अबुल हसन हज़रत इमाम अली रज़ा (अ.स.)
समूहन इमाम रज़ा (अ)
लेखक मौलाना नजमुल हसन करारवी
पुस्तक की भाषा هندی
मुद्रण वर्ष 1404

अबुल हसन हज़रत इमाम अली रज़ा (अ स )

(चौदह सितारे)

लेखकः नजमुल हसन कर्रारवी

नोटः ये किताब अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क के ज़रीऐ अपने पाठको के लिऐ टाइप कराई गई है और इस किताब मे टाइप वग़ैरा की ग़लतीयो को सही किया गया है।

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बतौर ज़ादे सफ़र उसवा ए हुसैन लिए

चला है सुए ख़ुरासान कारवाने रज़ा (अ.स.)

मुशाबेहत है बहुत करबला व मशहद में

वो आज़माइशे सब्र और ये इम्तेहाने रज़ा (अ.स.)

साबिर थरयानी ‘‘ कराची ’’

अरब से आप क्या आए कि , ईमान की बहार आई

अजम ने पाई इज़्ज़त मरकज़े , अहले विला हो कर

बहुत मुश्ताक़ थे अहले अजम , नूरे रिसालत के

ज़मीने तूस का चमका सितारा नक़्शा पा हो कर

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) रसूले करीम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.) के आठवें जां नशीन , मुसलमानो के आठवें इमाम और सिलसिला ए असमत की दसवीं कड़ी थे। आपके वालिदे माजिद इमाम मुसिए काज़िम (अ.स.) थे और वालेदा माजेदा उम्मुल बनीन उर्फ़ नजमा थीं। जनाबे नजमा के मुताअल्लिक़ उलमा का बयान है कि आपका शुमार अशरफ़े अजम में था और आप अक़ल व दियानीयत के लेहाज़ से अफ़ज़ल अन्साँ थीं। हमीदा ख़ातून यानी इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) की वालदा का कहना है कि मैंने उम्मुल बनीन से बेहतर किसी औरत को नहीं पाया।

अली बिन मीसम कहते हैं कि हमीदा ख़ातून को रसूले ख़ुदा (स.अ.) ने ख़्वाब में हुक्म दिया था कि उम्मुल बनीन की शादी इमाम मुसिए काज़िम (अ.स.) से करो ‘‘ क्यों कि सैलदसनहा ख़ैरा हल अर्ज़ ’’ इन से अनक़रीब एक ऐसा फ़रज़न्द पैदा होने वाला है जो मादरे गेती की आग़ोश में बसने वालों में सब से बेहतर होगा।(आलामुल वुरा पृष्ठ 182)

अल्लामा मोहम्मद रज़ा लिखते हैं कि जनाबे उम्मुल बनीन हुस्नो जमाल ज़ोहदो तक़वा में अपनी आप नज़ीर थीं।(जन्नातुल ख़ुलूद पृष्ठ 31)

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) अपने आबाओ अजदाद की तरह इमाम मन्सूस ‘‘मासूम’’ आलमें ज़माना और अफ़ज़ले काएनात थे। अल्लामा इब्ने हजर मक्की तहरीर फ़रमाते हैं कि आप तमाम लोगों में जलीलुल क़दर और अज़ीम उल मरतबत थे।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 122)

अल्लामा अब्दुरहमान जामी लिखते हैं कि आप की बातें पुर अज़ हिकमत और आपका अमल दरूस्त और आपका किरदार महफ़ूज़ अनल ख़ता था। आप इल्म हिकमत से भरपूर थे। रूए ज़मीन पर आपकी मिसाल व नज़ीर न थी।(शवाहेदुन नबूअत पृष्ठ 197 प्रकाशित लखनऊ 1904 ई 0)

अल्लामा अबीद उल्लाह लिखते हैं कि इब्राहीम बिन अब्बास का कहना है कि मैंने इन से बड़ा आलम देखा ही नहीं।( अरजहुल मतालिब पृष्ठ 255)

अल्लामा शहीर लिखते हैं कि आप अशरफ़ुल मख़लूके ज़माना थे।(हबीब अल सैर) आपको इल्मे माकान और मायकून आबाव अजदाद से विरासतन पहुँचा था।(वसीलतुन नजात पृष्ठ 377) आप हर ज़बान और हर लुग़त में फ़सीह और दाना तरीन मरदुम थे और जो शख़्स जिस ज़बान में बातें करता था उसको उसी ज़बान में जवाब देते थे।(रौज़तुल अहबाब) अल्लामा मोहम्मद बिन तल्हा शाफ़ेई लिखते हैं कि आप बारह इमामों में के तीसरे अली हैं। आपका ईमान हद से बढ़ा हुआ था। आपकी शान इन्तेहां को पहुँची हुई थी। आपका कसरे फ़ज़ीलत निहायत बलन्द था और आपके इमकानाते करम निहायत वसी थे। आपके मद्दगार बे शुमार और आपके शरफ़ व इमामत निहायत रौशन थे इसी वजह से ख़लीफ़ा ए वक़्त मामून रशीद ने आपको अपने दिल में जगह दी , अपनी हुकूमत में शरीक क़रार दिया। ख़लीफ़ा ए हुकूमत बनाया और अपनी लड़की की शादी आपके साथ कर दी। आपके मनाक़िब व सिफ़ात निहायत बलन्द , आपके मकारम और आपके इख़्लाक़ निहायत अज़ीम थे। बस मुख़्तसर यह कि सिफ़ाते हसना की जो मंज़िले थीं उनसे आपका दरजा बलन्द था।(मतालेबुल सूऊल पृष्ठ 252)

पादरी लेनेन एडवर्ड सील डी 0 डी 0 लिखता है कि इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) ने अली बिन मूसा (अ.स.) को अपना वारिस इस लिये क़रार दिया कि वह उनको सब से ज़्यादा मन्सूबे इमामत का अलह समझते थे।(अशना अशरया , पृष्ठ 46 प्रकाशित लाहौर 1925 ई 0)

हज़रत इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) फ़रमाते हैं कि मेरा यह फ़रज़न्द ‘‘ यतर मई फ़िल जाफ़र ला यनजू फ़ीहे इल्ला नबी अव वसी ’’ मेरे साथ जाफ़र जामए को देखता और उसे समझता है जिसे नबी और वसी के अलावा कोई देख नहीं सकता।(जन्नातुल ख़ुलूद पृष्ठ 31) रजाल कशी व दमए साकेबा पृष्ठ 35 व मसन्द इमाम रज़ा (अ.स.) के पृष्ठ 2 में है कि आप आलिम अहले ज़माना और कसीर उल सोम अल इबादत थे।

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की विलादत ब सआदत

उलेमा व मुवर्रेख़ीन का बयान है कि आप बा तारीख़ 11 ज़ीक़ादा 153 हिजरी यौमे पंज शम्बा बमक़ाम मदीना ए मुनव्वरा पैदा हुए हैं। (आलामुल वुरा , पृष्ठ 182 जिलाउल उयून पृष्ठ 280 रौज़तुल पृष्ठ जिल्द 3 पृष्ठ 13, अनवारूल नोमानिया पृष्ठ 127) आपकी विलादत के मुताअल्लिक़ अल्लामा मजलिसी और अल्लामा मोहम्मद पारसा तहरीर फ़रमाते हैं कि जनाबे उम्मुल बनीन का कहना है कि जब तक इमाम अली रज़ा (अ.स.) मेरे बत्न में रहे मुझे हमल की गरानियां क़तअन महसूस नहीं हुई। मैं ख़्वाब में अक्सर तसबीह व तहलील और तमजीद व तहमीद की आवाज़े सुना करती थी। जब इमाम रज़ा (अ.स.) पैदा हुए तो आपने ज़मीन पर तशरीफ़ लाते ही दोनों हाथ ज़मीन पर टेक दिये और अपना सरे मुबारक आसमान की तरफ़ बलन्द कर दिया। आपके होंठ जुम्बीश करने लगे। ऐसा मालूम होता था कि जैसे आप ख़ुदा से कुछ बातें कर रहे हैं। इसी असना में इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) तशरीफ़ लाये और मुझसे इरशाद फ़रमाया कि तुम्हे ख़ुदा वन्दे आलम की इनायत व करामत मुबारक हो। फिर मैंने मौलूदे मसूद को आपकी आग़ोश में दे दिया। आपने उसके दाहिने कान में अज़ान और बायें कान में अक़ामत कही। इसके बाद आपने इरशाद किया कि ‘‘ बग़ीर ईं रा कि बक़िया ख़ुदा अस्त दर ज़मीनो हुज्जत ख़ुदा अस्त बाद अज़ मन ’’ इसे ले लो यह ज़मीन पर ख़ुदा की निशानी है और मेरे बाद हुज्जते अल्लाह के फ़राएज़ का ज़िम्मेदार है।

इब्ने बाबविया फ़रमाते हैं कि आप दीगर आइम्मा (अ.स.) की तरह मख़्तून और नाफ़ बुरिदा (यानी ख़त्ना हुये और नाफ़ कटे हुये) पैदा हुये।(नस्ल अल ख़ताब जिलाउल उयून पृष्ठ 269)

नाम ,कुन्नियत , अल्क़ाब

आपके वालिदे माजिद हज़रत इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) ने लौहे महफ़ूज़ के मुताबिक़ और तइय्युने रसूल (स.अ.) के मुवाफ़िक़ आपको इस्मे अली से मौसूम फ़रमाया। आप आले मोहम्मद (स.अ.) में के तीसरे ‘‘ अली ’’ हैं। (आलामुल वुरा पृष्ठ 225 व मतालेबुल सूऊल पृष्ठ 282) आपकी कुन्नीयत ‘‘अबुल हसन’’ थी और आपके अलक़ाब साबिर , ज़की , वली , रज़ी , वसी थे। ‘‘ वशहरहा अल रज़ा ’’ और मशहूर तरीन लक़ब रज़ा था। (नूरूल अबसार पृष्ठ 128 व तज़किरा ए ख़वासुल उम्मता पृष्ठ 198)

लक़ब रज़ा की वजह

अल्लामा तबरेसी तहरीर फ़रमाते हैं कि आप को रज़ा इस लिये कहते हैं कि आसमानों ज़मीन में ख़ुदा वन्दे आलम , रसूले अकरम (स.अ.) और आइम्मा ए ताहेरीन (अ.स.) और तमाम मुख़ालेफ़ीन व मुवाफ़ेक़ीन आप से राज़ी थे। (आलमुल वुरा पृष्ठ 182)

अल्लामा मजलिसी तहरीर फ़रमाते हैं कि बज़नती ने हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) से लोगों की अफ़वाह का हवाला देते हुये कहा कि आपके वालिदे माजिद को लक़ब रज़ा मामून रशीद ने मुलक़्क़ब किया था। आपने फ़रमाया हरगिज़ नहीं। यह लक़ब ख़ुदा व रसूल (स.अ.) की ख़ुशनूदी का जलवा बरदार है और सच बात यह है कि आप से मुवाफ़िक़ व मुख़ा लिफ़ दोनों राज़ी और ख़ुशनूद थे।(जिलाउल उयून पृष्ठ 269 व रौज़तुल पृष्ठ जिल्द 3 पृष्ठ 12)

आपकी तरबियत

आपकी नशोनुमा और तरबियत अपने वालिदे बुज़ुर्गवार हज़रत इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) के ज़ेरे साया हुई और इसी मुक़द्दस माहौल में बचपना और जवानी की मुताअद्दिद मंज़िलें तय हुईं और 30 से 35 बरस की उम्र पूरी हुई। अगरचे आख़री चन्द साल इस मुद्दत के वह थे। जब इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) ईराक़ में क़ैदे ज़ुल्म की सख़्तियां बरदाश्त कर रहे थे , मगर उससे पहले 24 या 25 बरस आपको बराबर अपने पदरे बुज़ुर्गवार के साथ रहने का मौक़ा मिला।

बादशाहाने वक़्त

आपने अपनी ज़िन्दगी की पहली मंज़िल से ताबा अहदे वफ़ात बहुत से बादशाहों के दौर देखे। आप 153 ई 0 में अहदे मन्सूर दवानक़ी पैदा हुए। (तारीख़े ख़मीस) 158 हिजरी में मेहदी अब्बासी , 169 हिजरी में हादी अब्बासी , 170 हिजरी में हारून रशीद अब्बासी , 194 हिजरी में अमीन अब्बासी , 198 हिजरी में मामून रशीद अब्बासी अलत तरतीब ख़लीफ़ा ए वक़्त होते रहे।(इब्नुल वरदी , हबीब अल सियर , अबुल फ़िदा)

आपने हर एक का दौर बा चश्में खुद देखा और आप पदरे बुज़ुर्गवार नीज़ दीगर औलादे अली (अ.स.) व फ़ात्मा (स.अ.) के साथ जो कुछ होता रहा उसे आप मुलाहेज़ा फ़रमाते रहे यहां तक कि 230 हिजरी में आप दुनियां से रूख़सत हो गये और आपको ज़हर दे कर शहीद कर दिया।

जानशीनी

आपके पदरे बुज़ुर्गवार हज़रत इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) को मालूम था कि हुकूमते वक़्त जिसकी बाग डोर उस वक़्त हारून रशीद अब्बासी के हाथों में थी। आपको आज़ादी की सांस न लेने देगी और ऐसे हालात पेश आ जायेंगे कि आपकी उम्र के आखि़री हिस्से और दुनियां को छोड़ने के मौक़े पर दोस्ताने अहले बैत का आपसे मिलना या बाद के लिये रहनुमा का दरयाफ़्त करना गै़र मुमकिन हो जायेगा इस लिये आपने उन्हें आज़ादी के दिनों और सुकून के अवक़ात में जब कि आप मदीने में थे , पैरवाने अहले बैत को अपने बाद होने वाले इमाम से रूशेनास कराने की ज़रूरत महसूस फ़रमाई। चुनान्चे औलादे फ़ात्मा (स.अ.) में से 17 आदमी जो मुम्ताज़ हैसियत रखते थे उन्हें जमा फ़रमा कर अपने फ़रज़न्द हज़रत इमाम अली रज़ा (अ.स.) की वसी होने और जांनशीनी का ऐलान फ़रमा दिया और एक वसियत नामा तहरीरन भी मुकम्मल फ़रमा दिया जिस पर मदीने के मोअज़्जे़ज़ीन में से आठ आदमियों की गवाही लिखी गई। यह अहतेमाम दूसरे आइम्मा के यहां नज़र नहीं आया सिर्फ़ उन ख़ुसूसी हालात की बिना पर जिन से दूसरे आइम्मा अपनी वफ़ात के मौक़े पर दो चार नहीं होने वाले थे।

इमाम मूसाए काज़िम (अ.स.) की वफ़ात और इमाम रज़ा (अ.स.) के दौरे इमामत का आग़ाज़

183 हिजरी में हज़रत इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) ने क़ैद ख़ाना ए हारून रशीद में अपनी उम्र का एक बहुत बड़ा हिस्सा गुज़ार कर दरजा ए शहादत हासिल फ़रमाया। आपकी वफ़ात के वक़्त इमाम रज़ा (अ.स.) की उम्र मेरी तहक़ीक़ के मुताबिक़ तीस साल की थी। वालिदे बुज़ुर्गवार की शहादत के बाद इमामत की ज़िम्मेदारियां आपकी तरफ़ मुन्तक़िल हो गई। यह वह वक़्त था कि बग़दाद में हारून रशीद तख़्ते खि़लाफ़त पर मुतमक्किन था और बनी फ़ात्मा के लिये हालात बहुत ही ना साज़गार थे।

हारूनी फ़ौज और ख़ाना ए इमाम रज़ा (अ.स.)

हज़रत इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) के बाद दस बरस हारून रशीद का दौर रहा। यक़ीनन वह इमामे रज़ा (अ.स.) के वजूद को भी दुनियां में इसी तरह बरदाश्त नहीं कर सकता था जिसके तरह उसके पहले आपके वालिदे बुज़ुर्गवार का रहना उसने गवारा नहीं किया। मगर यह तो इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) के साथ जो तवील मुद्दत तक तशद्दुद और ज़ुल्म होता रहा और जिसके नतीजे में क़ैद खा़ने के ही अन्दर आप दुनिया से रूख़सत हो गये। इस से हुकूमते वक़्त की आम बदनामी हो गयी थी और या वाक़ेई ज़ालिम की बद सुलूक़ियों का एहसास और ज़मीर की तरफ़ से मलामत की कैफ़ियत थी जिसकी वजह से खुल्लम खुल्ला इमाम रज़ा (अ.स.) के खि़लाफ़ कोई कारवाई की थी लेकिन वक़्त से पहले उसने इमाम रज़ा (अ.स.) को सताने में कोई दक़ीक़ा अन्जाम नहीं दिया।

हज़रत के अहदे इमामत संभालते ही हारून रशीद ने आपका घर लुटवा दिया और औरतों के ज़ेवरात और अच्छे कपड़े तक उतरवा लिये थे।

तारीख़े इस्लाम मे है कि हारून रशीद ने इस हवाले और बहाने से कि मोहम्मद बिन जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने उसकी हुकूमत व खि़लाफ़त से इन्कार कर दिया है। एक अज़ीम फ़ौज ईसा जलोदी की मातहती में मदीना ए मुनव्वरा भेज कर हुक्म दिया कि अली व फ़ात्मा की तमाम औलाद को बिल्कुल ही तबाह व बरबाद कर दिया जाए , उनके घरों में आग लगा दी जाए , उनके सामान लूट लिये जायें और उन्हें इस दरजा मफ़लूज व मफ़लूक कर दिया जाऐ कि फिर उनमे किसी क़िस्म के हौसले के उभरने का सवाल ही पैदा न हो सके और मोहम्मद बिन जाफ़र को गिरफ़्तार कर के क़त्ल कर दिया जाय। ईसा जलोदी ने मदीने पहुँच कर तामीले हुक्म की कोशिश की और मुम्किन तरीक़े से बनी फ़ात्मा को तबाह व बरबाद किया। हज़रत मोहम्मद बिन जाफ़र (अ.स.) ने भर पूर मुक़ाबला किया लेकिन आखि़र में गिरफ़्तार हो कर हारून रशीद के पास पहुँचा दिये गये। ईसा जलूदी सादात किराम को लूट कर हज़रत इमाम अली रज़ा (अ.स.) के दौलत कदे पर पहुँचा और उसने ख़्वाहिश की कि वह हस्बे हुक्म हारून रशीद , ख़ाना ए इमाम में दाखि़ल हो कर अपने हाथों से औरतों के ज़ेवरात और कपड़े उतारे। इमाम (अ.स.) ने फ़रमाया यह नहीं हो सकता , मैं खुद तुम्हें सारा सामान दिये देता हूँ । पहले तो वह उस पर राज़ी न हुआ लेकिन बाद में कहने लगा कि अच्छा आप ही उतार लाइये। आप महल सरा में तशरीफ़ ले गये और आपने तमाम ज़ेवरात और सारे कपड़े एक सतर पोश चादर के अलावा ला कर दे दिये और उसी के साथ साथ असासुल बैत नक़दो जिन्स यहां तक कि बच्चों के कान के बुन्दे सब कुछ उसके हवाले कर दिया। वह मलऊन ज़ेवरात ले कर बग़दाद रवाना हो गया। यह वाक़िया आपके आगा़ज़े इमामत का है। अल्लामा मजलिसी बेहारूल अनवार में लिखते हैं कि मोहम्मद बिन जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के वाक़ए से इमाम अली रज़ा (अ.स.) को ताअल्लुक़ न था। वह अकसर अपना चचा मोहम्मद को ख़ामोशी की हिदायत और सब्र की तलक़ीन फ़रमाया करते थे। अबुल फ़र्ज असफ़हानी मुक़ातिल तालिबैन में लिखते हैं कि मोहम्मद बिन जाफ़र निहायत मुत्तक़ी और परहेज़गार शख़्स थे। किसी नासिबी ने दस्ती कुतबा लिख कर मदीने की दीवारों पर चस्पा कर दिया था जिसमें हज़रत अली (अ.स.) और जनाबे फ़ात्मा (स.अ.) के मुताअल्लिक़ ना साज़ अल्फ़ाज़ थे। यही आप के खु़रूज का सबब बना। आपकी बैअत लफ़्ज़े अमीरल मोमेनीन से की गई। आप जब नमाज़ को निकलते थे तो आपके साथ दो सौ सुलहा ब अत्तक़िया हुआ करते थे। अल्लामा शिब्लिन्जी लिखते हैं कि इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) की वफ़ात के बाद सफ़वान बिने यहिया ने इमाम अली रज़ा (अ.स.) से कहा कि मौला हम आपके बारे में हारून रशीद से बहुत ख़ाएफ़ हैं हमें डर है कि यह कहीं आपके साथ वही सुलूक न करे जो आपके वालिद के साथ कर चुका है। हज़रत ने इरशाद फ़रमाया कि यह तो अपनी सी करेगा लेकिन मुझ पर कामयाब न हो सकेगा चुनान्चे ऐसा ही हुआ और हालात ने उसे कुछ इस दरजा आखि़र में मजबूर कर दिया था कि वह कुछ भी न कर सका कि यहां तक कि जब ख़ालिद बिने यहिया बर मक्की ने उस से कहा कि इमामे रज़ा (अ.स.) अपने बाप की तरह अम्रे इमामत का ऐलान करते और अपने को इमामे ज़माना कहते हैं तो उसने जवाब दिया कि हम जो उनके साथ कर चुके हैं वही हमारे लिये काफ़ी है। अब तू चाहता है कि इन हम सब के सब को क़त्ल कर डालें अब मैं ऐसा नहीं करूँगा।

अल्लामा अली नक़ी लिखते हैं कि फिर भी हारून रशीद का अहलेबैते रसूल (स.अ.) से शदीद इख़्तिलाफ़ और सादात के साथ जो बरताव अब तक रहा था उसकी बिना आम तौर से अम्माले हुकूमत या आम अफ़राद भी जिन्हें हुकूमत को राज़ी रखने की ख़्वाहिश थी अहलेबैत के साथ कोई अच्छा रवय्या रखने पर तैय्यार नहीं सकते थे और न इमाम के पास लोग इस्तफ़ादा के लिये जा सकते थे न हज़रत को सच्चे इस्लामी अहकाम की इशाअत के मवाक़े हासिल थे।

हारून का आखि़री ज़माना अपने दोनों बेटों , अमीन और मामून की बाहिमी रक़ाबतों से बहुत बे लुत्फ़ी में गुज़रा , अमीन पहली बीवी से था जो ख़ानदान शाही से मन्सूर दुवानक़ी की पोती थी और इस लिये अरब सरदार सब उसके तरफ़दार थे और मामून एक अजमी कनीज़ के पेट से था और इस लिये दरबार का अजमी तबक़ा उस से मोहब्बत रखता था। दोनों की आपस की रस्सा कशी हारून के लिये सोहाने रूह बनी हुई थी , उसने अपने ख़्याल में उसका तसफ़िया ममलेकत की तक़सीम के साथ यूं कर दिया कि दारूल सलतनत बग़दाद और उसके चारों तरफ़ के अरबी हिस्से जैसे शाम , मिस्र , हिजाज़ , यमन वग़ैरह मोहम्मद अमीन के नाम किये और मशरिक़ी मुमालिक जैसे ईरान , ख़ुरासान , तुरकिस्तान वग़ैरह मामून के लिये मुक़र्रर किये मगर यह तसफ़ीया तो उस वक़्त कारगार हो सकता था जब दोनों फ़रीक़ ‘‘ जियो और जीने दो ’’ के उसूल पर अमल करते होते लेकिन जहां इक़्तेदार की हवस कारफ़रमा हो वहां बनी अब्बास में एक घर के अन्दर दो भाई अगर एक दूसरे के मददे मुक़ाबिल हांे तो क्यों न एक दूसरे के खि़लाफ़ जारहाना कारवाही करने पर तैयार नज़र आये और क्यों उन ताक़तों में बाहिमी तसादुम हो जब कि उनमें से कोई इस हमदर्दी और असार और ख़ल्क़े ख़ुदा की खै़र ख़्वाही का भी हामिल नहीं है। जिसे बनी फ़ात्मा अपने पेशे नज़र रख कर अपने वाक़ई हुकू़क़ से चश्म पोशी कर लिया करते थे। इसी का नतीजा था कि इधर हारून की आंख बन्द हुई और उधर भाईयों में ख़ाना जंगी के शोले भड़क उठे। आखि़र चार बरस की मुसलसल कशमकश और तवील ख़ूं रेज़ी बाद मामून को कामयाबी हुई और उसका भाई अमीन मोहर्रम सन् 198 हिजरी में तलवार के घाट उतार दिया गया और मामून की खि़लाफ़त तमाम बनी अब्बास के हुदूदे सलतनत पर क़ायम हो गयी।

यह सच है कि हारून रशीद के अय्यामे सलतनत में आप की इमामत के दस साल गुज़ारे इस ज़माने मे ईसा जलूदी ताख़्त के बाद फिर उसने आपके मुआमलात की तरफ़ बिल्कुल सुकूत और ख़ामोशी इख़्तियार कर ली उसकी दो वजहे मालूम होती हैं। अव्वल तो यह कि इस दस साला ज़िन्दगी के इब्तिदाई अय्याम में वह आले बरामका के इस्तीसाल राफ़ि बिने लैस इब्ने तयार के ग़द्र और फ़साद के इन्सिदाद में जो समर कन्द के इलाक़े से नमूदार हो कर मा वराउन नहर और हुदूदे अरब तक फैल चुका था ऐसा हमा वक़्त और हमादम उलझा कि फिर उसको इन उमूर की तरफ़ तवज्जोह करने की ज़रा भी फ़ुरसत न मिली। दूसरे यह कि अपनी दस साला मुद्दत के आखि़री अय्याम में यह अपने बेटों में मुल्क तक़सीम कर देने के बाद खुद ऐसा कमज़ोर और मजबूर हो गया था कि कोई काम अपने इख़्तियार से नहीं कर सकता था। नाम का बादशाह बना बैठा हुआ अपनी ज़िन्दगी के दिन निहायत उसरत और तंगी की हालतों में काट रहा था। उसके सबूत के लिये वाक़िया ज़ैल मुलाहेज़ा फ़रमायें। सबाह तिबरी का बयान है कि हारून जब ख़ुरासान जाने लगा तो मैं नहरवान तक उसकी मुशायत को गया रास्ते में उसने बयान किया कि ऐ सबाह तुम अब इसके बाद फिर मुझे ज़िन्दा न पाओगे। मैंने कहा अमीरल मोमेनीन ऐसा ख़्याल न करें आप इन्शाअल्लाह सही ओ सालिम इस सफ़र से वापिस आयेंगे। यह सुन कर उसने कहा कि शायद तुझको मेरा हाल मालूम नहीं है। आ मैं दिखा दूं फिर मुझे रास्ता काट कर एक सिम्त दरख़्त के नीचे ले गया और वहां से अपने ख़वासों को हटा कर अपने बदन का कपड़ा उठा कर मुझे दिखाया , तो एक परचाए रेशम शिकम पर लपेटा हुआ था और उससे सारा बदन कसा हुआ था। यह दिखा कर मुझ से कहा कि मैं मुद्दत से बीमार हूँ तमाम बदन में दर्द उठता है मगर किसी से अपना हाल कह नहीं सकता तुम्हारे पास भी यह राज़ अमानत रहे। मेरे बेटों में से हर एक का गुमाशता मेरे ऊपर मुक़र्रर है। मामून की तरफ़ से मसरूर , अमीन की जानिब से बख़तीशू। यह लोग मेरी सांस तक गिनते रहते हैं और उन्हें चाहते हैं कि मैं एक रोज़ भी ज़िन्दा रहूं अगर तुम को यक़ीन न हो तो देखो मैं तुम्हारे सामने घोड़ा सवार होने को मांगता हूँ , ऐसा टट्टू मेरे लिये लायेंगे जिस पर सवार हो कर मैं और ज़्यादा बिमार हो जाऊँ। यह कह कर घोड़ा तलब किया। वाक़ई ऐसा लाग़र अड़यल टट्टू हाज़िर किया। उस पर हारून बे चूं चरां सवार हो गया और मुझको वहां से रूख़सत कर के जरजान का रास्ता पकड़ लिया।

