अल इन्सो जिन होने का ऐलान किया गया और इसी तारीख़ 34 हिजरी में हज़रते उस्मान क़त्ल हुए और हज़रत अली (अ.स.) की बैअत की गई। इसी तारीख़ हज़रते मूसा (अ.स.) साहिरों पर ग़ालिब आये और हज़रते इब्राहीम (अ.स.) को आग से नजात मिली और इसी तारीख़ को हज़रते मूसा (अ.स.) ने जनाबे यूशा इब्ने नून को , हज़रते सुलैमान ने जनाबे आसिफ़ इब्ने बरखि़या को अपना जांनशीन मुक़र्रर किया और इसी तारीख़ को तमाम अम्बिया ने अपने जांनशीन मुक़र्रर फ़रमाए।

(जामेए अब्बासी या नज़द वबाबी पृष्ठ 58, 1914 0 देहली में छपा व इख़्तेयारात मजलिसी रहमतउल्लाह इलैह)

दस्तावेज़े खि़लाफ़त

सरवरे कायनात स. ने इब्तेदाए इस्लाम से ले कर जि़न्दगी के आखि़री दिनों तक हज़रत अली (अ.स.) की जांनशीनी का बार बार मुख़तलिफ़ अन्दाज़ व उन्वान से ऐलान करने के बाद वफ़ात के वक़्त यह चाहा कि उसे दस्तावेज़ी शक्ल दे दें लेकिन हज़रत उमर ने बनी बनाई इस्कीम के तहत रसूले करीम स. को कामयाब न होने दिया और उनके आखि़री फ़रमान (क़लम दवात की तलबी) को बकवास और हिज़यान से ताबीर कर के उन्हें मायूस कर दिया जिसके मुताअल्लिक़ आपका ख़ुद बयान है कि जब आं हज़रत स. ने वक़्ते आखि़र मरज़ुल मौत में हक़ को छोड़ कर बातिल की तरफ़ जाना चाहा ताके अली (अ.स.) की सराहत कर दें तो ख़ुदा की क़सम मैंने आं हज़रत स. को मना कर दिया और आं हज़रत स. अली (अ.स.) के नाम को तहरीरन ज़ाहिर न कर सके।

(तारीख़े बग़दाद व शरह इब्ने अबिल हदीद , जिल्द 1 पृष्ठ 51 तेहरान में छपी)

इमामें ग़ज़ाली फ़रमाते हैं कि रसूल अल्लाह स. ने अपनी वफ़ात से पहले असहाब से कहा कि मुझे क़लम दवात और काग़ज़ दे दो। ला ज़ैल अनकुम इशक़ाल अल मरज़ा जि़क्र लकुम मिनल मुस्तहक़ बादी क़ाला उमरा औ अल रजल फ़ाना लेहजर ताके मैं तुम्हारे लिये इमारत व खि़लाफ़त की मुश्किलात को तहरीरन दूर कर दूँ कि मेरे बाद इमारत व खि़लाफ़त का मुस्तहक़ कौन है। मगर हज़रत उमर ने उस वक़्त यह कह दिया कि इस मर्द को छोड़ दो यह हिज़यान बक रहा है और बकवास कर रहा है। (माअज़ अल्लाह)

मुलाहेज़ा हो:-

(सेराआलेमीन बम्बई में छपी , पृष्ठ 9, सतर 15 किताब अल शिफ़ा , काज़ी अयाज़ , बरेली में छपी , पृष्ठ 308 व नसीम अल रियाज़ शरह शिफ़ा , शरह मिश्क़ात , मोहद्दिस देहलवी व मदारिजे नबूवत , हबीब अल सैर जिल्द 1 पृष्ठ 144, रौज़तुल अहबाब जिल्द 1 पृष्ठ 550, बुखा़री जिल्द 6 पृष्ठ 656, अल फ़ारूक़ जिल्द 2 पृष्ठ 48 )


ख़लीफ़ा का तक़र्रूर और तवारीख़े फ़रहंग

मोअर्रेख़ीने इस्लाम के अलावा मोअर्रेख़ीने फि़रहंग (अंग्रेज़ इतिहासकारों) ने भी हज़रत अली (अ.स.) इस्तेहक़ाक़े खि़लाफ़त और नुमायां तौर पर ख़लीफ़ा मुक़र्रर किये जाने पर मुकम्मल रौशनी डाली है।

हम इस मौक़े पर मिस्टर डीवन पौर्ट की तहरीर का तरजुमा पेश करते हैं। इन दोनों फि़रक़ों सुन्नी और शिया में से एक ने मौहम्मद के चचा जा़द भाई और दामाद अली से जैसा कि मुक़तज़ाए इन्साफ़ व हमियत है तो ला रखा है क्योंकि आंहज़रत ऐलानिया तौर पर उनसे मोहब्बत व उल्फ़त रखते थे और कई बाद उनको अपना ख़लीफ़ा भी ज़ाहिर किया था। ख़ुसूसन दो मौक़ों पर एक जब आंहज़रत स. ने अपने घर में बनी हाशिम की दावत की थी और अली (अ.स.) ने कुफ़्फ़ार के मज़ाक उड़ाने और तौहीन करने के बावजूद अपना ईमान ज़ाहिर किया था। हज़रत ने अपनी बाहें उस जवान के गले में डाल कर छाती से लगाया और बाआवाज़े बलन्द कहा , देखो मेरे भाई , मेरे वसी और मेरे ख़लीफ़ा को।

दूसरे जब आं हज़रत ने अपने इन्तेक़ाल से कुछ महीने पहले ख़ुतबा पढ़ा था। बा हुक्मे ख़ुदा जिसको जिब्राईल आं हज़रत के पास लाये थे और यूं कहा था कि ऐ पैग़म्बर मैं ख़ुदा की तरफ़ से आप पर सलवात व रहमत लाया हूँ और इसका हुक्म आपके पैरवों के नाम जिनको आप बग़ैर ताख़ीर के सुना दीजिये और शरीरों से कोई ख़ौफ़ न कीजिये। ख़ुदा आपको उनके शर से बचाएगा। ख़ुदा के हुक्म के मुताबिक़ आंहज़रत ने अनस से कहा कि लोगों को जमा करें जिसमें आंहज़रत के पैरव व यहूदी व नसरानी व मुख़तलिफ़ बाशिन्दे भी हाजि़र हों। यह जीमयत एक गांव के पास जमा हुई जिसे ग़दीरे ख़ुम कहते हैं जो नवाह शहर हजफ़ा में मक्के और मदीने के बीच मे है। पहले इस मक़ाम को साफ़ किया गया और 2 अप्रैल 626 ई0 को आंहज़रत एक ऊंचे मिम्बर पर गये जो वहां उनके लिये तय्यार किया गया था और जब कि हाज़ेरीन निहायत तवज्जोह से सुनते थे। एक ख़ुतबा हज़रत ने बड़ी शानो शौकत और फ़साहत व बलाग़त से पढ़ा , जिसका खुलासा यह है:-

तमाम हम्दो सना उस खुदाए यकता के लिये हैं जिसके कोई देख नहीं सकता। उसका इल्म माज़ी , हाल और मुस्तक़बिल को शामिल है और उसको इन्सानों के कुल पोशीदा इसरार मालूम हैं क्यों कि उस से कोई चीज़ पोशीदा नहीं रह सकती। वह बेइन्तेहां बईद और बिल्कुल क़रीब है। वही वह है जिसने आसमानों ज़मीन और उसके दरमियान की तमाम चीज़ों को ख़ल्क़ किया। वह ग़ैर फ़ानी है और जो कुछ है सब उसकी क़ुदरत और उसके इखि़्तयार के ताबे है। उसकी रहमत और उसका फ़ज़ल सबके शामिले हाल है। वह जो करता है मसलेहत से करता है। वह नुज़ूले अज़ाब में टाल मटोल करता है। उसका सज़ा देना रहमत से खा़ली नहीं है। उसकी ज़ात का भेद मुमकिनात को मालूम नहीं हो सकता। आफ़ताब (सूरज) व महताब (चाँद) और बाक़ी अजरामे समावी (नक्षत्र) उसी के इल्म से अपनी राह पर जो उसी ने मुक़र्रर कर दी है चलते हैं। बाद हम्दे ख़ुदा वाज़े हो के मैं ख़ुदा का सिर्फ़ एक बन्दा हूं। मुझे ख़ुदा का हुक्म हुआ है और मैं उसकी तामील में सरे नियाज़ बा कमाले अदब व ख़ुज़ू झुकाता हूँ। सुनो तीन बार जिब्राईल मेरे पास आ चुके हैं और तीनों दफ़ा उन्होंने मुझे हुक्म दिया है कि मैं अपने तमाम पैरवों से ख़्वाह वह गोरे हों या काले यह ज़ाहिर कर दूँ कि अली (अ.स.) मेरे खलीफ़ा और मेरे वसी और तमाम उम्मत के इमाम हैं और मेरे गोश्त व पोस्त हैं और मेरे ऐसे हैं जैसे मूसा के हारून थे और मेरी वफ़ात के बाद वही तुम्हारी हिदायत करेंगे और हादी होंगे। जब मैं इस दुनिया से रेहलत कर जाऊं तो मेरे पैरवों को उनकी फ़रमा बरदारी ऐसी करनी चाहिये जैसे इताअत मेरी करते थे जब कि मैं तुम में मौजूद था।

सुनो ! जिसने अली (अ.स.) की नाफ़रमानी की उसने दर हक़ीक़त ख़ुदा और रसूल स. की नाफ़रमानी की , ऐ दोस्तों , यह ख़ुदा के अहकाम हैं। सब वहीयां (जिब्राईल के ज़रिये ख़ुदा के भेजे हुए सारे पैग़ामात) जो वक़्तन फ़ावक़्तन मुझ पर आई हैं अली (अ.स.) ने मुझ से सीख ली हैं। जो अली (अ.स.) का हुक्म न मानेगा उसके सर पर अल्लाह की दाएमी लानत ज़रूर रहेगी।

ख़ुदा ने क़ुरआन की हर सूरत में अली (अ.स.) की तारीफ़ की है मैं दोबारा कहता हूँ कि अली मेरे चचा ज़ाद भाई और मेरे गोश्त और ख़ून हैं और ख़ुदा ने उनको निहायत नादिर ख़ूबियां अता की हैं। अली (अ.स.) के बाद उनके बेटे हसन (अ.स.) और हुसैन (अ.स.) उनके जांनशीन होंगे। इस ख़ुतबे के तमाम होने पर अबू बक्र , उमर , उस्मान , अबू सुफि़यान और दूसरे लोगों ने अली (अ.स.) के हाथ चूमे और उनको रसूल स. के ख़लीफ़ा मुक़र्रर होने की मुबारक बाद दी और इक़रार किया कि उनके कुल अहकाम को सच्चे तौर पर बजा लाऐंगे।

622 ई0 में सिर्फ़ तीन दिन पहले अपने इन्तेक़ाल से आंहज़रत स. ने फिर अपने ताबेईन को इन अक़ीदों की मज़ीद ताक़ीद कर दी और इस बात पर ज़ोर दिया कि आप की आल से ख़ुसूसियत के साथ मोहब्बत रखें और उनकी इज़्ज़तों तौक़ीर करें। आपने बड़े शद्दो मद से यूँ फ़रमाया कि जो मुझको मौला मानता हो वह अली (अ.स.) को भी मौला समझे , अल्लाह ताईद करे उसकी जो दोस्ती रखे अली (अ.स.) से और ग़ज़बनाक हो उस पर जो उनका दुश्मन हो। ऐसे मुक़र्रर और मुसर्रह बयानात से जो खुद रसूल स. के लबों से अदा हुए थे एक वक़्त तो अमरे खि़लाफ़त से शको शुब्हा बिल्कुल दूर रहा मगर आखि़र में सब को मायूसी हो गई क्यों कि अबू बकर की बेटी और आं हज़रत स. की दूसरी ज़ौजा (पत्नी) आयशा ने साज़ बाज़ कर के अपने बाप को पहला ख़लीफ़ा लोगों से मुक़र्रर करा लिया। मलकुल मौत के इन्तिज़ार में आं हज़रत का आयशा के हुजरे में जाना चाहे आपकी मरज़ी से हो या बीबी आयशा के हुक्म से ख़ास कर के उनके मुफ़ीद मतलब बात हो गई कि आं हज़रत का हुक्म दोबारा खि़लाफ़ते अली (अ.स.) लोगों के कानों तक न पहुंचने पाए। बस अल्ल उमूम यह समझा गया कि रसूल स. बग़ैर अपने ख़लीफ़ा के मुताअल्लिक़ आखि़री वसीयत किए हुए इन्तेक़ाल किया और इस तरह यह बात हुई कि तीनों ख़लीफ़ाओं ने राज किया। इससे पहले कि अली (अ.स.) अपने हक़ को पहुँचें जिसका वह मुकम्मल इस्तेहक़़ाक़ रखते थे न सिर्फ़ बा लिहाज़े क़राबत व ज़ौजियत फ़ात्मा दुख़्तरे रसूल स. बल्कि बा लिहाज़ उन बेशुमार और बड़ी खि़दमतों के जो उन्होंने इस्लाम कीं , हो सकता है कि बीबी आयशा ने अपने बाप की लड़की होने की वजह से उनकी यह खि़दमत की हो कि , उन्हें ख़लीफ़ा बना दिया जाए लेकिन सही यह है कि आयशा को अली (अ.स.) की तरफ़ से पुराना बुग़ज़ व कीना था जो वाक़ए अफ़क़ के मौक़े पर पैदा हो गया था क्यों कि उस मौक़े पर अली (अ.स.) ने राय पेश की थी कि बीबी आयशा की तहक़ीक़ात कराई जाय। बीबी आयशा इस बात को कभी न भूलीं और उन्होंने दरगुज़र नहीं किया , बल्कि अली (अ.स.) को सताया और ऐसा इन्तेक़ाम लिया जो इस्लाम में अपनी आप नज़ीर है।

(किताबे खि़लाफ़त मन्क़ूल अज़ तारीख़े इस्लाम जिल्द 3 पृष्ठ 25 )

आनरएबिल मिस्टर टायलर ने अपनी किताब में लिखा है कि मौहम्मद स. ने ख़ुद अपने दामाद अली (अ.स.) को अपना ख़लीफ़ा और जांनशीन कर दिया था लेकिन आपके ससुर अबु बकर ने लोगों को अपनी साजि़श में ले कर खि़लाफ़त पर क़ब्ज़ा कर लिया।(मुलाहेज़ा हो एलीमेंट्स आफ़ जनरल हिस्टी ª पृष्ठ 249, 1851 0 में छपा)

इन्साईक्लोपीडिया बरटानिका में है कि , रसूल स. के बाद इस्लाम की सरदारी का दावा अली (अ.स.) को ज़्यादा मुनासिब मालूम होता था। मिस्टर टरयो ने लिखा है कि अगर क़राबत (नज़दीकी) की वजह से तख़्त नशीनी का उसूल अली (अ.स.) के मोअल्लिफ़ माना जाता तो वह बरबाद कुन झगड़े पैदा न होते जिन्होंने इस्लाम को मुसलमानों के ख़ून में डूबो दिया।(स्प्रिट आफ़ इस्लाम मिस्टर सडीवाज़ तारीख़े इस्लाम जिल्द 3 पृष्ठ 201 )

हज़रत अली (अ.स.) के फ़ज़ाएल

अमीरूल मोमेनीन हज़रत अली (अ.स.) के फ़ज़ाएल क़लमबन्द करना इन्सान की ताक़त के बाहर है। ख़ुद सरवरे कायनात स. ने इसके मोहाल होने पर नस फ़रमा दी है। आपका इरशाद है कि , अगर तमाम दुनिया के दरिया , समन्दर सियाही बन जायें और दरख़्त क़लम हो जायें और जिन्नो इन्स लिखने और हिसाब करने वाले हों तब भी अली इब्ने अबी तालिब (अ.स.) के मुकम्मल फ़ज़ाएल नहीं लिखे जा सकते।(कशफ़ुल गम्मा पृष्ठ 53 व अर हज्जुल मतालिब) उलेमाए इस्लाम ने भी अकसरियत फ़ज़ाएल का एतेराफ़ किया है और अकसर ने अहातए फ़ज़ाएल से आजेज़ी ज़ाहिर की है। अल्लामा अब्दुल बर ने किताब इस्तियाब जिल्द 2 के पृष्ठ 478 पर तहरीर फ़रमाया है फ़ज़ाएले ला यूहीत बहा किताब आपके फ़ज़ाएल किसी एक किताब में जमा नहीं किए जा सकते। अल्लामा इब्ने हजरे मक्की सवाएक़े मोहर्रेक़ा और मंज मकीया में लिखते हैं कि मनाकि़बे अली व फ़ज़ाएल अकसर मिन अन तुहसा हज़रत अली (अ.स.) के मनाकि़ब व फ़ज़ाएल हद्दे एहसा से बाहर हैं और सवाएक़ पृष्ठ 72 पर फ़रमाते हैं कि , फ़ज़ाएले अली वही क़सीरह , अज़ीताह मशाएतः हत्ता क़ाला अहमद वमा जा लाहद मिनल फ़ज़ाएल माजल अली बे शुमार हैं , बेश बहा हैं , और मशहूर हैं। अहमद इब्ने हम्बल का कहना है कि , अली (अ.स.) के लिये जितने फ़ज़ाएल व मनाकि़ब मौजद हैं किसी के लिये नहीं हैं। क़ाज़ी इस्माईल , इमामे निसाई और अबू अली नैशापूरी का कहना है कि किसी सहाबी की शान में उम्दा सनदों के साथ वह फ़ज़ाएल वारिद नहीं हुए जो हज़रत अली (अ.स.) की शान में वारिद हुए हैं। अल्लामा मौहम्मद इब्ने तल्हा शाफ़ेई तहरीर फ़रमाते हैं कि अली (अ.स.) के जो फ़ज़ाएल हैं वह किसी और को नसीब नहीं। रसूल अल्लाह ने आपको आयतुल हुदा , मनारूल ईमान और इमाम अल औलिया फ़रमाया है और इरशाद किया है कि अली का दोस्त मेरा दोस्त है और अली का दुश्मन मेरा दुश्मन है।(मतालेबुल सुऊल पृष्ठ 57 ) अल्लामा हजर लिखते हैं कि क़ुरआन मजीद में जहां या अय्योहल लज़ीना आमेनू आया है वहां ईमान दारों से मुराद लिये जाने वालों में अली (अ.स.) का दरजा सबसे पहला है। क़ुरआने मजीद में मुख़्तलिफ़ मक़ामात पर असहाब की मज़म्मत आई है लेकिन हज़रत अली (अ.स.) के लिये जब भी जि़क्र आया है ख़ैर के साथ आया है और अली (अ.स.) की शान में कु़रआने मजीद की तीन सौ (300) आयतें नाजि़ल हुई हैं।(सवाएके़ मोहर्रेक़ा पृष्ठ 76 मिस्र में छपी) यही वजह है कि इमाम अल इन्स वल जिन हज़रत अली (अ.स.) इरशाद फ़रमाते हैं , इस उम्मत में किसी एक का भी भीक़्यास और मुक़ाबेला आले मौहम्मद स. से नहीं किया जा सकता और इन लोगों की बराबरी जिनको बराबर नेमतें दी गईं उन अफ़राद से नही की जा सकती जो नेमत देने वाले थे और नेमतें देते रहे। आले रसूल स. दीन की निव और यक़ीन के खम्बे हैं।(सल सबीले फ़साहत तरजुमा नहजुल बलाग़ा पृष्ठ 27 ) बे शक हुज़ूरे विलायत का यह फ़रमान बिलकुल दुरूस्त है कि आले मौहम्मद स. की बराबरी नहीं की जा सकती क्यों कि हुज़ूर रसूले करीम स. ने इरशाद फ़रमा दिया है कि मेरी आल मेरे अलावा सारी कायनात से बेहतर और अफ़ज़ल है और हदीसे कफ़ो फ़ात्मा स. ने इसकी वज़ाहत कर दी कि आले रसूल स. का दरजा अम्बिया से बाला तर है। इन्हीं हज़रात की मोहब्बत का हुक्म ख़ुदा वन्दे आलम ने क़ुरआने मजीद में दिया है और उनकी मोहब्बत से सवाल किया जाना मुसल्लम है। इनके लिये दुनिया की मस्जिदें अपने घर के मानिन्द हैं।(दुरेमन्शर व मतालेबुल सवेल पृष्ठ 59 ) अहले बैत में हज़रत अली (अ.स.) का पहला दरजा है , और यह मानी हुई बात है कि जो फ़ज़ीलत अली (अ.स.) की है इसमें तमाम आइम्मा मुशतरक हैं। आपको ख़ुदा ने क़सीमे नारो जन्नत बनाया है।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 73 ) आपके हुक्म के बग़ैर कोई जन्नत में नही लेजा सकता। अल्लामा हजरे मक्की तहरीर फ़रमाते हैं कि हज़रत अबू बकर ने इरशाद फ़रमाया है कि मैंने रसूल अल्लाह स. को यह कहते सुना है कि , कोई शख़्स भी सिरात पर से गुज़र कर जन्नत में जा न सकेगा जब तक अली (अ.स.) का दिया हुआ परवानाए जन्नत उसके पास न होगा।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 75 मिस्र में छपी) आपको हक़ के साथ और हक़ को आपके साथ होने की बशारत दी र्गइं है। आपको रसूले अकरम स. ने मवाख़ात के मौक़े पर अपना भाई क़रार दिया है। आपके लिये दो बार आफ़ताब पलटा , शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 87 में है कि जंगे ख़ैबर के सिलसिले में सहाबा के मक़ाम पर (वही) का नज़ूल होने लगा और सरे मुबारके रसूल स. अली (अ.स.) के ज़ानू पर था और आफ़ताब ग़ुरूब हो गया था उस वक़्त आपने अली (अ.स.) को हुक्म दिया कि आफ़ताब को पलटा कर नमाज़ अदा करें चुनांचे आफ़ताब डूबने के बाद पलटा और अली (अ.स.) ने नमाज़ अदा की। इसी किताब के पृष्ठ 176 पर और किताब सफ़ीनातुल बिहार जिल्द 1 पृष्ठ 57 व मजमुए बैहरैन पृष्ठ 232 में है कि वफ़ाते रसूल स. के बाद हज़रत अली (अ.स.) बाबुल जाते वक़्त जब फ़रात के क़रीब पहुँचे तो असहाब की नमाज़े अस्र क़ज़ा हो गई , आपने आफ़ताब को हुक्म दिया कि पलट आए चुनांचे वह पलटा और असहाब ने नमाज़े अस्र अदा की। नसीमुल रियाज़ , शरह शिफ़ा क़ाज़ी अयाज़ वगै़रह में है कि एक मरतबा आपका एक ज़ाकिर आपके जि़क्र में मशग़ूल था कि नमाज़े अस्र क़ज़ा हो गई , उसने कहा कि ऐ आफ़ताब पलट आ कि मैं उसका जि़क्र कर रहा हूँ जिसके लिये तू दो बार पलट चुका है चुनांचे आफ़ताब पलटा और उसने नमाज़े अस्र अदा की। शवाहेदुन नबूवत के पृष्ठ 219 में है कि अली (अ.स.) मुजस्सम हक़ थे और उनकी ज़बान पर हक़ ही जारी होता था। इमामे शाफ़ेई इरशाद फ़रमाते थे जो मुसलमान अपनी नमाज़ में उन पर दुरूद न भेजे उसकी नमाज़ सही नहीं है।

मौलाना ज़फ़र अली खा़ँ का एक शेर और उसकी रद

मौलाना ज़फ़र अली खा़ँ मरहूम एडीटर ज़मींदार लाहौर का एक अजीबो ग़रीब शेर एक दरसी किताब(हमार्री उदू) मुसन्नेफ़ा हारून रशीद में हमारी नज़र से गुज़रा शेर यह है।

हैं किरनें एक ही मशल की अबु बक्रो , उमर उस्मानो अली।

हम मरतबा हैं , याराने नबी , कुछ फ़कऱ् नहीं इन चारों में।।

इस शेर में अगर मशल से मुराद नबी स. की ज़ात ली गई है तो असहाब का उनकी किरन होना इन्तेहाई बईद है क्यों कि वह नूरी और जौहरी थे और यह माद्दी हैं। वह मुजस्सम ईमान थे और उन लोगों ने 38 , 39 , 40 साल कुफ़्र में गुज़ारे हैं। उन्होंने कभी बुत परस्ती नहीं की और उन्होंने अपने उम्र के बड़े हिस्से बुत परस्ती में गुज़ार कर इस्लाम क़ुबूल किया था औश्र अगर मशअल से मुराद नबूवत ली गई है और उसकी किरने उनकी इमामत और खि़लाफ़त को क़रार दिया है तो यह भी दुरूस्त नही है क्यो कि रसूल स. की नबूवत मिन जानिब अल्लाह थी और उनकी खि़लाफ़त की बुनियाद इज्माए नाकि़स पर क़ायम हुई थी। इस शेर के दूसरे मिस्रे में चारों को हम मरतबा कहा गया है और रसूल स. का यार बताया गया है। हो सकता है कि तीनों हज़रात रसूल स. के यार रहे हों लेकिन हज़रत अली (अ.स.) हरगिज़ रसूल स. के यार नहीं थे बल्कि दामाद और भाई थे। अब रह गया चारों का हम मरतबा होना यह तो हो सकता है कि तीनों हम मरतबा हों और था भी कि तीनों हज़रात हर हैसियत से एक दूसरे के बराबर थे लेकिन हज़रत अली (अ.स.) का उनके बराबर होना यह उनका आपके हम मरतबा होना समझ से बाहर है क्यों कि यह चालीस साल बुत परस्ती के बाद मुसलमान हुए थे और अली (अ.स.) पैदा ही मोमिन और मुसलमान हुए। इन लोगों ने मुद्दतों बुत परस्ती की और अली (अ.स.) ने एक सेकेण्ड भी बुत नहीं पूजा। इसी लिये करम अल्लाहो वजहा कहा जाता है। यह फ़ात्मा स. के शौहर थे। इनमें से किसी को यह शरफ़ नसीब नहीं हुआ। वह लोग आम इन्सानों की तरह ख़ल्क़ हुए और अली मिसले नबी स. नूर से पैदा हुये। इसके अलावा खुद ख़ुदा वन्दे आलम ने अली (अ.स.) के अफ़ज़ल ही होने की नहीं बल्कि बेमिस्ल होने की नस (सनद) फ़रमा दी है। मुलाहेज़ा हों:-

(अहया अल उलूम , ग़ज़ाली सफ़सीर साअल्बी व तफ़सीरे कबीर जिल्द 2 पृष्ठ 283 )

इमाम फ़ख़रूद्दीन राज़ी ने हज़रत अली (अ.स.) को अम्बिया के बराबर और तमाम सहाबा से अफ़ज़ल तहरीर किया है।

(अरबईन फ़ी उसूल अल दीन , दारे हज अल मतालिब , पृष्ठ 455 )

सरवरे कायनात स. ने अली (अ.स.) को अपनी नज़ीर बताया है।

(अरजहुल मतालिब पृष्ठ 454 )

इन्ही ख़ुसूसीयात की बिना पर अली (अ.स.) को मेयारे ईमान क़रार दिया गया है।

अल्लामा तिरमिज़ी और इमामे नेसाई ने बुग़ज़े अली (अ.स.) से मुनाफि़क़ को पहचानने का उसूल बताया है और बाज़ ने अफ़ज़लियते अली (अ.स.) पर एतेक़ाद ज़रूरी क़रार दिया है और अल्लामा अब्दुल बर ने एस्तेयाब में सहाबा , ताबईन वग़ैरा की फ़ेहरिस्त पेश की है जो अली (अ.स.) को अफ़ज़ल सहाबा मानते थे और शायद इसकी वजह यह होगी कि तमाम लोग जानते थे कि ख़ुदा वन्दे आलम ने अली (अ.स.) के सिवा किसी के क़ल्ब को ईमान की कसौटी पर नहीं कसा।(एज़ालतुल ख़फ़ा जिल्द 2 पृष्ठ 256 )

हज़रत अली अलैहिस्सलाम की इल्मी हैसियत

हज़रत अली (अ.स.) का नफ़्से अल्लाह होना मुसल्लेमात से है और अल्लाह उस वाजेबुल वुजूद ज़ात को कहते हैं जो इल्म व क़ुदरत से इबारत है। यह ज़ाहिर है कि जो नफ़्से अल्लाह होगा उसे फि़तरतन तमाम उलूम से बहरावर होना चाहिये। हज़रत अली (अ.स.) के लिये यह मानी हुई चीज़ है कि आप दुनिया के तमाम उलूम से सिर्फ़ वाकि़फ़ ही नहीं बल्कि उनमें महारत रखते थे और इल्में लदुन्नी से भी माला माल थे। तमाम उलूम के बारे में आपके ज्ञान की कोई सीमा नहीं है। इमामे शबलन्जी लिखते हैः आपके इल्मों फ़हम वग़ैरा के लिये बहुत सी जिल्दें दरकार हैं। मौहम्मद इब्ने तल्हा शाफ़ेई लिखते हैं कि इमामुल मुफ़स्सेरीन जनाब इब्ने अब्बास का कहना है कि इल्मों हिकमत के 10 (दस) दरजों मे से 9 (नौ) हज़रत अली (अ.स.) को मिले हैं और दसवें में तमाम दुनिया के उलेमा शामिल हैं और इस दसवें दरजे में भी अली (अ.स.) को अव्वल नम्बर हासिल है। अबुल फि़दा कहते हैं कि हज़रत इल्म अल नास बिल क़ुरआन वल सन्न थे , यानी तुम लोगों से ज़्यादा उन्हें क़ुरआन व हदीस का इल्म था। ख़ुद सरवरे कायनात स. ने भी आपके इल्मी मदारिज पर बार बार रौशनी डाली है। कहीं अना मदीनतुल इल्म व अलीयन बाबोहा फ़रमाया , कहीं अना दारूल हिकमते व अलीयन बाबोहा इरशाद फ़रमाया , किसी जगह पर अलम उम्मती अली इब्ने अबी तालिब कहा। हज़रत अली (अ.स.) ने ख़ुद भी इसका इज़हार किया है और बताया है कि इल्मी नुक़्ताए नज़र से मेरा दरजा क्या है। एक मक़ाम पर फ़रमाया कि रसूल अल्लाह स. ने मुझे इल्म के हज़ार बाब (अध्याय) तालीम फ़रमाये हैं और मैंने हर बाब से हज़ार बाब (अध्याय) पैदा कर लिये हैं। एक मक़ाम पर इरशाद फ़रमाया ज़क़नी रसूल अल्लाह ज़क़न ज़क़न मुझे रसूल अल्लाह स. ने इस तरह इल्म भराया है जिस तरह कबूतर अपने बच्चे को दाना भराता है। एक मन्जि़ल पर कहा कि सलूनी क़ब्ल अन तफ़क़दूनी मेरी जि़न्दगी में जो चाहे पूछ लो वरना फिर तुम्हें इल्मी मालूमात से कोई बहरावर करने वाला न मिलेगा। एक मक़ाम पर फ़रमाया कि आसमान के बारे में मुझसे जो चाहे पूछो मुझे ज़मीन के रास्तों से ज़्यादा आस्मान के रास्तो का इल्म है। एक दिन फ़रमाया कि अगर मेरे लिये मसन्दे क़ज़ा बिछा दी जाए तो मैं तौरैत वालों को तौरैत से , इन्जील वालों को इन्जील से , ज़बूर वालों को ज़बूर से और क़ुरआन वालों को क़ुरआन से इस तरह जवाब दे सकता हूँ कि उनके उलेमा हैरान रह जाऐ। एक मौक़े पर आपने इरशाद फ़रमाया कि , ख़ुदा की क़सम मुझे इल्म है कि क़ुरआन की कौन सी आयत कहां नाजि़ल हुई है , और मैं यह भी जानता हूँ कि ख़ुश्की में कौन सी नाजि़ल हुई है और तरी में कौन सी आयत नाजि़ल हुई है। कौन सी दिन में और कौन सी आयत रात में नाजि़ल हुई है। उलेमा ने लिखा है कि एक शब इब्ने अब्बास ने हज़रत अली (अ.स.) से ख़्वाहिश की कि बिस्मिल्लाह की तफ़सीर बयान फ़रमायें , आपने सारी रात तफ़सीर बयान फ़रमाई और जब सुब्ह हो गई तो फ़रमाया ऐ इब्ने अब्बास मैं इसकी तफ़सीर इतनी बयान कर सकता हूँ कि 70 ऊँटों का बार हो जाए , बस मुख़तसर यह समझ लो कि जो कुछ क़ुरआन में है वह सूरा ए हम्द में है और जो सूरा ए हम्द में है वह बिस्मिल्लाह हिर रहमार्निरहीम में है और जो बिस्मिल्लाह में है वह बाए बिस्मिल्लाह में है और जो बाए बिस्मिल्लाह में है वह नुक़्ताए बाए बिस्मिल्लाह में है। ऐ इब्ने अब्बास मैं वही नुक़्ता हूँ जो बिस्मिल्लाह की बे के नीचे दिया जाता है। शेख़ सुलैमान क़न्दूज़ी लिखते हैं कि तफ़सीरे बिस्मिल्लाह सुन कर इब्ने अब्बास ने कहा कि ख़ुदा की क़सम मेरा और तमाम सहाबा का इल्म अली (अ.स.) के मुक़ाबले में ऐसा है जैसे सात समुन्दरों के मुक़ाबले में पानी का एक क़तरा। कुमैल इब्ने ज़्याद से हज़रत अली (अ.स.) ने फ़रमाया कि ऐ कुमैल मेरे सीने में इल्म के ख़ज़ाने हैं काश कोई अहल मिलता कि मैं उसे तालीम कर देता।

मुहिब तबरी तहरीर फ़रमाते हैं कि सरवरे आलम स. का इरशाद है कि जो शख़्स इल्मे आदम , फ़हमे नूह , हिल्मे इब्राहीम , ज़ोहदे यहीया , सौलते मूसा को इन हज़रात समेत देखना चाहे फ़ल यन्ज़र इला अली इब्ने अबी तालिब उसे चाहिये कि वह अली इब्ने अबी तालिब (अ.स.) के चेहरा ए अनवर को देखे। मुलाहेजा़ हों ,।(नूरूल अबसार शरह मवाकि़फ़ मतालेबुल सवेल , सवाएक़े मोहर्रेक़ा , श्वाहेदुन नबूवत , अबुल फि़दा , कशफ़ुल ग़म्मा , नेयाबुल मोअद्दत , मनाकि़ब इब्ने शहरे आशोब , रियाज़ुल नज़रा , अरजहुल मतालिब , अनवारूल ग़ता) उलमाए इस्लाम के अलावा अंग्रेज़ इतिहासकारों ने भी आपके कमाले इल्मी का एतेराफ़ (मान्ना) किया है। लेखक इन्साईक्लोपीडिया बरटानिका लिखते हैं , अली (अ.स.) इल्म और अक़्ल में मश्हूर थे और अब तक कुछ संग्रह ज़रबुल मिसाल और शेरों के उनसे मन्सूब हैं , ख़सूसन मक़ालाते अली जिसका अंग्रेज़ी तरजुमा (विल्यम पोल) ने 1832 ई0 में बा मक़ाम टोंबरा छपवाया।

(मोहज़ब्बुल मोकालेमा पृष्ठ 104 )

मिस्टर एयर विंग लिखते हैं , आप ही वह पहले ख़लीफ़ा हैं जिन्होंने उलूम व फ़ुनून की बड़ी हिमायत फ़रमाई। आपको ख़ुद भी शेर कहने का पूरा जौक़ था और आप के बहुत से हकीमाना मकूले और ज़रबुल मिसाल इस वक़्त तक लोगों के ज़बांज़द (याद) हैं और मुख़्तलिफ़ ज़बानों में उनका तरजुमा भी हो गया है।

(किताब ख़ुलफ़ाए रसूल पृष्ठ 178 )

मिस्टर ओकली लिखते हैं , तमाम मुसलमानों में बा इत्तेफ़ाक़ अली की अक़्ल व दानाई की शोहरत है जिसको सब मानते हैं। आपके सद कलेमात अभी तक महफ़ूज़ हैं जिनका अरबी में तुरकी में तरजुमा हो गया है। इसके अलावा आपके अशआर का दीवान भी है जिसका नाम अनवारूल अक़वाल है। लोवर वर्डलीन पुस्तकालय में आपके अक़वाल की एक बड़ी किताब(नहजुल बलाग़ह) मौजूद है। आपकी मशहूर तरीन तसनीफ़(जाफ़रो जामा) है जो एक बईदुल फ़हेम (समझ में न आने वाला) ख़त में आदादो हिन्द से (गिन्ती और निशानों) के ज़रिये से लिखा हुआ है। यह हिन्दसे उन तमाम अज़ीमुश्शान वाक़ेयात को जो इब्तेदाए इस्लाम से रहती दुनिया तक होने वाले वाक़ेयात बतलाते हैं। यह आपके ख़ानदान में है लेकिन पढ़ी नहीं जा सकती अल बत्ता इमामे जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) इसके कुछ हिस्से की तशरीह व तफ़सीर में कामयाब हो गये हैं और इसको मुकम्मल बारहवें इमाम करेंगे।

(तारीख़े अरब ओकली पृष्ठ 332 )

मोवर्रिख़ गिबन लिखते हैं , आप वह पहले ख़लीफ़ा हैं जिन्होंने इल्मों फ़न और किताबत की परवरिश की और हिकमत से ममलू अक़वाल का एक बड़ा मजमूआ आपके नाम से मन्सूब है। आपका क़ल्ब व दिमाग़ हर शख़्स से खि़राजे तहसीन हासिल करता रहेगा। आपका क़ल्बो देमाग़ मुजस्सम नूर था। आपकी दानाई और पुर मग़ज़ नुकता संजी ज़रबुल मिसाल के ईजाद में आपकी फ़ेरासत बहुत ही आला पाए की थी।

(तारीख़े अरब पृष्ठ 286 )

बम्बई हाई कोर्ट के जज मिस्टर अरनोल्ड , एडवोकेट जनरल एक फ़ैसले में लिखते हैं। शुजाअत , हिकमत , हिम्मत , अदालत , सख़ावत , जोहद और तक़वा में अली (अ.स.) का अदीलो नज़ीर तारीख़े आलम में कम नज़र आता है।

(लाँ रिपार्ट जिल्द 12 एजाज़ अल तन्ज़ील पृष्ठ 166 )

हज़रत अली (अ.स.) की तस्नीफ़ात

उल्माए इस्लाम का इस पर इत्तेफ़ाक़ है कि इस्लाम में सब से पहले मुसन्निफ़ (लेखक) हज़रत अली (अ.स.) हैं। अल्लामा रशीद उद्दीन इब्ने शहरे आशोब किताब माआलिम अल उलेमा में और अल्लामा मौहम्मद मोहसिन सदर ने किताब अल शिया व फ़ुनूने इस्लाम में तहरीर फ़रमाया है कि , अव्वल मिन सनफ़ फि़ल इस्लाम अमीरल मोमेनीन इस्लाम मे सब से पहले हज़रत अली (अ.स.) ने तस्नीफ़ की है। आपकी किताब का नाम (किताबे अली) और जामिया था। उसूले काफ़ी किताब अल हुज्जत में है कि इस किताब में तमाम दुनिया में होने वाले वाक़ेयात व हालात लिखे हुए थे। यह भी मुसल्लम है कि सब से पहले क़ुरआन जमा करने वाले भी हज़रत अली (अ.स.) हैं। मुलाहेज़ा हों (नूरूल अबसार इमामे शबलेंजी पृष्ठ 73 मिस्र में छपी) किताब आयानुल शिया में अबुल आइम्मा की तालीफ़ात व तसनीफ़ात की फ़ेहरिस्त इस तरह लिखी है।

1. कुरआने मजीद को तन्ज़ील के मुताबिक़ हज़रत अली (अ.स.) ने जमा किया इसमे असबाब व मक़ामाते नुज़ूल आया व सूर का भी जि़क्र था।

2. किताबे अली जिसमें क़ुरआने मजीद के साठ कि़स्म के उलूम का जि़क्र था।

3. किताब जामे , 4. किताब अल जफ़र 5. सहीफ़ुल फ़राएज़ , 6. किताब फ़ी ज़कात अल नअम 7. किताब फि़ल अबवाब अल फि़क़ा , 8. किताब फि़ल फि़क़ा 9. मालिके अशतर के नाम तहरीरी हिदायत , 10. मौहम्मद बिन हन्फि़या के नाम वसीयत , 11. मसन्दे अली (अ.स.) लाबी अब्दुल रहमान , अहमद बिन शईब नेसाई , इन किताबों के अलावा आपका संग्रह और सहीफ़ाए अलविया और आपके अशआर का मजमूआ दीवाने अली के नाम से हज़रत अली इब्ने अबी तालिब (अ.स.) की तरफ़ मन्सूब है। यह किताब नवाब अलाउद्दीन अहमद ख़ां बहादुर , फ़रमा रवाए लोहारो के हुक्म से 1876 ई0 में फ़ख़रूल मताबे , लाहौर में छपी थी और अब मुख़तलिफ़ मुल्कों में छप चुकी है और उसकी शरहें भी हो चुकी हैं। इन किताबों के अलावा जनाबे अमीरूल मोमेनीन का कलाम नीचे लिखी किताबों में जमा किया गया है।

1. नहजुल बलाग़ा:- इसे अल्लामा सय्यद रज़ी (अलै रहमा) ने जमा फ़रमाया है , वह 359 हिजरी मुताबिक़ 969 ई0 में पैदा हुए थे। और उनकी वफ़ात मोहर्रम 404 हिजरी मुताबिक़ 1513 ई0 में हुई है। किताब नहजुल बलाग़ा की बहुत सी शरहें लिखी गई हैं लिखने वालो में से कुछ नाम यह हैं।

1. इमामे अहले सुन्नत अज़ीज़ बिन अबु हामिद अब्दुल हमीद बिन हेयत उल्लाह बिन मौहम्मद बिन हसनैन इब्ने अबिल हदीद मदाईनी अल मुतावल्लिद 1 जि़लज्जिा 586 हिजरी मुताबिक़ 1257 ई0 बा मक़ाम बग़दाद।

2. क़वामुद्दीन युसूफ़ बिन हसन , जिनकी वफ़ात 922 हिजरी मुताबिक़ 1516 ई0।

3. मुफ़्ती मौहम्मद अब्दूह मिस्र

4. अल्लामा मौहम्मद हसन नाएल अल मरसफ़ी जिनका हाशिया है असल किताब नहजुल बलाग़ाह मिस्र के मशहूर प्रेस दारूल कुतुब अल अरबिया में छप गई है। यह चारों व्याख्याकर्ता अहले सुन्नत वल जमाअत से ताअल्लुक़ रखते हैं।

5. सय्यद अली बिन नासिर यह सय्यद रज़ी के दौर के थे सब से पहले नहजुल बलाग़ा की शरह उन्होंने ही लिखी है। उनकी शरह का नाम आलामे नहजुल बलाग़ा है।

6. अल्लामा कुतुबउद्दीन रावन्दी उनकी शरह का नाम मिनहाजुल बरअता है।

7. सय्यद इब्ने ताऊस , अबुल क़ासिम अली बिन मूसा बिन जाफ़र बिन मौहम्मद बिन ताऊस जो मोहर्रम 519 हिजरी में पैदा हुये और 5 ज़ीक़ाद 668 हिजरी में इन्तेक़ाल हुआ।

8. कमाल उद्दीन मीसम बिन अली मीसम बहरानी।

9. कुतुबउद्दीन मौहम्मद बिन हुसैन सिकन्दरी।

10. शेख़ हुसैन बिन शहाबुद्दीन हैदर अली आमेली का सफ़र के महीने में 1076 हिजरी मुताबिक़ अगस्त 1664 ई0 बामक़ाम हैदराबाद दकन इन्तेक़ाल हुआ।

11. शेख़ निज़ामुद्दीन अली बिन हुसैन इनकी शरह का नाम अनवारूल फ़साहत है।

12. अल्लामा मिर्ज़ा अलाउद्दीन मौहम्मद बिन अबी तुराब अल हुसैन उनकी शरह बहुत ही मबसूत है। इसका नाम हदायक़ुल हक़ाएक़ है। यह 20 (बीस) जिल्दों में है।

13. आक़ा शेख़ मौहम्मद रज़ा मुसम्मा बा दुर्रे नजफि़या।

14. मुल्ला फ़तेह अल्लाह काशेफ़ी जिनका इन्तेक़ाल 997 हिजरी में हुआ यह फ़ारसी में है और इसका नाम तम्बीहुल ग़ाफ़ेलीन है।

15. मोहकि़क़ हबीब अल्लाह हाशमी अल खूई इनकी शरह का नाम भी मिनहाज उल बराअता फ़ी नहजुल बलाग़ा है यह 25 जिल्दों में है। क़ुम ख़याबाने इरम तेहरान में मिलती है। इसके अलावा किताब के कुछ मुस्तदरकात हैं जो छप चुकी हैं।

2. मायते कलमता जिसको जाहिज़ ने जमा किया था।

3. ग़र्र अल हकम व दरद अल कलम जिसको अब्दुल वाहिद बिन मौहम्मद बिन अब्दुल वाहिद ने जमा किया था।

4. दस्तूरे माअलम हक्म जिसको क़ाज़ी अबू अब्दुल्लाह मौहम्मद बिन सलामा ने जमा किया था इनका इन्तेक़ाल 454 हिजरी में हुआ था।

5. नसर अला लाई जिसको अबुल फ़ज़ल अली बिन हुसैन अल बतरसी साहब मजमउल बयान ने जमा किया।

6. किताब मतलूब कुल्ले तालिब मन कलामे अली बिन अबी तालिब जिसको अबू इस्हाक़ अल वतवात अल अन्सारी ने जमा किया है। इसका फ़ारसी और जरमन ज़बान में तरजुमा हो चुका है।

7. क़लाएद अल हकम व फ़राएद अल क़लम जिसको क़ाज़ी अबू युसूफ़ बिन सुलैमान अला सफ़रानई ने जमा किया है।

8. किताब माअमियाते अली

9. इमसाल अल इमाम अली बिन अबी तालिब

10. शेख़ मुफ़ीद अल रहमा ने किताब अल इरशाद में कुछ कलाम जमा किया है।

11. नसर बिन मज़ाहम की किताब सिफ़्फ़ीन में आपका कलाम जमा है।

12. किताब जवाहरूल मतालिब।

आपकी इल्मी मरकजीयत

अल्लामा इब्ने अबिल हदीद , अल्लामा इब्ने शहरे आशोब , अल्लामा इब्ने तल्हा शाफ़ेई और अल्लामा अरबली तहरीर फ़रमातें हैं कि अशरफ़ुल उलूम , उल इलाहियात है और यह हज़रत अली (अ.स.) ही के कलाम से एक़तेबास किया गया है और आप ही इसकी इब्तेदा और इन्तेहां हैं। अक़ाएद के एतेबार से इस्लाम में मुख़तलिफ़ फि़रक़े हैं इन्में मोतज़ला भी है। इस फि़रक़े का बानी वासिल इब्ने अता है जो अबु हाशिम का शार्गिद था और वह अपने बाप मौहम्मद बिन हन्फि़या का शार्गिद था और मौहम्मद हज़रत अली के शार्गिद थे। दूसरा फि़रक़ा अशअरिया है जो अबुल हसन अशअरी की तरफ़ मन्सूब है और वह शार्गिद था अबु अली जबाई का जो मशाएख़ मोतज़ला से था। इसकी इन्तेहा भी हज़रत अली तक क़रार पाती है। तीसरा फि़रक़ा इमामिया व ज़ैदिया है। इसका हज़रत की तरफ़ मन्सूब होना बिल्कुल वाज़ेह है।

इस्लामी उलूम में इल्में फि़क़्हा भी है और इस्लाम का हर फि़रक़ा व मुजतहिद हज़रत ही का शार्गिद है। चुनान्चे अहले सुन्नत में चार फि़रक़े हैं। मालकी , हन्फ़ी , शाफ़ेई और हम्बली। मालकी फि़रके़ के बानी इमामे मालिक शार्गिद थे रबीअतुल राई के और वह शार्गिद थे अकरेमा के और वह शार्गिद थे इब्ने अब्बास के और वह शार्गिद थे हज़रत अली (अ.स.) के। दूसरे फि़रक़े हन्फ़ी के बानी इमामे अबू हनीफ़ा थे , वह शार्गिद थे इमामे मौहम्मद बाक़र (अ.स.) के और इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के और वह शार्गिद थे इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) के और इमाम आबिद (अ.स.) शार्गिद थे इमाम हुसैन (अ.स.) के और वह शार्गिद थे हज़रत अली (अ.स.) के। तीसरे फि़रक़े के बानी इमाम शाफ़ेई शार्गिद थे इमाम मौहम्मद के और वह शार्गिद थे इमाम अबू हनीफ़ा के। चौथे फि़रक़े के बानी इमाम अहमद बिन हम्बल शार्गिद थे , इमाम शाफ़ेई के इस तरह उनका फि़रक़ा भी हज़रत अली (अ.स.) का शार्गिद हुआ। इसके अलावा सहाबा के फ़ुक़हा हज़रत उमर व अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास थे , और दोनों ने इल्में फि़क़्हा हज़रत अली (अ.स.) से ही सीखा। इब्ने अब्बास का शार्गिदे हज़रत अली (अ.स.) होना तो वाज़ेह और मशहूर है , रहे हज़रत उमर तो उनके बारे में भी सब को इल्म है कि बकसरत मसाएल में जब उनकी अक़्लो फ़हम और राह चारो तदबीर बन्द हो जाया करती थी तो वह हज़रत अली (अ.स.) की तरफ़ रूजु करते और हज़रत अली (अ.स.) से ही मुश्किल कुशाई की दरख़्वास्त किया करते थे और अकसर ऐसा भी हुआ है कि अपने अलावा दीगर सहाबा की भी मुश्किल कुशाई अली (अ.स.) से कराया करते थे। उनका बार बार लौला अली लहक़ा उमर अगर अली (अ.स.) न होते तो उमर हलाक हो जाता , कहना और यह फ़रमाना कि ख़ुदा वह वक़्त न लाये कि मैं किसी इल्मी मुश्किल में मुब्तिला हो जाऊँ और अली (अ.स.) मौजूद न हों। इसके अलावा यह कहना कि जब अली (अ.स.) मस्जिद में मौजूद हों तो कोई फ़तवा देने की जुरअत न करे। यह साबित करता है कि हज़रत उमर की फि़क़ही हद हज़रत अली (अ.स.) की मुन्तही होती है। हज़रत अली (अ.स.) ही वह हैं जिन्होने उस औरत के मुक़दमे में मुनसेफ़ाना फ़तवा दिया जिसने छः (6) महीने में बच्चा जना था और जि़ना कार हामला औरत के मामले में तय फ़रमाया था जिसके रजम का फ़तवा हज़रत उमर दे चुके थे।

इस्लामी उलूम में तफ़सीरे क़ुरआनी का इल्म भी है। यह इल्म भी हज़रत अली (अ.स.) से हासिल किया गया है। जो शख़्स तफ़सीर की किताबें देखे उसे आसानी से इस दावे की सेहत मालूम हो जाऐगी क्यों कि तफ़सीर के मतालिब ज़्यादा तर हज़रत अली (अ.स.) और अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास ही से मन्क़ूल हैं और अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास का शार्गिदे अली (अ.स.) होना मशहूर व मारूफ़ है। लोगों ने अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास से एक दफ़ा पूछा कि हज़रत अली (अ.स.) के इल्म के मुक़ाबले में आपका इल्म कितना है ? फ़रमाया जितना एक बहरे ज़ख़्ख़ार के मुक़ाबले में एक छोटा क़तरा हो सकता है। इस्लामी उलूम में इल्मे तरीक़त व हकी़क़त और उसूले तसव्वुफ़ भी है और तुमको मालूम होना चाहिये कि इस फ़न के जुमला उलेमा व माहेरीन अपने को हज़रत की तरफ़ ही मन्सूब करते हैं और हज़रत ही तक अपने सिलसिले को मुन्तही क़रार देते हैं। इसकी सराहत उन लोगों ने भी की है जो फि़रक़ाए सूफ़ीया के इमाम और पेशवा माने गये हैं। जैसे शिब्ली , जुनैद , सिरी , अबू यज़ीद बस्तामी , मारूफ़ करख़ी , सूफ़ी ख़रक़ा , सूफ़ी को अली (अ.स.) का ही शेआर क़रार देते हैं।

उलेमा अरबिया मे इल्मे नुजूम भी है। दुनिया के माहेरीन को इल्म है कि इस इल्म के बानी हज़रत अली (अ.स.) हैं। आप ही ने इस इल्म की ईजाद की है। आप ही ने इसके क़वाएद व ज़वाबित मदून फ़रमाये हैं। आप ने इस इल्म के उसूल व जवामे की तालीम अबू अल अस्वद देली को दी और उसके क़वानीन तरतीब देने का तरीक़ा सिखाया हज़रत ने जो मुख़्तसर और जामे उसूल बताये उनमें कलाम , कलमा और एराब थे। आप ने कहा कि कलाम , इल्मे फ़ेल , हरफ़ को कहते हैं और कलमा मारेफ़ा और नुक़रा होता है और एराब , रफ़े नसब हजर और जज़्म में मुन्क़सिम होता है। हज़रत के इन मुख़्तसर उसूल व ज़वाबित को आपके मोजेज़ात मे शुमार करना चाहिये।(शरह इब्ने अबिल हदीद , जिल्द 1 पृष्ठ 7, व मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 98 व कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 54 मनाकि़ब जिल्द 2 पृष्ठ 67 )

इसके अलावा इल्म अल कि़रअत , इल्म अल फ़राएज़ , इल्म अल कलाम , इल्म अल खि़ताबत , इल्म अल फ़साहत व बलाग़त , इल्म अल शेर , इल्म अल उरूज वल क़वाफ़ी , इल्म अल अदब , इल्म अल किताबत , इल्म ताबीरे ख़्वाब , इल्म अल फ़लसफ़ा , इल्म अल हिन्दसा , इल्म अल नुजूम , इल्म अल हिसाब , इल्म अल तिब , इल्मे मन्तिक़ अल तैर वग़ैरा में आपको इन्तेहाई कमाल हासिल था।(मनाकि़ब जिल्द 2 पृष्ठ 67 ) और इल्मे लदुन्नी , इल्मे अल ग़ैब में भी आपको यदे तूला हासिल था।(नुरूल अबसार पृष्ठ 760 व अरजहुल मतालिब पृष्ठ 213 )

इब्ने शहरे आशोब ने मनाकि़ब में हज़रत अली (अ.स.) के सौते नाकूस की तफ़सीर बयान फ़रमाने की तफ़सील लिखी है और अल्लामा मौहम्मद बाक़र ने दमुस साके़बा के पृष्ठ 141 पर इब्ने अबिल हदीद के हवाले से 33 , बड़ी सतरों पर मुश्तमिल हज़रत का एक निहायत फ़सीह व बलीग़ ऐसा ख़ुतबा नक़ल किया है जिसमें लफ़्ज़े अलिफ़ नहीं है।

आपका ज़ोहद व तक़वा

मिस्र के मशहूर मोवर्रिख़ अल्लामा जरजी ज़ैदान लिखते हैं कि अली (अ.स.) की हालत क्या बयान हो। ज़ोहद और तक़वे के मुताअल्लिक़ आपके वाक़ेयात बहुत कसरत से हैं। उसूले इस्लाम की पाबन्दी करने में आप बहुत सख़्त और अपने हर क़ौलो फ़ेल में निहायत शरीफ़ व आज़ाद थे। जाल , फ़रेब , धोका , मक्र को आप जानते तक न थे और अपनी जि़न्दगी के मुख़्तलिफ़ ज़मानों से किसी हालत में भी आपने चाल , हीला , ग़द्दारी वग़ैरा की तरफ़ ज़र्रा बराबर भी रूख़ न किया। आपकी तमाम तर तवज्जे महज़ दीन के मुताअल्लिक़ रहती थी और आपका कुल एतेमाद और भरोसा सिर्फ़ सच्चाई और हक़ पर था। चुनान्चे आपके ज़ोहद और फ़क़ीराना जि़न्दगी की मिसालों में से एक यह भी है कि आपने जिस वक़्त रसूल स. की बेटी फ़ात्मा (स अ ) से शादी की तो आपके पास फ़र्श की कि़स्म से कोई चीज़ नहीं थी सिवाय दुम्बे की एक खाल के कि उसी पर दोनों शब में पड़ कर सो रहते थे और दिन के वक़्त इसी चमड़े पर अपने ऊँट को दाना खिलाते थे। आपके पास एक मुलाजि़म भी न था जो आपकी खिदमत करता। आपकी खि़लाफ़ते ज़ाहेरी के ज़माने में एक दफ़ा असफ़हान के (ख़ेराज) का माल आया तो आपने उसको सात हिस्सों पर तक़सीम कर दिया फिर उसमें एक रोटी मिली तो उसके भी सात टुकड़े किये। आप ऐसे कपड़ों का लिबास पहनते थे जो सर्दी से ज़रा भी महफ़ूज़ नहीं रख सकता था। बाज़ लोगों ने आपको देखा कि अपने ओढ़ने की चादर में खजूरें उठा कर खुद ला रहे हैं जिनको एक दिरहम में खरीदा था। यह देख कर अर्ज़ कि ऐ अमीरूल मोमेनीन यह हमें दे दें ताके हम पहुँचा दें। आपने जवाब दिया कि जिसके अयाल हैं उन्हीं को उनका बोझ उठाना चाहिये। आपके ज़र्री अक़वाल से यह भी है कि मुसलमान को चाहिये कि इतना कम खाएं कि भूख से उनके पेट हल्कें रहें और इतना कम पियें कि प्यास से उनके पेट सूखे रहें और खुदा के ख़ौफ़ से इतना रोयें कि उनकी आंखें ज़ख़्मी रहें।

(तारीख़े तमददुने इस्लामी , जिल्द 4 पृष्ठ 37 व तारीख़े कामिल जिल्द 3 पृष्ठ 204 )

आपकी सही राय

आप की राय इतनी सही थी कि कभी लग़जि़श नहीं हुई। जिसको जो मशवेरा दे दिया वह अटल साबित हुआ। अल्लामा इब्ने अबिल हदीद शरह नहजुल बलाग़ह में लिखते हैं कि तमाम लोगों से ज़्यादा हज़रत अली (अ.स.) की राय साएब और मोहकम व सही हुआ करती थी और आपकी तदबीर तमाम लोगों की तदबीरों से बलन्द व बरतर होती थी अलबत्ता आप इसी मामले में राय देते थे जो शरीयत के मुताबिक़ और इस्लाम की रौशनी में हो यानी ग़लत उमूर में आपका कोई मशवेरा न था।

आपकी सियासत

अल्लामा इब्ने अबिल हदीद लिखते हैं काना शदीद अल सियासत खशनन फ़ी ज़ात अल्लाह आप बे नज़ीर सियासी थे। आप की सियासत उन लोगों जैसी न थी जो दीन और ख़ुदा को पहचानते नहीं। आप की सियासत हुक्मे खुदा व रसूल स. की मिसाल हुआ करती थी। आप अल्लाह की ज़ात के बारे में निहायत ही सख़्त और शदीद अल अमल थे। इस सिलसिले में उन्होंने कभी अपने भाई तक की परवाह नहीं की। अक़ील और इब्ने अब्बास की नाराज़गी मशहूर है।

(सवाएक़े मोहर्रेक़ा)

हिल्म ,सदाक़त , अदल

ख़ालिद इब्नल अमीर का बयान है कि मैं अली (अ.स.) को तीन बातों की वजह से महबूब रखता हूँ।

1. यह कि जब वह ख़फ़ा होते थे तो मुकम्मल इल्म का इस्तेमाल करते थे।

2. जो बात कहते थे सच कहते थे।

3. जो फ़ैसला करते थे पूरे अदल के साथ करते थे।

माअक़ल इब्नुल यसार का बयान है कि सरवरे कायनात स. ने एक दिन फ़ात्मा ज़हरा स. से फ़रमाया कि मैंने तुम्हारी शादी बहुत बड़े आलिम और उम्मत में सब से बड़े ईमानदार और अज़ीम तरीन हिल्म करने वाले अली से की है।(अरजहुल मतालिब पृष्ठ 202 )

मौला ए कायनात हज़रत अली (अ.स.) के बाज़ करामात

यह मुसल्लम है कि मौला ए कायनात , मुशकिल कुशा , आलिम , हज़रत अली बिन अबी तालिब (अ.स.) मज़हरूल अजाएब वल ग़राएब थे। खि़ल्क़ते ज़ाहेरी से क़ब्ल अम्बिया (अ.स.) की मद्द करना , सलमाने फ़ारसी को दश्त अरज़न में शेर से छुड़ाना और ज़हूरो शहूद के बाद एक शब में चालीस जगह बयक वक़्त दावत में शिरकत करना , दुनिया के हर गोशे में आपके क़दम के निशानात का पत्थर पर मौजूद होना। ग़ारे असहाबे कहफ़ में निशाने क़दम का मौजूद होना। क़ाबुल में मज़ारे सख़ी का वजूद और दीगर निशानात का मौजूद होना। तूरे ख़ुम के क़रीब मस्जिदे अली की तामीर , पेशावर में असाए शाहे मरदां की जि़यारत गाह का होना। कोटा के रास्ते में क़दम के निशानात का पाया जाना। हैदराबाद में क़दम गाह मौला अली का होना। आलम में हर शख़्स की मुश्किल कुशाई का हो जाना। नीज़ बाबे ख़ैबर का उख़ाड़ना। रसूल करीम स. की आवाज़ पर चश्मे ज़दन में पहुच जाना। चादर पर बैठ कर ग़ारे असहाबे कहफ़ तक जाना और उनसे कलाम करना वग़ैरा वग़ैरा आपके मज़हरूल अजाएब वल ग़राएब होने का बय्यन सुबूत है। हम ज़ैल में किताब (इमामे मुबीन) से वाक़ेयात का खुलासा दर्ज करते हैं।


आपका गहवारे में कल्ला ए अज़दर दो पारा करना

एक दफ़ा का जि़क्र है कि हवालिये मक्का में एक निहायत ज़बर दस्त और तवील अज़दहा आ गया है और उसने तबाही मचा दी , एक लशकर ने उसे मारने की कोशिश की मगर कामयाब न हुआ। एक दिन वह अज़दहा मदीने की तरफ़ चला , जब क़रीब पहुँचा , शहरे मदीना में हलचल मच गई। लोग घरों को छोड़ कर भागने लगे। इत्तेफ़ाक़न वह अज़दहा ख़ाना ए अबू तालिब (अ.स.) में दाखि़ल हो गया। वहां मौला ए काएनात गहवारे में फ़रोकश थे और उनकी मादरे गेरामी कहीं बाहर तशरीफ़ ले गईं थी। जब वह अज़दहा गहवारे के क़रीब पहुँचा तो यदुल्लाह ने उसके दोनो जबड़ों को पकड़ कर दो कर दिया। रसूले ख़ुदा स. ने मसर्रत का इज़हार किया , अवाम ने दादे शुजाअत दी। माँ ने वापस आकर माजरा देखा और अपने नूरे नज़र का नाम हैदर रखा। इस नाम का जि़क्र मरहब के मुक़ाबले में अली बिन अबी तालिब (अ.स.) ने ख़ुद भी फ़रमाया है।

अना अल लज़ी सम्मतनी अम्मी हैदर।

ज़रग़ाम , आजाम वल यस क़सूरा।।

साकि़ए कौसर और संगे ख़ारा

रवायत में है कि हज़रत अमीरल मोमेनीन (अ.स.) जंगे सिफ़्फ़ीन से वापस जाते हुए एक सहराए लक़ो दक़ से गुज़रे , शिद्दते गरमा की वजह से आपका लशकर बे इन्तेहा प्यासा हो गया उसने हज़रत से पानी की ख्वाहिश की। आपने सहरा में इधर उधर नज़र दौड़ाई , एक बहुत बड़ा पत्थर नज़र आया , उसके क़रीब तशरीफ़ ले गये और पत्थर से कहा कि मैं तुझसे सुनना चाहता हूँ कि इस सहरा में पानी कहां है उसने ब क़ुदरते ख़ुदा जवाब दिया कि चशमाए आब मेरे ही नीचे है। हज़रत ने लशकर को हुक्म दिया कि इस पत्थर को हटाएं लेकिन सौ (100) आदमी कामयाब न हो सके। फिर आपने लबे मुबारक को हरकत दी और दस्ते ख़ैबर कुशा उस पर मारा , पत्थर दूर जा गिरा। उसके हटते ही शहद से ज़्यादा शीरीं और बर्फ़ से ज़्यादा सर्द पानी का चश्मा बरामद हो गया। सब सेराब हुए और सब ने पानी से छाबने भर लीं। फिर आपने पत्थर को हुक्म दिया कि अपनी जगह पर आ जमे बरवायत इब्ने अब्बास पत्थर उस जगह से खुद ब खुद सरक कर अपनी जगह पर आ पहुँचा और लश्कर शुकरे ख़ुदा करता हुआ रवाना हो गया।

मौला अली (अ.स.) और इन्सान की शक्ल बदल देना

असबग़ बिन नबाता का बयान है कि एक शख़्स क़ुरैश से हज़रत अली (अ.स.) की खि़दमत में हाजि़र हो कर कहने लगा कि मैं वह हूँ कि जिसने बे शुमार इन्सानों को क़त्ल किया है और बहुत से अत्फ़ाल को यतीम किया है। हज़रत ने उसका जब यह ताअरूफ़ सुना तो आपको ग़ुस्सा आ गया। आपने फ़रमाया कि अख़साया क़ल्ब ऐ कुत्ते! मेरे पास से दूर हो जा , हज़रत के दहने अक़दस से इन अल्फ़ाज़ का निकलना था कि उसकी माहियत और उसकी हय्यत बदल गई। और वह कुत्ते की शक्ल में हो कर दुम हिलाने लगा लेकिन साथ ही साथ बेताब हो कर फ़रयादो फ़ुग़ा करते हुए ज़मीन पर लोटने लगा। हज़रत को उस पर रहम आया और आपने दुआ की ख़ुदा ने फिर उसे उसकी शक्ल में बदल दिया।

ऐन उल्लाह ,अली (अ.स.) ने कोरे मादर ज़ाद को चशमे बीना दे दी

अब्दुल्लाह बिन यूनुस का बयान है कि मैं एक साल हज्जे बैतुल्लाह के लिये घर से रवाना हो कर जा रहा था। नागाह रास्ते में एक नाबीना ज़ने हबशिया को देखा कि वह हाथों का उठाए हुए इस तरह दुआ कर रही है। ऐ अल्लाह ब हक़्क़े अली बिन अबी तालिब (अ.स.) मुझे चश्में बीना दे दे। यह देख कर मैं उसके क़रीब गया और उस्से पूछा कि क्या तू वाक़ेइ अली बिन अबी तालिब (अ.स.) से मोहब्बत रखती है ? उसने कहा बे शक मैं उन पर सद हज़ार जान से क़ुरबान हूँ। यह सुन कर मैंने उसे बहुत से दिरहम दिये मगर उसने क़ुबूल न किया और कहा कि मैं दिरहम व दिनार नहीं मांगती। मैं आंख चाहती हूँ फिर मैं उसके पास से रवाना हो कर मक्के मोअज़्ज़मा पहुँचा और हज से फ़राग़त के बाद फिर उसी रास्ते से वापस आया। जब उस मक़ाम पर पहुँचा जिस मक़ाम पर वह नाबीना औरत थी तो देखा कि वह औरत चशमे बीना की मालिक है और सब कुछ देखती है। मैंने उस से पूछा कि तेरा माजरा क्या है ? उसने कहा कि मैं बदस्तूर दुआ किया करती थी , एक दिन हसबे मामूल मशग़ूले दुआ थी नागाह एक मुक़द्दस तरीन शख़्स नमूूदार हुए और उन्होंने मुझ से पूछा कि क्या तू वाक़ेइ अली को दोस्त रखती है ? मैंने कहा जी हाँ , ऐसा ही है। यह सुन कर उन्होंने कहा कि खुदाया अगर यह औरत दावाए मोहब्बत में सच्ची है तो उसे बीनाई अता फ़रमा। उनके इन अल्फ़ाज़ के ज़बान पर जारी होते ही मेरी आंखें खुल गईं , चशमे बीना मिल गई। मैं सब कुछ देखने लगी। मैंने उसके फ़ौरन बाद क़दमों पर गिर कर पूछा , हुज़ूर आप कौन हैं ? फ़रमाया , मैं वही हूँ जिसके वास्ते से तू दुआ कर रही थी।

मुशकिल कुशा की मुशकिल

कुशाई एक रवायत में है कि एक दिन हज़रत अली (अ.स.) मदीने की एक गली से गुज़र रहे थे , नागाह आपकी निगाह अपने एक मोमिन पर पड़ी देखा कि उसे एक शख़्स बुरी तरह गिरफ़्त में लिये हुए है। हज़रत उसके क़रीब गये और उस से पूछा यह क्या मामेला है ? उस मोमिन ने कहा , मौला मैं इस मर्दे मुनाफि़क़ के एक हज़ार सात सौ (1700) दीनार का क़जऱ्दार हूँ। इसने मुझे पकड़ रखा है और इतनी मोहलत भी नहीं देता कि मैं यहाँ से जा कर कोई बन्दोबस्त करूं। हज़रत ने फ़रमाया कि तू ज़मीन की रूख़ कर और जो पत्थर वग़ैरह इस वक़्त तेरे हाथ आयें उन्हें उठा ले। चुनान्चे उसने ऐसा ही किया , जब उसने उठा कर देखा तो वह सब सोने के थे।

हज़रत ने फ़रमाया कि इसका क़र्ज़ा अदा करने के बाद जो बचे उसे अपने काम में ला। रावी कहता है कि दूसरे दिन जिब्राईल के कहने से हज़रत रसूले करीम स. ने इस वाक़ेए को असहाब के मजमे में बयान फ़रमाया।

एक मशलूल की शिफ़ा याबी

अब्दुल्लाह बिन अब्बास का बयान है कि एक रोज़ नमाज़े सुब्ह के बाद हज़रत रसूले करीम स. मस्जिदे मदीना में बैठे हुए सलमान , अबूज़र , मिक़दाद और हुज़ैफ़ा से महवे गुफ़तुगू थे कि नागाह मस्जिद के बाहर एक ग़ुलग़ुला उठा , शोर सुन कर लोग मस्जिद के बाहर गये , तो देखा कि चालीस आदमी खड़े हैं जो मुसल्लाह हैं और उनके आगे एक निहायत ख़ूबसूरत नौजवान शख़्स हैं। हुज़ैफ़ा ने रसूले ख़ुदा को हालात से आगाह किया , आपने फ़रमाया कि उन लोगों को मेरे पास लाओ। वह आ गये , तो हज़रत ने फ़रमाया कि अली बिन अबी तालिब को बुला लाओ। हुज़ैफ़ा गये , अमीरूल मोमेनीन ने फ़रमाया कि ऐ हुज़ैफ़ा मुझे इल्म है कि एक गिरोह क़ौमे आद से आया है , मुझे उनकी हाजत भी मालूम है। उसके बाद आप हाजि़रे खि़दमते रसूले करीम (स अ व व ) हुए। आं ने हज़रत अली (अ.स.) से उनका सामना कराया। हज़रत अली (अ.स.) ने उस मरदे ख़ूबरू से कहा कि ऐ हज्जाज बिन ख़ल्जा बिन अबिल असफ़ बिन सईद बिन मम्ता बिन अलाक़ बिन वहब बिन सअब बता तेरी क्या हाजत है। उसने जब अपना नाम और पूरा शजरा सुना तो हैरान रह गया और कहा कि हुज़ूर मेरे भाई को शिकार का बड़ा शौक है। उसने एक दिन जंगल में शिकार खेलते हुए एक जानवर के पीछे घोड़ा डाला और उस पर तीर चलाया , इसके फ़ौरन बाद उसका निस्फ़ बदन शल हो गया। बड़े इलाज किये मगर कोई फ़ायदा न हुआ , आपने फ़रमाया कि उसे मेरे सामने ला। वह एक ऊँट पर लाया गया। हज़रत ने उसे हुक्म दिया कि उठ बैठ चुनान्चे वह तन्दरूस्त हो कर उठ बैठा। यह देख कर वह और उसके क़बीले के सत्तर हज़ार (70,000) नुफ़ूस मुसलमान हो गये।

आपकी सायए रहमत से महरूमी

हज़रत मौहम्मद मुस्तफ़ा स. ने 28 सफ़र 11 हिजरी यौमे दोशम्बा इन्तेक़ाल फ़रमाया।(मोअद्दतूल क़ुरबा) हज़रत अली (अ.स.) आपकी तजहीज़ो तकफ़ीन में मशग़ूल हो गये। हज़रत उमर अबू बकर को हमराह ले कर सक़ीफ़ा बनी साएदा जो मदीने से 3 मील के फ़ासले पर वाक़े है और मशवेरा हाय बातिल के लिये बनाया गया था , चले गये।(ग़यासुल लुग़ात) रस्सा कशी के बाद हज़रत अबू बक्र को ख़लीफ़ा बना लाये। हज़रत अली (अ.स.) चूंकि रसूले करीम स. को इन लोगों की वापसी के पहले दफ़्न कर चुके थे। इस लिये सब से पहले उन्होंने यह सवाल किया कि आपने हमारी वापसी का इन्तेज़ार क्यों नहीं किया। हज़रत अली (अ.स.) ने फ़रमाया कि रसूले करीम स. ब मुक़ामे ग़दीर ख़लीफ़ा मुक़र्रर कर चुके थे। आप किस जवाज़ से वहां गये और किस उसूल से मसलाए खि़लाफ़त को ज़ेरे बहस लाये , और क्या वजह थी कि हम रसूल स. का लाशा बे गोरो कफ़न रहने देते। इसके बाद उन्होंने बैअत का मुतालेबा किया। हज़रत अली (अ.स.) ने अपना हक़ फ़ाएक़ होना और अपने को मन्सूस ख़लीफ़ा होना ज़ाहिर कर के उनके मुतालेबे के खि़लाफ़ एहतेजाज किया और फ़रमाया कि मुझसे बैअत का सवाल ही पैदा नहीं होता। इस पर उन्होंने शदीद इसरार किया और आप से बैअत लेने की हर मुम्किन कोशिश की। मोवर्रेख़ीन का इत्तेफ़ाक़ है कि इसी सिलसिले में फ़ात्मा ज़हरा स. का घर जलाया गया। फ़ात्मा स. के दुर्रे लगाए गये। अली (अ.स.) की गरदन में रस्सी बांधी गयी और आपको क़त्ल कर देने की धमकी दी गई और विरासते रसूल स. से फ़ात्मा स. और औलादे फ़ात्मा स. को महरूम कर दिया गया। बाग़ छीना गया। अली (अ स ) , हसनैन (अ.स.) और उम्मे ऐमन को गवाही में झूठा क़रार दिया गया। इन हालात से आले मौहम्मद स. को जितना मुताअस्सिर होना चाहिये इसका अन्दाज़ा हर बा फ़हम कर सकता है। हज़रत अली (अ.स.) जो सायाए रहमते रसूल स. से महरूम हो कर मसाएब व आलाम की चक्की के दोनों पाटों में आ गये। उन्होंने अपने ख़ुतबात से इस पर रौशनी डाली है और अपने हालात की वज़हत की है। तफ़सील के लियें मुलाहेज़ा हों ख़ुतबाए शक़शक़या।

वफ़ाते रसूल स के बाद अली (अ.स.) का ख़़ुतबा

किताब नहजुल बलाग़ाह जिल्द 1 पृष्ठ 432 प्रकाशित मिस्र में है बुज़ुरगाने असहाबे मौहम्मद स. ने जो हाफि़ज़े क़ुरआन व सुन्नते नबवी थे जान लिया था कि मैं कभी एक साअत के लिये भी फ़रमाने ख़ुदा और रसूल स. दूर नहीं हुआ और पैग़म्बरे अकरम स. की ख़ातिर कभी अपनी जान की परवा नहीं की। जब दिलेरों ने राहे फ़रार इख़्तेयार की और बड़े बड़े पहलवान पीछे हट आये , इस शुजाअत और जवां मरदी के बाएस जो ख़ुदा ने मुझे अता की है मैंने जंग की और रसूले ख़ुदा स. की क़ब्ज़े रूह इस हालत में हुई कि आपका सरे मुबारक मेरे सीने पर था। इनकी जान मेरे ही हाथों पर बदन से जुदा हुई। चुनान्चे मैंने अपने हाथ (रूह निकलने के बाद) अपने चेहरे पर मले। मैंने ही आं हज़रत स. के जसदे अतहर को ग़ुस्ल दिया और फ़रिश्तों ने मेरी इस काम में मदद की। पस बैते नबवी और उसके एतराफ़ से गिरयाओ जा़री की सदा बलन्द हुई। फ़रिश्तों का एक गिरोह जाता था तो दूसरा आ जाता था। उनकी नमाज़े जनाज़ा का हमहमा मेरे कानों से जुदा नहीं हुआ यहां तक कि आपको आख़री आराम गाह में रख दिया गया। पस आं हज़रत की हयात व ममात में उनसे मेरे मुक़ाबले में कौन सज़ावार था। जो कोई इसका अदआ करता है वह सही नहीं कहता।

(तरजुमा नहजुल बलागा , रईस अहमद जाफ़री जिल्द 1 पृष्ठ 1200 प्रकाशित लाहौर)

इसी किताब के पृष्ठ 1303 पर है कि मेरे माँ बाप आप पर क़ुरबान ऐ रसूले ख़ुदा स. आपकी वफ़ात से नबूवत , ऐहकामे इलाही और अख़बारे आसमानी का सिलसिला मुनक़ेता हो गया। जो दूसरे पैग़म्बारों की वफ़ात पर कभी नहीं हुआ था। आपकी ख़ुसुसियत यगानगत यह भी थी कि दूसरी मुसीबतों से आपने तसल्ली दे दी क्यों कि आपकी मुसीबत हर मुसीबत से बालातर है और दुनिया से रहलत फ़रमाने की बिना पर आपको यह उमूमियत व ख़ुसूसियत हासिल है कि आपके मातम में तमाम लोंग यकसां दर्दमन्द और सीना फि़ग़ार हैं।

रफ़ीक़ाए हयात की जुदाई

रसूले करीम स. के इन्तेक़ाल पुर मलाल को अभी 100 दिन भी न गुज़रे थे कि आपकी रफ़ीक़ा ए हयात हज़रत फ़ात्मा ज़ैहरा स. अपने पदरे बुज़ुर्गवार की वफ़ात के सदमे वग़ैरा से बतारीख़ 20 जमादुस्सानिया 11 हिजरी इन्तेक़ाल फ़रमा गईं। हज़रत अली (अ.स.) ने वसीयते फ़ात्मा स. के मुताबिक़ हज़रत अबू बक्र , हज़रत उमर , हज़रत आयशा को शरीके जनाज़ा नहीं होने दिया और शब के तारीक पर्दे में हज़रत फ़ात्मा ज़ैहरा स. को सुपुर्दे ख़ाक फ़रमा दिया। और ज़मीन से मुख़ातिब हो कर कहा , या अरज़न असतो दक़ा व देयती हाज़ा बिन्ते रसूल अल्लाह ऐ ज़मीन मैं अपनी अमानत तेरे सुपुर्द कर रहा हूँ ऐ ज़मीन यह रसूल स. की बेटी है। ज़मीन ने जवाब दिया या अली अना अरफ़क़ बेहा मिनका ऐ अली आप घपरायें नहीं मैं आपसे ज़्यादा नर्मी करूंगी।

(मुअद्दतुल क़ुरबा पृष्ठ 129 तमाम वाक़ेयात की तफ़सील गुज़र चुकी है।)

शहादते फातेमा जहरा पर हज़रत अली (अ.स.) का ख़ुतबा

ज़मीन से मुख़ातिब होने के बाद आपने सरवरे कायनात स. को मुख़ातिब कर के कहा कि , या रसूल अल्लाह स. आपको मेरी जानिब से और आपकी पड़ोस में उतरने वाली और आप से जल्द मुल्हक़ होने वाली आपकी बेटी की तरफ़ से सलाम हो। या रसूल अल्लाह स. आपकी बरगुज़ीदा बेटी की रेहलत से मेरा सब्रो शकेब जाता रहा। मेरी हिम्मत व तवानाई ने साथ छोड़ दिया लेकिन आपकी मुफ़ारेक़त के हादसाए उज़मा और आपकी रेहलत के सदमाए जांकह पर सब्र कर लेने के बाद मुझे इस मुसिबत पर भी सब्र ही से काम लेना पड़ेगा जब कि मैंने अपने हाथों से आपको क़ब्र की लहद में उतारा और इस आलम में आपकी रूह ने परवाज़ की कि आपका सर मेरी गरदन और सीने के दरमियान रखा हुआ था।(इन्ना लिल्लाहे व इन्ना इलैहे रजेऊन) अब यह अमानत पलटाई गई। गिरवीं रखी हुई चीज़ छुड़ा ली गई लेकिन मेरा ग़म बे पायां और मेरी रातें बे ख़्वाब रहेंगी यहां तक कि ख़ुदा वन्दे आलम मेरे लिये भी इसी घर को मुन्तखि़ब करे जिसमें आप रौनक़ अफ़रोज़ हैं। या रसूल अल्लाह स. वह वक़्त आ गया कि आपकी बेटी आपको बताऐं कि किस तरह आपकी उम्मत ने उन पर ज़ुल्म ढाने के लिये एका कर लिया। आप उनसे पूरे तौर पर पूछें और तमाम अहवाल और वारदात दरयाफ़्त करें। यह सारी मुसिबत इन पर बीत गई हालां कि आपको गुज़रे हुए कुछ ज़्यादा अरसा नहीं हुआ था और न आपके तज़किरों सें ज़बाने बन्द हुईं थीं। आप दोनों पर मेरा सलामे रूख़सती हो। ऐसा सलाम जो किसी मलूल और दिल तंग की तरफ़ से होता है। अब अगर मैं इस जगह से पलट जाऊँ तो इस लिये नहीं कि आप से मेरा दिल भर गया और अगर ठहरा रहूँ तो इस लिये नहीं कि मैं इस वादे से बदज़न हूँ जो अल्लाह ने सब्र करने वालों से किया है।

(नहजुल बलाग़ा मुतरजमा मुफ़्ती जाफ़र हुसैन जिल्द 2 पृष्ठ 243 प्रकाशित लाहौर)

हज़रत अली (अ.स.) की गोशा नशीनी

पैग़म्बरे इस्लाम के इन्तेक़ाले पुर मलाल और उनके इन्तेक़ाल के बाद हालात नीज़ फ़ात्मा ज़हरा स. की वफ़ाते हसरत आयात ने हज़रत अली (अ.स.) को उस स्टेज पर पहुँचा दिया , जिसके बाद मुस्तक़बिल का प्रोग्राम बनाना नागुज़ीर हो गया। यानी इन हालात में हज़रत अली (अ.स.) यह सोचने पर मजबूर हो गये कि आप आइन्दा जि़न्दगी किस असलूब और किस तरीक़े से गुज़ारें। बिल आखि़र आप इस नतीजे पर पहुँचे कि 1. दुश्मनाने आले मौहम्मद को अपने हाल पर छोड़ देना चाहिये। 2. गोशा नशीनी इख़्तेयार कर लेना चाहिये। 3. हत्तल मक़दूर मौजूदा सूरत में भी इस्लाम की मुल्की व ग़ैर मुल्की खि़दमत करते रहना चाहिये चुनान्चे आप इसी पर कारबन्द हो गये।

हज़रत अली (अ.स.) ने जो प्रोग्राम मुरत्तब फ़रमाया वह पैग़म्बरे इस्लाम के फ़रमान की रौशनी में मुरत्तब फ़रमाया क्यों कि इन्हें इन हालात की पूरी इत्तेला थी और उन्होंने हज़रत अली (अ.स.) को सब बता दिया था। अल्लामा इब्ने हजर लिखते हैं इन्नल्लाहा ताआला अतला नबीया अला मायक़ूना बाआदा ममा अब्तेला बा अली कि ख़ुदा वन्दे आलम ने अपने नबी को इन तमाम उमूर से बा ख़बर कर दिया था जो उनके बाद होने वाले थे और इन हालात व हादेसात की इत्तेला कर दी थी , जिसमें अली (अ.स.) मुब्तिला हुये।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 72 ) रसूले करीम स. ने फ़रमाया था कि ऐ अली (अ.स.) मेरे बाद तुमको सख़्त सदमात पहुँचेगे , तुम्हे चाहिये कि इस वक़्त तुम तंग दिल न हो और सब्र का तरीक़ा इख़्तेयार करो और जब देखना कि मेरे सहाबा ने दुनिया इख़्तेयार कर ली है तो तुम आख़ेरत इख़्तेयार किये रहना।(रौज़ातु अहबाब जिल्द 1 पृष्ठ 559 व मदारेजुल नबूवत जिल्द 2 पृष्ठ 511 ) यही वजह है कि हज़रत अली (अ.स.) ने तमाम मसाएब व आलाम निहायत ख़न्दा पेशानी से बरदाश्त किये मगर तलवार नहीं उठाई और गोशा नशीनी इख़्तेयार कर के जम ए कु़रआन की तकमील करते रहे और वक़्तन फ़वक़्तन अपने मशवेरों से इस्लाम की कमर मज़बूत फ़रमाते रहे।

ग़स्बे खि़लाफ़त के बाद तलवार न उठाने की वजह बाज़ बरादराने इस्लाम यह कह देते हैं कि जब अली (अ.स.) की खि़लाफ़त ग़स्ब की गई और उन्हें मसाएब व आलाम से दो चार किया गया तो उन्होंने बद्रो , ओहद , ख़ैबरो खन्दक़ की चली हुई तलवार को नियाम से बाहर क्यों न निकाल लिया और सब्र पर क्यों मजबूर हो गये लेकिन मैं कहता हँू कि अली (अ.स.) जैसी शखि़्सयत के लिये यह सवाल ही पैदा नहीं होता कि उन्होंने इस्लाम के अहदे अव्वल में जंग क्यों नहीं की। क्यों कि इब्तेदा उम्र से ता हयाते पैग़म्बर अली (अ.स.) ही ने इस्लाम को परवान चढ़ाया था। हर महलक़े में इस्लाम ही के लिये लड़े थे। अली (अ.स.) ने इस्लाम के लिये कभी अपनी जान की परवाह नहीं की थी। भला अली (अ.स.) से यह क्यों कर मुम्किन हो सकता था कि रसूले करीम स. के इन्तेक़ाल के बाद वह तलवार उठा कर इस्लाम को तबाह कर देते और सरवरे कायनात की मेहनत और अपनी मशक़्क़त को अपने लिये तबाह व बरबाद कर देते। इस्तेयाब अब्दुलबर जिल्द 1 पृष्ठ 183 प्रकाशित हैदराबाद में है कि हज़रत अली (अ.स.) फ़रमाते हैं कि मैंने लोगों से यह कह दिया था कि देखो रसूल अल्लाह स. का इन्तेक़ाल हो चुका है और खि़लाफ़त के बारे में मुझसे कोई नज़ा न करे क्यों कि हम ही उसके वारिस हैं लेकिन क़ौम ने मेरे कहने की परवाह न की। ख़ुदा क़सम अगर दीन में तफ़रेक़ा पड़ जाने और अहदे कुफ्ऱ के पलट आने का अन्देशा न होता तो मैं उनकी सारी कारवाईयां पलट देता। फ़तेहुल बारी , शरह बुख़ारी जिल्द 4 पृष्ठ 204 की इबारत से वाज़े होता है कि हज़रत अली (अ.स.) ने इस तरह चश्म पोशी की जिस तरह कुफ़्र के पलट आने के ख़ौफ़ से हज़रत रसूले करीम स. मुनाफि़क़ों और मुवल्लेफ़तुल क़ुलूब के साथ करते थे। कन्ज़ुल आमाल जिल्द 6 पृष्ठ 33 में है कि आं हज़रत मुनाफि़को के साथ इस लिये जंग नहीं करते थे कि लोग कहने लगेंगे कि मौहम्मद स. ने अपने अस्हाब को क़त्ल कर डाला। किताब मुअल्लिमुल तन्ज़ील सफ़ा 414 , अहया अल उलूम जिल्द4 सफ़ा 88 सीरते मोहम्मदिया सफ़ा 356 , तफ़सीरे कबीर जिल्द 4 सफ़ा 686 , तारीख़े ख़मीस जिल्द 2 सफ़ा 1139 , सीरते हल्बिया सफ़ा 356 , शवाहेदुन नबूवत और फ़तेहुल बारी में है कि आं हज़रत ने आएशा से फ़रमाया कि ऐ आएशा लौलाहद सान क़ौमका बिल कुफ़्र लेफ़आलत अगर तेरी कौम ताज़ी मुसलमान न होती तो मैं इसके साथ वह करता जो करना चाहिये था।

हज़रत अली (अ.स.) और रसूले करीम स. के अहद में कुछ ज़्यादा फ़कऱ् न था जिन वजूह की बिना पर रसूल स. ने मुनाफि़कों से जंग नहीं की थी। उन्हीं वजूह की बिना पर हज़रत अली (अ.स.) ने भी तलवार नहीं उठाई। (कन्ज़ुल अमाल , जिल्द 6 सफ़ा 69 , ख़साएसे सियूती जिल्द 2 सफ़ा 138 व रौज़तुल अहबाब जिल्द 1 सफ़ा 363 , इज़ालतुल ख़फ़ा जिल्द 1 सफ़ा 125 वग़ैरा में मुख़तलिफ़ तरीक़े से हज़रत की वसीयत का जि़क्र है और इसकी वज़ाहत है कि हज़रत अली (अ.स.) के साथ क्या होना है और अली (अ.स.) को उस वक़्त क्या करना है चुनान्चे हज़रत अली (अ.स.) ने इस हवाले के बाद कि मेरी जंग से इस्लाम मन्जि़ले अव्वल में ही ख़त्म हो जायेगा। मैंने तलवार नहीं उठाई। यह फ़रमाया कि ख़ुदा की क़सम मैंने उस वक़्त का बहुत ज़्यादा ख़्याल रखा कि रसूले ख़ुदा स. ने मुझसे अहदे ख़ामोशी व सब्र ले लिया था। तारीख़े आसम कूफ़ी सफ़ा 83 प्रकाशित बम्बई में हज़रत अली (अ.स.) की वह तक़रीर मौजूद है जो आपने खि़लाफ़ते उस्मान के मौक़े पर फ़रमाई है। हम उसका तरजुमा आसम कूफ़ी उर्दू प्रकाशित देहली के सफ़ा 113 से नक़ल करते हैं। ख़ुदाए जलील की क़सम अगर मौहम्मद रसूल अल्लाह स. हमसे अहद न लेते और हमको इस अम्र से मुत्तेला न कर चुके होते जो होने वाला था तो मैं अपना हक़ कभी न छोड़ता और किसी शख़्स को अपना हक़ न लेने देता। अपने हक़ को हासिल करने के लिये इस क़दर कोशिशे बलीग़ करता कि हुसूले मतलब से पहले मरज़े हलाकत में पड़ने का भी ख़्याल न करता। इन तमाम तहरीरों पर नज़र डालने के बाद यह अमर रोज़े रौशन की तरह वाज़े हो जाता है कि हज़रत अली (अ.स.) ने जंग क्यों नहीं की और सब्र व ख़ामोशी को क्यों तरजीह दी।

मैंने अपनी किताब अल ग़फ़ारी के सफ़ा 121 पर हज़रत अबू ज़र के मुताअल्लिक़ अमीरल मोमेनीन हज़रत अली (अ.स.) के इरशाद व अला अलमन इज्ज़ फि़हा की शरह करते हुए इमामे अहले सुन्नत इब्ने असीर जज़री की एक इबारत तहरीर की है जिसमें हज़रत अली (अ.स.) की जंग न करने की वजह पर रौशनी पड़ती है। वह यह है:-

निहायतुल लुग़त इब्ने असीर जज़री के सफ़ा 231 में है अल एजाज़ जमा इज्ज़ व हू मोख़राशी यरीद बेहा आखि़रूल अमूर एजाज़ इज्ज़ की जमा है जिसके मानी मोख़रशी के हैं और जिसका मतलब आखि़र उमूर तक पहुंचने से मुताअल्लिक़ है। इसके बाद अल्लामा जज़री लफ़्ज़े एजाज़ की शरह करते हुए हज़रत अली (अ.स.) की एक हदीस नक़ल फ़रमाते हैं वमन हदीस अली लना हक़ अन नाता नाख़ज़ा व अन नमनआ नरक़ब एजाज़ अल बल व अन ताक़ा सरा आप फ़रमाते हैं खि़लाफ़त हमारा हक़ है अगर दे दिया गया तो ले लेगें और अगर हमें रोक दिया यानी हमें न दिया गया तो हम ऐजाज़े अबल पर सवारी करेंगे। यानी आखि़र तक अपने इस हक़ के लिये जद्दो जेहद जारी रखेंगे और उसमें मुद्दत की परवाह न करेंगे , यहां तक कि उसे हासिल कर लें। यही वजह है कि सलम व सब्र अल्ल ताख़ीर वलम यक़ातल व इननमा क़ातल बाद एन्आक़ाद अल इमामता दिल तंग और सब्र के आखि़र तक बैठे रहे और ख़ुल्फ़ाए वक़्त से जंग नहीं की फिर जब उन्होंने इमामत (खि़लाफ़त) हासिल कर ली तो उसे सही उसूलों पर चलाने के लिये ज़रूरी समझा।

हज़रत अली (अ.स.) का क़ुरआन पेश करना

नूरूल अबसार इमाम शबलन्जी में है कि हज़रत अली (अ.स.) ने रसूले करीम स. के ज़माने में क़ुरआने मजीद जमा कर के आं हज़रत की खि़दमत में पेश किया था। जिल्द 1 सफ़ा 73 , सवाएक़े मोहर्रेक़ा सफ़ा 76 में है कि जब आपको बैय्यते अबू बक्र के लिये मजबूर किया गया और कहा गया तो आपने फ़रमाया कि मैंने क़सम खाई है कि जब तक क़ुरआने मजीद को मुकम्मल तौर पर जमा न कर लूँगा रिदा न ओढ़ूगां।(एतक़ाने सियूती सफ़ा 57 ) हबीब अल सियर जिल्द 1 सफ़ा 4 में है कि अली (अ.स.) का क़ुरआन तन्ज़ील के मुताबिक़ था। बेहारूल अनवार व मनाकि़ब जिल्द 2 सफ़ा 66 में है कि अमीरूल मोमेनीन ने पूरा क़ुरआन जमा करने के बाद उसे चादर में लपेटा और ले कर मस्जिद मे पहुँचे और हज़रत अबू बक्र से कहा कि यह क़ुरआन है जिसे मैंने तन्ज़ील के मुताबिक़ जमा किया है और जो आं हज़रत स. की नज़र से गुज़र चुका है , इसे ले लो और राएज कर दो। आपने यह भी कहा कि मैं इसे इस लिये पेश कर रहा हूँ कि मुझे आं हज़रत (अ.स.) ने हुक्म दिया था कि एतमामे हुज्जत के लिये पेश करना। किताब फ़सल अल ख़त्ताब में है कि उन्होंने जवाब दिया कि इसे वापस ले जाओ। हमें तुम्हारे क़ुरआन की ज़रूरत नहीं है। अल्लामा स्यूती तारीख़ुल ख़ुलफ़़ा के सफ़ा 184 में इब्ने सीरीन का क़ौल नक़ल करते हुए लिखते हैं कि अगर वह क़ुरआन क़ुबूल कर लिया गया होता तो लोगों को बे इन्तेहा फ़ाएदा पहुँचता।

हज़रत अली (अ.स.) के मुहाफि़ज़े इस्लाम मशवरे

यह मुसल्लेमा हक़ीक़त है कि अपने से पहले ख़ुलेफ़ा को गद्दार , ख़ाईन , काजि़ब , गुनाहगार समझते थे।(सही मुस्लिम जिल्द 2 सफ़ा 91 प्रकाशित नवल किशोर) और उनकी सीरत से इस दरजा बेज़ार थे कि मौक़ाए तक़र्रूरे खि़लाफ़त हज़रत उस्मान , सीरते शेख़ैन की शर्त की वजह से तख़्त छोड़ना गवारा किया था लेकिन इस से इन्कार नहीं किया जा सकता कि हज़रत अली (अ.स.) अपने ज़ाती जज़बात पर ख़ुदा व रसूल स. के जज़बात को मुक़द्दम रखते थे। अमरो बिन अब्दवुद ने जब जंगे खन्दक में आपके चेहरा ए मुबारक के साथ लोआबे दहन से बे अदबी की थी और आपको ग़ुस्सा आ गया था तो आप सीने से उतर आए थे , ताके कारे ख़ुदा में अपना ज़ाती ग़ुस्सा शामिल न हो जाय। यही वजह थी कि आप दिल तंग और नाराज़ होने के बवजूद तहफ़्फ़ुज़े वक़ारे इस्लाम की ख़ातिर ख़ुलफ़ा को अपने मज़ीद मशवरों से नवाज़ते रहे। मिसाल के लिये मुलाहेज़ा हों।

1. क़ैसरे रोम ने दूसरे ख़लीफ़ा से सवाल कर दिया कि आपके क़ुरआन में कौन सा सूरा है जो सिर्फ़ सात आयतों पर मुशतमिल है और इसमें सात हुरूफ़ हुरूफ़े तहजी के नहीं हैं। इस सवाल से आलमे इस्लाम मे हलचल मच गई। हुफ़्फ़ाज़ ने बहुत गौरो फि़क्र के बाद हथियार डाल दिये। हज़रत उमर ने हज़रत अली (अ.स.) को बुलवा भेजा और यह सवाल सामने रखा , आपने फ़ौरन इरशाद फ़रमाया कि वह सूरा ए हम्द है। इस सूरे में सात आयतें हैं और इसमें से , जीम , ख़े , ज़े , शीन , ज़ोय , फ़े नहीं हैं।

2. उलमाए यहूद ने दूसरे ख़लीफ़ा से असहाबे कहफ़ के बारे में चन्द सवालात किये , आप उनका जवाब न दे सके और आप ने अली (अ.स.) की तरफ़ रूजु की , हज़रत ने ऐसा जवाब दिया कि वह पूरे तौर पर मुतमइन हो गये। हज्रे अस्वद के बोसा देने पर हज़रत अली (अ.स.) ने जो बयान दिया है उस से हज़रत उमर की पशेमानी , बुदूरे साफ़रा सियूती में मौजूद है।

3. एहदे अव्वल में नीज़ अहदे सानी की इब्तेदा में शराब पीने पर (40) चालीस कोड़े मारे जाते थे। हज़रत उमर ने यह देख कर कि इस हद से रोब नहीं जमता और कसरत से शराब पी रहे हैं , हज़रत अली (अ.स.) से मशवेरा किया , आपने फ़रमाया कि चालीस के बजाय (80) अस्सी कोड़े कर दिये जाऐ और उसके लिये यह दलील पेश की कि जो शराब पीता है वह नशे में होता है और जिसको नशा होता है वह हिज़यान बकता है और जो हिज़यान बकता है वह इफ़तेरा करता है। व अली अल मुफ़तरी समानून और इफ़तेरा करने वालों की सज़ा अस्सी कोड़े हैं लेहाज़ा शराबी को भी अस्सी कोड़े मारने चाहिये। हज़रत उमर ने इसे तस्लीम कर लिया।(मतालेबुस सूऊल सफ़ा 104 )

4. एक हामेला औरत ने जे़ना किया हज़रत उमर ने हुक्म दिया कि उसे संगसार किया जाए। हज़रत अली (अ.स.) ने फ़रमाया कि ज़ेना औरत ने किया है लेकिन वह बच्चा जो पेट में है , उसकी कोई ख़ता नहीं , लेहाज़ा औरत पर उस वक़्त हद जारी की जाए जब वज़ए हमल हो चुके। हज़रत उमर ने तस्लीम कर लिया और साथ ही साथ कहाः अगर अली न होते तो उमर हलाक हो जाता।

5. जंगे रूम में आपने जाने के मुताअल्लिक़ हज़रत उमर ने हज़र अली (अ.स.) से मशवेरा किया।

6. जंगे फ़ारस में भी खुद शरीके जंग होने के मुताअल्लिक़ हज़रत अली (अ.स.) से मशवेरा लिया। मुवर्रेख़ीन का इत्तेफ़ाक़ है कि हज़रत अली (अ.स.) ने हज़रत उमर को ख़ुद जंग में जाने से रोका और फ़रमाया कि अगर आप शहीद हो जायेंगे तो कसरे शाने इस्लाम होगी। हज़रत अली (अ.स.) के मशवेरे पर हज़रत उमर बहादुरों के मुसलसल ज़ोर देने के बावजूद जंग में शरीक न हुए। मेरा ख़्याल है कि हज़रत अली (अ.स.) ने निहायत ही साएब मशवेरा दिया था क्यों कि वह जंगे बद्र और ख़ैबर , ख़न्दक़ के वाक़ेयात व हालात से वाकि़फ़ थे। अगर ख़ुदा न ख़ासता मैदान छूट जाता तो यक़ीनन कसरे शाने इस्लाम होती। अगर शहादत से कसरे शाने इस्लाम का अन्देशा होता तो हज़रत अली (अ.स.) सरवरे कायनात स. को भी मशवेरा देते कि आप किसी जंग में ख़ुद न जाइये। तारीख़ में है कि वह बराबर जाते और ज़ख़्मी होते रहे। ओहद में तो जान ही ख़तरे में आ गई थी।

7. मिस्टर अमीर अली तारीख़े इस्लाम में लिखते हैं कि हज़रत अली (अ.स.) के मशवेरे से ज़मीन की पैमाईश की गई और माल गुज़ारी का तरीक़ा राएज किया गया।

8. आप ही के मशवेरे से सन् हिजरी क़ायम हुआ।

मशवरों के मुताअल्लिक़ इस्लाम की रायें

अल्लामा इब्ने अबिल हदीद लिखते हैं कि जब हज़रते उमर ने चाहा कि ख़ुद जंगे रोम व ईरान में जायें तो हज़रत अली (अ.स.) ही ने उनको मुफ़ीद मशवेरा दिया जिसको हज़रत उमर ने शुकरिये के साथ क़ुबूल किया और वह अपने इरादे से बाज़ रहे और हज़रत उस्मान को भी ऐसे क़ीमती मशवेरे दिये जिनको अगर वह क़ुबूल कर लेते तो उन्हें हवादिसों आफ़ात का सामना न करना पड़ता। उबैद उल्लाह अमरतसरी लिखते हैं कि तमाम मुवर्रेख़ीन मुत्तफि़क़ हैं कि इस्लाम में हज़रत उमर से ज़्यादा कोई ख़लीफ़ा मुदब्बिर पैदा नहीं हुआ इसकी ख़ास वजह यह थी कि हज़रत उमर हर बाब में हज़रत अली (अ.स.) से मशवेरा लेते थे।(अरजहुल मतालिब सफ़ा 227 ) मिस्टर अमीर अली लिखते हैं कि हज़रत उमर के अहदे हुकूमत में जितने काम रेफ़ाहे आम के हुये वह सब हज़रत अली (अ.स.) की सलाह व मशवरे से अमल में आये।

(तारीख़े इस्लाम)

मशवरों के अलावा जानी इमदाद

हज़रत अली (अ.स.) ने सिर्फ़ मशवेरों ही से अहदे गोशा नशीनी में इस्लाम की मदद नहीं कि बल्कि जानी खि़दमात भी अन्जाम दी है। मिसाल के लिये अर्ज़ है कि जब फ़तेह मिस्र का मौक़ा आया तो हज़रत अली (अ.स.) ने अपने ख़ानदान के नौजवानों को फ़ौज में भरती कराया और उनके ज़रिये से जंगी खि़दमात अन्जाम दिये। शैख़ मौहम्मद इब्ने मौहम्मद बिन मआज़ मम्लेकते मिस्र में मुसलमानों की फ़तूहात के सिलसिले में कहते हैं कि मुबारकबाद के क़ाबिल हैं हज़रत अली (अ.स.) के भतीजे और दामाद मुस्लिम बिन अक़ील और उनके भाई जिन्होंने महाज़े मिस्र में सख़्त जंग की और इस दरजा ज़ख़्मी हुए कि ख़ून उनकी जि़रह पर से जारी था और ऐसा मालूम होता था कि ऊँट के जिगर के टूकड़े हैं।(मुलाहेज़ा हो किताब फ़तूहात , सफ़ा 64 प्रकाशित बम्बई 1286 0 ) इसी तरह फ़तेह शुशतर के मौक़े पर 170 हिजरी में आपके भतीजे मौहम्मद इब्ने जाफ़र और औन बिन जाफ़र शहीद हुए।

(तारीख़े इस्लाम जिल्द 3 सफ़ा 81 बा हवाला तारीख़े कामिल व इस्तियाब।)

हज़रत अली (अ.स.) और इस्लाम में सड़कों की तामीरी बुनियाद

हज़रत अली (अ.स.) बज़ाते खु़द सीराते मुस्तक़ीम थे और आपको रास्तो से ज़्यादा दिलचस्पी थी। आप फ़रमाते थे कि मैं ज़मीन व आसमान के रास्तों से वाकि़फ़ हूँ। हाफि़ज़ हैदर अली क़लन्दर सीरते अलविया में लिखते हैं कि जजि़ये का माल व रूपया लशकर की आरास्तगी सरहद की हिफ़ाज़त और कि़लों की तामीर में सर्फ़ होता था और जो उससे बच रहता था वह सड़को पुलों की तय्यारी और सरिशतये तालीम के काम में आता था।(एहसनुल इन्तेख़ाब , सफ़ा 488 प्रकाशित लखनऊ 1351 हिजरी)

इसी सीरते अलविया की रौशनी में फि़क़ही किताबों में सड़क की तामीर की तरफ़ लफ़्ज़े फ़ी सबी लिल्लाह से इशारा किया गया है।(शराए अल इस्लाम प्रकाशित ईरान 1207 0 ) में है कि फ़ी सबी लिल्लाह से मुराद मख़सूस जंगी एख़राजात हैं और एक क़ौल है कि इसमें रास्तों और पुलों की तामीर , ज़ायरों की इमदाद , मस्जिदों की मरम्मत भी शामिल है और मुजाहिद को चाहे वह अपने मामेलात में ग़नी हीं क्यों न हो इमदाद देनी ज़रूरी है। सबील माने रास्ते के हैं और इसकी इज़ाफ़त अल्लाह की तरफ़ देने से बाहवाला मज़कूरा साबित होता है कि सड़क की तामीर को भी ख़ास अहमियत हासिल है। इसी लिये हज़रत अली (अ.स.) ने सड़क की तामीर में पूरे इनहेमाक का सुबूत दिया है। अल्लामा हाशिम बहरैनी किताब मदीनातुल मआजिज़ के सफ़ा 79 पर बाहवाला इब्ने शहरे आशोब तहरीर फ़रमाते हैं कि हज़रत अली (अ.स.) ने 17 मील तक अपने हाथों से ज़मीन हमवार की और सड़क की तामीर फ़रमाई और हर मील पर पत्थर नस्ब कर के उन पर हाज़ा मीले अली तहरीर फ़रमाया चूंकि इस ज़माने मे नक़लो हमल का कोई ज़रिया न था इस लिये इन वज़नी पत्थरों को जिन्हें बड़े क़वी हैक़ल लोग उठा न सकते थे। हज़रत अली (अ.स.) ख़ुद उठा कर ले जाते थे और नस्ब करते थे और उठाने की शान यह थी कि दो पत्थरों को हाथों में ले लेते थे और एक को पैरों की ठोकरों से आगे बढ़ाते थे। इसी तरह तीन तीन पत्थर ले जा कर हर मील पर संगे मील नस्ब करते थे। अल्लामा शिब्ली ने हज़रत उमर के मोहक़्मए जंगी की ईजाद को अल फ़ारूख़ में बड़े शद्दो मद से लिखा है , लेकिन हज़रत अली (अ.स.) की इस अहम रिफ़ाही खि़दमत का कहीं भी कोई जि़क्र नहीं किया हालाकि हज़रत अली (अ.स.) की यह वह बुनियादी खि़दमत है जिसका जवाब ना मुमकिन है।

हज़रते उस्मान की खि़लाफ़त और वफ़ात

मुवर्रेख़ीन का इत्तेफ़ाक़ है कि हज़राते शेख़ैन की वफ़ात के बाद मसलए खि़लाफ़त फिर ज़ेरे बहस लाया गया और हज़रत अली (अ.स.) से कहा गया कि आप सीरते शेख़ैन पर अमल पैरा होने का वायदा कीजिये तो आपको ख़लीफ़ा बना दिया जाए। आपने फ़रमाया कि मैं खुदा व रसूल स. और अपनी साएब राय पर अमल करूंगा लेकिन सीरते शेख़ैन पर अमल नहीं कर सकता।(तबरी जिल्द 5 सफ़ा 37 व शरह फि़क़हे अकबर सफ़ा 80 और तारीखुल क़ुरआन सफ़ा 36 प्रकाशित जद्दा) इस फ़रमाने के बाद लोगों ने इसी इक़रार के ज़रिये हज़रत उस्मान को ख़लीफ़ा बना दिया। हज़रत उस्मान ने अपने अहदे खि़लाफ़त में ख़ुवेश परवरी , अक़रेबा नवाज़ी की। बड़े बड़े अस्हाबे रसूल स. को जिला वतन किया। बैतुल माल के माल में बेजा तसर्रूफ़ किया। अपनी लड़की के लिये महर तामीर कराये। मरवान बिन हकम को अपना दामाद और वज़ीरे आज़म बना लिया। हालांकि रसूल अल्लाह स. उसे शहर बदर कर चुके थे , और शेख़ैन ने भी इसे दाखि़ले मदीना नहीं होने दिया था। फि़दक इसके हवाले कर दिया। बाज़ मोअजि़्ज़ज़ सहाबा को पिटवाया। गुज़रे हुए अहद में जो क़ुरआन राएज थे उन्हे जमा कर के जला दिया। जिन असहाब ने अपने क़ुरआन न दिये थे उन्हें मस्जिद मे इतना पिटवाया कि पसलियां टूट गईं। हज़रत आयशा उम्मुल मोमेनीन का वज़ीफ़ा बन्द कर दिया और हज़रत मौहम्मद इब्ने अबी बक्र को क़त्ल कर देने की पूरी साजि़श की। इन्हीं हालात की वजह से नतीजा यह बरामद हुआ कि हज़रत आयशा ने लोगों को हुक्म दिया कि अक़तलू नासल इस लम्बी दाढ़ी वाले को क़त्ल कर दो।

(रौज़ातुल अहबाब जिल्द 3 सफ़ा 12 -20, मजमउल बिहार सफ़ा 372, नहाया इब्ने असीर सफ़ा 166 )

इस फ़रमाने के बाद आप हज को तशरीफ़ ले गईं। आपके जाने के बाद लोगों ने उस्मान को क़त्ल कर डाला। जब आपको मक्के में क़त्ले उस्मान की ख़बर मिली तो आप बहुत ख़ुश हुईं। मुवर्रेख़ीन ने लिखा है कि आपके जनाज़े पर हज़रत अली (अ.स.) मदीने में होने के बावजूद नमाज़े जनाज़ा न पढ़ सके। आपकी लाश कुड़े पर डाल दी गई और कुत्तो ने एक टांग खा ली।(तारीख़े आसम कूफ़ी) अलग़रज़ आप 18 जि़ल्हिज्जा सन् 35 हिजरी यौमे जुमा 88 साल की उम्र में क़त्ल हो कर यहूदियों के क़बरस्तान(ख़शे कौकब) में दफ़्न हुये।

हज़रत अली (अ.स.) की खि़लाफ़ते ज़ाहेरी

पैग़म्बरे इस्लाम स. के इन्तेक़ाल के बाद हज़रत अली (अ.स.) गोशा नशीनी के आलम में फ़राएज़े मन्सबी अदा फ़रमाते रहे यहां तक कि खि़लाफ़त के तीन दौरे इस्लाम की तक़दीर के चक्कर बन कर गुज़र गये और 35 ई0 में तख़्ते खि़लाफ़त ख़ाली हो गया। 23 , 24 साल की मुद्दते हालात को परखने और हक़ व बातिल के फ़ैसले के लिये काफ़ी होती हैं। बिल आखि़र असहाब इस नतीजे पर पहुँचे कि तख़्ते खि़लाफ़त हज़रत अली (अ.स.) को बिला शर्त हवाले कर देना चाहिये। चुनान्चे असहाब का एक अज़ीम गिरोह हज़रत अली (अ.स.) की खि़दमत में हाजि़र हुआ। इस गिरोह में ईराक़ , मिस्र , शाम , हिजाज़ , फि़लस्तीन और यमन के नुमाइन्दे शामिल थे। उन लोगों ने खि़लाफ़त क़ुबूल करने की दरख़्वास्त की।

हज़रत अली (अ.स.) ने फ़रमाया मुझे इसकी तरफ़ रग़बत नहीं है तुम किसी और को ख़लीफ़ा बना लो। इब्ने ख़लदून का बयान है कि जब लोगों ने इस्लाम के अन्जाम से हज़रत को डराया , तो आपने रज़ा ज़ाहिर फ़रमाई। नहजुल बलाग़ा में है कि आपने फ़रमाया कि मैं ख़लीफ़ा हो जाऊंगा तो तुम्हे हुक्मे ख़ुदावन्दी मानना पड़ेगा। बहर हाल आपने ज़ाहेरी खि़लाफ़त क़ुबूल फ़रमा ली। मुसन्निफ़ बिरीफ़ सरवे ने लिखा है कि अली (अ.स.) 655 ई0 में तख़्ते खि़लाफ़त पर बिठाए गये। जो हक़ीक़त के लेहाज़ से रसूल स. के बाद ही होना चाहिये था।(तारीख़े इस्लाम जिल्द 3 सफ़ा 26 ) रौज़ातुल अहबाब में है कि खि़लाफ़ते ज़ाहिरया क़ुबूल करने के बाद आपने जो पहला ख़ुतबा पढ़ा उसकी इब्तेदा इन लफ़्ज़ो से थी। अलहम्दो लिल्लाह अला एहसाना क़द रजअल हक़ अला मकानेह ख़ुदा का लाख लाख शुक्र और उसका एहसान है कि उसने हक़ को अपने मरकज़ और मकान पर फिर ला मौजूद किया। तारीख़े इस्लाम और जामए अब्बासी में है कि 18 जि़ल्हिज्जा को हज़रत अली (अ.स.) ने खि़लाफ़ते ज़ाहेरी क़ुबूल फ़रमाई और 25 जि़ल्हिज्जा 35 हिजरी को बैयते आम्मा अमल में आई। इन्साइक्लोपीडिया बरटानिका में है कि जब मौहम्मद साहब स. ने इन्तेक़ाल फ़रमाया तो अली (अ.स.) में मज़हबे इस्लाम के मुसल्लम अल सुबूत सरदार होने के हुक़ूक़ मौजूद थे लेकिन दूसरे तीन साहब अबू बक्र , उमर व उस्मान ने जाये खि़लाफ़त पर क़ब्ज़ा कर लिया और अली (अ.स.) मुलक़्क़ब बा ख़लीफ़ा न हुये लेकिन बादे उस्मान 656 हिजरी में अली (अ.स.) ख़लीफ़ा हो गये , अली (अ.स.) के अहदे खि़लाफ़त में सब से पहला काम तलहा व ज़ुबैर की बग़ावत को फ़रो करना था। जिन्हें बी बी आयशा ने बहकाया था। आयशा अली (अ.स.) की सख़्त दुश्मन थीं और ख़ास उन्हीं की वजह से अली (अ.स.) अब तक ख़लीफ़ा न हो सके थे।(मोहज़्ज़ब मुकालेमा , सफ़ा 34 ) मुवर्रिख़ जरजी ज़ैदान लिखते हैं कि , अगर हज़रत उमर के ज़माने में जब लोगों के दिलों में नबूवत की दहशत और रिसालत की हैबत क़ायम थी और सच्चा दीन क़ायम था , हज़रत अली (अ.स.) मुसलमानों के हाकिम मुक़र्रर होते तो आपकी हुकूमत और सियासत कहीं बेहतर और आला साबित होती और आपके कामों में ज़र्रा बराबर भी ज़ोफ़ ज़ाहिर न होता लेकिन इसको क्या किया जाय कि आपके पास खि़लाफ़त की खि़दमत उस वक़्त आई जब लोगों की नियतें फ़ासिद हो गईं थीं और इन्तेज़ामाते मुल्की और उसूली हुकूमत के मुताअल्लिक़ वालियो और मातहतों के दिलों में हिरस व लालच पैदा हो गई थी और इन सब से ज़्यादा लालची और मक्कार माविया इब्ने अबू सुफि़यान था क्योकि इसने अपनी हुकूमत जमाने के लिये लोगों को धोका फ़रेब दे कर उनके साथ मक्र व हीला कर के और मुसलमानों का माल बे दरेग़ लुटा कर लोगों को अपनी तरफ़ कर लिया था।(तारीख़ अल तमद्दुन अल इस्लामी 4 सफ़ा 37 प्रकाशित मिस्र)

फ़ाजि़ल माअसर सैय्यद इब्ने हसन जारचावी लिखते हैं कि अगर अली (अ.स.) रसूल स. के बाद ही ख़लीफ़ा तसलीम कर लिये जाते तो दुनिया मिनहाजे रिसालत पर चलती और राहवारे सलतनत व हुकूमत दीने हक़ की शाहराह पर सरपट दौड़ता मगर मसलेहत और दूर अन्देशी के नाम से जो आइन व रूसूम हुकमरां जमाअत का जुज़वे जि़न्दगी और औढना बिछोना बन गये थे , उन्होंने अली (अ.स.) की पोज़ीशन नाहमवार और उनका मौकफ़ ना इस्तेवार बना दिया था। पिछलों दौर की गै़र इस्लामी रसमों और इम्तियाज़ पसन्द ज़ेहनियतों की इस्लाह करने में उनको बड़ी दिक़्क़त हुई और फि़र भी खा़तिर ख़्वाह कामयाबी हासिल न हो सकी। तबीयते आदम मसावात की खूगर और माअशरती अदल से कोसों दूर हो चुकी थीं।

टली (अ.स.) ने बैअत के दूसरे रौज़ बैतुल माल का जायज़ा लिया और सब को बराबर तक़सीम कर दिया। हबशी ग़ुलाम और क़ुरैशी सरदार दोनों को दो दो दिरहम मिले। इस पर पेशानी पर सिलवटें पड़ने लगीं। बनी उमय्या को इस दौर में अपनी दाल गलते नज़र न आई। कुछ माविया से जा मिले , कुछ उम्मुल मोमेनीन आयशा के पास मक्के जा पहुँचे। आसम कूफ़ी का बयान है कि आयशा हज से वापस आ रहीं थीं कि उन्हें क़त्ले उस्मान की ख़बर मिली। उन्होने निहायत इशतेयाक़ से पूछा कि अब कौन ख़लीफ़ा हुआ। कहा गया , अली यह सुन कर बिल्कुल ख़ामोश हुईं। अब्दुल्लाह इब्ने सलमा ने कहा , क्या आप उस्मान की मज़म्मत और अली (अ.स.) की तारीफ़ नहीं करती थीं , अब नाख़ुश का सबब क्या है ? फ़रमाया आखि़र वक़्त में उसने तौबा कर ली थी। अब उसका क़सास चाहती हूं। इब्ने ख़ल्दून का बयान है कि आयशा ने ऐलान कराया कि जो शख़्स इस्लाम की हमदर्दी करना और ख़ूने उस्मान का बदला लेना चाहता हो और उसके पास सवारी न हो , वह आय उसे सवारी दी जायेगी। बिरीफ़ सरवे ऑफ़ हिस्ट्री में है कि आयशा जो अली (अ.स.) की पुरानी और हमेशा की दुश्मन थीं अदावत में इस कद्र बढ़ गईं कि उनके माज़ूद कर ने के लिये एक फ़ौज जमा कर ली।

हज़रत अली (अ.स.) को एक दूसरी दिक़्क़त यह दरपेश थी कि सारा आलमे इस्लाम इन उमवी आमिलो और हाकिमों से तंग आ गया था जो हज़रत उस्मान के अहद में मामूर थे , अगर अली (अ.स.) उनको ब दस्तूर रहने देते तो हुकूमत के बवजूद जमहूर को चैन न मिलता , और अगर हटाते हैं तो मुखा़लिफ़ों की तादाद में इज़ाफ़ा करते हैं। हुक्काम व आमिल मुद्दत से ख़ुदसरी के आदी और बैतूल माल को हज़म करने के ख़ूगर हो चुके थे। अकसर उनमें ऐसे थे जिनके बाप दादा अज़ीज़ व अक़रोबा अली (अ.स.) की तलवार से मौत के घाट उतर चुके थे या अली (अ.स.) को खरे और बे लौस अदलों इन्साफ़ का तमाशा देख चुके थे। उनको नज़र आ रहा था कि अली (अ.स.) हैं तो हम नहीं रह सकते और रहे भी तो मन मानी नहीं कर सकते। उन्होने वह कमीनगाह(छुपने की जगह) तलाश की जहां बैठ कर वह दामादे रसूल स.अ.व.व. पर तीर चला सकें और वह मोरचे बनाए और वह घाटियां खोदीं जिनकी आड़ में छुप कर वह नई हुकूमत को जड़ से उखाड़ सकें।

तलहा व ज़ुबैर जो ख़ुद हुकूमत के ख़्वाहां और खि़लाफ़त के आरज़ू मन्द थे और हज़रत आयशा की हिमायत और मदद उनको हासिल थी। पहले तो हज़रत अली (अ.स.) से बैयत कर बैठे , फिर लगे उनसे साजि़शे करने। एक दिन आय और बसरे और कूफ़े की हुकूमत तलब करने लगे। हज़रत अली अ ने कहा मुझे तुम्हारी ज़रूरत है , मदीने में रहो और रोज़ मर्रा के कारोबारे हुकूमत में मेरी मदद करो। दूसरे दिन वह मक्का जाने की इजाज़त मांगने आय। वाशिंगटन एयरविंग लिखता है , ऐसी हालत में कि लब पर तक़वा और दिल में मक्र था। यह आयशा से जा मिले जो मुख़ालेफ़त के लिये तैय्यार थीं। यही मुवर्रिख़ लिखता है। अली (अ.स.) ख़लीफ़ा हो गये लेकिन देखते थे कि उनकी हुकूमत जीम नही है। गुज़शता ख़लीफ़ा के ज़माने में बहुत सी बद उन्वानियां पैदा हो गईं थीं जिनमें इस्लाह की ज़रूरत थी और बहुत से सूबे उन लोगों के हाथ में थे जिनकी वफ़ादारी पर उनको मुतलक़न एतेमाद न था। उन्होंने इस्लाहे आम का इरादा किया।


गवर्नरों की तक़र्रूरी

पहली इस्लाह यह थी कि गवर्नर हटा दिये जायें। लोगों ने उनके इस अमल की मोअफ़ेक़त न की मगर अली (अ.स.) ने न माना और गवरनरों की तक़र्रूरी फ़रमा दी। आपने हालाते हाज़रा के पेशे नज़र इस ओहदे पर ज़्यादा उन लोगों को फ़ाएज़ किया जिन पर आपको कामिल एतेमाद था और जो अहदे साबिक़ में अपने हुक़ूक़े सरदारी से महरूम रखे गये थे। आपने अब्दुल्लाह को यमन का , सईद को बहरैन का , समाआ को तहामा का , औन को मियामा का , क़सम को मक्के का , क़ैस को मिस्र का , उस्मान बिन हनीफ़ को बसरे का , अम्मार को कूफ़े का और सहल को शाम का गवर्नर मुक़र्रर फ़रमा दिया। हज़रत अली (अ.स.) को सलाह दी गई कि वह माविया को अपनी जगह रहने दें मगर अली (अ.स.) ने ऐसी सलाहों पर तवज्जोह न की और क़सम खाई कि मैं रास्ते से मुन्हरिफ़ उमूर पर अमल न करूंगा। एहसान अल्लाह अब्बासी तारीख़े इस्लाम में लिखतें हैं। अली (अ.स.) ने सीधे तौर पर जवाब दिया कि मैं उम्मते रसूल स. पर बूरे लोगों को हुक्मरां नहीं रख सकता। अल्लामा जरज़ी ज़ैदान तारीख़े तमद्दुने इस्लामी में लिखते हैं , यह अम्र पहले मालूम हो चुका है कि अबू सुफि़यान और उसकी औलाद ने महज़ मजबूरी के आलम में इस्लाम क़ुबूल किया था क्यों कि उनको अपनी कामयाबी से मायूसी हो चुकि थी इस लिये माविया को खि़लाफ़त की आरज़ू महज़ दुनियावी अग़राज़ की वजह से पैदा हुई। क़ुरैश के चन्द चीदा चीदा सरदार उनके पास जमा हो गये। अग़राज़े नफ़सानी की बिना पर मन्सबे खि़लाफ़त का ख़ानदाने बनी हाशिम में जाना उनको बहुत शाक़ गुज़र रहा था।

आमिल हटते गये और कुछ माविया के पास शाम में और कुछ उम्मुल मोमेनीन आयशा के पास मक्के में जमा होते गये। तलहा व जु़बैर मक्के जा कर उम्मुल मोमेनीन से मिले और इन्तेक़ामे उस्मान के नाम से एक तहरीक उठाई। अब्दुल्लाह इब्ने आमिर और लैला इब्ने उमय्या ने जो माज़ूल गवर्नर थे और बैतुल माल का रूपया ले कर भाग आय थे माली इम्दाद दी। तारीख़े इस्लाम जिल्द 3 सफ़ा 169 में है कि बा रवायते साहबे रौज़ातुल अहबाब व इब्ने ख़लदून , इब्ने असीर लैला ने जनाबे आयशा को साठ हज़ार (60,000) दीनार जो छः लाख (6,00,000) दिरहम होते हैं और छः सौ (600) ऊँट इस ग़रज़ से दिये कि अली (अ.स.) से लड़ने की तैय्यारी करें। उन्हीं ऊँटों में एक निहायत उम्दा अज़ीम उल जुस्सा ऊँट था जिसका नाम असकर था और जिसकी क़ीमत ब रवायत मसूदी दो सौ अशरफ़ी थी। मुवर्रिख़ीन का बयान है कि इसी ऊँट पर सवार हो कर जनाब उम्मुल मोमेनीन आयशा दामादे रसूल स. शौहरे बुतूल अली (अ.स.) से लड़ीं और इसी ऊँट की सवारी की वजह से इस लड़ाई को जंगे जमल कहा गया।

जंगे जमल

(36 हिजरी)

यह मुसल्लेमा हक़ीक़त है कि हज़रत अली (अ.स.) क़त्ले उस्मान के बाद 18 जि़लहिज्जा 35 हिजरी को तख़्ते खि़लाफ़त पर मुतमक्किन हुये और आपने अनाने हुकूमत संभालने के बाद सब से पहला जो काम किया वह क़त्ले उस्मान की तहक़ीक़ात से मुताअल्लिक़ था। नायला ज़वजए उस्मान अगरचे कोई शहादत न दे सकीं और किसी का नाम न बता सकीं नीज़ उनके अलावा भी कोई चश्म दीद गवाह न मिल सका , जिसकी वजह से फ़ौरी सज़ाएं दी जायें लेकिन हज़रत अली (अ.स.) तहक़ीक़ाते यक़ीनीया का अज़मे समीम कर चुके थे। अभी आप किसी नतीजे पर न पहुँचने पाये थे कि मक्के में साजि़शें शुरू हो गईं। हज़रत आयशा जो हज से फ़राग़त के बाद मदीने के लिये रवाना हो चुकी थीं और खि़लाफ़ते अली (अ.स.) की ख़बर पाने के बाद फिर मक्के में जा कर फ़रोकश हो गईं थीं। उन्होंने चार यारान , तल्हा , ज़ुबैर , अब्दुल्लाह , अबुल याअली के मशवेरे से इन्तेक़ामे ख़ूने उस्मान के नाम से एक साजि़शी तहरीक की बुनियाद डाल दी और क़त्ले उस्मान का इल्ज़ाम हज़रत अली (अ.स.) पर लगा कर लोगों को भड़काना शुरू कर दिया और इसका ऐलाने आम करा दिया कि जिसके पास अली (अ.स.) से लड़ने के लिये मदीना जाने के वास्ते सवारी न हो वह हमें इत्तेला दे , हम सवारी का बन्दो बस्त करेंगे। उस वक़्त अली (अ.स.) के दुश्मनों की कमी नहीं थी। किसी को आप से बुग़ज़े लिल्लाही था , कोई जंगे बद्र में अपने किसी अज़ीज़ के मारे जाने से मुतास्सिर था , किसी को प्रोपेगन्डे ने मुतास्सिर कर दिया गया था। ग़रज़ के एक हज़ार अफ़राद हज़रत आयशा की आवाज़ पर मक्के में जमा हो गये और प्रोग्राम बनाया गया कि सब से पहले बसरे पर छापा मारा जाय। चुनान्चे आप इन्हीं मज़कूरा चारों अफ़राद के मैमने और मैसरे पर मुशतमिल लशकर ले कर बसरे की तरफ़ रवाना हो गईं। आपके साथ अज़वाजे नबी में से कोई भी बीबी नहीं गई। हज़रत आयशा का यह लशकर जब मुक़ामे जातुल अरक़ में पहुँचा तो मुगीरा और सईद इब्ने आस ने लश्कर से मुलाक़ात की और कहा कि तुम अगर ख़ूने उस्मान का बदला लेना चाहते हो तो तल्हा और ज़ुबैर से लो क्यो कि उस्मान के सही क़ातिल यह हैं और अब तुम्हारे तरफ़दार बन गये हैं। इतिहास में है कि रवानगी के बाद जब मक़ामे हव्वाब पर हज़रत आयशा की सवारी पहुँची और कुत्ते भौंकने लगे तो उम्मुल मोमेनीन ने पूछा कि यह कौन सा मुक़ाम है ? किसी ने कहा इसे हवाब कहते हैं। हज़रत आयशा ने उम्मे सलमा की याद दिलाई हुई हदीस का हवाला हो दे कर कहा कि मैं अब अली (अ.स.) से जंग के लिये नहीं जाऊँगी क्यों कि रसूल अल्लाह स. ने फ़रमाया था कि मेरी एक बीवी पर हवाब के कुत्ते भौकेंगे और वह हक़ पर न होगी लेकिन अब्दुल्लाह इब्ने ज़ुबैर के जि़द करने से आगे बढ़ीं , बिल आखि़र बसरे जा पहुँचीं और वहां के अलवी गर्वनर उस्मान बिन हनीफ़ पर रातो रात हमला किया और चालीस आदमियों को मस्जिद में क़त्ल करा दिया और उस्मान बिन हनीफ़ को गिरफ़्तार करा के उनके सर , डाढ़ी , मूंछ , भवें और पलकों के बाल नुचवा डाले और उन्हें चालीस कोडे़ मार कर छोड़ दिया। उनकी मद्द के लिये हकीम इब्ने जब्लता आये तो उन्हें भी सत्तर आदमियों समेत क़त्ल करा दिया गया। इस के बाद बैतुल मार पर क़ब्ज़ा न देने की वजह से सत्तर आदमी और शहीद हुए , यह वाक़ेया 25 रबीउस सानी , 36 हिजरी का है।

(तबरी)

हज़रत अली (अ.स.) को जब इत्तेला मिली तो आपने भी तैय्यारी शुरू कर दी , अभी आप बसरे की तरफ़ रवाना न होने पाये थे कि मक्के से उम्मुल मोमेनीन हज़रत उम्मे सलमा का ख़त आ गया। जिसमें लिखा था कि आयशा हुक्मे ख़ुदा व रसूल स. के खि़लाफ़ आपसे लड़ने के लिये मक्के से रवाना हो गई हैं , मुझे अफ़सोस है कि मैं औरत हूँ , हाजि़र नहीं हो सकती , अपने बेटे उमर बिन अबी सलमा को भेजती हूँ इसकी खि़दमत क़ुबूल फ़रमायें।

(आसिम कूफ़ी)

हज़रत अली (अ.स.) आखि़र रबीउल अव्वल 36 हिजरी में अपने लशकर समेत मदीने से रवाना हुए। आपने लश्कर की अलमदारी मोहम्मदे हनफि़या के सिपुर्द की और मैमने पर इमाम हसन (अ.स.) और मैसरे पर इमाम हुसैन (अ.स.) को मुताअय्यन फ़रमाया , और सवारों की सरदारी अम्मारे यासिर और पियादों की नुमाइन्दगी मौहम्मद इब्ने अबी बक्र के हवाले की और मुक़दमा तुल जैश का सरदार अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास को क़रार दिया। मुक़ामे ज़ब्दा में आपने क़याम फ़रमाया और वहां से कूफ़े के वाली अबू मूसा अशअरी को लिखा कि फ़ौज रवाना करे , लेकिन चुंकि वह आयशा के ख़त से पहले ही मुतास्सिर हो चुका था लेहाज़ा उसने फ़रमाने अली (अ.स.) को टाल दिया। हज़रत को मक़ामे ज़ीक़ारा पर हालात की इत्तेला मिली , आपने उसे माज़ूद कर के क़रज़ा इब्ने काब को अमीर नामज़द कर दिया और मालिके अशतर के ज़रिेये से दारूल इमाराह ख़ाली करा लिया।

(तबरी)

इसके बाद इमाम हसन (अ.स.) के हमराह 7000 (सात हज़ार) कूफ़ी और मालिके अशतर के हमराह 12000 (बारह हज़ार) कूफ़ी 6 दिन के अन्दर जी़क़ार पहुँच गये। इसी मुक़ाम पर उवैसे क़रनी ने भी पहुँच कर बैयत की। इसी मुक़ाम पर उन ख़ुतूत के जवाब आये जो रबज़ा से हज़रत ने (तल्हा व ज़ुबैर) को लिखे थे जिनमें उनकी हरकतों का तज़किरा किया था और लिखा था कि अपनी औरतों को घर में बिठा कर नामूसे रसूल स. को जो दर बदर फिरा रहे हो इससे बाज़ आओ। जवाबात में इस्कीम के मातहत क़त्ले उस्मान की रट थी। इसके बाद इमाम हसन (अ.स.) ने एक ख़ुतबे में तलहा और ज़ुबैर के क़ातिले उस्मान होने पर रौशनी डाली। हज़रत अभी मक़ामे ज़ीक़ार ही में थे कि मज़लूम उस्मान बिन हनीफ़ आपकी खि़दमत में जा पहुँचे। हज़रत ने उस्मान का हाल देख कर बेहद अफ़सोस किया और फ़ौरन बसरे की तरफ़ रवाना हो गये। मुसन्निफ़ तारीख़े आइम्मा लिखते हैं कि आयशा के लशकर की आख़री तादाद 30,000 (तीस हज़ार) और हज़रत अली (अ.स.) के लशकर की तादाद 20,000 (बीस हज़ार) थी। सफ़ा 265 अल्लामा अब्बासी लिखते हैं कि हज़रत अली (अ.स.) तलहा , ज़ुबैर और आयशा के तमाम हालात देख रहे थे लेकिन यही चाहते थे कि लडा़ई न हो। जब बसरे के क़रीब आप पहुँचे तो क़आक़ा इब्ने उमरो को उन लोगों के पास भेजा और सुलह की पेश कश की। क़आक़ा ने जो रिर्पोट वापस आकर पहुँचाई इससे वह लोग तो मुतास्सिर हुए जो ज़ेरे क़यादत आसम इब्ने क़लीब अली (अ.स.) के पास बतौरे सफ़ीर आये हुए थे और उनकी तादाद 100 (सौ) थी , लेकिन आयशा वगै़रा पर कोई ख़ास असर न हुआ। आसम वग़ैरा ने अली (अ.स.) की बैयत कर ली और अपनी क़ौम से जा कर कहा कि अली (अ.स.) की बातें नबियों जैसी हैं। ग़रज़ कि दूसरे दिन अली (अ.स.) बसरा पहुँच गये। उसके बाद जमल वाले बसरा से निकल कर मुक़ामे ज़ाबुक़ा या ख़रबिया में जा ठहरे और वहां से अली (अ.स.) के मुक़ाबले के लिये हज़रत आयशा ऊंट पर सवार हो कर खुद निकल पड़ीं। हज़रत अली (अ.स.) ने अपने लशकर को हुक्म दिया कि आयशा और उनके लशकर पर हमला न करें , न उनका जवाब दें। ग़रज़ कि वह जंग की कोशिश कर के वापस गईं। उसके बाद अली (अ.स.) ने ज़ैद इब्ने सूहान को उम्मुल मोमेनीन के पास भेज कर जंग न करने की ख़्वाहिश की मगर कोई नतीजा बरामद न हुआ।

15 जमादिल आखि़र 36 हिजरी यौमे पंजशम्बा बा वक़्ते शब तल्हा व ज़ुबैर ने शबख़ूँ मार कर हज़रत अली (अ.स.) को सोते में क़त्ल कर डालना चाहा लेकिन अली (अ.स.) बेदार थे और तहज्जुद में मशग़ूल थे। हज़रत को हमले की ख़बर दी गई , आपने हुक्मे जंग दे दिया। इस तरह जंग का आग़ाज़ हुआ।

मैदाने कारज़ार

हज़रत आयशा को तल्हा व ज़ुबैर लोहे व चमड़े से मढ़े हुये हौदज में बैठा कर मैदान में लाये और अलमदारी का मनसब भी उन्हीं के सिपुर्द किया और उसकी सूरत यह की कि हौदज में झन्डा नस्ब कर के मेहारे नाक़ा अस्कर लायली के सिपुर्द कर दी। यह देख कर हज़रत अली (अ.स.) रसूल अल्लाह स. के घोड़े दुलदुल पर सवार हो कर दोंनो लश्करों के दरमियान आ खड़े हुये , और ज़ुबैर को बुला कर कहा कि तुम लोग क्या कर रहे हो , अब भी सोचो और उस पर ग़ौर करो कि रसूल अल्लाह स. ने तुम से क्या कहा था। ऐ ज़ुबैर क्या तुम्हें मुझ से जंग करने के लिये मना नहीं किया था। यह सुन कर ज़ुबैर शरमिन्दा हुए और वापस चले आये लेकिन अपने लड़के अब्दुल्लाह के भड़काने से आयशा की तरफ़दारी में नबरद आज़माई से बाज़ न आये।

अलग़रज़ हज़रत अली (अ.स.) ने जब देखा कि यह जमल वाले ख़ूँरेज़ी से बाज़ न आयेंगे तो अपनी फ़ौज को ख़ुदा की तरसी की तलक़ीन फ़रमाने लगे , आपने कहा:- 1. बहादुरों सिर्फ़ दफ़ये दुश्मन की नियत रखना। 2. इब्तेदाए जंग न करना। 3. मक़तूलो के कपड़े न उतारना। 4. सुलह की पेशकश मान लेना और पेशकश करने वाले के हथियार न लेना। 5. भागने वालों का पीछा न करना। 6. ज़ख़्मी बीमार और औरतों व बच्चों पर हथियार न उठाना। 7. फ़तेह के बाद किसी के घर में न घुसना।

इसके बाद आयशा से फ़रमानो लगे , तुम अनक़रीब पशेमान होगी और अपने लोगों की तरफ़ मुतावज्जे हो कर कहा तुम में कौन ऐसा है जो क़ुरआन के हवाले से जंग करने से बाज़ रखे। यह सुन कर मुस्लिम नामी एक जांबाज़ इस पर तैयार हुआ और क़ुरआन ले कर उनके मजमे में जा घुसा। तल्हा ने उसके हाथ कटवा दिये , और फिर शहीद करा दिया।

हज़रत अली (अ.स.) के लशकर पर तीरों की बारिश शुरू हो गई। बारवायत तबरी आपने फ़रमाया अब इन लोगों से जंग जायज़ है। आपने मौहम्मद बिन हनफि़या को हुक्म दिया , मौहम्मद काफ़ी लड़ कर वापस आये। हज़रत अली (अ.स.) ने अलम ले कर एक ज़बर दस्त हमला किया और कहा बेटा इस तरह लड़ते हैं। फिर अलम मौहम्मद बिन हनफि़या के हाथ में दे कर कहा हां बेटा आगे बढ़ो , मौहम्मद हनफि़या अन्सार ले कर यहां तक कि हौदज तक मारते हुय जा पहुँचे , बिल आखि़र सात दिन के बाद हज़रत अली (अ.स.) खुद मैदान में निकल पड़े और दुश्मन को पसपा कर डाला। मरवान के ज़हर आलूद तीर से तल्हा मारे गये और ज़ुबैर मैदाने जंग से भाग निकले। रास्ते मे वादीउस्सबा के क़रीब उमर बिने ज़रमोज़ ने उनका काम तमाम कर दिया। उसके बाद हज़रते आयशा बारह हज़ार जर्रार समेत आखि़री हमले के लिये सामने आ गईं। अलवी लशकर ने इस क़दर तीर बरसाए कि हौदज पुश्ते साही के मानिन्द हो गया। हज़रत आयशा ने क़ाअब इब्ने असवद को क़ुरआन दे कर हज़रत अली (अ.स.) के लशकर की तरफ़ भेजा। मालिके अशतर ने उसे रास्ते ही में क़त्ल कर दिया। उसके बाद आयशा के नाक़े को पैय कर दिया गया। ऊँट हौदज समेत गिर पड़ा और लोग भाग निकले। हज़रत अली (अ.स.) ने मौहम्मद बिन अबी बक्र को हुक्म दिया कि हौदज के पास जा कर उसकी हिफ़ाज़त करें। उसके बाद ख़ुद पहुँच कर कहने लगे , आयशा तुम ने हुरमते रसूल बरबाद कर दी। फिर मौहम्मद से फ़रमाया कि इन्हें अब्दुल्लाह इब्ने हनीफ़ ख़ज़ाई बसरी के मकान में ठहरायें। हज़रत ले कुशतों को दफ़्न कर ने का हुक्म दिया , और ऐलाने आम कराया कि जिसका सामान जंग में रह गया हो तो जामेउल बसरा में आ कर ले जाय। मसूदी ने लिखा है कि इस जंग में 13,000 (तेराह हज़ार) आयशा के और 5,000 (पांच हज़ार) हज़रत अली (अ.स.) के लशकर वाले मारे गये।

(मुरूज जुज़हब , जिल्द 5 सफ़ा 177 )

मुवर्रेख़ीन का बयान है कि फ़तह के बाद अब्दुल रहमान इब्ने अबी बक्र ने हज़रते अली (अ.स.) की बैयत कर ली। मसूदी और आसम कूफ़ी ने लिखा है कि हज़रत अली (अ.स.) ने आयशा को मुताअदद्दि आदमियों से कहला भेजा कि जल्द से जल्द मदीने वापस चली जाओ , लेकिन उन्होंने एक न सुनी। आखि़र में बारवायते रौज़तुल अहबाब व हबीब उस सैर व आसम कूफ़ी , इमाम हसन (अ.स.) के ज़रिये से कहला भेजा अगर तुम अब जाने में ताख़ीर करोगी तो मैं तुम्हे ज़वजियते रसूल स. से तलाक़ दे दूँगा। यह सुन कर वह मदीने जाने के लिये तैय्यार हो गईं। हज़रते अली (अ.स.) ने चालीस (40) औरतों को मरदों के सिपाहियाना लिबास में हज़रते आयशा की हिफ़ाज़त के लिये साथ कर दिया , और खुद भी बसरे के बाहर तक पहुँचाने गये।(अलखि़ज़री जिल्द 2 सफ़ा 90 ) और मौहम्मद बिन अबी बक्र को हुक्म दिया कि इन्हें मंजि़ले मक़सूद तक जा कर पहुँचा आओ। एयरविंग लिखता है कि आयशा को अली (अ.स.) के हाथों सख़्त बरताव की उम्मीद हो सकती थी लेकिन वह आली हौसला शख़्स ऐसा न था जो एक गिरे हुए दुशमन पर शान दिखाता। उन्होंने इज़्ज़त दी और चालीस आदमियों के साथ मदीने के तरफ़ रवाना कर दिया।

उसके बाद हज़रत अली (अ.स.) ने बसरे के बैतुल माल का जायज़ा लिया , 6,00,000 (छः लाख) दुर्रे आबदार बरामद हुये , आपने सब अहले मारेका पर तक़सीम कर दिये और अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास को वहां का गवर्नर मुक़र्रर कर के बरोज़ सोमवार 16 रजब 36 हिजरी को कूफ़े की तरफ़ रवाना हो गये और वहां पहुँच कर कुछ दिनों क़याम किया और दौराने क़याम में कूफ़ा , ईराक़ , ख़ुरासान , यमन , मिस्र और हरमैन का इन्तेजा़म किया। ग़रज़ शाम के सिवा तमाम मुमालिके इस्लामी पर हज़रत का तसल्लुत हो गया और क़ब्ज़ा बैठ गया और इस अन्देशे से कि माविया ईराक़ पर क़ब्ज़ा न कर ले कूफ़े को दारूल खि़लाफ़ा बना लिया। इब्ने ख़ल्दूर लिखता है कि जमल के बाद सिस्तान में बग़ावत हुई , हज़रत ने रज़ी इब्ने क़ास अम्बरी मो भेज कर उसे फ़रो कराया।

ख़ुरासान में रफ़ए बग़ावत के लिये अलवी फ़ौज की जंग और जनाबे शहर बानों का लाना

तरीख़े इस्लाम में है कि अहदे उस्मानी में अहले फ़ारस ने बग़ावत व सरकशी कर के अब्दुल्लाह इब्ने मोअम्मर वालीए फ़ारस को मार डाला और हुदूदे फ़ारस से लशकरे इस्लाम से निकाल दिया। उस वक़्त फ़ारस की लशकरी छावनी मक़ामे असतख़र था। ईरान का आखि़री बादशा यज़द जरद इब्ने शहरयार इब्ने कि़सरा अहले फ़ारस के साथ था। हज़रत उस्मान ने अब्दुल्लाह इब्ने आमिर को हुक्म दिया कि बसरा और अमान के लशकर को मिला कर फ़ारस पर चढ़ाई करे। उसने तामीले इरशाद की। हुदूदे अस्तख़ा में ज़बरदस्त जंग हुई मुसलमान कामयाब हो गये और अस्तख़र फ़तेह हो गया।

अस्तख़र के फ़तेह होने के बाद 31 हिजरी में यज़द जरद मक़ामे रै और फिर वहां से ख़ुरासान और ख़ुरासान से मरव जा पहुँचा और वहीं सुकूनत इख़्तेयार कर ली। इसके हमराह चार हज़ार आदमी थे। मरव मे वह ख़ाक़ाने चीन की साजि़शी इमदाद की वजह से मारा गया और शाहाने अजम के गोरिस्तान अस्तख़र में दफ़्न कर दिया गया।

जंगे जमल के बाद ईरान , ख़ुरासान के इसी मक़ाम मरव में सख़्त बग़ावत हो गयी उस वक़्त ईरान में बारवायत इरशाद मुफ़ीद व रौज़तुल सफ़ा हरस इब्ने जाबिर जाअफ़ी गवर्नर थे। हज़रते अली (अ.स.) ने मरव के कजि़या न मरजि़या को ख़त्म करने के लिये इमदादी तौर पर ख़लीद इब्ने क़रआ यरबोई को रवाना किया। वहां जंग हुई और हरीस इब्ने जाबिर जाफ़ी ने यज़द जरद इब्ने शहरयार इब्ने कसरा (जो अहदे उस्मानी में मारा जा चुका था) की दो बेटियां आम असीरों में हज़रते अली (अ.स.) की खि़दमत में इरसाल कीं। एक का नाम शहर बानो और दूसरी का नाम केहान बानो था। हज़रत ने शहर बानों इमाम हुसैन (अ.स.) को और केहान बानों , मौहम्मद इब्ने अबी बक्र को अता फ़रमाईं।(जामेउल तवारीख़ सफ़ा 149, कशफ़ल ग़म्मा सफ़ा 89, मतालेबुल सेवेल सफ़ा 261, सवाएक़े मोहर्रेक़ा सफ़ा 120, नूरूल अबसार सफ़ा 126, तोहफ़ए सुलैमानिया शरह इरशादिया सफ़ा 391 प्रकाशित ईरान)

जंगे सिफ़्फ़ीन

(36 , 37 हिजरी)

सिफ़्फ़ीन नाम है उस मक़ाम का जो फ़ुरात के ग़रबी जानिब बरक़ा और बालस के दरमियान वाक़े है।(माजमुल बलदान सफ़ा 370 ) इसी जगह अमीरल मोमेनीन और माविया में ज़बरदस्त जंग हुई थी। इस जगह के मुताअल्लिक़ उलेमा व मुवर्रेख़ीन का बयान है कि बानीए जंगे जमल आयशा की मानिन्द माविया भी लोगों को क़त्ले उस्मान के फ़र्ज़ी अफ़साने के हवाले से हज़रते अली (अ.स.) के खि़लाफ़ भड़काता और उभारता था। जंगे जमल के बाद हज़रते अली (अ.स.) के शाम पर मुक़र्रर किये हुए हाकिम सुहैल इब्ने हनीफ़ ने कूफ़े आ कर हज़रत को ख़बर दी कि माविया ने ऐलाने बग़ावत कर दिया है और उस्मान की कटी हुई ऊँगलियों और ख़ून आलूद कुर्ता लोगों को दिखा कर अपना साथी बना रहा है और यह हालत हो चुकी है कि लोगों ने क़समे खा ली हैं कि ख़ूने उस्मान का बदला लिये बग़ैर न नरम बिस्तर पर सोयगें न ठंडा पानी पियेंगे। उमरे आस वहां पहुँच चुका है जो उसे मदद दे रहा है। हज़रते अली (अ.स.) ने माविया को एक ख़त मदीने से दूसरा कूफ़े से इरसाल कर के दावते बैयत दी लेकिन कोई नतीजा बरामद न हुआ। माविया जो जमए लशकर में मशग़ूलो मसरूफ़ था एक लाख बीस हज़ार (1,20,000) अफ़राद पर मुशतमिल लश्कर ले कर मक़ामे सिफ़्फ़ीन में जा पहुँचा। हज़रते अली (अ.स.) भी शव्वाल 36 हिजरी में (नख़लिया और मदाएन) होते हुये रक़ा में जा पहुँचे। हज़रत के लशकर की तादाद नब्बे हज़ार (90,000) थी। रास्ते में लशकर सख़्त प्यासा हो गया। एक राहिब के इशारे से हज़रत ने ज़मीन से एक ऐसा चश्मा बरामद किया जो नबी और वसी के सिवा किसी के बस का न था।(आसम कूफ़ी सफ़ा 212, रौज़तुल सफ़ा जिल्द 2 सफ़ा 392 ) हज़रत ने अपने लशकर को सात हिस्सों में तक़सीम किया और माविया ने भी सात टुकड़े कर दिये। मक़ामे रका़ से रवाना हो कर आबे फ़रात उबूर किया। हज़रत के मुक़द्देमातुल जैश से माविया के मुक़द्दम ने मज़ाहेमत की और वह शिकस्त खा कर माविया से जा मिला। हज़रत का लशकर जब वारिदे सिफ़्फ़ीन हुआ तो मालूम हुआ की माविया ने घाट पर क़ब्ज़ा कर लिया है और अलवी लशकर को पानी देना नहीं चाहता। हज़रत ने कई पैग़ाम्बर भेजे और बन्दिशे आब को तोड़ने के लिये कहा मगर समाअत न की गई। बिल आखि़र हज़रत की फ़ौज ने ज़बर दस्त हमला कर के घाट छीन लिया। मुवर्रेख़ीन का बयान है कि घाट पर क़ब्ज़ा करने वालों में इमाम हुसैन (अ.स.) और हज़रते अब्बास इब्ने अली (अ.स.) ने कमाल जुरअत का सुबूत दिया था।(जि़करूल अब्बास सफ़ा 26 मोअल्लेफ़ा हकी़र) हज़रत अली (अ.स.) ने घाट पर क़ब्ज़ा करने के बाद ऐलान करा दिया कि पानी किसी के लिये बन्द नहीं है। मतालेबुस सूऊल में है कि हज़रत अली (अ.स.) बार बार माविया को दावते मसालेहत देते रहे लेकिन कोई असर न हुआ आखि़र कार माहे जि़ल्हिज में लड़ाई शुरू हुई और इन्फ़ेरादी तौर पर सारे महीने होती रही। मोहर्रम 37 हिजरी में जंग बन्द रही और यकुम सफ़र से घमासान की जंग शुरू हो गई। एयरविंग लिखता है अली (अ.स.) को अपनी मरज़ी के खि़लाफ़ तलवार ख़ैंचना पड़ी। चार महीने तक छोटी छोटी लड़ाईयां होती रहीं जिन्मे माविया के 45,000(पैंतालिस हज़ार) आदमी काम आये और अली (अ.स.) की फ़ौज ने उससे आधा नुकसान उठाया। जि़करूल अब्बास सफ़ा 27 में है कि अमीरल मोमेनीन अपनी रवायती बहादुरी से दुशमने इस्लाम के छक्के छुड़ा देते थे। अमरू बिन आस और बशर इब्ने अरताता पर जब आपने हमले किये तो यह लोग ज़मीन पर लेट कर बरेहना हो गये। हज़रते अली (अ.स.) ने मुँह फेर लिया , यह उठ कर भाग निकले। माविया ने अमरू आस पर ताना ज़नी करते हुये कहा कि दर पनाह औरत खुद गि़रीख़्ती तूने अपनी शर्मगाह के सदक़े में जान बचा ली। मुवर्रेख़ीन कर बयान है कि यकुम सफ़र से सात शाबान रोज़ जंग जारी रही। लोगों ने माविया को राय दी कि अली (अ.स.) के मुक़ाबले मे ख़ुद निकलें मगर वह न माने। एक दिन जंग के दौरान में अली (अ.स.) ने भी यही फ़रमाया था कि ऐ जिगर ख़्वारा के बेटे क्यों मुसलमानों को कटवा रहा है तू ख़ुद सामने आजा और हम दोनों आपस में फ़ैसला कुन जंग कर लें। बहुत सी तवारीख़ में है कि इस जंग में नब्बे (90) लड़ाईयां वुक़ू में आईं। 110 रोज़ तक फ़रीक़ैन का क़याम सिफ़्फ़ीन में रहा। माविया के 90,000 (नब्बे हज़ार) और हज़रते अली (अ.स.) के 20,000 (बीस हज़ार) सिपाही मारे गये। 13 सफ़र 37 हिजरी को माविया की चाल बाजि़यों और अवाम की बग़ावत के बाएस फ़ैसला हकमैन के हवाले से जंग बन्द हो गई। तवारीख़ में है कि हज़रते अली (अ.स.) ने जंगे सिफ़्फ़ीन में कई बार अपना लिबास बदल कर हमला किया है। तीन मरतबा इब्ने अब्बस का लिबास पहना , एक बार अब्बास इब्ने रबिया का भेस बदला , एक दफ़ा अब्बास इब्ने हारिस का रूप् इख़्तेयार किया और जब क़रीब इब्ने सबा हमीरी मुक़ाबले के लिये निकला तो अपने बेटे हज़रते अब्बास (अ.स.) का लिबास बदला और ज़बरदस्त हमला किया। मुलाहेज़ा हो मुनाकि़बे(एहज़ब ख़वारज़मी सफ़ा 196 क़लमी) लड़ाई निहायत तेज़ी से जारी थी कि अम्मारे यासिर जिनकी उम्र 93 साल थी , मैदान में आ निकले और अट्ठारा शामियों को क़त्ल कर के शहीद हो गये। हज़रत अली (अ.स.) ने आपकी शहादत को बहुत महसूस किया। एयर विंग लिखता है कि अम्मार की शहादत के बाद अली (अ.स.) ने बारह हज़ार सवारों को ले कर पुर ग़ज़ब हमला किया और दुशमनो की सफ़ें उलट दी और मालिके अशतर ने भी ज़बर दस्त बेशुमार हमले किये।

दूसरे दिल सुबह को हज़रत अली (अ.स.) फिर लशकरे माविया को मुखातिब कर के फ़रमाया कि लोगों सुन लो कि अहकामे ख़ुदा मोअत्तल को जा रहे हैं इस लिये मजबूरन लड़ रहा हूं। इस के बाद हमला शुरू कर दिया और कुशतों के पुश्ते लग गये।

लैलतुल हरीर

जंग निहायत तेज़ी के साथ जारी थी मैमना और मैसरा अब्दुल्लाह और मालिके अशतर के क़ब्ज़े में था। जुमे की रात थी , सारी रात जंग जारी रही। बरवायत आसम कूफ़ी 36,000 (छत्तीस हज़ार) सिपाही तरफ़ैन के मारे गये। 900 (नौ सौ) आदमी हज़रत अली (अ.स.) के हाथों क़त्ल हुए। लशकरे माविया से अल ग़यास , अल ग़यास की आवाज़ें बलन्द हो गईं। यहां तक कि सुबह हो गई और दोपहर तक जंग का सिलसिला जारी रहा। मालिके अशतर दुशमन के ख़ेमे तक जा पहुँचे क़रीब था कि , माविया ज़द में आ जाऐ और लशकर भाग खड़ा हो। नागाह उमरो बिन आस ने 500 (पांच सौ) क़ुरआन नैजा़ पर बलन्द कर दिये और आवाज़ दी कि हमारे और तुम्हारे दरमियान क़ुरआन है। वह लोग जो माविया से रिशवत खा चुके थे फ़ौरत ताईद के लिये खड़े हो गये और अशअस बिन क़ैस , मसूद इब्ने नदक़ , ज़ैद इब्ने हसीन ने आवाम को इस दरजा वरग़लाया कि वह लोग वही कुछ करने पर आमादा हो गये जो उस्मान के साथ कर चुके थे मजबूरन मालिके अशतर को बढ़ते हुए क़दम और चलती हुई तलवार रोकना पड़ी। मुवर्रिख़ गिबन लिखता है कि अमीरे शाम भागने का तहय्या कर रहा था लेकिन यक़ीनी फ़तेह , फ़ौज के जोश और नाफ़रमानी की बदौलत अली (अ.स.) के हाथ से छीन ली गई। ज़रजी ज़ैदान लिखता है कि नैजा़ पर क़ुरआन शरीफ़ देख कर हज़रत अली (अ.स.) की फ़ौज के लोग धोखा खा गये। नाचार अली (अ.स.) को जंग मुलतवी करनी पड़ी। बिल आखि़र अवाम ने माविया की तरफ़ उमरो आस और हज़रत की तरफ़ से उनकी मरज़ी के खि़लाफ़ अबू मूसा अशअरी को हकम मुक़र्रर करके माहे रमज़ान में बामक़ाम जोमतुल जन्दल फ़ैसला सुनाने को तय किया।

हकमैन का फ़ैसला

अल ग़रज़ माहे रमज़ान में बमुक़ाम अज़रह चार चार सौ अफ़राद समेत उमरो बिन आस और अबू मूसा अशअरी जमा हुये और अपना वह बाहमी फ़ैसला जिसकी रू से दोनों को खि़लाफ़त से माज़ूल करना था , सुनाने का इन्तेज़ाम किया। जब मिम्बर पर जा कर ऐलान करने का मौक़ा आया तो अबू मूसा ने उमरो बिन आस को कहा कि आप जा कर पहले बयान दें। उन्होंने जवाब दिया , आप बुज़ुर्ग हैं पहले आप फ़रमायें। अबू मूसा मिम्बर पर गये और लोगों को मुख़ातिब कर के कहा कि मैं अली (अ.स.) को खि़लाफ़त से माज़ूल करता हूं। यह कह कर उतर आये। उमरो बिन आस जिससे फ़ैसले के मुताबिक़ अबू मूसा को यह तवक़्क़ो थी कि वह भी माविया की माज़ूली का ऐलान कर देगा लेकिन उस मक्कार ने इसके बर अक्स यह कहा कि मैं अबू मूसा की ताईद करता हूँ और अली (अ.स.) को हुकूमत से हटा कर माविया को ख़लीफ़ा बनाता हूँ। यह सुन कर अबू मूसा अशअरी बहुत ख़फ़ा हुए लेकिन तीर तरकश से निकल चुका था। यह सुन कर मजमे पर सन्नाटा छा गया। अली (अ.स.) ने मुसकुरा कर अपने तरफ़दारों से कहा कि मैं न कहता था कि दुशमन फ़रेब देने की फि़क्र में है।

जंगे नहरवान

हकमैन के मोहमल और मक्काराना फ़ैसले को हज़रत अली (अ.स.) और उनके तरफ़दारों ने मुस्तरद कर दिया और दोबारा आला पैमाने पर फ़ौज कशी का फ़ैसला और तहय्या कर लिया। अभी इसकी नौबत न आने पाई थी कि ख़वारिज की बग़ावत की इत्तेला मिली और पता चला कि वह लोग जो सिफ़्फ़ीन में जंग रोकने के खि़लाफ़ थे अब हज़रत के सख़्त मुख़ालिफ़ हो कर मक़ामे हरवरा में आ रहे हैं। फिर मालूम हुआ कि वह लोग बग़दाद से चार फ़रसख़ के फ़ासले पर बमुक़ाम नहरवान बतारीख़ 10 शव्वाल 37 हिजरी जा पहुँचे हैं और वहां मुसलमानों को सता रहे हैं। हज़रत ने मजबूरन उन पर चढ़ाई की। 12,000 (बाहर हज़ार) में से कुछ कूफ़े और मदाएन चले गये और कुछ ने बैयत कर ली। चार हज़ार (4000) आमादए पैकार हुये। बिल आखि़र लडा़ई हुई और नौ आदमियों के अलावा सब मारे गये। इसी जंग में मशहूर मुनाफि़क़ व ख़ारजी ज़ुलसदिया भी मारा गया जिसका असली नाम मोज़ज था। इसके एक हाथ की जगह लम्बा सा पिस्तान बना हुआ था इसी लिये इसे ज़ुलसदिया कहा जाता था।

मौहम्मद इब्ने अबी बक्र की इबरत नाक मौत

मौहम्मद इब्ने अबी बक्र मिस्र के गवर्नर थे। माविया ने छः हज़ार (6,000) फ़ौज के साथ अमर इब्ने आस को मौहम्मद से मुक़ाबले के लिये मिस्र भेज दिया। मौहम्मद ने हज़रत अली (अ.स.) को वाक़ेए की इत्तेला दी। आपने फ़ौरन जनाबे मालिके अशतर को उनकी मदद के लिऐ मिस्र रवाना कर दिया। माविया को जब मालिके अशतर की रवानगी का पता चला तो उसने मक़ामे अरीश या मुल्जि़म के ज़मींदार को ख़ुफि़या लिख कर भेजा कि मालिके अशतर मिस्र जा रहे हैं , अगर तुम उन्हें दावत वगै़रह के ज़रिये से क़त्ल कर दो तो मैं तुम्हारा खि़राज 20 साल के लिये माफ़ कर दूंगा। उस शख़्स ने ऐसा ही किया। जब मालिके अशतर पहुँचे तो उसने दावत दी और आपके लिये इफ़तारे सोम का इन्तेजा़म किया , और दूध में ज़हर मिला कर दे दिया। जनाबे मालिके अशतर शहीद हो गये।(तारीख़े कामिल जिल्द 3 सफ़ा 141 व तबरी जिल्द 6 सफ़ा 54 ) इधर मालिके अशतर शहीद हुए उधर उमरो आस ने जनाबे मौहम्मद इब्ने अबी बक्र पर मिस्र में हमला कर दिया। आपने पूरा पूरा मुक़ाबला किया लेकिन नतीजे पर गिरफ़तार हो गये। आपको माविया इब्ने ख़दीज ने माविया इब्ने अबू सुफि़यान के हुक्म से गधे की खाल में सी कर जि़न्दा जला दिया। हज़रते आयशा को जब इस इबरत नाक मौत की ख़बर मिली तो आप बे हद रंजिदा हुईं और ता हयात माविया और उमरो आस के लिये हर नमाज़ के बाद बद दुआ करने को वतीरा बना लिया।(तारीख़े कामिल जिल्द 3 सफ़ा 143, हयातुल हैवान वग़ैरा) इस वाकि़ये से अमीरल मोमेनीन को बेहद रंज पहुँचा और माविया को ख़ुशी हुई।(तबरी इब्ने ख़ल्दून मसूदी) यह वाक़ेया सफ़र 38 हिजरी का है।

(तारीख़े इस्लाम जिल्द 1 सफ़ा 216 )

किताब निहायतुल अरब फ़ी मारेफ़त निसाबुल अरब मोअल्लिफ़ा अबुल अब्बास अहमद बिने अली बिन अहमद बिन अब्दुल्लाह , तअलक़शन्दी , अल मुतावफ्फा 821 , हितरी मतबुआ बग़दाद 1908 ई0 में मुताबिक़ 299 के फ़ुट नोट में है कि मौहम्मद बिन अबी बक्र मक्के मदीने के दरमियान 10 हिजरी में पैदा हुए थे। उनकी परवरिश हज़रते अली (अ.स.) के आग़ोशे करामत में हुई थी। वफ़ाते अबू बक्र के बाद उनकी मां असमा बिन्ते उमैस से हज़रत ने अक़्द कर लिया था। हज़रत उनको बे हद चाहते थे। यह जंगे जमल और सिफ़्फ़ीन में हज़रत अली (अ.स.) के साथ थे। सन् 37 में अमीरल मोमेनीन (अ.स.) ने उन्हें मिस्र का गवर्नर बना दिया। जब जंगे सिफ़्फ़ीन से अमीरल मोमेनीन बइरादा रवाना हो गये तो माविया ने एक बड़ा लशकर भेज कर मिस्र पर हमला करा दिया। काफ़ी जंग हुई बिल आखि़र मौहम्मद को शिकस्त हुई। अख़्तफ़ी मौहम्मद फ़ाअरफ़ माविया बिन ख़दीज मक़ाना क़ब्ज़ अलैहे व क़त्ला सुम हरक़ा मौहम्मद इब्ने अबी बक्र रूपोश हो गये लेकिन माविया ने उन्हें तलाश कर के गिरफ़्तार कर लिया फिर उन्हें क़त्ल कर के उन्हें जला दिया। बड़े ज़ाहिद थे। तारीख़े आसम कूफ़ी के सफ़ा 338 में है कि उन्हें गधे की खाल में सी कर जलवा दिया था। हज़रत मौहम्मद बिन अबी बक्र की शहादत के नतीजे में हज़रते आयशा को भी कुएं में गिरा कर अमीरे माविया ने ख़त्म करा दिया था।(हबीब उस सैर वग़ैरा) असकी क़दरे तफ़सील आइन्दा आयेगी।

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) की विलादत

इसी साल सन् 38 हिजरी के जमादियुस सानी की 15 तारीख़ को हज़रते इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) जनाबे शहर बानों बिन्ते यज़द जुरद इब्ने शहरयार इब्ने केसरा शाह ईरान के बत्न से पैदा हुये।

हिन्दुस्तान में इस्लाम सब से पहले

हज़रत अली बिन अबी तालिब (अ.स.) के ज़रिये से पहुँचा इलाक़ए सिन्ध से आले मौहम्मद स. का ख़ुसूसी इलाक़ा व राबेता

यह ज़ाहिर है कि हज़रते रसूले करीम स. के बाद इस्लाम की सारी जि़म्मेदारी अमीरूल मोमेनीन हज़रत अली बिन अबी तालिब (अ.स.) पर थी जिस तरह सरकारे दो आलम अपने अहदे नबूवत में ता बा हयाते ज़ाहेरी इस्लाम की तब्लीग़ करते रहे और उसे फ़रोग़ देने में तन , मन , धन की बाज़ी लगाए रहे इसी तरह उनके बाद अमीरूल मोमेनीन ने भी इस्लाम को बामे ऊरूज तक पहुँचाने के लिये जेहदे मुसलसल और सई पैहम की और किसी वक़्त भी उसकी तब्लीग़ से ग़फ़लत नहीं बरती , यह और बात है कि ग़ज़बे इक़्तेदार की वजह से दारए अमल वसी न हो सका और हलक़ाए असर महदूद हो कर रह गया। ताहम फ़रीज़े की अदायगी इमामत की ख़ामोशी फि़ज़ा में जारी रही यहां तक की इक़तेदार क़दमों में आया और मिन्हाजे नबूवत पर काम शुरू हो गया तबलीग़ के महदूद हलक़े वसी हो गये। इमामत खि़लाफ़त के दोश बदोश आगे बढ़ी और इस्लाम की रौशनी मुमालिके ग़ैर में पहुँचने लगी। हिन्दोस्तान जो कुफ़्रो इल्हाद और ग़ैर उल्लाह की परस्तिश का मरक़ज़ और मलजा व मावा था अमीरूल मोमेनीन ने दीगर मुमालिक के साथ साथ वहां भी इस्लाम की रौशनी पहुँचाने का अज़मे मोहकम कर लिया और थोड़ी सी जद्दो जेहद के बाद वहां इस्लाम की किरन पहुँचा दी और ज़मीने हिन्द को इस्लामी ताबन्दगी से मुनव्वर कर दिया।

इमामुल मुवर्रेख़ीन अबू मौहम्मद , अब्दुल्लाह बिने मुस्लिम इब्ने क़तीबा दीनवरी अपनी किताबुल माअर्रिफ़ के सफ़ा 95 प्रकाशित मिस्र 1934 ई0 मे लिखते हैं इस्लाम सिन्ध हिन्दुस्तान में सब से पहले अमीरल मोमेनीन अली इब्ने अबी तालिब (अ.स.) के अहद में पहुँचा इस पर बहुत से वाकि़यात शाहिद हैं। हज नामा क़लमी सफ़ा 34 में है कि अमीरल मोमेनीन (अ.स.) ने सन् 38 हिजरी में नाजि़र बिन दावरा को सरहादाते सिन्ध की देख भाल के लिये रवाना किया। यह रवानगी बज़ाहिर अपने मक़सद के लिये राह हमवार करने की खा़तिर थी और यह मालूम करना मक़सूद था कि हिन्दोस्तान में क्यों कर दाखि़ला हो सकता है। इसी मक़सद के लिये इस से क़ब्ल अहदे उस्मानी में अब्दुल्लाह बिन आमिर इब्ने करेज़ को मुक़र्रर किया गया था। मुवर्रिख़ बिलाज़री लिखते हैं कि वह सफ़रूल हिन्द की तरफ़ दरयाई मुहिम पर रवाना हुये। ग़रज़ यह थी कि इस मुल्क के हालात से आगाही हासिल हो। अब्दुल्लाह बिन आमिर ने हकीम बिन जि़ब्तुल अदवी की सरदारी में एक दस्ता समुन्दर के रास्ते रवाना किया। वह बलुचिस्तान और सिन्ध के मशरिक़ी इलाक़े को देख कर वापस आये तो अब्दुल्लाह ने उनको उस्मान बिन अफ़ान के पास भेज दिया कि जो कुछ देखा है जा के सुना दे , उस्मान ने पूछा उस मुल्क का क्या हाल है , कहा मैंने उस मुल्क को चल फिर कर अच्छी तरह देख लिया है। उस्मान ने कहा मुझ से उसकी कैफि़यत बयान करो। हकीम बिन जबला ने कहाः वहां पानी कम , फल रद्दी , चोर बेबाक , लशकर कम हो तो ज़ाया जायेगा , बहुत हो तो भूखों मरेगा। यह सुन कर उन्होंने कहा , ख़बर दे रहे हो या हजो कर रहे हो। बोले ऐ अमीर , ख़बर दे रहा हूं। यह सुन कर उन्होंने लशकर कशी का ख़्याल तर्क कर दिया।

(तरजुमा फ़तहुल बलदान बेलाज़री लिल्द 2 सफ़ा 613 )

हज़रत उस्मान जिनका मक़सद मुल्क पर क़ब्जा़ करना और फ़तुहवात की फ़ेहरिस्त बढ़ाना था , वहां के हालात सुन कर ख़ामोश हो गये और सिन्ध वग़ैरा की तरफ़ बढ़ने का ख़्याल तर्क कर दिया लेकिन हज़रत अमीरूल मोमेनीन (अ.स.) जिनका मक़सद फ़तूहात की फ़हरिस्त मुरत्तब करना न था बल्कि दीने इस्लाम फ़ैलाना था , उन्होंने नासाज़गार हालात के बवजूद आगे बढ़ने का अज़म बिल जज़्म कर लिया और 39 हिजरी में हज़रत अली (अ.स.) ने हारिस बिन मुर्रा अब्दी को सिन्ध पर क़ाबू हासिल करने के लिये भेजा। इसी सन् में सिन्ध फ़तेह हुआ। यह हज़रत अली (अ.स.) का कारनामा है कि सिन्ध अली बिन अबी तालिब अ.स. के हाथो फ़तेह हुआ और हुकूमते इस्लामिया पहले पहल उन्हीं के हाथों क़ायम हुई।(तारीख़े सिन्ध दारूल मुस्न्नेफ़ीन आज़म गढ़ 1947 0 )

अल्लाम बिलाज़री अल मुतावफ्फा 279 लिखते हैं कि आखि़र 38 हिजरी या अव्वल 39 हिजरी में हारिस बिन मुर्रा अब्दी ने अली बिन अबी तालिब रजी़ अल्लाह अनहा से इजाज़त ले कर बा हैसियत मुतव्वा सरहदे हिन्द पर हमला किया। फ़तेहयाब हुये , कसीर ग़नीमत हाथ आई , सिर्फ़ लौंडी ग़ुलाम ही इतने थे की एक दिन में एक हज़ार तक़सीम किये गये। हारिस और उनके अक्सर असहाब अरज़े क़ैक़ान मे काम आये सिर्फ़ चन्द जि़न्दा बचे। यह 42 हिजरी का वाक़ेया है।

(तरजुमा फ़तहुल बलदान बिलाज़री जिल्द 2 सफ़ा 613 प्रकाशित कराची)

मुवर्रिख़ जा़किर हुसैन का बयान है कि साहेबे रौज़तुल सफ़ा लिखते हैं कि हिन्दोस्तान में क़ासिम की मातहती में एक मोतदबेह फ़ौज रवाना की गई , जो 38 हिजरी के अवाएल में सिन्ध की फ़तूहात में मसरूफ़ हुई। उसने चन्द मक़ामाते सिन्ध पर क़ब्ज़ा किया। क़ासिम के बाद 38 हिजरी के आखि़र में या 39 हिजरी के शुरू में हारिस बिन मर्रा अब्दी एक दूसरी फ़ौज के साथ दारूल खि़लाफ़ा से रवाना किया गया और उसने इन मुमालिक में बहुत से मुमालिक फ़तेह किये। बहुत से हिन्दू गिरफ़्तार किये गये और कसीर माले ग़नीमत हाथ आया जो बराहे रास्त दारूल खि़लाफ़ा को रवाना किया गया , और एक दिन में एक हज़ार लौंडी ग़ुलाम ग़नीमत के माल में तक़सीम किये गये हारिस बिन मुर्रा मुद्दत तक इन बिलाद पर क़ाबिज़ रहे।

(तारीख़े इस्लाम जिल्द 3 सफ़ा 222 प्रकाशित देहली 1331 हिजरी)

बादशाह शन्सब बिन हरिक़ का दस्ते अमीरल मोमेनीन पर ईमान लाना

हिन्दोस्तान के लिये फ़तेह सिन्ध के बाद राह का हमवार हो जाना यक़ीनी था इसी लिये सिन्ध फ़तेह किया गया। फ़तेह सिन्ध के बाद अमीरल मोमेनीन हज़रत अली (अ.स.) के इस्लामी जद्दो जेहद के आसार तारीख में मौजूद हैं। मुवर्रिख़ मुल्ला मौहम्मद क़ासिम हिन्दू शाह फ़रीशता ज़ेरे उन्वान जि़क्र बिनाए शहरे देहली लिखते हैं कि 307 ई0 में दादपत्ता राजपूत ने जो ताएफ़े तूरान से ताअल्लुक़ रखता था , क़सबाए इन्द्र पत के पहलू में देहली की बुनियाद रखी फिर उनके आठ अफ़राद ने इस पर हुकूमत की फिर ज़वाले हुकूमते तूरान के बाद ताएफ़ चौहान की हुकूमत क़ाएम हुई। इस ताएफ़े के 6 छः अफ़राद ने हुकूमत की। उसके बाद सुल्तान शाहबुद्दीन गा़ैरी ने उनके आखि़री बादशाह पिथवरा को क़त्ल कर दिया। फिर ऊमरे हुकूमत 588 ई0 में मुलूके गा़ैर के आखि़री फ़रमारवा ज़ुहाक़ ताज़ी पर बादशाह फ़रीदूँ का ग़ल्बा हो गया और ज़ुहाक़ के पोते या नवासे सूरी और साम उसके हमराह हो गये। एक अरसे के बाद इन दोनों को फ़रीदों की तरफ़ से अपनी तबाही का वहम पैदा हो गया। चुनान्चे यह दोनों नेहा चन्द चले गये और हुकूमत क़ायम कर ली और फ़रीदूँ से मुक़ाबले शुरू कर दिया। बिल आखि़र फ़रीदूँ ग़ालिब रहा और उन लोगों ने खि़राज क़ुबूल कर के हुकूमत क़ायम रखी और जुर्रियत ज़ुहाक़ इस मम्लेकत में यके बा दीगरे बुज़ुर्ग क़बीला यानी बादशाह होता रहा।

(ता बवक़्ते इस्लाम नौबत बा शन्सब रसीद व ऊ दर ज़माने अमीरल मोमेनीन असद उल्लाहुल ग़ालिब अली बिन अबी तालिब (अ.स.) बूद व बर दस्ते आं हज़रत ईमान आवुरदा। मन्शूरे हुकूमते ग़ौर बख़्ते मुबारक शाह विलायत पनाह याफ़त(तारीख़े फ़रिशता जिल्द 1 सफ़ा 54 मक़ालए दोउम जि़क्र बिनाए देहली व अहवाल मुलूक ग़ौर प्रकाशित नवल किशोर 1281 0 )

यहां तक कि दौरे इस्लाम आ गया और नौबते शाही शन्सब तक आ पहुँची। इसका ज़माना अहदे अमीरल मोमेनीन हज़रत अली बिन अबी तालिब (अ.स.) मे आया। उसने हज़रत अली (अ.स.) के हाथों पर ईमान क़ुबूल किया और मुसलमान हुआ और हुकूमते गा़ैर का मन्शूर हज़रत शाह विलायत पनाह के हाथों पर बना। यही कुछ तबक़ाते नासरी मुसन्नेफ़ा अबू उमर मिनहाजउद्दीन उस्मान बिन मेराज उद्दीन प्रकाशित कलकत्ता 1864 ई0 जि़क्रे सलातीन शन्सानिया के तबक़ए 7 सफ़ा 29 में भी है। तारीख़े इस्लाम जा़किर हुसैन के जिल्द 3 सफ़ा 222 में है कि शन्सब तुरकी नसब का था। मुवर्रिख़ फ़रिशते ने शाह शन्सब का नसब नामा यूँ तहरीर किया है। शन्सब बिन हरीक़ बिन नहीक़ इब्ने मयसी बिन वज़न बिन हुसैन बिन बहराम बिन हबश बिन हसन बिन इब्राहीम बिन साद बिन असद बिन शद्दाद बिन ज़हाक़ सफ़ा 54।

औलादे शन्सब की अमले बनी उम्मया से बेज़ारी

मुल्ला मौहम्मद क़ासिम फ़हरशता लिखते हैं कि जिस ज़माने में बनी उम्मया ने यह अन्धेरा गरदी कर रखी थी कि अहले बैते रसूल ख़ुदा स. को तमाम मुमालिके इस्लामिया में मिम्बरों पर बुरा भला कहा जाता था और वह हुक्म बाजा़हिर पहुँचा हुआ था मगर गा़ैर में अहले ग़ौर मुरतकिब आँ अमरे शनीअ नशुदन्द अहले ग़ौर ने इस अमरे नामाक़ूल का इरतेक़ाब नहीं किया था।(और वह इस अमल में बनी उम्मया से बेज़ार थे) तारीख़े फ़रिशता सफ़ा 54।


औलादे शन्सब की दुश्मनाने आले मौहम्मद स. से जंग

इसी तारीख़े फ़रिशता के सफ़ा 54 में है कि जब अबू मुस्लिम मरवज़ी ने बादशाहे वक़्त के खि़लाफ़ ख़ुरूज किया था और उसने औलादे शन्सब से मदद चाही थी तो उन लोगों ने दर क़त्ले आदाए अहले बैत तक़सीर न करद दुश्मनाने आले मौहम्मद स. के क़त्ल करने में कोई कमी नहीं की। इन तहरीरों से मालूम होता है कि अमीरल मोमेनीन (अ.स.) के ज़रिये से इस्लाम के साथ साथ शिईयत भी हिन्दोस्तान में पहुँची थी क्यो कि औलादे शन्सब का तरज़े अमल शीईयत का आईना दार है।

हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) की राहे कूफ़ा से सिन्ध जाने की ख़्वाहिश

मुवर्रिख़ अबू मौहम्मद , मौहम्मद अब्दुल्लाह बिन मुस्लिम बिन क़तीबा देवनरी अल मुतावफ्फा 276 ई0 तहरीर फ़रमाते हैं जब हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) को हुर ने कूफ़े के रास्ते में रोका तो आपने इरशाद फ़रमाया कि तुम अगर मेरे ईराक़ मे आने को पसन्द नहीं करते तो मुझे छोड़ दो कि मैं सिन्ध चला जाऊँ। उसके बाद इब्ने क़तीबा लिखते है कि इमाम हुसैन (अ.स.) के इस फ़रमाने से मालूम होता है कि इस्लाम इस वक़्त से पहले में पहुँच चुका था।(मारिफ़ इब्ने क़तीबा सफ़ा 94 प्रकाशित मिस्र 1934 0 महीज़ उल अहज़ान सफ़ा 163 )

हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) की एक ज़ौजा का सिन्धी होना

इस्लाम के क़दीम तरीन मुवर्रिख़ इब्ने क़तीबा अपनी किताबे मआरिफ़ के सफ़ा 73 पर लिखता है कानत ज़ौजातुल इमाम ज़ैनुल आबेदीन सिन्दिया व तवल्लुद तहा ज़ैद अल शहीद इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) की एक बीवी सिन्धी थीं और उनसे हज़रत ज़ैद शहीद पैदा हुये। फिर इसी किताब के सफ़ा 94 पर लिखता है। ज़ैद बिन इमाम सज्जाद बिन इमाम हुसैन की कुन्नीयत अबुल हसन थीं और उनकी माँ सिन्धी थीं।

एक और जगह लिखता है जो बीवी इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) को दी गई वह सिन्धी थीं। अब्दुल रज़्ज़ाक़ लिखते हैं कि ज़ैद शहीद इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) की जिस बीवी से पैदा हुये वह सिन्धी थीं।

(किताब ज़ैद शहीद पृष्ठ 5 प्रकाशित नजफ़े अशरफ़)

इन जुमला हालात पर नज़र करने से यह बात वाज़ेह हो जाती है कि सिन्ध(हिन्दोस्तान) में दीने इस्लाम हज़रत अली (अ.स.) के ज़रिये से पहुँचा और इसी के साथ साथ शीईयत की भी बुनियाद पड़ी थी नीज़ यह कि हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) को सिन्ध के मुसलमानों पर भरोसा था। वह कूफ़ा व शाम के मुसलमानों पर सिन्ध के मुसलमानों को तरजीह देते थे। यही वजह है कि आपने कूफ़ा में इब्ने जि़याद और यज़ीद बिन माविया के लशकर के सरदार हुर बिन यज़ीद बिन माविया के लशकर के सरदार हुर बिन यज़ीदे रेयाही। (जो बाद में हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) के क़दमो में शहीद हो कर राहिये जन्नत हुये थे।) से यह फ़रमाया था कि मुझे सिन्ध चले जाने दो। इसके अलावा आपके फ़रज़न्द इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) ने एक बीवी सिन्ध की अपने पास रखी थी जिस से हज़रत ज़ैद शहीद पैदा हुए थे। यह तमाम उमूर इस अम्र की वज़ाहत करते हैं कि आले मौहम्मद स. को इलाक़ाए सिन्ध से दिलचस्पी और वह उसके बाशिन्दों को अच्छी निगाह से देखते थे और उन पर पूरा भरोसा करते थे।

हज़रत अली (अ.स.) की शहादत

(40 हिजरी)

सिफ़्फ़ीन के साज़ेशी फ़ैसलाए हकमैन के बाद हज़रत अली (अ.स.) इस नतीजे पर पहुँचे कि अब एक फै़सला कुन हमला करना चाहिये। चुनान्चे आपने तैय्यारी शुरू फ़रमा दी और सिफ़्फ़ीन व नहरवान के बाद ही से आप इसकी तरफ़ मुतावज्जेह हो गये थे। यहां तक की हमले की तैय्यारियां मुकम्मल हो गईं। दस हज़ार फ़ौज का अफ़सर इमाम हुसैन (अ.स.) को और दस हज़ार फ़ौज का सरदार क़ैस इब्ने सआद को और दस हज़ार का अबू अय्यूब अंसारी को मुक़र्रर किया। इब्ने ख़ल्दून लिखता है कि फ़ौज की जो मुकम्मल फ़ेहरिस्त तैय्यार हुई उसमें चालीस हज़ार आज़मूदा कार , सत्तर हज़ार रंग रूट और आठ हज़ार मज़दूर पेशा शामिल थे लेकिन कूच का दिन आने से पहले इब्ने मुलजिम ने काम तमाम कर दिया। मुक़द्देमा नहजुल बलाग़ा , अब्दुल रज़्जा़क़ जिल्द 2 सफ़ा 704 में है कि फ़ैसला तो ढोंग ही था , मगर सिफ़्फ़ीन की जंग ख़त्म हो गई और माविया हतमी तबाही से बच गया। अब अमीरल मोमेनीन (अ.स.) ने कूफ़े का रूख़ किया और माविया पर आखि़री ज़र्ब लगाने की तैय्यारियां करने लगे। साठ हज़ार (60,000) फ़ौज आरास्ता हो चुकी थी और यलग़ार शुरू होने वाली थी कि एक ख़ारजी अब्दुल रहमान इब्ने मुलजिम ने दग़ा बाज़ी से हमला कर दिया। हज़रत अमीरल मोमेनीन (अ.स.) शहीद हो गये। इब्ने मुलजिम की तलवार ने हज़रत अली (अ.स.) काम तमाम नहीं किया बल्कि पूरी उम्मते मुसलेमा को क़त्ल कर डाला , तारीख़ का धारा ही बदल डाला। इब्ने मुलजिम की तलवार न होती तो खि़लाफ़त मिनहाजे नबूवत पर इस्तेवार रहती। (अरजहुल मतालिब सफ़ा 478 में है कि पैग़म्बरे इस्लाम ने पेशीन गोई फ़रमाई थी कि अली (अ.स.) की डाढ़ी सर के ख़ून से रंगीन होगी। तारीख़ अल फ़ख़री सफ़ा 73 में है कि हज़रत अली (अ.स.) एक मरतबा बीमार हुए और शैख़ेन उन्हें देखने के लिये गये , तो हालत सक़ीम देख कर आं हज़रत स. से कहने लगे कि शायद अली (अ.स.) न बचेगें। आपने फ़रमाया अभी अली (अ.स.) को मौत नहीं आयेगी। अली (अ.स.) दुनिया के तमाम रंजो ग़म उठाने के बाद तलवार से शहीद होंगे। सवाएक़े मोहर्रेक़ा सफ़ा 80 में है कि हज़रत अली (अ.स.) फ़रमाते थे कि मेरे सर और मेरी दाढ़ी को ख़ून से जो रंगीन करेगा वह दुनिया मे सब से ज़्यादा बद बख़्त होगा। शरह इब्ने अबिल हदीद जुज़ 13 सफ़ा 102 में है कि ख़ालिद बिन वलीद बाज़ उमूरे शुजाअत की वजह से अली (अ.स.) को क़त्ल करना चाहते थे। सीरते हलबिया जिल्द 2 सफ़ा 199 व बुख़ारी जिल्द 5 हालाते ग़ज़वाए ताएफ़ सफ़ा 29 में है कि रसूल अल्लाह स. ख़ालिद इब्ने वलीद पर तबर्रा करते थे। तारीख़ अबुल फि़दा वग़ैरा में है कि ख़ालिद ने अहदे अबू बक्र में मालिक इब्ने नवेरा की बीवी से ज़ेना किया था। तारीख़े आसम कूफ़ी सफ़ा 34 व तारीख़े तबरी जिल्द 4 सफ़ा 464 में है कि हज़रत उमर ने ख़लीफ़ा होते ही ख़ालिद को माज़ूद कर दिया था। तारीख़े तबरी जिल्द 6 सफ़ा 54 व कामिल वग़ैरा में है कि 38 हिजरी में अमीरे माविया ने मालिके अशतर को ज़हर से शहीद करा दिया। तारीख़े कामिल इब्ने असीर जिल्द 3 सफ़ा 142 में है कि माविया ने हज़रत अबू बक्र के बेटे मौहम्मद को गधे की खाल में सी कर जि़न्दा जला दिया था। जिसका हज़रत आयशा को बहुत रंज था और माविया को बद दुआ किया करती थीं। तवारीख़ मे है कि माविया ने हज़रत आयशा को कुएं में गिरा कर जि़न्दा दफ़्न कर दिया। जि़क्र अल अब्बास सफ़ा 51 में मुख़्तलिफ़ तवारीख़ के हवाले से मरक़ूम है कि 28 सफ़र 50 हिजरी को वाकि़ये शहादत हज़रत अली (अ.स.) के दस साल बाद इमाम हसन (अ.स.) को ज़हर से माविया ने शहीद कराया था। कशफ़ुल ग़म्मा सफ़ा 61 में है कि हज़रत अली (अ.स.) ने पेशीन गोई फ़रमाई थी कि अमीरे शाम को उस वक़्त तक मौत न आयेगी जब तक वह मेरे सर और मेरी दाढ़ी को ख़ून आलूद अपनी आंख़ों से न देख लेगा। किताब तज़किराए मौहम्मद व आले मौहम्मद जिल्द 2 सफ़ा 288 में है कि इब्ने मुलजिम ख़ारजी तहरीक़ की इस जमाअत का मिम्बर था जो किसी मज़बूत हाथ के इशारे पर नाच रही थी। ऐन उस वक़्त जब हज़रत अली (अ.स.) शाम के हमले के लिये रवाना होने की तैय्यारियां कर रहे थे इब्ने मुलजिम का वार करना यह बता रहा है कि इसकी तह में बड़ी साजि़श थी। तारीख़ अल इमामत वल सियासत जिल्द 2 सफ़ा 30 में है कि माविया ने अहदे उस्मान में हज़रते उस्मान से क़त्ले अली (अ.स.) की इजाज़त मांगी थी लेकिन उन्होने इन्कार कर दिया था। किताब मनाकि़बे मुरतज़वी के सफ़ा 277 में बा हवाला हदीक़तुल हक़ाएक़ हकीम सनाई (र.) मरक़ूम है कि अमीरल मोमेनीन के क़त्ल के इन्तेज़ामात इब्ने मुलजिम के ज़रिये से अमीरे माविया ने किये थे जिसका इक़रार ख़ुद इब्ने मुलजिम ने इन अल्फ़ाज़ में किया था।

मैंने माविया के कहने से ऐसा किया मगर अफ़सोस कोई फ़ायदा बरामद न हुआ। मुलाहेज़ा हो जि़क्र अल अब्बास सफ़ा 20 किताब अरजहुल मतालिब सफ़ा 753 व तबरी जिल्द 4 सफ़ा 599 व रौज़तुल अहबाब में है कि अब्दुल रहमान इब्ने मुलजिम ने कूफ़ा पहुँच कर एक हज़ार दिरहम की एक तलवार ख़रीदी और उसे ज़हर में बुझा लिया और मौक़े की तलाश में कूफ़े की गलियों के चक्कर काटने लगा। इसी दौरान में एक दिन उसकी नज़र एक हसीन औरत पर जा पड़ी जिसका नाम क़तामा बिन्ते नजबा था और जो माविया की रिशतेदार होती थी। इब्ने मुलजिम उस औरत का बे दाम ग़ुलाम बन गया आर उससे सिलसिला जुम्बानी शुरू की। बिल आखि़र बात ठहरी और अक़्द का फ़ैसला हो गया। जब मेहर की गुफ़्तुगू हुई तो उसने कहा कि तीन हज़ार अशरफि़या और हज़रत अली (अ.स.) का सर लूगीं क्यो कि उन्होंने इस्लामी जंगों में मेरे बाप और भाईयो को क़त्ल कर दिया है। इब्ने मुलजिम ने जवाब दिया कि मुझे मंज़ूर है। लक़द क़सदत लक़तल अली वमा अक़द मनी हाज़ल मिस्र ग़ैर ज़ालेका ख़ुदा की क़सम तू ने ऐसी चीज़ मांगी है जिसके लिये मैं ख़ुद इस शहर में भेजा गया हूँ , अलबत्ता तुझे भी अपने वायदे का पास व लिहाज़ रखना चाहिये , उसने कहा ऐसा ही होगा। इस अहदो पैमान वायदा वईद के बाद इब्ने मुलजिम तगो दौ व सई व कोशिश और जद्दो जेहद में मशग़ूल हो गया। सवाएक़े मोहर्रेक़ा सफ़ा 80 में है कि इब्ने मुलजिम की इमदाद के लिये शबीब इब्ने बीरह अशजई भी था। रौज़तुल शोहदा सफ़ा 198 में है कि क़तामा ने और बई अशख़ास इसकी मद्द के लिये मोअय्यन और मोहय्या कर दिये। मुस्तदरिक हाकिम में है कि क़तामा ने ऐसा महर मांगा जिसकी मिसाल अरब व अजम में नहीं है। तारीख़े अहमदी सफ़ा 210 में ब हवाला रौज़तुल अहबाब मरक़ूम है कि हज़रत अली (अ.स.) ने ज़मानाए शहादत क़रीब होने पर कई बार अपनी शहादत का इशारे और कनाये में जि़क्र फ़रमाया था। मन्क़ूल है कि एक दिन आप ख़ुतबा फ़रमा रहे थे नागाह इमाम हसन (अ.स.) दौराने ख़ुतबा में आ गये। हज़रत अली (अ.स.) ने पूछा बेटा आज कौन सी तारीख़ है और इस महीने के कितने दिन गुज़र चुके हैं ? आपने अर्ज़ कि बाबा जान 13 दिन गुज़र गये हैं। फिर हज़रत ने इमाम हुसैन (अ.स.) की तरफ़ रूख़ कर के पूछा बेटा अब महीने के ख़त्म होने में कितने दिन बाक़ी रह गये हैं ? इमाम हुसैन (अ.स.) ने अर्ज़ कि बाबा जान 17 दिन रह गये हैं। उसके बाद आप ने अपनी रीशे मुबारक पर हाथ फेर कर फ़रमाया कि अन्क़रीब क़बीलाए मुराद का एक नामुराद मेरी दाढ़ी को सर के ख़ून से रंगीन करे गा। (अख़बारे सहीहा में वारिद है कि हज़रत अली (अ.स.) का उसूल यह था कि आप एक एक दिन अपने बेटों के यहां इफ़्तार फ़रमाया करते थे और सिर्फ़ एक लुक़मा तनावुल करते थे। एक रवायत में है कि आपने अपनी बेटी उम्मे कुलसूम से फ़रमाया कि मैं अन्क़रीब तुम लोगों से रूख़सत हो जाऊँगा। यह सुन कर वह रोने लगीं। आपने फ़रमाया कि मौत से किसी को छुटकारा नहीं बेटी मैंने आज रात को ख़्वाब में सरवरे आलम को देखा है कि वह मेरे सर से ग़ुबार साफ़ कर रहे हैं और फ़रमाते हैं कि तुम तमाम फ़राएज़ अदा कर चुके अब मेरे पास आ जाओ। जम्हूरे मुवर्रेख़ीन का इत्तेफ़ाक़ है कि जिस रात की सुबह को आप शहीद हुए उस रात में आप सोय नहीं। यह रात आप की इस तरह गुज़री कि आप थोड़ी थोड़ी देर के बाद मुसल्ले से उठ कर सहने ख़ाना में आते और आसमान की तरफ़ देख कर फ़रमाते थे कि मेरे आक़ा सरवरे कायनात ने सच फ़रमाया है कि मैं शहीद किया जाऊँगा। लिखा है कि जब नमाज़े सुबह के इरादे से बाहर निकले , तो सहने ख़ाना में बत्तख़ों ने दामन थाम लिया और शोर मचाने लगीं किसी ने रोका तो आपने फ़रमाया मत रोको यह मुझ पर नौहा कर रहीं हैं। फिर आप दौलत सरा से बरामद हो कर दाखि़ले मस्जिदे कूफ़ा हुए और गुलदस्तै अज़ान पर जा कर अज़ान कहने लगे। इसके बाद नमाज़ में मशग़ूल हो गये। जब आप सज्दाए अव्वल में गये , नामुराद इब्ने मुलजिम मुरादी ने सरे अक़दस पर तलवार लगा दी। यह तलवार उसी जगह लगी जिस जगह ख़न्दक़ में उमर बिन अब्देवुद की तलवार लग चुकी थी। ज़र्ब लगते ही आसमान से आवाज़ आई अला क़तलल अमीरल मोमेनीन आगाह हो कि अमीरल मोमेनीन क़त्ल हो गये। इसके बाद आप ज़मीन पर लौटने लगे और ज़ख़्म पर मिट्टी डाल कर बोले फ़ुज़तो बे रब्बिल काबा ख़ुदा की क़सम मैंने हयाते अब्दी पाई और कामयाब हो गया। ज़र्ब लगने के बाद इब्ने मुलजिम भागा , लोगों ने पीछा किया। (किताब जि़करूल अब्बास सफ़ा 40 मे है कि आपको ख़ून में नहाया देख कर अवलादो असहाब ने गिरया करना शुरू कर दिया। आप ने फ़रमाया बस रो चुको और मुझे घर ले चलो यह सुन कर हज़रत इमाम हसन (अ.स.) और हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) और हज़रते अब्बास (अ.स.) ने उक गिलीम में डाल कर आपको घर पहुँचाया। किताब अल कर्रार सफ़ा 402 में है कि घर पहुँच कर आप ने सुबह को मुख़ातिब कर के फ़रमाया कि तू गवाह रहना कि मैंने कभी नमाज़ क़जा़ नहीं की , और ख़ुदा और रसूल स. की कोई मुख़ालेफ़त मुझसे नहीं हुई। तारीख़े अहमदी सफ़ा 212 मे है कि कोई इलाज कारगर न हुआ और आपकी वफ़ात का वक़्त आ पहुँचा। तारीख़ अल इमामत वल सियासत जिल्द 1 सफ़ा 154 में है आपको ऐसी ज़हर से बुझी हुई तलवार से ज़ख़्मी किया गया था कि सारे अहले मिस्र के लिये काफ़ी था। किताब रहमतुल आलेमीन मुसन्नेफ़ा क़ाज़ी मौहम्मद सुलैमान जज पटियाला के सफ़ा 81 में है कि ज़ख़्म को जिस पर शहादत हुई कसीर बिन उमरो सकूनी जो शाहाने ईरान का तबीबे ख़ास रह चुका था उसने बताया कि ज़ख़्म उम्मे दिमाग़ तक पहुँच गया है और अब सेहत मोहाल है। तारीख़े कामिल इब्ने असीर में है कि इन्तेक़ाल के वक़्त आपने नसीहतें और वसीयतें फ़रमाईं जो तक़वा परहेज़ गारी , इबादत सिलए रहम वग़ैरा वग़ैर से मुताअल्लिक़ थीं। फिर एक नविश्ता लिख कर दिया। किताब अख़बारे मातम सफ़ा 124 में और बाज़ कुतुबे तवारीख़ में है कि आपकी खि़दमत में शरबत पेश किया गया तो आपने थोड़ा सा पी कर क़ातिल को भीजवा दिया। अल अख़बार अल तवाल सफ़ा 360 में है कि हज़रत उम्मे कुलसूम ने इब्ने मुलजिम से कहलाया कि ऐ दुशमने ख़ुदा तू ने अमीरल मोमेनीन को शहीद कर दिया , तो उसने जवाब दिया कि अमीरल मोमेनीन को नहीं , मैंने तुम्हारे बाप को क़त्ल किया है और ऐसी तलवार से क़त्ल किया है जिसे एक माह ज़हर पिलाता रहा हूँ। कशफ़ुल अनवार तरजुमा बिहार जिल्द 9 सफ़ा 277 मे है कि आपने आख़री वक़्त अपने सब बेटों को बुला कर इमाम हसन (अ.स.) और इमाम हुसैन (अ.स.) की इताअत और इमादाद का हुक्म दिया और फ़रमाया कि यह फ़रज़न्दाने रसूल स. हैं। उसूले काफ़ी सफ़ा 141 मे है कि जिन बेटों को हिदायत दी गई उनकी तादाद बारह थी। मरक़ातुल ईक़ान जिल्द 1 सफ़ा 40 में है कि आपने अपनी तमाम अवलाद व अज़वाज को इमाम हसन (अ.स.) के सिपुर्द फ़रमाया। माईतन्न सफ़ा 441 में है कि हज़रते अब्बास (अ.स.) को इमाम हुसैन (अ.स.) के हवाले कर के फ़रमाया कि यह तुम्हारा ग़ुलाम है करबला में काम आयेगा। किताब अक़दुल फ़रीद में है कि आपने अमरे खि़लाफ़त इमाम हसन (अ.स.) के सिपुर्द फ़रमाया। किताब वसीलातुन नजात में है कि इमाम हसन (अ.स.) हज़रत अली (अ.स.) की वसीयत के मुताबिक़ इमामे बरहक़ और ख़लीफ़ा ए वक़्त क़रार पाए। तारीख़े कामिल इब्ने असीर , बेहारूल अनवार , आलाम अल वरा , जि़करूल अब्बास सफ़ा 38 में है कि आपने 21 रमज़ान 40 हिजरी को इन्तेक़ाल फ़रमाया। किताब जामेए अब्बासी सफ़ा 59 और अल याक़ूबी में है कि शबे 21 रमज़ान को आपने इन्तेक़ाल फ़रमाया है। इसी शब को हज़रते ईसा (अ.स.) आसमान पर उठाए गये। हज़रते मूसा (अ.स.) ने रहलत की और यूशा इब्ने नून ने वफ़ात पाई। किताब अल इमामत वल सियासत जिल्द 1 सफ़ा 155 व इरशादे मुफ़ीद सफ़ा 7 में है कि इमामे हसन (अ स ) , इमामे हुसैन (अ.स.) और अब्दुल्लाह इब्ने जाफ़र ने ग़ुस्ल दिया और मोहम्मदे हनफि़या ने पानी डालने में मद्द की। कफ़न पिनहाने के बाद हज़रत इमाम हसन (अ.स.) ने नमाज़े जनाज़ा पढ़ी। रहला इब्ने जबीर अनदलसी सफ़ा 189 प्रकाशित मिस्र 1908 ई0 में है कि आपको जिस जगह ग़ुस्ल दिया गया उस जगह हज़रत नूह (अ.स.) की बेटी का घर था। सवाएक़े मोहर्रेक़ा सफ़ा 80 में है कि शहादत के वक़्त आप की उम्र 63 साल थी। बाज़ तवारीख़ में है कि आपकी क़ब्र हज़रत नूह (अ.स.) की बनाई हुई थी और आपका जनाज़ा सिरहाने की तरफ़ से फ़रिश्ते उठाये हुए थे। तारीख़े अबुल फि़दा में है कि आप नजफ़े अशरफ़ में सिपुर्दे ख़ाक किये गये जो अब भी जि़यारत गाहे आलम है। अल याकूबी जिल्द 2 सफ़ा 203 में है कि शहादते अली (अ.स.) के बाद इमामे हसन (अ.स.) ने अपने ख़ुतबे में फ़रमाया कि उन्होंने सिर्फ़ सात सौ (700) दिरहम छोड़े हैं। मुसतदरिक हाकिम और रियाज़ुन नज़रा और अरजहुल मतालिब सफ़ा 760 में है कि जिस शब में हज़रत अली (अ.स.) शहीद हुये उसकी सुबह को बैतुल मुक़द्दस का जो पत्थर उठाया जाता था , उसके नीचे से ख़ूने ताज़ा बरामद होता था। तारीख़ अल याकूबी जिल्द 2 सफ़ा 203 में है कि हज़रत अली (अ.स.) के दफ़्न के बाद उनकी क़ब्र पर क़आक़ा बिन ज़रारा ने एक तक़रीर की जिसमें निहायत ग़मों अन्दोह के साथ कहा कि ऐ मौला आपकी जि़न्दगी ख़ैरो बरकत की किलीद थी , अगर लोग आपको सहीह तरीक़े पर मानते तो ख़ैर ख़ैर पाते मगर दुनिया वालों ने दुनिया को दीन पर तरजीह दी और ख़ैर हासिल न कर सके। इन्शाअल्लाह दुनिया दार जहन्नम में जायेंगे। किताब अनवारूल हुसैनिया जिल्द 2 सफ़ा 36 में है कि आपकी क़ब्र पोशीदा रखी गई थी। मिस्टर गिबन की तारीख़ डी गाईन एण्ड हाल अॅाफ़ दी रोमन इम्पाएर में है कि ज़ालिम बनी उम्मया की वजह से अली (अ.स.) की क़ब्र छुपाई गई। चौथी सदी में एक क़ुब्बा रौज़ए कूफ़ा के खन्डरों के पास नमूदार हो गया। मशहदे अली कूफ़े से पाँच मील और बग़दाद से 120 मील जुनूब में वाक़े है। हयातुल हैवान व दमीरी जिल्द 2 सफ़ा 187 में है कि सब से पहले आपकी क़ब्र के गिर्द कटैहरे लगवाये गये थे। किताब सैफ़ अल मुक़ल्लेदीन बाब 5 सफ़ा 274 में है कि मुसन्निफ़ किताब अब्दुल जलील यूसुफ़ी जी ने आपकी तारीख़ के बारे में लिखा है। गर तू साले शहादतश जूई।

सरे मातम चरानमी गोई।।

हज़रत अली (अ.स.) की शहादत पर मरसिया

हज़रत अली (अ.स.) की शहादत पर बहुत से शोअरा ने मरासी कहे हैं हम इस वक़्त किताब रहमतुल लिल आलेमीन मुसन्नेफ़ा का़ज़ी मौहम्मद सुलैमान जज पटियाला के जिल्द 2 सफ़ा 81 से बक्ऱ बिन हमाद अल क़ाहेरी के 11 अशआर में से सिर्फ़ तीन शेर मय तरजुमा नक़ल करते हैं।

क़ुल ला बिन मलहजम व अला क़द अर ग़ालेबा।

हदमत वै लका , लिल इस्लाम अरकाना।।

इब्ने मुलजिम से कहना गो मैं जानता हूँ कि तक़दीर सब पर ग़ालिब है कि कमबख़्त तूने इस्लाम के अरकान को ढा दिया।

क़तलत अफ़ज़ल मिन यमशी अली क़दम।

व अव्वलुन नास , इस्लामन व ईमाना।

वह शख़्स जो ज़मीन पर चलने वालों में सब से अफ़ज़ल था और इस्लाम व ईमान में सब से अव्वल।

व इल्मुन्नास बिल क़ुरआन सुम बेमा।

सन रसूलना , शरअन वत तबैना।।

और क़ुरआन व सुन्नत के जानने में सब आलम था , तूने उसे क़त्ल किया है।

हज़रत अली (अ.स.) की अज़वाज व औलाद

किताब अनवारूल हुसैनिया जिल्द 2 सफ़ा 35 में है कि आपने दस औरतों से निकाह किया और आपके इन्तेक़ाल के वक़्त चार बीवियां मौजूद थीं। इमामा , असमा , लैला और उम्मुल बनीन। आपने दस बेटे और अटठारा बेटियां छोड़ीं। इरशादे मुफ़ीद सफ़ा 199 व हमराह इब्ने हज़म व तहज़ीबुल असमा जिल्द 1 सफ़ा 149 में है कि आपके बारह बेटे और सोलह बेटियां थीं आप की नस्ल पांच बेटों से बढ़ी। 1. इमाम हसन (अ स ) , 2. इमाम हुसैन (अ स ) , 3. मोहम्मदे हनफि़या1 , 4. हज़रते अब्बास (अ.स.) 5. उमर बिन अली , मुलाहेज़ा हों। नासेख़ुल तवारीख़ जिल्द 3 सफ़ा 707 प्रकाशित बम्बई व जि़करूल अब्बास सफ़ा 44 प्रकाशित लाहौर।

1.मौहम्मद की माँ का असली नाम ख़ूला और लक़ब और हनफ़ेया था वह क़बीलाए हनफि़या बिन लहीम से थीं , मौहम्मद बिन हनफि़या 8 हिजरी में पैदा हुए और उन्होंने यकुम मोहर्रम 81 हिजरी को इन्तेक़ाल किया। उनके ज़ोहद व रियाज़द और ज़ोरो क़ुव्वत की हिकायत बहुत मशहूर है।(किताब रहमतुल लिल आलेमीन जिल्द 2 सफ़ा 85 प्रकाशित लाहौर) अबुल अब्बास , अहमद बिन अली नल शन्दी अल मुतावफ्फा 821 ई0 तहरीर फ़रमाते हैं कि बनी हनफ़या अदनान के बक्र बिन वाएली से मुताअल्लिक़ एक क़बीला है जिसका सिलसिला यह है। बनू हनफ़या बिन लहीम , बिन साअब बिन अली बिन बक्र बिन वाएल यह यमामा में रहते थे।

(निहायतुल अरब फि़न निसाब अल अरब सफ़ा 225 प्रकाशित नजफ़े अशरफ़)


अबु मोहम्मद हज़रत इमाम हसन ( अ स )

बाप की शमशीर का हमसर है बेटे का क़लम।

बाज़ुए हैदर की ताक़त , खा़मए शब्बर में है।।

फ़तेह ख़ैबर में है मुज़मर मक़सदे सुलहे हसन।

मक़सदे सुलहे हसन , फ़तहे दरे ख़ैबर में है।।

साबिर थरयानी (कराची)

वली ज़ुलमेनन , हज़रत हसन , आँ सरवरे ख़ूबां।

कि हर चीज़ अज़ अदम बाकु़दर तश मुमकिन ज़े इमकाँ शुद।।

ज़ेहे सौदाए बातिल , के तवानम , मदहे आँ शाहे।

कि मदाहश ख़ुदा , रावी पयम्बर , मदहे कु़रां शुद।।

हज़रत इमाम हसन (अ स ) , अमीरल मोमेनीन हज़रत अली (अ.स.) व सय्यदतुननिसां हज़रत फ़ात्मा (स अ व व ) के फ़रज़न्द और पैग़म्बरे ख़ुदा हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) व मोहसिने इस्लाम हज़रत ख़दीजतुल कुबरा के नवासे थे। आपको खु़दा वन्दे आलम ने मासूम मन्सूस अफ़ज़ले कायनात आलिमे इल्मे लदुन्नी क़रार दिया है।

आपकी विलादत

आप 15 रमज़ानुल मुबारक 3 हिजरी की शब को मदीनाए मुनव्वरा में पैदा हुये। विलादत से क़ब्ल उम्मे अफ़ज़ल ने ख़्वाब में देखा कि रसूले अकरम (स अ व व ) के जिस्मे मुबारक का एक टूकड़ा मेरे घर में आ पहुँचा है। ख़्वाब रसूले करीम (स अ व व ) से बयान किया। आपने फ़रमाया कि इसकी ताबीर यह है कि मेरे लख़्ते जिगर फ़ात्मा के बत्न से एक बच्चा पैदा होगा जिसकी परवरिश तुम करोगी। मुवर्रेखी़न का बयान है कि रसूल (स अ व व ) के घर में आपकी पैदाईश अपनी नवैय्यत की पहली ख़ुशी थी। आपकी विलादत ने रसूल (स अ व व ) के दामन में मक़तूलून् नसल होने का धब्बा साफ़ कर दिया और दुनियां के सामने सूरए कौसर की एक अमली और बुनियादी तफ़सीर पेश कर दी।

आपका नामे नामी

विलादत के बाद इस्मे गेरामी हम्ज़ा तजवीज़ हो रहा था लेकिन सरवरे कायनात (स अ व व ) ने बा हुक्मे खुदा मूसा (अ.स.) के वज़ीर हारून (अ.स.) के फ़रज़न्दों के शब्बीर व शब्बर नाम पर आपका नाम हसन और बाद में आपके भाई का नाम हुसैन रखा। बेहारूल अनवार में है कि इमाम हसन (अ.स.) की पैदाईश के बाद जिब्राईले अमीन ने सरवरे कायनात (स अ व व ) की खि़दमत में एक सफ़ैद रेशमी रूमाल पेश किया जिस पर हसन , हुसैन लिखा हुआ था। माहिरे इल्म अल नसब अल्लामा अबुल हुसैन का कहना है कि ख़ुदा वन्दे आलम ने दोनो शाहज़ादों का नाम अन्ज़ारे आलम से पोशीदा रखा था यानी इनसे पहले हसन और हुसैन नाम से कोई मोसूम नहीं था। किताबे आलमे अलवरी के मुताबिक़ यह नाम भी लौहे महफ़ूज़ में लिखा हुआ था।

ज़बाने रिसालत दहने इमामत में अल्ल शराए में है कि जब इमाम हसन (अ.स.) की विलादत हुई और आप सरवरे कायनात (स अ व व ) की खि़दमत में लाये गये तो रसूले करीम (स अ व व ) बे इन्तेहा खु़श हुये और उनके दहने मुबारक में अपनी ज़बाने अक़दस दे दी। बेहारूल अनवार में है कि आं हज़रत ने नौज़ायदा बच्चे को आग़ोश में ले कर प्यार किया और दाहिने कान में अज़ान और बांए में अक़ामत फ़रमाने के बाद अपनी ज़बान उनके मुंह में दे दी इमाम हसन (अ.स.) उसे चूसने लगे। इसके बाद आपने दुआ की ख़ुदाया इसको और इसकी औलाद को अपनी पनाह में रखना। बाज़ लोगों का कहना है कि इमाम हसन (अ.स.) को लोआबे दहने रसूल (स अ व व ) कम और इमाम हुसैन (अ.स.) को ज़्यादा चूसने का मौक़ा दस्तियाब हुआ था। इसी लिये इमामत नसले इमाम हुसैन (अ.स.) में मुस्तक़र हो गई।

आपका अक़ीक़ा

आपकी विलादत के सातवें दिन सरवरे कायनात ने खुद अपने दस्ते मुबारक से अक़ीक़ा फ़रमाया और बालों के मुंडवा कर उसके हम वज़न चांदी तसद्दुक़ की।(असद उल ग़ाबेता जिल्द 3 पृष्ठ 13 ) अल्लामा कमालुद्दीन का बयान है कि अक़ीक़े के सिलसिले में दुम्बा ज़ब्हा किया गया था।(मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 220 ) काफ़ी कुलैनी में है कि सरवरे कायनात (स अ व व ) ने अक़ीक़े के वक़्त जो दुआ पढ़ी थी उसमें यह इबारत भी थीः अल्लाह हुम्मा अज़महा बाअज़मा लहमहा , बिल हमा , दमहा बदमहा वशअरहा , बशराही , अल्लाहा हुम्मा अज अलहा वक़आ लम हमीदिन वालेही

तरजुमाः

खु़दाया इसकी हड्डी मौलूद की हड्डी के ऐवज़ , इसका गोश्त उसके गोश्त के एवज़ , इसका ख़ून उसके खून के ऐवज़ , इसका बाल उसके बाल के ऐवज़ क़रार दे और इसे मोहम्मद व आले मोहम्मद (स अ व व ) के लिये हर बला से नजात का ज़रिया बना दे। इमामे शाफ़ेई का कहना है कि आं हज़रत (स अ व व ) ने इमामे हसन (अ.स.) का अक़ीक़ा कर के इसके सुन्नत होने की दाएमी बुनियाद डाल दी।(मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 220 ) बाज़ माआसेरीन ने लिखा है कि आं हज़रत (स अ व व ) ने आपका ख़त्ना भी कराया था लेकिन मेरे नज़दीक यह सही नहीं है क्यो कि इमामत की शान से मख़्तून पैदा होना भी है।

कुन्नियत व अलक़ाब

आपकी कुन्नियत सिर्फ़ अबू मोहम्मद थी और आपके अलक़ाब बहुत कसीर हैं जिनमें तय्यब , तक़ी , सिब्त व सय्यद ज़्यादा मशहूर हैं। (मोहम्मद बिन तलहा शाफ़ेई का बयान है कि आपका सय्यद लक़ब खुद सरवरे कायनात का अता करदा है।(मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 221 )

ज़्यारते आशूरा से मालूम होता है कि आपका लक़ब नासेह और अमीन भी था।

इमामे हसन (अ.स.) पैग़म्बरे इस्लाम (स अ . व . व . ) की नज़र में

यह मुसल्लेमा हक़ीक़त है कि इमाम हसन (अ.स.) पैग़म्बरे इस्लाम (स अ व व ) के नवासे थे लेकिन कु़रआने मजीद ने उन्हें फ़रज़न्दे रसूल (स अ व व ) का दरजा दिया है और अपने दामन में जा बजा आपके तज़किरे को जगह दी है। ख़ुद सरवरे कायनात (स अ व व ) ने बे शुमार आहादीस आपके मुताअल्लिक़ इरशाद फ़रमाई हैं। एक हदीस में है कि आं हज़रत (स अ व व ) ने इरशाद फ़रमाया है कि मैं हसनैन को दोस्त रखता हूं और जो उन्हें दोस्त रखे उसे भी क़द्र की निगाह से देखता हूँ। एक सहाबी का बयान है कि मैंने रसूले करीम (स अ व व ) को इस हाल में देखा है कि वह एक कंधे पर इमामे हसन (अ.स.) और एक पर इमामे हुसैन (अ.स.) को बिठाए हुए लिये जा रहे हैं और बारी बारी दोनों का मुंह चूमते जाते हैं। एक सहाबी का बयान है कि एक दिन आं हज़रत (स अ व व ) नमाज़ पढ़ रहे थे और हसनैन आपकी पुश्त पर सवार हो गये किसी ने रोकना चाहा तो हज़रत ने इशारे से मना फ़रमाया।(असाबा जिल्द 2 पृष्ठ 12 ) एक सहाबी का बयान है कि मैं उस दिन से इमाम हसन (अ.स.) को बहुत ज़्यादा दोस्त रखने लगा हूँ जिस दिन मैंने रसूले करीम (स अ व व ) की आग़ोश में बैठ कर उन्हें उनकी दाढ़ी से खेलते हुए देखा।(नूरूल अबसार पृष्ठ 113 ) एक दिन सरवरे कायनात (स अ व व ) इमाम हसन (अ.स.) को कंधे पर सवार किये हुए कहीं लिये जा रहे थे , एक सहाबी ने कहा कि ऐ साहब ज़ादे तुम्हारी सवारी किस क़द्र अच्छी है , यह सुन कर आं हज़रत (स अ व व ) ने फ़रमाया कहो कि किस क़द्र अच्छा सवार है।(असद अल ग़ाब्बा जिल्द 3 पृष्ठ 15 बाहवाला तिरमिज़ी) इमाम बुख़ारी और इमाम मुस्लिम लिखते हैं कि एक दिन रसूले खुदा (स अ व व ) इमाम हसन (अ.स.) को कांधे पर बिठाए हुए फ़रमा रहे थे ख़ुदाया मैं इसे दोस्त रखता हूँ तू भी इससे मुहब्बत कर। हाफ़िज़ अबू नईम , अबू बक्र से रवायत करते हैं कि एक दिन आं हज़रत (स अ व व ) नमाज़े जमाअत पढ़ा रहे थे कि नागाह इमाम हसन (अ.स.) आ गये और वह दौड़ कर पुश्ते रसूल (स अ व व ) पर सवार हो गये यह देख कर रसूल (स अ व व ) ने निहायत नरमी के साथ सर उठाया। इख्तेतामे नमाज़ पर आपसे इसका तज़किरा किया गया तो फ़रमाया यह मेरा गुले उम्मीद है।

इब्नी हाज़ा सय्यद यह मेरा बेटा सरदार है और देखो यह अनक़रीब दो बड़े गिरोहों में सुलह करायेगा। इमाम निसाई अब्दुल्लाह इब्ने शद्दाद से रवायत करते हैं कि एक दिन नमाज़े इशा पढ़ाने के लिये आं हज़रत (स अ व व ) तशरीफ़ लाये आपकी आग़ोश में इमाम हसन (अ.स.) थे आं हज़रत नमाज़ में मशग़ूल हो गये जब सजदे में गये तो इतना तूल कर दिया कि मैं यह समझने लगा कि शायद आप पर वही नाज़िल होने लगी है। इख़्तेतामे नमाज़ पर आपसे इसका तज़किरा किया गया तो फ़रमाया कि मेरा फ़रज़न्द मेरी पुश्त पर आ गया था , मैंने यह न चाहा कि उसे उस वक़्त तक पुश्त से उतारूं जब तक कि वह खुद न उतर जाये , इस लिये सजदे को तूल देना पड़ा। हकीम तिरमिजी़ और निसाई व अबू दाऊद ने लिखा है कि आं हज़रत (स अ व व ) एक दिन महवे ख़ुत्बा थे कि हसनैन (अ.स.) आ गये और हसन (अ.स.) के पांव अबा के दामन में इस तरह उलझे कि ज़मीन पर गिर पडे़ , यह देख कर आं हज़रत (स अ व व ) ने ख़ुतबा तर्क कर दिया और मिम्बर से उतर कर आग़ोश में उठा लिया और मिम्बर पर ले जा कर ख़ुत्बा शुरू फ़रमाया।(मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 223 )

इमाम हसन (अ.स.) की सरदारीए जन्नत

आले मोहम्मद (अ.स.) की सरदारी मुसल्लेमात में से है , उलेमाए इस्लाम का इस पर इत्तेफ़ाक़ है कि सरवरे कायनात (स अ व व ) ने इरशाद फ़रमाया हैःالحسن والحسین سیدا شباب اهل الجنة و ابوهما خیر منهما

हसन (अ.स.) और हुसैन (अ.स.) जवानाने बहिश्त के सरदार हैं और उनके वालिदे बुज़ुर्गवार यानी अली इब्ने अबी तालिब (अ.स.) इन दोनों से बेहतर हैं। जनाबे हुज़ैफ़ाए यमानी का बयान है कि मैंने आं हज़रत (स अ व व ) को एक दिन बहुत ही मसरूर पा कर अर्ज़ कि मौला आज इफ़राते शादमानी की क्या वजह है ? इरशाद फ़रमाया कि मुझे आज जिब्राईल ने यह बशारत दी है कि मेरे दोनों फ़रज़न्द हसन (अ.स.) व हुसैन (अ.स.) जवानाने बेहिशत के सरदार हैं और उनके वालिद अली इब्ने अबी तालिब (अ.स.) उनसे बेहतर हैं।(कन्ज़ुल आमाल जिल्द 7 पृष्ठ 107, सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 117 ) इस हदीस से इसकी भी वज़ाहत हो गई है कि हज़रत अली (अ.स.) सिर्फ़ सय्यद ही न थे बल्कि फ़रज़न्दाने सियादत के बाप थे।

जज़बाए इस्लाम की फ़रावानी

मुवर्रेख़ीन का बयान है कि एक दिन अबू सुफ़ियान हज़रत अली (अ.स.) की खि़दमत में हाज़िर हो कर कहने लगा कि आप आं हज़रत (स अ व व ) से सिफ़ारिश कर के एक ऐसा मोहायदा लिखवा दीजिए जिसके रू से मैं अपने मक़सद में कामयाब हो सकूं। आप ने फ़रमाया कि आं हज़रत (स अ व व ) जो कह चुके हैं अब उसमें बाल बराबर फ़र्क़ न होगा। उसने इमाम हसन (अ.स.) से सिफ़ारिश की ख़्वाहिश की। आपकी उम्र अगरचे उस वक़्त सिर्फ़ 4 साल की थी लेकिन आप ने उस वक़्त ऐसी र्जुअत का सबूत दिया जिसका तज़किरा ज़बाने तारीख़ पर है। लिखा है कि अबू सुफ़ियान की तलब सिफ़ारिश पर आपने दौड़ कर उसकी दाढ़ी पकड़ ली और नाक मरोड़ कर कहा कलमा ए शहादत ज़बान पर जारी करो। तुम्हारे लिये सब कुछ है। यह देख कर अमीरूल मोमेनीन (अ.स.) मसरूर हो गये।(मनाक़िबे आले अबू तालिब जिल्द 4 पृष्ठ 46 )

इमाम हसन (अ.स.) और तरजुमानी वही

अल्लामा मजलिसी तहरीर फ़रमाते हैं कि इमाम हसन (अ.स.) का यह तरीका था कि आप इन्तेहाई कम सिनी के आलम में अपने नाना पर नाज़िल होने वाली वही मन अन अपनी वालेदा माजेदा को सुना दिया करते थे। एक दिन हज़रत अली (अ.स.) ने फ़रमाया कि ऐ बिन्ते रसूल मेरा जी चाहता है कि हसन को तरजुमानीए वही खुद करते हुए देखूं और सुनूं सय्यदा (स अ व व ) ने इमाम हसन (अ.स.) के पहुँचने का वक़्त बता दिया। एक दिन अमीरल मोमेनीन (अ.स.) हसन (अ.स.) से पहले दाखि़ले ख़ाना हो गये और गोशा ख़ाना में छुप कर बैठ गए। इमाम हसन (अ.स.) हसबे मामूल तशरीफ़ लाये और मां की आग़ोश में बैठ कर वही सुनानी शुरू कर दी , लेकिन थोड़ी देर के बाद अर्ज़ कि , ‘‘ या अमाह क़द तलजलज लेसानी व कुल बयानी लाअल सय्यदी यरानी ’’ मादरे गेरामी आज वही तरजुमानी में लुक़नत और बयाने मक़सद में रूकावट हो रही है मुझे ऐसा मालूम होता है कि जैसे मेरे बुजु़र्ग मोहतरम मुझे देख रहे हों। यह सुन कर हज़रत अमीरल मोमेनीन (अ.स.) ने दौड़ कर इमाम हसन (अ.स.) को आग़ोश में उठा लिया और बोसा देने लगे।(बेहारूल अनवार जिल्द 10 पृष्ठ 193 )

हज़रत इमाम हसन (अ.स.) का बचपन में लौहे महफ़ूज़ का मुतालेआ करना।

इमाम बुख़ारी रक़म तराज़ हैं कि एक दिन कुछ सदक़े की खजूरें आईं हुई थीं इमाम हसन (अ.स.) इसके ढेर से खेल रहे थे और खेल ही के तौर पर इमाम हसन (अ.स.) ने दहने अक़दस में रख ली , यह देख कर आं हज़रत (स अ व व ) ने फ़रमाया , ऐ हसन क्या तुम्हें मालूम नहीं है कि हम लोगों पर सदक़ा हराम है।(सही बुखारी पारा 6 पृष्ठ 25 )

हज़रत हुज्जतुल इस्लाम शहीदे सालिस का़ज़ी नूर उल्लाह शूशतरी फ़रमाते हैं कि इमाम पर अगरचे वही नाज़ील नहीं होती लेकिन उसको इल्हाम होता है और वह लौहे महफ़ूज़ का मुतालेआ करता है जिस पर अल्लामा इब्ने हजरे असक़लानी का वह क़ौल दलालत करता है जो उन्होंने सही बुखा़री की इस रवायत की शरह में लिखा है जिसमें आं हज़रत (स अ व व ) ने इमाम हसन (अ.स.) के शीरख़्वारगी के आलम में सदक़े की खजूर के मुंह में रख लेने पर ऐतेराज़ फ़रमाया था। ‘‘ कख़ कख़ अमा ताअलम अनल सदक़तः अलैना हराम ’’ थूकू थूकू क्या तुम्हें मालूम नहीं कि हम लोगों पर सदक़ा हराम है और जिस शख़्स ने यह ख़्याल किया कि इमाम हसन (अ.स.) उस वक़्त दूध पीते थे , आप पर अभी शरई पाबन्दी न थी आं हज़रत (स अ व व ) ने उन पर क्यों एतेराज़ किया। इसका जवाब अल्लामा असक़लानी ने अपनी फ़तेह अलबारी शरह सही बुखा़री में दिया है कि इमाम हसन (अ.स.) और दूसरे बच्चे बराबर नहीं हो सकते। क्यों कि ‘‘انا الحسن یتلالع لوح المحفوظ ’’ इमाम हसन (अ.स.) शीर ख़्वारगी के आलम में भी लौहे महफ़ूज़ का मुतालेआ किया करते थे।(हक़ाएक़ुल हक़ पृष्ठ 127 )

ख़लीफ़ाए अव्वल को मिम्बरे रसूल (स अ . व . व . ) से उतरने का हुक्म

अल्लामा इब्ने हसर और इमामे सियूती रक़मतराज़ हैं कि इमाम हसन (अ.स.) एक दिन मस्जिदे रसूल (स अ व व ) से गुज़रे। आपने देखा कि हज़रत अबू बक्र मिम्बरे रसूल (स अ व व ) पर बैठे हुये है आप से रहा न गया और आप मिम्बर के क़रीब तशरीफ़ ले जा कर फ़रमाने लगेانزل ممنر ابی

मेरे बाप के मिम्बरे से उतर आओ , यह तुम्हारे बैठने की जगह नहीं है , यह सुन कर वह मिम्बर से उतर आये और इमाम हसन (अ.स.) को अपनी आग़ोश में बैठा लिया।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 105, तारीलख अल ख़ोल्फ़ा पृष्ठ 55, रियाज़ुन नज़रा पृष्ठ 128 )

इमाम हसन (अ.स.) का बचपन और मसाएले इल्मिया

यह मुसल्लेमात से है कि हज़रात आइम्मा ए मासूमीन (अ.स.) को इल्मे लदुन्नी हुआ करता था। वह दुनिया में तहसीले इल्म के मोहताज नहीं हुआ करते थे। यही वजह है कि वह बचपन में ही ऐसे मसाएले इल्मिया से वाक़िफ़ होते थे जिनसे दुनिया के आम उलेमा अपनी ज़िन्दगी के आख़री उम्र तक बे बहरा रहते थे। इमाम हसन (अ.स.) जो ख़ानवादाए रिसालत की एक फ़र्द अकमल और सिलसिले असमत की एक मुस्तहकम कड़ी थे कि बचपन के हालात व वाक़ेयात देखे जायें तो मेरे दावे का सबूत मिल सकेगा।

पहला वाकिआ

मनाक़िब इब्ने शहरे आशोब में ब हवाले शरह अख़बारे क़ाज़ी नोमान मरक़ूम है कि एक सायल हज़रत अबू बक्र की खि़दमत में आया और उसने सवाल किया कि मैंने हालाते अहराम में शुतर मुर्ग़ के चन्द अन्डे भून कर खा लिये हैं बताइये कि मुझ पर क्या कफ़्फ़ारा वाजिब उल अदा हुआ ? सवाल का जवाब चूंकि उनके बस का न था , इस लिये अरक़े निदामत पेशानिये खि़लाफ़त पर आ गया। इरशाद हुआ कि इसे अब्दुल रहमान बिन औफ़ के पास ले जाओ। जो उनसे सवाल दोहराया तो वह भी ख़ामोश हो गये और कहा कि इसका हल तो अमीरल मोमेनीन (अ.स.) कर सकते हैं। साएल हज़रत अली (अ.स.) की खिदमत में लाया गया। आपने साएल से फ़रमाया कि मेरे दो छोटे बच्चे जो सामने नज़र आ रहे हैं उनसे दरयाफ़्त कर ले। साएल इमामे हसन (अ.स.) की तरफ़ मुतवज्जे हुआ और मसला दोहराया , इमामे हसन (अ.स.) ने जवाब दिया कि तूने जितने अन्डे खाए हैं उतनी ही ऊंटनियां ले कर उन्हें हामेला करा और उन से जो बच्चे पैदा हों उन्हें राहे ख़ुदा में हदियाए खा़ना काबा कर दे। अमीरल मोमेनीन (अ.स.) ने हंस कर फ़रमाया कि बेटा जवाब तो बिल्कुल सही है लेकिन यह तो बताओ कि क्या ऐसा नहीं है कि कुछ हमल ज़ाया हो जाते हैं और कुछ बच्चे मर जाते हैं। अर्ज़ कि बाबा जान बिल्कुल दुरूस्त है , मगर ऐसा भी तो होता है कि कुछ अन्डे भी ख़राब और गन्दे निकल जाते हैं। यह सुन कर साएल पुकार उठा कि एक मरतबा अपने अहद में सुलैमान बिन दाऊद ने भी यही जवाब दिया था जैसा कि मैंने अपनी किताबो में देखा है।

दूसरा वाकिआ

एक रोज़ अमीरल मोमेनीन (अ.स.) मक़ामे रहबा में तशरीफ़ फ़रमा थे और हसनैन (अ.स.) वहां मौजूद थे , नागाह एक शख़्स आ कर कहने लगा कि मैं आपकी रियाया और अहले बलद(शहरी) हूं। हज़रत ने फ़रमाया कि तू झूठ बोलता है , तू न तो मेरी रियाया में से है और न मेरे शहर का शहरी है , बल्कि तू बादशाहे रोम का फ़रसतादा है। तुझे उसने माविया के पास चन्द मसाएल दरयाफ़्त करने के लिये भेजा था और उसने मेरे पास भेज दिया है। उसने कहा या हज़रत आपका इरशाद बिल्कुल बजा है मुझे माविया ने पोशीदा तौर पर आपके पास भेजा है और इसका हाल ख़ुदा वन्दे आलम के सिवा किसी को मालूम नहीं है , मगर आप बा इल्मे इमामत समझ गये। आप ने फ़रमाया की अच्छा अब इन मसाएल के जवाबात इन दो बच्चों में से किसी एक से भी पूछ ले। यह इमाम हसन (अ.स.) की तरफ़ मुतवज्जे हो कर चाहता था कि सवाल करे कि इमाम हसन (अ.स.) ने फ़रमाया कि ऐ शख़्स तू यह दरियाफ़्त करने आया है कि , 1. हक़ो बातिल में कितना फ़ासला है ?, 2. ज़मीन व आसमान तक कितनी मसाफ़त है ?, 3. मशरिक़ व मग़रिब में कितनी दूरी है ?. 4. का़ैस क़ज़ा क्या चीज़ है ?, 5. मख़नस किसे कहते हैं ?, 6. वह दस चीज़ें क्या हैं जिनमें से हर एक को ख़ुदा वन्दे आलम ने दूसरे से सख़्त और फ़ाएक़ पैदा किया है ?.