बहरहाल हारूर रशीद की यही मजबूरीयां थीं जिन्होंने उसको हज़रत इमाम अली रज़ा (अ.स.) के मुख़ालिफ़ाना उमूर की तरफ़ मुतवज्जेह नहीं होने दिया वरना उसे फ़ुरसत होती और वह अपनी क़दीम जी़ इख़्तियारी की हालतों पर क़ायम रहता तो इस सिलसिले की ग़ारत गरी व बरबादी को कभी भूलने वाला नहीं था मगर उस वक़्त क्या कर सकता था अपने ही दस्तो पा अपने ही इख़्तेयार में नहीं थे। बहरहाल हारून रशीद इसी ज़ीकुन नफ़्स मजबूरी नादारी और बेइख़्तेयारी की ग़ैर मुतहमिल मुसीबतों में ख़ुरासान पहुँच कर शुरू 193 हि. में मर गया।

इन दोनों भाइयों अमीन और मामून के मुतअल्लिक़ मुवर्रिख़ीन का कहना है कि मामून तो फिर भी सूझ बूझ और अच्छे कैरेक्टर का आदमी था लेकिन अमीन अय्याश , ला उबाली और कमज़ोर तबीयत का था। सलतनत के तमाम हिस्सों में बाज़ीगर , मसख़रे और नुजूमी जोतिशी बुलवाये। निहायत ख़ूबसूरत तवाएफ़ और निहायत कामिल गाने वालियों और ख़्वाजा सराओं को बड़ी बड़ी रक़में ख़र्च करके और नाटक की एक महफ़िल मिस्ल इन्द्र सभ के तरतीब दी। यह थियेटर अपने ज़र्क़ बर्क़ सामानों से परियों का अख़ाड़ा मालूम होता था। स्यूती ने इब्ने जरीर से नक़्ल किया है कि अमीन अपनी बीबियों को छोड़ कर ख़स्सियों से लवात करता था।(तारीख़े इस्लाम जिल्द 1 पृष्ठ 60)

इमाम अली रज़ा (अ.स.) का हज और हारून रशीद अब्बासी

ज़माना ए हारून रशीद में हज़रत इमामे अली रज़ा (अ.स.) हज के लिये मक्के मुअज़्ज़मा तशरीफ़ ले गये। उसी साल हारून रशीद भी हज के लिये आया हुआ था। ख़ाना ए काबा में दाखि़ले के बाद इमाम अली रज़ा (अ.स.) एक दरवाज़े से और हारून रशीद दूसरे दरवाज़े से निकले । इमाम (अ.स.) ने फ़रमाया कि यह दूसरे दरवाज़े से निकलने वाला जो हम से दूर जा रहा है , अनक़रीब तूस में दोनों एक जगह होंगे। एक रिवायत में है कि यहया बिने ख़ालिद बर मक्की को इमाम (अ.स.) ने मक्के में देखा कि वह रूमाल से गर्द की वजह से मुहं बन्द किये हुए जा रहा है। आप ने फ़रमाया कि उसे पता भी नहीं कि उसके साथ इमसाल क्या होने वाला है। यह अनक़रीब तबाही की मन्ज़िल में पहुँचा दिया जायेगा। चुनान्चे ऐसा ही हुआ।

रावी मुसाफ़िर का बयान है कि हज के मौक़े पर इमाम (अ.स.) ने हारून रशीद को देख कर अपने दोनों हाथों की अंगुलियां मिलाते हुए फ़रमाया कि मैं और यह इसी तरह एक हो जायेंगे। वह कहता है कि मैंने इस इरशाद का मतलब उस वक़्त समझा जब आपकी शहादत वाक़े हुई और दोनों एक मक़बरे में दफ़्न हुए। मूसा बिने इमरान का कहना है कि इसी साल हारून रशीद मदीने मुनव्वरा पहुँचा और इमाम (अ.स.) ने उसे खुत्बा देते हुए देख कर फ़रमाया कि अनक़रीब मैं और हारून एक ही मक़बरे में दफ़्न किये जायेंगे।(नूरूल अबसार पृष्ठ 144)

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) का मुजद्दिदे मज़हबे इमामिया होना

अहादीस में हर सौ साल के बाद एक मुजद्दे इस्लाम के नुमूदो शुहूद का निशान मिलता है। यह ज़ाहिर है कि जो इस्लाम का मुजद्द होगा उसके तमाम मानने वाले उसी के मसलक पर गामज़न और उसी के उसूलो फ़ुरू के सराहने वाले होंगे और मुजद्द को जो बुनियादी मज़हब होगा उसके मानने वालों का भी वही मज़हब होगा। हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) जो क़तई तौर पर फ़रज़न्दे रसूले इस्लाम (स.अ.) थे वह उसी मसलक पर गामज़न थे। जिस मसलक की बुनियाद पैग़म्बरे इस्लाम और अली (अ.स.) ख़ैरूल अनाम का वुजूद ज़ी जूद था। यह मुसल्लेमात से है कि आले मोहम्मद (अ.स.) पैग़म्बर (अ.स.) के नक़्शे क़दम पर चलते थे और उन्हीं के ख़ुदाई मन्शा और बुनियादी मक़सद की तबलीग़ फ़रमाया करते थे यानी आले मोहम्मद (अ.स.) का मसलक वही था जो मोहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.) का मसलक था। अल्लामा इब्ने असीर जज़री अपनी किताब जामिउल उसूल में लिखते हैं कि हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) तीसरी सदी हिजरी में और सुक़्क़तुल इस्लाम अल्लामा क़ुलैनी चैथी सदी हिजरी में मज़हबे इमामिया के मुजद्दे थे। अल्लामा क़ौनवी और मुल्ला मुबीन ने उसी को दूसरी सदी के हवाले से तहरीर फ़रमाया है।(वसीलतुन निजात पृष्ठ 376 व शरह जामे सग़ीर)

मुहद्दिस देहलवी शाह अब्दुल अज़ीज़ इब्ने असीर का कौल नक़ल करते हुए लिखते हैं कि इब्ने असीर जज़री साहबे जामिउल उसूल के हज़रत इमामे अली बिने मूसा रिज़ा (अ.स.) मुजद्दे मज़हबे इमामिया दरक़रन सालिस गुफ़्ता अस्त। इब्ने असीर जज़री साहबे जामिउल उसूल ने हज़रत इमामे रज़ा (अ.स.) को तीसरी सदी में मज़हबे इमामिया का मुजद्द होना ज़ाहिरो वाज़िह फ़रमाया है। (तोहफ़ा ए असना अशरया कीद 85 पृष्ठ 83) बाज़ उलेमाए अहले सुन्नत ने आप को दूसरी सदी का और बाज़ ने तीसरी सदी का मुजद्द बतलाया है। मेरे नज़दीक दोनों दुरूस्त हैं क्यों कि दूसरी सदी में इमामे रज़ा (अ.स.) की विलादत और तीसरी सदी के आग़ाज़ में आपकी शहादत हुई है।

हज़रत इमामे अली रज़ा (अ.स.) के अख़्लाक़ व आदात और शमाएल व ख़साएल

आपके इख़्लाक़ो आदात और शमाएल ओ ख़साएल का लिखना इस लिये दुश्वार है कि वह बेशुमार हैं। ‘‘ मुश्ते नमूना अज़ ख़ुरदारे ’’ यह है बहवाले अल्लामा शिबलिन्जी इब्राहीम बिने अब्बास तहरीर फ़रमाते हैं कि हज़रत इमामे अली रज़ा (अ.स.) ने कभी किसी शख़्स के साथ गुफ़्तुगू करने में सख़्ती नहीं की और किसी बात को क़ता नहीं फ़रमाया। आपके मकारिमो आदात से था कि जब बात करने वाला अपनी बात ख़त्म कर लेता तब अपनी तरफ़ से आग़ाज़े कलाम फ़रमाते। किसी की हाजत रवाई और काम निकालने में हत्तल मक़दूर दरेग़ न फ़रमाते। कभी अपने हमनशीं के सामने पांव फ़ैला कर न बैठते और न अहले महफ़िल के रू ब रू तकिया लगा कर बैठते थे। कभी अपने ग़ुलामों को गाली न दी और चीज़ों का क्या ज़िक्र। मैंने कभी आपको थूकते और नाक साफ़ करते नहीं देखा। आप क़ह क़हा लगा कर हरगिज़ नहीं हंसते थे। ख़न्दा ज़नी के मौक़े पर आप तबस्सुम फ़रमाया करते थे। मुहासिने इख़्लाक़ और तवाज़ो व इन्केसारी की यह हालत थी कि दस्तरख़्वान पर साइस और दरबान तक को अपने साथ बिठा लेते । रातों को बहुत कम सोते और अक्सर रातों को शाम से सुबह तक शब्बेदारी करते थे और अक्सर औक़ात रोज़े से होते थे मगर तो आपसे कभी क़ज़ा नहीं हुए। इरशाद फ़रमाते थे कि हर माह में कम अज़ कम तीन रोज़े रख लेना ऐसा है जैसे कोई हमेशा रोज़े से रहे। आप कसरत से ख़ैरात किया करते थे और अकसर रात के तारीक परदे में इस इसतिहबाब को अदा फ़रमाया करते थे। मौसमे गर्मा में आपका फ़र्श जिस पर आप बैठ कर फ़तवा देते या मसाएल बयान किया करते बोरिया होता था और सरमा में कम्बल आपका यही तर्ज़े उस वक्त़ भी रहा जब आप वली अहदी हुकूमत थे। आपका लिबास घर में मोटा और ख़शन होता था और रफ़ए तान के लिये बाहर आप अच्छा लिबास पहनते थे। एक मरतबा किसी ने आप से कहा हुज़ूर इतना उम्दा लिबास क्यों इस्तेमाल फ़रमाते हैं ? आपने अन्दर का पैराहन दिखा कर फ़रमाया अच्छा लिबास दुनिया वालों के लिये और कम्बल का पैराहन ख़ुदा के लिये है। अल्लामा मौसूफ़ तहरीर फ़रमाते हैं कि एक मरतबा आप हम्माम में तशरीफ़ रखते थे कि एक शख़्स जुन्दी नामी आ गया और उसने भी नहाना शुरू किया। दौराने ग़ुस्ल में उसने इमामे रज़ा (अ.स.) से कहा कि मेरे जिस्म पर पानी डालिये आपने पानी डालना शुरू किया। इतने में एक शख़्स ने कहा ऐ जुन्दी ! फ़रज़न्दे रसूल (स.अ.) से खि़दमत ले रहा है , अरे यह इमामे रज़ा (अ.स.) हैं। यह सुनना था कि वह पैरों पर गिर पड़ा और माफ़ी मांगने लगा।(नूरूल अबसार पृष्ठ 38 व पृष्ठ 39)

एक मर्दे बलख़ी नाक़िल है कि मैं हज़रत के साथ एक सफ़र में था एक मक़ाम पर दस्तरख़्वान बिछा तो आपने तमाम ग़ुलामों को जिनमे हब्शी भी शामील थे , बुला कर बिठा लिया मैंने अर्ज़ किया मौला इन्हें अलाहिदा बिठाये तो क्या हर्ज़ है आपने फ़रमाया कि सब का रब एक है और मां बाप आदम ओ हव्वा भी एक हैं और जज़ा और सज़ा आमाल पर मौसूफ़ है , तो फिर तफ़रीक़ क्या। आपके एक ख़ादिम यासिर का कहना है कि आपका यह ताकीदी हुक्म था कि मेरे आने पर कोई ख़ादिम खाना खाने की हालत में मेरी ताज़ीम को न उठे। मुअम्मर बिने ख़लाद का बयान है कि जब भी दस्रख़्वान बिछता आप हर खाने में से एक एक लुक़मा निकाल लेते थे और उसे मिसकीनों और यतीमों को भेज दिया करते थे। शेख़ सुदूक़ तहरीर फ़रमाते हैं कि आपने एक सवाल का जवाब देते हुए फ़रमाया कि बुज़ुर्गी तक़वा से है जो मुसझे ज़्यादा मुत्तक़ी है वह मुझ से बेहतर है। एक शख़्स ने आपसे दरख़्वास्त की कि आप मुझे अपनी हैसियत के मुताबिक़ कुछ माल दुनियां से दीजिए। आपने फ़रमाया यह मुश्किल है। फिर उसने अर्ज़ की अच्छा मेरी हैसियत के मुताबिक़ इनायत कीजिये , फ़रमाया यह मुम्किन है। चुनान्चे आप ने उसे दो सौ अशरफ़ी इनायत फ़रमा दी। एक मरतबा नवीं ज़िलहिज्जा यौमे अर्फ़ा आपने राहे खु़दा में सारा घर लुटा दिया। यह देख कर फ़ज़्ल बिने सुहैल वज़ीरे मामून ने कहा , हज़रत यह तो ग़रामत यानी अपने आप को नुक़सान पहुँचाना है। आपने फ़रमाया यह ग़रामत नहीं ग़नीमत है मैं इसके इवज़ में खु़दा से नेकी और हसना लूंगा। आपके ख़ादिम यासिर का बयान है कि हम एक दिन मेवा खा रहे थे और खाने में ऐसा करते थे कि एक फल से कुछ खाते और कुछ फेंक देते थे हमारे इस अमल को आपने देख लिया और फ़रमाया नेमते ख़ुदा को ज़ाया न करो , ठीक से खाओ और जो बच जाए उसे किसी मोहताज को दे दो। आप फ़रमाया करते थे कि मज़दूर की मज़दूरी पहले तै करना चाहिये क्यों कि चुकाई हुई उजरत से ज़्यादा जो कुछ दिया जायेगा पाने वाला उसको इनाम समझेगा।

सूली का बयान है कि आप अक्सर ऊदे हिन्दी का बुख़ूर करते और मुश्क व गुलाब का पानी इस्तेमाल करते थे। इत्रयात का आपको बड़ा शौक़ था। नमाज़े सुबह अव्वल वक़्त पढ़ते उसके बाद सजदे में चले जाते थे और निहायत तूल देते थे फिर लोगों को नसीहत फ़रमाते।

सुलेमान बिन जाफ़र का कहना है कि आप अपने आबाओ अजदाद की तरह ख़ुरमें को बहुत पसन्द फ़रमाते थे। आप शबो रोज़ में एक हज़ार रकत नमाज़ पढ़ते थे। जब भी आप बिस्तर पर लेटते थे तो जब तक सो न जाते क़ुरआने मजीद के सूरे पढ़ा करते थे।

मूसा बिन सयार का बयान है कि आप अकसर अपने शियों की मय्यत में शिरकत फ़रमाते थे और कहा करते थे कि हर रोज़ शाम के वक़्त इमामे वक़्त के सामने आमाल पेश होते हैं , अगर कोई शिया गुनाहगार होता है तो इमाम उसके लिये असतग़फ़ार करते हैं।

अल्लामा तबरसी लिखते हैं कि आपके सामने जब भी कोई आता था आप पहचान लेते थे कि मोमिन है या मुनाफ़िक़। (आलामुल वुरा तोफ़ाए रिज़विया , कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 122)

अल्लामा मोहम्मद रज़ा लिखते हैं कि आप हर सवाल का जवाब क़ुराने मजीद से देते थे और रोज़आना एक क़ुरआन ख़त्म करते थे।(जन्नातुल ख़ुलूद पृष्ठ 31)

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) के बाज़ करामात

आपके क़ौलो फ़ेल से बेइन्तेहा करामत का ज़हूर हुआ है जिनमें से कुछ इस जगह लिखे जाते हैं अल्लामा मोमिन शिब्लन्जी रक़म तराज़ हैं।

1.एक दिन हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) ने अमीन और मामून पर नज़र डालते हुए फ़रमाया कि अन्क़रीब अमीन को मामून क़त्ल कर देगा , चुनान्चे ऐसा ही हुआ और अमीन अब्बासी 23 मोहर्रम 198 हिजरी को 4 साल 8 माह सलतनत करने के बाद मामून रशीद के हाथों क़त्ल हुआ।(तारीख़े इस्लाम जिल्द 1 पृष्ठ 20 व नूरूल अबसार)

2. हुसैन बिन मूसा का बयान है कि हम लोग एक मक़ाम पर बैठे हुए बातें कर रहे थे कि इतने में जाफ़र बिन उमर अल अलवी का गुज़र हुआ इसकी शक्ल व शबाहत और हैसीयत व हालत देख कर आपस में बातें करने लगे। हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) ने फ़रमाया अन्क़रीब दौलत मन्द और रईस हो जायेगा और इसकी हालत यकसर तबदील हो जायेगी। चुनान्चे ऐसा ही हुआ और वह एक माह के अन्दर मदीने का गर्वनर हुआ।

3. जाफ़र बिन सालेह से आपने फ़रमाया तेरी बीवी को दो जुड़वाँ बच्चे होगें। एक का नाम अली और दूसरे का नाम उम्मे उमर रखना। जब इसके यहां विलादत हुई तो ऐसा ही हुआ। जाफ़र बिन सालेह ने अपनी माँ से कहा , इमाम अली रज़ा (अ.स.) ने यह उम्मे उमर क्या नाम तजवीज़ फ़रमाया है ? इसने कहा तेरी दादी का नाम उम्मे उमर था हज़रत ने इसी के नाम पर मौसूम फ़रमाया है।

4. आपने एक शख़्स की तरफ़ देख कर फ़रमाया उसे मेरे पास बुला लाओ। जब वह लाया गया तो आपना फ़रमाया कि तू वसीयत कर ले अमरे हतमी के लिये तैयार हो जा ‘‘फ़मात अर जअल बादा सलासता अय्याम ’’ इसे फ़रमाने के तीन दिन बाद उस शख़्स का इन्तेक़ाल हो गया।(नूरूल अबसार पृष्ठ 139)

5. अल्लामा अब्दुर्रहमान रक़म तराज़ हैं कि एक शख़्स ख़ुरासान के इरादे से निकला , उसे उसकी लड़की ने एक हाला दिया कि फ़रोख़्त कर के फ़ीरोज़ा लेते आना। वह कहता है कि जब मैं मक़ाम मर्द में पहुँचा तो इमाम रज़ा (अ.स.) के एक ख़ादिम ने मुझ से कहा कि एक दोस्त दार अहले बैत का इन्तेक़ाल हो गया है इसके कफ़न की ज़रूरत है तू अपना हाला मेरे हाथ फ़रोख़्त कर दे ताकि मैं उसे इसके कफ़न के लिये इस्तेमाल करूँ। इस मर्दे कूफ़ी ने कहा कि मेरे पास कोई हाला बराए फ़रोख़्त नहीं है। ख़ादिम ने इमाम रज़ा (अ.स.) से वाक़ेया बयान किया। इस से जा कर मेरा सलाम कह दे और उसे मेरा पैग़ाम पहुँचा कर कह तेरी लड़की ने जो हाला बराए ख़रीद फ़ीरोज़ा दिया है वह फ़रोख़्त कर दे। उसने बड़ा ताज्जुब किया और हाला निकाल कर उसके हाथ में फ़रोख़्त कर डाला। उस कूफ़ी का बयान है कि मैंने यह सोच कर की वह बड़े बा कमाल हैं इन से चन्द सवालात करना चाहा और इसी इरादे से इनके मकान पर गया लेकिन इतना इज़देहाम था कि दरे दौलत तक न पहुँच सका। दूर खड़ा सोच ही रहा था कि एक ग़ुलामने एक पर्चा ला कर दे दिया और कहा कि इमाम रजा़ (अ.स.) ने यह पर्चा इनायत फ़रमाते हुए कहा है कि तेरे सवाल के जवाबात इस में मरक़ूम हैं। ( चून निगाही करदम जवाबे मसाएले मन बूदे ) जब मैंने उसे देखा तो वाक़िएन मेरे सवालात के जवाबात थे।

6. रियान बिन सलत का बयान है कि मैं हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की खि़दमत में हाज़िर हुआ। मेरे दिल मे यह था कि मैं हज़रत से अपने लिये जामे और उनसे वह दिरहम मागूँगा जिस पर आपका इस्म गिरामी कन्दा होगा। मेरे हाज़िर होते ही आपने अपने गु़लाम से फ़रमाया कि यह जामे और सिक्का चाहते हैं इन्हें दो जामे और मेरे नाम के तीस सिक्के दे दो।

7. एक ताजिर को किरमान के रास्ते में डाकुओ ने पकड़ कर उसके मुहँ में इस दरजा बरफ़ भर दी कि उसकी ज़बान और उसका जबड़ा बेकार हो गया। उसने बहुत इलाज किया लेकिन कोई फ़ायदा न हुआ। एक दिन उसने सोचा कि मुझे इमाम रजा़ (अ.स.) की खि़दमत में हाज़िर हो कर इलाज की दरख़्वास्त करनी चाहिये। यह सोच कर वह रात में सो गया , ख़्वाब में देखा कि मैं इमाम रज़ा (अ.स.) की खि़दमत में हाज़िर हूँ। उन्होंने फ़रमाया कि कमूनी सआतर और नमक को पानी में भिगो कर तीन चार बार ग़रारा करो , इन्शा अल्लाह शिफ़ा हो जायेगी। जब मैं ख़्वाब से बेदार हो कर हाज़िरे खि़दमत हुआ तो हज़रत ने फ़रमाया तुम्हारा वही इलाज है जो मैंने तुम को ख़्वाब मे बतलाया है। वह कहता है कि मैंने अपना ख़्वाब उन से बयान नहीं किया था इसके बा वजूद आपने वही जवाब दिया।

अल्लामा अरबली लिखते हैं कि हज़रत जो दवा बताई थी उसके अज्जा़ यह हैं।1. ज़ीरा किरमानी 2. सआतर नमक (कशफ़ल ग़म्मा पृष्ठ 112)

8. अबु इस्माईल सिन्धी का बयान है कि मैं हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की खि़दमत में हाज़िर हो कर अर्ज़ परदाज़ हुआ कि मौला मुझे अरबी ज़बान नहीं आती। आपने उसके लबों पर दस्ते मुबारक फेर कर उसे अरबी में गोया बना दिया।

9. एक हाजी ने आप से बहुत से सवाल किये , आपने सबका जवाब दे कर फ़रमाया कि वह सवाल तुम ने नहीं किया जो एहराम के लिबास से मुताअल्लिक़ था जिसमें तुम्हे शक है। उसने कहा हां मौला उसे भूल गया था। आपने फ़रमाय उस मख़सूस लिबास में एहराम दुरूस्त है।

10. आपने ख़ाके ज़मीन सूँघ कर अपनी क़ब्र की जगह बता दी।

11. एक शख़्स मोतमिद का बयान है कि मैं हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) के पास खड़ा था कि चिड़ियों का एक झुंड इमाम (अ.स.) के पास आके चीख़ने लगा। इमाम (अ.स.) ने मुझसे कहा जानते हो यह क्या कहता है। मैंने कहा कि खु़दा और रसूल (स.अ.) और फ़रज़न्दे रसूल (स.अ.) ही इसे जान सकते हैं। आपने फ़रमाया इस झुंड का कहना यह है कि एक सांप आया हुआ है और वह मेरे बच्चों को खाना चाहता है। तुम जाओ और उसे तलाश कर के मार डालो। चुनान्चे मैं उस मक़ाम पर गया और सांप को मार डाला।(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 199 से 201)

12. अल्लामा मोहम्मद रज़ा लिखते हैं कि एक मरतबा क़हत पड़ा , आपने दुआ की , एक अब्र नमूदार हुआ , लोग ख़ुश हो गये लेकिन आपने फ़रमाया कि यह टुकड़ा अब्र का फ़लां मक़ाम के लिये है। इसी तरह कई बार हुआ। आखि़र में आपने एक अब्र के टुकड़े के नमूदार होने पर फ़रमाया कि यह यहां बरसेगा। चुनान्चे ऐसा ही हुआ।(जन्नातुल ख़ुलूद पृष्ठ 31, उयून अख़्बारे रज़ा पृष्ठ 214)

13. अल्लामा तबरेसी तहरीर फ़रमाते हैं कि एक रोज़ आप अपनी ज़मींदारी पर तशरीफ़ ले गये। जाते वक़्त फ़रमाया कि मेरे हमराही को चाहिये कि बारिश का सामान ले ले। हसन बिन मूसा ने कहा कि हुज़ूर सख़्त गरमी है बारिश के तो आसार नहीं हैं। फ़रमाया बारिश ज़रूर होगी। चुनान्चे वहां पहुँचने के बाद ही बारिश का नुज़ूल शुरू हो गया और ख़ूब पानी बरसा।(आलामुल वुरा पृष्ठ 189)

हज़रत रसूले खु़दा (स.अ.) और जनाबे अली रज़ा (अ.स.) वाक़ए तमर सीहानी

14. अल्लामा इब्ने हजर मक्की , अल्लामा शिब्लन्जी , अल्लामा अब्दुल्लाह रक़म तराज़ हैं कि मोहम्मद बिन हबीब का बयान है कि मैंने ख़्वाब में हज़रत रसूल खुदा (स.अ.) को अपने शहर की उस मस्जिद में देखा जिसमें हाजी उतरते और नमाज़ वग़ैरा पढ़ा करते थे। मैंने हज़रत को सलाम किया और हज़रत के पास तबक़ देखा जिसमें निहायत उम्दा खजूरें रखी हुई थीं। मेरे सलाम पर हज़रत ने अट्ठारा दाने इस खजूर के मरहमत फ़रमाये। मैं इस ख़्वाब से बेदार हुआ तो समझा कि अब सिर्फ़ अट्ठराहा साल ज़िन्दा रहूँगा। इस ख़्वाब के बीस दिन के बाद हज़रत इमाम अली रज़ा (अ.स.) मदीने से तशरीफ़ लाये और इसी मस्जिद में उतरे जिसमें हज़रत रसूल (स.अ.) को मैंने ख़्वाब में देखा था। हज़रत के सामने एक तबक़ में देसी खजूरें रखी थीं। लोग हज़रत को सलाम करने के लिये दौड़े , मैं भी गया तो देखा कि हज़रत उसी जगह तशरीफ़ फ़रमा हैं जहां मैंने ख़्वाब में रसूले ख़ुदा (स.अ.) को तशरीफ़ फ़रमा देखा था। मैंने सलाम किया तो हज़रत ने जवाब दिया और अपने क़रीब बुला कर एक मुठ्ठी इस तबक़ की खजूरें मरहमत फ़रर्माईं मैंने गिनी तो वह भी अट्ठारा थीं। इसी क़द्र जितनी रसूले ख़ुदा (स.अ.) ने मुझे ख़्वाब मे दी थीं। मैंने अर्ज़ कि हुज़ूर और कुछ मरहमत हों तो फ़रमायें। आपने फ़रमाया ‘‘ लौ ज़ादेका रसूल अल्लाह लज़्दे नाक ’’ कि अगर रसूले ख़ुदा (स.अ.) तुम को ख़्वाब में इससे ज़्यादा दिये होते तो मैं भी ज़्यादा देता।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 122, नूरूल अबसार पृष्ठ 144, अरजहुल मतालिब पृष्ठ 454)


हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) का इल्मी कमाल

मुवर्रेख़ीन का बयान है कि आले मोहम्मद (स.अ.) के इस सिलसिले में हर फ़र्द हज़रते अहदियत की तरफ़ से बलन्द तरीन इल्म के दरजे पर क़रार दिया गया था जिसे दोस्त और दुश्मन सब को मानना पड़ता था। यह और बात है कि किसी को इल्मी फ़यूज़ फैलाने का ज़माने ने कम मौक़ा दिया और किसी को ज़्यादा। चुनान्चे इन हज़रात में से इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के बाद अगर किसी को सब से ज़्यादा मौक़ा हासिल हुआ तो वह हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) हैं। जब आप इमामत के मन्सब पर नहीं पहुँचे थे उस वक़्त हज़रत इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) अपने तमाम फ़रज़न्दों और ख़ानदान के लोगों को नसीहत फ़रमाते थे कि तुम्हारे भाई अली रज़ा आलिमे आले मोहम्मद है। अपने दीनी मसाएल को इन से दरयाफ़्त कर लिया करो और जो कुछ कहें उसे याद रखो और फिर हज़रत इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) की वफ़ात के बाद जब आप मदीने में थे और रौज़ा ए रसूल (स.अ.) पर तशरीफ़ फ़रमा थे तो उल्माए इस्लाम मुश्किल मसाएल में आपकी तरफ़ रूजू करते थे।

मोहम्मद बिन ईसा यक़तैनी का बयान है कि मैंने इन तहरीरी मसाएल जो हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) से पूछने गये थे और आपने इनका जवाब तहरीर फ़रमाया। इकट्ठा किया तो अठ्ठारा हज़ार की तादाद में थे। साहबे लुमतुल रज़ा तहरीर करते हैं कि हज़राते आइम्मा ए ताहेरीन (अ.स.) के ख़ुसूसियात में यह अमर तमाम तारीख़ी मुशाहिद और नीज़ हदीस व सैर के असानीद से साबित है। बावजूद एक अहले दुनियां को आप हज़रात की तक़लीद और मुताबेअत फ़ील अहकाम का बहुत कम शरफ़ हासिल था मगर बई हमा तमाम ज़माना व हर ख़वेश व बेगाना आप हज़रात को तमाम उलूमे इलाही और इसरारे इलाही का गन्जीना समझता था और मोहद्दे सीन व मुफ़स्सेरीन और तमाम उलमा फ़ज़लन आपके मुक़ाबले का दावा रखते थे। वह भी इल्मी मुबाहस व मजालिस में आँ हज़रत के आगे ज़ानुए अदब तै करते थे और इल्मी मसाएल को हल करने की ज़रूरतों के वक़्त हज़रत अमीरल मोमेनीन (अ.स.) से ले कर इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) तक इस्तफ़ादे किए वह सब किताबों में मौजूद हैं।