सुन हक़ व बातिल में चार अंगुश्त का फ़र्क़ व फ़ासला है। अक्सर व बेशतर जो कुछ आंख से देखा है और जो कुछ कान से सुना व बातिल है। (आंख से देखा हुआ यक़ीनी , कान से सुना हुआ मोहताजे तहक़ीक़) ज़मीन और आसमान के दरमियान इतनी मसाफ़त है कि मज़लूम की आह और आंख की रौशनी पहुँच जाती है। मशरिक़ व मग़रिब में इतना फ़ासला है कि सूरज एक दिन में तय कर लेता है और कौसे क़ज़ा असल में कौसे ख़ुदा है। इस लिये कि क़ज़ह शैतान का नाम है। यह फ़रावनी रिज़्क़ और अहले ज़मीन के लिये ग़र्क़ से अमान की अलामत है इस लिये अगर यह ख़ुश्की में नमूदार होती है तो बारिश के अलामात से समझी जाती है और बारिश में निकलती है तो ख़त्मे बारान की अलामात में से शुमार की जाती है। मुख़न्नस वह है जिसके मुताअल्लिक़ यह मालूम न हो कि वह मर्द है या औरत और जिसके जिस्म में दोनों के आज़ा हों। इसके हुक्म यह है कि ता हदे बुलूग़ इन्तेज़ार करे , अगर मोहतलिम हो तो मर्द और हायज़ हो और पिस्तान उभर आयें तो औरत। अगर इससे मसला हल न हो तो देखना चाहिये कि उसके पेशाब की धार सीधी जाती है कि नहीं , अगर वह सीधी जाती है तो मर्द वरना औरत। और वह दस चीज़ें जिनमें से एक दूसरे पर ग़ालिब व क़वी हैं वह यह हैं कि ख़ुदा ने सब से ज़्यादा सख़्त पत्थर को पैदा किया है मगर इस से ज़्यादा सख़्त लौहा है जो पत्थर को भी काट देता है , उससे ज़्यादा सख़्त क़वी आग है जो लोहे को पिघला देती है और आग से ज़्यादा सख़्त क़वी पानी है जो आग को बूझा देता है और इससे ज़्यादा सख़्त क़वी अब्र है जो पानी को अपने कंधों पर उठाए फिरता है और उससे ज़्यादा क़वी हवा है जो अब्र को उड़ाये फिरती है और हवा से ज़्यादा सख़्त व क़वी फ़रिश्ता है जिसकी हवा महकूम है और उससे ज़्यादा सख़्त व क़वी मलकुल मौत है जो फ़रिशताए बाद की भी रूह क़ब्ज़ कर लेंगे और मलकुल मौत से भी ज़्यादा सख़्त व क़वी मौत है जो मलकुल मौत को भी मात डालेगी और मौत से भी ज़्यादा सख़्त क़वी हुक्मे ख़ुदा है। यह जवाबात सुन कर साएल फ़ड़क उठा।

तीसरी वाकिआ

हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) से मनक़ूल है कि एक मरतबा लोगों ने देखा कि एक शख़्स के हाथ में खून आलूदा छुरी है और उसी जगह एक शख़्स ज़ब्ह किया हुआ पड़ा है। जब उससे पूछा गया कि तूने उसे क़त्ल किया है तो उसने कहा हां। लोग उसे जसदे मक़तूल समेत जनाबे अमीरल मोमेनीन (अ.स.) की खि़दमत में चले। इतने में एक शख़्त दौड़ता हुआ आया और कहने लगा कि इसे छोड़ दों , इस मक़तूल का क़ातिल मैं हूँ। उन लोंगों ने उसे भी साथ ले लिया और हज़रत के पास ले गये। सारा क़िस्सा बयान किया गया। आपने पहले शख़्स से पूछा कि जब तू इसका क़ातिल नहीं था तो क्या वजह है कि अपने को इस का क़ातिल बयान किया। उसने कहा मौला मैं क़स्साब हूँ। गोसफ़न्द ज़ब्ह कर रहा था कि मुझे पेशाब की हाजत हुई। इस तरह ख़ून आलूदा छुरी लिये हुये उस ख़राबे में चला गया , वहां देखा की वह मक़तूल ताज़ा ज़िब्हा किया हुआ पड़ा है , इतने में लोग आ गये और मुझे पकड़ लिया। मैंने यह ख़्याल करते हुये कि इस वक़्त जब कि क़त्ल के सारे क़राएन मौजूद हैं मेरे इन्कार को कौन बावर करेगा। मैंने इक़रार कर लिया। फिर आपने दूसरे से पूछा कि तू इसका क़ातिल है ? उसने कहा जी हंा मैं ही उसे क़त्ल कर के चला गया था। जब देखा कि एक क़स्साब की ना हक़ जान चली जायेगी , तो हाज़िर हो गया। आपने फ़रमाया मेरे फ़रज़न्द हसन को बुलाओ वही इस मक़सद का फ़ैसला सुनायेंगे। इमाम हसन (अ.स.) आये सारा क़िस्सा सुना। फ़रमाया दोनों को छोड़ दो यह क़स्साब बे कु़सूर है और यह शख़्स अगरचे का़तिल है मगर उसने एक नफ़्स को क़त्ल किया तो दूसरे नफ़्स (क़स्साब) को बचा कर उसे हयात दी और उसकी जान बचा ली , और हुक्मे क़ुरआन है कि ! ‘‘ मन अययाहा फ़ाक़ानमा अहया अन्नास जमीअन ’’ जिसने एक नफ़्स की जान बचाई उसने गोया तमाम लोगों की जान बचाई। लेहाज़ा उस मक़तूल का ख़ून बहा बैतुलमाल से दे दिया जाये।

चौथा वाकिआ

अली इब्ने इब्राहीम क़ुम्मी ने अपनी तफ़सीर मे लिखा कि शाहे रोम ने जब हज़रत अली (अ.स.) के मुक़ाबले में माविया की चीरा दस्तियों से आगाही हासिल की तो दोनों को लिखा कि मेरे पास एक एक नुमाइन्दा भेज दें। हज़रत अली (अ.स.) की तरफ़ से इमाम हसन (अ.स.) और माविया की तरफ़ से यज़ीद की रवानगी अमल में आई। यज़ीद ने वहां पहुँच कर शाहे रोम की दस्त बोसी की और इमाम हसन (अ.स.) ने जाते ही कहा कि ख़ुदा का शुक्र है मैं यहूदी , नसरानी , मजूसी वग़ैरा नहीं हूँ बल्कि ख़ालिस मुसलमान हूँ। शाहे रोम ने चन्द तसावीर निकालीं। यज़ीद ने कहा कि मैं इन में से एक को भी नहीं पहचानता और न बता सकता हूं कि यह किन हज़रात की शक्लें हैं। हज़रत इमाम हसन (अ.स.) ने , हज़रत आदम (अ स ) , हज़रत नूह (अ स ) , हज़रत इब्राहीम (अ.स.) और शुऐब (अ.स.) व याहीया (अ.स.) की तसवीरें देख कर शक्लें पहचान लीं और एक तसवीर देख कर आप रोने लगे। बादशाह ने पूछा यह किसी तसवीर है ? फ़रमाया मेरे जद्दे नामदार की। इसके बाद बादशाह ने सवाल किया कि वह कौन से जान दार हैं जो अपनी मां के पेट से पैदा नहीं हुए ? आपने फ़रमाया कि ऐ बादशाह , वह सात 7 जानदार हैं। 1. आदम , 2. हव्वा , 3. दुम्बाए इब्राहीम , 4. नाक़ा ए सालेह , 5. इबलीस , 6. मुसवी अज़दहा , 7. वह कव्वा जिसने क़ाबील की दफ़्ने हाबील की तरफ़ रहबरी की। बादशाह ने यह तबह्हुरे इल्मी देख कर बड़ी इज़्ज़त की और ताहएफ़ के साथ वापस किया।

इमाम हसन (अ.स.) और तफ़सीरे क़ुरआन

अल्लामा इब्ने तल्हा शाफ़ेई बा हवाला ए तफ़सीर वसीत वाहिदी लिखते हैं कि एक शख़्स ने इब्ने अब्बास और इब्ने उमर से एक आयत से मुताअल्लिक़ ‘‘ शाहिद व मशहूद ’’ के मानी दरयाफ़्त किये। इब्ने अब्बास ने शाहिद से यौमे जुमा और मशहूद से यौमे अरफ़ा बताया और इब्ने उमर ने यौमे जुमा और यौमुल नहर कहा। इसके बाद वह शख़्स इमाम हसन (अ.स.) के पास पहुँचा। आपने शाहिद से रसूले ख़ुदा (स अ व व ) और मशहूद से यौमे क़यामत फ़रमाया और दलील से आयत पढ़ी। 1. ‘‘ या अय्योहन नबी अना अरसलनाका शाहिदो मुबशशिरो नज़ीरा ’’ ऐ नबी हम ने तुम को शाहिदो मुबशशिर और नज़ीर बना कर भेजा। 2. ‘‘ ज़ालेका यौमे मजमूआ लहा अन्नास व ज़ालेका यौमे मशहूद ’’ क़यामत का वह दिन होगा , जिसमें तमाम लोग एक मक़ाम पर जमा कर दिये जायेंगे और यही यौमे मशहूर है। साएल ने सब के जवाब सुन्ने के बाद कहा ‘‘ फ़काना का़ैल अल हसन अहसन ’’ इमाम हसन (अ.स.) का जवाब दोनों से कहीं बेहतर है।(मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 225 )

इमाम हसन (अ.स.) की साया ए रहमत से महरूमी

मुवर्रेख़ीन का बयान है कि इमाम हसन (अ.स.) की उम्र जब सात 7 , साल पांच 5 , माह और तेरह 13 दिन की हुई तो आपके सर से रहमतुल लिल आलेमीन का साया 28 सफ़र 11 हिजरी को उठ गया। अभी आप नाना का सोग मनाने से फ़राग़त हासिल न कर सके थे कि 3 जमादिउस्सानी 11 हिजरी को आपकी वालेदा माजेदा हज़रत फ़ात्मा ज़हरा (स अ व व ) ने भी इन्तेक़ाल फ़रमाया। इस गाम बालाए ग़म ने इमाम हसन (अ.स.) को बे इन्तेहा सदमा पहुँचाया।

मुशहबेहते रसूल (स अ व व )

अल्लामा अली मुत्तक़ी तहरीर फ़रमाते हैं कि हज़रते अली (अ.स.) फ़रमाया करते थे कि हसन रसूले करीम (स. अ.) की शक्लो शबाहत से बहुत ज़्यादा मुशाबेह है। अनस बिने मालिक का बयान है कि इमाम हसन (अ.स.) के जिस्म का निस्फ़ बालाई हिस्सा रसूल अल्लाह (स अ व व ) से और निस्फ़ हिस्सा ज़ेरी अमीरल मोमेनीन (अ.स.) से मुशाबेहत है।

एक रवायत में है कि आं हज़रत (स अ व व ) फ़रमाया करते थे कि हसन में ख़ुदा ने हैबत और सरदारी और हुसैन में जुर्रत व हिम्मत वदीअत की है।(कन्ज़ुल आमाल जिल्द 7 पृष्ठ 107 )

इमाम हसन (अ.स.) की इबादत

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) फ़रमाते हैं कि इमाम हसन (अ.स.) ज़बरदस्त आबिद बेमिसाल ज़ाहिद , अफ़ज़ल तरीन आलिम थे। आप ने जब भी हज फ़रमाया पैदल फ़रमाया। कभी कभी पा बरहैना हज को जाते थे। आप अकसर मौत , अज़ाबे क़ब्र , सिरात और बेअसत व नशूर को याद कर के रोया करते थे। जब आप वज़ू करते थे तो आपके चेहरे का रंग ज़र्द हो जाया करता था और जब नमाज़ के लिये खड़े होते थे तो बेद की मिस्ल कांपने लगते थे। आपका मामूल था कि जब दरवाज़ए मस्जिद पर पहुँचते तो खुदा को मुख़ातिब करके कहते , मेरे पालने वाले तेरा गुनाहगार बन्दा तेरी बारगाह में आया है ऐ रहमानों रहीम अपनी अच्छाईयों के सदक़े में मुझ जैसे बुराई करने वाले को माफ़ कर दे। आप जब नमाज़े सुबह से फ़ारिग़ होते थे तो उस वक़्त तक वजा़एफ़ में मशगू़ल रहते थे जब तक सूरज तुलू न हो जाये।(रौज़ातुल वाएज़ीन व बेहारूल अनवार)

आपका ज़ोहद

इमाम शाफ़ेई लिखते हैं कि इमाम हसन (अ.स.) ने अक्सर अपना सारा माल राहे ख़ुदा में तक़सीम कर दिया और बाज़ मरतबा निस्फ़ माल तक़सीम फ़रमाया। वह अज़ीम ज़ाहिदो परहेज़गार थे।

आपकी सख़ावत

मुवर्रेख़ीन लिखते हैं कि एक शख़्स ने हज़रत इमाम हसन (अ.स.) से कुछ मांगा। दस्त सवाल दराज़ होना था कि आपने 50,000 (पचास हज़ार) दिरहम और 500 (पांच सौ) अशर्फि़यां दे दीं और फ़रमाया कि मज़दूर ला कर इसे उठा ले जा। इसके आपने मज़दूर की मज़दूरी में अपना चोग़ा बख़्श दिया।(मरातुल जनान 123 ) एक मरतबा आपने एक साएल को ख़ुदा से दुआ करते हुए सुना , ख़ुदाया मुझे दस हज़ार दिरहम अता फ़रमा। आपने घर पहुँच कर मतलूबा रक़म भिजवा दी।(नूरूल अबसार पृष्ठ 122 )

आपसे किसी ने पूछा कि आप तो फ़ाक़ा करते हैं लेकिन साएल को महरूम वापस नहीं फ़रमाते। इरशाद फ़रमाया कि मैं खु़दा से मांगने वाला हूँ उसने मुझे देने की आदत डाल रखी है , और मैंने लोगों को देने की आदत डाली है। मैं डरता हूँ कि अगर अपनी आदत बदल दूं तो कहीं ख़ुदा भी अपनी आदत न बदल दे और मुझे भी महरूम कर दे।(सफ़ा 123 )

तवक्कुल के मुताअल्लिक़ आपका इरशाद

इमामे शाफ़ेई का बयान है कि किसी ने इमाम हसन (अ.स.) से अर्ज़ की कि अबूज़रे ग़फ़्फ़ारी फ़रमाया करते थे कि मुझे तवंगरी से ज़्यादा नादारी और सेहत से ज़्यादा बीमारी पसन्द है। आपने फ़रमाया कि ख़ुदा अबू ज़र पर रहम करे उनका कहना दुरूस्त है लेकिन मैं तो कहता हूँ कि जो शख़्स के क़ज़ा व क़द्र पर तवक्कल करे वह हमेशा इसी चीज़ को पसन्द करेगा जिसे खु़दा उसके लिये पसन्द करे।(मरातुल जेना जिल्द 1 पृष्ठ 125 )


इमाम हसन (अ.स.) हिल्म और अख़्लाक़ के मैदान में

अल्लामा इब्ने शहरे आशोब तहरीर फ़रमाते हैं कि एक दिन हज़रत इमाम हसन (अ.स.) घोड़े पर सवार कहीं तशरीफ़ लिये जा रहे थे , रास्ते में माविया के तरफ़दारों का एक शामी सामने आ पड़ा। उसने हज़रत को गालियां देनी शुरू कर दी। आपने उसका मुतलक़न कोई जवाब न दिया। जब वह अपनी जैसी कर चुका तो आप उसके क़रीब गये और उसको सलाम कर के फ़रमाया कि भाई शायद तू मुसाफ़िर है , सुन अगर तुझे सवारी की ज़रूरत हो , तो मैं तुझे सवारी दे दूं। अगर तू भूखा हो तो खाना खिला दूं। अगर तुझे कपड़े दरकार हों तो कपड़े दे दूं। अगर तुझे रहने को जगह चाहिये तो मकान का इन्तेज़ामक र दूं। अगर दौलत की ज़रूरत है तो तुझे इतना दे दूं कि तू ख़ुश हाल हो जाये। यह सुन कर शामी बे इन्तेहा शरमिन्दा हुआ और कहने लगा कि मैं गवाही देता हूँ कि आप ज़मीने ख़ुदा पर ख़लीफ़ा हैं। मौला मैं तो आपको और आपके बाप दादा के सख़्त नफ़रत और हिक़ारत की नज़र से देखता था लेकिन आज आपके इख़्लाक़ ने मुझे आपका गिरवीदा बना दिया। अब मैं आपके क़दमों से दूर न जाऊंगा और ता हयात आपकी खि़दमत में रहूँगा।(मुनाक़िब जिल्द 4 पृष्ठ 53 व कामिल मबरूज 2 पृष्ठ 86 )

एहसान का बदला एहसान

अबुल हसन मदाईनी का बयान है कि एक मरतबा इमाम हसन (अ स ) , इमाम हुसैन (अ.स.) और अब्दुल्लाह बिन जाफ़रे तय्यार हज को जाते हुए भूख और प्यास की हालत में एक ज़ईफ़ा के झोपड़े में जा पहुँचे और उससे खाने पीने की चीज़ तलब फ़रमाई। उसने अर्ज़ की कि मेरे पास एक बकरी है उसका दूध दूह कर प्यास बुझाई जा सकती है , उन्होंने दूध पी लिया लेकिन गुरसनगी से तसल्ली न हुई तो उससे फ़रमाया कि कुछ खाने का बन्दो बस्त भी हो सकता है। उसने कहा मेरे पास तो बस यही एक बकरी है लेकिन मैं क़सम देती हूँ कि आप इसे ज़ब्ह कर के तनावुल फ़रमा लें। बकरी ज़ब्ह की गई गोश्त भूना गया और सब ने खा लिया और इसके बाद क़दरे आराम कर के वह लोग रवाना हो गये। जब शाम को उसका शौहर आया तो उस औरत ने सारा वाक़िया सुनाया। शौहर ने पूछा वह कौन लोग थे ? कहा मालूम नहीं , जाते वक़्त यह कहा था कि हम मदीने के रहने वाले है। शौहर ने कहा ख़ुदा की बन्दी यह तो बता कि अब हमारा गुज़ारा किस तरह होगा। ग़रज़ कि थोड़े ही अरसे में उन लोगों को क़हत का सामना करना पड़ा और यह सख़्त मुसिबतों में मुब्तिला हो कर भीख मांगते हुए मदीने जा पहुँचे। एक गली से गुज़र रहे थे कि नागाह इमाम हसन (अ.स.) की निगाह उस औरत पर जा पड़ी। आप ने उसे बुलवा कर बकरी वाला वाक़िया याद दिलाया और उसको एक हज़ार बकरियां और एक हज़ार अशर्फि़यां इनायत फ़रमा दीं और उसे इमाम हुसैन (अ.स.) की खि़दमत में भेज दिया , उन्होंने भी उसे इसी क़द्र बकरियां वग़ैरा अता फ़रमाई फिर अब्दुल्लाह इब्ने जाफ़र को इत्तेला दी गई उन्होंने भी उसी के लगभग उसे दे दिया। वह माला माल हो कर अपने घर वापस चली गई।(नूरूल अबसार पृष्ठ 121 व मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 229 )

अहदे अमीरल मोमेनीन (अ.स.) में इमाम हसन (अ.स.) की इस्लामी खि़दमात

तवारीख़ में है कि जब हज़रत अली (अ.स.) को पच्चीस बरस की ख़ाना नशीनी के बाद मुसलमानों ने ख़लीफ़ाए ज़ाहिरी की हैसियत से तसलीम किया और उसके बाद जमल , सिफ़्फ़ीन और नहरवान की लड़ाईयां हुईं तो हर एक जेहाद में इमाम हसन (अ.स.) अपने वालिदे बुज़ुर्गवार के साथ साथ ही नहीं रहे बल्कि बाज़ मौक़ों पर जंग में आपने कारहाय नुमायां भी किये। सैरूल सहाबा और रौज़ातुल पृष्ठ में है कि जंगे सिफ़्फ़ीन के सिलसिले में जब अबू मूसा अशअरी की रेशा दवानियां उरयां हो चुकीं तो अमीरल मोमेनीन (अ.स.) ने इमाम हसन (अ.स.) और अम्मारे यासीर को कूफ़ा रवाना फ़रमाया। आपने जामए कूफ़ा में अबू मूसा के अफ़सून को अपनी तक़रीर के तिरयाक़ से बे असर बना दिया और लोगों को हज़रत अली (अ.स.) के साथ जाने पर आमादा किया। अख़बार अल तवाल की रवायत की बिना पर नौ हज़ार छः सौ पचास (9650) का लशकर तय्यार हो गया।

मुवर्रेख़ीन का बयान है कि जंगे जमल के बाद जब आयशा मदीने जाने पर आमादा न हुईं तो हज़रत अली (अ.स.) ने इमामे हसन (अ.स.) को भेजा और उन्होंने समझा बुझा कर मदीने रवाना किया चुनान्चे वह इस सई मम्दूह में कामयाब हो गये। बाज़ तारीखो में है कि इमाम हसन (अ.स.) जंगे जमल व सिफ़्फ़ीन में अलमदारे लशकर थे और आपने मोहायदए तहकीम पर दस्तख़त फ़रमाये थे और जंगे जमल व सिफ़्फ़ीन और नहरवान में भी सई बलीग़ की थी। फ़ौजी कामों के अलावा आपके सिपुर्द सरकारी मेहमान ख़ाने का इन्तेज़ाम और शाही मेहमानों की मदारात का काम भी था। आप मुक़दमात के फ़ैसले भी करते थे और बैतुल माल की निगरानी भी फ़रमाते थे।

हज़रत अली (अ.स.) की शहादत और इमाम हसन (अ.स.) की बैयत

मवर्रेख़ीन का बयान है कि इमाम हसन (अ.स.) के वालिदे बुज़ुर्गवार हज़रत अली (अ.स.) के सरे मुबारक पर बा मक़ामे मस्जिदे कूफ़ा 19 रमज़ान , 40 हिजरी बा वक़्ते सुबह अमीरे माविया की साज़िश से अब्दुल रहमान इब्ने मुल्जिम मुरादी ने ज़हर में बुझी हुई तलवार लगाई। जिसके सदमे से आपने 21 रमज़ानुल मुबारक 40 हिजरी बा वक़्ते सुबह शहादत पाई। इस वक़्त इमाम हसन (अ.स.) की उम्र 38 साल 6 यौम की थी। हज़रत अली (अ.स.) की तदफ़ीन व तकफ़ीन के बाद अब्दुल्लाह अब्ने अब्बास की तहरीक से बक़ौल इब्ने असीर क़ैस इब्ने सआद इबादा अन्सारी ने इमामे हसन (अ.स.) की बैयत की और उनके बाद तमाम हाज़ेरीन ने बैयत कर ली जिनकी तादाद 40,000 (चालीस हज़ार) थी। यह वाके़या 21 रमज़ान 40 हिजरी यौमे जुमा का है। किफ़ाएतुल अस्र अल्लामा मजलिसी में है कि इस वक़्त आपने एक फ़सीह व बलीग़ ख़ुतबा पढ़ा। जिसमें आपने हम्दो सना के बाद 12 इमामों की खि़लाफ़त का ज़िक्र फ़रमाया और इसकी वज़ाहत की कि आं हज़रत (स अ व व ) ने फ़रमाया है कि हम में हर एक या तलवार के घाट उतरेगा या ज़हरे दग़ा से शहीद होगा। इसके बाद आपने ईराक़ , ईरान , ख़ुरासान , हिजाज़ और यमन व बसरा वग़ैरा के अम्माल की तरफ़ तवज्जो की और अब्दुल्ला इब्ने अब्बास को बसरा का हाकिम मुक़र्रर फ़रमाया। माविया को ज्योही ख़बर पहुँची तो बसरे के हाकिम इब्ने अब्बास मुक़र्रर कर दिये गये हैं तो उसने दो जासूस रवाना किये , एक क़बीलए हमीर , कूफ़े की तरफ़ और दूसरा क़बीलए क़ीन का बसरे की तरफ़। इसका मक़सद यह था कि लोग इमाम हसन (अ.स.) से मुनहरिफ़ हो कर मेरी तरफ़ आ जायें लेकिन वह दोनों जासूस गिरफ़्तार कर लिये गये और उन्हें बाद में क़त्ल कर दिया गया।

हक़ीक़त है कि जब ऐनाने हुकुमत इमाम हसन (अ.स.) के हाथों में आई तो ज़माना बड़ा पुर आशोब था। हज़रत अली (अ.स.) जिनकी शुजाअत की धाक सारे अरब में बैठी हुई थी दुनियां से कूच कर चुके थे। उनकी दफ़ातन शहादत ने सोये हुये फ़ितनों को बेदार कर दिया था और सारी ममलकत में साज़िशों की खिचड़ी पक रही थी। ख़ुद कूफ़े में अशअस इब्ने क़ैस , उमर बिने हरीस , शीस इब्ने रबई वग़ैरा खुल्लम खुल्ला बर सरे अनाद और आमादए फ़साद नज़र आते थे। माविया ने जा बजा जासूस मुक़र्रर कर दिये थे जो मुसलमानों में फूट डलवाते और हज़रत के लश्कर में इख़्तेलाफ़ो इफ़तेराक़ का बीज बोते थे। उसने कूफ़े के बडे़ बड़े सरदारों से साज़िशी मुलाक़ातें कीं और बड़ी बड़ी रिश्वतें दे कर उन्हें तोड़ लिया। बेहारूल अनवार में एल्लश्शराए के हवाले से मन्क़ूल है कि माविया ने उमर बिने हरीस , अशअस बिने क़ैस , हजर इब्नुल हजर शीश इब्ने रबई के पास अलाहेदा अलाहेदा यह पैग़ाम भेजा कि जिस तरह हो सके हसन इब्ने अली को क़त्ल करा दो , जो मनचला यह काम कर गुज़रेगा उसे दो लाख दिरहम नग़द इनाम दूँगा और फ़ौज की सरदारी अता करूगां और अपनी किसी लड़की से शादी कर दूंगा। यह इनाम हासिल करने के लिये लोग शबो रोज़ मौक़े की तलाश में रहने लगे। हज़रत को इत्तेला मिली तो आपने कपड़ों के नीचे ज़िरह पहनना शुरू कर दी। यहां तक की नमाज़े जमाअत पढ़ाने के लिये बाहर निकलते तो ज़िरह पहन कर निकलते थे। माविया ने एक तरफ़ तो ख़ुफ़िया तोड़ जोड़ किये , दूसरी तरफ़ एक बड़ा लशकर ईराक़ पर एक बड़ा हमला करने के लिये भेज दिया। जब हमला आवर लश्कर हुदूदे ईराक़ में दूर तक आगे बढ़ आया तो हज़रत ने अपने लशकर को हरकत करने का हुक्म दिया। हजर इब्ने अदी को थोड़ी सी फ़ौज के साथ आगे बढ़ने के लिये फ़रमाया। आपके लश्कर में भीड़ भाड़ तो ख़ासी नज़र आने लगी थी मगर सरदार जो सिपाहीयों को लडा़ते हैं कुछ तो माविया के हाथ बिक चुके थे , कुछ आफ़ियत पोशी में मसरूफ़ थे। हज़रत अली (अ.स.) की शहादत ने दोस्तों के हौसले पस्त कर दिये थे और दुशमनों को जुरअतो हिकमत दिला दी थी।

मुवर्रेख़ीन का बयान है कि माविया 60,000 (साठ हज़ार) की फ़ौज ले कर मक़ामे मकसन में जा उतरा , जो बग़दाद से दस फ़रसख़ तकरीत की जानिब अवाना के क़रीब वाक़े है। इमाम हसन (अ.स.) को जब माविया की पेश क़दमी का इल्म हुआ तो आपने भी एक बड़े लशकर के साथ कूच कर दिया और कूफ़े से साबात में जा पहुँचे और बारह हज़ार की फ़ौज क़ैस इब्ने साअद की मातहती में माविया की पेश क़दमी रोकने के लिये रवाना कर दिया फिर साबात से रवाना होते वक़्त आपने एक ख़ुतबा पढ़ा जिसमें आपने फ़रमाया कि , ‘‘ लोगों तुमने इस शर्त पर मुझ से बैयत की है कि सुलह और जंग दोनों ही हालातों में मेरा साथ दोगे। मैं ख़ुदा की क़सम खा कर कहता हूँ कि मुझे किसी शख़्स से बुग़ज व अदावत नहीं है , मेरे दिल में किसी को सताने का ख़्याल नहीं है। मैं सुलह को जंग से और मोहब्बत को अदावत से कहीं बेहतर समझता हूं।

लोगों ने हज़रत के इस खि़ताब का मतलब यह समझा कि हज़रत इमाम हसन (अ.स.) अमीरे माविया से सुलह करते की तरफ़ माएल हैं और खि़लाफ़त से दस्त बरदारी करने का इरादा दिल में रखते हैं। इसी दौरान में माविया ने इमाम हसन (अ.स.) के लशकर की कसरत से मुतास्सिर हो कर यह मशवेरा अमरे आस कुछ लोगों को इमाम हसन (अ.स.) के लशकर में और कुछ को क़ैस इब्ने साअद के लशकर में भेज कर एक दूसरे के खि़लाफ़ प्रोपेगन्डा करा दिया। इमाम हसन (अ.स.) के लशकर वाले साज़िशयों ने क़ैस के मुताअल्लिक़ यह शोहरत देनी शुरू की कि उसने माविया से सुलह कर ली है और क़ैस बिने साअद के लशकर में जो साज़िशी घुसे हुए थे उन्होंने तमाम लशकरयों में चर्चा कर दिया कि इमाम हसन (अ.स.) ने माविया से सुलह कर ली है। इमाम हसन (अ.स.) के दोनों लशकरों में इस ग़ल्त अफ़वा हके फैल जाने से बग़ावत और बद गुमानी के जज़बात उभर निकले। इमाम हसन (अ.स.) के लश्कर का वह उन्सर जिसे पहले ही से शुबह था कि माएल ब सुलह हैं यह कहने लगा कि इमाम हसन (अ.स.) भी अपने बाप हज़रत अली (अ.स.) की तरह काफ़िर हो गये हैं। बिल आखि़र फ़ौजी आपके ख़ैमे पर टूट पड़े आपका कुल असबाब लूट लिया। आपके नीचे से मुसल्ला तक खींच लिया। दोशे मुबारक पर से रिदा भी उतार ली और बाज़ नुमाया क़िस्म के अफ़राद ने इमाम हसन (अ.स.) को माविया के हवाले कर देने का प्लान तय्यार किया। आखि़र कार आप इन बद बख़्तों से मदाएन के गर्वनर साअद या सईद की तरफ़ रवाना हो गये। रास्ते में एक ख़वारजी ने जिसका नाम बा रवायतुल अख़बारूल तवाल पृष्ठ 393 , जराह बिने क़ैसा था , आपकी रान पर कमी गाह से एक ऐसा ख़न्जर लगाया जिसने हड्डी तक महफ़ूज़ न रहने दी। आपने मदाएन में मुक़ीम रह कर इलाज कराया और अच्छे हो गये। तारीख़े कामिल जिल्द 3 , पृष्ठ 161 , तारीख़े आइम्मा पृष्ठ 333 , फ़तेहुलबारी।

माविया ने मौक़ा ग़नीमत जान कर 20,000 (बीस हज़ार) का लश्कर अब्दुल्लाह इब्ने अमिर की क़यादत व मातहती में मदाएन भेज दिया। इमाम हसन (अ.स.) उससे लड़ने के लिये निकलने ही वाले थे कि उसने आम शोहरत कर दी कि माविया बहुत बड़ा लश्कर ले कर आ रहा है। मैं इमाम हसन (अ.स.) और उनके लश्कर से दरख़्वास्त करता हूं कि मुफ़त में जान न दें और सुलह कर लें। इस दावते सुलह और पैग़ामे ख़ौफ़ से लोगों के दिल बैठ गये , हिम्मते पस्त हो गईं और इमाम हसन (अ.स.) की फ़ौज भागने के लिये रास्ता ढूंढने लगी।

सुलह

मुवर्रिख़ , मआसिर अल्लामा अली नक़ी लिखते हैं कि अमीरे शाम को हज़रते इमाम हसन (अ.स.) की फ़ौज की हालत और लोगों की बेवफ़ाई का हाल मालूम हो चुका था इस लिये वह समझते थे कि इमाम हसन (अ.स.) के लिये जंग मुम्किन नहीं है मगर इसके साथ यह भी यक़ीन रखते थे कि हज़रत इमाम हसन (अ.स.) कितने ही बेबस और बेकस हों मगर अली (अ.स.) व फ़ात्मा (स अ व व ) के बेटे और पैग़म्बरे इस्लाम के नवासे हैं इस लिये वह ऐसे शराएत पर हरगिज़ सुलह न करेंगे जो हक़ परस्ती के खि़लाफ़ हों और जिनसे बातिल की हिमायत होती हो। इसको नज़र में रखते हुए उन्होंने एक तरफ़ तो आपके साथियों अब्दुल्लाह इब्ने आमिर के ज़रिये पैग़ाम दिलवाया कि अपनी जान के पीछे न पड़ो और ख़ूंरेज़ी न होनें दों इस सिलसिले में कुछ लोगों को रिशवतें भी दी गई और कुछ बुज़दिलों को अपनी तादाद की ज़्यादती से ख़ौफ़ ज़दा किया गया और दूसरी तरफ़ हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) के पास पैग़ाम भेजा कि आप जिन शराएत पर कहें उन्हीं शराएत पर सुलह के लिये तय्यार हूं।

इमाम हसन (अ.स.) यक़ीनन अपने साथियों की ग़द्दारी देखते हुए जंग करना मुनासिब न समझते थे लेकिन इसी के साथ साथ यह ज़रूर पेशे नज़र था कि ऐसी सूरत पैदा हो कि बातिल की तक़वियत का धब्बा मेरे दामन पर न आने पाये। इस ज़माने को हुकूमत व इक़तेदार की हवस तो कभी थी ही नहीं उन्हें तो मतलब इससे था कि मख़लूक़े ख़ुदा की बेहतरी हो और हुदूदे इलाही का इजरा हो। अब अमीरे माविया ने जो आप से मुंह मांगे शरायत पर सुलह करने के लिये आमदगी ज़ाहिर की तो अब मुसालेहत से इन्कार करना शख़्सी इक़तेदार की ख़्वाहिश के अलावा और कुछ नहीं क़रार पा सकता था और यह की अमीरे शाम सुलह की शरायत पर अमल न करेंगे। बात की बात थी जब तक सुलह न होती यह अंजाम सामने कहां से आ सकता था और हुज्जतें तमाम क्यों कर हो सकती थीं फिर भी आख़री जवाब देने से क़ब्ल आपने साथ वालों को जमा कर लिया और तक़रीर फ़रमाई।

आगाह रहो कि तुम में वह खूं रेज़ लडा़ईयां हो चुकि हैं जिनमें बहुत लोग क़त्ल हुए कुछ मक़तूल सिफ़्फ़ीन में हुए जिनके लिये आज तक रो रहे हो और कुछ मक़तूल नहरवान के जिनका मुआवेज़ा तलब कर रहे हो। अब अगर तुम मौत पर राज़ी हो तो हम इस पैग़ामे सुलह को क़बूल न करें और उनसे अल्लाह के भरोसे पर तलवारों से फ़ैसला करें और अगर ज़िन्दगी को अज़ीज़ रखते हो तो हम उसको क़बूल कर लें और तुम्हारी मरज़ी पर अमल करें। जवाम मे लोगों ने हर तरफ़ से पुकारना शुरू किया कि हम ज़िन्दगी चाहते हैं। आप सुलह कर लिजिये। इसी का नतीजा था कि आपने सुलह के शरायत मुरत्तब कर के मआद के पास रवाना किये।(तरजुमा इब्ने ख़ल्दून)

शराएते सुलह

इस सुलह नामे के शराएत हसबे ज़ैल थे

1. यह कि माविया हुकूमते इस्लाम में , किताबे ख़ुदा और सुन्नते रसूल (स अ व व ) पर अमल करेगे।

2. यह कि माविया को अपने बाद किसी को ख़लीफ़ा नामजद करने का हक़ न होगा।

3. यह कि शाम व ईराक़ व हिजाज़ व यमन सब जगह के लोगों के लिये अमान होगी।

4. यह कि हज़रत अली (अ.स.) के असहाब और शिया जहां भी हैं उनके जान व माल और नामूस और औलाद महफ़ूज़ रहेंगे।

5. यह कि माविया हसन इब्ने अली (अ.स.) और उनके भाई हुसैन इब्ने अली (अ.स.) ख़ानदाने रसूल (स अ व व ) में से किसी को भी कोई नुक़सान या हलाक करने की कोशिश न करेगे और न ख़ुफ़िया तौर पर और न ऐलानियां और उनमें से किसी को किसी जगह धमकाया और डराया न जायेगा।

6. यह कि जनाबे अमीरल मोमेनीन (अ.स.) की शान में कलमाते नाज़ेबा जो अब तक मस्जिदे जामा और कु़नूते नमाज़ में इस्तेमाल होते रहे हैं वह तर्क कर दिये जायें आखि़री शर्त की मंज़ूरी में माविया को उज़्र हुआ तो यह तय पाया कि कम अज़ कम जिस मौक़े पर इमाम हसन (अ.स.) मौजूद हों , उस जगह ऐसा न किया जाये। यह मुआहेदा रबीउल अव्वल या जमादिउल अव्वल 41 हिजरी को अमल में आया।

सुलह नामे पर दस्तख़त

25 रबीउल अव्वल को कूफ़े के क़रीब मुक़ामे अम्बारे में फ़रीक़ैन का इज्तेमा हुआ और सुलह नामे पर दोनों के दस्तख़त हुए और गवाहियां सब्त हुईं।(निहायतुल अरब फ़ी मारेफ़तुन निसाब अल अरब पृष्ठ 80 ) इसके बाद माविया ने अपने लिये आम बैयत का ऐलान कर दिया और साल का नाम सुन्नतुल जमाअत रखा फिर इमाम हसन (अ.स.) को ख़ुतबा देने पर मजबूर किया। आप मिम्बर पर तशरीफ़ ले गये और इरशाद फ़रमाया , ‘‘ ऐ लोगों ख़ुदाए तआला ने हम में से अव्वल के ज़रिए से तुम्हारी हिदायत की और आखि़र के ज़रिये से तुम्हें खूं रेज़ी से बचाया। माविया ने इस अम्र में मुझसे झगड़ा किया जिसका मैं इस से ज़्यादा मुस्तहक़ हूं लेकिन मैंने लोगों की खूं रेज़ी की निसबत इस अम्र का तर्क कर देना बेहतर समझा। तुम रंज व मलाल न करों कि मैंने हुकूमत इसके न अहद को दे दी , और उसके हक़ को जाय नाहक़ पर रखा मेरी नियत इस मामले में सिर्फ़ उम्मत की भलाई है। यहां तक फ़रमाने पाय थे कि माविया ने कहा बस ऐ हज़रत ज़्यादा फ़रमाने की ज़रूरत नहीं है।(तारीख़े ख़मीस जिल्द 2 पृष्ठ 325 )

तकमीले सुलह के बाद इमाम हसन (अ.स.) ने सब्र व इस्तेक़लाल व नफ़्स की बलन्दी के साथ उन तमाम नाख़ुशगवार हालात के बरदाश्त किया और मोहायदे पर सख़्ती से क़ायम रहे , मगर इधर यह हुआ कि अमीरे शाम ने जंग के ख़त्म होते ही और सियासी इक़तेदार के मज़बूत होते ही ईराक़ में दाखि़ल हो कर नख़ीले में जिसे कूफ़े की सरहद समझना चाहिये क़याम किया और जुमे के ख़ुत्बे के बाद ऐलान किया कि मेरा मक़सद जंग से यह न था कि तुम लोग नमाज़ पढ़ने लगो , रोज़े रखने लगो , हज करो या ज़कात अदा करो , यह सब तुम तो करते ही हो मेरा मक़सद तो यह था कि मेरी हुकूमत तुम पर मुसल्लम हो जाय और यह मेरा मक़सद हसन (अ.स.) के उस मुहायदे के बाद पूरा हो गया और बावजूद तुम लोगो की नगवारी के मैं कामयाब हो गया। रह गये वह शरायत जो मैंने हसन (अ.स.) के साथ किये हैं वह सब मेरे पैरों के नीचे हैं। इनका पूरा करना या न करना मेरे हाथ की बात है। यह सुन कर मजमे में एक सन्नाटा छा गया , मगर अब किस में दम था कि उसके खि़लाफ़ ज़बान खोलता।

शराएते सुलह का हशर

मुवर्रेख़ीन का इत्तेफ़ाक़ है कि अमीरे माविया जो मैदाने सियासत का खिलाड़ी और मकरो जौर की सलतनक का ताजदार था इमाम हसन (अ.स.) से वादा और मुहायदा के बाद ही सब से मुकर गया। ‘‘ वलमयफ़ लहु मावीयतालयाअ महाआहद अलैह ’’ तारीखे कामिल इब्ने असीर जिल्द 3 पृष्ठ 162 में है कि माविया ने किसी एक चीज़ की भी परवाह न की और किसी पर अमल न किया। इमाम अबुल हसन अली बिन मोहम्मद लिखते हैं कि जब माविया के लिये अमरे सलतनत उसतवार हो गया तो इस ने अपने हाकिमों को जो मुख़तलिफ़ शहरों और इलाकों़ में थे , यह फ़रमान भेजा कि अगर कोई शख़्स अबु तुराब और उसके अहले बैत की फ़ज़ीलत की रवायत करेगा तो मै उससे बरीउजि़्ज़म्मा हूं। जब यह ख़बर तमाम मुल्कों में फैल गई और लोगों को माविया का मंशा मालूम हो गया तो तमाम ख़तीबों ने मिम्बर पर से सब्बो शितम और मनक़सते अमीरल मोमेनीन पर ख़ुत्बा देना शुरू कर दिया। कूफ़े में ज़्याद इब्ने अबीहा जो कई बरस तक हज़रत अली (अ.स.) के अहद में उनके अलम में रह चुका था वह शीआने अली को अच्छी तरह से जानता था। मर्द , औरतों , जवानों और बूढ़ों से अच्छी तरह आगाह था इसे हर एक रहाईश और कोनों और गोशों में बसने वालों का पता था। इसे कूफ़े और बसरे दोनों का गर्वनर बना दिया गया था। इसके ज़ुल्म की हालत यह थी कि शियाने अली को क़त्ल करता और बाज़ों की आंखों को फोड़ देता और बाज़ों के हाथ पांव कटवा देता था। इस ज़ुल्में अज़ीम से सैकड़ों तबाह हो गये। हज़ारों जंगलों और पहाड़ों में जा छुपे। बसरे में आठ हज़ार आदमियों का क़त्ल वाक़े हुआ जिनमें बैयालिस हाफ़िज़ और क़ारीये क़ुरआन थे। इन पर मोहब्बते अली का जुर्म आयद किया गया था। हुक्म यह था कि अली (अ.स.) के बजाय उस्मान के फ़ज़ाएल बयान किये जायें और अली (अ.स.) के फ़ज़ाएल के मुताअल्लिक़ यह फ़रमान था कि एक फ़ज़ीलत के एवज़ दस दस मुनक़सत व मज़म्मत तसनीफ़ की जाए यह सब कुछ अमीरल मोमेनीन (अ.स.) से बदला लेने और यज़ीद के लिये ज़मीने खि़लाफ़त हमवार करने की ख़ातिर था।

कूफ़े से इमाम हसन (अ.स.) की मदीने को रवानगी सुलह के मराहिल तय होने के बाद इमामे हसन (अ.स.) अपने भाई इमाम हुसैन (अ.स.) और अब्दुल्लाह इब्ने जाफ़र और अपने अतफ़ाल व अयाल को ले कर मदीने की तरफ़ रवाना हो गये। तारीख़े इस्लाम मिस्टर ज़ाकिर हुसैन की जिल्द 1 पृष्ठ 34 में है कि जब आप कूफ़े से मदीना के लिये रवाना हुए तो माविया ने रास्ते में एक पैग़ाम भेजा और वह यह था कि आप ख़्वारिज से जंग करने के लिये तय्यार हो जायें क्यों कि उन्होंने मेरी बैयत होते ही फिर सर निकाला है। इमाम हसन (अ.स.) ने जवाब दिया कि अगर खूंरेज़ी मक़सूद होती तो मैं तुझ से क्यों सुलह करता। जस्टिस अमीर अली अपनी तारीख़े इस्लाम में लिखते हैं कि ख़्वारिज हज़रत अबू बक्र और हज़रत उमर को मानते और हज़रत अली (अ.स.) और उस्मान ग़नी को नहीं तसलीम करते थे और बनी उमय्या को मुरतिद कहते थे।

सुलह हसन (अ.स.) और उसकी वजह व असबाब

उस्ताज़ुल आलाम हज़रत अल्लामा सय्यद अदील अख़्तर आलल्लाहो मक़ामा(साबिक़ प्रिन्सपल मदरसातुल वाएज़ीन लखनऊ) अपनी किताबे तसकीन अल फ़तन फ़ी सुलह अल हसन के पृष्ठ 158 में तहरीर फ़रमाते हैं

इमामे हसन (अ.स.) की पालीसी बिल्कुल जैसा कि बार बार लिखा जा चुका है कुल अहले बैत की पालीसी एक और सिर्फ़ एक थी।(विरासत अल बैब पृष्ठ 249 ) वह यह कि हुक्मे खुदा और हुक्मे रसूल (स अ व व ) की पाबन्दी उन्हीं के एहकाम का इजरा चाहिए हैं। इस मतलब के लिये जो बरदाश्त करना पडे़ , मज़कूरा बाला हालात में इमाम हसन (अ.स.) के लिये सिवाए सुलह क्या चारा हो सकता था। इसको ख़ुद साहेबाने अक़ल समझ सकते हैं। किसी इस्तेदलाल की चन्दा ज़रूरत नहीं है। यहां पर अल्लामा इब्ने असीर की यह इबारत (जिसका तरजुमा दर्ज किया जाता है) का़बिले गौ़र है।

कहा गया है कि इमाम हसन (अ.स.) ने हुकूमत माविया को इस लिये सुर्पुद की जब माविया ने खि़लाफ़त हवाले करने के मुताअल्लिक़ आपको ख़त लिखा उस वक़्त आपने ख़ुत्बा पढ़ा और खुदा की हम्दो सना के बाद फ़रमाया कि देखो हम को शाम वालों से इस लिये नहीं दबना पड़ रहा है कि अपनी हक़ीक़त में कोई शक या निदामत है। बात तो फ़क़त यह है कि हम अहले शाम से सलामत और सब्र के साथ लड़ रहे थे , मगर अब सलामत में अदावत और सब्र मे फ़रियाद मख़्लूत कर दी गई है। जब तुम लोग सिफ़्फ़ीन को जा रहे थे उस वक़्त तुम्हारा दीन तुम्हारी दुनिया पर मुक़द्दम था लेकिन अब तुम एक से हो गये हो कि आज तुम्हारी दुनिया तुम्हारे दीन पर मुक़द्दम हो गई है। इस वक़्त तुम्हारे दोनों तरफ़ दो क़िस्म के मक़तूल हैं। एक सिफ़्फ़ीन के मक़तूल जिन पर रो रहे हो दूसरे नहरवान के मक़तूल जिनके ख़ून का बदला चा रहे हो। खुलासा यह कि जो बाक़ी है वह साथ छोड़ने वााला है और जो रो रहा है वह बदला लेना ही चाहता है। ख़ूब समझ लो कि माविया ने हम को जिस अम्र की दावत दी है न इसमें इज़्ज़त है और न इन्साफ़ लेहाज़ा अगर तुम लोग मौत पर आमादा हो तो हम इसकी दावत रद कर दें और हमारा इसका फ़ैसला खुदा के नज़दीक़ भी तलवार की बाढ़ से हो जाये और अगर तुम ज़िन्दगी चाहते हो तो जो इसने लिखा है मान लिया जाय और जो तुम्हारी मरज़ी है वैसा हो जाय। यह सुनना था कि हर तरफ़ से लोंगो ने चिल्लाना शुरू कर दिया , बक़ा लक़ा , सुलह सुलह। ’’(तारीख़े कामिल जिल्द 3 पृष्ठ 162 )

कारेईन इंसाफ़ फ़रमाइये कि क्या अब भी इमाम हसन (अ.स.) के लिये यह राय है कि सुलह न करे। इन फ़ौजियों के बल बूते पर (अगर ऐसों को फ़ौज और उनकी क़ुव्वतों को बल बूता कहा जा सके) लड़ाई ज़ेबा है हर गिज़ नहीं। ऐसे हालात में सिर्फ़ यही चारा था कि सुलह कर के अपनी और इन तमाम लोगों की ज़िन्दगी को महफ़ूज़ रखें जो दीने रसूल (स अ व व ) का नाम लेवा और हक़ीक़ी पैरो औ पाबन्द थे। इसके अलावा पैग़म्बरे इस्लाम (स अ व व ) की पेशीन गोई भी सुलह की राह में मशाल का काम कर रही थी।(बुखा़री) अल्लामा मोहम्मद बाक़र लिखते हैं कि हज़रत को अगरचे माविया की वफ़ाए सुलह पर एतेमाद नहीं था लेकिन आपने हालात के पेशे नज़र चारो नाचार दावते सुलह मंज़ूर कर ली।(अद्दमतुस् साकेबा)

सुलह हसन (अ.स.) और जंगे हुसैन (अ.स.)

सुलह और जंग दो मुतज़ात मुताबइन लफ़्ज़ हैं। सुलह का लफ़ज़ कलामे अरब में उस वक़्त इस्तेमाल होता है जब फ़साद बाक़ी न रहे और मुसालेह उस क़रारदाद को कहते हैं जिससे नज़ा दूर हो जाय और साहेबाने सियासत के नज़दीक़ सुलह उसको कहते हैं जिसके बाद कुछ शराएत पर लड़ाई रोक दी जाय।(सवानेह इमाम हसन पृष्ठ 99 बा हवालाए मोअज्जिम अल तालिब पृष्ठ 555 ) और जंग उसे कहते हैं जिसके दामन में सुलह का इम्कान न हो। सुलह इम्काने जंग मफ़्कूद होने पर और जंग इमकाने सुलह के फ़क़दान पर होती है और इस इम्कान और अदम इमकान नीज़ मौक़े के समझने का हक़ साहबे मामेला को होता है। यही वजह है कि आं हज़रत (स अ व व ) ने मौक़े सुलह पर सुलह हुदैबिया किया और मौक़ाए जंग पर बेशुमार जेहाद किये और हज़रत अली (अ.स.) ने मौक़ाए सुलह में ख़ामोशी और गोशा नशीनी इख़्तेयार की और मौक़ाए जंग में जमल और सिफ़्फ़ीन का कारनामा पेश किया।

इमाम हसन (अ.स.) के लिये जंग मुम्किन न थी इस लिये उन्होंने सुलह की और इमाम हुसैन (अ.स.) के लिये सुलह मुम्किन न थी इस लिये उन्हेांने जंग की और अज़ रूए हदीस अपने मक़ाम पर दोनों अमल सहीह और मम्दूह हुये।اماما قام او قعودا यह दोनों इमाम हसन (अ.स.) और इमाम हुसैन (अ.स.) हर हाल में वाजिब अल इताअत हैं चाहे जंग करें या सुलह।(बेहार) यानी दोनों के हालात और सवालात में फ़र्क़ था। इमाम हसन (अ.स.) के पास उस वक़्त बिल्कुल मुईन व मददगार न थे। जब माविया ने ख़लऐ खि़लाफ़त का सवाल किया था नीज़ माविया का सवाल यह था कि खि़लाफ़त छोड़ दो या अपनी और अपने मानने वालों की तबाही व बरबादी बरदाश्त करो। इमाम हसन (अ.स.) ने हालात की रौशनी में खि़ल खि़लाफ़त को मुनासिब समझा और सुलह कर ली। आप इरशाद फ़रमाते थे ‘‘ फ़क़द तराकतोहू लम इरादतन ले इसलाहल उम्मता व हक़ देमाअल मुसलेमीन ’’ मैंने खि़लाफ़त जान बूझ कर इस लिये तर्क कर दी ताकि इस्लाह व सुकून हो सके और ख़ून न बहे।(कामिल व बेहार)

इमाम हुसैन (अ.स.) के पास बेहतरीन जां निसार जां बाज़ मौजूद थे और यज़ीद का सवाल यह था कि बैअत करो या सर दो।(तबरी रौज़तुल सफ़ा) इमाम हुसैन (अ.स.) ने हालात की रौशनी में सर देने को मुनासिब समझा और बैअत से इन्कार कर के जंग के लिये तैय्यार हो गये।

यक़ीन करना चाहिये कि अगर इमाम हसन (अ.स.) से भी बैअत का सवाल होता तो वह भी वहीं कुछ करते जो इमाम हुसैन (अ.स.) ने किया है। आपके मददगार होते या न होते , क्यों कि आले मोहम्मद (अ.स.) किसी ग़ैर की बैयत हरामे मुतलक़ समझते थे। अल्लामा जलाल हुसैनी मिसरी ने ‘‘अल हुसैन ’’ में बा हवालाए वाक़ेए हिर्रा लिखा है कि वाक़ेए करबला के बाद किसी हुकूमत ने आले मोहम्मद के किसी अहद में बैअत का सवाल नहीं किया।

बा हुक्मे हक़ कहीं सुलह कर लेते हैं दुश्मन से।

कहीं पर जंगे ख़ामोशी जवाबे संग होती है।।

जम़ाना यह सबक़ ले फ़ात्मा के दिल के टुकड़ों से।

कहां पर सुलह होती है कहां पर जंग होती है।।

इमाम हसन (अ.स.) पर कसरते अज़वाज का इल्ज़ाम

यह एक मुसल्लेमा हक़ीक़त है कि पैग़म्बरे इस्लाम (स अ व व ) की जद्दो जेहद और अमीरल मोमेनीन (अ.स.) की सई व कोशिश से इसलाम दुनिया में फैला जो लोग इब्तेदाए बेसत में मुसलमान हुये और जिन्होंने हयाते पैग़म्बर तक इस्लाम क़ुबूल किया उनके मज़हबी इन्के़लाब में हज़रत अली (अ.स.) के दस्ते बाज़ू का बड़ा दखल है। उमवी और अब्बासी नस्लों में इस्लाम की दरामद और अली (अ.स.) की जेहादी क़ुव्वत रहीने मिन्नत है। ज़रूरत थी कि इन नस्लों के चश्मों चिराग़ जब आगे चल कर फ़रोग़ पाते तो अली (अ.स.) का क़सीदा पढ़ते , क्यों कि उन्हीं के सदक़े में उन्हें सिराते मुस्तक़ीम नसीब हुई थी लेकिन यह होता उसी वक़्त जब कि बा जबरो इक़राह इस्लाम क़बूल न किया होता। यहां हाल यह था ज़बान पर अल्लाह दिल में बागड़ बिल्ला यही वजह है कि नस्लों की हर फ़र्द ने फ़रोग़ पाते ही मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) और उनकी आले पाक की मुख़ालेफ़त अपना शेवा बना लिया था। अमीरे माविया जो बक़ौले मुवर्रेख़ीन इस्लाम व फ़िरंग , सियाना , बदनियत गुनाहों से बे परवाह , खुदा से बे खौ़फ़ था।(महाज़राते असफ़हानी , तारीख़े अमीर अली) को नहीं इक़तेदार हासिल हुआ। उसने आले मोहम्मद (अ.स.) को तबाह करने के लिये वह तमाम मसाएल मोहय्या किये जिनके बाद बानिये इस्लाम और उनकी आल की इज़्ज़त व आबरू , जान माल का तहफ़्फ़ुज़ ना मुमकिन सा हो गया। जंगे जमल व सिफ़्फ़ीन वग़ैरा इसकी चीरा दस्तियों से रूनूमां हुई। इमाम हसन (अ.स.) की सुलह इसी की ज़्यादतियों का नतीजा थीं मुवर्रेख़ीन का बयान है कि सुलह हसन (अ.स.) के बाद माविया मुसल्लेमुल सुबूत बादशाह बन गया। फिर इसने अपनी ताक़त के ज़ोर से मोहम्मद (स अ व व ) व आले मोहम्मद (अ.स.) के खि़लाफ़ हदीसों के गढ़ने और तारीख़ का धारा मोड़ने की मुहिम शुरू कर दी और मोहम्मद (स अ व व ) व आले मोहम्मद (अ.स.) को बदनाम करने में कोई दक़ीक़ा फ़रो गुशात नहीं किया। इस मौक़े पर चन्द चीज़ों की तरफ़ इशारा करता हूँ।

1. पैग़म्बरे इस्लाम (स अ व व ) को मेराजे जिस्मानी नहीं हुई।(शरह शिफ़ा)

2. आप में जिन्सी हवस इस दर्जा थी कि शबो रोज़ अपनी ग्यारह बीवियों के पास जाते थे।(सम्त अल शमीम महिब , तबरी जिल्द 2, पृष्ठ 94 तबआ हलब)

3. आपके दिल पर अक्सर पर्दे पड़ जाया करते थे।(सही मुस्लिम व अबू दाऊद)

4. आपकी चार लड़कियां थीं।(तवारीख़े इस्लाम)

5. आप के बाप दादा काफ़िर थे और आखि़र वक़्त तक मुसलमान न हुये।

6. उस्मान ग़नी ज़ुन्नुररैन थे।

7. अबू तालिब बिल्कुल मुफ़लिस थे।

8. अली ने उस्मान को क़त्ल किया।

9. अली बहुत ज़बरदस्त डाकू थे।(मरऊजे अल ज़हब मसअवी)

10. अली व फ़ात्मा नमाज़े सुबह नहीं पढ़ते थे।(हयातुल औलिया , जिल्द 3 पृष्ठ 144 तबाअ मिस्र 1933 0 )

11. अली की बेटी उम्मे कुलसूम का अक़्द ख़लीफ़ाए दोयम से हुआ था।

12. अफ़सानए सकीना बिन्तुल हुसैन , इमाम हसन की कसरते अज़वाज और कसरते तलाक़ का अफ़साना भी ऐसी नस्ले बनी उमय्या ख़ुसूसन माविया की पैदावार है। खि़लाफ़त को छोड़ने के बवजूद वह इसके दस्ते ज़ुल्म से महफ़ूज़ नहीं रह सके। मुख़्तलिफ़ क़िस्म के इलज़ामात उन पर हज़बे आदत लगते रहे और फिर इन तमाम चीज़ों को तवारीख़ और अहादीस में जगह देने की सई करता रहा उसके बाद ज़रा सुकून हासिल करते ही किताब अल इख़्बारूल माज़ीयीन तदवीन कराई और इसमें उल्टी सीधी बातें लिखवा दीं।

उमवी अहद की तारीख़ के मुताअल्लिक़ मुसतशरक़ीने यूरोप की राय

अमेरीका का मशहूर मुवर्रिख़ फिल्पि के0 हिट्टी अपनी तसनीफ़(तारीख़े अरब) में लिखता है कि मुसलमान अरब के दो फ़िरक़ जब कभी कोई मज़हबी , सियासी या समाजी निज़ा होती थी तो हर एक फ़रीक़ अपनी ताईद में रसूल अल्लाह (स अ व व ) की हदीस पेश करता , ख़्वाह वह हदीसें सही हों या मौजूआ और झूठी , इस लिये अली (अ.स.) और अबू बक्र की सियासी मुख़ालेफ़त , अली (अ.स.) और माविया का झगड़ा , बनी अब्बास और बनी उमय्या की बाहमी अदावत वगै़रा मुताअद्िदद झूठी हदीसों के बनने के बाएस हुए। इसके अलावा उलमा की कसीर तादाद के लिये यह दौलत कमाने और रूप्या पैदा करने का ज़रिया बन गया।

प्रोफ़ेसर सिमेन किले कैम्बरेज यूनीवर्सिटी मतूफ़ी 1720 ई0 अपनी तारीख़ सारा सेनेज़ में लिखते हैः अरबो ने तारीख़ नवीसी का ग़लत तरीक़ा इख़्तेयार कर के हम को इस मसर्रत और फ़ायदे से महरूम कर दिया जो हम को इनकी लिखी हुई किताबों से हासिल हो सकता था। मुवर्रिख़ के फ़राएज़ और हुक़ूक़ क्या होते हैं उन्होंने कमा हक़्क़ा न समझा इस लिये इन फ़राएज़ और हुक़ूक़ को नज़र अन्दाज़ कर दिया। हमारे लिये इनकी लिखी हुई तारीखो का मुतालेआ करना और उनसे सही तारीख़ी वाक़ेयात का अख़़्ज़ करना बहुत मुश्किल हो गया।

यह इन तारीख़ी किताबो की बे एतेमादी और उनकी कोताहियों का आलम है जिनमें इमाम हसन (अ.स.) जैसे मुरताज़ इमाम की कसरते अज़वाज का अफ़साना मुरत्तब किया गया है।

जब हम कसरते अज़वाज और कसरते तलाक़ के अफ़साने पर ग़ौर करते हैं तो हमें साफ़ नज़र आता है कि ऐसा वाक़िया हरगिज़ नहीं हुआ क्यों कि अगर ऐसा होता तो इनत माम औरतों के नाम इल्मे रिजाल की तारीख़ की किताबों में ज़रूर होते। हमें कुतुबे रिजाल में जो नाम मिलते हैं उनकी इन्तेहा सिर्फ़ 9 तक होती है। यह हक़ीक़त है कि आपने वक़तन फ़ावक़तन इसी तरह नौ 9 बीवियां अपने अक़्द में रखीं। जिस तरह से रसूल अल्लाह (स अ व व ) की नौ 9 बीवियां थी। आपकी बीवियों के नाम यह हैं। 1. उम्मे फ़रवा , 2. खूला , 3. उम्मे बशीर , 4. सक़फ़िया , 5. रम्ला , 6. उम्मे इसहाक़ , 7. उम्मुल हसन , 8. बिन्ते उमराउल क़ैस , 9. जोदा बिन्ते अशअस।(सीरतुल हसन , अबसारूल ऐन)

एडर्वड गिबन मशहूर मारूफ़ तारीख़ तन्ज़ील व इनके़ताए सलतनते रोम में लिखते हैं।

यह हज़रात आले मोहम्मद (अ.स.) हालाते हर्ब , मालो ज़र सियासी न रखते थे , इस पर लोग इसकी इज़्ज़त , वक़अत और ताज़ीम करते थे। जो चीज़ हुक्मरान ख़ुलफ़ा के दिलों मे रश्क व हसद की आग भड़काती थी , इनके मज़ाराते मुक़द्देसा जो मदीने , फ़रात के किनारे और ख़ुरासान में मौजूद हैं। अब तक इन के शियों की ज़्यारत गाह हैं। इन बुज़ुर्गवारों पर हमेशा बग़ावत और ख़ाना जंगियों का इल्ज़ाम लगाया जाता था , हालां कि यह शाही ख़ानदान के औलिया अल्लाह , दुनिया को हमेशा हक़ीर समझते थे। मशियते इजे़दी के मुताबिक़ सरे तसलीम ख़म करते हुये और इन्सानों के मज़ालिम बरदाश्त करते हुये उन्होंने उमूरे दीनी तालीम व तलक़ीन में अपनी उमरें सर्फ़ कर दीं। यह समझने की बात है कि जो हज़रात दुनिया को हक़ीर समझते हों उनकी तरफ़ कसरते अज़वाज और कसरते तलाक़ का इन्तेसाब अफ़साने से ज़्यादा क्या वुक़अत हासिल कर सकता है।

हज़रत इमाम हसन (अ.स.) की शहादत

मुवर्रेखी़न का इत्तेफ़ाक़ है कि इमाम हसन (अ.स.) अगर सुलह के बाद मदीने में गोशा नशीन हुए थे लेकिन अमीरे माविया आपके दर पाए आज़ार रहे। उन्होंने बार बार कोशिश की किसी तरह इमाम हसन (अ.स.) इस दारे फ़ानी से मुल्के जावेदानी को रवाना हो जायें और इससे इनका मक़सद यज़ीद की खि़लाफ़त के लिये ज़मीन हमवार करना थी। चुनान्चे उसने आपको पांच बार ज़हर दिलवाया लेकिन अय्यामे हयात बाक़ी थे ज़िन्दगी ख़त्म न हो सकी। बिल आखि़र शाहे रोम से एक ज़बरदस्त क़िस्म का ज़हर मगंवा कर मोहम्मद इब्ने अशअस या मरवान के ज़रिये से जोदा बिन्ते अशअस के पास अमीरे माविया ने भेजा और कहला दिया कि जब इमाम हसन शहीद हो जायेंगे तब हम तुझे एक लाख दिरहम देंगे और तेरा अक़्द अपने बेटे यज़ीद के साथ कर देंगे। चुनान्चे इसने इमाम हसन (अ.स.) को ज़हर दे कर हलाक कर दिया।(तारीख़े मरऊजुल ज़हब मसूदी जिल्द 2 पृष्ठ 303 व मक़ातिल अल तालेबैन पृष्ठ 51, अबू अल फ़िदा जिल्द 1 पृष्ठ 183, रौज़तुल पृष्ठ जिल्द 3 पृष्ठ 7, हबीबुल सैर , जिल्द 2 पृष्ठ 18, तबरी पृष्ठ 604, इस्तेयाब जिल्द 1 पृष्ठ 144 )

मफ़स्सिरे क़ुरान साहिबे तफ़सीरे हुसैनी अल्लामा हुसैन वाएज़ काशफ़ी रक़म तराज़ हैं कि इमाम हसन (अ.स.) मुसालेह माविया के बाद मदीने में मुस्तक़िल तौर पर फ़रोकश हो गये थे। आपको इत्तेला मिली की बसरे में रहने वाले मुहिब्बाने अली (अ.स.) के ऊपर चन्द ऊबाशों ने शब ख़ूं मार कर इनके 38 आदमी हलाक कर दिये। इमाम हसन (अ.स.) इस ख़बर से मुतास्सिर हो कर बसरे की तरफ़ रवाना हो गये। आपके हमराह अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास भी थे। रास्ते में बा मुक़ामे मूसली साअद मूसली जो जनाबे मुख़्तार इब्ने अबी उबैदा सक़फ़ी के चचा थे वहां क़याम फ़रमाया। इसके बाद वहां से रवाना हो कर वह दमिश्क से वापसी पर जब आप मूसल पहुंचे तो बइसरारे शदीद एक दूसरे शख़्स के वहां मुक़ीम हुए और वह शाख़्स माविया के फ़रेब में आ चुका था और माल व दौलत की वजह से इमाम हसन (अ.स.) को ज़हर देने का वायदा कर चुका था। चुनान्चे दौराने क़याम में उसने तीन बार हज़रत को खाने में ज़हर दिया लेकिन आप बच गये। इमाम के महफ़ूज़ रह जाने से इस शख़्स ने माविया को ख़त लिखा कि तीन बार ज़हर दे चुका हूं मगर इमाम हसन हलाक नहीं हुए। यह मालूम कर के माविया ने ज़हरे हलाहल इरसाल किया और लिखा कि अगर इसका एक क़तरा भी दे सका तो यक़ीनन इमाम हसन हलाक हो जायेंगे। नामाबर ज़हर और ख़त लिये हुए आ रहा था कि रास्ते में एक दरख़्त के नीचे खाना खा कर लेट गया इसके पेट में ऐसा दर्द उठा कि वह बरदाश्त न कर सका नागाह एक भेड़िया बरामद हुआ और उसे ले कर रफ़ू चक्कर हो गया। इत्तेफ़ाक़न इमाम हसन (अ.स.) के एक मानने वाले का उस तरफ़ से गुज़र हुआ। उसने नाक़ा ख़त और ज़हर से भरी हुई बोतल हासिल कर ली और इमाम हसन (अ.स.) की खि़दमत में पेश किया। इमाम हसन (अ.स.) ने उसे मुलाहेज़ा फ़रमा कर जा नमाज़ के नीचे रख लिया। हाज़ेरीन ने वाक़ेया दरयाफ़्त किया। इमाम ने बताया। साअद मोसली ने मौक़ा पर वह ख़त जा नमाज़ के नीचे से निकाल लिया जो माविया की तरफ़ से इमाम के मेज़बान के नाम से भेजा गया था। ख़त पढ़ कर साद मोसली आग बबूला हो गया और मेज़बान से पूछा क्या मामेला है ? उसने ला इल्मी ज़ाहिर की मगर उसके उज़्र को बावर न किया गया उसको ज़दो क़ोब किया गया यहा तक कि वह हलाक हो गया। उसके बाद आप मदीने रवाना हो गये।

मदीने में उस वक़्त मरवान बिन हकम वाली था उसे माविया का हुक्म था कि जिस सूरत से हो सके इमाम हसन (अ.स.) को हलाक कर दे। मरवान ने एक रूमी दल्लाला जिस का नाम अल्यसूनिया था , को तलब किया और उससे कहा कि तू जोदा बिन्ते अशअस के पास जा कर उसे मेरा यह पैग़ाम पहुँचा दे कि अगर तू इमाम हसन (अ.स.) को किसी सूरत से शहीद कर देगी तो तुझे माविया एक हज़ार दीनारे सुख्र और पचास खि़ल्अते मिस्री अता करेगा और अपने बेटे यज़ीद के साथ तेरा अक़्द कर देगा और उसके साथ साथ सौ दीनार नक़द भेज दिये। दल्लाला ने वायदा किया और जोदा के पास जा कर उस से वायदा ले लिया। इमाम हसन (अ.स.) उस वक़्त घर में न थे और बमुक़ामे अक़ीक़ गये हुए थे इस लिये दल्लाला को बात चीत का अच्छा ख़ासा मौक़ा मिल गया और जोदा को राज़ी करने में कामयाब हो गयी। अल ग़रज़ मरवान ने ज़हर भेजा और जोदा ने इमाम हसन (अ.स.) को शहद में मिला कर दे दिया। इमाम (अ.स.) उसे खाते ही बीमार हो गये और फ़ौरन रोज़ाए रसूल (स अ व व ) पर जा कर सेहत याब हुए। ज़हर तो आपने खा लिया लेकिन जोदा से बदगुमान भी हो गये। आपको शुब्हा हो गया जिसकी वजह से आपने उसके हाथ का खाना पीना भी छोड़ दिया और यह मामूल मुक़र्रर कर लिया कि हज़रते क़ासिम की मां या हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) के घर से खाना मंगवा कर खाने लगे। थोड़े अरसे बाद आप जोदा के घर तशरीफ़ ले गये उसने कहा मौला हवाली मदीना से बहुत उम्दा ख़ुरमें आये हैं हुक्म हो तो हाज़िर करूं आप चुंकि ख़ुरमे बहुत पसन्द करते थे। फ़रमाया ले आ। वह खुरमें जह़र आलूद ख़ुरमें ले कर आई और पहचाने हुए खुरमें छोड़ कर खुद साथ खाने लगी। इमाम ने एक तरफ़ से खाना शुरू किया और वह दाने खा गये जिनमे ज़हर था। उसके बाद इमाम हुसैन (अ.स.) के घर तशरीफ़ लाये और सारी रात तड़प कर बसर की। सुबह को रौज़ा ए रसूल (स अ व व ) पर जा कर दुआ मांगी और सेहतयाब हुए। इमाम हसन (अ.स.) ने बार बार इस क़िस्म की तकलीफ़ उठाने के बाद अपने भाइयों से तबदीलीए आबो हवा के लिये मूसल जाने का मशविरा किया और मूसल के लिये रवाना हो गये। आपके हमराह हज़रत अब्बास (अ.स.) और चन्द हवा ख़्वाहान भी गये। अभी वहां चन्द यौम न गुज़रे थे कि शाम से एक नाबीना भेज दिया गया और उसे एक ऐसा असा दिया गया जिसके नीचे लौहा लगा हुआ था जो ज़हर में बुझा हुआ था। उस नाबीना ने मूसल पहुँच कर इमाम हसन (अ.स.) के दोस्तदारान में से अपने को ज़ाहिर किया और मौक़ा पा कर उनके पैर में अपने असा की नोक चुभो दी। ज़हर जिस्म मे दौड़ गया और आप अलील हो गये। जर्राह इलाज के लिये बुलाया गया , उसने इलाज शुरू किया। नाबीना ज़ख़्म लगा कर रू पोश हो गया था। चौदह दिन के बाद जब पन्द्रहवे दिन वह निकल कर शाम की तरफ़ रवाना हुआ तो हज़रते अब्बास अलमदार (अ.स.) की नज़र उस पर जा पड़ी। आपने उससे असा छीन कर उस के सर पर इस ज़ोर से मारा कि सर शिग़ाफ़ता हो गया और वह अपने कैफ़रो किरदार को पहुँच गया। उसके बाद जनाबे मुख़्तार और उनके चचा साद मोसली ने उसकी लाश जला दी। चन्द दिनों बाद हज़रत इमाम हसन (अ.स.) मदीनाए मुनव्वरा वापस तशरीफ़ ले गये।

मदीनाए मुनव्वरा में आप अय्यामें हयात गुज़ार रहे थे कि अल सोनिया दल्लाला ने फिर मरवान के इशारे पर जोदा से सिलसिला जुम्बानी शुरू कर दी और ज़हरे हलाहल उसे दे कर इमाम हसन (अ.स.) का काम तमाम करने की ख़्वाहिश की। इमाम हसन (अ.स.) चूंकि उससे बदगुमान हो चुके थे इस लिये उसकी आमदो रफ़्त बन्द थी। उसने हर चन्द कोशिश की लेकिन मौक़ा न पा सकी। बिल आखि़र शबे 28 सफ़र 40 ई0 को वह उस जगह जा पहुँची जिस मक़ाम पर इमाम हसन (अ.स.) सो रहे थे। आपके क़रीब हज़रत ज़ैनब व उम्मे कुलसूम सो रही थीं और आपकी पाइंती कनीज़े महवे ख़्वाब थीं। जोदा उस पानी में ज़हरे हलाहल मिला कर ख़ामोशी से वापस आईं जो इमाम हसन (अ.स.) के सराहने रखा हुआ था। उसकी वापसी के थोड़ी देर बाद ही इमाम हसन (अ.स.) की आंख खुली , आपने जनाबे जै़नब को आवाज़ दी और कहा कि ऐ बहन मैंने अभी अभी अपने नाना , अपने पदरे बुज़ुर्गवार और अपनी मादरे गेरामी को ख़्वाब में देखा है। वह फ़रमाते थे कि ऐ हसन तुम कल रात हमारे पास होगे। उसके बाद आपने वज़ू के लिये पानी मांगा और ख़ुद अपना हाथ बढ़ा कर सराहने से पानी लिया और पी कर फ़रमाया कि ऐ बहन ज़ैनबایں چه آب بود از سر حلقم تا نافم پاره شد हाय यह कैसा पानी है जिसने मेरे हल्क़ से नाफ़ तक टुकड़े टुकड़े कर दिया है। उसके बाद इमाम हुसैन (अ.स.) को इत्तेला दी गई वह आये दोनों भाई बग़ल गीर हो कर महवे गिरया हो गये। उसके बाद इमाम हुसैन (अ.स.) ने चाहा कि एक कूज़ा पानी खुद पी कर इमाम हसन (अ.स.) के साथ नाना के पास पहुँचें। इमाम हसन (अ.स.) ने पानी के बरतन को ज़मीन पर पलट दिया वह चूर चूर हो गया। रावी का बयान है कि जिस ज़मीन पर पानी गिरा था वह उबलने लगी थी। अल ग़रज़ थोड़ी देर के बाद इमाम हसन (अ.स.) को ख़ून की क़ै आने लगी। आपके जिगर के सत्तर टुकड़े तख़्त में आ गये। आप ज़मीन पर तड़पने लगे। जब दिन चढ़ा तो आपने इमाम हुसैन (अ.स.) से पूछा कि मेरे चेहरे का रंग कैसा है ? कहा ‘‘ सब्ज़ ’’ है। आपने फ़रमाय कि हदीसे मेराज का यही मुक़तज़ा है। लोगों ने पूछा कि यह हदीसे मेराज क्या है ? फ़मरमाया कि शबे मेराज मेरे नाना ने आसमान पर दो क़स्र एक ज़मर्रूद को एक याक़ूत को देखा तो पूछा कि ऐ जिब्राईल यह दोनों क़स्र किस के लिये हैं ? उन्होंने अर्ज़ कि एह हसन के लिये और दूसरा हुसैन के लिये। पूछा दोनों के रंग में फ़र्क़ क्यो है ? कहा हसन ज़हर से शहीद होंगे और हुसैन तलवार से शहादत पायेंगे। यह कह कर आप हुसैन (अ.स.) से लिपट गये और दोनों भाई रोने लगे और आपके साथ दरो दीवार भी रोने लगे।

उसके बाद आपने जोदा से कहा अफ़सोस तूने बड़ी बे वफ़ाई की लेकिन याद रख तूने जिस मक़सद के लिये ऐसा किया है उसमें कामयाब न होगी। उसके बाद आपने हुसैन (अ.स.) और बहनों से कुछ वसीयतें कीं और आंखें बन्द फ़रमा ली। फिर थोड़ी देर के बाद आंख खोल कर फ़रमाया ऐ हुसैन मेरे बाल बच्चें तुम्हारे सुपुर्द हैं फिर आंख बन्द फ़रमा कर नाना की खि़दमत में पहुँच गये। इन्ना लिल्लाहे व इन्ना इलेहै राजेऊन

इमाम हसन (अ.स.) की शहादत के फ़ौरन बाद मरवान ने जोदा को अपने पास बुला कर दो औरतों और एक मर्द के साथ माविया के पास भेज दिया। माविया ने उसे हाथ पैर बंधवा कर दरियाए नील में यह कह कर डलवा दिया कि तूने जब इमाम हसन (अ.स.) के साथ वफ़ा न की तो यज़ीद के साथ क्या वफ़ा करेगी।(रौज़ातुल शोहदा पृष्ठ 220 ता 235 प्रकाशित बम्बई 1285 0 व ज़िकरूल अब्बास पृष्ठ 50 प्रकाशित लाहौर 1956 0 )

माविया सजदा ए शुक्र में

मरवान हाकिमे मदीना ने जोदा बिन्ते अशअस के ज़रिए से अपनी कामयाबी की इत्तेला माविया को दी। माविया ख़बरे शहादत पाते ही ख़ुशी के मारे अल्लाहो अकबर कह कर सजदे में गिर पडा़ और उस के देखा देखी सारे दरबार वाले ख़ुशी मनाने के लिये नाराए तकबीर बलन्द करने लगे। उनकी आवाज़ें फ़ात्मा बिन्ते क़रज़आ के कानों में पहुँची जो माविया की बीवी थी , वो कहने लगी यह किस चीज़ की ख़ुशी है ? माविया ने जवाब दिया इमाम हसन की शहादत हो गई है। इस ख़ुशी में मैंने नाराए तकबीर बलन्द कर के सज्दाए शुक्र अदा किया है। फ़ात्मा बेइन्तेहा रंजीदा हुई और कहने लगीं अफ़सोस फ़रज़न्दे रसूल (स अ व व ) क़त्ल किया जाये और दरबार में ख़ुशी मनाई जाये।(तारीख़ अबुल फ़िदा जिल्द 1 पृष्ठ 182, अक़्दुल फ़रीद जिल्द 2 पृष्ठ 211, ओकली पृष्ठ 336, रौज़तुल मनाज़िर जिल्द 11 पृष्ठ 133, तारीख़े खमीस जिल्द 2 पृष्ठ 328, हयातुल हैवान जिल्द 1 पृष्ठ 51, नूजूलुल अबरार पृष्ठ 5, अरजहुल मतालिब पृष्ठ 357 व अख़बारूल तवाल पृष्ठ 400 ) इब्ने क़तीबा ने इब्ने अब्बास के दरबारे माविया में पहुँच कर इस मौक़े की ज़बर दस्त गुफ़तगू लिखी है।(अल इमामत वल सियासत)

इमाम हसन (अ.स.) की तजहीज़ों तकफ़ीन

अल ग़रज़ इमाम हसन (अ.स.) की शहादत के बाद इमाम हुसैन (अ.स.) ने गु़स्लो कफ़न का इन्तेज़ाम फ़रमाया और नमाज़े जनाज़ा पढ़ी गई। इमाम हसन (अ.स.) की वसीयत के मुताबिक़ उन्हें सरवरे कायनात (स अ व व ) के पहलू में दफ़्न करने के लिये अपने कंधों पर उठा कर ले चले। अभी पहुँचे ही थे कि बनी उमय्या ख़ुसूसन मरवान वग़ैरा ने आगे बढ़ कर पहलू रसूल (स अ व व ) में दफ़्न होने से रोका और हज़रत आयशा भी एक खच्चर पर सवार हो कर आ पहुँची और कहने लगीं यह घर मेरा है मैं तो हरगिज़ हसन को अपने घर में दफ़्न होने न दूं गी।(तारीख़े अबुल फ़िदा जिल्द 1 पृष्ठ 183, रौज़तुल मनाज़िर जिल्द 11 पृष्ठ 133 ) यह सुन कर बाज़ लोगों ने कहा ऐ आयशा तुम्हारा क्या हाल है। कभी ऊँट पर सवार हो कर दामादे रसूल (स अ व व ) से जंग करती हो कभी खच्चर पर सवार हो कर फ़रज़न्दे रसूल (स अ व व ) के दफ़्न में मज़ाहेमत करती हो। तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिये।(तफ़सील के लिये मुलाहेजा़ हों ज़िकरूल अब्बास पृष्ठ 51 ) मगर वह एक न मानी और ज़िद पर अड़ी रही यहां तक कि बात बढ़ गई। आप के हवाख़वाहों ने आले मोहम्मद (अ.स.) पर तीर बरसाए। किताब रौज़ातुल पृष्ठ जिल्द 3 पृष्ठ 7 मे है कि कई तीर इमाम हसन (अ.स.) के ताबूत में पेवस्त हो गये। किताब ज़िकरूल अब्बास पृष्ठ 51 में है कि ताबूत में सत्तर तीर पेवस्त हुए थे। तारीख़े इस्लाम जिल्द 1 पृष्ठ 28 में है कि नाचार लाशे मुबारक को जन्नतुल बक़ी में ला कर दफ़्न कर दिया गया। तारीख़े कामिल जिल्द 3 पृष्ठ 182 में है कि शहादत के वक़्त आपकी उम्र 47 साल की थी।

आपकी अज़वाज और औलाद

आपने मुख़्तलिफ़ अवक़ात में 9 नौ बीवियां की। आपकी औलाद में आठ बेटे और सात बेटियां थीं। यही तादाद इरशादे मुफ़ीद पृष्ठ 208 और नूरूल अबसार पृष्ठ 112 प्रकाशित मिस्र में है। अल्लामा तल्हा शाफ़ेई मतालेबुस सूऊल के पृष्ठ 239 पर लिखते हैं कि इमाम हसन (अ.स.) की नस्ल जै़द और हसने मुसन्ना से चली है। इमाम शिब्लन्जी का कहना है कि आपके तीन फ़रज़न्द अब्दुल्लाह , क़ासिम और उमरो करबला में शहीद हुए हैं।(नूरूल अबसार पृष्ठ 112 )

जनाबे ज़ैद बड़े जलीलुल क़द्र और सदक़ाते रसूल (स अ व व ) के मुतावल्ली थे उन्होंने 120 हिजरी में 90 साल की उम्र में इन्तेक़ाल फ़रमाया।

जनाबे हसने मुसन्ना निहायत फ़ाज़िल , मुत्तक़ी और सदक़ाते अमीरल मोमेनीन (अ.स.) के मुतवल्ली थे। आपकी शादी इमाम हुसैन (अ.स.) की बेटी जनाबे फ़ात्मा से हुई थी। आपने करबला की जंग में शिरकत की थी और बेइंतेहां ज़ख़्मी हो कर मक़तूलों में तब गये थे। जब सर काटे जा रहे थे तब उनके मामू अबू हसान ने आपको ज़िन्दा पा कर उमरे साद से ले लिया था। आपको ख़लीफ़ा सुलैमान बिन अब्दुल मलिक ने 97 हिजरी में ज़हर दे दिया था जिसकी वजह से आपने 52 साल की उम्र में इन्तेक़ाल फ़रमाया। आपकी शहादत के बाद आपकी बीवी जनाबे फ़ात्मा एक साल तक क़ब्र पर खेमा ज़न रहीं।(इरशादे मुफ़ीद पृष्ठ 211 व नूरूल अबसार पृष्ठ 269 )

शेख अब्दुल क़ादिर जीलानी

बरादराने अहले सुन्नत के अवाम का ख़्याल है कि शेख़ सय्यद अब्दुल का़दिर जीलानी और बरवायते इब्ने जंगी दोस्त और बरवायते इब्ने चंग दोस्त सय्यद थे और इनका नसब जनाबे हसने मुसन्ना इब्ने इमाम हसन बिन अली (अ.स.) तक पहुँचता है लेकिन उनके उलेमा इस से इनकार करते हैं।

1. इमाम उल अन्साब अहमद बिन अली बिन अल हुसैन बिन अली , बिन महन्ना अपनी किताब उमदतुल तालिब प्रकाशित बम्बई के पृष्ठ 112 पर लिखते हैं कि खुद शेख़ अब्दुल क़ादिर ने अपनी सियादत का दावा नहीं किया और न उनके बेटों ने किया है अलबत्ता इसकी इजाद उनके पोते क़ाजी़ अबुल सालेह नासिर बिन अबी बक्र बिन अब्दुल क़ादिर ने फ़रमाई है लेकिन अपने दावे के सुबूत में वह दलील लाने से क़ासिर रहे हैं। यहीं वजह है कि किसी अहले नसब ने आपका दावा तसलीम नहीं किया।

2. अल्लामाए दौरां ने सय्यद अहमद बिन मोहम्मद अल हुसैनी निसबे किताब शजरतुल अल अवलिया में रक़म तराज़ हैं कि तमाम उलेमाए इन्साब ने शेख़ सय्यद अब्दुल क़ादिर के सिलसिलाए सियादत से इन्कार किया है और किसी ने भी इनके सादात होने को नक़ल नहीं किया और ख़ुद उन्होंने भी सय्यद होने का दावा नहीं किया और उनकी ज़िन्दगी में किसी और ने भी इनको सय्यद नहीं कहा। ‘‘ अन अव्वल मन अज़हर हाज़ा अल दाआ अल बातलता हु अनसरा इब्ने अबी बक्र बिन अल शेख़ अब्दुल क़ादिर ’’ मालूम होना चाहिये कि इस दावाए बातिला को सब से पहले इनके पोते नसर बिन अबी बक्र ने ज़ाहिर किया है।

3. रिसाला सू़फ़ी जो बसर परस्ती ख़्वाजा हसन निज़ामी मंडी बहाउद्दीन ज़िला गुजरात से शाया होता था इसके जिल्द 3 पृष्ठ 6 में लिखा है सेयुम पीरे तरीक़त हज़रत ख़्वाजा मुहिउद्दीन अब्दुल क़ादिर जीलानी हैं। वलदियत आपकी क़दम बक़दम हज़रत ईसा के है सिलसिला नसब आपका हज़रत उमर फ़ारूख़ तक पहुंचता है।

इमाम शिब्लन्जी का इरशाद है कि आपकी विलादत 470 ई0 में और वफ़ात 561 ई0 में हुई है। आप हम्बलीउल मज़हब थे। आपकी वालेदा उम्मुल ख़ैर मक़ामे जबाल इलाक़ए तबरिस्तान की रहने वाली थीं। इस लिये आपको अब्दुल क़ादिर जिब्ली कहते हैं और जीलानी एज़ाज़ी तौर पर कहा जाता है।(नूरूल असार पृष्ठ 214 व इक़तेबासुल अनवार पृष्ठ 72 ) आप दो किताबों ग़नीयतुल तालेबैन और फ़तूहुल ग़ैब के मुसन्निफ़ हैं।(तारीख़े इस्लाम जिल्द 5 पृष्ठ 63 )


माविया इब्ने अबू सुफ़ियान का तारीख़ी र्ताअरूफ़

अमीरे माविया के र्ताअरूफ़ और आपके किरदार की आईना दारी के लिये अगरचे सिर्फ़ यही कहना काफ़ी है कि आप हज़रत अली (अ.स.) इमाम हसन (अ.स.) अम्मारे यासिर , मालिके अशतर और उम्मुल मोमेनीन हज़रत आयशा बिन्ते अबी बक्र , मोहम्मद इब्ने अबी बक्र नीज़ अब्दुर्रहमान इब्ने ख़ालिद इब्ने वलीद वग़ैराहुम के मुसल्लेमुल सुबूत क़ातिल हैं जैसा कि तहरीर किया जा चुका है लेकिन इससे आपकी नस्ली हालात और आपके किरदार के दिगर पहलू रौशन नहीं होते इस लिये ज़रूरत है कि कुतबे मोतबर के हवाले से चन्द चीज़ें निहायत मुख़्तसर लफ़्ज़ों में पेश कर दी जाऐ। बनाबरीं अर्ज़ है कि 1. नसायह काफ़िया पृष्ठ 95 व पृष्ठ 110 में है कि क़बीलाए क़ुरैश की इब्तेदा , क़सी इब्ने क़लाब से हुई जो औलादे क़अब इब्ने लवी से थे क़सी के चार बेटों में से एक का नाम अब्दुल मनाफ़ था। हाशिम और अब्दुल शम्स अब्दुल मनाफ़ के बेटे थे। हाशिम की ज़ुर्रियत से मोहम्मद व आले मोहम्मद (स अ व व ) में जो हाशमी कहलाते हैं और अब्दुल शम्स की तरफ़ मन्सूब हैं जो पसता क़द , चुन्धा , करंजा , बदशक्ल था जिसके चेहरे से शरारत व नहूसत नुमाया थी उमिया के मानी छोटी लौंडी के हैं। हस्सान बिन साबित ने इसके औलाद व अब्दुल शम्स होने से इन्कार किया है। देखो दीवाने हस्सान पृष्ठ 91 ,

2. अलहुर्रियत फी़ल इस्लाम मुसन्नेफ़ा अबुल कलाम अज़ादा के पृष्ठ 26 में है कि खि़लाफ़ते राशेदा के बाद बनू उमय्या का दौरे फ़ितना व बिदआत से शुरू होता है जिन्होंने निज़ामे हुकूमते इस्लामी की बुनियादं मुताज़लज़िल कर दीं।

3. ततहीर उल जिनान पृष्ठ 142 नसलहे काफ़िया पृष्ठ 106 में है कि आं हज़रत (स अ व व ) ने इरशाद फ़रमाया है कि हमारा सब से बड़ा दुशमन क़बीलाए बनी उमय्या है।

4. नियाबुल मोवद्दता पृष्ठ 148 में है कि क़बाएले अरब में सब से शरीर बनी उमय्या हैं।

5. तहरीरूल जेनान पृष्ठ 148 में है कि हर शै के लिये एक आफ़त है और दीने इस्लाम की आफ़त बनी उमय्या हैं।

6. तारीख़ उल ख़ुल़्फ़ा पृष्ठ 8 और तफ़सीरे नैशा पुरी में है कि आं हज़रत (स अ व व ) ने ख़्वाब में देखा कि मिम्बर पर लंगूर कूद रहे हैं जिससे आपको बेइन्तेहां सदमा हुआ जिससे तसल्ली के लिये सूरए क़द्र नाज़िल हुआ जिसमें फ़रमाया गया है कि शबे क़द्र मुद्दते हुकूमत बनी उमय्या से बेहतर है।

7. रौज़तुल मनाज़िर बर हाशिया कामिल जिल्द पृष्ठ 85 में है कि शाजराए मलउना फ़िल क़ुरान से बुराद बनी उमय्या हैं।

8. तारीख़े आसम कूफ़ी पृष्ठ 242 में है कि अहदे जाहितयत में बनी उमय्या कि ग़िज़ा टिड्डी और मुरदार थी।

9. फ़तेहुलबारी इब्ने हजर असक़लानी जिल्द 5 पृष्ठ 65 में है कि ज़मानाए जाहिलयत में फ़ाहेशा औरतें अपने मकानों पर पहचान के लिये झन्डे लगाए रहती थीं।

10. नसायहे काफ़िया पृष्ठ 110 , समरतुल अवराक़ पृष्ठ 108 , अबुल फ़िदा जिल्द 1 पृष्ठ 188 , इब्ने शहना जिल्द 2 पृष्ठ 134 , एयर विंग पृष्ठ 48 , तज़किराए ख़वास अल उम्मता पृष्ठ 117 , तारीख़े आसम कूफ़ी पृष्ठ 236 वग़ैरा में है कि मशहूर फ़ाहेशा औरतें जिनके मकानों पर झन्डे थे , वह चार थीं , 1. ज़रक़ा , 2. नाबेग़ा , उमरो आस की मां , 3. हमामा , अमीरे माविया की दादी , 4. हिन्दा , अमीरे माविया की मां। और हिन्दा के मुताअल्लिक़ आसम कूफ़ी पृष्ठ 236 में है कि यह तमाम ऐबों की ख़ज़ीना दार थीं।

11. तारीख़े ख़ुल्फ़ा पृष्ठ 218 में है कि यह शायरा और बड़ी संग दिल थी। इसके एक शेर अहवाले मामून रशीद में दर्ज है जिसका तरजुमा यह है। हम ख़ूबसूरती में सितारए सुबह सादिक़ की बेटियां है। नर्म बिस्तरों पर हम किसी के साथ यूं मिलते हैं जैसे मुजामेअत करने वाला मस्त चकोर चांद के गिर्द घूमता है।(मुतख़ेबुल लुग़ात व सराह)

13. नसाए पृष्ठ 83 में है कि हस्सान इब्ने साबित ने हिन्दा की ज़िना कारी अपने अशआर में बयान की है और आं हज़रत को सुनाया हज़रत ख़ामोश रहे। अशआर मुलाहेज़ा हो दीवाने हस्सान पृष्ठ 40 से 60 में।

14. इब्ने क़तीबा ने लिखा है कि आं हज़रत (स अ व व ) ने उक़बा को मक़ामे सफ़ोरिया (शाम) का यहूदी फ़रमाया है।

15. निसाय काफ़िया पृष्ठ 110 में है कि उमय्या ने सफ़ोरिया की एक यहूदन लड़की से ज़िना किया था जिससे ज़कवान नामी लड़का पैदा हुआ था जिसकी कुन्नियत अबू उमरो मुक़र्रर की गई थी। यही अबू उमरो अक़बा का दादा है।

16. रौज़तुल अनफ़ असाबा व कामिल और हलबी में ज़कवान के ग़ुलामे उमय्या लिखा है।

17. आग़ाफ़ी अबुल फ़रह असफ़हानी 48ध्8 तरजुमा मुसाफ़िर में है कि उमय्या के बाद ज़कवान ने अपनी मां से निकाह कर लिया था।

18. अग़ाफ़ी अबुल फ़राह असफ़हानी निसाए काफ़िया हाशिया पृष्ठ 84 तज़किरए सिब्ते अब्ने जौज़ी में है कि इसी अबू उमर का बेटा मुसाफ़िर था जो सख़ावत और जमाली शेर गोई में मशहूर था। हिन्दा का उस से मोअशेक़ा हो गया और उससे हामेला हो गई जब हमल ज़ाहिर हो गया तो उसने मुसाफ़िर से कहा कि तू किसी तरफ़ चला जा। चुनान्चे वह हीरा को चला गया। उसके बाद हिन्दा अबू सुफ़ियान के तसर्रूफ़ में आ गई। जब मुसाफ़िर को पता लगा तो उसने फ़ेराक़ में जान दे दी। मुसाफ़िर के चले जाने के बाद हिन्दा मक़ामे अजयाद की तरफ़ चली गई और वहीं बच्चा जना।

19. सिब्ते इब्ने जोज़ी ने तज़किराए ख़वास अल उम्मता में लिखा है कि हज़रत आयशा ने उम्मे हबीबा ख़्वाहरे माविया को कहा , ‘‘ क़ातिल अल्लाह अब्नतुल राहता ’’ ख़ुदा लानत करे दुख़्तरे ज़ने ज़िना कार पर , और इमाम हसन (अ.स.) ने माविया को कहा , ‘‘ वक़द अलमत अल फ़राश्त लज़ी दलदत इलैहे ’’ मैं उस फ़र्श को जानता हूँ जिस पर तू पैदा हुआ है। उसके बाद इसकी तौज़ीह इब्ने जोज़ी ने यह की है ‘‘ क़ाला अल समीई वल हशाम इब्ने मोहम्मद अल कल्बी फ़ी किताब अल मुसम्मा बिल मसालिब वक़फ़त अला मानी क़ौल अल हसन माविया क़द अलिमतो अल फ़राशत लज़ी वलदत इलहै अन माविया कानाया अल अनाह मिन्नी अरबता मिन कुरैश ग़मारता इब्ने वलीद व मुसाफ़िर इब्ने अबी उमरो व अबी सुफ़ियान वल अब्बास व हूला कानू अन्दमा अबी सुफ़ियान व काना कुल यत्तहुम बेहिन्द ’’ यानी असमई और हश्शाम ने कहा है कि इमाम हसन (अ.स.) के क़ौल के यह मानी हैं कि , माविया , अबु सुफ़ियान , उमरो अब्बास और मुसाफ़िर चार आदमियों की तरफ़ मन्सूब है। ‘‘ अमा मुसाफ़िर बिन अबी उमरो फ़क़ाला अल कलबी आउम्मतुन नास अली अन माविया मिनहा ’’ कल्बी ने कहा कि जमहूर की राय थी कि माविया मुसाफ़िर इब्ने उमरो से है क्यों कि वही सब से ज़्यादा हिन्दा से मोहब्बत करता था। मसालिब इबने समआन में है कि पदरे हिन्दा ने इसका निकाह ‘‘ लोअदा ’’ माले कसीर अबू सुफ़ियान से किया।

‘‘ फ़ौज़अत माविया बाद सलासता अशहर ’’ निकाह के तीन माह बाद बत्ने हिन्दा से माविया पैदा हुआ। इसी लिये ज़महशरी ने रबीउल अबरार में माविया को चार यारी लिखा है। बरवायत हिन्दा का ताअल्लुक़ एक ख़ूब सूरत डोम से भी था जिसका नाम ‘‘ सब्बाह ’’ था। इसी से माविया का भाई अतबा इब्ने अबू सुफ़ियान पैदा हुआ। जैसा कि निसाए काफ़िया पृष्ठ 110 में है ‘‘ क़ाला अल शआबी फ़क़द असा रसूल अल्लाह अबी हिन्दा यौमे फ़तेह मक्का बशी मन हाज़ा ’’ इमामे शाबी का बयान है कि हिन्दा की ज़िना कारी की तरफ़ आं हज़रत (स अ व व ) ने फ़तेह मक्का के दिन उस मौक़े पर इशारा फ़रमाया था जब िकवह बैयत करने आई थी। हिन्दा ने कहा कि मैं किस चीज़ पर बैयत करूं ? हज़रत ने फ़रमाया कि तू उस चीज़ पर बैयत कर कि आज से ज़िना नहीं करेगी। उसने कहा कि हज़रत कहीं ‘‘ हुर्रा ’’ आज़ाद औरतें ज़िना करती हैं। ‘‘ मन्ज़र रसूल अल्लाह इला उमरे तबस्सुम ’’ यह सुन कर आपने हज़रत उमर की तरफ़ देख कर तबस्सुम फ़रमाया , मुलाहेज़ा हो।(माविया दायरतुल इस्लाह पृष्ठ 8 )

अल्लामा मजलिसी हयातुल क़ुलूब जिल्द 2 पृष्ठ 437 पर लिखते हैं कि हज़रत उमर ज़मानए जाहिलयत के अमली शाहिद थे। इसी लिये रसूल अल्लाह (स अ व व ) उनकी तरफ़ देख कर मुस्कुराए थे।

20. तमाम तवारीख़े इस्लाम में है कि इसी हिन्दा ने हज़रते हम्ज़ा को अपने एक आशिक़ हब्शी नामी से शहीद करा के उनका जिगर चबाना चाहा था और कान , नाक वग़ैरा काट कर अपने गले का हार बनाया था।

21. माविया का बाप जो अबू सुफ़ियान कहा जाता है वह बरवायत हयातुल हैवान ‘‘ तेली ’’ था।

22. आसम कूफ़ी पृष्ठ 236 में है कि यह शराबी था।

23. हयातुल क़ुलूब और नहजुल बलाग़ाह जिल्द 2 पृष्ठ 131 में है कि अबू सुफ़ियान ने ब जब्रो इक़राह इस्लाम क़ुबूल किया था।

24. माविया दायरतुल इस्लाह पृष्ठ 14 में है कि माविया 17 या 22 साल क़ब्ले हिजरत हिन्दा के शिकम में पैदा हुआ।

25. नहजुल बलाग़ह जिल्द 2 पृष्ठ 19 में है कि हज़रत अली (अ.स.) ने माविया को नसीक़ फ़रमाया है जिसके मानी मुत्तिहमुन नसब है।

26. जनातुल ख़ुलूद में है कि माविया का क़द लम्बा और आंखें सब्ज़ थीं।

27. तारीख़ुल ख़ुलफ़ा पृष्ठ 132 में है कि इसकी सूरत डरावनी है।

28. तारीख़े कामिल जिल्द 3 पृष्ठ 166 और निसाए काफ़िया पृष्ठ 21 में है कि मोहम्मद इब्ने अबी बक्र ने माविया को लईन इब्ने लईन कहा है।

29. उसने ग़लत तौर पर मशहूर किया कि अली (अ.स.) क़ातिले उस्मान हैं।(आसम कूफ़ी पृष्ठ 169 )

30. निसाए काफ़िया पृष्ठ 53 व हुलयातुल औलिया पृष्ठ 144 में है कि उसने ग़लत शोहरत दी कि माज़अल्लाह अली (अ.स.) नमाज़ नहीं पढ़ते।

31. निसाए काफ़िया पृष्ठ 53 में है कि माविया के हुक्म से उबैदुल्लाह इब्ने अब्बास के दो कमसिन बच्चे मां की गोद में ज़िब्ह किये गये।

32. आसम कूफ़ी पृष्ठ 307 में है कि माविया ने यमन और हिजाज़ में 30,000 (तीस हज़ार) मुहिब्बाने अली (अ.स.) को क़त्ल किया।

33. निसाए काफ़िया पृष्ठ 61 में है कि माविया ने मालिके अशतर को ज़हर से शहीद करा दिया।

34. आसम कूफ़ी पृष्ठ 338 में है कि माविया ने मोहम्मद इब्ने अबी बक्र को गधे की खाल में सिलवा कर जलवा दिया।

35. इसी किताब में है कि जब हज़रत आयशा को इसकी ख़बर मिली तो बहुत रोईं और तहयात बद दुआ देती रहीं।

36. निसाई काफ़िया पृष्ठ 62 में है कि हज़रत अली (अ.स.) को इसकी इत्तेला मिली तो बक़ा बक़आ शदीदन बहुत रोय।

37. निसाई काफ़िया पृष्ठ 58 में सीरते मोहम्मदिया पृष्ठ 577 में है कि हजर इब्ने अदी सहाबिए रसूले करीम (स अ व व ) मोहब्बते अली (अ.स.) में क़त्ल किये गये और अब्दुर्रहमान इब्ने हस्सान ज़िन्दा दफ़्न किये गये।

38. निसाई काफ़िया पृष्ठ 43 में है कि उमर बिन हमक़ भी हुक्मे माविया से शहीद किये गये।

39. तबरी और निसाई काफ़िया पृष्ठ 52 में है कि माविया के एक आमिल समरता ने आठ हज़ार आदमियों को शहीद किया।

40. तारीख़े आसम पृष्ठ 334 व निसाए काफ़िया पृष्ठ 70 में है कि बसरे और कूफ़े में एक एक रात को पांच पांच सौ (500) मुहिब्बाने अली (अ.स.) क़त्ल किये गये।

41. तारीख़े कामिल इब्ने असीर जिल्द 3 पृष्ठ 133 में है कि माविया नमाज़ के हर क़ुनूत में हज़रत अली (अ स ) , इब्ने अब्बास , इमाम हसन (अ स ) , इमाम हुसैन (अ.स.) और मालिके अशतर पर लानत करता था।

42. निसाए काफ़िया पृष्ठ 170 में है कि माविया मोअल्लेफ़ुल क़ुलूब में था उसका कातिबे वही होना ग़लत है।

43. तारीख़े आसम पृष्ठ 46 में है कि माविया ने शोहदाय ओहद की क़ब्रों पर नहर जारी कराई और लाशों को दूसरी जगह दफ़्न करा दिया। लाशों के निकालने में एक बेलचा हज़रते हम्ज़ा के पैर में लग गया जिससे ख़ूने ताज़ा जारी हो गया।

44. मोलवी अमीर अली अपनी तारीख़े इस्लाम में लिखते हैं कि इमाम हसन (अ.स.) के तरके खि़लाफ़त के बाद माविया हक़ीकत में ही बादशाहे इस्लाम बन गया। इस तरफ़ ज़माने के अजीबो ग़रीब इन्के़लाब से हज़रते मोहम्मदे मुस्तुफ़ा (स अ व व ) के दुश्मानें ने उनकी औलाद का मौरूसी हक़ ग़ज़्ब कर लिया और बुत परस्ती के हामी उन जनाब के मज़हब और सलतन्त के सरदार और पेशवा बन गये। दारूल खि़लाफ़ा जो हज़रत अली (अ.स.) ने कूफ़े में मुक़र्रर किया था अब दमिश्क़ में मुन्तक़िल हो गया जहां माविया ईरानी और यूनानी शानो शौकत के साथ रहा करता था। वह अक्सर अपने दुश्मनों या मुख़ालिफ़ों का ज़हर या तलवार से काम तमाम कर देता था। रिश्तेदारी या खि़दमते इस्लाम भी उसके सफ़्फ़ाक हाथों से बचा न सकती थी और फिर मुवर्रिख़ ओबसरन ने नक़ल किया है कि बनी उमय्या का अव्वल ख़लीफ़ा सियाना , मुताफ़न्नी और सफ़्फ़ाक था। अपना मतलब निकालने के लिये किसी जुर्म के इरतेक़ाब से न डरता था। जबर दस्त ग़नीम को हलाक करा देना उसके बायं हाथ का खेल था। पैग़म्बरे इस्लाम के नवासे इमाम हसन (अ.स.) और मालिके अशतर को ज़हर से हालाक करा दिया। इसी तरह अब्दुल रहमान इब्ने ख़ालिद इब्ने वलीद को 45 हिजरी में ज़हर से तमाम करा दिया।(कामिल इब्ने असीर , तबरी , अबुल फ़िदा , रौज़ातुल सफ़ा , हबीब अल सैर) और उम्मुल मोमेनीन जनाबे आयशा को इस तरह ज़िन्दा गढ़े में दफ़्न कर दिया कि 56 हिजरी में आ कर एक मकान में गढ़ा खुदवा कर उसको ख़स पोश कर के आबनूस की कुर्सी बिछवाई और आयशा को दावत में बुलवा कर उस पर बिठाया , आयशा बैठते ही उस गढ़े में जा पड़ीं। माविया ने इस गढ़े को पत्थर और चूने से बंद करा दिया और मक्के की तरफ़ कूच कर गये।(हबीब उस सैर जिल्द 1 पृष्ठ 85, ओकली तारीख़े इस्लाम रबीउल अबरार , अवाएल सियूती , कामिल अल सफ़ीना , हदीक़ा हकीम सनाई , मुनाक़िबे मुर्तज़वी)

45. 51 ई0 में हजर इब्ने अदी को जो निहायत मुत्तक़ी व परहेज़गार और इबादत गुज़ार थे और उनके छ़ हमराहियों को और उमर इब्ने हमक़ सहाबी को सिर्फ़ इस जुर्म में कि वह दोस्त दाराने अली (अ.स.) में से थे और जब माविया का गर्वनर कूफ़े के मिम्बर पर अली (अ.स.) पर लानत करता तो यह रोकते और अली (अ.स.) की हिमायत करते थे , क़त्ल करा दिया।

46. खानदाने बनी उमय्या को क़ुरआन में शजराए मलऊना फ़रमाया है।

47. उनको , अली (अ.स.) उनकी औलाद और उनके शियों से सख़्त दुश्मनी थी चुनान्चे माविया हज़रत अली (अ.स.) पर तबर्रा करता था। उसने 41 हिजरी में हुक्म दिया कि ममालिके महरूसा की मस्जिदों मे ख़तीब मिम्बर पर बैठ कर हज़रत अली (अ.स.) पर तबर्रा किया करें और यह रस्म 99 हिजरी तक जारी रही जब कि उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ ने ख़ुतबे में से इस तबर्रा को निकलवा कर आयएःان الله یعمر بالعدل والاحسان

और ख़ुलफ़ाए अरबिया के नाम दाखि़ल कराये। मुलाहेज़ा हो , सही मुस्लिम , तिर्मिज़ी , मिनहाजुल सुन्नता , अक़्दुल फ़रीद , अबुल फ़िदा , कामिल इब्ने असीर , तबरी , तारीख़ अल खु़लफ़ा , फ़तावाए अज़ीज़ी , तफ़रीह उल अहबाब , ख़साएस निसाई।

इमाम ग़ज़ाली (र.) लिखते हैं कि हज़रत अली (अ.स.) पर शितम व तबर्रा एक हज़ार माह तक जारी रहा।(इसरारूल आलेमीन पृष्ठ 10 तबआ बम्बई) अल निसाएल काफ़िया के पृष्ठ 9 में है कि हज़रत अली (अ.स.) पर सत्तर हज़ार मिम्बरों पर सबबो शितम की जाती थी। माविया ने अबू हुरैरा , उमरे आस , मुग़ीरा इब्ने शेबा और उरवा इब्ने ज़ुबैर को इस अम्र पर मामूर किया था कि अली (अ.स.) की मनक़सत में झूठी हदीसे तय्यार करें।

48. इब्ने अबिल हदीद जिल्द 2 पृष्ठ 9 पर है , शियाने अली (अ.स.) के माल व मता ज़ब्त कर लिये गये वो क़त्ल किये गये और इस क़दर उन पर ज़ुल्म किये गये कि कोई अपने को शिया न कह सकता था।

49. इब्ने अबिल हदीद जिल्द 2 पृष्ठ 9 , निसाए काफ़िया पृष्ठ 70 , किताब अल फ़ख़्री में है कि माविया उमूरे दुनिया में इस क़द्र मुनहमिक रहता और अपनी हिम्मत तदबीर उमूरे दुनिया में इतनी मसरूफ़ करता कि और सब बातें उसके सामने हेच समझता था।

50. दिन में पांच मरतबा खाता था और आख़री दफ़ा सब से ज़्यादा खा कर कहता था ऐ गु़लाम उठा ले खाते खाते थक गया मगर सेर नहीं हुआ। एक बछड़ा भून कर लाये वह एक ही मैदे की रोटी के साथ खा गया और साथ में चार मोटे मोटे गुर्दे। एक गर्म भेड़ का बच्चा और एक ठन्डे भेड़ का बच्चा और खजूरों से अलग मुंह मीठा किया। इसके आगे सौ (100) रतल बाक़लानी रूतब रखा गया वह सब खा गया।

51. इमाम निसाई फ़रमाते हैं कि रसूल अल्लाह (स अ व व ) ने उनके हक़ में बद दुआ की थी ला अशबा उल्लाह बतना ख़ुदा इसका पेट न भरे।

52. माविया अपना मतलब निकालने में खूंरेज़ी के मुताअल्लिक़ परवाह न करता था।

53. ओकली लिखता है कि वह ज़क्र बर्क कपड़े पहनता और शानो शौकत से बसर करता और हमेशा शराब पीता था।

54. हसन बसरी कहते हैं कि माविया की चार बातें ऐसी हैं कि उनमें से एक ही उसकी हलाकत के लिये काफ़ी है। 1. अव्वल मुस्तहक़ीने खि़लाफ़त को महरूम करके ज़बर दस्ती खि़लाफ़त पर क़ब्ज़ा करना। 2 , दूसरे यज़ीद को वली अहद बनाना जो बद अतवार , शराबी , हरीर पहनने वाला , गाना बजाना सुनने का शौकीन था। 3. तीसरे अबू सुफ़ियान के हरामी बेटे ज़ियाद को शरीयत के खि़लाफ़ अपना भाई बनाना। 4. चौथे हजर और उनके असहाब पर ज़ुल्म करना और उनको क़त्ल कराना।

55. इमाम शाफ़ेई फ़माते हैं कि चार सहाबी ऐसे हैं जिनकी गवाही क़ाबिले क़ुबूल नहीं। माविया , उमरो आस , मुग़िरा , ज़ियाद। हकीक़त यह है कि इस्लाम की इन्हीं चार फ़ितना ग़रों ने कमर तोड़ी है।

56. मसूदी लिखता है कि अहले शाम माविया के फ़रमा बरदार और इताअत गुज़ार ऐसे थे कि जंगे सिफ़्फ़ीन को जाते हुए माविया ने जुमे की नमाज़ बुध को पढ़ा दी और लोगों ने पढ़ ली।

57. फिर मसूदी लिखता है कि बनी उमय्या के अहद में आम लोगों के इख़्लाक़ में यह बात दाखि़ल हो गई थी कि सय्यद को सरदार न बनायें। बनी उमय्या बग़ैर आलिम होने के इल्म की बात कहते थे बिला तमीज़ फ़ाज़ील व मफ़जू़ल और फ़ायदा नुक़सान के जो उनके आगे हो जाय उसकी मुताबेक़त कर लेते थे और हक़ो बातिल में तमीज़ न करते थे।

58. माविया 60 हिजरी में अलील हुआ और उसने यज़ीद से कहा कि जो कुछ मांगना हो मांग ले। उसने कहा हुकूमत चाहता हूँ ताकि उसके ज़रिये से जहन्नुम से नजात हासिल कर लूँ। उसने यज़ीद का मुंह चूम लिया और कहा मुझे मंज़ूर है।(तारीख़े कामिल)

चुनान्चे यह यज़ीद जैसे दुश्मने इस्लाम को ख़लीफ़ा बना कर रजब 60 हिजरी में राहीए दार उल बवार हो गया।

(तारीख़े इस्लाम जिल्द 1 पृष्ठ 33 )

59. यह मुसल्लेमाते तारीख़ी में से है कि माविया के हक़ में कोई एक हदीस भी वारिद न हुई और उसके बिदआत बे शुमार हैं। ततहिरूल जिनान , मौज़ूआते मुल्ला अली क़ारी पृष्ठ 48 व फ़तेहुल बारी में है कि माविया के हक़ में कोई भी ख़बर सही वारिद नहीं यही वजह है कि सही बुख़ारी में उसके लिये कोई बाब नहीं किया गया।

60. मफ़रूदात इमाम राग़िब असफ़हानी में है कि हज़रत अली (अ.स.) ने फ़रमाया था कि माविया के गले में जब तब ईसाईयों की सलीब न पड़ेगी उसे मौत न आयेगी। चुनान्चे आख़री वक़्त नसरानी किरस्टान ने तावीज़े शिफ़ा के नाम से उसके गले में सलीब डाल दी। उसके बाद उसका इन्तेक़ाल हो गया। यक़ीन है कि माविया नसरानी व ईसाई महशूर होगा। क्यों कि यह अली (अ.स.) का दुश्मन और उनको अज़ीयत देने वाला था , और हदीस में है कि ‘‘ मन अज़ी अलीयन बाएस यौमुल क़यामा यहूदिया ’’ जो अली (अ.स.) को अज़ीयत दे गा वह यहूदी या नसरानी मबऊस व महशूर होगा। निसाए काफ़िया , तारीख़ुल खुलफ़ा पृष्ठ 135 में है कि माविया ने चालीस साल हुकूमत की। 77 साल की उम्र पाई और 60 हिजरी में इन्तेक़ाल किया और दमिश्क़ (शाम) में दफ़्न किया गया।(1)

मैं कहता हूँ कि माविया के जुमला अमल व किरदार के नताएज एक तरफ़ और उसका हज़रत अली (अ.स.) और इमाम हसन (अ.स.) का क़त्ल करना एक तरफ़। यक़ीन करना चाहिये कि माविया की बख़्शिश क़तअन दुश्वार नामुम्किन और मोहाल है।

(1). सुना जाता है कि शाम में जिस जगह पर माविया की क़ब्र थी उस जगह चूड़िया बनाने की भट्टी बनी हुई है।


अबु अब्दुल्लाह हज़रत इमाम हुसैन (अ स ) शहीदे कर्बला

हुसैन तूने तहे तेग़ , वह किया सजदा।

कि फ़ख़्र करती है ताअत भी इस इताअत पर।।

न अब्दियत को फ़क़त , इफ़्तेख़ार है मौला।

उलूहियत भी है नाज़ां , तेरी इबादत पर।।

साबिर थरयानी (कराची)

यूँही बस तीसरी शाबान को हुरमत चौगनी हो गई।

मुझे बारह पिला दे , पांचवां साक़ी हुआ पैदा।।

न क्यों कर , ऐसे बेटे हों नाज़ां साक़ीए कौसर।

निहां हैं जिसमें नौ कौसर यह वह इस्मत का है दरिया।।

हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) अबुल आइम्मा अमीरल मोमेनीन हज़रत अली इब्ने अबी तालिब (अ.स.) व सय्यदुन्निसां हज़रत फ़ात्मातुज़ ज़हरा (अ.स.) के फ़रज़न्द और पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) व जनाबे ख़दीजातुल कुबरा के नवासे और शहीदे मज़लूम इमाम हसन (अ.स.) के कु़व्वते बाज़ू थे। आपको अबुल आइम्मातुस सानी कहा जाता है क्यों कि आप ही की नस्ल से नौ इमाम मुतावल्लिद हुए। आप भी अपने पदरे बुज़ुर्गवार और बरादरे आली वक़ार की तरह मासूम मन्सूस अफ़ज़ले ज़माना और आलिमे इल्मे लदुन्नी थे।

आपकी विलादत

हज़रत इमाम हसन (अ.स.) की विलादत के पचास रातें गुज़री थीं कि हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) का नुक़ता ए वजूद बतने मादर में मुस्तक़र हुआ था। हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) इरशाद फ़रमाते हैं कि विलादते हसन (अ.स.) और इस्तेक़रारे इमाम हुसैन (अ.स.) में तोहर का फ़ासला था। (असाबा नज़लुल अबरार वाक़ेदी) अभी आपकी विलादत न होने पाई थी कि बा रवायते उम्मुल फ़ज़ल बिन्ते हारिस ने ख़्वाब में देखा कि रसूले करीम (स अ व व ) के जिस्म का एक टुकड़ा काट कर मेरी आग़ोश में रखा गया है। इस ख़्वाब से वह बहुत घबराई और दौड़ी हुई रसूले करीम (स अ व व ) की खि़दमत में हाज़िर हो कर अर्ज़ परदाज़ हुई कि हुज़ूर आज एक बहुत बुरा ख़्वाब देखा है। हज़रत ने ख़्वाब सुन कर मुस्कुराते हुए फ़रमाया कि यह ख़्वाब तो निहायत ही उम्दा है। ऐ उम्मुल फ़ज़ल इसकी ताबीर यह है कि मेरी बेटी फ़ात्मा के बतन से अन्क़रीब एक बच्चा पैदा होगा जो तुम्हारी आग़ोश में परवरिश पाऐगा। आपके इरशाद फ़रमाने से थोड़ा ही अरसा गुज़रा था कि ख़ुसूसी मुद्दते हमल सिर्फ़ 6 माह गुज़ार कर नूरे नज़र रसूल (स अ व व ) इमाम हुसैन (अ.स.) बातारीख़ 3 शाबान सन् 4 हिजरी बमुक़ाम मदीना ए मुनव्वरा बतने मादर से आग़ोशे मादर में आ गये।(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 13 व अनवारे हुसैनिया जिल्द 3 पृष्ठ 43 बा हवालाए साफ़ी पृष्ठ 298, व जामए अब्बासी पृष्ठ 59 व बेहारूल अनवार व मिसबाहे तूसी व मक़तल इब्ने नम्मा पृष्ठ 2 ) वग़ैरा , उम्मुल फ़ज़ल का बयान है कि मैं हसबुल हुक्म इनकी खि़दमत करती रही , एक दिन मैं बच्चे को ले कर आं हज़रत (स अ व व ) की खि़दमत में हाज़िर हुई। आपने आग़ोशे मोहब्बत में ले कर प्यार किया और आप रोने लगे मैंने सबब दरियाफ़्त किया तो फ़रमाया कि अभी अभी जिब्राईल मेरे पास आए थे वह बतला गए हैं कि यह बच्चा उम्मत के हाथों निहायत ज़ुल्मों सितम के साथ शहीद होगा और ऐ उम्मुल फ़ज़ल वह मुझे इसकी क़त्लगाह की सुखऱ् मिट्टी भी दे गये हैं। (मिशकात जिल्द 8 पृष्ठ 140 प्रकाशित लाहौर और मसनद इमाम रज़ा पृष्ठ 38 में है कि आं हज़रत (स अ व व ) ने फ़रमाया देखो यह वाक़ेया फ़ात्मा (अ.स.) से कोई न बतलाए वरना वह सख़्त परेशान होंगी।

मुल्ला जामी लिखते हैं कि उम्मे सलमा ने बयान किया कि एक दिन रसूले ख़ुदा (स अ व व ) मेरे घर इस हाल में तशरीफ़ लाए कि आप के सरे मुबारक के बाल बिखरे हुए थे और चहरे पर गर्द पड़ी हुई थी। मैंने इस परेशानी को देख कर पूछा कि क्या बात है ? फ़रमाया मुझे अभी अभी जिब्राईल ईराक़ के मुक़ामे करबला ले गये थे वहां मैंने जाय क़त्ले हुसैन (अ.स.) देखी है और यह मिट्टी लाया हूँ। ऐ उम्मे सलमा (अ.स.) इसे अपने पास महफ़ूज़ रखो , जब यह ख़ून आलूद हो जाय तो समझना कि मेरा हुसैन शहीद हो गया।(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 174 )

आपका इस्मे गेरामी

इमाम शिब्लन्जी लिखते हैं कि विलादत के बाद सरवरे कायनात (स अ व व ) ने इमाम हुसैन (अ.स.) की आंखों में लोआबे दहन लगाया और अपनी ज़बान उनके मूंह में दे कर बड़ी देर तक चुसाया इसके बाद दाहिने कान में अज़ान और बायें में अक़ामत कही फिर दुआए ख़ैर फ़रमा कर हुसैन नाम रखा।(नूरूल अबसार पृष्ठ 113 ) उलेमा का बयान है कि यह नाम इस्लाम से पहले किसी का भी नहीं था। वह यह भी कहते हैं कि यह नाम ख़ुदा ख़ुदा वन्दे आलम का रखा हुआ है।(अरजहुल मतालिब व रौज़तुल शोहदा पृष्ठ 236 ) किताब आलाम अल वरा तबरसी में है कि यह नाम भी दीगर आइम्मा के नामों की तरह लौहे महफ़ूज़ में लिखा हुआ है।

आपका अक़ीक़ा

इमाम हुसैन (अ.स.) का नाम रखने के बाद सरवरे कायनात (स अ व व ) ने हज़रत फ़ात्मा (अ.स.) से फ़रमाया कि बेटी जिस तरह हसन (अ.स.) का अक़ीक़ा किया गया है उसी तरह इसके अक़ीक़े का भी इन्तेज़ाम करो और इसी तरह बालों के हम वज़न चांदी तसद्दुक़ करो जिस तरह हसन (अ.स.) के लिये कर चुकी हो। अल ग़रज एक मेंढा मंगवाया गया और रस्मे अक़ीक़ा अदा कर दी गई।(मतालेबुस सूऊल सुनन 241 )

बाज़ माअसरीन ने अक़ीक़े के साथ ख़त्ने का ज़िक्र किया है जो मेरे नज़दीक क़तअन ना क़ाबिले क़ुबूल है क्यों कि इमाम का मख़्तून पैदा होना मुसल्लेमात से है।

कुन्नियत व अलक़ाब

आपकी कुन्नियत सिर्फ़ अबु अब्दुल्लाह थी अल बत्ता अलक़ाब आपके बे शुमार हैं जिनमें सय्यद , सिब्ते असग़र , शहीदे अकबर और सय्यदुश शोहदा ज़्यादा मशहूर हैं। अल्लामा मोहम्मद बिन तल्हा शाफ़ेई का बयान है कि सिब्ते और सय्यद ख़ुद रसूले करीम (स अ व व ) के मोअय्यन करदा अलक़ाब हैं।(मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 321 )

आपकी रज़ाअत

उसूले काफ़ी बाब मौलूदुल हुसैन (अ.स.) पृष्ठ 114 में है कि इमाम हुसैन (अ.स.) ने पैदा होने के बाद न हज़रत फ़ात्मा ज़हरा (अ.स.) का शीरे मुबारक नोश किया और न किसी दाई का दूध पिया। होता यह था कि जब आप भूखे होते तो सरवरे कायनात तशरीफ़ ला कर ज़बाने मुबारक दहने अक़दस में दे देते थे और इमाम हुसैन (अ.स.) उसे चूसने लगते थे। यहां तक कि सेरो सेराब हो जाते थे। मालूम होना चाहिये कि इसी से इमाम हुसैन (अ.स.) का गोश्त पोस्त बना और लोआबे दहने रिसालत से हुसैन (अ.स.) परवरिश पा कर कारे रिसालत अंजाम देने की सलाहियत के मालिक बने। यही वजह है कि आप रसूले करीम (स अ व व ) से बहुत मुशाबेह थे।(नूरूल अबसार पृष्ठ 113 )

ख़ुदा वन्दे आलम की तरफ़ से विलादते इमाम हुसैन (अ.स.) की तहनियत व ताज़ियत

अल्लामा हुसैन वाएज़ काशेफ़ी रक़म तराज़ हैं कि इमाम हुसैन (अ.स.) की विलादत के बाद ख़ल्लाक़े आलम ने जिब्राईल को हुक्म दिया कि ज़मीन पर जा कर मेरे हबीब मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) को मेरी तरफ़ से हुसैन (अ.स.) की विलादत पर मुबारक बाद दे दो और साथ ही साथ उनकी शहादते उज़मा से भी उन्हें मुत्तला कर के ताज़ियत अदा कर दो। जनाबे जिब्राईल ब हुक्मे रब्बे जलील ज़मीन पर वारिद हुए और उन्होंने आं हज़रत (अ.स.) की खि़दमत में पहुँच कर तहनियत अदा की। इसके बाद अर्ज़ परदाज़ हुए कि ऐ हबीबे रब्बे करीम आपकी खि़दमत में शाहदते हुसैन (अ.स.) की ताज़ियत भी मिन जानिब अल्लाह अदा की जाती है। यह सुन कर सरवरे कायनात का माथा ठन्का और आपने पूछा कि जिब्राईल माजेरा क्या है ? तहनियत के साथ ताज़ियत की तफ़सील बयान करो। जिब्राईल (अ.स.) ने अर्ज़ की एक वह दिन होगा जिस दिन आपके इस चहिते फ़रज़न्द ‘‘ हुसैन ’’ के गुलूए मुबारक पर ख़न्जरे आबदार रखा जायेगा और आपका यह नूरे नज़र बे यारो मद्दगार मैदाने करबला में यक्काओ तन्हा तीन दिन का भूखा प्यासा शहीद होगा। यह सुन कर सरवरे आलम (अ.स.) महवे गिरया हो गये। आपके रोने की ख़बर ज्यों ही अमीरल मोमेनीन (अ.स.) को पहुँची वह भी रोने लगे आलमे गिरया में दाखि़ले ख़ाना ए सय्यदा हो गए। जनाबे सय्यदा (अ.स.) ने जो हज़रत अली (अ.स.) को रोता देखा तो दिल बेचैन हो गया। अर्ज़ कि अबुल हसन रोने का सबब क्या है ? फ़रमाया बिन्ते रसूल (अ.स.) अभी जिब्राईल आये हैं और वह हुसैन की तहनियत के साथ साथ उसकी शहादत की ख़बर भी दे गये हैं हालात से बा ख़बर होने के बाद फ़ात्मा का गिरया गुलूगीर हो गया। आपने हुज़ूर (स अ व व ) की खि़दमत में हाज़िर हो कर अर्ज़ कि बाबा जान यह कब होगा ? फ़रमाया जब न मैं हूंगा न तुम होगी न अली होंगे न हसन होंगे। फ़ात्मा (अ.स.) ने पूछा बाबा मेरा बच्चा किस ख़ता पर शहीद होगा ? फ़रमाया फ़ात्मा (स अ व व ) बिल्कुल बे जुर्म व बे ख़ता सिर्फ़ इस्लाम की हिमायत में शहीद होगा। फ़ात्मा (स अ व व ) ने अर्ज़ कि बाबा जान जब हम में से कोई न होगा तो इस पर गिरया कौन करेगा और उसकी सफ़े मातम कौन बिछायेगा।

रावी का बयान है कि इस सवाल का हज़रत रसूले करीम (स अ व व ) अभी जवाब न देने पाये थे कि हातिफ़े ग़यबी की आवाज़ आई , ऐ फ़ात्मा ग़म न करो , तुम्हारे इस फ़रज़न्द का ग़म अब्द उल आबाद तक मनाया जायेगा और इसका मातम क़यामत तक जारी रहेगा।

एक रवायत में है कि रसूल करीम (स अ व व ) ने फ़ात्मा के जवाब में यह फ़रमाया था कि ख़ुदा कुछ लोगों को हमेशा पैदा करता रहेगा , जिसके बूढ़े , बूढ़ों पर और जवान जवानों पर और बच्चे बच्चों पर और औरतें औरतों पर गिरया व ज़ारी करते रहेंगे।

फ़ितरूस का वाक़ेया

अल्लामा मज़कूर बाहवालाए हज़रत शेख़ मुफ़ीद अल रहमा रक़म तराज़ हैं कि इसी तहनियत के सिलसिले में जनाबे जिब्राईल बे शुमार फ़रिश्तों के साथ ज़मीन की तरफ़ आ रहे थे। नागाह उनकी नज़र ज़मीन के एक ग़ैर मारूफ़ तबक़े पर पड़ी , देखा कि एक फ़रिश्ता ज़मीन पर पड़ा हुआ ज़ारो क़तार रो रहा है। आप उसके क़रीब गए और आपने उससे माजरा पूछा। उसने कहा ऐ जिब्राईल मैं वही फ़रिश्ता हूँ जो पहले आसमान पर सत्तर हज़ार फ़रिश्तों की क़यादत करता था। मेरा नाम फ़ितरूस है। जिब्राईल ने पूछा तुझे यह किस जुर्म की सज़ा मिली है ? उसने अर्ज़ की , मरज़ीए माबूद के समझने में एक पल की देरी की थी , जिसकी यह सज़ा भुगत रहा हूँ। बालो पर जल गए हैं , यहां कुंजे तन्हाई में पड़ा हूँ। ऐ जिब्राईल ख़ुदारा मेरी कुछ मद्द करो। अभी जिब्राईल जवाब न देने पाये थे कि उसने सवाल किया , ऐ रूहुल अमीन आप कहां जा रहे हैं ? उन्होंने फ़रमाया कि नबी आख़ेरूज़ ज़मां हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) के यहां एक फ़रज़न्द पैदा हुआ है जिसका नाम ‘‘ हुसैन ’’ है। मैं ख़ुदा की तरफ़ से उसकी अदाए तहनियत के लिये जा रहा हूँ। फ़ितरूस ने अर्ज़ कि ऐ जिब्राईल ख़ुदा के लिये मुझे अपने हमराह लेते चलो , मुझे इसी दर से शिफ़ा और नजात मिल सकती है। जिब्राईल उसे साथ ले कर हुज़ूर की खि़दमत में उस वक़्त पहुँचे जब कि इमाम हुसैन (अ.स.) आग़ोशे रसूल (स अ व व ) में जलवा फ़रमा रहे थे। जिब्राईल ने अर्ज़े हाल किया। सरवरे कायनात (स अ व व ) ने फ़रमाया कि फ़ितरूस के जिस्म को हुसैन (अ.स.) के जिस्म से मस कर दो , शिफ़ा हो जायेगी। जिब्राईल ने ऐसा किया और फ़ितरूस के बालो पर उसी तरह रोईदा हो गये जिस तरह पहले थे। वह सेहत पाने के बाद फ़ख़्रो मुबाहात करता हुआ अपनी मंज़िले असली आसमाने सेयुम पर जा पहुँचा और मिसले साबिक़ सत्तर हज़ार फ़रिश्तों की क़यादत करने लगा।

बाद अज़ शहादते हुसैन (अ.स.) चूँ बरां क़ज़िया मतला शुद ’’

यहां तक कि वह ज़माना आया जिसमें इमाम हुसैन (अ.स.) ने शहादत पाई और इसे हालात से आगाही हुई तो उसने बारगाहे अहदियत में अर्ज़ कि ‘‘ मालिक मुझे इजाज़त दी जाय कि मैं ज़मीन पर जा कर दुश्मनाने हुसैन (अ.स.) से जंग करूं। इरशाद हुआ कि जंग की कोई ज़रूरत नहीं अलबत्ता तू सत्तर हज़ार फ़रिश्ते ले कर ज़मीन पर चला जा और उनकी क़ब्रे मुबारक पर सुबह व शाम गिरया ओ मातम किया कर और इसका जो सवाब हो उसे उनके रोने वालों पर हिबा कर दे। चुनान्चे फ़ितरूस ज़मीने करबला पर जा पहुँचा और ता क़याम क़यामत शबो रोज़ रोता रहेगा। ’’(रौज़तुल शोहदा अज़ 236 ता पृष्ठ 238 प्रकाशित बम्बई 1385 हिजरी व ग़नीमतुल तालेबीन शेख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी)

इमाम हुसैन (अ.स.) का चमकता चेहरा

मुल्ला जामी रहमतुल्लाह अलैहा तहरीर फ़रमाते हैं कि इमाम हुसैन (अ.स.) को ख़ुदा वन्दे आलम ने वह हुस्न व जमाल दिया कि जिसकी नज़ीर नज़र नहीं आतीं आपके रूए ताबां का यह हाल था कि जब आप जाय तारीक में बैठ जाते थे तो लोग आपके रूए रौशन से शमा ए तारीक़ का काम लेते थे यानी चीज़ रौशन हो जाती थी और लोगों को तारीकी में राहबरी की ज़हमत नहीं होती थी।(शवाहेदुन नबूवत रूकन 6 पृष्ठ 174 व रौज़तुल शोहदा बाब 7 पृष्ठ 238 ) शेख़ अब्दुल वासेए इब्ने यहीया वासेई लिखते हैं कि इमाम हसन (अ.स.) और इमाम हुसैन (अ.स.) एक दिन रसूल करीम (स अ व व ) की खि़दमत में हाज़िर थे यहां तक कि रात हो गई , आपने फ़रमाया मेरे बच्चों अब रात हो गई तुम अपनी माँ के पास चले जाओ। बच्चे हसबुल हुक्म रवाना हो गये। रावी का बयान है कि जैसे यह बच्चे घर की तरफ़ चले एक रौशनी पैदा हो हुई जो उनके रास्ते की तारीकी को दूर करती जाती थी , यहां तक कि बच्चे अपनी माँ की खि़दमत में जा पहुँचे। पैग़म्बरे इस्लाम (स अ व व ) जो इस रौशनी को देख रहे थे इरशाद फ़रमाने लगे। ‘‘ अल हम्दो लिल्लाहिल लज़ी अकरामना अहल्ल बैत ’’ ख़ुदा का शुक्र है कि उसने हम अहले बैत को इज़्ज़त व करामत अता फ़रमाई है।(मुसनदे इमाम रज़ा पृष्ठ 32 मतबुआ मिस्र 1341 हिजरी)

जनाबे इब्राहीम का इमाम हुसैन (अ.स.) पर क़ुरबान होना

उलेमा का बयान है कि एक रोज़ हज़रत रसूले ख़ुदा (स अ व व ) इमाम हुसैन (अ.स.) को दाहिने ज़ानू पर और अपने बेटे जनाबे इब्राहीम को बायें ज़ानू पर बिठाये हुए प्यार कर रहे थे कि नागाह जिब्राईल नाज़िल हुए और कहने लगे इरशादे ख़ुदा वन्दी है कि दो में से एक अपने पास रखो। पैग़म्बरे इस्लाम (स अ व व ) ने इमाम हुसैन (अ.स.) को इब्राहीम पर तरजीह दी और अपने फ़रज़न्द इब्राहीम को हुसैन (अ.स.) पर फ़िदा कर देने के लिये कहा। चुनान्चे इब्राहीम अलील हो कर तीन यौम में इन्तेक़ाल कर गये। रावी का बयान है कि इस वाक़िये के बाद से जब इमाम हुसैन (अ.स.) आं हज़रत (स अ व व ) के सामने आते थे तो आप उन्हें आग़ोश में बिठा कर फ़रमाते थे कि यह वह है जिस पर मैंने अपने बेटे इब्राहीम को क़ुरबान कर दिया है।(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 174 व तारीख़े बग़दाद जिल्द 2 पृष्ठ 204 )

हसनैन(अ स . ) की बाहमी ज़ोर आज़माई

इब्नल ख़शाब शेख़ कमालउद्दीन और मुल्ला जामी लिखते हैं कि एक मरतबा इमाम हसन (अ.स.) और इमाम हुसैन (अ.स.) कमसिनी के आलम में रसूले ख़ुदा (स अ व व ) की नज़रों के सामने आपस में ज़ोर अज़माई करने और कुश्ती लड़ने लगे। जब बाहम एक दूसरे से लिपट गए तो रसूले ख़ुदा (स अ व व ) ने इमाम हसन (अ.स.) से कहना शुरू किया , हां बेटा ‘‘ हसन बगीर , हुसैन रा ’’ हुसैन को गिरा दे और चीत कर दे। फ़ात्मा (स अ व व ) ने आगे बढ़ कर अर्ज़ कि बाबा जान आप तो बड़े फ़रज़न्द की हिम्मत बढ़ा रहे हैं और छोटे बेटे की हिम्मत अफ़ज़ाई नहीं करते। आपने फ़रमाया कि ऐ बेटी यह तो देखो जिब्राईल खड़े हुए हुसैन से कह रहे हैं ‘‘ बगीर हसन रा ’’ ऐ हुसैन तुम हसन को गिरा दो , और चित कर दो।

(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 174 व रौज़तुल शोहदा पृष्ठ 239 नूरूल अबसार पृष्ठ 114 प्रकाशित मिस्र)

ख़ाके क़दमे हुसैन (अ.स.) और हबीब इब्ने मज़ाहिर

अल्लामा हुसैन वाएज़ काशफ़ी लिखते हैं कि एक दिन रसूले ख़ुदा (स अ व व ) एक रास्ते से गुज़र रहे थे आपने देखा कि चन्द बच्चे खेल रहे हैं। आप उनके क़रीब गए और उनमें से एक बच्चे को उठा कर अपनी आग़ोश में बैठा लिया और आप उसकी पेशानी के बोसे देने लगे। एक साहबी ने पूछा , हुज़ूर इस बच्चे में क्या ख़ुसूसियत है कि आपने इस दर्जा क़द्र अफ़ज़ाई फ़रमाई है ? आपने इरशाद फ़रमाया कि मैंने इस एक दिन इस हाल में देखा कि यह मेरे बच्चे हुसैन के क़दमों की ख़ाक उठा कर अपनी आंखों में लगा रहा था। बाज़ हज़रात का बयान है कि वह बच्चा आं हज़रत ने जिसको प्यार किया था उसका नाम हबीब इब्ने मज़ाहिर था।(रौज़तुल शोहदा)

पिसरे मुर्तज़ा , इमाम हुसैन -- कि चूँ ऊला न बूदा दर कौनैन

मुस्तफ़ा ऊरा कशीदा बदोश -- मुर्तज़ा , पर वरीदा दर आग़ोश

अक़्ल दर बन्द अहदो पैमाईश -- बूदा जिब्राईल ,महद जुम्बानिश

इमाम हुसैन (अ.स.) के लिये हिरन के बच्चे का आना

किताब कनज़ुल ग़राएब में है कि एक शख़्स ने सरवरे काएनात (स अ व व ) की खि़दमत में एक बच्चे आहू (हिरन) हदिये में पेश किया। आपने उसे इमाम हसन (अ.स.) के हवाले कर दिया क्यों कि आप बर वक़्त हाज़िरे खि़दमत हो गये थे। इमाम हुसैन (अ.स.) ने जब इमाम हसन (अ.स.) के पास हिरन का बच्चा देखा तो अपने नाना से कहने लगे , नाना जान आप मुझे भी हिरन का बच्चा दीजिए। सरवरे कायनात (स अ व व ) इमाम हुसैन (अ.स.) को तसल्ली देने लगे लेकिन कमसिनी का आलम था फ़ितरते इंसानी ने इज़हारे फ़ज़ीलत के लिये करवट ली और इमाम हुसैन (अ.स.) ने ज़िद करना शुरू कर दिया और क़रीब था कि रो पड़ें , नागाह एक हिरन को आते हुए देखा गया जिसके साथ उसका बच्चा था। वह आहू (हिरन) सीधा खि़दमत में आया और उसने बा ज़बाने फ़सीह कहा , हुज़ूर मेरे दो बच्चे थे एक को सय्याद ने शिकार कर के आपकी खि़दमत में पहुँचा दिया और दूसरे को मैं इस वक़्त ले कर हाज़िर हुआ हूँ। उसने कहा मैं जंगल में था कि मेरे कानों में एक आवाज़ आई जिसका मतलब यह था कि नाज़ परवरदा ए रसूल (स अ व व ) बच्चा ए आहू के लिये मचला हुआ है जल्द से जल्द अपने बच्चे को रसूल (स अ व व ) की खि़दमत में पहुँचा। हुक्म पाते ही मैं हाज़िर हुआ हूँ और हदिया पेशे खि़दमत है। आं हज़रत (स अ व व ) ने आहू को दुआ ए ख़ैर दी और बच्चे को इमाम हुसैन (अ.स.) के हवाले कर दिया।(रौज़तुल शोहदा जिल्द 1 पृष्ठ 220 )

इमाम हुसैन (अ.स.) सीना ए रसूल (स अ . व . व . ) पर

सहाबिये रसूल (स अ व व ) अबू हुरैरा रावी ए हदीस का बयान है कि , मैंने अपनी आंखों से यह देखा कि रसूले करीम (स अ व व ) लेटे हुए हैं और इमाम हुसैन (अ.स.) निहायत कमसिनी के आलम में उनके सीना ए मुबारक पर हैं। उनके दोनों हाथों को पकड़े हुए फ़रमाते हैं , ऐ हुसैन तू मेरे सीने पर कूद चुनान्चे इमाम हुसैन (अ.स.) आपके सीना ए मुबारक कूदने लगे उसके बाद हुज़ूर (स अ व व ) ने इमाम हुसैन (अ.स.) का मूंह चूम कर ख़ुदा की बारगाह में अर्ज़ कि ऐ मेरे पालने वाले मैं इसे बेहद चाहता हूँ , तू भी इसे महबूब रख। एक रवायत में है कि हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) आं हज़रत (स अ व व ) का लोआबे दहन और उनकी ज़बान इस तरह चूसते थे जिस तरह कोई खजूर चूसे।(अरजहुल मतालिब पृष्ठ 359, पृष्ठ 361, इस्तेआब जिल्द 1 पृष्ठ 144, असाबा जिल्द 2 पृष्ठ 11 कंज़ुल आमाल जिल्द 7 पृष्ठ 104, कंज़ुल अल हक़ाएक़ पृष्ठ 59 )

हसनैन (अ.स.) में ख़ुशनवीसी का मुक़ाबला

रसूले करीम (स अ व व ) के शहज़ादे इमाम हसन (अ.स.) और इमाम हुसैन (अ.स.) ने एक तहरीर लिखी फिर दोनों आपस में मुक़ाबला करने लगे कि किसका ख़त अच्छा है। जब बाहमी फ़ैसला न हो सका तो फ़ात्मा ज़हरा (स अ व व ) की खि़दमत में हाज़िर हुए। उन्होंने फ़रमाया अली (अ.स.) के पास जाओ। अली (अ.स.) ने कहा रसूल अल्लाह से फ़ैसला कराओ। रसूले करीम ने इरशाद किया , ऐ नूरे नज़र इसका फ़ैसला तो मेरी लख़्ते जिगर फ़ात्मा ही करेगी उसके पास जाओ। बच्चे दौड़े हुए फिर मां की खि़दमत में हाज़िर हुए। मां ने गले लगा लिया और कहा ऐ मेरे दिल की उम्मीद तुम दोनों का ख़त बेहतरीन है और दोनों ने बहुत ख़ूब लिखा है लेकिन बच्चे न माने और यही कहते रहे मादरे गेरामी दोनों को सामने रख कर सही फ़ैसला दीजिये। मां ने कहा अच्छा बेटा , लो अपना गुलू बन्द तोड़ती हूँ उसके दाने चुनो , फ़ैसला ख़ुदा करेगा। सात दानों का गुलू बंद टूटा , ज़मीन पर दाने बिखरे , बच्चों ने हाथ बढ़ाए और तीन तीन दानों पर दोनों ने क़ब्ज़ा कर लिया और एक दाना जो रह गया उसकी तरफ़ दोनों के हाथ बराबर से बढ़े। हुक्मे ख़ुदा वन्दे आलम हुआ जिब्राईल दानों के दो टुकड़े कर दो। एक हसन (अ.स.) ने ले लिया और एक हुसैन (अ.स.) ने उठा लिया। मां ने बढ़ कर दोनों के बोसे लिये और कहा क्यों बच्चों मैं न कहती थी कि तुम दोनों के ख़त अच्छे हैं और एक की दूसरे के ख़त पर तरजीह नहीं है।(ख़ासेतुल मसाएब पृष्ठ 335 ) क़ारी अब्दुल वुदूद शम्स लखनवी खलफ़ मौलवी अब्दुल हकीम उस्ताद मौलवी शेख़ अब्दुल शकूर मुदीर अल नजम पाटा नाला लखनऊ , भारत , अपने एक क़सीदे में लिखते हैं।

दोनों भाई एक दिन , मादर से यह कहने लगे।

आप फ़रमाएं कि लिखना किसको बेहतर आ गया।।

सात मोती रख के फ़रमाया , कि जो ज़ाएद उठाये।

एक मोती , दो हुआ , हिस्सा बराबर हो गया।।

जन्नत से कपड़े और फ़रज़न्दाने रसूल (स अ . व . व . ) की ईद

इमाम हसन (अ.स.) और इमाम हुसैन (अ.स.) का बचपन है। ईद आने को है और इन असखि़याये आलम के घर में नये कपड़े का क्या ज़िक्र पुराने कपड़े बल्कि जौ की रोटियां तक नहीं हैं। बच्चों ने मां के गले में बाहें डाल दीं। मादरे गेरामी मदीने के बच्चे ईद के दिन ज़र्क़ बर्क़ कपड़े पहन कर निकलेंगे और हमारे पास नये कपड़े नहीं हैं। हम किस तरह ईद मनायेंगे। माँ ने कहा बच्चों घबराओ नहीं तुम्हारे कपड़े दरज़ी लायेगा। ईद की रात आई , बच्चों ने फिर मां से कपड़ों का तक़ाज़ा किया। माँ ने वही जवाब दे कर नौनिहालों को ख़ामोश कर दिया। अभी सुबह न हो पाई थी कि एक शख़्स ने दरवाज़े पर आवाज़ दी , दरवाज़ा खटखटाया , फ़िज़्ज़ा दरवाज़े पर गईं। एक शख़्स ने एक गठरी लिबास की दी। फ़िज़्ज़ा ने उसे सय्यदा ए आलम की खि़दमत में पेश किया। अब जो खोला तो उसमें दो छोटे छोटे अम्मामे , दो क़बाऐं , दो अबाऐं ग़रज़ की तमाम ज़रूरी कपड़े मौजूद थे। माँ का दिल बाग़ बाग़ हो गया। वह समझ गईं कि यह कपड़े जन्नत से आये हैं लेकिन मुँह से कुछ नहीं कहा। बच्चों को जगाया कपड़े दिये। सुबह हुई , बच्चों ने जब कपड़ों के रंग की तरफ़ नज़र की तो कहा मादरे गेरामी यह तो सफ़ैद कपड़े हैं। मदीने के बच्चे रंगीन कपड़े पहने होंगे। अम्मा जान हमें रंगीन कपड़े चाहिये। हुज़ूरे अनवर (स अ व व ) को इत्तेला मिली , तशरीफ़ लाये। फ़रमाया घबराओ नहीं तुम्हारे कपड़े अभी अभी रंगीन हो जायेंगे। इतने में जिब्राईल आफ़ताबा (एक बड़ा और चौड़ा बरतन) लिये हुए आ पहुँचे। उन्होंने पानी डाला , मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) के इरादे से कपड़े सब्ज़ और सुखऱ् हो गये। सब्ज़ (हरा) जोड़ा हसन (अ.स.) ने पहना और सुखऱ् जोड़ा हुसैन (अ.स.) ने जे़गे तन किया। माँ ने गले लगाया , बाप ने बोसे दिये , नाना ने अपनी पुश्त पर सवार कर के मेहार के बदले अपनी ज़ुल्फ़ें हाथो में दे दीं और कहा मेरे नौनिहालों , रिसालत की बाग तुम्हारे हाथ में है। जिधर चाहो मोड़ो और जहां चाहो ले चलो।(रौज़तुल शोहदा पृष्ठ 189 बेहारूल अनवार) बाज़ उलेमा का कहना है कि सरवरे कायनात बच्चों को पुश्त पर बिठा कर दोनों हाथो पैरों से चलने लगे और बच्चों की फ़रमाईश पर ऊंट की आवाज़ मुंह से निकालने लगे।(कशफ़ुल महजूब)

गिरया ए हुसैनी और सदमा ए रसूल (स अ . व . व . )

इमाम शिबलंजी और अल्लामा बदख़्शी लिखते हैं कि ज़ैद इब्ने ज़ियाद का बयान है कि एक दिन आं हज़रत (स अ व व ) ख़ाना ए आयशा से निकल कर कहीं जा रहे थे , रास्ते में फ़ात्मा ज़हरा (अ.स.) का घर पड़ा। उस घर में से इमाम हुसैन (अ.स.) के रोने की आवाज़ बरामद हुई। आप घर में दाखि़ल हो गए और फ़रमाया ऐ फ़ात्मा ‘‘ अलम तालमी अन बक़ाराह यूज़ीनी ’’ क्या तुम्हें मालूम नहीं कि हुसैन (अ.स.) के रोने से मुझे किस क़द्र तकलीफ़ और अज़ीयत पहुँचती है।(नूरूल अबसार पृष्ठ 114 व मम्बए अहतमी जिल्द 9 पृष्ठ 201 व ज़ख़ाएर अल अक़बा पृष्ठ 123 ) बाज़ उलमा का बयान है कि एक दिन रसूले ख़ुदा (स अ व व ) कहीं जा रहे थे। रास्ते में एक मदरसे की तरफ़ से गुज़र हुआ। एक बच्चे की आवाज़ कान में आई जो हुसैन (अ.स.) की आवाज़ से बहुत ज़्यादा मिलती थी। आप दाखि़ले मदरसा हुए और उस्ताद को हिदायत की कि इस बच्चे को न मारा करो क्यों कि इसकी आवाज़ मेरे बच्चे हुसैन से बहुत मिलती है।

इमाम हुसैन (अ.स.) की सरदारीए जन्नत

पैग़म्बरे इस्लाम की यह हदीस मुसल्लेमात और मुतावातेरात में से है कि ‘‘ अल हसन वल हुसैन सय्यदे शबाबे अहले जन्नतः व अबु हुमा ख़ेर मिन्हमा ’’ हसन व हुसैन जवानाने जन्नत के सरदार हैं और उनके पदरे बुज़ुर्गवार इन दोनों से बेहतर हैं।(इब्ने माजा) सहाबी ए रसूल जनाबे हुज़ैफ़ा यमानी का बयान है कि मैंने एक दिन सरवरे कायनात (स अ व व ) को बेइन्तेहा ख़ुश देख कर पूछा , हुज़ूर इफ़राते मसर्रत की क्या वजह है ? आप ने फ़रमाया ऐ हुज़ैफ़ा ! आज एक ऐसा मलक नाज़िल हुआ है जो मेरे पास इससे पहले नहीं आया था उसने मेरे बच्चों की सरदारिये जन्नत पर मुबारक बाद दी है और कहा है कि ‘‘ अन फ़ातमा सय्यदुन निसाए अहले जन्नतः व अनल हसन वल हुसैन सय्यदे शबाबे अहले जन्नतः ’’ फ़ात्मा जन्नत की औरतों की सरदार और हसनैन जन्नत के मरदों के सरदार हैं।(कन्ज़ुल आमाल जिल्द 7 पृष्ठ 107, तारीख़ुल ख़ोलफ़ा पृष्ठ 132, असदउल ग़ाबा पृष्ठ 12, असाबा जिल्द 2 पृष्ठ 12, तिर्मिज़ी शरीफ़ , मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 242, सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 114 ) इस हदीस से सियादते अलविया का मसला भी हल हो गया। क़तए नज़र इसके कि हज़रत अली (अ.स.) में मिसले नबी सियादत का ज़ाती शरफ़ मौजूद था और ख़ुद सरवरे कायनात ने बार बार आपकी सियादत की तसदीक़ सय्यदुल अरब , सय्यदुल मुत्तक़ीन , सय्यदुल मोमेनीन वग़ैरा जैसे अल्फ़ाज़ से फ़रमाई है। हज़रत अली (अ.स.) सरदाराने जन्नत इमाम हसन (अ.स.) और इमाम हुसैन (अ.स.) से बेहतर होना वाज़ेह करता है कि आपकी सियादत मुसल्लम ही नहीं बल्कि बहुत बलन्द दरजा रखती है। यही वजह है कि मेरे नज़दीक जुमला अवलादे अली (अ.स.) सय्यद हैं। यह और बात है कि बनी फ़ात्मा के बराबर नहीं हैं।


इमाम हुसैन (अ.स.) आलमे नमाज़ में पुश्ते रसूल (स अ . व . व . ) पर

ख़ुदा ने जो शरफ़ इमाम हसन (अ.स.) और इमाम हुसैन (अ.स.) को अता फ़रमाया है वह औलादे रसूल (स अ व व ) के सिवा किसी को नसीब नहीं। इन हज़रात की ज़िक्र इबादत और उनकी मोहब्बत इबादत यह हज़रात अगर पुश्ते रसूल (स अ व व ) पर आलमे नमाज़ में सवार हो जायें तो नमाज़ में कोई ख़लल वाक़े नहीं होता। अकसर ऐसा होता था कि यह नौनेहाले रिसालत पुश्ते रसूल (स. स.) पर आलमे नमाज़ में सवार हो जाया करते थे और जब कोई मना करना चाहता था तो आप इशारे से रोक दिया करते थे और कभी ऐसा भी होता था कि आप सजदे में उस वक़्त तक मशग़ूले ज़िक्र रहा करते थे जब तक बच्चे आपकी पुश्त से ख़ुद न उतर आयें। आप फ़रमाया करते थे , ख़ुदाया मैं इन्हें दोस्त रखता हूँ तू भी इनसे मोहब्बत कर। कभी इरशाद होता था , ऐ दुनिया वालों ! अगर मुझे दोस्त रखते हो तो मेरे बच्चों से भी मोहब्बत करो।(असाबा पृष्ठ 12 जिल्द 2, मुसतदरिक इमाम हाकिम व मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 223 )

हदीसे हुसैनो मिन्नी

सरवरे कायनात (स अ व व ) ने इमाम हुसैन (अ.स.) के बारे में इरशाद फ़रमाया है कि ऐ दुनिया वालों ! बस मुख़्तसर यह समझ लो कि , ‘‘ हुसैनो मिन्नी व अना मिनल हुसैन ’’ हुसैन मुझ से है और मैं हुसैन से हूँ। ख़ुदा उसे दोस्त रखे जो हुसैन को दोस्त रखे।(मतालेबुस सूऊल , पृष्ठ 242, सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 114, नूरूल अबसार पृष्ठ 113 व सही तिर्मिज़ी जिल्द 6 पृष्ठ 307, मुस्तदरिक इमाम हाकिम जिल्द 3 पृष्ठ 177 व मस्नदे अहमद जिल्द 4 पृष्ठ 972 असदउल ग़ाबता जिल्द 2 पृष्ठ 91 कंज़ुल आमाल , जिल्द 4 पृष्ठ 221 )

मकतूबाते बाबे जन्नत

सरवरे कायनात हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) इरशाद फ़रमाते हैं कि शबे मेराज जब मैं सैरे आसमानी करता हुआ जन्नत के क़रीब पहुँचा तो देखा कि बाबे जन्नत पर सोने के हुरूफ़ में लिखा हुआ है। ‘‘ ला इलाहा इल्ललाह मोहम्मदन हबीब अल्लाह अलीयन वली अल्लाह व फ़ात्मा अमत अल्लाह वल हसन वहल हुसैन सफ़ुत अल्लाह व मिनल बुग़ज़हुम लानत अल्लाह ’’

तरजुमाः ख़ुदा के सिवा कोई माबूद नहीं , मोहम्मद (स अ व व ) अल्लाह के हबीब हैं , अली (अ.स.) अल्लाह के वली हैं , फ़ात्मा (स अ व व ) अल्लाह की कनीज़ हैं , हसन (अ.स.) और हुसैन (अ.स.) अल्लाह के बुरगुज़ीदा हैं और उनसे बुग़्ज़ रखने वालों पर ख़ुदा की लानत हैं।

(अरजहुल मतालिब बाब 3 पृष्ठ 313 प्रकाशित लाहौर 1251 0 )

इमाम हुसैन (अ.स.) और सिफ़ाते हसना की मरकज़ीयत

यह तो मालूम ही है कि इमाम हुसैन (अ.स.) हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) के नवासे हज़रत अली (अ.स.) व फ़ात्मा (स अ व व ) के बेटे और इमाम हसन (अ.स.) के भाई थे और इन्हीं हज़रात को पंजेतन कहा जाता है , और इमाम हुसैन (अ.स.) पंजेतन के आख़री फ़र्द हैं। यह ज़ाहिर है कि आखि़र तक रहने वाले और हर दौर से गुज़रने वाले के लिये इक़तेसाब सिफ़ाते हसना के इम्कानात ज़्यादा होते हैं। इमाम हुसैन (अ.स.) 3 शाबान 4 हिजरी को पैदा हो कर सरवरे कायनात (स अ व व ) की परवरिश व परदाख़्त और आग़ोशे मादर में रहे और कसबे सिफ़ात करते हरे। 28 सफ़र 11 हिजरी को जब आं हज़रत (स अ व व ) शहादत पा गये और 3 जमादिउस्सानी को मां की बरकतों से महरूम हो गये तो हज़रत अली (अ.स.) ने तालिमाते इलाहिया और सिफ़ाते हसना से बहरावर किया। 21 रमज़ान 40 हिजरी को आपकी शहादत के बाद इमाम हसन (अ.स.) के सर पर ज़िम्मेदारी आयद हुई। इमाम हसन (अ.स.) हर क़िस्म की इस्तेमदाद व इस्तेयानते ख़ानदानी और फ़ैज़ाने बारी में बराबर के शरीक रहे।

28 सफ़र 50 हिजरी को जब इमाम हसन (अ.स.) शहीद हो गये तो इमाम हुसैन (अ.स.) सिफ़ाते हसना के वाहिद मरक़ज़ बन गए। यही वजह है कि आप में जुमला सिफ़ाते हसना मौजूद थे और आपके तरज़े हयात में मोहम्मद (स अ व व ) व अली (अ स ) , फ़ात्मा (स अ व व ) और हसन (अ.स.) का किरदार नुमायां था और आपने जो कुछ किया क़ुरआन और हदीस की रौशनी में किया। कुतुबे मक़ातिल में है कि करबला में जब इमाम हुसैन (अ.स.) रूख़्सते आखि़र के लिये ख़ेमे में तशरीफ़ लाये तो जनाबे ज़ैनब ने फ़रमाया था कि ऐ ख़ामेसे आले एबा आज तुम्हारी जुदाई के तसव्वुर से ऐसा मालूम होता है कि मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) अली ए मुर्तुज़ा (अ.स.) फ़ात्मा (स अ व व ) हसने मुजतबा (अ.स.) हम से जुदा हो रहे हैं।

हज़रत उमर का एतेराफ़े शरफ़े आले मोहम्मद (स अ . व . व . )

अहदे उमरी में अगर चे पैग़म्बरे इस्लाम (स अ व व ) की आंखें बन्द हो चुकी थीं और लोग मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) की खि़दमत और तालिमात को पसे पुश्त डाल चुके थे लेकिन फिर भी कभी कभी ‘‘ हक़ बर ज़बान जारी ’’ के मुताबिक़ अवाम सच्ची बातें सुन ही लिया करते थे। एक मरतबा का ज़िक्र है कि हज़रत उमर मिम्बरे रसूल पर ख़ुत्बा फ़रमा रहे थे। नागाह हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) का उधर से गुज़र हुआ। आप मस्जिद में तशरीफ़ ले गये और हज़रत उमर की तरफ़ मुख़ातिब हो कर बोले ‘‘ अन्ज़ल अन मिम्बर अबी ’’ मेरे बाप के मिम्बर पर से उतर आईये और जाईये अपने बाप के मिम्बर पर बैठिये। हज़रत उमर ने कहा मेरे बाप का तो कोई मिम्बर नहीं है। उसके बाद मिम्बर पर से उतर कर इमाम हुसैन (अ.स.) को अपने हमराह अपने घर ले गये और वहां पहुँच कर पूछा कि साहब ज़ादे तुम्हें यह बात किसने सिखाई है तो उन्होंने फ़रमाया कि मैंने अपने से कहा है , मुझे किसी ने नहीं सिखाया। उसके बाद उन्होंने कहा मेरे माँ बाप तुम पर फ़िदा हों , कभी कभी आया करो। आपने फ़रमाया बेहतर है। एक दिन आप तशरीफ़ ले गये तो हज़रत उमर को माविया से तनहाई में महवे गुफ़्तुगू पा कर वापस चले गये। जब इसकी इत्तेला हज़रत उमर को हुई तो उन्होंने महसूस किया और रास्ते में एक दिन मुलाक़ात पर कहा कि आप वापस क्यों चले आये थे। फ़रमाया कि आप महवे गुफ़्तुगू थे , इस लिये मैं अब्दुल्लाह इब्ने उमर के हमराह वापस आया। हज़रत उमर ने कहा फ़रज़न्दे रसूल (स अ व व ) मेरे बेटे से ज़्यादा तुम्हारा हक़ है। ‘‘ फ़ा अन्नमा अन्ता मातरी फ़ी दो सना अल्लाह सुम अनतुम ’’ इस से इन्कार नहीं किया जा सकता कि मेरा वुजूद तुम्हारे सदक़े में है।

(असाबा जिल्द 2 पृष्ठ 25 कनज़ुल आमाल जिल्द 7 पृष्ठ 107 व इज़ालतुल ख़फ़ा जिल्द 3 पृष्ठ 80 व तारीख़े बग़दाद जिल्द 1 पृष्ठ 141 )

इब्ने उमर का एतराफ़े शरफ़े हुसैनी

इब्ने हरीब रावी हैं कि एक दिन अब्दुल्लाह इब्ने उमर ख़ाना ए काबा के साय में बैठे हुए लोगों से बातें कर रहे थे कि इतने में हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) सामने से आते हुए दिखाई दिये इब्ने उमर ने लोगों की तरफ़ मुख़ातिब हो कर कहा कि यह शख़्स यानी इमाम हुसैन (अ.स.) अहले आसमान के नज़दीक तमाम अहले ज़मीन से ज़्यादा महबूब हैं।(असाबा जिल्द 2 पृष्ठ 15 )

इमाम हुसैन (अ.स.) की रक़ाब

इब्ने अब्बास के हाथों में सिपहर काशानी लिखते हैं कि एक मरतबा हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) घोड़े पर सवार हो रहे थे। हज़रत इब्ने अब्बास सहाबिये रसूल (स अ व व ) की नज़र आप पर पड़ी तो आप ने दौड़ कर हज़रत की रक़ाब थाम ली और इमाम हुसैन (अ.स.) को सवार कर दिया। यह देख कर किसी ने कहा कि ऐ इब्ने अब्बास तुम तो इमाम हुसैन (अ.स.) से उम्र और रिश्ते दोनों में बड़े हो , फिर तुम ने इमाम हुसैन (अ.स.) की रक़ाब क्यों थामी ? आपने गु़स्से में फ़रमाया कि ऐ कमबख़्त तुझे क्या मालूम कि यह कौन हैं और इनका शरफ़ क्या है। यह फ़रज़न्दे रसूल (स अ व व ) हैं , इन्हीं के सदक़े में नेमतों से भरपूर और बहरावर हूँ अगर मैंने इनकी रकाब थाम ली तो क्या हुआ।(नासेख़ुल तवारीख़ जिल्द 6 पृष्ठ 45 )

इमाम हुसैन (अ.स.) की गर्दे क़दम और जनाबे अबू हुरैरा

कौन है जो जनाबे अबू हुरैरा के नाम से वाक़िफ़ न हो आप ही वह हैं जिन पर साबिक़ की हुकूमतों को बड़ा एतमाद था और आप पर एतमाद की यह हद थी कि माविया ने जब अमीरल मोमेनीन अली इब्ने अबी तालिब (अ.स.) के खि़लाफ़ हदीसें गढ़ने की स्कीम बनाई थी तो उन्हीं को इस स्कीम का रूहे रवां क़रार दिया था।(मीज़ान अल बक़रा इमाम शेरानी पृष्ठ 21 ) आप को हज़रत अली (अ.स.) से अक़ीदत भी थी आप नमाज़ हज़रत अली (अ.स.) के पीछे पढ़ते थे और खाना माविया के दस्तरख़्वान पर खाते थे। आप फ़रमाते थे कि इबादत का लुत्फ़ अली (अ.स.) के साथ और खाने का मज़ा माविया के साथ है।

मुवर्रिख़ तबरी का बयान है कि एक मय्यत में इमाम हुसैन (अ.स.) और जनाबे अबू हुरैरा ने शिरकत की और दोनों हज़रात साथ ही चल रहे थे। रास्ते में थोड़ी देर के लिये रूक गये तो अबू हुरैरा ने झट रूमाल निकाल कर हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) के पाये मुबारक और तूतियों से गर्द झाड़ना शुरू कर दिया। इमाम हुसैन (अ.स.) ने फ़रमाया ऐ अबू हुरैरा ! तुम यह क्या करते हो , मेरे पैरों और जूतियों से गर्द क्यों झाड़ने लगे ? आपने अर्ज़ कि ‘‘ दाअनी मिनका फ़लो या लम अलनास मिनका मा अलम लहमलूक अला अवा तक़ाहुम ’’ ‘‘ मौला मुझे मना न किजीये , आप इसी क़ाबिल हैं कि मैं आपकी गर्दे क़दम साफ़ करूं। मुझे यक़ीन है कि अगर लोगों को आपके फ़ज़ाएल और आपकी वह बढ़ाई मालूम हो जाय जो मैं जानता हूँ तो यह लोग आपको अपने कंधों पर उठाये फिरें ’’(तारीख़े तबरी जिल्द 3 पृष्ठ 19 तबअ मिस्र)

इमाम हुसैन (अ.स.) का ज़ुर्रियते नबी में होना

हज़रत इमाम हसन (अ.स.) और हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) के ज़ुर्रियते नबी में होने पर आयते मुबाहेला गवाह है। रसूले ख़ुदा (स अ व व ) ने अबनअना की तामील व तकमील हसनैन (अ.स.) ही से की थी। यह उनके फ़रज़न्दाने रसूल होने की दलीले मोहकम हैं जिसके बाद किसी एतराज़ की गुन्जाईश नहीं रहती। आसिम बिन बहदेला कहते हैं कि एक दिन हम लोग हज्जाज बिन युसूफ़ के पास बैठे हुए थे कि इमाम हुसैन (अ.स.) का ज़िक्र आ गया। हज्जाज ने कहा उनका ज़ुर्रियते रसूल (स अ व व ) से कोई ताअल्लुक़ नहीं। यह सुनते ही यहिया बिन यामर ने कहा ‘‘ कुन्बत अहिय्या अल अमीर ’’ अमीर यह बात बिल्कुल ग़लत है और झूठ है वह यक़ीनन जु़र्रियते रसूल (स अ व व ) में से हैं। यह सुन कर उसने कहा कि इसका सुबूत क़ुरआने मजीद से पेश करो। ‘‘ अवला क़तलनका क़तलन ’’ वरना तुम्हें बुरी तरह क़त्ल करूंगा। यहिया ने कहा क़ुरआन मजीद में है। ‘‘ व मन ज़ुर्रियते दाऊदो सुलैमान व ज़करया व यहिया व ईसा ’’ इस आयत में ज़ुर्रियते आदम में हज़रते ईसा भी बताये गये हैं जो अपनी मां की तरफ़ से शमिल हुये हैं। बस इसी तरह इमाम हुसैन (अ.स.) भी अपनी मां की तरफ़ से ज़ुर्रियते रसूल (स अ व व ) में हैं। हज्जाज ने कहा यह सही है लेकिन मजमें में तुमने मेरी तक़ज़ीब (बे इज़्ज़ती) की है लेहाज़ा तुम्हें शहर बदर किया जाता है। इसके बाद उन्हें ख़ुरासान भेज दिया।(मुस्तदरिक सहीहीन जिल्द 3 पृष्ठ 164 )

करमे हुसैनी की एक मिसाल

इमाम फ़ख़रूद्दीन राज़ी तफ़सीरे कबीर में ज़ेरे आयत ‘‘ अल आदम अल असमा कुल्लेहा ’’ लिखते हैं कि एक एराबी ने खि़दमते इमाम हुसैन (अ.स.) में हाज़िर हो कर कुछ मांगा और कहा कि मैंने आपके जद्दे नामदार से सुना है कि जब कुछ मांगना हो तो चार क़िस्म के लोगों से मांगों। 1. शरीफ़ अरब से , 2. करीम हाकिम से , 3. हामिले क़ुरआन से , 4. हसीन शक्ल वाले से। मैं आपमें यह जुमला सिफ़ात पाता हूँ इस लिये मांग रहा हूँ। आप शरीफ़े अरब हैं। आपके नाना अरबी हैं। आप करीम हैं क्यों कि आपकी सीरत ही करम है। क़ुरआने पाक आपके घर में नाज़िल हुआ है। आप सबीह व हसीन हैं। रसूले ख़ुदा (स अ व व ) का इरशाद है कि जो मुझे देखना चाहे वह हसन व हुसैन को देखे। लेहाज़ा अर्ज़ है कि मुझे अतीये से सरफ़राज़ फ़रमाईये। आपने फ़रमाया कि जद्दे नामदार ने फ़रमाया है कि ‘‘ अल मारूफ़ बे क़दरे अल मारफ़ते ’’ मारफ़त के मुताबिक़ अतिया देना चाहिये। तू मेरे सवालात का जवाब दे , 1. बता सब से बेहतर अमल क्या है ? उसने कहा अल्लाह पर ईमान लाना। 2. हलाकत से नजात का ज़रिया क्या है ? उसने कहा अल्लाह पर भरोसा करना। 3. मरद की ज़ीनत क्या है ? कहा ‘‘ इल्म मय हिल्म ’’ ऐसा इल्म जिसके साथ हिल्म हो , आपने फ़रमाया दुरूस्त है। उसके बाद आप हंस पड़े। ‘‘ वरमी बिल सीरते इल्हे ’’ और एक बड़ा कीसा उसके सामने डाल दिया।(फ़ज़ाएल उल ख़मसते मिन सहायसित्ता जिल्द 3 पृष्ठ 268 )

इमाम हुसैन (अ.स.) की एक करामत

तबाक़ात इब्ने सआद जिल्द 5 पृष्ठ 107 में है कि जब इमाम हुसैन (अ.स.) मदीने से मक्के जाने के लिये निकले तो रास्ते में इब्ने मतीह मिल गये। वह उस वक़्त कुआं खोद रहे थे। पूछा मौला कहां का इरादा है ? फ़रमाया मक्के जा रहा हूँ , शायद मेंरा आख़री सफ़र हो। यह सुन कर उन्होंने अर्ज़ की मौला इस सफ़र को मुलतवी कर दिजीए। फ़रमाया मुम्किन नहीं है। फिर बात ही बात में उन्होंने अर्ज़ कि मैं कुआं खोद रहा हूँ। अकसर इधर पानी खारा निकलता है। आप दुआ कर दें पानी मीठा हो और कसीर हो। आपने थोड़ा पानी जो उस वक़्त बरामद हुआ था ले कर चखा और उसमें कुल्ली कर के कहा कि इसे कुएं में डाल दो। चुनान्चे उन्होंने ऐसा ही किया। ‘‘ फ़जब वमही ’’ उसका पानी शीरीं (मीठा) और कसीर हो गया।

इमाम हुसैन (अ.स.) की नुसरत के लिये रसूले करीम (स अ . व . व . ) का हुक्म

अनस बिन हारिस जो सहाबी ए रसूल और असहाबे सुफ़फ़ा में से में थे , का बयान करते है , मैंने देखा है कि हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) एक दिन रसूले ख़ुदा (स अ व व ) की गोद में थे और वह उनको प्यार कर रहे थे। इसी दौरान में फ़रमाया ‘‘ अन अम्बी हाज़ा यक़तेदा बारे ज़ैने यक़ाला लहा करबल फ़मन शोहदा ज़ालेका फ़ल यनसेरहा ’’ कि मेरा यह फ़रज़न्द ‘‘ हुसैन ’’ उस ज़मीन पर क़त्ल किया जायेगा जिसका नाम करबला है। देखो तुम में से उस वक़्त जो भी मौजूद हो उसके लिये ज़रूरी है कि उसकी मद्द करे।

रावी का बयान है कि असल रावी और चश्म दीद गवाह अनस बिन हारिस जो कि उस वक़्त मौजूद थे वह इमाम हुसैन (अ.स.) के हमराह करबला में शहीद हो गये थे।

(असदुल ग़ाबेआ जिल्द 1 पृष्ठ 123 व पृष्ठ 349, असाबा जिल्द 1 पृष्ठ 48, कन्ज़ुल आमाल जिल्द 6 पृष्ठ 223, ज़ख़ायर अल अक़बा मुहिब तबरी पृष्ठ 146 )

इमाम हुसैन (अ.स.) की इबादत

उलेमा व मुवर्रेख़ीन का इत्तेफ़ाक़ है कि हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) ज़बरदस्त इबादत गुज़ार थे। आप शबो रोज़ में बेशुमार नमाज़ें पढ़ते और अनवाए अक़साम इबादत से सरफ़राज़ होते थे। आपने अच्चीस हज पा पियादा किए और यह तमाम हज ज़माना ए क़यामे मदीने मुनव्वरा में फ़रमाए थे। इराक़ में क़याम के दौरान आपको अमवी हंगामा आराइयों की वजह से किसी हज का मौक़ा नहीं मिल सका।(असद उल ग़ाबा जिल्द 3 पृष्ठ 27 )

इमाम हुसैन (अ.स.) की सख़ावत

मसनदे इमामे रज़ा पृष्ठ 35 में है कि सख़ी दुनियां के सरदार और मुत्तक़ी आख़ेरत के लोगों के सरदार होते हैं। इमाम हुसैन (अ.स.) सख़ी ऐसे थे जिनकी मिसाल नहीं। उलमा का बयान है कि उसामा इब्ने ज़ैद सहाबिए रसूल (स अ व व ) बीमार थे , इमाम हुसैन (अ.स.) उन्हे देखने के लिये तशरीफ़ ले गये तो आपने महसूस किया कि वह बेहद रंजीदा हैं। पूछा ऐ मेरे नाना के सहाबी क्या बात है ? ‘‘वाग़माहो ’’ क्यों कहते हो ? अर्ज़ कि मौला साठ हज़ार दिरहम का क़र्ज़ दार हूँ। आपने फ़रमाया घबराओ नहीं उसे मैं उसे अदा कर दूंगा। चुनान्चे आपने अपनी ज़िन्दगी में ही उन्हें क़रज़े के बार से सुबुक दोश फ़रमा दिया।

एक दफ़ा एक देहाती शहर में आया और उसने लोगों से दरयाफ़्त किया कि यहां सब से ज़्यादा सख़ी कौन है ? लोगों ने इमाम हुसैन (अ.स.) का नाम लिया। उसने हाज़िरे खि़दमत हो कर बा ज़रिये अशआर सवाल किया। हज़रत ने चार हज़ार अशरफ़ियां इनायत फ़रमा दीं। शईब ख़ज़ाई का कहना है कि शहादते इमामे हुसैन (अ.स.) के बाद आपकी पुश्त पर बार बरदारी के घट्टे देखे गये। जिसकी वज़ाहत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) ने यह फ़रमाई थी कि आप अपनी पुश्त पर लाद कर अशरफ़ियां और ग़ल्लों के बोरे बेवाओं और यतीमो के घर रात के वक़्त पहुंचाया करते थे। किताबों में है कि आपके एक ग़ैर मासूम फ़रज़न्द को अब्दुल रहमान सलमा ने सुरा ए हम्द की तालीम दी , आपने एक हज़ार अशरफ़ियां और एक हज़ार क़ीमती ख़लअतें इनायत फ़रमाई।

(मनाक़िब इब्ने शहरे आशोब जिल्द 4 पृष्ठ 74 )

इमाम शिब्लंजी और अल्लामा इब्ने मोहम्मद तल्हा शाफ़ेई ने नूरूल अबसार और मतालेबुस सूऊल में एक अहम वाक़ेया आपकी सिफ़ते सख़ावत के मुताअल्लिक़ तहरीर किया है , जिसे हम इमाम हसन (अ.स.) के हाल में लिख आये हैं क्यों कि इस वाक़िये सख़ावत में वह भी शरीक थे।

इमाम हुसैन (अ.स.) का अम्रे आस को जवाब

एक मरतबा माविया , उमरो आस और हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) एक मक़ाम पर बैठे हुए थे। उमरो आस ने पूछा क्या वजह है कि हमारे अवलाद ज़्यादा होती है और आप हज़रात के कम ? हज़रत ने उसके जवाब में एक शेर पढ़ा , जिसका तरजुमा यह है कि , कमज़ोर और ज़लील व हक़ीर चिड़यों के बच्चे ज़्यादा और शिकारी परिन्दे बाज़ और शाहीन वग़ैरा के बच्चे क़ुदरतन कम होते हैं। फिर उमरो आस ने पूछा कि हमारी मूंछों के बाल जल्दी सफ़ैद हो जाते हैं और आपके देर में , इसकी वजह क्या है ? आपने फ़रमाया कि तुम्हारी औरते गन्दा दहन होती हैं , बा वक़्ते मक़ारबत उनके बुख़ारात से तुम्हारी मूछों के बाल सफ़ैद हो जाते हैं। फिर उसने पूछा कि इसकी क्या वजह है कि आप लोगों की दाढ़ी घनी निकलती है ? आपने फ़रमाया कि इसका जवाब तो क़ुरआन में मौजूद है। उसके बाद आपने एक आयत पढ़ी , जिसका तरजुमा यह है। अच्छी ज़मीन से अच्छा सब्ज़ा उगता है और बुरी और ख़बीस ज़मीन से बुरी पैदावार होती है।(पारा 8 रूकू 14 ) उसके बाद माविया ने उमरो आस को मज़ीद सवाल करने से रोक दिया। तब आपने अरबी के शेर पढ़े , जिसका फ़ारसी में तरजुमा यह है।

नैश अक़रब न अज़ पैए कीं अस्त --- मुक़्तज़ाए तबीअतश ईं अस्त(मनाक़िब इब्ने शहरे आशोब जिल्द 4 पृष्ठ 75 व बेहार जिल्द 1 पृष्ठ 148 )

हज़रत उमर की वसीयत कि सनदे गु़लामी ए अहले बैत का नविशता मेरे कफ़न में रखा जाऐ

उल्माए अहले सुन्नत का बयान है कि एक दिन मंज़िले मनाख़ेरत में अब्दुल्लाह बिन उमर इमाम हसन (अ.स.) और इमाम हुसैन (अ.स.) के सामने फ़ख़रो इफ़तेख़ार की बातें करने लगे। यह सुन कर इमाम हसन (अ.स.) ने फ़रमाया कि तुम तो हमारे ग़ुलाम ज़ादे हो। इतनी बढ़ चढ़ कर क्या बातें कर रहे हो। इस पर अब्दुल्लाह बिन उमर रंजीदा हो कर अपने बाप के पास गये और इमाम हसन (अ.स.) ने जो कुछ कहा था उसे बयान किया। यह सुन कर हज़रत उमर ने फ़रमाया कि बेटा यह बात उन से लिख वा लेा , अगर लिख दें तो मेरे कफ़न में रख देना। एक रवायत में है कि उन्होंने लिख दिया और हज़रत उमर ने वसीयत कर दी कि इसे उनके कफ़न में रखा जाय क्यों कि मोहम्मद (स अ व व ) व आले मोहम्मद (अ.स.) की ग़ुलामी बख़शिश का ज़रिया है।

यह रवायत इस दर्जा मशहूर है कि शोअरा ने भी इसे नज़म किया है। इस मक़ाम पर रहबरे शरीयत व तरीक़त हज़रत फ़ाज़िल मख़दमू सय्यद मोहम्मद नासिर जलाली मद् ज़िल्लहुल आली की वह नज़म दर्ज करता हूँ जो उन्होंने ज़ेरे उनवान ‘‘ शाने अदब ’’ तहरीर फ़रमाई है। जिसे हाफ़िज़ शफ़ीक़ अहमद नासरी पाक बंगाल जहांगीर रोड , कराची नम्बर 5 रिसाला ‘‘ ख़ून के आंसू ’’ में शाया किया है अगर चे इसके बाज़ मुनदरजात से मुझे इत्तेफ़ाक़ नहीं है। वह तहरीर फ़रमाते हैं

एक दिन इब्ने उमर से यह हसन कहने लगे

जानते हो मेरे नाना थे , शहन शाहे ज़मन

हमसरी का है अगर , मुझसे तुम्हे कुछ दावा

साफ़ कहता हूँ कि यह अमर नहीं मुस्तहसन

जानता हूँ मैं तुम्हें तुम हो ग़ुलाम इब्ने गु़लाम

मेरे रूतबे से ख़बर दार है , हर अहले वतन

सुन के यह बात हुए , इब्ने उमर सख़्त मुलूल

ज़रदिये रूख़ से अयां हो गई दिल की उलझन

देर तक पहले तो ख़ामोश रहे हैरत से

फिर कहा फ़रते खि़ज़ालत से झुका कर गरदन

आप अपनी ज़बां से जिसे कहते हैं ग़ुलाम

है वह फ़रज़न्दे उमर कौन उमर फ़ख़र ज़मन

आज हैं अहले अरब उन्हीं की सरदारी में

आज है तख़्ते खि़लाफ़त पायही जलवा फ़िगन

नाम से उनके लरज़ जाते हैं दिल शाहों के

काम से उनके एयवाने अरब रशके चमन

मेरी तौक़ीर व शराफ़त की है दुनिया क़ायम

मेरी आज़ादिये अज़मत है जहां पर रौशन

फिर ग़ुलाम इब्ने ग़ुलाम आप मुझे कहते हैं

ग़ौर कीजिए है यही अहदे वफ़ा रसमे कोहन

जाके दरबारे खि़लाफ़त में करूंगा फ़रियाद

है कलाम आपका दर असल बहुत सब्र शिकन

आये इस हाल में नज़दिके उमर इब्ने उमर

अश्क आंखों में अलम दिल में लबों पर शेवन

दाद ख़्वाना तरीक़े से यह फिर अर्ज़ किया

देख लिजिये मुझ इस तरह से कहते हैं हसन

माजरा सुन के यह बेटे से उमर कहने लगे

सच तेरे साथ हसन का है यही तरज़े सुख़न

यूँ तेरी बात का कब दिल को यक़ीं आता है

हाँ अगर शाहे हसन लिख दें यह बातें मनो अन

आये फिर पेशे हसन इब्ने उमर और कहा

है ख़लीफ़ा का यह फ़रमान बा आदाबे हसन

आप लिख दीजिए काग़ज़ पर मुनासिब है यही

साफ़ वह बात कि जिससे है मुझे रंजो मेहन

सुन के इरशाद किया शाहे हसन ने कि सुनो

मुझ को डर है न किसी का न किसी से है जलन

लाओ काग़ज़ की अभी तुमको नविश्ता दे दूँ

किज़्ब के कांटों में उलझा नहीं मेरा दामन

है उमर मेरे ग़ुलाम , और मेरे नाना के

एक काग़ज़ पा दिया लिख के यह बे हीना व फ़न

लाये क़िरतासे हसन , पेशे उमर इब्ने उमर

ग़ुस्से के जोश में करते थे सब आज़ा सन सन

सर में सौदा था कि अब होगी हसन को ताजी़र

वहम था होंगे गिरफ़्तार , हसन के दुश्मन

और था हाले उमर यह कि पढ़ा जब काग़ज़

बल न अबरू पा पड़े आई जबीं पर न शिकन

झूम कर फ़रते मसर्रत से यह इरशाद किया

बारे एहसाने हसन से नहीं उठती गरदन

दस्ते अक़दस से दिया लिख के ग़ुलामी नामा

मेरी उम्मीद के कांटों को बनाया गुलशन

मिल गई अहमदे मुरसल से गु़लामी की सनद

हो गया पुर दुर्रे मक़सूद से मेरा दामन

दीनो दुनियां में मेरे वास्ते है बाएसे फ़ख़्र

इसे रखना यह वसीयत है मेरे ज़ेरे कफ़न

इमाम हुसैन (अ.स.) की मुनाजात और ख़ुदा की तरफ़ से जवाब

अल्लामा इब्ने शहरे आशोब और अल्लामा मजलिसी लिखते हैं कि हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) एक रात को जनाबे ख़दीजा (अ.स.) की क़ब्र पर तशरीफ़ ले गये। आपके हमराह अनस इब्ने मालिक सहाबिए रसूल भी थे। आपने मज़ारे ख़दीजा (अ.स.) पर नमाज़ें पढ़ीं और आप बारगाहे ख़ुदावन्दी में महवे मुनाजात हो गये , मुनाजात में आपने 6 अश्आर पढ़े जिनमें पहला शेर यह है। ‘‘ या रब या रब अन्ता मौला - फ़ा रहम अबीदन इलैका मलजाहा ’’ तरजुमा ऐ मेरे रब ऐ मेरे रब , तू ही मेरा मौला और आक़ा है। ऐ मालिक तू अपने ऐसे बन्दे पर रहम फ़रमा जिसकी बाज़ गश्त सिर्फ़ तेरी ही तरफ़ है। अभी आपकी मुनाजात तमाम न होने पाई थी कि हातिफ़े गै़बी की मनजूम आवाज़ आई। जिसका पहला शेर है कि

लब्बैक अब्दी वा अन्ता फ़ी कन्फ़ी , व कलमा क़लत क़द अलमनहा

तरजुमा ऐ मेरे बन्दे मैं तेरी सुन्ने के लिये मौजूद हूँ और तू मेरी बारगाह में आया हुआ है। तूने जो कुछ कहा है मैंने अच्छी तरह से सुन लिया है।(मनाक़िब जिल्द 4 पृष्ठ 78 व बेहार जिल्द 1 पृष्ठ 144 )

जंगे सिफ़्फ़ीन में इमाम हुसैन (अ.स.) की जद्दो जेहद

अगरचे मुवर्रेख़ीन का तक़रीबन इस पर इत्तेफ़ाक़ है कि इमाम हुसैन (अ.स.) अहदे अमीरल मोमेनीन (अ.स.) के हर मारके में मौजूद रहे लेकिन महज़ इस ख़्याल से कि यह रसूले अकरम (स अ व व ) की ख़ास अमानत हैं। उन्हें किसी जंग में लड़ने की इजाज़त नहीं दी गई।(अनवारूल हुसैनिया पृष्ठ 44 ) लेकिन अल्लामा शेख़ मेहदी माज़ नदरानी की तहक़ीक़ के मुताबिक़ आपने बन्दिशे आब तोड़ने के लियेय सिफ़्फ़ीन में नबर्द आज़माई फ़रमाई थी।(शजरा ए तूबा , प्रकाशित नजफ़े अशरफ़ 1354 हिजरी व बेहारल अनवार जिल्द 10 पृष्ठ 257 प्रकाशित ईरान) अल्लामा बाक़र ख़ुरासानी लिखते हैं कि इस मौक़े पर इमाम हुसैन (अ.स.) के हमराह हज़रते अब्बास भी थे।

(किबरियत अल अहमर पृष्ठ 25 व ज़िकरूल अब्बास पृष्ठ 26 )

हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) गिरदाबे मसाएब में (वाक़िए करबला का आग़ाज़)

हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) जब पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) की ज़िन्दगी के आख़री लम्हात से ले कर इमाम हसन (अ.स.) की हयात के आख़री अय्याम तक बहरे मसाएब व आलाम के साहिल से खेलते हुए ज़िन्दगी के इस अहद में दाखि़ल हुए जिसके बाद आपके अलावा पंजेतन में कोई बाक़ी न रहा तो आपका सफ़ीना ए हयात ख़ुद गिरदाबे मसाएब में आ गया। इमाम हसन (अ.स.) की शहादत के बाद माविया की तमाम तर जद्दो जेहद यही रही कि किसी तरह इमाम हुसैन (अ.स.) का चिराग़े ज़िन्दगी भी इसी तरह गुल कर दें जिस तरह हज़रत अली (अ.स.) और इमाम हसन (अ.स.) की शम्मा ए हयात बुझा चुका है और उसके लिये वह हर क़िस्म का दाँव करता रहा और इससे उसका मक़सद यह था कि यज़ीद की खि़लाफ़त के मनसूबे को परवान चढ़ाये। बिल आखि़र उसने 56 हिजरी में एक हज़ार की जमाअत समेत यज़ीद के लिये बैअत लेने की ग़रज़ से हिजाज़ का सफ़र इख़्तेयार किया और मदीना ए मुनव्वरा पहुँचा। वहां इमाम हुसैन (अ.स.) से मुलाक़ात हुई उसने बैएते यज़ीद का ज़िक्र किया। आपने साफ़ लफ़्ज़ों में उसकी बदकारी का हवाला दे कर इनकार कर दिया। माविया को आपका इन्कार खला तो बहुत ज़्यादा लेकिन चंद उलटे सिधे अल्फ़ाज़ कहने के सिवा और कुछ कर न सका। इसके बाद मदीना और फिर मक्का में बैएते यज़ीद ले कर शाम को वापस चला गया।

अल्लामा हुसैन वाएज़ काशफ़ी लिखते हैं कि माविया ने जब मदीने में बैएत का सवाल उठाया तो हुसैन बिन अली (अ.स.) अब्दुल रहमान बिन अबी बक्र , अब्दुल्लाह इब्ने उमर , अब्दुल्लाह इब्ने ज़ुबैर ने बैएते यज़ीद से इन्कार कर दिया। उसने बड़ी कोशिश की लेकिन यह लोग न माने और रफ़्ए फ़ितना के लिये इमाम हुसैन (अ.स.) के अलावा सब मदीने से चले गये। माविया उनके पीछे मक्के पहुँचा और वहां उन पर दबाव डाला लेकिन कामयाब न हुआ। आखि़र कार शाम वापस चला गया।(रौज़तुल शोहदा पृष्ठ 243 ) माविया बड़ी तेज़ी के साथ बेएते यज़ीद लेता रहा , और बक़ौल अल्लामा इब्ने क़तीबा इस सिलसिले में उसने टको में लोगों के दीन भी ख़रीद लिये। अल ग़रज़ रजब 60 हिजरी में माविया रख़्ते सफ़र बांध कर दुनिया से चल बसा। यजी़द जो अपने बाप के मिशन को कामयाब करना ज़रूरी समझता था। सब से पहले मदीने की तरफ़ मुतवज्जे हो गया और उसने वहां के वाली वलीद बिन उक़बा को लिखा कि इमाम हुसैन (अ स ) , अब्दुर रहमान इब्ने अबी बक्र , अब्दुल्लाह इब्ने उमर और इब्ने ज़ुबैर से मेरी बैएत ले ले , और अगर यह इन्कार करें तो उनके सर काट कर मेरे पास भेज दे। इब्ने अक़बा ने मरवान से मशविरा किया उसने कहा कि सब बैएत कर लेंगे लेकिन इमाम हुसैन (अ.स.) हरगिज़ बैएत न करेंगे और तुझे उनके साथ पूरी सख़्ती का बरताव करना पड़ेगा।

साहेबे तफ़सीरे हुसैनी अल्लामा हुसैन वाएज़ काशफ़ी लिखते हैं कि वलीद ने एक शख़्स अब्दुल्लाह इब्ने उमर बिन उस्मान को इमाम हुसैन (अ.स.) और इब्ने ज़ुबैर को बुलाने के लिये भेजा। क़ासिद जिस वक़्त पहुँचा दोनों मस्जिद में महवे गुफ़्तुगू थे। आपने इरशाद फ़रमाया कि तुम चलो हम आते हैं। क़ासिद वापस चला गया और यह दोनों आपस में बुलाने के सबब पर तबादला ए ख़्याल करने लगे। इमाम हुसैन (अ.स.) ने फ़रमाया कि मैंने आज एक ख़्वाब देखा है जिससे मैं समझता हूँ कि माविया ने इन्तेक़ाल किया और यह हमें बैएते यज़ीद के लिये बुला रहा है। अभी यह हज़रात जाने न पाये थे कि क़ासिद फिर आ गया और उसने कहा कि वलीद आप हज़रात के इन्तेज़ार में है। इमाम हुसैन (अ.स.) ने फ़रमाया कि जल्दी क्या है जा कर कह दे कि हम थोड़ी देर में आ जायेंगे। इसके बाद इमाम हुसैन (अ.स.) दौलत सरा में तशरीफ़ लाये और 30 बहादुरों को हमराह ले कर वलीद से मिलने का क़स्द फ़रमाया , आप दाखि़ले दरबार हो गये और बहादुराने बनी हाशिम बैरूने ख़ाना दरबारी हालात का मुतालेआ करते रहे। वलीद ने इमाम हुसैन (अ.स.) की मुकम्मल ताज़ीम की और माविया के मरने की ख़बर सुना ने के बाद बैएत का ज़िक्र किया। आपने फ़रमाया कि मसला सोच विचार का है तुम लोगों को जमा करो और मुझे भी बुला लो मैं ‘‘ अली रूसे अल शहाद ’’ आम मजमे में इज़्हारे ख़्याल करूंगा। वलीद ने कहा बेहतर है। फिर कल तशरीफ़ लाइयेगा। अभी आप जवाब न देने पाये थे कि मरवान बोल उठा , ऐ वलीद ! अगर हुसैन इस वक़्त तेरे क़ब्ज़े से निकल गये तो फिर हाथ न आयेंगे। उनको इसी वक़्त मजबूर कर दे और अभी बैएत ले ले , और अगर यह इन्कार करें तो हुक्मे यज़ीद के मुताबिक़ सर तन से उतार ले। यह सुन्ना था कि इमाम हुसैन (अ.स.) को जलाल आ गया। आपने फ़रमाया ‘‘ यब्ने ज़रक़ा ’’ किस्में दम है जो हुसैन को हाथ लगा सके , तुझे नहीं मालूम हम आले मोहम्मद (स अ व व ) हैं। फ़रिश्तें हमारे घरों में आते जाते रहते हैं। हमें क्यों कर मजबूर किया जा सकता है कि हम यज़ीद जैसे फ़ासिक़ व फ़ाजिर और शराबी की बैएत कर लें। इमाम हुसैन (अ.स.) की आवाज़ बुलन्द होना था कि बहादुराने बनी हाशिम दाखि़ले दरबार हो गये और क़रीब था कि ज़बर दस्त हंगामा बरपा कर दें लेकिन इमाम हुसैन (अ.स.) ने उन्हें समझा बुझा कर ख़ामोश कर दिया। इसके बाद इमाम हुसैन (अ.स.) वापस दौलत सरा तशरीफ़ ले गये। वलीद ने सारा वाक़ेया लिख कर भेज दिया। उसने जवाब में लिखा कि इस ख़त के जवाब में इमाम हुसैन (अ.स.) का सर भेज दो। वलीद ने यज़ीद का ख़त इमाम हुसैन (अ.स.) के पास भेज कर कहला भेजा कि फ़रज़न्दे रसूल मैं यज़ीद के कहने पर किसी सूरत से अमल नहीं कर सकता , लेकिन आप को बा ख़बर करता हूँ और बताना चाहता हूँ कि यज़ीद आपका ख़ून बहाने के दरपै है। इमाम हुसैन (अ.स.) ने सब्र के साथ हालात पर ग़ौर किया और नाना के रौज़े पर जा कर दरदे दिल बयान किया और बेइन्तेहा रोये। सुबह सादिक़ के क़रीब मकान वापस आये और दूसरी रात को फिर रौज़ा ए रसूल (स अ व व ) पर तशरीफ़ ले गये और मुनाजात के बाद रोते रोते सो गये। ख़्वाब में आं हज़रत (स अ व व ) को देखा कि आप हुसैन (अ.स.) की पेशानी का बोसा ले रहे हैं और फ़रमा रहे हैं कि ऐ नूरे नज़र अन्क़रीब उम्मत तुम्हें शहीद कर देगी। बेटा तुम भूखे और प्यासे होंगे , तुम फ़रयाद करते होंगे और कोई तुम्हारी फ़रियाद रसी न करेगा। इमाम हुसैन (अ.स.) की आंख खुल गई , आप दौलत सरा वापस तशरीफ़ लाये और अपने आइज़्ज़ा को जमा कर के फ़रमाने लगे कि अब इसके सिवा कोई चारा कार नहीं है कि मैं मदीना छोड़ दूँ। तरके वतन का फ़ैसला करने के बाद आप , इमाम हसन (अ.स.) और मज़ारे जनाबे सय्यदा (स अ व व ) पर तशरीफ़ ले गये। भाई से रूख़सत हुए और मां को सलाम किया क़ब्र से जवाबे सलाम आया। नाना के रौज़े पर रूख़्सते आखि़र के लिये तशरीफ़ ले गये , रोते रोते सो गये , सरवरे कायनात (स अ व व ) ने जवाब में सब्र की तलक़ीन की और फ़रमाया बेटा हम तुम्हारे इन्तेज़ार में हैं।

उलेमा का बयान है कि इमाम हुसैन (अ.स.) 28 रजब 60 हिजरी यौमे सेह शम्बा ब इरादा ए मक्का रवाना हुए। अल्लामा इब्ने हजर मक्की का कहना है कि ‘‘ नफ़रूल मकता ख़ौफ़न अला नफ़सहू ’’ इमाम हुसैन (अ.स.) जान के ख़ौफ़ से मक्के को तशरीफ़ ले गये।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 47 ) आपके साथ तमाम मुख़द्देराते इस्मत व तहारत और छोटे छोटे बच्चे थे। अलबत्ता आपकी एक सहाबज़ादी जिनका नाम फ़ात्मा सुग़रा था और जिनकी उम्र उस वक़्त 7 साल थी , बवहे अलालते शदीद हमराह न जा सकीं। इमाम हुसैन (अ.स.) ने आपकी तीमार दारी के लिये हज़रत अब्बास की मां जनाबे उम्मुल बनीन को मदीने ही में छोड़ दिया था और कुछ फ़रिज़ा ए खि़दमत उम्मुल मोमेनीन जनाबे उम्मे सलमा के सिपुर्द कर दिया था। आप तीन शाबान 60 हिजरी यौमे जुमा को मक्के मोअज़्ज़मा पहुँच गये। आपके पहुँचते ही वालिये मक्का सईद इब्ने आस मक्का से भाग कर मदीने चला गया और वहां से यज़ीद को मक्के के तमाम हालात लिखे और बताया कि लोगों का रूझान इमाम हुसैन (अ.स.) की तरफ़ तेज़ी से बढ़ रहा है कि जिसका जवाब नहीं। यज़ीद ने यह ख़बर पाते ही मक्के में क़त्ले हुसैन (अ.स.) की साज़िश पर ग़ौर करना शुरू कर दिया।

इमाम हुसैन (अ.स.) मक्के मोअज़्ज़मा 4 माह शाबान , रमज़ान , शव्वाल , ज़ीक़ाद मुक़ीम रहे। यज़ीद जो बहर सूरत इमाम हुसैन (अ.स.) को क़त्ल करना चाहता था। उसने यह ख़्याल करते हुए कि हुसैन (अ.स.) अगर मदीने से बच कर निकल गये हैं तो मक्का में क़त्ल हो जायें और मक्के से बच निकलें तो कूफ़ा पहुँच कर शहीद हो सकें। यह इन्तेज़ाम किया कि कूफ़े से 12,000 (बारह हज़ार) ख़ुतूत दौराने क़याम मक्के में पहुँचवाये क्यों कि दुश्मनों को यक़ीन था कि हुसैन (अ.स.) कूफ़े में आसानी से क़त्ल किये जा सकेंगे। न यहां के बाशिन्दों में अक़िदे का सवाल है और न अक़ीदत का। यह फ़ौजी लोग हैं इनकी अक़्लें भी मोटी होती हैं। यही वजह है कि शहादते इमाम हुसैन (अ.स.) से क़ब्ल जब तक जितने अफ़सर भेजे गये वह महज़ इस ग़र्ज़ से भेजे जाते रहे कि हुसैन (अ.स.) को कूफ़े ले जायें।(कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 68 ) और एक अज़ीम लशकर मक्के में शहीद किये जाने के लिये इरसाल किया और तीस 30 ख़्वारजियों को हाजियों के लिबास में ख़ास तौर पर भिजवा दिया जिसका क़ायद उमर इब्ने साअद था।(नासेख़ुल तवारीख़ जिल्द 6 पृष्ठ 21, मुन्तखि़ब तरीही ख़ुलासेतुल मसाएब , पृष्ठ 150, ज़िकरूल अब्बास 122 )

अब्दुल हमीद ख़ान एडीटर मौलवी लिखते हैं कि ‘‘ इसके अलावा एक साज़िश यह भी की गई कि अय्यामे हज में 300 शामियों को भेज दिया गया कि वह गिरोहे हुज्जाज में शामिल हो जायें और जहां जिस हाल में भी हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) को पायें क़त्ल कर डालें। ’’(शहीदे आज़म पृष्ठ 71 ) ख़ुतूत जो कूफ़े से आये थे उन्हें शरई रंग दिया गया था और वह ऐसे लोगों के नाम से भेजे गये थे जिनसे इमाम हुसैन (अ.स.) मुतारिफ़ थे। शाह अब्दुल अज़ीज़ मुहद्दिस का कहना है कि यह ख़ुतूत ‘‘ मन कुल तायफ़तः व जमा अता हर तायफ़ा ’’ और जमाअत की तरफ़ से भीजवाए गये थे।(इसरारूयल शहादतैन पृष्ठ 27 )

अल्लामा इब्ने हजर का कहना है कि ख़ुतूत भेजने वाले आम अहले कूफ़ा थे।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 117 ) इब्ने जरीर का बयान है कि इस ज़माने में कूफ़े में एक घर के अलावा कोई शिया न था।(तबरी)

हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) ने अपनी शरई ज़िम्मेदारी को पूरा करने के लिये कूफ़े के हालात जानने के लिये जनाबे मुस्लिम इब्ने अक़ील को कूफ़े से रवाना कर दिया।

हज़रत मुस्लिम इब्ने अक़ील

हज़रत मुस्लिम (अ.स.) हुक्मे इमाम पाते ही सफ़र के लिये रवाना हो गये। शहर से बाहर निकलते ही आपने देखा कि एक सय्यद ने एक आहू (हिरन) का शिकार किया है और उसे छुरी से ज़िब्हा कर डाला। दिल में ख़्याल पैदा हुआ कि इस वाक़ेए को इमाम हुसैन (अ.स.) से बयान करूं तो बेहतर होगा। इमाम हुसैन (अ.स.) की खि़दमत में हाज़िर हुए और वाक़िया बयान किया। आपने दुआये कामयाबी दी और रवानगी में उजलत की तरफ़ इशारा किया। जनाबे मुस्लिम इमाम हुसैन (अ.स.) के हाथों और पैरों का बोसा दे कर बा चश्में गिरया मक्के से रवाना हो गये। मुस्लिम इब्ने अक़ील के दो बेटे थे। मोहम्मद और इब्राहीम , एक की उम्र 7 साल दूसरे की 8 साल थी। यह दोनों बेटे बारवायत मदीना ए मुनव्वरा में थे। हज़रत मुस्लिम मक्के से रवाना हो कर मदीना पहुँचे और वहां पहुँच कर रौज़ा ए रसूल (स अ व व ) पर नमाज़ अदा की और ज़्यारत वग़ैरा से फ़राग़त हासिल कर के अपने घर वारिद हुए। रात गुज़री सुबह के वक़्त अपने बच्चों को ले कर दो रहबरों समैत जंगल के रास्ते से कूफ़ा रवाना हुए। रास्ते में शिद्दते अतश की वजह से इन्तेक़ाल कर गये। आप जिस वक़्त कूफ़ा पहुँचे और वहा जनाबे मुख़्तार इब्ने अबी उबैदा सक़ाफ़ी के मकान पर क़याम फ़रमा हुए। थोड़े दिनों में अट्ठारा हज़ार ( 18,000) कूफ़ियों ने आपकी बैअत कर ली। इसके बाद बैअत करने वालों की तादाद 30,000 (तीस हज़ार) हो गई। इसी के दौरान यज़ीद ने अब्दुल्लाह इब्ने ज़ियाद को बसरा लिखा कि कूफ़े में इमाम हुसैन (अ.स.) का एक भाई मुस्लिम नामी पहुँच गया है तू जल्द से जल्द वहां पहुँच कर नोमान इब्ने बशीर से हुकूमते कूफ़ा का चार्ज ले ले और मुस्लिम का सर मेरे पास भेज दे। इब्ने ज़ियाद पहली फ़ुरसत में कूफ़े पहुँच गया। इसने दाखि़ले के वक़्त ऐसी शक्ल बनाई कि लोग समझे कि इमाम हुसैन (अ.स.) आ गये हैं लेकिन मुस्लिम इब्ने उमर बहाली ने पुकार कर कहा कि यह इब्ने ज़ियाद है।

हज़रत मुस्लिम इब्ने अक़ील को जब इब्ने ज़ियाद की रसीदगी कूफ़े की इत्तेला मिली तो आप ख़ाना ए मुख़्तार से हट कर हानी इब्ने उरवा के मकान में चले गये। इब्ने ज़ियाद ने माक़िल नामी ग़ुलाम के ज़रिए जनाबे मुस्लिम की क़याम गाह का पता लगा लिया। उसे जब यह मालूम हुआ कि मुस्लिम हानि बिन उरवा के मकान में हैं तो हानी को बुलवा भेजा और पूछा कि तुमने मुस्लिम इब्ने अक़ील की हिमायत का बिड़ा उठाया है और वह तुम्हारे घर में हैं ? जनाबे हानी ने पहले तो इन्कार कर दिया लेकिन जब माक़िल जासूस सामने लाया गया तो आपने फ़रमाया कि ऐ अमीर ! हम मुस्लिम को अपने घर बुला कर नहीं लाये बल्कि वह ख़ुद आ गये हैं। इब्ने ज़ियाद ने कहा , अच्छा जो सूरत भी हो तुम मुस्लिम को हमारे हवाले करो। जनाबे हानी ने जवाब दिया कि यह बिल्कुल ना मुम्किन है। यह सुन कर इब्ने ज़ियाद ने हुक्म दिया कि हानी को क़ैद कर दिया जाये। जनाबे हानी ने फ़रमाया कि मैं हर मुसिबत को बर्दाश्त करूंगा लेकिन मेहमान को तुम्हारे सिपुर्द न करूंगा। मुख़्तसर यह कि जनाबे हानी जिनकी उम्र 90 साल की थी , को खम्बे में बंधवा कर पांच सौ ( 500) कोड़े मारने का हुक्म दिया गया। जनाबे हानी बेहोश हो गये। उसके बाद उनका सर काट कर तने मुबारक को दार पर लटका दिया गया।

जब हज़रत मुस्लिम को जनाबे हानी की गिरफ़्तारी का इल्म हुआ तो आप अपने साथियो को ले कर बाहर निकल गये। दुश्मन से घमासान जंग हुई लेकिन क़तीर इब्ने शहाब , मोहम्मद इब्ने अशअस , शिम्र इब्ने ज़िलजौशन , शीस इब्ने रबी के बहकाने और ख़ौफ़ दिलाने से सब डर गये। यहां तक कि नमाज़े मग़रबैन में आपके हमराह सिर्फ़ 30 आदमी थे और जब आपने नमाज़ तमाम की तो कोई भी साथ न था। आपने चाहा कि कूफ़े से बाहर जा कर कहीं रात गुज़ार लें , मगर मोहम्मद इब्ने कसीर ने कहा कि कूफ़े के तमाम रास्ते बन्द हैं आप मेरे मकान में जा ठहरिये। इब्ने ज़ियाद ने बाप और बेटे दोनों को तलब किया और दरबार में निहायत सख़्त और सुस्त कहा। उस वक़्त उनके साथी मोहम्मद इब्ने कसीर और दरबारियों में सख़्त जंग हुई। बिल आखि़र यह बाप और बेटे दोनों शहीद हो गये।

हज़रत मुस्लिम को जब मोहम्मद कसीर की शहादत की इत्तेला मिली तो वह उनके घर से बाहर बरामद हुए। मुस्लिम यह चाहते थे कि कोई ऐसा रास्ता मिल जाये कि मैं कूफ़े से बाहर चला जाऊँ और इसी कोशिश में घोड़े पर सवार हो कर कूफ़े के हर दरवाज़े पर गये लेकिन किसी दरवाज़े से रास्ता न मिला , क्यों कि हर जगह दो दो हज़ार सिपाहियों का पहरा था , नागाह सुबह हो गई और मुस्लिम नाचार अपना घोड़ा शारए आम पर छोड़ कर एक कूचे में घुस गये और वहां की एक बोसिदा मस्जिद में छुपे रहे। इब्ने ज़ियाद को जैसे यह मालूम था कि कूफ़े ही में मुस्लिम कहीं रू पोश हैं। उसने ऐलान करा दिया कि जो मुस्लिम को गिरफ़्तार कर के लायेगा या उनका सर दरबार में पहुँचायेगा तो उसे काफ़ी माल दिया जायेगा।

हज़रत मुस्लिम ने दिन मस्जिद में गुज़ारा और रात को मस्जिद से निकल कर खडे़ हुए। जनाबे मुस्लिम की हालत भूख और प्यास से ऐसी हो गई थी कि रास्ता चलना दूभर था। आप इसी हालत में एक महल्ले में सर गरदां फिर रहे थे कि आपकी नज़र एक ज़ईफ़ा (बूढ़ी औरत) पर पड़ी , आप उसके क़रीब गये और उससे पानी मांगा। उसने पानी दे कर ख़्वाहिश की कि जल्दी अपनी राह लगें क्यों कि यहां फ़िज़ा बहुत मुकद्दर है। आपने फ़रमाया कि ऐ ‘‘ तौआ ’’ जिसका कोई घर न हो वह कहां जाये। उसने पूछा कि आप कौन हैं ? फ़रमाया मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) और अली ए मुर्तुज़ा का भतीजा और इमाम हुसैन (अ.स.) का चचा जा़द भाई हूँ। यह सुन कर ‘‘तौआ ” ने आपको अपने घर में जगह दी। आपने रात गुज़ारी लेकिन सुबह होते ही दुश्मन का लशकर आ पहुँचा क्यों कि पिसरे तौआ ने माँ से पोशिदा इब्ने ज़ियाद से चुग़ल ख़ोरी कर दी थी। लशकर का सरदार मोहम्मद बिन अशअस था जो इमाम हसन (अ.स.) की क़ातेला जादा बिन्ते अशअस का सगा भाई था। हज़रत मुस्लिम ने जब तीन हज़ार घोड़ों की टापों की आवाज़ सुनी तो तलवार ले कर घर से बाहर निकल पड़े और सैकड़ों दुश्मनों को तहे तेग़ कर दिया। बिल आखि़र इब्ने अशअस ने और फ़ौज मांगी। इब्ने ज़ियाद ने कहला भेजा कि एक शख़्स के लिये तीन हज़ार फ़ौज कैसे न काफ़ी है। उसने जवाब दिया कि शायद तूने यह समझा है कि किसी बनिये बक़्क़ाल से लड़ने के लिये भेजा है। ग़र्ज़ कि जब मुस्लिम पर किसी तरह क़ाबू न पाया जा सका तो एक खस पोश गढ़े में आपको गिरा दिया गया , फिर गिरफ़्तार कर के इब्ने ज़ियाद के सामने पेश कर दिया।

इसने हुक्म दिया कि इन्हें कोठे से ज़मीन पर गिरा कर इनका सर काट लिया जाऐ। आपने कुछ वसीयतें की और कोठे से गिरते वक़्त ‘‘ अस्सलामो अलैका या अबा अब्दिल्लाह ’’ कहा और नीचे तशरीफ़ लाये। आपका सर काटा गया। उलमा का बयान है कि आपका और हानी का सर काट कर दमिश्क़ भेज दिया गया और तन बाज़ारे क़साबा में दार पर लटका दिया गया।

एक रवायत में है कि दोनों के पैरों में रस्सी बांध कर बाज़ारों में फिरा रहे थे कि क़बीला ए मुज़हज ने काफ़ी जंगो जिदाल कर के लाशें हासिल कर लीं और दफ़्न कर दिया। मुलाहेज़ा होः(रौज़तुल शोहदा पृष्ठ 260 से 276 तक व कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 68 व ख़ुलासतुल मसाएब पृष्ठ 46 )

आपकी शहादत 9 ज़िल्हिज 60 हिजरी को वाक़े हुई है।

(अनवारूल मजालिस बाब 9 मजालिस 2 प्रकाशित ईरान)

मोहम्मद और इब्राहीम की शहादत

मुवर्रेख़ीन का बयान है कि शहादते हज़रत मुस्लिम के बाद लोगों ने इब्ने ज़ियाद को जनाबे मुस्लिम के दोनों कमसिन लड़कों के कूफ़े में मौजूद होने की ख़बर दी जिनका नाम मोहम्मद व इब्राहीम था। इब्ने ज़ियाद ने इनकी गिरफ़्तारी का हुक्म नाफ़िज़ कर दिया। पिसराने मुस्लिम क़ाज़ी शुरए के घर में पोशीदा थे। सरकारी ऐलान के बाद क़ाज़ी ने बच्चों से कहा कि हमारी और तुम्हारी दोनों की जान अब ख़तरे में है बेहतर यह है कि तुम्हें किसी सूरत से मदीने पहुँचा दिया जाय। बच्चों ने इसे क़ुबूल किया। क़ाज़ी ने अपने बेटे असद को हुक्म दिया कि इन बच्चों को दरवाज़े अराक़ेन के बाहर जो काफ़ला मदीना जाने के लिये ठहरा हुआ है उसमें छोड़ आ। असद उन बच्चों को ले कर जब रात के वक़्त वहां पहुँचा तो काफ़ला रवाना हो चुका था लेकिन इस मक़ाम से नज़र आ रहा था। असद ने बच्चों को उसी काफ़ले के रास्ते पर लगा दिया और घर वापस आया। कमसिन बच्चे थोड़ी दूर चले थे कि काफ़ला नज़रों से ग़ायब हो गया और सुबह हो गई। बच्चे हैरान व सरगरदान फिर रहे थे कि नागाह सरकारी आदमियों ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया और उन्हें इब्ने ज़ियाद के पास पहुँचा दिया। उसने उन्हे क़ैद ख़ाने में बन्द कर के यज़ीद को बच्चों की गिरफ़्तारी की इत्तेला दे दी। क़ैद ख़ाने का दरबान इत्तेफ़ाक़न मुहिब्बे आले मोहम्मद (स अ व व ) था। उसने रात के वक़्त बच्चों को छोड़ दिया और राहे क़ादसिया पर लगा कर एक अंगूठी दी और कहा कि क़ादसिया में मेरे भाई से मिलना और इस अंगूठी के ज़रिये से ताअर्रूफ़ के बाद उनसे कहना कि वह तुम्हें मदीना पहुँचा दें। बच्चे तो रवाना हो गये लेकिन सुबह होते ही दरबान जिसका नाम ‘‘ मशकूर ’’ था क़त्ल कर दिया गया। उससे पूछा गया कि तूने मुस्लिम के बेटों को क्यों छोड़ दिया ? उसने कहा कि ख़ुशनूदिये ख़ुदा के लिये। इब्ने ज़ियाद ने पाँच सौ ( 500) कोड़े मारने का हुक्म दिया। मशकूर की शहादत के बाद उसे उमर इब्ने अल हारिस ने दफ़्न कर दिया।

पिसराने मुस्लिम बिन अक़ील , मशकूर की मेहरबानी से रिहा हो कर क़ादसिया जा रहे थे। हुदूदे कूफ़ा के अन्दर ही रास्ता भूल गये और सारी रात चक्कर लगा कर सुबह को अपने को कूफ़े में ही पाया। सुबह हो चुकि थी दुश्मन के ख़तरे से दोनों एक दरख़्त पर चढ़ गये। इत्तेफ़ाक़न एक औरत उस जगह पानी भरने आई उसने पानी में परछाई देख कर पूछा कि तुम कौन हो ? उन्होंने इतमेनान करने के बाद कहा कि हम मुस्लिम के फ़रज़न्द हैं। उस औरत ने अपनी मलका को ख़बर दी। वह सरो पा बरहैना दौड़ कर आई और इन बच्चों को ले गईं और मकान की एक ख़ाली जगह पर इनको ठहरा दिया। थोड़ी रात गुज़री थी कि इस मोमिना का शौहर ‘‘ हारिस बिन उरवा ’’ सर गर्दा व परेशान घर में आया तो मोमिना ने पूछा कि आज बड़ी रात कर दी ख़ैर तो है ? उसने कहा , मशकूर दरबान ने मुस्लिम के बेटों को क़ैद से रिहा कर दिया जिनकी तलाश के लिये इनाम व इकराम इब्ने ज़ियाद की तरफ़ से मुक़र्रर किया गया है। मैं भी अब तक उनकी तलाश में फिर रहा था। हारिस खाना खा कर बिस्तर पर लेट गया। अभी आंख न लगी थी कि बच्चों की सांस की आवाज़ को महसूस कर के उठ खड़ा हुआ , बिवी से पूछा कि यह किस के सांस की आवाज़ आती है ? उसने कोई जवाब न दिया। यह उस तहख़ाने की तरफ़ चला जिसमें नौनिहालाने रिसालत जलवा अफ़रोज़ थे। उसकी आहट पा कर एक भाई ने दूसरे को जगा कर कहा कि भय्या अभी मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) अली मुर्तुज़ा (अ.स.) फ़ात्मा ज़हरा (स अ व व ) हसने मुजतबा (अ.स.) और इमाम हुसैन (अ.स.) और मेरे बाबा ख़्वाब में तशरीफ़ लाये थे और उन्होंने फ़रमाया कि हम तुम्हारें इन्तेज़ार में हैं। इतने में हारिस अन्दर दाखि़ल हो गया। उन्हें पकड़ कर कहा कि तुम कौन हो ? उन्होंने फ़रमाया कि हम तेरे नबी की अवलाद हैं। ‘‘ हर बना मिनल सजन ’’ क़ैद ख़ाने से भाग कर आये हैं और तेरे घर में पनाह ली है। उसने कहा कि तुम क़ैद से भाग कर मौत के मुंह में आ गये हो। उसके बाद उसने उन यतीमों के रूख़सारों (गालों) पर ज़ोर से तमाचे मारे कि यह मुंह के बल गिर पड़े। फिर उसने उनके बाज़ुओं को कस कर बांधा और हाथ पाओ बांध कर डाल दिया। यह बेचारे सारी रात अपनी बेबसी और बे कसी पर रोते रहे। जब सुबह हुई तो उन्हें नहर पर क़त्ल करने के लिये ले चला। बीवी ने फ़रियाद की , उसे एक तलवारी मारी। गु़लाम ने रोका तो उसे क़त्ल कर दिया। बेटे ने मना किया तो उसे भी क़त्ल कर दिया। अलग़रज़ नहरे फ़ुरात पर ले जा कर क़त्ल करना ही चाहा था कि बच्चों ने कहा कि ऐ शेख़ 1. हमें ज़िन्दा इब्ने ज़ियाद के पास ले चल। 2 हमें बाज़ार में बेच डाल। 3. हमारी कम सिनी पर रहम कर। 4. हमें दो रकअत नमाज़ पढ़ने की इजाज़त दे। उसने कहा कि क़त्ल के सिवा कोई चारा कार नहीं। अलबत्ता अगर नमाज़ पढ़ते हो तो पढ़ लो लेकिन कोई फ़ायदा नहीं है। अल ग़रज़ बच्चों ने वुज़ू किया और दो दो रकअत नमाज़ अदा कि और दुआ के लिये हाथ उठाये। इस मलऊन ने बड़े भाई की गरदन पर तलवार लगाई। सरे मुबारक दूर जा कर गिरा। छोटे भाई ने दौड़ कर सरे मुबारक उठाया लिया और भाई के ख़ून में लौटने लगा। इस ज़ालिम ने बड़े भाई की लाश पानी में डाल दी और छोटे का सर भी काट लिया। जब दोनों लाशें पानी में पहुँची तो बाहम बग़लगीर हो कर डूब गईं। रावी का बयान है कि हारिस ने जिस वक़्त इब्ने ज़ियाद के सामने फ़रज़न्दे मुस्लिम के सर पेश किये ‘‘ क़ाम सुम क़दो फ़ल ज़ालेका सलासन ’’ तो वह तीन मरतबा उठा और बैठा। फिर हुक्म दिया कि यह सर उसी पानी में डाल दिये जायें जिस जगह इनके तन डाले गयें हैं। चुनान्चे एक मुहिब्बे आले मोहम्मद (अ.स.) ने इन सरों को फ़रात में डाल दिया। कहा जाता है कि सरों के पानी में पहुँचते ही डूबे हुए जिस्म सतह आब पर उभर आये और अपने सरों समैत तह नशीन हो गये। अल्लामा हुसैन वाएज़ काशफ़ी तहरीर फ़रमाते हैं कि वह शख़्स जो मुस्लिम के बेटों के सरों को पानी में डाल ने के लिये लाया था उसका नाम ‘‘ मक़ातिल ’’ था। उसने दोनों सरों को पानी में डालने के बाद हारिस मलऊन को मक़तूल ग़ुलाम और बेटे की लाशों को बाबे बनी ख़ज़ीमा में दफ़्न कर दिया।(रौज़तुल शोहदा पृष्ठ 276 से पृष्ठ 285 व ख़ुलासतुल मसाएब पृष्ठ 421 ) अल्लामा अरबेली लिखते हैं कि जनाबे मुस्लिम इब्ने अक़ील हानी इब्ने उरवा व मोहम्मद इब्ने कसीर और फ़रज़न्दाने मुस्लिम को ठिकाने लगाने के बाद उमर इब्ने साअद और इब्ने ज़ियाद के माबैन ‘‘ रै ’’ का मोहयदा हो गया और तय पाया कि हुर इब्ने यज़ीद रियाही को सब से पहले दो हज़ार सवारों समैत रवाना कर के इमाम हुसैन (अ.स.) को गिरफ़्तार कराया जाए और उन्हें कूफ़े ला कर क़त्ल क र दिया जाय।(कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 68 )


मक्के मोअज़्ज़मा में इमाम हुसैन (अ.स.) की जान बच न सकी

यह वाक़ेया है कि इमाम हुसैन (अ.स.) मदीना ए मुनव्वरा से इस लिये आज़िमे मक्का हुए थे कि यहां उनकी जान बच जायेगी लेकिन आपकी जान लेने पर ऐसा सफ़्फ़ाक दुश्मन लगा हुआ था जिसने मक्का ए मोअज़्ज़मा और काबा ए मोहतरम में भी आपको महफ़ूज़ न रहने दिया और वह वक़्त आ गया कि इमाम हुसैन (अ.स.) मक़ामे अमन को महले ख़ौफ़ समझ कर मक्का ए मोअज़्ज़मा छोड़ने पर मजबूर हो गये और मजबूरी इस हद तक बढ़ गई कि आप हज तक न कर सके। यह मुसल्लेमात से है कि शयातीने बनी उमय्या के तीस ख़ूंख़ार हज के लिबास में इमाम हुसैन (अ.स.) के साथ हो गये और क़रीब था कि आपको आलमे हज व तवाफ़ में क़त्ल कर दें। इमाम हुसैन (अ.स.) को जैसे ही साज़िश का पता लगा आपने फ़ौरन हज को उमरे में बदला और आठ ज़िल्हिज 60 हिजरी को जनाबे मुस्लिम के ख़त पर भरोसा कर के आज़िमे कूफ़ा हो गये। अभी आप रवाना न होने पाये थे कि अज़ीज़ व अक़रेबा ने कमाले हमदर्दी के साथ कूफ़े के सफ़र को न करने की दरख़्वास्त की। आपने फ़रमाया कि अगर मैं चूंटी के बिल में भी छुप जाऊँ तो भी क़त्ल ज़रूर किया जाऊँगा और सुनो मेरे नाना ने फ़रमाया है कि हुरमते मक्का एक दुम्बे के क़त्ल से बरबाद होगी। मैं डरता हूँ कि वह दुम्बा मैं ही न क़रार पाऊँ। मेरी ख़्वाहिश है कि मैं मक्का से बाहर चाहे एक ही बालिश्त पर क्यों न ही क़त्ल किया जाऊँ।(तारीख़े कामिल जिल्द 4 पृष्ठ 20, नियाबुल मोअद्दता पृष्ठ 236, सवाएक़े मोहर्रेक़ा) यह वाके़या है कि यज़ीद का इरादा बहर सूरत इमाम हुसैन (अ.स.) को क़त्ल करना और इस्तेहसाले बनी फ़ात्मा था।(कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 87 ) यही वजह है कि जब इमाम हुसैन (अ.स.) के मक्के मोअज़्ज़मा से रवाना होने की इत्तेला वालीए मक्का उमर बिन सआद को हुई तो उसने पूरी ताक़त से वापस लाने की सई की और इसी सिललिसे में उसने यहिया बिन सईद इब्ने अल आस को एक गिरोह के साथ आपको रोकने के लिये भेज दिया। ‘‘ फ़ा क़ालू लहू अन सरफ़ा अयना तज़हब ’’ इन लोगों ने आपको रोका और कहा कि आप यहां से कहां निकले जा रहे हैं फ़ौरन लौटिये। आपने फ़रमाया ऐसा हरगिज़ नहीं होगा। यह रोकना मामूली न था जिसमें मार पीट की भी नौबत आई।(दमाउस साकेबा पृष्ठ 316 ) मक़सद यह है कि वालिये मक्का यह नहीं चाहता था कि इमाम हुसैन (अ.स.) इसके हुदूदे इक़्तेदार से निकल जायें और यज़ीद के मन्शा को पूरा न कर सकें क्यों कि उसके पेशे नज़र वालीए मदीना की बरतरफ़ी या तअत्तुल था। वह देख चुका था कि हुसैन (अ.स.) के मदीने से सालिम निकल आने पर वालीए मदीना बर तरफ़ कर दिया गया था।

इमाम हुसैन (अ.स.) की मक्के से रवानगी

अल ग़रज़ इमाम हुसैन (अ.स.) अपने जुमला आईज़्ज़ा और अक़रेबा व अनसारे जां निसार को हमराह ले कर जिनकी तादाद बक़ौल इमाम शिब्ली 72 थी मक्के से रवाना हो गये। आप जिस वक़्त मंज़िले पृष्ठ पर पहुँचे तो फ़रज़दक़ शायर से मुलाक़ात हुई। वह कूफ़े से आ रहा था। इसरार पर उसने बताया कि चाहे लोगों के दिल आपके साथ हों लेकिन इनकी तलवारें आपके खि़लाफ़ हैं। आपने अपनी रवानगी की वजहं बयान फ़रमाईं और आप वहां से आगे बढ़े फिर मंज़िले हाजिज़ के एक चश्मे पर उतरे और वहां अब्दुल्लाह इब्ने मुती से मुलाक़ात हुई उन्होंने भी कूफ़ियों की बे वफ़ाई का ज़िक्र किया , इसके बाद आप मंज़िले बतन अल रहमा पहुँचे और वहां से मंज़िले ज़ातुल अर्क़ पर डेरा डाला। वहां एक शख़्स बशीर इब्ने ग़ालिब से मुलाक़ात हुई उसने भी कूफ़ियों की ग़द्दारी का तज़किरा किया। फिर आप वहां से आगे बढ़े। एक मक़ाम पर एक ख़ेमा नस्ब देखा। पूछा इस जगह कौन ठहरा है। मालूम हुआ कि ज़ोहैरे इब्ने क़ैन। आपने उन्हें बुलवा भेजा। जब वह आये तो आपने अपनी हिमायत का ज़िक्र किया। उन्होंने क़ुबूल कर के अपनी बीवी को बा रवायत अपने भाई के साथ घर रवाना कर दिया और ख़ुद इमाम हुसैन (अ.स.) के साथ हो गये। फिर आप वहां से रवाना हो कर मंज़िले ‘‘ जबाला ’’ में पहुँचे वहां आपको हज़रते मुस्लिम व हानी और मोहम्मद बिन कसीर और अब्दुल्लाह बिन यक़तर जैसे दिलेरों की शहादत की ख़बर मिली। आपने ‘‘ निन्ना लिल्लाहे व इन्ना इलैहे राजेऊन ’’फ़रमाय और दाखि़ले ख़ेमा हो कर हज़रत मुस्लिम की बच्चियों को कमाले मोहब्बत के साथ प्यार किया और बे इन्तेहा रोये। उसके बाद बक़ौले अल्लामा अरबली , आपने ब वक़्ते शब एक ख़ुतबा दिया जिसमें हालात की वज़ाहत के बाद इरशाद फ़रमाया कि मेरा क़त्ल यक़ीनी है। मैं तुम लोगों की गरदनों से तौक़ै बैएत उतारे लेता हूँ। तुम्हारा जिधर जी चाहे चले जाओ। दुनियां दार तो वापस हो गये लेकिन सब दींदार साथ ही रहे। फिर वहां से रवाना हो कर मंज़िले क़सर बनी मक़ातिल पर उतरे। वहां पर अब्दुल्लाह इब्ने हजर जाफ़ेई से मुलाक़ात हुई। आपके इसरार के बवजूद वह बक़ौले वाएज़ काशफ़ी आपके साथ न हुआ। फिर आप मंज़िले साअलबिया पर पहुँचे वहां जनाबे ज़ैनब की आग़ोश में सर रख कर सो गये। ख़्वाब में रसूले ख़ुदा को देखा कि बुला रहे हैं। आप रो पड़े उम्मे कुलसूम ने रोने की वजह पूछी आपने ख़्वाब का हवाला दिया और ख़ानदान की तबाही का असर ज़ाहिर किया। अली अकबर (अ.स.) ने अर्ज़ कि बाबा हम हक़ पर हैं हमें मौत से कोई डर नहीं। उसके बाद आप ने मंज़िले क़तक़तानिया पर ख़ुतबा दिया और वहां से रवाना हो कर क़बीला ए बनी सुकून में ठहरे। आपकी यहां सुकूनत की इत्तेला इब्ने ज़ियाद को दी गई। उसने एक हज़ार या दो हज़ार के लशकर समैत हुर बिन यज़ीदे रिहाइ को इमाम हुसैन (अ.स.) की गिरफ़्तारी के लिये रवाना कर दिया। इमाम हुसैन (अ.स.) अपनी क़याम गाह से निकल कर कूफ़े की तरफ़ ब दस्तूर रवाना हो गये। रास्ते मे बनी अकरमा का एक शख़्स मिला , उसने कहा क़ादसिया में ग़दीब तक सारी ज़मीन लश्कर से पटी पड़ी है। आपने उसे दुआए ख़ैर दी और ख़ुद आगे बढ़ कर ‘‘ मंज़िले शराफ़ ’’ पर क़याम किया। वहां आपने मोहर्रम 61 हिजरी का चांद देखा और आप रात गुज़ार कर बहुत सवेरे रवाना हो गये।

हुर बिन यज़ीदे रियाही

सुबह का वक़्त गुज़रा दोपहर आई , लशकरे हुसैनी बादया पैमाई कर रहा था कि नागाह एक साहाबिये हुसैन (अ.स.) ने तकबीर कही। लोगों ने वजह पूछी , उसने जवाब दिया कि मुझे कूफ़े की सिम्त ख़ुरमे और केले के दरख़्त जैसे नज़र आ रहे हैं। यह सुन कर लोग यह ख़्याल करते हुए कि इस जंगल में दरख़्त कहां , उस तरफ़ ग़ौर से देखने लगे , थोड़ी देर में घोड़ों की कनौतियां नज़र आई , इमाम (अ.स.) ने फ़रमाया कि दुश्मन आ रहे हैं। लेहाज़ा मंज़िले ज़ुख़शब या जूहसम की तरफ़ मुड़ चले। लश्करे हुसैनी ने रूख़ बदला और लश्करे हुर ने तेज़ रफ़्तारी इख़्तेयार की। बिल आखि़र सामने आ पहुँचा और ब रवायते लजामे फ़रस पर हाथ डाल दिया। यह देख कर हज़रते अब्बास (अ.स.) आगे बढ़े और फ़रमाया तेरी माँ तेरे ग़म में बैठे। ‘‘ मातरीद ’’ क्या चाहता है ?(मातईन पृष्ठ 183 )

मुवर्रेख़ीन का बयान है कि चूंकि लश्करे हुर प्यास से बेचैन था इस लिये साक़िये क़ौसर के फ़रज़न्द ने अपने बहादुरों को हुक्म दिया कि हुर के सवारों और सवारी के जानवरों को अच्छी तरह सेराब कर दो। चुनान्चे अच्छी तरह सेराबी कर दी गई। उसके बाद नमाज़े ज़ौहर की अज़ान हुई। हुर ने इमाम हुसैन (अ.स.) की क़यादत में नमाज़ अदा की और बताया कि हमें आपकी गिरफ़्तारी के लिये भेजा गया है और हमारे लिये यह हुक्म है कि हम आपको इब्ने ज़ियाद के दरबार में हाज़िर करें। इमाम हुसैन (अ.स.) ने फ़रमाया कि मेरे जीते जी यह ना मुम्किन है कि मैं गिरफ़्तार हो कर ख़ामोशी के साथ कूफ़े में क़त्ल कर दिया जाऊं। फिर उसने तन्हाई में राय दी कि चुपके से रात के वक़्त किसी तरफ़ निकल जायें। आपने उसकी राय को पसन्द किया और एक रास्ते पर आप चल पड़े। जब सुबह हुई तो फिर हुर को पीछा करते देखा और पूछा कि अब क्या बात है ? उसने कहा मौला किसी जासूस ने इब्ने ज़ियाद से मुख़बिरी कर दी है। चुनान्चे अब उसका हुक्म यह आ गया है कि मैं आप को बे आबो गियाह जंगल (जहां पानी और साया न हो) में रोक लूँ। गुफ़्तुगू के साथ साथ रफ़्तार भी जारी थी कि नागाह इमाम हुसैन (अ.स.) के घोड़े ने क़दम रोके , आपने लोगों से पूछा कि इस ज़मीन को क्या कहते हैं ? कहा गया ‘‘ करबला ’’ आपने अपने साथियों को हुक्म दिया कि यहीं पर डेरे डाल दो और यहीं ख़ेमे लगा दो क्यो कि क़ज़ा ए इलाही यहीं हमारे गले मिलेगी।

(नूरूल अबसार पृष्ठ 117 मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 257, तबरी जिल्द 3 पृष्ठ 307, कामिल जिल्द 4 पृष्ठ 26, अबुल फ़िदा जिल्द 2 पृष्ठ 201 व दमए साकेबा पृष्ठ 330, अख़बारूल तवाल पृष्ठ 250, इब्नुल वरदी जिल्द 1 पृष्ठ 172, नासिक़ जिल्द 6 पृष्ठ 219 बेहारूल अनवार जिल्द 10 पृष्ठ 286 )

करबला में वुरूद

2 मोहर्रमुल हराम 61 हिजरी यौमे पंज शम्बा को इमाम हुसैन (अ.स.) वारिदे करबला हो गये।(नूरूल ऐन पृष्ठ 46, हयवातुल हैवान जिल्द 1 पृष्ठ 51 मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 250, इरशादे मुफी़द व दमए साकेबा पृष्ठ 321 ) अल्लामा हुसैन वाएज़ काशफ़ी और अल्लामा अरबली का बयान है कि जैसे ही इमाम हुसैन (अ.स.) ने ज़मीने करबला पर क़दम रखा ज़मीने करबला ज़र्द हो गई और एक ऐसा ग़ुबार उठा जिससे आपके चेहरा ए मुबारक पर परेशानी के आसार नुमाया हो गये। यह देख कर असहाब डर गये और जनाबे उम्मे कुलसूम रोने लगीं।(कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 69 व रौज़तुल शोहदा पृष्ठ 301 )

साहेबे मख़ज़नुल बुका लिखते हैं कि करबला के फ़ौरन बाद जनाबे उम्मे कुलसूम ने इमाम हुसैन (अ.स.) से अर्ज़ कि भाई जान यह कैसी ज़मीन है कि इस जगह हमारा दिल दहल रहा है। इमाम हुसैन (अ.स.) ने फ़रमाया बस यह वही मक़ाम है जहां बाबा जान ने सिफ़्फ़ीन के सफ़र में ख़्वाब देखा था यानी यह वह जगह है जहां हमारा ख़ून बहेगा। किताब माईन में है कि इसी दिन एक सहाबी ने एक बेरी के दरख़्त से मिसवाक के लिये शाख़ काटी तो उससे ख़ूने ताज़ा जारी हो गया।

इमाम हुसैन (अ.स.) का ख़त अहले कूफ़ा के नाम

करबला पहुँचने के बाद आपने सब से पहले एतमामे हुज्जत के लिये एहले कूफ़ा के नाम कै़स इब्ने मसहर के ज़रिये से एक ख़त इरसाल फ़रमाया , जिसमें आपने तहरीर फ़रमाया था कि तुम्हारी दावत पर मैं करबला तक आ गया हूँ। क़ैस ख़त लिये जा रहे थे कि रास्ते में गिरफ़्तार कर लिये गये और उन्हें इब्ने ज़ियाद के सामने कूफ़े ले जा कर पेश कर दिया गया। इब्ने ज़ियाद ने ख़त मांगा क़ैस ने बा रवायते चाक कर के फेंक दिया और बा रवायते इस ख़त को खा लिया। इब्ने ज़ियाद ने उन्हें ताज़याने (कोड़े) मार कर शहीद कर दिया।(रौज़तुल शोहदा पृष्ठ 301, कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 66 )

उबैदुल्लाह इब्ने ज़ियाद का ख़त इमाम हुसैन (अ.स.) के नाम

अल्लामा इब्ने तल्हा शाफ़ेई लिखते हैं कि इमाम हुसैन (अ.स.) के करबला पहुँचने के बाद , हुर ने इब्ने ज़ियाद को आपके करबला पहुँचने की ख़बर दी। उसने इमाम हुसैन (अ.स.) को फ़ौरन एक ख़त इरसाल किया जिसमें लिखा कि मुझे यज़ीद ने हुक्म दिया है कि मैं आप से उसके लिये बैएत ले लूँ , या क़त्ल कर दूं। इमाम हुसैन (अ.स.) ने इस ख़त का जवाब न दिया। ‘‘ अल क़ायमन यदह ’’ और उसे ज़मीन पर फेंक दिया।(मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 257 व नूरूल अबसार पृष्ठ 117 ) इसके बाद आपने मोहम्मद बिन हनफ़िया को अपने करबला पहुँचने की एक ख़त के ज़रिये से इत्तेला दी और तहरीर फ़रमाया कि मैंने ज़िन्दगी से हाथ धो लिया है और अन्क़रीब उरूसे मौत से हमकनार हो जाऊंगा।(जिलाउल उयून पृष्ठ 196 )

दूसरीमोहर्रम से नवी मोहर्रम तक के मुख़्तसर वाक़ेयात

दूसरी मोहर्रमुल हराम 61 हिजरी

को आप करबला में वारिद हुए। आपने अहले कूफ़ा के नाम ख़त लिखा। आपके नाम इब्ने ज़ियाद का ख़त आया , इसी तारीख़ को आपके हुक्म से नहरे फ़ुरात के किनारे ख़ेमे नस्ब किये गये।(कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 69 व शहीदे आज़म पृष्ठ 111 ) हुर ने रोका और कहा कि फ़ुरात से दूर ख़ेमे नस्ब कीजिए।(नूरूल ऐन पृष्ठ 46 ) अब्बास इब्ने अली (अ.स.) को ग़ुस्सा आ गया।(शहीदे आज़म जिल्द 2 पृष्ठ 371 ) इमाम हुसैन (अ.स.) ने गु़स्से पर क़ाबू किया और बक़ौल अल्लामा असफ़राईनी 3 या 5 मील के फ़ासले पर ख़ेमे नस्ब किये गये।(नूरूल ऐन पृष्ठ 46 ) नस्बे ख़्याम के बाद अभी आप इसमें दाखि़ल ने हुए थे कि चंद अशआर आपकी ज़बान पर जारी हुए। जनाबे ज़ैनब ने ज्यों ही अश्आर को सुना इस दर्जा रोईं कि बेहोश हो गईं। इमाम (अ.स.) रूख़सार पर पानी छिड़ कर होश में लाये।(लहूफ़ पृष्ठ 106 आसारतुल अहज़ान पृष्ठ 36 ) फिर आले मोहम्मद (स अ व व ) दाखि़ले ख़ेमा हुए। उसके बाद 60 हज़ार दिरहम पर 16 मुरब्बा मील ज़मीन ख़रीद कर चंद शरायत के उन्हीं को हिबा कर दी।(कशकोल बहाई पृष्ठ 91 ज़िकरूल अब्बास पृष्ठ 144 )

तीसरी मोहर्रमुल हराम

यौमे जुमा को उमर इब्ने साअद 5, 6 बक़ौल अल्लामा अरबली 22,000 (बाईस हज़ार सवार) व पियादे ले कर करबला पहुँचा और उसने इमाम हुसैन (अ.स.) से तबादलाए ख़्यालात की ख़्वाहिश की। हज़रत ने इरादा ए कूफ़े का सबब बयान फ़रमाया। उसने इब्ने ज़ियाद को गुफ़्तुगू की तफ़सील लिख दी। और यह भी लिखा कि इमाम हुसैन (अ.स.) फ़रमाते हैं कि अगर अब अहले कूफ़ा मुझे नहीं चाहते तो मैं वापस जाने को तैयार हूँ। इब्ने ज़ियाद ने उमर बिन साद के जवाब में लिखा कि अबा जब कि हम ने हुसैन को चुंगल में ले लिया है तो वह छुटकारा चाहते हैं। ‘‘ लात हीना मनास ’’ यह हरगिज़ नहीं होगा। इन से कह दो कि यह अपने तमाम आईज़्ज़ा व अक़रेबा समैत बैअते यज़ीद करें या क़त्ल होने के लिये आमादा हो जायें। मैं बैअत से पहले उनकी किसी बात पर ग़ौर करने के लिये तैयार नहीं हूँ।(नासिख़ व रौज़तुल शोहदा) इसी तीसरी तारीख़ की शाम को हबीब इब्ने मज़ाहिर क़बीला ए बनी असद में गये और उनमें से 90 जांबाज़ इमदादे हुसैनी के लिये तैयार किये। वह उन्हें ला रहे थे कि किसी ने इब्ने ज़ियाद को इत्तेला कर दी। उसने 400 (चार सौ) का लश्कर भेज कर उस कुमक को रूकवा दिया।(नासेख़ुल तवारीख़ जिल्द 6 पृष्ठ 235 )

चौथी मोहर्रमुल हराम

को इब्ने ज़ियाद ने मस्जिदे जामा में ख़ुत्बा दिया जिसमें उसने इमाम हुसैन (अ.स.) के खि़लाफ़ लोगों को भड़का दिया और कहा कि हुक्मे यज़ीद से तुम्हारे लिये ख़ज़ानों के मुंह खोल दिये गये हैं। तुम उसके दुश्मन इमाम हुसैन (अ.स.) से लड़ने के लिये आमादा हो जाओ। उसके कहने से बेशुमार लोग आमादा ए करबला हो गये और सब से पहले शिम्र ने रवानगी की दरख़्वास्त की। चुनान्चे शिम्र 4000 (चार हज़ार) इब्ने रकाब को दो हज़ार ( 2000) इब्ने नमीर को चार हज़ार ( 4000) इब्ने रहीना को तीन हज़ार ( 3000) इब्ने हरशा को दो हज़ार ( 2000) सवार दे कर करबला रवाना कर दिया।(दमएस साकेबा पृष्ठ 322 )

पाँचवीं मोहर्रमुल हराम

यौमे यकशम्बा को शीश इब्ने रबी को चार हज़ार ( 4000) उरवा इब्ने क़ैस को चार हज़ार ( 4000) सिनान इब्ने अनस को दस हज़ार ( 10,000) मोहम्मद इब्ने अशअस को एक हज़ार ( 1000) अब्दुल्लाह इब्ने हसीन को एक हज़ार का लश्कर दे कर रवाना कर दिया।(नासिख़ुल तवारीख़ जिल्द 6 पृष्ठ 233 दमउस साकेबा पृष्ठ 322 )

छठी मोहर्रमुल हराम

यौमे दोशम्बा को ख़ूली इब्ने यज़ीद असबही को दस हज़ार ( 10,000) इब्नुल हुर को तीन हज़ार ( 3000) हज्जाज इब्ने हुर को एक हज़ार ( 1000) का लशकर दे कर रवाना कर दिया गया। इनके अलावा छोटे बड़े और कई लश्कर इरसाल करने के बाद इब्ने ज़ियाद ने उमर इब्ने साद को लिख कर भेजा कि अब तक तुझे अस्सी हज़ार का कूफ़ी लश्कर भेज चुका हूँ इनमें हेजाज़ी और शामी शामिल नहीं हैं। तुझे चाहिये कि बिना हिला हवाला हुसैन को क़त्ल कर दे।(नासिख़ुल जिल्द 6 पृष्ठ 233, दमए साकेबा पृष्ठ 322 जिलाउल ऐन पृष्ठ 197 ) इसी तारीख़ को खू़ली इब्ने यज़ीद ने इब्ने ज़ियाद के नाम एक ख़त इरसाल किया जिसमें उमर इब्ने साद के लिये लिखा कि यह इमाम हुसैन (अ.स.) से रात को छुप कर मिलता है और इनसे बात चीत किया करता है। इब्ने ज़ियाद ने इस ख़त को पाते ही उमरे साद के नाम एक ख़त लिखा कि मुझे तेरी तमाम हरकतों की इत्तेला है , तू छुप कर बातें करता है। देख मेरा ख़त पाते ही हुसैन पर पानी बन्द कर दे और उन्हें जल्द से जल्द मौत के घाट उतारने की कोशिश कर।

(नासिख़ुल तवारीख़ जिल्द 6 पृष्ठ 236, अख़बारूल तौल पृष्ठ 256 तबरी जिल्द 1 पृष्ठ 212 अलबराता व अनहातिया जिल्द 8 पृष्ठ 175 )

सातवीं मोहर्रमुल हराम

यौमे सह शम्बा उमर इब्ने हजाज को पाँचसो सवारों समैत नहरे फ़ुरात पर इस लिये मुक़र्रर कर दिया कि इमाम हुसैन (अ.स.) के ख़ेमों तक पानी न पहुँच पाए।(तारीख़े तबरी जिल्द 1 पृष्ठ 313 व नासिख़ुल तवारीख़ जिल्द 6 पृष्ठ 236 ) फिर मज़ीद अहतीयात के लिये चार हज़ार ( 4000) का लशकर दे कर हजर को एक हज़ार ( 1000) का लशकर दे कर शीस इब्ने रवी को रवाना किया गया।(मक़तल मख़निफ़ पृष्ठ 32 ) और पानी की बन्दिश कर दी गईं। पानी बन्द होने के बाद अब्दुल्लाह इब्ने हसीन ने निहायत करीह लफ़्ज़ों में ताना ज़नी की।(नूरूल ऐन पृष्ठ 31 ) जिससे इमाम हुसैन (अ.स.) को सख़्त सदमा पहुँचा।(तज़किरा पृष्ठ 121 ) फिर इब्ने हौशब ने ताना ज़नी की जिसका जवाब हज़रत अब्बास (अ.स.) ने दिया।(अल इमामत वल सियासत जिल्द 1 पृष्ठ 8 ) आपने ग़ालेबन ताना ज़नी के जवाब में ख़ेमे से 19 क़दम के फ़ासले पर जानिबे क़िबला एक ज़र्ब तीशा से चश्मा जारी कर दिया।(मक़तले अवाम पृष्ठ 78 व आसम कूफ़ी पृष्ठ 266 ) और यह बता दिया कि हमारे लिये पानी की कमी नहीं है लेकिन हम इस मुक़ाम पर मोजिज़ा दिखाने के लिये नहीं आए बल्कि इम्तेहान देने आए हैं।

आठवीं मोहर्रमुल हराम

यौमे चार श्म्बा की शब को खे़मा ए आले मोहम्म्द (अ.स.) व आले मोहम्मद (स अ व व ) से पानी बिल्कुल ग़ाएब हो गया। इस प्यास की शिद्दत ने बच्चों को बेचैन कर दिया। इमाम हुसैन (अ.स.) ने हालात को देख कर हज़रत अब्बास (अ.स.) को पानी लाने का हुक्म दिया। आप चन्द सवारों को ले कर तशरीफ़ ले गये और बड़ी मुश्किलों से पानी लाये। वज़लका समीउल अब्बास सक्क़ा इसी सक्क़ाई वजह से अब्बास (अ.स.) को सक़्क़ा कहा जाता है।(अख़बारूल तवाल पृष्ठ 253, जिलाउल ऐन पृष्ठ 198 व दमए साकेबा पृष्ठ 323 ) रात गुज़रने के बाद जब सुबह हुई तो यज़ीद इब्ने हसीन सहराई ने ब इजाज़त इमाम हुसैन (अ स ) , इब्ने साद को फ़हमाईश की लेकिन कोई नतीजा बरामद न हुआ। इसने कहा यह कैसे हो सकता है कि हुसैन को पानी दे कर हुकूमते ‘‘ रै ’’ छोड़ दूँ।(नासिख़ुल तवारीख़ जिल्द 3 पृष्ठ 338 ) इमाम शिब्ली लिखते हैं कि इब्ने हसीन और इब्ने साद की गुफ़्तुगू के बाद इमाम हुसैन (अ.स.) ने अपने ख़ेमे के गिर्द ख़न्दक़ खोदने का हुक्म दिया।(नूरूल अबसार पृष्ठ 117 ) इसके बाद हज़रत अब्बास (अ.स.) को हुक्म दिया कि कुएं खोद कर पानी बरामद करो। आपने कुआं तो खोदा लेकिन पानी न निकला।(मक़तल अबी मख़नफ़ पृष्ठ 27 )

नवीं मोहर्रमुल हराम

यौमे पंज शम्बा की शब को इमाम हुसैन (अ.स.) और उमरे साद में आख़री गुफ़्तुगू हुई। आपके हमराह हज़रत अब्बास (अ.स.) और अली अकबर (अ.स.) भी थे। आप ने गुफ़्तुगू में हर क़िस्म की हुज्जत तमाम कर ली।(दमए साकेबा पृष्ठ 323 ) नवीं की सुबह को आपने हज़रत अब्बास (अ.स.) को फिर कुंआ खोदने का हुक्म दिया लेकिन पानी बरामद न हुआ।(नासिख़ुल तवारीख़ जिल्द 6 पृष्ठ 245 ) थोड़ी देर के बाद इमाम हुसैन (अ.स.) ने बच्चों की हालत के पेशे नज़र फिर हज़रत अब्बास (अ.स.) से कुआं खोदने की फ़रमाईश की। आपने सई बलीग़ शुरू कर दी। जब बच्चों ने कुंआ खुदता हुआ देखा तो सब कुज़े ले कर आ पहुँचे। अभी पानी निकलने न पाया था कि दुश्मन ने आ कर उसे बन्द कर दिया। फ़हर बत अतफ़ाले ख़्याम दुश्मन को देख कर बच्चे ख़मों में जा छुपे। फिर थोड़ी देर बाद हज़रत अब्बास (अ.स.) ने कुंआ खोदा वह भी बन्द कर दिया गया। हत्ताहफ़रा अरबन यहां तक कि चार कुंए खोदे और पानी हासिल न कर सके। ब रवाएते पांचवीं मरतबा पानी बरामद हुआ। सकीना ने कुज़ा भरा और दुश्मन के ख़ौफ़ से ख़ेमे की तरफ़ भागीं तनाबे ख़ेमा में पांव उलझे और आप गिर पड़ीं पानी जाता रहा और दुश्मन ने कुंआ बन्द कर दिया , सकीना प्यासी की प्यासी रहीं।(ख़ुलासेतुल मसाएब पृष्ठ 112 प्रकाशित नवल किशोर पृष्ठ 1876 ) इसके बाद इमाम हुसैन (अ.स.) एक नाक़े पर सवार हो कर दुश्मन के क़रीब गए और अपना ताअर्रूफ़ कराया लेकिन कुछ न बना।(कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 70 ) मुवर्रेख़ीन लिखते हैं कि नवीं तारीख़ को शिम्र कूफ़ा वापस गया और उसने उमरे साद की शिकायत कर के इब्ने ज़ियाद से एक सख़्त हुक्म हासिल किया जिसका मक़सद यह था कि अगर हुसैन (अ.स.) बैअत नहीं करते तो उन्हें क़त्ल कर के उनकी लाश पर घोड़ें दौड़ा दें और अगर तुझ से यह न हो सके तो शिम्र को चार्ज दे दे हम ने उसे हुक्मे तामील हुक्मे यज़ीद दिया है।(रौज़तुल शोहदा पृष्ठ 306 व दम ए साकेगा पृष्ठ 323 ) इब्ने ज़ियाद का हुक्म पाते ही इब्ने साद तामील पर तैय्यार हो गया , इसी नवीं तारीख़ को शिम्र ने हज़रत अब्बास (अ.स.) और उनके भाईयों को अमान की पेशकश की उन्होंने बड़ी देर से उसे ठुकरा दिया।(जिलाउल उयून पृष्ठ 198, तबरी पृष्ठ 237 जिल्द 6 ) तफ़सील के लिये मुलाहेज़ा हों ज़िकरूल अब्बास पृष्ठ 176 से 182 तक। इसी नवीं की शाम आने से पहले शिम्र की तहरीक से इब्ने साद ने हमले का हुक्म दे दिया। इमाम हुसैन (अ.स.) ख़ेमे में तशरीफ़ फ़रमा थे। आपको हज़रते ज़ैनब फिर हज़रते अब्बास (अ.स.) ने फिर दुश्मन के आने की इत्तेला दी। हज़रत ने फ़रमाया मुझे अभी निंद सी आ गई थी , मैंने आं हज़रत (स अ व व ) को ख़्वाब में देखा उन्होंने फ़रमाया कि अनका तरो ग़दा हुसैन तुम कल मेरे पास पहुँच जाओगे।(दमए साकेबा 322 ) जनाबे ज़ैनब रोने लगीं और इमाम हुसैन (अ.स.) ने हज़रते अब्बास से फ़रमाया कि भय्या तुम जा कर उन दुश्मनों से एक शब की मोहलत ले लो। हज़रत अब्बास तशरीफ़ ले गए और लड़ाई एक शब के लिये मुलतवी हो गई।(तारीख़े इस्लाम 272 प्रकाशित गोरखपुर 1931 0 ) जंग के रोकने की ग़रज़ क्या थी उसके लिये मुलाहेज़ा हो ज़िकरूल अब्बास पृष्ठ 186)

शबे आशूर

नवीं का दिन गुज़रा , आशूर की रात आई , इलतवाए जंग के बाद इमाम हुसैन (अ.स.) को जिस चीज़ की ज़्यादा फ़िक्र थी वह यह थी कि अपने असहाब को मौत से बचा लें। आपने रात के वक़्त अपने असहाब और रिश्तेदारों को जमा कर के फ़रमाया , इसमें शक नहीं कि तुम से बेहतर रिश्तेदार और असहाब किसी को नसीब नहीं हुए लेकिन देखो चूंकि यह सिर्फ़ मुझी को क़त्ल करना चाहते हैं इस लिये मैं तुम्हारी गरदनों से तौक़े बैएत उतारे लेता हूँं। तुम रात के अंधेरे में अपनी जाने बचा कर निकल जाओ , यह सुन्ना था कि हज़रते अब्बास , फ़रज़न्दाने मुस्लिम बिन अक़ील , मुस्लिम इब्ने औसजा , ज़ोहैर इब्ने क़ैन , साद इब्ने अब्दुल्लाह खड़े हो गये और अर्ज़ करने लगे , मौला आपने यह क्या फ़रमाया , ‘‘ अरे लानत है उस ज़िन्दगी पर जो आपके बाद बाक़ी रहे ’’(इब्न अल वर्दी जिल्द 1 पृष्ठ 173, इरशाद पृष्ठ 297 व दमए साकेबा पृष्ठ 324 जला उल उयून 199 इन्सानियत मौत के दरवाज़े पर पृष्ठ 72 )

ख़ुत्बे के बाद आपने हज़रते अब्बास को पानी लाने का हुक्म दिया। आप 30 सवारों और 20 प्यादों समेत नहर पर तशरीफ़ ले गए और बड़ी देर जंग करने के बवजूद पानी न ला सके।(तज़किराए ख़्वास अल उम्मता पृष्ठ 141 ) उसके बाद इमाम हुसैन (अ.स.) मौक़ा ए जंग देखने के लिये मैदान की तरफ़ ले गये। वापसी में ख़ैमा ए जनाबे ज़ैनब में गए , जनाबे ज़ैनब ने पूछा भय्या आपने असहाब का इम्तेहान ले लिया है या नहीं ? आपने इत्मिनान दिलाया। फिर हिलाल इब्ने नाफ़ए ने जनाबे ज़ैनब को मुतमईन किया।(दमए साकेबा पृष्ठ 325 ) जनाबे ज़ैनब से गुफ़्तुगू के बाद आपने फिर एक ख़ुत्बा फ़रमाया और आइज़्ज़ा व असहाब से मिस्ले साबिक़ कहा कि यह लोग मेरी जान चाहते हैं तुम लोग अपनी जाने न दो। यह सुन कर असहाब व रिश्तेदारो ने बड़ा दिलेराना जवाब दिया।(नासिख़ जिल्द 6 पृष्ठ 227 ) इसके बाद इमाम हुसैन (अ.स.) ने अपने असहाब को जन्नत दिखला दी।(वसाएले मुज़फ़्फ़री पृष्ठ 394 )

अल्लामा कन्तूरी लिखते हैं कि पानी न होने की वजह से ख़ेमे में शदीद इज़तेराब पैदा हो गया और जनाबे ज़ैनब के गिर्द 20 लड़के और लड़कियां जमा हो कर फ़रयाद करने लगीं।(मातीं जिल्द 1 पृष्ठ 318 ) यह हालत बुरैर हमदानी को मालूम हो गई। वह कुछ साथियो को ले कर नहर पर पहुँचे। ज़बरदस्त जंग हुई। हज़रत अब्बास मदद को भेजे गए। चंद जाबाज़ काम आ गये। ग़ालेबन इसी मौक़े पर हज़रत अब्बास (अ.स.) के एक भाई अब्बास अल असग़र भी शहीद हुए हैं।(नासिख़ जिल्द 6 पृष्ठ 289 ) अल ग़र्ज़ बुरैर हमदानी बहुत मुश्किल से एक मश्क़ ख़ेमे तक ले ही आये। बच्चे बेताबी की वजह से इस मश्क़ पर जा गिरें और मश्क़ का मुंह खुल गया , पानी बह गया। बच्चों और औरतों के साथ बुरैर ने भी मुंह पीट लिया और इन्तेहाई हसरत और अफ़सोस के साथ कहा , हाय आले मोहम्मद (स अ व व ) की प्यास न बुझ सकी।(मायतीन जिल्द 1 पृष्ठ 316 ) अल्लामा काशफ़ी लिखते हैं कि पानी की जद्दो जेहद की नाकामी के बाद इमाम हुसैन (अ.स.) ने हुक्म दिया कि सब अपने अपने ख़ेमों में जा कर इबादत में मशग़ूल हो जायें।(रौज़तुल शोहदा पृष्ठ 312 )

मुजाहेदीने करबला की आख़री सहर

इमाम हुसैन (अ.स.) और आपके अस्हाब व आईज़्ज़ा मशग़ूले इबादत हैं। सफ़ैद ए सहरी नमूदार होने को है। ज़िन्दगी की आख़री सुबह होने वाली है। नागाह इमाम हुसैन (अ.स.) की आंख लग गई , आपने ख़्वाब में देखा कि बहुत से कुत्ते आप पर हमला आवर हैं और इन कुत्तों में ए अबलक़ मबरूस कुत्ता है जो बहुत ही सख़्ती कर रहा है।(दमए साकेबा पृष्ठ 326 )

अल्लामा दमीरी लिखते हैं कि इमाम हुसैन (अ.स.) को शिम्र ने शहीद किया है जो मबरूस था।(हयातुल हैवान जिल्द 1 पृष्ठ 51 )

काशफ़ी का बयान है कि जब सुबह का इब्तेदाई हिस्सा ज़ाहिर हो गया तो आसमान से आवाज़ आई या ख़लील उल्लाह अरक़बी , ऐ अल्लाह के बहादुर सिपाहियों तैय्यार हो जाओ , मौक़ा ए इम्तेहान और वक़्ते मौत आ रहा है। उसके बाद सुबह हो गई।(रौज़तुल शोहदा पृष्ठ 312, महीजुल एहज़ान पृष्ठ 102 )

सुबह आशूर

(तुलूए सुबहे महशर थी तुलूए सुबह आशूरा)

दस मोहर्रमुल हराम 61 हिजरी यौमे जुमा रात गुज़री , सुबह काज़िब का ज़ुहूर हुआ तो यज़ीदी काज़िबो और झूठों ने अपने लश्कर की तरतीब दे ली और सुबह सादिक़ का तुलू हुआ तो सादक़ैन ने नमाज़े सुबह का तहय्या किया। हज़रत अली अकबर (अ.स.) ने अज़ान कही और इमाम हुसैन (अ.स.) ने नमाज़े जमाअत पढ़ाई। अल्लाह के सच्चे बन्दे अभी मुस्से पर ही थे कि अस्सी हज़ार 80,000 के लशकर में हमला वर होने के आसार ज़ाहिर होने लगे। इमाम (अ.स.) मुसल्ले से उठ खड़े हुए और अपने 72 जांबाज़ों पर मुश्तमिल लशकर की तंज़ीम यूं फ़रमा दी। मैमना 20 बहादुर , मैसरा 20 बहादुर बाक़ी क़ल्बे लश्कर। मैमना के सरदार ज़ुहैरे क़ैन , मैसरा के हबीब इब्ने मज़ाहिर और अलमदारे लशकर हज़रत अब्बास (अ.स.) को क़रार दे दिया।(जलाल अल उयून पृष्ठ 201, अख़बारूल तवारीख़ पृष्ठ 203 ) इसके बाद हज़रत अब्बास (अ.स.) से फ़रमाया कि जंग छिड़ी ही चाहती है। भय्या एक दफ़ा पानी की और कोशीश कर लो , और सुनो सिर्फ़ अपने भाई भतीजों को जमा कर के कुआं खोदो , यानी असहाब को ज़हमत न दो। हज़रत अब्बास (अ.स.) ने कमाले जाफिशानी से कुआं खोदा लेकिन कोई नतीजा न निकला , फिर दूसरा कुआं खोदा वह भी बे सूद ही रहा।(दमउस साकेबा पृष्ठ 329 हालाते सुबह आशूर) इमाम हुसैन (अ.स.) ख़ेमे में थे और बक़ौले अब्दुल हमीद ऐडीटर रिसाला मौलवी देहली , ठीक 10 बजे लश्कर वालों को उमरे साद का अर्जन्ट हुक्म मिलता है कि हुसैन को क़त्ल करने के लिये आगे बढ़ो , टिड्डी दल फ़ौज ने हरकत की और तीन दिन के भूखे प्यासे थोड़े से मुसाफ़िरों को क़त्ल करने दुश्मनाने इस्लाम आगे बढ़े।(शहीदे आज़म पृष्ठ 166 प्रकाशित देहली) हज़रत ने घोड़ों की टापों की आवाज़ सुनी। रसूले ख़ुदा (स अ व व ) की ज़िरह ज़ेब तन की और खन्दक में आग देने का हुक्म दे कर आप असहाब की फ़हमाईश करने लगे।(नासिख़ जिल्द 6 पृष्ठ 245 ) इतने में दुश्मनों ने ख़ेमों को घेर लिया। बुरैर इब्ने ख़ज़ीर ने बाहर निकल कर उन्हें समझाया लेकिन कोई फ़ायदा न हुआ। फिर आप ख़ुद दुश्मनों के सामने आए और अपना ताअर्रूफ़ कराया और बरवाएते यह भी फ़रमाया कि मुझे छोड़ दो , मैं यहां से हिन्द ( 1) या किसी और तरफ़ चला जाऊँ। मगर उन्होंने एक न सुनीं , फिर आपने फ़रमाया कि यह बता दो कि मुझे किस जुर्म की बिना पर क़त्ल करना चाहते हो ? उन्होंने जवाब दिया नक़ तलक़ बुग़ज़न ले अबीका हम तुम्हें तुम्हारे बाप की दुश्मनी में क़त्ल कर रहे हैं।(नयाबुल मोवद्दता पृष्ठ 246 ) फिर आपने क़ुरआन मजीद को हकम क़रार दिया। लेकिन उन्होंने एक न मानी।(नासिख़ुल तवारीख़ जिल्द 6 पृष्ठ 250 ) फिर आपने बारगाहे ख़ुदा वन्दी में दस्ते दुआ बलन्द किया और आखि़र में बरवायते ‘‘ दमउस साकेबा पृष्ठ 328 ’’ अर्ज़ की अल्ला हुम्मा सलता ग़ुलामसकीफ़ ख़ुदाया इन पर क़बीला ए सक़ी़फ़ के एक ग़ुलाम (मुख़्तार) को मुसल्लत कर के उन्हें ज़ुल्म आफ़रीनी का मज़ा चखाए।

1. अल्लामा इब्ने क़तीबा लिखते हैं कि हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) ने इरशाद फ़रमाया ‘‘ अन लस्तुम बराज़ैन बारूहल इराक़ फ़ातिर कूनी लाज़हबा अल्ल सिनदह ’’ तुम अगर मेरे इराक़ पहुँचने पर राज़ी नहीं हो तो मुझे छोड़ दो मैं सिन्ध (हिन्द) चला जाऊँ। तफ़सील के लिये देखें , मुख़्तारे आले मोहम्मद प्रकाशित लाहौर 12 मना।

जनाबे हुर की आमद

इमाम हुसैन (अ.स.) के मवाएज़ का असर सिर्फ़ हुर पर पड़ा। उन्होंने इब्ने साद के पास जा कर आख़री इरादह मालूम किया फिर अपने घोड़े को ऐड़ दी और इमाम (अ.स.) की खि़दमत में हाज़िर हो गए।(तारीख़े तबरी) इसके बाद घोड़े से उतर कर इमाम हुसैन (अ.स.) की रक़ाब को बोसा दिया।(रौज़ातुल अहबाब) इमाम ने हुर को माफ़ी दे कर जन्नत की बशारत दी।(तबरी) दमउस साकेबा पृष्ठ 330 में है कि हुर के साथ इसका बेटा भी था। हमीद इब्ने मुस्लिम का बयान है कि उमरे साद ने लश्करे हुसैनी पर सब से पहले तीर चलाया। इसके बाद तीरों की बारिश शुरू हुई। रौज़तुल अहबाब में है कि जनाबे हुर को क़सूर इब्ने कनाना और इरशाद मुफ़ीद में है कि अय्यूब मशरह ने एक कूफ़ी की मदद से शहीद किया। तफ़सील के लिये मुलाहेज़ा हों किताब ‘‘ बहत्तर सितारें ’’ मोअल्लेफ़ा हक़ीर प्रकाशित लाहौर।

इमाम हुसैन (अ.स.) और उनके असहाब व आइज़्ज़ा की अर्श आफ़रीं जंग

अल्लामा ईसा अरबली लिखते हैं कि जनाबे हुर की शहादत के बाद उमरे साद के लश्कर से दो नाबकार मुबारज़ तलब हुए जिनके नाम निसयान व सालिम थे। इनके मुक़ाबले के लिये इमाम हुसैन (अ.स.) के लश्कर से जनाबे हबीब इब्ने मज़ाहिर और यज़ीद इब्ने हसीन बरामद हुए और इन दोनों को चन्द हमलों में फ़ना के घाट उतार दिया। इसके बाद माक़िल इब्ने यज़ीद सामने आया। जनाबे यज़ीद इब्ने हसीन और बक़ौले मजलिसी बुरैर इब्ने ख़जी़र हमादानी ने उसे क़त्ल कर डाला। फिर मज़ाहिम इब्ने हरीस सामने आया। उसे जनाबे नाफ़े इब्ने हिलाल ने क़त्ल कर दिया।(कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 71 )

जंगे मग़लूबा

उमर इब्ने साद ने जनाबे हुसैनी बहादुरों की शाने शुजाअत देखी तो समझ गया कि इनसे इन्फ़ेरादी मुक़ाबला न मुम्किन है , लेहाज़ा इजतेमाई हमले का प्रोग्राम बनाया और अपने चीफ़ कमाडण्र को हुक्म दिया कि कसीर तादाद में कमान अन्दाज़ों को ला कर यक बारगी तीर बारानी कर दो। जिसका नतीजा यह हुआ कि इमाम हुसैन (अ.स.) का तक़रीबन तमाम लश्कर मजरूह हो गया। 32 या 40 या 22 या 50 असहाब इसी वक़्त शहीद हो गए।(मुलाहेज़ा हो तफ़सील के लिये बहत्तर सितारें मोअल्लेफ़ा हक़ीर)

जंगे मग़लूबा के बाद हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) अपने बहादुरों को ले कर जिनकी कुल तादाद 32 थी मैदान में निकल आए और इस बे जिगरी से लड़े कि लश्करे मुख़ालिफ़ के छक्के छूट गए। जिस तरफ़ हमला करते थे सफ़ें साफ़ हो जाती थीं और हमले में बेशुमार दुश्मन मौत के घाट उतार दिए। इन भूखे प्यासे बहादुर शेरों ने लश्कर में ऐसी हल चल मचा दी , जिस से अफ़सरान तक के हाथ पांव फुला दिए। बिल आखि़र लश्करे कूफ़ा के कमानीर उरवा बिन क़ैस ने उमर इब्ने साद को कहला भेजा कि जल्द लश्कर और ख़ुसूसन तीर अन्दाज़ भेजो क्यों कि इन थोड़े से अलवी बहादुरों ने हमारी दुरगत बना दी है।(तारीख़े कामिल जिल्द 4 पृष्ठ 35 तबरी जिल्द 6 पृष्ठ 250 बेहारूल अनवार जिल्द 6 पृष्ठ 299 ) उमर इब्ने साद ने फ़ौरन 500 कमानदारों को हसीन इब्ने नमीर के हमराह उरवा बिन क़ैस की कुमक में भेज दिया। इन रूबाहों ने पहुँचते ही तीर बारानी शुरू कर दी और इसका नतीजा यह हुआ कि इमाम हुसैन (अ.स.) के कई बहादुर काम आ गए और तक़रीबन कुल के कुल प्यादा हो गए। इसी दौरान उमर इब्ने साद ने आवाज़ दी कि आग लगाओ हम ख़ेमों को जलाऐंगें। यह देख कर इमाम हुसैन (अ.स.) ने शिम्र को पुकारा कि यह क्या बेहयाई की जा रही है। इतने में शबश इब्ने अरबी आ गया और उसने हरकते नाशाइस्ता से बाज़ रखा।(बेहारूल अनवार जिल्द 10 पृष्ठ 299 )

मुवर्रिख़ इब्ने असीर और अल्लामा मजलिसी लिखते हैं कि दौराने जंग में नमाज़े ज़ौहर का वक़्त आ गया तो अबू सुमामा समदी या सैदावी ने खि़दमते इमाम हुसैन (अ.स.) में अर्ज़ कि मौला अगरचे हम दुश्मनों में घिरे हुए हैं लेकिन दिल यही चाहता है कि नमाज़े ज़ोहर अदा कर ली जाए। इमाम (अ.स.) ने अबू समामा को दुआ दी और नमाज़ का तहय्या फ़रमाया। तीर चूंकि मुसलसल आ रहे थे इस लिये ज़ुहैर इब्ने क़ैन और साद इब्ने अब्दुल्लाह इमाम हुसैन (अ.स.) के सामने खड़े हो कर तीरों को सीनों पर लेने लगे। यहां तक कि इमाम हुसैन (अ.स.) ने नमाज़ तमाम फ़रमा ली। मुवर्रेख़ीन लिखते हैं कि तलवारों और नेज़ों के ज़ख़्म के अलावा 13 तीर सईद के सीने में पेवस्त हो गए। नमाज़ तमाम हुई और जनाबे सईद भी दुनियां से रूख़सत हो गए।(तारीख़े कामिल बेहारूल अनवार जिल्द 10 पृष्ठ 299 ) जंगे मग़लूबा के बाद जो 32 असहाब बचे उनमें से बाज़ के मुख़्तसर हालात दर्ज ज़ैल किये जाते हैं।

हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) के मशहूर असहाब और उनकी शहादत

हबीब इब्ने मज़ाहिर

जनाबे हबीब इब्ने मज़ाहिर इब्ने रेयाब इब्ने अश्तर जनजवान इब्ने फ़क़अस इब्ने तरीफ़ इब्ने उमर बिन क़ैस हरस इब्ने साअलबा , इब्ने दवान , इब्ने असद अबू क़ासिम असदी के बेटे इमाम हुसैन (अ.स.) के बचपने के दोस्त थे। उन्हें रिसालत माब (स अ व व ) के सहाबी होने का भी शरफ़ हासिल था। यह असहाबे अमीरल मोमेनीन (अ.स.) में भी थे और हर जंग में शरीक रहे। उन्होंने कूफ़े में हज़रत मुस्लिम इब्ने अक़ील का पूरा पूरा साथ दिया और यह शहादत के बाद करबला को पा पियादा रवाना हो कर इमाम हुसैन (अ.स.) की खि़दमत में पहुँचे थे। करबला पहुँच कर उन्होंने पूरी कोशिश की बनी असद से कुछ मद्द ले आयें लेकिन उमरे साद के लशकर ने रास्ते में मज़ाहेमत की। शबे आशूर एक शब की मोहलत के लिये जब हज़रत अब्बास (अ.स.) गए तो हबीब भी साथ थे। नमाज़े ज़ोहर आशूरा के मौक़े पर हसीन इब्ने नमीर की बद कलामी का जवाब हबीब ही ने दिया था और उसके कहने पर ‘‘ हुसैन की नमाज़ कु़बूल न होगी ’’ हबीब ने बढ़ कर घोड़े के मुंह पर तलवार लगाई थी फिर मैदान में मुसलसल लोगों से लड़ते और उन्हें क़त्ल करते रहे यहां तक कि बदील इब्ने हरीम अक़फ़ाई ने आप पर तलवार लगाई और बनी तमीम के एक शख़्स ने नैज़ा मारा और हसीन बिन नमीर ने सर काट लिया। हबीब की शहादत के बाद इमाम हुसैन (अ.स.) ने इन्तेहाई दर्द अंगेज़ लहजे में कहा , ऐ हबीब मैं तुम को और अपने असहाब को ख़ुदा से लूंगा।

ज़ुहैर इब्ने क़ैन

जनाबे ज़ुहैर क़ैन इब्ने क़ैस नमीरी बजल्ली के बेटे थे। यह क़ौम के सरदार और रईस थे। 60 हिजरी में इमाम हुसैन (अ.स.) के साथ हुए। शबे आशूर जब हज़रत अब्बास (अ.स.) एक शब की मोहलत के लिये आगे बढ़े तो आपके हमराह ज़ुहैर भी थे। इमाम हुसैन (अ.स.) की ज़िन्दगी में जब शिम्र ने ख़ेमे के पास आ कर उसे जलाना चाहा था तो जनाबे जु़हैर ही ने इस से मुक़ाबला कर के इसे इस इरादे से बाज़ रखा था और नमाज़े ज़ोहर के लिये सईद के साथ ज़ुहैर ने भी इमाम हुसैन (अ.स.) की हिफ़ाज़त के लिये सीना तान दिया था। आपने मैदान में ज़बरदस्त जंग की बिल आखि़र कसीर इब्ने अब्दुल्ला शुएबी और महाजिर इब्ने औस तमीमी ने आप को शहीद कर दिया। शहादत के बाद इमाम हुसैन (अ.स.) लाश पर तशरीफ़ लाए और कहा ज़ुहैर ख़ुदा तुम पर रहमत नाज़िल करे और तुम्हारे क़ातिलों पर जो बन्दरों और रीछों की तरह मसख़ हो गए हैं लानत करे।

नाफ़े इब्ने हिलाल

जनाबे नाफ़े , हिलाल इब्ने नाफ़े इब्ने जमल इब्ने साद अशीरा इब्ने मद हज जमली के बेटे थे। आप शरीफ़ुन नफ़्स सरदारे का़ैम , बहादुर और क़ारीए क़ुरआन रावी उल हदीस थे। आप हर जंग में अमीरल मोमेनीन (अ.स.) के साथ रहे। करबला में जब हज़रत अब्बास (अ.स.) पानी की जद्दो जेहद के लिये नहरे फ़ुरात पर तशरीफ़ ले गये थे तो नाफ़े इब्ने हिलाल आपके साथ थे। मैदाने में कारज़ार करबला में नाफ़े इब्ने हिलाल ने 12 दुश्मनों को ज़हर से बुझे हुए तीर से क़त्ल किया फिर जब तीर ख़त्म हो गए तो तलवार से लड़ने लगे। बिल आखि़र तीर बारानी की गई और आपके दोनों बाज़ू टूट गए और आप गिरफ़्तार हो कर इब्ने साद के सामने लाए गए। फिर शिम्र के हाथों क़त्ल कर दिये गए।

मुस्लिम इब्ने औसजा

जनाबे मुस्लिम , औसजा इब्ने साद इब्ने सआलबा इब्ने दोदान इब्ने असद इब्ने हज़ीमा अबू हजल असदीसादी के बेटे थे। यह शरीफ़ तरीन मर्दुम , आबिदो ज़ाहिद और सहाबी ए रसूल थे। अकसर इस्लामी जंगों में शरीक रहे। कूफ़े में मुस्लिम बिन अक़ील की पूरी ताक़त से मद्द की आपके हमराह मदहज चार क़बीले तमीम व हमदान व कुन्दा व रबीआ थे। जनाबे हानी व मुस्लिम की शहादत के बाद अपने बाल बच्चों समेत करबला आ पहुँचे और इमाम हुसैन (अ.स.) के क़दमों में शरफ़े शहादत से सरफ़राज़ हुऐ मुवर्रेख़ीन का बयान है कि मुस्लिम इब्ने औसजा नेहायत दिलेरी के साथ जंग फ़रमा रहे थे कि मुस्लिम इब्ने अब्दुल्ला ज़ेआनी तऊन और अब्दुल्ला इब्ने ख़स्तकारह ने मिल कर आपको शहीद कर दिया।

आबिस शाकरी

जनाबे आबिस , अबू शबीब बिन शाकरी इब्ने रबीह बिन मालिक इब्ने साब इब्ने माविया बिन कसीर बिन मालिक इब्ने चश्म इब्ने हम्दानी के बेटे थे। आप निहायत बहादुर , रईस , आबिद शब ज़िन्दह दार और अमीरल मोमेनीन (अ.स.) के मुख़लिस तरीन मानने वाले थे। आपके क़बीला ए बनू शाकिर पर अमीरल मोमेनीन (अ.स.) को बड़ा एतमाद था। इसी वजह से जंगे सिफ़्फ़ीन मे फ़रमाया था कि अगर क़बीला ए बनी शाकिर के एक हज़ार अफ़राद मौजूद हों तो दुनियां में इस्लाम के सिवा कोई मज़हब बाक़ी न रहे। आबिस ने कूफ़े में जनाबे मुस्लिम का पूरा साथ दिया और जब जनाबे मुस्लिम कूफ़ा पहुँचे तो आपने सब से पहले ताअउन का यक़ीन दिलाया था। आप कूफ़े से जनाबे मुस्लिम का ख़त ले कर मक्का गए थे और वहीं से इमाम हुसैन (अ.स.) के साथ हो गए और यौमे आशूरा शहीद हो गए। आप मैदान में आए और मुबारज़ तलबी की मगर किसी मे दम न था कि आबिस से लड़ता बिल आखि़र इन पर इजतेमाई तौर पर पथराव किया फिर बेशुमार अफ़राद ने मिल कर उन्हें शहीद कर के सर काट लिया।

बुरैर हमादानी

जनाबे बुरैर इब्ने ख़ज़ीर हम्दानी मशरक़ी , बनू मशरिक़ के क़बीला ए हम्दान के एक मोअम्मर ताबेई थे। यह निहायत बहादुर आबिद और ज़ाहिद और बेमिस्ल क़ारीए क़ुरआन थे। इनका शुमार कूफ़े के शोरफ़ा में था। इन्होंने कूफ़े से मक्के जा कर इमाम हुसैन (अ.स.) की हमराही इख़्तेयार की थी और ता हयात साथ रहे। शबे आशूर पानी लाने में इन्होंने अज़ीम जद्दो जेहद की थी। मैदाने जंग में आपका मुक़ाबला यज़ीद इब्ने माक़ल से हुआ , आप ने उसे क़त्ल कर दिया। फिर रज़ी इब्ने मनक़ज़ अब्दी सामने आया। आपने ज़मीन पर दे मारा। इब्ने में क़ाअब इब्ने जाबिर अज़दी ने आपकी पुश्त में नेजा़ मारा और आपने उस रज़ी की नाक दांत से काट ली। जिसके सीने पर सवार थे। क़आब का नेज़ा बुरैर की पुश्त में रह गया और उसने तलवार से बुरैर को शहीद कर दिया।

इमाम हुसैन (अ.स.) के आइज़्ज़ा व अक़रेबा और औलाद की शहादत

असहाबे बावफ़ा और अन्साराने बासफ़ा की शहादत के बाद आपके आइज़्ज़ा व अक़रोबा यके बाद दीगरे मैदाने कारज़ार में आ कर शहीद हो गए। मेरे नज़दीक बनी हाशिम में सब से पहले जिसने शरफ़े शहादत हासिल किया वह अब्दुल्लाह इब्ने मुस्लिम इब्ने अक़ील थे।। आप हज़रत अली (अ.स.) की बेटी रूक़य्या बिन्ते सहबा बिन्ते उबाद बिन्ते रबिया बिन यहिया बिन अब्द बिन अल क़मा सअलबिया के फ़रज़न्द थे। आप मैदान में तशरीफ़ लाए और ऐसा शेराना हमला किया कि रूबाहों की हिम्मतें पस्त हो गईं। आपने तीन हमले फ़रमाऐ और 90 दुश्मनों को फ़िन्नार किया। दौराने जंग में उमर बिन सबीह सैदावी ने आपकी पेशानी पर तीर मारा। आपने फ़ितरत के तक़ाज़े पर तीर पहुँचने से पहले अपना हाथ पेशानी पर रख लिया और हाथ पेशानी से इस तरह पेवस्त हो गया कि फिर जुदा न हुआ। फिर उसने दूसरा तीर मारा जो साहब ज़ादे के दिल पर लगा और आप ज़मीन पर तशरीफ़ लाए।(नूरूल ऐन तरजुमा अबसारूल हुसैन पृष्ठ 76 ) आपको ख़ाको खूं में ग़लता देख कर आपके भाई मोहम्मद बिन मुस्लिम आगे बढ़े और उन्होंने भी ज़बरदस्त जंग की। बिल आखि़र अबू जरहम अज़वी और लक़ीत और इब्ने अयास जहमी ने आपको शहीद कर दिया।(बेहारूल अनवार जिल्द 10 पृष्ठ 302 ) इनके बाद जाफ़र बिन अक़ील इब्ने अबी तालिब मैदान में तशरीफ़ ले गए। आपने 15 ज़बरदस्त दुश्मनों को फ़ना के घाट उतारा। आखि़र में बशर बिन खोत ने आपको शहीद कर दिया।(कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 82 ) इनके बाद जनाबे अब्दुर रहमान इब्ने अक़ील मैदान में तशरीफ़ लाए। आपने ज़बरदस्त जंग की और आपको दुश्मनों ने घेर लिया आखि़र कार उस्मान बिन ख़ालिद मलऊन की ज़र्बे शदीद से राहीए जन्नत हुए। इनके बाद अब्दुल्लाह अकबर बिन अक़ील मैदान में आए और ज़बरदस्त क़ेताल के बाद उस्मान बिन ख़ालिद के हाथों शहीद हुए। अबू मख़नफ़ के कहने के मुताबिक़ अब्दुल्लाह अकबर के बाद मूसा बिन अक़ील ने मैदान लिया और 70 आदमियों को क़त्ल कर के शहीद हुए। इनके बाद औन बिन अक़ील और जाफ़र बिन मोहम्मद बिन अक़ील और अहमद बिन मोहम्मद बिन अक़ील यके बाद दीगरे मैदान में तशरीफ़ लाए और कार हाए नुमाया कर के दर्जाए शहादत हासिल किया। इनके बाद औन बिन अब्दुल्लाह बिन जाफ़र मैदान में आए और 30 सवार 8 पियादों को क़त्ल करने के बाद अब्दुल्लाह इब्ने बत के हाथों शहीद हुए। आपके बाद जनाबे हसन मुसन्ना मैदान में तशरीफ़ लाए। आपने ज़बर दस्त जंग की और इस दर्जा ज़ख़्मी हो गए कि जां बर होने का कोई इम्कान न था। बिल आखि़र मक़तूलैन में डाल दिए गए। नतीजे पर उनका एक रिश्ते का मामू असमा बिन ख़रजा मकीनी बिन अबी हसान उन्हें उठा ले गए। इनके बाद जनाबे क़ासिम इब्ने हसन (अ.स.) मैदान में तशरीफ़ लाए। अगरचे आपकी उम्र अभी नाबालगी़ की हद से मुताजाविज़ न हुई थी लेकिन आपने ऐसी जंग की कि दुश्मनों की हिम्मते पस्त हो गईं। आपके मुक़ाबले में अरज़क़ शामी आया। आपने उसे पछाड़ दिया। इसके बाद चारों तरफ़ से हमले शुरू हो गए। आपने 70 दुश्मनों को क़त्ल किया आखि़र कार अमर बिन माद बिन उरवा बिन नफ़ील आज़दी की तेग़ से शहीद हुए। मुवर्रेख़ीन का बयान है कि आपका जिस्मे मुबारक ज़िन्दगी ही मे पामाले सुमे अस्पाँ हो गया था। उनके बाद अब्दुल्लाह इब्ने हसन (अ.स.) मैदान में आए और ज़बरदस्त जंग की , आपने 14 दुश्मानों को तहे तेग़ किया। आपको हानी इब्ने शीस ख़ज़रमी ने शहीद किया। उनके बाद अबू बक्र इब्ने हसन मैदान में आए आपना मैमना और मैसरे को तबाह कर दिया। आप 80 दुश्मानों को क़त्ल कर के शहीद हो गए। आपको बक़ौल अल्लामा समावी अब्दुल्ला इब्ने अक़बा ग़नवी ने शहीद किया है उनके बाद अहमद बिन हसन मैदान में आए। अगरचे आपकी उम्र 18 साल से कम थी लेकिन आपने यादगार जंग की और 60 सवारों को क़त्ल कर के दर्जा ए शहादत हासिल किया। उनके बाद अब्दुल्लाह असग़र मैदान में आए। आप हज़रत अली (अ.स.) के बेटे थे आपकी वालेदा लैला बिन्ते मसूद तमीमी थीं। आपने ज़बर दस्त जंग की और दर्जा ए शहादत हासिल किया। आप 21 दुश्मनों को क़त्ल कर के ब दस्ते अब्दुल्ला बिन उक़बा ग़नवी शहीद हुए।

बाज़ अक़वाल के बिना पर उनके बाद उमर बिन अली (अ.स.) मैदान में आए और शहीद हुए। तबरी का बयान है यह करबला में शहीद नहीं हुए। अकसर मुवर्रेख़ीन का कहना है कि अब्दुल्लाह असग़र के बाद अब्दुल्लाह बिन अली (अ.स.) असग़र मैदान में तशरीफ़ लाए। यह हज़रत अब्बास (अ.स.) के हक़ीक़ी भाई थे। उनकी उमर बवक़्ते शहादत 35 साल की थी। आपको हानी इब्ने सबीत खि़र्जरमी ने शहीद किया। उनके बाद हज़रत अब्बास (अ.स.) के दूसरे भाई उस्मान बिन अली (अ.स.) मैदान में आए। आपने रजज़ पढ़ा और ज़बरदस्त जंग की। दौराने क़ताल में ख़ूली इब्ने यज़ीद असबही ने पेशानी पर एक तीर मारा जिसकी वजह से आप ज़मीन पर आ गए। फिर एक शख़्स जो क़बीला ए अबानबिन दारिम का था ने आपका सर काट लिया। शहादत के वक़्त आपकी उम्र 23 साल थी। इनके बाद हज़रत अब्बास (अ.स.) के तीसरे हक़ीक़ी भाई मैदान में तशरीफ़ लाए और बक़ौले अबुल फर्ज बदस्ते ख़ूली इब्ने यज़ीद और बरवाएते अबू मख़न्नफ़ बा ज़रबे हानी इब्ने सबीत अल ख़ज़रमी शहीद हुए। शहादत के वक़्त आपकी उम्र 21 साल थी। इनके बाद फ़ज़ल बिन अब्बास बिन अली (अ.स.) मैदान में तशरीफ़ लाए और मशग़ूले कारज़ार हो गए। आपने 250 दुश्मानों को क़त्ल किया और बिल आखि़र चारों तरफ़ से हमला कर के आपको शहीद कर दिया गया। इनके बाद हज़रत अब्बास (अ.स.) के दूसरे बेटे क़ासिम इब्ने अब्बास (अ.स.) मैदान में तशरीफ़ लाए। आपकी उम्र बक़ौले इमाम असफ़रानी 19 साल की थी। आपने 800 दुश्मानों को फ़ना के घाट उतार दिया। इसके बाद इमाम हुसैन (अ.स.) की खि़दमत में हाज़िर हो कर पानी मांगा। पानी न मिलने पर आप फिर वापस गए और 20 सवारों को क़त्ल कर के शहीद हो गए।

अलमदारे करबला हज़रते अब्बास (अ.स.) की शहादत

इन बनी हाशिम के बहादुर नौ निहालो की शहादत के बाद हज़रते अब्बास (अ.स.) अलमदार मैदान में हुसूले आब के लिये तशरीफ़ लाए और कारे नुमायां कर के शहीद हो गए। आपके तफ़सीली हालात के लिये मुलाहेज़ा हो किताबे ज़िकरूल अब्बास 1 मोवल्लेफ़ा नजमुल हसन करारवी , मतबुआ लाहौर।

आपके मुख़्तसर हालात

यह हैं कि आप 4 शाबान 26 हिजरी मुताबिक़ 18 मई 647 ई 0 यौमे सह शम्बा को मदीना ए मुनव्वरा में पैदा हुए। आप इमाम हुसैन (अ.स.) के मुस्तक़िल अलमबरदार थे। आपको करबला में जंग करने की इजाज़त नहीं दी गई सिर्फ़ पानी लाने का हुक्म दिया गया था। आप कमाले वफ़ादारी की वजह से नहरे फ़ुरात में दाखि़ल हो कर प्यासे बरामद गए थे। आपका दाहिना हाथ ख़ेमे में पानी पहुँचाने की सई में जै़द इब्ने वरक़ा की तलवार से कट गया था , और बायां हाथ हकीम इब्ने तुफ़ैल की तलवार से कटा , फिर एक तीर मशकीज़े पर लगा और सारी पानी बह गया। फिर एक तीर आपके सीने में लगा। इसके बाद लौहे का गुर्ज़ सर पर पड़ा और आप ज़मीन पर आ गए। आपने इमामा हुसैन (अ.स.) को आवाज़ दी , इमाम हुसैन (अ.स.) ने कमर थाम कर आवाज़ दी ‘‘ अलाअन अन कसरा ज़हरी ’’ हाय मेरी कमर टूट गई। आपका लक़ब सक़्क़ा और कुन्नियत अबू फ़ज़ल थी। आप भी यौमे आशूरा शहीद हो गए। आपकी तारीख़े शहादत मौलाना रोम ने मिसरा ‘‘ सर दीं रा बुरीद बे दीने ’’ से निकाली है। शहादत के वक़्त आपकी उम्र 34 साल चन्द माह थी।

1. कराची के एक मौलवी साहब ने अपने एक रिसाले में जो हज़रत अब्बास (अ.स.) के हालात पर मुश्तमिल है ज़िकरूल अब्बास पर बे सरो पा एतराज़ात किए हैं हम उनके साठ साल से उपर हो जाने की वजह से उनके एतराज़ात का जवाब देना पसन्द नहीं करते।

हज़रत अली अकबर (अ.स.) की शहादत

हज़रत अब्बास (अ.स.) की शहादत के बाद हज़रत अली अकबर (अ.स.) ने इज़्ने जिहाद की सई बलीग़ की। बिल आखि़र आप कामयाब हो कर मैदाने करबला में तशरीफ़ लाए। आपको इमाम हुसैन (अ.स.) ने अपने हाथों से आरास्ता किया , हज़रत अली (अ.स.) की तलवार हिमाएल की ज़िरह पहनाई और पैग़म्बरे इस्लाम की सवारी के घोड़े पर सवार फ़रमाया जिसका नाम उक़ाब या मुरतजिज़ था। आपकी रवानगी के वक़्त इमाम हुसैन (अ.स.) ने बारगाहे अहदियत में हाथों को बुलन्द कर के कहा ‘‘ मेरे पालने वाले अब तेरी राह में मेरा वह फ़रज़न्द क़ुरबान होने जा रहा है जो सूरत और सीरत में तेरे रसूल (स अ व व ) से बहुत मुशाबेह है। मेरे मौला जब मैं नाना की ज़ियारत का मुश्ताक़ होता था तो इसकी सूरत देख लिया करता था , मालिक इसकी तू ही मदद फ़रमाना ’’ उलमा ने लिखा है कि मैदान में पहुँचने के बाद हज़रत अली अकबर ने रजज़ पढ़ी और मुक़ाबला शुरू हो गया और ऐसी ज़बरदस्त जंग हुई कि दुश्मनों के दांतों पसीने आ गए। सफ़ें की सफ़ें उलट गईं। एक सौ बीस दुश्मन फ़िन्नार वस सक़र हो गए। हज़रत अली अकबर (अ.स.) जो तीन दिन के भूखे और प्यासे थे बाप की खि़दमत में हाज़िर हुए और अर्ज़ की बाबा जान , प्यास मारे डालती है , पानी की कोई सबील कर दीजिए। इमाम हुसैन (अ.स.) के पास पानी कहां था जो ज़ख़्मों से चूर अली अकबर जैसे बेटे की आख़री ख़्वाहिश पूरी फ़रमाते। आपने कहा बेटा पानी तो थोड़ी ही देर में नाना जान पिलायेंगे अलबत्ता अपनी ज़बान मेरे मुंह में दे दो। अली अकबर ने बेचैनी में अपनी ज़बान तो मुंह में दे दी लेकिन फ़ौरन ही खेंच ली और कहा बाबा जान ‘‘ लिसानाका ऐबस मन लस्सानी ’’ आपकी ज़बान तो मेरी ज़बान से भी ज़्यादा ख़ुश्क़ है फिर इमाम हुसैन (अ.स.) ने रसूले करीम (स अ व व ) की एक अंगूठी अली अकबर (अ.स.) के मुंह मे दी और फ़रमाया बेटा जाओ ख़ुदा हाफ़िज़।

हज़रत अली अकबर (अ.स.) दोबारा मैदान में पहुँचे तारिक़ इब्ने शीस जिससे उमरे साद ने हुकूमते ‘‘ रै ’’ और ‘‘ मूसल ’’ का वायदा किया था अली अकबर (अ.स.) के मुक़ाबले में आ गया। आपने कमाले जवां मरदी से इस पर नैज़े का वार किया नैज़ा उसके सीने पर लग कर पुश्त में से दो बालिश्त बाहर निकल गया।। इसके मरते ही उसका बेटा उमर तारिक़ मैदान में आ गया। आपने उसे भी क़त्ल कर दिया। फिर तल्हा इब्ने तारिक़ सामने आया आपने इसका गरेबान पकड़ कर उसे पछाड़ दिया। यह देख कर उमरे साद ने मिसला इब्ने ग़ालिब को मुक़ाबले का हुक्म दिया वह अली अकबर (अ.स.) के सामने आ कर दो टुकड़े हो गया। उसके क़त्ल होने से हल चल मच गई। उमरे साद ने मोहकम इब्ने तुफ़ैल... और इब्ने नौफ़िल को दो हज़ार सवारों के साथ अली अकबर (अ.स.) पर हमला करने का हुक्म दिया। अली अकबर (अ.स.) ने निहायत दिलेरी से हमले का जवाब दिया और प्यास से बेचैन हो कर इमाम हुसैन (अ.स.) की खि़दमत में फिर हाज़िर हुए और पानी का सवाल किया , आपने फ़रमाया बेटा अब तुम्हें साक़ीए कौसर ही सेराब करेंगे। नूरे नज़र जाने पदर जल्द जाओ , रसूले करीम (स अ व व ) इन्तेज़ार फ़रमा रहे हैं। हज़रत अली अकबर (अ.स.) मैदान में वापस आए। दुश्मनों ने यूरिश कर दी , आपने शेरे गुरिसना की तरह हमले किये और थोड़ी ही देर में अस्सी दुश्मनों को क़त्ल कर डाला।

बिल आखि़र मुनकज़ बिन मुर्रा अब्दी और इब्ने नमीर ने सीने मे नैज़ा मारा। आपके हाथ से ऐनाने सिपर छूट गई और आप घोड़े की गिरदन से लिपट गए। घोड़ा जिस तरफ़ से गुज़रता था आपके जिस्म पर तलवारें लगती थीं। यहां तक कि आपका जिस्म पारा पारा हो गया। आपने आवाज़ दी ‘‘ या अबाताहो अदरिकनी ’’ बाबा जान ख़बर लिजिए। इमाम हुसैन (अ.स.) दौड़ कर पहुँचे लेकिन आप से पहले हज़रत ज़ैनब पहुँच गईं। उलेमा ने लिखा है कि ज़ैनब ने वहां पहुँच कर अपने को अली अकबर पर गिरा दिया था। इमाम हुसैन (अ.स.) ने उन्हें ख़ेमे में पहुँचाया और अली अकबर के चेहरे से ख़ून साफ़ किया और कहा कि ऐ बेटे तेरे बाद इस ज़िन्दगानीए दुनिया पर ख़ाक है फिर आपने अली अकबर को ख़ेमे में ले जाने की कोशिश की लेकिन हर क़िस्म के ज़ौफ़ ने कामयाब न होने दिया , बिल आखि़र बच्चों को आवाज़ दी , बच्चों आओ मेरी मद्द करो। चुनान्चे बच्चों की इमदाद से अली अकबर का लाशा ख़ेमे के क़रीब लाया गया और मुख़द्देराते असमत मे कोहरामे अज़ीम बरपा हो गया। रौज़तुल शोहदा पृष्ठ 368, कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 75 अबसारूल ऐन पृष्ठ 34, अल्लामा समावी लिखते हैं कि हज़रत अली अकबर का असली नाम अली लक़ब अकबर और कुन्नियत अबुल हसन थी। आपकी उम्र शहादत के वक़्त 18 साल थी।(नूरूल ऐन तरजुमा अबसारूल ऐन पृष्ठ 34 )

हज़रत अली असग़र (अ.स.) की शहादत

अल्लामा अरबली लिखते हैं कि जब इमाम हुसैन (अ.स.) बे यारो मद्दगार हो गए तो आप ख़ुद बा क़स्दे शहादत मैदान के लिये चले और वहां पहुँच कर आपने ‘‘ हल मिन नासेरिन यनसेरना ’’ की आवाज़ बलन्द की। जिनों के एक गिरोहे अज़ीम ने सआदते नुसरत हासिल करने की ख़्वाहिश की आपने उन्हें दुआ ए ख़ैर से याद फ़रमाया और नुसरत क़ुबूल करने से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि मुझे शरफ़े शहादत हासिल करना है और मैंने आवाज़े इस्तेग़ासा इतमामे हुज्जत के लिये बुलन्द किया है। मेरा मक़सद यह है कि दुश्मनाने ख़ुदा व रसूल (स अ व व ) के लिये मेरी मद्द न करने का कोई बहाना बाक़ी न रहे। अभी आप जिनों से बाते कर रहे थे कि नागाह हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) अपनी कमाले अलालत के बा वजूद एक असा लिये हुए ख़ेमे से बाहर निकल आए। इमाम हुसैन (अ.स.) ने जनाबे उम्मे कुलसूम को आवाज़ दी , बहन फ़ौरन आबिदे बिमार को रोको , कहीं ऐसा न हो कि सादात का सिलसिला ए नसल व नस्ब ही ख़त्म हो जाए। सय्यदुश शोहदा ने आवाज़े इस्तेग़ासा का असर जब अपने ख़ेमों के बाशिन्दों पर देखा तो फ़ौरन वापस तशरीफ़ ला कर सबको समझाया और अपनी मौत का हवाला दे कर इसरारे इमामत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) के सिपुर्द फ़रमाया। आप रवाना होना ही चाहते थे कि बा रवायत जनाबे सकीना घोड़े के सुम से लिपट गईं। इमाम हुसैन (अ.स.) ने सीने से लगाया , रूख़सार का बोसा दिया , सब्र की तलक़ीन की और जनाबे ज़ैनब को सकीना की निगाह दाश्त की हिदायत फ़रमाई। उसके बाद हज़रत अली असग़र को जिन्होंने अपने को झूले से गिरा दिया था इमाम हुसैन (अ.स.) ने बढ़ कर अपनी आग़ोश में लिया और मक़तल की तरफ़ रवाना हो गये।

मैदान मे पहुँच कर आप एक टीले पर बुलन्द हुए और आपने क़ौमे अशक़िया को मुख़ातिब कर के कहा कि देखो मैं अपने छ महीने के बच्चे को पानी पिलाने लाया हूँ। इसकी माँ का दूध ख़ुश्क हो गया और इसकी ज़बान सूख गई है , ख़ुदारा इसे पानी पिला कर इसकी जान बचा लो , और सुनो अगर मैं तुम्हारें ज़ौमे नाक़िस में गुनाहगार हो सकता हूँ तो मेरे इस मासूम बच्चे में गुनाह की सलाहियत नहीं हैं। यह तो बे ख़ता है इस सदाए पुर तासीर का असर यह हुआ कि लशकर का मिजाज़ बिगड़ने लगा , शक़ीउल क़ल्ब लशकरी रो पड़े। उमरे साद ने जब यह देखा तो फ़ौरन हुरमुला इब्ने काहिल अज़दी को हुक्म दिया , ‘‘ अक़ता कलामुल हुसैन ’’ हुसैन के कलाम को नोके तीर से क़ता कर दे। हुरमुला ने तीरे सेह शोबा चिल्ला ए कमान में जोड़ा और अली असग़र के गले की तरफ़ फेंका। तीर जो ज़हर से बुझा हुआ था अली असग़र के गले पर लगा और उसने अली असग़र के गले के साथ साथ इमाम हुसैन (अ.स.) का बाज़ू भी छेद दिया। इमाम हुसैन (अ.स.) ने बच्चे को सीने से लगा कर उसके ख़ून से चुल्लू भर लिया और चाहा कि आसमान की तरफ़ फेंकें , आसमान से जवाब आया , यह ख़ूने ना हक़ है इसे इस तरफ़ न फेकिये वरना क़यामत तक के लिये बारिश का सिलसिला बन्द हो जायेगा। आपने चाहा कि उसे ज़मीन की तरफ़ ही फेंक दें , उधर से भी जवाब मिल गया। तो आपने उसे अपने चेहरा ए मुबारक पर मल लिया और फ़रमाया , ‘‘ हकज़ा लाती जद्दी रसूल अल्लाह ’’ मैं इसी तरह अपने जद्दे नामदार हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) की खि़दमत में पहुँचूगा।(अबसारूल ऐन व अनवारूल शहादत) इसके बाद आपने एक नन्हीं सी क़ब्र खोदी और उसमें हज़रत अली असग़र को दफ़्न फ़रमा दिया।

नन्हीं सी क़ब्र खोद के असग़र को गाड़ के

शब्बीर , उठ खड़े हुए , दामन को झाड़ के

इमाम हुसैन (अ.स.) की रूख़सती

हज़रत अली असग़र की शहादत के बाद न सरकार है न दरबार न लशकर है न अलमदार , अली असग़र को नन्हीं सी क़ब्र खोद कर दफ़्न फ़रमाते हैं और अकेले हरम के ख़ेमों की तरफ़ आते हैं और अहले बैत से रूख़सत होते हैं और फ़रमाते हैं ऐ ज़ैनब , ऐ उम्मे कुलसूम , ऐ रूक़य्या , ऐ रबाब , ऐ सकीना अलैकुम मिन्नी अस्सलाम , सलामे अलविदा यह मेरी आख़री रूख़सती है। ऐ बहनों , ऐ बीबियों , ऐ बेटियों बस ख़ुदा हाफ़िज़ो नासिर है और वही हामियों मद्दगार है।

बहन ज़ैनब देखो , हर मुसीबत में हर बला में ख़ुदा को याद रखना , अपने रहीमो करीम ख़ालीक़ को न भूलना। एनाने सब्र को हाथ से न छोड़ना। राहे इलाही में हर एक रंज व मुसिबत को राहत समझना। रस्सी से हाथ बंधे तो उफ़ न करना , चादर छिने तो ग़म न खाना। अम्मा के सब्र और बाबा के हिल्म के जौहर दिखलाना। नाना रसूल (स अ व व ) तुम्हारे मद्दगार और ख़ुदा तुम्हारा हामी है। हां लुटने के लिये तय्यार हो जाओ। क़ैद होने के लिये कमरों को कस लो। चादरों को अच्छी तरह से ओढ़ लो। मक़नों को मज़मूती से बांध लो। ऐ बहन ज़ैनब यह यतीम बच्चे , यह असीराने अहलेबैत (अ.स.) का काफ़ला बस तुम्हारे साथ है। बीमारे करबला सय्यदे सज्जाद ज़ैनुल आबेदीन को ग़श से जगा दो , होशियार कर दो। अब तौक़ो ज़जीर पहन्ने और असीर होने का वक़्त आ गया है। बेड़ियां पहन्ने और कांटों पर पैदल चलने का ज़माना क़रीब है। अब जंगल के कांटों भरे रास्ते हैं और सहरा नवरदी है। कभी कूफ़ा व शाम के बाज़ार हैं और लोगों का हुजूम है , तमाशईयों का मजमा है , मां बहनों के नंगे सर हैं और ज़ैनुल आबदीन हैं। यज़ीद और इब्ने ज़ियाद के दरबार में शिम्र के ताज़याने हैं और हमारा लाडला बीमार है। ऐ ज़ैनुल आबेदीन !

प्यासा गला कटाया यह ओहदा है बाप का

पहनो गले में तौक़ यह हिस्सा है आप का

बस हमारे बाद दुनियां के इमाम तुम हो। ऐ जाने पदर इस कश्ती की मल्लाही अब तेरी ज़ात पर है। देखना आपकी मेहनत राएगां ना जाने पाऐ , अन्नाने सब्र व तहम्मुल हाथ से न छूटे। करबला से कूफ़ा और कूफ़े से शाम तक माँ बहनों के साथ , बेड़ियां पहने , तौक़ डाले , नंगे पांव जाओ , सब्रो रज़ा ए इलाही के जौहर दिखलाओ। तौहीद के ख़ुत्बे पढ़ो , हिदायत के रास्ते बताओ। हां हां बेटा देखना बेड़ी पहन कर सिलसिला ए सब्र छूट न जाए। बस हम राहे रज़ा सर से क़ता करने को तैय्यार हैं और तुम अपने पैरों से तय करना। राहे इलाही में ख़ार दार तौक़ को फूलों को हार समझना और इश्क़े इलाही में लौहे की तप्ती बेड़ियों को मोहब्बते ख़ुदा की जंजीरे जनाना। यह फ़रमाने के बाद इमाम हुसैन (अ.स.) फटे पुराने कपड़े मांगते हैं , पोशाक के नीचे पहनते हैं , उन्हें भी जगह जगह से चाक फ़रमा देते हैं। सबब पूछा जाता है तो फ़रमाते हैं कि मेरे शहीद हो जाने के बाद यह ज़ालिम शक़ी मेरा लिबास भी लूटेंगें और कपड़े भी उतारेंगे। शायद यह फटे पुराने कपड़े नीचे देख कर छोड़ दें और इस तरह मेरी लाश बरहनगी से बच जाए।(तारीख़े कामिल जिल्द 4 पृष्ठ 40 व तबरी पृष्ठ 34 )

बहन के रूख़सत फ़रमा कर , बीबीयों को अलविदा कह कर , माँ की कनीज़ फ़िज़्ज़ा , पालने वाली को भी सलाम कर के बाली सकीना सीने पर सोने वाली लाडली बेटी को छाती से लगा कर मुह चूमते और फ़रमाते थे , बेटी तुम को ख़ुदा के सिपुर्द किया। ख़ेमे का परदा उठा , बाहर तशरीफ़ लाए , बहन ने रक़ाब थामी , ज़ुल्जना पर सवार हुए और मैदाने कारज़ार पर रवाना हो गए।(नामूसे इस्लाम)

हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) मैदाने जंग में

जब आपके 72 असहाब व अन्सार और बनी हाशिम क़ुरबान गाहे इस्लाम पर चढ़ चुके तो आप ख़ुद अपनी क़ुरबानी पेश करने के लिये मैदाने कारज़ार में आ पहुँचे। लशकरे यज़ीद जो हज़ारों की तादाद में था , अस्हाबे बावफ़ा और बहादुराने बनी हाशिम के हाथों वासीले जहन्नम हो चुका था। इमाम हुसैन (अ.स.) जब मैदान में पहुँचे तो दुश्मनों के लशकर में से तीस हज़ार सवार व पियादे बाक़ी थे यानि सिर्फ़ एक प्यासे को तीस हज़ार दुश्मनों से लड़ना था।(कशफ़ुल ग़म्मा) मैदान पहुँचने के बाद आपने सब से पहले दुश्मनों को मुख़ातिब कर के एक ख़ुत्बा इरशाद फ़रमाया। आपने कहा , ऐ ज़ालिमों ! मेरे क़त्ल से बाज़ आओ , मेरे ख़ून से हाथ न रंगो , तुम जानते हो मैं तुम्हारे नबी का नवासा हूँ। मेरे बाबा अली (अ.स.) साबिक़े इस्लाम हैं , मेरी माँ फ़ात्मा ज़हरा (स अ व व ) तुम्हारे नबी (स अ व व ) की बेटी हैं और तुम जानते हो कि मेरे नाना रसूल अल्लाह (स अ व व ) ने मुझे और मेरे भाई हसन (अ.स.) को सरदारे जवानाने जन्नत फ़रमाया है। अफ़सोस तुम कैसी बुरी क़ौम और कैसी बुरी उम्मत हो कि न तुम को ख़ुदा का ख़ौफ़ है न रसूल (स अ व व ) से शर्म है। तुम अपने नबी की औलादों और अपने रसूल (स अ व व ) की आल का ख़ून बहाते हो और मेरे ख़ूने ना हक़ पर आमादा होते हो , हालांकि न मैंने किसी को क़त्ल किया है न किसी का माल छिना है कि जिसके बदले में तुम मुझको क़त्ल करते हो। मैं तो दुनियां से बे ताअल्लुक़ अपने नाना रसूल (स अ व व ) की क़ब्र पर मुजाविर बना बैठा था। तुम ने मुझे हिदायत के लिये बुलाया और मुझे न नाना की क़ब्र पर बैठने दिया न ख़ुदा के घर में रहने दिया। सुनो अब भी हो सकता है कि मुझे इसका मौक़ा दे दो कि मैं नाना की क़ब्र पर बैठूं या ख़ाना ए ख़ुदा में पनाह ले लूं। इसके बाद आपने इतमामे हुज्जत के लिये उमरे साद को बुलाया और उससे फ़रमाया , 1. तुम मेरे क़त्ल से बाज़ आओ। 2. मुझे पानी दे दो। 3. अगर यह मन्ज़ूर न हो तो फिर मेरे मुक़ाबले के लिये एक एक शख़्स को भेजो। उसने जवाब दिया आपकी तीसरी दरख़्वास्त मन्ज़ूर की जाती है और आपसे लड़ने के लिये एक एक शख़्स मुक़ाबले में आएगा।(रौज़तुल शोहदा)

इमाम हुसैन (अ.स.) की नबर्द आज़माई

मोहाएदे के मुताबिक़ आपसे लड़ने के लिये लश्करे शाम से एक एक शख़्स आने लगा और आप उसे फ़ना के घाट उतारने लगे। सब से पहले जो शख़्स मुक़ाबले के लिये निकला वह ख़मीम इब्ने क़हतबा था आपने इस पर बरक़ ख़ातिफ़ की तरह हमला किया और उसे तबाह व बरबाद कर डाला। यह सिलसिला ए जंग थोड़ी देर जारी रहा और मुद्दते क़लील में कुश्तों के पुश्ते लग गए और मक़तूलीन की तादाद हदे शुमार से बाहर हो गई। यह देख कर उमरे साद ने लश्कर वालों को पुकार कर कहा क्या देखते हो सब मिल कर यक बारगी हमला कर दो। यह अली का शेर है इससे इनफ़ेरादी मुक़ाबले में कामयाबी क़त्अन न मुम्किन है। उमरे साद की इस आवाज़ ने लश्कर के हौसले बुलन्द कर दिये और सब ने मिल कर यक बारगी हमले का फ़ैसला किया। आपने लश्कर के मैमना और मैसरा को तबाह कर दिया। आपके पहले हमले में एक हज़ार नौ सौ पचास दुश्मन क़त्ल हुए और मैदान ख़ाली हो गया। अभी आप सुकून न लेने पाए थे कि अठ्ठाइस हज़ार दुश्मनों ने फिर हमला कर दिया। इस तादाद मे चार हज़ार कमान दार थे। अब सूरत यह हुई कि सवार प्यादे और कमान दारों ने हम आहंग व हम हमल हो कर मुसलसल मुतावातिर हमले शुरू कर दिये। इस मौक़े पर आपने जो शुजाअत का जौहर दिखाया इसके मुताअल्लिक़ मुवर्रेख़ीन का कहना है कि सर बरसने लगे , धड़ गिरने लगे और आसमान थरथराया , ज़मीं कांपी , सफ़ें उल्टीं , परे दरहम बरहम हो गए।

अल्लाह रे हुसैन का वो आख़री जिहाद , हर वार पर अली ए वली दे रहे थे दाद

कभी मैसरा को उलटते थे कभी मैमना को तौड़ते हैं कभी क़ल्बे लश्कर में दरआते हैं कभी जिनाहे लश्कर पर हमला फ़रमाते हैं। शामी कट रहे हैं कूफ़ी गिर रहे हैं। लाशों के ढेर लग रहे हैं। हमले करते हुए फ़ौजों को भगाते हुए नहर की तरफ़ पहुँच जाते हैं। भाई की लाश तराई पर पड़ी नज़र आती है। आप पुकार कर कहते हैं , ऐ अब्बास तुम ने यह हमले न देखे , यह सफ़ आराई न देखी अफ़सोस तुम ने मेरी तन्हाई न देखी।

अल्लामा असफ़रानी का कहना है कि इमाम हुसैन (अ.स.) दुश्मनों पर हमला करते थे तो लशकर इस तरह से भागता था जिस तरह से टिड्डियां मुन्तशिर हो जाती हैं। नूरूल एैन में एक मुक़ाम पर लिखा है कि इमाम हुसैन (अ.स.) बहादुर शेर की तरह हमला फ़रमाते और सफ़ों को दरहम बरहम कर देते थे और दुश्मनों को इस तरह काट कर फेंक देते थे जिस तरह तेज़ धार आले से खेती कटती है।

अल्लामा अरबली लिखते हैं कि ‘‘ आँ हज़रत हमलागरां अफ़गन्द हर कि बाद कोशीद शरबते मर्ग नोशीद व बहर जानिब कि ताख़त गिरोहे रा बख़ाक अन्दाख़्त ’’ कोई आपके अज़ीमुश्शान हमले की कोई ताब न ला सकता था , जो आपके सामने आता था शरबते मर्ग से सेराब होता था और आप जिस जानिब हमला करते थे गिरोह के गिरोह को ख़ाक में मिला देते थे।(कशफ़ुल ग़म्मा)

मुवर्रीख़ इब्ने असीर का बयान है कि जब इमाम हुसैन (अ.स.) को यौमे आशुरा दाहिने और बाऐं जानिब से घेर लिया गया तो आपने दाईं जानिब हमला कर के सब को भगा दिया। फिर पलट कर बाईं जानिब हमला करते हुए तो सब को मार कर हटा दिया। ख़ुदा की क़सम। हुसैन (अ.स.) से बढ़ कर किसी शख़्स को ऐसा क़वी दिल , साबित क़दम बहादुर नहीं देखा गया जो शिकस्ता दिल हो , सदमे उठाए हुए हो , बेटों अज़ीज़ों और दोस्त अहबाब के दाग़ भी खाए हुए हो और फिर हुसैन (अ.स.) की सी साबित क़दमी और बे जिगरी से जंग कर सके। ब ख़ुदा दुश्मनों की फ़ौज के सवार और प्यादे हुसैन (अ.स.) के सामने इस तरह भागते थे जिस तरह भेड़ बकरियों के ग़ल्ले शेर के हमले से भागते हैं। हुसैन (अ.स.) जंग कर रहे थे ‘‘ इज़न ख़रजता ज़ैनब ’’ कि जनाबे ज़ैनब ख़ेमे से निकल आईं और फ़रमाया , काश आसमान ज़मीन पर गिर पड़ता। ऐ उमरे साद तू देख रहा है और अबू अब्दुल्लाह क़त्ल किये जा रहे हैं। यह सुन कर उमरे साद रो पड़ा। आंसू दाढ़ी पर बहने लगे और उसने मुंह फेर लिया। इमाम हुसैन (अ.स.) उस वक़्त ख़ज का झुब्बा पहने हुए थे , सर पर अमामा बंधा हुआ था और वसमा का खि़ज़ाब लगाए हुए थे। हुसैन (अ.स.) ने घोड़े से गिर कर भी उसी तरह जंग फ़रमाई जिस तरह जंग जू बहादुर सवार जंग करते थे , हमलों को रोकते थे और सवारों के पैरों पर हमले फ़रमाते थे। ऐ ज़ालिमों ! मेरे क़त्ल पर तुम ने ऐका कर लिया है। क़सम ख़ुदा की तुम मेरे क़त्ल से ऐसा गुनाह कर रहे हो जिसके बाद किसी के क़त्ल से भी इतने गुनाह गार न होगे। तुम मुझे ज़लील कर रहे हो और ख़ुदा मुझे इज़्ज़त दे रहा है और सुनो वह दिन दूर नहीं कि मेरा ख़ुदा तुम से अचानक बदला ले लेगा। तुम्हें तबाह कर देगा , तुम्हारा ख़ून बहाएगा , तुम्हें सख़्त अज़ाब में मुब्तिला कर देगा।(तारीख़े कामिल जिल्द 4 पृष्ठ 40 )

मिस्टर जेम्स कारकरन इमाम हुसैन (अ.स.) की बहादुरी का ज़िक्र करते हुए वाक़ेए करबला के हवाले से लिखते हैं कि ‘‘ दुनियां में रूस्तम का नाम बहादुरी मे मशहूर है लेकिन कई शख़्स ऐसे गुज़रे हैं कि इनके सामने रूस्तम का नाम लेने के क़ाबिल नहीं। चुनान्चे अव्वल दर्जे में हुसैन इब्ने अली (अ.स.) हैं क्यों कि मैदाने करबला में गर्म रेत पर और भूख के आलम में जिस शख़्स ने ऐसा ऐसा काम किया हो , उसके सामने रूसतम का नाम वही शख़्स लेता है जो तारीख़ से वाक़िफ़ नहीं है। किसके क़लम को क़ुदरत है कि इमाम हुसैन (अ.स.) का हाल लिखे , किसकी ज़बान मे ताक़त है कि इन बहत्तर बुज़ुर्गवारों की साबित क़दमी और तेवरे शुजाअत और हज़ारों खू ख़्वार सवारों के जवाब देने और एक एक के हलाक हो जाने के बाब में ऐसी तारीफ़ करे , जैसी होनी चाहिये। किस के बस की बात है जो इन पर वाक़े होने वाले हालात का तसव्वुर कर सके। लश्कर में घिर जाने के बाद से शहादत तक के हालात अजीब व ग़रीब क़िस्म की बहादुरी को पेश करते हैं। यह सच है कि एक की दवा , दो मश्हूर हैं और मुबालग़ा की यही हद है कि जब किसी हाल में यह कहा जाता है कि तुम ने चार तरफ़ से घेर लिया लेकिन हुसैन (अ.स.) और बहत्तर तन को आठ क़िस्म के दुश्मनों ने तंग किया था। चार तरफ़ से यज़ीदी फ़ौज जो आंधी की तरह तीर बरसा रही थी। पांचवा दुश्मन अरब की धूप , छठा दुश्मन गर्म रेत जो तनूर के ज़र्रात की मानिन्द जान लेवा हरकतें कर रहे थे। पस जिन्होंने ऐसे मारके में हज़ारों काफ़िरों का मुक़ाबला किया हो इन पर बहादुरी का ख़ात्मा हो चुका , ऐेसे लोगों से बहादुरी में कोई फ़ौक़ीयत नहीं रखता। ’’(तारीख़े चीन दफ़्तर दोम बाब 16 जिल्द 2 )

इमाम हुसैन (अ.स.) अपने मक़तूल बहादुरों को पुकारते हुए

भूख और प्यास के आलम में नबर्द आज़माई की भी कोई हद होती है। आखि़र कार जब इमाम हुसैन (अ.स.) का जिस्मे मुबारक तीरों से मिस्ले साही हो गया और आप बे हद ज़ख़्मी हो गए तो आप अपने बहादुर मक़तूलों की तरफ़ मुतवज्जा हो कर फ़रमाने लगे , ‘‘ ऐ बहादुर शेरो उठो और हुसैन की मद्द करो , बेशक तुम ने बड़ी मद्द की और तुम मेरी हिमायत में सर से गुज़र गए हो , जान से बे नियाज़ हो गए हो लेकिन सुनो अब वक़्त व हालात का तक़ाज़ा यह है कि इस वक़्त मेरी मद्द करो ’’ लेकिन अफ़सोस जान से गुज़र जाने वाले हयाते ज़ाहिरी से महरूम क्यों कर मद्द करते। बाज़ रवायतों में है कि आपकी आवाज़ पर ज़ाफ़र जिन ने लब्बैक कही और इमदाद की दरख़्वास्त की। आपने यह कह कर उसे मुस्तरद कर दिया कि मैं इम्तिहान देने के लिये आया हूँ और इतमामे हुज्जत के लिये सदाए इम्दाद बुलन्द की है वरना मुझे मद्द की ज़रूरत नहीं है। एक रवायत में है कि फिर फ़रिश्तों ने मदद करना चाही उन्हें भी जवाब दे दिया। एक और रवायत में है कि हुसैन (अ.स.) की इस आख़री पुकार पर कटी हुई गरदनों से लब्बैक की आवाज़ आई।

बारगाहे अहदीयत में इमाम हुसैन (अ.स.) के दिल की अवाज़

हुसैन (अ.स.) यको तन्हा , बे यारो मद्दगार , जलती हुई ज़मीन पर दुश्मनों के झुन्ड में खड़े हैं और नाना रसूले (स अ व व ) अरबी का अमामा जिसके पेच कटे हुए ख़ून से भरा हुआ सर पर है , पै रहने अहमदी ज़ैबे तन है लेकिन तीरों से छलनी और ख़ून से रंगीन है। क़बा का दामन अली अकबर के ख़ून से लाल , चेहरा ए अनवर अली असग़र के ख़ून से गुलनार है , पेशानी मुबारक से ख़ून टपक रहा है और अब्बास (अ.स.) के ग़म से कमर टूट चुकी है। प्यास से कलेजा फुक रहा है , अन्सार की लाशें सामने पड़ीं हैं , बराबर का बेटा कड़ियल जवान , शबीहे पयम्बर सीने पर बर्छी खाए ख़ून से नाहाए सो रहा है। भाई की निशानी क़ासिम इब्ने हसन (अ.स.) ख़ून की मेंहदी लगाए उरूसे मौत से हम कनार आराम कर रहा है। बहन के लाडले दाग़ दे कर चले जा चुके हैं। लश्कर की ज़ीनत , बच्चों की ढारस , सकीना का सक्का , अली का शेर , क़ूव्वते बाज़ू , शाने कटाए नहर की तराई पर पड़ा है। 6 माह की जान तीरे सेह शोबा की नज़र हो चुकी है। क़त्ल गाह मेना का नक़्शा पेश कर रहा है , ख़्याम से भूखे प्यासे बच्चों के रोने बिल बिलाने की जिगर सोज़ आवाज़ें आ रही हैं। बीबीयों के रोने और फ़रियाद करने की आवाज़ें दिल को जला रही हैं लेकिन अल्लाह रे हुसैन (अ.स.) का जज़्बा ए क़ुर्बानी , यह इश्क़े ख़ुदा का मतवाला , इस्लाम का फ़रेफ़ता , तौहीद का शेफ़ता , सब्रो रज़ा का मुजस्समा , यादे ख़ुदा में महो और मुनाजात में मशग़ूल है। जैसे जैसे मसाएब व आलाम बढ़ते जाते हैं चेहरा शग़ुफ़्ता होता जाता है। आप फ़रमाते हैं , मेरे पालने वाले मैं अपनी ज़िन्दगी से उस मौत को पसन्द करता हूँ जो तेरी राह में हो। मेरे मौला मुझे इसमें ख़ुशी महसूस होती है कि मैं सत्तर मरतबा तेरी बारगाह में शहीद किया जाऊ और इस क़त्ल पर फ़ख़्र करता हूं जिस में तेरे दीन की नुसरत का राज़ मुज़मिर हो। इसके बाद आप अर्ज़ करते हैं , तरकतुल नास तरानी हवाक व अतीमतुल अयाल लकी अराक 1. मेरे मालिक तू जानता है और बेहतर जानता है कि मैंने तेरी मोहब्बत में सब से हाथ उठा लिया है और फ़क़त तेरे दीदार के शौक़ में अहलो अयाल को छोड़ दिया और बच्चों को यतीम बना दिया। 2. मालिक अगर तेरे दीदारे इश्क़ में मेरे टुकड़े कर दिए जाएं तब भी मेरा दिल तेरे सिवा किसी और की तरफ़ झुक नहीं सकता। यह कह कर आपने तलवार नियाम में रख ली क्यों कि सदा ए आसमानी आ गई थी कि ‘‘ अपना वादा ए तिफ़ली पूरा करो ’’ आपके हाथों का रूकना था कि सारा लश्कर मुसलसल हमले पर आमादा हो गया और चालीस हज़ार अफ़राद ने आपको घेरे में ले कर वार करना शुरू कर दिया।

इमाम हुसैन (अ.स.) अर्शे ज़ीन से फ़रशे ज़मीन पर

आप पर मुसलसल वार हो रहे थे कि नागाह एक पत्थ्र पेशानिये अक़दस पर लगा इसके फ़ौरन बाद अबवाल हतूफ़ जाफ़ई मलऊन ने जबीने मुबारक पर तीर मारा आपने उसे निकाल कर फेंक दिया और ख़ून पोछने के लिये आप अपना दामन उठाना ही चाहते थे कि सीना ए अक़दस पर एक तीरे सह शोबा पेवस्त हो गया , जो ज़हर में बुझा हुआ था। इसके बाद सालेह इब्ने वहब लईन ने आपके पहलू पर अपनी पूरी ताक़त से एक नेज़ा मारा जिसकी ताब न ला कर आप ज़मीने गर्म पर दाहिने रूख़सार के भल गिरे , ज़मीन पर गिरने के बाद आप फिर उठ खड़े हुए , वरआ इब्ने शरीक लईन ने आपके दायें शाने पर तलवार लगाई और दूसरे मलऊन ने दाहिने तरफ़ वार किया। आप फिर ज़मीन पर गिर पड़े , इतने में सिनान बिन अनस ने हज़रत के ‘‘ तरकूह ’’ हसली पर नैज़ा मारा और उसको खैंच कर दूसरी दफ़ा सीना ए अक़दस पर लगाया। फिर इसी ने एक तीर हज़रत के गुलू ए मुबारक पर मारा इन पैहम ज़रबात से हज़रत कमाले बेचैनी से उठ बैठे और आपने तीर को अपने हाथो से खींचा और ख़ून रीशे मुबारक पर मला। इसके बाद मालिक बिन नसर कन्दी लईन ने सरपर तलवार लगाई और वरह इब्ने शरीक ने शाने पर तलवार का वार किया। हसीन बिन नमीर ने दहने अक़दस पर तीर मारा। अबू अय्यूब ग़नवी ने हलक़ पर हमला किया। नसर बिन हरशा ने जिस्म पर तलवार लगाई इब्ने वहब ने सीना ए मुबारक पर नैज़ा मारा। यह देख कर उमरे साद ने आवाज़ दी अब देर क्या है इनका सर फ़ौरन काट लो। सर काटने के लिये शीस इब्ने रबी बढ़ा। इमाम हुसैन (अ.स.) ने इसके चेहरे पर नज़र की उसने हुसैन (अ.स.) की आंखों में रसूल (स अ व व ) की तसवीर देखी और कांप उठा। फिर सिनान बिन अनस आगे बढ़ा। इसके जिस्म में राशा पड़ गया। वह भी सरे मुबारक न काट सका। यह देख कर शिमरे मलऊन ने कहा , यह काम सिर्फ़ मुझसे हो सकता है और वह ख़न्जर लिये हुए इमाम हुसैन (अ.स.) के क़रीब आ कर सीना ए मुबारक पर सवार हो गया। आपने पूछा तू कौन है ? उसने कहा मैं शिम्र हूँ। फ़रमाया , तू मुझे नहीं पहचानता ? इसने कहा ‘‘ अच्छी तरह जानता हूँ ’’ तुम अली व फ़ात्मा के बेटे और मोहम्मद (स अ व व ) के नवासे हो। आपने फ़रमाया फिर मुझे क्यों ज़बह करता है ? इसने जवाब दिया इस लिये कि मुझे यज़ीद की तरफ़ से मालो दौलत मिलेगा।(कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 79 )

इसके बाद आपने अपने दोस्तों को याद फ़रमाया और सलामे आख़री के जुमले अदा किये। ऐ शिम्र मुझे इजाज़त दे दे कि मैं अपने ख़ालिक़ की आख़री नमाज़े अस्र अदा कर लूँ। इसने इजाज़त दी , आप सजदे में तशरीफ़ ले गए।(रौज़तुल शोहदा पृष्ठ 277 ) और शिम्र ने आपके गुलू ए मुबारक को कुन्द ख़न्जर की बारह ज़र्बों से क़ता कर के सरे अक़दस को नैज़े पर बुलन्द कर दिया। हज़रत ज़ैनब ख़ैमे से निकल पड़ीं , ज़मीन कांपने लगी , आलम में तारीकी छा गई , लोगों के बदन में कप कपीं पड़ गई। आसमान ख़ूं के आंसू रोने लगा। जो शफ़क़ की सूरत में रहती दुनियां तक क़ायम रहेगा।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 116 ) इसके बाद उमरे साद ने खूली बिन यज़ीद और हमीद बिन मुस्लिम के हाथों सरे मुबारक करबला से कूफ़े इब्ने ज़ियाद के पास भेज दिया।(अल हुसैन अज उमर बिन नसर पृष्ठ 154 ) इमाम हुसैन (अ.स.) के सरे बुरिदा के बाद आपका लिबास लूटा गया। अखि़नस बिन मुरसिद अमामा ले गया , इस्हाक़ इब्ने हशूआ क़मीस पैराहन ले गया। अबहर बिन क़ाब पैजामा ले गया। असवद बिन ख़ालिद नालैन ले गया , अब्दुल्लाह बिन असीद कुलाह ले गया , बज़दल बिन सलीम अंगुशतरी ले गया। क़ैस बिन अशअस पटका ले गया। उमर बिन साद ज़िरह ले गया , जमीह बिन ख़लक़ अज़दी तलवार ले गया। अल्लाह रे ज़ुल्म एक कमर बन्द के लिये जमाल मलऊन ने हाथ क़ता कर दिया। एक अंगूठी के लिये बुज़दिल ने उंगली काट डाली।

इसके बाद दीगर शोहदा के सर काटे गाए , और लाशों पर घोड़े दौड़ाने के लिये उमरे साद ने लशकरियों को हुक्म दिया दस अफ़राद इस अहम जुर्म खुदाई के लिये तैयार हो गए। जिनके नाम यह है , इस्हाक बिन हवीया , अखनस बिन मरसद , हकीम बिन तुफ़ैल , उमरो बिन सबीह , सालिम बिन खसीमह , सालेह बिन वहब , वाएज़ बिन ताग़म , हानि बिन मसबत , असीद बिन मालिक। तवारीख़ में है कि ‘‘ फ़ला सवाअल हुसैन ब हवाफ़र ख़ैवलाहुम हत्ती रजू अज़हरा वहमदहू ’’ इमाम हुसैन (अ.स.) की लाश को इस तरह घोड़ों की टापों से पामाल किया कि आपका सीना और पुश्त टुकड़े टुकड़े हो गई। बाज़ मुवर्रेख़ीन का कहना है कि जब इन लोगों ने चाहा कि जिस्म को इस तरह पामाल कर दें कि बिल्कुल ना पैद हो जाए तो जंगल से एक शेर निकला और उसने लाशा पामाल होने से बचा लिया।(दमए साकेबा पृष्ठ 350 ) अल्लामा इब्ने हजर मक्की लिखते हैं कि हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) की शहादत के फ़ौरन बाद , जो मिट्टी रसूले ख़ुदा (स अ व व ) जनाबे उम्मे सलमा को दे गए थे ख़ून से लाल हो गई।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 115 ) और रसूले ख़ुदा उम्मे सलमा के ख़्वाब में मदीने पहुँचे , उनकी हालत यह थी कि वह बाल बिखरा ए हुए , सर पर ख़ाक डाले हुए थे। उम्मे सलमा ने पूछा कि आप का यह क्या हाल है फ़रमाया ‘‘ शहादता क़तलन हुसैना अनफ़ा ’’ मैं अभी अभी हुसैन के क़त्ल गाह में था और अपनी आंखों से उसे ज़बह होते हुए देखा है।(सही तिरमिज़ी जिल्द 2 पृष्ठ 306, मुस्तदरिक हाकिम जिल्द 4 पृष्ठ 19 तहज़ीबुल तहज़ीब जिल्द 2 पृष्ठ 356 ज़ख़ाएरूल ओक़बा पृष्ठ 148 )

शामे ग़रीबा

शहादते इमाम हुसैन (अ.स.) के बाद अस्पे वफ़ा दार ने अपनी पेशानी इमाम हुसैन (अ.स.) के ख़ून मे रंगीन कर के अहले हरम में ख़बरे शहादत पहुँचा दी थी जिसकी वजह से ख़ेमें में कोहरामे अज़ीम बपा ही था कि दुश्मनों ने ख़ेमों का रूख़ किया और पहुँचते ही ख़ैमों में आग लगा दी और सामान लूटना शुरू कर दिया। अहले बैते रसूल (स अ व व ) फ़रियादों फ़ुग़ां की आवाज़े बलन्द कर रहे थे और कोई फ़रयाद रस और पुरसाने हाल न था। तमाम बीबीयों के सरों से चादरें छीन लीं। फ़ात्मा बिन्ते हुसैन (अ.स.) के पैरों से छागलें उतार लीं और हज़रत ज़ैनब व उम्मे कुलसूम के कानों से गोशवारे खींच लिये। सय्यदे सज्जाद (अ.स.) के नीचे से बिस्तर खींच कर उन्हें ज़मीन पर डाल दिया। ग़रज़ कि एक ऐसा हशर बरपा कर दिया गया जो न किसी के हाथ कभी रवा रखा गया था और न इससे क़ब्ल सुनने में आया था। इन हालात को देख कर एक औरत जो क़बीला ए बकर इब्ने वाएल से थी एक तलवार का टुकड़ा ले कर इन मुख़ालिफ़ों पर हमलावर हुई जो आले रसूल (स अ व व ) को लूट रहे थे। बाज़ रवाएतों में है कि एक बच्चे के कुर्ते में आग लगी हुई थी और वह बाहर की तरफ़ भाग रहा था , जैसे हवा लगती थी आग भड़क जाती थी , यह हाल देख कर एक दुश्मन ने तरस खाया , और बढ़ कर दामन से आग बुझ़ा दी , नौनिहाल ने जब उसे अपने ऊपर मेहरबान पाया तो पूछने लगा कि ऐ शेख़ नजफ़ का रास्ता किधर है ? उसने कहा ऐ फ़रज़न्द इस कमसिनी में नजफ़ का रास्ता क्यों पूछते हो ? फ़रमाया मैं अपने नाना के पास जा कर उनके सामने फ़रयाद करूंगा।(किताब तौज़ीह में यह वाक़ेया जनाबे सकीना की तरफ़ मन्सूब है)

अल ग़रज ज़ल्मों जौर की इन्तेहा हो रही थी किसी बीबी की पुश्त पर ताज़याने लगाए जा रहे थे किसी के रूख़सार पर तमाचे लगा रहे थे किसी की पीठ पर नै़ज़े की अनी चुभोई जा रही थी। जब सब कुछ लूटा जा चुका , ख़ैमे जल चुके और शाम आ गई तो वहीं के जले भुने ग़ल्ले के दानों से और ब रवाएते हुर की बीवी दाना पानी लाई और फ़ाक़ा शिकनी की गई।

इसके बाद हज़रत ज़ैनब ने जनाबे उम्मे कुलसूम से फ़रमाया कि बहन अब रात हो चुकी है , तारीकी छाई हुई है , तुम सब औरतों और बच्चों को एक जगह जमा करो , उनकी हिफ़ाज़त में मैं रात भर पहरा दूंगी। हज़रत उम्मे कुलसूम ने सब बीबीयों को जमा कर लिया लेकिन उन्हें जनाबे सकीना न मिलीं , आपने जनाबे ज़ैनब से अर्ज़े वाक़िया किया , जनाबे ज़ैनब मक़तल की तरफ़ हज़रत सकीना को तलाश करने के लिये निकलीं। एक नशेब से सकीना के रोने की आवाज़ आई , जा कर देखा कि सकीना बाप के सीने से लिपटी हुई गिरया कर रही है। जनाबे ज़ैनब उन्हें ख़ेमे में ले आईं। जनाबे सकीना का बयान है कि उस वक़्त बाबा की कटी हुई गरदन से यह आवाज़ आ रही थी

शिअती मा अन शरबतुम , मा अज़बे फ़ाज़ करूनी

औ समअतुम बेग़रीब ओ शहीद फ़ानद बूनी

व अनल सिब्तल लज़ी , मन ग़ैरे जुर्मिन क़तलूनी

व मजब्र द्दल ख़ल्ल बाअदल क़त्ल सहक़ूनी

लैताकुम फ़ी यौमे आशूरा , जमीआ तन्ज़रूनी

कैफ़ा असतसक़ी लुतफ़ली फ़ा बवाअन यरहमूनी

तरजुमाः ऐ मेरे शियों ! जब ठन्डा पानी पीना तो मुझे याद करना और जब किसी ग़रबी या शहीद के वाक़ेआत सुनना तो मुझ पर गिरया करना। ऐ मेरे दोस्तों सुनो मैं रसूल (स अ व व ) का वह मज़लूम नवासा हूँ जिसे बिला जुर्म व ख़ता दुश्मनों ने क़त्ल कर दिया और फिर क़त्ल के बाद उसकी लाश पर घोड़े दौड़ा दिये। ऐ मेरे शियों ! काश तुम आज आशूरा के दिन होते तो यह रूह फ़रसा मनाज़िर देखते कि मैं अपने प्यासे बच्चे अली असग़र के लिये किसी तरह पानी मांग रहा था और यह संग दिल किस दिलेरी और बे बाकी से इन्कार कर रहे थे।

ग़रज़ कि हज़रत ज़ैनब जनाबे सकीना को बाप के सीने से समझा बुझा कर उठा लाईं और उन्हें जनाबे उम्मे कुलसूम के सिपुर्द कर के तिलाया फिरना शुरू कर दिया।(दमए साकेबा)

रात का काफ़ी हिस्सा गुज़रने के बाद जनाबे ज़ैनब ने देखा कि एक सवार घोड़ा बढ़ाये चला आ रहा है। आपने बढ़ कर उससे कहा कि हम आले रसूल (स अ व व ) हैं हमारे छोटे बड़े , बूढ़े , जवान जब आज ही क़त्ल किये जा चुके हैं। अब हमारे छोटे छोटे बच्चे अभी रोते रोते सो गए हैं। ऐ सवार अगर तुझे हम को ज़्यादा लूटना मक़सूद है तो सुबह आ जाना और जो कुछ हमारे पास रह गया है उसे भी लूट लेना , लेकिन देख इन बच्चों को न सता और उन्हें सोने दे। ख़ुदा के लिये इस वक़्त चला जा , लेकिन सवार ने एक न सुनी और घोड़े के क़दम बराबर बढ़ते ही रहे। आखि़र ज़ैनब भी शेरे ख़ुदा की बेटी थीं , उन्हें जलाल आ गया और उन्होंने लजामे फ़रस पर बढ़ कर हाथ डाल दिया , और कहा कि मैं क्या कहती हूँ और तू क्या करता है। यह हाल देख कर सवार घोड़े से उतर पड़ा और ज़ैनब को सीने से लगा कर कहने लगा , ऐ बेटी मैं तेरा बाप अली हूँ , बेटी तेरी हिफ़ाज़त के लिये आया हूँ , ऐ जाने पदर तू बच्चों में जा मैं तेरी हिफ़ाज़त करूंगा। ज़ैनब ने फ़रियादो फ़ुग़ा शुरू कर दी और तमाम वाक़ियात बयान किये। अल ग़रज़ जब यह अश्र आफ़रीं रात तमाम हुई तो हुक्मे उमरे साद से लशकरियों ने आ कर आले रसूल (स अ व व ) को घेर लिया और बिला महमिल व कजावे के नाक़ों पर सवार होने को कहा। चारो नाचार रसूल ज़ादियां नाक़ों पर सवार हुईं। हाल यह था कि सर खुले हुए थे , बाल बिखरे हुए थे और आंखों से आंसू जारी थे। इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) की अलालत की वजह से चूंकि ताबो तवां न रखते थे , इस लिये सवार होने से परेशानी थी। शिम्र ने ताज़ियाने से अज़ीयत पहुँचाई और फ़िज़्ज़ा ने दौड़ कर इमाम (अ.स.) को मदद दी और आप नाक़े पर सवार हो गए लेकिन ताक़त न होने की वजह से नाक़े की पुश्त पर संभलना दुश्वार था इस लिये दुश्मनाने इस्लाम ने आप के पैरों को नाक़े के पेट से मिला कर बांध दिया।

(असरारूल शहादत)

फिर उसके बाद उस काफ़िले को ले कर कूफ़े के लिये रवाना हुए और ग़ज़ब यह किया कि इन रसूल ज़ादियों को मक़तल की तरफ़ से गुज़ारा। मुवर्रेख़ीन का बयान है कि जैसे ही यह हुसैनी काफ़िला मक़तल में पहुँचा हश्र का समा पेश हो गया। ज़ैनब ने अपने को नाक़े से गिरा दिया और फ़रयादों फ़ुगां करने लगीं। आपने कहा ऐ मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) जिन पर मलाएका आसमान से दुरूद भेजते हैं देखिये यह हुसैन (अ.स.) ख़ाको ख़ून में आलूदा टुकड़े टुकड़े हो कर चटीयल मैदान में पड़े हैं। आपकी बेटियां और नवासियां क़ैदी हैं। आप की अवलाद मक़तूल है और हवा उन पर खाक उड़ा रही है।

यह दर्दनाक मरसिया सुन कर दोस्त व दुश्मन कोई ऐसा न था जो रोने न लगा हो। उस वक़्त उन लोगों को महसूस हुआ कि वह किस क़द्र शदीद गुनाह के मुरतकिब हुए हैं लेकिन अब क्या हो सकता था।(अल हुसैन अबू नसर पृष्ठ 155 ) दम उस साकेबा में है कि जनाबे ज़ैनब की फ़रियाद से जानवर भी रोने लगे और उनकी आखों से आंसू टपक रहे थे। इस तरह हज़रत उम्मे कुलसूम भी नौहा ओ फ़रियाद कर रही थीं और जनाबे सकीना भी महवे गिरयाओ मातम थीं। बिल आखि़र दुश्मनों के तशद्दुद से यह काफ़ेला आगे बढ़ गया और आले रसूल की लाशें बे गोरो कफ़न ज़मीने गर्म करबला पर पड़ी रहीं। चंद दिनों के बाद बनी असद ने उन पर नमाज़ें पढ़ीं और उन्हें सिपुर्दे ख़ाक कर दिया।

सुबह ग्यारह मुहर्रम

वाक़ेया यह है कि अली (अ.स.) की बेटियां रसूल (स अ व व ) की नवासियां बे महमिल व अमारी के नाक़ों पर सवार कर के दरबारे कूफ़ा में दाखि़ल की गईं , फिर एक हफ़्ता उन्हें कूफ़े के क़ैद ख़ाने में रखा गया। इसके बाद इन ग़रीबों को बारह रबीउल अव्वल 61 हिजरी यौमे चहार शम्बा को शाम पहुँचा दिया गया और वहां एक साल क़ैद में रखा गया। फिर वहां से रिहाई के बाद आले रसूल (स अ व व ) 20 सफ़र 62 हिजरी करबला होते हुए आठ रबीउल अव्वल 62 हिजरी वारिदे मदीना मुनव्वरा हुए।

इस इजमाल की मुख़्तसर अलफ़ाज़ में तफ़सील यह है कि ग्यारहवीं मोहर्रम यौमे शम्बा को शिम्र बिन ज़िलजौशन ने हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) से कहा कि अब तुम्हें औरतों और बच्चों समैत दरबारे इब्ने ज़ियाद में चलना होगा जो कूफ़े मे है। इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) ने फ़रमाया कि मैं सानीये ज़हरा से अर्ज़ करता हूँ। चुनान्चे उन्होंने फूफी से अर्ज़ कि। ज़ैनब बिन्ते अली (अ.स.) को जलाल आ गया। फ़ौरन भाई की वसीअत याद आ गई सर झुका कर कहा , बेटा हर मुसीबत बर्दाश्त करूंगी।

फिर रवानगी का बन्दो बस्त शुरू हो गया बे महमिल व अमारी के नाक़ों पर सर बरैहना मुख़्देराते अस्मत व तहारत सवार की गईं। सरों को ब रवायते नैजों पर बुलन्द किया गया और शोहदा के लाशों को ज़मीने गर्म पर छोड़ कर काफ़ला कूफ़ा के लिये रवाना हो गया। बाज़ारो कूफ़ा में दाख़ले के वक़्त हज़रत ज़ैनब (स अ व व ) की फ़रियादी आवाज़ को मानन्द करने के लिये बाजों की आवाज़ तेज़ करा दी गई। ब रवायते हज़रत ज़ैनब ने मातम शुरू कर दिया फिर इनके हाथ पसे गरदन से बांध दिये गए। कूफ़े में दाखि़ला हुआ। बाज़ारे कूफ़ा में हज़रत ज़ैनब व उम्मे कुलसूल , हज़रत फ़ात्मा बिन्ते हुसैन और हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) ने ज़बर दस्त तक़रीर की और वाक़िये पर भरपूर रौशनी डाली। दारूल अमारा के दरवाज़े पर सरे मुस्लिम बिन अक़ील (अ.स.) लटका हुआ देखा गया। इब्ने ज़ियाद ने मुख़्तार को क़ैद ख़ाने से बुलाया और सरे हुसैन (अ.स.) तश्ते तिला में रख कर उनके सामने लाया गया , फिर छड़ी से दनदाने मुबारक इमाम हुसैन (अ.स.) के साथ बे अदबी की गई। एक हफ़्ता कूफ़े के क़ैद ख़ाने में मुख़द्देराते अस्मत व तहारत को क़ैद रखने के बाद हुसैनी काफ़ले को शाम के लिये रवाना कर दिया गया। जो ब रवायते 36 दिन में और ब रवाएते 16 रबीउल अव्वल 61 हिजरी चहार शम्बा के दिन शाम पहुँचा। जब शाम की राजधानी दमिश्क़ में जहां यज़ीद का दरबार लगता था दाख़ले का मौक़ा आया तो तीन दिन तक इस काफ़ले को ‘‘ बाब अल साअत ’’ पर ठहराया गया क्यों कि दरबार के सजने में तीन दिन की ज़रूरत बाक़ी थी। फिर दरबार में दाखि़ला हुआ। हज़ारों कुर्सी नशीन आले मोहम्मद (स अ व व ) की मुख़्दद्देरात( औरतों) का तमाशा देखने के लिये जमा थे। यज़ीद ने हज़रते ज़ैनब से कलाम करना चाहा। जनाबे फ़िज़्ज़ा ने मज़हमत की। फिर यज़ीद की ताना ज़नी पर बिन्ते अली ने दुख दर्द से भरे हुए अलफ़ाज़ में ज़बरदस्त तक़रीर की। दरबार में हलचल मची और मुख़्द्देराते असमत व तहारत को ऐसे क़ैद खाने में भेज दिया गया जिसमें धूप और औस से बचाव का कोई इन्तेज़ाम न था फिर इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) ने मस्जिदे दमिश्क़ में यादगार ख़ुतबा दिया जो अज़ान के ज़रिए से मुनक़ेता कर दिया गया।(बिहार जिल्द 10 पृष्ठ 233 )

अल ग़रज़ यह हुसैनी काफ़िला तक़रीबन एक साल इस क़ैद ख़ाने में पड़ा रहा। इसी दौरान में हज़रत सकीना का इन्तेक़ाल भी हो गया। क़ुतूबे मक़ातिल से क़ैद ख़ाने में हिन्दा ज़ौजा ए यज़ीद के आने का भी पता मिलता है। काफ़ी वक़्त गुज़रने के बाद यह काफ़िला रिहा किया गया। एक ख़ाली मकान में मुख़्द्देराते तहारत ने एक हफ़्ता नौहा व मातम किया और शाम की औरतों से ताज़ीयत क़ुबूल की। फिर बशीर बिन जज़लम की रहनुमाई में यह काफ़िला 20 सफ़र 62 हिजरी को करबला पहुँचा। हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह अन्सारी जो सहाबिये रसूल और क़ब्रे हुसैन (अ.स.) के मुजाविरे अव्वल थे उन्होंने फ़रयादो फ़ुग़ा की हालत में इन्तेहाई रंजो ग़म के साथ इस काफ़िले का इस्तक़बाल किया। ज़ैनब ने क़ब्रे इमाम हुसैन (अ.स.) पर अपने को गिरा दिया। बरावएते तीन दिन तक फ़रयादो फ़ुग़ा और नौहा मातम के बाद यह काफ़ला मदीना ए मुनव्वरा को रवाना हुआ। क़रीबे मदीना काफ़िला ठहरा। बशीर ने ख़बरे ग़म अहले मदीना तक पहुँचाई , ज़ूक़ दर ज़ूक़ अहले मदीना क़ाफ़िले के मुस्तक़र पर सरो पा बरैहना रोते पीटते जमा हो गए। मोहम्मद हनफ़िया भी आए , अब्दुल्लाह बिन जाफ़र भी आए और उम्मे सलमा भी आईं। उम्मे सलमा के एक हाथ में फ़ात्मा सुग़रा का हाथ था और एक हाथ में वह शीशी थी जो रसूले ख़ुदा दे गए थे और इसमें करबला की मिट्टी ख़ून हो गई थी। काफ़िला दाखि़ले मदीना हुआ। हज़रत उम्मे कुलसूम ने मरसिया पढ़ा जिसका पहला शेर यह है।

मदीनातो जद्देना ला तक़बलीना ,

फ़बल हसराते वाएहज़ान जैना

तरजुमाः- ऐ हमारे नाना के मदीने तू हमें क़ुबूल न कर (क्यों कि हम क़ुबूल किए जाने के क़ाबिल नहीं हैं) हम यहां हसरतों मुसीबतों और अन्दोह ग़म के साथ वापस आऐ हैं।

मदीने में दाखि़ले के बाद रौज़ा ए रसूल (स अ व व ) पर बेपनाह फ़रयादो फ़ुग़ां की गई 15 शबाना रोज़ बनी हाशिम के घरों में चुल्हा नहीं जला और इनके घरो से धुआं नहीं उठा। इस वाके़ए हाल के बाद हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) चालिस साल ज़िन्दा रहे और शबो रोज़ गिरया ओ ज़ारी फ़रमाते रहे। यही हाल हज़रत ज़ैनब , उम्मे कुलसूम और हज़रत फ़ात्मा नीज़ दीगर तमाम शुरकाए गिरदाब व मसाएब का रहा ता ज़िन्दगी इनके आंसू सूखे नहीं।

हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) की बहन जनाबे ज़ैनब व जनाबे कुलसूम के मुख़्तसर हालात विलादत ,वफ़ात और मदफ़न

जनाबे ज़ैनब व उम्मे कुलसूम हज़रत रसूले ख़ुदा (स अ व व ) और जनाबे ख़दीजतुल कुबरा (स अ व व ) की नवासीयां , हज़रत अबू तालिब (अ.स.) व फ़ात्मा बिन्ते असद (स अ व व ) की पोतियां हज़रत अली (अ.स.) व फ़ात्मा ज़हरा (स अ व व ) की बेटियां इमाम हसन (अ.स.) व इमाम हुसैन (अ.स.) की हकी़की़ और हज़रत अब्बास (अ.स.) व जनाबे मोहम्मदे हनफ़िया की अलाती बहनें थीं। इस सिलसिले के पेशे नज़र जिसकी बालाई सतह में हज़रत हमज़ा , हज़रत जाफ़रे तैय्यार , हज़रत अब्दुल मुत्तलिब और हज़रत हाशिम भी हैं। इन दोनों बहनों की अज़मत बहुत नुमाया हो जाती है।

यह वाक़ेया है कि जिस तरह इनके आबाओ अजदाद , माँ बाप और भाई बे मिस्ल व बे नज़ीर हैं इसी तरह यह दो बहने भी बे मिस्ल व बे नज़ीर हैं। ख़ुदा ने इन्हें जिन ख़ानदानी सेफ़ात से नवाज़ा है इसका मुक़तज़ा यह है कि मैं यह कहूं कि जिस तरह अली (अ.स.) व फ़ात्मा ज़हरा (स अ व व ) के फ़रज़न्द ला जवाब हैं इसी तरह इनकी दुख़्तरान ला जवाब हैं , बेशक जनाबे ज़ैनब व उम्मे कुलसूम मासूम न थीं लेकिन इनके महफ़ूज़ होने में कोई शुब्हा नहीं जो मासूम के मुतरादिफ़ है। हम ज़ैल में दोनों बहनों का मुख़्तसर अलफ़ाज़ में अलग अलग ज़िक्र करते हैं।

हज़रत ज़ैनब की विलादत

मुवर्रेख़ीन का इत्तेफ़ाक़ है कि हज़रत ज़ैनब बिन्ते अमीरल मोमेनीन (अ.स.) 5 जमादिल अव्वल 6 हिजरी को मदीना मुनव्वरा में पैदा हुईं जैसा कि ‘‘ ज़ैनब अख़त अल हुसैन ’’ अल्लामा मोहम्मद हुसैन अदीब नजफ़े अशरफ़ पृष्ठ 14 ‘‘ बतालता करबला ’’ डा 0 बिन्ते अशाती अन्दलसी पृष्ठ 27 प्रकाशित बैरूत ‘‘ सिलसिलातुल ज़हब ’’ पृष्ठ 19 व किताबुल बहरे मसाएब और ख़साएसे ज़ैनबिया इब्ने मोहम्मद जाफ़र अल जज़ारी से ज़ाहिर है। मिस्टर ऐजाज़ुर्रहमान एम 0 ए 0 लाहौर ने किताब ‘‘ जै़नब ’’ के पृष्ठ 7 पर 5 हिजरी लिखा है जो मेरे नज़दीक सही नहीं। एक रवायत में माहे रजब व शाबान एक में माहे रमज़ान का हवाला भी मिलता है। अल्लामा महमूदुल हुसैन अदीब की इबारत का मतन यह है। ‘‘ फ़क़द वलदत अक़ीलह ज़ैनब फ़िल आम अल सादस लिल हिजरत अला माअ तफ़क़ा अलमोरेखून अलैह ज़ालेका यौमल ख़ामस मिन शहरे जमादिल अव्वल अलख़ ’’ हज़रत ज़ैनब (स अ व व ) जमादील अव्वल 6 हिजरी में पैदा हुईं। इस पर मुवर्रेख़ीन का इत्तेफ़ाक़ है। मेरे नज़दीक यही सही है। यही कुछ अल वक़ाएक़ व अल हवादिस जिल्द 1 पृष्ठ 113 प्रकाशित क़ुम 1341 ई 0 में भी है।

हज़रत ज़ैनब की विलादत पर हज़रत रसूले करीम (स अ व व ) का ताअस्सुर वक्त़े विलादत के मुताअल्लिक़ जनाबे आक़ाई सय्यद नूरूद्दीन बिन आक़ाई सय्यद मोहम्मद जाफ़र अल जज़ाएरी ख़साएस ज़ैनबिया में तहरीर फ़रमाते हैं कि जब हज़रत ज़ैनब (स अ व व ) मुतावल्लिद हुईं और उसकी ख़बर हज़रत रसूले करीम (स अ व व ) को पहुँची तो हुज़ूर जनाबे फ़ात्मा ज़हरा (स अ व व ) के घर तशरीफ़ लाए और फ़रमाया कि ऐ मेरी राहते जान , बच्ची को मेरे पास लाओ , जब बच्ची रसूल (स अ व व ) की खि़दमत में लाई गई तो आपने उसे सीने से लगाया और उसके रूख़सार पर रूख़सार रख कर बे पनाह गिरया किया यहां तक की आपकी रीशे मुबारक आंसुओं से तर हो गई। जनाबे सय्यदा ने अर्ज़ कि बाबा जान आपको ख़ुदा कभी न रूलाए , आप क्यों रो पड़े इरशाद हुआ कि ऐ जाने पदर , मेरी यह बच्ची तेरे बाद मुताअद्दि तकलीफ़ों और मुख़तलिफ़ मसाएब में मुबतिला होगी। जनाबे सय्यदा यह सुन कर बे इख़्तियार गिरया करने लगीं और उन्होंने पूछा कि इसके मसाएब पर गिरया करने का क्या सवाब होगा ? फ़रमाया वही सवाब होगा जो मेरे बेटे हुसैन के मसाएब के मुतासिर होने वाले का होगा इसके बाद आपने इस बच्ची का नाम ज़ैनब रखा।(इमाम मुबीन पृष्ठ 164 प्रकाशित लाहौर) बरवाएते ज़ैनब इबरानी लफ़्ज़ है जिसके मानी बहुत ज़्यादा रोने वाली हैं। एक रवायत में है कि यह लफ़्ज़ जै़न और अब से मुरक्कब है। यानी बाप की ज़ीनत फिर कसरते इस्तेमाल से ज़ैनब हो गया। एक रवायत में है कि आं हज़रत (स अ व व ) ने यह नाम ब हुक्मे रब्बे जलील रखा था जो ब ज़रिए जिब्राईल पहुँचा था।

विलादते ज़ैनब पर अली बिन अबी तालिब (अ.स.) का ताअस्सुर

डा 0 बिन्तुल शातमी अन्दलिसी अपनी किताब ‘‘बतलतै करबला ज़ैनब बिन्ते अल ज़हरा ’’ प्रकाशित बैरूत के पृष्ठ 29 पर रक़म तराज़ हैं कि हज़रत ज़ैनब की विलादत पर जब जनाबे सलमाने फ़ारसी ने असद उल्लाह हज़रत अली (अ.स.) को मुबारक बाद दी तो आप रोने लगे और आपने उन हालात व मसाएब का तज़किरा फ़रमाया जिनसे जनाबे ज़ैनब बाद में दो चार होने वाली थीं।

हज़रत ज़ैनब की वफ़ात

मुवर्रेख़ीन का इत्तेफ़ाक़ है कि हज़रत ज़ैनब (स अ व व ) जब बचपन जवानी और बुढ़ापे की मंज़िल तय करने और वाक़े करबला के मराहिल से गुज़रने के बाद क़ैद ख़ाना ए शाम से छुट कर मदीने पहुँची तो आपने वाक़ेयाते करबला से अहले मदीना को आगाह किया और रोने पीटने , नौहा व मातम को अपना शग़ले ज़िन्दगी बना लिया। जिससे हुकूमत को शदीद ख़तरा ला हक़ हो गया। जिसके नतीजे में वाक़िये ‘‘ हर्रा ’’ अमल में आया। बिल आखि़र आले मोहम्मद (स अ व व ) को मदीने से निकाल दिया गया।

अबीदुल्लाह वालीए मदीना अल मतूफ़ी 277 अपनी किताब अख़बारूल ज़ैनबिया में लिखता है कि जनाबे ज़ैनब मदीने में अकसर मजलिसे अज़ा बरपा करती थीं और ख़ुद ही ज़ाकरी फ़रमाती थीं। उस वक़्त के हुक्कामे को रोना रूलाना गवारा न था कि वाक़िये करबला खुल्लम खुल्ला तौर पर बयान किया जाय। चुनान्चे उरवा बिन सईद अशदक़ वाली ए मदीना ने यज़ीद को लिखा कि मदीने में जनाबे ज़ैनब की मौजूदगी लोगों में हैजान पैदा कर रही है। उन्होंने और उनके साथियों ने तुझ से ख़ूने हुसैन (अ.स.) के इन्तेक़ाम की ठान ली है। यज़ीद ने इत्तेला पा कर फ़ौरन वाली ए मदीना को लिखा कि ज़ैनब और उनके साथियों को मुन्तशर कर दे और उनको मुख़तलिफ़ मुल्कों में भेज दे।(हयात अल ज़हरा)

डा 0 बिन्ते शातमी अंदलसी अपनी किताब ‘‘ बतलतए करबला ज़ैनब बिन्ते ज़हरा ’’ प्रकाशित बैरूत के पृष्ठ 152 में लिखती हैं किे हज़रत ज़ैनब वाक़िये करबला के बाद मदीने पहुँच कर यह चाहती थीं कि ज़िन्दगी के सारे बाक़ी दिन यहीं गुज़ारें लेकिन वह जो मसाएबे करबला बयान करती थीं वह बे इन्तेहा मोअस्सिर साबित हुआ और मदीने के बाशिन्दों पर इसका बे हद असर हुआ। ‘‘ फ़क़तब वलैहुम बिल मदीनता इला यज़ीद अन वुजूद हाबैन अहलिल मदीनता महीज अल ख़वातिर ’’ इन हालात से मुताअस्सिर हो कर वालीए मदीना ने यज़ीद को लिखा कि जनाबे ज़ैनब का मदीने में रहना हैजान पैदा कर रहा है। उनकी तक़रीरों से अहले मदीना में बग़ावत पैदा हो जाने का अन्देशा है। यज़ीद को जब वालीए मदीना का ख़त मिला तो उसने हुक्म दिया कि इन सब को मुमालिको अम्सार में मुन्तशिर कर दिया जाय। इसके हुक्म आने के बाद वालीए मदीना ने हज़रते ज़ैनब से कहला भेजा कि आप जहां मुनासिब समझें यहां से चली जायें। यह सुनना था कि हज़रते ज़ैनब को जलाल आ गया और कहा कि ‘‘ वल्लाह ला ख़रजन व अन अर यक़त दमायना ’’ ख़ुदा की क़सम हम हरगिज़ यहां से न जायेंगे चाहे हमारे ख़ून बहा दिये जायें। यह हाल देख कर ज़ैनब बिन्ते अक़ील बिन अबी तालिब ने अर्ज़ कि ऐ मेरी बहन ग़ुस्से से काम लेने का वक़्त नहीं है बेहतर यही है कि हम किसी और शहर में चले जायें। ‘‘ फ़ख़्रहत ज़ैनब मन मदीनतः जदहा अल रसूल सुम्मा लम हल मदीना बादे ज़ालेका इबादन ’’ फिर हज़रत ज़ैनब मदीना ए रसूल से निकल कर चली गईं। उसके बाद से फिर मदीने की शक्ल न देखी। वह वहां से निकल कर मिस्र पहुँची लेकिन वहां ज़ियादा दिन ठहर न सकीं। ‘‘ हकज़ा मुन्तकलेतः मन बलदाली बलद ला यतमईन बहा अल्ल अर्ज़ मकान ’’ इसी तरह वह ग़ैर मुतमईन हालात में परेशान शहर बा शहर फिरती रहीं और किसी एक जगह मकान में सुकूनत इख़्तेयार न कर सकीं। अल्लामा मोहम्मद अल हुसैन अल अदीब अल नजफ़ी लिखते हैं ‘‘ व क़ज़त अल अक़ीलता ज़ैनब हयातहाबाद अख़यहा मुन्तक़लेत मन मल्दाली बलद तकस अलन्नास हना व हनाक ज़ुल्म हाज़ा अल इन्सान इला रख़या अल इन्सान ’’ कि हज़रत ज़ैनब अपने भाई की शहादत के बाद सुकून से न रह सकीं वह एक शहर से दूसरे शहर में सर गरदां फिरती रहीं और हर जगह ज़ुल्मे यज़ीद को बयान करती रहीं और हक़ व बातिल की वज़ाहत फ़रमाती रहीं और शहादते हुसैन (अ.स.) पर तफ़सीली रौशनी डालती रहीं।(ज़ैनब अख्तल हुसैन पृष्ठ 44 ) यहां तक कि आप शाम पहुँची और वहां क़याम किया क्यों कि बा रवायते आपके शौहर अब्दुल्लाह बिन जाफ़रे तय्यार की वहां जायदाद थी वहीं आपका इन्तेक़ाल ब रवायते अख़बारूल ज़ैनबिया व हयात अल ज़हरा रोज़े शम्बा इतवार की रात 14 रजब 62 हिजरी को हो गया। यही कुछ किताब ‘‘ बतलतए करबला ’’ के पृष्ठ 155 में है। बा रवाएते ख़साएसे ज़ैनबिया क़ैदे शाम से रिहाई के चार महीने बाद उम्मे कुलसूम का इन्तेक़ाल हुआ और उसके दो महीने बीस दिन बाद हज़रते ज़ैनब की वफ़ात हुई। उस वक़्त आपकी उम्र 55 साल की थी। आपकी वफ़ात या शहादत के मुताअल्लिक़ मशहूर है कि एक दिन आप उस बाग़ में तशरीफ़ ले गईं जिसके एक दरख़्त में हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) का सर टांगा गया था। इस बाग़ को देख कर आप बेचैन हो गईं। हज़रत ज़ुहूर जारज पूरी मुक़ीम लाहौर लिखते हैं।

करवां शाम की सरहद में जो पहुँचा सरे शाम

मुत्तसिल शहर से था बाग़ , किया उसमें क़याम

देख कर बाग़ को , रोने लगी हमशीरे इमाम

वाक़ेया पहली असीरी का जो याद आया तमाम

हाल तग़ईर हुआ , फ़ात्मा की जाई का

शाम में लटका हुआ देखा था सर भाई का

बिन्ते हैदर गई , रोती हुई नज़दीके शजर

हाथ उठा कर यह कहा , ऐ शजरे बर आवर

तेरा एहसान है , यह बिन्ते अली के सर पर

तेरी शाख़ों से बंधा था , मेरे माजाये का सर

ऐ शजर तुझको ख़बर है कि वह किस का था

मालिके बाग़े जिनां , ताजे सरे तूबा था

रो रही थी यह बयां कर के जो वह दुख पाई

बाग़बां बाग़ में था , एक शकी़ ए अज़ली

बेलचा लेके चला , दुश्मने औलादे नबी

सर पे इस ज़ोर से मारा , ज़मीं कांप गई

सर के टुकड़े हुए रोई न पुकारी ज़ैनब

ख़ाक पर गिर के सुए ख़ुल्द सिधारीं ज़ैनब

हज़रत ज़ैनब का मदफ़न

अल्लामा मोहम्मद अल हुसैन अल अदीब अल नजफ़ी तहरीर फ़रमाते हैं। ‘‘ क़द अख़तलफ़ अल मुरखून फ़ी महल व फ़नहा बैनल मदीनता वश शाम व मिस्र व अली बेमा यग़लब अन तन वल तहक़ीक़ अलैहा अन्नहा मदफ़नता फ़िश शाम व मरक़दहा मज़ार अला लौफ़ मिनल मुसलेमीन फ़ी कुल आम ’’ ‘‘ मुवर्रेख़ीन उनके मदफ़न यानी दफ़्न की जगह में इख़्तेलाफ़ किया है कि आया मदीना है या शाम या मिस्र लेकिन तहक़ीक़ यह है कि वह शाम में दफ़्न हुई हैं और उनके मरक़दे अक़दस और मज़ारे मुक़द्दस की हज़ारों मुसलमान अक़ीदत मन्द हर साल ज़्यारत किया करते हैं। ’’(ज़ैनब अख़्तल हुसैन पृष्ठ 50 नबा नजफ़े अशरफ़) यही कुछ मोहम्मद अब्बास एम 0 ए 0 जोआईट एडीटर पीसा अख़बार ने अपनी किताब ‘‘ मशहिरे निसवां ’’ प्रकाशित लाहौर 1902 ई 0 के पृष्ठ 621 मे और मिया एजाज़ुल रहमान एम 0 ए 0 ने अपनी किताब ‘‘ ज़ैनब रज़ी अल्लाह अन्हा ’’ के पृष्ठ 81 प्रकाशित लाहौर 1958 ई 0 में लिखा है।

शाम में जहां जनाबे ज़ैनब का मज़ारे मुक़द्दस है उसे ‘‘ ज़ैनबिया ’’ कहते हैं। नाचीज़ को शरफ़े ज़ियारत 1966 ई 0 में नसीब हुआ।

हज़रत उम्मे कुलसूम की विलादत ,वफ़ात और उनका मदफ़न

तारीख़ के औराक़ शाहीद हैं कि हज़रते उम्मे कुलसूम अपनी बहन हज़रते ज़ैनब के कारनामों में बराबर की शरीक थीं। वह तारीख़ में अपनी बहन के दोश ब दोश नज़र आती हैं वह मदीने की ज़िन्दगी , करबला के वाक़ेयात , दोबारा गिरफ़्तारी और मदीने से अख़राज सब में हज़रते ज़ैनब के साथ रहीं। उनकी विलादत 9 हिजरी में हुई। उनका अक़्द 1. मोहम्मद बिन जाफ़र बिन अबी तालिब से हुआ। उनकी वफ़ात हज़रत ज़ैनब से दो महीने 20 दिन पहले हुईं। वह शाम में दफ़्न हैं।(ख़साएसे ज़ैनबिया)

(मोअज़्ज़म अल बलदान याकूत हम्वी जिल्द 4 पृष्ठ 216 ) उनका मज़ार और सकीना बिन्तुल हुसन (अ.स.) का मज़ार शाम में एक ही इमारत में वाक़े है। उनकी उम्र 51 साल की थी। इनकी औलाद का तारीख़ में पता नहीं मिलता। अलबत्ता हज़रते ज़ैनब के अब्दुल्लाह बिन जाफ़रे तय्यार से चार फ़रज़न्द अली , मोहम्मद , औन , अब्बास और एक दुख़्तर उम्मे कुलसूम का ज़िक्र मिलता हैं।(ज़ैनब अख़्तल हुसैन पृष्ठ 55 व सफ़ीनतुल बेहार जिल्द 8 पृष्ठ 558 )

हाशिया 1. हज़रत उम्मे कुलसूम के साथ उमर बिन ख़त्ताब के अक़्द का फ़साना तौहीने आले मोहम्मद (स अ व व) का एक दिल सोज़ बाब है। इसकी रद के लिये मुलाहेज़ा हों मुक़द्देमा अहयाउल ममात अल्लामा जलालउद्दीन सियूती मतबूआ लाहौर।


अबु मोहम्मद हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ स )

बन के सज्जादे की ज़ीनत आये सज्जाद हज़ीं

चूमती है जिनके क़दमों को , इबादत की जबीं

दोस्त का क्या ज़िक्र है मूज़ी को यह कहना पड़ा

अनता ज़ैनुल आबेदीन , व अनता जै़नुल आबेदीन

(साबिर थरयानी , कराचीं)

मिसाले जद ख़ुद इमामे अवलिया

चूँ पदर मशहूर , दर सबरे रज़ा

दर इबादत ईं क़दर सर गर्म बूद

अन्ता ज़ैनुल आबेदीन आमद निदा

हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद (स. अ.) के चोथे जां नशीन , हमारे चौथे इमाम और चाहरदा मासूमीन (अ.स.) की छटे मोहतरम फ़र्द हैं। आपके वालिदे माजिद शहीदे करबला हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) थे और वालेदा माजेदा जनाबे शाहे ज़नान उर्फ़ शहर बानो थीं। आप अपने आबाओ अजदाद की तरह इमामे मन्सूस , मासूम , आलमे ज़माना और अफ़ज़ले कायनात थे। उलेमा का बयान है कि आप इल्म , ज़ोहद , इबादत में हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) की जीती जागती तस्वीर थे।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 119 )

इमाम ज़हरी इब्ने अयनिया और इब्ने मुसय्यब का बयान है कि हम ने आपसे ज़्यादा किसी को अफ़ज़ले इबादत ग़ुज़ार और फ़क़ीह नहीं देखा।(नूरूल अबसार पृष्ठ 126 )

एक शख़्स ने सईद बिन मुसय्यब से किसी का ज़िक्र करते हुए कहा कि वह बड़ा मुत्तक़ी है। इब्ने मुसय्यब ने पूछा , तुम ने इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) को देखा है ? उसने कहा नहीं। उन्होंने जवाब दिया ‘‘ मा रायता अहदन अवरा मिनहा ’’ मैंने उनसे ज़्यादा मुत्तक़ी और परहेज़गार किसी को नहीं देखा।(मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 267 )

इब्ने अबी शेबा का कहना है कि ‘‘ असहा इलासा नीद ’’ वह रवायत है जो ज़हरी इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) मन्सूब करे।(तबक़ात अल हफ़्फ़ाज़ ज़हबी अरजहुल मतालिब पृष्ठ 435 ) अल्लामा दमीरी फ़रमाते हैं कि इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) हदीस बयान करने में निहायत मोतमिद इलैहे और सादिक़ुल रवायत थे। आप बहुत बड़े आलिम और फ़िक़हे अहलेबैत में बे मिस्ल व बे नजी़र थे।(हयातुल हैवान जिल्द 1 पृष्ठ 121 तारीख़ इब्ने ख़ल्कान जिल्द 1 पृष्ठ 320 ) आप ऐसे पुर जलाल व जमाल थे कि जो भी आपको देखता था ताज़ीम करने पर मजबूर हो जाता था।(वसीलतुन नजात पृष्ठ 319 )

आपकी विलादत बा सआदत

आप बतारीख़ 15 जमादिउस सानी 38 हिजरी यौमे जुमा बक़ौले 15 जमादिल अव्वल 38 हिजरी यौमे पन्चशम्बा बा मक़ाम मदीनाए मुनव्वरा पैदा हुए।(आलामुल वुरा पृष्ठ 141 व मनाक़िब जिल्द 4 पृष्ठ 131 )

अल्लामा मजलिसी तहरीर फ़रमाते हैं कि जब जनाबे शहर बानो ईरान से मदीने के लिये रवाना हो रही थीं तो जनाबे रिसालत मआब (स. अ.) ने आलमे ख़्वाब में उनका अक़्द हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) के साथ में पढ़ दिया था।(जिलाउल उयून पृष्ठ 256 ) और जबा आप वारिदे मदीना हुईं तो हज़रत अली (अ.स.) ने इमाम हुसैन (अ.स.) के सिपुर्द कर के फ़रमाया कि वह असमत परवर बीवी है कि जिसके बतन से तुम्हारे बाद अफ़ज़ले अवसिया और अफ़ज़ले कायनात होने वाला बच्चा पैदा होगा। चुनान्चे हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) पैदा हुए लेकिन अफ़सोस यह है कि आप अपनी मां की आग़ोश में परवरिश पाने का लुत्फ़ उठा न सके। ‘‘ मातत फ़ी नफ़ासहा बेही ’’ आपके पैदा होते ही ‘‘ मुद्दते नेफ़ास ’’ में जनाबे शहर बानो की वफ़ात हो गई।(क़मक़ाम जलाल अल उयून , उयून अख़्बारे रज़ा , दमए साकेबा जिल्द 1 पृष्ठ 426 )

कामिल मुबरद में है कि जनाबे शहर बानो , मारूफ़तुल नसब और बेहतरीन औरतों में थीं।

शेख़ मुफी़द तहरीर फ़रमाते हैं कि जनाबे शहर बानो , बादशाहे ईरान यज़द जरद बिन शहरयार बिन शेरविया इब्ने परवेज़ बिन हरमज़ बिन नौशेरवाने आदिल ‘‘ किसरा ’’ की बेटी थीं।(इरशाद पृष्ठ 391 व फ़ज़लुल ख़त्ताब)

अल्लामा तरयिही तहरीर फ़रमाते हैं कि हज़रत अली (अ.स.) ने शहर बानो से पूछा कि तुम्हारा नाम क्या है तो उन्होंने कहा ‘‘ शाहे जहां ’’ हज़रत ने फ़रमाया नहीं अब ‘‘ शहर बानो ’’ है।(मजमउल बहरैन पृष्ठ 570 )

नाम ,कुन्नियत , अल्क़ाब

आपका इस्मे गेरामी ‘‘ अली ’’ कुन्नियत ‘‘ अबू मोहम्मद ’’ ‘‘ अबुल हसन ’’ और ‘‘ अबुल क़ासिब ’’ था।

आपके अल्का़ब बेशुमार थे जिनमें ज़ैनुल आबेदीन , सय्यदुस साजेदीन , जुल शफ़नात , सज्जाद व आबिद ज़्यादा मशहूर हैं।(मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 261, शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 176, नूरूल अबसार पृष्ठ 126, अल फ़रा अल नामी , नवाब सिद्दीक़ हसन पृष्ठ 158 )

लक़ब ज़ैनुल आबेदीन की तौज़ीह

अल्लामा शिब्लन्जी का बयान है कि इमाम मालिक का कहना है कि आपको ज़ैनुल आबेदीन कसरते इबादत की वजह से कहा जाता है। नूरूल अबसार पृष्ठ 126 उलेमाए फ़रीक़ैन का इरशाद है कि हज़रत ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) एक शब नमाज़े तहज्जुद में मशग़ूल थे कि शैतान अज़दहे की शक्ल में आपके क़रीब आ गया और आपके पाए मुबारक के अंगूठे को मुंह में ले कर काटना शुरू किया , इमाम जो अमातन मशग़ूले इबादत थे और आपका रूजहाने कामिल बारगाहे ईज़दी की तरफ़ था। वह ज़रा भी उसके अमल से मुताअस्सिर न हुए और बदस्तूर नमाज़ में मुन्हमिक व मसरूफ़ व मशग़ूल रहे बिल आखि़र वह आजिज़ आ गया और इमाम ने अपनी नमाज़ भी तमाम कर ली। उसके बाद आपने शैतान मलऊन को तमाचा मार कर दूर हटा दिया। उस वक़्त हातिफ़े गै़बी ने अनतः ज़ैनुल आबेदीन की तीन बार आवाज़ दी और कहा बे शक तुम इबादत गुज़रों की जी़नत हो। उसी वक़्त से आपका यह लक़ब हो गया।(मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 262 शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 177 )

अल्लामा शहरे आशोब लिखते हैं कि इस अजदहे के दस सर थे और उसके दांत बहुत तेज़ और उसकी आंखें सुखऱ् थीं और वह मुसल्ले के क़रीब से ज़मीन फाड़ के निकला था।(मनाक़िब जिल्द 4 पृष्ठ 108 )

एक रवायत में इसकी वजह यह भी बयान कि गई है कि क़यामत में आपको इसी नाम से पुकारा जायेगा।(दएम साकेबा पृष्ठ 426 )

लक़ब सज्जाद की तौजीह

ज़हबी ने तबक़ात उल हफ़ाज़ में इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) के हवाले से लिखा है कि हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) को सज्जाद इस लिये कहा जाता है कि आप तक़रीबन हर कारे ख़ैर पर सजदा फ़रमाया करते थे। जब आप ख़ुदा की किसी नेमत का ज़िक्र करते थे तो सजदा करते। जब कलामे खुदा की आयते ‘‘ सजदा ’’ पढ़ते तो सजदा करते। जब दो शख़्सों में सुलह कराते तो सजदा करते इसी का नतीजा था आपके मवाज़े सुजूद पर ऊंट के घट्टों की तरह घट्टे पड़ जाते थे फिर उन्हें कटवाना पड़ता था। इसी लिये आपका लक़ब ‘‘ ज़ुल शफ़नास ’’ यानी घट्टे वाले भी था।(अरजहुल मतालिब पृष्ठ 434 )

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) की नसब बलन्दी

नसब और नस्ल बाप और मां की तरफ़ से देखे जाते हैं। इमाम (अ.स.) के वालिदे माजिद हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) और दादा हज़रत अली (अ.स.) और दादी फ़ात्मातुज़ ज़हरा बिन्ते रसूले ख़ुदा (स. अ.) हैं और आपकी वालेदा जनाबे शहर बानो बिन्ते यज़द जर्द इब्ने शहरयार इब्ने किसरा हैं। आप पैग़म्बरे इस्लाम (स. अ.) के पोते और नौशेरवाने आदिल के नवासे हैं। यह वह बादशाह है जिसके अहद में पैदा होने पर सरवरे कायनात (स. अ.) ने इज़हारे मसर्रत फ़रमाया है। इस सिलसिलाए नसब के मुताअल्लिक़ अबुल असवद दवाएली ने अपने अशआर में उसकी वज़ाहत की है कि इस से बेहतर और सिलसिला नामुम्किन है। उसका एक शेर यह है वा अन ग़ुलामन , बैन क़िसरा व हाशिम

ला करम मन यनतत , अलैहे अल तमाएम

इस फ़रज़न्द से बलन्द नसब कोई और नहीं हो सकता जो नौशेरवाने आदिल और फ़ख़्रे कायनात हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स. अ.) के दादा हाशिम की नसल से हो।(उसूले काफ़ी पृष्ठ 255 )

शेख़ सुलैमान कन्दूज़ी और दीगर उलेमाए इस्लाम लिखते हैं कि नौशेरवां आदिल की बरकत तो देखो कि उसी नस्ल को आले मोहम्मद (स. अ.) के नूर की हामिल क़रार दिया और आइम्मा ए ताहेरीन (अ.स.) की एक अज़ीम फ़र्द को उस लड़की से पैदा किया जो नौशेरवां की तरफ़ मन्सूब है। फिर तहरीर करते हैं कि इमाम हुसैन (अ.स.) की तमाम बीवीयों में यह शरफ़ सिर्फ़ जनाबे शहर बानो को नसीब हुआ जो हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) की वालेदा माजेदा हैं।(नियाबुल मोअद्दता पृष्ठ 315 व फ़स्ल अल ख़ताब पृष्ठ 261 )

अल्लामा अबीदुल्लाह बा हवाला इब्ने ख़लक़ान लिखते हैं कि जनाब शहर बानो शाहाने फ़ारस के आख़री बादशाह ‘‘ यज़द जर्द ’’ की बेटी थीं और आप ही से इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) पैदा हुए हैं। जिनको ‘‘ अल ख़ैरतैन ’’ कहा जाता है क्यों कि हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) फ़रमाया करते थे कि खुदा वन्दे आलम ने अपने बन्दों में से दो गिरोह अरब और अजम को बेहतरीन क़रार दिया है और मैंने अरब से क़ुरैश और आजम से फ़ारस को मुन्तख़ब कर लिया है चूंकि अरब और अजम का इज्तेमा इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) में है इसी लिये आपको इब्नल ख़ैरतैन से याद किया जाता है।(अरजहुल मतालिब पृष्ठ 434 )

अल्लामा शहरे आशोब लिखते हैं कि जनाबे शहर बानों को ‘‘ सय्यदुन निसां ’’ कहा जाता है।(मनाक़िब जिल्द 4 पृष्ठ 131 )

जनाबे शहर बानों की तशरीफ़ आवरी की बहस

कहा जाता है कि अहदे उमरी में फ़तेह मदाएन के मौक़े पर जनाबे शहर बानों लशकरे इस्लाम के हाथ लगी थीं और वहां से अपनी दीगर बहनों के साथ मदीने पहुँच कर हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) की ज़ौजियत से मुशर्रफ़ हुईं।(रबीउल अबरार , ज़मख़्शरी) लेकिन मेरे नज़दीक यह बिल्कुल ग़लत है क्यों कि फ़तेह मदाएन सफ़र 16 , 17 हिजरी में हुई है जैसा कि तारीख़ अबुल फ़िदा , जिल्द 1 पृष्ठ 116 , तारीख़े कामिल जिल्द 2 पृष्ठ 197 , मोअज़्ज़मुल बलदान जिल्द 7 पृष्ठ 413 व फ़तहुल आज़म पृष्ठ 160 , तारीख़े इब्ने ख़ल्दून जिल्द 2 पृष्ठ 100 में है और यज़द जर्द जनाबे शहर बानों का बाप था 14 हिजरी के शुरू में एनाने हुक्मरानीका मालिक हुआ। जैसा कि तारीख़े तबरी जिल्द 2 पृष्ठ 169 , तारीख़े कामिल जिल्द 1 पृष्ठ 178 व तारीख़े अबुल फ़िदा जिल्द अव्वल पृष्ठ 56 में है और तख़्त नशीनी के वक़्त उसकी उम्र 21 साल की थी। जैसा कि तारीख़े तबरी जिल्द 3 पृष्ठ 81 तारीख़े कामिल जिल्द 2 पृष्ठ 172 तारीख़ इब्ने ख़ल्दून जिल्द 2 पृष्ठ 91 , फ़तूहात इस्लामिया जिल्द 1 पृष्ठ 66 में है इस हिसाब से फ़तेह मदाइन के वक़्त उसकी उम्र ज़्यादा से ज़्यादा 22 साल की हो सकती है। मेरी समझ में नहीं आता कि एक अजमी जो गरम मुल्क का बाशिन्दा न हो वह ग़रीबों की तरह इतनी थोड़ी उम्र में क्यों कर मुबाशेरत के का़बिल बन सकता है यानी यह मुम्किन है कि एक इतने कम सिन शख़्स से ऐसी लड़की पैदा हो सके जो 16 हिजरी में फ़तेह मदाईन के वक़्त शादी के क़ाबिल हो। इस लिये लामोहाला यह मानना पड़ेगा यज़द जर्द की शादी 18 , 19 साल की उम्र में हुई होगी। अब ऐसी सूरत में इसकी शादी 18 , 19 साल की उम्र में तसलीम की जाए और यह भी मान लिया जाए कि जनाबे शहर बानों उसकी पहली औलाद थीं मदाएन के वक़्त जनाबे शहर बानों की उम्र 5 , 6 साल से ज़्यादा नहीं हो सकती। इसके अलावा हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) जो 4 हिजरी में पैदा हुए हैं उनकी शादी कम सिनी में बाहालते नाबालीग़ फिर ऐसी सूरत में जब कि इमाम हसन (अ.स.) की शादी न हुई हो जो इमाम हुसैन (अ.स.) से बडे़ थे , 16 हिजरी में फ़तेह मदाएन के बाद हज़रत अली (अ.स.) क्यों कर सकते हैं।

मुवर्रिख़ शहरी शमसुल उलमा , शिबली नोमानी हज़रत उमर का हाल लिखते हुए तहरीर फ़रमाते हैं कि इस मौक़े पर हज़रत शहर बानो का क़िस्सा जो ग़लत तौर पर मशहूर हो गया है इसे ज़िक्र करना ज़रूरी है। आम तौर पर मशहूर है कि जब फ़ारस फ़तेह हुआ तो यज़द जर्द शहनशाहे फ़ारस की बेटियां गिरफ़्तार हो कर मदीने में आईं हज़रत उमर ने आम लौंड़ियों की तरह बाज़ार में उनके बेचने का हुक्म दिया लेकिन हज़रत अली (अ.स.) ने मना किया कि ख़ानदाने शाही के साथ ऐसा सुलूक जाइज़ नहीं। इन लड़कियों की की़मत का अन्दाज़ा कराया जाए। फिर यह लड़कियां किस के एहतिमाम और सुपुर्दगी में दी जायं और उससे उनकी की़मत आला से आला शरह पर लगवा ली जाए। चुनान्चे हज़रत अली (अ.स.) ने ख़ुद उनको अपने एहतिमाम में लिया और एक इमाम हुसैन (अ.स.) को एक मोहम्मद बिन अबू बक्र को एक अब्दुल्लाह बिन उमर को इनाएत की। इस ग़लत क़िस्से की हक़ीक़त यह है कि ज़ैहमख़शरी ने जिसको फ़ने तारीख़ से कुछ वास्ता नहीं रबीउल अबरार में इसको लिखा और इब्ने ख़ल्का़न कने इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) के हाल में यह रवायत उसके हवाले से नक़ल कर दी लेकिन यह महज़ ग़लत है। अव्वलन तो ज़ैहमख़शरी के सिवा तबरी इब्ने असीर , याकू़बी बिलाज़री इब्ने क़तीबा वग़ैरा किसी ने इस वाक़िया को नहीं लिखा और ज़हमख़शरी का फ़न तारीख़ी में जो पाया है वह ज़ाहिर है। इसके अलावा तारीख़ी क़रायन इसके बिल्कुल खि़लाफ़ हैं। हज़रत उमर के अहद में यज़दो जरद और ख़ानदाने शाही पर मुसलमानों को मुतलक़ क़ाबू हासिल नहीं हुआ। मदाएन के मारके में यज़दो जर्द मय तमाम अहलो अयाल के दारूल सलतनत से निकला और हवान पहुँचा। जब मुसलमान हवान पर चढ़े तो वह असफ़हान भाग गया और फिर करमान वग़ैरा से टकराता फिरा। मरू में पहुँच कर 30- 31 हिजरी में जो हज़रत उस्मान की खि़लाफ़त का ज़माना था मारा गया। मुझको शुब्हा है कि ज़ैमख़शरी को यह भी मालूम था या नहीं कि यज़दो जर्द का क़त्ल किस अहद में हुआ। इसके अलावा जिस वक़्त का यह वाक़ेया बयान किया जाता है उस वक़्त इमाम हुसैन (अ.स.) की उम्र 12 साल थी क्यों कि जनाबे मम्दुह हिजरत के पांचवे साल पैदा हुए और फ़ारस 17 हिजरी में फ़तह हुआ इस लिये यह उम्र भी किसी क़दर मुस्तबअद है कि हज़रत अली (अ.स.) ने उनके नागालगी़ में उन पर इस क़िस्म की इनायत की होगी इसके अलावा वह एक शहनशाह की अवलाद की क़ीमत निहायत गरां क़रार पाई होगी और हज़रत अली (अ.स.) निहायत ज़ाहिदाना और फ़क़ीराना ज़िन्दगी बसर करते थे। ग़रज़ कि किसी हैसीयत से इस वाक़िये की सेहत पे गुमान नहीं हो सकता।(अल फ़ारूक़ पृष्ठ 172 )

मैंने तवारीख़ से जो इस्तेमबात किया है वह यह है कि अहदे उसमानी में अहले फ़ारस ने बग़ावत कर के अबीद उल्ला बिन उमर ‘‘ वाली फ़ारस ’’ फ़ारस को मार डाला और हुदूदे फ़ारस से लश्कर भी निकाल दिया। इस वक़्त फ़ारस की लशकरी छावनी का मुक़ाम ‘‘ अस्तख़र ’’ था। ईरान का आख़री बादशाह ‘‘यज़द जर्द ’’ अहले फ़ारस के साथ था। हज़रत उस्मान ने अब्दुल्लाह बिन आमिर को हुक्म दिया बसरा और अम्मान में लशकर को मिला कर फ़ारस पर चढ़ाई कर दो। चुनान्चे ऐसा ही किया गया। हुदूदे अस्तख़र में ज़बरदस्त और घमासान की जंग हुई और मुसलमान कामयाब हुए। अस्तख़र फ़तेह होने के बाद 31 हिजरी में यज़द जर्द ‘‘ रै ’’ वहां से ख़ुरासान और फिर ख़ुरासान से मरोजा पहुँचा। उसके हमराह चार हज़ार जर्रार सिपाही भी थे। मरोजा में वह ख़ाकान चीन की साज़िशी इमदाद की वजह से मारा गया और शहान अजम के गोरिस्तान ‘‘ अस्तख़र ’’ में दफ़्न हुआ। इसके बाद अहदे उस्मानी बदल गया और हज़रत अली (अ.स.) शेरे ख़ुदा का ज़माना आ गया।

जंगे जमल के बाद ईरान ख़ुरासान के मक़ाम ‘‘ मरौ ’’ में सख़्त बग़ावत हुई। उस वक़्त ईरान में बरावायत इरशाद मुफ़ीद व रौज़ातुल पृष्ठ हरीस इब्ने वजअफ़ी गर्वनर थे। हज़रत अली (अ.स.) ने मरौ के क़ज़िया नामरज़िया को ख़त्म करने के लिये इमदादी तौर पर खुलीद इब्ने क़ुर्रा यरबोई को रवाना किया , वहां जंग हुई और लशकरे इस्लाम कामयाब हुआ। हरीस इब्ने जाबिर जाअफ़ी ने यज़द जर्द इब्ने शहरयार इब्ने क़िसरा जो अहदे उस्मानी में मारा जा चुका था कि दो बेटियो शहर बानों और गीहान बानों को आम असीरों के साथ हज़रत अली (अ.स.) की खि़दमत में भेजा। शेरे ख़ुदा अली (अ.स.) ने शहर बानों को इमाम हुसैन (अ.स.) और गीहान बानों को मोहम्मद बिन अबी बक्र की ज़ौजियत में दे दिया। जैसा कि रौज़तुल पृष्ठ जिल्द 3 पृष्ठ 9 प्रकाशित निवल किशोर , इरशादे मुफ़ीद जिल्द 2 पृष्ठ 292 , आलाम अल वरा पृष्ठ 101 , उम्दतुल तालिब पृष्ठ 171 , जामेउल तवारीख़ पृष्ठ 149 , कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 89 , मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 261 , सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 120 , नूरूल अबसार पृष्ठ 126 , तोहफ़ाए सुलैमानिया , शरए इरशाद पृष्ठ 391 में मौजूद है उस वक़्त इमाम हुसैन (अ.स.) की उम्र और जनाबे शहर बानों की उम्र काफ़ी हो चुकि थी और इमाम हसन (अ.स.) की शादी हुये अरसा गुज़र चुका था। हज़रत अली (अ.स.) की खि़लाफ़त 35 हिजरी से 40 हिजरी तक रही। जनाबे शहर बानों से 38 हिजरी में इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) और गिहान बानों से क़ासिम बिन मोहम्मद पैदा हुए।

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) के बचपन का एक वाके़या

अल्लामा मजलिसी रक़मतराज़ है कि एक दिन इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) जब कि आपका बचपन था बीमार हुये। हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) ने फ़रमाया , बेटा ! अब तुम्हारी तबीयत कैसी है और तुम कोई चीज़ चाहते हो तो बयान करो ताकि मैं तुम्हारी ख़्वाहिश के मुताबिक़ उसे फ़राहम करने की कोशिश करूँ। आप ने अर्ज़ कि बाबा जान अब ख़ुदा के फ़ज़ल से अच्छा हूँ। मेरी ख़्वाहिश सिर्फ़ यह है कि ख़ुदा वन्दे आलम मेरा शुमार उन लोगों में करे जो परवरदिगारे आलम के क़ज़ा व क़दर के खि़लाफ़ कोई ख़्वाहिश नहीं रखते। यह सुन कर इमाम हुसैन (अ.स.) खु़श व मसरूर हो गये और फ़रमाने लगे बेटा तुम ने बड़ा मसर्रत अफ़ज़ा और मारेफ़त ख़ेज़ जवाब दिया है। तुम्हारा जवाब बिल्कुल हज़रत इब्राहीम (अ.स.) के जवाब से मिलता जुलता है। हज़रत इब्राहीम (अ.स.) को जब मिनजनीक़ में रख कर आग की तरफ़ फेंका गया था और आप फ़ज़ां में होते हुए आग की तरफ़ जा रहे थे तो हज़रत जिब्राईल (अ.स.) ने आप से पूछा था ‘‘ हल्लक हाजतः ’’ आपकी कोई हाजत व ख़्वाहिश है ? उस वक़्त उन्होंने जवाब दिया था , ‘‘ नाअम इमा इलैका फ़ला ’’ बेशक मुझे हाजत है लेकिन तुम से नहीं , अपने पालने वाले से है।(बेहारूल अनवार जिल्द 11 पृष्ठ 21 प्रकाशित ईरान)

आपके अहदे हयात के बादशाहाने वक़्त

आपकी विलादत बादशाहे दीनो ईमान हज़रत अली (अ.स.) के अहदे असमत में हुई। फिर इमाम हसन (अ.स.) का ज़माना रहा , फिर बनी उमय्या की ख़ालिस दुनियावी हुकूमत हो गई। सुलेह इमाम हसन (अ.स.) के बाद फिर 60 हिजरी तक माविया बिन अबी सुफ़ियान बादशाह रहा। उसके बाद उसका फ़ासिक़ व फ़ाजिर बेटा यज़ीद 64 हिजरी तक हुक्मरां रहा। 64 हिजरी में माविया बिन यज़ीद बिन माविया और मरवान बिन हकम हाकिम रहे। 64 हिजरी में वलीद बिन अब्दुल मलिक ने हुक्मरानी की और उसी ने 94 हिजरी में हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) को ज़हरे दग़ा से शहीद कर दिया।(तारीखे़ आइम्मा पृष्ठ 392 व सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 12 व नूरूल अबसार पृष्ठ 128 )

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) का अहदे तफ़ूलियत और हज्जे बैतुल्लाह

अल्लामा मजलिसी तहरीर फ़रमाते हैं कि इब्राहीम बिन अदहम का बयान है कि मैं एक मरतबा हज के लिये जाता हुआ क़ज़ाए हाजत की ख़ातिर क़ाफ़िले से पीछे रह गया। अभी थोड़ी ही देर गुज़री थी कि मैंने एक नौ उम्र लड़के को इस जंगल में सफ़रे पामा देखा। उसे देख कर फिर ऐसी हालत में कि वह पैदल चल रहा था और उसके साथ कोई सामान न था और न उसका कोई साथी था। मैं हैरान हो गया फ़ौरन उसकी खि़दमत में हाज़िर हो कर अर्ज़ परदाज़ हुआ। ‘‘ साहब ज़ादे ’’ यह लक़ो दक़ सहरा और तुम बिल्कुल तने तन्हा , यह मामेला क्या है ज़रा मुझे बताओ ? तो सही कि तुम्हारा ज़ादे राह और तुम्हारा राहेला कहां है और तुम कहां जा रहे हो ? इस नौ ख़ेज़ ने जवाब दिया।

ज़ादी तक़वा व राहलती रजाली व क़सादी मौलाया

मेरा ज़ादे राह तक़वा और परहेज़गारी है मेरी सवारी मेरे दोनों पैर हैं और मेरा मक़सूद मेरा पालने वाला है और मैं हज के लिये जा रहा हूँ। मैंने कहा कि आप तो बिल्कुल कमसिन हैं , हज आप पर वाजिब नहीं है। उस नौ ख़ेज़ ने जवाब दिया। बेशक तुम्हारा कहना दुरूस्त है लेकिन ऐ शेख़ मैं देखता हूँ कि मुझसे छोटे छोटे बच्चे भी मर जाते हैं इस लिये हज को ज़रूरी समझता हूँ कि कहीं ऐसा न हो कि इस फ़रीज़े की अदाएगी से पहले मर जाऊँ। मैंने पूछा ऐ साहब ज़ादे तुम ने खाने का क्या इंतेज़ाम किया है देख रहा हूँ कि तुम्हारे साथ खाने का कोई इन्तेज़ाम नहीं है। उसने जवाब दिया। ऐ शेख़ जब तुम किसी के यहां मेहमान जाते हो तो खाना अपने हमराह ले जाते हो ? मैंने कहा नहीं। फिर उसने फ़रमाया सुनो , मैं तो ख़ुदा का मेहमान हो कर जा रहा हूँ खाने का इन्तेज़ाम उसके ज़िम्मे है। मैंने कहा इतने लम्बे सफ़र को पैदल क्यो कर तय करोगे। उसने जवाब दिया कि मेरा काम कोशिश करना है और ख़ुदा का काम मंज़िले मक़सूद तक पहुँचाना है।

हम अभी बाहमी गुफ़्तुगू में ही मसरूफ़ थे कि नागाह एक ख़ूब सूरत जवान सफ़ैद लिबास पहने हुये आ पहुँचा और उसने इस नौ ख़ेज़ को गले से लगा लिया। यह देख कर मैंने उस जवाने राना से दरयाफ़्त किया यह नौ उम्र फ़रज़न्द कौन है ? उस नौजवान ने कहा कि यह हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) बिन इमाम हुसैन (अ.स.) बिन अली इब्ने अबी तालिब (अ.स.) हैं। यह सुन कर मैं उस जवाने राना के पास से इमाम की खि़दमत में हाज़िर हुआ और माज़ेरत ख़्वाही के बाद उनसे पूछा कि यह खूब सूरत जवान जिन्होंने आपको गले से लगाया यह कौन हैं ? उन्होंने फ़रमाया यह हज़रते खि़ज्र नबी (अ.स.) हैं। उनका फ़र्ज़ है कि रोज़ाना हमारी ज़्यारत के लिये आया करें। उसके बाद मैंने फिर सवाल किया और कहा कि आखि़र आप इस अज़ीम और तवील सफ़र को बिला ज़ाद और राहेला क्यों कर तय करेंगे। तो आपने फ़रमाया कि मैं ज़ाद और राहेला सब कुछ रखता हूँ और वह यह चार चीज़े हैं। 1. दुनिया अपनी तमाम मौजूदात समेत खुदा की ममलेकत है। 2. सारी मख़्लूक़ अल्लाह के बन्दे हैं। 3. असबाब और अरज़ाक़ ख़ुदा के हाथ में हैं। 4. क़ज़ाए खुदा हर ज़मीन में नाफ़िज़ है। यह सुन कर मैंने कहा ख़ुदा की क़सम आप ही का ज़ाद व राहेला सही तौर पर मुक़द्दस हस्तियों का सामाने सफ़र है।(दमए साकेबा जिल्द 3 पृष्ठ 437 )

उलेमा का बयान है कि आपने सारी उम्र में 25 (पच्चीस) हज पा पियादा किये हैं। आपने सवारी पर जब भी सफ़र किया है अपने जानवर को एक कोड़ा भी नहीं मारा।

आपका हुलिया ए मुबारक

इमाम शिब्लंजी लिखते हैं कि आपका रंग गन्दुम गूँ (सांवला) और क़द मियाना था। आप दुबले पतले क़िस्म के इंसान थे।(नूरूल अबसार पृष्ठ 126 व अख़बारूल अव्वल पृष्ठ 109 )

मुल्ला मुबीन तहरीर फ़रमाते हैं कि आप हुसनो जमाल , सूरतो कमाल में निहायत ही मुम्ताज़ थे। आपके चेहरे मुबारक पर जब किसी की नज़र पड़ती थी तो वह आपका एहतेराम करने और आपकी ताज़ीम करने पर मजबूर हो जाता था।(वसीलतुन नजात पृष्ठ 219 )

मोहम्मद बिन तल्हा शाफ़ेई रक़मतराज़ हैं कि आप साफ़ कपड़े पहनते थे और जब रास्ता चलते थे तो निहायत ख़ुशू के साथ राह रवी में आपके हाथ ज़ानू से बाहर नहीं जाते थे।(मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 226 व पृष्ठ 264 )

हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) की शाने इबादत

जिस तरह आपकी इबादत गुज़ारी में पैरवी ना मुम्किन है इसी तरह आपकी शाने इबादत की रक़मतराजी़ भी दुश्वार है। एक वह हस्ती जिसका मक़सद माबूद की इबादत और ख़ालिक की मारेफ़त हो और जो अपनी हयात का मक़सद इताअते ख़ुदा वन्दी ही को समझता हो और इल्मो मारेफ़त में हद दरजा कमाल रखता हो उसकी शाने इबादत को सतेह क़िरतास (क़लम से नहीं लिखा जा सकता) पर क्यों कर लाया जा सकता है और ज़बाने क़लम इसकी तरजुमानी में किस तरह कामयाबी हासिल कर सकती है। यही वजह है कि उलेमा की बे इन्तेहा काहिशो काविश के बा वजूद आपकी शाने इबादत का मुज़ाहेरा नहीं हो सका। ‘‘ क़द बलिग़ मिनल इबादतः मअलम बलीग़ः अहादो ’’ आप इबादत की उस मंज़िल पर फ़ायज़ थे जिस पर कोई भी फ़ायज़ नहीं हुआ।(दमए साकेबा पृष्ठ 439 )

इस लिससिले में अरबाबे इल्म और साहेबाने क़लम जो कुछ कह और लिख सके हैं उनमें से बाज़ वाके़यात व हालात यह हैं।


आपकी हालत वज़ू के वक़्त

वज़ू नमाज़ के लिये मुक़द्दमे की हैसियत रखता है और इसी पर नमाज़ का दारो मदार होता है। इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) जिस वक़्त वज़ू का इरादा फ़रमाते थे आपके रगो पै में ख़ौफ़े ख़ुदा के असरात नुमायां हो जाते थे। अल्लामा मोहम्मद तल्हा शाफ़ेई लिखते हैं कि जब आप वज़ू का क़ज़्द फ़रमाते थे और वज़ू के लिये बैठते थे तो आपके चेहरे मुबारक का रंग ज़र्द हो जाया करता था। यह हालत बार बार देखने के बाद उनके घर वालों ने पूछा कि वज़ू के वक़्त आपके चेहरे का रंग ज़र्द क्यों पड़ जाता है तो आपने फ़रमाया कि उस वक़्त मेरा तसव्वुरे कामिल अपने ख़ालिक़ व माबूद की तरफ़ होता है। इस लिये उसकी जलालत के रोब से मेरा यह हाल हो जाया करता है।(मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 262 )

आलमे नमाज़ में आपकी हालत

अल्लामा तबरेसी लिखते हैं कि आपको इबादत गुज़ारी में इम्तियाज़े कामिज हासिल था। रात भर जागने की वजह से आपका सारा बदन ज़र्द रहा करता था और ख़ौफ़े ख़ुदा में रोते रोते आपकी आंखें फूल जाया करती थीं और नमाज़ में ख़ड़े ख़ड़े आपके पांव सूज जाया करते थे।(आलाम अल वरा पृष्ठ 153 ) और पेशानी पर घट्टे रहा करते थे और आपकी नाक का सिरा ज़ख़्मी रहा करता था।(दमए साकेबा पृष्ठ 439 )

अल्लामा मोहम्मद बिन तल्हा शाफ़ेई लिखते हैं कि जब आप नमाज़ के लिये मुसल्ले पर खड़े हुआ करते थे तो लरज़ा बर अन्दाम हो जाया करते थे। लोगों ने बदन में कपकपी और जिस्म में थरथरी का सबब पूछा तो इरशाद फ़रमाया कि मैं उस वक़्त ख़ुदा की बारगाह में होता हूँ और उसकी जलालत मुझ़े अज़ खुद रफ़ता कर देती और मुझ पर ऐसी हालत तारी कर देती है।(मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 226 )

एक मरतबा आपके घर में आग लग गई और आप नमाज़ में मशगू़ल थे। अहले महल्ला और घर वालों ने बे हद शोर मचाया और हज़रत को पुकारा ‘‘ हुज़ूर आग लगी हुई है ’’ मगर आपने सरे नियाज़ सजदे बे नियाज़ से न उठाया। आग बुझा दी गई। नमाज़ ख़त्म होने पर लोगों ने आप से पूछा कि हुज़ूर आग का मामेला था , हम ने इतना शोर मचाया लेकिन आपने कोई तवज्जो न फ़रमाई। आपने इरशाद फ़रमाया ‘‘ हाँ ’’ मगर जहन्नम की आग के डर से नमाज़ तोड़ कर उस आग की तरफ़ मुतवज्जे न हो सका।(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 177 )

अल्लामा शेख़ सब्बान मालकी लिखते हैं कि जब आप वज़ू के लिये बैठते थे तब की से कांपने लगते थे और जब तेज़ हवा चलती थी तो आप ख़ौफ़े ख़ुदा से लाग़र हो जाने की वजह से गिर कर बेहोश हो जाया करते थे।(असआफ़ अल राग़ेबीन बर हाशिया ए नुरूल अबसार पृष्ठ 200 )

इब्ने तल्हा शाफ़ेई लिखते हैं कि हज़रत इमाम जै़नुल आबेदीन (अ.स.) नमाज़े शब सफ़र व हज़र दोनों में पढ़ा करते थे और कभी उसे क़ज़ा नहीं होने देते थे।(मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 263 )

अल्लामा मोहम्मद बाक़र बेहारूल अनवार के हवाले से तहरीर फ़रमाते हैं कि इमाम जै़नुल आबेदीन (अ.स.) एक दिन नमाज़ में मसरूफ़ व मशग़ूल थे कि इमाम मोहम्मद बाक़र (अ.स.) कुएं में गिर पड़े। बच्चे के गेहरे कुएं में गिरने से उनकी मां बेचैन हो कर रोने लगीं और कुएं के गिर्द पीट पीट कर चक्कर लगाने लगीं और कहने लगीं इब्ने रसूल (अ.स.) मोहम्मद बाक़र (अ.स.) ग़र्क़ हो गये हैं। इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) ने बच्चे के कुएं में गिरने की कोई परवाह न की और इतमीनान से नमाज़ तमाम फ़रमाई। उसके बाद आप कुएं के क़रीब आए और पानी की तरफ़ देखा फिर हाथ बढ़ा कर बिला रस्सी के गहरे कुएं से बच्चे को निकाल लिया। बच्चा हंसता हुआ बरामद हुआ। कु़दरते ख़ुदा वन्दी देखिये उस वक़्त न बच्चे के कपड़े भीगे थे और न बदन तर था।(दमए साकेबा पृष्ठ 430, मनाक़िब जिल्द 4 पृष्ठ 109 )

इमाम शिब्लन्जी तहरीर फ़रमाते हैं कि ताऊस रावी का बयान है कि मैंने एक शब हजरे असवद के क़रीब जा कर देखा कि इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) बारगाहे ख़ालिक़ में मुसलसल सजदा रेज़ी कर रहे हैं। मैं उसी जगह ख़डा़ हो गया। मैंने देखा कि आपने एक सजदे को बे हद तूल दे दिया है , यह देख कर मैंने कान लगाया तो सुना कि आप सजदे में फ़रमा रहे हैं , ‘‘ अब्देका बे फ़सनाएक मिसकीनेका बेफ़ासनाएक़ साएलेका बेफ़नाएक फ़क़ीरेका बेफ़नाएक ’’ यह सुन कर मैंने भी इन्ही कलेमात के ज़रिए ये दुआ माँगनी शुरू कर दी , फ़वा अल्लाह। ख़ुदा की क़सम मैंने जब भी उन कलामात के ज़रिये से दुआ मांगी फ़ौरन क़ुबूल हुई।(नूरूल अबसार पृष्ठ 126 प्रकाशित मिस्र इरशाद मुफ़ीद पृष्ठ 296 )

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) की शबाना रोज़ एक हज़ार रकअतें

उलेमा का बयान है कि आप शबो रोज़ में एक हज़ार रकअतें अदा फ़रमाया करते थे।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 119 मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 267 ) चूंकि आपके सजदों का कोई शुमार न था इसी लिये आपके आज़ाए सुजूद ‘‘ सफ़ना बईर ’’ ऊँट के घट्टे की तरह हो जाया करते थे और साल में कई मरतबा काटे जाते थे।(अल फ़रआ अल नामी पृष्ठ 158 व दमए साकेबा , कशफ़ल ग़म पृष्ठ 90 )

अल्लामा मजलिसी लिखते हैं कि आपके मक़ामाते सुजूद के घट्टे साल में दो बार काटे जाते थे हर मरतबा पांच तह निकलती थीं।(बेहारूल अनवार जिल्द 2 पृष्ठ 3 )

अल्लामा दमीरी मुवर्रिख़ इब्ने असाकर के हवाले से लिखते हैं कि दमिशक़ में हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) के नाम से मौसूम एक मस्जिद है जिसे ‘‘ जामेए दमिशक़ ’’ कहते हैं।(हयातुल हैवान जिल्द 1 पृष्ठ 121 )

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) मन्सबे इमामत पर फ़ाएज़ होने से पहले

अगरचे हमारा अक़ीदा यह है कि इमाम बतने मादर से इमामत की तमाम सलाहियतों से भर पूर आता है। ताहम फ़राएज़ की अदाएगी की ज़िम्मेदारी इसी वक़्त होती है जब वह इमामे ज़माना की हैसियत से काम शुरू करें , यानी ऐसा वक़्त आजाए जब काएनाती अरज़ी पर कोई भी उस से अफ़ज़ल व इल्म में बरतर व अकमल न हो। इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) अगरचे वक़्ते विलादत ही से इमाम थे लेकिन फ़राएज़ की अदाएगी की ज़िम्मेदारी आप पर उस वक़्त आएद हुई जब आपके वालिदे माजिद हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) दर्जए शहादत पर फ़ाएज़ हो कर हयाते ज़ाहेरी से महरूम हो गए।

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) की विलादत 38 हिजरी में हुई जब कि हज़रत अली (अ.स.) इमामे ज़माना थे। दो साल उनकी ज़ाहिरी ज़िन्दगी में आपने हालते तफ़ूलियत में अय्यामे हयात गुज़ारे फिर 50 हिजरी तक इमामे हसन (अ.स.) का ज़माना रहा फिर आशुरा 61 हिजरी तक इमाम हुसैन (अ.स.) फ़राएज़े इमामत की अंजाम देही फ़रमाते रहे। आशूर की दो पहर के बाद सारी ज़िम्मेदारी आप पर आएद हो गईं। इस अज़ीम ज़िम्मेदारी से क़ब्ल के वाक़ेयात का पता सराहत के साथ नहीं मिलता अलबत्ता आपकी इबादत गुज़ारी और आपके इख़्लाक़ी कार नामे बाज़ किताबों में मिलते हैं बहर सूरत हज़रत अली (अ.स.) के आख़री अय्यामे हयात के वाक़ेयात और इमाम हसन (अ.स.) के हालात से मुताअस्सिर होता एक लाज़मी अमर है। फिर इमाम हसन (अ.स.) के साथ तो 22- 23 साल गुज़ारे थे यक़ीनन इमाम हसन (अ.स.) के जुमला मामलात में आप ने बड़े बेटे की हैसियत से साथ दिया ही होगा लेकिन मक़सदे हुसैन (अ.स.) के फ़रोग़ देने में आपने अपने अहदे इमामत के आगा़ज़ होने पर इन्तेहाई कमाल कर दिया।

वाक़ेए करबला के सिलसिले में इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) का शानदार किरदार

28 रज़ब 60 हिजरी को आप हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) के हमराह मदीने से रवाना हो कर मक्का मोअज़्ज़मा पहुँचे चार माह क़याम के बाद वहां से रवाना हो कर 2 मोहर्रमुल हराम को वारिदे करबला हुए। वहां पहुँचते ही या पहुँचने से पहले आप अलील हो गए और आपकी अलालत ने इतनी शिद्दत एख़तियार की आप इमाम हुसैन (अ.स.) की शहादत के वक़्त इस क़ाबिल न हो सके कि मैदान में जा कर दर्जए शहादत हासिल करते। ताहम हर अहम मौक़े पर आपने जज़बाते नुसरत को बरूए कार लाने की सई की। जब कोई आवाज़े इस्तेग़ासा कान में आई आप उठ बैठे और मैदाने में कारज़ार में शिद्दते मर्ज़ के बावजूद जा पहुचने की सईए बलीग़ की। इमाम हुसैन (अ.स.) के इस्तेग़ासा पर तो आप ख़ेमे से बाहर निकल आए एक चोबा ए खे़मा ले कर मैदान का अजम कर दिया नागाह इमाम हुसैन (अ.स.) की नज़र आप पर पड़ गई और उन्होंने जंगाह से बक़ौले हज़रते ज़ैनब (स. अ.) को आवाज़ दी ‘‘ बहन सय्यदे सज्जाद को रोको वरना नस्ले मोहम्मद (स. अ.) का ख़ातमा हो जाएगा ’’ हुक्मे इमाम से ज़ैनब (स. अ.) ने सय्यदे सज्जाद (अ.स.) को मैदान में जाने से रोक लिया। यही वजह है कि सय्यदों का वजूद नज़र आ रहा है। अगर इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) अलील हो कर शहीद होने से न बच जाते तो नस्ले रसूल (स. अ.) सिर्फ़ इमाम मोहम्मद बाक़र (अ.स.) में महदूद रह जाती। इमाम सालबी लिखते हैं कि मर्ज़ और अलालत की वजह से आप दर्जए शहादत पर फ़ाएज़ न हो सके।(नूरूल अबसार पृष्ठ 126 )

शहादते इमाम हुसैन (अ.स.) के बाद जब खेमों में आग लगाई तो आप उन्हीं ख़ेमों में से एक ख़ेमे में बदस्तूर पड़े हुए थे। हमारी हज़ार जानें क़ुर्बान हो जायें हज़रत ज़ैनब बिन्ते अली (अ.स.) पर कि उन्होंने अहद फ़राएज़ की अदाएगी के सिलसिले में सब से पहला फ़रीज़ा इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) के तहफ़्फ़ुज़ का अदा फ़रमाया और इमाम को बचा लिया। अलग़रज़ रात गुज़री और सुबह नमूदार हुई , दुश्मनों ने इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) को इस तरह झिंझोड़ा कि आप अपनी बिमारी भूल गये। आपसे कहा गया कि नाक़ों पर सब को सवार करो और इब्ने ज़्याद के दरबार में चलो। सब को सवार करने के बाद आले मोहम्मद (अ.स.) का सारेबान फूफियों , बहनों और तमाम मुख़द्देरात को लिये दाखि़ले दरबार हुआ। हालत यह थी कि औरतें और बच्चे रस्सीयों में बंधे हुए और इमाम लोहे में जकड़े हुए दरबार में पहुँच गये। आप चूंकि नाक़े की बरैहना पुश्त पर संभल न सकते थे इस लिये आपके पैरों को नाक़े की पुश्त से बांध दिया गया था। दरबारे कूफ़ा में दाखि़ल होने के बाद आप और मुख़द्देराते अस्मत क़ैद ख़ाने में बन्द कर दिये गये। सात रोज़ के बाद आप सब को लिये हुए शाम की तरफ़ रवाना हुए और 19 मंज़िले तय कर के तक़रीबन 36 यौम (दिनों) में वहां पहुँचे।

कामिल बहाई में है कि 16 रबीउल अव्वल 61 हिजरी को आप दमिश्क़ पहुँचे हैं। अल्लाह रे सब्रे इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) बहनों और फुफियों का साथ और लबे शिकवा पर सकूत की मोहर हुदूदे शाम का एक वाक़ेया यह है आपके हाथों में हथकड़ी , पैरों में बेड़ी और गले मे ख़ारदार तौक़े आहनी पड़ा हुआ था , इस पर मुस्तज़ाद यह कि लोग आप पर आग बरसा रहे थे। इसी लिये आपने बाद वाक़ेय करबला एक सवाल के जवाब में ‘‘ अश्शाम , अश्शाम , अश्शाम ’’ फ़रमाया था।(तहफ़्फ़ुज़े हुसैनिया अल्लामा बसतामी)

शाम पहुँचने के कई घन्टों या दिनों के बाद आप आले मोहम्मद (अ.स.) को लिये हुए सरहाय शोहदा समेत दाखि़ले दरबार हुए फिर क़ैद ख़ाने में बन्द कर दिये गये। तक़रीबन एक साल क़ैद की मशक़्क़तें झेलीं। क़ैद खा़ना भी ऐसा था कि जिसमें तमाज़ते आफ़ताबी की वजह से इन लोगों के चेहरों की खालें मुताग़य्यर हो गई थी। लहूफ़ मुद्दते क़ैद के बाद आप सब को लिये हुए 20 सफ़र 62 हिजरी को वारिदे करबला हुए। आपके हमराह सरे हुसैन (अ.स.) भी कर दिया गया था।

आपने उसे पदरे बुजु़र्गवार के जिस्में मुबारक से मुलहक़ किया(नासिख़ुल तवारीख़) 8 रबीउल अव्वल 62 हिजरी को आप इमाम हुसैन (अ.स.) का लुटा हुआ काफ़िला लिए हुए , मदीने मुनव्वरा पहुँचे , वहां के लोगों ने आहो जा़री और कमालो रंज से आपका इस्तेक़बाल किया। 15 शाबाना रोज़ नौहा व मातम होता रहा।(तफ़सीली वाक़ेआत के लिये कुतुब मक़ातिल व सैर मुलाहेज़ा किजिए)

इस अज़ीम वाक़ेया का असर यह हुआ की ज़ैनब (अ.स.) के बाल इस तरह सफ़ेद हो गये थे कि जानने वाले उन्हें पहचान न सके।(अहसन अलक़सस पृष्ठ 182 प्रकाशित नजफ़) रूबाब ने साय में बैठना छोड़ दिया , इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) गिरया फ़रमाते रहे।(जलालुल ऐन पृष्ठ 256 ) अहले मदीना यज़ीद की बैअत से अलाहेदा हो कर बाग़ी हुए बिल आखि़र वाक़ेए हर्रा की नौबत आ गई।

वाक़ेए करबला और हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) के ख़ुतबात

मारकाए करबला की ग़मगीन दास्तान तारीख़े इस्लाम ही नहीं तारीख़े आलम का अफ़सोस नाक सानेहा है। हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) अव्वल से आखि़र तक इस होशरूबा और रूह फ़रसा वाक़ेए में अपने बाप के साथ रहे और बाप की शहादत के बाद खु़द इस अलमिया के हीरो बने और फिर जब तक ज़िन्दा रहे इस सानेहा का मातम करते रहे। 10 मोहर्रम 61 हिजरी का यह अन्दोह नाक हादसा जिसमें 18 बनी हाशिम और 72 असहाब व अनसार काम आए। हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) मुदतुल उम्र घुलता रहा और मरते दम तक इसकी याद फ़रामोश न हुई और इसका सदमाए जां काह दूर न हुआ। आप यूं तो इस वाक़ेए के बाद चालिस साल ज़िन्दा रहे मगर लुत्फ़े ज़िन्दगी से महरूम रहे और किसी ने आपको बशशाशा और फ़रहानाक न देखा। इस जान का वाक़ेए करबला के सिलसिले में आपने जो जाबजा ख़ुत्बे इरशाद फ़रमाये हैं उनका तरजुमा दर्जे ज़ैल है।

कूफ़े में आपका ख़ुत्बा

किताब लहूफ़ पृष्ठ 68 में है कि कूूफ़ा पहुँचने के बाद इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) ने लोगों को ख़ामोश रहने का इशारा किया , सब ख़ामोश हो गये , आप खड़े हुए ख़ुदा की हम्दो सना की। हज़रत बनी सालिम का ज़िक्र किया उन पर सलवात भेजी फिर इरशाद फ़रमाया , ऐ लोगों ! जो मुझे पहचानता है वह तो पहचानता ही है , जो नहीं पहचानता उसे मैं बताता हूँ। मैं अली इब्नुल हुसैन बिन अली बिन अबी तालिब (अ.स.) हूँ। मैं उसका फ़रज़न्द हूँ जिसकी बेहुरमती की गई , जिसका सामान लूट लिया गया , जिसके अहलो अयाल क़ैद कर दिये गये। मैं उसका फ़रज़न्द हूँ जो साहिले फ़ुरात पर ज़ब्हा कर दिया गया और बग़ैर कफ़न व दफ़न छोड़ दिया गया और शहादते हुसैन (अ.स.) हमारे फ़ख़्र के लिये काफ़ी है। ऐ लोगों ! मैं तुम्हे ख़ुदा की क़सम देता हूँ ज़रा सोचो तुम ने ही मेरे पदरे बुज़ुर्गवार को ख़त लिखा और फिर तुम ने ही उनको धोखा दिया , तुम ने ही उनके साथ अहदो पैमान किया और उनकी बैअत की और फिर तुम ने ही उनको शहीद कर दिया। तुम्हारा बुरा हो कि तुम ने अपने लिये हलाकत का सामान इकठ्ठा कर लिया , तुम्हारी राहें किस क़द्र बुरी हैं , तुम किन आख़ों से रसूल (स. अ.) को देखोगे। जब रसूल बाज़ पुर्स करेंगे कि तुम लोगों ने मेरी इतरत को क़त्ल किया और मेरे अहले हरम को ज़लील किया ‘‘ इस लिये तुम मेरी उम्मत से नहीं ’’।

मस्जिदे दमिश्क़ (शाम) में आपका ख़ुत्बा

मक़तल अबी मख़नफ़ पृष्ठ 135 , बेहारूल अनवार जिल्द 10 पृष्ठ 233 , रियाज़ुल कु़द्स जिल्द 2 पृष्ठ 328 और रौज़ातुल अहबाब वग़ैरा में है कि जब हज़रत ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) अहले हरम समेत दरबारे यज़ीद में दाखिल किये गये और उनको मिम्बर पर जाने का मौक़ा मिला तो आप मिम्बर पर तशरीफ़ ले गये और अम्बिया की तरह शीरी ज़बान में निहायत फ़साहत व बलाग़त के साथ ख़ुत्बा इरशाद फ़रमाया। ऐ लोगों ! जो मुझे पहचानता है वह तो पहचानता ही है , जो नहीं पहचानता उसे मैं बताता हूँ कि मैं कौन हूँ सुनो मैं अली बिन हुसैन बिन अली इब्ने अबी तालिब (अ.स.) हूँ। मैं उसका फ़रज़न्द हूँ जिसने हज किये हैं उसका फ़रज़न्द हूँ जिसने तवाफ़े काबा किया है और सई की है। मैं पिसरे ज़मज़म व पृष्ठ हूँ मैं फ़रज़न्दे फ़ात्मा ज़हरा (स. अ.) हूँ मैं उसका फ़रज़न्द हूँ जो पसे गरदन से ज़िब्हा किया गया। मैं उस प्यासे का फ़रज़न्द हूँ जो प्यासा ही दुनिया से उठा। मैं उसका फ़रज़न्द हूँ जिस पर लोगों ने पानी बन्द कर दिया हालां कि तमाम मख़लूक़ात पर पानी जायज़ क़रार दिया। मैं मोहम्मदे मुस्तफ़ा (स. अ.) का फ़रज़न्द हूँ। मैं उसका फ़रज़न्द हूँ जो करबला में शहीद किया गया। मैं उसका फ़रज़न्द हूँ जिसके अनसार ज़मीन में आराम की निन्द सो गये मैं उसका पिसर हूँ जिसके अहले हरम क़ैद कर दिये गये। मैं उसका फ़रज़न्द हूँ जिसके बच्चे बग़ैर जुर्मों ख़ता ज़िब्हा कर डाले गये। मैं उसका बेटा हूँ जिसके ख़ेमों में आग लगा दी गई। मैं उसका फ़रज़न्द हूँ जो ज़मीने करबला पर शहीद कर दिया गया। मैं उसका फ़रज़न्द हूँ जिसको न ग़ुस्ल दिया गया और न कफ़न। मैं उसका फ़रज़न्द हूँ जिसका सर नोके नैज़ा पर बुलन्द किया गया। मैं उसका फ़रज़न्द हूँ जिसके अहले हरम की करबला में बेहुरमी की गई। मैं उसका फ़रज़न्द हूँ जिसका जिस्म ज़मीने करबला पर छोड़ दिया गया और सर दूसरे मक़ामात पर नोके नैज़ा पर बुलन्द कर के फिराया गया। मैं उसका फ़रज़न्द हूँ जिसके इर्द गिर्द सिवाए दुश्मन के कोई और न था। मैं उसका फ़रज़न्द हूँ जिसके अहले हरम को क़ैद कर के शाम तक फिराया गया। मैं उसका फ़रज़न्द हूँ जो बे यारो मददगार था। फिर इमाम (अ.स.) ने फ़रमाया लोगों ख़ुदा ने हम को पाँच चीजो से फ़ज़ीलत बख़्शी है। 1. ख़ुदा की क़सम हमारे ही घर से फ़रिश्तों की आमदो रफ़्त रही और हम ही मादने नबूवत व रिसालत हैं। 2. हमारी ही शान में क़ुरआन की आयतें नाज़िल कीं और हम ने लोगों की हिदायत की। 3. शुजाअत हमारे ही घर की कनीज़ है , हम कभी किसी की क़ुव्वत व ताक़त से नहीं डरे और फ़साहत हमारा ही हिस्सा है। जब फ़सहा (ज्ञानी) फ़क़रो मुबाहात करे। 4. हम ही सिरातल मुस्तक़ीम और हिदायत का मरकज़ हैं और इसके लिये इल्म का सर चश्मा हैं जो इल्म हासिल करना चाहे और दुनियां के मोमेनीन के दिलों में हमरी मोहब्बत है। 5. हमारे ही मरतबे आसमानों और ज़मीनों में बुलन्द हैं। अगर हम न होते तो ख़ुदा दुनिया ही को पैदा न करता। हर फ़ख़्र हमारे फ़़ख़्र के सामने पस्त है। हमारे दोस्त रोज़े क़यामत सेरो सेराब होंगे और हमारे दुश्मन रोज़े क़यामत बद बख़्ती में होंगे। जब लोगों ने इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) का कलाम सुना तो चीख़ मार कर रोने और पीटने लगे और उनकी आवाज़ें बे साख़्ता बुलन्द होने लगीं। यह हाल देख कर यज़ीद घबरा उठा कि कहीं कोई फ़ितना न खडा़ हो जाये। इसके लिये उसने रद्दे अमल में फ़ौरन मोअजि़्ज़न को हुक्म दिया कि अज़ान शुरू कर के इमाम के ख़ुत्बे को मुन्क़ता कर दे। जब मोअजि़्ज़न गुलदस्ता ए अज़ान पर गया और कहा ‘‘ अल्लाहो अकबर ’’ (ख़ुदा की ज़ात सब से बुज़ुर्ग व बरतर है) इमाम (अ.स.) ने फ़रमाया तुने एक बड़ी ज़ात की बढ़ाई बयान की एक अज़ीमुश्शान ज़ात की अज़मत का इज़हार किया और जो कुछ कहा हक़ कहा। फिर मोअजि़्ज़न ने काह ‘‘ अश हदोअन ला इलाहा अल्लल्लाह ’’ (मैं गवाही देता हूँ कि नहीं कोई माबूद सिवाए अल्ला के) इमाम (अ.स.) ने फ़रमाया कि मैं भी इस मक़सद की हर गवाह के साथ गवाही देता हूँ और हर इन्कार करने वाले के खि़लाफ़ इक़रार करता हूँ। फिर मोअजि़्ज़न ने कहा ‘‘ अश हदो अन्ना मोहम्मदन रसूल अल्लाह ’’ (मैं गवाही देता हूँ कि मोहम्मद मुस्तफ़ा (स. अ.) अल्लाह के रसूल हैं) ‘‘ फ़बका अलीउन ’’ यह सुन कर हज़रत अली बिन हुसैन (अ.स.) रो पड़े और फ़रमाया ऐ यज़ीद मैं तुझे ख़ुदा का वास्ता दे कर पूछता हूँ बता हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स. अ.) मेरे नाना थे या तेरे ? यज़ीद ने कहा आपके। आपने फ़रमाया , फिर क्यों तूने उनके अहले बैत को शहीद किया ? यज़ीद ने कोई जवाब नहीं दिया और अपने महल में यह कहता हुआ चला गया ‘‘ ला हाजतः ली बिल सलवातः ’’ मुझे नमाज़ से कोई वास्ता नहीं है। इसके बाद मिन्हाल बिन उमर खड़े हुए और कहा ऐ फ़रज़न्दे रसूल (अ.स.) आपका क्या हाल है ? फ़रमाया ऐ मिन्हाल ऐसे शख़्स का क्या हाल पूछते हो जिसका बाप निहायत बे दर्दी से शहीद कर दिया गया। जिसके मद्दगार ख़त्म कर दिये गये हों , जो अपने चारों तरफ़ अहले हरम को क़ैद देख रहा हो जिनका न परदा रह गया न चादरें रह गई , जिनका न कोई मद्दगार है। तुम तो देख ही रहे हो कि मैं मुक़य्यद हूँ , ज़लील रूसवा किया गया हूँ , ना कोई मेरा नासिर है न मद्दगार मैं और मेरे अहले बैत लिबासे कुहना में मलबूस हैं , हम पर नये लिबास हराम कर दिये गये हैं। अब जो मेरा हाल पूछते हो तो मैं तुम्हारे सामने मौजूद हूँ तुम देख ही रहे हो हमारे दुश्मन हमें बुरा भला कहते हैं और हम सुब्हो शाम मौत का इन्तेज़ार करते हैं। फिर फ़रमाया अरब व अजम इस पर फ़ख्र करते हैं कि हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स. अ.) इन में से थे और क़ुरैश अरब पर इस लिये फ़ख़्र करते हैं कि आं हज़रत (स अ व व ) क़ुरैश थे और हम इन के अहले बैत हैं लेकिन हम को क़त्ल किया गया , हम पर ज़ुल्म किया गया , हम पर मुसीबतों के पहाड़ टूट गये और हम को क़ैद कर के दर बदर फिराया गया गोया हमारा हसब बहुत गिरा हुआ है और बहुत ज़लील है , गोया हम इज़्ज़तों की बुलन्दी पर नहीं चढ़े और बुज़ुर्गियों के फ़रश पर जलवा अफ़रोज़ नहीं हुए। आज गोया तमाम यज़ीद और इसके लशकर का हो गया आले मुस्तफ़ा (स अ व व ) यज़ीद की अदना ग़ुलाम हो गई है। यह सुनना था कि हर तरफ़ से रोने पीटने की सदाए बुलन्द हो गईं। यज़ीद बहुत ख़ाएफ़ हुआ कि कोई फ़ितना न खड़ा हो जाए इसने इस शख़्स से कहा जिसने इमाम को मिम्बर पर तशरीफ़ ले जाने को गया था , ‘‘ वयहका अरदत बसअव दह ज़वाली मलकी ’’ तेरा बुरा हो तू इनको मिम्बर पर बिठा कर मेरी सलतनत ख़त्म करना चाहता है। इसने जवाब दिया , ब खु़दा मैं यह न जानता था कि यह लड़का इतनी बुलन्द गुफ़्तुगू करेगा। यज़ीद ने कहा ‘‘ क्या तू नहीं जानता कि यह अहले बैते नबूवत और मादने रिसालत की एक फ़रद है ’’ यह सुन कर मोअजि़्ज़न से न रहा गया और उसने कहा कि ऐ यज़ीद ! ‘‘ अज़कान कज़ालका फ़लम्मा क़लत अबाह ’’ जब तू यह जानता था तो तूने इनके पदरे बुज़ुर्गवार को क्यों शहीद किया ? मोअजि़्ज़न की गुफ़्तुगू सुन कर यज़ीद बरहम हो गया ‘‘ फ़मर बज़र अनक़ह ’’ और मोअजि़्ज़न की गरदन मार देने का हुक्म दिया।

मदीने के क़रीब पहुँच कर आपका ख़ुत्बा

मक़तल अबी मख़नफ़ पृष्ठ 88 में है कि एक साल तक क़ैद खा़ने शाम की सऊबत बरदाश्त करने के बाद जब अहले बैते रसूल (अ.स.) की रिहाई हुई और यह काफ़ला करबला होता हुआ मदीना की तरफ़ चला तो क़रीबे मदीना पहुँच कर इमाम (अ.स.) ने लोगों को ख़ामोश हो जाने का इशारा किया सब के सब ख़ामोश हो गये , आपने फ़रमाया:

हम्द उस ख़ुदा की जो तमाम दुनिया का परवरदिगार है , रोज़े जज़ा का मालिक है। तमाम मख़्लूक़ात का पैदा करने वाला है जो इतना दूर है बुलन्द आसमान से भी बुलन्द है और इतना क़रीब है कि सामने मौजूद है और हमारी बातों को सुनता है। हम ख़ुदा की तारीफ़ करते हैं और उसका शुक्र बजा लाते हैं। अज़ीम हादसों , ज़माने की हौलनांक गरदिशों , दर्द नाक ग़मों , ख़तरनाक आफ़तों शदीद तकलीफ़ों और क़ल्बो जिगर को हिला देने वाली मुसीबतों के नाज़िल होने के वक़्त ऐ लोगों ! खु़दा और सिर्फ़ खु़दा के लिये हम्द है। हम बड़े बड़े मसाएब में मुबतिला किए गए , दीवारे इस्लाम में बहुत बड़ा रखना (शिग़ाफ़) पड़ गया। हज़रत अबू अब्दुल्लाह हुसैन (अ.स.) और उनके अहले बैत शहीद कर दिये गये। इनकी औरतें और बच्चे क़ैद कर दिये गये और लशकरे यज़ीद ने इनके सर हाय मुबारक को बुलन्द नैज़ों पर रख कर शहरों में फिराया। यह वह मुसीबत है जिसके बराबर कोई मुसीबत नहीं। ऐ लोगों ! तुम में से कौन मर्द है जो शहादते हुसैन (अ.स.) के बाद खु़श रहे या कौन सा दिल है जो शहादते हुसैन (अ.स.) से ग़मगीन न हो या कौन सी आंख है जो आंसू को रोक सके। शहादते हुसैन (अ.स.) पर सातों आसमान रोए। समन्दर और उसकी मौजे रोईं , आसमान और उसके अरकान रोए , ज़मीन और उसके अतराफ़ रोए। दरख़्त और उसकी शाख़ें रोईं , मछलियां और समन्दर के गिरदाब रोए। मलाएक मुक़रेबीन और तमाम आसमान वाले रोए। ऐ लोगों ! कौन सा क़ल्ब है जो शहादते हुसैन (अ.स.) की ख़बर सुन कर फट न जाए। कौन सा क़ल्ब है जो महज़ून न हो। कौन सा कान है जो इस मुसीबत को सुन कर जिससे दीवारे इस्लाम में रखना पड़ा , बहरा न हो। ऐ लोगों ! हमारी यह हालत थी कि हम कशाँ कशाँ फिराये जाते थे। दर बदर ठुकराए जाते थे। ज़लील किए गये शहरों से दूर थे गोया हम को औलादे तुर्क दकाबिल समझ लिया गया था हालां कि न हम ने कोई जुर्म किया था न किसी की बुराई का इरतेक़ाब किया था न दीवारे इस्लाम में कोई रखना डाला था और न इन चीज़ों के खि़लाफ़ किया था जो हम ने अपने आबाओ अजदाद से सुना था , ख़ुदा की क़सम अगर हज़रत नबी (स. अ.) भी इन लोगों (लशकरे यज़ीद) को हम से जंग करने के लिये मना करते तो यह न मानते जैसे कि हज़रत नबी (स. अ.) ने हमारी वसीअत का ऐलान किया और इन लोगों ने न माना बल्कि जितना उन्होंने किया है इस से ज़्यादा सुलूक करते। हम ख़ुदा के लिये हैं और खुदा की तरफ़ हमारी बशाग़त है।

रौज़ा ए रसूल (स. अ.) पर इमाम (अ.स.) की फ़रयाद

मक़तल अबी मख़नफ़ पृष्ठ 143 में है कि यह लुटा हुआ काफ़िला मदीने में दाखि़ल हुआ तो हज़रत उम्मे कुलसूम (अ.स.) गिरयाओ बुका करती हुई मस्जिदे नबवी में दाखि़ल हुईं और अर्ज़ कि , ऐ नाना आप पर मेरा सलाम हो ‘‘ अनी नाऐतहू अलैका वलदक अल हुसैन ’’ मैं आपको आपके फ़रज़न्द हुसैन (अ.स.) की ख़बरे शहादत सुनाती हूँ। यह कहना था कि क़ब्रे रसूल (स. अ.) गिरये की सदा बुलन्द हुई और तमाम लोग रोने लगे फिर हज़रत ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) अपने नाना की क़बे्र मुबारक पर तशरीफ़ लाए और अपने रूख़सार क़बे्र मुताहर से रगड़ते हुए यूँ फ़रयाद करने लगे।

اناجیک یاجداه یاخیرمرسل

اناجیک محزوناعلیک موجلا

سبیناکماتسبی الاماء ومسنا

حبیبک مقتول ونسلک ضائع

اسیرا ومالی حامیا ومدافع

من الضرمالاتحمله الاصابع

तरजुमा:

मैं आपसे फ़रयाद करता हूँ ऐ नाना , ऐ तमाम रसूलों में सब से बेहतर आपका महबूब हुसैन (अ.स.) शहीद कर दिया गया और आपकी नस्ल तबाह व बरबाद कर दी गई। ऐ नाना हम सब को इस तरह क़ैद किया गया जिस तरह लावारिस कनीज़ों को कै़द किया जाता है। ऐ नाना हम पर इतने मसाएब ढाए गए जो उंगलियों पर गिने नहीं जा सकते।

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) और ख़ाके शिफ़ा

मिसबाह उल मुजतहिद में है कि हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) के पास एक कपड़े में बंधी हुई थोड़ी सी ख़ाके शिफ़ा रहा करती थी।(मुनाक़िब जिल्द 2 पृष्ठ 329 प्रकाशित मुलतान)

हज़रत के हमराह ख़ाके शिफ़ा का हमेशा रहना तीन हाल से ख़ाली न था या उसे तबर्रूक समझते थे या उस पर नमाज़ में सजदा करते थे या उसे ब हैसीयत मुहाफ़िज़ रखते थे और लोगों को बताना मक़सूद रहता था कि जिसके पास ख़ाके शिफ़ा हो वह जुमला मसाएब व अलाम से महफ़ूज़ रहता है और इसका माल चोरी नहीं होता जैसा कि अहादीस से वाज़े है।

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) और मोहम्मदे हनफ़िया के दरमियान हजरे असवद का फ़ैसला

आले मोहम्मद (अ.स.) के मदीने पहुँचने के बाद इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) के चचा मोहम्मद हनफ़िया ने बरावयते अहले इस्लाम से ख़्वाहिश की कि मुझे तबर्रूकाते इमामत दे दो कि मैं बुर्ज़ग ख़ानदान और इमामत का अहल व हक़दार हूँ। आपने फ़रमाया कि हजरे असवद के पास चलो वह फ़ैसला कर देगा। जब यह हज़रत उसके पास पहुँचे तो वह ब हुक्मे ख़ुदा यूं बोला , ‘‘ इमामत ज़ैनुल आबेदीन का हक़ है ’’ इस फ़ैसले को दोनों ने तसलीम कर लिया।(शवाहेदुन नबूअत पृष्ठ 176 )

कामिल मबरद में है कि इस वाक़िये के बाद से मोहम्मद हनफ़िया इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) की बड़ी इज़्ज़त करते थे। एक दिन अबू ख़ालिद काबली ने उनसे इसकी वजह पूछी तो कहा हजरे असवद ने खि़लाफ़त का इनके हक़ में फ़ैसला दे दिया है और यह इमामे ज़माना हैं यह सुन कर वह मज़हबे इमाम का क़ाएल हो गया।(मुनाक़िब जिल्द 2 पृष्ठ 326 )

सुबूते इमामत में इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) का कन्करी पर मुहर लगाना

उसूले काफ़ी में है कि एक औरत जिसकी उम्र 113 साल की हो चुकी थी एक दिन इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) के पास आई उसके पास वह कन्करी थी जिस पर हज़रत अली (अ.स.) इमाम हसन (अ.स.) इमाम हुसैन (अ.स.) की मोहरे इमामत लगी हुई थी। उसके आते ही बिला कहे हुये आपने फ़रमाया कि वह कन्करी ला जिस पर मेरे आबाओ अजदाद की मोहरें लगी हुई हैं उस पर मैं भी मोहर कर दूँ। चुनान्चे उस ने कन्करी दे दी। आपने उसे मोहर कर के वापस कर दी और उसकी जवानी भी पलटा दी। वह ख़ुश व खुर्रम वापस चली गई।(दमए साकेबा जिल्द 2 पृष्ठ 436 )

वाक़ेए हुर्रा और इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.)

मुस्तनद तवारीख़ में है कि करबला के बेगुनाह क़त्ल ने इस्लाम में एक तहलका डाल दिया। ख़ुसूसन ईरान में एक कौमी जोश पैदा कर दिया जिसने बाद में बनी अब्बास को बनी उमय्या के ग़ारत करने में बड़ी मद्द दी चुंकि यज़ीद तारेकुस्सलात और शराबी था और बेटी बहन से निकाह करता और कुत्तों से खेलता था , उसकी मुलहिदाना हरकतों और इमाम हुसैन (अ.स.) के शहीद करने से मदीने में इस क़द्र जोश फैला कि 62 हिजरी में अहले मदीना ने यज़ीद की मोअत्तली का ऐलान कर दिया और अब्दुल्लाह बिन हनज़ला को अपना सरदार बना कर यजी़द के गर्वनर उस्मान बिन मोहम्मद बिन अबी सुफ़ियान को मदीने से निकाल दिया। स्यूती तारीख़ अल ख़ुलफ़ा में लिखता है कि ग़सील उल मलायका (हनज़ला) कहते हैं कि हम ने उस वक़्त तक यज़ीद की खि़लाफ़त से इन्कार नहीं किया जब तक हमें यह यक़ीन नहीं हो गया कि आसमान से पत्थर बरस पड़ेंगे। ग़ज़ब है कि लोग मां बहनों और बेटियां से निकाह करें , ऐलानियां शराब पियें और नमाज़ छोड़ बैठें।

यज़ीद ने मुस्लिम बिन अक़बा को जो ख़ूं रेज़ी की कसरत के सबब (मुसरिफ़) के नाम से मशहूर है फ़ौजे कसीर दे कर अहले मदीना की सरकोबी को रवाना किया। अहले मदीना ने बाब अल तैबा के क़रीब मक़ामे ‘‘ हुर्रा ’’ पर शामियों का मुक़ाबला किया। घमासान का रन पड़ा , मुसलमानों की तादाद शामियों से बहुत कम थी इस के बावजूद उन्होंने दादे मरदानगी दी मगर आखि़र शिकस्त खाई। मदीने के चीदा चीदा बहादुर रसूल अल्लाह (स. अ.) के बड़े बड़े सहाबी , अन्सार व महाजिर इस हंगामे आफ़त में शहीद हुए। शामी घरों में घुस गये। मज़ारात को उनकी ज़ीनत और आराईश की ख़ातिर मिसमार कर दिया। हज़ारों औरतों से बदकारी की। हज़ारों बाकरा लड़कियों का बकारत (बलात्कार) कर डाला। शहर को लूट लिया। तीन दिन क़त्ले आम कराया दस हज़ार से ज़्यादा बाशिन्दगाने मदीना जिन में सात सौ महाजिर और अन्सार और इतने ही हामेलान व हाफ़ेज़ाने क़ुरआन व उलेमा व सुलोहा मोहद्दिस थे इस वाक़िये में मक़्तूल हुए। हज़ारों लड़के लड़कियां गु़लाम बनाई गईं और बाक़ी लोगों से बशर्ते क़ुबूले ग़ुलामी यज़ीद की बैयत ली गई। मस्जिदे नबवी और हज़रत के हरमे मोहतरम में घोड़े बंधवाये गए। यहां तक कि लीद का अम्बार लग गए। यह वाक़िया जो तारीख़े इस्लाम में वाक़ेए हर्रा के नाम से मशहूर है 27 ज़िलहिज 63 हिजरी को हुआ था। इस वाक़िये पर मौलवी अमीर अली लिखते हैं कि कुफ़्र व बुत परस्ती ने फिर ग़लबा पाया। एक फ़िरंगी मोवरिख़ लिखता है कि कुफ्ऱ का दोबारा जन्म लेना इस्लाम के लिये सख़्त ख़ौफ़ नाक और तबाही बख़्श साबित हुआ। बक़ीया तमाम मदीने को यज़ीद का ग़ुलाम बनाया गया। जिसने इन्कार किया उसका सर उतार लिया। इस रूसवाई से सिर्फ़ दो आदमी बचे ‘‘ अली बिन हुसैन (अ.स.) और अली बिन अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास ’’ इन से यज़ीद की बैयत भी नहीं ली गई। मदारिस शिफ़ाख़ाने और दीगर रेफ़ाहे आम की इमारतें जो ख़ुल्फ़ा के ज़माने में बनाई गईं थीं बन्द कर दी गईं या मिस्मार कर दी गईं और अरब फिर एक वीराना बन गया। इसके चन्द मुद्दत बाद अली बिन हुसैन (अ.स.) के पोते जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने अपने जद्दे माजिद अली ए मुर्तुज़ा (अ.स.) का मक़तब फिर मदीना में जारी किया मगर यह सहरा में सिर्फ़ एक ही सच्चा नख़लिस्तान था इसके चारों तरफ़ जु़ल्मत व ज़लालत छाई हुई थी। मदीना फिर कभी न संभला। बनी उमय्या के अहद में मदीना ऐसी उजडी़ बस्ती हो गया कि जब मन्सूरे अब्बासी ज़्यारत को मदीने में आया तो उसे एक रहनुमा की ज़रूरत पड़ी। हवास को वह मकानात बताए जहां इब्तेदाई ज़माने के बुर्ज़ुगाने इस्लाम रहा करते थे।(तारीख़े इस्लाम जिल्द 1 पृष्ठ 36, तारीख़े अबुल फ़िदा जिल्द 1 पृष्ठ 191, तारीख़ फ़ख़्री पृष्ठ 86, तारीख़े कामिल जिल्द 4 पृष्ठ 49, सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 132 )

वाक़ेए हुर्रा और आपकी क़याम गाह

तवारीख़ से मालूम होता है कि आपकी एक छोटी सी जगह ‘‘मुन्बा ’’ नामी थी जहां खेती बाड़ी का काम होता था। वाक़ेए हुर्रा के मौक़े पर शहरे मदीना से निकल कर अपने गाँव चले गये थे।(तारीख़े कामिल जिल्द 4 पृष्ठ 45 ) यह वही जगह है , जहाँ हज़रत अली (अ.स.) ख़लीफ़ा उस्मान के अहद में क़याम पज़ीर थे।(अक़दे फ़रीद जिल्द 2 पृष्ठ 216 )

ख़ानदानी दुश्मन मरवान के साथ आपकी करम गुस्तरी

वाक़ेए हुर्रा के मौक़े पर जब मरवान ने अपनी और अपने अहलो अयाल की तबाही और बरबादी का यक़ीन कर लिया तो अब्दुल्लाह इब्ने उमर के पास जा कर कहने लगा कि हमारी मुहाफ़ज़त करो। हुकूमत की नज़र मेरी तरफ़ से भी फिरी हुई है मैं जान और औरतों की बेहुरमती से डरता हूँ। उन्होंने साफ़ इन्कार कर दिया। उस वह इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) के पास आया और उसने अपनी और अपने बच्चों की तबाही व बरबादी का हवाला दे कर हिफ़ाज़त की दरख़्वास्त की हज़रत ने यह ख़्याल किए बग़ैर कि यह ख़ानदानी हमारा दुश्मन है और इसने वाक़ेए करबला के सिलसिले में पूरी दुश्मनी का मुज़ाहेरा किया है। आपने फ़रमाया बेहतर है कि अपने बच्चों को मेरे पास बमुक़ाम मुनबा भेज दो , जहां पर मेरे बच्चे रहेंगे तुम्हारे भी रहेंगे। चुनान्चे वह अपने बाल बच्चों को जिन में हज़रत उसमान की बेटी आयशा भी थी आपके पास पहुँचा गया और आपने सब की मुकम्मल हिफ़ाज़त फ़रमाई।(तारीख़े कामिल जिल्द 4 पृष्ठ 45 )

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) और मुस्लिम बिन अक़बा

अल्लामा मसूदी लिखते हैं कि मदीने के इन हंगामी हालात में एक दिन मुस्लिम बिन अक़बा ने इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) को बुला भेजा। अभी वह पहुँचे न थे कि उसने अपने पास के बैठने वालों से आपकी ख़ानदानी बुराई शुरू की और न जाने क्या क्या कह डाला लेकिन अल्लाह रे आपका रोब व जलाल कि ज्यों ही आप उसके पास पहुँचे वह ब सरो क़द ताज़ीम के लिये खड़ा हो गया। बात चीत के बाद जब आप तशरीफ़ ले गये तो किसी ने मुस्लिम से कहा कि तूने इतनी शानदार ताज़ीम क्यो कि उसने जवाब दिया , मैं क़सदन व इरादतन ऐसा नहीं किया बल्कि उनके रोब व जलाल की वजह से मजबूरन ऐसा किया है।

(मरूजुल ज़हब मसउदी बर हाशिया तारीख़े कामिल जिल्द 6 पृष्ठ 106 )

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) से बैअत का सवाल न करने की वजह

मुवर्रेख़ीन का इत्तेफ़ाक़ है कि वाक़ेए हर्रा में मदीने का कोई शख़्स ऐसा न था जो यज़ीद की बैअत न करे और क़त्ल होने से बच जाए लेकिन इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) बैअत न करने के बावजूद महफ़ूज़ रहे , बल्कि उसे यूं कहा जाए कि आप से बैअत तलब ही नहीं की गई। अल्लामा जलालउद्दीन हुसैनी मिसरी अपनी किताब ‘‘ अल हुसैन ’’ में लिखते हैं कि यज़ीद का हुक्म था कि सब से बैअत लेना। अली इब्नुल हुसैन को (अ.स.) को न छेड़ना वरना वह भी सवाले बैअत पर हुसैनी किरदार पेश करेंगे और एक नया हंगामा खड़ा हो जायेगा।

दुश्मने अज़ली हसीन बिन नमीर के साथ आपकी करम नवाज़ी

मदीने को तबाह बरबाद करने के बाद मुस्लिम बिन अक़बह इब्तिदाए 64 हिजरी में मदीने से मक्का को रवाना हो गया। इत्तेफ़ाक़न राह में बीमार हो कर वह गुमराह , राहिए जहन्नम हो गया मरते वक़्त उस ने हसीन बिन नमीर को अपना जा नशीन मुक़र्रर कर दिया। उसने वहां पहुँच कर ख़ाना ए काबा पर संग बारी की और उस में आग लगा दी , उसके बाद मुकम्मिल मुहासरा कर के अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर को क़त्ल करना चाहा। इस मुहासरे को चालीस दिन गुज़रे थे कि यज़ीद पलीद वासिले जहन्नम हो गया। उसके मरने की ख़बर से इब्ने ज़ुबैर ने ग़लबा हासिल कर लिया और यह वहां से भाग कर मदीना जा पहुँचा।

मदीने के दौरान क़याम में इस मलऊन ने एक दिन ब वक़्ते शब चन्द सवारों को ले कर फ़ौज के ग़िज़ाई सामान की फ़राहमी के लिये एक गाँव की राह पकड़ी। रास्ते में उसकी मुलाक़ात हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) से हो गई , आपके हमराह कुछ ऊटँ थे जिन पर ग़िज़ाई सामान लदा हुआ था। उसने आप से वह ग़ल्ला ख़रीदना चाहा , आपने फ़रमाया कि अगर तुझे ज़रूरत है तो यूं ही ले ले हम इसे फ़रोख़्त नहीं कर सकते (क्यों कि मैं इसे फ़ुक़राए मदीना के लाया हूँ) उसने पूछा की आपका नाम क्या है ? आपने फ़रमाया ‘‘ अली इब्नुल हुसैन ’’ कहते हैं। फिर आपने उससे नाम दरयाफ़्त किया तो उसने कहा मैं हसीन बिन नमीर हूँ। अल्लाह रे आपकी करम नवाज़ी , आपने यह जानने के बावजूद कि यह मेरे बाप के क़ातिलों में से है उसे सारा ग़ल्ला दे दिया (और फ़ुक़रा के लिये दूसरा बन्दो बस्त फ़रमाया) उसने जब आपकी यह करम गुस्तरी देखी और अच्छी तरह पहचान भी लिया तो कहने लगा कि यज़ीद का इन्तेक़ाल हो चुका है आपसे ज़्यादा मुस्तहक़े खि़लाफ़त कोई नहीं। आप मेरे साथ तशरीफ़ ले चलें मैं आपको तख़्ते खि़लाफ़त पर बैठा दूंगा। आप ने फ़रमाया कि मैं ख़ुदा वन्दे आलम से अहद कर चुका हूँ कि ज़ाहिरी खि़लाफ़त क़बूल न करूंगा। यह फ़रमा कर आप अपने दौलत सरा को तशरीफ़ ले गये।(तरीख़े तबरी फ़ारसी पृष्ठ 644 )

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) और फ़ुक़राऐ मदीना की किफ़ालत

अल्लामा इब्ने तल्हा शाफ़ेई लिखते हैं कि हज़रत ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) फ़ुक़राए मदीना के 100 घरों की किफ़ालत फ़रमाते थे और सारा सामान उन के घर पहुँचाया करते थे। उनमे बहुत ज़्यादा ऐसे घराने थे जिनमें आप यह भी मालम न होने देते थे कि यह सामान ख़ुरदोनोश रात को कौन दे जाता है। आपका उसूल यह था कि बोरियाँ पुश्त पर लाद कर घरों में रोटी और आटा वग़ैरा पहुँचाते थे और यह सिलसिला ता बहयात जारी रहा। बाज़ मोअज़्ज़ेज़ीन का कहना है कि हमने अहले मदीना को यह कहते सुना है कि इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) की ज़िन्दगी तक हम ख़ुफ़िया ग़िज़ाई रसद से महरूम नहीं हुए।(मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 265, नुरूल अबसार पृष्ठ 126 )

हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) और खेती

अहादीस में है कि ज़राअत (खेती) व काश्त कारी सुन्नत है। हज़रत इदरीस के अलावा कि वह ख़य्याती करते थे। तक़रीबन जुमला अम्बिया ज़राअत किया करते थे। हज़रात आइम्माए ताहेरीन (अ.स.) का भी यही पेशा रहा है लेकिन यह हज़रात इस काश्त कारी से ख़ुद फ़ायदा नहीं उठाते थे बल्कि इस से ग़ुरबा , फ़ुक़रा और तयूर के लिये रोज़ी फ़राहम किया करते थे। हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) फ़रमाते हैं ‘‘ माअजरा अलज़रा लतालब अलफ़ज़ल फ़ीह वमाअज़रा अलालैतना वलहू अल फ़क़ीरो जुल हाजता वलैतना वल मना अलक़बरता ख़सता मन अल तैर ’’ मैं अपना फ़ायदा हासिल करते के लिये ज़राअत नहीं किया करता बल्कि मैं इस लिये ज़राअत करता हूँ कि इस से ग़रीबों , फ़क़ीरों मोहताजों और ताएरों ख़ुसूसन कु़बर्रहू को रोज़ी फ़राहम करूँ।(सफ़ीनतुल बेहार जिल्द 1 पृष्ठ 549 )

वाज़े हो कि कु़बरहू वह ताएर हैं जो अपने महले इबादत में कहा करता है ‘‘ अल्लाह हुम्मा लाअन मबग़ज़ी आले मोहम्मद ’’ ख़ुदाया उन लोगों पर लानत कर जो आले मोहम्मद (स अ व व ) से बुग़्ज़ रखते हैं।(लबाब अल तावील बग़वी)

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) और फ़ित्नाए इब्ने ज़ुबैर

मुवर्रिख़ मि0 ज़ाकिर हुसैन लिखते हैं कि अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर जो आले मोहम्मद (स. अ.) का शदीद दुश्मन था 3 हिजरी में हज़रत अबू बकर की बड़ी साहब ज़ादी असमा के बतन से पैदा हुआ , इसे खि़लाफ़त की बड़ी फ़िक्र थी। इसी लिये जंगे जमल में मैदान गरम करने में उसने पूरी सई से काम लिया था। यह शख़्स इन्तेहाई कन्जूस और बनी हाशिम का सख़्त दुश्मन था और उन्हें बहुत सताता था। बरवाएते मसूदी उसने जाफ़र बिन अब्बास से कहा कि मैं चालीस बरस से तुम बनी हाशिम से दुश्मनी रखता हूँ। इमाम हुसैन (अ.स.) की शहादत के बाद 61 हिजरी में मक्का में और रजब 64 हिजरी में मुल्के शाम के बाज़ इलाक़ों के अलावा तमाम मुमालिके इस्लाम में इसकी बैअत कर ली गई। अक़दुल फ़रीद और मरूज उज़ ज़हब में है कि जब इसकी कु़व्वत बहुत बढ़ गई तो उसने ख़ुतबे में हज़रत अली (अ.स.) की मज़म्मत की और चालीस रोज़ तक ख़ुत्बे में दुरूद नहीं पढ़ा और मोहम्मद हनफ़िया और इब्ने अब्बास और दीगर बनी हाशिम को बैअत के लिये बुलाया उन्होंने इन्कार किया तो बरसरे मिम्बर उनको गालियां दीं और ख़ुत्बे से रसूल अल्लाह (स. अ.) का नाम निकाल डाला और जब इसके बारे में इस पर एतिराज़ किया गया तो जवाब दिया कि इस से बनी हाशिम बहुत फ़ुलते हैं , मैं दिल में कह लिया करता हूँ। इसके बाद उस ने मोहम्मद हनफ़िया और इब्ने अब्बास को हब्से बेजा में मय 15 बनी हाशिम के क़ैद कर दिया और लकड़िया क़ैद ख़ाने के दरवाज़े पर चिन दीं और कहा कि अगर बैअत न करोगे तो मैं आग लगा दूंगा। जिस तरह बनी हाशिम के इन्कारे बैअत पर लकड़िया चिनवा दी गई थीं। इतने में वह फ़ौज वहां पहुँच गई जिसे मुख़्तार ने उनकी मदद के लिये अब्दुल्लाह जदली की सर करदगी में भेजी थी और उसने इन मोहतरम लोगों को बचा लिया और वहां से ताएफ़ पहुँचा दिया।(अक़दे फ़रीद व मसूदी)

उन्हीं हालात की बिना पर हज़रत ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) अकसर फ़ित्नाए इब्ने ज़ुबैर का ज़िक्र फ़रमाते थे। आलिमे अहले सुन्न्त अल्लामा शिबली लिखते हैं कि अबू हमज़ा शुमाली का बयान है कि एक दिन हज़रत की खि़दमत में हाज़िर हुआ और चाहा कि आपसे मुलाक़ात करूँ लेकिन चूंकि आप घर के अन्दर थे , इस लिये सुए अदब समझते हुए मैंने आवाज़ न दी। थोड़ी देर के बाद ख़ुद बाहर तशरीफ़ लाए और मुझे हमराह ले कर एक जानिब रवाना हो गए। रास्ते में आपने एक दिवार की तरफ़ इशारा करते हुए फ़रमाया , ऐ अबू हमज़ा ! मैं एक दिन सख़्त रंजो अलम में इस दीवार से टेक लगाए खड़ा था और सोच रहा था कि इब्ने ज़ुबैर के फ़ितने से बनी हाशिम को क्यों कर बचाया जाए। इतने में एक शरीफ़ और मुकद्दस बुज़ुर्ग साफ़ सुथरे कपड़े पहने हुए मेरे पास आए और कहने लगे आखि़र क्यों परेशान खड़े हैं ? मैंने कहा मुझे फ़ितनाए इब्ने ज़ुबैर का ग़म और उसकी फ़िक्र है। वह बोले , ऐ अली इब्नुल हुसैन (अ.स.) ! घबराओ नहीं जो ख़ुदा से डरता है , ख़ुदा उसकी मद्द करता है। जो उससे तलब करता है वह उसे देता है। यह कह कर वह मुक़द्दस शख़्स मेरी नज़रों से ग़ाएब हो गये और हातिफ़े ग़ैबी ने आवाज़ दी। ‘‘ हाज़ल खि़ज़्र ना हबाक़ा ’’ कि यह जो आपसे बातें कर रहे थे वह जनाबे खि़ज्ऱ (अ.स.) थे।(नुरूल अबसार पृष्ठ 129, मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 264, शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 178 ) वाज़े हो कि यह रवायत बरादराने अहले सुन्नत की है। हमारे नज़दीक इमाम कायनात की हर चीज़ से वाक़िफ़ होता है।


हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) की अपने पदरे बुज़ुर्गवार के क़र्ज़े से सुबुक दोशी

उलेमा का बयान है कि हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) क़ैद ख़ाना ए शाम से छूट कर मदीने पहुँचने के बाद से अपने पदरे बुज़ुर्गवार हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) के क़र्ज़े की अदाएगी की फ़िक्र में रहा करते थे और चाहते थे कि किसी न किसी सूरत से 75 हज़ार दीनार जो हज़रत सय्यदुश शोहदा का क़र्ज़ा है मैं अदा कर दूं। बिल आखि़र आपने ‘‘ चश्मए तहनस ’’ को जो कि इमाम हुसैन (अ.स.) का बामक़ाम ‘‘ ज़ी ख़शब ’’ बनवाया हुआ था फ़रोख़्त कर के क़रज़े की अदाएगी से सुबुक दोशी हासिल फ़रमाई। चशमे के बेचने में यह शर्त थी कि शबे शम्बा को पानी लेने का हक़ ख़रीदने वाले को न होगा बल्कि उसकी हक़दार सिर्फ़ इमाम (अ.स.) की हमशीरा होंगी।

(बेहारूल अनवार , वफ़ा अल वफ़ा जिल्द 2 पृष्ठ 249 व मनाक़िब जिल्द 4 पृष्ठ 114 )

माविया इब्ने यज़ीद की तख़्त नशीनी और इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.)

यज़ीद के मरने के बाद उसका बेटा अबू लैला , माविया बिन यज़ीद ख़लीफ़ा ए वक़्त बना दिया गया। वह इस ओहदे को क़बूल करने पर राज़ी न था क्यों कि वह फ़ितरतन हज़रत अली (अ.स.) की मोहब्बत पर पैदा हुआ था और उनकी औलाद को दोस्त रखता था। बा रवायत हबीब अल सैर उसने लोगों से कहा कि मेरे लिये खि़लाफ़त सज़ावार और मुनासिब नहीं है मैं ज़रूरी समझता हूँ कि इस मामले में तुम्हारी रहबरी करूँ और बता दूं कि यह मन्सब किस के लिये ज़ेबा है , सुनो ! इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) मौजूद हैं उन में किसी तरह का कोई ऐब निकाला नहीं जा सकता। वह इस के हक़ दार और मुस्तहक़ हैं , तुम लोग उनसे मिलो और उन्हें राज़ी करो अगरचे मैं जानता हूँ कि वह इसे क़ुबूल न करेंगे।

मिस्टर ज़ाकिर हुसैन लिखते हैं कि 64 हिजरी में यज़ीद के मरते ही माविया बिन यज़ीद की बैअत शाम में , अब्दुल्लाह इब्ने ज़ुबैर की हिजाज़ और यमन में हो गई और अब्दुल्लाह इब्ने ज़ियाद ईराक़ में ख़लीफ़ा बन गया।

माविया इब्ने यज़ीद हिल्म व सलीम अल बतआ जवाने सालेह था। वह अपने ख़ानदान की ख़ताओं और बुराईयों को नफ़रत की नज़र से देखता और अली (अ.स.) और औलादे अली (अ.स.) को मुस्तहक़े खि़लाफ़त समझता था।(तारीख़े इस्लाम जिल्द 1 पृष्ठ 37 ) अल्लामा मआसिर रक़म तराज़ हैं कि 64 हिजरी में यज़ीद मरा तो उसका बेटा माविया ख़लीफ़ा बनाया गया। उसने चालीस रोज़ और बाज़ क़ौल के मुताबिक़ 5 माह खि़लाफ़त की। उसके बाद ख़ुद खि़लाफ़त छोड़ दी और अपने को खि़लाफ़त से अलग कर लिया। इस तरह कि एक रोज़ मिम्बर पर चढ़ कर देर तक ख़ामोश बैठा रहा फिर कहा , ‘‘ लोगों ! ’’ मुझे तुम लोगों पर हुकूमत करने की ख़्वाहिश नहीं है क्यों कि मैं तुम लोगों की जिस बात (गुमराही और बे ईमानी) को ना पसन्द करता हूँ वह मामूली दरजे की नहीं बल्कि बहुत बड़ी है और यह भी जानता हूँ कि तुम लोग भी मुझे ना पसन्द करते हो इस लिये कि मैं तुम लोगों की खि़लाफ़त से बड़े अज़ाब में मुब्तिला और गिरफ़्तार हूँ और तुम लोग भी मेरी हुकूमत के सबब मुमराही की सख़्त मुसीबत में पड़े हो। ‘‘ सुन लो ’’ कि मेरे दादा माविया ने इस खि़लाफ़त के लिये उस बुज़ुर्ग से जंगो जदल की जो इस खि़लाफ़त के लिये उस से कहीं ज़्यादा सज़ावार और मुस्तहक़ थे और वह हज़रत इस खि़लाफ़त के लिये सिर्फ़ माविया ही नहीं बल्कि दूसरे लोगों से भी अफ़ज़ल थे इस सबब से कि हज़रत को हज़रत रसूले ख़ुदा (स. अ.) से क़राबते क़रीबिया हासिल थी। हज़रत के फ़जा़एल बहुत थे। ख़ुदा के यहां हज़रत को सब से ज़्यादा तक़र्रूब हासिल था। हज़रत तमाम सहाबा , महाजेरीन से ज़्यादा अज़ीम उल क़द्र , सब से ज़्यादा बहादुर , सब से ज़्यादा साहेबे इल्म , सब से पहले ईमान लोने वाले , सब से आला अशरफ़ दर्जा रखने वाले और सब से पहले हज़रत रसूले ख़ुदा (स. अ.) की सोहबत का फ़ख्ऱ हासिल करने वाले थे। अलावा इन फ़ज़ाएल व मनाक़िब के वह जनाबे हज़रत रसूले ख़ुदा (स. अ.) के चचा ज़ाद भाई , हज़रत के दामाद और हज़रत के दीनी भाई थे जिनसे हज़रत ने कई बार मवाख़ात फ़रमाई। जनाबे हसनैन (अ.स.) जवानाने अहले बेहिश्त के सरदार और इस उम्मत में सब से अफ़ज़ल और परवरदए रसूल (स. अ.) और फ़ात्मा बुतूल (स. अ.) के दो लाल यानी पाको पाकीज़ा दरख़ते रिसालत के फूल थे। उनके पदरे बुज़ुर्गवार हज़रत अली (अ.स.) ही थे। ऐसे बुज़ुर्ग से मेरा दादा जिस तरह सरकशी पर आमादा हुआ उसको तुम लोग ख़ूब जानते हो और मेरे दादा की वजह से तुम लोग जिस गुमराही में पड़े उस से भी तुम लोग बे ख़बर नहीं हो। यहां तक कि मेरे दादा को उसके इरादे में कामयाबी हुई और उसके दुनिया के सब काम बन गए मगर जब उसकी अजल उसके क़रीब पहुँच गई और मौत के पंजों ने उसको अपने शिकंजे में कस लिया तो वह अपने आमाल में इस तरह गिरफ़्तार हो कर रह गया कि अपनी क़ब्र में अकेला पड़ा है और जो ज़ुल्म कर चुका था उन सब को अपने सामने पा रहा है और जो शैतनत व फ़िरऔनियत उसने इख़्तेयार कर रखी थी उन सब को अपनी आख़ों से देख रहा है। फिर यह खि़लाफ़त मेरे बाप यज़ीद के सिपुर्द हुई तो जिस गुमराही में मेरा दादा था उसी ज़लालत में पड़ कर मेरा बाप भी ख़लीफ़ा बन बैठा और तुम लोगों की हुकूमत अपने हाथ में ले ली हालां कि मेरा बाप यज़ीद भी इस्लाम कुश बातों दीन सोज़ हरकतों और अपनी रूसियाहियो की वजह से किसी तरह उसका अहल न था कि हज़रत रसूले करीम (स. अ.) की उम्मत का ख़लीफ़ा और उनका सरदार बन सके , मगर वह अपनी नफ़्स परस्ती की वजह से इस गुमराही पर आमादा हो गया और उसने अपने ग़लत कामों को अच्छा समझा जिसके बाद उसने दुनियां में जो अंधेरा किया उस से ज़माना वाक़िफ़ है कि अल्लाह से मुक़ाबला और सरकशी करने तक पर आमादा हो गया और हज़रत रसूले ख़ुदा (स. अ.) से इतनी बग़ावत की कि हज़रत की औलाद का ख़ून बहाने पर कमर बांध ली , मगर उसकी मुद्दत कर रही और उसका ज़ुल्म ख़त्म हो गया। वह अपने आमाल के मज़े चख रहा है और अपने गढ़े (क़ब्र्र) से लिपटा हुआ और अपने गुनाहों की बलाओं में फंसा हुआ पड़ा है। अलबत्ता उसकी सफ़ाकियों के नतीजे जारी और उसकी ख़ूं रेज़ियों की अलामतें बाक़ी हैं। अब वह भी वहां पहुँच गया जहां के लिये अपने करतूतों का ज़ख़ीरा मोहय्या किया था और अब किये पर नादिम हो रहा है। मगर कब ? जब किसी निदामत का कोई फ़ायदा नहीं और वह इस अज़ाब में पड़ गया कि हम लोग उसकी मौत को भूल गये और उसकी जुदाई पर हमें अफ़सोस नहीं होता बल्कि उसका ग़म है कि अब वह किस आफ़त में गिरफ़्तार है , काश मालूम हो जाता कि वहां उसने क्या उज़्र तराशा और फिर उससे क्या कहा गया , क्या वह अपने गुनाहों के अज़ाब में डाल दिया गया और अपने आमाल की सज़ा भुगत रहा है ? मेरा गुमान तो यही है कि ऐसा ही होगा। उसके बाद गिरया उसके गुलूगीर हो गया और वह देर तक रोता रहा और ज़ोर ज़ोर से चीख़ता रहा।

फिर बोला , अब मैं अपने ज़ालिम ख़ानदान बनी उमय्या का तीसरा ख़लीफ़ा बनाया गया हूँ हालां कि जो लोग मुझ पर मेरे दादा और बाप के ज़ुल्मों की वजह से ग़ज़ब नाक हैं उनकी तादाद उन लोगों से कहीं ज़्यादा है जो मुझ से राज़ी हैं।

भाईयों मैं तुम लोगों के गुनाहों के बार उठाने की ताक़त नहीं रखता और ख़ुदा वह दिन भी मुझे न दिखाए कि मैं तुम लोगों की गुमराहियां और बुराईयों के बार से लदा हुआ उसकी दरगाह में पहुँचूँ। अब तुम लोगों को अपनी हुकूमत के बारे में इख़्तेयार है उसे मुझ से ले लो और जिसे पसन्द करो अपना बादशाह बना लो कि मैंने तुम लोगों की गरदनों से अपनी बैअत उठा ली। वस्सलाम। जिस मिम्बर पर माविया इब्ने यज़ीद ख़ुत्बा दे रहा था उसके नीचे मरवान बिन हकम भी बैठा हुआ था। ख़ुत्बा ख़त्म होने पर वह बोला , क्या हज़रत उमर की सुन्नत जारी करने का इरादा है कि जिस तरह उन्होंने अपने बाद खि़लाफ़त को ‘‘ शूरा ’’ के हवाले किया था तुम भी इसे शूरा के सिपुर्द करते हो। इस पर माविया बोला , आप मेरे पास से तशरीफ़ ले जायें , क्या आप मुझे भी मेरे दीन में धोखा देना चाहते हैं। ख़ुदा की क़सम मैं तुम लोगों की खि़लाफ़त का कोई मज़ा नहीं पाता अलबत्ता इसकी तलखि़यां बराबर चख रहा हूँ। जैसे लोग उमर के ज़माने में थे , वैसे ही लोगों को मेरे पास भी लाओ। इसके अलावा जिस तारीख़ से उन्होंने खि़लाफ़त को शूरा के सिपुर्द किया और जिस बुज़ुर्ग हज़रत अली (अ.स.) की अदालत में किसी क़िस्म का शुब्हा किसी को हो भी नहीं सकता , इसको उस से हटा दिया। उस वक़्त से वह भी ऐसा करने की वजह से क्या ज़ालिम नहीं समझे गये। ख़ुदा की क़सम अगर खि़लाफ़त कोई नफ़े की चीज़ है तो मेरे बाप ने उस से नुक़सान उठाया और गुनाह ही का ज़ख़ीरा मोहय्या किया और अगर खि़लाफ़त कोई और वबाल की चीज़ है तो मेरे बाप को उस से जिस क़द्र बुराई हासिल हुई वही काफ़ी है।

यह कह कर माविया उतर आया , फिर उसकी माँ और दूसरे रिश्ते दार उसके पास गये तो देखा कि वह रो रहा है। उसकी मां ने कहा कि काश तू हैज़ ही में ख़त्म हो जाता और इस दिन की नौबत न आती। माविया ने कहा ख़ुदा की क़सम मैं भी यही तमन्ना करता हूँ फिर कहा मेरे रब ने मुझ पर रहम नहीं किया तो मेरी नजात किसी तरह नहीं हो सकती। उसके बाद बनी उमय्या उसके उस्ताद उमर मक़सूस से कहने लगे कि तू ही ने माविया को यह बातें सिखाई हैं और उसको खि़लाफ़त से अलग किया है और अली (अ.स.) व औलादे अली (अ.स.) की मोहब्बत उसके दिल में रासिख़ कर दी है। ग़र्ज़ उसने हम लोगों के जो अयूब व मज़ालिम बयान किये उन सब का बाएस तू ही है और तू ही ने इन बिदअतों को उसकी नज़र में पसंदीदा क़रार दे दिया है जिस पर उस ने यह ख़ुत्बा बयान किया है। मक़सूस ने जवाब दिया ख़ुदा की क़सम मुझ से उसका कोई वास्ता नहीं है बल्कि वह बचपन ही से हज़रत अली (अ.स.) की मोहब्बत पर पैदा हुआ है लेकिन उन लोगों ने बेचारे का कोई उज्ऱ नहीं सुना और क़ब्र खोद कर उसे ज़िन्दा दफ़्न कर दिया।

(तहरीर अल शहादतैन पृष्ठ 102, सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 122, हयातुल हैवान जिल्द 1 पृष्ठ 55, तारीख़े ख़मीस जिल्द 2 पृष्ठ 232, तारीख़े आइम्मा पृष्ठ 391 )

मुवर्रिख़ मिस्टर ज़ाकिर हुसैन लिखते हैं , इसके बाद बनी उमय्या ने माविया बिन यज़ीद को भी ज़हर से शहीद कर दिया। उसकी उम्र 21 साल 18 दिन की थी। उसकी खि़लाफ़त का ज़माना चार महीने और बा रवायते चालीस यौम शुमार किया जाता है। माविया सानी के साथ बनी उमय्या की सुफ़यानी शाख़ की हुकूमत का ख़ात्मा हो गया और मरवानी शाख़ की दाग़ बेल पड़ गई।(तारीख़े इस्लाम जिल्द 1 पृष्ठ 38 ) मुवर्रिख़ इब्नुल वरदी अपनी तारीख़ में लिखते हैं कि माविया इब्ने यज़ीद के मरने के बाद शाम में बनी उमय्या ने मुतफ़्फ़ेक़ा तौर पर मरवान बिन हकम को ख़लीफ़ा बना लिया।

मरवान की हुकूमत सिर्फ़ एक साल क़ायम रही फिर उसके इन्तेक़ाल के बाद उसका लड़का अब्दुल मलिक इब्ने मरवान ख़लीफ़ाए वक़्त क़रार दिया गया।

अब्दुल मलिक इब्ने मरवान और इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.)