जाबिर बिन अब्दुल्लाह अन्सारी और हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़र (अ.स.) की खि़दमत में समअ हदीस के वाक़ेआत तमाम हदीस की किताब में महफ़ूज़ हैं। इसी तरह अबुल तुफ़ैल अमिरी और सईद बिन जैर आख़्री सहाबा की तफ़सीली हालात जो उन बुज़ुर्गों के हाल में पाए जाते हैं वह सैरो तवारीख़ में मज़कूर व मशहूर हैं सहाबा के बाद ताबईन और तबेए ताबईन और उन लोगों की फ़ैज़याबी की भी यही हालत है।

शअबी , ज़हरी इब्ने क़तीबह , सुफ़यान , सौरी इब्ने शीबा , अब्दुर्रहमान , अकरमा , हसन बसरी वग़ैरा वग़ैरा यह सब के सब जो उस वक़्त इस्लामी दुनियां में दीनयात के पेशवा और मुक़द्दस समझे जाते थे इन्हीं बुज़ुर्गों के चश्माए फ़ैज़ के जुरआ नोश और उन्हीं हज़रात के मुतीय व हलक़ा बगोश थे।

जनाबे इमामे रज़ा (अ.स.) को इत्तेफ़ाक़े हसना से अपने इल्मो फ़ज़ल के इज़हार के ज़्यादा मौक़े पेश आये क्यों कि मामून अब्बासी के पास जब तक दारूल हुकूमत मर्व तशरीफ़ फ़रमा रहे बड़े बड़े उलमा व फ़ुज़ला मुख़तलिफ़ उलूम में आपकी इस्तेदाद और फ़ज़ीलत का अन्दाज़ा कराया गया और कुछ इस्लामी उलमा व फ़ुज़ला पर मौकूफ़ नहीं था बल्कि उलमा ए यहूदो नसारा से भी आपका मुक़ाबला कराया गया। मगर इन तमाम मनाज़िरो व मुबाहेसो में इन तमाम लोगों पर आपकी फ़ज़ीलत व फ़ौक़ियत ज़ाहिर हुई। ख़ुद मामून भी ख़ुलफ़ा ए अब्बासीया में सब से ज़्यादा आलम व अफ़क़ह था बा वजूद इसके उलूम तबर्हुरफ़ी का लौहा मानता था चारो नाचार इसका ऐतराफ़ और इक़रार पर इक़रार करता था। चुनान्चे अल्लामा इब्ने हजर मक्की सवाएक़े मोहर्रेक़ा में लिखते हैं कि आप जलालत क़दर इज़्ज़त व शराफ़त में मारूफ़ व मज़कूर हैं। इसी वजह से मामून आपको बमुनज़िला अपनी रूह व जान जानता था। उसने अपनी दुख़्तर का निकाह आँ हज़रत (अ.स.) से किया और मुल्क व विलायत में अपना शरीक गरदाना। मामून बराबर उलमा , अदयान व फ़ुक़हाय शरीअत को जनाबे इमाम रज़ा (अ.स.) के मुक़ाबले में बुलाता और मनाज़रा कराता। मगर आप हमेशा उन लोगों पर ग़ालिब आते थे और ख़ुद इरशाद फ़रमाते थे कि मैं मदीने में रौज़ा ए हज़रत रसूले ख़ुदा (स.अ.) में बैठता , वहां के उलमाए कसीर किसी इल्मी मसाएल में आजिज़ आते तो बिल इत्तेफ़ाक़ मेरी तरफ़ रूजू करते। जवाब हाय शाफ़ी दे कर इनकी तसल्ली व तस्कीन कर देता। अबासलत हरवी इब्ने सालेह कहते हैं कि हज़रत इमाम अली बिन मूसा रज़ा (अ.स.) से ज़्यादा कोई आलम मेरी नज़र से नहीं गुज़रा और मुझ पर मौकू़फ़ नहीं जो कोई आपकी ज़ियारत से मुशर्रफ़ होगा वह मेरी तरह आपकी इल्मियत की शहादत देगा।

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) और हुरूफ़े तहज्जी

बज़ाहिर ऐसा मालूम होता है कि हुरूफ़े तहजी यानी (अलीफ़ , बे , जीम , दाल) वग़ैरा की कोई हैसियत नहीं लेकिन जब उसक हैसियत अरबाबे अस्मत से दरयाफ़्त की जाती है तो मालूम होता है कि यह हुरूफ़ जिन से क़ुरआन मजीद जैसी ऐजाज़ी किताब मुरत्तब की गई है और जिस पर काएनात के इफ़हाम व तफ़हीम का दारो मदार है यह अपने दामन में बेशुमार सेफ़ात रखते हैं और खुदा वन्दे आलम ने उन्हीं हुरूफ़ को अपनी मारफ़त का ज़रिया बनाया है और हर हर्फ़ में ख़ास चीज़ पिन्हा रखती है। हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) से हुरूफ़े तहज्जी दरयाफ़्त किया गया आपने बा हवाला बाबे मदीनतुल उलूम हज़रत अली (अ.स.) इरशाद फ़रमाते हैं कि ‘‘ अलिफ़ ’’ से आला अल्लाह , ख़ुदा की नेअमतें , ‘‘ बे ’’ से बहा उल्लाह , ख़ुदा की खुबीयाँ , बहजतुल्लाह ख़ुदा मोमिन से ख़ुश होना। ‘‘ ते ’’ से तमामुल अमर बक़ाएमे आले मोहम्मद दुनियां का ख़ात्मा इमाम मेहदी (अ.स.) के अहद ममें होगा। ‘‘ से ’’ से सवाब अल मोमेनीन अली अमालेहुम सालेहता मोमेनीन को अच्छे आमाल का भर पूर सवाब मिलेगा। ‘‘ जीम ’’ से जमाल अल्लाह , अल्लाह का जमाल व जलाल अल्लाह , अल्लाह का जलाल , ‘‘ हे ’’ से हिल्मुल्लाह अन अलमज़नबीन। गुनाहगार से अल्लाह का हुक्म। ‘‘ ख़े ’’ से खमोल ज़िक्र अहलुल मासी इन्दुल्लाह ‘‘ ख़ुदा ’’ का गुनाह गारों के गुनाहों से बुलवा देना। ‘‘ दाल ’’ से दीन अल्लाह , अल्लाह का दीन इस्लाम। ‘‘ जीम ’’ ज़ुल्जलाल , अल्लाह का साहबे जमाल होना। ‘‘ रे ’’ से अल्लाह का रऊफ़ुर रहीम होना। ‘‘ जे़ ’’ से ज़लाज़िले अलक़यामता , क़यामत के दिन अज़ीम ज़लज़ले। ‘‘ सीन ’’ से सेना अल्लाह। अल्लाह की अच्छाईयां और बयान। ‘‘ शीन ’’ से शा अल्लाह माशा अल्लाह। जो ख़ुदा चाहे वही होगा। ‘‘ स्वाद ’’ से सादिक़ुल वाद , अल्लाह का वादा सच्चा और लोगों को सच बोलना चाहिए। ‘‘ ज़वाद ’’ से ज़लमिन ख़ालिफ़ मोहम्मद (स.अ.) व आले मोहम्मद (अ.स.)। वह जो शख़्स गुम्राह है जो मोहम्मद (स.अ.) आले मोहम्मद (अ.स.) का मुख़ालिफ़ है। ‘‘ तो ’’ से तूबाअल मोमेनीन , के लिये जन्नत की मुबारक बाद। ‘‘ ज़ो ’’ से ज़न अलमोमेनीन बिल्लाह ख़ैर। मोमिन को ख़ुदा के साथ अच्छा ज़न रखना चाहिये। ‘‘ ऐन ’’ से इल्म यानी ख़ुदा अलमे मुतलक़ है और इल्म इंसान के लिये बेहतरीन ज़ेवर है। ‘‘ ग़ैन ’’ से अलग़नी , ख़ुदा सब से मुसतग़नी है और ग़नी को ग़रीबों पर ख़र्च करना चाहिये। ‘‘ फ़े ’’ से फ़ैज़ मन अफ़वाज़ अन्नार , लोग अगर गुनाह करेंगे तो फ़ौज दर फ़ौज जहन्नुम में जायेंगे। ‘‘ क़ाफ़ ’’ से कु़रआन यह अल्लाह की भेजी हुई किताब है जो हिदायत से पुर है। ‘‘ क़ाफ़ ’’ से अल क़ाफ़ी ख़ुदा बन्दों के लिये काफ़ी ह। ‘‘ लाम ’’ से लग़वो अल काफ़ेरीन फ़ी इफ़तराहुम एल्ल लाहे अलविज़्ब , ख़ुदा पर झूठे इल्ज़ाम देना यह काफ़िरों का काम नेहायत लग़ो है। ‘‘ मीम ’’ से मलकूुल ला हुल यौम ला मालेक ग़ैरहू , एक दिन सिर्फ़ अल्लाह की हुकूमत होगी और कोई भी ज़िन्दा न होगा और न इसके सिवा कोई मालिक होगा , इस दिन ख़ुदा फ़रमायेगा , लेमन उल मुलके अल यौम , आज के दिन किसकी हुकूमत है तो अरवाहे आइम्मा यह जवाब देगें। अल्लाह अल वाहिद अलक़हार , आज सिर्फ़ ख़ुदाए वाहिद क़हार की हुकूमत है। ‘‘ नून ’’ से नवाल अल्लाह अल मोमेनीन व निकाला बिल काफ़ेरीन। मोमेनीन पर ख़ुदा का करम और काफ़िरों पर उसका अज़ाब मोहित होगा। ‘‘ वाव ’’ से वैल लमन असी अल्लाह , वैल और तबाही है इस के लिये जो ख़ुदा की ना फ़रमानी करे। ‘‘ हे ’’ से हान इल लल्लाह मन असह जो ख़ुदा का गुनाह करता है वह उसकी तौहीन करता है। ‘‘ ला ’’ से ला इलाहा इल्लल्लाह , यह वह कलमाए इख़्लास है जो उसे खुलूस व इक़्तेदार और शराएत के साथ ज़बान पर जारी करे वह ज़रूर जन्नत में जाऐगा। ‘‘ ये ’’ से यदुल्लाह अल्लाह का हाथ जो मख़लूक़ात को रोजी़ पहुँचाता है मुराद है।

फिर आपने फ़रमाया कि इन्हीं हुरूफ़ पर मुश्तमिल क़ुरआन मजीद नाज़िल हुआ है और नज़ूल चूंकि ख़ुदा की तरफ़ से था इस लिये दावा कर दिया गया कि जो किताब हम ने हुरूफ़ व अलफ़ाज़ में भेजी है। इसका जवाब जिन व इन्स सब मिल कर भी नहीं दे सकते।(दमए साकेबा जिल्द 3 पृष्ठ 61)

इमाम रज़ा (अ.स.) और वक़्ते निकाह

सक़तुल इस्लाम हज़रत क़ुलैनी किताब उसूले काफ़ी में तहरीर फ़रमाते हैं कि हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) से दरयाफ़्त किया गया कि तजवीज़ व निकाह किस वक़्त होना चाहिये ? आपने इरशाद फ़रमाया कि निकाह रात को सुन्नत है इस लिये कि रात लज़्ज़त और सुकून के लिये बनाई गई है और औरतें मर्दों के लिये लुत्फ़ व लज़्ज़त और सुकून का मरकज़ है।(मुनाक़िब जिल्द 1 पृष्ठ 91 ब हवाला काफ़ी)

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) के बाज़ मरवीयात व इरशादात

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) से बुशामर अहादीस मरवी हैं जिनमें से बाज़ यह हैं।

1. बच्चों के लिये माँ के दूध से बेहतर कोई दूध नहीं। 2. सिरका बेहतरीन सालन है , जिसके घर में सिरका होगा वह मोहताज न होगा। 3. हर अनार में एक दाना जन्नत का होता है। 4. मुनक़्क़ा सफ़रे को दुरूस्त करता है , बलग़म को दूर करता है , पठ्ठो को मज़बूत करता है , नफ़्स को पाकीज़ा बनाता और रंजो ग़म दूर करता है। 5. शहद में शिफ़ा है , अगर कोई शहद हदिया करे तो वापस न करो। 6. गुलाब जन्नत के फूलों का सरदार है। 7. बनफ़शे का तेल सर में लगाना चाहिये इसकी तासीर गर्मियों में सर्द और सर्दियों में गर्म हेती है। 8. जो ज़ैतुन का तेल सर में लगाए या खाए उसके पास चालीस दिन तक शैतान न आयेगा। 9. सेलाए रहम और पड़ोसियों के साथ अच्छा सुलूक करने से माल में ज़्यादती होती है। 10. अपने बच्चों को ख़तना सातवें दिन करा दिया करो इससे सेहत ठीक होती है और जिस्म पर गोश्त चढ़ता है। 11. जुमे के दिन रोज़ा रखना 10 दस रोज़ों के बराबर है। 12. जो किसी औरत का महर न दे या मज़दूर की उजरत रोके या किसी को फ़रोख़्त कर दे वह बख़्शा न जायेगा। 13. क़ुरआन पढ़ने , शहद खाने और दुध पीने से हाफ़ेज़ा बढ़ता है। 14. गोश्त खाने से शिफ़ा होती है और मर्ज़ दूर होता है। 15. खाने की इब्तेदा नमक से करनी चाहिये क्यों कि इस से सत्तर बीमारियों से हिफ़ाज़त होती है जिनमें जुज़ाम भी है। 16. जो दुनियां में ज़्यादा खायेगा क़यामत में भूखा रहेगा। 17. मसूर , 70 सत्तर अम्बिया की पसन्दीदा खुराक है इस से दिल नरम होता है और आंसू बनते हैं। 18. जो चालीस दिन गोश्त न खायेगा बद इख़्लाक़ हो जायेगा। 19. खाना ठंडा कर के खाना चाहिये। 20. खाना प्याले के किनारे से खाना चाहिये। 21. तूले उम्र के लिये अच्छा खाना , अच्छी जूती पहन्ना और क़र्ज़ से बचना , कसरते जिमा से परहेज़ करना मुफ़ीद है। 22. अच्छे इख़्लाक़ वाला पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.) के साथ क़यामत में होगा। 23. जन्नत में मुत्तक़ी और हुस्ने खुल्क़ वालों की और जहन्नम में पेटू , ज़िना कारों की कसरत होगी। 24. इमाम हुसैन (अ.स.) के क़ातिल बख़्शे न जायेंगे। उनका बदला खुदा खुद लेगा। 25. हसन व हुसैन (अ.स.) जवानाने जन्नत के सरदार हैं और उनके पदरे बुज़ुर्गवार दोनों से बेहतर हैं। 26. अहले बैत (अ.स.) की मिसाल सफ़ीना ए नूह जैसी है , नजात वही पायेगा जो इस पर सवार होगा। 27. हज़रत फ़ात्मा (स.अ.) साक़े अर्श पकड़ कर क़यामत के दिन वाक़िये करबला का फ़ैसला चाहेंगी। उस दिन उनके हाथ में इमाम हुसैन (अ.स.) का ख़ून भरा लिबास होगा। 28. ख़ुदा से रोज़ी सदक़ा दे कर मांगो। 29. सब से पहले जन्नत में वह शोहदा और अयाल दार जायेंगे जो परहेज़गार होंगे और सब से पहले जहन्नम में न इंसाफ़ हाकिम और मालदार जायेंगे। (मसनद इमाम रज़ा (अ.स.) प्रकाशित मिस्र 1341 हिजरी) 30. हर मोमिन का कोई न कोई पड़ोसी अज़ियत का बाएस ज़रूर होगा। 31. बालों की सफ़ेदी का सर के अगले हिस्से से शुरू होना सलामती और इक़बाल मन्दी की दलील है और रूख़्सारों , दाढ़ी के अतराफ़ से शुरू होना सख़ावत की अलामत है और गेसूओं से शुरू होना शुजाअत का निशान है और गुद्दी से शुरू होना नहूसत है। 32. क़ज़ा व क़द्र के बारे में आपने फ़ज़ील बिन सुहैल के जवाब में फ़रमाया कि इंसान न बिल्कुल मजबूर है और न बिल्कुल आज़ाद है।(नूरूल अबसार पृष्ठ 140)

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) और मजलिसे शोहदाऐ करबला

अल्लामा मजलिसी बेहारूल अनवार में तहरीर फ़रमाते हैं कि शायरे आले मोहम्मद (स.अ.) देबले ख़ेज़ाई का बयान है कि एक मरतबा आशूर के दिन मैं हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की खि़दमत में हाज़िर हुआ तो देखा कि आप असहाब के हल्क़े में इन्तेहाई ग़मगीन व हज़ीं बैठे हुये हैं। मुझे हाज़िर होते देख कर फ़रमाया , आओ , आओ हम तुम्हारा इन्तेज़ार कर रहे हैं। मैं क़रीब पहुँचा तो आपने अपने पहलू में जगह दे कर फ़रमाया कि ऐ देबल चूंकि आज यौमे आशूरा है और यह दिन हमारे लिये इन्तेहाई रंजो ग़म का दिन है लेहाज़ा तुम मेरे जद्दे मज़लूम हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) के मरसिए से मुताअल्लिक़ कुछ शेर पढ़ो। ऐ देबल जो शख़्स हमारी मुसीबत पर रोये या रूलाय उसका अज्र ख़ुदा पर वाजिब है। ऐ देबल जिस शख़्स की आंख हमारे जद्दे नामदार हज़रत सय्यदुश शोहदा हुसैन (अ.स.) के ग़म में रोयेगा खुदा उसके गुनाह बख़्श देगा। यह फ़रमा कर इमाम (अ.स.) ने अपनी जगह से उठ कर परदा खींचा और मुख़द्देराते असमत को बुला कर उसमें बिठा दिया। फिर आप मेरी तरफ़ मुख़ातिब हो कर फ़रमाने लगे। हां देबल ! अब मेरे जद्दे अमजद का मरसिया शुरू करो। देबल कहते हैं कि मेरा दिल भर आया और मेरी आंखों से आंसू जारी थे और आले मोहम्मद (अ.स.) में रोने का कोहरामे अज़ीम बरपा था।

साहेबे दारूल मसाएब तहरीर फ़रमाते हैं कि देबल का मरसिया सुन कर मासूमाए क़ुम जनाबे फ़ात्मा हमशीरा हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) इस क़द्र रोईं कि आपको ग़श आ गया।

इस इजतेमाई तरीक़े से ज़िक्रे हुसैनी को मजलिस कहते हैं। इसका सिलसिला अहदे इमाम रज़ा (अ.स.) में मदीने से शुरू हो कर मर्व तक जारी रहा।

अल्लामा अली नक़ी लिखते हैं कि अब इमाम रज़ा (अ.स.) को तबलीग़े हक़ के लिये नामे हुसैन (अ.स.) की इशाअत के काम को तरक़्क़ी देने का भी पूरा मौक़ा हासिल हो गया जिसकी बुनियाद उसके पहले हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़र (अ.स.) और इमाम ज़ाफ़रे सादिक़ (अ.स.) क़ायम कर चुके थे मगर वह ज़माना ऐसा था कि जब इमाम की खि़दमत में वही लोग हाज़िर होते थे जो बा हैसियत इमाम या बा हैसियत आलिमे दीन आपके साथ अक़ीदत रखते थे , और अब इमाम रज़ा (अ.स.) तो इमामे रूहानी भी हैं और वली अहदे सलतनत भी , इस लिये आपके दरबार में हाज़िर होने वालों का दायरा वसी है। ‘‘ मर्वका ’’ वह मक़ाम है जो ईरान से तक़रीबन वसत वाक़े है। हर तरफ़ के लोग यहां आते हैं और यहां यह आालम कि इधर मोहर्रम का चान्द निकला और आंखों से आंसू जारी हो गये। दूसरों को भी तरग़ीब व तहरीस की जाने लगी कि आले मोहम्मद (स.अ.) के मसाएब को याद करो और असराते ग़म को ज़ाहिर करो। यह भी इरशाद होने लगा कि जो इस मजलिस में बैठे जहां हमारी बाते ज़िन्दा की जाती हैं उसका दिल मुर्दा न होगा , उस दिन कि जब सब के दिल मुर्दा होंगे। तज़किराए इमाम हुसैन (अ.स.) के लिये जो मजमा हो उसका नाम इसलाही तौर पर ‘‘ मजलिस ’’ इसी इमाम रज़ा (अ.स.) की हदीस से माख़ूज़ है। आपने अमली तौर पर भी खुद मजलिसें करना शुरू कर दीं। जिनमें कभी खुद ज़ाकिर हुए और दूसरे सामेईन जैसे रियान इब्ने शबीब की हाज़री के मौक़े पर आपने मसाएबे इमाम हुसैन (अ.स.) बयान फ़रमाये और कभी अब्दुल्लाह बिन साबित या देबले खेज़ाई ऐसे किसी शायर के हाज़री के मौक़े पर उस शायर को हुक्म हुआ कि तुम ज़िक्रे इमाम हुसैन (अ.स.) में अशआर पढ़ो , वह ज़ाकिर हुआ और हज़रत सामेईन में दाखि़ल हुए।

1. किताब अल काफ़ी जिल्द 7 पृष्ठ 7 में है कि इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने एक दिन सय्यद हिमयरी को हुक्म दिया कि मरसिया पढ़ो। उन्होंने मरसिया पढ़ा। इमाम खुद भी बे हद रोय और पसे परदा मुख़दे्देरात (औरतों) ने भी बे पनाह गिराया किया।

ख़लीफ़ा मामून रशीद अब्बासी और हज़रत इमाम अली रज़ा (अ.स.)

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) के वालिदे माजिद हज़रत इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) को 183 हिजरी में हारून रशीद अब्बासी ज़हर से शहीद कराने के बाद 193 हिजरी में फ़ौत हो गया। इसके मरने के बाद जमादील सानी 193 हिजरी में इसका बेटा अमीन ख़लीफ़ा हुआ। हारून चुंकि अपने बेटों में सलतनत तक़सीम कर चुका था और उसके उसूल मोअय्यन कर चुका था इस लिये एक के बजाय दो हुक्मरानें रशीदी हुदूदे सलतनत पर हुक्मरानी करने लगे। अमीन चुंकि निहायत ही लग़ों आदमी था इस लिये उसने अपने उसअते इख़्तेयार की वजह से मामून पर जबरो ताअद्दी शुरू कर दी बिल आखि़र दोनों भाईयों में जंग हुई और अमीन चार साल आठ माह सलतनत करने के बाद 23 मोहर्रम हराम 198 हिजरी में क़त्ल कर दिया गया।

अमीन के क़त्ल के बाद भी मामून चार साल तक मर्व में रहा। सलतनत का कारोबार तो फ़ज़ल बिन सुहेल के सुपुर्द कर रखा था और खुद आलमों फ़ाज़िलों से जो उसके दरबार में भरे रहते थे फ़लसफ़ी मुबाहिसों में मसरूफ़ रहता था। ईराक़ में फ़ज़ल का भाई , हसन बिन सुहेल गर्वनर बनाया गया था। अबूहज़ीरह में नसर बिन नशिस्त अक़ील ने बग़ावत की और वह पांच साल तक शाही फ़ौजों का मुक़ाबला करता रहा। ईराक़ में बद्दू , लुच्चों , बदमाशों को बुलाकर हसन बिन सुहेल के खि़लाफ़ अलमे बग़ावत बुलन्द कर दिया। यह हालत देख कर हज़रत अली (अ.स.) और हज़रत जाफ़र तैय्यार के बाज़ बुलन्द नज़र नौनिहालों ने शायद यह ख़्याल किया कि इनके हुकू़क़ वापस मिलने का वक़्त आ गया है। चुंनाचे जमादिल सानी 199 हिजरी मुताबिक़ 814 ई 0 में अबू अब्दुल्लाह बिन इब्राहीम बिन इस्माईल बिन इब्राहीम अल मारूफ़ बा तबा बिन हसन अली बिन अबी तालिब अलवी ने जो मज़हब ज़ैदिया रखते थे कूफ़े में ख़रूज किया और लोगों को आले रसूल की बैअत और मुताबेअत की दावत दी। इनकी मद्द पर बनी शैबान का मुअजि़्ज़ज़ सरदार अबुल सरयासरी बिय मन्सूर शैबानी जो हर समह के फ़ौजी सरदारों में से था उठ खड़ा हुआ उन्होंने अपनी मुत्तफ़ेक़ा अफ़वाज से हसन की फ़ौज को कूफ़े के बाहर शिकस्त दे कर तमाम जुनूबी ईराक़ पर क़ब्ज़ा कर लिया।

फ़तेह के दूसरे दिन मोहम्मद बिन इब्राहीम मर्गे मफ़ाजात से फ़ौत हो गये। अबू असराया ने इनकी जगह मोहम्मद निब ज़ैद शहीद को अमीर बना लिया। हसन ने फिर फ़ौज भेजी। अबुल सराया ने उसे भी मार कर फ़ना कर दिया। इसी दौरान अलवी हर चार जानिब से अबुल सरया की मद्द को जमा जो गए और जा बजा शहरों में फैल गये और अबुल सरया ने कूफ़े में इमाम रज़ा (अ.स.) के नाम दिरहम व दीनार ‘‘ मस्कूक ’’ कराए और बसरा वस्ता , मदाएन की तरफ़ फ़ौज रवाना की और ईराक़ के बहुत से शहरो क़रिए फ़तह कर लिये। अलवीयों की क़ूवत व शौकत बहुत बढ़ गई। उन्होंने अब्बासीयो के घर जो कूफ़े में थे फूंक दिये और जो अब्बासी मिला उसे क़त्ल कर डाला। इसके बाद मौसमे हज आया तो अबू असराया ने हुसैन बिन हसन इब्ने इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) को जिन्हें अफ़तस कहते हैं मक्का का गर्वनर मुक़र्रर किया और इब्राहीम बिन मूसा काज़िम को यमन का आमिल बनाया और फ़ारस पर इस्माईल बिन मूसा काफ़िम को गर्वनर किया और मदायन की तरफ़ मोहम्मद बिन सुलैमान बिन दाऊद हसन मुसन्ना को रवाना किया और हुक्म दिया कि जानिबे शरक़ी से बग़दाद पर हमला करें। इस तरह अबुल सरया की सलतनत बहुत वसी हो गई।

फ़ज़ल बिने सहल ने हरसमा को अबू सराया की सरकोबी के लिये रवाना किया और अबूल सराया नहरवान के क़रीब शिकस्त खा कर मारा गया और मोहम्मद बिने मोहम्मद बिने जै़द मामून के पास मर्व भेज दिये गये। अबू सराया का दौरा दौरा कुल दस माह रहा। अबू सराया के क़त्ल हो जाने के बाद हिजाज़ में लोेगों ने मोहम्मद बिने जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) को अमीरल मोमेनीन बनाया। अफतस ने भी उनकी बैअत कर ली और यमन में इब्राहीम बिने मूसिए काज़िम (अ.स.) ने सर उठाया। इसी तरह ईरान की सरहद से यमन तक तमाम मुल्क में ख़ाना जंगी फैल गई। अबुल सराया के क़त्ल के बाद हरसमा मग़रिब के हालात बयान करने को बादशाह की खि़दमत में मर्व हाज़िर हुआ क्यों कि वज़ीर इन तमाम हालात को बादशाह से मख़फ़ी रखता था। हालात बयान कर के वह बादशाह के पास से वापस आ रहा था कि वज़ीर ने रास्ते में उसे क़त्ल करा दिया। यह वाक़ेया 200 हिजरी का है। हरसूमा के क़त्ल की ख़बर सुन कर बग़दाद के सिपाहीयों ने जो उसे दोस्त रखते थे बग़दादियों में बग़ावत कर के हसन बिने सहल को निकाल दिया और मन्सूर बिन मेहदी को अपना गर्वनर बना लिया।