65 हिजरी में मरवान के मरने के बाद उसका बेटा अब्दुल मलिक मिस्त्र व शाम का बादशाह तसलीम किया गया। यह बनी उमय्या का असलन नमूना था चूंकि मुसतबद फ़रेबी और ईमान से दूर था। वह अजीब क़ाबलियत के साथ अपनी खि़लाफ़त को मुस्तहकम करने में मसरूफ़ हुआ। उसकी राह में मुख़्तार बिन अबी उबैदा सक़फी और अब्दुल्ला इब्ने ज़ुबैर रूकावट थे। उनके बाद जमादुस्सानिया 73 हिजरी में अब्दुल मलिक इब्ने मरवान तमाम मुमालिके इस्लाम का अकेला बादशाह बन गया। इब्ने ज़ुबैर से लड़ने में चूंकि हज्जाज बिन यूसुफ़ अमवी जरनल ने नुमायां किरदार अदा किया था इस लिये अब्दुल मलिक बिन मरवान ने उसे हिजाज़ का गर्वनर बना दिया था।

75 हिजरी में अब्दुल मलिक ने इसे अपनी मशरिक़ी सलतनत , ईराक़ , फ़ारस और सिस्तान , किरमान और ख़ुरासान का जिसमें काबुल और कुछ हिस्सा मावरा अल नहर का भी शामिल था वायस राय बना दिया।

हज्जाज ने अपनी हिजाज़ की गर्वनरी के ज़माने में मदीने के लोगों पर जिनमें असहाबे रसूल (स. अ.) भी थे बड़े बड़े ज़ुल्म किये। ईराक़ में अपनी बीस बरस की गर्वनरी के दौरान में उसने तक़रीबन डेढ़ लाख (1,50000 और बा रवायत मिशक़ात 5,00000 पांच लाख) बन्दगाने ख़ुदा का ख़ून बहाया था। जिनमें से बहुत लोगों पर झूठे इल्ज़ाम और बोहतान लगाये गये थे। उसकी वफ़ात के वक़्त 50,000 (पचास हज़ार) मर्द व ज़न क़ैद ख़ानों में पड़े हुए उसकी जान को रो रहे थे। बे सख़फ़ (बग़ैर छत) क़ैद ख़ाना उसी की ईजाद है।

इब्ने ख़ल्क़ान लिखता है कि अब्दुल मलिक बड़ा ज़ालिम और सफ़्फ़ाक था और ऐसे ही उसके गवरनर , हज्जाज ईराक़ में , मेहरबान ख़ुरासान में , हश्शाम इब्ने इस्माईल हिजाज़ और मग़रेबी अरब में और उसका बेटा अब्दुल्लाह मिस्त्र में , हस्सान बिन नोमान मग़रिब में , हज्जाज का भाई मोहम्मद बिन यूसुफ़ यमन में , मोहम्मद बिन मरवान जज़ीरे में , यह सब के सब ज़ालिम और सफ़्फ़ाक थे। और मसूदी लिखता है कि बे परवाही से ख़ून बहाने में अब्दुल मलिक के आमिल इसी के नक़्शे क़दम पर चलते थे मुवर्रेख़ीन लिखते हैं कि यह कंजूस , बे रहम , सफ़्फ़ाक , वायदा खि़लाफ़ , दग़ा बाज़ बे ईमान था। यह मतलब बरारी के लिये सब कुछ किया करता था। अख़तल इसके दरबार का मशहूर शायर और ज़हरी मशहूर मोहद्दिस था जिसने सब से अव्वल हदीस की किताब लिखी।(तारीख़े इस्लाम जिल्द 1 पृष्ठ 42 )

ज़हरी का असल नाम इमाम अबू बकर मोहम्मद बिन मुस्लिम बिन अबीद उल्ला इब्ने शहाब ज़हरी मदनी शामी था। यह ताबई फ़क़ीह और मोहद्दिस था। 51 हिजरी में पैदा हो कर 124 हिजरी में फ़ौत हुआ। मदीने के नामी मोहद्दिसों और फ़की़हो में था , अब्दुल मलक और हश्शाम ख़ुल्फ़ा बनी उमय्या की सोहबत में रहा। इमाम मालिक का उस्ताद और इल्मे हदीस का मदून था।

(तारीख़े इस्लाम जिल्द 5 पृष्ठ 79 पृष्ठ 19, 20 )

बहुत से उलमा ने लिखा है कि अब्दुल मलक बिन मरवान ने हुक्म दे दिया था कि अली इब्ने हुसैन (अ.स.) को गिरफ़्तार कर के शाम पहुँचा दिया जाए। चुनांचे आप को जंजीरों में जकड़ कर मदीने से बाहर एक ख़ेमें में ठहरा दिया गया।

ज़हरी का बयान है कि मैं उन्हें रूख़सत करने के लिये उनकी खि़दमत में हाज़िर हुआ। जब मेरी नज़र हथकड़ी और बेड़ियों पर पड़ी तो मेरी आंखों से आंसू निकल पड़े और मैं अर्ज़ परदाज़ हुआ कि काश आपके बजाए लोहे के ज़ेवरात मैं पहन लेता और आप इससे बरी हो जाते। आपने फ़रमाया ज़हरी तुम मेरी हथकड़ियां , बेड़ी और मेरे तौक़े गरां बार को देख कर घबरा रहे हो सुनों ! मुझे इसकी कोई परवाह नहीं है।(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 177 व अरजहुल मतालिब पृष्ठ 422 हयातुल औलिया जिल्द 3 पृष्ठ 135 प्रकाशित मिस्त्र)

अल्लामा मोहम्मद बिन तल्हा शाफ़ेई बा हवाला ज़हरी लिखते हैं कि इस वाक़ेए के बाद अब्दुल मलिक इब्ने मरवान के पास गया मैंने कहा कि ‘‘ ऐ अमीर , लैयसा अली इब्नुल हुसैन हैस तज़न अन्दा मशगू़ल बे रब्बेही ’’ इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) पर किसी क़िस्म का कोई इल्ज़ाम नहीं है। वह तेरी हुकूमत के मामेलात से कोई दिलचस्पी नहीं रखते वह ख़ालिस अल्लाह वाले हैं। कि ज़हरी के तज़किरे ख़ुसूसी के बाद अब्दुल मलिक इब्ने मरवान ने हज्जाज बिन यूसुफ़ को लिखा कि ‘‘ अन यजूतनेबा देमा बनी अब्दुल मुत्तलिब ’’ बनी हाशिम को सताने और उनके ख़ून बहाने से इज्तेनाब करें।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 119 )

अल्लामा शिबली लिखते हैं कि बादशाह ने हज्जाज को इज्तेनाब की वजह भी लिखी थी और वह यह थी कि बनी उमय्या के अकसर बादशाह उन्हें सताकर जल्द तबाह हो गए हैं।(नूरूल अबसार पृष्ठ 127 ) ग़रज़ अब्दुल मलिक के ज़माने में इस वाक़िये के बाद से औलादे अबु तालिब हज्जाज के हाथों से अमान में रही।(तारीख़े इस्लाम जिल्द 1 पृष्ठ 141 )

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) और बुनियादे काबा ए मोहतरम व नसबे हजरे असवद

71 हिजरी में अब्दुल मलिक बिन मरवान ने ईराक़ पर लशकर कशी कर के मसअब बिन ज़ुबैर को क़त्ल किया फिर 72 हिजरी में हज्जाज बिन यूसुफ़ को एक अज़ीम लशकर के साथ अब्दुल्लाह इब्ने ज़ुबैर को क़त्ल करने के लिये मक्के मोअज़्ज़मा रवाना किया।(अबुल फ़िदा) वहीं पहुँच कर हज्जाज ने इब्ने ज़ुबैर से जंग की इब्ने ज़ुबैर ने ज़बर दस्त मुक़ाबला किया और बहुत सी लड़ाईयां हुईं , आखि़र में इब्ने ज़ुबैर महसूर हो गए , और हज्जाज ने इब्ने ज़ुबैर को काबे से निकालने के लिये काबे पर संग बारी शुरू कर दी यही नहीं बल्कि उसे खुदवा डाला। इब्नु ज़ुबैर जमादिल आखि़र 73 हिजरी में क़त्ल हुआ।(तारीख़ इब्नुल वरदी) और हज्जाज जो ख़ाना ए काबा की बुनियाद तक ख़राब कर चुका था , इसकी तामीर की तरफ़ मुतवज्जे हुआ।

अल्लामा सद्दूक़ किताब एललुश शराए में लिखते हैं कि हज्जाज के हदमे काबा के मौक़े पर लोग उसकी मिट्टी तक उठा कर ले गए और काबा को इस तरह लूट लिया कि इसकी कोई पुरानी चीज़ बाक़ी न रही। फिर हज्जाज को ख़्याल पैदा हुआ कि इसकी तामीर करानी चाहिए। चुनान्चे उस ने तामीर का प्रोग्राम मुरत्तब कर लिया और काम शुरू करा दिया। काम की अभी बिल्कुल इब्तेदाई मंज़िल थी कि एक अज़दहा बरामद हो कर ऐसी जगह बैठ गया जिसके हटे बग़ैर काम आगे नहीं बढ़ सकता था। लोगों ने इस वाक़िए की इत्तेला हज्जाज को दी , हज्जाज घबरा उठा और लोगों को जमा कर के उन से मशविरा किया कि अब क्या करना चाहिए। जब लोग इसका हल निकालने से का़सिर रहे तो एक शख़्स ने खड़े हो कर कहा कि आज कर फ़रज़न्दे रसूल (स. अ.) हज़रत ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) यहां आए हुए हैं बेहतर होगा कि उन से दरयाफ़्त कराया जाए यह मसला उनके अलावा कोई हल नहीं कर सकता। चुनान्चे हज्जाज ने आपको ज़हमते तशरीफ़ आवरी दी। आपने फ़रमाया हज्जाज तूने ख़ाना ए काबा को अपनी मीरास समझ लिया। तूने तो बेनाए इब्राहीम (अ.स.) उखड़वा कर रास्ते में डलवा दिया। ‘‘ सुन ! तुझे ख़ुदा उस वक़्त तक काबे की तामीर में कामयाब न होने देगा जब तक तू काबे का लूटा हुआ सामान वापस न मंगाएगा। यह सुन कर ऐलान किया कि काबे से मुतअल्लिक़ जो शय भी किसी के पास हो वह जल्द अज़ जल्द वापस करें चुनान्चे लोगों ने पत्थर मिट्टी वग़ैरा जमा कर दी। जब सब कुछ जमा हो गया तो आप उस अज़दहे के क़रीब गए और वह हट कर एक तरफ़ हो गया। आपने उसकी बुनियाद इस्तेवार की और हज्जाज से फ़रमाया कि इसके ऊपर तामीर करो ‘‘ फ़ल ज़ालिक सार अल बैत मरतफ़अन ’’ फिर इसी बुनियाद पर ख़ाना ए काबा की तामीर बुलन्द हुई। किताब अल ख़राएज वल हराए में अल्लामा कुतब रावन्दी लिखते हैं कि जब तामीरे काबा उस मक़ाम तक पहुँची जिस जगह हजरे असवद नसब करना था यह दुशवारी पैदा हुई कि जब कोई आलिम , ज़ाहिद , क़ाजी़ उसे नस्ब करता था तो ‘‘ यताज़ल ज़लव यज़तरब वला यसतक़र ’’ हजरे असवद मुताज़लज़िल और मुज़तरिब रहता और अपने मुक़ाम पर ठहरता न था बिल आखि़र इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) बुलाए गए और आपने बिस्मिल्लाह कह कर उसे नसब कर दिया , यह देख कर लोगों ने अल्लाहो अकबर का नारा लगाया।(दमए साकेबा जिल्द 2 पृष्ठ 437 ) उल्मा व मुवर्रेख़ीन का बयान है कि हज्जाज बिन यूसुफ़ ने यज़ीद बिन माविया ही की तरह ख़ाना ए काबा पर मिनज़नीक़ से पत्थर वग़ैरा फिकवाए थे।

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) और अब्दुल मलिक बिन मरवान का हज

बादशाहे दुनिया अब्दुल मलिक बिन मरवान अपने अहदे हुकूमत में अपने पाये तख़्त से हज के लिये रवाना हो कर मक्के मोअज़्ज़मा पहुँचा और बादशाहे दीन हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) भी मदीना ए मुनव्वरा से रवाना हो कर पहुँच गए। मनासिके हज के सिलसिले में दोनों का साथ हो गया। हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) आगे आगे चल रहे थे और बादशाह पीछे पीछे चल रहे था। अब्दुल मलिक को यह बात नागवार हुई और उसने आपसे कहा क्या मैंने आप के बाप को क़त्ल किया है जो आप मेरी तरफ़ मुतवज्जे नहीं होते ? आपने फ़रमाया कि जिसने मेरे बाप को क़त्ल किया है उसने अपनी दुनिया व आख़ेरत ख़राब कर ली ह ,ै क्या तू भी यही हौसला रखता है ? उसने कहा नहीं। मेरा मतलब यह है कि आप मेरे पास आयें ताकि मैं आपसे कुछ माली सुलूक करूँ। आपने इरशाद फ़रमाया , मुझे तेरे माले दुनिया की ज़रूरत नहीं है , मुझे देने वाला ख़ुदा है। यह कह कर आपने उसी जगह ज़मीन पर रिदाए मुबारक डाल दी और काबे की तरफ़ इशारा कर के कहा , मेरे मालिक इसे भर दे। इमाम (अ.स.) की ज़बान से अल्फ़ाज़ का निकलना था कि रिदाए मुबारक मोतियों से भर गई। आपने उसे राहे ख़ुदा में दे दिया।(दमए साकेबा , जन्नातुल ख़ुलूद पृष्ठ 23 )

बद किरदार और रिया कार हाजियों की शक्ल

इमामुल हदीस ज़हरी का बयान है कि मैं हज के मौक़े पर इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) के पास मक़ामे अराफ़ात में खड़ा हाजियों को देख रहा था। दफ़तन मेरे मुहं से निकला कि मौला कितने लाख हाजी हैं और कितना ज़बरदस्त शोर मचा हुआ है। हज़रत ने फ़रमाया कि मेरे क़रीब आओ। जब मैं बिल्कुल नज़ीद हुआ तो आपने मेरे चेहरे पर हाथ फेर कर फ़रमाया , ‘‘ अब देखो ’’ जब मैं ने फिर नज़र की तो मुझे लाखों आदमियों में दस हज़ार के एक के तनासुब से इन्सान दिखाई दिये बाक़ी सब के सब बन्दर , कुत्ते , सुअर , भेड़िये और इसी तरह के जानवर नज़र आये। यह देख कर मैं हैरान रह गया। आपने फ़रमाया कि सुनो ! जो सही नियत और सही अक़ीदे के बग़ैर हज करते हैं उनका यही हश्र होता है। ऐ ज़हरी नेक नियत और हमारी मोवद्दत व मोहब्बत के बग़ैर सारे आमाल बेकार हैं।(तफ़सीरे इमाम हसन असकरी व दमए साकेबा , जिल्द 2 पृष्ठ 438 )

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) और एक मर्दे बल्ख़ी

अल्लामा शेख़ तरही और अल्लामा मजलिसी रक़म तराज़ हैं कि बलख़ का रहने वाला एक दोस्त दारे आले मोहम्मद (अ.स.) हमेशा हज किया करता था और जब हज को आता था तो मदीने जा कर इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) की ज़ियारत का शरफ़ भी हासिल किया करता था। एक मरतबा हज से लौटा तो उसकी बीवी ने कहा कि तुम हमेशा अपने इमाम की खि़दमत मे तोहफ़े ले जाते हो मगर उन्होंने आज तक तुम को कुछ न दिया। उसने कहा तौबा करो तुम्हारे लिये यह कहना सज़ावार नहीं है , वह इमामे ज़माना हैं। वह मालिके दीनो दुनियां हैं। वह फ़रज़न्दे रसूल (स. अ.) हैं। वह तुम्हारी बातें सुन रहे हैं। यह सुन कर वह ख़ामोश हो गई। अगले साल जब वह हज से फ़राग़त कर के इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) की खि़दमत में पहुँचा और सलाम व दस्त बोसी के बाद आपके पास बैठा तो आप ने खाना तलब फ़रमाया। हुक्मे इमाम (अ.स.) से मजबूर हो कर उसने इमाम (अ.स.) के साथ खाना खाया। जब दोनों खाना खा चुके तो इमाम के दोस्त बलख़ी ने हाथ धुलाना चाहा। आपने फ़रमाया तू महमान है , यह तेरा काम नहीं। उसने इसरार किया और हाथ धुलाना शुरू कर दिया। जब तश्त भर गया तो आपने पूछा यह क्या है। उसने कहा ‘‘ पानी ’’ हज़रत ने फ़रमाया नहीं ‘‘ याक़ूते अहमर ’’ हैं। जब उसने ग़ौर से देखा तो वह तश्त ‘‘ याकूते सुर्ख ’’ से भरा हुआ था। इसी तरह ‘‘ ज़मुर्रदे सब्ज़ ’’ और ‘‘ दुरे बैज़ ’’ से भर गया। यानी तीन बार ऐसा ही हुआ यह देख कर वह हैरान हो गया और आपके हाथों का बोसा देने लगा। हज़रत ने फ़रमाया इसे लेते जाओ और अपनी बीवी को दे देना और कहना कि हमारे पास और कुछ माले दुनिया से नहीं है। वह शख़्स शरमिन्दा हो कर बोला , मौला आपको हमारी बीवी की बात किसने बता दी ? इमाम (अ.स.) ने फ़रमाया हमें सब मालूम हो जाता है। उसके बाद वह इमाम (अ.स.) से रूख़सत हो कर बीवी के पास पहुँचा। जवाहेरात दे कर सारा वाक़ेया बयान किया। बीवी ने कहा आइन्दा साल मैं भी चल कर ज़ियारत करूँगी। जब दूसरे साल बीवी हमराह रवाना हुई , तो रास्ते में इन्तेक़ाल कर गई। वह शख़्स हज़रत की खि़दमत में रोता पीटता हाज़िर हुआ। हज़रत ने दो रकअत नमाज़ पढ़ कर फ़रमाया , जाओ तुम्हारी बीवी भी ज़िन्दा हो गई है। उस ने क़याम गाह पर लौट कर बीवी को ज़िन्दा पाया। जब वह हाज़िरे खि़दमत हुई तो कहने लगी , ख़ुदा की क़सम इन्होंने मुझे मलकुल मौत से कह कर ज़िन्दा किया था और उस से कहा था कि यह मेरी ज़ायरा है। मैंने इसकी उम्र तीस साल बढ़वा ली है।

(अल मुन्तखि़ब वल बिहार)

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) अख़लाख की दुनियां मे

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) चूंकि फ़रज़न्दे रसूल (स. अ.) थे इस लिये आप में सीरते मोहम्मदिया का होना लाज़मी था। अल्लामा मोहम्मद इब्ने तल्हा शाफ़ेई लिखते हैं कि एक शख़्स ने आपको बुरा भला कहा , आपने फ़रमाया , भाई मैंने तो तेरा कुछ नहीं बिगाड़ा अगर कोई हाजत रखता हो तो बता ताकि मैं पूरी करूं। वह शरमिन्दा हो कर आपके अख़लाख का कलमा पढ़ने लगा।

(मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 267 )

अल्लामा हजरे मक्की लिखते हैं , एक शख़्स ने आपकी बुराई आपके मुंह पर की , आपने उस से बे तवज्जीही बरती। उसने मुख़ातिब कर के कहा मैं तुम को कह रह हूँ। आप ने फ़रमाया मैं हुक्मे ख़ुदा ‘‘ वा अर्ज़ अनालन जाहेलीन ’’ जाहिलों की बात की परवाह न करो , पर अमल कर रहा हूँ।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 120 )

अल्लामा शिब्लन्जी लिखते हैं कि एक शख़्स ने आप से आ कर कहा कि फ़लां शख़्स आपकी बुराई कर रहा था। आपने फ़रमाया कि मुझे उसके पास ले चलो , जब वहां पहुँचे , तो उस से फ़रमाया भाई जो बात तूने मेरे लिये कही है , अगर मैंने ऐसा किया हो तो खु़दा मुझे बख़्शे और अगर नहीं किया तो ख़ुदा तुझे बख़्शे कि तूने बोहतान लगाया।

एक रवायत में है कि आप मस्जिद से निकल कर चले तो एक शख़्श आपको सख़्त अल्फ़ाज़ में गालियां देने लगा। आपने फ़रमाया कि अगर कोई हाजत रखता है तो मैं पूरी करूँ , ‘‘ अच्छा ले ’’ यह पांच हज़ार दिरहम। वह शरमिन्दा हो गया।

एक रवायत में है कि एक शख़्स ने आप पर बोहतान बांधा। आपने फ़रमाया मेरे और जहन्नम के दरमियान एक खाई है अगर मैंने उसे तय कर लिया तो परवाह नहीं , जो जी चाहे कहो और अगर उसे पार न कर सकूं तो मैं इस से ज़्यादा बुराई का मुस्तहक़ हूँ जो तुमने की।(नूरूल अबसार पृष्ठ 126- 127 )

अल्लामा दमीरी लिखते हैं कि एक शामी हज़रत अली (अ.स.) को गालियां दे रहा था। इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) ने फ़रमाया , भाई तुम मुसाफ़िर मालूम होते हो , अच्छा मेरे साथ चलो , मेरे यहां क़याम करो और जो हाजत रखते हो बताओ ताकि मैं पूरी करूं। वह शरमिन्दा हो कर चला गया।(हयातुल हैवान जिल्द 1 पृष्ठ 121 )

अल्लामा तबरिसी लिखते हैं कि एक शख़्स ने आपसे बयान किया कि फ़लां शख़्स आपको गुमराह और बिदअती कहता है। आपने फ़रमाया अफ़सोस है कि तुम ने उसकी हम नशीनी और दोस्ती का कोई ख़्याल न रखा और उसकी बुराई मुझसे बयान कर दी। देखो यह ग़ीबत है अब ऐसा कभी न करना।(एहतेजाज पृष्ठ 304 )

जब कोई सायल आपके पास आता तो ख़ुश व मसरूर हो जाते थे और फ़रमाते थे कि ख़ुदा तेरा भला करे कि तू मेरा ज़ादे राहे आख़ेरत उठाने के लिये आ गया है।(मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 263 )

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) सहीफ़ा ए कामेला में इरशाद फ़रमाते हंै , ख़ुदा वन्दा मेरा कोई दरजा न बढ़ा , मगर यह कि इतना ही खुद मेरे नज़दीक मुझको घटा और मेरे लिये कोई ज़ाहिरी इज़्ज़त न पैदा कर मगर यह कि ख़ुद मेरे नज़दीक इतनी ही बातनी लज़्ज़त पैदा कर दे।

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) और सहीफ़ा ए कामेला

किताब सहीफ़ा ए कामेला आपकी दुआओं का मजमूआ है। इसमें बेशुमार उलूम व फ़ुनून के जौहर मौजूद हैं। यह पहली सदी की तसनीफ़ है।(मआलिम अल उलेमा पृष्ठ 1 तबआ ईरान) इसे उलेमा ए इस्लाम ने ज़ुबूरे आले मोहम्मद (स अ व व ) और इन्जीले अहलेबैत (अ.स.) कहा है।(नेयाबुल मोअद्दता पृष्ठ 499 व फ़ेहरिस्त कुतुब ख़ाना ए तेहरान पृष्ठ 36 ) और उसकी फ़साहत व बलाग़त मआनी को देख कर उसे कुतुबे समाविया और सहफ़े लौहिया व अरशिया का दरजा दिया गया है।(रियाज़ुल सालीक़ैन पृष्ठ 1 ) इसकी चालीस हज़ार शरहें हैं जिनमें मेरे नज़दीक रियाज़ुल सालीकैन को फ़ौकी़यत हासिल है।

हश्शाम बिन अब्दुल मलिक और क़सीदा ए फ़रज़दक़

अब्दुल मलिक इब्ने मरवान का सन् 105 में ख़लीफ़ा होने वाला बेटा हश्शाम बिन अब्दुल मलिक अपने बा पके अहदे हुकूमत में एक मरतबा हज्जे बैतुल्लाह के लिये मक्के मोअज़्ज़मा गया। मनासिके हज बजा लाने के सिलसिले में तवाफ़ से फ़राग़त के बाद हजरे असवद का बोसा देने आगे बढ़ा और पूरी कोशिश के बवजूद हाजियों की कसरत की वजह से हजरे असवद के पास न पहुँच सका। आखि़र कार एक कुर्सी पर बैठ कर मजमे के छटने का इन्तेज़ार करने लगा। हश्शाम के गिर्द उसके मानने वालों का अम्बोह कसीर था। यह बैठा हुआ इन्तेज़ार ही कर रहा था कि नागाह एक तरफ़ से फ़रज़न्दे रसूल (स. अ.) हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) बरामद हुए। आपने तवाफ़ के बाद ज्यों ही हजरे असवद की तरफ़ रूख़ किया मजमा फटना लगा , हाजी हटने लगे , रास्ता साफ़ हो गया और आप क़रीब पहुँच कर तक़बील फ़रमाने लगे। हश्शाम जो कुर्सी पर बैठा हुआ था हालात का मुतालेआ कर रहा था जल भुन कर ख़ाक हो गया और उसके साथी बहरे हैरत में ग़र्क़ हो गये। एक मुंह चढ़े ने हश्शाम से पूछा , हुज़ूर यह कौन हैं ? हश्शाम ने यह समझते हुए कि अगर तअर्रूफ़ करा दिया और इन्हें बता दिया कि यह ख़ानदाने रिसालत के चश्मों चिराग़ हैं तो कहीं मेरे मानने वालों की निगाह मेरी तरफ़ से फिर कर उनकी तरफ़ मुड़ न जाये। तजाहुले आरोफ़ाना के तौर पर कहने लगा , ‘‘ मआ अरफ़ा ’’ मैं नहीं पहचानता। यह सुन कर शायरे दरबार जनाब फ़रज़दक़ से न रहा गया और उन्होंने शामियों की तरफ़ मुख़ातिब हो कर कहा , ‘‘ अना अराफ़ा ’’ इसे मैं जानता हूँ कि यह कौन हैं , ‘‘ मुझ से सुनो ’’ यह कह कर उन्होंने इरतेजालन और फ़िल बदीहा एक अज़ीम उश्शान क़सीदा पढ़ना शुरू कर दिया जिसका पहला शेर यह है तरजुमा यह वह शख़्स है जिस को खाना ए काबा हिल्लो हरम सब पहचानते हैं और उसके क़दम रखने की जगह , क़दम की चाप को ज़मीन बतहा भी महसूस कर लेती है। मैं इस रदीफ़ में इस क़सीदे का उर्दू मनजूम तरजुमा दर्ज ज़ैल करता हूँ।

यह वह है जानता है मक्का जिसके नक़्शे क़दम

ख़ुदा का घर भी है , आगाह और हिल्लो हरम

जो बेहतरीन ख़लाएक़ है उस का है फ़रज़न्द

है पाक व ज़ाहिद व पाकीज़ा व बुलन्द हशम

कु़रैश लिखते हैं जब , इसे तू कहते हैं

बुर्ज़ुगियों पे हुई इसकी इन्तेहाए करम

इस क़सीदे के तमाम नाक़ेलीन ने पहला शेर यह लिखा है।

हाज़ल लज़ी ताअररूफ अल बतहा व तातहू

वाअल बैतया अरफ़हू वाअलहलव अलहरम

लेकिन यह मालूम होने के बाद कि क़सीदे के लिये मतला ज़रूरी होता है। उसे पहला शेर क़रार नहीं दिया जा सकता , अल बत्ता यह मुम्किन है कि यह समझा जाए कि शायर ने मौक़े के लेहाज़ से अपने क़सीदे की इस वक़्त पढ़ने की इब्तेदा इसी शेर से की थी और मुवर्रेख़ीन ने इसी शेर को पहला शेर क़रार दे दिया। अल्लामा अब्दुल्लाह इब्ने मोहम्मद इब्ने यूसुफ़ ज़ाज़नी अल मौतूफ़ी 231 हिजरी शरहे सबहे मुअल्लेक़ात में लिखते हैं कि इस क़सीदे का पहला शेर यह है।

या साएली एन हल अलजदू व अल करम

अन्दी बयान अज़ा , तलाबहा क़दम

क़सीदाऐ फ़रज़दक़ के मुतालिक़ एक ग़लत फ़हमी और उसका इज़ाला

इमामे अहले सुन्नत मोहम्मद अब्दुल क़ादिर सईद अलराफ़ई ने 1927 ई0 में शाएर अरब अबू अलतमाम हबीब अदस बिन हारस ताई आमली शामी बग़दाद के कीवान ‘‘ हमासह ’’ के मिस्र प्रकाशित कराया है। इसकी जिल्द 2 पृष्ठ 284 पर इस क़सीदे के इब्तेदाई 6 अश्आर को नक़ल कर के लिखा है कि यह अश्आर ‘‘ हज़ीन अल कनानी ’’ के हैं। इसने उन्हें अब्दुल्लाह बिन अब्दुल मलिक बिन मरवान की मदह में कहे थे , साथ ही साथ यह भी लिखा है ‘‘व अलनास यरोदन हाज़ह अल बयात अलप फ़रज़ोक़ यमदह बहा अली इबनुल हुसैन बिन अबी तालिब व हैग़लतमन रदहाफ़ह लान हाज़ा लेस ममायदहा बेही मिस्ल अली बिन अल हुसैन व लहमन अल फ़ज़ल अलबा हरमालैसा ला हद फ़ी वक़तहू ’’ और लोग जो इन अबयात के मुताअल्लिक़ यह रवायत करते हैं कि यह फ़रज़दक़ के हैं और उसने उन्हें मदहे ‘‘ इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) ‘‘ में कहा है ग़लत है क्यों कि यह अशआर उनके शायाने शान नहीं हैं वह तो अपने वक़्त के सब से बड़े साहेबे फ़ज़ीलत थे। मैं कहता हूँ कि यह अशआर फ़रज़दक ही के हैं क्यों कि इसे बेशुमार फ़हूल उलमा व मुवर्रेख़ीन ने उन्हीं के अश्आर तसलीम किए हैं जिनमें इमाम अल मोहक़ेक़ीन अल्लामा शेख़ मुफ़ीद अलै हिर रहमा मौतूफ़ी 413 हिजरी व इमाम ज़दज़नी अल मौतूफ़ी 431 हिजरी व अल्लामा इब्ने हजर मक्की व हाफ़िज़ अबू नईम और साहेबे मज़ा फिल अदब शामिल हैं। मुलाहेज़ा हो इरशाद मुफ़ीद पृष्ठ 399 प्रकाशित ईरान 1303 इन उलमा के तसलीम करने के बाद किसी फ़रदे वाहिद के इनकार से कोई असर नहीं पड़ा।

पहुँच गया है यह इज़्ज़त की उस बुलन्दी पर

जहां पर जा सके इस्लाम के अरब व अजम

यह चाहता है कि ले हाथों हाथ रूकने हतीम

जो चूमने हजरे असवद , आए निज़्दे हरम

छड़ी है हाथ में , जिसके महकती है ख़ुशबू

व्ह हाथ जो नहीं इज़्ज़त में और शान में कम

नज़र झुकाए हैं सब यह हया है रोब से लोग

जो मुस्कुराए तो आजाए , बात करने का दम

जबीं के नूरे हिदायत से , कुफ्ऱ घटता है यूँ

ज़ियाए महर से तारीकियाँ , हों जैसे कम

फ़ज़ीलत और नबीयो की इसके जद से है पस्त

तमाम उम्मतें , उम्मत से इसके रूतबे में कम

यह वह दरख़्त है जिसकी है जड़ खुदा का रसूल

इसी से फ़ितरत व आदात भी हैं पाक बहम

यह फ़ात्मा का है , फ़रज़न्द ‘‘ तू नहीं वाक़िफ़ ’’

इसी के जद से नबियों का बढ़ सका न क़दम

अज़ल से लिखी है , हक़ ने शराफ़तों अज़्ज़त

चला इसी के लिये लौह पर खु़दा का क़लम

जो कोई ग़ैज़ दिला दे , तो शेर से बढ़ जाए

सितम करे कोई इस पर तो मौत का नहीं ग़म

ज़र्र न होगा उसे तू , बने हज़ार अन्जान

इसे तो जानते हैं सब अरब तमाम अजम

बरसते हब्र हैं हाथ इसके जिनका फ़ैज़ है आम

वह बरसा करते हैं , यकसाँ कभी नहीं हुए कम

वह नरम है , कि डर जल्द बाज़ियों का नहीं

है हुसने ख़ुल्क , इसी की तो ज़ीनते बाहम

मुसिबतों में क़बीलों के , बार उठाता है

हैं जितने खूब शमाएल , हैं इतने खूब करम

कभी न उसने कहा ‘‘ ला ’’ बजुज़ तशहुद के

अगर न होता तशहुद तो होता ‘‘ ला ’’ भी नअम

खि़लाफ़े वादा नहीं करता , यह मुबारक ज़ात

है मेज़ बान भी , अक़ल व इरादह भी है बहम

तमाम ख़लक़ पे एहसाने आम है इसका

इसी से उठ गया अफ़लासो रंजो फ़क्रा क़दम

मोहब्बत इसकी है ‘‘ दीन ’’ और अदावत इसकी है कुफ़्र

है क़ुरबा इसका , निजातो पनाह का आलम

शुमार ज़ाहिदों का हो , तो पेशवा यहा हो

कि बेहतरीन ख़लाएक़ , इसीको कहते है हम

पहुँचना इसकी सख़ावत , ग़ैर मुम्किन है

सख़ी हों लाख न पांएगे इसकी गरदे क़दम

जो क़हत की हो यह अबरे बारां हैं

जो भड़के जंग की आतिश यह शेर से नहीं कम

न मुफ़लिसी का असर है , फ़राग़ दस्ती पर

कि इसको ज़र की ख़ुशी है न बेज़री का अलम

इसी की चाह से जाती है आफ़त और बदी

इसी की वजह से आती है नेकी और करम

इसी का ज़िक्र मुक़द्दम है बाद ज़िक्रे खु़दा

इसी के नाम से हर बात ख़त्म करते हैं हम

मज़म्मत आने से इसके क़रीब भागती है

करीमे ख़लक़ हैं होती नहीं सख़ावत कम

ख़ुदा बन्दों में है कौन ऐसा जिसका सर

इसी घराने के एहसान से हुआ न हो ख़म

ख़ुदा को जानता है जो इसे भी जानता है

इसी के घर से मिला उम्मतों को दीन बहम

इस क़सीदे को सुन कर हश्शाम ग़ैज़ो ग़ज़ब से पेचो ताब खाने लगा और उसका नाम दरबारी शोअरा की फ़ेहरीस्त से निकाल कर उसे बमुक़ाम असफ़ान क़ैद कर दिया। हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) को जब इसकी क़ैद का हाल मालूम हुआ तो आपने बारह हज़ार दिरहम उसके पास भेजा। फ़रज़दक़ ने यह कह कर वापिस कर दिया कि मैंने दुनियावी उजरत के लिये क़सीदा नहीं कहा है इस से मैं क़सदे सवाब का इरादा रखता हूँ। हज़रत ने फ़रमाया कि हम आले मोहम्मद (अ.स.) का यह उसूल है कि जो चीज़ दे देते हैं फिर उसे वापस नहीं लेते। तुम इसे ले लो। खुदा तुम्हारी नियत का अजरे अज़ीम देगा , वह सब कुछ जानता है। ‘‘ फ़ा क़बलहल फ़रज़दक़ ’’ फ़रज़दक़ ने उसे क़ुबूल कर लिया।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 120 मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 226, अरजहुल मतालिब पृष्ठ 403, मजालिसे अदब , जिल्द 6 पृष्ठ 254, वसीलतुन नजात पृष्ठ 320, तारीख़े अहमदी पृष्ठ 328, तारीख़े आइम्मा पृष्ठ 369, हुलयतुल अवलिया हाफ़िज़ अबू नईम रिसाला हक़ाएक लख़नऊ)

अल्लामा इब्ने हसन जारचवी लिखते हैं कि ‘‘ हश्शाम उनको एक हज़ार दीनार सालाना दिया करता था जब उसने यह रक़म बन्द कर दी तो यह बहुत परेशान हुए। माविया बिने अब्दुल्लाह इब्ने जाफ़रे तय्यार ने कहा , फ़रज़दक़ घबराते क्यों हो , कितने साल ज़िन्दा रहने की उम्मीद है ? उन्होंने कहा यही बीस साल। फ़रमाया कि यह बीस हज़ार दीनार ले लो और हश्शाम का ख़्याल छोड़ दो। उन्होंने कहा मुझे अबू मोहम्मद अली इब्नुल हुसैन (अ.स.) ने भी रक़म इनायत फ़रमाने का इरादा किया था मगर मैंने क़बूल नहीं किया। मैं दुनिया का नहीं आख़ेरत के अज्र का उम्मीदवार हूँ।

बेहारूल अनवार में है कि हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) ने चालीस दीनार अता फ़रमाये और हुआ भी ऐसी ही कि फ़रज़दक़ उसके बाद चालीस साल और ज़िन्दा रहे।(तज़किरा मोहम्मद (स. .अ.) व आले मोहम्मद (अ.स.) जिल्द 2 पृष्ठ 190)

फ़रज़न्दे रसूल (स अ . व . व . ) इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) और मुख़्तार आले मोहम्मद

अब्दुल मलिक बिन मरवान के अहदे खि़लाफ़त में हज़रते मुख़्तार बिन अबू उबैदा सक़फी क़ातेलाने हुसैन से बदला लेने के लिये मैदान में निकल आये।

अल्लामा मसूदी लिखते हैं कि इस मक़सद में कामयाबी हासिल करने के लिये उन्होंने इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) की बैअत करनी चाही मगर आपने बैअत लेने से इन्कार कर दिया।(मरूजुल ज़हब जिल्द 3 पृष्ठ 155 ) अल्लामा नुरूल्लाह शूस्तरी शहीदे सालिस तहरीर फ़रमाते हैं कि अल्लामा हिल्ली ने मुख़्तार को मक़बूल लोगों में शुमार किया है। इमाम मोहम्मद बाक़र (अ.स.) ने उन पर नुक़ता चीनी करने से रोका है और इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने उनके लिये रहमत की दुआ की है।(मजालेसुल मोमेनीन जिल्द 346 )

अल्लामा मजलिसी लिखते हैं कि हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) ने उनकी कार गुज़ारी के लिससिले में ख़ुदा का शुक्र अदा किया है।

(जिलाउल उयून)

आप कूफ़े के रहने वाले थे। जनाबे मुस्लिम इब्ने अक़ील को आप ही ने सब से पहले मेहमान रखा था। आपको इब्ने ज़ियाद ने आले मोहम्मद (अ.स.) से मोहब्बत के जुर्म में कै़द कर दिया था। वहां से छूटने के बाद आप ने ख़ूने हुसैन (अ.स.) का बदला लेने का अज़मे बिल जज़म कर लिया था। चुनान्चे 26 हिजरी में एक बड़ी जमाअत के साथ बरामद हो कर कूफ़े के हाकिम बन बैठे और आपने किताब , सुन्नत और इन्तेक़ामे ख़ूने हुसैन (अ.स.) पर बैअत ले कर बड़ी मुस्तैदी से इन्तेक़ाम लेना शुरू कर दिया। शिम्र को क़त्ल कर दिया , ख़ूली को क़त्ल कर के आग में जला दिया , उमर बिन सअद और उसके बेटे हफ़स को क़त्ल किया।(तारीख़ अबुल फ़िदा)

मुल्ला मुबीन लिखते हैं कि शिम्र को क़त्ल कर के उसकी लाश को उसी तरह घोड़ों की टापों से पामाल कर दिया जिस तरह उसने इमाम हुसैन (अ.स.) की लाशे मुबारक को पामाल किया था।(वसीलतुन नजात) 67 हिजरी में इब्ने ज़ियाद को गिरफ़्तार करने के लिये इब्राहीम इब्ने मालिके अशतर की सरकरदगी में एक बड़ा लशकर मूसल भेजा जहां का वह उस वक़्त गर्वनर था। शदीद जंग के बाद इब्राहीम ने उसे क़त्ल किया और उसका सर मुख़्तार के पास भेज कर बाक़ी बदन नज़रे आतश कर दिया।(अबुल फ़िदा) फिर मुख़्तार के हुक्म से कै़स इब्ने अशअस की गरदन मारी गई। बजदल इब्ने सलीम (जिसने इमाम हुसैन (अ.स.) की उंगली एक अंगूठी के लिये काटी थी) के हाथ पाओं काटे गये। फिर हकीम इब्ने तुफ़ैल पर तीर बारानी की गई। उसने अलमदारे करबला हज़रत अब्बास (अ.स.) को शहीद किया था। इसी के साथ यज़ीद इब्ने सालिक , इमरान बिन ख़ालिद , अब्दुल्लाह बिजली , अब्दुल्लाह इब्ने क़ैस ज़रआ इब्ने शरीक , सबीह शामी और सनान बिन अनस तलवार के घाट उतारे गये।(हबीब उल सैर) उमर बिन हज्जाज भी गिरफ़्तार हो कर क़त्ल हुआ।(रौज़तुल सफ़ा)

मिन्हाल बिन उमर का कहना है कि मैं इसी दौरान में हज के लिये गया तो हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) से मुलाक़ात हुई। आपने पूछा हुरमुला बिन काहिल असदी का क्या हश्र हुआ ? मैंने कहा वह तो सालिम था। आपने आसमान की तरफ़ हाथ उठा कर फ़रमाया , ख़ुदाया उसे आतशे तेग़ का मज़ा चखा। जब मैं कूफ़े वापस आया और मुख़्तार से मिला और उन से वाक़ेया बयान किया तो वह इमाम (अ.स.) की बद दुआ की तकमील पर सजदा ए शुक्र अदा करने लगे।ग़र्ज़ कि आपने बेशुमार क़ातेलाने हुसैन (अ.स.) को तलवार के घाट उतार दिया।

क़ाज़ी मेबज़ी ने शरहे दीवाने मुतर्ज़वी में लिखा है कि मुख़्तारे आले मोहम्मद(स. अ.) के हाथों से क़त्ल होने वालों की तादाद अस्सी हज़ार तीन सौ तीन (80,303) थी।

मुवर्रेख़ीन का बयान है कि जनाबे मुख़्तार के सामने जिस वक़्त इब्ने ज़ियाद मलऊन का सर रखा गया था तो एक सांप आ कर उसके मुंह में घुस कर नाक से निकलने लगा। इसी तरह देर तक आता जाता रहा। वह यह भी लिखते हैं कि हज़रते मुख़्तार ने इब्ने ज़ियाद का सर हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) की खि़दमत में मदीना ए मुनव्वरा भेज दिया। जिस वक़्त वह सर पहुँचा तो आपने शुक्रे ख़ुदा अदा किया और मुख़्तार को दुआएं दीं। मुवर्रेखी़न का यह भी बयान है कि उसी वक़्त औरतों ने बालों में कंघी करनी और सर में तेल डालना और आंखों में सुरमा लगाना शुरू किया जो वाक़ेए करबला के बाद से इन चीज़ों को छोड़े हुये थीं।(अक़दे फ़रीद जिल्द 2 पृष्ठ 251, नुरूल अबसार पृष्ठ 124, मजालिसे मोमेनीन , बेहारूल अनवार) ग़र्ज़ कि जनाबे मुख़्तार ने इन्तेक़ामे ख़ूने शोहदा लेने के सिलसिले में कारहाय नुमायां किये। बिल आखि़र 14 रमज़ान 67 हिजरी को आप कूफ़े के दारूल इमाराह के बाहर शहीद कर दीये गये। ‘‘ इन्ना लिल्लाहे व इन्ना इलैहे राजेऊन ’’(तफ़सील के लिये मुलाहेज़ा हो किताब मुख़्तार आले मोहम्मद (स. अ.) मोअल्लेफ़ा हक़ीर मतबूआ लाहौर)

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ की निगाह में

86 हिजरी में अब्दुल मलिक इब्ने मरवान के इन्तेक़ाल के बाद उसका बेटा वलीद बिन अब्दुल मलिक ख़लीफ़ा बनाया गया। यह हज्जाज बिन यूसुफ़ की तरह निहायत ज़ालिमों जाबिर था। इसके अहदे ज़ुल्मत में उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ जो कि चचा ज़ाद भाई था , हिजाज़ का गर्वनर मुक़र्रर हुआ। यह बड़ा मुनसिफ़ मिजाज़ और फ़य्याज़ था। उसी के अहदे गर्वनरी का एक वाक़ेया यह है कि 87 हिजरी में सरवरे कायनात के रौज़े की एक दीवार गिर गई थी। जब उसकी मरम्मत का सवाल पैदा हुआ और उसकी ज़रूरत महसूस हुई कि किसी मुक़द्दस हस्ती के हाथ से इसकी इब्तेदा की जाय तो उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ ने हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) ही को सब पर तरजीह दी।(वफ़ा अल वफ़ा जिल्द 1 पृष्ठ 386 ) इसी ने फ़िदक वापस किया था और अमीरल मोमेनीन (अ.स.) पर से तबर्रा की वह बिदअत जो माविया ने जारी की थी बन्द कराई थी।

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) की शहादत

आप अगर चे गोशा नशीनी की ज़िन्दगी बसर फ़रमा रहे थे लेकिन आप के रूहानी इक़तेदार की वजह से बादशाहे वक़्त वलीद बिन अब्दुल मलिक ने आपको ज़हर दिया और आप बतारीख़ 25 मोहर्रमुल हराम 95 हिजरी मुताबिक़ 714 ई0 को दरजा ए शहादत पर फ़ाएज़ हो गये। इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) ने नमाज़े जनाज़े पढ़ाई और आप मदीने के जन्नतुल बक़ी में दफ़्न कर दिये गये।

अल्लामा शिब्लन्जी , अल्लामा इब्ने सबाग़ मालेकी , अल्लामा सिब्ते इब्ने जोज़ी तहरीर फ़रमाते हैं कि ‘‘ व अनल लज़ी समआ अल वलीद बिन अब्दुल मलिक ’’ जिसने आपको ज़हर दे कर शहीद किया वह वलीद बिन अब्दुल मलिक ख़लीफ़ा ए वक़्त है।(नूरूल अबसार पृष्ठ 128, सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 120, फ़ुसूल अल महमा , तज़किराए सिब्ते जौज़ी , अरजहुल मतालिब पृष्ठ 444, मनाक़िब जिल्द 4 पृष्ठ 121 ) मुल्ला जामी तहरीर फ़रमाते हैं कि आपकी शहादीन के बाद आपका नाक़ा क़ब्र पार नाला व फ़रियाद करता हुआ तीन रोज़ में मर गया।(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 179 ) शहादत के वक़्त आपकी उम्र 57 साल की थी।

आपकी औलाद

उलेमा ए फ़रीक़ैन का इत्तेफ़ाक़ है कि आपने ग्यारह लड़के और चार लड़कियां छोड़ीं।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 120 व अरजहुल मतालिब पृष्ठ 444 )

अल्लामा शेख़ मुफ़ीद फ़रमाते हैं कि उन 15 अवलादों के नाम यह हैं।

1. हज़रत इमाम मोहम्मद (अ.स.) आपकी वालेदा हज़रत इमाम हसन (अ.स.) की बेटी अम्मे अब्दुल्लाह जनाबे फ़ात्मा थीं।

2. अब्दुल्लाह ,

3. हसन ,

4. ज़ैद ,

5. उमर ,

6. हुसैन ,

7. अब्दुल रहमान ,

8. सुलैमान ,

9. अली ,

10. मोहम्मद असग़र ,

11. हुसैन असग़र

12. ख़दीजा ,

13. फ़ात्मा ,

14. आलीया

15. उम्मे कुल्सूम।

(इरशाद मुफ़ीद फ़ारसी पृष्ठ 401 )

जनाबे ज़ैद शहीद

आपकी औलाद में हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़र (अ.स.) के बाद सब से नुमाया हैसियत जनाबे ज़ैद शहीद की है। आप 80 हिजरी में पैदा हुये। 121 हिजरी में हश्शाम बिन अब्दुल मलिक से तंग आ कर आप अपने हम नवा तलाश करने लगे और यकुम सफ़र 122 हिजरी को चालीस हज़ार (40000) कूफ़ीयों समैत मैदान में निकल आये। ऐन मौक़ा ए जंग में कूफ़ीयों ने साथ छोड़ दिया। बाज़ मआसरीन लिखते हैं कि कूफ़ीयों के साथ छोड़ने का सबब इमाम अबू हनीफ़ा की नकस बैअत है क्यों कि उन्होंने पहले जनाबे ज़ैद की बैअत की थी फिर जब हश्शाम ने आपको दरबार में बुला कर इमामे आज़म का खि़ताब दिया तो यह हुकूमत के साथ हो गये और उन्होंने ज़ैद की बैअत तोड़ दी। इसी वजह से उनके तमाम मानने वाले उन्हें छोड़ कर अलग हो गये। उस वक़्त आपने फ़रमाया ‘‘ रफ़ज़त मूनी ’’ ऐ कूफी़यों ! तुम ने मेरा साथ छोड़ दिया। इसी फ़रमाने की वजह से कूफ़ीयों को राफ़ज़ी कहा जाता है। जहां उस वक़्त चंद अफ़राद के सिवा कोई भी शिया न था सब हज़रते उस्मान और अमीरे माविया के मानने वाले थे। ग़रज़ के दौराने जंग में आपकी पेशानी पर एक तीर लगा जिसकी वजह से आप ज़मीन पर तशरीफ़ लाये यह देख कर आपका एक ख़ादिम आगे बढ़ा और उसने आपको उठा कर एक मकान में पहुँचा दिया। ज़ख़्म कारी था , काफ़ी इलाज के बवजूद जां बर न हो सके फिर आपके ख़ादिमों ने ख़ुफ़िया तौर पर आप को दफ़्न कर दिया और क़ब्र पर से पानी गुज़ार दिया ताकि क़ब्र का पता न चल सके लेकिन दुश्मानों ने सुराग लगा कर लाश क़ब्र से निकाल ली और सर काट कर हश्शाम के पास भेजने के बाद आपके बदन को सूली पर लटका दिया। चार साल तक यह जिस्म सूली पर लटका रहा। ख़ुदा की क़ुदरत तो देखिये उसने मकड़ी को हुक्म दिया और उसने आपके औरतैन (पोशीदा मक़ामात) पर घना जाला तान दिया।(ख़मीस जिल्द 2 पृष्ठ 357 व हयातुल हैवान) चार साल के बाद आपके जिस्म को नज़रे आतश कर के राख दरियाए फ़रात में बहा दी गई।(उमदतुल मतालिब पृष्ठ 248 )

शहादत के वक़्त आपकी उम्र 42 साल की थी। हज़रत ज़ैद शहीदे अज़ीम मनाक़िब व फ़ज़ाएल के मालिक थे। आपको ‘‘ हलीफ़ अल क़ुरआन ’’ कहा जाता था। आप ही की औलाद को ज़ैदी कहा जाता है और चूंकि आपका क़याम बा मक़ाम वासित था इस लिये बाज़ हज़रात अपने नाम के साथ ज़ैदी अल वास्ती लिखते हैं। तारीख़ इब्नुल वरदी में है कि 38 हिजरी में हज्जाज बिन यूसुफ़ ने शहरे वासित की बुनियाद डाली थी। जनाबे ज़ैद के चार बेटे थे जिनमें जनाबे याहया बिन ज़ैद की शुजाअत के कारनामे तारीख़ के अवराख़ में सोने के हुुरूफ़ से लिखे जाने के क़ाबिल हैं। आप दादहियाल की तरफ़ से हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) और नानिहाल की तरफ़ से जनाबे मोहम्मद बिन हनफ़िया की यादगार थे। आपकी वालेदा का नाम ‘‘ रेता ’’ था जो मोहम्मद बिन हनफ़िया की पोती थीं। नसले रसूल (स. अ.) में होने की वजह से आपको क़त्ल करने की कोशिश की गई। आपने जान के तहफ़्फ़ुज़ के लिये यादगार जंग की। बिल आखि़र 125 हिजरी में आप शहीद हो गये। फिर वलीद बिन यज़ीद बिन अब्दुल मलिक के हुक्म से आपका सर काटा गया और हाथ पाओं काटे गये। उसके बाद लाशे मुबारक सूली पर लटका दी गई फिर एक अरसे के बाद उसे उतार कर जलाया गया और हथौड़े से कूट कूट कर रेज़ा रेज़ा किया गया फिर एक बोरे में रख कर कशती के ज़रिये से एक एक मुठ्ठी राख दरियाए फ़रात की सतह पर छिड़क दी गई। इस तरह इस फ़रज़न्दे रसूल (स. अ.) के साथ ज़ुल्मे अज़ीम किया गया।

1. उन्होंने सलतनते हश्शाम में दावा ए खि़लाफ़त किया था बहुत से लोगों ने बैअत कर ली थी। तदाएन , बसरा , वास्ता , मूसल , ख़ुरासान , रै , जरजान के अलावा सिर्फ़ कूफ़े ही के 15 हज़ार शख़्स थे। जब यूसुफ़ सक़फ़ी उनके मुक़ाबले में आया तो यह सब लोग उन्हें छोड़ कर भाग गये। ज़ैद शहीद ने फ़रमाया ‘‘ ज़फ़ज़र अल यौम ’’ उस दिन से राफ़ज़ी का लफ़्ज़ निकाला...... इनके चार फ़रज़न्द थे। 1. यहीया , 2. हुसैन , 3. ईसा , 4. मोहम्मद। सादाते बाराह व बिल गिराम का नसब मोहम्मद बिन ईसा तक पहुँचता है।(किताब रहमतुल आलेमीन जिल्द 2 पृष्ठ 142 )

ईसा बिन ज़ैद

यह भी जनाबे ज़ैद शहीद के निहायत बहादुर साहब ज़ादे थे। ख़लीफ़ा ए वक़्त आपके भी ख़ून का प्यासा था। आप अपना हसब नसब ज़ाहिर न कर सकते थे। ख़लीफ़ा ए जाबिर की वजह से रूपोशी की ज़िन्दगी गुज़ारते थे। कूफ़े में आब पाशी का काम शुरू कर दिया था और वहीं एक औरत से शादी कर ली थी और उस से भी अपना हसब नसब ज़ाहिर नहीं किया था। इस औरत से आपकी एक बेटी पैदा हुई जो बड़ी हो कर शादी के क़ाबिल हो गई। इसी दौरान में आपने एक मालदार बेहिश्ती के वहां मुलाज़ेमत कर ली जिसके एक लड़का था। मालदार बेहिश्ती ने जनाबे ईसा की बीवी से अपने लड़के का पैग़ाम दिया। जनाबे ईसा की बीवी बहुत ख़ुश हुई कि मालदार घराने से लड़की का रिश्ता आया है जब जनाबे ईसा घर तशरीफ़ लाये तो उनकी बीवी ने कहा कि मेरी लड़की की तक़दीर चमक उठी है क्यों कि मालदार घराने से पैग़ाम आया है यह सुनना था कि जनाबे ईसा सख़्त परेशान हुयें बिल आखि़र खुदा से दुआ की , बारे इलाहा सैदानी ग़ैरे सय्यद से बिहाई जा रही है मालिक मेरी लड़की को मौत दे दे। लड़की बीमार हुई और दफ़अतन उसी दिन इन्तेक़ाल कर गई। उसके इन्तेक़ाल पर आप रो रहे थे उनके एक दोस्त ने कहा कि इतने बहादुर हो कर आप रोते हैं उन्होंने फ़रमाया कि इसके मरने पर नहीं रो रहा हूँ मैं अपनी इस बे बसी पर रो रहा हूँ कि हालात ऐसे हैं कि मैं इस से यह तक नहीं बता सका कि मैं सय्यद हूँ और यह सय्यद ज़ादी है।(उमदतुल मतालिब पृष्ठ 278, मिनहाज अल नदवा पृष्ठ 57 )

अल्लामा अबुल फ़रज़ असफ़हानी अल मतूफ़ी 356 हिजरी लिखते हैं कि जनाबे ईसा बिन ज़ैद ने अपने दोस्त से कहा था कि मैं इस हालत में नहीं हूँ कि इन लोगों को यह बता सकूं ‘‘ बाना ज़ालेका ग़ैर जाएज़ ’’ कि यह शादी जाएज़ नहीं है इस लिये कि यह लड़का हमारे कफ़ो का नहीं है।(मक़ातिल अल तालेबैन पृष्ठ 271, मतबुआ नजफ़े अशरफ़ 1385 हिजरी)


अबु जाफ़र हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर ( अ स )

बाक़रे आले मोहम्मद और ज़ैनुल आबेदीन

किस तरह ज़िन्दा रहे गोया है राज़े किबरिया

करबला की हर बला हर इब्तेला को झेल कर

ज़िन्दगी इनकी हक़ीक़त में है ज़िन्दा मोजेज़ा

साबिर थरयानी (कराची)

हुआ पैदा जहां में , आज वह हमनामे पैग़म्बर

लक़ब बाक़िर है जिसका और कुन्नियत अबु जाफ़र

इमामुल तमुत्तकीं , मन्सूस और मासूम आलम में

नबी का पांचवां नायब , हमारा पांचवां रहबर

हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) के पांचवें जा नशीन , हमारे पांचवें इमाम और सिलसिला ए अस्मत की सातवीं कड़ी थे। आपके वालिदे माजिद सय्यदुस साजेदीन हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) थे और वालेदा माजेदा उम्मे अब्दुल फातेमा बिन्ते हज़रत इमाम हसन (अ.स.) थीं। उलमा का इत्तेफ़ाक़ है कि आप बाप और मां दोनों की तरफ़ से अलवी और नजीबुत तरफ़ैन हाशमी थे। नसब का यह शरफ़ किसी को भी नहीं मिला।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 120 व मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 269 ) आप अपने आबाओ की तरह इमाम मन्सूस , मासूम , इल्मे ज़माना और अफ़ज़ले काएनात थे यानी ख़ुदा की तरफ़ से आप इमाम मासूम और अपने अहदे इमामत में सब से बडे़ आलिम और काएनात में सब से अफ़ज़ल थे।

अल्लामा इब्ने हजर मक्की लिखते हैं कि आप इबादत इल्म और ज़ोहद वग़ैरा में हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) की जीती जागती तस्वीर थे।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 120 ) अल्लामा मोहम्मद तल्हा शाफ़ेई लिखते हैं कि आप इल्म ज़ोहद , तक़वा तहारत सफ़ाए क़ल्ब और दीगर महासिन व फ़ज़ाउल में इस दर्जा पर फ़ाएज़ थे कि यह सिफ़ात खुद इनकी तरफ़ इन्तेसाब से मुम्ताज़ क़रार पाया।(मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 269 )

अल्लामा इब्ने साद का कहना है कि आप ताबेईन के तीसरे तबक़े में से थे और बहुत बड़े आलम , आबिद और सुक़्क़ा थे। इब्ने शाहब ज़हरी और इमाम निसाई ने आपको सुक़्क़ा फ़क़ीह लिखा है। फ़कु़हा की बड़ी जमाअत ने आप से रवायत की है। अता का बयान है कि उलमा को अज़रूए इल्म किसी के सामने इस क़दर अपने आप का झूठा समझते हुए नहीं देखा जिस तरह कि वह अपने आपको इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) के रू ब रू समझते थे। मैंने हाकिम जैसे आलिम को उनके सामने सिपर अन्दाख़्ता देखा है।(अरजहुल मतालिब पृष्ठ 446 )

साहबे रौज़तुल पृष्ठ का कहना है कि हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) के फ़ज़ाएल लिखने के लिये एक अलाहेदा किताब दरकार है। ख़्वाजा मोहम्मद पारसा लिखते हैं कि ‘‘ इमाम बारआ मजमुए जलालहू व कमालहू ’’ आप अज़ीमुश्शान इमाम व पेशवा और जामेए सफ़ात जलाल व कमाल थे।(फ़सल अल ख़ताब)

अल्लामा शेख़ मोहम्मद खि़ज़री लिखते हैं कि इमाम मोहम्मदे बाक़िर (अ.स.) अपने ज़माने में बनी हाशिम के सरदार थे।(तारीख़े फ़क़ा पृष्ठ 179 प्रकाशित कराची)

आपकी विलादत बा सआदत

हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) ब तारीख़ यकुम रजबुल मुरज्जब 57 हिजरी यौमे जुमा मदीना ए मुनव्वरा में पैदा हुए।(अल्लामा अलवरी पृष्ठ 155 व जलाल उल उयून पृष्ठ 26 व जनातुल ख़लूद पृष्ठ 25 )

अल्लामा मजलिसी फ़रमाते हैं कि जब आप बतने मादर में तशरीफ़ लाए तो आबाओ अजदाद की तरह आपके घर में आवाज़े गै़बी आने लगी और जब नौ माह के हुए तो फ़रिश्तों की बेइन्तेहा आवाज़ें आने लगीं और शबे विलादत एक नूर साते हुआ। विलादत के बाद क़िबला रूख़ हो कर आसमान की तरफ़ रूख़ फ़रमाया और(आदम की मानिन्द) तीन बार छींकने के बाद हम्दे खुदा बजा लाए , एक शबाना रोज़ दस्ते मुबारक से नूर साते रहा। आप ख़तना करदा , नाफ़ बुरीदा , तमाम अलाइशों से पाक और साफ़ मुतवल्लिद हुए थे।(जलाल अल उयून पृष्ठ 259 )

इस्मे गिरामी ,कुन्नियत और अलक़ाब

आपका इस्मे गिरामी ‘‘ लौहे महफ़ूज़ ’’ के मुताबिक़ और सरवरे काएनात (स. अ.) की ताय्युन के मुआफ़िक़ ‘‘ मोहम्मद ’’ था। आपकी कुन्नियत ‘‘ अबू जाफ़र ’’ थी और आपके अलक़ाब कसीर थे जिनमें बाक़िर , शाकिर , हादी ज़्यादा मशहूर हैं।(मतालेबुस सूऊल शवाहेदुन नबूअत पृष्ठ 181 )

बाक़िर की वजह तसमिया

बाक़िर बक़रह से मुशतक और इसी का इस्म फ़ाएल है इसके मानी शक करने और वसअत देने के हैं।(अलमन्जिद पृष्ठ 41 ) हज़रत इमाम मोहम्मदे बाक़िर (अ.स.) को इस लक़ब से इस लिये मुलक़्क़ब किया गया था कि आपने उलूम व मआरिफ़ को नुमाया फ़रमाया और हक़ाएक़ अहकाम व हिकमत व लताएफ़ के वह सरबस्ता ख़ज़ाने ज़ाहिर फ़रमाए जो लोगों पर ज़ाहिरो हुवैदा न थे।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 10, मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 269, शवाहेदुन नबूअत पृष्ठ 181 )

जौहरी ने अपनी सहाह में लिखा है कि ‘‘ तवससया फ़िल इल्म ’’ को बक़रह कहते है। इसी लिये इमाम मोहम्मद बिन अली को बाक़िर से मुलक़्क़ब किया जाता है। अल्लामा सिब्ते इब्ने जौज़ी का कहना है कि कसरते सुजूद की वजह से चुंकि आपकी पेशानी वसी थी इस लिये आपको बाक़िर कहा जाता है और एक वजह यह भी है कि जामिय्यत इलमिया की वजह से आपको यह लक़ब दिया गया है। शहीदे सालिस अल्लामा नूर उल्लाह शुश्तरी का कहना है कि आँ हज़रत (स. अ.) ने इरशाद फ़रमाया है कि इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) उलूमो मारिफ़ को इस तरह शिग़ाफ़ता करेंगे जिस तरह ज़ेराअत के लिये ज़मीन शिग़ाफ़ता की जाती है।(मजालिस अल मोमेनीन पृष्ठ 117 )

बादशाहाने वक़्त

आप 57 हिजरी में मावीया इब्ने अबी सुफ़ियान के अहद में पैदा हुए 60 हिजरी में यज़ीद बिन मावीयाा बादशाहे वक़्त रहा 64 हिजरी में मावीया बिन यज़ीद और मरवान बिन हकम बादशाह रहे। 65 हिजरी से 86 हिजरी तक अब्दुल्ल मलिक बिन मरवान ख़लीफ़ा ए वक़्त रहा। फिर 86 से 96 हिजरी तक वलीद बिन अब्दुल मलिक ने हुक्मरानी की। इसी ने 95 हिजरी में आपके वालिदे माजिद को दर्जए शहादत पर फ़ाएज़ कर दिया। इसी 95 हिजरी से आपकी इमामत का आग़ाज़ हुआ और 114 हिजरी तक आप फ़राएज़े इमामत अदा फ़रमाते रहे। इसी दौरान वलीद अब्दुल मलिक के बाद सलमान बिन अब्दुल मलिक , उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ , यज़ीद इब्ने अब्दुल मलिक और हश्शाम बिन अब्दुल मलिक बादशाहे वक़्त रहे।(अलाम अल वरा पृष्ठ 156 )

वाक़ेए करबला में इमाम मोहम्मदे बाक़िर (अ.स.) का हिस्सा

आपकी उमर अभी ढाई साल की थी कि आपको हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) के हम्राह वतने अज़ीज़ मदीना ए मुनव्वरा छोड़ना पड़ा। फिर मदीना से मक्का और वहां से करबला तक की सऊबते सफ़र बरदाश्त करना पड़ी। इसके बाद वाक़ेए करबला के मसाएब देखे , कूफ़ाओ शाम के बाज़ारों और दरबारों का हाल देखा। एक साल शाम में क़ैद रहे फिर वहां से छूट कर 8 रबीउल अव्वल 62 हिजरी को मदीना ए मुनव्वरा वापस हुए। जब आपकी उमर चार साल की हुई तो आप एक दिन कुंए में गिर गए। ख़ुदा ने आपको डूबने से बचा लिया और जब आप पानी से बरामद हुए तो आपके कपड़े और आपका बदन तक भीगा हुआ न था।(मुनाक़िब जिल्द 4 पृष्ठ 109 )

हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) और जाबिर बिन अब्दुल्लाह अंसारी की बाहमी मुलाक़ात

यह मुसल्लेमा हक़ीक़त है कि हज़रत मोहम्मद (स. अ.) ने अपनी ज़ाहेरी ज़िन्दगी के एख़्तेमाम पर इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) की विलादत से तक़रीबन 46 साल पहले जाबिर बिन अब्दुल्लाह अन्सारी के ज़रिए से इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) को सलाम कहलाया था। इमाम (अ.स.) का यह शरफ़ इस दरजे मुम्ताज़ है कि आले मोहम्मद (स. अ.) में से कोई भी इसकी हमसरी नहीं कर सकता।(मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 272 )

मुवर्रेख़ीन का बयान है कि सरवरे काएनात(स. अ.) एक दिन अपनी आग़ोशे मुबारक में हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) को लिये हुए प्यार कर रहे थे नागाह आपके साहबी ए ख़ास जाबिर बिन अब्दुल्लाह हाज़िर हुए। हज़रत ने जाबिर को देख कर फ़रमाया ऐ जाबिर मेरे इस फ़रज़न्द की नस्ल से एक बच्चा पैदा होगा जो इल्मो हिकमत से भर पूर होगा। ऐ जाबिर ! तुम उसका ज़माना पाओगे और उस वक़्त तक ज़िन्दा रहोगे जब तक वह सतहे अर्ज़ पर न आ जाये। ऐ जाबिर ! देखो जब तुम उस से मिलना तो उसे मेरा सलाम कह देना। जाबिर ने इस ख़बर और इस पेशीनगोई को कमाले मसर्रत के साथ सुना और उसी वक़्त से इस बहज़त आफ़रीं साअत का इन्तेज़ार करना शुरू कर दिया। यहां तक कि चश्मे इंतेज़ार पत्थरा गई और आंखों का नूर जाता रहा। जब तक आप बीना थे हर मजलिस व महफ़िल में तलाश करते रहे और जब नूरे नज़र जाता रहा तो ज़बान से पुकारना शुरू कर दिया। आपकी ज़बान पर जब हर वक़्त इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) का नाम रहने लगा तो लोग यह कहने लगे कि जाबिर का दिमाग़ जा़ैफ़े पीरी की वजह से अज़कार रफता हो गया है लेकिन बहर हाल वह वक़्त आ ही गया कि आप पैग़ामे अहमदी और सलामे मोहम्मदी पहुँचाने में कामयाब हो गए। रावी का बयान है कि हम जनाबे जाबिर के पास बैठे हुए थे कि इतने में इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) तशरीफ़ लाए आपके हमराह आपके फ़रज़न्द इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) भी थे। इमाम (अ.स.) ने अपने फ़रज़न्द अरजुमन्द से फ़रमाया कि चचा जाबिर बिन अब्दुल्लाह अनसारी के सर का बोसा दो। उन्होंने फ़ौरन तामील इरशाद फ़रमाया , जाबिर ने इनको अपने सीने से लगा लिया और कहा कि इब्ने रसूल (अ.स.) आपको आपके जद्दे नाम दार हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा(स. अ.) ने सलाम फ़रमाया है। हज़रत ने कहा ऐ जाबिर इन पर और तुम पर मेरी तरफ़ से भी सलाम हो। इसके बाद जाबिर इब्ने अब्दुल्लाह अनसारी ने आप से शफ़ाअत के लिये ज़मानत की दरख़्वास्त की। आपने उसे मनज़ूर फ़रमाया और कहा कि मैं तुम्हारे जन्नत में जाने का ज़ामिन हूँ।

(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 120 वसीला अल नजात पृष्ठ 338 मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 373 शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 181, नूरूल अबसार पृष्ठ 14, रेजाल कशी पृष्ठ 27 तारीख़ तबरी जिल्द 3 पृष्ठ 96 मजालिस अल मोमेनीन पृष्ठ 117 )

अल्लामा मोहम्मद बिन तल्हा शाफ़ेई का बयान है कि आँ हज़रत ने यह भी फ़रमाया था कि ‘‘ अन बकारक बादा रौयते ही यसरा ’’ कि ऐ जाबिर मेरा पैग़ाम पहुँचाने के बाद बहुत थोड़ा ज़िन्दा रहोगे चुनान्चे ऐसा ही हुआ।(मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 273 )

सात साल की उम्र में इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) का हज्जे ख़ाना ए काबा

अल्लामा जामी तहरीर फ़रमाते हैं कि रावी बयान करता है कि मैं हज के लिये जा रहा था , रास्ता पुर ख़तर और इन्तेहाई तारीक था। जब मैं लक़ो दक़ सहरा में पहुँचा तो एक तरफ़ से कुछ रौशनी की किरन नज़र आई मैं उसकी तरफ़ देख ही रहा था कि नागाह एक सात साल का लड़का मेरे क़रीब आ पहुँचा। मैंने सलाम का जवाब देने के बाद उस से पूछा कि आप कौन हैं ? कहां से आ रहे हैं और कहां का इरादा है और आपके पास ज़ादे राह क्या है ? उसने जवाब दिया , सुनो में ख़ुदा की तरफ़ से आ रहा हूँ और ख़ुदा की तरफ़ जा रहा हूँ। मेरा ज़ादे राह ‘‘ तक़वा ’’ है मैं अरबी उल नस्ल , कुरैशी ख़ानदान का अलवी नजा़द हूँ। मेरा नाम मोहम्मद बिन अली बिन हुसैन बिन अली बिन अबी तालिब है। यह कह कर वह नज़रों से ग़ायब हो गए और मुझे पता न चल सका कि आसमान की तरफ़ परवाज़ कर गये या ज़मीन में समा गये।(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 183 )

हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) और इस्लाम में सिक्के की इब्तेदा

मुवर्रिख़ शहीर ज़ाकिर हुसैन तारीख़े इस्लाम जिल्द 1 पृष्ठ 42 में लिखते हैं कि अब्दुल मलिक बिन मरवान ने 75 हिजरी में इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) की सलाह से इस्लामी सिक्का जारी किया। इससे पहले रोम व ईरान का सिक्का इस्लामी ममालिक में भी जारी था।

इस वाक़िये की तफ़सील अल्लामा दमीरी के हवाले से यह है कि एक दिन अल्लामा किसाई से ख़लीफ़ा हारून रशीद अब्बासी ने पूछा कि इस्लाम में दिरहम व दीनार के सिक्के कब और क्यों कर राएज हुए ? उन्होंने कहा कि सिक्कों का इजरा ख़लीफ़ा अब्दुल मलिक बिन मरवान ने किया है लेकिन इसकी तफ़सील से ना वाक़िफ़ हूँ और मुझे नहीं मालूम कि इनके इजरा और ईजाद की ज़रूरत क्यों महसूस हुई। हारून रशीद ने कहा कि बात यह है कि ज़माना ए साबिक़ में जो कागज़ वग़ैरा ममालिके इस्लाकिया में मुस्तमिल होते थे वह मिस्र में तैय्यार हुआ करते थे जहां उस वक़्त नसरानियो की हुकूमत थी और वह तमाम के तमाम बादशाहे रूम के मज़हब पर थे। वहां के कागज़ पर जो ज़र्ब यानी (ट्रेड मार्क) होता था। उसमें ब ज़बाने रोम (अब इब्न रूहुल क़ुदस) लिखा होता था। ‘‘ फ़लम यज़ल ज़ालेका कज़ालेका फ़ी सदरूल इस्लाम कल्लाह बेमआनी अलेहा काना अलैहा ’’ और यही चीज़ इस्लाम में जितने दौर गुज़रे थे सब में रायज थी। यहां तक कि जब अब्दुल मलिक बिन मरवान का ज़माना आया तो चूंकि वह बड़ा जे़हीन और होशियार था लेहाज़ा उसने तरजुमा करा के गर्वनरे मिस्र को लिखा कि तुम रूमी ट्रेड मार्क को मौकूफ़ व मतरूक कर दो यानी कागज़ कपड़े वग़ैरा जो अब तय्यार हों उनमें यह निशान न लगने दो बल्कि उन पर यह लिखवाओ ‘‘ शहद अल्लाह अन्हा ला इलाहा इला हनो ’’ चुनान्चे इस अमल पर अमल दरामद किया गया। जब इन नये मार्क के कागज़ों का जिन पर कलमाए तौहीद सब्त था रवाज पाया तो क़ैसरे रोम को बे इन्तेहा नागवार गुज़रा। उसने तोहफ़े तवाएफ़ भेज कर अब्दुल मलिक बिन मरवान ख़लीफ़ा ए वक़्त को लिखा कि कागज़ वग़ैरा पर जो मार्क पहले था वही बदस्तूर जारी करो। अब्दुल मलिक ने हदिये लेने से इन्कार कर दिया और सफ़ीर को तोहफ़ों और हदाया समैत वापस भेज दिया और उसके ख़त का जवाब तक न दिया।

क़ैसरे रोम ने तहाएफ़ को दुगना कर के भेजा और लिखा कि तुमने मेरे तहाएफ़ कम समझ कर वापस कर दिया इस लिये अब इज़ाफ़ा कर के भेज रहा हूँ इसे क़ुबूल कर लो और कागज़ से नया मार्क हटा दो। अब्दुल मकिल ने फिर हदीये वापस किये और मिसले साबिक़ कोई जवाब न दिया। इसके बाद क़ैसरे रोम ने तीसरी मरतबा ख़त लिखा और तहाएफ़ व हदाया भेजे और ख़त में लिखा कि तुम ने मेरे ख़तों के जवाबात नहीं दिये और न मेरी बात क़ुबूल की। अब मैं क़सम खा कर कहता हूँ कि अगर तुम ने अब भी रूमी ‘‘ ट्रेड मार्क ’’ को अज़ सरे नौ रवाज न दिया और तौहीद के जुमले कागज़ से न हटाय तो मैं तुम्हारे रसूल को गालियां , सिक्का ए दिरहम व दीनार पर नक़्श करा के तमाम ममालिके इस्लामिया में रायज करूंगा और तुम कुछ न कर सकोगे। देखो अब जो मैंने लिखा है उसे पढ़ कर ‘‘ अर फ़स जबिनेका अरक़न ’’ अपनी पेशानी का पसीना पोछ डालो और जो मैं कहता हूँ उस पर अमल करो ताकि हमारे और तुम्हारे दरमियान जो रिश्ताए मोहब्बत क़ायम है बदस्तूर बाक़ी रहे।

अब्दुल मलिक इब्ने मरवान ने जिस वक़्त इस ख़त को पढ़ा उस के पाओं तले से ज़मीन निकल गई। हाथ के तोते उड़ गये और नज़रो में दुनिया तारीक हो गई। उसने कमाले इज़तेराब में उलेमा , फ़ुज़ला , अहले राय और सियासत दोनों को फ़ौरन जमा कर के उनसे मशविरा तलब किया और कहा कि ऐसी बात सोचो की सांप भी मर जाय और लाठी भी न टूटे या सरासर इस्लाम कामयाब हो जाय। सब ने सर तोड़ कर बहुत देर तक ग़ौर किया लेकिन कोई ऐसी राय न दे सके जिस पर अलम किया जा सकता। ‘‘ फ़ल्म यहजद अन्दा अहदा मिन्हुम राया यामल बेही ’’ जब बादशाह उनकी किसी राय से मुतमईन न हो सका तो और ज़्यादा परेशान हुआ और दिल में कहने लगा मेरे पालने वाले अब क्या करूं। अभी वह इसी तरद्दुद में बैठा था कि उसका वज़ीरे आज़म इब्ने ‘‘ ज़न्बआ ’’ बोल उठा। बादशाह तू यक़ीनन जानता है कि इस अहम मौक़े पर इस्लाम की मुश्किल कुशाई कौन कर सकता है लेकिन अमदन उसकी तरफ़ रूख़ नहीं करता। बादशाह ने कहा , ‘‘ वैहका मन ’’ ख़ुदा तुझसे समझे , बता तो सही वह कौन हैं ? वज़ीरे आज़म ने अर्ज़ की ‘‘ एलैका बिल बाक़िर मिन अहले बैतुन नबी ’’ मैं फ़रज़न्दे रसूल (स. अ.) इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) की तरफ़ इशारा कर रहा हूँ और वही इस आड़े वक़्त में काम आ सकते हैं। अब्दुल मलिक बिन मरवान ने ज्यों ही आपका नाम सुना ‘‘ क़ाला सदक़त ’’ कहने लगा , ख़ुदा की क़सम तुम ने सच कहा और सही रहबरी की है।

इसके बाद उसी वक़्त फ़ौरन अपने आमिले मदीने को लिखा कि इस वक़्त इस्लाम पर एक सख़्त मुसिबत आ गई है , और इसका दफ़आ होना इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) के बग़ैर ना मुमकिन है , लेहाज़ा जिस तरह हो सके उन्हें राज़ी कर के मेरे पास भेज दो , देखो इस सिलसिले में जो मसारिफ़ होंगे , वह हुकूमत के ज़िम्मे होंगे।

अब्दुल मलिक ने दरख़्वास्त तलबी , मदीने इरसाल करने के बाद शाहे रोम के सफ़ीर को नज़र बन्द कर दिया और हुक्म दिया कि जब तक मैं इस मसले को हल न कर सकूँ इसे राजधानी से जाने न देना।

हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) की खि़दमत में अब्दुल मलिक बिन मरवान का पैग़ाम पहुँचा और आप फ़ौरन आज़िमे सफ़र हो गये और अहले मदीना से फ़रमाया कि चूंकि इस्लाम का काम है लेहाज़ा मैं अपने तमाम कामों पर इस सफ़र को तरजीह देता हूँ। अलग़रज़ आप वहां से रवाना हो कर अब्दुल मकिल के पास पहुँचे। चुंकि वह सख़्त परेशान था इस लिये उसने आप के इस्तक़बाल के फ़ौरन बाद अर्ज़े मुद्दआ कर दिया। इमाम (अ.स.) ने मुस्कुराते हुए फ़रमाया , ‘‘ ला याज़म हाज़ा अलैका फ़ानहु लैसा बे शैइन ’’ ऐ बादशाह घबरा नहीं यह बहुत ही मामूली सी बात है। मैं इसे अभी चुटकी बजाते हल किए देता हूँ। बादशाह सुन मुझे बा इल्मे इमामत मालूम है कि ख़ुदाये क़ादिरो तवाना क़ैसरे रोम को इस फ़ेले क़बीह पर क़ुदरत ही न देगा और फिर ऐसी सूरत में जब कि उसने तेरे हाथों में उस से ओहदा बर होने की ताक़त दे रखी है। बादशाह ने अर्ज़ किया , यब्ना रसूल अल्लाह (स. अ.) वह कौन सी ताक़त है जो मुझे नसीब है और जिसके ज़रिये से मैं कामयाबी हासिल कर सकता हूँ ?

हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) ने फ़रमाया कि तुम इसी वक़्त हक़ाक और कारीगरों को बुलाओ और उनसे दिरहम और दीनार के सिक्के ढलवाओ और मुमालिके इस्लामिया में रायज कर दो। उसने पूछा की उनकी क्या शक्लो सूरत होगी और वह किस तरह ढलेंगे ? इमाम (अ.स.) ने फ़रमाया कि सिक्के के एक तरफ़ कलमा ए तौहीद दूसरी तरफ़ पैग़म्बरे इस्लाम का नामे पसमी और ज़र्ब सिक्के का सन् लिखा जाए। उसके बाद उसके औज़ान बतायें आपने कहा कि दिरहम के तीन सिक्के इस वक़्त जारी हैं एक बग़ली जो दस मिसक़ाल के दस होते हैं। दूसरे समरी ख़फ़ाक़ जो छः मिसक़ाल के दस होते हैं। तीसरे पांच मिसक़ाल के दस यह कुल 21 मिसक़ाल होते हैं। इसको तीन पर तक़सीम करने पर हासिले तक़सीम 7 सात मिसका़ल हुए। इसी सात मिसक़ाल के दस दिरहम बनवां और इसी सात मिसक़ाल की क़ीमत के सोने के दीनार तैय्यार कर जिसका खुरदा दस दिरहम हो। सिक्का दिरहम का नक़्श चूंकि फ़ारसी में है इसी लिये इसी फ़ारसी में रहने दिया जाय और दीनार का सिक्का रूमी हरफ़ों में है लेहाज़ा उसे रूमी ही हरफ़ों में कन्दा कराया जाय और ढालने की मशीन ‘‘ साचा ’’ शीशे का बनाया जाय ताकि सब हम वज़न तैय्यार हो सकें।

अब्दुल मलिक ने आपके हुक्म के मुताबिक़ तमाम सिक्के ढलवा लिये और सब काम दुरूस्त कर लिया। इसके बाद हज़रत की खि़दमत में हाज़िर हो कर दरयाफ़्त किया कि अब क्या करूं ? ‘‘ अमरहा मोहम्मद बिन अली ’’ आपने हुक्म दिया कि इन सिक्कों को तमाम ममालिके इस्लामिया में रायज कर दे और साथ ही एक हुक्म नाफ़िज़ कर दे जिसमें यह हो कि इसी सिक्के को इस्तेमाल किया जाय और रूमी सिक्के खि़लाफ़े क़ानून क़रार दिये गये। अब जो खि़लाफ़ वरज़ी करेगा उसे सख़्त सज़ा दी जायेगी और ब वक़्ते ज़रूरत उसे क़त्ल भी किया जायेगा। अब्दुल बिन मरवान ने तामीले इरशाद के बाद सफ़ीरे रूम को रिहा कर के कहा कि अपने बादशाह से कहना कि हमने अपने सिक्के ढलवा कर रायज कर दिये और तुम्हारे सिक्के को ग़ैर क़ानूनी क़रार दे दिया। अब तुम से जो हो सके कर लो।

सफ़ीरे रोम यहां से रिहा हो कर जब अपने क़ैसर के पास पहुँचा और उस से सारी दास्तान बताई तो वह हैरान रह गया और सर डाल कर देर तक खा़मोश बैठा सोचता रहा। लोगों ने कहा , बादशाह तूने जो कहा था कि मैं मुसलमानों के पैग़म्बर को सिक्कों पर गालियां कन्दा कर दूंगा। अब इस पर अमल क्यों नहीं करते ? उसने कहा अब गालियां कन्दा कर के क्या कर लूगां। अब तो उनके ममालिक में मेरा सिक्का ही नहीं चल रहा और लेन देन ही नहीं हो रहा है।(हयातुल हैवान दमीरी अल मतूफ़ी 808 हिजरी जिल्द 1 पृष्ठ 63 तबआ मिस्र 136 हिजरी)

वलीद बिन अब्दुल मलिक की आले मोहम्मद (अ.स.) पर ज़ुल्म आफ़रीनी

तारीख़े अबुल फ़िदा में है कि हिजरी 86 में वलीद बिन अब्दुल मलिक इब्ने मरवान ख़लीफ़ा मुक़र्रर हुआ। तारीख़े कामिल में है कि 91 हिजरी में उसने हज्जे काबा अदा किया। मुवर्रेख़ीने इस्लाम का बयान है कि जब वलीद बिन अब्दुल मलिक हज से फ़ारिग़ हो कर मदीना ए मुनव्वरा आया तो एक दिन मिम्बरे रसूल (स अ ) पर ख़ुत्बा देते हुए उसकी नज़र इमाम हसन (अ.स.) के बेटे हसने मुसन्ना पर पड़ी हसने मुसन्ना पर पड़ी जो ख़ाना ए सय्यदा में बैठे हुए आयना देख रहे थे। ख़ुत्बे से फ़राग़त के बाद उसने उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ को तलब कर के कहा कि तुमने हसन बिन हसन (अ.स.) वग़ैरा को क्यों अब तक इस मकान में रहने दिया और क्यों न उनको यहां से निकाल बाहर किया। मैं नहीं चाहता कि आइन्दा फिर इन लोगों को यहां देखूं। ज़रूरत है कि यह मकान इन से ख़ाली करा लिया जाय और इसे ख़रीद कर मस्जिद में शामिल कर दिया जाय। हसन मुसन्ना और फातेमा बिन्ते इमाम हुसैन (अ.स.) और उनकी औलाद ने घर छोड़ने से इन्कार किया। वलीद ने हुक्म दिया कि मकान को उन लोगों पर गिरा दो। फिर लोगों ने ज़बर दस्ती असबाब निकाल कर फेकना और उसे उजाड़ना शुरू कर दिया। मजबूरन यह हज़रात मुख़द्देराते आलियात समैत रोजे़ रौशन में घर से निकल कर बैरूने मदीना सुकूनत पज़ीर हुए। कुछ दिनों के बाद इसी क़िस्म का वाक़िया जनाबे हफ़सा के मकान का भी पेश आया जो औलादे हज़रत उमर के क़ब्ज़े में था। चुनान्चे जब उन से कहा गया कि घर से बाहर निकलो तो उन्होंने मन्ज़ूर न किया और उसकी क़िमत भी क़ुबूल न की। हज्जाज बिन यूसुफ़ उस वक़्त मदीने में मौजूद था उसने चाहा कि मकान को गिरा दे मगर जब इस बात की इत्तेला वलीद बिन अब्दुल मलीक को हुई तो उसने उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ आमिले मदीना को लिखा कि औलादे उमर बिन ख़त्ताब की रज़ा जोई में कमी न करो और उनका एहतेराम मल्हूफ़े ख़ातिर रखो। अगर वह मकान फ़रोख़्त करने पर राज़ी न हो तो उनके रहने के लिये मकान का एक हिस्सा छोड़ दो और उनकी आमदो रफ़्त के लिये मस्जिद की जानिब एक दरवाज़ा भी रहने दो।

(किताब जज़बुल क़ुलूब पृष्ठ 173 व वफ़ा अल वफ़ा जिल्द 1 पृष्ठ 363)

आपके वालिदे माजिद की वफ़ात हसरते आयात

जब आपकी उम्र तक़रीबन 38 साल की हुई तो वलीद बिन अब्दुल मलिक ने आपके वालिदे माजिद हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) को 95 हिजरी में ज़हरे दग़ा से शहीद कर दिया। आपने फ़राएज़े तजहीज़ो तकफ़ीन सर अंजाम दिये। आप ही ने नमाज़ पढ़ाई। मुल्ला जामी लिखते हैं ंकि हज़रत इमाम ज़ैनुल अबेदीन (अ.स.) ने अपने बाद आपको अपना वसी मुक़र्रर फ़रमाया क्यों कि आप ही तमाम औलादे में अफ़ज़ल व अरफ़ा थे। उलेमा का बयान है कि अपने वालिदे माजिद की ज़ाहिरी वफ़ात के बाद इमाम इमामे ज़माना क़रार पााए आर आप दरजाए इमामत के फ़राएज़ की अदायगी की ज़िम्मेदारी आयद हो गई।

हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) की इल्मी हैसियत

किसी मासूम की इल्मी हैसियत पर रौशनी डालना बहुत दुश्वार है क्यों कि मासूम और इमामे ज़माना को इल्मे लदुन्नी होता है। वह ख़ुदा की बारगाह से इल्मी सलाहियतों से भरपूर पैदा होता है हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) चूंकि इमामे ज़माना मासूमे अज़ली थे इस लिये आपके इल्मी कमालात , इल्मी कारनामे और आपकी इल्मी हैसियत की वज़ाहत नामुम्किन है। ताहम मैं उन वाक़ियात में से कुछ वाक़ेयात लिखता हूँ जिनर उलमा ने उबूर हासिल कर सके हैं।

अल्लामा इब्ने शहरे आशोब लिखते हैं कि हज़रत का ख़ुद इरशाद है कि ‘‘ अलमना मन्तिक़ अल तैरो अवतैना मिन कुल्ले शैइन ’’ हमें ताएरों तक की ज़बान सिखाई गई है और हमे हर चीज़ का इल्म अता किया गया है।(मनाक़िब इब्ने शहरे आशोब जिल्द 5 पृष्ठ 11 )

रौज़ातुल पृष्ठ में है कि ‘‘ बा ख़ुदा सौगन्द कि माख़ाजनाने खुदाएम दर आसमान व ज़मीन ’’ ख़ुदा की क़सम हम ज़मीन और आसमान में ख़ुदा वन्दे आलम के ख़ाज़िने इल्म हैं और हम ही शजराए नबूवत और मादने हिकमत हैं। वही हमारे यहां आती रही और फ़रिश्तें हमारे यहां आते रहते हैं। यही वजह है कि दुनिया के ज़ाहिरी अरबाबे इक़तेदार हम से जलते और हसद करते हैं। लिसानुल वाएज़ीन में है कि अबू मरीयम अब्दुल ग़फ़्फ़ार का कहना है कि मैं एक दिन हज़रत मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) की खि़दमत में हाज़िर हो कर अर्ज़ परदाज़ हुआ कि 1. मौला कौन सा इस्लाम बेहतर है ? फ़रमाया , जिससे अपने बरादरे मोमिन को तकलीफ़ न पहुँचे। 2. कौन सा ख़ुल्क़ बेहतर है ? फ़रमाया , सब्र और माफ़ कर देना। 3. कौन सा मोमिन कामिल है ? फ़रमाया जिसका इख़्लाक़ बेहतर हो। 4. कौन सा जेहाद बेहतर है ? फ़रमाया , जिसमें अपना ख़ून बह जाऐ। 5. कौन सी नमाज़ बेहतर है ? फ़रमाया , जिसका क़ुनूत तवील हो। 6. कौन सा सदक़ा बेहतर है ? फ़रमाया , जिससे नाफ़रमानी से निजात मिले। 7. बादशाहाने दुनिया के पास जाने में क्या राय है ? फ़रमाया , मैं अच्छा नहीं समझता। 8. पूछा क्यों ? फ़रमाया , इस लिये की बादशाहों के पास की आमदो रफ़्त से तीन बातें पैदा होती हैं , 1. मोहब्बते दुनिया , 2. फ़रामोशिए मर्ग , 3. क़िल्लते रज़ाए ख़ुदा। 9. पूछा फिर मैं न जाऊं ? फ़रमाया , मैं तलबे दुनिया से मना नहीं करता अलबत्ता तलबे मआसी से रोकता हूँ।

अल्लामा तबरीसी लिखते हैं कि यह मुसल्लेमा हक़ीक़त है और इसकी शोहरते आम्मा कि आप इल्मो ज़ोहद और शरफ़ में सारी दुनिया से फ़ौकी़यत ले गये। आपसे इल्मे क़ुरआन इल्मे इल आसार , इल्मे अल सुनन और हर क़िस्म के उलूम , हुक्मे आदाब वग़ैरा में कोई भी फ़ौक़ नहीं गया। हत्ता कि आले रसूल (स. अ.) में भी अबुल आइम्मा के अलावा आपके बराबर उलूम के मज़ाहिरे में कोई नहीं हुआ। बड़े बड़े सहाबा और नुमायां ताबेईन और अज़ीमुल क़द्र फ़ुक़हा आपके सामने ज़ानुए अदब तह करते रहे। आपको आं हज़रत (स अ ) ने जाबिर बिन अब्दुल्लाह अन्सारी के ज़रिए से सलाम कहलाया था और इसकी पेशीन गोई फ़रमाई थी कि यह मेरा फ़रज़न्द ‘‘ बेक़ारूल उलूम ’’ होगा। इल्म की गुत्थियों को इस तरह सुलझायेगा कि दुनियां हैरान रह जायेगी। आलाम उल वरा पृष्ठ 157 , अल्लामा शेख़ मुफ़ीद , अल्लामा शिब्लन्जी तहरीर फ़रमाते हैं कि इल्मे दीन , इल्मे अहादीस , इल्मे सुनन और तफ़सीरे कु़रआन व इल्म अल सीरत व उलूमो फ़ुनून , अदब वगै़रा के ज़ख़ीरे जिस क़द्र इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) से ज़ाहिर हुय इतने इमाम हुसैन (अ.स.) और इमाम हसन (अ.स.) की औनाद में से किसी से ज़ाहिर नहीं हुए। मुलाहेज़ा हो किताब अल इरशाद पृष्ठ 286 , नूरूल अबसार पृष्ठ 131 अरजहुल मतालिब पृष्ठ 447 , अल्लामा इब्ने हजर मक्की लिखते हैं कि हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) के इल्मी फ़यूज़ व बरकात और कमालात व एहसानात से उस शख़्स के अलावा जिसकी बसीरत ज़ाइल हो गई हो , जिसका दिमाग़ ख़राब हो गया हो और जिसकी तबीयत व तीनत फ़ासिद हो गई हो। कोई शख़्स इन्कार नहीं कर सकता। इसी वजह से आपके बारे में कहा जाता है कि आप ‘‘ बाक़रूल उलूम ’’ इल्म के फैलाने वाले और जामेउल उलूम हैं। आप ही उलूमे मआरिफ़ में शोहरते आम्मा हासिल करने और उसके मदारिज बुलन्द करने वाले हैं। आपका दिल साफ़ , इल्मो अमल रौशन व ताबिन्दा , नफ़्स पाक और खि़ल्क़त शरीफ़ थी। आपके कुल अवक़ात इताअते ख़ुदावन्दी में बसर होते थे। जिनके बयान करने से वसफ़ करने वालों की ज़बानें गूंगी और आजिजा़ मांदा हैं। आपके ज़ोहद व तक़वा आपके उलूमो मआरिफ़ आपके इबादात व रियाज़ात और आपके हिदायात व कमालात इस कसरत से हैं कि उनका बयान इस किताब में ना मुम्किन हैं।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 120 )

अल्लामा इब्ने ख़ल्दून लिखते हैं कि इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) अल्लामा ज़मान और सरदारे कबीर उस शान थे। आप उलूम में बड़े तवाहुर और वसीउल इत्तेला थे।(वफ़यात उल अयान , जिल्द 1 पृष्ठ 450 )

अल्लामा ज़हबी लिखते हैं कि आप बनी हाशिम के सरदार और मुतबहे इल्मी की वजह से बाक़िर मशहूर थे। आप इल्म की तह तक पहुँच गये थे। आपने इसके दक़ाएक़ को अच्छी तरह समझ लिया था।(तज़केयल हफ़्फ़ाज़ जिल्द 1 पृष्ठ 111 )

अल्लामा शबरावी लिखते हैं कि इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) के इल्मी तज़किरे दुनिया में मशहूर हुए और आपकी मदहो सना में बा कसरत शेर लिखे गये। मालिक ज़ेहनी ने यह तीन शेर लिखे हैं।

तरजुमा:- जब लोग क़ुरआने मजीद का इल्म हासिल करना चाहें तो पूरा क़बीला ए क़ुरैश उसके बताने से आजिज़ रहेगा क्यों कि वह खुद मोहताज हैं और अगर फ़रज़न्दे रसूल (स. अ.) इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) के मुहं से कोई बात निकल जाय तो बे हदो हिसाब मसाएल व तहक़ीक़ात के ज़ख़ीरे मोहय्या कर देंगे। यह हज़रात वह सितारे हैं जो हर क़िस्म की तारीकियों में चलने वालों के लिये चमकते हैं और उनके अनवार से लोग रास्ते पाते हैं।(इलतहाफ़ पृष्ठ 42 व तारीख़ुल आइम्मा पृष्ठ 413 )

अल्लामा शहरे आशोब का बयान है कि सिर्फ़ एक रावी मोहम्मद बिन मुस्लिम ने आप से तीस हज़ार (30,000) हदीसें रवायत की हैं।(मनाक़िब जिल्द 5 पृष्ठ 11 )


आपके बाज़ इल्मी हिदायात व इरशादात

अल्लामा मोहम्मद बिन तल्हा शाफ़ेई लिखते हैं कि जाबिर जाफ़ेई का बयान है कि एक दिन हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) से मिला तो आपने फ़रमाया ,

ऐ जाबिर मैं दुनियां से बिल्कुल बेफ़िक्र हूं क्यों कि जिसके दिल में दीने ख़ालिस हो वह दुनियां को कुछ नहीं समझता और तुम्हें मालूम होना चाहिये कि दुनिया छोड़ी हुई सवारी , उतारा हुआ कपड़ा और इस्तेमाल की हुई औरत है।

मोमिन दुनियां की बक़ा से मुत्मिईन नहीं होता और उसकी देखी हुई चीज़ों की वजह से नूरे ख़ुदा उससे पोशिदा नहीं होता।

मोमिन को तक़वा इख़्तेयार करना चाहिये कि वह हर वक़्त उसे मुतानब्बे और बेदार रखता है।

सुनो दुनिया एक सराय फ़ानी है। ‘‘ नज़लत बेही दारे तहलत मिनहा ’’ इसमें आना जाना लगा रहता है , आज आये और कल गये और दुनिया एक ख़्वाब है जो कमाल के मानन्द देखी जाती है और जब जाग उठो तो कुछ नहीं आपने फ़रमाया , तकब्बुर बहुत बुरी चीज़ है यह जिस क़द्र इंसान में पैदा होगा उसी क़द्र उसकी अक़ल घटेगी।

कमीने शख़्स का हरबा गालियां बकना है।

एक आलिम की मौत को इबलीस नब्बे (90) आबिदों के मरने से बेहतर समझता है।

एक हज़ार आबिदों से वह एक आलिम बेहतर है जो अपने इल्म से फ़ायदा पहुंचा रहा हो।

मेरे मानने वाले वह हैं जो अल्लाह की इताअत करें।

आंसुओ की बड़ी की़मत है रोने वाला बख़्शा जाता है और जिस रूख़सार पर आंसू जारी हों वह ज़लील नहीं होता।

सुस्ती और ज़्यादा तेज़ी बुराईयों की कुंजी है। ख़ुदा के नज़दीक बेहतरीन इबादत पाक दामनी है। इनसान को चाहिये कि अपने पेट और अपनी शर्मगाहों को महफ़ूज़ रखें।

दुआ से क़ज़ा भी टल जाती है। नेकी बेहतरीन ख़ैरात है।

बदतरीन ऐब यह है कि इन्सान को अपनी आंख की शहतीर दिखाई न दे और दूसरों की आंख का तिन्का नज़र न आये। यानी अपने बड़े गुनाह की परवाह न हो और दूसरों के छोटे अयूब उसे बड़े नज़र आयें और खुद अमल न करे। सिर्फ़ दूसरों को तामील दे।

जो ख़ुशहाली में साथ दे और तंग दस्ती में दूर रहे , वह तुम्हारा भाई और दोस्त नहीं है।(मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 272 )

अल्लामा शिबलंजी लिखते हैं कि , हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) ने फ़रमाया कि जब कोई नेमत मिले तो कहो अलहम्दो लिल्लाह और जब कोई तकलीफ़ पहुँचे तो कहो ‘‘ लाहौल विला कु़व्वता इल्लाह बिल्ला ’’ और जब रोज़ी तंग हो तो कहो ‘’ अस्तग़ फ़िरूल्लाह ’’। दिल को दिल से राह होती है , जितनी मोहब्बत तुम्हारे दिल में होगी इतनी ही तुम्हारे भाई के और दोस्त के दिल में भी होगी।

तीन चीज़ें ख़ुदा ने तीन चीज़ों में पोशीदा रखी है।

1. अपनी रज़ा अपनी इताअत मे किसी फ़रमा बरदारी को हक़ीर न समझो। शायद इसी में खुदा की रज़ा हो।

2. अपनी नाराज़़ी अपनी माअसीयत में - किसी गुनाह को मामूली न जानों शायद ख़ुदा उसी से नाराज़ हो जाय।

3. अपनी दोस्ती या अपने वली - मख़लूक़ात में किसी शख़्स को हक़ीर न समझो , शायद वह वली उल्लाह हो।(नूरूल अबसार पृष्ठ 131 व इतहाफ़ पृष्ठ 93 )

अहादीसे आइम्मा में है। इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) फ़रमाते हैं , इन्सान को जितनी अक़्ल दी गई है उसी के मुताबिक़ उससे क़यामत में हिसाब व किताब होगा।

एक नफ़ा पहुँचाने वाला आलिम सत्तर हज़ार आबिदों से बेहतर है।

ख़ुदा उन उलमा पर रहम व करम फ़रमाए जो अहयाए इल्म करते और तक़वा को फ़रोग़ देते हैं।

इल्म की ज़कात यह है कि मख़लूके ख़ुदा को तालीम दी जाय।

क़ुरआन मजीद के बारे में तुम जितना जानते हो उतना ही बयान करो।

बन्दों पर ख़ुदा का हक़ यह है कि जो जानता हो उसे बताए और जो न जानता हो उसके जवाब में ख़ामोश हो जाए।

इल्म हासिल करने के बाद उसे फैलाओ इस लिये कि इल्म को बन्द रखने से शैतान का ग़लबा होता है।

मोअल्लिम और मुताकल्लिम का सवाब बराबर है।

जिस तालीम की ग़रज़ यह हो कि वह उलमा से बहस करे , जोहला पर रोब जमाए और लोगों को अपनी तरफ़ माएल करे वह जहन्नमी है।

दीनी रास्ता दिखलाने वाला और रास्ता पाने वाला दोनों सवाब की मीज़ान के लिहाज़ से बराबर हैं।

जो दीनियात में ग़लत कहता हो उसे सही बता दो।

ज़ाते इलाही वह है जो अक़ले इंसानी में समा न सके और हुदूद में महदूद न हो सके। इसकी ज़ात फ़हम व अदराक से बाला तर है। ख़ुदा हमेशा से है और हमेशा रहेगा।

ख़ुदा की ज़ात के बारे में बहस न करो वरना हैरान हो जाओगे।

अज़ल की दो क़िस्मे हैं , एक अज़ल महतूम , दूसरे अज़ल मौकूफ़ , दूसरी से ख़ुदा के सिवा कोई वाक़िफ़ नहीं।

ज़मीने हुज्जते ख़ुदा के बग़ैर बाक़ी नहीं रह सकती।

उम्मते बे इमाम की मिसाल भेड़ बकरी के उस ग़ल्ले की है , जिसका कोई भी निगरान हो।

इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) से रूह की हक़ीक़त और माहीयत के बारे में पूछा तो फ़रमाया कि रुह हवा कि मानिन्द मुताहर्रिक है और यह रीह से मुश्ताक़ है , हम जिन्स होने की वजह से उसे रुह कहा जाता है। यह रुह जो जानदारों की ज़ात के साथ मख़सूस है , वह तमाम रूहों से पाकीज़ा तर है। रूह मख़लूक़ और मसनूह है और हादिस और एक जगह से दूसरी जगह मुनतक़िल होने वाली है। वह ऐसी लतीफ़ शै है जिसमें न किसी क़िस्म की गरानी और सगीनी है न सुबकी , वह एक बारीक एक रक़ीक़ शै है जो क़ालिबे क़सीफ़ में पोशीदा है। इसकी मिसाल इस मशक जैसी है जिसमें हवा भर दो , हवा भरने से वह फूल जायेगी लेकिन उसके वज़न में इज़ाफ़ा न होगा। रूह बाक़ी है और बदन से निकलने के बाद फ़ना नहीं होती। यह सूर फुंकने के वक़्त फ़ना होगी।

आपसे ख़ुदा वन्दे आलम के सिफ़ात के बारे में पूछा गया तो आपने फ़रमाया कि , वह समी बसीर है और आलाए समा व बसर के बग़ैर सुनता और देखता है।

रईसे मोतज़ला उमर बिन अबीद ने आपसे पूछा कि ‘‘ मन यहाल अलैहा ग़ज़बनी ’’ से कौन सा ग़ज़ब मुराद है ? फ़रमाया उक़ाब और अज़ाब की तरफ़ इशारा फ़रमाया गया है।

अबुल ख़ालीद क़ाबली ने आपसे पूछा कि क़ौले ख़ुदा ‘‘ फ़ामनू बिल्लाह व रसूलहे नूरूल लज़ी अन्ज़लना ’’ में नूर से क्या मुराद है ? आपने फ़रमाया , ‘‘ वल्लाहा अलन नूर अल आइम्मते मिन आले मोहम्मद ’’ ख़ुदा की क़सम नूर से हम आले मोहम्मद मुराद हैं।

आप से दरयाफ़्त किया गया कि ‘‘ यौमे नदउ कुल्ले उनासिम बे इमामेहिम ’’ से कौन लोग मुराद हैं ? आपने फ़रमाया वह रसूल अल्लाह हैं और उनके बाद उनकी औलाद से आइम्मा होंगे। उन्ही की तरफ़ आयत से इशारा फ़रमाया गया है। जो उन्हें दोस्त रखेगा और उनकी तसदीक़ करेगा। वही नजात पायेगा और जो उनकी मुख़ालेफ़त करेगा जहन्नम में जायेगा।

एक मरतबा ताऊसे यमानी ने हज़रत की खि़दमत में हाज़िर हो कर यह सवाल किया कि वह कौन सी चीज़ है जिसका थोड़ा इस्तेमाल हलाल था , और ज़्यादा इस्तेमाल हराम ? आपने फ़रमाया की नहरे तालूत का पानी था , जिसका सिर्फ़ एक चुल्लू पीना हलाल था और उससे ज़्यादा हराम। पूछा वह कौन सा रोज़ा था जिसमें ख़ाना पीना जायज़ था ? फ़रमाया वह जनाबे मरयम का ‘‘ सुमत ’’ था जिसमें सिर्फ़ न बोलने का रोज़ा था , खाना पीना हलाल था। पूछा वह कौन सी शै है जो सर्फ़ करने से कम होती है बढ़ती नहीं ? फ़रमाया की वह उम्र है। पूछा वह कौन सी शै है जो बढ़ती है घटती है नहीं ? फ़रमाया वह समुद्र का पानी है। पूछा वह कौन सी चीज़ है जो सिर्फ़ एक बार उड़ी और फिर न उड़ी ? फ़रमाया वह कोहे तूर है जो एक बार हुक्मे ख़ुदा से उढ़ कर बनी इसराईल के सरों पर आ गया था। पूछा वह कौन लोग हैं जिनकी सच्ची गवाही ख़ुदा न झूटी क़रार दी ? फ़रमाया वह मुनाफ़िक़ों की तसदीक़े रिसालत है जो दिल से न थी। पूछा बनी आदम का 1/3 हिस्सा कब हलाक हुआ ? फ़रमाया ऐसा कभी नहीं हुआ। तुम यह पूछो की इन्सान का 1 /4 हिस्सा कब हलाक हुआ तो मैं तुम्हें बताऊं कि यह उस वक़्त हुआ जब क़ाबील ने हाबील को क़त्ल किया क्यों कि उस वक़्त चार आदमी थे। आदम , हव्वा , हाबील , क़ाबील। पूछा फिर नस्ले इंसानी किस तरह बढ़ी ? फ़रमाया जनाबे शीस से जो क़त्ले हाबील के बाद बतने हव्वा से पैदा हुए।

इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) और जनाबे अबू हनीफ़ा का इम्तेहान

अल्लामा शिबली नोमानी और अल्लामा अलक़ीम लिखते हैं कि इमाम अबू हनीफ़ा एक मुद्दत तक हज़रत की खि़दमत में हाज़िर रहे और उन्हीं से फे़क़हा हदीस के मुताल्लिक़ बहुत सी नादिर बातें हासिल कीं। शिया सुन्नी दोनों ने माना है कि अबू हनीफ़ा की मालूमात का बड़ा ज़ख़ीरा हज़रत ही का फ़ैज़े सोहबत था। इमाम साहब ने इनके फ़रज़न्दे रशीद हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की फ़ैज़े सोहबत से भी बहुत कुछ फ़ायदा उठाया जिसका ज़िक्र उमूमन तारीख़ों में पाया जाता है।(सीरतुल नोमान व अलाम अल माक़ेनीन जिल्द 1 पृष्ठ 93 ) (1.)

अल्लामा शबादी शाफ़ेई लिखते हैं कि एक दिन हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) ने इमाम अबू हनीफ़ा से फ़रमाया कि मैंने सुना है कि तुम क़यास करने में ज़मीन व आसमान के कुलाबे मिलाते हो। यह सच है ? उन्होंने कहा मैं बे शक क़यास करता हूँ और इसकी वजह हदीस व अख़बार हैं। हज़रत ने फ़रमाया कि अच्छा मैं चन्द सवाल करता हूँ तुम क़यास करके जवाब दो। उन्होंने कहा फ़रमाईये , आपने इरशाद फ़रमाया क़तल बड़ा गुनाह है कि ज़िना अर्ज़ की क़त्ल है फिर क्या वजह है कि क़तल में सिर्फ़ दो गवाह काफ़ी हैं ज़िना की शहादत में चार गवाह तलब होते हैं ? उन्होंने सुकूत इख़्तेयार किया इसार पर यूँ बोले मुझे इल्म नहीं। फिर आपने फ़रमाया , नमाज़ की अज़मत ज़्यादा है या रोज़े की ? कहा नमाज़ की , कहा फिर क्या वजह है कि हाएज़ औरतों को नमाज़ की क़ज़ा ज़रूरी नहीं और रोज़े की कज़ा लाज़मी है। उन्होंने कहा मुझे मालूम नहीं। फिर हज़रत ने फ़रमाया बताओ , पेशाब ज़्यादा नजीस है या मनी ? उन्होंने कहा पेशाब ज़्यादा नजीस है। हज़रत ने फ़रमाया कि फिर क्या वजह है कि पेशाब के बाद वज़ू किया जाता है और मनी के बाद गु़स्ल वाजिब है ? कहा मुझे इल्म नहीं।

इमाम अबू हनीफ़ा का बयान है कि इन सवालात के बाद आप दूसरे कामों में लग गए तो मैंने अर्ज़ कि ऐ फ़रज़न्दे रसूल (स. अ.) इन सब मसाएल के बारे में मेरी तशफ़फ़ी फ़रमाएं। आपने फ़रमाया कि मैं इस शर्त से बताऊंगा कि तुम आइन्दा क़यास करने से बाज़ रहने का वादा करो। चुनान्चे मैंने वादा किया तो आपने इरशाद फ़रमाया , सुनो !

1. क़त्ल करने वाला एक ही शख़्स होता है , इस लिये सिर्फ़ दो गवाह काफ़ी होते हैं और ज़िना में दो शख़्स होते हैं इस लिये चार गवाह की ज़रूरत होती है।

2. हाएज़ को साल में एक ही मरतबा रोज़े से दो चार होना पड़ता है। इसकी क़ज़ा आसान है और नमाज़ से हर माह साबेक़ा पड़ता है इसकी क़ज़ा मुश्किल है इस लिये ख़ुदा ने यह सहूलियत दी है कि रोज़े की क़ज़ा करें और नमाज़ की क़ज़ा न करे।

3. पेशाब सिर्फ़ मसाने से निकलता है और दिन में कई मरतबा निकलता है इस में गु़स्ल दुश्वार होता है। और मनी सारे जिस्म से निकलती है ‘‘ तहत कुलशरता जनाबता ’’ बल्कि यूँ समझो कि हर बुने मू से निकलती है और कभी कभी निकलती है इस लिये ग़ुस्ल करना आसान होता है। लेहाज़ा इसके महल्ले इख़्राज का लेहाज़ करते हुए गु़स्ल ज़रूरी क़रार दिया गया है। इमाम अबू हनीफ़ा का बयान है कि इस जवाब से मुझे पूरी तसल्ली हो गई और हज़रत को सलाम कर के घर वापस आया।(इताफ़ पृष्ठ 88 )

अल्लामा दमेरी ने अपनी किताब हयातुल हैवान की जिल्द 2 पृष्ठ 86 तहतुल लुग़त ज़बी प्रकाशित मिस्र में इस वाक़िए को इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) से मुताल्लिक़ लिखा है।

अल्लामा शिबलन्जी लिखते हैं कि अलाए बिन उमर बिन अबीद ने हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) से पूछा , ‘‘ इन अलसमावाता वल अर्ज़ा कानता रतक़ाफफतक़ना हमा ’’ का क्या मतलब है ? आपने इरशाद फ़रमाया , आसमान व ज़मीन दोनों(अपनी फ़ैज़ रसाई से) बन्द थे फिर ख़ुदा ने उन्हें खोल दिया , यानी आसमान से पानी बरसने लगा और ज़मीन से दाना उगने लगा।(नूरूल अबसार पृष्ठ 130 व इतहाफ़ पृष्ठ 53 व कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 54 )

अल्लामा जामी लिखते हैं कि इन्सानों की तरह आप से जिन भी इल्मी फ़ायदा उठाया करते थे। रावी का बयान है कि मैंने एक दिन बारह अजनबी अशख़ास को आपके पास देख कर पूछा कि यह कौन लोग हैं ? इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) ने फ़रमाया यह जिन हैं , मेरे पास मसाएल शरई पूछने आते हैं।(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 182 )

1. इसकी तफ़सील के लिये मुलाहेज़ा हों ‘‘ तारीख़े इस्लाम ’’ जिल्द 1 मोअल्लेफ़ा हक़ीर मतबूआ इमामिया कुतुब ख़ाना मुग़ल हवेली लाहौर।

इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) के बाज़ करामात

आइम्मा ए अहले बैत (अ.स.) का साहेबे करामत होना मुसल्लेमात में से है। हज़रत इमाम मोहम्मदे बाक़िर (अ.स.) के करामात हदे एहसा से बाहर हैं। इस मुक़ाम पर चन्द लिखे जाते हैं।

अल्लामा जामेई रहमतुल्लाह अलैहा लिखते हैं कि एक रोज़ आप खच्चर पर सफ़र फ़रमा रहे थे और आपके हमराह एक और शख़्स गधे पर सवार था। मक्का और मदीना के दरमियान पहाड़ से एक भेड़िया बरामद हुआ आपने उसे देख कर अपनी सवारी रोक ली। वह क़रीब पहुँच कर गोया हुआ , मौला ! इस पहाड़ी में मेरी मादा है और उसे सख़्त दर्दे ज़ेह आरिज़ है आप दुआ फ़रमा दीजिए की इस मुसीबत से नजात हो जाए। आपने दुआ फ़रमा दी। फिर उसने कहा कि यह दुआअ कीजिए कि ‘‘ अज़नस्ल मन पर शीआए तौ मफ़स्तल न गिरदाना ’’ मेरी नस्ल में से किसी को भी आपके शिओं पर ग़लबा व तसल्लत न हासिल होने दे। आपने फ़रमाया मैंने दुआ कर दी। वह चला गया।

2. एक शब एक शख़्स शदीद बारिश के दौरान में आपके दौलत कदे पर जा कर ख़ामोश खड़ा हो गया और सोचने लगा कि इस न मुनासिब वक़्त में दक़्क़ुलबाब करूं या वापस चला जाऊँ। नागाह आपने अपनी लौंडी से फ़रमाया कि फ़ुलाँ शख़्स मक्के से आ कर मेरे दरवाज़े पर खड़ा है उसे बुला लो। उसने दरवाज़ा खोल कर बुला लिया।

3. रावी का बयान है कि मैं एक दिन आपके दौलत कदे पर हाज़िर हो कर इज़ने हुज़ूरी का तालिब हुआ। आपने किसी वजह से इजाज़त न दी मैं ख़ामोश खड़ा रहा। इतने में देखा कि बहुत से आदमी आए और गए। यह हाल देख कर मैं बहुत ही रंजीदा हुआ और देर तक सोचने लगा कि किसी और मज़हब में चला जाऊँ इसी ख्याल में घर चला गया। जब रात हुई तो आप मेरे मकान पर तशरीफ़ लाये और कहने लगे किसी मज़हब में मत जाओ , कोई मज़हब दुरूस्त नहीं है। आओ मेरे साथ चलो , यह कह कर मुझे अपने हमराह ले गए।

4. एक शख़्स ने आप से कहा ख़ुदा पर मोमिन का क्या हक़ है ? आपने इसके जवाब से ऐराज़ किया। जब वह न माना तो फ़रमाया कि इस दरख़्त को अगर कह दिया जाय कि चला आ , तो वह चला आऐगा , यह कहना था कि वह अपने मक़ाम से रवाना हो गया , फिर आपने हुक्म दिया वह वापस चला गया।

5. एक शख़्स ने आपके मकान के सामने कोई हरकत की , आपने फ़रमाया मुझे इल्म है , दीवार हमारी नज़रों के दरमियान हाएल नहीं होती , आइन्दा ऐसा नहीं होना चाहिये। 6. एक शख़्स ने अपने बालों के सफ़ेद होने की शिकायत की , आपने उसे अपने हाथों से मस कर दिया , वह सियाह हो गये।

7. जिस ज़माने में इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) का इन्तेक़ाल हुआ था। आप मस्जिदे नबवी में तशरीफ़ फ़रमा थे , इतने में मन्सूर दवान्क़ी और दाऊद बिन सुलैमान मस्जिद में आए। मन्सूर आपसे दूर बैठा और दाऊद क़रीब आ गया। उसने फ़रमाया , मन्सूर मेरे पास क्यों नहीं आता ? उसने कोई उज़्र बयान किया। हज़रत ने फ़रमाया इससे कह दो तू अन्क़रीब बादशाहे वक़्त होगा और शरक़ व ग़र्ब का मालिक होगा। यह सुन कर दवान्क़ी आपके क़रीब आ गया और कहने लगा आपका रोब व जलाल मेरे क़रीब आने से माने था। फिर आपने उसकी हुकूमत की तफ़सील बयान फ़रमाई , चुनान्चे वैसा ही हुआ।

8. अबू बसीर की आंखें जाती रही थीं , उन्होंने एक दिन कि आप तो वारिसे अम्बिया हैं , मेरी आंखों की रौशनी पलटा दीजिए। आपने इसी वक़्त आंखों पर हाथ फेर कर उन्हें बिना बना दिया।

9. एक कूफ़ी ने आपसे कहा कि मैंने सुना है कि आपके ताबे फ़रिश्ते हैं जो आपको शिया और गै़र शिया बता दिया करते हैं। आपने पूछा तू क्या काम करता है ? उसने कहा गन्दुम फ़रोशी। आपने फ़रमाया ग़लत है। फिर उसने फ़रमाया कभी कभी जौं भी बेचता हूँ। फ़रमाया यह भी ग़लत है। तू सिर्फ़ ख़ुरमे बेचता है। उसने कहा आपसे यह किसने बताया है ? इमाम (अ.स.) ने फ़रमाया उसी फ़रिश्ते ने जो मेरे पास आता है। इसके बाद आपने फ़रमाया कि तू फ़ुलां बीमारी में तीन दिन के अन्दर वफ़ात कर जायेगा। चुनान्चे ऐसा ही हुआ।

10. रावी कहता है कि मैं एक दिन हज़रत की खि़दमत में हाज़िर हुआ तो क्या देखा , आप ब ज़बाने सुरयानी मुनाजात पढ़ रहे हैं। मेरे सवाल के जवाब में फ़रमाया कि यह फ़ुलां नबी की मुनाजात है।

11. हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) इरशाद फ़रमाते हैं कि मेरे वालिदे बुज़ुर्गवार इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) एक दिन मदीने में बहुत से लोगों के दरमियान बैठे हुए थे नागाह आपने सर डाल दिया। इसके बाद आपने फ़रमाया , ऐ अहले मदीना आईन्दा साल यहां नाफ़े बिन अरज़क़ चार हज़ार जर्रार सिपाही ले कर आयेगा और तीन शबाना रोज़ शदीद मुक़ाबला व मुक़ातेला करेगा , और तुम अपना तहफ़्फ़ुज़ न कर सकोगे। सुनो जो कुछ मैं कह रहा हूँ ‘‘ हवा काएन लायद मनहू ’’ वह होके रहेगा चुनान्चे आइन्दा साल(कान अल अमर अला मक़ाल) वही हुआ जो आपने फ़रमाया था।

12. जै़द बिन आज़म का बयान है कि एक दिन ज़ैद शहीद आपके सामने से गुज़रे तो आपने फ़रमाया कि यह ज़रूर कूफ़े में ख़ुरूज करेंगे और क़त्ल होंगे और इनका सर दयार ब दयार फिराया जायेगा। (फ़कान कमाकाल) चुनान्चे वही कुछ हुआ।

(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 185 नुरूब अबसार पृष्ठ 130 )

आपकी इबादत गुज़ारी और आपके आम हालात

आप अपने आबाओ अजदाद की तरह बेपनाह इबादत करते थे। सारी रात नमाज़े पढ़नी और सारा दिन रोज़े से गुज़ारना आपकी आदत थी। आपकी ज़िन्दगी ज़ाहिदाना थी। बोरीए पर बैठते थे। हदाया जो आते थे उसे फ़ुक़राओ मसाकीन पर तक़सीम कर देते थे। ग़रीबों पर बे हद शफ़क़्क़त फ़रमाते थे। तवाज़े और फ़रोतनी , सब्र और शुक्र ग़ुलाम नवाज़ी सेलह रहम वग़ैरा में अपनी आप नज़ीर थे। आपकी तमाम आमदनी फ़ुक़राओ पर सर्फ़ होती थी। आप फ़क़ीरों की बड़ी इज़्ज़त करते थे और उन्हें अच्छे नाम से याद करते थे।(कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 95 ) आपके एक ग़ुलाम अफ़लह का बयान है कि एक दिन आप काबे के क़रीब तशरीफ़ ले गए , आपकी जैसे ही काबे पर नज़र पड़ी आप चीख़ मार कर रोने लगे मैंने कहा कि हुज़ूर सब लोग देख रहे हैं आप आहिस्ता से गिरया फ़रमायें। इरशाद किया ऐ अफ़लह शायद ख़ुदा भी उन्हीं लोगों की तरह मेरी तरफ़ देख ले और मेरी बख़्शिश का सहारा हो जाय। इसके बाद आप सजदे में तशरीफ़ ले गये और जब सर उठाया तो सारी ज़मीन आँसुओं से तर थी।(मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 271 )

हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) और हश्शाम बिन अब्दुल मलिक

तवारीख़ में है कि 96 हिजरी में वलीद बिन अब्दुल मलिक फ़ौत हुआ(अबुल फ़िदा) और उसका भाई सुलैमान बिन अब्दुल मलिक ख़लीफ़ा मुक़र्रर किया गया।(इब्ने वरा) 99 हिजरी में उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ ख़लीफ़ा हुआ।(इब्नुल वरा) उसने ख़लीफ़ा होते ही इस बिदअत को जो 41 हिजरी में बनी उमय्या ने हज़रत अली (अ.स.) पर सबो शितम की सूरत में जारी कर रख थी। हुकमन रोक दिया।(अबुल फ़िदा) और रूकू़मे ख़ुम्स बनी हाशिम को देना शुरू कर दिया।(किताब उल ख़राएज अबू युसूफ़) यह वह ज़माना था जिसमें अली (अ.स.) के नाम पर अगर किसी बच्चे का नाम होता था तो वह क़त्ल कर दिया जाता था और किसी को भी ज़िन्दा न छोड़ा जाता था।(तदरीक अल रावी , सयूती) इसके बाद 101 हिजरी में यज़ीद इब्ने अब्दुल मलिक ख़लीफ़ा बनाया गया।(इब्नुल वरदी) 105 हिजरी में हश्शाम इब्ने अब्दुल मलिक बिन मरवान बादशाहे वक़्त मुक़र्रर हुआ।(इब्नुल वरदी)

हश्शाम बिन अब्दुल मलिक चुस्त , चालाक , कंजूस , मुताअस्सिब , चाल बाज़ , सख़्त मिज़ाज , कजरौ , ख़ुद सर , हरीस , कानों का कच्चा और हद दरजा शक्की था। कभी किसी का ऐतबार न करता था। अक्सर सिर्फ़ शुब्हे पर सलतनत के लाएक़ मुलाज़िमों को क़त्ल करा देता था। यह ओहदों पर उन्हीं को फ़ाएज़ करता था जो ख़ुशामदी हों। उसने ख़ालिद बिन अब्दुल्लाह क़सरी को 105 हिजरी से 120 हिजरी तक ईराक़ का गर्वनर रखा। क़सरी का हाल यह था कि हश्शाम को रसूल अल्लाह (स. अ.) से अफ़ज़ल बताता और उसी का प्रोपेगन्डा किया करता था।(तारीख़े कामिल जिल्द 5 पृष्ठ 103 ) हश्शाम आले मोहम्मद (स. अ.) का दुश्मन था। इसी ने ज़ैद शहीद को निहायत बुरी तरह क़त्ल किया था।(तारीख़े इस्लाम जिल्द 1 पृष्ठ 49 ) इसी ने अपने ज़माना ए वली अहदी में फ़रज़दक़ शायर को इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) की मदह के जुर्म में बा मक़ाम असक़लान क़ैद किया था।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा)

हश्शाम का सवाल और उसका जवाब

तख़्ते सलतनत पर बैठने के बाद हश्शाम बिन अब्दुल मलिक हज के लिये गया। वहां उस ने इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) को देखा कि मस्जिदुल हराम में बैठे हुए लोगों को पन्दो नसाहे से बहरावर कर रहे हैं। यह देख कर हश्शाम की दुश्मनी ने करवट ली और उसने दिल में सोचा कि उन्हें ज़लील करना चाहिये और इसी इरादे से उसने एक शख़्स से कहा कि जा कर उनसे कहो कि ख़लीफ़ा पूछ रहे हैं कि हश्र के दिन आख़री फ़ैसले से पहले लोग क्या खायें और पियेंगे। उसने जा कर इमाम (अ.स.) के सामने ख़लीफ़ा का सवाल पेश किया। आपने फ़रमाया जहां हश्रो नश्र होगा वहां मेवे दार दरख़्त होंगे , वह लोग उन्हीं चीज़ों को इस्तेमाल करेंगे। बादशाह ने जवाब सुन कर कहा यह बिल्कुल ग़लत है क्यों कि हश्र में लोग मुसिबतों और परेशानियों में मुब्तेला होंगे , उनको खाने पीने का होश कहां होगा ? क़ासिद ने बादशाह का जुमला नक़्ल कर दिया। हज़रत ने क़ासिद से फ़रमाया कि जाओ और बादशाह से कहो कि तुमने क़ुरआन भी पढ़ा है या नहीं। क़ुरआन में यह नहीं है कि जहन्नम के लोग जन्नत वालों से कहेंगे कि हमें पानी और कुछ नेमतें दे दो कि पी और खा लें। उस वक़्त वह जवाब देंगे कि काफ़िरों पर जन्नत की नेमतें हराम हैं।(पारा 8 रूकू 13 ) तो जब जहन्नम में भी लोग खाना पीना नहीं भूलेंगे तो हश्रो नश्र में कैसे भूल जायेंगे। जिसमें जहन्नम से कम सख़्तियां होंगी और वह उम्मीदो बीम और जन्नत व दोज़ख़ के दरमियान होंगे। यह सुन कर हश्शाम शर्मिन्दा हो गया।(इरशादे मुफ़ीद पृष्ठ 408 व तारीख़े आइम्मा पृष्ठ 414 )

इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) और हश्शाम की मुश्किल कुशाई

यह और बात है कि आले मोहम्मद (स. अ.) को दीदा व दानिस्ता नज़र अन्दाज़ कर दिया जाए लेकिन कठिन मौक़ों पर अहम मराहिल के लिये उनकी मुश्किल कुशाई के बग़ैर कोई चारा कार ही न था।

अल्लामा मजलिसी (अलैहिर रहमा) लिखते हैं ‘‘ हश्शाम बिन अब्दुल मलिक बिन मरवान के ज़माने में शाम और ईराक़ के आने वाले हज्जाज को मक्के के रास्ते में एक मंज़िल पर पानी न मिलने की वजह से सख़्त मुसीबत का सामना हुआ करता था। ग़रीब हज्जाज उस मंज़िल की बे आबी और अपने इज़तेराब और बेचैनी का ख़्याल करके मंज़िल दो मंज़िल पहले से अपना सामान जमा कर लिया करते थे ताकि उस मंज़िल तक किफ़ायत कर सकें , मगर बाज़ औक़ात यह इन्तेज़ामात भी नाकाफ़ी साबित हो जाते थे और बहुत से ग़रीब हज्जाज पानी न मिलने की वजह से इस मंज़िल पर जां बहक़ तसलीम हो जाते थे। इस मुश्किल की शिकायत अहले इस्लाम में हमेशा बनी रहती थी। वहा की ज़मीन भी हज्जाज की तमाम ज़मीनों से ज़्यादा संगलाख़ (बंजर) थी। वहां ज़मीन से पानी निकालना गोया आसमान से पानी लाना था। आखि़र कार हज्जाज की इस नाक़ाबिले बर्दाश्त मुसिबत पर सलतनत ने तवज्जो की और एक बहुत बड़ा कुआं खोदने का बंदोबस्त किया। हश्शाम ने इस कुएं की तामीर का एहतेमाम ख़ुद अपने ज़िम्मे लिया और अपने मीरे इमारत को मज़दूरों और काम करने वालों की एक बड़ी जमाअत के साथ उस मक़ाम पर भेजा। ग़रज़ कि मोहकमाए तामीरात का सुलतानी इस्टाफ़ उस मक़ाम पर पहुँच कर अपने काम में मसरूफ़ हुआ वह अरब की ज़मीन और फिर अरब में भी किस हिस्से की , हिजाज़ की दिन , दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद हाथ दो हाथ ज़मीन का खुद जाना भी ग़रीब काम करने वालों के लिये ग़नीमत था। ख़ुदा ख़ुदा कर के काम करने वाले सतेह आब के क़रीब पहुँचे तो यकायक उसकी जानिब से एक सूराख़ पैदा हो गया। उससे एक निहायत गरम और मुंह झुलसा देने वाली हवा निकली जिसने उन सब को हलाक कर दिया , जो उस वक़्त कुंए के अन्दर थे। कुएं के ऊपर जो दीगर काम करने वाले थे उन्होंने जब उनकी ज़िन्दगी के आसार मफ़कू़द पाए तफ़हुस हाल के लिये चन्द और आदमियों को कुएं में उतारा वह भी जा कर वापस न आए।

जब तमाम इस्टाफ़ के दो तिहाई कारकुन ज़ाया हो चुके और उनकी हालत की कोई वजह मालूम न हो सकी तो मीरे इमारत ने मजबूर हो कर काम बन्द कर दिया और हश्शाम की खि़दमत में हाज़िर हो कर अर्ज़ परदाज़ हुआ और सारा वाक़िया इससे बयान किया। इस ख़बरे वहशत असर के सुनते ही तमाम दरबार में सन्नाटा छा गया और हर एक अपनी अपनी इस्तेदाद और हैसियत के मुताबिक़ इसके असबाब और बवाएस ढ़ूंढ़ने लगा। आखि़र कार हश्शाम ने एक तहक़ीक़ाती जमाअत को मुरत्तब कर के मौक़े पर भेजा मगर वह भी न काम रही और यह मालूम न कर सकी कि इसमें जाने वाले मर क्यों जाते हैं।

हश्शाम इसी इज़्तेराब और परेशानी मे था कि हज का ज़माना आ गया , यह दमिश्क़ से चल कर मक्का मोअज़्ज़मा पहुँचा और वहां पहुँच कर उसने हर मकतबे ख़्याल के रहनुमाओ को जमा किया और उनके सामने कुऐं वाला वाक़ेया बयान किया और उनकी मुश्किल कुशाई की ख़्वाहिश की।

बादशाह की बात सुन कर सब ख़ामोश हो गये और काफ़ी सोचने के बावजूद किसी नतीजे पर न पहुँच सके। नागाह हज़रत इमाम मोहम्मदे बाक़िर (अ.स.) जो बादशाह की तरफ़ से मदऊ थे आ पहुँचे और आपने हालात सुन कर फ़रमाया मैं मौक़ा देख्ूागां चुनान्चे आप तशरीफ़ ले गये और वापस आकर आपने फ़रमाया , ऐ बादशाहे क़ौम आदम से जो अहले एहक़ाफ़ थे जिनका ज़िक्र क़ुरआने मजीद में है , यह जगह उन्हीं के मोअज़्ज़ब होने की है। यह रह अक़ीम जो ज़मीन के सातवें तबक़े से निकल रही है यह किसी को भी ज़िन्दा न छोड़े गी , लेहाज़ा इस जगह को फ़ौरन बन्द करा दे और फ़लाँ मक़ाम पर कुआँ खुदवा , चुनान्चे बादशाह ने ऐसा ही किया। आपके इरशाद से लोगों की जानें भी बच गईं और कुआँ भी तैयार हो गया।(हयातुल क़ुलूब जिल्द 2 व मजमउल बहरैन पृष्ठ 577 व मासिरे बक़र पृष्ठ 22 )

रसूले करीम (स. अ.) फ़रमाते हैं कि इन मुक़ामात से जल्द दूर भागो जो माजूब हो चुके हैं ताकि कहीं ऐसा न हो कि तुम भी मुतासिर हो जाओ।(मुक़दमा इब्ने ख़लदून पृष्ठ 125 प्रकाशित मिस्र)

अल्लामा रशीदउद्दीन अबू अब्दुल्लाह मोहम्मद बिन अली बिन शहर आशोब ने इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) ही जैसा वाक़ेया अहदे मेहदी अब्बासी में इमाम मूसा काज़िम (अ.स.) के मुताअल्लिक़ लिखा है।(मुनाक़िब जिल्द 5 पृष्ठ 69 )

हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) की दमिश्क़ में तलबी

अल्लामा मजलिसी और सय्यद इब्ने ताऊस रक़मतराज़ हैं कि हश्शाम बिन अब्दुल मलिक अपने अहदे हकूमत के आख़िरी अय्याम में हज्जे बैतुल्लाह के लिये मक्का मोअज़्ज़मा पहुँचा। वहां हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) और इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) भी मौजूद थे। एक दिन इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) ने मजमाए आम में एक ख़ुतबा इरशाद फ़रमाया जिसमें और बातों के अलावा यह भी कहा कि हम रूए ज़मीन पर ख़ुदा के ख़लीफ़ा और उसकी हुज्जत हैं , हमारा दुश्मन जहन्नम में जायेगा , और हमारा दोस्त नेमाते जन्नत से मुतमइन होगा। इस ख़ुतबे की इत्तेला हश्शाम को दी गई , वह वहां तो खा़मोश रहा लेकिन दमिश्क़ पहुँचने के बाद वालीए मदीना को पैग़ाम भेजा कि मोहम्मद बिन अली और जाफ़र बिन मोहम्मद को मेरे पास भेज दो। चुनान्चे आप हज़रात दमिश्क़ पहुँचे वहां हश्शाम ने आपको तीन रोज़ तक इज़ने हुज़ूरी नही दिया। चौथे रोज़ जब अच्छी तरह दरबार को सजा लिया तो आपको बुलावा भेजा। आप हज़रात जब दाखि़ले दरबार हुए तो आपको ज़लील करने के लिये आपसे कहा हमारे तीर अन्दाज़ों की तरह आप भी तीर अन्दाज़ी करें।

हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) ने फ़रमाया कि मैं ज़ईफ़ हो गया हूँ मुझे इस से माफ़ रख , उसने ब क़सम कहा यह न मुम्किन है। फिर एक तीर कमान आपको दिलवा दी आपने ठीक निशाने पर तीर लगाए , यह देख कर वह हैरान रह गया। इसके बाद इमाम (अ.स.) ने फ़रमाया , बादशाह हम मादने रिसालत हैं हमारा मुक़ाबला किसी अमर में कोई नहीं कर सकता। यह सुन कर हश्शाम को ग़ुस्सा आ गया , वह बोला कि आप लोग बहुत बड़े बड़े वादे करते हैं आपके दादा अली बिन अबी तालिब ने ग़ैब का दावा किया है। आपने फ़रमाया बादशाह क़ुरआन मजीद में सब कुछ मौजूद है और हज़रत अली (अ.स.) इमामे मुबीन थे , उन्हे क्या नहीं मालूम था।(जिलाउल उयून)

सक़्क़तुल इस्लाम अल्लामा क़ुलैनी तहरीर फ़रमाते हैं कि हश्शाम ने अहले दरबार को हुक्म दिया था कि मैं मोहम्मद इब्ने अली इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) को सरे दरबार ज़लील करूंगा तुम लोग यह करना कि जब मैं ख़ामोश हो जाऊं तो उन्हें कलमाते न सज़ा कहना चुनान्चे ऐसा ही किया गया।

आखि़र में हज़रत ने फ़रमाया , बादशाह याद रख हम ज़लील करने से ज़लील नहीं हो सकते , ख़ुदा वन्दे आलम ने हमें जो इज़्ज़त दी है उसमें हम मुन्फ़रिद हैं। याद रख आक़बत की शाही मुत्तक़ीन के लिये है। यह सुन कर हश्शाम ने फ़ामर बहा अला अलजिस आपको क़ैद करने का हुक्म दे दिया चुनान्चे आप क़ैद कर दिये गये।

क़ैद ख़ाने में दाख़िल होने के बाद आपने क़ैदियों के सामने एक मोजिज़ नुमा तक़रीर की जिसके नतीजे में क़ैद ख़ाने के अन्दर कोहरामे अज़ीम बरपा हो गया। बिल आखि़र क़ैद खाने के दरोगा़ ने हश्शाम से कहा कि अगर मोहम्मद बिन अली ज़्यादा दिनों क़ैद रहे तो तेरी ममलेकत का निज़ाम मुन्क़लिब हो जायेगा। इनकी तक़रीर क़ैद ख़ाने से बाहर भी असर डाल रही है और अवाम में इनके क़ैद होने से बड़ा जोश है। यह सुन कर हश्शाम डर गया और उसने आपकी रेहाई का हुक्म दिया और साथ ही यह भी ऐलान करा दिया कि न आपको कोई मदीने पहुँचाने जाय और न रास्ते में कोई आपको खाना पानी दे , चुनान्चे आप तीन रोज़ भूखे प्यासे दाखि़ले मदीना हुए।

वहां पहुँच कर आपने खाने पीने की सई की लेकिन किसी ने कुछ न दिया। बाज़ार हश्शाम के हुक्म से बन्द थे यह हाल देख कर आप एक पहाड़ी पर गए और आपने उस पर खड़े हो कर अज़ाबे इलाही का हवाला दिया। यह सुन कर एक पीर मर्द बाज़ार में खड़ा हो कर कहने लगा भाईयों ! सुनो , यही वह जगह है जिस जगह हज़रत शुऐब नबी ने खड़े हो कर अज़ाबे इलाही की ख़बर दी थी और अज़ीम तरीन अज़ाब नाज़िल हुआ था। मेरी बात मानो और अपने आप को अज़ाब में मुबतिला न करो। यह सुन कर सब लोग हज़रत की खि़दमत में हाज़िर हो गए और आपके लिए होटलों के दरवाज़े खोल दिये।(उसूले काफ़ी)

अल्लामा मजलिसी लिखते हैं कि इस वाक़ऐ के बाद हश्शाम ने वाली मदीना इब्राहीम बिन अब्दुल मलिक को लिखा कि इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) को ज़हर से शहीद कर दे।(जिलाउल उयून पृष्ठ 262 )

किताब अल ख़राएज व अल बहराएज़ में अल्लामा रवन्दी लिखते हैं कि इस वाक़ेए के बाद हश्शाम बिन अब्दुल मलिक ने ज़ैद बिन हसन के साथ बाहमी साज़िश के ज़रिए इमाम (अ.स.) को दोबारा दमिश्क़ में तलब करना चाहा लेकिन वालिये मदीना की हमनवाई हासिल न होने की वजह से अपने इरादे से बाज़ आया। उसने तबरूकाते रिसालत (स. अ.) जबरन तबल किये और इमाम (अ.स.) ने बरवाएते इरसाल फ़रमा दिये।

दमिश्क़ से रवानगी और एक राहिब का मुसलमान होना

अल्लामा मजलिसी तहरीर फ़रमाते हैं कि हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) क़ैद ख़ाना ए दमिश्क़ से रिहा हो कर मदीने को तशरीफ़ लिये जा रहे थे कि नागाह रास्ते में एक मुक़ाम पर मजमए कसीर नज़र आया। आपने तफ़ाहुसे हाल किया तो मालूम हुआ कि नसारा का एक राहिब है जो साल में सिर्फ़ एक बार अपने माअबद से निकलता है। आज इसके निकलने का दिन है। हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) इस मजमे में अवाम के साथ जा कर बैठ गए , राहिब जो इन्तेहाई ज़ईफ़ था , मुक़र्रेरा वक़्त पर बरामद हुआ। उसने चारों तरफ़ नज़र दौड़ाने के बाद इमाम (अ.स.) की तरफ़ मुख़ातिब हो कर बोला , 1. क्या आप हम में से हैं ? इमाम (अ.स.) ने फ़रमाया , मैं उम्मते मोहम्मद से हूँ। 2. आप उलमा से हैं या जोहला से ? फ़रमाया मैं जाहिल नहीं हूँ। 3. आप मुझ से कुछ दरियाफ़्त करने के लिये आयें हैं ? फ़रमाया नहीं। 4. जब कि आप आलिमों में से हैं क्या मैं आप से कुछ पूछ सकता हूँ ? फ़रमाया ज़रूर पूछिए।

यह सुन कर राहिब ने सवाल किया 1. शबो रोज़ में वह कौन सा वक़्त है जिसका शुमार न दिन में हो न रात में हो ? फ़रमाया वह सूरज के तुलू से पहले का वक़्त है जिसका शुमार दिन और रात दोनों में नहीं। वह वक़्त जन्नत के अवक़ात में से है और ऐसा मुताबर्रिक है कि इसमें बीमारों को होश आ जाता है। र्दद को सुकून होता है। जो रात भर न सो सके उसे नींद आ जाती है , यह वक़्ते आख़रत की तरह रग़बत रखने वालों के लिये ख़ास उल ख़ास है। 2. आपका अक़ीदा है कि जन्नत में पेशाब व पख़ाना की ज़रूरत न होगी , क्या दुनिया में इसकी कोई मिसाल है। फ़रमाया बतने मादर में जो बच्चे परवरिश पाते हैं , इनका फ़ुज़ला ख़ारिज नहीं होता। 3. मुसलमानों का अक़ीदा है कि खाने से बहिश्त का मेवा कम न होगा इसकी यहां कोई मिसाल है ? फ़रमाया हाँ , एक चिराग़ से लाखों चिराग़ जलाए जाऐ तब भी पहले चिराग़ की रौशनी में कमी न होगी। 4. वह कौन से दो भाई हैं जो एक साथ पैदा हुए और एक साथ मरे लेकिन एक की उमर पचास साल की हुई दूसरे की डेढ़ सौ साल की हुई ? फ़रमाया उज़ैर और अज़ीज़ पैग़म्बर हैं। यह दोनों दुनियां में एक ही रोज़ पैदा हुए और एक ही रोज़ मरे। पैदाईश के बाद तीस बरस तक साथ रहे फिर ख़ुदा ने अज़ीज़ नबी को मार डाला (जिसका ज़िक्र क़ुरआन मजीद में मौजूद है) और सौ बरस (100) के बाद फिर ज़िन्दा फ़रमाया इसके बाद वह अपने भाई के साथ और ज़िन्दा रहे और फिर एक रोज़ दोनों ने इन्तेक़ाल किया।

यह सुन कर राहिब अपने मानने वालों की तरफ़ मोतवज्जा हो कर कहने लगा कि जब तक यह शख़्स शाम के हुदू में मौजूद है मैं किसी के सवाल का जवाब न दूंगा। सब को चाहिये कि इसी आलमे ज़माना से सवाल करे इसके बाद वह मुसलमान हो गया।

(जलाल उल उयून पृष्ठ 261 प्रकाशित ईरान 1301 हिजरी)

इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) की शहादत

आप अगरचे अपने इल्मी फ़ैज़ व बरकात की वजह से इस्लाम को बराबर फ़रोग़ दे रहे थे लेकिन इसके बावजूद हश्शाम बिन अब्दुल मलिक ने आपको ज़हर के ज़रिए से शहीद करा दिया और आप बतारीख़ 7 ज़िल्हिज्जा 114 हिजरी यौमे दोशम्बा मदीना मुनव्वरा में इन्तिक़ाल फ़रमा गए। इस वक़्त आपकी उम्र 57 साल की थी आप जन्नतुल बक़ीह में दफ़्न हुए।(कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 93 जिलाउल उयून पृष्ठ 264 जनात अल ख़लूद पृष्ठ 26, दमए साकेबा पृष्ठ 449, अनवारूल हुसैनिया पृष्ठ 48, शवाहेदुन नबूअत पृष्ठ 181 रौज़तुल शोहदा पृष्ठ 434 )

अल्लामा शिबलंजी और अल्लामा इब्ने हजर मक्की फ़रमाते हैं , ‘‘ मात मसमूमन काबहू ’’ आप अपने पदरे बुज़ुर्गवार इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) ही की तरह ज़हर से शहीद कर दिए गए।(नुरूल अबसार पृष्ठ 31 व सवाक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 120 ) आपकी शहादत हश्शाम के हुक्म से इब्राहीम बिन वालिये मदीना की ज़हर ख़ूरानी के ज़रिए वाक़े हुई है। एक रवायत में है कि ख़लीफ़ा ए वक़्त हश्शाम बिन अब्दुल मलिक की मुरसला ज़हर आलूद ज़ीन के ज़रिए से वाक़े हुई थी।(जनात अल खुलूद व दमए साकेबा जिल्द 2 पृष्ठ 478 )

शहादत से क़ब्ल आपने हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) से बहुत सी चीज़ों के मुताअल्लिक़ वसीअत फ़रमाई और कहा कि बेटा मेरे कानों में मेरे वालिदे माजिद की आवाज़ आ रही है। वह मुझे जल्द बुला रहे हैं।(नुरूल अबसार पृष्ठ 131 )

आपने ग़ुस्लो कफ़न के मुताअल्लिक़ ख़ास तौर पर हिदायत की क्यों कि इमाम राजिज़ इमाम नशवेद , इमाम को इमाम ही ग़ुस्ल दे सकता है।(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 181 ) अल्लामा मजलिसी फ़रमाते हैं कि आपने अपनी वसीअतों में यह भी कहा कि 800 दिरहम मेरी अज़ादारी और मेरे मातम पर सर्फ़ करना और ऐसा इन्तेज़ाम करना कि दस साल तक मिना मेंब ज़मानए हज मेरी मज़लूमियत का मातम किया जाए।(जिलाउल उयून पृष्ठ 264 ) उलमा का बयान है कि वसीयतों में यह भी था कि मेरे बन्दे कफ़न क़ब्र में खोल देना और मेरी क़ब्र चार उंगल से ज़्यादा ऊँची न करना।(जनात अल ख़ुलूद पृष्ठ 27 )

अज़वाज व औलाद

आपकी चार बीबीयाँ थीं और उन्हीं से औलाद हुई। उम्मे फ़रवा , उम्मे हकीम , लैला और एक बीबी उम्मे फ़रवा क़ासिम बिन मोहम्मद बिन अबी बक्र जिन से हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) और अब्दुल्लाह अफ़तह पैदा हुए और उम्मे बिन्ते असद बिन मोग़ैरा शक़फ़ी से इब्राहीम व अब्दुल्लाह और लैला से अली और ज़ैनब पैदा हुये और चौथी बीबी से उम्मे सलमा मोता वल्लिद हुइ।(इरशाद मुफ़ीद पृष्ठ 294 मनाक़िब जिल्द 5 पृष्ठ 19 व नुरूल अबसार सफ़़ा 131 )

अल्लामा मोहम्मद बाक़िर बहभानी , अल्लामा मोहम्मद रज़ा आले काशेफ़ुल ग़ता और अल्लामा हुसैन वाएज़ काशफ़ी लिखते हैं कि हज़रत मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) की नस्ल सिर्फ़ इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) से बढ़ी है उनके अलावा किसी की औलादें ज़िन्दा और बाक़ी नहीं रहीं।(दमए साकेबा जिल्द 2 पृष्ठ 479 अनवारूल हुसैनिया जिल्द 2 पृष्ठ 48, रौज़तुल शोहदा पृष्ठ 434 प्रकाशित लखनऊ 1284 0 )


अबु अब्दुल्लाह हज़रत इमामे जाफ़रे सादिक़ (अ स)

इसी इजमाल की हैं शरह , गोया जाफ़रे सादिक़

लक़ब जिसका किताब अल्लाह में ख़त्मे नबूवत है

बनाये सब से पहले , फ़िक़हा के आईन मौला ने

इन्हीं के दम से क़ायम आज इस्लामी शरीअत है

साबिर थरयानी ‘‘ कराची ’’

सादिक़ आले मोहम्मद , वह इमामे सादस

ज़ेबे सर जिसके इमामत का है मौरूसी ताज

है यह मौलूदे जिगर बन्द , मोहम्मद बाक़र

ख़ाना ए हस्ती , जिदअत को करेगा ताराज

हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) के छठे जानशीन और सिलसिलाए अस्मत की आठवीं कड़ी हैं। आपके वालिदे माजिद हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़र (अ.स.) थे और वालिदा माजिदा जनाबे उम्मे फ़रवा बिन्ते क़ासिम बिन मोहम्मद बिन अबी बक्र थीं। आप अपने आबाओ अजदाद की तरह इमाम मन्सूस , मासूम , आलिमें ज़माना और अफ़ज़ले काएनात थे।

अल्लामा हजर लिखते हैं कि हज़रत इमामे जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) अफ़ज़ल व अकमल थे। इसी बिना पर आपने अपने बा पके ख़लीफ़ा और वसी क़रार पाये।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 120 ) अल्लामा इब्ने ख़ल्क़ान तहरीर फ़रमाते हैं कि आप सादात अहलेबैत से थे व फ़ज़लह ‘‘ अश्हरान यज़कर ’’ इनकी अफ़ज़लियत व करम मोहताज बयान नहीं।(दफ़ायात अल अयान जिल्द 1 पृष्ठ 105 )

इमाम फ़ख़रूद्दीन राज़ी की तफ़सीर कबीर जिल्द 5 पृष्ठ 429 व जिल्द 6 पृष्ठ 783 प्रकाशित मिस्र बहवाला ए आयाए ततहीर और आरिफ़ समदानी अली हमदानी की मुवदतुल क़ुर्बा पृष्ठ 34 प्रकाशित बम्बई 1310 ई 0 और शाह अब्दुल अज़ीज़ की अश्रया ताअन 13 पृष्ठ 439 प्रकाशित लखनऊ 1309 की इबारत से मुस्तफ़ाद होता है कि आप भी अपने आबाओ अजदाद की तरह मासूम और महफ़ूज़ थी। वरासतु लबीव पृष्ठ 200 में है कि आपने इब्तिदा ए उम्र से आखि़र तक कोई गुनाह नहीं किया और इसी को महफ़ूज़ कहे हैं। इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ख़ुद इरशाद फ़रमाते हैं कि (नहन क़ौम मासूमन) हम हैं वही ख़ुदा के तरजुमान , हम हैं इल्मे ख़ुदा के ख़ज़ीनादार और हम ही लोग मासूम हैं। ख़ुदा ने हमारी इताअत का हुक्म दिया है और हमारी मासीयत से दुनिया वालों को रोका है।(आलाम अल वरा पृष्ठ 169 )

अल्लामा इब्ने तल्हा शाफ़ई लिखते हैं कि आप अहले बैत और रिसालत की अज़ीम तरीन फ़र्द थे और आप मुख़्तलिफ़ क़िस्म के उलूम से भर पूर थे। आप ही से क़ुरआन मजीद के मानी के चश्मे फूटते रहे हैं। आपके बहरे इल्म से उलूम के मोती रोले जाते हैं। आप ही से इल्मी अजाएब व कमालात का ज़हूर व इन्केशाफ़ हुआ।(मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 173 )

अल्लामा इब्ने हजर मक्की लिखते हैं कि उलमा ने आपसे इस दर्जा नक़ले उलूम किया जिसकी कोई हद नहीं। आपका आवाज़े इल्म तमाम अवसाद दयार में फैला हुआ था।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 120 )

मुल्ला जामी तहरीर फ़रमाते हैं कि आपके उलूम का अहाता व फ़हमो इदराक से बुलन्द है।(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 180 )

अल्लामा मिस्र शेख़ मोहम्मद ख़ज़री बक लिखते हैं कि इनसे इमाम मालिक बिन अन्स , इमाम अबू हनीफ़ा और अकसर उलेमा ए मदीना ने रवायत की है मगर इमाम बुख़ारी , सहाए सित्ता में सब से ज़्यादा मुताबर्रिक समझी जाती है। वाज़े हो कि दीगर सहाह में आले मोहम्मद (स. अ.) से भी रवायत ली गई हैं। ज़रूरत थी कि इन सहाह का बुख़ारी से बुलन्द दर्जा दिया जाता मगर ऐसा नहीं हुआ।

बरीं अक़ल व दानिश बेबायद गिरीस्त

आपकी विलादत ब सआदत आप बतारीख़ 17 रबीउल अव्वल 83 हिजरी मुताबिक़ 702 ई 0 यौमे दो शम्बा मदीना ए मुनव्वरा में पैदा हुए।(इरशाद मुफ़ीद फ़ारसी पृष्ठ 413, आलाम अल वरा पृष्ठ 159, जामे अब्बासी पृष्ठ 60 वगै़राह) आपकी विलादत की तारीख़ को ख़ुदा वन्दे आलम ने बड़ी इज़्ज़त दे रखी है। अहादीस में है कि इस तारीख़ को रोज़ा रखना एक साल के रोज़े के बराबर है। विलादत के बाद एक दिन हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़र (अ.स.) ने फ़रमाया कि मेरा यह फ़रज़न्द इन चन्द मख़सूस अफ़राद में से है जिसनी वजह से ख़ुदा ने बन्दों पर एहसान फ़रमाया और यही मेरे बाद मेरा जानशीन होगा।(जन्नात अल ख़ुलूद पृष्ठ 27 )

अल्लामा मजलिसी लिखते हैं कि जब आप बतने मादर में थे तब कलाम फ़रमाते थे। विलादत के बाद आपने कलमाए शहादतैन ज़बान पर जारी फ़रमाया आप भी नाफ़ बुरीदा और ख़तना शुदा पैदा हुए हैं।(जिला अल उयून पृष्ठ 265 ) आप तमाम नबूवतों के ख़ुलासा थे।

इस्मे गिरामी , कुन्नियत , अलक़ाब

आपका इस्में गेरामी जाफ़र , आपकी कुन्नियत अबू अब्दुल्लाह , अबू इस्माईल और आपके अलक़ाब सादिक़ , फ़ाज़िल , ताहिर वग़ैरा हैं। अल्लामा मजलिसी रक़म तराज़ हैं कि आं हज़रत ने अपनी ज़ाहिरी ज़िन्दगी में हज़रत जाफ़र बिन मोहम्मद को लक़ब सादिक़ से मौसूम व मुलक़्क़ब फ़रमाया था और इसकी वजह बज़ाहिर यह थी कि अहले आसमान के नज़दीक़ आपका लक़ब पहले ही से ‘‘ सादिक़ ’’ था।(जिला अल उयून पृष्ठ 264 )

अल्लामा इब्ने ख़ल्क़ान का कहना है कि सिदक़ मक़ाल की वजह से आपके नामे नामी का जुज़ो ‘‘ सादिक़ ’’ क़रार पाया है।(वफ़यात उल अयान जिल्द 1 पृष्ठ 105 )

‘‘ जाफ़र ’’ के मुताअल्लिक़ उलेमा का बयान है कि जन्नत में जाफ़र नामी एक शीरी नहर है इसी की मुनासिबत से आपका यह लक़ब रखा गया है चूंकि आपका फ़ैज़े आम नहरे जारी की तरह था इसी लिये लक़ब से मुलक़्क़ब हुए।(अरजहुल मतालिब पृष्ठ 361 बहवाला तज़किरातुल उल ख़्वास उल उम्मता)

इमामे अहले सुन्नत अल्लामा वहीदुज़्ज़मा हैदराबादी तहरीर फ़रमाते हैं कि जाफ़र छोटी नहर या बड़ी वासेए (कुशादा) इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) मशहूर नाम हैं। बारह इमामों में से और बड़े सुक़्क़ा और फ़क़ीह और हाफ़िज़ थे। इमाम मालिक और इमामे अबू हनीफ़ा के शेख़ (हदीस) हैं और इमाम बुख़ारी को मालूम नहीं क्या शुबहा हो गया कि वह अपनी सही में इनसे रवायत नहीं करते और यहया बिन सईद क़तान ने बड़ी बेअदबी की है जो कहते हैं , ‘‘ फ़ी मनहू शैइनव मजालिद अहबा इला मिन्हा ’’ मेरे दिल में इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की तरफ़ से ख़लिश है। मैं इनसे बेहतर मजालिद को समझता हूँ हालांकि मजालिद को इमाम साहब के सामने क्या रूतबा है। ऐसी ही बातों की वजह से अहले सुन्नत बदनाम होते हैं कि उनको आइम्मा अहले बैत (अ.स.) से मोहब्बत और ऐतिक़ाद नहीं। अल्लाह ताअला इमाम बुख़ारी पर रहम न करे कि मरवान और इमरान बिन ख़्तान और कई ख़्वारिज से तो उन्होंने रवाएत की और जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) से जो इब्ने रसूल अल्लाह (स अ व व ) हैं इनकी रवाएत में शुब्हा करते हैं।(अनवारूल अलख़्ता पारा पृष्ठ 47 प्रकाशित हैदराबाद दकन)

अल्लामा इब्ने हजर मक्की अल्लामा शिब्लंजी रक़म तराज़ हैं कि अयाने आइम्मा में से एक जमाअत मिस्ल यहया बिन सईद इब्ने हजर , इमाम मालिक , इमाम शैफ़ान सूरी , सुफ़यान बिन ऐनिया , अबू हनीफ़ा , अय्यूब सजसतानी ने आपसे हदीस अख़्ज़ की , अबू हातिम का कौल है कि इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ऐसे सुक़्क़ा हैं (लायस अल अन्हा मसलह) कि आप ऐसे शख़्सों की निस्बत कुछ तहक़ीक़ और इस्तेफ़सार व तफ़हुस की ज़रूरत ही नहीं। आप रियासत की तलब से बे नियाज़ थे और हमेशा इबादत गुज़ारी में बसर करते रहे। उमर इब्ने मक़दाम का कहना है कि जब मैं इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) को देखता हूँ तो मुझे माअन ख़्याल होता है कि यह जौहरे रिसालत (स अ व व ) की असल बुनियाद हैं।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 120 नूरूल अबसार 131 हुलयतुल अबरार , तारीख़ आईम्मा पृष्ठ 433 )

बादशाहाने वक़्त

आपकी विलादत 83 हिजरी में हुई है इस वक़्त अब्दुल मलिक बिन मरवान बादशाहे वक़्त था फिर वलीद सुलेमान उमर बिन अब्दुल यज़ीद बिन अब्दुल मलिक , यज़ीद अल नाक़िस , इब्राहीम इब्ने वलीद और मरवान अल हेमार , अल्ल तरतीब ख़लीफ़ा मुक़र्रर हुए। मरवान अल हेमार के बाद सलतनते बनी उमय्या का चिराग़ गुल हो गया और बनी अब्बास का पहला बादशाह अबुल अब्बास , सफ़ाह और दूसरा मन्सूर दवानक़ी हुआ है। मुलाहेज़ा हो ,(आलाम अल वरा , तारीख़ इब्ने अलवरी व तारीख़े आइम्मा पृष्ठ 336 ) इसी मन्सूर ने अपनी हुकूमत के दो साल गुज़रने के बाद इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) को ज़हर से शहीद कर दिया। (अनवारूल हुसैनिया जिल्द पृष्ठ 50)

अब्दुल मलिक बिन मरवान के अहद में आपका एक मनाज़िरा

हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) ने बे शुमार इल्मी मनाज़िरे फ़रमाए हैं आपने दहिरयों , क़दरियों काफ़िर और यहूदी व नसारा को हमेशा शिकस्ते फ़ाश दी है। किसी एक मनाज़िरे में भी आप पर कोई ग़लबा हासिल न कर सका। अहदे अब्दुल मलिक इब्ने मरवान का ज़िक्र है कि एक क़दरिया मज़हब का मनाज़िर इसके दरबार में आ कर उलमा से मनाज़िरे का ख़्वाहिश मन्द हुआ। बादशाह ने हसबे आदत अपने उलमा को तलब किया और उनसे कहा कि इस क़दरिये मनाज़िर से मनाज़िरा करो। उलमा ने उस से काफ़ी ज़ोर आज़माई की मगर वह मैदाने मनाज़िरे का खिलाड़ी इन से न हार सका और तमाम उलमा आजिज़ आ गए। इस्लाम की शिकस्त होते हुए देख कर अब्दुल मलिक इब्ने मरवान ने फ़ौरन एक ख़त इमाम मोहम्मद बाक़र (अ.स.) की खि़दमत में मदीना रवाना कर दिया और उसमें ताकीद की कि आप ज़रूर तशरीफ़ लायें। हज़रत मोहम्मद बाक़र (अ.स.) की खि़दमत में जब इसका ख़त पहुँचा तो आपने अपने फ़रज़न्द हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) से फ़रमाया कि बेटा मैं ज़ईफ़ हो चुका हूँ तुम मनाज़िरे के लिये शाम चले जाओ। हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) अपने पदरे बुर्ज़ुगवार के हस्ब उल हुक्म मदीना से रवाना हो कर शाम पहुँच गए। अब्दुल मलिक इब्ने मरवान ने जब इमाम मोहम्मद बाक़र (अ.स.) के बजाए इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) को देखा तो कहने लगा कि आप अभी कमसिन हैं और वह बड़ा पुराना मनाज़िर है , हो सकता है कि आप भी और उलमा की तरह शिकस्त खांए इस लिये मुनासिब नहीं कि मजालिसे मनाज़िरा फिर मुन्अक़िद की जाए। हज़रत ने फ़रमाया , बादशाह नू घबरा नहीं , अगर ख़ुदा ने चाहा तो मैं सिर्फ़ चन्द मिनट में मनाज़िरा ख़त्म कर दूंगा। आपके इरशाद की ताईद दरबारियों ने भी की और मौक़ा ए मनाज़िरे पर फ़रीक़ैन आ गए। चूंकि क़दरियों का एतेक़ाद है कि बन्दा ही सब कुछ है। ख़ुदा को बन्दों के मामले में कोई दख़ल नहीं है , और न ख़ुदा कुछ कर सकता है। यानी ख़ुदा के हुक्म और क़ज़ा व क़द्र व इरादों को बन्दों के किसी अमर में दख़ल नहीं। लेहाज़ा हज़रत ने इसकी पहल करने की ख़्वाहिश पर फ़रमाया कि मैं तुम से सिर्फ़ एक बात कहना चाहता हूँ और वह यह है कि तुम ‘‘ सूरा ए हम्द पढ़ो ’’ उसने पढ़ना शुरू किया। ज बवह ‘‘ इय्या का नाब्दो व इय्याका तस्तेईन ’’ पर पहुँचा , जिसका तरजुमा यह है कि ‘‘ मैं सिर्फ़ तेरी इबादत करता हूँ और बस तुझी से मद्द चाहता हूँ ’’ तो आपने फ़रमाया , ठहर जाओ और मुझे इसका जवाब दो कि जब ख़ुदा को तुम्हारे एतेक़ाद के मुताबिक़ तुम्हारे किसी मामले में दख़्ल देने का हक़ नही तो फिर तुम उससे मद्द क्यों मांगते हो। यह सुन कर वह ख़ामोश हो गया और कोई जवाब न दे सका। बिल आखि़र मजलिसे मनाज़ेरा बरख़्वास्त हो गई और बादशाह बेहद ख़ुश हुआ।(तफ़सीरे बुरहान जिल्द 1 पृष्ठ 33 )

अबु शाकिर देसानी का जवाब अबु शाकिर देसानी जो ला मज़हब था। हज़रत से कहने लगा कि क्या आप ख़ुदा का ताअर्रूफ़ करा सकते हैं और उसकी तरफ़ मेरी रहबरी फ़रमा सकते हैं। आपने एक ताऊस का अन्डा हाथ में ले कर फ़रमाया देखो इसकी बाहरी बनावट पर ग़ौर करो , और अन्दर की बहती हुई ज़र्दी और सफ़ैदी को बहुत ग़ौर से देखो और उस पर तवज्जो दो कि इसमें रंग बिरंग के तायर (पक्षी) क्यों कर पैदा हो जाते हैं। क्या तुम्हारी अक़्ले सलीम इसको तसलीम नहीं करती कि इस अंडे को अछूते अन्दाज़ में बनाने वाला और उससे पैदा करने वाला कोई है। यह सुन कर वह ख़ामोश हो गया और दहरियत से बाज़ आया। इसी देसानी का ज़िक्र है कि उसने एक दफ़ा आपके साहबी हश्शाम बिन हकम के ज़रिये से सवाल किया कि क्या यह मुम्किन है कि ख़ुदा सारी दुनिया को एक अंडे में समो दे और अंडा बढे न दुनिया घटे ? आपने फ़रमाया बेशक वह हर चीज़ पर क़ादिर है। उसने कहा कोई मिसाल ? फ़रमाया मिसाल के लिये आंख की छोटी पुतली काफ़ी है। इसमें सारी दुनियां समा जाती है न पुतली बढ़ती है न दुनिया घटती है।(उसूले काफ़ी पृष्ठ 433 जामए उल अख़बार)

इमामे जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) और हकीम इब्ने अयाश कल्बी

हश्शाम बिन अब्दुल मलिक बिन मरवान के अहदे हयात का एक वाक़ेया है कि हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) की खि़दमत में एक शख़्स ने हाज़िर हो कर अर्ज़ किया कि हकीम बिन अयाश कल्बी आप लोगों की हजो किया करता है। हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने फ़रमाया कि अगर तुझ को उसका कुछ कलाम याद हो तो बयान कर। उसने दो शेर सुनाये , जिसका हासिल यह है कि हमने ज़ैद को शाख़े दरख़्ते ख़ुरमा पर सूली दे दी , हालां कि हम ने नहीं देखा कोई मेहदी दार पर चढ़ाया गया हो और तुम ने अपनी बे वकूफ़ी से अली (अ.स.) को उस्मान के साथ क़यास कर लिया हालां कि अली (अ.स.) उस्मान से बेहतर और पाकीज़ा थे। यह सुन कर इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने दुआ की बारे इलाहा अगर यह हकीम कल्बी झूठा है तो इस पर अपनी मख़्लूक़ में से किसी दरिन्दे को मुसल्लत फ़रमा। चुनान्चे उनकी दुआ क़ुबूल हुई और हकिम कल्बी को राह में शेर ने हलाक कर दिया।(असाबा इब्ने हजर , असक़लानी जिल्द 2 पृष्ठ 80 )

मुल्ला जामी तहरीर फ़रमाते हैं कि जब हकीम कल्बी के हलाक होने की ख़बर इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) को पहुँची तो उन्होंने सजदे में जा कर कहा कि उस ख़ुदा ए बरतर का शुकरिया है कि जिसने हम से जो वायदा फ़रमाया उसे पूरा किया।(शवाहेदुन नबूवत सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 121 व नूरूल अबसार पृष्ठ 147 )

113, हिजरी में इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) का हज अल्लामा इब्ने हजर मक्की लिखते हैं कि आपने 113 हिजरी में हज किया और वहां ख़ुदा से दुआ की , ख़ुदा ने बिला फ़स्ल अंगूर और दो बेहतरीन रिदायें भिजवाईं। आपने अंगूर ख़ुद भी खाया और लोगों को भी खिलाया और रिदायें एक साएल को दे दीं।

इस वाक़िये की मुख़्तसर अल्फ़ाज़ में तफ़सील यह है कि बअस बिन सअद उसी सन् में हज के लिये गये। वह नमाज़े अस्र पढ़ कर एक दिन कोहे अबू क़बीस पर गए , वहां पहुँच कर देखा कि एक निहायत मुक़द्दस शख़्स मशग़ूले नमाज़ है। फिर नमाज़ के बाद वह सज्दे में गया और या रब या रब कह कर ख़ामोश हो गया। फिर या हय्यो या हय्यो कहा और चुप हो गया। फिर या अर रहमान निर्रहीम कह कर चुप हो गया। फिर बोला ख़ुदा मुझे अंगूर चाहिये और मेरी रिदा बोसिदा हो गई है , दो रिदाए चाहिये हैं। रावी ए हदीस बाअस कहता है कि यह अल्फ़ाज़ अभी तमाम न होने पाए थे कि एक ताज़ा अंगूरों से भरी हुई ज़म्बील(बहुत बड़ा टोकरा) आ मौजूद हुई और उस पर दो बेहतरीन चादरें रखी हुई थीं। उस आबिद ने जब अंगूर खाना चाहा तो मैंने अर्ज़ कि हुज़ूर मैं आमीन कह रहा था मुझे भी खिलाईये। उन्होंने हुक्म दिया , मैंने खाना शुरू किया। ख़ुदा की क़सम ऐसे अंगूर सारी उम्र ख़्वाब में भी नज़र न आये थे। फिर आपने एक चादर मुझे दी। मैंने कहा मुझे ज़रूरत नहीं है। उसके बाद आपने एक चादर पहन ली और एक ओढ़ ली , फिर पहाड़ से उतर कर मक़ामे सई की तरफ़ गये। मैं उनके साथ था। रास्ते में एक सायल ने कहा , मौला ! मुझे चादर दे दीजिये , ख़ुदा आपको जन्नत के लिबास से आरास्ता करेगा। आपने फ़ौरन दोनों चादरें उसके हवाले कर दीं। मैंने उस सायल से पूछा यह कौन हैं ? उसने कहा इमाम ज़माना हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ स )। यह सुन कर मैं उनके पीछे दौड़ा कि उन से मिल कर कुछ इस्तेफ़ादा करूं लेकिन फिर वह मुझे न मिल सके।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 121 व कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 66, मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 277 )

वलीद बिन यज़ीद और सादिक़े आले मोहम्मद (अ स)

हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक (अ.स.) के वालिदे माजिद हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) को सन् 114 में शहीद करने के बाद हश्शाम बिन अब्दुल मलिक बिन मरवान 125 हिजरी में वासिले जहन्नम हुआ। उसके मरने के बाद वलीद बिन यज़ीद बिन अब्दुल मलिक बिन मरवान ख़लीफ़ा ए बनाया गया। यह ख़लीफ़ा ऊबाश , इख़्लाक़ी औसाफ़ से कोसों दूर , बे शर्म , मुन्हियात का मुरतकिब निहायत फ़ासिक़ो फ़ाजिर और अय्याश था। मय नोशी और लवाता में ख़ास शोहरत रखता था। निहायत जब्बार और कीना वर , जिस हांडी में खाता उसी मे सूराख़ करता। यह अपने बाप की कनीज़ों को भी इस्तेमाल किया करता था। एक दिन उसकी जमीला लड़की एक ख़ादेमा के पास बैठी थी उसने उसे पकड़ लिया और उसकी बुकारत (इज़्ज़त लूटना) ज़ायल कर दी। ख़ादेमा ने कहा कि यह तो मजूस का काम है। उसने जवाब दिया कि मलामत का ख़्याल करने वाले मग़मूम मर जाते हैं।

एक दिन हज के ज़माने में यह ख़ाना ए काबा की छत पर मय नोशी के लिये भी गया था। तारीख़ का यह मशहूर वाक़ेया है कि एक दिन उसने क़ुरआने मजीद से फ़ाल खोली , उसमें आयत ‘‘ ख़ाबा कल जब्बार अनीद ’’ निकला यह देख कर उसने ग़ुस्से में क़ुरआने मजीद को फेंक दिया , फिर उसे टांग कर तीरों से टुकड़े टुकड़े कर डाला और कहा ऐ क़ुरआन ! जब ख़ुदा के पास जाना तो कह देना ‘‘ मज़क़नी अल वलीद ’’ मुझे वलीद ने पारा पारा किया है।

एक दिन वलीद अपनी कनीज़ के साथ बैठा शराब पी रहा था। इतने में अज़ान की अवाज़ कान में आई। यह फ़ौरन मुबाशेरत (सम्भोग) में मशग़ूल हो गया। जब लोगों ने नमाज़ पढ़ाने के लिये कहा तो उस कनीज़ को अपना लिबास पहना कर शराब के नशे और जनाबत की हालत में नमाज़ पढ़ाने के लिये मस्जिद में भेज दिया और उसने नमाज़ पढ़ा दी।(तारीख़े ख़मीस , हबीब उस सैर , हज्जुल करामा , सिद्दीक़ हसन) यह ज़ाहिर है कि जो दीनो ईमान , नमाज़ व मस्जिद व क़ुरआने मजीद का एहतेराम न करता हो वह आले मोहम्मद (स अ व व ) का क्या एहतेराम कर सकता है। यही वजह है कि उसने अपने मुख़्तसर अहद में उनके साथ कोई रियायत नहीं की। तारीख़ में है कि हज़रत ज़ैद शहीद (र. अ.) के बेटे जनाबे यहीया को इसी के अहद में बुरी तरह शहीद किया गया और उनका सर वलीद के दरबार में लाया गया और जिस्म ख़ुरासान में सूली पर लटकाया गया।(तारीख़े इस्लाम जिल्द 1 पृष्ठ 48 )

हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) और जनाबे अबू हनीफ़ा नोमान बिन साबित कूफ़ी

फ़रज़न्दे रसूल (स अ व व ) हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) जो आलीमे इल्मे लदुन्नी थे। आपके फ़ैज़े सोहबत से अरबाबे अक़ल ने उलूम हासिल किये। आपकी ही एक कनीज़ ‘‘ हुसैनिया ’’ का ज़िक्र ज़बान ज़द ख़्वासो आम है कि उसने बादशाहे वक़्त के दरबार में चालीस उलेमा ए इस्लाम को चुप कर के दम बा खुद कर दिया था। आप ही के फ़ैज़े सोहबत से जनाबे नोमान बिन साबित ने इल्मी मदारिज हासिल किये थे और आपके लिये मनक़बते अज़ीम है।(हदाएक़ उल हनफ़िया पृष्ठ 18 प्रकाशित लखनऊ 1906 0 )

जनाबे नोमान बिन साबित 80 हिजरी में बा मक़ाम कूफ़ा पैदा हुए। आपकी कुन्नियत अबू हनीफ़ा थी। आप अजमी नस्ल के थे। आपको हारून रशीद अब्बासी के अहद में काफ़ी उरूज हासिल हुआ।(तारीख़े सग़ीर बुख़ारी सन् 174 व सीरतुन नोमान , शिब्ली पृष्ठ 17 )

आपको हश्शाम बिन अब्दुल मलिक बिन मरवान के ज़माने में ‘‘ इमामे आज़म ’’ का खि़ताब मिला। जब कि उन्होंने 123 हिजरी में जनाबे ज़ैद शहीद की बैयत की और हुकूमत की मुख़ालेफ़त कर के मोआफ़ेक़त की थी।

किताब मुस्तफ़ा शरह मौता में है कि अकाबिरे मोहद्देसीन मिस्ल अहमद बुख़ारी , इमाम मुस्लिम , तिरमिज़ी , निसाई , अबू दाऊद , इब्ने माजा ने आपकी रवायत पर भरोसा नहीं किया। आपकी वफ़ात 150 हिजरी में हुई है।(तारीख़े सग़ीर पृष्ठ 174 )

इसी तारीख़े सग़ीर में बा रवायत नईम बिन हमाद , मरवी है कि मैं सुफ़ियान सौरी की खि़दमत में हाज़िर था कि नागाह अबू हनीफ़ा साहब की वफ़ात की ख़बर सुनी गई तो सुफ़ियान ने ख़ुदा का शुक्र अदा किया और कहा कि वह शख़्स इस्लाम को तोड़ कर चकना चूर करता था। ‘‘ मा वल्द फ़िल इस्लाम अश्शाम मिन्हा ’’ इस्लाम में इस्से ज़्यादा शूम कोई पैदा नहीं हुआ।

इमाम अबू हनीफ़ा की शार्गिदी का मसला

यह तारीख़ी मुसल्लेमात से है कि जनाबे अबू हनीफ़ा हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़र (अ.स.) और इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के शार्गिद थे लेकिन अल्लामा तक़ीउद्दीन इब्ने तैमिया ने हम असर होने की वजह से इसमें कुन्केराना शुब्हा ज़ाहिर किया है। इनके शुब्हे को शम्सुल उलेमा अल्लामा शिब्ली नोमानी ने रद करने हुए तहरीर फ़रमाया है , ‘‘ अबू हनीफ़ा एक मुद्दत तक इस्तेफ़ादे की ग़र्ज़ से इमाम मोहम्मद बाक़र (अ.स.) की खि़दमत में हाज़िर रहे और फ़िक़ा व हदीस के मुताअल्लिक़ बहुत बड़ा ज़ख़ीरा हज़रत मम्दूह का फ़ैज़े सोहबत था। इमाम साहब ने उनके फ़रज़न्दे रशीद हज़रत जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की फ़ैज़े सोहबत से भी कुछ फ़ायदा उठाया , जिसका ज़िक्र उमूमन तारीख़ों में पाया जाता है। ’’ इब्ने तैमिया ने इससे इन्कार किया है और उसकी वजह यह ख़्याल है कि इमाम अबू हनीफ़ा इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के माअसर और हम असर थे। इस लिये उनकी शार्गिदी क्यों कर इख़्तेयार करते लेकिन इब्ने तैमिया की गुस्ताख़ी और ख़ीरा चश्मी है। इमाम अबू हनीफ़ा लाख मुजतहिद और फ़क़ीह हों लेकिन फ़ज़लो कमाल में उनको हज़रत जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) से क्या निसबत। हदीस व फ़िक़ा बल्कि तमाम मज़हबी उलूमे अहले बैत (अ.स.) के घर से निकले हैं। ‘‘ वा साहेबुल बैत अदरा बेमा फ़ीहा ’’ घर वाले ही घर की तमाम चीज़ों से वाक़िफ़ होते हैं।(सीरतुन नोमान पृष्ठ 45 तबआ आगरा)

जनाबे अबू हनीफ़ा का इम्तेहान तारीख़ में है कि हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की खि़दमत में अकसर हज़रत अबू हनीफ़ा नोमान बिन साबित हाज़िर हुआ करते थे और यह होता रहता था कि आप उनका इम्तेहान ले कर उन्हें फ़ायदा पहुँचा दिया करते थे। एक दफ़ा का ज़िक्र है कि जनाबे अबू हनीफ़ा हज़रत की खि़दमत मे हाज़िर हुए , तो आपने पूछा कि ऐ अबू हनीफ़ा मैंने सुना है कि तुम मसाएले दीनिया मे ‘‘ क़यास ’’ से काम लिया करते हो। अर्ज़ कि जी हां है तो ऐसा ही। आपने फ़रमाया कि ऐसा न किया करो क्यों कि ‘‘ अव्वल मन क़यास इब्लीस ’’ दीन में क़यास करना इब्लीस का काम है और उसी ने क़यास की पहल की है।

एक दफ़ा आपने पूछा कि ऐ अबू हनीफ़ा यह बताओ कि ख़ुदा वन्दे आलम ने आखों में नमकीनी , कानों में तल्ख़ी , नाक के नथनों में रूतूबत और लबों पर शीरीनी क्यों पैदा की ? उन्होंने बहुत ग़ौरो ख़ौज़ के बाद कहा , या हज़रत इसका इल्म मुझे नहीं है। आपने फ़रमाया , अच्छा मुझ से सुनो , आंखें चरबी का ढेला हैं , अगर उनमें शूरियत और नमकीनी न होती तो पिघल जातीं , कानों में तल्ख़ी इस लिये है कि कीड़े मकोड़े न घुस जायें। नाक में रूतूबत इस लिये है कि सांस की आमदो रफ़्त में सहूलियत हो और ख़ुशबू और बदबू महसूस हो , लबों में शीरीनी इस लिये है कि खाने पीने मे लज़्ज़त आये।

फिर आपने पूछा कि वह कौन सा कलमा है जिसका पहला हिस्सा कुफ़्र और दूसरा ईमान है ? उन्होंने अर्ज़ की मुझे इल्म नहीं। आपने फ़रमाया कि वह वही कलमा है जो तुम रात में पढ़ा करते हो , सुनो ! ला इलाहा कुफ्ऱ और इल्लल्लाह ईमान है।

फिर आपने पूछा कि औरत कमज़ोर है या मर्द , नीज़ यह कि हालते हमल में औरत को ख़ूने हैज़ क्यों नहीं आता ? उन्होंने कहा कि यह तो मालूम है कि औरत कमज़ोर है लेकिन यह नहीं मालूम कि इसे आलमे हमल में हैज़ क्यों नहीं आता। आपने फ़रमाया कि अच्छा अगर औरत कमज़ोर है तो क्या वजह है कि मीरास में उसको एक हिस्सा और मर्द को दो हिस्सा दिया जाता है। उन्होंने जवाब दिया मुझे मालूम नहीं। आपने फ़रमाया कि औरत का नफ़क़ा मर्द पर है और हुसूले आज़ूक़ा उसी के ज़िम्मे है इस लिये उसे दोहरा दिया गया और औरत को आलमे हमल में ख़ूने हैज़ इस लिये नहीं आता कि वह बच्चे के पेट में दाखि़ल हो कर ग़िज़ा बन जाता है।

इब्ने ख़ल्क़ान लिखते हैं कि एक दिन हज़रत की खि़दमत में जनाबे अबू हनीफ़ा साहब तशरीफ़ लाये तो आपने पूछा , ऐ अबू हनीफ़ा तुम इस मुजरिम के बारे में क्या फ़तवा देते हो , जिस ने हज के लिये एहराम बांधने के बाद हिरन के वह दांत तोड़ डाले हों जिनको रूबाई कहते हैं। ‘‘ फ़क़ाला या बिन रसूल मा आलमा मा फ़ीहा ’’ अर्ज़ की फ़रज़न्दे रसूल (अ.स.) मुझे इसका हुक्म मालूम नहीं ‘‘ फ़क़ाला अनता तदाहिर वला तालम ’’ आपने फ़रमाया कि इसी इल्मीयत पर फ़ख़्र करते और लोगों को धोका देतो हो , तुम्हें यह तक मालूम नहीं कि हिरन के रूबाईया होते ही नहीं।(अल मसाएद पृष्ठ 202 )

फिर आपने पूछा कि यह बताओ कि अक़्ल मन्द कौन है ? उन्होंने अर्ज़ कि जो अच्छे बुरे की पहचान करे और दोस्त दुश्मन में तमीज़ कर सके। आपने फ़रमाया कि यह सिफ़त और तमीज़ तो जानवरों में भी होती है। वह भी प्यार करते और मारते हैं। यानी अच्छे बुरे को जानते हैं। उन्होंने कहा फिर आप ही फ़रमायें। आपने इरशाद किया कि अक़्ल मन्द वह है जो दो नेकियों और दो बुराईयों में यह इम्तियाज़ कर सके कि कौन सी नेकी तरजीह देने के क़ाबिल और दो बुराईयों में कौन सी बुराई कम और कौन ज़्यादा है।(हयातुल हैवान , दमीरी जिल्द 2 पृष्ठ 85, 86 तारीख़ इब्ने ख़ल्क़ान जिल्द 1 पृष्ठ 105 मनाक़िब इब्ने शहरे आशोब पृष्ठ 41 नूरूल अबसार पृष्ठ 131 )

इमामे जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के बाज़ नसीहते व इरशादात

अल्लामा शिब्ली तहरीर फ़रमाते हैः

1. सईद वह है जो तन्हाई में अपने को लोगों से बे नियाज़ और ख़ुदा की तरफ़ झुका हुआ पाये।

2. जो शख़्स किसी बरादरे मोमिन का दिल ख़ुश करता है ख़ुदा वन्दे आलम उसके लिये एक फ़रिश्ता पैदा करता है जो उसकी तरफ़ से इबादत करता है और क़ब्र में मूनिसे तन्हाई , क़यामत में साबित क़दमी का बाएस , मन्ज़िले शफ़ाअत में और जन्नत में पहुँचाने में रहबर होगा।

3. नेकी का तकमेला यानी कमाल यह है कि इसमें जल्दी करो और उसे कम समझो और छुपा के करो।

4. अमले ख़ैर नेक नीयती से करने को सआदत कहते हैं।

5. तवाज़ो में ताख़ीर नफ़्स का धोखा है।

6. चार चीज़ें ऐसी हैं जिनकी क़िल्लत को कसरत समझना चाहिए। ( 1) आग , ( 2) दुश्मनी , ( 3) फ़क़ीरी , ( 4) मर्ज़।

7. किसी के साथ बीस दिन रहना अज़ीज़दारी के मुतारादिफ़ है।

8. शैतान के ग़ल्बे से बचने के लिये लोगों पर एहसान करो।

9. जब अपने किसी भाई के वहां जाओ तो सदरे मजलिस में बैठने के अलावा इसकी हर नेक ख़्वाहिश को मान लो।

10. लड़की रहमत नेकी और लड़का नेअमत है। ख़ुदा हर नेकी पर सवाब देता है और नेअमत पर सवाल करेगा।

11. जो तुम्हें इज़्ज़त की निगाह से देखे तो तुम भी उसकी इज़्ज़त करो , जो ज़लील समझे उससे ख़ुद्दारी बरतो। 12. बख़शिश से रोकना ख़ुदा से बदज़नी है।

1 3. दुनियां में लोग बाप दादा के ज़रिये से मुतअर्रिफ़ होते हैं और आख़ेरत में आमाल के ज़रिये से पहचाने जायेंगे।

14. इन्सान के बाल बच्चे उसके असीर और क़ैदी हैं नेअमत की वुसअत पर उन्हें वुसअत देनी चाहिये वरना ज़वाले नेअमत का अन्देशा है।

15. जिन चीज़ों से इज़्ज़त बढ़ती है इनमें तीन यह हैं , ( 1) ज़ालिम से बदला न लो। ( 2) उस पर करम गुस्तरी जो मुख़ालिफ़ हो। ( 3) जो इसका हमर्दद न हो उसके साथ हमदर्दी करे।

16. मोमिन वह है जो जादए हक़ से न हटे और ख़ुशी में बातिल की पैरवी न करे।

17. जो ख़ुदा की दी हुई नेअमत पर क़िनाअत करेगा , मुस्तग़नी रहेगा।

18. जो दूसरों की दौलत मंदी पर लल्चाई हुई नज़र डालेगा , वह हमेशा फ़क़ीर रहेगा।

19. जो राज़ी ब रज़ा ख़ुदा नहीं वह ख़ुदा पर इत्तेहाम तक़दीर लगा रहा है।

20. जो अपनी लग़ज़िश को नज़र अन्दाज़ करेगा वह दूसरों की लग़ज़िश को भी नज़र में न लायेगा।

21. जो किसी को बे पर्दा करने की सई करेगा ख़ुद बरहना हो जायेगा।

22. जो किसी पर ना हक़ तलवार खींचेगा तो नतीजे में ख़ुद मक़तूल होगा।

23. जो किसी के लिये कुआं खोदेगा ख़ुद उसमें गिरेगा। ‘‘ चाह कुन रा चाह दरपेश ’’।

24. जो शख़्स बे वकूफ़ों से राह रस्म रखेगा ज़लील होगा।

25. हक़ गोई करनी चाहिये ख़्वाह वह अपने लिये मुफ़ीद हो या मुज़िर।

26. चुग़ल ख़ोरी से बचो क्यों कि यह लोगों के दिलों में दुश्मनी और अदावत का बीज बोती है।

27. अच्छों से मिलो , बुरों के क़रीब न जाओ क्यों कि वह ऐसे पत्थर हैं जिनमें जोंक नहीं लगती , यानी उनसे फ़ायदा नहीं हो सकता।(नूरूल अबसार पृष्ठ 134 )

28. जब कोई नेअमत मिले तो बहुत ज़्यादा शुक्र करो ताकि इज़ाफ़ा हो।

29. जब रोज़ी तंग हो तो अस्तग़फ़ार ज़्यादा करो कि अब्वाबे रिज़्क़ खुल जाएं।

30. जब हुकूमत या ग़ैर हुकूमत की तरफ़ से कोई रंज पहुँचे तो ‘‘ ला हौल वला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहिल अलीअल अज़ीम ’’ ज़्यादा कहो कि रंज दूर हो , ग़म काफ़ूर हो और ख़ुशी का वफ़ूर हो।(मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 274 से पृष्ठ 275 )

आपके बाज़ करामात

हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) के करामात और ख्वारिक़ आदात और इल्मी मालूमाती वाक़ेआत से किताबें भरी पड़ी हैं। अल्लामा अरबली लिखते हैं कि अबू बसीर एक दिन हमाम ख़ाने के लिये अपने घर से बरामद हुए। रास्ते में चन्द ऐसे हज़रात मिले जो इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की ज़्यारत के लिये जा रहे थे। अबू बसीर साहबी सोच कर साथ हो गए कि अगर मैं हमाम से वापसी में जाऊंगा तो सआदते ज़ियारत में पीछे रह जाऊंगा। जब वहां पहुँचे तो इमाम (अ.स.) ने इशारतन फ़रमाया कि नबी और इमाम के घर में हालते जनाबत में दाखि़ल नहीं होना चाहिए। अबू बसीर ने माज़रत की और हमाम चले गए। (कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 97)

यूनुस बिन ज़िबयान कहते हैं कि हम लोग एक दिन हज़रत की खि़दमत में हाज़िर हुए तो आपने दौराने गुफ़्तुगू में फ़रमाया कि ज़मीन के ख़ज़ाने हमारे इख़्तेयार मे हैं। यह कह कर आपने पैर से ज़मीन पर एक ख़त खींचा और एक बालिश्त का डब्बा उठा कर हमें दिखलाया। इसमें बेहतरीन सोने की ईटें थीं। मैंने अर्ज़ की मौला , आपके क़ब्ज़े में सब कुछ है मगर आपके मानने वाले तकलीफ़ उठा रहे हैं। आपने फ़रमाया उनके लिये जन्नत है।(तज़किरतुल मासूमीन पृष्ठ 183 )

आपका अख़्लाक़ और आदात व औसाफ़

अल्लामा इब्ने शहर आशोब तहरीर फ़रमाते हैं कि एक दिन इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) ने अपने एक ग़ुलाम को किसी काम से बाज़ार भेजा। जब उसकी वापसी में बहुत देर हुई तो आप उसको तलाश करने के लिये निकल पड़े , देखा एक जगह लेटा हुआ सो रहा है। आप उसे जगाने के बजाए उसके सरहाने बैठ गए और पंखा झलने लगे। जब वह बेदार हुआ तो आपने फ़रमाया यह तरीक़ा अच्छा नहीं है। रात सोने के लिये और दिन काम काज के लिये है। आइन्दा ऐसा न करना।(मनाक़िब इब्ने शहर आशोब जिल्द 5 पृष्ठ 52 )

अल्लामा मआसिर मौलाना अली नक़ी मुजतहिदुल असर रक़म तराज़ हैं , आप इसी सिलसिला ए असमत की एक कड़ी थे जिसे ख़ुदा वन्दे आलम ने नवए इन्सानी के लिए नमूना ए कामिल बना कर पैदा किया। उनके इख़्लाक़ व अवसाफ़ , ज़िन्दगी के हर शोबे में मेआरी हैसीयत रखते थे। ख़ास ख़ास अवसाफ़ जिनके मुताअल्लिक़ मुवर्रेख़ीन ने मख़्सूस तौर पर वाक़ेयात नक़ल किये हैं। मेहमां नवाज़ी , ख़ैरो ख़ैरात , मख़फ़ी तरीक़े पर ग़ुरबा की ख़बर गीरी , अज़ीज़ों के साथ हुस्ने सुलूक , अफ़ो जराएम , सब्र व तहम्मुल वग़ैरा हैं।

एक मरतबा एक हाजी मदीने में वारिद हुआ और मस्जिदे रसूल (स अ व व ) में सो गया आंख खुली तो उसे शुबा हुआ कि उसकी एक हज़ार की थैली मौजूद नहीं। उसने इधर उधर देखा किसी को न पाया। एक गोशा ए मस्जिद में इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) नमाज़ पढ़ रहे थे। वह आपको बिल्कुल न पहचानता था। आपके पास आ कर कहने लगा कि मेरी थैली तुम ने ले ली है। हज़रत ने पूछा उसमें क्या था ? उसने कहा एक हज़ार दीनार। हज़रत ने फ़रमाया मेरे साथ मेरे मकान तक आओ , वह आपके साथ हो गया। बैत उस शरफ़ में तशरीफ़ ला कर एक हज़ार दीनार इसके हवाले कर दिये। वह मस्जिद में वापस चला गया और अपना असबाब उठाने लगा , तो ख़ुद उसके दीनारो की थैली असबाब में नज़र आई , यह देख कर बहुत शर्मिन्दा हुआ और दौड़ता हुआ फिर इमाम (अ.स.) की खि़दमत में आया , उज़्र ख़्वाही करते हुए हज़ार दीनार वापस करना चाहा। हज़रत ने फ़रमाया , हम जो कुछ दे देते हैं वह फिर वापस नहीं लेते।

मौजूदा ज़माने में यह हालात सभी की आंखों से देखे हुए हैं कि जब यह अन्देशा मालूम होता है कि अनाज मुश्किल से मिलेगा तो जिसको जितना मुम्किन हो वह अनाज ख़रीद कर रख लेता है मगर इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के किरदार का एक वाक़ेया यह है कि एक मरतबा आप से आपके एक वकील माक़िब ने कहा कि हमें इस गरानी और क़हत की तकलीफ़ का कोई अन्देशा नहीं है। हमारे पास ग़ल्ले का इतना ज़ख़ीरा है जो बहुत अर्से तक के लिये काफ़ी होगा। हज़रत ने फ़रमाया यह तमाम ग़ल्ला फ़रोख़्त कर डालो इसके बाद जो हाल सब का होगा वह हमारा भी होगा , और जब ग़ल्ला फ़रोख़्त कर दिया गया तो फ़रमाया अब ख़ालिस गेहूँ की रोटी न पका करे , बल्कि आधे गेहूँ और आधे जौ की रोटी पकाई जाए। जहां तक मुम्किन हो हमें ग़रीबों का साथ देना चाहिये।

आपका क़ायदा था कि आप मालदारों से ज़्यादा ग़रीबों की इज़्ज़त करते थे। मज़दूरों की बड़ी क़दर फ़रमाते थे। ख़ुद भी तिजारत फ़रमाते थे और अकसर अपने बाग़ों में ब नफ़्से नफ़ीस मेहनत भी करते थे।

एक मरतबा आप बेलचा हाथ में लिये बाग़ में काम कर रहे थे और पसीने से तमाम जिस्म तर हो गया था। किसी ने कहा ये बेलचा मुझे इनायत फ़रमाइये कि मैं यह खि़दमत अन्जाम दूं। हज़रत (अ.स.) ने फ़रमाया , तलबे माश में धूप और गर्मी की तकलीफ़ सहना ऐब की बात नहीं। ग़ुलामों और कनीज़ों पर वही मेहरबानी रहती थी जो इस घराने की इम्तेआज़ी सिफ़त थी। इसका एक हैरत अंगेज़ नमूना यह है कि जिसे सफ़यान सूरी ने बयान किया है कि मैं एक मरतबा इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की खि़दमत में हाज़िर हुआ देखा कि चेहरा ए मुबारक का रंग मुताग़य्यर है। मैंने सबब दरयाफ़्त किया तो फ़रमाया मैंने मना किया था कि कोई मकान के कोठे पर न चढ़े इस वक़्त जो मैं घर आया तो क्या देखा कि एक कनीज़ जो एक बच्चे की परवरिश पर मुतअय्यन थी उसे गोद में लिये ज़िने से ऊपर जा रही थी। मुझे देखा तो ऐसा ख़ौफ़ तारी हुआ कि बद हवासी में बच्चा उसके हाथ से छूट गया और इस सदमे से जान बाहक़ तसलीम हो गया। मुझे बच्चे के मरने का इतना सदमा नहीं जितना इसका रंज है कि इस कनीज़ पर इतना रोब हेरास क्यों तारी हुआ। फिर हज़रत ने इस कनीज़ को पुकार कर फ़रमाया , डर नहीं , मैंने तुमको राहे ख़ुदा में आज़ाद कर दिया। इसके बाद हज़रत बच्चे की तजहीज़ की तरफ़ मोतवज्जा हुए। (सादिके आले मोहम्मद (अ.स.) पृष्ठ 12, मुनाक़िब इब्ने शहरे आशोब जिल्द 5 पृष्ठ 54)

किताब मजानी अल अदब जिल्द 1 पृष्ठ 67 में है कि हज़रत के यहां कुछ महमान आए थे। हज़रत ने खाने के मौक़े पर अपनी कनीज़ को खाना लाने का हुक्म दिया। वह सालन का बड़ा प्याला ले कर जब दस्तरख़्वान के क़रीब पहुँची तो इत्तेफ़ाक़न प्याला उसके हाथ से छूट कर गिर गया। इसके गिरने से इमाम (अ.स.) और दीगर महमानों के कपड़े ख़राब हो गए। कनीज़ कांपने लगी और आपने ग़ुस्से के बजाए उसे राहे ख़ुदा में यह कह कर आज़ाद कर दिया कि तू जो मेरे ख़ौफ़ से कांपती है शायद यही आज़ाद करना कफ़्फ़ारा हो जाए। फिर उसी किताब के सफ़े 69 में है कि एक ग़ुलाम आपका हाथ धुला रहा था कि दफ़तन लोटा छूट कर तश्त में गिरा और पानी उड़ कर हज़रत के मुंह पर पड़ा। ग़ुलाम घबरा उठा हज़रत ने फ़रमाया डर नहीं जा मैंने तुझे राहे ख़ुदा में आज़ाद कर दिया।

किताब तोहफ़तुल अलज़राएर अल्लामा मजलिसी में है कि आपकी आदात में इमाम हुसैन (अ.स.) की ज़्यारत के लिये जाना दाखि़ल था। आप अहदे सफ़ाह और ज़मानाए मन्सूर में भी ज़ियारत के लिये तशरीफ़ ले गए थे। करबला की आबादी से तक़रीबन चार सौ क़दम शुमाल की जानिब , नहरे अलक़मा के किनारे बाग़ों में शरीए सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) इसी ज़माने से बना हुआ है।(तसवीरे अज़ा 10 पृष्ठ 60 प्रकाशित देहली 1919 0 )

इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की इल्मी बुलन्दी

यह ज़ाहिर है कि इल्म ही इन्सान का वह जौहरे फ़ानी है जिसके बग़ैर हक़ीक़ी इम्तेआज़ हासिल नहीं होता। हज़रत आदम (अ.स.) ने इल्म के ज़रिये मलाएका पर फ़ज़ीलत हासिल की और आपके इस तरज़े अमल के ना ग़ुज़ीर तौर पर यह वाज़े हो गया कि मनसूस मिन अल्लाह को आलिमे जैय्यद होना लाज़मी है। हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) चूंकि सही तौर पर मनसूस थे लेहाज़ा आपका आलमे ज़माना होना लाज़मी था और यही वजह है कि आप इल्म के उन मदारिज पर फ़ाएज़ थे जिनके अर्श ए बुलन्द के पाए को परिन्दा पर नहीं मार सकता था।

सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) की तसानीफ़

आपकी तसानीफ़ का शुमार नहीं किया जा सकता। तवारीख़ से मालूम होता है कि आप ने बेशुमार किताबें व रिसाले और मक़ालात से दुनियां वालों को फ़ैज़याब फ़रमाया है। आप चूंकि उलूम में ग़ैर महदूद थे। इस लिये आपकी किताबें हर इल्म में मिलती हैं। आपने इल्में दीन , इल्मे कीमिया , इल्मे रजज़ , इल्मे फ़ाल , इल्मे फ़लसफ़ा , इल्मे तबीइयात , इल्मे हैय्यत , इल्मे मन्तिक़ , इल्मे तिब , इल्मे समीयात , इल्मे तशरीह अल अजसाम व अफ़आल अल आज़ा , इल्म अल हयात वमा बाद अल तबयात वग़ैरा वग़ैरा पर ख़ामा फ़रसाई की है और लेक्चर दिये हैं। हम इस मक़ाम पर सिर्फ़ दो किताबों को ज़िक्र करना चाहते हैं। 1. किताबे जफ़रो जामोआ , 2. किताब अहले लिजिया।


किताब जफ़र व जामेअ

किताब जफ़रो जामोआ के मुताअल्लिक़ उलेमा के बयानात मुख़्तलिफ़ हैं। मौलवी वहीदुज़्ज़मा हैदराबादी अपनी किताब अनवारूल लुग़ता के पारा 5 पृष्ठ 15 पर लिखते हैं कि आं हज़रत (स अ व व ) ने अमीरूल मोमेनीन अली इब्ने अबी तालिब (अ.स.) को दो किताबें लिखवा दीं थीं।

‘‘ एक जफ़र दूसरी जामेए ’’ एक किताब तो बकरी की खाल पर थी , दूसरी भेड़ की खाल पर और उसमे क़यामत तक जितनी बातें होने वाली थीं वह सब मुजमिलन लिखवा दी थीं। सय्यद शरीफ़ ने शरह मवाफ़िक़ में नक़ल किया है कि जफ़र और जामए दो किताबें हैं जो हज़रत अली (अ.स.) के पास थीं। इनमें अज़ रूए क़वाएद , इल्मे हुरूफ़ व तकसीर बड़े बड़े हवादिस का बयान था जो क़यामत तक होने वाले थे और आपकी औलाद मे जो इमाम गुज़रे वह इन्हीं किताबों को देख कर अकसर उमूर की ख़बर देते थे।

किताब बहरे मुहीत में है कि इल्मे जफ़र और इल्मे तकसीर एक ही हैं , यानी सायल के सवाल के हुरूफ़ में तसर्रूफ़ और तग़य्युर कर के सवाल का जवाब निकालना।

अल्लामा शिब्लंजी अपनी किताब नूरूल अबसार के पृष्ठ 133 पर बा हवाला हयातुल हैवान दमीरी लिखते हैं कि इब्ने क़तीबा ने किताबे अदब अल कातिब में लिखा है कि किताब अल जफ़र हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की लिखी हुई है। इसमें वह तमाम चीज़ें हैं जो क़यामत तक दुनियां में रूनूमा होंगी।

अल्लामा इब्ने तल्हा शाफ़ेई अपनी किताब मतालेबुस सूऊल के पृष्ठ 214 में किताब अल जफ़र का ज़िक्र करते हुए लिखते हैं कि ‘‘ होआमन कलामेह ’’ यह किताब आप ही की तसनीफ़ है। यही इबारत बिल्कुल इसी तरह शवाहेदुन नबूवत मुल्ला जामी के पृष्ठ 187 प्रकाशित लखनऊ 1905 में भी मौजूद है। तारीख़ से मालूम होता है कि आप जफ़र व जामेए के अलावा जफ़रे अहमर व जफ़रे अबयज़ और मुसहफ़े फ़ात्मा के भी मालिक थे और आप को ख़ुदा ने इल्मे ग़ाबिर व मज़बूर नुक़त व नक़र से बहरावर फ़रमाया था। अल्लामा जामी शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 187 में और अल्लामा अरबली कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 97 में फ़रमातें हैं कि हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) फ़रमाया करते थे , हमें आईन्दा और गुज़िश्ता का इल्म और इल्हाम की सलाहियत और मलायका की बातें सुन्ने की ताक़त दी गई है। मेरे ख़्याल में यही आलिमे इल्मे लदुन्नी होने की दलील है जो जानशीने पैग़म्बर (स अ व व ) होने के सुबूत में पेश किया जा सकता है।

साहेबे मजमाउल बैहरैन इसकी ताईद करते हुए लिखते हैं कि जफ़र व जामया में क़यामत तक होने वाले सारे वाक़ेयात मुन्दरिज हैं। यहां तक कि इस में ख़राश लग जाने की भी सज़ा का ज़िक्र है और एक ताज़याना बल्कि आधा ताज़याना (कोड़ा) का भी हुक्म मौजूद है।

किताबे अलहिलीचिया

अल्लामा मजलिसी ने किताब बेहारूल अनवार की जिल्द 2 में हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की किताब अलहिलीचिया को मुकम्मल तौर पर नक़ल फ़रमाया है। इस किताब के तसनीफ़ करने की ज़रूरत यूं महसूस हुई कि एक हिन्दुस्तानी फ़लसफ़ी हज़रत की खि़दमत मे हाज़िर हुआ और उसने आलीयात और मा बादत तबीआत पर हज़रत से तबादला ए ख़्यालात करना चाहा। हज़रत ने उससे निहायत मुकम्मल गुफ़्तुगू की और इल्मे कलाम से उसूल पर दहरियत और मादीयत को फ़ना कर छोड़ा , उसे आखि़र में कहना पड़ा कि आपने अपने दावे को इस तरह साबित फ़रमा दिया है कि अरबाबे अक़ल को माने बग़ैर चारा नहीं। तवारीख़ से मालूम होता है कि हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने हिन्दी फ़लसफ़ी से जो गुफ़्तुगू की थी उसे किताब की शक्ल में जमा कर के बाबे अहले बैत के मशहूर मुताकल्लिम जनाब मुफ़ज़ल बिन उमर अल जाफ़ी के पास भेज दिया था और यह लिखा था कि ,

‘‘ ऐ मुफ़ज़ल मैंने तुम्हारे लिये एक किताब लिखी है जिसमें मुन्करीने ख़ुदा की रद की है और उसके लिखने की वजह यह हुई कि मेरे पास हिन्दुस्तान से एक तबीब (फ़लसफ़ी) आया था और उसने मुझसे मुबाहेसा किया था। मैंने जो जवाब उसे दिया था , उसी को क़लम बन्द कर के तुम्हारे पास भेज रहा हूँ। ’’

हज़रत सादिक़े आले मोहम्मद (अ स ) के फ़लक़ वक़ार शार्गिद

हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के शार्गिदों का शुमार मुश्किल है। बहुत मुम्किन है कि आईन्दा सिलसिला ए तहरीर में आपके बाज़ शार्गिदों का ज़िक्र आता जाय। आम मुवर्रेख़ीन ने बाज़ नामों को ख़ुसूसी तौर पर पेश कर के आपकी शार्गिदी की सिल्क में पिरो कर उन्हें मोअज़्ज़ज़ बताया है। मतालेबुस सूऊल , सवाएक़े मोहर्रेक़ा , नूरूल अबसार वग़ैरा में इमाम अबू हनीफ़ा , यहीया बिन सईद अन्सारी , इब्ने जरीह , इमाम मालिक इब्ने अनस , इमाम सुफ़ियान सूरी , सुफ़ियान बिन अयनिया , अय्यूब सजिस्तानी वग़ैरा का आपके शार्गिदों में ख़ास तौर पर ज़िक्र है। तारीख़ इब्ने ख़लक़ान जिल्द 1 पृष्ठ 130 और ख़ैरूद्दीन ज़र कली की अल्ल आलाम पृष्ठ 183 प्रकाशित मिस्र मोहम्मद फ़रीद वजदी की इदारा मायफ़ल क़ुरआन की जिल्द 3 पृष्ठ 109 प्रकाशित मिस्र में है ‘‘ वा काना तलमीना अबू मूसा जाबिर बिन हय्यान अल सूफ़ी अल तरसूसी ’’ आपके शार्गिदों में जाबिर बिन हय्यान सूफ़ी तरसूसी भी हैं। आपके बाज़ शार्गिदों की जलालत क़द्र और उनकी तसानीफ़ और इल्मी खि़दमात पर रौशनी डालनी तो बे इन्तेहा दुशवार है। इस लिये इस मक़ाम पर सिर्फ़ जाबिर बिन हय्यान तरसूसी जो कि इन्तेहाई बा कमाल होने के बवजूद शार्गिदे इमाम की हैसियत से अवाम की नज़रों से पोशीदा हैं , का ज़िक्र किया जाता है।

इमामुल कीमिया जनाबे जाबिर इब्ने हय्यान तरसूसी

आपका पूरा नाम अबू मूसा जाबिर बिन हय्यान बिन अब्दुल समद अल सूफ़ी अल तरसूसी अल कूफ़ी है। आप 742 ई 0 में पैदा हुए और 803 ई 0 में इन्तेक़ाल फ़रमा गए। बाज़ मोहक़्क़ेक़ीन ने आपकी वफ़ात 813 ई 0 बताई है लेकिन इब्ने नदीम ने 777 ई 0 लिखा है।

इन्साईकिलो पीडिया आफ़ इस्लामिक हिस्ट्र में है कि उस्तादे आज़म जाबिर बिन हय्यान बिन अब्दुल्लाह , अब्दुल समद कूफ़ै में पैदा हुए। वह तूसी उल नस्ल थे और आज़ाद नामी क़बीले से ताअल्लुक़ रखते थे , ख़्यालात में सूफ़ी थे और यमन के रहने वाले थे। अवाएल उम्र में इल्मे तबीआत की तालीम अच्छी तरह हासिल कर ली और इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) इब्ने इमाम मोहम्मद बाक़र (अ.स.) की फ़ैज़े सोहबत से इमाम उल फ़न हो गए।

तारीख़ के देखने से मालूम होता है कि जाबिर बिन हय्यान ने इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की अज़मत का एतराफ़ करते हुए कहा है कि सारी कायनात में कोई ऐसा नहीं जो इमाम की तरह सारे उलूम पर बोल सके।

तारीख़े आइम्मा में हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की तसनीफ़ात का ज़िक्र करते हुए लिखा है कि हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने एक किताब कीमीया , जफ़र रमल पर लिखी थी। हज़रत के शार्गिद व मशहूर मारूफ़ कीमिया गर जाबिर बिन हय्यान जो यूरोप में जबर के नाम से मशहूर हैं , जिनको जाबिर सूफ़ी का लक़ब दिया गया था और जुनूनन मिस्री की तरह वह भी इल्मे बातिन से ज़ौक़ रखते थे। इन जाबिर बिन हय्यान ने हज़ारों वरक़ की एक किताब तालीफ़ की थी जिसमें हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के पांच सौ रिसालों को जमा किया था। अल्लामा इब्ने ख़लकान किताब दफ़ियात इला अयान जिल्द 1 पृष्ठ 130 प्रकाशित मिस्र में हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) का ज़िक्र करते हुए लिखते हैं।

हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के मक़ालात इल्मे कीमिया और इल्मे जफ़र व फ़ाल में मौजूद हैं और आपके शार्गिद थे जाबिर बिन हय्यान सूफ़ी तरसूसी जिन्होंने हज़ार वरक़ की एक किताब तालीफ़ की थी जिसमें इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के पांच सौ रिसालों को जमा किया था। अल्लामा ख़ैरूद्दीन ज़रकली ने भी अल आलाम जिल्द 1 पृष्ठ 182 प्रकाशित मिस्र में यही कुछ लिखा है। इसके बाद तहरीर किया है कि उनकी बेशुमार तसानीफ़ हैं जिनका ज़िक्र इब्ने नदीम ने अपनी फ़ेहरिस्त में किया है। अल्लामा मोहम्मद फ़रीद वजदी ने दायरा ए मआरेफ़ुल क़ुरआन अल राबे अशर की जिल्द 3 पृष्ठ 109 प्रकाशित मिस्र में भी लिखा है कि जाबिर बिन हय्यान ने इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के पांच सौ रसायल को जमा कर के एक किताब हज़ार सफ़हे की तालीफ़ की थी। अल्लामा इब्ने ख़ल्दून ने भी मुक़दमा ए इब्ने ख़ल्दून मतबूआ मिस्र पृष्ठ 385 में इल्मे कीमिया का ज़िक्र करते हुए जाबिर बिन हय्यान का ज़िक्र किया है और फ़ाज़िल हंसवी ने अपनी ज़ख़ीम तसनीफ़ किताब और किताब ख़ाना ग़ैर मतबूआ में बा हवाला ए मुक़द्दमा इब्ने ख़ल्दून पृष्ठ 579 प्रकाशित मिस्र लिखा है कि जाबिर बिन हय्यान इल्मे कीमिया के ईजाद करने वालों का इमाम है बल्कि इस इल्म के माहेरीन ने इसको जाबिर से इस हद तक मख़सूस कर दिया है कि इस इल्म का नाम ‘‘ इल्मे जाबिर ’’ रख दिया है।(अल जव्वाद शुमारा 11 जिल्द 1 पृष्ठ 9 )

मुवर्रिख़ इब्नुल क़त्फ़ी लिखते हैं कि जाबिर बिन हय्यान को इल्मे तबीआत और कीमिया में तक़द्दुम हासिल है। इन उलूम में उसने शोहरा ए आफ़ाक़ किताबें तालीफ़ की हैं। इनके अलावा उलूमे फ़लसफ़ा वग़ैरा में शरफ़े कमाल पर फ़ाएज़ थे और यह तमाम कमालात से भर पूर होना इल्मे बातिन की पैरवी का नतीजा था। मुलाहेज़ा हो ,(तबक़ातुल उमम , पृष्ठ 95 व अख़बारूल हुक्मा पृष्ठ 111 प्रकाशित मिस्र)

पयामे इस्लाम जिल्द 7 पृष्ठ 15 में है कि वही ख़ुश क़िस्मत मुसलमान है जिसे हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की शार्गिदी का शरफ़ हासिल था। इसके मुताअल्लिक़ जनवरी 25 ई 0 में साईंस प्रोग्ररेस नवीशता ए जे 0 होलम यार्ड एम 0 ए 0 एफ़ 0 आई 0 सी 0 आफ़ीसरे आला शोबा ए र्साइंस कफ़टेन कालेज ब्ररिस्टल ने लिखा है कि इल्मे कीमिया के मुतअल्लिक़ ज़माना ए वस्ता की अकसर तसानीफ़ मिलती हैं। जिसमें ‘‘ गेबर ’’ का ज़िक्र आता है और आम तौर पर गेबर या जेबर दर अस्ल ‘‘ जाबिर ’’ हैं। चुनान्चे जहां कहीं भी लातीनी कुतुब में गेबर का ज़िक्र आता है वहां मुराद अरबी माहिरे कीमिया जाबिर बिन हय्यान ही है। जिसे जे के बजाय गे आसानी से समझ में आ जाता है , लातानी में (जे) से मिलती जुल्ती आवाज़ और बाज़ इलाक़ों मसलन मिस्र वग़ैरा में (जे) को अब भी बतौर (जी) यानी गाफ़ इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा ख़लीफ़ा हारून के ज़माने में साईंस कमेस्ट्री वग़ैरा का चरचा बहुत हो चुका है और इस इल्म के जानने वाले दुनिया के गोशे गोशे से खिंच कर दरबारे खि़लाफ़त से मुन्सलिक हो रहे थे। जाबिर इब्ने हय्यान का ज़माना भी कमो बेश इसी दौर में था। पिछले 20, 25, साल में इंगलिस्तान और जर्मनी में जाबिर के मुतअल्लिक़ बहुत सी तहक़ीक़ात हुई हैं। लातीनी ज़बाना में इल्मे कीमिया के मुताअल्लिक़ चंद कुतुब सैकड़ों साल से इस मुफ़क्किर के नाम से मन्सूब हैं। जिसमें मख़सूस 1. समा , 2. बरफ़ेकशन , 3. डी इन्वेस्टीगेशन परफ़ेक्शन , 4. डी इन्वेस्टीगेशन वर टेलेक्स , 5. टीटा बहन , लेकिन इन किताबों के मुताअल्लिक़ अब तक उक तूलानी बहस है और इस वक़्त तक मुफ़क़्के़रीने योरोप इन्हें अपने यहां की पैदावार बताते हैं। इस लिये उन्हें इसकी ज़रूरत महसूस होती है। जाबिर को हर्फ़ (जी) (गाफ़) गेबर से पुकारें और बजाय अरबी नस्ल के उसे यूरोपियन साबित करें। हांलाकि समा के कई प्रकाशित शुदा ऐडीशनों में गेबर को अरब ही कहा गया है। रसल के अंगे्रज़ी तरजुमे में उसे एक मशहूर अरबी शाहज़ादा और मन्तक़ी कहा गया है।

1541 ई 0 में की नूरन बर्ग कि एडिशन में वह सिर्फ़ अरब है। इसी तरह और बहुत से क़ल्मी नुसख़े ऐसे मिल जाते हैं जिनमें कहीं उसे ईरानियों के बादशाह से याद किया गया है किसी जगह उसे शाह बन्द कहा गया है। इन इख़्तेलाफ़ात से समझ में आता है कि जाबिर बर्रे आज़म एशिया से न था बल्कि इस्लामी अरब का एक चमकता सितारा था।

इन्साईकिलो पीडिया आफ़ इस्लामिक कैमिस्ट्री के मुताबिक़ जाफ़र बर मक्की के ज़रिये से जाबिर बिन हय्यान का ख़लीफ़ा हारून रशीद के दरबार में आना जाना शुरू हो गया चुनान्चे उन्होंने ख़लीफ़ा के नाम से इल्मे कीमिया में एक किताब लिखी जिसका नाम ‘‘ शुगूफ़ा ’’ रखा। इस किताब में उसने इल्मे कीमिया के जली व ख़फ़ी पहलूओं के मुताअल्लिक़ निहायत मुख़्तसर तरीक़े , निहायत सुथरा तरीक़े अमल और अजीबो ग़रीब तजरबात बयान किये। जाबिर की वजह से ही कुस्तुनतुनया से दूसरी दफ़ा यूनानी कुतुब बड़ी तादात में लाई गई।

मन्तिक़ में अल्लामा ए दहर मशहूर हो गया और 90 साल से कुछ ज़्यादा उम्र में उसने तीन हज़ार किताबें लिखीं और इन किताबों में से वह बाज़ पर नाज़ करता था। अपनी किसी तसनीफ़ के बारे में उसने लिखा है कि रूए ज़मीन पर हमारी इस किताब के मिस्ल एक किताब भी नहीं है न आज तक ऐसी किताब लिखी गई है और न क़यामत तक लिखी जायेगी।(सरफ़राज़ 2 दिसम्बर 1952 0 )

फ़ाज़िल हंसवी अपनी किताब ‘‘ किताब व किताब ख़ाना ’’ में लिखते हैं कि जाबिर के इन्तेक़ाल के दो बरस बाद इज़्ज़ उद दौला इब्ने मुइज़्ज़ उद दौला के अहद में कूफ़े के शारेह बाबुश शाम के क़रीब जाबिर की तजरूबे गाह का इन्केशाफ़ हो चुका है। जिसको खोदने के बाद बाज़ क़दीमी मख़तूतात ब्रिटिश मियूज़ियम में अब तक मौजूद हैं। जिनमें से किताब उल ख़वास क़ाबिले ज़िक्र है। इसी तरह फ़ुस्ते वस्ता में बाज़ किताबों का तरजुमा लातीनी में किया गया। इन किताबों के अलावा इन अनुवादों के सिबअईन भी हैं जो नाक़िसों ना तमाम है।

‘‘ इसी तरह अल बहस अनल कमाल ’’ का तरजुमा भी लातीनी में किया जा चुका है। यह किताब लातीनी ज़बान में कीमिया पर यूरोप की ज़बान में सब से पहली किताब है। इसी तरह और दूसरी किताबें भी अनुवादित हुई हैं। जाबिर ने कीमिया के अलावा तबीयात , हैय्यत इल्मे रोया , मन्तिक़ , तिब और दूसरे उलूम पर भी किताबें लिखीं। इसकी एक किताब समीयत पर भी है जो कुत्बे ख़ाना ए तैमूरिया क़ाहेरा मिस्र में मौजूद है। इनमें चन्द ऐसे मक़ालात को जो बहुत मुफ़ीद थे बाद करह हुरूफ़ ने रिसाला ए मक़ततफ़ जिल्द 58. 59 में शाया किये हैं। मुलाहेज़ा हो ,(मोअज्जमुल मतबूआत अल अरबिया अल मोअर्रेबा जिल्द 3 हरफ़ जीम पृष्ठ 665 )

जबिर ब हैसियत एक तबीबी के काम करता था लेकिन इसकी तिब्बी तसानीफ़ हम तक न पहुंच सकीं। हालां कि इस मक़ाले का लिखने वाला यानी डाक्टर माक्स मी यरहाफ़ ने जाबिर की किताब को जो समूूम पर है हाल ही में मालूम कर लिया।

जाबिर की एक किताब जिसको मय मतन अरबी और तरजुमा फ़्रानसीसी पोल कराओ मुशर्तरक ने 1935 ई 0 में शाया किया है ऐसी भी है जिसमें उसने तारीख़ इन्तेशार आराद अक़ाएद व अफ़कार हिन्दी यूनानी और इन तग़य्यूरात का ज़िक्र किया है जो मुसलमानों ने किए हैं। इस किताब का नाम ‘‘ एख़राज माफ़िल क़ूव्वत इल्ल फ़ेल ’’ है।(अल जवाद जिल्द 10 पृष्ठ 9 प्रकाशित बनारस)

प्रोफ़ेसर रसकार की रद मेरे बयान से यह यक़ीनन वाज़ेह हो गया कि मुवर्रेख़ीन इस पर मुत्तफ़िक़ है कि जाबिर बिन हय्यान इस्लाम का मोअजि़्ज़ कीमिया गर हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) का शार्गिद था। लेकिन मिस्टर प्रोफ़ेसर रसकार ने इल्मे कीमिया के बारे में जो रिसाला शाया किया है उसमें जाबिर इब्ने हय्यान के उन दावों को ग़लत और जाली बताया है जो इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की शार्गिदी की तरफ़ मन्सूब है। इसकी दलील यह है कि इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) को इल्मे कीमिया और साईंस से क्या वास्ता और इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की हैसियत का इमाम पारे , गन्धक , खटाई और फुकनी के इस्तेमाल में मसरूफ़ हो यह कैसे हो सकता है। मैं मौसूफ़ के जवाब में कहता हूँ कि मौसूफ़ ने कोई माक़ूल वजह इन्कार की बयान नहीं फ़रमाई। तारीख़ों को सुबूत पेश करना सुबूत के लिये काफ़ी है और उनके इन्कार से अदम शर्मिंन्दगी की दलील नहीं क़ायम की जा सकती। यह कब ज़ुरूरी है कि जाबिर बिन हय्यान जैसे ज़की व ज़ेहीन शार्गिद को बच्चों की तरह बैठ कर अमल कर के दिखाया हो। ज़ैहीन तालिबुल इल्मों को ज़बानी तालीम दी जाती है और अगर इसी तरह तालीम दी हो जिस तरह एतेराज़ करने वालों का ख़्याल है , तब भी कोई हर्ज नहीं है।

इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) जैसा उस्ताद उलूम को फ़ैलाने के लिये पारा और गन्धक , खटाई और फुकनी में कुछ देर मसरूफ़ रह सकता है और यह कोई एतेराज़ की बात नहीं हो सकती , मुम्किन है कि हज़रत ने जुमला उलूम के उसूल तालीम फ़रमा दिये हों और जाबिर ने उन्हें वसअत दे दी हो। मिसाल के लिये मुलाहेज़ा हो , किताब मनाक़िब में है कि हज़रत अली फ़रमाते हैं , अल मनी रसूल अल्लाह (स अ व व ) अलीफ़ बाब , आं हज़रत (स अ व व ) ने मुझे उलूम के एक हज़ार बाब तालीम फ़रमाये और मैंने हर बाब से हज़ार हज़ार बाब खुद पैदा किये। किताब मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 58 में है कि हज़रत अली (अ.स.) ने इल्मे नहो के उसूल अबु असवद दवेली को तालीम फ़रमाये फिर उसने तमाम तफ़सीलात मुकम्मल किये , हो सकता है कि इसी उसूल पर जाबिर को तालीम दी गई हो।

जाबिर बिन हय्यान की वफ़ात इन्साईकिलो पीडिया आफ़ इस्लामिक कैमिस्ट्री से मालूम होता है कि जाबिर बिन हय्यान की उम्र 90 साल से कुछ ज़्यादा थी। मिस्टर जाफ़र बारहवी ने उनकी विलादत और वफ़ात के बारे में सरफ़राज़ 17 नवम्बर 1952 ई 0 में जो कुछ तहरीर किया है उसी को नक़ल करते हुए मिस्टर क़मर रज़ा ने पयामे इस्लाम जिल्द 7 पृष्ठ 15, 16, 26 जुलाई 1953 ई 0 में लिखा है कि जाबिर बिन हय्यान 722 ई 0 में पैदा हुए और उन्होंने 803 ई 0 में इन्तेक़ाल किया और बाज़ का कहना है कि 813 ई 0 तक ज़िन्दा रहे। इसके बाद लिखते हैं कि इब्ने नदीम ने उनकी वफ़ात 777 ई 0 में बताई है और मेरे नज़दीक यही ठीक है। मेरी समझ में नहीं आता कि मौसूफ़ ने इब्ने नदीम के फ़ैसले को क्यों कर तसलीम कर लिया , इस लिये कि अगर विलादत का सन् सही है तो फिर इब्ने नदीम का बयान मानने लायक़ नहीं क्यों कि अगर वह 722 ई 0 में पैदा हुए थे और 777 ई 0 में वफ़ात पा गये तो गोया उनकी उम्र सिर्फ़ 55 साल की हुई जो इतने साहेबे कमाल के लिये क़रीने क़यास नहीं है। मेरे नज़दीक़ इन्साईकिलो पीडिया वाले की तहक़ीक़ सही है वह 90 साल से कुछ ज़्यादा उनकी उम्र बताता है जो हिसाब के एतेबार से सही है क्यों कि विलादत 722 ई 0 और वफ़ा 813 ई 0 में तसलीम करने के बाद उनकी उम्र 91 साल होती है और यह उम्र ऐसे बा कमाल के लिये होनी मुनासिब है।

सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) के इल्मी फ़ुयूज़ व बरकात

हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) जिन्हें रासेख़ीन फिल इल्म में होने का शरफ़ हासिल है और जो इल्मे अव्वलीन व आख़ेरीन से आगाह और दुनिया की तमाम ज़बानों से वाक़िफ़ हैं। जैसा कि मुवर्रेख़ीन ने लिखा है , मैं उनके तमाम इल्मी फ़यूज़ व बरकात पर थोड़े अवराक़ में क्या रौशनी डाल सकता हूँ। मैंने आपके हालात की छान बीन भी की है और यक़ीन रखता हूँ कि अगर मुझे फ़ुरसत मिले तो तक़रीबन 6 महीने में आपके उलूम और फ़ज़ाएलो कमालात का काफ़ी ज़ख़ीरा जमा किया जा सकता है। आपके मुताअल्लिक़ इमाम मालिक बिन अनस लिखते हैं ‘‘ मेरी आंखों ने इल्मो फ़ज़ल , वरा व तक़वे में इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) से बेहतर देखा ही नहीं जैसा कि ऊपर गुज़रा वह बहुत बड़े लोगों में से थे और बहुत बड़े ज़ाहिद थे। ख़ुदा से बेपनाह डरते थे। बे इन्तेहा हदीसें बयान करते थे , बड़ी पाक मजलिस वाले और कसीरूल फ़वाएद थे। आपसे मिल कर बे इन्तेहा फ़ायदा उठाया जाता था। ’’(मनाक़िब शहरे आशोब जिल्द 5 पृष्ठ 52 प्रकाशित बम्बई)

इल्मी फ़यूज़ रसानी का मौक़ा यूं तो हमारे तमाम आइम्मा ए अहलेबैत (अ.स.) इल्मी फ़यूज़ व बरकात से भरपूर थे और इल्मे अव्वलीन व आख़ेरीन के मालिक , लेकिन दुनिया वालों ने उनसे फ़ायदा उठाने के बजाय उन्हें क़ैदो बन्द में रख कर उलूमो फ़ुनून के ख़ज़ाने पर हतकड़ियों और बेड़ियों के नाग बिठा दिये थे। इस लिये इन हज़रात के इल्मी कमालात कमा हक़्क़ा मंज़रे आम पर न आ सके। वरना आज दुनिया किसी इल्म में ख़ानदाने रिसालत के अलावा किसी की मोहताज न होती। फ़ाज़िल मआसिर मौलाना सिब्तुल हसन साहब हंसवी लिखते हैं कि इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) अल मतूफ़ी 148 हिजरी का अहद मआरफ़ परवरी के लिहाज़ से एक ज़र्री अहद था। वह रूकावटें जो आप से पहले आइम्मा अहलेबैत (अ.स.) के लिये पेश आया करती थीं उनमें किसी हद तक कमी थीं। उमवी हुकूमत की तबाही और अब्बासी सलतनत का इस्तेहकाम आपके लिये सुकून व अमन का सबब बना। इस लिये हज़रत को मज़हबे अहलेबैत (अ.स.) की इशाअत और उलूमव फ़ुनून की तरवीज (फ़ैलाने) का बेहतरीन मौक़ा मिला। लोगों को भी इन आलिमाने रब्बानी की तरफ़ रूजु करने में अब कोई ख़ास ज़हमत न थी जिसकी वजह से आपकी खि़दमत में अलावा हिजाज़ के दूर दराज़ मक़ामात मिस्ले ईराक़ , शाम , ख़ुरासान , काबुल , सिन्ध और बलादे रोम , फ़िरहंग के तुल्बा शाएक़ीने इल्म हाज़िर हो कर मुस्तफ़ीद होते थे। हज़रत के हलक़ा ए दर्स में चार हज़ार असहाब थे। अल्लामा शेख़ मुफ़ीद (अ.र.) किताबे इरशाद में फ़रमाते हैं।

तरजुमा लोगों ने आपके उलूम को नक़ल किया जिन्हें तेज़ सवार मनाज़िल बईदा की तरफ़ ले गये और आपकी शोहरत तमाम शहरों में फ़ैल गई और उलेमा ने अहले बैत (अ.स.) में किसी से भी इतने उलूम व फ़ुनून को नहीं नक़्ल किया है जो आप से रवायत करते हैं और जिनकी तादाद 4000 (चार हज़ार) है। ग़ैर अरब तालेबान इल्म से एक रूमी नसब बुज़ुर्ग ज़रार बिन ऐन मतूफ़ी 150 हिजरी में क़ाबिले ज़िक्र है। जिनके दादा सुनसुन बिला दरदम के एक मुक़द्दस राहिब (छवदा) थे। ज़रारा अपनी खि़दमाते इल्मिया के एतेबार से इस्लामी दुनियां में काफ़ी शोहरत रखते थे और साहेबे तसानीफ़ थे। किताब अल इस्तेताअत वल जबरान की मशहूर तसनीफ़ है।(ख़ुलासतुल अक़वाल अल्लामा जल्ली पृष्ठ 38, मिन्हाजुल मक़ाल पृष्ठ 142 व मोअल्लेफ़ा शिया फ़ी सदरूल इस्लाम पृष्ठ 51 )

कुतुबे उसूले अरबा मिया

हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के चार सौ ऐसे मुसन्नेफ़ीन थे जिन्होंने अलावा दीगर उलूम व फ़ुनून के कलामे मासूम को ज़ब्त कर के चार सौ कुतुब उसूल तैयार कीं। असल से मुराद मजमूए अहादीसे अहलेबैत (अ.स.) की वह किताबें हैं जिनमें जामे ने ख़ुद बराहे रास्त मासूम से रवायत कर के अहादीस को ज़ब्ते तहरीर किया है या ऐसे रावी से सुना है जो ख़ुद मासूम से रवायत करता है। इस क़िस्म की किताब में जामे की दूसरी किताब या रवायत से अन फ़लां अन फ़लां के साथ नक़ल करता जिसकी सनद में और सवाएत की ज़रूरत हो। इस लिये कुनुबे उसूल में ख़ता व ग़लत सहो व निसयान का एहतेमाल ब निसबत और दूसरी किताबों के बहुत कम है। कुतुबे उसूल के ज़माना ए तालीफ़ का इन्हेसार अहदे अमीरल मोमेनीन अली इब्ने अबी तालिब (अ.स.) से ले कर इमाम हसन असकरी (अ.स.) के ज़माने तक है जिसमें असहाबे मासूमीन ने बिल मुशाफ़ा मासूम से रवायत कर के अहादीस को जमा किया है या किसी ऐसे सुक़्क़े रावी से हदीसे मासूम को अख़ज़ किया है जो बराहे रास्त मासूम से रवायत करता है। शेख़ अबुल क़ासिम जाफ़र बिन सईद अल मारूफ़ बिल मोहक़क़्िक अल हली अपनी किताब अल मोतबर में फ़रमाते हैं कि इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के जवाबात मसाएल को चार सौ मुसन्नेफ़ीन असहाबे इमाम ने तहरीर कर के चार सौ तसानीफ़ मुकम्मल की है।

सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) के असहाब की तादाद और उनकी तसानीफ़

आगे चल कर फ़ाज़िल माअसर अल जव्वाद में बा हवाला ए किताब व कुतुब ख़ाना लिखते हैं कुतुब रेजाल में असहाबे आइम्मा के हालात व तराजिम मज़कूर हैं। उनकी मजमूई तादाद चार हज़ार पांच सौ असहाब है। जिनमें से सिर्फ़ चार हज़ार असहाब हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के हंै। सब का तज़किरा अबुल अब्बास अहमद बिन मोहम्मद बिन सईद बिन अक़्दा 249 से 333 ने अपनी किताब रेजाल में किया है और शेख़ अल ताएफ़ा अबू जाफ़र अल तूसी ने भी इन सब का ज़िक्र अपनी किताब रिजाल में किया है। मासूमीन (अ.स.) के तमाम असहाब में से मुसन्नेफ़ीन की जुमला तादाद एक हज़ार तीन सौ से ज़्यादा नहीं है। ज़िन्होंने सैकड़ो की तादाद में कुतुबे उसूल और हज़रों की तादाद में दूसरी किताबें तालीफ़ और तसनीफ़ की हैं जिनमें से बाज़ मुसन्नेफ़ीन असहाबे आइम्मा तो ऐसे थे जिन्होंने तन्हा सैकड़ों किताबें लिखीं। फ़ज़ल बिन शाज़ान ने एक सो अस्सी किताबें तालीफ़ कीं। इब्ने दवल ने सौ किताबें लिखीं। इसी तरह बरक़ी ने भी तक़रीबन सौ किताबें लिखीं। इब्ने अबी अमीर ने 90 नब्बे किताबें लिखीं और अक्सर असहाबे आइम्मा ऐसे थे जिन्होंने तीस या चालीस से ज़्यादा किताबें तालीफ़ कीं। ग़रज़ की एक हज़ार तीन सौ मुसन्नेफ़ीन असहाबे आइम्मा ने तक़रीबन पांच हज़ार तसानीफ़ कीं। मजमउल बैहरैन में लफ़्ज़े जबर के मातहत है कि सिर्फ़ जाबिर अल जाफ़ेई इमाम सादिक़ (अ.स.) के सत्तर हज़ार अहादीस के हाफ़िज़ थे।(अमीरल मोमेनीन , किताब मक़तल अल हुसैन ज़्यादा मशहूर है।)

तारीख़े इस्लाम जिल्द 5 पृष्ठ 3 में है कि ‘‘ अब्बना बिन शग़लब बिन रबाह(अबू सईद) कूफ़ी सिर्फ़ इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) की तीस हज़ार अहादीस के हाफ़िज़ थे। ’’ उनकी तसानीफ़ में तफ़सीर ग़रीबुल क़ुरआन , किताब अल मुफ़रद , किताब अल फ़ज़ाएल , किताब अल सिफ़्फ़ीन क़ाबिले ज़िक्र हैं। यह क़ारी फ़क़ीह लग़वी मोहद्दीस थे। इन्हें हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) और हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़र (अ.स.) हज़रत इमाम जा़फ़रे सादिक़ (अ.स.) के सहाबी होने का शरफ़ हासिल था। 141 हिजरी में इन्तेक़ाल किया।

हज़रत सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) और इल्मे जफ़र

हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) को चूंकि नशरे उलूम का मौक़ा मिल गया था लेहाज़ा आपने इल्मी इफ़ादात के दरिया बहा दिये। आपको जहां दीगर उलूम में कमाल था और आपने मुख़्तलिफ़ उलूम के नशर में कोशिश की है। इल्मे जफ़र में भी आप यकताए ज़माना थे और इस इल्म में भी आपकी तसानीफ़ हैं।

इल्मे जफ़र किसे कहते हैं इसके मुताअल्लिक़ ‘‘ अलाब लौलैस मालूफ़ अल यसवा ’’ किताब अल मन्जद के पृष्ठ 91 प्रकाशित बैरूत में लिखते हैं कि इल्मे जफ़र को इल्मे हुरूफ़ भी कहते हैं। यह ऐसा इल्म है कि इसके ज़रिये से हवादिसे आलम को मालूम कर लिया जाता है। मौलवी वहीदुज़्ज़मां अपनी किताब अनवारूल लुग़त पृष्ठ 15 ब हवाला ए बहरे मुहीत लिखते हैं कि इल्मे जफ़र जो इल्मे तकसीर का दूसरा नाम है इससे मुराद यह है कि सायल के सवाल के हुरूफ़ में तग़य्युर व तबद्दुल कर के हालात मालूम किये जायें। मजमउल बैहरैन में लफ़्ज़े जफ़र के मातहत लिखा है कि इल्म अल हुरूफ़ के उसूल पर हवादिसे आलम के मालूम करने का नाम इल्मे जफ़र है। तारीख़े आइम्मा बा हवाला ए तारीख़े इब्ने ख़लक़ान जिल्द 1 पृष्ठ 85 में है कि इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने एक किताब कीमिया और जफ़र और रमल पर लिखी थी।

1 अल्लामा सय्यद अब्दुल हुसैन शरफ़उद्दीन अपनी किताब ‘‘ मोअल्लेफ़ा अल शिया फ़ी सदरूल इस्लाम ’’ प्रकाशित बग़दाद के पृष्ठ 36 में लिखतें हैं कि जनाबे जाबिर जाफ़ेई का असली नाम और सिलसिला ए नसब यह था। जाबिर बिन यज़ीद बिन हरस बिन अब्दुल ग़ौस बिन क़आब बिन अल हरस बिन माविया बिन वाएल अल जाएफ़ी अल कूफ़ी था। उनकी तसानीफ़ में किताब अल तफ़सीर , किताब अल नवादर , किताब अल फ़ज़ाएल , किताब अल जमल , किताब अल सिफ़्फ़ीन , किताब अल नहरवान , किताब मक़तल अमीरल मोमेनीन , किताब मक़तल अल हुसैन , ज़्यादा मशहूर हैं।

हज़रत सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) और इल्मे तिब

अल्लामा इब्ने बाबूया अल नफ़मी किताब ख़साएल जिल्द 2 बाब 19 पृष्ठ 97 से 99 प्रकाशित ईरान में तहरीर फ़रमाते हैं कि हिन्दुस्तान का एक मशहूर तबीब ‘‘ मन्सूर दवांक़ी ’’ के दरबार में तलब किया गया। बादशाह ने हज़रत से उसकी मुलाक़ात कराई। इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) ने इल्मे तशरीह अल अजसाम और अफ़आल उला आज़ा के मुताअल्लिक़ उससे उन्नीस सवालात किये। वह अगरचे अपने फ़न में पूरा कमाल रखता था लेकिन जवाब न दे सका। बिल आखि़र कलमा पढ़ कर मुसलमान हो गया। अल्लामा इब्ने शहरे आशोब लिखते हैं कि इस तबीब से हज़रत ने 20 सवालात किये थे और अन्दाज़े से पुर अज़ मालूमात तक़रीर फ़रमाई कि वह बोल उठा ‘‘ मिन एना लका हाज़ा अल इल्म ’’ ऐ हज़रत यह बे पनाह इल्म आपने कहां से हासिल फ़रमाया ? आप ने कहा कि मैंने अपने बाप दादा से , उन्होंने हज़रत मोहम्मद (स अ व व ) से उन्होंने जिब्राईल , उन्होंने ख़ुदा वन्दे आलम से इसे हासिल किया है। जिसने अजसाम व अरवाह को पैदा किया है। ‘‘ फ़क़ाला अल हिन्दी सदक़त ’’ उसने कहा बेशक आपने सच फ़रमाया। इसके बाद फिर उसने कलमा पढ़ कर इस्लाम क़ुबूल कर लिया और कहा , ‘‘ इन्नका आलम अहले ज़माना ’’ मैं गवाही देता हूँ कि आप अहदे हाज़िर के सब से बड़े आलिम हैं।(मनाक़िब इब्ने शहरे आशोब जिल्द 1 पृष्ठ 45 प्रकाशित बम्बई)

हज़रत सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) का इल्मुल क़ुरआन

मुख़्तसर यह है कि आपके इल्मी फ़यूज़ व बरकात पर मुफ़स्सल रौशनी डालनी तो दुश्वार है जैसा कि मैंने पहले अर्ज़ किया है। अलबत्ता सिर्फ़ यह अर्ज़ कर देना चाहता हूँ कि इल्मुल क़ुरआन के बारे में दम ए साकेबा पृष्ठ 478 पर आपका क़ौल मौजूद है। वह फ़रमाते हैं कि , ख़ुदा की क़सम मैं क़ुरआने मजीद को अव्वल से आखि़र तक इसी तरह पर जानता हूँ गोया मेरे हाथ में ज़मीन व आसमान की ख़बरें हैं और वह ख़बरे भी हैं जो हो चुकी हैं और हो रही हैं और होने वाली हैं , और क्यों न हो जब कि क़ुरआने मजीद में हैं कि इस पर हर चीज़ अयां है। एक मक़ाम पर आपने फ़रमाया है कि हम अम्बिया और रसूलों के उलूम के वारिस हैं।(दमए साकेबा पृष्ठ 488 )

इल्मे नुजूम

इल्मे नुजूम के बारे में अगर आपके कमालात देखना हों तो कुतुबे तवाल का मुतालेआ करना चाहिये। आपने निहायत जलील उलेमा ए इल्म अल नुजूम से मुबाहेसा और मुनाज़ेरा कर के अंगुश्त बदन्दां कर दिया है। बेहारूल अनवार मनाक़िबे शहरे आशोब व दमए साकेबा वग़ैरा में आपके मनाज़िरे मौजूद हैं उलेमा का फ़ैसला है कि इल्मे नुजुम हक़ है लेकिन उसका सही इल्म आइम्मा ए अहले बैत के अलावा किसी को नसीब नहीं। यह दूसरी बात है कि हल्क़ा बगोशान मोअद्दते नूरे हिदायत से कसबे ज़िया कर लें।

इल्मे मन्तिक़ुत तैर

सादिके़ आले मोहम्मद (अ.स.) दीगर आइम्मा की तरह मन्तिक़ अल तैर से भी बा क़ायेदा वाक़िफ़ थे। जो परिन्दा या कोई जानवर आपस में बात चीत करता था उसे आप समझ लिया करते थे और ब वक़्ते ज़रूरत उसकी ज़बान में तकल्लुम फ़रमाया करते थे। मिसाल के लिये मुलाहेज़ा हों किताब तफ़सीरे लुबाब अल तावील जिल्द 5 पृष्ठ 113 व मआलम अल तन्ज़ील पृष्ठ 113, अजायबुल क़सस पृष्ठ 105, नूरूल अनवार पृष्ठ 311 प्रकाशित ईरान में है कि सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) ने क़बरह नामी परिन्दा जिसको चकोर या चनडोल कहते हैं कि बोलते हुए असहाब से फ़रमाया कि तुम जानते हो यह क्या कहता है ? असहाब ने सराहत की ख़्वाहिश की तो फ़रमाया यह कहता है ‘‘ अल्लाहुम्मा लाअन मबग़ज़ी मोहम्मद व आले मोहम्मद ’’ ख़ुदाया मोहम्मद (स अ व व ) व आले मोहम्मद (अ.स.) से बुग़्ज़ करने वालों पर लानत कर। फ़ाख़्ता की आवाज़ पर आपने कहा कि इसे घर में न रहने दो यह कहती है कि ‘‘ फ़क़्द तुम फ़क़्द तुम ’’ ख़ुदा तुम्हें नेस्तो नाबूद करे , वग़ैरा वग़ैरा।

हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) और इल्मुल अजसाम

मनाक़िबे शहरे आशोब और बेहारूल अनवार जिल्द 14 में है कि एक ईसाई ने हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) से इल्मे तिब के बारे में सवालात करते हुए जिस्मे इन्सानी की तफ़सील पूछी। आपने इरशाद फ़रमाया कि ख़ुदा वन्दे आलम ने इन्सान के जिस्म में वसल , 248 हड्डियां और तीन सौ साठ रगें ख़ल्क़ फ़रमाई हैं। रगें तमाम जिस्म को सेराब करती हैं। हड्डियां जिस्म को , गोश्त हड्डियों को और आसाब गोश्त को रोके रखते हैं।

सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) ने जन्नत में घर बनवा दिया

यह एक मुसल्लेमा हक़ीक़त है कि बेहिश्त पर अहले बैते रसूल (स अ व व ) का पूरा पूरा हक़ व इक़्तेदार है। मुल्ला जामी लिखते हैं कि एक शख़्स ने हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) रवाना ए हज होते हुए कुछ दिरहम दिये और अर्ज़ की कि मैं हज को जाता हूँ मेहरबानी फ़रमा कर मेरी वापसी तक एक मकान मेरी रहाईश का बनवा दीजिए गा या ख़रीद फ़रमा दीजिए गा। जब वह लौट कर आया तो आपने फ़रमाया कि मैंने तेरे लिये जन्नत में एक घर ख़रीद लिया है। जिसके हुदूदे अरबा यह हैं। हुदूदे अरबा बताने के बाद आपने एक नविश्ता दिया और वह घर चल गया। वहां पहुँच कर बीमार हुआ और मरने लगा की कि नविश्ता मेरे कफ़न में रखा जाय। चुनान्चे लोगों ने रख दिया। जब दूसरा दिन हुआ तो क़ब्र पर वही परचा मिला। ‘‘ व बर पुश्त दे नविश्ता ’’ कि ‘‘ जाफ़र बिन मोहम्मद वफ़ा नमूद बा नचे वायदा करदा बूद। ’’ इस परचे की पुश्त पर लिखा हुआ था कि सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) ने जो वायदा किया था , दुरूस्त निकला और मुझे मकान मिल गया।(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 192 )

दस्ते सादिक़ (अ.स.) में एजाज़े इब्राहीमी

पैग़म्बरे इस्लाम (स अ व व ) की मशहूर हदीस है कि मेरे अहले बैत मेरे अलावा तमाम अम्बिया से बेहतर हैं। इसका मतलब यह हुआ कि जो मोजिज़ात अम्बिया कराम दिखाया करते थे वह आपके अहते बैत भी दिखा सकते थे। यह दूसरी बात है कि उन्हें तहद्दी के तौर पर असबाते नबूवत के लिये दुनिया वालों को दिखाना ज़रूरी था , लेकिन अहले बैत (अ.स.) को ऐसे मोजिज़ात दिखलाना ज़रूरी न हो , लेकिन अगर किसी वक़्त कोई इस क़िस्म का मोजेज़ा तलब करे तो वह शाने इस्लाम दिखलाने के लिये मोजेज़ा दिखला दिया करते थे।

मुल्ला जामी लिखते हैं कि एक शख़्स ने सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) से पूछा कि हज़रत इब्राहीम (अ.स.) ने चार जानवरों को ज़िन्दा किया था तो वह परिन्दे हम जिन्स थे या मुख़्तलिफ़ अजनास के थे। हज़रत ने ताअज्जुबाना सवाल को सुन कर फ़रमाया , देखो हज़रत इब्राहीम (अ.स.) ने इस तरह ज़िन्दा किया था। यह फ़रमा कर आपने आवाज़ दी ताऊस यहां आ। ग़राब यहां आ। बाज़ यहां आ। कबूतर यहां आ। यह तमाम परिन्दे हज़रत के पास आ गये। आपने हुक्म दिया इन्हें ज़ब्हा कर के इनके गोश्त को ख़ूब पीस डालो। उसके बाद आपने सर हाथ में ले कर एक एक को आवाज़ दी। आवाज़ के साथ गोश्त उड़ा और अपने अपने सर से जा लगा और पहरन्दा फिर मुकम्मल हो गया। यह देख कर सायल हैरान रह गया।(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 191 प्रकाशित लखनऊ 1905 0 )

ख़तो किताबत और दरख़्वास्त के बारे में आपकी हिदायत

बिस्मिल्लाह के लिखने का तरीक़ा

हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी चीज़ों के बारे में हिदायत फ़रमाई है। उसूले काफ़ी पृष्ठ 690 प्रकाशित ईरान में है कि जब कुछ भी लिखो तो ‘‘ बिस्मिल्लाह अर रहमान अर रहीम ’’ से शुरू करो और देखो बिस्मिल्लाह को दन्दाने वाले ‘‘ सीन ’’ से लिखना , यानी बे बाद सीन इर तरह लिखना।(सीन)

दरख़्वास्त लिखने का तरीक़ा

आप फ़रमाते हैं कि दाहेनी तरफ़ दवात रख कर दरख़्वास्त लिखो। इमाम शिब्लंजी नूरूल अबसार प्रकाशित मिस्र के पृष्ठ 133 और अल्लामा मजलिसी हुलयतुल मुत्तक़ीन में लिखते हैं कि सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) ने फ़रमाया है कि जब कोई दरख़्वास्त दो , और चाहो कि वह ज़रूर मन्ज़ूर हो जाय तो उसके सर नामे पर

बिस्मिल्लाह हिर्ररहमार्निरहीम

‘‘ वआदअल्लाह अल साबेरीन अल मख़रज मिम्मा यकराहून वल रिज़्क़ मिन हैस ला यसतबून जाअलना अल्लाह व इय्या कुम मिनल लज़ीना ला ख़ौफ़ुन अलैहिम वला हुम यह ज़नून ’’ अल्लामा अरबली किताब कशफ़ुल ग़म्मा के पृष्ठ 97 पर इसी तरीक़ा ए तहरीर को लिखते के बाद लिखते हैं कि बर सरे रूक़ा ब क़लम बे मदाद ब नवीस यानी यह इबारत बिला रौशनाई के बर सर दरख़्वास्त लिखनी चाहिये।(तहज़ीबुल इस्लाम , तरजुमा हिल्यतुल मुत्तक़ीन पृष्ठ 185 प्रकाशित कराची)

ख़त और जवाबे ख़त

उसूले काफ़ी पृष्ठ 690 में है कि ‘‘ क़ाला अल सादिक़ (अ.स.) रद्दे जवाब अल किताब वाजेबून को जोबे रद्देस सलाम ’’ हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) फ़रमाते हैं कि ख़त का जवाब देना इसी तरह वाजिब है जिस तरह सलाम का जवाब देना वाजिब है।

हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की अन्जाम बीनी और दूर अन्देशी मुवर्रेख़ीन लिखते हैं कि जब बनी अब्बास इस बात पर आमादा हो गये कि बनी उमय्या को ख़त्म कर दें तो उन्होंने यह ख़्याल किया कि आले रसूल (स अ व व ) की दावत का हवाला दिये बग़ैर काम चलना मुश्किल है लेहाज़ा वह इमदाद व इन्तेक़ामे आले मोहम्मद (अ.स.) की तरफ़ दावत देने लगे और यही तरीक़ा करते हुए उठ खड़े हुए जिससे आम तौर पर आले मोहम्मद (अ.स.) यानी बनी फ़ात्मा (अ.स.) की मदद समझी जाती थी। इसी वजस से शियाने बनी फ़ात्मा को भी उनसे हमदर्दी पैदा हो गयी थी और वह उनके मद्दगार हो गए थे और इसी सिलसिले में अबू सलमा जाफ़र बिन सुलैमान कूफ़ी आले मोहम्मद की तरफ़ से वज़ीर तजवीज़ किये गये थे। यानी वह गुमाश्ते के तौर पर तबलीग़ करते थे। उन्हें इमामे वक़्त की तरफ़ से कोई इजाज़त हासिल न थी। यह बनी उमय्या के मुक़ाबले में बड़ी कामयाबी से काम कर रहे थे। जब हालात ज़्यादा साज़गार नज़र आये तो उन्होंने इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) और अबू मोहम्मद अब्दुल्लाह इब्ने हसन को अलग अलग एक एक ख़त लिखा कि आप यहां आ जायें ताकि आपकी बैअत की जाय।

क़ासिद अपने अपने खु़तूत ले कर मंज़िल तक पहुँचे , मदीने में जिस वक़्त क़ासिद पहुँचा वह रात का वक़्त था। क़ासिद ने अर्ज़ कि मौला मैं अबू सलमा का ख़त लाया हूँ। हुज़ूर उसे मुलाहेज़ा फ़रमा कर जवाब इनायत फ़रमायें।

यह सुन कर हज़रत ने चिराग़ तलब किया और ख़त ले कर उसी वक़्त पढ़े बग़ैर नज़रे आतिश कर दिया और क़ासिद से फ़रमाया कि अबू सलमा से कहना कि तुम्हारे ख़त का यही जवाब था।

अभी वह क़ासिद मदीने पहुँचा भी न था कि 3 रबीउल अव्वल 132 हिजरी को जुमे के दिन हुकूमत का फ़ैसला हो गया और सफ़ाह अब्बासी ख़लीफ़ा बनाया जा चुका था।(मरवजुल ज़हब मसूदी बर हाशिया , कामिल जिल्द 8 पृष्ठ 30, तारीख़ुल ख़ुल्फ़ा पृष्ठ 272 हयातुल हैवान जिल्द 1 पृष्ठ 74, तारीख़े आइम्मा पृष्ठ 433 )

ख़लीफ़ा मन्सूर दवानेक़ी और हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ स)

मुवर्रिख़ अबुल फ़िदा लिखता है कि अबुल अब्बास सफ़ाह बिन अब्दुल्लाह अब्बासी ने चार साल छः माह( 4 साल 6 महीने) हुकूमत कर के ज़िल्हिज्जा 136 हिजरी मुताबिक़ 754 ई 0 में इन्तेक़ाल किया और वक़्ते वफ़ात अपने भाई मन्सूर को अपना वली अहद क़रार दिया। जिस वक़्त सफ़ाह ने इन्तेक़ाल किया मन्सूर हज को गया हुआ था। 137 हिजरी में उसने वापस आ कर एनाने हुकूमत संभाल ली।

जस्टिस अमीर अली लिखते हैं कि मन्सूर बनी अब्बासी का वह बादशाह है जिसकी आक़ेबत अन्देशी और दूर बीनी से इस ख़ानदान को इतना क़याम और इस क़द्र इक़तेदार हासिल हुआ कि दुनियावी सलतनत जाने के बाद भी अरसे तक ख़ानदानी वक़ार बाक़ी रहा।

मुवर्रेख़ ज़ाकिर हुसैन लिखते हैं कि मन्सूर मुदब्बिर , मुन्तज़िम , मगर दग़ा बाज़ , बे रहम , शक्की , वसवासी और सफ़्फ़ाक था। जिस पर उसे ज़रा भी शुब्हा होता था कि ज़ात या ख़ानदान के लिये मुज़िर साबित होगा , उसे हरगिज़ ज़िन्दा न छोड़ता था। हज़रत अली (अ.स.) की औलाद के साथ जो ज़ुल्म उसने किये हैं उन्हीं ने अब्बासी तारीख़ के सफ़ों को सब से ज़्यादा सियाह किया है। उसी ने अलवियों और अब्बासियों में अदावत की बीज बोया। बड़ा कंजूस था। एक एक दांग पर जान देता था। इसी लिये उसे दवानेक़ी कहते हैं। हज़रत इमाम हसन (अ.स.) और हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) की औलाद अगरचे जुम्ला दुनियावी उमूर से किनारा कश थी लेकिन उनका रूहानी इक़तेदार मन्सूर के लिये निहायत ही तकलीफ़ देह था और ख़्वाम ख़्वाह उनकी तरफ़ से उसे खटका लगा रहता था। यह सादात से पूरी दुश्मनी करता था। उसने बनी हुसैन (अ.स.) की जायदातें ज़ब्त कीं और बहुत से सादात क़त्ल किये , बहुतों को ज़िन्दा दीवारों में चुनवा दिया। इमाम मालिक को इसी लिये ताज़याने लगवाये की उन्होंने एक मौक़े पर सादात की हिमायत की थी। इमाम अबू हनीफ़ा को इसी लिये क़ैद किया कि उन्होंने इब्तेदा में जै़द शहीद की बैअत कर ली थी। फिर 150 ई 0 में उन्हें ज़हर दिलवा दिया। ग़रज़ कि उसके ज़माने में बेशुमार सादात क़त्ल हुए और बहुत से क़ैद ख़ाने में सड़ गए और ज़िन्दान के ज़हरीले बुख़ारात की वजह से मर गए। हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) के साथ भी उसका रवय्या इसी अन्दाज़ का था हालांकि आपने और आपसे पहले आपके वालिदे माजिद हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़र (अ.स.) ने इसे ब इल्मे इमामत हाकिम होने की ख़ुश ख़बरी दी थी और उस वक़्त उसने उनकी मदह सराई की थी।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 121 )

मुल्ला जामी और इमाम शिब्लंजी लिखते हैं कि मंसूर अब्बासी का एक मुक़र्रब बारगाह नाक़िल है कि मैंने एक दिन मन्सूर को मुताफक्किर देख कर सबबे तफ़क्कुर दरयाफ़्त किया , मन्सूर ने कहा कि मैंने अलवियों की जमाअते कसीर को फ़ना कर दिया लेकिन उनके पेशवा को अब तक बाक़ी रखा है। मैंने पूछा वह कौन हैं ? मन्सूर ने कहा ‘‘ जाफ़र बिन मोहम्मद (अ.स.) ’’ मैंने अर्ज़ कि जाफ़र इब्ने मोहम्मद (अ.स.) तो ऐसे शख़्स हैं जो हमेशा इबादत और यादे ख़ुदा में मशग़ूल रहते हैं दुनियां से कुछ ताअल्लुक़ नहीं रखते। मन्सूर ने कहा जानता हूँ कि तू दिल से इनकी इमामत का ख़्याल रखता है , मगर मैंने क़सम खाई है कि रात होने से पहले ही इनकी तरफ़ से मुतमईन हो जाऊंगा। यह कह कर जल्लाद को हुक्म दिया कि जब जाफ़र बिन मोहम्मद को लोग हाज़िर करें और मैं अपने सर पर हाथ रखूं तो तू फ़ौरन उनको क़त्ल कर देना। थोड़ी देर के बाद हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) तशरीफ़ लाये , वह उस वक़्त कुछ पढ़ रहे थे। जब मन्सूर की नज़र उन पर पड़ी तो कांपने लगा और इस्तेक़बाल कर के उनको अपनी मसनद पर बिठा लिया उसके बाद पूछा कि या बिन रसूल अल्लाह(अ स ) आपके तकलीफ़ करने की क्या वजह हुई ? उन्होंने फ़रमाया तलब किये जाने पर आया हूँ। मन्सूर ने कहा कि अगर कोई हाजत हो तो बयान कीजिये। हज़रत (अ.स.) ने फ़रमाया , यही हाजत है कि आइन्दा मेरी तलबी न हो , जब मैं चाहूं आऊँ , यह कह कर वहां से चले गए।(शवहिद अल नबूवत पृष्ठ 188 वसीला ए नजात नूरूल अबसार 146 मजानी अदब जिल्द 2 पृष्ठ 182, इरशाद मुफ़ीद पृष्ठ 415 )

मन्सूर अब्बासी की सादात कशी

जब बनी उमय्या की सलतनत का ज़माना ख़त्म हुआ , तो बनी अब्बास की हुकूमत का दौर चला। यह लोग बनी उमय्या से भी ज़्यादा सादात के दुश्मन साबित हुए। इनके ज़माने में तो सादात पर वह तबाही आई कि इसके बयान से बदन पर रौंगटे ख़ड़े होते हैं। इस सिलसिला ए अब्बासिया का दूसरा बादशाह मन्सूर अब्बासी हुआ है। ख़ुदा की पनाह इसके मज़ालिम का क्या ठिकाना है। हज़ारों सय्यदों को इस ज़ालिम ने क़त्ल कराया। इनके खू़न के गारों से दीवारें तामीर कराईं यही नहीं बल्कि बहुत से बेगुनाहों को दीवारों में ज़िन्दा चिनवा दिया। बीखों और बुनियादों में दबवा दिया।। क़ैद ख़ाने में सड़ा सड़ा कर मार दिया। इसके ज़माने में शिया या सय्यदों का शुब्हा हो जाना क़त्ल के लिये काफ़ी था। सब से ज़्यादा तबाही इस ज़ालिम के दौरे सलतनत में हुसैनी सादात पर आई। ख़्याल करो कि नाज़ुक दौर में हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने किस ऐहतियात से अपनी ज़िन्दगी बसर की होगी। ज़ुल्म के बर्दाश्त करने की भी कोई हद होती है। सालहा सालसे ग़रीब सादात एक अजीब बे कसी की हालत में बसर कर रहे थे , आखि़र उनके सीनों भी दिल था और एक बहादुर ख़ानदान का ख़ून रगों में दौड़ा हुआ था। रफ़ता रफ़ता उनको भी जोश आ गया। इमाम हसन (अ.स.) की औलाद में उनके पोते जनाबे अब्दुल्लाह महज़ एक बड़े नेक दिल और जोशीले सय्यद थे। उन्होंने चाहा कि सादात को अब्बासियों के मज़ालिम से किस तरह छुड़ायें। इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) ने उनको इस इरादे से रोकना चाहा मगर उनका जोश कर नहीं हुआ और लोगों को मन्सूर के खि़लाफ़ उभारने लगे। उनके दो बेटे थे। एक का नाम मोहम्मद नफ़से ज़किया और दूसरे का इब्राहीम था। इन दोनों ने इस कोशिश में पूरा हिस्सा लिया। मन्सूर को जब उनके इरादों का हाल मालूम हुआ तो उसने सादाते हुसैनी की गिरफ़्तारी के लिये एक फ़ौज भेजी जिनमें सत्तर पछत्तर आदमी , कमसिन बच्चे , नौजवान और बूढ़े सब शामिल थे , गिरफ़्तार कर लिये गये। लिखा है कि जब यह सित्म रसीदा काफ़िला मदीने से चला तो उनकी बे कसी व मजबूरी , बे गुनाही व बे कसूरी का ख़्याल कर के हर एक अपने मक़ाम पर रोता और बेचैन नज़र आता था। आह वह साहेबाने फ़ज़लो कमाल जो सूरतो सीरत में बे मिस्ल बे नज़ीर थे जिनका एक एक जवान हिम्मत व दिलेरी में तमाम अरब में मशहूर था। गले में तौक़ पहने और हाथों में दोहरी जंजीरें डालें शर्मों हिजाब से गरदने नीचे किये लाग़र ऊंटों की पीठों पर बैठे हुए मदीना ए रसूल (स अ व व ) से निकल रहे थे।

तारीख़े कामिल में है कि जब इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) को कुन्बे की गिरफ़्तारी का हाल मालूम हुआ तो बेचैन हो गये। मस्जिदे रसूल के दरवाज़े पर खड़े थे कि मज़लूम सादात का काफ़ेला इधर से गुज़रा। इमाम (अ.स.) ने जब यह हाल देखा कि किसी के पैर में ज़न्जीर है किसी के गले में तौक़ , किसी की मुश्कें कसी हैं किसी के पैर ऊंट के पेट से बंधे हुए हैं तो आप ज़ार ज़ार रोने लगे और फ़रमाया ख़ुदा की क़सम आज के बाद से हुरमते हरमे ख़ुदा और रसूल महफ़ूज़ न रहेगी। ख़ुदा की क़सम क़ौमे अन्सार से जो मुआहेदा हज़रत रसूले ख़ुदा (स अ व व ) ने लिया था यानी उनकी औलाद और उनकी हिफ़ाज़त को वह भूल गये। ख़ुदा वन्दा तू अन्सार से सख़्त मुआख़ेज़ा करना। हज़रत की परेशानी का उस वक़्त यह आलम था कि रिदाये मुबारक दोशे अक़दस से गिर गई थी। इस वाक़िये का आप पर इतना गहरा असर पड़ा कि आप उसी रोज़ से बीमार पड़ गये और तक़रीबन बीस रोज़ तक तप (बुख़ार) की वह शदीद तकलीफ़ उठाई कि जान के लाले पड़ गये। हज़रत ने चाहा कि अपने चचा हज़रते अब्दुल्लाह महज़ तक जायें और तसल्ली व दिलासा दें मगर एक संगदिल ने वहां तक न जाने दिया।


मोहम्मद नफ़से ज़किया व इब्राहीम

हज़रत अब्दुल्लाह महज़ उस ज़माने में रूपोश हो गये थे और सहराई अरबों का भेस बदल कर रहने लगे थे। चुनान्चे उसी भेस में वह छुप कर एक मंज़िल पर जनाबे अब्दुल्लाह महज़ से मिले। उन्होंने बेटों से कहा कि इस ज़िल्लत की ज़िन्दगी से इज़्ज़त की मौत बेहतर है। मन्सूर उस ज़माने में कूफ़े में था। क़ैदी उसके सामने पेश हुये। चन्द रोज़ बाद ही यह लोग मरने लगे। क़यामत यह आई कि उनके मुरदों को भी क़ैद ख़ाने से बाहर न निकाला गया। वहीं मरते और सड़ते रहे। इससे वहां की हवा और ज़्यादा गन्दी हो गई और एक ऐसी वबा फैली कि हर रोज़ दो चार मरने लगे। हक़ीक़त यह है कि सादात कशी में बनी अब्बास के मज़ालिम बनी उमय्या से भी कहीं ज़्यादा बढ़ गये थे। बनी उमय्या ने अगर ऐसा किया तो गै़र हो कर क़दीमी दुश्मन बन कर यह तो अपने कहलाते थे माले दुनियां की तमा और हुकूमत की हिर्स ने उनकी आखों पर ऐसा परदा डाला कि नेक व बद की तमीज़ बाक़ी न रही और दुनियां के पीछे आख़ेरत को बिल्कुल भूल गये। बहर हाल ग़रीब सादात ने इस क़ैद ख़ाने में बड़ी इबरत नाक हालत में ज़िन्दगी बसर की लेकिन इस हालत में भी ख़ुदा की याद से ग़ाफ़िल न रहे। शबो रोज़ तिलावते कलामे पाक से काम रहता था। क़ैद ख़ाने की तारीकी में दिन के अवक़ात का चूंकि पता न चलता था , इस लिये अपनी तिलावत को पांच हिस्सों में तक़सीम कर दिया था और उन्हीं से अवक़ाते नमाज़ का पता लगाते थे। उनको इस क़ैद ख़ाने में कई कई वक़्त फ़ाके से गुज़र जाते थे और कोई पुरसाने हाल न था बल्कि खाने का क्या ज़िक्र पानी भी ज़रूरत भर न मिलता था।

अब इधर का हाल सुनों , मोहम्मद नफ़्से ज़किया ने बहुत जल्द एक फ़ौज फ़राहम कर के मन्सूर पर चढ़ाई की और मदीने पर क़ब्ज़ा कर लिया मगर चन्द ही रोज़ बाद मन्सूर की फ़ौजों ने फिर आ घेरा। मोहम्मद उनके मुक़ाबले की ताब न ला सके आखि़र शहीद हो गये। उनका सर काट कर के मन्सूर के पास भेज दिया गया। इस ज़ालिम ने इस सर को एक क़ैद ख़ाने में रख कर क़ैद ख़ाने में उनके बूढ़े बाप अब्दुल्लाह महज़ के पास भेज दिया। जनाबे अब्दुल्लाह उस वक़्त नमाज़ पढ़ रहे थे कि सर मुसल्ले के पास रखा गया। नमाज़ से फ़ारिग़ हो कर जब देखा तो जवान बेटे का सर रखा हुआ है। बे साख़्ता एक आह सीने से निकली , सर को छाती से लगा लिया और कहने लगे बेटा , शाबाश तुम बे शक उन्हीं वायदा वफ़ा करने वालों में से हो जिनकी तारीफ़ ख़ुदा ने क़ुरआन में की है। बेटा तुम ऐसे जवान थे कि तुम्हारी तलवार ने तुमको ज़िल्लत से बचा लिया और तुम्हारी परहेज़गारी ने तुम को गुनाहों से महफ़ूज़ रखा। फिर सर लाने वाले से कहा कि मन्सूर से कह देना कि हम तो मक़तूल हो ही चुके , अब तुम्हारी बारी है। अब हमारा और तुम्हारा इंसाफ़ ख़ुदा के यहां होगा। यह कह के एक ठंडी सांस भरी और दम निकल गया।

अब दूसरे भाई यानी इब्राहीम का हाल सुनो , यह भी मुद्दतों इधर उधर घूमते फिरे आखि़र उन्होंने भी एक फ़ौज जमा कर के मिस्र की हुकूमत हासिल कर ली। जिस ज़माने में नफ़्से ज़किया मन्सूर से लड़ रहे थे। उन्होंने भाई की मद्द को आना चाहा , मगर मन्सूर ने रास्ते बन्द कर रखे थे , मुम्किन न हुआ। मोहम्मद पर फ़तेह पाने के बाद मन्सूर ने इब्राहीम का भी ख़ात्मा कर दिया। सूरत यह हुई कि इब्राहीम अपने लशकर को साथ लिये कूफ़े की तरफ़ रवाना हुए। मक़ाम ‘‘ अल अहमरा ’’ में ख़ेमा ज़न थे कि मन्सूर का लशकर भी वहां पहुँच गया। दोनों लशकरों में सख़्त मुक़ाबला हुआ। सैकड़ों आदमी मारे गये। इब्राहीम की फ़तेह के आसार नुमायां हो चुके थे कि यका यक मामेला दिगर गूँ हो गया और इब्राहीम की फ़ौज ने भागते हुए दुश्मन का पीछा किया मगर नेक दिल इब्राहीम को उनकी तबाह हालत पर रहम आ गया , अपने सिपाहियों को ताअक़्कु़ब से रोक दिया। मन्सूर के सरदार ‘‘ ऐनी ’’ ने इस मौक़े से फ़ायदा उठाया और अपनी तितर बितर क़ुव्वत को जमा कर के फिर एक दम हमला कर दिया। इब्राहीम की फ़ौज को इस बलाए नागहानी की क्या ख़बर थी। वह अपनी फ़तेह देख कर अपनी कमरे खोल चुके थे कि शिकस्त खाई दुश्मन की फ़ौज फिर लौट पड़ी। अब इब्राहीम को मुक़ाबला करना दुश्वार हो गया। फ़ौज तितर बितर हो गई। मजबूरन तलवार ले कर ख़ुद मुक़ाबले को निकल पड़े। देर तक हाशमी शुजाअत के जौहर दिखाते रहे। आखि़र कहां तक लड़ते। दुश्मन ने चारों तरफ़ से घेर कर हलाक कर दिया। यह वाक़ेया 25 ज़िक़ादा 145 हिजरी का है। इब्राहीम वह शख़्स थे कि पूरे पांच बरस रूपोश रहे थे और मन्सूर बावजूद इतनी क़ुदरतो ताक़त के किसी तरह उनको गिरफ़्तार न कर सका था।

इब्राहीम और नफ़से ज़किया के क़त्ल होने के बाद भी मन्सूर के मज़ालिम सादात पर कम न हुए। जहां जिसको पाया बिना क़त्ल किये न छोड़ा। उस ज़माने में सादात की वह तबाही हुई कि बयान में नहीं आ सकती। अल्लामा मजलिसी लिखते हैं कि मन्सूर के ज़माने में बे शुमार औलादे अली (अ.स.) शहीद किये गये और बहुतों को दीवार में चिन्वा दिया गया। मन्सूर उस ज़माने में बग़दाद में महल बनवा रहा था। इसमें जहां औरो को ज़िन्दा चिनवा दिया था एक हसीन नौजवान को भी चुनवाया , वह चूंकि बहुत ही हसीनों ख़ूब सूरत था। उसके चेहरे पर मेमार की नज़र पड़ी तो बे साख़्ता उसका दिल रोने लगा। हुक्म से मजबूर था। दीवार में चुनते चुनते उसे मौक़ा मिल गया। बोला कि ऐ फ़रज़न्दे रसूल (अ.स.) आप घबरायें नहीं , मैं सांस के लिये सूराख़ छोड़ देता हूँ और रात को आ कर निकाल लूंगा। चुनांचे वह रात की तारीकी में दीवार के क़रीब आया और ईंटें हटा कर उस ना जवान बाग़े रिसालत को दीवार से निकाल दिया और कहा कि आप सिर्फ़ इतना कीजिये कि इस तरह ज़िन्दा बच कर किसी तरफ़ चले जाइये कि आपका पता निशान न मिल सके और ऐ फ़रज़न्दे रसूल (अ.स.) आप अपने नाना मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) से मेरी बख़्शिश की सिफ़ारिश फ़रमाईयेगा।

उन्होंने शुक्रिया अदा किया और कहा ऐ शेख़ अगर तुम से हो सके तो मेरी ज़ुल्फ़ों को तराश लो और किसी रात को मेरी दुखिया मां के पास फ़लां महल्ले में जा कर उन्हें मेरी ज़ुल्फ़ें दे कर कह दें कि मैं ज़िन्दा हूँ और अन्क़रीब मिलंूगा। इस मेमार का बयान है कि मैं उनकी ख़्वाहिश के मुताबिक़ उनके मकान पर पहुँचा तो उनकी माँ बैठी रो रही थीं। मैंने उन्हें सुबूते हयात के लिये ज़ुल्फ़ें दे कर नवेदे ज़िन्दगी सुनाई और वापस चला आया।(जिलाउल उयून पृष्ठ 269 प्रकाशित ईरान व सवानेह उमरी चहारदा मासूमीन हिस्सा 2 पृष्ठ 7 )

तवारीख़ में है कि जनाबे नफ़्से ज़किया के शहीद होने के बाद से जहां मज़ालिम का पूरा ज़ोर पैदा हो गया था वहां इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) भी महफ़ूज़ नहीं रह सके। इमाम शब्लन्जी लिखते हैं कि उनको क़त्ल कराने के बाद मन्सूर ने इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) को तलब किया और उनकी सख़्त तहदीद की और क़त्ल की खुले अल्फ़ाज़ मे धमकी दी।(नूरूल अबसार पृष्ठ 133 )

मन्सूर का हज और इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) पर बोहतान तराज़ी हालात की रौशनी में हर बा फ़हम इसका अन्दाज़ा कर सकता है कि हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की ज़िन्दगी किस दौर से गुज़र रही थी और मन्सूर किस ताक में था और किस तरह बहाना तलाश कर रहा था।

तारीख़े हबीबुस सियर में है कि 144 हिजरी में मन्सूर अब्बासी हज के लिये गया। मन्सूर ने हज से फ़राग़त की तो एक शख़्स ने उससे कहा कि इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) तुम्हारे खि़लाफ़ लोगों को भड़काते और उकसाते हैं। उसने इमाम (अ.स.) को बुला कर उनसे कहा कि मुझे ऐसा मालूम हुआ है कि आप मेरी हुकूमत के खि़लाफ़ प्रोपेगन्डा करते और लोगों को उकसाते और भड़काते हैं। आपने इरशाद फ़रमाया , ऐ बादशाह ! यह बिल्कुल ग़लत है और तूझे मेरे कहने पर यक़ीन न आये तो तू उस शख़्स को मेरे सामने तलब कर। मन्सूर ने उसे बुलाया। आपने फ़रमाया कि तूने मुझ पर क्यों बोहतान बांधा हैं ? उसने कहा कि मैंने सच कहा है। इमाम (अ.स.) ने फ़रमाया कि क्या तू क़सम खा कर कह सकता है ? उसने कहा हां , फिर उसने ख़ुदा की क़सम खाई। आपने कहा इस तरह नहीं जिस तरह मैं कहूँ उस तरह क़सम खा। चुनान्चे आपने फ़रमाया कि अपनी ज़बान से यह कह कर क़सम खा ‘‘ बरत मिन हौल अल्लाह ’’ मैं ख़ुदा की क़ुव्वत व ताक़त से दूर हट कर अपने भरोसे पर क़सम खाता हूँ। उसने पहले तो हल्का सा इन्कार किया फिर वह क़सम खा गया। उसका नतीजा यह हुआ कि उसी जगह गिर कर हलाक हो गया।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 120 प्रकाशित मिस्र)

इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) का दरबारे मन्सूर में एक तबीबे हिन्द से तबादला ए ख़यालात

अल्लामा रशीद उद्दीन अबू अब्दुल्लाह मोहम्मद बिन अली इब्ने शहरे आशोब माज़न्द्रानी अल मतूफ़ी 588 हिजरी ने दरबारे मन्सूर का एक अहम वाक़ेया नक़ल फ़रमाया है जिसमें मुफ़स्सल तौर पर यह वाज़े किया गया है कि एक तबीब जिसको अपनी क़ाबलियत पर बड़ा भरोसा और ग़ुरूर था वह इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के सामने किस तरह सिपर अन्दाख़्ता हो कर आपके कमालात का मोतरिफ़ हो गया। हम मौसूफ़ की अरबी इबारत का तरजुमा अपने फ़ाज़िल मआसर के अल्फ़ाज़ में पेश करते हैं।

एक बार हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) मन्सूर दवानक़ी के दरबार में तशरीफ़ फ़रमा थे। वहां एक तबीबे हिन्दी तिब की बाते बयान कर रहा था और हज़रत ख़ामोश बैठे सुन रहे थे। जब वह कह चुका तो हज़रत से मुख़ातिब हो कर कहने लगा। अगर कुछ पूछना चाहें तो शोक़ से पूछें। आपने फ़रमाया , मैं क्या पूछूँ , मुझे तुझ से ज़्यादा मालूम है। तबीब अगर यह बात है तो मैं भी कुछ सुनूं। इमाम (अ.स.) जब किसी मर्ज़ का ग़लबा हो तो उसका इलाज ज़िद से करना चाहिये यानी हार , गर्म का इलाज बारद सर्द से , तर का ख़ुश्क से , ख़ुश्क का तर से और हर हालत में अपने ख़ुदा पर भरोसा रखे। याद रख मेदा तमाम बिमारियों का घर है और परहेज़ सौ दवाओं की एक दवा है। जिस चीज़ का इंसान आदी हो जाता है उसके मिजाज़ के मुवाफ़िक़ और उसकी सेहत का सबब बन जाती है। तबीब बे शक आपने जो बयान फ़रमाया है असली तिब यही है। इमाम (अ.स.) यह न समझना चाहिये कि मैंने जो बयान किया है यह तिब की किताबें पढ़ कर हासिल किया है बल्कि यह उलूम मुझको ख़ुदा की तरफ़ से मिले हैं। अब बता तू ज़्यादा इल्म रखता है या मैं ? तबीब मैं। इमाम (अ.स.) अच्छा मैं चन्द सवाल करता हूँ उनका जवाब दे।

1. आंसुओं और रूतूबतों की जगह सर में क्यों है ?

2. सर पर बाल क्यों हैं ?

3. पेशानी बालों से खाली क्यों है ?

4. पेशानी पर ख़त और शिकन क्यों हैं ?

5. दोनों पल्कें आंखों के ऊपर क्यों हैं ?

6. नाक दोनों आंखों के दरमियान क्यों है ?

7. आंखें बादामी शक्ल की क्यों हैं ?

8. नाक का सूराख़ नीचे की तरफ़ क्यो है ?

9. मूंह पर दो होंठ क्यों बनाये गये हैं ?

10. सामने के दांत तेज़ और दाढ़ें चौड़ी क्यों है और उन दोनों के बीच में लम्बे दांत क्यों हैं ?

11. दोनों हथेलियां बालों से ख़ाली क्यों हैं ?

12. मर्दो के दाढ़ी क्यों होती है ?

13. नाख़ून और बालों में जान क्यों नहीं ?

14. दिल सनोबरी शक्ल का क्यों है ?

15. फ़ेफड़े के दो टुकड़े क्यों हैं और वह अपनी जगह हरकत क्यों करता हैं ?

16. जिगर की शक्ल मोहद्दब क्यों है ?

17. गुर्दे की शक्ल लोबिये के दाने की तरह क्यों होती है ?

18. घुटने आगे को झुकते हैं पीछे को क्यों नहीं झुकते ?

19. दोनों पावों के तलवे बीच से ख़ाली क्यों होते हैं ?

तबीब मैं इन बातों का जवाब नहीं दे सकता। इमाम (अ.स.) ख़ुदा के फ़ज़्ल से मैं इन सब सवालों का जवाब जानता हूँ। तबीब ने कहा कि बराऐ करम बयान फ़रमाइये।

इमाम (अ.स.) ने फरमायाः

1. सर अगर आंसुओं और रूतूबतों का मरकज़ न होता तो ख़ुश्की की वजह से टुकड़े टुकड़े हो जाता।

2. बाल इस लिये सर पर हैं कि उनकी जड़ों से तेल वग़ैरा दिमाग़ तक पहुँचता रहे और बहुत से दिमाग़ी अबख़रे निकलते रहें , दिमाग़ गर्मी और सर्दी से महफ़ूज़ रहे।

3. पेशानी बालों से इस लिये ख़ाली है कि इस जगह से आंखों में नूर पहुँचता है।

4. पेशानी में लकीरें इस लिये हैं कि सर से जो पसीना गिरे वह आंखों में न जा पाये। जब शिकनों में पसीना जमा हो तो इंसान उसे पोंछ कर फे़क दे जिस तरह ज़मीन पर पानी जारी होता है तो गढ़ों में जमा हो जाता है।

5. पलकें इस लिये आंखों पर क़रार दी गई हैं कि आफ़ताब की रौशनी इतनी उन पर पड़े जितनी ज़रूरत है और ब वक़्ते ज़रूरत बन्द हो कर आंखों की हिफ़ाज़त कर सके और सोने में मद्द दे सकें। तुम ने देखा होगा की जब इंसान ज़्यादा रौशनी में बलन्दी की तरफ़ किसी चीज़ को देखना चाहता है तो हाथ आंखों के ऊपर रख कर साया कर लेता है।

6. नाक को दोनों आंखों के बीच में इस लिये क़रार दिया गया है कि मजमा ए नूर से रौशनी तक़सीम हो कर बराबर दोनों आंखों को पहुँचे।

7. आंखों को बदामी शक्ल का इस लिये बनाया गया है कि बा वक़्ते ज़रूरत सलाई के ज़रिये से दवा , सुरमा वग़ैरा इसमें आसानी से पहुँच जायें। अगर आंख चकोर या गोल होती तो सलाई का उसमें फिरना मुश्किल होता। दवा उसमें ब ख़ूबी न पहुँच सकती और बीमारी दफ़ा न होती।।

8. नाक का सूराख़ नीचे को इस लिये बनाया कि दिमाग़ी रूतूबतें आसानी से निकल सकें अगर ऊपर को होता तो यह बात न होती और दिमाग़ तक किसी भी चीज़ की बू जल्दी से न पहुँच सकती।

9. होंठ इस लिये मुंह पर लगाये गये कि जो रूतूबतें दिमाग़ से मुंह मे आयें वह रूकी रहें और खाना भी इंसान के इख़्तियार में रहे , जब चाहे फेकें और थूक दे।

10. दाढ़ी मर्दों को इस लिये दी कि मर्द और औरत में तमीज़ हो जाय।

11. अगले दांत इस लिये तेज़ हैं कि किसी चीज़ का काटना सहल हो और दाढ़ों को चौड़ा इस लिये बनाया कि ग़िज़ा पीसना और चबाना आसान हो। इन दोनों के दरमियान लम्बे दांत इस लिये बनाये कि दोनों के इस्तेहकाम के बाएस हों जिस तरह मकान की मज़बूती के बाएस सुतून (खम्बे) होते हैं।

12. हथेलियों पर बाल इस लिये नहीं कि किसी चीज़ को छूने से इसकी नरमी , सख़्ती , गर्मी और सर्दी वग़ैरा आसानी से मालूम हो जाय। बालों की सूरत में यह बात हासिल न होती।

13. बाल और नाख़ूनों में जान इस लिये नहीं कि इन चीज़ों का बढ़ना बुरा मालूम होता है और नुक़्सान देह है , अगर इन में जान होती तो काटने में तकलीफ़ होती।

14. दिल सनोबरी शक्ल यानी सर पतला और दुम चौड़ी (निचला हिस्सा) इस लिये है कि आसानी से फे़फ़ड़े में दाखि़ल हो सके और उसकी हवा से ठंडक पाता रहे ताकि उसके बुख़ारात दिमाग़ की तरफ़ चढ़ कर बीमारियां पैदा न करें।

15. फे़फ़ड़े के दो टुकड़े इस लिये हुए कि दिल उनके दरमियान रहे और वह उसको हवा दें।

16. जिगर मोहद्दब इस लिये हुआ कि अच्छी तरह मेदे के ऊपर जगह पकड़े और अपनी गरानी व गर्मी से ग़िज़ा को हज़म करे।

17. गुर्दा लोबिये के दाने की शक्ल का इस लिये हुआ कि मनी यानी नुत्फ़ा इंसानी पुश्त की जानिब से इसमें आता है और उसके फ़ैलने और सुकड़ने की वजह से आहिस्ता आहिस्ता निकलना है जो सबबे लज़्ज़त है।

18. घुटने पीछे की तरफ़ इस लिये नहीं झुकते कि चलने में आसानी हो अगर ऐसा न होता तो आदमी चलते वक़्त गिर गिर पड़ता , आगे चलना आसान न होता।

19. दोनों पैरों के तलवों के बीच में जगह ख़ाली इस लिये है कि दोनों किनारों पर बोझ पड़ने से आसानी से पैर उठ सकें अगर ऐसा न होता और पूरे बदन का बोझ पेरों पर पड़ता तो सारे बदन का बोझ उठाना दुश्वार हो जाता।

यह जवाबात सुन कर हिन्दोस्तानी तबीब (हकीम , वैद्य) हैरान रह गया और कहने लगा कि आपने यह इल्म किससे सीखा है ? फ़रमाया अपने दादा से उन्होंने रसूले ख़ुदा (स अ व व ) से हासिल किया और उन्होंने ख़ुदा से सीखा है। उसने कहा , ‘‘ इन्ना अशहदो अन ला इलाहा इलल्लाह व अन मोहम्मदन रसूल अल्लाह व अब्दहू ’’ मैं गवाही देता हूँ कि ख़ुदा एक है और मोहम्मद (स अ व व ) उसके रसूल और अब्दे ख़ास हैं। ‘‘ व इन्नका आलमो अहले ज़माना ’’ और आप अपने ज़माने में सब से बडे आलिम हैं।(मनाक़िब इब्ने शहरे आशोब जिल्द 5 पृष्ठ 46 प्रकाशित बम्बई व सवानेह चहारदा मासूमीन हिस्सा 2 पृष्ठ 25 )

इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) को बाल बच्चों समेत जला देने का मन्सूबा

तबीबे हिन्दी से गुफ़्तुगू के बाद इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) का आम शोहरा हो गया और लोगों के क़ुलूब पहले से ज़्यादा आपकी तरफ़ माएल हो गये। दोस्त और दुश्मन आपके इल्मी कमालात का ज़िक्र करने लगे। यह देख कर मन्सूर के दिल में आग लग गई और वह अपनी शरारत के तक़ाज़ों से मजबूर हो कर यह मन्सूबा बनाने लगा कि अब जल्द से जल्द इन्हें हलाक कर देना चाहिये। चुनान्चे उसने ज़ाहिरी क़द्रों मन्ज़ेलत के साथ आपको मदीना रवाना कर के हाकिमे मदीना हुसैन बिन ज़ैद को हुक्म दिया ‘‘ अन अहरक़ जाफ़र बिन मोहम्मद फ़ी दाराह ’’ इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) को बाल बच्चों समैत घर के अन्दर जला दिया जाए। यह हुक्म पा कर वालिये मदीना चन्द ग़ुन्डों के ज़रिये से रात के वक़्त जब कि सब महवे ख़्वाब थे , आपके मकान में आग लगवा दी और घर जलने लगा। आपके असहाब अगरचे उसे बुझाने की पूरी कोशिश कर रहे थे लेकिन आग बुझने को न आती थी। बिल आखि़र आप उन्हीं शोलों में कहते हुए कि ‘‘ अना इब्ने ईराक़ अल शरआ , अना इब्ने इब्राहीम अल ख़लील ’’ ऐ आग मैं वह हूँ जिसके आबाव अजदाद ज़मीनों आसमान की बुनियादों के सबब हैं और मैं ख़लीले ख़ुदा इब्राहीम नबी का फ़रज़न्द हूँ। निकल पड़े और अपनी अबा के दामन से आग बुझा दी।(तज़किरतुल मासूमीन पृष्ठ 181 ब हवाला उसूले काफ़ी आक़ा ए क़ुलैनी अर रहमा)

147 हिजरी में मन्सूर का हज और इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के क़त्ल का अज़म बिल जज़म

अल्लामा शिब्लंजी और अल्लामा मोहम्मद बिन तल्हा शाफ़ेई रक़म तराज़ हैं कि 147 हिजरी में मन्सूर हज को गया। उसे चूंकि इमाम (अ.स.) के दुश्मनों की तरफ़ से बराबर यह ख़बर दी जा चुकि थी कि इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) तेरी मुख़ालेफ़त करते रहते हैं और तेरी हुकूमत का तख़्ता पलटने की कोशिश में हैं। लेहाज़ा उसने हज से फ़राग़त के बाद मदीने का क़स्द किया और वहां पहुँच कर अपने ख़ास हमदर्द ‘‘ रबी ’’ से कहा कि जाफ़र बिन मोहम्मद को बुलवा दो। रबी ने वायदे के ब वजूद टाल मटोल की। उसने फिर दूसरे दिन सख़्ती के साथ कहा कि उन्हें बुलवा। मैं कहता हूँ कि ख़ुदा मुझे क़त्ल करे अगर मैं उन्हें क़त्ल न कर सकूँ। रबी ने इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की खि़दमत में हाज़िर हो कर अर्ज़ कि मौला ! आपको मन्सूर बुला रहा है और उसके तेवर बहुत ख़राब हैं। मुझे यक़ीन है कि वह इस मुलाक़ात से आपको क़त्ल कर देगा। हज़रत ने फ़रमाया , ‘‘ ला हौला वला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहिल अली उल अज़ीम ’’ यह इस दफ़ा न मुम्किन है। ग़रज़ कि रबी हज़रत को ले कर हाज़िरे दरबार हुआ। मन्सूर की नज़र जैसे ही आप पर पड़ी तो आग बबूला हो कर बोला , ‘‘ या अदू अल्लाह ’’ ऐ दुश्मने ख़ुदा तुमको अहले ईराक़ इमाम मानते हैं और तुम्हें ज़कात अम्वाल वग़ैरा देते हैं और मेरी तरफ़ उनका कोई ध्यान नहीं। याद रखो , मैं आज तुम्हें क़त्ल कर के छोड़ूगा और इसके लिये मैंने क़सम खा ली है। यह रंग देख कर इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने इरशाद फ़रमाया। ऐ अमीर , जनाबे सुलेमान (अ.स.) को अज़ीम सलतनत दी गई तो उन्होंने शुक्र किया। जनाबे अय्यूब को बला में मुब्तिला किया गया तो उन्होंने सब्र किया। जनाबे यूसुफ़ पर ज़ुल्म किया गया तो उन्होंने ज़ालिमों को माफ़ कर दिया। ऐ बादशाह ये सब अम्बिया थे और उन्हीं की तरफ़ तेरा नसब भी पहुँचता है तुझे तो उनकी पैरवी लाज़िम है यह सुन कर उसका ग़ुस्सा ठंडा हो गया।(नूरूल अबसार पृष्ठ 132, मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 276 )

हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की दरबारे मन्सूर में सातवीं बार तलबी

147 हिजरी में हज से फ़राग़त के बाद जब मन्सूर अपने दारूल खि़लाफ़ा में पहुँचा तो मुशीरों ने मौक़े से इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) का ज़िक्र छेड़ा। मन्सूर जो इसी दौरान में उनसे मिल कर आया था उसने फ़ौरन हुक्म दे दिया कि इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की तलबी की जाय और उन्हें बुला कर मेरे सामने दरबार में पेश किया जाय। दावत नामा चला गया और इमाम (अ.स.) मदीने से चल कर दरबार में उस वक़्त पहुँचे जब उसे एक मक्खी सता रही थी और वह उसे बार बार हकंा रहा था। वह मुंह पर बैठी थी और मन्सूर उसे दफ़ा करता था लेकिन वह बाज़ न आती थी। मन्सूर इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की तरफ़ मुतावज्जे हो कर बोला , कि ज़रा यह बताइये कि ख़ुदा ने मक्खी को क्यों पैदा किया है ? हज़रत ने फ़रमाया ! ‘‘ लैज़ल बेही अल जब्बारता ’’ कि ख़ुदा ने मक्खी इस लिये पैदा की है कि उसके ज़रिये से जाबिरों को ज़लील करे व सर कशों का सर झुकाये।(नूरूल अबसार , पृष्ठ 144, मनाक़िब इब्ने शहरे आशोब जिल्द 3 पृष्ठ 40 )

इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) और दरबार के शेर

एक दिन का ज़िक्र है कि मन्सूर ने बाबुल से सत्तर जादूगरों को बुला कर दरबार में बैठाये हुए था और उनसे कह दिया था कि मैं अन्क़रीब अपने एक दुश्मन को बुलाने वाला हूँ वह जब यहां पर आये तो तुम उसके साथ कोई ऐसा करतब करना जिससे वह ज़लील हो जाय। वहां पहुँच कर अपने देखा कि सत्तर मसनवी शेर दरबार में बैठे हुए हैं। आपको ग़ुस्सा आ गया और आपने उन शेरों की तरफ़ मुतव्वजे हो कर कहा कि अपने बनाने वालों को निगल लो। वह नक़ली शेर की तस्वीरें मुजस्सम हुईं और उन्होंने सब जादूगरों को निगल लिया। यह देख कर मन्सूर कांपने लगा , फिर थोड़ी देर के बाद बोला , ऐ इब्ने रसूल अल्लाह (अ.स.) इन शेरों को हुक्म दीजिये कि इन जादूगरों को उगल दें। आपने फ़रमाया यह नहीं हो सकता। अगर असाए मूसा ने सांपों को उगल दिया होता तो यक़ीन है कि यह भी उगल देते।(दमए साकेबा जिल्द 2 पृष्ठ 513 बा हवाला ए शरह शाफ़िया अबी फ़ारस)

इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) को दरबार में क़त्ल किये जाने का बन्दो बस्त

अल्लामा दहर शती ब हवाला ए किताब मशारिको अनवार अल्लामा तबरीसी रक़म तराज़ हैं कि मन्सूर अब्बासी जब आपकी रूहानियत से आजिज़ आ गया और किसी मरतबा क़त्ल करने में कामयाबी न हासिल कर सका तो उसने सवालिये अफ़राद तलाश किये जो कुछ जानते और पहचानते ही न थे , बिल्कुल अल्लढ़ और कुन्दा ए ना तराश थे। उसने मालो दौलत दे कर इस अम्र पर राज़ी किया कि जब इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) की तरफ़ इशारा किया जाय तो वह उन्हें क़त्ल कर दें। प्रोग्राम मुरत्तब होने के बाद रात के वक़्त हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) को बुलाया गया। आप तशरीफ़ लाए , हुक्म था कि बिल्कुल तन्हा तशरीफ़ लायें। आप अकेले आये। जब आप दरबार में दाखि़ल हुए और उन लोगों की नज़रे आप पर पड़ीं जो तलवारें सूते हुए खड़े थे तो वह सब के सब तलवारें फें़क कर आपके क़दमों पर गिर पड़े। यह हाल देख कर मन्सूर ने कहा , इब्ने रसूल अल्लाह आप रात के वक़्त क्यों तशरीफ़ लाये हैं ? आपने फ़रमाया कि तूने मुझे गिरफ़्तार करा के मंगवाया है , अब कहता है क्यों आए हैं। उसने कहा माअज़ अल्लाह कहीं यह भी हो सकता है। आप तशरीफ़ तशरीफ़ ले जायें और क़याम गाह में आराम फ़रमायें। आप वापस चले गये। वहां से मदीना तशरीफ़ ले गये। इमाम (अ.स.) के चले जाने के बाद उन लोगों से पूछा गया कि तुमने खि़लाफ़ वरज़ी क्यों की और उन्हें क़त्ल क्यों नहीं किया ? उन्होंने जवाब दिया कि यह तो वह इमामे ज़माना हैं जो हमारी शबो रोज़ ख़बर गिरी करता है और हमेशा हमारी अपने बच्चों की तरह परवरिश करते हैं। यह सुन कर मन्सूर डर गया और उसे ख़्याल हुआ कि कहीं यह लोग मुझ से इसका बदला न लेने लगें इसी लिये उन्हें रात ही में रवाना कर दिया। ‘‘ सम क़त्ल बिल इसमा ’’ फिर आपको ज़हर से शहीद करा दिया।(दम ए साकेबा पृष्ठ 481 जिल्द 2 प्रकाशित नजफ़) अल्लामा अरबली का कहना है कि आपको क़ैद ख़ाने में ज़हर दिया गया।(कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 100 ) रवायात से मालूम होता है कि आपको कई मरतबा ज़हर दिया गया।(जन्नातुल ख़ुलूद पृष्ठ 28 ) बिल आखि़र आप इस आख़ेरी ज़हर से शहीद हो गये , जो अंगूर के ज़रिये से दिया गया था।(जिलाउल उयून पृष्ठ 268 )

हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की शहादत

उलेमा ए फ़रीक़ैन का इत्तेफ़ाक़ है कि ब तारीख़ 15 शव्वाल 148 हिजरी 65 साल की उम्र में आपने इस दारे फ़ानी से ब तरफ़े मुल्के जावेदानी रेहलत फ़रमाई।(इरशादे मुफ़ीद पृष्ठ 413 आलामु वुरा पृष्ठ 159 नूरूल अबसार पृष्ठ 132 मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 277 ) यौमे वफ़ात दोशम्बा था और मक़ामे दफ़्न जन्नतुल बक़ी है।

अल्लामा इब्ने हजर अल्लामा सिब्ते इब्ने जौज़ी अल्लामा शिब्लन्जी अल्लामा इब्ने तल्हा शाफ़ेई तहरीर फ़रमाते हैं कि ‘‘ माता मस्मूमन अय्यामल मन्सूर ’’ मन्सूर के ज़माने में आप ज़हर से शहीद हुए।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 121, ग़ाएतुल इख़्तेसार पृष्ठ 62 सहा अल अख़बार पृष्ठ 44, तज़किरा ए ख़वासुल उम्मता , नूरूल अबसार पृष्ठ 133, अरजहुल मतालिब पृष्ठ 450 )

उलेमा ए अहले तशीय का इत्तेफ़ाक़ है कि आपको मन्सूर दवानक़ी ने ज़हर से शहीद कराया था और नमाज़ हज़रत इमाम मूसी ए काज़िम (अ.स.) ने पढ़ाई थी। अल्लामा क़ुलैनी और अल्लामा मजलिसी का इरशाद है कि आपको निहायत क़ीमती कफ़न दिया गया और आपके मक़ामे वफ़ात पर हर शब चराग़ जलाया जाता रहा।(किताब काफ़ी व जिलाउल उयून मजलिसी पृष्ठ 269 )


आपकी औलाद

आपकी मुख़्तलिफ़ बीबीयों से दस औलादें थीं जिनमें से सात लड़के और तीन लड़कियां थीं। लड़कों के नाम यह हैं। 1. जनाबे इस्माईल , 2. हज़रत मूसी ए काज़िम (अ स ) , 3. अब्दुल्लाह , 4. इस्हाक़ , 5. मोहम्मद , 6. अब्बास , 7. अली , और लड़कियों के नाम यह हैं। 1. उम्मे फ़रवा , 2. असमा , 3. फ़ात्मा।(इरशाद व जन्नातुल ख़ुलूद) अल्लामा शिब्लंजी ने सात औलाद तहरीर किया है। जिन्में सिर्फ़ एक लड़की का हवाला दिया है जिसका नाम उम्मे फ़रवा था।(नूरूल अबसार पृष्ठ 133 )

आपकी ही औलाद से ख़ुल्फ़ा ए फ़ात्मिया गुज़रे हैं जिनकी सलतनत 267 हिजरी से 567 हिजरी तक 270 साल क़ायम रही। उनकी तादाद 14 थी।

फ़ात्मी ख़ुल्फ़ा

मुवर्रिख़ एहसान उल्लाह अब्बासी अपनी तारीख़े इस्लाम के पृष्ठ 422 में लिखते हैं कि तीसरी सदी हिजरी के आख़ीर में एक बड़ी ज़बर दस्त सलतनत अलवियों की मग़रिब में क़ायम हुई। बनू उमय्या और अब्बासियों के बाद हुदूदे आराजी के हिसाब से नीज़ इस एतेबार से कि अर्से तक बादशाहत क़ायम रही। अलवी सलतनत तीसरे दर्जे में शुमार होती है। बग़दाद से पछिचम अन्दलस तक अलवियों की बादशाहत थी। कुछ दिनों तक शाम , मक्का और मदीने में भी अलवियों का ज़ोर था। साल भर तक ख़ुत्बा ए बग़दाद में मुसतसिर अलवी का नाम लिया गया। अन्दलस ऐसी मुसतक़िल और ज़बर दस्त इस्लामी सलतनत अर्से तक अलवियों का एक सूबा रही।

सलातीने अलविया बा एतेबार ख़ुल्फ़ा ए अब्बासिया ज़्यादा पाबन्दे अहकामे शरिया थे। लहो लाब से उनको परहेज़ था। इस लिये ईसाई मुवर्रिख़ों ने ताअस्सुब की बिना पर अलवियां को मुताअस्सिब लिखा है। 250 सौ बरस से कुछ ज़्यादा अर्से तक यह ख़ान दान क़ायम रहा। चौदहवें बादशाह आज़द पर 567 हिजरी में इसका ख़ात्मा हुआ।

अल्लामा अली हैदर लिखते हैं कि यही सलातीने अलविया ख़ुल्फ़ा ए फ़ात्मीन के नाम से मशहूर हैं। यह हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की नस्ल से थे। इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के बड़े साहब ज़ादे जनाबे इस्माईल अपने वालिदे माजिद की ज़िन्दगी में इन्तेक़ाल फ़रमा गये थे मगर आपकी शादी हो चुकी थी जिनसे उनके बेटे हुसैन अल तक़ी और उनके बेटे अब्दुल्लाह अल मेहदी हुए जो ख़ुल्फ़ा ए फ़ात्मीन के बुज़ुर्ग थे। इसी वजह से इस ख़ान दान को इस्माईलिया कहते हैं। अशना अशरी फ़िरक़े के लोग इन लोगों को ‘‘ शिश इमामी ’’ (छ: इमामों को मानने वाले) भी कहते हैं क्यों कि यह लोग बारह इमामों में से सिर्फ़ 6 इमामों को मानते हैं और हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के बाद हज़रत इमाम मूसी ए काज़िम (अ.स.) को हुक्मे ख़ुदा और रसूल (स अ व व ) के खि़लाफ़ इमाम नहीं मानते बल्कि जनाबे इस्माईल के बेटे मोहम्मद को इमाम मानते हैं और इस अम्र के क़ायल हैं कि इमामत जनाबे इस्माईल ही के औलाद में क़यामत तक रहेगी। हिन्दुस्तान व पाकिस्तान के ‘‘ शिया बोहरों ’’ और आग़ा ख़ानी ख़ोजों का यही मज़हब है। मुवर्रिख़ ज़ाकिर हुसैन लिखते हैं कि 21 रबी उल अव्वल 297 हिजरी मुताबिक़ 909 ई 0 को यह सलतनत क़ायम हुई। इन्तेहाई उरूज के ज़माने की सलतनत बहरे ज़ुल्मात से सहराए शाम तक और बहरे रोम से सहरा ए अफ़रीक़ा तक फैल गई थी। मशरिक़ बलादिउल जज़ाएर , तून्स , तराबलीस , बरक़ा , मिस्र , शाम , यमन जज़ीरा ए सक़ीलह और बहरे रोम के बाज़ और जज़ीरा ए इसमें शामिल थे बल्कि बग़दाद व मूसल तक एक साल तक इनके नाम का ख़ुत्बा पढ़ा गया। इन बादशाहों को उलूम व फ़नून का भी कमाल शौक़ था। ख़ुद भी बड़े आलिम व फ़ाज़िल थे। उन्होंने मिस्र में हर क़िस्म की ऐसी तरक़्क़ी , रौनक़ और रौशनी फैलाई जो उन्हीं के ज़माने में मख़सूस थी। ना इनसे पहले मिस्र को यह दिन नसीब हुआ था ना इनके बाद हुआ। अस्टैलनली लैन पोल लिखता है कि ‘‘ ख़ानदाने फ़ात्मिया की दौलत व हशमत , शान व शौकत और तिजारत , बहरे रोम की ख़ुश हाली का बाएस साबित हुई। ’’ ज़ैल में इस ख़ान दान के चौदह बादशाहों के मुख़्तसर हालात लिखते हैं।

1. जनाबे अबू मोहम्मद अबीद उल्लाह उल मेहदी बिल्लाह आप 260 हिजरी मुताबिक़ 874 ई 0 में बामुक़ाम सल्मीह या कूफ़ा पैदा हुए और आपने सलतनते फ़ात्मीन की बुनियाद क़ायम की। 303 ई 0 से 306 ई 0 तक उन्होंने बनी फ़ात्मा को ख़ारजियों के हाथ से महफ़ूज़ रखने की ग़रज़ से ‘‘ क़ीरोवान ’’ के क़रीब एक मज़बूत शहर और मुस्तहकम क़िला तामीर कराया और उसका नाम ‘‘ महदीया ’’ रख कर किरदार अल हुकूमत क़रार दिया। क़ीरूवान और तराबस को फ़तेह कर के मिस्र की तरफ़ आए। यही ख़लीफ़ा मुक़तदर अब्बासी की तरफ़ से ‘‘ मूनिस ख़ादिम ’’ मुक़ाबला को आया लेकिन कामयाबी जनाबे अबीद उल्लाह ही को होई। आपने तमाम मग़रिबे अक़सा (मराकू) को मुसख़्ख़र कर के फ़ात्मी सलतनत में शामिल कर लिया। मग़रिबे अक़सा की फ़तह के बाद आप इन्दलस फ़तेह करने की तदबीरें कर रहे थे कि अजल आ गई। आपने अपनी सलतनत अपनी हयात ही में बहरे ज़ुल्मात और जज़ाएर ख़ालदात (कज़ीर) तक और बहरे रोम से सहराए अज़ीम अफ़रीक़ा तक फ़ैलाई थी। आपकी खि़लाफ़त ज़बरदस्त और मुस्तएदाना थी।

स्यूती ने लिखा है कि आपने दाद गुस्तरी और फ़य्याज़ी के साथ सलतनत की। लोग आपकी तरफ़ झुके हुए थे। आपका अहदे जुलूस रबीउल अव्वल 297 हिजरी था। आपकी तारीख़े वफ़ात 15 रबी उल अव्वल 322 हिजरी मुद्दते सलतनत 24 साल मुद्दते उम्र 62 साल थी। आप शहरे महदीया में दफ़्न किए गए।

2. जनाबे अल क़ासिम मोहम्मद नज़ार क़ाएम बेअमरिल्लाह बिन मेंहदी आपकी तारीख़े विलादत मोहर्रम 280 हिजरी मुताबिक़ 893 ई 0 तारीख़ जुलूस 15 रबी उल अव्वल 322 हिजरी मुद्दते सलतनत 12 साल 7 माह और मुद्दते उम्र 54 साल 9 माह थी। आप बड़े जंग आज़मूदह थे। अक्सर जंगों में ख़ुद फ़ौज ले कर जाया करते थे।

मिस्टर अमीर अली ने लिखा है कि यह पहले फ़ात्मी ख़लीफ़ा हैं जिन्होंने बहरे रोम पर हुकूमत व एक़तिदार हासिल करने की ग़रज़ से जहाज़ों का एक ज़बर दस्त बेड़ा तैय्यार किया। 224 हिजरी में मग़रिब अक़सा की बग़ावत फ़रो की और ‘‘ रीफ़ ’’ के बनों इदरीस को मुतीय किया। इटली के डाकू फ़ात्मी ख़लीफ़ा के बन्दरगाहों पर लूट मार कर जाया करते थे। इसके रद्दे अमल में आपका सिपह सालार जुनूबी इटली को गीटा तक ताराज करता हुआ शहर ‘‘ जनवा ’’ तक जा पहुँचा। इसने शहर को फ़तेह कर के बहुत से बाशिन्दों को गिरफ़्तार कर लिया। जनवा मुद्दत दराज़ तक ख़ुल्फ़ा ए फ़ात्मीन के क़ब्ज़े में रहा। इनकरवा (लोम बरीडी) का एक हिस्सा भी क़ब्ज़े में आ गया। यक़ीन है कि अगर आपकी अपनी सलतनत में बग़ावत न शुरू हो जाती तो आप पूरे मुल्क ‘‘ इटली ’’ को फ़तेह कर लेते। आपके इस बेड़े ने वापसी के मौक़े पर ‘‘ सारडेना ’’ पर हमला कर के फ़िरंगियों को बहुत सी शिकस्तें दीं फिर क़रक़ीसिया का रूख़ किया जो शाम के साहिल पर वाक़े है। यहां इसने अब्बासियों के जहाज़ को जला दिया और बहुत सा माले ग़नीमत ले कर ‘‘ महदिया ’’ की तरफ़ मरजाअत की। 333 हिजरी में आपके ख़ादिम ‘‘ ज़ैदान ’’ ने इसकनदरया फ़तेह कर लिया। फिर अहले सक़लिया ने बग़ावत की और शाहे क़ुस्तुनतुनिया के बेड़े को अपनी मद्द के लिये बुला लिया। सक़लिया के फ़ात्मी गवरनर ने क़ेला ‘‘ अबू असर ’’ और क़ेला ‘‘ बलूत ’’ फ़तेह कर के जर जन्नत का मोहासेरा कर लिया और आपके बेड़े ने रूमी बेड़े को तबाह कर डाला। आपके ज़माने में अबू यज़ीद खारजी ने बग़ावत की जो मुद्दत दराज़ तक जारी रही। इसी दौरान में बआमिरल्लाह ने बीमार हो कर इन्तेक़ाल किया।

3. जनाबे अबू ताहिर इस्माईली मन्सूर बिल्लाह बिन अल क़ायम आप 302 हिजरी में बा मुक़ाम क़ीरूवान पैदा हुए और 13 शव्वाल 334 हिजरी में सलतनते संभाली और शव्वाल 341 हिजरी में वफ़ात पाई। मुद्दते सलतनत सात साल 16 यौम थी। आपकी उम्र 39 साल थी।

आप बड़े बहादुर , अक़्लमन्द , मुस्तइद , मुस्तक़िल मिजाज़ , ख़ुश ख़ुल्क़ , अदीब लबीब , शायर ,मुक़र्रि , बलीग़ और निहायत मुन्तिज़म थे। आप पहले से सोचे बग़ैर ख़ुत्बा शुरू करते थे और दरिया की रवानी की तरह बयान करते चले जाते थे। आपका ऐसी हालत में बादशाह होतना कि अबू यज़ीद की बग़ावत से तमाम मुल्क में ग़दर मचा हुआ था , साहिले बहर के चन्दक़ेला बन्द शहरों और महदिया (पाए तख़्त) के सिवा कुछ भी क़ब्ज़े में न रह गया था। इन्दलिस के उमवी ख़लीफ़ा नासिर ने मग़रिबे अक़्सा पर क़ब्ज़ा कर लिया था। सलतनत का संभालना और अपने तमाम आबाई मुल्कों पर दोबारह क़ब्ज़ा कर लेना उन्ही का काम था। आपने बादशाह होते ही अबू यज़ीद से ऐसी जंग की कि वह बद हवास हो कर भागा। रबीउल अव्वल 335 हिजरी में उन्होंने अबू यज़ीद का तअक़्कु़ब किया और उसे दबाते चले गए। जंगल बियाबान चले गए , पहाड़ , वादी और दलदलों की कुछ परवाह न की , यहां तक कि उसके पीछे ‘‘ बिलासौदान ’’ के ऐसे वीराने में पहुँचे जहां पानी की एक मश्क एक अशरफ़ी को मिलती थी। ग़रज़ कि सख़्त लड़ाई के बाद अबू यज़ीद मारा गया।

साहेबे अख़्बार अल हक़ाएक़ लिखते हैं कि अबू यज़ीद मुलहद था। ख़ुदा ने उसके शर से अहले मग़रिब को निजात दिया दी। वह बहुत बड़ा ज़ालिम था। इसी बादशाहे मन्सूर ने ब मुक़ाम ‘‘ फ़तेह ’’ मन्सूरिया कि तामीर की और इसके गवर्नर ‘‘ हसन ’’ ने शहर ‘‘ रेओ ’’ के वस्त में मस्जिद बनवाई।

4. जनाबे अबू तमी मोअज़लउद्दीन अल्लाह बिन मन्सूर आप 11 रमज़ानुल मुबारक 313 हिजरी में ब मुक़ाम ‘‘ महदिया ’’ पैदा हुए। शव्वाल 341 हिजरी में सलतनत संभाली। 15 रबीउल आखि़र 356 हिजरी को क़ाहेरा में वफ़ात पाई। 23 साल 6 माह हुकूमत की , 45 साल 7 माह आपकी उम्र थी।

आप निहायत ज़ैरिक और बाहोश बादशाह थे। मुख़ालिफ़ों ने भी आपको बादशाह दाना , मुस्तइद , बहादुर , सख़ी , मुनसिफ़ , आदिल , करीमउल एख़लाक़ , साइन्स व फ़लसफ़े में माहिर , उलूम व फ़नून का बड़ा मुरब्बी , साहेबे अराए अमूर मम्लेकत से आगाह , इल्मे नुजूम व हय्यत का शाएक़ व माहिर लिखा है।

उलूम व फ़ुनून की क़द्र दानी के लेहाज़ से बाज़ मोवर्रेख़ों ने उन्हें मग़रिब का ‘‘ मामून ’’ लिखा है। माअज़ के अहदे हुकूमत में शुमाली अफ़रीक़ा ने आला दर्जे की तहज़ीब और खु़श हाली हासिल की। लोग फ़ारिग़ुल बाली और ख़ुश हाली में बसर करते थे। बादशाह ने मुल्क के अन्दरूनी फ़साद और हंगामें सख़्ती से फ़रो किए। इन्तेज़ाम असली उसूल की बुनियाद पर क़ाएम किया। तमाम कामों के वास्ते क़वाएद व ज़वाबित मुरत्तिब किए। अमन क़ाएम रखने के लिये फ़ौज के साथ मलेशिया भी क़रार दिया। फ़ौज और बेड़े को अज़सरे नव तरतीब दिया और तिजारत व सनत व हिरफ़त को भी पूरा फ़रोग़ दिया।

मुवर्रिख़ इब्ने ख़ल्दून ने लिखा है कि ‘‘ चूंकि मोइज़उद्दीन अल्लाह नरम मिजाज़ और रहम दिल थे और ख़ुदा ने एक अजीब व ग़रीब शऊर व लियाक़त इनको अता की थी। वह सरदार भी जो उनके आबाओ अजदाद के ख़ून के प्यासे थे वह चाहे दिल से ना हों लेकिन बा ज़ाहिर उस पर जान देते थे। माअज़ उनके साथ अच्छा बरताव करता था। ’’(तारीख़े इस्लाम मिस्टर ज़ाकिर हुसैन पृष्ठ 116 )

मुवर्रिख़ अब्बासी लिखते हैं सलतनत ने इसके ज़माने में ऊरूज पकड़ा। मिस्र , इस्कन्दरिया , मक्का और मदीना तमाम मुक़ामात अब्बासियों के तसर्रूफ़ से निकल कर उसकी सलतनत में शामिल हुए। शाम पर भी इसका दख़ल हो गया। क़ाहेरा इसका आबाद किया हुआ शहर अब तक मिस्र का दारूल ख़ेलाफ़ा है। इस बादशाह ने मिस्र को अपना दारूल ख़ेलाफ़ा क़रार दिया और फिर बराबर सलतनते इस्माईला का यही दारूल ख़ेलाफ़ा रहा।(तारीख़े इस्लाम पृष्ठ 464 ) इन्दलस के उमवी ख़लीफ़ा ‘‘ नासिरउद्दीन अल्लाह ’’ ने एक ऐसा बड़ा तिजारती जहाज़ बनवाया कि इस वक़्त तक दुनियां कि किसी सलतनत ने इतना बड़ा जहाज़ तैय्यार नहीं किया था। इस जहाज़ ने ‘‘ माअज़ुद्दीनउल्लाह ’’ के जहाज़ को लूट लिया तो आपने एक ज़बर दस्त बेड़ा तैय्यार करा के इन्दलिस पर हमला करने की ग़र्ज़ से रवाना कर दिया। उस बेड़े ने ‘‘ मरयह ’’ की लंगर गाह में घुस कर तमाम जहाज़ों को फ़ूंक दिया। पहले जहाज़ को गिरफ़्तार कर लिया और ख़ुश्की में उतार कर क़त्ल व ग़ारत गरी का बाज़ार गरम कर दिया और बहुत कुछ माले ग़नीमत ले कर वापस पलटा। इसके बाद भी यह उमवी और फ़ात्मी बादशाह आपस में लड़ कर आपनी क़ुव्वत ज़ाया करते रहे , वरना ऐसे ज़बर दस्त थे कि अगर इनमे इत्तेहाद होता तो इस वक़्त तमाम यूरोप को फ़तेह कर लेना कोई बड़ी बात न थी। 347 हिजरी के ख़त्म होते होते हुदूदे मिस्र से साहिल बहर उक़यानूस तक फिर तमाम ममालिक पर फ़ात्मी ख़लीफ़ा का क़ब्जा़ हो गया। 352 हिजरी में रूमियों से सख़्त लड़ाई हुई। मुसलमानों ने फ़तेह पाई और बहुत से रूमी गिरफ़्तार कर लिये गए। 351 हिजरी से 352 तक जज़ीरा ए सक़लिया से रूमियों की सलतनत बिल्कुल नीस्त व नाबूद कर दी गई। 359 हिजरी में यूरोप की फ़ौजों ने जुनूबी इटली के मुसलमानों पर चढ़ाई की मगर सब कोशिश बेसूद साबित हुईं। 357 हिजरी में अहले मिस्र की दरख़्वास्त पर इनकी फ़रियाद रसी करने के लिये ‘‘ अबू अल हसन जौहर ’’ को एक लाख से ज़्यादा सवार और बारह सौ से ज़्यादा माल के सन्दूक़ दे कर मिस्र की तरफ़ रवाना कर दिया। जौहर को पूरी कामयाबी नसीब हुई। ‘‘ शहर क़ाहिरया माज़िया ’’ को आबाद करके दारूल हुकूमत बना दिया। मिस्र से अब्बासियों का सिक्का और ख़ुत्बा मौकूफ़ कर के माजलदैन उल्लाह के नाम का सिक्का व ख़ुत्बा जारी किया। ‘‘ नमाज़ में हय्या अला ख़ैरिल अमल ’’ फिर से जारी किया गया नमाज़ में ‘‘ बिस्मिल्लिाह हिर्ररहमान निर्रहीम ’’ बा आवाज़े बुलन्द पढ़ने लगा और और ख़ुत्बे के बाद ‘‘ अल्लाह हुम्मा सल्ले अला मोहम्मदे मुस्तफ़ा (स अ व व ) व अला अली मुर्तुज़ा (अ.स.) व अला फ़ातेमतुल बुतूल (अ.स.) व अला अल हसन (अ.स.) व अल हुसैन (अ.स.) सिब्ते रसूल अल लज़ी अजहब अनल्लाहा अन्हुम रिजस व तहर हुम्मा ततहीरा व सल्लेअला आइम्मतुत ताहेरीन अबनाआ अमीरल मोमेनीन अलख़ ’’ पढ़ा जाने लगा और अहले बैत (अ.स.) के फ़ज़ाएल बयान होने लगे। इसके बाद जौहर ने बादशाह के हुक्म से ‘‘ जामए अज़हर ’’ तामीर की जो इस वक़्त अहले इस्लाम की सब से बड़ी यूनीवर्सीटी है। 364 हिजरी में ‘‘ ईदे ग़दीर ’’ मिस्र में पहली बार कमाले शान व शौकत से मनाई गई।

जौहर ने मिस्र फ़तेह करने के बाद शाम फ़तेह कर लिया और अब्बासियों का ख़ुत्बा मौकूफ़ करके फ़ात्मी बादशाह का ख़ुत्बा जारी कर दिया। 363 हिजरी में मक्का और मदीना में भी माअज़ के नाम का ख़ुत्बा मुस्तक़िल तौर पर जारी हो गया।

मुवर्रिख़ हबीब उस सियर ने लिखा है कि माअज़ ने ऐसी अदालत और सख़ावत के साथ सलतनत की कि इससे ज़्यादा ख़्याल में नहीं आ सकती। पन्द्रह हज़ार ऊँट और दस हज़ार ख़च्चर ज़र से लदे हुए अफ्रीक़ा से क़ाहेरा ले कर आए। उन्होंने ख़ज़ान्ची को हुक्म दे रखा था कि वह हर रोज़ चन्द सन्दूक़ पुर ज़र दरबार में ला कर रखे। चुनान्चे वह ऐसा ही करता रहा। बादशाह का हुक्म था कि हर मोहताज एक मुठ्ठी ज़र उस में से ले ले। मक़रयज़ी ने लिखा है कि माज़ का ख़ुत्बा तमाम ममालिके मग़रिब , मिस्र , शाम , हेजाज़ और बाज़ एराक़ के ईलाक़ों में पढ़ा जाता था।

5. जनाबे अबू मन्सूर नज़ार अज़ीज़ बिल्लाह बिन माअज़ आप 14 मोहर्रमुल हराम को महदिया में पैदा हुए। 15 रबीउस्सानी 365 हिजरी में तख़्त नशीं हुए और 28 रमज़ान 386 हिजरी में इन्तेक़ाल कर गए। आपकी सलतनत की मुद्दत 21 साल 5 -6 माह और आपकी उम्र 42 साल 8- 9 माह थी।

आप जवाद , करीम , शुजा , अक़ील , हलीम , साबिर , ख़ुश इख़्लाक़ और कसीरूल अफ़ू थे। दुशमन पर रहम करते थे और उसे माल व ज़र देते थे। आप आलिम व फ़ाज़िल और ज़बर दस्त अदीब व शायर थे। आपके एक फ़रज़न्द का ईद के दिन इन्तेक़ाल हो गया तो आपने चन्द अशआर कहे। जिनमें से वाज़े किया कि आले मोहम्मद (अ.स.) हमेशा मसाएब में मुब्तिला रहे हैं। लोगों की ईदें ख़ुशी में गुज़रती हैं और हमारी ईद मातम में।(यतीमुल अल दहर सालबी) आपको इमारतों की तामीर का बड़ा शौक़ था। मिस्र में बहुत सी इमारतें आपकी यादगार हैं। आपके अहद में हमस , हमात , शैहज़र और हलब फ़तेह हो कर फ़ात्मी सलतनत में शामिल हुए। मूसल , मदाएन , कूफ़ा , अन्बार वग़ैरह में आपके नाम का ख़ुत्बा और सिक्का जारी हुआ। यमन मे भी आपके नाम का ख़ुत्बा पढ़ा गया। आपके अहद में फ़ात्मी सलतनत दरिया ए फ़ुरात के किनारे बहरे ज़ुल्मात तक फ़ैली हुई थी और अरब का तमाम मग़रबी हिस्सा मिन्तहा ए यमन तक उसमें शामिल था। इन्देलिस से बनी उमय्या ने जो बाज़ इलाक़े मग़रिब अक़सा के दबा लिये थे आपने इन सब को वापिस ले लिया और 371 हिजरी में इससे सब लोगों को बरतरफ़ कर दिया। अजदुद दौला विलाबू यही से आपने दोस्ताना मरास्लत जारी थी। आपने 386 हिजरी में वफ़ात पाई जिससे फ़ात्मी ख़ुलफ़ा की अज़मत व शौकत को बड़ा नुकसान पहुँचा। मोर्वेख़ीन ने लिखा है कि इस बादशाह के अहद में लोगों के दिन ईद और रात शबे बारात की तरह गुज़र रहे थे।

6. अबू अली मन्सूर हाकिम ब अमर अल्लाह बिन अज़ीज़ आप 23 रबीउल अव्वल 375 हिजरी को क़ाहेरा में पैदा हुए। 28 रमज़ान 386 हिजरी को तख़्त नशीन हुए। 27 शव्वाल 411 हिजरी को इन्तेक़ाल फ़रमाया। 25 साल 29 दिन तक सलतनत की और 36 साल 7 माह की उम्र पाई। आप 11 साल की उम्र में बादशाह हुए। मुवर्रिख़ अब्बासी ने लिखा है कि यह बड़ा मुतशर्रह बादशाह था। उसने औरतों के लिये पर्दे में सख़्ती की , मुस्करात की ख़रीद फ़रोख़्त बन्द की। उसके वक़्त मे इन्तेज़ामें शहर भी अच्छा था। क़ाहेरा में मस्जिदे अज़हर इसी ने बनवाई।(तारीख़े इस्लाम पृष्ठ 425 ) इब्ने जूलाक़ ने लिखा है कि ख़लीफ़ा हाकिम सख़ी , शुजा , मुनसिफ़ , आलिम और साहेबे करामत था। साहेबे हबीब उस सियर ने लिखा है कि बादशाह आदिल और ख़ुदा तरस था। उसने मदरसे बनवाए। उनके लिये जागीर वक़्फ़ की और उनमें आलिम व फ़क़ीह मुक़र्रर किए। हुक्म था कि ख़लीफ़ा के वास्ते ज़मीन बोसी न की जाए। न सलाम के वक़्त हाथ चूमा जाए। आम इजाज़त थी कि जिसका दिल चाहे बादशाह से मिल कर बराहे रास्त शिकायत पेश करे।

यह ख़लीफ़ा आला दर्जे का हैसियत दां था इसकी किताब चार जिल्दों में थी। 27 शव्वाल 411 हिजरी में एक पहाड़ पर किसी दुश्मन ने तन्हा पाकर हलाक कर दिया। मिस्टर अमीर अली ने लिखा है कि हाकिम बड़ी फ़य्याज़ी तन्देही से इल्म और साईंस की तरक़्क़ी में कोशिश करते थे। शाम और मिस्र में उन्होंने बहुत सी मस्जिदे , कालिज और रसद ख़ाने तामीर कराए।

7. जनाबे अबू अल हसन अली ज़ाहिर ला अज़ाज़ दीन अल्लाह बिन हाकिम आप 10 रमज़ान 395 हिजरी बमुक़ाम क़ाहेरा पैदा हुए। 4 ज़ीक़ाद 411 हिजरी को तख़्त नशीन हुए। 15 शाबान 427 हिजरी को फ़ौत हुए। 15 साल 10 माह सलतनत की और 22 साल की उम्र पाई।

मुवर्रिख़ अब्बासी लिखते हैं कि यह बादशाह बड़ा नेक नाम था। इसकी नेक नामी सुन कर अमाएद ख़ुरासानी हज कर के फिरे , तो मिस्र होते हुए आए और वहां से खि़लअत लाए। महमूद सुबूक़तग़ीन को इसकी ख़बर लग गई , उसने फ़ौरन ख़लीफ़ा को बग़दाद मुत्तिला किया। हुज्जाज मिस्र से आ कर अभी बग़दाद पहुँचे ही थे कि ख़लीफ़ा ने उनसे बाज़ पुर्स की और उनकी खि़लअत जला दिए। इससे मालूम होता है कि महमूद को भी फ़ात्मी ख़ुलफ़ा से ख़ौफ़ था और यहीं से यह भी मालूम होता है कि दयालमा मुलूक ग़ज़नी सलजूक़ी वग़ैरा सब ख़ुलफ़ा बग़दाद की ख़ातिर इस लिये भी करते थे कि फ़ात्मी ख़ुलफ़ा से दूबदू मुक़ाबेला करने को मसालेहत के खि़लाफ़ जानते थे। सलातीन अलवी को ज़ोरे बाज़ू के अलावा वह जो इज़्ज़ते ख़ासो आम नज़रों में हासिल थी वह इन ग़ैर क़रशी अल नस्ल सलातीन के लिये बहुत ज़्यादा परेशान कुन थी।(तारीख़े इस्लाम पृष्ठ 425 )

आपने इस्माईल मज़हब को कमाले रौनक़ के साथ रवाज दिया। 418 हिजरी में क़ैसर से सुलह हुई और उसने अपने मुल्म में जनाब ज़ाहिर का ख़ुत्बा पढ़ने की मुसलमानों इजाज़त दे दी। कु़स्तुनतुनया में मस्जिद बनाई गई और इसमें मोअजि़्ज़न मुक़र्रर किया गया।

साहेबे हबीब उस सैर लिखते हैं कि आप अपने आबाओ अजदाद की तरह मुनसिफ़ और नेक सीरत थे , साहब रौज़तुस अल पृष्ठ का बयान है कि जनाबे ज़ाहिर की फ़रते सियासत और कमाले कयासत की वजह से तमाम फ़ितने फ़रो हो गए और दीन दुनियां के उमूर मुस्तक़ीम हो गए लेकिन आप ही के अहद से फ़ात्मी सलतनत का इनहेतात(ज़वाल) शुरू हो गया।

8. जनाबे अबू तमीम माअद मुस्तनसिर ब अम्र अल्लाह बिन ज़ाहिर आप जमादिउस्सानी 420 हिजरी में बामुक़ाम क़ाहेरा पैदा हुए। 15 शाबान 427 हिजरी में तख़्त नशीनी अमल में आई। 18 ज़िलहिज को आप की वफ़ात हुई। 60 साल 4 माह हुकूमत कर के 67 साल की उम्र में दुनियां से रेहलत की।

मुवर्रिख़ अब्बासी लिखते हैं कि क़ायम बिल्लाह अब्बासी ने वाली ए अफ़रीक़ा से साज़िश कर के उनको नुक़सान पहुँचाना चाहा लेकिन इसकी हिकमत कारगर न हुई और इसके बदले में मुसतनसर के इशारे से ‘‘ बसासीरी ’’ ने क़ाएम को बग़दाद में क़ैद कर के साल भर तक मुस्तनसर का नाम बग़दाद के ख़ुत्बे में क़ायम रखा। मुसतनसर के अहद में अब्बासियों का ख़ातमा हो जाता लेकिन तोग़रल बेग ने आ कर ‘‘ बसा सैरी ’’ को मग़लूब कर दिया और क़ायम बिल्लाह को बड़े एज़ाज़ के साथ फिर तख़्त पर बिठा दिया इसी सुलोह में अपने लिये रूकनुकदीन का खि़ताब हासिल किया।(तारीख़े इस्लाम पृष्ठ 426 ) 479 हिजरी में ‘‘ हसन बिन सबाह ’’ जो बाद में नजरिया इस्माईलीयों के पेशवा हुए , ताजिरो के लिबास में मुसतनसर के पास आए। सात साल तक मिस्र में रहे फिर मुसतनसर की तरफ़ से ख़ुरासान व बिलादे अजम दाई मुक़र्रर हुए। हसन ने पहले मख़्फ़ी तौर पर फिर एलानिया बिलादे अजम में इस्माईली दावत फ़ैलाना शुरू कर दी और क़िलों पर क़ब्ज़ा कर के हुकूमत क़ायम कर ली। रूख़्सत होते वक़्त उन्होंने मुस्तनसर से पूछा था कि आपके बाद मेरा इमाम कौन है ? मुसतनसर ने अपने साहबज़ादे नजा़र को बताया था। जनाबे मुसतनसर के तीन बेटे थे। 1. नज़ार , 2. अहमद मुस्तम्ली , 3. मोहम्मद।

9. जनाबे अबुल क़ासिम अहमद मुस्तम्ली बिल्लाह बिन मुस्तनसर आप 20 शाबान 467 हिजरी को पैदा हुए। 18 ज़िलहिज 487 हिजरी को बादशाह क़रार पाये। 17 सफ़र 495 हिजरी को 28 साल की उम्र में वफ़ात पाई मुद्दते सलतनत 7 साल 3 माह थी।

अगर चे जनाबे मुस्तन्सिर ब अमरे अल्लाह अपनी ज़िन्दगी में अपने बड़े बेटे जनाबे नज़ार को वली अहद मुक़र्रर किया था मगर वज़ीरे आज़म अफ़़ज़ल में और उनमें आपसी दुश्मनी थी इस लिये अफ़ज़ल ने नज़ार को हटा कर जनाबे अहमद को मुस्तम्ली के लक़ब से ख़लीफ़ा बना दिया। जनाबे नज़ार और अफ़ज़ल में जंग छिड़ गई। बिल आखि़र नज़ार गिरफ़्तार हो कर मुस्तमली के हवाले कर दिये गये। नज़ारी इस्माईली कहते हैं कि जनाबे नज़ार के फ़रज़न्द हादी क़ैद से निकल कर बिलादे अजम में चले गये थे और यहां जनाबे हादी से ‘‘ अल मौत ’’ के इस्माईली इमाम पैदा हुए। उस वक़्त से इस्माईलियों के दो फ़िरक़े हो गये। एक नज़ार , यह जो जनाबे नज़ार और उनकी औलाद को इमामे बरहक़ मानता है वह हसन बिन सियाह के मुक़ल्लिद और हिन्द पाक के आग़ा ख़ानी ख़ोजे हैं। दूसरी वह जो मुस्तमली और उनकी औलाद को इमामे बरहक़ मानते हैं और मस्त अलविया कहलाते हैं। वह शिया बोहरे हैं।

10. अबू अली मन्सूर अम्र बा अहकाम अल्लाह बिन मुस्तमली आप 13 मोहर्रमुल हराम 490 हिजरी मुताबिक़ 1096 ई 0 को पैदा हुए। 17 सफ़र 495 हिजरी को तख़्त नशीन हुए और 29 साल 8 माह हुकूमत कर के 34 साल की उम्र में 3 ज़ीक़ाद 524 हिजरी को वफ़ात पा गये। मुवर्रिख़ अब्बासी लिखते हैं कि इसके अहद में शिमाली ईसाई से बड़ी लड़ाई हुई और मुसलमान ग़ालिब आये। इन शिमाली ईसाईयों को अहले फ़िरंग लिखते हैं कि इस वक़्त में शाम में एक ख़ानदान नज़ारिया नाम का साहेबे हुकूमत हुआ और चंद मुल्क अलवियों के इस ख़ानदान के क़ब्ज़े में आ गया। इसकी कोई औलाद न थी इस लिये अपने चचा हाफ़िज़ को उसने वली अहद मुक़र्रर किया।(तारीख़े इस्लाम पृष्ठ 426 ) आपने जवान हो कर वज़ीरे आज़म अफ़ज़ल को क़त्ल कर दिया। आप करीम और जवाद थे , आपके ज़माने में आपकी और आपके मुताअल्लेक़ीन की कसरते जूदो अता से लोग कमाल ऐश व इत्मेनान में बसर करते थे। मिस्र में कोई शख़्स ज़माने या इफ़लास का शाकी नहीं मिलता था। आप हाफ़िज़े क़ुरआन भी थे। नज़ारिया फ़िरक़े के लोग मुस्तअलीयों और उनके इमामों से सख़्त दुश्मनी रखते थे और मुद्दत से जनाबे आमिर की ताक में थे। एक दिन 425 हिजरी में आपको हलाक कर दिया। मस्तअलीयों (बोहरों) का एतेक़ाद है कि जनाबे अम्र ने 2 साल चन्द माह के एक साहब ज़ादे अबुल क़ासिम तय्यब को छोड़ कर इन्तेक़ाल कियाा और अपने चचा ज़ाद भाई अब्दुल मजीद मम्यून बिन अबील क़ासिम मुस्तन्सिर को हाफ़िजु़द्दीन अल्लाह के लक़ब से उनका निगरां मुक़र्रर किया था कि खि़लाफ़ते ज़ाहेरिया का इन्तेज़ाम करें और जब तय्यब लायक़ हो जाय तो खि़लाफ़त उनके सिपुर्द कर दें मगर दो साल के बाद हाफ़िज़ ख़ुद ख़लीफ़ा बन गए और जनाबे तय्यब ने रूपोशी इख़्तेयार कर ली। इस अम्र की ख़बर पहले से इमाम अम्र ने अपने अकाबिर ‘‘ दाअता ’’ को दे दी थी और हुक्म दिया था कि शम्से इमामत के सतर में जाने का वक़्त आ गया है। जब हाफ़िज़ की नज़र में फ़र्क़ देखो उसी वक़्त मेरे फ़रज़न्द को ले कर रूपोशी इख़्तेयार करना और ऐसा ही हुआ। अब बोहरे हज़रात उन इमाम तय्यब की नस्ल दर नस्ल इमाम का हर ज़माने में वजूद होना वाजिब जानते हैं और यही उनका एतेक़ाद है।(तारीख़े इस्लाम मिस्टर ज़ाकिर हुसैन जिल्द 1 पृष्ठ 126 )

10. जनाबे अब्दुल मजीद मम्यून हाफ़िज़उद्दीन अल्लाह आप मोहर्रम 467 हिजरी में पैदा हुए। तीन ज़िक़ाद 524 हिजरी को तख़्त नशीन हुए और 19 साल 7 माह हुकूमत कर के 77 साल की उम्र में 5 जमादिल आखि़र 544 हिजरी को इन्तेक़ाल कर गये। आप नज़र बन्दी में बसर करते थे। आपका वज़ीर अहमद कुल उमूरे सलतनत पर हावी था यह अज़ीम अशना अशरी था और ब रवायत किरमानी हाफ़िज़ ने भी मज़हबे इसना अशअरी का इज़हार कर दिया था। वज़ीर अहमद ने बारहवें इमाम मोहम्मद मेहदी (अ.स.) के नाम का सिक्का और कुत्बा भी जारी कर दिया था। 15 मोहर्रम 526 हिजरी को वज़ीर अहमद क़त्ल कर दिया गया और 544 हिजरी में जनाबे हाफ़िज़ का इन्तेक़ाल हो गया। आपकी तमाम उम्र वज़ीरों की हुकूमत में गुज़री जो वह चाहते करा लेते। मक़रेज़ी ने लिखा है कि हाफ़िज़ मुदब्बिर , सियासत दां , कसीरूल मुदारात आरिफ़ और इल्मे नजूम में शाएक़ थे। आप पर हिल्म ग़ालिब था। आपको दर्दे कूलजं की शिकायत रहती थी। आपके तबीब ने एक तबल बन वाया था जिसकी आवाज़ से उन्हें फ़ाएदा पहुँचा था। हाफ़िज़ के बाद आपकी हस्बे वसीअत आपके बेटे ‘‘ अबू मन्सूर इस्माईल ’’ बादशाह हुए।

12. जनाबे अबू मन्सूर इस्माईल ज़फ़र बाअम्रअल्लाह बिन हाफ़िज़ आप 5 रबीउस्सानी 527 हिजरी को पैदा हुए और 5 जमादिउस्सानी 544 हिजरी को तख़्त नशीन हुए और 4 साल 7 माह हुकूमत कर के 21 साल 9 माह की उम्र में 15 मोहर्रमुल हराम 549 हिजरी को इन्तेक़ाल कर गए। आप ज़माना हुकूमत में बेबस थे। वज़ीर बादशाही करते थे। बग़ावतें , रक़ाबतें साज़िशें और फ़िरक़ा बंदियां फ़ैल गईं थी। मोहर्रम 549 हिजरी में आप क़त्ल कर दिये गए।

13. जनाबे अबू अल क़ासिम ईसा फ़ाएज़ ब नस्रअल्लाह बिन जा़फ़र आप 21 मोहर्रम 544 हिजरी में पैदा हुए। 15 मोहर्रम 549 हिजरी को तख़्त नशीन हुए और 6 साल 6 माह बराए नाम हुकूमत कर के 11 साल 6 माह की उम्र में 15 रजब 555 हिजरी को इन्तेक़ाल कर गए।

मुवर्रिख़ अब्बासी लिखते हैं कि अहले फ़िरंग से इसके वक़्त में भी लड़ाई रही। बेलादे ग़रबी पर अहले फ़िरंग का जो क़ब्ज़ा हो चुका था वह मुसतहकम हुआ और कुछ हिस्सा मुल्क उसने वापस भी ले लिया।(तारीख़े इस्लाम पृष्ठ 427 ) आप तमाम उम्र मर्ज़ सरह में मुब्तिला रहे।

सालेह बिन ज़ैरिक उनका वज़ीर था जो उस अहद में दर अस्ल बादशाही करता रहा था। वह बड़ा फ़ाज़िल सख़ी था और अहले इल्म से बड़ी मोहब्बत करता था। कातिब , अदीब और आला दर्जे का शायर था। अज़रूए फ़ज़ल व अक़ल व सियासत व ततबीर अपने ज़माने का सब से बड़ा शख़्स था। शकल में रोब दार सितवत में अज़ीम था। नीज़ बड़ा पक्का असना अशअरी था। खि़लाफ़ते जनाबे अमीर में ज़बर दस्त किताब लिखी। लोगों से मनाज़रे किए। वज़ीर होते ही शिया मज़हब का इज़हार किया। नेहायत ख़ूबी से हुकूमत की। आखि़र उम्र तक फ़िरंगियों से लड़ता रहा। तमाम मुमालिक के अहले इल्म इसके पास आते दुरे मक़सूद से दामन भर कर वापस जाते थे।

अल्लामा मक़रेज़ी(अलख़त्त जिल्द 4 पृष्ठ 81 ) में लिखा है कि सालेह बिन ज़ैरिक अरमनी क़ौम के अस्ना अशरी मज़हब का एक फ़कीर था। एक दिन ज़्यारते रौज़तुल अमीरल मोमेनीन (अ.स.) के लिये नजफ़े अशरफ़ गया। हज़रत ने उसी शब रौज़े के ख़ादिम ‘‘ सय्यद इब्ने मासूम ’’ से ख़्वाब में फ़रमाया कि तलाया बिन ज़रीक हमारे महबूबों में से हैं उससे कह दो कि वह मिस्र चला जाए। मैंने उसे मिस्र का वाली बना दिया है। सय्यद ने तलाए को बुला कर ख़्वाब बयान किया वह फ़ौरन मिस्र पहुँच कर सल्तनत का मुलाज़िम हो गया। फिर चन्द दिनों में मिस्र का बादशाह हो गया। इसका असली नाम तलाया बिन जै़रिक था। मिस्र में कारे नुमाया करने की वजह से इसका खि़ताब ‘‘ मलक सालेह ’’ हो गया।

(मोअल्लिफ़) मैं कहता हूँ कि मक़रेज़ी के इस बयान से सय्यद इस्माईल शहीद देहलवी के इस बयान की ताईद होती है जिसमें उन्होंने कहा है कि ‘‘ दुनियां के तमाम बादशाहों का तक़ररूर और तनज़्ज़ुल अली इब्ने अबी तालिब (अ.स.) करते हैं ’’ मुलाहेज़ा हो मौसूफ़ की किताब ‘‘ सिरातल मुस्तक़ीम ’’

14. अबू मोहम्मद अल्लाह आज़लुद्दीन अल्लाह बिन युसूफ़ बिन हाफ़िज़ आप 20 मोहर्रमुल हराम 546 हिजरी मुताबिक़ 1151 को पैदा हुए। 17 रजब 555 हिजरी को तख़्त नशीन हुए और 11 साल 6 माह बराए नाम हुकूमत की और 21 साल की उम्र में 10 मोहर्रमुल हराम 567 हिजरी में इन्तेक़ाल कर गए।

मुवर्रिख़ अब्बासी लिखते हैं कि इसके अहद में अहले फ़िरंग साहिल शरक़ी व ग़रबी से आते आते मिस्र तक पहुँच गए और मिस्र पर क़ाबिज़ हो गए। ग़ैर मुसलमानों का मिस्र पर क़ाबिज़ होना ‘‘ नूरूद्दीन मोहम्मद ’’ वाली शाम को बहुत गराँ गुज़रा। उसने मिसरियों की मद्द के लिये फ़ौज भेजी जो अहले फ़िरंग पर ग़ालिब आई। शामियों ने अहले फ़िरंग को निकाल बाहर कर दिया लेकिन ख़ुत्बे में आज़िद के बजाए ‘‘ मस्तज़ी बाअल्लाह ’’ अब्बासी का नाम दाखि़ल कर दिया। इसी ज़माने में ‘‘ आज़िद ’’ भी मर गया और इसके साथ ही सलातीने अलविया इस्माईल का ख़ात्मा हो गया और बनू मेहदी का नाम मिट गया।(तारीख़े इस्लाम पृष्ठ 427 )

आप 10 साल की उम्र में ख़लीफ़ा हुए। सालेह ने अपनी बेटी उनसे ब्याह दी और सालेह तमाम उमूरे सलतनत पर हावी रहा। मगर 19 रमज़ान 556 हिजरी को बेचारा क़त्ल कर दिया गया। ख़लीफ़ा ए आज़द ने उसकी वफ़ात के बाद अहले सुन्नत से एक शख़्स ‘‘ सलाहुद्दीन यूसुफ़ ’’ को वज़ीर बना लिया। उसने बेवफ़ाई की और तमाम उमूरे सलतनत पर हावी हो कर ख़लीफ़ा को बे दख़ल कर दिया और शिया क़ाज़ियों को माज़ूल कर तमाम मुल्क में शाफ़ई क़ाज़ी मुक़र्रर किए। इस वक़्त से मुल्के मिस्र में मज़हबे शिया ख़त्म होने लगा और मज़हबे मालकी और शाफ़ई ज़ोर पकड़ने लगा। मोहर्रम 567 हिजरी में सलाहुद्दीन ने ख़लीफ़ा ए आज़द ख़ुत्बा भी मिस्र से बन्द कर के मुस्तज़ी अब्बासी का ख़ुत्बा जारी कर दिया। ख़लीफ़ा आज़िदउद्दीन अल्लाह ने आशूर मोहर्रम 567 हिजरी को इन्तेक़ाल किया। आपकी वफ़ात से सलतनते फ़ात्मीन का सितारा जो मुमालिके अफ़रीक़ा व मिस्र में 270 साल से चमक रहा था बिल्कुल ग़ुरूब हो गया।

फ़ात्मी ख़ुलफ़ा के अहद में जो बरकतें मिस्र को नसीब हुई वह किसी बादशाह के अहद में नहीं हुए। उलूम फ़नून तिजारत व हिरफ़त सबको कमाले तरक़्क़ी हुई। शफ़ाख़ाने , मदरसे , मस्जिदें और रेफ़ाह आम की दूसरी बेशुमार इमारतें और औक़ाफ़ा मुद्दतों यादगार हैं। ‘‘ शिया युनीवर्सिटी ’’ जामए अज़हर इसी अहद की रहती दुनियां तक के लिये यादगार है। एक लाख तीस हज़ार किस्म की 16 लाख किताबों का कुतुब ख़ाना इसी अहद में मुरत्तब हुआ था। जामा मस्जिदें बनवाईं गईं थी। 1. जामा अज़हर , 2. जामा माज़िया , 3. जामा नूर , 4. जामा हाकिम जो अपनी शान व शौकत के लिहाज़ से बड़ी पुर अज़मत थी। उन्हीं के अहद में क़ाहेरा की ख़ास इमारत हुसैनिया (इमाम बाड़ा) थी जिसमें अय्यामे अज़ा में मजालिस मुनअक़िद की जाती थीं जिनमें बादशाह और रेआया सब शरीक होते थे।(तारीख़े इस्लाम मिस्टर ज़ाकिर हुसैन जिल्द 1 पृष्ठ 133 )

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1. यह अम्र क़ाबिले ज़िक्र है कि खि़लाफ़ते फ़ात्मीया के ख़त्म होते ही जामए अज़हर में शियों का दाख़ला ममनूआ क़रार दे दिया गया था जिसका सिलसिला अब तक बाक़ी रहा लेकिन अहदे जमाल अब्दुल नासिर में डा 0 शलतूत ने इस मुमानियत को ख़त्म करके शिया फ़िक़ह की किताबें शरहे लुमआ व तब्सेरतूल मुतालेमीन को दाखि़ले निसाब कर दिया।

अल ईज़ा इमाम शरक़ावी लिखते हैं कि ख़ुल्फ़ा ए बनी उमय्या 14 ख़ुलफ़ा ए बनी अब्बास 37 और ख़ुल्फ़ा ए बनी फ़ात्मा 15 थे और वह यह भी लिखते हैं कि फ़ात्मी ख़ुल्फ़ा में 650 हिजरी तक खि़लाफ़र रही ‘‘ काना यज़अन बक़ाए हाफ़ेहुम ऐला अन यस मूहालम हुदा फिल आखि़रूज़ ज़मान ’’ वह यह गुमान करते थे कि यह हुकूमत उन्हीं में उस वक़्त तक रहेगी जब तक ज़हुरे क़ायमे आले मोहम्मद न होगा। उनके ज़हुर के बाद उसे उनके सिपुर्द कर देगें।(तोहफ़तुल नाज़ेरीन बर हाशिया फ़तूह अल शाह वाक़दी जिल्द 1 पृष्ठ 118 प्रकाशित मिस्र 1386 हिजरी) मेरी नज़दीक इमाम शरक़ावी का ख़ुल्फ़ा ए बनी फ़ात्मा की तादाद 15 बताना दुरूस्त नहीं है। तमाम कुतुबे मुतबरा में 14 ही की तादाद है। मुलाहेज़ा हो नज़रह असना अशअरीया अल्लामा मिर्ज़ा मोहम्मद जिल्द 1 पृष्ठ 213, तारीख़े मज़हिब पृष्ठ 462 प्रकाशित कोएटा व तारीख़े इस्लाम व तरजुमा ए सलातीने इस्लाम लैनिन पोल पृष्ठ 89 प्रकाशित लाहौर)


अबुल हसन हज़रत इमाम मूसा काजि़म अ स

काजि़मे आले मोहम्मद के तहम्मुल पर न जा

हाकिमे ज़ालिम यह जाने हैदरो ज़हरा हैं देख

दौलतो हशमत के नशे में ना इतना सर उठा

ऐ बनी अब्बास के फि़रऔन यह मूसा हैं देख

(साबिर थरयानी ‘‘कराची ’’)

मख़ज़ने जुम्ला फ़ुनून आपका क़ल्बे रौशन

मादने जुम्ला उलूम , आईनए प्रकाशित सलीम

आस्ताने दरे हज़रत का अगर देख ले औज

सूरते चखऱ् पये बोसा , झुके अरर्शे अज़ीम

हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ स . )

पैग़म्बरे इस्लाम रसूले करीम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) के सातवें जांनशीन , हमारे सातवें इमाम और सिलसिलाए अस्मत की नवीं कड़ी हैं। आपके वालिद माजिद हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) थे और आपकी वालदा माजदा जनाबे हमीदा ख़ातून जो बरबर या इन्दलिस की रहने वाली थीं। आपके मुताअल्लिक़ हज़रत इमामे बाक़र (अ.स.) ने इरशाद फ़रमाया है कि आप दुनिया में हमीदा और आख़ेरत में महमूदा हैं।

(शवाहिद अल नबूवत पृष्ठ 186 )

अल्लामा मोहम्मद रज़ा लिखते हैं कि आप साहेबे जमाल कमाल और निहायत दियानत दार थीं।

(जेनातुल ख़ुलूद पृष्ठ 29 )

अल्लामा मजलिसी का कहना है कि वह हर निसवानी आलाईश से पाक थीं।

(जिलाउल उयून पृष्ठ 270 )

अल्लामा शहर आशोब लिखते हैं कि जनाबे हमीदा के वालिद माजिद साएद बसरी थे। हमीदा ख़ातून की कुन्नियत लोलो (मोती) थी।

(मनाकि़ब जिल्द 5 पृष्ठ 76 )

हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) अपने आबाओ अजदाद की तरह इमाम मन्सूस आलमे ज़माना अफ़ज़ले काएनात थे। आप जुमला सिफ़ात हसना से भर पूर थे , आप दुनिया की तमाम ज़बाने जानते और इल्में ग़ैब से आगाह थे। आपके मुताअल्लिक़ इब्ने हजर मक्की लिखते हैं कि हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के इल्म , मारेफ़त कमाल और अफ़ज़लीयत में वारिस व जांनशीन थे। आप दुनिया के आबिदों में से सब से बड़े इबादत गुज़ार सब से बड़े आलिम और सब से बड़े सख़ी थे।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 121 ) और इब्ने तल्हा शाफ़ेई लिखते हैं कि आप बहुत बड़ी इज़्ज़त व क़द्र के मालिक इमाम और इन्तेहाई शान व शौकत के मुजतहिद थे। आपका इजतेहाद में नज़ीर न था। आप इबादत व ताअत में मशहूर ज़माना और करामत में मशहूरे कायनात थे। उन चीज़ों में आपकी कोई मिसाल न मिलती थी। आप सारी रात रूकु व सुजूद और क़याम व क़यूद में गुज़ारते और सारा दिन सदक़ा और रोज़े में बसर करते थे।

(मतालेबुस सुऊल 308 )

अल्लामा शिब्ली लिखते हैं कि आप बहुत बड़ी क़द्र व मंजि़लत के दुनिया में मुन्फ़रिद इमाम और ज़बर दस्त हुज्जते ख़ुदा थे। नमाज़ों की वजह से हमेशा सारी रात जागते थे और दिन भर रोज़ा रखते थे।(अनवारूल अख़्बार पृष्ठ 134 )

अल्लामा इब्ने सबाग़ मालिकी लिखते हैं कि आप अपने ज़माने के लोगों में सब से ज़्यादा आबिद और सब से ज़्यादा इल्म वाले और सब से ज़्यादा सख़ी और बुज़ुर्ग नफ़्स थे।(फ़ुसूल मोहम्मद व अरजहुल मतालिब पृष्ठ 451 )

अल्लामा हुसैन वाएज़ काशफ़ी लिखते हैं कि आप आबिद तरीन अहले ज़माना और करीम तरीन अहले आलिम थे। आपके फ़ज़ाएल व करामात बे शुमार हैं।(रौज़तुल शोहदा पृष्ठ 432 )

किताब रौज़तुल अहबाब में है कि आप व रूए क़द्र मंजि़लत बुज़ुर्ग तरीन अहले आलिम थे और अपने पदरे बुज़ुर्गवार की नस के मुताबिक़ उनके बाद वली अमरे इमामत हुये।

आपकी विलादत ब सआदत

हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) बतारीख़ 7 सफ़रूल मुज़फ़्फ़र 128 हिजरी मुताबिक़ 10 नवम्बर 745 ई0 यौमे शम्बा ब मुक़ाम अबवा जो मक्का व मदीने के बीच वाक़े है पैदा हुए।

(अनवारे नोमानिया पृष्ठ 126 व आलामुल वरा पृष्ठ 171 व जिलाउल उयून पृष्ठ 269 व शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 192 रौज़तुल शौहदा पृष्ठ 436 )

अल्लामा मजलिसी तहरीर फ़रमाते हैं कि पैदा होते ही आपने हाथों को ज़मीन पर टेक कर आसमान की तरफ़ रूख़ किया और कलमाए शहादतैन ज़बान पर जारी फ़रमाया। आपने यह अमल बिलकुल उसी तरह किया जिस तरह हज़रत रसूले ख़ुदा स. ने विलादत के बाद किया था। आपके दाहिने बाज़ू पर ‘‘ कलमाए तम्मत कल्मता रब्बेका सदक़ा व अदलन ’’ लिखा हुआ था। आप इल्मे अव्वलीन व आख़ेरीन से बहरावर मुतावल्लिद हुए थे। आपकी विलादत से हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) को बे हद मसर्रत हुई थी आपने मदीना जा कर अहले मदीना को दावते ताअम दी थी।(जिलाउल उयून पृष्ठ 270 ) आप दीगर आइम्मा की तरह मख़तून और नाफ़ बुरीदा मुतावल्लिद हुये थे।

इस्मे गिरामी कुन्नियत ,अल्क़ाब

आपके वालिदे माजिद हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने ख़ुदा वन्दे आलम के मुअय्यन कर्दा नाम मूसा से मौसूम किया। अल्लामा मोहम्मद रज़ा लिखते हैं कि मूसा क़ब्ती लफ़्ज़ है और ‘‘ मू ’’ और ‘‘ सी ’’ से मुरक्कब है। मू के मानी पानी आर सी के मानी दरख़्त है। इस नाम से सब से पहले हज़रत कलीम अल्लाह मौसूम किये गये थे और इसकी वजह यह थी कि ख़ौफ़े फि़रऔन से मादरे मूसा ने आपको उस सन्दूक़ में रख कर दरिया में बहाया था जो ‘‘हबीब नजार ’’ का बनाया हुआ था और बाद में ताबूते सकीना क़रार पाया तो वह सन्दूक बह कर फि़रऔन और जबाने आसिया तक पानी के ज़रिये से उन दरख़्तों से टकराता हुआ जो ख़ास बाग़ में थे पहुँचा था लेहाज़ा पानी और दरख़्त के सबब से उनका नाम मूसा क़रार पाया था।(जन्नातुल ख़ुलूद पृष्ठ 29 ) आपकी कुन्नियत अबुल हसन , अबू इब्राहीम , अबु अली , अबु अब्दुल्लाह थी और आपके अल्क़ाब काजि़म , अब्दे सालेह , नफ़्से ज़किया , साबिर , अमीन , बाबुल हवाएज वग़ैरह थे। शोहरते आम्मा काजि़म को है और उसकी वजह यह है कि आप बद सुलूक के साथ एहसान करते और सताने वाले को माफ़ फ़रमाते और ग़ुस्से को पी जाते थे। बड़े हलीम बुर्दबार और अपने पर ज़ुल्म करने वाले को माफ़ कर दिया करते थे।

(मतालेबुस सुऊल पृष्ठ 273, शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 192, रौज़तुल शोहदा पृष्ठ 432, तारीख़े ख़मीस जिल्द 2 पृष्ठ 32 )

लक़्ब बाबुल हवाएज की वजह

अल्लामा इब्ने तल्हा शाफ़ेई लिखते हैं कि कसरते इबादत की वजह से अब्दे सालेह और ख़ुदा से हाजत तलब करने के ज़रिये होने की वजह से आपको बाबुल हवाएज कहा जाता है। कोई भी हाजत हो जब आपके वास्ते से तलब की जाती थी तो ज़रूर पूरी होती थी। मुलाहेज़ा हो।(मतालेबुल सुऊल पृष्ठ 278, सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 131 ) फ़ाजि़ल माअसर अल्लामा अली हैदर रक़म तराज़ हैं कि हज़रत का लक़ब बाबे क़ज़ा अल हवाएज यानी हाजतें पूरी हाने का दरवाज़ा भी था। हज़रत की जि़न्दगी में तो हाजतें आपके तवस्सुल से पूरी होती ही थीं शहादत के बाद भी यह सिलसिला जारी ही रहा और अब भी है। (अख़बार पायनियर इलाहाबाद मोअर्रेख़ा 10 अगस्त 1928 ई0 में ज़ेरे उन्वान इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के रौज़े पर एक अन्धे को बीनाई मिल गई। ख़बर शाया हुई है जिसका तरजुमा यह है कि हाल ही में रौज़ा ए काज़मैन शरीफ़ पर जो शहर बग़दाद से बाहर है एक मोजेज़ा ज़ाहिर हुआ है कि एक अन्धा और बूढ़ा सैय्यद निहायत मुफ़लिसी की हालत में रौज़े शरीफ़ के अन्दर दाखि़ल हुआ और जैसे ही उसने इमाम मूसी ए काजि़म (अ.स.) की रौज़े की ज़रीहे अक़दस को हाथ से मस किया वह फ़ौरन चिल्लाता हुआ बाहर की तरफ़ दौड़ा मुझे बीनाई मिल गई मैं देखने लगा हूँ इस पर लोगों का बड़ा हुजूम जमा हो गया और अकसर लोग इसके कपड़े तबर्रूक के तौर पर छीन झपट कर ले गए। इसको तीन दफ़ा कपड़े पहनाए गये और हर दफ़ा वह कपड़े टुकड़े हो गये। आखि़र रौज़ाए शरीफ़ के ख़ुद्दाम ने इस ख़्याल से कि कहीं इस बूढ़े सैय्यद के जिस्म को नुक़सान न पहुँचे इसको उसके घर पहुँचा दिया। इसका बयान है कि मैं बग़दाद के अस्पताल में अपनी आँख का इलाज करा रहा था बिल आखि़र सब डाँक्टरों ने यह कह कर मुझे अस्पताल से निकाल दिया कि तेरा मजऱ् ला इलाज हो गया है अब इसका इलाज ना मुम्किन है। तब मैं मायूस हो कर रौज़ा ए अक़दस इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) पर आया यहां आपके वसीले से ख़ुदा से दुआ की ‘‘ बारे इलाहा तुझे इसी इमाम मदफ़ून का वास्ता मुझे अज़सरे नव बीनाई अता कर दे। यह कह कर जैसे ही मैंने रौज़े की ज़री को मस किया मेरी आँख़ों के सामने रौशनी नमूदान हुई और आवाज़ आई जा तुझे फिर से रौशनी दे दी गई ’’ इस आवाज़ के साथ ही मैं हर चीज़ को देखने लगा।(अख़बार इन्क़ेलाब लाहौर , अख़बार अहले हदीस अमरतसर मोवर्रिख़ा 24 अगस्त 1928 0 )

अल्लामा इब्ने शहर आशोब लिखते हैं कि ख़तीब बग़दादी ने अपनी तारीख़ में लिखा है कि जब मुझे कोई मुश्किल दरपेश होती है मैं इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के रौज़े पर चला जाता हूँ और उनकी क़ब्र पर दोआ करता हूँ मेरी मुश्किल हल हो जाती है।(मनाक़िब जिल्द 3 पृष्ठ 125 प्रकाशित मुल्तान)

बादशाहाने वक़्त

आप 128 हिजरी में मरवान अल हमार उमवी के अहद में पैदा हुए। इसके बाद 132 हिजरी में पृष्ठ अब्बासी ख़लीफ़ा हुआ(अबुल फि़दा) 136 हिजरी में मन्सूर दवानीक़ी अब्बासी ख़लीफ़ा बना(अबुल फि़दा) 158 हिजरी में महदी बिन मालिके सलतनत हुआ।(हबीब अल सियर 169 हिजरी में हादी अब्बासी की बैैअत की गई। (इब्ने अलवरी) 170 में हारून रशीद अब्बासी इब्ने महदी ख़लीफ़ा ए वक़्त हुआ (अबुल फि़दा) 183 हिजरी में हारून के ज़हर देने से इमाम (अ.स.) ब हालते मज़लूमी क़ैदख़ाने में शहीद हुए।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा अख़बार अल ख़ुलफ़ा इब्ने राई)

नशोनुमा और तरबीअत

अल्लामा अली नक़ी लिखते हैं कि आपकी उमर के बीस बरस अपने वालिदे बुज़ुर्गवार हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के साए तरबीयत में गुज़रे एक तरफ़ ख़ुदा के दिए हुए फि़तरी कमाल के जौहर दूसरी तरफ़ इस बाप की तरबियत जिसने पैग़म्बर के बताए हुए मकारेमुल अख़्लाक़ की याद को भूली हुई दुनियाँ में ऐसा ताज़ा कर दिया कि उन्हें एक तरह से अपना बना लिया और जिसकी बिना पर मिल्लते जाफ़री नाम हो गया। इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) ने बचपना और जवानी का काफ़ी हिस्सा इसी मुक़द्दस आगोश में गुज़ारा यहाँ तक कि तमाम दुनिया के सामने आपके ज़ाती कमालात व फ़ज़ाएल रौशन हो गए और इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) ने अपना जां नशीन मुक़र्रर फ़रमा दिया। बावजूदे कि आपके बड़े भाई भी मौजूद थे मगर ख़ुदा की तरफ़ का मन्सब मीरास का तरका नहीं है बल्कि जा़ती कमालात को ढुंढता है। सिलसिलाए मासूमीन में इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) में बजाए फ़रज़न्दे अकबर के इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की तरफ़ इमामत का मुन्तकि़ल होना इसका सुबूत है कि मियारे इमामत में नसबी विरासत को मद्दे नज़र नहीं रखा गया है।

(सवानेह मूसा काजि़म पृष्ठ 4 )

आपके बचपन के बाज़ वाक़ेआत

यह मुसल्लेमात से है कि नबी और इमाम तमाम सलाहियतों से भर पूर मोतवल्लिद होते हैं। जब हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की उमर तीन साल की थी एक शख़्स जिसका नाम सफ़वान जम्माल था हज़रत इमाम जाफ़र सादिक (अ.स.) की खि़दमत में हाजि़र हो कर मुस्तफ़सिर हुआ कि मौला , आपके बाद इमामत के फ़राएज़ कौन अदा करेगा आपने इरशाद फ़रमाया ऐ सफ़वान ! तुम इसी जगह बैठो और देखते जाओ जो ऐसा बच्चा मेरे घर से निकले जिसकी हर बात मारफ़ते ख़ुदा से पुर हो और आम बच्चों की तरह लहो लआब न करता हो , समझ लेना कि ऐनाने इमामत इसी के लिये सज़ावार है। इतने में इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) बकरी का एक बच्चा लिये हुए बरामद हुए और बाहर आ कर इससे कहने लगेः अपने ख़ुदा का सजदा कर। यह देख कर इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने उसे सीने से लगा लिया।(तज़किरतुल मासूमीन पृष्ठ 192 )

सफ़वान कहता है यह देख कर मैं ने इमाम मूसा (अ.स.) से कहा साहब जा़दे ! इस बच्चे को कहिए की मर जाए। आप ने इरशाद फ़रमाया कि वाए हो तुम पर , क्या मौत व हयात मेरे ही इख़्तेयार में है।(बेहारूल अनवार जिल्द 11 पृष्ठ 266 )

अल्लामा मजलिसी लिखते हैं कि इमाम अबू हनीफ़ा एक दिन इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) से मसाएले दीनीया दरियाफ़्त करने के लिये हसबे दस्तूर हाजि़र हुए। इत्तेफ़ाक़न आप आराम फ़रमा रहे थे। मौसूफ़ इस इन्तेज़ार में बैठ गये कि आप बेदार हों तो अर्ज मुद्दआ करूं। इतने में इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) जिनकी उम्र उस वक़्त पाँच साल की थी बरामद हुए। इमाम अबू हनीफ़ा ने उन्हें सलाम कर के कहा , ऐ साहब ज़ादे बताओ कि इन्सान फ़ाएल मुख़्तार है या इनके फ़ेल का ख़ुदा फ़ाएल है ? यह सुन कर आप ज़मीन पर दो ज़ानू बैठ गये और फ़रमाने लगे , सुनो ! बन्दों के अफ़आल तीन हालतों से ख़ाली नहीं , या इनके अफ़आल का फ़ाएल सिर्फ़ ख़ुदा है या सिर्फ़ बन्दा है या दोनों की शिरकत से अफ़आल वाक़े होते हैं अगर पहली सूरत है तो ख़ुदा को बन्दे पर अज़ाब का हक़ नहीं , अगर तीसरी सूरत है तो भी यह इन्साफ़ के खि़लाफ़ है कि बन्दे को सज़ा दे और अपने को बचा ले क्यो कि इरतेक़ाब दोनों की शिरकत से हुआ है। अब ला मोहाला दूसरी सूरत होगी वह यह की बन्दा ख़ुदा फ़ाएल हो और इरतिक़ाबे क़बीह पर ख़ुदा उसे सज़ा दे।

(बिहारूल अनवार जिल्द 11 पृष्ठ 185 )

इमाम अबू हनीफ़ा कहते हैं कि मैं ने उस साहब ज़ादे को इस तरह नमाज़ पढ़ते हुए देख कर कि उनके सामने से लोग बराबर गुज़र रहे थे इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) से अर्ज़ किया कि आप के साहब ज़ादे मूसा काजि़म नमाज़ पढ़ रहे थे और लोग उनके सामने से गुज़र रहे थे। हज़रत ने इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) को आवाज़ दी , वह हाजि़र हुए , आपने फ़रमाया बेटा ! अबू हनीफ़ा क्या कहते हैं उनका कहना है कि तुम नमाज़ पढ़ रहे थे और लोग तुम्हारे सामने से गुज़र रहे थे। इमामे मूसा काजि़म (अ.स.) ने अर्ज कि बाबा जान लोगों के गुज़रने से नमाज़ पर क्या असर पड़ता है वह हमारे और ख़ुदा के दरमियान हाएल तो नहीं हुए थे क्यों कि वह तो रगे जान से भी ज़्यादा क़रीब है। यह सुन कर आपने उन्हें गले से लगा लिया और फ़रमाया कि इस बच्चे को असरारे शरीअत अता हो चुके हैं।

(मनाक़िब जिल्द 5 पृष्ठ 69 )

एक दिन अब्दुल्लाह इब्ने मुस्लिम और अबू हनीफ़ा दोनो वारिदे मदीना हुए। अब्दुल्लाह ने कहा चलो इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) से मुलाक़ात करें और उनसे कुछ इस्तेफ़ादा करें। यह दोनों हज़रत के दरे दौलत पर हाजि़र हुए। यहाँ पहुँच कर देखा कि हज़रत के मानने वालों की भीड़ लगी हुई है। इतने में इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के बजाए इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) बरामद हुए। लोगो ने सरो क़द ताज़ीम की , अगरचे आप उस वक़्त बहुत ही कम सिन थे लेकिन आपने उलूम के दरिया बहाना शुरू किये। अब्दुल्लाह वग़ैरा ने जो आपसे कुछ दूरी पर थे आपके क़रीब जाते हुए आपकी इज़्ज़त व मंजि़लत का आपस में तज़किरा किया। आखि़र में इमाम अबू हनीफ़ा ने कहा कि चलो मैं उन्हें उनके शियों के सामने रूसवा और ज़लील करता हूँ। मैं उनसे ऐसा सवाल करूगां कि यह जवाब न दे सकेंगे। अब्दुल्लाह ने कहा , यह तुम्हारा ख़्याले ख़ाम है वह फ़रज़न्दे रसूल स. हैं। अल ग़रज़ दोनों हाजि़रे खि़दमत हुए इमाम अबू हनीफ़ा ने इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) से पूछा साहब ज़ादे यह तो बताओ कि अगर तुम्हारे शहर में कोई मुसाफि़र आ जाए और उसे क़ज़ाए हाजत करनी हो तो क्या करे और उसके लिये कौन सी जगह मुनासिब होगी ? हज़रत ने बरजस्ता फ़रमाया ! मुसाफि़र को चाहिये कि मकानों की दीवारों के पीछे छुपे , हमसायों की निगाहों से बचे , नहरों के किनारों से परहेज़ करे जिन मुक़ामात पर दरख़्तों के फल गिरते हों उस जगह से परहेज़ करे। मकानों के सहन से अलहदा , शाहराहो और रास्तों से अलग मस्जिदों को छोड़ कर , ना कि़बले की जानिब मुह करे ना पीठ फिर अपने कपड़ों को बचा कर जहाँ चाहे रफ़ये हाजत करे। यह सुन कर इमाम अबू हनीफ़ा हैरान रह गये और अब्दुल्लाह कहने लगे कि मैं न कहता था कि यह फ़रज़न्दे रसूल स. हैं इन्हें बचपन ही में हर कि़स्म का इल्म हुआ करता है।

(बिहार , मनाक़िब व एहतिजाज)

अल्लामा मजलिसी तहरीर फ़रमाते हैं कि एक दिन हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) मकान में तशरीफ़ फ़रमा थे इतने में आपके नूरे नज़र इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) कहीं बाहर से वापस आए। इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने फ़रमाया , बेटे ज़रा इस मिसरे पर मिसरा लगाओ। ‘‘तन्नहाक अन अलक़बीह वल अमस्तोदा ’’ आपने फ़ौरन मिसरा लगाया। ‘‘ वमन औलियतन हसना फ़ज़दहा ’’ बुरी बातों से दूर रहो और उनका इरादा भी न करो। जिसके साथ भलाई करो भर पूर करो। फिर फ़रमाया इस पर मिसरा लगाओ। ‘‘ सतलक़ी मिन अदूका कुल कैद ’’ आपने मिसरा लगाया ‘‘ अज़ाका वल अदो फला तकदा ’’ तरजुमा 1. तुमहारा दुश्मन हर कि़स्म का मकरो फ़रेब करेगा , 2. जब दुश्मन मकरो फ़रेब करे तब भी उसे बुराई के क़रीब नहीं जाना चाहिये।

(बिहारूल अनवार जिल्द 11 पृष्ठ 36 )

हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की इमामत

148 हिजरी में इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की शहादत हुई। उस वक़्त से हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) बाज़ाते ख़ुद फ़राएज़े इमामत के जि़म्मेदार हुए। उस वक़्त सलतनते अब्बासिया के तख़्त पर मन्सूर दवानकी़ बादशाह था। यह वही ज़ालिम बादशाह था जिसको हाथों ला तादाद सादात मजा़लिम का निशाना बन चुके थे। तलवार के घाट उतारे गये , दीवारों में चुनवाये गये या क़ैद रखे गये थे। ख़ुद इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के खि़लाफ़ तरह तरह की साजि़शें की जा चुकी थीं और मुख़तलिफ़ सूरतों से तकलीफ़ें पहुँचाई गई थीं। यहाँ तक कि मन्सूर ही का भेजा हुआ ज़हर था जिससे आप दुनिया से से रूख़सत हुए थे। इन हालात में आपको अपने जानशीन के मुताअल्लिक़ यह क़तई अन्देशा था कि हुकूमते वक़्त उसे जि़न्दा न रहने देगी। इस लिए आपने आख़री वक़्त एक एख़्लाक़ी बोझ हुकूमत के कांधो पर रख देने के लिये यह सूरत एखि़्तयार फ़रमाई कि अपनी जायदाद और घर बार के इन्तेज़ामात के लिये पाँच शख़्सों की एक जमाअत मुक़र्रर फ़रमाई। जिसमें पहला शख़्स खुद ख़लिफ़ाए वक़्त मन्सूर अब्बासी था। इसके अलावा मोहम्मद बिन सुलैमान हाकिमे मदीना और अब्दुल्लाह अफ़ताह जो इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के सिन में बड़े भाई थे और हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) और उनकी वालेदा मुअज़्ज़मा हमीदा ख़ातून।

इमाम (अ.स.) का अन्देशा बिल्कुल सही था और आप का तहफ़्फ़ुज़ भी कामयाब साबित हुआ। चुनान्चे जब हज़रत की वफ़ात की इत्तेला मन्सूर को पहुँची तो उसने पहले तो सियासी मसलेहत से इज़हारे रंज किया। तीन मरतबा ‘‘ इन्ना लिल्लाहे व इन्ना इलैहे राजेऊन ’’ कहा और कहा अब भला जाफ़र का मिस्ल कौन है ? इसके बाद हाकिमे मदीना को लिखा कि अगर जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने किसी शख़्स को अपना वसी मुक़र्रर किया हो तो उसका सर क़लम कर दो। हाकिमे मदीना ने जवाब में लिखा कि उन्होंने तो पाँच वसी मुक़र्रर किये हैं जिनमें से पहले आप खुद हैं। यह जवाब सुन कर मन्सूर देर तक ख़ामोश रहा और सोचने के बाद कहने लगा कि इस सूरत में तो यह लोग क़त्ल नहीं किये जा सकते। इस के बाद दस बरस मन्सूर जि़न्दा रहा लेकिन इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) से कोई ताअररूज न किया और आप मज़हबी फ़राएज़े इमामत की अन्जाम देही में अमनो सुकून के साथ मसरूफ़ रहे। यह भी था कि इस ज़माने में मन्सूर शहरे बग़दाद की तामीर में मसरूफ़ था। जिससे 157 हिजरी यानी अपनी मौत से सिर्फ़ एक साल पहले फ़राग़त हुई। इस लिये वह इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के मुताअल्लिक़ किसी ईज़ा रसानी की तरफ़ मुतावज्जेह नहीं हुआ। मगर इस अहद से क़ब्ल वह सादात कुशी मे कमाल दिखा चुका था।

अल्लामा मक़रेज़ी लिखते हैं कि मन्सूर के ज़माने में बे इन्तेहा सादात शहीद किये गये हैं और जो बचे हैं वह वतन भाग गये हैं। इन्हीं तारीकीने वतन में हाशिम बिन इब्राहीम बिन इस्माईल अल दीबाज बिन इब्राहीम उमर बिनुल हसने मुसन्ना इब्ने इमाम हसन (अ.स.) भी थे। जिन्होने मुल्तान के इलाको में से ख़ान में सुकूनत इख़्तेयार कर ली थी।

(अल निज़ा व अल तख़ासम पृष्ठ 74 प्रकाशित मिस्र)

158 हिजरी के आखि़र में मन्सूर दवांक़ी दुनिया से रूख़सत हुआ और उसका बेटा मेहदी तख़्ते सलतन्त पर बैठा। शुरू में तो उसने भी इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के इज़्ज़तो एहतेराम के खि़लाफ़ कोई बरताव नहीं किया मगर चन्द साल बाद फिर वही बनी फ़ात्मा की मुख़ालेफ़त का जज़बा उभरा और 164 हिजरी में जब वह हज के नाम से हिजाज़ की तरफ़ गया तो इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) को अपने साथ मक्के से बग़दाद ले गया और कै़द कर दिया। एक साल तक हज़रत उसी क़ैद में रहे। फिर उसको अपनी ग़लती का एहसास हुआ और हज़रत को मदीने की तरफ़ वापसी का मौक़ा दिया गया।

मेहदी के बाद उसका भाई हादी 169 हिजरी में तख़्ते सलतन्त पर बैठा और फिर एक साल एक माह तक उसने सलतन्त की। उसके बाद हारून नशीद का ज़माना आया जिसमें इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) को आज़ादी की सांस लेना नसीब नहीं हुई।

(सवाने इमाम मूसा काजि़म पृष्ठ 5 )

अल्लामा तबरेसी तहरीर फ़रमाते हैं कि जब आप दरजाए इमामत पर फ़ाएज़ हुए उस वक़्त आपकी उम्र 20 साल की थी।

(आलामुलवुरा पृष्ठ 171 )

हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के बाज़ करामात

वाकि़याऐ शक़ीक़ बलख़ी

अल्लामा मोहम्मद बिन तलहा शाफ़ेई लिखते हैं कि आपके करामात ऐसे हैं कि इनको देख कर अक़्लें चकरा जाती हैं मिसाल के लिए मुलाहेज़ा हों 149 हिजरी में शक़ीक़ बलख़ी हज के लिये गये। इनका बयान है कि जब मुक़ामे क़ादसिया में पहुँचा तो देखा कि एक निहायत ख़ूब सूरत जवान जिनका रंग सांवला (गन्दुम गूं) था वह एक अज़ीम मजमे में तशरीफ़ फ़रमा हैं। जिस्म उनका ज़ईफ़ है वह अपने कपड़ों के ऊपर एक कम्बल डाले हुए हैं और पैरों में जूतियाँ पहने हुए हैं। थोड़ी देर बाद वह मजमें से हट कर एक अलाहेदा मक़ाम पर जा कर बैठ गए मैंने दिल में सोचा कि यह सूफ़ी हैं और लोगों पर ज़ादे राह के लिये बार बनाना चाहते हैं मैं अभी उसको ऐसी तम्बीह करूंगा कि यह भी याद करेगा , ग़जऱ् कि मैं इनके क़रीब गया। जैसे ही मैं उनके क़रीब पहुँचा , वह बोले ऐ , शक़ीक़ बदगुमानी मत किया करो यह अच्छा शेवा नहीं है। इसके बाद वह फ़ौरन उठ कर रवाना हो गये। मैंने ख़्याल किया कि यह मामला क्या है। उन्होंने मेरा नाम ले कर मुझे मुख़ातिब किया और मेरे दिल की बात जान ली। इस वाकि़ए से मैं इस नतीजे पर पहुँचा कि हो न हों यह कोई अब्दे सालेह हैं। बस यही सोच कर मैं उनकी तलाश में निकला और उनका पीछा किया , ख़्याल था कि वह मिल जाएं , मैं उनसे कुछ सवालात करूं , लेकिन न मिल सके। इनके चले जाने के बाद हम लोग भी रवाना हो हुए। चलते चलते जब हम वादिए फि़जा़ में पहुँचे तो हमने देखा कि वही जवान सालेह यहां नमाज़ में मशग़ूल हैं और उनके आज़ा व जवारे बेद की मानिन्द काँप् रहे हैं और उनकी आँखों से आँसू जारी हैं। मैं यह सोच कर उनके क़रीब गया की अब उनसे माफ़ी तलब करूँगा। जब वह नमाज़ से फ़ारिग़ हुए तो बोले ऐ शक़ीक़ ख़ुदा का क़ौल है कि जो तौबा करता है मैं उसे बख़्श देता हूँ। इसके बाद फिर रवाना हो गये। अब मेरे दिल में आया कि यक़ीनन यह बन्दाए आबिद कोई अबदाल हैं , क्यों कि दो बारा यह मेरे इरादे से अपनी वाक़फि़यत ज़ाहिर कर चुका है। मैंने हर चन्द फिर उनसे मिल ने की सई की लेकिन वह न मिल सके। जब मैं मंजि़ले जबाला पर पहँुचा तो देखा कि वही जवान एक कुएं की जगत पर बैठे हुए हैं , उसके बाद उन्होंने एक कूज़ा निकाल कर कुएं से पानी लेना चाहा , नागाह उनके हाथ से कूज़ा छूट कर कुऐं में गिर गया , मैंने देखा कि कूज़ा गिरने के बाद उन्होंने आसमान की तरफ़ मुँह कर के बारगाहे अहदियत में कहा मेरे पालने वाले जब मैं प्यासा होता हूँ तू ही सेराब करता है और भूखा होता हूँ तो तू ही खाना देता है , खुदाया ! इस कूज़े के अलावा मेरे पास और कोई बरतन नहीं है , मेरे मालिक! मेरा कूज़ा पूर आब बरामद कर दे। उस जवान सालेह का यह कहना था कि कुऐ का पानी बुलन्द हुआ और ऊपर तक आ गया। आपने हाथ बढ़ा कर अपना कूज़ा पानी से भरा हुआ ले लिया और वज़ू फ़रमा कर चार रकअत नमाज़ पढ़ी। उसके बाद आपने रेत की एक मुठ्ठी उठाई और पानी में डाल कर खाना शुरू किया। यह देख कर मैं अज़्र परदाज़ हुआ। मुझे भी कुछ इनायत हो मैं भूखा हूँ। आपने वही कूज़ा मेरे हवाले कर दिया जिसमें रेत भरी थी। ख़ुदा की क़सम। जब मैंने उसमे से खाया तो उसे ऐसा लज़ीज़ सत्तू पाया जैसा मैंने खाया ही न था। फिर उस सत्तू में एक ख़ास बात यह थी कि जब तक सफ़र में रहा , भूखा नहीं हुआ। इसके बाद आप नज़रों से ग़ायब हो गये। जब मैं मक्का मोअज़्ज़मा पहुँचा तो मैंने देखा कि एक बालू (रेत) के टीले के किनारे मशग़ूले नमाज़ हैं और हालत आपकी यह है कि आपकी आँखों से आँसू जारी हैं और बदन पर ख़ुशू व ख़ुज़ू के आसार नुमाया हैं आप नमाज़ ही में मशग़ूल थे कि सुबह हो गई , आपने नमाज़े सुबह अदा फ़रमाई और उससे उठ कर तवाफ़ का इरादा किया , फिर सात बार तवाफ़ करने के बाद एक मक़ाम पर ठहरे। मैंने देखा कि आपके गिर्द बेशुमार हज़रात हैं और सब बेइन्तेहां ताज़ीम व तकरीम कर रहे हैं। मैं चुंकि एक ही सफ़र में करामात देख चुका था इस लिये मुझे बहुत ज़्यादा फि़क्र थी कि यह मालूम करूं कि यह बुज़ुर्ग कौन हैं ? चुनान्चे मैं उनके गिर्द जो लोग जमा थे उनके क़रीब गया और मैंने पूछा कि यह साहबे करामात कौन हैं , उन्होंने कहा कि यह फ़रज़न्दे रसूल हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) हैं , मैंने कहा बेशक ऐसे करामात जो मैंने देखे वह इसी घराने के लिये सज़ावार हैं।

(मतालेबुल सुऊल पृष्ठ 279, नूरूल अबसार पृष्ठ 135 व शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 193 सवाहेक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 121, अरजहुल मतालिब पृष्ठ 452 )

मुवर्रिख़ ज़ाकिर हुसैन लिखते हैं कि शक़ीक़ इब्ने इब्राहीम बल्ख़ी का इन्तेक़ाल 190 हिजरी में हुआ था।(तारीख़े इस्लाम जिल्द 1 पृष्ठ 59 )

इमाम शिबली लिखते हैं कि एक मरतबा ईसा मदाएनी हज के लिये गए और एक साल मक्का में रहने के बाद वह मदीना चले गये। इनका ख़्याल था कि वहां भी एक साल गुजा़रे गें , मदीना पहुँच कर उन्होंने जनाबे अबूज़र के मकान में क़याम किया। मदीने में ठहरने के बाद उन्होंने इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) वहां आना जाना शुरू किया। मदाईनी का बयान है कि एक शब को बारिश हो रही थी मैं उस वक़्त इमाम (अ.स.) की खि़दमत में हाजि़र था। थोड़ी देर के बाद आपने फ़रमाया कि ऐ ईसा तुम फ़ौरन अपने मकान चले जाओ क्यों कि तुम्हारा मकान तुम्हारे असासे पर गिर गया है और लोग सामान निकाल रहे हैं। यह सुन कर मैं फ़ौरन मकान की तरफ़ गया , देखा कि घर गिर चुका है और लोग मकान से सामान निकाल रहे हैं। दूसरे दिन जब हाजि़र हुआ तो इमाम (अ.स.) ने पूछा कि कोई चीज़ चोरी तो नहीं गई , मैंने अजऱ् कि एक तश्त नहीं मिलता जिसमें वज़ू किया करता था। आपने फ़रमाया वह चोरी नहीं गया बल्कि इन्हेदाम मकान से क़ब्ल तुम उसे बैतुल ख़ला में रख कर भूल गये हो , तुम जाओ और मालिक की लड़की से कहो वह ला देगी। चुनान्चे मैंने ऐसा ही किया और तश्त मिल गया।

(नूरूल अबसार पृष्ठ 135 )

अल्लामा जामी तहरीर फ़रमाते हैं कि एक शख़्स ने एक सहाबी के हमराह 100 दीनार हुजू़र मूसा काजि़म (अ.स.) की खि़दमत में बतौरे नज़र इरसाल किया वह उसे ले कर मदीना पहुँचा , यहाँ पहुँच कर उसने सोचा कि इमाम के हाथों में इसे जाना है लेहाज़ा पाक कर लेना चाहिये। वह कहता है कि मैंने इन दीनारों को जो अमानत थे शुमार किया 99 थे। मैंने उनमें अपनी तरफ़ से एक दीनार शामिल कर के 100 पूरा कर दिया। जब मैं हज़रत की खि़दमत में हाजि़र हुआ तो आपने फ़रमाया सब दीनार ज़मीन पर डाल दो। मैंने थोली खोल कर सब ज़मीन पर निकाल दिया। आपने मेरे बताए बग़ैर इसमे से मेरा वही दीनार जो मैंने मिलाया था निकाल कर मुझे दे दिया और फ़रमाया भेजने वाले ने अदद का लेहाज़ नहीं किया बल्कि वज़न का लेहाज़ किया है जो पूरा 99 होता है।

एक शख़्स का कहना है कि मुझे अली बिन यक़तीन ने एक ख़त दे कर इमाम (अ.स.) की खि़दमत में भेजा। मैंने हज़रत की खि़दमत में पहुँच कर उनका ख़त दिया , उन्होंने उसे पढ़े बग़ैर आस्तीन से एक ख़त निकाल कर मुझे दे दिया और कहा कि उन्होंने जो कुछ लिखा है उसका यह जवाब है।

(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 195 )

अबू बसीर का कहना है कि इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) दिल की बाते जानते थे और हर सवाल का जवाब रखते थे हर जानदार की ज़बान से वाकि़फ़ थे।

(रवाहल मुस्तफ़ा पृष्ठ 162 )

अबू हमज़ा बताऐनी का कहना है कि मैं एक मरतबा हज़रत के साथ हज को जा रहा था कि रास्ते में एक शेर बरामद हुआ , उसने आपके कान में कुछ कहा , आपने उसको उसी ज़बान में जवाब दिया और वह चला गया। हमारे सवाल के जवाब में आपने फ़रमाया कि उसने अपनी शेरनी की तकलीफ़ के लिये दुआ की ख़्वाहिश की , मैंने दुआ कर दी और वह वापस चला गया।

(तज़किरतुल मासूमीन पृष्ठ 193 )

अली बिन यक़तीन इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के ख़ास असहाब में से थे। 121 हिजरी में ब मुक़ाम कूफ़ा पैदा हुए और 182 हिजरी में ब मुक़ाम बग़दाद ब उम्र 57 साल फ़ौत हुए। उन्होंने कई किताबें भी लिखी हैं।

(रेजाल तूसी पृष्ठ 355 प्रकाशित नजफ़ अशरफ़)

ख़लीफ़ा मेंहदी अब्बासी और हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ स . )

मन्सूर दवानक़ी के बाद 157 हिजरी में मेंहदी अब्बासी ख़लीफ़ा ए वक़्त क़रार पाया। उसने अपनी जि़न्दगी में कुछ अच्छे काम भी किए हैं। उसने बहुत से मुलहिदों को ख़ाक में मिला दिया है। मानी जो फ़लसफ़ी था(मज़दक मुतवफ्फा चौथी सदी के शुरुआत से मख़लूत गुमराह कुन अक़ीदे की नशो नुमा करता था) को इसने क़त्ल करा दिया था। इसके अलावा वह आले मोहम्मद के साथ भी इसकी रविश मोतदिल थी लेकिन यह ऐतिदाल बहुत दिनों बाक़ी नहीं रहा और यह अपने आबाओ अजदाद के जादे पर बहुत थोड़े ही अर्से चल निकला और इस अम्र की कोशिश करने लगा कि आले मोहम्मद स. का कोई मोअज़जि़ज़ फ़र्द रहने न पाये बल्कि कोई ऐसा शख़्स भी महफ़ूज़ न रहे जो आले मोहम्मद स. को दोस्त रखता हो। तवारीख़ में है कि उसने याक़ूब इब्ने दाऊद को जो ज़ैदी मज़हब के थे अपना वज़ीरे आज़म बना कर रेफ़ाहे आम के तमाम काम इनसे लिए और यह मालूम होने के बाद कि यह दोस्तदारे आले मोहम्मद हैं उन्हे क़ैद कर दिया।

साहेबे हबीब उस सैर लिखते हैं कि याकू़ब हमेशा से दोस्त दाराने अहले बैत में से था। यहिया इब्ने जै़द और इब्राहीम बरादरे नफ़्से ज़किया के रफ़ीक़ों में से था। शहादते इब्राहीम के बाद मन्सूर ने उसे क़ैद कर लिया था। मेंहदी ने लाएक़ देख कर उसे वज़ीर बना लिया था।(तारीख़े इस्लाम जिल्द 1 पृष्ठ 56 ) जब लोगों ने मेंहदी को बावर करा दिया कि यह आले मोहम्मद स. का ख़ास दिलदादा है तो उस ने उनसे कहा कि मैं तुम्हें एक बाग़ एक लौड़ीं और एक लाख दिरहम देता हूँ तुम क़ैद ख़ाने में जा कर फ़ुला अलवी को क़त्ल कर दो। उन्होंने सब कुछ लेने के बाद इस अलवी को इसके दो रफ़ीको समैत कै़द ख़ाने से रेहा कर दिया और उसे काफ़ी माल दे कर इससे कहा कि यहाँ से चले जाओ। चुनान्चे वह किसी तरफ़ चले गये। चन्द दिनों के बाद इस कनीज़ ने जो उन्हें मिली थी मेंहदी से बता दिया कि उन्होंने अलवी को क़त्ल करने के बजाए रेहा कर दिया और यही नहीं बल्कि तेरे दिये हुए माल से उसे नवाज़ा भी है। मेंहदी ने आपकी तलाशी ली और वाक़ेयात का पता भी लगाया वाक़ेया चूंकि सही था इस वजह से वह बेरहम हो गया और उसने उन्हें क़ैद का हुक्म दे दिया। याकू़ब क़ैद कर दिये गये और मुद्दतुल उमर क़ैद में रहे।

अल्लामा शाफ़ेई लिखते हैं कि याक़ूब को मेंहदी के हुक्म से उस कुऐं में क़ैद किया गया जिसमें रौशनी न जा सकती थी। जिसके नतीजे में वह बिल्कुल अन्धे हो गये। याक़ूब उसी क़ैद ख़ाने में पड़े रहे यहाँ तक कि हारून रशीद का ज़माना आया और उसने उन्हें रेहा कर के मक्का मोअज़्ज़मा भेज दिया जहाँ यह 187 हिजरी में इन्तेक़ाल फ़रमा गये। इन्ना लिल्लाहे व इन्ना इलैहे राजेऊन।

(मरातुल जेनान जिल्द 1 पृष्ठ 419 प्रकाशित हैदराबाद दक्कन)

इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की बग़दाद में क़त्ल के लिये तलबी

जैसा कि मैंने ऊपर तहरीर किया है मेंहदी चन्द दिनों से ज़्यादा आले मोहम्मद स. का तरफ़ दार नहीं रहा। आखि़र वह वक़्त आ गया कि उसने इमाम (अ.स.) को मदीने से बग़दाद तलब कर लिया। इस तलबी का मक़सद यह था कि वहां बुला कर उन्हें क़त्ल करा दे। बहर सूरत इसी मक़सद के पेशे नज़र हुक्म पहुँचा कि आप बग़दाद हाजि़र हों। इमाम (अ.स.) हसबुल हुक्म वहां से रवाना हो गये।

अल्लामा शिबलंजी और अल्लामा जामी लिखते हैं कि आप मंजि़ले ज़बाला पर पहुँचे तो आप से अबूख़ालिद ने मुलाक़ात की। अबू ख़ालिद कहते हैं कि मैंने हज़रत मूसा काजि़म (अ.स.) को देखा कि आप उन लोगों की हिरासत में तशरीफ़ ला रहे हैं जो बग़दाद से आपको लाने के लिये भेजे गये थे। मैं हज़रत के क़रीब गया और मैंने सलाम किया , मुझे देख कर इमाम (अ.स.) ख़ुश हो गये और मुझसे फ़रमाने लगे कि फ़लां फ़लां चीज़ें ख़रीद कर अपने पास रख लेना जब मैं वापस आऊंगा तो ले लूगां। मैंने अजऱ् कि बहुत बेहतर। थोड़ी देर के बाद आपने फ़रमाया , अबू ख़ालिद रंजिदा क्यों हो ? मैंने अजऱ् कि , मौला आप दुशमनों के मुँह में जा रहे हैं , डरता हूँ कि जाने वह क्या करें। आपने फ़रमाया , घबराओ नहीं मैं इन्शा अल्लाह वापस आऊगां और अबू ख़ालिद सुनो तुम फ़लां तारीख़ ब वक़्त शाम मेरा इन्तेज़ार करना , यह फ़रमा कर आप रवाना हो गये और बग़दाद जा पहुँचे।

अल्लामा इब्ने तल्हा शाफ़ेई व अल्लामा जामी लिखते हैं कि बग़दाद पहुँचते ही आप क़ैद कर दिये गये। अल्लामा मजलिसी लिखते हैं कि थोड़े दिन क़ैद रखने के बाद मेंहदी ने आपको क़त्ल करा देना चाहा और इसी लिये इसने हमीद इब्ने क़हतबा को आधी रात के वक़्त बुला भेजा और उस से कहा कि मेरे और तुम्हारे बाप और भाई के दरमियान कितने अच्छे ताअल्लुक़ात थे और सुनों इस वक़्त मुझे तुम से एक ज़रूरी काम लेना है क्या तुम उसे कर सकोगे , इसने कहा कि हाँ ज़रूर करूगां और ऐ बादशाह अगर तामील इरशाद में मेरा माल , मेरी जान , मेरी औलाद हत्ता कि मेरा ईमान भी काम आजाए तो परवाह नहीं। ख़लीफ़ा मेंहदी ने कहा कि ख़ुदा तुम्हारा भला करे , मुझे तुमसे इसी की तवक़्क़ो थी। देखो काम यह है कि तुम इमाम मूसा काजि़म को सुबह होने से पहले क़त्ल कर दो। उसने कहा बेहतर है। बात तय हो गई , हमीद चला गया। मेंहदी सोने चले गया। अभी थोड़ी ही देर सोया था कि अमीरल मोमेनीन (अ.स.) ख़्वाब में तशरीफ़ लाये और उससे कहने लगे कि क्या तुम्हें हुकूमत इसी लिये दी गई है कि तुम अहले क़राबत को तबाह कर दो , होश में आओ और अपने इरादाऐ नजिस से बाज़ आओ। यह देख कर मेंहदी बेदार हो गया और उसने फ़ौरन हमीद को कहला भेजा कि मैंने जो हुक्म दिया है उस पर आज अमल न करना। इसी ख़्वाब की वजह से मेंहदी ने उन्हें रेहा कर के मदीने भेज दिया।

अल्लामा जामी (अलैहिर् रहमा) लिखते हैं कि इमाम (अ.स.) वापस आ रहे थे और अबू ख़ालिद ज़बावली का हाल यह था कि जिस दिन से इमाम (अ.स.) ज़बाला से रवाना हुए थे यह बड़ी मुश्किलों से दिन रात काट रहे थे। जब वह दिन आया जिस दिन इमाम (अ.स.) ने पहुँचने का वायदा फ़रमाया था यह घर से निकल कर बग़दाद के रास्ते पर खड़े हो गये। सूरज डूबते ही उनका दिल डूबने लगा और उन्हें यह शुब्हा पैदा होने लगा कि शायद इमाम (अ.स.) पर कोई मुसिबत आ गई है। नागाह देखा कि ईराक़ की तरफ़ से ग़ुबार नमूदार हुआ और उस के आगे इमाम (अ.स.) ख़च्चर पर सवार चले आ रहे हैं। यह देख कर अबू ख़ालिद मसरूर हो गये और इस्तेक़बाद के लिये दौड़ पड़े। इमाम (अ.स.) ने फ़रमाया ऐ अबू खालिद अपने कहने के मुताबिक़ वापस आ गया हूँ लेकिन एक मौक़ा ऐसा भी आने वाला है कि बग़दाद जा कर वापस न आ सकूगां।

(नूरूल अबसार पृष्ठ 130, दमेए साकेबा जिल्द 3 पृष्ठ 13, बा हवालाए मनाकि़ब व बेहार जिल्द 9 पृष्ठ 64, शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 193, मतालेबुल सुऊल पृष्ठ 278 ) फिर वहां से रवाना हो कर आप मदीना ए मुनव्वरा पहुँचे और बा दस्तूर फ़राएज़े इमामत की अदाएगी में मसरूफ़ हो गये।

इमाम मूसा ए काजि़म (अ.स.) हादी अब्बासी की क़ैद में

तवारीख़ में है कि मेहदी के बाद उसका बेटा हादी अब्बासी 22 मोहर्रम 169 हिजरी मुताबिक़ 785 ई0 में तख़्ते खि़लाफ़त पर बैठा। मिस्टर ज़ाकिर हुसैन लिखते हैं कि हादी बड़ा खुद सर , खुद राय , जि़द्दी , ख़ूंख़ार और बे रहम था। शराब पीता और लहो आब में मसरूफ़ रहता था।

हादी को आले मोहम्मद (स. अ.) से वही बुग़्ज़ व एनाद था जो उसके आबाव अजदाद को था , उसी की सलतन्त में और उसी के अहद में हुकूमत में मदीने के गर्वनर ने इमाम हसन (अ.स.) की औलाद में से बाज़ अफ़राद का बादा ख़वारी का झूठा इल्ज़ाम लगवा कर पिटवाया और उनके गले में रस्सियां बंधवा कर मदीने के कूचे व बाज़ार में तशहीर कराया और कई सौ बनी हसन को क़त्ल कराया और उनकी नुमायां फ़र्द जनाबे हुसैन बिन अली बिन हसन मुसल्लस बिन हसने मुसन्ना का सर कटवा कर बग़दाद भिजवा दिया और पूरी ताक़त से सादात पर ज़ुल्म करता रहा।

(तारीख़े इस्लाम जिल्द 1 पृष्ठ 7 )

हादी ने हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के साथ वही कुछ किया जो इमाम के आबाव अजदाद के साथ करते आय थे।

अल्लामा इब्ने हजर मक्की लिखते हैं कि ख़लीफ़ा हादी बिन मेहदी ने हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) को कै़द कर दिया। बाप क़ैद की मुसिबतों को बरदाश्त कर ही रहे थे कि एक शब हज़रत अली (अ.स.) ने उसके सामने एक आयत पढ़ी जिसका तरजुमा यह है कि क्या इसी लिये तुम हाकिम बने हो कि फ़साद बरपा करो और क़तए रहम करो। इस ख़्वाब से वह बेदार हुआ और उसने फ़ौरन आपकी रेहाई का हुक्म दिया।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 122 व अरजहुल मतालिब पृष्ठ 453 )

हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के अख़लाक़ व आदात

अल्लामा अली नक़ी लिखते हैं कि हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) उस मुक़द्दस सिलसिले की एक फ़र्द थे जिसको ख़ालिक़ ने नौए इन्सान के लिये मेयारे कमाल क़रार दिया था। इसी लिये उनमें से हर एक अपने वक़्त में बेहतरीन इख़लाक़ व औसाफ़ का मुरक़्क़ा था। बे शक यह एक हक़ीक़त है कि बाज़ अफ़राद में बाज़ सिफ़ात इतने मुम्ताज़ नज़र आते हैं कि सब से पहले उन पर नज़र पड़ती है। चुनान्चे सातवें इमाम (अ.स.) में तहम्मुल व बरदाश्त और ग़ुस्सा ज़ब्त करने की सिफ़ात इतनी नुमाया थी कि आपका लक़ब काजि़म क़रार पा गया। जिसके मानी ही हैं ग़ुस्से को पीने वाला। आपको कभी किसी ने तुर्श रूई और सख़्ती के साथ बात करते नहीं देखा और इन्तेहाई नागवार हालात में भी मुस्कुराते हुये नज़र आये।

मदीने के एक हाकिम से आपको सख़्त तकलीफ़े पहुँची यहां तक कि वह जनाबे अमीर (अ.स.) की शान में भी नाज़ेबा अल्फ़ाज़ इस्तेमाल किया करता था मगर हज़रत ने अपने असहाब को हमेशा उसके जवाब देने से रोका।

जब अस्हाब ने उसकी ग़ुस्ताखि़यों की बहुत शिकायत की और कहा कि अब हमें ज़ब्त की ताब नहीं हमें उनसे इन्तेक़ाम लेने की इजाज़त दी जाऐ तो हज़रत ने फ़रमाया कि मैं ख़ुद उसका तदारूक करूगां। इस तरह उनके जज़्बात में सुकून पैदा करने के बाद हज़रत ख़ुद उस शख़्स के पास उसके ख़ेमों में तशरीफ़ ले गये और कुछ ऐसा एहसान और हुसने सुलूक फ़रमाया कि वह अपनी ग़ुस्ताखि़यों पर नादिम हुआ और अपने तरज़े अमल को बदल दिया। हज़रत ने अपने अस्हाब से सूरते हाल बयान फ़रमा कर पूछा कि जो मैंने उसके साथ किया वह अच्छा था या जिस तरह तुम लोग उसके साथ करना चाहते थे। सब ने कहा यक़ीनन हुज़ूर ने जो तरीक़ा इख़्तेयार फ़रमाया वही बेहतर था। इस तरह आपने अपने जद्दे बुजुर्गवार हज़रत अमीर (अ.स.) के उस इरशाद को अमल में ला कर दिख लाया जो आज तक नहजुल बलाग़ा में मौजूद है कि अपने दुश्मन पर ऐहसान के साथ फ़तेह हासिल करो क्यों कि यह दो कि़स्म की फ़तेह में ज़्यादा पुर लुत्फ़े कामयाबी है। बेशक इस लिये फ़रीक़े मुख़ालिफ़ के ज़र्फ़ का सही अन्दाज़ा ज़रूरी है और इसी लिये हज़रत अली (अ.स.) ने इन अल्फ़ाज़ के साथ यह भी फ़रमाया है कि ख़बरदार! यह अदम तशद्दुद का तरीक़ा न अहल के साथ इख़्तेयार न करना वरना उसके तशद्दुद में इज़ाफ़ा हो जायेगा।

यक़ीनन ऐसे अदम तशद्दुद के मौक़े को पहचानने के लिये ऐसी ही बालीग़ निगाह की ज़रूरत है जैसी इमाम (अ.स.) को हासिल थी मगर यह उस वक़्त में है जब मुख़ालिफ़ की तरफ़ से कोई ऐसा अमल हो चुका हो जो उसके साथ इन्तेक़ामी तशद्दुद का जवाज़ पैदा कर सके लेकिन अगर उसकी तरफ़ कोई एक़दाम अभी ऐसा न हुआ हो तो यह हज़रात बहर हाल उसके साथ ऐहसान करना पसन्द करते थे ताकि उसके खि़लाफ़ हुज्जत क़ायम हो और उसे ऐसे जारेहाना एक़दाम के लिये तलाश से भी कोई उज़्र न मिल सके बिल्कुल इसी तरह जैसे इब्ने मुल्जिम के साथ जनाब अमीर (अ.स.) को शहीद करने वाला था आखि़र वक़्त तक जनाबे अमीर (अ.स.) एहसान फ़रमाते रहे। इसी तरह मोहम्मद बिन इस्माईल के साथ जो इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की जान लेने के बाएस हुआ। आप एहसान फ़रमाते रहे यहां तक कि इस सफ़र के लिये जो उसने मदीने से बग़दाद की जानिब ख़लीफ़ा अब्बासी के पास इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की शिकायतें करने के लिये किया था। साढ़े चार सौ दीनार और पन्द्रह सौ दिरहम की रक़म ख़ुद हज़रत ही ने अता फ़रमाई थी जिसको वह ले कर रवाना हुआ था।

आपको ज़माना बहुत ना साज़गार मिला था न उस वक़्त वह इल्मी दरबार क़ायम रह सकता था जो इमामे जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के ज़माने में क़ायम रह चुका था। न दूसरे ज़राए से तबलीग़ो इशाअत मुमकिन थी। बस आपकी ख़ामोश सीरत ही थी जो दुनिया को आले मोहम्मद (अ.स.) की तालीमात से रूशेनास बना सकती थी। आप अपने मजमूओ में भी अकसर बिलकुल ख़ामोश रहे थे। यहां तक कि जब तक आपसे किसी अमर के मुताअल्लिक़ कोई सवाल न किया जाय आप गुफ़्तुगू में इब्तेदा भी न फ़रमाते थे। इसके बाद आपकी इल्मी जलालत का सिक्का दोस्त और दुश्मन सब के दिल पर क़ायम था और आपकी सीरत की बलन्दी को भी सब मानते थे। इसी लिये आम तौर पर आपको इबादत और शब जि़न्दा दारी की वजह से अब्दे सालेह के लक़ब से याद किया जाता था। आपकी सख़ावत और फ़य्याज़ी का भी शोहरा था और फ़ोक़राए मदीना की अकसर पोशीदा तौर पर ख़बर गीरी फ़रमाते थे। हर नमाज़े सुब्ह की ताक़ीबात के बाद आफ़ताब के बलन्द होने के बाद से पेशानी सजदे में रख देते थे और ज़वाल के वक़्त सर उठाते थे। क़ुरआने मजीद की निहायत दिलकश अन्दाज़ में तिलावत फ़रमाते थे खुद भी रोते जाते थे और पास बैठने वाले भी आपकी आवाज़ से मुताअस्सिर हो कर रोते थे।

(सवानेह मूसा काजि़म पृष्ठ 8 व आलामुल वुरा पृष्ठ 178 )

अल्लामा शिबलंजी लिखते हैं कि हज़रत मूसा काजि़म (अ.स.) का यह तरीक़ा और वतीरा था कि आप फ़की़रों को ढ़ूंढा़ करते थे और जो फ़क़ीर आपको मिल जाता था उसके घर में रूप्या पैसा अशरफ़ी और खाना , पानी पहुँचाया करते थे और यह अमल आपका रात के वक़्त होता था। इस तरह आप फ़ुक़राए मदीना के बे शुमार घरों का आज़ूक़ा चला रहे थे और लुत्फ़ यह है कि उन लोगों तक को यह पता न था कि हम तक सामान पहुँचाने वाला कौन है। यह राज़ उस वक़्त खुला जब आप दुनिया से रेहलत फ़रमा गये।

(नूरूल अबसार पृष्ठ 136 प्रकाशित मिस्र)

इसी किताब के पृष्ठ 134 में है कि आप हमेशा दिन भर रोज़ा रखते और रात भर नमाज़ें पढ़ा करते थे। अल्लामा ख़तीबे बग़दादी लिखते हैं कि आप बे इन्तेहा इबादत व रियाज़त फ़रमाया करते थे और ताअते ख़ुदा में इस दरजा शिद्दत बरदाश्त किया करते थे जिसकी कोई हद न थी।

एक दफ़ा मस्जिदे नबवी में आपको देखा गया कि आप सजदे में मुनाजात फ़रमा रहे हैं और इस दरजा सजदे को तूल दिया कि सुबह हो गई।

(दफ़यात अल अयान जिल्द 2 पृष्ठ 131 )

एक शख़्स आपकी बराबर बिला वजह बुराईयां करता था जब आपको इसका इल्म हुआ तो आपने एक हज़ार दीनार (अशरफ़ी) उसके घर पर बतौर इनाम भिजवा दिया जिसके नतीजे में वह अपनी हरकत से बाज़ आ गया।

(रवाएह अल मुस्तफ़ा पृष्ठ 264 )


इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की तसनीफ़ात

आपको अगरचे तसनीफ़ात का मौका़ ही नहीं नसीब हुआ लेकिन फिर भी आप उसकी तरफ़ मुतवज्जेह रहे हैं। आपकी एक तसनीफ़ जिसका जि़क्र अल्लामा चलपी बा हवाला हाफि़ज़ अबु नईम असफ़हानी किया है वह मसनदे इमाम मूसा काजि़म है।(कशफ़ुल ज़नून पृष्ठ 433 व अरजहुल मतालिब पृष्ठ 454 )

आपकी रिवायत की हुई हदीसे

आपसे बहुत सी हदीसें मरवी हैं जिनमें की दो यह हैं

1. आं हज़रत (स. अ.) फ़रमाते हैं कि लड़के का अपने वालेदैन के चेहरों पर नज़र करना इबादत है।

2. झूठ और ख़यानत के अलावा मोमिन हर आदत इख़्तेयार कर सकता है।

(नूरूल अबसार पृष्ठ 134 )

अहमद बिन हम्बल का कहना है कि आपका सिलसिलाए रवायत इतना अहम है कि ‘‘ लौ क़दी अल्लल मजनून ला फ़ाक़ेहा ’’ यानी अगर मजनून पर पढ़ कर दम कर दिया जाय तो उसका जुनून जाता रहे।

(मनाक़िब जिल्द 5 पृष्ठ 73 )

ख़लीफ़ा हारून रशीद अब्बासी और हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ स . )

पांच रबीउल अव्वल 170 हिजरी को मेहदी का बेटा अबू जाफ़र हारून रशीद अब्बासी ख़लीफ़ाए वक़्त बनाया गया। उसने अपना वज़ीरे आज़म यहीया बिन ख़ालिद बर मक्की को बनाया और इमाम अबू हनीफ़ा के शागिर्द अबू यूसुफ़ को क़ाज़ी क़ज़्ज़ाता का दरजा दिया। बा रवायत ज़ेहनी उसने अगरचे बाज़ अच्छे काम भी किये हैं लेकिन लहो लाब और हुसूले लज़्ज़ाते मम्नुआ में मुन्फ़रीद था।

इब्ने ख़ल्दून का कहना है कि यह अपने दादा मन्सूर दवानक़ी के नक़्शे क़दम पर चलता था फ़कऱ् इतना था कि वह बख़ील था और यह सख़ी। यह पहला ख़लीफ़ा है जिसने राग रागनी और मौसीक़ी को शरीफ़ पेशा क़रार दिया था। उसकी पेशानी पर भी सादात कुशी का नुमायां दाग़ है। इल्मे मौसीक़ी माहिर अबू इस्हाक़ इब्राहीम मौसली उसका दरबारी था। हबीब अल सैर में है कि यह पहला इस्लामी बादशाह है जिसने मैंदान में गेंद बाज़ी की और शतरंज के खेल का शौक़ किया। अहादीस में है कि शतरंज खेलना बहुत बड़ा गुनाह है। जामेए अल अख़बार में है कि जब इमामे हुसैन (अ.स.) का सर दरबारे यज़ीद में पहुँचा था तो वह शतरंज खेल रहा था। तारीख़ अल ख़ुल्फ़ा स्यूती में है कि हारून रशीद अपने बाप की मदख़ूला लौंड़ी पर आशिक़ हो गया। उसने कहा कि मैं तुम्हारे बाप के पास रह चुकी हूँ तुम्हारे लिये हलाल नहीं हूँ। हारून ने क़ाज़ी अबू युसूफ़ से फ़तवा तलब किया। उन्होंने कहा आप इसकी बात क्यों मानते हैं यह झूठ भी तो बोल सकती है। इस फ़तवे के सहारे से उसने उसके साथ बद फ़ेली (बलात्कार) की।

अल्लामा स्यूती यह भी लिखते हैं कि बादशाह हारून रशीद ने एक लौंड़ी ख़रीद कर उसके साथ उसी रात बिला इस्तेबरा जिमआ (सम्भोग) करना चाहा। क़ाज़ी अबू युसूफ़ ने कहा कि इसे किसी लड़के को हिबा कर के इस्तेमाल कर लिजिये।

अल्लामा स्यूती का कहना है कि इस फ़त्वे की उजरत क़ाज़ी अबू युसूफ़ ने एक लाख दिरहम ली थी।

अल्लामा इब्ने ख़ल्क़ान का कहना है कि अबू हनफि़या के शार्गिदों में अबू युसूफ़ की नज़ीर न थी। अगर यह न होते तो इमाम अबू हनीफ़ा का जि़क्र भी न होता।

तारीख़े इस्लाम मिस्टर जा़किर हुसैन मे ब हवाला सहाह अल अख़बार में है कि हारून रशीद का दरजा सादात कुशी में मन्सूर के कम न था। उसने 176 हिजरी में हज़रत नफ़्से ज़किया (अल रहमा) के भाई यहीया को दीवार में जि़न्दा चुनवा दिया था। उसी ने इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) को इस अन्देशे से कि कहीं वह वली अल्लाह मेरे खि़लाफ़ अलमे बग़ावत बलन्द न कर दें अपने साथ हिजाज़ से ईराक़ में ला कर क़ैद कर दिया और 183 हिजरी में ज़हर से हलाक कर दिया। अल्लामा मजलिसी तहफ़्फ़ुज़े ज़ाएर में लिखते हैं कि हारून रशीद ने दूसरी सदी हिजरी में इमाम हुसैन (अ.स.) की क़ब्र मुताहर की ज़मीन जुतवाई थी और क़ब्र पर जो बेरी का दरख़्त बतौरे निशान मौजूद था उसे कटवा दिया था। जिलाउल उयून और क़म्क़ाम में बाहवाला अमाली शेख़ तूसी मरक़ूम है कि जब इस वाक़ेए की इत्तला जरीर इब्ने अब्दुल हमीद को हुई तो उन्होंने कहा कि रसूले ख़ुदा (स अ व व ) की हदीस ‘‘ अलाअन अल्लाह क़ातेअ अल सिदरता ’’ बेरी के दरख़्त काटने वाले पर ख़ुदा की लानत , का मतलब अब वाज़े हुआ।

(तस्वीरे करबला पृष्ठ 61 प्रकाशित देहली पृष्ठ 1338 )

हारून रशीद का पहला हज और इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की पहली गिरफ़्तारी

मोहम्मद अबुल फि़दा लिखता है कि एनाने हुकूमत लेने के बाद हारून रशीद ने 173 हिजरी मे पहला हज किया।

अल्लामा इब्ने हजर मक्की तहरीर फ़रमाते हैं कि ‘‘ कि जब हारून रशीद हज को आया तो लोगों ने इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के बारे में चुग़ली खाई कि उनके पास हर तरफ़ से माल चला आता है। इत्तेफ़ाक़ से एक रोज़ हारून रशीद ख़ानाए काबा के नज़दीक हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) से मुलाक़ी हुआ और कहने लगा तुम ही हो जिनसे लोग छुप छुप कर बैयत करते है। इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) ने फ़रमाया कि हम दिलों के इमाम हैं और आप जिसमों के। फिर हारून रशीद ने हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) से पूछा कि तुम किस दलील से कहते हो कि हम रसूल (स अ व व ) की ज़ुर्रियत हैं हालांकि तुम अली की औलाद हो और हर शख़्स अपने दादा से मुन्तसिब होता है नाना से मुन्तसिब नहीं होता। हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) ने फ़रमाया कि ख़ुदा ए करीम क़ुरान मजीद में इरशाद करता है ‘‘वमन ज़मुरैत दाऊद सुलैमान व अयूबा व ज़करया व यहया व इसा ” और ज़ाहिर है कि हज़रत ईसा बे बाप के पैदा हुए थे तो जिस तरह महज़ अपनी वालेदा की निस्बत से ज़ुर्रियत अम्बिया में मुल्हक़ हुए उसी तरह हम भी अपनी मादरे गिरामी जनाबे फ़ात्मा (स अ व व ) की निस्बत से जनाबे रसूले खुदा (स अ व व ) की ज़ुर्रियत में ठहरे। फिर फ़रमाया कि जब आयत मुबाहेला नाजि़ल हुई तो मुबाहेले के वक़्त पैग़म्बरे ख़ुदा (स अ व व ) ने सिवा अली (अ.स.) और फ़ात्मा (स अ व व ) और हसन हुसैन (अ.स.) के किसी को नहीं बुलाया इस लिहाज़ से हज़रत हसन (अ.स.) व हज़रत हुसैन (अ.स.) ही रसूल अल्लाह (स. अ.) के बेटे क़रार पाए।

(सवाएके़ मोहर्रेक़ा पृष्ठ 122, नूरूल अबसार पृष्ठ 134 अरजहुल मतालिब पृष्ठ 452 )

अल्लामा इब्ने ख़ल्क़ान लिखते हैं कि हारून रशीद हज करने के बाद मदीना मुनव्वरा आया और ज़्यारत करने के लिये रौज़ा ए मुक़द्देसा नबी (स. अ.) पर हाजि़र हुआ। उस वक़्त उसके गिर्द क़ुरैश और दीगर क़बाएले अरब जमा थे , नीज़ हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) भी साथ थे। हारून रशीद ने हाज़ेरीन पर अपना फ़ख़्र ज़ाहिर करने के लिये क़ब्रे मुबारक की तरफ़ मुख़ातिब हो कर कहा , सलाम हो आप पर ऐ रसूल अल्लाह (स. अ.) ऐ इब्ने अम (मेरे चचा जा़द भाई) हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) ने फ़रमाया कि सलाम हो आप पर मेरे पदरे बुजुर्गवार यह सुन कर हारून के चेहरे का रंग फ़क़ हो गया और उसने हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) को अपने हमराह ले जाकर क़ैद कर दिया।

(दफ़ायात अल अयान जिल्द 2 पृष्ठ 131 व तारीख़े अहमदी पृष्ठ 349 )

अल्लामा इब्ने शहर आशोब तहरीर फ़रमाते हैं कि जिस ज़माने में आप हारून रशीद के क़ैद ख़ाने में थे हारून ने आप का इम्तेहान करने के लिये नेहायत हसीन जमील लड़की , आपकी खि़दमत करने के लिये क़ैद ख़ाने में भेज दी। हज़रत ने जब उसे देखा तो लाने वाले से फ़रमाया कि हारून से जा कर कह देना कि उन्होंने यह हदिया वापस दिया हैं। ‘‘ बल अन्तुम बहदयातकम तफर हूना ’’ वह अताए तौबा लक़ा तो इससे तुम ही ख़ुशी हासिल करो। उसने हारून से वाकि़या बयान किया। हारून ने कहा कि इसे ले जाकर वहीं छोड़ आओ और इब्ने जाफ़र से कहो कि न मैंने तुम्हारी मरज़ी से क़ैद किया और न तुम्हारी मरज़ी से तुम्हारे पास यह लौंड़ी भेजी है , मैं जो हुक्म दूँ तुम्हे वह करना होगा। अल ग़रज़ वह लौंड़ी हज़रत के पास छोड़ दी गई।

चन्द दिनों के बाद हारून ने एक शख़्स को हुक्म दिया कि जा कर पता लगाए कि इस लौंड़ी का क्या रहा। उस ने जो क़ैद ख़ाने में जा कर देखा तो वह हैरान रह गया। वह भागा हुआ हारून के पास आ कर कहने लगा कि वह लौंड़ी तो ज़मीन पर सजदे में पड़ी हुई सुब्बूहुन क़ुद्दूसुन कह रही है और इसका अजब हाल है। हारून ने हुक्म दिया कि उसे इसके सामने पेश किया जाए , जब वह आई तो बिल्कुल मबहूस थी। हारून ने पूछा कि बात क्या है ? उसने कहा कि जब हज़रत के पास गई और उनसे कहा कि मैं आपकी खि़दमत के लिये हाजि़र हुईं हूँ तो आपने एक तरफ़ इशारा कर के फ़रमाया कि यह लोग जब कि मेरे पास मौजूद हैं मुझे तेरी क्या ज़रूरत है। मैंने जब उस सिम्त को नज़र की तो देखा कि जन्नत आरास्ता है और हूरो गि़लमान मौजूद हैं , उनका हुस्नों जमाल देख कर मैं सज्दे में गिर पड़ी और इबादत करने पर मजबूर हो गई। ऐ बादशाह ! मैंने वह चीज़े कभी नहीं देखीं जो क़ैद ख़ाने में मेरी नज़र से गुज़रीं। बादशाह ने कहा कि कहीं तूने सोने की हालत में ख़्वाब न देखा हो। उसने कहा ऐ बादशाह! ऐसा नहीं है मैंने आलमे बेदारी में बचश्मे ख़ुद सब कुछ देखा है। यह सुन कर बादशाह ने उस औरत को किसी महफ़ूज़ मुक़ाम पर पहुँचा दिया और उसके लिये हुक्म दिया कि इसकी निगरानी की जाय ताकि यह किसी से यह वाक़ेया बयान न करने पाय। रावी का बयान है कि इस वाकि़ये के बाद वह ता हयात मशग़ूले इबादत रही और जब कोई उसकी नमाज़ वग़ैराह के बारे में कुछ कहता था तो यह जवाब में कहती थी कि मैंने अब्दे सालेह हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) को इसी तरह करते देखा है। यह पाक बाज़ औरत हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की वफ़ात से कुछ दिनों पहले फ़ौत हो गई।(मनाक़िब इब्ने शहर आशोब जिल्द 5 पृष्ठ 63 )

क़ैद ख़ाने से आपकी रेहाई आप क़ैद खा़ने में तकलीफ़ से दो चार थे और हर कि़स्म की सखि़्तयां आप पर की जा रही थीं कि नागाह बादशाह ने एक ख़्वाब देखा जिससे मजबूर हो कर उसने आपको रेहा कर दिया।

अल्लामा इब्ने हजर मक्की बहवाला अल्लामा मसूदी लिखते हैं कि एक शब को हारून रशीद ने हज़रत अली (अ.स.) को ख़्वाब में इस तरह देखा कि वह एक तेशा (एक तरह का हथियार) लिये हुए तशरीफ़ लाये हैं और फ़रमाते हैं कि मेरे फ़रज़न्द को रेहा कर दे वरना मैं अभी तुझे कैफ़रे किरदाद तक पहुँचा दूँगा। इस ख़्वाब को देखते ही उसने रेहाई का हुक्म दे दिया और कहा कि अगर आप यहां रहना चाहें तो रहिये और मदीना जाना चाहते हैं तो वहां तशरीफ़ ले जाइये आपको इख़्तेयार है।

अल्लामा मसूदी का कहना है कि इसी शब को हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) ने हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ ) को ख़्वाब में देखा था।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 122 प्रकाशित मिस्र) अल्लामा जामी लिखते हैं कि मदीने रवाना करते वक़्त हारून ने आप से ख़ुरूज का शुबहा जा़हिर किया। आपने फ़रमाया कि ख़ुरूज व बग़ावत मेरे शायाने शान नहीं है , ख़ुदा की क़सम मैं ऐसा हरगिज़ नहीं कर सकता।(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 192 )

हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) और अली बिन यक़तीन बग़दादी

क़ैद ख़ाना ए रशीद से छूटने के बाद हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) मदीना ए मुनव्वरा पहुँचे और बदस्तूर अपने फ़राएज़े इमामत की अदायगी में मशग़ूल हो गये। आप चूंकि इमामे ज़माना थे इस लिये आपको ज़माने के तमाम हवादिस की इत्तेला थी। एक मरतबा हारून रशीद ने अली बिन यक़तीन बिन मूसा कूफ़ी बग़दादी को जो कि हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के ख़ास मानने वाले थे और अपनी कार करदिगी की वजह से हारून रशीद के मुक़र्रेबीन में से थे। बहुत सी चीज़ें दीं जिनमें ख़ेलअते फ़ाख़ेरा और एक बहुत उमदा कि़स्म का सियाह ज़रबफ़त का बना हुआ चोग़ा था जिस पर सोने के तारों से फूल कढ़े हुये थे और जिसे सिर्फ़ ख़ुल्फ़ा औद बादशाह पहना करते थे। अली बिन यक़तीन ने अज़ राहे तक़र्रूब व अक़ीदत उस सामान में और बहुत सी चीज़ों का इज़ाफ़ा कर के हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की खि़दमत में भेज दिया। आपने उनका हदिया क़ुबूल कर लिया लेकिन उसमें से इस लिबास मख़सूस को वापस कर दिया जो ज़रबफ़त का बना हुआ था और फ़रमाया कि उसे अपने पास रखो यह तुम्हारे उस वक़्त काम आयेगा जब ‘‘ जान जोखम ’’ में पड़ी होगी। उन्होंने यह ख़्याल करते हुए कि इमाम ने न जाने किस वाकि़ये की तरफ़ इशारा फ़रमाया हो उसे अपने पास रख लिया। थोड़े दिनों के बाद इब्ने यक़तीन अपने एक ग़ुलाम से नाराज़ हो गये और उसे अपने घर से निकाल दिया। इसने जा कर रशीद ख़लीफ़ा से इनकी चुग़ली खाई और कहा कि आप ने जिस क़दर खि़लअत उन्हें दी है उन्होंने सब का सब हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) को दे दिया है और चूंकि वह शिया हैं इस लिये इमाम को बहुत मानते हैं। बादशाह ने जैसे ही यह बात सुनी वह आग बबूला हो गया और उसने फ़ौरन सिपाहियों को हुक्म दिया कि अली बिन यक़तीन को इसी हालत में गिरफ़्तार कर लाऐं जिस हाल में वह हों। अलग़रज़ इब्ने यक़तीन लाए गये , बादशाह ने पूछा मेरा दिया हुआ चोग़ा कहाँ है ? उन्होंने कहा बादशाह मेरे पास है। इसने कहा मैं देखना चाहता हूँ और सुनों ! अगर तुम इस वक़्त उसे न दिखा सके तो मैं तुम्हारी गरदन मार दूँगा। उन्होंने कहा बादशाह मैं अभी पेश करता हूँ। यह कह कर उन्होंने एक शख़्स से कहा कि मेरे मकान में जा कर मेरे फ़ुलां कमरे से मेरा सन्दूक उठा ला। जब वह बताया हुआ सन्दूक ले आया तो आपने उसकी मोहर तोड़ी और चोग़ा निकाल कर उसके सामने रख दिया। जब बादशाद ने अपनी आंखों से चोग़ा देख लिया तो उसका ग़ुस्सा ठन्डा हुआ और ख़ुश हो कर कहने लगा कि अब मैं तुम्हारे बारे में किसी की कोई बात न मानूँगा।

(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 194 )

अल्लामा शिबलन्जी लिखते हैं कि फिर उसके बाद रशीद ने और बहुत सा अतिया दे कर उन्हें इज़्ज़त व ऐहतराम के साथ वापस कर दिया और हुक्म दिया कि चुग़ली करने वालों को एक हज़ार कोड़े लगाए जाऐं चुनान्चे जल्लादो ने मारना शुरू किया और वह पाँच सौ कोड़े खा कर मर गया।

(नूरूल अबसार पृष्ठ 130 )

अली बिन यक़तीन को उलटा वज़ू करने का हुक्म

अल्लामा तबरसी और अल्लामा इब्ने शहर आशोब लिखते हैं अली बिन यक़तीन ने हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) को एक ख़त लिखा जिसमें तहरीर किया कि हमारे दरमियान इस अमर में बहस हो रही है कि आया मसह काब से असाबा (उंगलियों) तक होना चाहिये या उंगलियों से काब तक , हुज़ूर इसकी वज़ाहत फ़रमायें। हज़रत ने उस ख़त का एक अजीब व ग़रीब जवाब तहरीर फ़रमाया , आपने लिखा कि मेरा ख़त पाते ही तुम इस तरह वज़ू शुरू करो तीन मरतबा कुल्ली करो , तीन मरतबा नाक में पानी डालो , तीन मरतबा मुह धो अपनी दाढ़ी अच्छी तरह भिगो , सारे सर का मसा करो , अन्दर बाहर कानों का मसा करो तीन मरतबा पाँव धो और देखो मेरे इस हुक्म के खि़लाफ़ हरगिज़ हरगिज़ ना करना। अली बिन यक़तीन ने जब इस ख़त को पढ़ा तो वह हैरान रह गये लेकिन यह समझते हुए मौलाई आलमा बेमा क़ाला आपने जो कुछ हुक्म दिया है उसकी गहराई और उसकी वजह का अच्छी तरह आपको इल्म होगा। इस पर अमल करना शुरू कर दिया।

रावी का बयान है कि अली बिन यक़तीन की मुखा़लेफ़त बराबर दरबार में हुआ करती थी और लोग बादशाह से कहा करते थे कि यह शिया हैं और तुम्हारे मुख़ालिफ़ है। एक दिन बादशाह ने अपने ख़ास मुशीरों से कहा कि अली बिन यक़तीन की शिकायत बहुत हो चुकी है अब मैं ख़ुद छुप कर देख़ूँगा और यह मालूम करूँगा कि वज़ू क्यों कर करते हैं और नमाज़ कैसे पढ़ते हैं। चुनान्चे उसने छुप कर आपके हुजरे में नज़र डाली तो देखा कि वह अहले सुन्नत के उसूल और तरीक़े पर वज़ू कर रहे हैं। यह देख कर उनसे मुतमईन हो गया और उसके बाद से किसी के कहने को बावर नहीं किया। इस वाकि़ये के फ़ौरन बाद हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) का ख़त अली बिन यक़तीन के पास पहुँचा जिसमें मरक़ूम था कि ख़दशा दूर हो गया अब तुम इसी तरह वज़ू करो जिस तरह ख़ुदा ने हुक्म दिया है यानी अब उल्टा वज़ू न करना बल्कि सीधा और सही वज़ू करना और तुम्हारे सवाल का जवाब यह है कि उंगलियों के सर से काबेईन तक पाँव का मसा होना चाहिए।

(आलामुल वरा पृष्ठ 170, मनाक़िब जिल्द 5 पृष्ठ 58 )

वज़ीरे आज़म अली बिन यक़तीन का हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की फ़हमाईश

अल्लामा हुसैन बिन अब्दुल वहाब तहरीर फ़रमाते हैं कि मोहम्मद बिन अली सूफ़ी का बयान है कि इब्राहीम जमाल जो हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के सहाबी थे , ने एक दिन अबुल हसन अली बिन यक़तीन से मुलाक़ात के लिये वक़्त चाहा उन्होंने वक़्त न दिया। उसी साल वह हज के लिये गये और हज को हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) भी तशरीफ़ ले गये इब्ने यक़तीन हज़रत से मिलने के लिये गये उन्होंने मिलने से इन्कार कर दिया इब्ने यक़तीन को बड़ा ताअज्जुब हुआ। रास्ते मुलाक़ात हुई तो हज़रत ने फ़रमाया कि तुम ने इब्राहीम से मुलाका़त करने से इन्कार किया था इस लिये मैं भी तुम से नहीं मिला और उस वक़्त तक न मिलूगाँ जब तक तुम उनसे माफ़ी न मांगोगे और उन्हें राज़ी न करोगे। इब्ने यक़तीन ने अजऱ् की मौला मैं मदीने में हूँ और वह कूफ़े में है , मेरी मुलाक़ात है कैसे हो सकती है ? फ़रमाया तुम तन्हा बक़ी में जाओ , एक ऊँट तय्यार मिलेगा इस पर सवार हो कर कूफ़ा के लिये रवाना हो चश्में ज़दन में वहां पहुँच जाओगे। चुनान्चे वह गये और ऊँट पर सवार हो कर कूफ़ा पहुँचे , इब्राहीम के दरवाज़े पर दक़्क़ुलबाब किया। आवाज़ आई कौन है ? कहा मैं इब्ने यक़तीन हूँ। उन्होंने कहा तुम्हारा मेरे दरवाज़े पर क्या काम है ? इब्ने यक़तीन ने जवाब दिया , सख़्त मुसीबत में मुबतिला हूँ , ख़ुदा के लिये मिलने का वक़्त दो। चुनान्चे उन्होंने इजाज़त दी। इब्ने यक़तीन ने क़दमों पर सर रख कर माफ़ी मांगी और सारा वाक़ेया कह सुनाया। इब्राहीम जमाल ने माफ़ी दी। फिर इसी ऊँट पर सवार हो कर चश्में ज़दन में मदीने पहुँचे और हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की खि़दमत में हाजि़र हुए। इमाम ने फिर माफ़ कर दिया और मुलाक़ात का वक़्त दे कर गुफ़्तुगू फ़रमाई।

(ऐनुल मोजेज़ात पृष्ठ 122 प्रकाशित मुल्तान)

हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के हुक्म से बादल का एक मर्दे मोमिन को चीन से तालेक़ान पहुँचाने का वाकि़आ

हारून रशीद का एक सवाल और उसका जवाब

यह मुसल्लम है कि हज़रात मोहम्मद व आले मोहम्मद , मोजिज़ात करामात और उमूरे ख़रक़ आदात में यकताए काएनात थे , रजअत शमस , शक़्क़ुल क़मर और हज़रत अली (अ.स.) का एक गिरोह समेत चादर पर बैठ कर ग़ारे अस्हाबे कहफ़ तक सफ़र करना उसके शवाहेद हैं।

अल्लामा मोहम्मद इब्ने शहर आशोब तहरीर फ़रमाते हैं कि ‘‘ खा़लिद बिन समा बयान करते हैं कि एक दिन हारून रशीद ने एक शख़्स को तलब किया था अली बिन सालेह तालक़ानी , पूछा तुम ही वह हो जिसको बादल चीन से उठा कर तालक़ान लाए थे ? कहा हाँ। इसने कहा बताओ क्या वाक़ेआ है , यह क्यों कर हुआ ? तालक़ानी ने कहा कि मैं किश्ती में सवार था नागाह जब मेरी कश्ती समुन्दर के इस मक़ाम पर पहुँची जो सब से ज़्यादा गहरा था तो मेरी कश्ती टूट गई। तीन रोज़ मैं तख़्तों पर पड़ा रहा और मौजें मुझे थपेड़े लगाती रहीं , फिर समुन्द्र की मौजों ने मुझे ख़ुश्की में फेंक दिया। वहाँ नहरे और बाग़ात मौजूद थे , मैं एक दरख़्त के साए में सो गया। इसी असना में मैंने एक ख़ौफ़नाक आवाज़ सुनी , डर के मारे बेदार हो गया। फिर दो घोडो को आपस में लड़ते हुए देखा। ऐसे ख़ूब सूरत घोड़े कभी नहीं देखे थे। उन्होंने जब मुझे देखा , समुन्दर में चले गये। मैंने इसी असना में एक अजीब अल खि़ल्क़त परिन्दे को देखा जो आ कर बैठ गया। पहाड़ के ग़ार के क़रीब मैं दरख़्त में छुपे हुए इसके क़रीब गया ताकि इस को अच्छी तरह देख सकूँ। परिन्दे ने जब मुझे देखा तो उड़ गया। मैं उसके पीछे चल पड़ा। ग़ार के क़रीब मैंने तसबीह व तहलील तकबीर और तिलावते क़ुरआने मजीद की आवाज़ सुनी। मैं ग़ार के क़रीब गया। आवाज़ देने वाले ने आवाज़ दी ‘‘ ऐ अली बिन सालेह तालक़ानी ’’ ख़ुदा तुम पर रहम करे। ग़ार में अन्दर आ जाओ। मैं ग़ार के अन्दर चला गया , वहां एक अज़ीम शख़्स को देखा। मैंने सलाम किया , उसने जवाब दिया। फिर फ़रमाया कि ऐ बिन सालेह तालक़ानी तुम मादन उल क़नूज़ हो। भूख , प्यास और ख़ौफ़ के इम्तेहान में पास हुए हो। अल्लाह ताअला ने तुम पर रहम किया है , तुम्हें नजात दी है। तुम्हें पाकीज़ा पानी पिलाया है। मैं उस वक़्त को जानता हूँ जब तुम कश्ती पर सवार हुए और समुन्दर में रहे , तुम्हारी कश्ती टूट गई कितनी दूर तक मौजों के थपेड़े खाती रही। तुम ने अपने आप को समुन्दर में गिराने का इरादा किया , अगर ऐसा करते तो खुद मौत को दावत देते। बड़ी मुसिबत उठाई। मैं उस वक़्त को भी जानता हूँ जब तुम ने नजात पाई और दो ख़ूब सूरत चीज़ें देखीं। तुम ने परिन्दे का पीछा किया। जब उसने तुम्हे देखा तो आसमान की तरफ़ उड़ गया। अल्लाह ताअला तुम पर रहम करें , आओ यहाँ बैठ जाओ। जब मैंने उस शख़्स की बात सुनी तो उस से कहा , मैं तुम्हें अल्लाह ताअला का वास्ता दे कर पूछता हूँ यह बताओ कि मेरे हालात तुम को किसने बताऐ ? फ़रमाया उस ज़ात ने जो ज़ाहिरो बातिन की जानने वाली है। फिर फ़रमाया कि तुम भूखे हो। मैंने अजऱ् की बेशक भूखा हूँ। यह सुन कर आपने अपने लबों को हरकत दी और एक दस्तरख़्वान रूमाल से ढ़का हुआ हाजि़र हो गया। उन्होंने दस्तरख़्वान से रूमाल को उठा लिया। फ़रमाया अल्लाह ताअला ने जो रिज़्क़ दिया है आओ उसे खाओ। मैंने खाना खाया , ऐसा पाकीज़ा खाना कभी न खाया था फिर मुझे पानी पिलाया , मैंने ऐसा लज़ीज़ और मीठा पानी कभी नहीं पिया था। फिर उन्होंने दो रकअत नमाज़ पढ़ी और मुझ से फ़रमाया कि ऐ अली घर जाना चाहते हो , मैंने अजऱ् कि मैं वतन से बहुत दूर हूँ (चीन के इलाक़े में पडा हूँ) मेरी मदद कौन कर सकता है और मैं क्यो कर यहाँ से वतन जा सकता हूँ ? उन्होंने फ़रमाया घबराओ नहीं हम अपने दोस्तों की मदद किया करते हैं। हम तुम्हारी मदद करेंगे। फिर उन्होंने दुआ के लिये हाथ उठाया , नागाह बादल के टुकड़े आने लगे और ग़ार के दरवाज़े को घेर लिये। जब बादल उनके सामने आया तो उसने बाहुक्मे ख़दा सलाम किया ‘‘ ऐ अल्लाह के वली और उसकी हुज्जत आप पर सलाम हो। उन्होंने जवाबे सलाम दिया। फिर बादल के एक टूकड़े से पूछा कहां का इरादा है और किस ज़मीन के लिये तुम भेजे गये हो। उसने ज़मीन का नाम लिये और वह चला गया। फिर अब्र का एक टुकड़ा सामने आया और आ कर सलाम किया। उन्होंने जवाब दिया। पूछा कहां जाने के लिये आया है ? कहा तालक़ान जाने का हुक्म दिया गया है। ऐ ख़ुदा ए वहदहू ला शरीक का इताअत गुज़ार अब्र जिस तरह अल्लाह की दी हुई चीज़ें उड़ा कर लिये जा रहा है इसी तरह इस बन्दाए मोमिन को भी ले जा। जवाब मिला ब सरो चश्म (सर आंखों पर) फिर उन्होंने बादल को हुक्म दिया कि ज़मीन पर बराबर हो जा , वह ज़मीन पर आ गया , फिर मेरे बाज़ू को पकड़ कर उस पर बैठा दिया। बादल अभी उड़ने भी न पाया था कि मैंने उनकी खि़दमत में अजऱ् की , मैं आपको अल्लाम ताअला की क़सम और मोहम्मद (स. अ.) और आइम्मा ए ताहेरीन (अ.स.) का वास्ता दे कर पूछता हूँ कि आप यह फ़रमाइये आप हैं कौन ? आप का इस्मे गेरामी (नाम) क्या है ? इरशाद फ़रमाया ! ऐ अली बिन सालेह तालक़ानी मैं ज़मीन पर अल्लाह की हुज्जत हूँ और मेरा नाम मूसा बिन जाफ़र (मूसा काजि़म) है। फिर मैंने उनके आबाव हजदाद की इमामत का जि़क्र किया और उन्होंने बादल को हुक्म दिया और वह बलन्द हो कर हवा के दोश पर चल पड़ा। ख़ुदा की क़सम न मुझे कोई तकलीफ़ पहुँची और न ख़ौफ़ ला हक़ हुआ। मैं थोडी़ देर में वतन ‘‘ तलक़ान ’’ जा पहुँचा और ठीक उस सड़क पर उतरा जिस पर मेरा मकान था। यह सुन कर हारून रशीद ने जल्लादों को हुक्म दे कर उसे इस लिये क़त्ल करा दिया कि वह कहीं इस वाकि़ये को लोगों में बयान न कर दे और अज़मते आले मोहम्मद और वाज़े न हो जाय।

(मनाक़िब इब्ने शहर आशोब जिल्द 3 पृष्ठ 121 प्रकाशित मुल्तान)

हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) और फि़दक के हुदूदे अरबा

अल्लामा युसूफ़ बग़दादी सिब्ते इब्ने जोज़ी हनफ़ी तहरीर फ़रमाते हैं कि एक दिन हारून रशीद ने हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) से कहा कि आप ‘‘ फि़दक ’’ लेना चाहें तो मैं दे दूँ। आपने फ़रमाया कि मैं जब उसके हुदूद बताऊगां तो तू उसे देने पर राज़ी न होगा और मैं उसी वक़्त ले सकता हूँ जब उसके पूरे हुदूद दिये जायें। उसने पूछा कि उसके हुदूद क्या हैं ? फ़रमाया पहली हद अदन है , दूसरी हद समर कन्द है तीसरी हद अफ़रीक़ा है , चौथी हद सैफ़ अल बहर है जो ख़ज़र्र और आरमीनिया के क़रीब है। यह सुन कर हारून रशीद आग बबूला हो गया और कहने लगा फिर हमारे लिये क्या है ? हज़रत ने फ़रमाया कि इसी लिये तो मैंने लेने से इन्कार किया था। इस वाकि़ये के बाद ही से हारून रशीद हज़रत के दरपए क़त्ल हो गया।

(ख़वास अल उम्मता अल्लामा सिब्ते इब्ने जौज़ी पृष्ठ 416 प्रकाशित लाहौर)

हारून रशीद अब्बासी की सादात कुशी

हमीद बिन क़हतबा और उसका वाक़ेआ

तवारीख़ में है कि हारून रशीद तामीरे बग़दाद और दीगर मुल्की मसरूफि़यात की वजह से थोड़े अर्से तक सादात कुशी की तरफ़ मुतवज्जा न हो सका लेकिन जब उसे ज़रा सा सुकून हुआ तो उसने अपने आबाई जज़बात को बरूए कार लाने का तहय्या कर लिया और इसकी सई शुरू कर दी कि ज़मीन पर आले मोहम्मद का कोई बीज भी बाक़ी न रहने पाए , चुनान्चे उसने पूरा हौसला निकाला और हर मुमकिन सूरत से उन्हें तबाह व बरबाद कर दिया।

उलमा का कहना है कि उसने ग़ुन्ड़ों के गिरोह क़त्ले सादात के लिए मुक़र्रर कर दिये थे और ख़ुद अपनी हुकूमत के आला हुक्काम को ख़ुसूसी हुक्म भेज दिया था कि सलतनत व हुकूमत को पूरी ताक़त से सादात की तलाश की जाए और इनमें से एक को भी जि़न्दा ना छोड़ा जाए।

अल्लामा मजलिसी ‘‘ अब्दुल्लाह बज़ार नेशापुरी के हवाले से ’’ हाकिम ईरान हमीद इब्ने क़हतबा तूसी का एक ख़त लिखते हैं। इब्ने क़हतबा कहते हैं कि मैं इस लिये रौज़ा नमाज़ नहीं करता कि मुझे इल्म है कि मैं बख़्शा नहीं जा सकता और बहर सूरत जहन्नुम में जाऊँगा। ऐ अब्दुल्लाह! तुम से क्या बताऊँ अभी थोड़े अर्से की बात है कि हारून रशीद ने मुझे रात के वक़्त जब कि वह तूस आया हुआ था और मैं भी इत्तेफ़ाक़न आ गया , बुलाया और मुझे हुक्म दिया कि तुम इस ग़ुलाम के साथ जाओ और यह मेरी तलवार हमराह लेते जाओ , यह जो कहे वह करो। मैं इसके हुक्म से ग़ुलाम के साथ हो लिया। ग़ुलाम मुझे एक ऐसे मकान में ले गया जिसमें फ़ात्मा बिन्ते असद रसूल अल्लाह (स. अ.) और अली (अ.स.) की ज़ौजा बुतूल की औलाद क़ैद थी। ग़ुलाम ने एक कमरे का दरवाज़ा खोला और मुझ से कहा कि इन सब को क़त्ल कर के इस कुएं में डाल दो , मैंने उन्हें क़त्ल किया और कुएं में डाल दिया। फिर दूसरा कमरा खोला और मुझ से कहा कि इन सब को क़त्ल कर के कुऐं में डालो , मैंने उन्हें भी क़त्ल किया। मगर तीसरा कमरा खोला और मुझ से कहा कि उन्हें भी क़त्ल करो। मैंने उन्हें भी क़त्ल किया। ऐ अब्दुल्लाह इन सब मक़तूलों की तादाद साठ थी। इनमें छोटे , बड़े , बूढ़े , जवान और सभी कि़स्म के सादात थे। ऐ अब्दुल्लाह जब मैं आख़री कमरे के क़ैदी सादात को क़त्ल करने लगा तो आखि़र में एक नेहायत नूरानी बुजुर्ग बरामद हुए और मुझ से कहने लगे , ऐ ज़ालिम ! क्या रसूल अल्लाह (स अ व व ) को मुँह नहीं दिखाना है ? और क्या खुदा की बारगाह में तुझे नहीं जाना है ? यह तू क्या कर रहा है। इसका कलाम सुन कर मेरा दिल काँप गया और उन पर मेरा हाथ न उठा। इतने में ग़ुलाम ने मुझे डाँट कर कहा हुक्मे अमीर में क्यों देर करता है। उसके यह कहने पर मैंने उन्हें भी तलवार के घाट उतार दिया। अब मेरी नमाज़ और मेरा रौज़ा मुझे क्या फ़ायदा पहुँचा सकता है।

हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की दोबारा गिरफ़्तारी

अल्लामा इब्ने शहर आशोब , अल्लामा तबरसी , अल्लामा अरबली , अल्लामा शिबलन्जी तहरीर फ़रमाते हैं कि 169 -70 हिजरी में हादी के बाद हारून तख़्ते खि़लाफ़त पर बैठा। सलतनत अब्बासीया के क़दीम रवायत जो सादात बनी फ़ात्मा (स अ व व ) की मुख़ालेफ़त मे थे इसके पेशे नज़र थे। खुद इसके बाप मन्सूर का रवय्या जो इमामे जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के खि़लाफ़ था उसे मालूम था। उसका यह इरादा की जाफ़रे सादिक़ के जानशीन को क़त्ल कर डाला जाए यक़ीनन उसके बेटे हारून को मालूम हो चूका होगा वह तो इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की हाकीमाना वसीयत का इख़्लाक़ी दबाव था जिसने मन्सूर के हाथ बांध दिये थे और फिर शहर बग़दाद की तामीर की मसरूफ़ीयत थी जिसने उसे उस जानिब मुतावज्जे नहीं होने दिया था। अब हारून के लिये उनमें से कोई बात माने नहीं थी तख़्ते सलतनत पर बैठ कर अपने अख़्तेदार को मज़बूत करने के रखने के लिये सब से पहले यह ही तसव्वर पैदा हो सकता था कि इस रूहानियत के मरक़ज़ को जो मदीने महल्ला बनी हाशिम में क़ाएम है तोड़ने की कोशिश की जाए मगर एक तरफ़ इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) का मोहतात और ख़ामोश तरज़े अमल और दूसरी सलतनत की अन्दुरूनी मुश्किलात उनकी वजह से 9 बरस तक हारून रशीद को भी किसी खुले हुऐ तशद्दुद का इमाम के खि़लाफ़ मौक़ा न मिला।

इसी दौरान में अब्दुल्लाह इब्ने हसन के फ़रज़न्द याहिया दरपेश हुआ वह अमान दिये जाने के बाद तमाम अहदो पैमान को तोड़ कर दर्द नाक तरीक़े पर क़ैद रखे गये और फिर क़त्ल किये गए बावजूद कि याहिया के मामलात से इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) को किसी तरह का सरो कार न था बल्कि वाक़ेयात से साबित होता है कि हज़रत उनको हुकूमते वक़्त की मुख़ालफ़त से मना फ़रमाते थे। मगर अदावते बनी फ़ात्मा का जज़बा जो याहिया बिन अब्दुल्लाह की मुख़ालेफ़त के बहाने से उभर गया था इसकी ज़द से हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) भी महफ़ूज़ न सके। इधर याहिया बिन खा़लिद बर मक्की जो वज़ीरे आज़म था अमीन (फ़रज़न्द हारून रशीद) के अतालिक़ ताफरबिन मोहम्मद अशअस की रक़ाबत में इसके खि़लाफ़ यह इल्ज़ाम क़ाएम किया कि यह इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के शियों में से है और इनके इक़तिदार का ख़्वाह है।

बराह रास्त उस का मक़सद हारून को जाफ़र से बरग़श्ता करना था लेकिन बिल वास्ता इसका ताअल्लुक़ हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के साथ भी था इस लिये हारून को हज़रत की ज़रर रसानी की फि़क्र पैदा हो गई इस दौरान में यह वाकि़या पैदा हुआ कि हारून रशीद हज के इरादे से मक्का मोअज़्ज़मा में आया। इत्तेफ़ाक़ से इसी साल हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) भी हज को तशरीफ़ लाए हुए थे। हारून ने अपनी आँख से इस अज़मत व मरजीयत का मुशाहेदा किया जो मुसलमानों में इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के मुतालिक़ पाई जाती थी। इससे इसके हसद की आग भी भड़क उठी। इसके बाद इसमें मोहम्मद बिन इस्माईल की मुख़ालेफ़त ने और इज़ाफ़ा कर दिया वाक़ेया ये है कि इस्माईल इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के बड़े फ़रज़न्द थे और इस लिये उनकी जि़न्दगी में आम तौर पर लोगों का ख़्याल यह था कि वह इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के क़ायम मुक़ाम हो गये मगर उनका इन्तेक़ाल इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के ज़माने में ही हो गया और लोगों का ख़्याल ग़लत साबित हुआ फिर भी बाज़ सादा लौह असहाब इस ख़्याल पर क़ायम रहे कि जा नशिनी का हक़ इस्माईल और औलादे इस्माईल में मुनहासिर है। उन्होंने इमाम हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की इमामत को क़ुबूल नहीं किया चुनान्चे इस्माईलिया फि़रका़ बन गया मुख़्तसर तादाद में सही अब दुनिया में मौजूद थे। मोहम्मद इन ही इस्माईल के फ़रज़न्द थे और इस लिये मूसा काजि़म (अ.स.) से एक तरह की मुख़ालेफ़त पहले से रखते थे। मगर चुंकि इनके मानने वालों की तादाद बहुत ही कम थी और वह हज़रात कोई नुमाया हैसियत न रखते थे इस लिये ज़ाहिरी तौर पर इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के यहां आमदो नफ़्त रखते थे और ज़ाहिरी तौर पर क़राबत दारी के तालुक़ात क़ाएम किए हुए थे।

हारून रशीद ने इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की मुखालफ़त की सूरतों पर ग़ौर करते हुए याहिया बर मक्की से मशविरा लिया कि मैं चाहता हूँ कि औलादे अबू तालिब में से किसी को बुला कर इससे मूसा इब्ने जाफ़र के पूरे हालात दरयाफ़्त करूं। याहिया जो ख़ुद अदावत बनी फ़ात्मा में हारून से कम न था इसने मोहम्मद बिन इस्माईल का पता दिया कि आप इनको बुला कर दरयाफ़्त करें तो सही हालात मालूम हो सकेंगे चुनान्चे उसी वक़्त मोहम्मद बिन इस्माईल के नाम ख़त लिखा गया।

शहनशाहे वक़्त का ख़त जो मोहम्मद बिन इस्माईल को पहुँचा तो उसने अपनी दुनियांवी कामयाबी का बेहतरीन ज़रिया समझ कर फ़ौरन बग़दाद जाने का इरादा कर लिया मगर इन दिनों हाथ बिल्कुल ख़ाली थे , इतना रूपया पैसा मौजूद न था कि सामाने सफ़र करते मजबूरत इसी डेवढी पर आना पड़ा जहां करम व अता में दोस्त व दुश्मन की तफ़रीक़ न थी। इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के पास आ कर बग़दाद जाने का इरादा ज़ाहिर किया। हज़रत ख़ूब समझते थे कि इस बग़दाद के सफ़र का पस मन्ज़र और इसकी बुनियाद क्या है। हुज्जत तमाम करने की ग़रज़ से आप ने सफ़र का सबब दरयाफ़्त किया। उन्होंने अपनी परेशान हाली बयान करते हुए क़र्ज़दार बहुत हो गया हूँ कि शायद वहां जा कर कोई सूरत बसर अवक़ात की निकले और मेरा क़र्ज़ा अदा हो जाए। हज़रत ने फ़रमाया वहां जाने की ज़रूरत नहीं है , मैं वादा करता हूँ कि तुम्हारा क़र्ज़ा अदा करूगां और जहां तक होगा। तुम्हारे ज़रूरयाते जि़न्दगी भी पूरी करता रहूँगा। अफ़सोस है कि मोहम्मद ने इसके बाद बग़दाद जाने का इरादा नहीं बदला। चलते वक़्त हज़रत से रूख़सत होने लगे तो अज्र किया कि मुझे वहां के मुताअल्लिक़ कुछ हिदायत फ़रमाई जाएं , हज़रत ने उसका कुछ जवाब न दिया। जब उन्होंने कई मरतबा इस्रार किया तो हज़रत ने फ़रमायाः बस इतना ख़्याल रखना कि मेरे ख़ून में शरीक न होना और मेरे बच्चों की यतीमी के बाएस न बनना। कुछ और हिदायत फ़रमाइये , हज़रत ने उसके अलावा कुछ कहने से इन्कार किया। जब वह चलने लगे तो हज़रत ने साढ़े चार सौ दीनार और पन्द्रह सौ दिरहम उन्हें मसारिफ़े सफ़र के लिये अता फ़रमायें। नतीजा वही हुआ जो हज़रत के पेशे नज़र था। मोहम्मद बिन इस्माईल बग़दाद पहुँचे और वज़ीरे आज़म बर मक्की के मेहमान हुए। उसके बाद यहीया के साथ हारून के दरबार में पहुँचे। मसलेहते वक़्त की बिना पर बहुत ताज़ीमो तकरीम की गई। गुफ़्तुगू के दौरान हारून ने मदीने के हालात दरयाफ़्त किये। मोहम्मद ने इन्तेहाईं ग़लत बयानियो के साथ वहां के हालात का तज़किरा किया और यह भी कहा कि मैंने आज तक नहीं देखा और न सुना कि एक मुल्क में दो बादशाह हों। उसने कहा ! कि इसका क्या मतलब ? मोहम्मद ने कहा कि बिल्कुल उसी तरह जैसे आप बग़दाद में सलतनत कर रहे हैं मूसा काजि़म मदीने में अपनी सलतनत क़ायम किये हुए हैं , अतराफ़ मुल्क से उनके पास खि़राज पहुँचता है और वह आपके मुक़ाबले के दावे दार हैं। उन्होंने बीस हज़ार अशरफी की एक ज़मीन ख़रीदी है जिसका नाम ‘‘ सैरिया ’’ है। (शिबलन्जी) यही बाते थीं जिनके कहने के लिये यहीया बर मक्की ने मोहम्मद को मुन्तखि़ब किया था। हारून का ग़ैज़ो ग़ज़ब इन्तेहाई इशतेआल के दरजे तक पहुँच गया उसने मोहम्मद को दस हज़ार दीनार अता कर के रूख़सत किया। ख़ुदा का करना यह कि मोहम्मद को इस रक़म से फ़ायदा उठाने का एक दिन भी मौक़ा नहीं मिला इसी शब को उनके हलक़ में दर्द पैदा हुआ ग़ालेबन ‘‘ ख़न्नाक ’’ हो गया और सुबह होते होते वह दुनिया से रूख़सत हो गये। हारून को यह ख़बर पहुँची तो अशरफि़यों के तोड़े वापस मंगवा लिये मगर मोहम्मद की बातों का असर उसके दिल पर ऐसा जम गया था कि उसने यह तय कर लिया कि इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) का नाम सफ़हे हसती से मिटा दिया जाय। चुनान्चे 169 हिजरी में फिर हारून रशीद ने मक्कए मोअज़्ज़मा का सफ़र किया और वहां से मदीना ए मुनव्वरा गया। दो एक रोज़ क़याम के बाद कुछ लोग इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) को गिरफ़्तार करने के लिये रवाना किये। जब यह लोग इमाम (अ.स.) के मकान पर पहुँचे तो मालूम हुआ कि हज़रत रौज़ा ए रसूल (स अ व व ) पर हैं। उन लोगों ने रौज़ा ए पैग़म्बर (स अ व व ) की इज़्ज़त का भी ख़्याल न किया। हज़रत उस वक़्त क़ब्रे रसूल (स अ व व ) के नज़दीक नमाज़ में मशग़ूल थे। बे रहम दुश्मनों ने आपको नमाज़ की ही हालत में क़ैद कर लिया और हारून के पास ले गये।

मदीना ए रसूल (स अ व व ) के रहने वालों में बे हिसी इसके पहले भी बहुत दफ़ा देखी जा चुकी थी। यह भी इसकी एक मिसाल थी कि रसूल (स. अ.) के फ़रज़न्द रौज़ा ए रसूल (स अ व व ) से इस तरह गिरफ़्तार कर के ले जाया जा रहा था मगर नाम नेहाद मुसलमानों में एक भी ऐसा न था जो किसी तरह की आवाज़े एहतेजाज बलन्द करता। यह 20 शव्वाल 179 हिजरी का वाकि़या है।

हारून इस अन्देशे से कि कोई जमाअत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) को रिहा कराने की कोशिश न करे दो महमिले तैय्यार कराईं। एक में इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) को सवार कराया और उसको एक बहुत बड़े फ़ौजी दस्ते के हल्क़े में बसरे रवाना किया और दूसरी महमिल जो ख़ाली थी उसे भी इतनी ही तादात की हिफ़ाज़त में बग़दाद रवाना किया। मक़सद यह था कि आपके महले क़याम और क़ैद की जगह को भी मशक़ूक बना दिया जाए। यह निहायत हसरत नाक वाकि़या था कि इमाम के अहले हरम और बच्चे वक़्ते रूख़सत आपको देख भी न सके और अचानक महल सरा में सिर्फ़ यह इत्तेला पहुँच सकी कि हज़रत सलतनते वक़्त की तरफ़ से क़ैद कर लिये गये हैं। इससे बीवियों और बच्चों में कोहराम बरपा हो गया और यक़ीनन इमाम के दिल पर भी जो इसका सदमा हो सकता है वह ज़ाहिर है मगर आपके ज़ब्तो सब्र की ताक़त के सामने हर मुश्किल आसान थी।

मालूम नहीं कितने हेर फेर से यह रास्ता तय किया गया था कि पूरे एक महीने सत्तरह रोज़ के बाद 7 जि़ल्हिज्जा को आप बसरे पहुँचाये गये। एक साल तक आप बसरे में क़ैद रहे। यहां का हाकिम हारून का चचा ज़ाद भाई ईसा बिन जाफ़र था। शुरू में तो उसे सिर्फ़ बादशाह के हुक्म की तामील मद्दे नज़र थी बाद में उसने ग़ौर करना शुरू किया कि आखि़र उनके क़ैद किये जाने का सबब क्या है।

इस सिलसिले में उसको इमाम (अ.स.) के हालात और सीरते जि़न्दगी इख़लाक़ो अवसाफ़ की जुस्तुजू का मौक़ा भी मिला और जितना उसने इमाम की सीरत का मुतालेआ किया उतना उसके दिल पर आपकी बलन्दीए इख़लाक़ और हुसैन किरदार का असर का़यम होता गया। अपने इन असरात से उसने हारून को मुत्तला भी किया। हारून पर इसका उल्टा असर हुआ। ईसा के बारे में बदगुमानी पैदा हो गई इस लिये उसने इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) को बग़दाद में बुला भेजा और फ़ज़ल बिन रबी की हिरासत में दे दिया और फिर फ़ज़ल का रूझान शिअत की तरफ़ महसूस करके यहीया बर मक्की को उसके लिये मुक़र्रर किया।

मालूम होता है कि इमाम के इख़्लाक़ और अवसाफ़ की कशिश हर एक पर अपना असर डालती थी इस लिये ज़ालिम बादशाह को निगरानों की तबदीली की ज़रूरत पड़ती थी। सब से आखि़र में इमाम (अ.स.) सिन्दी बिन शाहक के क़ैद ख़ाने में रखे गये , यह बहुत ही बे रहम और सख़्त दिल था। मुलाहेज़ा हो।(मनाक़िब जिल्द 5 पृष्ठ 68 व आलामुल वुरा पृष्ठ 180, कशफ़ल ग़म्मा पृष्ठ 108, नूरूल अबसार पृष्ठ 136, सवानेह मूसा काजि़म पृष्ठ 15 )


इमाम (अ.स.) का क़ैद ख़ाने में इम्तेहान और इल्मे ग़ैब का मुज़ाहेरा

अल्लामा शिब्लनजी लिखते हैं कि जिस ज़माने में आप हारून रशीद के क़ैद ख़ाने में सखि़्तयां बरदाश्त फ़रमा रहे थे इमाम अबू हनीफ़ा के शार्गिद रशीद अबू युसूफ़ और मोहम्मद बिन हसन एक शब क़ैद ख़ाने में इस लिये गये कि आपके बहरे इल्म की थाह मालूम करें और देखें कि आप इल्म के कितने पानी में है। वहां पहुँच कर उन लोगों ने सलाम किया , इमाम (अ.स.) ने जवाबे सलाम इनायत फ़रमाया। अभी यह हज़रात कुछ पूछने ना पाय थे कि एक मुलाजि़म डयूटी ख़त्म कर के घर जाते हुए आपकी खि़दमत में अर्ज परदाज़ हुआ कि मैं कल वापस आऊँगा अगर कुछ मंगाना हो तो मुझ से फ़रमा दीजिये मैं लेता आऊँगा। आपने इरशाद फ़रमाया मुझे किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं। जब वह चला गया तो आपने अबू युसूफ़ वग़ैरा से कहा कि यह बेचारा मुझसे कहता है कि मैं उस से अपनी हाजत बयान करूं ताकि यह कल उसकी तकमील व तामील कर दे लेकिन उसे ख़बर नहीं कि यह आज रात को वफ़ात पा जायेगा। इन हज़रात ने जो यह सुना तो सवाल जवाब के बग़ैर ही वापस चले आये और आपस में कहने लगे कि हम इन से हलालो हराम , वाजिबो सुन्नत के मुताअल्लिक़ सवालात करना चाहते थे। ‘‘ फ़ा अख़ाज़ा यतकलम माआना इल्म अल ग़ैब ’’ मगर यह तो हमसे इल्में ग़ैब की बाते कर रहे हैं। उसके बाद उन दोनों हज़रात ने उस मुलाजि़म के हालात का पता लगाया तो मालूम हुआ कि वह नागहानी तौर पर रात ही में वफ़ात कर गया। यह मालूम करके इन हज़रात को सख़्त ताअज्जुब हुआ।

(नूरूल अबसार पृष्ठ 146 )

अल्लामा अरबली लिखते हैं कि इस वाकि़ये के बाद यह हज़रात फिर इमाम (अ.स.) की खि़दमत में हाजि़र हो कर अर्ज़ परदाज़ हुए कि हमें मालूम था कि आपको सिर्फ़ इल्मे हलालो हराम में ही महारत हासिल है लेकिन क़ैद ख़ाने के मुलाजि़म के वाकि़ये ने वाज़े कर दिया कि आप इल्म अल मनाया और इल्मे ग़ैब भी जानते हैं। आपने इरशाद फ़रमाया कि यह इल्म हमारे लिये मख़्सूस है। इसकी तालीम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स. अ.) ने हज़रत अली (अ.स.) को दी थी और उनसे यह इल्म हम तक पहुँचा है।

हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की शहादत

अल्लामा शिब्लन्जी लिखते हैं कि जब हारून रशीद ने बसरे में एक साल क़ैद रखने के बाद ईसा इब्ने जाफ़र वालिये बसरा को लिखा कि मूसा बिन जाफ़र (इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) को क़त्ल कर के बादशाह को उनके वुजूद से सुकून दे दे तो उसने अपने हमर्ददों से मशवेरे के बाद हारून रशीद को लिखा कि ऐ बादशाह इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) में मैं ने एक साल के अन्दर कोई बुराई नहीं देखी यह शबो रोज़ नमाज़ रोज़े में मसरूफ़ व मशग़ूल रहते हैं अवाम और हुकूमत के लिये दुआए ख़ैर किया करते हैं और मुल्क की फ़लाह व बहबूद के ख़्वाहिश मन्द हैं भला मुझ से क्यों कर हो सकता है कि मैं उन्हें क़त्ल कर के अपनी आक़ेबत बिगाड़ूं।

ऐ बादशाह ! मैं उनके क़त्ल करने में अपने अन्जाम और अपनी आक़ेबत की तबाही देख रहा हूँ और सख़्त हरज महसूस करता हूँ लेहाज़ा तू मुझे इस गुनाहे अज़ीम के इरतेक़ाब से माफ़ कर बल्कि मुझे हुक्म दे दे कि मैं उन्हें क़ैदे मशक़्क़त से रिहा करूं। इस ख़त को पाने के बाद हारून रशीद ने आखि़र में यह काम सन्दी बिन शाहक के हवाले किया और इसी से आपको ज़हर दिलवा कर शहीद करा दिया। ज़हर खाने के बाद आप तीन रोज़ तक तड़पते रहे , यहां तक कि वफ़ात पा गये।

(नूरूल अबसार पृष्ठ 137 )

अल्लामा जामी लिखते हैं कि ज़हर खाते ही आपने फ़रमाया कि आज मुझे ज़हर दिया गया है कल मेरा बदन ज़र्द हो जायेगा और तीसरे रोज़ काला हो जायेगा और उसी दिन मैं इस दुनियां से रूख़सत हो जाऊँगा। चुनान्चे ऐसा ही हुआ।

(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 193 )

अल्लामा इब्ने हजरे मक्की लिखते हैं कि हारून रशीद ने आपको बग़दाद में क़ैद कर दिया और ता-हयात क़ैद रखा। आपकी वफ़ात के बाद हथकड़ी और बेड़ी कटवाई गई। आपकी वफ़ात हारून रशीद के ज़हर से हुई जो उसने सन्दी इब्ने शाहक के ज़रिये से दिलवाया था। जब आपको खाने या ख़ुरमा में ज़हर दिया गया तो आप तीन रोज़ तक तड़प ते रहे। यहां तक कि इन्तेक़ाल हो गया।

(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 132, अरजहुल मतालिब पृष्ठ 454 )

अल्लामा इब्ने अल साई अली बिन अल नजब बग़दादी लिखते हैं कि आप को ज़हर से इन्तेहाई मज़लूमी की हालत में शहीद कर दिया गया।

(अख़बारूल ख़ुलफ़ा)

अल्लामा अबुल फि़दा लिखते हैं कि क़ैद खा़ने रशीद में आपने वफ़ात पाई।

(अबुल फि़दा जिल्द 2 पृष्ठ 151 )

अल्लामा दायरे बकरी लिखते हैं कि आपको हारून रशीद के हुक्म से यहीया इब्ने ख़ालिद बर मक्की वज़ीरे आज़म ने ख़ुरमे में ज़हर दे कर शहीद कर दिया।(तारीख़े ख़मीस जिल्द 2 पृष्ठ 320 )

अल्लामा जामी लिखते हैं कि आपको हारून रशीद ने बग़दाद में ला कर ता उम्र क़ैद रखा आखि़र में अपने वज़ीरे आज़म यहीया इब्ने ख़ालिद बर मक्की के ज़रिये से क़ैद ख़ाने में ज़हर दिलवा दिया और आप वफ़ात पा गये।

(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 193 )

अल्लामा मजलिसी तहरीर फ़रमाते हैं कि आपको कई मरतबा ज़हर दिया गया लेकिन आप हर बार महफ़ूज़ रहे। एक मरतबा आपने वह ख़ुरमा उठा कर जिसमें ज़हर था ज़मीन पर फ़ेंक दिया जिसे हारून के कुत्ते ने खा लिया और वह मर गया कुत्ते के मरने की ख़बर से हारून रशीद को शदीद रंज हुआ और उसने ख़ादिम से सख़्त बाज़ पुर्स की।(जिलाउल उयून पृष्ठ 173 )

आपकी तारीख़े वफ़ात

आप की वफ़ात हसरत आयात बतारीख़ 25 रजबुल मुरज्जब 183 हिजरी यौमें जुमा वाक़े हुई। आपकी उम्र उस वक़्त 55 साल की थी।

(मतालेबुल सुऊल पृष्ठ 282, अलाम अल वरा पृष्ठ 171 व शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 192, नूरूल अबसार पृष्ठ 137 वगै़रह) अपने 14 साल हारून रशीद के क़ैद ख़ाने में गुज़ारे।

मिर्ज़ा दबीर कहते हैं

मौला पर इन्तेहाए असीरी गुज़र गई।

जि़न्दान में जवानी व पीरी गुज़र गई।।

वफ़ात के बाद आपकी नाअशे मुबारक क़ैद ख़ाने से हथकड़ी और बेड़ी समेत निकाल कर बग़दाद के पुल पर डाल दी गई और नेहायत तौहीन आमेज़ अलफ़ाज़ में आपके और आपके मानने वालों को याद किया गया लोग अगरचे बादशाह के ख़ौफ़ से नुमाया तौर पर मज़हमत की जुरअत ना करते थे ताहम एक गिरोह ने जिसके सरदार सुलेमान बिन जाफ़र इब्ने अबी जाफ़र थे हिम्मत की और नाअशे मुबारक दुश्मनों से छीन कर ग़ुस्लों कफ़न का बन्दो बस्त किया। ढ़ाई हज़ार का कि़मती कफ़न दिया , जिस पर पूरा क़ुरआन लिखा हुआ था। नेहायत तुज़ुक व एहतिशाम से जनाज़ा ले कर चले इन लोगों के गरेबान ग़में इमामे मज़लूम में चाक थे यह इन्तेहाई ग़म व अलम के साथ जनाज़े को ले कर मक़बरा क़ुरैश में पहुँचे। हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) नमाज़ व दफ़न के लिये मदीना से ब ऐजाज़ पहुँच चुके थे। आपने नमाज़ पढ़ाई और अपने वालिदे माजिद को सुपुर्दे ख़ाक फ़रमाया।

(आलामुल वुरा पृष्ठ 170 अनवारे नोमानिया पृष्ठ 127 जिन्नात अल ख़लूद पृष्ठ 130 जिलाउल उयून पृष्ठ 275 )

तदफ़ीन के बाद हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) वापस मदीना तशरीफ़ ले गए। मदीने वालों को जब आपकी शहादत की इत्तिला मिली तो कोहराम बरपा हो गया। मातम और अदाए ताज़ीयत का सिलसिला मुद्दतों जारी रहा।

(जिलाउल उयून पृष्ठ 276 )

अल्लामा मोहम्मद बिन तलह शाफ़ेई लिखते हैं कि आप की तदफ़ीन के एक अर्से बाद अयान मुल्क से एक शख़्स ने वफ़ात की , लोगों की ख़्वाहिश पर उसे आप ही के मक़बरे में दफ़न कर दिया गया। एक शब उसने अपने ख़ादिम को ख़्वाब में आगाह किया। उसने देखा कि मक़बरे में आग लगी हुई है और इससे धुआं फ़ैल रहा है और बदबू फैल रही है , सुबह को उसने बादशाहे वक़्त को बाख़बर किया , बादशाह ने क़ब्र ख़ुदवाई तो आग के आसार मौजूद थे और क़ब्र में मैय्यत का वजूद ना था वह जल कर ख़ाक स्तर हो गई थी।

(मतालिबुल सुऊल पृष्ठ 281 )

तादादे औलाद

सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 122 में है कि आपके 37 औलाद थीं। अल्लामा तबरसी , अल्लामा अरबली और हज़रत शैख़ मुफ़ीद लिखते हैं कि आप के 19 लड़के 18 लड़कियाँ थी जिनके नाम यह हैं।

1.हज़रत इमाम रज़ा (अ स ) , 2. इब्राहीम , 3. अब्बास , 4. क़ासिम , 5. इस्माईल , 6. जाफ़र , 7. हारून , 8. हसन , 9.अहमद , 10. मोहम्मद , 11. हमज़ा , 12. अब्दुल्लाह , 13. इस्हाक़ , 14. अबीद अल्लाह , 15. ज़ैद , 16. हसन , 17. फ़ज़ल , 18. हुसैन , 19. सुलैमान , 20. फ़ात्मा , 21. कुबरा , 22. रूक़य्या , 23. आलीया , 24. रूक़य्या सुग़रा , 25. कुलसूम , 26. उम्मे जाफ़र , 27. लबाह , 28. ज़ैनब , 29. ख़तीजा , 30. आलीहा , 31. आमना , 32. हुसना , 33. बरयह , 34. उम्मे सलमा , 35. मैमूना , 36. उम्मे कुलसूम , 37. उम्मे अबीहा व ब़क़ौले उम्मे अब्दुल्लाह व बक़ौले उम्मे असमा।

(आलामुल वुरा पृष्ठ 181 कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 103 , इरशाद पृष्ठ 330 , नूरूल अबसार पृष्ठ 137 आपकी यह औलादें मुख़तलिफ़ बीबीयों से थे।


अबुलहसन हज़रत इमाम अली रज़ा ( अ स )

बतौर ज़ादे सफ़र उसवा ए हुसैन लिए

चला है सुए ख़ुरासान कारवाने रज़ा (अ.स.)

मुशाबेहत है बहुत करबला व मशहद में

वो आज़माइशे सब्र और ये इम्तेहाने रज़ा (अ.स.)

साबिर थरयानी ‘‘ कराची ’’

अरब से आप क्या आए कि , ईमान की बहार आई

अजम ने पाई इज़्ज़त मरकज़े , अहले विला हो कर

बहुत मुश्ताक़ थे अहले अजम , नूरे रिसालत के

ज़मीने तूस का चमका सितारा नक़्शा पा हो कर

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) रसूले करीम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.) के आठवें जां नशीन , मुसलमानो के आठवें इमाम और सिलसिला ए असमत की दसवीं कड़ी थे। आपके वालिदे माजिद इमाम मुसिए काज़िम (अ.स.) थे और वालेदा माजेदा उम्मुल बनीन उर्फ़ नजमा थीं। जनाबे नजमा के मुताअल्लिक़ उलमा का बयान है कि आपका शुमार अशरफ़े अजम में था और आप अक़ल व दियानीयत के लेहाज़ से अफ़ज़ल अन्साँ थीं। हमीदा ख़ातून यानी इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) की वालदा का कहना है कि मैंने उम्मुल बनीन से बेहतर किसी औरत को नहीं पाया।

अली बिन मीसम कहते हैं कि हमीदा ख़ातून को रसूले ख़ुदा (स.अ.) ने ख़्वाब में हुक्म दिया था कि उम्मुल बनीन की शादी इमाम मुसिए काज़िम (अ.स.) से करो ‘‘ क्यों कि सैलदसनहा ख़ैरा हल अर्ज़ ’’ इन से अनक़रीब एक ऐसा फ़रज़न्द पैदा होने वाला है जो मादरे गेती की आग़ोश में बसने वालों में सब से बेहतर होगा।( आलामुल वुरा पृष्ठ 182)

अल्लामा मोहम्मद रज़ा लिखते हैं कि जनाबे उम्मुल बनीन हुस्नो जमाल ज़ोहदो तक़वा में अपनी आप नज़ीर थीं।( जन्नातुल ख़ुलूद पृष्ठ 31)

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) अपने आबाओ अजदाद की तरह इमाम मन्सूस ‘‘मासूम’’ आलमें ज़माना और अफ़ज़ले काएनात थे। अल्लामा इब्ने हजर मक्की तहरीर फ़रमाते हैं कि आप तमाम लोगों में जलीलुल क़दर और अज़ीम उल मरतबत थे।( सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 122)

अल्लामा अब्दुरहमान जामी लिखते हैं कि आप की बातें पुर अज़ हिकमत और आपका अमल दरूस्त और आपका किरदार महफ़ूज़ अनल ख़ता था। आप इल्म हिकमत से भरपूर थे। रूए ज़मीन पर आपकी मिसाल व नज़ीर न थी।( शवाहेदुन नबूअत पृष्ठ 197 प्रकाशित लखनऊ 1904 0)

अल्लामा अबीद उल्लाह लिखते हैं कि इब्राहीम बिन अब्बास का कहना है कि मैंने इन से बड़ा आलम देखा ही नहीं।( अरजहुल मतालिब पृष्ठ 255)

अल्लामा शहीर लिखते हैं कि आप अशरफ़ुल मख़लूके ज़माना थे।( हबीब अल सैर ) आपको इल्मे माकान और मायकून आबाव अजदाद से विरासतन पहुँचा था।( वसीलतुन नजात पृष्ठ 377) आप हर ज़बान और हर लुग़त में फ़सीह और दाना तरीन मरदुम थे और जो शख़्स जिस ज़बान में बातें करता था उसको उसी ज़बान में जवाब देते थे।( रौज़तुल अहबाब ) अल्लामा मोहम्मद बिन तल्हा शाफ़ेई लिखते हैं कि आप बारह इमामों में के तीसरे अली हैं। आपका ईमान हद से बढ़ा हुआ था। आपकी शान इन्तेहां को पहुँची हुई थी। आपका कसरे फ़ज़ीलत निहायत बलन्द था और आपके इमकानाते करम निहायत वसी थे। आपके मद्दगार बे शुमार और आपके शरफ़ व इमामत निहायत रौशन थे इसी वजह से ख़लीफ़ा ए वक़्त मामून रशीद ने आपको अपने दिल में जगह दी , अपनी हुकूमत में शरीक क़रार दिया। ख़लीफ़ा ए हुकूमत बनाया और अपनी लड़की की शादी आपके साथ कर दी। आपके मनाक़िब व सिफ़ात निहायत बलन्द , आपके मकारम और आपके इख़्लाक़ निहायत अज़ीम थे। बस मुख़्तसर यह कि सिफ़ाते हसना की जो मंज़िले थीं उनसे आपका दरजा बलन्द था।( मतालेबुल सूऊल पृष्ठ 252)

पादरी लेनेन एडवर्ड सील डी 0 डी 0 लिखता है कि इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) ने अली बिन मूसा (अ.स.) को अपना वारिस इस लिये क़रार दिया कि वह उनको सब से ज़्यादा मन्सूबे इमामत का अलह समझते थे।( अशना अशरया , पृष्ठ 46 प्रकाशित लाहौर 1925 0)

हज़रत इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) फ़रमाते हैं कि मेरा यह फ़रज़न्द ‘‘ यतर मई फ़िल जाफ़र ला यनजू फ़ीहे इल्ला नबी अव वसी ’’ मेरे साथ जाफ़र जामए को देखता और उसे समझता है जिसे नबी और वसी के अलावा कोई देख नहीं सकता।( जन्नातुल ख़ुलूद पृष्ठ 31) रजाल कशी व दमए साकेबा पृष्ठ 35 व मसन्द इमाम रज़ा (अ.स.) के पृष्ठ 2 में है कि आप आलिम अहले ज़माना और कसीर उल सोम अल इबादत थे।

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की विलादत ब सआदत

उलेमा व मुवर्रेख़ीन का बयान है कि आप बा तारीख़ 11 ज़ीक़ादा 153 हिजरी यौमे पंज शम्बा बमक़ाम मदीना ए मुनव्वरा पैदा हुए हैं ( आलामुल वुरा , पृष्ठ 182 जिलाउल उयून पृष्ठ 280 रौज़तुल पृष्ठ जिल्द 3 पृष्ठ 13, अनवारूल नोमानिया पृष्ठ 127) आपकी विलादत के मुताअल्लिक़ अल्लामा मजलिसी और अल्लामा मोहम्मद पारसा तहरीर फ़रमाते हैं कि जनाबे उम्मुल बनीन का कहना है कि जब तक इमाम अली रज़ा (अ.स.) मेरे बत्न में रहे मुझे हमल की गरानियां क़तअन महसूस नहीं हुई। मैं ख़्वाब में अक्सर तसबीह व तहलील और तमजीद व तहमीद की आवाज़े सुना करती थी। जब इमाम रज़ा (अ.स.) पैदा हुए तो आपने ज़मीन पर तशरीफ़ लाते ही दोनों हाथ ज़मीन पर टेक दिये और अपना सरे मुबारक आसमान की तरफ़ बलन्द कर दिया। आपके होंठ जुम्बीश करने लगे। ऐसा मालूम होता था कि जैसे आप ख़ुदा से कुछ बातें कर रहे हैं। इसी असना में इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) तशरीफ़ लाये और मुझसे इरशाद फ़रमाया कि तुम्हे ख़ुदा वन्दे आलम की इनायत व करामत मुबारक हो। फिर मैंने मौलूदे मसूद को आपकी आग़ोश में दे दिया। आपने उसके दाहिने कान में अज़ान और बायें कान में अक़ामत कही। इसके बाद आपने इरशाद किया कि ‘‘ बग़ीर ईं रा कि बक़िया ख़ुदा अस्त दर ज़मीनो हुज्जत ख़ुदा अस्त बाद अज़ मन ’’ इसे ले लो यह ज़मीन पर ख़ुदा की निशानी है और मेरे बाद हुज्जते अल्लाह के फ़राएज़ का ज़िम्मेदार है।

इब्ने बाबविया फ़रमाते हैं कि आप दीगर आइम्मा (अ.स.) की तरह मख़्तून और नाफ़ बुरिदा (यानी ख़त्ना हुये और नाफ़ कटे हुये) पैदा हुये।( नस्ल अल ख़ताब जिलाउल उयून पृष्ठ 269)

नाम , कुन्नियत , अल्क़ाब

आपके वालिदे माजिद हज़रत इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) ने लौहे महफ़ूज़ के मुताबिक़ और तइय्युने रसूल (स.अ.) के मुवाफ़िक़ आपको इस्मे अली से मौसूम फ़रमाया। आप आले मोहम्मद (स.अ.) में के तीसरे ‘‘ अली ’’ हैं। (आलामुल वुरा पृष्ठ 225 व मतालेबुल सूऊल पृष्ठ 282) आपकी कुन्नीयत ‘‘अबुल हसन’’ थी और आपके अलक़ाब साबिर , ज़की , वली , रज़ी , वसी थे। ‘‘ वशहरहा अल रज़ा ’’ और मशहूर तरीन लक़ब रज़ा था ( नूरूल अबसार पृष्ठ 128 तज़किरा ख़वासुल उम्मता पृष्ठ 198)

लक़ब रज़ा की वजह

अल्लामा तबरेसी तहरीर फ़रमाते हैं कि आप को रज़ा इस लिये कहते हैं कि आसमानों ज़मीन में ख़ुदा वन्दे आलम , रसूले अकरम (स.अ.) और आइम्मा ए ताहेरीन (अ.स.) और तमाम मुख़ालेफ़ीन व मुवाफ़ेक़ीन आप से राज़ी थे। (आलमुल वुरा पृष्ठ 182)

अल्लामा मजलिसी तहरीर फ़रमाते हैं कि बज़नती ने हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) से लोगों की अफ़वाह का हवाला देते हुये कहा कि आपके वालिदे माजिद को लक़ब रज़ा मामून रशीद ने मुलक़्क़ब किया था। आपने फ़रमाया हरगिज़ नहीं। यह लक़ब ख़ुदा व रसूल (स.अ.) की ख़ुशनूदी का जलवा बरदार है और सच बात यह है कि आप से मुवाफ़िक़ व मुख़ा लिफ़ दोनों राज़ी और ख़ुशनूद थे।( जिलाउल उयून पृष्ठ 269 रौज़तुल पृष्ठ जिल्द 3 पृष्ठ 12)

आपकी तरबियत

आपकी नशोनुमा और तरबियत अपने वालिदे बुज़ुर्गवार हज़रत इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) के ज़ेरे साया हुई और इसी मुक़द्दस माहौल में बचपना और जवानी की मुताअद्दिद मंज़िलें तय हुईं और 30 से 35 बरस की उम्र पूरी हुई। अगरचे आख़री चन्द साल इस मुद्दत के वह थे। जब इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) ईराक़ में क़ैदे ज़ुल्म की सख़्तियां बरदाश्त कर रहे थे , मगर उससे पहले 24 या 25 बरस आपको बराबर अपने पदरे बुज़ुर्गवार के साथ रहने का मौक़ा मिला।

बादशाहाने वक़्त

आपने अपनी ज़िन्दगी की पहली मंज़िल से ताबा अहदे वफ़ात बहुत से बादशाहों के दौर देखे। आप 153 ई 0 में अहदे मन्सूर दवानक़ी पैदा हुए। (तारीख़े ख़मीस) 158 हिजरी में मेहदी अब्बासी , 169 हिजरी में हादी अब्बासी , 170 हिजरी में हारून रशीद अब्बासी , 194 हिजरी में अमीन अब्बासी , 198 हिजरी में मामून रशीद अब्बासी अलत तरतीब ख़लीफ़ा ए वक़्त होते रहे।( इब्नुल वरदी , हबीब अल सियर , अबुल फ़िदा )

आपने हर एक का दौर बा चश्में खुद देखा और आप पदरे बुज़ुर्गवार नीज़ दीगर औलादे अली (अ.स.) व फ़ात्मा (स.अ.) के साथ जो कुछ होता रहा उसे आप मुलाहेज़ा फ़रमाते रहे यहां तक कि 230 हिजरी में आप दुनियां से रूख़सत हो गये और आपको ज़हर दे कर शहीद कर दिया।

जानशीनी

आपके पदरे बुज़ुर्गवार हज़रत इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) को मालूम था कि हुकूमते वक़्त जिसकी बाग डोर उस वक़्त हारून रशीद अब्बासी के हाथों में थी। आपको आज़ादी की सांस न लेने देगी और ऐसे हालात पेश आ जायेंगे कि आपकी उम्र के आखि़री हिस्से और दुनियां को छोड़ने के मौक़े पर दोस्ताने अहले बैत का आपसे मिलना या बाद के लिये रहनुमा का दरयाफ़्त करना गै़र मुमकिन हो जायेगा इस लिये आपने उन्हें आज़ादी के दिनों और सुकून के अवक़ात में जब कि आप मदीने में थे , पैरवाने अहले बैत को अपने बाद होने वाले इमाम से रूशेनास कराने की ज़रूरत महसूस फ़रमाई। चुनान्चे औलादे फ़ात्मा (स.अ.) में से 17 आदमी जो मुम्ताज़ हैसियत रखते थे उन्हें जमा फ़रमा कर अपने फ़रज़न्द हज़रत इमाम अली रज़ा (अ.स.) की वसी होने और जांनशीनी का ऐलान फ़रमा दिया और एक वसियत नामा तहरीरन भी मुकम्मल फ़रमा दिया जिस पर मदीने के मोअज़्जे़ज़ीन में से आठ आदमियों की गवाही लिखी गई। यह अहतेमाम दूसरे आइम्मा के यहां नज़र नहीं आया सिर्फ़ उन ख़ुसूसी हालात की बिना पर जिन से दूसरे आइम्मा अपनी वफ़ात के मौक़े पर दो चार नहीं होने वाले थे।

इमाम मूसाए काज़िम (अ.स.) की वफ़ात और इमाम रज़ा (अ.स.) के दौरे इमामत का आग़ाज़

183 हिजरी में हज़रत इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) ने क़ैद ख़ाना ए हारून रशीद में अपनी उम्र का एक बहुत बड़ा हिस्सा गुज़ार कर दरजा ए शहादत हासिल फ़रमाया। आपकी वफ़ात के वक़्त इमाम रज़ा (अ.स.) की उम्र मेरी तहक़ीक़ के मुताबिक़ तीस साल की थी। वालिदे बुज़ुर्गवार की शहादत के बाद इमामत की ज़िम्मेदारियां आपकी तरफ़ मुन्तक़िल हो गई। यह वह वक़्त था कि बग़दाद में हारून रशीद तख़्ते खि़लाफ़त पर मुतमक्किन था और बनी फ़ात्मा के लिये हालात बहुत ही ना साज़गार थे।

हारूनी फ़ौज और ख़ाना ए इमाम रज़ा (अ.स.)

हज़रत इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) के बाद दस बरस हारून रशीद का दौर रहा। यक़ीनन वह इमामे रज़ा (अ.स.) के वजूद को भी दुनियां में इसी तरह बरदाश्त नहीं कर सकता था जिसके तरह उसके पहले आपके वालिदे बुज़ुर्गवार का रहना उसने गवारा नहीं किया। मगर यह तो इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) के साथ जो तवील मुद्दत तक तशद्दुद और ज़ुल्म होता रहा और जिसके नतीजे में क़ैद खा़ने के ही अन्दर आप दुनिया से रूख़सत हो गये। इस से हुकूमते वक़्त की आम बदनामी हो गयी थी और या वाक़ेई ज़ालिम की बद सुलूक़ियों का एहसास और ज़मीर की तरफ़ से मलामत की कैफ़ियत थी जिसकी वजह से खुल्लम खुल्ला इमाम रज़ा (अ.स.) के खि़लाफ़ कोई कारवाई की थी लेकिन वक़्त से पहले उसने इमाम रज़ा (अ.स.) को सताने में कोई दक़ीक़ा अन्जाम नहीं दिया।

हज़रत के अहदे इमामत संभालते ही हारून रशीद ने आपका घर लुटवा दिया और औरतों के ज़ेवरात और अच्छे कपड़े तक उतरवा लिये थे।

तारीख़े इस्लाम मे है कि हारून रशीद ने इस हवाले और बहाने से कि मोहम्मद बिन जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने उसकी हुकूमत व खि़लाफ़त से इन्कार कर दिया है। एक अज़ीम फ़ौज ईसा जलोदी की मातहती में मदीना ए मुनव्वरा भेज कर हुक्म दिया कि अली व फ़ात्मा की तमाम औलाद को बिल्कुल ही तबाह व बरबाद कर दिया जाए , उनके घरों में आग लगा दी जाए , उनके सामान लूट लिये जायें और उन्हें इस दरजा मफ़लूज व मफ़लूक कर दिया जाऐ कि फिर उनमे किसी क़िस्म के हौसले के उभरने का सवाल ही पैदा न हो सके और मोहम्मद बिन जाफ़र को गिरफ़्तार कर के क़त्ल कर दिया जाय। ईसा जलोदी ने मदीने पहुँच कर तामीले हुक्म की कोशिश की और मुम्किन तरीक़े से बनी फ़ात्मा को तबाह व बरबाद किया। हज़रत मोहम्मद बिन जाफ़र (अ.स.) ने भर पूर मुक़ाबला किया लेकिन आखि़र में गिरफ़्तार हो कर हारून रशीद के पास पहुँचा दिये गये। ईसा जलूदी सादात किराम को लूट कर हज़रत इमाम अली रज़ा (अ.स.) के दौलत कदे पर पहुँचा और उसने ख़्वाहिश की कि वह हस्बे हुक्म हारून रशीद , ख़ाना ए इमाम में दाखि़ल हो कर अपने हाथों से औरतों के ज़ेवरात और कपड़े उतारे। इमाम (अ.स.) ने फ़रमाया यह नहीं हो सकता , मैं खुद तुम्हें सारा सामान दिये देता हूँ । पहले तो वह उस पर राज़ी न हुआ लेकिन बाद में कहने लगा कि अच्छा आप ही उतार लाइये। आप महल सरा में तशरीफ़ ले गये और आपने तमाम ज़ेवरात और सारे कपड़े एक सतर पोश चादर के अलावा ला कर दे दिये और उसी के साथ साथ असासुल बैत नक़दो जिन्स यहां तक कि बच्चों के कान के बुन्दे सब कुछ उसके हवाले कर दिया। वह मलऊन ज़ेवरात ले कर बग़दाद रवाना हो गया। यह वाक़िया आपके आगा़ज़े इमामत का है। अल्लामा मजलिसी बेहारूल अनवार में लिखते हैं कि मोहम्मद बिन जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के वाक़ए से इमाम अली रज़ा (अ.स.) को ताअल्लुक़ न था। वह अकसर अपना चचा मोहम्मद को ख़ामोशी की हिदायत और सब्र की तलक़ीन फ़रमाया करते थे। अबुल फ़र्ज असफ़हानी मुक़ातिल तालिबैन में लिखते हैं कि मोहम्मद बिन जाफ़र निहायत मुत्तक़ी और परहेज़गार शख़्स थे। किसी नासिबी ने दस्ती कुतबा लिख कर मदीने की दीवारों पर चस्पा कर दिया था जिसमें हज़रत अली (अ.स.) और जनाबे फ़ात्मा (स.अ.) के मुताअल्लिक़ ना साज़ अल्फ़ाज़ थे। यही आप के खु़रूज का सबब बना। आपकी बैअत लफ़्ज़े अमीरल मोमेनीन से की गई। आप जब नमाज़ को निकलते थे तो आपके साथ दो सौ सुलहा ब अत्तक़िया हुआ करते थे। अल्लामा शिब्लिन्जी लिखते हैं कि इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) की वफ़ात के बाद सफ़वान बिने यहिया ने इमाम अली रज़ा (अ.स.) से कहा कि मौला हम आपके बारे में हारून रशीद से बहुत ख़ाएफ़ हैं हमें डर है कि यह कहीं आपके साथ वही सुलूक न करे जो आपके वालिद के साथ कर चुका है। हज़रत ने इरशाद फ़रमाया कि यह तो अपनी सी करेगा लेकिन मुझ पर कामयाब न हो सकेगा चुनान्चे ऐसा ही हुआ और हालात ने उसे कुछ इस दरजा आखि़र में मजबूर कर दिया था कि वह कुछ भी न कर सका कि यहां तक कि जब ख़ालिद बिने यहिया बर मक्की ने उस से कहा कि इमामे रज़ा (अ.स.) अपने बाप की तरह अम्रे इमामत का ऐलान करते और अपने को इमामे ज़माना कहते हैं तो उसने जवाब दिया कि हम जो उनके साथ कर चुके हैं वही हमारे लिये काफ़ी है। अब तू चाहता है कि इन हम सब के सब को क़त्ल कर डालें अब मैं ऐसा नहीं करूँगा।

अल्लामा अली नक़ी लिखते हैं कि फिर भी हारून रशीद का अहलेबैते रसूल (स.अ.) से शदीद इख़्तिलाफ़ और सादात के साथ जो बरताव अब तक रहा था उसकी बिना आम तौर से अम्माले हुकूमत या आम अफ़राद भी जिन्हें हुकूमत को राज़ी रखने की ख़्वाहिश थी अहलेबैत के साथ कोई अच्छा रवय्या रखने पर तैय्यार नहीं सकते थे और न इमाम के पास लोग इस्तफ़ादा के लिये जा सकते थे न हज़रत को सच्चे इस्लामी अहकाम की इशाअत के मवाक़े हासिल थे।

हारून का आखि़री ज़माना अपने दोनों बेटों , अमीन और मामून की बाहिमी रक़ाबतों से बहुत बे लुत्फ़ी में गुज़रा , अमीन पहली बीवी से था जो ख़ानदान शाही से मन्सूर दुवानक़ी की पोती थी और इस लिये अरब सरदार सब उसके तरफ़दार थे और मामून एक अजमी कनीज़ के पेट से था और इस लिये दरबार का अजमी तबक़ा उस से मोहब्बत रखता था। दोनों की आपस की रस्सा कशी हारून के लिये सोहाने रूह बनी हुई थी , उसने अपने ख़्याल में उसका तसफ़िया ममलेकत की तक़सीम के साथ यूं कर दिया कि दारूल सलतनत बग़दाद और उसके चारों तरफ़ के अरबी हिस्से जैसे शाम , मिस्र , हिजाज़ , यमन वग़ैरह मोहम्मद अमीन के नाम किये और मशरिक़ी मुमालिक जैसे ईरान , ख़ुरासान , तुरकिस्तान वग़ैरह मामून के लिये मुक़र्रर किये मगर यह तसफ़ीया तो उस वक़्त कारगार हो सकता था जब दोनों फ़रीक़ ‘‘ जियो और जीने दो ’’ के उसूल पर अमल करते होते लेकिन जहां इक़्तेदार की हवस कारफ़रमा हो वहां बनी अब्बास में एक घर के अन्दर दो भाई अगर एक दूसरे के मददे मुक़ाबिल हांे तो क्यों न एक दूसरे के खि़लाफ़ जारहाना कारवाही करने पर तैयार नज़र आये और क्यों उन ताक़तों में बाहिमी तसादुम हो जब कि उनमें से कोई इस हमदर्दी और असार और ख़ल्क़े ख़ुदा की खै़र ख़्वाही का भी हामिल नहीं है। जिसे बनी फ़ात्मा अपने पेशे नज़र रख कर अपने वाक़ई हुकू़क़ से चश्म पोशी कर लिया करते थे। इसी का नतीजा था कि इधर हारून की आंख बन्द हुई और उधर भाईयों में ख़ाना जंगी के शोले भड़क उठे। आखि़र चार बरस की मुसलसल कशमकश और तवील ख़ूं रेज़ी बाद मामून को कामयाबी हुई और उसका भाई अमीन मोहर्रम सन् 198 हिजरी में तलवार के घाट उतार दिया गया और मामून की खि़लाफ़त तमाम बनी अब्बास के हुदूदे सलतनत पर क़ायम हो गयी।

यह सच है कि हारून रशीद के अय्यामे सलतनत में आप की इमामत के दस साल गुज़ारे इस ज़माने मे ईसा जलूदी ताख़्त के बाद फिर उसने आपके मुआमलात की तरफ़ बिल्कुल सुकूत और ख़ामोशी इख़्तियार कर ली उसकी दो वजहे मालूम होती हैं। अव्वल तो यह कि इस दस साला ज़िन्दगी के इब्तिदाई अय्याम में वह आले बरामका के इस्तीसाल राफ़ि बिने लैस इब्ने तयार के ग़द्र और फ़साद के इन्सिदाद में जो समर कन्द के इलाक़े से नमूदार हो कर मा वराउन नहर और हुदूदे अरब तक फैल चुका था ऐसा हमा वक़्त और हमादम उलझा कि फिर उसको इन उमूर की तरफ़ तवज्जोह करने की ज़रा भी फ़ुरसत न मिली। दूसरे यह कि अपनी दस साला मुद्दत के आखि़री अय्याम में यह अपने बेटों में मुल्क तक़सीम कर देने के बाद खुद ऐसा कमज़ोर और मजबूर हो गया था कि कोई काम अपने इख़्तियार से नहीं कर सकता था। नाम का बादशाह बना बैठा हुआ अपनी ज़िन्दगी के दिन निहायत उसरत और तंगी की हालतों में काट रहा था। उसके सबूत के लिये वाक़िया ज़ैल मुलाहेज़ा फ़रमायें। सबाह तिबरी का बयान है कि हारून जब ख़ुरासान जाने लगा तो मैं नहरवान तक उसकी मुशायत को गया रास्ते में उसने बयान किया कि ऐ सबाह तुम अब इसके बाद फिर मुझे ज़िन्दा न पाओगे। मैंने कहा अमीरल मोमेनीन ऐसा ख़्याल न करें आप इन्शाअल्लाह सही ओ सालिम इस सफ़र से वापिस आयेंगे। यह सुन कर उसने कहा कि शायद तुझको मेरा हाल मालूम नहीं है। आ मैं दिखा दूं फिर मुझे रास्ता काट कर एक सिम्त दरख़्त के नीचे ले गया और वहां से अपने ख़वासों को हटा कर अपने बदन का कपड़ा उठा कर मुझे दिखाया , तो एक परचाए रेशम शिकम पर लपेटा हुआ था और उससे सारा बदन कसा हुआ था। यह दिखा कर मुझ से कहा कि मैं मुद्दत से बीमार हूँ तमाम बदन में दर्द उठता है मगर किसी से अपना हाल कह नहीं सकता तुम्हारे पास भी यह राज़ अमानत रहे। मेरे बेटों में से हर एक का गुमाशता मेरे ऊपर मुक़र्रर है। मामून की तरफ़ से मसरूर , अमीन की जानिब से बख़तीशू। यह लोग मेरी सांस तक गिनते रहते हैं और उन्हें चाहते हैं कि मैं एक रोज़ भी ज़िन्दा रहूं अगर तुम को यक़ीन न हो तो देखो मैं तुम्हारे सामने घोड़ा सवार होने को मांगता हूँ , ऐसा टट्टू मेरे लिये लायेंगे जिस पर सवार हो कर मैं और ज़्यादा बिमार हो जाऊँ। यह कह कर घोड़ा तलब किया। वाक़ई ऐसा लाग़र अड़यल टट्टू हाज़िर किया। उस पर हारून बे चूं चरां सवार हो गया और मुझको वहां से रूख़सत कर के जरजान का रास्ता पकड़ लिया।

बहरहाल हारूर रशीद की यही मजबूरीयां थीं जिन्होंने उसको हज़रत इमाम अली रज़ा (अ.स.) के मुख़ालिफ़ाना उमूर की तरफ़ मुतवज्जेह नहीं होने दिया वरना उसे फ़ुरसत होती और वह अपनी क़दीम जी़ इख़्तियारी की हालतों पर क़ायम रहता तो इस सिलसिले की ग़ारत गरी व बरबादी को कभी भूलने वाला नहीं था मगर उस वक़्त क्या कर सकता था अपने ही दस्तो पा अपने ही इख़्तेयार में नहीं थे। बहरहाल हारून रशीद इसी ज़ीकुन नफ़्स मजबूरी नादारी और बेइख़्तेयारी की ग़ैर मुतहमिल मुसीबतों में ख़ुरासान पहुँच कर शुरू 193 हि. में मर गया।

इन दोनों भाइयों अमीन और मामून के मुतअल्लिक़ मुवर्रिख़ीन का कहना है कि मामून तो फिर भी सूझ बूझ और अच्छे कैरेक्टर का आदमी था लेकिन अमीन अय्याश , ला उबाली और कमज़ोर तबीयत का था। सलतनत के तमाम हिस्सों में बाज़ीगर , मसख़रे और नुजूमी जोतिशी बुलवाये। निहायत ख़ूबसूरत तवाएफ़ और निहायत कामिल गाने वालियों और ख़्वाजा सराओं को बड़ी बड़ी रक़में ख़र्च करके और नाटक की एक महफ़िल मिस्ल इन्द्र सभ के तरतीब दी। यह थियेटर अपने ज़र्क़ बर्क़ सामानों से परियों का अख़ाड़ा मालूम होता था। स्यूती ने इब्ने जरीर से नक़्ल किया है कि अमीन अपनी बीबियों को छोड़ कर ख़स्सियों से लवात करता था।( तारीख़े इस्लाम जिल्द 1 पृष्ठ 60)


इमाम अली रज़ा (अ.स.) का हज और हारून रशीद अब्बासी

ज़माना ए हारून रशीद में हज़रत इमामे अली रज़ा (अ.स.) हज के लिये मक्के मुअज़्ज़मा तशरीफ़ ले गये। उसी साल हारून रशीद भी हज के लिये आया हुआ था। ख़ाना ए काबा में दाखि़ले के बाद इमाम अली रज़ा (अ.स.) एक दरवाज़े से और हारून रशीद दूसरे दरवाज़े से निकले । इमाम (अ.स.) ने फ़रमाया कि यह दूसरे दरवाज़े से निकलने वाला जो हम से दूर जा रहा है , अनक़रीब तूस में दोनों एक जगह होंगे। एक रिवायत में है कि यहया बिने ख़ालिद बर मक्की को इमाम (अ.स.) ने मक्के में देखा कि वह रूमाल से गर्द की वजह से मुहं बन्द किये हुए जा रहा है। आप ने फ़रमाया कि उसे पता भी नहीं कि उसके साथ इमसाल क्या होने वाला है। यह अनक़रीब तबाही की मन्ज़िल में पहुँचा दिया जायेगा। चुनान्चे ऐसा ही हुआ।

रावी मुसाफ़िर का बयान है कि हज के मौक़े पर इमाम (अ.स.) ने हारून रशीद को देख कर अपने दोनों हाथों की अंगुलियां मिलाते हुए फ़रमाया कि मैं और यह इसी तरह एक हो जायेंगे। वह कहता है कि मैंने इस इरशाद का मतलब उस वक़्त समझा जब आपकी शहादत वाक़े हुई और दोनों एक मक़बरे में दफ़्न हुए। मूसा बिने इमरान का कहना है कि इसी साल हारून रशीद मदीने मुनव्वरा पहुँचा और इमाम (अ.स.) ने उसे खुत्बा देते हुए देख कर फ़रमाया कि अनक़रीब मैं और हारून एक ही मक़बरे में दफ़्न किये जायेंगे।( नूरूल अबसार पृष्ठ 144)

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) का मुजद्दिदे मज़हबे इमामिया होना

अहादीस में हर सौ साल के बाद एक मुजद्दे इस्लाम के नुमूदो शुहूद का निशान मिलता है। यह ज़ाहिर है कि जो इस्लाम का मुजद्द होगा उसके तमाम मानने वाले उसी के मसलक पर गामज़न और उसी के उसूलो फ़ुरू के सराहने वाले होंगे और मुजद्द को जो बुनियादी मज़हब होगा उसके मानने वालों का भी वही मज़हब होगा। हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) जो क़तई तौर पर फ़रज़न्दे रसूले इस्लाम (स.अ.) थे वह उसी मसलक पर गामज़न थे। जिस मसलक की बुनियाद पैग़म्बरे इस्लाम और अली (अ.स.) ख़ैरूल अनाम का वुजूद ज़ी जूद था। यह मुसल्लेमात से है कि आले मोहम्मद (अ.स.) पैग़म्बर (अ.स.) के नक़्शे क़दम पर चलते थे और उन्हीं के ख़ुदाई मन्शा और बुनियादी मक़सद की तबलीग़ फ़रमाया करते थे यानी आले मोहम्मद (अ.स.) का मसलक वही था जो मोहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.) का मसलक था। अल्लामा इब्ने असीर जज़री अपनी किताब जामिउल उसूल में लिखते हैं कि हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) तीसरी सदी हिजरी में और सुक़्क़तुल इस्लाम अल्लामा क़ुलैनी चैथी सदी हिजरी में मज़हबे इमामिया के मुजद्दे थे। अल्लामा क़ौनवी और मुल्ला मुबीन ने उसी को दूसरी सदी के हवाले से तहरीर फ़रमाया है।( वसीलतुन निजात पृष्ठ 376 शरह जामे सग़ीर )

मुहद्दिस देहलवी शाह अब्दुल अज़ीज़ इब्ने असीर का कौल नक़ल करते हुए लिखते हैं कि इब्ने असीर जज़री साहबे जामिउल उसूल के हज़रत इमामे अली बिने मूसा रिज़ा (अ.स.) मुजद्दे मज़हबे इमामिया दरक़रन सालिस गुफ़्ता अस्त। इब्ने असीर जज़री साहबे जामिउल उसूल ने हज़रत इमामे रज़ा (अ.स.) को तीसरी सदी में मज़हबे इमामिया का मुजद्द होना ज़ाहिरो वाज़िह फ़रमाया है। (तोहफ़ा ए असना अशरया कीद 85 पृष्ठ 83) बाज़ उलेमाए अहले सुन्नत ने आप को दूसरी सदी का और बाज़ ने तीसरी सदी का मुजद्द बतलाया है। मेरे नज़दीक दोनों दुरूस्त हैं क्यों कि दूसरी सदी में इमामे रज़ा (अ.स.) की विलादत और तीसरी सदी के आग़ाज़ में आपकी शहादत हुई है।

हज़रत इमामे अली रज़ा (अ.स.) के अख़्लाक़ व आदात और शमाएल व ख़साएल

आपके इख़्लाक़ो आदात और शमाएल ओ ख़साएल का लिखना इस लिये दुश्वार है कि वह बेशुमार हैं। ‘‘ मुश्ते नमूना अज़ ख़ुरदारे ’’ यह है बहवाले अल्लामा शिबलिन्जी इब्राहीम बिने अब्बास तहरीर फ़रमाते हैं कि हज़रत इमामे अली रज़ा (अ.स.) ने कभी किसी शख़्स के साथ गुफ़्तुगू करने में सख़्ती नहीं की और किसी बात को क़ता नहीं फ़रमाया। आपके मकारिमो आदात से था कि जब बात करने वाला अपनी बात ख़त्म कर लेता तब अपनी तरफ़ से आग़ाज़े कलाम फ़रमाते। किसी की हाजत रवाई और काम निकालने में हत्तल मक़दूर दरेग़ न फ़रमाते। कभी अपने हमनशीं के सामने पांव फ़ैला कर न बैठते और न अहले महफ़िल के रू ब रू तकिया लगा कर बैठते थे। कभी अपने ग़ुलामों को गाली न दी और चीज़ों का क्या ज़िक्र। मैंने कभी आपको थूकते और नाक साफ़ करते नहीं देखा। आप क़ह क़हा लगा कर हरगिज़ नहीं हंसते थे। ख़न्दा ज़नी के मौक़े पर आप तबस्सुम फ़रमाया करते थे। मुहासिने इख़्लाक़ और तवाज़ो व इन्केसारी की यह हालत थी कि दस्तरख़्वान पर साइस और दरबान तक को अपने साथ बिठा लेते । रातों को बहुत कम सोते और अक्सर रातों को शाम से सुबह तक शब्बेदारी करते थे और अक्सर औक़ात रोज़े से होते थे मगर तो आपसे कभी क़ज़ा नहीं हुए। इरशाद फ़रमाते थे कि हर माह में कम अज़ कम तीन रोज़े रख लेना ऐसा है जैसे कोई हमेशा रोज़े से रहे। आप कसरत से ख़ैरात किया करते थे और अकसर रात के तारीक परदे में इस इसतिहबाब को अदा फ़रमाया करते थे। मौसमे गर्मा में आपका फ़र्श जिस पर आप बैठ कर फ़तवा देते या मसाएल बयान किया करते बोरिया होता था और सरमा में कम्बल आपका यही तर्ज़े उस वक्त़ भी रहा जब आप वली अहदी हुकूमत थे। आपका लिबास घर में मोटा और ख़शन होता था और रफ़ए तान के लिये बाहर आप अच्छा लिबास पहनते थे। एक मरतबा किसी ने आप से कहा हुज़ूर इतना उम्दा लिबास क्यों इस्तेमाल फ़रमाते हैं ? आपने अन्दर का पैराहन दिखा कर फ़रमाया अच्छा लिबास दुनिया वालों के लिये और कम्बल का पैराहन ख़ुदा के लिये है। अल्लामा मौसूफ़ तहरीर फ़रमाते हैं कि एक मरतबा आप हम्माम में तशरीफ़ रखते थे कि एक शख़्स जुन्दी नामी आ गया और उसने भी नहाना शुरू किया। दौराने ग़ुस्ल में उसने इमामे रज़ा (अ.स.) से कहा कि मेरे जिस्म पर पानी डालिये आपने पानी डालना शुरू किया। इतने में एक शख़्स ने कहा ऐ जुन्दी ! फ़रज़न्दे रसूल (स.अ.) से खि़दमत ले रहा है , अरे यह इमामे रज़ा (अ.स.) हैं। यह सुनना था कि वह पैरों पर गिर पड़ा और माफ़ी मांगने लगा।( नूरूल अबसार पृष्ठ 38 व पृष्ठ 39)

एक मर्दे बलख़ी नाक़िल है कि मैं हज़रत के साथ एक सफ़र में था एक मक़ाम पर दस्तरख़्वान बिछा तो आपने तमाम ग़ुलामों को जिनमे हब्शी भी शामील थे , बुला कर बिठा लिया मैंने अर्ज़ किया मौला इन्हें अलाहिदा बिठाये तो क्या हर्ज़ है आपने फ़रमाया कि सब का रब एक है और मां बाप आदम ओ हव्वा भी एक हैं और जज़ा और सज़ा आमाल पर मौसूफ़ है , तो फिर तफ़रीक़ क्या। आपके एक ख़ादिम यासिर का कहना है कि आपका यह ताकीदी हुक्म था कि मेरे आने पर कोई ख़ादिम खाना खाने की हालत में मेरी ताज़ीम को न उठे। मुअम्मर बिने ख़लाद का बयान है कि जब भी दस्रख़्वान बिछता आप हर खाने में से एक एक लुक़मा निकाल लेते थे और उसे मिसकीनों और यतीमों को भेज दिया करते थे। शेख़ सुदूक़ तहरीर फ़रमाते हैं कि आपने एक सवाल का जवाब देते हुए फ़रमाया कि बुज़ुर्गी तक़वा से है जो मुसझे ज़्यादा मुत्तक़ी है वह मुझ से बेहतर है। एक शख़्स ने आपसे दरख़्वास्त की कि आप मुझे अपनी हैसियत के मुताबिक़ कुछ माल दुनियां से दीजिए। आपने फ़रमाया यह मुश्किल है। फिर उसने अर्ज़ की अच्छा मेरी हैसियत के मुताबिक़ इनायत कीजिये , फ़रमाया यह मुम्किन है। चुनान्चे आप ने उसे दो सौ अशरफ़ी इनायत फ़रमा दी। एक मरतबा नवीं ज़िलहिज्जा यौमे अर्फ़ा आपने राहे खु़दा में सारा घर लुटा दिया। यह देख कर फ़ज़्ल बिने सुहैल वज़ीरे मामून ने कहा , हज़रत यह तो ग़रामत यानी अपने आप को नुक़सान पहुँचाना है। आपने फ़रमाया यह ग़रामत नहीं ग़नीमत है मैं इसके इवज़ में खु़दा से नेकी और हसना लूंगा। आपके ख़ादिम यासिर का बयान है कि हम एक दिन मेवा खा रहे थे और खाने में ऐसा करते थे कि एक फल से कुछ खाते और कुछ फेंक देते थे हमारे इस अमल को आपने देख लिया और फ़रमाया नेमते ख़ुदा को ज़ाया न करो , ठीक से खाओ और जो बच जाए उसे किसी मोहताज को दे दो। आप फ़रमाया करते थे कि मज़दूर की मज़दूरी पहले तै करना चाहिये क्यों कि चुकाई हुई उजरत से ज़्यादा जो कुछ दिया जायेगा पाने वाला उसको इनाम समझेगा।

सूली का बयान है कि आप अक्सर ऊदे हिन्दी का बुख़ूर करते और मुश्क व गुलाब का पानी इस्तेमाल करते थे। इत्रयात का आपको बड़ा शौक़ था। नमाज़े सुबह अव्वल वक़्त पढ़ते उसके बाद सजदे में चले जाते थे और निहायत तूल देते थे फिर लोगों को नसीहत फ़रमाते।

सुलेमान बिन जाफ़र का कहना है कि आप अपने आबाओ अजदाद की तरह ख़ुरमें को बहुत पसन्द फ़रमाते थे। आप शबो रोज़ में एक हज़ार रकत नमाज़ पढ़ते थे। जब भी आप बिस्तर पर लेटते थे तो जब तक सो न जाते क़ुरआने मजीद के सूरे पढ़ा करते थे।

मूसा बिन सयार का बयान है कि आप अकसर अपने शियों की मय्यत में शिरकत फ़रमाते थे और कहा करते थे कि हर रोज़ शाम के वक़्त इमामे वक़्त के सामने आमाल पेश होते हैं , अगर कोई शिया गुनाहगार होता है तो इमाम उसके लिये असतग़फ़ार करते हैं।

अल्लामा तबरसी लिखते हैं कि आपके सामने जब भी कोई आता था आप पहचान लेते थे कि मोमिन है या मुनाफ़िक़ ( आलामुल वुरा तोफ़ाए रिज़विया , कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 122)

अल्लामा मोहम्मद रज़ा लिखते हैं कि आप हर सवाल का जवाब क़ुराने मजीद से देते थे और रोज़आना एक क़ुरआन ख़त्म करते थे।( जन्नातुल ख़ुलूद पृष्ठ 31)

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) के बाज़ करामात

आपके क़ौलो फ़ेल से बेइन्तेहा करामत का ज़हूर हुआ है जिनमें से कुछ इस जगह लिखे जाते हैं अल्लामा मोमिन शिब्लन्जी रक़म तराज़ हैं।

1.एक दिन हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) ने अमीन और मामून पर नज़र डालते हुए फ़रमाया कि अन्क़रीब अमीन को मामून क़त्ल कर देगा , चुनान्चे ऐसा ही हुआ और अमीन अब्बासी 23 मोहर्रम 198 हिजरी को 4 साल 8 माह सलतनत करने के बाद मामून रशीद के हाथों क़त्ल हुआ।( तारीख़े इस्लाम जिल्द 1 पृष्ठ 20 नूरूल अबसार )

2. हुसैन बिन मूसा का बयान है कि हम लोग एक मक़ाम पर बैठे हुए बातें कर रहे थे कि इतने में जाफ़र बिन उमर अल अलवी का गुज़र हुआ इसकी शक्ल व शबाहत और हैसीयत व हालत देख कर आपस में बातें करने लगे। हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) ने फ़रमाया अन्क़रीब दौलत मन्द और रईस हो जायेगा और इसकी हालत यकसर तबदील हो जायेगी। चुनान्चे ऐसा ही हुआ और वह एक माह के अन्दर मदीने का गर्वनर हुआ।

3. जाफ़र बिन सालेह से आपने फ़रमाया तेरी बीवी को दो जुड़वाँ बच्चे होगें। एक का नाम अली और दूसरे का नाम उम्मे उमर रखना। जब इसके यहां विलादत हुई तो ऐसा ही हुआ। जाफ़र बिन सालेह ने अपनी माँ से कहा , इमाम अली रज़ा (अ.स.) ने यह उम्मे उमर क्या नाम तजवीज़ फ़रमाया है ? इसने कहा तेरी दादी का नाम उम्मे उमर था हज़रत ने इसी के नाम पर मौसूम फ़रमाया है।

4. आपने एक शख़्स की तरफ़ देख कर फ़रमाया उसे मेरे पास बुला लाओ। जब वह लाया गया तो आपना फ़रमाया कि तू वसीयत कर ले अमरे हतमी के लिये तैयार हो जा ‘‘फ़मात अर जअल बादा सलासता अय्याम ’’ इसे फ़रमाने के तीन दिन बाद उस शख़्स का इन्तेक़ाल हो गया।( नूरूल अबसार पृष्ठ 139)

5. अल्लामा अब्दुर्रहमान रक़म तराज़ हैं कि एक शख़्स ख़ुरासान के इरादे से निकला , उसे उसकी लड़की ने एक हाला दिया कि फ़रोख़्त कर के फ़ीरोज़ा लेते आना। वह कहता है कि जब मैं मक़ाम मर्द में पहुँचा तो इमाम रज़ा (अ.स.) के एक ख़ादिम ने मुझ से कहा कि एक दोस्त दार अहले बैत का इन्तेक़ाल हो गया है इसके कफ़न की ज़रूरत है तू अपना हाला मेरे हाथ फ़रोख़्त कर दे ताकि मैं उसे इसके कफ़न के लिये इस्तेमाल करूँ। इस मर्दे कूफ़ी ने कहा कि मेरे पास कोई हाला बराए फ़रोख़्त नहीं है। ख़ादिम ने इमाम रज़ा (अ.स.) से वाक़ेया बयान किया। इस से जा कर मेरा सलाम कह दे और उसे मेरा पैग़ाम पहुँचा कर कह तेरी लड़की ने जो हाला बराए ख़रीद फ़ीरोज़ा दिया है वह फ़रोख़्त कर दे। उसने बड़ा ताज्जुब किया और हाला निकाल कर उसके हाथ में फ़रोख़्त कर डाला। उस कूफ़ी का बयान है कि मैंने यह सोच कर की वह बड़े बा कमाल हैं इन से चन्द सवालात करना चाहा और इसी इरादे से इनके मकान पर गया लेकिन इतना इज़देहाम था कि दरे दौलत तक न पहुँच सका। दूर खड़ा सोच ही रहा था कि एक ग़ुलामने एक पर्चा ला कर दे दिया और कहा कि इमाम रजा़ (अ.स.) ने यह पर्चा इनायत फ़रमाते हुए कहा है कि तेरे सवाल के जवाबात इस में मरक़ूम हैं। (चून निगाही करदम जवाबे मसाएले मन बूदे) जब मैंने उसे देखा तो वाक़िएन मेरे सवालात के जवाबात थे।

6. रियान बिन सलत का बयान है कि मैं हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की खि़दमत में हाज़िर हुआ। मेरे दिल मे यह था कि मैं हज़रत से अपने लिये जामे और उनसे वह दिरहम मागूँगा जिस पर आपका इस्म गिरामी कन्दा होगा। मेरे हाज़िर होते ही आपने अपने गु़लाम से फ़रमाया कि यह जामे और सिक्का चाहते हैं इन्हें दो जामे और मेरे नाम के तीस सिक्के दे दो।

7. एक ताजिर को किरमान के रास्ते में डाकुओ ने पकड़ कर उसके मुहँ में इस दरजा बरफ़ भर दी कि उसकी ज़बान और उसका जबड़ा बेकार हो गया। उसने बहुत इलाज किया लेकिन कोई फ़ायदा न हुआ। एक दिन उसने सोचा कि मुझे इमाम रजा़ (अ.स.) की खि़दमत में हाज़िर हो कर इलाज की दरख़्वास्त करनी चाहिये। यह सोच कर वह रात में सो गया , ख़्वाब में देखा कि मैं इमाम रज़ा (अ.स.) की खि़दमत में हाज़िर हूँ। उन्होंने फ़रमाया कि कमूनी सआतर और नमक को पानी में भिगो कर तीन चार बार ग़रारा करो , इन्शा अल्लाह शिफ़ा हो जायेगी। जब मैं ख़्वाब से बेदार हो कर हाज़िरे खि़दमत हुआ तो हज़रत ने फ़रमाया तुम्हारा वही इलाज है जो मैंने तुम को ख़्वाब मे बतलाया है। वह कहता है कि मैंने अपना ख़्वाब उन से बयान नहीं किया था इसके बा वजूद आपने वही जवाब दिया।

अल्लामा अरबली लिखते हैं कि हज़रत जो दवा बताई थी उसके अज्जा़ यह हैं।1. ज़ीरा किरमानी 2. सआतर नमक ( कशफ़ल ग़म्मा पृष्ठ 112)

8. अबु इस्माईल सिन्धी का बयान है कि मैं हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की खि़दमत में हाज़िर हो कर अर्ज़ परदाज़ हुआ कि मौला मुझे अरबी ज़बान नहीं आती। आपने उसके लबों पर दस्ते मुबारक फेर कर उसे अरबी में गोया बना दिया।

9. एक हाजी ने आप से बहुत से सवाल किये , आपने सबका जवाब दे कर फ़रमाया कि वह सवाल तुम ने नहीं किया जो एहराम के लिबास से मुताअल्लिक़ था जिसमें तुम्हे शक है। उसने कहा हां मौला उसे भूल गया था। आपने फ़रमाय उस मख़सूस लिबास में एहराम दुरूस्त है।

10. आपने ख़ाके ज़मीन सूँघ कर अपनी क़ब्र की जगह बता दी।

11. एक शख़्स मोतमिद का बयान है कि मैं हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) के पास खड़ा था कि चिड़ियों का एक झुंड इमाम (अ.स.) के पास आके चीख़ने लगा। इमाम (अ.स.) ने मुझसे कहा जानते हो यह क्या कहता है। मैंने कहा कि खु़दा और रसूल (स.अ.) और फ़रज़न्दे रसूल (स.अ.) ही इसे जान सकते हैं। आपने फ़रमाया इस झुंड का कहना यह है कि एक सांप आया हुआ है और वह मेरे बच्चों को खाना चाहता है। तुम जाओ और उसे तलाश कर के मार डालो। चुनान्चे मैं उस मक़ाम पर गया और सांप को मार डाला।( शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 199 से 201)

12. अल्लामा मोहम्मद रज़ा लिखते हैं कि एक मरतबा क़हत पड़ा , आपने दुआ की , एक अब्र नमूदार हुआ , लोग ख़ुश हो गये लेकिन आपने फ़रमाया कि यह टुकड़ा अब्र का फ़लां मक़ाम के लिये है। इसी तरह कई बार हुआ। आखि़र में आपने एक अब्र के टुकड़े के नमूदार होने पर फ़रमाया कि यह यहां बरसेगा। चुनान्चे ऐसा ही हुआ।( जन्नातुल ख़ुलूद पृष्ठ 31, उयून अख़्बारे रज़ा पृष्ठ 214)

13. अल्लामा तबरेसी तहरीर फ़रमाते हैं कि एक रोज़ आप अपनी ज़मींदारी पर तशरीफ़ ले गये। जाते वक़्त फ़रमाया कि मेरे हमराही को चाहिये कि बारिश का सामान ले ले। हसन बिन मूसा ने कहा कि हुज़ूर सख़्त गरमी है बारिश के तो आसार नहीं हैं। फ़रमाया बारिश ज़रूर होगी। चुनान्चे वहां पहुँचने के बाद ही बारिश का नुज़ूल शुरू हो गया और ख़ूब पानी बरसा।( आलामुल वुरा पृष्ठ 189)

हज़रत रसूले खु़दा (स.अ.) और जनाबे अली रज़ा (अ.स.) वाक़ए तमर सीहानी

14. अल्लामा इब्ने हजर मक्की , अल्लामा शिब्लन्जी , अल्लामा अब्दुल्लाह रक़म तराज़ हैं कि मोहम्मद बिन हबीब का बयान है कि मैंने ख़्वाब में हज़रत रसूल खुदा (स.अ.) को अपने शहर की उस मस्जिद में देखा जिसमें हाजी उतरते और नमाज़ वग़ैरा पढ़ा करते थे। मैंने हज़रत को सलाम किया और हज़रत के पास तबक़ देखा जिसमें निहायत उम्दा खजूरें रखी हुई थीं। मेरे सलाम पर हज़रत ने अट्ठारा दाने इस खजूर के मरहमत फ़रमाये। मैं इस ख़्वाब से बेदार हुआ तो समझा कि अब सिर्फ़ अट्ठराहा साल ज़िन्दा रहूँगा। इस ख़्वाब के बीस दिन के बाद हज़रत इमाम अली रज़ा (अ.स.) मदीने से तशरीफ़ लाये और इसी मस्जिद में उतरे जिसमें हज़रत रसूल (स.अ.) को मैंने ख़्वाब में देखा था। हज़रत के सामने एक तबक़ में देसी खजूरें रखी थीं। लोग हज़रत को सलाम करने के लिये दौड़े , मैं भी गया तो देखा कि हज़रत उसी जगह तशरीफ़ फ़रमा हैं जहां मैंने ख़्वाब में रसूले ख़ुदा (स.अ.) को तशरीफ़ फ़रमा देखा था। मैंने सलाम किया तो हज़रत ने जवाब दिया और अपने क़रीब बुला कर एक मुठ्ठी इस तबक़ की खजूरें मरहमत फ़रर्माईं मैंने गिनी तो वह भी अट्ठारा थीं। इसी क़द्र जितनी रसूले ख़ुदा (स.अ.) ने मुझे ख़्वाब मे दी थीं। मैंने अर्ज़ कि हुज़ूर और कुछ मरहमत हों तो फ़रमायें। आपने फ़रमाया ‘‘ लौ ज़ादेका रसूल अल्लाह लज़्दे नाक ’’ कि अगर रसूले ख़ुदा (स.अ.) तुम को ख़्वाब में इससे ज़्यादा दिये होते तो मैं भी ज़्यादा देता।( सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 122, नूरूल अबसार पृष्ठ 144, अरजहुल मतालिब पृष्ठ 454)


हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) का इल्मी कमाल

मुवर्रेख़ीन का बयान है कि आले मोहम्मद (स.अ.) के इस सिलसिले में हर फ़र्द हज़रते अहदियत की तरफ़ से बलन्द तरीन इल्म के दरजे पर क़रार दिया गया था जिसे दोस्त और दुश्मन सब को मानना पड़ता था। यह और बात है कि किसी को इल्मी फ़यूज़ फैलाने का ज़माने ने कम मौक़ा दिया और किसी को ज़्यादा। चुनान्चे इन हज़रात में से इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के बाद अगर किसी को सब से ज़्यादा मौक़ा हासिल हुआ तो वह हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) हैं। जब आप इमामत के मन्सब पर नहीं पहुँचे थे उस वक़्त हज़रत इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) अपने तमाम फ़रज़न्दों और ख़ानदान के लोगों को नसीहत फ़रमाते थे कि तुम्हारे भाई अली रज़ा आलिमे आले मोहम्मद है। अपने दीनी मसाएल को इन से दरयाफ़्त कर लिया करो और जो कुछ कहें उसे याद रखो और फिर हज़रत इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) की वफ़ात के बाद जब आप मदीने में थे और रौज़ा ए रसूल (स.अ.) पर तशरीफ़ फ़रमा थे तो उल्माए इस्लाम मुश्किल मसाएल में आपकी तरफ़ रूजू करते थे।

मोहम्मद बिन ईसा यक़तैनी का बयान है कि मैंने इन तहरीरी मसाएल जो हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) से पूछने गये थे और आपने इनका जवाब तहरीर फ़रमाया। इकट्ठा किया तो अठ्ठारा हज़ार की तादाद में थे। साहबे लुमतुल रज़ा तहरीर करते हैं कि हज़राते आइम्मा ए ताहेरीन (अ.स.) के ख़ुसूसियात में यह अमर तमाम तारीख़ी मुशाहिद और नीज़ हदीस व सैर के असानीद से साबित है। बावजूद एक अहले दुनियां को आप हज़रात की तक़लीद और मुताबेअत फ़ील अहकाम का बहुत कम शरफ़ हासिल था मगर बई हमा तमाम ज़माना व हर ख़वेश व बेगाना आप हज़रात को तमाम उलूमे इलाही और इसरारे इलाही का गन्जीना समझता था और मोहद्दे सीन व मुफ़स्सेरीन और तमाम उलमा फ़ज़लन आपके मुक़ाबले का दावा रखते थे। वह भी इल्मी मुबाहस व मजालिस में आँ हज़रत के आगे ज़ानुए अदब तै करते थे और इल्मी मसाएल को हल करने की ज़रूरतों के वक़्त हज़रत अमीरल मोमेनीन (अ.स.) से ले कर इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) तक इस्तफ़ादे किए वह सब किताबों में मौजूद हैं।

जाबिर बिन अब्दुल्लाह अन्सारी और हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़र (अ.स.) की खि़दमत में समअ हदीस के वाक़ेआत तमाम हदीस की किताब में महफ़ूज़ हैं। इसी तरह अबुल तुफ़ैल अमिरी और सईद बिन जैर आख़्री सहाबा की तफ़सीली हालात जो उन बुज़ुर्गों के हाल में पाए जाते हैं वह सैरो तवारीख़ में मज़कूर व मशहूर हैं सहाबा के बाद ताबईन और तबेए ताबईन और उन लोगों की फ़ैज़याबी की भी यही हालत है।

शअबी , ज़हरी इब्ने क़तीबह , सुफ़यान , सौरी इब्ने शीबा , अब्दुर्रहमान , अकरमा , हसन बसरी वग़ैरा वग़ैरा यह सब के सब जो उस वक़्त इस्लामी दुनियां में दीनयात के पेशवा और मुक़द्दस समझे जाते थे इन्हीं बुज़ुर्गों के चश्माए फ़ैज़ के जुरआ नोश और उन्हीं हज़रात के मुतीय व हलक़ा बगोश थे।

जनाबे इमामे रज़ा (अ.स.) को इत्तेफ़ाक़े हसना से अपने इल्मो फ़ज़ल के इज़हार के ज़्यादा मौक़े पेश आये क्यों कि मामून अब्बासी के पास जब तक दारूल हुकूमत मर्व तशरीफ़ फ़रमा रहे बड़े बड़े उलमा व फ़ुज़ला मुख़तलिफ़ उलूम में आपकी इस्तेदाद और फ़ज़ीलत का अन्दाज़ा कराया गया और कुछ इस्लामी उलमा व फ़ुज़ला पर मौकूफ़ नहीं था बल्कि उलमा ए यहूदो नसारा से भी आपका मुक़ाबला कराया गया। मगर इन तमाम मनाज़िरो व मुबाहेसो में इन तमाम लोगों पर आपकी फ़ज़ीलत व फ़ौक़ियत ज़ाहिर हुई। ख़ुद मामून भी ख़ुलफ़ा ए अब्बासीया में सब से ज़्यादा आलम व अफ़क़ह था बा वजूद इसके उलूम तबर्हुरफ़ी का लौहा मानता था चारो नाचार इसका ऐतराफ़ और इक़रार पर इक़रार करता था। चुनान्चे अल्लामा इब्ने हजर मक्की सवाएक़े मोहर्रेक़ा में लिखते हैं कि आप जलालत क़दर इज़्ज़त व शराफ़त में मारूफ़ व मज़कूर हैं। इसी वजह से मामून आपको बमुनज़िला अपनी रूह व जान जानता था। उसने अपनी दुख़्तर का निकाह आँ हज़रत (अ.स.) से किया और मुल्क व विलायत में अपना शरीक गरदाना। मामून बराबर उलमा , अदयान व फ़ुक़हाय शरीअत को जनाबे इमाम रज़ा (अ.स.) के मुक़ाबले में बुलाता और मनाज़रा कराता। मगर आप हमेशा उन लोगों पर ग़ालिब आते थे और ख़ुद इरशाद फ़रमाते थे कि मैं मदीने में रौज़ा ए हज़रत रसूले ख़ुदा (स.अ.) में बैठता , वहां के उलमाए कसीर किसी इल्मी मसाएल में आजिज़ आते तो बिल इत्तेफ़ाक़ मेरी तरफ़ रूजू करते। जवाब हाय शाफ़ी दे कर इनकी तसल्ली व तस्कीन कर देता। अबासलत हरवी इब्ने सालेह कहते हैं कि हज़रत इमाम अली बिन मूसा रज़ा (अ.स.) से ज़्यादा कोई आलम मेरी नज़र से नहीं गुज़रा और मुझ पर मौकू़फ़ नहीं जो कोई आपकी ज़ियारत से मुशर्रफ़ होगा वह मेरी तरह आपकी इल्मियत की शहादत देगा।

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) और हुरूफ़े तहज्जी

बज़ाहिर ऐसा मालूम होता है कि हुरूफ़े तहजी यानी (अलीफ़ , बे , जीम , दाल) वग़ैरा की कोई हैसियत नहीं लेकिन जब उसक हैसियत अरबाबे अस्मत से दरयाफ़्त की जाती है तो मालूम होता है कि यह हुरूफ़ जिन से क़ुरआन मजीद जैसी ऐजाज़ी किताब मुरत्तब की गई है और जिस पर काएनात के इफ़हाम व तफ़हीम का दारो मदार है यह अपने दामन में बेशुमार सेफ़ात रखते हैं और खुदा वन्दे आलम ने उन्हीं हुरूफ़ को अपनी मारफ़त का ज़रिया बनाया है और हर हर्फ़ में ख़ास चीज़ पिन्हा रखती है। हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) से हुरूफ़े तहज्जी दरयाफ़्त किया गया आपने बा हवाला बाबे मदीनतुल उलूम हज़रत अली (अ.स.) इरशाद फ़रमाते हैं कि ‘‘ अलिफ़ ’’ से आला अल्लाह , ख़ुदा की नेअमतें , ‘‘ बे ’’ से बहा उल्लाह , ख़ुदा की खुबीयाँ , बहजतुल्लाह ख़ुदा मोमिन से ख़ुश होना। ‘‘ ते ’’ से तमामुल अमर बक़ाएमे आले मोहम्मद दुनियां का ख़ात्मा इमाम मेहदी (अ.स.) के अहद ममें होगा। ‘‘ से ’’ से सवाब अल मोमेनीन अली अमालेहुम सालेहता मोमेनीन को अच्छे आमाल का भर पूर सवाब मिलेगा। ‘‘ जीम ’’ से जमाल अल्लाह , अल्लाह का जमाल व जलाल अल्लाह , अल्लाह का जलाल , ‘‘ हे ’’ से हिल्मुल्लाह अन अलमज़नबीन। गुनाहगार से अल्लाह का हुक्म। ‘‘ ख़े ’’ से खमोल ज़िक्र अहलुल मासी इन्दुल्लाह ‘‘ ख़ुदा ’’ का गुनाह गारों के गुनाहों से बुलवा देना। ‘‘ दाल ’’ से दीन अल्लाह , अल्लाह का दीन इस्लाम। ‘‘ जीम ’’ ज़ुल्जलाल , अल्लाह का साहबे जमाल होना। ‘‘ रे ’’ से अल्लाह का रऊफ़ुर रहीम होना। ‘‘ जे़ ’’ से ज़लाज़िले अलक़यामता , क़यामत के दिन अज़ीम ज़लज़ले। ‘‘ सीन ’’ से सेना अल्लाह। अल्लाह की अच्छाईयां और बयान। ‘‘ शीन ’’ से शा अल्लाह माशा अल्लाह। जो ख़ुदा चाहे वही होगा। ‘‘ स्वाद ’’ से सादिक़ुल वाद , अल्लाह का वादा सच्चा और लोगों को सच बोलना चाहिए। ‘‘ ज़वाद ’’ से ज़लमिन ख़ालिफ़ मोहम्मद (स.अ.) व आले मोहम्मद (अ.स.)। वह जो शख़्स गुम्राह है जो मोहम्मद (स.अ.) आले मोहम्मद (अ.स.) का मुख़ालिफ़ है। ‘‘ तो ’’ से तूबाअल मोमेनीन , के लिये जन्नत की मुबारक बाद। ‘‘ ज़ो ’’ से ज़न अलमोमेनीन बिल्लाह ख़ैर। मोमिन को ख़ुदा के साथ अच्छा ज़न रखना चाहिये। ‘‘ ऐन ’’ से इल्म यानी ख़ुदा अलमे मुतलक़ है और इल्म इंसान के लिये बेहतरीन ज़ेवर है। ‘‘ ग़ैन ’’ से अलग़नी , ख़ुदा सब से मुसतग़नी है और ग़नी को ग़रीबों पर ख़र्च करना चाहिये। ‘‘ फ़े ’’ से फ़ैज़ मन अफ़वाज़ अन्नार , लोग अगर गुनाह करेंगे तो फ़ौज दर फ़ौज जहन्नुम में जायेंगे। ‘‘ क़ाफ़ ’’ से कु़रआन यह अल्लाह की भेजी हुई किताब है जो हिदायत से पुर है। ‘‘ क़ाफ़ ’’ से अल क़ाफ़ी ख़ुदा बन्दों के लिये काफ़ी ह। ‘‘ लाम ’’ से लग़वो अल काफ़ेरीन फ़ी इफ़तराहुम एल्ल लाहे अलविज़्ब , ख़ुदा पर झूठे इल्ज़ाम देना यह काफ़िरों का काम नेहायत लग़ो है। ‘‘ मीम ’’ से मलकूुल ला हुल यौम ला मालेक ग़ैरहू , एक दिन सिर्फ़ अल्लाह की हुकूमत होगी और कोई भी ज़िन्दा न होगा और न इसके सिवा कोई मालिक होगा , इस दिन ख़ुदा फ़रमायेगा , लेमन उल मुलके अल यौम , आज के दिन किसकी हुकूमत है तो अरवाहे आइम्मा यह जवाब देगें। अल्लाह अल वाहिद अलक़हार , आज सिर्फ़ ख़ुदाए वाहिद क़हार की हुकूमत है। ‘‘ नून ’’ से नवाल अल्लाह अल मोमेनीन व निकाला बिल काफ़ेरीन। मोमेनीन पर ख़ुदा का करम और काफ़िरों पर उसका अज़ाब मोहित होगा। ‘‘ वाव ’’ से वैल लमन असी अल्लाह , वैल और तबाही है इस के लिये जो ख़ुदा की ना फ़रमानी करे। ‘‘ हे ’’ से हान इल लल्लाह मन असह जो ख़ुदा का गुनाह करता है वह उसकी तौहीन करता है। ‘‘ ला ’’ से ला इलाहा इल्लल्लाह , यह वह कलमाए इख़्लास है जो उसे खुलूस व इक़्तेदार और शराएत के साथ ज़बान पर जारी करे वह ज़रूर जन्नत में जाऐगा। ‘‘ ये ’’ से यदुल्लाह अल्लाह का हाथ जो मख़लूक़ात को रोजी़ पहुँचाता है मुराद है।

फिर आपने फ़रमाया कि इन्हीं हुरूफ़ पर मुश्तमिल क़ुरआन मजीद नाज़िल हुआ है और नज़ूल चूंकि ख़ुदा की तरफ़ से था इस लिये दावा कर दिया गया कि जो किताब हम ने हुरूफ़ व अलफ़ाज़ में भेजी है। इसका जवाब जिन व इन्स सब मिल कर भी नहीं दे सकते।( दमए साकेबा जिल्द 3 पृष्ठ 61)

इमाम रज़ा (अ.स.) और वक़्ते निकाह

सक़तुल इस्लाम हज़रत क़ुलैनी किताब उसूले काफ़ी में तहरीर फ़रमाते हैं कि हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) से दरयाफ़्त किया गया कि तजवीज़ व निकाह किस वक़्त होना चाहिये ? आपने इरशाद फ़रमाया कि निकाह रात को सुन्नत है इस लिये कि रात लज़्ज़त और सुकून के लिये बनाई गई है और औरतें मर्दों के लिये लुत्फ़ व लज़्ज़त और सुकून का मरकज़ है।( मुनाक़िब जिल्द 1 पृष्ठ 91 हवाला काफ़ी )

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) के बाज़ मरवीयात व इरशादात

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) से बुशामर अहादीस मरवी हैं जिनमें से बाज़ यह हैं।

1. बच्चों के लिये माँ के दूध से बेहतर कोई दूध नहीं। 2. सिरका बेहतरीन सालन है , जिसके घर में सिरका होगा वह मोहताज न होगा। 3. हर अनार में एक दाना जन्नत का होता है। 4. मुनक़्क़ा सफ़रे को दुरूस्त करता है , बलग़म को दूर करता है , पठ्ठो को मज़बूत करता है , नफ़्स को पाकीज़ा बनाता और रंजो ग़म दूर करता है। 5. शहद में शिफ़ा है , अगर कोई शहद हदिया करे तो वापस न करो। 6. गुलाब जन्नत के फूलों का सरदार है। 7. बनफ़शे का तेल सर में लगाना चाहिये इसकी तासीर गर्मियों में सर्द और सर्दियों में गर्म हेती है। 8. जो ज़ैतुन का तेल सर में लगाए या खाए उसके पास चालीस दिन तक शैतान न आयेगा। 9. सेलाए रहम और पड़ोसियों के साथ अच्छा सुलूक करने से माल में ज़्यादती होती है। 10. अपने बच्चों को ख़तना सातवें दिन करा दिया करो इससे सेहत ठीक होती है और जिस्म पर गोश्त चढ़ता है। 11. जुमे के दिन रोज़ा रखना 10 दस रोज़ों के बराबर है। 12. जो किसी औरत का महर न दे या मज़दूर की उजरत रोके या किसी को फ़रोख़्त कर दे वह बख़्शा न जायेगा। 13. क़ुरआन पढ़ने , शहद खाने और दुध पीने से हाफ़ेज़ा बढ़ता है। 14. गोश्त खाने से शिफ़ा होती है और मर्ज़ दूर होता है। 15. खाने की इब्तेदा नमक से करनी चाहिये क्यों कि इस से सत्तर बीमारियों से हिफ़ाज़त होती है जिनमें जुज़ाम भी है। 16. जो दुनियां में ज़्यादा खायेगा क़यामत में भूखा रहेगा। 17. मसूर , 70 सत्तर अम्बिया की पसन्दीदा खुराक है इस से दिल नरम होता है और आंसू बनते हैं। 18. जो चालीस दिन गोश्त न खायेगा बद इख़्लाक़ हो जायेगा। 19. खाना ठंडा कर के खाना चाहिये। 20. खाना प्याले के किनारे से खाना चाहिये। 21. तूले उम्र के लिये अच्छा खाना , अच्छी जूती पहन्ना और क़र्ज़ से बचना , कसरते जिमा से परहेज़ करना मुफ़ीद है। 22. अच्छे इख़्लाक़ वाला पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.) के साथ क़यामत में होगा। 23. जन्नत में मुत्तक़ी और हुस्ने खुल्क़ वालों की और जहन्नम में पेटू , ज़िना कारों की कसरत होगी। 24. इमाम हुसैन (अ.स.) के क़ातिल बख़्शे न जायेंगे। उनका बदला खुदा खुद लेगा। 25. हसन व हुसैन (अ.स.) जवानाने जन्नत के सरदार हैं और उनके पदरे बुज़ुर्गवार दोनों से बेहतर हैं। 26. अहले बैत (अ.स.) की मिसाल सफ़ीना ए नूह जैसी है , नजात वही पायेगा जो इस पर सवार होगा। 27. हज़रत फ़ात्मा (स.अ.) साक़े अर्श पकड़ कर क़यामत के दिन वाक़िये करबला का फ़ैसला चाहेंगी। उस दिन उनके हाथ में इमाम हुसैन (अ.स.) का ख़ून भरा लिबास होगा। 28. ख़ुदा से रोज़ी सदक़ा दे कर मांगो। 29. सब से पहले जन्नत में वह शोहदा और अयाल दार जायेंगे जो परहेज़गार होंगे और सब से पहले जहन्नम में न इंसाफ़ हाकिम और मालदार जायेंगे। (मसनद इमाम रज़ा (अ.स.) प्रकाशित मिस्र 1341 हिजरी) 30. हर मोमिन का कोई न कोई पड़ोसी अज़ियत का बाएस ज़रूर होगा। 31. बालों की सफ़ेदी का सर के अगले हिस्से से शुरू होना सलामती और इक़बाल मन्दी की दलील है और रूख़्सारों , दाढ़ी के अतराफ़ से शुरू होना सख़ावत की अलामत है और गेसूओं से शुरू होना शुजाअत का निशान है और गुद्दी से शुरू होना नहूसत है। 32. क़ज़ा व क़द्र के बारे में आपने फ़ज़ील बिन सुहैल के जवाब में फ़रमाया कि इंसान न बिल्कुल मजबूर है और न बिल्कुल आज़ाद है।( नूरूल अबसार पृष्ठ 140)

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) और मजलिसे शोहदाऐ करबला

अल्लामा मजलिसी बेहारूल अनवार में तहरीर फ़रमाते हैं कि शायरे आले मोहम्मद (स.अ.) देबले ख़ेज़ाई का बयान है कि एक मरतबा आशूर के दिन मैं हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की खि़दमत में हाज़िर हुआ तो देखा कि आप असहाब के हल्क़े में इन्तेहाई ग़मगीन व हज़ीं बैठे हुये हैं। मुझे हाज़िर होते देख कर फ़रमाया , आओ , आओ हम तुम्हारा इन्तेज़ार कर रहे हैं। मैं क़रीब पहुँचा तो आपने अपने पहलू में जगह दे कर फ़रमाया कि ऐ देबल चूंकि आज यौमे आशूरा है और यह दिन हमारे लिये इन्तेहाई रंजो ग़म का दिन है लेहाज़ा तुम मेरे जद्दे मज़लूम हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) के मरसिए से मुताअल्लिक़ कुछ शेर पढ़ो। ऐ देबल जो शख़्स हमारी मुसीबत पर रोये या रूलाय उसका अज्र ख़ुदा पर वाजिब है। ऐ देबल जिस शख़्स की आंख हमारे जद्दे नामदार हज़रत सय्यदुश शोहदा हुसैन (अ.स.) के ग़म में रोयेगा खुदा उसके गुनाह बख़्श देगा। यह फ़रमा कर इमाम (अ.स.) ने अपनी जगह से उठ कर परदा खींचा और मुख़द्देराते असमत को बुला कर उसमें बिठा दिया। फिर आप मेरी तरफ़ मुख़ातिब हो कर फ़रमाने लगे। हां देबल ! अब मेरे जद्दे अमजद का मरसिया शुरू करो। देबल कहते हैं कि मेरा दिल भर आया और मेरी आंखों से आंसू जारी थे और आले मोहम्मद (अ.स.) में रोने का कोहरामे अज़ीम बरपा था।

साहेबे दारूल मसाएब तहरीर फ़रमाते हैं कि देबल का मरसिया सुन कर मासूमाए क़ुम जनाबे फ़ात्मा हमशीरा हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) इस क़द्र रोईं कि आपको ग़श आ गया।

इस इजतेमाई तरीक़े से ज़िक्रे हुसैनी को मजलिस कहते हैं। इसका सिलसिला अहदे इमाम रज़ा (अ.स.) में मदीने से शुरू हो कर मर्व तक जारी रहा।

अल्लामा अली नक़ी लिखते हैं कि अब इमाम रज़ा (अ.स.) को तबलीग़े हक़ के लिये नामे हुसैन (अ.स.) की इशाअत के काम को तरक़्क़ी देने का भी पूरा मौक़ा हासिल हो गया जिसकी बुनियाद उसके पहले हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़र (अ.स.) और इमाम ज़ाफ़रे सादिक़ (अ.स.) क़ायम कर चुके थे मगर वह ज़माना ऐसा था कि जब इमाम की खि़दमत में वही लोग हाज़िर होते थे जो बा हैसियत इमाम या बा हैसियत आलिमे दीन आपके साथ अक़ीदत रखते थे , और अब इमाम रज़ा (अ.स.) तो इमामे रूहानी भी हैं और वली अहदे सलतनत भी , इस लिये आपके दरबार में हाज़िर होने वालों का दायरा वसी है। ‘‘ मर्वका ’’ वह मक़ाम है जो ईरान से तक़रीबन वसत वाक़े है। हर तरफ़ के लोग यहां आते हैं और यहां यह आालम कि इधर मोहर्रम का चान्द निकला और आंखों से आंसू जारी हो गये। दूसरों को भी तरग़ीब व तहरीस की जाने लगी कि आले मोहम्मद (स.अ.) के मसाएब को याद करो और असराते ग़म को ज़ाहिर करो। यह भी इरशाद होने लगा कि जो इस मजलिस में बैठे जहां हमारी बाते ज़िन्दा की जाती हैं उसका दिल मुर्दा न होगा , उस दिन कि जब सब के दिल मुर्दा होंगे। तज़किराए इमाम हुसैन (अ.स.) के लिये जो मजमा हो उसका नाम इसलाही तौर पर ‘‘ मजलिस ’’ इसी इमाम रज़ा (अ.स.) की हदीस से माख़ूज़ है। आपने अमली तौर पर भी खुद मजलिसें करना शुरू कर दीं। जिनमें कभी खुद ज़ाकिर हुए और दूसरे सामेईन जैसे रियान इब्ने शबीब की हाज़री के मौक़े पर आपने मसाएबे इमाम हुसैन (अ.स.) बयान फ़रमाये और कभी अब्दुल्लाह बिन साबित या देबले खेज़ाई ऐसे किसी शायर के हाज़री के मौक़े पर उस शायर को हुक्म हुआ कि तुम ज़िक्रे इमाम हुसैन (अ.स.) में अशआर पढ़ो , वह ज़ाकिर हुआ और हज़रत सामेईन में दाखि़ल हुए।

1. किताब अल काफ़ी जिल्द 7 पृष्ठ 7 में है कि इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने एक दिन सय्यद हिमयरी को हुक्म दिया कि मरसिया पढ़ो। उन्होंने मरसिया पढ़ा। इमाम खुद भी बे हद रोय और पसे परदा मुख़दे्देरात (औरतों) ने भी बे पनाह गिराया किया।


ख़लीफ़ा मामून रशीद अब्बासी और हज़रत इमाम अली रज़ा (अ.स.)