मामून को बाग़ियों की कसरत और अलवियों की तलबे खि़लाफ़त में उठने की ख़बर पहुँची तो घबरा गया और उसने यही मसलहत देखी कि इमाम अली रज़ा (अ.स.) को वली अहद बना ले। चुनान्चे उनको मदीने से बुला कर 2 रमज़ान 201 हिजरी मुताबिक़ 816 ई 0 को बवजूद उनके सख़्त इंकार के अपना वली अहद बना लिया। उनसे अपनी बेटी उम्मे हबीबा की शादी कर दी। उनका नाम दिरहमों दीनार में मस्कूक कराया। शाही वर्दी से अब्बसीयों का सियाह रंग दूर कर के बनी फ़ात्मा का सब्ज़ रंग इख़्तियार किया।(तारीख़े इस्लाम जिल्द 1 पृष्ठ 61) इस वाक़िए तफ़सील कसीर किताबों में मौजूद है। हम मुख़सर अलफ़ाज़ में तहरीर करते हैं।

मामून रशीद की मजलिसे मुशाविरत

हालात से मुतासिर हो कर मामून रशीद ने एक मजलिसे मुशाविरत तलब की जिसमें उलमा , फ़ुज़ला , जुमआ और उमरा सभी को मदऊ किया। जब सब जमा हो गए तो असल राज़ दिल में रखते हुए उनसे यह कहा कि चूंकि शहरे ख़ुरासान में हमारी तरफ़ से कोई हाकिम नहीं है और इमाम रज़ा (अ.स.) से ज़्यादा लाएक़ कोई नहीं है इस लिये हम चाहते हैं कि इमाम रज़ा (अ.स.) को बुला कर वहां की ज़िम्मेदारी उनके सुपुर्द कर दें। मामून का मक़सद तो यह था कि उनको ख़लीफ़ा बना कर अलवियों की बग़ावत और उनकी चाबुक दस्ती को रोक दे लेकिन यह बात उसने मजलिसे मुशाविरत में ज़ाहिर नहीं कि बल्कि मुल्की ज़रूरत का हवाला दे कर उन्हें ख़ुरासान का हाकिम बनाना ज़ाहिर किया और लोगों ने तो इस पर जो भी राय दी हो लेकिन हसन बिने सहल और वज़ीरे आज़म फ़ज़ल बिने सहल इस पर राज़ी न हुए और यह कहा कि इस तरह खि़लाफ़त बनी अब्बास से आले मोहम्मद (अ.स.) की तरफ़ मुन्तक़िल हो जायेगी। मामून ने कहा मैंने जो कुछ सोचा है वह यही है और उस पर अमल करूंगा यह सुन कर वह लोग ख़ामोश हो गए। इतने में हज़रत अली इब्ने अबी तालिब (अ.स.) के एक मोअजि़्ज़ज़ सहाबी , सुलेमान बिने इब्राहीम बिने मोहम्मद बिने दाऊद बिने क़ासिम बिने हैबत बिने अब्दुल्लाह बिने हबीब बिने शैख़ान बिने अरक़म खड़े हो गए और कहने लगे ऐ मामून रशीद ‘‘ रास्त मी गोई इमामी तरसम कि तू हज़रते इमाम रज़ा हमाना कुनी कि कूफ़ियान बा हज़रते इमाम हुसैन करदन्द ’’ तू सच कहता है लेकिन मैं डरता हूँ कि तू कहीं इनके साथ वही सुलूक न करे जो कूफ़ियों ने इमाम हुसैन (अ.स.) के साथ किया है। मामून रशीद ने कहा , ऐ सुलेमान ! तुम यह क्या सोच रहे हो ऐसा हरगिज़ नहीं हो सकता मैं उनकी अज़मत से वाक़िफ़ हूँ जो उन्हें सताएगा क़यामत में हज़रते रसूले करीम (स.अ.) हज़रते अली हकीम (अ.स.) को क्यों कर मुंह दिखाएगा तुम मुतमईन रहो इन्शा अल्लाह इनका एक बाल बीका न होगा। यह कह कर बा रवाएते अबू मख़नफ़ मामून रशीद ने क़ुराने मजीद पर हाथ रखा और क़सम खा कर कहा मैं हरगिज़ औलादे पैग़म्बर पर कोई ज़ुल्म न करूंगा। इसके बाद सुलेमान ने तमाम लोगों को कसम दे कर बैअत ले ली फिर उन्होंने एक बैअत नामा तैयार किया और उस पर अहले ख़ुरासान के दस्तख़त लिये। दस्तख़त करने वालों की तादाद चालीस हज़ार थी। बैअत नामा तैय्यार होने के बाद मामून रशीद ने सुलैमान को बैअत नामा समेत मदीने भेज दिया। सुलेमान क़ता मराहिल व तै मनाज़िल करते हुए मदीने मुनव्वरा पहुँचे और हज़रते इमाम रज़ा (अ.स.) से मुलाक़ात की। उनकी खि़दमत में मामून का पैग़ाम पहुँचाया और मजलिसे मशाविरत के सारे वाक़ियात बयान किये और बैअत नामा हज़रत की खि़दमत में पेश किया। हज़रत ने ज्यों ही उसको खोला और उसका सर नामा देखा सरे मुबारक हिला कर फ़रमाया कि यह मेरे लिये किसी तरह मुफ़ीद नहीं है। इस वक़्त आप आब दीदा थे। फिर आपने फ़रमाया कि मुझे जद्दे नाम दार ने ख़्वाब में नतीजा व अवाक़िब से आग़ाह कर दिया है। सुलैमान ने कहा मौला यह तो ख़ुशी का मौक़ा है। आप इस दर्जा परेशान क्यों हैं ? इरशाद फ़रमाया कि मैं इस दावत में अपनी मौत देख रहा हूँ। उन्होंने कहा मौला मैंने सब से बैअत ले ली है। कहा दुरूस्त है , लेकिन जद्दे नाम दार ने जो फ़रमाया है वह ग़लत नहीं हो सकता। मैं मामून के हाथों शहीद किया जाऊंगा।

बिल आखि़र आप पर कुछ दबाव पड़ा कि आप मर्व ख़ुरासान के लिये आज़िम हो गए। जब आप के अज़ीज़ों और वतन वालों को आपकी रवानगी का हाल मालूम हुआ बेपनाह रोए।

ग़रज़ कि आप रवाना हो गए। रास्ते में एक चश्मा ए आब के किनारे चन्द आहुओं को देखा कि वह बैठे हुए हैं , जब उनकी नज़रे हज़रत पर पड़ी सब दौड़ पड़े और ब चश्मे तर कहने लगे कि हुज़ूर ख़ुरासान न जायें कि दुश्मन बा लिबासे दोस्ती आपकी ताक में है और मलकुल मौत इस्तेग़बाल के लिये तैय्यार है। हज़रत ने फ़रमाया कि अगर मौत आनी है तो हर हाल में आयेगी। (कन्जु़ल अन्साब अबू मख़नफ़ 807 प्रकाशित बम्बई 1302 हिजरी)

एक रवायत में है कि मामून रशीद ने अपनी ग़रज़ के लिये जब हज़रत को ख़लीफ़ा ए वक़्त बनाने के लिये लिखा तो आपने इनकार कर दिया। फिर उसने तहरीर किया कि आप मेरी वली अहदी को क़ुबूल कीजिए। आपने इसे भी इन्कार कर दिया। जब वह आपकी तरफ़ से मायूस हो गया तो उसने 300 अफ़राद पर मुश्तमिल फ़ौज भेज दी और हुक्म दे दिया कि वह जिस हालत में हो और जहां हो उनको गिरफ़्तार कर के लाया जाए और उन्हें इतनी मोहलत न दी जाए कि वह किसी से मिल सकें। चुनान्चे फ़ौज ग़ालेबन फ़ज़ल बिने सहल वज़ीरे आज़म की क़यादत में मदीने पहुँची और इमाम (अ.स.) मस्जिद से गिरफ़्तार कर के मर्व ख़ुरासान के लिये रवाना हो गये। इतना मौक़ा न दिया कि इमाम (अ.स.) अपने अहलो अयाल से रूख़सत हो लेते।

मामून की तलबी से क़ब्ल इमाम (अ.स.) की रौज़ा ए रसूल पर फ़रयाद

अबू मख़नफ़ बिने लूत बिने यहया ख़ज़ाई का बयान है कि हज़रते इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) की शहादत के बाद 15 मोहर्रमुल हराम शबे यक शम्बा को हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) ने रौज़ा ए रसूले ख़ुदा (स.अ.) पर हाज़री दी। वहां मशग़ूले इबादत थे कि आंख लग गई , ख़्वाब में देखा कि हज़रत रसूले करीम (स.अ.) बा लिबासे स्याह तशरीफ़ लाये हैं और सख़्त परेशान हैं। इमाम (अ.स.) ने सलाम किया हुज़र ने जवाबे सलाम दे कर फ़रमाया , ऐ फ़रज़न्द ! मैं और अली (अ.स.) , फ़ात्मा (स.अ.) हसन (अ.स.) , हुसैन (अ.स.) सब तुम्हारे ग़म में नाला व गिरया हैं और हम ही नहीं फ़रज़न्द ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) व मोहम्मद बाक़र (अ.स.) , जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) और तुम्हारे पदर मूसिए काज़िम (अ.स.) सब ग़मगीन और रंजीदा हैं। ऐ फ़रज़न्द ! अन्क़रीब मामून रशीद तुम को ज़हर से शहीद कर देगा। यह देख कर आपकी आंख खुल गई और आप ज़ार ज़ार रोने लगे। फिर रौज़ा ए मुबारक से बाहर आए। एक जमाअत ने आपसे मुलाक़ात की और आपको परेशान देख कर पूछा कि मौला इज़तिराब की वजह क्या है ? फ़रमाया , अभी अभी जद्दे नाम दार ने मेरी शहादत की ख़बर दी है। अबुल सलत दुश्मन मुझे शहीद करना चाहते हैं और मैं खुदा पर पूरा भरोसा करता हूँ जो मरज़िए माबूद हो वही मेरी मरज़ी है इस ख़्वाब के थोड़े अर्से के बाद मामून रशीद का लशकर मदीने पहुँच गया और इमाम (अ.स.) को अपनी सियासी ग़रज़ पूरी करने के लिये वहां से दारूल खि़लाफ़त ‘‘ मर्व ’’ में ले आया।(कन्ज़ुल अन्साब पृष्ठ 86)

इमाम रज़ा (अ.स.) की मदीने से मर्व में तलबी

अल्लामा शिब्लन्जी लिखते है कि हालात की रौशनी में मामून ने अपने मुक़ाम पर यह क़तई फ़ैसला और अज़म बिल जज़म कर लेने के बाद कि इमाम रज़ा (अ.स.) को वली अहले खि़लाफ़त बनायेगा। अपने वज़ीरे आज़म फ़ज़ल बिन सहल को बुला कर भेजा और उससे कहा कि हमारी राए है कि हम इमाम रज़ा (अ.स.) को वली अहद सुपुर्द कर दे तुम भी इस पर सोच विचार करो और अपने भाई हसन बिन सहल से मशविरा करो। इन दोनों ने आपस में दबादलाए ख़यालात करने के बाद मामून की बारगाह में हाज़री दी। उनका मक़सद था कि मामून ऐसा न करे वरना खि़लाफ़त आले अब्बास से आले मोहम्मद (अ.स.) में चली जायेगी। उन लोगों ने अगर चे खुल कर मुख़ालफ़त न की लेकिन दबे लफ़्ज़ों में नाराज़गी का इज़हार किया। मामून ने कहा मेरा फ़ैसला अटल है और मैं तुम दोनों को हुक्म देता हूँ कि तुम मदीने जा कर इमाम रज़ा (अ.स.) को अपने हमराह लाओ। (हुक्मे हाकिम मर्गे मफ़ाजात) आखि़र कार यह दोनों इमाम रज़ा (अ.स.) की खि़दमत में मक़ामे मदीने मुनव्वरा हाज़िर हुए और उन्होंने बादशाह का पैग़ाम पहुँचाया। हज़रते इमाम अली रज़ा (अ.स.) ने इस अर्ज़ दाश्त को मुस्तरद कर दिया और फ़रमाया कि इस अम्र के लिये अपने को पेश करने के लिये माज़ूह हूँ लेकिन चूंकि बादशाह का हुक्म था कि उन्हें ज़रूर लाओ इस लिये उन दोनों ने बे इन्तेहा इसरार किया और आपके साथ उस वक़्त तक लगे रहे जब तक आपने मशरूत तौर पर वादा नहीं कर लिया।(नूरूल अबसार पृष्ठ 41)

इमाम रज़ा (अ.स.) की मदीने से रवानगी

तारीख़ अबुल फ़िदा में है कि जब अमीन क़त्ल हुआ तो मामून सलतनते अब्बासिया का मुस्तक़िल बादशाह बन गया। यह ज़ाहिर है कि अमीन के क़त्ल होने के बाद सलतनत मामून के पाए नाम हो गई मगर यह पहले कहा जा चुका है कि अमीन नाननहाल की तरफ़ से अरबीउन नस्ल था और मामून अजमिउन नस्ल था। अमीन के क़त्ल होने से ईराक़ की अरब का़ैम और अरकाने सलतनत के दिल मामून की तरफ़ से साफ़ नहीं हो सकते थे बल्कि वह ग़मो ग़स्से की कैफ़ीयत महसूस करते थे दूसरी तरफ़ खुद बनी अब्बास में से एक बडी़ जमाअत जो अमीन की तरफ़ दार थी इससे भी मामून को हर तरह का ख़तरा लगा हुआ था। औलादे फ़ात्मा (स.अ.) में से बहुत से लोग जो वक़्त्न फ़वक़्तन बनी अब्बास के मुक़ाबिल ख़ड़े होते रहते थे वह ख़्वाह क़त्ल कर दिये गये हों या जिला वतन किये गए हों या क़ैद रखे गए हों उनके मुआफ़िक़ एक जमाअत थी जो अगर चे हुकूमत का कुछ बिगाड़ न सकती थी मगर दिल ही दिल में हुकूमते बनी अब्बास से बेज़ार ज़रूर थी। ईरान में अबू मुस्लिम ख़ुरासानी ने बनी उमय्या के खि़लाफ़ जो इश्तेआल पैदा किया वह इन मज़ालिम को याद दिला कर जो बनी उमय्या के हाथों हज़रते इमाम हुसैन (अ.स.) और दूसरे बनी फ़ात्मा (स.अ.) के साथ किये गये थे। इस से ईरान में इस ख़ानदान के साथ हमदर्दी का पैदा होना फ़ितरी था। दरमियान में बनी अब्बास ने इससे ग़लत फ़ायदा उठाया मगर इतनी मुद्दत में कुछ ना कुछ ईरानियों की आंखें भी खुल गई होगीं कि उनसे कहा गया था क्या और इक़्तेदार किन लोगों ने हासिल कर लिया है। मुम्किन है कि ईरानी क़ौम के इन रूझानात का चर्चा मामून के कानो तक भी पहुँचा हो। अब जिस वक़्त की अमीन के क़त्ल के बाद वह अरब क़ौम पर और बनी अब्बास के ख़ानदान पर भरोसा नहीं कर सकता था और उसे हर वक़्त इस हल्क़े से बग़ावत का अन्देशा था तो उसे इसी सियासी मस्लहत इसी में मालूम हुई। अरब के खि़लाफ़ अजम और बनी अब्बास के खि़लाफ़ बनी फ़ात्मा को अपना बनाया जाए और चुंकि तरज़े अमल में ख़ुलूस समझा नहीं जा सकता और वह आम तबाए पर असर नहीं डाल सकता। अगर यह नुमाया हो जाए कि वह सीयासी मसलहतों की बिना पर है इस लिये ज़रूरत हुई कि मामून मज़हबी हैसियत से अपनी शियत नवाज़ी और विलाए अहले बैत के चर्चे अवाम में फैलाए और वह यह दिखलाए कि वह इन्तेहाई नेक नीयती पर क़ाएम है। ‘‘ अब हक़ बा हक़दार रसीद के मकूले को सच्चा बनाना चाहता है।’’

इस सिलसिले में जनाबे शेख़ सद्दूक़ आलाल्लाहो मुक़ामा ने फ़रमाया है कि इसने अपनी नज़र की हिक़ायत भी शाया की कि जब अमीन का और मेरा मुक़ाबला था और बहुत नाज़ुक हालत थी और यह उसी वक़्त मेरे खि़लाफ़ सीसतान और किरमान में भी बग़ावत हो गई थी और ख़ुरासान में भी बेचैनी फैली हुई थी और फ़ौज की तरफ़ से भी इतमिनान न था और उस वक़्त दुश्वार माहोल में मैंने खुदा से इलतिजा की और मन्नत मानी कि अगर यह सब झगड़े ख़त्म हो जायें और मैं बामे खिलाफ़त तक पहुँचू तो उसको उसके असली हक़दार यानी औलादे फ़ात्मा मे से जो इसका अहल है उस तक पहुँचा दूंगा। इसी नज़र के बाद मेरे सब काम बनने लगे और आखि़र तमाम दुश्मनों पर फ़तेह हासिल हुई यक़ीनी यह वाक़िया मामून की तरफ़ से इस लिये बयान किया गयाा कि इसका तर्ज़े अमल खुलूसे नियत और हुस्ने नियत पर मुबनी समझा जाए। यूं तो अहले बैत (अ.स.) के खुले दुश्मन सख़्त से सख़्त थे वह भी इनकी हक़ीक़त और फ़ज़ीलत से वाक़िफ़ थे। मगर शीयत के मानी यह जानना तो नहीं है बल्कि मोहब्बत रखना और इताअत करना है और मामून के तरज़े अमल से यह ज़ाहिर है कि वह इस दावाए शीयत और मोहब्बते अहले बैत का ढिंढोरा पीटने के बावजूद खुद इमाम की इताअत नहीं करना चाहता था बल्कि इमाम को अपना मंशा के मुताबिक़ चलाने की कोशिश थी। वली अहद बनने के बारे में आपके इख़्तेआरात को बिल्कुल सलब कर दिया गया और आपको मजबूर बना दिया गया था। इससे ज़ाहिर है कि यह वली अहदी की तफ़वीज भी एक हाकिमाना तशद्द था जो उस वक़्त इमाम के साथ किया जा रहा था।

इमाम रज़ा (अ.स.) का वली अहदी को क़ुबूल करना बिल्कुल वैसा ही था जैसा हारून के हुक्म से इमाम मूसा काज़िम (अ.स.) का जेल ख़ाने में चला जाना। इस लिये जब इमाम रज़ा (अ.स.) मदीने से ख़ुरासान की तरफ़ रवाना हो रहे थे तो आपके रंजो सदमा और इस्तेराब की कोई हद न थी। रौज़ा ए रसूल से रूख़सत के वक़्त आपका वही आलम था जो हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) का मदीने से रवानगी के वक़्त था। देखने वालों ने देखा कि आप बे ताबाना रौज़े के अन्दर जाते हैं और नालाओ आह के साथ उम्मत की शिकायत करते हैं। फिर बाहर निकल कर घर जाने का इरादा करते हैं और फिर दिल नहीं मानता फिर रौज़े से लिपट जाते हैं यही सूरत कई मरतबा हुई। रावी का बयान है कि मैं हज़रत के क़रीब गया तो फ़रमाया , ऐ महूल ! मैं अपने जद्दे अमजद के रौज़े से ब जब्र जुदा किया जा रहा हूँ , अब मुझको यहां आना नसीब न होगा।(सवानेह इमाम रज़ा (अ.स.) जिल्द 3 पृष्ठ 7)

महूल शैबानी का बयान है कि जब वह ना गवार वक़्त पहुँच गया कि हज़रते इमाम रज़ा (अ.स.) अपने जद्दे बुज़ुर्गवार के रौज़ा ए अक़दस से हमेशा के लिये विदा हुए तो मैंने देखा कि आप बेताबान अन्दर जाते और बा नालाओ आह बाहर आते हैं और दिल में उम्मत की शिकायत करते हैं या बाहर आ कर गिरया ओ बुका फ़रमाते हैं और फिर अन्दर चले जाते हैं। आपने चन्द बार ऐसे ही किया और मुझसे न रहा गया और मैंने हाज़िर हो कर अर्ज़ की मौला इज़्तेराब की क्या वजह है ? फ़रमाया , ऐ महूल ! मैं अपने नाना के रौज़े से जबरन जुदा किया जा रहा हूँ। मुझे इसके बाद अब यहां आना न नसीब होगा। मैं इसी मुसाफ़िरत और ग़रीबुल वतनी में क़त्ल कर दिया जााऊंगा और हारून रशीद के मक़बरे में मदफ़ून हूंगा। उसके बाद आप दौलत सरा में तशरीफ़ लाए और सब को जमा कर के फ़रमाया कि मैं तुम से हमेशा के लिये रूख़सत हो रहा हूँ। यह सुन कर घर में एक अज़ीम कोहराम बरबा हो गया और सब छोटे बड़े रोने लगे। आपने सब को तसल्ली दी और कुछ दीनार आइज़्ज़ा में तक़सीम कर के राहे सफ़र इख़्तेयार फ़रमाया। एक रवायत की बिना पर आप मदीने से रवाना हो कर मक्के मोअज़्ज़मा पहुँचे और वहां तवाफ़ कर के ख़ाना ए काबा को रूख़सत फ़रमाया।


हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) का नेशा पूर में वरूदे मसऊद

रज़ब 200 हिजरी में हज़रत मदीनाए मुनव्वरा से मर्व ‘‘ ख़ुरासान ’’ की जानिब रवाना हो गये। अहलो अयाल और मुअल्लेक़ीन सब को मदीना मुनव्वरा ही में छोड़ा। उस वक़्त इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की उम्र पांच बरस की थी। आप मदीने ही में रहे। मदीना से रवानगी के वक़्त कूफ़ा और कु़म की सीधी राह छोड़ कर बसरा और अहवाज़ का ग़ैर मुतअर्रिफ़ रास्ता इस ख़तरे के पेशे नज़र इख़्तेयार किया गया कि कहीं अक़ीदत मन्दाने इमाम मुज़ाहमत न करें। ग़रज़ कि क़तए मराहल और तै मनाज़िल करते हुए यह लोग नेशापुर के क़रीब पहुँचे।

मुवर्रेख़ीन लिखते हैं कि जब आपकी मुक़द्दस सवारी शहर नेशा पुर के क़रीब पहुँची तो जुमला उलमा व फ़ुज़ला शहर ने बैरून शहर हाज़िर हो कर आपकी रस्मे इस्तग़बाल अदा की। दाखि़ले शहर होते हुए तो तमाम खुर्द व बुज़ुर्ग शौक़े ज़्यारत में उमड़ आए। मरकबे आली जब मरबा शहर (चैक) में पहुँचा , तो हुजूमे ख़लाएक़ से ज़मीन पर तिल रखने की जगह न थी उस वक़्त इमाम रज़ा (अ.स.) क़ातिर नामी खच्चर पर सवार थे जिसका तमाम साज़ो सामान नुक़रई था , ख़च्चर पर अमारी थी और इस पर दोनों तरफ़ पर्दे पड़े हुए थे और ब रवाएते छतरी लगी हुई थी। उस वक़्त इमामुल मुहद्देसीन हाफ़िज़ अबू ज़रआ राज़ी और मोहम्मद बिन अस्लम तूसी आगे आगे और उनके पीछे अहले इल्म व हदीस की एक अज़ीम जमाअत हाज़िरे खि़दमत हुई और बई कलमात इमाम (अ.स.) को मुख़ातिब किया। ‘‘ ऐ जमीय सादात के सरदार , ऐ तमाम इमामों के इमाम और ऐ मरकज़े पाकीज़गी आपको रसूले अकरम का वास्ता , आप अपने अजदाद के सदक़े में अपने दीदार का मौक़ा दीजिए और कोई हदीस अपने जद्दे नाम दार की बयान फ़रमाईये ’’ यह कह कर मोहम्मद बिन राफ़े , अहमद बिन हारिस , यहिया बिन यहिया और इस्हाक़ इब्ने सहविया ने आपके क़ातिर की बाग थाम ली। उनकी इस्तदुआ सुन कर आप ने सवारी रोक दीए जाने के लिये इशारा फ़रमाया और इशारा किया कि हिजाब उठा दिए जाएं। फ़ौरन तामील की गई। हाज़ेरीन ने ज्यों ही वह नूरानी चेहरा अपने प्यारे रसूल के जिगर गोशे का देखा सीनों मे दिल बेताब हो गए। दो ज़ुल्फ़ें रूए अनवर पर मानिन्द गेसूए मुश्क बूए जनाबे रसूले खुदा (स.अ.) फूटी हुई थी। किसी को यारए ज़ब्त बाक़ी न रहा वह सब के सब बे अख़्तेयार धाड़े मार कर रोने लगे। बहुत ने अपने कपड़े फाड़ डा़ले कुछ ज़मीन पर गिर कर लोटने लगे बाज़ सवारी के गिर्द पेश घूमने और चक्कर लगाने लगे और मरक़बे अक़दस के ज़ीन व लजाम चूमने लगे और अमारी का बोसा देने लगे। आखि़र मरक़बे आली के क़दम चूमने के इश्तेआक में दर्राना बढ़े चले आते थे ग़रज़ कि अजीब तरह का वलवला था कि जमाले बा कमाल को देखने से किसी को सेरी नहीं हुई थी। टक टकी लगाए रूख़े अनवर की तरफ़ निगरां थे। यहां तक कि दो पहर हो गई और इनके मौजूद शौक़ व तमन्ना की पुर जोशियों में कोई कमी नहीं आई। इस वक़्त उलमा और फ़ुज़ला की जमाअत ने बा आवाज़े बुलन्द पुकार कर कहा कि ऐ मुसलमानों ! ज़रा ख़ामोश हो जाओ और फ़रज़न्दे रसूल (स.अ.) के लिये आज़र न बनो इनकी इस्तेदुआ पर क़दरे शोर व ग़ुल थमा तो इमाम रज़ा (अ.स.) ने इरशाद फ़रमाया:-

“ हदसनी अबी मुसा काज़िम , अन अबीहा जाफ़र अल सादिक़ अन अबीह मोहम्मद अल बाक़र अन अबीह ज़ैन अल अबेदीन अन अबीह हुसैन अल शहीदे करबला अन अबीह अली अल मुर्तुज़ा क़ाला हदसनी जैबी व क़रता ऐनी रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वालेही वसल्लम क़ाला हदसनी जिबराईल अलैहिस्सलाम क़ाला हदसनी रब्बुल इज़्ज़त सुबहानहा व ताला क़ाला ला इलाहा इल्लाह हस्सनी फ़मन क़ाला दख़ला हसनी वमन दखला हसना अमेना मन अज़ाबी ’’

तर्जुमा:- मेरे पदरे बुज़ुर्गवार हज़रत इमाम मुसिए काज़िम (अ.स.) ने मुझ से फ़रमाया और उनसे इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने और उनसे इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) ने उनसे इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) ने और उनसे इमाम हुसैन (अ.स.) ने और उनसे हज़रत अली मुर्तुज़ा (अ.स.) ने और उन से हज़रत रसूले करीम जनाबे मोहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.) ने और उनसे जनाबे जिब्राईले अमीन ने और उनसे खुदा वन्दे आलम ने इरशाद फ़रमाया कि ला इलाहा इल्लल्लाह मेरा क़िला है जो इसे ज़बान पर जारी करेगा मेरे क़िले में दाखि़ल हो जायेगा और जो मेरे क़िला ए रहमत में दाखि़ल होगा मेरे अज़ाब से महफ़ूज़ हो जायेगा। (मसनदे इमाम रज़ा (अ.स.) पृष्ठ 7 प्रकाशित मिस्र 1341 हिजरी)

यह फ़रमा कर आपने परदा खिंचवा दिया और चन्द क़दम बढ़ने के बाद फ़रमाया ‘‘ बा शरतहा व शरूतहा व अना मन शरूतहा ला इलाहा अल्लल्लाह ’’ कहने वाला नजात ज़रूर पायेगा लेकिन इसके कहने और नजात पाने में चन्द शर्तें हैं जिनमें से एक शर्त मैं भी हूं यानी अगर आले मोहम्मद (स.अ.) की मोहब्बत दिल में न होगी तो ला इलाहा इल्लल्लाह कहना काफ़ी न होगा। उलेमा ने ‘‘तारीख़े नेशापूर’’ के हवाले से लिखा है कि इस हदीस के लिखने में मफ़रूद दावातों के अलावा 24 हज़ार कममदान इस्तेमाल किये गये।

अहमद बिन हम्बल का कहना है कि यह हदीस जिन असनाद और जिन नामों के ज़रिए से बयान फ़रमाई गई है अगर इन्हीं नामों को पढ़ कर मजनून पर दम किया जाय तो ‘‘ ला फ़ाक़ मन जुनूना ’’ ज़रूर उसका जुनून जाता रहेगा और वह अच्छा हो जायेगा।