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) के वालिदे माजिद हज़रत इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) को 183 हिजरी में हारून रशीद अब्बासी ज़हर से शहीद कराने के बाद 193 हिजरी में फ़ौत हो गया। इसके मरने के बाद जमादील सानी 193 हिजरी में इसका बेटा अमीन ख़लीफ़ा हुआ। हारून चुंकि अपने बेटों में सलतनत तक़सीम कर चुका था और उसके उसूल मोअय्यन कर चुका था इस लिये एक के बजाय दो हुक्मरानें रशीदी हुदूदे सलतनत पर हुक्मरानी करने लगे। अमीन चुंकि निहायत ही लग़ों आदमी था इस लिये उसने अपने उसअते इख़्तेयार की वजह से मामून पर जबरो ताअद्दी शुरू कर दी बिल आखि़र दोनों भाईयों में जंग हुई और अमीन चार साल आठ माह सलतनत करने के बाद 23 मोहर्रम हराम 198 हिजरी में क़त्ल कर दिया गया।

अमीन के क़त्ल के बाद भी मामून चार साल तक मर्व में रहा। सलतनत का कारोबार तो फ़ज़ल बिन सुहेल के सुपुर्द कर रखा था और खुद आलमों फ़ाज़िलों से जो उसके दरबार में भरे रहते थे फ़लसफ़ी मुबाहिसों में मसरूफ़ रहता था। ईराक़ में फ़ज़ल का भाई , हसन बिन सुहेल गर्वनर बनाया गया था। अबूहज़ीरह में नसर बिन नशिस्त अक़ील ने बग़ावत की और वह पांच साल तक शाही फ़ौजों का मुक़ाबला करता रहा। ईराक़ में बद्दू , लुच्चों , बदमाशों को बुलाकर हसन बिन सुहेल के खि़लाफ़ अलमे बग़ावत बुलन्द कर दिया। यह हालत देख कर हज़रत अली (अ.स.) और हज़रत जाफ़र तैय्यार के बाज़ बुलन्द नज़र नौनिहालों ने शायद यह ख़्याल किया कि इनके हुकू़क़ वापस मिलने का वक़्त आ गया है। चुंनाचे जमादिल सानी 199 हिजरी मुताबिक़ 814 ई 0 में अबू अब्दुल्लाह बिन इब्राहीम बिन इस्माईल बिन इब्राहीम अल मारूफ़ बा तबा बिन हसन अली बिन अबी तालिब अलवी ने जो मज़हब ज़ैदिया रखते थे कूफ़े में ख़रूज किया और लोगों को आले रसूल की बैअत और मुताबेअत की दावत दी। इनकी मद्द पर बनी शैबान का मुअजि़्ज़ज़ सरदार अबुल सरयासरी बिय मन्सूर शैबानी जो हर समह के फ़ौजी सरदारों में से था उठ खड़ा हुआ उन्होंने अपनी मुत्तफ़ेक़ा अफ़वाज से हसन की फ़ौज को कूफ़े के बाहर शिकस्त दे कर तमाम जुनूबी ईराक़ पर क़ब्ज़ा कर लिया।

फ़तेह के दूसरे दिन मोहम्मद बिन इब्राहीम मर्गे मफ़ाजात से फ़ौत हो गये। अबू असराया ने इनकी जगह मोहम्मद निब ज़ैद शहीद को अमीर बना लिया। हसन ने फिर फ़ौज भेजी। अबुल सराया ने उसे भी मार कर फ़ना कर दिया। इसी दौरान अलवी हर चार जानिब से अबुल सरया की मद्द को जमा जो गए और जा बजा शहरों में फैल गये और अबुल सरया ने कूफ़े में इमाम रज़ा (अ.स.) के नाम दिरहम व दीनार ‘‘ मस्कूक ’’ कराए और बसरा वस्ता , मदाएन की तरफ़ फ़ौज रवाना की और ईराक़ के बहुत से शहरो क़रिए फ़तह कर लिये। अलवीयों की क़ूवत व शौकत बहुत बढ़ गई। उन्होंने अब्बासीयो के घर जो कूफ़े में थे फूंक दिये और जो अब्बासी मिला उसे क़त्ल कर डाला। इसके बाद मौसमे हज आया तो अबू असराया ने हुसैन बिन हसन इब्ने इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) को जिन्हें अफ़तस कहते हैं मक्का का गर्वनर मुक़र्रर किया और इब्राहीम बिन मूसा काज़िम को यमन का आमिल बनाया और फ़ारस पर इस्माईल बिन मूसा काफ़िम को गर्वनर किया और मदायन की तरफ़ मोहम्मद बिन सुलैमान बिन दाऊद हसन मुसन्ना को रवाना किया और हुक्म दिया कि जानिबे शरक़ी से बग़दाद पर हमला करें। इस तरह अबुल सरया की सलतनत बहुत वसी हो गई।

फ़ज़ल बिने सहल ने हरसमा को अबू सराया की सरकोबी के लिये रवाना किया और अबूल सराया नहरवान के क़रीब शिकस्त खा कर मारा गया और मोहम्मद बिने मोहम्मद बिने जै़द मामून के पास मर्व भेज दिये गये। अबू सराया का दौरा दौरा कुल दस माह रहा। अबू सराया के क़त्ल हो जाने के बाद हिजाज़ में लोेगों ने मोहम्मद बिने जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) को अमीरल मोमेनीन बनाया। अफतस ने भी उनकी बैअत कर ली और यमन में इब्राहीम बिने मूसिए काज़िम (अ.स.) ने सर उठाया। इसी तरह ईरान की सरहद से यमन तक तमाम मुल्क में ख़ाना जंगी फैल गई। अबुल सराया के क़त्ल के बाद हरसमा मग़रिब के हालात बयान करने को बादशाह की खि़दमत में मर्व हाज़िर हुआ क्यों कि वज़ीर इन तमाम हालात को बादशाह से मख़फ़ी रखता था। हालात बयान कर के वह बादशाह के पास से वापस आ रहा था कि वज़ीर ने रास्ते में उसे क़त्ल करा दिया। यह वाक़ेया 200 हिजरी का है। हरसूमा के क़त्ल की ख़बर सुन कर बग़दाद के सिपाहीयों ने जो उसे दोस्त रखते थे बग़दादियों में बग़ावत कर के हसन बिने सहल को निकाल दिया और मन्सूर बिन मेहदी को अपना गर्वनर बना लिया।

मामून को बाग़ियों की कसरत और अलवियों की तलबे खि़लाफ़त में उठने की ख़बर पहुँची तो घबरा गया और उसने यही मसलहत देखी कि इमाम अली रज़ा (अ.स.) को वली अहद बना ले। चुनान्चे उनको मदीने से बुला कर 2 रमज़ान 201 हिजरी मुताबिक़ 816 ई 0 को बवजूद उनके सख़्त इंकार के अपना वली अहद बना लिया। उनसे अपनी बेटी उम्मे हबीबा की शादी कर दी। उनका नाम दिरहमों दीनार में मस्कूक कराया। शाही वर्दी से अब्बसीयों का सियाह रंग दूर कर के बनी फ़ात्मा का सब्ज़ रंग इख़्तियार किया।( तारीख़े इस्लाम जिल्द 1 पृष्ठ 61) इस वाक़िए तफ़सील कसीर किताबों में मौजूद है। हम मुख़सर अलफ़ाज़ में तहरीर करते हैं।

मामून रशीद की मजलिसे मुशाविरत

हालात से मुतासिर हो कर मामून रशीद ने एक मजलिसे मुशाविरत तलब की जिसमें उलमा , फ़ुज़ला , जुमआ और उमरा सभी को मदऊ किया। जब सब जमा हो गए तो असल राज़ दिल में रखते हुए उनसे यह कहा कि चूंकि शहरे ख़ुरासान में हमारी तरफ़ से कोई हाकिम नहीं है और इमाम रज़ा (अ.स.) से ज़्यादा लाएक़ कोई नहीं है इस लिये हम चाहते हैं कि इमाम रज़ा (अ.स.) को बुला कर वहां की ज़िम्मेदारी उनके सुपुर्द कर दें। मामून का मक़सद तो यह था कि उनको ख़लीफ़ा बना कर अलवियों की बग़ावत और उनकी चाबुक दस्ती को रोक दे लेकिन यह बात उसने मजलिसे मुशाविरत में ज़ाहिर नहीं कि बल्कि मुल्की ज़रूरत का हवाला दे कर उन्हें ख़ुरासान का हाकिम बनाना ज़ाहिर किया और लोगों ने तो इस पर जो भी राय दी हो लेकिन हसन बिने सहल और वज़ीरे आज़म फ़ज़ल बिने सहल इस पर राज़ी न हुए और यह कहा कि इस तरह खि़लाफ़त बनी अब्बास से आले मोहम्मद (अ.स.) की तरफ़ मुन्तक़िल हो जायेगी। मामून ने कहा मैंने जो कुछ सोचा है वह यही है और उस पर अमल करूंगा यह सुन कर वह लोग ख़ामोश हो गए। इतने में हज़रत अली इब्ने अबी तालिब (अ.स.) के एक मोअजि़्ज़ज़ सहाबी , सुलेमान बिने इब्राहीम बिने मोहम्मद बिने दाऊद बिने क़ासिम बिने हैबत बिने अब्दुल्लाह बिने हबीब बिने शैख़ान बिने अरक़म खड़े हो गए और कहने लगे ऐ मामून रशीद ‘‘ रास्त मी गोई इमामी तरसम कि तू हज़रते इमाम रज़ा हमाना कुनी कि कूफ़ियान बा हज़रते इमाम हुसैन करदन्द ’’ तू सच कहता है लेकिन मैं डरता हूँ कि तू कहीं इनके साथ वही सुलूक न करे जो कूफ़ियों ने इमाम हुसैन (अ.स.) के साथ किया है। मामून रशीद ने कहा , ऐ सुलेमान ! तुम यह क्या सोच रहे हो ऐसा हरगिज़ नहीं हो सकता मैं उनकी अज़मत से वाक़िफ़ हूँ जो उन्हें सताएगा क़यामत में हज़रते रसूले करीम (स.अ.) हज़रते अली हकीम (अ.स.) को क्यों कर मुंह दिखाएगा तुम मुतमईन रहो इन्शा अल्लाह इनका एक बाल बीका न होगा। यह कह कर बा रवाएते अबू मख़नफ़ मामून रशीद ने क़ुराने मजीद पर हाथ रखा और क़सम खा कर कहा मैं हरगिज़ औलादे पैग़म्बर पर कोई ज़ुल्म न करूंगा। इसके बाद सुलेमान ने तमाम लोगों को कसम दे कर बैअत ले ली फिर उन्होंने एक बैअत नामा तैयार किया और उस पर अहले ख़ुरासान के दस्तख़त लिये। दस्तख़त करने वालों की तादाद चालीस हज़ार थी। बैअत नामा तैय्यार होने के बाद मामून रशीद ने सुलैमान को बैअत नामा समेत मदीने भेज दिया। सुलेमान क़ता मराहिल व तै मनाज़िल करते हुए मदीने मुनव्वरा पहुँचे और हज़रते इमाम रज़ा (अ.स.) से मुलाक़ात की। उनकी खि़दमत में मामून का पैग़ाम पहुँचाया और मजलिसे मशाविरत के सारे वाक़ियात बयान किये और बैअत नामा हज़रत की खि़दमत में पेश किया। हज़रत ने ज्यों ही उसको खोला और उसका सर नामा देखा सरे मुबारक हिला कर फ़रमाया कि यह मेरे लिये किसी तरह मुफ़ीद नहीं है। इस वक़्त आप आब दीदा थे। फिर आपने फ़रमाया कि मुझे जद्दे नाम दार ने ख़्वाब में नतीजा व अवाक़िब से आग़ाह कर दिया है। सुलैमान ने कहा मौला यह तो ख़ुशी का मौक़ा है। आप इस दर्जा परेशान क्यों हैं ? इरशाद फ़रमाया कि मैं इस दावत में अपनी मौत देख रहा हूँ। उन्होंने कहा मौला मैंने सब से बैअत ले ली है। कहा दुरूस्त है , लेकिन जद्दे नाम दार ने जो फ़रमाया है वह ग़लत नहीं हो सकता। मैं मामून के हाथों शहीद किया जाऊंगा।

बिल आखि़र आप पर कुछ दबाव पड़ा कि आप मर्व ख़ुरासान के लिये आज़िम हो गए। जब आप के अज़ीज़ों और वतन वालों को आपकी रवानगी का हाल मालूम हुआ बेपनाह रोए।

ग़रज़ कि आप रवाना हो गए। रास्ते में एक चश्मा ए आब के किनारे चन्द आहुओं को देखा कि वह बैठे हुए हैं , जब उनकी नज़रे हज़रत पर पड़ी सब दौड़ पड़े और ब चश्मे तर कहने लगे कि हुज़ूर ख़ुरासान न जायें कि दुश्मन बा लिबासे दोस्ती आपकी ताक में है और मलकुल मौत इस्तेग़बाल के लिये तैय्यार है। हज़रत ने फ़रमाया कि अगर मौत आनी है तो हर हाल में आयेगी। (कन्जु़ल अन्साब अबू मख़नफ़ 807 प्रकाशित बम्बई 1302 हिजरी )

एक रवायत में है कि मामून रशीद ने अपनी ग़रज़ के लिये जब हज़रत को ख़लीफ़ा ए वक़्त बनाने के लिये लिखा तो आपने इनकार कर दिया। फिर उसने तहरीर किया कि आप मेरी वली अहदी को क़ुबूल कीजिए। आपने इसे भी इन्कार कर दिया। जब वह आपकी तरफ़ से मायूस हो गया तो उसने 300 अफ़राद पर मुश्तमिल फ़ौज भेज दी और हुक्म दे दिया कि वह जिस हालत में हो और जहां हो उनको गिरफ़्तार कर के लाया जाए और उन्हें इतनी मोहलत न दी जाए कि वह किसी से मिल सकें। चुनान्चे फ़ौज ग़ालेबन फ़ज़ल बिने सहल वज़ीरे आज़म की क़यादत में मदीने पहुँची और इमाम (अ.स.) मस्जिद से गिरफ़्तार कर के मर्व ख़ुरासान के लिये रवाना हो गये। इतना मौक़ा न दिया कि इमाम (अ.स.) अपने अहलो अयाल से रूख़सत हो लेते।

मामून की तलबी से क़ब्ल इमाम (अ.स.) की रौज़ा ए रसूल पर फ़रयाद

अबू मख़नफ़ बिने लूत बिने यहया ख़ज़ाई का बयान है कि हज़रते इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) की शहादत के बाद 15 मोहर्रमुल हराम शबे यक शम्बा को हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) ने रौज़ा ए रसूले ख़ुदा (स.अ.) पर हाज़री दी। वहां मशग़ूले इबादत थे कि आंख लग गई , ख़्वाब में देखा कि हज़रत रसूले करीम (स.अ.) बा लिबासे स्याह तशरीफ़ लाये हैं और सख़्त परेशान हैं। इमाम (अ.स.) ने सलाम किया हुज़र ने जवाबे सलाम दे कर फ़रमाया , ऐ फ़रज़न्द ! मैं और अली (अ.स.) , फ़ात्मा (स.अ.) हसन (अ.स.) , हुसैन (अ.स.) सब तुम्हारे ग़म में नाला व गिरया हैं और हम ही नहीं फ़रज़न्द ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) व मोहम्मद बाक़र (अ.स.) , जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) और तुम्हारे पदर मूसिए काज़िम (अ.स.) सब ग़मगीन और रंजीदा हैं। ऐ फ़रज़न्द ! अन्क़रीब मामून रशीद तुम को ज़हर से शहीद कर देगा। यह देख कर आपकी आंख खुल गई और आप ज़ार ज़ार रोने लगे। फिर रौज़ा ए मुबारक से बाहर आए। एक जमाअत ने आपसे मुलाक़ात की और आपको परेशान देख कर पूछा कि मौला इज़तिराब की वजह क्या है ? फ़रमाया , अभी अभी जद्दे नाम दार ने मेरी शहादत की ख़बर दी है। अबुल सलत दुश्मन मुझे शहीद करना चाहते हैं और मैं खुदा पर पूरा भरोसा करता हूँ जो मरज़िए माबूद हो वही मेरी मरज़ी है इस ख़्वाब के थोड़े अर्से के बाद मामून रशीद का लशकर मदीने पहुँच गया और इमाम (अ.स.) को अपनी सियासी ग़रज़ पूरी करने के लिये वहां से दारूल खि़लाफ़त ‘‘ मर्व ’’ में ले आया।( कन्ज़ुल अन्साब पृष्ठ 86)

इमाम रज़ा (अ.स.) की मदीने से मर्व में तलबी

अल्लामा शिब्लन्जी लिखते है कि हालात की रौशनी में मामून ने अपने मुक़ाम पर यह क़तई फ़ैसला और अज़म बिल जज़म कर लेने के बाद कि इमाम रज़ा (अ.स.) को वली अहले खि़लाफ़त बनायेगा। अपने वज़ीरे आज़म फ़ज़ल बिन सहल को बुला कर भेजा और उससे कहा कि हमारी राए है कि हम इमाम रज़ा (अ.स.) को वली अहद सुपुर्द कर दे तुम भी इस पर सोच विचार करो और अपने भाई हसन बिन सहल से मशविरा करो। इन दोनों ने आपस में दबादलाए ख़यालात करने के बाद मामून की बारगाह में हाज़री दी। उनका मक़सद था कि मामून ऐसा न करे वरना खि़लाफ़त आले अब्बास से आले मोहम्मद (अ.स.) में चली जायेगी। उन लोगों ने अगर चे खुल कर मुख़ालफ़त न की लेकिन दबे लफ़्ज़ों में नाराज़गी का इज़हार किया। मामून ने कहा मेरा फ़ैसला अटल है और मैं तुम दोनों को हुक्म देता हूँ कि तुम मदीने जा कर इमाम रज़ा (अ.स.) को अपने हमराह लाओ। (हुक्मे हाकिम मर्गे मफ़ाजात) आखि़र कार यह दोनों इमाम रज़ा (अ.स.) की खि़दमत में मक़ामे मदीने मुनव्वरा हाज़िर हुए और उन्होंने बादशाह का पैग़ाम पहुँचाया। हज़रते इमाम अली रज़ा (अ.स.) ने इस अर्ज़ दाश्त को मुस्तरद कर दिया और फ़रमाया कि इस अम्र के लिये अपने को पेश करने के लिये माज़ूह हूँ लेकिन चूंकि बादशाह का हुक्म था कि उन्हें ज़रूर लाओ इस लिये उन दोनों ने बे इन्तेहा इसरार किया और आपके साथ उस वक़्त तक लगे रहे जब तक आपने मशरूत तौर पर वादा नहीं कर लिया।( नूरूल अबसार पृष्ठ 41)

इमाम रज़ा (अ.स.) की मदीने से रवानगी

तारीख़ अबुल फ़िदा में है कि जब अमीन क़त्ल हुआ तो मामून सलतनते अब्बासिया का मुस्तक़िल बादशाह बन गया। यह ज़ाहिर है कि अमीन के क़त्ल होने के बाद सलतनत मामून के पाए नाम हो गई मगर यह पहले कहा जा चुका है कि अमीन नाननहाल की तरफ़ से अरबीउन नस्ल था और मामून अजमिउन नस्ल था। अमीन के क़त्ल होने से ईराक़ की अरब का़ैम और अरकाने सलतनत के दिल मामून की तरफ़ से साफ़ नहीं हो सकते थे बल्कि वह ग़मो ग़स्से की कैफ़ीयत महसूस करते थे दूसरी तरफ़ खुद बनी अब्बास में से एक बडी़ जमाअत जो अमीन की तरफ़ दार थी इससे भी मामून को हर तरह का ख़तरा लगा हुआ था। औलादे फ़ात्मा (स.अ.) में से बहुत से लोग जो वक़्त्न फ़वक़्तन बनी अब्बास के मुक़ाबिल ख़ड़े होते रहते थे वह ख़्वाह क़त्ल कर दिये गये हों या जिला वतन किये गए हों या क़ैद रखे गए हों उनके मुआफ़िक़ एक जमाअत थी जो अगर चे हुकूमत का कुछ बिगाड़ न सकती थी मगर दिल ही दिल में हुकूमते बनी अब्बास से बेज़ार ज़रूर थी। ईरान में अबू मुस्लिम ख़ुरासानी ने बनी उमय्या के खि़लाफ़ जो इश्तेआल पैदा किया वह इन मज़ालिम को याद दिला कर जो बनी उमय्या के हाथों हज़रते इमाम हुसैन (अ.स.) और दूसरे बनी फ़ात्मा (स.अ.) के साथ किये गये थे। इस से ईरान में इस ख़ानदान के साथ हमदर्दी का पैदा होना फ़ितरी था। दरमियान में बनी अब्बास ने इससे ग़लत फ़ायदा उठाया मगर इतनी मुद्दत में कुछ ना कुछ ईरानियों की आंखें भी खुल गई होगीं कि उनसे कहा गया था क्या और इक़्तेदार किन लोगों ने हासिल कर लिया है। मुम्किन है कि ईरानी क़ौम के इन रूझानात का चर्चा मामून के कानो तक भी पहुँचा हो। अब जिस वक़्त की अमीन के क़त्ल के बाद वह अरब क़ौम पर और बनी अब्बास के ख़ानदान पर भरोसा नहीं कर सकता था और उसे हर वक़्त इस हल्क़े से बग़ावत का अन्देशा था तो उसे इसी सियासी मस्लहत इसी में मालूम हुई। अरब के खि़लाफ़ अजम और बनी अब्बास के खि़लाफ़ बनी फ़ात्मा को अपना बनाया जाए और चुंकि तरज़े अमल में ख़ुलूस समझा नहीं जा सकता और वह आम तबाए पर असर नहीं डाल सकता। अगर यह नुमाया हो जाए कि वह सीयासी मसलहतों की बिना पर है इस लिये ज़रूरत हुई कि मामून मज़हबी हैसियत से अपनी शियत नवाज़ी और विलाए अहले बैत के चर्चे अवाम में फैलाए और वह यह दिखलाए कि वह इन्तेहाई नेक नीयती पर क़ाएम है। ‘‘ अब हक़ बा हक़दार रसीद के मकूले को सच्चा बनाना चाहता है।’’

इस सिलसिले में जनाबे शेख़ सद्दूक़ आलाल्लाहो मुक़ामा ने फ़रमाया है कि इसने अपनी नज़र की हिक़ायत भी शाया की कि जब अमीन का और मेरा मुक़ाबला था और बहुत नाज़ुक हालत थी और यह उसी वक़्त मेरे खि़लाफ़ सीसतान और किरमान में भी बग़ावत हो गई थी और ख़ुरासान में भी बेचैनी फैली हुई थी और फ़ौज की तरफ़ से भी इतमिनान न था और उस वक़्त दुश्वार माहोल में मैंने खुदा से इलतिजा की और मन्नत मानी कि अगर यह सब झगड़े ख़त्म हो जायें और मैं बामे खिलाफ़त तक पहुँचू तो उसको उसके असली हक़दार यानी औलादे फ़ात्मा मे से जो इसका अहल है उस तक पहुँचा दूंगा। इसी नज़र के बाद मेरे सब काम बनने लगे और आखि़र तमाम दुश्मनों पर फ़तेह हासिल हुई यक़ीनी यह वाक़िया मामून की तरफ़ से इस लिये बयान किया गयाा कि इसका तर्ज़े अमल खुलूसे नियत और हुस्ने नियत पर मुबनी समझा जाए। यूं तो अहले बैत (अ.स.) के खुले दुश्मन सख़्त से सख़्त थे वह भी इनकी हक़ीक़त और फ़ज़ीलत से वाक़िफ़ थे। मगर शीयत के मानी यह जानना तो नहीं है बल्कि मोहब्बत रखना और इताअत करना है और मामून के तरज़े अमल से यह ज़ाहिर है कि वह इस दावाए शीयत और मोहब्बते अहले बैत का ढिंढोरा पीटने के बावजूद खुद इमाम की इताअत नहीं करना चाहता था बल्कि इमाम को अपना मंशा के मुताबिक़ चलाने की कोशिश थी। वली अहद बनने के बारे में आपके इख़्तेआरात को बिल्कुल सलब कर दिया गया और आपको मजबूर बना दिया गया था। इससे ज़ाहिर है कि यह वली अहदी की तफ़वीज भी एक हाकिमाना तशद्द था जो उस वक़्त इमाम के साथ किया जा रहा था।

इमाम रज़ा (अ.स.) का वली अहदी को क़ुबूल करना बिल्कुल वैसा ही था जैसा हारून के हुक्म से इमाम मूसा काज़िम (अ.स.) का जेल ख़ाने में चला जाना। इस लिये जब इमाम रज़ा (अ.स.) मदीने से ख़ुरासान की तरफ़ रवाना हो रहे थे तो आपके रंजो सदमा और इस्तेराब की कोई हद न थी। रौज़ा ए रसूल से रूख़सत के वक़्त आपका वही आलम था जो हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) का मदीने से रवानगी के वक़्त था। देखने वालों ने देखा कि आप बे ताबाना रौज़े के अन्दर जाते हैं और नालाओ आह के साथ उम्मत की शिकायत करते हैं। फिर बाहर निकल कर घर जाने का इरादा करते हैं और फिर दिल नहीं मानता फिर रौज़े से लिपट जाते हैं यही सूरत कई मरतबा हुई। रावी का बयान है कि मैं हज़रत के क़रीब गया तो फ़रमाया , ऐ महूल ! मैं अपने जद्दे अमजद के रौज़े से ब जब्र जुदा किया जा रहा हूँ , अब मुझको यहां आना नसीब न होगा।( सवानेह इमाम रज़ा ( . . ) जिल्द 3 पृष्ठ 7)

महूल शैबानी का बयान है कि जब वह ना गवार वक़्त पहुँच गया कि हज़रते इमाम रज़ा (अ.स.) अपने जद्दे बुज़ुर्गवार के रौज़ा ए अक़दस से हमेशा के लिये विदा हुए तो मैंने देखा कि आप बेताबान अन्दर जाते और बा नालाओ आह बाहर आते हैं और दिल में उम्मत की शिकायत करते हैं या बाहर आ कर गिरया ओ बुका फ़रमाते हैं और फिर अन्दर चले जाते हैं। आपने चन्द बार ऐसे ही किया और मुझसे न रहा गया और मैंने हाज़िर हो कर अर्ज़ की मौला इज़्तेराब की क्या वजह है ? फ़रमाया , ऐ महूल ! मैं अपने नाना के रौज़े से जबरन जुदा किया जा रहा हूँ। मुझे इसके बाद अब यहां आना न नसीब होगा। मैं इसी मुसाफ़िरत और ग़रीबुल वतनी में क़त्ल कर दिया जााऊंगा और हारून रशीद के मक़बरे में मदफ़ून हूंगा। उसके बाद आप दौलत सरा में तशरीफ़ लाए और सब को जमा कर के फ़रमाया कि मैं तुम से हमेशा के लिये रूख़सत हो रहा हूँ। यह सुन कर घर में एक अज़ीम कोहराम बरबा हो गया और सब छोटे बड़े रोने लगे। आपने सब को तसल्ली दी और कुछ दीनार आइज़्ज़ा में तक़सीम कर के राहे सफ़र इख़्तेयार फ़रमाया। एक रवायत की बिना पर आप मदीने से रवाना हो कर मक्के मोअज़्ज़मा पहुँचे और वहां तवाफ़ कर के ख़ाना ए काबा को रूख़सत फ़रमाया।


हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) का नेशा पूर में वरूदे मसऊद

रज़ब 200 हिजरी में हज़रत मदीनाए मुनव्वरा से मर्व ‘‘ ख़ुरासान ’’ की जानिब रवाना हो गये। अहलो अयाल और मुअल्लेक़ीन सब को मदीना मुनव्वरा ही में छोड़ा। उस वक़्त इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की उम्र पांच बरस की थी। आप मदीने ही में रहे। मदीना से रवानगी के वक़्त कूफ़ा और कु़म की सीधी राह छोड़ कर बसरा और अहवाज़ का ग़ैर मुतअर्रिफ़ रास्ता इस ख़तरे के पेशे नज़र इख़्तेयार किया गया कि कहीं अक़ीदत मन्दाने इमाम मुज़ाहमत न करें। ग़रज़ कि क़तए मराहल और तै मनाज़िल करते हुए यह लोग नेशापुर के क़रीब पहुँचे।

मुवर्रेख़ीन लिखते हैं कि जब आपकी मुक़द्दस सवारी शहर नेशा पुर के क़रीब पहुँची तो जुमला उलमा व फ़ुज़ला शहर ने बैरून शहर हाज़िर हो कर आपकी रस्मे इस्तग़बाल अदा की। दाखि़ले शहर होते हुए तो तमाम खुर्द व बुज़ुर्ग शौक़े ज़्यारत में उमड़ आए। मरकबे आली जब मरबा शहर (चैक) में पहुँचा , तो हुजूमे ख़लाएक़ से ज़मीन पर तिल रखने की जगह न थी उस वक़्त इमाम रज़ा (अ.स.) क़ातिर नामी खच्चर पर सवार थे जिसका तमाम साज़ो सामान नुक़रई था , ख़च्चर पर अमारी थी और इस पर दोनों तरफ़ पर्दे पड़े हुए थे और ब रवाएते छतरी लगी हुई थी। उस वक़्त इमामुल मुहद्देसीन हाफ़िज़ अबू ज़रआ राज़ी और मोहम्मद बिन अस्लम तूसी आगे आगे और उनके पीछे अहले इल्म व हदीस की एक अज़ीम जमाअत हाज़िरे खि़दमत हुई और बई कलमात इमाम (अ.स.) को मुख़ातिब किया। ‘‘ ऐ जमीय सादात के सरदार , ऐ तमाम इमामों के इमाम और ऐ मरकज़े पाकीज़गी आपको रसूले अकरम का वास्ता , आप अपने अजदाद के सदक़े में अपने दीदार का मौक़ा दीजिए और कोई हदीस अपने जद्दे नाम दार की बयान फ़रमाईये ’’ यह कह कर मोहम्मद बिन राफ़े , अहमद बिन हारिस , यहिया बिन यहिया और इस्हाक़ इब्ने सहविया ने आपके क़ातिर की बाग थाम ली। उनकी इस्तदुआ सुन कर आप ने सवारी रोक दीए जाने के लिये इशारा फ़रमाया और इशारा किया कि हिजाब उठा दिए जाएं। फ़ौरन तामील की गई। हाज़ेरीन ने ज्यों ही वह नूरानी चेहरा अपने प्यारे रसूल के जिगर गोशे का देखा सीनों मे दिल बेताब हो गए। दो ज़ुल्फ़ें रूए अनवर पर मानिन्द गेसूए मुश्क बूए जनाबे रसूले खुदा (स.अ.) फूटी हुई थी। किसी को यारए ज़ब्त बाक़ी न रहा वह सब के सब बे अख़्तेयार धाड़े मार कर रोने लगे। बहुत ने अपने कपड़े फाड़ डा़ले कुछ ज़मीन पर गिर कर लोटने लगे बाज़ सवारी के गिर्द पेश घूमने और चक्कर लगाने लगे और मरक़बे अक़दस के ज़ीन व लजाम चूमने लगे और अमारी का बोसा देने लगे। आखि़र मरक़बे आली के क़दम चूमने के इश्तेआक में दर्राना बढ़े चले आते थे ग़रज़ कि अजीब तरह का वलवला था कि जमाले बा कमाल को देखने से किसी को सेरी नहीं हुई थी। टक टकी लगाए रूख़े अनवर की तरफ़ निगरां थे। यहां तक कि दो पहर हो गई और इनके मौजूद शौक़ व तमन्ना की पुर जोशियों में कोई कमी नहीं आई। इस वक़्त उलमा और फ़ुज़ला की जमाअत ने बा आवाज़े बुलन्द पुकार कर कहा कि ऐ मुसलमानों ! ज़रा ख़ामोश हो जाओ और फ़रज़न्दे रसूल (स.अ.) के लिये आज़र न बनो इनकी इस्तेदुआ पर क़दरे शोर व ग़ुल थमा तो इमाम रज़ा (अ.स.) ने इरशाद फ़रमाया:-

“ हदसनी अबी मुसा काज़िम , अन अबीहा जाफ़र अल सादिक़ अन अबीह मोहम्मद अल बाक़र अन अबीह ज़ैन अल अबेदीन अन अबीह हुसैन अल शहीदे करबला अन अबीह अली अल मुर्तुज़ा क़ाला हदसनी जैबी व क़रता ऐनी रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वालेही वसल्लम क़ाला हदसनी जिबराईल अलैहिस्सलाम क़ाला हदसनी रब्बुल इज़्ज़त सुबहानहा व ताला क़ाला ला इलाहा इल्लाह हस्सनी फ़मन क़ाला दख़ला हसनी वमन दखला हसना अमेना मन अज़ाबी ’’

तर्जुमा:- मेरे पदरे बुज़ुर्गवार हज़रत इमाम मुसिए काज़िम (अ.स.) ने मुझ से फ़रमाया और उनसे इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने और उनसे इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) ने उनसे इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) ने और उनसे इमाम हुसैन (अ.स.) ने और उनसे हज़रत अली मुर्तुज़ा (अ.स.) ने और उन से हज़रत रसूले करीम जनाबे मोहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.) ने और उनसे जनाबे जिब्राईले अमीन ने और उनसे खुदा वन्दे आलम ने इरशाद फ़रमाया कि ला इलाहा इल्लल्लाह मेरा क़िला है जो इसे ज़बान पर जारी करेगा मेरे क़िले में दाखि़ल हो जायेगा और जो मेरे क़िला ए रहमत में दाखि़ल होगा मेरे अज़ाब से महफ़ूज़ हो जायेगा। (मसनदे इमाम रज़ा (अ.स.) पृष्ठ 7 प्रकाशित मिस्र 1341 हिजरी)

यह फ़रमा कर आपने परदा खिंचवा दिया और चन्द क़दम बढ़ने के बाद फ़रमाया ‘‘ बा शरतहा व शरूतहा व अना मन शरूतहा ला इलाहा अल्लल्लाह ’’ कहने वाला नजात ज़रूर पायेगा लेकिन इसके कहने और नजात पाने में चन्द शर्तें हैं जिनमें से एक शर्त मैं भी हूं यानी अगर आले मोहम्मद (स.अ.) की मोहब्बत दिल में न होगी तो ला इलाहा इल्लल्लाह कहना काफ़ी न होगा। उलेमा ने ‘‘तारीख़े नेशापूर’’ के हवाले से लिखा है कि इस हदीस के लिखने में मफ़रूद दावातों के अलावा 24 हज़ार कममदान इस्तेमाल किये गये।

अहमद बिन हम्बल का कहना है कि यह हदीस जिन असनाद और जिन नामों के ज़रिए से बयान फ़रमाई गई है अगर इन्हीं नामों को पढ़ कर मजनून पर दम किया जाय तो ‘‘ ला फ़ाक़ मन जुनूना ’’ ज़रूर उसका जुनून जाता रहेगा और वह अच्छा हो जायेगा।

अल्लामा शिब्लन्जी नूरूल अबसार में बा हवाला ए अबूल क़ासिम तज़ीरी लिखते हैं कि सासाना के रहने वाले बाज़ रऊसा ने जब इस सिलसिला ए हदीस को सुना तो उसे सोने के पानी से लिखवा कर अपने पास रख लिया और मरते वक़्त वसीअत की कि उसे मेरे कफ़न में रख दिया जाए चुंकि ऐसा ही किया गया मरने के बाद उसने ख़्वाब में बताया कि ख़ुदा वन्दे आलम ने मुझे इन नामों की बरकत से बख़्श दिया है और मैं बहुत आराम की जगह पर हूँ।

मोअल्लिफ़ कहता है कि इसी फ़ाएदे के लिये शिया अपने कफ़न में जवाब नामा के तौर पर इन असमा को लिख कर रखते हैं। बाज़ किताबों में है कि नेशा पुर में आप से बहुत से करामात नमूदार हुए।

शहर ख़ुरासान में नुज़ूले इजलाल

अबुल सलत हरदी नाक़िल है कि असनाए सफ़र में जब आप ख़ुरासान पहुँचे तो दिन ढल चुका था आप फ़रीज़ाए ज़ौहर अदा करने के लिये सवारी से उतरे और आपने तजदीदे वज़ू के लिये पानी तलब फ़रमाया अर्ज़ की गई मौला इस वक़्त यहां पानी नहीं। यह सुन कर आपने एक ज़मीन पर पड़े हुए पत्थर के नीचे से चश्मा जारी फ़रमाया और वज़ू कर के नमाज़ अदा फ़रमाई। जनाब शेख़ सद्दूक़ रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि इस चश्मे का हनूज़ असर बाक़ी है।

शहर तूस में आप का नुज़ूलो वरूद

जब इस सफ़र में चलते चलते शहर तूस पहुँचे तो वहां देखा कि एक पहाड़ से लोग पत्थर तराश कर हंाडी वग़ैरा बनाते हैं। आप इस से टेक लगा कर खड़े हो गये और आपने उसे नरम होने की दुआ की। वहां के बाशिन्दों का कहना है कि पहाड़ का पत्थर बिल्कुल नरम हो गया और बड़ी आसानी से बर्तन बनने लगे।

क़रिया सना बाद में हज़रत का नुज़ूले करम

शहरे तूस से रवाना हो कर आप क़रिया सना बाद पहुँचे और आपने मोहल्ला नौख़ान में क़याम फ़रमाया और लिबास उतार कर धुलने को दे दिया। हमीद बिने क़ैबता का बयान है कि आपकी जेब में एक दोआ कनीज़ ने पाई। उसने मुझे दिखाई मैंने उसे हज़रत तक पहुँचाते हुए दरियाफ़्त किया कि इस दुआ का फ़ायदा क्या है ? फ़रमाया यह शरीरों के शर से हिफ़ाज़त का हिर्ज़ है। फिर आप कु़ब्बाए हारून में तशरीफ़ ले गए और आपने क़िबले की तरफ़ ख़त खैंच कर फ़रमाय कि मैं इस जगह दफ़्न किया जाऊँगा और यह जगह मेरी ज़्यारत गाह होगी। इसके बाद आपने नमाज़ अदा फ़रमाई और वहां से चलने का इरादा किया।

इमाम रज़ा (अ.स.) का दारूल खि़लाफ़ा मर्व में नुज़ूल

इमाम (अ.स.) तय मराहिल और के़तय मनाज़िल करने के बाद जब मर्व पहुँचे जिसे सिकन्दर ज़ुलकरनैन ने बारवाएते मोअज़्ज़मुल बलदान आबाद किया था और जो उस वक़्त दारूल सलतनत था , तो मामून ने चन्द रोज़ ज़ियाफ़तो तकरीम के मरासिम अदा करने के बाद क़ुबूले खि़लाफ़त का सवाल पेश किया। हज़रत ने उस से इसी तरह इनकार किया जिस तरह हज़रत अमीरल मोमेनीन (अ.स.) चौथे मौक़े पर खि़लाफ़त पेश किए जाने के वक़्त इनकार फ़रमा रहे थे। मामून को खिलाफ़त से दस्त बरदार होना दर हक़िक़त मन्ज़ूर न था वरना वह इमाम को इसी पर मजबूर करता चुनान्चे जब हज़रत ने खि़लाफ़त के कु़बूल करने से इन्कार फ़रमाया तो उसने वली अहदी का सवाल पेश किया। हज़रत इसके भी अन्जाम से न वाक़िफ़ न थे। नीज़ बाख़ुशी जाबिर हुकूमत की तरफ़ से कोई मन्सब कु़बूल करना आपके ख़ानदान के उसूल के खि़लाफ़ था। हज़रत ने उस से भी इन्कार फ़रमाया। मगर उस पर मामून का इक़रार जब्र की हद तक पहुँच गया और उसने साफ़ कह दिया कि ‘‘ लाबद मन क़बूलक़ ’’ अगर आप इसको मन्ज़ूर नहीं कर सकते तो इस वक़्त आपको अपनी जान से हाथा धोना पड़ेगा। जान का ख़तरा क़ुबूल किया जा सकता है जब मज़हबी मफ़ाद का क़याम जान देने का मौक़ूफ़ हो वरना हिफ़ाज़ते जान शरीअते इस्लाम का बुनियादी हुक्म है। इमाम (अ.स.) ने फ़रमाया , यह है तो मैं मजबूरन क़ुबूल करता हूँ मगर कारो बारे सलतनत में बिल्कुल दख़्ल न दूँगा , हाँ अगर किसी बात में मुझ से मशविरा लिया जाएगा तो नेक मशविरा ज़रूर दूंगा। इसके बाद यह वली अहदी से बरा नाम सलतनते वक़्त के एक ढखोसले से ज़्यादा वक़त न रखती थी। जिससे मुम्किन है कि कुछ अर्से तक सियासी मक़सद में कामयाबी हासिल कर ली गई हो मगर इमाम की हैसियत अपने फ़राएज़ के अन्जाम देने में बिल्कुल वह थी जो उनके पेश रौ अली मुर्तुज़ा (अ.स.) अपने ज़माने के बाइख़्तेदार ताक़तों के साथ इख़्तियार कर चुके थे। जिस तरह उनका कभी कभी मशविरा दे देना उन हुकूमतों को सही व जाएज़ नहीं बना सकता वैसे ही इमाम रज़ा (अ.स.) का इस नौइय्यत से वली अहदी का क़ुबूल फ़रमाना इस सलतनत के जवाज़ का बाएस नहीं हो सकता था सिर्फ़ मामून की एक राज हट थी जो सियासी ग़रज़ के पेशे नज़र इस तरह पूरी हो गई मगर इमाम (अ.स.) ने अपने दामन को सलतनते जु़ल्म के इक़्दामात और नजमो नस्ख़ से बिल्कुल अलग रखा। तवारीख़ में है कि मामून ने हज़रते इमाम रज़ा (अ.स.) से कहा उसके बाद आपने दोनों हाथ आसमान की तरफ़ बलन्द किये और बारगाहे अहदीयत में अर्ज़ की परवरदीगार तू जानता है कि इस अमर को मैंने बामजबूरत और नाचारी और ख़ौफ़ो क़त्ल की वजह से क़ुबूल कर लिया है। ख़ुदा वन्दा तू मेरे इस फे़ल पर मुझसे उसी तरह मवाखि़ज़ा ना करना जिस तरह जनाबे युसूफ़ और जनाबे दानियाल से बाज़पुर्स नहीं फ़रमाई। इसके बाद कहा मेरे पालने वाले तेरे अहद के सिवा कोई अहद नहीं तेरी अता की हुई हैसियत के सिवा कोई इज़्ज़त नहीं। ख़ुदाया तू मुझे अपने दीन पर क़ाएम रहने की तौफ़ीक़ इनायत फ़रमा।

ख़्वाजा मोहम्मद पासी का कहना है कि वली अहदी के वक़्त आप रो रहे थे। मुल्ला हुसैन लिखते हैं कि मामून की तरफ़ से इसरार और हज़रत की तरफ़ से इन्कार का सिलसिला दो माह जारी रहा इसके बाद वली अहदी क़ुबूल की गई।


जलसा ए वली अहदी का इन्एक़ाद

पहली रमज़ान 201 हिजरी ब रोज़े पंज शम्बा जलसा ए वली अहदी मुनक़िद हुआ। बड़ी शानो शौकत और तुज़ुको एहतिशाम के साथ तक़रीब अमल में लाई गई। सब से पहले मामून ने अपने बेटे अब्बास को इशारा किया और उसने बैअत की फिर और लोग बैअत से शरफ़याब हुए। सोने और चांदी के सिक्के सरे मुबारक पर निसार किये गए और तमाम अरकाने सलतनत और मुलाज़मीन को इनामात तक़सीम हुए।

मामून ने हुक्म दिया कि हज़रत के नाम का सिक्का तैय्यार किया जाए। चुनान्चे दिरहम और दीनार पर हज़रत के नाम का नक़्श हुआ और तमाम शहरों में वह सिक्का चलाया गया। जुमे के खु़त्बे में हज़रत का नामे नामी दाखि़ल किया गया। यह ज़ाहिर है कि हज़रत के नामें मुबारक का सिक्का अक़ीदत मन्दों के लिये तबरूक और ज़मानत की हैसियत रखता था। इस सिक्के को सफ़रो हज़र में हिफ़्जे़ जान के लिये साथ रखना यक़ीनी अमर था। साहेबे जिन्नातुल खुलूद ने बहरो बर के सफ़र में तहफ़्फ़ुज़ के लिए आपके तवस्सुल का ज़िक्र किया है। उसी के याद गार में बतौरे ज़मानत ब अक़ीदा ए तहफ़्फ़ुज़ हम अब भी सफ़र में बाज़ू पर इमाम ज़ामिन सामिन का पैसा बांधते हैं।

अल्लामा शिब्ली नोमानी लिखते हैं कि 33,000 (तेतिस हज़ार) मरदो ज़न वग़ैरा की मौजूदगी में आपको वली अहदे खि़लाफ़त बना दिया गया। उसके बाद उसने तमाम हाज़ेरीन से हज़रत इमाम अली रज़ा (अ.स.) के लिये बैएत ली और दरबार का लिबास बजाय काले के हरा क़रार दिया गया। जो सादात का इम्तेयाज़ी लिबास था। फ़ौज की वर्दी भी बदल दी गई। तमाम मुल्क में एहकामे शाही नाफ़िज़ हुए कि मामून के बाद अली रज़ा (अ.स.) ही तख़्त के मालिक है और उनका लक़ब है ‘‘ अल रज़ा मन आले मोहम्मद ’’ । हसन बिन सहल के नाम भी फ़रमान गया कि उनके लिये बैअते आम ली जाय और उमूमन अहले फ़ौज व अमाएदे बनी हाशिम सब्ज़ (हरे) रंग के फ़रहरे और सब्ज़ कुलाह व क़बाएं इस्तेमाल की जाएं।

अल्लामा शरीफ़ जरजानी ने लिखा है कि क़ुबूले वली अहदी के मुताअल्लिक़ जो तहरीर हज़रत इमाम अली रज़ा (अ.स.) ने मामून को लिखी। उसका मज़मून यह था कि ‘‘ चंूकि मामून ने हमारे उन हुक़ूक़ को तसलीम कर लिया है जिनको उनके आबाओ अजदाद ने नहीं पहचाना था लेहाज़ा मैंने उनकी दरख़्वास्ते वली अहदी क़ुबूल कर ली अगरचे जफ़र व जामेए से मालूम होता है कि यह काम अंजाम को न पहुँचेगा । ’’

अल्लामा शिब्लन्जी लिखते हैं कि क़ुबूले वली अहदी के सिलसिले में आपने जो कुछ तहरीर फ़रमाया था उस पर गवाह की हैसियत से फ़ज़ल बिन सहल , सहल बिन फ़ज़ल , यहिया बिन अक़सम , अब्दुल्लाह इब्ने ताहिर , समाना बिन अशरस , बशर बिन मोतमर , हम्माद बिन नोमान वग़ैरा के दस्तख़त थे। उन्होंने यह भी लिखा है कि इमाम अली रज़ा (अ.स.) ने इस जलसे वली अहदी में अपने मख़्सूस अक़ीदत मन्दों को क़रीब बुला कर कान में फ़रमाया था कि इस तक़रीब पर दिल में ख़ुशी को जगह न दो। मुलाहेज़ा हों( सवाएक़े मोहर्रेका़ पृष्ठ 122, मतालेबुल सूऊल पृष्ठ 282, नूरूल अबसार पृष्ठ 142, आलामुल वुरा पृष्ठ 193, कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 112, जन्नातुल ख़ुलूद पृष्ठ 31, अल मामून पृष्ठ 82, वसीलतुन नजात पृष्ठ 379, अरजहुल मतालिब पृष्ठ 454, मसन्द इमाम रज़ा पृष्ठ 7, तारीख़े तबरी , शरह मवाक़िफ़ , तारीख़े आइम्मा पृष्ठ 472, तारीख़े अहमदी पृष्ठ 354, शवाहेदुन नबूवत , नियाबुल मोअद्दता , फ़सलुल ख़त्ताब , हिलयातुल अवलिया , रौज़तुल सफ़ा , उयून अख़बारे रज़ा , दमए साकेबा , सवानए इमाम रज़ा ( . . )

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की वली अहदी का दुशमनों पर असर

तारीख़े इस्लाम में है कि इमाम रज़ा (अ.स.) की वली अहदी की ख़बर सुन कर बग़दाद के अब्बासी ख़याल कर के कि यह खि़लाफ़त हमारे ख़ानदान से निकल चुकी , कमाल दिल सोख़ता हुये और उन्होंने इब्राहीम बिन मेंहदी को बग़दाद के तख़्त पर बिठा दिया और मोहर्रम 202 हिजरी में मामून की माजूली का ऐलान कर दिया। बग़दाद और उसके क़रीबी जगहों मे बिल्कुल बद नज़मी फैल गई। लुच्चे ग़ुन्डे दिन दहाड़े लूट मार करने लगे। जुनूबी ईराक़ और हिजाज़ में भी मामेलात की हालत ऐसी ही हो रही थी। फ़ज़ल वज़ीरे आज़म सब ख़बरों को बादशाह से पोशीदा रखता था मगर इमाम रज़ा (अ.स.) ने उसे ख़बरदार कर दिया। बादशाह वज़ीर की तरफ़ से बदज़न हो गया। मामून को जब इन शोरिशों की ख़बर हुई तो बग़दाद की तरफ़ रवाना हो गया। सरख़स में पहुँच कर उसने फ़ज़ल बिन सहल वज़ीरे सलतनत को हम्माम में क़त्ल करा दिया।( तारीख़े इस्लाम जिल्द 1 पृष्ठ 61)

शम्सुल उलेमा शिब्ली नोमानी , हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की बैअते वली अहदी का ज़िक्र करते हुए लिखते हैं कि इस अनोखे हुक्म ने बग़दाद में एक क़यामत अंगेज़ हलचल मचा दी और मामून से मुख़ालेफ़त का पैमाना लबरेज़ हो गया। बाजो़ ने सब्ज़ रंग वग़ैरा के एख़्तियार करने के हुक्म की ब जब्र तामील की मगर आम सदा यही थी कि खि़लाफ़त ख़ानदाने अब्बास के दायरे से बाहर नहीं जा सकती।( अल मामून पृष्ठ 82)

अल्लामा शिब्लन्जी लिखते हैं कि हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) जब वली अहदे खि़लाफ़त मुक़र्रर किये जाने लगे मामून के हाशिया नशीन सख़्त बद ज़न और दिल तंग हो एक और उन पर यह ख़ौफ़ छा गया कि अब खि़लाफ़त बनी अब्बास से निकल कर बनी फ़ात्मा की तरफ़ चली जायेगी और इसी तसव्वुर ने उन्हें हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) से सख़्त मुतनफ़्फ़िर कर दिया।( नूरूल अबसार पृष्ठ 143)

वाक़िए हिजाब

मोअर्रेख़ीन लिखते हैं कि इस वाक़िए वली अहदी से लोगों में इस दर्जा बुग़ज़ हसद और किना पैदा हो गया कि वह लोग मामूली मामूली बातों पर इसका मुज़ाहेरा कर देते थे।

अल्लामा शिब्लन्जी और अल्लामा इब्ने तल्हा शाफ़ई लिखते हैं कि हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की वली अहदी के बाद यह उसूल था कि आप मामून से अकसर मिलने के लिये तशरीफ़ ले जाया करते थे और होता यह था कि जब आप दहलीज़ के क़रीब पहुँचते थे तो तमाम दरबान और ख़ुद्दाम आपकी ताज़ीम के लिये खड़े हो जाते थे और सलाम कर के पर्दा ए दर उठाया करते थे। एक दिन सब ने मिल कर तय कर लिया कि कोई पर्दा न उठाए चुनान्चे ऐसा ही हुआ जब इमाम (अ.स.) तशरीफ़ लाए तो हिज्जाब ने पर्दा न उठाया। मतलब यह था कि इससे इमाम की तौहीन होगी , लेकिन अल्लाह के वली को कोई ज़लील नहीं कर सकता। जब ऐसा मौक़ा आया तो एक तुन्द हवा ने पर्दा उठाया और इमाम दाखि़ले दरबार हो गए। फिर जब आप वापस तशरीफ़ लाए तो हवा ने बदस्तूर पर्दा उठाने में सबक़त की। इसी तरह कई दिन तक होता रहा। बिल आखि़र वह सब के सब शर्मिन्दा हो गये और इमाम (अ.स.) की खि़दमत मिस्ल साबिक़ करने लगे।( नूरूल अबसार पृष्ठ 143 मतालेबुल सूऊल पृष्ठ 282, शवाहेदुन नबूअत पृष्ठ 197)

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) और नमाज़े ईद

वली अहदी को अभी ज़्यादा दिन न गुज़रे थे कि ईद का मौक़ा आ गया मामून ने हज़रत से कहला भेजा कि आप सवारी पर जा कर लोगों को नमाज़े ईद पढ़ायें। हज़रत ने फ़रमाया कि मैंने पहले ही तुम से शर्त कर ली है कि बादशाहत और हुकूमत के किसी काम में हिस्सा न लूंगा और न इसके क़रीब जाऊँगा इस वजह से तुम मुझको इस नमाज़े ईद से भी माफ़ रखो। मगर मामून ने बहुत इसरार किया। हज़रत ने फ़रमाया कि अगर तुम माफ़ कर दो तो बेहतर है वरना मैं नमाज़े ईद के लिये उसी तरह जाऊँगा जिस तरह मेरे जद्दे माजिद हज़रत रसूले ख़ुदा (स.अ.) तशरीफ़ ले जाया करते थे। मामून ने कहा आपको इख़्तेयार है जिस तरह चाहे जायें। इसके बाद उसने सवारों और प्यादों को हुक्म दिया कि हज़रत के दरवाज़े पर हाज़िर हों। जब यह ख़बर शहर में मशहूर हुई तो लोग ईद के रोज़ सड़को पर छतों पर हज़रत की सवारी की शान देखने को जमा हो गये , एक भीड़ लग गई। औरतों और लड़कों सब को आरज़ू थी कि हज़रत की ज़्यारत करें। और आफ़ताब निकलने के बाद हज़रत ने गु़स्ल किया और कपड़े बदले , सफ़ेद अम्मामा सर पर बांधा , इत्र लगाया और असा हाथ में ले कर ईद गाह जाने पर आमादा हुए । इसके बाद नौकरों और ग़ुलामों को हुक्म दिया कि तुम भी ग़ुस्ल कर के कपड़े बदल लो और इसी तरह पैदल चलो। इस इन्तेज़ाम के बाद हज़रत घर से बाहर निकले। पाएजामा आधी पिंडली तक उठा लिया। कपड़ों को समेट लिया , नंगे पांव हो गए और फिर दो तीन क़दम चल कर खड़े हो गए और सर को आसमान की तरफ़ बलन्द कर के कहा , अल्लाहो अकबर , अल्लाहो अकबर । हज़रत के साथ नौकरों ग़ुलामों और फ़ौज के सिपाहियों ने भी तकबीर कही।

रावी का बयान है कि जब इमाम रज़ा (अ.स.) तकबीर कह रहे थे तो हम लोगों को मालूम होता था कि दरो दीवार और ज़मीनो आसमान से हज़रत की तकबीरों का जवाब सुनाई देता है। इस हैबत को देख कर यह हालत हुई कि सब लोग और खुद लशकर वाले ज़मीन पर गिर पड़े। सब की हालत बदल गई। लोगों ने छुरियों से अपनी जुतीयों के कुल तसमें काट दिये और जल्दी जल्दी जुतियां फेक कर नगें पांव हो गयें। शहर भर के लोग चीख़ चीख़ कर रोने लगे। एक कोहराम बरपा हो गया। इसकी ख़बर मामून को भी हो गई। वज़ीर फ़ज़ल बिन सहल ने इससे कहा कि अगर इमाम इमाम रज़ा (अ.स.) की इसी हालत से ईद गाह तक पहुँच जायेंगे तो मालूम नहीं क्या फ़ितना और हंगामा हो जायेगा। सब लोग इनकी तरफ़ हो जायेगें और हम नहीं जानते कि हम लोग कैसे बचेगें। वज़ीर की इस तक़रीर पर मुतानब्बे हो कर मामून ने अपने पास से एक शख़्स को हज़रत की खि़दमत में भेज कर कहला भेजा कि मुझ से ग़लती हो गई है जो आप से ईद गाह जाने के लिये कहा। इस से आपको ज़हमत हो रही है और मैं आपकी मशक़्क़त को पसन्द नहीं करता। बेहतर है कि आप वापस चले आयें और ईदगाह जाने की ज़हमत न फ़रमायें। पहले जो शख़्स नमाज़ पढ़ाता था पढ़ायेगा। यह सुन कर हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) वापस तशरीफ़ लाए और नमाज़े ईद न पढ़ सके।( वसीलतुन नजात पृष्ठ 382, मतालेबुल सूऊल पृष्ठ 282 उसूले काफ़ी )

अल्लामा शिब्लन्जी लिखते हैं कि फ़राज़ अल अरज़ा अला बैत व रक़ब अल मामून फ़सल ब अलनास कि रज़ा (अ.स.) दोलत सरा को वापस तशरीफ़ लाए और मामून ने जा कर नमाज़ पढ़ाई।( नूरूल अबसार पृष्ठ 143)

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की मदह सराई और देबले खि़ज़ाई और अबू नवास

अरब के मशहूर शायर जनाब देबले ख़ेज़ाई का नाम अबू अली देबले इब्ने अली बिन ज़र्रीन है। आप 148 हिजरी में पैदा हो कर 245 हिजरी में ब मक़ाम मशूश वफ़ात पा गये। (रिजाले तूसी 374) और अबूनवास का पूरा नाम अबू अली हसन बिन हानी इब्ने अब्दुल आला हुवाज़ी बसरी बग़दादी हैं। यह 136 हिजरी में पैदा हो कर 196 हिजरी में फ़ौत हुए। देबल आले मोहम्मद (अ.स.) के मद्दाहे ख़ास थे और अबूनवास हारून रशीद अमीन व मामून का नदीम था।

देबले खि़ज़ाई के बे शुमार अशआर मदहे आले मोहम्मद (अ.स.) में मौजूद हैं। अल्लामा शिब्लन्जी तहरीर फ़रमाते हैं कि जिस ज़माने में इमाम रज़ा (अ.स.) वली अहदे सलतनत थे। देबले खि़ज़ाई एक दिन दारूल सलतनत मर्व में आपसे मिले और उन्होंने कहा कि मैंने आपकी मदह में 120 अशआर पर मुशतमिल एक क़सीदा लिखा है। मेरी तमन्ना है कि मैं सब से पहले हुज़ूर ही को सुनाऊँ। हज़रत ने फ़रमाया बेहतर है पढ़ो।

देबले खि़जा़ई ने अशआर पढ़ना शुरू किया। क़सीदे का मतला यह है।

ज़करत महल अर रबामन अरफ़ात

फ़जरयत दमाअलएैन बिल इबारत ’’

जब देबल क़सीदा पढ़ चुके तो इमाम (अ.स.) ने एक सौ अशरफ़ी की थैली उन्हें अता फ़रमाई। देबल ने शुकरिया अदा करने के बाद उसे वापस करते हुए कहा कि मौला मैंने यह क़सीदा कु़रबतन इल्लहा कहा है मैं कोई अतिया नहीं चाहता ख़ुदा ने मुझे सब कुछ दे रखा है। अलबत्ता हुज़ूर मुझे जिस्म से उतरे हुए कपड़े से कुछ इनायत फ़रमा दें तो वह मेरी ऐन ख़्वाहिश के मुताबिक़ होगा। आपने एक जुब्बा अता करते हुए फ़रमाया कि इस रक़म को भी ले लो यह तुम्हारे काम आयेगी। देबल ने उसे ले लिया। थोड़े अर्से के बाद देबल मर्व से ईराक़ जाने वाले क़ाफ़िले के साथ रवाना हुए। रास्ते में चोरों और डाकुओ ने हमला कर के सब का सब कुछ लूट लिया और चन्द आदमियों को गिरफ़्तार कर भी कर लिया जिन में देबल भी थे। डाकुओं ने माल तक़सीम करते वक़्त देबल का एक शेर पढ़ा। देबल ने पूछा यह किसका शेर है ? उन्होंने कहा किसी का होगा। देबल ने कहा यह मेरा शेर है। उसके बाद उन्होंने सारा क़िस्सा सुना दिया। उन लोगों ने देबल के सदक़े में सब कुछ छोड़ दिया और सब का माल वापस कर दिया यहां तक कि यह नौबत आई कि उन लोगों ने वाक़िया सुन कर इमाम रज़ा (अ.स.) का जुब्बा ख़रीदना चाहा और उसकी क़ीमत एक हज़ार लगा दी। देबल ने जवाब दिया कि यह मैंने ब तौरे तबर्रूक अपने पास रखा है इसे फ़रोख़्त न करूगां। बिल आखि़र बार बार गिरफ़्तार होने के बाद उन्होंने उसे एक हज़ार अशरफ़ी पर फ़रोख़्त कर दिया। अल्लामा शिब्लन्जी ब हवाला ए अबूसलत हरवी लिखते हैं कि देबल ने जब इमाम रज़ा (अ.स.) के सामने यह क़सीदा पढ़ा तो आप रो रहे थे और आपने दो बैतों के बारे में फ़रमाया था कि यह अशआर इल्हामी है।( नूरूल अबसार पृष्ठ 138)

अल्लामा अब्दुल रहमान लिखते हैं कि हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) ने क़सीदा सुनते हुए नफ़से ज़किया के तज़किरे पर फ़रमाया कि ऐ देबल इस जगह एक शेर का और इज़ाफ़ा करो , ताकि तुम्हारा क़सीदा मुकम्मल हो जाये। उन्हों ने अर्ज़ कि मौला फ़रमायें। इरशाद हुआ।

व क़ब्र बातूस , नालहा मन मुसिबता

अल हत अल्लल अहशाए बिज़ क़रात

देबल ने घबरा कर पूछा , मौला यह किस की क़ब्र होगी जिसका हुज़ूर ने हवाला दिया है। फ़रमाया , ऐ देबल! यह क़ब्र मेरी होगी और मैं अन क़रीब इस आलमे ग़ुरबत में जब कि मेरे आइज़्ज़ा व अक़रेबा व बाल बच्चे मदीने में हैं शहीद कर दिया जाऊँगा और मेरी क़ब्र यहीं बनेगी। ऐ देबल जो मेरी ज़्यारत को आयेगा जन्नत में मेरे हमराह होगा।( शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 199)

देबल का यह मशहूर क़सीदा मजालिसे मामेनीन पृष्ठ 466 में मुकम्मल मन्क़ूल है। अलबत्ता इसका मतलब बदला हुआ है। अल्लामा शेख़ अब्बास क़ुम्मी ने लिखा है कि देबल ने एक किताब लिखी थी जिसका नाम था ‘‘ तबक़ाते शोअरा ’’ ।( सफ़ीनतुल बेहार जिल्द 1 पृष्ठ 241)

अबू नवास के मुताअल्लिक़ उलेमाए इस्लाम लिखते हैं कि एक दिन इसके दोस्तों ने इस से कहा कि तुम अकसर अशआर कहते हो और फिर मदहे भी किया करते हो लेकिन अफ़सोस की बात है कि तुम ने हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की मदह में कोई शेर नहीं कहा। उसने जवाब दिया कि हज़रत की जलालते क़द्र ही ने मुझे मदहे सराई से रोका है। मेरी हिम्मत नहीं पड़ती कि आपकी मदह करूँ। यह कह कर उसने चन्द अशआर पढ़े। जिसका तरजुमा यह है कि , उम्दा कलाक के हर रंग और मज़ाक़ के अशआर सब लोगों से अच्छे तुम्ही कहते हो बल्कि अच्छे अशआर में तुम्हारे मदहीया क़सीदे ऐसे होते हैं कि जिनसे सुनने वालों के सामने मोती झड़ते हैं। फिर तुम ने हज़रत इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) के बेटे हज़रत इमाम अली रज़ा (अ.स.) की मदह और हज़रत के फ़ज़ायल व मनाक़िब में कोई क़सीदा क्यों नहीं लिखा। तो मैं ने सब के जवाब में कह दिया कि भाईयों जिन जलील उश शान इमाम के आबाए कराम के ख़ादिम जिब्राईल ऐसे फ़रिशते हों उनकी मदह करना मुझ से मुम्किन नहीं है। उसके बाद उसने चन्द अशआर आपकी मदह में लिखे जिसका तरजुमा यह है। यह हज़रात आइम्मा ए ताहेरीन ख़ुदा के पाको पाकीज़ा किये हुए हैं और इनका लिबास भी तय्यबो ताहिर है। जहां भी उनका ज़िक्र होता है वहां उन पर दुरूद का नारा बलन्द हो जाता है। जब हसब व नसब बयान होते वक़्त कोई शख़्स अलवी ख़ानदान का न निकले तो उसको इब्तिदाये ज़माने से कोई फ़ख्र की बात नहीं मिलेगी। जब मख़लूक़ को पैदा किया फिर उसको हर तरह उस्तवार किया और संवारा तो उसी खुदा के बरगज़ीदा हज़रात आप लोगों को ख़ुदा ने सब से ज़्यादा शरीफ़ भी क़रार दिया और सब पर फ़ज़ीलत भी दी। मैं सच कहता हूँ कि आप हज़रात ही मलाए आला हैं और आप ही के पास क़ुरआने मजीद का इल्म और सूरों के मतालिब व मफ़ाहिम हैं।( दफ़ियातुल ऐयान जिल्द 1 पृष्ठ 322 नूरूल अबसार पृष्ठ 138 प्रकाशित मिस्र )

मज़ाहिबे आलम के उलेमा से हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) के इल्मी मुनाज़िरे

मामून रशीद को ख़ुद भी इल्मी ज़ौक़ था। उसने वली अहदी के मरहले तो तय करने के बाद हज़रत इमाम अली रज़ा (अ.स.) से काफ़ी इस्तेफ़ादा किया फिर अपने ज़ौक़ के तक़ाज़े पर उसने मज़ाहिबे आलम के उलेमा को दावते मुनाज़िरा दी और हर तरफ़ से उलेमा को तलब कर के हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) से मुक़ाबला कराया। अहदे मामून में इमाम रज़ा (अ.स.) से जिस क़दर मुनाज़िरे हुए हैं उनकी तफ़सील अकसर कुतुब में मौजूद हैं। इस सिलसिले में ऐहतेजाजी तबरसी , बिहार , दमऐ साकेबा वग़ैरा जैसी किताबें देखी जा सकती हैं। इख़्तेसार के पेशे नज़र सिर्फ़ दो चार मुनाज़िरे लिखता हूँ।

आलिमे नसारा से मुनाज़िरा

मामून रशीद के अहद में नसारा का एक बहुत बड़ा आलिम व मुनाज़िर शोहरते आम्मा रखता था। जिसका नाम ‘‘ जासलीक ’’ था। उसकी आदत थी कि मुताकल्लमीने इस्लाम से कहा करता था कि हम तुम दोनो नबूवते ईसा और उनकी किताब पर मुत्तफ़िक़ हैं और इस बात पर भी इत्तेफ़ाक़ रखते हैं कि वह आसमान पर ज़िन्दा मौजूद हैं। इख़तिलाफ़ है तो सिर्फ़ मोहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.) में है। तुम उनकी नबूवत का एतेक़ाद रखते हो और हम इन्कार करते हैं फिर हम तुम उनकी वफ़ात पर मुत्तफ़िक़ हो गये हैं। अब ऐसी सूरत में कौन सी दलील तुम्हारे पास बाक़ी है जो हमारे लिये हुज्जत क़रार पाए। यह कलाम सुन कर अकसर मुनाज़िर ख़ामोश हो जाया करते थे। मामून रशीद के इशारे पर एक दिन वह हज़रात इमाम रज़ा (अ.स.) से भी हम कलाम हुआ। मौक़ा ए मनाज़ेरह में उसने मज़कूरा सवाल दोहराते हुये कहा कि पहले आप यह फ़रमायें कि हज़रत ईसा की नबूवत और उनकी किताब दोनों पर आपका ईमान व एतेक़ाद है या नहीं। आपने इरशाद फ़रमाया कि मैं उस ईसा की नबूवत का यक़ीनन एतेक़ाद रखता हूँ जिसने हमारे नबी हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.) की नबूवत की अपने हवारीन को बशारत दी है और उस किताब की तसदीक़ करता हूँ जिसमें यह बशारत दर्ज है। जो ईसाई उसके मोतरिफ़ नहीं और जो किताब उसकी शारेह और मुसद्दक़ नहीं उस पर मेरा ईमान नहीं है। यह जवाब सुन कर जासलीक खा़मोश हो गया। फिर आपने इरशाद फ़रमाया कि ऐ जासलीक हम उस ईसा को जिसने हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.) की नबूवत की बशारत दी , नबीए बरहक़ जानते हैं मगर तुम उनकी तन्क़ीस करते हो और कहते हो कि वह नमाज़ रोज़े के पाबन्द न थे। जाशलीक ने कहा कि हम तो यह नहीं कहते वह तो हमेशा क़ायमुल लैल और साएमुन नहार रहा करते थे। आपने फ़रमाया , ईसा तो बनाबर एतेक़ाद नसारा ख़ुद माज़ अल्लाह ख़ुदा थे। तो वह रोज़ा और नमाज़ किसके लिये करते थे। यह सुन कर जाशलीक मबहूत हो गया और कोई जवाब न दे सका। अलबत्ता यह कहने लगा कि जो मुर्दो को ज़िन्दा करे , जुज़ामी को शिफ़ा दे , नाबीना को बीना बनाये और पानी पर चले क्या वह इसका सज़ावार नहीं कि उसकी परस्तिश की जाय और उसे माबूद समझा जाय। आपने फ़रमाया इलयासाह भी पानी पर चलते थे , अन्धे , कोढ़ी को शिफ़ा देते थे। इसी तरह हिज़क़ील पैग़म्बर (अ.स.) ने 35 हज़ार इन्सानों को साठ बरस के बाद ज़िन्दा किया था। कौमे इसराईल के बहुत से लोग ताऊन के ख़ौफ़ से अपने घर छोड़ कर बाहर चले गये थे। हक़्के़ ताआला ने एक सआत में सब को मार दिया था बहुत दिनों के बाद एक नबी इस्तेख़्वाने बोसीदा (बोसीदा हड्डियों) से गुज़रे तो ख़ुदा वन्दे आलम ने उन पर वही नाज़िल की उन्हें आवाज़ दो। उन्होंने कहा ऐ अज़ाम बालिया (मुर्दा हड्डियों) उठ ख़डे हो। वह सब ब हुक्मे ख़ुदा उठ खड़े हुये। इसी लिये हज़रते इब्राहीम (अ.स.) के परिन्दों को ज़िन्दा करने और हज़रते मूसा (अ.स.) के कोहे तूर पर ले जाने और रसूले ख़ुदा (स.अ.) के अहयाए अम्वात फ़रमाने का हवाला दे कर फ़रमाया कि इन चीज़ों पर तौरेत व इन्जील और क़ुरआन मजीद की शहादत मौजूद है। अगर मुर्दो को ज़िन्दा करने से इन्सान ख़ुदा हो सकता है तो यह सब अम्बिया भी ख़ुदा होने के मुस्तहक़ हैं। यह सुन क रवह चुप हो गया और उसने इस्लाम क़ुबूल करने के सिवा और चारा न देखा।

आलिमे यहूद से मनाज़ेरा

उल्माए यहूद में से एक आलिम जिसका नाम ‘‘ रासुल जालूत ’’ था , को अपने इल्म पर बड़ ग़ुरूर और तकब्बुर व नाज़ था। वह किसी को भी अपनी नज़र में न लाता था। एक दिन उसका मनाज़रह और मुबाहेसा फ़रज़न्दे रसूल (स.अ.) हज़रत इमाम अली रज़ा (अ.स.) से हो गया। आपसे गुफ़्तुगू के बाद उसने अपने इल्म की हक़ीक़त जानी और समझा कि मैं ख़ुद फ़रेबी में मुबतेला हूँ।

इमाम (अ.स.) की खि़दमत में हाज़िर होने के बाद उसने अपने ख़्याल के मुताबिक़ बहुत सख़्त सवालात किये। जिनके तसल्ली बख़्श और इत्मीनान आफ़रीन जवाबात से बहरावर हुआ। जब वह सवालात कर चुका तो इमाम (अ.स.) ने फ़रमाया कि ऐ ‘‘ रासुल जालूत ’’ तुम तौरैत की इस इबारत का क्या मतलब समझते हो कि ‘‘ आया नूर सीना से और रौशन हुआ जबले साएर से और ज़ाहिर हुआ कोहे फ़ारान से ’’ उसने कहा कि इसे हम ने पढ़ा ज़रूर है लेकिन उसकी तशरीह से वाक़िफ़ नहीं हूँ। आपने इरशाद फ़रमाया , कि नूर से वही मुराद है। तमरे सीना से वह पहाड़ मुराद है जिस पर हज़रत मूसा (अ.स.) ख़ुदा से कलाम करते थे। जबल साईर से महल व मक़ामें ईसा (अ.स.) मुराद है। कोहे फ़ारान से जबले मक्का मुराद है जो शहर से एक मंज़िल के फ़ासले पर वाक़े है। फिर फ़रमाया तुम ने हज़रते मूसा (अ.स.) की यह वसीयत देखी है कि तुम्हारे पास बनी अख़वान से एक नबी आयेगा उसकी बात मानना और उसके क़ौल की तसदीक़ करना। उसने कहा देखी है। आपने पूछा की बनी अख़वान से कौन मुराद है ? उसने कहा मालूम नहीं। आपने फ़रमाया कि वह औलादे इस्माईल हैं क्यों कि वह हज़रत इब्राहीम के एक बेटे हैं और बनी इसराईल के मुरेसे आला हज़रत इस्हाक़ बनी इब्राहीम के भाई हैं और उन्हीें से हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.) हैं।

उसके बाद जबले फ़ारान वाली बशारत की तशरीह फ़रमा कर कहा कि शैया नबी का क़ौल तौरैत में मज़कूर है कि मैंने दो सवार देखे कि जिनके परतौ से दुनिया रौशन हो गई। उन्में एक गधे पर सवारी किये था और एक ऊँट पर। ऐ ‘‘ रासुल जालूत ’’ तुम बतला सकते हो उस से कौन मुराद हैं ? उसने इन्कार किया , आपने फ़रमाया कि राकेबुल हमार से हज़रत ईसा (अ.स.) और राकेबुल जमल से हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.) मुराद हैं।

फिर आपने फ़रमाया कि तुम हज़रत जबकूक नबी के उस क़ौल से वाक़िफ़ हो कि ख़ुदा अपना बयान जबले फ़ारान से लाया और तमाम आसमान हम्दे इलाही की आवाज़ों से भर गये। उसकी उम्मत और उसके लशकर के सवार ख़ुशकी और तरी में जंग करेंगे। उन पर एक किताब आयेगी और सब कुछ बैतुल मुकद्दस की ख़राबी के बाद होगा। इसके बाद इरशाद फ़रमाया कि यह बताओ कि तुम्हारे पास हज़रत मूसा (अ.स.) की नबूवत की क्या दलील है ? उसने कहा कि उनसे वह उमूर ज़ाहिर हुए जो उनसे पहले के अम्बिया पर नहीं हुए थे। मसलन दरिया ए नील का शिग़ाफ़ता होना। असा का संाप बन जाना। एक पत्थर से बारह चशमों का जारी होना और यदे बैज़ा वग़ैरा। आपने फ़रमाया कि जो भी इस क़िस्म के मोजेज़ात को ज़ाहिर करे और नबूवत का मुद्दई हो उसकी तसदीक़ करनी चाहिये। उसने कहा नही। आपने फ़रमाया क्यों ? कहा इस लिये कि मूसा को जो क़ुरबत या मंज़िलत हक़्क़े ताआला के नज़दीक़ थी वह किसी को नहीं हुई। लेहाज़ा हम पर वाजिब है कि जब तक कोई शख़्स बैनेह वही मोजेज़ात व करामात न दिखलाये हम उसकी नबूवत का इक़रार न करेंगे। इरशाद फ़रमाया कि तुम मूसा (अ.स.) से पहले अम्बिया मुरसलीन की नबूवत का किस तरह इक़रार करते हो हांला कि उन्होंने न कोई दरिया शिग़ाफ़्ता किया न किसी पत्थर से चशमें निकाले न उनका हाथ रौशन हुआ और न उनका असा अज़दहा बना। ‘‘ रासुल जालूत ’’ ने कहा कि जब ऐसे उमूर व अलामात ख़ास तौर से उनसे ज़ाहिर हों जिनके इज़हार से उमूमन तमाम ख़लाएक़ आजिज़ हो , तो वह अगरचे बैनेह ऐसे मोजेज़ात हों या न हों। उनकी तस्दीक़ हम पर वाजिब हो जायेगी।

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) ने फ़रमाया कि हज़रत ईसा (अ.स.) भी मुर्दों को ज़िन्दा करते , कोरे मादर ज़ाद (पैदाईशी अन्धे) को बीना बनाते। मबरूस को शिफ़ा देते। मिट्टी की चिड़िया बना कर हवा में उड़ाते थे। वह यह उमूर हैं जिनसे आम लोग आजिज़ हैं फिर तुम उनको पैग़म्बर क्यों नहीं मानते ? रासुल जालूत ने कहा कि लोग ऐसा कहते हैं मगर हमने उनको ऐसा करते देखा नहीं है। फ़रमाया तो क्या आयात व मोजेज़ाते मूसा (अ.स.) को तुमने अपनी आंखों से देखा है आखि़र वह भी तो मोतबर लोगों की ज़बानी सुना ही होगा। वैसा ही अगर ईसा (अ.स.) के मोजेज़ात मोतबर लोगों से सुनो तो तुमको उनकी नबूवत पर ईमान लाना चाहिये और बिल्कुल इसी तरह हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.) की नबूवत व रिसालत का इक़रार आयातो , मोजेज़ात की रौशनी में करना चाहिये। सुनो उनका एक अज़ीम मोजेज़ा कु़रआने मजीद है जिसकी फ़साहतो बलाग़त का जवाब क़यामत तक नहीं दिया जा सकेगा। यह सुन कर वह ख़ामोश हो गया।

आलिमे मजूस से मनाज़ेरा

मजूसी यानी आतश परस्त का एक मशहूर आलिम ‘‘ हरबिज़ा अकबर ’’ हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की खि़दमत में हाज़िर हो कर इल्मी गुफ़्तुगू करने लगा। आपने उसके सवालात के मुकम्मल जवाबात इनायत फ़रमाये। उसके बाद उस से सवाल किया कि तुम्हारे पास ‘‘ ज़र तश्त ’’ की नबूवत की क्या दलील है। उसने कहा कि उन्होेंने हमारी ऐसी चीज़ों की तरफ़ रहबरी फ़रमाई है जिसकी तरफ़ पहले किसी ने रहनुमाई नहीं की थी। हमारे असलाफ़ कहा करते थे कि ‘‘ ज़र तश्त ’’ ने हमारे लिये वह उमूर मुबाह किये हैं कि उनसे पहले किसी ने नहीं किये थे। आपने फ़रमाया कि तुम को इस अम्र में क्या उज़्र हो सकता है कि कोई शख़्स किसी नबी और रसूल के फ़ज़ायलो कमालात तुम पर रौशन करे और तुम उसके मानने में पसो पेश करो। मतलब यह है कि जिस तरह तुम ने मोतबर लोगों से सुन कर ‘‘ ज़र तश्त ’’ की नबूवत मान ली। उसी तरह मोतबर लोगों से सुन कर अम्बिया और रसूल की नबूवत के मानने में तुम्हें क्या उज़्र हो सकता है। यह सुन क रवह ख़ामोश हो गया।

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) और इस्मते अम्बिया (अ.स.)

अम्बिया कराम , दवाज़दाह इमाम और जनाबे मरयम व हज़रते फ़ात्मा (स.अ.) की असमत का एतेक़ाद मुसल्लेमात से है , लेकिन बद क़िस्मती से बाज़ मुसलमान जो उनकी हैसियत को सही तौर पर नहीं समझ सके वह इसमें कलाम करते हैं इस लिये बहस ख़ास अहमियत की मालिक बन गई है और उलमा ने इस पर ख़ामा फ़रसाई फ़रमाई है। इस सिलसिले में किताब तन्ज़ीहुल अम्बिया , एहतेजाजे तबरीसी , बेहारूल अनवार , शरह तजरीद वग़ैरह देखने के क़ाबिल हैं। हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) जो ख़ुद अपने आबाओ अजदाद और अम्बिया की तरह मासूम थे उन से जब इस मसले के मुताअल्लिक़ सवाल किया गया तो आपने उसका जवाब निहायत ख़ूब सूरत तरीक़े पर दे कर मुख़ातिब को मुतमईन फ़रमा दिया।

अली बिन जहम कहते हैं कि एक दफ़ा मामून रशीद ने हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) से दरयाफ़्त किया कि जब ख़ुदा वन्दे आलम ने हज़रते आदम (अ.स.) के लिये वाज़े तौर पर फ़रमा दिया ‘‘ फ़ाआसा आदम रब्बेहे फ़ग़वा ’’ कि आदम ने अपने परवर दिगार की नाफ़रमानी की और वह बहक गये तो फिर वह मासूम कहां रहे।

आपने फ़रमाया कि ख़ुदा का हुक्म था कि ऐ आदम तुम दोनों बेहिश्त में रहो और जो चाहे खाओ पियो। ‘‘ वला तक़रेबा हुदल शजरतः फ़ता कूना मिनल ज़ालेमीन ’’ लेकिन इस दरख़्त के नज़दीक़ न जाना , वरना अपना खुद बिगाड़ोगे। यानी उनसे यह नहीं फ़रमाया था कि इस शजर और उसके जिन्स दीगर से भी न खाना और उन्होंने इस दरख़्त ममनूआ से खाया भी नहीं। मगर शैतान के वसवसे से एक और वैसे ही दरख़्त से खा लिया क्यों कि शैतान ने उन से कहा कि ख़ुदा वन्दे तआला ने तुम को ख़ास उस दरख़्त से मना फ़रमाया है इस क़िस्म के और दरख़्तों से मुमानियत नहीं फ़रमाई और उसके पास जाने की भी मुमानियत नहीं फ़रमाई। खाने का ज़िक्र इरशादे ख़ुदा वन्दी में मौजूद नहीं। फिर शैतान ने उनसे क़सम खाई कि मैं तुम्हारा नासेह मुशफ़िक़ हूँ। हज़रत आदम व हव्वा ने इस से पहले किसी को झूठी क़सम खाते नहीं सुना था। उनको धोका हो गया और उसकी क़सम पर एतेबार कर के उसके मुरतकिब हो गये और यह इज़तेराब भी उन हज़रात से क़ब्ले नबूवत हुआ और गुनाहे कबीरा न था। जिससे मुस्तहक़ दुख़ूले जहन्नम होते। यह सिर्फ़ सग़ायरे मौहूबा से था जो अम्बिया (अ.स.) से क़ब्ल अज़ वही जाएज़ हैै। जब ख़ुदा वन्दे आलम ने उनको बरगुज़ीदा किया और नबी गर दाना तो मासूम थे। गुनाहे कबीरा व सग़ीरा उन हज़रात से सादिर न होता था। चुनान्चे अल्लाह तआला ने इरशाद फ़रमाया , ‘‘ सुम इतमेबाह रबा फ़ताबा अलैहे ’’ ख़ुदा ने उनको बरगुज़ीदा किया और उनकी तौबा क़ुबूल कर ली।

अल्लामा तबरिसी फ़रमाते हैं सग़ाएर मौहूबा से तरक अवला मुराद है जो अम्बिया के लिये क़बल अज़ल नुज़ू लवही जाएज़ है। मोअल्लिफ़ का कहना है कि (नहीं) की दो क़िस्में है। नहीं तरहीमी और नहीं तनज़ीही लातक़रबा में यही थी। यानी इसके क़़रीब न जाना तुम्हारे लिये बेहतर होगा। फ़ताकूना अलज़ालमीन और अगर चले गए तो तुम अपना ख़ुद नुक़सान करोगे। जैसा कि किताब ‘‘ तनज़ीह अम्बिया ’’ से मुस्तफ़ाद होता है।

इसी तरह आपने हज़रत इब्राहीम (अ.स.) , हज़रत मूसा (अ.स.) , हज़रत यूसुफ़ (अ.स.) और हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.) की असमत पर रौशनी डाली और बतलाया कि इज़रात से गुनाहों का सादिर होना इमकान व कु़दरत के बावजूद मोहाल था। इन से कभी कोई गुनाह सग़ीरा हो या कबीरा सादिर नहीं हुआ।( उयून अख़बार रज़ा पृष्ठ 71 प्रकाशित ईरान )


आपकी तसानीफ़

उलमा ने आपकी तसानीफ़ में सहीफ़तुर रज़ा , सहीफ़तुर रिज़विया , तिब्बे रज़ा और और मसनदे इमाम रज़ा (अ.स.) का हवाला दिया है और बताया है कि आपकी तसानीफ़ हैं। सहीफतुर्ररज़ का ज़िक्र अल्लामा मजालिसी , अल्लामा तबरसी और अल्लामा ज़हमख़शरी ने किया है। इसका उर्दू तरजुमा हकीम इकराम अली रज़ा लखनवी ने प्रकाशित कराया था। अब जो तक़रीबन नापैद है। सहीफ़तुर अरज़ा का तरजुमा मोलवी शरीफ़ हुसैन साहब बरेलवी ने किया है। तिब्बे रज़ा का ज़िक्र अल्लामा मजलिसी शेख़ मुन्तख़बुद्दीन ने किया है। इसकी शरह फ़ज़लुल्लाह इब्ने इरावन्दी ने लिखी है इसी को रिसाला ज़हबिया भी कहते हैं और इसका तरजुमा मौलाना हकीम मक़बूल अहमद साहब क़िबला मरहूम ने भी किया है। इसका तज़किरा शमशुल उलमा अल्लामा शिबली नोमानी ने अल मामून पृष्ठ 92 में किया है। मसनदे इमाम रज़ा (अ.स.) का ज़िक्र अल्लामा चेलपी ने किताब मशफ़ुल ज़नून में किया है। जिसको अल्लामा अब्दुल्लाह अमरत सरी ने किताब अरजहुल मतालिब के पृष्ठ 454 पर नक़ल किया है। नाचीज़ मुअल्लिफ़ के पास यह किताब मिस्र की मतूबा मौजूद है। यह किताब 1321 हिजरी में छपी है और इसके मुरतिब अल्लामा शेख़ अब्दुल अलवासा मिस्री और महशी अल्लामा मोहम्मद इब्ने अहमद है।

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) ने ‘‘ माऊल लहम ’’ बनाने और मौसिमयात के मुताअल्लिक़ जो अफ़दा फ़रमाया है उसका ज़िक्र किताबों में मौजूद है। तफ़सील के लिये मुलाहेज़ा हो।( दमए साकेबा वग़ैरा )

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) और शेरे क़ालीन

अल्लामा मोहम्मद तक़ी इब्ने मोहम्मद बाक़र हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) के हवाले से तहरीर फ़रमाते हैं कि हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की वली अहदी के ज़माने में एक दफ़ा शदीद तरीन क़हत पड़ा। मामून ने हज़रत की खि़दमत में हाज़िर हो कर अर्ज़ की मौला कोई तदबीर कीजिए और किसी सूरत से दुआ फ़रमाइये कि ख़ुदा वन्दे आलम नज़ूले बारां कर दे। अब मुल्क की बुरी हालत हो गई है। भूख और प्यास से लोगों के जान बहक़ होने का सिलसिला शुरू हो गया है। आपने इरशाद फ़रमाया ऐ बादशाह घबरा नहीं। मैं दो शम्बे के दिन तलबे बारीश के लिये निकलूगां। मुझे अपने परवर दिगार से बड़ी तवक़्क़ा है। इंशा अल्लाह नजूले बारां होगा और ख़ल्के़ ख़ुदा की परेशानी दूर होगी। ग़रज़ कि वक़्ते मुक़र्रर आया और इमाम (अ.स.) सहरा की तरफ़ बरामद हुए। आपने मुसल्ला बिछाया और दस्ते दुआ बारगाहे अहदीयत में बलन्द कर के दोआ फ़रमाई अभी दुआ के जुमले तमाम न होने पाए थे कि ठन्डी हवा के झोंके चलने लगे। बादल छा गया बूंदे पड़नी लगीं और इस क़दर बारिश हुई कि जल थल हो गया। बादशाह भी ख़ुश हुआ पब्लिक भी मुतमईन और आसूदा हुई और लोग अपने अपने घरों को वापस चले गए। इस करामते ख़ास और इस्तेजाबत दोआ की वजह से बहुत से हासिद जल भुन कर ख़ाकिस्तर हो गए। एक दिन जब दरबार आरास्ता था उन्हीं हासिदों में से एक ने कहा , लोग आपके बारे में बहुत से ख़ुराफ़ात नशर करते हैं और आपको बढ़ाने की सई में मुनहमिक़ हैं। सब चाहते हैं कि आपका पाया बादशाह सलामत के पाय से बलन्द कर दें और सुने सब से बड़ी करामत जो आपकी इस वक़्त मशहूर की जा रही है वह यह है कि आप ने बारिश करा दी है मैं कहता हूँ कि जब कि बारिश अर्से से नहीं हुई थी। वह आपकी दुआ करते या न करते उसे तो होना ही था लेहाज़ा मेरी नज़र में यह करामत कोई हैसियत नहीं रखती हां करामत और मोजिज़ा तो यह है कि पेशे नज़र क़ालीन और मस्नद पर जो शेर की तस्वीर बनी हुई है उसे मुजस्सम कर दीजिये और हुक्म दीजिए की मुझे फाड़ खाए।

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) ने फ़रमाया कि देख मैंने किसी से नहीं कहा कि मेरी करामत बयान करे और न यह कहा कि मुझे बढ़ाने की कोशिश करे। अब रह गया आबे बारानी का वाक़ेया , वह ख़ुदा की मेहरबानी और इनायत से अमल में आया है , मैं इसमें भी अपनी कोई तारीफ़ नहीं चाहता। यह सब ख़ुदा की इनायत है। अलबत्ता जो तुझे यह हौंसला है कि शेरे क़ालीन व मसनद मुजस्सम हो जाए और तुझे फाड़ खाए तो ले यह किए देता हूँ।

यह फ़रमा कर आप शेर की तस्वीरों की तरफ़ मुतवज्जा हुए और आपने फ़रमाया , ‘‘ कि ऐन फ़ाजिर कि नज़दे शमाअस्त और राबदरौ असर राबाक़ी नगज़ारीद ’’ इस फ़ासिक़ व फ़ाजिर को चीर फाड़ कर खा जाओ कि इसका निशान तक बाक़ी न रहे।

इमाम (अ.स.) का यह फ़रमाना था कि दोनों शेर की तस्वीर मुजस्सम हो गयीं और उन्होंने हमहमा भर कर काफ़िर अज़ली पर हमला कर दिया जिसका नाम हमीद बिन महरान था और उसे पारा पारा कर के खा डाला। इस हंगामे को देख कर मामून बेहोश हो गया। हज़रत ने उसे होश में ला कर शेरों को हुक्म दिया कि अपनी असली हालत व सूरत में हो जाओ चुनान्चे वह फिर क़ालीन व मसनद की तसवीन बन गये।( काशेफ़ुन नक़ाब शरह उयून अख़बार रज़ा पृष्ठ 216)


हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) के साथ उम्मे हबीबा बिन्ते मामून की शादी और मामून का सफ़रे ईराक़

वाक़ेए वली अहदी के क़बल बाद से ले कर 202 हिजरी के शुरू तक हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) से मनाज़िरे , मुबाहसे और इल्मी मज़ाहिरे मामून रशीद कराता रहा। अब इसकी वजह या यह हो कि शोहरते आम्मा हो जाए और अलवी सरनिगंू रहें और अलमे ख़ुरूज बुलन्द न करें या यह हो कि अब्बासीयों पर हुज्जतें क़ायम हो जायं और हज़रत की अहलीयत व क़ाबलीयत से मरऊब हो कर वह लोग मुख़लेफ़त और तमरूद व सरकशी का क़सद न करें और ठीक से मामून को हुकूमत करते दें। या यह हो कि इमाम रज़ा (अ.स.) और उनके मानने वालों के दिल साफ़ हो जायें और किसी को बाद के आने वाले वाक़ेयात में यह शुबहा न हो कि मनाज़रे और मुबाहसे के बाद मामून ने अपने ख़ुफ़िया मक़सद की तकमील के लिये ईराक़ का सफ़र करने का फ़ैसला किया। इसके क़ब्ल इसने यह ज़रूरी समझा कि शुबहे की गुनजाईश को ख़त्म कर देने के लिये अपनी लड़की की शादी इमाम रज़ा (अ.स.) से कर दे। चुनान्चे उस ने रऊसा अल शहाद बरसरे दरबार मजिलिसे अक़्द कर के अपनी बेटी उम्में हबीब की शादी हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) के साथ कर दी।

अल्लामा शिब्लन्जी लिखते हैं कि ‘‘ ज़ौजा अल मामून अबनाता उम्में हबीब फी अव्वल सुन्नतह असनैन वमातैन वल मामून मतार्वज्जाहू अल ईराक़ ’’ मामून ने अवएल 202 हिजरी में अपनी लड़की उम्मे हबीबा का अक़्द हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) के साथ कर दिया , यह उस वक़्त किया जब कि वह सफ़रे ईराक़ का तहय्या कर चुका था।( नूरूल अबसार पृष्ठ 142 प्रकाशित मिस्र )

अल्लामा मोहम्मद रज़ा लिखते हैं कि उम्मे हबीबा को आपके तसर्रूफ़ में नहीं दिया गया।( जन्नातुल ख़ुलूद पृष्ठ 32) यह 202 हिजरी ही है जिसमें अब्बासीयों ने बग़दाद की हुकूमत से मामून को बे दख़ल कर के इसकी जगह पर इब्राहीम बिन मेहदी को ख़लीफ़ा बनाने का ऐलान कर दिया था। इस वक़्त बग़दाद की हालत यह थी कि वह इन्तेशार और बद नज़मियों का मरकज़ बन गया था।

मुवर्रिख़ ज़ाकिर हुसैन वाक़िए वली अहदी के बाद के हालात के सिलसिले में लिखते हैं कि बग़दाद और उसके गिर्द व नवाह में बिल्कुल बदनज़मी फैल गई , लुच्चेख् ग़ुन्डे दिन दहाड़े लूट मार करने लगे। जुनूबी ईराक़ व हिजाज़ में भी मामलात की हालत ऐसी ही ख़राब हो रही थी। फ़ज़ल सब ख़बरों को पोशीदा रखता था । मगर इमाम रज़ा (अ.स.) ने उन्हें बा ख़बर कर दिया। बादशाह वज़ीर से बदज़न हो गया। मामून को जब इन शोरिशों की ख़बर हुई तो बग़दाद की तरफ़ रवाना हो गया। सरख़स में पहुँच कर उसने अपने वज़ीर को हम्माम में क़त्ल करा दिया। फिर जब तूस पहुँचा तो इमाम रज़ा (अ.स.) को जिनको वली अहद करने के सबब बग़दाद में बग़ावत हुई थी अग़ूरों में ज़हर दे कर शहीद कर दिया। मामून में ज़ाहिर में तो मातम किया और वहीं दफ़्न कर के मक़बरा तामीर कराया। मामून ने इमाम (अ.स.) की वफ़ात का हाल बग़दाद लिख भेजा जिससे वहां अमनो अमान क़ायम हो गया। मामून आगे बढ़ा यहां तक कि मदाएन पहुँच कर आठ दिन क़याम किया। जहां बग़दाद के जंगी सरदारों , रईसों से मिला। बनी अब्बास ने उसका इस्तक़बाल किया और उसने बाज़ अमाएद की दरख़्वास्त पर फिर वही अब्बासी सियाह रंग इख़्तेयार कर लिया। मामून के आने की ख़बर सुन कर इब्राहीम बिन मेहदी और उसके तरफ़दार भाग गये मगर फिर इब्राहीम पकड़ा गया।( तारीख़े इस्लाम जिल्द 1 पृष्ठ 61 वल फ़ख़्री वल मामून )

मामून रशीद अब्बासी और हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की शहादत

यह एक मुसल्लेमा हक़ीक़त है कि ग़ैर मासूम अरबाबे इक़्तेदार हवसे हुक्मरानी में किसी क़िस्म का सरफ़ा नहीं करते अगर हुसूले हुकूमत या तहफ़्फ़ुज़े हुक्मरानी में बाप बेटे , मां बेटी या मुक़द्दस से मुक़द्दस तरीन हस्तियों को भेंट चढा़ दे , तो वह उसकी परवाह नहीं करते। इसी बिना पर अरब में मिसाल के तौर पर कहा जाता है कि ‘‘ अल मुल्क अक़ीमुन ’’

अल्लामा वहीदुज़्ज़मा हैदार बादी लिखते हैं कि अल मुल्क अक़ीम बादशाहत बाझं है। यानी बादशाहत हासिल करने के लिये बाप बेटे की परवाह नहीं करता। बेटा बाप की परवाह नहीं करता बल्कि ऐसा भी हो जाता है कि बेटा बाप को मार कर खुद बादशाह बन जाता है।( अनवारूल लुग़त पारा 8 पृष्ठ 173) अब इस हवसे हुक्मरानी में किसी मज़हब और अक़ीदे का सवाल नहीं । हर वह शख़्स जो इख़्तेदार का भूखा होगा वह इस क़िस्म की हरकतें करेगा। मिसाल के लिये इस्लामी तवारीख़ की रौशनी में हुज़ूर रसूले करीम (स.अ.) की वफ़ात के फ़ौरन बाद के वाक़यात को देखिये। जनाबे सय्यदा (स.अ.) के मसाएब व आलाम और वजहे शहादत पर ग़ौर किजिये। इमाम हसन (अ.स.) के साथ बरताव पर ग़ौर फ़रमाईये। वाक़िया ए करबला और उसके पसे मंज़र , नीज़ दीगर आइम्मा ए ताहेरीन के साथ बादशाहाने वक़्त के सुलूक और उनकी क़ैदो बन्द और शहादत के वाक़ेयात को मुलाहेज़ा कीजिए। इन उमूर से यह बात वाज़े हो जायेगी कि हुक्मरानी के लिये क्या क्या मज़ालिम किए जा सकते हैं और कैसी कैसी हस्तियों की जानें ली जा सकती हैं और क्या कुछ किया जा सकता है। तवारीख़ में मौजूद है कि मामून रशीद अब्बासी की दादी ने अपने बेटे ख़लीफ़ा हादी को 26 साल की उम्र में ज़हर दिलवा कर मार दिया। मामून रशीद के बाप हारून रशीद अपने वज़ीरों के ख़ानदान बरामका को तबाह व बरबाद कर दिया।( अल मामून पृष्ठ 20) मरवान की बीवी ने अपने ख़ाविन्द को बिस्तरे ख़्वाब पर दो तकियों से गला घुटवा कर मरवा दिया। वलीद बिन अब्दुल मलिक ने फ़रज़न्दे रसूल इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) को ज़हर से शहीद किया। हश्शाम बिन अब्दुल मलिक ने इमाम मोहम्मद बाक़र (अ.स.) को ज़हर दिया। इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) को मन्सूर दवान्क़ी ने ज़हर से शहीद किया। इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) को हारून रशीद अब्बासी ने ज़हर से शहीद किया। इमाम अली रज़ा (अ.स.) को मामून अब्बासी ने ज़हर दे कर शहीद किया। इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) को मोतसिम बिल्लाह ने उम्मुल फ़ज़ल बिन्ते मामून के ज़रिये से ज़हर दिलवाया। इमाम अली नक़ी (अ.स.) को मोतमिद अब्बासी ने ज़हर से शहीद किया। ग़रज़ कि हुकूमत के सिलसिले में यह सब कुछ होता रहता है। औरंगज़ेब को देखिये , उसने अपने भाई को क़त्ल कराया और अपने बाप को सलतनत से महरूम कर के क़ैद कर दिया था। उसी ने शहीदे सालिस हज़रत नूरूल्लाह शुस्तरी (आगरा) की ज़बान गुद्दी से खिंचवाई थी। बहर हाल जिस तरह सब के साथ होता रहा। हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) के साथ भी हुआ।

तारीख़े शहादत

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की शहादत 23 ज़ीक़ाद 203 हिजरी मुताबिक़ यौमे जुमा बा मुक़ाम तूस वाक़ेए हुई है। (जिलाउल उयून पृष्ठ 280, अनवारूल ग़मानीह पृष्ठ 127, जन्नातुल ख़ुलूद पृष्ठ 31) आपके पास इस वक़्त अज़ीज़ अक़रबा औलाद वग़ैरा में कोई न था। एक तो आप खुद मदीना से ग़रीबुल वतन हो कर आए दूसरे यह कि दारूल सलतनत मर्व में भी आपने वफ़ात नहीं पाई बल्कि आप सफ़र की हालत में बा आलमे ग़ुरबत फ़ौत हुए। इसी लिये आपको ग़रीबुल ग़ुरबा कहते है।

वाक़िया ए शहादत के मुताअल्लिक़ मोवर्रिख़ लिखते हैं कि इमाम रज़ा (अ.स.) ने फ़रमाया था ‘‘ फ़मा यक़तलनी वल्लाह वग़ैरह ’’ ख़ुदा की क़सम मुझे मामून के सिवा कोई और क़त्ल नहीं करेगा और मैं सब्र करने पर मजबूर हूँ।( दमए साकेबा जिल्द 3 पृष्ठ 71)

अल्लामा शिब्लन्जी लिखते हैं कि हर समा बिन अईन से आपने अपनी वफ़ात की तफ़सील बताई थी और यह भी बता दिया था कि अंगूर और अनार में मुझे ज़हर दिया जायेगा।( नूरूल अबसार पृष्ठ 144)

अल्लामा मआसिर लिखते हैं कि एक रोज़ मामून ने हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) को अपने गले से लगाया और पास बिठा कर उनकी खि़दमत में बेहतरीन अंगूरों का एक तबक़ रखा और उसमें से एक खोशा उठा कर आपकी खि़दमत में पेश करते हुए कहा , इब्ने रसूल अल्लाह यह अंगूर इन्तेहाई उम्दा हैं तनावुल फ़रमाईये। आपने यह कहते हुए इन्कार फ़रमाया कि जन्नत के अंगूर इससे बेहतर हैं। इसने शदीद इसरार किया औेर आपने उसमें से तीन दाने खा लिये। यह अंगूर के दाने ज़हर आलूद थे। अंगूर खाने के बाद आप उठ खड़े हुए। मामून ने पूछा कहां जा रहे हैं आपने इरशाद फ़रमाया जहां तूने भेजा है वहां जा रहा हूँ। क़याम गाह पर पहुँचने के बाद आप तीन दिन तक तड़पते रहे। बिल आखि़र इन्तेक़ाल फ़रमा गये।( तारीख़े आइम्मा पृष्ठ 476) इन्तेक़ाल के बाद हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) बा ऐजाज़ तशरीफ़ लाए और नमाज़े जनाज़ा पढ़ाई और आप वापस चले गए। बादशाह ने बड़ी कोशिश की मगर न मिल सका।( मतालेबुल सूऊल पृष्ठ 288)

इसके बाद आपको बा मुक़ाम तूस मोहल्ला सना बाद में दफ़्न कर दिया गया जो आज कल मशहदे मोक़द्दस के नाम से मशहूर है और अतराफ़े आलम के अक़ीदत मन्दों के हवाएज का मरक़ज़ है।


शहादते इमाम रज़ा (अ.स.) के मुताअल्लिक़ अबासलत हरवी का बयान

अल्लामा अब्दुर्रहमान जामी तहरीर फ़रमाते हैं कि अबू सलत हरवी का बयान है कि हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) ने एक दिन मुझ से फ़रमाया कि हारून रशीद के पांयती की गिर्द की मिट्टी लाओ। जब मैं मिट्टी लाया तो आपने उसे सूंघ पर फेंक दिया और फ़रमाया कि अन्क़रीब मेरी क़ब्र के लिये इसी मुक़ाम की ज़मीन खोदेंगे और ऐसा पत्थर निकल आएगा कि उसे न कोई काट सकेगा और न उखाड़ सकेगा। फिर फ़रमाया कि हारून रशीद के सरहाने की मिट्टी लाओ मैं मिट्टी ले आया तो आपने उसे सूंघ कर फ़रमाया कि इसी मुक़ाम पर मेरी क़ब्र होगी। फिर फ़रमाया ऐ अबू सलत कल मुझे मामून तलब करेगा। सुनो जब मैं जाने लगूं तो तुम यह देख लेना कि मेरे सर पर कोई चादर वगै़रा है या नहीं। अगर हो तो मुझ से कलाम न करना और अगर न हो तो मुझसे बातें करना। अबू सलत कहते हैं कि सुबह के वक़्त इमाम (अ.स.) फ़राग़त के बाद मामून के पयाम का इन्तेज़ार करने लगे। इतने में मैंने देखा कि मामून रशीद का क़ासिद आ गया इमाम (अ.स.) इसके हमराह रवाना हो गये। जिस वक़्त आप जा रहे थे आपके सरे मुबारक पर अज़ा क़िस्म कोई तौलिया कोई कपड़ा था। मैंने हस्बे हुक्म आप से कोई कलाम नहीं किया और वह तशरीफ़ ले गए। इस वक़्त मामून के सामने अंगूरों का एक तबक़ रखा हुआ था। इसने मरासिमे ताजी़म अदा करने के बाद कहा , इब्ने रसूल (स.अ.) आपने इस से बेहतर अंगूर कभी नहीं देखा होगा। आपने फ़रमाया कि बेहिश्त के अंगूर इससे कहीं बेहतर हैं फिर मामून ने एक ख़ोशये अंगूर उठाते हुए कहा। लीजिए तनावुल फ़रमाइये। आपने फ़रमाया ऐ बादशाह इसे खाने को इस वक़्त मेरा जी नहीं चाहता , लेहाज़ा मुझे माफ़ करो। मैं इस वक़्त नहीं खाऊंगा। मामून ने शदीद इसरार करते हुए कहा ‘‘ मारमोहत्तम नी वारी ’’ आप क्यों नहीं तनावुल करते क्या आपको मुझ पर भरोसा नहीं है और क्या आप मुझ पर इत्तेहाम लगाते और मुझसे बदगुमानी करते हैं। यह कहते हुए मामून ने एक खा़ेशा उठाया और उसे खाना शुरू किया। फिर एक और खोशा उठाया और उसे इमाम (अ.स.) की तरफ़ बढ़ाते हुए कहा लीजिए तनावुल कीजिए। इमाम (अ.स.) ने उसके शदीद इसरार पर उसे ले लिया और उसमें से तीन दाने तनावुल फ़रमाये । इन अंगूरों को खाते ही जौहरे वजूद में इन्के़लाब पैदा हो गया। बक़िया अंगूरों को फेंकते हुए आप उठ खड़े हुए। मामून ने कहा कहां तशरीफ़ लिये जा रहे हैं ? आपने फ़रमाया कि ‘‘ बेअन्जा के फरसतादी ’’ जहां तूने भेजा है वहां जा रहा हूँ। उसके बाद आप सरे मुबारक पर चादर डाल कर रवाना हो गये।

अबु सलत हरवी कहते हैं कि इमाम (अ.स.) दरबार से रवाना हो कर दाखि़ले ख़ाना हुए और आपने मुझे हुक्म दिया कि दरवाज़ा बन्द कर दो। मैंने दरवाज़ा बन्द कर दिया। फिर आप बिस्तर पर लेट गए। आपक बिस्तर पर लेटना था कि मुझे रंजो अलम ने आ घेरा। तरह तरह के ख़्यालात पैदा होने लगे और मैं सख़्त हैरान हो कर परेशान हो गया। इमाम (अ.स.) बिस्तरे अलालत पर थे और मैं रंजो ग़म की हालत में बैठा हुआ था। नागाह मैंने घर के अन्दर एक ख़ूब सूरत नौजवान को देख कर उस से पूछा की आप कौन हैं ? और जब कि दरवाज़ा बन्द है आपको अन्दर किसने पहुँचा दिया। आपने इरशाद फ़रमाया मैं हुज्जते ख़ुदा मोहम्मद तक़ी (अ.स.) हूँ। मुझे बन्द मकान में वही लाया है जिसने चश्मे ज़दन में मदीने से यहां पहुँचाया है। मैं अपने पदरे बुज़ुर्गवार की खि़दमत के लिये हाज़िर हुआ हूँ। यह कह कर आप इमाम रज़ा (अ.स.) की खि़दमत में हाज़िर हुए। इमाम (अ.स.) ने जैसे ही आपको देखा फ़ौरन अपने सीने से लगाया। पेशानी का बोसा दिया और चुपके चुपके आप से कुछ बातें करने लगे। थोड़ी देर के बाद आपने देखा कि रूहे मुबारक मुफ़ारेक़त कर गई और इमाम (अ.स.) वफ़ात पा गए। आपके वफ़ात फ़रमाने के बाद हज़रत मोहम्मद बिन अली (अ.स.) ने ग़ुस्लो कफ़न और हुनूत का इन्तेज़ाम फ़रमाया। फिर क़ुदरती ताबूत मंगवा कर नमाज़ पढ़ने के बाद उसमे रखा। थोड़ी देर के बाद वह ताबूत आसमान की तरफ़ चला गया। अबू सलत कहते हैं कि यह देख कर मैंने अर्ज़ कि मौला अभी मामून वग़ैरा आते होंगे मैं उन्हें क्या जवाब दूंगा। आपने फ़रमाया यह ताबूत अभी वापस आ जायेगा। चुनान्चे मिस्ले साबिक़ छत शिग़ाफ़्ता हुई और ताबूत आ गया। आपने इमाम (अ.स.) को बदस्तूर बिस्तर पर लेटा दिया और मुझे हुक्म दिया कि अब दरवाज़ा खोल दो। मैंने दरवाज़ा खोल दिया तो मामून वग़ैरा दाखि़ले ख़ाना हुए और सब आहो बुका करने लगे। फिर तजहीज़ और तक़फ़ीन का अज़ सरे नौ इन्तेज़ाम हुआ और आप हारून रशीद के सरहाने दफ़्न कर दिये गए।( शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 212, रौज़तुल पृष्ठ जिल्द 3 पृष्ठ 16 अलामुल वुरा पृष्ठ 198)

अल्लामा बिन तल्हा शाफ़ेई लिखते हैं कि मामून ने हर चन्द चाहा कि इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) से मिलें मगर आपके फ़ौरी चले जाने की वजह से मुलाक़ात न हो सकी।( मतालेबुल सूऊल पृष्ठ 288)

अल्लामा नेमत उल्लाह जज़ाएरी लिखते हैं कि इमाम (अ.स.) की शहादत के बाद जो ख़बर सब से पहले उड़ी वह यह थी कि इमाम रज़ा (अ.स.) को मामून ने धोखे से शहीद कर दिये।( तज़किरतुल मासूमीन )

अल्लामा नेमत उल्लाह जज़ाएरी तहरीर फ़रमाते हैं कि मामून रशीद ने आपको अनार और अंगूर के ज़रिए ज़हर दिया था। (अनवार नेमानी पृष्ठ 27) अल्लामा तबरसी फ़रमाते हैं कि अनार के अरक़ में ज़हर मिला कर इसमें धागा तर कर लिया और उस धागे को सोज़न के ज़रिए अंगूर में गुज़ार कर उन्हें मसमूम कर दिया था।( आलामुल वुरा पृष्ठ 199)

शहादते इमाम रज़ा (अ.स.) के मौक़े पर इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) का ख़ुरासान पहुँचना

अबू मखनफ़ का बयान है कि जब हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) को ख़ुरासान में ज़हर दे दिया और आप बिस्तरे अलालत पर करवटें लेने लगे तो ख़ुदा वन्दे आलम ने इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) को वहां भेजने का बन्दो बस्त किया। चुनान्चे इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) जब कि मस्जिदे मदीना में मशग़ूले इबादत थे एक हातिफ़े ग़ैबी ने आवाज़ दी कि ‘‘ अगरमी ख़्वाही पदर खुद रा ज़िन्दा दरयाबी क़दम दर्राह न ’’ अगर अपने वालिदे बुज़ुर्ग वार से उनकी ज़िन्दगी में मिलना चाहते हो तो फ़ौरन ख़ुरासान के लिये रवाना हो जाएं यह आवाज़ सुनना था कि आप मस्जिद से बरामद हो कर दाखि़ले ख़ाना हुए और आपने अपने आइज़्ज़ा अक़रूबा को शहादते पदरे बुज़ुर्गवार से आगाह किया। घर में कोहराम बरपा हो गया। उसके बाद आप वहां से रवाना हो कर एक साअत में ख़ुरासान पहुँचे। वहां पहुँच कर देखा कि दरबान ने दरवाज़ा बन्द कर रखा है। आपने फ़रमाया कि दरवाज़ा खोल दो। मैं अपने पदरे बुज़ुर्गवार की खि़दमत में जाना चाहता हूँ। आपकी आवाज़ सुनते ही इमाम (अ.स.) ख़ुद अपने बिस्तर से उठे और दरवाज़ा खोल कर इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) को अपने गले से लगाया और बेपनाह गिरया फ़रमाया। इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) पदरे बुज़ुर्गवार की बेबसी , बेकसी और ग़ुरबत पर आंसू बहाने लगे फिर इमाम (अ.स.) तबरूकाते इमामत फ़रज़न्द के सुपुर्द कर के राहिए मुल्के बक़ा हो गए। इन्ना लिल्लाहे व इन्ना इलैहे राजेऊन। (कनज़ुल अनसाब पृष्ठ 95) अल्लामा शेख़ अब्बास क़ुम्मी बा हवाला आलामिल वुरा तहरीर फ़रमाते हैं कि हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) को ज्यों ही ख़बर मिली , ख़ुरासान तशरीफ़ ले गए और अपने वालिद बुज़ुर्गवार को दफ़्न करके एक साअ में वापस और यहां पहुँच कर लोगों को हुक्म दिया कि इमाम (अ.स.) का मातम करें।( मुन्तहल आमाल जिल्द 2 पृष्ठ 312)

बहस व नज़र

इससे इन्कार नहीं किया जा सकता है कि जिस तरह ख़लीफ़ा मामून ने हालात की रौशनी में अपने भाई की मातहती क़ुबूल कर ली। फिर उसे क़त्ल कर दिया और जिस तरह फ़ज़ल बिन सुहेल (जूल रियासतैन मालिक निसान व क़लम ‘‘ अल फ़ख़री ’’) को वज़ीरे जंग बनाया फिर उसे ब मुक़ाम सरख़स हमाम में क़त्ल करा दिया और जिस तरह ताहिर को वज़ीरे आज़म बनाया और उसी की वजह से इस्तक़रार खि़लाफ़त हासिल किया। फिर उसे क़त्ल करा दिया। बिल्कुल इसी तरह अपनी ज़रूरत के वक़्त हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) को खि़लाफ़त का वली अहद बनाया। इनके साथ अपनी लड़की की शादी की और काम निकलने केे बाद उन्हें अपने हाथों से शहीद कर दिया। यानी जब अलवियों का ज़ोर हुआ तो उनकी बग़ावत को रोक देने के लिये शदीद इन्कार के बवजूद इमाम रज़ा (अ.स.) को वली अहद बनाया और जब अब्बासीयों का ज़ोर बढ़ा तो उन्हें राज़ी करने के लिये इमाम रज़ा (अ.स.) को शहीद कर दिया। इसे कहते हैं सियासत जिसमें हर क़िस्म का हरबा इस्तेमाल करना जाएज़ है।

इमाम रज़ा (अ.स.) को किसने ज़हर दिया। इसके मुताअल्लिक़ अल्लामा शिब्ली नोमानी ने जो कुछ तहरीर फ़रमाया है उसका ख़ुलासा यह है कि तमाम मुवर्रेख़ीन व उलमाए अहले तशीय बिला इसतसना इस पर मुत्तफ़िक़ हैं कि इमाम रज़ा (अ.स.) को ख़ुद मामून ने ज़हर दिया है लेकिन मुवर्रेख़ीन अहले तसन्नुन में से एक मुवर्रिख़ ने मामून पर इस इल्ज़ाम के लगाने की जुर्रत नहीं की।( किताब अल मामून पृष्ठ 62)

मैं समझता हूँ कि अल्लामा शिब्ली इस मामले में या तो बिल्कुल मामून के साथ हुसने ज़न से काम ले रहे हैं या उन्हें इल्म ही न था। उन्होंने तो साफ़ साफ़ लिखा है कुतुब अहले तशीय हमारे पास नहीं हैं लेकिन यह नहीं लिखा है कि हम ने तमाम क़ुतुब अहले सुन्नत को देख लिया है।

मेरे ख़्याल से वह अपनी किताबों से भी न वाक़िफ़ थे और उनकी तंग नज़री ने उनसे मज़कूरा जुमले लिखवा दिए। मैं कहता हूँ कि बहुत से उलमा व मुवर्रेख़ीन अहले सुन्नत इस वाक़िए को अपनी किताबों में लिखा है बाज़ ने तो बड़ी तफ़सील के साथ वाक़िए शहादत और हादसए ज़हर ख़्वानी को तहरीर किया है और बहुतों ने इशारतन ‘‘ व कनायतन ’’ इस पर रौशनी डाली है। मिसाल के लिए मुलाहेजा़ हो।

1. तारीख़ रौज़तुल पृष्ठ जिल्द 16, 2. तारीख़ शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 202, 3. तारीख़े कामिल जिल्द 6 पृष्ठ 116, 4. तारीख़ मरूज अलज़हब मसूदी जिल्द 9 पृष्ठ 33, 5. तारीख़ नूरूल अबसार पृष्ठ 144, 6. तारीख़ अल फ़ख़री पृष्ठ 163, 7. मतालेबुल सूऊल पृष्ठ 288, 8. तारीख़ हबीब अल सियर जिल्द 2 जुज़ अव्वल पृष्ठ 51, 9. तारीख़े आले मोहम्मद पृष्ठ 64, 10. रवाहे अल मुस्तफ़ा पृष्ठ 174, 11. किताब इन्साब समानी , 12. ख़ुलासा तहज़ीब अल कमाल , 13. मुख़तसिर अख़बार अल खुलफ़ा , 14. तारीख़ तबरी फ़ारसी जिल्द 4 पृष्ठ 792, 15. तारीख़ इब्ने तूलून पृष्ठ 98, 16. इन्साब समानी , 17. अख़बार अल ख़ुलफ़ा , 18. तारीख़े इस्लाम ग़ुलाम रसूल महरिज 2 पृष्ठ 58........

मेरे नज़दीक मज़कूरह बाला हवाला जात की मौजूदगी में अल्लामा शिब्ली का यह कहना है कि एक सुन्नी मुवर्रिख़ ने भी मामून पर इस इल्जा़म लगाने की जुर्रत नही की। (अल मामून पृष्ठ 92)

और इब्ने ख़लदून और जस्टिस अमीर अली का यह फ़रमाना कि बाज़ लोगों का यह ख़्याल............ कि मामून ने खुद इमाम रज़ा (अ.स.) को ज़हर दे कर हलाक किया बिल्कुल लग़ो और फ़ुज़ूल है।( तारीख़े इस्लाम अमीर अली पृष्ठ 186) हद दर्जा मोहमल , लगव फ़ुज़ूल और न क़ाबिले ऐतबार है।

मैं इन मुनकिराने हक़ाएक़ से पूछता हूँ कि अगर मामून ने ख़ुद ज़हर नहीं दिया , तो क्या किसी एक तारीख़ में भी यह मौजूद है कि उसने वाक़िए क़त्ल की तहक़ीक़ात कराई ? हरगिज़ नहीं। नीज़ यह कि उसने आपकी वफ़ात को 24 घन्टे छुपाया क्यों ?( मक़ातिल अल तालबैन पृष्ठ 378 प्रकाशित नजफ़े अशरफ़ )

मैं यह सच कहता हूँ कि फ़रज़न्दे रसूल की जैसी शख़्सीयत के क़त्ल की तहक़ीक़ात न करानी और सिर्फ़ रो पीट कर मगरमच्छ के आँसुओं की तरह आंसू बहा कर अरबाबे नज़र की निगाहों में उसे इल्ज़ामे क़त्ल से बरी नहीं कर सकता।

मालूम होना चाहिये कि मामून को इमाम रज़ा (अ.स.) वली अहदी और फ़ज़ल बिन सहल की वज़ारते जंग पर तक़र्रूरी के बाद इस वक़्त तक सुकून नसीब नहीं हुआ जब तक वह इन दोनो को निस्त नाबूद नहीं कर सका। बग़दादियों की बग़ावत रोकने के लिये चुंकि इन दोनों को ख़त्म करना ज़रूरी था इस लिये उसने एक ही सफ़र में दोनों का ख़ात्मा कर दिया। इसके बाद अहले बग़दाद को देखा कि अब क्या चीज़ बाक़ी है जिसकी तुम शिकायत कर सकते हो। शिबली लिखता हैं कि इन दोनों के क़त्ल होने से अहले बग़दाद की शिकायतों को फ़ैसला हो गया।( अल मामून पृष्ठ 92) यानी इन दोनो के क़त्ल से मामून की ग़रज़ पूरी हो गई। अहले बग़दाद की बग़ावत का ख़ात्मा हो गया। अब्बासी क़ब्ज़े में आ गए और हुकूमत अज़ सरे नौ जम गई।


हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की तादादे औलाद

इमाम (अ.स.) की तादादे औलाद में शदीद इख़्तेलाफ़ हैं। अल्लामा मजलिसी ने बहारूल अनवार जिल्द 12 पृष्ठ 26 में कई अक़वाल नज़र करने के बाद ब हवालाए कु़र्बल असनाद तहरीर फ़रमाया है कि आपके दो फ़रज़न्द थे। 1. इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) दूसरे मूसा । अनवारे नोमानीया पृष्ठ 127 में है कि आपकी तीन औलादें थीं। अनवार हुसैनिया जिल्द 3 पृष्ठ 52 में है कि आपकी तीन औलाद थी मगर नस्ल सिर्फ़ इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) से जारी हुई। सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 123 में है कि आपके पाँच लड़के और एक लड़की थी। नूरूल अबसार पृष्ठ 125 में है कि आपके पाँच लड़के और एक लड़की थी। जिनके नाम यह हैं। इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) , हसन ज़ाफ़र , इब्राहीम , हुसैन और आएशा। रौज़तुल शोहदा पृष्ठ 438 में है कि आपके पांच लड़के थे जिनके नाम यह हैं। इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) , हसन जाफ़र , इब्राहीम , हुसैन और अक़ब ऊअज़ बुज़ुर्गवारश मोहम्मद तक़ी अस्त। मगर आपकी नस्ल इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) से बढ़ी है। यह कुछ रहमतुल आलेमीन जिल्द 2 पृष्ठ 145 में है। जन्नातुल खुलूद पृष्ठ 32 में है कि आपके पाँच लड़के और एक लड़की थी। रौज़तुल अहबाब जमालउद्दीन में है कि आपके पाँच लड़के थे। कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 110 में है कि आपके छः औलाद थीं 5 लड़के और एक लड़की। यही मतालेबुल सूऊल में है। कनज़ुल अनसाब पृष्ठ 96 में है कि आपके आठ लड़के थे जिनके नाम यह हैं इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) हादी ‘‘ अली नक़ी ’’ हसन , याकू़ब , इब्राहीम , फ़ज़ल , जाफ़र। लेकिन इमाम अल मोहद्देसीन ताज अल मोहक़्के़कीन हज़रत अल्लामा मोहम्मद बिन मोहम्मद नोमान बग़दादी अल मतूफ़ी 413 हिजरी अल मुलक़क़ब ब शेख़ मुफ़ीद अलैह रहमाह किताब इरयाद पृष्ठ 271- 345 में और ताज अल मुफ़रेसीन , अमीन अल्लादीन हज़रत अबू अली फ़ज़ल बिन हसन बिन फ़ज़ल तबरसी अल मशहदी साहब मजमउल बयान अल मतूफ़ी 548 किताब आलामुल वुरा पृष्ठ में तहरीर फ़रमाते हैं कान अलरज़ामन अल वालिद अबनहू अबू जाफ़र मोहम्मद बिन अली अल जवाद लाग़ैर। हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के अलावा अली रज़ा (अ.स.) के कोई औलाद न थी। यही कुछ किताब उमदतुल तालिब पृष्ठ 186 में है।

अल्लाम शेख़ मुफ़ीद अलैह रहमह के मुतअल्लिक़ अल्लामा सय्यद नूर उल्लाह शुस्तरी शहीदे सालिस। किताबे मजलिस मोमेनीन के पृष्ठ 200 में तहरीर फ़रमाते हैं कि वह मुअतहिद कुदसी ज़मीर और मुतकल्लिमे बे नज़ीर थे। पृष्ठ 206 में ब हवालाए ख़ुलासतुल अक़वाल तहरीर फ़रमाते हैं कि शेख़ मौसूफ़ अवसख़ अहले ज़माना व अल महूम अपने ज़माने के सब से ज़्यादा सुक़्क़ा और सब से बड़े आलिम थे। आपकी वफ़ात पर इमाम ज़माना साहबे अस्र वज़्ज़मान (अ.स.) ने मरसिया कह कर भेजा था और इस मरसिये के चन्द शेर अलैह रहमा की क़ब्र पर कन्दा हैं।

इसी तरह अल्लामा तबरसी के मुताअल्लिक़ तहरीर फ़रमाते हैं कि आपका शुमार बहुत बड़े उलमा में था। आप तफ़सीर मजमा अल बयान के मुस्निफ़ व मुफ़स्सिर और इसकी जामियत आपकी बुलन्दी मुक़ाम की शाहिद है।

(मजलिसुल मोमेनीन पृष्ठ 212)

मजलिसी सानी अल्लामा शेख़ अब्बास कु़म्मी तहरीर फ़रमाते हैं कि ‘‘ कान लिलमरज़ामन अलवलदाअबनाह अबू जाफ़र मोहम्मद ला गै़र ’’ इमाम रज़ा (अ.स.) के मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के अलावा कोई फ़रज़न्द ना था।( सफ़ीनतुल अल बहार जिल्द 2 पृष्ठ 239)

यही कुछ अल्लामा मौसूफ़ ने अपनी किताब मुन्तही अलमाल की जिल्द 2 के पृष्ठ 312 में भी लिखा है। वह तहरीर फ़रमाते हैं कि उलमा बराए इमाम रज़ा (अ.स.) फ़रज़न्दे ग़ैर अज़ इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) ‘‘ ज़िक्र न करदा अन्द बल्कि बाज़े गुफ़्ता अन्द के औलादश मुख़सर बा आँ हज़रत बुदह ’’ उलमा ने इमाम रज़ा (अ.स.) की औलाद के बारे में इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के अलावा किसी का ज़िक्र नहीं किया। बल्कि बाज़ ने तो मोहम्मद तक़ी (अ.स.) में हसर किया है।

यही कुछ अल्लामा मोहम्मद बिन शहर आशोब ने भी तहरीर फ़रमाया है वह लिखते हैं आपके फ़रज़न्द सिर्फ़ इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) हैं।( मुनाक़िब इब्ने शहर आशोब जिल्द 3 पृष्ठ 206 प्रकाशित मुल्तान )

खुलासा यह है कि फ़हूल उलमा व शिया जैसे अल्लामा शेख़ मुफ़ीद , अल्लामा तबरसी , अल्लामा इब्ने शहर आशोब , अल्लामा शेख़ अब्बास क़ुम्मी ने तहरीर फ़रमाया है कि हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) के फ़रज़न्द हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के अलावा कोई न था और जिन उलेमा ने एक से ज़्यादा औलाद तसलीम की हैं इनमें से भी अल्लामा मोहम्मद रज़ा , अल्लामा वाएज़ कशफ़ी ने लिखा है कि इनकी नस्ल सिर्फ़ इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) से बढ़ी है बाज़ उलमा एक लड़की का वजूद भी तसलीम करते हैं जैसे अल्लामा शेख़ सद्दूख़ व अल्लामा मजलिसी लड़की का नाम ‘‘ फ़ात्मा ’’ था। उन्होंने अपने पदरे बुज़ुर्गवार से रवायत भी की है। इनके शौहर का नाम मोहम्मद बिन जाफ़र बिन क़ासिम इब्ने इस्हाक़ बिन अब्दुल्लाह बिन जाफ़र बिन अबी तालिब था। वह वालिदा थीं हसन बिन मोेहम्मद बिन जाफ़र इब्ने क़ासिम की इनके मुताअल्लिक़ नूरूल अबसार शिब्लन्जी में करामत भी मज़कूरा मरक़ूम है।( मुंतहल आमाल फ़ी तारीख़ अल नबी अल्ल जिल्द 2 पृष्ठ 313 प्रकाशित तेहरान 1379 हिजरी ) मेरे नज़दीक़ इसी को तरजीह है। वाज़े ही कि तहक़ीक़ का दरवाज़ा बन्द नहीं है। इस पर मज़ीद ग़ौर किया जा सकता है।

क़ुम की मुख़्तसर तारीख़ और जनाबे फ़ात्मा (स.अ.) मासूमा ए क़ुम के मुख़्तसर हालात

क़ुम नाम है ईरान के एक क़दीम और अज़ीम शहर का जिसकी बुनियाद बारवाएते महल ‘‘अलहादी’’ दारूल तबलीग़ इस्लामी क़ुम ईरान 2 हिजरी पड़ी थी जिसका ज़िक्र ‘‘ जिसका नाम शाहनामा फ़िरदौसी ’’ में है। एक रवाएत की बिना पर 83 में क़ायम हुई थी।

क़ुम की वजहे तसमिया

कु़म की वजह तसमिया के मुताअल्लिक़ बहुत से अक़वाल हैं। 1. इस जगह का नाम ‘‘को मैदान’’ था। फिर ‘‘कु़म’’ और बाद में क़ुम हो गया। 2. इस शहर से 20 किमी 0 पर ग़रबी जानिब एक पहाड़ है जिसका नाम ‘‘ क़मु ’’ है। इसी मुनासेबत से यह नाम पड़ा जो बाद मे क़ुम हो गया। 3. इसकी आबादी से क़ब्ल कुछ लोग इस मुक़ाम पर आ ठहरे थे और उन्होंने जंगल को काट कर और इसके गढ़ों के पाट कर अपने खे़मे नसब किये थे और मकानात बनाए थे और इस जगह का नाम ‘‘कोतह’’ रखा था। जिस से ‘‘क़ुम’’ हो गया । फिर बाद में कु़म बन गया। (अल हादी क़ुम ईरानी ज़ीक़ाद 1392 हिजरी पृष्ठ 99) 4. जब कश्तीए नूह (अ.स.) चक्कर लगाती हुई इस सर ज़मीन पर पहुँची थी तो ठहर गई थी लेहाज़ा इसके क़याम की वजह से इस जगह का नाम क़ुम क़रार पाया। 5. इस इलाक़े के बाशिन्दे , का़एमे आले मोहम्मद (अ.स.) के ज़हूर करते ही इनकी खि़दमत में हाज़िर हो जायेंगे और इनके साथ क़ाएम रहेंगे और इनकी मद्द करेंगे । इसी लिये इसका नाम क़ुम रखा गया है।( सफ़ीनतुल बेहार जिल्द 2 पृष्ठ 446)

यह मुक़ाम बहुत से क़रियों में घिरा हुआ था , उन्हीं क़रियों में से एक का नाम ‘‘कमन्दान’’ था। इसी के नाम पर इस इलाक़े का नाम जो अब ‘‘ क़ुम ’’ मशहूर है। कमन्दान रख दिया गया मुरवरे अय्याम और कसरते इस्तेमाल की वजह से ’’ क़ुम ‘‘ हो गया।( मजालिसुल मोमेनीन शहीदे सालिस पृष्ठ 36)

क़ुम और अहले क़ुम के फ़ज़ाएल

तारीख़े क़ुम से मुस्तफ़ाद होता है कि यह वह जगह है जिसने ‘‘ यौमे अलस्त ’’ सब ज़मीनों से पहले विलाएते अमीरल मोमेनीन (अ.स.) को क़ुबूल किया था। इसी लिये ख़ुदा ने जन्नत का एक दरवाज़ा इसकी तरफ़ खोल दिया ह।

अल्लामा शेख़ अब्बास क़ुम्मी तहरीर फ़रमाते हैं 1. कूफ़े को तमाम शहरों पर फ़ज़ीलत है लेकिन क़ुम और अहले कु़म को तमाम दुनियां पर फ़ज़ीलत है और इसके बाशिन्दों को मशरिक़ व मग़रिब और जिन व इन्स पर फ़जी़लत है। 2. ख़ुदा ने यहां के लोगों को दीन और ईमान में हमेशा अज़ीम तौफ़ीक़ दी है। 3. इन अलबला यामद फूअता अन क़ुम वालेही ’’ तमाम बलायें कु़म और अहले क़ुम से दूर रखी गई हैं। यहीं मलाएक दफ़ये बला के लिये हाज़िर रहते हैं। 4. किसी दुश्मन ने कभी क़ुम पर ग़लबा हासिल नहीं किया। 5. कु़म अल्लाह की तरफ़ से इल्म व फ़ज़ल का मरकज़ बनाया गया है। 6. हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) इरशाद फ़रमाते हैं कि जब सारी दुनियां में फ़ितना फैल जाए तो क़ुम में पनाह ले लेना चाहिये। 7. मासूम फ़रमाते हैं कु़म आले मोहम्मद (अ.स.) का मरकज़े सुकून और शियों का मलजा व मावा है। 9. हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) फ़रमाते हैं कि जन्नत के आठ दरवाजो में से एक दरवाज़ा क़ुम में है। क़ुम के बाशिन्दे का़बिले मुबारक बाद है। 10. हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) फ़रमाते हैं कि क़ुम हमारे शियों और दोस्तों का गढ़ है। 11. क़ुम मौज़ा ए क़दमे जिबराईल (अ.स.) है। यहां एक ऐसा चश्मा है कि जो इससे पानी पी ले शिफ़ायाब हो जाए। यही वह चश्मा है जिस से हज़रत ईसा (अ.स.) ने उस मिट्टी को गूंधा था जिससे ब हुक्मे ख़ुदा ताएर बनाया था जिसका ज़िक्र क़ुरआने मजीद में है। 12. सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) फ़रमाते हैं कि अहले क़ुम का हिसाब व किताब सब क़ब्र ही में होगा और वहीं से वह जन्नत चले जायेंगे। एक रवायत में है कि इनका हिसाब व किताब न होगा और यूंही जन्नत में चले जायेंगे।( कन्ज़ुल अन्साब पृष्ठ 9) 13. मासूम (अ.स.) फ़रमाते हैं कि ‘‘ लौलल क़मेयून लेज़ायद्दीन ’’ अगर अहले क़ुम न होते तो दीन ज़ाया हो जाता । 14. एक हदीस में है कि अहले क़ुम बख़्शे हुए हैं। 15. इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) फ़रमाते हैं कि क़ुम की मिट्टी मुक़द्दस है। ‘‘ व अहलहा मना व नजन मिनहुम ’’ इसके बाशिन्दे हम से हैं और हम उनसे हैं , जो दुश्मन क़ुम की तरफ़ आंख उठा कर देखेगा वासिले जहन्नम होगा। क़ुम हमारा और हमारे शियों का शहर है। ‘‘ मुतहरता मक़दसतह , पाक और पाकीज़ा और मुक़द्दस है। यह हमारे क़ाएम की मद्द करने वाले हैं और हमारे हक़ के पहचानने वाले हैं। 16. यह वह हैं जिन्होंने सब से पहले ख़ुम्स अदा किया और सब से पहले हमारे नाम पर जाएदादें वक़्फ़ की। 17. हज़रत सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) फ़रमाते हैं कि ‘‘ सयाती ज़मान तकून बलदता क़ुम व अहलहा हुज्जतह अला अल ख़लाएक़ व ज़ालाका फ़ी ज़मान ग़ैबता क़ाएमना अला ज़हूरहा वाला ज़ालक लसाख़्तह अर्ज़ बहालहा अलख़ ’’ अन क़रीब एक ज़माना आने वाला है कि क़ुम और इसके बाशिन्दे काएनात पर ख़ुदा की हुज्जत होंगे और यह ज़माना ग़ैबते इमाम आखि़रूज़्ज़मान (अ.स.) में आएगा और ज़हूर तक मुमतद होगा और अगर ऐसा न होगा तो ज़मीन पानी में डूब जाएगी।( सफ़ीनतुल बेहार जिल्द 2 पृष्ठ 446)

दारूल तबलीग़े इस्लामी क़ुम ईरान

मज़कूरा हदीस में जिस अहद की तरफ़ इशारा है हो सकता है उससे मुराद इसी इदारे का अहद हो जिसका इस्तेफ़ादा क़यामत तक मुम्किन है और अहले क़ुम के हुज्जत होने से मुराद आयत उल्लाह उज़मा , मरजये तक़लीद सरकार शरीअत मदार हज़रत आक़ा सैय्यद मोहम्मद काज़िम मुजतहिदे आज़म ज़ईमे हौज़ा ए इलमिया क़ुम व क़ीम एदारा मज़कूराह का वजूद ज़ी जूद हो कि वही अहदे हाज़िर नाएब इमाम होने की वजह से हुज्जत हैं।

हज़रत मासूमा ए क़ुम के मुताअल्लिक़ हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की पेशीन गोई

सादिक़े आले मोहम्मद हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) इरशाद फ़रमाते हैं कि अल्लाह की वजह से मक्का ए मोअज़्ज़मा हरम , रसूल अल्लाह (स.अ.) की वजह से मदीना हरम , अमीरल मोमेनीन (अ.स.) की वजह से कूफ़ा (नजफ़) हरम है। ‘‘ वानलना हरमन वहू बलदतन क़ुम वसतदफ़न फ़ीहा अमराता मन अवलादी तसमी फ़ात्मता अलख़ ’’ और हम दीगर अहले बैत की वजह से शहरे क़ुम हरम है और अन क़रीब इस शहर में हमारी औलाद से एक मोहतरमा दफ़्न होंगी जिनका नाम होगा ‘‘ फ़ात्मा बिन्ते इमाम मूसा काज़िम (अ.स.) ’’( सफ़ीनतुल बेहार जिल्द 2 पृष्ठ 226)

क़ुम में हज़रत मासूमा ए क़ुम की आमद

हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की पेशीन गोई के मुताबिक़ बा रवायते अल्लामा मजलिसी (र. अ.) हज़रत फ़ात्मा बिन्ते इमाम मूसा काज़िम (अ.स.) हमशीरा हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) उस ज़माने में यहां तशरीफ़ लाईं जब कि 200 हिजरी में मामून रशीद ने हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) को जबरन मर्व बुलाया था। अल्लामा शेख़ अब्बास क़ुम्मी लिखते हैं कि जब मामून रशीद ने इमाम रज़ा (अ.स.) को बजब्रो इक़राह वली अहद बनाने के लिये दारूल ख़ुलफ़ा मर्व में बुला लिया था तो इसके एक साल बाद हज़रत फ़ात्मा (अ.स.) भाई की मोहब्बत से बेचैन हो कर ब इरादा ए मर्व मदीना से निकल पड़ी थीं। चुनान्चे मराहले सफ़र तय करते हुए बा मुक़ाम ‘‘ सावा ’’ पहुँची तो अलील हो गईं। जब आपकी रसीदगी सावा और अलालत की ख़बर मूसा बिन खि़ज़रिज़ बिन साद क़ुम्मी को पहुँची तो वह फ़ौरन हाज़िरे खि़दमत हो कर अर्ज़ परदाज़ हुए कि आप क़ुम तशरीफ़ ले चलें। उन्होंने पूछा की क़ुम यहां से कितनी दूर है। मूसा ने कहा कि 10 फ़रसख़ है। वह रवानगी के लिये आमादा हो गईं चुनान्चे मूसा बिन खि़ज़रिज़ उनके नाक़े की मेहार पकड़े हुए कु़म तक लाए। यहां पहुँच कर उन्हीं के मकान में जनाबे फ़ात्मा ने क़याम फ़रमाया। भाई की जुदाई का सदमा शिद्दत पकड़ता गया और अलालत बढ़ती गई यहां तक कि सिर्फ़ 17 यौम के बाद आपने इन्तेक़ाल फ़रमाया। ‘‘ इन्ना लिल्लाहे व इन्ना इलैहे राजेऊन ’’ आपके इन्तेक़ाल के बाद से गु़स्लो कफ़न से फ़राग़त हासिल की गई और ब मुक़ाम ‘‘ बाबलान ’’ (जिस जगह रोज़ा बना हुआ है) दफ़्न करने के लिये ले जाया गया और इस सरदाब में जो पहले से आपके लिये (क़ुदरती तौर पर) बना हुआ था उतारने के लिये बाहमी गुफ़्तुगू शुरू हुई कि कौन उतारे फ़ैसला हुआ कि ‘‘ क़ादिर ’’ नामी इनका ख़ादिम जो मर्दे सालेह है वह क़ब्र में उतारे इतने में देखा गया कि रेगज़ार से दो नक़ाब पोश नमूदार हुए और उन्होंने नमाज़े जनाज़ा पढ़ाई और वही क़ब्र में उतरे फिर तदफ़ीन के फ़ौरन बाद वापस चले गए। यह न मालूम हो सका कि दोनों कौन थे। फिर मूसा बिन खि़ज़रिज़ ने क़ब्र पर बोरिया का छप्पर बना दिया इसके बाद हज़रत ज़ैनब बिन्ते हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) ने क़ुब्बा बनवाया । (मुन्तल आमाल जिल्द 2 पृष्ठ 242) फिर मुख़्तलिफ़ अदवार शाही में इसकी तामीर व तज़ीन होती रही तफ़सील के लिये मुलाहेजा़ हो ।( माहनामा अल हादी क़ुम ईरान ज़ीक़ाद 1393 हिजरी पृष्ठ 105)


हज़रत मासूमा ए क़ुम की ज़्यारत की अहमियत

हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) फ़रमाते हैं कि जो मासूमा ए कु़म की ज़्यारत करेगा उसके लिए जन्नत वाजिब होगी। हदीस उयून के अल्फ़ाज़ यह हैं ‘‘ मन जारहा वजबत लहा अलजन्नता ’’( सफ़ीनतुल बिहार जिल्द 2 पृष्ठ 426) अल्लामा शेख़ अब्बास कु़म्मी , अल्लामा क़ाज़ी नूरूल उल्लाह शुस्तरी (शहीदे सालिस) से रवाएत करते हैं कि हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) इरशाद फ़रमाते हैं कि ‘‘ तद खि़ल ब शफ़ाअताहा शैती अ ल जन्नता ’’ मासूमा ए क़ुम की शिफ़ाअत से कसीर शिया जन्नत में जाएगें।( सफ़ीनतुल बेहार जिल्द 2 पृष्ठ 386) हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) फ़रमाते हैं कि ‘‘ मन ज़ारहा फ़लहू अल जन्नता ’’ जो मेरी हमशीरा की क़ब्र की ज़्यारत करेगा उसके लिये जन्नत है। एक रवायत में हैं कि अली बिन इब्राहीम ने अपने बाप से उन्होंने साद से उन्होंने अली बिन मूसिए रज़ा (अ.स.) से रवायत की है वह फ़रमाते हैं कि ऐ साद तुम्हारे नज़दीक़ हमारी एक क़ब्र है। रावी ने अर्ज़ की मासूमा ए क़ुम की , फ़रमाया हां ऐ साद ‘‘ मन ज़ारहा अरफ़ाबहक़हा फ़लहू अल जन्नता ’’ जो इनकी ज़्यारत इनके हक़ को पहचान के करेगा इसके लिये जन्नत है यानी वह जन्नत में जायेगा।(सफ़ीनतुल बेहार जिल्द 2 पृष्ठ 376 प्रकाशित ईरान)

अबु जाफ़र हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ स )

दिये जवाब तक़ी (अ.स.) ने ,वह बर सरे दरबार।

कि दंग थे उलमा , तिफ़ल की बसीरत से।।

दिखाए इल्म के जौहर वह इब्ने अक्सम को।

कि वाफ़क़ीह भी , वाक़िफ़ हुये इमामत से।।

साबिर थनयानी ‘‘ कराची ’’

तरके दुनियां में नहीं , मशक़े रियाज़त में नहीं

कसरते इल्म में तौफ़ीक़ , बसीरत में नही

दिल की एक कैफ़ीयते , ख़ास है तक़वा बानो

तरज़ पोशिश में नहीं शक्लो , शबाहत में नहीं

हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) के नवे जानशीन और हमारे नवे इमाम और सिलसिला ए अस्मत की ग्यारवीं कड़ी थे। आपके वालिदे माजिद वली अहदे सलतनते अब्बासीया ग़रीबुल ग़ुरबा शहीदे जफ़ा इमाम रज़ा (अ.स.) थे और आपकी वालदा माजदा जनाबे ख़ैज़रान उर्फ़ सकीना थीं। उलमा का बयान है कि आप उम्मुल मोमेनीन जनबा मारया क़िबतिया यानी वालदा जनाबे इब्राहीम बिन रसूले करीम (स अ व व ) की नस्ल से थीं।(शवाहिद अल नबूवत पृष्ठ 204, रौज़तुल पृष्ठ जिल्द 3 पृष्ठ 16 )

इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) अपने आबाओ अजदाद की तरह , इमाम मन्सूस , मासूम , इमामे ज़माना और अफ़ज़ले काएनात थे। आप जुमला सिफ़ाते हुस्ना में यगाना रोज़गार और मुम्ताज़ थे। अल्लामा बिन तल्हा शाफ़ेई लिखते हैं , ‘‘ वइन कान सग़ीर अलसन फ़हू कबीर अल क़दर , रफ़ीह अलज़कर ’’ इमाम (अ.स.) अगरचे तमाम मासूमीन में सब से कम सिन और छोटे थे लेकिन आपकी क़दरो मन्ज़ेलत आपके आबाओ अजदाद की तरह निहायत ही अज़ीम थी और आपका बुलन्द तज़किरा बर सरे नोक ज़बान था।(मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 195 )

अल्लामा हुसैन वाएज़ काशफ़ी लिखते हैं कि ‘‘ मुक़ामे वै बिसयार बुलन्द अस्त ’’ आपकी मन्ज़िलत और आपकी हस्ती नेहायत ही बुलन्द थी।(रौज़तुल शोहदा पृष्ठ 438 )

अल्लामा ख़विन्द शाह लिखते हैं ‘‘ दर कमाल फ़ज़ल व इल्म और हिकमत इमाम जवाद बा मरतबाबूदह कि ’’ हेच कसरा अज़ आज़मे सादात आन मरतबा ना बूदा ’’ इल्म व फ़ज़ल , अदब व हिकमत में इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) को वह कमाल हासिल था जो किसी को भी नसीब ना था।(रौज़तुल पृष्ठ जिल्द 3 पृष्ठ 16 )

अल्लामा शिबलन्जी लिखते हैं कि इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) कम सिनी के बावजूद फ़ज़ाएल से भर पूर थे ‘‘ व मुनक़बये कसीरा ’’ और आपके मनाक़िब व मदायह बेशुमार हैं।(नूरूल अबसार पृष्ठ 145 )

अल्लामा तबरसी लिखते हैं कि ‘‘ कान क़द बलग़ फ़ी कमाल अल अक़ल वल फ़ज़ल वा आलेम व अल हकम वा अलदाब व रिफ़अते माज़लतेही तम यसा व फ़ीहा अहद मन ज़ी अलसिन मन अलसादात वग़ैर हिम ’’ आप कमाले अक़ल और फ़ज़ल और इल्म व हिक्म व आदाब व बुलन्दी मनज़िलत में इन मदारिज पर फ़ाएज़ थे जिन पर आपके सिन और उमर के सादात और ग़ैर सादात में से कोई भी फ़ायज़ न था।(अलाम अल वरा पृष्ठ 202 ) अल्लामा शेख़ मुफ़ीद (र. अ.) आपकी बुलन्दी ए मन्ज़ेलत का ज़िक्र करते हुए तहरीर फ़रमाते हैं। ‘‘ मशाययख़ अहले ज़बान बा उमसावी दरफ़ज़ल न बुलन्द ’’ िकइस अहद में दुनियां के बड़े बड़े लोग फ़ज़ाएल व कमालात में आपकी बराबरी नहीं कर सकते थे।(इरशाद मुफ़ीद पृष्ठ 474 )

इमाम (अ.स.) की विलादत बा सआदत

उलमा का बयान है कि इमाम अल मुत्तक़ीन हज़रज इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) बा तारीख़ 10 रजबुल मुरज्जब 195 हिजरी में बा मुताबिक़ 811 ई 0 यौमे जुमा बामुक़ाम मदीना मुनव्वरा में मोतावल्लिद हुय ऐ।(रौज़ातुल अल पृष्ठ जिल्द 2 पृष्ठ 16 व शवाहेदुन नबूअत पृष्ठ 204 व अनवारे नोमानी पृष्ठ 127 )

अल्लामा यगाना जनाबे शेख़ मुफ़ीद (र. अ.) फ़रमाते हैं , चूंकि हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) के कोई औलाद आपकी विलादत से क़ब्ल न थी इस लिये लोग ताना ज़नी करते हुए कहते थे कि शियों के इमाम मुन क़ता उल नस्ल हैं। यह सुन कर हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) ने इरशाद फ़रमाया कि औलाद का होना ख़ुदा की इनाएत से मुताअल्लिक़ है उसे मुझे साहेबे औलाद किया है और अंक़रीब मेरे यहां मस्नदे इमामत का वारिस पैदा होगा। चुनांचे आपकी विलादत बा साअदत हुई।(इरशाद मुफ़ीद पृष्ठ 473 )

अल्लामा तबरीसी लिखते हैं कि हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) ने इरशाद फ़रमाया था कि मेरे यहां जो बच्चा अंक़रीब पैदा होगा वह अज़ीम बरकतों का हामिल होगा।(अलामुल वरा पृष्ठ 200 ) वाक़ए विलादत के मुताअल्लिक़ लिखा है कि इमाम रज़ा (अ.स.) की बहन हकीमा ख़ातून फ़रमाती हैं कि एक दिन मेरे भाई ने मुझे बुला कर कहा कि आज तुम मेरे घर में क़याम करो क्यों कि ख़ैज़रान के बतन से आज रात को ख़ुदा मुझे एक फ़रज़न्द अता फ़रमायेगा। मैंने ख़ुशी के साथ इस हुक्म की तामील की। जब रात आई तो हमसाया और चन्द औरतें भी बुलाई गईं , निस्फ़ शब से ज़्यादा गुज़रने पर यका यक वाज़ेह हमल के आसार नमूदार हुए। यह हाल देख कर मैं ख़ैज़रान को हुजरे में ले गई और मैंने चिराग़ रौशन कर दिया। थोड़ी देर में इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) पैदा हुए। मैंने देखा कि वह मख़तून और नाफ़ बुरीदा हैं। विलादत के बाद मैंने नहलाने के लिये तश्त में बैठाया। इस वक़्त जो चिराग़ रौशन था गुल हो गया मगर फिर भी उस हुजरे में रौशनी ब दस्तूर रही और इतनी रौशनी रही कि मैंने बच्चे को आसानी से नहला दिया। थोड़ी देर में मेरे भाई इमाम रज़ा (अ.स.) भी वहां तशरीफ़ ले आए। मैंने निहायत उजलत के साथ साहब ज़ादे को कपड़े में लपेट कर हज़रत की आग़ोश में दे दिया। आपने सर और आंखों पर बोसा दे कर फिर मुझे वापस कर दिया। दो दिन तक इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की आंखें बन्द रहीं हैं तीसरे दिन जब आंखें खुली तो आपने सब से पहले आसमान की तरफ़ नज़र की , फिर दाहिने बाऐ देख कर कलमा ए शहादतैन ज़बान पर जारी किया। मैं यह देख कर सख़्त मुतअजिब हुई और मैंने सारा वाक़ेया अपने भाई से बयान किया। आपने फ़रमाया , ताअज्जुब न करो , यह मेरा फ़रज़न्द हुज्जते ख़ुदा और वसीए रसूल (स अ व व ) हादी है। इस से जो अजाएबात ज़हूर पज़ीर हों , उनमें ताअज्जुब क्या। मोहम्मद बिन अली नाक़ील हैं , हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के दोनों कंधों के दरमियान इसी तरह मोहरे इमामत थी जिस तरह दीगर आइम्मा (अ.स.) के दोनों कंधो के दरमियान मोहरें हुआ करती थीं।(मुनाक़िब)

नाम कुन्नियत और अलक़ाब

आपका इसमे गिरामी लौहे महफ़ूज़ के मुताबिक़ उनके वालिदे माजिद हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) ने मोहम्मद रखा। आपकी कुन्नियत अबु जाफ़र और आपके अलक़ाब जवाद , कानेह , मुर्तुज़ा थे और मशहूर तरीन लक़ब तक़ी था।(रौज़तुल अल पृष्ठ जिल्द 3 पृष्ठ 96, शवाहेदुन नबूअत पृष्ठ 202 आलामु वुरा पृष्ठ 199 )

बादशाहाने वक़्त

हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की विलादत 195 हिजरी में हुई। इस वक़्त बादशाहे वक़्त , अमीन इब्ने हारून रशीद अब्बासी था।(दफ़ियात अल अयान) 198 हिजरी में मामून रशीद अब्बासी बादशाहे वक़्त हुआ।(तारीख़े ख़मीस व अबुल फ़िदा) 218 हिजरी में मोतसिम अब्बासी ख़लीफ़ाए वक़्त क़रार पाया।(अबुल फ़िदा) इसी मोतसिम ने सन् 220 हिजरी में आपको ज़हर से शहीद करा दिया।(वसीलतुन नजात)

इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की नशो नुमा और तरबीअत

यह एक हसरत नाक वाक़िया है कि इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) को निहायत कमसिनी ही के ज़माने में मसाएब और परेशानियों का मुक़ाबला करने के लिये तैय्यार हो जाना पड़ा। उन्हें बहुत ही कम इतमेनान और सुकून के लमहात में बाप की मोहब्बत और शफ़क़तो तरबीअत के साए में ज़िन्दगी गुज़ारने का मौक़ा मिल सका। आपको सिर्फ़ पांचवा बरस था जब हज़रते इमाम रज़ा (अ.स.) मदीने से ख़ुरासान की तरफ़ सफ़र करने पर मजबूर हुए। इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) उस वक़्त से जो अपने बाप से जुदा हुए तो फिर ज़िन्दगी में मुलाक़ात का मौक़ा न मिला। इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) से जुदा होने के तीसरे साल इमाम रज़ा (अ.स.) की शहादत हो गई। दुनियां समझती होगी कि इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के लिये इल्मी और अमली बलन्दियों तक पहुँचने का कोई ज़रिया नहीं रहा इस लिये अब इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की इल्मी मस्नद शायद ख़ाली नज़र आए मगर ख़लक़े ख़ुदा की हैरत की इन्तेहा न रही जब इस कम सिन बच्चे को थोड़े दिन बाद मामून के पहलू में बैठ कर बड़े बड़े उलमा से फ़िक़ा व हदीस व तफ़सीर और कलाम पर मनाज़रे करते और उन सबको क़ाएल हो जाते देखा। उनकी हैरत उस वक़्त तक दूर होना मुमकिन न थी जब तक वह मद्दी असबाब के आगे एक मख़सूस ख़ुदा वन्दी मर्दसा तालीम व तरबीअत के क़ाएल न होते जिसके बग़ैर यह मोअम्मा न हल हुआ और न कभी हल हो सकता है। (सवाने इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) पृष्ठ 4) मक़सद यह है कि इमाम को इल्मे लदुन्नी होता है यह अम्बिया की तरह पढ़े लिखे और तमाम सलाहियतों से भर पूर पैदा होते हैं। उन्होंने सरवरे काएनात की तरह कभी किसी के सामने ज़ानूए तल्लमुज़ नहीं तह किया और न कर सकते थे। यह इसके भी मोहताज नहीं होते थे कि आबाओ अजदाद उन्हें तालीम दें। यह और बात है कि इज़दियाद व इल्म शरफ़ के लिये ऐसा कर दिया जाय या उलूमे मख़सूसा की तालीम दे दी जाए।

वालिदे माजिद के साया ए आत्फ़ियत से महरूमी

यूं तो उमूमी तौर पर किसी के बाप के मरने से साया ए आतिफ़त से महरूमी हुआ करती है लेकिन हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) अपने वालिदे माजिद के साया ए आतिफ़त से उनकी ज़िन्दगी ही में महरूम हो गए थे। अभी आप की उम्र छः साल की भी न हो पाई थी कि आप अपने पदरे बुज़ुर्गवार की शफ़क़तों अतूफ़त से महरूम कर दिये गए और मामून रशीद अब्बासी ने आपके वालिदे माजिद हज़रते इमाम रज़ा (अ.स.) को अपनी सियासी ग़रज़ के तहत मदीने से ख़ुरासान तलब कर लिया और साथ ही यह शर्त भी लगा दी कि आप के बाल बच्चे मदीने ही में रहेंगे। जिसका नतीजा यह हुआ कि आप सबको हमेशा के लिये ख़ैर बाद कह कर ख़ुरासान तशरीफ़ ले गए और वहीं आलमें गु़रबत में सब से जुदा मामून रशीद के हाथों ही शहीद हो कर दुनियां से रूख़सत हो गए।

आपके मदीने से तशरीफ़ ले जाने का असर ख़ानदान पर यह चढ़ा कि सब के दिल का सुकून जाता रहा और सब के सब अपने को ज़िन्दा दर गोर समझते रहे। बिल आखि़र यह नौबत पहुँची कि आपकी हमशीरा जनाबे फ़ात्मा जो बाद में मासूमा ए क़ुम के नाम से मुलक़्क़ब हुईं इन्तेहाई बेचैनी की हालत में घर से निकल कर ख़ुरासान की तरफ़ रवाना हो गईं। उनके दिल में जज़बात यह थे कि किसी तरह अपने भाई अली रज़ा (अ.स.) से मिलें लेकिन एक रवायत की बिना पर आप मदीने से रवाना हो कर जब मुक़ामे वसावा में पहुँची तो अलील हो गईं। आपने पूछा यहां से क़ुम कितनी दूर है ? लोगों ने कहा कि यहां से कु़म की मसाफ़त दस 10 फ़रसख़ हैं। आपने ख़्वाहिश ज़ाहिर की किसी सूरत से वहां पहुँचा दी जायें। चुनान्चे आप आले साद के रईस मूसा बिन ख़ज़रज की कोशिश से वहां पहुँची और उसी के मकान में 17 दिन बीमार रह कर अपने भाई को रोती पीटती दुनियां से रूख़सत हो गईं और मक़ामे बाबूलान क़ुम में दफ़्न हुई। यह वाक़िया 201 हिजरी का है।(अनवारूल हुसैनिया जिल्द 4 पृष्ठ 53 ) और एक रिवायत की बिना पर आप उस वक़्त ख़ुरासान पहुँची जब भाई शहीद हो चुका था और लोग दफ़्न के लिये काले काले अलमों के साये में लिये जा रहे थे। आप क़ुम आ कर वफ़ात पा गईं। हज़रते इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की जुदाई क्या कम थी कि उस पर मुस्तज़ाद अपनी फुफी के साए से भी महरूम हो गए। हमारे इमाम के लिये कम सिनी में यह दोनों सदमे इन्तेहाई तकलीफ़ देह और रन्ज रसा थे लेकिन मशीयते ऐज़दी में चारा नहीं। आखि़र आपको तमाम मराहिल का मुक़ाबेला करना पड़ा और आप सब्रो ज़ब्त के साथ हर मुसीबत को झेलते रहे।

मामून रशीद अब्बासी और हज़रते इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) का पहला सफ़रे ईराक़

अब्बासी ख़लीफ़ा मामून रशीद अब्बासी हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की शहादत से फ़राग़त के बाद या इस लिये की उस पर इमाम रज़ा (अ.स.) के क़त्ल का इल्ज़ाम साबित न हो सके या इस लिये कि वह इमाम रज़ा (अ.स.) की वली अहदी के मौक़े पर अपनी लड़की उम्मे हबीबा की शादी का ऐलान भी कर चुका था कि वली अहद के फ़रज़न्द इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के साथ करेगा। उसे निभाने के लिये या इस लिये की अभी उस की सियासी ज़रूरत उसे मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की तरफ़ तवज्जो की दावत दे रही थी। बहरहाल जो बात भी हो। उसने यह फ़ैसला कर लिया कि इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) को मदीने से बग़दाद बुलाया जाए। जो इमाम रज़ा (अ.स.) की शहादत के बाद पाऐ तख़्त बनाया जा चुका था चुनान्चे दावत नामा इरसाल किया और उन्हें इसी तरह मजबूर कर के बुलाया जिस तरह इमाम रज़ा (अ.स.) को बुलवाया था। ‘‘ हुक्मे हाकिम मर्गे मफ़ाजात ’’ बिल आखि़र इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) को बग़दाद आना पड़ा।

बाज़ और मछली का वाक़िया

इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) जिनकी उम्र उस वक़्त तक़रीबन 9 साल की थी। एक दिन बग़दाद के किसी गु़जरगाह में खड़े हुए थे और चन्द लड़के वहां खेल रहे थे कि नागाह ख़लीफ़ा मामून की सवारी दिखाई दी , सब लड़के डर कर भाग गए मगर इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) अपनी जगह पर खड़े रहे। जब मामून की सवारी वहां पहुँची तो उसने इमाम हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) से मुख़ातिब हो कर कहा कि साहब ज़ादे सब लड़के भाग गए तो तुम क्यों नहीं भागे। उन्होंने बेसाख़्ता बिला ताअम्मुल जबाव दिया मेरे खड़े रहने से रास्ता तंग न था , जो हट जाने से वसी हो जाता और न कोई जुर्म किया था कि डरता नीज़ मेरा हुसने ज़न है कि तुम बेगुनाह को ज़र्र नहीं पहुँचाते। मामून को हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) का अन्दाज़े बयान बहुत पसन्द आया। इसके बाद मामून वहां से आगे बढ़ा। उसके साथ शिकारी बाज़ भी थे जब आबादी से बाहर निकल गया तो उसने एक बाज़ को एक चकोर पर छोड़ा। बाज़ नज़रों से ओझल हो गया और जब वापस आया तो उसकी चोच में एक छोटी सी ज़िन्दा मछली थी जिसको देख कर मामून बहुत मुताअज्जिब हुआ। थोड़ी देर में जब वह इसी तरह लौटा तो उसने हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) को दूसरे लड़कों के साथ वहीं देखा जहां वह पहले थे। लड़के मामून की सवारी देख कर फिर भागे लेकिन हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) बदस्तूर साबिक़ वहीं खड़े रहे। जब मामून उनके क़रीब आया , तो मुठ्ठी बन्द कर के कहने लगा , साहब ज़ादे बताओ मेरे हाथ में क्या है ? उन्होंने फ़रमाया अल्लाह ताअला ने अपने दरिया ए क़ुदरत में छोटी मछलियां पैदा की हैं और सलातीन अपने बाज़ से उन मछलियों का शिकार कर के अहले बैते रिसालत के इल्म का इम्तेहान लेते हैं। यह सुन कर मामून बोला , बे शक तुम अली बिन मूसा रज़ा (अ.स.) के फ़रज़न्द हो। फिर उनको अपने साथ ले गया।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 123, मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 290, शवाहेदुन नबूअत पृष्ठ 204 नुरूल अबसार पृष्ठ 145, अरजहुल मतालिब पृष्ठ 459 )

यह वाक़िया हमारी भी बाज़ किताबों में है , इस वाक़िये के सिलसिले में जिन किताबों का हवाला दिया है उनमें ‘‘ इन्नल्लहा ख़लक़ फ़ी बहरे कु़दरताहू समाकन सग़ारत ’’ मुन्दरिज है। अलबत्ता बाज़ कुतुब में ‘‘ बैन अल समाआ व अल हवाअन ’’ लिखा है। अव्वल उज़ ज़िक्र के मुताअल्लिक़ तवील का सवाल ही पैदा नहीं होता क्यों कि हर दरिया ख़ुदा की क़ुदरत से जारी है और मज़कूरा वाक़िये में इमकान क़वी है कि बाज़ ऐसी ज़मीन पर जो दरिया हैं उनमें से किसी एक से शिकार कर के लाया होगा। अलबत्ता अखि़र उज़ ज़िक्र के मुतअल्लिक़ कहा जा सकता है।

1. जहां तक मुझे इल्म है गहरे से गहरे दरिया की इन्तेहा किसी सतह अरर्ज़ी पर है।

2. बक़ौल अल्लामा मजलिसी दरिया ऐसे हैं जिनसे अब्र छोटी मछलियों को उड़ा कर ऊपर ले जाते हैं।

3. 1932 ई 0 के अख़बार में यह शाया हो चुका है कि अमरीका की नहर पनामा में जो सन्डबोल बन्दरगाह के क़रीब है मछलियो की बारिश हुई है।

4. आसमान और हवा के दरमियान बहरे मुतलातिम से मुराद फ़िज़ा की वह कैफ़ियत हों जो दरिया की तरह पैदा होते हैं।

5. कहा जाता है कि इल्म हैवान में यह साबित है कि मछली दरिया से एक सौ पचास गज़ तक बाज़ हालात में बुलन्द हो जाती हैं। बहर हाल इन्हीं गहराईयों की रौशनी में फ़रज़न्दे रसूल (स अ व व ) ने मामून से फ़रमाया कि बादशाहे बहरे क़ुदरत ख़ुदावन्दी से शिकार कर के लाया है और आले मोहम्मद (स अ व व ) का इम्तेहान लेता है।

हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) से उलमाए इस्लाम का मनाज़ेरा और अब्बासी हासिदों की शिकस्ते फ़ाश

उलमाए इस्लाम का बयान है कि बनी अब्बास को मामून की तरफ़ इमाम रज़ा (अ.स.) को वली अहद बनाया जाना ही ना क़ाबिले बर्दाश्त था। इमाम रजा़ (अ.स.) की वफ़ात से एक हद तक उन्हें इतमीनान हासिल हुआ था और उन्होंने मामून से अपने हस्ब दिलख़्वाह तसलीम कर लिया गया। इसके अलावा इमाम रज़ा (अ.स.) की वली अहदी के ज़माने में अब्बासीयों का मख़सूस शुमार यानी काला लिबास तर्क हो कर जो सब्ज़ लिबास का रवाज हो रहा था उसे मन्सूख़ करके फिर स्याह लिबास की पाबन्दी आएद कर दी गई ताकि बनी अब्बास के रवायाते क़दीम मख़सूस रहे। यह सब बातें अब्बासीयों के यक़ीन दिला रहीं थी कि वह मामून पर पूरा क़ाबू पा चुके हैं , मगर अब मामून का यह इरादा कि वह इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) को अपना दामाद बनाऐ। उन लोगों के लिये तशवीश का बाएस बना और इस हद तक बना कि वह अपने दिली रूझान को दिल में न रख सके और एक वफ़द की शक्ल में मामून के पास आ कर अपने जज़बात का इज़हार कर दिया। उन्होंने साफ़ साफ़ कहा कि इमाम रज़ा (अ.स.) के साथ जो आपने तरीख़ा इख़्तेयार किया , वही हम को ना पसन्द था। मगर वह ख़ैर कम अज़ कम औसाफ़ व कमालात के लेहाज़ से ना क़ाबिले इज़्ज़त भी समझे जा सकते थे , मगर यह उन के बेटे मोहम्मद तो अभी बिल्कुल कम सिन हैं। एक बच्चे को बड़े बड़े उलमा , मुवज़्ज़ेज़ीन पर तरजीह देना और इस क़दर इसकी इज़्ज़त करना हर गिज़ ख़लीफ़ा के लिए ज़ेबा नहीं है फिर उम्मे हबीबा का निकाह जो इमाम रज़ा के साथ किया गया था , उससे हम को क्या फ़ायदा पहुँचा जो उम्मे अफ़ज़ल का निकाह मोहम्मद बिन अली के साथ किया जा रहा है।

मामून ने तमाम तक़रीर का यह जवाब दिया कि मोहम्मद कमसिन ज़रूर हैं मगर मैंने ख़ूब अन्दाज़ा कर लिया है , औसाफ़ और कमालात में वह अपने बाप के पूरे जानशीन हैं और आलमे इस्लाम के बडे़ बड़े उलमा जिनका तुम हवाला दे रहे हो वह इल्म में उनका मुक़ाबला नहीं कर सकते। अगर तुम चाहो तो इम्तेहान ले कर देख लो फिर तुम्हे भी फ़ैसले से मुत्तफ़िक़ होना पडे़गा।

यह सिर्फ़ मुन्सेफ़ाना जवाब ही नहीं , बल्कि एक तरह का चैलेन्ज था जिस पर मजबूरन उन लोगों को मनाज़िरा की दावत मंज़ूर करनी पड़ी हालांकि ख़ुद मामून तमाम सलातीन बनी अब्बास में यह ख़ुसूसीयत रखता है कि मोर्वेख़ीन इसके लिये यह अल्फ़ाज़ लिख देते हैं। ‘‘ काना यादा मन कबारल फ़ुक़ाहा ’’ यानी इनका शुमार बड़े बड़े फ़क़ीहों में है। इस लिये इसका फ़ैसला ख़ुद कुछ कम वक़त न रखता था , मगर इन लोगों ने इस पर इक़्तेफ़ा नहीं की बल्कि बग़दाद के सब से बड़े आालिम यहया बिने अक्सम को इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) से बहस के लिये मुन्तख़ब किया। मामून ने एक अज़ीमुश्शान जलसा इस मनाज़िरे के लिये मुनअक़िद किया और आम ऐलान करा दिया। हर शख़्स इस अजीब और बज़ाहिर ग़ैर मुतावाज़िन मुक़ाबले के देखने का मुश्ताक़ हो गया। जिस में एक तरफ़ एक नौ बरस का बच्चा था और दूसरी तरफ़ एक आमूदाकार आरै शोरा ए अफ़ाक़ क़ाज़िउल कुज़्ज़ाज़त। इस का नतीजा था कि हर तरफ़ से ख़लाएक़ का हुजूम हो गया।

मुवर्रेख़ीन का बयान है कि अरकाने दौलत और मोअज़्ज़ेज़ीन के अलावा इस जलसे में नव सौ कुर्सियां फ़क़त उलमा व फ़ुज़ला के लिये मख़सूस थीं और इसमें कोई ताज्जुब भी नहीं इस लिये कि यह ज़माना अब्बासी सलतनत के शबाब और बिल ख़ुसूस इल्मी तरक़्क़ी के ऐतबार से ज़री दौर था और बग़दाद दारूल सलतनत था जहां तमाम अतराफ़े मुख़्तलिफ़ उलूम और फ़ुनून के माहेरीन खिंच कर जमा हो गए थे। इस ऐतबार से यह तादात किसी मुबालग़े पर मुबनी नहीं होती।

मामून ने हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के लिये अपने पहलू में मसनद बिछवाई थी और हज़रत के सामने यहया बिने अक़सम के लिये बैठने की जगह थी। हर तरफ़ कामिल सन्नाटा था मजमा हमातन चश्म व गोश बना हुआ गुफ़्तुगू शुरू होने के वक़्त का मुन्तज़िर ही था िकइस ख़ामोशी को यहिया के इस सवाल ने तोड़ दिया जो उसने मामून की तरफ़ मुख़ातिब हो कर किया था आप इजाज़त देते हैं मैं आपसे कुछ दरयाफ़्त करूँ।

हज़रत ने फ़रमाया ऐ याहिया ऐ याहिया तुम जो पूछना चाहते हो पूछ सकते हो। यहिया ने कहा यह फ़रमाईये कि हालते एहराम में अगर कोई शख़्स शिकार करे तो इसका क्या हुक्म है ? इस सवाल से अन्दाज़ा होता है कि यहिया हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की इल्मी पाबन्दी से बिल्कुल वाक़िफ़ न था। वह अपने ग़ुरूरे इल्म और जिहालत से यह समझता था कि यह कमसिन साहब ज़ादे तो हैं ही रोज़मर्रा के रोज़े नमाज़ के मसाएल से वाक़िफ़ हों तो हों। मगर हज वग़ैरा के अहकाम और हालते अहराम में जिन चीज़ों की मुमानियत है उनके कफ़्फ़ारों से भला कहां वाक़िफ़ होंगे।

इमाम (अ.स.) ने इसके जवाब में इस तरह सवाल के गोशों की अलग अलग तहलील फ़रमाई जिससे बग़ैर कोई जवाब अस्ल मसले का दिए हुए आपके इल्म की गहराईयों का यहिया और तमाम अहले महफ़िल को अन्दाज़ा हो गया। यहिया ख़ुद भी अपने को सुबुक पाने लगा और तमाम मजमे को भी इसका सुबुक होना महसूस होने लगा। आपने जवाब में फ़रमाया: यहिया तुमहारा सवाल बिल्कुल मुबहम है और मोहमल है। सवाल के ज़ैल में यह देखने की ज़रूरत है कि शिकार हिल में था कि हरम में। शिकार करने वाला मसले से वाक़िफ़ था या ना वाक़िफ़ था। इसने अमदन जानवर को मार डाला या धोखे से क़त्ल हो गया। या वह शख़्स आज़ाद था या ग़ुलाम , कमसिन था या बालिग़ , पहली मरतबा ऐसा किया था या इसके पहले भी ऐसा कर चुका था। शिकार परिन्द का था या कोई और , छोटा था या बड़ा। वह अपने फ़ेल पर इसरार रखता है या पशेमान है। रात को या पोशीदा तरीक़े पर उसने यह शिकार किया या दिन दहाड़े और एलानियाँ। एहराम उमरे का था या हज का। जब तक यह तमाम तफ़सीलात न बताए जाएं इस मसले का कोई मोअय्यन हुक्म नहीं बताया जा सकता।

यहिया कितना ही नाक़िस क्यों न होता। बहरहाल फ़िक़ही मसाएल पर कुछ उसकी नज़र थी। इन कसीउत्ताए दाद शिक़ों के पैदा ही करने से ख़ूब समझ गया कि उनका मुक़ाबेला मेरे लिए आसान नहीं है उसके चेहरे पर ऐसी शिकस्तगी के आसार पैदा हुए जिनका तमाम देखने वालों ने अन्दाज़ा कर लिया उसकी ज़बान ख़ामोश थी और वह कुछ जवाब न देता था।

मामून उसकी कैफ़ियत का सही अन्दाज़ा कर के उससे कुछ कहना बेकार समझा और हज़रत से अर्ज़ किया कि फिर आप तमाम शिकों के एहकाम बयान फ़रमा दीजिए ताकि हम सब को इस्तेफ़ादे का मौक़ा मिल सके। इमाम (अ.स.) ने तफ़सील के साथ तमाम सूरतो से जुदागाना जो एहकाम थे फ़रमा दिये। आपने फ़रमाया कि ‘‘ अगर एहराम बांधने के बाद ‘‘ हिल ’’ में शिकार करे और वह शिकार परिन्दा हो और बड़ा भी हो तो उस पर कफ़्फ़ारा एक बकरी है और अगर ऐसा शिकार हरम में किया है तो दो बकरियां हैं और अगर किसी छोटे परिन्दे को हिल में शिकार किया है तो दुम्बे का एक बच्चा जो अपनी मां का दूध छोड़ चुका हो। कफ़्फ़ारा देगा , और अगर हरम में शिकार किया हो तो उस परिन्दे की क़ीमत और एक दुम्बा कफ़्फ़ारा देगा और अगर वह शिकार चौपाया हो तो उसकी कई क़िस्में हैं। अगर वह वहशी गधा है तो एक गाय और अगर शुतुरमुर्ग़ है तो एक ऊंट और अगर हिरन है तो एक बकरी कफ़्फ़ारा देगा। यह कफ़्फ़ारा तो जब है कि हिल में शिकार किया हो लेकिन अगर हरम में किया हो तो यही कफ़्फ़ारे दुगने देने होंगे और उन जानवरों को जिन्हें कफ़्फ़ारे में देगा , अगर एहराम उमरे का था तो ख़ाना ए काबा तक पहुँचायेगा और मक्के में क़ुर्बानी करेगा और अहराम हज का था तो मिना में क़ुर्बानी करेगा और इन कफ़्फ़ारों में आलिम व जाहिल दोनों बराबर हैं और इरादे से शिकार करने में कफ़्फ़ारा देने के अलावा गुनाहगार भी होगा। हां भूले से शिकार करने में गुनाह नहीं होगा। और आज़ाद अपना कफ़्फ़ारा ख़ुद देगा और ग़ुलाम का कफ़्फ़ारा उसका मालिक देगा और छोटे बच्चे पर कोई कफ़्फारा नहीं है और बालिग़ पर कफ़्फ़ारा देना वाजिब है और जो शख़्स अपने इस फ़ेल पर नादिम हो आख़ेरत के अज़ाब से बच जायेगा लेकिन अगर इस फ़ेल पर इसरार करेगा तो आख़ेरत में भी इस पर अज़ाब होगा। ’’

यह तफ़सीलात सुन कर यहिया हक्का बक्का रह गया और सारे मजमे से अहसन्त अहसन्त की आवाज़ बुलन्द होने लगी। मामून को भी क़द थी कि वह यहिया की रूसवाई को इन्तेहाई दर्जे तक पहुँचा दे। उसने इमाम से अर्ज़ की कि अगर मुनासिब मालूम हो तो आप यहिया से सवाल फ़रमाएं। हज़रत ने एख़लाकन यहिया से दरियाफ़्त फ़रमाया कि क्या मैं भी तुम से कुछ पूछ सकता हूँ। यहिया अपने मुताअल्लिक़ किसी धोखे में मुब्तिला न था। उसने कहा ‘‘ कि हुज़ूर दरियाफ़्त फ़रमायें ! अगर मुझे मालूम होगा तो अर्ज़ करूगां वरना खुद भी हुज़ूर से मालूम कर लूगां ’’ हज़रत ने सवाल किया।

उस शख़्स के बारे में क्या कहते हो जिसने सुबह को एक औरत की तरफ़ नज़र की वह उस पर हराम थी। दिन चढ़े हलाल हो गई , ग़ुरूबे आफ़ताब पर फिर हराम हो गई। असर के वक़्त फिर हलाल हो गई , आधी रात को हराम हो गई सुबह के वक़्त हलाल हो गई। बताओ एक ही दिन में इतनी दफ़ा वह औरत उस शख़्स पर किस तरह हराम व हलाल होती रही। इमाम (अ.स.) की ज़बाने मोजिज़बयान से इस सवाल को सुन कर क़ाज़िउल क़ुज़्ज़ात यहिया बिन अक़सम मबहूत हो गए और जवाब न दे सके , बिल आखि़र इन्तेहाई आजज़ी के साथ कहा फ़रज़न्दे रसूल आप ही इसकी वज़ाहत फ़रमा दें और मसले को हल कर दें।

इमाम (अ.स.) ने फ़रमाया , सुनो ! वह औरत किसी की लौंड़ी थी। उसकी तरफ़ सुबह के वक़्त एक अजनबी शख़्स ने नज़र की तो वह उसके लिये हराम थी , दिन चढ़े उसने वह लौड़ी ख़रीद ली वह हलाल हो गई। जौहर के वक़्त उसको आज़ाद कर दिया वह हराम हो गई , असर के वक़्त उसने निकाह कर लिया फिर हलाल हो गई , मग़रिब के वक़्त उससे ज़हार किया तो फिर हराम हो गई , इशा के वक़्त ज़हार का कफ़्फ़ारा दे दिया , तो फिर हलाल हो गई , आधी रात को उस शख़्स ने उसको तलाक़े रजई दी , जिससे फिर हराम हो गई और सुबह के वक़्त उस तलाक़ से रूजू कर लिया ‘’ हलाल हो गई ’’

मसले का हल सुन कर सिर्फ़ यहिया ही नहीं बल्कि सारा मजमा हैरान रह गया और सब में मर्सरत की लहर दौड़ गई। मामून को अपनी बात के ऊँचा रहने की ख़ुशी थी , उसने मजमे की तरफ़ मुख़ातिब हो कर कहा मैं न कहता था कि यह वह घराना है जो क़ुदरत की तरफ़ से मालिक क़रार दिया गया है। यहां के बच्चों का भी कोई मुक़ाबला नहीं कर सकता। मजमे में जोशो ख़रोश था सब ने यही एक ज़बान हो कर कहा कि बेशक जो आपकी राय है वह बिल्कुल ठीक है और यक़ीनन अबू जाफ़र मोहम्मद बिने अली (अ.स.) का कोई मिस्ल नहीं है। (सवाऐक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 122 रवाहिल मुस्तफ़ा 191 नूरूल अबसार पृष्ठ 142 शरा इरशाद 478 से 479, तारीख़े आइम्मा 485, सवानह मोहम्मद तक़ी (अ.स.) पृष्ठ 6)

इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के साथ उम्मे फ़ज़ल का अक़्द और ख़़ुत्बा ए निकाह

इस अज़ीमुश्शान मनाज़रा में इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की शान दार कामयाबी ने मामून को आपका और गिरवीदा बना दिया , और उसकी मंज़िले एतराफ़ में इन्तेहाई बुलन्दी पैदा हो गई , इसके हर क़िस्म के हुस्ने ज़न में यक़ीन की रूह दौड़ गई।

उलमा लिखते हैं कि ‘‘ मामून ने इसके बाद फ़ौरन ही अपनी दिली मुराद को अमली जामा पहनाने का तहय्या कर लिया और ज़रा भी ताख़ीर मुनासिब न समझते हुए इसी जलसे में इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) ने ख़ुतबा और निकाह पढ़ा और यह तक़रीब पूरी कामयाबी के साथ अन्जाम पज़ीर हुई , मामून ने ख़ुशी में बड़ी फ़य्याज़ी से काम लिया , लाखों रूपए ख़ैरो ख़ैरात में तक़सीम किए गए और तमाम रेआया को इनामात व अतीया के साथ माला माल किया गया। ’’(सफ़र नामा हज व ज़्यारत पृष्ठ 434 प्रकाशित पेशावर 1972 0 )

अल्लामा शेख़ मुफ़ीद और अल्लामा शिब्लंजी लिखते हैं कि हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) ने जो ख़ुत्बा ए निकाह पढ़ा वह यह था। ‘‘ अलहम्दो लिल्लाह अक़रार अब्नाहताह व आलाल्लाहा अख़्लासन लौहदा नैहतेही अलख़. ’’ और जो महर किया वह महरे फ़ातमी मुब्लिग़ पाँच सौ ( 500) दिरहम था।(इरशाद मुफ़ीद पृष्ठ 477 नूरूल अबसार पृष्ठ 146 ) मालूम होना चाहिये इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) ने जो ख़ुत्बा ए निकाह अपनी ज़बाने मुबारक पर जारी किया था वह वही है जो इस वक़्त भी निकाह के मौक़े पर पढ़ा जाता है। मेरी नज़र में इस ख़ुत्बे के होते हुए दूसरे ख़ुत्बे को पढ़ना मुनासिब नहीं है।

अल्लामा शिबलन्जी का बयान है कि हर क़िस्म की ख़ुश्बू की बास में अक़दे निकाह हुआ , और हाज़ेरीन की हलवे से तवाज़ो की गई।(नूरूल अबसार पृष्ठ 146, सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 123 शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 204, रौज़तुल पृष्ठ जिल्द 3 पृष्ठ 17, इरशाद पृष्ठ 477, कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 116 )

अल्लामा शेख़ मुफ़ीद तहरीर फ़रमाते हैं कि शादी के बाद शबे उरूस की सुबह को जहां और लोग हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की खि़दमत में मुबारक बाद अदा करने के लिए आए , एक शख़्स मोहम्मद बिन अली हाशमी भी पहुँचे। उनका बयान है कि मुझे दफ़तन सख़्त प्यास महसूस हुई , मैं अभी पासे अदब में पानी मांगने न पाया था कि आपने हुक्म दिया और आबे खुनक आ गया , थोड़ी देर बाद फिर ऐसा ही वाक़ेया दर पेश हुआ। मैं हज़रत के इस इल्मे ज़माएर से बहुत मुताअस्सिर हुआ , और मुझे यक़ीन हो गया कि इमामिया आपके जुमला उलूम में माहिर होने का जो अक़ीदा रखते हैं बिल्कुल दुरूस्त है।(इरशाद पृष्ठ 481 )


उम्मुल फ़ज़ल की रूख़सती , इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) कर मदीने को वापसी और हज़रत के इख़्लाक़ो औसाफ़ आदातो ख़साएल

इस शादी का पस मंज़र जो भी हो लेकिन मामून ने निहायत अछूते अन्दाज़ से अपनी लख़्ते जिगर उम्मुल फ़ज़ल को इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के हबलए निकाह में दे दिया। तक़रीबन एक साल तक इमाम (अ.स.) बग़दाद में मुक़ीम रहे , मामून ने दौराने क़याम बग़दाद में आपकी इज़्ज़तो तौक़ीर में कोई कमी नहीं की। ‘‘ इला अन तवज्जो बेज़ैवजता उम्मुल फ़ज़ल इलल्ल मदीनता अलमुशरफ़ता ’’ यहां तक आप अपनी ज़ौजा उम्मुल फ़ज़ल समेत मदीना ए मुशर्रे़फ़ा तशरीफ़ ले आए।(नूरूल अबसार पृष्ठ 146 ) मामून ने बहुत ही इन्तेज़ाम और एहतिमाम के साथ उम्मुल फ़ज़ल को हज़रत के साथ रूख़सत कर दिया। अल्लामा शेख़ मुफ़ीद , अल्लामा तबरसी , अल्लामा शिब्लन्जी , अल्लामा जामी अलैहिम अलरहमता तहरीर फ़रमाते हैं कि इमाम (अ.स.) अपनी एहलिया को लिए हुए मदीना तशरीफ़ लिये जा रहे थे , आप के हमराह बहुत से हज़रात भी थे। चलते चलते शाम के वक़्त आप वारिदे कुफ़ा हुए। वहां पहुँच कर आपने जनाबे मसीब के मकान पर क़याम फ़रमाया और नमाज़े मग़रिब पढ़ने के लिये एक निहायत क़दीम मस्जिद में तशरीफ़ ले गए। आपने वज़ू के लिये पानी तलब फ़रमाया , पानी आने पर आप एक ऐसे दरख़्त के थाले में वज़ू करने लगे जो बिल्कुल ख़ुश्क था और मुद्दतों से सर सब्ज़ी और शादाबी से महरूम था। इमाम (अ.स.) ने उस जगह वज़ू किया , फिर आप नमाज़े मग़रिब पढ़ कर वहां से वापस तशरीफ़ लाए और अपने प्रोग्राम के मुताबिक़ वहां से रवाना हो गए।

इमाम (अ.स.) तो तशरीफ़ ले गए लेकिन एक अज़ीम निशानी छोड़ गए और वह यह थी कि जिस ख़ुश्क दरख़्त के थाले में आपने वज़ू फ़रमाया था वह सर सब्ज़ शादाब हो गया , और रात ही भर में तैय्यार फलों से लद गया। लोगों ने उसे देख कर बे इंतेहा ताज्जुब किया।(इरशाद मुफ़ीद पृष्ठ 479, आलामु वुरा पृष्ठ 205, नूरूल अबसार पृष्ठ 147, शवाहेदुन नबूअत पृष्ठ 205 ) कूफ़े से रवाना हो कर तय मराहेल व क़ता मनाज़िल करते हुए आप मदीने मुनव्वरा पहुँचे। वहां पहुँच कर आप अपने फ़राएज़े मन्सबी की अदाएगी में मुनहमिक़ व मशग़ूल हो गए। पन्दो नसाए , तबलीग़ व हिदायत के अलावा आपने इख़्लाक़ का अमली दर्स देना शुरू कर दिया। ख़ानदानी तुर्रए इम्तेयाज़ के बामोजिब हर एक से झुक कर मिलना , ज़रूरत मन्दों की हाजत रवाई करना मसावात और सादगी को हर हाल में पेश नज़र रखना। ग़ुर्बा की पोशीदा तौर पर ख़बर लेना। दोस्त के अलावा दुश्मनों तक से अच्छा सुलूक करते रहना। मेहमानों की ख़ातिर दारी में इन्हेमाक और इल्मी व मज़हबी प्यासों के लिये फ़ैज़ के चश्मे जारी रखना , आपकी सीरते ज़िन्दगी का नुमाया पहलू था। अहले दुनियां जो आपकी बुलन्दीये नफ़्स का ज़्यादा अन्दाज़ा न रखते थे उन्हें यह तस्वर ज़रूर होता था कि एक कमसिन बच्चे का अज़ीमुश्शान मुसलमान सलतनत के शहनशाह का दामाद हो जाना , यक़ीनन इसके चाल ढाल , तौर तरीक़े को बदल देगा और उसकी ज़िन्दगी दूसरे सांचे में ढल जायेगी। हक़ीक़त में यह एक बहुत बड़ा मक़सद हो सकता है जो मामून की कोता निगाह के सामने भी था। बनी उमय्या या बनी अब्बास के बादशाहों को आले रसूल (स अ व व ) की ज़ात से इतला इख़्तेलाफ़ न था , जिनका उनकी सिफ़ात से था। वह हमेशा इसके दरपए रहते थे कि बुलन्दी इख़्लाक़ और मेराजे इन्सानियत का वह मरकज़ जो मदीना ए मुनव्वरा में क़ायम है और जो सलतनत के माद्दी इक़तिदार के मुक़ाबले में एक मिसाली रूहानियत का मरकज़ बना हुआ है , यह किसी तरह टूट जाए। इसी के लिये घबरा घबरा कर वह मुख़्तलीफ़ तदबीरें करते रहे। इमाम हुसैन (अ.स.) से बैअत तलब करना , इसी की एक शक्ल थी और फिर इमाम रज़ा (अ.स.) को वली अहद बनाना इसी का दूसरा तरीक़ा था। फ़क़त ज़ाहेरी शक्ल सूरत में एक का अन्दाज़ा मआन्दाना और दूसरा तरीक़ा इरादत मन्दी के रूप् में था। मगर असल हक़ीक़त दोनों सूरतों की एक थी , जिस तरह इमाम हुसैन (अ.स.) ने बैअत न की , तो वह शहीद कर डाले गए , इसी तरह इमाम रज़ा (अ.स.) वली अहद होने के बवजूद हुकूमत के मादीम क़ासिद के साथ साथ न चले तो आपको ज़हर के ज़रिए से हमेशा के लिये ख़ामोश कर दिया गया , अब मामून के नुक़ता ए नज़र से यह मौक़ा इन्तेहाई क़ीमती था कि इमाम रज़ा (अ.स.) का जा नशीन एक आठ नौ बरस का बच्चा है जो तीन चार बरस पहले ही बाप से छुड़ा लिया जा चुका था। हुकूमते वक़्त की सियसी सूझ बूझ कह रही थी कि इस बच्चे को अपने तरीक़े पर लाना निहायती आसान है और इसके बाद वह मरकज़ जो हुकूमते वक़्त के खि़लाफ़ साकिन और ख़ामोश मगर इन्तेहाई ख़तरनाक क़ाएम है हमेशा के लिये ख़त्म हो जायेगा।

मामून रशीद अब्बासी , इमाम रज़ा (अ.स.) के वली अहद की मोहिम में अपनी नाकामी को मायूसी का सबब नहीं तसव्वुर करता था , इस लिये कि इमाम रज़ा (अ.स.) की ज़िन्दगी एक उसूल पर क़ाएम रह चुकी थी , इमसें तबदीली नहीं हुई तो यह ज़रूरी नहीं कि इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) जो आठ नौ बरस के सिन से क़सरे हुकूमत में नशोनुमा पा कर बढे वह भी बिल्कुल अपने बुज़ुर्गों के उसूले ज़िन्दगी पर बरक़रार हैं।

सिवाए उन लोगों के जो इन मख़सूस अफ़राद के ख़ुदा दाद कमालात को जानते थे इस वक़्त का हर शख़्स यक़ीनन मामून ही का हम ख़्याल होगा , मगर दुनियां को हैरत हो गई , जब यह देखा कि नौ बरस का बच्चा जैसे शहंशाहे इस्लाम का दामाद बना दिया गया। इस उमर में अपने ख़ानदानी रख रखाओ और उसूल का इन्तेहाई पा बन्द है कि वह शादी के बाद महले शाही में क़याम से इन्कार कर देता है , और इस वक़्त भी जब बग़दाद में क़याम रहता है तो एक अलाहदा मकान किराए पर ले कर इसमें क़याम फ़रमाते हैं। इसी से भी इमाम (अ.स.) की मुस्तहकम क़ूव्वते इरादी का अन्दाज़ा किया जा सकता है। उमूमन माली एतबार से लड़के वाले जो कुछ भी बड़ा दर्जा रखते होते हैं तो वह यह पसन्द करते हैं कि जहां वह रहे वहीं दामाद भी रहे। इस घर में न सही कम अज़ कम इसी शहर में इसका क़याम रहे , मगर इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) ने शादी के एक साल बाद ही मामून को हिजाज़ वापस जाने की इजाज़त पर मजबूर कर दिया। यक़ीनन यह अमर एक चाहने वाले बाप और मामून ऐसे ब इक़तिदार के लिये इन्तेहाई ना गवार था। मगर उसे लड़की की जुदाई गवारा करना पड़ी और इमाम मय उम्मुल फ़ज़ल के मदीना तशरीफ़ ले गए।

मदीना तशरीफ़ लाने के बाद डयोढ़ी का वही आलम रहा जो इसके पहले था , न पहरे दार न कोई ख़ास रोक टोक , न तुज़ुक व एहतिशाम , न औक़ाते मुलाक़ात , न मुलाक़ातियों के साथ बरताओ में कोई तफ़रीक़ ज़्यादा तर नश्शित मस्जिदे नबवी में रहती थी जहाँ मुसलमान हज़रत के वाज़ व नसीहत से फ़ाएदा उठाते थे। रावीयाने हदीस , इख़बार व अहादीस दरियाफ़्त करते थे। तालिबे इल्म मसाएल पूछते थे , साफ़ ज़ाहिर था कि जाफ़र सादिक़ (अ.स.) ही का जां नशीन और इमाम रज़ा (अ.स.) का फ़रज़न्द है जो इसी मसनदे इल्म पर बैठा हुआ हिदायत का काम अन्जाम दे रहा है।


उमूरे ख़ाना दारी और अज़वाजी ज़िन्दगी में

आपके बुज़ुर्गों ने अपनी बीबीयों को जिन हुदूद में रखा हुआ था उन्हीं हुदूद में आपने उम्मुल फ़ज़ल को भी रखा आपने इसके मुतालिक़ परवाह ना की कि आप की बीवी एक शहनशाहे वक़्त की बेटी है। चुनान्चे उम्मुल फ़ज़ल के होते हुए आपने हज़रत अम्मार यासिर की नस्ल से एक मोहतरम ख़ातून के साथ अक़्द भी फ़रमाया और क़ुदरत को नस्ले इमामत इसी ख़ातून से बाक़ी रखना मन्ज़ूर थी। यही इमाम नक़ी (अ.स.) की माँ हुईं। उम्मुल फ़ज़ल ने इसकी शिकायत अपने बाप के पास लिख कर भेजी , मामून के दिल के लिये भी यह कुछ कम तकलीफ़ देह अमर न था , मगर अब उसे अपने किए को निभाना था इस लिये उम्मुल फ़ज़ल को जवाब में लिखा कि मैंने तुम्हारा अक़्द अबू जाफ़र के साथ इस लिये नहीं किया कि उन पर किसी हलाले ख़ुदा को हराम करूं। ख़बरदार ! मुझसे अब इस क़िस्म की शिकायत न करना। यह जवाब दे कर हक़ीक़त में उसने अपनी खि़फ़्फ़त मिटाई है। हमारे सामने इस की नज़ीरें मौजूद हैं कि अगर मज़हबे हैसीयत से कोई बाएहतेराम ख़ातून हुई हैं तो इस की ज़िन्दगी में किसी दूसरी बीवी से निकाह नहीं किया गया , जैसे पैग़म्बरे इस्लाम (स अ व व ) के लिये जनाबे ख़दीजा (अ.स.) और हज़रत अली ए मुर्तुज़ा (अ.स.) के लिये जनाबे फ़ात्मा ज़हरा (अ.स.) मगर शंहशाहे दुनियां की बेटी को यह इम्तेआज़े दुनियां सिर्फ़ इस लिये कि वह एक बादशाह की बेटी हैं। इस्लाम की उस रूह के खि़लाफ़ था जिसके आले मोहम्मद (अ.स.) मुहाफ़िज़ थे। इस लिये इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) ने इसके खि़लाफ़ तर्ज़े अमल इख़्तेआर करना अपना फ़रीज़ा समझा। (सवानेह मोहम्मद तक़ी (अ.स.) जिल्द 2 पृष्ठ 11)

इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) और तैयुल अर्ज़

इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) अगर चे मदीना में क़याम फ़रमाते थे लेकिन फ़राएज़ की वुस्अत ने आपको मदीना ही के लिये महदूद नहीं रखा था। आप मदीना में रह कर अतराफ़े आलम के अक़ीदत मन्दों की ख़बर गीरी फ़रमाते थे यह ज़रूरी नहीं कि जिसके साथ करम गुस्तरी की जाए। वह आपके कवाएफ़ व हालात से भी आगाह हो। अक़ीदे का ताअल्लुक़ दिल की गहराई से है कि ज़मीनों आसमान ही नहीं सारी काएनात उनके ताबे होती है। उन्हें इसकी ज़रूरत नहीं पड़ती कि वह किसी सफ़र में तय मराहिल के लिये ज़मीन अपने क़दमों से नापा करें , उनके लिये यही बस है कि जब और जहां चाहें चश्में ज़दन में पहुँच जाएं और यह अक़लन मोहाल भी नहीं है। ऐसे ख़ासाने ख़ुदा के लिये इस क़िस्म के वाक़ियात क़ुरान मजीद में भी मिलते हैं। आसिफ़ बिन ख़्यावसी जनाबे सुलेमान (अ.स.) के लिए उलमा ने इस क़िस्म के वाक़िये का हवाला दिया है। उनमें से एक वाक़िया है कि आप मदीना मुनव्वरा से रवाना हो कर शाम पहुँचे , एक शख़्स को उस मुक़ाम पर इबादत में मसरूफ़ व मशग़ूल पाया जिस जगह इमाम हुसैन (अ.स.) का सरे मुबारक लटकाया गया था , आपने इससे कहा मेरे हमराह चलो वह रवाना हुआ अभी चन्द क़दम भी न चला था कि कूफ़े की मस्जिद में जा पहुँचा , वहीं नमाज़ अदा करने के बाद जो रवानगी हुई तो सिर्फ़ चन्द मिन्टों में मदीना मुनव्वरा जा पहुँचे और ज़्यारत व नमाज़ से फ़राग़त की गई , फिर वहां से चल कर चन्द लम्हों में मक्का ए मोअज़्ज़मा रसीदगी हो गई , तवाफ़ व दीगर इबादत से फ़राग़त के बाद आपने चश्मे ज़दन में उसे शाम की मस्जिद में पहुँचा दिया और ख़ुद नज़रों से ओझल हो कर मदीना ए मुनव्वरा जा पहुँचे , फिर जब दूसरा साल आया तो आप बदस्तूरे शाम की मस्जिद में तशरीफ़ ले गए और उस आबिद से कहा मेरे हम राह चलो चुनान्चे वह चल पड़ा , आपने चन्द लम्हों में उसे साले गुज़िश्ताा की तरह तमाम मुक़द्दस मक़ामात की ज़्यारत करा दी। पहले ही साल के वाक़िये से वह शख़्स बेइन्तेहा मुत्तअस्सिर था ही कि दूसरे साल भी ऐसा ही वाक़िया हो गया। अबकी मरतबा उसने मस्जिदे शाम वापस पहुँचते ही उनका दामन थाम लिया और क़सम दे कर पूछा कि फ़रमाईये आप इस करामात के मालिक कौन हैं ? आपने इरशाद फ़रमाया कि मैं मोहम्मद बिन अली इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) हूँ। इसने बड़ी अक़ीदत और ताज़ीम व तकरीम के मरासिम अदा किए। आपके वापस तशरीफ़ ले जाने के बाद यह ख़बर बिजली की तरह फैल गई। जब वालिये शाम मोहम्मद अब्दुल मलिक को इसकी इत्तेला मिली और यह भी पता चला कि लोग इस वाक़िये से इन्तेहाई मुताअस्सिर हो गए हैं तो आपने उस आबिद पर मुदयी नबूअत होने का इल्ज़ाम लगा कर उसे क़ैद करा दिया और फिर शाम से मुन्तक़िल कर के ईराक़ भिजवा दिया। उसने वाली को क़ैद ख़ाने से एक ख़त भेजा जिसमें लिखा की मैं बे ख़ता हूँ मुझे रिहा किया जाए , तो उसने ख़त की पुश्त पर लिखा कि जो शख़्स तूझे शाम से कूफ़े और कूफ़े से मदीने और वहां से मक्का और फिर वहां से शाम पहुँचा सकता है। अपनी रिहाई में उसी की तरफ़ रूजू कर। इस जवाब के दूसरे दिन यह शख़्स मुकम्मल सख़्ती के बवजूद सख़्त तरीन पहरे के होते हुए क़ैद ख़ाने से ग़ाएब हो गया। अली बिन ख़ालिद रावी का बयान है कि जब मैं क़ैद ख़ाने के फाटक पर पहुँचा तो देखा की तमाम ज़िम्मे दारान हैरान व परेशान हैं और कुछ पता नहीं चलता कि आबिदे शामी ज़मीन में समा गया या आसमान पर उठा लिया गया। अल्लामा मुफ़ीद (अ. र.) लिखते हैं कि इस वाक़िये से अली बिन ख़ालिद जो दूसरे मज़हब का पैरो था , इमामिया मसलक़ का मोतक़िद हो गया।(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 205, नूरूल अबसार पृष्ठ 146, आलामु वुरा पृष्ठ 731, इरशाद मुफ़ीद पृष्ठ 481 )

हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के बाज़ करामात

साहबे तफ़सीर हुसैनी अल्लामा हुसैन वाएज़ काशफ़ी का बयान है कि हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के करामात बेशुमार हैं।(रौज़तुल शोहदा पृष्ठ 438 ) में बाज़ तज़केरा मुख़्तलिफ़ कुतुब से करता हूँ।

अल्लाम अब्दुरर्रहमान जामी तहरीर फ़रमाते हैं कि 1. मामून रशीद के इन्तेक़ाल के बाद हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) ने इरशाद फ़रमाया कि अब तीस माह बाद मेरा भी इन्तेक़ाल होगा , चुनान्चे ऐसा ही हुआ।

2. एक शख़्स ने आपकी खि़दमत में हाज़िर हो कर अर्ज़ किया कि एक मुसम्मता (उम्मुल हसन) ने आपसे दरख़्वास्त की है कि अपना कोई जामये कुहना (पुराने कपड़े) दीजिए ताकि मैं उसे कफ़न में रखूं। आपने फ़रमाया कि अब जामेय कुहना की ज़रूरत नहीं है। रावी का बयान है कि मैं वह जवाब ले कर जब वापस हुआ तो मालूम हुआ कि 13 14 दिन हो गए हैं वह इन्तेक़ाल कर चुकी है।

3. एक शख़्स उमय्या बिन अली कहता है कि मैं और हमाद बिन ईसा एक सफ़र में जाते हुए हज़रत की खि़दमत में हाज़िर हुए ताकि एक से रूख़सत हो लें , आपने इरशाद फ़रमाया कि , तुम आज अपना सफ़र मुलतवी करो , चुनान्चे हस्बे अल हुक्म ठहर गया , लेकिन मेरे साथी हमाद बिन ईसा ने कहा कि मैंने सारा सामाने सफ़र घर से निकाल रखा है अब अच्छा नहीं मालूम होता है कि सफ़र मुलतवी करूँ , यह कह कर वह रवाना हो गया और चलते चलते रात को एक वादी में जा पहुँचा और वहीं क़याम किया , रात के किसी हिस्से में एक अज़ीमुश्शान सेलाब आ गया और वह तमाम लोगों के साथ हमाद को भी बहा ले गया।(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 202 )

4. अल्लामा अरबली तहरीर फ़रमाते हैं कि मिम्बर बिन ख़लाद का बयान है कि एक दिन मदीना मुनव्वरा में जब कि आप बहुत कमसिन थे मुझसे फ़रमाया कि चलो मेरे हमराह , चुनान्चे मैं साथ हो गया , हज़रत ने मदीने से बाहर एक वादी में जा कर मुझ से फ़रमाया कि तुम ठहरो मैं अभी आता हूँ , चुनान्चे आप नज़रों से ग़ायब हो गए और थोड़ी देर बाद वापस हुए , वापसी पर आप बेइन्तेहा मलूल और रंजीदा थे , मैंने पूछा फ़रज़न्दे रसूल (स अ व व ) आपके चेहरा ए मुबारक से आसारे हुज़न व मलाल हुवैदा हैं। इरशाद फ़रमाया ! कि इसी वक़्त बग़दाद से वापस आ रहा हूँ वहां मेरे वालिदे माजिद हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) ज़हर से शहीद कर दिये गए हैं , मैं उन पर नमाज़ वग़ैरा अदा करने गया था।

5. क़ासिम बिन अब्दुर्रमान का बयान है कि बग़दाद में मैंने देखा किसी शख़्स के पास बराबर लोग आते जाते हैं और मैंने दरियाफ़्त किया कि जिसके पास आने जाने का ताता बंधा हुआ है यह कौन है ? लोगों ने कहा कि अबू जाफर बिन अली (अ.स.) हैं , अभी यह बातें हो ही रहीं थी कि आप नाक़े पर सवार उस तरफ़ से गुज़रे , क़ासिम कहता है कि उन्हें देख कर मैंने दिल में कहा कि लोग बड़े बेवकूफ़ हैं जो आपकी इमामत के क़ाएल हैं और आपकी इज़्ज़त व तौक़ीर करते हैं , यह तो बच्चे हैं और मेरे दिल मे इनकी कोई वक़त महसूस नहीं होती। मैं अपने दिल मे यही सोच रहा था कि आप ने क़रीब आ कर फ़रमाया कि , ऐ क़ासिम बिन अब्दुर्रहमान ! जो शख़्स हमारी इताअत से गुरेज़ाँ हैं वह जहन्नम में जायेगा। आपके इस फ़रमाने पर मैंने ख़्याल किया कि यह जादूगर हैं कि इन्होंने मेरे दिल के इरादे को मालूम कर लिया है। जैसे ही यह ख़्याल मेरे दिल में आया , आपने फ़रमाया कि तुम्हारा ख़्याल बिल्कुल ग़लत है तुम अपने अक़ीदे की इस्लाह करो। यह सुन कर मैंने आपकी इमामत का इक़रार किया और मुझे मानना पड़ा कि आप हुज्जतुल्लाह हैं।

6. क़ासिम इब्नुल हसन का बयान है कि मैं एक सफ़र में था , मक्का और मदीना के दरमियान एक मफ़लूक़ुल हाल ने मुझसे सवाल किया , मैंने उसे रोटी का एक टुकड़ा दे दिया। अभी थोड़ी देर गुज़री थी कि एक ज़बर दस्त आंधी आई और वह मेरी पगड़ी उड़ा ले गई। मैंने बड़ी तलाश की लेकिन वह दस्तयाब न हुई। जब मैं मदीने पहुँचा और हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) से मिलने गया तो आपने फ़रमाया , ऐ क़ासिम ! तुम्हारी पगड़ी हवा उड़ा ले गई। मैंने अर्ज़ कि जी हुज़ूर। आपने अपने ग़ुलाम को हुक्म दिया कि इनकी पगड़ी ले आओ। ग़ुलाम ने पगड़ी हाज़िर की। मैंने बड़े ताज्जुब से दरियाफ़्त किया कि मौला ! यह पगड़ी यहां कैसे पहुँची ? आपने फ़रमाया तुमने जो राहे ख़ुदा में रोटी का टुकड़ा दिया था , उसे ख़ुदा ने क़ुबूल फ़रमा लिया है। ऐ क़ासिम ! ख़ुदा वन्दे आलम यह नहीं चाहता कि जो उसकी राह में सदक़ा दे वह उसे नुक़सान पहुँचने दे।

7. उम्मुल फ़ज़ल ने हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की शिकायत अपने वालिद मामून रशीद अब्बासी को लिख कर भेजी , कि अबू जाफ़र मेरे होते हुए दूसरी शादी भी कर रहे हैं। उसने जवाब दिया कि मैंने तेरी शादी इस लिये नहीं की कि हलाले ख़ुदा को हराम कर दूँ। उन्हें क़ानूने ख़ुदा वन्दी इजाज़त देता है वह दूसरी शादी करें इसमें तेरा क्या दख़ल है। आइन्दा से इस क़िस्म की कोई शिकायत न करना और सुन तेरा फ़रीज़ा है कि तू अपने शौहर अबू जाफ़र को जिस तरह हो राज़ी रख। इस तमाम ख़तो किताबत की इत्तेला हज़रत को हो गई।(कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 120 )

अल्लामा शेख़ हुसैन बिन अब्दुल वहाब तहरीर फ़रमाते हैं कि एक दिन उम्मुल फ़ज़ल ने हज़रत (अ.स.) की एक बीवी को जो अम्मार यासीर की नस्ल से थीं , देखा तो मामून रशीद को कुछ इस अन्दाज़ से कहा कि वह हज़रत के क़त्ल पर आमादा हो गया मगर क़त्ल न कर सका।(अयुनूल मोजिज़ात पृष्ठ 154 प्रकाशित मुलतान)

हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के हिदायात व इरशादात

यह एक मुसल्लेमा हक़ीक़त है कि बहुत से बुज़ुर्ग मरतबा उलेमा ने आपसे उलूमे अहले बैत की तालीम हासिल की। आपके ऐसे मुख़्तसिर हाकिमाना मक़ूलों का भी एक ज़ख़ीरा है। जैसे आपके जद्दे बुज़ुर्गवार हज़रत अमीरल मोमेनीन इमाम अली बिन अबी तालिब (अ.स.) के कसरत से पाए जाते हैं। जनाबे अमीर (अ.स.) के बाद इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के मक़ूलों को एक ख़ास दर्जा हासिल है। बाज़ उलमा ने आपके मक़ूलों की तादाद कई हज़ार बताई है। अल्लामा शिबलन्जी ब हवाला ए फ़सूलुलप मोहिमा तहरीर फ़रमाते हैं कि इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) का इरशाद है कि 1. ख़ुदा वन्दे आलम जिसे जो नेमत देता है ब इरादा दवाम देता है लेकिन उस से वह उस वक़्त ज़ाएल हो जाती है जब वह लोगों यानी मुस्तहक़ीन का देना बन्द कर देता है।

2. हर नेमते ख़ुदा वन्दी में मख़लूक़ का हिस्सा है। जब ख़ुदा किसी को अज़ीम नेमतें देता है तो लोगों की हाजतें भी कसीर हो जाती हैं। इस मौके़ पर अगर साहेबे नेअमत (मालदार) ओहदे बरआ हो सका तो ख़ैर ने नेअमत का ज़वाल लाज़मी है।

3. जो किसी को बड़ा समझता है उस से डरता है।

4. जिसकी ख़्वाहिशात ज़्यादा होंगी उसका जिस्म मोटा होगा।

5. सहीफ़ा ए हयाते मुस्लिम का सर नामा हुस्ने ख़ल्क़ है।

6. जो ख़ुदा के भरोसे पर लोगों से बेनियाज़ हो जायेगा लोग उसके मोहताज होंगे।

7. जो ख़ुदा से डरेगा लोग उसे दोस्त रखेगें।

8. इन्सान की तमाम ख़ुबीयों का मरकज़ ज़बान है।

9. इन्सान के कमालात का दारो मदार अक़ल के कमाल पर है।

10. इन्सान के लिये फ़ख़्र की ज़ीनत इफ़्फ़त है। ख़ुदाई इम्तेहान की ज़ीनत शुक्र है। हसब की ज़ीनत तवाज़ो और फ़रोतनी है। कलाम की ज़ीनत फ़साहत है। रवायत की ज़ीनत हाफ़ेज़ा है। इल्म की ज़ीनत इन्केसार है। वरा और तक़वा की ज़ीनत हुस्ने अदब है। क़नात की ज़ीनत ख़न्दा पेशानी है। वरा व परेहज़गारी की ज़ीनत तमाम मामेलात से कनारा कशी है।

11. ज़ालिम और ज़ालिम के मद्दगार और ज़ालिम के फे़ल को सराहने वाले एक ही ज़ुमरे में हैं यानी सब का दर्जा बराबर है।

12. जो ज़िन्दा रहना चाहता है उसे चाहिये कि बर्दाश्त करने के लिये अपने दिल को सब्र अज़मा बना ले।

13. ख़ुदा की रज़ा हासिल करने के लिये तीन चीज़ें होनी चाहियें , अव्वल अस्तग़फ़ार , दोम , नरमी और फ़रोतनी , सौम , कसरते सदक़ा।

14. जो जल्द बाज़ी से परहेज़ करेगा , लोगों से मशविरा लेगा , अल्लाह पर भरोसा रखेगा वह कभी शर्मिन्दा नहीं होगा।

15. अगर जाहिल ज़बान बन्द रखे तो इख़्तेलाफ़ात न हों।

16. तीन बातों से दिल मोह लिये जाते हैं , क. माशरे में इंसाफ़ , ख. मुसीबत में हमदर्दी , ग. परेशान ख़ातरी में तसल्ली।

17. जो किसी बुरी बात को अच्छी निगाह से देखेगा वह उसमें शरीक समझा जायेगा।

18. कुफ़राने नेअमत करने वाला ख़ुदा की नाराज़गी को दावत देता है।

19. जो तुम्हारे किसी अतिए पर शुक्रिया अदा करे गोया उसने तुम्हें उससे ज़्यादा दे दिया।

20. जो अपने भाई को पोशीदा तौर पर नसीहत करे वह उसका मोहसिन है और जो एलानिया नसीहत करे गोया उसके साथ बुराई की।

21. अक़लमन्दी और हिमाक़त जवानी के क़रीब तक एक दूसरे पर ग़लबा करते रहते हैं और जब अठ्ठारा साल पूरे हो जाते हैं तो इस्तक़लाल पैदा हो जाता है और राह मोअय्यन हो जाती है।

22. जब किसी बन्दे पर नेअमत का नुज़ूल हो वह इस नेअमत से मुताअस्सिर हो कर यह समझे कि यह ख़ुदा की इनायत और मेहरबानी है तो ख़ुदा वन्दे आलम शुक्र करने से पहले उसका नाम शाकिरों में लिख लेता है और जब कोई गुनाह करने के बाद यह महसूस करे कि मैं ख़ुदा के हाथ में हूँ वह जब और जिस तरह चाहे अज़ाब कर सकता है तो ख़ुदा वन्दे आलम उसे अस्तग़फ़ार से क़ब्ल बख़्श देता है।

23. शरीफ़ वह है जो आलिम है और अक़्लमन्द वह है जो मुत्तक़ी है।

24. जल्द बाज़ी कर के किसी अम्र को शोहरत न दो जब तक तकमील न हो जाए। 25. अपनी ख़्वाहिशात को इतना न बढ़ाओ कि दिल तंग हो जाओ।

26. अपने ज़ईफ़ों पर रहम करो और उन पर रहम के ज़रिए से अपने लिये रहम की ख़ुदा से दरख़्वास्त करो।

27. आम मौत से बूरी मौत वह है जो गुनाह के ज़रिए से हो , और आम ज़िन्दगी से ख़ैरो बरकत के साथ वाली ज़िन्दगी बेहतर है।

28. जो ख़ुदा के लिये अपने किसी भाई को फ़ाएदा पहुँचाए वह ऐसा है जैसे उसने अपने लिये जन्नत में घर बना लिया।

29. जो ख़ुदा पर एतमाद रखे और उस पर तवक़्कु़ल और भरोसा करे खु़दा उसे हर बुराई से बचाता है और उसकी हर क़िस्म के दुश्मन से हिफ़ाज़त करता है।

30. दीन इज़्ज़त है , इल्म ख़ज़ाना है और ख़ामोशी नूर है।

31. ज़ोहद कि इन्तेहा वरा और तक़वा है।

32. दीन को तबाह कर देने वाली चीज़ बिदअत है।

33. इन्सान को बादबाद करने वाली चीज़ लालच है।

34. हाकिम की सलाहियत पर रेआया की ख़ुशहाली का दारो मदार है।

35. दुआ के ज़रिए हर बला टल सकती है।

36. जो सब्रो ज़ब्त के साथ मैदान में आ जाए वह कामयाब होगा।

37. जो दुनियां में तक़वा का बीज बोएगा आख़ेरत में दिली मुरादों का फल पाएगा।

(नूरूल अबसार पृष्ठ 148 प्रकाशित मिस्र)

हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की एक रवायत

मुवर्रिख़े दमिश्क़ अल्लामा शम्सुद्दीन इब्ने तालून लिखते हैं कि हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) ने अपने आबाओ अजदाद से रवायत करते हुए इरशाद फ़रमाया है कि हज़रत अली (अ.स.) ने बयान फ़रमाया है कि जब आं हज़रत (स अ व व ) ने मुझे यमन की तरफ़ भेजा था तो चन्द ख़ास वसीअतें की थीं जिनमें एक यह थी ‘‘ या अली माख़ाबा मन इस्तेख़ारो लानदम मन इस्तेशार ’’ जो शख़्स अपने कामों में इस्तेख़ारा कर लिया करेगा वह ख़ाएब यासिर न होगा और जो अपने मुख़लिस दोस्तों से मशविरा किया करेगा वह नादिमो शर्मिन्दा न होगा मन इस्तेफ़ादा काफ़िल्लाह फ़क़त इस्तेफ़ाद बैतन फिल जन्नत जो अपने भाई को फ़ी सबीलिल्लाह फ़ाएदा पहुँचाएगा वह जन्नत में अपना घर बनवा लेगा।(अल मता अल असना अशर पृष्ठ 103 प्रकाशित बैरूत)

मामून की वफ़ात, मोतसिम की खि़लाफ़त और हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की गिरफ़्तारी

शादी के बाद हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) मदीने में क़दरे पुर सुकून ज़िन्दगी बसर कर रहे थे यानी आपको वह ख़दशा न था जो हुकूमते वक़्त की तरफ़ से आपके आबाओ अजदाद को हर वक़्त लगा रहता था और जिसके नतीजे में शहादत का दर्जा नसीब होता रहता था। आपको जो तकलीफ़ थी वह उम्मुल फ़ज़ल के शिकायती ख़ुतूत की थी जिनके ज़रिए से वह मामून की अनाने तवज्जा आपकी मुख़ालेफ़त की तरफ़ मोड़ना चाहती थीं। मामून चुंकि होशियार और अपने किए के निभाने का आदी था इस लिये उसने कोई परवाह नहीं की लेकिन इसके बाद वाले ख़लीफ़ा ने इसको पूरी अहमियत दे कर आपका काम तमाम कर दिया।

अल्लामा अली नक़ी लिखते हैं कि 218 हिजरी में मामून ने दुनियां को ख़ैर बाद कहा। अब मामून का भाई और उम्मुल फ़ज़ल का चचा मोतसिम जो इमाम रज़ा (अ.स.) के बाद वली अहद बनाया जा चुका था तख़्ते सलतनत पर बैठा और मोतसिम बिल्लाह अब्बासी के नाम से मशहूर हुआ , इसके बैठते ही इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के मुताअल्लिक़ उम्मुल फ़ज़ल के इसी तरह के शिकायती ख़ुतूत की रफ़्तार बढ़ गई , जिस तरह के उसने अपने बाप मामून को भेजे थे। मामून ने जो तमाम बनी अब्बासीयों की मुख़ालेफ़तों के बवजूद भी अपनी लड़की का निकाह इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के साथ कर दिया था इस लिये अपनी बात की पच और किए की लाज रखने की ख़ातिर उसने उन शिकायतों पर कोई तवज्जोह नही दी बल्कि मायूस कर देने वाले जवाब से बेटी की ज़बान बन्द कर दी मगर मोतसिम जो इमाम रज़ा (अ.स.) की वली अहदी का दाग़ अपने सीने पर लिये हुए था और इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) को दामाद बनाए जाने से तमाम बनी अब्बास के नुमाइन्दे की हैसियत से पहले ही इख़्तेलाफ़ करने वालों में पेश पेश रह चुका था। अब उम्मुल फ़ज़ल के शिकायती ख़ुतूत को अहमियत दे कर अपने इस इख़्तेलाफ़ को जो इस निकाह से था हक़ बा जानिब करना चाहता था। फिर सब से ज़्यादा इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की इल्मी मरजीयत आपके इख़लाक़ी असर का शोहरा जो हिजाज़ से बढ़ कर ईराक़ तक पहुँचा हुआ था , वह बिना मुख़ासेमत जो मोतसिम के बुज़ुर्गों को इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के बुज़ुर्गों से रह चुकि थी वह फिर इस सियासत की नामी और मन्सूबा की शिकस्त का महसूस हो जाना जो इस अक़्द का मुहर्रिक हुआ था जिसकी तशरीह पहले हो चुकि है। यह तमाम बातें थीं कि मोतसिम मुख़ालेफ़त के लिये अमादा हो गया। उसने अपनी सलतनत के दूसरे ही साल इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) को मदीने से बग़दाद की तरफ़ जबरन बुलवा भेजा। हाकिमे मदीना अब्दुल मलिक को इस बारे में ताक़िदी ख़त लिखा मजबूरन इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) अपने फ़रज़न्द हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) और उनकी वालेदा को मदीने में छोड़ कर बग़दाद की तरफ़ रवाना हो गए। मुल्ला मोहम्मद मुबीन फिरंगी महली कहते हैं कि जब मामून के बाद मोतसिम ख़लीफ़ा हुआ और उसने इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के फ़ज़ाएल का आवाज़ सुना तो बराए बुग़ुज़ व अनाद मदीना ए मुनव्वरा से ब मुक़ाम बग़दाद आपको तलब कर लिया। इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) जब मदीने से चलने लगे तो उन्होंने अपने फ़रज़न्द इमाम अली नक़ी (अ.स.) को अपना वसी और ख़लीफ़ा क़रार दे कर कुतुबे उलूमे इलाही और असारे जनाबे रिसालत पनाही उन्हें सुपुर्द फ़रमाया , उसके बाद मदीने से रवाना हो कर नवीं मोहर्रम ( 9 मोहर्रम) 220 हिजरी को बग़दाद पहुँचे और मोतसिम ने उसी साल उनको शहीद कर दिया।(वसीलाए नजात पृष्ठ 260 )

इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की नज़र बन्दी क़ैद और शहादत

मदीना ए रसूल (स अ व व ) से फ़रज़न्दे रसूल को तलब करने की ग़रज़ चुंकि नेक नीयती पर मुबनी न थी इस लिये अज़ीम शरफ़ के ब वजूद बाप हुकूमते वक़्त की किसी रियायत के क़ाबिल नहीं मतसव्वुर हुए। मोतसिम ने बग़दाद बुलवा कर आपको क़ैद कर दिया।

अल्लामा अरबली लिखते हैं कि चूंकि मोतसिम ब खि़लाफ़त बानश्त आँ हज़रत रा अज़ मदीना ए तय्यबा ब दारूल खिलाफ़ा बग़दाद आवरदा जलस फ़रमूदा(कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 112 ) एक साल तक आपने क़ैद की सख़्तियां सिर्फ़ इस जुर्म में बर्दाश्त कीं कि आप कमालाते इमामत के हामिल क्यों हैं और आपको ख़ुदा ने यह शरफ़ क्यों अता फ़रमाया है। बाज़ उलमा का कहना है कि आप पर इस क़दर सख़्तियां थीं और इतनी कड़ी निगरानी और नज़र बन्दी थी कि आप अक्सर अपनी ज़िन्दगी से बेज़ार हो जाते थे। बहरहाल वह वक़्त आ गया कि आप सिर्फ़ पच्चीस साल तीन माह 12 यौम की उम्र में क़ैद ख़ाने के अन्दर आखि़र ज़िक़ाद (ब तारीख़ 29 ज़िक़ादा सन् 220 हिजरी यौमे सह शम्बा) मोतसिम के ज़हर से शहीद हो गए।(कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 121, सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 123, रौज़तुल पृष्ठ जिल्द 3 पृष्ठ 16, आलामु वुरा पृष्ठ 205, इरशाद 480, अनवारे नोमानिया पृष्ठ 127, अनवारूल हुसैनिया पृष्ठ 54 ) आपकी शहादत के मुताअल्लिक़ मुल्ला मुबीन कहते हैं कि मोतसिम अब्बासी ने आपको ज़हर से शहीद किया।(वसीलतुन नजात पृष्ठ 297 ) अल्लामा इब्ने हजर मक्की लिखते हैं कि आपको इमाम रज़ा (अ.स.) की तरह ज़हर से शहीद किया गया।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 123 )

अल्लामा हुसैन काशफ़ी लिखते हैं कि ‘‘ गोयन्द ब ज़हर शहीद शुद ’’ कहते हैं कि ज़हर से शहीद हुए हैं।(रौज़तुल शोहदा पृष्ठ 438 ) मुल्ला जामी की किताब में है ‘‘ क़ीला मता मसमूमन ’’ कहा जाता है कि आपकी वफ़ात ज़हर से हुई।(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 204 )

अल्लामा नेमत उल्ला जज़ायरी लिखते हैं ‘‘ माता मसमूमन क़द समेउल मोतसिम ’’ आप ज़हर से शहीद हुए हैं और यक़ीनन मोतसिम ने आपको ज़हर दिया है।(अनवारे नोमानिया पृष्ठ 195 ) यही कुछ अल्लामा तबरी ने भी तहरीर फ़रमाया है।(आलामुल वरा पृष्ठ 205 ) और अल्लामा अब्दुल रज़ा ने भी यही लिखा है।(अनवारूल हुसैनिया पृष्ठ 54 )

नवाब सिद्दीक़ हसन लिखते हैं कि मोहतसिम अब्बासी ने आपको ज़हर से मार दिया।(अल फ़राहुल आमी) अल्लामा शिब्लन्जी लिखते हैं कि ‘‘अना मता मसमूमन ’’ आप ज़हर से शहीद हुए है। ‘‘ यक़ाल इन उम्मुल फ़ज़ल बिनतुल मामून सख़्तहू बे मूराबीहा ’’ कहा जाता है कि आपको आपकी बीवी उम्मुल फ़ज़ल ने अपने बाप मामून के मुताबिक़ मोतसिम की मदद से ज़हर दे कर शहीद किया।(नूरूल अबसार पृष्ठ 147, अरजहुल मतालिब पृष्ठ 460 )

मतलब यह हुआ कि मामून रशीद ने इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के वालिदे माजिद इमाम रज़ा (अ.स.) को उसकी बेटी ने इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) को बक़ौले शिब्लन्जी शहीद कर के अपने वतीरे मुस्तमारता और उसूले ख़ानदानी को फ़रोग़ बख़्शा है।

अल्लामा मौसूफ़ लिखते हैं कि ‘‘ दख़्लत इम्रातहा उम्मुल फ़ज़ल अला क़सर अल मोतसिम ’’ कि इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) को शहीद कर के उनकी बीवी उम्मुल फ़ज़ल मोतसिम के पास चली गईं। बाज़ मआसेरीन लिखते हैं कि इमाम (अ.स.) ने शहादत के वक़्त उम्मुल फ़ज़ल के बदतरीन मुस्तक़बिल का ज़िक्र फ़रमाया था जिसके नतीजे में उसके नासूर हो गया था और वह आखि़र में दीवानी हो कर मरी।

मुख्तसर यह कि शहादत के बाद हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) ने आपकी तजहीज़ व तकफ़ीन में शिरकत की और नमाज़े जनाज़ा पढ़ाई और इसके बाद आप मुक़ाबिर क़ुरैश में अपने जद्दे नामदार हज़रत इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) के पहलू में दफ़्न किए गए। चुंकि आपके दादा का लक़ब काज़िम और आपका लक़ब जवाद भी था इस लिये उस शहर को आपकी शिरकत से ‘‘ काज़मैन ’’ और वहां के इस्टेशन को आपके दादा की शिरकत की रिआयत से ‘‘ जवादीन ’’ कहा जाता है।

इस मक़बरा ए क़ुरैश में जिसे काज़मैन के नाम से याद किया जाता है 356 हिजरी मुताबिक़ 998 ई 0 में मोअज़ उद्दौला और 452 हिजरी मुताबिक़ 1044 ई 0 जलालुद दौला शाहाने आल बोयह के जनाज़े ऐतिक़ाद मन्दी से दफ़्न किए गए। काज़मैन में जो शानदार रौज़ा बना हुआ है इस पर बहुत से तामीरी दौर गुज़रे लेकिन इसकी तामीरी तकमील शाह इस्माईल सफ़वी ने 966 हिजरी मुताबिक़ 1520 ई 0 में कराई। 1255 हिजरी मुताबिक़ 1856 में मोहम्मद शाह क़ाचार ने उसे जवाहेरात से मुरस्सा किया।

आपकी अज़वाज और औलाद

उलमा ने लिखा है कि हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के चन्द बीवीयां थीं जिनमें उम्मुल फ़ज़ल बिन्ते मामून रशीद अब्बासी और समाना ख़ातून यासरी नुमायां हैसीयत रखती थीं। जनाबा समाना ख़ातून जो कि हज़रत अम्मार यसीर की नस्ल से थी के अलावा किसी से कोई औलाद नहीं हुई। आपकी औलाद के बारे में उलमा का इत्तेफ़ाक़ है कि दो नरीना और दो ग़ैर नरीना थीं जिसके असमा यह हैं 1. हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) 2. जनाबे मूसा मुबर्रेक़ा (अ.स.) 3. जनाबे फ़ात्मा 4. जनाबे अमामह।(इरशाद मुफ़ीद पृष्ठ 493, सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 123, रौज़तुल शोहदा पृष्ठ 438, नूरूल अबसार पृष्ठ 147, अनवारे नोमानिया पृष्ठ 127 कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 116, आलामुल वरा पृष्ठ 205 वगै़रह।)

सिलसिला ए सादा ते रिज़विया

हज़रत इमाम अली रज़ा (अ.स.) के हालात में बहवाले इमाम उल मोहद्देसीन हुज्जतुल इस्लाम हज़रत अल्लामा शेख़ मुफ़ीद (अ. र.) व अल्लामा मोतमिद तबरसी लिखा जा चुका है कि हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) के नरीना फ़रज़न्द , हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) थे। इन हज़रात की तहक़ीक़ पर ऐतिमाद व एतिक़ाद करने के बाद यह यक़ीनी तौर पर कहा जा सकता है कि हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की नस्ल सिर्फ़ इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) से बढ़ी , बेटे की औलाद का दादा की तरफ़ इन्तेसाब ख़ुसूसन ऐसी हालत में जब कि बाप के अलावा दादा के कोई और औलाद न हो नेहायत मुनासिब है।

इसी लिये अल्लामा हुसैन वाएज़ काशफ़ी , अल्लामा सय्यद नूरूल्लाह शूस्तरी(शहीदे सालिस) अल्लामा मजलिसी तहरीर फ़रमाते हैं कि हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की औलाद को ‘‘ रिज़वी ’’ कहा जाता है।(रौज़तुल शोहदा पृष्ठ 438, मजालिस अल मोमेनीन व बेहारूल अनवार) अल्लामा मआसिर मौलाना सय्यद अली नक़ी मुजतहीदुल अस्र रक़म तराज़ हैं कि ‘‘ यह एक हक़ीकत है कि जितने सादात ‘‘ रिज़वी ’’ कहलाते हैं वह दरअस्ल तक़वी हैं यानी हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की औलाद हैं। अगर हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की औलाद हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के अलावा किसी और फ़रज़न्द के ज़रिए से भी होती तो इम्तेआज़ के वह अपने को ‘‘ रिज़वी ’’ कहलाती और इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की औलाद अपने को तक़वी कहती , मगर चुंकि इमाम रज़ा (अ.स.) की नस्ल इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) से चली और हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की शख़्सी शोहरत सलतनते अब्बासीया के वली अहद होने की वजह से जम्हूरे मुसल्लेमीन में बहुत हो चुकी थी , इस लिये तमाम औलाद को हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की तरफ़ मन्सूब कर के तारूफ़ किया जाने लगा और रिज़वी के नाम से मशहूर हुए। ’’

हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की नस्ल दो बेटों से बढ़ी , एक इमाम अली नक़ी (अ.स.) और दूसरे मूसा मबरक़ा अलैह रहमह(किताब रहमतुल लिलअलेमीन जिल्द 2 पृष्ठ 145 ) इमाम अली नक़ी (अ.स.) की औलाद अपने को नक़वी और मूसा मुबरक़े की औलाद मज़कूरा वजह की बिना पर अपने को रिज़वी कहलाती है।


जनाबे मूसा बिन इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के फ़रज़न्द

मुताबिक़ तहरीर सय्यद हामिद हुसैन करारवी मतूफ़ी 1271 हिजरी महूलए ‘‘ लताएफ़ुश शरफ़ ’’ तीन थे।

अल्लामा हुसैन वाएज़ काशफ़ी लिखते हैं ‘‘ अक़ब मुबरक़ा अज़ सय्यद अहमद अस्त व अक़ब अहमद अज़ मोहम्मद अरज अस्त ’’(रौज़तुल शोहदा पृष्ठ 438 ) सय्यद अहमद के तीन बेटे थे 1. सय्यद सालेह 2. सय्यद जलील 3. सय्यद मोहम्मद अरज मोहम्मद अरज के फ़रज़न्द अबू अब्दुल्लाह सय्यद अहमद ‘‘ नक़ीब अलकुम ’’ थे जिसके मानी रईसे आज़म , निगराने आला , सरबराह और क़ौम के हर दाख़ली और ख़ारजी अमर में तदबीर और साज़गारी पैदा करने वाले के हैं।(मजमउल बहरैन पृष्ठ 157 ) सादाते करारी ज़िला इलाहबाद का सिलसिला ए नसब आप ही की वसातत से इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) और इमाम अली रज़ा (अ.स.) तक पहुँचता है। सादाते करारी के मूरिसे आला सय्यद हसामुद्दीन आल्लाह मुक़ामहू , गर्वनर मथुरा ब अहदे फ़िरोज़ शाह तुग़लक थे। सय्यद रियाज़ुल हसन करारवी मुक़ीम कराची लिखते हैं कि ‘‘ आप ईरान से हिन्दुस्तान आ कर ज़ैद पुर ज़िला बारा बंकी में सुकूनत पज़ीर हुए थे। आपको पहले सूबे का गर्वनर फिर फ़ौज का कमान्डर बना दिया गया था। आप बहुत बड़े बहादुर और सख़ी थे। ’’ आपका सिलसिला नौ वास्तों से नक़ीब अलकु़म तक , फिर चार वास्तों से हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) तक पहुँचता है। आपने 717 हिजरी में जंगल काट कर ‘‘ करारी ’’ को आबाद किया जो तक़रीबन आढ़ाई सौ मवाज़ेआत पर मुश्तमिल है , जिन पर आपकी औलाद क़ाबिज़ और मुतासरिफ़ है।(किताब शजरह सादात करारी मोअल्लेफ़ा सय्यद रियाज़ हुसैन मरहूम पृष्ठ 17 -18 प्रकाशित लखनऊ 1927 0 )

सैय्यद हसामुद्दीन के कु़म से हिन्दुस्तान तशरीफ़ लाने के मुताअल्लिक़ कहा जा सकता है कि चंगेज़ ख़ाँ ने जब ईरान फ़तेह करने के लिये लश्कर भेजा और उस लश्कर ने क़यामत ख़ेज़ तबाही मचाई थी , इसी मौक़े पर दीगर हज़रात की तरह आप भी हिन्दुस्तान तशरीफ़ लाए। (तारीख़ रौज़तुल पृष्ठ जिल्द 5 पृष्ठ 25 ता पृष्ठ 39 प्रकाशित लखनऊ में है कि चंगेज़ खाँ का लश्कर 615 हिजरी में फ़तेह ईरान के लिये निकला। इसकी हालत यह थी कि सैले हवादिस की तरह जिस तरफ़ गुज़रता था तबाहो बरबाद कर छोड़ता था , किसी ने किसी का हवाला देते हुए कहा है कि ‘‘ आमदन् दव कन्दन्द व सोख़तन्द व कुश्तन्द व बुरदन्द ’’ कि लश्कर वाले आए , उखाड़ा वछाड़ जलाया फूका , क़त्ल किया और सब लूट कर ले गए। पृष्ठ 2 चंगेज़ ख़ाँ के दस्त बुरद से ईरान का कोई शहर नुमाया क़रिया नहीं बचा। उसने क़त्लो ग़ारत का सिलसिला 621 हिजरी तक जारी रखा। यूँ तो हर जगह तबाही हुई और सब ही क़त्ल हुए लेकिन वह मुक़ामात जिनकी तबाही से हमारे दिलों को रूही सदमा पहुँचा , वह बलख़ , ख़ुरासान , सब्ज़ावार , नेशापूर और क़ुम जैसे शहर में , बलख़ में पचास हज़ार सादात थे जो क़त्ल हुए। ख़ुरासान में करीब सद हज़ार मोमिन मोवहिद शहीद साखतनद ’’ तक़रीबन एक लाख मोमिन क़त्ल हुए। पृष्ठ 36, सब्ज़ावार में सत्तर हज़ार क़त्ल किये गए। पृष्ठ 36, नेशापूर में तो मक़तूलीन की इतनी कसरत थी कि बारह दिन तक लाशों का शुमार होता रहा। हेरात में भी शदीद अन्धेर गर्दी थी , बेशुमार सादात क़त्ल किये गए। इन हंगामों में नेहायत बरबरियत का सबूत दिया गया , आग लगाई गई। अस्मतदरी की गई , पानी बन्द किया गया और बे दरेग़ क़त्ल व खूंरेज़ी से सर ज़मीने ईरान लालाज़ार बनाई गई। बाज़ मुक़ामात के तज़किरे में मज़कूर है कि ज़ालिम यह कहते थे कि राफ़्ज़ी लोग हैं इनका क़त्ल करना ‘‘ एैन सवाब व मुस्तलज़िम सवाब अस्त ’’ नेहायत सही अमल है और बे हद सवाब का मोजिब है। पृष्ठ 30, बहर हाल हालात से मुतासिर हो कर सादात ईरान से जान बचा कर निकल खड़े हुए और एतराफ़े आलम जहाँ जिसको सूझा वहां जा ठहरा पृष्ठ 39 साहबे उम्दतूल तालिब की तहरीर के मुताबिक़ हज़रत मूसा मबरक़ा की औलाद भी हिन्दुस्तान आई। बदरे मशअशा पृष्ठ 31 जहाँ तक मैं समझता हूँ सैय्यद हुसामुद्दीन का तशरीफ़ लाना भी इसी अहद से मुतअल्लिक़ है।


हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के फ़रज़न्दे अर्जुमन्द जनाब मूसा मुबरक़ा के मुख़्तसिर हालात

हज़रत मूसा मुबरक़ा (अ. र.) हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के फ़रज़न्द और हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) के बरादरे अज़ीज़ थे। आपकी कुन्नीयत अबू जाफ़र और अबू अहमद थी। आप कमाले हुस्नो जमाल की वजह से हमेशा चेहरे पर नक़ाब डाले रहते थे। इसी लिये आपके नाम के साथ ‘‘ मुबरक़ा ’’ भी मुस्तमिल होता है। आप बेहतरीन आलिमे दीन , सख़ी और बहादुर थे। आप 10 रजबुल मुरज्जब 217 हिजरी को मदीना ए मुनव्वरा में पैदा हुए फिर 38 साल की उम्र में 255 हिजरी में कूफ़े तशरीफ़ ले गए , फिर वहां से 256 हिजरी में क़ुम मुन्तक़िल हो गए। उलमा का बयान है कि यह पहले शख़्स हैं जिन्होंने सादाते रिज़विया से कु़म में मुस्तक़िल क़याम का इरादा किया।

अल्लामा शेख़ अब्बास कु़म्मी तहरीर फ़रमाते हैं कि जब आप कूफ़े से क़ुम पहुँचे तो वहा के रऊसा ने आपके मुस्तक़िल क़याम की मुख़ालेफ़त की और आपकी भर पूर कोशिशे क़याम के बावजूद आपको वहां टिकने न दिया , बिल आखि़र आप वहां से रवाना हो कर ‘‘ काशान ’’ पहुँचे , आपकी नस्ली अज़मत और तबलीग़ी सर गर्मियों की शोहरत की वजह से वहां के बाशिन्दों ने आपकी बड़ी आओ भगत की और पूरी इज़्ज़त व तौक़ीर के साथ इनको अपनी आंखों पर जगह दी , चुनान्चे इनके सरबराह अहमद बिन अब्दुल अज़ीज़ बिन दल्फ़ अजली ने दिलो जान से ख़ैर मक़दम किया और लिबासे फ़ाख़ेरा पहना कर उनके लिये शानदार घोड़े फ़राहम किये और एक हज़ार मिसक़ाल सोना , सालाना उनके लिये मुक़र्रर किया।

मुवर्रेख़ीन का बयान है कि अहले काशान आपके वहां क़याम करने से इन्तेहाई ख़ुश थे और आपके क़याम को सारे काशान की ख़ुश क़िस्मती समझते थे लेकिन इसी दौरान में जब क़ुम वालों को होश आया और उनके बाज़ मोअजि़्ज़ हज़रात जो कि बाहर थे जैसे ‘‘ अबू अल सय्यद बिन अल हुसैन बिन अली बिन आदम ’’ जब क़ुम वापस पहुँचे और उन्हें इस हादसे अख़राज का हुक्म हुआ तो वह बेहद शर्मिन्दा हुए और उन लोगों की सख़्त मज़म्मत की जिनका इनके अख़्राज में हाथ था। ‘‘ फ़ार सल्वा रऊसा अल अरब ’’ फिर इन मोअज़्ज़ेज़ीन और अरब के रऊसा ने आपको वापस लाने के लिये एक जमीअत भेज दी , इसने उज़र व माज़ेरत के बाद आपको क़ुम वापस तशरीफ़ लाने पर आमादा कर लिया। चुनान्चे आप निहायत इज़्ज़त व एहतिराम के साथ क़ुम वापस तशरीफ़ लाए , इन हज़रात ने इनके लिये एक शानदार मकान और बहुत सी ज़रूरी चीज़ें और जाएदाद में उनको वाफ़िर हिस्सा दिया और बीस हज़ार दिरहम से नक़द खि़दमत की आपके क़ुम में मुस्तक़िल क़याम के बाद आपकी बहने , ज़ीनत उम्मे मोहम्मद ,मैमूना वग़ैरा भी पहुँच गई और आपकी लड़की बरेह भी जा पहुँची। यह बीबियां मुस्तक़िल वहीं मुक़ीम रहीं बिल आखि़र सब की सब हज़रत मासूमा ए क़ुम के गिर्दा गिर्द दफ़्न हुई।

आप अपने भाई इमाम अली नक़ी (अ.स.) के पैरो थे और उन्हें बेहद मानते थे और मसाएल के जवाब देने में बावक़्ते ज़रूरत उन्हीं से मद्द लिया करते थे जैसा कि यहिया इब्ने अक़सम के सवाल के जवाब में आपका इमाम अली नक़ी (अ.स.) की तरफ़ रूजू करने से ज़ाहिर है।(सफ़ीनतुल बेहार जिल्द 1 पृष्ठ 591 ) आपके मुताअल्लिक़ जो यह कहा जाता है कि आप इमाम अली नक़ी (अ.स.) की मर्ज़ी के खि़लाफ़ एक दफ़ा मुतावक्लि से मिलने गए थे। ‘‘ ग़लत है ’’ क्यों कि इस ख़बर की रवायत याक़ूब बिन यासिर ने की है और वह मोवक्किल का आदमी था यानी ‘‘ यह हवाई उसी दुश्मन की उड़ाई हुई है ’’ इसकी कोई अस्लीयत नहीं।(बदर मशअशा अल्लामा नूरी व सफ़ीनतुल अल बहार 2 पृष्ठ 652 )

आपने शबे चार शम्बा 22 रबीउस्सानी 296 में ब उम्र 79 साल वफ़ात पाई। आपकी नमाज़े जनाज़ा अमीरे क़ुम अब्बास बिन अमरू ग़नवी ने पढ़ाई और आप इसी मुक़ाम पर दफ़्न हुए जिस जगह आपका रौज़ा बना हुआ है। एक रवायत की बिना पर यह वह जगह है जिस जगह मोहम्मद बिन अल हसन बिन अबी ख़ालिद अशरी मुलक़्क़ब ब ‘‘ शम्बूल ’’ का मकान था।(मन्थउल माल जिल्द 2 पृष्ठ 351 ) राक़िम अल हुरूफ़ ने 1966 ई 0 में आपके मज़ारे मुक़द्दस पर हाज़री दी और फ़ातेहा ख़्वानी की है।

मोअल्लिफ़ किताब (14 सितारे) का शजरहए नस्ब

मोवलिफ़ किताब और राक़िम अल हुरूफ़ का शजरह ए नस्ब यह है। सय्यद नजमुल हसन बिन सय्यद फ़ैज़ मोहम्मद बिन सय्यद तय्यब हुसैन इब्ने सय्यद अमीर हुसैन(क़ाज़ी शरीअत बअहदे मलका विक्टोरिया) बिन सय्यद शरीफ़ अली सय्यद रौशन अली बिन सय्यद फ़ैज़ महमूद बिन सय्यद शरीफ़ मोहम्मद बिन सय्यद ईसा इब्ने सय्यद मोहम्मद क़ाएम बिन रूह उल्लाह बिन सय्यद फ़ातेह उ बिन सय्यद शरीफ़ अली सय्यद रौशन अली बिन सय्यद फ़ैज़ महमूद बिन सय्यद शरीफ़ मोहम्मद बिन सय्यद ईसा इब्ने सय्यद मोहम्मद क़ाएम बिन रूह उल्लाह बिन सय्यद फ़तेह उल्लाह बिन सय्यद फ़ैज़ बिन सय्यद हाशिम बिन सय्यद याक़ूब बिन सय्यद इमामुद्दीन बिन सय्यद हैदर बिन सय्यद मोहम्मद बिन सय्यद फ़िरोज़ बिन सय्यद कुतुबुद्दीन बिन सय्यद इमामुद्दीन बिन सय्यद फ़ख़्रूद्दीन बिन सय्यद हुसामुद्दीन (मूरिसे आला सादात करारी) बिन सय्यद कमालुद्दीन (छहतीम) बिन सय्यद बदरूद्दीन बिन ताजुद्दीन (शहीद) बिन सय्यद यहिया बिन सय्यद अब्दुल अज़ीज़ बिन सय्यद इब्राहीम बिन सय्यद महमूद बिन सय्यद अब्दुल्लाह (ज़रबख़्श) बिन सय्यद याक़ूब बिन अबू अब्दुल्लाह सय्यद अहमद (नक़ीब अल क़ुम) बिन सय्यद अबू अली मोहम्मद ऊरूज बिन अबू अहमद सय्यद अबू अल मकारम बिन सय्यद मूसा मुबरक़ा बिन हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) बिन हज़रत इमाम अली रज़ ा (अलैहिस्सलाम)


अबुल हसन हज़रत इमाम अली नक़ ी (अ स )

अली का नाम और खुलक़े हसन लेकर मौहम्मद का

नक़ी दुनिया में आये , दीन है महवे , सना ख्वानी

सितारा औज पर है , दसवीं मन्जि़ल का इमामत का

तक़ी के घर में नाजि़ल हो रहा है नूरे यज़दानी

(साबिर थरयानी कराची)

आज दसवां नाएबे ख़ैरूल बशर पैदा हुआ

हैं लक़ब हादी , नक़ी , जिसके अली है जिसका नाम

रहबरे दीने ख़ुदा हैं , यह मौहम्मद का पिसर

इतरते अतहार में चौथा अली आली मक़ाम

वालैदेन

हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) पैग़म्बरे इस्लाम मौहम्मद (स अ व व ) के दसवें जानशीन और हमारे दसवें इमाम और सिलसिला ए मासूमीन की बारवीं कड़ी हैं। आपके वालिदे माजिद हज़रत इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स.) थे और वालदा माजदा जनाबे समाना ख़ातून थीं। आप अपने आबाओ अजदाद की तरह इमाम मनसूस , मासूम ए आलम , ज़माना और अफज़ल काएनात थे। आप इल्म सख़ावत तहारते नफ़स , बुलन्दी ए किरदार और जुमला सिफ़ात हसना में अपने वालिद माजिद की जीती जागती तस्वीर थे।

(सवाएक़े मोहर्रेक़ा सफ़ा 123 मतालेबुस सूऊल सफ़ा 291 नूरूल अबसार सफ़ा 149 )

आपकी वालेदा के मुताअल्लिक़ उलमा ने लिखा है कि आप सैय्यदा उम्मुल फ़ज़ल के नाम से मशहूर थीं।

(मनाक़िब जिल्द 5 सफ़ा 116 )

इमाम अली नक़ी (अ.स.) की विलादते बासआदत

आप ब तारीख़ 5, रज्जबुल मुरज्जब 214 हिजरी बरोज़ सेह शम्बा बामुक़ाम मदीना ए मुनव्वरा मुतावल्लिद हुए। नुरूल अबसार सफ़ा 149, दम ए साकेबा सफ़ा 120, शेख़ मुफ़ीद का कहना है कि मदीने के क़रीब एक क़रिया है जिसका नाम सरया है , आप वहां पैदा हुए।

इस्मे गिरामी ,कुन्नीयत और अलक़ाब

आपका इस्मे गिरामी अली आपके वालिदे माजिद इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स.) ने रखा इसे यूं समझना चाहिये कि सरवरे काएनात (स अ व व ) ने जो अपने बारह जानशीन अपनी ज़ाहेरी हयात के ज़माने में मोअयन फ़रमाये थे। उनमें से एक आपकी ज़ाते गिरामी भी थी। आपके वालिदे माजिद ने उसी मोअयन नाम से मौसूम कर दिया। अल्लामा तबरसी लिखते हैं कि चौदह मासूमीन (अ.स.) के असमा नाम लौहे महफ़ूज़ में लिखे हुए हैं। सरवरे काएनात स. ने उसी के मुताबिक़ सब के नाम मुअयन फ़रमाये हैं और हर एक के वालिद ने उसी की रौशनी में अपने फ़रज़न्द को मौसूम किया है। अल्लामा अल वरा सफ़ा 225, किताब कशफुल ग़म्मा सफ़ा 4 में है कि आं हज़रत ने सब के नाम हज़रत आयशा को लिखवा दिये थे। आपकी कुन्नियत अबुल हसन थी। आपके अलक़ाब बहुत ज़्यादा हैं। जिनमें नक़ी , नासेह , मोतावक्किल , मुर्तुज़ा और असकरी ज़्यादा मशहूर हैं।

(कशफ़ुल ग़म्मा सफ़ा 122 नूरूल अबसार सफ़ा 149, मतालेबुस सूऊल सफ़ा 191 )

आपके अहदे हयात और बादशाहाने वक़्त

आप जब 214, हिजरी में पैदा हुए तो उस वक़्त बादशहाने वक़्त मामून रशीद अब्बासी था। 218 ई 0 में मामून रशीद ने इन्तेक़ाल किया और मोतासिम ख़लीफ़ा हुआ अबुल फि़दा 227, हिजरी मे वासिक़ इब्ने मोतासिम ख़लीफ़ा बनाया गया अबुल फि़दा 232 हिजरी वासिक़ का इन्तेक़ाल हुआ और मुतावक्किल अब्बासी ख़लीफ़ा मुक़र्रर किया गया। अबुल फि़दा फि़र 247 हिजरी में मुग़तसिर बिन मुतावक्किल और 248 हिजरी में मुस्तईन और 252 हिजरी में ज़ुबेर इब्ने मुतावक्किल अलमकनी व ‘‘मोताज़बिल्लाह अलत तरतीब ख़लीफ़ा बनाए गए। अबुल फि़दा दमतुस् साकेबा 254 हिजरी में मोताज़ के ज़हर देने से इमाम नक़ी (अ.स.) शहीद हुए।

(तज़किरातुल मासूमीन)

हज़रत इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स.) का सफ़रे बग़दाद और हज़रत इमाम नक़ी (अ.स.) की वली अहदी

मामून रशीद के इन्तेक़ाल के बाद जब मोतासिम बिल्लाह ख़लीफ़ा हुआ तो उसने भी अपने अबाई किरदार को सराहा और ख़ानदानी रवये का इत्तेबा किया। उसके दिल में भी आले मौहम्मद की तरफ़ से वही जज़बात उभरे जो उसके आबाओ अजदाद के दिलों में उभर चुके थे , उसने भी चाहा कि आले मौहम्मद स. की कोई फ़र्द ज़मीन पर बाक़ी न रहे। चुनाचे उसने तख़्त नशीं हाते ही हज़रत इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स.) को मदीने से बग़दाद तलब कर के नज़र बन्द कर दिया। इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स.) जो अपने आबाओ अजदाद की तरह क़यामत तक के हालात से वाकि़फ़ थे। मदीने से चलते वक़्त अपने फ़रज़न्द को अपना जां नशीन मुक़र्रर कर दिया और वह तमाम तबर्रूकात जो इमाम के पास हुआ करते हैं आपने इमाम नक़ी (अ.स.) के सिपुर्द कर दिए। मदीने मुनव्वरा से रवाना हो कर आप 9 मोहर्रमुल हराम 220 हिजरी को वारिदे बग़दाद हुए। बग़दाद मे आपको एक साल भी न गुज़रा था कि मोतसिम अब्बासी ने आपको ब तारीख़ 29 जि़क़ाद 220 हिजरी मे ज़हर से शहीद कर दिया।

(नूरूल अबसार सफ़ा 147 )

उसूल काफ़ी में है कि जब इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स.) को पहली बार मदीने से बग़दाद तलब किया गया तो रावीये ख़बर इस्माइल बिन महरान ने आपकी खि़दमत में हाजि़र हो कर कहाः मौला। आपको बुलाने वाला दुश्मने आले मौहम्मद है। कहीं ऐसा न हो कि हम बे इमाम हों जायें। आपने फ़रमाया कि हमको इल्म है तुम घबराओ नहीं इस सफ़र में ऐसा न होगा।

इस्माईल का बयान है कि जब दोबारा आपको मोतासिम ने बुलाया तो फिर मैं हाजि़र हो कर अर्ज़ परदाज़ हुआ कि मौला यह सफ़र कैसा रहेगा ? इस सवाल का जवाब आपने आसुओें के तार से दिया और ब चश्में नम कहा कि ऐ इस्माईल मेरे बाद अली नक़ी को अपना इमाम जानना और सब्र ज़ब्त से काम लेना।

(तज़किरातुल मासूमीन सफ़ा 217 )

इमाम अली नक़ी (अ.स.) का इल्मे लदुन्नी

बचपन का एक वाकि़या

यह हमारे मुसल्लेमात से है कि हमारे अइम्मा को इल्मे लदुन्नी होता है। यह खुदा की बारगाह से इल्म व हिकमत ले कर कामिल और मुकम्मिल दुनियां में तशरीफ़ लाते हैं। उन्हे किसी से इल्म हासिल करने की ज़रूरत नहीं होती है और उन्होने किसी दुनियां वाले के सामने ज़ानु ए अदब तक नहीं फ़रमाया ज़ाती इल्म व हिकमत के अलावा मज़ीद शरफ़े कमाल की तहसील अपने आबाओ अजदाद से करते रहे , यही वजह है कि इन्तेहाई कमसिनी में भी यह दुनियां के बड़े बड़े आलिमों को इल्मी शिकस्त देने में हमेशा कामियाब रहे और जब किसी ने फ़रद से माकूफ़ समझा तो ज़लील हो कर रह गया , फिर सरे ख़म तसलीम करने पर मजबूर हो गया।

अल्लामा मसूदी का बयान है कि हज़रत इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स.) की वफ़ात के बाद इमाम अली नक़ी (अ.स.) जिनकी उस वक़्त उमर 6- 7 साल की थी मदीने में मरजए ख़लाएक़ बन गए थे , यह देख क रवह लोग जो आले मौहम्मद से दिली दुश्मनी रखते थे यह सोचने पर मजबूर हो गये कि किसी तरह इनकी मरकजि़यत को ख़त्म कर दिया जाए और कोई ऐसा मोअल्लिम इनके साथ लगा दिया जो उन्हें तालीम भी दे और इनकी अपने उसूल पर तरबीयत करने के साथ उनके पास लोगों के पहुंचने का सद्दे बाब करें। यह लोग इसी ख्याल में थे उमर बिन फ़जऱ् रहजी फ़राग़ते हज के बाद मदीना पहुंचा लोगों ने उस से अरज़ किया , बिल आखि़र हुकूमत के दबाव से ऐसा इन्तेज़ाम हो गया कि हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) को तालीम देने के लिए ईराक़ का सब से बड़ा आलम , आबिद अब्दुल्लाह जुनीदी माकूल मुशाहेरा पर लगाया गया यह जुनीदी आले मौहम्मद स. की दुशमनी में ख़ास शोहरत रखता था। अलग़रज़ जुनीदी के पास हुकूमत ने इमाम अली नक़ी (अ.स.) को रख दिया और जुनीदी को ख़ास तौर पर इस अमर की हिदायत कर दी कि उनके पास रवाफि़ज़ न पहुंचने पाएं। जुनीदी ने आपको क़सर सरबा में अपने पास रखा। होता यह था कि जब रात होती थी तो दरवाज़ा बन्द कर दिया जाता था और दिन में भी शियों को मिलने की इजाज़त न थी। इसी तरह आपके मानने वालों का सिलसिला मुनक़ता हो गया और आपका फ़ैज़े जारी बन्द हो गया लोग आपकी जि़यारत और आपसे इस्तेफ़ादे से महरूम हो गये। रावी का बयान है कि मैने एक दिन जुनीदी से कहा , ग़ुलाम हाशमी का क्या हाल है ? उसने निहायत बुरी सूरत बना कर कहा , उन्हें ग़ुलाम हाशमी न कहो , वह रईसे हाशमी हैं। खुदा की क़सम वह इस कमसिनी में मुझ से कहीं ज़्यादा इल्म रखते हैं। सुनो मैं अपनी पूरी कोशिश के बाद जब अदब का कोई बाब उनके सामने पेश करता हूँ तो वह उसके मुताल्लिक़ ऐसे अबवाब खोल देते हैं कि मैं हैरान रह जाता हूं। लोग समझ रहे हैं कि मैं उन्हें तालीम दे रहा हूं लेकिन खुदा की क़सम मैं उनसे तालीम हासिल कर रहा हूं। मेरे बस में यह नहीं कि मैं उन्हें पढ़ा सकूं। खुदा की क़सम वह हाफि़ज़े क़ुरआन ही नहीं वह उसकी तावील व तन्ज़ील को भी जानते हैं और मुख़तसर यह कि वह ज़मीन पर बसने वालों में सब से बेहतर और काएनात में सब से अफ़ज़ल हैं।

(असबात उल वसीयत दमतुस् साकेबा सफ़ा 121 )

हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) के करामात और आपका इल्मे बातिन

इमाम अली नक़ी (अ.स.) तक़रीबन 29 साल मदीना मुनव्वरा क़याम पज़ीर रहे। आपने इस मुद्दते उमर में कई बादशाहों का ज़माना देखा। तक़रीबन हर एक ने आपकी तरफ़ रूख़ करने से ऐहतिराज़ किया। यही वजह है कि आप उमूरे इमामत को अन्जाम देने में कामयाब रहे। आप चूंकि अपने आबाओ अजदाद की तरह इल्मे बातिन और इल्मे ग़ैब भी रखते थे। इसी लिए आप अपने मानने वालों को होने वाले वाकि़यात से बा ख़बर फ़रमा दिया करते थे और कोशिश फ़रमाते थे कि मक़दूरात के अलावा कोई गज़न्द न पहुंचने पाए इस सिलसिले में आपके करामात बे शुमार हैं जिनमें से हम इस मक़ाम पर किताब कशफ़ुल ग़ुम्मा से चन्द करामात तहरीर करते हैं।

1. मौहम्मद इब्ने फरज रहजी का बयान है कि हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) ने मुझे तहरीर फ़रमाया कि तुम अपने तमाम उमूर व मामलात को रास्त और निज़ामे ख़ाना को दुरूस्त कर लो और अपने असलहों को सम्भाल लो। मैंने उनके हुक्म के बामोजिब तमाम दुरूस्त कर लिया लेकिन यह न समझ सका यह हुक्म आपने क्यों दिया लेकिन चन्द दिनी के बाद मिस्र की पुलिस मेरे यहां आई और मुझे गिरफतार कर के ले गई और मेरे पास जो कुछ था। सब ले लिया और मुझे क़ैद खाने में बन्द कर दिया। मैं आठ साल इस क़ैद खाने में पडा रहा। एक दिन इमाम (अ.स.) का खत पहुंचा , जिसमें मरक़ूम था कि ऐ मौहम्मद बिन फ़जऱ् , तुम उस रास्ते की तरफ़ न जाना जो मग़रिब की तरफ़ वाक़े है। ख़त पाते ही मेरी हैरानी की कोई हद न रही। मै सोचता रहा कि मैं तो क़ैद खाने में हूं मेरा तो उधर जाना मुम्किन ही नहीं फिर इमाम ने क्यों यह कुछ तहरीर फ़रमाया ? आपके ख़त आने को अभी दो चार ही दिन गुज़रे थे कि मेरी रेहाई का हुक्म आ गया और मैं उनके हुक्म के मुताबिक उस तरफ नही गया कि जिसको आपने मना किया था। क़ैद ख़ाने से रेहाई के बाद मैने इमाम (अ.स.) को लिखा कि हुज़ूर मैं क़ैद से छूट कर घर आ गया हूं। अब आप खुदा से दुआ फ़रमाऐं कि मेरा माल मग़सूबा वापस करा दें। आपने उसके जवाब में तहरीर फ़रमाया कि अन्क़रीब तुम्हारा सारा माल तुम्हें वापस मिल जाएगा चुनांचे ऐसा ही हुआ।

2. एक दिन इमाम अली नक़ी (अ.स.) और अली बिन हसीब नामी शख़्स दोनों साथ ही रास्ता चल रहे थे। अली बिन हसीब आपसे चन्द गाम आगे बढ़ कर बोले , आप भी क़दम बढ़ा कर जल्द आजाएं हज़रत ने फ़रमाया कि ऐ इब्ने हसीब तुम्हें पहले जाना है। तुम जाओ इस वाकि़ए के चार दिन बाद इब्ने हसीब फ़ौत हो गए।

3. एक शख़्स मौहम्मद बिन फ़ज़ल बग़दादी नामी का बयान है कि मैंने हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) को लिखा कि मेरे पास एक दुकान है मैं उसे बेचना चाहता हूं आपने उसका जवाब न दिया। जवाब न मिलने पर मुझे अफ़सोस हुआ। लेकिन जब मैं बग़दाद वापस पहुंचा तो वह आग लग जाने की वजह से जल चुकी थी।

4. एक शख्स अबू अय्यूब नामी ने इमाम (अ.स.) को लिखा कि मेरी ज़ौजा हामेला है , आप दुआ फ़रमाएं कि लड़का पैदा हो। आप ने फ़रमाया इन्शा अल्लाह उसके लड़का ही पैदा होगा और जब पैदा हो तो उसका नाम मौहम्मद रखना। चुनांचे लड़का ही पैदा हुआ , और उसका नाम मौहम्मद ही पैदा रखा गया।

5. यहिया बिन ज़करिया का बयान है कि मैंने इमाम अली नक़ी (अ.स.) को लिखा कि मेरी बीवी हामेला है आप दुआ फ़रमाऐ कि लड़का पैदा हो। आपने जवाब में तहरीर फ़रमाया कि बाज़ लड़कियां लड़कों से बेहतर होती हैं , चुनांचे लड़की पैदा हुई।

6. अबू हाशिम का बयान है कि मैं 227 हिजरी में एक दिन हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) की खि़दमत में हाजि़र था कि किसी ने आकर कहा कि तुर्को की फ़ौज गुज़र रही है। इमाम (अ.स.) ने फ़रमाया कि ऐ अबू हाशिम चलो इन से मुलाक़ात करें। मैं हज़रत के हमराह हो कर लश्करियों तक पहुचा। हज़रत ने एक ग़ुलाम तुर्की से इसकी ज़बान में गुफ़्तगू शुरू फ़रमाई और देर तक बातें करते रहे। उस तुर्की सिपाही ने आपके क़दमों का बोसा दिया। मैंने उस से पूछा कि वह कौन सी चीज़ है जिसने तुझे इमाम का गिरवीदा बना दिया ? उसने कहाः इमाम ने मुझे उस नाम से पुकारा जिसका जानने वाला मेरे बाप के अलावा कोई न था।

7. तिहत्तर ज़बानों की तालीमः

अबू हाशिम कहते हैं कि मैं एक दिन हज़रत की खि़दमत में हाजि़र हुआ तो आपने मुझ से हिन्दी ज़बान में गुफ़तगू की जिसका मैं जवाब न दे सका , तो आपने फ़रमाया कि मैं अभी अभी तुम्हें तमाम ज़बानों का जानने वाला बनाए देता हूं। यह कह कर आपने एक संग रेज़ा उठाया और उसे अपने मुहं में रख लिया उसके बाद उस संग रेज़े को मुझे देते हुए फ़रमाया कि इसे चुसो। मैने मुँह में रख कर उसे अच्छी तरह चूसा , उसका नतीजा यह हुआ कि मैं तेहत्तर ज़बानों का आलिम बन गया। जिनमें हिन्दी भी शामिल थी। इसके बाद से फिर मुझे किसी ज़बान के समझने और बोलने में दिक़्कत न हुई। पेज न. 122 से 125

8. इमाम अली नक़ी (अ.स.) के हाथों में रेत का सोने मे बदल जाना

आइम्माए ताहेरीन के उलील अम्र होने पर क़ुरान मजीद की नस सरीह मौजूद है। इनके हाथों और ज़बान में खुदा वन्दे आलम ने यह ताक़त दी है कि वह जो कहे हो जाए , जो इरादा करें उसकी तकमील हो जाए। अबू हाशिम का बयान है कि एक दिन मैनें इमाम अली नक़ी (अ.स.) की खिदमत में अपनी तंग दस्ती की शिकायत की। आपने फ़रमाया बड़ी मामूली बात है तुम्हारी तक्लीफ़ दूर हो जाएगी। उसके बाद आपने रमल यानी रेत की एके मुठ्ठी ज़मीन से उठा कर मेरे दामन में ड़ाल दी और फ़रमाया इसे ग़ौर से देखो और इसे फ़रोख्त कर के काम निकालो।

अबू हाशिम कहते हैं कि ख़ुदा की क़सम जब मैने उसे देखा तो वह बेहतरीन सोना था , मैंने उसे बाज़ार ले जा कर फ़रोख्त कर दिया।

(मनाक़िब इब्ने शहर आशोब जिल्द 6 सफ़ा 119 )

9. इमाम अली नक़ी (अ.स.) और इस्मे आज़म

हज़रत सुक़्क़तुल इस्लाम अल्लामा क़ुलैनी उसूले काफ़ी में लिखते हैं कि इमाम अली नक़ी (अ.स.) ने फ़रमाया , इस्म अल्लाहुल आज़म 73 हुरूफ़ में इनमें से सिर्फ़ एक हरफ़ आसिफ़ बरखि़या वसी सुलेमान को दिया गया था जिसके ज़रिए से उन्होंने चश्मे ज़दन में मुल्के सबा के तख्ते बिलक़ीस मंगवा लिया था और इस मंगवाने में यह हुआ था कि ज़मीन सिमट कर तख्त को क़रीब ले आई थी , ऐ नौफ़ली रावी ख़ुदा वन्दे आलम ने हमें इस्मे आज़म के 72 हुरूफ़ दिये हैं और अपने लिये सिर्फ़ एक हरफ़ महफ़ूज़ रखा है जो इल्मे ग़ैब से मुताअल्लिक़ है।

मसूदी का कहना है कि इसके बाद इमाम ने फ़रमाया कि ख़ुदा वन्दे आलम ने अपनी क़ुदरत और अपने इज़्ने इल्म से हमें वह चीज़े अता कि हैं जो हैरत अंगेज़ और ताज्जुब ख़ैज़ हैं। मतलब यह है कि इमाम जो चाहें कर सकते हैं। उनके लिए कोई रूकावट नहीं हो सकती।

(उसूले काफ़ी - मनाक़िब इब्ने शहर आशोब जिल्द 5 सफ़ा 118 व दमतुस् साकेबा सफ़ा 126 )

इमाम अली नक़ी (अ.स.) और साल के चार अहम रोज़े

10. शेख़ अबू जाफ़र तूसी किताब मिसबाह में लिखते हैं कि इस्हाक़ बिन अब्दुल्लाह अलवी अरीज़ी हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) की खि़दमत में बा मुक़ाम सरय्या मदीना हाजि़र हुए। इमाम (अ.स.) ने उन्हें देख कर फ़रमाया , मैं जानता हूं कि तुम्हारे बाप और तुम्हारे चचा के दरमियान यह अमर ज़ेर बहस है कि साल के वह कौन से रोज़े है कि जिनका रखना बहुत ज़्यादा सवाब रखता है और तुम इसी के मुताल्लिक़ मुझ से सवाल करने आए हो। उसने कहा ऐ मौला बस यही बात है कि आपने फ़रमाया सुनो वह चार रोज़े हैं जिनके रखने की ताकीद है।

1. यौमे विलादत हज़रत पैग़म्बरे इस्लाम स. 17 रबीउल अव्वल।

2. यौमे बैसत व मेराज 27 रजबुल मुरज्जब।

3. यौमे दहवुल अर्ज़ यानी जिस दिन काबे के नीचे से ज़मीन बिछाई गई और सफ़ीना ए नूह कोह जूदी पर ठहरा जिसकी तारीख़ 25 ज़ीक़ाद है।

4. यानी यौमें अल ग़दीर जिस दिन हज़रत रसूले ख़ुदा स. ने हज़रत अली (अ.स.) को अपने जानशीन होने का ऐलान आम फ़रमाया जिसकी तारीख़ 18 जि़ल हिज है।

ऐ अरीज़ी जो इन दिनों में से किसी दिन भी रोज़ा रखे। उसके साठ और सत्तर साला गुनाह बख़शे जाते हैं।

(किताब मनाक़िब जिल्द 5 सफ़ा 123 व दम ए साकेबा जिल्द 3 सफ़ा 123 )

इमाम अली नक़ी (अ.स.) और मुतावक्किल की तख़्त नशीनी

यह मानी हुई बात है कि मौहम्मद स. व आले मौहम्मद स. उन तमाम उमूर से वाकि़फ़ होते हैं जिनसे अवाम उस वक़्त तक ब खबर नहीं होते जब तक वह मन्ज़रे आम पर न आजायें। इमाम शिबलन्जी लिखते हैं कि वासिक़ का एक मुहं चढ़ा रफ़ीक़ अस्बाती एक दिन ईराक़ से मदीना मुनव्वरा पहुचां और वहां जा कर इमाम अली नक़ी (अ.स.) से मिला। आपने ख़ैर ख़ैरियत दरयाफ़त करने के बाद फ़रमाया कि वासिक़ बिल्लाह ख़लीफ़ा ए वक़्त का क्या हाल है ? उसने कहा मैनें उसे ब सलामत छोड़ा और वह बिल्कुल बख़ैरियत है , मैं उसका भेजा हुआ यहां आया हूं। आपने फ़रमाया लोग कहते हैं कि वह फ़ौत हो गया है। यह सुन कर अस्बाती ने सुकूत इख़्तेयार किया और समझा कि यह जो आपने फ़रमाया है , बइल्मे इमामत फ़रमाया है कि हो सकता है कि दुरूस्त हो। फिर आपने कहा अच्छा यह बताओ कि इब्ने अज़यात किस हाल में है ? उसने अर्ज़ कि वह वह भी अच्छा ख़ासा है। बिल्कुल ख़ैरियत से है। इस वक़्त उसी का तूती बोलती है और इसी का हुक्म चलता है। आपने इरशाद फ़रमायाः ऐ अस्बाती सुनों हुक्में ख़ुदा को कोई नहीं टाल सकता और क़लमे क़ुदरत को कोई नहीं रोक सकता। वासिक़ का इन्तेक़ाल हो गया है और मुतावक्किल तख़्त नशीने खि़लाफ़त हो गया है और इब्ने अज़यात क़त्ल कर दिया गया है। अस्बाती ने चौंक कर पूछाः या हज़रत यह सब कैसे हो गया है ? मैं तो सबको ख़ैरियत व आफि़यत में छोड़ कर आया हूं। आपने फ़रमाया तुम्हारे ईराक़ से निकलने के छः दिन बाद यह इन्क़ेलाब आया है। इसके बाद अस्बाती आप से रूख़सत हो कर शहर में किसी मुक़ाम पर जा ठहरा। चन्द दिनों के बाद मुतावक्किल का नामा बर मदीना पहुंचा तो बिल्कुल उन्हीं हालात का इन्केशाफ़ हुआ जिनकी ख़बर इमामे ज़माना दे चुके थे। नुरूल अबसार सफ़ा 149, प्रकाशित मिस्र मुवर्रिख़ अलवर्दी लिखते हैं कि यह वाकि़या 232 हिजरी का है तारीख़े इस्लाम मिस्टर ज़ाकिर हुसैन में है कि इब्ने अलज़्यारत वज़ीर था उसके क़त्ल होते ही मोतावक्किल ने अपना वज़ीर फतेह इब्ने ख़क़ान को बनाया जो बहुत ज़ेहीन व ज़की था।

(फ़ेहरिस्त इब्ने नदीम सफ़ा 175 )

हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) और सहीफ़ा ए कामेला की एक दुआ

हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) के एक सहाबी सबा बिन हमज़तुल क़ुम्मी ने एक को तहरीर किया कि मौला मुझे ख़लीफ़ा मोतासिम वज़ीर से बहुत दुख पहुंच रहा है , मुझे इसका भी अन्देशा है कि कहीं वह मेरी जान न ले ले। हज़रत ने इसके जवाब में तहरीर फ़रमाया कि घबराओ नही और दुआ ए सहीफ़ा ए कामेला यामन तहलो बेहा अक़दा अलमकाराहा अलख़ , पढ़ो मुसीबत से नजात पाओगे। यसआ बिन हमज़ा का बयान है कि मैनें इमाम के हस्बे अल हुक्म नमाज़ सुब्हा के बाद इस दुआ की तिलावत की जिसका पहले ही दिन यह नतीजा निकला कि वज़ीर ख़ुद मेरे पास आया मुझे अपने हमराह ले गया और लिबासे फ़ख़रा पहना कर मुझे बादशाह के पहलू में बिठा दिया।

हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) के आबाओ अजदाद की क़ब्रों के साथ मोतावकिल अब्बासी का सुलूक

हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) मदीने ही में थे कि जि़लहिज 222 हिजरी में अबू अल फ़ज़ल जाफ़र मुतावक्किल अब्बासी तख़्ते खि़लाफ़त पर मुतामक्किन होने के बाद इसने वह हरकतें शुरू कीं जिन्होने ज़ारे दमिश्क़ यज़ीद को भी शर्मा दिया।

मुवर्रिख़ निगार में मुतावक्किल अब्बासी को वही दर्जा हासिल है जो बनी उम्मया में यज़ीद को हासिल था। यह दोनों अपने ज़ाती किरदार के अलावा जो कुछ आले मौहम्मद स. के साथ करते रहे उससे तारीख़े इस्लाम सख़्त शर्मिन्दा है। मुतावक्किल के मुताल्लिक़ मुवर्रिख़ इब्ने असीर लिखता है कि यह अली बिन अबी तालिब (अ.स.) और उनके अहले बैत से सख्त बुग़ज़ रखता था।

दमेरी का कहना है कि मोतावक्किल हज़रत अली (अ.स.) से बुग़ज़ शदीद रखता था और उनकी मनक़सत किया करता था। तारीख़ अबुल फि़दा में है कि मुतावक्किल ने शायर इब्ने सक़ीयत को इस जुर्म कि उसने मुतावक्किल के इस सवाल के जवाब में मेरे बेटे मोताज़ और मोइद बेहतर हैं या अली (अ.स.) के बेटे हसन (अ.स.) हुसैन (अ.स.) यह कहा था कि तेरे बेटों को मैं हसनैन के ग़ुलाम क़म्बर के बराबर भी नहीं समझता। मोतावक्किल ने उनकी ज़बान गुद्दी से खिचवा ली थी , मोतावक्किल की जि़न्दगी का एक बदतरीन और सियाह ज़माना आले मौहम्मद स. की क़ब्रों को मिसमार करना है। इसके आम हालात यह हैं कि यह बड़ा ज़ालिम दाएम उल ख़ुम्र और अय्याश बादशह था। इसकी चार हज़ार कनीज़ें थीं। इन सब से मुजामेअत कर चुका था। इसके दरबार में हज़ल और मसख़्रा पन बहुत होता था , जो तमसखुर में बढ़ कर होता वही इसका ज़्यादा क़रीब होता था। वह महफि़ले बज़म में मुसाहेबों और नदीमों के साथ तकलीफ़ और ख़ुश तबइयां करता था , कभी मजलिस में शेर को छुड़ा देता था , कभी किसी की आस्तीन में सांप छोड़ देता था , जब वह काटता तो तरयाक़ से मदावा करता कभी मटकों मे बिच्छू भरवा कर उन्हें मजलिस में तुड़वा देता था , वह मजलिस में फैल जाते किसी को हरकत करने का यारा न होता। उसने एक फ़रमान की रू से मज़हब मोताजि़ला को खिलाफ़े हुकूमत क़रार दिया था। मोताजि़लयों को सरकारी ओहदों से माज़ूल कर दिया था। अली (अ.स.) और औलादे अली (अ.स.) से दुश्मनी रखता था।

स्यूती लिखता है कि मुतावक्किल नासबी था। अली (अ.स.) और औलादे नबी स. का दुश्मन था। साहबे गुलज़ार शाही लिखते हैं कि इसके वक़्त में सादात बेचारे मुसीबत के मारे जिला वतन हो गये। करबला के रौज़े जो उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ ने बनवाये थे और उन रोज़ों के गिर्द के मकानात उसने मिसमार करवा दिये और लोगों को जि़यारत से मना किया। साहबे हबीब अस सियर लिखते हैं कि 236 हिजरी में मुतावक्किल ने हुक्म दिया कि कोई मज़ारे हैदरे करार और उनकी औलाद की ज़्यारत को न जाया करें और हुक्म दिया कि इमाम हुसैन (अ.स.) और शोहदाए करबला के रौज़े को हमवार कर के उन पर ज़राअत के लिये पानी छोड़ दें और तारीख़ गुज़ीदा और तारीख़े कामिल में है कि मुतावक्किल ने हुक्म दिया कि इमाम हुसैन (अ.स.) के मज़ार और उसके गिर्द के मकानात वगै़रह मुन्हदिम कर के वहां ज़राअत की जाए और लोगों को उस मक़ाम तक जाने की मुमानीयत कर के यह मुनादी करा दी कि जो शख़्स वहां दिखाई देगा वह क़ैद किया जायेगा। तवारीख़ में है कि हर चन्द फ़रमा बरों ने कोशिश की मगर पानी इमाम और तमाम शोहदा ए इतरते ताहेरा की क़ब्रों पर जारी न हुआ जिस से खि़लक़त को सख़्त हैरत हुई और उस वक़्त से और इसी सबब से उस मशहदे मुक़द्दस को हायर कहने लगे। मुतावक्किल की इस हरकत से मुसलमानों को सख़्त सदमा हुआ। अहले बग़दाद ने मस्जिदों और घरों की दिवारों पर उसे गालियां लिखी और हुजूमें अशआर कहे। इस बनी फ़ातेमा से बागे़ फि़दक भी छीन लिया था। ग़ैर मुस्लिमों को ओहदों से बरतरफ़ कर दिया था। नसारा को हुक्म दिया कि गले में जि़न्नार न बांधें , घोड़े पर सवार न हों , बल्कि गधे और खच्चर पर सवार हों और रक़ाबे काठ की रखें। 234 हिजरी में उसने तमाम मोहद्देसीन को सामर्रा में जमा किया और इनाम व इकराम दे कर हुक्म दिया कि सिफ़ात व रोयत व ख़ल्क़े क़ुरआन के मुताअल्लिक़ हदीसे बयान करें। चुनाचे इसी लिये अबू बर्क इब्ने शीबा को जामा मस्जिद रसाफ़ा में और उनके भाई उसमान को जामा मन्सूर में मुक़र्रर किया। इन दोनों के वाज़ में हर रोज़ क़रीब हज़ार आदमी जमा होते थे। सियूती लिखता है कि मोतावक्किल वह पहला ख़लीफ़ा है जिसने शाफ़ेई मज़हब इख़्तेयार किया। मोतावक्किल के ज़माने में बड़ी बड़ी आफ़तें नाजि़ल हुईं। बहुत से इलाक़ों मे ज़लज़ले आए , ज़मीनें दस गईं , आग लगीं , आसमान से हौलनाक अवाज़ें सुनाई दीं। बादे समूम से बहुत से आदमीं और जानवर हलाक हुए। आसमान से मिसले टिडडियों के तारे टूटे। दस दस रतल के पत्थर आसमान से बरसे।

(तारीख़े इस्लाम जिल्द 1 सफ़ा 65 )

मक़ामे ज़खार मे है कि मुतावक्किल चुंकि हज़रत अली (अ.स.) से दुश्मनी रखता था इसका मुस्तकि़ल रवय्या यह था कि वह ऐसे लोगों को अपने पास रखता था जो अमीरूल मोमिनीन से बुग़्ज़ व अनाद रखते थे और उनकी तौहीन में बसर्रत महसूस करते थे। जैसे इब्ने जहम शायर , उमर बिन फर्जरहजी अबू अलहज़ इब्ने अतरजा , अबू अल अबर यह लोग मोतावक्किल को हमेशा औलादे अली के क़त्ल की तरफ़ मोतावज्जा करते थे और इससे कहते थे कि अगर तूने उन्हें बाक़ी रहने दिया तो यह एक न एक दिन तेरी सलतनत पर क़ब्ज़ा कर लेगें। इन लोगों के हर वक़्त उभारने का नतीजा यह हुआ कि दिल में आले मौहम्मद स. की दुश्मनी पूरी तरह क़ाएम हो गई। वह चुंकि गाने वाली औरतों का शायक़ था लेहाज़ा उसने शराब पीने के बाद एक ऐसी औरत को तलब किया जिससे वह बहुत ज़्यादा मानूस था। लोगों ने कहा कि दूसरी औरतें हाजि़र हैं इनसे काम निकाला जाए वह आ जाएगी। चुनान्चे ऐसा ही हुआ। जब वह थोड़ी देर बाद पहुंची तो बादशाह ने पूछा कि कहां गई थीं ? उसने कहा मैं हज करने गई थी। मोतावक्किल ने कहा माहे शाबान में कौन हज करता है। सच बता ? इसने जवाब दियाः इमाम हुसैन (अ.स.) की जि़यारत के लिये चन्द औरतों के हमराह चली गई थी। यह सुन कर मोतावक्किल बहुत ग़ज़ब नाक हुआ और उसे क़ैद करा दिया। इसका तमाम माल असबाब ज़ब्त कर लिया और लोगों को ज़ियारते करबला से रोक दिया और तीन रोज़ के बाद मनादी कर दी कि जो शख़्स हुसैन (अ.स.) की ज़्यारत को जायेगा क़ैद किया जायेगा और हर तरफ़ एक एक मील के फ़ासले से पहरे बिठा दिये कि जो शख़्स ज़्यारत को जाता हुआ पाया जाऐ फौरन क़ैद में भैज दिया जाए। फिर एक नौ मुस्लिम यहूदी जिसका नाम वैरिज था को हुक्म दिया कि करबला जा कर हुसैन (अ.स.) की क़ब्र का निशान मिटा दे और उस जगह को जुतवा कर वहां खेत बनवा दे और ज़रीह को किसी तरह फिकवा दे। हुक्म पाते ही नौ मुस्लिम यहूदी जिसे इस्लाम और इस्लाम के बानीयों का सही ताअर्रूफ़ भी न था तामील के लिया रवाना हो गया और वहां पहुंच कर दो सौ जरीब ज़मीन उसने जुत्वा डाली। जब क़ब्रे मुनव्वरा इमाम हुसैन (अ.स.) को जोतने के लिये आगे बढ़ा तो मुसलमानों ने तामीले हुक्म से इनकार कर दिया और कहा कि यह फ़रज़न्दे रसूल स. हैं और शहीद हैं। क़ुरान मजीद इन्हें जि़न्दा बताता है हम हरगजि़ ऐसी नाजायज़ हरकत नहीं कर सकते। यह सुन कर विरज ने यहूदियों से मदद ली , मगर कामयाब न हुआ। उसके बाद नहर काट कर क़ब्रे मुनव्वरा को ज़ेरे आब करना चाहा। पानी नहर में चल कर जब क़ब्र के क़रीब पहुंचा तो उस पर रवां न हुआ बल्कि इसके इर्द गिर्द जारी हो गया। क़ब्रे मुबराक ख़ुश्क ही रही। इस यहूदी ने बड़ी कोशिश की , लेकिन कामयाबी हासिल न कर सका। वह ज़मीन जहां तक पानी फैला हुआ था उसे हाएर कहते हैं। किताबे तस्वीरे अज़ा में ब हवाले किताब सराएर मरक़ूम है इस ज़मीन को हाएर इस सबब से कहते हैं कि लुग़ते अरब में हाएर के मानी ज़मीन पस्त के हैं। इस जगह बहता हुआ पानी पहुंच कर साकिन और हैरान हो जाता है क्योंकि बहने का रास्ता नहीं पाता।

शैख़ शहीद अलैहा रहमता का कहना है कि ज़माना ए मोतावक्किल में चुकि आपकी क़ब्र के निशान को मिटाने के लिये पानी जारी किया गया था और वहां पहुंच कर ब एजाज़े हुसैनी हैरान रह गया था और उस पर जारी नहीं हो सका इस लिये इस मुक़ाम को जिसमें पानी ठहरा हुआ था हाएर कहते हैं। स्यूती तारीख़ अल ख़ुलफ़ा में लिखता है कि यह वाकि़या इन्हेदामे क़ब्रे इमाम हुसैन (अ.स.) 236 हिजरी का है उसने हुक्म दिया था कि इमाम हुसैन (अ.स.) की क़ब्र ढा दी जाए और निशाने क़ब्र मिटा दिया जाए और उनके मज़ार के इर्द गिर्द जितने मकानात हैं उन्हें भी मिस्मार कर के उस मुक़ाम को एक सहरा की शक्ल दे दी जाए और वहां पर खेती की जाए और लागों को ज़ियारते इमाम हुसैन (अ.स.) से क़तअन रोक दिया। इसके बाद स्यूती लिखता है मुतावक्किल बड़ा नासबी था उसके इस फ़ेल से मुसलमानों में सख़्त हैजान पैदा हो गया और लागों ने उसकी हजो की और दीवारों पर इसके लिये गालियां लिखीं यही कुछ किताब हबीब उस सियर तारीख़े इस्लाम , तारीख़े कामिल , जिलाउल उयून , क़ुम क़ाम ज़खारे , अमाली शैख़ तूसी वग़ैरा में है।

अल्लामा स्यूती लिखते हैं कि इस मौक़े पर जिन बहुत से शायरो ने अशआर लिखे उनमे से एक शायर ने कई शेर कहें हैं जिनका तरजुमा यह है।

1. ख़ुदा की क़सम बनी उमय्या ने अपने नबी के नवासे को करबला में भूखा और प्यासा ज़ुल्मो जौर के साथ क़त्ल कर दिया।

2. तो बनी अब्बास जो रसूल के चचा की औलाद हैं उन्होंने भी उन पर ज़ुल्म में कमी नही की और उनकी क़ब्र खुदवा कर उसी कि़स्म के ज़ुल्म का इरतेक़ाब किया है।

3. बनी अब्बास को इस कि़स्म का सदमा था कि वह क़त्ले हुसैन (अ.स.) में शरीक न हो सके तो उन्होंने इस सदमें की आग को बुझाने के लिये हज़रत की हडडियों पर धावा बोल दिया।

(तारीख़ अल ख़ुलफ़ा सफ़ा 237 )

अमाली शैख़ तूसी में है कि मुतावक्किल का फि़रस्तादा वह जब जि़यारत से मना करने के लिये करबला पहुंचा तो वहां के लोगों ने ज़्यारत न करने से साफ़ इन्कार कर दिया और कहा कि अगर मोतावक्किल सब को क़त्ल कर दे तब ही यह सिलसिला बन्द हो सकता है। उसने वापस जाकर मुतावक्किल से वाकि़या बयान किया तो 247 हिजरी तक के लिये ख़ामोश हो गया।

तवारीख़ में है कि ख़लीफ़ा के हुक्म के मुताबिक़ अमीरे फ़ौज ने करबला वालों को ज़ियारते इमाम हुसैन (अ.स.) करने से रोकना चाहा तो उन लोगों ने फ़ौज से मरऊब होने के बजाए मुक़ाबले का प्रोग्राम बना लिया और अपनी जानों पर खेल कर अतराफ़ व जवानिब से दस हज़ार अफ़राद जमा कर लिये और सरकारी फ़ौज के बिल मुक़ाबिल आकर कहा कि अगर मुतावक्किल हम में से एक एक को क़त्ल कर डाले तब भी यह सिलसिला बन्द न होगा। हमारी औलादें हमारी नस्लें इस सुन्नते ज़्यारत को अदा करेगी। सुनों हमारे आबाओ अजदाद वही करते चले आए जो हम कर रहे हैं और हमारे अबनाये वाहेफ़ा वही करेंगे जो हम कर रहे हैं , बेहतर होगा कि तुम हमें बाज़ रखने की कोशिश न करो और मुतावक्किल से कह दो कि वह शराब के नशे में ऐसी हरकतें न करे और अपने फ़ैसले पर नज़र सानी कर के हुक्म वापस ले ले। अमीरे फ़ौज वापस गया और उसने सारी दास्तान मुतावक्किन के सामने दोहर दी। मुतावक्किल चुंकि उन दिनों सामरा की तमकील में मशग़ूल था। इसने मन्सूर दवानक़ी की तरह तक़रीबन दस साल ख़ामोश रहा। यानी मन्सूर दवानक़ी जो तामीरे बग़दाद की वजह से दस साल तक इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की तरफ़ मुतावज्जक न हो सका। मुतावक्किल भी सामरा की वजह से तक़रीबन इतनी ही मुद्दत के लिये ख़ामोश हो गया। इमाम शिबलन्जी लिखते हैं कि सामरा एक ज़बरदस्त शहर है जो दजला के मशरिक़ मे तकरीयत और बग़दाद के दरमियान वाक़े हैं इसकी बुनियाद 221 हि. में मोतासिम अब्बासी ने डाली थी और मुद्दतों इसकी तकमील का सिलसिला जारी रहा।

(नुरूल अबसार सफ़ा 149 व तारीख़ किरमानी क़लमी)

इमाम अली नक़ी (अ.स.) की मदीने से सामरा तलबी

हुकूमत की तरफ़ से इमाम अली नक़ी (अ.स.) की मदीने से सामरा में तलबी और रास्ते का अहम वाकि़या

मोतावक्किल 232 हिजरी में ख़लीफ़ा हुआ और उसने 236 हिजरी में इमाम हुसैन (अ.स.) की क़ब्र के साथ पहली बार बेअदबी की लेकिन उसमें पूरी कामयाबी न हासिल होने पर अपने फि़तरी बुग़ज़ की वजह से जो आले मौहम्मद स. के साथ था वह हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) की तरफ़ मुतावज्जा हुआ। मुतावक्किल 243 हिजरी मे इमाम नक़ी (अ.स.) को सताने की तरफ़ मुतावज्जे हुआ और इसने हाकिमे मदीना अब्दुल्ला बिन मौहम्मद को ख़ुफि़या हुक्म दे कर भेजा कि फ़रज़न्दे रसूल इमाम अली नक़ी (अ.स.) को सताने में कोई दक़ीक़ा फ़रो गुज़ाश्त न करे। चुनान्चे इसने हुकूमत के मन्शा के मुताबिक़ पूरी तवज्जा और पूरे इन्हेमाक के साथ अपना काम शुरू कर दिया। ख़ुद जिस क़दर सता सका उसने सताया और आपके खि़लाफ़ रिकार्ड के लिये मोतावक्किल को शिकायत भेजनी शुरू की।

अल्लामा शिबलन्जी लिखते हैं कि इमाम अली नक़ी (अ.स.) को यह मालूम हो गया कि हाकिमे मदीना ने आपके खि़लाफ़ रेशा दवानाइयां शुरू कर दी हैं और इस सिलसिले में इसने मोतावक्किल को आपकी शिकायत भेजनी शुरू कर दी हैं तो आपने भी एक तफ़सीली ख़त लिखा जिसमें हाकिमें मदीना की बे एतिदाली और ज़ुल्म आफ़रीनी का ख़ास तौर से जि़क्र किया। मोतावक्किल ने आपका ख़त पढ़ कर आपको इसके जवाब में लिखा के आप हमारे पास चले आएं। इसमें हाकिमें मदीना के अमल की माज़ेरत भी थी , यानी जो कुछ वह कर रहा है अच्छा नहीं करता , हम इसकी तरफ़ से माज़ेरत ख्वाह हैं मतलब यह था कि इसी बहाने से उन्हें सामरा बुला लें। ख़त मे उसने इतना नरम लहजा इख़्तेयार किया था जो एक बादशाह की तरफ़ से नहीं हुआ करता , यह सब हीला साज़ी थी और ग़रज़ महज़ यह थी कि आप मदीना छोड़ कर सामरा पहुंच जायें।

(नुरूल अबसार सफ़ा 149 )

अल्लामा मजलिसी तहरीर फ़रमाते हैं कि मुतावक्किल ने यह भी लिखा था कि मैं आपकी ख़ातिर से अब्दुल्ला इब्ने मौहम्मद को माजूल कर के इसकी जगह पर मौहम्मद बिन फ़ज़ल को मुक़र्रर कर रहा हूं।

(जिलाउल उयून सफ़ा 292 )

अल्लामा अरबली लिखते हैं कि मुतावक्किल ने सिर्फ़ यही नही किया कि अली नक़ी (अ.स.) को ख़त लिखा हो कि आप सामरा चले आइये बल्कि इसने तीन सौ का लश्कर यहिया इब्ने हरसमा की क़यादत में मदीना भेज कर उन्हें बुलाना चाहा यहिया इब्ने हरसमा का बयान है कि मैं हुक्मे मुतावक्किल पा कर इमाम (अ.स.) को लाने के लिये ब इरादा मदीना मुनव्वरा रवाना हो गया , मेरे हमराह तीन सौ का लश्कर था और इसमें एक कातिब भी था जो इमामिया मज़हब रखता था। हम लोग अपने रास्ते पर जा रहे थे और इस कोशिश में थे कि किसी तरह जल्द से जल्द मदीना पहुंच कर इमाम (अ.स.) को ले आऐ और मुतावक्किल के सामने पेश करें। हमराह जो एक शिया कातिब था उससे एक लश्कर के अफ़सर से रास्ते भर मज़हबी मनाज़रा होता रहा। यहां तक कि हम लोग एक अज़ीमुश्शान वादी में पहुंचे , जिसके इर्द गिर्द मीलों कोई आबादी न थी और वह ऐसी जगह थी जहां से इन्सान का मुश्किल से गुज़र होता था बिल्कुल जंगल और खुश्क सहरा था। जब हमारा लश्कर वहां पहुंचा तो उस अफ़सर ने जिसका नाम शादी था और जो कातिब से मनाज़रा करता चला आ रहा था। कहने लगा ऐ कातिब तुम्हारे इमाम हज़रत अली (अ.स.) का यह क़ौल है कि दुनिया की कोई ऐसी वादी न होगी जिसमें क़ब्र न हो या अनक़रीब क़ब्र न बन जाए। कातिब ने कहा बेशक हमारे इमाम (अ.स.) ग़ालिब कुल्ले ग़ालिब का यही इरशाद है। इसने कहाः बताओ इस ज़मीन पर किस की क़ब्र है ? या किस की क़ब्र बन सकती है। तुम्हारे इमाम यूं ही की दिया करते हैं। इब्ने हरसमा का कहना है कि मैं चूंकि हश्वी ख़्याल का था लेहाज़ा जब यह बातें हमने सुनीं तो हम सब हंस पड़े और कातिब शर्मिन्दा हो गया। ग़रज़ कि लश्कर बढ़ता रहा और उसी दिन मदीना पहुंच गया। वारिदे मदीना होने के बाद मैंने मुतावक्किल का ख़त इमाम अली नक़ी (अ.स.) की खि़दमत में पेश किया। इमाम (अ.स.) उसे मुलाहेज़ा फ़रमा कर लश्कर पर नज़र डाली और समझ गये कि दाल में कुछ काला है। आपने फ़रमाया ऐ इब्ने हरसमा चलने को तैय्यार हूं लेकिन एक दो रोज़ की मोहलस ज़रूरी है। मैंने अर्ज़ कि हुज़ूर ख़ुशी से जब हुक्म हो फ़रमायें मैं हाजि़र हो जाऊं और रवानगी हो जाए। इब्ने हरसमा का बयान है कि इमाम (अ.स.) ने मेरे सामने मुलाज़ेमीन को से कहा कि दरज़ी को बुला दो और उससे कहो कि मुझे सामरा जाना है लेहाज़ा रास्ते के लिये गर्म कपड़े टोपियां जल्दी से तैय्यार कर दे। मैं वहां से रूख़सत हो कर अपने क़याम गाह पर पहुंचा और रास्ते भर यह सोचता रहा कि इमामीया कैसे बेवकूफ़ हैं कि एक शख़्स को इमाम मानते हैं जिसे माज़ा अल्लाह यह तक तमीज़ नहीं है कि यह गर्मी का ज़माना है या जाड़े का। इतनी शदीद गर्मी में जाड़े के कपड़े सिलवा रहे हैं और उसे हमराह ले जाना चाहते हैं। अलग़रज़ मैं दूसरे दिन इनकी खि़दमत में हाजि़र हुआ तो देखा कि जाड़े के बहुत से कपड़े सिले हुए रखे हैं और आप सामाने सफ़र दुरूस्त फ़रमा रहे हैं और आप अपने मुलाज़ेमीन से कहते जाते हैं देखो कुलाह बारानी और बरसाती वग़ैरा रहने न पाए। सब साथ मे बांध दो। इसके बाद मुझे कहा ऐ याहिया इब्ने हरसमा जाओ तुम भी अपना सामान दुरूस्त करो ताकि मुनासिब वक़्त में रवांगी हो जाए। मैं वहां से निहायत बद दिल वापस आया। दिल में सोचता था कि उन्हें क्या हो गया कि इस शदीद गर्मी के ज़माने में सर्दी और बरसात का सामान हमराह ले रहे हैं और मुझे भी हुक्म देते हैं कि तुम भी इस कि़स्म के सामान हमराह ले लो। मुख़्तसर यह कि सामाने सफ़र दुरूस्त हो गया और रवानगी हो गई। मेरा लश्कर इमाम (अ.स.) को घेरे में लिए हुए जा रहा था कि नागाह इसी वादी में जा पहुंचे , जिसके मुतअल्लिक़ कातिब इमामिया और अफ़सर शाही में यह गुफ़तगू हुई थी कि यहां पर किसकी क़ब्र है या होगी। इस वादी में पहुंचना था कि क़यामत आ गई , बादल गरजने लगे , बिजली चमकने लगी और दोपहर के वक़्त इस क़दर तारीकी छाई कि एक दूसरे को देख न सकता था , यहां तक कि बारिश शुरू हुई और ऐसी मुसलाधार बारिश हुई कि उमर भर न देखी थी इमाम (अ.स.) ने आसार के पैदा होते ही मुलाज़मीन को हुक्म दिया कि बरसाती और बारानी टोपीयां पहन लो और एक बरसाती याहिया इब्ने हरसमा और एक कातिब को दे दो। ग़रज़ कि खूब बारिश हुई हवा इतनी ठन्डी चली कि जान के लाले पड़ गए। जब बारिश थमी और और बादल छटे तो मैंने देखा कि अस्सी अफ़राद मेरी फ़ौज के हलाक हो गऐं हैं। इमाम (अ.स.) ने फ़रमाया कि ऐ याहिया इब्ने हरसमा अपने मुर्दो को दफ़न करो और यह जान लो कि ख़ुदाए ताला हम चुनी पुरमी गिरवान्द बक़ा राज़ेक़बूर इस तरह ख़ुदा वन्दे आलम हर बुक़्क़ाए अर्ज़ को क़ब्रों से पुर करता है , इसी लिए मेरे जद नामदार हज़रत अली (अ.स.) ने इरशाद फ़रमाया है कि ज़मीन का काई टुकड़ा ऐसा न होगा जिसमें कब़्र न बनी हो। ‘‘यह सुन कर मैं अपने घोड़े से उतर पड़ा और इमाम (अ.स.) के क़रीब जा कर पा बोस हुआ और उनकी खि़दमत मे अर्ज़ की मौला मैं आज आपके सामने मुसलमान होता हुँ यह कह कर मैंने इस तरह कलमा पढ़ा अशअदो अन ला इलाहा इल्ल्लाह व अशअदो अन मौहम्मद अबदहू व इनकुम ख़ुलाफ़ा अला फ़ीअर हैना ’’ और यक़ीन कर लिया कि यही हज़रत ख़ुदा की ज़मीन पर ख़लीफ़ा हैं और दिल में सोचने लगा कि अगर इमाम (अ.स.) ने जाड़े और बरसात का सामान न लिया होता और अगर मुझे न दिया होता तो मेरा क्या हशर होता। फिर वहां से रवाना हो कर अस्कर पहुंचा और आपकी इमामत का क़ाएल रह कर जि़न्दा रहा और ताहयात आपके जद्दे नामदार का कलमा पढ़ता रहा।

(कशफ़ुल ग़म्मा सफ़ा 124 )

अल्लामा जामी और अल्लामा शिब्लन्जी लिखते हैं कि दो सौ से ज़ाएद अफ़राद आपको अपने घेरे में लिये हुए सामरा पहुंचे। वहां आपके क़याम का कोई इन्तेज़ाम नहीं किया गया था और हुक्म था कि मुतावक्किल का कि इन्हें फ़क़ीरो के ठहराने की जगह उतारा जाए चुनान्चे आपको ख़नुल सालेआ में उतारा गया वह जगह बदतरीन थी वहां शुरफ़ा नही जाया करते थे। एक दिन सालेहा बिन सईद नामी एक शख़ जो आपके मानने वाले थे आपकी खि़दमत में हाजि़र हुए और कहने लगे मौला यह लोग आपकी क़दरो मन्जि़लत पर पर्दा डाल रहे हैं और नूरे ख़ुदा को छुपाने की किस क़दर कोशिश करते हैं कहा हुज़ूर की ज़ाते अक़दस और कहा यह क़याम गाह। हज़रत ने फ़रमायाः ऐ सालेह तुम दिल तंग न हो मैं उसकी इज़्ज़त अफ़ज़ाई का ख़्वाहां और उनकी करम गुस्तरी का जोया हूं , ख़ुदा वन्दे आलम ने आले मौहम्मद स. को जो दर्जा दिया है और जो मुक़ाम अता फ़रमाया है उसे कोई छीन नहीं सकता। ऐ सालेह बिन सईद मैं तुम्हे ख़ुश करने के लिये बताना चाहता हूं कि तुम मुझे इस मुक़ाम पर देख कर परेशान न हो ख़ुदा वन्दे आलम ने यहां भी मेरे लिये बेहिश्त जैसा बन्दो बस्त फ़रमाया है यह कह कर आपने उंगली से इशारा किया और सालेह की नज़र में बेहतरीन बाग़ बेहतरीन नहर वगै़रह नज़र आने लगीं। सालेह का बयान है कि यह देख कर मुझे क़दरे तसल्ली हो गई।

(शवाहेदुन नबूअत सफ़ा 208, नूरूल अबसार सफ़ा 150 )

इमाम अली नक़ी (अ.स.) की नज़र बन्दी

इमाम अली नक़ी (अ.स.) को धोके से बुलाने के बाद पहले तो ख़ान अल सआलेक में फिर इसके बाद एक दूसरे मक़ाम में आपको नज़र बन्द कर दिया और ताहयात इसी में क़ैद रखा। इमाम शिब्लन्जी लिखते हैं कि मुतावक्किल आपके साथ ज़ाहिर दारी ज़रूर करता था , लेकिन आपका सख़्त दुश्मन था। उसने हीला साज़ी और धोका बाज़ी से आपको बुलाया और दरपर्दा सताने और तबाह करने और मुसीबतों में मुबतिला करने की कोशिश करता रहा।

(नूरूल अबसार सफ़ा 150 )

अल्लामा इब्ने हजर मक्की लिखते हैं कि मुतावक्किल ने आपको जबरन बुला कर सामरा मे नज़र बन्द कर दिया और ता जि़न्दगी बाहर न निकलने दिया।

(सवाएक़े मोहर्रेक़ा सफ़ा 124 )


इमाम अली नक़ी (अ.स.) का जज़बा ए हमदर्दी

मदीने से सामरा पहुंचने के बाद भी आपको पास लागों की आमद का तांता बंधा रहा। लोग आपसे फ़ायदे उठाते और दीनी और दुनियावी उमूर में आपसे मदद चाहते रहे और आप हल्ले मुश्किल में उनके काम आते रहे। उलमाए इस्लाम लिखते हैं कि सामरा पहुंचने के बाद जब आपकी नज़र बन्दी मे सख़्ती और शिद्दत न थी , एक दिन आप सामरा के एक क़रये में तशरीफ़ ले गये। आपके जाने के बाद एक साएल आपके मकान पर आया , उसे यह मालूम हुआ कि आप फ़लां गांव में तशरीफ़ ले गए हैं , वह वहां चला गया और जाकर आपसे मिला। आपने पूछा कि तुम कैसे आए हो। तुम्हारा क्या काम है ? उसने अर्ज़ कि मौला ग़रीब आदमी हूं। मुझ पर दस हज़ार दिरहम क़र्ज़ हो गया है और इसकी अदाएगी की कोई सबील नहीं। मौला ख़ुदा के लिये मुझे इस बला से निजात दिलाईये। हज़रत ने फ़रमाया घबराओ नहीं। इन्शाअल्लाह तुम्हारे क़र्ज़ की अदाएगी का बन्दो बस्त हो जाएगा। वह साएल रात को आपके हमराह मुक़ीम रहा , सुबह के वक़्त आपने इस से कहा कि मैं तुम्हे जो कहूं उसकी तामील करना और देखो इस अमर में ज़रा भी मुख़लेफ़त न करना , उसने तामीले इरशाद का वादा किया। आपने उसे एक ख़त लिख कर दिया जिसमें यह मरक़ूम था कि ‘‘ मैं दस हज़ार दिरहम इसके अदा कर दूंगा और फ़रमाया कि कल मैं सामरा पहुंच जाऊंगा जिस वक़्त मैं वहां कें बड़े बड़े लोगो के दरमियान बैठा हूं तो तुम मुझसे रूपयां का तक़ाज़ा करना उसने अर्ज़ कि हुज़ूर यह क्यों कर हो सकता है कि मैं लोगो में आपकी तौहीन करूं। हज़रत ने फ़रमाया कोई हर्ज नहीं मैं तुमसे जो कहूं वह करो। ग़रज़ कि साएल चला गया और जब आप सामरा वापस हुए और लोगो को आपकी वापसी की इत्तेला मिली तो आयाने शहर आपसे मिलने आए। जिस वक़्त आप लोगों से महवे मुलाक़ात थे साएल मज़कूर भी पहुंच गया साएल ने हिदायत के मुताबिक़ आपसे रक़म का तक़ाज़ा किया। आपने बहुत नरमी से उसे टालने की कोशिश की , लेकिन वह न टला और ब दस्तूर रक़म मांगता रहा। बिल आखि़र हज़रत ने उसे तीन दिन में अदाएगी का वादा फ़रमाया और वह चला गया। यह ख़बर जब बादशाहे वक़्त को पहुंची तो उसने मुबलिग़ तीस हज़ार दिरहम आपकी खि़दमत में भेज दिये तीसरे दिन जब साएल आया तो आपने उससे फ़रमाया कि यह तीस हज़ार दिरहम ल ले और अपनी राह लग। उसने अर्ज़ कि मौला मेरा क़र्ज़ तो सिर्फ़ दस हज़ार है आप तीस हज़ार दे रहे हैं। आपने फ़रमाया जो क़र्ज़ की अदाएगी से बचे उसे अपने बच्चों पर सर्फ़ करना। वह बहुत ख़ुश हुआ और यह पढ़ता हुआ कि ख़ुदा ही ख़ूब जानता है कि रिसालत व अमानत का कोई अहल है। अपने घर चला गया।

(नूरूल अबसार सफ़ा 149, सवाएक़े मोहर्रेक़ा सफ़ा 123, शवाहेदुन नबूवत सफ़ा 207 अरजहुल मतालिब सफ़ा 461 )

इमाम अली नक़ी (अ.स.) की हालत सामरा पहुंचने के बाद

मुतावक्किल की नीयत ख़राब थी ही इमाम अली (अ.स.) के सामराह पहुचने के बाद उसने अपनी नीयत का मुज़ाहरा अमल से शुरु किया और आपके साथ न मुनासिब तरीक़ों से दिल का बुख़ार निकालने की तरफ़ मुतावज्जा हुआ लेकिन अल्लाह जिसकी लाठी में आवाज़ नहीं उसने उसे कैफ़रे किरदार तक पहुंचा दिया मगर इसकी जि़न्दगी में भी ऐसे असार और असरात ज़ाहिर किए जिससे वह भी जान ले कि वह जो कुछ कर रहा था ख़ुदावन्द उसे पसन्द नहीं करता।

मुवर्रिख़ अज़ीम लिखते हैं कि मुतावक्किल के ज़माने में बड़ी आफ़तें नाजि़ल हुईं बहुत से इलाक़ों में ज़लज़ले आए , ज़मीने धस गईं , आगें लगीं , आसमान से हौलनांक आवाज़ें सुनाई दीं। बादे समूम से बहुत से जानवर और आदमी हलाक हुए। आसमान से मिस्ल टिड्डी के कसरत से सितारे टूटे , दस दस रसल के पत्थर आसमान से बरसे। रमज़ान 243 हिजरी में हलब से एक परिन्दा कौवे से बड़ा आ कर बैठा और वह शोर मचाया ‘‘या अय्योहन नास इत्तक़ूल्लाह ’’ चालीस दफ़ा यह आवाज़ लगा कर उड़ गया दो दिन ऐसा ही हुआ।

(तारीख़े इस्लाम जिल्द 1 सफ़ा 65 )

हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) और सवारी की तेज़रफ़्तारी

अल्लामा तबरसी लिखते हैं कि हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) के मदीने से सामरा तशरीफ़ ले जाने के बाद एक दिन अबू हाशिम ने कहाः मौला मेरा दिल नहीं मानता कि मैं एक दिन भी आपकी जियारत से महरूम हूं , बल्कि जी चाहता है कि हर रोज़ आपकी खि़दमत में हाजि़र हुआ करूं। हज़रत ने पूछा इसके लिए तुम्हें कौन सी रूकावट है ? उन्होने अर्ज़ की मेरा क़याम बग़दाद है और मेरी सवारी कमज़ोर है। हज़रत ने फ़रमायाः जाओ अब तुम्हारी सवारी का जानवर ताक़तवर हो जाऐगा और इसकी रफ़्तार बहुत तेज़ हो जाएगी। अबू हाशिम का बयान है कि हज़रत के इस इरशाद के बाद से ऐसा हो गया कि मैं रोज़ाना नमाज़े सुब्ह व नमाज़े ज़ोहर सामरा के असकर महल्ले में और नमाज़े मग़रिब इशा बग़दाद में पढ़ने लगा।

(आलामुलवुरा सफ़ा 208 )

दो माह पहले पहले काज़ी की मौत की ख़बर

अल्लामा जामी रहमतुर अल्लाह तहरीर फ़रमाते हैं कि आप से एक मानने वाले ने अपनी तकलीफ़ बयान करते हुए बग़दाद के काज़ी शहर की शिकायत की और कहा कि मौला वह बड़ा ज़ालिम है हम लोगों को बेहद सताता है आपने फ़रमाया घबराओ नहीं वह दो माह बाद बग़दाद में न रहेगा। रावी का बयान है कि ज्योंही दो माद पूरे हुए काज़ी अपने मनसब से माज़ूल हो कर अपने घर बैठ गया।(शवाहेदुन नबूवा)

आपका एहतिराम जानवरों की नज़र में

अल्लामा मौसूफ़ यह भी लिखते हैं कि मुतावक्किल के मकान में बहुत सी बतख़े पली हुईं थीं जब कोई वहां जाता तो वह इतना शोर मचाया करती थीं कि कान पड़े बात सुनाई न देती थी लेकिन जब इमाम (अ.स.) तशरीफ़ ले जाते थे तो वह सब ख़ामोश हो जाती थीं और जब तक आप वहां तशरीफ़ रखते थे , वह चुप रहती थीं।

(शवाहेदुन नबूअत सफ़ा 209 )

हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) और ख़्वाब की अमली ताबीर

अहमद बिन ईसा अल कातिब का बयान है कि मैंने एक शब ख़्वाब में देखा कि हज़रत मौहम्मद मुस्तफ़ा स. तशरीफ़ फ़रमा हैं और मैं उनकी खि़दमत में हाजि़र हूं। हज़रत ने मेरी तरफ़ नज़र उठा कर देखा और अपने दस्ते मुबारक से एक मुठ्ठी ख़ुरमा इस तश्त से अता फ़रमाया जो आपके सामने रखा हुआ था। मैंने उन्हें गिना तो वह पच्चीस थे। इस ख़्वाब को अभी ज़्यादा दिन न गुज़रे थे कि मुझे मालूम हुआ कि हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) सामरा तशरीफ़ लाए हैं। मैं उनकी ज़्यारत के लिए हाजि़र हुआ तो मैंने देखा कि उनके सामने एक तश्त रखा है जिसमें ख़ुरमें है। मैंने हज़रत को सलाम किया। हज़रत ने जवाबे सलाम देने के बाद एक मुठ्ठी ख़ुरमा मुझे अता फ़रमाया , मैंने इन ख़ुरमों का शुमार किया तो वह भी पच्चीस थे। मैंने अर्ज़ की मौला क्या कुछ ख़ुरमा और मिल सकता है ? जवाब में फ़रमाया ! अगर ख़्वाब में तुम्हें रसूले ख़ुदा स. ने इससे ज़्यादा दिया होता तो मैं भी इज़ाफ़ा कर देता। दमतुस् साकेबा जिल्द 3 सफ़ा 124 इसी कि़स्म का वाकि़या इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) और इमाम अली रज़ा (अ.स.) के लिए भी गुज़रा है।

हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) और फ़ुक़हाए मुस्लेमीन

यह तो मानी हुई बात है कि आले मौहम्मद स. ही वह है जिनके घर में क़ुरान मजीद नाजि़ल हुआ। इन से बेहतर न क़ुरान समझने वाला है और न उसकी तफ़्सीर जानने वाला है। उलमा का बयान है कि जब मोतावक्किल को ज़हर दिया गया तो उसने यह नज़र मानी कि अगर मैं अच्छा हो गया तो राहे ख़ुदा में माले कसीर दूगां। फिर सेहत पाने के बाद उसने अपने उल्माए इस्लाम को जमा किया और इनसे वाकि़या बयान कर के माले कसीर की तफ़्सीर मालूम करना चाही। इसके जवाब में हर एक ने अलाहेदा अलाहेदा बयान दिया एक फ़क़ीहे ने कहा माले क़सीर से एक हज़ार दिरहम दूसरे फ़क़ीह ने दस हज़ार दिरहम , तीसरे ने कहा एक लाख दिरहम मुराद लेना चाहिए। मोतावक्किल ने जब हर फ़क़ीह से अलाहेदा जवाब सुना तो तशवीश में पड़ गया और ग़ौर करने लगा कि अब क्या करना चाहिए। मुतावक्किल अभी सोच ही रहा था कि एक दरबान सामने आया जिसका नाम हसन था और अर्ज़ करने लगा कि हुज़ूर अगर मुझे हुक्म हो तो मैं इसका सही जवाब ला दूं। मुतावक्किल ने कहा बेहतर है जवाब लाओ अगर तुम सही जवाब लाए तो दस हज़ार दिरहम तुमको इनाम दूगां और अगर तसल्ली बख़्श जवाब न ला सके तो सौ कोड़े मारूगां। इसने कहा मुझे मन्ज़ूर हैं। इसके बाद दरबान हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) की खि़दमत में गया। इमाम (अ.स.) जो नज़र बन्द जि़न्दगी बसर कर रहे थे दरबान को देख कर बोले अच्छा अच्छा माले कसीर की तफ़्सीर पूछने आया है जा और मुतावक्किल से कह दे माले कसीर अस्सी दिरहम मुराद हैं दरबान ने मुतावक्किल से यही कह दिया। मुतावक्किल ने कहा जा कर दलील मालूम कर। वह वापस आया हज़रत ने फ़रमाया कि क़ुरान मजीद में आं हज़रत स. के लिए आया है कि लक़द नसरकुमुलिल्लाह फ़ी मवातिन कसीरतह ऐ रसूल अल्लाह स. ! ने तुम्हारी मद मवातिन कसीरह यानी बहुत से मुक़ामात पर की है जब हमने इन मुक़ामात का शुमार किया जिनमें ख़ुदा ने आपकी मद्द फ़रमाई है तो वह हिसाब से अस्सी होते हैं। मालूम हुआ की लफ़्ज़े कसीर का इतलाक़ अस्सी पर होता है। यह सुन कर मुतावक्किल ख़ुश हो गया और उसने अस्सी दिरहम सदक़ा निकाल कर दस हज़ार दिरहम दरबान को इनाम दिया।

(मनाकि़ब इब्ने शहरे आशोब जिल्द 5 सफ़ा 116 )

इसी कि़स्म का एक वाकि़या है कि मुतावक्किल के दरबार में एक नसरानी पेश किया गया जो मुसलमान औरत से जि़ना करता हुआ पकड़ा गया। जब वह दरबार में आया तो कहने लगा मुझ पर हद जारी न किया जाए। मैं इस वक़्त मुसलमान होता हूँ। यह सुन कर काज़ी यहिया बिन अक़सम ने कहा कि इसे छोड़ देना चाहिए क्योंकि यह मुसलमान हो गया है। एक फ़क़ीह ने कहा कि नहीं हद जारी होना चाहिए ग़रज़ कि फोक़हाए मुसलेमीन में इख़्तेलाफ़ हो गया। मुतावक्किल ने जब यह देखा कि मसला हल होता नज़र नहीं आता तो हुक्म दिया कि इमाम अली नक़ी (अ.स.) को ख़त लिख कर इनसे जवाब मगाया जाए। चुनान्चे मसला लिखा गया। हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) ने इसके जवाब में तहरीर फ़रमाया यज़रब हत्त यमूता कि उसे इतने मारना चाहिए कि मर जाए। जब यह जवाब मुतावक्किल के दरबार में पहुंचाया तो यहिया इब्ने अकसम क़ाज़ी शहर और फ़क़ीह सलतनत नीज़ दीगर फ़ुक़हा ने कहा इसका कोई सबूत क़ुरान मजीद में नहीं है बराए मेहरबानी इसकी वज़ाहत फ़रमायें। आपने ख़त मुलाहेज़ा फ़रमा कर एक आयत तहरीर फ़रमाई जिसका तरजुमा यह है। जब काफि़रों ने हमारी सख़्ती देखी तो कहा कि हम अल्लाह पर ईमान लाते हैं और अपने कुफ़्र से तौबा करते हैं यह उनका कहना उनके लिए मुफि़द न हुआ और न ईमान लाना काम आया आयत पढ़ने के बाद मुतावक्किल ने तमाम फ़ुक़हा के अक़वाल मुस्तरद कर दिए और नसरानी के लिए हुक्म दे दिया कि इस क़दर मारा जाए कि मर जाए।

(दमतुस साकेबा जिल्द 3 सफ़ा 120 )

शाहे रोम को हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) का जवाब

अल्लामा मौहम्मद बाक़र नजफ़ी लिखते है कि बादशाहे रोम ने ख़लीफ़ाए वक़्त को लिखा कि मैंने इन्जील में पढ़ा है कि जो शख़्स इस सूरे की तिलावत करे जिसमें यह सात लफ़्ज़ न हों 1. से 2. जीम 3. ख़े 4. ज़े 5. शीन 6. ज़ो 7. फ़े। वह जन्नत में जाएगा। इसे देखने के बाद मैंने तौरैत ज़बूर का अच्छी तरह मुतालेआ किया लेकिन इस कि़स्म का कोई सूरा इसमें नहीं मिला। आप ज़रा अपने उलमा से तहक़ीक़ कर के लिखये कि शायद यह बात आपके क़ुरान मजीद में हो। बादशाहे वक़्त ने बहुत से उलमा जमा किये और उनके सामने यह चीज़ पेश की सबने बहुत देर तक ग़ौर किया लेकिन कोई इस नतीजे पर न पहुंच सका कि तसल्ली बख़्श जवाब दे सके। जब ख़लीफ़ा ए वक़्त तमाम उलमा से मायूस हो गया तो इमाम अली नक़ी (अ.स.) की तरफ़ तवज्जा की। जब आप दरबार में तशरीफ़ लाए और आपके सामने मसला लाया गया तो आपने बिला ताख़ीर कहा , वह सूरा ए हम्द है। अब जो गौ़र किया गया तो बिल्कुल ठीक पाया गया। बादशाहे इस्लाम ख़लीफ़ा ए वक़्त ने अर्ज़ कि , यब्ना रसूल अल्लाह स. क्या अच्छा होता अगर आप इसकी वजह भी बताऐं कि यह हरूफ़ इस सूरा में क्यंों नहीं लाए गये। आपने फ़रमाया यह सूरा रहमत व बरकत का है इसमें यह हुरूफ़ इस लिए नहीं लाए गए कि से सबूर हलाकत तबाही , बरबादी की तरफ़ , जीम से जेहीम जहन्नम की तरफ़ ख़े ख़ैबत यानी ख़ुसरान की तरफ़ ज़े से ज़क़ूम यानी थोहड़ की तरफ़ शीन से शक़ावत की तरफ़ ज़ो ज़ुलमत की तरफ़ फ़े फ़ुरक़त की तरफ़ तबादरे ज़ेहनी होता है और यह तमाम चीज़ें रहमत व बरकत के मुनाफ़ी हैं। ख़लीफ़ा ए वक़्त ने आपका तफ़्सीली बयान शाहे रोम को भेज दिया। बादशाहे रोम ने ज्यांही उसे पढ़ा मसरूर हो गया और उसी वक़्त इस्लाम लाया और ता हयात मुसलमान रह।

(दमतुस साकेबा जिल्द 3 सफ़ा 140 ब हवाला शरा शाफ़या अबू फ़रास)

मुतावक्किल के कहने से इब्ने सकीत व इब्ने अकसम का इमाम अली नक़ी (अ.स.) से सवाल

उलमा का बयान है कि एक दिन मुतावक्किल अपने दरबार में बैठा हुआ था दीगर कामों से फ़राग़त के बाद इब्ने सकीत की तरफ़ मुतावज्जा हो कर बोला अबुल हसन से ज़रा सख्त सख्त सवाल करो , इब्ने सक़ीन ने क़ाबलीयत भर सवाल किए। इमाम (अ.स.) ने तमाम सवालात के मुफ़स्सल और मुकम्मल जवाब दिए। यह देख कर यहिया इब्ने अक़सम क़ाज़ी सलतनत ने कहा ऐ इब्ने सकीत तुम नहो शेर , लुग़द के आलिम हो , तुम्हें मनाज़रे से क्या दिलचस्पी , ठहरो मैं सवाल करता हूं। यह कह कर उसने एक सवाल नामा निकाला जो पहले से लिख कर अपने हमराह रखे हुए था और हज़रत को दे दिया। हज़रत ने इसका इसी वक़्त जवाब लिखना शुरू कर दिया कि क़ाज़ी शहर को मुतावक्किल से कहना पड़ा कि इन जवाबात को पोशीदा रखा जाए वरना शीयां की हौसला अफ़ज़ाई होगी। इन सवालात में एक सवाल यह भी था कि क़ुरान मजीद में सबता अलबहर और मानफ़दत कलमात अल्लाह जो हैं इसमें किन सात दरियाओं की तरफ़ इशारा है और कलमात अल्लाह से क्या मुराद है। आपने इसके जवाब में तहरीर फ़रमाया कि सात दरिया यह हैं 1 ऐन अलकिबरीयत 2 ऐन अलमैन 3 ऐन अलबरहूत 4 ऐन अलबतरया 5 ऐन अलसैदान 6 ऐन अल फ़रीक़ 7 ऐन अल याहुरान यह कलमात से हम मौहम्मद स. व आले मौहम्मद (अ.स.) मुराद हैं जिनके फ़ज़एल का एहसा न मुम्किन है।

(मनाक़िब जिल्द 5 सफ़ा 117 )

क़ज़ा व क़दर के मुताअल्लिक़ इमाम अली नक़ी (अ.स.) की रहबरी व रहनुमाई

क़ज़ा व क़दर के बारे में तक़रीबन तमाम फि़रक़े जादए ऐतिदाल से हटे हुए हैं इसकी वज़ाहत में कोई जब्र का क़ाएल नज़र नहीं आता है कोई मुतलक़न तफ़वीज़ पर ईमान रखता हुआ दिखाई देता है। हमारे इमाम अली नक़ी (अ.स.) अपने आबाओ अजदाद की तरह क़ज़ाओ क़दर की वज़ाहत इन लफ़्ज़ों में फ़रमाई हैः न इन्सान बिल्कुल मजबूर है न बिल्कुल आज़ाद है बल्कि दोनो हालातों के दरमियान है।

(दमतुस् साकेबा जिल्द 3 सफ़ा 134 )

मैं हज़रत का मतलब यह समझता हूं कि इन्सान असबाब व आमाल में बिल्कुल आज़ाद है और नतीजे की बरामदगी में ख़ुदा का मोहताज है।

उलमाए इमामिया की जि़म्मेदारीयों के मुतालिक़ हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) का इरशाद है

हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) ने इरशाद फ़रमाया है कि हमारे उलमा ग़ैबते क़ाएम आले मौहम्मद स. के ज़माने में मुहाफि़ज़े दीन और रहबरे इल्म व यक़ीन होंगे। इनकी मिसाल शियों के लिये बिल्कुल वैसी ही होगी जैसी कश्ती के लिए न ख़ुदा की होती है। वह हमारे ज़ईफ़ों को तसल्ली देंगे। वह अफ़जल उन नास और क़ाएदे मिल्लत होंगे।

(दमतुस् साकेबा जिल्द 2 सफ़ा 137 )

हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) की ख़ाना तलाशी

मुवर्रेख़ीन का बयान है कि 243 हिजरी में हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) सामरा पहुंच कर नज़र बन्द हो गए , लेकिन आपने इस हालत में भी फ़रीज़ाए इमामत अदा करने में ज़रा भी पसो पेश नहीं फ़रमाया और फ़रीज़ाए मन्सबी तबलीग़े दीने इस्लाम बराबर फ़रमाते रहे चूंकि आप फ़रज़न्दे रसूल स. और आलिमें अहले ज़माना थे इस लिए आपका विक़ार लोगों की निगाहों में रोज़ बरोज़ बढ़ता गया। आप लोगों को उसूले इस्लाम और इबादत की तालीम फ़रमाया करते थे और ख़ुद भी शबो रोज़ इबादत गुज़ारी में मशग़ूल रहा करते थे। आप यह तहय्या किए हुए थे कि उमूरे सलतनत में कोई दख़ल किसी तरह से न देंगे और अपने को हर वक़्त मशग़ूले हक़ रखेगें और यही कुछ रहे लेकिन दुनिया वाले कब किसी अल्लाह वाले को चैन लेने देते हैं। वह लोग यह भी बर्दाश्त न कर सके कि इमाम इज़्ज़त व विक़ार और सुकून व इतमिनाने ज़ाहेरी की जि़न्दगी बसर करें। बिल आखि़र ज़ालिम मुतावक्किल से चुग़ली ख़ाना शुरू कर दिया और इसे इस दर्जा भड़काया कि वह आपकी हैसीयत से क़ता नज़र कर के आपकी ख़ाना तलाशी पर आमादा हो गया। अल्लामा इब्ने ख़लक़ान लिखते हैं कि बाज़ लोगों ने मुतावक्किल से चुग़ली की कि हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) के घर मे हतियार और ख़ुतूत वग़ैरा इनके शियों के भेजे हुए जमा हैं। नीज़ मुतावक्किल को यह भी वहम दिलाया गया कि हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) अपने लिए अमरे खि़लाफ़त के तालिब हैं। मुतावक्किल ने चन्द सिपाही मुक़र्रर किये कि रात को उन्हें गिरफ़्तार कर लाएं। सिपाहीयों ने अचानक हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) के घर में पहुंच कर देखा कि वह बालों का कुर्ता पहने सौफ़ की चादर ओढ़े तन्हा अपने हुजरे में रेग और संग रेज़ों के फ़र्श पर रू बा कि़ब्ला बैठे हुए आहिस्ता आहिस्ता क़ुरान मजीद की तिलावत कर रहे हैं। सिपाहीयां ने उन्हें इसी हालत में ले जा कर मुतावक्किल के सामने पेश किया। मुतावक्किल उस वक़्त शराब लिए हुए मै नोशी कर रहा था। हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) को देख कर इसने ताज़ीम की और उनको अपने पहलू मे बैठा लिया। सिपाहीयों ने बयान किया कि इनके घर में कोई शै अज़ कि़स्म कुतुब वग़ैरा नहीं मिली और न कोई ऐसी बात पाई गई जिससे इन पर शक व इल्ज़ाम क़ायम हो , यह सुन कर मुतावक्किल ने वह जाम शराब जो इसके हाथों में था हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) जानिब बढ़ाया। उन्होंने फ़रमाया मेरा गोश्त व ख़ून कभी शराब से आलूदा नहीं हुआ। मुझे इससे माफ़ रख। मुतावक्किल ने कहा कि अगर शराब न पियो तो कुछ अश्आर पढ़ूं। हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) ने फ़रमाया कि मुझे अश्आर से कम दिलचस्पी है। मुतावक्किल न माना कि ज़रूर कुछ पढ़ो। इमाम नक़ी (अ.स.) ने मजबूर हो कर चन्द शेर इरशाद फ़रमाये , जिनका हासिले मक़सद यह है कि जिन लोगों ने अपनी हिफ़ाज़त की ग़रज़ से पहाड़ों की चोटियों पर सुकूत इख़्तेयार की इनको भी मौत ने न छोड़ा और इज़्ज़त की बुलन्दी से ख़ाके जि़ल्लत पर गिर कर कशां कशां क़ब्रों पर पहुंचा दिया , बाद अज़ां इनको हातिफ़ ने आवाज़ दी के ऐ ! क़ब्र वालों कहां गऐ तुम्हारे तख्त ताज और कहां हैं तुम्हारे लिबासे नफ़ीस और क्या हुए वह नाज़ परवर्दा वह चेहरे जिनके लिए ख़ेमें सरा पर्दे नसब किए जाते थे। इस वक़्त क़ब्र ने इनकी जानिब से जवाब दिया कि दुनिया में वह मुद्दत तक खाते पीते रहे आखि़र कार खुद लुक़्माए हशरातुल अर्ज़ हो गये और अब इन पर कीड़े रेंग रहे हैं। अल्लामाऐ मआसिर मौलाना सैय्यद अली नक़ी साहब कि़ब्ला ने हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) के अश्आर का तरजुमा इस नज़म में फ़रमाया है।

रहे पहाड़ों की चोटी पर पहरे बिठला कर

बहादुरों की हरासत में बच न सके मगर

बुलन्द कि़लों की इज़्ज़त जो पस्त होके रही

तो कुन्ज क़ब्र में मन्जि़ल भी क्या बुरी पाई

सदा ये उनको दी हातिफ़ ने बादे दफ़ने लहद

कहां हैं वह तख्त व ताज और वह लिबासे जस्द

कहां वह चेहरे हैं जो थे हमेशा ज़ेरे नक़ाब

ग़ुबार जिन पे कभी आने देते थे न हिजाब

ज़बाने हाल से बोले जवाब में मदफ़न

वह रूख़ ज़मीन के कीड़ों का बन गए मसकन

ग़ेजा़एं खाईं शराबें जो पी थीं हद से सिवा

नतीजा इसका है खुद आज बन गए वह गि़ज़ा।।

जब हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) ने यह अशआर पढ़े तो मुतावक्किल और हाज़ेरीन पर कमाले रिक़्क़त तारी हुई और मुतावक्किल इस क़दर रोया कि इसकी दाढ़ी आंसूओं से तर हो गई। बाद इसने हुक्म दिया कि शराब उठा ली जाए और हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) को उनके घर पहुंचा दिया जाए।

(मुलाहेज़ा हो किताब दफ़ायात अयान जिल्द 1 सफ़ा 322 व नूरूल अबसार , दमतुस् साकेबा जिल्द 3 सफ़ा 142 )

अल्लामा शिबलन्जी ने इन अश्आर के चार इब्तेदाई अश्आर सैफ़ बिन ज़ीयज़ हमीरी के क़स्त्र पर लिखे हुए देखे गए हैं। कंज़ुल फ़वाएद कन्ज़ुल मदफ़ून में है कि मुतावक्किल रोते , रोते अपने हाथ से जाम ज़मीन पर फेंक देता था।

हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) और शेरे क़ालीन

मुल्ला जामी लिखते हैं कि एक दिन मुतावक्किल के पास एक मशहूर हिन्दी शोबदे बाज़ आया और उसने बहुत से करतब दिखालाए। मुतावक्किल ने उससे कहा मेरे दरबार में एक निहायत शरीफ़ शख़्स अनक़रीब आने वाला है अगर तू अपने करतब से उसे शर्मिन्दा कर दे तो मैं तुझे एक हज़ार अशरफ़ी इनाम दूगां। उसने कहा ऐ बादशाह ज बवह आजाए तो खाने का बन्दोबस्त कर और मुझे पहलू में बिठा दे मैं ऐसा करूंगा कि सख्त शर्मिन्दा होगा। यह सुन कर मुतावक्किल ख़ुश हो गया और जब आप तशरीफ़ लाए तो खाना लाया गया और सब खाने के लिये बैठे। हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) ने ज्यों ही लुक़मा उठाया और तनावुल फ़रमाना चाहा उसने जादू के ज़ोर से उड़ाना दिया। इसी तरह उसने तीन मरतबा ऐसा किया , आखि़र यह सारा मजमा हंस पड़ा। हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) यह देख कर उस क़ालीन की तरफ़ मुतावज्जा हुए जो दीवार में लगा हुआ था और उस पर शेर की तस्वीर बनी हुई थी। आपने शेरे क़ालीन को हुक्म दिया कि मुज्जसम हो कर इस काफि़रे अज़ली को निगल ले। शेर मुज्जसम हुआ और उसने बढ़ कर काफि़रे हिन्दी को मुसल्लम निगल लिया। इस वाकि़ये से दरबार में हलचल मच गई। मुतावक्किल सर निगूं हो गया और इमाम (अ.स.) से दरख्वास्त करने लगा कि इस शेरे क़ालीन को जो फिर अपनी हालत पर आ गया है। हुक्म दीजिए कि इस काफि़रे हिन्दी को उगल दे। आपने फ़रमाया यह हरगिज़ न होगा और उठ कर चले गए। एक रिवायत की बिना पर आपने जवाब दिया कि अपर मूसा के अज़दहे ने फि़रऔन के सांपों को निगल लेने के बाद उगल दिया होता तो यह शेर भी उगल देता। चूंकि उसने नहीं उगला था , इस लिए यह भी नहीं उगले गा।

(शवाहेदुन नबूअत सफ़ा 209 दमतुस् साकेबा जिल्द 3 सफ़ा 145 )

हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) और अब्दुर रहमान मिस्री का ज़ेहनी इन्क़ेलाब

अल्लामा अरबली लिखते हैं कि एक दिन मुतावक्किल ने बरसरे दरबार हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) को क़त्ल कर देने का फ़ैसला कर के आपको दरबार में तलब किया आप सवारी पर तशरीफ़ लाए।

अब्दुर्ररहमान मिस्री का बयान है कि मैं सामरा गया हुआ था और मुतावक्किल के दरबार का यह हाल सुना कि एक अलवी के क़त्ल का हुक्म दिया गया है तो मैं दरवाज़े पर इस इन्तेज़ार में खड़ा हो गया कि देखूं वह कौन शख़्स है जिसके क़त्ल के इन्तेज़ामात हो रहे हैं इतने में देखा कि हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) तशरीफ़ ला रहे हैं। मुझे किसी ने बताया कि इसी अलवी के क़त्ल का बन्दो बस्त हुआ है। मेरी नज़र ज्यां ही उनके चेहरे पर पड़ी , मेरे दिल में उनकी मोहब्बत सराएत कर गई और मैं दुआ करने लगा। ख़ुदाया तू मुतावक्किल के शर से इस शरीफ़ अलवी को बचाना। मैं दिल में दुआ कर ही रहा था कि आप नज़दीक आ पहुंचे और मुझसे बिला जाने पहचाने फ़रमाया कि ऐ अब्दुर्रहमान तुम्हारी दुआ क़ुबूल हो गई है और मैं इन्शा अल्लाह महफ़ूज़ रहूंगा। चुनान्चे दरबार में आप पर कोई हाथ उठा न सका और आप महफ़ूज़ रहे। फिर आपने मुझे दुआ दी और मैं माला माल हो गया और साहेबे औलाद हो गया। अब्दुर्रहमान कहता है कि मैं इसी वक़्त आपकी इमामत का क़ाएल हो कर शिया हो गया।

(कश्फ़ुल ग़म्मा सफ़ा 123 व दमतुस् साकेबा जिल्द 3 सफ़ा 125 )

हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) के दौर मे नकली ज़ैनब का आना

उलमा का बयान है कि एक दिन मुतावक्किल के दरबार में एक औरत जवान और ख़ूबसूरत आई और उसने आकर कहा ज़ैनब बिन्ते अली व फ़ात्मा हूं। मुतावक्किल ने कहा कि तू जवान है और ज़ैनब को पैदा हुए और वफ़ात पाए अर्सा गुज़र गया। अगर तुझे ज़ैनब तस्लीम कर लिया जाय तो यह कैसे माना जाए कि ज़ैनब इतनी उमर तक जवान रह सकती हैं। इसने कहा कि मुझे रसूले ख़ुदा (स अ व व ) ने यह दुआ दी थी कि मैं चालीस और पचास साल के बाद जवान हो जाऊंगी इस लिये मैं जवान हूं। मुतावक्किल ने उलमाए दरबार को जमा कर के उनके सामने इस मसले को पेश किया। सब ने कहा यह झूठी हैं। ज़ैनब के इन्तेक़ाल को अर्सा हो गया है। मुतावक्किल ने कहा कोई ऐसी दलील दो कि मैं इसे झुठला सकूं। सब ने अपनी आजिज़ी का हवाला दिया। फ़ता इब्ने ख़ाक़ान वज़ीर मुतावक्किल ने कहा कि इस मसले को इब्ने रज़ा अली नक़ी (अ.स.) के सिवा कोई हल नहीं कर सकता। लेहाज़ा उन्हें बुलाया जाए। मुतावक्किल ने हज़रत को ज़हमते तशरीफ़ आवरी दी। जब आप दरबार में पहुंचे मुतावक्किल ने सूरते मसला पेश की। इमाम ने फ़रमाया झूठी है , मुतावक्किल ने कहा कोई ऐसी दलील दीजिऐ कि मैं इसे झूठी साबित कर सकूं। आपने फ़रमाया मेरे जद्दे नामदार का इरशाद है कि दरिन्दों पर मेरी औलाद का गोश्त हराम है। ऐ बादशाह तू इस औरत को दरिन्दों में डाल दे अगर यह सच्ची होगी और इसका ज़ैनब होना तो दरकिनार अगर यह सय्यदा भी होगी तो जानवर इसे न छेड़ेंगे और अगर सय्यदा से भी बे बहरा और ख़ाली होगी तो दरिन्दे इसे फाड़ खाऐंगे। अभी यह गुफ़्तुगू जारी ही थी कि दरबार में इशारा बाज़ी होने लगी और दुश्मनों ने मिल जुल कर मुतावक्किल से कहा कि इसका इम्तेहान इमाम अली नक़ी (अ.स.) ही के ज़रिये से क्यों न लिया जाए और देखा जाए कि आया दरिन्दे सय्यदों को खाते हैं या नहीं। मतलब यह था कि अगर उन्हें जानवरों ने फाड़ खाया तो मुतावक्किल का मन्शा पूरा हो जाएगा और अगर यह बत गए तो मुतावक्किल की वह उलझन दूर हो जाऐगी जो ज़ैनब काज़ेबा ने डाल रखी है। ग़रज़ कि मुतावक्किल ने इमाम (अ.स.) से कहा ऐ इब्नुल रज़ा क्या अच्छा होता कि आप खुद बरकतुल सबआ में जा कर इसे साबित कर दीजिऐ कि आले रसूल स. का गोश्त दरिन्दों पर हराम है। इमाम (अ.स.) तैय्यार हो गये। मुतावक्किल ने अपने बनाये हुए बरकतुल सबआ ‘‘ शेर ख़ाने ’’ में आपको डलवा कर फाटक बन्द करवा दिया और खुद मकान के बाला ख़ाने पर चला गया ताकि वहां से इमाम के हालात का मुतालेआ करे। अल्लामा हजर मक्की लिखते हैं कि जब दरिन्दां ने दरवाज़ा खुलने की आवाज़ सुनी तो ख़ामोश हो गये। जब आप सहन में पहुंच कर सीढ़ी पर चढ़ने लगे तो दरिन्दे आप की तरफ़ बढ़े जिनमें तीन और बारिवायते दमे साकेबा 6 शेर भी थे, और ठहर गये और आप को छू कर आपके गिर्द फिरने लगे। आप अपनी आस्तीन उन पर मलते थे। फिर दरिन्दे घुटने टेक कर बैठ गये। मुतावक्किल इमाम (अ.स.) के मुताल्लिक़ छत पर से यह बाते देखता रहा और उतर आया। फिर जनाब सहन से बाहर तशरीफ़ ले आये। मुतावक्किल ने आपके पास गरां बहा सिला भेजा। लोगों ने कहा मुतावक्किल तू भी ऐसा कर के दिखला दे। उसने कहा शायद तुम मेरी जान लेना चाहते हो।

अल्लामा मौहम्मद बाक़र लिखते हैं कि ज़ैनबे कज़्ज़ाबा ने जब इन हालात को अपनी आंखों से देखा तो फ़ौरन अपनी किज़्ब बयानी का एतेराफ़ कर लिया। एक रवायत की बिना पर उसे तौबा की हिदायत कर के छोड़ दिया गया। दूसरी रवायत की बिना पर मुतावक्किल ने उसे दरिन्दों में डलवा कर फड़वा डाला।

(सवाएक़े मोहर्रेक़ा , सफ़ा 124, अरजहुल मतालिब सफ़ा 461, दम ए साकेबा जिल्द 3 सफ़ा 145, जला लल उयून , सफ़ा 293, रौज़ातुल सफ़ा , फ़सल अल ख़त्ताब।)

अल्लामा इब्ने हजर का कहना है कि इस कि़स्म का वाकि़या अहदे रशीद अब्बासी में जनाबे यहिया बिन अब्दुल्लाह बिन हसने मुसन्ना इब्ने इमाम हसन (अ.स.) के साथ भी हुआ है।

हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) और मुतावक्किल का इलाज

अल्लामा अब्दुर्रहमान जामी तहरीर फ़रमाते हैं कि जिस ज़माने में हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) नज़र बन्दी की जि़न्दगी बसर कर रहे थे। मुतावक्किल के बैठने की जगह कमर के नीचे जिसम के पिछले हिस्से में एक ज़बर दस्त ज़हरीला फोड़ा निकल आया। हर चन्द कोशिश की गई मगर किसी सूरत से शिफ़ा की उम्मीद न हुई। जब जान ख़तरे में पड़ गई तो मुतावक्किल की मां ने मन्नत मान ली कि अगर मुतावक्किल अच्छा हो गया तो इब्ने रज़ा की खिदमत में मैं माले कसीर नज़र करूंगी और फ़तह बिन ख़क़ान ने मुतावक्किल से दरख्वास्त की कि अगर आपका हुक्म हो तो मैं मर्ज़ की कैफि़यत अबुल हसन से बयान कर के कोई दवा तजवीज़ करवा लाऊं। मुतावक्किल ने इजाज़त दी और इब्ने ख़क़ान हज़रत की खिदमत में हाजि़र हुए। उन्होंने साना वाकि़या बयान कर के दवा की तजवीज़ चाही , हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) ने फ़रमाया , कस्बे ग़नम बकरी की मेंगनियां लेकर गुलाब के अरक़ में हल कर के लगा दो , इन्शा अल्लाह ठीक हो जाऐगा। वज़ीर फ़तह इब्ने ख़ाक़ान ने दरबार में हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) की तजवीज़ पेश की लोग हंस पड़े और कहने लगे इमाम होकर क्या दवा तजवीज़ फ़रमाई है। वज़ीर ने कहा ऐ ख़लीफ़ा तजरूबे में क्या हर्ज है। अगर हुक्म हो तो मैं इन्तेज़ाम करूं। ख़लीफ़ा ने हुक्म दिया , दवा लगाई गई , मुतावक्किल की आंख खुल गई और रात भर सोया तीन दिन के अन्दर शिफ़ाए कामिल हो जाने के बाद मां ने दस हज़ार अशरफ़ी की सर ब मुहर थैली हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) की खि़दमत में भिजवा दी।

(शवाहेदुन नबूअत सफ़ा 207 आलामु वुरा सफ़ा 208 )


हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) की दोबारा ख़ाना तलाशी

दरन्दिों की जुब्बा साई और मुतावक्किल के इलाज में इमाम (अ.स.) की शानदार कामयाबी ने दुश्मनों के दिलों में हसद की लगी हुई आग को और भड़का दिया जिसका नतीजा यह हुआ कि जान आप ही के इलाज से बची थी वह ममनूने एहसान होने के बजाए इमाम के दरपए आज़ार हो कर खुल्लम खुल्ला उन्हें सताने की तरफ़ ख़ुसूसी तौर पर मुतावज्जा हो गया।

मुल्ला जामी अलेहिर्रहमा का बयान है कि वाक़ए सेहत के चन्द ही दिनों बाद लोगों ने मुतावक्किल से चुग़ल खाई और कहा कि हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) के घर में असलाह जंग जमा हैं और अन क़रीब अपने जमातियों के बल बूते पर तेरी हुकूमत का तख़्ता उलट देगें और हाकिमें वक़्त बन कर तेरे किये का बदला लेगें। मुतावक्किल जो पहले से आले मौहम्मद स. का शदीद दुश्मन था लोगों के कहने से फिर भड़क उठा और उसने सईद को बुला कर हुक्म दिया कि जिनकी नज़र बन्दी में इस वक़्त आप थे, मुतावक्किल ने हुक्म दिया कि तू आधी रात को दफ़तन ‘‘इमाम के मकान में जा कर तलाशी ले और जो चीज़ बरामद हो उसे मेरे पास ले आ। सईद हाजिब का बयान है कि मैं आधी रात को हज़रत के मकान में कोठे की तरफ़ से गया मुझे रास्ता न मिला था , क्योंकि सख़्त तारीकी थी। हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) ने अपने मुसल्ले पर से जो अन्दर बिछा हुआ था आवाज़ दी , ऐ सईद अन्धेरा है , ठहरो ! मैं शमा ला रहा हूं। ग़रज़ मैंने जा कर देखा कि आप ज़मीन पर मुसल्ला बिछा ए हुए हैं और आप के घर में एक शमा के सिवा कोई असलाह नहीं है और एक वह थैली है जो मुतावक्किल की मां ने भेजी थी। मैंने इन चीज़ों को मुतावक्किल के सामने पेश कर दिया। इसने उन्हें वापस किया और वह अपने मुक़ाम पर शर्मिन्दा हुआ।

(शवाहेदुन नबूअत सफ़ा 208, जिलाउल उयून सफ़ा 294 )

अल्लामा मजलिसी का बयान है कि मुतावक्किल ने आप पर पूरी सख़्ती शुरू कर दी और आप को क़ैद कर दिया। पहले ज़राफ़ी की क़ैद में रखा और ज़राफ़ी की क़ैद में महबूस रखा। ‘‘जिलाउल उयून सफ़ा 293’’ अल्लामा मौहम्मद बाक़र नजफ़ी का बयान है कि मुतावक्किल ने आपके पास जाने पर मुकम्मल पाबन्दी आएद कर दी ‘‘दमतुस् साकेबा जिल्द 3 सफ़ा 121’’ और हुक्म दिया कि कोई भी आपके क़रीब तक न जाने पाए।

(कशफ़ुल ग़म्मा सफ़ा 124 )

हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) के तसव्वुरे हुकूमत पर ख़ौफ़े ख़ुदा ग़ालिब था

हज़रत की सीरते जि़न्दगी और अख़लाक़ व कमालात वही थे जो इस सिलसिले असमत की हर फ़र्द के अपने दौर में इम्तेआज़ी तौर पर मुशाहिदे में आते रहे थे , क़ैद खाने और नज़र बन्दी का आलम हो या आज़ादी का ज़माना हर वक़्त हर हाल में यादे इलाही , इबादत , ख़लक़े खुदा से इस्तग़ना सबाते क़दम सब्र इस्तक़लाल , मसाएब के हुजूम में माथे पर शिकन का न होना , दुश्मन के साथ हिलम व मुरव्वत से काम लेना , मोहताजों और ज़रूरत मन्दो की इमादाद करना यही वह औसाफ़ हैं जो हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) की सीरते जि़न्दगी में नुमाया नज़र आते हैं।

क़ैद के ज़माने में जहां भी आप रहे आप के मुसल्ले के सामने एक क़ब्र खुदी तैय्यार रहती थी। देखने वालों ने जब इस पर हैरत व दहशत का इज़हार किया तो आपने फ़रमाया मैं अपने दिल में मौत का ख़्याल रखने के लिये यह क़ब्र अपनी निगाहों के सामने तैय्यार रखता हूं। हक़ीक़त मे यह जा़लिम ताक़त को इसके बातिल मुतालबा ए इताअत और इस्लाम की हक़ीक़ी तालीमात कि नश्रो अशाअत के तर्क कर देने की ख़्वाहिश का एक अमली जवाब था। यानी ज़्यादा से ज़्यादा सलातीने वक़्त के साथ जो कुछ है वह जान का लेना। मगर जो शख़्स मौत के लिये इतना तैय्यार हो कर हर वक़्त खुदी हुई क़ब्र अपने सामने रखे। वह ज़ालिम हुकूमत से डर कर सरे तस्लीम ख़म करने पर कैसे मजबूर किया जा सकता है। मगर इसके साथ दुनियावी साजि़शो में शिरकत या हुकूमते वक़्त के खि़लाफ़ किसी बे महल अक़दाम की तैय्यारी से सख्त तरीन जासूसी इन्तेज़ाम के कभी आपके खि़लाफ़ कोई इलज़ाम साबित न हो सका और कभी सलातीने वक़्त को कोई दलील आपके खि़लाफ़ के जवाज़ की न मिल सकी , बा वजूदे कि सलतनते अब्बासिया की बुनियादें इस वक़्त इतनी खोखली हो रही थी कि दारूल सलतनत में हर रोज़ एक नई साजि़श का फि़तना खड़ा होता था।

मुतावक्किल ने खुद इसके बेटे की मुख़ालफ़त और उसके इन्तेइाई अज़ीज़ गु़लाम बाग़र रूमी की इससे दुश्मनी मुतन्तसर के बाद उमराए हुकूमत का इन्तेशार और आखि़र मुतावक्किल के बेटों को खि़लाफ़त से महरूम कराने का फ़ैसला मुस्तईन की दौरे हुकूमत में यहिया बिन उमर यहिया बिन हसीन बिन ज़ैद अलवी का कूफ़ा में ख़ुरूज और हसन बिन ज़ैद अल मुनक़्क़ब ब दाई अलहक़ का एलाक़ए तबरस्तान पर कब्ज़ा कर लेना और मुसतकि़ल सलतनत क़ाएम कर लेना फिर दारूल सलतनत में तुरकी ग़ुलामां की बग़ावत मुस्तईन का सामरा को छोड़ कर बग़दाद की तरफ़ भागना और कि़ला बन्द हो जाना , आखि़र को हुकूमत से दस्त बरदारी पर मजबूर होना और कुछ अर्से बाद माअज़ बिल्लाह के साथ तलवार के घाट , फिर माज़ बिल्लाह के दौर में रूमियों का मुख़ालफ़त पर तैय्यार रहना। माज़ बिल्लाह को खुद अपने भाईयों से ख़तरा महसूस होना और मोवीद की जि़न्दगी का ख़ातमा और मोफि़क़ का बसरा में क़ैद किया जाना , इन तमाम हगांमी हालात , इन तमाम शोरिशो , इन तमाम बेचैनियो और झगड़ो में से किसी में भी हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) की शिरकत का शुब्हा तक न पैदा होना क्या इस तर्ज़ अमल के खि़लाफ़ नहीं जो ऐसे मौक़े पर जज़्बात से काम लेने वालों का हुआ करता है। एक ऐसे अक़तेदार के मुक़ाबले में जिसे न सिर्फ़ वह हक़ व इन्साफ़ के रू से नाजाएज़ समझते हैं बल्कि इनके हाथों उन्हें जिलावतनी , क़ैद और एहानितों का सामना भी करना पड़ता है मगर वह जज़्बात से बुलन्द और अज़मते नफ़्स के कामिल मज़हर दुनियावी हंगामों और वक़्त के इत्तेफ़ाक़ी मौका़ं से किसी तरह का फ़ायदा उठाना अपनी बेलौस हक़्क़ानियत और कोह से गरां सदाक़त के खि़लाफ़ समझता है और मुख़ालफ़त पर पसे पुश्त हमला करने को आपने बुलन्द नुक़्ताए निगाह और मेयारे अमल के खि़लाफ़ जानते हुए हमेशा किनारा कश रहा।

(दसवें इमाम सफ़ा 9 )

क़ब्रे हुसैन (अ.स.) के साथ मुतावक्किल की दोबारा बेअदबी 247हिजरी

हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) को क़ैद करने के बाद फि़र मुतावक्किल क़ब्रे इमाम हुसैन (अ.स.) के इन्हेदाम की तरफ़ मुतावज्जा हुआ और चाहा कि नेस्त व नाबूद कर दे। मुवर्रिख़ ने लिखा है कि जब इसे यह मालूम हुआ कि करबला में क़ब्रे हुसैनी की ज़्यारत के लिये एतराफ़े आलम से अक़ीदतमंदों की आमद का तांता बंधा हुआ है और बेशुमार हज़रात ज़्यारत को आते हैं तो मुतावक्किल की आतिशे हसद भड़क उठी और इसने इस सिलसिले को बन्द करने का तैहय्या कर लिया और यह भी न सोचा कि यह वही क़ब्र है जिस पर हस्बे तहक़ीक़ पीराने पीर शेख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी सत्तर हज़ार फ़रिश्ते आसमान से उतर कर ख़ानाए काबा का तवाफ़ करने के बाद जाते हैं वहां रोते हैं और इसकी ज़्यारत करते और मुजावरत के फ़राएज़ रोज़ाना अदा करते हैं।

(ग़नीयतुल तालबैन सफ़ा 374, मजमाउल बहरैन सफ़ा 502 )

आमाली शेख़ तूसी और जिलाउल उयून में है कि मुतावक्किल ने अपनी फ़ौज के दस्ते को ज़्यारत के रोकने और नहरे अलक़मा को काट के क़ब्र पर से गुज़ारने को भेजा और हुक्म दिया जो शख़्स ज़्यारत के लिये आए उसे क़त्ल कर दिया जाए और बाज़ उलमा के बयान के मुताबिक़ यह भी हुक्म दिया गया कि पहले हाथ काटे जायें फिर अगर बाज़ न आऐ तो क़त्ल कर दिये जाऐं यह एक ऐसा हुक्म था जिसने मोतक़ेदीन को बेचैन कर दिया। हज़रत ज़ैद मजनून को दोस्त दाराने आले मौहम्मद स. में से थे , यह ख़बर सुन कर ज़्यारत के लिये मिस्र से चल कर कुफ़े पहुंचे वहां पहुंच कर हज़रत बहलोल दाना से मिले जो उस वक़्त ब मसलेहत अपने को दिवाना बनाए हुए थे। दोनां में तबादलाए ख़्यालात हुआ और दोनों ज़ियारते क़ब्रे मुनव्वर के लिये करबला रवाना हो गये। उन्होंने आपस में तय किया था कि हाथ काटे जाये तो कटवायेंगे क़त्ल होने की ज़रूरत महसूस हो तो क़त्ल हो जायेंगे लेकिन ज़ियारत ज़रूर करेंगे। जब यह दोंनो करबला पहुंचे तो उन्होंने देखा कि क़ब्र की तरफ़ नहर का पानी क़ब्र पर गुज़रने की बे अदबी नहीं करता। पानी क़ब्र तक पहुंच कर फट जाता है और क़तरा कर एतराफ़ व जानिबे क़ब्र का बोसा लेता हुआ गुज़रता है। यह हाल देख कर इनका जज़्बाए मोहब्बत और उभर गया , यह अभी इसी मुक़ाम पर ही थे कि वह शख़्स इनकी तरफ़ मुतावज्जा हुआ जो इन्हेदामें क़ब्र पर मुताअय्यन था। उसने पूछा कि तुम क्यों आये हो ? उन लोगों ने कहा ज़ियारत के लिये। उसने जवाब दिया जो ज़्यारत को आए , मैं उसे क़त्ल करने के लिये मुक़र्रर किया गया हूं। इन हज़रात ने कहा हम क़त्ल होने की तमन्ना में ही आए हैं। यह सुन कर वह इनके पैरों पर गिर पड़ा और अपने अमल से ताऐब हो कर मुतावक्किल के पास वापस गया। मुतावक्किल ने उसे क़त्ल करा कर सूली पर चढ़ा दिया। फिर पैरों में रस्सी बंधवा कर बाज़ार में खिंचवाया। ज़ैद को जब यह वाकि़या मालूम हुआ , फ़ौरन सामरा पहुंचे और उसकी लाश दफ़न की और उस पर क़ुरान मजीद पढ़ा।

अभी हज़रत ज़ैद सामरा में ही थे कि एक दिन बड़े धूम धाम से एक जनाज़ा उठाया गया स्याह अलम साथ था अरकाने दौलत और अमाएदीन सलतनत हमराह थे। चारों तरफ़ से रोने की आवाज़ें आ रही थीं। ज़ैद ने समझा कि शायद मुतावक्किल का इन्तेक़ाल हो गया है। यह मालूम करने के बाद हज़रत ज़ैद ने एक आहे सर्द खींची और कहा अल्लाह अल्लाह फ़रज़न्दे रसूल स. इमाम हुसैन (अ.स.) करबला में तीन रोज़ के भुके प्यासे शहीद कर दिये गये। इन पर कोई रोने वाला नहीं था बल्कि उनकी क़ब्र के निशानात मिटाने के भी लोग दरपए हैं और एक मन्हूस कनीज़ का यह एहतिराम है इसके बाद इसी कि़स्म के मज़ामीन पर मुश्तमिल चन्द अश्आर लिख कर हज़रत ज़ैद मजनून ने मुतावक्किल के पास भिजवा दिया , उसने उन्हें मुक़य्यद कर दिया। मुतावक्किल ने ख़्वाब में देखा कि एक मर्दे मोमिन आए हैं और कहते हैं कि ज़ैद को इसी वक़्त रेहा कर दे। वरना मैं तुझे अभी अभी हलाक कर दूंगा। चुनान्चे उसने उसी वक़्त रेहा कर दिया।

मुतावक्किल का क़त्ल

मुतावक्किल के ज़ुल्म व तआद्दी ने लोगों को जि़न्दगी से बेज़ार कर दिया था। अब इसकी यह हालत हो चूकी थी कि बरसरे आम आले मौहम्मद स. को गालियां देने लगा था। एक दिन उसने अपने बेटे मुस्तनसर के सामने हज़रत फ़ात्मा ज़हरा स. के लिए नासाज़ अलफ़ाज़ इस्तेमाल किए। मुन्तसार से दरयाफ़्त किया कि जो शख़्स ऐसे अल्फ़ाज़ बिन्ते रसूल स. के लिऐ इस्तेमाल करे उसके लिए क्या हुक्म है। उलमा ने कहा वह वाजेबुल क़त्ल है। तारीख़ अबुल फि़दा में है कि मुनतासिर ने रात के वक़्त बहालते ख़लवत बहुत से आदमियों की मदद से मुतावक्किल को क़त्ल कर दिया। हादी अल तवारीख़ , तारीख़े इस्लाम , जिल्द 1 सफ़ा 66 दमतुस् साकेबा सफ़ा 147 में है कि यह वाकि़या चार शव्वाल 247 हिजरी का है बाज़ मासरीन लिखते हैं मुतावक्किल ने अपने अहदे सलतनत में कई लाख शिया क़त्ल कराए हैं।

इमाम अली नक़ी (अ.स.) को पैदल चलने का हुक्म

अल्लामा मजलिसी तहरीर फ़रमाते हैं कि क़त्ले मुतावक्किल से तीन चार दिन क़ब्ल इसी ज़ालिम मुतावक्किल ने हुक्म दिया कि मेरी सवारी के साथ तमाम लोग पैदल तफ़रीह के लिये चलें। हुक्म में इमाम (अ.स.) ख़ास तौर पर मामूर थे। चुनान्चे आप भी कई मिल पैदल चल कर वापस तशरीफ़ लाए और आपको इस दर्जे तअब तकलीफ़ हुआ कि आप सख़्त अलील हो गये।

(जिला अल उयून सफ़ा 292 )

हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) की शहादत

मुतावक्किल के बाद आप का बेटा मुसतनसिर फिर मुसतईन फिर 252 हिजरी में माज़ बिल्लाह ख़लीफ़ा हुआ मोतिज़ इब्ने मुतावक्किल ने भी अपने बाप की सुन्नत को नहीं छोड़ा और हज़रत के साथ सख़्ती ही करता रहा। यहां तक कि उसी ने आपको ज़हर दे दिया। समा अल मोताज़ , अनवारूल हुसैनिया जिल्द 2 सफ़ा 55 और आप व तारीख़ 2 रजब 254 हिजरी बरोज़ दो शम्बा इन्तेक़ाल फ़रमा गए।

(दमतुस् साकेबा जिल्द 3 सफ़ा 149 )

अल्लामा इब्ने जौज़ी तज़किराए खास अल मता में लिखते हैं कि आप मोताज़ के ज़माने खि़लाफ़त में शहीद किए गये हैं आपकी शहादत ज़हर से हुई है अल्लामा शिबलन्जी लिखते हैं कि आपको ज़हर से शहीद किया गया। नूरूल अबसार सफ़ा 150, अल्लामा इब्ने हजर लिखते हैं कि आप ज़हर से शहीद हुए हैं सवाएक़े मोहर्रेक़ा सफ़ा 124, दमतुस् साकेबा सफ़ा 185 में है कि आपके इन्तेक़ाल से क़ब्ल इमाम हसन अस्करी (अ.स.) को मवारिस अम्बिया वग़ैरा सुपुर्द फ़रमाते थे। वफ़ात के बाद इमाम हसन अस्करी (अ.स.) ने गरेबान चाक किया तो लोग मोतरिज़ हुए। आपने फ़रमाया कि यह सुन्नते अम्बिया है। हज़रत मूसा ने वफ़ाते हज़रत हारून पर अपना गरेबान फाड़ा था।

(दमतुस् साकेबा सफ़ा 185, जिला अल उयून सफ़ा 294 )

आप पर इमाम हसन अस्करी (अ.स.) ने नमाज़ पढ़ी और आप सामरा ही में दफ़्न किए गये इन्ना लिल्लाहे व इन्ना इलैहे राजेउन अल्लामा मजलिसी तहरीर फ़रमाते हैं कि आपकी वफ़ात इन्तेहाई कसमा पुर्सी की हालत में हुई इन्तेक़ाल के वक़्त आपके पास कोई भी न था।

(जिला अल उयून सफ़ा 292 )

आपकी अज़वाज व औलाद

आपकी कई बीवीयां थीं उनकी कई औलादें पैदा हुईं जिनके असमा यह हैं।

इमाम हसन अस्करी (अ.स.) 2. हुसैन बिन अली 3. मौहम्मद बिन अली 4. जाफ़र बिन अली 5. दुख़्तर मासूमा आयशा बिन्ते अली।

(इरशाद मुफ़ीद सफ़ा 602 व सवाएक़े मोहर्रेक़ा सफ़ा 129 प्रकाशित मिस्र)

हाशिया

अल्लामा क़ाज़ी मौहम्मद सुलैमान मन्सूर पूरी रिटार्यड जज रियासत पटयाला लिखते हैं कि इमाम अली नक़ी रज़ी अल्लाह अन्हो ताला के दो फ़रज़न्द अबू अब्दुल्लाह जाफ़र क़ज़्ज़ाब और हसन अस्करी र से नस्ल जारी है। अबू अब्दुल्लाह जाफ़र के नाम के साथ लक़ब कज़्ज़ाब बाज़ लोग इस लिए शामिल किया करते हैं कि उन्होने अपने भाई हसन अस्करी र की वफ़ात के बाद ख़ुद इमाम होने का दावा किया था। इनकी औलाद इनको जाफ़र तव्वाब कहती है और अपने आप को रिज़वी कहलाती है। सादाते अमरोहा इन्हीं की नस्ल से हैं। किताब रहमतुलल्लि आलमीन जिल्द 2 पेज न. 146 प्रकाशित लाहौर मेरे नज़दीक मुसन्निफ़ को या तो इल्म नहीं या उन्हें धोखा हो गया है दर अस्ल जनाबे जाफ़र एलैह रहमा की औलाद को नक़वी कहा जाता है।


अबु मोहम्मद हज़रत इमाम हसन असकरी (अ स )

क्यों न झुकें सलाम को , फ़ौजे उलूम के परे

बज़्मे नकी़ में जौ़ फ़िशाँ आज है नूरे असकरी

वारिसे जु़ल्फ़िक़ार है सुल्बे में इनकी जलवा गर

ज़ात है इनकी मुज़दा ए , आमद दौरे हैदरी

साबिर थरयानी ‘‘ कराची ’’

बू मोहम्मद इमाम याज़ दहुम

जां नशीने रसूल अर्श मक़ाम

जिसके जद वजहे खि़लक़ते आलम

जिसके फ़रज़न्द से जहां को क़याम

हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद (स अ व व ) के ग्यारहवें जां नशीन और सिलसिला ए इस्मत के 13 वीं कड़ी हैं। आपके वालिदे माजिद हज़रत इमाम अली नकी़ (अ.स.) थे और आपकी वालेदा माजेदा हदीसा ख़ातून थीं। मोहतरमा के मुताअल्लिक़ अल्लामा मजलिसी लिखते हैं कि आप अफ़ीफ़ा , करीमा , निहायत संजीदा और वरा व तक़वा से भर पूर थीं।(जिलाउल उयून पृष्ठ 295 )

हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) अपने आबाओ अजदाद की तरह इमाम मन्सूस मासूम आलिमे ज़माना और अफ़ज़ले काएनात थे।(इरशाद मुफ़ीद पृष्ठ 502 ) आपको हसना सिफ़ाते इल्म व सख़ावत वग़ैरा अपने वालिद से विरसे मे मिले थे।(अरजहुल मतालिब पृष्ठ 461 )

अल्लामा मोहम्मद बिन तल्हा शाफ़ई का बयान है कि आपको ख़ुदा वन्दे आलम ने जिन फ़ज़ाएल व मनाक़िब और कमालात और बुलन्दी से सरफ़राज़ किया है इनमें मुकम्मिल दवाम मौजूद हैं। न वह नज़र अन्दाज़ किये जा सकते हैं और न इनमें कुहनगी आ सकती है और आपका एक अहम शरफ़ यह भी है कि इमाम मेहदी (अ.स.) आप ही के इकलौते फ़रज़न्द हैं जिन्हें परवर दिगारे आलम ने तवील उम्र अता की है।(मतालिब उल सुऊल पृष्ठ 292 )

इमाम हसन असकरी (अ.स.) की विलादत और बचपन के बाज हालात

उलमाए फ़रीक़ैन की अक्सरीयत का इत्तेफ़ाक़ है कि आप बातारीख़ 10 रबीउस्सानी 232 हिजरी यौमे जुमा ब वक़्ते सुबह बतने जनाबे हदीसा ख़ातून से ब मुक़ाम मदीना मुनव्वरा मुतवल्लिद हुए हैं। मुलाहेज़ा हो शवाहेदुन नबूअत पृष्ठ 210 सवाएक़े मोहर्रेक़ पृष्ठ 124 नूरूल अबसार 110. जिलाउल उयून पृष्ठ 295, इरशाद मुफ़ीद पृष्ठ 502 दम ए साकेबा जिल्द 3 पृष्ठ 163। आपकी विलादत के बाद हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) ने हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) के रखे हुए नाम ‘‘ हसन बिन अली ’’ से मौसूम किया।(निहाबुल मोवद्दता)

आपकी कुन्नियत और आपके अल्क़ाब

आपकी कुन्नियत ‘‘ अबू मोहम्मद ’’ थी और आपके अल्क़ाब बेशुमार थे। जिनमें अस्करी , हादी , ज़की , खलिस , सिराज और इब्ने रज़ा ज़्यादा मशहूर हैं।(नूरूल अबसार पृष्ठ 150, शवाहेदुन नबूअत पृष्ठ 210, दमए साकेबा जिल्द 3 पृष्ठ 122 व मुनाक़िब इब्ने शहर आशोब जिल्द पृष्ठ 125 ) आपका लक़ब इसकरी इस लिये ज़्यादा मशहूर हुआ कि आप जिस महल्ले में ब मुक़ाम ‘‘ सरमन राय ’’ रहते थे उसे असकर कहा जाता था और ब ज़ाहिर इसकी वजह यह थी जब ख़लीफ़ा मोतसिम बिल्ला ने इस मुक़ाम पर लश्कर जमा किया था और ख़ुद भी क़याम पज़ीर था उसे ‘‘ असकर ’’ कहने लगे थे , और ख़लीफ़ा मुतावक्किल ने इमाम अली नक़ी (अ.स.) को मदीने से बुलवा कर यहीं मुक़ीम रहने पर मजबूर किया था। नीज़ यह भी था कि एक मरतबा ख़लीफ़ा ए वक़्त ने इमामे ज़माना को इसी मुक़ाम पर नव्वे हज़ार लशकर का मुआएना कराया था और आपने अपनी दो उंगलियां के दरमियान से अपने ख़ुदाई लशकर का मुताला करा दिया था। उन्हीं वजह की बिना पर इस मुका़म का नाम ‘‘ असकर ’’ हो गया था जहाँ इमाम अली नक़ी (अ.स.) और इमाम हसन असकरी (अ.स.) मुद्दतो मुक़ीम रह कर असकरी मशहूर हो गए।(बेहारूल अनवार जिल्द 12 पृष्ठ 154, दफ़यात अयान जिल्द 1 पृष्ठ 145, मजमूउल बहरैन पृष्ठ 322 दमए साकेबा जिल्द 3 पृष्ठ 163, तज़किरतुल मासूमीन पृष्ठ 222 )

आपके अहदे हयात और बादशहाने वक़्त

आपकी विलादत 232 हिजरी में उस वक़्त हुई जब कि वासिक़ बिल्लाह बिन मोतसिम बादशाहे वक्त़ था जो 227 हिजरी में ख़लीफ़ा बना था।(तारीख़ अबूल फ़िदा) फिर 233 हिजरी में मुतावक्किल ख़लीफ़ा बना(तारीख़ इब्नुल वरा) जो हज़रत अली (अ.स.) और उनकी औलाद से सख़्त बुग़़्ज़ व कीना रखता था और उनकी मनक़स्त किया करता था।(हयातुल हैवान व तारीख़े कामिल) इसी ने 236 हिजरी में इमाम हुसैन (अ.स.) की ज़्यारत को जुर्म क़रार दी और उनके मज़ार को ख़त्म करने की सई की।(तारीख़े कामिल) और इसी ने इमाम अली नक़ी (अ.स.) को जबरन मदीने से सरमन राय तलब करा लिया।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा) और आपको गिरफ़्तार करा के आपके मकान की तलाशी कराई।(दफ़अतिल अयान) फिर 247 हिजरी में मुन्तसर बिन मुतावक्किल ख़लीफ़ा ए वक़्त हुआ।(तारीख़े अबुल फ़िदा) फिर 248 हिजरी में मोतस्तईन ख़लीफ़ा बना।(अबूल फ़िदा) फिर 252 हिजरी में मुमताज़ बिल्ला ख़लीफ़ा हुआ।(अबुल फ़िदा) इसी ज़माने में अली नक़ी (अ.स.) को ज़हर से शहीद कर दिया गया।(नूरूल अबसार) फिर 255 हिजरी में मेंहदी बिल्लाह ख़लीफ़ा बना।(तारीख़ इब्ने अल वर्दी) फिर 256 हिजरी में मोतमिद बिल्ला ख़लीफ़ा हुआ।(तारीख़ अबुल फ़िदा) इसी ज़माने में 260 हिजरी में इमाम हसन असकरी (अ.स.) ज़हर से शहीद हुए।(तारीख़े कामिल) इन तमाम खुल्फ़ा ने आपके साथ वही बरताव किया जो आले मोहम्मद (स अ व व ) के साथ बरताव किए जाने का दस्तूर चला आ रहा था।

चार माह की उम्र में मनसबे इमामत

हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) कि उम्र जब चार माह के क़रीब हुई तो आपके वालिद अली नक़ी (अ.स.) ने अपने बाद के लिये मन्सबे इमामत की वसीअत की और फ़रमाया कि मेरे बाद यही मेरे जां नशीन होंगे और इस पर बहुत से लोगों को गवाह भी कर दिया।(इरशाद मुफ़ीद पृष्ठ 502 व दमए साकेबा जिल्द 3 पृष्ठ 193 बहवाला ए उसूले काफ़ी)

अल्लामा इब्ने हजर मक्की का कहना है कि इमाम हसन असकरी (अ.स.) इमाम अली नक़ी (अ.स.) की औलाद में सब से ज़्यादा अज़िल अरफ़ा अला व अफ़ज़ल थे।

चार साल की उम्र में आपका सफ़रे ईराक़

मुतावक्किल अब्बासी जो आले मोहम्मद (स अ व व ) का हमेशा से दुश्मन था उसने इमाम हसन असकरी (अ.स.) के वालिदे बुज़ुर्गवार इमाम अली नक़ी (अ.स.) को जबरन 239 हिजरी में मदीने से ‘‘ सरमन राय ’’ बुला लिया। आप ही के हमराह इमाम हसन असकरी (अ.स.) को भी जाना पड़ा। इस वक़्त आपकी उम्र चार साल चन्द माह की थी।(दमए साकेबा जिल्द 3 पृष्ठ 162 )

यूसुफ़े आले मोहम्मद(स. अ.) कुएं में

हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) न जाने किस तरह अपने घर के कुएं में गिर गए। आपके गिरने से औरतों में कोहरामे अज़ीम बरपा हो गया। सब चीख़ने और चिल्लाने लगीं मगर हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) जो महवे नमाज़ थे मुतलक़ मुताअस्सिर न हुए और इतमिनान से नमाज़ का एख़तेताम किया। उसके बाद आपने फ़रमाया कि घबराओ नहीं हुज्जते ख़ुदा को कोई गज़न्द न पहुँचेगी। इसी दौरान में देखा कि पानी बलन्द हो रहा है और इमाम हसन असकरी (अ.स.) पानी में खेल रहे हैं।(दमए साकेबा जिल्द 3 पृष्ठ 179 )

इमाम हसन असकरी (अ.स.) और कमसिनी में उरूजे फ़िक्र

आले मोहम्मद (स अ व व ) जो तदब्बुरे क़ुरआनी और उरेजे फ़िक्र में ख़ास मक़ाम रखते हैं उनमें से एक बलन्द मक़ाम बुज़ुर्ग हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) हैं। उलमा ए फ़रीक़ैन ने लिखा है कि एक दिन आप एक ऐसी जगह खड़े रहे जिस जगह कुछ बच्चे खेल में मसरूफ़ थे। इत्तेफ़ाक़न उधर से आरिफ़े आले मोहम्मद (स अ व व ) जनाब बहलोल दाना गुज़रे। उन्होंने यह देख कर कि सब बच्चे खेल रहे हैं और एक ख़ूब सूरत सुखऱ् व सफ़ैद बच्चा खड़ा रो रहा है। उधर मुतावज्जे हुए और कहा ऐ नौनेहाल मुझे बड़ा अफ़सोस है कि तुम इस लिये रो रहे हो कि तुम्हारे पास वह खिलौने नहीं जो इन बच्चों के पास हैं। सुनो ! मैं अभी अभी तुम्हारे लिये खिलौने ले कर आता हूँ। यह कहना था कि आप कमसिनी के बवजूद बोले , अना न समझ। हम खेलने के लिये नहीं पैदा किये गए हैं। हम इल्मो इबादत के लिये ख़ल्क़ हुए हैं। उन्होंने पूछा कि तुम्हें यह क्यों कर मालूम हुआ कि ग़रज़े खि़लक़त इल्मो इबादत है। आपने फ़रमाया कि इसकी तरफ़ क़ुरआने मजीद रहबरी करता है। क्या तुमने नहीं पढ़ा कि ख़ुदा फ़रमाता है , ‘‘ अफ़सबतुम इन्नमा ख़लक़ना कुम अबसा ’’ क्या तुम ने यह समझ लिया है कि हम ने तुम को अबस(खेल कूद) के लिये पैदा किया है ? और क्या तुम हमारी तरफ़ पलट कर न आओगे। यह सुन कर बहलोल हैरान रह गए और यह कहने पर मजबूर हो गए कि ऐ फ़रज़न्द तुम्हें क्या हो गया था कि तुम रो रहे थे , तुम से गुनाह का तसव्वुर तो हो ही नहीं सकता क्यों कि तुम बहुत कमसिन हो। आपने फ़रमाया कि कमसिनी से क्या होता है , मैंने अपनी वालेदा को देखा है कि बड़ी लकड़ियों को जलाने के लिये छोटी लकड़ियां इस्तेमाल करती हैं। मैं डरता हूँ कि कहीं जहन्नम के बड़े ईंधन के लिये हम छोटे और कमसिन लोग इस्तेमाल न किये जाऐ।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 124, नूरूल अबसार पृष्ठ 150, तज़केरतुल मासूमीन पृष्ठ 230 )

इमाम हसन असकरी (अ.स.) के साथ बादशहाने वक़्त सुलूक और तरज़े अमल

जिस तरह आपके आबाओ अजदाद के वुजूद को उनके अहद के बादशाह अपनी सलतनत और हुक्मरानी की राह में रूकावट समझते रहे। उनका यह ख़्याल रहा कि दुनियां के क़ुलूब उनकी तरफ़ माएल हैं क्यों कि यह फ़रज़न्दे रसूल (स अ व व ) और आमाले सालेह के ताजदार हैं लेहाज़ा उनको आवाम की नज़रों से दूर रखा जाए वरना इमकान क़वी है कि लोग उन्हें अपना बादशाहे वक़्त तसलीम कर लेंगे। इसके अलावा यह बुग़्ज़ो हसद भी था कि इनकी इज़्ज़त बादशाहे वक़्त के मुक़ाबले में ज़्यादा की जाती है और यह कि इमाम मेहदी (अ.स.) उन्हीं की नस्ल से होंगे जो सलतनतों का इन्के़लाब लाऐंगे। इन्ही तसव्वुरात ने जिस तरह आपके बुज़ुर्गों को चैन न लेने दिया और हमेशा मसाएब की अमाजगा बनाए रखा। इसी तरह आपके अहद के बादशाहों ने भी आपके साथ किया। अहदे वासिक़ में आपकी विलादत हुई और अहदे मुतवक्किल के कुछ अय्याम में बचपना गुज़ारा।

मुतवक्किल जो आले मोहम्मद (स अ व व ) का जानी दुश्मन था उसने सिर्फ इस जुर्म में कि आले मोहम्मद (स अ व व ) की तारीफ़ की है इब्ने सकीत शायर की ज़ुबान गुद्दी से खिंचवा ली।(अबुल फ़िदा जिल्द 2 पृष्ठ 14 ) उसने सब से पहले तो आप पर यह ज़ुल्म किया कि चार साल की उम्र में तरके वतन करने पर मजबूर किया यानी इमाम अली नक़ी (अ.स.) को जबरन मदीने से सामरा बुलवाया जिनके हमराह इमाम हसन असकरी (अ.स.) को लाज़मन जाना पड़ा। फिर वहां आपके घर के लोगों के कहने सुन्ने से तलाशी कराई और आपके वालिदे माजिद को जानवरों से फड़वा डालने की कोशिश की। ग़रज़ कि जो सई आले मोहम्मद (अ.स.) को सताने की मुमकिन थी , वह सब उसने अपने अहदे हयात में कर डाली। उसके बाद उसका बेटा मुस्तनसर ख़लीफ़ा हुआ। यह भी अपने बाप के नक्शे क़दम पर चल कर आले मोहम्मद (स अ व व ) को सताने की सुन्नत अदा करता रहा और इसकी मुसलसल कोशिश यही रही कि इन लोगों को सुकून नसीब न होने पाये। उसके बाद मुस्तईन का जब अहदे नव आया तो उसने आपके वालिदे माजिद को क़ैद ख़ाने में रखने के साथ साथ उसकी सई पैहम की कि किसी सूरत से इमाम हसन असकरी (अ.स.) को क़त्ल करा दे और इसके लिये उसने मुख़्तलिफ़ रास्ते तलाश किये।

मुल्ला जामी लिखते हैं कि एक मरतबा उसने अपने शौक़ के मुताबिक़ एक निहायत ज़बरदस्त घोड़ा ख़रीदा लेकिन इत्तेफ़ाक़ से वह इस दर्जा सरकश निकला कि उसने बड़े बड़े लोगों को सवारी न दी और जो उसके क़रीब गया उसको ज़मीन पर दे मारा और टापों से कुचल डाला। एक दिन ख़लीफ़ा मुस्तईन बिल्लाह के एक दोस्त ने राय दी कि इमाम हसन असकरी (अ.स.) को बुला कर हुक्म दिया जाय कि वह इस पर सवारी करें , अगर वह इस पर कामयाब हो गये तो घोड़ा ठीक हो जायेगा , और अगर कामयाब न हुए और कुचल डाले गए तो तेरा मक़सद हल हो जायेगा। चुनान्चे उसने ऐसा ही किया लेकिन अल्लाह रे शाने इमामत जब आप उसके क़रीब पहुँचे तो वह इस तरह भीगी बिल्ली बन गया कि जैसे कुछ जानता ही न हो। बादशाह यह देख कर हैरान रह गया और उसके पास इसके सिवा कोई चारा न था कि घोड़ा हज़रत के हवाले कर दे।(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 210 )

फिर मुस्तईन के बाद जब मोतज़ बिल्लाह ख़लीफ़ा हुआ तो उसने भी आले मोहम्मद (स अ व व ) को सताने की सुन्नत जारी रखी और इसकी कोशिश करता रहा कि अहदे हाज़िर के इमाम ज़माना और फ़रज़न्दे रसूल (स अ व व ) इमाम अली नक़ी (अ.स.) को दरजा ए शहादत पर फ़ाएज़ कर दे। चुनान्चे यही हुआ और उसने 254 ई 0 में आपके वालिदे बुज़ुर्गवार को ज़हर से शहीद करा दिया। यह एक मुसीबत थी कि जिसने इमाम हसन असकरी (अ.स.) को बे इन्तेहा मायूस कर दिया। इमाम अली नक़ी (अ.स.) की शहादत के बाद इमाम हसन असकरी (अ.स.) ख़तरात में महसूर हो गये , क्यो कि हुकूमत का रूख़ अब आप ही की तरफ़ रह गया था। आपको खटका लगा ही था कि हुकूमत की तरफ़ से अमल दरामद शुरू हो गया। मोतज़ ने एक शक़ीए अज़ली और नासबे अब्दी इब्ने यारिश की हिरासत और नज़र बन्दी में इमाम हसन असकरी (अ.स.) को दे दिया। उसने उनको सताने में कोई दक़ीक़ा नहीं छोड़ा लेकिन आखि़र में वह आपका मोतक़िद बन गया। आपकी इबादत गुज़ारी और रोज़ा दारी ने उस पर ऐसा गहरा असर किया कि उसने आपकी खि़दमत में हाज़िर हो कर माफ़ी मांग ली और आपको दौलत सरा तक पहुँचा दिया।

अली बिन मोहम्मद ज़ियाद का बयान है कि इमाम हसन असकरी (अ.स.) ने मुझे एक ख़त तहरीर फ़रमाया जिसमें लिखा कि तुम ख़ाना नशीन हो जाओ क्यों कि एक बहुत बड़ा फ़ितना उठने वाला है। ग़रज़ कि थोड़े दिनों के बाद एक हंगामा ए अज़ीम बरपा हुआ और हुज्जाज बिन सुफ़यान ने मोतज़ को क़त्ल कर दिया।(कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 127 )

फिर जब मेहदी बिल्लाह का अहद आया तो उसने भी बदस्तूर अपना अमल जारी रखा और हज़रत को सताने में हर क़िस्म की कोशिश करता रहा। एक दिन उसने सालेह बिन वसीफ़ नामी नासेबी के हवाले आपको कर दिया और हुक्म दिया कि हर मुम्किन तरीक़े से आपको सताये। सालेह के मकान के क़रीब एक बहुत ख़राब हुजरा था जिसमें आप क़ैद किये गए। सालेह बद बख़्त ने जहां और तरीक़े से सताया एक तरीक़ा यह भी था कि आपको खाना और पानी से भी हैरान और तंग रखता था। आखि़र ऐसा होता रहा कि आप तयम्मुम से नमाज़ अदा फ़रमाते रहे। एक दिन उसकी बीवी ने कहा कि ऐ दुश्मने ख़ुदा यह फ़रज़न्दे रसूल (स अ व व ) हैं। इनके साथ रहम का बरताव कर। उसने कोई तवज्जो न की। एक दिन का ज़िक्र है , बनी अब्बासिया के एक गिरोह ने सालेह से जा कर दरख़्वास्त की कि हसन असकरी पर ज़ियादा ज़ुल्म किया जाना चाहिये। उसने जवाब दिया कि मैंने उनके ऊपर दो ऐसे शख़्सों को मुसल्लत कर दिया है जिनका ज़ुल्मों तशद्दुद में जवाब नहीं है लेकिन मैं क्या करूं कि उनके तक़वे और उनकी इबादत गुज़ारी से वह इस दर्जा मुताअस्सिर हो गये हैं कि जिसकी कोई हद नहीं। मैंने उनसे जवाब तलबी की तो उन्होंने क़ल्बी मजबूरी ज़ाहिर की। यह सुन कर वह लोग मायूस वापिस गये।(तज़किरतुल मासूमीन पृष्ठ 223 )

ग़रज़ कि मेहदी का ज़ुल्म तशदद्दुद ज़ोरो पर था और यही नहीं कि वह इमाम हसन असकरी (अ.स.) पर सख़्ती करता था बल्कि यह कि वह उनके मानने वालों को बराबर क़त्ल करता रहता था। एक दिन आपके एक साहबी अहमद बिन मोहम्मद ने एक अरीज़े के ज़रिये से उसके ज़ुल्म की शिकायत की तो आपने तहरीर फ़रमाया कि घबराओ नहीं कि मेहदी की उम्र अब सिर्फ़ पांच दिन बाक़ी रह गई है। चुनान्चे छटे दिन उसे कमाले ज़िल्लत व ख़वारी के साथ क़त्ल कर दिया गया।(कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 126 )

इसी के अहद में जब आप क़ैद ख़ाने में पहुँचे तो ईसा बिन फ़तेह से फ़रमाया कि तुम्हारी उम्र इस वक़्त 65 साल एक माह दो यौम की है। उसने नोट बुक निकाल कर उसकी तसदीक़ की। फिर आपने फ़रमाया कि ख़ुदा तुम्हें औलादे नरीना अता करेगा। वह ख़ुश हो कर कहने लगा मौला! क्या आपको ख़ुदा फ़रज़न्द न देगा ? आपने फ़रमाया ख़ुदा की क़सम अन्क़रीब मुझे मालिक ऐसा फ़रज़न्द देगा जो सारी कायनात पर हुकूमत करेगा और दुनियां को अदलो इंसाफ़ से भर देगा।(नूरूल अबसार पृष्ठ 101 )

फिर जब उसके बाद मोतमिद ख़लीफ़ा हुआ तो उसने इमाम हसन असकरी (अ.स.) पर ज़ुल्मो जौरो सितम व इस्तेबदाद का ख़ात्मा कर दिया।

इमाम अली नक़ी (अ.स.) की शहादत और इमाम हसन असकरी (अ.स.) का आग़ाज़े इमामत

हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) ने अपने इमाम हसन असकरी (अ.स.) की शादी नरजिस ख़ातून से कर दी जो क़ैसरे रोम की पोती और शमऊन वसी ए ईसा (अ.स.) की नस्ल से थीं।(जिला अल उयून पृष्ठ 298 ) इसके बाद आप 3 रजब 254 ई 0 को दरजा ए शहादत पर फ़ाएज़ हुए। आपकी शहादत के बाद हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) की इमामत का आग़ाज़ हुआ। आपके तमाम मोतक़दीन ने आपको मुबारक बाद दी और आप से हर क़िस्म का इस्तेफ़ादा शुरू कर दिया। आपकी खि़दमत में आमदो रफ़्त और सवालात व जवाबात का सिलसिला जारी हो गया। आपने जवाबात में ऐसे हैरत अंगेज़ मालूमात का इन्केशाफ़ फ़रमाया कि लोग दंग रह गए। आपने इल्मे ग़ैब और इल्मे बिलमौत तक का सबूत पेश फ़रमाया और इसकी भी वज़ाहत की कि फ़लां शख़्स को इतने दिनों में मौत आ जायेगी।

अल्लामा मुल्ला जामी लिखते हैं कि एक शख़्स ने अपने वालिद समेत हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) की राह में बैठ कर यह सवाल करना चाहा कि बाप को पांच सौ दिरहम और बेटे को तीन सौ दिरहम अगर इमाम दें तो सारे काम हो जाऐ , यहां तक कि इमाम हसन असकरी (अ.स.) इस रास्ते पर आ पहुँचे। इत्तेफ़ाक़ यह दोनों इमाम (अ.स.) को पहचानते न थे। इमाम (अ.स.) ख़ुद इन दोनों के क़रीब गए और उन से कहा कि तुम्हें आठ सौ दिरहम की ज़रूरत है। आओ मैं तुम्हें दे दूं। दोनों हमराह हो लिये और रक़म माहूद हासिल कर ली। इसी तरह एक और शख़्स क़ैद ख़ाने में था। उसने क़ैद की परेशानी की शिकायत इमाम (अ.स.) को लिख कर भेजी और तंग दस्ती का ज़िक्र शर्म की वजह से न किया। आपने तहरीर फ़रमाया कि तुम आज ही क़ैद ख़ाने से रिहा हो जाओगे और तुम ने जो शर्म से तंग दस्ती का ज़िक्र नहीं किया , इसके मुताअल्लिक़ मालूम करो कि मैं अपने मुक़ाम पर पहुँचते ही सौ दिनार भेज दूंगा। चुनान्चे ऐसा ही हुआ। इसी तरह एक शख़्स ने आपसे अपनी तंग दस्ती की शिकायत की। आपने ज़मीन कुरेद कर एक अशरफ़ी की थैली निकाली और उसके हवाले कर दी। इसमें सौ दीनार थे। इसी तरह एक शख़्स ने आपको तहरीर किया कि मिशक़ात के मानी क्या हैं ? नीज़ यह कि मेरी औरत हामेला है इससे जो फ़रज़न्द पैदा होगा उसका नाम रख दीजिए। आपने जवाब में तहरीर फ़रमाया कि मिशक़ात से मुराद क़ल्बे मोहम्मदे मुस्तफ़ा (स अ व व ) और आखि़र में लिख दिया ‘‘ अज़मुल्लाह अजरकुम व अख़लफ़ अलैक ’’ ख़ुदा तुम्हें अज्र दे और नेमुल बदल अता करे। चुनान्चे ऐसा ही हुआ कि उसके यहां मुर्दा लड़का पैदा हुआ। इसके बाद उसकी बीवी हामला हुई , फ़रज़न्दे नरीना मुतावल्लिद हुआ। मुलाहेज़ा हों।(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 211 )

अल्लामा अरबली लिखते हैं कि हसन इब्ने ज़रीफ़ नामी एक शख़्स ने हज़रत से मिलकर दरयाफ़्त किया कि क़ाएमे आले मोहम्मद (अ.स.) पोशीदा होने के बाद कब ज़ुहूर करेंगे ? आपने तहरीर फ़रमाया जब ख़ुदा की मसलहत होगी। इसके बाद लिखा कि तुम तप रबआ का सवाल करना भूल गए जिसे तुम मुझसे पूछना चाहते हो , तो देखो ऐसा करो कि जो इसमें मुबतिला हो उसके गले में आयत ‘‘ या नार कूनी बरदन सलामन अला इब्राहीम ’’ लिख कर लटका दो शिफ़ायाब हो जायेगा। अली बिन ज़ैद इब्ने हुसैन का कहना है कि मैं एक घोड़े पर सवार हो कर हज़रत की खि़दमत में हाज़िर हुआ तो आपने फ़रमाया कि इस घोड़े की उम्र सिर्फ़ एक रात बाक़ी रह गई है चुनान्चे वह सुबह होने से पहले मर गया। इस्माईल बिन मोहम्मद का कहना है कि मैं हज़रत की खि़दमत में हाज़िर हुआ और मैंने उनसे क़सम खा कर कहा कि मेरे पास एक दिरहम भी नहीं है। आपने मुस्कुरा कर फ़रमाया कि क़सम मत खाओ तुम्हारे घर दो सौ दीनार मदफ़ून हैं। यह सुन कर वह हैरान रह गया। फिर हज़रत ने गु़लाम को हुक्म दिया कि उन्हें अशरफ़ियां दे दो।

अब्दी रवायत करता है कि मैं अपने फ़रज़न्द को बसरे में बिमार छोड़ कर सामरा गया और वहां हज़रत को तहरीर किया कि मेरे फ़रज़न्द के लिया दुआ ए शिफ़ा फ़रमाएं। आपने जवाब में तहरीर फ़रमाया ‘‘ ख़ुदा उस पर रहमत नाज़िल फ़रमाए ’’ जिस दिन यह ख़त उसे मिला उसी दिन उसका फ़रज़न्द इन्तेक़ाल कर चुका था। मोहम्मद बिन अफ़आ कहता है कि मैंने हज़रत की खि़दमत में एक अरज़ी के ज़रिये से सवाल किया कि ‘‘ क्या आइम्मा को भी एहतेलाम होता है ? ’’ जब ख़त रवाना कर चुका तो ख़्याल हुआ कि एहतेलाम तो वसवसए शैतानी से हुआ करता है और इमाम (अ.स.) तक शैतान पहुँच नहीं सकता। बहर हाल जवाब आया कि इमाम नौम और बेदारी दोनों हालतों में वसवसाए शैतानी से दूर होते हैं जैसा कि तुम्हारे दिल में भी ख़्याल पैदा हुआ है , फिर एहतेलाम क्यों कर हो सकता है। जाफ़र बिन मोहम्मद का कहना है कि मैं एक दिन हज़रत की खि़दमत में हाज़िर था , दिल में ख़्याल आया कि मेरी औरत जो हामेला है अगर उससे फ़रज़न्दे नरीना पैदा हो तो बहुत अच्छा हो। आपने फ़रमाया कि ऐ जाफ़र लड़का नहीं लड़की पैदा होगी। चुनान्चे ऐसा ही हुआ।(कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 128 )


अपने अक़ीदत मन्दों में हज़रत का दौरा

जाफ़र बिन शरीफ़ जरजानी का बयान करते हैं कि मैं हज से फ़राग़त के बाद हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) की खि़दमत में हाज़िर हुआ और उनसे अर्ज़ कि मौला ! अहले जरजान आपकी तशरीफ़ आवरी के ख़्वास्त गार और ख़्वाहिश मन्द हैं। आपने फ़रमाया तुम आज से 190 दिन के बाद जरजान पहुँचोगे और जिस दिन तुम पहुँचोंगे उसी दिन शाम को मैं भी पहुँचूगा। तुम उन्हें बा ख़बर कर देना। चुनान्चे ऐसा ही हुआ। मैं वतन पहुँच कर लोगों को आगाह कर चुका था कि इमाम (अ.स.) की तशरीफ़ आवरी हुई। आपने सब से मुलाक़ात की और सब ने शरफ़े ज़ियारत हासिल किया। फिर लोगों ने अपनी मुशकीलात पेश की। इमाम (अ.स.) ने सब को मुतमईन कर दिया। इसी सिलसिले में नसर बिन जाबिर ने अपने फ़रज़न्द को पेश किया , जो नाबीना था। हज़रत ने उसके चेहरे पर दस्ते मुबारक फेर कर उसे बीनाई अता कि। फिर आप उसी रोज़ वापस तशरीफ़ ले गए।(कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 128 ) एक शख़्स ने आपको एक ख़त बिला रौशनाई के क़लम से लिखा। आपने उसका जवाब मरहमत फ़रमाया और साथ ही लिखने वाले का और उसके बाप का नाम भी तहरीर फ़रमाया दिया। यह करामात देख कर वह शख़्स हैरान हो गया और इस्लाम लाया और आपकी इमामत का मोतक़िद बना गया।(दमए साकेबा पृष्ठ 172 )

इमाम हसन असकरी (अ.स.) का पत्थर पर मोहर लगाना

सुक़्क़तुल इस्लाम अल्लामा क़ुलैनी और इमामे अहले सुन्नत अल्लामा जामी रक़म तराज़ हैं कि एक दिन हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) की खि़दमत में एक ख़ूबसूरत सायमेनी आया और उसने एक संग पारा यानी पत्थर का टुकड़ा पेश कर के ख़्वाहिश की कि आप इस पर अपनी इमामत की तसदीक़ में मोहर कर दें। हज़रत ने मोहर लगा दी। आपका इसमे गिरामी इस तरह कन्दा हो गया जिस तरह मोम पर लगाने से कन्दा होता है।

एक सवाल के जवाब में कहा गया कि आने वाला मजमूए इब्नुल सलत बिन अक़बा बिन समआन इब्ने ग़ानम था। यह वही संग पारा लाया था जिस पर उसके ख़ान दान की एक औरत उम्मे ख़ानम ने तमाम आइम्मा ए ताहेरीन (अ.स.) से मोहर लगवा रखी थी। उसका तरीक़ा यह था कि जब कोई इमामत का दावा करता था तो वह उसको ले कर उसके पास चली जाती थी अगर उस मुद्दई ने पत्थर पर मोहर लगा दी तो उसने समझ लिया कि यह इमामे ज़माना हैं और अगर वह इस अमल से आजिज़ रहा तो वह उसे नज़र अन्दाज़ कर देती थी चूंकि उसने इसी संग पारे पर कई इमामों की मोहर लगवाई थी। इस लिये उसका लक़ब साहेबतुल साअता हो गया था।

अल्लामा जामी लिखते हैं कि जब मजमूए बिन सलत ने मोहर लगवाई तो उससे पूछा गया कि तुम हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) को पहले से पहचानते थे ? उसने कहा नहीं। वाक़ेया यह हुआ कि मैं उनका इन्तेज़ार कर ही रहा था कि आप तशरीफ़ लाये लेकिन मैं चूंकि पहचानता न था इस लिये ख़ामोश बैठा रहा। इतने में एक नाशिनास नौजवान ने मेरी नज़रों के सामने आ कर कहा कि यह हसन बिन अली हैं।

रावी अबू हाशिम बयान करता है कि जब वह जवान आपके दरबार में आया तो मेरे दिल में यह आया कि काश मुझे मालूम होता कि यह कौन हैं। दिल में इस ख़्याल का आना था कि इमाम (अ.स.) ने फ़रमाया कि मोहर लगवाने के लिये वह संग पारा लाया है जिस पर मेरे बाप दादा की मोहरें लगी हुई हैं। चुनान्चे उसने पेश किया और आपने मोहर लगा दी। वह शख़्स आयाए ‘‘ ज़ुर्रियते बाज़हा मिन बाअज़ ’’ पढ़ता हुआ चला गया।(उसूले काफ़ी व दमए साकेबा , पृष्ठ 164, शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 211 प्रकाशित लखनऊ 1905 0, आलामुल वुरा पृष्ठ 214 )

इमाम हसन असकरी (अ.स.) के इल्मी खि़दमात

तफ़सीरे क़ुरआन

यह एक मुसल्लेमा हक़ीक़त है कि जब इन्सान को सुकून नसीब न हो तो दिलो दिमाग़ अज़कारे रफ़्ता हो जाते हैं और उसमें इतनी सलाहियत नहीं रहती कि वह कोई ग़ैर फ़ानी दिमाग़ी किरदार पेश कर सके। हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) जिन्हें बिल वास्ता या बिला वास्ता ख़ुलफ़ाए अब्बासिया के सात ज़ालिमों के दस्ते इस्तेबदाद से मुताअस्सिर होना पड़ा। कभी आपके वालिदे माजिद को क़ैद किया गया , कभी नज़र बन्दी की ज़िन्दगी बसर करने पर मजबूर किया गया। गरज़ कि आपका कोई लम्हा ए हयात पुर सुकून नहीं गुज़रा। फिर उम्र भी आपने सिर्फ़ 28 साल की पाई थी। इन्ही वजूह से आपके कमालाते इल्मिया का कमा हक़्क़ा इज़हारो इन्केशाफ़ न हो सका। इसी बिना पर अल्लामा किरमानी लिखते हैं कि आप दुनियां में इतने दिनों ब क़ैदे हयात रहे ही नहीं कि आपके फ़ज़ाएल व मनाक़िब और उलूम व हुक्म लोगों पर ज़ाहिर हो सकें।(अख़बारूल दवल पृष्ठ 117 ) ताहम इन हालात में भी आपने अपने इल्मे लदुन्नी , नीज़ अपने वालिदे बुज़ुर्गवार से हासिल करदा इल्म के सहारे तबहव्वे इल्मी के साथ बड़े बड़े इल्मी कारनामों से लोगों को हैरान कर दिया। आपने मुख़ालेफ़ीने इस्लाम और अज़ीम जां शलीक़ों से अहम मनाज़िरे किये और इल्म व हुक्म के दरया बहाये हैं।

आपके इल्मी कारनामों में एक अहम कारनामा क़ुरआने मजीद की तफ़सीर है। जो तफ़सीरे इमाम हसन असकरी (अ.स.) के नाम से मौसूम व मशहूर है। यह तफ़सीर उलूमे क़ुरआनी और हुक्मे नबवी से मम्लू है।(दमए साकेबा जिल्द 3 पृष्ठ 164 ) मेरे नज़दीक इसका इन्तेसाब तशना ए तहक़ीक़ है।

आपने अपनी क़लमी सलाहियत को महले इफ़्तेख़ार में ज़िक्र फ़रमाया है। आपका कहना है कि हम वह हैं जिन्हें साहेबे क़लम क़रार दिया है। उलेमा का बयान है कि जब आप लिखते लिखते नमाज़ के लिये चले जाया करते थे तो आपका क़लम बराबर चलता रहता था और आप माफ़िज़ ज़मीर बहुक्मे ख़ुदा वन्दी सतहे क़िरतास पर मरक़ूम होता रहता था।(बेहारूल अनवार दमए साकेबा जिल्द 3 पृष्ठ 179 ) बहवाला ए असबात अल हदाया उर आमली। अल्लामा शेख़ मुफ़ीद का कहना है कि आप इल्म फ़ज़ल , ज़ोहदो तक़वा अक़्लो असमत , शुजाअतो करम आमालो इबादत में अफ़ज़ल अहले ज़माना थे।(इरशाद मुफ़ीद पृष्ठ 502 ) सुक़्क़तुल इस्लाम अल्लामा क़ुलैनी(र.अ.) का बयान है कि हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) अपने आबाओ अजदाद की तरह तमाम ज़बानों से वाक़िफ़ थे। आप तुर्की , रूमी ग़रज़ कि हर ज़बान में तकल्लुम किया करते थे। ख़ुदा ने आपको हर ज़बान से बहरावर फ़रमाया था और आप इल्मे रजाल , इल्मे अन्साब , इल्मे हवादिस में कमाल रखते थे।(दमए साकेबा जिल्द 3 पृष्ठ 177, बहवाला उसूले काफ़ी) अब्दुल्लाह इब्ने मोहम्मद का बयान है कि मैंने हज़रत को भेड़िये से बात चीत करते हुए ख़ुद सुना है।(किताब मनाक़िबे फ़ात्मा)

हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) का ईराक़ के एक अज़ीम फ़लसफ़ी को शिकस्त देना

मुवर्रेख़ीन का बयान है कि ईराक़ के अज़ीम फ़लसफ़ी इस्हाक़ कन्दी को ख़ब्त सवार हुआ कि क़ुरआन मजीद में तनाक़ज़ साबित करे और यह बता दे कि क़ुरआने मजीद की एक आयत दूसरी आयत से और एक मज़मून दूसरे मज़मून से टकराता है। उसने इस मक़सद की तकमील के लिये किताब ‘‘ तनाक़ुज़े कु़रआन ’’ लिखना शुरू की और इस दर्जा मुनहमिक़ हो गया कि लोगों से मिलना झुलना और कहीं आना जाना सब तर्क कर दिया।

हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) को जब इसकी इत्तेला हुई तो आपने उसके ख़ब्त को दूर करने का इरादा फ़रमाया। आपका ख़्याल था कि उस पर कोई ऐसा एतराज़ कर दिया जाये कि जिसका वह जवाब न दे सके और मजबूरन अपने इरादे से बाज़ आ जाये। इत्तेफ़ाक़न एक दिन आपकी खि़दमत में उसका एक शार्गिद हाज़िर हुआ। हज़रत ने फ़रमाया कि तुम में कोई ऐसा नहीं है जो इस्हाक़ कन्दी को ‘‘ तनाकुज़ अल क़ुरआन ’’ लिखने से बाज़ रख सके। उसने अर्ज़ कि मौला ! मैं उसका शार्गिद हूँ भला उसके सामने लब कुशाई कर सकता हूँ। आपने फ़रमाया कि अच्छा यह तो कर सकते हो कि जो मैं कहूँ वह उस तक पहुँचा दो। उसने कहा कर सकता हूँ। हज़रत ने फ़रमाया कि पहले तो तुम उस से मवानस्त पैदा करो और उस पर एतेबार जमाओ। जब वह तुम से मानूस हो जाये और तुम्हारी बात तवज्जो से सुन ने लगे तो उससे कहना कि मुझे एक शुबहा पैदा हो गया है , आप उसको दूर फ़रमा दें। जब वह कहे कि बयान करो तो कहना कि ‘‘ इन्ना एताका हज़ल मुताकल्लिम बे हज़ारूल क़ुरआन हल यह बज़ूअन यकून मुरादा बेमा तकल्लुम मिन्हा अनल मआनी अल लती क़द ज़न सतहा इन्का ज़ेबतहा इलैहा ’’ अगर इस किताब यानी क़ुरआन का मालिक तुम्हारे पास इसे लाये तो क्या हो सकता है कि इस कलाम से जो मतलब उसका हो वह तुम्हारे समझे हुए मआनी व मतालिब के खि़लाफ़ हो। ज बवह तुम्हारा यह एतेराज़ सुनेगा तो चुंकि ज़हीन आदमी है फ़ौरन कहेगा बेशक ऐसा हो सकता है। जब वह यह कहे तो तुम उससे कहना कि फिर किताब ‘‘ तनाक़ुज़ अल क़ुरआन ’’ लिखने से क्या फ़ायेदा ? क्यों कि तुम उसके जो मानी समझ कर उस पर जो एतेराज़ कर रहे हो हो सकता है िकवह ख़ुदाई मक़सूद के खि़लाफ़ हो। ऐसी सूरत में तुम्हारी मेहनत ज़ाया और बरबाद हो जायेगी। क्यों कि तनाक़िज़ तो जब हो सकता है कि तुम्हारा समझा हुआ मतलब सही और मक़सूदे ख़ुदा वन्दी के मुताबिक़ हो और ऐसा यक़ीनी तौर पर नही ंतो तनाक़िस कहां रहा ? अल ग़रज़ वह शार्गिद इस्हाक़ कन्दी के पास गया और उसने इमाम (अ.स.) के बताए हुए उसूल पर उससे मज़कूरा सवाल किया। इस्हाक़ कन्दी यह एतेराज़ सुन कर हैरान रह गया और कहने लगा कि सवाल को दोहराओ। उसने फिर दोहराया। इस्हाक़ थोड़ी देर के लिये महवे तफ़क्कुर हो गया और दिल में कहने लगा कि बे शक इस क़िस्म का एहतेमाल ब एतेबारे लुग़त और ब लेहाज़े फ़िकरो तदब्बुर मुम्किन है। फिर अपने शार्गिद की तरफ़ मुतावज्जे हो कर बोला ! मैं तुम्हें क़सम देता हूँ , तुम मुझे सही सही बताओ कि तुम्हें यह एतेराज़ किसने बताया है ? उसने जवाब दिया , मेरे शफ़ीक़ उस्ताद यह मेरे ही ज़हन की पैदावार है। इस्हाक़ ने कहा हरगिज़ नहीं , यह तुम्हारे जैसे इल्म वाले के बस की चीज़ नहीं है। तुम सच कहो कि तुम्हें किसने बताया और इस एतेराज़ की तरफ़ किसने रहबरी की है ? शार्गिद ने कहा सच तो यह है कि मुझे हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) ने फ़रमाया था और मैंने उन्हीं के बताये हुए उसूल पर सवाल किया है।

इस्हाक़ कन्दी बोला ‘‘ एलान जेहत बेह ’’ अब तुम ने सच कहा है। ऐसे ऐतराज़ और ऐसी अहम बातें ख़ानादाने रिसालत ही से बरामद हो सकती हैं। ‘‘ सुम अनह दुआ बिन नार व अहरक़ जीमए मा काना अनफ़हा ’’ फिर उसने आग मंगाई और किताब ‘‘ तनाक़ज़ अल क़ुरआन ’’ का सारा मसवेदा नज़रे आतश कर दिया।(मनाक़िब इब्ने शहरे आशोब मा ज़न्दरानी जिल्द 5 पृष्ठ 127 व बेहारूल अनवार जिल्द 12 पृष्ठ 172 दमए साकेबा पृष्ठ 183 जिल्द 3 )

हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) और ख़ुसूसियाते मज़हब

हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) का इरशाद है कि हमारे मज़हब में उन लोगों का शुमार होगा जो उसूल व फ़ुरू और दीगर लवाज़िम के साथ साथ इन दस चीज़ों के क़ायल बल्कि उन पर आमिल हों।

1. शबो रोज़ में 51 रकअत नमाज़ पढ़ना। 2. सजदा गाहे करबला पर सजदा करना। 3. दाहिने हाथ में अंगूठी पहन्ना। 4. अज़ान व अक़ामत के जुमले दो दो मरतबा कहना। 5. अज़ान व अक़ामत में हय्या अला ख़ैरिल अमल कहना। 6. नमाज़ में बिस्मिल्लिाह ज़ोर से पढ़ना। 7. हर दूसरी रकअत में क़ुनूत पढ़ना। 8. आफ़ताब की ज़रदी से पहले नमाज़े अस्र और तारों के डूब जाने से पहले नमाज़े सुबह पढ़ना। 9. सर और दाढ़ी में वसमा का खि़ज़ाब करना। 10. नमाज़े मय्यत में पांच तकबीरे कहना।(दमए साकेबा जिल्द 3 पृष्ठ 172 )

हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) और ईदे नुहुम रबीउल अव्वल

हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) चन्द अज़ीम अस्हाब जिनमें अहमद बिन इस्हाक़ क़ुम्मी भी थे। एक दिन मोहम्मद बिन अबी आला हम्दानी और यहिया बिन मोहम्मद बिन जरीह बग़दादी के दरमियान 9 रबीउल अव्वल के यौमे ईद होने पर गुफ़्तुगू हो रही थी। बात चीत की तकमील के लिये यह दोनों अहमद बिन इस्हाक़ के मकान पर गए। दक़्क़ुल बाब किया , एक ईराक़ी लड़की निकली , आने का सबब पूछा , कहा अहमद से मिलना है। उसने कहा वह आमाल कर रहे हैं। उन्होंने कहा कैसा अमल है ? लड़की ने कहा अहमद बिन इस्हाक़ ने हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) से रवायत की है कि 9 रबीउल अव्वल यौमे ईद है और हमारी बड़ी ईद है , और हमारे दोस्तों की ईद है। अल ग़रज़ वह अहमद से मिले। उन्होंने कहा कि मैं अभी ग़ुस्ले ईद से फ़ारिग़ हुआ हूँ और आज ईदे नहुम 9 है। फिर उन्होंने कहा कि मैं आज ही हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) की खि़दमत में हाज़िर हुआ हूँ। उनके यहां अंगीठी सूलग रही थी और तमाम घर के लोग अच्छे कपड़े पहने हुए थे। ख़ुशबू लगाए हुए थे। मैंने अर्ज़ कि इब्ने रसूल अल्लाह (स अ व व ) आज क्या कोई ताज़ा यौमे मसर्रत है ? फ़रमाया हां आज 9 रबीउल अव्वल है। हम अहले बैत और हमारे मानने वालों के लिये यौमे ईद है। फिर इमाम (अ.स.) ने इस दिन के यौमे ईद होने और रसूले ख़ुदा (स अ व व ) और अमीरल मोमेनीन (अ.स.) के तरज़े अमल की निशान देही फ़रमाई।

हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.)के अक़वाल

हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) के पन्दो नसायह हुक्म और मवाएज़ में से कुछ नीचे लिखे जा रहे हैं।

1. दो बेहतरीन आदतें यह हैं कि अल्लाह पर ईमान रखे और लोगों को फ़ायदे पहुँचायें।

2. अच्छों को दोस्त रखने में सवाब है।

3. तवाज़ो और फ़रोतनी यह है कि जब किसी के पास से गुज़रे तो सलाम करें और मजलिस में मामूली जगह बैठें।

4. बिला वजह हंसना जिहालत की दलील है।

5. पड़ोसियों की नेकी को छुपाना और बुराईयों को उछालना हर शख़्स के लिये कमर तोड़ देने वाली मुसीबत और बेचारगी है।

6. यह इबादत नहीं है कि नमाज़ रोज़े अदा करता रहे , बल्कि यह भी अहम इबादत है कि ख़ुदा के बारे में सोच विचार करे।

7. वह शख़्स बदतरीन है जो दो मुहा और दो ज़बान हो , जब दोस्त सामने आये तो अपनी ज़बान से ख़ुश कर दे और जब वह चला जाए तो उसे खा जाने की तदबीर सोचे जब उसे कुछ मिले तो यह हसद करे और जब उस पर कोई मुसीबत आ जाए तो क़रीब न फटके।

8. गु़स्सा हर बुराई की कुन्जी है।

9. हसद करने और कीना रखने वाले को भी सुकूने क़ल्ब नसीब नहीं होता।

10. परहेज़गार वह है जो शब के वक़्त तवकुफ़ व तदब्बुर से काम ले और हर अमर से मोहतात रहे।

11. बेहतरीन इबादत गुज़ार वह है जो फ़राएज़ अदा करता रहे।

12. बेहतरीन सईद और ज़ाहिर वह है जो गुनाह मुतलक़न छोड़ दे।

13. जो दुनियां में बोऐगा वही आख़ेरत में काटेगा।

14. मौत तुम्हारे पीछे लगी हुई है अच्छा बोओगे तो अच्छा काटोगे , बुरा बोओगे तो निदामत होगी।

15. हिरस और लालच से कोई फ़ाएदा नहीं जो मिलना है वही मिलेगा।

16. एक मोमिन दूसरे मोमिन के लिये बरकत है।

17. बेवकूफ़ का दिल उसके मुंह में होता है और अक़ल मन्द का मुंह उसके दिल में होता है।

18. दुनिया की तलाश में कोई फ़रीज़ा न गवा देना। 19. तहारत में शक की वजह से ज़्यादती करना ग़ैर मम्दूह है।

20. कोई कितना ही बड़ा आदमी क्यों न हो जब वह अक़ को छोड़ देगा ज़लील तर हो जायेगा।

21. मामूली आदमी के साथ हक़ हो तो वही बड़ा है।

22. जाहिल की दोस्ती मुसीबत है।

23. ग़मगीन के सामने हंसना बे अदबी और बद अमली है।

24. वह चीज़ मौत से बदतर है जो तुम्हें मौत से बेहतर नज़र आए।

25. वह चीज़ ज़िन्दगी से बेहतर है जिसकी वजह से तुम ज़िन्दगी को बुरा समझो।

26. जाहिल की दोस्ती और इसके साथ गुज़ारा करना मोजिज़े के मानिन्द है।

27. किसी की पड़ी हुई आदत को छुड़ाना ऐजाज़ की हैसीयत रखता है।

28. तवाज़े ऐसी नेमत है जिस पर हसद नहीं किया जा सकता।

29. इस अन्दाज़ से किसी की ताज़ीम न करो जिसे वह बुरा समझे।

30. अपनी भाई की पोशीदा नसीहत करनी इसकी ज़ीनत का सबब होता है।

31. किसी की ऐलानिया नसीहत करना बुराई का पेश ख़ेमा है।

32. हर बला और मुसीबत के पस मन्ज़र में रहमत और नेमत होती है।

33. मैं अपने मानने वालों को नसीहत करता हूँ कि अल्लाह से डरें दीन के बारे में परेहगारी को शआर बना लें ख़ुदा के मुताअल्लिक़ पूरी सई करें और उसके अहकाम की पैरवी में कमी न करें। सच बोलें , अमानतें चाहे मोमिन की हो या काफ़िर की , अदा करें , और अपने सजदों को तूल दें और सवालात के शीरीं जवाब दें। तिलावते कु़रआने मजीद किया करें मौत और ख़ुदा के ज़िक्र से ग़ाफ़िल न हों।

34. जो शख़्स दुनियां से दिल का अन्धा उठेगा , आख़ेरत में भी अन्धा रहेगा। दिल का अन्धा होना हमारी मुवद्दत से ग़ाफ़िल रहना है। क़ुरआन मजीद में है कि क़यामत के दिन ज़ालिम कहेंगे ‘‘रब्बे लमा हश्रतनी आएमी व क़नत बसीरन ’’ मेरे पालने वाले हम तो दुनियां में बीना थे हमें यहां अन्धा क्यों उठाया है ? जवाब मिलेगा , हम ने जो निशानियां भेजी थी तुमने उन्हें नज़र अन्दाज़ किया था। लोगों! अल्लाह की नेमत अल्लाह की निशानियां हम आले मोहम्मद (स अ व व ) हैं। एक रवायत में है कि आपने दो शम्बे के शर व नहूसत से बचने के लिये इरशाद फ़रमाया है कि नमाज़े सुब्ह की रक्ते अव्वल में सुरह ‘‘ हल अता ’’ पढ़ना चाहिए। नीज़ यह फ़रमाया है कि नहार मुंह ख़रबुज़ा नहीं खाना चाहिये क्यो कि इससे फ़ालिज का अन्देशा है।(बेहार अल अनवार जिल्द 14 )

इमाम मेहदी (अ.स.) की विलादत बा सआदत

15 शाबान 255 हिजरी में बतने जनाबे नरजिस ख़ातून से क़ाएमे आले मोहम्मद हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) की विलादत ब सआदत हुई। इमाम हसन असकरी (अ.स.) ने दुश्मनों के ख़ौफ़ से आपकी विलादत को ज़ाहिर होने नहीं दिया।

मुल्ला जामी लिखते हैं कि इमाम मेहदी (अ.स.) की विलादत के बाद हज़रते जिब्राईल उन्हें परवरिश व परदाख़्त के लिये उठा कर ले गए।(शवाहेदुन नबूवत)

अल्लामा अरबली लिखते हैं कि आप तीन साल की उम्र में देखे गए और आपने हुज्जतुल्लाह होने का इज़हार किया।(कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 138 )

मोतमिद अब्बासी की खि़लाफ़त और इमाम हसन असकरी (अ.स.) की गिरफ़्तारी

गर क़लम दर दस्ते ग़द्दारे बूद , ला जुर्म मन्सूर , बरदारे बूद

256 हिजरी में मोतमिद अब्बासी खि़लाफ़त मकबूज़ा तख़्त पर मुतमक्किन हुआ इसने हुकूमत की कमान संभालते ही अपने अबाई तर्ज़े अमल को इख़्तेयार करना और जद्दी किरदार को पेश करना शुरू कर दिया और दिल से सई शुरू कर दी कि आले मोहम्मद (स अ व व ) के वजूद से ज़मीन ख़ाली हो जाए। यह अगरचे हुकूमत की बाग डोर अपने हाथों में लेते ही मुल्की बग़ावत का शिकार हो गया था लेकिन फिर भी अपने वज़ीफ़े और अपने मिशन से ग़ाफ़िल नहीं रहा। इसने हुक्म दिया अहदे हाज़िर में ख़ानदाने रिसालत की यादगार इमाम हसन असकरी (अ.स.) को क़ैद कर दिया जाए और उन्हें क़ैद में किसी क़िस्म का सुकून न दिया जाए। हुक्मे हाकिम मरगे मफ़ाजात आखि़र इमाम हसन असकरी (अ.स.) बिला जुर्मो ख़ता आज़ाद फ़ेज़ा से क़ैद ख़ाने में पहुँचा दिये गए और आप पर अली बिन अवताश नामी एक नासबी मुसल्लत कर दिया गया जो आले मोहम्मद (स अ व व ) , आले अबी तालिब (अ.स.) का सख़्त तरीन दुश्मन था और उससे कह दिया गया कि जो जी चाहे करो तुम्से कोई पूछने वाला नहीं है। इब्ने औतश ने असबे हिदायत आप पर तरह तरह की सख़्तियां शुरू कर दीं। इसने न ख़ुदा का ख़ौफ़ किया न पैग़म्बर की औलाद होने का कोई लिहाज़ किया लेकिन अल्लाह रे आपका ज़ोहदो तक़वा कि दो चार ही यौम में दुश्मन का दिल मोम हो गया और वह हज़रत के पैरों पर पड़ गया। आपकी इबादत गुज़ारी और तक़वा व तहारत देख कर वह इतना मुताअस्सिर हुआ कि हज़रत की तरफ़ नजर उठा कर देख न सकता था। आपकी अज़मतो व जलालत की वजह से सर झुका कर आता व चला जाता। यहां तक कि वह वक़्त आ गया कि दुश्मन बसीरत आगे बन कर आपका मोतरिफ़ और मानने वाला हो गया।(आलामुल वुरा पृष्ठ 218 )

अबू हाशिम दाऊद बिन क़ासिम का बयान है कि मैं और मेरे हमराह हसन बिन मोहम्मद अलक़तफ़ी व मोहम्मद बिन इब्राहीम उमर और दीगर बहुत से हज़रात इस क़ैद ख़ाने में आले मोहम्मद (स अ व व ) की मोहब्बत के जुर्म की सज़ा भुगत रहे थे कि नागाह हमें मालूम हुआ कि हमारे इमामे ज़माना हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) भी ला रहे हैं। हम ने उनका इस्तेक़बाल किया वह तशरीफ़ ला कर क़ैद ख़ाने में हमारे पास बैठ गए और बैठते ही एक अन्धे की तरफ़ इशारा करते हुए फ़रमाया कि अगर यह शख़्स न होता तो मैं तुम्हें यह बता देता कि अन्दरूनी मामला किया है और तुम कब रिहा होगे। लोगों ने यह सुन कर उस अन्धे से कहा कि तुम ज़रा हमारे पास से चन्द मिनट के लिये हट जाओ चुनान्चे वह हट गया। उसके चले जाने के बाद आपने फ़रमाया कि यह नाबीना क़ैदी नहीं है तुम्हारे लिये हुकूमत का जासूस है। इसकी जेब में ऐसे कागज़ात मौजूद हैं जो इसकी जासूसी का सुबूत देते हैं। यह सुन कर लोगों ने उसकी तलाशी ली और वाक़िया बिल्कुल सही निकला। अबू हाशिम कहते हैं कि अय्याम गुज़र रहे थे कि एक दिन ग़ुलाम खाना लाया। हज़रत ने शाम का खाना खाने से इन्कार कर दिया और फ़रमाया कि मैं समझता हूँ कि मेरा अफ़्तार क़ैद से बाहर होगा। इस लिये खाना न लूंगा। चुनान्चे ऐसा ही हुआ आप असर के वक़्त क़ैद खाने से बरामद हो गए।(आलामुल वुरा पृष्ठ 214 )

इस्लाम पर इमाम हसन असकरी (अ.स.) का एहसाने अज़ीम

वाक़िए क़हत

इमाम हसन असकरी (अ.स.) क़ैद ख़ाने ही में थे कि सामरा में जो तीन साल से क़हत पड़ा हुआ था उसने शिद्दत इख़्तेयार कर ली और लोगों का हाल यह हो गया कि मरने के क़रीब पहुँच गए। भूख और प्यास की शिद्दत ने ज़िन्दगी से आजिज़ कर दिया। यह हाल देख कर ख़लीफ़ा मोतमिद अब्बासी ने लोगों को हुक्म दिया कि तीन दिन तक बाहर निकल कर नमाज़े इसतेस्क़ा पढ़ें। चुनान्चे सब ने ऐसा किया , मगर पानी न बरसा। चौथे रोज़ बग़दाद के लसारा की जमाअत सहरा में आई और इनमें से एक राहिब ने आसमान की जानिब अपना हाथ बुलन्द किया , उसका हाथ बुलन्द होना था कि बादल छा गए और पानी बरसना शुरू हुआ। इसी तरह उस राहिब ने दूसरे दिन भी अमल किया और बदस्तूर उस दिन भी बाराने रहमत का नुज़ूल हुआ। यह हालत देख कर सब को निहायत ताअज्जुब हुआ। हत्ता कि बाज़ जाहिलों के दिलों में शक पैदा हो गया। बल्कि बाज़ उनमें से इसी वक़्त मुरतिद हो गए।

यह वाक़िया ख़लीफ़ा पर बहुत शाक गुज़रा और उसने इमाम हसन असकरी (अ.स.) को तलब कर के कहा , अबू मोहम्मद अपने जद के कलमे गोयों की ख़बर लो और उनको हलाकत यानी गुमराही से बचाओ। हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) ने फ़रमाया कि अच्छा राहिबों को हुक्म दिया जाए कि कल फिर वह मैदान में आ कर दोआए बारान करें , इन्शा अल्लाह ताला मैं लोगों के शकूक ज़ाएल कर दूँगा। फिर जब दूसरे दिन वह लोग मैदान में तलबे बारां के लिये जमा हुए तो इस राहिब ने मामूल के मुताबिक़ आसमान की तरफ़ हाथ बुलन्द किया नागाह आसमान पर अब्र नमूदार हुआ और मेह बरसने लगा। यह देख कर इमाम हसन असकरी (अ.स.) ने एक शख़्स से कहा कि राहिब के हाथ पकड़ कर जो चीज़ राहिब के हाथ में मिले ले ले , उस शख़्स ने राहिब के हाथ में एक हड्डी दबी हुई पाई और उससे ले कर हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) की खि़दमत में पेश की। उन्होंने राहिब से फ़रमाया कि तू हाथ उठा कर बारिश की दुआ कर उसने हाथ उठाया तो बजाए बारिश होने के मतला साफ़ हो गया और धूप निकल आई , लोग कमाले मुताअज्जिब हुए और ख़लीफ़ा मोतमिद ने हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) से पूछा कि ऐ अबू मोहम्मद यह क्या चीज़ है ? आपने फ़रमाया कि यह एक नबी की हड्डी है जिसकी वजह से राहिब अपनी मुद्दोआ में कामयाब होता रहा। क्यों कि नबी की हड्डी का यह असर है कि जब जब वह ज़ेरे आसमान खोल दी जायेगी तो बाराने रहमत ज़रूर नाज़िल होगा। यह सुन कर लोगों ने इस हड्डी का इम्तेहान किया तो उसकी वही तासीर देखी जो हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) ने की थी। इस वाक़िये से लोगों के दिलों के शकूक ज़ाएल हो गए जो पहले पैदा हो गए थे। फिर इमाम हसन असकरी (अ.स.) इस हड्डी को ले कर अपनी क़याम गाह पर तशरीफ़ लाए।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 124 व कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 129 ) फिर आपने इस हड्डी को कपड़े मे लपेट कर दफ़्न कर दिया।(अख़बार अल दवल पृष्ठ 117 )

शेख़ शहाबुद्दीन क़लदूनी ने किताब ग़राएब व अजाएब में इस वाक़िये को सूफ़ियों की करामत के सिलसिले में लिखा है बाज़ किताबों ंमें है कि हड्डी की गिरफ़्त के बाद आपने नमाज़ अदा की और दुआ फ़रमाई। ख़ुदा वन्दे आलम ने इतनी बारिश की कि जल थल हो गया और क़हत जाता रहा। यह भी मरक़ूम है कि इमाम (अ.स.) ने क़ैद से निकलते वक़्त अपने साथियों की रिहाई का मुतालेबा फ़रमाया था जो मंज़ूर हो गया था और वह लोग भी राहिब की हवा उखाड़ने के लिये हमराह थे।(नूरूल अबसार पृष्ठ 151 )

एक रवायत में है कि जब आपने दुआ ए बारान की और अब्र आया तो आपने फ़रमाया कि फ़लां मुल्क के लिये है और वह वहीं चला गया। इसी तरह कई बार हुआ फिर वहां बरसा।

वाक़ीयाए क़हत के बाद

256 हिजरी के आखि़र में वाक़िए क़हत के बाद हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) का चर्चा तमाम आलम में फैल गया। अब क्या था मुवाफ़िक़ व मुख़ालिफ़ सब ही का मैलान व रूझान आपकी तरफ़ होने लगा। आपके वह नए मानने वाले जिनके दिलों में आले मोहम्मद (स अ व व ) की मोअद्दत कमाल को पहुँची हुई थी वह यह चाहते थे कि किसी सूरत से इमाम (अ.स.) की खि़दमत में इमाम मेहदी (अ.स.) की विलादत की मुबारक बाद पेश करें लेकिन इसका मौक़ा न मिलता था क्यों कि या इमाम क़ैद में होते या हिरासत में। उनसे मिलने की किसी को इजाज़त न होती थी लेकिन क़हत के वाक़िये से इतना हुआ कि आप तक़रीबन एक साल क़ैद ख़ाने से बाहर रहे। इसी दौरान में लोगों ने मसाएल वग़ैरा दरयाफ़्त किये और जो लोग ज़्यारत के मुश्ताक़ थे उन्होंने ज़ियारत की और जो ख़ुफ़िया तहनियते विलादत हज़रते हज़रत हुज्जत (अ.स.) अदा करना चाहते थे उन्होंने तहनियत अदा की।

अल्लामा मोहम्मद बाक़र लिखते हैं कि 257 हिजरी में तक़रीबन 70 आदमी मदाएन से करबला होते हुए सामरा पहुँचे और हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) की खि़दमत में हाज़िर हो कर तहनियत गुज़ार हुए। हज़रत ने फ़रते मसर्रत से आंखों में आंसू भर कर उनका इस्तेक़बाल किया और उनके सवालात के जवाबात दिये।(दमए साकेबा जिल्द 3 पृष्ठ 172 )

अक़ीदत मंदों की आमद का चुंकि तांता बंध गया था इस लिये ख़लीफ़ा मोतमिद ने आपके हालात की निगरानी के लिये बेशुमार जासूस मुक़र्रर कर दिये। इमाम हसन असकरी (अ.स.) ने जिन्हें हुकूमत की नियत का बहुत अच्छी तरह इल्म था ख़ामोशी और ंगोशा नशीनी की ज़िन्दगी बसर करने लगे और आपने इसकी एहतीयात बरती कि मुल्की मामेलात पर कोई तबसेरा न किया जाय और सिर्फ़ दीनी उमूर से बहस की जाय। चुनान्चे 257 हिजरी के आखि़र तक यही कुछ होता रहा लेकिन ख़लीफ़ा मुतमईन न हुआ और उसने हसबे आदत रोक टोक शुरू की और सब से पहले उसने ख़ुम्स की आमद की बन्दिश कर दी।

इमाम हसन असकरी (अ.स.) और अबीदुल्लाह वज़ीरे मोतमिद अब्बासी

इसी ज़माने में एक दिन हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) मुतवक्किल के वज़ीर फ़तेह इब्ने ख़ाकान के बेटे अबीदुल्लाह इब्ने ख़ाक़ान जो कि मोतमिद का वज़ीर था मिलने के लिये तशरीफ़ ले गए। उसने आपकी बेइन्तेहां ताज़ीम की और आपसे इस तरह महवे गुफ़्तुगू रहा कि मोतमिद का भाई मौक़फ़ दरबार में आया तो उसने कोई परवाह न की। यह हज़रत की जलालत और ख़ुदा की दी हुई इज़्ज़त का नतीजा था। हम इस वाक़िये को अबीदुल्लाह के बेटे अहमद ख़ाक़ान की ज़बानी बयान करते हैं। कुतुबे मोतबरा में है कि जिस ज़माने में अहमद ख़ाक़ान क़ुम का वाली था , उसके दरबार में एक दिन अलवियों का तज़किरा छिड़ गया। वह अगरचे दुशमने आले मोहम्मद होने में मिसाली अहमियत रखता था लेकिन यह कहने पर मजबूर हो गया कि मेरी नज़र में इमाम हसन असकरी (अ.स.) से बेहतर कोई नहीं। उनकी जो वक़अत उनके मानने वालों और अराकीने दौलत की नज़र में थी वह उनके अहद में किसी को भी नसीब नहीं हुई। सुनो! एक मरतबा मैं अपने वालिद अबीदुल्लाह इब्ने ख़ाक़ान के पास खड़ा हुआ था कि नागाह दरबान ने आ कर इत्तेला दी कि इमाम हसन असकरी (अ.स.) तशरीफ़ लाए हुए हैं , वह इजाज़ते दाखि़ला चाहते हैं। यह सुन कर मेरे वालिद ने पुकार कर कहा कि हज़रत इब्नुब रज़ा को आने दो। वालिद ने चूंकि कुन्नियत के साथ नाम लिया था इस लिये मुझे सख़्त ताअज्जुब हुआ क्यो कि इस तरह ख़लीफ़ा या वली अहद के अलावा किसी का नाम नहीं लिया जाता था। इसके बाद ही मैंने देखा कि एक साहब जो सब्ज़ रंग , ख़ुश क़ामत , ख़ूब सूरत , नाज़ुक अन्दाम जवान थे , दाखि़ल हुए। जिनके चहरे से रोबो जलाल हुवेदा था। मेरे वालिद की नज़र ज्यों ही उनके ऊपर पड़ी वह उठ खड़े हुए और उनके इस्तेक़बाल के लिये आगे बढ़े और उन्हें सीने से लगा कर उनके चेहरे और सीने का बोसा दिया और अपने मुसल्ले पर उनको बिठा लिया और कमाले अदब से उनकी तरफ़ मुख़ातिब रहे और थोड़ी थोड़ी देर के बाद कहते थे , मेरी जान आप पर क़ुरबान ऐ फ़रज़न्दे रसूल (स अ व व )। इसी असना में दरबान ने आ कर इत्तेला दी कि ख़लीफ़ा का भाई मौफ़िक़ आया है। मेरे वालिद ने कोई तवज्जो न की हालांकि उसका उमूमन यह एज़ाज़ रहता था कि जब तक वापस न चला जाए , दरबार के लोग दो रोया सर झुकाय खड़े रहते थे। यहां तक कि मौफ़ि़क़ के ग़ुलामे ख़ास को उसने अपनी नज़रों से देख लिया। उन्हें देखने के बाद मेरे वालिद ने कहा या इब्ने रसूल अल्लाह (स अ व व ) अगर इजाज़त हो तो मौफ़िक़ से कुछ बातें कर लूं। हज़रत ने वहां से उठ कर रवाना हो जाने का इरादा किया। मेरे वालिद ने उन्हें सीने से लगाया और दरबानों को हुक्म दिया कि उन्हें दो मुकम्मल सफ़ों के दरमियान से ले जाओ कि मौफ़िक़ की नज़र आप पर न पड़े। चुनान्चे हज़रत इसी अन्दाज़ से वापस तशरीफ़ ले गए। आप के जाने के बाद मैंने ख़ादिमों और ग़ुलामों से कहा कि वाए हो तुमने कुन्नियत के साथ किस का नाम ले कर उसे मेरे वालिद के सामने पेश किया था , जिसकी उसने इस दर्जा ताज़ीम की जिसकी मुझे तवक़्क़ो न थी। उन लोगों ने फिर कहा कि यह शख़्स सादाते अलविया में से था। उसका नाम हसन बिन अली और कुन्नियत इब्नुल रज़ा है। यह सुन कर मेरे ग़म व ग़ुस्से की कोई इन्तेहां न रही और मैं दिन भर इसी ग़ुस्से में भुनता रहा कि अलवी सादात की मेरे वालिद ने इतनी इज़्ज़त व तौक़िर क्यो कि , यहां तक कि रात आ गई। मेरे वालिद नमाज़ में मशग़ूल थे। जब वह फ़रीज़ा ए इशा से फ़ारिग़ हुए तो मैं उनकी खि़दमत में हाज़िर हुआ। उन्होंने पूछा , ऐ अहमद ! इस वक़्त आने का क्या सबब है ? मैंने अर्ज़ की कि इजाज़त दीजिए तो कुछ पूछूं। उन्होंने फ़रमाया कि जो जी चाहे पूछो। मैंने कहा यह कौन शख़्स था , जो सुबह आपके पास आया था ? जिसकी आपने ज़बर दस्त ताज़ीम की और हर बात में अपने को और अपने बाप को उस पर से फ़िदा करते थे। उन्होंने फ़रमाया कि ऐ फ़रज़न्द यह राफ़ज़ियों के इमाम हैं। उनका नाम हसन बिन अली और उनकी मशहूर कुन्नियत इब्नुल रज़ा है। यह फ़रमा कर वह थोड़ी देर चुप रहे। फिर बोले ऐ फ़रज़न्द यह वह कामिल इंसान हैं कि अगर अब्बासीयों से सलतन चली जाए तो इस वक़्त दुनियां में इससे ज़्यादा इस हुकूमत का मुस्तहक़ कोई नहीं। यह शख़्स इफ़्फ़त , ज़ोहद , कसरते इबादत , हुस्ने इख़लाक़ , सलाह , तक़वा वग़ैरा में तमाम बनी हाशिम से अफ़ज़ल और आला हैं , और ऐ फ़रज़न्द अगर तू उनके बाप को देखता तो हैरान रह जाता , वह इतने साहबे करम और फ़ाज़िल थे कि उनकी मिसाल भी नहीं थी। यह सब बातें सुन कर मैं ख़ामोश तो हो गया लेकिन वालिद से हद दर्जा नाख़ुश रहने लगा और साथ ही साथ इब्नुल रज़ा के हालात को मालूम करना अपना शेवा बना लिया। इस सिलसिले में मैंने बनी हाशिम , उमरा , लशकर , मुन्शियाने दफ़्तरे क़ज़्ज़ाता और फ़ुक़हा और अवामुन नास से हज़रत के हालात का इस्तेफ़सार किया। सब के नज़दीक हज़रत इब्नुल रज़ा को जलील उल क़द्र और अज़ीम पाया और सबने बिल इत्तेफ़ाक़ यही बयान किया कि इस मरतबे और खू़बियों का कोई शख़्स किसी ख़ानदान में नहीं है। जब मैंने हर दोस्त और दुश्मन को हज़रत के बयाने इख़्लाक़ और इज़हारे मकारमे इख़्लाक़ में मुत्तफ़िक़ पाया तो मैं भी उनका दिल से मानने वाला हो गया और अब उनकी क़द्रो मंज़िलत मेरे नज़दीक़ बे इन्तेहा है। यह सुन कर तमाम अहले दरबार ख़ामोश हो गए। अलबत्ता एक शख़्स बोल उठा कि ऐ अहमद तुम्हारी नज़र में उनके बरादर जाफ़र की क्या हैसियत है ? अहमद ने कहा उनके मुक़ाबले में उसका क्या ज़िक्र करते हो वह तो ऐलानिया फ़िस्क़ व फ़ुजूर का इरतेक़ाब करता था। दाएमुल ख़ुमर था , ख़फ़ीफ़ उल अक़्ल था , अनवाए मलाही व मनाही का मुरतक़िब होता था। इब्नुल रज़ा के बाद जब ख़लीफ़ा मोतमिद से उसने उनकी जा नशीनी का सवाल किया तो उसने उसके किरदार की वजह से दरबार से निकलवा दिया था।(मनाक़िब इब्ने शहरे आशोब जिल्द 5 पृष्ठ 124 व इरशादे मुफ़ीद पृष्ठ 505 ) बाज़ उलेमा ने लिखा है कि यह गुफ़्तुगू इमाम हसन असकरी (अ.स.) की शहादत के 18 साल बाद माहे शाबान 278 हिजरी की है।(दमए साकेबा पृष्ठ 192 जिल्द 3 प्रकाशित नजफ़े अशरफ़)

इमाम हसन असकरी (अ.स.) की दोबारा गिरफ़्तारी

यह एक मुसल्लेमा हक़ीक़त है कि ख़ुल्फ़ाए बनी अब्बासिया ख़ूब जानते थे कि सिलसिला ए आले मोहम्मद (स अ व व ) के वह अफ़राद जो रसूल अल्लाह (स अ व व ) की सही जा नशीनी के मिसदाक़ व हक़दार हो सकते हैं वह वही अफ़राद हैं जिनमें से ग्यारहवीं हस्ती इमाम हसन असकरी (अ.स.) की है। इस लिये उनका फ़रज़न्द वह हो सकता है जिसके बारे में रसूल अल्लाह (स अ व व ) की पेशीन गोई सही क़रार पा सके। लेहाज़ा कोशिश यह थी कि उनकी ज़िन्दगी का दुनिया से ख़ात्मा हो जाए। इस तरह की उनका जा नशीन दुनिया में मौजूद ने हो। यही सबब था कि इमाम हसन असकरी (अ.स.) के लिये नज़र बन्दी पर इक़तेफ़ा नहीं की गई। जो इमाम अली नक़ी (अ.स.) के लिये ज़रूरी समझी गई थी बल्कि आपके लिये अपने घर बार से अलग क़ैद तन्हाई को ज़रूरी समझा गया। यह और बात है कि क़ुदरती इन्तेज़ाम के मातहत दरमियान में इन्के़लाबाते सलतनत के वाक़ए आपकी क़ैदे मुसलसल के बीच में क़हरी रिहाई के सामान पैदा कर दिया करते थे , मगर फिर भी जो बादशाह तख़्त पर बैठता वह अपने पेश रौ के नज़रिये के मुताबिक़ आपको दोबारा मुक़य्यद करने पर तैयार हो जाता था। इस तरह आपकी मुख़्तसर ज़िन्दगी जो दौरे इमामत के बाद थी उसका बेशतर हिस्सा क़ैदो बन्द में ही गुज़रा। इस क़ैद की सख़्ती मोतमिद के ज़माने में बहुत बढ़ गई थी। अगरचे वह मिस्ल दीगर सलातीन के आपके मरतबे और हक़्क़ानियत से ख़ूब वाक़िफ़ था लेकिन फिर भी वह बुग़्ज़े लिल्लाही को छोड़ न सका और दस्तूरे साबिक़ के मुताबिक़ उन्होंने ज़िन्दगी की मंज़िले आखि़र तक पहुँचाने के दरपए रहा। यही वहज है कि वह नज़र बन्दियों से मुतमईन न हो सका और उसने 258 हिजरी में इमाम हसन असकरी (अ.स.) को फिर मुक़य्यद कर दिया।(आलामुल वुरा पृष्ठ 214 ) और अबकी मरतबा चूंकि नियत बिल्कुल ख़राब थी इस लिये क़ैद में भी पूरी सख़्ती की गई। हुक्म था कि आपके साथ किसी क़िस्म की कोई रियायत न की जाए। चुनान्चे यही कुछ होता रहा लेकिन उसे इससे तसल्ली न हुई और उसने अपने एक ज़ालिम खि़दमतगार जिसका नाम ‘‘ नख़रीर ’’ था को बुला कर कहा कि उन्हें तू अपनी निगरानी में ले ले और जिस दर्जा सता सके उन्हें परेशान कर। नख़रीर ने हुक्म पाते ही तशद्दुद शुरू कर दिया। इमाम (अ.स.) को दिन की रौशनी और पानी की फ़रावानी तक से महरूम कर दिया। आपको दिन और रात का पता सूरज की रौशनी से न चलता था सिर्फ़ तारीकी ही रहती थी। एक दिन उसकी बीवी ने उससे दरख़्वास्त की के फ़रज़न्दे रसूल (स अ व व ) है उसके साथ तुम्हारा यह बरताव अच्छा नहीं है। उसने कहा यह क्या है अभी तो उन्हें जानवरों से फड़वा डालना बाकी़ है।

हुज्जते ख़ुदा दरिन्दों में

चुनान्दे उसने इजाज़त हासिल कर के इमाम हसन असकरी (अ.स.) को दरिन्दों मे डाल दिया। शेर और दीगर दरिन्दों की नज़र जब आप पर पड़ी तो उन्होंने हुज्जते ख़ुदा को पहचान लिया और उन्हें फाड़ खाने के बजाए उनके क़दमों पर सर रख दिया इमाम हसन असकरी (अ.स.) ने उनके दरमियान मुसल्ला बिछा कर नमाज़ पढ़ना शुरू कर दिया दुश्मनों ने एक बुलन्द मक़ाम से यह हाल देखा और सख़्त शर्मिन्दा हो कर इमाम (अ.स.) की फ़ज़ीलत का एतेराफ़ किया।(आलामुल वुरा पृष्ठ 218, कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 127, इरशाद मुफ़ीद पृष्ठ 514 )

इस वाक़िये ने आप की दबी हुई फ़ज़ीलत को उभार दिया लोगों में इस करामत का चरचा हो गया अब तो मुतामिद के लिये इस के सिवा कोई चारा न था कि उन्हें जल्द से जल्द इस दारे फ़ानी से रूख़सत कर दे चुनान्चे उसने एक ऐसे क़ैद ख़ाने में आपको मुक़य्यद कर दिया जिसमें रह कर ज़िन्दा रहने से मौत बेहतर है।

इमाम हसन असकरी (अ.स.) की शहादत

इमाम याज़ दहुम ग्यारहवें इमाम हज़रत हसन असकरी (अ.स.) क़ैदो बन्द की ज़िन्दगी गुज़ारने के दौरान में एक दिन अपने ख़ादिम अबुल अदयान से इरशाद फ़रमाते हुए कि तुम जब अपने सफ़रे मदाएन से पन्द्रह दिन के बाद पलटोगे तो मेरे घर से शेवनो बुका की आवाज़ आती होंगी।(जिलाउल उयून , पृष्ठ 299 ) नीज़ आपका यह फ़रमाना भी मन्क़ूल है कि 260 हिजरी में मेरे मानने वालों के दरमियान इन्के़लाबे अज़ीम आयेगा।(दमए साकबे जिल्द 3 पृष्ठ 177 )

अल ग़रज़ इमाम हसन असकरी (अ.स.) को बातारीख़ 1 रबीउल अव्वल 260 हिजरी को मोतमिद अब्बासी ने ज़हर दिलवा दिया और आप 8 रबीउल अव्वल 260 हिजरी को जुमे के दिन ब वक़्ते नमाज़े सुबह खि़लअते हयाते ज़ाहेरी उतार कर ब त फ़े मुल्के जावेदानी रेहलत फ़रमा गए। ‘‘ इन्ना लिल्लाहे व इन्ना इलैहे राजेऊन ’’(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 124 व फ़ुसूल अल महमा व अरजहुल मतालिब पृष्ठ 464 जिलाउल उयून पृष्ठ 296, अनवारूल हुसैनिया जिल्द 3 पृष्ठ 56 )

उलेमा का बयान है कि वफ़ात से क़ब्ल आपने इमाम मेहदी (अ.स.) को तबर्रूकात सिपुर्द फ़रमा दिये थे।(दमए साकेबा जिल्द 3 पृष्ठ 192 )

शहादत के वक़्त आपकी उम्र 28 साल की थी।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 124 )

उलमाए फ़रीक़ैन का इत्तेफ़ाक़ है कि आपने हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) के अलावा कोई औलाद नहीं छोड़ी।(मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 292 व सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 124, नूरूल अबसार , अरजहुल मतालिब पृष्ठ 462, कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 126 व आलामुल वुरा पृष्ठ 218 )

शहादत के बाद

वाक़िए क़हत , दरिन्दों की सजदा रेज़ी और आपकी मज़लूमियत की वजह से हर एक के दिल में आप की वक़अत , आपकी मोहब्बत जा गुज़ी हो चुकी थी। यही वजह है कि आपकी शहादत की ख़बर का शोहरत पाना था कि हर घर से रोने की आवाज़ें आने लगीं। हर दिल में इज़तेराब की लहरे दौड़ने लगीं। शोरो शेवन से सामरा की गलियां क़यामत का मन्ज़र पेश करने लगीं।

अल्लामा मजलिसी लिखते हैं कि इमाम हसन असकरी (अ.स.) के इरशाद के मुताबिक़ जब 15 दिन के बाद अबुल अदयान दाखि़ले सामरा हुए तो आप शहीद हो चुके थे और शेवन व मातम की आवाज़ें बुलन्द थीं।(जिलाउल उयून पृष्ठ 297 )

इमाम शिब्लन्जी लिखते हैं कि आपके इन्तेक़ाल की ख़बर के मशहूर होते ही तमाम सामरा में हल चल मच गई और हर तरफ़ रोने पीटने का शोर बुलन्द हो गया। बाज़ारों में हरताल हो गई , दुकानें बन्द हो गईं। फिर तमाम बनी हाशिम और हाकिमाने क़सास , अरकाने अदालत , अयाने हुकूमत , मुन्शी , क़ाज़ी और आइम्मा ए ख़लाएक़ आपके जनाज़े में शिरकत के लिये दौड़ पड़े। सरमन राय इस दिन क़यामत का नमूना था।(नूरूल अबसार पृष्ठ 168, फुसूल मूहिम्मा , अरजहुल मतालिब पृष्ठ 468 )

ग़रज़ कि निहायत तुज़ुक व एहतेशाम और ज़ाहेरी शानो शौकत के साथ आपका जनाज़ा उठाया गया और उस मुक़ाम पर ले जा कर रखा गया जिस जगह नमाज़ पढ़ाई जाती थी। इतने में मोतमिद के हुक्म से ईसा इब्ने मुतावक्किल जो उमूमन नमाज़े मय्यत पढ़ाया करता था आगे बढ़ा और उसने चेहरे से कफ़न सरका कर बनी हाशिम अलवी व अब्बासी और सब अमीरों , मुन्शियों , क़ाज़ियों ग़रज़ कि कुल अशराफ़ों अयान को दिखाते हुए कहा कि ‘‘ माता हतफ़ अनफ़ा अला फ़राशा ’’ देखो यह अपनी मौत से मरे हैं। यानी इन्हें किसी ने कुछ खिलाया नहीं है।(तज़किरतुल मासूमीन पृष्ठ 229 )

इसके बाद जाफ़रे तव्वाब नमाज़ पढ़ाने के लिये आगे बढ़े , अभी आप तकबीरतुल हराम न कहने पाए थे कि मोहम्मद इब्ने हसन अल क़ायम अल मेहदी (अ.स.) बरामद हो कर सामने आ गए और आपने चचा को हटा कर नमाज़े जनाज़ा पढ़ाई।(जला उल उयून पृष्ठ 292 ) इस के बाद आपको इमाम अली नक़ी (अ.स.) के रौज़ा ए मुबारक में दफ़्न कर दिया गया।(अरजहुल मतालिब पृष्ठ 264 )

यह आपकी ख़ानदानी करामत है कि आपके रौज़े पर ताएर बीट नहीं करते।(दमए साकेबा जिल्द 3 पृष्ठ 179 प्रकाशित नजफ़े अशरफ़)

अल्लामा मजलिसी लिखते हैं कि इमाम हसन असकरी (अ.स.) की तदफ़ीन के बाद इमाम मेहदी (अ.स.) के तजस्सुस में आपके घर की तलाशी ली गई और आपकी औरतों को गिरफ़्तार किया गया। मक़सद यह था कि इमाम मेहदी (अ.स.) को गिरफ़्तार कर के क़त्ल कर दिया जाए ताकि ख़ानदाने रिसालत का ख़ात्मा हो जाए और क़यामत के क़रीब अदलो इन्साफ़ की बस्ती न बसाई जा सके और ज़ालिमों के ज़ुल्म का बदला न लिया जा सके , लेकिन ख़ुदा वन्दे आलम ने अपने वादे ‘‘ वल्लाह मतम नूरा ’’ के मुताबिक़ उन्हें इस ज़ालिम मोतमिद के दस्त रस से महफ़ूज़ कर दिया। अब इन्शा अल्लाह जब हुक्मे ख़ुदा होता तो आप ज़हूर फ़रमायेंगे।(अजल्लाह तआला फ़राजहू)


क़ायमे आले मोहम्मद अबुल क़ासिम हज़रत इमाम मोहम्मद मेहदी ( अ स ) साहेबुज़्ज़मान

है यही ख़ालिक़ की अदालत का तक़ाज़ा दम ब दम

जान लेवा है अगर कोई , तो जां परवर भी हो

छुप के जब जब परदे में बहकाता है इबलीसे लईं

है तक़ाज़ा अद्ल का , परदे में एक रहबर भी हो।।

साबिर थरयानी ‘‘कराची ’’

या इलाही मेहदियम , अज़ ग़ैब आर

त बगरदुद , दर जहाँ अदल आशकार

इमामे ज़माना हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) सिलसिलए अस्मते मोहम्मदिया की चौदहवीं और सिल्के इमामते अलविया की बारहवीं कड़ीं हैं। आपके वालिदे माजिद हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) और वालेदा माजेदा नरजिस ख़ातून 1 थीं।

आप अपने आबाओ अजदाद की तरह इमामे मन्सूस , मासूम , आलमे ज़माना और अफ़ज़ले कायनात हैं। आप बचपन ही में इल्मों हिकमत से भर पूर थे।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 124 )

आपको पांच साल की उम्र में वैसी ही हिकमत दे दी गई थी जैसी हज़रते यहिया को मिली थी , और आप बतने मादर में उसी तरह इमाम क़रार दिये गये थे जिस तरह हज़रत ईसा (अ.स.) नबी क़रार पाये थे।(कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 130 )

आप अम्बिया से बेहतर हैं।(एसआफ़ुल राग़ेबीन पेज न 128 ) आपके मुताअल्लिक़ हज़रत रसूले करीम (स अ व व ) ने बेशुमार पेशीन गोईयां फ़रमाई हैं और इसकी वज़ाहत की है कि आप हुज़ूर की इतरत और हज़रत फ़ात्मा ज़हरा (स अ व व ) की औलाद से होंगे। मुलाहेज़ा हों(जामए सग़ीर सियूती पृष्ठ 160 प्रकाशित मिस्र व मसनद अहमद बिन हम्बल जिल्द 1 पृष्ठ 84 प्रकाशित मिस्र व कन्ज़ुल हक़ाएक़ पृष्ठ 122 व मुस्तदरिक जिल्द 4 पृष्ठ 520 व मिशकात शरीफ़)

आपने यह भी फ़रमाया कि इमाम मेहदी (अ.स.) का ज़ुहूर आखि़र ज़माने में होगा और हज़रते ईसा (अ.स.) उनके पीछे नमाज़ पढ़ेंगे। मुलाहेजा़ हो सही बुख़ारी पारा 1 4 पृष्ठ 399 व सही मुस्लिम जिल्द 2 पृष्ठ 95 सही तिर्मिज़ी पृष्ठ 270 व सही अबू दाऊद जिल्द 2 पृष्ठ 210 व सही इब्ने माजा पृष्ठ 204 व पृष्ठ 209 व जामए सग़ीर पृष्ठ 134 व अनवारूल हक़ाएक़ पृष्ठ 90) आपने यह भी कहा है कि इमाम मेहदी (अ.स.) मेरे ख़लीफ़ा की हैसियत से ज़हूर करेंगे और यख़तमुद्दीन बेही कमा फ़तेह बना जिस तरह मेरे ज़रिये से दीने इस्लाम का आग़ाज़ हुआ उसी तरह उनके ज़रिये से मुहरे एख़तेताम लगा दी जायेगी। मुलाहेज़ा हो कन्ज़ुल हक़ाएक़ पृष्ठ 209 । आपने इसकी भी वज़ाहत फ़रमाई है कि इमाम मेहदी (अ.स.) का असल नाम मेरे नाम की तरह मोहम्मद और कुन्नियत मेरी कुन्नियत की तरह अबुल का़सिम होगी। वह जब ज़हूर करेंगे तो सारी दुनिया को अदल व इन्साफ़ से उसी तरह पुर कर देंगे जिस तरह वह उस वक़्त ज़ुल्म व जौर से भरी होगी। मुलाहेज़ा हो , जामए सग़ीर पृष्ठ 104 व मुस्तदरिक इमाम हाकिम पृष्ठ 422 व 495 । ज़हूर के बाद उनकी फ़ौरन बैअत करनी चाहिये क्यों कि वह ख़ुदा के ख़लीफ़ा होंगे।(सनन इब्ने माजा उर्दू पृष्ठ 261 प्रकाशित किराची 1377 हिजरी)

हाशिया : 1. नरजिस एक यमनी बूटी को कहते हैं जिसके फूल की शोअरा आंखों से तशबीह देते हैं।(अल मुंजद पृष्ठ 835 ) मुन्तहुल अदब जिल्द 4 पृष्ठ 2227 में है कि यह जुमला दख़ील और मआरब यानी किसी दूसरी ज़बान से लाया गया है। सराह पृष्ठ 425 और अल मआत सिद्दीक़ हसन पृष्ठ 47 में है कि यह लफ़्ज़ नरजिस , नरगिस से मआरब है जो कि फ़ारसी है। रिसाला आजकल लखनऊ के सालनामा 1947 ई. के पृष्ठ 118 में है कि यह लफ़्ज़ यूनानी नरकोस से मआरब है। जिसे लातीनी में नरकसस और अंग्रेज़ी में नरसेसिस कहते हैं।

हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) की विलादत ब सआदत

मुवर्रेख़ीन का इत्तेफ़ाक़ है कि आपकी विलादत ब सअदत 15 शाबान 225 हिजरी यौमे जुमा बवक़्ते तुलूए फ़जर वाक़े हुई है। जैसा कि दफ़यातुल अयान , रौज़तुल अहबाब , तारीख़ इब्नुल वरदी , नियाबुल मोवद्दता ,, तारीख़े कामिल , तबरी , कशफ़ुल ग़म्मा , जिलाउल उयून , उसूले काफ़ी ,, नूरूल अबसार , इरशाद , जामए अब्बासी , आलामु वुरा और अनवारूल हुसैनिया वग़ैरा में मौजूद है।

बाज़ उलेमा का कहना है कि विलादत का सन् 256 हिजरी और माद्दए तारीख़ नूर है। यानी आप शबे बराअत के एख़तेताम पर बवक़्ते सुबहे सादिक़ आलमे ज़हूर व शहूद में तशरीफ़ लाये हैं।

हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) की फुफी जनाबे हकीमा ख़ातून का बयान है कि एक रोज़ मैं हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) के पास गई तो आपने फ़रमाया कि ऐ फुफी आप आज हमारे ही घर में रहिये , क्यों कि ख़ुदा वन्दे आलम मुझे आज एक वारिस अता फ़रमायेगा। मैंने कहा यह फ़रज़न्द किस के बतन से होगा ? आपने फ़रमाया कि बतने नरजिस से मुतावल्लिद हो गा। जनाबे हकीमा ने कहा ! बेटे मैं तो नरजिस में कुछ भी हमल के आसार नहीं पाती , इमाम (अ.स.) ने फ़रमाया कि ऐ फुफी नरजिस की मिसाल मादरे मूसा जैसी है , जिस तरह हज़रते मूसा का हमल विलादत के वक़्त से पहले ज़ाहिर नहीं हुआ उसी तरह मेरे फ़रज़न्द का हमल भी बर वक़्त ज़ाहिर होगा। ग़रज़ कि इमाम के फ़रमाने से उस वक़्त वहीं रही। जब आधी रात गुज़र गई तो मैं उठी और नमाज़े तहज्जुद में मशग़ूल हो गई , और नरजिस उठ कर नमाज़े तहज्जुद पढ़ने लगी। उसके बाद मेरे दिल में यह ख़्याल गुज़रा कि सुबह क़रीब है और इमाम हसन असकरी (अ.स.) ने जो कहा था वह अभी तक ज़ाहिर नहीं हुआ। इस ख़्याल के दिल में आते ही इमाम (अ.स.) ने अपने हुजरे से आवाज़ दी , ऐ फुफी ! जल्दी न किजिये , हुज्जते ख़ुदा के ज़हूर का वक़्त बिलकुल क़रीब है। यह सुन कर मैं नरजिस के हुजरे की तरफ़ पलटी , नरजिस मुझे रास्ते में ही मिलीं , मगर उनकी हालत उस वक़्त मुताग़य्यर थी। वह लरज़ा बर अन्दाम थीं और उनका सारा जिस्म कांप रहा था।(अल बशरा , शराह मोअद्दतुल क़ुरबा पृष्ठ 139 )

मैंने यह देख कर उनको अपने सीने से लिपटा लिया और सूरा ए क़ुल हो वल्लाह , इन्ना अनज़लना व आयतल कुरसी पढ़ कर उन पर दम किया। बतने मादर से बच्चे की आवाज़ आने लगी , यानी मैं जो कुछ पढ़ती थी वह बच्चा भी बतने मादर में वही कुछ पढ़ता था। उसके बाद मैंने देखा कि तमाम हुजरा रौशन व मुनव्वर हो गया। अब जो मैं देखती हूं तो एक मौलूद मसऊद ज़मीन पर सजदे में पड़ा हुआ है। मैंने बच्चे को उठा लिया। हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) ने अपने हुजरे से आवाज़ दी ऐ फुफी ! मेरे फ़रज़न्द को मेरे पास लाईये। मैं ले गई , आपने उसे अपनी गोद में बिठा लिया और ज़बान दर दहाने वै क़रद और अपनी ज़बान बच्चे के मूँह में दे दी और कहा कि ऐ फ़रज़न्द , ख़ुदा के हुक्म से बात करो , बच्चे ने इस आयत बिस्मिल्लाह हिर रहमानिर रहीम व नर यदान नमन अल्ल लज़ीना असतज़अफ़रा फ़िल अर्ज़ व नजअल हुम अल वारीसैन की तिलावत की जिसक तरजुमा यह है , कि हम चाहते हैं कि एहसान करें उन लोगों पर जो ज़मीन पर कमज़ोर कर दिये गए हैं और उनको इमाम बनायें और उन्हीं को रूए ज़मीन का वारिस क़रार दें।