अल्लामा शिब्लन्जी नूरूल अबसार में बा हवाला ए अबूल क़ासिम तज़ीरी लिखते हैं कि सासाना के रहने वाले बाज़ रऊसा ने जब इस सिलसिला ए हदीस को सुना तो उसे सोने के पानी से लिखवा कर अपने पास रख लिया और मरते वक़्त वसीअत की कि उसे मेरे कफ़न में रख दिया जाए चुंकि ऐसा ही किया गया मरने के बाद उसने ख़्वाब में बताया कि ख़ुदा वन्दे आलम ने मुझे इन नामों की बरकत से बख़्श दिया है और मैं बहुत आराम की जगह पर हूँ।

मोअल्लिफ़ कहता है कि इसी फ़ाएदे के लिये शिया अपने कफ़न में जवाब नामा के तौर पर इन असमा को लिख कर रखते हैं। बाज़ किताबों में है कि नेशा पुर में आप से बहुत से करामात नमूदार हुए।

शहर ख़ुरासान में नुज़ूले इजलाल

अबुल सलत हरदी नाक़िल है कि असनाए सफ़र में जब आप ख़ुरासान पहुँचे तो दिन ढल चुका था आप फ़रीज़ाए ज़ौहर अदा करने के लिये सवारी से उतरे और आपने तजदीदे वज़ू के लिये पानी तलब फ़रमाया अर्ज़ की गई मौला इस वक़्त यहां पानी नहीं। यह सुन कर आपने एक ज़मीन पर पड़े हुए पत्थर के नीचे से चश्मा जारी फ़रमाया और वज़ू कर के नमाज़ अदा फ़रमाई। जनाब शेख़ सद्दूक़ रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि इस चश्मे का हनूज़ असर बाक़ी है।

शहर तूस में आप का नुज़ूलो वरूद

जब इस सफ़र में चलते चलते शहर तूस पहुँचे तो वहां देखा कि एक पहाड़ से लोग पत्थर तराश कर हंाडी वग़ैरा बनाते हैं। आप इस से टेक लगा कर खड़े हो गये और आपने उसे नरम होने की दुआ की। वहां के बाशिन्दों का कहना है कि पहाड़ का पत्थर बिल्कुल नरम हो गया और बड़ी आसानी से बर्तन बनने लगे।

क़रिया सना बाद में हज़रत का नुज़ूले करम

शहरे तूस से रवाना हो कर आप क़रिया सना बाद पहुँचे और आपने मोहल्ला नौख़ान में क़याम फ़रमाया और लिबास उतार कर धुलने को दे दिया। हमीद बिने क़ैबता का बयान है कि आपकी जेब में एक दोआ कनीज़ ने पाई। उसने मुझे दिखाई मैंने उसे हज़रत तक पहुँचाते हुए दरियाफ़्त किया कि इस दुआ का फ़ायदा क्या है ? फ़रमाया यह शरीरों के शर से हिफ़ाज़त का हिर्ज़ है। फिर आप कु़ब्बाए हारून में तशरीफ़ ले गए और आपने क़िबले की तरफ़ ख़त खैंच कर फ़रमाय कि मैं इस जगह दफ़्न किया जाऊँगा और यह जगह मेरी ज़्यारत गाह होगी। इसके बाद आपने नमाज़ अदा फ़रमाई और वहां से चलने का इरादा किया।

इमाम रज़ा (अ.स.) का दारूल खि़लाफ़ा मर्व में नुज़ूल

इमाम (अ.स.) तय मराहिल और के़तय मनाज़िल करने के बाद जब मर्व पहुँचे जिसे सिकन्दर ज़ुलकरनैन ने बारवाएते मोअज़्ज़मुल बलदान आबाद किया था और जो उस वक़्त दारूल सलतनत था , तो मामून ने चन्द रोज़ ज़ियाफ़तो तकरीम के मरासिम अदा करने के बाद क़ुबूले खि़लाफ़त का सवाल पेश किया। हज़रत ने उस से इसी तरह इनकार किया जिस तरह हज़रत अमीरल मोमेनीन (अ.स.) चौथे मौक़े पर खि़लाफ़त पेश किए जाने के वक़्त इनकार फ़रमा रहे थे। मामून को खिलाफ़त से दस्त बरदार होना दर हक़िक़त मन्ज़ूर न था वरना वह इमाम को इसी पर मजबूर करता चुनान्चे जब हज़रत ने खि़लाफ़त के कु़बूल करने से इन्कार फ़रमाया तो उसने वली अहदी का सवाल पेश किया। हज़रत इसके भी अन्जाम से न वाक़िफ़ न थे। नीज़ बाख़ुशी जाबिर हुकूमत की तरफ़ से कोई मन्सब कु़बूल करना आपके ख़ानदान के उसूल के खि़लाफ़ था। हज़रत ने उस से भी इन्कार फ़रमाया। मगर उस पर मामून का इक़रार जब्र की हद तक पहुँच गया और उसने साफ़ कह दिया कि ‘‘ लाबद मन क़बूलक़ ’’ अगर आप इसको मन्ज़ूर नहीं कर सकते तो इस वक़्त आपको अपनी जान से हाथा धोना पड़ेगा। जान का ख़तरा क़ुबूल किया जा सकता है जब मज़हबी मफ़ाद का क़याम जान देने का मौक़ूफ़ हो वरना हिफ़ाज़ते जान शरीअते इस्लाम का बुनियादी हुक्म है। इमाम (अ.स.) ने फ़रमाया , यह है तो मैं मजबूरन क़ुबूल करता हूँ मगर कारो बारे सलतनत में बिल्कुल दख़्ल न दूँगा , हाँ अगर किसी बात में मुझ से मशविरा लिया जाएगा तो नेक मशविरा ज़रूर दूंगा। इसके बाद यह वली अहदी से बरा नाम सलतनते वक़्त के एक ढखोसले से ज़्यादा वक़त न रखती थी। जिससे मुम्किन है कि कुछ अर्से तक सियासी मक़सद में कामयाबी हासिल कर ली गई हो मगर इमाम की हैसियत अपने फ़राएज़ के अन्जाम देने में बिल्कुल वह थी जो उनके पेश रौ अली मुर्तुज़ा (अ.स.) अपने ज़माने के बाइख़्तेदार ताक़तों के साथ इख़्तियार कर चुके थे। जिस तरह उनका कभी कभी मशविरा दे देना उन हुकूमतों को सही व जाएज़ नहीं बना सकता वैसे ही इमाम रज़ा (अ.स.) का इस नौइय्यत से वली अहदी का क़ुबूल फ़रमाना इस सलतनत के जवाज़ का बाएस नहीं हो सकता था सिर्फ़ मामून की एक राज हट थी जो सियासी ग़रज़ के पेशे नज़र इस तरह पूरी हो गई मगर इमाम (अ.स.) ने अपने दामन को सलतनते जु़ल्म के इक़्दामात और नजमो नस्ख़ से बिल्कुल अलग रखा। तवारीख़ में है कि मामून ने हज़रते इमाम रज़ा (अ.स.) से कहा उसके बाद आपने दोनों हाथ आसमान की तरफ़ बलन्द किये और बारगाहे अहदीयत में अर्ज़ की परवरदीगार तू जानता है कि इस अमर को मैंने बामजबूरत और नाचारी और ख़ौफ़ो क़त्ल की वजह से क़ुबूल कर लिया है। ख़ुदा वन्दा तू मेरे इस फे़ल पर मुझसे उसी तरह मवाखि़ज़ा ना करना जिस तरह जनाबे युसूफ़ और जनाबे दानियाल से बाज़पुर्स नहीं फ़रमाई। इसके बाद कहा मेरे पालने वाले तेरे अहद के सिवा कोई अहद नहीं तेरी अता की हुई हैसियत के सिवा कोई इज़्ज़त नहीं। ख़ुदाया तू मुझे अपने दीन पर क़ाएम रहने की तौफ़ीक़ इनायत फ़रमा।

ख़्वाजा मोहम्मद पासी का कहना है कि वली अहदी के वक़्त आप रो रहे थे। मुल्ला हुसैन लिखते हैं कि मामून की तरफ़ से इसरार और हज़रत की तरफ़ से इन्कार का सिलसिला दो माह जारी रहा इसके बाद वली अहदी क़ुबूल की गई।

जलसा ए वली अहदी का इन्एक़ाद

पहली रमज़ान 201 हिजरी ब रोज़े पंज शम्बा जलसा ए वली अहदी मुनक़िद हुआ। बड़ी शानो शौकत और तुज़ुको एहतिशाम के साथ तक़रीब अमल में लाई गई। सब से पहले मामून ने अपने बेटे अब्बास को इशारा किया और उसने बैअत की फिर और लोग बैअत से शरफ़याब हुए। सोने और चांदी के सिक्के सरे मुबारक पर निसार किये गए और तमाम अरकाने सलतनत और मुलाज़मीन को इनामात तक़सीम हुए।

मामून ने हुक्म दिया कि हज़रत के नाम का सिक्का तैय्यार किया जाए। चुनान्चे दिरहम और दीनार पर हज़रत के नाम का नक़्श हुआ और तमाम शहरों में वह सिक्का चलाया गया। जुमे के खु़त्बे में हज़रत का नामे नामी दाखि़ल किया गया। यह ज़ाहिर है कि हज़रत के नामें मुबारक का सिक्का अक़ीदत मन्दों के लिये तबरूक और ज़मानत की हैसियत रखता था। इस सिक्के को सफ़रो हज़र में हिफ़्जे़ जान के लिये साथ रखना यक़ीनी अमर था। साहेबे जिन्नातुल खुलूद ने बहरो बर के सफ़र में तहफ़्फ़ुज़ के लिए आपके तवस्सुल का ज़िक्र किया है। उसी के याद गार में बतौरे ज़मानत ब अक़ीदा ए तहफ़्फ़ुज़ हम अब भी सफ़र में बाज़ू पर इमाम ज़ामिन सामिन का पैसा बांधते हैं।

अल्लामा शिब्ली नोमानी लिखते हैं कि 33,000 (तेतिस हज़ार) मरदो ज़न वग़ैरा की मौजूदगी में आपको वली अहदे खि़लाफ़त बना दिया गया। उसके बाद उसने तमाम हाज़ेरीन से हज़रत इमाम अली रज़ा (अ.स.) के लिये बैएत ली और दरबार का लिबास बजाय काले के हरा क़रार दिया गया। जो सादात का इम्तेयाज़ी लिबास था। फ़ौज की वर्दी भी बदल दी गई। तमाम मुल्क में एहकामे शाही नाफ़िज़ हुए कि मामून के बाद अली रज़ा (अ.स.) ही तख़्त के मालिक है और उनका लक़ब है ‘‘ अल रज़ा मन आले मोहम्मद ’’ । हसन बिन सहल के नाम भी फ़रमान गया कि उनके लिये बैअते आम ली जाय और उमूमन अहले फ़ौज व अमाएदे बनी हाशिम सब्ज़ (हरे) रंग के फ़रहरे और सब्ज़ कुलाह व क़बाएं इस्तेमाल की जाएं।

अल्लामा शरीफ़ जरजानी ने लिखा है कि क़ुबूले वली अहदी के मुताअल्लिक़ जो तहरीर हज़रत इमाम अली रज़ा (अ.स.) ने मामून को लिखी। उसका मज़मून यह था कि ‘‘ चंूकि मामून ने हमारे उन हुक़ूक़ को तसलीम कर लिया है जिनको उनके आबाओ अजदाद ने नहीं पहचाना था लेहाज़ा मैंने उनकी दरख़्वास्ते वली अहदी क़ुबूल कर ली अगरचे जफ़र व जामेए से मालूम होता है कि यह काम अंजाम को न पहुँचेगा । ’’

अल्लामा शिब्लन्जी लिखते हैं कि क़ुबूले वली अहदी के सिलसिले में आपने जो कुछ तहरीर फ़रमाया था उस पर गवाह की हैसियत से फ़ज़ल बिन सहल , सहल बिन फ़ज़ल , यहिया बिन अक़सम , अब्दुल्लाह इब्ने ताहिर , समाना बिन अशरस , बशर बिन मोतमर , हम्माद बिन नोमान वग़ैरा के दस्तख़त थे। उन्होंने यह भी लिखा है कि इमाम अली रज़ा (अ.स.) ने इस जलसे वली अहदी में अपने मख़्सूस अक़ीदत मन्दों को क़रीब बुला कर कान में फ़रमाया था कि इस तक़रीब पर दिल में ख़ुशी को जगह न दो। मुलाहेज़ा हों(सवाएक़े मोहर्रेका़ पृष्ठ 122, मतालेबुल सूऊल पृष्ठ 282, नूरूल अबसार पृष्ठ 142, आलामुल वुरा पृष्ठ 193, कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 112, जन्नातुल ख़ुलूद पृष्ठ 31, अल मामून पृष्ठ 82, वसीलतुन नजात पृष्ठ 379, अरजहुल मतालिब पृष्ठ 454, मसन्द इमाम रज़ा पृष्ठ 7, तारीख़े तबरी , शरह मवाक़िफ़ , तारीख़े आइम्मा पृष्ठ 472, तारीख़े अहमदी पृष्ठ 354, शवाहेदुन नबूवत , नियाबुल मोअद्दता , फ़सलुल ख़त्ताब , हिलयातुल अवलिया , रौज़तुल सफ़ा , उयून अख़बारे रज़ा , दमए साकेबा , सवानए इमाम रज़ा (अ.स.)

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की वली अहदी का दुशमनों पर असर

तारीख़े इस्लाम में है कि इमाम रज़ा (अ.स.) की वली अहदी की ख़बर सुन कर बग़दाद के अब्बासी ख़याल कर के कि यह खि़लाफ़त हमारे ख़ानदान से निकल चुकी , कमाल दिल सोख़ता हुये और उन्होंने इब्राहीम बिन मेंहदी को बग़दाद के तख़्त पर बिठा दिया और मोहर्रम 202 हिजरी में मामून की माजूली का ऐलान कर दिया। बग़दाद और उसके क़रीबी जगहों मे बिल्कुल बद नज़मी फैल गई। लुच्चे ग़ुन्डे दिन दहाड़े लूट मार करने लगे। जुनूबी ईराक़ और हिजाज़ में भी मामेलात की हालत ऐसी ही हो रही थी। फ़ज़ल वज़ीरे आज़म सब ख़बरों को बादशाह से पोशीदा रखता था मगर इमाम रज़ा (अ.स.) ने उसे ख़बरदार कर दिया। बादशाह वज़ीर की तरफ़ से बदज़न हो गया। मामून को जब इन शोरिशों की ख़बर हुई तो बग़दाद की तरफ़ रवाना हो गया। सरख़स में पहुँच कर उसने फ़ज़ल बिन सहल वज़ीरे सलतनत को हम्माम में क़त्ल करा दिया।(तारीख़े इस्लाम जिल्द 1 पृष्ठ 61)

शम्सुल उलेमा शिब्ली नोमानी , हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की बैअते वली अहदी का ज़िक्र करते हुए लिखते हैं कि इस अनोखे हुक्म ने बग़दाद में एक क़यामत अंगेज़ हलचल मचा दी और मामून से मुख़ालेफ़त का पैमाना लबरेज़ हो गया। बाजो़ ने सब्ज़ रंग वग़ैरा के एख़्तियार करने के हुक्म की ब जब्र तामील की मगर आम सदा यही थी कि खि़लाफ़त ख़ानदाने अब्बास के दायरे से बाहर नहीं जा सकती।(अल मामून पृष्ठ 82)

अल्लामा शिब्लन्जी लिखते हैं कि हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) जब वली अहदे खि़लाफ़त मुक़र्रर किये जाने लगे मामून के हाशिया नशीन सख़्त बद ज़न और दिल तंग हो एक और उन पर यह ख़ौफ़ छा गया कि अब खि़लाफ़त बनी अब्बास से निकल कर बनी फ़ात्मा की तरफ़ चली जायेगी और इसी तसव्वुर ने उन्हें हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) से सख़्त मुतनफ़्फ़िर कर दिया।(नूरूल अबसार पृष्ठ 143)

वाक़िए हिजाब

मोअर्रेख़ीन लिखते हैं कि इस वाक़िए वली अहदी से लोगों में इस दर्जा बुग़ज़ हसद और किना पैदा हो गया कि वह लोग मामूली मामूली बातों पर इसका मुज़ाहेरा कर देते थे।

अल्लामा शिब्लन्जी और अल्लामा इब्ने तल्हा शाफ़ई लिखते हैं कि हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की वली अहदी के बाद यह उसूल था कि आप मामून से अकसर मिलने के लिये तशरीफ़ ले जाया करते थे और होता यह था कि जब आप दहलीज़ के क़रीब पहुँचते थे तो तमाम दरबान और ख़ुद्दाम आपकी ताज़ीम के लिये खड़े हो जाते थे और सलाम कर के पर्दा ए दर उठाया करते थे। एक दिन सब ने मिल कर तय कर लिया कि कोई पर्दा न उठाए चुनान्चे ऐसा ही हुआ जब इमाम (अ.स.) तशरीफ़ लाए तो हिज्जाब ने पर्दा न उठाया। मतलब यह था कि इससे इमाम की तौहीन होगी , लेकिन अल्लाह के वली को कोई ज़लील नहीं कर सकता। जब ऐसा मौक़ा आया तो एक तुन्द हवा ने पर्दा उठाया और इमाम दाखि़ले दरबार हो गए। फिर जब आप वापस तशरीफ़ लाए तो हवा ने बदस्तूर पर्दा उठाने में सबक़त की। इसी तरह कई दिन तक होता रहा। बिल आखि़र वह सब के सब शर्मिन्दा हो गये और इमाम (अ.स.) की खि़दमत मिस्ल साबिक़ करने लगे।(नूरूल अबसार पृष्ठ 143 मतालेबुल सूऊल पृष्ठ 282, शवाहेदुन नबूअत पृष्ठ 197)

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) और नमाज़े ईद

वली अहदी को अभी ज़्यादा दिन न गुज़रे थे कि ईद का मौक़ा आ गया मामून ने हज़रत से कहला भेजा कि आप सवारी पर जा कर लोगों को नमाज़े ईद पढ़ायें। हज़रत ने फ़रमाया कि मैंने पहले ही तुम से शर्त कर ली है कि बादशाहत और हुकूमत के किसी काम में हिस्सा न लूंगा और न इसके क़रीब जाऊँगा इस वजह से तुम मुझको इस नमाज़े ईद से भी माफ़ रखो। मगर मामून ने बहुत इसरार किया। हज़रत ने फ़रमाया कि अगर तुम माफ़ कर दो तो बेहतर है वरना मैं नमाज़े ईद के लिये उसी तरह जाऊँगा जिस तरह मेरे जद्दे माजिद हज़रत रसूले ख़ुदा (स.अ.) तशरीफ़ ले जाया करते थे। मामून ने कहा आपको इख़्तेयार है जिस तरह चाहे जायें। इसके बाद उसने सवारों और प्यादों को हुक्म दिया कि हज़रत के दरवाज़े पर हाज़िर हों। जब यह ख़बर शहर में मशहूर हुई तो लोग ईद के रोज़ सड़को पर छतों पर हज़रत की सवारी की शान देखने को जमा हो गये , एक भीड़ लग गई। औरतों और लड़कों सब को आरज़ू थी कि हज़रत की ज़्यारत करें। और आफ़ताब निकलने के बाद हज़रत ने गु़स्ल किया और कपड़े बदले , सफ़ेद अम्मामा सर पर बांधा , इत्र लगाया और असा हाथ में ले कर ईद गाह जाने पर आमादा हुए । इसके बाद नौकरों और ग़ुलामों को हुक्म दिया कि तुम भी ग़ुस्ल कर के कपड़े बदल लो और इसी तरह पैदल चलो। इस इन्तेज़ाम के बाद हज़रत घर से बाहर निकले। पाएजामा आधी पिंडली तक उठा लिया। कपड़ों को समेट लिया , नंगे पांव हो गए और फिर दो तीन क़दम चल कर खड़े हो गए और सर को आसमान की तरफ़ बलन्द कर के कहा , अल्लाहो अकबर , अल्लाहो अकबर । हज़रत के साथ नौकरों ग़ुलामों और फ़ौज के सिपाहियों ने भी तकबीर कही।

रावी का बयान है कि जब इमाम रज़ा (अ.स.) तकबीर कह रहे थे तो हम लोगों को मालूम होता था कि दरो दीवार और ज़मीनो आसमान से हज़रत की तकबीरों का जवाब सुनाई देता है। इस हैबत को देख कर यह हालत हुई कि सब लोग और खुद लशकर वाले ज़मीन पर गिर पड़े। सब की हालत बदल गई। लोगों ने छुरियों से अपनी जुतीयों के कुल तसमें काट दिये और जल्दी जल्दी जुतियां फेक कर नगें पांव हो गयें। शहर भर के लोग चीख़ चीख़ कर रोने लगे। एक कोहराम बरपा हो गया। इसकी ख़बर मामून को भी हो गई। वज़ीर फ़ज़ल बिन सहल ने इससे कहा कि अगर इमाम इमाम रज़ा (अ.स.) की इसी हालत से ईद गाह तक पहुँच जायेंगे तो मालूम नहीं क्या फ़ितना और हंगामा हो जायेगा। सब लोग इनकी तरफ़ हो जायेगें और हम नहीं जानते कि हम लोग कैसे बचेगें। वज़ीर की इस तक़रीर पर मुतानब्बे हो कर मामून ने अपने पास से एक शख़्स को हज़रत की खि़दमत में भेज कर कहला भेजा कि मुझ से ग़लती हो गई है जो आप से ईद गाह जाने के लिये कहा। इस से आपको ज़हमत हो रही है और मैं आपकी मशक़्क़त को पसन्द नहीं करता। बेहतर है कि आप वापस चले आयें और ईदगाह जाने की ज़हमत न फ़रमायें। पहले जो शख़्स नमाज़ पढ़ाता था पढ़ायेगा। यह सुन कर हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) वापस तशरीफ़ लाए और नमाज़े ईद न पढ़ सके।(वसीलत न नजात पृष्ठ 382, मतालेबुल सूऊल पृष्ठ 282 व उसूले काफ़ी)

अल्लामा शिब्लन्जी लिखते हैं कि फ़राज़ अल अरज़ा अला बैत व रक़ब अल मामून फ़सल ब अलनास कि रज़ा (अ.स.) दोलत सरा को वापस तशरीफ़ लाए और मामून ने जा कर नमाज़ पढ़ाई।(नूरूल अबसार पृष्ठ 143)

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की मदह सराई और देबले खि़ज़ाई और अबू नवास

अरब के मशहूर शायर जनाब देबले ख़ेज़ाई का नाम अबू अली देबले इब्ने अली बिन ज़र्रीन है। आप 148 हिजरी में पैदा हो कर 245 हिजरी में ब मक़ाम मशूश वफ़ात पा गये। (रिजाले तूसी 374) और अबूनवास का पूरा नाम अबू अली हसन बिन हानी इब्ने अब्दुल आला हुवाज़ी बसरी बग़दादी हैं। यह 136 हिजरी में पैदा हो कर 196 हिजरी में फ़ौत हुए। देबल आले मोहम्मद (अ.स.) के मद्दाहे ख़ास थे और अबूनवास हारून रशीद अमीन व मामून का नदीम था।

देबले खि़ज़ाई के बे शुमार अशआर मदहे आले मोहम्मद (अ.स.) में मौजूद हैं। अल्लामा शिब्लन्जी तहरीर फ़रमाते हैं कि जिस ज़माने में इमाम रज़ा (अ.स.) वली अहदे सलतनत थे। देबले खि़ज़ाई एक दिन दारूल सलतनत मर्व में आपसे मिले और उन्होंने कहा कि मैंने आपकी मदह में 120 अशआर पर मुशतमिल एक क़सीदा लिखा है। मेरी तमन्ना है कि मैं सब से पहले हुज़ूर ही को सुनाऊँ। हज़रत ने फ़रमाया बेहतर है पढ़ो।

देबले खि़जा़ई ने अशआर पढ़ना शुरू किया। क़सीदे का मतला यह है।

ज़करत महल अर रबामन अरफ़ात

फ़जरयत दमाअलएैन बिल इबारत ’’

जब देबल क़सीदा पढ़ चुके तो इमाम (अ.स.) ने एक सौ अशरफ़ी की थैली उन्हें अता फ़रमाई। देबल ने शुकरिया अदा करने के बाद उसे वापस करते हुए कहा कि मौला मैंने यह क़सीदा कु़रबतन इल्लहा कहा है मैं कोई अतिया नहीं चाहता ख़ुदा ने मुझे सब कुछ दे रखा है। अलबत्ता हुज़ूर मुझे जिस्म से उतरे हुए कपड़े से कुछ इनायत फ़रमा दें तो वह मेरी ऐन ख़्वाहिश के मुताबिक़ होगा। आपने एक जुब्बा अता करते हुए फ़रमाया कि इस रक़म को भी ले लो यह तुम्हारे काम आयेगी। देबल ने उसे ले लिया। थोड़े अर्से के बाद देबल मर्व से ईराक़ जाने वाले क़ाफ़िले के साथ रवाना हुए। रास्ते में चोरों और डाकुओ ने हमला कर के सब का सब कुछ लूट लिया और चन्द आदमियों को गिरफ़्तार कर भी कर लिया जिन में देबल भी थे। डाकुओं ने माल तक़सीम करते वक़्त देबल का एक शेर पढ़ा। देबल ने पूछा यह किसका शेर है ? उन्होंने कहा किसी का होगा। देबल ने कहा यह मेरा शेर है। उसके बाद उन्होंने सारा क़िस्सा सुना दिया। उन लोगों ने देबल के सदक़े में सब कुछ छोड़ दिया और सब का माल वापस कर दिया यहां तक कि यह नौबत आई कि उन लोगों ने वाक़िया सुन कर इमाम रज़ा (अ.स.) का जुब्बा ख़रीदना चाहा और उसकी क़ीमत एक हज़ार लगा दी। देबल ने जवाब दिया कि यह मैंने ब तौरे तबर्रूक अपने पास रखा है इसे फ़रोख़्त न करूगां। बिल आखि़र बार बार गिरफ़्तार होने के बाद उन्होंने उसे एक हज़ार अशरफ़ी पर फ़रोख़्त कर दिया। अल्लामा शिब्लन्जी ब हवाला ए अबूसलत हरवी लिखते हैं कि देबल ने जब इमाम रज़ा (अ.स.) के सामने यह क़सीदा पढ़ा तो आप रो रहे थे और आपने दो बैतों के बारे में फ़रमाया था कि यह अशआर इल्हामी है।(नूरूल अबसार पृष्ठ 138)

अल्लामा अब्दुल रहमान लिखते हैं कि हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) ने क़सीदा सुनते हुए नफ़से ज़किया के तज़किरे पर फ़रमाया कि ऐ देबल इस जगह एक शेर का और इज़ाफ़ा करो , ताकि तुम्हारा क़सीदा मुकम्मल हो जाये। उन्हों ने अर्ज़ कि मौला फ़रमायें। इरशाद हुआ।

व क़ब्र बातूस , नालहा मन मुसिबता

अल हत अल्लल अहशाए बिज़ क़रात

देबल ने घबरा कर पूछा , मौला यह किस की क़ब्र होगी जिसका हुज़ूर ने हवाला दिया है। फ़रमाया , ऐ देबल! यह क़ब्र मेरी होगी और मैं अन क़रीब इस आलमे ग़ुरबत में जब कि मेरे आइज़्ज़ा व अक़रेबा व बाल बच्चे मदीने में हैं शहीद कर दिया जाऊँगा और मेरी क़ब्र यहीं बनेगी। ऐ देबल जो मेरी ज़्यारत को आयेगा जन्नत में मेरे हमराह होगा।(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 199)

देबल का यह मशहूर क़सीदा मजालिसे मामेनीन पृष्ठ 466 में मुकम्मल मन्क़ूल है। अलबत्ता इसका मतलब बदला हुआ है। अल्लामा शेख़ अब्बास क़ुम्मी ने लिखा है कि देबल ने एक किताब लिखी थी जिसका नाम था ‘‘ तबक़ाते शोअरा ’’ ।(सफ़ीनतुल बेहार जिल्द 1 पृष्ठ 241)