इसके बाद कुछ सब्ज़ तारों ने आकर हमें घेर लिया , इमाम हसन असकरी (अ.स.) ने उन मे से एक तारे को बुलाया और बच्चे को देते हुए कहा ख़दह फ़ा हिफ़ज़हू इसको ले जा कर इसकी हिफ़ाज़त करो यहां तक कि ख़ुदा इसके बारे में कोई हुक्म दे। क्यो कि ख़ुदा अपने हुक्म को पूरा कर के रहेगा। मैंने इमाम हसन असकरी (अ.स.) से पूछा कि यह तारा कौन था और दूसरे तारे कौन थे ? आपने फ़रमाया कि यह जिब्राईल थे और वह दूसरे फ़रिश्तगाने रहमत थे। इसके बाद फ़रमाया कि ऐ फुफी इस फ़रज़न्द को उसकी माँ के पास ले आओ ताकि उसकी आंखें खुनुक हों और महजून व मग़मूम न हो और यह जान ले कि ख़ुदा का वादा हक़ है। व अकसरहुम ला यालमून लेकिन अकसर लोग इसे नहीं जानते इसके बाद इस मौलूदे मसऊद को उसकी माँ के पास पहुँचा दिया गया।(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 212 प्रकाशित लखनऊ 1905 0 )

अल्लामा हायरी लिखते हैं कि विलादत के बाद आपको जिब्राईल परवरिश के लिये उड़ा ले गये।(ग़ायतुल मक़सूद जिल्द 1 पृष्ठ 75 )

किताब शवाहेदुन नबूवत और वफ़यातुल अयान व रौज़ातुल अहबाब में है कि जब आप पैदा हुए तो मख़्तून और नाफ़ बुरीदा थे और आपके दाहिने बाज़ू पर यह आयत मन्कूश थी। जाअल अक़्क़ो वा ज़ाहाक़ल बातिल इन्नल बातेला काना ज़हूक़ा यानी हक़ आया और बातिल मिट गया और बातिल मिटने ही के का़बिल था। यह क़ुदरती तौर पर बहरे मुताक़ारिब के दो मिसरे बन गये हैं। हज़रत नसीम अमरोहवी ने इस पर क्या ख़ूब तज़मीन की है। वह लिखते हैं

चश्मो , चराग़ दीदए नरजिस

ऐने ख़ुदा की आँख का तारा

बदरे कमाल , नीमए शाबान

चौदहवां अख़्तर औज बक़ा का

हामिए मिल्लत माहिए बिदअत

कुफ्र मिटाने ख़ल्क़ में आया

वक़्ते विलादत माशा अल्लाह

कु़रआन सूरत देख के बोला

जाअल अक़्क़ो वल हक़्क़ुल बातिल

इन्नल बातेला काना ज़हुक़ा

मोहद्दिस देहलवी शेख़ अब्दुल हक़ अपनी किताब मनाक़िबे आइम्मा अतहार में लिखते हैं कि हकीमा ख़ातून जब नरजिस के पास आईं तो देखा कि एक मौलूद पैदा हुआ है। जो मख़तून और मफ़रूग़ मुंह है यानी जिसका ख़तना किया हुआ है और नहलाने धुलाने के कामों से जो मौलूद के साथ होते हैं बिलकुल मुसतग़नी है। हकीमा ख़ातून बच्चे को इमाम हसन असकरी (अ.स.) के पास लाईं , इमाम ने बच्चे को लिया और उसकी पुश्ते अक़दस और चश्मे मुबारक पर हाथ फेरा। अपनी ज़बाने मुतहत उनके मुंह में डाली और दाहिने कान में अज़ान और बाएं में अक़ामत कही। यही मज़मून फ़सल अल ख़त्ताब और बेहारूल अनवार में भी है। किताब रौज़तुल अहबाब और नियाबुल मोवद्दता में है कि आपकी विलादत बमुक़ाम सरमन राय ‘‘सामरह मे हुई है।

किताब कशफ़ल ग़म्मा पृष्ठ 120 में है कि आपकी विलादत छिपाई गई और पूरी सई की गई कि आपकी पैदाईश किसी को मालूम न हो सके। किताब दमए साकेबा जिल्द 3 पृष्ठ 194 में है कि आपकी विलादत इस लिये छिपाई गई कि बादशाहे वक़्त पूरी ताक़त के साथ आपकी तलाश में था। इस किताब के पृष्ठ 192 में है कि इसका मक़सद यह था कि हज़रते हुज्जत को क़त्ल कर के नस्ले रिसालत का ख़ात्मा कर दे।

तारीख़े अबूल फ़िदा में है कि बादशाहे वक़्त मोतज़ बिल्लाह था। तज़किरए ख़वासुल उम्मता में है कि उसी के अहद में इमाम अली नकी़ (अ.स.) को ज़हर दिया गया था। मोतज़ के बारे में मुवर्रेख़ीन की राय कुछ अच्छी नहीं है। तरजुमा तारीख़ अल खुलफ़ा अल्लामा सियूती के पृष्ठ 363 में है कि उसने अपनी खि़लाफ़त में अपने भाई को वली अहदी से माज़ूल करने के बाद कोड़े लगवाये थे और ता हयात क़ैद में रखा था। अकसर तवारीख़ में है कि बादशाहे वक़्त मोतमिद बिन मुतावक्किल था जिसने इमाम हसन असकरी (अ.स.) को ज़हर से शहीद किया। तारीख़े इस्लाम जिल्द 1 पृष्ठ 67 में है कि ख़लीफ़ा मोतमिद बिन मुतावक्किल कमज़ोर मतलून मिज़ाज और ऐश पसन्द था। यह अय्याशी और शराब नोशी में बसर करता था। इसी किताब के पृष्ठ 29 में है कि मोतमिद हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) को ज़हर से शहीद करने के बाद हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) को क़त्ल करने के दरपए हो गया था।

आपका नसब नामा

आपका पदरी नसब नामा यह है। मोहम्मद बिन हसन बिन अली बिन मोहम्मद बिन अली इब्ने मूसा इब्ने जाफ़र बिन मोहम्मद बिन अली बिन हुसैन बिन अली व फ़ात्मा बिन्ते रसूल अल्लाह (स अ व व ) यानी आप फ़रज़न्दे रसूल (स अ व व ) , दिल बन्दे अली (अ.स.) और नूरे नज़र बुतूल (स अ व व ) हैं। इमाम अहमद बिन हम्बल का कहना है कि इस सिलसिलाए नसब के असमा को अगर किसी मजनून पर दम कर दिया जाए तो उसे यक़ीनन शिफ़ा हासिल होगी।(मसनद इमाम रज़ा पृष्ठ 7 ) आपका सिलसिलाए नसब मां की तरफ़ से हज़रत शमऊन बिन हमून अल सफ़आ वसी हज़रत ईसा तक पहुँचता है।

अल्लामा मजलिसी और अल्लामा तबरी लिखते हैं कि आपकी वालेदा जनाब नरजिस ख़ातून थीं। जिनका नाम मलीका भी था। नरजिस ख़ातून यशूआ की बेटी थीं जो राम के बादशाह क़ैसर के फ़रज़न्द थे सिनका सिलसिलाए नसब वसीए हज़रते ईसा (अ.स.) जनाब शमऊन तक पहुँचता है। 13 साल की उम्र मे क़ैसरे रोम ने चाहा था कि नरजिस का अक़्द अपने भतीजे से कर दे लेकिन बाज़ क़ुदरती कु़दरती हालात की वजह से वह इस मक़सद में कामयाब न हो सका। बिल आखि़र एक ऐसा वक़्त आ गया कि आलमे अरवाह में हज़रते ईसा (अ.स.) , जनाबे शमऊन हज़रते मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) जनाबे अमीरल मोमेनीन (अ.स.) और जनाबे फ़ात्मा (स अ व व ) बमक़ाम क़सरे क़ैसर जमा हुए। जनाबे सय्यदा(स. अ.) ने नरजिस ख़ातून को इस्लाम की तलक़ीन की और आं हज़रत (स अ व व ) बतवस्सुत हज़रत ईसा (अ.स.) जनाबे शमऊन से इमाम हसन असकरी (अ.स.) के लिये नरजिस ख़ातून की ख़्वास्गारी की , निस्बत की तकमील के बाद हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) ने एक नूरी मिम्बर पर बैठ कर अक़्द पढ़ा और कमाले मसर्रत के साथ यह महफ़िले निशात बरख़्वास्त हो गई। जिसकी इत्तेला जनाबे नरजिस को ख़्वाब के तौर पर हुई। बिल आखि़र वह वक़्त आया कि जनाबे नरजिस ख़ातून हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) की खि़दमत में आ पहुँची और आपके बतने मुबारक से नूरे ख़ुदा का ज़हूर हुआ।(किताब जिलाउल उयून पृष्ठ 298 व ग़ाएतुल मक़सूद पृष्ठ 175 )

आपका इस्मे गिरामी

आपका नामे नामी व इस्मे गिरामी मोहम्मद और मशहूर लक़ब मेहदी है। उलेमा का कहना है कि आपका नाम ज़बान पर जारी करने की मुमानिअत है।

अल्लामा मजलिसी इसकी ताईद करते हुए फ़रमाते हैं कि हिकमत आन मख़्फ़ी अस्त इसकी वजह पोशीदा और ग़ैर मालूम है।(जिलाउल उयून)

उलेमा का बयान है कि आपका यह नाम खुद हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) ने रखा था। मुलाहेज़ा हो रोज़ातुल अहबाब व नियाबुल मोअद्दता।

मुवर्रिख़े आज़म मिस्टर जा़किर हुसैन तारीखे़ इस्लाम जिल्द 1 पृष्ठ 31 में लिखते हैं कि आं हज़रत (स अ व व ) ने फ़रमाया कि मेरे बाद बारह 12 ख़लीफ़ा क़ुरैश से होंगे। आपने फ़रमाया कि आखि़री ज़माने में जब दुनिया ज़ुल्मो जौर से भर जायेगी , तो मेरी औलाद में से मेहदी का ज़हूर होगा जो ज़ुल्मो जौर को दूर कर के दुनिया को अदलो इन्साफ़ से भर देगा। शिर्क व कुफ़्र को दुनिया से नाबूद कर देगा। नाम मोहम्मद और लक़ब मेहदी होगा। हज़रत ईसा (अ.स.) आसमान से उतर कर उसकी नुसरत करेंगे और उसके पीछे नमाज़ पढ़ेंगे और दज्जाल को क़त्ल करेंगे।

आपकी कुन्नियत

इस पर उलमाए फ़रीक़ैन का इत्तेफ़ाक़ है कि आपकी कुन्नियत अबुल का़सिम और अबू अब्दुल्लाह थी और इस पर भी उलेमा मुत्तफ़िक़ हैं कि अबुल क़ासिम कुन्नियत ख़ुद सरवरे कायनात की तजवीज़ करदा है। हुलाहेजा़ हां(जामेए सग़ीर पृष्ठ 104, तज़किराए ख़वास अल उम्मता , पृष्ठ 204, रौज़तुल शोहदा पृष्ठ 439, सवाऐक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 134, शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 312, कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 130, जिलाउल उयून पृष्ठ 298 )

यह मुसल्लेमात से है कि आं हज़रत (स अ व व ) ने इरशाद फ़रमाया है कि मेहदी का नाम मेरा नाम और उनकी कुन्नियत मेरी कुन्नियत होगी। लेकिन इस रवायत में बाज़ अहले इस्लाम ने यह इज़ाफ़ा किया है कि आं हज़रत (स अ व व ) ने यह भी फ़रमाया है कि मेहदी के बाप का नाम मेरे वालिदे मोहतरम का नाम होगा। मगर हमारे रावियों ने इसकी रवायत नहीं की और ख़ुद तिरमिज़ी शरीफ़ में भी इस्मे अबीहा इस्मे अबी नहीं है। ताहम बक़ौल साहेबुल मनाक़िब अल्लामा कन्जी शाफ़ेई यह कहा जा सकता है कि रवायत में लफ़्ज़ अबीहा से मुराद अबू अब्दुल्लाह अल हुसैन हैं यानी इससे इस अम्र की तरफ़ इशारा है कि इमाम मेहदी (अ.स.) हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) की औलाद से हैं।

आपके अलक़ाब

आपके अलक़ाब मेहदी , हुज्जत उल्लाह , ख़लफ़े अलसालेह , साहेबुल असर व साहेबुल अमर वल ज़मान , अल क़ायम , अल बाक़ी और अल मुन्तज़र हैं। मुलाहेज़ा हो तज़किराए ख़वासुलमता पृष्ठ 204 , रौज़ातुल शोहदा पृष्ठ 439 , कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 131 सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 124 , मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 294 , आलामु वुरा पृष्ठ 24 हज़रत दानियाल नबी ने हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) की विलादत से 1420 साल पहले आप का लक़ब मुन्तज़िर क़रार दिया है। मुलाहेज़ा हो किताब व दानियाल बाब 12 आएत 12 । अल्लामा इब्ने हजर मक्की अल मुन्तज़िर की शरह करते हुए लिखते हैं कि उन्हें मुन्तज़िर यानी जिसका इन्तेज़ार किया जाए इस लिये कहते हैं कि वह सरदाब में गा़एब हो गए हैं और यह मालूम नहीं होता कि कहां चले गए। मतलब यह है कि लोग उनका इन्तेज़ार कर रहे हैं। शैख़ अल ऐराक़ैन अल्लामा शैख़ अब्दुल रसा तहरीर फ़रमाते हैं कि आपको मुन्तज़र इस लिये कहते हैं कि आप की ग़ैबत की वजह से आपके मुख़लिस आपका इन्तेज़ार कर रहे हैं। मुलाहेज़ा हो।(अनवारूल हुसैनिया जिल्द 2 पृष्ठ 57 प्रकाशित बम्बई)

आपका हुलिया मुबारक

किताब अक्मालुद्दीन में शेख़ सदूक़ तहरीर फ़रमाते हैं कि सरवरे काएनात (स अ व व ) का इरशाद है कि इमाम मेहदी (अ.स.) शक्ल व शबाहत ख़ल्क़ व ख़लक़ ख़साएल , अक़वाल व अफ़आल में मेरे मुशाबे होंगे। आपके हुलिये के मुताअल्लिक़ उलमा ने लिखा है कि आपका रंग गन्दुम गून , क़द मियाना है। आपकी पेशानी खुली हुई और आपके अबरू घने और बाहम पेवस्ता हैं , आपकी नाक बारीक और बुलन्द है आपकी आंखें बड़ी और आपका चेहरा नेहायत नूरानी है। आपके दाहिने रूख़सार पर एक तिल है कानहू कौकब दुर जो सितारे की मानिन्द चमकता है। आपके दांत चमकदार खुले हुए हैं आपकी ज़ुल्फ़ें कन्धों तक बड़ी रहती हैं। आपका सीना चौड़ा और आपके कन्धे खुले हुए हैं। आपकी पुश्त पर इसी तरह की मुहरे इमामत सब्त है जिस तरह पुश्ते रिसालत माब (स अ व व ) पर मुहरे नबूअत सबत थी।(अलाम अल वरा पृष्ठ 265, व ग़ाएत अल मक़सूद जिल्द 1 पृष्ठ 64, नूरूल अबसार पृष्ठ 152 )

तीन साल की उम्र में हुज्जतुल्लाह होने का दावा

किताब तवारीख़ व सैर से मालूम होता है कि आप की परवरिश का काम जनाबे जिब्राईल (अ.स.) के सिपुर्द था और वही आपकी परवरिश व परदाख्त करते थे। ज़ाहिर है कि जो बच्चा विलादत के वक़्त कलाम कर चुका हो और जिसकी परवरिश जिब्राईल जैसे मुक़र्रब फ़रिश्ते के सिपुर्द हो वह यक़ीनन दुनियां में चन्द दिन गुज़ारने के बाद बहरे सूरत इस सलाहियत का मालिक हो सकता है कि वह अपनी ज़बान से हुज्जतुल्लाह होने का दावा कर सके।

अल्लामा अरबली लिखते हैं अहमद इब्ने इसहाक़ और साद अल अशकरी एक दिन हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) की खि़दमत में हाज़िर हुए और उन्होंने ख़्याल किया कि आज इमाम (अ.स.) से यह दरयाफ़्त करेंगे कि आप के बाद हुज्जतुल्लाह फ़िल अर्ज़ कौन होगा। जब सामना हुआ तो इमाम हसन असकरी (अ.स.) ने फ़रमाया कि ऐ अहमद ! तुम जो दिल में ले कर आये हो मैं उसका जवाब तुम्हे देता हूँ , यह फ़रमा कर आप अपने मक़ाम से उठे और अन्दर जा कर यूं वापस आये कि आप के कंधे पर एक नेहायत ख़ूब सूरत बच्चा था जिसकी उम्र तीन साल की थी। आपने फ़रमाया ऐ अहमद ! मेरे बाद हुज्जते ख़ुदा यह होगा। इसका नाम मोहम्मद और इसकी कुन्नियत अबुल क़ासिम है यह खि़ज़्र की तरह ज़िन्दा रहेगा और ज़ुलक़रनैन की तरह सारी दुनियां पर हुकूमत करेगा। अहमद इब्ने इसहाक़ ने कहा मौला ! कोई ऐसी अलामत बता दीजिए कि जिससे दिल को इत्मीनाने कामिल हो जाए। आपने इमाम मेहदी (अ.स.) की तरफ़ मुतावज्जा हो कर फ़रमाया , बेटा इसको तुम जवाब दो। इमाम मेहदी (अ.स.) ने कमसिनी के बवजूद बज़बाने फ़सीह फ़रमाया अना हुज्जतुल्लाह व अना बक़ीयतुल्लाह मैं ही ख़ुदा की हुज्जत और हुक्मे ख़ुदा से बाक़ी रहने वाला हूँ। एक वह दिन आयेगा जिसमे मैं दुश्मनाने ख़ुदा से बदला लूंगा , यह सुन कर अहमद ख़ुश व मसरूय व मुतमईन हो गए।(कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 138 )

पांच साल की उम्र मे ख़ासुल ख़ास असहाब से आपकी मुलाक़ात

याक़ूब बिन मनक़ूस व मोहम्मद बिन उस्मान उमरी व अबी हाशिम जाफ़री और मूसा बिन जाफ़र बिन वहब बग़दादी का बयान है कि हम हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) की खि़दमत में हाज़िर हुए और हम ने अर्ज़ कि मौला ! आपके बाद अमरे इमामत किस के सुपुर्द होगा और कौन हुज्जते ख़ुदा क़रार पाऐगा। आपने फ़रमाया कि मेरा फ़रज़न्द मोहम्मद मेरे बाद हुज्जतुल्लाह फ़िल अर्ज़ होगा। हम ने अर्ज़ कि मौला हमे उनकी ज़ियारत करा दीजीए। आपने फ़रमाया वह पर्दा जो सामने आवेख़्ता है उसे उठाओ। हम ने पर्दा उठाया तो उस से एक नेहायत ख़ूब सूरत बच्चा जिसकी उमर पाँच साल थी बरामद हुआ और वह आ कर इमाम हसन असकरी (अ.स.) की आग़ोश में बैठ गया। यही मेरा फ़रज़न्द मेरे बाद हुज्जतुल्लाह होगा। मोहम्मद बिन उस्मान का कहना है कि हम इस वक़्त चालीस अफ़राद थे और हम सब ने उनकी ज़ियारत की। इमाम हसन असकरी (अ.स.) ने अपने फ़रज़न्द इमाम मेहदी (अ.स.) को हुक्म दिया कि वह अन्दर चले जाएं और हम से फ़रमाया शुमा ऊरा नख़्वही दीद ग़ैर अज़ इमरोज़ कि अब तुम आज के बाद फिर उसे न देख सकोगे। चुनान्चे ऐसा ही हुआ फिर ग़ैबत शुरू हो गई।।(कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 139 व शवाहेदुन नबूअत पृष्ठ 213 )

अल्लामा तबरसी किताब आलामुल वुरा के पृष्ठ 243 में तहरीर फ़रमाते हैं कि आइम्मा के नज़दीक मोहम्मद और उसमान उमरी दोनों सुक़ह हैं। फिर इसी सफ़ह पर तहरीर फ़रमाते हैं कि अबू हारून का कहना है कि मैंने बचपन में साहेबुज़्ज़मान को देखा है। ‘‘कानहू अलक़मर लैलता अलबदर इनका चेहरा चौदवीं रात के चांद की तरह चमकता था।

इमाम मेहदी (अ.स.) नबूवत के आईने में

अल्लामा तबरसी बहवाला हज़रात मासूमीन (अ.स.) तहरीर फ़रमाते हैं कि हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) में बहुत से अम्बिया के हालात व कैफ़ियात नज़र आते हैं और जिन वाक़ेयात से मुख़तलिफ़ अम्बिया को दो चार होना पड़ा वह तमाम वाक़ियात आपकी ज़ात सतूदा पेज न.त में दिखाई देते हैं। मिसाल के लिए हज़रत नूह (अ स ) , हज़रत इब्राहीम (अ.स.) हज़रत मूसा (अ.स.) हज़रत ईसा (अ.स.) हज़रत अय्यूब (अ.स.) हज़रत युनूस (अ.स.) हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) को ले लीजिए और उनके हालात पर ग़ौर कीजिए। आपको हज़रत नूह (अ.स.) की तवील ज़िन्दगी नसीब होगी। हज़रत इब्राहीम (अ.स.) की तरह आपकी विलादत छिपाई गई और लोगों से किनारा कश हो कर रूपोश होना पड़ा। हज़रत मूसा (अ.स.) की तरफ हुज्जत के ज़मीन से उठ जाने का ख़ौफ़ ला हक़ हुआ और उन्ही कि विलादत की तरह आपकी विलादत भी पोशीदा रखी गई और उन्हीं के मानने वालों की तरह आपके मानने वालों को आपकी ग़ैबत के बाद सताया गया। हज़रत ईसा (अ.स.) की तरह आपके बारे में लोगों ने इख़्तेलाफ़ किया। हज़रत अय्यूब (अ.स.) की तरह तमाम इम्तेहानात के बाद आपकी फ़र्ज़ व कशाइश नसीब होगी। हज़रत युसुफ़ (अ.स.) की तरह अवाम व ख़वास से आपकी ग़ैबत होगी। हज़रत यूनुस (अ.स.) की तरह ग़ैबत के बाद आपका ज़हूर होगा। यानी जिस तरह वह अपनी क़ौम से ग़ाएब हो कर बुढ़ापे के बावजूद नौजवान थे उसी तरह आपका जब ज़हूर होगा तो आप चालीस साल के जवान होंगे और हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) की तरह आप साहेबुल सैफ़ होंगे।(आलामु वुरा पृष्ठ 264 प्रकाशित बम्बई 1312 हिजरी)

इमाम हसन असकरी (अ.स.) की शहादत

इमाम मेहदी (अ.स.) की उम्र अभी सिर्फ़ पाँच साल की हुई थी कि ख़लीफ़ा मोतमिद बिन मुतावक्किल अब्बासी ने मुद्दतों क़ैद रखने के बाद इमाम हसन असकरी (अ.स.) को ज़हर दे दिया जिसकी वजह से आप बतारीख़ 8 रबीउल अव्वल 260 हिजरी मुताबिक़ 873 ब उम्र 28 साल रेहलत फ़रमा गए। वख़ल मन अलविदा बनहूमोहम्मदन और आपने औलाद में सिर्फ़ इमाम मेहदी (अ.स.) को छोड़ा।(नुरूल अबसार पृष्ठ 53, दमए साकेबा पृष्ठ 191 )

अल्लामा शिब्लन्जी लिखते हैं कि जब आपकी शहादत की ख़बर मशहूर हुई तो सारे शहर सामरा में हलचल मच गई। फ़रयादो फ़ुग़ां की आवाज़ बुलन्द हो गई , सारे शहर में हड़ताल कर दी गई यानी सारी दुकाने बन्द हो गईं लोगों ने अपने करोबार छोड़ दिये। तमाम बनी हाशिम हुक्कामे दौलत , मुन्शी काज़ी अरकान अदालत , अयान हुकूमत और आम ख़लाएक़ हज़रत के जनाज़े के लिये दौड़ पड़े। हालत यह थी कि शहर सामरा क़यामत का मन्ज़र पेश कर रहा था। तजहीज़ और नमाज़ से फ़राग़त के बाद आपको इसी मकान में दफ़्न कर दिया गया जिस में इमाम अली नक़ी (अ.स.) मदफ़ून थे।(नुरूल अबसार पृष्ठ 152 व तारीख़े कामिल सवाएक़े मोहर्रेक़ा व फ़सूल महमा , जिला अल उयून पृष्ठ 296 )

अल्लामा मोहम्मद बाक़िर तहरीर फ़रमाते हैं कि इमाम हसन असकरी (अ.स.) की वफ़ात के बाद नमाज़े जनाज़ा हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) ने पढ़ाई। मुलाहेज़ा हो ,(दमए साकेबा जिल्द 3 पृष्ठ 192 व जिला अल उयून पृष्ठ 297 )

अल्लामा तबरसी लिखते हैं कि नमाज़ के बाद आप को बहुत से लोगों ने देखा और आपके हाथों का बोसा दिया।(आलामुल वुरा पृष्ठ 242 ) अल्लामा इब्ने ताऊस का इरशाद है कि 8 रबीउल अव्वल को इमाम हसन असकरी (अ.स.) की वफ़ात वाक़ेए हुई और 9 रबीउल अव्वल से हज़रत हुज्जत (अ.स.) की इमामत का आग़ाज़ हुआ। हम 9 रबीउल अव्वल को जो ख़ुशी मनाते हैं इसकी एक वजह यह भी है।(किताब इक़बाल) अल्लामा मजलिसी लिखते हैं 9 रबीउल अव्वल को उमर बिन साद ब दस्ते मुख़्तार आले मोहम्मद का क़त्ल हुआ।(ज़ाद अल माद पृष्ठ 585 ) जो उबैदुल्लहा इब्ने ज़्याद का सिपह सालार था , जिसके क़त्ल के बाद आले मोहम्मद (स अ व व ) ने पूरे तौर पर ख़ुशी मनाई।(बेहारूल अनवार मुख़तार आले मोहम्मद) किताब दमए साकेबा के पृष्ठ 192 में है कि हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) ने 259 में अपनी वालेदा को हज के लिये भेज दिया था और फ़रमा दिया था कि 260 हिजरी में मेरी शहादत हो जायेगी। इसी सिन में आपने हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) को जुमला तबरूकात दे दिये थे और इस्में आज़म वग़ैरा तालीम कर दिया था।(दमए साकेबा व जिला अल उयून पृष्ठ 298 ) उन्हीं तबरूकात में हज़रत अली (अ.स.) का जमा किया हुआ वह क़ुरान भी था जो तरतीब नुज़ूल पर सरवरे काएनात की ज़िन्दगी में मुरत्तब किया गया था।(तारीख़ अल ख़ुलफ़ा व अनफ़ान) और जिसे हज़रत अली (अ.स.) ने अपने अहदे खि़लाफ़त में भी इस लिये राएज न किया था कि इस्लाम में दो क़ुरआन रवाज पा जायेंगे और इस्लाम में तफ़रेक़ा पड़ जायेगा।(अज़ाता अल ख़फ़ा पृष्ठ 273 ) मेरे नज़दीक इस सन् में हज़रत नरजिस ख़ातून का इन्तेक़ाल हुआ है और इसी सन् में हज़रत ने ग़ैबत इख़्तेयार फ़रमाई है।

हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) की ग़ैबत और उसकी ज़रूरत

बादशाहे वक़्त ख़लीफ़ा मोतमिद बिन मुतावक्किल अब्बासी जो अपने आबाव अजदाद की तरह ज़ुल्म का ख़ूगर और आले मोहम्मद (अ.स.) का जानी दुश्मन था उसके कानों में मेहदी (अ.स.) की विलादत की भनक पड़ चुकी थी। उसने हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) की शहादत के बाद तकफ़ीन व तदफ़ीन से पहले बक़ौल अल्लामा मजलिसी हज़रत के घर पर पुलिस का छापा डलवाया और चाहा कि इमाम मेहदी (अ.स.) को गिरफ़्तार करा ले लेकिन चुकि वह बहुक्मे ख़ुदा 23 रमज़ानुल मुबारक 259 हिजरी को सरदाब में जा कर ग़ायब हो चुके थे। जैसा कि शवाहेदुन नबूवत , नुरूल अबसार , दमए साकेबा , रौज़तुस शोहदा , मनाक़िब अल आइम्मा , अनवारूल हुसैनिया वग़ैरा से मुुस्तफ़ाद मुस्तबज़ होता है इसी लिये वह उसे दस्तयाब न हो सके। उसने उसके रद्दे अमल में हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) की तमाम बीबीयों को गिरफ़्तार करा लिया और हुक्म दिया कि इस अमर की तहक़ीक़ की जाये कि आया कोई उनमें से हामेला तो नहीं है , अगर कोई हामेला हो तो उसका हमल ज़ाया कर दिया जाए। क्यों कि वह हज़रते सरवरे कायनात (स अ व व ) की पेशीन गोई से ख़ाएफ़ था कि आख़री ज़माने में मेरा एक फ़रज़न्द जिसका नाम मेहदी होगा। कायनात आलम के इन्क़ेलाब का ज़ामिन होगा और उसे यह मालूम था कि वह फ़रज़न्द इमाम हसन असकरी (अ.स.) की औलाद से ही होगा , लेहाज़ा उसने आपकी तलाश और आपके क़त्ल की पूरी कोशिश की। तारीख़े इस्लाम जिल्द 1 पृष्ठ 31 में है कि 260 हिजरी में इमाम हसन असकरी (अ.स.) की शहादत के बाद जब मोतमिद ख़लीफ़ए अब्बासी ने आपके क़त्ल करने के लिये आदमी भेजे तो आप(सरदाब) 1 सरमन राय में ग़ायब हो गये। बाज़ अकाबिर उलेमाए अहले सुन्नत भी इस अमर में शियों के हम ज़बान हैं। चुनान्चे मुल्ला जामी ने शवाहेदुन नबूवत में इमाम अब्दुल वहाब शेरानी ने लवाक़ेउल अनवार व अल यूवाक़ेयत वल जवाहर में और शेख़ अहमद मुहिउद्दीन इब्ने अरबी ने फ़तूहाते मक्कीया में और ख़्वाजा पारसा ने फ़सलुल खि़ताब मोहद्दिस देहलवी ने रिसाला आइम्माए ताहेरीन में और जमालुद्दीन मोहद्दिस ने रौज़तुल अहबाब में , अबू अब्दुल्लाह शामी साहब किफ़ातुल तालिब ने किताब अल तिबयान फ़ी अख़बार साहेबुज़्ज़मान में और सिब्ते इब्ने जौज़ी ने तज़किराए ख़्वास अल मता , और इब्ने सबाग़ नुरूद्दीन अली मालकी ने फ़सूल अल महमा में और कमालुद्दीन इब्ने तलहा शाफ़ेई ने मतालेबुस सूऊल में और शाह वली उल्लाह फ़ज़ल अल मुबीन में और शेख़ सुलेमान हनफ़ी ने नियाबुल मोवद्दता में और बाज़ दीगर उलेमा ने भी ऐसा ही लिखा है और जो लोग इन हज़रत के तवील उम्र में ताअज्जुब कर के इन्कार करते हैं उनको यह जवाब देते हैं कि ख़ुदा की क़ुदरत से कुछ बईद नहीं है जिसने आदम (अ.स.) को बग़ैर माँ बाप के और ईसा (अ.स.) बग़ैर बाप के पैदा किया , तमाम अहले इस्लाम ने हज़रत खि़ज़्र (अ.स.) को अब तक ज़िन्दा माना हुआ है। इदरीस (अ.स.) बेहिशत में और हज़रत ईसा (अ.स.) आसमान पर अब तक ज़िन्दा माने जाते हैं और अगर ख़ुदाए ताअला ने आले मोहम्मद (स अ व व ) में से एक शख़्स को तुले उम्र इनायत किया तो ताअज्जुब क्या है ? हालां कि अहले इस्लाम को दज्जाल के मौजूद होने के क़रीबे क़यामत ज़हूर करने से इन्कार नहीं है। किताब शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 68 में है कि ख़ानदाने नबूवत के ग्यारवे इमाम हसन असकरी (अ.स.) 260 हिजरी में ज़हर से शहीद कर दिये गये थे उनकी वफ़ात पर इनके साहब ज़ादे मोहम्मद लक़ब व मेहदी शियों के आख़री इमाम हुए।

मौलवी अमीर लिखते हैं कि ख़ानदाने रिसालत के इन इमामों के हालात निहायत दर्द नाक हैं। ज़ालिम मुतावक्किल ने हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) के वालिदे माजिद इमाम अली नकी़ (अ.स.) को मदीने से सामरा पकड़ बुलाया था और वहां उनकी वफ़ात तक उनको नज़र बन्द रखा था फिर ज़हर से हलाक कर दिया था इसी तरह मुतावक्किल के जां नशीनों ने बदगुमानी और हसद के मारे हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) को क़ैद रखा था। उनके कमसिन साहब ज़ादे मोहम्मद अल मेहदी (अ.स.) जिनकी उम्र अपने वालिद की वफ़ात के वक़्त पांच साल की थी ख़ौफ़ के मारे अपने घर के क़रीब ही एक ग़ार में छुप गये और ग़ायब हो गये। इब्ने बतूता ने अपने सफ़र नामे में लिखा है कि जिस ग़ार में इमाम मेहदी (अ.स.) की ग़ैबर बताई जाती है उसे मैंने अपनी आंखों से देखा है।(नूरूल अबसार जिल्द 1 पृष्ठ 152 ) अल्लामा हजरे मक्की का इरशाद है कि इमाम मेहदी (अ.स.) सरदाब में ग़ायब हुये थे। फ़ल्म यारफ़ ईं ज़हब फिर मालूम नहीं कहां तशरीफ़ ले गये।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 124 )

हाशिया : 1. यह सरदाब मक़ाम सरमन राय में वाक़े है जिसे असल में सामेरा कहते हैं। सामरा की आबादी बहुत ही क़दीमी है और दुनियां के क़दीम तरीन शहरों में से एक शहर है। इसे साम बिन नूह ने आबाद किया था और इसी को दारूल सलतनत भी बनाया था। इसकी आबादी सात फ़रसख़ लम्बी थी। इसने इसे निहायत ख़ूब सूरत शहर बना दिया था इस लिये इसका नाम सरमन राय रख दिया था यानी वह शहर जिसे जो भी देखे ख़ुश हो जाए , असकरी इसी का एक मोहल्ला है जिसमें इमाम अली नक़ी (अ.स.) नज़र बन्द थे बाद में उन्होंने दलील बिन याक़ूब नसरानी से एक मकान ख़रीद लिया था जिसमें अब भी आपका मज़ार मुक़द्दस वाक़े है।

सामरा में हमेशा ग़ैर शिया आबादी रही इसी लिये अब तक वहां शिया आबाद नहीं हैं वहां के जुमला ख़ुद्दाम भी ग़ैर शिया हैं।

हज़रत हुज्जत (अ.स.) के ग़ाएब होने का सरदाब वहीं एक मस्जिद के किनारे वाक़े है जो हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) और हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) के मज़ारे अक़दस के क़रीब है।

ग़ैबते इमाम मेहदी (अ.स.) पर उलेमाए अहले सुन्नत का इजमा

जम्हूरे उलेमाए इस्लामा इमाम मेहदी (अ.स.) के वुजूद को तसलीम करते हैं। इसमें शिया सुन्नी का सवाल नहीं हर फ़िरक़े के उलेमा यह मानते हैं कि आप पैदा हो चुके हैं और मौजूद हैं। हम उलेमाए अहले सुन्नत के अस्मा मय उनकी किताबों और मुख़्तसर अक़वाल के दर्ज करते हैं।

1. अल्लामा मोहम्मद बिन तल्हा शाफ़ेई किताब मतालेबुस सूऊल में फ़रमाते हैं कि इमाम मेहदी (अ.स.) सामरा में पैदा हुए जो बग़दाद से 20 फ़रसख़ के फ़ासले पर है।

2. अल्लामा अली बिन मोहम्मद बिन सबाग़ मालकी की किताब फ़ुसूल अल महमा में है कि इमाम हसन असकरी (अ.स.) गयाहरवें इमाम ने अपने बेटे इमाम मेहदी (अ.स.) की विलादत बादशाहे वक़्त से ख़ौफ़ से पोशीदा रखी।

3. अल्लामा शेख़ अब्दुल्लाह बिन अहमद ख़साब की किताब तवारीख़ मवालीद में है कि इमाम मेहदी (अ.स.) का नाम मोहम्मद और कुन्नियत अबुल क़ासिम है। आप आख़री ज़माने में ज़हूर व ख़ुरूज करेंगे।

4. अल्लामा मुहिउद्दीन इब्ने अरबी हम्बली की किताब फ़तूहात में है कि जब दुनियां ज़ुल्मो जौर से भर जायेगी तो इमाम मेहदी (अ.स.) ज़हूर करेंगे।

5. अल्लामा शेख़ अब्दुल वहाब शेरानी की किताब अल यूवाक़ियात वल जवाहर में है कि इमाम मेहदी (अ.स.) 15 शाबान 255 हिजरी में पैदा हुए हैं। अब इस वक़्त यानी 958 हिजरी में उनकी उम्र सात सौ छः 706 साल) की है। हयी मज़मून अल्लामा बदख़शानी की किताब मिफ़ताह अल नजाता में भी है।

6. अल्लामा अब्दुल रहमान जामी हनफ़ी की किताब शवाहेदुन नबूवत में है कि इमाम मेहदी (अ.स.) सामरा में पैदा हुए हैं और उनकी विलादत पोशीदा रखी गई है। वह इमाम हसन असकरी (अ.स.) की मौजूदगी में ग़ाएब हो गए हैं। इसी किताब में विलादत का पूरा वाक़ेया हकीमा ख़ातून की ज़बानी लिखा है।

7. अल्लामा शेख़ अब्दुल हक़ मोहद्दिस देहलवी की किताब मनाक़ेबुल आइम्मा में है कि इमाम मेहदी (अ.स.) 15 शाबान 255 हिजरी में पैदा हुए हैं। इमाम हसन असकरी (अ.स.) ने उनके कान में अज़ान व इक़ामत कही है और थोड़े अर्से के बाद आपने फ़रमाया कि वह उस मालिक के सुपुर्द हो गये हैं जिनके पास हज़रते मूसा (अ.स.) बचपने में थे।

8. अल्लामा जमाल उद्दीन मोहद्दिस की किताब रौज़ातुल अहबाब में है कि हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) 15 शाबान 255 हिजरी में पैदा हुए और ज़मानाए मोतमिद अब्बासी में बमक़ाम सरमन राय अज़ नज़र बराया ग़ायब शुद , लोगों की नज़र से सरदाब में ग़ायब हो गये।

9. अल्लामा अब्दुल रहमान सूफ़ी की किताब मराएतुल इसरार में है कि आप बतने नरजिस से 15 शाबान 255 हिजरी में पैदा हुए।

10. अल्लामा शहाबुद्दीन दौलताबादी साहेबे तफ़सीर बहरे मवाज की किताब हिदाएतुल सआदा में है कि खि़लाफ़ते रसूल (स अ व व ) हज़रत अली (अ.स.) के वास्ते से इमाम मेहदी (अ.स.) तक पहुँची आप ही आख़री इमाम हैं।

11. अल्लामा नसर बिन अली जहमनी की किताब मवालिदे आइम्मा में है कि इमाम मेहदी (अ.स.) नरजिस ख़ातून के बतन से पैदा हुए हैं।

12. अल्लामा मुल्ला अली क़ारी की किताब मरक़ात शरह मिशक़ात में है कि इमाम मेहदी (अ.स.) बारहवें इमाम हैं। शियो का यह कहना ग़लत है कि अहले सुन्न्त अहते बैत (अ.स.) के दुश्मन हैं।

13. अल्लामा जवाद साबती की किताब बराहीन साबतीया मे है कि इमाम मेहदी (अ.स.) औलादे फ़ात्मा (स अ व व ) में से हैं। वह बक़ौले 255 हिजरी में पैदा हो कर एक अर्से के बाद ग़ायब हो गये हैं।

14. अल्लामा शेख़ हसन ईराक़ी जिनकी तारीफ़ किताब अल वाक़ेया में है कि उन्होंने इमाम मेहदी (अ.स.) से मुलाक़ात की है।

15. अल्लामा अली ख़वास जिनके मुताअल्लिक़ शेरानी ने अल यूवाक़ियत में लिखा है कि उन्होंने इमाम मेहदी (अ.स.) से मुलाक़ात की है।

16. अल्लामा शेख़ सईद उद्दीन का कहना है कि इमाम मेहदी (अ.स.) पैदा हो कर ग़ायब हो गए हैं। दौरे आखि़र ज़माना आशकार गरदद और वह आखि़र ज़माने में ज़ाहिर होंगे। जैसा कि किताब मस्जिदे अक़सा में है।

17. अल्लामा अली अकबर इब्ने सआद अल्लाह की किताब मकाशिफ़ात में है कि आप पैदा हो कर कुतुब हो गये हैं।

18. अल्लामा अहमद बिला ज़री अहादीस में लिखते हैं कि आप पैदा हो कर महज़ूब हो गये हैं।

19. अल्लामा शाह वली अल्लाह मोहद्दिस देहलवी के रिसाले नवादर में है , मोहम्मद बिन हसन (अ.स.)(अल मेहदी) के बारे में शियों का कहना दुरूस्त हैं।

20. अल्लामा शम्सुद्दीन जज़री ने बहवाला मुसलसेलात बिलाज़री ने एतेराफ़ किया है।

21. अल्लामा अलाउद्दौला अहमद समनानी साहब तारीख़े ख़मीस दर अहवाली अल नफ़स नफ़ीस अपनी किताब में लिखते है कि इमाम मेहदी (अ.स.) ग़ैबत के बाद एबदाल फिर कु़तुब हो गये।

23. अल्लामा नूर अल्लाह बहवाला किताब बयानुल एहसान लिखते हैं कि इमाम मेहदी (अ.स.) तकमीले सिफ़ात के लिये ग़ायब हुये हैं।

24. अल्लामा ज़हबी अपनी तारीख़े इस्लाम में लिखते हैं कि इमाम मेहदी (अ.स.) 256 हिजरी में पैदा हो कर मादूम हो गये हैं।

25. अल्लामा इब्ने हजर मक्की की किताब सवाएक़े मोहर्रेक़ा में है कि इमाम मेहदी अल मुन्तज़र (अ.स.) पैदा हो कर सरदाब में ग़ायब हो गए हैं।

26. अल्लामा अस्र की किताब दफ़यातुल अयान की जिल्द 2 पृष्ठ 451 में है कि इमाम मेहदी (अ.स.) की उम्र इमाम हसन असकरी (अ.स.) की वफ़ात के वक़्त 5 साल की थी। वह सरदाब में ग़ाएब हो कर फिर वापस नहीं हुए।

27. अल्लामा सिब्ते इब्ने जौज़ी की किताब तज़किराए ख़वास अल आम्मा के पृष्ठ 204 में है कि आपका लक़ब अल क़ायम , अल मुन्तज़िर , अल बाक़ी है।

28. अल्लामा अबीद उल्लाह अमरतसरी की किताब अर हज्जुल मतालिब के पृष्ठ 377 में बहवाला किताबुल बयान फ़ी अख़बार साहेबुज़्ज़ान मरक़ूम है कि आप उसी तरह ज़िन्दा व बाक़ी हैं जिस तरह हज़रत ईसा (अ स ) , खि़ज़्र (अ स ) , इलयास (अ.स.) वग़ैरा ज़िन्दा और बाक़ी हैं।

29. अल्लामा शेख़ सुलैमान तमन दोज़ी ने किताब नियाबुल मोवद्दता पृष्ठ 393 में।

30. अल्लामा इब्ने ख़शाब ने किताब मवालिद अलले बैत में।

31. अल्लामा शिब्लन्जी ने नूरूल अबसार के पृष्ठ 152 प्रकाशित मिस्र 1222 हिजरी में बहवाला किताबुल बयान लिखा है कि इमाम मेहदी (अ.स.) ग़ायब होने के बाद अब तक ज़िन्दा और बाक़ी हैं और उनके वजूद के बाक़ी और ज़िन्दा होने में कोई शुबहा नहीं। वह इसी तरह ज़िन्दा और बाक़ी हैं जिस तरह हज़रते ईसा (अ स ) , हज़रते खि़ज़्र (अ.स.) और हज़रत इलयास (अ.स.) वग़ैरा ज़िन्दा और बाक़ी हैं। उन अल्लाह वालों के अलावा दज्जाल , इबलीस भी ज़िन्दा हैं। जैसा कि क़ुरआने मजीद , सही मुस्लिम , तारीख़े तबरी वग़ैरा से साबित है लेहाज़ा ला इमतना फ़ी बक़ाया उनके बाक़ी और ज़िन्दा होने में कोई शक व शुबहे की गुन्जाईश नहीं है।

32. अल्लामा चलपी किताब कशफ़ुल जुनून के पृष्ठ 208 में लिखते हैं कि किताब अल बयान फ़ी अख़बार साहेबुज़्ज़मान अबू अब्दुल्लाह मोहम्मद बिन यूसुफ़ कंजी शाफ़ेई की तसनीफ़ हैं। अल्लामा फ़ाज़िल रोज़ बहान की अबताल अल बातिल में है कि इमाम मेहदी (अ.स.) क़ायम व मुन्तज़िर हैं। वह आफ़ताब की मानिन्द ज़ाहिर हो कर दुनिया की तारीकी , कुफ़्र ज़ाएल कर देंगे।

33. अल्लामा अली मुत्तक़ी की किताब कंज़ुल आमाल की जिल्द 7 के पृष्ठ 114 में है कि आप ग़ायब हैं ज़ुहूर कर के 9 साल हुकूमत करेंगे।

34. अल्लामा जलाल उद्दीन सियूती की किताब दुर्रे मन्शूर जिल्द 3 पृष्ठ 23 में है कि इमाम मेहदी (अ.स.) के ज़हूर के बाद हज़रते ईसा (अ.स.) नाज़िल होंगे वग़ैरा वग़ैरा।

इमाम मेहदी (अ.स.) की ग़ैबत और आपका वुजूद व ज़ुहूर क़ुरआने मजीद की रौशनी में

हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) की ग़ैबत और आपके मौजूद होने और आपके तूले उम्र नीज़ आपके ज़ुहूर व शहूद और ज़हूर के बाद सारे दीन को एक कर देने के मुताअल्लिक़ 94 आयतें क़ुरआन मजीद में मौजूद हैं जिनमें से अकसर दोनों फ़रीक़ ने तसलीम किया है। इसी तरह बेशुमार ख़ुसूसी अहादीस भी हैं। तफ़सील के लिये मुलाहेज़ा हों। ग़ाएतुल मक़सूद व ग़ाएतुल मराम , अल्लामा हाशिम बहरानी व नियाबतुल मोवद्दता। मैं इस मक़ाम पर सिर्फ़ दो तीन आयतें लिखता हूँ आपकी ग़ैबत के मुताअल्लिक़। अलीफ़ लाम्मीम। ज़ालेकल किताबो ला रैबा फ़ीहे हुदल्लीम मुत्तक़ीन। अल लज़ीना यौमेनूना बिल ग़ैब है।

हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) फ़रमाते हैं कि ईमान बिल ग़ैब से इमाम मेहदी (अ.स.) की ग़ैबत मुराद है। नेक बख़्त हैं वह लोग जो उनकी ग़ैबत पर सब्र करें और मुबारकबाद के क़ाबिल हैं , वह समझदार लोग जो ग़ैबत मे भी उनकी मोहब्बत पर क़ायम रहेंगे।(नेयाबुल मोवद्दता पृष्ठ 370 प्रकाशित बम्बई) आपके मौजूद और बाक़ी होने के मुताअल्लिक़ जाअलहा कलमता बाक़ियता फ़ी अक़बा है। इब्राहीम (अ.स.) की नस्ल में कलमा बक़िया को क़रार दिया है जो बाक़ी और ज़िन्दा रहेगा। इस कलमाए बाक़िया से इमाम मेहदी (अ.स.) का बाक़ी रहना मुराद है और वही आले मोहम्मद (स अ व व ) में बाक़ी हैं।(तफ़सीरे हुसैनी अल्लामा हुसैन वाएज़ काशफ़ी पृष्ठ 226 ) नम्बर 3 , आपके ज़हूर और ग़लबे के मुताअल्लिकत्र यनज़हरहू अलद्दीने कुल्लाह जब इमाम मेहदी (अ.स.) ब हुक्मे ख़ुदा ज़हूर फ़रमाएंगे तो तमाम दीनों पर ग़लबा हासिल कर लेंगे यानी दुनिया में सिवा एक दीने इस्लाम के कोई और दीन न होगा।(नूरूल अबसार पृष्ठ 153 प्रकाशित मिस्र)

इमाम मेहदी (अ.स.) का ज़िक्र कुतुबे आसमानी में

हज़रत दाऊद (अ.स.) की ज़बूर की आयत 4 मरमूज़ 97 में है कि आख़री ज़माने में जो इन्साफ़ का मुजस्सेमा इन्सान आयेगा , उसके सर पर अब्र साया फ़िगन होगा। किताब सफ़याए पैग़म्बर के फ़सल 3 आयत 9 में है आख़री ज़माने में तमाम दुनिया मोवहिद हो जायेगी। किताब ज़बूर मरमूज़ 120 में है , जो आख़ेरूज़्ज़मान आयेगा उस पर आफ़ताब असर अन्दाज़ न होगा। सहीफ़ए शैया पैग़म्बर के फ़सल 11 मे है कि जब नूरे ख़ुदा ज़हूर करेगा तो अदलो इन्साफ़ का डन्का बजेगा , शेर और बकरी एक जगह रहेगे , चीता और बाज़गाला एक साथ चरेंगे। शेर और गौसाला एक साथ रहेंगे , गोसाला और मुर्ग़ एक साथ होंगे। शेर और गाय में दोस्ती होगी। तिफ़ले शीर ख़्वार सांप के बिल में हाथ डालेगा और वह काटेगा नहीं। फिर इसी सफ़हे के फ़सल 27 में है कि यह नूरे ख़ुदा जब ज़ाहिर होगा तो तलवार के ज़रिये तमाम दुश्मनों से बदला लेगा। सहीफ़ए तनजास हरफ़े अलिफ़ में है कि ज़हूर के बाद सारी दुनिया के बुत मिटा दिये जायेंगे ज़ालिम और मुनाफ़िक़ ख़त्म कर दिये जायेंगे। यह ज़हूर करने वाला कनीज़े ख़ुदा (नरजिस) का बेटा होगा।

तौरैत के सफ़रे अम्बिया में है कि मेहदी (अ.स.) ज़हूर करेंगे। हज़रज ईसा (अ.स.) आसमान से उतरेंगे। दज्जाल को क़त्ल करेंगे। इन्जील में है कि मेहदी (अ.स.) और ईसा (अ.स.) दज्जाल और शैतान को क़त्ल करेंगे। इसी तरह मुकम्मल वाक़िया जिसमें शहादते इमाम हुसैन (अ.स.) और ज़हूरे मेहदी (अ.स.) का इशारा हैं इन्जील किताब दानियाल बाब 12 फ़सल 9 आयत 24 रोयाए 2 में मौजूद है।(किताब अल वसाएल पृष्ठ 129 प्रकाशित बम्बई 1339 हिजरी)

इमाम मेहदी (अ.स.) की ग़ैबत की वजह

मज़कूरा बाला तहरीरों से उलेमाए इस्लाम का एतेराफ़ साबित हो चुका यानी वाज़े हो गया कि इमाम मेहदी (अ.स.) के मुताअल्लिक़ जो अक़ाएद शियो के हैं वही मुन्सिफ़ मिज़ाज और ग़ैर मुताअस्सिब अहले तसन्नुन के उलेमा के भी हैं और मक़सदे असल की ताईद क़ुरआन की आयतों ने भी कर दी। अब रही ग़ैबते इमाम मेहदी (अ.स.) की ज़रूरत उसके मुताअल्लिक़ अर्ज़ है कि , 1. ख़ल्लाक़े आलम ने हिदायते ख़ल्क़ के लिये एक लाख चौबीस हज़ार पैग़म्बर और कसीर तादाद में उनके औसिया भेजे। पैग़म्बरों में से एक लाख तेहीस हज़ार नौ सौ निन्नियानवे 1,23,999 ) अम्बिया के बाद चूंकि हुज़ूर रसूले करीम (स अ व व ) तशरीफ़ लाये थे लेहाज़ा उनके जुमला सिफ़ात व कमालात व मोजेज़ात हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) में जमा कर दिये गये थे और आपको ख़ुदा ने तमाम अम्बिया के सिफ़ात का जलवा बरदार बना दिया बल्कि ख़ुद अपनी ज़ात का मज़हर क़रार दिया था और चूंकि आपको भी इस दुनियाए फ़ानी से ज़ाहिरी तौर पर जाना था इस लिये आपने अपनी ज़िन्दगी ही मे हज़रत अली (अ.स.) को हर क़िस्म के कमालात से भर पूर कर दिया था। हज़रत अली (अ.स.) अपने ज़ाती कमालात के अलावा नबवी कमालात से भी मुम्ताज़ हो गये थे। सरवरे कायनात के बाद कायनाते आलम में सिर्फ़ अली (अ.स.) की हस्ती थी जो कमालाते अम्बिया की हामिल थी। आपके बाद यह कमालात अवसाफ़ में मुन्तिक़िल होते हुए इमाम मेहदी (अ.स.) तक पहुँचे। बादशाहे वक़्त इमाम मेहदी (अ.स.) को क़त्ल करना चाहता था। अगर वह क़त्ल हो जाते तो दुनियां से अम्बिया व औसिया का नाम व निशान मिट जाता और सब की यादगार बयक ज़र्ब शमशीर ख़त्म हो जाती और चुंकि उन्हें अम्बिया के ज़रिये से ख़ुदा वन्दे आलम मुताअरिफ़ हुआ था लेहाज़ा उसका भी ज़िक्र ख़त्म हो जाता। इस लिये ज़रूरी था कि ऐसी हस्ती को महफ़ूज़ रखा जाए जो जुमला अम्बिया और अवसिया की यादगार और तमाम के कमालात की मज़हर हो। 2. ख़ुदा वन्दे आलम ने क़ुरआन मजीद में इरशाद फ़रमाया वाजालाहा कमातह बाक़ीयता फ़ी अक़बे इब्राहीम (अ.स.) की नस्ल मे कलमा बाक़ीहा क़रार दे दिया है। नस्ले इब्राहीम (अ.स.) दो फ़रज़न्दों से चली है एक इस्हाक़ (अ.स.) और दूसरे इस्माईल (अ.स.)। इस्हाक़ (अ.स.) की नस्ल से ख़ुदा वन्दे आलम जनाबे ईसा (अ.स.) को ज़िन्दा व बाक़ी क़रार दे कर आसमान पर महफ़ूज़ कर चुका था अब यह मुक़तज़ाए इन्साफ़ ज़रूरी थी कि नस्ले इस्माईल (अ.स.) से भी किसी एक को बाक़ी रखे और वह भी ज़मीन पर क्यो कर आसमान पर एक बाक़ी मौजूद था लेहाज़ा इमाम मेहदी (अ.स.) को जो नस्ले इस्माईल (अ.स.) से हैं ज़मीन पर ज़िन्दा और बाक़ी रखा और उन्हें भी इसी तरह दुश्मन के शर से महफ़ूज़ कर दिया जिस तरह हज़रत ईसा (अ.स.) को महफ़ूज़ किया था। 3. यह मुसल्लेमाते इस्लामी से है कि ज़मीन हुज्जते ख़ुदा और इमामे ज़माना से ख़ाली नहीं रह सकती।(उसूले काफ़ी 103 प्रकाशित नवल किशोर) चुंकि हुज्जते ख़ुदा उस वक़्त इमाम मेहदी (अ.स.) के सिवा कोई न था , उन्हें दुश्मन क़त्ल कर देने पर तुले हुए थे इस लिये उन्हे महफ़ूज़ व मस्तूर कर दिया गया। हदीस में है कि हुज्जते ख़ुदा की वजह से बारीश होती है और उन्हीं के ज़रिये से रोज़ी तक़सीम की जाती है।(बेहार) 4. यह मुसल्लम है कि हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) जुमला अम्बिया के मज़हर थे इस लिये ज़रूरत थी कि उन्हीं की तरह उनकी ग़ैबत भी होती यानी जिस तरह बादशाहे वक़्त के मज़ालिम की वजह से हज़रत नूह (अ स ) , हज़रत इब्राहीम (अ स ) , हज़रत मूसा (अ स ) , हज़रत ईसा (अ.स.) और हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) अपने अहदे हयात में मुनासिब मुद्दत तक ग़ाएब रह चुके थे इसी तरह यह भी ग़ाएब रहते। 5. क़यामत का आना मुसल्लम है और इस वाक़िये क़यामत में इमाम मेहदी (अ.स.) का ज़िक्र बताता है कि आपकी ग़ैबत मस्लहते ख़ुदा वन्दे आलम की बिना पर हुई है। 6. सुरए इन्ना अन ज़ल्नाहो से मालूम होता है कि नुज़ूले मलाएक शबे क़दर में होता रहता है यह ज़ाहिर है कि नुज़ूले मलाएक अम्बिया व औसिया पर ही हुआ करता है। इमाम मेहदी (अ.स.) को इस लिये मौजूद और बाक़ी रखा गया है ताकि नुज़ूले मलाएक की मरकज़ी ग़रज़ पूरी हो सके और शबे क़द्र में उन्हीं पर नुज़ूले मलाएक हो सके। हदीस में है कि शबे क़द्र में साल भर की रोज़ी वगै़रह इमाम मेहदी (अ.स.) तक पहुँचा दी जाती है और वही उसे तक़सीम करते हैं। 7. हकीम का फ़ेल हिकमत से ख़ाली नहीं होता यह दूसरी बात है कि आम लोग इस हिकमत व मसेलहत से वाक़िफ़ न हों। ग़ैबते इमाम मेहदी (अ.स.) उसी तरह मसलेहत व हिकमते ख़ुदा वन्दी की बिना पर अमल में आई है। जिस तरह तवाफ़े काबा , रमी जमरात वग़ैरह हैं जिसकी असल मसलेहत ख़ुदा वन्दे आलम को ही मालूम है।। 8. इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) का फ़रमान है कि इमाम मेहदी (अ.स.) को इस लिये ग़ायब किया जायेगा ताकि ख़ुदा वन्दे आलम अपनी सारी मख़लूक़ात का इम्तेहान कर के यह जांचे कि नेक बन्दे कौन हैं और बातिल परस्त कौन लोग है। (इकमालुद्दीन) 9. चूंकि आपको अपनी जान का ख़ौफ़ था और यह तय शुदा है कि मन ख़ाफ अली नफ़सही एहसताज अली इला सत्तार कि जिसे अपने नफ़्स और अपनी जान का ख़ौफ़ हो वह पोशीदा होने को लाज़मी जानता है।(अल मुतुर्जा़) 10. आपकी ग़ैबत इस लिये वाक़े हुई है कि ख़ुदा वन्दे आलम एक वक़्ते मोइय्यन में आले मोहम्मद (स अ व व ) पर जो मज़ालिम किये गए हैं इनका बदला इमाम मेहदी (अ.स.) के ज़रिये से लेगा यानी आप अहदे अव्वल से लेकर बनी उमय्या और बनी अब्बास के मज़ालिमों से मुकम्मिल बदला लेंगे।(कमालुद्दीन)

ग़ैबते इमाम मेहदी (अ.स.) जफ़र जामए की रौशनी में

अल्लामा शेख़ क़न्दूज़ी बलख़ी हनफ़ी रक़मतराज़ हैं कि सुदीर सैरफ़ी का बयान है कि हम और मुफ़ज़ल बिन उमर , अबू बसीर , अमान बिन तग़लब एक दिन सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) की खि़दमत में हाज़िर हुए तो देखा कि आप ज़मीन पर बैठे हुए रो रहे हैं और कहते हैं कि ऐ मोहम्मद ! तुम्हारी ग़ैबत की ख़बर ने मेरा दिल बेचैन कर दिया है। मैंने अर्ज़ कि हुज़ूर , ख़ुदा की आंखों को कभी न रूलाए , बात क्या है , किस लिए हुज़ूर गिरया कुना हैं ? फ़रमाया , ऐ सुदीर ! मैंने आज किताब जाफ़र जामे में बवक़्ते सुबह इमाम मेहदी की ग़ैबत का मुताला किया है। ऐ सुदीर ! यह वह किताब है जिसमे आमा माकाना वमायकून का इन्दराज है और जो कुछ क़यामत तक होने वाला है सब इसमें लिखा हुआ है। ऐ सुदीर ! मैंने इस किताब में यह देखा है कि हमारी नस्ल से इमाम मेहदी होगें। फिर वह ग़ायब हो जाएगें और उनकी ग़ैबत नीज़ उमर बहुत तवील होगी। उनकी ग़ैबत के ज़माने में मोमेनीन मसाएब में मुबतिला होगें और उनके इम्तेहानात होते रहेंगे और ग़ैबत में ताख़ीर की वजह से उनके दिलों में शकूक पैदा होते होंगे , फिर फ़रमाया ऐ सुदीर ! सुनो इनकी विलादत हज़रत मूसा (अ.स.) की तरह होगी और उनकी ग़ैबत ईसा (अ.स.) की मानिन्द होगी और उनके ज़हूर का हाल हज़रत नूह (अ.स.) के मानिन्द होगा और उनकी उम्र हज़रते खि़ज़्र (अ.स.) की उम्र जैसी होगी।(नेयाबुल मोवद्दत) इस हदीस की मुख़तसर शरह यह है कि :

1. तारीख़ में है कि जब फ़िरऔन को मालूम हुआ कि मेरी सलतनत का ज़वाल एक मौलूद बनी इस्राईल के ज़रिए होगा तो उसने हुक्म जारी कर दिया कि मुल्क में कोई औरत हामेला न रहने पाए और कोई बच्चा बाक़ी न रखा जाए। चुनान्चे इसी सिलसिले में 40 हज़ार बच्चे ज़ाया किये गए लेकिन खुदा ने हज़रत मूसा (अ.स.) को फ़िरऔन की तमाम तरकीबों के बवजूद पैदा किया , बाक़ी रखा और उन्हीं के हाथों से उसकी सलतनत का तख़्ता उलट दिया। इसी तरह इमाम मेहदी (अ.स.) के लिये हुआ कि तमाम बनी उमय्या और बनी अब्बास की सई बलीग़ के बावजूद आप बतने नरजीस ख़ातून से पैदा हुए और आपको कोई देख तक न सका।

2. हज़रत ईसा (अ.स.) के बारे में तमाम यहूदी और नसरानी मुत्तफ़िक़ हैं कि आपको सूली दे दी गई और आप क़त्ल किये जा चुके , लेकिन ख़ुदा वन्दे आलम ने उसकी रद्द फ़रमा दी और कह दिया कि वह न क़त्ल हुए हैं और न उनको सूली दी गई है। यानी ख़ुदा वन्दे आलम ने अपने पास बुला लिया और वह आसमान पर अमन व अमाने ख़ुदा में हैं। इसी तरह हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) के बारे में भी लोगों का कहना है कि पैदा ही नहीं हुए , हालां कि पैदा हो कर हज़रत ईसा (अ.स.) की तरह ग़ाएब हो चुके हैं।

3. हज़रत नूह (अ.स.) ने लोगों की नाफ़रमानी से आजिज़ आ कर ख़ुदा के अज़ाब के नज़ूल की दरख़्वास्त की। ख़ुदा वन्दे आलम ने फ़रमाया कि पहले एक दरख़्त लगाओ वह फल लाएगा , तब अज़ाब करूगां। इसी तरह नूह (अ.स.) ने सात मरतबा किया बिल आखि़र इस ताख़ीर के वजह से आपके तमाम दोस्त व मवाली और इमानदार काफ़िर हो गए और सिर्फ़ 70 मोमिन रह गए। इसी तरह ग़ैबते इमाम मेहदी (अ.स.) और ताख़ीरे ज़हूर की वजह से हो रहा है। लोग फ़रामीने पैग़म्बर और आइम्मा (अ.स.) की तकज़ीब कर रहे हैं और अवामे मुस्लिम बिला वजह ऐतिराज़ात कर के अपनी आक़बत ख़राब कर रहे हैं और शायद इसी वजह से मशहूर है कि जब दुनियां में चालीस मोमिन कामिल रह जाएगें तब आपका ज़हूर होगा।

4. हज़रते खि़ज्र (अ.स.) जो ज़िन्दा और बाक़ी हैं और क़यामत तक ज़िन्दा और मौजूद रहेगें। उन्हीं की तरह हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) भी ज़िन्दा और बाक़ी हैं और क़यामत तक मौजूद रहेंगे और जब कि हज़रते खि़ज़्र (अ.स.) के ज़िन्दा और बाक़ी रहने में मुसलमानों में कोई इख़्तेलाफ़ नहीं है , हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) के ज़िन्दा और बाक़ी रहने में भी कोई इख़्तेलाफ़ की वजह नहीं हैं।

ग़ैबते सुग़रा व कुबरा और आपके सुफ़रा

आपकी ग़ैबत की दो हैसियतें थीं , एक सुग़रा और दूसरी कुबरा। ग़ैबते सुग़रा की मुद्दत 75 या 73 साल थी। उसके बाद ग़ैबते कुबरा शुरू हो गई। ग़ैबते सुग़रा के ज़माने में आपका एक नाएबे ख़ास होता था जिसके ज़ेरे एहतेमाम हर क़िस्म का निज़ाम चलता था। सवाल व जवाब , ख़ुम्स व ज़कात और सिफ़ारिश से सुफ़रा मुक़र्रर किये जाते थे।

सब से पहले जिन्हें नाएबे ख़ास होने की सआदत नसीब हुई उनका नामे नामी व इस्मे गेरामी हज़रत उस्मान बिन सईद उमरी था। आप हज़रत इमाम अली नकी़ (अ.स.) और इमाम हसन असकरी (अ.स.) के मोतमिदे ख़ास और असहाबे ख़ल्लस में से थे। आप क़बीलाए बनी असद से थे। आपकी कुन्नियत अबू उमर थी। आप सामरा के क़रीए असकर के रहने वाले थे। वफ़ात के बाद आप बग़दाद में दरवाज़ा जबला के क़रीब मस्जिद में दफ़्न किये गये हैं। आपकी वफ़ात के बाद बहुक्मे इमाम (अ.स.) आपके फ़रज़न्द हज़रत मोहम्मद बिन उस्मान बिन सईद इस अज़ीम मंज़िलत पर फ़ाएज़ हुए , आपकी कुन्नियत अबू जाफ़र थी। आपने अपनी वफ़ात से दो माह क़ब्ल अपनी क़ब्र खुदवा दी थी। आपका कहना था कि मैं यह इस लिये कर रहा हूँ कि मुझे इमाम (अ.स.) ने बता दिया है और अपनी तारीख़े वफ़ात से वाक़िफ़ हूँ। आपकी वफ़ात जमादिल अव्वल 305 हिजरी में वाक़े हुई और आप माँ के क़रीबब बमक़ाम दरवाज़ा कूफ़ा सिरे राह दफ़्न हुये।

फिर आपकी वफ़ात के बाद बा वास्ता मरहूम हज़रत इमाम (अ.स.) के हुक्म से हज़रत हुसैन बिन रौह इस मनसबे अज़ीम पर फ़ाएज़ हुए।

जाफ़र बिन मोहम्मद बिन उस्मान सईद का कहना है कि मेरे वालिद हज़रत मोहम्मद बिन उस्मान ने मेरे सामने हज़रत हुसैन बिन रौह को अपने बाद इस मनसब की ज़िम्मेदारी के मुताअल्लिक़ इमाम (अ.स.) का पैग़ाम पहुँचाया था। हज़रत हुसैन बिन रौह की कुन्नियत अबू क़ासिब थी। आप महल्ले नव बख़्त के रहने वाले थे। आप ख़ुफ़िया तौर पर जुमला मुमालिके इस्लामिया का दौरा किया करते थे। आप दोनों फ़िरक़ों के नज़दीक मोतमिद , सुक़्क़ा , सालेह और अमीन क़रार दिये गये हैं। आपकी वफ़ात शाबान 326 हिजरी में हुई और आप महल्ले नव बख़्त कूफ़े में मदफ़ून हुए हैं। आपकी वफ़ात के बाद बहुक्मे इमाम (अ.स.) हज़रत अली बिन मोहम्मद अल समरी इस ओहदाए जलीला पर फ़ाएज़ हुए। आपकी कुन्नियत अबुल हसन थी। आप अपने फ़राएज़ अंजाम दे रहे थे , जब वक़्त क़रीब आया तो आप से कहा गया कि आप अपने बाद का क्या इंतेज़ाम करेंगे ? आपने फ़रमाया कि अब आइन्दा यह सिलसिला क़ाएम न रहेगा।(मजालेसुल मोमेनीन , पृष्ठ 89 व जज़ीरए खि़ज़रा पृष्ठ 6 व अनवारूल हुसैनिया पृष्ठ 55 ) मुल्ला जामी अपनी किताब शवाहेदुन नबूवत के पृष्ठ 214 में लिखते हैं कि मोहम्मद अल समरी के इन्तेक़ाल से 6 यौम क़ब्ल इमाम (अ.स.) का एक फ़रमाने नाहिया मुक़द्देसा से बरामद हुआ जिसमें उनकी वफ़ात का ज़िक्र और सिलसिलाए सिफ़ारत के ख़त्म होने का सिलसिला था। इमाम मेहदी (अ.स.) के ख़त के उयून अल्फ़ाज़ यह हैं।

बिस्मिल्लाहिर्रहमार्निरहीम

या अली बिन मोहम्मद अज़म अल्लाह अजरा ख़वाएनेका फ़ीक़ा फ़ाअनका मयता मा बैनका व बैने सुन्नता अय्याम फ़ा अज़मा अमरेका वला तरज़ इला अहद याकौ़म मक़ामेका बाअद वफ़ातेका फ़क़त वक़अत अल ग़ैबता अल तामता फ़ला ज़हूर इला बआद इज़न अल्लाह ताआला व ज़ालेका बआद तूल अल आमद। ’’

तरजुमा:- ऐ अली बिन मोहम्मद ! ख़ुदा वन्दे आलम तुम्हारे बारे में तुम्हारे भाईयों और दोस्तों को अजरे जमील अता करे। तुम्हें मालूम हो कि तुम 6 यौम में वफ़ात पाने वाले हो , तुम अपने इन्तेज़ामात कर लो और आइन्दा के लिये अपना कोई क़ाएम मुक़ाम तजवीज़ व तलाश न करो। इस लिये कि ग़ैबते कुबरा वाक़े हो गई है और इज़ने ख़ुदा के बग़ैर ज़हूर न मुम्किन होगा। यह ज़हूर बहुत तवील अर्से के बाद होगा।

ग़रज़ कि 6 दिन गुज़रने के बाद हज़रत अबुल हसन अली बिन मोहम्मद अल समरी बतारीख़ 15 शाबान 329 हिजरी इन्तेक़ाल फ़रमा गए और फिर कोई ख़ुसूसी सफ़ीर मुक़र्रर नहीं हुआ और ग़ैबते कुबरा शुरू हो गई।

सुफ़राए उमूमी के नाम

मुनासिब मालूम होता है कि उन सुफ़रा के इस्मा भी दरजे ज़ैल कर दिये जायें जो उन्हें नब्वाबे ख़ास के ज़रिए और सिफ़ारिश से बहुक्मे इमाम (अ.स.) मुमालिके महरूसा मख़सूसिया में इमाम (अ.स.) का काम करते और हज़रत की खि़दमत में हाज़िर होने रहते थे।

1.बग़दाद से हाजिज़ , बिलाली , अत्तार 2. कूफ़े से आसमी , 3. अहवाना से मोहम्मद बिन इब्राहीम बिन मेहरयार , 4. हमदान से मोहम्मद इब्ने सालेह , 5. रै से बसामी व असदी 6. आज़र बैजान से क़सम बिन अला , 7. नैशापूर से मोहम्मद बिन शादान , 8. क़सम से अहमद बिन इस्हाक़।(ग़ाएत अल मक़सूद जिल्द 1 पृष्ठ 120 )

हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) की ग़ैबत के बाद

हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) की ग़ैबत चूंकि ख़ुदा वन्दे आलम की तरफ़ से बतौरे लुत्फ़े ख़ास अमल में आई थी। इस लिये आप ख़ुदाई खि़दमत में हमतन मुनहमिक हो गये और ग़ायब होने के बाद आपने दीने इस्लाम की खि़दमत शुरू फ़रमा दी। मुसलमानों , मोमिनों के ख़ुतूत के जवाबात देने उनकी बवक़्ते ज़रूरत रहबरी करने और उन्हें राहे रास्त दिखाने का फ़रीज़ा अदा करना शुरू कर दिया। ज़रूरी खि़दमात आप ज़मानाए ग़ैबते सुग़रा में ब वास्ता सुफ़रा या बिला वास्ता और ज़मानए कुबरा में बिला वास्ता अन्जाम देते रहे और क़यामत तक अन्जाम देते रहेंगे।

307 हिजरी में आपका हजरे असवद नसब करना

अल्लामा अरबली लिखते हैं कि ज़मानाए नियाबत में बाद हुसैन बिन रौह , अबूल क़ासिम , जाफ़र बिन मोहम्मद , कौलिया हज के इरादे से बग़दाद गये और वह मक्के मोअज़्ज़मा पहुँच कर हज करने का फ़ैसला किये हुए थे लेकिन वह बग़दाद पहुँच कर सख़्त अलील हो गये। इसी दौरान में आपने सुना कि क़रामता ने हजरे असवद को निकाल लिया है और वह उसे कुछ दुरूस्त कर के अय्यामे हज में फिर नसब करेंगे। किताबों में चूंकि पढ़ चुके थे कि हजरे असवद सिर्फ़ इमामे ज़माना ही नसब कर सकता है जैसा कि पहले हज़रत मोहम्मद (स अ व व ) ने नसब किया था। फिर ज़मानाए हज में इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) ने नसब किया था। इसी बिना पर उन्होंने अपने एक करम फ़रमा ‘‘ इब्ने हश्शाम ’’ के ज़रिए से एक ख़त इरसाल किया और उसे कह दिया कि जो हजरे असवद नसब करे उसे यह ख़त दे देना। नसबे हजर की लोग सई कर रहे थे लेकिन वह अपनी जगह पर क़रार नहीं लेता था कि इतने में एक ख़ूब सूरत नौ जवान एक तरफ़ से सामने आया और उसने उसे नसब कर दिया और वह अपनी जगह पर मुसतक़र हो गया। जब वह वहां से रवाना हुआ तो इब्ने हश्शाम उनके पीछे हो लिये। रास्ते में उन्होंने पलट कर कहा ऐ इब्ने हश्शाम , तू जाफ़र बिन मोहम्मद का ख़त मुझे दे दे। देख उस में उसने मुझ से सवाल किया है कि वह कब तक ज़िन्दा रहेगा। यह कह कर वह नज़रों से ग़ायब हो गए। इब्ने हश्शाम ने सारा वाक़ेया बग़दाद पहुँच कर जाफ़र बिन क़ौलिया से बयान कर दिया। ग़रज़ कि वह तीस साल के बाद वफ़ात पा गये।(कशफ़ुल ग़ुम्मा पृष्ठ 133 )

इसी क़िस्म के कई वाक़ेयात किताबे मज़कूरा में मौजूद हैं। अल्लामा अब्दुल रहमान मुल्ला जामी रक़म तराज़ हैं कि एक शख़्स इस्माईल बिन हसन हर कुली जो नवाही हिल्ला में मुक़ीम था उसकी रान पर एक ज़ख़्म नमूदार हो गया था जो हर ज़मानए बहार में उबल आता था। जिसके इलाज से तमाम दुनिया के हकीम आजिज़ और क़ासिर हो गये थे। वह एक दिन अपने बेटे शम्सुद्दीन को हमराह ले कर सय्यद रज़ी उद्दीन अली बिन ताऊस की खि़दमत में गया। उन्होंने पहले तो बड़ी सई की लेकिन कोई चारा कार न हुआ। हर तबीब यह कहता था कि यह फोड़ा ‘‘ रगे एकहल ’’ पर है अगर इसे नशतर दिया तो जान का ख़तरा है इस लिये इसका इलाज न मुम्किन है। इस्माईल का बयान है कि ‘‘ चून अज़ अत्तबा मायूस शुदम अज़ी मत मशहद शरीफ़ सरमन राए करदम ’’ जब मैं तमाम एतबार से मायूस हो गया तो सामरा के सरदाब के क़रीब गया और वहां पर हज़रते साहेबे अम्र को मुतावज्जे किया। एक शब दरयाए दजला से ग़ुस्ल कर के वापस आ रहा था कि चार सवार नज़र आए , उनमें से एक ने मेरे ज़ख़्म के क़रीब हाथ फेरा और मैं बिल्कुल अच्छा हो गया। मैं अभी अपनी सेहत पर ताअज्जुब ही कर रहा था कि इनमें से एक सवार ने जो सफ़ेद रीश (सफ़ैद दाढ़ी) थे कहा कि ताअज्जुब क्या है। तुझे शिफ़ा देने वाले इमाम मेहदी (अ.स.) हैं। यह सुन कर मैंने उनके क़दमों का बोसा दिया और वह लोग नज़रों से ग़ायब हो गये।(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 214 व कशफ़ुल ग़ुम्मा पृष्ठ 132 )

इस्हाक़ बिन याक़ूब के नाम इमामे अस्र (अ.स.) का ख़त

अल्लामा तबरिसी बहवाला मोहम्मद बिन याक़ूब क़ुलैनी लिखते हैं कि इस्हाक़ बिन याक़ूब ने बज़रिये मोहम्मद बिन उस्मान अमरी हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) की खि़दमत में एक ख़त इरसाल किया जिसमें कई सवालात लिखे थे। हज़रत ने ख़ुद खत़ का जवाब तहरीर फ़रमाया और तमाम सवालात के जवाबात तहरीर इनायत फ़रमा दिये जिसके अजज़ा यह हैं:

1. जो हमारा मुनकिर है , वह हम से नहीं।

2. मेरे अज़ीज़ों में से जो मुख़ालेफ़त करते हैं , उनकी मिसाल इब्ने नूह और बरादराने युसुफ़ की हैं।

3. फुक्का़ह यानी जौ की शराब का पीना हराम है।

4. हम तुम्हारे माल सिर्फ़ इस लिये(बतौरे ख़ुम्स) क़ुबूल करते हैं कि तुम पाक हो जाओ और अज़ाब से निजात हासिल कर सको।

5. मेरे ज़हूर करने और न करने का ताल्लुक़ सिर्फ़ ख़ुदा से है जो लोग वक़्ते ज़हूर मुक़र्रर करते हैं वह ग़लती पर हैं झूट बोलते है।

6. जो लोग यह कहते हैं कि इमाम हुसैन (अ.स.) क़त्ल नहीं हुए वह काफ़िर झूठे और गुमराह हैं।

7. तमाम वाके़ए होने वाले हवादिस में मेरे सुफ़रा पर एतिमाद करो वह मेरी तरफ़ से तुम्हारे लिए हुज्जत हैं और मैं हुज्जतुल्लाह हूँ।

8. मोहम्मद बिन उस्मान ’’ अमीन और सुक़्क़ह हैं और उनकी तहरीर मेरी तहरीर है।

9. मोहम्मद बिन अली महरयार अहवाज़ी का दिल इन्शा अल्लाह बहुत साफ़ हो जायेगा और उन्हें कोई शक न रहेगा।

10. गाने वाले की उजरत व क़ीमत हराम है।

11. मोहम्मद बिन शादान बिन नईम हमारे शियों में से हैं।

12. अबू अल ख़त्ताब मोहम्मद बिन ज़ैनब अजद मलऊन है और इनके मानने वाले भी मलऊन हैं मैं और मेरे बाप दादा इस से और इसके बाप दादा से हमेशा बेज़ार रहे हैं।

13. जो हमारा माल खाते हैं वह अपने पेटों में आग भरते हैं।

14. ख़ुम्स हमारे सादात शिया के लिये हलाल है।

15. जो लोग दीने ख़ुदा में शक करते हैं वह अपने खुद ज़िम्मेदार हैं।

16. मेरी ग़ैबत क्यो वाक़ेए हुई है यह बात ख़ुदा की मसलहत से मुताअल्लिक़ है इसके मुताअल्लिक़ सवाल बेकार है। मेरे आबाओ अजदाद दुनियां वालों के शिकन्जें में हमेशा रहे हैं लेकिन ख़ुदा ने मुझे इस शिकन्जे से बचा लिया है जब मैं ज़हूर करूगां बिल्कुल आज़ाद हूंगा।

17. ज़मानाए ग़ैबत में मुझ से फ़ायदा क्या है इसके मुताअल्लिक़ यह समझ लो कि मेरी मिसाल ग़ैबत में वैसी है , जैसे अब्र में छुपे हुए आफ़ताब की। मैं सितारों की मानिन्द अहले अर्ज़ के लिये अमान हूँ। तुम लोग ग़ैबत और ज़हूर के मुताअल्लिक़ सवालात का सिलसिला बन्द करो और ख़ुदा वन्दे आलम की बारगाह में दोआ करो औ वह जल्द मेरे ज़हूर का हुक्म दे दे। ऐ इस्हाक़ ! तुम पर और उन लोगों पर मेरा सलाम जो हिदायत की इब्तेदा करते हैं।

(आलामुल वुरा पृष्ठ 258, मजालिसुल मोमेनीन पृष्ठ 190, कशफ़ुल ग़ुम्मा पृष्ठ 140 )

शेख़ मोहम्मद बिन मोहम्मद के नाम इमामे ज़माना (अ.स.) का मकतूबे गिरामी

डलमा का बयान है कि हज़रत इमामे अस्र (अ.स.) ने जनाबे शेख़ मुफ़ीद अबू अब्दुल्लाह मोहम्मद बिन मोहम्मद बिन नेमान के नाम एक मकतूब इरसाल फ़रमाया है जिसमें उन्होंने शेख़ मुफ़ीद की मदह फ़रमाई है और बहुत से वाक़ेयात से मौसूफ़ को आगाह फ़रमाया है। उनके मकतूबे गिरामी का तरजुमा यह है:-

मेरे नेक बरादर और लाएक़ मोहिब , तुम पर मेरा सलाम हो। तुम्हें दीनी मामले में ख़ुलूस हासिल है और तुम मेरे बारे में यक़ीने कामिल रखते हो। हम उस ख़ुदा की तारीफ़ करते हैं जिसके सिवा कोई माबूद नहीं है। हम दुरूद भेजते हैं हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) और उनकी पाक आल पर। हमारी दुआ है कि ख़ुदा तुम्हारी तौफ़ीक़ाते दीनी हमेशा क़ाएम रखे और तुम्हें नुसरते हक़ की तरफ़ हमेशा मुतावज्जा रहे। तुम जो हमारे बारे में सिदक़ बयानी करते रहतें हो , ख़ुदा तुमको इसका अज्र अता फ़रमाए। तुम ने जो हम से ख़त व किताबत का सिलसिला जारी रखा और दोस्तों को फ़ायदा पहुँचाया , वह का़बिले मदह व सताईश है। हमारी दोआ है कि ख़ुदा तुम को दुश्मनों के मुक़ाबले में कामयाब रखे। अब ज़रा ठहर जाओ , और जैसा हम कहते हैं उस पर अमल करो। अगरचे हम ज़ालिमों के इमकानात से दूर हैं जब तब दौलते दुनियां फ़ासिक़ों के हाथ में रहेगी। हम उन लग़ज़ीशों को जानते हैं जो लोगों से अपने नेक असलाफ़ के खि़लाफ़ जा़हिर हो रही हैं। (शायद इससे अपने चचा जाफ़र की तरफ़ इरशाद फ़रमाया है) उन्होंने अपने अहदों को पसे पुश्त डाल दिया गोया वह कुछ जानते ही नहीं। ताहम हम उनकी रिवायतों को छोड़ने वाले नहीं और न उनके ज़िक्र भूलने वालें हैं अगर ऐसा होता तो इन पर मुसीबतें नाज़िल होतीं और दुश्मनों का ग़लबा हासिल हो जाता , पस उनसे कहो कि ख़ुदा से डरो और हमारे अमर नहीं मुनकर की हिफ़ाज़त करो और अल्लाह अपने नूर का कामिल करने वाला है चाहे मुश्रिक कैसी ही कराहीय्यत करें तक़य्या को पकड़े रहो। मैं उसकी निजात का ज़ामिन हूँ जो ख़ुदा की मरज़ी का रास्ता चलेगा। इस साल जमादील अव्वल का महीना आयेगा तो इसके वाक़ियात से इबरत हासिल करना तुम्हारे लिए आसमान व ज़मीन से रौशन आएतें ज़ाहिर होगीं। मुसलमानों के गिरोह हुज़न व क़लक़ में बामुक़ाम एराक़ फंस जाएगें और उनकी बद आमालियों की वजह से रिज़्क़ में तगीं हो जाऐगी। फिर यह ज़िल्लत व मुसीबत शरीरों की हलाकत के बाद दूर हो जायेगी। उनकी हलाकत से नेक और मुत्तक़ी लोग ख़ुश होंगे। लोगों को चाहिये कि वह ऐसे काम करें जिनसे उनमें हमारी मोहब्बत ज़्यादा हो। यह मालूम होना चाहिए कि जब मौत यकायक आएगी तो बाबे तौबा बन्द हो जाऐगा और ख़ुदाई कहर से नजात न मिलेगी। ख़ुदा तुम को नेकी पर क़ाएम रखे और तुम पर रहमत नाज़िल करे। ’’

मेरे ख़्याल में यह ख़त अहदे ग़ैबते कुबरा का है , क्योंकि शेख़ मुफ़िद की विलादत 11 ज़ीक़ाद 326 हिजरी और वफ़ात 3 रमज़ान 413 हिजरी में हुई और ग़ैबते सुग़रा का ऐख़्तेतामम 15 शाबान 329 हिजरी में हुआ है। अल्लामा कबीर हज़रत शहीदे सालिस अल्लामा नूर उल्लाह शूस्तरी मजालिस अल मोमेनीन के पृष्ठ 206 में लिखते हैं कि शेख़ मुफ़ीद के मरने के बाद हज़रत इमामे इस्र (अ.स.) ने तीन शेर इरसाल फ़रमाए थे जो मरहूम की क़ब्र पर कन्दा हैं।

उन हज़रात के नाम जिन्होंने ज़मानए ग़ैबते सुग़रा में इमाम को देखा है।

चारों वकलये ख़ुसूसी और सात वकलाए उमूमी के अलावा वह जिन लोगों ने हज़रत इमामे अस्र (अ.स.) को देखा है उनके इसमाए बाज़ के नाम यह हैं:-

बग़दाद के रहने वालों में से , 1. अबू अल क़ासिम बिन रईस , 2. अबू अब्दुल्लाह इब्ने फ़राख़ , 3. मसरूर अल तबाख़ , 4. , 5. अहमद व मोहम्मद पिसराने हसन , 6. इसहाक़ कातिब अज़नू बख़्त , 7. साहेगे अल फ़राए , 8. साहेबे असरतह अल मख़तूमा , 9. अबू अल क़ासिम बिन अबी जलैसा , 10. अबू अब्दुल्लाह अल कन्दी , 11. अबू अब्दुल्लाह अल जन्दी , 12. हारून अल फ़राज़ , 13. अल नैला , (हमदान के बाशिन्दों में से) 16. हसन बिन हरवान , 17. अहमद बिन हरवान(अज़ असफ़हान) 18. इब्ने बाज़शाला ,(अज़ जै़मर) 19. ज़ैदान अज़ क़ुम , 20. हसन बिन नसर , 21. मोहम्मद बिन मोहम्मद , 22. अली बिन मोहम्मद बिन इसहाक़ , 23. मोहम्मद बिन इसहाक़ , 24. हसन बिन याक़ूब , (अज़ रै) 25. क़सम बिन मूसा , 26. फ़रज़न्द क़सीम बिन मूसा , 27. इब्ने मोहम्मद बिन हारून , 28. साहेबे अल अस साका़ , 29. अली बिन मोहम्मद , 30. मोहम्मद बिन याक़ूब क़ुलैनी , 31. अबू जाफ़र अरक़ा , (अज़ कज़वीन) 32. मरवास , 33. अली बिन अहमद , (अज़ फ़ारस) 34. अकमज़रूह (शेहज़ोर) 35. इब्ने अल जमाल , (अज़ क़ुद्स) 36. मजरूह (अज़मरो) 37. साहेबे अलफ़ दीनार , 38. साहेबे अल माल व अरक़ता अल बैज़ा , 39. अबू साबित (अज़ नेशापूर) 40. मोहम्मद बिन शोऐब बिन सालेह (अज़ यमन) 41. फ़ज़ल बिन यज़ीद , 42. हसन बिन फ़ज़ल , 43. जाफ़री , 44. इब्ने अल अजमी , 45. शमशाती (अज़ मिस्र) 46. साहेबे अल मौलूदैन , 47. साहेबे अल माल , 48. अबू रहाए , (अज़ नसीबैन) 50. अल हुसैनी(ग़ायतल मक़सूद जिल्द 1 पृष्ठ 121 )

ज़्यारते नाहिया और उसूले काफ़ी

कहते हैं कि इसी ज़मानाए ग़ैबते सुग़रा में नाहिया मुक़द्देसा से एक ऐसी ज़्यारत बरामद हुई है जिसमे तमाम शोहदाए करबला के नाम और उनके क़ातिलों के असमा हैं इसे ‘‘ ज़्यारते नाहिया ’’ के नाम से मौसूम किया जाता है।

इसी तरह यह भी कहा जाता है कि उसूले काफ़ी जो कि हज़रत सुक़तुल इस्लाम अल्लामा क़ुलैनी अल मतूफ़ी 328 हिजरी की 20 साला तसनीफ़ है। वह जब इमामे अस्र (अ.स.) की खि़दमत में पेश हुई तो आपने फ़रमाया ‘‘ हाज़ क़ाफ़े लाशैतना ’’ यह हमारे शियो के लिये काफ़ी है।

ज़्यारते नाहिया की तौसीक़ बहुत से उलमा ने की है जिनमें अल्लामा तबरसी और मजलिसी भी हैं। दोआए सबासब आप ही से मरवी है।

ग़ैबते कुबरा में इमाम मेहदी (अ.स.) का मरक़जी़ मुक़ाम

इमाम मेहदी (अ.स.) चुंकि उसी तरह ज़िन्दा और बाक़ी हैं जिस तरह हज़रत ईसा (अ स ) , हज़रत खि़ज्ऱ (अ.स.) हज़रत इलयास नीज़ दज्जाल , बताल , याजूज माजूज और इब्लीस लईन ज़िन्दा और बाक़ी हैं और उन सब का मरक़ज़ी मुक़ाम मौजूद है। जहां यह रहते हैं मसलन हज़रत ईसा चौथे आसमान पर(क़ुरान मजीद) हज़रत इदरीस जन्नत में(क़ुरान मजीद) हज़रत खि़ज़्र और इलयास मजमउल बहरैन यानी दरियाए फ़ारस व रोम के दरमियान पानी के क़सर में(अजाएब अल क़स अल्लामा अब्दुल वाहिद पृष्ठ 176 ) और दज्जाल व बताल तबरस्तान जज़ीराए मग़रिब में(किताब ग़ायतुल मक़सूद जिल्द 1 पृष्ठ 102 ) और याजूज माजूज बहरे रोम के अक़ब में दो पहाड़ों के दरमियान(ग़ायतल मक़सूद जिल्द 2 पृष्ठ 74 ) और इबलीस लईन , इस्तेमारे अरज़ी के वक़्त वाले पाएतख़्त मुल्तान में(किताब इरशाद उत तालेबीन अल्लामा अख़ून्द दरवीज़ा पृष्ठ 243 ) तो ला मुहाला हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) का भी कोई मरकज़ी मुक़ाम होना ज़रूरी है जहां आप तशरीफ़ फ़रमा हों और वहां से सारी काएनात में अपने फ़राएज़ अंजाम देते हों।

इसी लिये कहा जाता है कि ज़मानाए ग़ैबत में हज़रत मेहदी (अ.स.)(जज़ीराए खि़ज़रा और बहरे अबयज़) में अपनी औलाद अपने असहाब समेत क़याम फ़रमा हैं और वहीं से ब एजाज़ तमाम काम किया करते और जगह पहुँचा करते हैं। यह जज़ीराए खि़ज़रा सरज़मीने विलायत बरबर में दरमियान दरिया उन्दलिस वाक़े है यह जज़ीरह मामूर व आबाद है। इस दरिया के साहिल में एक मौज़ा भी है जो ब शक्ले जज़ीरा है उसे उन्दलिस वाले(जज़ीराए रफ़ज़ा) कहते हैं क्यों कि उसमें सारी आबादी शियों की है। इस तमाम आबादी की ख़ुराक वग़ैरा जज़ीराए खि़ज़रा से बराह बहरे अबयज़ साल में दो बार इरसाल की जाती है।

मुलाहेज़ा हो (तारीख़ जहाँ आरा , रेआज़ उल उलमा कफ़ाएतुल मेहदी , कशफ़ुल के़नाअ , रेआज़ अल मोमेनीन , ग़ाएतल मक़सूद , रिसाला जज़ीराए खि़ज़रा , बहरे अबयज़ और मजालिस अल मोमेनीन , अल्लामा नूर उल्लाह शूस्तरी व बेहारूल अनवार , अल्लामा मजलिसी किताब रौज़तुल शौहदा अल्लामा हुसैन वाज़ेए काशफ़ी पृष्ठ 439 में इमाम मेहदी (अ.स.) के अक़साए बिलादे मग़रिब में होने और उनके शहरों पर तसर्रूफ़ रखने और साहबे औलाद वग़ैरा होने का हवाला है।

इमाम शिब्लन्जी अल्लामा अब्दुल अल मोमिन ने भी अपनी किताब नूरूल अबसार के पृष्ठ 152 में इसकी तरफ़ ब हवाला किताब जामेए अल फ़नून इशारा किया है ग़यास अल ग़ास के पृष्ठ 72 में है कि यह वह दरिया है जिसके जानिबे मशरिक़ चीन , जानिबे ग़रबी यमन , जानिबे शुमाली हिन्द , जानिबे जुनूबी दरियाए मोहीत वाक़े हैं। इस बहरे अबयज़ व अख़ज़र का तूल 2 हज़ार फ़रसख़ और अर्ज़ पाँच सौ फ़रसख़ है। इसमें बहुत से जज़ीरे आबाद हैं जिनमें एक सरान्दीब भी है इस किताब के पृष्ठ 295 में है कि आप कि ‘‘ साहेबुज़्ज़मान ’’ हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) का लक़ब है। अल्लामा तबरसी लिखते हैं कि आप जिस मकान में रहते हैं उसे ‘‘ बैतुल हम्द ’’ कहते हैं।(आलामुल वुरा पृष्ठ 263 )


जज़ीराए खि़ज़रा में इमाम (अ.स.) से मुलाक़ात

हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) की क़याम गाह जज़ीराए खि़ज़रा में जो लोग पहुँचे हैं उनमें से शेख़ सालेह , शेख़ ज़ैनुल आब्दीन अली बिन फ़ाज़िल माज़न्देरानी का नाम नुमाया तौर पर नज़र आता है। आपकी मुलाक़ात की तस्दीक़ , फ़ज़ल बिन यहिया बिन अली ताबई कुफ़ी व शेख़ आलिम आलिम शेख़ शम्सुद्दीन नजी अली व शेख़ जलालुद्दीन , अब्दुल्लाह इब्ने अवाम हिल्ली ने फ़रमाई है।

अल्लामा मजलिसी ने आपके सफ़र की सारी रूदाद एक रिसाले की सूरत में ज़ब्त किया है जिसका मुसलसल ज़िक्र बेहारूल अनवार में मौजूद है। रिसाला जज़ीराए खि़ज़रा के पृष्ठ 1 में है कि शेख़ अजल सईद शहीद बिन मोहम्मद मक्की और मीर शम्सुद्दीन मोहम्मद असद उल्लाह शुस्तरी ने भी तसदीक़ की है।

मोअल्लिफ़ किताबे रिसाला जज़ीराए खि़ज़रा कहता है कि हज़रत की विलादत हज़रत की ग़ैबत , हज़रत का ज़ुहूर वग़ैरा जिस तरह रमज़े ख़ुदावन्दी और राज़े इलाही है उसी तरह आपकी जाए क़याम भी एक राज़ है जिसकी इत्तेला आम ज़रूरी नहीं है। वाज़े हो कि कोलम्बस के इदराक से भी क़ब्ल अमरीका का वजूद था।

इमामे ग़ायब का हर जगह हाज़िर होना

अहादीस से साबित है कि इमाम मेहदी (अ.स.) जो कि मज़हरूल अजाएब हज़रत अली (अ.स.) के पोते हैं , हर मक़ाम पर पहुँचते और हर जगह अपने मानने वालों के काम आते हैं। उलमा ने लिखा है कि आप ब वक़्ते ज़रूरी मज़हबी लोगों से मिलते हैं उन्हें देखते हैं यह और बात है कि उन्हें पहचान न सकें।(गा़एतुल मक़सूद)

इमाम मेहदी (अ.स.) और हज्जे काबा

यह मुसल्लेमात से है कि हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) हर साल काबा के लिये मक्का मोअज़्ज़मा इसी तरह तशरीफ़ ले जाते हैं जिस तरह हज़रते खि़ज़र व इलयास (अ.स.) जाते हैं।(सिराज अल क़ुलूब पृष्ठ 77 )

अहमद कूफ़ी का बयान है कि मैं तवाफ़े काबा में मसरूफ़ व मशग़ूल था कि मेरी नज़र एक निहायत ख़ूब सूरत नवजवान पर पड़ी मैंने पूछा आप कौन हैं और कहां से तशरीफ़ लाए हैं ? आपने फ़रमाया ‘‘ अनल मेहदी व अनल क़ाएम ’’ मैं मेहदी आख़रूज़ ज़मा और क़ाएमे आले मोहम्मद (स अ व व ) हूँ।

ग़ानम हिन्दी का बयान है कि मैं इमाम मेहदी (अ.स.) की तलाश में एक मरतबा बग़दाद गया , एक पुल से गुज़रते हुए मुझे एक साहब मिले वह मुझे एक बाग़ में ले गए और उन्होंने मुझ से हिन्दी ज़बान में कलाम किया और फ़रमाया कि तुम इस साल हज के लिये ना जाओ वरना नुक़सान पहुँच जाऐगा। मोहम्मद बिन शाज़ान का कहना है कि मैं एक दफ़ा मदीने में दाखि़ल हुआ तो हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) से मुलाक़ात हुई , उन्होंने मेरा पूरा नाम ले कर मुझे पुकारा , चुंकि पूरे नाम से कोई वाक़िफ़ न था इस लिये मुझे ताज्जुब हुआ। मैंने पूछा आप कौन हैं ? फ़रमाया इमामे ज़मान हूँ।

अल्लामा शेख़ सुलेमान क़न्दूज़ी बलख़ी तहरीर फ़रमाते हैं कि अब्दुल्लाह इब्ने सालेह ने कहा मैंने ग़ैबते कुबरा के बाद इमाम मेहदी (अ.स.) को हजरे असवद के नज़दीक इस हाल में खड़े हुए देखा कि उन्हें लोग चारों तरफ़ से घेरे हुए हैं।(यनाबिउल मोवद्दता)

ज़मानाए ग़ैबते कुबरा में इमाम मेहदी (अ.स.) की बैअत

हज़रत शेख़ अब्दुल लतीफ़ हलबी हनफ़ी का कहना है कि मेरे वालिद शेख़ इब्राहीम हुसैन का शुमार हलब के मशएख़ अज़ाम में था। वह फ़रमाते हैं कि मेरे मिस्री उस्ताद ने बयान किया है कि मैंने हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) के हाथ पर बैअत की है।(नियाबुल मोवद्दता बाब 85 पृष्ठ 392 )

इमाम मेहदी (अ.स.) की मोमेनीन से मुलाक़ात

रिसालए जज़ीरए खि़ज़रा के पृष्ठ 16 में ब हवाला अहादीसे आले मोहम्मद (स अ व व ) मरक़ूम है कि हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) से हर मोमिन की मुलाक़ात होती है यह और बात है कि मोमेनीन उन्हें मसलहते ख़ुदा वन्दी की बिना पर इस तरह न पहचान सकें जिस तरह पहचान्ना चाहिये। मुनासिब मालूम होता है कि इस मुक़ाम पर मैं अपना ख़्वाब लिख दूँ। वाक़िया है कि आज कल जब कि मैं इमामे ज़माना (अ.स.) के हालात लिख रहा हूँ हदिसे मज़कूर पर नज़र डालने के बाद फ़ौरन ज़हन में यह ख़्याल पैदा हुआ कि मौला सब को दिखाई देते हैं लेकिन मुझे आज तक नज़र नहीं आये। इसके बाद मैं बिस्तरे इस्तेराहत पर गया और सोने के इरादे से लेटा। अभी नींद ना आई थी और क़तई तौर पर नीम बेदारी(ग़ुनूदगी) की हालत थी कि नागाह मैंने देखा कि मेरे मकान से मशरिक़ की जानिब ता बा हद्दे नज़र एक क़ौसी ख़त पड़ा हुआ है यानी शुमाल की जानिब का सारा हिस्सा आलमे पहाड़ है और उस पर इमाम मेहदी (अ.स.) तलवार लिये ख़ड़े हैं और यह कहते हुए कि ‘‘ निस्फ़ दुनिया आज ही फ़तह कर लूंगा ’’ शुमाल की जानिब एक पांव बढ़ा रहे हैं। आपका क़द आम इंसानों के क़द से डेयोढ़ा और जिस्म दोहरा है। बड़ी बड़ी सुरगमीं आंखें और चेहरा इन्तेहाई रौशन है। आपके पट्टे कटे हुए हैं और सारा लिबास सफ़ैद है और वक़्त अस्र का है। यह वाक़िया 30 नवम्बर 1958 ई0 शबे यक शम्बा(रवीवार की रात) ब वक़्त 4.30 बजे शब का है।

मुल्ला मोहम्मद बाक़िर दामाद का इमामे अस्र (अ.स.) से इस्तेफ़ादा करना

हमारे अकसर उलेमा इल्मी मसाएल और मज़हबी व मआशरती मराहिल हज़रत इमामे ज़माना (अ.स.) ही से तय करते आये हैं। मुल्ला मोहम्मद बाक़िर दामाद जो हमारे अज़ीमुल क़द्र मुजतहिद थे उनके मुताअल्लिक़ है कि एक शब आपने ज़रीह नजफ़े अशरफ़ में एक मसला लिख कर डाला , उसके जवाब में तहरीरन कहा गया कि तुम्हारा इमामे ज़माना इस वक़्त मस्जिदे कूफ़ा में नमाज़ गुज़ार है , तुम वहां जाओ। वह वहा जा पहुँचे। खुद ब खुद मस्जिद का दरवाज़ा खुद गया और आप अन्दर दाखि़ल हो गये। आप ने मसले का जवाब हासिल किया और आप मुतमइन हो कर बरामद हुए।

जनाब बहरूल उलूम का इमामे ज़माना (अ.स.) से मुलाका़त करना

किताब क़सासुल उलेमा मोअल्लेफ़ा अल्लामा तन्काबनी पृष्ठ 55 में मुजतहिदे आज़म करबलाए मोअल्ला जनाब आक़ा सय्यद मोहम्मद मेहदी बहरे उलूम के तज़किरे में मरक़ूम है कि एक शब आप नमाज़ में अन्दूरूने हरम मशग़ूल थे कि इतने में इमामे अस्र (अ.स.) अपने अबो जद की ज़्यारत के लिये तशरीफ़ लाये जिसकी वजह से उनकी ज़बान में लुकनत हुई और बदन में एक क़िस्म का राशा पैदा हो गया फिर जब वह वापस तशरीफ़ ले गये तो उन पर जो एक ख़ास क़िस्म की कैफ़ियत तारी थी वह जाती रही। इसके अलावा आपके इसी क़िस्म के कई वाक़ेयात किताब मज़कूरा में लिखे हैं।

इमाम मेहदी (अ.स.) का हिमायते मज़हब फ़रमाना

वाक़िए‘‘ अनार ’’

किताब कशफ़ुल ग़ुम्मा पृष्ठ 133 में है कि सय्यद बाक़ी बिन अतूवाह इमामिया मज़हब के थे और उनके वालिद ज़ैद यह ख़्याल रखते थे। एक दिन उनके वालिद अतूवाह ने कहा कि मैं सख़्त अलील हो गया हूँ और अब बचने की कोई उम्मीद नहीं। हर क़िस्म के हकीमों का इलाज कर चुका हूँ। ऐ नूरे नज़र मैं तुमसे वायदा करता हूँ कि अगर मुझे तुम्हारे इमाम ने शिफ़ा दे दी तो मैं मज़हबे इमामिया इख़्तेयार कर लूंगा। यह कहने के बाद जब यह रात को बिस्तर पर गये तो इमामे ज़माना का उन पर ज़हूर हुआ , इमाम ने मक़ामे मर्ज़ को अपने हाथ से मस कर दिया और वह मर्ज़ जाता रहा , अतूवाह ने उसी वक़्त मज़हबे इमामिया इख़्तेयार कर लिया और रात ही में जा कर अपने फ़रज़न्द बाक़ी अतूवाह को ख़ुश ख़बरी दे दी।

इसी तरह किताब जवाहरूल बयान में है कि बहरैन का वाली नसरानी और उसका वज़ीर ख़वारजी था। वज़ीर ने बादशाह के सामने चन्द ताज़ा अनार पेश किये जिन पर ख़ुल्फ़ा के नाम अल्ल तरतीब कन्दा थे और बादशाह को यक़ीन दिलाया कि हमारा मज़हब हक़ है और तरतीबे खि़लाफ़त मन्शाए क़ुदरत के मुताबिक़ दुरूस्त है। बादशाह के दिल में यह बात कुछ इस तरह बैठ गई िकवह यह समझने पर मजबूर हो गया कि वज़ीर का मज़हब हक़ है और इमामिया राहे बातिल पर गामज़न है। चुनान्चे उसने अपने ख़्याल की तकमील के लिये जुमला उलेमाए इमामिया को जो उसके अहदे हुकूमत में थे बुला भेजा और उन्हें अनार दिखा कर उन से कहा कि इसकी रद्द में कोई माक़ूल दलील लाओ वरना हम तुम्हें क़त्ल कर के तमाम मज़हब को जड़ से उखा़ड़ देंगे। इस वाक़िए ने उलेमाए कराम में एक अजीब क़िस्म का हैज़ान पैदा कर दिया। बिला आखि़र सब उलेमा आपस में मशवरे के बाद ऐसे दस उलेमा पर मुत्तफ़िक़ हो गये जो उन में निसबतन मुक़द्दस थे और प्रोग्राम यह बना कि जंगल में एक एक आलिम शब में जा कर इमामे ज़माना (अ.स.) से इस्तेआनत करे , चूंकि एक शब की मोहलत व मुद्दत मिली थी इस लिये परेशानी ज़्यादा थी। ग़रज़ कि उलेमा ने जंगल में जा कर इमामे ज़माना (अ.स.) से फ़रियाद का सिलसिला शुरू किया। दो आलिम अपनी अपनी मुद्दते फ़रयादो फ़ुगां ख़त्म होने पर जब वापस आये और तीसरे आलिम हज़रत मोहम्मद बिन अली की बारी आई तो आपने बदस्तूर सहरा में जाकर मुसल्ला बिछा दिया और नमाज़ के बाद इमामे ज़माना (अ.स.) को अपनी तरफ़ मुतवज्जे करने की कोशिश की लेकिन नाकाम हो कर वापस आते हुए उन्हें एक शख़्स रास्ते में मिला , उसने पूछा क्या बात है क्यों परेशान हो ? आपने अर्ज़ की इमामे ज़माना की तलाश है और वह तशरीफ़ ला नहीं रहे हैं। उस शख़्स ने कहा ‘‘ अना साहेबुल अस्र फ़ा ज़िक्र हाजतेका ’’ मैं ही तुम्हारा इमामे ज़माना हूँ। कहो क्या कहते हो। मोहम्मद बिन अली ने कहा कि अगर साहेबुल अस्र हैं तो आपसे हाजत बयान करने की ज़रूरत क्या ? आपको ख़ुद ही इल्म होगा।

इसके जवाब में उन्होंने फ़रमाया कि सुनो ! वज़ीर के कमरे में एक लकड़ी का सन्दूक़ है उसमें मिट्टी के कुछ सांचे रखे हुए हैं। जब अनार छोटा होता है वज़ीर उस पर सांचा चढ़ा देता है और जब वह बढ़ता है तो उस पर नाम कन्दा हो जाते हैं। जो सांचे में कन्दा हैं। मोहम्मद बिन अली ! तुम बादशाह को अपने हमराह ले जाकर वज़ीर के दजल व फ़रेब को वाज़े कर दो। वह अपने इरादे से बाज़ आ जायेगा और वज़ीर को सज़ा देगा। चुनान्चे ऐसा ही किया गया और वज़ीर बरख़ास्त कर दिया गया।(किताब बदाए उल अख़बार मुल्ला इस्माईल सबज़वारी , पृष्ठ 150 व सफ़ीनतुल बेहार जिल्द 1 पृष्ठ 536 मुद्रित नजफ़े अशरफ़)

इमामे अस्र (अ.स.) का वाक़िए करबला बयान करना

हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) से पूछा गया कि ‘‘كهيعص ’’ का क्या मतलब है। तो फ़रमाया कि इसमें काफ़ से करबला है , हे से हलाकते इतरत , ये से यज़ीद मलऊन , ऐन से अतशे हुसैनी , सुवाद से सब्रे आले मोहम्मद मुराद है। आपने फ़रमाया कि आयत में जनाबे ज़करिया का ज़िक्र किया गया है। जब ज़करिया को वाक़िए करबला की इत्तेला हुई तो वह तीन रोज़ तक मुसलसल रोते रहे।(तफ़सीरे सानी पृष्ठ 279 )

हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) के तूले उम्र की बहस

बाज़ मुशतशरक़ीन व माहेरीन आमार का कहना है कि ‘‘ जिनके आमाल व किरदार अच्छे होते हैं और जिनका पेज न.ए बातिन कामिल होता है उनकी उमरें तवील होती हैं। यही वजह है कि उलमा फ़ुक़हा और सुलहा की उमरें अकसर तवील देखी गई हैं और हो सकता है कि तवील उमर इमाम मेहदी (अ.स.) की यह भी वजह हो , इन से क़ब्ल जो आइम्मा (अ.स.) गुज़रे वह शहीद कर दिये गए और इन पर दुशमन का दस्तरस न हुआ तो यह ज़िन्दा रह गए और अब तक बाक़ी हैं। लेकिन मेरे नज़दीक़ उम्र का तक़र्रूर व तअय्युन दस्त एज़िदी में है उसे इख़्तेयार है कि किसी की उम्र कम रखे किसी की ज़्यादा। उसकी मोअय्यन करदा मुद्दत उम्र में एक पल का भी तफ़रेक़ा नहीं हो सकता।

तवारीख़ व अहादीस से मालूम होता है कि ख़ुदा वन्दे आलम ने बाज़ लोगों को काफ़ी तवील उमरे अता की हैं। उम्र की तवालत मसलहते ख़ुदा वन्दी पर मब्नी है। इससे उसने अपने दोस्दों और दुश्मनों को नवाज़ा है। दोस्तों में हज़रत ईसा (अ स ) , हज़रत इदरीस (अ स ) , हज़रत खि़ज़्र (अ स ) , हज़रत इलयास (अ.स.) और दुश्मनों में से इबलीस लईन , दज्जाल व बताल , याजूज माजूज वग़ैरा हैं और हो सकता है कि चुंकि क़यामत उसूले दीने इस्लाम से है और इसकी आमद में इमाम मेहदी (अ.स.) का ज़हूर ख़ास हैसियत रखता है लेहाज़ा उनका ज़िन्दा व बाक़ी रहना मक़सद रहा हो और उनके तवीले उम्र के ऐतिराज़ को रद और रफ़ा दफ़ा करने के लिये उसने बहुत से अफ़राद की उम्रें तवील कर दी हों। मज़कूरा अफ़राद को जाने दीजिए। आम इंसानों की उम्रों को देखिए बहुत से ऐसे लोग मिलेंगे जिनकी उम्रे काफ़ी तवील रही है। मिसाल के लिये मुलाहेज़ा हों:-

1. लुक़मान की उम्र 3500 साल , 2. औज बिन अनक़ की उम्र 3300 साल और बक़ौले 3600 साल , 3. ज़ुलक़रनैन की उम्र 3000 साल , 4. हज़रत नूह (अ.स.) की उम्र 900 साल , 5. ज़हाक़ व 6. तमहूरस की उम्रें 1000 साल , 7. क़ैनान की उम्र 900 साल , 8. महलाइल की उम्र 800 साल , 9. नफ़ीस बिन अब्दुल्लाह की उम्र 700 साल , 10. रबी बिन उम्र उर्फ़ सतीह काहिन की उम्र 600 साल , 11. हाकिमे अरब आमिर बिन ज़रब की उम्र 500 साल , 12. साम बिन नूह 500 साल , 13. हरस बिन मजाज़ ज़र हमी की उम्र 400 साल , 14. अरमख़्शद की उम्र 400 साल , 15. दरीद बिन ज़ैद की उम्र 456 साल , 16. सलमान फ़ारसी की उम्र 400 साल , 17. उमर बिन दूसी की उम्र 400 साल , 18. ज़ुहैर बिन जनाब बिन अब्दुल्लाह की उम्र 430 साल , 19. हरस बिन ज़यास की उम्र 400 साल , 20. काब बिन जमजा की उम्र 390 साल , 21. नसर बिन धमान बिन सलमान की उम्र 390 साल , 22. क़ैस बिन साद की उम्र 380 साल , 23. उमर बिन रबी की उम्र 333 साल , 24. अक्सम बिन ज़ैफ़ी की उम्र 336 साल , 25. उमर बिन तफ़ील अदवानी की उम्र 200 साल थी।(ग़ाएतलम क़सूद पृष्ठ 103 आलामुल वुरा पृष्ठ 270 )

इन लोगों की तवील उम्रों को देखने के बाद यह हरगिज़ नहीं कहा जा सकता कि ‘‘ चुंकि इतनी उम्र का इंसान नहीं होता , इस लिये इमाम मेहदी (अ.स.) का वजूद हम तसलीम नहीं करते। क्यों कि इमाम मेहदी (अ.स.) की उम्र इस वक़्त (किताब लिखते वक्त) 1393 हिजरी में सिर्फ़ ग्यारह सौ अड़तालिस साल की होती है जो मज़कूरा उम्रों में है लुक़मान हकीम और ज़ुलक़रनैन जैसे मुक़द्दस लोगों की उम्रों से बहुत कम है।

अलग़रज़ कु़रआने मजीद , अक़वाले उलमाए इस्लाम और अहादीस से यह साबित होता है कि इमाम मेहदी (अ.स.) पैदा हो कर ग़ायब हो गए हैं और क़यामत के क़रीब ज़हूर करेंगे और आप उसी तरह ज़मानाए ग़ैबत में भी हुज्जते ख़ुदा हैं जिस तरह बाज़ अम्बिया अपने अहदे नबूवत में ग़ायब होने के दौरान में भी हुज्जत थे।(अजाएब अल क़सस पृष्ठ 191 ) और अक़ल भी यही कहती है कि आप ज़िन्दा और बाक़ी मौजूद हैं , क्यों कि जिस के पैदा होने पर उलमाए इस्लाम का इत्तेफ़ाक़ हुआ और वफ़ात का कोई एक भी ग़ैर मुतअसिब आलिम क़ाएल न हुआ और तवील उल उम्र इन्सानों के होने की मिसालें भी मौजूद हों तो ला मुहाला उसका मौजूद और बाक़ी होना मानना पड़ेगा। दलील मन्तक़ी से भी यही साबित होता है लेहाज़ा इमाम मेहदी (अ.स.) ज़िन्दा और बाक़ी हैं।

इन तमाम शवाहिद और दलाएल की मौजूदगी में जिनका हम ने इस किताब में ज़िक्र किया है मौलवी मोहम्मद अमीन मिस्री का रिसाला ‘‘ तूले इस्लाम ’’ कराची जिल्द 14 पृष्ठ 45 व पृष्ठ 94 में यह कहना कि , ‘‘ शियों को इब्तेदाअन रूए ज़मीन पर कोई ज़ाहेरी ममलेकत का़एम करने में कामयाबी न हो सकी इनको तकलीफ़ें दी गईं और परागन्दा और मुन्तशिर कर दिया गया तो उन्होंने हमारे ख़्याल के मुताबिक़ इमामे मुन्तज़िर और इमाम मेहदी (अ.स.) वग़ैरा के पुर उम्मीद अक़ाएद ईजाद कर लिये ताकि अवाम की ढारस बन्धी रहे।

और मुल्ला अख़ून्द दरवेज़ा का किताब इरशाद अल तालेबीत पृष्ठ 396 मे यह फ़रमाना कि , ‘‘ हिन्दुस्तान में एक शख़्स अब्दुल्लाह नामी पैदा होगा जिसकी बीवी अमीना(आमना) होगी। उसके एक लड़का पैदा होगा जिसका नाम मोहम्मद होगा , वही कूफ़े जा कर हुकूमत करेगा। लोगों का यह कहना दुरूस्त नहीं कि इमाम मेहदी (अ.स.) वही हैं जो इमाम हसन असकरी (अ.स.) के फ़रज़न्द हैं। ’’ हद दरजा मज़हक़ा ख़ेज़ , अफ़सोसनाक और हैरत अंगेज़ है क्यों कि उलेमाए फ़रीक़ैन का इत्तेफ़ाक़ है कि ‘‘ अल मेहदी मन वलद अल इमाम अल हसन अल असकरी ’’ इमाम मेहदी (अ.स.) हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) के बेटे हैं और 15 शाबान 255 हिजरी में पैदा हो चुके हैं।

मुलाहेज़ा हो , असआफ़ अल राग़बैन , दफ़यातुल अयान , रौज़तुल अहबाब , तारीख़े इब्नुल वरदी , नेयाबुल मोअद्दता , तारीख़े कामिल , तारीख़े तबरी , नुरूल अबसार , उसूले काफ़ी , कशफ़ुल ग़म्मा , जिलाउल उयून , इरशाद मुफ़ीद , आलामुल वरा , जामाए अब्बासी , सवाएक़े मोहर्रेक़ा , मतालेबुस सूऊल , शवाहेदुन नबूवत , अर हज्जुल मतालिब , बेहारूल अनवार , मनाक़िब वग़ैरा।

हदीसे नअसल और इमामे अस्र(अ स . )

नअसल एक यहूदी था जिससे हज़रत आयशा हज़रत उस्मान को तशबीह दिया करती थीं और रसूले इस्लाम (स अ व व ) के बाद फ़रमाया करती थीं इस नअसले इस्लामी उस्मान को क़त्ल कर दो। मुलाहेज़ा हो ,(निहायत अल लुग़ता अल्लामा इब्ने असीर जज़री पृष्ठ 321 ) यही नअसल एक दिन हुज़ूर रसूले करीम (स अ व व ) की खि़दमत में हाज़िर हो कर अर्ज़ परदाज़ हुआ , मुझे अपने ख़ुदा , अपने दीन , अपने ख़ुलफ़ा का ताअर्रूफ़ कराईये अगर मैं आपके जवाब से मुतमईन हो गया तो मुसलमान हो जाऊंगा। हज़रत ने निहायत बलीग़ और बेहतरीन अंदाज़ में ख़ल्लाके आलम का ताअर्रूफ़ कराया। उसके बाद दीने इस्लाम की वज़ाहत की , ‘‘ का़ला सदक़त ’’ नअसल ने कहा आपने बिल्कुल दुरूस्त फ़रमाया फिर उसने अर्ज़ कि मुझे अपने वसी से आगाह कीजिए और बताइये की वह कौन हैं ? आपने फ़रमाया मेरे वसी अली बिन अबी तालिब (अ.स.) और उनके फ़रज़न्द हसन (अ.स.) व हुसैन (अ.स.) के सुल्ब से नौ (9) बेटे क़यामत तक होंगे। उसने कहा सब के नाम बताइये। आपने बारह इमामों के नाम बताए। नामों को सुनने के बाद वह मुसलमान हो गया और कहने लगा कि मैंने कुतुबे आसमानी में इन बारह नामों को इसी ज़बान के अलफ़ाज़ में देखा है। फिर उसने हर वसी के हालात बयान किये। करबला का होने वाला वाक़िया बताया। इमाम मेहदी (अ.स.) की ग़ैबत की ख़बर दी और कहा कि हमारे बारह इस्बात में से लादी बिन बरखि़या ग़ायब हो गये थे। फिर मुद्दतों के बाद ज़ाहिर हुये और अज़ सरे नौ दीन की बुनियादें इस्तेवार (मज़बूत) कीं।

हज़रत ने फ़रमाया इसी तरह हमारा बारहवां जानशीन इमाम मेहदी मोहम्मद बिन हसन (अ.स.) तवील मुद्दत तक ग़ायब रह कर ज़हूर करेगा और दुनियां को अदलो इन्साफ़ से भर देगा।

(ग़ायतुल मक़सूद पृष्ठ 134 बहवाला फ़राएद अल सिमतैन हमवीनी)

अलामते ज़हूरे मेहदी (अ.स.) के मुताअल्लिक़ अरबाबे अस्मत के इरशादात

इमाम मेहदी (अ.स.) के ज़हूर से पहले बेशुमार अलामात ज़ाहिर होंगे। फिर आखि़र में आपका ज़हूर होगा। मग़रिब व मशरिक़ पर आपकी हुकूमत होगी। ज़मीन खुद ब खुद तमाम दफ़ाएन (ज़मीन के ख़ज़ाने) उगल देगी। दुनियां की कोई ऐसी ज़मीन न बाक़ी रहेगी जिसको आप आबाद न कर दें। अलामाते ज़हूर में यह चन्द हैं:

1. औरतें मरदों के मुशाबेह होगीं। 2. मर्द औरतों जैसे होगें। 3. औरतें ज़ीन जैसी चीज़ें , घोड़े , साईकिलों , स्कूटरों , करों वग़ैरा पर सवारी करने लगेंगी। 4. नमाज़ जान बूझ कर क़ज़ा की जाने लगेगी। 5. लोग ख़ाहिशाते नफ़सानी की पैरवी करने लगेंगे। 6. क़त्ल करना मामूली चीज़ समझा जायेगा। 7. सूद का ज़ोर होगा। 8. ज़िना आम होगा। 9. अच्छी अच्छी इमारतें बहुत बनेगीं। 10. झूठ बोलना हलाल समझा जायेगा। 11. रिश्वत आम होगी। 12. शहवते नफ़सानी की पैरवी की जायेगी। 13. दीन को दुनिया के बदले बेचा जायेगा। 14. अज़ीज़दारी की परवाह न होगी। 15. अहमक़ों को आमिल बनाया जायेगा। 16. बुर्दबारी को बुज़दिली व कमज़ोरी पर महमूल किया जायेगा। 17. ज़ुल्म फ़ख़्र के तौर पर किया जायेगा। 18. बादशाह व उमरा फ़ासिक़ो फ़ाजिर होंगे। 19. वज़ीर झूठ बोलेंगे। 20. अमानत दार ख़ाएन होंगे। 21. हर एक मद्दगार ज़ुल्म परवर होगा। 22. क़ारीयाने क़ुरआन फ़ासिक़ होंगे। 23. ज़ुल्म व जौर आम होगा। 24. तलाक़ बहुत ज़्यादा होंगी। 25. फ़िसक़ो फ़ुजूर नुमायाँ होंगे। 26. फ़रेबी की गवाही क़ुबूल की जायेगी। 27. शराब नोशी आम होगी। 28. इग़लाम बाज़ी का ज़ोर होगा। 29. सिहक़ , यानी औरतें , औरतों के ज़रिए शहवत की आग बुझाएंगी। 30. माले ख़ुदा व रसूल (स अ व व ) को माले ग़नीमत समझा जायेगा। 31. सदक़ा व ख़ैरात से नाजायज़ फ़ायदा उठाया जायेगा। 32. शरीरों की ज़बान के ख़ौफ़ से नेक बन्दे ख़ामोश रहेंगे। 33. शाम से सुफ़ियानी का ख़ुरूज होगा। 34. यमन से यमानी बरामद होगा। 35. मक्के और मदीने के दरमियान ब मक़ाम ‘‘ लुद ’’ ज़मीन धंस जायेगी। 36. रूकन और मक़ाम के दरमियान आले मोहम्मद की एक मोअजि़्ज़ज़ फ़र्द क़त्ल होगी।(नुरूल अबसार पृष्ठ 155 मुद्रित मिस्र) 37. बनी अब्बास में शदीद एख़्तेलाफ़ होगा। 38. 15 शाबान को सूरज गरहन और इसी माह के आखि़र में चाँद गरहन होगा। 39. ज़वाल के वक़्त आफ़ताब अस्र के वक़्त तक क़ाएम रहेगा। 40. मग़रिब से आफ़ताब निकलेगा। 41. नफ़से ज़किया और सत्तर (70) सालेहीन का क़त्ल। 42. मस्जिदे कूफ़ा की दीवार ख़राब व बरबाद कर दी जायेगी। 43. ख़ुरासान की जानिब से सियाह (काले) झंडे बरामद होंगे। 44. मिस्र में एक मग़रेबी का ज़हूर होगा। 45. तुर्क जज़ीरे में होंगे। 46. रोम रमले में पहुँच जायेंगे। 47. मशरिक़ में एक सितारा निकलेगा जिसकी रौशनी मग़रिब तक फ़ैलेगी। 48. एक सुरखी ज़ाहिर होगी जो आसमान और सूरज पर गा़लिब आ जायेगी। 49. मशरिक़ से एक ज़बरदस्त आग भड़केगी जो तीन या सात रोज़ बाक़ी रहेगी और बरवायत शिब्लन्जी पृष्ठ 21 , वह आग मग़रिब तक फैल कर आलम को तहस नहस कर देगी। 50. अरब मुख़तलिफ़ बलाद पर क़ाबू पा लेंगे और अजम के बादशाह को मग़लूब कर देगें। 51. मिस्री अपने बादशाह और हाकिम को क़त्ल कर देंगे। 52. शाम तबाह व बरबाद हो जायेगा। 53. क़ैस व अरब के झंड़े मिस्र पर लहराएगें। 54. ख़ुरासान पर बनी कन्दा का परचम लहरायेगा। 55. फ़रात का पानी इस दरजा चढ़ जायेगा कि कूफ़े के गली कूचों में पानी होगा। 56. 60 , अद्द मुद्दीयाने नबूवत ज़ाहिर होंगे। 57. 13 नफ़र औलादे अबू तालिब से दावाए इमामत करेंगे। 58. बनी अब्बास का एक अज़ीम शख़्स ब मुक़ाम हलवलाद ख़ानक़ैन नज़रे आतश किया जायेगा। 59. बग़दाद में ख़रक़ जैसा पुल बनाया जायेगा। 60. सियाह आंधी का आना। 61. ज़लज़लों का आना। 62. अकसर मक़ामात पर ज़मीन का धंस जाना। 63. नागहानी मौतों का ज़्यादा होना। 64. जानो माल व समरात (फ़लों) की तबाही। 65. चींटीयों और टिड्डियों की कसरत जो खेती को खा जायें। 66. ग़ल्ले का कम उगना। 67. आपसी कुश्तो ख़ून की कसरत। 68. अपने सरदारो से लोगों का नाफ़रमान होना। 69. अपने सरदारों को क़त्ल करना। 70. बाज़ गिरोह का सुअर और बन्दर की सूरत में मसख़ होना। 71. आसमान से एक आवाज़ का आना जिसे तमाम अहले ज़मीन सुनेंगे। 72. आसमानी आवाज़ का हर ज़बान बोलने वाले के कान में उसी की ज़बान में पहुँचना। 73. बाज़ सूरतों का मक़ामे ऐन अल शम्स में ज़ाहिर होना। 74. 24 , चौबीस बारीशों का पै दर पै होना। 75. ज़मीन का ज़िन्दा हो कर अपने तमाम मालूमात ज़ाहिर करना।(कशफ़ल ग़म्मा पृष्ठ 134 ) 76. अच्छाई और बुराई एक नज़र से देखी जायेगी। 77. बुराई का हुक्म अपनी औलाद को दिया जायेगा और अच्छाई से रोका जायेगा। 78. लालच की वजह से बातिन ख़राब हो जायेंगे। 79. ख़ौफ़े ख़ुदा दिल से निकल जायेगा। 80. क़ुरआन का सिर्फ़ निशान रह जायेगा। 81. मस्जिदें आबाद मगर हिदायत से ख़ाली होंगी। 82. फ़ोक़हा फ़ितना परवर होंगे। 83. औरतों से मशवेरा लिया जायेगा। 84. गुनाह खुल्लम खुल्ला किया जायेगा। 85. बद अहदी आम होगी। 86. औरतों को तिजारत में शरीक किया जायेगा। 87. ज़लील तरीन शख़्स क़ौम का सरदार होगा। 88. गाने वालियों का ज़ोर होगा। 89. उस ज़माने के लोग अगलों पर बिला वजह लानत करेंगे। 90. झूठी गवाही दी जायेगी। 91. हक़ ख़त्म हो जायेगा। 92. क़ुरआन एक कोहना (पुरानी) किताब समझी जायेगी। 93. दीन अन्धा कर दिया जायेगा। 94. बदकारी ऐलान के साथ की जायेगी। 95. फ़िसक़ो फ़ुजूर में जिसकी मदह की जायेगी ख़ुश होगा। 96. लड़के औरतों की तरह उजरत पर इस्तेमाल होंगे। 97. मासियत पर माल ख़र्च करने वालों को टोका न जायेगा। 98. हमसाया हमसाये को अज़ीयत देगा। 99. नेकी का हुक्म करने वाला ज़लील होगा। 100. नेकी के रास्ते छोड़ दिये जायेंगे। 101. बैतुल्लाह मोअत्तल कर दिया जायेगा। 102. औरतें अन्जुमनें क़ायम करेंगी। 103. मर्द औरतों की तरह कंघी करेंगे। 104. मर्दों को शर्मगाहों का मुआवज़ा मिलेगा। 105. मोमिन से ज़्यादा साहेबे माल की इज़्ज़त होगी। 106. औरतें अपने शौहरों को मर्दों के साथ बद फ़ेली पर मजबूर करेंगी। 107. औरतों की दलाली करने वाले मोअज़्ज़ज़ समझे जायेंगे। 108. मोमिन ग़मगीन और ज़लील होगा। 109. हराम को हलाल किया जायेगा। 110. दीन में खुदराई की जायेगी। 111. गुनाह के लिये परदाए शब की ज़रूरत न होगी। 112. बड़े बड़े माल ख़ुदा की मासियत में सर्फ़ होंगे। 113. हुक्काम दीनदारी से दूर होंगे। 114. जज फ़ैसले में रिश्वत लेंगे। 115. हराम औरतों से ज़िना किया जायेगा , जैसे माँ बहनें। 116. मर्द अपनी जौजा की हराम कमाई खायेगा। 117. औरतें अपने मर्दों पर हुकूमत करेंगी। 118. मर्द अपनी जोजा और लोंडी को किराये पर चढ़ायेगा। 119. शरीफ़ को ज़लील समझा जायेगा। 120. हुक्काम में उसकी इज़्ज़त होगी जो आले मोहम्मद (स अ व व ) को बुरा कहेगा। 121. कु़रआन पढ़ना और सुन्ना बार होगा। 122. चुग़लखोरी आम होगी। 123. ग़ीबत को अच्छा समझा जायेगा। 124. हज और जेहाद ख़ुदा के लिये नहीं दीगर मक़ासिद के लिये किया जायेगा। 125. बादशाह यानी बर सरे इक़्तेदार तबक़ा मोमिन को काफ़िर के लिये ज़लील करेगा। 126. वीराना आबादी से बदल जायेगा। 127. नाप तोल में कमी लोंगो का ज़रिए माश होगा। 128. लोग रियासत तलबी के लिये अपने को बदज़बानी में मशहूर करेंगे ताकि ख़ौफ़ के मारे हुकूमत उनके सिपुर्द कर दी जाये। 129. नमाज़ बिल्कुल हलकी और बेअहमियत कर दी जायेगी। 130. माले कसीर के बावजूद ज़कात न दी जायेगी। 131. मय्यत क़ब्र से निकालीं जायेगी। 132. क़ब्र से कफ़न चुरा कर बेचा जायेगा। 133. इन्सान सुबह शाम नशे में होगा। 134. चोपायो के साथ बदफ़ेली की जायेगी। 135. चौपाए चौपायों को फाड़ खायेंगे। 136. लोग जानमाज़ पर बरहैना जायेंगे। 137. लोगों के क़ुलूब सख़्त हो जायेंगे। 138. लोगों की आंखें बेहयाई करेंगी। 139. ज़िक्रे ख़ुदा लोगों पर बार होगा। 140. माले हराम आम होगा। 141. नमाज़ सिर्फ़ दिखावे के लिये पढ़ी जायेगी। 142. फ़क़ीह दीन के सिवा दूसरे कामों के लिये फ़िक़ा हासिल करेंगे। 143. लोग ग़ासिब का साथ देंगे। 144. हलाल रोज़ी कमाने वाले की मज़म्मत की जायेगी। 145. तालिबे हराम की मदाह की जायेगी। 146. हरमैन शरीफ़ैन में ऐसे अमल होंगे जो मन्शाए ख़ुदा वन्दी के खि़लाफ़ होंगे। 147. आलाते ग़िना (गाने बजाने की चीज़ें) मक्के व मदीने में आम हों जायेंगी। 148. हक़ की हिदायत को मना किया जायेगा। 149. लोग एक दूसरे की तरफ़ देखेंगे और अहले शहर उनकी इक़्तेदा करेंगे चाहे वह कुछ करें। 150. नेकी के रास्ते ख़ाली हो जायेंगें। 151. मय्यत का मज़हका़ उड़ाया जायेगा। 152. हर साल बुराईयों मे ईज़ाफ़ा होगा। 153. मजलिस में सिर्फ़ माल दार की इज़्ज़त की जायेगी। 154. फ़क़ीरों को मज़हक़े के तौर पर माल दिया जायेगा। 155. आसमानी मख़ादफ़ से कोई ख़ौफ़ न खायेगा। 156. मर्द और औरतें सब के सामने ख़्वाहिशाते नफ़सानी की आग बुझायेंगे। 157. अपनी इज़्ज़त के ख़ौफ़ से कोई शरीफ़ किसी को रोक टोक न सकेगा। 158. मासियत में माल ख़ुशी से सर्फ़ किया जायेगा लेकिन ख़ुदा की राह में बिल्कुल न दिया जायेगा। 159. वालेदैन की तरफ़ से औलाद को आक़ करना आम हो जायेगा। 160. वालेदैन अपनी औलाद की निगाह में सुबुक़ होंगे। 161. औलाद अपने वालेदैन पर इफ़तेरा करने में ख़ुशी महसूस करेगी। 162. औरतें मुल्क व हुकूमत पर गा़लिब हो जायेंगी। 163. फ़रज़न्द अपने बाप पर बोहतान बांधेगा। 164. लड़का माँ बाप पर बद दुआ करेगा। 165. फ़रज़न्द माँ बा पके जल्द मरने की तमन्ना करेगा। 166. इंसान जिस दिन कोई गुनाह न करेगा उस दिन ग़मगीन रहेगा। 167. बादशाह गरानी के लिये ग़ल्ला रोकेगा। 168. आइज़्ज़ा का माल फ़रेब से तक़सीम किया जायेगा। 169. जुआ खेला जायेगा। 170. शराब के ज़रिये से मरीज़ों का इलाज किया जायेगा। 171. अच्छाई और बुराई दोनों की तलक़ीन बराबर हैसियत रखेगी। 172. मुनाफ़िक़ और दुश्मने ख़ुदा की हवा बंधेगी और अहले हक़ मक़हूर (बे इज़्ज़त) रहेंगे। 173. उजरत ले कर अज़ान कही जायेगी और ऐवज़ ले कर नमाज़ पढ़ाई जायेगी। 174. ख़ुदा से न डरने वाले मस्जिदों पर क़ाबिज़ होंगे। 175. मस्जिदों में न अहल जमा हो कर ग़िबतें करेंगे। 176. बद मस्त रसमी तौर पर जमाअत में खड़े हो कर नमाज़ पढ़ेंगे। 177. यतीमों का माल खाने वाले की मदह की जायेगी। 178. क़ाज़ी हुक्मे ख़ुदा के खि़लाफ़ फ़ैसला करेगा। 179. हुक्काम लालच की वजह से ख़ाइनों पर भरोसा करेंगे। 180. मीरास बदकारी में सर्फ़ की जायेगी। 181. मिम्बर पर तक़वे का ज़िक्र किया जायेगा लेकिन वाएज़ ख़ुद अमल नहीं करेगा। 182. नमाज़ के अवक़ात की परवाह न की जायेगी। 183. सदक़ा व ख़ैरात ख़ुशनूदिये ख़ुदा के लिये नहीं सिर्फ़ सिफ़ारिश पर दिया जायेगा। 184. इन्सान का मक़सूदे हयात सिर्फ़ पेट पालना और ऐश करना होगा। 185. हक़ की निशानियां मिट जायेंगी। 186. भाई भाई से हसद करेगा। 187. अपने दोस्तों के साथ ख़यानत की जायेगी। 188. दिलों में ज़हर की तरह तकब्बुर दौड़ जायेगा। 189. ज़ोहद ख़त्म हो जायेगा। 190. लोगों की शक्लें इन्सानी और दिल शैतानी हो जायेंगे। 191. उनकी उम्रें क़लील और उनकी तमन्नाएं कसीर होंगी।(बेहारूल अनवार जिल्द 13 पृष्ठ 174 मुद्रित ईरान) 192. कनीज़ों से मशविरे किये जायेंगे। 193. बच्चे मिम्बरों पर बैठेंगे। 194. ऐसे हाकिम होंगे कि जब उनसे कोई बात करेगा तो क़त्ल कर दिया जायेगा। 195. हुक्काम शुरफ़ा के माल को अपना माल समझेंगे। 196. औरतों की आबरू रेज़ी करेंगे। 197. कुछ चीज़ें मशरिक़ से और कुछ मग़रिब से लाई जायेंगी जिनसे उम्मत का इम्तेहान किया जायेगा। 198. मस्जिद नक़शों निगार से मुज़अय्यन की जायेगी। 199. कु़रआन मजीद सजाये जायेंगे। 200. मस्जिदों की मिनारें बलन्द बनाई जायेंगी। 201. मर्द सोना इस्तेमाल करेंगे। 202. रेशमी कपड़े पहनेगें। 203. चीते की खाल का फ़र्श बनायेंगे। 204. सूद ख़ोरी ज़ाहिर बज़ाहिर होगी। 205. हदे शरई न की जायेगी। 206. शरीर अफ़राद हाकिम होंगे। 207. मालदार तफ़रीह के लिये , ग़रीब दिखाने के लिये मुतवसित तिजारत के लिये हज करेंगे। 208. क़ुरआन मजीद सुर से पढ़ा जायेगा। 209. वल्द अज़ ज़ेना की कसरत होगी। 210. ख़ुशामद बहुत ज़्यादा राएज होगी। 211. लिबास पर फ़ख़रो मुबाहात किया जायेगा। 212. उमरा शतरन्ज खेलेंगे। 213. क़ारियाने क़ुरआन और अब्बाद एक दूसरे पर लानत करेंगे। 214. मालदार फ़ख़ीरों से दूर भागेंगे। 215. मुल्की नज़्म व नस्क़ में वह लोग दख़ील होंगे जिनको उससे हिस व मिस न होगा। 216. ज़मीने ऐतिराफ़ से धंस जायेंगी।(तफ़सीर अली बिन इब्राहीम क़ुम्मी पृष्ठ 229 ) 217. दरिन्दें इन्सानों से बाते करने लगेंगे। 218. लोंगो से उनके कोड़े और जूते कलाम करने लगेंगे। 219. इन्सान की राने बोलने लगेंगी और वह इसके घर के लोगों ने जो कुछ किया होगा घर के मालिक को बताने लगेगी।(नियाबुल मोवद्दता पृष्ठ 431 बहवाला तिरमिज़ी) 220. सुफ़यानी , ख़ुरासानी , यमानी का ख़ुरूज एक ही दिन , एक ही महीना , एक ही साल में होगा। 221. हुकूमते शाम , हमस महतसकीन , अरदन कफ़ससरीन पर ग़ालिब आ जायेगी। 222. तूफ़ान का ज़ोर होगा। 223. वादी याबिस से ‘‘ इब्ने आक़लातुल अकबाद ’’ खुरूज करेंगे। 224. मोमेनीन का इम्तेहान ख़ौफ़ , जू अन्कस अमवाल , नक़श , समरात से होगा। 225. शाम का ‘‘ क़रिया ’’ जाबीह ज़मीन में धंस जायेगा। 226. क़त्ले नफ़से ज़किया के 15 दिन बाद इमाम मेहदी (अ.स.) का ज़हूर होगा।(आलम अलवरा तबरसी पृष्ठ 262 मुद्रित बम्बई 1312 हिजरी) 227. दुनियां में झगड़े बखेड़े बेइन्तेहां होंगे। 228. नए नए फ़ितने पैदा होंगे। 229. आमदो रफ़्त के रास्ते बन्द हों जायेंगे। 230. लोग एक दूसरे को लूटने लगेगें।(अरजहुल मतालिब पृष्ठ 472 ) 231. मर्दों की कमी और औरतों की ज़्यादती होगी। 232. हेजाज़ से आग निकलेगी। 233. मस्जिदों से(लाऊड स्पीकर वग़ैरा के ज़रिये से) आवाज़ें बुलन्द होंगी। 234. रेशमी लिबास मर्द पहनने लगेगें। 235. मशरिक़ मग़रिब जज़ीराए अरब में ज़मीन धंस जायेंगी। 236. यमन और अदन से आग भड़कने लगेगी।(मिशक़ात पृष्ठ 461 ) 237. अच्छे लोग ख़त्म हो जायेंगे और बुरों की कसरत होगी। 238. मुक़द्देराते इलाही की मुख़ालेफ़त आम होगी। 239. माल के लाने ले जाने वाले चोरी करेंगे। 240. हराम ख़ोरी आम होगी। 241. गरानी हद से बढ़ जाएगी। 242. दरिया ख़ुश्क हो जायेंगे। 243. बारिश बन्द हो जायेगी। 244. अहले बरबर ज़र्द झंडे ले कर मिस्र पहुँच जायेंगे। 245. सख़र की औलाद से एक शख़्स खुरूज करेगा। 246. बर सरे आम औरतों की छातियों से खेला जायेगा। 247. सफ़ेद पिंडलियों की औरतें सड़कों पर बरैहना मिलेगी। 248. एक यमनी बादशाह हसन नामी यमन से खुरूज करेगा। 249. हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) फ़रमाते हैं क़ुरसे आफ़ताब (सूरज के गोले) के क़रीब आसमान पर एक हाथ ज़ाहिर होगा। 250. हज का रास्ता बन्द कर दिया जायेगा। 251. मर्दों से बदफ़ेली के लिये ताक़तवर ग़िजा़ए खाई जायेंगी। 252. दौलत के ज़ोर से हुकूमत हासिल की जायेगी। 253. झूठी क़सम खाना फ़ैशन में दाखि़ल होगा। 254. ज़ख़ीरा अन्दोज़ी होगी। 255. मस्जिदे बरासा जो जंगे नहरवान के बाद हज़रत अली (अ.स.) ने राहिब ज़रिये से बनाई थी , तबाह कर दी जायेगी। 256. क़ज़वैन में एक काफ़िर की अज़ीम हुकूमत होगी। 257. तकरीत से एक शख़्स ‘‘ औफ़ सलमा ’’ नामी ख़ुरूज करेगा। 258. मक़ामे क़रक़िया में जंगे अज़ीम होंगी। 259. तुर्क मैदाने जंग में उतर आयेंगे। 260. अहले नाक़ूस नसारा की हुकूमते आलम पर छा जायेंगे। 261. इस्लामी मुमालिक में बेशुमार कलीसे बनाये जायेंगे।(किताब अल वसाएल अलहाज मोहम्मद अली पृष्ठ 207 मुद्रित बम्बई 1329 हिजरी) 262. औरतें ऊंट के कोहान की तरह सर के बाल बनाएंगी। 263. औरतें ऐसे कपड़े पहनेंगी कि बरैहना मालूम होंगी। 264. औरतें ज़ीनत कर के बाहर निकला करेंगी।(बेहारूल अनवार) 265. लड़के लम्बे बाल रखेंगे। 266. बेवकूफ़ तफ़रीह के लिये इस्तेमाल किये जायेंगे। 267. मस्जिदें ख़ूबसूरत बनाई जायेंगी। 268. बड़ी बड़ी इमारतें बनाई जायेंगी। 269. क़हवे की मुख़्तलिफ़ क़िस्में इस्तेमाल होंगी। 270. लोग सवारियों से टकरा कर मरेंगे। 271. लोग रात में सोयेंगे और सुबह को मुर्दा होंगे। 272. रोयते हिलाल पर इख़्तेलाफ़ होंगे। 273. लोग आलाते ग़िना जेब में रख कर घूमा करेंगे। 274. हिन्द तिब्बत की वजह से तबाह होगा और तिब्बत की तबाही चीन की वजह से होगी।(मनाक़िब) 275. मिस्र में अमीर अल आमरा का क़याम होगा। 276. अरबो की हुकूमत छिन जायेगी।(कशफ़ुल ग़म्मा) 277. अदन की गहराई से आग निकलेगी।(रिसालाए ग़ैबत तूसी पृष्ठ 281 ) 278. दुनियां में हबशियों की हुकूमत क़ायम हो जायेंगी। 279. शाम में चीनी घुस जायेंगे तब ज़हूर होगा।(इलजा़म अल निसाब पृष्ठ 183 )

हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) का ज़हूर मौफ़ूरुल सुरूर

हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) के ज़हूर से पहले जो अलामात जा़हिर होंगी उनकी तकमील के दौरान ही में नसारा फ़तेह ममालिके आलम का इरादा कर के उठे खड़े होंगे और बेशुमार ममालिक पर क़ाबू हासिल करने के बाद उन पर हुक्मरानी करेंगे। इसी ज़माने में अबू सुफ़ियान की नस्ल से एक ज़ालिम पैदा होगा जो अरब व शाम पर हुक्मरानी करेगा। इसकी दिली तमन्ना यह होगी की सादात के वजूद से मुमालिके मीरूसा ख़ाली कर दिये जायें और नस्ले मोहम्मदी का एक फ़रज़न्द भी बाक़ी न रहे। चुनान्चे वह सादात को निहायत बेदर्दी से क़त्ल करेगा। फिर इसी असना में बादशाहे रोम को नसारा के एक फ़िरक़े से ज़ग करना पड़ेगी शाहे रोम एक फ़िरक़े को हमवार बना कर दूसरे फ़िरक़े से जंग करेगा और शहर क़ुसतुनतुनयां पर क़ब्ज़ा कर लेगा। क़ुसतुनतुनियां का बादशाह वहां से भाग कर शाम में पनाह लेगा , फिर वह नसारा के दूसरे फ़िरक़े की मुवावनत से फ़िरक़ये मुख़लिफ़ के साथ नर्बद आज़मा होगा। यहां तक कि इस्लाम को ज़बर दस्त फ़तेह नसीब होगी। फ़तेह इस्लाम के बवजूद नसारा शोहरत देंगे कि ‘‘ सलीब ’’ ग़ालिब आयेगी उस पर नसारा और मुसलमानों मे जंग होगी और नसारा ग़ालिब आजायगें। बादशाहे इस्लाम क़त्ल हो जायेगा और मुल्के शाम पर भी नसारा का झंडा लहराने लगेगा और मुसलमानों का क़त्ले आम होगा। मुसलमान अपनी जान बचा कर मदीने की तरफ़ कूच करेंगे और नसारा अपनी हुकूमत को वुस्अत देते हुए ख़ैबर तक पहुँचेंगे। इस्लामियां आलम के लिये कोई पनाह न होगी। मुसलमान अपनी जान बचाने से आजिज़ होंगे। उस वक़्त वह गिरोह सारे आलम में मेहदी (अ.स.) को तलाश करेंगे , ताकि इस्लाम महफ़ूज़ रह सके और उनकी जानें बच सकें और अवाम ही नहीं मुल्क के कुतुब , अबदाल और औलिया , जुस्तजू में मशग़ूल व मसरूफ़ होंगे नागाह आप मक्का ए मोअज़्ज़मा में रूकनव मक़ाम के दरमियान से बरामद होंगे।(क़यामत नामा क़दो तह अल मोहद्देसीन शाह रफ़ीउद्दीन देहलवी पृष्ठ 3 मुद्रित पेशावर 1926 0 ) उलमाए फ़रीक़ैन का कहना है कि आप क़रिया ‘‘ क़रआ ’’ से रवाना हो कर मक्कए मोअज़्ज़मा से ज़हूर फ़रमाएंगे।

(ग़ाएतल मक़सूद पृष्ठ 165, नूरूल अबसार पृष्ठ 154 )

अल्लामा कुन्जी शाफ़ई और अली बिन मोहम्मद साहब किफ़ायतुल अस्र का ब हवाला अबू हुरैरा बयान करते हैं कि हज़रत सरवरे कायनात (स अ व व ) ने इरशाद फ़रमाया है कि इमाम मेहदी (अ.स.) क़रया (क़रआ) (जो मदीने से बतरफ़ मक्का तीस मील के फ़ासले पर वाक़े है(मजमुअल बहरैन पृष्ठ 435 ) निकल कर मक्का ए मोअज़्ज़मा से ज़हूर करेंगे , वह मेरी ज़िरा पहने होगे। मेरी तलवार लगाए होंगे और मेरा अमामा बांधे होंगे। उनके सर पर अब्र का साया होगा और मलक आवाज़ देता होगा यही इमाम मेहदी (अ.स.) हैं इनकी इत्तेबा करो। एक रवायत में है कि जिब्राईल आवाज़ देगें और ‘‘ हवा ’ ’ इसको सारी कायनात में पहुँचा देगी और लोग आपकी खि़दमत मे हाज़िर होंगे।(ग़ाएतुल मक़सूद पृष्ठ 165 )

लुग़ाते सरवरी पृष्ठ 530 में है कि आप क़स्बाए ख़ैरवाँ से ज़हूर फ़रमाएंगे। मासूम का फ़रमान है कि इमाम मेहदी (अ.स.) के ज़हूर के मुताअल्लिक़ किसी का कोई वक़्त मोअय्यन करना फ़िल हक़ीक़त अपने आप को इल्में ग़ैब में ख़ुदा का शरीक क़रार देना है। वह मक्के में बे ख़बर ज़हूर करेंगे , उनके सर पर ज़र्द रंग का अमामा होगा। बदन पर रिसालत मआब (स अ व व ) की चादर और पाँव में उन्हीं की नालैने मुबारक होगी। वह अपने सामने चन्द भेड़ें रखेंगे। कोई उन्हें पहचान न सकेगा और उसी हालत में यको तन्हा बग़ैर किसी रफ़ीक़ के काबातुल्लाह में आ जायेंगे। जिस वक़्त आलम सियाहिए शब की चादर ओढ़ लेगा और लोग सो जायेंगे उस वक़्त मलाएका सफ़ ब सफ़ उतरेंगे और हज़रत जिब्राईल व मीकाईल उन्हें नवेदे इलाही सुनाएंगे , कि उनका हुक्म तमाम दुनियां पर जारी व सारी है। यह बशारत पाते ही इमाम मेहदी (अ.स.) शुक्रे ख़ुदा बजा लाऐंगे और रूकने हजरे असवद और मक़ामे इब्राहीम के दरमियान खड़े हो कर बा आवाज़े बुलन्द निदा देंगे कि ऐ वह गिरोह जो मेरे मख़सूसों और बुज़ुर्गों से हो और वह लोग जिनको हक़ तआला ने रूए ज़मीन पर मेरे ज़ाहिर होने से पहले मेरी मद्द के लिये जमा किया है ‘‘ आजाओ ’’ यह निदा हज़रत के उन लोगों तक ख़्वाह वह मशरिक़ में हैं या मग़रिब में पहुँच जायेगी , और वह लोग यह आवाज़ सुन कर चश्मे ज़दन में हज़रत के पास जमा हो जायेंगे। यह लोग 313 होंगे और नक़ीबे इमाम कहलाएंगे। उसी वक़्त एक नूर ज़मीन से आसमान तक बलन्द होगा जो सफ़े दुनियां में हर मोमिन के घर में दाखि़ल होगा। जिससे उनकी तबीयतें मसरूर हो जायेंगी मगर मोमिनीन को मालूम न होगा कि इमाम (अ.स.) का ज़हूर हुआ है। सुबह इमाम (अ.स.) मय उन 313 अशख़ास (लोगों) के जो रात को उन के पास जमा हो गये थे काबे में खड़े होंगे और दीवार से तकिया लगा कर अपना हाथ खोलेंगे जो मूसा (अ.स.) के यदे बैज़ा के मानिन्द होगा और कहेंगे कि जो कोई इस हाथ पर बैयत करेगा वह ऐसा है गोया उसने ‘‘ यद अल्लाह ’’ पर बैयत की। सब से पहले जिब्राईल शरफ़े बैयत से मुशर्रफ़ होंगे। इनके बाद मलायका बैयत करेंगे। फिर मुक़द्दम अल ज़िक्र नुक़बा 313 बैयत से मुशर्रफ़ होंगे। इस हलचल और इज़देहाम में मक्के में तहलका मच जायेगा और लोग हैरत ज़दा हो कर हर सिम्त से इस्तेफ़सार करेंगे कि यह कौन शख़्स है। यह तमाम वाक़ेयात तुलूए आफ़ताब से पहले सर अन्जाम हो जायेंगे फिर जब सूरज चढ़ेगा तो कु़रसे आफ़ताब के सामने एक मुनादी करने वाला ज़ाहिर होगा और बाआवाज़े बलन्द कहेगा जिसको साकेनाने ज़मीनो आसमान सुनेंगे कि ‘‘ ऐ गिरोह ख़लाएक़ यह मेहदी आले मोहम्मद (स अ व व ) हैं इनकी बैयत करो फिर मलाएक और 313 आदमी तसदीक़ करेंगे और दुनिया के हर गोशे से ज़ूक दर ज़ूक आपकी ज़्यारत के लिये रवाना हो जायेंगे और आलम पर हुज्जत क़ायम हो जायेगी। इसके बाद दस हज़ार अफ़राद बैयत करेंगे और कोई यहूदी और नसरानी बाक़ी न छोड़ा जायेगा सिर्फ़ अल्लाह का नाम होगा और इमाम मेहदी (अ.स.) का काम होगा। जो मुख़ालेफ़त करेगा उस पर आसमान से आग बरसे गी और उसे ख़ाक इसतर कर देगी।(नूरूल अबसार , इमाम शिब्लन्जी , शाफ़ेई पृष्ठ 155, आलामुल वुरा पृष्ठ 264 )

उलेमा ने लिखा है कि 27 मुख़लेसीन आपकी खि़दमत में कूफ़े से इस क़िस्म के पहुँच जायेंगे जो हाकिम बनाए जायेंगे। जिनके असमा , किताब ‘‘ मुन्तख़ब बसाएर ’’ यह हैं। यूशा बिन नून , सलमान फ़ारसी , अबू दजाना अन्सारी , मिक़दाद बिन असवद , मालिके अशतर और क़ौमे मूसा के 15 अफ़राद और सात असहाबे कहफ़।(आलामुल वुरा पृष्ठ 264, इरशाद मुफ़ीद पृष्ठ 216 )

अल्लामा अब्दुल रहमान जामी का कहना है कि कुतब , अबदाल , अरफ़ा सब आपकी बैयत करेंगे। आपकी जानवरों की ज़बान से भी वाक़िफ़ होंगे और आप इंसानों व जिनों में अदल व इंसाफ़ करेंगे।(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 216 )

अल्लामा तबरीसी का कहना है कि आप हज़रते दाऊद (अ.स.) के उसूल पर अहकाम जारी करेंगे। आपको गवाह की ज़रूरत न होगी। आप हर एक के अमल से ब इल्हामे ख़ुदा वन्दी वाक़िफ़ होंगे।(आलामुल वुरा पृष्ठ 264 )

इमाम शिब्लन्जी शाफ़ेई का बयान है कि जब इमाम मेहदी (अ.स.) का ज़हूर होगा तो तमाम मुसलमान ख़वास और अवाम ख़ुश व मसरूर हो जायेंगे। उनके कुछ वज़रा होंगे जो आपके अहकाम पर लोगों से अमल कराऐंगे।(नूरूल अबसार पृष्ठ 153 बहवाला फ़तूहाते मक्किया)

अल्लाम हल्बी का कहना है कि असहाबे कहफ़ आप के वज़रा होंगे।(सीरते हल्बिया)

हमूयनी का बयान है कि आपके जिस्म का साया न होगा।(ग़ायत अल मक़सूद जिल्द 2 पृष्ठ 150 )

हज़रत अली (अ.स.) का फ़रमान है कि अन्सार व असहाब इमाम मेहदी (अ.स.) ख़ालिस अल्लाह वाले होंगे।(अरजहुल मतालिब पृष्ठ 469 ) और आपके गिर्द इस तरह लोग जमा हो जायेंगे जिस तरह शहद की मक्खी अपने ‘‘ यासूब ’’ बादशाह के गिर्द जमा हो जाती हैं।(अरजहुल मतालिब पृष्ठ 469 )

एक रवायत में है कि ज़हूर के बाद आप सब से पहले कूफ़े तशरीफ़ ले जायेंगे और वहां के कसीर अफ़राद क़त्ल करेंगे।

इमाम मेहदी (अ.स.) का सिने ज़हूर

ख़ल्लाक़े आलम ने पांच चीजो का इल्म अपने लिये मख़सूस रखा है जिनमें एक क़यामत भी है।(क़ुरआने मजीद) ज़हूरे इमाम मेहदी (अ.स.) चूंकि लाज़मए क़यामत से है लेहाज़ा इसका इल्म भी ख़ुदा ही को है कि आप कब ज़हूर फ़रमाऐंगे। कौन सी तारीख़ होगी , कौन सा सन् होगा। ताहम अहादीसे मासूमीन (अ.स.) जो इल्हाम और कु़रआन से मुसतम्बित होती हैं उनमें इशारे मौजूद हैं। अल्लामा शेख़ मुफ़ीद , अल्लामा सैय्यद अली , अल्लामा तबरेसी , अल्लामा शिब्लन्जी रक़म तराज़ हैं कि हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने इसकी वज़ाहत फ़रमाई है कि आप ताक़ सन् में ज़हूर फ़रमाऐंगे जो 1 , 3 , 5 , 7 , 9 , से मिल कर बनेगा मसलन 1300 , 1500 , 1700 , 1900 या 1000 , 3000 , 5000 , 7000 , 9000 , इसी के साथ ही साथ आपने फ़रमाया है कि आपके इस्मे गेरामी का ऐलान बज़रिए जनाबे जिब्राईल (अ.स.) 23 तारीख़ को कर दिया जायेगा और ज़हूर यौमे आशूरा होगा जिस दिन इमाम हुसैन (अ.स.) ब मुक़ामे करबला शहीद हुए हैं।(शरह इरशाद मुफ़ीद पृष्ठ 532, ग़ायतूल मक़सूद जिल्द 1 पृष्ठ 161, आलामुल वुरा पृष्ठ 262, नूरूल अबसार पृष्ठ 155 )

मेरे नज़दीक़ ज़िल्ज्जिा की 23 तारीख़ होगी क्यो कि नफ़से ज़किया के क़त्ल और ज़हूर में 15 रातों का फ़ासला होना मुसल्लम है। इमकान है कि क़त्ले नफ़से ज़किया के बाद ही नाम का ऐलान कर दिया जाय फिर उसके बाद ज़हूर हो।

मुल्ला जव्वाद साबाती का कहना है कि इमाम मेहदी (अ.स.) यौमे जुमा बवक़्ते सुबह बतारीख़ 10 मोहर्रमुल हराम 7100 हिजरी में ज़हूर फ़रमाऐंगे।(ग़ाएतुल मक़सूद पृष्ठ 161 ब हवाला बराहीने साबतीया)

इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) का इरशाद है कि इमाम मेहदी (अ.स.) का ज़हूर बवक़्ते अस्र होगा और वही असराय ‘‘ वल अस्र इन्नल इंसाना लफ़ी ख़ुसरिन ’’ से मुराद है।

शाह नेमत अल्लाह वली काज़मी अल मतूफ़ी 827 हिजरी(मजालिसे मोमेनीन पृष्ठ 276 ) जो शायर होने के अलावा आलिम और मुनज्जिम भी थे। आपको इल्मे जाफ़र में भी दख़्ल था। आपने अपनी मशहूर पेशीन गोई में 1380 हिजरी का हवाला दिया है जिसका ग़लत होना साबित है क्यों कि 1393 हिजरी है। (वल इल्म इन्दल्लिाह) (क़यामत नामा क़ुदवतुल मोहद्देसीन शाह रफ़ीउद्दीन पृष्ठ 38 )

ज़हूर के वक़्त इमाम (अ.स.) की उम्र

यौमे विलादत से ता बा ज़हूर आपकी क्या उम्र होगी ? इसे तो ख़ुदा ही जाने , लेकिन यह मुसल्लेमात से है कि जिस वक़्त आप ज़हूर फ़रमायेंगे मिसले हज़रते ईसा (अ.स.) आप चालीस साला जवान की हैसियत में होंगे।(आलामुल वुरा पृष्ठ 265 व ग़ायतुल मक़सूद पृष्ठ 76 पृष्ठ 119 )

आपका अलम

हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) के अलम पर ‘‘ अल बकीयतुल्लाह ’’ लिखा होगा और आप अपने हाथों पर ख़ुदा के लिये बैयत लेंगे और कायनात में सिर्फ़ दीने इस्लाम का परचम लहरायेगा।(यनाबिउल मोवद्दता पृष्ठ 434 )

ज़हूर के बाद

ज़हूर के बाद हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) काबे की दीवार से टेक लगा कर खडे होंगे। अब्र(बादल) का साया आपके सरे मुबारक पर होगा। आसमान से आवाज़ आती होगी ‘‘ यही इमाम मेहदी (अ.स.) हैं ’’ इसके बाद आप एक मिम्बर पर जलवा अफ़रोज़ होंगे। लोगो को ख़ुदा की तरफ़ दावत देंगे और दीने हक़ की तरफ़ आने की सब को हिदायत फ़रमायेंगे। आपकी तमाम सीरत पैग़म्बरे इस्लाम की सीरत होगी और उन्हीं के तरीक़े पर अमल पैरा होंगे। अभी आपका ख़ुत्बा जारी होगा कि आसमान से जिब्राईल और मीकाईल आ कर बैयत करेंगे। फिर मलाएक ए आसमानी की आम बैयत होगी। हज़ारों मलाएका की बैयत के बाद वह 313 मोमेनीन बैयत करेंगे जो आपकी खि़दमत में हाज़िर हो चुके होंगे। फिर आम बैयत का सिलसिला शुरू होगा। दस हज़ार अफ़राद की बैयत के बाद आप सब से पहले कूफ़े तशरीफ़ ले जायेंगे और दुश्मनाने आले मोहम्मद का गला क़मा करेंगे। आपके हाथ में असाए मूसा होगा। जो अज़दहे का काम करेगा और तलवार हेमाएल होगी।(अयनुल हयात मजलिसी पृष्ठ 92 )

तवारीख़ में है कि जब आप कूफ़े पहुँचेंगे तो कई हज़ार का एक गिरोह आपकी मुख़ालफ़त के लिये निकल पडे़गा और कहेगा हमें बनी फ़ात्मा की ज़रूरत नहीं , आप वापस जाइये , यह सुन कर तलवार से उनका क़िस्सा पाक कर देंगे और किसी को भी ज़िन्दा न छोड़ेंगे। जब कोई भी दुश्मनें आले मोहम्मद और मुनाफ़िक़ वहां बाकी़ न रहेगा तो आप एक मिम्बर पर तशरीफ़ ले जायेंगेक और वाक़िया ए करबला का ज़िक्र करेंगे यानी मजलिसे हुसैन (अ.स.) पढ़ेंगे। उस वक़्त लोग महवे गिरया हो जायेंगे और कई घंटे तक रोने का सिलसिला जारी रहेगा। फिर आप हुक्म देंगे कि मशहदे हुसैन (अ.स.) तक नहरे फ़ुरात काट कर लाई जाये और एक मस्जिद की तामीर की जाये , जिसके एक हज़ार दर हों चुनान्चे ऐसा ही किया जायेगा। इसके बाद आप ज़्यारते सरवरे कायनात के लिये मदीनए मुनव्वरा तशरीफ़ ले जायेंगे।

(आलामुल वुरा पृष्ठ 263 इरशाद मुफ़ीद पृष्ठ 532 नूरूल अबसार पृष्ठ 155 )

क़ुदवतुल मोहद्देसीन शाह रफ़ीउद्दीन रक़म तराज़ हैं कि हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) जो इल्मे लदुन्नी से भर पूर होंगे जब मक्के से आपका ज़हूर होगा और उस ज़हूर की शोहरत अतराफ़ व अकनाफ़े आलम में फैलेगी तो अफ़वाज़ मदीना व मक्का आपकी खि़दमत में हाज़िर होगी और शाम व ईराक़ व यमन के अब्दाल और औलिया खि़दमत शरीफ़ में हाज़िर होंगे और अरब की फ़ौजे जमा हो जायेंगी। आप उन तमाम लोगों को उस ख़ज़ाने से माल देंगे जो काबे से बरामद होगा और मुक़ामे ख़जा़ना को ‘‘ ताजुल काबा ’’ कहते होंगे। इसी असना में एक शख़्स ख़ुरासानी अज़ीम फ़ौज ले कर हज़रत की मदद के लिये मक्के मोअज़्ज़मा को रवाना होगा। रास्ते में इस लशकरे ख़ुरासानी के मुक़द्देमा अल जैश के कमान्डर मन्सूर से नसरानी फ़ौज की टक्कर होगी और ख़ुरासानी लशकर नसरानी फ़ौज को पसपा कर के हज़रत की खि़दमत में पहुँच जायेगा।

इसके बाद एक शख़्स सुफ़ियानी जो बनी कल्ब से होगा हज़रत से मुक़ाबले के लिये लशकरे अज़ीम इरसाल करेगा लेकिन बहुक्मे ख़ुदा जब वह लशकरे मक्काए मोअज़्ज़मा और काबाए मुनव्वरा के दरमियान पहुँचेगा और पहाड़ में क़याम करेंगा जो ज़मीन में वहीं धंस जायेगा। फिर सुफ़ियानी जो दुशमनों आले मोहम्मद होगा नसारा से साज़ बाज़ कर के इमाम मेहदी (अ.स.) से मुक़ाबले के लिये ज़बर दस्त फ़ौज फ़राहम करेगा। नसरानी और सुफ़ियानी फ़ौज के अस्सी निशान होंगे और निशान के नीचे 12000 की फ़ौज होगी। उनका दारूल खि़लाफ़ा शाम होगा। इमाम मेहदी (अ.स.) भी मदीनाए मुनव्वरा होते हुए जल्द से जल्द शाम पहुँचेंगे। जब आप का वरूदे मसऊद दमिशक़ में होगा तो दुश्मने आले मोहम्मद और सुफ़ियानी और दुशमने इस्लाम नसरानी आप से मुक़ाबले के लिये सफ़ आरा होंगे। इस जंग में फ़रीक़ैन के बे शुमार अफ़राद क़त्ल होंगे। बिल आखि़र इमाम (अ.स.) का फ़तेह कामिल होगी और एक नसरानी भी ज़मीने शाम पर बाक़ी न रहेगा। उसके बाद इमाम (अ.स.) अपने लशकरियों में इनाम तक़सीम करेंगे और उन मुसलमानों को मदीनए मुनव्वरा से वापस बुला लेगे जो नसरानी बादशाह के ज़ुल्म व जौर से आजिज़ आ कर शाम से हिजरत कर गये थे।(क़यामत नामा पृष्ठ 4 )

इसके बाद आप मक्काए मोअज़्ज़मा वापस तशरीफ़ ले जायेंगे और मस्जिदे सहला में क़याम फ़रमायेंगे।(इरशाद पृष्ठ 533 )

इसके बाद मस्जिदुल हराम को अज़ सरे नो बनायेंगे और दुनिया की तमाम मसाजिद को शरई उसूल पर कर देंगे , हर बिदअत को ख़त्म कर देंगे और हर सुन्नत को क़ायम करेंगे। निज़ामे आलम दुरूस्त करेंगे और शहरों में फ़ौजें इरसाल करेंगे। इन्सेराम व इन्तेज़ाम के लिये वज़रा रवाना होंगे।(आलामुल वुरा पृष्ठ 262 पृष्ठ 264 )

इसके बाद आप मोमेनीन , कामेलीन और काफ़रीन को ज़िन्दा करेंगे और इस ज़िन्दगी का मक़सद यह होगा कि मोमेनीन इस्लामी उरूज से ख़ुश हों और काफ़ेरीन से बदला लिया जाये। इन ज़िन्दा किये जाने वालों में का़बिल से ले कर उम्मते मोहम्मदिया के फ़राना तक ज़िन्दा किये जायेंगे और उनके किये का पूरा पूरा बदला उन्हें दिया जायेगा। जो जो ज़ुल्म उन्हीं ने किये उनका मज़ा चखेंगे। ग़रीबों मज़लूमों और बे कसों पर जो ज़ुल्म हुआ है उसकी , ज़ालिम को सज़ा दी जायेगी। सब से पहले जो वापस लाया जायेगा वह यज़ीद बिन माविया मलऊन होगा और इमाम हुसैन (अ.स.) तशरीफ़ लायेंगे।(ग़ायत अल मक़सूद)


दज्जाल और उसका ख़ुरूज

दज्जाल दजल से मुश्तक़ है (बना है) जिसके मानी फ़रेब के हैं। इसका असल नाम साएफ़ , बाप का नाम साएद , माँ का नाम काहेता उर्फ़ क़तामा है। यह अहदे रिसालत माआब (स अ व व ) में बमक़ामे तौहा जो मदीना ए मुनव्वरा से तीन मील के फ़ासले पर वाक़े है चहार शम्बे के दिन बवक़्ते ग़ुरूबे आफ़ताब पैदा हुआ है। पैदाईश के बाद आन्न फ़ान्न बढ़ रहा था उसकी दाहिनी आँख फूटी थी और बाई आँख पेशानी पर चमक रही थी। वह चन्द दिनों में काफ़ी बढ़ कर दावाए ख़ुदाई करने लगा। सरवरे कायनात (स अ व व ) जो हालात से बराबर मुत्तला हो रहे थे उन्होंने सलमाने फ़ारसी और चन्द असहाब को लिया और बमक़ामे तीहा जा कर उसको तबलीग़ करना चाही , उसने बहुत बुरा भला कहा और चाहा कि हज़रत पर हमला कर दे , लेकिन आप के असहाब ने मदाफ़ेअत की , आपने उससे यह फ़रमाया था कि ख़ुदाई का दावा छोड़ दे और मेरी नबूवत को मान ले। उलेमा ने लिखा है कि दज्जाल की पेशानी पर ब ख़त्ते यज़दानी ‘‘ अल काफ़िर बिल्लाह ’’ लिखा हुआ था और आँख के ढेले पर भी (काफ़ , फ़े , रे) मरक़ूम था। ग़रज़ कि आपने वहां से मदीना ए मुनव्वरा वापस तशरीफ़ लाने का इरादा किया। दज्जाल ने एक संगे गरां (बहुत बड़ा पत्थर) जो पहाड़ के मानिन्द था हज़रत की राह में रख दिया। यह देख कर हज़रत जिब्राईल (अ.स.) आसमान से आये और उसे हटा दिया। अभी आप मदीने पहुँचे ही थे कि दज्जाल लशकरे अज़ीम ले कर मदीने के क़रीब जा पहुँचा। हज़रत ने बारगाहे अहदियत में अर्ज़ की , ख़ुदाया इसे उस वक़्त तक के लिये महबूस कर दे , जब तक इसे ज़िन्दा रखना मक़सूद है। इसी दौरान में जनाबे जिब्राईल आये और उन्होंने दज्जाल की गरदन को पुश्त की तरफ़ से पकड़ कर उठा लिया और उसे ले जा कर जज़ीरा ए तबरिस्तान में महबूस (क़ैद) कर दिया। लतीफ़ा यह है कि जिब्राईल उसे ले कर जाने लगे तो उसने ज़मीन पर दोनो हाथ मार कर तहतुल शरह तक की दो मुठ्ठी खा़क ले ली और उसे तबरिस्तान में डाल दिया। जिब्राईल (अ.स.) ने सरवरे कायनात (स अ व व ) के जवाब में कहा कि आपकी वफ़ात से 960 साल बाद यह खा़क आलम मे फैले गी और उसी वक़्त से आसारे क़यामत शुरू हो जायेंगे।(ग़ायतल मक़सूद पृष्ठ 64, इरशाद अल तालेबैन पृष्ठ 394 )

पैग़म्बरे इस्लाम का इरशाद है कि दज्जाल को मबहूस होने के बाद तमीम दारमी ने जो पहले नसरानी था जज़ीरा ए तबरिस्तान में ब चश्मे खुद देखा है। उसकी मुलाक़ात की तफ़सील किताब सियाह अल मसाबिह , ज़हरतुल रियाज़ , सही बुख़ारी , सही मुस्लिम में मौजूद है।

ग़रज़ कि अकसर रवायात के मुताबिक़ दज्जाल हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) के ज़हूर फ़रमाने के 18 यौम बाद ख़ुरूज करेगा।(मजमऊल बहरैन पृष्ठ 560 व ग़ायतल मक़ूसद जिल्द 2 पृष्ठ 69 ) ज़हूरे इमाम (अ.स.) और खुरूजे दज्जाल से पहले तीन साल तक सख़्त कहत पडे़गा। पहले साल एक बटे तीन बारिश और एक बटे तीन ज़राएत ख़त्म हो जायेगी। दूसरे साल आसमान व ज़मीन की बरकत व रहमत ख़त्म हो जायेगी। तीसरे साल बिल्कुल बारिश न होगी और सारी दुनियां वाले मौत की आग़ोश में पहुँचने के क़रीब हो जायेंगे। दुनियां ज़ुल्म व जौर , इज़तेराब व परेशानी से बिल्कुल पुर होगी। इमाम मेहदी (अ.स.) के ज़हूर के बाद 18 दिन में कायनात निहायत अच्छी सहत पर पहुँची हो गी कि नागाह दज्जाल मलऊन के खुरूज का गुलग़ुला उठेगा। वह बरवायत अखवन्द दरवीज़ा हिन्दोस्तान के एक पहाड़ पर नमूदार होगा और वहां से ब आवाज़े बलन्द कहेगा ‘‘ मैं खुदाए बुज़ुर्ग हू ’’ मेरी इताअत करो। यह आवाज़ मशरिक़ व मग़रिब में पहुँचेगी। उसके बाद तीन यौम या बरवायत 40 यौम इसी मुक़ाम पर रह कर लश्कर तैयार करेगा। फिर शाम व ईराक़ होता हुआ अस्फ़ाहान के एक क़रये ‘‘ यहूदिया ’’ से ख़ुरूज करेगा। उसके हमराह बहुत बड़ा लश्कर होगा जिसकी तादाद 70 ,00 ,000 (सत्तर लाख) मरक़ूम है। जिन , देव , परी , शैतान इनके अलावा होंगे। वह एह गधे पर सवार होगा। जो अबलक़ रंग का होगा। उसके जिस्म का बालाई हिस्सा सुर्ख़ , हाथ पाँव ताज़ा नौ सियाह उसके बाद से सुम तक सफ़ैद होगा। उसके दोनों कानों के दरमियान 40 मील का फ़ासला होगा। वह 21 मील ऊँचा और 90 मील लम्बा होगा। उसका हर क़दम एक मील का होगा। उसके दोनों कानों में ख़ल्के़ कसीर बैठी होगी। चलने में उसके बालों से हर क़िस्म के बाजों की आवाज़ आयेगी। वह उसी गधे पर सवार होगा। सवारी के बाद जब वह रवाना होगा तो उसके दाहिने तरफ़ एक पहाड़ होगा जो हमराह चलता रहेगा। उसमें नहरें , मेवा जात और हर क़िस्म की नेमते होंगी , और बाईं जानिब एक पहाड़ होगा जिसमें हर क़िस्म के सांप बिच्छू होंगे। वह लोगों को उन्हीं चीज़ों के ज़रिये से बहकायेगा और कहेगा कि मैं खु़दा हूँ। जो मेरा हुक्म मानेगा जन्नत में रखूगा जो न मानेगा उसे जहन्नुम में डाल दूंगा। इसी तरह चालीस दिन में सारी दुनियां का चक्कर लगा कर और सब को बहका कर इमाम मेहदी (अ.स.) की इस्कीम को नाकामयाब बनाने की सई कोशिश में ख़ानाए काबा को गिराना चाहेगा और एक अज़ीम लश्कर भेज कर काबे और मदीने को तबाह करने पर मामूर करेगा और खुद कूफ़े के लिये रवाना होगा। उसका मक़सद यह होगा कि कूफ़ा जो इमाम मेहदी (अ.स.) की आमाजगाह है उसे तबाह कर दे। ‘‘ चूँ आन लईन नज़दीक़ कूफ़ा बरसदे इमाम मोहम्मद मेहदी (अ.स.) बइसतेसाले ओ बरसद ’’ लेकिन ख़ुदा का करना देखिये कि जब वह कूफ़े के क़रीब पहुँचेगा जो हज़रत इमाम मोहम्मद मेहदी (अ.स.) ख़ुद वहां पहुँच जायेंगे और उसे ब हुक्मे खुदा जड़ से उखाड़ देंगे। ग़रज़ कि घमासान की जंग होगी और शाम तक फैले हुए लश्कर पर इमाम मेहदी (अ.स.) ज़बरदस्त हम ले करेंगे बिल आखि़र वह मलऊन आपकी ज़रबों की ताब न ला कर शाम के मक़ामे ‘‘ उक़बाए रफ़ीक़ ’’ या बमक़ाम ‘‘ लुद ’’ जुमे के दिन तीन घड़ी दिन चढे़ मारा जायेगा। उसके मरने के बाद दस मील तक दज्जाल और उसके गधे और लश्कर का ख़ून ज़मीन पर जारी रहेगा। उलेमा का कहना है कि क़त्ले दज्जाल के बाद इमाम (अ.स.) उसके लशकरियों पर एक ज़बरदस्त हमला करेंगे और सब को क़त्ल कर डालेंगे। उसे जो काफ़िर ज़मीन के किसी हिस्से में छुपे गा , वह आवाज़ देगा कि फ़लां काफ़िर यहां छुपा हुआ है इमाम (अ.स.) उसे क़त्ल कर देंगे। आखि़र कार ज़मीन पर कोई दज्जाल का मानने वाला न रहेगा।(इरशाद अल तालेबीन पृष्ठ 397 ) ग़ायतल मक़सूद जिल्द 2 पृष्ठ 71 , ऐनुल हयात पृष्ठ 126 , किताब अल वसाएल पृष्ठ 181 , क़यामत नामा पृष्ठ 7 , माअरफ़ुल मिल्लता पृष्ठ 328 , सही मुस्लिम , लम्आते शरह मिशक़ात अब्दुल हक़ , मरक़ात , शरह मिशक़ात मजमउल बेहार)

बाज़ रवायात में है कि दज्जाल को हज़रते ईसा (अ.स.) बहुक्मे हज़रते इमाम मेहदी (अ.स.) क़त्ल करेंगे।

नुज़ूले हज़रते ईसा(अ स )

हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) सुन्नत के का़यम करने और बिदअत के मिटाने नीज़ इनसेराम व इन्तेज़ामे आलम में मशग़ूल व मसरूफ़ होंगे कि एक दिन नमाज़े सुबह के वक़्त बरवायते नमाज़े अस्र के वक़्त हज़रते ईसा (अ.स.) दो फ़रिश्तों के कंधो पर हाथ रखे हुए दमिश्क़ की जामे मस्जिद के मिनारए शरक़ी पर नुज़ूल फ़रमायेगें। हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) उनका इस्तेक़बाल करेंगे और फ़रमायेंगे कि आप नमाज़ पढ़ाइये हज़रते ईसा कहेंगे कि यह नामुम्किन है नमाज़ आपको पढ़ानी होगी चुनान्चे हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) इमामत करेंगे और हज़रत ईसा (अ.स.) उनके पीछे नमाज़ पढ़ेंगे और उनकी तसदीक़ करेंगे।(नूरूल अबसार पृष्ठ 154 ग़ायत अल मक़सूद पृष्ठ 104 से 154, बहवालाए मुस्लिम व इब्ने माजा , मिशक़ात पृष्ठ 458 ) उस वक़्त हज़रते ईसा (अ.स.) की उम्र चालीस साला नौजवान जैसी होगी। वह इस दुनियां में शादी करेंगे और उनके दो लड़के पैदा होंगे एक नाम अहमद और दूसरे का नाम मूसा होगा।(असआफ़ुल राग़ीबैन , बर हाशिया नूरूल अबसार पृष्ठ 135, क़यामत नामा , पृष्ठ 9, बहवालाए किताबुल वफ़ा इब्ने जोज़ी व मिशक़ात पृष्ठ 465 व सिराजुल कु़लूब पृष्ठ 77 )

इमाम मेहदी (अ.स.) और ईसा इब्ने मरियम का दौरा

इसके बाद हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) और हज़रते ईसा (अ.स.) बलाद मुमालिक का दौरा करने और हालात का जायज़ा लेने के लिये बरामद होंगे और दज्जाल मलऊन के पहुँचाये हुये नुक़सानात और उसके पैदा किये हुये बदतरीन हालात को बेहतरीन सतह पर लायेंगे। हज़रते ईसा (अ.स.) ख़न्जीर के क़त्ल करने , सलीबों को तोड़ने और लोगों के इस्लाम क़ुबूल करने का इन्सेराम व बन्दोबस्त फ़रमायेंगे। अदले मेहदवी से बलादे आलम में इस्लाम का डंका बजेगा और ज़ुल्म व सित्म का तख़्ता तबाह हो जायेगा।(क़यामत नामा क़ुदवतुल मोहद्देसीन पृष्ठ 8 बहवाला सही मुस्लिम)

हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) का कुस्तुनतुनया को फ़तेह करना

रवायत में है कि इमाम मेहदी (अ.स.) कुसतुनतुनया , चीन और जबले देलम को फ़तेह करेंगे। यह वही कु़सतुनतुनया है जिसे अस्तम्बोल कहते हैं और जिस पर उस ज़माने में नसारा का क़ब्ज़ा होगा और उनका क़ब्ज़ा भी मुसलमान बादशाह को क़त्ल करने के बाद होगा। चीन और जबले देलम पर भी नसारा का क़ब्ज़ा होगा और वह हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) से मुक़ाबले का पूरा इन्तेज़ामात करेंगे। ‘‘ चीन ’’ जिसको अरबी में ‘‘ सीन ’’ कहते हैं इसके बारे में रवायत के हवाले से अल्लामा तरही ने मजमउल बहरैन के पृष्ठ 615 में लिखा है कि सीन (1) एक पहाड़ी है। (2) मशरिक़ में एक ममलेकत है। (3) कूफ़े में एक मौजा है। पता यह चलता है कि सारी चीज़ें फ़तेह की जायेंगी। इनके अलावा सिन्ध और हिन्द के मकानात की तरफ़ भी इशारा है। बहर हाल इमाम मेहदी (अ.स.) शहरे कुस्तुनतुनया को फ़तह करने के लिये रवाना होंगे और उनके हमराह सत्तर हज़ार बनू इस्हाक़ के नौजवान होंगे उन्हें दरियाये रोम के किनारे शहर में जाकर उसे फ़तेह करने का हुक्म होगा। ज बवह वहां पहुँच कर फ़सील के किनारे नाराए तकबीर लगायेंगे तो खुद ब खुद रास्ता पैदा हो जायेगा और यह दाखि़ल हो कर उसे फ़तेह कर लेंगे। कुफ़्फ़ार क़त्ल होंगे और उस पर पूरा पूरा क़ब्ज़ा हो जायेगा। (नूरूल अबसार पृष्ठ 155 बहवालाए तबरानी , ग़ाएतल मक़सूद जिल्द 1 पृष्ठ 152 , बहवालाए अबू नईम , आलामुल वुरा , बहवालए इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) पृष्ठ 264 क़यामत नामा बहवालाए सही मुस्लिम)

याजूज माजूज और उनका ख़ुरूज

क़यामते सुग़रा यानी ज़हूरे आले मोहम्मद और क़यामते कुबरा के दरमियान दज्जाल के बाद याजूज और माजूज का ख़ुरूज होगा यह सद्दे सिकन्दरी से निकल कर सारे आलम में फ़ैल जायेंगे और दुनिया के अमनो अमान को तबाह व बरबाद कर देने में पूरी कोशिश करेंगे।

याजूज , माजूज हज़रते नूह (अ.स.) के बेटे याफ़िस की औलाद से हैं। यह दोनो चार सौ क़बीलों और उम्मतों के सरदार और सरबर आवुरदा हैं। उनकी कसरत का कोई अन्दाज़ा नहीं लगाया जा सकता। मख़लूक़ात में मलाएका के बाद उन्हें कसरत दी गई है। इनमें कोई ऐसा नहीं जिसके एक एक हज़ार औलाद न हो। यानी यह उस वक़्त मरते ही नहीं जब तक एक हज़ार बहादुर पैदा न कर लें। यह तीन क़िस्म के लोग हैं , एक वह जो ताड़ से ज़्यादा लम्बे हैं , दूसरे वह जो लम्बे और चौड़े बराबर हैं जिनकी मिसाल बहुत बड़े हाथी से दी जाती है। तीसरे वह जो अपना एक कान बिछाते हैं और दूसरा ओढ़ते हैं। इनके सामने लोहा , पत्थर , पहाड़ तो कोई चीज़ नहीं है। यह हज़रते नूह (अ.स.) के ज़माने में दुनिया के आखि़र में उस जगह पैदा हुये हैं जहां से पहले पहल सूरज ने तुलउ किया था। ज़मानए फ़ितरत से पहले यह लोग अपनी जगह से निकल पड़ते थे और अपने क़रीब की सारी दुनियां को खा पी जाते थे यानी हाथी , घोड़ा , ऊँट इंसान , जानवर , खेती बाड़ी ग़रज़ कि जो कुछ सामने आता था सब को हज़म कर जाते थे। वहां के लोग उन से सख़्त तंग आ कर आजिज़ थे। यहां तक कि ज़मानए फ़ितरत में हज़रते ईसा (अ.स.) के बाद बरवायते जब ‘‘ ज़ुलक़रनैन ’’ उस मंज़िल तक पहुँचे तो उन्हें वहां का सारा वाक़िया मालूम हुआ और वहां की मख़्लूक़ ने उनसे दरख़्वास्त की कि हमे इस बलाए बे दरमा याजूज , माजूज से बचाइये चुनान्चे उन्होंने दो पहाड़ों के उस दरमियानी रास्ते को जिससे वह आया करते थे बहुक्मे ख़ुदा लौहे की दीवार से जो दौ सौ (200) गज़ ऊँची और पचास सा साठ (50 या 60) ग़ज़ चौड़ी थी बन्द कर दिया। इसी दीवार को ‘‘ सद्दे सिकन्दरी ’’ कहते हैं क्यो कि ‘‘ जु़लक़रनैन ’’ का असल नाम सिकन्दरे आज़म था। सद्दे सिकन्दरी के लग जाने के बाद उनकी ख़ुराक सांप क़रार दी गई जो आसमान से बरसते हैं। यह ता बा ज़हूर इमाम मेहदी (अ.स.) इसी में महसूर रहेंगे। उनका उसूल और तरीक़ा यह है कि यह लोग अपनी ज़बान से सद्दे सिकन्दरी को सारी रात चाट कर काटते हैं जब सुबह होती है और धूप लगती है तो हट जाते हैं फिर दूसरी रात कटी हुई दीवार भी पुर हो जाती है और वह फिर उसे काटने में लग जाते हैं। बहुक्मे ख़ुदा यह लोग इमाम मेहदी (अ.स.) के ज़माने में खु़रूज करेंगे दीवार कट जायेगी और यह निकल पड़ेंगे। उस वक़्त का आलम यह होगा कि यह लोग अपनी सारी तादाद समैत सारी दुनियां में फैल कर निज़ामे आलम को दरहम बरहम करना शुरू कर देंगे। लाखों जाने जा़या होंगी और दुनियां की कोई चीज़ ऐसी बाक़ी न रहेगी जो खाई और पी जा सके और यह उस पर तसर्रूफ़ न करें। यह बला के जंगजू लोग होंगे। दुनिया को मार कर खा जायेंगे और अपने तीर आसमान की तरफ़ फेंक कर आसमानी मख़लूक़ को मारने का हौसला करेंगे और जब उधर से बहुक्मे ख़ुदा तीर ख़ून आलूद आयेगा तो यह बहुत खुश होंगे और आपस में कहेंगे कि अब हमारा इक़तेदार ज़मीन से बुलन्द हो कर आसमान तक पहुँच गया है। इसी दौरान में हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) की बरकत और हज़रते ईसा (अ.स.) की दुआ की वजह से ख़ुदा वन्दे आलम एक बीमारी भेज देगा जिसको अरबी में ‘‘ नग़फ़ ’’ कहते हैं। यह बीमारी नाक से शूरू हो कर ताऊन की तरह एक ही शब में उन सब का काम तमाम कर देगी। फिर उनके मुरदार को खाने के लिये ‘‘ उन्क़ा ’’ नामी परिन्दा पैदा होगा जो ज़मीन को उनकी गंदगी से साफ़ कर देगा और इंसान उनके तीरो कमान और जल सकने वाली चीज़ो और आलाते हर्ब (लड़ाई के असलहों) को सात साल तक जलायेंगे।(तफ़सीरे साफ़ी पृष्ठ 278, मिशकात पृष्ठ 366, सही मुस्लिम , तिरमिज़ी , इरशाद अल तालेबैन , पृष्ठ 398, ग़ायतुल मक़सूद जिल्द 2 पृष्ठ 76, मजमुअल बहरैन पृष्ठ 466, क़यामत नामा पृष्ठ 8 )

इमाम मेहदी (अ.स.) की मुद्दते हुकूमत और ख़ातमाए दुनिया

हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) का पाए तख़्त शहरे कूफ़ा होगा। मक्के में आपके नाएब का तक़र्रूर होगा। आपका दीवान ख़ाना और आपके इजराए हुक्म की जगह मस्जिदे कूफ़ा होगी। बैतुल माल मस्जिदे सहला क़रार दी जायेगी और खि़लवत कदा नजफ़े अशरफ़ होगा।(हक़्क़ुल यक़ीन पृष्ठ 145 )

आपके अहदे हुकूमत में मुकम्मल अमनो सुकून होगा। बकरी और भेड़ , गाय और शेर , इंसान और सांप , ज़म्बील और चूहें सब एक दूसरे से बे खौ़फ़ होंगे।(दुर्रे मनशूर , स्यूती जिल्द 3 पृष्ठ 23 ) गुनाह का इरतेक़ाब बिल्कुल बन्द होगा। तमाम लोग पाक बाज़ हो जायेंगे। जेहल , जबन , बुखल काफ़ुर हो जायेंगे। आजिजो , ज़ईफ़ों की दाद रसी होगी जु़ल्म दुनियां से मिट जायेगा। इस्लाम के का़लिब बे जान में रूहे ताज़ा पैदा हो जायेगी। दुनियां के तमाम मज़ाहिब ख़त्म हो जायेंगे , न ईसाई होंगे न यहूदी न और कोई मसलक होगा सिर्फ़ इस्लाम होगा और उसी का डंका बजता होगा। आप दावत बिल सैफ़ देंगे जो आपके खि़लाफ़ होगा क़त्ल कर दिया जायेगा। जज़िया मौक़ूफ़ होगा। ख़ुदा की जानिब से शहर अकाके हरे भरे मैदान में मेहमानी होगी। सारी कायनात मसर्रतों से ममलूह होगी। ग़रज़ कि अदलो इंसाफ़ से दुनिया भर जायेगी दुनियां के तमाम मज़लूम बुलाये जायेंगे और उन पर ज़ुल्म करने वाले हाज़िर किये जायेंगे। हत्ता की आले मोहम्मद (स अ व व ) तशरीफ़ लायेंगे और उन पर ज़ुल्म के पहाड़ तोड़ने वाले बुलाये जायेंगे। हज़रत इमाम (अ.स.) मज़लूम की दाद रसी फ़रमायेंगे और ज़ालिम को कैफ़रो किरदार तक पहुँचायेंगे। हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) इन तमाम उमूर में निगरानी का फ़रीज़ा अदा फ़रमाने के लिये जलवा अफ़रोज़ होंगे। इसी दौरान में हज़रते ईसा (अ.स.) अपनी साबेक़ा अरज़ी 33 साला ज़िन्दगी में 7 साला मौजूदा अरज़ी ज़िन्दगी का इज़ाफ़ा कर के चालीस साल की उम्र में इन्तेक़ाल कर जायेंगे और आपको रौज़ाए हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) में दफ़्न कर दिया जायेगा।(हाशिए मिशक़ात , पृष्ठ 463, सिराज अल क़ुलूब पृष्ठ 77, अजाएबुल क़सस पृष्ठ 23 )

इसके बाद हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) की हुकूमत का ख़ात्मा हो जायेगा और हज़रत अमीरूल मोमेनीन निज़ामे कायनात पर हुक्म रानी करेंगे जिसकी तरफ़ कु़रआने मजीद में ‘‘ दाबतुल अर्ज़ ’’ से इशारा किया गया है। अब रह गया यह कि हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) की मुद्दते हुकूमत क्या होगी ? इसके बारे मे सख़्त इख़्तेलाफ़ है। इरशाद मुफ़िद के पृष्ठ 533 में सात साल और पृष्ठ 537 में 19 साल और आलामुल वुरा के पृष्ठ 364 में 19 साल , मिशक़ात के पृष्ठ 462 में 7 , 8 , 9 साल , नूरूल अबसार के पृष्ठ 154 में 7 , 8 , 9 , 10 साल और नेयाबुल मोअद्दता शेख़ सुलेमान क़न्दूज़ी बलखी़ के पृष्ठ 433 में 20 साल मरक़ूम है। मैंने हालात हदीस , अक़वाले उलेमा से इस्तेम्बात कर के बीस साल को तरजीह दी है। हो सकता है कि एक साल दस साल के बराबर हों।

(इरशाद मुफ़िद पृष्ठ 533, नूरूल अबसार पृष्ठ 155 ) ग़रज़ कि आपकी वफ़ात के बाद हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) आपको ग़ुस्लो कफ़न देंगे और नमाज़ पढ़ा कर दफ़्न फ़रमायेंगे। जैसा कि अल्लामा सैय्यद अली बिन अब्दुल हमीद ने किताब अनवारूल मज़ीया में तहरीर फ़रमाया है , हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) के अहदे ज़हूर में क़यामत से पहले ज़िन्दा होने को रजअत कहते हैं यह रजअत ज़रूरियाते मज़हबे इमामिया से है।(मजमुल बहरैन पृष्ठ 422 ) इसका मतलब यह है कि ज़हूर के बाद बहुक्मे ख़ुदा शदीद तरीन काफ़िर और मुनाफ़िक़ और कामिल तरीन मोमेनीन हज़रत रसूले करीम (स अ व व ) , आइम्मा ए ताहेरीन (अ स ) , बाज़ अम्बियाए सलफ़ बराए इज़हार दौलते हक़के मोहम्मदे दुनिया में पलट कर आयेंगे।(तकलीफ़ अल मुकल्लेफ़ीन फी उसूल अल दीन पृष्ठ 25 )

इसमें ज़ालिमो को ज़ुल्म का बदला और मज़लूमों को इन्तेक़ाम का मौक़ा दिया जायेगा। इस्लाम को इतना फ़रोग़ दिया जायेगा कि ‘‘ लेज़हरा अल्ल दीने कुल्लह ’’ दुनियां में सिर्फ़ एक इस्लाम रह जायेगा।(मआरिफ़ अल मिल्लता अल नाजिया वल नारिया पृष्ठ 380 )

इमाम हुसैन (अ.स.) का मुकम्मल बदला लिया जायेगा।(ग़ायतुल मक़सूद जिल्द 1 पृष्ठ 186 बहवाला तफ़सीर अयाशी) और दुशमनाने आले मोहम्मद (स अ व व ) को क़यामत में अज़ाबे अकबर से पलहे रतअत में अज़ाबे अदना का मज़ा चखाया जायेगा।(हक़्क़ुल यकी़न पृष्ठ 147, बहवाला क़ुरआने मजीद)

शैतान सरवरे कायनात (स अ व व ) के हाथों से नहरे फ़रात पर एक अज़ीम जंग के बाद क़त्ल होगा। आइम्मा ए ताहेरीन (अ.स.) के हर अहदे हुकूमत में अच्छे बुरे ज़िन्दा किये जायेंगे और हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) के अहद में जो लोग ज़िन्दा होंगे उनकी तादाद चार हज़ार होगी(ग़ाएतल मक़सूद जिल्द 1 पृष्ठ 178 ) शोहदा को भी रजअत में ज़ाहेरी ज़िन्दगी दी जायेगी ताकि उसके बाद जो मौत आये उससे आयत के हुक्म ‘‘کل نفس ذائقة الموت ’’ की तकमील हो सके और उन्हें मौत का मज़ा नसीब हो जाये।(ग़ायतुल मक़सूद जिल्द 1 पृष्ठ 173 )

इसी रजअत में वादाए क़ुरआनी के हिसाब से आले मोहम्मद (स अ व व ) को हुकूमते आइम्मा ए आलम दी जायेगी और ज़मीन का कोई गोशा न होगा जिस पर आले मोहम्मद (स अ व व ) की हुकूमत न हो। इसके मुताअल्लिक़ कुरआने मजीद में ‘‘ अन्ना अरज़ यरशहा अबादिल सालेहून ’’ व ‘‘و نرید أن نمن على الذین استضعفوا فى الأرض و نجعلهم أئمّة و نجعلهم الوارثین ’’ मौजूद है।(हक़्कु़ल यक़ीन पृष्ठ 146 )

अब रह गया यह कि कायनात की जा़हेरी हुकूमत व विरासते आले मोहम्मद (स अ व व ) के पास कब तक रहेगी उसके मुताअल्लिक़ एक रवायत 8000(आठ हज़ार) साल का हवाला दे रही है और पता यह चलता है कि अमीरल मोमेनीन (अ.स.) हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) के ज़ेरे निगरानी हुकूमत करेंगे और दीगर आइम्मा ए ताहेरीन उनके वज़रा और सुफ़रा की हैसियत से मुमालिके आलम में इन्तेज़ाम व इन्सेराम फ़रमायेंगे। एक रवायत मे यह भी है कि हर इमाम तरतीब से हुकूमत करेंगे।(हक़्क़ुल यक़ीन व ग़ायतुल मक़सूद)

हज़रत अली (अ.स.) के ज़हूर और निज़ामे आलम पर हुक्मरानी के मुताअल्लिक़ कु़रआने मजीद में ब सराहत मौजूद है। इरशाद होता है‘‘ اخرجنا لهم دابة من الارض (पारा 20 रूकू 1 )

उलमाए फ़रीक़ैन यानी शिया व सुन्नी का इत्तेफ़ाक़ है कि इस आयत से मुराद हज़रत अली (अ.स.) हैं। मुलाहेज़ा हो ! मीज़ान अल एतेदाल , अल्लामा ज़ेहबी व मोआलिम अल तनज़ील , अल्लामा बग़वी व हक़्क़ुल यक़ीन अल्लामा मजलिसी व तफ़सीर साफ़ी अल्लामा मोहसिन फ़ैज़ उसकी तरफ़ तौरेत में भी इशारा मौजूद है।(तज़किरतुल मासूमीन पृष्ठ 246 ) आपका काम यह होगा कि आप ऐसे लोंगे की तसदीक़ न करेंगे जो ख़ुदा के मुख़ालिफ़ और उसकी आयतों पर यकी़न न रखने वाले होंगे। वह पृष्ठ व मरवा के दरमियान से बरामद होंगे। उनके हाथ में हज़रत सुलैमान (अ.स.) की अंगूठी और हज़रते मूसा (अ.स.) का असा होगा। जब क़यामत क़रीब होगी तो आप असा व अंगूशतरी से हर मोमिन व काफ़िर की पेशानी पर निशान लगायेंगे। मोमिन की पेशानी पर ‘‘ हाज़ा मोमिन हक़ा ’’ और काफ़िर की पेशानी पर ‘‘ हाज़ा काफ़िर हक़ा ’’ तहरीर हो जायेगा। मुलाहेजा़ हो (किताब इरशाद अल तालीबैन अख़वन्द दरवेज़ा पृष्ठ 400 व क़यामत नामा , कु़दवतुल मोहद्देसीन , अल्लामा रफ़ीउद्दीन पृष्ठ 10 , अल्लामा बग़वी किताब मिशक़ात अल मसाबीह के पृष्ठ 464 में तहरीर फ़रमाते हैं कि व अबतल अज्ऱ दोपहर के वक़्त निकलेगा और जब इस दाबतुल अर्ज़ का अमल दरामद शुरू हो जायेगा तो बाबे तौबा बन्द हो जायेगा और उस वक़्त किसी का ईमान लाना कारगर न होगा।

हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) फ़रमाते हैं कि एक मरतबा हज़रत अली (अ.स.) मस्जिद में सो रहे थे इतने में हज़रत रसूले करीम (स अ व व ) तशरीफ़ लाये और आपने फ़रमाया ‘‘ क़ुम या दाबतुल्लाह ’’ इसके बाद एक दिन फ़रमाया ! ‘‘ या अली अज़ाकान अख़रज कुल्लाहा ’’ ऐ अली (अ.स.) जब दुनियां का आखि़री ज़माना आयेगा तो ख़ुदा वन्दे आलम तुम्हें बरामत करेगा उस वक़्त तुम अपने दुशमनों की पेशानियों पर निशान लगाओगे।(मजमउल बहरैन पृष्ठ 127 )

आपने यह भी फ़रमाया कि अली ‘‘ व अबता अल जन्नता ’’ हैं लुग़त में है कि दाबा के मानी पैरों से चलने वाले के हैं।(मजमउल बहरैन पृष्ठ 127 )

कसीर रवायत से मालूम होता है कि आले मोहम्मद (स अ व व ) की हुक्मरानी जिसे साहेबे अर हज्जुल मतालिब ने बादशाही लिखा है। उस वक़्त तक क़ाएम रहेगी जब तक दुनिया के ख़त्म होने में चालीस दिन बाक़ी रहेंगे।(इरशाद मुफ़ीद पृष्ठ 137 व आलामुल वुरा पृष्ठ 264 ) इसका मतलब यह है कि चालीस दिन की मुद्दत क़ब्रों से मुर्दो को निकालने और क़यामते कुबरा के लिये होगी। हश्रो नश्र , हिसाबो किताब , सूर फूंकना और दीगर तवाज़िमे क़यामते कुबरा इसी में अदा होगे।(आलामुल वुरा पृष्ठ 264 )

इसके बाद हज़रत अली (अ.स.) लोगों को जन्नत का परवाना देंगे। लोग उसे ले कर पुले सिरात पर से गुज़रेंगे।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा इब्ने हजर मक्की पृष्ठ 74 व इस्आफुल राग़ेबीन पृष्ठ 75, बर हाशिया नूरूल अबसार)

फिर आप हौज़े कौसर की निगरानी करेंगे जो दुशमनाने आले मोहम्मद (स अ व व ) हौज़े कौसर पर होगा उसे आप उठा देंगे।(अरजहुल मतालिब पृष्ठ 767 )

फिर आप ‘‘ लवा अल हम्द ’’ यानी मोहम्मदी झन्डा ले कर जन्नत की तरफ़ चलेंगे और पैग़म्बरे इस्लाम (अ.स.) आगे आगे होंगे। अम्बिया व शोहदा व सालेहीन और दीगर आले मोहम्मद (स अ व व ) के मानने वाले पीछे होंगे।(मनाक़िब अख़तब ख़वारज़मी , कल्मी व अर हज्जुल मतालिब पृष्ठ 774 ) फिर आप जन्नत के दरवाज़े पर जायेंगे और अपने दोस्तों को बग़ैर हिसाब दाखि़ले जन्नत करेंगे और दुशमनों के जहन्नम में झोंक देंगे।(किताब शिफ़ा क़ाज़ी अयाज़ व सवाएके़ मोहर्रेक़ा)

इसी लिये हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) ने हज़रत अबू बक्र , हज़रत उमर , हज़रत उस्मान और बहुत से असहाब को जमा कर के फ़रमा दिया था कि अली (अ.स.) ज़मीन और आसमान दोनों में मेरे वज़ीर हैं अगर तुम लोग खुदा को राज़ी करना चाहते हो तो अली (अ.स.) को राज़ी करो इस लिये की अली (अ.स.) की रज़ा खुदा की रज़ा और अली (अ.स.) का ग़ज़ब ख़ुदा का ग़ज़ब है।(मोवद्दतुल क़ुरबा पृष्ठ 55 से 62 )

अली (अ.स.) की मोहब्बत के बारे में तुम सब को ख़ुदा के सामने जवाब देना पड़ेगा और तुम अली (अ.स.) की मरज़ी के बग़ैर जन्नत में न जा सकोगे और अली (अ.स.) से कह दिया कि तुम और तुम्हारे शिया ‘‘ ख़ैरूल बर्रिया ’’ यानी ख़ुदा की नज़र में अच्छे लोग हैं यह क़यामत में ख़ुश होंगे और तुम्हारे दुशमन नाशादो नामुराद रहेंगे।

मुलाहेजा़ हो !(कंज़ुल आमाल जिल्द 6 पृष्ठ 218 व तोफ़ए अशना अशरया पृष्ठ 604, तफ़सीर फ़तहुल बयान जिल्द 1 पृष्ठ 323 )

वस्सलाम

[[अलहम्दो लिल्लाह ये किताब चौदह सितार पूरी टाईप हो गई। खुदा वंदे आलम से दुआगौ हुं कि हमारे इस अमल को कुबुल फरमाऐ और इमाम हुसैन फाउनडेशन को तरक्की इनायत फरमाए कि जिन्होने इस किताब को अपनी साइट (अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क) के लिऐ टाइप कराया।]]

22-01-2017


विषय सूची

पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा ( स अ व व ) 2

पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ व व ) के मुख़्तसर ख़ानदानी हालात 2

क़ुसई 4

अब्दे मनाफ़ 6

हाशिम 7

जनाबे असद 8

जनाबे अब्दुल मुत्तलिब 9

जनाबे अब्दुल्लाह 13

हज़रत अबुतालिब 15

जनाबे अब्बास 17

जनाबे हमज़ा 18

हज़रत अबू तालिब के बेटे 19

पैग़म्बरे इस्लाम अबुल क़ासिम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा ( स अ .) 21

आं हज़रत की विलादत बसाअदत 22

आपकी तारीख़े विलादत 25

आपका पालन पोषण और आपका बचपना 26

आपकी सायाए मादरी से महरूमी 30

हज़रत अब्दुल मुत्तलिब की वसीयत व हिदायत 31

हज़रत अबु तालिब (अ.स.) के तिजारती सफ़र में बहीरा राहिब का वाक़ेया 31

आं हज़रत (स अ व व ) का मक्के को रूमीयों के इक़्तेदार से बचाना 33

ख़ाना ए काबा में हजरे असवद को नस्ब करना 34

जनाबे ख़दीजा (स अ व व ) के साथ आपकी शादी ख़ाना आबादी 35

कोहे हिरा में आं हज़रत (स अ व व ) की इबादत गुज़ारी 37

आपकी बेअसत 37

दावते ज़ुल अशीरा का वाक़ेया और ऐलाने रिसालत व वज़ारत 40

हिजरते हब्शा 5 बेअसत 45

हज़रते रसूले करीम (स अ व व ) दारूल अरक़म में 6 बेअसत 47

हज़रत रसूले करीम (स अ व व ) शोएबे अबी तालिब में (मोहर्रम 7 बेअसत) 48

आपका मोजिज़ा ए शक़ उल क़मर 9 बेअसत 53

हज़रत अबू तालिब (अ.स.) और जनाबे ख़तीजातुल कुबरा (स.) की वफ़ात 54

क़बीलाए ख़जरज का एक गिरोह खि़दमते रसूल (स अ व व ) में 56

आं हज़रत (स अ व व ) की मेराजे जिस्मानी 57

बैअते उक़बा ऊला 58

बैअते उक़बा (दूसरी) 59

हिजरते मदीना 60

एक 1 हिजरी के महत्वपूर्ण वाक़ेयात 65

अज़ान व अक़ामत 65

अक़्दे मवाख़ात (भाईचारा कराना) 65

2 हिजरी के महत्वपूर्ण वाक़ेयात 66

जनाबे सैय्यदा (स अ व व ) का निकाह 66

तहवीले काबा 67

जेहाद 67

जंगे बद्र 68

3 हिजरी के अहम वाके़यात 69

जंगे ओहद 69

मदीना मातम कदा बन गया 72

4 हिजरी के अहम वाक़ेयात 73

वाक़ये बैरे मऊना 73

ग़ज़वा बनी नुज़ैर 74

ग़ज़वा ज़ातुल रूक़ा 74

5 हिजरी के अहम वाक़ेयात 75

ग़ज़वाए बनी मुस्तलक़ और वाकिए अफ़क़ 81

6 हिजरी के अहम वाक़ेयात 82

7 हिजरी के अहम वाक़ेयात 84

हज़रत अली (अ.स.) के लिये रजअते शम्स 88

तबलीगी ख़ुतूत 90

हुसूले फ़िदक़ 91

एक वाकेया 92

8 हिजरी के अहम वाक़ेयात 93

जंगे मौता 93

ज़ातुल सलासिल 95

मिम्बरे नबवी की इब्तेदा 95

फ़तेह मक्का 95

दावते बनी ख़ज़ीमा 98

जंगे हुनैन 98

हलीमा सादिया की सिफ़ारिश 101

9 हिजरी के अहम वाके़यात 101

फिलिस की तबाही 101

ग़ज़वा ए तबूक़ 102

वाक़ऐ उक़बा 103

तबलीग़े सूरा ए बराअत 104

जंगे वादीउल रमल 104

वफ़ूद 105

वुसूलीए सदक़ात 105

10 हिजरी के अहम वाक़ेयात 106

यमन में हज़रत अली (अ.स.) की शानदार कामयाबी पर मुख़ालिफ़ों की हासेदाना रविश 106

यमन का निज़ामे हुकूमत 107

असहाब का तारीख़ी इजतेमा और तबलीग़े रिसालत की आख़री मंज़िल 108

हज़रत अली (अ.स.) की खि़लाफ़त का ऐलान 108

हुज्जतुल विदा 109

वाक़ेए मुबाहेला 111

सरवरे काऐनात के के आख़री लम्हाते ज़िन्दगी 112

वाक़ेए क़िरतास 114

रसूले करीम (स अ व व ) की शहादत 116

वफ़ात और शहादत का असर 118

आं हज़रत (स अ व व ) की शहादत का सबब 119

अज़वाज 121

औलाद 121

उम्मुल आइम्मा हज़रत फातेमा ज़हरा ( स अ ) ख़ातूने जन्नत 124

आप की विलादत 125

आप का इकलौती बेटी होना 126

बचपन और तरबीयत 128

आपकी इस्मत 130

आप की वालेदा की वफ़ात 130

हिजरते फातेमा (स.अ) 132

हज़रत फातेमा ज़हरा (स.अ) की शादी 132

जनाबे सैय्यदा का जहेज़ 134

जुलूसे रूख़सत 135

हज़रत फातेमा (स.अ) का निज़ामे अमल 136

फातेमा (स.अ) और पर्दा 137

जनाबे सैय्यदा (स.अ) का जिहाद 138

हज़रत फातेमा (स.अ) और उमूरे ख़ानादारी 139

हज़रत फातेमा (स.अ) और बाहम गुज़ारदारी ज़ौजा व ख़ावन्द 140

सास बहू के ताअल्लुक़ात 141

आपकी औलाद 142

आपकी इबादत 142

फातेमा ज़हरा (स.अ) पैग़म्बरे इस्लाम (स अ व व ) की नज़र में 143

हज़रत फातेमा (स अ) रब्बुल इज़्ज़त की निगाह मे 144

फातेमा (स अ) अहदे रिसालत (स अ व व ) मे 145

फातेमा ज़हरा रसूले इस्लाम के बाद 146

आपकी अलालत 152

आपकी वसीयत 153

आपकी वफ़ात हसरते आयात 154

आपका जनाज़ा 158

नतीजा 159

हज़रत फातेमा (स.अ) के जनाज़े मे शिरकत करने वाले 160

हज़रत फातेमा (स.अ) का मदफ़न 160

हज़रत फातेमा (स.अ) की क़ब्र पर हज़रत अली (अ.स) का मरसिया 161

आपके रोज़े का इन्हेदाम 162

अमीरल मोमेनीन हज़रत अली ( अ स ) 164

आपकी परवरिश 168

हुलिया मुबारक 170

माँ की वफ़ात 173

आपके वालिदे माजिद का इन्तेक़ाल 173

हज़रत अली (अ.स.) के जंगी कारनामे 174

जंगे बेरूल अलम 175

इस्लाम पर अली (अ.स.) के एहसानात 178

दुनिया हज़रत अली (अ.स.) की निगाह में 179

कसबे हलाल की जद्दो जहद 181

हज़रत अली (अ.स.) अख़लाक़ के मैदान में 182

हज़रत अली (अ.स.) ख़ल्लाक़े आलम की नज़र में 183

अली (अ.स.) की शान में मशहूर आयात 184

हज़रत अली (अ.स.) रसूले ख़ुदा की निगाह में 185

अली (अ.स.) की शान में मशहूर अहादीस 186

नक़्शे ख़ातमे रसूल स. और अली वली अल्लाह 186

नियाबते रसूल (स अ व व ) 187

18 जि़ल्हिज्जा 189

दस्तावेज़े खि़लाफ़त 190

ख़लीफ़ा का तक़र्रूर और तवारीख़े फ़रहंग 192

हज़रत अली (अ.स.) के फ़ज़ाएल 197

हज़रत अली अलैहिस्सलाम की इल्मी हैसियत 203

हज़रत अली (अ.स.) की तस्नीफ़ात 208

आपकी इल्मी मरकजीयत 213

आपका ज़ोहद व तक़वा 217

आपकी सही राय 219

आपकी सियासत 219

हिल्म , सदाक़त , अदल 220

मौला ए कायनात हज़रत अली (अ.स.) के बाज़ करामात 220

आपका गहवारे में कल्ला ए अज़दर दो पारा करना 222

साकि़ए कौसर और संगे ख़ारा 222

मौला अली (अ.स.) और इन्सान की शक्ल बदल देना 223

ऐन उल्लाह , अली (अ.स.) ने कोरे मादर ज़ाद को चशमे बीना दे दी 224

मुशकिल कुशा की मुशकिल 225

एक मशलूल की शिफ़ा याबी 226

आपकी सायए रहमत से महरूमी 227

वफ़ाते रसूल स के बाद अली (अ.स.) का ख़़ुतबा 229

रफ़ीक़ाए हयात की जुदाई 230

शहादते फातेमा जहरा पर हज़रत अली (अ.स.) का ख़ुतबा 231

हज़रत अली (अ.स.) की गोशा नशीनी 232

हज़रत अली (अ.स.) का क़ुरआन पेश करना 237

हज़रत अली (अ.स.) के मुहाफि़ज़े इस्लाम मशवरे 238

मशवरों के मुताअल्लिक़ इस्लाम की रायें 242

मशवरों के अलावा जानी इमदाद 242

हज़रत अली (अ.स.) और इस्लाम में सड़कों की तामीरी बुनियाद 243

हज़रते उस्मान की खि़लाफ़त और वफ़ात 245

हज़रत अली (अ.स.) की खि़लाफ़ते ज़ाहेरी 247

गवर्नरों की तक़र्रूरी 253

जंगे जमल 254

मैदाने कारज़ार 260

जंगे सिफ़्फ़ीन 265

लैलतुल हरीर 269

हकमैन का फ़ैसला 270

जंगे नहरवान 271

मौहम्मद इब्ने अबी बक्र की इबरत नाक मौत 272

हिन्दुस्तान में इस्लाम सब से पहले 275

बादशाह शन्सब बिन हरिक़ का दस्ते अमीरल मोमेनीन पर ईमान लाना 279

औलादे शन्सब की अमले बनी उम्मया से बेज़ारी 281

औलादे शन्सब की दुश्मनाने आले मौहम्मद स. से जंग 282

हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) की राहे कूफ़ा से सिन्ध जाने की ख़्वाहिश 282

हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) की एक ज़ौजा का सिन्धी होना 283

हज़रत अली (अ.स.) की शहादत 284

हज़रत अली (अ.स.) की शहादत पर मरसिया 294

हज़रत अली (अ.स.) की अज़वाज व औलाद 295

अबु मोहम्मद हज़रत इमाम हसन ( अ स ) 297

आपकी विलादत 298

आपका नामे नामी 298

आपका अक़ीक़ा 300

कुन्नियत व अलक़ाब 301

इमामे हसन (अ.स.) पैग़म्बरे इस्लाम (स अ व व ) की नज़र में 301

इमाम हसन (अ.स.) की सरदारीए जन्नत 304

जज़बाए इस्लाम की फ़रावानी 304

इमाम हसन (अ.स.) और तरजुमानी वही 305

हज़रत इमाम हसन (अ.स.) का बचपन में लौहे महफ़ूज़ का मुतालेआ करना। 306

ख़लीफ़ाए अव्वल को मिम्बरे रसूल (स अ व व ) से उतरने का हुक्म 307

इमाम हसन (अ.स.) का बचपन और मसाएले इल्मिया 308

इमाम हसन (अ.स.) और तफ़सीरे क़ुरआन 314

इमाम हसन (अ.स.) की साया ए रहमत से महरूमी 315

मुशहबेहते रसूल (स अ व व ) 316

इमाम हसन (अ.स.) की इबादत 317

आपका ज़ोहद 317

आपकी सख़ावत 318

तवक्कुल के मुताअल्लिक़ आपका इरशाद 319

इमाम हसन (अ.स.) हिल्म और अख़्लाक़ के मैदान में 320

अहदे अमीरल मोमेनीन (अ.स.) में इमाम हसन (अ.स.) की इस्लामी खि़दमात 322

हज़रत अली (अ.स.) की शहादत और इमाम हसन (अ.स.) की बैयत 323

सुलह 328

शराएते सुलह 330

सुलह नामे पर दस्तख़त 331

शराएते सुलह का हशर 333

सुलह हसन (अ.स.) और उसकी वजह व असबाब 335

सुलह हसन (अ.स.) और जंगे हुसैन (अ.स.) 337

इमाम हसन (अ.स.) पर कसरते अज़वाज का इल्ज़ाम 340

उमवी अहद की तारीख़ के मुताअल्लिक़ मुसतशरक़ीने यूरोप की राय 342

हज़रत इमाम हसन (अ.स.) की शहादत 345

माविया सजदा ए शुक्र में 352

इमाम हसन (अ.स.) की तजहीज़ों तकफ़ीन 353

आपकी अज़वाज और औलाद 354

माविया इब्ने अबू सुफ़ियान का तारीख़ी र्ताअरूफ़ 357

अबु अब्दुल्लाह हज़रत इमाम हुसैन ( अ.स. ) शहीदे कर्बला 373

आपकी विलादत 374

आपका इस्मे गेरामी 376

आपका अक़ीक़ा 376

कुन्नियत व अलक़ाब 377

आपकी रज़ाअत 377

ख़ुदा वन्दे आलम की तरफ़ से विलादते इमाम हुसैन (अ.स.) की तहनियत व ताज़ियत 378

इमाम हुसैन (अ.स.) का चमकता चेहरा 382

जनाबे इब्राहीम का इमाम हुसैन (अ.स.) पर क़ुरबान होना 383

हसनैन(अ स ) की बाहमी ज़ोर आज़माई 384

ख़ाके क़दमे हुसैन (अ.स.) और हबीब इब्ने मज़ाहिर 384

इमाम हुसैन (अ.स.) के लिये हिरन के बच्चे का आना 385

इमाम हुसैन (अ.स.) सीना ए रसूल (स अ व व ) पर 386

हसनैन (अ.स.) में ख़ुशनवीसी का मुक़ाबला 387

जन्नत से कपड़े और फ़रज़न्दाने रसूल (स अ व व ) की ईद 388

गिरया ए हुसैनी और सदमा ए रसूल (स अ व व ) 390

इमाम हुसैन (अ.स.) की सरदारीए जन्नत 391

इमाम हुसैन (अ.स.) आलमे नमाज़ में पुश्ते रसूल (स अ व व ) पर 393

हदीसे हुसैनो मिन्नी 394

मकतूबाते बाबे जन्नत 394

इमाम हुसैन (अ.स.) और सिफ़ाते हसना की मरकज़ीयत 395

हज़रत उमर का एतेराफ़े शरफ़े आले मोहम्मद (स अ व व ) 396

इब्ने उमर का एतराफ़े शरफ़े हुसैनी 398

इमाम हुसैन (अ.स.) की रक़ाब 398

इमाम हुसैन (अ.स.) की गर्दे क़दम और जनाबे अबू हुरैरा 399

इमाम हुसैन (अ.स.) का ज़ुर्रियते नबी में होना 400

करमे हुसैनी की एक मिसाल 401

इमाम हुसैन (अ.स.) की एक करामत 402

इमाम हुसैन (अ.स.) की नुसरत के लिये रसूले करीम (स अ व व ) का हुक्म 403

इमाम हुसैन (अ.स.) की इबादत 404

इमाम हुसैन (अ.स.) की सख़ावत 404

इमाम हुसैन (अ.स.) का अम्रे आस को जवाब 406

हज़रत उमर की वसीयत कि सनदे गु़लामी ए अहले बैत का नविशता मेरे कफ़न में रखा जाऐ 407

इमाम हुसैन (अ.स.) की मुनाजात और ख़ुदा की तरफ़ से जवाब 411

जंगे सिफ़्फ़ीन में इमाम हुसैन (अ.स.) की जद्दो जेहद 412

हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) गिरदाबे मसाएब में (वाक़िए करबला का आग़ाज़) 412

हज़रत मुस्लिम इब्ने अक़ील 419

मोहम्मद और इब्राहीम की शहादत 424

मक्के मोअज़्ज़मा में इमाम हुसैन (अ.स.) की जान बच न सकी 430

इमाम हुसैन (अ.स.) की मक्के से रवानगी 432

हुर बिन यज़ीदे रियाही 434

करबला में वुरूद 436

इमाम हुसैन (अ.स.) का ख़त अहले कूफ़ा के नाम 437

उबैदुल्लाह इब्ने ज़ियाद का ख़त इमाम हुसैन (अ.स.) के नाम 437

दूसरी मोहर्रम से नवी मोहर्रम तक के मुख़्तसर वाक़ेयात 438

शबे आशूर 446

मुजाहेदीने करबला की आख़री सहर 448

सुबह आशूर 449

जनाबे हुर की आमद 451

इमाम हुसैन (अ.स.) और उनके असहाब व आइज़्ज़ा की अर्श आफ़रीं जंग 452

जंगे मग़लूबा 452

हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) के मशहूर असहाब और उनकी शहादत 455

हबीब इब्ने मज़ाहिर 455

ज़ुहैर इब्ने क़ैन 456

नाफ़े इब्ने हिलाल 457

मुस्लिम इब्ने औसजा 457

आबिस शाकरी 458

बुरैर हमादानी 459

इमाम हुसैन (अ.स.) के आइज़्ज़ा व अक़रेबा और औलाद की शहादत 460

अलमदारे करबला हज़रते अब्बास (अ.स.) की शहादत 464

हज़रत अली अकबर (अ.स.) की शहादत 465

हज़रत अली असग़र (अ.स.) की शहादत 468

इमाम हुसैन (अ.स.) की रूख़सती 471

हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) मैदाने जंग में 473

इमाम हुसैन (अ.स.) की नबर्द आज़माई 475

बारगाहे अहदीयत में इमाम हुसैन (अ.स.) के दिल की अवाज़ 480

शामे ग़रीबा 485

सुबह ग्यारह मुहर्रम 491

हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) की बहन जनाबे ज़ैनब व जनाबे कुलसूम के मुख़्तसर हालात विलादत , वफ़ात और मदफ़न 495

हज़रत उम्मे कुलसूम की विलादत , वफ़ात और उनका मदफ़न 503

अबु मोहम्मद हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन ( अ.स. ) 505

आपकी विलादत बा सआदत 507

नाम , कुन्नियत , अल्क़ाब 508

लक़ब ज़ैनुल आबेदीन की तौज़ीह 508

लक़ब सज्जाद की तौजीह 510

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) की नसब बलन्दी 510

जनाबे शहर बानों की तशरीफ़ आवरी की बहस 512

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) के बचपन का एक वाके़या 517

आपके अहदे हयात के बादशाहाने वक़्त 518

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) का अहदे तफ़ूलियत और हज्जे बैतुल्लाह 519

आपका हुलिया ए मुबारक 521

हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) की शाने इबादत 522

आपकी हालत वज़ू के वक़्त 524

आलमे नमाज़ में आपकी हालत 524

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) की शबाना रोज़ एक हज़ार रकअतें 527

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) मन्सबे इमामत पर फ़ाएज़ होने से पहले 528

वाक़ेए करबला के सिलसिले में इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) का शानदार किरदार 529

वाक़ेए करबला और हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) के ख़ुतबात 533

कूफ़े में आपका ख़ुत्बा 534

मस्जिदे दमिश्क़ (शाम) में आपका ख़ुत्बा 535

मदीने के क़रीब पहुँच कर आपका ख़ुत्बा 539

रौज़ा ए रसूल (स. अ.) पर इमाम (अ.स.) की फ़रयाद 541

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) और ख़ाके शिफ़ा 543

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) और मोहम्मदे हनफ़िया के दरमियान हजरे असवद का फ़ैसला 543

सुबूते इमामत में इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) का कन्करी पर मुहर लगाना 544

वाक़ेए हुर्रा और इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) 545

वाक़ेए हुर्रा और आपकी क़याम गाह 547

ख़ानदानी दुश्मन मरवान के साथ आपकी करम गुस्तरी 548

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) और मुस्लिम बिन अक़बा 549

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) से बैअत का सवाल न करने की वजह 549

दुश्मने अज़ली हसीन बिन नमीर के साथ आपकी करम नवाज़ी 550

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) और फ़ुक़राऐ मदीना की किफ़ालत 551

हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) और खेती 552

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) और फ़ित्नाए इब्ने ज़ुबैर 553

हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) की अपने पदरे बुज़ुर्गवार के क़र्ज़े से सुबुक दोशी 556

माविया इब्ने यज़ीद की तख़्त नशीनी और इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) 556

अब्दुल मलिक इब्ने मरवान और इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) 563

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) और बुनियादे काबा ए मोहतरम व नसबे हजरे असवद 567

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) और अब्दुल मलिक बिन मरवान का हज 569

बद किरदार और रिया कार हाजियों की शक्ल 570

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) और एक मर्दे बल्ख़ी 571

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) अख़लाख की दुनियां मे 573

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) और सहीफ़ा ए कामेला 575

हश्शाम बिन अब्दुल मलिक और क़सीदा ए फ़रज़दक़ 576

क़सीदाऐ फ़रज़दक़ के मुतालिक़ एक ग़लत फ़हमी और उसका इज़ाला 578

फ़रज़न्दे रसूल (स अ व व ) इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) और मुख़्तार आले मोहम्मद 584

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ की निगाह में 587

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) की शहादत 588

आपकी औलाद 589

जनाबे ज़ैद शहीद 590

ईसा बिन ज़ैद 593

अबु जाफ़र हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर ( अ स ) 595

आपकी विलादत बा सआदत 597

इस्मे गिरामी , कुन्नियत और अलक़ाब 598

बाक़िर की वजह तसमिया 598

बादशाहाने वक़्त 599

वाक़ेए करबला में इमाम मोहम्मदे बाक़िर (अ.स.) का हिस्सा 600

हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) और जाबिर बिन अब्दुल्लाह अंसारी की बाहमी मुलाक़ात 600

सात साल की उम्र में इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) का हज्जे ख़ाना ए काबा 603

हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) और इस्लाम में सिक्के की इब्तेदा 604

वलीद बिन अब्दुल मलिक की आले मोहम्मद (अ.स.) पर ज़ुल्म आफ़रीनी 610

आपके वालिदे माजिद की वफ़ात हसरते आयात 612

हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) की इल्मी हैसियत 612

आपके बाज़ इल्मी हिदायात व इरशादात 617

इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) और जनाबे अबू हनीफ़ा का इम्तेहान 623

इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) के बाज़ करामात 627

आपकी इबादत गुज़ारी और आपके आम हालात 630

हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) और हश्शाम बिन अब्दुल मलिक 631

हश्शाम का सवाल और उसका जवाब 633

इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) और हश्शाम की मुश्किल कुशाई 634

हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) की दमिश्क़ में तलबी 637

दमिश्क़ से रवानगी और एक राहिब का मुसलमान होना 641

इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) की शहादत 643

अज़वाज व औलाद 644

अबु अब्दुल्लाह हज़रत इमामे जाफ़रे सादिक़ (अ स ) 646

इस्मे गिरामी , कुन्नियत , अलक़ाब 649

बादशाहाने वक़्त 651

अब्दुल मलिक बिन मरवान के अहद में आपका एक मनाज़िरा 652

इमामे जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) और हकीम इब्ने अयाश कल्बी 655

वलीद बिन यज़ीद और सादिक़े आले मोहम्मद (अ स ) 657

हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) और जनाबे अबू हनीफ़ा नोमान बिन साबित कूफ़ी 659

इमाम अबू हनीफ़ा की शार्गिदी का मसला 660

इमामे जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के बाज़ नसीहते व इरशादात 664

आपके बाज़ करामात 667

आपका अख़्लाक़ और आदात व औसाफ़ 668

इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की इल्मी बुलन्दी 672

सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) की तसानीफ़ 673

किताब जफ़र व जामेअ 674

हज़रत सादिक़े आले मोहम्मद ( अ.स. ) के फ़लक़ वक़ार शार्गिद 677

इमामुल कीमिया जनाबे जाबिर इब्ने हय्यान तरसूसी 678

सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) के इल्मी फ़ुयूज़ व बरकात 686

कुतुबे उसूले अरबा मिया 689

सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) के असहाब की तादाद और उनकी तसानीफ़ 690

हज़रत सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) और इल्मे जफ़र 691

हज़रत सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) और इल्मे तिब 693

हज़रत सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) का इल्मुल क़ुरआन 694

इल्मे नुजूम 694

इल्मे मन्तिक़ुत तैर 695

हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) और इल्मुल अजसाम 696

सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) ने जन्नत में घर बनवा दिया 696

दस्ते सादिक़ (अ.स.) में एजाज़े इब्राहीमी 697

ख़तो किताबत और दरख़्वास्त के बारे में आपकी हिदायत 698

ख़लीफ़ा मन्सूर दवानेक़ी और हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ स ) 701

मन्सूर अब्बासी की सादात कशी 704

इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) का दरबारे मन्सूर में एक तबीबे हिन्द से तबादला ए ख़यालात 714

इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) को बाल बच्चों समेत जला देने का मन्सूबा 720

147 हिजरी में मन्सूर का हज और इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के क़त्ल का अज़म बिल जज़म 721

हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की दरबारे मन्सूर में सातवीं बार तलबी 723

इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) और दरबार के शेर 724

इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) को दरबार में क़त्ल किये जाने का बन्दो बस्त 724

हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की शहादत 726

आपकी औलाद 728

फ़ात्मी ख़ुल्फ़ा 728

अबुल हसन हज़रत इमाम मूसा काजि़म अ स 752

हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ स ) 752

आपकी विलादत ब सआदत 755

इस्मे गिरामी कुन्नियत , अल्क़ाब 756

लक़्ब बाबुल हवाएज की वजह 757

बादशाहाने वक़्त 759

नशोनुमा और तरबीअत 759

आपके बचपन के बाज़ वाक़ेआत 760

हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की इमामत 764

हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के बाज़ करामात 767

ख़लीफ़ा मेंहदी अब्बासी और हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ स ) 773

इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की बग़दाद में क़त्ल के लिये तलबी 775

इमाम मूसा ए काजि़म (अ.स.) हादी अब्बासी की क़ैद में 778

हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के अख़लाक़ व आदात 779

इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की तसनीफ़ात 785

आपकी रिवायत की हुई हदीसे 785

ख़लीफ़ा हारून रशीद अब्बासी और हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ स ) 786

हारून रशीद का पहला हज और इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की पहली गिरफ़्तारी 788

हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) और अली बिन यक़तीन बग़दादी 793

अली बिन यक़तीन को उलटा वज़ू करने का हुक्म 795

वज़ीरे आज़म अली बिन यक़तीन का हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की फ़हमाईश 797

हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के हुक्म से बादल का एक मर्दे मोमिन को चीन से तालेक़ान पहुँचाने का वाकि़आ 798

हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) और फि़दक के हुदूदे अरबा 802

हारून रशीद अब्बासी की सादात कुशी 803

हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की दोबारा गिरफ़्तारी 805

इमाम (अ.स.) का क़ैद ख़ाने में इम्तेहान और इल्मे ग़ैब का मुज़ाहेरा 813

हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की शहादत 814

आपकी तारीख़े वफ़ात 817

तादादे औलाद 819

अबुल हसन हज़रत इमाम अली रज़ा ( अ स ) 820

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की विलादत ब सआदत 823

नाम , कुन्नियत , अल्क़ाब 824

लक़ब रज़ा की वजह 825

आपकी तरबियत 826

बादशाहाने वक़्त 826

जानशीनी 827

इमाम मूसाए काज़िम (अ.स.) की वफ़ात और इमाम रज़ा (अ.स.) के दौरे इमामत का आग़ाज़ 828

हारूनी फ़ौज और ख़ाना ए इमाम रज़ा (अ.स.) 828

इमाम अली रज़ा (अ.स.) का हज और हारून रशीद अब्बासी 836

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) का मुजद्दिदे मज़हबे इमामिया होना 837

हज़रत इमामे अली रज़ा (अ.स.) के अख़्लाक़ व आदात और शमाएल व ख़साएल 838

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) के बाज़ करामात 843

हज़रत रसूले खु़दा (स.अ.) और जनाबे अली रज़ा (अ.स.) वाक़ए तमर सीहानी 848

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) का इल्मी कमाल 850

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) और हुरूफ़े तहज्जी 853

इमाम रज़ा (अ.स.) और वक़्ते निकाह 856

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) के बाज़ मरवीयात व इरशादात 856

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) और मजलिसे शोहदाऐ करबला 859

ख़लीफ़ा मामून रशीद अब्बासी और हज़रत इमाम अली रज़ा (अ.स.) 862

मामून रशीद की मजलिसे मुशाविरत 865

मामून की तलबी से क़ब्ल इमाम (अ.स.) की रौज़ा ए रसूल पर फ़रयाद 869

इमाम रज़ा (अ.स.) की मदीने से मर्व में तलबी 870

इमाम रज़ा (अ.स.) की मदीने से रवानगी 871

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) का नेशा पूर में वरूदे मसऊद 876

शहर ख़ुरासान में नुज़ूले इजलाल 880

शहर तूस में आप का नुज़ूलो वरूद 880

क़रिया सना बाद में हज़रत का नुज़ूले करम 881

इमाम रज़ा (अ.स.) का दारूल खि़लाफ़ा मर्व में नुज़ूल 881

जलसा ए वली अहदी का इन्एक़ाद 884

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की वली अहदी का दुशमनों पर असर 886

वाक़िए हिजाब 888

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) और नमाज़े ईद 889

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की मदह सराई और देबले खि़ज़ाई और अबू नवास 891

मज़ाहिबे आलम के उलेमा से हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) के इल्मी मुनाज़िरे 895

आलिमे नसारा से मुनाज़िरा 896

आलिमे यहूद से मनाज़ेरा 898

आलिमे मजूस से मनाज़ेरा 902

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) और इस्मते अम्बिया (अ.स.) 903

आपकी तसानीफ़ 906

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) और शेरे क़ालीन 907

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) के साथ उम्मे हबीबा बिन्ते मामून की शादी और मामून का सफ़रे ईराक़ 910

मामून रशीद अब्बासी और हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की शहादत 912

तारीख़े शहादत 914

शहादते इमाम रज़ा (अ.स.) के मुताअल्लिक़ अबासलत हरवी का बयान 917

शहादते इमाम रज़ा (अ.स.) के मौक़े पर इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) का ख़ुरासान पहुँचना 921

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की तादादे औलाद 926

क़ुम की मुख़्तसर तारीख़ और जनाबे फ़ात्मा (स.अ.) मासूमा ए क़ुम के मुख़्तसर हालात 930

क़ुम की वजहे तसमिया 930

क़ुम और अहले क़ुम के फ़ज़ाएल 931

हज़रत मासूमा ए क़ुम के मुताअल्लिक़ हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की पेशीन गोई 934

क़ुम में हज़रत मासूमा ए क़ुम की आमद 934

हज़रत मासूमा ए क़ुम की ज़्यारत की अहमियत 937

अबु जाफ़र हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी ( अ स ) 938

इमाम (अ.स.) की विलादत बा सआदत 940

नाम कुन्नियत और अलक़ाब 942

बादशाहाने वक़्त 943

इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की नशो नुमा और तरबीअत 943

वालिदे माजिद के साया ए आत्फ़ियत से महरूमी 945

मामून रशीद अब्बासी और हज़रते इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) का पहला सफ़रे ईराक़ 947

बाज़ और मछली का वाक़िया 948

हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) से उलमाए इस्लाम का मनाज़ेरा और अब्बासी हासिदों की शिकस्ते फ़ाश 950

इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के साथ उम्मे फ़ज़ल का अक़्द और ख़़ुत्बा ए निकाह 958

उम्मुल फ़ज़ल की रूख़सती , इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) कर मदीने को वापसी और हज़रत के इख़्लाक़ो औसाफ़ आदातो ख़साएल 961

उमूरे ख़ाना दारी और अज़वाजी ज़िन्दगी में 966

इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) और तैयुल अर्ज़ 967

हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के बाज़ करामात 970

हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के हिदायात व इरशादात 974

हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की एक रवायत 978

मामून की वफ़ात , मोतसिम की खि़लाफ़त और हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की गिरफ़्तारी 979

इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की नज़र बन्दी क़ैद और शहादत 981

आपकी अज़वाज और औलाद 985

सिलसिला ए सादाते रिज़विया 985

जनाबे मूसा बिन इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के फ़रज़न्द 988

हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के फ़रज़न्दे अर्जुमन्द जनाब मूसा मुबरक़ा के मुख़्तसिर हालात 991

मोअल्लिफ़ किताब (14 सितारे) का शजरहए नस्ब 994

अबुल हसन हज़रत इमाम अली नक़ी ( अ.स. ) 996

वालैदेन 996

इमाम अली नक़ी (अ.स.) की विलादते बासआदत 997

इस्मे गिरामी , कुन्नीयत और अलक़ाब 997

आपके अहदे हयात और बादशाहाने वक़्त 998

हज़रत इमाम मौहम्मद तक़ी (अ.स.) का सफ़रे बग़दाद और हज़रत इमाम नक़ी (अ.स.) की वली अहदी 999

इमाम अली नक़ी (अ.स.) का इल्मे लदुन्नी 1000

हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) के करामात और आपका इल्मे बातिन 1003

इमाम अली नक़ी (अ.स.) और मुतावक्किल की तख़्त नशीनी 1009

हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) और सहीफ़ा ए कामेला की एक दुआ 1010

हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) के आबाओ अजदाद की क़ब्रों के साथ मोतावकिल अब्बासी का सुलूक 1011

इमाम अली नक़ी (अ.स.) की मदीने से सामरा तलबी 1020

इमाम अली नक़ी (अ.स.) की नज़र बन्दी 1026

इमाम अली नक़ी (अ.स.) का जज़बा ए हमदर्दी 1028

इमाम अली नक़ी (अ.स.) की हालत सामरा पहुंचने के बाद 1030

हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) और सवारी की तेज़रफ़्तारी 1031

दो माह पहले पहले काज़ी की मौत की ख़बर 1031

आपका एहतिराम जानवरों की नज़र में 1032

हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) और ख़्वाब की अमली ताबीर 1032

हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) और फ़ुक़हाए मुस्लेमीन 1033

शाहे रोम को हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) का जवाब 1036

मुतावक्किल के कहने से इब्ने सकीत व इब्ने अकसम का इमाम अली नक़ी (अ.स.) से सवाल 1037

क़ज़ा व क़दर के मुताअल्लिक़ इमाम अली नक़ी (अ.स.) की रहबरी व रहनुमाई 1039

हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) की ख़ाना तलाशी 1040

हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) और शेरे क़ालीन 1044

हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) और अब्दुर रहमान मिस्री का ज़ेहनी इन्क़ेलाब 1045

हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) के दौर मे नकली ज़ैनब का आना 1046

हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) और मुतावक्किल का इलाज 1049

हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) की दोबारा ख़ाना तलाशी 1051

हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) के तसव्वुरे हुकूमत पर ख़ौफ़े ख़ुदा ग़ालिब था 1052

क़ब्रे हुसैन (अ.स.) के साथ मुतावक्किल की दोबारा बेअदबी 247 हिजरी 1055

मुतावक्किल का क़त्ल 1058

इमाम अली नक़ी (अ.स.) को पैदल चलने का हुक्म 1059

हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) की शहादत 1059

हाशिया 1061

अबु मोहम्मद हज़रत इमाम हसन असकरी ( अ स ) 1062

इमाम हसन असकरी (अ.स.) की विलादत और बचपन के बाज हालात 1063

आपकी कुन्नियत और आपके अल्क़ाब 1064

आपके अहदे हयात और बादशहाने वक़्त 1065

चार माह की उम्र में मनसबे इमामत 1066

चार साल की उम्र में आपका सफ़रे ईराक़ 1067

यूसुफ़े आले मोहम्मद (स. अ.) कुएं में 1067

इमाम हसन असकरी (अ.स.) और कमसिनी में उरूजे फ़िक्र 1068

इमाम हसन असकरी (अ.स.) के साथ बादशहाने वक़्त सुलूक और तरज़े अमल 1069

इमाम अली नक़ी (अ.स.) की शहादत और इमाम हसन असकरी (अ.स.) का आग़ाज़े इमामत 1074

अपने अक़ीदत मन्दों में हज़रत का दौरा 1079

इमाम हसन असकरी (अ.स.) का पत्थर पर मोहर लगाना 1080

इमाम हसन असकरी (अ.स.) के इल्मी खि़दमात 1081

तफ़सीरे क़ुरआन 1081

हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) का ईराक़ के एक अज़ीम फ़लसफ़ी को शिकस्त देना 1083

हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) और ख़ुसूसियाते मज़हब 1086

हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) और ईदे नुहुम रबीउल अव्वल 1087

हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) के अक़वाल 1088

इमाम मेहदी (अ.स.) की विलादत बा सआदत 1092

मोतमिद अब्बासी की खि़लाफ़त और इमाम हसन असकरी (अ.स.) की गिरफ़्तारी 1092

इस्लाम पर इमाम हसन असकरी (अ.स.) का एहसाने अज़ीम 1095

इमाम हसन असकरी (अ.स.) और अबीदुल्लाह वज़ीरे मोतमिद अब्बासी 1099

इमाम हसन असकरी (अ.स.) की दोबारा गिरफ़्तारी 1103

हुज्जते ख़ुदा दरिन्दों में 1105

इमाम हसन असकरी (अ.स.) की शहादत 1106

शहादत के बाद 1107

क़ायमे आले मोहम्मद अबुल क़ासिम हज़रत इमाम मोहम्मद मेहदी ( अ.स. ) साहेबुज़्ज़मान 1110

हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) की विलादत ब सआदत 1112

आपका नसब नामा 1118

आपकी कुन्नियत 1120

आपके अलक़ाब 1121

आपका हुलिया मुबारक 1122

तीन साल की उम्र में हुज्जतुल्लाह होने का दावा 1123

हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) की ग़ैबत और उसकी ज़रूरत 1129

ग़ैबते इमाम मेहदी (अ.स.) पर उलेमाए अहले सुन्नत का इजमा 1133

इमाम मेहदी (अ.स.) की ग़ैबत और आपका वुजूद व ज़ुहूर क़ुरआने मजीद की रौशनी में 1139

इमाम मेहदी (अ.स.) का ज़िक्र कुतुबे आसमानी में 1140

इमाम मेहदी (अ.स.) की ग़ैबत की वजह 1141

ग़ैबते इमाम मेहदी (अ.स.) जफ़र जामए की रौशनी में 1145

ग़ैबते सुग़रा व कुबरा और आपके सुफ़रा 1148

सुफ़राए उमूमी के नाम 1151

हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) की ग़ैबत के बाद 1152

307 हिजरी में आपका हजरे असवद नसब करना 1152

इस्हाक़ बिन याक़ूब के नाम इमामे अस्र (अ.स.) का ख़त 1154

शेख़ मोहम्मद बिन मोहम्मद के नाम इमामे ज़माना (अ.स.) का मकतूबे गिरामी 1157

उन हज़रात के नाम जिन्होंने ज़मानए ग़ैबते सुग़रा में इमाम को देखा है। 1159

ज़्यारते नाहिया और उसूले काफ़ी 1160

ग़ैबते कुबरा में इमाम मेहदी (अ.स.) का मरक़जी़ मुक़ाम 1161

जज़ीराए खि़ज़रा में इमाम (अ.स.) से मुलाक़ात 1164

इमामे ग़ायब का हर जगह हाज़िर होना 1165

इमाम मेहदी (अ.स.) और हज्जे काबा 1165

ज़मानाए ग़ैबते कुबरा में इमाम मेहदी (अ.स.) की बैअत 1166

इमाम मेहदी (अ.स.) की मोमेनीन से मुलाक़ात 1167

मुल्ला मोहम्मद बाक़िर दामाद का इमामे अस्र (अ.स.) से इस्तेफ़ादा करना 1168

जनाब बहरूल उलूम का इमामे ज़माना (अ.स.) से मुलाका़त करना 1169

इमाम मेहदी (अ.स.) का हिमायते मज़हब फ़रमाना 1169

इमामे अस्र (अ.स.) का वाक़िए करबला बयान करना 1172

हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) के तूले उम्र की बहस 1172

हदीसे नअसल और इमामे अस्र (अ स ) 1176

अलामते ज़हूरे मेहदी (अ.स.) के मुताअल्लिक़ अरबाबे अस्मत के इरशादात 1178

हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) का ज़हूर मौफ़ूरुल सुरूर 1189

इमाम मेहदी (अ.स.) का सिने ज़हूर 1194

ज़हूर के वक़्त इमाम (अ.स.) की उम्र 1196

आपका अलम 1197

ज़हूर के बाद 1197

दज्जाल और उसका ख़ुरूज 1202

नुज़ूले हज़रते ईसा (अ स ) 1206

इमाम मेहदी (अ.स.) और ईसा इब्ने मरियम का दौरा 1207

हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) का कुस्तुनतुनया को फ़तेह करना 1208

याजूज माजूज और उनका ख़ुरूज 1209

इमाम मेहदी (अ.स.) की मुद्दते हुकूमत और ख़ातमाए दुनिया 1212