अबू नवास के मुताअल्लिक़ उलेमाए इस्लाम लिखते हैं कि एक दिन इसके दोस्तों ने इस से कहा कि तुम अकसर अशआर कहते हो और फिर मदहे भी किया करते हो लेकिन अफ़सोस की बात है कि तुम ने हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की मदह में कोई शेर नहीं कहा। उसने जवाब दिया कि हज़रत की जलालते क़द्र ही ने मुझे मदहे सराई से रोका है। मेरी हिम्मत नहीं पड़ती कि आपकी मदह करूँ। यह कह कर उसने चन्द अशआर पढ़े। जिसका तरजुमा यह है कि , उम्दा कलाक के हर रंग और मज़ाक़ के अशआर सब लोगों से अच्छे तुम्ही कहते हो बल्कि अच्छे अशआर में तुम्हारे मदहीया क़सीदे ऐसे होते हैं कि जिनसे सुनने वालों के सामने मोती झड़ते हैं। फिर तुम ने हज़रत इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) के बेटे हज़रत इमाम अली रज़ा (अ.स.) की मदह और हज़रत के फ़ज़ायल व मनाक़िब में कोई क़सीदा क्यों नहीं लिखा। तो मैं ने सब के जवाब में कह दिया कि भाईयों जिन जलील उश शान इमाम के आबाए कराम के ख़ादिम जिब्राईल ऐसे फ़रिशते हों उनकी मदह करना मुझ से मुम्किन नहीं है। उसके बाद उसने चन्द अशआर आपकी मदह में लिखे जिसका तरजुमा यह है। यह हज़रात आइम्मा ए ताहेरीन ख़ुदा के पाको पाकीज़ा किये हुए हैं और इनका लिबास भी तय्यबो ताहिर है। जहां भी उनका ज़िक्र होता है वहां उन पर दुरूद का नारा बलन्द हो जाता है। जब हसब व नसब बयान होते वक़्त कोई शख़्स अलवी ख़ानदान का न निकले तो उसको इब्तिदाये ज़माने से कोई फ़ख्र की बात नहीं मिलेगी। जब मख़लूक़ को पैदा किया फिर उसको हर तरह उस्तवार किया और संवारा तो उसी खुदा के बरगज़ीदा हज़रात आप लोगों को ख़ुदा ने सब से ज़्यादा शरीफ़ भी क़रार दिया और सब पर फ़ज़ीलत भी दी। मैं सच कहता हूँ कि आप हज़रात ही मलाए आला हैं और आप ही के पास क़ुरआने मजीद का इल्म और सूरों के मतालिब व मफ़ाहिम हैं।(दफ़ियातुल ऐयान जिल्द 1 पृष्ठ 322 व नूरूल अबसार पृष्ठ 138 प्रकाशित मिस्र)

मज़ाहिबे आलम के उलेमा से हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) के इल्मी मुनाज़िरे

मामून रशीद को ख़ुद भी इल्मी ज़ौक़ था। उसने वली अहदी के मरहले तो तय करने के बाद हज़रत इमाम अली रज़ा (अ.स.) से काफ़ी इस्तेफ़ादा किया फिर अपने ज़ौक़ के तक़ाज़े पर उसने मज़ाहिबे आलम के उलेमा को दावते मुनाज़िरा दी और हर तरफ़ से उलेमा को तलब कर के हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) से मुक़ाबला कराया। अहदे मामून में इमाम रज़ा (अ.स.) से जिस क़दर मुनाज़िरे हुए हैं उनकी तफ़सील अकसर कुतुब में मौजूद हैं। इस सिलसिले में ऐहतेजाजी तबरसी , बिहार , दमऐ साकेबा वग़ैरा जैसी किताबें देखी जा सकती हैं। इख़्तेसार के पेशे नज़र सिर्फ़ दो चार मुनाज़िरे लिखता हूँ।

आलिमे नसारा से मुनाज़िरा

मामून रशीद के अहद में नसारा का एक बहुत बड़ा आलिम व मुनाज़िर शोहरते आम्मा रखता था। जिसका नाम ‘‘ जासलीक ’’ था। उसकी आदत थी कि मुताकल्लमीने इस्लाम से कहा करता था कि हम तुम दोनो नबूवते ईसा और उनकी किताब पर मुत्तफ़िक़ हैं और इस बात पर भी इत्तेफ़ाक़ रखते हैं कि वह आसमान पर ज़िन्दा मौजूद हैं। इख़तिलाफ़ है तो सिर्फ़ मोहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.) में है। तुम उनकी नबूवत का एतेक़ाद रखते हो और हम इन्कार करते हैं फिर हम तुम उनकी वफ़ात पर मुत्तफ़िक़ हो गये हैं। अब ऐसी सूरत में कौन सी दलील तुम्हारे पास बाक़ी है जो हमारे लिये हुज्जत क़रार पाए। यह कलाम सुन कर अकसर मुनाज़िर ख़ामोश हो जाया करते थे। मामून रशीद के इशारे पर एक दिन वह हज़रात इमाम रज़ा (अ.स.) से भी हम कलाम हुआ। मौक़ा ए मनाज़ेरह में उसने मज़कूरा सवाल दोहराते हुये कहा कि पहले आप यह फ़रमायें कि हज़रत ईसा की नबूवत और उनकी किताब दोनों पर आपका ईमान व एतेक़ाद है या नहीं। आपने इरशाद फ़रमाया कि मैं उस ईसा की नबूवत का यक़ीनन एतेक़ाद रखता हूँ जिसने हमारे नबी हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.) की नबूवत की अपने हवारीन को बशारत दी है और उस किताब की तसदीक़ करता हूँ जिसमें यह बशारत दर्ज है। जो ईसाई उसके मोतरिफ़ नहीं और जो किताब उसकी शारेह और मुसद्दक़ नहीं उस पर मेरा ईमान नहीं है। यह जवाब सुन कर जासलीक खा़मोश हो गया। फिर आपने इरशाद फ़रमाया कि ऐ जासलीक हम उस ईसा को जिसने हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.) की नबूवत की बशारत दी , नबीए बरहक़ जानते हैं मगर तुम उनकी तन्क़ीस करते हो और कहते हो कि वह नमाज़ रोज़े के पाबन्द न थे। जाशलीक ने कहा कि हम तो यह नहीं कहते वह तो हमेशा क़ायमुल लैल और साएमुन नहार रहा करते थे। आपने फ़रमाया , ईसा तो बनाबर एतेक़ाद नसारा ख़ुद माज़ अल्लाह ख़ुदा थे। तो वह रोज़ा और नमाज़ किसके लिये करते थे। यह सुन कर जाशलीक मबहूत हो गया और कोई जवाब न दे सका। अलबत्ता यह कहने लगा कि जो मुर्दो को ज़िन्दा करे , जुज़ामी को शिफ़ा दे , नाबीना को बीना बनाये और पानी पर चले क्या वह इसका सज़ावार नहीं कि उसकी परस्तिश की जाय और उसे माबूद समझा जाय। आपने फ़रमाया इलयासाह भी पानी पर चलते थे , अन्धे , कोढ़ी को शिफ़ा देते थे। इसी तरह हिज़क़ील पैग़म्बर (अ.स.) ने 35 हज़ार इन्सानों को साठ बरस के बाद ज़िन्दा किया था। कौमे इसराईल के बहुत से लोग ताऊन के ख़ौफ़ से अपने घर छोड़ कर बाहर चले गये थे। हक़्के़ ताआला ने एक सआत में सब को मार दिया था बहुत दिनों के बाद एक नबी इस्तेख़्वाने बोसीदा (बोसीदा हड्डियों) से गुज़रे तो ख़ुदा वन्दे आलम ने उन पर वही नाज़िल की उन्हें आवाज़ दो। उन्होंने कहा ऐ अज़ाम बालिया (मुर्दा हड्डियों) उठ ख़डे हो। वह सब ब हुक्मे ख़ुदा उठ खड़े हुये। इसी लिये हज़रते इब्राहीम (अ.स.) के परिन्दों को ज़िन्दा करने और हज़रते मूसा (अ.स.) के कोहे तूर पर ले जाने और रसूले ख़ुदा (स.अ.) के अहयाए अम्वात फ़रमाने का हवाला दे कर फ़रमाया कि इन चीज़ों पर तौरेत व इन्जील और क़ुरआन मजीद की शहादत मौजूद है। अगर मुर्दो को ज़िन्दा करने से इन्सान ख़ुदा हो सकता है तो यह सब अम्बिया भी ख़ुदा होने के मुस्तहक़ हैं। यह सुन क रवह चुप हो गया और उसने इस्लाम क़ुबूल करने के सिवा और चारा न देखा।

आलिमे यहूद से मनाज़ेरा

उल्माए यहूद में से एक आलिम जिसका नाम ‘‘ रासुल जालूत ’’ था , को अपने इल्म पर बड़ ग़ुरूर और तकब्बुर व नाज़ था। वह किसी को भी अपनी नज़र में न लाता था। एक दिन उसका मनाज़रह और मुबाहेसा फ़रज़न्दे रसूल (स.अ.) हज़रत इमाम अली रज़ा (अ.स.) से हो गया। आपसे गुफ़्तुगू के बाद उसने अपने इल्म की हक़ीक़त जानी और समझा कि मैं ख़ुद फ़रेबी में मुबतेला हूँ।

इमाम (अ.स.) की खि़दमत में हाज़िर होने के बाद उसने अपने ख़्याल के मुताबिक़ बहुत सख़्त सवालात किये। जिनके तसल्ली बख़्श और इत्मीनान आफ़रीन जवाबात से बहरावर हुआ। जब वह सवालात कर चुका तो इमाम (अ.स.) ने फ़रमाया कि ऐ ‘‘ रासुल जालूत ’’ तुम तौरैत की इस इबारत का क्या मतलब समझते हो कि ‘‘ आया नूर सीना से और रौशन हुआ जबले साएर से और ज़ाहिर हुआ कोहे फ़ारान से ’’ उसने कहा कि इसे हम ने पढ़ा ज़रूर है लेकिन उसकी तशरीह से वाक़िफ़ नहीं हूँ। आपने इरशाद फ़रमाया , कि नूर से वही मुराद है। तमरे सीना से वह पहाड़ मुराद है जिस पर हज़रत मूसा (अ.स.) ख़ुदा से कलाम करते थे। जबल साईर से महल व मक़ामें ईसा (अ.स.) मुराद है। कोहे फ़ारान से जबले मक्का मुराद है जो शहर से एक मंज़िल के फ़ासले पर वाक़े है। फिर फ़रमाया तुम ने हज़रते मूसा (अ.स.) की यह वसीयत देखी है कि तुम्हारे पास बनी अख़वान से एक नबी आयेगा उसकी बात मानना और उसके क़ौल की तसदीक़ करना। उसने कहा देखी है। आपने पूछा की बनी अख़वान से कौन मुराद है ? उसने कहा मालूम नहीं। आपने फ़रमाया कि वह औलादे इस्माईल हैं क्यों कि वह हज़रत इब्राहीम के एक बेटे हैं और बनी इसराईल के मुरेसे आला हज़रत इस्हाक़ बनी इब्राहीम के भाई हैं और उन्हीें से हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.) हैं।

उसके बाद जबले फ़ारान वाली बशारत की तशरीह फ़रमा कर कहा कि शैया नबी का क़ौल तौरैत में मज़कूर है कि मैंने दो सवार देखे कि जिनके परतौ से दुनिया रौशन हो गई। उन्में एक गधे पर सवारी किये था और एक ऊँट पर। ऐ ‘‘ रासुल जालूत ’’ तुम बतला सकते हो उस से कौन मुराद हैं ? उसने इन्कार किया , आपने फ़रमाया कि राकेबुल हमार से हज़रत ईसा (अ.स.) और राकेबुल जमल से हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.) मुराद हैं।

फिर आपने फ़रमाया कि तुम हज़रत जबकूक नबी के उस क़ौल से वाक़िफ़ हो कि ख़ुदा अपना बयान जबले फ़ारान से लाया और तमाम आसमान हम्दे इलाही की आवाज़ों से भर गये। उसकी उम्मत और उसके लशकर के सवार ख़ुशकी और तरी में जंग करेंगे। उन पर एक किताब आयेगी और सब कुछ बैतुल मुकद्दस की ख़राबी के बाद होगा। इसके बाद इरशाद फ़रमाया कि यह बताओ कि तुम्हारे पास हज़रत मूसा (अ.स.) की नबूवत की क्या दलील है ? उसने कहा कि उनसे वह उमूर ज़ाहिर हुए जो उनसे पहले के अम्बिया पर नहीं हुए थे। मसलन दरिया ए नील का शिग़ाफ़ता होना। असा का संाप बन जाना। एक पत्थर से बारह चशमों का जारी होना और यदे बैज़ा वग़ैरा। आपने फ़रमाया कि जो भी इस क़िस्म के मोजेज़ात को ज़ाहिर करे और नबूवत का मुद्दई हो उसकी तसदीक़ करनी चाहिये। उसने कहा नही। आपने फ़रमाया क्यों ? कहा इस लिये कि मूसा को जो क़ुरबत या मंज़िलत हक़्क़े ताआला के नज़दीक़ थी वह किसी को नहीं हुई। लेहाज़ा हम पर वाजिब है कि जब तक कोई शख़्स बैनेह वही मोजेज़ात व करामात न दिखलाये हम उसकी नबूवत का इक़रार न करेंगे। इरशाद फ़रमाया कि तुम मूसा (अ.स.) से पहले अम्बिया मुरसलीन की नबूवत का किस तरह इक़रार करते हो हांला कि उन्होंने न कोई दरिया शिग़ाफ़्ता किया न किसी पत्थर से चशमें निकाले न उनका हाथ रौशन हुआ और न उनका असा अज़दहा बना। ‘‘ रासुल जालूत ’’ ने कहा कि जब ऐसे उमूर व अलामात ख़ास तौर से उनसे ज़ाहिर हों जिनके इज़हार से उमूमन तमाम ख़लाएक़ आजिज़ हो , तो वह अगरचे बैनेह ऐसे मोजेज़ात हों या न हों। उनकी तस्दीक़ हम पर वाजिब हो जायेगी।

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) ने फ़रमाया कि हज़रत ईसा (अ.स.) भी मुर्दों को ज़िन्दा करते , कोरे मादर ज़ाद (पैदाईशी अन्धे) को बीना बनाते। मबरूस को शिफ़ा देते। मिट्टी की चिड़िया बना कर हवा में उड़ाते थे। वह यह उमूर हैं जिनसे आम लोग आजिज़ हैं फिर तुम उनको पैग़म्बर क्यों नहीं मानते ? रासुल जालूत ने कहा कि लोग ऐसा कहते हैं मगर हमने उनको ऐसा करते देखा नहीं है। फ़रमाया तो क्या आयात व मोजेज़ाते मूसा (अ.स.) को तुमने अपनी आंखों से देखा है आखि़र वह भी तो मोतबर लोगों की ज़बानी सुना ही होगा। वैसा ही अगर ईसा (अ.स.) के मोजेज़ात मोतबर लोगों से सुनो तो तुमको उनकी नबूवत पर ईमान लाना चाहिये और बिल्कुल इसी तरह हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.) की नबूवत व रिसालत का इक़रार आयातो , मोजेज़ात की रौशनी में करना चाहिये। सुनो उनका एक अज़ीम मोजेज़ा कु़रआने मजीद है जिसकी फ़साहतो बलाग़त का जवाब क़यामत तक नहीं दिया जा सकेगा। यह सुन कर वह ख़ामोश हो गया।

आलिमे मजूस से मनाज़ेरा

मजूसी यानी आतश परस्त का एक मशहूर आलिम ‘‘ हरबिज़ा अकबर ’’ हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की खि़दमत में हाज़िर हो कर इल्मी गुफ़्तुगू करने लगा। आपने उसके सवालात के मुकम्मल जवाबात इनायत फ़रमाये। उसके बाद उस से सवाल किया कि तुम्हारे पास ‘‘ ज़र तश्त ’’ की नबूवत की क्या दलील है। उसने कहा कि उन्होेंने हमारी ऐसी चीज़ों की तरफ़ रहबरी फ़रमाई है जिसकी तरफ़ पहले किसी ने रहनुमाई नहीं की थी। हमारे असलाफ़ कहा करते थे कि ‘‘ ज़र तश्त ’’ ने हमारे लिये वह उमूर मुबाह किये हैं कि उनसे पहले किसी ने नहीं किये थे। आपने फ़रमाया कि तुम को इस अम्र में क्या उज़्र हो सकता है कि कोई शख़्स किसी नबी और रसूल के फ़ज़ायलो कमालात तुम पर रौशन करे और तुम उसके मानने में पसो पेश करो। मतलब यह है कि जिस तरह तुम ने मोतबर लोगों से सुन कर ‘‘ ज़र तश्त ’’ की नबूवत मान ली। उसी तरह मोतबर लोगों से सुन कर अम्बिया और रसूल की नबूवत के मानने में तुम्हें क्या उज़्र हो सकता है। यह सुन क रवह ख़ामोश हो गया।

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) और इस्मते अम्बिया (अ.स.)

अम्बिया कराम , दवाज़दाह इमाम और जनाबे मरयम व हज़रते फ़ात्मा (स.अ.) की असमत का एतेक़ाद मुसल्लेमात से है , लेकिन बद क़िस्मती से बाज़ मुसलमान जो उनकी हैसियत को सही तौर पर नहीं समझ सके वह इसमें कलाम करते हैं इस लिये बहस ख़ास अहमियत की मालिक बन गई है और उलमा ने इस पर ख़ामा फ़रसाई फ़रमाई है। इस सिलसिले में किताब तन्ज़ीहुल अम्बिया , एहतेजाजे तबरीसी , बेहारूल अनवार , शरह तजरीद वग़ैरह देखने के क़ाबिल हैं। हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) जो ख़ुद अपने आबाओ अजदाद और अम्बिया की तरह मासूम थे उन से जब इस मसले के मुताअल्लिक़ सवाल किया गया तो आपने उसका जवाब निहायत ख़ूब सूरत तरीक़े पर दे कर मुख़ातिब को मुतमईन फ़रमा दिया।

अली बिन जहम कहते हैं कि एक दफ़ा मामून रशीद ने हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) से दरयाफ़्त किया कि जब ख़ुदा वन्दे आलम ने हज़रते आदम (अ.स.) के लिये वाज़े तौर पर फ़रमा दिया ‘‘ फ़ाआसा आदम रब्बेहे फ़ग़वा ’’ कि आदम ने अपने परवर दिगार की नाफ़रमानी की और वह बहक गये तो फिर वह मासूम कहां रहे।

आपने फ़रमाया कि ख़ुदा का हुक्म था कि ऐ आदम तुम दोनों बेहिश्त में रहो और जो चाहे खाओ पियो। ‘‘ वला तक़रेबा हुदल शजरतः फ़ता कूना मिनल ज़ालेमीन ’’ लेकिन इस दरख़्त के नज़दीक़ न जाना , वरना अपना खुद बिगाड़ोगे। यानी उनसे यह नहीं फ़रमाया था कि इस शजर और उसके जिन्स दीगर से भी न खाना और उन्होंने इस दरख़्त ममनूआ से खाया भी नहीं। मगर शैतान के वसवसे से एक और वैसे ही दरख़्त से खा लिया क्यों कि शैतान ने उन से कहा कि ख़ुदा वन्दे तआला ने तुम को ख़ास उस दरख़्त से मना फ़रमाया है इस क़िस्म के और दरख़्तों से मुमानियत नहीं फ़रमाई और उसके पास जाने की भी मुमानियत नहीं फ़रमाई। खाने का ज़िक्र इरशादे ख़ुदा वन्दी में मौजूद नहीं। फिर शैतान ने उनसे क़सम खाई कि मैं तुम्हारा नासेह मुशफ़िक़ हूँ। हज़रत आदम व हव्वा ने इस से पहले किसी को झूठी क़सम खाते नहीं सुना था। उनको धोका हो गया और उसकी क़सम पर एतेबार कर के उसके मुरतकिब हो गये और यह इज़तेराब भी उन हज़रात से क़ब्ले नबूवत हुआ और गुनाहे कबीरा न था। जिससे मुस्तहक़ दुख़ूले जहन्नम होते। यह सिर्फ़ सग़ायरे मौहूबा से था जो अम्बिया (अ.स.) से क़ब्ल अज़ वही जाएज़ हैै। जब ख़ुदा वन्दे आलम ने उनको बरगुज़ीदा किया और नबी गर दाना तो मासूम थे। गुनाहे कबीरा व सग़ीरा उन हज़रात से सादिर न होता था। चुनान्चे अल्लाह तआला ने इरशाद फ़रमाया , ‘‘ सुम इतमेबाह रबा फ़ताबा अलैहे ’’ ख़ुदा ने उनको बरगुज़ीदा किया और उनकी तौबा क़ुबूल कर ली।

अल्लामा तबरिसी फ़रमाते हैं सग़ाएर मौहूबा से तरक अवला मुराद है जो अम्बिया के लिये क़बल अज़ल नुज़ू लवही जाएज़ है। मोअल्लिफ़ का कहना है कि (नहीं) की दो क़िस्में है। नहीं तरहीमी और नहीं तनज़ीही लातक़रबा में यही थी। यानी इसके क़़रीब न जाना तुम्हारे लिये बेहतर होगा। फ़ताकूना अलज़ालमीन और अगर चले गए तो तुम अपना ख़ुद नुक़सान करोगे। जैसा कि किताब ‘‘ तनज़ीह अम्बिया ’’ से मुस्तफ़ाद होता है।

इसी तरह आपने हज़रत इब्राहीम (अ.स.) , हज़रत मूसा (अ.स.) , हज़रत यूसुफ़ (अ.स.) और हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.) की असमत पर रौशनी डाली और बतलाया कि इज़रात से गुनाहों का सादिर होना इमकान व कु़दरत के बावजूद मोहाल था। इन से कभी कोई गुनाह सग़ीरा हो या कबीरा सादिर नहीं हुआ।(उयून अख़बार रज़ा पृष्ठ 71 प्रकाशित ईरान)


आपकी तसानीफ़

उलमा ने आपकी तसानीफ़ में सहीफ़तुर रज़ा , सहीफ़तुर रिज़विया , तिब्बे रज़ा और और मसनदे इमाम रज़ा (अ.स.) का हवाला दिया है और बताया है कि आपकी तसानीफ़ हैं। सहीफतुर्ररज़ का ज़िक्र अल्लामा मजालिसी , अल्लामा तबरसी और अल्लामा ज़हमख़शरी ने किया है। इसका उर्दू तरजुमा हकीम इकराम अली रज़ा लखनवी ने प्रकाशित कराया था। अब जो तक़रीबन नापैद है। सहीफ़तुर अरज़ा का तरजुमा मोलवी शरीफ़ हुसैन साहब बरेलवी ने किया है। तिब्बे रज़ा का ज़िक्र अल्लामा मजलिसी शेख़ मुन्तख़बुद्दीन ने किया है। इसकी शरह फ़ज़लुल्लाह इब्ने इरावन्दी ने लिखी है इसी को रिसाला ज़हबिया भी कहते हैं और इसका तरजुमा मौलाना हकीम मक़बूल अहमद साहब क़िबला मरहूम ने भी किया है। इसका तज़किरा शमशुल उलमा अल्लामा शिबली नोमानी ने अल मामून पृष्ठ 92 में किया है। मसनदे इमाम रज़ा (अ.स.) का ज़िक्र अल्लामा चेलपी ने किताब मशफ़ुल ज़नून में किया है। जिसको अल्लामा अब्दुल्लाह अमरत सरी ने किताब अरजहुल मतालिब के पृष्ठ 454 पर नक़ल किया है। नाचीज़ मुअल्लिफ़ के पास यह किताब मिस्र की मतूबा मौजूद है। यह किताब 1321 हिजरी में छपी है और इसके मुरतिब अल्लामा शेख़ अब्दुल अलवासा मिस्री और महशी अल्लामा मोहम्मद इब्ने अहमद है।

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) ने ‘‘ माऊल लहम ’’ बनाने और मौसिमयात के मुताअल्लिक़ जो अफ़दा फ़रमाया है उसका ज़िक्र किताबों में मौजूद है। तफ़सील के लिये मुलाहेज़ा हो।(दमए साकेबा वग़ैरा)

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) और शेरे क़ालीन

अल्लामा मोहम्मद तक़ी इब्ने मोहम्मद बाक़र हज़रत इमाम हसन असकरी (अ.स.) के हवाले से तहरीर फ़रमाते हैं कि हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की वली अहदी के ज़माने में एक दफ़ा शदीद तरीन क़हत पड़ा। मामून ने हज़रत की खि़दमत में हाज़िर हो कर अर्ज़ की मौला कोई तदबीर कीजिए और किसी सूरत से दुआ फ़रमाइये कि ख़ुदा वन्दे आलम नज़ूले बारां कर दे। अब मुल्क की बुरी हालत हो गई है। भूख और प्यास से लोगों के जान बहक़ होने का सिलसिला शुरू हो गया है। आपने इरशाद फ़रमाया ऐ बादशाह घबरा नहीं। मैं दो शम्बे के दिन तलबे बारीश के लिये निकलूगां। मुझे अपने परवर दिगार से बड़ी तवक़्क़ा है। इंशा अल्लाह नजूले बारां होगा और ख़ल्के़ ख़ुदा की परेशानी दूर होगी। ग़रज़ कि वक़्ते मुक़र्रर आया और इमाम (अ.स.) सहरा की तरफ़ बरामद हुए। आपने मुसल्ला बिछाया और दस्ते दुआ बारगाहे अहदीयत में बलन्द कर के दोआ फ़रमाई अभी दुआ के जुमले तमाम न होने पाए थे कि ठन्डी हवा के झोंके चलने लगे। बादल छा गया बूंदे पड़नी लगीं और इस क़दर बारिश हुई कि जल थल हो गया। बादशाह भी ख़ुश हुआ पब्लिक भी मुतमईन और आसूदा हुई और लोग अपने अपने घरों को वापस चले गए। इस करामते ख़ास और इस्तेजाबत दोआ की वजह से बहुत से हासिद जल भुन कर ख़ाकिस्तर हो गए। एक दिन जब दरबार आरास्ता था उन्हीं हासिदों में से एक ने कहा , लोग आपके बारे में बहुत से ख़ुराफ़ात नशर करते हैं और आपको बढ़ाने की सई में मुनहमिक़ हैं। सब चाहते हैं कि आपका पाया बादशाह सलामत के पाय से बलन्द कर दें और सुने सब से बड़ी करामत जो आपकी इस वक़्त मशहूर की जा रही है वह यह है कि आप ने बारिश करा दी है मैं कहता हूँ कि जब कि बारिश अर्से से नहीं हुई थी। वह आपकी दुआ करते या न करते उसे तो होना ही था लेहाज़ा मेरी नज़र में यह करामत कोई हैसियत नहीं रखती हां करामत और मोजिज़ा तो यह है कि पेशे नज़र क़ालीन और मस्नद पर जो शेर की तस्वीर बनी हुई है उसे मुजस्सम कर दीजिये और हुक्म दीजिए की मुझे फाड़ खाए।

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) ने फ़रमाया कि देख मैंने किसी से नहीं कहा कि मेरी करामत बयान करे और न यह कहा कि मुझे बढ़ाने की कोशिश करे। अब रह गया आबे बारानी का वाक़ेया , वह ख़ुदा की मेहरबानी और इनायत से अमल में आया है , मैं इसमें भी अपनी कोई तारीफ़ नहीं चाहता। यह सब ख़ुदा की इनायत है। अलबत्ता जो तुझे यह हौंसला है कि शेरे क़ालीन व मसनद मुजस्सम हो जाए और तुझे फाड़ खाए तो ले यह किए देता हूँ।

यह फ़रमा कर आप शेर की तस्वीरों की तरफ़ मुतवज्जा हुए और आपने फ़रमाया , ‘‘ कि ऐन फ़ाजिर कि नज़दे शमाअस्त और राबदरौ असर राबाक़ी नगज़ारीद ’’ इस फ़ासिक़ व फ़ाजिर को चीर फाड़ कर खा जाओ कि इसका निशान तक बाक़ी न रहे।

इमाम (अ.स.) का यह फ़रमाना था कि दोनों शेर की तस्वीर मुजस्सम हो गयीं और उन्होंने हमहमा भर कर काफ़िर अज़ली पर हमला कर दिया जिसका नाम हमीद बिन महरान था और उसे पारा पारा कर के खा डाला। इस हंगामे को देख कर मामून बेहोश हो गया। हज़रत ने उसे होश में ला कर शेरों को हुक्म दिया कि अपनी असली हालत व सूरत में हो जाओ चुनान्चे वह फिर क़ालीन व मसनद की तसवीन बन गये।(काशेफ़ुन नक़ाब शरह उयून अख़बार रज़ा पृष्ठ 216)

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) के साथ उम्मे हबीबा बिन्ते मामून की शादी और मामून का सफ़रे ईराक़

वाक़ेए वली अहदी के क़बल बाद से ले कर 202 हिजरी के शुरू तक हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) से मनाज़िरे , मुबाहसे और इल्मी मज़ाहिरे मामून रशीद कराता रहा। अब इसकी वजह या यह हो कि शोहरते आम्मा हो जाए और अलवी सरनिगंू रहें और अलमे ख़ुरूज बुलन्द न करें या यह हो कि अब्बासीयों पर हुज्जतें क़ायम हो जायं और हज़रत की अहलीयत व क़ाबलीयत से मरऊब हो कर वह लोग मुख़लेफ़त और तमरूद व सरकशी का क़सद न करें और ठीक से मामून को हुकूमत करते दें। या यह हो कि इमाम रज़ा (अ.स.) और उनके मानने वालों के दिल साफ़ हो जायें और किसी को बाद के आने वाले वाक़ेयात में यह शुबहा न हो कि मनाज़रे और मुबाहसे के बाद मामून ने अपने ख़ुफ़िया मक़सद की तकमील के लिये ईराक़ का सफ़र करने का फ़ैसला किया। इसके क़ब्ल इसने यह ज़रूरी समझा कि शुबहे की गुनजाईश को ख़त्म कर देने के लिये अपनी लड़की की शादी इमाम रज़ा (अ.स.) से कर दे। चुनान्चे उस ने रऊसा अल शहाद बरसरे दरबार मजिलिसे अक़्द कर के अपनी बेटी उम्में हबीब की शादी हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) के साथ कर दी।

अल्लामा शिब्लन्जी लिखते हैं कि ‘‘ ज़ौजा अल मामून अबनाता उम्में हबीब फी अव्वल सुन्नतह असनैन वमातैन वल मामून मतार्वज्जाहू अल ईराक़ ’’ मामून ने अवएल 202 हिजरी में अपनी लड़की उम्मे हबीबा का अक़्द हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) के साथ कर दिया , यह उस वक़्त किया जब कि वह सफ़रे ईराक़ का तहय्या कर चुका था।(नूरूल अबसार पृष्ठ 142 प्रकाशित मिस्र)

अल्लामा मोहम्मद रज़ा लिखते हैं कि उम्मे हबीबा को आपके तसर्रूफ़ में नहीं दिया गया।(जन्नातुल ख़ुलूद पृष्ठ 32) यह 202 हिजरी ही है जिसमें अब्बासीयों ने बग़दाद की हुकूमत से मामून को बे दख़ल कर के इसकी जगह पर इब्राहीम बिन मेहदी को ख़लीफ़ा बनाने का ऐलान कर दिया था। इस वक़्त बग़दाद की हालत यह थी कि वह इन्तेशार और बद नज़मियों का मरकज़ बन गया था।

मुवर्रिख़ ज़ाकिर हुसैन वाक़िए वली अहदी के बाद के हालात के सिलसिले में लिखते हैं कि बग़दाद और उसके गिर्द व नवाह में बिल्कुल बदनज़मी फैल गई , लुच्चेख् ग़ुन्डे दिन दहाड़े लूट मार करने लगे। जुनूबी ईराक़ व हिजाज़ में भी मामलात की हालत ऐसी ही ख़राब हो रही थी। फ़ज़ल सब ख़बरों को पोशीदा रखता था । मगर इमाम रज़ा (अ.स.) ने उन्हें बा ख़बर कर दिया। बादशाह वज़ीर से बदज़न हो गया। मामून को जब इन शोरिशों की ख़बर हुई तो बग़दाद की तरफ़ रवाना हो गया। सरख़स में पहुँच कर उसने अपने वज़ीर को हम्माम में क़त्ल करा दिया। फिर जब तूस पहुँचा तो इमाम रज़ा (अ.स.) को जिनको वली अहद करने के सबब बग़दाद में बग़ावत हुई थी अग़ूरों में ज़हर दे कर शहीद कर दिया। मामून में ज़ाहिर में तो मातम किया और वहीं दफ़्न कर के मक़बरा तामीर कराया। मामून ने इमाम (अ.स.) की वफ़ात का हाल बग़दाद लिख भेजा जिससे वहां अमनो अमान क़ायम हो गया। मामून आगे बढ़ा यहां तक कि मदाएन पहुँच कर आठ दिन क़याम किया। जहां बग़दाद के जंगी सरदारों , रईसों से मिला। बनी अब्बास ने उसका इस्तक़बाल किया और उसने बाज़ अमाएद की दरख़्वास्त पर फिर वही अब्बासी सियाह रंग इख़्तेयार कर लिया। मामून के आने की ख़बर सुन कर इब्राहीम बिन मेहदी और उसके तरफ़दार भाग गये मगर फिर इब्राहीम पकड़ा गया।(तारीख़े इस्लाम जिल्द 1 पृष्ठ 61 वल फ़ख़्री वल मामून)

मामून रशीद अब्बासी और हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की शहादत

यह एक मुसल्लेमा हक़ीक़त है कि ग़ैर मासूम अरबाबे इक़्तेदार हवसे हुक्मरानी में किसी क़िस्म का सरफ़ा नहीं करते अगर हुसूले हुकूमत या तहफ़्फ़ुज़े हुक्मरानी में बाप बेटे , मां बेटी या मुक़द्दस से मुक़द्दस तरीन हस्तियों को भेंट चढा़ दे , तो वह उसकी परवाह नहीं करते। इसी बिना पर अरब में मिसाल के तौर पर कहा जाता है कि ‘‘ अल मुल्क अक़ीमुन ’’

अल्लामा वहीदुज़्ज़मा हैदार बादी लिखते हैं कि अल मुल्क अक़ीम बादशाहत बाझं है। यानी बादशाहत हासिल करने के लिये बाप बेटे की परवाह नहीं करता। बेटा बाप की परवाह नहीं करता बल्कि ऐसा भी हो जाता है कि बेटा बाप को मार कर खुद बादशाह बन जाता है।(अनवारूल लुग़त पारा 8 पृष्ठ 173) अब इस हवसे हुक्मरानी में किसी मज़हब और अक़ीदे का सवाल नहीं । हर वह शख़्स जो इख़्तेदार का भूखा होगा वह इस क़िस्म की हरकतें करेगा। मिसाल के लिये इस्लामी तवारीख़ की रौशनी में हुज़ूर रसूले करीम (स.अ.) की वफ़ात के फ़ौरन बाद के वाक़यात को देखिये। जनाबे सय्यदा (स.अ.) के मसाएब व आलाम और वजहे शहादत पर ग़ौर किजिये। इमाम हसन (अ.स.) के साथ बरताव पर ग़ौर फ़रमाईये। वाक़िया ए करबला और उसके पसे मंज़र , नीज़ दीगर आइम्मा ए ताहेरीन के साथ बादशाहाने वक़्त के सुलूक और उनकी क़ैदो बन्द और शहादत के वाक़ेयात को मुलाहेज़ा कीजिए। इन उमूर से यह बात वाज़े हो जायेगी कि हुक्मरानी के लिये क्या क्या मज़ालिम किए जा सकते हैं और कैसी कैसी हस्तियों की जानें ली जा सकती हैं और क्या कुछ किया जा सकता है। तवारीख़ में मौजूद है कि मामून रशीद अब्बासी की दादी ने अपने बेटे ख़लीफ़ा हादी को 26 साल की उम्र में ज़हर दिलवा कर मार दिया। मामून रशीद के बाप हारून रशीद अपने वज़ीरों के ख़ानदान बरामका को तबाह व बरबाद कर दिया।(अल मामून पृष्ठ 20) मरवान की बीवी ने अपने ख़ाविन्द को बिस्तरे ख़्वाब पर दो तकियों से गला घुटवा कर मरवा दिया। वलीद बिन अब्दुल मलिक ने फ़रज़न्दे रसूल इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) को ज़हर से शहीद किया। हश्शाम बिन अब्दुल मलिक ने इमाम मोहम्मद बाक़र (अ.स.) को ज़हर दिया। इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) को मन्सूर दवान्क़ी ने ज़हर से शहीद किया। इमाम मूसिए काज़िम (अ.स.) को हारून रशीद अब्बासी ने ज़हर से शहीद किया। इमाम अली रज़ा (अ.स.) को मामून अब्बासी ने ज़हर दे कर शहीद किया। इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) को मोतसिम बिल्लाह ने उम्मुल फ़ज़ल बिन्ते मामून के ज़रिये से ज़हर दिलवाया। इमाम अली नक़ी (अ.स.) को मोतमिद अब्बासी ने ज़हर से शहीद किया। ग़रज़ कि हुकूमत के सिलसिले में यह सब कुछ होता रहता है। औरंगज़ेब को देखिये , उसने अपने भाई को क़त्ल कराया और अपने बाप को सलतनत से महरूम कर के क़ैद कर दिया था। उसी ने शहीदे सालिस हज़रत नूरूल्लाह शुस्तरी (आगरा) की ज़बान गुद्दी से खिंचवाई थी। बहर हाल जिस तरह सब के साथ होता रहा। हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) के साथ भी हुआ।

तारीख़े शहादत

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की शहादत 23 ज़ीक़ाद 203 हिजरी मुताबिक़ यौमे जुमा बा मुक़ाम तूस वाक़ेए हुई है। (जिलाउल उयून पृष्ठ 280, अनवारूल ग़मानीह पृष्ठ 127, जन्नातुल ख़ुलूद पृष्ठ 31) आपके पास इस वक़्त अज़ीज़ अक़रबा औलाद वग़ैरा में कोई न था। एक तो आप खुद मदीना से ग़रीबुल वतन हो कर आए दूसरे यह कि दारूल सलतनत मर्व में भी आपने वफ़ात नहीं पाई बल्कि आप सफ़र की हालत में बा आलमे ग़ुरबत फ़ौत हुए। इसी लिये आपको ग़रीबुल ग़ुरबा कहते है।

वाक़िया ए शहादत के मुताअल्लिक़ मोवर्रिख़ लिखते हैं कि इमाम रज़ा (अ.स.) ने फ़रमाया था ‘‘ फ़मा यक़तलनी वल्लाह वग़ैरह ’’ ख़ुदा की क़सम मुझे मामून के सिवा कोई और क़त्ल नहीं करेगा और मैं सब्र करने पर मजबूर हूँ।(दमए साकेबा जिल्द 3 पृष्ठ 71)

अल्लामा शिब्लन्जी लिखते हैं कि हर समा बिन अईन से आपने अपनी वफ़ात की तफ़सील बताई थी और यह भी बता दिया था कि अंगूर और अनार में मुझे ज़हर दिया जायेगा।(नूरूल अबसार पृष्ठ 144)

अल्लामा मआसिर लिखते हैं कि एक रोज़ मामून ने हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) को अपने गले से लगाया और पास बिठा कर उनकी खि़दमत में बेहतरीन अंगूरों का एक तबक़ रखा और उसमें से एक खोशा उठा कर आपकी खि़दमत में पेश करते हुए कहा , इब्ने रसूल अल्लाह यह अंगूर इन्तेहाई उम्दा हैं तनावुल फ़रमाईये। आपने यह कहते हुए इन्कार फ़रमाया कि जन्नत के अंगूर इससे बेहतर हैं। इसने शदीद इसरार किया औेर आपने उसमें से तीन दाने खा लिये। यह अंगूर के दाने ज़हर आलूद थे। अंगूर खाने के बाद आप उठ खड़े हुए। मामून ने पूछा कहां जा रहे हैं आपने इरशाद फ़रमाया जहां तूने भेजा है वहां जा रहा हूँ। क़याम गाह पर पहुँचने के बाद आप तीन दिन तक तड़पते रहे। बिल आखि़र इन्तेक़ाल फ़रमा गये।(तारीख़े आइम्मा पृष्ठ 476) इन्तेक़ाल के बाद हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) बा ऐजाज़ तशरीफ़ लाए और नमाज़े जनाज़ा पढ़ाई और आप वापस चले गए। बादशाह ने बड़ी कोशिश की मगर न मिल सका।(मतालेबुल सूऊल पृष्ठ 288)

इसके बाद आपको बा मुक़ाम तूस मोहल्ला सना बाद में दफ़्न कर दिया गया जो आज कल मशहदे मोक़द्दस के नाम से मशहूर है और अतराफ़े आलम के अक़ीदत मन्दों के हवाएज का मरक़ज़ है।

शहादते इमाम रज़ा (अ.स.) के मुताअल्लिक़ अबासलत हरवी का बयान

अल्लामा अब्दुर्रहमान जामी तहरीर फ़रमाते हैं कि अबू सलत हरवी का बयान है कि हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) ने एक दिन मुझ से फ़रमाया कि हारून रशीद के पांयती की गिर्द की मिट्टी लाओ। जब मैं मिट्टी लाया तो आपने उसे सूंघ पर फेंक दिया और फ़रमाया कि अन्क़रीब मेरी क़ब्र के लिये इसी मुक़ाम की ज़मीन खोदेंगे और ऐसा पत्थर निकल आएगा कि उसे न कोई काट सकेगा और न उखाड़ सकेगा। फिर फ़रमाया कि हारून रशीद के सरहाने की मिट्टी लाओ मैं मिट्टी ले आया तो आपने उसे सूंघ कर फ़रमाया कि इसी मुक़ाम पर मेरी क़ब्र होगी। फिर फ़रमाया ऐ अबू सलत कल मुझे मामून तलब करेगा। सुनो जब मैं जाने लगूं तो तुम यह देख लेना कि मेरे सर पर कोई चादर वगै़रा है या नहीं। अगर हो तो मुझ से कलाम न करना और अगर न हो तो मुझसे बातें करना। अबू सलत कहते हैं कि सुबह के वक़्त इमाम (अ.स.) फ़राग़त के बाद मामून के पयाम का इन्तेज़ार करने लगे। इतने में मैंने देखा कि मामून रशीद का क़ासिद आ गया इमाम (अ.स.) इसके हमराह रवाना हो गये। जिस वक़्त आप जा रहे थे आपके सरे मुबारक पर अज़ा क़िस्म कोई तौलिया कोई कपड़ा था। मैंने हस्बे हुक्म आप से कोई कलाम नहीं किया और वह तशरीफ़ ले गए। इस वक़्त मामून के सामने अंगूरों का एक तबक़ रखा हुआ था। इसने मरासिमे ताजी़म अदा करने के बाद कहा , इब्ने रसूल (स.अ.) आपने इस से बेहतर अंगूर कभी नहीं देखा होगा। आपने फ़रमाया कि बेहिश्त के अंगूर इससे कहीं बेहतर हैं फिर मामून ने एक ख़ोशये अंगूर उठाते हुए कहा। लीजिए तनावुल फ़रमाइये। आपने फ़रमाया ऐ बादशाह इसे खाने को इस वक़्त मेरा जी नहीं चाहता , लेहाज़ा मुझे माफ़ करो। मैं इस वक़्त नहीं खाऊंगा। मामून ने शदीद इसरार करते हुए कहा ‘‘ मारमोहत्तम नी वारी ’’ आप क्यों नहीं तनावुल करते क्या आपको मुझ पर भरोसा नहीं है और क्या आप मुझ पर इत्तेहाम लगाते और मुझसे बदगुमानी करते हैं। यह कहते हुए मामून ने एक खा़ेशा उठाया और उसे खाना शुरू किया। फिर एक और खोशा उठाया और उसे इमाम (अ.स.) की तरफ़ बढ़ाते हुए कहा लीजिए तनावुल कीजिए। इमाम (अ.स.) ने उसके शदीद इसरार पर उसे ले लिया और उसमें से तीन दाने तनावुल फ़रमाये । इन अंगूरों को खाते ही जौहरे वजूद में इन्के़लाब पैदा हो गया। बक़िया अंगूरों को फेंकते हुए आप उठ खड़े हुए। मामून ने कहा कहां तशरीफ़ लिये जा रहे हैं ? आपने फ़रमाया कि ‘‘ बेअन्जा के फरसतादी ’’ जहां तूने भेजा है वहां जा रहा हूँ। उसके बाद आप सरे मुबारक पर चादर डाल कर रवाना हो गये।

अबु सलत हरवी कहते हैं कि इमाम (अ.स.) दरबार से रवाना हो कर दाखि़ले ख़ाना हुए और आपने मुझे हुक्म दिया कि दरवाज़ा बन्द कर दो। मैंने दरवाज़ा बन्द कर दिया। फिर आप बिस्तर पर लेट गए। आपक बिस्तर पर लेटना था कि मुझे रंजो अलम ने आ घेरा। तरह तरह के ख़्यालात पैदा होने लगे और मैं सख़्त हैरान हो कर परेशान हो गया। इमाम (अ.स.) बिस्तरे अलालत पर थे और मैं रंजो ग़म की हालत में बैठा हुआ था। नागाह मैंने घर के अन्दर एक ख़ूब सूरत नौजवान को देख कर उस से पूछा की आप कौन हैं ? और जब कि दरवाज़ा बन्द है आपको अन्दर किसने पहुँचा दिया। आपने इरशाद फ़रमाया मैं हुज्जते ख़ुदा मोहम्मद तक़ी (अ.स.) हूँ। मुझे बन्द मकान में वही लाया है जिसने चश्मे ज़दन में मदीने से यहां पहुँचाया है। मैं अपने पदरे बुज़ुर्गवार की खि़दमत के लिये हाज़िर हुआ हूँ। यह कह कर आप इमाम रज़ा (अ.स.) की खि़दमत में हाज़िर हुए। इमाम (अ.स.) ने जैसे ही आपको देखा फ़ौरन अपने सीने से लगाया। पेशानी का बोसा दिया और चुपके चुपके आप से कुछ बातें करने लगे। थोड़ी देर के बाद आपने देखा कि रूहे मुबारक मुफ़ारेक़त कर गई और इमाम (अ.स.) वफ़ात पा गए। आपके वफ़ात फ़रमाने के बाद हज़रत मोहम्मद बिन अली (अ.स.) ने ग़ुस्लो कफ़न और हुनूत का इन्तेज़ाम फ़रमाया। फिर क़ुदरती ताबूत मंगवा कर नमाज़ पढ़ने के बाद उसमे रखा। थोड़ी देर के बाद वह ताबूत आसमान की तरफ़ चला गया। अबू सलत कहते हैं कि यह देख कर मैंने अर्ज़ कि मौला अभी मामून वग़ैरा आते होंगे मैं उन्हें क्या जवाब दूंगा। आपने फ़रमाया यह ताबूत अभी वापस आ जायेगा। चुनान्चे मिस्ले साबिक़ छत शिग़ाफ़्ता हुई और ताबूत आ गया। आपने इमाम (अ.स.) को बदस्तूर बिस्तर पर लेटा दिया और मुझे हुक्म दिया कि अब दरवाज़ा खोल दो। मैंने दरवाज़ा खोल दिया तो मामून वग़ैरा दाखि़ले ख़ाना हुए और सब आहो बुका करने लगे। फिर तजहीज़ और तक़फ़ीन का अज़ सरे नौ इन्तेज़ाम हुआ और आप हारून रशीद के सरहाने दफ़्न कर दिये गए।(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 212, रौज़तुल पृष्ठ जिल्द 3 पृष्ठ 16 व अलामुल वुरा पृष्ठ 198)

अल्लामा बिन तल्हा शाफ़ेई लिखते हैं कि मामून ने हर चन्द चाहा कि इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) से मिलें मगर आपके फ़ौरी चले जाने की वजह से मुलाक़ात न हो सकी।(मतालेबुल सूऊल पृष्ठ 288)

अल्लामा नेमत उल्लाह जज़ाएरी लिखते हैं कि इमाम (अ.स.) की शहादत के बाद जो ख़बर सब से पहले उड़ी वह यह थी कि इमाम रज़ा (अ.स.) को मामून ने धोखे से शहीद कर दिये।(तज़किरतुल मासूमीन)

अल्लामा नेमत उल्लाह जज़ाएरी तहरीर फ़रमाते हैं कि मामून रशीद ने आपको अनार और अंगूर के ज़रिए ज़हर दिया था। (अनवार नेमानी पृष्ठ 27) अल्लामा तबरसी फ़रमाते हैं कि अनार के अरक़ में ज़हर मिला कर इसमें धागा तर कर लिया और उस धागे को सोज़न के ज़रिए अंगूर में गुज़ार कर उन्हें मसमूम कर दिया था।(आलामुल वुरा पृष्ठ 199)

शहादते इमाम रज़ा (अ.स.) के मौक़े पर इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) का ख़ुरासान पहुँचना

अबू मखनफ़ का बयान है कि जब हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) को ख़ुरासान में ज़हर दे दिया और आप बिस्तरे अलालत पर करवटें लेने लगे तो ख़ुदा वन्दे आलम ने इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) को वहां भेजने का बन्दो बस्त किया। चुनान्चे इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) जब कि मस्जिदे मदीना में मशग़ूले इबादत थे एक हातिफ़े ग़ैबी ने आवाज़ दी कि ‘‘ अगरमी ख़्वाही पदर खुद रा ज़िन्दा दरयाबी क़दम दर्राह न ’’ अगर अपने वालिदे बुज़ुर्ग वार से उनकी ज़िन्दगी में मिलना चाहते हो तो फ़ौरन ख़ुरासान के लिये रवाना हो जाएं यह आवाज़ सुनना था कि आप मस्जिद से बरामद हो कर दाखि़ले ख़ाना हुए और आपने अपने आइज़्ज़ा अक़रूबा को शहादते पदरे बुज़ुर्गवार से आगाह किया। घर में कोहराम बरपा हो गया। उसके बाद आप वहां से रवाना हो कर एक साअत में ख़ुरासान पहुँचे। वहां पहुँच कर देखा कि दरबान ने दरवाज़ा बन्द कर रखा है। आपने फ़रमाया कि दरवाज़ा खोल दो। मैं अपने पदरे बुज़ुर्गवार की खि़दमत में जाना चाहता हूँ। आपकी आवाज़ सुनते ही इमाम (अ.स.) ख़ुद अपने बिस्तर से उठे और दरवाज़ा खोल कर इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) को अपने गले से लगाया और बेपनाह गिरया फ़रमाया। इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) पदरे बुज़ुर्गवार की बेबसी , बेकसी और ग़ुरबत पर आंसू बहाने लगे फिर इमाम (अ.स.) तबरूकाते इमामत फ़रज़न्द के सुपुर्द कर के राहिए मुल्के बक़ा हो गए। इन्ना लिल्लाहे व इन्ना इलैहे राजेऊन। (कनज़ुल अनसाब पृष्ठ 95) अल्लामा शेख़ अब्बास क़ुम्मी बा हवाला आलामिल वुरा तहरीर फ़रमाते हैं कि हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) को ज्यों ही ख़बर मिली , ख़ुरासान तशरीफ़ ले गए और अपने वालिद बुज़ुर्गवार को दफ़्न करके एक साअ में वापस और यहां पहुँच कर लोगों को हुक्म दिया कि इमाम (अ.स.) का मातम करें।(मुन्तहल माल जिल्द 2 पृष्ठ 312)

बहस व नज़र

इससे इन्कार नहीं किया जा सकता है कि जिस तरह ख़लीफ़ा मामून ने हालात की रौशनी में अपने भाई की मातहती क़ुबूल कर ली। फिर उसे क़त्ल कर दिया और जिस तरह फ़ज़ल बिन सुहेल (जूल रियासतैन मालिक निसान व क़लम ‘‘ अल फ़ख़री ’’) को वज़ीरे जंग बनाया फिर उसे ब मुक़ाम सरख़स हमाम में क़त्ल करा दिया और जिस तरह ताहिर को वज़ीरे आज़म बनाया और उसी की वजह से इस्तक़रार खि़लाफ़त हासिल किया। फिर उसे क़त्ल करा दिया। बिल्कुल इसी तरह अपनी ज़रूरत के वक़्त हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) को खि़लाफ़त का वली अहद बनाया। इनके साथ अपनी लड़की की शादी की और काम निकलने केे बाद उन्हें अपने हाथों से शहीद कर दिया। यानी जब अलवियों का ज़ोर हुआ तो उनकी बग़ावत को रोक देने के लिये शदीद इन्कार के बवजूद इमाम रज़ा (अ.स.) को वली अहद बनाया और जब अब्बासीयों का ज़ोर बढ़ा तो उन्हें राज़ी करने के लिये इमाम रज़ा (अ.स.) को शहीद कर दिया। इसे कहते हैं सियासत जिसमें हर क़िस्म का हरबा इस्तेमाल करना जाएज़ है।

इमाम रज़ा (अ.स.) को किसने ज़हर दिया। इसके मुताअल्लिक़ अल्लामा शिब्ली नोमानी ने जो कुछ तहरीर फ़रमाया है उसका ख़ुलासा यह है कि तमाम मुवर्रेख़ीन व उलमाए अहले तशीय बिला इसतसना इस पर मुत्तफ़िक़ हैं कि इमाम रज़ा (अ.स.) को ख़ुद मामून ने ज़हर दिया है लेकिन मुवर्रेख़ीन अहले तसन्नुन में से एक मुवर्रिख़ ने मामून पर इस इल्ज़ाम के लगाने की जुर्रत नहीं की।(किताब अल मामून पृष्ठ 62)

मैं समझता हूँ कि अल्लामा शिब्ली इस मामले में या तो बिल्कुल मामून के साथ हुसने ज़न से काम ले रहे हैं या उन्हें इल्म ही न था। उन्होंने तो साफ़ साफ़ लिखा है कुतुब अहले तशीय हमारे पास नहीं हैं लेकिन यह नहीं लिखा है कि हम ने तमाम क़ुतुब अहले सुन्नत को देख लिया है।

मेरे ख़्याल से वह अपनी किताबों से भी न वाक़िफ़ थे और उनकी तंग नज़री ने उनसे मज़कूरा जुमले लिखवा दिए। मैं कहता हूँ कि बहुत से उलमा व मुवर्रेख़ीन अहले सुन्नत इस वाक़िए को अपनी किताबों में लिखा है बाज़ ने तो बड़ी तफ़सील के साथ वाक़िए शहादत और हादसए ज़हर ख़्वानी को तहरीर किया है और बहुतों ने इशारतन ‘‘ व कनायतन ’’ इस पर रौशनी डाली है। मिसाल के लिए मुलाहेजा़ हो।

1. तारीख़ रौज़तुल पृष्ठ जिल्द 16, 2. तारीख़ शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 202, 3. तारीख़े कामिल जिल्द 6 पृष्ठ 116, 4. तारीख़ मरूज अलज़हब मसूदी जिल्द 9 पृष्ठ 33, 5. तारीख़ नूरूल अबसार पृष्ठ 144, 6. तारीख़ अल फ़ख़री पृष्ठ 163, 7. मतालेबुल सूऊल पृष्ठ 288, 8. तारीख़ हबीब अल सियर जिल्द 2 जुज़ अव्वल पृष्ठ 51, 9. तारीख़े आले मोहम्मद पृष्ठ 64, 10. रवाहे अल मुस्तफ़ा पृष्ठ 174, 11. किताब इन्साब समानी , 12. ख़ुलासा तहज़ीब अल कमाल , 13. मुख़तसिर अख़बार अल खुलफ़ा , 14. तारीख़ तबरी फ़ारसी जिल्द 4 पृष्ठ 792, 15. तारीख़ इब्ने तूलून पृष्ठ 98, 16. इन्साब समानी , 17. अख़बार अल ख़ुलफ़ा , 18. तारीख़े इस्लाम ग़ुलाम रसूल महरिज 2 पृष्ठ 58........

मेरे नज़दीक मज़कूरह बाला हवाला जात की मौजूदगी में अल्लामा शिब्ली का यह कहना है कि एक सुन्नी मुवर्रिख़ ने भी मामून पर इस इल्जा़म लगाने की जुर्रत नही की। (अल मामून पृष्ठ 92)

और इब्ने ख़लदून और जस्टिस अमीर अली का यह फ़रमाना कि बाज़ लोगों का यह ख़्याल............ कि मामून ने खुद इमाम रज़ा (अ.स.) को ज़हर दे कर हलाक किया बिल्कुल लग़ो और फ़ुज़ूल है।( तारीख़े इस्लाम अमीर अली पृष्ठ 186) हद दर्जा मोहमल , लगव फ़ुज़ूल और न क़ाबिले ऐतबार है।

मैं इन मुनकिराने हक़ाएक़ से पूछता हूँ कि अगर मामून ने ख़ुद ज़हर नहीं दिया , तो क्या किसी एक तारीख़ में भी यह मौजूद है कि उसने वाक़िए क़त्ल की तहक़ीक़ात कराई ? हरगिज़ नहीं। नीज़ यह कि उसने आपकी वफ़ात को 24 घन्टे छुपाया क्यों ?(मक़ातिल अल तालबैन पृष्ठ 378 प्रकाशित नजफ़े अशरफ़)

मैं यह सच कहता हूँ कि फ़रज़न्दे रसूल की जैसी शख़्सीयत के क़त्ल की तहक़ीक़ात न करानी और सिर्फ़ रो पीट कर मगरमच्छ के आँसुओं की तरह आंसू बहा कर अरबाबे नज़र की निगाहों में उसे इल्ज़ामे क़त्ल से बरी नहीं कर सकता।

मालूम होना चाहिये कि मामून को इमाम रज़ा (अ.स.) वली अहदी और फ़ज़ल बिन सहल की वज़ारते जंग पर तक़र्रूरी के बाद इस वक़्त तक सुकून नसीब नहीं हुआ जब तक वह इन दोनो को निस्त नाबूद नहीं कर सका। बग़दादियों की बग़ावत रोकने के लिये चुंकि इन दोनों को ख़त्म करना ज़रूरी था इस लिये उसने एक ही सफ़र में दोनों का ख़ात्मा कर दिया। इसके बाद अहले बग़दाद को देखा कि अब क्या चीज़ बाक़ी है जिसकी तुम शिकायत कर सकते हो। शिबली लिखता हैं कि इन दोनों के क़त्ल होने से अहले बग़दाद की शिकायतों को फ़ैसला हो गया।(अल मामून पृष्ठ 92) यानी इन दोनो के क़त्ल से मामून की ग़रज़ पूरी हो गई। अहले बग़दाद की बग़ावत का ख़ात्मा हो गया। अब्बासी क़ब्ज़े में आ गए और हुकूमत अज़ सरे नौ जम गई।


हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की तादादे औलाद

इमाम (अ.स.) की तादादे औलाद में शदीद इख़्तेलाफ़ हैं। अल्लामा मजलिसी ने बहारूल अनवार जिल्द 12 पृष्ठ 26 में कई अक़वाल नज़र करने के बाद ब हवालाए कु़र्बल असनाद तहरीर फ़रमाया है कि आपके दो फ़रज़न्द थे। 1. इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) दूसरे मूसा । अनवारे नोमानीया पृष्ठ 127 में है कि आपकी तीन औलादें थीं। अनवार हुसैनिया जिल्द 3 पृष्ठ 52 में है कि आपकी तीन औलाद थी मगर नस्ल सिर्फ़ इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) से जारी हुई। सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 123 में है कि आपके पाँच लड़के और एक लड़की थी। नूरूल अबसार पृष्ठ 125 में है कि आपके पाँच लड़के और एक लड़की थी। जिनके नाम यह हैं। इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) , हसन ज़ाफ़र , इब्राहीम , हुसैन और आएशा। रौज़तुल शोहदा पृष्ठ 438 में है कि आपके पांच लड़के थे जिनके नाम यह हैं। इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) , हसन जाफ़र , इब्राहीम , हुसैन और अक़ब ऊअज़ बुज़ुर्गवारश मोहम्मद तक़ी अस्त। मगर आपकी नस्ल इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) से बढ़ी है। यह कुछ रहमतुल आलेमीन जिल्द 2 पृष्ठ 145 में है। जन्नातुल खुलूद पृष्ठ 32 में है कि आपके पाँच लड़के और एक लड़की थी। रौज़तुल अहबाब जमालउद्दीन में है कि आपके पाँच लड़के थे। कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 110 में है कि आपके छः औलाद थीं 5 लड़के और एक लड़की। यही मतालेबुल सूऊल में है। कनज़ुल अनसाब पृष्ठ 96 में है कि आपके आठ लड़के थे जिनके नाम यह हैं इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) हादी ‘‘ अली नक़ी ’’ हसन , याकू़ब , इब्राहीम , फ़ज़ल , जाफ़र। लेकिन इमाम अल मोहद्देसीन ताज अल मोहक़्के़कीन हज़रत अल्लामा मोहम्मद बिन मोहम्मद नोमान बग़दादी अल मतूफ़ी 413 हिजरी अल मुलक़क़ब ब शेख़ मुफ़ीद अलैह रहमाह किताब इरयाद पृष्ठ 271- 345 में और ताज अल मुफ़रेसीन , अमीन अल्लादीन हज़रत अबू अली फ़ज़ल बिन हसन बिन फ़ज़ल तबरसी अल मशहदी साहब मजमउल बयान अल मतूफ़ी 548 किताब आलामुल वुरा पृष्ठ में तहरीर फ़रमाते हैं कान अलरज़ामन अल वालिद अबनहू अबू जाफ़र मोहम्मद बिन अली अल जवाद लाग़ैर। हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के अलावा अली रज़ा (अ.स.) के कोई औलाद न थी। यही कुछ किताब उमदतुल तालिब पृष्ठ 186 में है।

अल्लाम शेख़ मुफ़ीद अलैह रहमह के मुतअल्लिक़ अल्लामा सय्यद नूर उल्लाह शुस्तरी शहीदे सालिस। किताबे मजलिस मोमेनीन के पृष्ठ 200 में तहरीर फ़रमाते हैं कि वह मुअतहिद कुदसी ज़मीर और मुतकल्लिमे बे नज़ीर थे। पृष्ठ 206 में ब हवालाए ख़ुलासतुल अक़वाल तहरीर फ़रमाते हैं कि शेख़ मौसूफ़ अवसख़ अहले ज़माना व अल महूम अपने ज़माने के सब से ज़्यादा सुक़्क़ा और सब से बड़े आलिम थे। आपकी वफ़ात पर इमाम ज़माना साहबे अस्र वज़्ज़मान (अ.स.) ने मरसिया कह कर भेजा था और इस मरसिये के चन्द शेर अलैह रहमा की क़ब्र पर कन्दा हैं।

इसी तरह अल्लामा तबरसी के मुताअल्लिक़ तहरीर फ़रमाते हैं कि आपका शुमार बहुत बड़े उलमा में था। आप तफ़सीर मजमा अल बयान के मुस्निफ़ व मुफ़स्सिर और इसकी जामियत आपकी बुलन्दी मुक़ाम की शाहिद है।

(मजलिसुल मोमेनीन पृष्ठ 212)

मजलिसी सानी अल्लामा शेख़ अब्बास कु़म्मी तहरीर फ़रमाते हैं कि ‘‘ कान लिलमरज़ामन अलवलदाअबनाह अबू जाफ़र मोहम्मद ला गै़र ’’ इमाम रज़ा (अ.स.) के मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के अलावा कोई फ़रज़न्द ना था।(सफ़ीनतुल अल बहार जिल्द 2 पृष्ठ 239)

यही कुछ अल्लामा मौसूफ़ ने अपनी किताब मुन्तही अलमाल की जिल्द 2 के पृष्ठ 312 में भी लिखा है। वह तहरीर फ़रमाते हैं कि उलमा बराए इमाम रज़ा (अ.स.) फ़रज़न्दे ग़ैर अज़ इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) ‘‘ ज़िक्र न करदा अन्द बल्कि बाज़े गुफ़्ता अन्द के औलादश मुख़सर बा आँ हज़रत बुदह ’’ उलमा ने इमाम रज़ा (अ.स.) की औलाद के बारे में इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के अलावा किसी का ज़िक्र नहीं किया। बल्कि बाज़ ने तो मोहम्मद तक़ी (अ.स.) में हसर किया है।

यही कुछ अल्लामा मोहम्मद बिन शहर आशोब ने भी तहरीर फ़रमाया है वह लिखते हैं आपके फ़रज़न्द सिर्फ़ इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) हैं।(मुनाक़िब इब्ने शहर आशोब जिल्द 3 पृष्ठ 206 प्रकाशित मुल्तान)

खुलासा यह है कि फ़हूल उलमा व शिया जैसे अल्लामा शेख़ मुफ़ीद , अल्लामा तबरसी , अल्लामा इब्ने शहर आशोब , अल्लामा शेख़ अब्बास क़ुम्मी ने तहरीर फ़रमाया है कि हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) के फ़रज़न्द हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के अलावा कोई न था और जिन उलेमा ने एक से ज़्यादा औलाद तसलीम की हैं इनमें से भी अल्लामा मोहम्मद रज़ा , अल्लामा वाएज़ कशफ़ी ने लिखा है कि इनकी नस्ल सिर्फ़ इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) से बढ़ी है बाज़ उलमा एक लड़की का वजूद भी तसलीम करते हैं जैसे अल्लामा शेख़ सद्दूख़ व अल्लामा मजलिसी लड़की का नाम ‘‘ फ़ात्मा ’’ था। उन्होंने अपने पदरे बुज़ुर्गवार से रवायत भी की है। इनके शौहर का नाम मोहम्मद बिन जाफ़र बिन क़ासिम इब्ने इस्हाक़ बिन अब्दुल्लाह बिन जाफ़र बिन अबी तालिब था। वह वालिदा थीं हसन बिन मोेहम्मद बिन जाफ़र इब्ने क़ासिम की इनके मुताअल्लिक़ नूरूल अबसार शिब्लन्जी में करामत भी मज़कूरा मरक़ूम है।(मुंतहल आमाल फ़ी तारीख़ अल नबी व अल्ल जिल्द 2 पृष्ठ 313 प्रकाशित तेहरान 1379 हिजरी) मेरे नज़दीक़ इसी को तरजीह है। वाज़े ही कि तहक़ीक़ का दरवाज़ा बन्द नहीं है। इस पर मज़ीद ग़ौर किया जा सकता है।

क़ुम की मुख़्तसर तारीख़ और जनाबे फ़ात्मा (स.अ.) मासूमा ए क़ुम के मुख़्तसर हालात

क़ुम नाम है ईरान के एक क़दीम और अज़ीम शहर का जिसकी बुनियाद बारवाएते महल ‘‘अलहादी’’ दारूल तबलीग़ इस्लामी क़ुम ईरान 2 हिजरी पड़ी थी जिसका ज़िक्र ‘‘ जिसका नाम शाहनामा फ़िरदौसी ’’ में है। एक रवाएत की बिना पर 83 में क़ायम हुई थी।

क़ुम की वजहे तसमिया

कु़म की वजह तसमिया के मुताअल्लिक़ बहुत से अक़वाल हैं। 1. इस जगह का नाम ‘‘को मैदान’’ था। फिर ‘‘कु़म’’ और बाद में क़ुम हो गया। 2. इस शहर से 20 किमी 0 पर ग़रबी जानिब एक पहाड़ है जिसका नाम ‘‘ क़मु ’’ है। इसी मुनासेबत से यह नाम पड़ा जो बाद मे क़ुम हो गया। 3. इसकी आबादी से क़ब्ल कुछ लोग इस मुक़ाम पर आ ठहरे थे और उन्होंने जंगल को काट कर और इसके गढ़ों के पाट कर अपने खे़मे नसब किये थे और मकानात बनाए थे और इस जगह का नाम ‘‘कोतह’’ रखा था। जिस से ‘‘क़ुम’’ हो गया । फिर बाद में कु़म बन गया। (अल हादी क़ुम ईरानी ज़ीक़ाद 1392 हिजरी पृष्ठ 99) 4. जब कश्तीए नूह (अ.स.) चक्कर लगाती हुई इस सर ज़मीन पर पहुँची थी तो ठहर गई थी लेहाज़ा इसके क़याम की वजह से इस जगह का नाम क़ुम क़रार पाया। 5. इस इलाक़े के बाशिन्दे , का़एमे आले मोहम्मद (अ.स.) के ज़हूर करते ही इनकी खि़दमत में हाज़िर हो जायेंगे और इनके साथ क़ाएम रहेंगे और इनकी मद्द करेंगे । इसी लिये इसका नाम क़ुम रखा गया है।(सफ़ीनतुल बेहार जिल्द 2 पृष्ठ 446)

यह मुक़ाम बहुत से क़रियों में घिरा हुआ था , उन्हीं क़रियों में से एक का नाम ‘‘कमन्दान’’ था। इसी के नाम पर इस इलाक़े का नाम जो अब ‘‘ क़ुम ’’ मशहूर है। कमन्दान रख दिया गया मुरवरे अय्याम और कसरते इस्तेमाल की वजह से ’’ क़ुम ‘‘ हो गया।(मजालिसुल मोमेनीन शहीदे सालिस पृष्ठ 36)

क़ुम और अहले क़ुम के फ़ज़ाएल

तारीख़े क़ुम से मुस्तफ़ाद होता है कि यह वह जगह है जिसने ‘‘ यौमे अलस्त ’’ सब ज़मीनों से पहले विलाएते अमीरल मोमेनीन (अ.स.) को क़ुबूल किया था। इसी लिये ख़ुदा ने जन्नत का एक दरवाज़ा इसकी तरफ़ खोल दिया ह।

अल्लामा शेख़ अब्बास क़ुम्मी तहरीर फ़रमाते हैं 1. कूफ़े को तमाम शहरों पर फ़ज़ीलत है लेकिन क़ुम और अहले कु़म को तमाम दुनियां पर फ़ज़ीलत है और इसके बाशिन्दों को मशरिक़ व मग़रिब और जिन व इन्स पर फ़जी़लत है। 2. ख़ुदा ने यहां के लोगों को दीन और ईमान में हमेशा अज़ीम तौफ़ीक़ दी है। 3. इन अलबला यामद फूअता अन क़ुम वालेही ’’ तमाम बलायें कु़म और अहले क़ुम से दूर रखी गई हैं। यहीं मलाएक दफ़ये बला के लिये हाज़िर रहते हैं। 4. किसी दुश्मन ने कभी क़ुम पर ग़लबा हासिल नहीं किया। 5. कु़म अल्लाह की तरफ़ से इल्म व फ़ज़ल का मरकज़ बनाया गया है। 6. हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) इरशाद फ़रमाते हैं कि जब सारी दुनियां में फ़ितना फैल जाए तो क़ुम में पनाह ले लेना चाहिये। 7. मासूम फ़रमाते हैं कु़म आले मोहम्मद (अ.स.) का मरकज़े सुकून और शियों का मलजा व मावा है। 9. हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) फ़रमाते हैं कि जन्नत के आठ दरवाजो में से एक दरवाज़ा क़ुम में है। क़ुम के बाशिन्दे का़बिले मुबारक बाद है। 10. हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) फ़रमाते हैं कि क़ुम हमारे शियों और दोस्तों का गढ़ है। 11. क़ुम मौज़ा ए क़दमे जिबराईल (अ.स.) है। यहां एक ऐसा चश्मा है कि जो इससे पानी पी ले शिफ़ायाब हो जाए। यही वह चश्मा है जिस से हज़रत ईसा (अ.स.) ने उस मिट्टी को गूंधा था जिससे ब हुक्मे ख़ुदा ताएर बनाया था जिसका ज़िक्र क़ुरआने मजीद में है। 12. सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) फ़रमाते हैं कि अहले क़ुम का हिसाब व किताब सब क़ब्र ही में होगा और वहीं से वह जन्नत चले जायेंगे। एक रवायत में है कि इनका हिसाब व किताब न होगा और यूंही जन्नत में चले जायेंगे। (कन्ज़ुल अन्साब पृष्ठ 9) 13. मासूम (अ.स.) फ़रमाते हैं कि ‘‘ लौलल क़मेयून लेज़ायद्दीन ’’ अगर अहले क़ुम न होते तो दीन ज़ाया हो जाता । 14. एक हदीस में है कि अहले क़ुम बख़्शे हुए हैं। 15. इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) फ़रमाते हैं कि क़ुम की मिट्टी मुक़द्दस है। ‘‘ व अहलहा मना व नजन मिनहुम ’’ इसके बाशिन्दे हम से हैं और हम उनसे हैं , जो दुश्मन क़ुम की तरफ़ आंख उठा कर देखेगा वासिले जहन्नम होगा। क़ुम हमारा और हमारे शियों का शहर है। ‘‘ मुतहरता मक़दसतह , पाक और पाकीज़ा और मुक़द्दस है। यह हमारे क़ाएम की मद्द करने वाले हैं और हमारे हक़ के पहचानने वाले हैं। 16. यह वह हैं जिन्होंने सब से पहले ख़ुम्स अदा किया और सब से पहले हमारे नाम पर जाएदादें वक़्फ़ की। 17. हज़रत सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) फ़रमाते हैं कि ‘‘ सयाती ज़मान तकून बलदता क़ुम व अहलहा हुज्जतह अला अल ख़लाएक़ व ज़ालाका फ़ी ज़मान ग़ैबता क़ाएमना अला ज़हूरहा वाला ज़ालक लसाख़्तह अर्ज़ बहालहा अलख़ ’’ अन क़रीब एक ज़माना आने वाला है कि क़ुम और इसके बाशिन्दे काएनात पर ख़ुदा की हुज्जत होंगे और यह ज़माना ग़ैबते इमाम आखि़रूज़्ज़मान (अ.स.) में आएगा और ज़हूर तक मुमतद होगा और अगर ऐसा न होगा तो ज़मीन पानी में डूब जाएगी।(सफ़ीनतुल बेहार जिल्द 2 पृष्ठ 446)

दारूल तबलीग़े इस्लामी क़ुम ईरान

मज़कूरा हदीस में जिस अहद की तरफ़ इशारा है हो सकता है उससे मुराद इसी इदारे का अहद हो जिसका इस्तेफ़ादा क़यामत तक मुम्किन है और अहले क़ुम के हुज्जत होने से मुराद आयत उल्लाह उज़मा , मरजये तक़लीद सरकार शरीअत मदार हज़रत आक़ा सैय्यद मोहम्मद काज़िम मुजतहिदे आज़म ज़ईमे हौज़ा ए इलमिया क़ुम व क़ीम एदारा मज़कूराह का वजूद ज़ी जूद हो कि वही अहदे हाज़िर नाएब इमाम होने की वजह से हुज्जत हैं।

हज़रत मासूमा ए क़ुम के मुताअल्लिक़ हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की पेशीन गोई

सादिक़े आले मोहम्मद हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) इरशाद फ़रमाते हैं कि अल्लाह की वजह से मक्का ए मोअज़्ज़मा हरम , रसूल अल्लाह (स.अ.) की वजह से मदीना हरम , अमीरल मोमेनीन (अ.स.) की वजह से कूफ़ा (नजफ़) हरम है। ‘‘ वानलना हरमन वहू बलदतन क़ुम वसतदफ़न फ़ीहा अमराता मन अवलादी तसमी फ़ात्मता अलख़ ’’ और हम दीगर अहले बैत की वजह से शहरे क़ुम हरम है और अन क़रीब इस शहर में हमारी औलाद से एक मोहतरमा दफ़्न होंगी जिनका नाम होगा ‘‘ फ़ात्मा बिन्ते इमाम मूसा काज़िम (अ.स.) ’’( सफ़ीनतुल बेहार जिल्द 2 पृष्ठ 226)

क़ुम में हज़रत मासूमा ए क़ुम की आमद

हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की पेशीन गोई के मुताबिक़ बा रवायते अल्लामा मजलिसी (र. अ.) हज़रत फ़ात्मा बिन्ते इमाम मूसा काज़िम (अ.स.) हमशीरा हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) उस ज़माने में यहां तशरीफ़ लाईं जब कि 200 हिजरी में मामून रशीद ने हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) को जबरन मर्व बुलाया था। अल्लामा शेख़ अब्बास क़ुम्मी लिखते हैं कि जब मामून रशीद ने इमाम रज़ा (अ.स.) को बजब्रो इक़राह वली अहद बनाने के लिये दारूल ख़ुलफ़ा मर्व में बुला लिया था तो इसके एक साल बाद हज़रत फ़ात्मा (अ.स.) भाई की मोहब्बत से बेचैन हो कर ब इरादा ए मर्व मदीना से निकल पड़ी थीं। चुनान्चे मराहले सफ़र तय करते हुए बा मुक़ाम ‘‘ सावा ’’ पहुँची तो अलील हो गईं। जब आपकी रसीदगी सावा और अलालत की ख़बर मूसा बिन खि़ज़रिज़ बिन साद क़ुम्मी को पहुँची तो वह फ़ौरन हाज़िरे खि़दमत हो कर अर्ज़ परदाज़ हुए कि आप क़ुम तशरीफ़ ले चलें। उन्होंने पूछा की क़ुम यहां से कितनी दूर है। मूसा ने कहा कि 10 फ़रसख़ है। वह रवानगी के लिये आमादा हो गईं चुनान्चे मूसा बिन खि़ज़रिज़ उनके नाक़े की मेहार पकड़े हुए कु़म तक लाए। यहां पहुँच कर उन्हीं के मकान में जनाबे फ़ात्मा ने क़याम फ़रमाया। भाई की जुदाई का सदमा शिद्दत पकड़ता गया और अलालत बढ़ती गई यहां तक कि सिर्फ़ 17 यौम के बाद आपने इन्तेक़ाल फ़रमाया। ‘‘ इन्ना लिल्लाहे व इन्ना इलैहे राजेऊन ’’ आपके इन्तेक़ाल के बाद से गु़स्लो कफ़न से फ़राग़त हासिल की गई और ब मुक़ाम ‘‘ बाबलान ’’ (जिस जगह रोज़ा बना हुआ है) दफ़्न करने के लिये ले जाया गया और इस सरदाब में जो पहले से आपके लिये (क़ुदरती तौर पर) बना हुआ था उतारने के लिये बाहमी गुफ़्तुगू शुरू हुई कि कौन उतारे फ़ैसला हुआ कि ‘‘ क़ादिर ’’ नामी इनका ख़ादिम जो मर्दे सालेह है वह क़ब्र में उतारे इतने में देखा गया कि रेगज़ार से दो नक़ाब पोश नमूदार हुए और उन्होंने नमाज़े जनाज़ा पढ़ाई और वही क़ब्र में उतरे फिर तदफ़ीन के फ़ौरन बाद वापस चले गए। यह न मालूम हो सका कि दोनों कौन थे। फिर मूसा बिन खि़ज़रिज़ ने क़ब्र पर बोरिया का छप्पर बना दिया इसके बाद हज़रत ज़ैनब बिन्ते हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) ने क़ुब्बा बनवाया । (मुन्थी अलमाल जिल्द 2 पृष्ठ 242) फिर मुख़्तलिफ़ अदवार शाही में इसकी तामीर व तज़ीन होती रही तफ़सील के लिये मुलाहेजा़ हो ।(माहनामा अल हादी क़ुम ईरान ज़ीक़ाद 1393 हिजरी पृष्ठ 105)

हज़रत मासूमा ए क़ुम की ज़्यारत की अहमियत

हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) फ़रमाते हैं कि जो मासूमा ए कु़म की ज़्यारत करेगा उसके लिए जन्नत वाजिब होगी। हदीस उयून के अल्फ़ाज़ यह हैं ‘‘ मन जारहा वजबत लहा अलजन्नता ’’(सफ़ीनतुल बिहार जिल्द 2 पृष्ठ 426) अल्लामा शेख़ अब्बास कु़म्मी , अल्लामा क़ाज़ी नूरूल उल्लाह शुस्तरी (शहीदे सालिस) से रवाएत करते हैं कि हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) इरशाद फ़रमाते हैं कि ‘‘ तद खि़ल ब शफ़ाअताहा शैती अ ल जन्नता ’’ मासूमा ए क़ुम की शिफ़ाअत से कसीर शिया जन्नत में जाएगें।(सफ़ीनतुल बेहार जिल्द 2 पृष्ठ 386) हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) फ़रमाते हैं कि ‘‘ मन ज़ारहा फ़लहू अल जन्नता ’’ जो मेरी हमशीरा की क़ब्र की ज़्यारत करेगा उसके लिये जन्नत है। एक रवायत में हैं कि अली बिन इब्राहीम ने अपने बाप से उन्होंने साद से उन्होंने अली बिन मूसिए रज़ा (अ.स.) से रवायत की है वह फ़रमाते हैं कि ऐ साद तुम्हारे नज़दीक़ हमारी एक क़ब्र है। रावी ने अर्ज़ की मासूमा ए क़ुम की , फ़रमाया हां ऐ साद ‘‘ मन ज़ारहा अरफ़ाबहक़हा फ़लहू अल जन्नता ’’ जो इनकी ज़्यारत इनके हक़ को पहचान के करेगा इसके लिये जन्नत है यानी वह जन्नत में जायेगा।(सफ़ीनतुल बेहार जिल्द 2 पृष्ठ 376 प्रकाशित ईरान)

- - - - - - - तमाम - - - - - - -

[[अलहम्दो लिल्लाह ये किताबः अबुल हसन हज़रत इमाम अली रज़ा (अ.स.) जो कि किताबः चौदह सितारे एक हिस्सा है , पूरी टाईप हो गई खुदा वंदे आलम से दुआगौ हुं कि हमारे इस अमल को कुबुल फरमाऐ और इमाम हुसैन फाउनडेशन को तरक्की इनायत फरमाए कि जिन्होने इस किताब को अपनी साइट (अलहसनैन इस्लामी नेटवर्क) के लिऐ टाइप कराया। ]]

30 -07 -2016


Contents

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की विलादत ब सआदत 5

नाम , कुन्नियत , अल्क़ाब 6

लक़ब रज़ा की वजह 7

आपकी तरबियत 8

बादशाहाने वक़्त 8

जानशीनी 9

इमाम मूसाए काज़िम (अ.स.) की वफ़ात और इमाम रज़ा (अ.स.) के दौरे इमामत का आग़ाज़ 10

हारूनी फ़ौज और ख़ाना ए इमाम रज़ा (अ.स.) 10

इमाम अली रज़ा (अ.स.) का हज और हारून रशीद अब्बासी 17

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) का मुजद्दिदे मज़हबे इमामिया होना 19

हज़रत इमामे अली रज़ा (अ.स.) के अख़्लाक़ व आदात और शमाएल व ख़साएल 20

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) के बाज़ करामात 25

हज़रत रसूले खु़दा (स.अ.) और जनाबे अली रज़ा (अ.स.) वाक़ए तमर सीहानी 30

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) का इल्मी कमाल 32

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) और हुरूफ़े तहज्जी 35

इमाम रज़ा (अ.स.) और वक़्ते निकाह 38

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) के बाज़ मरवीयात व इरशादात 38

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) और मजलिसे शोहदाऐ करबला 41

ख़लीफ़ा मामून रशीद अब्बासी और हज़रत इमाम अली रज़ा (अ.स.) 43

मामून रशीद की मजलिसे मुशाविरत 47

मामून की तलबी से क़ब्ल इमाम (अ.स.) की रौज़ा ए रसूल पर फ़रयाद 50

इमाम रज़ा (अ.स.) की मदीने से मर्व में तलबी 52

इमाम रज़ा (अ.स.) की मदीने से रवानगी 53

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) का नेशा पूर में वरूदे मसऊद 58

शहर ख़ुरासान में नुज़ूले इजलाल 62

शहर तूस में आप का नुज़ूलो वरूद 62

क़रिया सना बाद में हज़रत का नुज़ूले करम 63

इमाम रज़ा (अ.स.) का दारूल खि़लाफ़ा मर्व में नुज़ूल 63

जलसा ए वली अहदी का इन्एक़ाद 66

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की वली अहदी का दुशमनों पर असर 68

वाक़िए हिजाब 70

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) और नमाज़े ईद 71

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की मदह सराई और देबले खि़ज़ाई और अबू नवास 73

मज़ाहिबे आलम के उलेमा से हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) के इल्मी मुनाज़िरे 77

आलिमे नसारा से मुनाज़िरा 78

आलिमे यहूद से मनाज़ेरा 80

आलिमे मजूस से मनाज़ेरा 84

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) और इस्मते अम्बिया (अ.स.) 85

आपकी तसानीफ़ 88

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) और शेरे क़ालीन 89

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) के साथ उम्मे हबीबा बिन्ते मामून की शादी और मामून का सफ़रे ईराक़ 91

मामून रशीद अब्बासी और हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की शहादत 94

तारीख़े शहादत 96

शहादते इमाम रज़ा (अ.स.) के मुताअल्लिक़ अबासलत हरवी का बयान 98

शहादते इमाम रज़ा (अ.स.) के मौक़े पर इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) का ख़ुरासान पहुँचना 102

हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की तादादे औलाद 107

क़ुम की मुख़्तसर तारीख़ और जनाबे फ़ात्मा (स.अ.) मासूमा ए क़ुम के मुख़्तसर हालात 111

क़ुम की वजहे तसमिया 111

क़ुम और अहले क़ुम के फ़ज़ाएल 112

हज़रत मासूमा ए क़ुम के मुताअल्लिक़ हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) की पेशीन गोई 115

क़ुम में हज़रत मासूमा ए क़ुम की आमद 115

हज़रत मासूमा ए क़ुम की ज़्यारत की अहमियत 117